Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Shri Jatakabharan

Syam Sundar · 2012/08

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भूमिका। वाचकबंद ! भारतवर्षकी इस गिरी हुई दशामें भी यदि ऋपि- योंकी भविष्यवाणीके यथार्थ होनेमें कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण है तो वह ज्योतिष शास्त्र है, यद्यपि इस शास्त्रमें कहे हुए प्रत्येक विषय सत्य हैं; परन्तु ग्रहण, वृष्टि इत्यादिका निर्दिष्ट समयमें होना इत्यादि मुख्य मुख्य वात जिस प्रकार लोगोंके विश्वासको इस शास्त्रको सत्यतामें दृढ करती हैं, अन्य विषय वैसे नहीं । जो कुछ हो, अभी भारतवर्षमें अनेक मनुष्य इस वातको निर्विवाद स्वीकार करते हैं कि-उक्त शास्त्रकी भूत, भविष्य और वर्तमान किसी भी वातमें लन्देह नहीं है। शास्त्रोंमें लिखी हुई सभी बातें सत्य हैं। उनमें साम्प्रतमें जो कुछ दोष लोग लगाते हैं वे मनुप्योंके आलस्य, कम परिश्रम करना इत्यादि दोपोके कारणसे हैं। अव भी कितने ही गणक अपने शास्त्रमें इतने निष्णात मिल सकते हैं कि, वे इस विद्याके मर्मको जानते और सन्दिग्धोंके संशयोंको निर्मूल करते हैं। यहां हमको संक्षिप्त सूचना "जातकाभरण" के विपयमें देनी है। गोदावरी नदीके समीप पार्थनगरके निवासीगणकवर श्रीढुण्डिराजका बनाया हुआ यह ग्रन्ध जन्मपत्रीके लिखने अथवा उसके फल कहनेमें अत्युपयोगी है । जातकादि अनेक ग्रंथोंको देखनेका कुछ भी परिश्रम उस मनुष्यको न करना पड़ेगा जो केवल इस ग्रन्थको भलीभाँति पढ़कर कण्ठस्थ कर ले। एक ही ग्रन्थसे जन्मपत्री लिखने वा फल कहने में परम सुभीता हो इस आशयसे हमने इस --

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भूमिका।
ग्रन्थकी बांसवरेलीस्थ पण्डित श्यामलालजीसे भापाटीका वनवा.
कर इसे सुपुष्ट चिकण कागजॉपर अपने "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्
प्रेलमें मुद्रित किया है, साथ ही मनोहर दृढ जिल्द बंधवाकर
पुस्तककी पुष्टि करनेमें त्रुटि नहीं रखी है और ग्राहकोंके सुभीतेके
लिये ऐसी उपयोगी और मनोरम पुस्तकका मूल्य अल्प रखा है ।
आशा है कि विद्यानुरागी तथा ज्योतिर्विद् लोग इस पुस्तकको
मँगाकर लाभ उठावेंगे, और दृढ परिश्रमपूर्वक इस शास्त्रके फला-
देशको ऐसा यथार्थ वतावेंगे कि लोगोंका विश्वास हमारे ज्योतिष
शास्त्रमें नित नया बढ़ता रहे और सदा बना रहे ।
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आपका कृपाकांक्षी-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष-"श्रीवेंकटेश्वर" स्टीम्-प्रेस, पम्बई.
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श्री। भापाटीकासहित जातकाभरणकी विषयानुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. पृष्ठ. ૨૨ ... "" १३ " :::: " " ७ ... ... " " ... ... १५ ... ८ 1 ११ " 11 ... विषय. जयसंवत्सरजातफलंम् मन्मथसंवत्सरजातफलम् दुर्मुखसंवत्सरजातफलम् हेमलंबसंवत्सरजावफलम् विलंबसंवत्सरजातफळम् विकारिसंवत्सरजातफलम् शारीसंवत्सरजातफटम् प्लवसंवत्सरजातफलम् शुभकृत्संवत्सरजातफलम् शोभनसंवत्सरजातफलम् कोधिसंवत्सरजातफलम् विश्वावसुसंवत्सरजातफलम् पराभवसंवत्सरजातफलम् प्लवङ्गसंवत्सरजातफलम् कीटकसंवत्सरजातफलम् सौम्यसंवत्सरजातफरम् साधारणसंवत्सरजातफरटेम् विरोधकृत्संवत्सरजातफलम् परिधाविसंवरसरजातफलम् प्रमादिसंवत्सरजातफलम् भानन्दसंवत्सरजातफलम रादाससंवत्सरजातफलम् १० नलसंयत्सरजातफलम पिंगलसंवत्सरजावफलम् काळपुक्तसंवत्सरजातफरम सिद्धापिसंवत्सरजाताळम रोट्रसंघातरजातफलम् ११ दुर्मतिसंयत्सरजातफलम् दुन्दुभिसंयत्सरजातफरम् रुधिरोहारिसंयासरजावफारम् रत्तासियत्सरमातकटम् फोधनसयसरजावपटम् १२. सासंघासरजातकम्प " " भापाकारकृतमङ्गलाचरणम् ग्रन्थकारकृतमङ्गलाचरणम् ज्यौतिपशास्त्रप्रशंसामाह दैवज्ञलक्षणम् जन्मपत्रप्रशंसामाह प्रभवसंवत्सरजातफलम् विभवसंवत्सरजातफलम् शुक्लसंवत्सरजातफलम् प्रमोदसंवत्सरजातफलम् प्रजाधीशसंवत्सरजातफलम् मांगिरससंवत्सरजातफलम् श्रीमुखसंवत्सरजातफलम् भावसंवत्सरजातफटम् पुर्ववासरजातफलम् धावसंवत्सरजातफलम ईश्वरसंवत्सरजातफलम् यदुधान्यसंघासरजातफलम प्रमाविसंवत्सरजातफटम् विक्रमसंवत्सरजावफलम यूपसंवत्सरजातफलम् चित्रभानुसंवत्सरजातफलम् सुभानुसंवत्सरजातफलम् तारणसंघरसरजावफलम् पाधिषसंयत्सरजातफलम् प्ययसंवाटरजातफलम उजिसवत्सरजातफलम् उपधारिसयातरजातफलम् रोधिसंयासरजातफलम् पतियत्सरजावफप्टम् रिसंवासरमातफटम् न्दनसंपाउरजातफरम् नपसदरसरजातफरम ... ... ९ ... " " ... १ ... ११ " ... १७ " " .१ " ... ... ... ... " 11 ... ." ... ... 41 भापाटीकासहित जातकाभरणकी- विपप. विषय. ... " " २७ " " " ... " " . " २८ 1 " ... " " ... " " ... " " ... " " ... .. " अपनजातकार.माह तर उत्तरापण अष्टमीजातफलम् जातफलम् १९ नवमीजातफलम् दक्षिणायनजातफलम् दशमीजातफरम् माजातफलमाह तबादी वसन्तमातु पकादशीजातफलम् जातफटम् २०ढादशीजायफलम् प्रीमनातुमातफालम् त्रयोदशीजातफलम् घर्ष जारफलम् चतुर्दशीजातफलन् शरहतुजातफलम् पौर्णमासीजातफलम् हेमंतऋतुजातफरम् अमावास्याजातफलम् शिशिरऋतुजातफलम् २१ बारजातफटमाह तबादी रवि- मासजातफलमाह तबादौ- वारजातफलम् चैत्रजातफलम् सोमवारजातफन्टम् पशाखमाखजातफलम् भीमवारजातफलम् ज्येष्ठमासजातफलम् बुधवारजातफलम् आपाढमालजातफटम् गुरुवारजातफरम् श्रावणमासजातफलम् २२ भृगुवारजातफलम् शनिवारजातफलम् भाद्रपदमासजातफरम् भाविनमासजातफलम् नक्षत्रजातफलमाह तनादौ-- कार्तिकमासजातकटम् अश्विनीनक्षत्रजातफलम् मार्गशिरमासजातफलम् भरणीनक्षत्रजातफलम् पोपमासमातफरम् २३ त्तिकानक्षत्रजातफाटम् माघमासजातफलम् रोहिणीनक्षत्रजातफलम् फाल्गुनमासजातफलम् मृगशिरनक्षत्रजातफटम् मलमासजातफलम् पक्षजातफलमाह तत्रादौ राक्ष- आनक्षत्रजातफ० पक्षजातफलमू पुनर्वसुनवजातफलम् कृष्णपक्षजातफलम् २५ पुग्यनक्षत्रजातफलम् दिनरात्रिजातफलमाह तत्रादी- आश्लेपानक्षरजातफलम् दिवा जातफरम् मवानक्षत्रजातफ० रात्रिजातफलम् पूर्वाफाल्गुनीनक्षवजातफ. प्रतिपदाजातफलम् उत्तराफाल्गुनीनक्षत्रजातफा० द्वितीयाजातफलम् हस्तनक्षत्रजातफ० तृतीयाजातफलम् २५/ चित्रानक्षत्रजातफ० चतुर्थी जातफलम् स्वातीनक्षत्रजातफ. पश्चमीजातफलम् विशाखानक्षवजातफलम् पष्ठीजातफलम् अनुराधानक्षत्रमातफलम् सप्तमीजातफलम् ज्येष्ठानक्षत्रजातफलम् " " " " ३० " " " ... ... 11 ... ३१ ... ... " " ... " " .. " " ... ३३ " " " 1 ...

