Sanmati Library, Jaipur

Labdhisaar

Aacharya, Nemichandrasiddhant Chakravarti · 2009/10

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Front matter

Printed by Ramchandra Yesu Shodgo, at tho Nirnaya-Sagar Press,
23, Kolbhat Lane, Bombay.
Published by Sha Rerashankar Jagnjeovan Javeri, Lion, Vyavasthrpal:
Shree Paramasbruta-Prabhavnk Mandal, Javeri Bazar,
Kharakuva, No. 2. BOMBAY,

ओं नमः प्रस्तावना। प्रिय पाठकगण! आज मैं श्रीमहावीर प्रभुकी कृपासे आपके सामने यह क्षपणासार- गर्मित लब्धिसार ग्रंथ संस्कृत छाया तथा संक्षिप्त हिंदीभापाटीका सहित उपस्थित करता हूं; जो कि गोमटसारका परिशिष्ट भाग है । गोमटसारके दोनों भागोंमें जीव और कर्म- का स्वरूप विस्तारसे दिखलाया गया है । तथा इस उक्त ग्रंथमें कांसे छूटनेका उपाय विस्तार सहित दिखलाया है । सव कर्मों में मोहनीयकर्म वलवान है, उसमें भी दर्शनमोहनीय जिसका दूसरा नाम मिथ्यात्वकर्म है सबसे अधिक वलवान है । इसी कर्मके मौजूद रहनेसे जीव संसारमें भटकता हुआ दुःख भोगरहा है। यदि यह दर्शनमोहनीयकर्म छूट जावे तो जीव सभी कमांसे मुक्त होकर अनन्तसुखमय अपनी स्वाभाविक अवस्थाकोप्राप्त होसकता है । इसीकारण इस लब्धिसार ग्रंथमें पहले मिथ्यात्वकर्म छुड़ानेकेलिये पांच लब्धियोंका वर्णन है। पांचोमें भी मुख्यतासे करणलब्धिका स्वरूप अच्छीतरह दिखलाया गया है। इसीसे मिथ्यात्र कर्म छूटकर सम्यक्त्वगुणकी प्राप्ति होती है। यही गुण मोक्षका मूलकारण है । उसके बाद चारित्रकी प्राप्तिका उपाय बतलाया है । चारित्रके कथनमें चारित्रमोहनीयक- मैके उपशम व क्षय (नाश) होनेका क्रम दिखलाया है। उसके बाद वाकी काँक क्षय होनेकी विधि वतलाई गयी है । कोका क्षय होनेपर मोक्षको प्राप्त जीवके मोक्षस्थानका खरूप दिखलाके ग्रंथ समाप्त किया गया है। यह ग्रंथ श्रीचामुंडराय राजाके प्रश्नके निमित्तसे श्रीनेमिचंद्रसिद्धांतचक्रवर्तीने बनाया है जोकि कपायप्राभृत नामा जयधवलसिद्धांतके पंद्रह अधिकारोंमसे पश्चिमस्कंध नामके पंद्रहवें अधिकारके अभिप्रायसे गर्भित है । इसकी संस्कृतटीका उपशम चारित्रके अधिका- रतक केशववर्णीकृत मिलती है आगेके क्षपणाधिकारकी नहीं। इसकी भापाटीका श्रीमान् विद्वच्छिरोमणि टोडरमल्लजीने बनाई है, वह बहुत विस्ता- रसे हैं। उसमें उन्होंने लिखा है कि उपशमचारित्रतक तो संस्कृतटीकाके अनुसार व्या- ख्यान किया गया है। किंतु कर्मोंके क्षपणा अधिकारके गाथाओंका व्याख्यान श्रीमाधवचंद्र आचार्यकृत संस्कृतगद्य रूप क्षपणासारके अनुसार अभिप्राय शामिल कर किया गया इसीसे इस ग्रंथका नाम लब्धिसार क्षपणासार प्रसिद्ध है। other २ इस ग्रंथके कर्ता श्रीनेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्तीका जीवन-चरित्र जीवकांड भापाटीका- की भूमिकामें विस्तारसे लिखा गया है इससे यहां लिखनेकी विशेप आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसके भाषाटीकाकारके विपयमें कुछ लिखना है जोकि वे स्वयं लिखगये हैं। इस ग्रंथकी भापाटीका रचनेवाले श्रीमद्विद्वद्वर्य टोडरमल्लजी हैं। इनकी जन्मभूमि ढूंढार देशमें जयपुरनगर है। उन्होंने लिखा है "रायमल्लनामके साधर्मी भाईकी प्रेरणासे संवत् १८१८ माघसुदि पंचमीके दिन सम्यग्ज्ञानचंद्रिका नामकी भापाटीका वनाके पूर्ण की" । इससे उनका जन्म संवत् भी लगभग अठारह सौके है। इसकी भापाटीकाका बहुतविस्तार होनेसे सबका मुद्रित करना दुस्साध्य समझकर श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडलके ऑनरेरी सेक्रेटरी श्रीमान् शा० रेवाशंकर जगजीवन जहेरीकी प्रेरणासे मैंने संस्कृतछाया तथा संक्षिप्त हिंदी भापाटीका तयार की है । यद्यपि इस भाषा- नुवादमें सब विषयोंका खुलासा नहीं आया है तो भी मैं समझता हूं कि मूलार्य कहीं नहीं छोड़ा गया है । सव विपयोंका खुलासा इसकी बड़ी भापाटीकामें ही होसकता है। इस समयके अनुकूल गाथा सूची और विषयसूची भी लगादी गई हैं इसलिये पाठकोंको वांचनेमें सुगमता होसकती है। यह भाषाटीका वड़ी टीकामें प्रवेश होनेकेलिये सहायकरूप अवश्य होगी यह मैं आशा करता हूं । तथा तत्त्वज्ञानी स्वर्गीय श्रीमान् रायचंद्रजी द्वारा स्थापित श्रीपरमश्रुतप्रभाव- कमंडलकी तरफसे इस ग्रंथका जो उद्धार हुआ है इसलिये उक्तमंडलके सेक्रेटरी तथा अन्य सभ्योंको कोटिशः धन्यवाद देता हूं कि जिन्होंने उत्साहित होकर इस महान ग्रंथका प्रकाशन कराके भव्यजीवोंका महान् उपकार किया है। द्वितीय धन्यवाद श्रीमान् स्याद्वाद- वारिधि गुरुवर पं० गोपालदासजी वरैयाको दिया जाता है कि जिन्होंके ज्ञानदानकी सहायता पाकर उनके चरणकमलोंकी कृपासे अपनी बुद्धिके अनुसार यह संक्षिप्त भापाटीका निर्विघ्न समाप्त कीगई है। इस ग्रंथकी तथा गोमटसार ग्रंथकी विशेष संज्ञाओंके तथा गणितके जाननेके लिये इसी मंडलकी तरफसे इन्हीं नेमिचंद्राचार्यका त्रिलोकसार ग्रंथ भी संस्कृतटीका तथा भाषाटीकासहित शीघ्र ही प्रकाशित किया जायगा । अब अंतमें पाठकोंसे मेरी यह प्रार्थना है कि जो प्रमादसे, दृष्टिदोपसे तथा बुद्धिकी मंदतासे कहोंपर अशुद्धियां रहगई हों तो पाठकगण मेरे ऊपर क्षमा करके शुद्ध करते हुए पढ़ें । क्योंकि ऐसे कठिनविपयमें अशुद्धियोंका रहजाना संभव है । इसतरह धन्यवाद पूर्वक प्रार्थना करता हुआ इस प्रस्तावनाको समाप्त करता हूं। कृतं पल्लवितेन विज्ञेयु । जैनग्रन्थ उद्धारककार्यालय खत्तरगली हौदावाड़ी जैनसमाजका सेवक. पोष्ट गिरगांव--बंबई. मनोहरलाल आसौज सुदि १५ वी० सं० २४४२. पाढम ( मैंनपुरी) निवासी लब्धिसारके गाथाओंकी अकारादि-क्रमसे सूची। गाथा. पृ. गा. गाथा. पृ. गा. ... अकसाय कसायाण अवगयवेदो संतो ५/१२) १३४/४९२ 1६०४ १६८१६३२ ... ६।१५ अपुव्वादिवग्गणाणं आ ... अट्ट अपुण्णपदेसुवि अथिरसुभगजस अरदी ... अजहण्णमणुकस्स यजहण्ण ठिदीतियं अहवावलिगद वरंठिदि अमुहाणं पयडीणं अणियट्टियसंखगुणे ... ... ... ... ... ... ... ... अणियही अद्धाए ... ... ... ... २१५ ४|११ १३१४० १३१४२ २३१७८ ११०1३९३ ११२।४०३ १३११४७९ १३१/४८० १३११४८१ १४१३५२२ १६२।६०७ ... ... . ... ... ... ... ... इ १२११४४० १०१३० १०३२/आदिमलदिभवो जो २०६५/ आऊ पडि णिरयदुगे २४१८० आदिमकरणद्धाए २८।९५ आदिम पडिसमय ३३।११३ आउगवन्नाणं टिदि ३३१११५/आदिम पढम ३४१११८ आउगव ठिदि..: ३४१११९ आदोलस्स य पढमे ३७११३०/आदोलस्स य चरिमे ३०११३२ आदोलस्स रसखंढे ३८११३३ आयादोवयमहियं ३९।१३५ आवरणदुगाण खये ૩૬૧૨૬ ४२११४८ इदि संढ संकामिय ५१११७८ ५२।१८२ उदये चटदसवादी ५२।१८३ उदइल्लाणं उदये ५४।१९० उकस्सद्विदिवंधो ६३१२२१ उकस्सद्विदि वंधिय ६४१२२४ उकस्सहिदिवन्धे ७०१२४५ उदरिय तदो विदीया ७०१२४७ उदयाणमावलिम्हि य ८०/२८५ उकहिद इगिभागे ८११२८७ उदयावलिस्स दव्वं ८६३०७ उकहिदम्हि देदि हु १००३६२ उवसामगो य सम्वो १०४॥३७६ उवसमसम्मत्तद्धा ११३६४०६ उवसमसम्मत्तुवरिं ११३१४०८ उकहिद इगभागं ... . ९/१८ अणियी संखेजा अणियट्टिकरणपढमे अमणं ठिदि सत्तादो अडवस्सादो उवरिं अडवस्से उवरिमिवि अडवस्से संपहियं अडवस्से गुणसेटी अडवस्से य ठिदीदो अणुसमओवट्टणयं अवरा मिच्छतियता अवर वर देसलद्धी अवरे देसाणे अवरे विरदठाणे असुहाणं रसखण्ड अणियहिस्स य पढमे ... अणुभयगाणंतरज अणुपुव्वीसंकमणं अवरे वहुगं देदि हु अवरादो चरिमोत्तिय अद्धा खए पडतो अवरादों वरमहियं अवरा जेहावाहा असुहाणं पयडीणं अणियहिस्स य पढमे ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ९/२९ १८१५८ १८५९ ૨૦૧૬ २०१६५ २०६८ २११६९ २१७१ ૨૨I २९.९९ २९.१०० ३०1१०३ ३०११०४ ... ... ... ... ...

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। पू. गा. गाथा. पृ.गा. ... ... ... ... ... ६६२३० ७१।२४९ ७३।२५५ ९३।३३५ ११२१४०१ ११३१४०५ ११५६४१४ ११६३४१७ 1५८९ ... ... ... ... ३४।११६ एवं पाला जादा ४१।१४२/एय णउंसयवेदं ४१।१४३ एवं संखेन्जेमु ४३३१४९/एवं पाछासंखं ५९।२०३/एकं च ठिदिविसेसं ६४१२२२/ एकाटिदिखंडय ६९।२४१ एइंदियटिदीदो ७०१२४४ एवं पल्ला जादा ७९।२८१/एदेणप्पा बहुग ८४१३०० एत्तो मुहुमंतोत्ति य ८४१३०२/एत्तो पदर कवाडं ८५।३०५/एकेकस्स टिभण ८६।३०९/एतो करेदि किहि ९४३३९ एत्थापुण्य विहाणं ९७१३४८ १०३।३७१ ... ... गाथा. उवहिसहस्सं तु सयं उक्कटिद वहुभागे उदयादि गलिदसेसा उदयवहिं उकाव्यि उवसमचरियाहिमुहो उदयावलिस्स वाहिं उवरिसमं उकीरइ उदयिल्लाणंतरज उकहिद पल्यासंखे उवसंतपढमसमये उदयादि अवट्टिदगा उवसंते पडिवडिदे उदयाणं उदयादो उवसामणा णिवत्ती उवसमसेढीदो पुण उवसंतद्धा दुगुणा उब्वट्टणा जहण्णा उकदि जे अंसे उदधिसहस्सपुधत्तं उदधि अभंतरदो उकीरिद्रं तु दव्वं उक्कट्टिदं तु देदि अ उक्कटिददव्वस्स य उवरिं उदयहाणा उदयगद संगहस्सय उक्कहिद इगिभागं उक्किण्णे अवसाणे उकदि पडिसमयं उक्कदि तंगुण १६६६२३ १६७६२६ १६८१६३१ १६९/६३५ ... ओ ... ... ... १११।३९ ओदरसुहुमादीए ... ... ८७१३१० ८७.३१३ ८८१३१४ ८८३१५ ८८।३१६ ८८१३१७ ८९/३१० ८९.३१९ ८९/३२० ९५४३४१ ... ... ... ... ओदर चादर पढमे ११११४०० ओदरमायापढमे ११४॥४११ ओदर मायालोभे ११६४१८ ओदरगमाणपढमे ११९३४३२ ओदरग चउमासा १२८१४६७ ओदरग कोहपढमे १३४१४९० ओदरग संजलणा १३९/५१४ ओदरग. पुरिसपढमे १४२१५२४ ओदरसुहमादीदो 1५८० 1५९३ १६८१६२९ अंतोकोडाकोडी १६९।६३३ / अंतोकोडा ठिदं अंतोमुहुत्तकाला ८।२५ अंतरकडपढमादो १७५७ अंतरपढम पत्ते २३१७६/अंतिमरसखंडुकी २३१७९/अंतोकोडाकोडी २५।८५ अंतोमुहुत्तमद्धं ५४।१८९ अंतोमुहुत्तकालं ६२।२१७ अंतोमुहुत्तकाले ६५।२२८ अंतिमरस चरिम ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... एदेहि विहीणाणं एतो समऊणावलि एवं विह संकमणं एकेकधिदिखंडय एयटिदि खंडक्की. एत्तो उवरिं विरदे एवं पमत्तमियर एइंदियट्टिदीदो..... ८॥२४ १११३४ २५1८७ २६१८९ २७९३ २८1९७ ३०११०२ ३४.११७ ४८।१६७ ५०११७६ ... ... ... " ... ... ... ...

लब्धिसारः। गाथा. गाथा. • पृ.' गा. ... ... ... ... १३९॥५१३ १४३१५२७ १४४३५३२ १४४१५३३ १४४३५३४ 1५३८ 1५४० १५४१ 1५४३ १५५२ ... ... ... . ... अंतोमुहुत्तमेत्तं... अंतोकोडाकोडी अंतरपढमे अण्णों अंतर हेदुकीरिद अंतरपढमादु कमे अंतर पडिसमय अंतरकदादु छण्णो अंतोमुहुत्त घादि अंतोमुहुत्त उवसंत अंतो बंधादो पुण अंतरकदपढमादो अंतरपढमठिदित्तिय अंतर विहीणकम अंतर दुघादोत्ति अंतर दिस्सदि हु अंतोमुहुत्तमाऊ ... पृ. गा. ६०२०८ कोहस्स पढमसंगह ६५।२२५ कोहस्स पटमकिहि ६९।२४२ कोहादिकिहिवेदग ६९।२४३ कोहस्स य जे पढमे ७१।२४८ कोहादिकिटियादि ७१।२५० कोहस्स पढमसंगह ७४।२६२ कोहस्स विदियकिष्टी ८३२२९७ कोहस्स विदियसंगह ८४१३०१ कोहस्स पढमकिट्टी ११२।४०४ कोहपटम व माणो १२५।४५७ कोहस्स कोहे... 1५८२ किट्टी वेदगपढमे 1५८३ कोहस्स य पढमादो 1५८५ हयगुण चरिमटिदी १५८६ कोहस्स य पटमठिदी १६४।६१६ किट्ठीकरणे चरिमे किट्टिाजोगी झाणं ... ... १५७१ १५७३ 1५८४ 1६०० १६९/६३६ १७०१६३९ क स २६४ ४२११४७/खय उवसमियविसोही ५।१४ ५८।२०२ १६२।६०६ ग ... ... ... ... .कम्ममलपडलसत्ती करणपढमादु जावय कदकरण सम्म खवण कोहदुगं संजलणग कोहस्स पढमठिदी किट्टीकरणद्धाए किट्टीयद्धाचरिमे किटिं सुहुमादीदो कमकरण विणादो करणे अधापवत्ते किट्टीकरणद्धहिया कोहोवसामणद्धा कोहं च छुहदि माणे कोहादीणमपुव्वं कोह दु सेसेणवाहिद कोहादीणं सगसग किटीयो इगिफट्टय कोहस्स य माणस्स य ... किटीकरणद्धाए किट्ठीवेदगपढमे खुजद्धं णाराए ४४/१५४ ७६।२६७/खवगबहुमस्स चरिमे ७६।२६८ खीणे घादिचउक्के ८११२८९ ८१।२९० गुणसेढी गुणसंकम ८३।२९६ गुणसेढी अपुन्च ९३३३३३ गुणसेडीदीहत्तम ९५६३४३ गुणसेढीए सीसं १०११३६६ गुणसेढि संखभागा १०२१३७० गुणसेढी सत्थेदर १२०१४३६ गुणसेढी पडिसमय १२८१४६८ गुणसेटी विदिय १२९।४७१ गुणसेढी दीहत्त १३३१४८९ गुणसेढि असंखेजा १३४१४९१ गुणसेढि अणंतगुणे १३५।४९४ गणणादेयपदेसग १३७१५०३ गुणसेढि अंतरहिदि ... ... ... ... ... ... १२॥३७ १६५३ १७५५ २५.८६ ४०११३९ ८७७३११ १०९।१९० ११०१३९४ ११०१३९५ १२११४३९ १२४/४५१ १२७१४६४ 1५७९ 1५८१ ... ... ... १३९४५११) गुणिय चउरादि खंडे ४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा. घ. गा. घ ... ... धादिति सादं मिच्छ घादितियाणं णियमा घादितियाणं संखं धादयदव्वादो पुण घादितियाण बंधो घादितियाणं वास घादितियाणं सत्तं घादीण मुहुत्तेतं ... ... च ३५.१२३ ३६।१२७ ३९.१३७ ४३११५० ४३१५१ ६११२१२ ७२१२५२ ९३.३३४ ९६३४६ ९८१३५१ ९८१३५२ १९.३५७ १२९/४७० 1५४४ १६३१६१० १६३१६११ १६५१६१९ १६६४६२२ १७०1६४० १७५४६४९ ... ... ... पृ. गा. गाथा. जत्य असंखेजाणं १२० जदि होदि गुणिदकम्मो ९०१३२५/जदि गोउच्छविसेसं १३७१५०५जदि संकिलेसजुत्तो १४२१५२३ जदि वि असंखेनाणं १४५।५३६ जावंतरस्स दुचरिम 1५४८ जत्तोपाये होदि हु 1५४९ जत्तोपाये असंखव 1५९७ /जदि भरदि सासणो सो जस्मुदयेणारुढो जस्मुद पढम. १/२ जस्मुदएण य चडिदो १४|४७ जे हीणा अवहारे १८१६० जस्स कसायस्स ४१११४४ जणोकसायविग्ध ४२११४५ जणोकसाय मुह ५१1१७९ जोगिस्स सेसकालो ९६३४४ जगपूरणम्हि एका १०२।३६७ योगिस्स सेसकालं १०२।३६९ १०४/३७७ जस्स य पायपसाए १०५।३७८ ठिदिवंधोसरणं पुण १०५।३७९ ठिदिसंडाणुकीरण १०६.३८१ १०६।३८२ ठिदिरसधादो णस्त्यि हु १०६३८३ ठिदिसत्तमपुव्वदुगे ठिदिखंडयं तु खइये १०७७३८६ १०७१३८८ ठिदिवंधसहस्सगदे 1५९९ ठिदिवंधपुधत्तगदे १६२१६०५ टिदिवंध मणदाणा १६६४६२१ ठिदिवंधाणोसरणं ठिदिखंडयं तु चरिमं ठिदिवंध संखेवा ... ठिदिवंध पत्तेयं ... ... ... बदुगदिमिच्छो सण्णी चरिम सम्वे खंडा चरिम णिसेउकडे चरिमं फालिं देदि हु चरिमं फालिं दिण्णे चरिमावाहा तत्तो चडणोदरकालादो चडवादरलोहस्सय चडमाया वेदद्धा चडमाणस्सय णामा चलतदिय अवरवंध चडमायमाणकोहो चडपडणमोहपढम चडपडणमोह चरिमं चडणे णामदुगाणं चडपड अपुव्वपढमो चडमाण अपुवस्स य चरिमे खंडे पडिदे चरिमे पढम विग्धं चउसमएसु रसस्स ... 4 १६१५४ ३९४१३४ ५०११७३ ६०१२०६ ६३१२२० ६५।२२६ ६५।२२७ ६८१२३७ ७२।२५४ १०७७३८५ ११५४१२ ११५.४१३ ११८१४२६ ११८४२७ ११८४२८ ११९४३० १२११४३७ ... ... छद्दन्वणवपयत्यो छकम्मे संछुद्धे ३१६ १३३।४८७ ठिदिवंध अहक ज जेहवरहिदिवंधे जम्हा हेद्विसभावा जम्हा उवरिमभावा ठिदिवंध सोलस ३० ठिदिवंध मण ... ११३३५ ठिदिखंडसहस्सगदे १६.५१/ठिदिवंध संदो... ... .

लब्धिसारः। गाथा. पृ. गा. गाथा. पृ. गा. ठिदिवंध संखेज ठिदिखंडपुधत्तगदे ठिदिसतं घादीण ठिदिसत्तमघादीण ठिदिखंडमसंखेने ... ... ण ... ... तेण परं हायदि वा ... ... ... ४१।१४१ ५६१८४ ५५४१९१ ५५।१९३ ५६१९४ ५६६१९५ ५९/२०४ ६२०२१६ ६३१२१८ ६६२३२ ૬૨૨ ६७२२४ ६७२३५ ६२३६ ६८।२३९ ७४।२६० ८५.३०४ ९२१३३३ ९४१३३८ णरतिरियाणं ओघो णिक्खेवमदित्थावण णिहवगो तहाणे. जरुतिरिये तिरियणरे णामदुगे वेणिय णवरि य पुवेदस्स य णवरि असंखाणंतिम णामधुवोदय वारस णवार य णामदुगाणं परयतिरिक्खणराउग णव फट्ट्याण करणं णासेदि परहाणिय णामदुगे वेयणिये णव णोकसाय विग्घ च ... पाहा य रायदोसा णवार समुग्धादगदे ... १२३६४४७ तत्य असंखवगुणं १२३१४४८ तत्य य पडिवायगया १२५१४५५ तत्य य पडिवादगया १३३१४८६ तत्तो पडिवज्जगया १६६१६२० तत्तोणुभयहाणे तत्तो य सुहुमसंजम ६।१६ तत्तो तियरणविहिणा १७५६ ३२।१११ विकरणवंधोसरणं ५३११८५ वेत्तियमेते वंधे ७३२२५८ तेत्तिय वेयणीय ७४।२५९ तेत्तिय तीसिय ८०१२८६ तकाले वेयणियं ८५।३०३ तीदे बंधसहस्से ९०३२३ तो देसघादिकरणा. ९६१३४७ तच्चरिमे पुर्वधो १३०१४७५ देसि रसवेदमव १४१३५२१ /तकाले मोहणियं १५९४ तत्तो अणियहिस्स य १६२१६०८ तस्सम्मत्तदाए १६३१६१२ ताहे चरिमसवेदो १६४१६१५ तग्गुणसेढी अहिया तम्मायावेदद्धा ४११०वीसिय चउण्ह पढमो ५।१३/तप्पढमद्विदिसंत ६।१७ / तिकरणमुभयोसरणं ६।१८ तकाले ठिदिसंत ७१९ तेत्तियमेत्ते वंधे ७१२२ तेत्तिय वेय टा२३ तेत्तिय वीति. ११.३३ तकाले इदि १३।४१/तीदे पल्लासंखे... १३१४३/तस्साणपुब्बिसंकम १९।६२ ताहे संखसहस्स १९४६४/ताहे मोहो योवो ... २७९४ ताहे असंखगुणियं २९९८/ताहे संजलणाण ४०११३० ताहे देसावर ... ... . ic ... ... ... ... ... ... तत्तो उदय सदस्स य ... तिरियदुगुनोवो विय ते चेव चौदसपदा ते तेरस विदिएण य ते चेवेकारपदा तं सुरचउक्कहीणं तं णरदुगुन्चहीणं ... तत्तो अभवजोग तरिमे ठिदिवंधो ताए अधापवत्त तत्तोदित्यावणगं तक्कालवन्नमाणे तत्तो पढमो अहिओ तहाणे ठिदिसतो तत्तकाले दिसं ल.सा.प्र.२ १०.३६० १०११३६५ १०२१३९८ १०६१३८४ १०७४३८७ १०८।३८९ ११५१४१५ ११६१४२० ११७१४२१ ११७७४२२ ११४१४२३ ११८१४२५ १२०१४३४ १२२१४४२ १२२॥४४३ १२२१४४४ १२६१४६० १२७१४६३ ... ... ... ... . ...

६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा. पृ. गा. गाथा. पृ. गा. १४.४४ ... ... ... ... १४१४५ १४।४६ .१५/४८ १५.४९ १५.५० ... ... ताहे दव्ववहारो ताहे अपुव्वफड्डय ताहे कोहुच्छि8 ताहे संजलणाणं वंधो ताहे अडमास तदियस्स माणचरिमे तदियगमायाचरिमे तत्तो सुहुमं गच्छदि ताणं पुण ठिदिसतं तिण्हं घादीणं ठिदि तत्थ गुणसेढि करणं तिहुवण सिहरेण मही ... ... ... थ ... ... ... ... थीयद्धा संखेनदि थी उवसमिदाणंतर थी अणुवसमे पढमे थी उदयस्स य एवं थी अद्धा संखेज थी पढमहिदिमेत्ता ... ... ... द १२९।४७२ पडिसमयग परिणामा १३०१४७३ पडिखंडगपरिणामा १३८।५०९ पढमे चरिमे समये १४४१५३५ पढमे करणे अवरा 1५४७ पढमे करणे पढमा । 1५५४ पढम व विदियकरणं 1५५७ पडिसमयं उक्कदि 1५७५ पडिसमयमसंखगुणं 1५७७ पढम अवरवरहिदि १५९५ पढमापुव्वरसादो १७११६४१ पढमद्विदियावलिपडि १७२।६४५ पढमादो गुणसंकम पढमापुठवजहण्णं ७३।२५६ पुत्वं तियरणविहिणा ७३१२५७ पल्लस्स संखभागो ९०३२४ पल्लडिदिदो उवरि ९९/३५८ पल्लस्स तस्स माणं १२११४४१ पलिदोवमसंतादो १६०३ पलिदो पढमो... पढमद्विदिखंडकी २१/पल्लस्स चरिम... १०३१ पढमे अवरो पल्लो ३२।११०/पडिवाददुगवर वर ४२११४६ पडिवादगया मिच्छे ४५।१५८ पडचरिमे गहणादी ४६।१६२ पडिवादादी तिदयं ४७११६४ पडिवज्जजहण्णदुर्ग ४८११६६ परिहारस्स जहणं ... ४९।१७२ पढमे छठे चरिमे ... ५०।१७४ पल्लस्स संखगुणूणं ... ५९।२०५/पुणरवि मदिपरिभोगे ९७१३५० पुरिसस्स य पढमठिदी १४३१५२९ पुरिसस्स उत्तणवर्क 1५६६ पढमावेदे संजल ।५६८ पढमावेदो तिविह पढमहिदिसीसादो ... ९।२७ पढमहिदि अद्धते .... १२।३९ पडिसमयमसंखगुणा ... ... २२/७५ २३१७७ ૧૪૧૮૨ २६३८८ २७९१ २८१९६ ३२।११२ ३३।११४ ३५।१२० ३५।१२१ ४६।१५९ ४६०१६० ५१११७७ ५१११८० ५२११८१ ५३।१८६ ५५/१९२ ५७।१९६ ५७.१९७ ५७.१९९ ५८१२०० ६४२२३ ६६२२९ ६८।२३८ ७४।२६१ ७५।२६३ ७॥॥२६४ ७५/२६५ ... ... ... ... ... ... ... देवतसवण्ण अगुरु दुति आउ तित्थ हार दसणमोहक्खवणा देवेसु देवमणुए दूरावकिट्टिपढम दसणमोहूणाणं दसणमोहे खविदे दुविहा चरित्तलद्धी दव्वं असंखगुणिय देसो समये समये दसणमोहुवसमणं दोण्हं तिण्ह चउण्हं दिनदि अणंतभागे दव्वं पढमे समये दवगपढमे सेसे ... ... ... ... ... .... ... ... ... ... ... ... ... ... ... पढमे सन्वे बिदिये ... ७६१२७० ७९।२७९ पलस्स संखभागं ७९/२८२ लब्धिसारः। पृ. गा. ... १५६९ ... ... ... ... १६४१६१४ १६८१६२८ १७०१६३७ १७३६६४६ ... ... व ... ... ... ... :: ... .... ... ... गाथा. पढमे चरिमे समये पुरिसादीणुच्छि8 पुरिसादो लोहगयं पुसंजलणिदराणं पुरिसे दु अणुवसंते पढमो अधापवत्तो पुंकोधोदयचलिय पुंकोहस्स य उदय पडणजहण्णहिदि वं- पडणस्स असंखाणं पडणाणियहियद्धा- पडिवडवर गुणसेढी पडणस्स तस्स दुगुणं पहस्स संखभाग पडिसमयं उकट्टदि पडिसमयमसंखगुणं पलस्स संखभागं पढमे छटे चरिमे पल्लस्स अवरंतु पलस्स संखगुणूणं पुणरवि मदिपरिभोग पडिसमयं असुहाणं पुरिसस्स य पढमहिदि- पुव्वाण फड्डयाणं पढमादिसु दिनकम पढमादिसु दिस्सकम पढमाणुभागखंडे - पढमादिसंगहाओ पडिसमयमसंखगुणं पुन्वादिम्हि अपुव्वा पडिपदमणतगुणिदा पुवापुन्वप्फड्डय पढमस्स संगहस्सय पुन्विल्ल वंधजेठा पडिसमयं अहिगदिणा पडिसमयं संखेजदि पढमादि संगहाणं पढमो विदिये तदिये पढमगमायाचरिमे पृ. गा. गाथा. ८२२२९४ पढमादिसु दिस्सकम ८३।२९८ पढमगुणसेटिसीसं ८३१२९९ पुरिसोदएण चडिद ८९।३२१/पडिसमयं दिव्वतम ९०१३२२/पुवादि वग्गणाणं ९५३४० पढमे असंखभाग ९७१३४९ पुन्वहस्स तिजोगो १००1३६१ १०११३६३ विदियकरणादिसमया १०३१३७२ वोलिय वंचावलियं १०३१३७३ विदियं व तदियकरणं १०४।३७४ विदियकरणादिमादो १०५।३८० विदियावलिस्स पढमे १०९।३९२ विदियकरणा वोच्छ ११०१३९६ विदियकरणस्स पढमे विदिय करणादु जावय ११११३९७ ११२॥४०२ विदियटिदिस्स दवं ११३१४०७ विदियविदिस्स पढम विदियकरणादिसमये ११४।४१० ११६१४१६ विदियद्ध लोभावर ११८१४२९/ विदियद्धा संखेजा १२३४४१ विदियद्धा परिसेसे वादरलोभादिठिदी १२५/४५६ विदियादिसु समयेसु हि १२८१४६५ वादरपढमे किट्टी १३०१४७६ वादरपढमे पटम १३०१४७७ वंधे मोहादिकमे १३११४७८ वंधण होदि उदओ १३४१४९३ १३६१४९९ वंधण होदि अहियो १३६१५०१ वंधोदएहि णियमा १३७१५०६ विदियादिसु समएसु १३८१५०७/विदियतिभागो किट्टी १३९।५१२ वारेकारमणतं... १४०१५१६ विदियादिमु चउठाणा १४०।५१८ वंधद्दव्वाणंतिम १४१३५२० / विदियस्स माणचरिमे 1५३९/विदियगमाया चरिमे 1५४२ विदियादिसु समये ।५५५ बहुठिदिखंडे तीदे ... ... १६.५२ १९६३ २४४८३ २७४९२ ३८।१३१ ४४।१५२ ४६११६१ ५०1१७५ ६१।२१० ६११२१३ ६३१२१९ ७९/२८० ૮૧૨૮૮ ८१।२९१ ८२।२९२ ८३२९५ ८४१३१२ ११४१४०९ ११७१४२४ १२११४३८ १२४१४५० १२४१४५२ १३०१४७४ १३३१४८८ १३७१५०२ १४०१५१५ १४२१५२६ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... १५५६ ... ... ... 1५९८ ...

रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । ८ गाथा. पृ. गा. गाथा. पृ. गा. न वादरमणवचि उस्सा ... ... वाहत्तरि पयडीओ ... ... ... ... ... २४१८१ ४४४१५३ १२६४६१ १२७४६२ १३२।४८४. ... ... ... १६७१६२४ १७२।६४४ रसगदपदेस गुणहा रसटिदिखंडुक्कीरण रससंतं आगहिदं ८/२५ रसखंडफयाओ २११७२ रसठिदिखंडाणेवं २६९० ३१।१०७ लोहस्स असंकमणं ३१1१०८ लोयाणमसंखेनं ३२।१०९ लोभोदएण चदिदो ३६।१२४ लोभादी कोहोत्तिय ३६।१२५ लोहस्स अवरकिटिंग ल ... ... ९११३२८ ९॥३३० ९८1३५४ १३५/४९६ १३५/४९७ १३६१४९८ १३९।५१० ३६।१२६ लोभस्स दव्वं तु ... ३७४१२८ लोहादो कोहादो ... ... ४५।१५६ लोहस्स पढमचरिमे ... ... ... 1५७४ ... व मिच्छणथीणति सुर चउ... मज्झिमधणमवहरिदे मिच्छत्तमिस्स सम्म मिस्सुदये संमिस्स मिच्छत्तं वेदंतो मिच्छाइट्ठी जीवो मिच्छुच्छिहादुवरिं मिस्सुच्छिठे समए मिच्छस्स चरमफालिं मिस्सद्गचरिमफाली मिच्छे खवदे सम्म मिच्छंतिमठिदिखंडो मिच्छो देसचरितं मिच्छो वेदगस मोहगपल्लासंख माणस्स पढमठिदी माणदुगं संजलणग माणस्स य आवलि मायाए पढमठिदी मायदुगं संजलणग मायाए आवलि मोहस्स असंखेजा मोहं वीसिय तीसिय मोहस्स य ठिदि बंधो मोहस्स पल्लवंधे माणोदएण चडिदो माणोदयचडपडिदो माणादितियाणुदये मोहगपल्लासंख माणादीणहियकमा माणतियकोहतदिये मासपुधत्तं वासा मायतिगादो लोभ माणतियाणुदयमहो मज्झिमवहुभागुदया ... ... ... ५४१८८ ७२।२५३ ९११३२९ I૪૬ १७४१६४८ स ... ४५1१५७ लोहस्स तदियसंगह ४८1१६८ लोहस्स पढमकिट्टी ४८११६९ लोहस्स तदीयादो ६६।२३१लोभस्स विदियकिटिं ७७१२७१ लोभस्स तिघादीणं ७७॥२७२ ७७।२७३ वेदगजोगो मिच्छो ७८।२७५/वस्साणं वत्तीसा ७८।२७६ विवरीयं पडिहण्णदि ७८।२७७ वेदिजादि डिदिए ९१६३२७ वीरिंदणंदिवच्छे १२।३३२ ९३१३३६ सिद्ध जिणिदचंदे ९४१३३७ सम्मत्तहिमहमिच्छो ९८१३५३ समए समए मिण्णा ९९/३५५ सत्थाणमसत्थाणं ९९।३५६ सत्तग्गटिदिवंधो ११६१४१९ सेसगभागे भजिदे १३२१४८३ संज्जदिमे सेसे 1५४५ सायारे वट्ठवगो ।५५८ सम्मुदये चलमलिण 1५७२ सुत्तादो तं सम्म 1६०१ सम्मस्स असंखाणं १७०१६३८ सेसं विसेसहीणं ११. ४६९ ... ... ... ... ... ... ... ११।३६ १२।३८ १८१६१ २११७० २५।८४ २९1१०१ ३०1१०५' ३१।१०६ ३५।१२२ ३७४१२९ ... ... ... ...

लब्धिसारः। ९ गाथा. पृ. गा. गाथा. पृ. गा. ... ... ... ... ... ... ४०।१४० समखंडं सविसेसं ४४११५५/सगसग फट्टयएहिं ४७११६३ संगहगे एकके... ४७११६५/ सेसाणं वस्साणं ४९।१७० से काले किडीओ ४९११७१ संकमादि संगहाणं ५४।१८७ संखातीदगुणाणि य ५८/२०१ संकमदो किट्टीणं ... ... १२८५४६६ १२९/४६९ १३५१४९५ १३७४५०४ १३८५५०८ १४११५१९ १४३१५२८ १४३१५३० १४४१५३१ १४५।५३७ १५५० ... ... ६०।२०७/ संगह अंतरजाणं ... ... ... ... ... 1५६१ ... ... 1५७८ 1५८८ 1५९० १५९१ ... ... ... सम्मत्तचरिमखंडे सम्मदुचरिमे चरिमे सत्तण्हं पयडीणं सत्तण्हं अवरं तु सम्मत्तुप्पत्तिं वा 'से काले देसवदी सयलचरित्तं तिविहं सामयिगदुगजहणं सम्मस्स असंखेना सम्मत्तपयडिपढम: सम्मादिठिदिज्झीणे सम्मत्तुप्पत्तीए संजलणाणं एक सत्तकरणाणियंतर संढादिम उवसमगे संजलणचउकाणं से काले माणस्स य से काले मायाए से काले लोहस्स य से काले किट्टिस्स य सोदीरणाण दव्वं सुहुममपविठ्ठ समये ... संढणुवसमे पंढमे सहाणे तावदियं संडदयंतरकरणो सुहुमंतिमगुणसेढी संजद अधापवत्तग सत्थाणमसत्थाणं संकामे दुकदि संजलणाणं एक सत्तकरणाणियंतर संछुहदि पुरिसवेदे सत्तण्हं पढमहिदि सत्तण्डं घादिठिदि संकमणं तदवढं सत्तण्हं संकामग समऊण दोणि आवलि सेकाले ओवणि ... - ... से काले कोहस्सय ६११२११ से काले तदियादो ६२।२१४ से काले माणस्स य ६२।२१५ सेसाणं पयडीणं ६८०२४० से काले लोहस्सय ७०१२४६ सुहसाओ किट्टीओ ७२।२५१ सकाले सुहुमगुणं ७५/२६६ सुहुमद्धादो पहिया ७६।२६९ सहुमाणं किट्टीणं ७७४२७४ सुहमे संखसहस्से ७८।२७८ से काले सो खीण ८२।२९३ सत्तण्हं पयडीणं ८५।३०६ समयढिदिगो वंधो ८६३३०८ सहाणे आवजिद ९१।३२६ सण्णिवि सुहुमणि ९५।३४२ सुहुमस्स य पढमादो १००३५९ सेढिपदस्स असंखं १०११६६४ सेढिपद सन्चाओ १०४।३७५ से काले जोगिजिणो १०९।३९१/सीलेसिं संपत्तो ११११३९९ सो मे तिहुवणमहियो ११९२४३१ १२०१४३३ हेहा सीसे उभयं १२०१४३५/हेठा सीसंथोच १२२१४४५ होदि असंखेजगुणं १२३१४४६ हयकण्णकरणचरिमे १२४१४५३ हेहा असंखभाग १२५४४५४ हेडिमणुभयवरादो १२६१४५८ हेट्ठा किटिप्पहुदिसु १२६१४५६ हेहादंडसंतो ... १६२।६०९ १६६१६१३ १६५।६१८ १६१६२५ १६७१३२७ १६८१६३० १६९१६३४ १७११६४२ १७११६४३ १७३१६४७ ... ho ... ८०१२८३ ८०१२८४ १३१४८२ १३२॥४८५ १३६१५०० १४०१५१७ १४२१५२५ १६५।६१७ ...

लब्धिसारकी विषयसूची पृ. पं. . ... ... का विधान विषय. विषय. पृ. प. मंगलाचरण, ग्रंथप्रतिज्ञा .... १1१ उपशमचारित्रका वर्णन ५९।२०३' उपशमश्रेणी चढ़नेमें द्वितीयोपशम स- दर्शनलब्धि अधिकार-१ म्यक्त्वीकी अवस्था ५९/२०४ प्रथमोपशसम्यक्त होनेके योग्य १।२ चारित्रमोहकर्मके उपशमकरनेमें आठ पांच लब्धियोंके नाम २२३ अधिकारोंका वर्णन ६३१२१८ क्षयोपशमलब्धिका स्वरूप २।४ तीनकरणका विधान ६३१२१९ विशुद्धिलब्धिका लक्षण २०५ बंधापसरणादिका खरूप... ६३।२२० देशनालब्धिका स्वरूप ३।६ उपशांतकपायसे पड़नेकी विधि ८५१३०५ प्रायोग्यलब्धिका खरूप ... ३१७ उपशमश्रेणी चढ़नेवाले बारह तरहके प्रकृतिबंधापसरणके चोंतीस स्थानोंका जीवोंकी विशेप क्रियायें ९७१३४९ वर्णन ४।११ क्षायिकचारित्र अधिकार-३ उदयका खरूप ९/२८ सत्वका स्वरूप १०.३१ चारित्रमोहकी क्षपणा (नाश करने) करणलब्धिका खरूप १११३३ १०८१३८९ अधःकरणका खरूप १११३५ अधःप्रवृत्तकरणका वर्णन... १०९.३९० अपूर्वकरणका स्वरूप १५।५० अपूर्वकरणका खरूप ११०१३९४ गुणश्रेणीका वर्णन २०६८ गुणश्रेणीका खरूप ११०॥३९५ गुणसंक्रमणका खरूप २२१७५ गुणसंक्रमका खरूप ११११३९७ स्थितिकांडकघातका खरूप २३१७७ स्थितिखंडनका खरूप ११२१४०२ अनुभागखंडनका कथन ... २३१७९ अनुभागखंडनका खरूप ... ११३१४०५ अनिवृत्तिकरणका खरूप ६४.८३ अनिवृत्तिकरणका खरूप ... ११३१४०८ प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके योग्य स्थितिबंधापसरणका क्रम ११५/४१२ काल २८९७ स्थितिसत्त्वापसरणका क्रम ११७१४२४ क्षायिक सम्यक्त्वका वर्णन और उस- क्षपणाका स्वरूप ११८१४२६ के योग्य सामग्री ३२।११० देशघातिकरणका खरूप ११८१४२८ अंतकांडकका विधान ४०।१३९ अंतरकरणका खरूप ११९॥४३० दर्शनमोहकी क्षपणाके अल्पवहुखके संक्रमणका खरूप १२०१४३३ तेतीसस्थान ४४।१५३ अपगतवेदीकी क्रियाका खरूप १२६१४५९ चारित्रलब्धि अधिकार-२ अनुभागकांडकके घात होनेपर जो चारित्रलब्धिका खरूप और मेदोंका अवस्था हो उसका कथन १३११४७८ कथन ४८६१६६ कृष्टि-क्रियासहित अर्धकर्ण किया होने- देशचारित्रका कथन ४८1१६७ में यति वृषभाचार्यकी सम्मति १३२।४८५ सकल चारित्रका वर्णन ५४११८७ वादरकृष्टिकरणका काल ... १३३१४८७ ... ... ... ... ... ... ... ... - ... ...

लन्धिसारः। पृपं. ... विपय. पार्थकृष्टिका कथन कृष्टिवेदनाका कथन संक्रमणद्रव्यका विधान अनुसमय अपवर्तनकी प्रवृत्तिका कथन खस्थान परस्थान गोपुच्छ रचनाका विधान ... दूसरा विधान ... ... पृ. पं. विपय. १३६१५०० केवलीके इंद्रियजनित सुख दुःख नहीं १३८1०८ होने हेतु १६३४१२ १४११५१९ दूसरा हेतु १६३११३ केवलीके आहारमार्गणा होनेमें कारण १६४१६१४ १४११५२० समुद्रातक्रियाका वर्णन १६४/६१६ समुद्धातके पहले केवलीके आवर्जित- १४२।५२३ करण होता है १६५।६१७ १४२३५२४ आवर्जितकरणमें गुणश्रेणी आयामका कथन १६५।६१९ 1५९६ | उस समुद्धातमें कार्य विधान १६६।३२० समुद्धातक्रियाके समंटनेका क्रम १६६१६२३ 1६००वादरयोगोंका सूक्ष्मरूप परिणमन होने- की अवस्था १६७१६२५ १६०२ अयोगकेवलीका कथन ... १७११६४२ १६०३ चौदहवें गुणस्थानके अंतसमयसे पह- लेमें तथा अंतसमयमें पचासी प्रकृ- १६०५, तियोंका ( काँका ) नाश करनेका १६२।६०६ कथन १७२१६४४ ऊर्चलोकके ऊपर मोक्षस्थानका स्वरूप १५२१६४५ १६२।६०७/इष्ट प्रार्थना १७३६४७ १६श६१० ग्रंथकर्ताकी प्रशस्ति १७४१६४८ १६३१६११ अंतमंगल १७५३६४९ क्षीणकपाय नामा वारहवें गुणस्थानका स्वरूप पुरुपवेदसहित श्रेणी चढ़नेवालेका स्वरूप स्त्रीवेद सहित चढ़े जीवोंके मेदोंका वर्णन नपुंसकवेद सहित चढ़े जीवोंका कथन क्षीणकपाय गुणस्थानके अंतसमयका कथन सयोगकेवली गुणस्थानका वर्णन चार घातियोंके क्षयसे चार गुणोंका प्रगट होना दुःखका लक्षण इंद्रियजनित सुखका लक्षण ... ... ... ... इति विपयसूची.

रायचंद्रजैनशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित ग्रंथोंकी सूची। १ पुरुपार्थसिच्युपाय भाषाटीका-यह प्रसिद्ध शास्त्र दूसरीवार छपाया गया है । न्यों. १ २०, २.पंचास्तिकाय संस्कृत भा० टी०-इसमें दो संस्कृत टीकायें और एक हिंदी भापाटीका है। यह भी दूसरी वार छपाया गया है । न्यों० २०. ३ ज्ञानार्णव भा० टी०-इसमें ब्रह्मचर्यका विस्तारसे कथन है दूसरी बार छपाया गया है।न्यो०४ रु. ४ सप्तभंगी तरंगिणी भा० टी०-यह भी दूसरी बार छपाई गई है । न्यों. १ रु०. ५ बृहद्रव्यसंग्रह सं० भा टी०-वृहद्रव्यका उत्तम कथन किया है। न्यों. २ रु०. ६ द्रव्यानुयोगतर्कणा भा० टी०-इसमें नयोंका कथन है । न्यों० २ रु०: ७ सभाष्य तत्त्वार्थाधिगम सूत्र भा० टी०-इसकी थोड़ी प्रतियां रहीं थीं इसलिये अब दूसरी वार छपाया जा रहाहै । अवकी वार पहलेकी त्रुटियां निकाल दी जायगी । न्यों० २ २०. ८ स्याद्वादमंजरी सं० भा० टी०-इसमें छहों मतोंका विवेचन है । न्यों० ४ रु०. ९ गोमटसार (जीवकांड ) संस्कृत छाया और संक्षिप्त हिन्दी भा० टी० । न्यों. २।। रु०. १० गोमटसार ( कर्मकांड ) संस्कृत छाया और संक्षिप्त हिन्दी भा० टी० न्यों० २ रु०. ११ प्रवचनसार सं०भा० टी०-इसमें दो संस्कृत टीका और एक हिन्दी भापाटीका है। न्यों. ३ रु०- १२ परमात्मप्रकाश सं०भा०टी०-यह अध्यात्म ग्रंथ है। न्यों० ३ १०. १३ लन्धिसार (क्षपणासार गर्भित ) संस्कृत छाया और संक्षिप्त हिन्दी भापाटीका सहित छपाया गया है। न्यों० १॥ रु०. १४ मोक्षमाला-यह ग्रंथ श्रीमद् रायचंद्रजीकृत है । गुजराती भापामें छपा है । न्यों वार आना । १५ भावनावोध-यह ग्रंथ भी उक्त महान पुरुप कृत है। गुजराती भापामें छपा है। न्यों चार आना। . आवश्यक सूचना। सभाष्यतत्त्वार्थाधिगम भा० टी०-यह प्रथ दूसरी वार शुद्ध कराके छपाया जा रहा है । पहली वारकी सव त्रुठियां यथा संभव निकाल दी जावेगी। त्रिलोकसार-यह ग्रंथ श्रीमन्नेमिचंद्राचार्य सिद्धांत चक्रवर्ती विरचित मूल गाथारूप है । गोमटसार वगैरहकी संज्ञाओंके जाननेकेलिये तथा तीन लोककी रचनाका खरूप और विशेपकर भूगोल, खगोल, भरतखंडकी सृष्टिकी रचना और संहार इत्यादि बहुत वातोंके विस्तारसे जाननेकेलिये संस्कृत टीका और हिन्दी भाषाटीका इन दो टीकाओं सहित इसी मंडलसे शीघ्र प्रकाशित कर पाठकोंके सामने एक वर्षके अंदर उपस्थित किया जायगा। यह संस्था किसी खार्थकेलिये नहीं है केवल प्राचीन आचार्योंके ग्रंथोका उद्धार कर पाठकोंके उपका- रके वास्ते खोली गई है। जो द्रव्य आता है वह इसी जैनशास्त्रमालामें उत्तम प्रथोंके ऊद्धारके वास्ते लगाया जाता है । इति शम् । ग्रन्थोंके मिलनेका पता- शा० रेवाशंकर जगजीवन जोहरी आनरैरी व्यवस्थापक श्रीपरमश्रुत प्रभावकमंडल जोहरी बाजार खाराकुवा पो० नं. २ बंबई ।

रायचंद्रजैनशास्त्रमाला ।
ॐ
श्रीनेमिचंद्राय नमः
अंथ छायासंक्षिप्तहिंदीभाषासहितः
लब्धिसारः
(क्षपणासारगर्मितः)
-
मंगलाचरण।
दोहा-सम्यग्दर्शन चरन गुन, पाय कुकर्मक्षिपाय ।
केवलज्ञान उपाय प्रभु, भए भनौं शिवराय ॥ १ ॥
लब्धिसारकों पायके, करिके क्षपणासार ।
हो है प्रवचनसारसों, समयसार अविकार ॥२॥
पहले श्री गोमटसार शास्त्रमें जीवकांड कर्मकांड अधिकारोंसे जीव और कर्मका खरूप
दिखलाया उसको यथार्थ जानकर मोक्षमार्गमें प्रवर्त होना चाहिये क्योंकि आत्माका हित
मोक्ष है । मोक्षके मार्ग (उपाय) दर्शन व चारित्र हैं और सम्यक् ज्ञान भी है परंतु यहां
गुणस्थानके क्रममें सम्यग्ज्ञानकी गौणता है इसीलिये मुख्यतासे दर्शन चारित्रकी ही
लब्धि ( प्राप्ति) का उपाय बतलाते हुए प्रथम अपने इष्ट देवको नमस्कार करते हैं:-
सिद्धे जिणिंदचंदे आयरिय उवज्झायः साहुगणे ।
वंदिय सम्मइंसण-चरित्तलद्धिं परूवेमो ॥१॥
सिद्धान् जिनेंद्रचंद्रान् आचार्योपाध्यायसाधुगणानू ।
वंदित्वा सम्यग्दर्शनचारित्रलब्धी प्ररूपयामः ।। १ ।।
अर्थ-सिद्ध अहंत आचार्य उपाध्याय और साधुओंको नमस्कारकर हम सम्यग्दर्शन
लब्धि और चारित्रलब्धि-इन दोनोंका स्वरूप कहेंगे।
आगे दर्शनलब्धिके कथनमें पहले प्रथमोपशम सम्यक्त्व होनेकी विधि कहते हैं।
चदुगदिमिच्छो सपणी पुण्णो गम्भजविसुद्धसागारो।
पढमुवसमं स गिण्हदि पंचमवरलद्धिचरिमम्हि ॥ २॥

२ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।। चतुर्गतिमिथ्यः संज्ञी पूर्णः गर्भजो विशुद्धः साकारः । प्रथमोपशमं स गृह्णाति पंचमवरलब्धिचरमे ॥२॥ अर्थ-चारों गतिवाला अनादि या सादि मिथ्यादृष्टि संज्ञी ( मनसहित ) पर्याप्त गर्भज जन्मवाला मंदक्रोधादिकषायरूप विशुद्धपनेका धारक गुणदोपविचाररूप साकार ज्ञानोपयो- गवाला जो जीव है वही पांचवीं लब्धिके अनिवृत्तकरण भागके अंतसमयमें प्रथमोपशम सम्यक्त्वको ग्रहण करता हैं ॥ २ ॥ आगे प्रथमोपशम सम्यक्त्व होनेसे पहले मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें पांच लब्धियां होती हैं उनके नाम कहते हैं- खयउवसमियविसोही देसणपाउग्गकरणलद्धी य । चत्तारि वि सामण्णा करणं सम्मत्तचारित्ते ॥३॥ क्षयोपशमविशुद्धी देशनाप्रायोग्यकरणलब्धयश्च । चतस्रोपि सामान्याः करणं सम्यक्त्वचारित्रे ॥ ३ ॥ अर्थ-क्षयोपशम १ विशुद्धि २ देशना ३ प्रायोग्य ४ करण ५- ये पांच लब्धियां हैं। उनमेंसे पहली चार तो साधारण हैं अर्थात् भव्यजीव और अभव्यजीव दोनोंके होती हैं । लेकिन पांचवीं करणलब्धि सम्यक्त्व और चारित्रकी तरफ झुके हुए भव्यजीवके ही होती है ॥ ३॥ आगे इन पांचोंमेंसे पहली क्षयोपशमलब्धिका खरूप कहते हैं- कम्ममलपडलसत्ती पडिसमयमणंतगुणविहीणकमा । होद्णुदीरदि जदा तदा खओवसमलद्धी दु॥४॥ कर्ममलपटलशक्तिः प्रतिसमयमनंतगुणविहीनक्रमा । भूत्वा उदीर्यते यदा तदा क्षयोपशमलब्धिस्तु ॥ ४ ॥ अर्थ-कोंमें मैलरूप जो अशुभ ज्ञानावरणादि समूह उनका अनुभाग जिस कालमें समय समय अनंतगुणा कमसे घटता हुआ उदयको प्राप्त होता है उस कालमें क्षयोपशम लब्धि होती है ॥ ४ ॥ आगे विशुद्धिलब्धिका स्वरूप कहते हैं- आदिमलद्धिभवो जो भावो जीवस्स सादपहुदीणं । सत्थाणं पयडीणं बंधणजोगो विसुद्धलद्धी सो ॥ ५ ॥ आदिमलब्धिभवो यः भावो जीवस्य सातप्रभृतीनाम् । : शस्तानां प्रकृतीनां बंधनयोग्यो विशुद्धिलब्धिः सः॥५॥. - लब्धिसारः। अर्थ-पहली (क्षयोपशम ) लब्धिसे उत्पन्न हुआ जो जीवके साता आदि शुभ प्रकृ- तियोंके बंधनेका कारण शुभपरिणाम उसकी जो प्राप्ति वह विशुद्धिलब्धि है। अशुभकर्मके अनुभाग घटनेसे संक्लेशकी हानि और उसके विपक्षी विशुद्धपनेकी वृद्धि होना ठीक ही है ॥ ५॥ आगे देशनालब्धिका स्वरूप कहते हैं;- छद्दवणुवपयत्थोपदेसयरसूरिपहुदिलाहो जो। देसिदपदस्थधारणलाहो वा तदियलद्धी दु॥६॥ पझ्द्रव्यनवपदार्थोपदेशकरसूरिप्रभृतिलाभो यः । देशितपदार्थधारणलाभो वा तृतीयलन्धिस्तु ॥६॥ अर्थ-छह द्रव्य और नौपदार्थका उपदेश करनेवाले आचार्य आदिका लाभ यानी उपदेशका मिलना अथवा उपदेशे हुए पदार्थोंके धारण करने ( याद रखने ) की प्राप्ति वह तीसरी देशनालन्धि है । तु शब्दसे नरकादि गतिमें जहां उपदेश देनेवाला नहीं है वहां पूर्वभवमें धारण किये हुए तत्त्वार्थके संस्कारके वलसे सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति जानना ॥ ६॥ आगे प्रायोग्यलब्धिको कहते हैं- अंतोकोडाकोडी विठ्ठाणे ठिदिरसाण जं करणं । पाउग्गलद्धिणामा भवामधेसु सामण्णा ॥ ७ ॥ अंत:कोटीकोटिविस्थाने स्थितिरसयोः यत्करणम् । प्रायोग्यलन्धिनाम भव्याभव्येपु सामान्या ॥ ७॥ अर्थ-पूर्वोक्त तीन लब्धिवाला जीव हरसमय विशुद्धताकी वढवारी होनेसे आयुके विना सातकर्मों की स्थिति घटाता हुआ अंतःकोड़ाकोडि मात्र रखे और कर्मोकी फल देनेकी शक्तिको भी कमजोर करदे ऐसे कार्यकरनेकी योग्यताकी प्राप्तिको प्रायोग्यलन्धि कहते हैं। वह सामान्यरीतिसे भव्यजीव और अभव्यजीव दोनोंके ही होसकती है ॥ ७ ॥ जेट्टवरहिदिवंधे जेवरहिदितियाण सत्ते य । णय पडिवजदि पढमुवसमसम्म मिच्छजीयो हु॥ ८॥ ज्येष्ठावरस्थितिबंधे ज्येष्ठावरस्थितित्रिकाणां सत्त्वे च । न च प्रतिपद्यते प्रथमोपशमसम्यं मिथ्यजीवो हि ॥ ८॥ अर्थ-संक्लेशपरिणामवाले संज्ञी पंचेंद्री पर्याप्तके संभव जो उत्कृष्ट स्थितिबंध और उत्कृष्ट स्थिति अनुभाग प्रदेशका सत्त्व तथा विशुद्ध सपकश्रेणीवालेके संभव जो जघन्य ४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । स्थितिबंध और जघन्यस्थिति अनुभाग प्रदेश इन तीनोंकी सत्ता उसके होनेपर मिथ्याती जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको नहीं ग्रहण करता ॥ ८॥ सम्मत्तहिमुहमिच्छो विसोहिवडीहिं चढमाणो हु । अंतोकोडाकोडिं सत्तण्हं बंधणं कुणई ॥९॥ सम्यक्त्वाभिमुखमिथ्यः विशुद्धिवृद्धिभिः वर्धमानो हि । अंतःकोटीकोटिं सप्तानां बंधनं करोति ॥ ९ ॥ अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्वके सन्मुख हुआ मिथ्यादृष्टि जीव विशुद्धपनेकी वृद्धिसे बढ़ता हुआ प्रायोग्यलब्धिके पहले समयसे लेकर पूर्वस्थितिबंधके संख्यातवें भाग अंतः- कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण आयुके विना सात काँकी स्थिति बांधता है ॥ ९ ॥ तत्तो उदय सदस्स य पुधत्तमेत्तं पुणो पुणोदरिय । बंधम्मि पयडिम्हि य छेदपदा होंति चोत्तीसा ॥ १०॥ ततः उदये शतस्य च पृथक्त्वमानं पुनः पुनरुदीर्य । बंधे प्रकृतौ च छेदपदा भवंति चतुश्चत्वारिंशत् ॥ १० ॥ अर्थ-उस अंतःकोडाकोड़ी सागर स्थितिबंधसे पल्यका संख्यातवां भागमात्र घटता हुआ स्थितिबंध अंतर्मुहूर्ततक समानतालिये हुए करता है । फिर उससे पल्यके संख्यातवें भाग घटता स्थितिबंध अंतर्मुहूर्ततक करता है । इसतरह क्रमसे संख्यातस्थितिबंधापसरणों- कर पृथक्त्व सौसागर घटनेसे पहला प्रकृतिबंधापसरणस्थान होता है । फिर उसी क्रमसे उससे भी पृथवत्व सौ सागर घटनेसे दूसरा प्रकृतिबंधापसरणस्थान होता है । इसतरह इसी क्रमसे इतना २ स्थितिबंध घटनेपर एक एक स्थान होता है। ऐसे प्रकृतिबंधापसरणके चौंतीस स्थान होते हैं ॥ १०॥ आगे चौंतीस स्थानोंमें क्रमसे कोंन कोनसी प्रकृतिका व्युच्छेद होता है ऐसा कहते हैं। आऊ पडि णिरयदुगे सुहुमतिये सुहुमदोणि पत्तेयं । वादरजुत दोण्णि पदे अपुण्णजुद वितिचसण्णिसण्णीसु ॥ ११ ॥ आयुः प्रति निरयद्विकं सूक्ष्मत्रयं सूक्ष्मद्वयं प्रत्येकं । बादरयुतं द्वे पदे अपूर्णयुतं द्वित्रिचतुरसंज्ञिसंज्ञिपु ॥ ११ ॥ अर्थ-पहला नरकायुका व्युच्छित्तिस्थान है अर्थात् वहांसे लेकर उपशमसम्यक्त्वतक नरकायुका बंध नहीं होता । इसीतरह आगे भी जानना । दूसरा तिर्यंचायुका स्थान है तीसरा मनुष्यायुका है चौथा देवायुका है। पांचवां नरकगति नरकगत्यानुपूर्वीका है छठा १ यहां पृथक्त्व नाम सात वा आठका है. इसलिये पृथक्त्व सौ सागर कहनेसे सातसौ वा आठसौ सांगर जानना । २ यहां प्रथमोपशम सम्यक्त्वमें आयुर्वधका अभाव है इसलिये सव आयुवंधकी व्युच्छित्ति कही गई है। .

लब्धिसारः।
संयोगरूप सूक्ष्म अपर्याप्तसाधारणोंका है । सातवां संयोगरूप सूक्ष्म अपर्याप्त प्रत्येकका है,
आठवां संयोगरूप बादर अपर्याप्त साधारणका है, नवमां संयोगरूप वादर अपर्याप्त प्रत्ये-
कका है दशवां संयोगरूप दोइन्द्री जाति अपर्याप्तका है, ग्यारवां तेंद्री अपर्याप्तका है,
बारवां चौइंद्री अपर्याप्तका है, तेरहवां असंञी पंचेंद्री अपर्याप्त है और चौदहवां संज्ञी
पंचेंद्री अपर्याप्तका है ॥ ११ ॥
अट्ट अपुण्णपदेसु वि पुण्णण जुदेसु तेसु तुरियपदे ।
एइंदिय आदावं थावरणामं च मिलिदा ॥ १२ ॥
अष्टौ अपूर्णपदेष्वपि पूर्णेन युतेषु तेपु तुरीयपदे ।
एकेंद्रिय आतापं स्थावरनाम च मिलितव्यम् ॥ १२ ॥
अर्थ-पन्द्रहवां सूक्ष्मपर्याप्तसाधारणका है, सोलवां सूक्ष्मपर्याप्तप्रत्येकका है, सत्रहवां
बादरपर्याप्त साधारणका है, अठारवां वादर पर्याप्त प्रत्येक एकेंद्री आतपस्थावरका है, उन्नी-
सवां दो इंद्री पर्याप्तका है, बीसमां ते इंद्री पर्याप्तका है, इक्कीसवां चौइंद्री पर्याप्तका है और
बावीसवां असंज्ञीपंचेद्री पर्याप्तका है ॥ १२ ॥
तिरिगदुगुजोवोवि य णीचे अपसत्थगमण दुभगतिए ।
हुंडासंपत्तेवि य णओसए वामखीलीए ॥ १३॥
तिर्यरिद्वकोद्योतोपि च नीचैः अप्रशस्तगमनं दुर्भगत्रिकं ।
हुंडासंप्राप्तेपि च नपुंसकं वामनकीलिते ॥ १३ ॥
अर्थ-तेईसवां तिर्यंचगति तिर्यंचगत्यानुपूर्वी उद्योतका है, चौवीसवां नीचगोत्रका है,
पच्चीसवां अप्रशस्तविहायोगतिदुर्भगदुःखर अनादेयका है, छठवीसवां हुंडसंस्थान सृपाटिका
संहननका है, सत्ताईसवां नपुंसकवेदका है और अट्ठाईसवां वामनसंस्थान कीलितसंहन-
नका है ॥ १३ ॥
खुजद्धं णाराए इत्थीवेदे य सादिणाराए ।
णग्गोधवजणारा-ए मणुओरालदुगवजे ॥ १४ ॥
कुब्जार्धनाराचं स्त्रीवेदं च स्वातिनाराचे ।
न्यग्रोधवज्रनाराचे मनुष्यौदारिकद्विकवने ॥ १४ ॥
अर्थ-उनतीसवां कुजसंस्थान अर्धनाराचसंहननका है, तीसवां स्त्रीवेदका है, इकती-
सवां स्वातिसंस्थाननाराचसंहननका है, वत्तीसवां न्यग्रोधसंस्थान वज्रनाराचसंहननका है
और तेतीसवां मनुष्यगति मनुष्यगत्यानुपूर्वी औदारिक शरीर औदारिक अंगोपांग वन
ऋषभनाराच संहननका है.॥ १४ ॥

.. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथिरसुभग जस अरदी सोयअसादे य होंति चोतीसा। बंधोसरणहाणां भवाभवेसु सामण्णा ॥ १५ ॥ अस्थिरसुभगंयशः अरतिः शोकासाते च भवंति चतुश्चत्वारिंशत् । वंधापसरणस्थांनानि भन्याभव्येषु सामान्यानि ॥ १५ ॥ अर्थ-चौंतीसवां संयोगरूप अस्थिर अशुभ अयश अरति शोक असाताका धन्युच्छि- तिस्थान है । ऐसे ये कहे हुए चौतीस स्थान भव्य अथवा अभव्यके समान होते हैं ॥१५॥ णरतिरियाणं ओघो भवणतिसोहम्मजुगलए विदियं । तिदियं अट्ठारसमं तेवीसदिमादि दसपदं चरिमं ।। १६ ॥ नरतिरश्चामोघः भवनत्रिसौधर्मयुगलके द्वितीयं । तृतीयं अष्टादशमं त्रयोविंशत्यादि दशपदं चरमम् ।। १६ ॥ अर्थ-मनुष्य और तिर्यंचोंके सामान्य कहे हुए चौंतीसस्थान पाये जाते हैं अर्थात् उनके बंधयोग्य एकसौ सत्रह प्रकृतियोंमेंसे चौतीसस्थानोंकर छयालीस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है। वहां आदिके छहस्थानों में नौ अठारवें स्थानमें एकेन्द्रियादि तीन उन्नीसवां आदि वीचके स्थानोंमें दो इंद्री ते इंद्री चौइंद्री ये तीन और तेईसवां आदि बारह स्थानोंमें इकतीस-ऐसे छयालीसकी व्युच्छित्ति होती है शेष इकहत्तर बंधती हैं । भवनवासी आदि तीनमें सौधर्मखर्ग युगलमें दूसरा तीसरा अठारवां तेईसवेंको आदिले दस और अंतका चौंतीसवां-ये चौदह स्थान ही संभवते हैं अर्थात् वहां इकतीस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है, बंधयोग्य एकसौ तीनमें वहत्तरि प्रकृतियोंका वंध वाकी रहता है॥१६॥ ते चेव चोदसपदा अट्ठारसमेण हीणया होति । रयणादिपुढविछक्के सणकुमारादिदसकप्पे ॥ १७ ॥ तानि चैव चतुर्दशपदानि अष्टादशेन हीनानि भवति । रत्नादिपृथिवीपटू सनत्कुमारादिदशकल्पे ॥ १७ ॥ अर्थ-रत्नप्रभा आदि छह नरककी पृथिवीयोंमें और सानत्कुमार आदि दस वर्गों में पूर्व कहे हुए चौदह स्थान होते हैं लेकिन उनमेंसे अठारवां स्थान नहीं होता । अर्थात् तेरहस्थानोंसे अट्ठाईस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है वहां बंधयोग्य सौ प्रकृतियोंमेंसे . बहत्तरिका बंध शेष रहता है ॥ १७ ॥ ते तेरेस विदिएण य तेवीसदिमेण चावि परिहीणा। आणदकप्पावरिमगेवेजंतोत्ति ओसरणा ॥१८॥ तानि त्रयोदश द्वितीयेन च त्रयोविंशतिकेन चापि परिहीनानि । आनतकल्पादुपरि प्रैवेयकांतमित्यपसरणाः॥ १८॥ . 1.

लब्धिसारः। अर्थ-आनतवर्गको आदि लेके ऊपरले त्रैवेयकतक उन तेरहस्थानोंमेंसे दूसरे और तेईसवें स्थानोंके विना ग्यारह बंधापसरण स्थान पाये जाते हैं। वहां उन ग्यारह स्थानोंकर चौवीस घटानेसे वंधयोग्य छयानवै प्रकृतियोंमेंसे वहत्तरि बांधता है ॥ १८ ॥ ते चेबेकारपदा तदिऊणा विदियठाणसंजुत्ता। चउचीसदिमेणूणा सत्तमिपुढविम्मि ओसरणा ॥ १९ ॥ तानि चैवैकादशपदानि तृतीयोनानि द्वितीयस्थानसंयुक्तानि । चतुर्विंशतिकेनोनानि.सप्तमीपृथिव्यामपसरणानि ॥ १९ ॥ अर्थ-सातवीं नरककी पृथिवीमें उन ग्यारहोंमेंसे तीसरे और चौवीसवें स्थानके विना तथा दूसरे स्थानसहित-इस तरह दस स्थान पाये जाते हैं। उन दस स्थानोंमेंसे तेईस वा उद्योतसहित चौवीस घटानेपर बंधयोग्य छयानवै प्रकृतियोंमेंसे तेहत्तरि वा बहत्तर वांधी जाती हैं क्योंकि उद्योतको वंध वा अबंध दोनों संभवते हैं ॥ १९ ॥ घादिति सादं मिच्छं कसायपुंहस्सरदि भयस्स दुगं । अपमत्तडवीसुचं बंधति विसुद्धणरतिरिया ॥२०॥ घातित्रयं सातं मिथ्यं कपायपुंहास्यरतयः भयस्य द्विकम् । अप्रमत्ताष्टाविंशोचं वनंति विशुद्धनरतियचः ॥ २० ॥ अर्थ-इसप्रकार व्युच्छित्ति होनेपर प्रथमोपशमसम्यक्त्वको सन्मुख हुए मिथ्यादृष्टि मनुष्य तिर्यंच हैं वे ज्ञानावरण आदि तीन घातियाओंकी उन्नीस सातावेदनीय मिथ्यात्व सोलह कपाय पुरुषवेद हास्य रति भय जुगुप्सा अप्रमत्तकी अट्ठाईस उच्चगोत्र-इसतरह इक- हत्तरि प्रकृतियों को बांधते हैं ॥ २० ॥ देवतसवण्णअगुरुचउक्कं समचउरतेजकम्मइयं । सग्गमणं पंचिंदी थिरादिछणिमिणमडवीसं ॥ २१ ॥ देवत्रसवर्णागुरुचतुष्कं समचतुरतेजःकार्मणकम् । सद्गमनं पंचेंद्री स्थिरादिपणिर्माणमष्टाविंशम् ।। २१ ।। अर्थ-देवचतुष्क त्रसचतुष्क वर्णचतुष्क अगुरुलघुचतुष्क समचतुरस्रसंस्थान तैजस कार्माण शुभविहायोगति, पंचेंद्री, स्थिर आदि छह, निर्माण-ये अट्ठाईस प्रकृतियां अप्रम- तकी हैं ।। २१॥ तं सुरचउक्कहीणं णरचउवजजुद पयडिपरिमाणं । सुरछप्पुढवीमिच्छा सिद्धोसरणा हु बंधंति ॥ २२ ॥ . १ देवचतुष्कसे देवगति देवगत्यानुपूर्वी वक्रियिकशरीर वैक्रियिक अंगोपांग जानना । .