विषयानुक्रमणिका। (७) विषय. पृष्ठः विषयः पृष्ठ " ... " ... " १ " ... ... ... ... .. ... " " ...४४ .. " ... ... मूलविचारः ३३ / योगजातफलमा तबादी विभ- अभुक्तमूलमाह योगजावफ मूलशांतिप्रकार: प्रीतियोगजातफल. मूलपादनातफलम् आयुष्मद्योगजातफ० विशेषमूलमाह सौभाग्पयोगजातफर पुरुषाकृती मूलारलेषाफलमाह शोभनपोगजातफ. पुरुषाकृतिमूल्घटीफलम् ६५ अतिगण्डयोगजातफर मूलारलेषासहूर्तस्वामिन माह सुकर्मयोगजातफ० मुहूर्ते जातफलम ३६ / धृतियोगजातफर मुहतशचक्रम् शूलयोगजातफ० मारलेपानक्षस्य मुहूतेशचक्रम् ३७ / गण्डयोगजातफ. मूलवृक्ष. वृद्धियोगजातफलम् शुवयोगजातफलम् मूलवृक्षफलम व्याघातयोगजातफ० मूलस्प शुभाशुभम् दर्पणयोगजातफ. पितुनक्षत्रजातफलम् ... ३८ वयोगजातफ. तस्य शांतिमाद सिद्धियोगजातफ० मूण्डनक्षत्रजातफलम् व्यतीपातयोगजातफ पूर्वापादानवजातफदम् वरीयान्-योगजातफ० उत्तरापाद्वानक्षत्रजालफरम् परिचयोगजातफ. अभिगिजातफलम् ३९ शिवयोगजातफ० श्रवणनक्षनजातफलम् सिद्रियोगजातफ. धनिष्टावक्षवनातफलम् साध्ययोगजातक शतभिपानक्षवजातफलम् शुभयोगजादफ. पूर्वाभाद्रपदानवजातफलम शुक्लपोगजातफ. उत्तराभाद्रपदानदात्र जातफटम् ४० प्रयोगजात रेयतीनवजातफलम ऐन्द्रयोगजात युद्दजातकोतमांशफलमाद तबादी वैधृतियोगमाफटम प्रथमनपांशमातफ्टम करणफळमाद तमादी यवतरण- द्वितीयांशमातरम् जातळ तृतीयनाराजातरुद्धम् बालरकरणातफर चतुर्पनाशनातर ....४. चौलवकरमतात. বননায়াৰ नैतिडपरलनातक पष्टनवांगनात गरहरणमातर उत्तमनगंग्रजात यणिजपरपज्ञातरम् भएमनयारानातक विधिपरणनातफरम् नयमनपांग्रजादक शानेपरपमानम् ... " ... " 1 " " ... " " 11 . " ...१८ ... ... " . ...

(८) भाषाटीकासाहेत जातकाभरणको- विषय. पृष्ठ विपय. पृष्ट ... " ... ... " ... ६५ १ 11 ... " ... ६५ " ... " १ ... " ... " ... ६७ चतुष्पदकरणजातफ० ...४९ / कंगन्यासः नागकरणजातफ० সলমার্কিন किस्तुरकरणात व्रणकारणमाह व्रणनिश्चयज्ञानम् गण्डान्तजातफ० पण मृत्युयोगः गणजातफटमाइ तवादी देवगण.. अनेकतीर्थहयोगः जावफदम् ५० मीचकर्मकृयोगः मनुष्यगणजातफ० हीनदेहयोगः राक्षसगणजातप खासक्षयप्लीहाल्मरोगयोगः मजातफलमाह तबादौ पलन- दक्ष्मीविदोनयोगः जातफलम् तेजोड़ीननेत्रपोगः कर्णनाशयोगः वृषलग्रजातफलम् मिथुनलप्रजातफ नेत्रदोषयोगः फकलमनात धनभावविचारमाह तब धनभवना- सिंहलप्रजातफ. त्किकिं चिंतनीयम कन्योलग्रजातफ० धनहीन-योगः तुलालमनातक० ५२ / धनवत्तायोगः वृश्चिकलनजातफ० धनप्रतिबन्धकयोगः धनुलग्नजातफा सहजभावविचारस्तत्र सहजभावा- मकरलग्नजातफ० रिककि चिंतनीयम् कुम्भलप्रजातफ० भ्रानाशयोग:-क्षेपक) मीनलग्नजातफ. ... ५३ [मुहदावविचारयोगः पूर्वोक्तसंवत्सराणां फलमाप्तिक्षमयमाद,, परिवारक्षयकारकयोगः डिभाख्पचक्रम् ... ५४ ] मावायोगः डिभाख्पचक्रे नक्षत्रन्यासफलमाइ सुतभावविचारः द्वस्वदीपागज्ञानमाह ५६ | पुन पुत्रलाभयोगः द्वादशभावानां फलानि क्षेत्रजपुत्रलाभोगः तनुभावे कि विधारणीयम् रिपुभावविचार तनुभावविचार ... ५७ । जापाभावविचारः सूर्यस्वरूयम् ... ५८/खोलामयोगः चन्द्रस्वरूपम् संक्षेपतोऽयमभावविचार भौमस्वरूपम् मरणयोगः बुधस्वरूपम् भाग्यभापविचारः गुरुस्वरूपम् ५९ भाग्यचद्योग भृगुस्वरूपम् दशमभावविचार शनिस्वरूपम् साभभावविचारः शरीराकादिज्ञानम् व्यपभावपियार " " . " . 11 " " ... " " " ... --- (१०) भाषाटीकासहित जातकाभरणकी- विषय. पृष्ट विषय. पृष्ठ ११५ " ... ... " । ... ... 11 ११७ १ " ". 1 ... ... " ११८ " " " " ... ... " 2 ... व्ययभावस्थितशुक्रफ. तनुभावस्थितशनिफ० धनभावस्थितशनिफर तृतीयभावस्थितशनिफलम् चतुर्थभावस्थितशनिफलम् पंचमभावस्थितशनिफटम् रिपुभावस्थितशनैश्चरफलम् सप्तमभावस्थितशनिफलम् अष्टमभाषस्थिवशनिफळम् नवमभावस्थितशनिफलम् दशमभापस्थितशनिफलम एकादशप्रायस्थितशनिफाटम् द्वादशभायस्थितशनिफरम् पदमानमाद वनुभावस्थितरातुफलम धनभावस्थितराहुफलम् सहजभावस्थितरायुफलम चतुर्यभावस्थितराइफलम् पंचमभावस्थितराहुफालम् रिपुभावस्थितराहुफलम् सप्तमभावस्थितराहुफलम अष्टमभावस्थितराहुफलम नयमभावस्थितराइफलम् • दशमभावस्थितरादुफलम् एकादशभावस्थितराहुफलन व्ययभावस्थितराहफारम मनुभाषस्थितकेतुफाटम् धनभावस्थित गुफटम् तृतीयभापस्थितनुफलम चतुर्यभायस्थितयेनुफटम पसमभावस्थितनुपालन रिएभापरिपतवेनुकदम् सप्तमभावरियसवेतुफलाम् १०८ अष्टमभावस्थितकेतुफलम् नवमभावस्थितकेतुफलम् दशमभावस्थितकेतुफलम १०९० एकादशभावस्थितकेतुफलम् व्ययभावस्थितकेतुफलम् ग्रहाणां दृष्टिमाह ग्रहाणां दृष्टिचक्र मेषादिगृहे रखौ ग्रहदृष्टिफलमाह- तत्र भौमगृहे रवी चन्द्रदृष्टि- फदम् भौमगृहे रयौ भौमदृष्टिफलम् भौमगृहे रवी बुधदृष्टिफलम् भौमगृहे रयो गुरुदृष्टिफलम् १११ भौमगृहे रवी भूगुदृष्टिफलम् भीमगृहे रवौ शनिदृष्टिफलम् शुक्रगृहे खौ चन्द्रदृष्टिफलम शुकगृहे रचौ भौमदष्टिफटम् ११२ शुक्रगृहे रखो धदृष्टिफल शुक्रगृहे रवी गुरुटिफलम शुभगृहे रवी शुक्रदृष्टिफा० शुक्रगृह रखो शनिदृष्टिफटम् सौम्यगृहे रवी चन्द्रष्टिक० ११३ सौम्यगृहे रयो चन्द्रदृष्टिफलम् ". सौम्पगृहे रयो भीमदृष्टिफलम् सौम्याद रखो धाष्टिफलम् सौम्यगृहे रयो गुरदृष्टिफल्म ११४ सौम्यगृहे रखो भृगुदृष्टिफटम सौम्यगृहे रवी शनिदृष्टिफटम् चन्द्रगद रशी चन्द्रप्टिस्टम् चन्द्रगृहे रबी भीमदृष्टिफयम् चन्द्रग्रहे रखी दुपहटिफ ११५/ चन्द्रगृहे खो गुरुष्टिक चन्द्रगृह रवी भृगुष्टिफारम १ " ... " " ... ... " " " " " ... " . " .. . " " ... 11 10 .. " ...

(१४) भापाटीकासहित जातकाभरणकी- विषय. विषय. " ... " . " " ... " ... " " " " " " " " " ... " १ " बुधों गुरी भृगुदृष्टिफलम् १६१॥ स्वोहगते शुक्रे रविष्टिफलम् ५६८ बुधक्ष गुरी शनिदृष्टिफलम् | स्वगेहगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफयम् कुलीरस्थे गुरौ रविदृष्टिफलम १६२ स्थगेहगते शुक्र भौमदृष्टिफलम् फुलीरस्थे गुरौ चदन्डष्टिफलम् स्थक्षेवगते शुक्रे बुधदृष्टिफलम् कुलीरस्थे गुरौ भीमदृष्टिफलम् स्वक्षेत्रगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम् फुलीरस्थे गुरौ बुधदृष्टिफलम स्वक्षेत्रगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् कुष्टीरस्थे गुरौ भृगुदृष्टिफलम् १६३ बुधवेश्मगते शुक्र रविदृष्टिफलम् फुलीरस्थे गुरौ शनिदृष्टिफलम् बुधवेमगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफलम् ... सिंहस्थे गुरौ रविदृष्टिफलम् बुधवेश्मगते शुक्रे भीमदृष्टिफलम् .. सिंहस्थ गुरी चन्द्रदृष्टिफलम् बुधवेश्मगते शुक्र बुधदृष्टिफलम् सिंहस्थे गुरौ भीमदृष्टिफलम् बुधवेश्मगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम सिंहस्थे गुरी बुधदृष्टिफलम् १६४ | बुधवेरमगते शुक्र शनि टिपालम् सिंहस्थे गुरौ भुगुदृष्टिफलम् कर्कराशिगते शुक रविटिपालम् . सिंहस्थे गुरौ शनिदृष्टिफलम् फराशिगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफलम... स्वगेहस्थे गुरौ रविदृष्टिफलम् फर्कराशिगते शुक्रे भीमदृष्टिफलम... १७१ स्पगेहस्ये गुरी चन्द्रदृष्टिफयम् कर्कराशिगते शुक्रे बुधदृष्टिपातम् म्हगेहस्थे गुरी भीमदरिफलम् कर्कराशिगते शुक्रे गुरुदरिफलम् . स्वगेहस्थे गुरी बुष्टिफटम् १६५५ कर्फराशिगते शुक्रेशनिदृष्टिपट .. म्यगेहस्थे गुरी भृगुदृष्टिपालम् सिहराशिगते शुक्रे रविदृष्टिफलम् . भ्यगेहस्ये गुरौ शनिदृष्टिफलम् सिहराशिगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफलम... १७० शनिक्षेत्रगते गुरोरविष्टिफ० सिंहराशिगते शुने भौमहटिफदम्... शनिक्षेप्रगते गुरौ चन्द्रदृष्टिफ० १६६ सिदराशिगते शुने बुधदृष्टिफटम् शनिक्षेत्रगते गुरो भीमदृष्टिकर सिद्दराशिगते शुक्रे गुरुटिफलम् शनिक्षेवगते गुरी बुधदृष्टिफ० सिंहराशिगते शुफे शनिदृष्टिफलम् . शनिक्षेवगवे गुरी भृगुदृष्टिफळ० "गुरुहगते शुक्रे रविष्टिफलम् शनिक्षेवगते गुरी शनिदृष्टिपट गुरुगेदगते शुक्र चन्द्रष्टिफलम मेवादिगशिगे भृगी ग्रहदृष्टिप सत्रादी गुरगदगते शुके भोमष्टिफटम् भौमीगते शुक्रे रविदृष्टिफलम् ...१६७ गुरगेहगते शुक्र युपदृष्टिफलम् भौमसंगवे राम चन्द्रदृष्टिफलम् गुरुगेदगते शुक्र गुरदृष्टिफारम भौमसंगते शके भीमदृष्टिफलम् गुरगेहगवे शंक शनिएिफ.सम ... १७४ • कजरंगते शुझे इपष्टिपरम् शनिक्षेत्रगते चने रविष्टिफलम भीमर्शगते मुझे गुपदृष्टिकम् रानिक्षेत्रगते शुने चन्द्रष्टिकर । भौमसंगते शुक्र शनिटिकलम ...१६८ शनिक्षेत्रगते यंग भीमदृष्टिर " " .. " ... " .." " 1 ... ". ... ... " ... + .. " ... . ... " . 1 " " ... " ...

विषयानुक्रमाणका। (१५) विषय. विषय. पृष्ट ११ ... ... . 11 ... 0. " " . ... 1 ... . . " " " " ... 1 शनिक्षेवगते शुक्रे बुधदृष्टिक १७४ गुरुगेहगते शनौ रविदृष्टिफलम् १८२ शनिक्षेत्रगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम १७५ | गुरुगेहगते शनी चन्द्रदृष्टिफलम् शनिक्षेत्रगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् . गुरुगेहगते शनी भीमदृष्टिफलम् उभौमालयस्थे शनौ रविदृष्टिफलम् गुरुगेहगते शनी बुधदृष्टिफलम् • भौमालयस्थे शनी चन्दृष्टिफलम् ... गुरुगेहगते शनी गुरुदृष्टिफलम् ", भौमालयस्थे शनी भीमदृष्टिफलम् .. गुरुगेहगते शनी भृगुदष्टिफलम् भौमालयस्ये शनी बुधदृष्टिफलम् १७६ / स्वगेदगते शनी रविदृष्टिफल , भौमालयस्थेशनौ गुरदृष्टिफलम् स्वगेहगते शनी चंद्रदृष्टिफ. भौमायस्थे शनौ भृगुष्टिफलम् स्वगेहगते शनी भौमदृष्टिफ० १८३ भृगुजालयस्थे शनी रविदृष्टिफलम् .. स्वगेहगते शनी बुधदृष्टिफ० भूगुजालपस्थे शनी चन्द्रदृष्टिफ० स्वगेहगते शनी गुरुदृष्टिक भृगुजालयस्थेशनौ भौमदृष्टिफलम... १७ | स्वगेहगते शनी भृगुदृष्टिफ० भगुजालयस्थेशनी बुधष्टिफलम् | राशिफलानि, तत्र मेपराशिगतसर्यफ० १८१ भृगुजाळपस्ये शनी गुरुष्टिफटम्... " परासिंगतसूर्यफलम् भूगुजालयस्ये शनी भृगुदृष्टिफलम... " मिथुनराशिगतसूर्यफ युधः शनी रविदृष्टिम् कर्कराशिगतसूर्यफलम बुधः शनी यन्द्रदृष्टिफलम् ... १७८ | सिंहराशिगतसूर्यफलम् पुधः शनी भीमदृष्टिफलम् कन्याराशिगतसूर्यफलम् पुणे शनी सुधाष्टिफलम् तुलाराशिगतसूर्यफ बुधस शनी गुरुष्टिफलम् " | पृश्चिकराशिगतस्पफ. शुधौं शनी भृगुदृष्टिफलम् धनराशिगतसूर्यफ. फफस्ये शनौ रविष्टिफलम् ... १७९ मकरराशिगतसूर्यफ० फस्ये शनी चन्द्रदृष्टिफल्म कुभराशिगतस्पफ० १८६ फराशिगते शनी भीमदृष्टिफलम् मीनराशिगतसूर्यफळम् करराशिगते शनी युधदृष्टिफलम मेपराशिगतचन्द्रफ फराशिगते शनी गुरुदृष्टिफलम् पराधिगतचंद्रफलम् फराशिगते शनी भृगुदृष्टिफलम् ... 10 मिथुनराशिगवयंट्रफलम् सिंहराशिगते रानीरविदृष्टिपरटम फर्कगशिगतचंद्रका सिंहराशिगते शनी पाद्रष्टिका सिंहराशिगतचंद्रमा सिंहगशिगते शनी भीमनिम... पन्याराशिगतचंद्रमा सिंहराशिगते शनी पुघटिपलम. नुरापनिगतचंटर सिहपशिगते शनी शुक्रष्टिफलम १८. मिकरागिगतदका सिराशिगते शनी भृगुटिफमतम् .., धनराशिगतपंद्रका ... " ... ... " ... ... ... ... ... ... ... ... " ... १८७ १ ... " ... 11 .. ... ... 1.. १८८ ... " भापाटीकासहित जातकाभरणी- विषय. पृष्ट. विषय. १९५ .. ... ... ... ... १९६० ... " ॥ " ... १९७ " " " ... १. " ... " " " मकरराशिगतचंद्रफ कुंभराशिगतचंद्रफ मीनराशिगतचंद्रफ मेषराशिगतभौमफ. पराशिगतभीमफ० मिथुनराशिगतभौमफलम राशिगतभौमफ० सिहराशिगतभीमफ. कन्याराशिगतभौमफर तुलाराशिगतभौमफ वृश्चिकराशिगतभौमफ. धनराशिगतभीमफ. मकरराशिगतभीमफ. कुम्भराशिगतभीमफा मीनराशिगतभीमफ মালিনমুখ प्रराशिगसबुधफ মিনায়িকা फराशिगतबुधफ. बिहराशिगतबुधफ कन्याराशिगतयुधफ० गुहाराशिगसबुधफ. वृधिकाशिगतबुधपसम • धनराशिगतबुधफ. कुम्भराशिगतबुधफ. मीनराशिगतयुधप० मेपराशिगतगुरुफ पराशिगतगुरुफ मिथुनराशिगतगुरका मराशिगतगुरुका सिहराशिगतगुरुफ. फन्पाराशिगतगुरुका नुहाराशिगतगुरुफ. २८८ वृश्चिकराशिगतगुरुफ. धनराशिगतगुरुफा x मकरराशिगतगुरुफ० १८९ / कुम्भराशिगतगुरुफ० मीनराशिगतगुरुफ मेपराशिगतभृगुफ० 14 ) पराशिगतभृगुफ० मिथुनराशिगतशुक्रफ १९. कर्कराशिगतशुक्रफा सिहराशिगतशुक्रफ कन्याराशिगतशुक्रफ तुलाराशिगत शुक्रफ वृश्चिकराशिगतशुक्रफ १९१ धनराशिगतशुक्रफ. मकरराशिगतशुक्रफ कुम्भराशिगतशुक्रफ० मीनराशिगशुक्रफ. मेपरराशिगतशनिक १९२ / पराशिगतशनिक मिथुनराशिगतशनिक कर्कराशिगतशानिफ० सिहराशिगतशनिक कन्याराशिगतशनिक ... १९३० तुलाराशिगाशनिफ वृश्चिकराशिगतनिफा. धगराशिगतरानिफ. ... मकरगशिगतशनिक १०४ | कुम्भराशिगतगनिस' मीनराशिगनयनिफ.. राशिपतीविभाग शुभाशुभज्ञानार्थ शनिचक्रग नराकारगनियम्यरूपम २९५, नराकारगनिनानग्यासमाह... " ... ... १९९. " ... ... १ ... ... .. २०० 11 ... ... " ... ... " ... " विषयानुक्रमणिका। (१७) विषय पृष्ठ विषय ... " 11 ... 11 ... .. 2 " नक्षत्रन्यासेन शनिनक्षत्रफ सर्वतोभद्रचक्रम् चक्रप्रकारमा वेधफलमाह वेधप्रकारमाह सर्वतोभद्रचक्रम् सूर्यकालानलचक्रम् सूर्पकालानलचक्रम् सूर्यकालानलचक्रविचारः चंद्रकालानलचक्रम् चंद्रकालानलनक्षत्रफ० चंद्रकालानलचक्रम् गोचरफ गोचरेण द्वादशधासूर्यफ. गोचरेण दादशधा चंद्रफ गोचरे भौमफ ... " " २१५ ... ... " २१६ " " ... " २१७ ... ... " २०३ / गुरोरष्टकवर्गमाह गुरोः शुमाष्टकम् गुरोरनिष्टाष्टकम् शुक्राष्टकवर्गमाह शुक्राष्टकवर्गच० २०५ शुक्रानिष्टाष्टकवर्गच० शनेरष्टकवर्गम् शनेरष्टकवर्गच. शनेरनिष्टाष्टकवर्गच० २०६ रेखासंख्या आह प्रत्येकरेखाफळमाह २०७, कः कदा फलदातेत्याह अङ्गविभागेत ग्रहारिष्टमाह द्विग्रहयोगादिवर्णनम् । तत्र सूर्य- २०८ चन्द्रयोगफल सूर्यभौमयोगका सूर्यबुधयोगफ चंद्रभीमयोगफ० २०९ / सूर्यगुरुयोगफ सूर्पशुक्रयोगफ० सूर्पशनियोगफ० २१०/ चन्द्राधयोगफ० चन्द्रगुरुयोगफ चन्द्रभृगुयोगफ० २११ चन्द्रशनियोगफ० भौमवृधयोगफ. भीमगुरुयोगफ० भौमभृगुयोगफ २११ भौमशनियोगफ २१२ बुधगुरुयोगकर बुधगुरुयोगफ० युधयनियोगफल. यस्शनयोगफ ... गोचरे बुधफ० गोचरे गुरुफ गोचरे शुक्रफ गोचरे शनिफ. गोचरे गहुफ० । ... ... 7 २१८ ... " " " ... " " ... , ... सूर्याष्टकवर्गमाह सूर्यशुभाटरम सूर्यानियाष्टकचक्रम् चदाष्टक्चर्गमाह चंद्रशुभाष्टकम् चंद्रानिष्टाष्टकम् भीमाटकवर्ग भीमाटकम् भोमानिष्टाष्टकम् बुधाष्टकवर्गमाह इथाष्टकम् धानियाटकम् " .. 1 ... ... २२० ... ... " .. पा ...