८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तत् सुरचतुष्कहीनं नरचतुर्वअयुतं प्रकृतिपरिमाणं । सुरपपृथिवीमिथ्याः सिद्धापसरणा हि वनंति ॥ २२ ॥ अर्थ-उन इकहत्तरमेंसे देवचतुष्क घटानेसे तथा मनुष्यचतुष्क वज्रऋपम नाराच मिलानेसे बहत्तरि प्रकृतियोंको जिनके बंधापसरणसिद्ध हुए हैं ऐसे मिथ्यादृष्टि देव वा छह पृथिवियोंके. नारकी बांधते हैं ॥ २२ ॥ तं गरदुगुचहीणं तिरियगुणीचजुद पयडिपरिमाणं । उज्जोवेण जुदं वा सत्तमखिदिगा हु बंधंति ॥ २३ ॥ तत् नरद्विकोचहीनं तिर्यरिद्वकं नीचयुतं प्रकृतिपरिमाणं । उद्योतेन युतं वा सप्तमक्षितिका हि वनति ॥ २३ ॥ अर्थ-उन बहत्तरमेंसे मनुष्यद्विक उच्चगोत्रके विना और तिर्यंचद्विक नीचगोत्रसहित बहत्तर अथवा उद्योतसहित तेहत्तर प्रकृतियोंको सांतवीं नरकपृथ्वीवाले बांधते हैं ।। २३ ॥ इस तरह प्रकृतिबंध अबंधका विभाग कहा है। अंतोकोडाकोडीठिदं असत्थाण सत्थगाणं च । वि चउट्ठाणरसं च य बंधाणं बंधणं कुणइ ॥ २४ ॥ अंतःकोटाकोटिस्थितिं अशस्तानां शस्तकानां च । अपि चतु:स्थानरसं च च बंधानां बंधनं करोति ॥ २४ ॥ अर्थ-प्रथमसम्यक्त्वके सन्मुख चारोंगतिवाला मिथ्यादृष्टि जीव चध्यमानप्रकृतियोंके चौतीस बंधापसरणस्थानों से एक एक स्थान के प्रति पृथक्त्व सौसागर घटता क्रम लिये हुए अंतःकोडाकोड़ीसागर प्रमाण स्थिति वांधता है। और प्रशस्तप्रकृतियोंका चार स्थानको प्राप्त समय २ अनंतगुणा बढता बांधता है ॥२४॥ मिच्छणथीणति सुरचउ समवजपसत्थगमणसुभगतियं । णीचुक्कस्सपदेसमणुक्करसंवा पवंधदि हु ॥ २५ ॥ मिथ्यानत्यानत्रिक सुरचतुः समवनप्रशस्तगमनसुभगत्रिकं । नीचोत्कृष्टप्रदेशमनुत्कृष्टं वा प्रबध्नाति हि ॥ २५ ॥ अर्थ-यह जीव मिथ्यात्व अनंतानुबंधीचतुष्क स्त्यानगृद्धित्रिक देवचतुष्क समचतुरस वजऋषभनाराच प्रशस्तविहायोगति सुभगादि तीन नीचगोत्र-इन उन्नीसप्रकृतियोंका उत्कृष्ट वा अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध करता है ॥ २५॥ एदेहि विहीणाणं तिण्णिमहादंडएसु उत्ताणं । एकढिपमाणाणमणुकस्सपदेसवंधणं कुणइ ॥ २६ ॥ १ मनुष्य चतुष्कसे मनुष्यगति मनुष्यगत्यानुपूर्वी औदारिक शरीर औदारिक अंगोपांग जानना ।

लब्धिसारः। एतविहीनानां त्रिमहादंडकेपूक्तानाम् । एकपष्टिप्रमाणानामनुत्कृष्टप्रदेशवंधनं करोति ॥ २६ ॥ अर्थ-इनसे हीन जो तीन महादंडकों (स्थानों.) में कहीं गई ऐसी प्रकृतियोंमें इकसठ प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध करता है ।। २६ ॥ पढमे सच्चे विदिये पण तिदिये चउ कमा अपुणरुत्ता । इदि पयडीणमसीदी तिदंडएसुवि अपुणरुत्ता ॥ २७ ॥ प्रथमे सर्वे द्वितीये पंच तृतीये चतुः क्रमादपुनरुक्ताः । इति प्रकृतीनामशीतिः त्रिदंडकेष्वपि अपुनरुक्ताः ॥ २७ ॥ अर्थ-मनुप्यतिर्यचके बंध योग्य जो पहलादंडक ( स्थान ) उसमें सव ( इकहत्तर) ही अपुनरुक्त हैं भवननिकादिके योग्य दूसरे दंडकमें मनुष्यचतुष्क वज्रऋपभनाराच-ये पांच अपुनरुक्त हैं अन्यप्रकृतियां पहले दंडकमें कहीं ही थीं। और सातवीं पृथ्वीचा के योग्य तीसरे दंडकमें तिर्यंचद्विक नीचगोत्र उद्योत-ये चार अपुनरुक्त हैं। ऐसे तीनों दंड- कोंमें अपुनरुक्त अस्सी प्रकृतियां जाननी ॥ २७ ॥ ऐसे बंध कहा। अब उसी जीवके उदय कहते हैं:- उदये चउदसघादी णिद्दा पयलाणमेकदरगं तु । मोहे दस सिय णामे वचि ठाणं सेसगे सजोगेकं ॥ २८ ॥ उदये चतुर्दश घातिनः निद्रा प्रचलानामेकतरकं तु । मोहे दश स्यात् नामनि वचःस्थानं शेपके सयोग्येकं ॥ २८ ॥ अर्थ-प्रथमसम्यक्त्वके सन्मुख जीवके नरकगतिमें ज्ञानावरणकी पांच दर्शनावरणकी आदिकी चार अंतरायकी पांच-ऐसे चौदह तथा मोहनीयकी दस वा नौ वा आठ, आयुकी एक नरकायु नामकर्मकी भाषापर्याप्तिकालमें उदययोग्य उनतीस, वेदनीयकी एक गोत्रकी एक नीचगोत्र-ऐसे इन प्रकृतियोंका उदय है ॥ २८ ॥ यहांपर मोहनीय आदिकी प्रकृ. तियां बदलेनेसे जो भंग ( भेद ) होते हैं उनका कथन गोमटसारके कर्मकांडके स्थानसमु- कीर्तन अधिकारमें है वहांसे समझलेना । उदइल्लाणं उदये पत्तेक्कठिदिस्स वेदगो होदि । विचउठाणमसत्थे सत्ये उदयल्लरसभुत्ती ॥ २९ ॥ उदयवतामुदये प्राप्ते एकस्थितिकस्य वेदको भवति । द्विचतुःस्थानमशस्ते शस्ते उदीयमानरसभुक्तिः ।। २९ ।। अर्थ-उदयवाली प्रकृतियोंका उदय होनेकी अपेक्षा एक स्थिति जो उदयको प्राप्त ल,सा.२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । हुआ एक निषेक उसका ही भोगनेवाला वह जीव होता है । और अप्रशस्त प्रकृतियोंका द्विस्थानरूप तथा शुभ प्रकृतियोंका चारस्थानरूप अनुभागका भोगना उसके होता है।॥२९॥ अजहण्णमणुकस्सपदेसमणुभवदि सोदयाणं तु । उदयिल्लाणं पयडिचउकण्णमुदीरगो होदि ॥ ३०॥ अजघन्यमनुत्कृष्टप्रदेशमनुभवति सोदयानां तु । उदयवतां प्रकृतिचतुष्काणामुदीरको भवति ॥ ३० ॥ अर्थ-उदयरूप प्रकृतियोंका अजघन्य वा अनुत्कृष्ट प्रदेशको भोगता है। यहां जघन्य वा उत्कृष्ट परमाणुओंका उदय नहीं है । और प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभाग जो उदयरूप कहे हैं उनका ही यह जीव उदीरणा करनेवाला होता है । क्योंकि जिसके जिन प्रकृति- योंका उदय उसके उन्हींकी उदीरणा भी संभवती है ॥ ३० ॥ इसप्रकार उदय और उदीरणा कहे हैं। अव सत्त्व कहते हैं। दुति आउ तित्थहारचउक्कणा सम्मगेण हीणा वा। मिस्सेणूणा वा वि य सबे पयडी हवे सत्तं ॥ ३१ ॥ द्वित्रि आयुः तीर्थाहारचतुष्कानां सम्यक्त्वेन हीना वा । मिश्रेणोना वापि च सर्वेपां प्रकृतीनां भवेत् सत्त्वम् ॥ ३१ ॥ अर्थ-सम्यक्त्वके सन्मुख अनादि मिथ्यादृष्टिके अवद्धायुके तो भुज्यमान विना तीन आयु, तीर्थकर, आहारकचतुष्क, सम्यग्मोहनी, मिश्रमोहनी-इन दसके विना एकसौ अड़तीसका सत्त्व है । उसी बद्धायुके एक वध्यमान आयु सहित एकसौ उनतालीसका सत्त्व है। और सम्यक्त्वके सन्मुख सादि मिथ्यादृष्टि अबद्धायुके तो भुज्यमान विना तीन आयु, तीर्थकर आहारकचतुष्क-इन आठके विना एकसौ चालीसका सत्त्व है । सम्यक्त्वमोहनी- की उद्वेलना होनेपर एकसौ उनतालीसका सत्त्व है, मिश्रमोहनीयकी उद्वेलना होनेसे एकसौ अड़तीसका सत्त्व होता है । तथा उसी बद्धायुके बध्यमान आयुसहित एकसौ इक. तालीस एकसौ चालीस एकसौ उनतालीसका सत्त्व होता है क्योंकि आहारकचतुष्टयकी उद्वेलना हुए विना तीर्थकर सत्तावाला जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वके सन्मुख नहीं होता॥३१॥ अजहण्णमणुकस्सं ठिदीतियं होदि सत्तपयडीणं । एवं पयडिचउकं बंधादिसु होदि पत्तेयं ॥ ३२ ॥ अजघन्यमनुत्कृष्टं स्थितित्रिकं भवति सत्त्वप्रकृतीनाम् । एवं प्रकृतिचतुष्कं बंधादिपु भवति प्रत्येकम् ॥ ३२ ॥ अर्थ -उन सत्तारूप प्रकृतियोंके स्थिति अनुभाग प्रदेश हैं वे अजघन्य अनुत्कृष्ट हैं। यहां पर जघन्य वा उत्कृष्ट स्थिति अनुभाग प्रदेशका सत्त्व नहीं संभवता । इसप्रकार प्रकृति .

लब्धिसारः।
११
स्थिति अनुभाग प्रदेशरूप चतुष्क हैं वे बंध उदय उदीरणा सत्त्वमें कहे गये हैं सो
प्रायोग्यनामा चौथी लब्धिके अंततक जानने ॥ ३२ ॥
आगे करणलब्धिका स्वरूप कहते हैं;-
तत्तो अभवजोग्गं परिणामं चोलिऊण भन्दो हु।
करणं करेदि कमसो अधापवत्तं अपुवमणियहिं ।। ३३ ॥
ततः अभव्ययोग्यं परिणामं मुक्त्वा भव्यो हि ।
करणं करोति क्रमशः अधःप्रवृत्तमपूर्वमनिवृत्तिम् ॥ ३३ ॥
अर्थ-उसके बाद अभव्यके भी योग्य ऐसे चार लब्धिरूप परिणामोंको समाप्तकर
भव्यजीव ही अधःप्रवृत्त, अपूर्व, और अनिवृत्ति करण-इन तीन करोको करता है ॥३३॥
इन तीनों करणों ( परिणामों ) का गोमटसारके जीवकांडमें गुणस्थानाधिकारमें तथा
कर्मकांडमें त्रिकरणचूलिकाधिकार में विशेष व्याख्यान है वहांसे जानना ।
अब यहां भी सामान्यतासे कहते हैं-
अंतोमुहुत्तकाला तिण्णिवि करणा हवंति पत्तेयं ।
उचरीदो गुणियकमा कमेण संखेजस्वेण ॥ ३४ ॥
अंतर्मुहूर्तकालानि त्रीण्यपि करणानि भवंति प्रत्येकम् ।
उपरितः गुणितक्रमाणि क्रमेण संख्यातरूपेण ॥ ३४ ।।
अर्थ-तीनों ही करण हरएक अंतर्मुहूर्तकालतक स्थित रहते हैं तो भी ऊपरसे
संख्यातगुणा क्रम लिये हुए हैं । अनिवृत्तिकरणका काल थोड़ा है उससे अपूर्वकरणका काल
संख्यातगुणा है उससे संख्यातगुणा काल अधःप्रवृत्तकरणका है ।। ३४
जम्हा हेटिमभावा उबरिमभायेहिं सरिसगा हुँति ।
तम्हा पढमं करणं अधापयत्तोत्ति णिहिटं ॥ ३५ ॥
यस्मादधस्तनभावा उपरितनभावैः सहशा भवति ।
तस्मात् प्रथमं करणं अधःप्रवृत्तमिति निर्दिष्टम् ॥ ३५ ॥
अर्थ-जिसकारण नीचेके समयवर्ती किसी जीवके परिणाम ऊपरले समयवर्ती किसी
जीवके परिणामोंके समान होते हैं इसकारण ऐसे परिणामका नाम अधःप्रवृत्तिकरण है।
भावार्थ-करणोंका कथन नाना जीवोंकी अपेक्षा है सो किसी जीवको अधःकरण शुरू
किये थोड़ा काल हुआ किसीको बहुतकाल हुआ उनके परिणाम इस करणमें संख्या और
विशुद्धताकर समान भी होते हैं ऐसा जानना ॥ ३५ ॥
समए समए भिण्णा भावा तम्हा अपुवकरणो हु।
अणियट्टीवि तहं वि य पडिसमयं एकपरिणामो ॥ ३६ ॥

१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। समये समये भिन्ना भावा तस्मादपूर्वकरणो हि । अनिवृत्तिरपि तथैव च प्रतिसमयमेकपरिणामः ॥ ३६ ॥ अर्थ-समय समयमें जीवोंके भाव जुदे २ ही होते हैं इसीलिये ऐसे परिणामका नाम अपूर्वकरण है । और जहां हरसमयमें एक ही परिणाम हो वह अनिवृत्ति करण है। भावार्थ-किसी जीवको अपूर्वकरण शुरू किये थोड़ाकाल हुआ किसीको बहुतकाल हुआ वहां उनके परिणाम सर्वथा समान नहीं होते। नीचले समयवालोंके परिणामसे ऊपरले समयवालोंका परिणाम अधिकसंख्यावाला विशुद्धता सहित होता है और जिनको करण प्रारंभ कियें समान काल होगया उनके परिणाम आपसमें समान भी होते हैं अथवा असमान भी होते हैं । जिनको अनिवृत्तिकरण प्रारंभ किये समान काल हुआ उनके परि- णाम समान ही होते हैं और नीचले समयवालोंसे ऊपरले समयवालोंके अधिक होते हैं ऐसा जानना ॥ ३६॥ गुणसेढी गुणसंकम ठिदिरसखंड च णत्थि पढमम्हि । पडिसमयमणंतगुणं विसोहिवहीहिं वहदि हु ॥ ३७ ॥ गुणश्रेढी गुणसंक्रमं स्थितिरसखंड च नास्ति प्रथमे । प्रतिसमयमनंतगुणं विशुद्धिवृद्धिभिर्वर्धते हि ॥ ३७ ॥ अर्थ-पहले अधःकरणमें गुणश्रेणी गुणसंक्रम स्थितिकांडकघात अनुभागकांडकघात नहीं होता और यहां समय २ में अनंतगुणी विशुद्धता वढती है ॥ ३७ ॥ सत्थाणमसत्थाणं चउविठ्ठाणं रसं च बंधदि हु। पडिसमयमणंतेण य गुणभजियकमं तु रसवंधे ॥ ३८ ॥ शस्तानामशस्तानां चतुर्विस्थानं रसं च वनाति हि । प्रतिसमयमनंतेन च गुणभजितक्रमं तु रसवंधे ॥ ३८ ॥ अर्थ-साता आदि शुभप्रकृतियोंका हरसमय अनंतगुणा चारस्थानरूप अनुभाग वांधता है और असाता आदि अप्रशस्त प्रकृतियोंका समय समयके प्रति अनंतवें भाग ही अनु- भाग बांधता है ॥ ३८॥ पल्लस्स संखभागं मुहुत्तअंतेण उपरदे बंधे। संखेजसहस्साणि य अधापवत्तम्मि ओसरणा ॥ ३९ ॥ पल्यस्य संख्यभागं मुहूर्तातरेण उपरते बंधे। संख्येयसहस्राणि च अधःप्रवृत्ते अपसरणानि ॥ ३९॥ अर्थ-अधःप्रवृत्तकरणके पहले समयसे लेकर अंतर्मुहूर्ततक पूर्वस्थिति बंधसे पल्यके . असंख्यातवें भाग घटता हुआ स्थिति बंध होता है । और उसके बाद अंतर्मुहूर्ततक उससे भी पल्यके असंख्यातवें भाग घटता हुआ स्थितिबंध होता है । इस तरह एक अंतर्मुहूर्तकर ३ लन्धिसारः। १३ पल्यका असंख्यातवां भागमात्र स्थितिबंधापसरण होता है । इसप्रकार अधःप्रवृत्तिकरणमें अपसरण संख्यात हजार होते हैं ॥ ३९॥ आदिमकरणद्धाए पढमहिदिवंधदो दु चरिमम्हि । संखेजगुणविहीणो ठिदिवंधो होइ णियमेण ॥४०॥ आदिमकरणाद्धायां प्रथमस्थितिबंधतस्तु चरमे । संख्यातगुणविहीनः स्थितिबंधो भवति नियमेन ॥ ४० ॥ अर्थ-पहले कालमें पहले समयकी अंतःकोड़ाकोड़ीसागर प्रमाण स्थितिबंधसे उसके अंतसमयमें संख्यातगुणा हीन स्थितिबंध नियमसे होता है ॥ ४० ॥ तचरिमे ठिदिवंघो आदिमसम्मेण देससयलजमं । पडिबजमाणगस्स वि संखेजगुणेण हीणकमो ॥४१॥ तञ्चरमे स्थितिबंध आदिमसम्येन देशसकलयमम् । प्रतिपद्यमानस्यापि संख्येयगुणेन हीनक्रमः ।। ४१ ।। अर्थ-उस अंतके समयमें जो स्थितिबंध कहा है उससे देशसंयमसहित प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाले जीवके संख्यातगुणा कम स्थितिबंध होता है । उससे सकल- संयम (चरित्र ) सहित प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाले जीवके संख्यातगुणा कम स्थितिबंध होता है ।। ४१॥ आदिमकरणद्धाए पडिसमयमसंखलोगपरिणामा । अहियकमा हु विसेसे मुहत्तअंतो हु पडिभागो ॥१२॥ आदिमकरणाद्धायां प्रतिसमयमसंख्यलोकंपरिणामाः । अधिकक्रमा हि विशेपे मुहूर्तातर्हि प्रतिभागः ।। ४२ ॥ अर्थ-पहले अधःप्रवृत्तकरण कालमें त्रिकालवी जीवोंके जो कपायोंके विशुद्ध- स्थान होते हैं उनमें समय समयके प्रति संभव असंख्यातलोकमात्र परिणाम हैं । वे पहले समयसे द्वितीय आदि समयोंमें क्रमसे समान प्रमाणरूप एक एक विशेष ( चय) कर बढते हुए जानने । और उस चयका प्रमाण अंतर्मुहूर्तमात्र भागहारका भाग देनेसे आता है ॥ ४२ ॥ ताए अधापवत्तद्वाए संखेजभागमेत्तं तु । अणुकट्ठीए अद्धा णिवग्गणकंडयं तं तु ॥ ४३ ॥ तस्या अधःप्रवृत्ताद्धायाः संख्येयभागमानं तु । अनुकृष्ट्या अद्धा निर्वर्गणकांडकं तत्तु ॥ ४३ ॥ अर्थ-उस अधःप्रवृत्तकालके प्रमाण जो ऊर्ध्व गच्छ उसके संख्यातवें भागमात्र अनु:

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कृष्टिका गच्छ होता है । एक एक समय संबंधी परिणामोंमें इतने २ खंड होते हैं। वे . निर्वर्गणकांडक समान जानना ॥ ४३ ॥ पडिसमयगपरिणामा णिवग्गणसमयमेत्तखंडकमा । अहियकमा हु विसेसे मुहत्तअंतो हु पडिभागो ॥ ४४ ॥ प्रतिसमयगपरिणामा निर्वर्गणसमयमात्रखंडक्रमाः । अधिकक्रमा हि विशेपे मुहूर्तातहि प्रतिभागः ॥ ४४ ।। अर्थ-समय समयके परिणामोंमें निर्वर्गणाकांडक समान खंड करना । वे भी पहले खंडसे द्वितीय आदि क्रमसे विशेष (चय ) कर बढते हैं । वहां पहले खंडमें अंतर्मुहू- तका भाग देनेसे विशेषका प्रमाण आता है ॥ ४४ ॥ पडिखंडगपरिणामा पत्तेयमसंखलोगमेत्ता हु। लोयाणमसंखेजा छहाणाणी विसेसेवि ॥ ४५ ॥ प्रतिखंडगपरिणामाः प्रत्येकमसंख्यलोकमात्रा हि । लोकानामसंख्येया पटूस्थानानि विशेपेपि ॥ ४५ ॥ अर्थ-हरएक खंडमें जघन्य मध्यम उत्कृष्टता लिये हुए विशुद्धपरिणामोंके भेद असं- ख्यातलोकमात्र हैं और यहां एक एक खंडमें तथा एक एक अनुकृष्टि विशेषमें भी असं- ख्यातलोकमात्रवार छहस्थानरूपी वृद्धिका संभव है ॥ ४५ ॥ पढमे चरिमे समये पढमं चरिमं च खंडमसरित्थं । सेसा सरिसा सवे अट्टचंकादिअंतगया ॥ ४६ ॥ प्रथम चरमे समये प्रथमं चरमं च खंडमसदृशम् । शेषाः सदृशाः सर्वे अष्टोकायंतगताः ॥ ४६ ।। अर्थ-प्रथमसमयका प्रथमखंड अंतसमयका अंतखंड-ये दोनों तो किसी खंडके समान नहीं हैं । बाकी सबखंड अन्यखंडोंसे यथासंभव समान पाये जाते हैं उन खंडोमें जो परिणामोंका पुज कहा है उसमें पहला परिणाम अष्टांक है अर्थात् पूर्व परिणामसे अनं- तगुणा वृद्धिखरूप है । और अंतका परिणाम उवैक है अर्थात् पूर्वपरिणामसे अनंतभाग- वृद्धिरूप है । क्योंकि छह स्थानोंका आदि अष्टांक और अंत उर्वक कहा गया है ॥ ४६॥ चरिमे सब्वे खंडा दुचरिमसमओत्ति अवरखंडाए। असरिसखंडाणोली अधापवत्तम्हि करणम्मि ॥ ४७ ॥ १ वर्गणा अर्थात् समयोंकी समानता उससे रहित ऊपर २ समयवर्ती परिणामखंडोंका कांडक (पर्व) उसको निर्वर्गणाकांडक कहते हैं । वे अधःकरणकालमें संख्यात हजार होते हैं।

लब्धिसारः। १५ चरमे सर्वे खंडा द्विचरमसमय इति अपरखंडः। असदशखंडानामावलिरधःप्रवृत्ते करणे ॥ १७ ॥ अर्थ-अधःप्रवृत्तकरणकालमें अंतसमयके तो सवखंड और दूसरे समयसे लेकर द्विच- रमसमयतकके प्रथम प्रथम खंड हैं वे उनके ऊपरके समयके सवखंडोंसे समान नहीं हैं इसलिये असहश हैं ॥ ४७॥ पढमे करणे अवरा णिवग्गणसमयमेत्तगा तत्तो। अहिगदिणा वरमवरं तो वरपंती अणंतगुणियकमा ॥४८॥ प्रथमे करणे अवरा निर्गणसमयमात्रकाः ततः । अहिगतिना वरमवरमतो वरपंक्तिरनंतगुणितक्रमा ॥ १८ ॥ अर्थ-पहले करणमें विशुद्धताके अविभाराप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा हरएक समयके प्रथम- खंडोंके जघन्य परिणाम हैं वे ऊपर ऊपर अनंतगुणे हैं उसके बाद निर्वर्गणकांडके अंतस- मयके प्रथमखंडको जघन्य परिणामसे पहले समयके अंतखंडका उत्कृष्ट परिणाम अनंत- गुणा है । उससे द्वितीयकांडकके प्रथमसमयके प्रथमखंडका जघन्यपरिणाम अनंतगुणा है इसतरह जैसे सर्प इघरसे उधर उधरसे इधर गमन करता है उसीतरह जघन्यसे उत्कृष्टका उत्कृष्टसे जघन्यका अनंतगुणा क्रम है जबतक कि अंतकांडकके अंतसमयके प्रथमखंडका जघन्यपरिणाम होवे तबतक । यहां पट् स्थान नहीं संभवते ॥ १८ ॥ पढमे करणे पढमा उहगसेढीए चरमसमयस्स । तिरियगखंडाणोली असरित्थाणंतगुणियकमा ॥ १९ ॥ प्रथमे करणे प्रथमा ऊर्ध्वगण्याः चरमसमयस्य । तिर्यग्गतखंडानामावलिरसहशा अणंतगुणितक्रमा ॥ ४९ ।। अर्थ-प्रथमकरणमें समय समयके परिणामोंकी ऊपर २ पंक्ति करनेसे और अंतसम- यके परिणामोंकी बरोबर तिर्यग्रुपपंक्ति करनेसे अंकुशाकार रचना होती है । वह इनके ऊपरके परिणामोंसे समानरूप नहीं है इसलिये असदृश हैं। तथा ये परिणाम अनंतगुणा क्रमलिए विशुद्धताखरूप जानने ॥ ४९ ।। इसतरह अधाकरणका खरूप कहा। अव दूसरे अपूर्वकरणका खरूप कहते हैं;- पढम व विदियकरणं पडिसमयमसंखलोगपरिणामा। अहियकमा हु विससे मुहत्तअंतो हु पडिभागो ॥ ५० ॥ प्रथम व द्वितीयकरणं प्रतिसमयमसंख्यलोकपरिणामाः। अधिकंक्रमा हि विशेपे मुहूर्तातर्हि प्रतिभागः ॥ ५० ॥ अर्थ-पहले अधःकरणकी तरह दूसरा अपूर्वकरण है । उसमें विशेषता इतनी है कि वे १६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । असंख्यातलोकमात्र अधःकरणके परिणामोंसे अपूर्वकरणके परिणाम असंख्यातलोकगुणे हैं । समय समयके प्रति विशेष (चय ) कर अधिक हैं । सो प्रथमसमयके परिणामों में अंतर्मुहूर्तका भाग देनेसे चयका प्रमाण आता है ॥ ५० ॥ जम्हा उवरिमभावा हेटिमभावेहि णत्थि सरिसत्तं । तम्हा विदियं करणं अपुवकरणेत्ति णिद्दि ॥ ५१ ॥ यस्मादुपरिमभावानां अधस्तनभावैः नास्ति सहशत्वम् । तस्मात् द्वितीयं करणमपूर्वकरणमिति निर्दिष्टम् ॥ ५१ ॥ अर्थ-क्योंकि ऊपरसमयके परिणाम हैं वे नीचले समयके परिणामोंके समान इसमें नहीं होते । अर्थात् प्रथमसमयकी उत्कृष्ट विशुद्धतासे भी द्वितीयसमयकी जघन्य विशु- द्धता अनंत गुणी है । इसतरह परिणामोंमें अपूर्वपना है। इसलिये दूसरा करण अपूर्वकरण कहा गया है ॥ ५१ ॥ बिदियकरणादिसमयादंतिमसमओत्ति अवरवरसुद्धी। अहिगदिणा खलु सबे होंति अणंतेण गुणियकमा ॥ ५२ ॥ द्वितीयकरणादिसमयादंतिमसमय इति अवरवरशुद्धी । अहिगतिना खलु सर्वे भवंत्यनंतेन गुणितक्रमाः ॥ ५२ ॥ अर्थ-दूसरे करणके प्रथमसमयसे लेकर अंतसमयतक अपने जघन्यसे अपना उत्कृष्ट और पूर्वसमयके उत्कृष्ट से उत्तरसमयका जघन्यपरिणाम क्रमसे अनंतगुणी विशुद्धतालिये सर्पकी चालकी तरह जानना । यहाँपर अनुकृष्टि नहीं होती ॥ ५२ ॥ गुणसेढीगुणसंकमठिदिरसखंडा अपुवकरणादो। गुणसंकमणेण समा मिस्साणं पूरणोत्ति हवे ॥५३ ॥ गुणश्रेणीगुणसंक्रमस्थितिरसखंडा अपूर्वकरणात् । गुणसंक्रमणेन समा मिश्राणां पूरण इति भवेत् ॥ ५३ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणके पहले समयसे लेकर जबतक सम्यक्त्वमोहनीमिश्रमोहनीयका पूर्ण- काल है अर्थात् जिसकालमें गुणसंक्रमणसे मिथ्यात्वकों सम्यक्त्वमोहनीय मिश्रमोहनीयरूप परिणमाता है उसकालके अंतसमयतक गुणश्रेणी गुणसंक्रम स्थितिखंडन अनुभागखंडन ये चार आवश्यक होते हैं । ५३ ॥ ठिदिवंधोसरणं पुण अधापवत्ताणुपूरणोति हवे । ठिदिवंधद्विदिखंडुकीरणकाला समा होति ॥ ५४ ॥ स्थितिवंधापसरणं पुन: अधःप्रवृत्तानुपूरण इति भवेत् । स्थितिबंधस्थितिखंडोत्कीरणकालाः समा भवंति ॥ ५४ ।। Mm लन्धिसारः। १७ अर्थ-फिर स्थितिबंधापसरण है वह अधःप्रवृत्तकरणकालके प्रथमसमयसे लेकर गुण- संक्रमण पूर्ण होनेके कालतक होता है । यद्यपि प्रायोग्यलब्धिसे ही स्थितिबंधापसरण होता है तौभी प्रायोग्यलब्धिके सम्यक्त्व होनेका नियम नहीं इससे ग्रहण नहीं किया । और स्थितिबंधापसरणका काल तथा स्थितिकांडकोत्करण काल-ये दोनों समान अन्तर्मुहूर्तमान हैं ॥ ५४॥ गुणसेढीदीहत्तमपुचढुगादो दु साहियं होदि । गलिदवसेसे उदयावलिवाहिरदो दु णिक्खेवो. ॥ ५५ ॥ गुणश्रेणीदीर्वत्वमपूर्वद्विकात् तु साधिकं भवति । गलितावशेपे उदयावलिवाह्यतस्तु निक्षेपः ॥ ५५ ॥ अर्थ-गुणश्रेणीका निपेकोंके प्रमाणमात्र आयाम है वह अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण इन दोनोंके कालसे कुछ अधिक है । यह गुणश्रेणी आयाम गलितावशेष है यानी समय वीतनेपर यह गुणश्रेणी आयाम भी घटता जाता है । और उदयावलिसे वाह्य है क्योंकि उदयावलिसे ऊपर गुणश्रेणि आयामके निषेक हैं। उस गुणश्रेणी आयाममें गुणश्रेणीके- लिये अपकर्षण किये गये द्रव्योंका निक्षेपण किया जाता है ।। ५५ ।। णिक्खेवमदित्थावणमवरं समकरण आवलितिभागं । तण्णूणावलिमेत्तं विदियावलियादिमणिसेगे ।। ५६ ॥ निक्षेपमतिस्थापनमवरं समकरणमावलित्रिभागम् । तन्यूनावलिमात्रं द्वितीयावलिकादिमनिपेके ॥ ५६ ॥ अर्थ-द्वितीय आवलिके प्रथमनिपेकमें समय कम आवलीका त्रिभाग एक समय अधिकप्रमाण निषेक तो जघन्य निक्षेप है और उससे न्यून अर्थात् न मिलानेसे उतना कम आवलि मात्र जघन्य अतिस्थापन है ।। ५६ ॥ एतो समऊणावलितिभागमेत्तो तु तं तु णिक्खेवो । उपरि आवलिवजिय सगढिदी होदि णिक्खेओ ॥ ५७ ॥ अतः समयोनावलित्रिभागमात्रस्तु तत्खलु निक्षेपः । उपरि आवलिवर्जिता स्वकस्थितिर्भवति निक्षेपः ।। ५७ ॥ अर्थ-इससे ऊपर द्वितीयावलिके द्वितीयनिषेकका अपकर्षण किया उस जगह एक समय अधिक आवलिमात्र इसके नीचे निषेक हैं उनमें निक्षेप तो समय कम आवलिका त्रिभाग मात्र ही है अतिस्थापन पहलेसे एक समय अधिक है । इसतरह क्रमसे अतिस्था. पन एक एक समय अधिक जानना और निक्षेप पूर्वोक्त प्रमाण ही है ॥ ५७ ॥ १ अधिकका प्रमाण अनिवृत्तिकरणकालके संख्यातवें भागमान जानना । ल.सा. ३ १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । उक्करसहिदिवंधो समयजुदावलिदुगेण परिहीणो । उक्कडिदिम्मि चरिमे ठिदिम्मि उक्कस्सणिक्खेवो ॥ ५८॥ उत्कृष्टस्थितिबंधः समययुतावलिद्विकेन परिहीनः । उत्कृष्टस्थितौ चरमे स्थितौ उत्कृष्टनिक्षेपः ॥ ५८ ॥ अर्थ-स्थितिके अंत निषेकके द्रव्यको अपकर्षणकर नीचले निपेकोंमें निक्षेपण करनेसे उस अंत निषेकके नीचे आवलीमात्र निषेक तो अतिस्थापना वरूप है और समय अधिक दो आवलिकर हीन उत्कृष्ट स्थितिमात्र निक्षेप होता है । यह उत्कृष्टनिक्षेप जानना ॥५८॥ उक्करसहिदि वंधिय मुहत्तअंतेण सुज्झमाणेण । इगिकंडएण घादे तम्हि य चरिमस्स फालिस्स ॥ ५९॥ चरिमणिसेउकहे जेट्टमदित्थावणं इदं होदि । समयजुदंतोकोडीकोडि विणुक्कस्सकम्मठिदी ॥६० ॥ उत्कृष्टस्थितिं बंधयित्वा मुहूर्तान्तः शुद्ध्यता । एककांडकेन घाते तस्मिन् च चरमस्य फालेः ॥ ५९ ॥ . चरमनिपेकोत्क ज्येष्ठमतिस्थापनमिदं भवति । समययुतान्ताकोटीकोटिं विना उत्कृष्टकर्मस्थितिः ॥ ६ ॥ अर्थ-कोई जीव उत्कृष्टस्थिति बांधकर पीछे क्षयोपशमलब्धिसे विशुद्ध हुआ। तव बन्धी हुई स्थितिमें आवाधारूप बंधावलीके वीतजानेपर एक अंतर्मुहूर्तकालसे स्थितिकांड- कका घात किया उस जगह जो अंतकी फालिमें स्थितिके अंतनिपेकके द्रव्यको ग्रहणकर अवशेष रही हुई स्थितिमें दिया। वहां एकसमय अधिक अंतःकोडाकोड़ी सागरकर हीन उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण उत्कृष्ट अतिस्थापन होता है | भावार्थ-जैसे अंक संदृष्टिसे हजार समयकी स्थितिमें कांडकघातकर सौ समयकी स्थिति रक्खी । उसजगह हजारवें समयके निषेकके द्रव्यको आदिके सौसमयसंबंधी निषेकोंमें दिया वहांपर आठसौ निन्यानवै समय- मात्र उत्कृष्ट अतिस्थापन होता है ॥ ५९॥ ६० ॥ सत्तग्गद्विदिबंधो आदिठिदुकट्टणे जहण्णेण । आवलिअसंखभागं तेत्तियमेत्तेव णिक्खियदि ॥ ६१॥ सत्ताग्रस्थितिबन्ध आदिस्थित्युत्कर्षणे जघन्येन । आवल्यसंख्यभागं तावन्मात्रमेव निक्षिपति ॥ ६१ ॥ १ यहां बंधके वाद आवलिकालतक तो उदीरणा होती नहीं इसलिये एक आवलि तो आवाधामें गई एक आवली अतिस्थापनारूप रही और अंत निषेकका द्रव्य ग्रहण नहीं किया इसी कारण उत्कृष्टस्थि- तिमें दो आवलि एक समय कमती किया है।

लब्धिसारः। १९ अर्थ-पूर्व सत्तारूप निपेकोंमें अंतनिपेकके द्रव्यके उत्कर्षण करनेके समयमें बन्धे हुए समयप्रबद्धमें जो पूर्वसत्ताका अंतनिषेक जिससमय उदय आने योग्य हो उससमयमें उस निषेकके ऊपरवर्ती आवलिके असंख्यातवें भागमात्र निषेकोंको अतिस्थापनरूप रख उनके ऊपर वर्ती उतने ही आवलिके असंख्यातवें भागमात्र निपेकोंमें उस सत्ताका अंतनिपेकके द्रव्यको निक्षेपण करते हैं। यह उत्कर्षणमें जघन्य अतिस्थापन और जघन्य- निक्षेप जानना ॥ ६१॥ तत्तोदित्थावणगं वहृदि जावावली तदुक्कस्सं । उवरीदो णिक्खेओ वरं तु वंधिय ठिदी जेजें ॥ १२ ॥ वोलिय बंधावलियं उक्कट्ठिय उदयदोदु णिक्सिविय । उवरिमसमये विदियावलिपढमुक्कटणे जादे ॥ ६३ ।। तकालवजमाणे वरहिदीए अदित्थियावाहं । समयजुदावलियावाहूणो उक्कस्सठिदिवंधो ॥ ६ ॥ ततोतिस्थापनकं वर्धते यावदावलिस्तदुत्कृष्टम् । उपरितो निक्षेपो वरं तु वंधयित्वा स्थितिज्येष्ठम् ॥ ६२ ॥ अपलाप्य बंधावलिकामुत्कर्ण्य उदयतस्तु निक्षिप्य । उपरितनसमये द्वितीयावलिप्रथमोत्कर्पणे जाते ।। ६३ ॥ तत्कालवय॑माने वरस्थित्या अतिस्थितावाधां । समययुतावलिकावाधोनः उत्कृष्टस्थितिवन्धः ॥ ६४ ।। अर्थ- -~-उस पूर्व सत्त्वके अंतनिषेकसे लगते नीचेके निपेकोंका उत्कर्षण होनेपर निक्षेप तो पूर्वोक्त प्रमाण ही रहता है और अतिस्थापन क्रमसे एक एक समय वढता हुआ होता है जब तक आवलिमात्र उत्कृष्ट अतिस्थापन हो तबतक यह क्रम है । अव उत्कृष्ट निक्षे- पक ही होता है ऐसा कहते हैं। किसी जीवने पहले उत्कृष्ट स्थिति बांध पीछे उसकी आवाधामें एक आवलि छोड़कर उसके बाद उस समयप्रवद्ध के अंतके निषेकको अपकर्षण किया । उसजगह उसके द्रव्यको अवशेष वर्तमानसमयमें उदययोग्य निपेकसे लेकर सब निषेकोंमें दिया । इसतरह पहले अपकर्षण क्रिया की, फिर उसके ऊपरवर्ती समयमें पहले अपकर्षण क्रिया करनेसे जो द्रव्य द्वितीयावलिके प्रथमनिपेको दिया था उसका उत्कर्षण किया । तव उसके द्रव्यको उस उत्कर्षण करनेके समयमें बंधा जो उत्कृष्टस्थिति लिये हुए समय प्रबद्ध उसके आबाधाकालको छोड़कर जो प्रथमादि निषेक पाये जाते हैं उनमें अंतके समय अधिक आवलिमात्र निषेक छोड़ अन्य सब निपेकोंमें निक्षेपण किया जाता २० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । है। और यहां एक समय अधिक आवलिकर सहित जो आवाधाकाल उससे हीन जो उत्कृष्ट काँकी स्थिति उस प्रमाण उत्कृष्ट निक्षेप जानना ।। ६२ । ६३ । ६४ ॥ अहवावलिगदवरठिदिपढमणिसेगे वरस्स बंधस्स । विदियणिसेगप्पहुदिसु णिक्खित्ते जेद्वणिक्खेओ ॥६५ ॥ अथवावलिगतवरस्थितिप्रथमनिपेके वरस्य वंधस्य । द्वितीयनिपेकप्रभृतिषु निक्षिप्ते ज्येष्ठनिक्षेपः ।। ६५ ।। अर्थ-अथवा किसी आचार्यके मतसे निक्षेप ऐसा माना गया है कि बांधी हुई उत्कृष्ट स्थितिकी बधावलिको छोड़ उसके बाद उसके प्रथमनिपेकका उत्कर्षण कर उसके द्रव्यको उस उत्कर्षण करनेके समयमें वन्धे उत्कृष्ट स्थिति लिये हुए समयप्रवद्धके द्विती- यनिषेकको आदि लेकर अंतमें अतिस्थापनावलीमात्रनिकोंको छोड़ सब निपेकोंमें निक्षेपण पण किया। वहांपर एक समय सहित एक आवलि और वन्धीस्थितिका आवाधाकाल इन दोनोंकर हीन उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण उत्कृष्ट निक्षेप होता है ॥६५॥ उकस्सटिदिवंधे आवाहागा ससमयमावलियं । उदरियणणिसेगेसुकढेसु अवरमावलियं ॥ ६६ ॥ उत्कृष्टस्थितिवंधे आवाधाया ससमयामावलिकाम् । उदीयमाणनिपेकेपूत्कर्पपु अवरमावलिकम् ।। ६६ ।। अर्थ-उत्कृष्ट स्थिति लिये हुए जो उत्कर्षण करनेके समयमें वन्धा समयप्रबद्ध है उसकी आबाधाकालके अन्तसमयसे लेकर एक समय अधिक आवलि मात्र समय पहले उदय आने योग्य जो सब सत्ताका निपेक उसके उत्कर्षण करनेपर आवलिमात्र जघन्य अतिस्थापन होता है ।। ६६ ॥ उदरिय तदो विदीयावलिपढमुक्कटणे वरं हेट्ठा । अइटावणमावाहा समयजुदावलियपरिहीणा ॥ ६७ ॥ उदीर्य ततो द्वितीयावलिप्रथमोत्कर्पणे वरमधस्तना । अतिस्थापना आवाधा समययुतावलिकपरिहीना ॥ ६७ ॥ अर्थ-उसके बाद उससे पहले उदय आने योग्य ऐसा दूसरा कोई सत्तारूप समय- प्रबद्ध संबन्धी द्वितीय आवलिका प्रथम निषेक उसके उत्कर्षण होनेपर नीचे एक समय अधिक आवलिकर हीन आबाधाकालके प्रमाण उत्कृष्ट अतिस्थापन होता है ॥ ६७ ॥ अब प्रसंग पाकर गुणश्रेणीका विधान करते हैं; उदयाणमावलिम्हि य उभयाणं बाहरम्मि खिवणटुं । लोयाणमसंखेजो कमसो उकट्टणो हारो॥ ६८॥ - लब्धिसारः। उदीयमानानामावलौ चोभयानां वाह्ये क्षेपणार्थम् । लोकानामसंख्येयः क्रमश उत्कर्पणो हारः॥ ६८ ॥ अर्थ-जिन प्रकृतियोंका उदय पाया जाता है उन्हींके द्रव्यका उदयावलिमें निक्षेपण होता है। उसके लिये असंख्यातलोकका भागहार जानना । और जिनके उदय और अनु- दय हैं उन दोनोंके द्रव्यका उदयावलिसे वाह्य गुणश्रेणीमें अथवा ऊपरकी स्थितिम निक्षे- पण होता है उसके लिये अपकर्षण भागहार जानना ॥ ६८ ॥ क्रमशः इस पदसे पल्यका असंख्यातवें भागका भी भाग प्रगट किया है। आगे इसी कथनको खुलासा करते हैं:- उक्कद्विदइगिभागे पल्लासंखेण भाजिदे तत्थ । बहुभागमिदं दवं उचरिलठिदीसु णिक्खियदि ॥ ६९ ॥ उत्कर्पितैकभागे पल्यासंख्येन भाजिते तत्र । बहुभागमिदं द्रव्यमुपरितनस्थितिपु निक्षिपति ॥ ६९ ॥ अर्थ-अपकर्षण भागहारका भाग देनेपर एक भागमें पल्यका : असंख्यातवें भागका भागदिया उसमेंसे बहुभाग ऊपरकी स्थितिमें निक्षेपण वह जीव करता है ।। ६९ ॥ सेसगभागे भजिदे असंखलोगेण तत्थ बहुभागं । गुणसेढीए सिंचदि सेसेगं चेव उदयम्हि ॥ ७० ॥ शेपकभागे भजितेऽसंख्यलोकेन तत्र वहुभागम् । गुणश्रेण्या सिंचति शेपैकं चैव उदये ॥ ७० ॥ अर्थ-अवशेष ( वाकी ) एक भागको असंख्यातलोकका भाग देना वहां वहुभागको गुणश्रेणी आयाममें देना और बाकीका एक भाग उदयावलिमें देना ॥ ७० ॥ उदयावलिस्स दवं आवलिभजिदे दु होदि मज्झधणं । रूऊणद्धाणद्वेणूणेण णिसेयहारेण ॥ ७१ ॥ मज्झिमधणमवहरिदे पचयं पचयं णिसेयहारेण । गुणिदे आदिणिसेयं विसेसहीणं कमं तत्तो ॥ ७२ ॥ उदयावलेद्रव्यमावलिभजिते तु भवति मध्यधनम् । रूपोनाद्धानार्धेनोनेन निपेकहारेण ॥ ७१ ॥ मध्यमधनमवहरिते प्रचयं प्रचयं निपेकहारेण । गुणिते आदिनिपेकं विशेषहीनं क्रमं ततः ॥ ७२ ॥ अर्थ-उदयावलिमें दिया जो द्रव्य उसको आवलीके समय प्रमाणका भाग देनेपर मध्यधन होता है । और उस मध्यधनको एक कम आवलि प्रमाण गच्छके आधेकम निपे- २२ . -- -- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कहारका भागदेनेसे चयका प्रमाण होता है । उस चयको निषेक हारसे (दो गुणहानिसे) गुणा करनेपर आवलीके प्रथम निषेकके द्रव्यका प्रमाण आता है। उससे द्वितीयादिनि. घेकोंमें दिये क्रमसे एक एक चयकर घटता प्रमाण लिए जानना। वहां एक कम आवली- 'मात्र चय घटनेपर अंतनिषकमें दिये द्रव्यका प्रमाण होता है। ऐसे उदयावलिके निषे. 'कोंमें दिये द्रव्यका विभाग है ।। ७१ । ७२ ॥ उक्कहिदम्हि देदि हु असंखसमयप्पवंधमादिम्हि । संखातीदगुणक्कममसंखहीणं विसेसहीणकमं ॥ ७३ ॥ अपकर्पिते ददाति हि असंख्यसमयप्रवद्धमादौ । संख्यातीतगुणक्रममसंख्यहीनं विशेपहीनक्रमम् ॥ ७३ ॥ अर्थ-गुणश्रेणीकेलिये अपकर्षण किये द्रव्यको प्रथमसमयकी एक शलाका उससे दूसरेकी असंख्यातगुणी इसतरह अंत समयतक असंख्यातगुणा क्रमलिये हुए जो शलाका उनको जोड़ उसका भाग देनेसे जो प्रमाण आवे उसको अपनी २ शलांकाओंसे गुणाक- रनेसे गुणश्रेणिआयामके प्रथमनिषेकमें दिया द्रव्य असंख्यात समयप्रवद्ध प्रमाण आता है। उससे द्वितीयादिनिकोंमें द्रव्य क्रमसे असंख्यातगुणा अंत समयतक जानना । प्रथम. निषेकमें द्रव्य गुणश्रेणीके अंत निषेकमें दिये द्रव्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । प्रथम गुणहानिका द्वितीयादि निषकोंमें दिया द्रव्य चय घटता क्रमलिये हुए है ॥ ७३ ॥ पडिसमयं उक्कट्टदि असंखगुणियक्कमेण संचदिय । इदि गुणसेढीकरणं आउगवजाण कम्माणं ॥ ७४ ॥ प्रतिसमयमपकर्षति असंख्यगुणितक्रमेण संचिनोति । इति गुणश्रेणीकरणमायुष्कवानां कर्मणाम् ॥ ४ ॥ अर्थ-गुणश्रेणी करने के द्वितीयादि अंतपर्यंत समयोंमें समय समयके प्रति असंख्यात गुणा क्रम लिये द्रव्यको अपकर्षण करता है और संचित अर्थात् पूर्वोक्त प्रकार उदयावलि आदिमें उसे निक्षेपण करता है । ऐसे. मिथ्यात्वकी तरह आयुके विना सातकोंका गुण- श्रेणीविधान समय २ में होता है सो जानना ॥ ७४ ॥ आगे गुणसंक्रमणका खरूप कहते हैं। पडिसमयमसंखगुणं-दवं संकमदि अप्पसत्थाणं । बंधुज्झियपयडीणं बंधं संजादिपयडीसु ॥ ७५ ॥ प्रतिसमयमसंख्यगुणं द्रव्यं संक्रामति अप्रशस्तानां । बन्धोज्झितप्रकृतीनां बन्धं स्वजातिप्रकृतिषु ॥ ७५ ॥ 'अर्थ-जिनका बन्ध न पाया जावे ऐसी अप्रशस्त प्रकृतियोंका द्रव्य है वह समय २ लब्धिसारः। २३ के प्रति असंख्यातगुणा क्रमलिये जिनका बन्ध पाया जावे ऐसी स्वजातिप्रकृतियों में संक्र- मण करता है । अर्थात् अपने खरूपको छोड़ उसरूप परिणमता है ॥ ७५ ॥ एवंविह संकमणं पढमकसायाण मिच्छमिस्साणं । संजोजणखवणाए इदरेसिं उभयसेढिम्मि ॥ ७६ ॥ एवंविधं संक्रमणं प्रथमकपायाणां मिथ्यमियोः । संयोजनक्षपणयोरितरेपामुभयश्रेणौ ॥ ७६ ।। अर्थ-ऐसा असंख्यातगुणा क्रमलिये हुए जो संक्रमण उसको गुणसंक्रमण कहते हैं । वह अनन्तानुबंधीकषायोंका गुणसंक्रमण उनके विसंयोजनमें होता है और मिथ्यात्व मिश्रमोहनीयका गुणसंक्रमण उनकी क्षपणामें होता है और अन्य प्रकृतियोंका गुणसंक्रमण उपशमक वा क्षपक श्रेणीमें पाया जाता है ॥ ७६ ॥ आगे स्थितिकांडक घातका स्वरूप कहते हैं- पढमं अवरवरडिदिखंडं पल्लस्म संखभागं खु । सायरपुधत्तमेत्तं इदि संखसहस्सखंडाणि ॥ ७७ ।। प्रथममवरवरस्थितिखंडं पल्यस्य संख्येयभागं खलु । सागरपृथक्त्वमात्रमिति संख्यसहस्रखंडानि ।। ७७ ।। अर्थ-अपूर्वकरणके पहले समयमें किया जो स्थितिकांडक आयाम वह जघन्य तो पल्यका संख्यातवां भागमात्र और उत्कृष्ट पृथक्त्वसागरप्रमाण है । इसतरह स्थितिखंड अपूर्वकरणके कालमें संख्यात हजार होते हैं ॥ ७७ ॥ आउगवजाणं ठिदिघादो पढमादु चरिमठिदिसंतो। ठिदिवंधो य अपुवो होदि हु संखेजगुणहीणो ॥ ७८ ॥ आयुष्कवानां स्थितिघातः प्रथमाञ्चरमस्थितिसत्त्वं । स्थितिबंधश्चापूर्वो भवति हि संख्येयगुणहीनः ॥ ७८ ॥ अर्थ-आयुकर्मको छोड़कर शेषकर्मोंके स्थितिखंड स्थितिसत्त्व स्थितिबन्ध हैं वे अपूर्वकरणके पहले समयसे अन्तके समयमें संख्यातगुणे कम हैं । यहाँपर संख्यात हजार स्थितिकांडक घातकर स्थितिसत्त्वका और संख्यात हजार स्थितिवन्धापसरणकर स्थितिबन्धका संख्यातगुणा कम होना जानना चाहिये ।। ७८ ॥ आगे अनुभागकांडकघातको कहते हैं- एकेकढिदिखंडयणिवडणठिदिवंधओसरणकाले । संखेजसहस्साणि य णिवडंति रसस्स खंडाणि ॥ ७९ ॥ १पृथक्त्व सात वा आठको कहते हैं।

रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् ।
२४
एकैकस्थितिकांडकनिपतनस्थितिवन्धापसरणकाले ।
संख्येयसहस्राणि च निपतन्ति रसस्य खंडानि ॥ ७९ ॥
अर्थ-जिसकर एकवार स्थिति सत्त्व घटाया जावे वह स्थितिकांडकोत्करणकाल है,
और जिसकर एकवार स्थितिबन्ध घटाया जावे वह स्थितिबन्धापसरण काल. है । ये दोनों
समान हैं अन्तर्मुहूर्तमात्र हैं। उन दोनों से किसी एकमें जिसकर अनुभागसत्त्व घटाया
जाता है ऐसे अनुभागखंडोत्करणकाल संख्यात हजार होते हैं ॥ ७९ ॥
असुहाणं पयडीणं अणंतभागा रसस्स खंडाणि ।
सुहपयडीणं णियमा णस्थित्ति रसस्स खंडाणि ।। ८० ॥
अशुभानां प्रकृतीनामनन्तभागा रसस्य खण्डानि ।
शुभप्रकृतीनां नियमानास्तीति रसस्य खण्डानि ।। ८० ॥
अर्थ-अशुभरूप असातादि प्रकृतियोंका अनुभागखण्ड ( अनुभागकाण्डकायाम )
अनन्त बहुभाग मात्र होता है । और साता वेदनीय आदि शुभ प्रकृतियोका अनुभागकां-
डक घात नियमसे नहीं है ।। ८० ॥
रसगदपदेसगुणहाणिहाणगफहयाणि थोवाणि ।
अइत्थावणणिक्खेवे रसखंडेणंतगुणियकमा ॥ ८१ ॥
रसगतप्रदेशगुणहानिस्थानकस्पर्धकानि स्तोकांनि ।
अतिस्थापननिक्षेपे रसखण्डेऽनन्तगुणितक्रमाणि ॥ ८१॥
अर्थ-अनुभागको प्राप्त ऐसे कर्मपरमाणुओंके एकगुणहानिस्थानमें थोड़े स्पर्धक होते
हैं उससे अनन्तगुणे अतिस्थापनारूप स्पर्धक हैं उससे अनन्तगुणा अनुभागकांडक आयाम
है ।। ८१॥
पढमापुवरसादो चरिमे समये पअच्छइदराणं ।
रससत्तमणतगुणं अणंतगुणहीणयं होदि ॥ ८२ ॥
प्रथमापूर्वरसात् चरमे समये प्रशस्तेतरेषाम् ।
रससत्त्वमनन्तगुणमनन्तगुणहीनकं भवति ॥ ८२ ॥
अर्थ-अपूर्वकरणके पहले समयका प्रशस्त और अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभागसत्त्व
उससे उसके अन्तसमयमें प्रशस्तोंका अनन्तगुणा बढता हुआ और अप्रशस्तोंका अनन्त-
गुणा घटता हुआ अनुभागसत्त्व होता है ॥ ८२ ॥
आगे अनिवृत्तिकरणके कार्य कहते हैं-
विदियं व तदियकरणं पडिसमयं एक एक परिणामो।
अण्णं ठिदिरसखंडे अण्णं ठिदिवंधमाणुवई ॥ ८३॥

लब्धिसारः। २५ द्वितीयमिव तृतीयकरणं प्रतिसमयमेक एकः परिणामः । अन्ये स्थितिरसखंडे अन्यत् स्थितिवंधमाप्नोति ।। ८३ ॥ अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणमें कहे हुए स्थितिखण्डादिकार्य तीसरे अनिवृत्तिकरणमें भी जानना । लेकिन इतना भेद है कि समय समयमें एक एक परिणाम ही होता है और यहां अन्य ही प्रमाणलिये हुए स्थितिखण्ड अनुभागखण्ड तथा स्थितिबन्धका प्रारंभ होता है ॥ ८३ ॥ संखजदिमे सेसे दसणमोहस्स अंतरं कुणई । अण्णं ठिदिरसखंडं अण्णं ठिदिवंधणं तत्थ ॥ ८४ ॥ संख्येये शेपे दर्शनमोहस्यांतरं करोति । अन्यत् स्थितिरसखंडमन्यत् स्थितिबंधनं तत्र ।। ८४ ॥ अर्थ-इसतरह स्थितिखण्डादिकर अनिवृत्तिकरणकालका संख्यातवां भाग वाकी रहने- पर दर्शनमोहका अन्तर ( अभाव ) करता है। वहां उसके कालके प्रथमसमयमें अन्य ही स्थितिखण्ड अनुभागवन्ध स्थितिवन्धका प्रारंभ होता है ।। ८४ ॥ एयटिदिखंडकारणकाले अंतरस्स णिप्पत्ती। अंतोमुहुत्तमेत्तं अंतरकरणस्स अद्धाणं ॥ ८५ ॥ एकस्थितिखंडोत्करणकाले अंतरस्य निष्पत्तिः । अंतर्मुहूर्तमात्रमंतरकरणस्याद्धा ॥ ८५ ॥ अर्थ-एक स्थितिखण्डोत्करणकालमें अन्तरकरणकी उत्पत्ति होती है । वह अन्तरक- रणका काल अन्तर्मुहूर्तमात्र है ॥ ८५ ॥ गुणसेढीए सीसं तत्तो संखगुण उवरिमठिदिं च । हेटुवरिम्हि य आवाहुज्झिय वंधम्हि संथुहदि ॥ ८६ ॥ गुणभेण्याः शीर्प ततः संख्यगुणं उपरितनस्थितिं च । अधस्तनोपरि चावाघोज्झित्वा वंधे संपातयति ।। ८६ ॥ अर्थ-गुणश्रेणीशीर्षके सब निषेक और उससे संख्यातगुणे ऊपरकी स्थिति के निषेक इन दोनोंको मिलानेसे अन्तरायाम होता है अर्थात् इतने निपेकोंका अभाव किया जाता है वह अन्तर्मुहूर्तमात्र है । उसके द्रव्यको मिथ्यात्वकर्मकी स्थितिका आवाधाकाल छोड़कर अन्तरायामसमान निकोंके नीचे वा ऊपरके निषेकोंमें निक्षेपण करता है ।। ८६ ।। अंतरकडपढमादो पडिसमयमसंखगुणिदमुवसमदि । गुणसंकमेण दंसणमोहणियं जाव पढमठिदी ॥ ८७ ॥ ल.सा.४ २६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अन्तरकृतप्रथमतः प्रतिसमयमसंख्यगुणितमुपशाम्यति । गुणसंक्रमेण दर्शनमोहनीयं यावत् प्रथमस्थितिः ।। ८७ ॥ अर्थ-अन्तरकृत हुआ प्रथमस्थितिके प्रथमसमयसे लेकर उसीके अन्तरसमय तक समय समयके प्रति असंख्यातगुणा क्रमलिये अन्तरायामके ऊपरवर्ती निकरूप द्वितीय- स्थितिमें रहनेवाला जो दर्शनमोह उसके द्रव्यको गुणसंक्रमण भागहारसे माजित कर उप- शमाता है जब तक पहली स्थिति है ॥ ८७ ।। पढमष्ठिदियावलिपडिआवलिसेसेसु णत्यि आगाला। पडिआगाला मिच्छत्तस्स य गुणसेढिकरणंपि ॥ ८८ ॥ प्रथमस्थितावावलिप्रत्यावलिशेपेषु नास्ति आगालाः । प्रत्यागाला मिथ्यात्वस्य च गुणश्रेणिकरणमपि ॥ ८८ ॥ अर्थ-प्रथमस्थितिमें उदयावलि और एकसमय अधिक द्वितीयावलि वाकी रहे वहां आगाल, प्रत्यागाल और मिथ्यात्वकी गुणश्रेणी नहीं होती । अर्थात् दर्शनमोहके विना अन्यकर्मोंकी गुणश्रेणी होती ही है ॥ ८८ ॥ द्वितीयस्थितिके निपेकोंके द्रव्यको अपक- पण कर प्रथमस्थितिके निपेकोंमें प्राप्त करनेको आगाल कहते हैं, प्रथमस्थितिके निषेक- द्रव्यको उत्कर्षणकर द्वितीय स्थिति के निपेकोंमें प्राप्त करना उसे प्रत्यागाल कहते हैं । अंतरपढमं पत्ते उपसमणामो हु तत्थ मिच्छत्तं । ठिदिरसखंडेण विणा उयइट्ठादूण कुणदि तदा ॥ ८९ ॥ अंतरप्रथमं प्राप्ते उपशमनाम हि तन मिथ्यात्वम् । स्थितिरसखंडेन विना उपस्थापयित्वा करोति तदा ॥ ८९ ॥ अर्थ-इस तरह अनिवृत्तिकरणकालको समाप्त होनेपर उसके बाद अन्तरायामके प्रथ- मसमयको प्राप्त होते दर्शनमोह और अनन्तानुबन्धी चतुष्क इनका उपशम होनेसे यह जीव तत्त्वार्थश्रद्धानरूप उपशम सम्यग्दृष्टी होता है। वहां द्वितीयस्थितिके प्रथमसमयमै मौजूद मिथ्यात्वद्रव्यको स्थितिकांडक अनुभागकांडकके घातके विना गुणसंक्रमणका भाग देकर तीनप्रकार परिणमाता है ॥ ८९ ॥ मिच्छत्तमिस्ससम्मसरूवेण य तत्तिधा य दवादो। सत्तीदो य असंखाणंतेण य होंति भजियकमा ॥ ९० ॥ मिथ्यात्वमिश्रसम्यस्वरूपेण च तत्रिधा च द्रव्यतः । शक्तितश्च असंख्यानतेन च भवंति भजितक्रमाः ॥ ९०॥ अर्थ-वह मिथ्यात्वद्रव्य मिथ्यात्व मिश्र सम्यक्त्वमोहनीयरूप तीनतरहका होता है।

लब्धिसारः।
२७
।
वह क्रमसे द्रव्य अपेक्षा असंख्यातवां भागमात्र और अनुभाग अपेक्षा अनन्तवां भागमात्र
जानना ॥ ९० ॥
पढमादो गुणसंकमचरिमोत्ति य सम्म मिस्ससंमिस्से ।
अहिगदिणाऽसंखगुणो विज्झादो संकमो तत्तो ॥११॥
प्रथमात् गुणसंक्रमचरम इति च सम्यगू मिश्रसंमिश्रे ।
अहिगतिनासंख्यगुणो विध्यातः संक्रमः ततः ॥ ९१ ।।
अर्थ-गुणसंक्रमणकालके प्रथमसमयसे लेकर अन्तसमयतक समय २ सर्पकी चालकी
तरह असंख्यात गुणा क्रम लिए मिथ्यात्वका द्रव्य है वह सम्यक्त्व मिश्रप्रकृतिरूप
परिणमता है। यहां विध्यातका अर्थ मन्द है सो यहांपर विशुद्धता मन्द होनेसे सूच्य-
गुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण जो विध्यातसंक्रम उसका भागदेनेसे जो प्रमाण आवे
उतने द्रव्यको सम्यक्त्व मोहनीय मिश्रमोहनीयरूप परिणमाता है ।। ९१ ।।
विदियकरणादिमादो गुणसंकमपूरणस्स कालोति ।
वोच्छं रसखंडुक्कीरणकालादीणमप्प बहु ॥ ९२ ॥
द्वितीयकरणादिमात् गुणसंक्रमपूरणस्य काल इति ।
वक्ष्ये रसखंडोत्करणकालादीनामल्पं बहु ॥ ९२ ।।
अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर गुणसंक्रमकालके पूर्णपनेतक संभवते
अनुभागकांडक उत्करणकालादि हैं उनका अल्पवहुत्व आगे कहेंगे ॥ ९२ ॥
अंतिमरसखंडुक्कीरणकालादो दु पढमओ अहिओ।
तत्तो संखेजगुणो चरिमष्टिदिखंडहदिकालो ॥ ९३ ॥
अंतिमरसखंडोत्करणकालतस्तु प्रथमो अधिकः ।
ततः संख्यातगुणः चरमस्थितिखंडहतिकालः ॥ ९३ ॥
अर्थ-अन्तसमयमें संभव ऐसा अनुभागखण्डोत्करणकाल है वह थोड़ा है उससे अपू-
करणके प्रथमसमयमें आरंभ होनेवाला अनुभागकांडकोत्करणकाल है उससे संख्यातगुणा
अन्तका स्थितिकांडकोत्करणकाल है और स्थितिवन्धापसरण काल भी इतना ही है क्योंकि
ये दोनों आपसमें समान हैं। ९३ ।।
तत्तो पढमो अहिओ पूरणगुणसेढिसेसपढमठिदी।
संखेण य गुणियकमा उवसमगद्धा विसेसहिया ॥ ९४ ॥
ततः प्रथम अधिकः पूरणगुणश्रेणिशेपप्रथमस्थितिः ।
संख्येन च गुणितक्रमा उपशमकाहा विशेषाधिकाः ॥ ९४ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-उससे अधिक अपूर्वकरणके पहले समयमें प्रारंभ होनेवालेका काल है । उससे संख्यातगुणा गुणसंक्रम पूरण करनेका काल है उससे संख्यात गुणा गुणश्रेणीशीर्ष है उससे संख्यातगुणा प्रथम स्थितिका आयाम है उससे समयकम दो आवलिमात्र विशेषकर अधिक दर्शनमोहके उपशमानेका काल है ।। ९४ ॥ अणियट्टियसंखगुणे णियहिए सेढियायदं सिद्धं । उवसंतद्धा अंतर अवरावरवाह संखगुणिदकमा ॥ ९५ ॥ अनिवृत्तिकसंख्यगुणं निवृत्तिकं श्रेण्यायतं सिद्धम् । उपशांताद्धा अंतरमवरवरवाधा संख्यगुणितक्रमा ।। ९५ ।। अर्थ-उससे संख्यातगुणा अनिवृत्ति करण काल है उससे संख्यात गुणा अपूर्वकरण काल है उससे अनिवृत्तिकरणकाल और इसका संख्यातवां भागमात्र विशेषकर अधिक गुणश्रेणि आयाम है उससे संख्यातगुणा उपशम सम्यक्त्वकाल है । उससे संख्यातगुणा अन्तरायाम है । उससे संख्यात गुणी जघन्य आवाधा है उससे संख्यातगुणी उत्कृष्ट आबाधा है ॥ ९५ ॥ पढमापुवजहणं ठिदिखंडमसंखमं गुणं तस्स । वरमवरहिदिसत्ता एदे य संखगुणियकमा ॥९६ ॥ प्रथमापूर्वजघन्यं स्थितिखंडमसंख्यातं गुणं तस्य । वरावरस्थितिसत्त्वे एतानि च संख्यगुणितक्रमाणि ॥ ९६ ॥ अर्थ-उससे संख्यात गुणा पत्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण जघन्यस्थितिकांडक आयाम है उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके पहले समयमें संभव उत्कृष्ट स्थितिकांडक आयाम है उससे संख्यातगुणा मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिवन्ध है उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके पहले समयमें संभव उत्कृष्ट स्थिति बन्ध है उससे संख्यात गुणा मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसत्त्व है उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें संभवता उत्कृष्ट स्थिति सत्त्व है । यहां पर जघन्य स्थितिबन्धादि चार पदोंका प्रमाण सामान्यरीतिसे अन्तःकोड़ा- कोड़ी सागर है ॥ ९६ ॥ इसतरह पञ्चीस जगह अल्पबहुत्व कहा गया है। अंतो कोडाकोडी जाहे संखेजसायरसहस्से । . णूणा कम्माण ठिदी ताहे उवसमगुणं गहइ ॥ ९७ ॥ अंतःकोटीकोटियदा संख्येयसागरसहस्रेण । न्यूना कर्मणां स्थितिः तदा उपशमगुणं गृह्णाति ॥ ९५॥ अर्थ-जिस अन्तरायामके प्रथमसमयमें संख्यातहजार सागरसे कम अन्तःकोड़ाकोड़ी- सागरमात्र कर्मोंका स्थितिसत्त्व होवे उससमयमें उपशमसम्यक्त्वगुणको ग्रहण करता है ॥९७॥ - लब्धिसारः। . २ ९ तहाणे ठिदिसंतो आदिमसम्मेण देससयलजमं । पडिवजमाणगस्स संखेजगुणेण हीणकमो ॥ ९८ ॥ तत्स्थाने स्थितिसत्त्वं आदिमसम्येन देशसकलयमं । प्रतिपद्यमानस्य संख्येयगुणेन हीनक्रमः ॥ ९८ ॥ अर्थ-उसी अन्तरायामके प्रथमसमयरूप स्थानमें जो देशसंयमसहित प्रथमोपशम- सम्यक्त्वको ग्रहण करे तो उसके स्थितिसत्त्व पूर्वकहे हुएसे संख्यातगुणा कम होता है । और जो सकलसंयम सहित प्रथम सम्यक्त्वको प्राप्त होवे उसके स्थितिसत्त्व उससे भी संख्यातगुणा कम होता है । क्योंकि अनन्तगुणी विशुद्धताके विशेपसे स्थितिखण्डायाम संख्यातगुणा होता है उनकर घटाई हुई बांकी स्थिति संख्यातवें भाग संभवती है ॥ ९८॥ उवसामगो य सबो णिवाघादो तहा णिरासाणो। उवसंते भजियचो णिरासओ चेव खीणम्हि ॥ ९९ ।। उपशामकश्च सर्वः निर्व्याघातस्तथा निरासानः । उपशांते भजितव्यो निरासानश्चैव क्षीणे ॥ ९९ ॥ अर्थ-दर्शनमोहका उपशम करनेवाले सभी जीव मरण रहित हैं और सासादनको प्राप्त नहीं होते । और उपशम हुए बाद उपशम सम्यक्त्वी हुए कोई सासादन गुणस्थानको प्राप्त नहीं होते कोई होते हैं । उपशम सम्यक्त्वका काल समाप्त होने वाद सासादन नहीं होता वहां नियमसे दर्शनमोहकी तीन प्रकृतियोंमेंसे एकका उदय होता है ।। ९९ ।। उवसमसम्मत्तद्धा छांवलिमेत्तो दु समयमेत्तोति । अवसिद्धे आसाणो अणअण्णदरुदयदो होदि ॥ १०॥ उपशमसम्यक्त्वाद्धा पडावलिमात्रस्तु समयमान इति । अवसिद्धे आसादनः अनान्यतमोदयतो भवति ॥ १०० ॥ अर्थ-उपशम सम्यक्त्वके कालमें उत्कृष्ट छह आवलि तथा जघन्य एक समय शेष रहनेपर अनन्तानुवन्धी क्रोधादिमेंसे किसी एकका उदय होनेसे सम्यक्त्वको विनाशकर जबतक मिथ्यात्वको प्राप्त न होवे उसके वीचके कालमें सासादन सम्यक्त्व होता है॥१०॥ सायारे वटवगो णिट्ठवगो मज्झिमो य भजणिजो। जोगे अण्णदरम्हि दु जहण्णए तेउलेस्साए ॥ १०१॥ साकारे प्रस्थापको निष्ठापकः मध्यमश्च भजनीयः । योगे अन्यतरस्मिन् तु जघन्यके तेजोलेश्यायाः ॥ १०१ ॥ अर्थ-साकार अर्थात् ज्ञानोपयोगके होनेपर ही यह जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्रारंभ करता है और उसको संपूर्ण करनेवाला और मध्य अवस्थावर्ती जीवका अनियम है .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
यानी साकार अनाकार दोनों ही उपयोगवाला होता है । और तीनमेंसे किसी एक योगमें
वर्तमान प्रथमसम्यक्त्वको प्रारंभ करसकता है । तेजोलेश्याके जघन्य अंशमें ही वर्तमान
जीव प्रथमसम्यक्त्वका प्रारंभक होता है अशुभलेश्यामें नहीं होता।
अंतोमुत्तमद्धं सबोवसमेण होदि उपसंतो।
तेण परं उदओ खलु तिण्णेकदरस्स कम्मस्स ॥ १०२ ॥
अंतर्मुहूर्तमद्धा सर्वोपशमेन भवति उपशांतः ।
तेन परं उदयः खलु त्रिवेकतमस्य कर्मणः ॥ १०२ ।।
अर्थ अन्तर्मुहूर्तकालतक सब दर्शनमोहका उपशमकर उपशमसम्यग्दृष्टी होता है ।
उसके बाद तीन दर्शनमोहकी प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय नियमसे होता है॥१०२।।
उवसमसम्मत्त्वरि दसणमोहं तुरंत पूरेदि ।
उदयिल्लस्सुदयादो सेसाणं उदयवाहिरदो ॥ १०३ ॥
उपशमसम्यक्त्वोपरि दर्शनमोहं त्वरितं पूरयति ।
उदीयमानस्योदयतः शेपाणामुयवाह्यतः ॥ १०३ ॥
अर्थ
-उपशम सम्यक्त्वके अन्तसमयके वाद दर्शनमोहकी अन्तरायामके ऊपरकी
द्वितीयस्थितिके निषेकद्रव्यका अपकर्षण करके अन्तरको पूरता है। वहां जिस प्रकृतिका
उदय पाया जावे उसका तो उदयावलिके प्रथमनिपेकस लेकर और उदयहीन प्रकृतियोंका
उदयावलिसे बाह्य निषेकसे लेकर उस अपकर्षण किये द्रव्यको अन्तरायाममें वा द्वितीय-
स्थितिमें निक्षेपण करता है ॥ १०३ ॥
उक्कट्टिदइगभागं समयगदीए विसेसहीणकर्म ।
सेसासंखाभागे विसेसहीणे खिवदि सवत्थ ॥ १०४॥
अपकर्पितेकभागं समयगत्या विशेपहीनक्रमम् ।
शेपासंख्यभागे विशेपहीने क्षिपति सर्वत्र ॥ १०४ ॥
अर्थ-उदयवान सम्यक्त्व मोहनीयके द्रव्यको अपकर्षण भागहारका भाग देवै । उन-
मैसे एकभागको असंख्यातलोकका भागदेवे उनमेंसे एक भाग तो उदयावलिके निषेकोंमें
चय घटते हुए क्रमसे निक्षेपण करना और अपकर्षण किये द्रव्यमें शेप बहुभाग मात्र अप-
कृष्टावशिष्ट द्रव्य है वह चयकर हीन सब जगह क्षेपण करना ॥ १०४ ॥ यहां चय
घटते क्रमसे गोपुच्छाकार रचना है ।
सम्मुदये चलमलिणमगार्ड सद्दहदि तच्चयं अत्थं ।
सद्दहदि असम्भावं अजाणमाणो, गुरुणियोगा ॥ १०५ ॥

लब्धिसारः। ३१ सुत्तादो तं सम्मं दरसिजंतं जदा ण सद्दहदि । सो चेव हवदि मिच्छाइटी जीवो तदो पहुदी ॥ १०६ ॥ सम्यक्त्वोदये चलमलिनमगाढं श्रद्दधाति तत्त्वमर्थम् । श्रद्धधाति असद्भावमजानन् गुरुनियोगात् ।। १०५ ।। सूत्रतस्तं सम्यक् दर्शयतं यदा न श्रद्दधाति । स चैव भवति मिथ्यावष्टिर्जीवः ततः प्रभृति ॥ १०६ ।। अर्थ-उपशम सम्यक्त्वंका काल पूर्ण हुए वाद नियमसे तीनोंमें एक दर्शन मोहकी प्रकृतिका उदय होता है। वहां पर सम्यक्त्वमोहनीके उदय होनेपर यह जीव वेदक (क्षयोपशमिक ) सम्यग्दृष्टी होता है । वह चल मलिन अगाढरूप तत्त्वार्थकी श्रद्धा करता है अर्थात् सम्यक्त्व मोहनीयके उदयसे श्रद्धानमें चलपना वा मैलापना वा शिथिलपना होता है । और वह जीव आप तो विशेष नहीं जानता हुआ अज्ञात गुरुके निमित्तसे असत्य श्रद्धान भी कर लेता है परंतु यह सर्वज्ञकी आना इसीतरह है ऐसा समझता है । इसीलिये सम्यग्दृष्टि है । तथा जो कभी कोई जानकार गुरू जिनसूत्रसे सम्यक् खरूप दिखलावे उसपर भी हठ वगैरःसे श्रद्धान न करे तो उसी कालसे लेकर वह मिथ्यादृष्टि होजाता है ॥ १०५। १०६ ॥ मिस्सुदये संमिस्सं दहिगुडमिस्सं व तत्तमियरेण । सद्दहदि एकसमये मरणे मिच्छो व अयदो वा ॥ १०७ ॥ मिश्रोदये संमिश्र दधिगुडमिश्र व तत्त्वमितरेण । श्रद्दधासेकसमये मरणे मिथ्यो वा असंयतो वा ॥ १०७ ॥ अर्थ-मिश्र यानी सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति उसके उदय होनेसे जीव मिश्रगुणस्थानी होता है । वह एकसमयमें तत्त्व और अतत्त्वके मेलरूप श्रद्धान करता है । जैसे दही गुड़ मिलानेसे अन्य ही खादरूप होजाता है उसीतरह यहां सत्य असत्य श्रद्धान मिला हुआ जानना । यहांपर मरण होनेसे पहले ही नियमसे मिथ्यादृष्टि या असंयत होजाता है क्योंकि मिश्रमें मरण नहीं है ॥ १०७ ।। मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदसणं होदि। ण य धम्म रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जुरिदो ॥ १०८ ॥ मिथ्यात्वं वेदयन् जीवो विपरीतदर्शनो भवति । न च धर्म रोचते हि मधुरं खलु रसं यथा चरितः ॥ १.०८ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयको अनुभवता हुआ जीव मिथ्यादृष्टि होता है वह विपरीत श्रद्धानी होता है। जैसे ज्वरवालेको मीठा नहीं रुचता उसीतरह उसको धर्म

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
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यानी अनेकान्त वस्तुका खभाव वा रत्नत्रयरूप मोक्षमार्ग वह नहीं रुचता ऐसा
जानना ॥१०८॥
मिच्छाइट्ठी जीवो उवइ8 पवयणं ण सद्दहदि ।
सदहदि असन्मावं उवइ8 वा अणुवइ8 ॥ १०९ ॥
मिथ्यादृष्टिर्जीव उपदिष्टं प्रवचनं न श्रद्दधाति ।
श्रद्दधात्यसद्भावमुपदिष्टं वा अनुपदिष्टम् ॥ १०९ ॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टि जीव जिनेश्वर भगवानकर उपदेशे हुए प्रवचनको श्रद्धान नहीं
करता और अन्यकर उपदेशा हो वा विना उपदेशा हो ऐसे अतत्त्वको श्रद्धान कर लेता
है ॥ १०९ ॥ इस तरह प्रथमोपशमसम्यक्स का कथन किया ।
अव क्षायिकसम्यक्त्वका वर्णन करते हैं;-
दसणमोहक्खवणापट्टनगो कम्मभूमिजो मणुसो।
तित्थयरपायमूले केवलिसुदकेवलीमूले ॥ ११ ॥
दर्शनमोहक्षपणाप्रस्थापकः कर्मभूमिजो मनुष्यः ।
तीर्थकरपादमूले केंवलिश्रुतकेवलिमूले ।। ११० ॥
अर्थ-जो मनुष्य कर्मभूमिमें उत्पन्न हुआ हो, तीर्थकर वा अन्यकेवली वा श्रुतकेव-
लीके चरणकमलों में रहता हो वही दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारंभक होता है क्योंकि दूसरी
जगह ऐसी परिणामों में विशुद्धता नहीं होती ॥ अर्थात् अधःकरणके प्रथम समयसे लेकर
जबतक मिथ्यात्वमिश्रमोहनीयका द्रव्य सम्यक्त्वप्रकृतिरूप होके संक्रमण करे तबतक
अन्तर्मुहूर्तकाल तक दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारंभक कहा जाता है ॥ ११० ॥
णिठ्ठवगो तहाणे विमाणभोगावणीसु धम्मे य ।
किदकरणिजो चदुसुवि गदीसु उप्पज्जदे जम्हा ॥ १११ ॥
निष्ठापकः तत्स्थाने विमानभोगावनिषु धर्मे च ।
कृतकृत्यः चतुर्वपि गतिपु उत्पद्यते यस्मात् ॥ १११ ॥
अर्थ-उस प्रारंभकालके आगेके समयसे लेकर क्षायिक सम्यक्त्वके ग्रहणसमयसे
पहले निष्ठापक होता है सो जिसजगह प्रारंभ किया था वहां ही तथा सौधर्मादि वर्ग
अथवा भोगभूमिया मनुष्य तियेचमें अथवा धर्मा नामकी नरकपृथ्वीमें भी निष्ठापक होता
है क्योंकि बद्धायु कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि मरकर चारों गतियों में उत्पन्न होता है वहां
निष्ठापन करता है ।।.१११॥
पुवं तियरणविहिणा अणं खु अणियट्टिकरणचरिमम्हि ।
: उदयावलिवाहिरगं ठिदि विसंजोजदे णियमा ॥ ११२ ॥

लब्धिसारः। ३३ पूर्व निकरणविधिना अनंतं खलु अनिवृत्तिकरणचरमे । उदयावलिवाह्यं स्थिति विसंयोजयति नियमात् ।। ११२ ॥ अर्थ-दर्शनमोहकी क्षपणाके पहले तीनकरण विधानसे अनन्तानुवन्धी क्रोध मान माया लोभके उदयावलिसे चाह्य सब स्थिति निपेकोंको अनिवृत्ति करणके अन्तसमयमें नियमसे विसंयोजन करता है अर्थात् वारह कपाय नव नोकपायरूप परिणमाता है।।११२।। अणियट्टीअद्धाए अणस्स चत्तारि होति पवाणि । सायरलक्खपुधत्तं पल्लं दूरायफिटि उच्छिष्टुं ॥ ११३ ॥ अनिवृत्त्यद्धायां अनंतस्य चत्वारि भवंति पर्वाणि । सागरलक्षपृथक्त्वं पल्यं दूरापकृष्टिरुच्छिष्टम् ॥ ११३ ।। अर्थ-अनिवृत्तिकरणके कालमें अनन्तानुवन्धीके स्थितिसत्त्वके चार पर्व ( विभाग) होते हैं अर्थात् स्थिति घटनेकी मर्यादाकर चार भाग होते हैं । उनमें से पहले समय पृथ- क्त्वलाख सागर प्रमाण स्थितिसत्त्व रहता है दूसरा संख्यात हजार स्थितिखण्ड होनेपर पल्यमात्र स्थितिसत्व रहता है तीसरा दूरापकृष्टि अर्थात् पल्यका असंख्यातवां भागमात्र स्थितिसत्त्व रहता है और उच्छिष्टावलि अर्थात् आवलिमात्र स्थिति सत्त्व वाकी रहता है वह चौथापर्व है ॥ ११३ ॥ पल्लस्स संखभागो संखा भागा असंखगा भागा। ठिदिखंडा होति कमे अणस्स पवादु पयोति ॥ ११४ ॥ पल्यस्य संख्यभागः संख्या भागा असंख्यका भागाः । स्थितिखंडा भवंति क्रमेण अनंतस्य पर्वात् पर्वान्तं ॥ ११४ ॥ अर्थ-अनन्तानुवन्धीके स्थितिसत्त्वके एक पर्वसे दूसरे पर्वतक क्रमसे स्थिति कांडक (खण्ड ) होते हैं । उनका आयाम (काल) क्रमसे पल्यका संख्यातयां भाग, पल्यके संख्यात बहुभाग और पल्यके असंख्यात बहुभागमात्र हैं ॥ ११४ ॥ अणियट्टीसंखेजाभागेसु गदेसु अणगठिदिसंतो। उदधिसहस्सं तत्तो वियले य समं तु पल्लादी ॥ ११५ ।। अनिवृत्तिसंख्यातभागेपु गतेषु अनंतगस्थितिसत्त्वं । उदधिसहस्रं ततो विकले च समं तु पल्यादि ॥ ११५ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणके कालको संख्यातका भाग देनेसे प्राप्त बहुभागद्रव्य वितीत होनेपर एक भाग वाकी रहते अनन्तानुबन्धीका स्थितिसत्त्व कहीं हजारसागरमात्र पीछे विकलेंद्रीके बन्धसमान पल्य और आदिसे दूरापकृष्टि और आवलिमात्र होता है ॥ ११५ ॥ ल,सा. ५ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । उवहिसहस्सं.तु सयं पण्णं पणवीसमेकयं चेव । वियलचउक्के एगे मिच्छुकस्सट्टिदी होदि ॥ ११६ ॥ उदधिसहस्रं तु शतं पंचाशत् पंचविंशतिरेकं चैव । विकलचतुष्के एकस्मिन् मिथ्योत्कृष्टस्थितिर्भवति ।। ११६ ॥ अर्थ-विकलचार यानी असंज्ञी पञ्चेन्द्री चौइन्द्री ते इन्द्री दो इन्द्री और एक अर्थात् एकेंद्री इनके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध क्रमसे हजार सागर, सौ सागर, पचास सागर, पच्चीस सागर और एकसागर काल प्रमाण होता है । इन्हींके समान स्थितिसत्त्व अनन्तानुवन्धीका कहीं होता है ॥ ११६ ॥ अंतोमुत्तकालं विस्समिय पुणोवि तिकरणं किरिय । अणियट्टीए मिच्छं मिस्सं सम्म कमेण णासेइ ॥ ११७ ॥ अंतर्मुहूर्तकालं विश्राम्य पुनरपि त्रिकरणं कृत्वा । अनिवृत्तौ मिथ्यं मित्रं सम्यक्त्वं क्रमेण नाशयति ।। ११७ ॥ अर्थ-अनन्तानुबन्धीकषायका विसंयोजन करनेके वाद अन्तर्महुर्त कालतक विश्राम लेकर उसके बाद फिर तीनकरणोंको करता हुआ अनिवृत्तिकरणकालमें मिथ्यात्व मिश्र और सम्यक्त्व मोहनीयको क्रमसे नाश करता है ॥ ११७ ॥ अणियट्टिकरणपढमे दसणमोहस्स सेसगाण ठिदी। सायरलक्खपुधत्तं कोडीलक्खगपुधत्तं च ॥ ११८ ॥ अनिवृत्तिकरणप्रथमे दर्शनमोहस्य शेपकानां स्थितिः । सागरलक्षपृथक्त्वं कोटिलक्षकपृथक्त्वं च ॥ ११८ ।। अर्थ-अनिवृत्ति करणके पहले समयमें दर्शनमोहका स्थितिसत्त्व पृथक्त्व लक्षसागर प्रमाण है और शेषकोका स्थितिसत्त्व पृथक्त्व लक्षकोटि सागर प्रमाण है । यहां पृथक्त्व नाम बहुतका है इसलिये कोड़ाकोड़ीके नीचे अन्तःकोड़ाकोडि जानना ॥ ११८ ॥ अमणं ठिदिसत्तादो पुधत्तमेत्ते पुधत्तमेत्ते य। ठिदिखंडये हवंति हु चउ ति वि एयक्ख पल्लठिदी ॥ ११९ ॥ अमनःस्थितिसत्त्वतः पृथक्त्वमानं पृथक्त्वमानं च । स्थितिकांडके भवंति हि चतुखि द्वि एकाक्षे पल्यस्थितिः ॥ ११९ ॥ अर्थ-दर्शनमोहनीकी पृथक्त्वलक्षसागर प्रमाण स्थिति प्रथमसमयमें संभव है उससे परे संख्यात हजार स्थितिकांडक होनेपर असंज्ञीके बन्धसमान हजार सागर स्थितिसत्त्व रहता है उसके बाद बहुत बहुत स्थिति कांडक (खण्ड) होनेपर क्रमसे चौ इन्द्री ते इन्द्री दो इन्द्री एकेंद्रीके स्थितिबन्धके समान सौ सागर आदि स्थितिसत्त्व होता है । उसके लब्धिसारः। ३५ वाद बहुत स्थितिखण्ड होनेपर पल्यके प्रमाण स्थितिसत्त्व होता है ॥ ११९ ॥ इस प्रकार यह दूसरा पर्व हुआ। पल्लटिदिदो उपरि संखेजसहस्समेतठिदिखंडे । दूरावकिट्टिसण्णिद ठिदिसंते होदि णियमेण ॥ १२० ।। पल्यस्थितित उपरि संख्येयसहनमात्रस्थितिखंडे । दूरापकृष्टिसंत्रितं स्थितिसत्त्वं भवति नियमेन ॥ १२० ॥ अर्थ-उस पल्य स्थितिसत्त्वके वाद पल्यको संख्यातका भाग देनेसे बहुभागमात्र आयामवाले ऐसे संख्यातहजार स्थितिखण्ड होजानेपर दूरापकृष्टि नामा स्थितिसत्त्व निय- मसे होता है ॥ १२० ॥ यह तीसरा पर्व हुआ । पल्लस्स संखभागं तस्स पमाणं तदो असंखेन । भागपमाणे खंडे संखेजसहस्सगेसु तीदेसु ॥ १२१ ।। सम्मस्स असंखाणं समयपत्रद्धाणुदीरणा होदि । तत्तो उपरि तु पुणो बहुखंडे मिच्छउच्छिष्टं ॥ १२२ ॥ पल्यस्य संख्यभागं तस्य प्रमाणं तत असंख्येयं । भागप्रमाणे खंडे संख्येयसहस्रकेषु अतीतेपु ॥ १२१ ।। सम्यक्त्वस्यासंख्यानां समयप्रवद्धानामुदीरणा भवति । 'तत उपरि तु पुनः बहुखंडे मिथ्योच्छिष्टम् ॥ १२२ ।। अर्थ-उस दूरापकृष्टि नामा स्थितिसत्त्वका प्रमाण पल्यके संख्यातवें भागमात्र जान- ना । उसके वाद पल्यको असंख्यातका भाग देनेपर बहुभागमात्र आयाम ( काल) लिये ऐसे संख्यात हजार स्थिति खण्ड होनेपर सम्यक्त्वमोहनीयका द्रव्य अपकर्षण किया उसमें असंख्यात समयमबद्धमात्र उदीरणा द्रव्यको उदयावलिमें देते हैं अर्थात् उदीरणारूप उदय होता है। उसके वाद फिर पल्यको असंख्यातका भाग देकर बहुभाग मात्र कालको लिये ऐसे बहुत स्थितिखण्ड होनेपर मिथ्यात्वके उच्छिष्टावलिमात्र निषेक वाकी रहते हैं अन्य सब मिथ्यात्वप्रकृतिका द्रव्य मिश्रमोहनीय व सम्यक्त्व मोहनीरूप परिणमता है ॥ १२१ । १२२ ॥ जत्थ असंखेजाणं समयपवद्धाणुदीरणा तत्तो। पल्लासंखेजदिमो हारेणासंखलोगमिदो ।। १२३ ॥ यत्रासंख्येयानां समयप्रवद्धानामुदीरणा ततः। पल्यासंख्येयः हारेणासंख्यलोकमितः ॥ १२३ ।। अर्थ-जिस कालमें असंख्यात समयप्रवद्धकी उदीरणा होवे अर्थात् ऊपरके निकोका रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ३६ द्रव्य उदयावलिमें प्राप्त होवे उस समयसे लेकर आगेके समयोंमें उदयावलिमें द्रव्य देने के लिये भागहार पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही जानना । वह पूर्ववत् असंख्यातलोक- मात्र जानना ॥ १२३ ।। मिच्छुच्छिहादुवरि पल्लासंखेजभागगे खंडे । संखेजे समतीदे मिस्सुच्छि8 हचे णियमा ॥ १२४ ॥ मिथ्योच्छिष्टादुपरि पल्यासंख्येयभागगे खंडे । संख्येये समतीते मिश्रोच्छिष्टं भवेत् नियमात् ।। १२४ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वकी उच्छिष्टावलिमात्र स्थिति बाकी रहनेके समयसे लेकर मिश्रमोह- नीकी स्थितिमें पल्यके असंख्यातका भाग देनेपर बहुभागमात्र आयामलिये ऐसे संख्यातं हजार स्थितिखण्ड वीत जानेपर अन्तमें मिश्रमोहनीयके निषेक ( उदय होके निर्जरा होने- वाले परमाणु ) उच्छिष्टावलिमात्र नियमसे वाकी रहते हैं ॥ १२४ ॥ मिस्सुच्छिट्टे समये पल्लासंखेजभागगे खंडे । चरिमे पडिदे चेदि सम्मस्सडवस्सठिदिसंतो ॥ १२५ ।। मिश्रोच्छिष्टे समये पल्यासंख्येयभागगे खंडे । चरमे पतिते चेष्टते सम्यक्त्वस्याष्टवर्पस्थितिसत्त्वम् ।। १२५ ॥ अर्थ-जिस समय मिश्रमोहनीकी उच्छिष्टावलिमात्र स्थिति वाकी रहती है उसी समयमें सम्यक्त्वमोहनीकी स्थितिमें पल्यके असंख्यातवेंका भाग देनेपर बहुभागमात्र आयामलिये ऐसे संख्यात हजार स्थितिखण्ड वीत जानेपर उस सम्यक्त्वमोहनीका आठवर्ष प्रमाण स्थितिसत्त्व बाकी रहता है । भावार्थ-मिश्रमोहनीकी उच्छिष्टावलिमात्र स्थिति रहनेका और सम्यक्त्वमोहनीकी आठ वर्ष स्थिति रहनेका यह एक ही काल है ॥१२५॥ मिच्छरस चरमफालिं मिस्से मिस्सस्स चरिमफालिं तु । संछुहदि हु सम्मत्ते ताहे तेसिं च वरदचं ॥ १२६ ॥ मिथ्यस्य चरमफालिं मिश्रे मिश्रस्य चरमफालि तु। संक्रामति हि सम्यक्त्वे तस्मिन् तेपां च वरद्रव्यम् ॥ १२६ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व प्रकृति के अन्तकांडककी अन्तफालि जिस समय मिश्रमोहनीमें संक्र- मण होती है उससमय मिश्रमोहनीका द्रव्य उत्कृष्ट होता है और मिश्रमोहनीके अन्तकां- डककी अन्तफालिका द्रव्य जिससमय सम्यक्स्व मोहनीमें संक्रमण करता है उससमय सम्य- क्त्व मोहनीका द्रव्य उत्कृष्ट होता है ॥ १२६ ॥ जदि होदि गुणिदकम्मो दद्यमणुकस्समण्णहा तेसिं । अवर ठिदिमिच्छटुगे उच्छित्ते समयदुगसेसे ॥ १२७ ॥ .

लब्धिसारः। ३७ यदि भवति गुणितकर्मा द्रव्यमनुत्कृष्टमन्यथा तेपाम् । अवरं स्थितिमिथ्यद्विके उच्छिष्टे समय द्विकोपे ॥ १२७ ॥ अर्थ-दर्शनमोहका क्षय करनेवाला जीव जो उत्कृष्टकर्मसंचय सहित हो तो उसके उन दो प्रकृतियोंका द्रव्य उससमयमें उत्कृष्ट होता है और जो वह उत्कृष्टकर्मका संचय सहित न हो तो उसके उनका द्रव्य अनुत्कृष्ट होता है और मिथ्यात्त्र तथा मिश्रमोहनीकी स्थिति उच्छिष्टावलिमात्र रहनेपर क्रमसे एक एक समयमें एक एक निषेक झड़कर दो समय चाकी रहनेपर जघन्यस्थिति होती है। भावार्थ-वहां उदयावलीका अन्तनिपेक- मात्र स्थितिसत्त्व होता है ॥ १२७ । मिस्सदुगचरिमफाली किंचूणदिबहसमयपबद्धपमा । गुणसेटिं करिय तदो असंखभागेण पुवं च ।। १२८ ।। मिश्रद्विकचरमफालिः किंचिदूनव्यर्धसमयप्रवद्धप्रमा। गुणश्रेणिं कृत्वा तत असंख्यभागेन पूर्व वा ॥ १२८ ॥ अर्थ-मिश्रमोहनी और सम्यक्त्वमोहनीकी अन्तकी दो फालिका द्रव्य कुछ कम डेढ गुणहानि गुणित समयप्रबद्ध प्रमाण है । उसके बाद पहलेकी तरह उन दोनों फालियोंके द्रव्यमें पल्यका असंख्यातवें भागका भाग देनेसे एक भाग गुणश्रेणीमें दिया ॥ १२८ ॥ सेसं विसेसहीणं अडवस्सुवरिमठिदीए संखुद्धे । -चरमाउलिं व सरिसी रयणा संजायदे एत्तो ॥ १२९ ॥ शेपं विशेपहीनमष्टवर्पस्योपरिस्थित्यां संक्षुब्धे । चरमावलिरिव सहशी रचना संजायतेऽतः ॥ १२९ ॥ अर्थ-अवशेष बहुभागोंके द्रव्यको गुणश्रेणी आयाममात्र अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष प्रमाण ऊपरकी स्थिति उसके निषेकोंमें चय घटते हुए क्रमसे क्षेपण करे । ऐसा देनेपर गुणश्रेणीके अन्तनिषेकके द्रव्यसे ऊपरकी स्थितिके प्रथमनिषेकका द्रव्य असंख्यातगुणा होता है। क्योंकि यहां बहुभाग मिलाया है और स्थितिका प्रमाण थोड़ा है ॥ १२९ ॥ अडवस्सादो उवरिं उदयादिअवटिदं च गुणसेढी। अंतोमुहुत्तियं ठिदिखंडं च य होदि सम्मस्स ॥ १३० ॥ अष्टवादुपरि उदयाद्यवस्थितं च गुणश्रेणी । अंतर्मुहूर्तिकं स्थितिखंडं च च भवति सम्यस्ख ॥ १३० ॥ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयकी आठवपस्थिति करने के समयसे लेकर ऊपर सब समयों में उदयादि अवस्थिति गुणश्रेणी आयाम है । और सम्यक्त्वमोहनीयकी स्थितिम स्थितिखण्ड -

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
अन्तर्मुहूर्तमात्र आयाम धारण करते हैं । यहाँसे अब एक एक स्थितीकांडककर अंतर्मुहूर्त-
मात्र स्थिति घटाते हैं ॥ १३० ॥
विदियावलिस्स पढमे पढमस्संते च आदिमणिसेये ।
तिहाणेणंतगुणेणूणकमोवट्टणं चरमे ॥ १३१
द्वितीयावले प्रथमे प्रथमस्यांते चादिमनिपेके ।
त्रिस्थानेनंतगुणेनोनक्रमापवर्तनं चरमे ॥ १३१ ।।
अर्थ-द्वितीयावलिके पहले समयमें प्रथमावलिके अन्तसमयमै और आदिके निपेकमें
इसतरह तीन स्थानों में समय समय प्रति अनन्तगुणा घटता क्रमसे उच्छिष्टावलिके अन्त-
समय पर्यंत अनुभागका अपवर्तन ( नाश ) जानना चाहिये ॥ १३१ ।।
अंडवस्से उवरिंमि वि दुचरिमखंडस्स चरिमफालित्ति ।
संखातीद्गुणकम विसेसहीणकमं देदि ॥ १३२ ।।
अष्टवर्षात् उपरि अपि द्विचरमखंडस्य चरमफालीति ।
संख्यातीतगुणक्रमं विशेपहीनक्रमं ददाति ।। १३२ ॥
अर्थ-आठवर्षस्थितिसे ऊपर स्थितिमें प्रथमफालिके पतनरूप प्रथमसमयसे लेकर
द्विचरमकांडककी अन्तफालिके पतनसमयतक गुणश्रेणी आदिके लिये अपकर्पण किये
द्रव्यका और स्थिति घटाने के लिये ग्रहण किये गये स्थितिकांडककी फालिके द्रव्यका उद-
यादि अवस्थितिगुणश्रेणी आयाममें तो असंख्यातगुणा कम लिये हुए तथा अन्तर्मुहूर्तकम
आठवर्षप्रमाण ऊपरकी स्थितिमें चय घंटता क्रम लिये हुए निक्षेपण होता है ॥ १३२ ॥
आगे यहां स्पष्ट अर्थ जानकेलिये आठवर्ष करनेके समयसे पहले समयमै अथवा आठ
वर्ष करनेके समयमें वा आगामी समयों में संभव विधान कहते हैं।
अडवस्से संपहियं पुचिल्लादो असंखसंगुणियं ।
उरि पुण संपहियं असंखसंखं च भागं तु ॥ १३३ ।।
अष्टवर्षे संग्रहितं पूर्वस्मात् असंख्यसंगुणितं ।
उपरि पुनः संप्रहितं असंख्यसंख्यं च भागं तु ॥ १३३ ।।
अर्थ-आठ वर्ष स्थिति अवशेष करनेके समयमें जो मिश्रसम्यक्त्वमोहनीकी अन्तकी
दो फालियोंका द्रव्य है वह इससे पूर्वसमयके द्विचरमफालिके अन्ततक तो गुणसंक्रमद्र-
व्यसहित सम्यक्त्वमोहनीका सत्वद्रव्य उससे असंख्यात गुणा
है। और प्रथमकांडककी
द्विचरमफालितक असंख्यातवें भागमात्र तो दीयमान द्रव्य है और अन्तफालिका द्रव्य
संख्यातवें भागमान है ॥ १३३ ॥

लब्धिसारः।
३९
ठिदिखंडाणुकीरण दुचरिमसमओत्ति चरिमसमये च ।
उकट्टिदफालीगददवाणि णिसिंचदे जम्हा ॥ १३४ ॥
स्थितिखंडानुकरणं द्विचरमसमय इति चरमसमये च ।
अपकर्पितफालिगतद्रव्याणि निपिंचति यस्मात् ।। १३४ ॥
अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयकी आठवर्षे प्रमाण स्थितिके अन्तर्मुहूर्तमात्र आयाम लिये हुए
स्थितिकांडकका आठवर्षकरनेके दूसरे समयमें प्रारंभ किये उनका स्थितिकांडकोत्करण काल
यथासंभव अन्तर्मुहूर्तमात्र है उसकालके प्रथम समयसे लेकर द्विचरमसमयतक जो फालि.
द्रव्य सहित अपकृष्ट द्रव्य निक्षेपण करते हैं वह सम्यक्त्वमोहनीके सत्वद्रव्यसे असंख्यात
गुणा कम है । और उसके अन्तसमयमें जो अन्तफालिका द्रव्य दिया जाता है वह सब
द्रव्यके संख्यातवें भागमात्र है । क्योंकि अपकर्षण भागहार संभवता है ।। १३४ ॥
अडवस्से संवहियं गुणसेढीसीसयं असंखगुणं ।
पुचिल्लादो णियमा उवरि विसेसाहियं दिस्सं ॥ १३५ ॥
अष्टवर्षे संप्रहितं गुणश्रेणीशीर्षकं असंख्यगुणम् ।
पूर्वस्मात् नियमात् उपरि विशेपाधिकं दृश्यम् ॥ १३५ ॥
अर्थ-आठवर्ष करनेके समयमें गुणश्रेणीका शीर्ष (अग्रभाग ) उसके पूर्व सत्त्वद्रव्य-
को और निक्षेपण किये द्रव्यको मिलानेसे दृश्यमान द्रव्यका जो प्रमाण है वह इसके बाद
पूर्वसमयके गुणश्रेणी शीर्षके दृश्यमान द्रव्यसे असंख्यात गुणा है । और इसके ऊपर
आठवर्ष करनेके द्वितीयादि समयके गुणश्रेणी शीर्षका द्रव्य क्रमसे पूर्व पूर्व गुणश्रेणीशीर्षके
द्रव्यसे विशेषकर अधिक है। असंख्यात गुणा नहीं है ॥ १३५ ॥
अडवस्से य ठिदीदो चरिमेदरफालिपडिददचं ।
संखासंखगुणूणं तेणुवरिमदिरसमाणमहियं सीसे ॥ १३६ ॥
अष्टवर्पे च स्थितितः चरमेतरफालिपतितद्रव्यं खलु ।
संख्यासंख्यगुणोनं तेनोपरिमदृश्यमानमधिकं शीर्षे ॥ १३६ ॥
अर्थ-आठ वर्ष करनेके पहले समय में मिश्रसम्यक्त्वमोहनीकी अन्त दो फालियोंका
दिया हुआ द्रव्य संख्यात व असंख्यातगुणा कम है और सर्वसत्तारूप द्रव्य और निक्षेपण
किये द्रव्यको मिलानेसे जो दृश्यमानद्रव्य वह पूर्व पूर्व समयके गुणश्रेणीशीर्षके द्रव्यसे
उत्तर उत्तर समयके गुणश्रेणी शीर्पका द्रव्य कुछ विशेषकर अधिक है । गुणकाररूप नहीं
है ॥ १३६ ॥
जदि गोउच्छविसेसं रिणं हवे तोवि धणपमाणादो।
जस्सि असंखगुणूणं ण गणिजदि तं तदो एत्थ ॥ १३७ ॥

४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । यदि गोपुच्छविशेष ऋणं भवेत् तथापि धनप्रमाणात् । यस्मात् असंख्यगुणोनं न गण्यते तत्ततोत्र ॥ १३७ ।। अर्थ-यद्यपि नीचले गुणश्रेणी निपेकके सत्त्वद्रव्यसे ऊपरके गुणश्रेणीशीर्षके सत्त्वद्व- व्यमें गोपुच्छविशेष ऋण है तो भी मिलाये हुए अपकृष्ट द्रव्यसे यह चयप्रमाण घटता हुआ द्रव्य असंख्यातगुणा कमती है सो यहांपर घटाने योग्य ऋणको मिलाने योग्य धनसे असंख्यात भाग जानकर थोड़ेपनेसे नहीं गिना । पूर्व गुणश्रेणीशीर्षके दृश्य द्रव्यसे उत्तर गुणश्रेणीशीर्षका द्रव्य विशेप अधिक ही कहा है ॥ १३७ ॥ तत्तकाले दिस्सं वजिय गुणसेडिसीसयं एकं । उवरिमठिदीसु वहदि बिसेसहीणकमेणेव ॥ १३८ ॥ तत्तत्काले दृश्यं वर्जयित्वा गुणश्रेणिशीर्षकमेकम् । उपरिमस्थितिपु वर्तते विशेपहीनक्रमेणैव ॥ १३८ ॥ अर्थ --उस उस समयमें गुणश्रेणीशीर्परूप हुए एक एक निपेकको छोड़कर उसके ऊपर जो ऊपरकी स्थिति के सब निपेक उनमें तत्काल संभवता दृश्यमान द्रव्य विशेष घटते अनुक्रमलिये ही जानना ॥ १३८ ॥ अब अन्तकांडकका विधान कहते हैं- गुणसेढिसंखभागा तत्तो संखगुण उवरिमठिदीओ। सम्मत्तचरिमखंडो दुचरिमखंडादु संखगुणो ॥ १३९ ।। गुणश्रेणिसंख्यभागाः ततः संख्यगुणं उपरितनस्थितयः । सम्यक्त्वचरमखंडो द्विचरमखंडात् संख्यगुणः ॥ १३९ ।। अर्थ-गलितावशेष गुणश्रेणी आयामके संख्यातवें भागसे लेकर संख्यातगुणा ऊपरकी स्थितिके निषेक बाकी रहे उनके अन्तपर्यंत सम्यक्त्वके अन्तकांडकायामका प्रमाण है वह द्विचरमकांडकायामके प्रमाणसे संख्यातगुणा है । तो भी यथायोग्य अन्तर्मुहूर्तमात्र ही है ॥ १३९ ॥ सम्मत्तचरिमखंडे दुचरिमफालित्तितिषिण पचाओ। संपहियपुरगुणसेढीसीसे सीसे य चरिमम्हि ॥ १४० ।। सम्यक्त्वचरमखंडे द्विचरमफालीति त्रयः पर्वाः । संप्राप्त पूर्वगुणश्रेणीशी शीर्षे च चरमे ॥ १४० ॥ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयके अन्तर्खडकी प्रथम फालिके पतन समयसे लेकर द्विचरम- फालिके पतनसमयतक द्रव्यनिक्षेपण करनेमें तीन पर्व जानना । अर्थात् - विभागकर तीन जगह द्रव्य देना । उस जगहपर प्रथम समयसे लेकर . अवशेष स्थितिके अन्तनिषकतक लन्धिसारः। ४२ । और उससे ऊपर '.. जिसका प्रारंभ हुआ.ऐसे गुणवेणी आयामके शीर्पतक तो एक पर्व जानना । उससे ऊपर पूर्व जो अवस्थितगुणश्रेणी आयाम था उसके शीर्पतक दूसरा पर्व जानना ऊपरकी स्थितिके प्रथमसमयसे लेकर अंतसमयतक तीसरा पर्व जाना ॥ १४ ॥ तत्य असंखेजगुणं असंखगुणहीणयं विसेसूणं । संखातीदगुणूणं विसेसहीणं च दत्तिकमो ॥ १४१ ॥ उक्कट्टिदबहुभागे पढमे सेसेकभागबहुभागे। विदिए पवेवि सेसिगभागं तदिये जहो देदि ॥ १४२ ।। तत्रासंख्येयगुणं असंख्यगुणहीनकं विशेपोनम् । संख्यातीतगुणोनं विशेपहीनं च दत्तिक्रमः ॥ १४१ ॥ अपकर्पितबहुभागे प्रथमे शेपैकभागबहुभागे । द्वितीये पर्वेपि शेपैकभागं तृतीये यथा ददाति ।। १४२ ॥ अर्थ-वहां पहले पर्वमें द्रव्य असंख्यातगुणा देना। उससे दूसरे पर्वमें निक्षेपण किया द्रव्य असंख्यात गुणा कम है और उससे तृतीय पर्वके प्रथमनिपेको निक्षेपण किया गया द्रव्य असंख्यातगुणा कम है वह चय घटते हुए क्रमसे जानना । उसजगह अपकर्षण किये द्रव्य- मेंसे पहले पर्वमें बहुभाग द्रव्य देना वाकीके एक भागमें भाग देनेपर बहुभाग तो दूसरे 'पर्वमें देना और वाकीके एकभागको तीसरे पर्वमें देना ॥ १४१ ॥ १४२ ॥ उदयादिगलिदसेसा चरिमे खंडे हवेज गुणसेढी। फाडेदि चरिमफालिं अणियट्टीकरणचरिमम्हि ॥ १४३ ।। उदयादिगलितशेपा चरमे खंडे भवेत् गुणश्रेणी । पातयति चरमफालिमनिवृत्तिकरणचरमे ।। १४३ ।। अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीके अन्तकांडककी प्रथमफालिके पतनसमवसे लेकर विचरमफा- लिके पतनसमयतक उदयादिगलितावशेष गुणश्रेणी आयाम है । और शेष रहे अनिवृत्ति- करणके अन्तसमयमें अन्तकांडककी अन्तफालिका पतन होता है ॥ १४३ ॥ चरिमं फालिं देदि दु पढमे पचे असंखगुणियकमा । अंतिमसमयम्हि पुणो पल्लासंखेजमूलाणि ॥ १४४ ॥ चरमं फालिं ददाति तु प्रथमे पर्वे असंख्यगुणितक्रमाणि । अंतिमसमये पुनः पल्यासंख्येयमूलानि ।। १४४ ॥ अर्थ-गुणितसमय प्रबद्ध प्रमाण अन्तकांडककी अन्तफालिका द्रव्य उसको असंख्यात- गुणा पल्यका प्रथमवर्गमूल उसका भाग देवे उसमेंसे एक भाग तो पहले पर्वमें असंख्या. ल,सा.६

४२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
तगुणा क्रमकर देना । और शेष बहुभागमात्र द्रव्य गुणश्रेणीके अन्तनिषेकमें निक्षेपण
करना ॥ १४४ ॥
चरिमे फालिं दिण्णे कदकरणिजेत्ति वेदगो होदि ।
सो वा मरणं पावइ चउगइगमणं च तटाणे ॥ १४५ ॥
देवेसु देवमणुए सुरणरतिरिए चउग्गईसुपि ।
कदकरणिजोपत्ती कमेण अंतोमुहुत्तेण ॥ १४६ ॥
चरमे फालिं दत्ते कृतकरणीयेति वेदको भवति ।
स वा मरणं प्राप्नोति चतुर्गतिगमनं च तत्स्थाने ॥ १४५ ।।
देवेषु देवमनुष्ये सुरनरतिरश्चि चतुर्गतिष्वपि ।
कृतकरणीयोत्पत्तिः क्रमेण अन्तर्मुहूर्तेन ॥ १४६ ॥
अर्थ-इसप्रकार अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें सम्यक्त्वमोहनीके अन्तफालिके द्रव्यको
नीचले निषकोंमें क्षेपण करनेसे अन्तर्मुहूर्त कालतक कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टी होता है।
वह जीव भुज्यमान आयुके नाशसे मरण पावे तो सम्यक्त्वग्रहणके पहले जो आयु बांधा
था उससे चारों गतियोंमें उत्पन्न होता है । वहांपर कृत्यकृत्यवेदकके कालके चार भाग
एक एक अन्तर्मुहूर्तमात्र करने चाहिये । उनमें से पहले भागमें मरे तो देवगतिमें दूसरे
भागमें मरे तो देव अथवा मनुष्यमें तीसरे भागमें मरे तो देव वा मनुष्य वा तिर्यंचमें
और चौथे भागमें मरण करे तो चारों गतियोंमेंसे कोई गतिमें उत्पन्न होता है । इस तरह
कृतकृत्यवेदककी उत्पत्ति जानना चाहिये ॥ १४५ ॥ १४६॥
करणपढमादु जावय किदुकिचुवरि मुहुत्तअंतोत्ति ।
ण सुहाण परावत्ती सा धि कोदावरं तु परि॥ १४७ ॥
करणप्रथमात् यावत् कृत्यकृत्योपरि मुहूर्तात इति ।
न शुभानां परावृत्तिः सा हि कपोतावरं तु उपरि ।। १४७ ॥
अर्थ-अधःकरणके प्रथमसमयसे लेकर जबतक कृतकृत्यवेदक है तबतक उस अन्तर्मु-
इतकालमें से प्रथमभागमें मरण करे तो पीत पद्म शुक्लरूप शुभ लेश्याओंका बदलना नहीं
होता क्योंकि यहांसे मरके देवगतिमें उत्पन्न होता है। और जो अन्यभागोंमें मरे तो शुभ-
लेश्याकी क्रमसे हानि होकर मरणसमय कपोतलेश्याका जघन्य अंश होता है ॥ १४७ ॥
अणुसमओ वट्टणयं कदकिजंतोत्ति पुषकिरियादो।
वट्टदि उदीरणं वा असंखसमयप्पवद्धाणं ॥ १४८ ॥
अनुसमयोपवर्तनं कृतकरणीय इति पूर्वक्रियातः ।
वर्तते उदीरणां वा असंख्यसमयप्रवद्धानाम् ॥ १४८ ॥

लब्धिसारः। ४३ अर्थ-समय समय अनन्तगुणा घटता क्रमलिये अनुभागका अपवर्तन कहा था वही इस कृतकृत्यवेदककालके अन्तसमयतक पाया जाता है उसीकालमें असंख्यात समय प्रव- द्धोंकी उदीरणा पायी जाती है ॥ १४८ ॥ अव उसकी विधि कहते हैं:- उदयवहिं उकट्टिय असंखगुणमुदयआवलिम्हि खिये । उवरि विसेसहीणं कदकिजो जाव अइत्यवणं ॥ १४९ ।। उदयवहिरपकर्पितं असंख्यगुणं उदयावलौ क्षिपेत् । उपरि विशेपहीनं कृतकृत्यो यावदतिस्थापनम् ॥ १४९ ॥ अर्थ-कृतकृत्यवेदककालके एकभाग प्रमाण द्रव्यको उदयावलिसे बाह्य ऊपरके निपे- कोंसे ग्रहणकर उसको प्रत्यके असंख्यातवें भागका भाग देके उनमेंसे एक भाग तो उद- यावलिमें असंख्यातगुणा क्रमलिये दिया जाता है और शेष बहुभागमात्र द्रव्य उस उदयावलिसे ऊपरकी स्थितिके अन्तमें समय अधिक अतिस्थापनावलिको छोड़ सब निपे- कोंमें विशेषहीन क्रमलिये निक्षेपण करे। इसप्रकार ऊपरकी स्थितिका द्रव्य उदयावलिमें दिया जाता है उसका नाम उदीरणा है ॥ ११९ ॥ जदि संकिलेसजुत्तो विसुद्धिसहिदो यतोपि पडिसमयं । दछमसंखेज्जगुणं उकट्टदि णस्थि गुणसेढी ।। १५० ॥ यदि संक्लेशयुक्तो विशुद्धिसहितो अतोपि प्रतिसमयम् । द्रव्यमसंख्येयगुणमपकर्पति नास्ति गुणश्रेणी ॥ १५० ॥ अर्थ-यद्यपि कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि लेश्याके बदलेनेसे संक्लेश सहित होता है विशु- द्धता युक्त होता है तो भी पहले उत्पन्न हुए करणरूप परिणामोंकी विशुद्धताके संस्कारसे समय २ प्रति असंख्यातगुणे द्रव्यको अपकर्षण कर उदीरणा करता है । गुणश्रेणी आया- मके विना कुछ द्रव्यको उदयावलिमें देता है वाकीको ऊपरकी स्थिति देदिया इसलिये यहां गुणश्रेणी नहीं है ॥ १५० ॥ जदि वि असंखेजाणं समयपवद्धाणुदीरणा तोवि । उदयगुणसेढिठिदिए असंखभागो हु पडिसमयं ॥ १५१ ॥ यद्यपि असंख्येयानां समयप्रवद्धानामुदीरणा तथापि । उदयगुणश्रेणिस्थितेरसंख्यभागो हि प्रतिसमयं ।। १५१ ।। अर्थ-यद्यपि असंख्यात समय प्रबद्धोंकी उदीरणा पूर्वपूर्व समयके उदीरणा द्रव्यसे असंख्यातगुणा क्रम लियेहुए है तो भी उस गुणश्रेणीरूप उदयमें आये निषेकके द्रव्यले यह उदीरणा द्रव्य प्रतिसमय असंख्यातवां भागमात्र ही है ।। १५१ ॥ समय समय प्रति

४४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
उच्छिष्टावलिके एक २ निषेकको निर्जरारूप कर उसके बाद के समयमें जीव क्षायकसम्य-
रदृष्टी होता है।
विदियकरणादिमादो कदकरिणजस्स पढमसमओत्ति ।
वोच्छं रसखंडुकीरणकालादीणमप्पवहु ॥ १५२ ॥
द्वितीयकरणादिमात् कृतकृत्यस्य प्रथमसमय इति ।
वक्ष्ये रसखंडोत्करणकालादीनामल्पबहुत्वम् ॥ १५२ ॥
अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर कृतकृत्य वेदकके प्रथम समयतक
अनुभागकांडकोत्करणकालादिकोंके अल्पबहुत्वके तेतीसस्थान कहूंगा ॥ १५२ ।।
रसठिदिखंडुक्कीरणअद्धा अवरं वरं च अवरवरं
सवत्थोवं अहियं संखेजगुणं विसेसहियं ॥१५३ ॥
रसस्थितिखंडोत्करणाद्धा अवरं वरं च अवरवरं ।
सर्वस्तोक अधिक संख्येयगुणं विशेषाधिकम् ॥ १५३ ।।
अर्थ-जघन्य अनुभागखंडोत्करण काल संख्यातआवलिमात्र है तो भी कहे जानेवाले
सब स्थानोंसे थोड़ा है, उससे उत्कृष्ट अनुभागखंडोत्करणकाल उसके संख्यातवें भागमात्र,
विशेषकर अधिक है, उससे संख्यातगुणा जघन्यस्थितिकांडकोत्करण काल है और उसके
संख्यातवें भागमात्र विशेषकर अधिक अपूर्व करणकी आदिमें संभवतां ऐसा उत्कृष्ट
स्थितिकांडकोत्करण काल है ॥ १५३ ॥
कदकरणसम्मखवणणियट्टिअपुबद्ध संखगुणिदकम ।
तत्तो गुणसेढिस्स य णिक्खेओ साहियो होदि ॥ १५४.॥.
कृतकरणसम्यक्षपणनिवृत्त्यपूर्वाद्धा संख्यगुणितक्रमं ।
ततो गुणश्रेण्याश्च निक्षेपः साधिको भवति ॥ १५४ ॥
अर्थ-उससे संख्यातगुणा कृतकृत्यवेदकका काल है ५ । उससे संख्यातगुणा अष्ट
वर्ष करनेके समयसे लेकर कृतकृत्य वेदकके अन्तसमयतक सम्यक्त्वमोहनीकी क्षपणाका
काल है ६ । उससे संख्यातगुणा अनिवृत्तिकरणका काल है ७ । उससे संख्यातगुणा
अपूर्वकरणका काल है ८। उससे अनिवृत्तिकरणकाल और इसके संख्यातवें भागमात्र विशे-
षकर अधिक अपूर्वकरणके पहले समयमें जिसका प्रारंभ हुआ था ऐसा गुणश्रेणी आयाम
है.॥.१५४ ॥-
सम्मदुचरिमे चरिमे अडवस्सस्सादिमे च ठिदिखंडा।
अवरवरावाहावि य अडवस्सं संखगुणियकमा ॥ १५५ ॥

लन्धिसारः। सम्यग्द्विचरम चरमे अष्टवर्पस्यादिमे च स्थितिखंडानि । अवरवरावाधापि च अष्टवर्प संख्यातगुणितक्रमाणि ।। १५५ ।। अर्थ-उससे संख्यातगुणा सम्यक्त्वमोहनीका द्विचरम स्थितिकांडकायाम है १० । उससे संख्यातगुणा सम्यक्त्व मोहनीका अन्तस्थितिकांडका आयाम है ११ । यससे संख्या- तगुणा सम्यक्त्वमोहनीका आठवर्षस्थितिका प्रथमस्थितिकांडक आयाम है १२ । उससे संख्यातगुणा कृतकृत्य वेदकके प्रथमसमयमें संभवता जो ज्ञानावरणादि कर्मोंका स्थितिबन्ध उसका जघन्य आवाधाकाल है १३ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें संभ- वतां स्थितिवन्धका उत्कृष्ट आवाधा काल है १४ । यहांतक ये सब काल प्रत्येक यथासंभव अन्तर्मुहूर्तमात्र ही जानने । उससे संख्यातगुणी सम्यक्त्वमोहनीकी अवशेष अष्टवर्पप्रमाण स्थिति है ॥ १५५॥ मिच्छे खवंदे सम्मदुगाणं ताणं च मिच्छसंतहि । पढमंतिमठिदिखंडा असंखगुणिदा हु दुटाणे ॥ १५६ ।। मिथ्ये क्षपिते सम्यद्विकानां तेपां च मिथ्यसत्त्वं हि । प्रथमांतिमस्थितिखंडान्यसंख्यगुणितानि हि द्विस्थाने ॥ १५६ ॥ अर्थ-उससे असंख्यात गुणा मिथ्यात्वके क्षय करनेके समय सम्यक्त्वमोहनीयका अन्तका स्थितिकांड क आयाम है १६ । उससे असंख्यातगुणा मिश्रमोहनीयका अन्तका स्थितिकांडक आयाम है १७ । उससे असंख्यातगुणा मिथ्यात्व क्षयकरनेके समयके वादमें संभवता मिश्रमोहनीय वा सम्यक्त्वमोहनीयका प्रथमस्थितिकांडक आयाम है १८ । उससे असंख्यात गुणा मिथ्यात्वका सत्त्वद्रव्य अन्तकांडक प्रमाण जहां वाकी रहे उस कालमें संभवता मिश्रमोहनी वा सम्यक्त्वमोहनीयका अन्तकांडकका आयाम है ॥ १५६ ॥ मिच्छंतिमठिदिखंडो पल्लासंखेजभागमेत्तेण । हेटिमठिदिप्पमाणेणभिहियो होदि णियमेण ॥ १५७ ॥ मिथ्यांतिमस्थितिखंड पल्यसंख्येयभागमात्रेण । अधस्तनस्थितिप्रमाणेनाभ्यधिकं भवति नियमेन ॥ १५७ ॥ अर्थ-उससे मिथ्यात्वका सत्त्व जिसकालमें पाया जावे उसमें मिश्रसम्यक्त्व मोहनी के अन्तखंडका घात होनेके वाद शेष रही उन दोनोंके नीचेकी स्थिति पत्यके असंख्यात भागमात्र उससे अधिक मिथ्यात्वके अन्तकांडकका आयाम है ।। १५७ ।। दूरावकिटिपढमं ठिदिखंड संखसंगुणं तिण्णं । दूरावकिटिहेदू ठिदिखंडं संखसंगुणियं ॥ १५८ ॥ दूरापकृष्टिप्रथमं स्थितिखंड संखसंगुणं त्रयं दूरापकृष्टिहेतुः स्थितिखंडः संख्यसंगुणितः ॥ १५८ ।। - ४६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-उससे असंख्यातगुणा दर्शनमोहत्रिककी दूरापकृष्टि नामा स्थितिमें प्राप्त हुआ ऐसा पल्यका असंख्यातवां वहुभागमात्र स्थितिकांडक आयाम है २१ । उससे संख्यातगुणा दूरापकृष्टिस्थितिका कारण ऐसा पत्यका असंख्यात बहुभागमात्र स्थितिकांडक आयाम है ॥ १५८॥ पलिदोवमसंतादो विदियो पल्लस्स हेदुगो जो दु । अवरो अपुवपढमे ठिदिखंडो संखगुणिदकमा ॥ १५९ ।। पलितोपमसत्त्वतो द्वितीयं पल्यस्य हेतुकं यत्तु । अवरमपूर्वप्रथमे स्थितिखंड संख्यगुणितक्रमं ॥ १५९ ।। अर्थ-उससे संख्यातगुणा पल्यमात्र शेपस्थिति होनेपर पाया जावे ऐसा द्वितीयस्थि- तिकांडकका आयाम है २३ । उससे संख्यातगुणा पल्यमात्र स्थितिको कारण ऐसा पल्यका संख्यातवां भागमात्र स्थितिकांडक आयाम है २४ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें जिसका प्रारंभ हुआ ऐसा जघन्य स्थितिकांडकका आयाम है ॥ १५९ ॥ पलिदोवमसंतादो पढमो ठिदिखंडओ दु संखगुणो। पलिदोवमठिदिसंतं होदि विसेसाहियं तत्तो ॥ १६० ॥ पल्योपमसत्त्वतः प्रथमं स्थितिखंडकं तु संख्यगुणं । पल्योपमस्थितिसत्त्वं भवति विशेषाधिकं ततः ॥ १६० ॥ अर्थ-उससे संख्यातगुणा पल्यमात्र अवशेष स्थितिमें प्राप्त ऐसा पल्यका संख्यात बहु- भागमात्र प्रथमकांडकका. आयाम है २६ । उससे पल्यका संख्यातवां भागमात्र विशेषकर अधिक पल्यमान स्थितिसत्त्व है ॥ १६० ।। विदियकरणस्स पढमे ठिदिखंडविसेसयं तु तदियस्स । करणस्स पढमसमये दंसणमोहस्स ठिदिसंतं ॥ १६१ ॥ दसणमोहूणाणं वंधो संतो य अवर वरगो य । संखेये गुणयकमा तेत्तीसा एत्थ पदसंखा ॥ १६२ ॥ द्वितीयकरणस्य प्रथमे स्थितिखंडविशेपकं तु तृतीयस्य । करणस्य प्रथमसमये दर्शनमोहस्य स्थितिसत्त्वम् ॥ १६१ ॥ दर्शनमोहोनानां बंधः सत्त्वं च अवरं वरकं च । संख्येयगुणितक्रमं त्रायस्त्रिंशदन पदसंख्या ॥ १६२ ॥ अर्थ-उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें जघन्य और उत्कृष्टकांडकोंमें बीचके विशेषका प्रमाण पल्यका संख्यातवें भागकर हीन पृथक्त्व सागर प्रमाण है २८ । उससे संख्यातगुणा अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें संभवता दर्शनमोहका स्थितिसत्त्व है

लन्धिसारः।
२९ । उससे संख्यातगुणा कृतकृत्यवेदकके प्रथमसमयमं संभवता दर्शनमोहक विना अन्य
कोका जघन्य स्थितिवन्ध है ३० । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें संभ-
वता उन्हीं काँका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध है ३१ । उससे संख्यातगुणा अनिवृत्तिकरणके
अन्तमागमें संभवता उन्हीं काँका जघन्य स्थितिसत्त्व है ३२ । उससे संख्यातगुणा अपू-
करणके प्रथमसमयमें संभवता उन्हीं काँका उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व है । ३३ । इस प्रकार
दर्शनमोहकी क्षपणाके अवसरमें संभवते अल्प बहुत्के तेतीस स्थान है ॥ १६१ ॥१६२ ।।
सत्तण्हं पयडीणं खयाटु खइयं तु होदि सम्मत्तं ।
मेरु व णिप्पकंपं मुणिम्मलं अक्खयंमणतं ॥ १६३ ।।
सप्तानां प्रकृतिना भयान् क्षायिकं तु भवति सम्यक्त्वम् ।
मेरुरिव निप्पकंपं सुनिर्मलमक्षयमनंतम् ॥ १६३ ॥
अर्थ-अनन्तानुवन्धी चार दर्शनमोहकी तीन-इन सातों प्रकृतियोंके क्षयसे क्षायक
सम्यक्त्व होता है वह सुमेरुके समान निश्चल है शंका आदि मलसे रहित हैं शिथिलताके
अभावसे गाढ है और अन्तरहित है ॥ १३ ॥
दसणमोहे सविदे सिझदि तत्थेव तदियतुरियभवे ।
णादिक्कदि तुरियभवं ण विणस्सदि सेससम्मं व ॥ १६४ ॥
दर्शनमोहे क्षपिते सिद्ध्यति तत्रैव तृतीयतुरीयभवे ।
नातिक्रामति तुरीयभवं न विनश्यति शेपसम्बगिव ॥ १६४ ॥
अर्थ-दर्शनमोहका क्षय होनेपर उसी भत्रमें अथवा तीसरे भवमें या मनुप्यतिर्यंचा
पहले आयु बन्धा हो तो भोगभूमि अपेक्षा चौथे भवमें सिद्धपदको पाता है । चौथे भवको
नहीं उलंघन करता । और यह सम्यक्त्व शेपके उपशमिक क्षायोपशमिक सम्यक्त्वकी तरह
नाशको नहीं प्राप्त होता ॥ १६४ ।।
सत्तण्हं पयडीणं खयादु अवरं तु खइयलद्वी दु।
उक्कस्सखइयलद्धी घाइचउक्कक्खएण हवे ॥ १६५ ॥
सप्तानां प्रकृतीनां क्षयादवरा तु क्षायिकलन्धिस्तु ।
उत्कृष्टक्षायिकलन्धिर्षातिचतुष्कायेण भवेत् ॥ १६५ ।।
अर्थ-सात प्रकृतियोंके क्षयसे असंयतसम्यग्दृष्टीके क्षायिकसम्यक्त्वरूप जयन्य क्षाय-
कलब्धि होती है और चार घातिया कर्मोंके क्षयसे परमात्माके केवलज्ञानादिरूप उत्कृष्ट
क्षायक लब्धि होती है ॥ १६५ ॥
इसप्रकार श्रीनेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती विरचित क्षपणासार गर्मित लब्धिसारमें दर्शन-
लन्धिका व्याख्यान करनेवाला पहला अधिकार समाप्त हुआ ॥ १ ॥

८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चारित्रलब्धिका अधिकार,॥२॥ J आगे चारित्रलब्धिका स्वरूप कहते हैं- दुविहा चरितलद्धी देसे सयले य देसचारित्तं । मिच्छो अयदो सयलं तेवि य देसो य लभेई ॥ १६६ ॥ द्विविधा चारित्रलब्धिः देशे सकले च देशचारित्रम् । मिथ्यो अयतः सकलं तावपि च देशश्च लभते ॥ १६६ ॥ अर्थ-चारित्रकी लब्धि अर्थात् प्राप्ति वह चारित्रलब्धि है वह देश सकलके भेदसे दो प्रकारकी है। उनमेंसे देश चारित्रको मिथ्याष्टि वा असंयत सम्यग्दृष्टी प्राप्त होता है और सकल चारित्रको वे दोनों तथा देशसंयत प्राप्त होता है ॥ १६६ ॥ अंतोमुहुत्तकाले देसवदी होहिदित्ति मिच्छो हु। सोसरणो सुझंतो करणेहिं करेदि सगजोग्गं ॥ १६७ ॥ अन्तमुहूर्तकाले देशव्रती भविष्यतीति मिथ्यो हि । सापसरणः शुध्यन् करणानि करोति वकयोग्यम् ॥ १६७ ।। अर्थ-अन्तर्मुहूर्तकालके वाद जो देशवती होगा वह मिथ्यादृष्टि जीव समय समय अनन्तगुणी विशुद्धतासे बढे तो आयुके विना सातकर्मोंका बन्ध वा सत्त्व अन्तःकोड़ाकोड़ी- मात्र शेष करनेसे स्थितिबन्धापसरणको करता हुआ अशुभकर्मोका अनुभाग अनन्तवें भाग- मात्र करनेसे अनुभागबन्धापसरणको करता हुआ अपने योग्य करण परिणामोंको करता है ॥ १६७ ॥ मिच्छो देसचरितं उसमसम्मेण गिण्हमाणो हु। सम्मतुष्पत्तिं वा तिकरणचरिमम्हि गेण्हदि हु॥ १६८ ॥ मिथ्यो देशचारित्रं उपशमसम्येन गृहन् हि । सम्यक्त्वोत्पत्तिमिव त्रिकरणचरमे गृह्णाति हि ॥ १६८ ॥ अर्थ-अनादि वा सादि मिथ्यादृष्टि जीव उपशम सम्यक्त्वसहित देशचारित्रको ग्रहण करता है वह सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके कथनकी तरह तीनकरणोंके अन्तसमयमें देशचारि- 'त्रको ग्रहण करता है । अर्थात् प्रकृतिवन्धापसरण स्थितिबंधापसरण आदि जो कार्यविशेष वहां कहे हैं वे सब होते हैं कुछ विशेषता नहीं है ॥ १६८ ॥ मिच्छो देसचरितं वेदगसम्मेण गेण्हमाणो हु। दुकरणचरिमे गेण्हदि गुणसेढी णत्थि तकरणे ॥ १६९ ॥ . .

लन्धिसारः। १९ सम्मत्तुष्पत्तिं वा थोपवहुत्तं च होदि करणाणं । ठिदिखंडसहस्सगदे अपुवकरणं समप्पदि हु॥ १७० ॥ मिथ्यो देशचारित्रं वेदकसम्येन गृहन् हि । द्विकरणचरमे गृहाति गुणश्रेणी नाति तत्करणे ॥ १६९ ॥ सम्यक्त्वोत्पत्तिमिव लोकबहुत्त्रं च भवति करणानाम् । स्थितिखंडसहस्रगते अपूर्वकरणं समाप्यते हि ॥ १७० ॥ अर्थ-सादि मिथ्यादृष्टि जीव वेदक सम्यक्त्वसहित देशचारित्रको ग्रहण करे तो उसके अधःकरण अपूर्वकरण ये दोही करण होते हैं उनमें गुणश्रेणीनिर्जरा नहीं होती अन्य स्थितिखंडादि सब कार्य होते हैं । वह अपूर्वकरणके अन्तसमयमें एक ही वक्त वेदक सम्यक्त्व और देशचारित्रको ग्रहण करता है क्योंकि अनिवृत्ति करणके बिना ही इनकी प्राप्ति है । वहां पर प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पतिकी तरह करणोंका अल्पबहुत्व है इस. लिये यहां अधःकरणकालसे अपूर्वकरणका काल संख्यातव भाग है और अपूर्वकरणकालमें संख्यात हजार स्थितिखंड वीतनेपर अपूर्वकरणका काल समाप्त होता है ॥ १६९। १७०॥ से काले देसवदी असंखसमयप्पवद्धमाहरिय । उदयावलिस्स वाहि गुणसेढिमवटिदं कुणदि ॥ १७१ ॥ तस्मिन् काले देशव्रती असंख्यसमयप्रबदमाहृत्य । उदयावलेाह्यं गुणश्रेणीमवस्थितां करोति ।। १७१ ॥ अर्थ-अपूर्णकरणके अन्तसमयके वादमें जीव देशवती होकर असंख्यातसमय प्रबद्ध प्रमाण द्रव्यको ग्रहणकर उदयावलीसे वाह्य अवस्थित गुणश्रेणी आयाम करता है ॥१७॥ दचं असंखगुणियकमेण एयंतवुद्धिकालोत्ति । वहुठिदिखंडे तीते अधापवत्तो हवे देसो ॥ १७२ ।। द्रव्यमसंख्यगुणितक्रमेण एकांतवृद्धिकाल इति । वहुस्थितिखंडेतीते अधाप्रवृत्तो भवेदेशः ॥ १७२ ॥ अर्थ-देशसंयतके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्ततक समय समय अनन्तगुणी विशु. द्धतासे वन्धता है उसे एकांतवृद्धि कहते हैं । उस एकांतवृद्धिकालमें समय समय असं. ख्यातगुणे क्रमसे द्रव्यको अपकर्षणकर अवस्थित गुणश्रेणी आयाममें निक्षेपण करता है वहां स्थितिकांडकादि कार्य होते हैं औ बहुत स्थितिखंड होनेपर एकांतवृद्धिका काल समाप्त होनेके वाद विशुद्धताकी वृद्धि, रहित हुआ स्वस्थान देशसंयत होता है । इमीको प्रवृतसंयत भी कहते हैं । उसका काल जघन्य अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट देशोन कोहि पूर्व वर्षप्रमाण है ॥ १७२ ॥ ल.सा.७

५०
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
ठिदिरसघादो णत्थि'हु अधापवताभिधाणदेसस्स।
पडिउटुदे मुहुत्तं संतेण हि तस्स करणदुगा ॥ १७३ ॥
स्थितिरसघातो नास्ति हि अधाप्रवृत्ताभिधानदेशस्य ।
प्रतिपतिते मुहूर्त संयतेन हि तस्य करणद्विकम् ॥ १७३ ॥
अर्थ-अधाप्रवृत्त देससंयतके काल में स्थितिखण्डन वा अनुभागखण्डन नहीं होता
और जो बाह्य कारणोंसे सम्यक्त्व वा देशसंयतसे भ्रष्ट होकर मिथ्यादृष्टि होता है वहां
बड़ा अन्तर्मुहूर्त वा संख्यात असंख्यातवर्षतक रहकर फिर वेदक सम्यक्त्वसहित देशसंय-
मको ग्रहण करे उसके अधःप्रवृत्त अपूर्वकरण दो करण होते हैं । इसलिये स्थिति अनुभा-
गकांडकका घात भी होता है ॥ १७३ ॥
देसो समये समये सुझंतो संकिलिस्समाणो य ।
चउबढिहाणिदधादवट्ठिदं कुणदि गुणसेटिं ॥ १७४ ॥
देशः समये समये शुध्यन् संक्लिश्यन् च ।
चतुर्वृद्धिहानिद्रव्यादवस्थितां करोति गुणश्रेणिम् ॥ १७४ ॥
अर्थ-अधाप्रवृत्त देशसंयत जीव संक्लेशी हुआ विशुद्धताकी वृद्धि समय समयमै
करता उसके अनुसार कभी असंख्यातवें भाग वढता कभी संख्यातवें भाग वढता कभी
संख्यातगुणा कभी असंख्यातगुणा द्रव्यको अपकर्षणकर गुणश्रेणीमें निक्षेपण करता है ।
और विशुद्धताकी हानिके अनुसार कभी असंख्यातवें भाग घटता कभी संख्यातवें भाग
घटता कभी संख्यातगुणा घटता कभी असंख्यातगुणा घटता द्रव्यका अपकर्षणकर गुणश्रे.
णीमें निक्षेपण करता है । इसप्रकार अधाप्रवृत्त देशसंयतके सबकालमें समय समय यथा-
संभव चतुस्थान पतित वृद्धि हानि लिये गुणश्रेणी विधान पायाजाता है ॥ १७४ ॥
विदियकरणादु जावय देसस्सेयंतवहिचरिमेति ।
अप्पावहुगं वोच्छं रसखंडद्धाण पहुदीणं ॥ १७५ ॥
द्वितीयकरणात् यावत् देशस्यैकांतवृद्धिचरमे इति ।
अल्पवहुत्वं वक्ष्ये रसखंडाद्धानां प्रभृतीनाम् ॥ १७५ ।।
अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणसे लेकर एकांत वृद्धि देशसंयतके अन्ततक संभव जो जघन्य
अनुभाग खण्डोत्करणकालादिरूप अठारह स्थान उनके अल्प बहुत्वको मैं कहूंगा ॥ १७५॥
अंतिमरसखंडकीरणकालादो दु पढमओ अहिओ।
चरिमठिदिखंडुक्कीरणकालो संखगुणिदो हु ॥ १७६ ॥
अंतिमरसखंडोत्करणकालतस्तु प्रथमो अधिकः ।
चरमस्थितिखंडोत्करणकालः संख्यगुणितो हि ॥ १७६ ॥

लब्धिसारः। ५१ अर्थ-सबसे थोड़ा देशसंयतके एकांतवृद्धिकालके अन्तमें संभव जघन्य अनुमागखंडो- करणकाल है १ । उससे कुछ विशेषकर अधिक अपूर्वकरणके प्रथमसमयने सम्भव उत्कृष्ट अनुभागखण्डोत्करण काल है २ । उससे संख्यातगुणा देशसंयतके एकांतवृद्धिकालके अन्तसमयमें संभवता जघन्यस्थिति कांडकोत्करणकाल ३ है ॥ १७६ ॥ पढमहिदिखंडकीरणकालो साहियो हवे तत्तो। एयंतवडिकालो अपुवकालो य संखगुणियकमा ॥ १७७ ॥ प्रथमस्थितिखंडोत्करणकालः साधिको भवेत् ततः। एकांतवृद्धिकाले अपूर्वकालश्च संख्यगुणितक्रमः ॥ १७७ ।। अर्थ-उससे कुछ विशेषकर अधिक अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें संभवता उत्कृष्टस्थिति- खण्डोत्करणकाल है ४ । उससे संख्यातगुणा एकांतवृद्धिका काल है ५ । उससे संख्यात- गुणा अपूर्वकरणका काल ६ है ॥ १७७ ॥ अवरा मिच्छतियद्धा अविरद तह देससंयमद्धा य । छप्पि समा संखगुणा तत्तो देसस्स गुणसेढी ॥ १७८ ।। अवरा मिथ्यत्रिकाद्धा अविरता तथा देशसंयमाद्धा च । पडपि समाः संख्यगुणा ततो देशस्य गुणश्रेणी ॥ १७८ ॥ अर्थ-उससे संख्यातगुणा मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वमोहनी इन तीनोंका उदयकाल और असंयम देशसंयम सकलसंयम-इन छहोंका जघन्यकाल आपसमें समान है ७ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें जिसका आरंभ हुआ ऐसा देशसं- यतका गुणश्रेणी आयाम ८ है ॥ १७८ ॥ चरिमावाहा तत्तो पढमावाहा य संखगुणियकमा । तत्तो असंखगुणियो चरिमद्विदिखंडओ णियमा ॥ १७९ ॥ चरमावाधा ततः प्रथमावाधा च संख्यगुणितक्रमा । तत असंख्यगुणितः चरमस्थितिखंडो नियमात् ।। १७९ ॥ अर्थ-उससे संख्यातगुणा एकांतवृद्धिके अन्तसमयमें संभव स्थितियन्धका जघन्य आवाधा काल है ९ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथम समयमें संभवते स्थितिय- न्धका उत्कृष्ट आवाधाकाल है १०। यहांतक ये कहे हुए सबकाल प्रत्येक अन्तमहतमात्र ही जानना । उससे असंख्यातगुणा एकांतवृद्धिके अन्तसमयमें सम्भवता जयन्यसितिकांडक आयाम ११ है ।। १७९ ॥ पल्लस्स संखभागं चरिमट्टिदिखंडयं हवे जम्हा। तम्हा असंखगुणियं चरिमं ठिदिसंडयं होई ।। १८० ॥

५२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पल्यस्य संख्यभागं चरमस्थितिखंडकं भवेत् यस्मात् ।
तस्मादसंख्यगुणितं चरमं स्थितिखंडकं भवति ॥ १८० ॥
अर्थ-यह कहा गया जो अन्तमें सम्भवता जघन्यस्थितिकांडक आयाम वह पल्यके
संख्यातवें भागमात्र है क्योंकि पूर्वोक्त अन्तर्मुहूर्तकालसे यह अन्तखण्ड असंख्यातगुणा
कहा है ॥ १८ ॥
पढमे अवरो पल्लो पढमुक्कस्सं च चरिमठिदिवंधो।
पढमो चरिमं पढमद्विदिसतं संखगुणिदकमा ॥ १८१ ॥
प्रथमे अवरः पल्यः प्रथमोत्कृष्टं च चरमस्थितिबंधः ।
प्रथमः चरमं प्रथमस्थितिसत्त्वं संख्यगुणितक्रमाणि ॥ १८१ ॥
अर्थ-उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें सम्भवता जघन्य स्थितिकांडक
आयाम है १२ । उससे संख्यातगुणा पल्य है १३ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके
प्रथमसमयमें सम्भवता पृथक्त्वसागरप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिकांडक आयाम है १४ । उससे
संख्यातगुणा जघन्यस्थितिवन्ध है १५ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें
सम्भवता उत्कृष्टस्थितिबन्ध है १६ । उससे संख्यातगुणा एकांतवृद्धिके अन्तसमय सम्भ-
वता जघन्यस्थितिसत्त्व है १७ । उससे संख्यातगुणा अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें सम्भवता
उत्कृष्टस्थितिसत्त्व है १८ । इसप्रकार कालके अल्प बहुत्व स्थान कहे ॥ १८१ ॥
आगे देशसंयममें परिणामोंकी विशुद्धतारूप लब्धिका अल्प वहुत्व कहते हैं-
अवरवरदेसलद्धी सेकाले मिच्छसंजमुबवण्णे।
अवरादु अणंतगुणा उकस्सा देसलद्धी दु ॥-१८२ ॥
अवरवरदेशलब्धिः स्वकाले मिथ्यसंयममुपपन्ने ।
अवरादनंतगुणा उत्कृष्टा देशलब्धिस्तु ॥ १८२ ॥
अर्थ-जो जीव देशसंयमके घातक कर्मके उदयसे देशसंयमसे गिरा हुआ मिथ्यात्वके
सन्मुख होता है उस मनुष्यके देशसंयमके अन्तमें जघन्य देशसंयमलब्धि होती है। और
अनन्तगुणी विशुद्धतासे देशसंयमके उत्कृष्टपनेको पाकर उसके वादके समयमें सकलसंयमको
जो प्राप्त होगा ऐसे मनुष्यके उत्कृष्ट देशसंयमलब्धि होती है । तथा जघन्य देशसंयमके
अविभागप्रतिच्छेदोंसे अनन्तानन्तगुणे उत्कृष्ट देशसंयमके अविभागप्रतिच्छेद हैं ॥ १८२ ॥
अयरे देसटाणे होंति अणंताणि फहयाणि तदो।
छट्ठाणगदा सवे लोयाणमसंखछट्ठाणा ॥ १८३ ॥
अवरे देशस्थाने भवंत्यनन्तानि स्पर्धकानि ततः ।
पटस्थानगतानि सर्वाणि लोकानामसंख्यषस्थानानि ॥ १८३ ॥

लब्धिसारः। ૧૨ अर्थ-सबसे जघन्य पूर्वोक्त देशसंयमके स्थानमें अविभागप्रतिच्छेद अनन्तानन्त पाये जाते हैं । वे सब जीवराशिसे अनन्तगुणे हैं । और इस जघन्य स्थानने लेकर असंन्यात- लोकमात्र देशसंयमलब्धिके स्थान हैं वे छह स्थानरूप वृद्धिको लिये हुए हैं ।। १८३ ॥ तत्थ य पडिवायगया पडियचगयात्ति अणुभयगयात्ति । उबरुवरिलद्धिठाणा लोयाणमसंखण्टाणा ॥ १८८ ।। तत्र च प्रतिपातगता प्रतिपद्यगता इति अनुभयगता इति । उपर्युपरि लन्धिस्थानानि लोकानामसंख्यपदस्थानानि ।। १८४ ।। अर्थ-वहां देशसंयमके स्थान तीनप्रकार हैं । प्रतिपातगत १ प्रतिपद्यमानगत २ अनुभयगत ३ । वे लब्धिस्थान ऊपर २ हैं। और असंख्यातलोकमात्र सान पहसान पतित वृद्धिको लिये हुए मध्यमें होते हैं ॥ १८४ ॥ देशसंयमसे भ्रष्ट होनेपर अन्तसम- यमें सम्भव जो स्थान वे प्रतिपातगत हैं। देशसंयमके प्राप्त होनेपर प्रथमसमयमें संभव जो स्थान वे प्रतिपद्यमानगत है । और इनके विना अन्यसमयों में संभव जो स्थान वे अनुभयगत हैं। णरतिरिये तिरियणरे अवरं अवरं वरं वरं तिमुवि । लोयाणमसंखेना छटाणा होति तम्मज्झे ।। १८५ ॥ नरतिरश्चि तिर्यग्नरे अवरं अवरं वरं वरं त्रिवपि । लोकानामसंख्येयानि पटूस्थानानि भवंति तन्मध्ये ॥ १८५ ।। अर्थ-उन प्रतिपात प्रतिपद्यमान अनुभय इन तीनोंके जघन्य जघन्य उत्कृष्ट उस्कृष्ट स्थान मनुप्य तिर्यंच तिर्यंच मनुप्योंमें क्रमसे जानना । और उनके बीच अन्तरसान असंख्यात लोकप्रमाण पदस्थानपतित वृद्धि सहित हैं ॥ १८५ ।। पडिवाददुगवरवरं मिच्छे अयदे अणुभयगजहणं । मिच्छवरविदियसमये तत्तिरियवरं तु संठाणे ॥ १८६ ॥ प्रतिपातद्विकावरवरं मिथ्ये अयते अनुभवगजघन्यं । मिथ्यावरद्वितीयसमये तत्तिर्यन्वरं तु स्वस्थाने ॥ १८६ ।। अर्थ-मिथ्यात्वके सन्मुख जीवके प्रतिपातस्थानों में मनुष्यक जघन्यसे लेकर तिर्यचके उत्कृष्टस्थानतक जो स्थान हैं वे होते हैं, तिर्यचके उस्कृष्टते लेकर मनुन्यके उत्कृष्टसान- तक जो स्थान वे असंयतके सन्मुख हुए जीवके होते हैं । प्रतिपद्यमानसानाम मनुष्यक जघन्यसे लेकर तिर्यंचके उत्कृष्टतक सान मिथ्याष्टिसे देशसंयतको प्राप्त होनेवालेके ही होते हैं । तिर्यंचके उत्कृष्ट से लेकर मनुप्यक उत्कृष्टतक सान असंयनले देशसंमत हुएक

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
होते हैं, और अनुभयस्थानोंमें मनुष्यके जघन्यसे लेकर तिर्यंचके अनुत्कृष्टतक स्थान
मिथ्यादृष्टि से देशसंयत हुएके होते हैं और तिर्यंचके उत्कृष्टसे लेकर मनुष्यके उत्कृष्टतक
स्थान असंयतसे देशसंयत हुएके होते हैं ॥ १८६ ॥ इति देशचारित्रविधानं ।
अब सकल चारित्रका वर्णन करते हैं;
सयलचरितं तिविहं खयउवसमि उपसमं च खयियं च ।
सम्मत्तुष्पत्तिं वा उवसमसम्मेण गिण्हदो पढमं ॥ १८७ ॥
सकलचारित्रं त्रिविधं क्षायोपशमिकं औपशमिकं च क्षायिकं च ।
सम्यक्त्वोत्पत्तिमिव उपशमसम्येन गृहन् प्रथमम् ॥ १८७ ॥
अर्थ-सकल चारित्र तीन तरहका है, क्षायोपशमिक १ औपशमिक २ क्षायिक ३ ।
उनमेंसे पहला क्षायोपशमिक चारित्र सातवें वा छठे गुणस्थानमें है उसको जो जीव उप-
शमसम्यक्त्वसहित ग्रहण करता है वह मिथ्यात्वसे ग्रहण करता है उसका सब विधान प्रथ-
मोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिमें कहे गयेकी तरह जानना ॥ १८७ ॥ क्षयोपशमचारित्रको
ग्रहण करता हुआ जीव पहले अप्रमत्तगुणस्थानको प्राप्त होता है ।
वेदगजोगों मिच्छो अविरददेसो य दोणिकरणेण ।
देसवदं वा गिण्हदि गुणसेढी णत्थि तकरणे ॥ १८८ ॥
वेदकयोगो मिथ्यो अविरतदेशश्च द्विकरणेन ।
देशव्रतमिव गृहाति गुणश्रेणी नास्ति तत्करणे ॥ १८८ ॥
अर्थ-वेदक सम्यक्त्व सहित क्षयोपशमचारित्रको मिथ्यादृष्टि वा अविरत वा देशसं-
यत जीव है वह देशव्रतके ग्रहणकरनेकी तरह अधःप्रवृत्त करण अपूर्व करण इन दोनों
करणोंसे ग्रहण करता है। वहां करणों में गुणश्रेणी नहीं है । सकल संयमके ग्रहण समयसे
लेकर गुणश्रेणी होती है ॥ १८८ ॥
एत्तो उवरि विरदे देसो वा होदि अप्पवहुगोत्ति ।
देसोत्ति य तहाणे विरदो त्ति य होदि वत्तवं ॥ १८९ ॥
अत उपरि विरते देश इव भवति अल्पवहुकत्वमिति ।
देश इति च तत्स्थाने विरत इति च भवति वक्तव्यम् ॥ १८९ ॥
अर्थ यहांसे ऊपर सकलविरतमें अल्पवहुत्व देशविरतकी तरह जानना। लेकिन इतना
भेद है कि जिस जगह देशविरत कहा है उस जगह सकलविरत कहना चाहिये ॥ १८९ ॥
अवरे विरदट्ठाणे होंति अणंताणि फड्ढयाणि तदो।
छट्ठाणगया सवे लोयाणमसंख छटाणा ॥ १९० ॥