(१८) भापाटीकासहित जातकाभरणी- विप. पृष्ठ विषय. ... " ... " " ... ול ... ... ... " ... २५१ " ... ... ) ... 7 ... गुरुशनियोगफ० शुक्रशनियोगफ सू० ० भौ० योगफलम् चं० बु० योगफलम् गु० योगफलम् शु० योगफ. सू० च० श० योगफलम् सू० बु० भौ० योगफलम् सू० म० वृ० योगफलम् सू०म० शुक योगफ श० योगफलम् सू० बु० ० योगफलम् सु०७० शु० योगफलम् सू० ० श० योगफलम् सू०१० श० योगफलम् सू० शु० श० योगफलम च००० योगफलम् चं० म०० योगफलम् चं० मं० शु० योगफलम् च० म० श० योगफलम् च० ० ० योगफलम् 50 बु० शु० योगफलम् च० बु० श० योगफटम् चं० ० ० योगफलम च०१० शयोगफलम् शु००० योगफाटम् मं० ० ० योगफलम् मं० ० शु० पोगफलम् म० यु० श० योगफलम् मं० ०१० योगपटम् मं० १० १० योगफरतम् शु० २० योगफलम् ३० पृ.शुरु योगफलम २२० बु० वृ० श० योगफलम् २२८ २२१ ० ०श योगफलम् ० शु००० योगफलम् शुभाशुभयुक्तचन्द्रसूर्यफलम् राजयोगाभ्यायप्रारम्भः तत्रादी गणेश स्तुतिः राजयोगकथनकारणमा राजयोगः राज्यमाप्तिकालमाह २२३ | राजयोगसंगतिसामुद्रिकाध्यापः राजभंगयोगाध्यायः २५४ पञ्चमहापुरुषाध्यायः २५७ रुचकयोगफलम भद्रयोगफटम् २२४ इंसमहापुरुषलक्षणम् २५९ मालव्यनृपतिरक्षणमाद २६० शशकपुरपरक्षणमाद कारकपोगाध्यायः २२५ नामसपोगाध्यायः रसु-मुसलनळयोगानाद मालायालयोगदयम् २६४ गदाराकटविहंगभंगाटपयोगानाद.... " हलनामयोगः ... २२६ धनयवकमरयोगानाद यापीयोगः यपशरशक्तिदण्डपोगानाद. नौट प्रधनुपभर्द्धचन्द्रयोगानाइ... १६८ पामुद्रागगियोगानार २२७ गोलादिममयोगानाद रग्जुयोगरटम् मुग्रयोगफलम् नन्थ्योगफटम् माटायोगमलम ... ... " २६३ २६३ ... " " ... ... ... ... ... " ... .. 17 " .. १ 11 " . ... ... " 1 विषयानुक्रमणिका विपय पृष्ठ. विषय पृष्ठ. २७८ ... ... १ " ... . " ... ... ... 7 .." ... ... ... २७९ ... ... " " ... " " ... .. ... " " ... ... ... ... " ... ... ... " ... .. " " ... ... सर्पयोगफलम गदायोगफलम् शकटयोगफलम् विहयोगफलम् शृगाटपयोगफलम् हलनामपोगफलम् वज्रयोगजातफलम् यवयोगफलम् कमलयोगपालम् चापीयोगफलम् यूपयोगजातफलम् शरयोगफलम् शक्तियोगजातफलम् टण्डयोगजातफलम् नौकायोगजातफलम् कूटयोगजातफलम् छनयोगजासफलम् कार्मुकयोगजातफलम् अदचन्द्रयोगजातफरम् चक्रयोगजातफलम् समुद्रयोगमावफलम् गोलयोगजातफलम् पुगयोगजातफलम शूल्योगमावफलम् केदारयोगजातफलम् पाशपोगजातफलम् दामिनीयोगजातफलम् चीणापोगजातफ्लम् रश्मिजातकाप्याय एकादिपश्चाग्मिफळम् दशरश्मिफलम् पथदशरम्भिफलम् विशतिरमिफलम् २७१ पञ्चविंशतिरमिफलम् विशद्रश्मिफलम् एकत्रिशद्रग्मिफलम् द्वात्रिंशद्रश्मिफलम নঘদ্বিায়িত २७२ / पञ्चविशद्रश्मिफळम् पत्रिशद्रश्मिफलम् अष्टानिशद्रन्मिफलम् एकोनचावारिशदग्मिफलम् चत्वारिशद्रश्मिफलम् २७३ ) एकचत्वारिशद्रश्मिफलम् द्विद्यावारिदिग्मिफलम् चतुश्चत्वारिंशद्रन्मिफलम् पश्चचत्वारिंशदग्मिफलम् ग्रहाणा दीप्ताद्यवस्थामाह २७५ दीप्तग्रहफलम् स्वस्थग्रहफलम हषितग्रहफलम् शान्तग्रहफलम् २७५ शक्तग्रहफलम् विकलग्रहफलम् दीनग्रहफलम् खलप्रदफलम् पीडितग्रहफलम् २७६ / स्थानादियुक्तग्रहफलम् संवादौ स्थानयटयुक्तग्रहफ दिग्यलयुक्तमपटम् कालपरयुक्तग्रहपरम् २७७ / सौम्यवलियाफटम् बलिपापप्रदफन्दम् नैसर्गिकपलमाह २७८ चेष्टारळपुतग्रहफलम् दृष्टिपरिप्रफलम् " ... .. ... " ... ... ... " " ... ... " .. ... " 1 " " ... ... " ... ... २८१ ... ... 11 ... " ... " ... ... " " ... " ... 1) ... " ... .. " ... " 1 (२०) भाषाटीकासहित जातकाभरणकी- विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. ... ... ... ... ... 11 " ... ... " " ... ... " ... 11 " " ... " १ ... " ... " ... .. सूर्ययोगाभ्यायः २८६ धान्यरिष्टयोगः सनादौ वोश्यादियोगाः द्वादशान्दे मृत्युयोगः ૩૦૭ चोरियोगफलम् रिटभंगाध्यायः वेशियोगफलम सर्वग्रहरिष्टभंगाध्यायः उभयचरीयोगफलम् सदसद्देशाविचारणा चन्द्रयोगाध्यायः तत्र सुनफानफा- देवस्तुतिः दुरुधराकेमद्रुमयोगानाह २८७ कर्कराशिगतचन्द्रदशाफलम केमदुमयोगफलम् भौमराशिगतचन्द्रदशाफटम् सुनफायोगफलम् बुधगुरुराशिगतचन्द्रदशाफरटम् अनफायोगफलम शुक्रराशिगवचन्द्रदशाफलम् दुरुधरायोगफलम् २८८ शनिराशिगतचन्द्रदशाफलम् केमद्रुमयोगजातफलम् रविदशाफरपिचारः ३२० केमद्रुमभंगमाह परमोच्चगतरविदशाफलम् प्रव्रज्याध्यायः २८९ / अयोञ्चच्युतरविदशाफलम् चतुरादिभिर्ग्रहः प्रत्रयायोग वृपराशिस्थितरविदशाफलम् प्रव्रज्याभेदमाह २९० मिथुनराशिगतरविदशाफलम् भरेष्टाध्यायः २९२ | कर्कराशिगतरपिदशाफलम् अरिष्टयोगः सिहराशिगतरविदयाफाटम विभिवपरिटयोगः २९३ | कन्याराशिगतरविदशाफलम् नयमवर्षे मृत्युपोग. तुलाराशिगतरविदशाफलम् मासेन मृत्युयोगः नीचांशयुक्तरविदशाफलम् पटव रिष्टपोगः २९४ नीचराशिगताटमस्थितरविदशाफलम् " चनुभिवपरियोग वृश्रिकराशिगतरविदशाफटम् भीनमृत्युयोगः २९५ / धनराशिगतरविदशाफलम् सप्तमवर्ष मृत्युयोग. मारराशिगतरविदशाफलम् अष्टमवर्ष मृत्युयोगः २९६ | पुंभराशिगतरपिदयाफटम शीप्रमृत्युपोगः मीनराशिगतरविदशाफलम् गशिलमानयाँ मृत्युपोगः ..! भयोश्चराचिन्यिताष्टममारस्थित. गशिसमानय मृत्युयोगः (.). रविदशाक्टम् नपमान्दे मृरपुपोगः २९९ / चन्ददशाफ्टाने गीप्रमृत्युपोगः मेपराशिगतचन्द्रदगाफटम् पसमुष्टिपोगः १०० पराशिगतराद्रमशार टम् मावा यह मृत्युयोगः ३. मात्रिकोणराशिम्पिन पददशापटम ... " ... " " ... ... " " " क ... " ... ... .. " ... ३२४ ... " ... ३३५ ... ... " विषयानुक्रमणिका। (२१) " " " . ... ... ... " " 1 १ " 11 ... " " " " ... " ... 7 विषय. पृष्ठ विषय. पृष्ठ. धृपस्थपूर्वाद्ध पराधगतचन्द्रदशाफ० ३२५ बुधदशाफलम् ... मिथुनराशिगतचंददशाफलम् भेषराशिस्थितयुधदशाफलम् कर्कराशिगतचंद्रदशाफलम् ३२६ / वृपराशिस्थितबुधदशाफलम् सिहराशिगतचन्द्रदशाफलम् मिथुनराशिस्थितबुधदशाफलम् कन्याराशिगतचंद्रगदशाफलम् १. कर्कराशिस्थितबुधदशाफलम् । तुलाराशिगतचन्द्रदशाफलम् सिहरास्थितबुधदशाफलम् नीचच्युतचन्द्रदशाफलम् ३२७ / परमोच्चराशिस्थितयुधदशाफलम धनराशिगतचंद्रदशामलम् मूलत्रिकोणांगस्थितबुधदशाफटम् मकरराशिगतचंद्रदशाफलम् स्वक्षेत्रकन्याराशिस्थितबधदशाफलम् कुम्भराशिगतचन्द्रदशाफलम् तुलाराशिस्थितबुधदशाफलम् वत्तिमे कभराशिगतचंद्रदशाफ... वृश्चिकराशिस्थितयुधदशाफलम् . मीनराशिस्थितचन्द्रदशाफलम् ३२८ धनराशिस्थितबुधदशाफलम् वोत्तममीनराशिगतचन्द्रदशाफ०... मकरराशिस्थितयुधदशाफलम् व्ययभावस्थितचन्द्रदशाफलम् फुम्भराशिस्थितबुधदशाफलम् नीचराशिगताष्टमभावस्थचन्द्रदशाफ० मीनराशिस्थितबुधदशाफम् भीमदशाफलम् भय गुपदशाफलम् मेपराशिगतभीमदशाफलम् ३२९ / मेपराशिगतगुरदशाफ्टम् पराशिस्थितभौमदशाफलम् पराशिगतगुरुदशाफलम् मिथुनराशिस्थितभीमदशाफलम् मिथुनपशिगतगुरुदशाफलम कर्कराशिस्थित भीमदशाफलम् ३३०) परमोच्चगतगुरुदशाफलम् १३७ नीचांशच्युतभीमदशाफलम् अयोच्चव्युतगुरुदशाफळम् ভিখিরীময়াম सिहराशिगतगुरुदशाफलम् कन्याराशिस्थितभीमदशाफलम् कन्यागशिगतगुरुदशाफलम तुलाराशिस्थितीमदशाफलम् तुलाराशिगतगुरुदशाफलम् वृधिकाशिस्थितभौमदशाफलम् ... ३३१ पृश्चिकराशिगतगुरुदयासतम धनराशिस्थितभीमदशाफटम् मदत्रिकोणांशराशिगतगुरुदयाफ. मकरराशिस्पितभीमदशाफलम् स्ववांशगतगुरुदशाफटम् भयोचांशत्यक्तभोमदशाफटम नीचांरागतगुरुदयाम् पुम्भराशिस्थितभीमदशाफलम् नीचांशच्युदगुरदासद्रम् मौनराशिस्थितभीमदशार टम् पुम्भराशिगतगुरुदयाकरम् यत्तिमभीमदशाम्... २३ मीनराशिगतगुरुदयास्रम् नोचाशस्थितभीमदगार हम भादशापडम.. महरिकोणराशिस्थितभीमदयाफलम् मेराशिगतभृदयामयम् ... " ... ... ३६ ... 11 " " " ... " 11 ... " ... ... ... " ... " " " " ... " ... ग ...