लब्धिमारः। अवरे विरतस्याने भवंसनंतानि स्पर्धकानि ननः । पद्रस्थानगतानि सर्वाणि लोकानामसंख्यं पट्स्यानानि ॥ १९० ।। अर्थ-सकलसंयमके जघन्यस्यानमें अनन्तानन्त अविभाग प्रतिच्छेद हैं वे जीवराशिम अनन्तगुणे जानने । वे स्थान पट्स्थानपतित वृद्धिलिये असंख्यात लोकमात्र हैं उनमें मतं- ख्यातलोकमात्र वार पदृस्यानपतित वृद्धिका सम्भव है ॥ १९० ॥ तत्थ य पडिवादगया पडिबजगयात्ति अणुभयगयात्ति । उवरुवरि लद्धिठाणा लोयाणमसंखछटाणा ॥ १९१ ॥ तत्र च प्रतिपातगता प्रतिपद्यगता इति अनुभयगना इति । उपर्युपरि लब्धिस्थानानि लोकानामसंख्यपटूस्थानानि ।। १९१ ।। अर्थ-उस सकलसंयममें भी तीनप्रकार स्थान हैं-प्रतिपातगत १ प्रतिपद्यमान २ अनु- भयगत ३ । ये लब्धिस्थान ऊपर ऊपर रचनावाले जानना । वे हर एक असंग्ल्यातलोक- मात्र हैं वहांपर असंख्यातलोकमात्र वार पद्स्थानरूप वृद्धिका सम्भव है ॥ १९१ ॥ पडिवादगया मिच्छे अयदे देसे य हॉति उवरुवार । पत्तेयमसंखमिदा लोयाणमसंखण्टाणा ॥ १९२ ॥ प्रतिपातगतानि मिथ्ये अयते देशे च भवंति उपर्युपरि । प्रत्येकमसंख्यमितानि लोकानामसंख्यपटूस्थानानि ॥ १९२ ॥ अर्थ-उन स्थानोंमसे प्रतिपातगत स्थान सकल संयमसे भ्रष्ट होनेके अन्तसमयमै पाये जाते हैं । वहांपर जघन्यसे लेकर असंख्यातलोकमात्र स्थान तो मिथ्यात्वके सन्मुख होनेवाले जीवोंके होते हैं उनके ऊपर असंख्यातलोकमात्र असंयतके सन्मुख होनेवाले के होते हैं । उसके बाद असंख्यातलोकमात्र स्थान देशसंयतके सन्मुख हुए जीवके होते हैं। इसप्रकार प्रतिपातस्थान तीन तरहके हैं । उन तीनों जगह जघन्य स्थान यथायोग्य तीन- क्लेशवालेके और उत्कृष्टस्यान मंदसंक्लेशवालेके होते हैं। तथा हरएकमें असंख्यातलोकमात्र छहस्थान सम्भवते हैं ॥ १९२ ॥ तत्तो पडिवजगया अजमिलेच्छे मिलेच्छअजे यं । कमसो अवरं अवरं वरं वरं होदि संखं वा ॥ १९३ ।। ततः प्रतिपद्यगता आर्यम्लेच्छे म्लेच्छायें च। क्रमशो अवरमवरं वरं वरं भवनि संख्यं वा ॥ १९३ ॥ अर्थ-उनके वाद प्रतिपद्यमानस्थानमिसे प्रथम आर्यखण्डका मनुष्य मिव्याष्टिने संयमी हुआ उसके जघन्य स्थान है । उसके वाद असंख्यात लोकमात्र पद सानले उपर रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । म्लेच्छखण्डको मनुष्य मिथ्याठिसे सकल संयमी हुआ उसका जघन्य स्थान है । उसके ऊपर म्लेच्छखण्डका मनुष्य देशसंयतसे सकलसंयमी हुआ उसका उत्कृष्ट स्थान है । उसके बाद आर्यखण्डका मनुष्य देशसंयतसे सकलसंयमी हुआ उसका उत्कृष्ट स्थान होता है ॥१९३॥ तत्तोणुभयहाणे सामाइयछेदजुगलपरिहारे । पडिवद्धा परिणामा असंखलोगप्पमा होति ॥ १९४ ॥ ततोनुभयस्थाने सामायिकछेदयुगलपरिहारे । प्रतिवद्धाः परिणामा असंख्यलोकप्रमा भवंति ॥ १९४ ॥ अर्थ--उसके बाद अन्तरस्थानोंके जानेपर उसके ऊपर अनुभयस्थान है । वहां प्रथम मिथ्यादृष्टि से सकलसंयमी होनेके दूसरे समयमें सामायिक छेदोपस्थापनाको जघन्य स्थान होते हैं । उसके ऊपर परिहार विशुद्धिका जघन्यस्थान होता है । यह स्थान परिहारविशु- द्धिसे छूटकर सामायिक छेदोपस्थापनाके सन्मुख होनेवालेके अन्तसमयमें होता है । उसके ऊपर परिहारविशुद्धिका उत्कृष्टस्थान होता है । उसके ऊपर सामायिक छेदोपस्थापनाका उत्कृष्टस्थान है । ये सवस्थान आपसमें असंख्यातलोकगुणे हैं परंतु सब मिलकर असंख्या- तलोक प्रमाण सकलसंयमके स्थान होते हैं, क्योंकि असंख्यातके भेद बहुत हैं ॥ १९४ ॥ तत्तो य सुहमसंजम पडिवजय संखसमयमेत्ता हु। तत्तो दु जहाखादं एयविहं संजमं होदि ॥ १९५ ॥ ततश्च सूक्ष्मसंयमं प्रतिवर्ण्य संख्यसमयमात्रा हि । ततस्तु यथाख्यातमेकविध संयमं भवति ॥ १९५ ॥ अर्थ ---उस सामायक छेदोपस्थापनाके उत्कृष्ट स्थानसे ऊपर असंख्यात लोकमात्र स्थानोंका अन्तरालकर उपशमश्रेणीसे उतरते अनिवृत्तिकरणके सन्मुख जीवके अपने अन्त- समयमें संभवता सूक्ष्मसांपरायका जघन्यस्थान होता है। उसके ऊपरं असंख्यातसमयमात्र स्थान जानेपर क्षपक सूक्ष्मसांपरायके अन्तसमयमै सम्भव सूक्ष्मसांपरायका उत्कृष्ट स्थान उसके ऊपर असंख्यातलोकमात्र स्थानोंका अन्तरालकर यथाख्यात चारित्रका एक स्थान होता है । यह स्थान सबसे अनन्तगुणी विशुद्धतालिये उपशांतकपाय क्षीणकपाय सयोगी अयोगीके होता है । इसमें सबकपायोंका सर्वथा उपशम वा क्षय है इसलिये जघन्य मध्यम उत्कृष्ट भेद नहीं हैं ॥ १९५ ॥ है। १ म्लेच्छखण्डके उपजे मनुष्यके सकलसंयम इस तरह है कि जो म्लेच्छ मनुष्य चक्रवतीके साथ आर्यखण्डमें आवे तब उसको दीक्षा सम्भव है। क्योंकि चक्रवतीके विवाहादिकका सम्बन्ध पाया जाता है । अथवा म्लेच्छकी कन्या चक्रवर्ती विवाहता है उसके जो पुत्र हुआ वह मातापक्षके सम्बन्धसे म्लेच्छ उसके दीक्षा सम्भव होसकती है।

लब्धिसारः। पडचरिमे गहणादीसमये पडियादगुगमणुभयं तु । तम्मज्झे उवरिमगुणगहणाहिमुहे य देसं वा ॥ १९६ ॥ पतनचरमे ग्रहणादिसमये प्रतिपातद्विकमनुभयं तु । तन्मध्ये उपरितनगुणग्रहणाभिमुखे च देशमिव ।। १९६ ।। अर्थ-संयमसे पड़नेके अन्तसमयमें और संयमके ग्रहणके प्रथम समयमै क्रमसे प्रति- पात और प्रतिपद्यमान ये दो स्थान हैं और इनके वीचमें अथवा ऊपरके गुणस्थानके सन्मुख होनेपर अनुभयस्थान होते हैं वे देशसंयमकी तरह यहां भी जानने ॥ १९६ ॥ पडिवादादीतिदयं उवरुवरिमसंखलोगगुणिदकमा । अंतरछक्कपमाणं असंखलोगा हु देसं वा ॥ १९७ ॥ प्रतिपातादित्रितयं उपर्युपरितनमसंख्यलोकगुणितक्रमं । अंतरपटप्रमाणमसंख्यलोको हि देशमिव ॥ १९७ ।। अर्थ-प्रतिपातआदि तीन स्थान अपने २ जघन्यसे उत्कृष्टतक ऊपर ऊपर असंख्या- तलोकगुणा क्रमलिये हुए हैं। उन छहोंमें प्रत्येकमें असंख्यातलोकमात्रवार पट्रस्थान वृद्धि देशसंयमकी तरह जाननी ॥ १९७ ॥ मिच्छयददेसभिण्णे पडिवादट्ठाणगे वरं अवरं । तप्पाउग्गकिय? तिवकिलिडे कमे चरिमे ॥ १९८ ॥ मिथ्यायतदेशमिन्ने प्रतिपातस्थानके वरमवरम् । तत्प्रायोग्यविष्टे तीव्रक्लिष्टे क्रमेण चरमे ॥ १९८ ॥ अर्थ-प्रतिपातस्थान मिथ्यात्व असंयत देशसंयतको सन्मुख होनेकी अपेक्षा तीन भेद लिये है। वहां जघन्यस्थान तो तीत्र संक्लेशवालेके संयमके अन्तसमयमें होता है और उत्कृष्ट स्थान यथायोग्य मन्दसंक्लेशवालेके होते हैं ॥ १९८ ॥ पडिवजजहण्णदुर्ग मिच्छे उक्कस्सजुगलमवि देसे । उवरिं सामइयदुगं तम्मज्झे होंति परिहारा ॥ १९९ ।। प्रतिपद्यजघन्यद्विकं मिथ्ये उत्कृष्टयुगलमपि देशे । उपरि सामायिकद्विकं तन्मध्ये भवंति परिहाराणि ॥ १९९ ॥ अर्थ-प्रतिपद्यमानस्थान आर्यम्लेच्छकी अपेक्षा दो प्रकारसे हैं उनका जयन्य तो मिथ्यादृष्टि से संयमी हुए जीवके होता है वा उत्कृष्ट देशसंयतले संयमी हुएके होता है। ल,सा.८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ५८ उनके ऊपर अनुभयस्थान हैं वे सामायिक छेदोपस्थापनाके हैं उनके जघन्य उत्कृष्टके बीचमें परिहारविशुद्धिके स्थान हैं ॥ १९९ ॥ परिहारस्स जहण्णं सामयियदुगे पडत चरिमम्हि । तजेडे सहाणे सबविसुद्धस्स तस्सेव ॥ २०० ॥ परिहारस्य जघन्यं सामायिकद्विके पततः चरमे । तज्येष्ठं स्वस्थाने सर्वविशुद्धस्य तस्यैव ॥ २०० ॥ अर्थ-परिहार विशुद्धिका जघन्यस्थान सामायिक छेदोपस्थापनामें पड़ते हुए जीवके अन्तसमयमें ही होता है और उसका उत्कृष्टस्थान सबसे विशुद्ध अप्रमत्तगुणस्थानवर्तीके ही एकांतवृद्धिके अन्तसमयमें होता है ।। २०० ॥ सामयियदुगजहण्णं ओघ अणियहिखवगचरिमम्हि । चरिमणियहिस्सुवरिं पडंत सुहुमस्स सुहुमवरं ।। २०१ ।। सामायिकद्विकजघन्यमोघं अनिवृत्तिक्षपकचरमे । चरमानिवृत्तेपरि पततः सूक्ष्मस्य सूक्ष्मवरम् ।। २०१॥ अर्थ-सामायिक छेदोपस्थापनाका जघन्यस्थान मिथ्यात्वके सन्मुख जीवके संयमके अन्तसमयमें होता है। उसका उत्कृष्टस्थान अनिवृत्तिकरण क्षपकश्रेणीवालेके अन्तसमयमें होता है । और उपशमश्रेणीसे पड़ते हुए सूक्ष्मसांपरायके अन्तसमयमै अनिवृत्तिकरणके सन्मुख होनेपर सूक्ष्मसांपरायका जघन्यस्थान होता है ।। २०१ ।। खवगसुहुमस्स चरिमे वरं जहाखादमोपजेटं तं । पडिवाददुगा सच्चे सामाइयछेदपडिबद्धा ॥ २०२॥ क्षपकसूक्ष्मस्य चरमे वरं यथाख्यातमोघज्येष्ठं तत् । प्रतिपातद्विके सर्वाणि सामायिकछेदप्रतिवद्धानि ॥ २०२ ॥ अर्थ-क्षीणकषायके सन्मुख हुए क्षपक सूक्ष्मसापरायके अन्तसमयमें सूक्ष्मसापरायका उत्कृष्टस्थान होता है और यथाख्यात चारित्रका उत्कृष्टस्थान सामान्य ( अभेदरूप ) है। तथा प्रतिपात प्रतिपद्यमानके सव स्थान सामायिक छेदोपस्थापनाके ही जानना । क्योंकि सकलसंयमसे भ्रष्ट होनेपर अन्तसमयमें और सकल संयमको ग्रहण करनेके प्रथम समयमें सामायिक छेदोपस्थापना संयम ही होता है, अन्य परिहार विशुद्धि आदि नहीं होते ॥२०२॥ इसतरह प्रसङ्ग पाकर सामायिक आदि पांचप्रकार सकलचारित्रके स्थान कहे । मुख्यपनेसे प्रमत्त अप्रमत्त गुणस्थानमें सम्भव क्षायोपशमिक सकल चारित्रका कथन किया वह समाप्त हुआ।

लब्धिमारः। अर्थ- आगे जिन्होंने सब दोप उपशांत किये हैं ऐसे उपशांतकपाय चीतरागको प्रणामकर उपशमचारित्रका विधान कहते हैं:- उवसमचरियाहिमुहो वेदगसम्मो अणं विजोयित्ता अंतोमुहुत्तकालं अधापवत्तो पमत्तो य ॥ २०३ ।। उपशमचरित्राभिमुखो वेदकसम्यक् अनं वियोज्य । अंतर्मुहूर्तकालं अधाप्रवृतः प्रमत्तश्च ॥ २०३ ।। --उपशम चारित्रके सन्मुख हुआ ऐसा वेदक सम्यग्दृष्टी जीव वह पहले कहे हुन विधानसे अनन्तानुबन्धीका विसंयोजनकर अन्तर्मुहूर्तकालतक अधाप्रवृत्त अप्रमत्त है अर्थात् खस्थान अप्रमत्त होता है वहां प्रमत्त अप्रमत्त दोनोंमें हजारोंवार जाना आना कर वादमें अप्रमत्तमें विश्राम करता है ॥ २०३ ॥ कोई जीव तीन दर्शनका क्षयकर क्षायिक सम्प. ग्दृष्टि हुआ चारित्रमोहके उपशमनका आरंभ करता है उसके तो पूर्व कहा हुआ क्षायिक- सम्यक्त्व होनेका विधान जानलेना । आगे कोई जीव द्वितीयोपशमसम्यक्त्व सहित उपशमश्रेणी चढे उसके दर्शनमोहके उप- शमनका विधान कहते हैं। तत्तो तियरणयिहिणा देसणमोहं समं खु उवसमदि । सम्मतुष्पति वा अण्णं च गुणसेढिकरणविही ॥ २० ॥ ततः त्रिकरणविधिना दर्शनमोहं समं खलु उपशमयति । सम्यक्त्वोत्पतिमिव अन्यं च गुणश्रेणिकरणविधिः ॥ २०४ ।। अर्थ-वस्थान अप्रमत्तमें अन्तर्मुहूर्त विश्रामकर उसके बाद तीनकरणविधिसे एक सम- यमें दर्शनमोहका उपशम करता है । वहांपर अपूर्वकरणके प्रथमसमयसे लेकर प्रथमोपश- मसम्यक्त्वकी तरह गुणसंक्रमणके विना अन्यस्थिति अनुभागकांडकका घात वा गुणश्रेणी- निर्जरा आदि सब विधान जानना । और इसके जो अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन होता है उसमें भी स्थितिखण्डनादि सत्र पूर्वकथितवत् जानने ॥ २०४ ॥ दसणमोहुवसमणं तक्खवणं वा हु होदि णवरिं तु । गुणसंकमो ण विजदि विज्झद याधापवत्तं च ।। २०५ ॥ दर्शनमोहोपशमनं तरक्षपणं वा हि भवति नवरि तु । गुणसंक्रमो न विद्यते विध्यातं वा अधःप्रवृत्तं च ॥ २०५ ॥ अर्थ-चारित्रमोहको उपशमानेके सन्मुख हुए जीवके दर्शनमोहका उपगम होता है अथवा क्षय होता है । वहां विशेष इतना है कि उपशमविधानमें केवल गुणसंक्रमण नहीं होता, विध्यातसंक्रमण अथवा अधःप्रवृत्त संक्रम है । उसका विशेष आगे कहेंगे ॥२०५|| रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ठिदिसत्तमपुवदुगे संखगुणूणं तु पढमदो चरिमं । उवसामण अणियट्टीसंखाभागासु तीदासु ॥ २०६ ॥ स्थितिसत्त्वमपूर्वद्विके संख्यगुणोनं तु प्रथमतः चरमम् । उपशामनमनिवृत्तिसंख्यभागेष्वतीतेपु । २०६ ।। अर्थ-अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयके स्थितिसत्त्वसे अन्तसमयमें स्थिति- सत्त्व है वह कांडक घात करनेसे संख्यातगुणा कम होता है। और अनिवृत्तिकरणकालके संख्यातबहुभाग वीत जानेपर एक भाग रहनेके समय उपशमकार्य होता है ।। २०६ ॥ अब उसीको दिखलाते हैं- सम्मस्स असंखेजा समयपवद्धाणुदीरणा होदि । तत्तो मुहुत्तअंते दंसणमोहंतरं कुणई ॥ २०७ ।। सम्यस्य असंख्येयानां समयप्रवद्धानामुदीरणा भवति । ततो मुहूर्तातः दर्शनमोहांतरं करोति ॥ २०७ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणकालका संख्यातवां भाग शेष रहनेपर सम्यक्त्व मोहनीके असं- ख्यातसमयप्रबद्धोंकी उदीरणा होती है। उसके वाद अन्तर्मुहूर्तकाल बीत जानेपर दर्शन- मोहका अन्तर करता है ॥ २०७॥ अंतोमुत्तमेत्तं आवलिमेत्तं च सम्मतियठाणं । मोत्तूण य पढमहिदि दंसणमोहंतरं कुणइ ॥ २०८ ॥ अंतर्मुहूर्तमानं आवलिमानं च सम्यक्त्वत्रयस्थानम् । मुक्त्वा च प्रथमस्थिति दर्शनमोहांतरं करोति ॥ २०८ ॥ अर्थ -सम्यक्त्व मोहनीयकी अंतर्मुहूर्तमात्र और उदयरहित मिश्र व मिथ्यात्वकी आवलिमात्र प्रथमस्थिति प्रमाण नीचले निषेकोंको छोड़कर उसके ऊपरके जो अन्तर्मुहूर्त- कालप्रमाण दर्शनमोहके निषेक हैं उनका अन्तर ( अभाव ) करता है । २०८ ॥ सम्मत्तपयडिपढमहिदिम्मि संछुहदि दसणतियाण। उक्कीरयं तु दवं बंधाभावादु मिच्छस्स ॥ २०९ ॥ सम्यक्त्वप्रकृतिप्रथमस्थितौ संपातयति दर्शनत्रयाणाम् । उत्कीर्ण तु द्रव्यं बंधाभावात् मिथ्यस्य ॥ २०९ ॥ अर्थ-उन तीनों दर्शनमोहकी प्रकृतियोंके निषेकद्रव्यको उदयरूप सम्यक्त्वमोहनीकी प्रथमस्थितिमें निक्षेपण करता है । क्योंकि जहां नवीनबन्ध होता है वहां उत्कर्षणकर द्विती-

लब्धिमारः।
यस्थितिमें भी निक्षेपण होता है । यहांपर सातवें गुणस्थानमें दर्शनमोहका बन्ध है ही नहीं
इसलिये द्वितीयस्थितिमें निक्षेपण नहीं करता ॥ २०९ ॥
विदियटिदिस्स दवं उक्कट्टिय देदि सम्मपढमम्मि ।
विदियट्ठिदिम्हि तस्स अणुकीरिज्जतमाणम्हि ॥ २१० ॥
द्वितीयस्थितेव्यमपकर्ण्य ददाति सम्यक्त्वप्रथमे ।
द्वितीयस्थितौ तस्यानुत्कीर्यमाणे ॥ २१० ॥
अर्थ-द्वितीयस्थितिका अपकर्षण क्रिया द्रव्य सम्यक्त्वमोहनीके प्रथमस्थितिरूपगुण-
श्रेणी आयाममें निक्षेपण करता है । और उसके अपकर्षण किये द्रव्यको द्वितीयस्थितिमें
निक्षेपण करता है ॥ २१० ॥
सम्मत्तपयडिपढमहिदीसु सरिसाण मिच्छमिस्साणं ।
ठिदिदचं सम्मस्स य सरिसणिसेयम्हि संकमदि ॥ २११ ॥
सम्यक्त्वप्रकृतिप्रथमस्थितिपु सदृशानां मिथ्यमिश्राणाम् ।
स्थितिद्रव्यं सम्यस्य च सशनिपेके संक्रामति ।। २११ ।।
अर्थ-मिथ्यात्व और मिश्रमोहनीकी प्रथमस्थितिके ऊपर जो अन्तरायामके निपेक
सम्यक्त्वमोहनीकी प्रथमस्थितिके समानपर्यंत पाये जाते हैं उनके द्रव्यको अपने २ समानवर्ती
सम्यक्त्वमोहनीयकें निपकों में निक्षेपण करता है। वहां द्रव्य देनेका विधान नहीं है ।।२११॥
जावं तरस्स दुचरिमफालिं पावे इमो कमो ताव ।
चरिमतिदसणदचं छुहेदि सम्मस्स पढमम्हि ।। २१२ ।।
यावदंतरस्य द्विचरमफालिं प्राप्ते अयं क्रमस्तावत् ।
चरमत्रिदर्शनद्रव्यं क्षेपयति सम्यस्य प्रथमे ।। २१२ ।।
अर्थ-जबतक अन्तरकरणकालके द्विचरमसमयवर्ती अन्तकी द्विचरमफालि प्राप्त हो
वहांतक फालिद्रव्य और अपकृष्टद्रव्यके निक्षेपण करनेका यह पूर्वोक्त कम जानना । और
अन्तरकरणकालके अन्तसमयके दर्शनमोहत्रिककी अन्तफालिका द्रव्य और अपकृष्ट सब
सम्यक्त्वमोहनीकी प्रथमस्थितिमें ही निक्षेपण किया जाता है ॥ २१२ ।।
विदियट्टिदिस्स दवं पढमहिदिमेदि जाय आवलिया।
पडिआवलिया चिदि सम्मत्तादिमटिदी ताय ।। २१३ ।।
द्वितीयस्थितेद्रव्यं प्रथमस्थितिमेति यावदावलिका
प्रत्यावलिका तिष्ठति सम्यक्त्वादिमधिनिः तावन,॥ २१३ ॥

६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीकी प्रथमस्थितिमें उदयावलि प्रत्यावलि ऐसे दो आवली शेष रहें तब तक द्वितीयस्थितिके द्रव्यको अपकर्षणके वशसे प्रथमस्थितिमें निक्षेपण करते हैं। वहां तक ही दर्शनमोहकी गुणश्रेणी है ॥ २१३ ॥ सम्मादिठिदिज्झीणे मिच्छद्दवादु सम्मसंमिस्से । गुणसंकमो ण णियमा विज्झादो संकमो होदि ॥ २१४ ॥ सम्यगादिस्थितिक्षीणे मिथ्यद्रव्यात् सम्यसंमिश्ने । गुणसंक्रमो न नियमात् विध्यातः संक्रमो भवति ॥ २१४ ।। अर्थ-सम्यक्वमोहनीकी प्रथमस्थितिके क्षय होनेपर उसके वाद अन्तरायामके प्रथमस- मयमें द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि होता है वहां नियमसे गुणसंक्रमण नहीं होता विध्यात संक्रमण होता है। इसलिये विध्यातसंक्रमण भागहार मिथ्यात्वके द्रव्यको मिश्रसम्यक्त्व मोहनीयमें निक्षेपण करते हैं ॥ २१४ ॥ सम्मत्तुप्पत्तीए गुणसंकमपूरणस्स कालादो। संखेजगुणं कालं विसोहिवड्डीहिं वड्ढदि हु ॥ २१५ ॥ सम्यक्त्वोत्पत्तौ गुणसंक्रमपूरणस्य कालात् । संख्येयगुणं कालं विशुद्धिवृद्धिभिः वर्धते हि ॥ २१५ ।। अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्वकी उत्पत्तिमें पूर्वकथित गुणसंक्रम पूरणके अन्तर्मुहूर्तमान- कालसे संख्यातगुणे कालतक यह द्वितीयोपशम सम्यग्दृष्टि प्रथमसमयसे लेकर समय समय प्रति अनन्तगुणी विशुद्धिकर वढता है। ऐसे यहां एकांतविशुद्धताकी वृद्धिका काल अन्त- मुहूर्तमात्र जानना ॥ २१५ ॥ तेण परं हायदि वा वहदि तवहिदो विसुद्धीहिं। उपसंतदसणतियो होदि पमत्तापमत्तेसु ॥ २१६ ॥ तेन परं हीयते वा वर्धते तद्वृद्धितो विशुद्धिभिः । उपशांतदर्शनत्रिकः भवति प्रमत्ताप्रमत्तयोः ॥ २१६॥ अर्थ उस एकांतवृद्धिकालके वाद विशुद्धतासे घटे अथवा वढे अथवा जैसाका तैसा रहे । कुछ नियम नहीं है । इसतरह जिसने तीन दर्शनमोह उपशम किये हैं ऐसा जीव बहुतवार प्रमत्त अप्रमत्तमें चक्कर करता है ॥ २१६ ॥ एवं पमत्तमियर परावत्तिसहस्सयं तु कादूण । इगवीसमोहणीयं उवसमदि ण अण्णपयडीसु ॥ २१७ ।। एवं प्रमत्तमितरं परावर्तिसहस्रकं तु कृत्वा । एकविंशमोहनीयं उपशमयति न अन्यप्रकृतिषु ।। २१७ ॥

लब्धिसारः।
अर्थ-इसतरह अप्रमत्तसे प्रमत्तम प्रमत्तसे अप्रमत्तमे हजारों वार पलटनेकर अनन्ता-
नुबन्धीचारके विना शेष इक्कीस चारित्रमोहकी प्रकृतियोंके उपशमानेका उद्यम करता है।
अन्यप्रकृतियोंका उपशम नहीं होता ॥ २१७ ॥
तिकरणबंधोसरणं कमकरणं देसघादिकरणं च ।
अंतरकरणं उसमकरणं उवसामणे होति ॥ २१८ ॥
त्रिकरणं बंधापसरणं क्रमकरणं देशघातिकरणं च ।
अंतरकरणमुपशमकरणं उपशामने भवंति ।। २१८ ।।
अर्थ-
--अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण-ये तीनकरण, स्थिति बन्धापसरण, क्रम-
फरण, देशघातिकरण, अन्तरकरण, उपशमकरण-इसतरह आठ अधिकार चारित्रमोहके
उपशमविधानमें पाये जाते हैं। उनमेंसे अधःकरणको सातिशय अप्रमत्त गुणस्थानवाला
मुनि करता है ।। २१८॥
विदियकरणादिसमये उपसंततिदंसणे जहण्णेण ।
पल्लस्स संखभागं उक्कस्सं सायरयुधत्तं ।। २१९ ॥
द्वितीयकरणादिसमये उपशांतत्रिदर्शने जयन्येन ।
पल्यस्य संख्यभागं उत्कृष्टं सागरपृथक्त्वम् ॥ २१९ ॥
अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें द्वितीयोपशमसम्यग्दृष्टिके जघन्यस्थितिकांडक
आयाम पल्यका असंख्यातवां भागमात्र है और उत्कृष्ट पृथक्त्वसागर प्रमाण है ॥ २१९ ॥
ठिदिखंडयं तु खइये परावरं पल्लसंखभागो दु ।
ठिदिपंधोसरणं पुण वरावरं तत्तियं होदि ॥ २२० ।।
स्थितिकांडकं तु क्षायिके वरावरं पल्यसंख्यभागस्तु ।
स्थितिवन्धापसरणं पुनः वरावरं तावतं भवति ॥ २२० ।
अर्थ-अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें क्षायिकसम्यग्दृष्टीके जघन्य वा उत्कृष्ट स्थितिकांडक
आयाम पल्यके असंख्यातवें भागमान है, क्योंकि दर्शनमोहकी क्षपणा समयमें बहुत
स्थिति घटाई जाती है स्थितिके अनुसारही कांडक होता है तौभी जघन्यसे उत्कृष्ट
संख्यातगुणा है । और उपशम वा क्षायिकसम्यग्दृष्टीके स्थितिबन्धापसरण पत्यके संख्या-
तवें भागमात्र ही है तो भी जघन्यसे उत्कृष्ट संख्यातगुणा है ।। २२० ।
असुहाणं रसखंडमणंतभागाण खंडमियराणं ।
अंतोकोडाकोडी संतं वंधं च तहाणे ॥ २२१ ॥

. - । ६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अशुभानां रसखंडमनंतभागानां खंडमितरेपाम् । अन्तःकोटीकोटिः सत्त्वं वन्धश्च तत्स्थाने ।। २२१ ॥ अर्थ-अशुभप्रकृतियोंका अनुभागखण्डन अनन्तबहुभागमात्र होता है एकभागमात्र शेष रहता है । विशुद्धपनेसे शुभप्रकृतियोंका अनुभागखण्डन नहीं होता । और उसी अपू. करणके प्रथमसमयमें स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्व अन्तःकोड़ाकोड़ीसागर प्रमाण है, उसमें इतना विशेष है कि स्थितिवन्धसे स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ॥ २२१ ।। उदयावलिस्स वाहिं गलिदवसेसा अपुषअणियट्टी। सुहुमद्धादो अहिया गुणसेढी होदि तहाणे ॥ २२२ ॥ उदयावलेबाह्यं 'गलितावशेपा अपूर्वानिवृत्तेः । सूक्ष्माद्धातो अधिका गुणश्रेणी भवति तत्स्थाने ॥ २२२ ।। अर्थ-अपूर्वकरणके पहले समयमें उदयावलिके वाह्य गलितावशेष गुणश्रेणीका प्रारंभ हुआ, उस गुणश्रेणी आयामका प्रमाण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसापराय-इनके मिलानेके कालसे उपशांतकषायके कालका संख्यातवां भागमात्र अधिक जानना । उस अपूर्वकरणमें गुणश्रेणी होती है ॥ २२२ ॥ पढमे छठे चरिमे बंधे चदुर वोच्छिण्णा। छण्णोकसायउदया अपुवचरिमम्हि वोच्छिण्णा ॥ २२३ ॥ प्रथमे पढ़े चरमे बंधे द्विकं त्रिंशत् चतस्रो व्युच्छिन्नाः । षण्णोकषायोदया अपूर्वचरमे व्युच्छिन्नाः ॥ २२३ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणकालके सातभागोंमेंसे पहले भागमें निद्रा प्रचला ये दोनों, छठे भागमें तीर्थकर आदि तीस और अंतके सातवें भागमें हास्यादि चार-ऐसे छत्तीसप्रक- तियां बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं । और अपूर्वकरणके अन्तसमयमें छह हास्यादि नोकषाय उदयसे व्युच्छिन्न होती हैं ॥ २२३ ॥ अणियट्टिस्स य पढमे अण्णटिदिखंडपहुदिमारवई । उवसामणा णिधत्ती णिकाचणा तत्थ वोच्छिण्णा ॥ २२४ ।। अनिवृत्तेः च प्रथमे अन्यस्थितिखंडप्रभृतिमारभते । उपशमनं निधत्तिः निकाचना तन व्युच्छिन्ना ॥ २२४ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें पहलेसे अन्यप्रमाण ही लिये स्थितिकांडक स्थितिबन्धापसरण अनुभागखण्ड प्रारंभ किये जाते हैं और वहां ही सब कर्मोंकी उपशम दुग तीस .

लब्धिसारः। निघत्ती निकाचना इन तीन अवस्थाओंकी व्युच्छित्ति होती है | इन तीनोंका सरूप फर्म- कांडमें हैं ।। २२४ ॥ अंतोकोडाकोडी अंतोकोडी य संत बंधं च । सत्तण्हं पयडीणं अणियट्टीकरणपढमम्हि ॥ २२५ ।। अंतःकोटीकोटिः अंतःकोटिश्च सत्त्वं बंधश्च । सप्तानां प्रकृतीनां अनिवृत्तिकरणप्रथमे ॥ २२५ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें आयुके विना सातकर्माका स्थितिसत्त्व यथायोग्य अन्तःकोड़ाकोड़िसागरमात्र है और स्थितिबन्ध अन्तःकोटीसागरमात्र है । अपूर्वकरणमें घटा- नेसे इतना कम रह जाता है ।। २२५ ॥ छिदिवंधसहस्सगदे संखेजा बादरे गदा भागा। तत्थ असपिणस्स ठिदीसरिस द्विदिवंधणं होदि ॥ २२६ ॥ स्थितिबंधसहस्रगते संख्येया बादरे गता भागाः । तत्र असंज्ञिनः स्थितिसहर्श स्थितिबंधनं भवति ।। २२६ ॥ अर्थ-स्थितिवन्धापसरणके क्रमसे हजारों सितिबन्ध होजानेपर अनिवृत्तिकरणकालके संख्यातभागोंमेंसे बहुभाग वीत जानेपर एकभाग शेष रहते असंज्ञीके स्थितिबन्धके समान स्थितिवन्ध होता है ॥ २२६ ॥ ठिदिवंधपुधत्तगदे पत्तेयं चदुर तिय वि एएदि । ठिदिवंधसमं होदि हु ठिदिवंधमणुक्कमेणेव ॥ २२७ ।। स्थितिबंधपृथक्त्वगते प्रत्येकं चतुरिद्वि एकेति । स्थितिबंधसमो भवति हि स्थितिबंधोऽनुक्रमणेव ।। २२७ ॥ अर्थ-उसके बाद हरएकके संख्यातहजार स्थितिबन्ध बीत जानेपर क्रमने चौदन्द्री ते इन्द्री दो इन्द्री एकेंद्रीके स्थितिबन्धके समान स्थितिबन्ध होता है ॥ २२७ ।। एइंदियहिदीदो संखसहस्से गदे दु टिदिबंधो । पल्लेकदिवहृदुगे टिदिबंधो चीसियतियाणं ॥ २२८ ॥ एकंद्रियस्थितितः संख्यसहने गते तु स्थितिबंधः । पल्यैकव्यर्धद्विक स्थितिबंधो विंशतित्रिकाणाम् ॥ २२८ ।। अर्थ -उस एकेंद्रीसमान स्थितिबन्धसे परे संख्यात हजार स्थितिबन्न बीत जानेयर वीसियका एक पल्य तीसियका डेढ पल्य चालीसियका दो पल्यप्रमाण स्थिनियन्य होता है ॥ २२८ ॥ यहांपर असंजीके सत्तर कोड़ाफोड़ी सागर प्रमाण स्थिनिधारक दर्शनमोहका 3.सा.

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
हजार बन्ध होता है तो वीस कोडाकोड़ी स्थितिधारक नामगोत्रोंका कितना होवे इस तरह
त्रैराशिक करनेपर हजार सागरका सांतवेका दो भाग आता है। ऐसे अन्यमें भी त्रैरा-
शिक विधान जानना।
पलस्स संखभाग संखगुणूणं असंखगुणहीणं ।
बंधोसरणे पल्लं पल्लासंखंति संखवस्संति ॥ २२९ ॥
पल्यस्य संख्यभाग संख्यगुणोनमसंख्यगुणहीनम् ।
वंधापसरणे पल्यं पल्यासंख्यमिति संख्यवर्पमिति ॥ २२९ ।।
अर्थ-अन्तःकोड़ाकोड़ी स्थितिबन्धसे जबतक पल्यमात्र स्थितिबन्ध हो तबतक स्थिति-
बन्धापसरणका प्रमाण पल्यके संख्यातवें भाग है, उसके वाद पत्यके असंख्यातवें भागरूप
दूरापकृष्टि स्थितितक क्रमसे संख्यातगुणा कम पल्यका संख्यातवां भागमात्र स्थितिबन्धाप-
सरण होता है । और दूरापकृष्टिस्थितिसे लेकर जबतक संख्यातहजार वर्षमात्र स्थितिवन्ध
हो वहां पल्यके असंख्यात बहुभागमात्र स्थितिबन्धापसरण है और असंख्यातगुणा कम
पल्यके असंख्यातवें भागमात्र स्थितिबन्ध होता है ऐसा जानना ॥ २२९ ॥
एवं पल्ला जादा वीसीया तीसिया य मोहो य ।
पल्लासंखं च कमे बंधेण य वीसियतियाओ ॥ २३० ॥
एवं पल्ये जाते वीसिया तीसिया च मोहश्च ।
पल्यासंख्यं च क्रमे बंधेन च वीसियत्रिकाः ॥ २३० ॥
अर्थः
- उस पल्यस्थितिसे परे वीसीय तीसीय मोहनीका स्थितिबन्ध है वह क्रमकरण-
कालके अंतमें पल्यका असंख्यातवां भागमात्र है। इसतरह संख्यातहजार स्थितिवन्धाप-
सरण जानेपर वीसीय तीसियोंका पल्यके संख्यातवें भागमात्र मोहका पत्यमान स्थितिबन्ध
होता है ।। २३० ॥
मोहगपल्लासंखडिदिबंधसहस्सगेसु तीदेसु ।
मोहो तीसिय हेटा असंखगुणहीणयं होदि ॥ २३१ ॥
मोहगपल्यासंख्यस्थितिबन्धसहस्रकेष्वतीतेषु ।
मोहः तीसियं अधस्तना असंख्यगुणहीनकं भवति ॥ २३१ ॥
अर्थ-मोहगतपल्यके असंख्यात बहुभागमात्र आयाम लिये ऐसे संख्यातहजार स्थिति-
बंध वीत जानेपर पूर्वस्थितिबन्धसे असंख्यातगुणा कम तीसिय मोह और वीसिय-इन
तीनोंका स्थितिबन्ध होता है ॥ २३१ ॥
तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेट्टावि ।
एकसराहो मोहो असंखगुणहीणयं होदि ॥ २३२॥

लन्धिसारः।
तावन्मात्रे बंधे समतीते वीसियानां अधन्ननापि ।
एकसदृशः मोहो असंख्यगुणहीनको भवति ॥ २३३ ॥
अर्थ -उतना संख्यातहजार स्थितिवन्ध बीत जानेपर तीनोंका पल्यका असंख्यातवां
भागमात्र स्थितिबन्ध होता है वहांपर थोड़ा मोहका उससे असंख्यातगुणा पीसियाओंका
उससे असंख्यातगुणा तीसियाओंका स्थितिवन्ध होता है । यहांपर विशुद्धताके होनेसे
वीसियाओंसे भी मोहका घटता स्थितिवन्धरूप क्रम हुआ ।। २३२ ॥
तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे यणीयहेहादु ।
तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होति ॥ २३३ ।।
तावन्मात्रे बंधे समतीते वेदनीयाधसनान् ।
तीसियपातित्रिका असंख्यगुणहीनका भवंति ।। २३३ ॥
अर्थ-उतने ही स्थितिवन्धापसरण वीत जानेपर उतना ही स्थितिबन्ध होता है।
उसमेंसे सबसे थोड़ा मोहका उससे असंख्यातगुणा वीसियाओंका उससे असंग्ल्यातगुणा
तीसियाओंमें तीन घातियोंका उससे असंख्यातगुणा वेदनीयका स्थितिबन्ध होता है ।
यहांपर विशेष विशुद्धताके कारण सातावेदनीयसे तीन पातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध कम
होजाता है ॥ २३३ ॥
तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेटादु ।
तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होंति ॥ २३४ ॥
तावन्माने बंधे समतीते वीसियानामधसनान् ।
तीसियघातित्रिका असंख्यगुणहीनका भवंति ।। २३४ ॥
अर्थ-उतने ही बंधके वीतनेपर उतना ही स्थितिबन्ध होता है। वहांपर सबसे
थोड़ा मोहका उससे असंख्यातगुणा तीसियाओंका उसमे असंख्यातगुणा वीसियाओंका
उससे ड्यौदा वेदनीयका स्थितिवन्ध होता है ॥ २३४ ॥
तकाले वेयणियं णामागोदादु साहियं होदि ।
इदि मोहतीसवीसियवेयणियाणं कमो जादो ॥ २३५ ।।
तत्काले वेदनीयं नामगोत्रतः साधिकं भवति ।
इति मोहतीसवीसियवेदनीयानां क्रमो जातः ।। २३५ ।।
अर्थ--उस क्रमकरणकालमें नाम गोत्रसे चेदनीयका साधिक बन्ध होता है। इसप्रकार
मोहतीसीयवीसिय और वेदनीयका क्रम है ऐसा जानना ॥ २३५ ॥
तीदे वंधसहस्से पल्लासखेजयं तु दिदिबंधो।
तत्य असंखेजाणं उदीरणा समयपवद्धाणं ॥ २३६ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अतीते वंधसहस्र पल्यासंख्येयं तु स्थितिबंधः ।
तत्र असंख्येयानां उदीरणा समयप्रवद्धानाम् ।। २३६ ।।
अर्थ-क्रमकरण प्रारंभके समयसे लेकर संख्यात हजार स्थितिवन्धापसरण वीतनेपर
जिसजगह कंमकरणके अंतमें मोहादिकोंका पल्यका असंख्यातवां भागमात्र स्थितिबन्ध
हुआ है वहां असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणा होती है ॥ २३६ ॥
ठिदिवंधसहस्सगदे मणदाणा तत्तियेवि ओहिदुर्ग ।
लाभ व पुणो वि सुदं अ चक्खु भोगं पुणो चक्खु ॥ २३७ ॥
पुणरवि मदिपरिभोगं पुणरवि विरयं कमेण अणुभागो।
बंधेण देसघादी पल्लासंखं तु ठिदिवंधे ॥ २३८ ॥
स्थितिवंधसहस्रगते मनोदाने तावन्मात्रेपि अवधिद्विकं ।
लाभो वा पुनरपि श्रुतं च चक्षुर्भोगं पुनरचक्षुः ॥ २३७ ॥
पुनरपि मतिपरिभोगं पुनरपि वीर्य क्रमेण अनुभागः ।
बंधेन देशघातिः पल्यासंख्यं तु स्थितिवंधे ।। २३८ ॥
अर्थ-पूर्व प्रकृतियोंका सर्वघाती स्पर्धकरूप अनुभाग बांधता था अब देशघाति कर-
णसे लेकर दारु लता समान दोस्थानगत देशघाती स्पर्धकरूप ही अनुभागको बांधता है।
वहां असंख्यात समयप्रबद्धकी उदीरणाके प्रारंभसे आगे संख्यात हजार स्थितिवन्धापसरण
वीत जानेपर मनःपर्ययज्ञानावरण दानांतरायका देशघातीबंध होता है । उससे परे उतने
२ ही स्थितिवन्धापसरण वीतनेपर क्रमसे अवधिज्ञानावरण अवधिदर्शनावरण लाभांतराय-
इनका और श्रुतज्ञानावरण चक्षुदर्शनावरण भोगांतरायका तथा मतिज्ञानावरण उपभोगांत-
राय वीयर्यातरायका देशघाती बन्ध होता है । और देशघातीकरणके अंतमें मोहादिकोंका
स्थितिबन्ध पल्यका असंख्यातवां भागमात्र ही है ॥ २३७ । २३८ ॥
तो देसघादिकरणादुवरिं तु गदेसु तत्तियपदेसु ।
इगिवीसमोहणीयाणंतरकरणं करेदीदि ॥ २३९ ।।
अतो देशघातिकरणादुपरि तु गतेपु तावत्कपदेपु ।
एकविंशमोहनीयानामंतरकरणं करोतीति ।। २३९ ॥
अर्थ-उस देशघातिकरणसे ऊपर संख्यात हजार स्थितिवन्ध वीतनेपर इक्कीस मोह-
नीयकी प्रकृतियोंका अंतरकरण करता है ॥ २३९ ॥ ऊपरके वा नीचेके निषेकोंको छोड़
श्रीचके विवक्षित कितने ही निषेकोंका अभाव करना वह अंतरकरण है।
संजलणाणं एक बेदाणेकं उदेदि तं दोण्हें ।
सेसाणं पढमहिदि ठवेदि अंतोमुहुत्त आवलियं ॥ २४० ॥

लब्धिसारः। ६९ संज्वलनानामेकं वेदानामेकं उदेति तत् द्वयोः । शेपानां प्रथमस्थिति स्थापयति अंतर्मुहूर्तमावलिकां ॥ २४० ॥ अर्थ-संज्वलनक्रोधादिमेंसे कोई एक और स्त्री आदि वेदों से किसी एकके उदयसहित श्रेणी चढे तो उन उदयरूप दो प्रकृतियोंकी प्रथमस्थिति अंतर्मुहूर्तस्थापन करता है और शेष उन्नीस प्रकृतियोंकी प्रथमस्थिति आवलिमात्र स्थापन करता है ।। अर्थात् प्रथमस्थिति- प्रमाण निषेकोंको नीचे छोड़ ऊपरके निषेकोंका अन्तर करता है। ऐसा जानना ॥ २४० ॥ उवरि समं उकीरइ हेठ्ठावि समं तु मज्झिमपमाणं । तदुपरि पढमठिदीदो संखेजगुणं हवे णियमा ॥ २४१ ॥, उपरि सम उत्कीर्यते अधस्तनापि समं तु मध्यमप्रमाणं । तदुपरि प्रथमस्थितितः संख्येयगुणं भवेत् नियमात् ॥ २४१ ॥ अर्थ-अन्तरायामके अन्तनिषेकंसे ऊपरके जो निषेक वे उदयरूप वा अनुदयरूप सब प्रकृतियोंके समान हैं और अन्तरायामके प्रथमनिषेकके नीचे जो निषेक वह उदय 'प्रकृतियोंका परस्परसमान है वा अनुदयप्रकृतियोंका परस्पर समान है । उसके बाद अन्त- मुहूर्त वा आवलिमात्र जो उदय अनुदय प्रकृतियोंकी प्रथमस्थिति उससे संख्यातगुणा ऐसा अन्तर्मुहूर्तमात्र अन्तरायाम है अर्थात् इतने निषेकोंका अभाव किया जाता है ॥ २४१ ॥ अंतरपढमे अण्णो ठिदिवंधो ठिदिरसाण खंडो य । एयढिदिखंडकीरणकाले अंतरसमत्ती ॥ २४२ ॥ अंतरप्रथमे अन्यः स्थितिबंधः स्थितिरसयोः खंडश्च । एकस्थितिखंडोत्करणकाले अंतरसमाप्तिः ॥ २४२ ।। अर्थ-अन्तरकरणके प्रथमसमयमें पूर्वस्थितिबन्धसे असंख्यात गुणा कम ऐसा अन्य ही स्थितिबन्ध अन्य ही स्थितिकांडक अन्य ही पहलेसे कमती अनुभागकांडकका प्रारंभ होता है। वहां एक स्थितिकांडकोत्करणके कालसे अन्तरकरण किया जाता है । उसकी समाप्ति होनेपर एक स्थितिकांडक घात हुआ उसमें संख्यातहजार अनुभागककांडोंका घात हुआ ऐसा जानना ॥ २४२ ॥ अंतरहेदुकीरिददवं तं अंतरम्हि ण य देदि। बंध ताणंतरजं बंधाणं विदियगे देदि ॥ २४३ ॥ अंतरहेतूत्कीरितद्रव्यं तदतरे न च ददाति । बंधं तेपामंतरजं बंधानां द्वितीयकें ददाति ॥ २४३ ॥ अर्थ-अन्तरके निमित्त उत्कीर्ण किये द्रव्यको अन्तरायाममें नहीं मिलाता परंतु

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
जिनका केवल बंध ही पाया जाता है ऐसी प्रकृतियोंके द्रव्यको उत्कर्षणकर तत्काल अपनी
वन्धी हुई प्रकृतिकी आवाधाको छोड़कर उसीकी द्वितीय स्थितिके प्रथमनिपेकसे लेकर
यथायोग्य अन्ततक निक्षेपण करता है। और अपकर्पणकर उदयरूप अन्यकयायकी प्रथम-
स्थितिमें निक्षेपण करता है ॥ २४३ ॥
उदयिल्लाणंतरजं सगपढमे देदि बंधविदिये च ।
उभयाणंतरदवं पढमे विदिये च संछुहदि ॥ २४४ ॥
औदयिकानामंतर स्वप्रथमे ददाति बंधद्वितीये च ।
उभयानामंतरद्रव्यं प्रथमे द्वितीये च संक्षिपति ।। २४४ ॥
अर्थ-जिनका केवल उदय ही पाया जावे ऐसे स्त्रीवेद वा नपुंसकवेदके अन्तरके
द्रव्यको अपकर्षणकर अपनी अपनी प्रथम स्थितिमें निक्षेपण करता है और उत्कर्पणकर उस
जगह बन्धे हुए अन्यकपायोंकी द्वितीयस्थितिम निक्षेपण करता है। और जिनके बन्ध
उदय दोनों ही पाये जाते हैं ऐसे पुरुषवेद वा कोई एक कपाय उनके अन्तरके द्रव्यको
अपकर्षणकर उदयरूप प्रकृतिकी प्रथमस्थितिम निक्षेपण करता है और उत्कर्षण कर वहां
वंधवाली प्रकृतियोंकी द्वितीयस्थितिम निक्षेपण करता है ॥ २४४ ॥
अणुभयगाणंतरजं बंध ताणं च विदियगे देदि ।
एवं अंतरकरणं सिज्झदि अंतोमुहुत्तेण ॥ २४५ ॥
अनुभयकानामंतरजं बंधं तेपां च द्वितीयके ददाति ।
एवमंतरकरणं सिद्ध्यति अंतर्मुहूर्तेण ॥ २४५ ।।
अर्थ-बंध उदय रहित जो अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यानकषाय और हास्यादि छह नोक-
पाय इनके अन्तरके द्रव्यको उत्कर्षणकर उस कालमें बंधी अन्यप्रकृतियोंकी द्वितीयस्थि-
तिमें निक्षेपण करता है और अपकर्षणकर उदयरूप अन्यप्रकृतियोंकी प्रथमस्थितिमें देता
है ॥ २४५॥
सत्तकरणाणि यंतरकदपढमे होति मोहणीयस्स।
इगिठाणिय वंधुदओ ठिदिवंधे संखवस्सं च ॥ २४६ ॥
अणुपुवीसंकमणं लोहस्स असंकमं च संढस्स ।
पढमोवसामकरणं छाबलितीदेसुदीरणदा ॥ २४७ ॥
सप्तकरणानि अंतरकृतप्रथमे भवंति मोहनीयस्य ।
एकस्थानको बंधोदयः स्थितिबंधः संख्यवर्ष च ॥ २४६ ॥
आनुपूर्वीसंक्रमणं लोभस्यासंक्रमं च पंढस्य ।
प्रथमोपशमकरणं पडावल्यतीतेपूदीरणता ॥ २४७ ॥

लब्धिसारः। अर्थ-अन्तर करनेके वाद प्रथमसमयमें सातकरणोंका एककालमें आरंभ होता है। वहां पहले अन्तरकरनेकी समाप्तितक मोहका दारुलतासमान दोस्थानगतवंध और उदय था वह अब लतासमान एकस्थानगत वन्ध उदय होनेलगा। ऐसे दो करण हुए। पहले मोहका स्थितिबन्ध असंख्यातवर्षका होता था अव संख्यातवर्षका ही होने लगा, पहले चारित्रमोहका परस्पर प्रकृतियोंका जिस तिस जगह संक्रमण होता था अव आनुपूर्वी संक्र- मण होने लगा, पहले संज्वलन लोभका संज्वलन क्रोधादिमें संक्रमण होता था अब इसका कहीं भी संक्रमण नहीं होता, अब नपुंसकवेदकी उपशमक्रियाका प्रारंभ हुआ, पहले बन्ध होनेके वाद एक आवलिकाल वीतजानेपर उदीरणा करनेकी सामर्थ्य थी अव जिसका बंध होता है उसकी वंघसमयसे छह आवलि वीत जानेपर उदीरणा करनेकी सामर्थ्य होती है ॥ २४६ । २४७ ॥ अंतरपढमादु कमे एकेकं सत्त चदुसु तिय पयर्डि। सममुच सामदि णवकं समऊणावलिदुर्ग वजं ॥ २४८ ॥ अंतरप्रथमात् क्रमेण एकैकं सप्त चतुर्पु त्रयं प्रकृति । समुच्य शमयति नवकं समयोनावलि द्विकं वय॑म् ॥ २४८ ॥ अर्थ-अन्तरकरनेके वाद प्रथमसमयसे लेकर क्रमसे एक एक अन्तर्मुहूर्तकालकर तो एक एक सात प्रकृतियोंको और चार अन्तर्मुहूर्तमें क्रमसे तीन तीन तीन तीन प्रकृति- योंको उपशमाता है। वहां समयकम दो आवलिमात्र नवक समयप्रवद्धको नहीं उपश- माता ॥२४८ ॥ एय णउसयवेदं इत्थीवेदं तहेव एवं च । सत्तेव णोकसाया कोहादितियं तु पयडीओ ॥ २४९ ॥ एकं नपुंसकवेदं स्त्रीवेदं तथैव एकं च । सप्तैव नोकपायाः क्रोधादित्रयं तु प्रकृतयः ॥ २४९ ॥ अर्थ -एक नपुंसकवेद एक स्त्रीवेद उसीतरह सात नोकषाय और तीन क्रोध तीन मान तीन माया तीन लोभ ऐसे क्रमसे उपशम होनेपर इक्कीस प्रकृतियां हैं ॥ २४९ ॥ अंतरकदपढमादो पडिसमयमसंखगुणविहाणकमे । गुवसामेदि हु संडं उवसंतं जाण णव अण्णं ॥ २५० ॥ अंतरकृतप्रथमतः प्रतिसमयमसंख्यगुणविधानक्रमे । णोपशाम्यति हि पंढं उपशांतं जानीहि नवान्यम् ॥ २५०॥ अर्थ-अन्तरकरने वाद प्रथमसमयसे लेकर समय २ प्रति नपुंसक वेदका उपशम ७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होता है वह असंख्यातगुणा क्रमलिये द्रव्य उपशमाता है जो समय समय प्रति द्रव्य उप- शमाया उसीका नाम उपशमन फालिका द्रव्य जानना ॥ २५० ॥ संढादिमउवसमगे इस्स उदीरणा य उदओ य । संढादो संकमिदं उवसमियमसंखगुणियकमा ॥ २५१ ॥ पंढादिमोपशामके इष्टस्योदीरणा च उदयश्च । पंढात् संक्रमितमुपशमितमसंख्यगुणितक्रमः ॥ २५१ ॥ अर्थ-नपुंसकवेदके उपशमकालके प्रथमसमयमें विवक्षित उपशमरूप पुरुषवेद उसका उदय उदीरणा वह नपुंसकवेदसे संक्रमण करता हुआ असंख्यातगुणा क्रम लिये है॥२५१॥ जत्तोपाये होदि हु ठिदिवंधो संखवस्समेत्तं तु । तत्तो संखगुणूणं बंधोसरणं तु पयडीणं ॥ २५२ ।। यत उपायेन भवति हि स्थितिबंधः संख्यवर्पमात्रं तु । ततः संख्यगुणोन बंधापसरणं तु प्रकृतीनाम् ॥ २५२ ।। अर्थ-जिस कारण यहां मोहका स्थितिबन्ध संख्यात हजार वर्षमात्र होता है इसलिये पूर्वस्थितिबन्धापसरणसे यहां स्थितिवन्धापसरण सब प्रकृतियोंका संख्यातगुणा कम होता है ॥ २५२ ॥ वस्साणं बत्तीसादुवरि अंतोमुहत्तपरिमाणं । ठिदिवंधाणोसरणं अवरद्विदिवंधणं जाव ॥ २५३ ॥ वर्षाणां द्वात्रिंशदुपरि अन्तर्मुहूर्तपरिमाणम् । स्थितिबंधानापसरणमवरस्थितिवंधनं यावत् ।। २५३ ।। अर्थ-जिसजगह बत्तीसवर्षका स्थितिबन्ध होता है वहांसे लेकर जहां जघन्य स्थिति- बन्ध होता है वहांतक उस बन्धापसरणका प्रमाण अन्तर्मुहूर्तमात्र जानना ॥ २५३ ।। ठिदिवंधाणोसरणं एवं समयप्पवद्धमहिकित्ता। उत्तं णाणादो पुण ण च उत्तं अणुववत्तीदो ॥ २५४ ॥ स्थितिवंधानामपसरणमेकं समयप्रवद्धमधिकृत्य । उक्तं नानातः पुनः न च उक्तमनुपपत्तितः ॥ २५४ ॥ अर्थ-स्थितिबन्धापसरण विवक्षित स्थितिबन्धके प्रथम समयमें संभव एक समयप्रव- द्धको अधिकारकरके कहा गया है और हरसमय स्थितिबन्ध कम होनेकी अप्राप्तिसे नाना समयप्रबद्धकी अपेक्षा नहीं कहा ॥ २५४ ॥ १ इसके आगेका एक गाथा भाषा टीकामें नहीं मिला वह यह है--"अंतरकरणादुवरि ठिदिस्स खंडा- म मोहणीयस्स । ठिदिवन्धोसरणं पुण संखेजगुणेण हीणकमा" ॥

लब्धिसारः। 9. एवं संखेजेसु ठिदिवंधसहस्सगेसु तीदेसु । संडवसमदे तत्तो इतिथं च तहेव उवसमदि ॥ २५५ ॥ एवं संख्येयेपु स्थितिवंधसहस्रकेपु अतीतेपु । पंढोपशांते ततः स्त्री च तथैव उपशमयति ॥ २५५ ॥ अर्थ-इसप्रकार संख्यातहजार स्थितिबन्ध वीतनेपर अन्तर्मुहूर्तकालकर नपुंसकवेदका उपशम होता है उसके बाद उसीतरह अन्तर्मुहूर्तकालसे स्त्रीवेदको उपशमाता है ॥२५५॥ थीयद्धा संखेजदिभागेपगदे तिघादठिदिवंधो । संखतुवं रसवंधो केवलणाणेगठाणं तु ॥ २५६ ॥ स्त्री अद्धा संख्येयभागेपगते त्रिघातिस्थितिबंधः । संख्यातं रसवंधः केवलज्ञानकस्थानं तु ॥ २५६ ।। अर्थ-स्त्रीवेद उपशमानेके कालका संख्यातवां भाग वीतजानेपर मोहका स्थितिबन्ध औरोंसे कम संख्यातहजार वर्षमात्र होता है उससे संख्यातगुणा तीनघातियोंका उससे असंख्यातगुणा पल्यका असंख्यातवां भागमात्र नामगोत्रका उससे कुछ अधिक सातावेदनी- यका स्थितिवन्ध होता है । और इसीकालमें केवलज्ञानावरण केवलदर्शनावरणके विना अन्यघातियाओंका लतासमान एकस्थानगत ही अनुभागबन्ध है ।। २५६ ॥ थीउपसमिदाणंतरसमयादो सत्त णोकसायाणं । उवसमगो तस्सद्धा संखजदिमे गदे तत्तो ॥ २५७ ॥ स्त्री उपशमितानंतरसमयात् सप्तनोकपायाणाम् । उपशामकः तस्याद्धा संख्याते गते ततः ॥२५७ ॥ अर्थ--स्त्रीवेद उपशमानेके वादके समयसे लेकर पुरुषवेद और छह हास्यादि ऐसे इन सातप्रकृतियोंको उपशमाता है । उनके उपशमानेका काल अन्तर्मुहूर्तमान है । उसके संख्यातवें भाग वीतजानेपर । जो होता है वह आगे कहते हैं ॥ २५७ ॥ णामदुगे वेयणियटिदिबंधो संखवस्सयं होदि । एवं सत्तकसाया उवसंता सेसभागते ॥ २५८ ॥ नामद्विके वेदनीयस्थितिवन्धः संख्यवर्पको भवति । एवं सप्तकषाया उपशांताः शेपभागांते ॥ २५८॥ अर्थ-नामगोत्रका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है उससे कुछ अधिक वेदनीयका जानना । इसतरह सात नोकषाय उपशमनकालके शेष बहुभागके अन्तसमयमें उपशम होते हैं । २५८ ॥ . ल.सा.१०

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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
७४
णवरि य पुंवेदस्स य णवकं समयोणदोण्णिावलियं ।
मुच्चा सेसं सवं उवसंते होदि तचरिमे ॥ २५९ ॥
नवरि च पुंवेदस्य च नवकं समयोनद्वयावलिकाम् ।
मुक्त्वा शेपं सर्वमुपशांते भवति तच्चरमे ॥ २५९ ।।
अर्थ-इतना विशेष है कि उस अन्तसमयमें पुरुषवेदका एकसमयकम दो आवलिमात्र
नवीनसमयप्रबद्धको छोड़ अवशेष सवको उपशमाता है ॥ २५९ ॥
तचरिमे पुंबंधो सोलसवस्साणि संजलणगाणं ।
तद्गाणं सेसाणं संखेजसहस्सवस्साणि ॥ २६० ॥
तच्चरमे पुंर्वधः पोडशवर्षाणि संज्वलनकानाम् ।
तड्डिकानां शेपाणां संख्येयसहस्रवाणि ॥ २६० ।।
अर्थ-सवेद अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें पुरुषवेदका स्थितिबन्ध सोलहवर्षमात्र,
संज्वलनचतुष्कका बत्तीसवर्षमात्र और शेषका संख्यातहजार वर्षमात्र स्थितिवन्ध होता है ।
उन शेषों से भी थोड़ा तीनघातियोंका उससे संख्यातगुणा नामगोत्रका उससे साधिक
वेदनीयका स्थितिबन्ध होता है ॥ २६० ॥
पुरिसस यं पढमठिदी आवलिदोसुवरिदासु आगाला।
पडिआगाला छिण्णा पडियावलियादुदीरणदा ॥ २६१ ।।
पुरुषस्य च प्रथमस्थितिः आवलिद्वयोरुपरतयोरागालाः ।
प्रत्यागालाः छिन्नाः प्रत्यावलिकात उदीरणता ॥ २६१ ॥
अर्थ-पुरुषवेदकी अन्तरायामके नीचे कही प्रथमस्थितिमें दो आवलि शेष रहनेपर
आगाल प्रत्यागालका व्युच्छेद होता है और शेष दो आवलिके प्रथमसमयसे लेकर पुरुषवेदकी
गुणश्रेणी निर्जराका व्युच्छेद हुआ वहां उदयावलीसे बाह्य ऊपरके निषेकोंमें तिष्ठते द्रव्यको
उदयावलीमें देते हैं ऐसी उदीरणा ही पाई जाती है ॥ २६१ ॥
अंतरकदादु छण्णोकसायदत्वं ण पुरिसगे देदि ।
एदि हु संजलणस्स य कोधे अणुपुविसंकमदो ॥ २६२ ॥
अंतरकृतात् पण्णोकषायद्रव्यं न पुरुपके ददाति ।
एति हि संज्वलनस्य च क्रोधे आनुपूर्विसंक्रमतः ॥ २६२ ॥
अर्थ-अन्तर करनेके वाद हास्यादि छह नोकषायोंका द्रव्य पुरुष वेदमें संक्रमण नहीं
करता संज्वलनक्रोधमें ही संक्रमण करता है क्योंकि यहां आनुपूर्वी संक्रमण पाया जाता
है ॥ २६२॥

. लन्धिसारः। ७५ पुरिसस्स उत्तणवकं असंखगुणियरमेण उवसंमदि। संकमदि हु हीणकमेणधापवत्तेण हारेण ॥ २६३ ।। पुरुषस्य उक्तनवकं असंख्यगुणितक्रमेण उपशमयति । संक्रामति हि हीनक्रमेणाधःप्रवृत्तेन हारेण || २६३ ।। अर्थ-पुरुषवेदका पूर्व कहा हुआ नवीनसमय प्रबद्ध है उसे असंख्यातगुणा कमलिये उपशमाता है और उसीका कोई एक नवीनसमयप्रवद्ध है उसको अधाप्रवृत्त भागहारसे विशेप हीनक्रमसे अन्य प्रकृतिमें संक्रमण करता है ॥ २६३ ॥ पढमावेदे संजलणाणं.अंतोमुहुत्तपरिहीणं । वस्साणं वत्तीसं संखसहस्सियरगाणठिदिवंधो ।। २६४ ।। प्रथमावेदे संज्वलनानां अंतर्मुहूर्तपरिहीनम् । वर्षाणां द्वात्रिंशत् संख्यसहस्रमितरेपां स्थितिवन्धः ॥ २६४ ।। अर्थ-अपगतवेदके प्रथमसमयमें संज्वलनचौकड़ीका तो अन्तर्मुहूर्तकम बत्तीस वर्षमात्र स्थितिबन्ध है और अन्यकर्मीका पूर्वस्थितिवन्धसे संख्यातगुणा कम हुआ हीनाधिक क्रम- लिये संख्यातहजार वर्षमात्र स्थितिबन्ध होता है ॥ २६ ॥ पढमावेदो तिविहं कोहं उयसमदि पुवपढमठिदी। समयाहियआवलियं जाय य तकालठिदिवंधो ॥ २६५ ॥ प्रथमावेदस्त्रिविधं क्रोधं उपशमयति पूर्वप्रथमस्थितिः । समयाधिकावलिका यावच तत्कालस्थितिवन्धः ।। २६५ ।। अर्थ-प्रथम समयवाला अपगतवेदी संयमी पुरुषवेदके नवक समयप्रवद्धसहित प्रत्या- ख्यानादि तीनों क्रोधोंका उपशम करता है । उससे पहले स्थापनकी हुई प्रथमस्थितिके पीतनेपर शेषकाल एक समय अधिक आवलिमात्र जवतक रहे तबतक ही क्रोधादिका स्थि- तिवन्ध रहता है ।। २६५ ॥ संजलणचउकाणं मासचउकं तु सेसपयडीणं । वस्साणं संखेजसहस्साणि हवंति णियमेण ॥ २६६ ॥ संज्वलनचतुष्काणां मासचतुष्कं तु शेषप्रकृतीनाम् । वर्षाणां संख्येयसहस्राणि भवंति नियमेन ॥ २६६ ॥ अर्थ-अपगतवेदीके प्रथमसमयसे लेकर अन्तर्मुहर्तमात्रकाल लिये ऐसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर क्रोधत्रिकके उपशमकालके अन्तसमयमें संज्वलनचौकड़ीका स्थितिबन्ध चारमासमात्र होता है और उसी अन्तसमयमें अन्यकर्मोंका स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा कम ऐसा संख्यातहजार वर्षमात्र पूर्वोक्तप्रकार हीनाधिकपना लिये हुए होता है ।। २६६ ॥ .

७६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कोहदुर्ग संजलणगकोहे संछुहदि जाव पढमठिदी। आवलितियं तु उवरिं संछुहदि हु माणसंजलणे ॥ २६७ ॥ क्रोधद्विकं संज्वलनकक्रोधे संक्रामति यावत् प्रथमस्थितिः । आवलि त्रिकं तु उपरि संक्रामति हि मानसंज्वलने ॥ २६७ ॥ अर्थ-अवेदके प्रथमसमयसे लेकर संज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमें तीन आवली शेष रहनेतक अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यानरूप दो क्रोधके द्रव्यको संज्वलनक्रोधमें संक्रमण करता है। और संक्रमावली उपशमनावलि उच्छिष्टावलि इन तीनोंमेंसे संक्रमावलिके अन्तसमयतक उन दोनोंका द्रव्य संज्वलनमानमें संक्रमण होता है ॥ २६७ ॥ कोहस्स पढमठिदी आवलिसेसे तिकोहमुवसंतं । ण य णवकं तत्थंतिमवंधुदया होंति कोहस्स ॥ २६८ ॥ क्रोधस्य प्रथमस्थितिः आवलिशेपे त्रिक्रोधमुपशांतं । न च नवकं तत्रांतिमबंधोदयौ भवतः क्रोधस्य ।। २६८ ॥ अर्थ-संज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमें उच्छिष्टावलि शेष रहनेपर अन्तमें नवीनसमय- प्रबद्धके विना समस्त संज्वलन क्रोधका द्रव्य अपनेरूप रहता हुआ उपशम हुआ। वहां ही संज्वलन क्रोधके बन्ध उदयका व्युच्छेद होता है ॥ २६८ ॥ से काले माणस्स य पढमद्विदिकारवेदगो होदि । पढमहिदिम्मि दवं असंखगुणियकमे देदि ॥ २६९ ॥ तस्मिन् काले मानस्य च प्रथमस्थितिकारवेदको भवति । प्रथमस्थितौ द्रव्यं असंख्यगुणितक्रमेण ददाति ॥ २६९ ॥ अर्थ-तीन क्रोधोंके उपशम होनेके वादमें यह संयमी संज्वलनमानकी प्रथमस्थितिके ऊपरवर्ती जो द्वितीयस्थितिका द्रव्य उसे प्रथमस्थितिके निषेकोंमें असंख्यातगुणा क्रम लिये निक्षेपण करता है और उसी प्रथमस्थितिका कर्ता भोक्ता होता है ॥ २६९ ॥ पढमद्विदिसीसादो विदियादिम्हि य असंखगुणहीणं । तत्तो विसेसहीणं जाव अइच्छावणमपत्तं ॥ २७० ॥ प्रथमस्थितिशीर्षतः द्वितीयादौ च असंख्यगुणहीनम् । ततो विशेषहीनं यावत् अतिस्थापनमप्राप्तम् ॥ २७० ॥ अर्थ-प्रथमस्थितिके अन्तसमयमें निक्षेपण किये द्रव्यसे द्वितीयस्थितिके प्रथमनिषेकमें निक्षेपण किया द्रव्यं असंख्यातगुणा कम है और उससे ऊपर विशेष घटता क्रमलिये जब- तक अतिस्थापनावली प्राप्त न हो तबतक द्रव्यका निक्षेपण होता है ॥ २७० ॥ .

लब्धिसारः। ७७ माणस्स पढमठिदी सेसे समयाहिया तु आवलियं । तियसंजलणगवंधो दुमास सेसाण कोह आलायो ।। २७१ ॥ मानस्य प्रथमस्थितिः शेपे समयाधिकां तु आवलिकाम् । निकसंज्वलनकवंधो द्विमासं शेषाणां क्रोध आलापः ॥ २७१ ॥ अर्थ-संज्वलनमानकी प्रथमस्थितिमें समय अधिक आवलि शेप रहनेपर उपशमंका लके अन्तमें संज्वलन मान माया लोभका स्थितिवन्ध दोमहीनेका होता है । अन्यकर्मोंकां स्थितिवन्ध क्रोधके समान संख्यातहजार वर्षमात्र होता है ॥ २७१ ।। माणदुर्ग संजलणगमाणे संछुहदि जाय पढमठिदी। आवलितियं तु उवरि मायासंजलणगे य संछुह दि ॥ २७२ ।। मानद्विकं संज्वलनकमाने संक्रामति यावत् प्रथमस्थितिः । आवलित्रयं तु उपरि मायासंज्वलनके च संक्रामति ॥ २७२ ।। अर्थ-संज्वलनमानकी प्रथमस्थितिमें तीन आवलि शेप रहनेपर अप्रत्याख्यान प्रत्या- ख्यानमानद्विकको संज्वलनमानमें संक्रमण करता है। उसके बाद संक्रमणावलिके अन्तस- मयतक उन दो मानोंको संज्वलनमायामें संक्रमण करता है ।। २७२ ॥ माणस्स य पढमठिदी आवलिसेसे तिमाणमुवसंतं । ण य णवकं तत्थंतिमबंधुदया होंति माणस्स ॥ २७३ ॥ मानस्य च प्रथमस्थितौ आवलिशेपे त्रिमानमुपशांतं । न च नवकं तत्रांतिमवंधोदयौ भवतः मानस्य ।। २७३ ।। अर्थ-संज्वलनमानकी प्रथमस्थितिमें आवलिकाल शेप रहनेपर नवीनसमयप्रबद्ध के विना अन्य सब तीनमानका द्रव्य उपशम हुआ उसीसमय संज्वलनके बन्धकी और उदय- की व्युच्छित्ति होती है ॥ २७३ ॥ से काले मायाए पढमहिदिकारवेदगो होदि। माणस्स य आलाओ दधस्स विभंजणं तत्थ ॥ २७४ ।। तस्मिन् काले मायायाः प्रथमस्थितिकारवेदको भवति । मानस्य च आलापो द्रव्यस्य विभंजनं तत्र ॥ ७४ ।। अर्थ-तीन मानके उपशमके वाद संज्वलनमायाकी प्रथमस्थितिका कर्ता व वेदक (भोक्ता ) होता है वहां संज्वलनमायाद्रव्यका अपकर्षण निक्षेपण विभाग मानद्रव्यवत् जानना । और संज्वलनमानके समयकम दो आवलिमात्र नवीन समयप्रवद्ध हैं वे तभी समयकम दो आवलिमात्र कालकर उपशमते हैं ॥ २७४ ॥ . ..