(२२) भापाटीफासहित जातकाभरणकी- . विषय. पृष्ठ विषय. पृष्ठ ... " " ... 11 " " 7 11 " " " 17 .. ... " ... ... ... " " ... " ... वृपराशिगतभृगुदशाफलम् ३४० चन्द्रदशामध्ये वेरन्तर्दशाफलम् ... ३५० मिथुनराशिगतभृगुदशाफलम् चंद्रदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् कर्कराशिगतभृगुर्दशाफलम चंद्रदशामध्ये युधांतर्दशाफलम् বিৱনিয়া २४१ / चंद्रदशामध्ये गुरोरंतर्दशाफलम् कन्याराशिगतभृगुदशाफ० चंद्रदशामध्ये शुक्रांतर्दशाफललम् तुळाराशिगतभृगुदशाफलम् चंद्रदशामध्ये शनेरन्तर्दशाफलम् वृश्चिकराशिगतभृगुदशाफलम् भीमदशामध्ये सूर्यांतर्दशाफलम् धनराशिगतभृगुदशाफलम् भीमदशामध्ये चंद्रांतर्दशाफलम् मकरराशिगतभृगुदशाफलम् ३४२ भौमदशामध्ये वुधान्तर्दशाफलम् कुम्भराशिगतभृगुदशाफ० भौमदशामध्ये गुरोरन्तर्दशाफलम् मीनराशिगतभृगुदशाफलम् भौमदशामध्ये भृगोरंतर्दशाफलम् : अयोच्चांशगतभूगदशाफलम् भौमदशामध्ये शनेरंतर्दशाफलम् शनिदशाफलम्... बुधदशामध्ये रवरंतर्दशाफलम् मेपराशिगतशनिदशाफलम् ३४३ बुधदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफलम् वृषराशिगतशनिदशाफलम् बुधदशामध्ये भीमांतर्दशाफलम् मिनराशिगतशनिदशाफलम् बुधदशामध्ये गुरोरंतर्दशाफलम् कर्कराशिगतशनिदशाफारम ३४४ | बुधदशामध्ये भृगोरंसदशाफलम् ষিয়িষয়রিয়া बुधदशामध्ये शनेरंतर्दशाफलम् कन्पाराशिगतशनिदशाफलम् गुरुदशामध्ये रव्यतर्दशाफलम् तुलाराशिगतरानिदशाफटम् गुरुदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफलम् वृश्चिकराशिंगतशनिदशाफलम् गुरुदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् धनराशिगतशनिदशाफरटम् ३४५ | गुरुदशामध्ये बुधांतर्दशाफलम् मकरराशिगतशनिदशाफलम् गुरुदशामध्ये शुक्रांतर्दशाफलम् कुम्भराशिगतशनिदशाफलम् गुरुदशामध्ये शनेरंतर्दशाफलम् मीनराशिगतशनिदशाफलम् शुक्रदशामध्ये रव्यंवर्दशाफलम् महादशाफलाध्यायः ३५६ शुक्रदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफलम् अधान्तदशाफलाध्यायः ३४८ शुक्रदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् सूर्यमहादशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफल... ३४९ शुरुदशामध्ये वर्धातर्दशाफटम् सूर्यमहादयामध्ये भीमान्तर्दशाफ... शुकदशामध्ये जीवांतर्दशाफलम् स्यंदशामध्ये युधांतर्दशाफलम् शुक्रदशामध्ये शनेरंचदशाफटम् सूर्यमहादशामध्ये गुरोरन्तर्दशाफलम् ३५० शनिदशामध्ये सुपीतर्दशाफलम् सूर्यमहादशामध्ये भृगोरंतर्दशाफलम् शनिदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफटम् सूर्यमहादशामध्ये शनेरन्तशाफटम्... " शनिदशामध्ये भीमांतर्दशाफरम् " ... " ५४ " ... ... 11 ... ... " " " " " ... " ... ... " ... " ३५७ ... " ... ... " " ... " " (२४) भापार्टीकासहित जातकाभरणकी-वि० अनु। विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ट. ३९३ " ... ... " ... ... ... " ... ... ३८२ . " ... 11 ... .. १९४ ... "" :::::::: .. " मेपराशिस्थितचन्द्रकृतनिर्याणमाह ३७६ , भाक्षताया एव रण्डायोगः वृपराशिस्थितचन्द्रनिर्याणम् ३७७ विवाहविहीनतायोगः मिथुनराशिस्थितयाद्रनिर्याणम् ३७८ गतालकायोगः... कर्कपशिगतचन्द्रनिर्माणमाह ३७२ | पुनर्भूयोगः सिंहराशिगतचन्द्रनिर्याणमाह ३८० पतित्यक्तायोगः कम्पाराशिस्थितनन्द्रकृतनियाणम् ३८१ परपुरुपगामिनीयोगः तुलाराशिस्थितचंद्रकृतनिर्याणमाह पत्याज्ञया दुश्चारिणीयोगः वृश्चिकराशिस्थितचंद्रकृतनियोणमाह ३८३ तायोगः धनूराशिस्थितचन्द्रकृतनिर्माणमाह ३८४ | विनष्टयोनियोगः मकरराशिगतचंद्रनिर्माणमाह ३८५ सप्तमभावस्थनयांशफरमाह फुम्भराशिगतचंदनिर्याणमाद ईन्यितायोगः मीनराशिगतचंद्रनिर्याणमाह २८६ करवापतीयोगः... खीजातफाप्यायः ३८७ भाग्यवतीयोगः... स्त्रीणां वैधव्पसौभाग्यसुखसौंदर्य भूषणादचापोगः विचारस्थानमा पैधव्ययोगः रुपाकृतियोगः ३८८ शेपानपातान्मृत्युयोगः पुरुपाकृतियोगः कृपयापीतो मरणपोगः विशांशयशाफरम् पन्धनान्मृरपुपोगः बुधभयने हो विशांशपशाफलम्... ३८९) जले मृत्युपोगः... गुरुभयने रूपन्दोसिशांशयशारफलम् जलोदरेण मृत्युयोगः भृगुभपने स्मेन्दीतिशाशरशारफरम् शवापिना मृत्युयोगः शनिभपने एनेन्दोसियांशशारफलम् ३९० न्याउिनीपोगः रविभवने सन्दीप्तिांग्रवशारदम् " अपारसपुत्रायोगः घाइभपने एपेन्दोखियांशयास्टम् पटुपुत्रायोगः खोखी मथुनयोगमार ३९१ पुष्पम्यभागाप्रगल्भायोगः कापुरुपयोगः मायादिनीयोग. पाटीपतियोगः... नारायफ्रमाद मपाशीरभूपोगः प्रन्पकाराप दशवर्णनम्... पतिस्पत्तापोग.... ३५. भाषावापतग्रन्यायमामि ... " " ... ... 11 ... " .." ... ३९६ " " " ... " " ... ११ ... " ... ... " " ... ... ... .. " ... .. ... " " ... ... ... ... ... ... ... ... इत्यनुक्रमणिका ममाना।

॥ श्रीहरिः॥
जातकाभरणं
श्यामसुंदरी-भाषाटीकासहितम् ।
अथ भाषाकारकृतं मंगलाचरणम् ।
नत्वा गणेशमथ पूषणमंविकांच
मोमाधवौ च कृतसूरिनतिःप्रयत्नात् ।
श्रीढुण्डिराजमुखनिर्गतजातकस्य.
श्रीश्यामलाल उचितां वितनोति भापाम् ।। १॥
अब भापाकार पंच देवकी स्तुति करता है-श्रीगणेशजी और सूर्य और दुर्गा
और लक्ष्मी और शिवजीको नमस्कार करके और वसिष्ठ गर्गादि पूर्वाचार्योंको यत्नसे
नमस्कार करके श्रीदुंदिराजके मुखसे निकले हुए जातकाभरण नाम ग्रंथकी श्रीश्या-
मलाल योग्य मापाको विस्तार करता है ।। १ ।।
अथ ग्रंयकारकृतमङ्गलाचरणम् ।
श्रीदं सदाहं हृदयारविंदे पादारविंदं वरदस्य वन्दे ।
मंदोऽपि यस्य स्मरणेन सद्यो गीर्वाणवंद्योपमतां समेति ॥१॥
उदारधीमन्दरभूधरेण. प्रमथ्य होरागमसिंधुराजम् ।
श्रीटुंढिराजः कुरुते किलार्या मार्यासपर्याममलोक्तिरत्नैः॥२॥
अब ग्रंयकर्ता गणेशजीकी वंदना करते है-हमेशा ऋद्धिसिद्धिके दाता ऐसे
श्रीगणेशजीके चरणकमलको हृदयमें धारण करके वंदना करता हूं,जिन गणेशजीका
स्मरण करके मूर्ख भी बहुत जल्दी बृहस्पतिके समान हो जाता है ॥ १॥ उत्तम
बुद्धिरूप मंदराचल पर्वतसे इस होराशास्त्ररूपी समुद्रको मय कर श्रीदुण्डिराज
महर्पिप्रणीत अन्योंको देखकर इस जातकाभरण नामक ग्रन्थको करते है ॥२॥
ज्ञानराजगुरुपादपङ्कजं मानसे खलु विचिंत्य भक्तितः।
जातकाभरणनाम जातकं जातकज्ञसुखदं विधीयते ॥३॥

(२) जातकाभरण। शास्त्रोक्तां जन्मपत्रीं करोति नानाग्रंथालोकनात्तस्य चित्तम् । अत्युद्विमंस्यात्ततो जातकेऽस्मिन्कुर्वेव्यक्तांजातकोक्तिं च सर्वाम् ज्ञानके देनेवाले श्रीगुरुजीके चरणारविदोंको अपने हृदयमें निश्चय कर भक्ति- सहित स्मरण कर यह जातकाभरण नाम जातक ग्रन्थ ज्योतिपियोंको मुखका देनेवाला विधान करता हूं ॥ ३ ॥ जो पंडितजन शास्त्रोक्त अनेक पद्धतियों करके जन्मपत्रीको बनाते हैं उन पंडितजनोंका चित्त बहुत ग्रन्थोंके देखनेसे उच्चाटनको प्राप्त हो जाता है इसवास्ते जातकाभरण ग्रन्थमें सब जातकग्रंथोंका कथन करता हूं ॥४॥ विचित्रपत्रीकरणादराणां श्रम विनानुक्रमलेखनाथम् । समर्थमेनं प्रकदार्थमेवात्यर्थ ततो नाम यथार्थमस्य ॥६॥ सन्मङ्गलाशीर्वचनान्वितानि पद्यानिचाग्रे समुदीरयते । तान्येव पत्रीकरणे प्रवीणाः श्रेयस्कराणि प्रथम लिखतु ॥६॥ विचित्र जन्मपत्र बनानेवाले पंडितजनोंको विना परिश्रमके यथार्थ लिखनेकी क्रमपूर्वक शक्ति हो उसको प्रकट करते हैं ॥ ६ ॥ श्रेष्ठ मंगलाचरणके श्लोक और आशीर्वादके श्लोक पद्यमें जो आगे कहेंगे उन्हीं श्लोकोंको जन्मपत्र बनानेवाले चतुर विद्वान् कल्याणकारक पहिले लिखें ॥६॥ शुण्डामण्डलसंप्रसारकरणमौलिस्थलान्दोलन- नवोन्मीलनमीलनेरविरलश्रीकर्णनालकमः । दानालिध्वनितैर्विलासचरितार्खाननोदर्जितै. र्जातानंदभरः करीन्द्रवदनो नःश्रेयसे कल्पताम् ॥७॥ अब मंगलाचरणके श्लोक कहते हैं-इन्हीं श्लोकोंको पहिले लिखना चाहिये सूंडको घुमाते हुए शिरको उठा आंखोंको खोल और चंदकरते कर्णतालसे क्रम करके गजमदकी पंक्तिसे गूंजते हुए भौरोंकरके उपरको मुख करके गर्जते ऐसे श्रीगणेशजी मेरेको कल्याण दें ॥ ७॥ पुन:पुनर्मङ्गलमूतिस्मरणं प्रत्यूहन्यूनिवारणपरमेवति पद्यांतरम- नानादानविधानयज्ञनिकरैरुप्रैस्तपोभिश्चिरात् प्राप्ते कल्पतरौं प्रकल्पितफलावाप्तिः कथंचिद्भवेद । .

भाषाटीकासहित । तूर्ण यच्चरणाम्बुजस्मरणतः संपूर्णकामः पुमान् । सोऽयं वोऽभिमतं ददातु सततं हेरम्बकल्पद्रुमः ॥ ८॥ वारंवार श्रीगणेशजीको स्मरण करनेसे विघ्नोंके समूह निवारण करनेको और भी श्लोक जानो-अनेक दान और यज्ञ विधान करनेसे और बड़े तप बहुत काल करनेसे और कल्पवृक्षकी प्राप्ति होनेसे मनोवांछित फल कभी प्राप्त हो जाते हैं, जिन गणेशजीके कमलरूपी चरणारविंदोंके स्मरण करनेसे शीघ्र ही मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त होजाते हैं सो श्रीगणेशजी मनोवांछित फल निरंतर कल्पवृक्षके तुल्य दें।॥ ८॥ सन्मानसावासविलासहंसी कर्णावतंसीकृतपद्मकोशा । तोपादशेपाभिमतं विशेषादेपापि भाषा भवतां ददातु ॥९॥ श्रेष्ठोके मनरूप मानसमें वास करके विलास, करनेवाली हंसी, कानाम कमलकोगरूप गहने पहिरे, ऐसी सरस्वती सन्तोष और विशेष रूपसे सर मनोरथोंकी सिद्धि आपको दें॥९॥ कल्याणानि दिवामणिः सुललिता कांति कलानां निधि- लक्ष्मी मातनयो बुधश्च बुधतां जीवश्चिरंजीविताम् । साम्राज्यं भृगुजोऽर्कजो विजयतां राहुवलोत्कर्पतां केतुर्यच्छतु तस्य वांछितमियं पत्री यदीयोत्तमा ॥१०॥ अब और आशीर्वादात्मक इलोक लिखते है-सूर्य आपको कल्याण दे और चंद्रमा लालित्य और कांतिको दें,मंगल लक्ष्मीको दें, बुध बुद्धिको दें और वृहस्पति दीर्घायु करें और शुक्र साम्राज्यको दें, शनैश्चर विजयको दें, राहु बलफी वृद्धि करें और केतु मनवांछित फल दें, जिसकी उत्तम पत्री मैं करता हूँ ॥ १० ॥ ननु.पूर्वजन्मोपार्जितानां सदसत्कर्मणां परिपाकोऽस्मिन- न्मनि शुभाशुभफलावाप्तिकालादेव व्यक्तोऽस्तीति जातका- गमोक्तप्रपञ्चेन किं प्रयोजनमिति चेत्सत्यम् । पूर्वोपार्जित- कर्मपरिपाकः शुभाशुभफलोपलब्धिदर्शनादेव ज्ञायते परम- भीएकाले ज्ञातुं न शक्यते तथा च भाग्यमखण्डितं खण्डितं रिएभगोऽप्यायुर्मानमित्यादिज्ञानार्थे जातकागम एवात्यर्थं समर्थस्तदेककारणत्वात् । तथाहि दिनरात्रिवि-