रायचन्द्रजैनशाखमालायाम । मायाए पढमठिदी सेसे समयाहियं तु आवलियं । मायालोहगवंधो मासं सेसाण कोह आलाओ॥ २७५ ।। मायायाः प्रथम स्थिती शेपे समयाधिकं तु आवलिकां । मायालोभगवन्धः मासं शेपाणां क्रोध आलापः ।। २७५ ।। अर्थ-मायाकी प्रथमस्थिति में समय अधिक आवलि शेष रहनेपर संचलन माया और लोभका तो मासमान स्थितिबन्ध होता है अन्यकर्मोका क्रोधवत् आलाप करना । पूर्वक्रथिन रीतिसे हीनाधिकपना लिये संख्यातहजारवर्षमात्र स्थितिबन्ध है ॥ २७५ ॥ मायदुर्ग संजलणगमायाए मुहदि जाय पढमठिदी। आवलितियं तु उपरि संछुहदि हु लोहसंजलणे ॥ २७६ ॥ मायाद्विक संज्वलनगमायायां संक्रामति यावन प्रथमाथितिः । आवलि त्रिकं तु उपरि संक्रामति हि लोभनंग्नलने ॥ २७६ ।। अर्थसंज्वलनमायाकी प्रथमस्थितिमें जबतक तीन आवलि शेष रहे तबतक अपत्या- ल्यानप्रत्याख्यानमाया द्विकका द्रव्य संज्वलनमाया ही संक्रमण करता है। उससे परे संक्रमणावलीमें उनका द्रव्य संज्वलनलोभमें संक्रमण करता है ॥ २७६ ॥ मायाए पढमठिदी आवलिसेसेति मायमुवसंतं । ण य णचकं तत्थंतिम बंधुदया होति मायाए ।। २७७ ॥ मायायाः प्रथमस्थिती आवलियोपे इति मायमुपशांन । न च नवकं तत्रांतिमे बंधोदयौ भवतः मायायाः ॥ २७ ॥ अर्थ-मायाकी प्रथमस्थितिमै आवलि शेष रहनेपर नवक समय प्रबद्धक विना भन्य- सब मायाका द्रव्य उपशम होजाता है । और उसीसमयमें संज्वलनमायाके बन्ध वा उद- यकी व्युच्छित्ति होती है ॥ २७७ ॥ से काले लोहस्स य पढमट्टिदिकारवेदगो होदि । पुण वादरलोहो माणं या होदि णिक्खेओ ॥ २७८ ॥ खे काले लोभस्य च प्रथमस्थितिकारवेदको भवति । तत् पुनः वादरलोभः मानो वा भवति निक्षेपः ।। २७८ ॥ अर्थ-मायाके उपशमके वाद संज्वलनलोभकी प्रथमस्थितिका कर्ता और भोगता होता है। वह अनिवृत्तिकरण जीव स्थूल लोभको अनुभवता हुआ बादरसांपराय कहा जाता है । उस-संज्वलनलोमका द्रव्य अपकर्षणकर प्रथमस्थितिमें निक्षेपण किया जाता है उसकी विधि मानकी तरह जानना ॥ २७८॥ तं लब्धिसारः। ७९ पढमद्विदिअद्धते लोहस्स य होदि दिणुपुधत्तं तु । वस्ससहस्सपुधत्तं सेसाणं होदि ठिदिवंधो ॥ २७९ ॥ प्रथमस्थित्यर्धाते लोभस्य च भवति दिनपृथक्त्वं तु । वर्पसहस्रपृथक्त्वं शेषाणां भवति स्थितिबंधः ।। २७९ ।। अर्थ-माया उपशमनके वाद अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयतक बादर लोभका वेदन- कालके प्रथम अन्तसमयमें स्थितिवन्ध संज्वलन . लोभका तो पृथक्त्व दिन प्रमाण और अन्यका पूर्वकथितक्रमसे पृथक्त्तव हजार वर्षप्रमाण है ॥ २७९ ॥ विदियद्धे लोभावरफड्ढयहेट्ठा करेदि रसकिदि। इगिफड्ढयवग्गणगद संखाणमणंतभागमिदं ॥ २८ ॥ द्वितीयाधै लोभावरस्पर्धकाधस्तनां करोति रसकृष्टिम् । एकस्पर्धकवर्गणागतं संख्यानामनंतभागमिदम् ।। २८० ।। अर्थ-संज्वलनलोमकी प्रथमस्थितिके प्रथम आधेको विताकर द्वितीय अर्धके प्रथम- समयमें संज्वलन लोभके अनुभागसत्त्वमें जघन्यस्पर्धकोंकी नीचेसे अनुभाग कृष्टिं करता है अर्थात् फलदेनेकी शक्तिको क्षीण करता है । उन सूक्ष्मकृष्टिरूप अविभागप्रतिच्छेदोंका प्रमाण एक स्पर्धक वर्गणाप्रमाणके अनन्तवें भागमात्र जानना ॥ २८० ॥ उक्कट्टिददगिमार्ग पल्लासंखेजखंडिदिगिभागं । देदि सुहुमासु किहिसु फहयगे सेसवहुभागं ॥ २८१ ॥ अपकर्पितकभागं पल्यासंख्येयखंडितैकभागम् । ददाति सूक्ष्मासु कृष्टिपु स्पर्धके शेपवहुभागम् ॥ २८१ ।। अर्थ-संज्वलनलोभके सब सत्त्वरूपद्रव्यके अपकर्षित एक भागमात्र द्रव्यको ग्रहणकर उसमें पल्यके असंख्यातवें भागसे भाजित एक भागको सूक्ष्मकृष्टिरूप परिणमाता है और शेष बहुभागको स्पर्धकमें निक्षेपण करता है ॥ २८१ ॥ पडिसमयमसंखगुणा दघादु असंखगुणविहीणकमे । पुवगहेट्ठा हेट्ठा करेदि किर्टि स चरिमोति ॥ २८२ ॥ प्रतिसमयमसंख्यगुणा द्रव्यात् असंख्यगुणविहीनक्रमेण । पूर्वगाधस्तनां अधस्तनां करोति कृष्टिं स चरम इति ॥ २८२ ॥ अर्थ-कृष्टिकरनेके कालके अन्तसमयतक हरसमय पूर्वपूर्वसमयोंमें की हुई कृष्टियोंके प्रमाणसे आगे आगेके समयमें की गई कृष्टियोंका प्रमाण कमसे असंख्यातगुणा घटता हुआ है और अनुभाग अनन्तगुणा घटता है ॥ २८२ ॥ १ कर्म परमाणुओंकी अनुभाग शक्तिके घटानेको कृष्टि कहते हैं। ।

. . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । हेटा सीसे उभयं दबविसेसे य हेटकिहिम्मि । मझिमखंडे दवं विभज विदियादिसमयेसु ॥ २८३ ॥ अधस्तना शीर्प उभयं द्रव्यविशेपे च अधस्तनकृष्टौ । मध्यमखंडे द्रव्यं विभज्य द्वितीयादिसमयेपु ॥ २८३ ॥ अर्थ-कृष्टिकरणकालके दूसरे आदि समयोंमें अपकर्षण किये द्रव्यको अधस्तनशीर्ष- विशेषोंमें उभयद्रव्यविशेषोंमें अधस्तनकृष्टियोंमें मध्यमखंडोंमें-इसतरह चार विभागोंमें निक्षेपण करता है ॥ २८३ ॥ हेट्ठासीसं थोवं उभयविसेसं तदो असंखगुणं । हेहा अणंतगुणिदं मज्झिमखंडं असंखगुणं ॥ २८४ ॥ अधस्तनशीर्प स्तोकं उभयविशेपं ततोऽसंख्यगुणम् । अधस्तनमनंतगुणितं मध्यमखंडं असंख्यगुणम् ॥ २८४ ॥ अर्थ-इन पूर्वकथित चारों द्रव्योंमेंसे अधस्तन शीर्पविशेपद्रव्य सबसे थोड़ा है उससे असंख्यातगुणा उभयद्रव्यविशेष है उससे अनन्तगुणी अधस्तन कृष्टि है और उससे भी असं- ख्यातगुणा मध्यमखण्ड द्रव्य है ॥ २८४ ॥ अवरे बहुगं देदि हु विसेसहीणकमेण चरिमोत्ति । तत्तो गंतगुणूणं विसेसहीणं तु फट्ठयगे ॥ २८५ ॥ अवरस्मिन् बहुकं ददाति हि विशेपहीनक्रमेण चरम इति । ततोऽनंतगुणोंन विशेपहीनं तु स्पर्धके ।। २८५ ॥ अर्थ-जघन्य कृष्टिमें बहुत द्रव्य दिया जाता है । द्वितीय अपूर्व कृष्टिसे लेकर पूर्व- कृष्टिकी अन्तकृष्टि पर्यंत चय घटता क्रम लिये निक्षेपण करता है । उससे पूर्वस्पर्धककी प्रथमवर्गणामें निक्षेपण किया द्रव्य अनन्तगुणा घटता हुआ है और उसके वाद चय घटते क्रमसे निक्षेपण करता है ॥ २८५ ॥ णवरि असंखाणंतिमभागूणं पुवकिट्टिसंधीसु । हेहिमखंडपमाणेणेव विसेसेण हीणादो ॥ २८६ ॥ नवरि असंख्यानामंतिमभागोनं पूर्वकृष्टिसंधिषु । । अधस्तनखंडप्रमाणेनैव विशेषेण हीनात् ॥ २८६ ॥ 'अर्थ इतना विशेष है कि अपूर्वकृष्टिकी अन्तकृष्टिमें निक्षेपण किये द्रव्यसे पूर्वकृष्टि- की प्रथमकृष्टिमें निक्षेपण किया द्रव्य असंख्यातवें भागकर व अनन्तवें भागकर घटता हुआ है । क्योंकि एक अधस्तन कृष्टिका द्रव्य और एक उभयद्रव्यविशेष इनकर हीन है ।। २८६॥ - लब्धिसाः। अवरादो चरिमोत्ति य अणंतगुणिदकमा सतीदो। इदि किट्टीकरणद्धा बादरलोहस्स विदियद्धं ॥ २८७ ॥ अवरस्मात् चरम इति च अनंतगुणितक्रमात् शक्तितः । इति कृष्टिकरणाद्धा वादरलोभस्य द्वितीयाधम् ॥ २८७ ॥ अर्थ जघन्य अपूर्वकृष्टि के अनुभागके अविभागप्रतिच्छेदोंसे द्वितीय पूर्वकृष्टिकी अंतक- ष्टितकके अविभागप्रतिच्छेद क्रमसे अनन्त अनन्तगुणे हैं। इसप्रकार बादर लोभवेदककाल- के द्वितीयअर्धमात्ररूप सूक्ष्मकृष्टि करनेका काल वितीत होता है ।। २८७ ।। विदियद्धा संखेजाभागेसु गदेसु लोभठिदिवंधो । अंतोमुहुत्तमेत्तं दिवसपुधत्तं तिघादीणं ॥ २८८ ।। द्वितीयाद्धा संख्येयभागेपु गतेपु लोभस्थितिबंधः । अंतर्मुहूर्तमानं दिवसपृथक्त्वं त्रिघातिनाम् ॥ २८८ ॥ अर्थ-संज्वलनलोभकी प्रथमस्थितिका द्वितीय अर्धमात्र कृष्टि करणकालके संख्याते वहुभाग वीतनेपर अन्तसमयमें संज्वलनलोभका अन्तर्मुहूर्तमात्र और तीन घातियाओंका पृथक्त्व दिनमात्र स्थितिवन्ध होता है ॥ २८८ ॥ किट्टीकरणद्धाए जाब दुचरिमं तु होदि ठिदिबंधो। वस्साणं संखेजसहस्साणि अधादिठिदिवंधो ॥ २८९ ॥ कृष्टिकरणाद्धाया यावत् द्विचरमं तु भवति स्थितिबंधः। वर्षाणां संख्येयसहस्राणि अधातिस्थितिबंधः ।। २८९ ।। अर्थ-कृष्टिकरणकालका जवतक द्विचरमसमय प्राप्त होवे तबतक तीन अघातियाओंका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षमात्र है और संज्वलनलोभादिका भी स्थितिवन्ध इसीके समान है ॥ २८९ ॥ किट्टीयद्धाचरिमे लोभस्संतो मुहुत्तियं बंधो। दिवसंतो घादीणं वेवस्संतो अघादीणं ॥ २९० ॥ कृष्ट्यद्धाचरमे लोभस्यांतर्मुहूर्तकं बंधः । दिवसांतः घातिनां द्विवर्षातो अघातिनाम् ॥ २९० ।। अर्थ-कृष्टिकरण कालके अन्तसमयमें पहले स्थितिबन्धसे संख्यातगुणाकम संज्वलन- लोभका अन्तर्मुहूर्तमात्र, तीन घातियाओंका कुछ कम एक दिन और अघातियाओंका कुछकम दोवर्ष स्थितिबन्ध होता है ॥ २९० ॥ विदियद्धा परिसेसे समऊणावलितियेसु लोभदुगं । सहाणे उवसमदि हु ण देदि संजलणलोहम्मि ॥ २९१ ॥ , ल.सा. ११

८२
रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम्।
द्वितीयार्धे परिशेपे समयोनावलित्रिकेपु लोभद्विकम् ।
स्वस्थाने उपशाम्यति हि न ददाति संज्वलनलोभे ॥ २९१ ।।
अर्थ-संज्वलनलोभकी प्रथमस्थितिके द्वितीयामें समयकम तीन आवलि शेप रहने-
पर अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यानलोभ अपने स्वरूपमें ही रहते हुए उपशम होते हैं लेकिन
संज्वलनलोभमें संक्रमण नहीं करते ॥ २९१ ॥
वादरलोभादिठिदी आवलिसेसे तिलोहमुवसंतं ।
णयकं किटिं मुचा सो चरिमो थूलसंपराओ यं ॥ २९२ ।।
वादरलोभादिस्थिती आवलिशेपे त्रिलोभमुपशांतम् ।
नवकं कृष्टिं मुक्त्वा स चरमः स्थूलसांपरायो यः ।। २९२ ।।
अर्थ-बादरलोभकी प्रथमस्थितिमें उच्छिष्टावली शेप रहनेपर उपशमनावली अन्त-
समयमें तीनों लोभका द्रव्य उपशम होता है लेकिन सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त हुआ द्रव्य और
एकसमय कम दो आवलिमात्र नवीनसमयप्रवद्धोका द्रव्य तथा उच्छिष्टावलिमात्र निषेकोंका
द्रव्य उपशमरूप नहीं होता । इसप्रकार कृष्टिकरणकालके अन्तसमयवर्तीको अन्तिम अनि-
वृत्तबादरसांपराय कहते हैं ॥ २९२ ।। इसप्रकार अनिवृत्तकरणका खरूप कहा ।
से काले किट्टिस्स य पढमहिदिकारवेदगो होदि ।
लोहगपढमठिदीदो अद्धं किंचूणयं गत्थ ॥ २९३ ।।
खे काले कृप्टेश्च प्रथमस्थितिकारवेदको भवति ।
लोभगप्रथमस्थितितो अर्ध किंचिदूनकं गत्वा ।। २९३ ।।
अर्थ-बादरलोभकी प्रथमस्थितिके द्वितीय अर्धसे कुछ कम सूक्ष्मकृष्टियोंकी प्रथम-
स्थिति करता है । और उसी सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टिके उदयका कर्ता और
भोगता है ॥ २९३ ॥
पढमे चरिमे समये कदकिट्टीणग्गदो दु आदीदो।
मुचा असंखभागं उदेदि सुहुमादिमे सधे ॥ २९४ ॥
प्रथम चरमे समये कृतकृष्टीनामग्रतस्तु आदितः ।
मुक्त्वा असंख्यभागं उदेति सूक्ष्मादिमे सर्वे ॥ २९४ ।।
. अर्थ-सूक्ष्मकृष्टि करनेके कालके प्रथमसमयमें अन्तसमयमेंकी हुई कृष्टियोंका असं-
ख्यातवां एकभाग अपने खरूपकर उदय नहीं होता। अन्य कृष्टिरूप परिणमनकर उदय
होती है । और शेष बहुभाग तथा द्वितीयादि द्विचरम समयोंमें की हुई सब कृष्टियें अपने
खरूपकर ही उदय होती हैं ॥ २९४ ॥

लब्धिसारः। विदियादिसु समयेसु हि छंडदि पल्लाअसंखभागं तु । आकुंददि हु अपुवा हेट्ठा तु असंखभागं तु ॥ २९५ ॥ द्वितीयादिपु समयेषु हि यजति पल्यासंख्यभागं तु । आक्रामति हि अपूर्वा अधस्तनास्तु असंख्यभागं तु ॥ २९५ ॥ अर्थ सूक्ष्मसापरायके द्वितीय आदिसमयोंमें पत्यके असंख्यातवें भागप्रमाण कृष्टि- योंको छोड़ता है अर्थात् उदयको प्राप्त नहीं करता । और उस प्रथमसमयमें जो नीचेकी अनुदय कृष्टि कहीं थी उनमें अन्तकृष्टि से लेकर यहां जितना प्रमाण कहा है उतनी कृष्टि- यां उदयरूप होती हैं ।। २९५॥ किटिं सुहुमादीदो चरिमोत्ति असंखगुणिदसेढीए। उवसमदि. हु तचरिमे अवरहिदिवंधर्ण छण्हं ।। २९६ ।। कृष्टिं सूक्ष्मादितः चरम इति असंख्यगुणितश्रेण्या । उपशमयति हि तच्चरमे अवरस्थितिबंधनं पण्णाम् ।। २९६ ॥ अर्थ-सूक्ष्मसांपरायके प्रथम समयसे लेकर अन्तसमयता असंख्यातगुणा क्रमलिये द्रव्य उपशमाता है । और सूक्ष्मसापरायके अन्तसमयमै आयुमोहके विना छहकर्मों का जघन्य स्थितिबन्ध होता है ॥ २९६ ॥ अंतोमुहुत्तमत्तं घादितियाणं जहण्णठिदिवंधो । णामदुग वेयणीये सोलस चउवीस य मुहुत्ता ॥ २९७ ॥ अंतर्मुहूर्तमानं घातित्रयाणां जघन्यस्थितिबंधः । नामद्विकं वेदनीयं पोडश चतुविंशश्च मुहूर्ताः ॥ २९७ ॥ अर्थ-उनमेंसे तीन घातियाओंका अन्तर्मुहूर्तमात्र, नाम गोत्रका सोलह मुहूर्त, साता- वेदनीयका चौवीसमुहूर्त जघन्य स्थितिबंध होता है || २९७ ।। पुरिसादीणुच्छि8 समऊणाबलिगदं तु पचिहिदि । सोदयपढमहिदिणा कोहादीकिट्टियंताणं ॥ २९८ ॥ पुरुपादीनामच्छिष्टं समयोनावलिगतं तु प्रत्याहंति । सोदयप्रथमस्थितिना क्रोधादिकृष्यंतानाम् ।। २९८ ।। अर्थ-पुरुपवेदादिकोंका एकसमयकम आवलिमात्र निषेकोंका द्रव्य उच्छिष्टावलिरूप रहता है वह क्रोधादि सूक्ष्मकृष्टिपर्यंतोंके उदयरूप निषेकसे लेकर प्रथमस्थितिके निषेकोंके साथ उसरूप परिणमनकर उदय होता है ॥ २९८॥ पुरिसादो लोहगयं णवकं समऊण दोणि आवलियं । वसमदि हु कोहादीकिट्टीअंतेसु ठाणेसु ॥ २९९ ॥ .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पुरुपांत् लोभगतं नवकं समयोने द्वे आवलिके ।
उपशाम्यति हि क्रोधादिकृष्ट्यंतेपु स्थानेषु ॥ २९९ ।।
अर्थ-पुरुषवेद आदि लोभ पर्यंततकका एकसमय कम दो आवलिमात्र नवक समय-
प्रबद्धोंका द्रव्य है वह क्रोधादिकृष्टितकके प्रथम स्थितिके कालोंमें समयसमय असंख्यातगुणा
क्रमलिये उपशम होता है ॥ २९९ ॥ इसप्रकार सूक्ष्मसापरायके अन्तसमयमें सब कृष्टि
द्रव्यको उपशमाके वादके समयमें उपशांतकपाय होता है ।
-उवसंतपढमसमये उवसंतं सयलमोहणीयं तु ।
मोहस्सुदयाभावा सवत्थ समाणपरिणामो ॥ ३०॥
उपशांतप्रथमसमये उपशांतं सकलमोहनीयं तु ।
,मोहस्योदयाभावात् सर्वत्र समानपरिणामः ॥ ३०० ॥
अर्थ-उपशांतकषायके पहले समयमें सकलचारित्रमोहनीयकर्म बंधादिक अवस्थाओंके न
होनेसे सब तरह उपशमरूप होगया । और कपायोंके उदयका अभाव होनेसे अपने गुणस्थानके
कालमें समानरूप विशुद्धपरिणाम होते हैं । हीनाधिकता नहीं होती ।। ३०० ॥ ऐसा
यथाख्यात चारित्र होता है।
अंतोमुहुत्तमेत्तं उवसंतकसायवीयरायद्धा ।
गुणसेढीदीहत्तं तस्सद्धा संखभागो दु ॥ ३०१ ॥
अंतर्मुहूर्तमानं उपशांतकपायवीतरागाद्धा।
गुणश्रेणीदीर्घत्वं तस्याद्धा संख्यभागस्तु ॥ ३०१ ॥
अर्थ-उपशांतकषाय वीतराग ग्यारवें गुणस्थानका काल अन्तर्मुहूर्त है। उससे परे
नियमकर द्रव्यकर्मके उदयके निमित्तसे संक्लेशरूप भावकर्म प्रगट होजाता है । और इस
कालके संख्यातवें भागमात्र यहां उदयादि अवस्थित गुणश्रेणी आयाम है ॥ ३०१ ॥
उदयादिअवट्ठिदगा गुणसेढी दवमवि अवहिदगं ।
पढमगुणसेढिसीसे उदये जेट्टं पदेसुदयं ॥ ३०२ ॥
उदयाद्यवस्थितका गुणश्रेणी द्रव्यमपि अवस्थितकम् ।
प्रथमगुणश्रेणिशी उदये ज्येष्ठं प्रदेशोदयम् ॥ ३०२ ।।
अर्थ-उपशांतकषायमें उदयादि अवस्थित गुणश्रेणी आयाम है और यहां परिणाम
अवस्थित है उसके निमित्तसे अपकर्षणरूप द्रव्यका प्रमाण भी अवस्थित है । तथा प्रथमस-
यममें की गई गुणश्रेणीका अन्तनिषेक जिससमय उदय आवे उस समय उत्कृष्ट परमाणु-
ओंका उदय जानना ॥ ३०२॥

लब्धिसारः। ८५ - .. णामधुवोदयवारस सुभगति गोदेक विग्धपणगं च । केवल णिद्दाजुयलं चेदे परिणामपञ्चया होंति ॥ ३०३ ॥ नामध्रुवोदयद्वादश सुभगत्रि गोत्रैकं विघ्नपंचकं च । केवलं निद्रायुगलं चैते परिणामप्रत्यया भवंति ॥ ३०३ ॥ अर्थ-उपशांतकषायमें जो उनसठ उदयप्रकृतियां पाई जाती हैं उनमें से तैजसशरीर आदि नामकर्मकी ध्रुवोदयी वारह प्रकृतियां, सुभग आदेय यशस्कीर्ति, उच्चगोत्र, पांच अन्तराय, केवल ज्ञानावरण दर्शनावरण और निद्रा प्रचला ये पच्चीस प्रकृतियां परिणाम प्रत्यय हैं अर्थात् वर्तमान परिणामके निमित्तसे इनका अनुभाग उत्कर्षण ( वढना ) अपक- पण (घटना ) आदिरूप होके उदय होता है ।। ३०३ ॥ तेसिं रसवेदमवठ्ठाणं भवपच्चया हु सेसाओ। चोत्तीसा उपसंते तेसिं तिहाण रसवेदं ॥ ३०४ ॥ तेपां रसवेदमवस्थानं भवप्रत्यया हि शेपाः । चतुर्विंशत् उपशांते तेषां त्रिस्थानं रसवेदं ॥ ३०४ ॥ अर्थ -उन पच्चीस प्रकृतियोंके अनुभागका उदय उपशांत कषायके प्रथमसमयसे अंत- समयतक अवस्थित ( समानरूप ) है । क्योंकि वहां परिणाम समान हैं। और शेष चौं- तीस प्रकृतियां भवप्रत्ययं हैं। आत्माके परिणामोंकी अपेक्षा रहित पर्यायके ही आश्रयसे इनके अनुभागमें हानि वृद्धि पायी जाती है इसलिये इनके अनुभागका उदय तीन अवस्था लिये है ॥ ३०४ ।। इस तरह उपशांत कपाय गुणस्थानके अन्तसमयतक इक्कीस चारित्र- मोहकी प्रकृतियोंका उपशमन विधान समाप्त हुआ। आगे उपशांतकपायसे पड़नेका विधान कहते हैं- उवसंते पडिबडिदे भवक्खये देवपढमसमयम्हि । उग्घाडिदाणि सबवि करणाणि हवंति णियमेण ॥ ३०५ ॥ उपशांते प्रतिपतिते भवक्षये देवप्रथमसमये । उद्घाटितानि सर्वाण्यपि करणानि भवंति नियमेन ॥ ३०५ ॥ अर्थ-उपशांतकपायके कालमें प्रथमादि अन्तसमयतक समयोंमें जिस किसीमें आयुके नाशसे मरकर देवपर्यायके असंयतगुणस्थानमें पड़े वहां असंयतके प्रथमसमयमें बंध उदी. रणा वगैरह सव करणोंको प्रगटकर प्रवर्तता है। क्योंकि जो उपशांत कपायमें उपशमे थे वे सब असंयतमें उपशम रहित हुए हैं ॥ ३०५ ॥ सोदीरणाण दवं देदि हु उदयावलिम्हि इयरं तु । उदयावलिवाहिरगे उंछाये देदि सेढीये ॥ ३०६ ॥ . .

८६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
सोदीरणानां द्रव्यं ददाति हि उदयावलौ इतरत्तु ।
उदयावलिवाह्यके अन्तरे ददाति श्रेण्याम् ॥ ३०६ ।।
अर्थ-वह देव उदयरूप प्रकृतियोंके द्रव्यको उदयावलिमें देता है। और उदय
रहित नपुंसकवेदादि मोहकी प्रकृतियोंके द्रव्यको उदयावलीसे वाह्य अन्तरायाम वा ऊपरकी
स्थितिमें चय घटते क्रमसे देता है ॥ ३०६ ॥
अद्धाखए पडतो अधापवत्तोत्ति पडदि हु कमेण ।
सुज्झंतो आरोहदि पडदि सो संकिलिस्संतो ॥ ३०७ ॥
अद्धाक्षये पतन् अधःप्रवृत्त इति पतति हि क्रमेण ।
शुद्ध्यन् आरोहति पतति स संक्लिश्यन् ॥ ३०७ ॥
अर्थ-उपशांतकषायका अन्तर्मुहूर्तकाल वीतनेपर क्रमसे पड़कर अधःप्रवृत्तकरणरूप
अप्रमत्त होता है । उसके बाद शुद्धता सहित होनेसे ऊपरके गुणस्थानोंमें चढ जाता है
और वही जीव संक्लेश सहित होनेसे नीचेके गुणस्थानोंमें पड़ जाता है। यहां उपशम-
कालके क्षयके निमित्तसे पड़ना जानना ॥ ३०७ ॥
सुहुममपविठ्ठसमयेण वसामण तिलोहगुणसेढी ।
सुहुमद्धादो अहिया अवद्विदा मोहगुणसेढी ॥ ३०८ ।।
सूक्ष्ममप्रविष्टसमयेनाध्रुवशमं त्रिलोभगुणश्रेणी।
सूक्ष्माद्धातो अधिका अवस्थिता मोहगुणश्रेणी ॥ ३०८ ॥
अर्थ-सूक्ष्मसापरायमें प्रवेश करनेके वाद प्रथमसमयमें जिनका उपशमकरण नष्ट हो-
गया है ऐसे अप्रत्याख्यानादि तीन लोभोंकी गुणश्रेणीका आरंभ होता है । उस गुणश्रेणी
आयामका प्रमाण चढनेवाले सूक्ष्मसांपरायके कालसे एक आवलिमात्र अधिक है । इस
अवसरमें मोहकी गुणश्रेणीका आयाम अवस्थितरूप जानना ।। ३०८ ॥
उदयाणं उदयादो सेसाणं उदयवाहिरे देदि ।
छण्हं बाहिरसेसे पुवतिगादहियणिक्खेओ ॥ ३०९ ॥
उदयानामुदयतः शेपाणां उदयवाह्ये ददादि ।
षण्णां वाह्यशेषे पूर्वत्रिकादधिकनिक्षेपः ॥ ३०९ ।।
अर्थ-उदयरूप द्रव्यको अपकर्षणकर उदयरूप गुणश्रेणी आयाममें निक्षेपण करे और
उदय रहित अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान लोभके द्रव्यको अपकर्षणकर उदयावलीसे बाह्य
निक्षेपण करे । और आयु मोहके विना छह कर्मोके द्रव्यको अपकर्षणकर उदयावलीमें
तथा बहुभाग गुणश्रेणी आयाममें देवै । वह गुणश्रेणी आयाम उतरनेवाले सूक्ष्मसांपरायादि
तीनोंका मिलाये हुए कालसे कुछ अधिक प्रमाण लिये हुए गलितावशेषरूप है ॥ ३०९॥

लन्धिसारः।
ओदरसुहुमांदीए बंधो अंतो मुहुत्तबत्तीसं ।
अडदालं च मुहुत्ता तिघादिणामदुगवेयणीयाणं ॥३१॥
अवतरसूक्ष्मादिके बंधो अन्तर्मुहूर्त द्वात्रिंशत् ।
अष्टचत्वारिंशत् च मुहूर्ताः त्रिघातिनामद्विकवेदनीयानाम् ॥ ३१० ॥
अर्थ-उतरे हुए सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयमें तीन घातियाओंका अन्तर्मुहूर्त, नाम
गोत्रका बत्तीसमुहूर्त और वेदनीयका अड़तालीस मुहूर्तमान स्थितिबन्ध है ॥३१०॥ आरो-
हकसे अवरोहक ( उतरनेवाला ) का दूना स्थितिबन्ध होता है।
गुणसेढीसत्थेदररसबंधो उपसमाहु विवरीयं ।
पढमुदओ किट्टीणमसंखभागा विसेसहियकमा ॥ ३११ ॥
गुणश्रेणी शस्तेतररसवन्ध उपशमात् विपरीतम् ।
प्रथमोदयः कृष्टीनामसंख्यभागा विशेषाधिकक्रमाः ॥३११ ॥
अर्थ-गुणश्रेणी प्रशस्त अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभागवंधका चढ़नेसे उतरनेमें विप-
रीतपना है । घटता बढता क्रमलिये है। और कृष्टियोंका प्रथम समयमें पत्यके असंख्या-
तवें भाग है फिस उसके बाद द्वितीयादि समयोंमें विशेष अधिकका क्रम जानना ॥३१॥
इस तरह सूक्ष्मसांपरायका काल वितीत हुआ।
बादरपढमे किट्टी मोहस्स य आणुपुविसंकमणं ।
गह्र ण च उच्छिटुं फट्टयलोहं तु वेदयदि ॥ ३१२ ॥
वादरप्रथमे कृष्टिः मोहस्य च आनुपूर्विसंक्रमणम् ।
नष्टं न च उच्छिष्टं स्पर्धकलोमं तु वेदयति ॥ ३१२ ।।
अर्थ-अवरोहक अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टियां उच्छिष्टावलिमात्र निषे-
कके विना सभी स्वरूपसे नष्ट हुई, मोहका आनुपूर्वी संक्रमण भी नष्ट होगया । अव उद-
यको प्राप्त हुए स्पर्धकरूप वादरलोभको भोगता है ।। ३१२ ॥
ओदरवादरपढमे लोहस्संतोमुहुत्तियो वंधो ।
दुदिर्णतो घादितिये चउबस्संतो अघादितिये ॥ ३१३ ॥
अवतरवादरप्रथमे लोभस्यांतर्मुहूर्तको वंधः ।
द्विदिनांतो घातित्रिके चतुःवर्षान्तो अघातित्रये ।। ३१३ ।।
अर्थ-उतरनेवाले वादरसांपराय अनिवृत्तिकरणके पहले समयमें संज्वलनलोभका स्थि-
तिवन्ध अन्तर्मुहूर्त है, तीन घातियाओंका कुछकम दो दिन है, नामगोत्रका कुछकम चार
दिन और तीन अघातियाओंका संख्यातहजार वर्ष है ॥ ३१३ ॥

८८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ओदरमायापढमे मायातिण्हं च लोभतिण्डं च । :, . ओदरमायावेदगकालादहियो दु गुणसेढी ॥ ३१४ ॥ अवतरमायाप्रथमे मायात्रयाणां च लोभत्रयाणां च । अवतरमायावेदककालादधिकस्तु गुणश्रेणी ॥ ३१४ ॥ अर्थ-उतरनेवाला अनिवृत्तिकरण मायावेदक कालके प्रथमसमयमें अप्रत्याख्यानादि तीन,मायाके द्रव्यको और तीनलोभके द्रव्यको अपकर्षणकर उदयावलिसे वाह्य साधिक मायावेदककालमात्र अवस्थित आयाममें गुणश्रेणी करता है । यहां संक्रमण होता है ॥ ३१४ ॥ . ओदरमायापढमे मायालोमे दुमासठिदिबंधो । छण्हं पुण वस्साणं संखेजसहस्सवस्साणि ॥ ३१५ ॥ अवतरमायाप्रथमे मायालोमे द्विमासस्थितिवन्धः । पण्णां पुनः वर्षाणां संख्येयसहस्रवर्षाणि ॥ ३१५ ॥ अर्थ-उतरनेवाले माया वेदक कालके प्रथमसमयमै संज्वलन मायालोभका दो महीने तीन घातियाओंका संख्यातहजार वर्ष, तीन अघातियाओंका उससे भी संख्यातगुणा स्थि- तिबन्ध होता है । इसप्रकार संख्यातहजार स्थितिवन्ध होनेपर मायावेदककाल समाप्त हो. जाता है ॥ ३१५॥ ओदरगमाणपढमे तेत्तियमाणादियाण पयडीणं । ओदरगमाणवेदगकालादहिओ दु गुणसेढी ॥ ३१६ ॥ अवतरकमानप्रथमे तावन्मानादिकानां प्रकृतीनाम् । अवतरकमानवेदककालादधिकस्तु गुणश्रेणी ॥ ३१६ ॥ अर्थ-उसके वाद मानवेदककालके प्रथमसमयमें संज्वलनमानके द्रव्यको अपकर्षणकर उदयावलिके प्रथमसमयंसे लेकर और दो मान तीन माया तीनलोभोंके द्रव्यको अपकर्षण- कर उदयावलिसे बाह्य प्रथमसमयसे लेकर आवलि अधिक माया वेदक कालप्रमाण अव- स्थित आयाममें गुणश्रेणी करता है ॥ ३१६ ॥ ओदरगमाणपढमे चउमासा माणपहुदिठिदिवंधो। छण्हं पुण वस्साणं संखेजसहस्समेत्ताणि ॥ ३१७ ॥ 'अवतरकमांनंप्रथमे चतुर्मासा मानप्रभृतिस्थितिबंधः । पण्णां पुनः वर्षाणां संख्येयसहस्रमात्राणि ।। ३१७ ।। अर्थ --उसी उतरनेवाले मानवेदक कालके प्रथमसमयमें संज्वलनमानमायालोभोंका चार महीने, तीन घातियाओंका संख्यातहजार वर्ष, तीन अघातियाओंका उससे संख्यातगुणा लन्धिसारः। ८९ स्थितिबन्ध होता है । इसतरह संख्यातहजार स्थितिवन्ध होनेपर मानवेदककाल समाप्त हो. जाता है ।। ३१७॥ ओदरगकोहपढमे छक्कम्मसमाणया हु गुणसेढी। वादरकसायाणं पुण एतो गलिदावसेसं तु ॥ ३१८ ।। अवतरकक्रोधप्रथमे पट्कर्मसमानिका हि गुणश्रेणी । वादरकपायाणां पुनः इतः गलितावशेषं तु ॥ ३१८ ।। अर्थ-उसके बाद उतरनेवाला अनिवृत्तिकरण है वह संज्वलनक्रोधके उदयके प्रथम- समयमें अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान संज्वलन क्रोध मान माया लोमरूप वारह कपायोंकी ज्ञाना- वरणादि छहकर्मोंके समान गलितावशेष गुणश्रेणी करता है ॥ ३१८ ॥ ओदरगकोहपढमे संजलणाणं तु अट्टमासठिदी। छण्हं पुण वस्साणं संखेज्जसहस्सवस्साणि ॥ ३१९ ।। अवतरकक्रोधप्रथमे संज्वलनानां तु अष्टमासस्थितिः । पण्णां पुनः वर्षाणां संख्येयसहस्रवर्षाणि ॥ ३१९ ॥ अर्थ-उतरनेवालेके क्रोधउदयके प्रथमसमयमें संज्वलन चार कपायोंका आठ महीने, तीनघातियाओंका संख्यातहजार वर्ष, उससे संख्यातगुणा नामगोत्रका, उससे डौढा वेद- नीयका स्थितिवन्ध होता है ॥ ३१९ ॥ ओदरगपुरिसपढमे सत्तकसाया पण?उवसमणा । उणवीसकसायाणं छकम्माणं समाणगुणसेढी ॥ ३२ ॥ अवतरकपुरुपप्रथमे सप्तकपायाः प्रणटोपशमकाः । एकोनविंशकपायाणां षट्कर्मणां समानगुणश्रेणी ॥ ३२० ॥ अर्थ-संज्वलनक्रोधवेदककालमें पुरुषवेदके उदय होनेके प्रथमसमयमें पुरुषवेद, छह हास्यादि-ये सात कषाय हैं वे नष्ट उपशम करणवाले होजाते हैं तव ही वारहकषाय और सातनोकषाय-ऐसे उन्नीस कपायोंकी ज्ञानावरणादि छहकोंके समान आयाममें गुणश्रेणी करता है ।। ३२० ॥ पुंसंजलणिदराणं वस्सा बत्तीसयं तु चउसट्टी। संखेजसहस्साणि य तकाले होदि ठिदिवंधो ॥ ३२१ ।। पुंसंज्वलनेतरेषां वर्षाणि द्वात्रिंशत् तु चतुःपष्ठिः। संख्येयसहस्राणि च तत्काले भवति स्थितिबंधः ॥ ३२१ ॥ अर्थ-उतरनेवालेके पुरुषवेद उदयके प्रथमसमयमें पुरुषवेदका बत्तीसवर्ष, संज्वलनचा- ल.सा. १२ , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । रका चौंसठवर्ष, तीनघातियाओंका संख्यात हजार वर्ष, उससे संख्यातगुणा नामगोत्रका और उससे ड्योढा वेदनीयका स्थितिवन्ध होता है ॥ ३२१ ॥ पुरिसे दु अणुवसंते इत्थी उवसंतगोत्ति अद्धाए । संखाभागासु गदेससंखवस्सं अघादिठिदिवंधो ॥ ३२२ ॥ पुरुषे तु अनुपांते स्त्री उपशांतका इति अद्धायाः । संख्यभागेपु गतेष्वसंख्यवर्षे अघातिस्थितिवंधः ॥ ३२२ ॥ अर्थ-पुरुषवेदके उदयकालमें स्त्रीवेदका जवतक उपशम काल रहे तब तकके कालके संख्यात बहुभाग वीतनेपर एकभाग शेष रहे अघातिया कर्मोका स्थितिवन्ध असंख्यात हजार वर्षमात्र होता है ।। ३२२ ॥ णवरि य णामदुगाणं वीसियपडिभागदो हवे बंधो। तीसियपडिभागेण य बंधो पुण वेयणीयस्स ॥ ३२३ ॥ नवरि च नामद्विकयोः वीसियप्रतिभागतो भवेत् वंधः । तीसियप्रतिभागेन च बंधः पुनः वेदनीयस्य ।। ३२३ ।। अर्थ-वहां इतना विशेष है कि नामगोत्रका पल्यके असंख्यातवें भागमात्र स्थितिवन्ध इतना वीसियोंका है । इसहिसावसे तीसिय वेदनीयका डेढगुणा पल्यके असंख्यातवें भागमात्र स्थितिबन्ध है । और तीन घातियाओंका संख्यात. हजार वर्षमात्र, उससे संख्यात- गुणा कम संख्यातहजार वर्षमात्र मोहनीयका स्थितिबन्ध है ॥ ३२३ ॥ थी अणुवसमे पढमे वीसकसायाण होदि गुणसेढी। संढुवसमोत्ति मज्झे संखाभागेसु तीदेसु ॥ ३२४ ॥ स्त्री अनुशमे प्रथमे विंशकपायाणां भवति गुणश्रेणी । पंढोपशम इति मध्ये संख्यभागेष्वतीतेपु ॥ ३२४ ॥ अर्थ-उससे आगे अन्तर्मुहूर्तकाल वीतनेपर स्त्रीवेदका उपशम नष्ट होजाता है वहांसे लेकर प्रथमसमयमें स्त्रीवेद और पहले कहे हुए उन्नीस कषाय-इसतरह वीस कषायोंकी गुणश्रेणी होती है । उसीकालमें जबतक नपुंसकवेदका उपशम है तवतकके कालके संख्यात बहुभाग वीतनेपर ॥ ३२४ ॥ घादितियाणं णियमा असंखवस्सं तु होदि ठिदिवंधो। तकाले दुट्ठाणं रसबंधो ताण देसघादीणं ॥ ३२५ ॥ घातित्रयाणां नियमात् असंख्यवर्षस्तु भवति स्थितिबंधः । तत्काले द्विस्थानं रसवंधः तेषां देशघातिनाम् ।। ३२५ ।। gho

लब्धिसारः।
९१
अर्थ-तीन घातियाओंका पत्यके असंख्यातवें भागमात्र, इससे असंख्यातगुणा नाम-
गोत्रका, उससे ड्योढा वेदनीयका और मोहका संख्यात हनार वर्षमान स्थितिवन्ध होता है।
उसी अवसरमें चार ज्ञानावरण तीन दर्शनावरण और पांच अन्तराय-इन देशधातियाओंका
लता और दारु समान दो स्थानगत अनुभागबंध होता है ॥ ३२५ ॥
संढणुवसमे पढमे मोहिगिवीसाण होदि गुणसेढी ।
अंतरकदोति मज्झे संखाभागासु तीदासु ॥ ३२६ ॥
पंढानुपशमे प्रथमे मोहैकविंशानां भवति गुणश्रेणी ।
अंतरकृत इति मध्ये संख्यभागेष्वतीतेपु ॥ ३२६ ।।
अर्थ-नपुंसकवेदका उपशम नष्ट होनेपर उसके प्रथमसमयमें नपुंसकवेद और पहली
वीस-इसतरह मोहकी इक्कीस प्रकृतियोंकी गुणश्रेणी होती है । और अन्तरकरण करे उसके
बीचमें अन्तर्मुहूर्तकाल है उसके संख्यात बहुभाग वीतनेपर ॥ ३२६ ।।
मोहस्स असंखेजा वस्सपमाणा हवेज ठिदिवंधो।
ताहे तस्स य जादं बंधं उदयं च दुटाणं ॥ ३२७ ॥
मोहस्य असंख्येयानि वर्षप्रमाणानि भवेत् स्थितिबंधः ।
तस्मिन् तस्य च जातो वंध उदयश्च द्विस्थानम् ।। ३२७ ॥
अर्थ-मोहनीयका असंख्यातवर्ष, तीन घातियाओंका उससे असंख्यातगुणा, नामगो-
त्रका उससे असंख्यातगुणा और वेदनीयका उससे अधिक स्थितिबन्ध होता है । उसी
अवसरमें मोहनीयके लता दारुरूप दो स्थानगत बन्ध और उदय होते हैं ॥ ३२७ ॥
लोहस्स असंकमणं छावलितीदेसु दीरणत्तं च ।
णियमेण पडताणं मोहस्सणुपुविसंकमणं ॥ ३२८ ।।
लोभस्य असंक्रमणं पडावल्यतीतेपूदीरणत्वं च ।
नियमेन पततां मोहस्यानुपूर्विसंक्रमणम् ॥ ३२८ ।।
अर्थ-उतरनेवालेके सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयसे लेकर जो कर्मवन्धे हुए थे उनकी
छह आवलि वीत जानेपर उदीरणा होनेका नियम था उसको छोड़ अब बन्धावली बीत
जानेपर ही उदीरणा की जाती है । और उतरनेवालेके मोहकी सब प्रकृतियोंका आनुपू-
वसिंक्रमका नियम था वह नष्ट हुआ ॥ ३२८ ॥
विवरीयं पडिहण्णदि विरयादीणं च देसघादित् ।
तह य असंखेजाणं उदीरणा समयपवद्धाणं ॥ ३२९ ॥
विपरीतं प्रतिहन्यते वीर्यादीनां च देशघातित्वम् ।
तथा च असंख्येयानामुदीरणा समयप्रवद्धानाम् ॥ ३२९ ॥

९२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-इसतरह वीर्यातराय आदिका देशघातीवन्ध होता था वह उलटा सर्वघातीरूप अनुभागबंध होनेलगा। उसके बाद हजारों स्थितिबन्ध होनेपर असंख्यात समयप्रवद्धकी उदीरणा होनेका अभाव हुआ ॥ ३२९ ॥ लोयाणमसंखेनं समयपवद्धस्स होदि पडिभागो। तत्तियमेत्तद्दवस्सुदीरणा वट्टदे तत्तो ॥ ३३० ॥ लोकानामसंख्येयं समयप्रवद्धस्य भवति प्रतिभागः । तावन्मानद्रव्यस्योदीरणा वर्तते ततः ॥ ३३० ।। अर्थ-अब असंख्यातलोकका भागहार समयप्रवद्धको हुआ इसलिये असंख्यात समय प्रबद्धोंकी उदीरणाका नाश होकर अव एक समयप्रवद्धके असंख्यातवें भागमात्र द्रव्यकी उदीरणा होनेलगी ॥ ३३० ।। तकाले मोहणियं तीसीयं वीसियं च वेयणियं । मोहं वीसिय तीसिय वेयणिय कम हवे तत्तो ॥ ३३१॥ तत्काले मोहनीयं तीसियं वीसियं च वेदनीयम् । मोहं वीसियं तीसियं वेदनीयं क्रमं भवेत् ततः ।। ३३१ ।। अर्थ-उस असंख्यात लोकमात्र भागहार संभव होनेके समयमें मोहका सबसे थोड़ा पल्यका असंख्यातवां भागमात्र, उससे असंख्यातगुणा तीन घातियाओंका, उससे असंख्या- तगुणा नामगोत्रका, उससे साधिक वेदनीयका स्थितिबन्ध होता है। उससे परे संख्यात- हजार स्थितिबन्ध जानेपर मोहका थोड़ा पल्यके असंख्यातवें भागमात्र, उससे असंख्यात- गुणा नामगोत्रका, उससे विशेष अधिक तीन घातियाओंका, उससे विशेष अधिक वेदनी- यका स्थितिबन्ध होता है ॥ ३३१ ॥ मोहं वीसिय तीसिय तो वीसिय मोहतीसयाण कम। वीसिय तीसिय मोहं अप्पाबहुगं तु अविरुद्धं ॥ ३३२ ।। मोहं वीसियं तीसियं ततो वीसियं मोहतीसियानां क्रमं । वीसियं तीसियं मोहं अल्पवहुकं तु अविरुद्धम् ।। ३३२ ।। अर्थ-उसके वाद संख्यातहजार स्थितिबन्ध जानेपर सबसे थोड़ा मोहका उससे असं- ख्यातगुणा नामगोत्रका उससे विशेष अधिक तीन घातिया और वेदनीयका स्थितिबन्ध होता है । उसके वाद संख्यातहजार स्थितिवन्ध जानेपर सबसे थोड़ा नामगोत्रका पल्यके असंख्यातवें भागमात्र उससे विशेष अधिक मोहका उससे विशेष अधिक तीन घातिया और वेदनीयका स्थितिवन्ध होता है। उसके वाद संख्यातहजार स्थितिवन्ध वीतनेपर

लब्धिसारः।
थोड़ा नामगोत्रका, उससे विशेष अधिक तीन घातिया और वेदनीयका उससे तीसरा भाग
अधिक मोहका स्थितिबन्ध होता है ।। ३३२ ।।
कमकरणविणट्टादो उवरिट्टबिदा बिसेसअहियाओ।
सबासि तण्णद्धे हेट्ठा सबासु अहियकर्म ॥ ३३३ ॥
क्रमकरणविनाशात् उपरि स्थिता विशेषाधिकाः ।
सर्वासां तदद्धायां अधस्तना सर्वासु अधिकक्रम ॥ ३३३ ॥
अर्थ-क्रमकरण विनाशकालसे ऊपर अर्थात् उस कालके अन्तमें पल्यका असंख्या-
तवां भागमात्र स्थितिवन्ध होनेके बाद उत्तरकालमें सब कर्मोंके स्थितिबन्धोंमें पूर्वस्थिति-
वन्धसे उत्तर स्थितिबन्ध विशेष अधिक है। और उस क्रमकरणकालकी आदिमें असंख्या-
तवर्षमात्र स्थितिवन्धसे पहले संख्यातहजार वर्षप्रमाण स्थितिवन्धपर्यंत आयु विना सात
कर्मोंका स्थितिबन्ध होता है वह भी पूर्वस्थितिबन्धसे आगेका स्थितिबन्ध अधिकक्रम लिये
होता है ॥ ३३३ ॥
जत्तोपाये होदि हु असंखवस्सप्पमाणठिदिवंधो।
तत्तोपाये अण्णं ठिदिवंधमसंखगुणियकर्म ॥ ३३४ ॥
यदुत्पादे भवति हि असंख्यवर्पप्रमाणस्थितिबंधः ।
तदुपायेन अन्यं स्थितिवंधमसंख्यगुणितक्रमम् ॥ ३३४ ॥
अर्थ-जहांसे लेकर नाम गोत्रादिकोंका असंख्यातवर्षमात्र स्थितिवन्धका प्रारंम हुआ
वहाँसे लेकर जो पहला पहला स्थितिबन्ध है उससे पिछला पिछला अन्य स्थितिबन्ध हुआ
वह असंख्यातगुणा है ऐसा क्रम जानना ॥ ३३४ ॥
एवं पल्लासंखं संखं भागं च होइ बंधेण ।
एतोपाये अण्णं ठिदिबंधो संखगुणियकर्म ॥ ३३५ ।।
एवं पल्यासंख्यं संख्यं भागं च भवति वंधेन ।
एतनुपायेन अन्यः स्थितिवंधः संख्यगुणितक्रमः ॥ ३३५ ॥
अर्थ-इसतरह यथासम्भव हीन अधिक प्रमाण लिये पल्यका असंख्यातवां भागमात्र
स्थितिबन्ध वढता क्रम लिये है वहां सवसे पीछे एक कालमें सातोंकाँका स्थितिवन्ध
पत्यके असंख्यातवें भागमात्र ही कहा है। उसके बाद अन्यस्थितिवन्ध होता है वह
सातोंकर्मोंका संख्यातगुणा ही है ॥ ३३५ ।।
मोहस्स य ठिदिवंधो पल्ले जादे तदा दु परिवड्डी ।
पल्लस्स संखभाग इगिविगलासण्णिबंधसमं ॥३३६ ॥

९४. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मोहस्य च स्थितिबंधः पल्ये जाते तदा तु परिवृद्धिः । पल्यस्य संख्यभागं एकविकलासंज्ञिवंधसमम् ॥ ३३६ ॥ अर्थ-जब मोहका स्थितिबन्ध पल्यमात्र होजावे तव आगेके स्थितिवन्धमें वृद्धि होती है। एक एक स्थितिवन्धोत्सरणमें पल्यका संख्यातवां भागमात्र स्थिति बढती है । इसतरह प्रत्येक संख्यात हजार स्थितिबन्ध होके क्रमसे एकेंद्री दो इंद्री तेइंद्री चौइंद्री और असंज्ञी पञ्चेद्रीके स्थितिबन्धके समान स्थितिवन्ध होता है ॥ ३३६ ॥ मोहस्स पल्लचंधे तीसदुगे तत्तिपादमद्धं च । दुति चऊ सत्तभागा वीसतिये एयवियलठिदी ॥ ३३७ ।। मोहस्य पल्यवंधे त्रिंशद्विके तत्रिपादमध च । द्वि त्रि चतुः सप्त भागा वीसत्रिके एकविकलस्थितिः ॥ ३३७ ॥ अर्थ-जब मोहका स्थितिवन्ध पल्यमात्र हुआ तब तीसियाओंका पल्यका तीन चौथा- भागमात्र, वीसियाओंका आधापल्यमात्र स्थितिवन्ध होता है। जहां एकेंद्री समान बन्ध हुआ वहां मोहका सागरके चार सातभागमात्र, तीसियाओंका सागरके तीन सातवांमाग- मात्र वीसियाओंका सागरके दो सातवां भागमात्र स्थितिबन्ध जानना । और दो इंद्री ते- इंद्री चौइंद्री असंज्ञी समान जहां स्थितिबन्ध हुआ वहां क्रमसे एकेंद्री समान वन्धसे पञ्ची- सगुणा पचासगुणा सौगुणा हजारगुणा जानना ॥ ३३७ ॥ तत्तो अणियट्टिस्स य अंतं पत्तो हु तत्थ उदधीणं । लक्षपुधत्तं बंधो से काले पुचकरणो हु ॥ ३३८ ॥ तत अनिवृत्तेश्च अंतं प्राप्तो हि तत्र उद्धीनाम् । लक्ष्यपृथक्त्वं बंधः स्खे काले अपूर्वकरणो हि ॥ ३३८ ॥ अर्थ-उसके वाद असंज्ञीसमान बन्धसे परे संख्यातहजार स्थितिबन्धोत्सरण होनेपर उतरनेवाला अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयको प्राप्त होता है। वहां मोह वीसिय तीसियोंका क्रमसे पृथक्त्वलक्षसागरोंका चार सातवां भाग, तीन सातवां भाग और दो सातवां भाग- मात्र स्थितिबन्ध होता है। उसके बादके समयमें उतरनेवाला अपूर्वकरण होता है ॥३३८॥ उवसामणा णिधत्ती णिकाचणुग्घाडिदाणि तत्थेव । चदुतीसढुगाणं च य बंधो अद्धापवत्तो य ॥ ३३९ ॥ उपशामना निधत्तिः निकाचना उद्घाटितानि तत्रैव । चतुस्त्रिंशद्विकानां च च बंधो अधाप्रवृत्तं च ॥ ३३९ ॥ अर्थ-उसके प्रथमसमयसे लेकर अप्रशस्त उपशमकरण निधत्तिकरण और निकाचन- करण-इनको प्रगट करता है । और अपूर्वकरणकालके सातभागोंमेंसे पहले भागमें हास्या- . . लन्धिसारः। ९५ दि चारका दूसरे भागमें तीर्थंकरादि तीस प्रकृतियोंका छठे भागके - अन्तसमयसे लेकर निद्रा प्रचलारूप दोका बंध होता है । उसके वादके समयमें उतरकर अप्रमत्तगुणस्थानमें अधःकरण परिणामको प्राप्त होता है ।। ३३९ ।। पढमो अधापवत्तो गुणसेढिमवद्विदं पुराणादो। संखगुणं तच्चंतोमुहुत्तमेत्तं करेदी हु ॥ ३४० ॥ प्रथमो अधाप्रवृत्तः गुणश्रेणिमवस्थितां पुराणात् । संख्यगुणं तच्च अंतर्मुहूर्तमानं करोति हि ॥ ३४० ॥ अर्थ-उसके प्रथमसमयमें उतरनेवाला अपूर्वकरणके अन्तसमयमें जितना द्रव्य अप- कर्षण किया था उससे असंख्यातगुणा कम द्रव्यको अपकर्षणकर गुणश्रेणी करता है। जिसका सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयमें आरंभ हुआ था ऐसे पुराने गुणश्रेणी आयामसे संख्यातगुणा है तौभी इसका अवस्थित आयाम अन्तर्मुहूर्त जानना ॥ ३४० ।। ओदरसुहुमादीदो अपुवचरिमोत्ति गलिदसेसे व। गुणसेढी णिक्खेवो सट्टाणे होदि तिट्ठाणं ॥ ३४१ ॥ अवतरसूक्ष्मादितो अपूर्वचरम इति गलितशेषो वा। गुणश्रेणी निक्षेपः स्वस्थाने भवति त्रिस्थानं ।। ३४१ ।। अर्थ-उतरनेवाले सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयसे लेकर अपूर्वकरणके अन्तसमयतक ज्ञानावरणादिका गुणश्रेणी आयाम गलितावशेष है अवस्थित नहीं है । क्यों कि तीन स्थानों- में वढकर अवस्थित गुणश्रेणी आयाम होता है ॥ ३४१ ॥ सट्टाणे तावदियं संखगुणूणं तु उवरि चडमाणे विरदाविरदाहिमुहे संखेजगुणं तदो तिविहं ॥ ३४२ ॥ स्वस्थाने तावत्कं संख्यगुणोनं तु उपरि चटमाने । विरताविरतामिमुखे संख्येयगुणं ततः त्रिविधं ।। ३४२ ॥ अर्थ-खस्थान संयत होनेमें वृद्धि हानि रहित अवस्थित गुणश्रेणी आयाम करता है। वही जीव विरताविरतरूप पांचवें गुणस्थानके सन्मुख होवे तो संक्लेशताकर पूर्वगुणश्रेणी आयामसे संख्यातगुणा.वढता गुणश्रेणी आयाम करता है । और पलटकर उपशम वा क्षप- कश्रेणी चढने सन्मुख होवे तो विशुद्धपनेकर उस गुणश्रेणी आयामसे संख्यातगुणा घटता गुणश्रेणी आयाम करता है । इसप्रकार स्वस्थानसंयमीके गुणश्रेणीकी वृद्धि हानि अवस्थित- रूप तीन स्थान कहे हैं ॥ ३४२ ॥ करणे अधापवत्ते अधापवत्तो दु संकमो जादो। विज्झादमवंधाणे.णटो गुणसंकमो तत्थ ।। ३४३ ॥ ।

९६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
करणे अधःप्रवृत्ते अधःप्रवृत्तस्तु संक्रमो जातः ।
विध्यातमबंधने नष्टो गुणसंक्रमस्तत्र ॥ ३४३ ।।
अर्थ-उतरनेवाले अधःप्रवृत्तकरणमें जिन प्रकृतियोंका वंध पायाजाता है उनका तो
अधःप्रवृत्त संक्रम होगया और जिनका बन्ध नहीं पायाजावे उनके विध्यात संक्रम होता
है । गुणसंक्रमका नाश ही होजाता है ॥ ३४३ ॥
चडणोदरकालादो पुचादो पुत्वगोत्ति संखगुणं ।
कालं अधापवत्तं पालदि सो उवसमं सम्मं ॥ ३४४ ॥
चटनावतरकालतो अपूर्वात् अपूर्वक इति संख्यगुणं ।
कालं अधःप्रवृत्तं पालयति स उपशमं सम्यम् ॥ ३४४ ॥
अर्थ-द्वितीयोपशम सम्यक्त्वसहित जीव चढते अपूर्वकरणके प्रथमसमयसे लेकर उत-
रते अपूर्वकरणके अन्तसमयतक जितना काल हुआ उससे संख्यातगुणा ऐसा अन्तर्मुहूर्त-
मात्र द्वितीयोपशमसम्यक्त्वका काल है इसकालतक अधःप्रवृत्त करण सहित इस द्वितीयो.
पशम सम्यक्त्वको पालता है ॥ ३४४ ॥
तस्सम्मत्तद्धाए असंजमं देससंजमं वापि ।
गच्छेजावलिछके सेसे सासणगुणं वापि ॥ ३४५ ॥
तत्सम्यक्त्वाद्धायां असंयम देशसंयम वापि । .
गत्वावलिषट्वे शेपे सासनगुणं वापि ॥ ३४५ ॥
अर्थ-उसी द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके कालमें अधःप्रवृत्तकरण कालको समाप्त कर
अप्रत्याख्यानके उदयसे असंयमको प्राप्त होता है, अथवा प्रत्याख्यानके उदयसे देशसंयत
गुणस्थानको प्राप्त होता है अथवा वहां असंयतकालके छह आवलि शेष रहनेपर अनन्ता-
नुबन्धी क्रोधादिमें किसी एकके उदयसे सासादन गुणस्थानको भी प्राप्त होता है ॥३४५॥
जदि मरदि सासणो सो णिरयतिरक्खं णरंण गच्छेदि ।
णियमा देवं गच्छदि जइवसहमुणिंदवयणेण ॥ ३४६ ॥
यदि म्रियते सासनः स निरयतिर्यचं नरं न गच्छति ।
नियमात् देवं गच्छति यतिवृषभमुनींद्रवचनेन ॥ ३४६ ॥
अर्थ-उपशमश्रेणीसे उतरा वह सासादन जीव जो आयुनाश होनेसे मरे तो नारक-
तिथंच और मनुष्यगतिको नहीं प्राप्त होता लेकिन देवगतिमें नियमसे जाता है ऐसा
कषाय प्राभृतनामा दूसरे महाधवलशास्त्रमें यतिवृषभनामा आचार्यने कहा है ॥ ३४६ ॥
णरयतिरिक्खणराउगसत्तो सको ण मोहमुवसमिदं ।
तम्हा .तिसुवि गदीसु ण तस्स उप्पजणं होदि ॥ ३४७ ॥

लब्धिसार। नरकतिर्यग्नरायुप्कसत्त्वः शक्यो न मोहमुपशमयितुम् । तस्मात् त्रिष्वपि गतिपु न तस्य उत्पादो भवति ॥ ३४७ ॥ अर्थ-नारक तिर्यंच मनुष्य आयुके सत्त्व सहित जीव चारित्रमोहके उपशमानेको समर्थ नहीं है इसलिये उपशम श्रेणीसे उतरे सासादनके देवगतिके विना अन्य तीन गतियोंमें उपजना नहीं होता । पहले जिसके आयु बंधा हो उसी सासादनका मरण होता है अवद्धायुका नहीं होता ॥ ३४७ ॥ उवसमसेढीदो पुण ओदिण्णो सासणं ण पापुणदि । भूदवलिणाहणिम्मलसुत्तस्स फुडोवदेसेण ॥ ३४८ ।। उपशमश्रेणीतः पुनरवतीर्णः सासनं. न प्राप्नोति । भूतबलिनाथनिर्मलसूत्रस्य स्फुटोपदेशेन ॥ ३४८ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणीसे उतरा हुआ जीव सासादनको नहीं प्राप्त होता क्योंकि पूर्व अनन्तानुवन्धीका विसंयोजनकर उपशमश्रेणी चढा है इसलिये उसके अनन्तानुवन्धीका उदय नहीं संभव होता। इसप्रकार भूतवलि मुनिनाथके कहे हुए महाकर्मप्रकृति प्राभृत नामा पहले धवल शास्त्रमें पूर्वापर विरोधरहित निर्मल प्रगट उपदेश है । उसीसे हमने भी निश्चय किया है ॥ ३४८॥ आगे उपशमश्रेणी चढनेवाले वारहप्रकारके जीव हैं उनकी क्रिया विशेषता कहते हैं- पुंकोधोदयचलियस्सेसाह परूवणा हु पुंमाणे । मायालोमे चलिदस्सस्थि विसेसं तु पत्तेयं ॥ ३४९ ॥ पुंक्रोधोदयचटितस्य शेपा अथ प्ररूपणा हि घुमाने । मायालोमे चटितस्यास्ति विशेषं तु प्रत्येकम् ॥ ३४९ ।। अर्थ-पूर्व कहीं सर्व प्ररूपणा वे पुरुषवेद और क्रोधकषाय सहित उपशम श्रेणी चढ- नेवाले जीवकी कहीं हैं और पुरुषवेद संज्वलन मान व माया व लोमसहित उपशमश्रेणी चढनेवालोंके क्रियाविशेष है । वही आगे कहते हैं ।। ३४९ ॥ दोण्हं तिण्ह चउण्ह कोहादीणं तु पढमठिदिमित्तं । माणस्स य मायाए वादरलोहस्स पढमठिदी ॥ ३५० ॥ द्वयोः त्रयाणां चतुर्णा क्रोधादीनां तु प्रथमस्थितिमात्रम् । मानस्य च मायाया वादरलोभस्य प्रथमस्थितिः ॥ ३५० ।। अर्थ-कोधके उदयसहित श्रेणी चढनेवाले के क्रमसे चारों कषायोंका उदय होता है, मानसहित चढनेवालेके क्रोधके विना तीनका ही उदय है, मायासहित चढनेवालेके माया ल, सा.१३ ९८ . . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । लोभ-इन दोनोंका उदय है, लोभसहित चढनेवालेके केवल लोभका ही उदय होता है इसलिये पूर्वोक्तप्रकार प्रथमस्थिति कही है । और चारोंमें किसी कपायके उदयसहित चढे सब जीवोंके सूक्ष्मलोभकी प्रथमस्थिति समान है उनके नपुंसक स्त्रीवेद सातनोकषायोंका उपशमनकाल समान है ।। ३५० ।। जस्सुदयेणारूढो सेढिं तस्सेव ठविदि पढमठिदी। सेसाणावलिमत्तं मोत्तूण करेदि अंतरं णियमा ।। ३५१ ॥ यस्योदयेनारूढो श्रेणिं तस्यैव स्थापयति प्रथमस्थितिः । शेपाणामावलिमात्रं मुक्त्वा करोति अंतरं नियमात् ॥ ३५१ ।। अर्थ-जिस वेद या कषायके उदयकर जीव श्रेणी चढा हो उसकी अन्तर्मुहूर्तमात्र प्रथमस्थिति स्थापन करता है और उदयरहित वेद या कपायोंकी आवलिमान स्थितिको छोड़ उसके ऊपरके निषेकोंका अन्तर करता है ॥ ३५१ ॥ जस्सुदएणारूढो सेटिं तकालपरिसमत्तीए । पढमहिदि करेदि हु अणंतरुवरुदयमोहस्स ॥ ३५२ ॥ यस्योदयेनारूढः श्रेणिं तत्कालपरिसमाप्तौ । प्रथमस्थितिं करोति हि अनंतरोपर्युदयमोहस्य ॥ ३५२ ।। अर्थ-जिस कषायके उदयसहितश्रेणी चढा है उस कपायकी प्रथमस्थिति समाप्त होने- पर उसके अनन्तरवर्ती कषायकी प्रथमस्थिति करता है। भावार्थ-क्रोधसहितश्रेणी चढे जीवके क्रोधकी प्रथमस्थितिका काल पूर्ण हुए वाद मानकी प्रथमस्थिति होती है इसीप्रकार आगे मायादिककी जानना । इसीतरह मान वगैर सहित चढे जीवमें जानना ॥ ३५२ ॥ माणोदएण चडिदो कोहं उवसमदि कोहअद्धाए । मायोदएण चडिदो कोहं माणं सगद्धाए ॥ ३५३ ॥ मानोदयेन चटितः क्रोधं उपशमयति क्रोधाद्धायाम् । मायोदयेन चटितः क्रोधं मानं स्वकाद्धायाम् ॥ ३५३ ॥ अर्थ-क्रोधके उदयकालमें ही मानके उदय सहित चढा जीव उदय रहित तीन को- धोंको उपशमाता है । उसीतरह मायाके उदय सहित चढा हुआ जीव उदय रहित तीन क्रोधोंको और तीन मानोंको अपने २ कालमें उपशमाता है ॥ ३५३ ॥ लोभोदएण चडिदो कोहं माणं च मायामुवसमदि। . अप्पप्पण अद्धाणे ताणं पढमहिदी णत्थि ॥ ३५४ ॥ लोभोदयेन चटितः क्रोधं मानं च मायामुपशाम्यति । आत्मात्मनो अध्वाने तेषां प्रथमस्थितिनास्ति ॥ ३५४ ।।

, लब्धिसारः। 'अर्थ-लोभके उदय सहित चढा जीव अपने २ कालमें उदय रहित तीन क्रोध तीन मान तीन मायाओंको क्रमसे उपशमाता है उन क्रोधादिक्रोंकी प्रथमस्थितीका अभाव है, क्योंकि लोभसहित चढे हुएके क्रोधादिका उदय नहीं पाया जाता ॥ ३५४ ॥ माणोदयचडपडिदो कोहोदयमाणमेत्तमाणुदओ। माणतियाणं सेसे सेससमं कुणदि गुणसेढी ।। ३५५ ।। मानोदयचटपतितः क्रोधोदयमानमात्रमानोदयः। मानत्रयाणां शेषे शेपसमं करोति गुणश्रेणी ॥ ३५५॥ अर्थ-मानके उदयसहित श्रेणी चढ पड़ा जो जीव उसके क्रोध मानका उदयकाल मिलाया हुआ जितना हो उतना मानका उदयकाल है। और मान माया लोमसहित चढ- कर पड़ा जीव क्रमसे मान माया लोभके द्रव्यको अपकर्षणकर ज्ञानावरणादिकोंकी गुणश्रेणी आयामके समान गलितावशेप आयामकर गुणश्रेणी आयाम करता है || ३५५ ॥ माणादितियाणुदये चडपडिये सगसगुदयसंपत्ते । . णव छत्ति कसायाणं गलिदवसेसं करेदि गुणसेटिं ॥ ३५६ ॥ मानादित्रयाणामुदये चटपतिते स्वकस्वकोदयसंप्राप्ते । नव पट् त्रिकपायाणां गलितावशेपं करोति गुणश्रेणिम् ॥ ३५६ ॥ . अर्थ- मान माया लोभके उदयसहित चढके पड़ा हुआ जीव अपनी २ कपायके उदयको प्राप्त हुए क्रमसे नवकपायोंकी, छहकपायोंकी और तीन कषायोंकी पूर्वोक्त रीतिसे गलि- तावशेप आयामलिये गुणश्रेणी करता है || ३५६ ॥ जस्सुदएण य चडिदो तम्हि य उक्कट्टियम्हि पडिऊण । अंतरमारेदि हु एवं पुरिसोदए चडिदो ॥ ३५७ ॥ यस्योदयेन च चटितः तस्मिंश्च अपकर्पिते पतित्वा । अंतरमापूरयति हि एवं पुरुपोदये चटितः ॥ ३५७ ।। अर्थ-जिस कषायके उदय सहित चढके पड़ा हो उसी कपायके द्रव्यका अपकर्षण होनेपर अन्तरको पूरता है अर्थात् नष्ट किये निषेकोंका सद्भाव करता है । इसीप्रकार पुरु- पवेद सहित क्रोधादि युक्त श्रेणी चढने उतरनेका व्याख्यान जानना ॥ ३५७ ॥ थी उदयस्स य एवं अवगदवेदो हु सत्तकम्मसे। सममुवसामदि संडस्सुदए चडिदस्स बोच्छामि ॥ ३५८ ॥ स्त्री उदयस्य च एवं अपगतवेदो हि सप्तकाशान् शममुपशमयति पंढस्योदये चटितस्य वक्ष्यामि ॥ ३५८ ।। .

१०० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-स्त्रीवेदयुक्त क्रोधादिकोंके उदय सहित श्रेणी चढे चार प्रकारके जीव हैं । वे वेद उदयरहित हुए पुरुषवेद और छह हास्यादि-इस तरह सात नोकपायोंको एकसाथ उपश- माते हैं । अब नपुंसकवेदके उदयसहित श्रेणी चढे हुएके विशेषता कहते हैं ॥ ३५८ ॥ संदृदयंतरकरणो संढद्धाणम्हि अणुवसंतेसे । इत्थिस्स य अद्धाए संढं इत्थिं च समगमुवसमदि ॥ ३५९ ।। पंढोदयांतरकरणः पंढाद्धायां अनुपशांतांशे । स्त्रियः च अद्धायां पंढं स्त्री च समकमुपशमयति ॥ ३५९ ॥ अर्थ-वे चारप्रकारके जीव नपुंसकवेदका अन्तर करते हुए नपुंसक वेदके कालमें नपुंसकवेदका उपशम समाप्त न हुआ हो तबतक स्त्रीवेद नपुंसकवेद इनदोनोंका एकसाथ उपशम करता है । वहांपर पुरुषवेद सहित चढे जीवके स्त्रीवेदके उपशम करनेके कालको प्राप्त होकर ॥ ३५९ ॥ ताहे चरिमसवेदो अवगदवेदो हु सत्तकम्मंसे । सममुवसामदि सेसा पुरिसोदयचलिदभंगा हु ॥ ३६० ॥ तस्मिन् चरमसवेदो अपगतवेदो हि सप्तकर्माशान् । सममुपशमयति शेषाः पुरुपोदयचलितभङ्गा हि ॥ ३६० ॥ अर्थ-सवेद अवस्थाके अन्तसमयको प्राप्त हुआ स्त्रीवेद नपुंसकवेदके उपशमको एक- साथ समाप्त करता है । उसके बाद अपगतवेदी हुआ पुरुषवेद छह हास्यादि कपाय-इन सातोंको युगपत् उपशमाता है । अन्य सब पुरुषवेद सहित श्रेणी चढे जीवके समान विधान जानना ॥ ३६०॥ पुंकोहस्स य उदए चलपलिदे पुवदो अपुचोत्ति । एदिस्से अद्धाणं अप्पाबहुगं तु चोच्छामि ॥ ३६१ ॥ पुंक्रोधस्य च उदये चटपतितेऽपूर्वतो. अपूर्व इति । एतस्य अद्धानामल्पवहुकं तु वक्ष्यामि ॥ ३६१ ॥ अर्थ-पुरुषवेद और क्रोधकषायके उदय सहित चढकर पड़े जीवके आरोहक अपूर्व- करणके प्रथम समयसे लेकर अवरोहक अपूर्वकरणके अन्तसमय पर्यंतकालमें संभवते अल्प बहुत्वके स्थानोंको कहूंगा ॥ ३६१ ॥ अवरादो वरमहियं रसखंड कीरणस्स अद्धाणं । संखगुणं अवरद्विदिखंडस्सुकीरणो कालो ॥ ३६२ ॥ अवरात् वरमधिकं रसखंडोत्करणस्याध्वानम् । संख्यगुणं अवरस्थितिखंडस्योत्करणः कालः ॥ ३६२ ।।

लब्धिसार। १०१ अर्थ-जघन्य अनुभागकांडकोत्करणकाल सबसे थोड़ा है उससे अधिक उत्कृष्ट अनु- भागकांडकोस्करणकाल है। उससे संख्यातगुणा जघन्यस्थितिकांडकोत्करण काल है।।३६२॥ पडणजहण्णटिदिवंधद्धा तह अंतरस्स करणद्धा। जेटिदिवंधठिदीउकीरद्धा य अहियकमा ॥ ३६३ ॥ पतनजघन्यस्थितिबंधाद्धा तथा अंतरस्य करणाद्धा। ज्येष्ठस्थितिवंधस्थित्युत्करणाद्धा च अधिकक्रमाः ॥ ३६३ ।। अर्थ-अवरोहक अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें संभव मोहका जघन्यस्थितिबंधापस- रण काल विशेष अधिक है । उससे विशेष अधिक अन्तर करनेका काल है, उससे अधिक उत्कृष्टस्थितिबंधकाल है उससे अधिक उत्कृष्ट स्थितिकांडकोत्करणकाल है ॥ ३६३ ॥ सुहमतिमगुणसेढी उपसंतकसायगस्स गुणसेढी । पडिबदसुहुमद्धावि य तिण्णिवि संखेजगुणिदकमा ॥ ३६४ ॥ सूक्ष्मातिमगुणश्रेणी उपशांतकपायकस्य गुणश्रेणी । प्रतिपतत्सूक्ष्माद्धापि च तिस्रोपि संख्येयगुणितक्रमाः ।। ३६४ ॥ अर्थ-उससे संख्यातगुणा आरोहक सूक्ष्मसांपरायके अन्तसमयमें संभव ऐसा गलिता- वशेष गुणश्रेणी आयाम है । उससे संख्यातंगुणा उपशांतकपायके प्रथमसमयमें आरंभ किया गुणश्रेणी आयाम है। उससे संख्यातगुणा पड़नेवाला सूक्ष्मसांपरायका काल है ॥ ३६४ ॥ तग्गुणसेढी अहिया चलसुहुमो किहिउवसमद्धा य । सुहुमस्स य पढमठिदी तिषिणचि सरिसा विसेसहिया ॥ ३६५ ॥ तद्गुणश्रेणी अधिका चलसूक्ष्मः कृप्युपशमाद्धा च । सूक्ष्मस्य च प्रथमस्थितिः तिस्रोपि सहशा विशेषाधिकाः ३६५ ।। अर्थ-उससे पड़नेवाले सूक्ष्मसापरायके लोभका गुणश्रेणी आयाम आवलिमात्र विशे- पकर अधिक है, उससे सूक्ष्मकृष्टि उपशमानेका काल और सूक्ष्मसांपरायकी प्रथमस्थिति आयाम-ये तीनों आपसमें समान हैं तौभी अन्तर्मुहूर्तमात्र विशेषकर अधिक हैं ॥३६५॥ किट्टीकरणद्धहिया पडवादर लोभवेदगद्धा हु। संखगुणं तस्सेय तिलोहगुणसेढिणिक्खेओ ॥ ३६६ ॥ .. कृष्टिकरणाद्धाधिका पतद्वादरलोभवेदकाद्धा हि । संख्यगुणं तस्यैव त्रिलोभगुणश्रेणिनिक्षेपः ॥ ३६६ ।। अर्थ-उससे सूक्ष्मकृष्टि करनेका काल विशेष अधिक है १२ । उससे पड़नेवाले १०२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । -वादरसांपरायके वादरलोभवेदकका काल संख्यातगुणा है १३ ॥ उससे पड़नेवाले अनिवृ- त्तिकरणके तीनलोभकी गुणश्रेणीका आयाम आवलिमात्र अधिक है ।। ३६६ ॥ चडवादरलोहस्स य वेदगकालो य तस्स पढमठिदी। पडलोहवेदगद्धा तस्सेव य लोहपढमठिदी ॥ ३६७ ॥ चंटवादरलोभस्य च वेदककालश्च तस्य प्रथमस्थितिः । पतल्लोहवेदकाद्धा तस्यैव च लोभप्रथमस्थितिः ॥ ३६७ ।। अर्थ-उससे आरोहक अनिवृत्तिकरणके वादरलोभका वेदककाल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है १५ । उससे वादरलोभकी प्रथमस्थितिका आयाम विशेष अधिक है १६ । उससे पड़- नेवालेके बादरलोभका वेदककाल विशेष अधिक है १७ । उससे उतरनेवालेके लोभकी प्रथमस्थितिका आयाम आवलिमात्र अधिक १८ है ॥३६७ ॥ तम्मायावेदद्धा पडिवडछण्हपि खित्तगुणसेढी । तम्माणवेदगद्धा तस्स गवण्डंपि गुणसेढी ॥ ३६८ ॥ तन्मायावेदकाद्धा प्रतिपतत्पण्णामपि क्षिप्तगुणश्रेणी । तन्मानवेदकाद्धा तस्य नवानामपि गुणश्रेणी ॥ ३६८ ॥ अर्थ-उससे पड़नेवालेके मायावेदककाल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है १९ । उससे पड़. नेवाले माया वेदकके छह कषायोंका गुणश्रेणी आयाम आवलिकर अधिक है २० । उससे पड़नेवालेके मानवेदककाल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है २१ । उससे उसीके नौकपार्योंका गुणश्रेणी आयाम आवलिकर अधिक २२ है ॥ ३६८ ॥ चडमायावेदद्धा पढमहिदिमायउवसमद्धा य । चलमाणवेदगद्धा पढमहिदिमाणउवसमद्धा य ॥ ३६९ ॥ चटमायावेदाद्धा प्रथमस्थितिमायोपशमाद्धा च । चटमानवेदकाद्धा प्रथमस्थितिमानोपशमाद्धा च ॥ ३६९ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके मायावेदककाल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है २३ । उससे उसके मायाकी प्रथमस्थितिका आयाम उच्छिष्टावलिकर अधिक है २४ । उससे मायाके उपशमा. नेका काल समयकम आवलिमात्र अधिक है २५ । उससे चढनेवालेके मानवेदककाल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है २६ । उससे उसकी प्रथमस्थितिका आयाम आवलिमात्र अधिक है २७ । उससे. उसके मान उपशमानेका काल समयकम आवलिमात्र अधिक २८ है ॥ ३६९॥ कोहोवसामणद्धा छप्पुरिसित्थीण उवसमाणं च । खुहुभवगाहणं च य अहियकमा एकवीसपदा ॥ ३७० ॥ .