(४)
जातकाभरण।
भागेन सूक्ष्मकालावयवसाधनोपायैस्तु यो ध्रुवभ्रमादिवि-
चित्रयंत्रैरुपलक्षितातिस्पष्टसमयोपात्तलमादिद्वादशराशिचकैः
स्वोचादिगतानां ग्रहाणां सदसदशानुक्रमेणाभीएसमयेऽपि
प्राकर्मपरिपाकोऽवगम्यते । रिष्टभंगः । प्रकृष्टं तु रिटस्यापि
विनष्टिं विशिनष्टि । तद्वदायुयानयनप्रकारेण वय-प्रमाण-
स्य च निर्णयः स्यात् । तस्माद्वेदाङ्गत्वेनाधुनिकाभावत्वेन
प्रत्ययसिद्धत्वेनापि विनष्टिं विशिनष्टि । तद्वदायुयानयन-
प्रकारेण वयाप्रमाणस्य च निर्णयः स्यात् । तस्मादेदाङ्गत्वे-
नाधुनिकाभावत्वेन प्रत्ययसिद्धं जातकस्कंधांगीकरणमु.
चितमेवेति ॥११॥
निश्चय कर पहिले जन्मके इकटे किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका परिपाक इस जन्ममें
शुभाशुभफल प्राप्तिकालसे स्पष्ट है, जातकोक्त प्रपंच करके क्या प्रयोजन ? यह सत्य
है, पूर्वजन्मार्जित कर्मपरिपाक शुभाशुभफलकी प्राप्ति देखनेसे जानते हैं, परन्तु इष्ट-
कालमें नहीं जान सकते हैं, वैसे ही भाग्योदय कम या पूरा रिष्टभंग और आयु
गाननेके लिये पंडितजन अत्यंत समर्थ नहीं होते हैं तथा दिनरात्रिका विभाग करके
सूक्ष्मफालके साधन करनेका उपाय जो ध्रुव घूमनेवाले यन्त्रों करके जाना जाता
है, स्पष्ट समय ज्ञात होता है, लग्नादि द्वादशराशिचक्रसे उच्चादिराशियोम
प्राप्त ग्रहोंकी अच्छी बुरी दशा क्रम करके प्राप्त होनेका समय पहिले जन्मके कर्मों-
को जानते हैं । रिष्टभंगादि उसी प्रकार आयुर्दाय प्रकार करके उमरका प्रमाण
निर्णय होता है उस कारण ज्योतिपशाम्रके कहे हुए भाव करके प्रत्ययसिद्धि
करके उसी प्रकार आयुर्दाय लानेके प्रकारके उमरके प्रमाणका निर्णय होता है,
उस कारणसे ज्योतिपके कहे हुए भाव करके प्रत्यय सिद्धि करके जातकस्वध-
को अंगीकार करना यह उचित जानना चाहिये ॥ ११ ॥
उपार्जितं यत्सदसद्विमिश्र जन्मांतरे कर्म नरोरिदानीम् ।
होरागमस्तस्य विपाकमुच्चैर्दशाक्रमेण प्रकटीकरोति ॥ १२ ॥
जो जन्मजन्मांतरोंके बीचमें मनुष्योंने अच्छे बुरे फर्म मिले हुए इकटे किये हैं
उन पूर्वार्जित कोका शुभाशुभ फल ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता इस जन्ममें दशा-
क्रम करके बतलाते हैं अर्यात् प्रकट करते हैं ॥ १२ ॥

भापाटीकासहित। अथ ज्योतिपशास्त्रमशंसामाह- साक्षाद्भवेद्भाग्यनिरीक्षणाय सुनिर्मलादर्शतलं किलेदम् । शास्त्रं विपद्वारिनिधिञ्च तत् तरिस्तथार्थार्जनचारुमित्रम् ॥१३॥ आधानकाले कमलोद्भवेन वर्णावली भालतलांतराले । या कल्पिता पश्यति दैववेत्ता होरागमज्ञानविलोचनेन ॥१॥ होरागमव्योमचरानुसारस्तेषां विचारः सुतरामुदारः। सिद्धान्तवादाकलनं तदास्यान्न्यासो यदास्यागणितव्यस्य १९॥ मनुष्यके भाग्य दखनेके लिये यह होराशास्त्ररूपी निर्मल आईना साक्षात् है और यह होराशास्त्र आपत्तिरूपी समुद्रसे पार उतरनेकी नौका है और धन पैदा करने में सुंदर मित्र है ॥ १३ ॥ मनुष्यके गर्भाधानके समय अथवा माता- ओंके गर्भसे पैदा हो करके सुखदुःखके अक्षरांकी माला जो भालके बीच ब्रह्माने लिख दी है उसको ज्योतिष शास्त्रका ज्ञाता होराशास्त्ररूपी ज्ञाननेत्रास देखता है ॥ १४ ॥ ज्योतिपशास्त्र ग्रहोंके अनुसार है, उसका विचार निरंतर उदार है, वह ज्योतिपशास्त्र सिद्धांत प्रयोंके पढ़नेसे और गणित जाननेसे होता है।॥ १९॥ अथ देवज्ञलक्षणम् । अपारहोरागमपारगामी पाट्यां च बीजे सुतरी प्रगल्भः। सद्गोलविद्याकुशलः स एव भवेत्फलादेशविधी समर्थः॥१६॥ जिस शाम्रका आदि अंत नहीं ऐसे ज्योतिषशास्त्रके आदिसे अंततकके जानने वाला, पाटी और बीजगणितमें अत्यंत प्रगल्भ और श्रेष्ठ गोलगणितमें कुगल इस प्रकारका ज्योतिषी फलादेश कहने में समर्थ होता है ॥ १६ ।। अय जन्मपत्रप्रशंमामाह- श्रीजन्मपत्रीशुभदीपकेन व्यक्तं भवेद्भावि फलं समस्तम् । क्षपाप्रदीपेन यथालयस्थं घटादिजातं प्रकटत्वमेति ॥ १७ ॥ जो मन होनहार फल होनेवाले हैं मो संपूर्ण जन्मपत्ररूपी दीपकसे जान पड़ते हैं असे मकानमें दीपक करके रात्रि घयादिक मय पदार्थ जान पड़ते हैं ॥ १७ ॥ सा जन्मपत्री विमला न यस्य तज्जीवितं संततमंधकं स्यात् । अनल्पमपंचततोऽल्पकंवा न कल्पते भाग्यमतीव हेतोः १८

(६)
जातकाभरण।
इस प्रकार ऐसी निर्मल जन्मपत्री जिस मनुष्यकी नहीं है उस पुरुषका जीवन
निरन्तर अन्धरूप होता है, बहुत थोडा भाग्य फल नहीं जान पड़ता है ।। १८ ॥
जन्मकालतिथिवारतारकाश्चापि योगकरणाः क्षणाभिधाः ।
मंगलाय किल संतु पत्रिका यस्य शास्त्रविहिता विरच्यते १९॥
ये वक्ष्यमाणा इह राजयोगा रश्मिप्रभूता अपि नाभसाश्च ।
ये कारकाः पूर्णफलं हि पूर्ण यच्छंतु पत्री क्रियते यदीया॥२०॥
यस्यामलेय किल जन्मपत्री कुतूहलेन क्रियते यथोक्ता ।
तस्यालये सत्कमला सलील मुनिश्चला तिष्ठतु दीर्घकालम् २१
कृतं मया नोदकयंत्रसाधनं नृपक्षणं चापि न शंकुसाधनम् ।
परोपरिष्टात्समयात्प्रयत्नतः शुभाशुभं जन्मफलं मयोच्यते २२
जन्मसमयका इष्ट और तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण और क्षणलग्न
मंगलके अर्थ क्रो जिसकी यह जन्मपत्री शास्त्रविहित रचना करते है ॥ १९ ॥
जो राजयोग, प्रभृतरश्मियोंसहित नाभसयोग और पूर्णकारक योग कहेंगे, वे पूर्ण
शुभ फलको दें जिसकी ये पत्री करते है ॥ २० ॥ जिस मनुष्यकी जन्मपत्री
कौतुक्से शास्त्रोक्त करते है उस मनुष्यके घरमें श्रेष्ठ लक्ष्मी अचल बहुत काल-
तक स्थिर हो ॥ २१ ॥ मैंने जलयंत्र साधन नहीं किया और न नृपेक्षण और
न कोई सिद्धान्तासे शंकु जन्मसमयमे लगाकर इष्टसाधन किया, पराये जताये हुए
समय करके यत्नपूर्वक अच्छा बुरा जन्मपत्रका फल मै कहता हूं ॥ २२ ॥
अय संहिताभिमायेण पञ्चाङ्ग फरानि निरुप्यन्ते, तत्रादौ संवत्सरफलम् ।
अथ प्रभवसंवत्मरजातफलम् ।
सर्ववस्तुपरिसंग्रहे रतः पुत्रसंततिरतीव सन्मतिः ।
सर्वभोगयुत्तदीर्घजीवितो जायते प्रभवसंभवः पुमान् ॥ ३ ॥
जिम मनुष्य के जन्मकारमें मभव संवत्सर होता है वह मनुष्य संपूर्ण
वस्तुओके मंग्रह करनेमें तत्पर, पुत्रसंतानवाला, श्रेष्ठत्रुटि, सर्वप्रकारचे भोगसहित
बड़ी उमरवारा होता है ॥ १॥
अय विभवसंवत्सरजातफलम् ।
उत्पन्नभोक्ता प्रियदर्शनश्च चलाधिशाली चतुरः कलाज्ञः ।
राजा भवेदात्मकुले सुशीलो विद्वान्मनुष्यो विभवाब्दजन्मा॥२॥