लब्धिसारः। क्रोधोपशामनाद्धा.पपुरुपत्रीणामुपशमानां च । क्षुद्भवगाहनं च च अधिकक्रमाणि,एकविंशपदानि ॥ ३७० ॥ अर्थ-उससे क्रोधके उपशमानेका काल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है २९ । उससे छह नोकपायके उपशमानेका काल विशेष. अधिक है ३० । उससे पुरुषवेदके उपशमानेका काल एकसमयकम दो आवलिकर अधिक है। उससे स्त्रीवेदके उपशमानेका काल अन्त- मुहूर्तकर अधिक है। उससे नपुंसकवेद उपशमानेका काल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है। उससे क्षुद्रभवका काल विशेष अधिक है वह एक श्वासके अठारवें भागमात्र है ॥३७०॥ इसतरह इक्कीसस्थान अधिक क्रम हैं । उवसंतद्धा दुगुणा तत्तो पुरिसरस कोहपढमठिदी। मोहोयसामणद्धा तिण्णिवि अहियकमा होति ॥ ३७१ ।। उपशांताद्धा द्विगुणा ततः पुरुपस्य क्रोधप्रथमस्थितिः । मोहोपशमनाद्धा त्रीण्यपि अधिकक्रमाणि भवति ।। ३७१ ॥ अर्थ -----उस क्षुद्रभवसे उपशांतकषायका काल दूना है । उससे पुरुषवेदकी प्रथमस्थि- तिका आयाम विशेष अधिक है। उससे संज्वलनकोधकी प्रथम स्थितिका आयाम कुछ कम त्रिभागमात्र अधिक है। उससे सर्व मोहनीयका उपशमनकाल कुछ अधिक है।३७१॥ पडणस्स असंखाणं समयपवद्धाणुदीरणाकालो। संखगुणो चडणस्स य तकालो होदि अहियो य ॥ ३७२ ॥ पतनस्यासंख्यानां समयप्रवद्धानामुदीरणाकालः । संख्यगुण: चटनस्य च तत्कालो भवस्यधिकश्च ।। ३७२ ।। अर्थ-उससे पड़नेवालेके असंख्यात समयप्रवद्धकी उदीरणा होनेका काल संख्यात- गुणा है । उससे चढनेवालेके असंख्यात समयप्रवद्धकी उदीरणा होनेका काल अन्तर्मुहूर्त- मात्र अधिक है ॥ ३७२ ॥ पडणाणियट्टियद्धा संखगुणा चडणगा विसेसहिया। पडमाणा पुचद्धा संखगुणा चडणगा अहिया ॥ ३७३ ।। पतनानिवृत्त्यद्धा संख्यगुणा चटनका विशेषाधिका । पतंत्योपूर्वाद्धाः संख्यगुणाः चटनका अधिकाः ।। ३७३ ॥ अर्थ-उससे पड़नेवालेके अनिवृत्तिकरणका काल संख्यातगुणा है । उससे चढनेवा- लेके अनिवृत्तिकरणकाल अन्तर्मुहूर्तमात्रकर अधिक है। उससे पड़नेवालेके अपूर्वकरणका काल संख्यातगुणा है। उससे चढनेवालेके अपूर्वकरणका काल अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है ॥ ३७३॥ .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
पडिवडवरगुणसेढी चढमाणापुचपढमगुणसेढी ।
अहियकमा उपसामगकोहस्स य वेदगद्धा हु ॥ ३७४ ।।
प्रतिपतद्वरगुणश्रेणी चटदपूर्वप्रथमगुणश्रेणी ।
अधिककमा उपशामकक्रोधस्य च वेदकाद्धा हि ।। ३७४ ।।
अर्थ--उससे पड़नेवालेके सूक्ष्मसांपरायके प्रथमसमयमें आरंभ किया उत्कृष्ट गुणश्रेणी
आयाम अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है । उससे चढनेवालेके अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें आरंम
हुआ उत्कृष्ट गुणश्रेणी आयाम अन्तर्मुहूर्तकर अधिक है । उससे चढनेवालेके क्रोधवेदक-
काल संख्यातगुणा है ॥ ३७४ ॥
संजदअधापवत्तगगुणसेढी दसणोवसंतद्धा।
चारितंतरिगठिदी दसणमोहंतरठिदीओ ॥ ३७५ ।।
संयताधःप्रवृत्तकगुणनेणी दर्शनोपशांताद्धा।
चारित्रांतरिकस्थितिः दर्शनमोहांतरस्थितिः ।। ३७५ ॥
अर्थ-उससे पड़नेवाले अप्रमत्तसंयमीके प्रथम समयमें किया गुणश्रेणी आयाम संख्या-
तगुणा है । उससे दर्शनमोहका उपशम अवस्थाका काल संख्यातगुणा है । उससे चारित्र-
मोहका अन्तर आयाम संख्यातगुणा है । उससे दर्शनमोहका अन्तर आयाम संख्यातगुणा
है ॥ ३७५ ॥
अवराजेट्टावाहा चडपडमोहस्स अवरठिदिबंधो।
चडपडतिपादिअवरद्विदिवंधत्तोमुहुत्तो य ॥ ३७६ ॥
अवराज्येष्ठाबाधा चटपतमोहस्य अवरस्थितिबंधः ।
चटपतत्रिघात्यवरस्थितिबंधातर्मुहूर्तश्च ॥ ३७६ ॥
अर्थ--उससे चढनेवालेके अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें संभव मोहके स्थितिबन्धकी
जघन्य आबाधा संख्यातगुणी है । उससे उतरनेवालेके अपूर्वकरणके अन्तसमयमें संभवती
सवकर्मोके स्थितिवन्धकी उत्कृष्ट आवाधा संख्यातगुणी है। उससे चढनेवालेके मोहका
जघन्यस्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे उतरनेवालेके मोहके जघन्यस्थितिबन्धका प्रमाण
संख्यातगुणा है । उससे चढनेवालेके सूक्ष्मसांपरायके अन्तसमयमें संभव ऐसा तीन घाति-
याओंका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे उतरनेवालेके तीन घातियाकर्मोंका
जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त संख्यातगुणा है वह एकस-
मयकम दो घड़ी प्रमाण जानना ॥ ३७६ ॥
चडमाणस्स य णामागोदजहण्णहिदीण बंधो य ।
तेरसपदासु कमसो संखेण य होंतिं गुणियकमा ॥ ३७७ ॥

लब्धिसारः। १०५ चटतः च नामगोत्रजघन्यस्थितीनां बंधश्च । त्रयोदशपदेपु क्रमशः संख्येन च भवंति गुणितक्रमाः ॥ ३७७ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके नामगोत्रका जघन्य स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है वह सोलह- मुहूर्त है । वह अपनी २ व्युच्छित्तिके अन्तसमयमें जानना । और वह तेरह स्थानों में क्रमसे संख्यातगुणा है ।। ३७७ ॥ चलतदियअवरबंधं पडणामागोदअवरठिदिवंधो । पडतदियस्स य अवरं तिण्णि पदा होंति अहियकमा ॥ ३७८ ॥ चटतृतीयावरवंधं पतन्नामगोत्रावरस्थितिवंधः । चटत्तृतीयस्य च अवरं त्रीणि पदानि भवंति अधिकक्रमाणि ।। ३७८ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके वेदनीयका जघन्यस्थितिबन्ध विशेष अधिक है वह चौवीस मुहूर्तमात्र है । उससे पड़नेवालेके नाम गोत्रका जघन्यवन्ध विशेष अधिक है वह बत्तीस- मुहूर्त है । उससे पड़नेवालेके वेदनीयका जघन्य स्थितिबन्ध विशेष अधिक है वह अड़ता- लीस मुहूर्तमान है ॥ ३७८ ॥ चडमायमाणकोहो मासादीदगुण अवरठिदिवंधो। पडणे ताणं दुगुणं सोलसवस्साणि चलणपुरिसस्स ॥ ३७९ ॥ चटमायामानक्रोधो मासादिद्विगुणोवरस्थितिबंधः । पतने तेपां द्विगुणं पोडशवर्षाणि चटनपुरुषस्य ॥ ३७९ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके संज्वलन मायाका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है वह एकमासमात्र है । उससे मानका जघन्यस्थितिवन्ध दूना है। उससे क्रोधका जघन्य स्थिति- बंध दूना है। और उतरनेवालेके उन्हीं मायादिकोंका जघन्यस्थितिवन्ध चढनेवालेसे दूना है। वह मायाका दो मास मानका चारमास क्रोधका आठमास जानना । चढनेवालेके पुरु- घवेदका जघन्य स्थितिबन्ध सोलह वर्षमात्र है ॥ ३७९ ॥ पडणस्स तस्स दुगुणं संजलणाणं तु तत्थ दुट्ठाणे । बत्तीसं चउसट्टी बस्सपमाणेण ठिदिवंधो ॥ ३८० ॥ पतनस्य तस्य द्विगुणं संज्वलनानां तु तत्र द्विस्थाने । द्वात्रिंशत् चतुःपष्ठिः वर्पप्रमाणेन स्थितिबंधः ॥ ३८० ।। अर्थ-पड़नेवालेके पुरुषवेदका जघन्य स्थितिबन्ध उससे दूना बत्तीस वर्ष है। और उसकालमें संज्वलन चौकड़ीका स्थितिबन्ध चढनेवालेके बत्तीस वर्ष उतरनेवालेके चौंसठव- र्घमात्र है ॥ ३८०॥ । ल.सा.१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चडपडणमोहपढम चरिमं तु तहा तिघादयादीणं । संखेजवस्सवंधो संखेजगुणकमो छण्हं ॥ ३८१ ॥ चटपतनमोहप्रथमं चरमं तु तथा निघातकादीनाम् । संख्येयवर्पवंधः संख्येयगुणक्रमः पण्णाम् ॥ ३८१ ।। अर्थ-चढनेवालेके मोहनीयका प्रथमस्थितिवन्ध संख्यातगुणा है । उससे उतरनेवा- लेके मोहका अन्तस्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे चढनेवालेके तीन घातियाओंका प्रथ- मस्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे उतरनेवालेके उनके अन्तका स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है । वह संख्यातहजार वर्षमात्र है ।। ३८१ ।। चडपडणमोहचरिमं पढमं तु तहा तिघादियादीणं । असंखेजवस्सबंधो संखेजगुणकमो छण्हं ॥ ३८२ ॥ चटपतनमोहचरमं प्रथमं तु तथा विघातकादीनाम् । असंख्येयवर्पवंधः संख्येयगुणक्रमः पण्णाम् ॥ ३८२ ।। अर्थ-उससे चढनेवालेके मोहनीयका असंख्यात वर्षमात्र अन्तस्थितिबन्ध है वह असं- ख्यातगुणा है । उससे उतरनेवालेके मोहका प्रथमस्थितिवन्ध असंख्यातगुणा है । उससे चढनेवालेके तीन घातियाओंका अन्तस्थितिवन्ध असंख्यातगुणा है । उससे उतरनेवालेके तीन धातियाओंका प्रथमस्थितिबन्ध असंख्यातगुणा है वह पल्यका असंख्यातवां भागमात्र है ॥ ३८२॥ चडणे णामदुगाणं पढमो पलिदोवमस्स संखेजो। भागो ठिदिस्स बंधो हेडिल्लादो असंखगुणो ॥ ३८३ ।। चटने नामद्विकयोः प्रथमः पलितोपमस्यासंख्येयः । भागः स्थितेर्वधो अधस्तनादसंख्यगुणः ॥ ३८३ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके नामगोत्रका पहला स्थितिवन्ध पल्यके असंख्यातवें भागमात्र है वह नीचेके तीनघातियाओंके स्थितिबन्धसे असंख्यातगुणा है ॥ ३८३ ।। तीसियचउण्ह पढमो पलिदोवमसंखभागठिदिवंधो। मोहस्सवि दोण्णि पदा विसेसअहियकमा होति ॥ ३८४ ॥ तीसियचतुर्णा प्रथमः पलितोपमासंख्यभागस्थितिबंधः । मोहस्यापि द्वे पदे विशेषाधिकक्रमा भवंति ॥ ३८४ ॥ अर्थ-उससे चढनेवालेके तीसियचतुष्कका प्रथम स्थितिबन्ध विशेष अधिक है वह भी पल्यके असंख्यातवें भागमात्र है। उससे चढनेवालेके मोहका चालीसियस्थितिबन्ध उसीके त्रिभागमात्र विशेषकर अधिक है ॥ ३८४ ॥ .

लब्धिसारः। ठिदिखंडयं तु चरिमं बंधोसरणद्विदी य पलद्धं । पल्लं चडपडवादरपढमो चरिमो य ठिदिवंधो ॥ ३८५ ॥ स्थितिखंडकं तु चरमं बंधापसरणस्थिती च पल्यार्ध । पल्यं चटपतद्वादरप्रथमः चरमञ्च स्थितिबंधः ।। ३८५ ॥ अर्थ-उससे अन्तका स्थितिखण्ड संख्यातगुणा है । उससे स्थितिवन्धापसरणोंकर उत्पन्न हुए पल्यके संख्यातवें भागप्रमाण स्थितिबन्ध वे सभी क्रमसे संख्यातगुणे हैं। उससे चढनेवालेके अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें सम्भव स्थितिवन्ध संख्यातगुणे हैं वे पृथ- क्वलक्षसागर प्रमाण हैं। उससे उतरनेवालेके अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें सम्भव स्थिति- वन्ध संख्यातगुणा है ।। ३८५ ॥ चडपडअपुच्चपढमो परिमो ठिदिवंधओ य पडणस्स । तचरिमं ठिदिसतं संखेज्जगुणकमा अट्ट ।। ३८६ ।। चटपतदपूर्वप्रथमः चरमः स्थितिबंधकश्च पतनस्य । तबरमं स्थितिसत्त्वं संख्येयगुणक्रम अष्ट ।। ३८६ ।। अर्थ-उससे चढनेवाले अपूर्वकरणके प्रथम समयमें स्थितिवन्ध संख्यातगुणा है वह अंतःकोटाकोटि सागर मात्र है । उससे पड़नेवाले अपूर्वकरणके अन्तसमयमें स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है । उससे पड़नेवालेके अपूर्वकरणके अंतसमयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है ।। ३८६ ॥ तप्पढमटिदिसंतं पडिवडअणियटिचरिमठिदिसत्तं । अहियकमा चलवादरपढमहिदिसतयं तु संखगुणं ॥ ३८७ ।। तत्प्रथमस्थितिसत्त्वं प्रतिपतदनिवृत्तिचरमस्थितिसत्त्वं । अधिकक्रमं चटवादरप्रथमस्थितिसत्त्वकं तु संख्यगुणम् ॥ ३८७ ।। अर्थ- उससे पड़नेवालेके अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है । उससे पड़नेवाले अनिवृत्ति करणके अंतसमयमें स्थितिसत्त्व एक समयकर अधिक है। उससे चढनेवाले अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है क्योंकि इसके अब भी अनिवृत्तिकरणके परिणामोंसे स्थितिसत्त्वका खंडन सम्भवता है ॥ ३८७ ॥ चडमाणअपुवस्स य चरिमहिदिसतयं विसेसहियं । तस्सेव य पढमछिदिसत्तं संखेजसंगुणियं ॥ ३८८ ॥ चटदपूर्वस्य च चरमस्थितिसत्त्वकं विशेषाधिकम् । तस्यैव च प्रथमस्थितिसत्त्वं संख्येयसंगुणितम् ॥ ३८८ ।।

१०८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-उससे चढनेवाले अपूर्वकरणके अन्तसमयमें स्थितिसत्त्वविशेष अधिक है, क्यों- कि उसके अन्तकांडककी अन्तफालिका प्रमाण पत्यक संख्यातवें भागमात्र सम्भवता है । उससे चढनेवाले अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है वह अन्तःकोटा- कोटि प्रमाण है, क्योंकि अपूर्वकरणके कालमें संख्यात हजार स्थितिकांडक होते हैं उनकर उसके प्रथमसमयमें जो स्थिति पाई जाती है उसका संख्यात बहुभागमात्र स्थितिका घात होता है, उसके अन्तसमयमें एकभागमात्र स्थिति रहती है और उस प्रथम समयवर्ती स्थितिसत्त्वसे पहले स्थितिकांडकका घात ही नहीं है इसलिये उसके अन्तसमयके स्थितिस- त्वसे प्रथमसमयवर्ती स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा जानना ॥ ३८८ ॥ इसतरह अल्पबहुत्व जानना। इसप्रकार श्रीनेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती विरचित लब्धिसारमै चारित्रलब्धि अधिकार- मेंसे क्षयोपशम व उपशमलब्धिका कहनेवाला दूसरा अधिकार समाप्त हुआ ॥ २ ॥ क्षायिकचारित्रका अधिकार ॥ ३॥ .. आगे माधवचंद्राचार्यविरचित संस्कृत क्षपणासारके अनुसारको लिये गाथाओंका व्याख्यान किया जाता है उसमें प्रथम मङ्गलाचरण भाषामें अनुवादित दिखलाते हैं। श्रीवरधर्मजलधिके नंदन रत्नाकरवर्धक सुखकार लोकप्रकाशक अतुल विमलप्रभु संतनिकरि सेवित गुनधार । माधववर बलभद्र नमितपदपद्मयुगल धारें विस्तार नेमिचंद्रजिन नेमिचंद्रगुरु चंद्र समान नमहं सो सार ॥१॥ अब चारित्रमोहकी क्षपणाका विधान कहते हैं। तिकरणमुभयोसरणं कमकरणं खवणदेसमंतरयं । संकम अपुष्वफहयकिट्टीकरणुभवण खमणाये ॥ ३८९ ॥ त्रिकरणमुभयापसरणं क्रमकरणं क्षपणं देशमंतरकम् । संक्रमं अपूर्वस्पर्धककृष्टिकरणानुभवनानि क्षपणायाम् ॥ ३८९ ।। अर्थ-अंधःकरण आदि तीन करण, बंधापसरण, सत्त्वापसरण, कमकरण, आठ कषाय सोलह प्रकृतियोंकी क्षपणा, देशघातिकरण, अंतरकरण, संक्रमण, अपूर्वस्पर्धककरण, कृष्टिकरण, कृष्टिअनुभवन-इसतरह ये चारित्रमोहकी क्षपणामें अधिकार जानने ॥३८२॥ उसके वाद ज्ञानावरणादि कर्मकी क्षपणाका अधिकार और योगनिरोध अधिकारका वर्णन किया जायगा। - लब्धिसारः। आगे चारित्र मोहकी क्षपणाके सन्मुख हुआ पहले अधःप्रवृत्तकरण करता है उसे कहते हैं- गुणसेढी गुणसंकम-ठिदिरसखंडाण पत्थि पढमम्हि । पडिसमयमणंतगुणं विसोहिवडीहिं वहृदि हु ॥ ३९० ॥. गुणश्रेणी गुणसंक्रमं स्थितिरसखंडनं नास्ति प्रथमे । प्रतिसमयमनंतगुणं विशुद्धिवृद्धिभिः वर्धते हि.॥ ३९० ॥ अर्थ-पहले अधःप्रवृत्तकरणमें गुणश्रेणी गुणसंक्रम स्थितिकांडकघात अनुभागकांडक घात-ये नहीं हैं। इसलिये वह जीव हर समय अनन्तगुणा क्रमलिये विशुद्धपनेकी वृद्धिकर वढता है ॥ ३९० ॥ सत्थाणमसत्थाणं चउविट्ठाणं रसं च बंधदि हु। पडिसमयमणंतेण य गुणभजियकमं तु रसबंधे ॥ ३९१ ॥ शस्तानामशस्तानां चतुरपि स्थानं रसं च वध्नाति हि । प्रतिसमयमनंतेन च गुणभजितक्रमं तु रसवंधे ॥ ३९१ ॥ अर्थ-वोही जीव हरसमय प्रशस्त प्रकृतियोंका अनन्तगुणा क्रमलियें चार स्थानिक अनुभागवन्ध करता है और अप्रशस्तप्रकृतियोंका अनन्तवां भागका क्रमलिये द्विस्थानिक अनुभागवन्ध करता है ॥ ३९१ ॥ पल्लस्स संखभागं मुहुत्ततेण ओसरदि बंधे। संखेजसहस्साणि य अधापयत्तम्हि ओसरणा ॥ ३९२ ।। पल्यस्य संख्यभागं मुहूर्तान्तरपसरति वंधे । संख्येयसहस्राणि च अधःप्रवृत्ते अपसरणानि ॥ ३९२ ॥ अर्थ-पूर्वस्थितिबन्धसे पल्यका संख्यातवां भागमात्र स्थितिवन्ध घटाके एक अन्तर्मु- हूर्तकालतक समयसमय समान बंध होवे वह एक स्थितिवन्धापसरण है । ऐसे संख्यातह- जार स्थितिवन्धापसरण अधःप्रवृत्तकरणमें होते हैं ॥ ३९२ ॥ १. "कसायखवणो ठाणे परिणामो केरिसो हवे । कसाय उवजोगो को लेस्सा वदो य को हवे ॥ "काणि वा पुब्बवन्धाणि के वा अंसेण बंधदि । कदियावलि पत्रिसंति कदिह वा पवेसगो ॥" "केदिये सेझीयदे पुव्वं वन्धेण उदयेण वा । अंतरं वा कहिं किचा के के संकामगो कहिं ॥" "केहिदीयाणि कम्माणि अणुभांगेसु केसु वा । उकहिण सेसाणि कं ठाणं पडिवज्जादि ।" इन चार सूत्रोंकर अधःप्रवृत्त. करणके विशेपजाननेके प्रश्न किये गये है उनका उत्तर बड़ी भाषामें दिखलाया है।'ये चार लोक दूसरे अन्य के मालूम होते हैं।

१११ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आदिमकरणद्धाए पढमहिदिवंधदो दु चरिमम्हि । संखेजगुणविहीणो ठिदिवंधो होदि णियमेण ॥ ३९३ ॥ आद्यकरणाद्धायां प्रथमस्थितिबंधतस्तु चरमे । संख्येयगुणविहीनः स्थितिबंधो भवति नियमेन ॥ ३९३ ॥ अर्थ-इसतरह स्थितिबन्धापसरण होनेसे पहले अधःप्रवृत्तकरण कालमें प्रथमसमयके स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा कम अन्तसमयमें स्थितिबन्ध नियमसे होता है ॥ ३९३ ॥ इस- तरह इस अधःकरणमें आवश्यक होते हैं। जिस जगह अन्य जीवके नीचेके समयवर्ती भावोंके समान अन्यजीवके ऊपर समयवर्ती भाव हों वह अधाप्रवृत्तकरण ऐसा सार्थक नाम है जानना। आगे अपूर्वकरणका वर्णन करते हैं- गुणसेढी गुणसंकम ठिदिखंडमसत्थगाण रसखंडं। विदियकरणादिसमए अण्णं ठिदिवंधमारवई ॥ ३९४ ॥ गुणश्रेणी गुणसंक्रमं स्थितिखंडमशस्तकानां रसखंडम् । द्वितीयकरणादिसमये अन्यं स्थितिबंधमारभते ॥ ३९४ ।। अर्थ-दूसरे अपूर्वकरणके पहलेसमयमें गुणश्रेणी गुणसंक्रम स्थितिखण्डन और अप्र- शस्त प्रकृतियोंका अनुभागखण्डन होता है । और अधःकरणके अन्तसमयमें जो स्थितिबंध होता था उससे पल्यका असंख्यातवां भाग घटता अन्य ही स्थितिबन्ध आरंभ करता है इसलिये यहां एक स्थितिबन्धापसरण होनेसे इतना स्थितिबन्ध घटाते हैं ॥ ३९४ ॥ गुणसेढीदीहत्तं अपुचचउक्कादु साहियं होदि । गंलिदवसेसे उदयावलिवाहिरदो दुणिक्खेओ ॥ ३९५ ॥ गुणश्रेणीदीर्घत्वं अपूर्वचतुष्कात् साधिकं भवति । गलितावशेषे उदयावलिबाह्यतस्तु निक्षेपः ॥ ३९५ ॥ अर्थ-यहांपर गुणश्रेणी आयामका प्रमाण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसापराय क्षीणकषाय-इन चार गुणस्थानोंके मिलाये हुए कालसे साधिक है । वह अधिकका प्रमाण क्षीणकषायके कालके संख्यातवें भागमात्र है । वह उदयावलिसे बाह्य गलितावशेषरूप गुण- श्रेणी आयाममें अपकर्षण किये द्रव्यका निक्षेपण होता है ॥ ३९५ ।। पडिसमयं उकट्टदि असंखगुणिदक्कमेण संचदि य । इदि गुणसेढीकरणं पडिसमयमपुत्वपढमादो ॥ ३९६ ॥ प्रतिसमयं अपकर्षति असंख्यगुणितक्रमेण संचिनोति च । इति गुणश्रेणीकरणं प्रतिसमयमपूर्वप्रथमात् ॥ ३९६ ।। । .

लब्धिसारः। १११ अर्थ-प्रथमसमयमें अपकर्षण किये द्रव्यसे द्वितीयादि समयोंमें असंख्यातगुणा क्रम- लिये समय समय प्रति द्रव्यको अपकर्पण करता है । और उदयावलिमें गुणश्रेणी आयो- ममें ऊपरकी स्थिति निक्षेपण करता है । इसतरह अपूर्वकरणके प्रथमसमयसे लेकर समय समय प्रति गुणश्रेणीका करना है। यह गुणश्रेणीका स्वरूप कहा ॥ ३९६ ॥ पडिसमयमसंखगुणं दवं संकमदि अप्पसत्थाणं । वधुज्झियपयडीणं बंधंतसजादिपयडीसु ॥ ३९७ ॥ प्रतिसमयमसंख्यगुणं द्रव्यं संक्रामति अप्रशस्तानाम् । वंघोज्झितप्रकृतीनां वध्यमानस्वजातिप्रकृतिषु ।। ३९७ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर जिनका यहां बन्ध नहीं पाया जाता ऐसी अप्रशस्तप्रकृतियोंका गुणसंक्रमण होता है वह समय समय प्रति असंख्यातगुणा क्रमलिये उन प्रकृतियोंका द्रव्य है वह बंध होनेवाली स्वजातिप्रकृतियोंमें संक्रमण करता है उसरूप परिणमता है। जैसे असातावेदनीका द्रव्य सातावेदनीयरूप होके परिणमता है । इसीतरह अन्य प्रकृतियोंका भी जानना ॥ ३९७ ॥ उबट्टणा जहण्णा आवलियाऊणिया तिभागेण । एसा ठिदिसु जहण्णा तहाणुभागे सणंतेसु ॥ ३९८ ॥ अतिस्थापना जघन्या आवलिकोनिका त्रिभागेन । एपा स्थितिपु जघन्या तथानुभागेप्वनंतेपु ।। ३९८ ॥ अर्थ-संक्रमणमें जघन्य अतिस्थापन अपने विभागकर कमती आवलिमात्र है यही जघन्यस्थिति है । उसीतरह अनन्त अनुभागोंमें भी जानना ।। ३९८ ।। संकामे दुकट्टदि जे असे ते अवहिदा होति । आवलियं से काले तेण परं होति भजियच्च ॥ ३९९॥ संक्रामे तु उत्कृप्यते ये अंशास्ते अवस्थिता भवति । आवलिका खे काले तेन परं भवंति भजितन्याः ॥ ३९९ ।। अर्थ-संक्रमणमें जो प्रकृतियोंके परमाणू उत्कर्षणरूप किये जाते हैं वे अपने कालमें आवलिपर्यंत तो अवस्थित ही रहते हैं उससे परे भजनीय हैं अर्थात् अवस्थित भी रहते हैं और स्थिति आदिकी वृद्धि हानिआदिरूप भी रहते हैं ।। ३९९ ।। उक्कदि जे अंसे से काले ते च होति भजियवा। बड्डीए अवठ्ठाणे हाणीए संकमे उदए ।। ४०० ॥ उत्कृष्यंते ये अंशाःखे काले ते च भवंति भजितव्याः। युद्धौ अवस्थाने हानौ संक्रमे उदये ।। ४०० ।। 6 ११२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । "! अर्थ-जो प्रकृतियोंके परमाणू अपकर्षण किये जाते हैं वे अपने कालमें भजनीय हैं । स्थित्यादिकी वृद्धि अवस्थान हानि संक्रमण और उदय इनरूप होवे भी और नहीं भी हो कुछ नियम नहीं है ॥ ४०० ॥ एकं च ठिदिविसेसं तु असंखेजेसु ठिदिविसेसेसु । बट्टेदि रहस्सेदि व तहाणुभागेमुणंतेसु ॥ १०१ ।। एकं च स्थितिविशेपं तु असंख्येयेपु स्थितिविशपेषु । वर्यते रहस्यते वा तथानुभागेष्वनंतेषु ॥ ४०१ ॥ अर्थ-एक स्थितिविशेष जो एक निपेकका द्रव्य वह असंख्यात निपेको निक्षेपण किया जाता है । उसीतरह अनंत अनुभागोंमें भी एक स्पर्धकका द्रव्य अनंत म्पर्धोंमें निक्षेपण किया जाता है ऐसा जानना ॥ ४०१ ॥ इस तरह गुणसंक्रमणका स्वरूप कहा। पल्लस्स संखभागं वरं पि अबरादु संखगुणिदं तु । पढमे अविखवगे ठिदिखंडपमाणयं होदि ॥ ४०२ ।। पल्यस्य संख्यभागं वरमपि अबरान संख्यगुणितं तु । प्रथमे अपूर्वक्षपके स्थितिखंडप्रमाणकं भवति ॥ ४०२ ।। अर्थ-क्षपक अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें स्थितिकांडक आयामका जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण पल्यके संख्यातवें भागमात्र है तो भी जघन्यते उत्कृष्ट संख्यातगुणा है॥ ४०२॥ आउगवजाणं ठिदिघादो पढमादु चरिमठिदिसंतो। ठिदिबंधों य अपुचे होदि हु संखेजगुणहीणो ॥ ४०३ ॥ आयुप्कवानां स्थितिघातः प्रथमान् चरमस्थितिसत्त्वम् । 'स्थितिबंधश्च अपूर्वे भवति हि संख्येयगुणहीनः ॥ ४०३ ॥ अर्थ-आयुके विना सातकर्मोंका स्थितिकांडक आयाम स्थितिसत्त्व और स्थितिबंध-ये तीनों अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें जो पाये जाते हैं उनसे उसके अंतसमयमें संख्यातगुणे कम होते हैं ॥ ४०३ ॥ अंतोकोडाकोडी अपुचपढमम्हि होदि ठिदिवंधो । बंधादो पुण सत्तं संखेजगुणं हवे तत्थ ॥ ४०४ ॥ अंतःकोटीकोटिः अपूर्वप्रथमे भवति स्थितिबंधः । वंधात् पुनः सत्त्वं संख्येयगुणं भवेत् तत्र ॥ ४०४ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें स्थितिबंध अंतःकोड़ाकोड़ी प्रमाण है वह पृथक्त्व ॥

लब्धिसारः। .. ११३ लक्ष्यफोडिसागर है । और वहां सत्त्व स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा है ॥ ४०४ ॥ इसतरह स्थितिकांडकका खरूप कहा। एकेकडिदिखंडयणियडणठिदिओसरणकाले । संखेजसहस्साणि य णिवडंति रसस्स खंडाणि ॥ ४०५ ॥ एकैकस्थितिखंडकनिपतनस्थित्युत्करणकाले । संख्येयसहस्राणि च निपतंति रसस्य खंडानि ।। ४०५ ॥ अर्थ-एक एक स्थिति खण्डघात जिसमें होवे ऐसे स्थितिकांडकोत्करणकालमें संख्यात- हजार अनुभागकांडकोंका घात होता है ।। ४०५ ॥ असुहाणं पयडीणं अणंतभागा रसस्स खंडाणि । सुहपयडीणं णियमा णस्थिति रसस्स खंडाणि ॥ ४०६ ॥ अशुभानां प्रकृतीनां अनंतभागा रसस्य खंडानि । शुभप्रकृतीनां नियमात् नास्तीति रसस्य खंडानि ।। ४०६ ॥ अर्थ-अशुभ प्रकृतियोंका अनंत बहुभागमात्र अनुभागकांडकका प्रमाण है और प्रश- त प्रकृतियोंका अनुभागखण्ड नियमसे नहीं होता क्योंकि विशुद्धपरिणामोंकर शुभप्रकृति- योंके अनुभागका घटाना संभव नहीं होता ॥ ४०६ ॥ इसप्रकार अनुभागखण्डका खरूप कहा। पढमे छठे चरिमे भागे दुग तीस चदुर वोछिण्णा। बंधेण अपुवस्स य से काले बादरो होदि ॥ ४०७ ॥ प्रथमे पट्टे चरमे भागे द्विकं त्रिंशत् चतस्रो व्युच्छिन्नाः । बंधेन अपूर्वस्य च स्वे काले बादरो भवति ॥ ४०७ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणके सात भागोंमेंसे पहले भागमें निद्रा प्रचला इन दो प्रकृतियोंकी बंधसे व्युच्छित्ति हुई । छठे भागमें देवगति आदि तीस प्रकृतियोंकी बंधन्युच्छित्ति हुई और इसके बाद संख्यातहजार स्थितिवन्ध होनेपर अपूर्वकरणके अंतसमयमें हास्यादि चार कर्मोंकी बंधसे व्युच्छित्ति होती है। यहांपर ही छह नोकषायोंके उदयकी व्युच्छित्ति होती है। जिस जगह ऊपर समयके भाव हमेशा नीचेके समयके भावोंके समान हों वह कर्म- नाश करनेवाला सार्थक नामका धारक अपूर्वकरण जानना । उसके बाद अपने कालमें अनिवृत्तिकरण होता है ॥ ४०७ ॥ आगे उस अनिवृत्तिकरणका खरूप कहते हैं। अणियहस्स य पढमे अण्णं ठिदिखंडपहुदिमारवई । उवसामणा णिवत्ती णिकाचणा तत्थ वोछिण्णा ॥४०८ ।। ल, सा.१५ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अनिवृत्तेश्च प्रथमे अन्य स्थितिखंडप्रभृतिमारभते । उपशामना निधत्तिः निकाचना तत्र व्युच्छिन्नाः ॥ ४०८॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें अन्य ही स्थितिखण्डादिक प्रारंभ किये जाते हैं, उस घातके वाद शेष रहे अनुभागका अनंत बहुभागमात्र अन्य ही अनुभागकांडक होता है और अपूर्वकरणके अंतसमयके स्थितिबन्धसे पल्यका संख्यातवां भागमात्र घटता अन्य ही स्थितिबन्ध होता है। यहांपर ही अप्रशस्त उपशम निधत्ति निकाचना इन तीन करणों- की व्युच्छित्ति होती है । सव ही कर्म उदय संक्रमण उत्कर्षण अपकर्षण करने योग्य होते हैं ॥ ४०८ ॥ वादरपढमे पढमं ठिदिखंडं विसरिसं तु विदियादि । ठिदिखंडयं समाणं सबस्स समाणकालम्हि ॥ ४०९ ॥ वादरप्रथमे प्रथमं स्थितिखंडं विसदृशं तु द्वितीयादि । स्थितिखंडकं समानं सर्वस्य समानकाले ॥ ४०९ ।। अर्थ-अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें पहला स्थितिखंड विसदृश है और द्वितीयादि- स्थितिखंड हैं वे समानकालमें सब जीवोंके समान हैं अर्थात् जिनको अनिवृत्तिकरण आरं- भकिये समान काल हुआ उनके परस्पर द्वितीयादि स्थितिकांडक आयामका समान प्रमाण जानना ॥ ४०९ ॥ पल्लस्स संखभागं अवरं तु वरं तु संखभागहियं । घादादिमठिदिखंडो सेसा सवस्स सरिसा हु ॥४१०॥ पल्यस्य संख्यभागं अवरं तु वरं तु संखभागाधिकम् । घातादिमस्थितिखंडः शेपाः सर्वस्य सहशा हि ।। ४१० ।। अर्थ-वह घातके पहले तक प्रथमस्थितिखंड जघन्य तो पल्यका संख्यातवां भागमात्र है और उत्कृष्ट उसके संख्यातवें भागकर अधिक है । तथा शेप द्वितीयादि स्थितिखंड सव जीवोंके समान है ॥ १० ॥ उदधिसहस्सपुधत्तं लक्खपुधत्तं तु वंध संतो य । अणियट्टीसादीए गुणसेढीपुवपरिसेसा ॥ ४११ ॥ उदाधिसहस्रपृथक्त्वं लक्ष्यपृथक्त्वं तु बंधः सत्त्वं च । अनिवृत्तेरादौ गुणश्रेणीपूर्वपरिशेपाः ॥ ४११ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें घटता घटता स्थितिवन्ध पृथक्त्वहजारसागरप्र- माण होता है, स्थितिसत्त्व,घटता घटता पृथक्त्वलक्ष्य सागर प्रमाण होता है और गुणश्रेणी आयाम यहांपर अपूर्वकरण कालके वीतनेके वाद शेष रहा वही जानना । समय समय

लब्धिसारः।
११५.
प्रति असंख्यातगुणा क्रम लिये पूर्वकी तरह गुणश्रेणी और गुणसंक्रम होता है ॥ ४११॥
इसतरह तीनकरण कहे।
आगे स्थितिवन्धापरणका क्रम कहते हैं।
ठिदिवंधसहस्सगदे संखेजा वादरे गदा भागा।
तत्थासण्णिस्सद्विदिसरिसं ठिदिवंधणं होदि ।। ४१२ ॥
स्थितिवंधसहस्रगते संख्येया वादरे गता भागाः ।
तत्रासंज्ञिनः स्थितिसहशं स्थितिबंधनं भवति ॥ ४१२ ।।
अर्थ-इसप्रकार संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर अनिवृत्तिकरणकालके संख्यात बहु-
भाग वीतजानेपर एक भाग शेष रहने के अवसरमें असंज्ञीपंचेंद्रीकी स्थितिके समान स्थिति-
बंध होता है ॥ ४१२॥
ठिदिवंधसहस्सगदे पत्तेयं चदुरतियविएइंदी।
ठिदिवंधसमं होदि हु ठिदिवंधमणुक्कमेणेव ॥ ४१३ ॥
स्थितिबंधसहस्रगते प्रत्येकं चतुविद्विएकेंद्री।
स्थितिबंधसमं भवति हि स्थितिवंधमनुक्रमेणैव ॥ ४१३ ॥
अर्थ-पूर्वोक्त क्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर क्रमसे चौइंद्री तेइंद्री दोइंद्री
एकेंद्रीके स्थितिवन्धके समान सौ पचास पच्चीस एकसागर प्रमाण कर्मका स्थितिबन्ध होता
है ॥ ४१३॥
एइंदियविदीदो संखसहस्से गदे हु ठिदिवंधे ।
पल्लेकदिवहूदुर्ग ठिदिवंधो वीसियतियाणं ॥ ४१४ ॥
एकेंद्रियस्थितितः संख्यसहस्त्रे गते हि स्थितिबंधे।
पल्यैकळ्यर्धद्विकं स्थितिबंधः वीसियत्रिकाणाम् ।। ४१४ ॥
अर्थ--एकेंद्रियसमान स्थितिबंधसे परे संख्यातहजार स्थितिवन्ध वीत जानेपर वीसि-
योंका एकपल्य तीसियोंका डेढपल्य मोहका दो पल्यमात्र स्थितिवन्ध होता है ॥ ४१४ ॥
तकाले ठिदिसंतं लक्खपुधत्तं तु होदि उवहीणं ।
बंधोसरणा बंधो ठिदिखंडं संतमोसरदि ॥ ४१५ ॥
तत्काले स्थितिसत्त्वं लक्ष्यपृथक्वं तु भवति उदधीनाम् ।
वैधापसरणं बंधः स्थितिखंडं सत्त्वमपसरति ॥ ४१५ ॥
अर्थ-उस समय कर्मोंका स्थितिसत्त्व पृथक्त्वलक्षसागर प्रमाण होता है। वह अनि-
वृत्तिकरणके प्रथमसमयके स्थितिवन्धसे संख्यातगुणा कम जानना । और स्थितिबन्धापसर-
णसे स्थितिबन्ध घटता है तथा स्थितिकांडकोंसे स्थितिसत्त्व घटता है ॥ ४१५ ॥

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११६
रायचन्द्रजैनशाखमालायाम्।
पल्लस्स संखभाग संखगुणूणं असंखगुणहीणं ।
बंधोसरणे पलं पल्लासंखं असंखवस्संति ॥ ४१६ ॥
पल्यस्य संख्यभाग संख्यगुणोनमसंख्यगुणहीनम् ।
बंधापसरणे पल्यं पल्यासंख्यं असंख्यवर्पमिति ॥ ४१६ ॥
अर्थ-पल्यका संख्यातवां भाग, पूर्ववन्धसे संख्यातगुणा कम, असंख्यातगुणा घटता
प्रमाण लिये स्थितिबन्धापसरणोंकर पल्यमात्र, पल्यका असंख्यातवां भागमात्र और असं-
ख्यातवर्षमात्र स्थितिवन्ध होता है ॥ ४१६ ॥ इसीप्रकार स्थितिसत्त्व जानना ।
एवं पलं जादा वीसीया तीसिया य मोहो य ।
पल्लासंखं च कमे बंधेण य वीसियतियाओ॥ १७ ॥
एवं पल्यं जाते वीसिया तीसिया च मोहश्च ।
पल्यासंख्यं च क्रमेण बंधेन च वीसियत्रिकाः ॥ ४१७ ॥
अर्थ-इसप्रकार वीसियोंका पल्यमान स्थितिबन्ध होनेपर वीसिय तीसिय मोह-इनका
पल्यके असंख्यातवें भाग क्रमसे पूर्व से संख्यातगुणा घटता स्थितिबन्ध होता है ।। ४१७॥
उदधिसहस्सपुधत्तं अन्भंतरदो दु सदसहस्सस्स ।
तकाले ठिदिसंतो आउगवजाण कम्माणं ॥ १८ ॥
उदधिसहस्रपृथक्त्वं अभ्यंतरतस्तु शतसहस्रस्य ।
तत्काले स्थितिसत्त्वं आयुर्वर्जितानां कर्मणाम् ॥ ४१८ ॥
अर्थ-उस मोहनीयके वन्ध होनेके वाद आयुके विना अन्यकर्मोंका स्थितिसत्त्व पृथ-
क्त्वहजार सागर प्रमाण होता है । यहां पृथक्त्वहजार शब्दकर लक्षके अंदर यथासम्भव
प्रमाण जानना । पहले पृथक्त्व लक्ष सागरका स्थितिसत्त्व था वह कांडकघातकर यहां
इतना रहा है ॥ ४१८॥
मोहगपल्लासंखडिदिबंधसहस्सगेसु तीदेसु ।
मोहो तीसिय हेट्ठा असंखगुणहीणयं होदि ॥ ४१९ ॥
मोहगपल्यासंख्यस्थितिबंधसहस्रकेप्वतीतेपु ।
मोहः तीसियं अधस्तना असंख्यगुणहीनकं भवति ॥ ४१९ ।।
अर्थ-मोहका पल्यके असंख्यातवें भागमात्र स्थितिवन्ध होने के समयमें मोह तीसिय
वीसिय कर्मोंका असंख्यातगुणाकम स्थितिवन्ध होता है ॥ ४१९ ॥
तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेट्ठादु ।
एकसराहे मोहे असंखगुणहीणयं होदि ॥ ४२० ॥

७ लब्धिसारः। ११७ तावन्मात्रे बंधे समताते वीसियानां अधस्तान् । एकसमये मोहो असंख्यगुणहीनको भवति ॥ ४२० ॥ अर्थ-ऐसा अल्प बहुत्वका क्रमलिये उतने ही संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर एक ही वार असंख्यातगुणा कम तीसिय वीसिय और मोहका स्थितिबन्ध होता है ।। ४२० ॥ तेत्तियमेचे बंधे समतीदे बेयणीयहेट्ठादु । तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होति ॥ १२१ ।। तावन्मात्रे बंधे समतीते वेदनीयाधस्तात् । तीसियघातित्रिका असंख्यगुणहीनका भवंति ॥ ४२१ ।। अर्थ-ऐसा क्रमलिये संख्यातहजार स्थितिबंध वीतनेपर वीसियोंमें भी वेदनीयसे नीचे तीनघातियाकर्मीका असंख्यातगुणा घटता क्रम लिये स्थितिवन्ध होता है ॥ ४२१ ॥ तेत्तियमेचे बंधे समतीदे वीसियाण हेट्ठा दु। तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होति ॥ ४२२ ॥ तावन्मात्रे बंधे समतीते वीसियानामधस्तात् तु । तीसियघातित्रिका असंख्यगुणहीनका भवंति ॥ ४२२ ॥ अर्थ-ऐसा क्रमलिये संख्यातहजार स्थितिवन्ध वीतजानेपर विशुद्धिके वलसे वीसि- योंके नीचे तीसियोंमेंसे तीनघातियाओंका असंख्यातगुणा घटता स्थितिबन्ध होता है ॥ ४२२ ॥ तकाले वेयणियं णामा गोदा हु साहियं होदि । इदि मोहतीसवीसियवेयणियाणं कमो बंधे ॥ ४२३ ।। तत्काले वेदनीयं नाम गोत्रं हि साविकं भवति । इति मोहतीसियवीसियवेदनीयानां क्रमो बंधे ॥ ४२३ ॥ अर्थ-उस कालमें वेदनीयका स्थितिवन्ध नाम गोत्रके स्थितिवन्धसे अधिक है उसके आधे प्रमाणकर अधिक होता है इसतरह मोह तीसिय वीसिय और वेदनीयका क्रमसे बंध हुआ। यही क्रमलिये अल्प वहुत्वका होना क्रमकरण है ॥ ४२३ ॥ आगे स्थितिसत्त्वापसरणका स्वरूप कहते हैं। बंधे मोहादिकमे संजादे तेत्तियहिं बंधेहि । ठिदिसंतमसपिणसमं मोहादिकमं तहा संते ॥ १२४ ॥ वंधे मोहादिक्रमे संजाते तावद्भिवधैः । स्थितिसत्त्वमसंज्ञिसमं मोहादिक्रम तथा सत्त्वे ॥ ४२४ ॥ अर्थ-मोहादिकका क्रम लिये क्रमकरणरूप बंध होनेके वाद इसी क्रमको लिये उतने ११२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ही संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर असंज्ञी पंचेंद्रीके समान स्थितिसत्त्व होता है। और उसके वाद वैसे ही स्थितिसत्त्वका होना क्रमसे जानना ॥ ४२४ ॥ तीदे बंधसहस्से पल्लासंखेजयं तु ठिदिवंधे। तत्थ असंखेजाणं उदीरणा समयवद्धाणं ॥ ४२५ ॥ अतीते बंधसहस्र पल्यासंख्येयकं तु स्थितिबंधे । तत्र असंख्येयानां उदीरणा समयबद्धानाम् ॥ ४२५ ।। अर्थ-इस क्रमकरणसे परे संख्यातहजार स्थितिवन्ध वीतनेपर पल्यका असंख्यातवां भागमात्र स्थितिबन्ध होते हुए असंख्यात समय प्रवद्धोंकी उदीरणा होती है ।। ४२५ ॥ आगे क्षपणाका खरूप कहते हैं; ठिदिवंधसहस्सगदे अट्ठकसायाण होदि संकमगो। ठिदिखंडपुधत्तेण य तहिदिसंतं तु आवलियविद्धं ॥ ४२६ ॥ स्थितिवंधसहस्रगते अष्टकपायानां भवति संक्रामकः । स्थितिखंडपृथक्त्वेन च तस्थितिसत्त्वं तु आवलिकविद्धं ॥ ४२६ ॥ अर्थ-उसके वाद संख्यातहजार स्थितिकांडक वीतनेपर अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोभरूप आठ कषायोंका संक्रामक होता है। इसतरह मोहराजाकी सेनाके नायक आठ कषायोंका नाश होनेपर शेष स्थितिसत्त्व काल अपेक्षा आवलिमात्र रहता है और निषेकोंकी अपेक्षा समयकम आवलीमात्र रहता है ॥ ४२६ ॥ ठिदिबंधपुधत्तगदे सोलसपयडीण होदि संकमगो। ठिदिखंडपुत्तेण य तहिदिसंतं तु आवलिपविठं ॥ ४२७ ॥ स्थितिबंधपृथक्त्वगते पोडशप्रकृतीनां भवति संक्रामकः । स्थितिखंडपृथक्त्वेन च तस्थितिसत्त्वं तु आवलिप्रविष्टम् ॥ ४२७॥ अर्थ-उसके वाद पृथक्त्व यानी संख्यातहजार स्थितिबन्ध वीतनेपर निद्रा निद्रा आदि तीन दर्शनावरणकी नरकगति आदि तेरह नामकर्मकी-इस तरह सोलह प्रकृतियोंका संक्रामक होता है । इस तरह संख्यातहजार स्थितिखण्डोंसे उनकर्मोंका स्थितिसत्त्व आव- लिमात्र रहता है ॥ ४२७ ॥ आगे देशघातिकरणको कहते हैं। ठिदिबंधपुधत्तगदे मणदाणा तत्तियेवि ओहि दुगं । लाभं च पुणोवि सुदं अचक्खुभोगं पुणो चक्खु ॥ ४२८ ॥ पुणरवि मदिपरिभोगं पुणरवि विरयं कमेण अणुभागो। बंधेण देसघादी पल्लासंखं तु ठिदिवंधो ॥ ४२९ ॥ . .

लन्धिसारः। ११९ स्थितिबंधपृथक्त्वगते मनोदाने तावसपि अवधिद्विकम् । लाभश्च पुनरपि श्रुतं अचक्षुभोगं पुनः चक्षुः ॥ ४२८ ॥ पुनरपि मतिपरिभोगं पुनरपि वीर्य क्रमेण अनुभागः । बंधेन देशघातिः पल्यासंख्यस्तु स्थितिबंधः ॥ ४२९ ।। अर्थ-सोलह प्रकृतियोंके संक्रमणके वाद पृथक्त्वसंख्यातहजार स्थितिकांडक वीत जानेपर मनःपर्यय ज्ञानावरण और दानांतरायका, उतने ही स्थितिकांडक वीत जानेपर अवधिज्ञानावरण अवधिदर्शनावरण और लाभांतरायका, उसीतरह श्रुतज्ञानावरण अचक्षुद- र्शनावरण भोगांतरायका, उसीतरह चक्षुदर्शनावरण, उसीतरह मतिज्ञानावरण उपभोगांतरा- यका और उसीतरह वीयर्सतरायका अनुमागवंध देशघाती होता है । इसी अवसरमें स्थि- तिवन्ध यथासंभव पत्यका असंख्यातवां भागमात्र ही जानना ॥ ४२८1१२९॥ आगे अंतरकरणको कहते हैं- ठिदिखंडसहस्सगदे चटुसंजलणाण णोकसायाणं । एयडिदिखंडुकीरणकाले अंतरं कुणइ ॥ ४३० ॥ स्थितिखंडसहस्रगते चतुःसंज्वलनानां नोकपायाणाम् । एकस्थितिखंडोत्कीरणकाले अंतरं करोति ॥ ४३० ॥ अर्थ-देशघातीकरणसे परे संख्यातहजार स्थितिखण्ड वीत जानेपर चार संज्वलन और नव नोकषायोंका अंतर करता है यानी वीचके निपेकोंका अभाव करता है । और एक स्थितिकांडकोत्करणका जितना काल है उतने कालकर अंतरको पूर्ण करता है।४३०॥ संजलणाणं एवं वेदाणेकं उदेदि तहोण्हं । सेसाणं पढमहिदि ठवेदि अंतोमुहुत्तमावलियं ॥ ४३१ ।। संज्वलनानामेकं वेदानामेकमुदेति तद्वयोः । शेपाणां प्रथमस्थिति स्थापयति अंतर्मुहूर्तमावलिकां ।। ४३१ ॥ अर्थ-संज्वलनक्रोधादिमेंसे कोई एक और तीनवेदों से कोई एक वेद इसतरह उदय- रूप दो प्रकृतियोंकी तो अंतर्मुहर्तमात्र प्रथमस्थिति स्थापन करता है । इनके विना जिनका उदय न पायाजावे ऐसी ग्यारह प्रकृतियोंकी आवलिमात्र प्रथमस्थिति स्थापन करता है ॥ ४३१ ॥ उक्कीरिदं तु दवं संते पढमटिदिम्हि संथुहदि । वंधेवि य आवाधमदित्थिय उकट्टदे णियमा ॥ ४३२ ॥ अपकर्पितं तु द्रव्यं सत्त्वे प्रथमस्थितौ संस्थापयति । वंधेपि च आवाधामतिक्रम्योत्कर्पति नियमात् ॥ ४३२ ॥ अर्थ-उनकों के अंतररूप निषेकोंके द्रव्यको पूर्वकथितरीतिसे सत्त्वमें अपकर्षणकर . ।

१२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रथमस्थितिमें निक्षेपण करता है और उत्कर्षण किये द्रव्यको आवाधा छोड़कर बंधरूप स्थितिमें निक्षेपण करता है ॥ ४३२ ॥ आगे संक्रमणको कहते हैं। सत्त करणाणि यंतरकदपढमे ताणि मोहणीयस्स । इगिठाणियवंधुदओ तस्सेव य संखवस्सठिदिवंधो ॥ ४३३ ॥ तस्साणुपुविसंकम लोहस्स असंकमं च संढस्स । आवेत्तकरणसंकम छावलितीदेसुदीरणदा ॥ १३ ॥ सप्तकरणानि अंतरकृतप्रथमे तानि मोहनीयस्य । एकस्थानिकवंधोदयौ तस्यैव च संख्यवस्थितिबंधः ॥ ४३३ ।। तस्यानुपूर्विसंक्रमं लोभस्यासंक्रमं च पंढस्य । आवृत्तकरणसंक्रमं पडावल्यतीतेपूदीरणता ॥ ४३४ ॥ अर्थ-जिसने अंतर किया ऐसे अंतरकृत जीवके प्रथमसमयमें सात करणोंका प्रारंभ होता है । उनमें से मोहनीयका बंध उदय केवल लतारूप एकस्थानगत हुआ ये दो करण, उसी मोहनीयका स्थितिबन्ध पल्यासंख्यातभागसे घटकर संख्यातवर्षमात्र हुआ, उन्हीं मोहप्रकृतियोंका आनुपूर्वी संक्रमण होता है, लोभका अन्यप्रकृतियोंमें संक्रमण नहीं होता, नपुंसकवेदका आवृत्तकरण संक्रम हुआ, और पूर्वकर्मों के बंध होनेवाद आवलि बीतनेपर उदीरणा होती थी अब छह आवलि वीतनेपर उदीरणा होती है । इसतरह सात करणोंका युगपत् प्रारंभ होता है ॥ ४३३ । ४३४ ॥ संछुहदि पुरिसवेदे इत्थीवेदं णउंसयं चेव । सत्तेव णोकसाए णियमा कोहम्हि संछुहदि ॥ ४३५ ॥ कोहं च छुहदि माणे माणं मायाए णियमि संछुहदि । मायं च छुहदि लोहे पडिलोमो संकमो णत्थि ॥ ४३६ ॥ संक्रामति पुरुषवेदे स्त्रीवेदं नपुंसकं चैव । सप्तव नोकषायान् नियमात् क्रोधे संक्रामति ॥ ४३५ ॥ क्रोधश्च क्रामति माने मानो मायायां नियमेन संक्रामति । माया च कामति लोभे प्रतिलोमः संक्रमो नास्ति ॥ ४३६ ॥ अर्थ-स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका द्रव्य तो पुरुषवेदमें संक्रमण करता है, पुरुषवेद हास्यादि छह ऐसें सात नोकषायका द्रव्य संज्वलन क्रोधमें, क्रोधका द्रव्य मानमें, मानका द्रव्य मायामें, मायाका द्रव्य लोभमें संक्रमण करता है । अब अन्यप्रकार संक्रम नहीं होता ॥ ४३५। ४३६॥

लब्धिसार। १२१ विदिवंधसहस्सगदे संढो संकामिदो हवे पुरिसे । पडिसमयमसंखगुणं संकामगचरिमसमओत्ति ॥ ४३७ ।। स्थितिवंधसहस्रगते पंढः संक्रामितो भवेत् पुरुपे । प्रतिसमयमसंख्यंगुणं संक्रामकचरमसमय इति ॥ ४३७ ।। अर्थ-अन्तरकरणके अनंतरसमयसे लेकर संख्यातहजार स्थितिबन्ध वीतजानेपर नपुं- सकवेद पुरुषवेदमें संक्रमण किया जाता है । और समय समय प्रति असंख्यातगुणा क्रम लिये संक्रमणकालके अंतसमयतक वह द्रव्य संक्रमित होता है ॥ ४३७ ।। बंधेण होदि उदओ अहिओ उदएण संकमो अहिओ। गुणसेढि असंखेजापदेसअंगेण वोधवा ॥ ४३८ ॥ वंधेन भवति उदयो अधिक उदयेन संक्रमो अधिकः । गुणश्रेणिरसंख्येयप्रदेशांगेन वोद्धव्या ॥ ४३८ ॥ अर्थ-उस कालमें पुरुपवेदके बंधद्रव्यसे उदय अधिक है और उदयद्रव्यसे संक्रमण द्रव्य अधिक है। वह अधिकता असंख्यात प्रदेशसमूहोंकर गुणश्रेणी अर्थात् गुणकारकी पशिरूप जानना ।। ४३८॥ गुणसेढिअसंखेज्जापदेसअंगेण संकमो उदओ। से काले से काले उजो बंधो पदेसंगो ॥ ४३९ ॥ गुणश्रेण्यसंख्येयप्रदेशांगेन संक्रम उदयः । खे काले खे काले योग्यो बंधः प्रदेशांगः ॥ ४३९ ।। अर्थ-अपने २ कालमें स्वस्थान अपेक्षा संक्रमसे संक्रम उदयसे उदय प्रदेश अपेक्षा- कर असंख्यातरूप गुणकारकी पति लिये है । और अपने पुरुषवेदके वधकालमें प्रदेश- रूप बंध भजनीय है ॥ ४३९ ॥ इदि संदं संकामिय से काले इत्थिवेदसंकमगो। अण्णं ठिदिरसखंडं अण्णं ठिदिवंधमारवई ॥ ४४० ॥ इति पंढं संक्राम्य खे काले स्त्रीवेदसंक्रामकः । अन्यस्थितिरसखंडमन्यं स्थितिवंधमारभते ॥ ४४० ।। अर्थ-इसप्रकार नपुंसकवेदको संक्रमण कर अपने कालमें स्त्रीवेदका संक्रामक होता है अर्थात् पुरुषवेदमें संक्रमणकर क्षपण करनेवाला होता है । वहां प्रथमसमयमें पूर्व से अन्य प्रमाण लिये स्थितिकांडक अनुभागकांडक और स्थितिवन्धको आरंभ करता है ॥ ४४० ॥ थी अद्धा संखेजभागे पगदे तिघादिठिदिवंधो। वस्साणं संखेज थी संकं तापगढ़ते ॥ ४४१ ॥ ल.सा. १६

१२२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
स्त्री अद्धा संख्येयभागेपगते निघातिस्थितिबंधः ।
वर्षाणां संख्येयं स्त्री संक्रमोपगतार्धाते ॥ ४४१ ।।
अर्थ-स्त्रीवेद क्षपणाकालका संख्यातवां भाग वीतनेपर ज्ञानावरण दर्शनावरण अन्त-
राय इन तीन घातियाओंके स्थितिबन्धको संकोचकर संख्यातवर्षप्रमाण स्थितिवन्ध करता
है। उसके बाद स्त्रीवेदका स्थितिसत्त्व अन्तस्थितिकांडकरूप करता है ॥ ४४१ ॥
ताहे संखसहस्सं वस्साणं मोहणीयठिदिसंतं ।
से काले संकमगो सत्तण्हं णोकसायाणं ॥ ४४२ ॥
तस्मिन् संख्यसहस्रं वर्षाणां मोहनीयस्थितिसत्त्वम् ।
खे काले संक्रामकः सप्तानां नोकपायाणाम् ॥ ४४२ ॥
अर्थ-स्त्रीवेद क्षपणाकालके अन्तमें मोहनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षप्रमाण है।
उसके बाद अपने कालमें सात नोकषायोंका संक्रामक होता है यानी संज्वलनक्रोधरूप
परिणामके नाश करनेवाला होता है ॥ ४४२ ।।
ताहे मोहो थोवो संखेजगुणं तिघादिठिदिवंधो।
तत्तो असंखगुणियो णामदुर्ग साहियं तु वेयणियं ॥ १४३ ॥
तत्र मोहः स्तोकः संख्येयगुणं त्रिघातिस्थितिवंधः।
ततोऽसंख्येयगुणितं नामद्विकं साधिकं तु वेदनीयम् ॥ ४४३ ॥
अर्थ-उसी जगह प्रथमसमयमें मोहका स्थितिवन्ध थोड़ा है, उससे तीन घातियोंका
संख्यातगुणा, उससे नाम गोत्रका असंख्यातगुणा और वेदनीयका साधिक स्थितिवन्ध
होता है ॥ ४४३॥
ताहे असंखगुणियं मोहादु तिघादिपयडिठिदिसंतं ।
तत्तो असंखगुणियं णामदुगं साहियं तु वेयणिये ॥४४४ ॥
तस्मिन् असंख्यगुणितं मोहात् निघातिप्रकृतिस्थितिसत्त्वम् ।
ततो असंख्यगुणितं नामद्विकं साधिकं तु वेदनीयं ।। ४४४ ॥
अर्थ--उसी प्रथमसमयमें संख्यातवर्षमात्र मोहका स्थितिसत्त्व थोड़ा है उससे असं-
ख्यातगुणा तीनघातियाओंका स्थितिसत्त्व है उससे असंख्यातगुणा नाम गोत्रका स्थितिसत्त्व
है उससे साधिक वेदनीयका स्थितिसत्त्व है ॥ ४४४ ॥
सत्तण्डं पढमद्विदिखंडे पुण्णे दु मोहठिदिसंतं ।
संखेजगुणविहीणं सेसाणमसंखगुणहीणं ॥ ४४५ ॥
सप्तानां प्रथमस्थितिखंडे पूर्णे तु मोहस्थितिसत्त्वं ।
संख्येय गुणविहीनं शेषाणामसंख्यगुणहीनम् ॥ ४४५ ॥

लब्धिसारः। १२३ अर्थ -सात नोकषायोंका पहला स्थितिकांडक पूर्ण होनेपर पूर्वस्थितिसत्त्वसे मोहका स्थितिसत्त्व संख्यातगुणाकम है और शेष कर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणा कम है ॥ ४४५ ॥ सत्तण्हं पढमद्विदिखंडे पुण्णेति घादिठिदिवंधो । संखेजगुणविहीणं अघादितियाणं असंखगुणहीणं ।। ४४६ ।। सप्तानां प्रथमस्थितिखंडे पूर्णे इति घातिस्थितिबंधः । संख्येयगुणविहीनो अघातित्रयाणामसंख्यगुणहीनः ॥ ४४६ ॥ अर्थ-सात नोकषायोंके प्रथमस्थितिखंड पूर्ण होनेपर पूर्वस्थितिवन्धसे चार घातिया- ओंका तो संख्यातगुणा घटता और तीन अघातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा घटता स्थिति- घन्ध होता है ॥ ४४६ ॥ ठिदिवंधपुधत्तगदे संखेजदिमं गतं तदद्धाए । एत्थ अघादितियाणं ठिदिवंधो संखवस्सं तु ॥ ४४७ ॥ स्थितिबंधपृथक्त्वगते संख्येयं गतं तदवायाम् । अन अघातित्रयाणां स्थितिवंधः संख्यवस्तु ॥ ४४७ ॥ अर्थ उसके बाद संख्यातहजार स्थितिबन्ध वीतजानेपर उस सात नोकपायक्षपणा- कालका संख्यातवां भाग वीतजानेसे नामगोत्र वेदनीयरूप तीन अघातियाओंका स्थितिबंध संख्यातहजार वर्षमात्र होता है । ४४७ ॥ ठिदिखंडपुधत्तगदे संखा भागा गदा तदद्धाए । घादितियाणं तत्थ य ठिदिसंतं संखवस्सं तु ॥ ४४८ ॥ स्थितिखंडपृथक्त्वगते संख्या भागा गता तदुद्धायाः। घातित्रयाणां तत्र च स्थितिसत्त्वं संख्यवर्प तु ॥ ४४८॥ अर्थ-उसके वाद संख्यातहजार स्थितिकांडक वीतनेपर सात नोकपायकालका संख्या- तवहुभाग वीतनेसे एक भागमें तीनघातियाओंका स्थितिसत्त्व संख्यात वर्षमात्र होता है ।। ४४८॥ पडिसमयं असुहाणं रसबंधुदया अणंतगुणहीणा । बंधोवि य उदयादो तदणंतरसमय उदयोथ ॥ ४४९ ॥ प्रतिसमयमशुभानां रसवंधोदयौ अनंतगुणहीनौ । बंधोपि च उदयात् तदनंतरसमय उदयोथ ।। ४४९ ।। अर्थ-अशुभप्रकृतियोंका अनुभागवन्ध और अनुभाग उदय समय समय प्रति अनन्त- १२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गुणा कम होता है। पूर्वसमयके उदयसे उत्तरसमयका बन्ध भी और अनन्तरससयवर्ती उदय भी अनन्तगुणा घटता जानना ॥ ४४९ ॥ वंधण होदि उदओ अहियो उदएण संकमो अहियो । गुणसेढि अणंतगुणा बोधवा होदि अणुभागे ॥ ४५० ॥ बंधेन भवति उदयो अधिक उदयेन संक्रमो अधिकः । गुणश्रेणिरनंतगुणा बोद्धव्या भवति अनुभागे ॥ ४५० ॥ अर्थ-बन्धसे तो उदय अधिक है और उदयसे संक्रम अधिक है। इसतरह अनुभा- गमें अनन्तगुणी गुणकारकी पंक्ति जानना । भावार्थ-विवक्षित एक समयमें अनुभागके बन्धसे अनन्तगुणा अनुभागका उदय होता है उससे अनन्तगुणा अनुभागका संक्रम होता है ॥ ४५०॥ गुणसेढि अणंतगुणेणूणा य वेदगो दु अणुभागो। गणणादिकंतसेढी पदेसअंगेण बोधवा ॥५१॥ गुणश्रेणिरनंतगुणेनोना च वेदकस्तु अनुभागः । गणनातिक्रांतश्रेणी प्रदेशांगेन वोद्धव्या ॥४५१ ॥ अर्थ-यद्यपि उदयरूप अनुभाग समय समय प्रति अनन्तगुणा घटतारूप गुणकार पति लिये है तौभी प्रदेश अंगकर असंख्यातगुणकारकी पशिरूप जानना । भावार्थ- समय २ प्रति अनुभागका उदय अनन्तगुणा घटता है तो भी कर्मपरमाणुओंका उदय समय २ प्रति असंख्यातगुणा बढता है ऐसा जानना ॥ ४५१ ॥ वंधोदएहिं णियमा अणुभागो होदि शंतगुणहीणं । से काले से काले भजो पुण संकमो होदि ॥ ४५२ ॥ बंधोदयाभ्यां नियमादनुभागो भवति अनंतगुणहीनः । खे काले स्खे काले भाज्यः पुनः संक्रमो भवति ॥ ४५२ ॥ अर्थ-अपने कालमें अनुभाग वन्ध और उदयकर समय २ प्रति अनन्तगुणा घटता ही है । और अपने २ कालमें संक्रम भजनीय है यानी घटनेके नियमसे रहित है ।।४५२॥ संकमणं तदबढे जाव दु अणुभागखंडयं पडिदि । अण्णाणुभागखंडे आढ़ते पंतगुणहीणं ॥ ४५३ ॥ संक्रमणं तदवस्थं यावतु अनुभागखंडकं पतति । अन्यानुभागखंडे आरब्धे अनंतगुणहीनम् ।। ४५३ ।। अर्थ-जिस अनुभागकांडकमें संक्रमण हो उस अनुभागकांडकका घात होकर न निवटे तबतक समय समय प्रति अवस्थित ( समान ) रूप ही अनुभागका संक्रमण होता

लब्धिसारः।
१२५
है। और अन्य नवीन अनुभागकांडकका प्रारंभ होजानेपर पहलेसे अनन्तगुणा घटता अनु-
भागका संक्रम होता है ।।.४५३ ॥
सत्तण्हं संकामगचरिमे पुरिसस्स बंधमडवस्सं ।
सोलस संजलणाणं संखसहस्साणि सेसाणं ॥ ४५४ ॥
सप्तानां संक्रामकचरमे पुरुपस्य वंधोष्टवर्पम् ।
पोडश संज्वलनानां संख्यसहस्राणि शेपाणाम् ॥ ४५४ ॥
अर्थ-सात नोकषायोंके संक्रमणकालके अन्तसमयमें पुरुपवेदका स्थितिवन्ध आठ
वर्षप्रमाण होता है और संज्वलनचौकड़ीका सोलह वर्षमात्र तथा शेष रहे मोह आयु
विना छह काँका संख्यातहजार वर्षमात्र स्थितिवन्ध होता है ।। ४५४ ॥
ठिदिसंतं घादीणं संखसहस्साणि होति बस्साणं ।
होति अघादितियाणं वस्साणमसंखमेत्ताणि ॥ ४५५ ।।
स्थितिसत्त्वं धातिनां संख्यसहस्राणि भवंति वर्षाणाम् ।
भवंति अधातित्रयाणां वर्षाणामसंख्यमात्राणि ॥ ४५५ ॥
अर्थ-वहांपर ही स्थितिसत्त्व चार धातियाओंका संख्यातहजार वर्षमात्र और तीन
अधातियाओंका असंख्यातवर्षप्रमाण जानना ॥ ४५५ ।।
पुरिसस्स य पढमहिदि आवलिदोसुवरिदासु आगाला ।
पडिआगाला छिण्णा पडिआवलियादुदीरणदा ॥ ४५६ ॥
पुरुपस्य च प्रथमस्थितौ आवलिद्वयोरुपरतयोरागालाः ।
प्रत्यागालाः छिन्ना प्रत्यावलिकाया उदीरणता ॥ ४५६ ॥
अर्थ-पुरुषवेदकी प्रथमस्थितिमें आवलि प्रत्यावलि दोनों शेष रहनेपर आगाल प्रत्या-
गाल नष्ट हो जाते हैं और द्वितीयावलिसे उदीरणा होती है ॥ ४५६ ॥ द्वितीयस्थितिमें
स्थित परमाणुओंको अपकर्षण करके प्रथमस्थितिम प्राप्त करना आगाल कहा जाता है।
प्रथमस्थितिमें ठहरे हुए परमाणुओंको उत्कर्पणकर द्वितीयस्थितिमें प्राप्त करना प्रत्यागाल है।
अंतरकदपढमादो कोहे छण्णोकसाययं छुहदि ।
पुरिसस्स चरिमसमए पुरिसवि एणेण सवयं छुहदि ॥ ४५७ ॥
अंतरकृतप्रथमात् क्रोधे पण्णोकपायकं संक्रामति ।
पुरुपस्य चरमसमये पुरुपमपि एतेन सर्व संक्रामति ॥ ४५७ ।।
अर्थ-अन्तरकरण करनेके वाद प्रथमसमयसे लेकर पुरुपवेदके उदयकालके अंतमें
छह नोकपायोंका सवसत्त्व संज्वलनक्रोधमें संक्रमण करता है । और पुरुषवेदको भी सब
संज्वलन क्रोधमें निक्षेपण करता है ॥ ४५७.॥

१२६ रांयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । समऊणदोण्णिावलिपमाणसमयप्पवद्धणयवंधो। विदिये ठिदीये अत्थि हु पुरिसस्सुदयावली च तदा ॥ ४५८ ॥ समयोनब्यावलिप्रमाणसमयप्रवद्धनववंधः । द्वितीयस्यां स्थितौ अस्ति हि पुरुपस्योदयावली च तदा ।। ४५८ ।। अर्थ-द्वितीय स्थितिमें समय कम दो आवलिमात्र नवक समयप्रवद्ध मात्र उदयाव- लिके निषेक पुरुषवेदके सत्त्वमें शेष रहते हैं अन्य सब संख्यातहजार वर्षमात्र स्थिति लिये पुरुषवेदका पुराना सत्त्व संज्वलनक्रोधमें संक्रमणरूप करदिया जाता है ॥ ४५८ ॥ अब अपगतवेदीकी क्रिया कहते हैं। से काले ओवणिउट्टण अस्सकण्ण आदोलं। करणं तियसण्णगयं संजलणरसेसु पट्टिहिदि ॥ ४५९ ॥ खे काले अपवर्तनोद्वर्तनं अश्वकर्णमांदोलम् । करणं त्रिकसंज्ञागतं संज्वलनरसेपु वर्तयति ॥ ४५९ ।। अर्थ-अपने कालमें अपवर्तनोद्वर्तकरण १ अश्वकरण २ आंदोलकरण-इसतरह नामोंको प्राप्त क्रिया है वह संज्वलनचौकड़ीके अनुभागमें प्राप्त होती है ॥ ४५९ ॥ आरंभ किये. प्रथम अनुभाग कांडकके घात होनेपर शेष अनुभाग क्रोधसे लेकर लोभतक अनन्तगुणा घटता, व लोभसे लेकर क्रोधतक अनन्तगुणा वढता होता है उसे अपवर्तनोद्वर्तनकरण कहते हैं । जैसे घोड़ेका कान मध्यके प्रदेशसे आदितक क्रमसे घटता होता है उसीतरह प्रथमअनुभागकांडकका घात हुए वाद क्रोध आदि लोभपर्यंतका क्रमसे अनुभाग घटता होता है उसे अश्वकर्ण कहते हैं । जैसे 'हिंडोलेको रस्सी वन्धती है वह रस्सीके वीचका प्रदेश आदिसे अन्ततक क्रमसे घटता होता है उसीतरह पूर्ववत् क्रोधसे लोभतकका अनु- भाग घटता होता है उसे आंदोलकरण कहते हैं ताहे संजलणाणं ठिदिसंतं संखवस्सयसहस्सं । अंतोमुहुत्तहीणो सोलसवस्साणि ठिदिवंधो ॥ ४६० ॥ तत्र संज्वलनानां स्थितिसत्त्वं संख्यवर्पसहस्रम् । अंतर्मुहूर्तहीनः पोडशवर्षाणि स्थितिबंधः ॥ ४६० ॥ अर्थ-उस अश्वकर्णके प्रारंभसमयमें संज्वलन चारका स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्ष- मात्र है और स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम सोलह वर्षमात्र है ॥ ४६० ॥ रससंतं आगहिदं खंडेण समं तु माणगे कोहे । मायाए लोभेवि य अहियकमा होति बंधेवि ॥ ४६१ ॥ .

लब्धिसार। रससत्त्वमागृहीतं खंडेन समं तु मानके क्रोधे। मायायां लोभेपि च अधिकक्रम भवति वंधेपि ॥ ४६१ ॥ अर्थ-प्रारंभ किये प्रथम अनुभागकांडककर सहित इस प्रथमअनुभाग कांडकके घात होनेसे पहले मानमें क्रोधमें मायामें लोभमें जो अनुभागसत्त्व है वह अधिक क्रमलिये हुए है। और इस अश्वकर्णके प्रारंभसमयमें जो अनुभागवन्ध है उसमें भी इसीतरह अल्प बहुत्वका क्रम जानना ॥ ४६१ ॥ रसखंडफड्ढयाओ कोहादीया हवंति अहियकमा । अवसेसफयाओ लोहादि अणंतगुणिदकमा ॥ ४६२ ॥ रसखंडस्पर्धकानि क्रोधादिकानां भवंति अधिकक्रमाणि । अवशेपस्पर्धकानि लोभादेः अनंतगुणितक्रमाणि ॥ ४६२ ।। अर्थ -धात करनेके लिये प्रथम अनुभागकांडकरूप ग्रहण किये जो स्पर्धक वे क्रोधके थोड़े हैं उससे मानादिके विशेष अधिक हैं। और प्रथम अनुभागकांडकका घात हुए वाद अवशेष रहे स्पर्धक हैं वे लोभके थोड़े हैं उससे मायादिके अनंतगुणे हैं ऐसा क्रम जानना ॥ ४६२ ॥ अव अश्वकर्णके प्रथम समयमें हुए अपूर्वस्पर्घकोंका व्याख्यान करते हैं- ताहे संजलणाणं देसावरफड्ढयस्स हेट्ठादो। पंतगुणूणमपुवं फहयमिह कुणदि हु अणतं ॥ ४६३ ।। तस्मिन् संज्वलनानां देशावरस्पर्धकस्य अधस्तनात् । अनंतगुणोनमपूर्व स्पर्धकमिह करोति हि अनंतम् ।। ४६३ ॥ अर्थ -उस अश्वकरणके आरंभसमयमें चारों संज्वलनकषायोंका एक साथ अपूर्वस्प- र्धक देशघाती जघन्यस्पर्धकसे नीचे अनन्तगुणा घटता अनुभागरूप करता है । इस तरह अनन्ते अपूर्वस्पर्धक होते हैं ।। ४६३ ॥ गणणादेयपदेसगगुणहाणिहाणफहयाणं तु । होदि असंखेजदिम अवरादु बरं अणंतगुणं ॥ ४६४ ।। गणनादेकप्रदेशकगुणहानिस्थानस्पर्धकानां तु । भवति असंख्येयं अवरतो वरमनंतगुणम् ॥ ४६४ ॥ अर्थ-गणनाकरके परमाणुओंकी गुणहानिके स्पर्धकोंका असंख्यातवां भाग अपूर्वस्प- धकोंका प्रमाण है और जघन्य अपूर्वस्पर्धकोंसे उत्कृष्ट अपूर्वस्पर्धकमें अनुभागके अविभाग- प्रतिच्छेद अनन्तगुणे होते हैं ॥ ४६४ ॥ इसका विशेषकथन कषायप्राभूत ( महाधवल) में कहा है।

१२०
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पुवाण फहयाणं छेत्तूण असंखभागदवं तु ।
कोहादीणमपुवं फड्ढयमिह कुणदि अहियकमा ॥ ४६५ ॥
पूर्वान् स्पर्धकान् छित्त्वा असंख्यभागद्रव्यं तु ।
क्रोधादीनामपूर्व स्पर्धकमिह करोति अधिकक्रमम् ॥ ४६५ ।।
अर्थ-संज्वलन क्रोध मान माया लोभके पूर्व स्पर्धकोंके द्रव्यको अपकर्षण भागमात्र
असंख्यातका भाग देकर एक भागमात्र द्रव्यको ग्रहणकर यहां अपूर्वस्पर्धक करता है । चे
स्पर्धक क्रमसे अधिक २ जानना ॥ ४६५ ॥
समखंड सविसेसं णिक्खिपियोकट्टिदादु सेसधणं ।
पक्खेवकरणसिद्धं इगिगोउंछेण उभयत्थ ।। ४६६ ।।
समखंडं सविशेष निक्षिप्यापकर्पितात् शेषधनम् ।
प्रक्षेपकरणसिद्धं एकगोपुच्छेन उभयत्र ॥ ४६६ ॥
अर्थ-अपकर्षणकिये द्रव्यमें कितने एक द्रव्य तो विशेष सहित समखण्डरूप अपूर्व-
स्पर्धकोंमें निक्षेपणकर अवशेष धनको एक गोपुच्छकर पूर्व अपूर्व दोनों स्पर्धकोंमें निक्षे-
पण करना सिद्ध हुआ ॥ ४६६ ॥
उक्कदिदं तु देदि अपुवादिमवग्गणाउ हीणकर्म ।
पुवादिवग्गणाए असंखगुणहीणयं तु हीणकमा ॥ ४६७ ॥
अपकर्पितं तु ददाति अपूर्वादिमवर्गणा हीनक्रमम् ।
पूर्वादिवर्गणायामसंख्यगुणहीनकं तु हीनक्रमम् ॥ ४६७ ॥
अर्थ-अपकर्षण किये द्रव्यमेंसे अपूर्वस्पर्धककी आदिवर्गणामें विशेष घटते क्रमसे
द्रव्य दिया जाता है । और अपूर्वस्पर्धककी अंतवर्गणामें दिये हुए द्रव्यसे साधिक अपक-
र्षण भागहारमात्र असंख्यातगुणा घटता पूर्व स्पर्धककी प्रथम वर्गणाम द्रव्य दिया जाता
है ॥ १६७ ॥
कोहादीणमपुवं जेहें सरिसं तु अवरमसरित्थं ।
लोहादिआदिवग्गणअविभागा होति अहियकमा ॥ ४६८ ॥
क्रोधादीनामपूर्व ज्येष्ठं सदृशं तु अवरमसदृशम् ।
लोभादिआदिवर्गणाविभागा भवंति अधिकक्रमाः ॥ ४६८॥
अर्थ-क्रोधादिचारों कषायोंके अपूर्वस्पर्धकोंकी उत्कृष्टवर्गणा अनुभागके अविभाग-
प्रतिच्छेदोंके प्रमाणकी अपेक्षा समान है और जघन्यवर्गणा असमान है । वहांपर लोभा-
दिककी जघन्य वर्गणाके अविभाग प्रतिच्छेद क्रमसे अधिक हैं ॥ ४६८ ॥

लब्धिसारः। १२९ सगसगफहयएहिं सगजेट्टे भाजिदे सगीआदि । मज्झवि अणंताओ वग्गणगाओ समाणाओ॥ ४६९ ॥ खकस्वकस्पर्धकैः स्वकज्येष्टे भाजिते स्वकीयादि । मध्येपि अनंता वर्गणाः समानाः ॥ ४६९ ॥ अर्थ-अपने अपने स्पर्धकोंका भाग अपनी २ उत्कृष्टवर्गणाओम देनेसे अपनी २ आदिवर्गणाओंका प्रमाण आता है । और मध्यम भी अनंतवर्गणा चारों कषायोंकी परस्पर समान होती हैं ।। ४६९ ॥ जे हीणा अवहारे रूवा तेहिं गुणिन्तु पुवफलं । हीणवहारेणहिये अद्धं पुवं फलेणहियं ॥ ४७० ॥ ये हीना अवहारे रूपाः तैः गुणितं पूर्वफलं । हीनावहारेणाधिके अर्ध पूर्व फलेनाधिकम् ॥ ४७० ॥ अर्थ- ॥ ४७० ॥ कोहदुसेसेणबहिदकोहे तकंडयं तु माणतिए । रूपहियं सगकंडयहिदकोहादी समाणसला ।। ४७१ ॥ क्रोधद्विशेषेणावहितक्रोधे तत्कांडकं तु मानत्रये । रूपाधिकं स्वककांडकहितक्रोधादि समानशलाकाः ॥ ४७१ ।। अर्थ-क्रोधके स्पधकप्रमाणको मानके स्पर्धकोंमें घटानेसे जो शेष रहे उसका भाग क्रोधके स्पर्धकोंके प्रमाणको देनेसे जो प्रमाण आवे उसका नाम क्रोध कांडक है और माना- दि तीनमें एक एक अधिक है। और अपने २ कांडकोंका भाग अपने २ स्पर्धकोंमें देनेसे जो नाना कांडकोंका प्रमाण आता है उतने ही वर्गणाओंके अविभागप्रतिच्छेद चारों कपायोंके परस्पर समान होते हैं ।। ४७१ ॥ ताहे दयवहारो पदेसगुणहाणिफड्ढयवहारो। पल्लस्स पडममूलं असंखगुणियकमा होति ॥ ४७२ ॥ तत्र द्रव्यावहारः प्रदेशगुणहानिस्पर्धकावहारः। पल्यस्य प्रथममूलं असंख्यगुणितक्रमा भवंति ।। ४७२ ।। अर्थ-अश्वकर्णकारकके प्रथमसमयमें सब द्रव्यको जिस अपकर्षण भागहारका भाग देनेसे प्रदेशोंकी एक गुणहानिमें जितना स्पर्घकोंका प्रमाण है उसको जिसका भाग दिया वह असंख्यातगुणा है । उससे पल्यका प्रथमवर्गमूल असंख्यातगुणा है ॥ १७२-11 १ इसका अर्थ भापाकारने नहीं किया इसलिये यहां भी छोड़दिया है। ल.सा.१७ १ '. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ताहे अपुवफड्ढयपुवस्सादीदणंतिमुवदेहि । बंधो हु लताणंतिमभागोत्ति अपुवफहयदो ॥ ४७३ ॥ तस्मिन् अपूर्वस्पर्धकपूर्वस्यादितो अनंतिममुदेति । बंधो हि लतानंतिमभाग इति अपूर्वस्पर्धकतः ॥ ४७३ ।। अर्थ-उस अर्श्वकर्णकरणके प्रथमसमयमें उदयनिषेकोंके सब अपूर्व स्पर्धक और पूर्व- स्पर्धककी आदिसे लेकर उसका अनंतवां भाग उदय होता है । और लता भागसे अनंतवें भागमात्र अपूर्वस्पर्धकके प्रथम स्पर्धकसे लेकर अन्तस्पर्धकतक जो स्पर्धक हैं उनरूप होकर बंधरूप स्पर्धक परिणमते हैं ॥ ४७३ ।। विदियादिसु समयेसु वि पढमं व अपुवफड्ढयाण विही । णवरि य संखगुणूणं 'दपमाणं तु' पडिसमयं ॥ ४७४ ॥ णवफड्डयाण करणं पडिसमयं एवमेव णवरिं तु । दत्वमसंखेजगुणं फहयमाणं असंखगुणहीणं ॥ ४७५ ॥ द्वितीयादिपु समयेपु अपि प्रथमं व अपूर्वस्पर्धकानां विधिः । नवरि च संख्यगुणोनं द्रव्यप्रमाणं तु प्रतिसमयम् ॥ ४७४ ॥ नवस्पर्धकानां करणं प्रतिसमयं एवमेव नवरि तु । द्रव्यमसंख्येयगुणं स्पर्धकमानं असंख्यगुणहीनम् ॥ ४७५ ॥ अर्थ-द्वितीयादि समयोंमें भी प्रथम समयवत् अपूर्वस्पर्धकोंकी विधि है । परंतु विशेष इतना है कि वहां द्रव्य तो क्रमसे असंख्यातगुणा बढता हुआ अपकर्पण किया जाता है और किये 'हुए नवीन स्पर्धकोंका प्रमाण असंख्यातगुणा घटता होता है ऐसा जानना ॥ ४७४।४७५॥ पढमादिसु दिजकमं तत्कालजफड्ढयाण चरिमोत्ति । हीणकम से काले असंखगुणहीणयं तु हीणकमं ॥ ४७६ ॥ प्रथमादिषु देयक्रमं तत्कालजस्पर्धकानां चरम इति । हीनक्रम स्खे काले असंख्यगुणहीनकं तु हीनक्रमम् ॥ ४७६ ॥ अर्थ-अपूर्वस्पर्धक करण कालके प्रथमादि समयोंमें अपकर्षण द्रव्य देने का क्रम उस- कालमें किये स्पर्धकों के अन्तपर्यंत तो विशेष हीन क्रम लिये है । उसके बाद असंख्यात- गुणा घटता हुआ उसके ऊपर विशेष हीन क्रमलिये जानना ॥ ४७६ ॥ पढमादिसु दिस्सकमं तकालजफढयाण चरिमोत्ति । हीणकम से काले हीणं हीणं कम तत्तो ॥ ४७७ ॥ . १ यह पाठ भाषांमें छूटा हुआ था सो अभिप्रायके अनुसार लिखागया है । इस समय प्राप्त भाषाकी प्रतिमें यह गाथा ही नहीं लिखा है।

लब्धिसारः। १३१ प्रथमादिपु श्यक्रमं तत्कालजस्पर्धकानां चरम इति । हीनक्रमं स्त्रे काले हीनं हीनं क्रमं ततः ॥ ४७७ ॥ अर्थ-अपूर्वस्पर्धक करणकालके प्रथमादि समयों में देखनेयोग्य परमाणुओंका क्रम उस समयमें किये गये स्पर्धकोंकी अन्तवर्गणा पर्यंत विशेष घटता क्रमलिये है । और उसके ऊपर जो वर्गणा उसका भी दृश्य द्रव्य एक चयमात्र घटता हुआ है ऐसा चय घटता क्रम जानना ॥ ४७७॥ आगे प्रथम अनुभागकांडकके घात होनेपर क्या होता है वह दिखलाते हैं; पढमाणुभागखंडे पडिदे अणुभागसंतकम्मं तु । लोभादणंतगुणिदं उवरिं पि अणंतगुणिदकमं ।। ४७८ ॥ प्रथमानुभागखंडे पतिते अनुभागसत्त्वकर्म तु । लोभादनंतगुणितमुपर्यपि अनंतगुणितक्रमम् ॥ ४७८ ।। अर्थ-इस तरह प्रथम अनुभागखण्डके पतन होनेपर लोभसे अनन्तगुणा क्रमलिये अनुभागसत्त्वरूप कर्म होता है ऐसा जानना ॥ ४७८ ॥ आदोलस्स य पढमे णिवत्तिदपुवफड्ढयाणि बहु । पडिसमयं पलिदोवममूलासंखेजभागभजियकमा ।। ४७९ ।। आंदोलस्य च प्रथमे निर्वर्तितापूर्वस्पर्धकानि वहूनि । प्रतिसमयं पलितोपममूलासंख्येयभागभजितक्रमम् ॥ ४७९ ।। अर्थ-आंदोलकरणके प्रथमसमयमें किये हुए अपूर्वस्पर्धक बहुत हैं उसके बाद समय समय प्रति पल्यके वर्गमूलका असंख्यातवां भागकर भाजित क्रमलिये हुए जानना ॥४७९॥ आदोलस्स य चरिमे पुवादिमवग्गणाविभागादो। दो चढिमादीणादी चढिदवामेत्तर्णतगुणा ॥ १८ ॥ आंदोलस्य च चरमे पूर्वादिमवर्गणाविभागात् । द्विचटितादीनामादिः चटितव्यामात्रानंतगुणाः ॥ ४८० ।। अर्थ-अश्वकर्णकालके अन्तसमयमें प्रथमस्पर्धककी आदिवर्गणाम अविभागप्रतिच्छेद अनुभागके थोड़े हैं उससे आगे दूसरे वगैरःके आदिकी वर्गणामें दूने तिगुने आदि अनन्त- गुणे जानना ॥ ४८० ॥ आदोलस्स य पढमे रसखंडे पाडिदे अपुवादो। कोहादो अहियकमा पदेसगुणहाणिफया तत्तो ॥ ४८१ ॥ होदि असंखेजगुणं इगिफड्ढयवग्गणा अणंतगुणा । तत्तो अणंतगुणिदा कोहस्स अपुवफड्डयाणं च ॥ ४८२ ।।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
माणादीणहियकमा लोभगपुवं च वग्गणा तेसिं ।
कोहोति य अट्ठपदा अणंतगुणिदकमा होति ॥ ४८३ ॥
आंदोलस्य च प्रथमे रसखंडे पातिते अपूर्वात् ।
क्रोधात् अधिकक्रमाः प्रदेशगुणहानिस्पर्धकास्ततः ॥ ४८१ ।।
भवति असंख्येयगुणं एकस्पर्धकवर्गणा अनंतगुणा ।
ततो अनंतगुणितं क्रोधस्य अपूर्वस्पर्धकानां च ॥ ४८२ ।।
मानादीनामधिकक्रम लोभगपूर्व च वर्गणा तेपां ।
क्रोध इति च अष्ट पदानि अनंतगुणितक्रमाणि भवंति ॥ ४८३ ॥
अर्थ-अश्वकरणकालके प्रथम अनुभागकांडकका घात होनेपर हुए क्रोधके अपूर्वस्पर्धक
थोड़े हैं उससे मानादिके विशेष अधिक क्रमलिये हुए हैं । उससे प्रदेशकी एक गुणहा-
निके स्पर्धकोंका प्रमाण असंख्यातगुणा है । उससे एकस्पर्धकमेंकी वर्गणाओंका प्रमाण अन-
न्तगुणा है । उससे क्रोधके सब अपूर्वस्पर्धकोंकी वर्गणाओंका प्रमाण अनंतगुणा है । उससे
मानके सब अपूर्व स्पर्धकोंकी वर्गणा विशेष अधिक क्रमलिये हैं । और लोभके अपूर्वस्पर्ध-
कोंकी वर्गणाओंके प्रमाणसे लोभके पूर्वस्पर्धकोंका प्रमाण अनन्तगुणा है । उससे लोभके
पूर्वस्पर्धकोंकी वर्गणाको प्रमाण अनन्तगुणा है। उससे मायादिका प्रमाण क्रोधकी व-
गणापर्यंत उलटे क्रमसे अनन्तगुणा है । इस प्रकार आठ स्थानोंका अल्पवहुत्व जानना
॥ ४८१ । ४८२ । ४८३ ॥
रसठिदिखंडाणेवं संखेजसहस्सगाणि गंतूणं ।
तत्थ य अपुवफड्डयकरणविही गिट्टिदा होई ॥ ४८४ ॥
रसस्थितिखंडानामेवं संख्येयसहस्रकानि गत्वा ।
तत्र च अपूर्वस्पर्धककरणविधिनिष्ठिता भवति ॥ ४८४ ॥
अर्थ-इसप्रकार क्रमसे हजारों अनुभागकांडक वीतजानेपर एकस्थितिकांडक होता
है। ऐसे संख्यात हजार स्थितिकांडक जिसमें हों ऐसा अन्तर्मुहूर्तमात्र अश्वकरणकाल होने-
पर अपूर्वस्पर्धककरणकी क्रिया पूर्ण होजाती है ॥ ४८४ ॥
आगे कृष्टि क्रियासहित अश्वकर्ण क्रिया होती है ऐसा यतिवृषभाचार्यका अभिप्राय
कहते हैं-
हयकण्णकरणचरिमे संजलणाणहवस्सठिदिबंधो।
वस्साणं संखेजसहस्साणि हवंति सेसाणं ॥ ४८५ ॥
हयकर्णकरणचरमे संज्वलनानामष्ठवर्षस्थितिबंधः ।
वर्षाणां संख्येयसहस्राणि भवंति शेषाणाम् ॥ ४८५ ॥

लब्धिसारः। अर्थ-अपूर्वस्पर्धक सहित अश्वकर्णकरणकालके अन्तसमयमें संज्वलनचारका आठ वर्षमान स्थितिबन्ध है । और शेपकाँका स्थितिवन्ध संख्यातहजार वर्षप्रमाण है । इसके पहले समयमें अधिक था ।। १८५॥ ठिदिसत्तमघादीणं असंखवस्साण होति घादीणं । वस्साणं संखेजसहस्साणि हवंति णियमेण ॥ ४८६ ॥ स्थितिसत्त्वमघातिनामसंख्यवर्षा भवंति घातिनाम् । वर्षाणां संख्येयसहस्राणि भवंति नियमेन ॥ ४८६ ॥ अर्थ-उसी अन्तसमयमै अघातिया नाम गोत्र वेदनीयका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्ष- मात्र है पहले समयमें अधिक था । और चार घातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातवर्षमात्र है ।। ४८६ ॥ इस तरह अपूर्वस्पर्धकका अधिकार पूर्ण हुआ। आगे कृष्टिकरणमेसे वादरकृष्टिकरणकालका प्रमाण कहते हैं- छक्कम्मे संछुद्धे कोहे कोहस्स बेदगद्धा जा। तस्स य पढमतिभागो होदि हु हयकण्णकरणद्धा ॥ १८७ ॥ विदियतिभागो किट्टीकरणद्धा फिट्टिवेदगद्धा हु। तदियतिभागो किट्टीकरणो हयकण्णकरणं च ॥ ४८८ ॥ पटूकर्मणि संक्षुब्धे क्रोधे क्रोधस्य वेदकाद्धा या । तस्य च प्रथमत्रिभागः भवति हि हयकर्णकरणाद्धा ॥ ४८७ ॥ द्वितीयत्रिभागः कृष्टिकरणाद्धा कृष्टिवेदकाद्धा हि । तृतीयत्रिभागः कृष्टिकरणं हयकर्णकरणं च ॥ ४८८ ॥ अर्थ-छह नोकषायोंको संज्वलनक्रोधी संक्रमणकर अन्तर्मुहूर्तमात्र क्रोधवेदककाल है। उसमेंसे पहला त्रिभाग अर्श्वकर्णकरणका काल है, दूसरा त्रिभाग कुछ कम है वह चार संज्वलनकपायोंके कृष्टि करनेका काल है वह वर्त रहा है और तीसरा त्रिभाग कुछ कम है वह क्रोधकृष्टिका वेदककाल है सो आगे प्रवर्तेगा । इस कृष्टिकरणकालमें भी अश्व- कर्णकरण पायाजाता है। क्योंकि यहां भी अश्वकरणके समान संज्वलनकपायोंका अनुभा- गसत्त्व वा अनुभागकांडक वर्तता है इसलिये यहां कृष्टिसहित अश्वकर्णकरण पाया जाता है ऐसा जानना ॥ ४८७ । ४८८॥ कोहादीणं सगसगपुवापुत्वगयफड्ढयेहिंतो। उक्कड्डिदूण दचं ताणं किट्टी करेदि कमे ॥ ४८९ ॥ क्रोधादीनां स्वकस्वकपूर्वापूर्वगतस्पर्धकान् । अपकर्पयित्वा द्रव्यं तेपां कृष्टिः करोति क्रमेण ॥ ४८९ ।।

रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम्। अर्थ-संज्वलन क्रोध मान माया लोमका अपना २ पूर्व अपूर्वस्पर्द्धकरूप सव द्रव्यको अपकर्षण भागहारसे भाजितकर एकभागमात्रद्रव्य ग्रहणकर यथा क्रमसे उन क्रोधादि- कोंकी कृष्टि करता है ॥ ४८९ ॥ उक्कट्टिददचस्स य पल्लासंखेजभागवहुभागो। बादरकिट्टिणिवद्धो फहयगे सेसइगिभागो ॥ ४९० ॥ अपकर्पितद्रव्यस्य च पल्यासंख्येयभागवहुभागः । वादरकृष्टिनिवद्धः स्पर्धके शेपैकभागः ॥ ४९० ॥ अर्थ-अपकर्षण किये द्रव्यको पल्यका असंख्यातवां भागसे भाजितकर बहुभागमात्र द्रव्य वादरकृष्टिका है और शेप एक भागमात्र द्रव्य पूर्व अपूर्व स्पर्धकोंमें निक्षेपण किया जाता है ॥ ४९० ॥ किट्टीयो इगिफहयवग्गणसंखाणणंतभागो दु । एकेकम्हि कसाये तियंति अहवा अणंता वा ॥ ४९१ ॥ कृष्टय एकस्पर्धकवर्गणासंख्यानामनंतभागस्तु । एकैकस्मिन् कपाये त्रिकत्रिकमथवा अनंता वा ॥ ४९१ ॥ अर्थ-एकस्पर्धकमें वर्गणाशलाकाके अनन्तवें भागमात्र सव कृष्टियोंका प्रमाण है । अनुभागके अल्पबहुत्वकी अपेक्षा एक एक कषायमें संग्रह कृष्टि तीन तीन हैं और एक एक संग्रह कृष्टिमें अन्तर कृष्टियां अनन्त अनन्त हैं ॥ ४९१ ॥ अकसायकसायाणं दबस्स विभंजणं जहा होई। किटिस्स तहेव हवे कोहो अकसायपडिबद्धं ॥ ४९२ ॥ अकषायकपायाणां द्रव्यस्य विभंजनं यथा भवति । कृष्टस्तथैव भवेत् क्रोधो अकपायप्रतिवद्धः ॥ ४९२ ।। अर्थ-नोकषाय और कषायोंके द्रव्यका विभाग जैसे होता है वैसे ही इनकी कृष्टि- योंके प्रमाणका विभाग जानना । और नोकषायकी कृष्टियां क्रोधकी कृष्टियोंमें जोड़नी । क्योंकि नोकषायोंका सव द्रव्य संज्वलनक्रोधरूप संक्रमण हुआ है ॥ ४९२ ।। पढमादिसंगहाओ पल्लासंखेज्जभागहीणाओ। कोहस्स तदीयाए अकसायाणं तु किट्टीओ॥ ४९३ ॥ प्रथमादिसंग्रहाः पल्यासंख्येयभागहीनाः । क्रोधस्य तृतीयायामकपायानां तु कृष्टयः ॥ ४९३ ।। अर्थ-पूर्वरीतिसे.प्रथम आदि बारह संग्रह कृष्टियोंका आयाम पल्यके असंख्यातवें लब्धिसारः। १३५ भागके क्रमसे घटता जानना । और नोकपायकी सत्र कृष्टियें क्रोधकी तीसरी संग्रहकृष्टिम प्राप्त जाननी || ४९३ ॥ कोहस्स य माणस्स य मायालोभोदएण चडिदस्स । वारस णव छ तिणि य संगहकिट्टी कमे होति ॥ ४९४ ॥ क्रोधस्य च मानस्य च मायालोभोदयेन चटितस्य । द्वादश नव पटू त्रीणि च संग्रहकृष्टयः क्रमेण भवंति ॥ ४९४ ॥ अर्थ-संज्वलनक्रोधके उदय सहित श्रेणी चढनेवाले जीवके चारों कषायोंकी वारहे संग्रह कृष्टि होती हैं। मानके उदय सहितके तीन कषायोंकी नौ संग्रह कृष्टियां होती है। मायाके उदय सहितके छह संग्रह कृष्टियां और लोभके उदयसहित श्रेणी चढनेवालेके लोभकी ही तीन संग्रह कृष्टियां होती हैं । १९४ ॥ संगहगे एकेके अंतरकिट्टी हवंति हु अणंता। लोभादि अणंतगुणा कोहादि अर्णतगुणहीणा ॥ १९५ ॥ संग्रहके एकैकस्मिन् अंतरकृयो भवंति हि अनंताः । लोभादौ अनंतगुणाः क्रोधादौ अनंतगुणहीनाः ॥ ४९५ ।। अर्थ -एक एक संग्रह कृष्टिम अन्तर कृष्टियां अनन्त हैं। उनमें लोभसे लेकर क्रमसे अनन्तगुणा बढ़ता और क्रोधसे लेकर क्रमसे अनन्तगुणा घटता अनुभाग पाया जाता है ।। ४९५॥ लोभादी कोहोत्ति य सष्ठाणंतरमणंतगुणिदकमं । तत्तो वादरसंगहकिट्टी अंतरमणतगुणिदकमं ॥ ४९६ ।। लोभादितः क्रोधांतं च स्वस्थानांतरमनंतगुणितक्रमं । ततो बादरसंग्रहकप्टेरंतरमनंतगुणितक्रमम् ॥ ४९६ ॥ अर्थ-लोभसे लेकर क्रोधतक स्वस्थान अन्तर अनन्तगुणा क्रमलिये है । उससे बादर- संग्रहकृष्टियोंका अन्तर अनन्तगुणा क्रमलिये है ॥ ४९६ ।। लोहस्स अवरकिट्टिगदवादो कोधजेकिहिस्स । दघोति य हीणकम देदि अणंतेण भागेण ॥ ४९७ ।। लोभस्य अवरकृष्टिगद्रव्यात् क्रोधज्येप्टकृप्टेः । द्रव्यांतं च हीनकम दीयते अनंतेन भागेन । ४९७ ॥ : अर्थ-लोभकी जघन्य कृष्टिके द्रव्यसे लेकर क्रोधकी उत्कृष्टकृष्टिके द्रव्यतक हीन क्रमलिये द्रव्य दिया जाता वह अनन्तभाग घटता क्रमलिये है ॥ ४९७ ॥ . है रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । लोभस्स अवरकिट्टिगदपादो कोधजेट्टकिट्टिस्स । दवं तु होदि हीणं असंखभागेण जोगेण ॥ ४९८ ॥ लोभस्यावरकृष्टिगद्रव्यतः क्रोधज्येष्ठकृष्टेः । द्रव्यं तु भवति हीनं असंख्यभागेन योगेन ॥ ४९८ ॥ अर्थ-लोभकी जघन्यकृष्टिके द्रव्यसे क्रोधकी उत्कृष्ट कृष्टिका द्रव्य असंख्यातवें भाग- कर हीन है ॥ ४९८॥ पडिसमयमसंखगुणं कमेण उक्कट्टिण दचं खु । संग्रहहेटापासे अपुवकिट्टी करेदी हु ॥ ४९९ ।। प्रतिसमयमसंख्यगुणं क्रमेणापकृष्य द्रव्यं खलु । संग्रहाधस्तनपाधै अपूर्वकृष्टिं करोति हि ॥ ४९९ ।। अर्थ-समय २ प्रति असंख्यातगुणा क्रमलिये द्रव्यको अपकर्षणकर संग्रह कृष्टिक नीचे वा पार्श्वमें अपूर्वकृष्टिको करता है ॥ ४९९ ॥ पूर्वसमयमें की हुई कृष्टियोंमें जो नवीनद्रव्यका निक्षेपण करना वह पार्थम करना समझना । हेटा असंखभागं फासे वित्थारदो असंखगुण । मज्झिमखंडं उभये दवविसेसे हवे फासे ॥५०० ॥ अधस्तनमसंख्यभागं पार्श्वे विस्तारतो असंख्यगुणं । मध्यमखंडमुभयं द्रव्यविशेपं भवति पार्थे ॥ ५०० ॥ अर्थ-संग्रहके नीचे की हुई कृष्टियों का प्रमाण सबके असंख्यातवें भागमात्र है और पार्श्वमें की हुई कृष्टियोंका प्रमाण उनसे असंख्यात गुणा है । वहां पार्श्वमें की हुई कृष्टि- योंमें मध्यमखण्ड और उभयद्रव्य विशेष होता है ॥ ५० ॥ पुत्वादिम्हि अपुवा पुब्वादि अपुव्वपढमगे सेसे । दिजदि असंखभागेणूणं अहियं अणंतभागूणं ॥ ५०१ ॥ पूर्वादौ अपूर्वा पूर्वादौ अपूर्वप्रथमके शेपे । दीयते असंख्यभागेनोनमधिकं अनंतभागोनं ॥ ५०१ ॥ अर्थ-अपूर्व ( नवीन ) कृष्टिकी अन्तकृष्टिसे पहले जो पुरातनकृष्टि उसकी आदि कृष्टिमें असंख्यातवें भाग घटता द्रव्य दिया जाता है और पूर्व (पुरातन ) कृष्टिकी अन्त- कृष्टिसे अपूर्व ( नवीन ) कृष्टि उसकी प्रथमकृष्टिमें असंख्यातवां भागमात्र अधिक द्रव्य- दिया जाता है । तथा शेष सब कृष्टियोंमें पूर्वकृष्टिसे उत्तरकृष्टिमें द्रव्य अनंतवां भागमात्र घटता हुआ दिया जाता है । ५०१॥. .

लब्धिसारः। . १३७ वारेकारमणतं पुवादि अपुवआदि सेसं तु । तेवीस ऊंटकूडा दिजे दिस्से अणंतभागूणं ॥ ५०२ ॥ द्वादशैकादशमनंत पूर्वादि अपूर्वादि शेपं तु । त्रयोविंशतिरुष्ट्रकूटा देये दृश्ये अनंतभागोनम् ॥ ५०२ ॥ अर्थ-पुरातन प्रथमकृष्टि बारह और नवीन प्रथमकृष्टि ग्यारह तथा शेषवष्टियां अनंत जानना । इसप्रकार देयद्रव्यमें तेवीस स्थानोंमें उष्ट्रकूट ( ऊंटकी पीठ समान ) रचना होती है । और दृश्यमानद्रव्यमें अनन्तवें भागमात्र घटता हुआ क्रम जानना ॥ ५०२ ।। किट्टीकरणद्धाए चरिमे अंतोसुहत्तसुज्जत्तो। चत्तारि होति मासा संजलणाणं तु ठिदिवंधो ॥ ५०३ ॥ कृष्टिकरणाद्धायाः चरमे अंतर्मुहूर्तसंयुक्ताः । चत्वारो भवंति मासाः संज्वलनानां तु स्थितिबंधः ॥ ५०३ ।। अर्थ-कृष्टिकरणकालके अन्तसमयमें अन्तर्मुहूर्त अधिक चार मास प्रमाण संज्वलन- चारका स्थितिबन्ध है । अपूर्वस्पर्धककरणकालके अन्तसमयमें आठ वर्षमात्र था वह एक एक स्थितिवन्धापरणमें अन्तर्मुहूर्तमान कम होकर यहां इतना रहजाता है ।। ५०३ ॥ सेसाणं वस्साणं संखेजसहस्सगाणि ठिदिबंधो। मोहस्स य ठिदिसंतं अडवस्संतोमुत्तहियं ।। ५०४ ॥ शेपाणां वर्षाणां संख्येयसहस्रकानि स्थितिवंधः । मोहस्य च स्थितिसत्त्वं अष्टवर्पोन्तर्मुहूर्ताधिकः ॥ ५०४ ॥ अर्थ-शेषकर्मोंका स्थितिवन्ध संख्यातहजार वर्षमात्र है । पहले भी संख्यातहजार वर्ष- मात्र ही था वह संख्यातगुणा घटता क्रमरूप संख्यातहजार स्थितिवन्धापसरण होनेपर भी आलापकर इतना ही कहा है । और मोहनीयका स्थितिसत्त्व पहले संख्यातहजार वर्षमात्र, था वह.घटकर यहां अन्तर्मुहूर्त अधिक आठवर्षमात्र रहा है ॥ ५०४ ॥ पादितियाणं संखं बस्ससहस्साणि होदि ठिदिसंतं । वस्साणमसंखेजसहस्साणि अघादितिण्णं तु ॥ ५०५ ॥ 'घांतित्रयाणां संख्यं वर्पसहस्राणि भवति स्थितिसत्त्वम् । वर्षाणामसंख्येयसहस्राणि अघातित्रयं तु ॥ ५०५ ।। अर्थ-तीन घातियाओंका संख्यातहजार वर्षप्रमाण स्थितिसत्त्व है और तीन अघाति- याओंका असंख्यातहजार वर्षमात्र स्थितिसत्त्व है ॥ ५०५ ॥ पडिपदमणतगुणिदा किट्टीयो फहया विसेसहिया । किट्टीण फड्ढयाणं लक्षणमणुभागमासेज ॥ ५०६ ॥ ल.सा.१८ १३८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रतिपदमनंतगुणिता कृष्टयः स्पर्धका विशेपाधिकाः । कृष्टीनां स्पर्धकानां लक्षणमनुभागमासाद्य ॥ ५०६ ॥ अर्थ-कृष्टियां प्रतिपद अनन्तगुणा अनुभागलिये हैं । स्पर्धक विशेष अधिक अनुमा- गलिये हैं । इसप्रकार अनुभागका आश्रयकर कृष्टि और स्पर्धकोंका लक्षण है । द्रव्यकी अपेक्षा तो चय घटता क्रम दोनों में ही है परंतु अनुभागके क्रमकी अपेक्षा इनका लक्षण जुदा कहा है ॥ ५०६ ॥ पुत्रापुचप्फड्ढयमणुहवदि हु किट्टिकारओ णियमा । तस्सद्धा णिहायदि पढमहिदि आपलीसेसे ॥ ५०७ ।। पूर्वापूर्वस्पर्धकमनुभवति हि कृष्टिकारको नियमात् । तस्याद्धा निष्ठापयति प्रथमस्थितौ आवलिशेपे ॥ ५०७ ॥ अर्थ-कृष्टिकरनेवाला उस कालमें पूर्व अपूर्वस्पर्धकोंके ही उदयको नियमसे भोगता है । इसप्रकार संज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमें उच्छिष्टावलीमात्र काल शेष रहनेपर उस कृष्टिकरणकालको समाप्त करता है । ५०७ ॥ इसतरह कृष्टिकरण अधिकार हुआ। अब कृष्टिवेदना अधिकारको कहते हैं, से काले किट्टीओ अणुहवदि हु चारिमासमडवस्सं । बंधो संतं मोहे पुवालावं तु सेसाणं ॥ ५०८ ॥ खे काले कृष्टीन् अनुभवति हि चतुर्मासमष्टवर्प । बंधः सत्त्वं मोहे पूर्वालापस्तु शेपाणाम् ॥ ५०८ ।। अर्थ-अपने कृष्टिवेदककालमें कृष्टियोंके उदयको अनुभवता है । द्वितीय स्थितिके निषकोंमें स्थित कृष्टियोंको प्रथमस्थितिके निपेकोंमें प्राप्तकर भोगता है उस भोगनेका नाम वेदना है। उसके कालके प्रथमसमयमें चार संज्वलनरूप मोहका स्थितिवन्ध चार महीने है और स्थितिसत्त्व आठवर्षमात्र है । तथा शेषकर्मोंका स्थितिवन्ध स्थितिसत्त्व आलापकर पूर्वोक्तप्रकार जानना ॥ ५०८ ॥ ताहे कोहुच्छिटुं सवं घादी हु देसघादी हु। दोसमऊणदुआवलिणवर्क ते फहयगदाओ ॥ ५०९ ॥ तत्र क्रोधोच्छिष्टं सर्व घातिहिं देशघातिर्हि । द्विसमयोनब्यावलिनवकं तत् स्पर्धकगतम् ॥ ५०९ ॥ अर्थ-अनुभाग सत्त्व है वह क्रोधकी उच्छिष्टावलिका तो सर्वघाती है । और संज्व- लन चौकड़ीका दो समय कम दो आवलिमात्र नवक समय प्रबद्धका अनुभाग देशघाति- शक्तिकर सहित है । क्योंकि कृष्टिरूप बन्ध नहीं है इसलिये स्पर्धकरूप शक्तिकर युक्त है ।। ५०९॥

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लब्धिसार।
लोहादो कोहादो कार वेदउ हवे किही।
आदिमसंगहकिटिं वेदयदि ण विदिय तिदियं च ॥ ५१० ॥
लोभात् क्रोधात् कारको वेदको भवेत् कृष्टेः ।
आदिमसंग्रहकृष्टिं वेदयति न द्वितीयां तृतीयां च ॥ ५१० ॥
अर्थ-कृष्टिका कारक तो लोभसे लेकर क्रमरूप है और वेदक है वह क्रोधसे लेकर
क्रमरूप है । तथा यहां पहले क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिको ही अनुभवता है द्वितीय तृतीय
संग्रह कृष्टिको नहीं अनुभवता ऐसा जानना ॥ ५१० ॥
किट्टीवेदगपढमे कोहस्स पढमसंगहादो दु ।
कोहस्स य पढमठिदी पत्तो उचट्टगो मोहे ॥ ५११ ॥
कृष्टिवेदकप्रथमे क्रोधस्य प्रथमसंग्रहात् तु ।
क्रोधस्य च प्रथमस्थितिं प्राप्तः अपवर्तको मोहे ॥ ५११ ॥
अर्थ-कृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें क्रोधकी प्रथम संग्रह कृष्टिसे क्रोधकी प्रथमस्थि-
ति करता है, इसप्रकार मोहकां घात करता है ॥ ५११ ॥
पढमस्स संगहस्स य असंखभागा उदेदि कोहस्स ।
वंधेवि तहा चेव य माणतियाणं तहा बंधे ॥ ५१२ ॥
प्रथमस्य संग्रहस्य च असंखभागान् उदयति क्रोधस्य ।
वंधेपि तथा चैव च मानत्रयाणां तथा बंधे ।। ५१२ ॥
अर्थ-कृष्टिवेदकके प्रथमसमयमै क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिको अन्तर कृष्टियोंके असं.
ख्यात बहुभाग उदय आते हैं । इसीतरह बन्धमें भी वीचकी असंख्यात बहुभागमात्र
कृष्टियां जानना । उसीप्रकार मानादि तीनकी असंख्यात बहुभागमात्र कृष्टियां बन्धती
हैं ॥ ५१२ ॥
कोहस्स पढमसंगहकिट्टिस्स य हेद्विमणुभयष्ठाणा ।
तत्तो उदयट्ठाणा उवरि पुण अणुभयट्ठाणा ॥ ५१३ ॥
उरि उदयट्ठाणा चत्तारि पदाणि होति अहियकमा ।
मज्झे उभयट्ठाणा होति असंखेजसंगुणिया ॥ ५१४ ॥
क्रोधस्य प्रथमसंग्रहकृष्टेवाधस्तनानुभयस्थानानि ।
तत उदयस्थानानि उपरि पुनरनुभयस्थानानि ॥ ५१३ ॥
उपरि उदयस्थानानि चत्वारि पदानि भवंति अधिकक्रमाणि ।
मध्ये उभयस्थानानि भवंति असंख्येयसंगुणितानि ॥ ५१४ ॥

१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी अन्तरकृष्टियोंमें नीचले अनुमय स्थान थोड़े हैं उससे उस कृष्टिके उदयस्थान पल्यके असंख्यातवें भागकर अधिक हैं । उससे ऊपरके अनुमय- स्थानरूप कृष्टियोंका प्रमाण अधिक है और उससे उदयस्थान अधिक है । इसतरह च पद तो अधिकक्रम लिये हैं । उससे असंख्यातगुणे वीचके उभयस्थान हैं ॥५१३१५१४॥ यह प्रथमसमयमें अल्पवहुत्व कहा है । विदियादिसु चउठाणा पुचिल्लेहिं असंखगुणहीणा । तत्तो असंखगुणिदा उवरिमणुभया तदो उभया ॥ ५१५ ॥ द्वितीयादिपु चतुःस्थानानि पूर्वभ्यो असंख्यगुणहीनानि । ततो असंख्यगुणितानि उपर्यनुभयानि तत उभयानि ॥ ५१५ ।। अर्थ-कृष्टिकरणकालके द्वितीयादिसमयों में चारों स्थान पूर्वसे असंख्यातगुणे कम है उससे असंख्यातगुणे ऊपरके अनुभयस्थान हैं उससे वीचमें वन्ध उदयरूप उभयकृष्टियां असंख्यातगुणी हैं ॥ ५१५ ॥ पुचिल्लवंधजेट्टा हेटासंखेज्जभागमोदरिय । संपडिगो चरिमोदयवरमवरं अणुभयाणं च ।। ५१६ ।। पौर्विकवंधज्येष्ठात् अधस्तनमसंख्येयभागमवतीर्य । सांप्रतिकः चरमोदयवरमवरं अनुभयानां च ॥ ५१६ ।। अर्थ-पूर्वसमयके बन्धकी उत्कृष्टकृष्टि से लेकर असंख्यातवें भागमात्र कृष्टि नीचे उत- रफर वर्तमान उत्तरसमयकी अन्तकी केवल उदयरूप उत्कृष्ट कृष्टि होती है । उसके बाद ऊपर अनुभयकृष्टिकी जघन्यकृष्टि पाई जाती है ॥ ५१६ ॥ हेटिमणुभयवरादो असंखबहुभागमेत्तमोदरिय । संपडिबंधजहणं उदयुक्तस्सं च होदिति ॥ ५१७ ॥ अधस्तनानुभयवरात् असंख्यवहुभागमात्रमवतीर्य । संप्रतिबंधजघन्यं उदयोत्कृष्टं च भवतीति ॥ ५१७॥ अर्थ-पूर्वसमयकी अनुभय कृष्टियोंका असंख्यात बहुभागमात्र कृष्टि नीचे उतरकर वर्तमान बन्धकृष्टिकी जघन्यकृष्टि होती है उसके वाद उदयकृष्टि उत्कृष्ट होती है ।।५१७|| पडिसमय अहिगदिणा उदये वंधे च होदि उक्कस्सं । बंधुदये च जहणणं अणंतगुणहीणया किट्टी ॥ ५१८ ।। प्रतिसमयमहिगतिना उदये वंधे च भवति उत्कृष्टं । बंधोदये च जघन्यं अनंतगुणहीनका कृष्टिः ॥ ५१८ ।। अर्थ -समय समय प्रति सर्पकी गतिकी तरह उत्कृष्ट तौ उदय और वन्धमें होती लन्धिसारः। है तथा जघन्य कृष्टि वन्ध और उदयमें अनन्तगुणा घटता क्रमलिये अनुभाग अपेक्षा जाननी ॥ ५१८॥ अब संक्रमणद्रव्यका विधान कहते हैं। संकमदि संगहाणं दवं सगहेछिमस्स पढमोति । तदणुदये संखगुणं इदरेसु हवे जहाजोग्गं ॥ ५१९ ।। संक्रामति संग्रहाणां द्रव्यं खकाधस्तनस्य प्रथम इति । - तदनुदये संख्यगुणमितरेषु भवेत् यथायोग्यम् ॥ ५१९ ॥ अर्थ-संग्रह कृष्टिका द्रव्य है वह अपनी कषायके नीचेकी कपायकी प्रथमसंग्रहक. ष्टितक संक्रमण करता है । उसके बाद भोगने योग्य संग्रह कृष्टिमें संख्यातगुणा द्रव्य संक्र- मण होता है। अन्यकृष्टियोंमें यथायोग्य संक्रमण होता है ॥ ५१९ ।। आगे अनुसमय अपवर्तनकी प्रवृत्तिका क्रम कहते हैं। पडिसमयं संखेजदिभागं णासेदि कंडयेण विणा । बारससंगहकिट्टीणग्गादो किद्विवेदगो णियमा ॥ ५२० ।। प्रतिसमयं संख्येयभागं नाशयति कांडकेन विना । द्वादशसंग्रहकृष्टीनामग्रतः कृष्टिवेदको नियमात् ॥ ५२० ॥ अर्थ-कृष्टिवेदक जीव है वह कांडक विना चारह संग्रह कृष्टियोंके अग्रभागसे सव कृष्टियोंके असंख्यातवें भागको हरसमय नियमसे नष्ट करता है ।। ५२० ॥ णासेदि परहाणिय गोउंछं अग्गकिट्टियादादो। . सट्टाणियगोउच्छं संकमदवादु घादेदि ॥ ५२१ ॥ नाशयति परस्थानिकं गोपुच्छमग्रकृष्टिघातात् । स्वस्थानिकगोपुच्छं संक्रमद्रव्यात् घातयति ।। ५२१ ॥ अर्थ-अग्रकृष्टिघातसे तो परस्थान गोपुच्छको नष्ट करता है और संक्रम द्रव्यसे ख- स्थान गोपुच्छको नष्ट करता है ॥ ५२१ ॥ आयादो वयमहियं हीणं सरिसं काहपि अण्णं च । तम्हा आयद्दवा ण होदि सटाणगोउच्छं ॥ ५२२ ॥ आयतो व्ययमधिकं हीनं सशं कुत्रापि अन्यञ्च । तस्मादायद्रव्यान्न भवति स्वस्थानगोपुच्छम् ।। ५२२ ।। अर्थ-कहींपर संग्रहकृष्टिमें आयद्रव्यसे व्ययद्रव्य अधिक है कहीं हीन है कहीं समान है कहीं दोनोंमेंसे एक ही है । इसलिये आयद्व्यसे खस्थान गोपुच्छ नहीं होता ॥५२२॥.

. .. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । : अव जिसतरह संस्थान परस्थान गोपुच्छका सद्भाव होता है. वैसे कहते हैं- घादयदवादो पुण वय आयदखेत्तदवगं देदि । सेसासंखाभागे अणंतभागूणयं देदि ॥ ५२३ ॥ घातकद्रव्यात् पुनर्व्ययमायतक्षेत्रद्रव्यर्फ ददाति । शेषासंख्यभागे अनंतभागोनकं ददाति ।। ५२३ ॥ अर्थ-घातद्रव्यसे व्यय और आयतक्षेत्र द्रव्यको देनेसे एक स्वस्थान गोपुच्छ होता है । शेष असंख्यातभागमें अनन्तभाग कम द्रव्य दिया जाता है यह दूसरा गोपुच्छ हुआ ॥ ५२३ ॥ उदयगदसंगहस्स य मज्झिमखंडादिकरणमेदेण । दवेण होदि णियमा एवं सवेसु समयेसु ॥ ५२४ ॥ . उदयगतसंग्रहस्य च मध्यमखंडादिकरणमेतेन । द्रव्येण भवति नियमादेवं सर्वेपु समयेषु ॥ ५२४ ।। !! अर्थ-उदयको प्राप्त संग्रह कृष्टिका इस घात द्रव्यसे ही मध्यमखण्डादि करना होता है। इसतरह समयसमय प्रति सब समयोंमें विधान होता है ॥ ५२४ । इसप्रकार घात- द्रव्यकर एक गोपुच्छ हुआ। अब दूसरा विधान कहते हैं- हेटाकिट्टिप्पहुदिसु संकमिदासंखभागमेत्तं तु । सेसा संखाभागा अंतरकिहिस्स दवं तु ॥ ५२५ ॥ अधस्तनकृष्टिप्रभृतिपु संक्रमितासंख्यभागमात्रं तु। शेपा असंख्यभागा अंतरकृष्टेद्रव्यं तु ॥ ५२५ ॥ अर्थसंक्रमणद्रव्यका असंख्यातवां भाग द्रव्य नीचेकी कृष्टिमें दिया जाता है और शेष असंख्यात बहुभाग अन्तरकृष्टियोंका द्रव्य है इसीसे अन्तरकृष्टिकी जाती है ॥५२५॥ वंधवाणंतिमभागं पुण पुवकिट्टिपडिबद्धं । सेसाणता भागा अंतरकिट्टिस्स.दवंतु ॥ ५२६ ॥ बंधद्रव्यानंतिमभाग पुनः पूर्वकृष्टिप्रतिवद्धम् । शेषानंता भागा अंतरकृप्टेर्द्रव्यं तु ॥ ५२६ ॥ । अर्थ-बन्धद्रव्यका अनन्तवा भाग पूर्वकृष्टि संबन्धी है और शेष अनन्त बहुभोग अन्तर कृष्टियोंका द्रव्य है। इस द्रव्यसे नवीनं अन्तरकृष्टि की जाती है.॥ ५२६ ॥ . प लब्धिसारः। . १४३ कोहस्स पढमकिटिं मोत्तूणेकारसंगहाणं तु । बंधणसंकमदचादपुवकिट्टि करेदी हु ॥ ५२७ ॥ क्रोधस्य प्रथमकृष्टिं मुक्त्वा एकादशसंग्रहाणां तु । बंधनसंक्रमद्रव्यादपूर्वकृष्टिं करोति हि ।। ५२७ ॥ अर्थ-क्रोधकी प्रथम संग्रह कृष्टिके विना शेष ग्यारह संग्रह कृष्टियोंके यथासंभव बन्धद्रव्य अथवा संक्रमद्रव्यसे अपूर्व कृष्टि करता है ॥ ५२७ ।। संखातीदगुणाणि य पल्लरसादिमपदाणि गंतूण । एकेकवंधकिट्टी किट्टीणं अंतरे होदि ॥ ५२८ ।। संख्यातीतगुणानि च पल्यस्यादिमपदानि गत्वा । एकैकबंधकृष्टिः कृष्टीनामंतरे भवति ॥ ५२८.।। अर्थ-अवयवकृष्टियोंका असंख्यातवां भागमात्र बन्ध योग्य नहीं है और वीचमें जो बन्धने योग्य हैं उनकी दो कृष्टियोंके वीचमें एक अन्तराल है ऐसे पल्यके प्रथमवर्गमूल- मात्र अन्तरालोंको छोड़कर उन कृष्टियोंके वीचमें एक एक अपूर्वकृष्टि होती है ॥ ५२८॥ दिजदि अणतभागेणूणकर्म बंधगे य पंतगुणं । तण्णंतरे गंतगुणूणं तत्तोणतभागूणं ॥ ५२९ ॥ दीयते अनंतभागेनोनक्रमं बंधके चानंतगुणम् । तदनंतरेऽनंतगुणोनं ततोऽनंतभागोनम् ।।. ५२९ ॥ अर्थ-अनन्तवें भागमात्रसे घटता द्रव्य दूसरी कृष्टिमें देते हैं जबतक अपूर्व कृष्टि प्राप्त न हो तबतक यह क्रम है । और उसके बाद पूर्वकृष्टियोंमें अनन्तगुणा कम द्रव्य दिया जाता है । उसके बाद अनन्तवां भागरूप विशेष घटता.क्रमलिये द्रव्य दिया जाता है जबतक कि अपूर्वकृष्टि प्राप्त न हो ॥ ५२९ ॥ इसप्रकार बन्धकृष्टिका खरूप कहा। संकमदो किट्टीणं संगहकिट्टीणमंतरे होदि । संगह अंतरजादो किट्टी अंतरभवा असंखगुणा.॥ ५३०॥ संक्रमतः कृष्टीनां संग्रहकृष्टीनामंतरे भवति । संग्रहे अंतरजातः कृष्टिरंतर्भवा असंख्यगुणा ॥ ५३०॥, अर्थ-संक्रमणद्रव्यसे उत्पन्न हुई अपूर्वकृष्टियां कितनी एक तो संग्रहकृष्टियों के नीचे होती हैं और कुछ उनके अंतरालमें उत्पन्न होती हैं । वहांपर संग्रहकृष्टियोंके अन्तरालमें उत्पन्न हुई कृष्टियोंसे अवयव कृष्टियोंके अंतरालमें हुई कृष्टियां असंख्यातगुणी हैं ॥५३०॥ १ "बंधणदव्वादों पुण चदुसहाणेसु पढमकिटीसु..। वंधुप्पवकिट्टीदो संकमकिटी असंखगुणा"। यह गाथा क पुस्तकमें है। .. .

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । संगहअंतरजाणं अपुवकिहि व वंधकिट्टि वा । इदराणमंतरं पुण पल्लपदासंखभागं तु ॥ ५३१ ॥ संग्रहांतरजानामपूर्वकृष्टिमिव बंधकृष्टिमिव । इतरेपामंतरं पुनः पल्यपदासंख्यभागस्तु ॥ ५३१ ॥ अर्थ-संग्रहकृष्टियोंके नीचे कृष्टि की थीं वहां द्रव्य देनेका विधान अपूर्वकृष्टिके समान जानना । और दूसरी कृष्टियोंका अन्तरालरूपस्थान पल्यके वर्गमूलका असंख्यातवां भाग है ॥ ५३१॥ कोहादिकिद्विवेदगपढमे तस्स य असंखभागं तु । णासेदि हु पडिसमयं तस्सासंखेजभागकमं ॥ ५३२ ॥ क्रोधादिकृष्टिवेदकप्रथमे तस्य च असंख्यभागस्तु । नाशयति हि प्रतिसमयं तस्यासंख्येयभागक्रमम् ॥ ५३२ ॥ अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका वेदक जीव प्रथमसमयमें सब कृष्टियोंका असंख्या- तवां भागमात्र कृष्टियोंको नाश करता है और इसीतरह क्रमसे हरएक समयमें असंख्यातवां भागमात्र घांत जानना ॥ ५३२ ।। कोहस्स य जे पढमे संगहकिदिम्हि पट्टकिट्टीओ। बंधुज्झियकिट्टीणं तस्स असंखेजभागो हु ॥ ५३३ ॥ क्रोधस्य च ये प्रथमे संग्रहकृष्टौ नष्टकृष्टयः । घोज्झितकृष्टीनां तस्यासंख्येयभागो हि ॥ ५३३ ।। अर्थ-क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिवेदकके सब कालमें जो कृष्टियां घात हुई उनका प्रमाण बन्धरहित कृष्टियोंके प्रमाणके असंख्यातवें भाग है ॥ ५३३ ॥ कोहादिकिट्टियादिहिदिम्हि समयाहियावलीसेसे ताहे जहण्णुदीरइ चरिमो पुण वेदगो तस्स ॥ ५३४ ॥ क्रोधादिकृष्टिकादिस्थितौ समयाधिकावलीशेपे । तत्र जघन्यमुदीरयति चरमः पुनर्वेदकस्तस्य ॥ ५३४ ॥ अर्थ-क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टिकी प्रथमस्थिति में समय अधिक आवलि शेष रहनेपर जंघन्यस्थितिकी उदीरणा करता है और वहां ही उस वेदकका अन्तसमय होता है।।५३४॥ ताहे संजलणाणं बंधो अंतोमुहत्तपरिहीणो। सत्तोवि य सददिवसा अडमासभहियछचरिसा ॥ ५३५ ॥ तत्र संज्वलनानां वंधो अन्तर्मुहूर्तपरिहीनः । सत्त्वमपि च शतदिवसा अष्टमासाभ्यधिकषड्वोः ॥ ५३५ ।।

लब्धिसारः। ११५ अर्थ-वहां संज्वलनका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहर्तकम सौ दिन है, पहले चार महीने था। और उसका स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तक्रम आठमहीना अधिक छह वर्ष है, पहले आठ- वर्ष था सो घटकर इतना रहा ॥ ५३५ ॥ धादितियाणं बंधो दसवासं तोमुहुत्तपरिहीणा । सत्तं संखं वस्सा सेसाणं संखऽसंखवस्साणि ॥ ५३६ ॥ घातित्रयाणां वंधो दशवर्या अंतर्मुहूर्तपरिहीनाः । सत्त्वं संख्यं वर्षाः शेषाणां संख्यासंख्यवर्पाः ॥ ५३६ ।। अर्थ-घातिकर्मोंका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्तकम दशवर्षमात्र है और उनका स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्षमात्र है तथा अघातिकमांका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षमात्र है और आयुके विना तीन अघातियाओंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षमात्र है ॥ ५३६ ॥ इसप्रकार क्रोधकी प्रथमसंग्रह कृष्टिवेदकका कथन किया । से काले कोहस्स य विदियादो संगहादु पढमठिदी। कोहस्स विदियसंगहकिट्टिस्स य वेदगो होदि ।। ५३७ ॥ खे काले क्रोधस्य च द्वितीयतः संग्रहात् प्रथमस्थितिः । क्रोधस्य द्वितीयसंग्रहकप्टेश्च वेदको भवति ॥ ५३७ ॥ अर्थ उसके बाद अपने कालमें क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टि से अपकर्षणकर उदयादि गुणश्रेणीरूप प्रथमस्थिति करता है वहांपर ही क्रोधकी द्वितीयसंग्रह कृष्टिका वेदक होता है ।। ५३७ ॥ कोहस्स पढमसंगहकिहिस्सावलिपमाण पढमठिदी। दोसमऊणदुआवलिणवकं च वि चेउदे ताहे ॥ ५३८ ॥ क्रोधस्य प्रथमसंग्रहकृष्टेरावलिप्रमाणं प्रथमस्थितिः । द्विसमयोनद्ध्यावलिनवकं चापि चतुर्दश तत्र ।। ५३८ ।। अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी प्रथमस्थितिमें उच्छिष्टावलिमात्र निषेक और द्विती- यस्थितिमें दो समय कम दो आवलिमात्र नवकसमयप्रबद्धरूप निषेक शेष सत्त्वरूप रहते हैं उसकालमें क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका द्रव्य चौदहगुणा होजाता है ।। ५३८ ।। पढमादिसंगहाणं चरिमे फालिं तु विदियपहुदीणं । हेष्ठा सवं देदि हु मज्झे पुवं व इगिमागं ॥ ५३९ ।। प्रथमादिसंग्रहाणां चरमे फालिं तु द्वितीयप्रभृतीनाम् । अधस्तनं सर्व ददाति हि मध्ये पूर्व इव एकभागम् ।। ५३९ ।। अर्थ-प्रथमादिसंग्रह कृष्टियोंके अन्तसमयमें जो संक्रमण द्रव्यरूप फालि उसको ल.सा. १९

'१४६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
द्वितीयादि संग्रहकृष्टियोंके नीचे सब देते हैं और मध्यमें पूर्ववत् एक भागको देते
हैं ॥ ५३९ ॥
कोहस्स विदियकिट्टी वेदयमाणस्स पढमकिर्टि वा।
उदओ बंधो णासो अपुवकिट्टीण करणं च ॥ ५४॥
क्रोधस्य द्वितीयकृष्टिं वेदकस्य प्रथम कृष्टिरिव ।
उदयो बंधो नाशो अपूर्वकृष्टीनां करणं च ॥ ५४० ॥
अर्थ-क्रोधकी द्वितीयसंग्रह कृष्टिका वेदक जीवके उदय, बंध, घात और अपूर्वकृष्टि-
योंका करना इत्यादि विधान प्रथमसंग्रहकृष्टिके समान जानना चाहिये ॥ ५४० ॥
कोहस्स विदियसंगहकिट्टी वेदंतयस्त संकमणं ।
सटाणे तदियोति य तदणंतर हेट्ठिमस्स पढमं च ॥ ५४१ ॥
क्रोधस्य द्वितीयसंग्रहकृष्टिं वेद्यमानस्य संक्रमणं ।
स्वस्थाने तृतीयांतं च तदनंतरमधस्तनस्य प्रथमं च ॥ ५४१ ।।
अर्थ-क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिके वेदकके स्वस्थान (विवक्षितकपाय ) में संक्रमण
होवे तो तीसरी संग्रह पर्यंत होता है और परस्थान अपनेसे नीचेकी कपायकी प्रथमसं.
ग्रह कृष्टिमें होता है ॥ ५४१॥
पढमो विदिये तदिये हेटिमपढमे च विदियगो तदिये।
हेछिमपढमे तदियो हेछिमपढमे च संकमदि ॥ ५४२ ॥
प्रथमो द्वितीये तृतीये अधस्तनप्रथमे च द्वितीयकस्तृतीये ।
अधस्तनप्रथमे तृतीयोऽधस्तनप्रथमे च संक्रामति ॥ ५४२ ।।
अर्थ-विवक्षितकषायकी पहली संग्रहकृष्टिका द्रव्य अपनी दूसरी तीसरी और नीचली
कषायकी पहली संग्रहकृष्टिमें संक्रमण करता है, दूसरी संग्रह कृष्टिका द्रव्य अपनी तीसरी
और नीचली कषायकी पहली संग्रहकृष्टिमें संक्रमण करता है और तीसरी संग्रह कृष्टिका
द्रव्यं नीचली कषायकी पहली संग्रहकृष्टिमें ही संक्रमण करता है ॥ ५४२ ॥
कोहस्स पढमकिट्टी सुण्णोति ण तस्स अत्थि संकमणं ।
लोभंतिमकिट्टिस्स य णस्थि पडित्थावणूणादो ॥ ५४३ ॥
क्रोधस्य प्रथमकृष्टिः शून्या इति न तस्यास्ति संक्रमणं।
'लोमांतिमकृष्टेश्च नास्ति प्रतिस्थापनमूनतः ॥ ५४३ ॥
अर्थ-क्रोधकी प्रथम संग्रहकृष्टि तो शून्य हुई इसलिये उसका संक्रमण नहीं होता
और लोभकी तीसरी संग्रहकृष्टिका भी संक्रमण नहीं होता, क्योंकि उलटे संक्रमणका
अभाव है ॥ ५४३ ॥

लब्धिसारः। १४७ जस्स कसायस्स जं किदि वेदयदि तस्स तं चेव । सेसाण कसायाणं पढमं किटिं तु वंधदि हु ॥ ५४४ ॥ यस्य कपायस्य यां कृष्टिं वेदयति तस्य तां चव शेषाणां कपायाणां प्रथमां कृष्टिं तु वध्नाति हि ॥ ५४४ ॥ अर्थ-जिस कपायकी जिस संग्रहकृष्टिको भोगता है उस कपायकी उसी संग्रहकृष्टिको वांधता है । और शेष कपायोंकी प्रथमसंग्रह कृष्टिको बांधता है ऐसा नियम है ।। ५४४ ॥ माणतिय कोहतदिये मायालोहस्स तियतिये अहिया। संखगुणं वेदिजे अंतरकिट्टी पदेसो य ॥ ५४५ ।। मानत्रये क्रोधतृतीये मायालोभस्य त्रिकत्रिके अधिका। संख्यगुणं वेद्यमाने अंतरकृष्टिः प्रदेशश्च ।। ५४५ ।। अर्थ-अवयवकृष्टियोंके द्रव्यका अल्पबहुत्व ऐसे है कि मानकी तीन, क्रोधकी तीसरी और माया लोभकी तीन तीन इनमें विशेष अधिक अवयव कृष्टियोंका तथा प्रदेशोंका ( परमाणुओंका) प्रमाणं है । और वेद्यमान ( भोग्य ) क्रोधकी दूसरी कृष्टिने संख्यातगुणा है ॥ ५४५॥ वेदिजादिद्विदिए समयाहियआवलीयपरिसेसे। ताहे जहण्णुदीरणचरिमो पुण वेदगो तस्स ॥ ५४६ ॥ वेद्यमानादि स्थितौ समयाधिकावलिकपरिशेपे । तत्र जघन्योदीरणचरमः पुनः वेदकस्तस्य ॥ ५४६ ।। अर्थ-जिस संग्रहकृष्टिको वेदता है उसकी प्रथमस्थितिम दो आवलि शेप रहनेपर आगाल प्रत्यागालका नाश होता है और समय अधिक आवलि शेष रहनेपर जघन्यस्थि. तिका उदीरक तथा वेदकका अन्तसमय होजाता है ॥ ५४६ ॥ ताहे संजलणाणं बंधो अंतोमुहत्तपरिहीणो । सत्तोवि य दिणसीदी चउमासभहियपणवस्सा ॥ ५४७ ॥ तत्र संज्वलनानां वंधो अंतर्मुहूर्तपरिहीनः । सत्त्वमपि च दिनाशीतिः चतुर्मासान्यधिकपंचवर्षाः ॥ ५४७ ॥ अर्थ-वहां संज्वलनचारका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त्तकम असी दिन है और उनका सत्त्व भी अन्तर्मुहूर्तकम चारमास अधिक पांचवर्षमात्र है ॥ ५४७ ॥ घादितियाणं बंधो वासपुधत्तं तु सेसपयडीणं । वस्साणं संखेजसहस्साणि हवंति णियमेण ॥ ५४८ ॥ .

. . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । घातित्रयाणां बंधो वर्पपृथत्त्वं तु शेपप्रकृतीनाम् । वर्षाणां संख्येयसहस्राणि भवंति नियमेन ॥ ५४८॥ अर्थ-तीन घातियाओंका स्थितिवन्ध पृथक्त्व (तीनके ऊपर ) वर्षमात्र है और शेष अघातियाओंका स्थितिवन्ध संख्यातहजार वर्षमात्र नियमसे है ॥ ५४८ ॥ घादितियाणं सत्तं संखसहस्साणि होति वस्साणं । तिण्हं पि अघादीणं वस्साणि असंखमेत्ताणि ॥ ५४९ ॥ घातित्रयाणां सत्त्वं संख्यसहस्राणि भवति वर्षाणां । प्रयाणामपि अघातिनां वर्पा असंख्यमानाः ।। ५४९ ।। अर्थ-तीन घातियाओंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्ष है और आयुके विना तीन अघातियाओंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षमात्र है ॥ ५४९ ॥ काले कोहस्स य तदियादो संगहादु पढमठिदी। अंते संजलणाणं बंधं सत्तं दुमास चउवस्सा ॥ ५५० ॥ स्खे काले क्रोधस्य च तृतीयतः संग्रहात् प्रथमस्थितिः । अंते संज्वलनानां बंधं सत्त्वं द्विमासं चतुर्वः ॥ ५५० ॥ अर्थ-उसके बाद अपने कालमें क्रोधकी तीसरी संग्रहकृष्टिका वेदक होता है उस वेदककालसे आवलि अधिकमात्र प्रथमस्थिति करता है। और वहां अन्तसमयमें संज्वलन चारका स्थितिवन्ध दो महीने तथा स्थितिसत्त्व चार वर्षमात्र जानना । शेषकर्माका पूर्ववत् है ॥ ५५०॥ से काले माणस्स य पढमादो संगहादु पढमठिदी। माणोदयअद्धाए तिभागमेत्ता हु पढमठिदी ॥ ५५१ ॥ खे काले मानस्य च प्रथमात् संग्रहात् प्रथमस्थितिः । मानोदयाद्धायाः त्रिभागमात्रा हि प्रथमस्थितिः ॥ ५५१ ॥ अर्थ-उसके बाद अपने कालमें मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी गुणश्रेणीरूप प्रथमस्थिति करता है। वह मानके वेदककालका तीसरा भाग आवलिसे अधिक उस प्रथमस्थितिका प्रमाण है। वहां मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है ॥ ५५१ ॥ कोहपढमं व माणो चरिमे अंतोमुहुत्तपरिहीणो। दिणमासपण्णचत्तं बंधं सत्तं तिसंजलणगाणं ॥ ५५२ ॥ क्रोधप्रथमं व मानः चरमे अंतर्मुहूर्तपरिहीनः । दिनमासपंचाशच्चत्वारिंशत् बंधः सत्त्वं त्रिसंज्वलनानाम् ॥ ५५२ ।।

लन्धिसारः । १४९ अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिके वेदककी तरह मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका वेदकवि- धान जानना । और अन्तसमयमें क्रोधके विना तीन संज्वलनका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम पचास दिन है और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम चालीस महीनेमात्र है ॥ ५५२ ।। विदियस्स माणचरिमे चत्तं वत्तीसदिवसमासाणि । अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो तिसंजलणगाणं ॥ ५५३ ॥ द्वितीयस्य मानचरमे चत्वारिंशत्द्वात्रिंशत् दिवसमासाः । अंतर्मुहूर्तहीना बंधः सत्त्वं त्रिसंज्वलनानाम् ॥ ५५३ ॥ अर्थ-मानकी दूसरी संग्रहकृष्टिके वेदकके अन्तसमयमें तीन संज्वलनका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्तकम चालीस दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम बत्तीस महीनेमात्र है ॥५५॥ तदियस्स माणचरिमे तीसं चउवीस दिवसमासाणि । तिण्हं संजलणाणं ठिदिवंधो तह य सत्तो य ॥ ५५४ ॥ तृतीयस्य मानचरमे त्रिंशत् चतुर्विशत् दिवसमासाः । नयाणां संज्वलनानां स्थितिवंधस्तथा च सत्त्वं च ।। ५५४ ।। अर्थ-उसके बाद मानकी तीसरी संग्रहकृष्टिवेदकके अन्तसमयमें तीन संज्वलनका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम तीस दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम चौवीस महीने मात्र होता है ॥ ५५४ ॥ पढमगमायाचरिमे पणवीसं वीस दिवसमासाणि । अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो दुसंजलणगाणं ।। ५५५ ॥ प्रथमगमायाचरमे पंचविंशतिः विंशतिः दिवसमासाः । अंतर्मुहूर्तहीना बंधः सत्त्वं द्विसंज्वलनकयोः ॥ ५५५॥ अर्थ-मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टि वेदकके अन्तसमयमें संज्वलन माया लोभ इन दोका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहर्तकम पच्चीस दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम वीस महीनेका है ॥ ५५५ ॥ विदियगमायाचरिमे वीसं सोलं च दिवसमासाणि ।। अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो दुसंजलणगाणं ॥ ५५६ ॥ द्वितीयगमायाचरमे विशं पोडश च दिवसमासाः। अंतर्मुहूर्तहीना बंधः सत्त्वं द्विसंज्वलनकयोः ॥ ५५६ ॥ अर्थ-मायाकी दूसरी संग्रहकृष्टिवेदकके अन्तसमयमें दो संज्वलनोंका स्थितिवन्ध अन्तर्मुहूर्तकम वीस दिन है और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम सोलह महीना है ।। ५५६ ॥

. १५० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तदियगमायाचरिमे पण्णरवारसय दिवसमासाणि । दोण्हं संजलणाणं ठिदिवंधो तह य सत्तो य ॥ ५५७ ॥ तृतीयकमायाचरमे पंचदशद्वादश दिवसमासाः । द्वयोः संज्वलनयोः स्थितिबंधस्तथा च सत्त्वं च ॥ ५५७ ॥ अर्थ-मायाकी तीसरी संग्रहकृष्टिवेदकके अन्तसमयमें दो संज्वलनोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम पन्द्रह दिन है और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम बारह महीने है ॥ ५५७ ॥ मासपुधत्तं वासा संखसहस्साणि बंध सत्तो य । घादितियाणिदराण संखमसंखेज्जवस्साणि ॥ ५५८ ।। मासपृथक्त्वं वर्षाः संख्यसहस्राः बंधः सत्त्वं च । घातित्रयाणामितरेप संख्यमसंख्येयवः ।। ५५८ ॥ अर्थ-तीन घातियाओंका स्थितिबन्ध पृथक्त्वमासप्रमाण है और स्थितिसत्त्व संख्या- तहजार वर्षमात्र है । तथा तीन अघातियाओंका स्थितिबन्ध संख्यातवर्षमात्र है और स्थि- तिसत्त्व असंख्यातवर्षमात्र है ।। ५५८ ।। लोहस्स पढमचरिम लोहस्संतोमुहुत्त बंधदुगे । दिवसपुधत्तं वासा संखसहस्साणि घादितिये ॥ ५५९ ॥ लोभस्य प्रथमचरमे लोभस्यांतर्मुहूर्त बंधद्विके । दिवसपृथक्त्वं वर्षाः संख्यसहस्रा घातित्रये ॥ ५५९ ॥ अर्थ-लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिवेदकके अन्तसमयमें संज्वलनलोभका स्थितिवन्ध अथवा स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्त है परंतु बन्धसे सत्व संख्यातगुणा है। और तीन घातियाओंका स्थितिबन्ध पृथक्त्वदिनमात्र तथा स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्ष है ॥ ५५९ ।। सेसाणं पयडीणं वासपुधत्तं तु होदि ठिदिवंधो । ठिदिसत्तमसंखेजा वस्साणि हवंति णियमेण ॥ ५६० ।। शेषाणां प्रकृतीनां वर्षपृथक्त्वं तु भवति स्थितिबंधः । स्थितिसत्त्वमसंख्येया वर्षा भवंति नियमेन ॥ ५६० ॥ अर्थ-शेष तीन अघातियाओंका.स्थितिबन्ध पृथक्त्ववर्षमात्र है और स्थितिसत्त्व असं- ख्यातवर्षमात्र नियमसे होता है ॥ ५६० ॥ से काले लोहस्स य विदियादो संगहादु पढमठिदी। ताहे सुहुमं किहि करेदि तविदियतदियादो ॥ ५६१ ॥ खे काले लोभस्य च द्वितीयतः संग्रहात् प्रथमस्थितिः । तन सूक्ष्मां कृष्टिं करोति तद्वितीयतृतीयतः ॥ ५६१ ॥ -- . " . .

. लब्धिसारः। अर्थ-उसके बाद अपने कालमें लोमकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे गुणश्रेणिरूप प्रथमस्थिति करता है उसका प्रमाण शेष अनिवृत्तिकरणकालके आवलिमात्र अधिक है । और उसीका- लमें लोमकी द्वितीयसंग्रहकृष्टि और तृतीयसंग्रहकृष्टि से सूक्ष्म अनुभाग शक्तिवाली सूक्ष्म- कृष्टिको करता है ।। ५६१ ॥ लोहस्स तदियसंगहकिट्टीए हेतुदो अवट्ठाणं । सुहमाणं किट्टीणं कोहस्स य पढमकिट्टिणिभा ।। ५६२ ।। लोभस्य तृतीयसंग्रहकृष्टया अधस्तनतो अवस्थानम् । सूक्ष्मानां कृष्टीनां क्रोधस्य च प्रथमकृष्टिनिभा ॥ ५६२ ।। अर्थ--उन सूक्ष्मकृष्टियोंका लोभकी तीसरी संग्रहकृष्टिके नीचे अवस्थान है और वे सूक्ष्मकृष्टिका क्रोधकी प्रथमकृष्टिके समान हैं ।। ५६२ ॥ कोहस्स पढमकिट्टी कोहे छुद्धे दु माणपढमं च । माणे छुद्धे मायापढमं मायाए संछुद्धे ॥ ५६३ ॥ लोहस्स पढमकिट्टी आदिमसमयकदसुहुमकिट्टी य अहियकमा पंचपदा सगसंखेजदिमभागेण ॥ ५६४ ॥ क्रोधस्य प्रथमकृष्टिः क्रोधे क्षुब्धे तु मानप्रथमं च । माने क्षुब्धे मायाप्रथमं मायायां संक्षुब्धायाम् ॥ ५६३ ।। लोभस्य प्रथमकृष्टिरादिमसमयकृतसूक्ष्मकृष्टिश्च ।. अधिकक्रमाणि पंचपदानि स्वकसंख्येयभागेन ॥ ५६४ ॥, अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकी अवयवकृष्टियां थोड़ी हैं। क्रोधकी तीनों संग्रह कृष्टियां मानकीके ऊपर मिलानेसे मानकी प्रथमसंग्रहकी अवयवकृष्टियां अधिक हैं । मानकी तीनों कृष्टियां मायाके ऊपर मिलानेसे मायाकी प्रथमसंग्रहकी अवयवकृष्टियां अधिक हैं, मायाकी तीनों संग्रहकृष्टियां लोभके ऊपर मिलानेसे लोमकी प्रथमसंग्रहकी अवयवकृष्टिं विशेष अधिक । इसतरह ये पांच स्थान संख्यातवां भाग अधिक क्रमलिये जानना ॥५६३ । ५६४ ॥ सुहुमाओ किट्टीओ पडिसमयमसंखगुणविहीणाओ। दरमसंखेजगुणं विदियस्स य लोहचरिमोत्ति ॥ ५६५ ॥ सूक्ष्माः कृष्टयः प्रतिसमयमसंख्यगुणविहीनाः । द्रव्यमसंख्येयगुणं द्वितीयस्य च लोभचरम इति ।। ५६५ ।।- अर्थ—सूक्ष्मकृष्टियां क्रमसे समय समय प्रति असंख्यातगुणी कम हैं और द्रव्य संख्या- तगुणा द्वितीयसमयसे लेकर लोभकी सूक्ष्मकृष्टिके अन्तसमयतक जानना ।। ५६५ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । दवं पढमे समये देदि हु सुहुमेसणंतभागूणं । थूलपढमे असंखगुणूणं तत्तो अणंतभागूणं ॥ ५६६ ॥ द्रव्यं प्रथमे समये ददाति हि सूक्ष्मेष्वनंतभागोनम् । स्थूलप्रथमे असंख्यगुणोनं ततो अनंतभागोनम् ॥ ५६६ ॥ अर्थ-सूक्ष्मकृष्टिकरणकालके प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टिकी जघन्यकृष्टि से लेकर अनन्तवां भाग घटता हुआ क्रमलिये, उत्कृष्ट सूक्ष्मकृष्टिसे प्रथम जघन्यवादर कृष्टिमें असंख्यातगुणा घटता और उससे द्वितीयादि वादर कृष्टियोंमें अनन्तवां भाग घटता क्रमलिये द्रव्य दिया जाता है ॥ ५६६ ॥ इसतरह प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टिकी प्ररूपणा समाप्त हुई । विदियादिसु समयेसु अपुचाओ पुवकिट्टिहेठाओ। पुवाणमंतरेसुवि अंतरजणिदा असंखगुणा ॥ ५६७ ॥ द्वितीयादिपु समयेपु अपूर्वाः पूर्वकृष्टयधस्तनाः । पूर्वासामंतरेष्वपि अंतरजनिता असंख्यगुणाः ॥ ५६७ ।। अर्थ-द्वितीय आदि समयोंमें अपूर्व ( नवीन ) सूक्ष्मकृष्टियां पूर्वकृष्टियोंके नीचे की जाती हैं और उनके वीच वीचमें अन्तर कृष्टियां की जाती हैं । वहां अधस्तन कृष्टियोंसे अन्तरकृष्टियोंका प्रमाण असंख्यातगुणा है ॥ ५६७ ॥ दवगपढमे सेसे देदि अपुवेसणंतभागूणं । पुवांपुवपवेसे असंखभागूणमहियं च ॥ ५६८ ॥ द्रव्यगप्रथमे शेपे ददाति अपूर्वेष्वनंतभागोनम् । पूर्वापूर्वप्रवेशे असंख्यभागोनमधिकं च ॥ ५६८ ॥ अर्थ-द्वितीयादि समयोंमें प्रथमसमयकी तरह द्रव्य दिया जाता है । विशेष इतना है कि सूक्ष्मकृष्टिके द्रव्यको अधस्तन अपूर्वकृष्टियोंमें अनन्तवां. भाग घटता हुआ क्रमलिये, पूर्वकृष्टिके प्रवेशमें असंख्यातवां भागमात्र घटता और अपूर्वकृष्टि के प्रवेश होनेपर असंख्या- तवां भागमात्र अधिक द्रव्य दिया जाता है ॥ ५६८ ।। पढमादिसु दिस्सकमं सुहुमेसु अणंतभागहीणकर्म । वादरकिट्टिपदेसो असंखगुणिदं तदो हीणं ॥ ५६९ ॥ प्रथमादिषु दृश्यक्रमं सूक्ष्मेष्वनंतभागहीनक्रमम् । बादरकृष्टिप्रदेशो असंख्यगुणितस्ततो हीनः ॥ ५६९ ।। अर्थ-प्रथमादिसमयोंमें दृश्यमान द्रव्यका क्रम सूक्ष्मकृष्टियोंमें अनन्तगुणा घटता क्रम- लिये है। उसके बाद द्वितीयादि द्वितीयसंग्रहकी अन्त वादरकृष्टिपर्यंत दृश्यमानद्रव्य अन- न्तगुणा घटता क्रमलिये है ऐसा जानना ॥ ५६९ ॥.

लन्धिसारः। १५३ लोहस्स तदियादो सुहुमगदं विदियदो दु तदियगदं । विदीयादो सुहुमगदं दवं संखेजगुणिदकमं ॥ ५७० ।। लोमस्य तृतीयतः सूक्ष्मगतं द्वितीयतस्तु तृतीयगतं । द्वितीयतः सूक्ष्मगतं द्रव्यं संख्येयगुणितक्रमम् ।। ५७० ।। अर्थ-लोभकी तीसरी संग्रहकृष्टि से सूक्ष्मकृष्टिरूप परिणत हुआ द्रव्य थोड़ा है उस द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे तीसरी संग्रह कृष्टिरूप परिणत द्रव्य संख्यातगुणा है और लोभकी द्वितीय संग्रहकृष्टिसे सूक्ष्मकृष्टिरूप परिणत द्रव्य संख्यातगुणा है ॥ ५७० ॥ किट्टीवेदगपढमे कोहस्स य विदियदो दु तदियादो। माणस्स य पढमगदो माणतियादो दु माणपढमगदो ॥ ५७१ ॥ मायतिगादो लोभस्सादिगदो लोभपढमदो विदियं । तदियं च गदा दवा दसपदमद्धियकमा होति ॥ ५७२ ॥ कृष्टिवेदकप्रथम क्रोधस्य च द्वितीयतस्तु तृतीयतः । मानस्य च प्रथमगतं मानत्रयात् तु मानप्रथमगतः ॥ ५७१ ।। मानत्रिकात् लोभस्यादिगतो लोभप्रथमतो द्वितीयं । तृतीयं च गतानि द्रव्याणि दशपदमधिकक्रमाणि भवंति ॥ ५७२ ॥ अर्थ-बादरकृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें क्रोधकी द्वितीयसंग्रह कृष्टि से मानकी प्रथम- संग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ द्रव्य थोड़ा है, उससे क्रोधकी तीसरी संग्रहकृष्टिसे मानकी प्रथ- मसंग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष अधिक है, उससे मानकी प्रथम संग्रहकृष्टिसे मायाकी प्रथमसंग्रहमें संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष अधिक हैं, उससे मानकी दूसरी संग्रह- कृष्टिसे मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टि में संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष अधिक है, उससे मानकी तीसरी संग्रहकृष्टिसे मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमं संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष अधिक है, उस मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष अधिक है, उस मायाकी दूसरी संग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ प्रदेश विशेष अधिक है, उससे मायाकी तीसरी संग्रहसे लोभकी प्रथमसंग्रहमें संक्रमण हुआ प्रदेश विशेष अधिक है, उस लोभकी प्रथम संग्रहकृष्टिसे लोभकी दूसरी संग्रहकृ- ष्टिमें संक्रमण हुआ प्रदेशसमूह विशेष अधिक है और उससे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे लोभकी तीसरी संग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ प्रदेश विशेषअधिक है | इसतरह दशस्थान अधिक क्रमलिये जानने ॥ ५७१ । ५७२ ॥ कोहस्स य पढमादो माणादी कोधतदियविदियगदं । तत्तो संखेजगुणं अहियं संखेजसंगुणियं ॥ ५७३ ॥ ल,सा.२०

१५४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
क्रोधस्य च प्रथमात् मानादौ क्रोधतृतीयद्वितीयगतम् ।
ततः संख्येयगुणमधिकं संख्येयसंगुणितम् ॥ ५७३ ।।
अर्थ-क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे मानकी प्रथमसंग्रहमें संक्रमण द्रव्य संख्यातगुणा है,
उससे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे क्रोधकी तीसरी संग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ द्रव्य विशेष
(पल्यका असंख्यातवां भाग ) अधिक है, उसके बाद क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे क्रोधकी
दूसरी संग्रहकृष्टिमें संक्रमण हुआ प्रदेशसमूह संख्यातगुणा है ।। ५७३ ॥
लोभस्स विदियकिहि वेदयमाणस जाव पढमठिदी।
आवलितियमवसेसं आगच्छदि विदियदो तदियं ॥ ५७८ ॥
लोभस्य द्वितीयकृष्टिं वेद्यमानस्य यावत् प्रथमस्थितिः ।
आवलिनिकसवशेपमागच्छति द्वितीयतस्तृतीयम् ॥ ५७४ ।।
अर्थ-इसप्रकार लोभकी द्वितीयकृष्टिको वेदते हुए जीवके उसकी प्रथमस्थिति में जव-
तक तीन आवलि शेष रहें तबतक दूसरीसंग्रहसे तीसरी संग्रहको द्रव्य संक्रगणरूप होके
प्राप्त होता है ।। ५७४ ॥
तत्तो सुहुसं गच्छदि समयाहियआवलीयसेसाए ।
सचं तदियं सुकुसे णय उच्छिष्टुं विहाय विदियं च ।। ५७५ ।।
ततः सूक्ष्मं गच्छति समयाधिकावलीशेपायाम् ।
सर्व तृतीयं सूक्ष्मे नवकमुच्छिष्टं विहाय द्वितीयं च ॥ ५७५ ।।
अर्थ-द्वितीय संग्रहकी प्रथमस्थितिमें समय अधिक आवलि शेष रहनेपर अनिवृ-
त्तिकरणका अन्तसमय होता है वहां लोभकी तीसरी संग्रहकृष्टिका सब द्रव्य सूक्ष्मकृष्टिको
प्राप्त होता है और पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा आगेके समयमें उच्छिष्टावलिमात्र निपेक
और समयकम दो आवलिमात्र नवक समयप्रवद्ध इन दोनोंके विना अन्य सब द्वितीय
संग्रहका द्रव्य सूक्ष्मकृष्टिरूप परिणमता है ऐसा जानना ॥ ५७५ ॥
लोभस्स तिघादीणं ताहे अघादीतियाण ठिदिवंधो।
अंतो दु' मुहुत्तस्स य दिवसस्स य होदि परिसस्स ॥ ५७६ ॥
लोभस्य त्रिघातिनां तत्रापातित्रयाणां स्थितिबंधः।
अंतस्तु मुहूर्तस्य च दिवसस्य च भवति वर्पस्य ॥ ५७६ ॥
अर्थ-अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें संज्वलनलोभका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तमात्र
है। यहांपर ही मोहबन्धकी व्युच्छित्ति होती है। तीन घातियाओंका एक दिनसे कुछ
कम और तीन अघातियाओंका एक वर्षसे कुछ कम स्थितिबन्ध होता है ॥ ५७६ ॥

लब्धिसार। . १५५ ताणं पुण ठिदिसंत कमेण अंतोमुहुत्य होइ । वस्साणं संखेजसहस्साणि असंखवरसाणि ॥ ५७७ ॥ तेपां पुनः स्थितिसत्त्वं क्रमेणांतर्मुहूर्तकं भवति । वर्षाणां संख्येयसहस्राणि असंख्यवाणि ॥ ५७७ ॥ अर्थ-उनका स्थितिसत्त्व क्रमसे लोभका अन्तर्मुहूर्त, तीन घातियाओंका संख्यातह- नार वर्ष और तीन अघातियाओंका असंख्यात वर्षमात्र है ।। ५७७ ।। से काले सुहुमगुणं पडिवजदि सुहुमकिहिठिदिखंडं । आणायदि तद्दचं उच्चट्टिय कुणदि गुणसेटिं ।। ५७८ ।। खे काले सूक्ष्मगुणं प्रतिपद्यते सूक्ष्मकृष्टिस्थितिखंडं । आनयति तद्रव्यं अपकृष्य करोति गुणश्रेणिं ।। ५७८ ॥ अर्थ-अपने कालमें सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानको प्राप्त होता है वहांपर लोभकी सूक्ष्मकृ- टिके स्थितिखण्डको करता है और मोहके एकभाग द्रव्यको अपकर्षणकर गुणश्रेणी करता है ॥ ५७८ ॥ गुणसेढि अंतरहिदि विदियटिदि इदि हबंति पचतिया । सुहुमगुणादो अहिया अवद्विद्धदयादि गुणसेढी ॥ ५७९ ॥ गुणश्चेणिरंतरस्थितिः द्वितीयस्थितिरिति भवंति पर्वत्रयाणि । सूक्ष्मगुणतोऽधिका अवस्थितोदयादिः गुणश्रेणी ॥ ५७९ ॥ अर्थ-गुणश्रेणी अन्तरस्थिति द्वितीयस्थिति-ये तीन पर्व हैं । सूक्ष्मसापरायके कालसे कुछ विशेष अधिक उदयादि अवस्थितरूप गुणश्रेणी आयाम है ॥ ५७९ ॥ उक्कट्टिदइगिमार्ग गुणसेढीए असंखबहुभागं । अंतरहिदे विदियठिदी संखसलागा हि अवहरिया ॥ ५८० ॥ गुणिय चउरादिखंड़े अंतरसयलहिदिम्हि णिक्खिवदि । सेसबहुभागमावलिहीणे विदियहिदीए हु॥ ५८१ ॥ अपकर्पितैकभागं गुणश्रेण्यामसंख्यवहुभागम् । अंतरहिते द्वितीयस्थितिः संख्यशलाका हि अपहरिताः ॥ ५८०॥ गुणित्वा चतुरादिखंडे अंतरसकलस्थितौ निक्षिपति । शेपवहुभागमावलिहीने द्वितीयस्थितौ हि ॥ ५८१ ।। अर्थ-अपकर्षण किये द्रव्यका असंख्यातवां एक भाग द्रव्यको गुणश्रेणी आयाममें देते हैं और शेष असंख्यात वहुभागद्रव्यमें अन्तरस्थितिसे भाजित द्वितीयस्थितिरूप जो १५६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । संख्यातशलाका उसका भागदेनेसे जो आवे उस एकभागको चारसे गुणाकरे जो प्रमाण आवे उतना द्रव्य अन्तरस्थिति में दिया जाता है । और शेप बहुभागरूप सब द्रव्य अति- स्थापनावलीसे हीन जो द्वितीयस्थिति उसमें दिया जाता है ।। ५८० । ५८१ ॥ अंतरपढमठिदित्तिय असंखगुणिदक्कमेण दिजदि हु। हीणकम संखेजगुणूणं हीणक्कम तत्तो ॥ ५८२ ॥ अंतरप्रथमस्थित्यंतं च असंख्यगुणितक्रमेण दीयते हि हीनक्रम संख्येयगुणोनं हीनक्रमं ततः ॥ ५८२ ।। अर्थ-अन्तरायामकी प्रथमस्थितितक तो असंख्यातगुणा क्रमलिये द्रव्य दिया जाता है उसके बाद हीनक्रमलिये संख्यातगुणा घटता फिर हीनक्रमलिये द्रष्य दिया जाता है ॥ ५८२॥ अंतरपढमठिदित्ति व असंखगुणिदकमेण दिस्सदि हु। हीणकमेण असंखेजेण गुणं तो विहीणकर्म ॥ ५८३ ॥ अंतरप्रथमस्थित्यंतं च असंख्यगुणितक्रमेण दृश्यते हि । हीनक्रमेण असंख्येयेन गुणमतो विहीनक्रमम् ।। ५८३ ॥ अर्थ-वर्तमान दृश्यद्व्यसे अन्तरायामके प्रथमनिपेकतक असंख्यातगुणा. क्रमलिये दृश्यमान द्रव्य है । उसके बाद अन्तरामके प्रथमनिपेकतक विशेष घटता क्रमलिये है। और उसके बाद द्वितीयस्थितिके प्रथमनिषेकका दृश्यमान द्रव्य असंख्यातगुणा है उसके वाद उसके अन्तनिषेकतक विशेष घटता क्रमलिये दृश्यमान द्रव्य है ॥ ५८३ ॥ आगे प्रथम कांडककी अन्तफालिके द्रव्यका प्रमाणदिखलाते हैं;- कंडयगुणचरिमठिदी सविसेसा चरिमफालिया तस्स । संखेजभागमंतरठिदिम्हि सबे तु बहुभागं ॥ ५८४ ॥ कांडकगुणचरमस्थितिः सविशेपा चरमस्फालिका तस्य । संख्येयभागमंतरस्थितौ सर्वायां तु बहुभागम् ॥ ५८४ ॥ अर्थ-कांडकायामसे गुणित जो विशेषसहित अन्तस्थिति उसके प्रमाण अन्तफालिका द्रव्य है । उसका संख्यातवां भाग अन्तरस्थितिमें और संख्यात बहुभाग सब स्थितिमें दिया जाता है ॥ ५८४ ॥ अंतरपढमठिदिति य असंखगुणिदकमेण दिनदि हु। हीणं तु मोहविदियटिदिखंडयदो दुधादोति ॥ ५८५ ॥ अंतरप्रथमस्थितिरिति च असंख्यगुणितक्रमेण दीयते हि । हीनं तु मोहद्वितीयस्थितिकांडकतो द्विघात इति ।। ५८५ ॥

लब्धिसारः। १५७ अर्थ—मोहकी द्वितीयस्थितिकांडकघातसे लेकर द्विचरमकांडक घाततक द्रव्यको अन्त- रके प्रथमनिपेकपर्यंत तो असंख्यातगुणा क्रमकर देते हैं । और उसके ऊपर एक एक विशेष घटता क्रमलिये अतिस्थापनावलिपर्यंत द्रव्यदिया जाता है ॥ ५८५ ।। अंतरपढमठिदित्ति य असंखगुणिदक्कमेण दिस्सदि हु। हीणं तु मोहविदियट्ठिदिखंडयदो दुघादोत्ति ॥ ५८६ ॥ अंतरप्रथमस्थितिरिति च असंख्यगुणितक्रमेण दृश्यते हि । हीनं तु मोहद्वितीयस्थितिकांडकतो द्विघातांतम् ॥ ५८६ ।। अर्थ-मोहके द्वितीयस्थितिकांडकघातसे लेकर द्विचरमकांडक घाततक दृश्यमान द्रव्य गुणश्रेणीके प्रथमनिपेकसे गुणश्रेणीशीर्षके ऊपर अन्तरायामके प्रथमनिषेकतक असंख्यात- गुणा क्रम लिये है । उसके वाद अन्तमें एक विशेष घटता क्रम लिये दृश्यमान द्रव्य है ॥ ५८६ ॥ पढमगुणसेढिसीसं पुचिल्लादो असंखसंगुणियं । -उवरिमसमये दिस्सं विसेसअहियं हवे सीसे ॥ ५८७ ॥ प्रथमगुणश्रेणिशीर्ष पूर्वस्मात् असंख्यसंगुणितम् । उपरिमसमये दृश्यं विशेषाधिकं भवेत् शीर्षे ॥ ५८७ ॥ अर्थ-प्रथमसमयमें गुणश्रेणीशीर्ष पहलेसे असंख्यातगुणा है और आगेके समयमै शीर्ष दृश्यद्रव्य विशेष अधिक है ।। ५८७ ॥ सुहुमद्धादो अहिया गुणसेढी अंतरं तु तत्चो दु । पढम खंड पढंमे संतो मोहस्स संखगुणिदकमा ।। ५८८ ।। सूक्ष्माद्धातो अधिका गुणश्रेणी अंतरं तु ततस्तु । प्रथमं खंड प्रथमे सत्त्वं मोहस्य संख्यगुणितक्रमं ।। ५८८ ॥ अर्थ-सूक्ष्मसांपरायके कालसे असंख्यातवें भागकर अधिक मोहकी गुणश्रेणीका आयाम है, उससे अन्तरायाम संख्यातगुणा है, उससे सूक्ष्मसांपरायके मोहका प्रथमस्थि- तिकांडक आयाम संख्यातगुणा है, और उससे सूक्ष्मसापरायके प्रथमसमयमें मोहका स्थि. तिसत्त्व संख्यातगुणा है ।। ५८८ ॥ एदेणप्पाबहुगविधाणेण विदीयखंड्यादीसु । गुणसेढिमुल्झियेया गोपुच्छा होदि सुहमम्हि ॥ ५८९ ॥ एतेनाल्पवहुकविधानेन द्वितीयकांडकादिपु । गुणश्रेणिमुज्झित्वा एकं गोपुच्छं भवति सूक्ष्मे ॥ ५८९ ।।

१५८
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-इस अल्पबहुत्वविधानकर सूक्ष्मसापरायमें द्वितीय आदि स्थितिकांडकोंके कालम
गुणश्रेणीको छोड़ ऊपरकी सब स्थितिका एक गोपुच्छ होता है ।। ५८९ ॥
सुहमाणं किट्टीणं हेटा अणुदिण्णगा हु थोवाओ ।
उपरिं तु विसेसहिया मज्झे उदया असंखगुणा ॥ ५९० ॥
सूक्ष्मानां कृष्टीनां अधस्तना अनुदीर्णका हि स्तोकाः ।
उपरि तु विशेषाधिका मध्ये उदया असंख्यगुणाः ॥ ५९०॥
अर्थ-सूक्ष्मकृष्टियोंमें जो जघन्यकृष्टि आदि नीचेकी कृष्टियां उदयरूप नहीं होती
उनका प्रमाण थोड़ा है । उससे ऊपरली कृष्टियोंका प्रमाण पल्यासंख्यातवें भाग विशेषकर
अधिक है और वीचकी उदयरूप कृष्टियां असंख्यातगुणी हैं ॥ ५९० ॥
सुहमे संखसहस्से खंडे तीदे वसाणखंडेण ।
आगायदि गुणसेढी आगादो संखभागे च ॥ ५९१ ॥
सूक्ष्मे संख्यसहले खंडेऽतीतेऽवसानखंडेन ।
आगाप्यते गुणश्रेणी अग्रतः संख्यभागे च ॥ ५९१ ।।
अर्थ-सूक्ष्मसांपरायमें संख्यातहजार स्थितिकांडक वीतनेपर अन्तके स्थितिखण्डसे
पूर्वगुणश्रेणी आयामके संख्यातवें भागमात्र आयाममें गुणश्रेणी करता है ॥ ५९१ ॥
एत्तो सुहुमंतोत्ति व दिजस्स य दिस्समाणगस्स कमो।
सम्मत्तचरिमखंडे तक्कदिकज्जेवि उत्तं च ॥ ५९२ ॥
इतः सूक्ष्मांत इति च देयस्य च दृश्यमानस्य क्रमः ।
सम्यक्त्वचरमखंडे तत्कृतकार्यपि उक्तमिव ॥ ५९२ ।।
अर्थ-यहाँसे लेकर सूक्ष्मसांपरायके अन्ततक देय द्रव्य और दृश्यमानद्रव्यका क्रम
है वह जैसे सम्यक्त्वमोहनीयके अन्तस्थितिकांडकमें अथवा उसके कृतकृत्यपनेमें पहले
कहा था वैसे ही जानना ॥ ५९२ ॥
उकिपणे अवसाणे खंडे मोहस्स णत्थि ठिदिघादो।
ठिदिसत्तं मोहस्स य सुहुमद्धासेसपरिमाणं ॥ ५९३ ॥
उत्कीर्णेऽवसाने खंडे मोहस्य नास्ति स्थितिघातः।
स्थितिसत्त्वं मोहस्य च सूक्ष्माद्धाशेषपरिमाणं ॥ ५९३ ॥
अर्थ-इसप्रकार मोहराजाके मस्तक समान लोभके अन्तकांडकका घातकरते हुए मोह-
का स्थितिघात नहीं होता । अब सूक्ष्मसांपरायका जितना काल शेष रहा है उतना ही मो-
हका स्थितिसत्त्व रहा है ॥ ५९३ ॥

लब्धिसारः। १५९ णामदुगे वेयणिये अडवारमुहुत्तय तिघादीणं । अंतोमुहुत्तमेत्तं ठिदिवंधो चरिम सुहमम्हि ॥ ५९४ ।। नामद्विके वेदनीये अष्टद्वादशमुहूर्तकं निघातिनाम् । अंतर्मुहूर्तमात्रं स्थितिबंधः चरमे सूक्ष्मे ॥ ५९४ ॥ अर्थ-सूक्ष्मसांपरायके अन्तसमयमें नामगोत्रका आठ मुहूर्त, वेदनीयका वारह मुहूर्त, और तीन घातियाओंका अन्तर्मुहूर्तमात्र जघन्यस्थितिबन्ध होता है । ५९४ ॥ तिण्डं घादीणं ठिदिसंतो अंतोमुहुत्तमेत्तं तु । तिण्हमघादीणं ठिदिसंतमसंखेजवस्साणि ॥ ५९५ ॥ त्रयाणां घातिनां स्थितिसत्त्वमंतर्मुहूर्तमानं तु । त्रयाणामघातिनां स्थितिसत्त्वमसंख्येयवः ॥ ५९५ ॥ अर्थ-तीन घातियाओंका स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तमात्र है और तीन अघातियाओंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षमात्र है ॥ ५९५ ॥ इसप्रकार कृष्टिवेदनाका अधिकार कहा। से काले सो खीणकसाओ ठिदिरसगबंधपरिहीणो। सम्मत्तडवस्सं वा गुणसेढी दिज दिस्सं च ॥ ५९६ ॥ खे काले स क्षीणकपायः स्थितिरसगवंधपरिहीनः । सम्यक्त्वाष्टवर्पमिव गुणश्रेणी देयं दृश्यं च ॥ ५९६ ॥ अर्थ --समस्त चारित्रमोहके क्षयके बाद अपने कालमें क्षीणकपायवाला होता है । वह स्थिति अनुभाग इन दोनों बन्धोंसे रहित है केवल योगके निमित्तसे प्रकृति प्रदेशरूप ईर्या- पथ वन्ध होता है। और जैसे सम्यक्त्वमोहनीयकी आठ वर्षकी स्थिति शेष रहनेपर कथ- न किया था उसी तरह यहां भी गुणश्रेणी वा देवद्रव्य वा दृश्यमान द्रव्य जानना।।५९६॥ यहां ऐसा जानना कि क्षीणकपायके प्रथमसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्ततक तो पहला पृथक्त्व- वितर्कविचार नामा शुक्लध्यान रहता है और क्षीणकपायकालका संख्यातवां भाग शेष रहनेपर एकत्ववितर्क अविचार नामा दूसरा शुक्लध्यान वर्तता है । घादीण मुहत्तंतं अघादियाणं असंखगा भागा। ठिदिखंडं रसखंडो अणंतभागा असत्थाणं ॥ ५९७ ॥ घातिनां मुहूर्तातमघातिकानामसंख्यका भागा। स्थितिखंड रसखंड अनंतभागा अशस्तानाम् ॥ ५९७ ॥ अर्थ-इस क्षीणकषायमें तीन घातियाओंका अन्तर्मुहूर्तमात्र और तीन अघातियाओंका पूर्वसत्त्वके असंख्यात बहुभागमात्र स्थितिकांडक आयाम है और अप्रशस्तप्रकृतियोंका पूर्वके अनन्त बहुभाग अनुभागकांडकका आयाम है ।। ५९७ ॥

१६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। वहुठिदिखंडे तीदे संखा भागा गदा तदद्धाए । चरिमं खंडं गिण्हदि लोमं वा तत्थ दिजादि ॥ ५९८ ॥ बहुस्थितिखंडेऽतीते संख्यभागा गतास्तद्धायाः । चरमं खंडं गृहाति लोभ इव तत्र देयादि ॥ ५९८ ॥ अर्थ-पूर्वरीतिसे क्रमसे बहुत स्थितिकांडक वीत जानेपर क्षीणकषायकालके संख्यात बहुभाग वीतं जानेपर तीन घातियों के अन्तकांडकको ग्रहण करता है । वहां देयादि द्रव्य- का विधान सूक्ष्मलोभके समान जानना ॥ ५९८ ॥ चरिमे खंडे पडिदे कदकरणिजोत्ति भण्णदे एसो। तस्स दुचरिमे णिहा पयला सत्तुदयवोछिण्णा ॥ ५९९ ॥ चरमे खंडे पतिते कृतकरणीय इति भण्यते एषः। तस्य द्विचरमे निद्रा प्रचला सत्त्वोदयव्युच्छिन्ना ॥ ५९९ ॥ अर्थ-इसप्रकार अन्तकांडकका घात होनेपर इसको कृतकृत्य वेदक छमस्थ कहते हैं । और क्षीणकषायके द्विचरमसमयमें निद्रा प्रचला कर्मका सत्त्व और उदयका व्युच्छेद हुआ ॥ ५९९॥ आगे पुरुष वेद और मानादिकषायसहित श्रेणी चढनेवालेके विशेषता कहते हैं- कोहस्स य पढमठिदीजुत्ता कोहादिएकदोतीहि । खवणद्धा हि कमसो माणतियाणं तु पढमठिदी ॥६०० ॥ क्रोधस्य च प्रथमस्थितियुक्ता क्रोधादिएकद्वित्रयाणाम् । क्षपणाद्धा हि क्रमशो मानत्रयाणां तु प्रथमस्थितिः॥ ६०० ॥ अर्थ-क्रोधकी प्रथमस्थिति सहित क्रोधादि एक दो तीन कषायोंका क्षपणाकाल क्रमसे मानादि तीन कषायोंकी प्रथमस्थिति होती है ॥ ६०० ॥ माणतियाणुदयमहो कोहादिगिदुतिय खवियपणिधम्हि । हयकण्णकिट्टिकरणं किच्चा लोहं विणासेदि । ६०१ ॥ मानत्रयाणामुदयमथ क्रोधाद्येकद्वित्रयं क्षपकप्रणिधौ। हयकर्णकिट्टिकरणं कृत्वा लोभं विनाशयति ॥ ६०१ ॥ अर्थ-मानादिक तीन कषायोंके उदयसहित श्रेणी चढा जीव क्रमसे क्रोधादिक एक दो तीन कषायोंका क्षपणाकालके निकट अश्वकर्ण सहित कृष्टिकरणको करके लोभका नाश ॥६०१॥ इसप्रकार पुरुषवेदसहित चढे चारप्रकार जीवोंकी विशेषता कही। करता लब्धिसारः। १६१ अब स्त्रीवेदसहित चढे चारप्रकार जीवोंके विशेष कहते हैं। पुरिसोदएण चडिदस्सित्थी खवणद्धउत्ति पढमठिदी। इत्थिस्स सत्तकम्मं अवगदवेदो समं विणासेदि ॥ ६०२ ॥ पुरुषोदयेन चटितस्य स्त्री क्षपणाद्धांतं प्रथमस्थितिः । स्त्रिया सप्तकर्माणि अपगतवेदः समं विनाशयति ॥ ६०२ ॥ अर्थ-पुरुषवेदसहित चढे हुए जीवके स्त्रीवेदके क्षपणाकालतक प्रथमस्थिति होती है। स्त्रीवेद सहित चढा जीव वेद उदयकर रहित हुआ सात नोकषायके क्षपणाकालमें सब सात नोकषायोंको खिपाता है ।। ६०२ ॥ अब नपुंसकवेद सहित चढे जीवोंका व्याख्यान करते हैं। थीपढमहिदिमेत्ता संढस्सवि अंतरादु सेढेक। तस्सद्धाति तदुवरि संढा इच्छि च खबदि धीचरिमे ॥ ६०३ ॥ अवगयवेदो संतो सत्त कसाये खवेदि कोहुदये । पुरिसुदये चडणविही सेसुदयाणं तु हेटुवरि ॥ ६०४ ॥ खीप्रथमस्थितिमात्रा पंढस्यापि अंतरात् पंढेकः । तस्याद्धा इति तदुपरि पंढं स्त्री च क्षपयति स्त्रीचरमे ॥ ६०३ ॥ अपगतवेदः संतः सप्त कपायान् क्षपयति क्रोधोदयेन । पुरुपोदयेन चटनविधिः शेपोदयानां तु अधस्तनोपरि ।। ६०४ ॥ अर्थ-स्त्रीवेदकी प्रथमस्थिति प्रमाण नपुंसकवेदकी भी प्रथमस्थिति स्थापन करता है । अन्तरकरणके वाद नपुंसकवेदका क्षपणाकाल है । उसके बाद स्त्रीवेदके क्षपणाकालके अंत- समयमें सब नपुंसक व स्त्रीवेदको एक समयमै क्षय करता है। उसके बाद वेद रहित हुआ सात नोकषायोंका क्षय करता है । अव शेष नीचे वा ऊपर सब विधान क्रोधके उदय और पुरुषवेदके उदयसहित श्रेणी चढे हुएके समान जानना ॥ ६०३ । ६०४ ।। इसतरह क्षीणकषायके द्विचरमसमयतक कथन किया। अब आगेका कथन करते हैं- चरिमे पढमं विग्धं चउर्दसण उदयसत्तवोछिण्णा । से काले जोगिजिणो सवण्हू सबदरसी य ॥ ६०५ ॥ चरमे प्रथमं विघ्नं चतुर्दर्शनं उदयसत्त्वव्युच्छिन्नाः । खे काले योगिजिनः सर्वज्ञः सर्वदर्शी च ।। ६०५ ॥ अर्थ-क्षीणकषायके अन्तसमयमें पहला पांचप्रकार ज्ञानावरण पांचप्रकार अन्तराय ल.सा. २१ १६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । और चारप्रकार दर्शनावरण उदयसे और सत्त्वसे व्युच्छित्तिरूप होते हैं । इसप्रकार क्षीण- कषायके अन्तसमयमें धातिकर्मोंका नाश करके उसके बाद अपने कालमें सयोग केवली जिन होता है। वह सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होता है। उसका शरीर निगोदरहित परमौदा- रिक होजाता है ऐसा जानना ॥ ६०५ ॥ खीणे घादिचउक्के गंतचउक्कस्स होदि उप्पत्ती। सादी अपज्जवसिदा उकस्साणंतपरिसंखा ॥ ६०६ ॥ क्षीणे घातिचतुष्केऽनंतचतुष्कस्य भवति उत्पत्तिः । सादिरपर्यवसिता उत्कृष्टानंतपरिसंख्या ॥ ६०६ ।। अर्थ-चार घातियाकर्मोंका नाश होनेपर अनन्तज्ञानादि अनन्तचतुष्टयकी उत्पत्ति होती है और वह उत्कृष्टानन्तकी संख्या आदि सहित और अन्तरहित है ॥ ६०६ ॥ आवरणदुगाण खये केवलणाणं च दंसणं होइ । विरियतरायियस्स य खएण पिरियं हवे गंतं ॥ ६०७ ॥ आवरणद्विकयोः क्षये केवलज्ञानं च दर्शनं भवति । वीर्यातरायिकस्य च क्षयेण वीर्य भवेदनंतम् ॥ ६०७ ।। अर्थ-ज्ञानावरण दर्शनावरण इन दोनोंके नाशसे केवलज्ञान और केवल दर्शन होते हैं। और वीर्यातरायकर्मके क्षयसे अनन्तवीर्य होता है, वह सव पदार्थोंको सदाकाल जान- नेपर भी खेद नहीं होने देने में उपकारी ऐसी सामर्थ्यरूप है ।। ६०७ ॥ णवणोकसायविग्धचउक्काणं च य खयादणंतसुहं । अणुवममवावाहं अप्पसमुत्थं णिरावेक्खं ॥ ६०८ ॥ नवनोकषायविघ्नचतुष्काणां च क्षयादनंतसुखम् । अनुपममव्याबाधमात्मसमुत्थं निरपेक्षम् ॥ ६०८ ॥ 'अर्थ-नव नोकषाय और दानादि चार अन्तरायका क्षय होनेसे अनन्तसुख होता है । वह अनुपम है, किसीसे बाधा नहीं किया जाता इसलिये अव्यावाध है, आत्मासे ही उत्पन्न हुआ है और इन्द्रियादि अपेक्षासे रहित है ॥ ६०८ ॥ सत्तण्हं पयडीणं खयादु खइयं तु होदि सम्मत्तं । वरचरणं उवसमदो खयदो दु चरित्तमोहस्स ॥ ६०९ ॥ सप्तानां प्रकृतीनां क्षयात् क्षायिकं तु भवति सम्यक्त्वम् । वरचरणं उपशमतः क्षयतस्तु चारित्रमोहस्य ॥ ६०९ ।। अर्थ-चार अनन्तानुबन्धी और तीन मिथ्यात्व-इन सातप्रकृतियोंके क्षयसे क्षायिक -- लब्धिसारः। . १६३ सम्यक्त्व होता है । तथा चारित्रमोहकी इक्कीस प्रकृतियोंके उपशमसे वा क्षयसे उत्कृष्ट यथाख्यातचारित्र होता है वह निःकपाय आत्मचरणरूप है ।। ६०९ ॥ अब यहां कोई प्रश्न करे कि केवलीके असातावेदनीयके उदयसे क्षुधा आदि परीपह होती हैं इसलिये आहारादि क्रियाका संभव है उसका समाधान कहते हैं। जंणोकसायविग्घचउक्काण वलेण दुक्खपहुदीणं । असुहपयडिणुदयभवं इंदियखेदं हवे. दुक्खं ॥ ६१० ॥ यत् नोकपायविनचतुष्काणां वलेन दुःखप्रभृतीनाम् । अशुभप्रकृतीनामुदयभवं इंद्रियखेदं भवेत् दुःखं ॥ ६१० ॥ अर्थ-जो नोकषाय और चार अन्तरायके उदयके वलसे असाता वेदनी आदि अशुभ प्रकृतियोंके उदयसे उत्पन्न हुआ ऐसा इन्द्रियोंके खेद ( आकुलता) उसका नाम दुःख है। वह केवलीके नहीं है ।। ६१० ॥ जंणोकसायबिग्घचउक्काण वलेण सादपहुदीणं । सुहपयडीणुदयभवं इंदियतोसं हवे सोक्खं ॥ ६११ ॥ यत् नोकपायविनचतुष्काणां चलेन सातप्रभृतीनाम् । शुभप्रकृतीनामुदयभवं इंद्रियतोपं भवेत् सौख्यम् ॥ ६११ ॥ अर्थ-जो नोकषाय और चार अन्तरायके उदयके वलसे साता वेदनीय आदि शुभ प्रकृतियोंके उदयसे उत्पन्न हुआ इन्द्रियोंको संतोष (कुछ निराकुलता) उसका नाम इन्द्रियजनित सुख है । वह भी केवलीके नहीं संभव होता है । ६११ ॥ उसका कारण बतलाते हैं- णट्टा य रायदोसा इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो। तेण दु सातासादजसुहदुक्खं णत्यि इंदियजं ॥ ६१२ ॥ नष्टौ च रागद्वेषौ इंद्रियज्ञानं च केवलिनि यतः । तेन तु सातासातजसुखदुःखं नास्ति इंद्रियजम् ।। ६१२ ॥ अर्थ-क्योंकि केवलीमें रागद्वेष नष्ट होगये हैं और इन्द्रियजनितज्ञान भी नष्ट होगया है इसकारण साता व. असाता वेदनीयके उदयसे उत्पन्न हुआ इन्द्रियजनित सुख दुःख नहीं है । इस हेतुसे यह वात सिद्ध हुई कि कारणके सद्भावसे परीपह उपचारमात्र तौ भी उनका दुःखरूप कार्य नहीं होता ॥ १२ ॥ अब दूसरा हेतु कहते हैं- समयहिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स । तेण असादस्सुदओ सादसरूपेण परिणमदि ॥ ६१३ ॥ fhod

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
समयस्थितिको बंधः सातस्योदयात्मको यतो तस्य ।
तेन असातस्योदयः सातस्वरूपेण परिणमति ॥ ६१३ ॥
अर्थ-क्योंकि केवली भगवानके एक समयमात्र स्थितिलिये सातावेदनीयका बन्ध
होता है वह उदयखरूप ही है इसकारण असाताका उदय भी सातारूप होके परिणमता
है । यहां परमविशुद्धि होनेसे साताका अनुभाग बहुत है इसलिये असाता जन्य क्षुधादि
परीषह की वेदना नहीं है और वेदनाके विना उसका प्रतीकार आहार भी नहीं संभव
होता ॥ ६१३॥
आगे कोई प्रश्न करे कि आहार नहीं है तो केवलीके आहारमार्गणा कैसे कही है
उसका उत्तर कहते हैं-
पडिसमयं दिवतमं जोगी णोकम्मदेहपडिवद्धं ।
समयपवद्धं बंधदि गलिदवसेसाउमेत्तठिदी ॥ ६१४ ॥
प्रतिसमयं दिव्यतमं योगी नोकर्मदेहप्रतिवद्धम् ।
समयप्रबद्धं वध्नाति गलितावशेपायुमानस्थितिः ॥ ६१४ ।।
अर्थ-सयोगकेवली जिन समय समय प्रति औदारिक शरीर संवन्धी अति उत्तम
परमाणुओंके समयप्रबद्धको ग्रहण करते हैं उसकी स्थिति आयु व्यतीत होनेके वाद जित-
ना शेष रहे उतनी है । इसलिये नोकर्मवर्गणाको ग्रहण करनेका ही नाम आहारमार्गणा
है । उसका सद्भाव केवलीमें है। क्योंकि ओज १ लेप्य १ मानस १ कवल १ कर्म १
नोकर्म १ भेदसे छह प्रकारका आहार है। उनमेंसे केवलीके कर्म नोकर्म ये दो आहार होते
हैं । साता वेदनीयके समयप्रबद्धको ग्रहण करता है वह कर्म आहार है और औदारिक
समयप्रबद्धको ग्रहण करता है वह नोकर्म आहार है ॥ ६१४ ॥
.. णवरि समुग्धादगदे पदरे तह लोगपूरणे पदरे ।
णत्थि तिसमये णियमा णोकम्माहारयं तत्थ ॥ ६१५ ॥
नवरि समुद्धातगते प्रतरे तथा लोकपूरणे प्रतरे ।
नास्ति निसमये नियमात् नोकर्माहारकस्तत्र ॥ ६१५ ॥
अर्थ इतना विशेष है कि केवलसमुद्धातको प्राप्त केवलीके दो प्रतरके समय और
एक लोकपूरणका समय-इसतरह तीन समयोंमें नोकर्मरूप आहार नियमसे नहीं है
अन्य सब सयोगीकालमें नोकर्मका आहार है ॥ ६१५ ॥
अब जिस कालमें समुद्धात क्रिया होती है उसे कहते हैं:-
अंतोमुहुत्तमाऊ परिसेसे केवली समुग्धादं ।
दंड कवाट पदरं लोगस्स य पूरणं कुणई ॥ ६१६ ॥

लन्धिसारः। १६५ अंतर्मुहूर्तमायुषि परिशेपे केवली समुद्धातम् । दंडं कपाट प्रतरं लोकस्य च पूरणं करोति ॥ ६१६ ॥ अर्थ-अपनी आयु अन्तर्मुहूर्तमात्र शेष रहनेपर केवली समुद्रात क्रिया करते हैं। वह दण्ड कपाट प्रतर लोकपूर्णरूप चार तरहकी करते हैं ॥ ६१६ ॥ हेढा दंडस्संतोसुहुत्तमावजिदं हवे करणं । तं च समुग्धादस्स य अहिमुहभावो जिणिदस्स ॥ ६१७ ॥ अधस्तनं दंडस्यांतर्मुहूर्तमावर्जितं भवेत् करणं । तच्च समुद्धातस्य च अभिमुखभावो जिनेंद्रस्य ॥ ६१७ ॥ अर्थ-दण्डसमुद्धातकरनेके कालके पहले अन्तर्मुहूर्ततक आवर्जितकरण होता है । वह निनेंद्र देवको समुद्धातक्रियाके सन्मुख होना है ।। ६१७ ॥ सहाणे आवजिदकरणेवि य णस्थि ठिदिरसाण हदी। उदयादि अवविदया गुणसेढी तस्स दवं च ॥ ६१८ ॥ स्वस्थाने आवर्जितकरणेपि च नास्ति स्थितिरसयोः हतिः । उदयादिः अवस्थिता गुणश्रेणी तस्य द्रव्यं च ॥ ६१८॥ अर्थ-आवर्जितकरण करनेके पहले स्वस्थानमें और आवर्जितकरणमें भी सयोगकेव- लीके कांडकादि विधानकर स्थिति और अनुभागका घात नहीं होता तथा उदयादि अव. स्थितरूप गुणश्रेणी आयाम है और उस गुणश्रेणीका द्रव्य भी अवस्थित है ॥ ६१८ ॥ आगे आवर्जित करणमें गुणश्रेणी आयाम दिखलाते हैं। जोगिस्स सेसकालो गयजोगी तस्स संखभागो य । जावदियं तावदिया आवज्जिदकरणगुणसेढी ॥ ६१९ ॥ योगिनः शेपकालः गतयोगी तस्य संख्यभागश्च । यावत् तावत्कं आवंर्जितकरणगुणश्रेणी ॥ ६१९ ॥ अर्थ-आवर्जितकरण करनेके पहलेसमय जो सयोगीका शेषकाल, अयोगीका सव- काल और अयोगीके कालका संख्यातवां भाग इन सबको मिलानेसे जितना होवे उतना आवर्जितकरणकी अवस्थित गुणश्रेणी आयाम है ॥ ६१९ ॥ अधातिया कर्मोंकी स्थिति आयुके समान करने के लिये जीवके प्रदेशोंका फैलनारूप केवलिसमुद्धात होता है। पहले समयमें दण्ड, दूसरे समयमें कपाट, तीसरे समयमें प्रतर करता है उस समय वातवलयके विना बाकी सब लोकमें आत्माके प्रदेश फैल जाते हैं सो इसका नाम मंथान भी है और चौथे समयमें लोकपूर्ण होता है उस जगह वातवलयसहित सबलोकमें आत्माके प्रदेश फैल जाते हैं। ऐसे चार समयोंमें चाररूप क्रमसे प्रदेश फैलते हैं।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे कार्यविशेष जो होता, है उसे कहते हैं;- लिदिखंडमसंखेजे भागे रसखंडमप्पसत्थाणं । हणदि अणता भागा दंडादीचउसु समएसु ॥ ६२० ॥ 'स्थितिखंडमसंख्येयान् भागान् रसखंडमप्रशस्तानाम् । हंति अनंतान् भागान् दंडादिचतुर्प समयेषु ॥ ६२० ॥ अर्थ-दण्डादिके चार समयोंमें स्थितिखण्ड असंख्यात बहुभागमात्र और अप्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागखण्ड अनन्त भागमात्र घातता है ॥ ६२० ॥ चउसमएसुरसस्स या अणुसमओवट्टणा असत्थाणं । ठिदिखंडस्सिगिसमयिगघादो अंतोमुहुत्तुवरि ।। ६२१ ॥ चतुःसमयेपु रसस्य च अनुसमयापवर्तनमशस्तानाम् । स्थितिखंडस्यैकसमयिकघातो अंतर्मुहूर्तोपरि ।। ६२१ ॥ अर्थ-चारसमयोंमें अप्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागका अनुसमय अपवर्तन होता है अर्थात् समय समय प्रति अनुभाग घटता है । और स्थितिखण्डका घात एकसमयकर होता है। एक एक समयमें एकएक स्थितिकांडक घात करना यह माहात्म्य समुद्धात क्रियाका है। लोकपूर्णके वाद अन्तर्मुहूर्तकालकर स्थिति अनुभागका घटाना जानना ॥ ६२१ ॥ जगपूरणम्हि एका जोगस्स य वग्गणा ठिदी तत्थ । । .. अंतोमुहुत्तमेत्ता संखगुणा आउआ होहि ॥ ६२२ ॥ जगत्पूरणे एका योगस्य च वर्गणा स्थितिस्तत्र । अंतर्मुहूर्तमात्रा संख्यगुणा आयुपो भवति ॥ ६२२ ।। अर्थ-लोकपूर्णके समयमें योगोंकी एक वर्गणा है और उसी समयमें अन्तर्मुहूर्तमात्र शेष रहती है वह शेष रहे आयुसे संख्यातगुणी है ॥ ६२२ ॥ आगे लोकपूर्णक्रियाके वाद समुद्रात क्रियाको समेटता है उसका क्रम कहते हैं- 'एत्तो पदर कवाडं दंडं पचा चउत्थसमयम्हि । पविसिय देहं तु जिणो जोगणिरोधं करेदीदि ॥६२३॥ अतः प्रतरं कपाटं दंडं प्रतीत्य चतुर्थसमये । प्रविश्य देहं तु जिनो योगनिरोधं करोतीति ॥ ६२३ ॥ :. अर्थ-इस लोकपूर्णके वाद प्रथमसमयमें, लोकपूर्णको समेट प्रतररूप, दूसरे समयमें प्रतरको समेट कपाटरूप, तीसरे समयमें कपाट समेट दण्डरूप और चौथे समयमें दण्ड- को समेट सब प्रदेश मूल शरीरमें प्रवेश करते हैं । यहां क्रिया करने समेटनेमें सात समय होते हैं । उसके बाद अन्तर्मुहूर्त विनामकर योगोंका निरोध करता है ॥ ६२३ ॥ - ܝ;

लन्धिसारः।
1
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.
१६७
वादरमण वचि उस्सास कायजोगं तु सुहुमजचउकं ।
रुभदि कमसो वादरसुहुमेण य कायजोगेण ॥ ६२४ ॥
वादरमनो वच उच्छास काययोगं तु सूक्ष्मजचतुष्कम् ।
रुणद्धि क्रमशो वादरसूक्ष्मेण च काययोगेन ॥ ६२४ ॥
अर्थ-चादर काययोगरूप होकर वादर मनयोग, वचनयोग, उच्छ्रास, काययोग-इन
चारोंका क्रमसे नाश करता है और सूक्ष्मकाय योगरूप होकर उन चारों सूक्ष्मोंको क्रमसे
नाश करता है ॥ ६२४ ॥
आगे कहते हैं कि वादरयोग सूक्ष्मरूप परिणमानेसे कैसे होते हैं:-
सण्णिविसुहुमणि पुण्णे जहण्णमणवयणकायजोगादो।
कुणदि असंखगुणूणं सुहुमणिपुण्णवरदोवि उस्सासं ॥ ६२५ ॥
संशिद्विसूक्ष्मनि पूर्णे जघन्यमनोवचनकाययोगतः ।
करोति असंख्यगुणोनं सूक्ष्मनिपूर्णावरतोवि उच्छासं ॥ ६२५ ।।
अर्थ--संज्ञीपर्याप्तके जघन्य मनोयोग है उससे असंख्यातगुणा कम सूक्ष्म मनोयोग
करता है, दो इंद्रियपर्याप्तके जघन्य वचनयोग है उससे असंख्यातगुणा कम सूक्ष्मवचन-
योग करता है और सूक्ष्मनिगोदिया पर्याप्तके जघन्य काययोगसे असंख्यातगुणा कम सूक्ष्म-
काययोग करता है । तथा सूक्ष्मनिगोदिया पर्याप्तकके जघन्य उच्छाससे असंख्यातगुणा
कम सूक्ष्म उच्छास करता है ॥ ६२५ ॥
एक्ककस्स णिठभणकालो अंतोमुहुत्तमेत्तो हु ।
सुहुमं देहणिमाणमाणं हियमाणि करणाणि ॥ ६२६ ॥
एकैकस्य निष्टंभनकालो अंतर्मुहूर्तमानो हि ।
सूक्ष्मं देहनिर्माणं आनं हीयमानं करणानि ।। ६२६ ।।
अर्थ-एक एक वादर व सूक्ष्म मनोयोगादिके निरोध करनेका काल प्रत्येक अन्तर्मु-
हूर्तमात्र है और सूक्ष्मकाययोगमें स्थित सूक्ष्म-उश्वासके नष्ट करनेके वाद सूक्ष्मकाययोगके
नाश करनेको प्रवर्तता है | उसके विनाइच्छा कार्य होते हैं ॥ ६२६ ॥
सुहुमस्स य पढमादो मुहुत्तअंतोत्ति कुणदि हु अपुचे ।
पुवगफड्डगहेट्ठा सेढिस्स असंखभागमिदो ॥ ६२७ ॥
सूक्ष्मस्य च प्रश्रमात् मुहूर्तातरिति करोति हि अपूर्वान् ।
पूर्वगस्पर्धकाधस्तनं श्रेण्या असंख्यभागमितम् ।। ६२७ ।।
अर्थ-सूक्ष्मकाययोग होनेके प्रथमसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तकालतक पूर्वस्पर्धकोंके
नीचे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागमात्र अपूर्वस्पर्धक करता है ॥ ६२७ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
१६८
पुवादिवग्गणाणं जीवपदेसाविभागपिंडादो।
होदि असंखं भागं अपुचपढमम्हि ताण दुगं ॥ ६२८ ॥
पूर्वादिवर्गणानां जीवप्रदेशाविभागपिंडतः ।
भवति असंख्य भागमपूर्वप्रथमे तयोकिम् ॥ ६२८ ।।
अर्थ-पूर्व स्पर्धकोंके जीवके प्रदेशोंके पिंडसे और आदि वर्गणाके अविभागप्रतिच्छे-
दोंके पिंडसे अपूर्वस्पर्धकके प्रथमसमयमें वे दोनों असंख्यातवें भागमात्र होते हैं।। ६२८॥
उक्कट्टदि पडिसमयं जीवपदेसे असंखगुणियकमे ।
कुणदि अपुवफडयं तग्गुणहीणक्कमेणेव ॥ ६२९ ॥
अपकर्पति प्रतिसमयं जीवप्रदेशान् असंख्यगुणितक्रमेण ।
करोति अपूर्वस्पर्धकं तद्गुणहीनक्रमेणैव ।। ६२९ ।।
अर्थ-द्वितीयादि समयोंमें समय समय प्रति असंख्यातगुणा क्रमकर जीवप्रदेशोंको
अपकर्षण करता है और असंख्यातगुणा हीन क्रमकर नवीन ( अपूर्व) स्पर्धक करता
है ॥ ६२९ ॥
सेढिपदस्स असंखं भागं पुवाण फड्ढयाणं वा।
सचे होति अपुवा हु फड्ढया जोगपतिवद्धा ॥ ६३०॥
श्रेणिपदस्यासंख्यं भागं पूर्वेषां स्पर्धकानां वा ।
सर्वे भवति अपूर्वा हि स्पर्धका योगप्रतिवद्धा ॥ ६३० ॥
अर्थ-सब समयोंमें किये योग संबन्धी अपूर्वस्पर्धकोंका प्रमाण जगच्छ्रेणीके प्रथमव-
गैमूलके असंख्यातवें भागमात्र है अथवा सब पूर्वस्पर्धकोंके प्रमाणके असंख्यातवें भागमात्र
है ॥ ६३०॥
एतो करेदि किहि मुहुत्तअंतोत्ति ते अपुचाणं ।
हेटादु फहयाणं सेढिस्स असंखभागमिदं ॥ ६३१ ॥
इतः करोति कृष्टिं मुहूर्तातरिति ता अपूर्वेषाम् ।
अधस्तनात् स्पर्धकानां श्रेण्या असंख्यभागमितं ॥ ६३१ ॥
अर्थ-उसके वाद अन्तर्मुहूर्तकालतक अपूर्वस्पर्धकोंके नीचे सूक्ष्मकृष्टि करता है उन
सूक्ष्मकृष्टियोंका प्रमाण जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागमात्र, एक स्पर्धकमें वर्गणाओंका
प्रमाण उसके असंख्यातवें भागमात्र है ॥ ६३१ ॥
अपुवादिवग्गणाणं जीवपदेसाविभागपिंडादो।
होंति असंखं भागं किट्टीपढमम्हि ताण दुगं ॥ ६३२ ॥

लन्धिसारः। १६९ अपूर्वादिवर्गणानां जीवप्रदेशाविभागपिंडतः। भवंति असंख्य भागं कृष्टिप्रथमे तयोह्निकम् ।। ६३२ ।। अर्थ-अपूर्वस्पर्धकसंवन्धी सब जीवप्रदेशोंके और अपूर्वस्पर्धककी प्रथमवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदोंके असंख्यातवें भागमात्र कृष्टिकरणके प्रथमसमयमें वे दोनों होते हैं ।। ६३२ ॥ उक्कद्ददि पडिसमयं जीवपदेसे असंखगुणियकमे । तंगुणहीणकमेण य करेदि किहि तु पडिसमए ।। ६३३ ॥ अपकर्पति प्रतिसमयं जीवप्रदेशान् असंख्यगुणितक्रमेण । तद्गुणहीनक्रमेण च करोति कृष्टिं तु प्रतिसमये ॥ ६३३ ।। अर्थ-द्वितीयादि समयोंमें समय समय प्रति असंख्यातगुणक्रमकर जीवके प्रदेशोंको अपकर्षण करता है और समय समय प्रति पूर्वसमयमें की हुई कृष्टियोंके नीचे असंख्यात- गुणा घटता क्रमलिये नवीन कृष्टियां करता है ॥ ६३३ ॥ सेढिपदस्स असंखं भागमपुवाण फड्ढयाणं व । सबाओ किट्टीओ पल्लस्स असंखभागगुणिदकमा ॥ ६३४ ॥ श्रेणिपदस्य असंख्यं भागं अपूर्वेषां स्पर्धकानां वा । सर्वाः कृष्ट्यः पल्यस्य असंख्यभागगुणितक्रमाः ॥ ६३४ ॥ अर्थ-सव समयोंमें की हुई कृष्टियोंका प्रमाण जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागमात्र है अथवा अपूर्वस्पर्धकोंके प्रमाणके असंख्यात भागमात्र है । वे कृष्टियां क्रमसे पल्यके असं- ख्यातवें भाग गुणित हैं ॥ ६३४ ॥ एत्थापुचविहाणं अपुच्चफहयविहिं व संजलणे । वादरकिट्टिविहिं वा करणं सुहुमाण किट्ठीणं ॥ ६३५ ॥ अनापूर्वविधानं अपूर्वस्पर्धकविधिरिव संज्वलने । वादरकृष्टिविधिरिव करणं सूक्ष्मानां कृष्टीनाम् ॥ ६३५ ॥ अर्थ-यहांपर योगोंके अपूर्वस्पर्धक करनेका विधान पूर्व कहे संज्वलन कषायके अपू. वस्पर्धक करनेके विधानके समान जानना और योगोंकी सूक्ष्मकृष्टि करनेका विधान संज्व- लनकी वादर कृष्टि करनेके विधानके समान जानना ॥ ६३५ ॥ किट्टीकरणे चरमे से काले उभयफड्ढये सचे। णासेइ मुहुत्तं तु किट्टीगदवेदगो जोगी ॥ ६३६ ॥ कृष्टिकरणे चरमे खे काले उभयस्पर्धकान् सर्वान् । नाशयति मुहूर्त तु कृष्टिगतवेदको योगी ।। ६३६ ॥ ल.सा. २२ १७० M रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-कृष्टिकरणकालके अन्तसमय हुए वाद अपने कालमें सब पूर्व अपूर्व स्पर्धकरूप प्रदेशोंको नाश करता है । और इस समयसे लेकर सयोगी गुणस्थानके अन्तपर्यंत जो अन्तर्मुहूर्तकाल उसमें कृष्टिको प्राप्त योगको वह सयोगकेवली अनुभव करता है । ६३६ ॥ पढमे असंखभागं हेटुवरि णासिदूण विदियादी । हेटुवरिमसंखगुणं कमेण किट्टि विणासेदि ॥ ६३७ ॥ प्रथमे असंख्यभागं अधस्तनोपरि नाशयित्वा द्वितीयादौ । अधस्तनोपर्यसंख्यगुणं क्रमेण कृष्टिं विनाशयति ॥ ६३७ ।। अर्थ-कृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें थोड़े अविभागप्रतिच्छेदयुक्त नीचेकी और बहुत अविभागप्रतिच्छेदयुक्त ऊपरकी असंख्यातवें भागमात्र कृष्टियोंको वीचकी कृष्टिरूप परिणमाके नाश करता है । और द्वितीयादि समयोंमें उनसे असंख्यातगुणा क्रमलिये नीचे ऊपरकी कृष्टियोंको बीचकी कृष्टिरूप परिणमाके नाश करता है ॥ ६३७ ॥ मज्झिम बहुभागुदया किर्टि वेक्खिय विसेसहीणकमा । पडिसमयं सत्तीदो असंखगुणहीणया होति ॥ ६३८ ॥ मध्या बहुभागोदयाः कृष्टिमपेक्ष्य विशेपहीनक्रमाः । प्रतिसमयं शक्तितो असंख्यगुणहीनका भवंति ॥ ६३८ ।। अर्थ-सब कृष्टियोंके असंख्यातवहुभागमात्र बीचकी कृष्टियां उदयरूप होती हैं इस अपेक्षा प्रतिसमय विशेष घटता क्रम लिये हैं । इसप्रकार कृष्टिके नाश करनेसे अविभाग प्रतिच्छेदरूप शक्तिकी अपेक्षा प्रथमसमयसे द्वितीयादि सयोगीके अन्तसमयतक असंख्यात गुणा घटता क्रम लिये योग पाये जाते हैं। ६३८ ॥ किट्टिगजोगी झाणं झायदि तदियं खु सुहुमकिरियं तु । चरिमे अ संखभागे किट्टीणं णासदि सजोगी ॥ ६३९ ॥ कृष्टिगयोगी ध्यानं ध्यायति तृतीयं खलु सूक्ष्म क्रियं तु । चरमे च संख्यभागान् कृष्टीनां नाशयति सयोगी ॥ ६३९ ॥ अर्थ-इसतरह सूक्ष्मकृष्टिका वेदक सयोगी . जिन तीसरा सूक्ष्मक्रियाप्रतिप्रातिनामा शुक्लध्यानको ध्यावता है । यहां चिंताका कारण योग है उसके निरोधको भी ध्यान "कार- णमें कार्यका उपचार कर" कहा गया है । इसप्रकार कृष्टियोंको नाश करता हुआ सयोगी अपने अन्तसमयमें कृष्टियोंका संख्यात बहुभाग शेष रहे हुएको नाश करता है ॥ ६३९॥ जोगिस्स सेसकालं मोत्तूण अजोगिसबकालं च । चरिमं खंडं गेण्हदि सीसेण य उवरिमठिदीओ ॥ ६४०॥ - लब्धिसारः। योगिनः शेपकालं मुक्त्वा अयोगिसर्वकालं च । चरमं खंडं गृह्णाति शीण च उपरिस्थितेः ॥ ६४० ॥ अर्थ-सयोगी गुणस्थानका अन्तर्मुहूर्तमात्र काल शेष रहनेपर वेदनीय नाम गोत्रका अन्तस्थितिकांडकको ग्रहण करता है उससे सयोगीका शेष रहा हुआ काल और अयो- गीका सब काल मिलाकर जो प्रमाण हो उतने निपेकोंको छोड़कर शेष सब स्थितिके गुण- श्रेणीशीर्ष सहित ऊपरकी स्थितिके निषेकोंके नाश करनेका आरंभ करता है ॥ ६४० ॥ तत्थ गुणसेढिकरणं दिजादिकमो य सम्मखवणं वा । अंतिमफालीपडणं सजोगगुणठाणचरिमम्हि ॥ ६४१ ॥ तत्र गुणश्रेणिकरणं देयादिक्रमश्च सम्यक्षपणमिव । अंतिमस्फालिपतनं सयोगगुणस्थानचरमे ।। ६४१ ।। अर्थ-वहां गुणश्रेणीका करना वा देय द्रव्यादिका अनुक्रम सम्यक्त्वमोहनीयके क्षप- णाविधानकी तरह जानना । और सयोगी गुणस्थानके अन्तसमयमें अघातियाओंके अन्त- कांडककी अन्तफालिका पतन होता है ॥ ६४१ ॥ इसप्रकार सयोगीके अन्तसमयमें अघातियोंकी अन्तफालिका पतन, योगका निरोध और सयोगगुणस्थानकी समाप्ति-ये तीनों एक ही समय होते हैं । इसतरह सयोगकेवलीगुणस्थानका कथन समाप्त हुआ ॥ से काले जोगिजिणो ताहे आउगसमा हि कम्माणि । तुरियं तु समुच्छिण्णं किरियं झायदि अयोगिजिणो ॥ ६४२ ॥ खे काले योगिजिनः तन आयुष्कसमानि कर्माणि । तुरीयं तु समुच्छिन्नक्रियं ध्यायति अयोगिजिनः ॥ ६४२ ॥ अर्थ-उसके बाद अपनेकालमै अयोगी जिन होता है वहां आयुकर्म के समान अघा- तियाओंकी स्थिति होती है । वह अयोगी जिन चौथा समुच्छिन्न क्रियानिवृत्तिनामा शुक्ल- ध्यानको ध्याता है ॥ भावार्थ-उच्छेद हुई मन वचन कायकी क्रिया और निर्दृचि अर्थात् प्रतिपातता इन दोनोंसे रहित यह ध्यान है इसलिये इसका सार्थक नाम है । यहांपर भी ध्यानका उपचार पहलेकी तरह जानना । सव आस्रवरहित केवलीके शेषक- मौकी निर्जराका कारण जो निन आत्मामें प्रवृत्ति उसीका नाम ध्यान है ।। ६४२ ॥ सीलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसओ जीवो। बंधरयविप्पमुक्को गयजोगो केवली होई ।। ६४३ ॥ शीलेशत्वं संप्राप्तो निरुद्धनिःशेपास्त्रवो जीवः। वंधरजोविप्रमुक्तः गतयोगः केवली भवति ॥ ६४३ ।।

१.७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ -समस्त शीलगुणका खामी हुआ सव आस्रवोंको रोककर कर्मवन्धरूपी रज (धूलि ) रहित हुआ योग रहित अयोगी केवली. होता है। भावार्थ-यद्यपि सयोगी निनके सब शील गुणोंका खामीपना सम्भवता है परंतु योगोंका आस्रव पाया जाता है इसलिये सकल संवरके न होनेसे शीलेशस्थान सम्भव है । और यह अयोगी जिन सब तरहसे निरासव और निर्बंध होगया है ॥ ६४३ ॥ वाहत्तरिपयडीओ दुचरिमगे तेरसं च चरिमम्हि । झाणजलणेण कवलिय सिद्धो सो होदि से काले ॥ ६४४ ॥ द्वासप्ततिप्रकृतयः द्विचरमके त्रयोदश च चरमे । ध्यानज्वलनेन कवलिताः सिद्धः स भवति स्खे काले ॥ ६४४ ॥ अर्थ-अयोगीका काल पांच हूख अक्षर उच्चारणकालके समान है । वहां एक एक समयमें एक एक निषेक गलनरूप जो अधःस्थितिगलन उससे क्षीण हुई उस कालके द्विच- रमसमयमें बहत्तरि प्रकृतियां और अन्तसमयमें तेरह प्रकृतियां शुक्लध्यानरूपी अमिसे ग्रासीभूत (नष्ट) होती हैं। ऐसे क्षयकर अनन्तर समयमें सिद्ध होता है। जैसे कालिमासे रहित होके शुद्ध सुवर्ण सोना ही होवे उसीतरह यह जीव सव कर्ममल रहित कृतकृत्य- शारूप निष्पन्न होता है ।। ६४४ ॥ उन वहत्तर और तेरह प्रकृतियोंके नाम कहते हैं-अनुदयरूप वेदनीय १ देवगति १ शरीर पांच ५ बन्धन पांच ५ संघात पांच ५ संस्थान छह ६ आंगोपांग तीन ३ संहनन छह ६ वर्णादिक वीस २० देवगत्यानुपूर्वी १ अंगुरुलघु १ उपधात उपघात १ परघात १ उच्छास १ अप्रशस्तविहायोगति १ प्रशस्तविहायोगति १ अपर्याप्त १ प्रत्येक १ स्थिर १ अस्थिर १ शुभ १ अशुभ १ दुर्भग १ सुखर १ दु:- खर १ अनादेय १ अयशस्कीर्ति १ निर्माण १ नीचगोत्र १-ये बहत्तरि प्रकृतियां हैं । और उदयरूप सातावेदनीय १ मनुष्यायु १ मनुष्यगति १ पञ्चंद्रीजाति १ मनुष्या- नुपूर्वी १ त्रस १ बादर १ पर्याप्त १ सुभग १ आदेय १ यशस्कीर्ति १ तीर्थकर १ उच्च- गोत्र १-ये तेरह प्रकृतियां अन्तसमयमें क्षय होती हैं। तिहुवणसिहरेण मही वित्थारे अठ्ठजोयणुदयथिरे । धवलच्छत्तायारे मणोहरे ईसिपम्भारे ॥ ६४५ ॥ त्रिभुवनशिखरेण मही विस्तारे अष्ट योजनान्युदयस्थिरा। धवलछत्राकारा मनोहरा ईषत्प्रभारा ॥ ६४५ ॥ अर्थ-वह जीव ऊर्ध्वगमन स्वभावसे तीन लोकके शिखरपर ईपत्प्रभार नामकी आठ- वीं पृथ्वीके ऊपर एकसमयमें जाकर तनुवातवलयके अन्तमें विराजमान होता हैं । कैसी पृथ्वी है उसे कहते हैं । जो पृथ्वी मनुष्यपृथ्वीके समान पैंतालीस लाख योजन चौड़ी लब्धिसारः। १७३ गोल आकार है । आठ योजन ऊंची है, स्थिर है और सफेद छत्रके आकार है खेत वर्ण है बीचमें मोटी किनारेपर पतली है और मनको हरनेवाली है ।। यद्यपि ईपत्याग्भार नाम पृथ्वी घनोदधिवात वलयतक है परंतु यहां उस पृथ्वीके बीचमें सिद्ध शिला पाई जाती है उसकी अपेक्षा ऐसा कथन है । धर्मास्तिकायके अभावसे वहांसे आगे गमन नहीं होता, वहां ही चरम ( अन्तके ) शरीरसे कुछ कम आकाररूप जीवद्रव्य अनन्त ज्ञानानन्दमय विराजता है ॥ ६४५॥ पुवण्हस्स तिजोगो संतो खीणो य पढमसुकं तु । विदियं सुकं खीणो इगिजोगो झायदे झाणी ॥ ६४६ ॥ पूर्वज्ञस्य त्रियोगः शांतः क्षीणश्च प्रथमशुक्लं तु । द्वितीयं शुक्लं क्षीण एकयोगो ध्यायति ध्यानी ॥ ६४६ ॥ अर्थ - जो महामुनि पूर्वोका ज्ञाता तीन योगोंका धारक उपशमश्रेणी या क्षपकश्रेणीवर्ती है वह पृथक्त्ववितर्कवीचार मामा पहला शुक्लध्यानको ध्याता है और दूसरे शुक्लध्यानको क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती तीनयोगोंमें एक योगका धारक होकर ध्याता है । यहांपर पृथ- क्त्ववितर्क वीचार उसे कहते हैं कि जुदा जुदा भावभुत ज्ञानकर अर्थ व्यञ्जन योगोंका संक्रमण होना । उसमें अर्थ तो द्रव्य गुण पर्याय हैं, व्यञ्जन श्रुतके शब्द हैं और योग मन वचन काय हैं-इनका पलटना वीचार कहा जाता है । इसतरह जिसध्यानमें प्रवृत्ति होना वही पृथक्ववितर्कवीचार है । और जिस जगह एकता लिये भावश्रुतसे पलटना नहीं होता अर्थात् जिस अर्थको, श्रुतरूप शब्दको, जिस योगकी प्रवृत्तिलिये ध्यावे उसको वैसे ही ध्यावे पलटे नहीं ऐसा एकत्त्ववितर्क ध्यान जानना ॥ ६४६ ॥ सो मे तिहुवणमहियो सिद्धो बुद्धो णिरंजणो णिचो। दिसदु वरणाणदंसणचरित्तसुद्धिं समाहिं च ।। ६४७ स मे त्रिभुवनमहितः सिद्धः बुद्धो निरंजनो नित्यः । दिशतु वरज्ञानदर्शनचारित्रशुद्धिं समाधि च ॥ ६४७ ॥ अर्थ-तीनलोकसे पूजित, सबके जाननेवाले, कर्मरूपी अञ्जनसे रहित और विनाश- रहित ऐसे वे सिद्ध भगवान मुझे उत्कृष्ट ज्ञान, दर्शन, चारित्रकी शुद्धि और समाधि ( अनुभवदशा या संन्यासमरण ) को देवें ॥ भावार्थ-यहां सिद्धोंके मोक्ष अवस्था होना उसका खरूप सब कर्मोंका सवतरहसे नाश होनेसे संपूर्ण आत्मस्वरूपकी प्राप्ति ही है। इस वारेमें अन्यमतवाले विपरीतकथन करते हैं वह श्रद्धान नहीं करना । उनमेंसे बौद्ध कहता है-जैसे दीपकका वुझना उसीतरह आत्माका स्कंधसंतानका नाश होनेसे अभाव - १७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होना वह निर्वाण ( मोक्ष ) है । उसको आचार्य समझाते हैं कि जहां मूलवस्तुका नाश होजावे तो उसके लिये उपाय क्यों करना । ज्ञानी पुरुष तो अपूर्वलाभके लिये उपाय करते हैं, इसलिये अभावमात्र मोक्ष कहना ठीक नहीं है । दूसरा नैयायिकमतवाला कहता है-बुद्धि सुख दुःख इच्छा द्वेष प्रयत्न धर्म अधर्म संस्कार-इन नौ आत्माके गुणोंका नाश होना वही मोक्ष है । उसको भी पूर्वकथितवचनसे समाधान करना चाहिये, क्योंकि जहां विशे- षरूप गुणोंका अभाव हुआ वहां आत्मवस्तुका ही अभाव आया सो ऐसा ठीक नहीं है । तीसरा सांख्यमतवाला कहता है-कार्य कारणसंवन्धसे रहित आत्माके बहुत सोते हुए पुरुषकी तरह अव्यक्त चैतन्यरूप होना वह मोक्ष है। उसका भी समाधान पूर्वकथित वचनसे होचुका, यहांपर अपना चैतन्यगुण था वह उलटा अव्यक्त होजाता है । इसतरह नानाप्रकार अन्यथा कहते हैं उनका निराकरण जैनन्याय शास्त्रोंमें किया गया है वहांसे जानना । मोक्ष अवस्थाको प्राप्त सिद्ध भगवान हमेशा अनन्त अतींद्रिय आनन्दका अनु- 'भव करते हैं। क्योंकि जब इन्द्रिय मनकर कुछ ज्ञान होनेमें कुछ निराकुलता होती है तव ही आत्मा अपनेको सुखी मानता है लेकिन जिस जगह सवका जानना हुआ और सर्वथा निराकुल हुआ वहांपर तो परम सुख कैसे न हो होता ही है । तीनलोकके तीन- कालके पुण्यवान् जीवोंके सुखसे भी अनन्तगुणा सुख सिद्धोंके एक समयमें होता है। क्योंकि संसार में सुख ऐसा है कि जैसे महारोगी रोगकी कमी होनेसे अपनेको सुखी मानता है और सिद्धोंके सुख ऐसा है कि जैसे रोगरहित निराकुल पुरुष खभावसे ही सुखी हो। ऐसे अनन्तसुखमें विराजमान सम्यक्त्वादि आठगुण सहित लोकाग्रमें विराजे हुए सिद्धभगवान हैं वे मेरा तथा सबका कल्याण करो ॥ ६४७ ॥ इसप्रकार बाहुबलि- नामा मंत्रीकर पूजित जो माधव चंद्र आचार्य उनने क्षपणासार ग्रन्थ रचा । वह यतिवृषभ आचार्य मूलकर्ता और वीरसेन आचार्य टीका कर्ता ऐसे धवल जयधवल. शास्त्र के अनुसार क्षपणासार ग्रन्थ किया गया है। उसके अनुसार यहां भी क्षपणाके वर्णनरूप लब्धिसारकी गाथा उनका व्याख्यान किया है ॥ इसप्रकार श्रीनेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ती विरचित लब्धिसारमें चारित्रलब्धि अधिकार में क्षायिकचारित्रको कहनेवाला कर्मोंकी क्षपणारूप तीसरा अधिकार पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ -- - ग्रन्थकर्तृप्रशस्तिः। अब आचार्य लब्धिसार शास्त्रकी समाप्ति करनेमें अपना नाम प्रगट करते हैं। वीरिंदणदिवच्छेणप्पसुदेणभयणंदिसिस्सेण । दसणचरित्तलद्धी सुसूयिया णेमिचंदेण ॥ ६४८ ।।

Labdhisaar

Author
Aacharya, Nemichandrasiddhant Chakravarti
Title
Labdhisaar
File name
Labdhisaar
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2009/10
Publisher
Bombay, Nirnaya Sagar Press
Language
Sanskrit
Pages
189
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
344193
Barcode
99999990234072.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Copyright permitted
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