..
भाषाटीकासहित।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें विभवनाम संवत्सर हो वह मनुष्य उत्पन्न किये
मोगोको भोगनेवाला, प्यारा है दर्शन जिसका, अधिक बलवान, चतुर, कलाओंका
जाननेवाला, अपने कुलमें राजा शीलवान और पंडित होता है ॥२॥
अथ शुक्लसंवत्सरजातफलम् ।
सदा सहर्षोऽतितरामुदारः सत्पुत्रदारैविभवैः समेतः ।
सद्भाग्यविद्याविनयोपपन्नो नूनं पुमाइशुक्लसमुद्भवः स्यात्।।३।।
जिस मनुष्यके जन्मकारमें शुक्लसंवत्सर हो वह मनुष्य हमेशा हर्पयुक्त, निरंतर
उदार, श्रेष्ठ पुत्र और स्त्री तथा वैभवसहित, श्रेष्ठ भाग्य, विद्या और नम्रता सहित
होता है ॥ ३ ॥
अय प्रमोदसंवत्सरजातफलम्।
दाता सुतानंदयुतोऽभिकान्तः सत्येन नित्यं सहितो गुणी स्यात्।
दक्षश्च धूर्तः परकार्यकर्ता प्रमोदजन्मा मनुजोऽभिमानी ॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्रमोद संवत्सर हो वह मनुष्य दाता, पुत्रके आनंदस-
हित, सत्य करके युक्त, गुणवान्, चतुर, धूर्त, पराया कार्य करनेवाला, अभिमानी
होता है ॥४॥
अथ मजाधीशसंवत्सरजातफलम् ।
दाराभिमानः सुतरां दयालुः कुलानुवृत्तः किल चारुशीलः ।
देवद्विजार्चाभिरतो विनीतो मर्त्यः प्रजाधीशसमुद्भवः स्यात्॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्रजाधीश संवत्सर होता है वह मनुष्य स्वीका आभ-
मानी, निरंतर दयावान, अपने कुलके समान चले, सुन्दर गीलवाला, देवता और
ब्राह्मणोंके पृजनमें तत्पर नम्रतासहित होता है ।। ५॥
अथाङ्गिरस्संवत्सरजातफलम्।
कांतः सुखी भोगयुतश्च मानी प्रियप्रवक्ता बहुपुत्रयुक्तः।
मुगुप्तधुद्धिः खलु दीर्घजीवी नरोड्रॉिवत्सरसंभवः स्यात् ।।६।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अंगिरा सक्त्तर हो वह मनुष्य स्खी करके मुखी,
भोगसहित, मानी, प्यारी वाणी बोलनेवाला, बहुत पुनोवाला, छिपी हुई बुद्धि और
बड़ी उमरवाला होता है ॥ ६ ॥
अथ श्रीमुखसवत्सरजातफलम् ।
श्रीमान्प्रतापी बहुशास्त्रवेत्ता सुहत्प्रियश्चारुमतिर्वलीयान् ।
सत्कीर्तियुक्तो नितरामुदारो भवेन्नरः श्रीमुखसंभवोऽसौ ॥७॥

जाताभरण।
जिस मनुप्यके जन्मकालमें श्रीमुख संवत्सर होता है वह मनुष्य लक्ष्मीवान, बड़ा
प्रतापी, बहुत शास्त्रोंको जाननेवाला, मित्रोंको प्यारा, सुंदर मति, वलवान, श्रेष्ठ,
कीर्तिसहित और निरंतर उदार होता है ॥ ७ ॥
अथ भावसंवत्सरजातफलम।
प्रशस्तचेताः सुतरां यशस्वी गुणान्वितो दानरतो विनीतः।
सदा सहर्षोऽभिमतो बहूनां भावाभिधानोद्भवमानवः स्यात।।८।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें भाव संवत्सर होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ चित्त, निरंतर
यशस्वी, गुणोंसहित, दान करनेमें तत्पर, नम्रतासहित, हमेशा आनंदमहित और
बहुत जनोंका प्यारा होता है ॥ ८ ॥
अथ युवसंवत्सरजातफलम् ।
प्रसन्नमूर्तिगुणवान्विनीतः शांतश्च दानाभिरतो नितान्तम् ।
सुधीश्चिरायुर्हढदेहशाली जातो युवाव्दे पुरुएः सतोपः ॥९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें युवनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य प्रसत्रमूर्ति, गुण-
वान, नम्रतासहित, शांतचित्त, दान करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ बुद्धिवाला, दीर्घ उमर,
मजबूत देहवाला होता है ॥९॥
अथ धातृसंवत्सरजातफलम् ।
सर्वलोकगुणगौरवयुक्तः सुन्दरोऽप्यतितरां गुरुभक्तः ।
शिल्पशास्त्रकुशलश्चसुशीलोधातृवत्सरभवोहि नरम्स्याद॥१०॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें धातृनाम संवत्सर होता है वह सब मनुष्यों में गुण
और गौरवसहित, सुंदर स्वरूप, निरन्तर गुरुका भक्त, शिल्पशाखमें चतुर और
श्रेष्ठ शीलवान होता है ॥ १० ॥
अथ ईश्वरसंवत्सरजातफलम् ।
तत्कालसंजातमहाप्रकोपोहाभियुक्तो गुणवान्प्रतापी ।
दक्षः कलाकौशलशीलशाली मयों भवेदीश्वरजातजन्मा॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ईश्वरनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य शीघ्र ही क्रोध
फरनेवाला, हर्पसहित, गुणवान, प्रतापी, चतुर और कलाओंमें कुशलस्वभाववाला
शीलवान होता है ॥ ११ ॥
अय बहुधान्यसंवत्सरजातफलम् ।
व्यापारदक्षः क्षितिपालमानी दानाभिमानी ननु शास्त्रवेत्ता।
वहुप्रकारैहुधान्यवित्तःस्यान्मानवो वे बहुधान्यजन्मा ॥१२॥

भाषाटीकासहित ।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बहुधान्यसंवत्सर हो वह मनुष्य व्यापारमें चतुर,
राजा करके मान पानेवाला, दानी, अभिमानी, शासका जाननेवाला, अनेक प्रकार
करके बहुत अन्न और धनवाला होता है ।। १२ ॥
अथ ममाथिसंवत्सरजातफलम् ।
स्थध्वजच्छत्रतुरङ्गमाद्यैर्युतश्च शास्त्राभिरतोऽरिहंता!
मन्त्री नरेन्द्रस्य नरः श्रुतिज्ञः प्रमाथिसंवत्सरसंभवः स्यात् ॥१३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्रमाथी संवत्सर होता है वह मनुष्य स्थ, ध्वजा,
छत्र, घोड़े आदिकरके सहित, शास्त्रमें तत्पर, शत्रुओंका नाश करनेवाला, राजाका
मंत्री और वेदका जाननेवाला होता है ॥ १३ ॥
अथ विक्रमसंवत्सरजातफलम् ।
अत्युग्रकर्माभिरतो नितांतमरातिचक्रक्रमणेऽतिदक्षः।
शूरश्च धीरोऽतितरामुदारः पराक्रमी विक्रमवर्षजातः॥१४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें विक्रमसंवत्सर होता है वह अत्यन्त उग्र क्मोंमें तत्पर
शत्रु दलका नाश करनेवाला, चतुर, वीर, धैर्यवान, अत्यन्त उदार और बड़ा
बलवान होता है ॥१४॥
अथ वृपसंवत्सरजातफलम् ।
कार्यप्रलापी किल निंद्यशीलः खलानुयातः परकर्मकर्ता ।
भर्ता बहूनां मलिनोऽलसश्च जातोपादे मनुजोऽतिलुब्धः १५
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृक्षसंवत्सर होता है वह मनुष्य कार्यमें बोलनेवाला,
नियशील, दुष्ट जनों सहित, पराये कामका करनेवाला/बहुत जनोंका स्वामी,मलिन,
आलसी और लोभी होता है ।। १५ ।।
अथ चिनभानुसंवत्सरजातफलम् ।
चित्रवस्त्रकुसुमैकमानसो मानसोद्भवचयान्वितः सदा।
चारुशीलविलखत्कलान्वितश्चित्रभानुजननोहि पूरुषः ॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चित्रभानु संवत्सर होता है वह मनुष्य विचित्रवन्ध,
और पुष्पाका धारण करनेवाला, मानसी चिन्ताके समूह करके सहित, सुंदर मील
और प्रमागवान् फ्लाकरके सहित होता है।॥ १६ ॥

(१०)
जातकाभरण।
अय सुभानुसंवत्सरजातफलम् ।
अरालकेशः सरलः सुकांतिजांतारिपक्षो मतिमान्विनीतः ।
प्रसन्नमूर्तिविलसद्विभूतिः सुभानुसंवत्सरजातजन्मा ॥ १७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सुभानु संवत्सर हो वह मनुष्य घूघरवाले केशोंवाला,
श्रेष्ठ कांतिवाला, शत्रुओंको जीतनेवाला, बुद्धिमान, नम्रतासहित, प्रसन्नमूर्ति, शोभा-
यमान और वैभवसहित होता है ॥ १७ ॥
अथ तारणसंवत्सरजातफलम् ।
धूर्तश्च शूरश्चपलः कलाज्ञः सुनिष्ठुरो गहितकर्मकर्ता ।
उत्पन्नभोक्ता द्रविणेन युक्तः स्यात्तारणान्दोद्भवमानवोयः॥१८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तारण संवत्सर होता है वह मनुष्य धूर्त शूरवीर और
चपल, कलाओंका जाननेवाला, कठोरचित्त, निन्दित काम करनेवाला, पैदा कियेका
भोगनेवाला और धनयुक्त होता है ॥ १८ ॥
अथ पार्थिवसंवत्सरजातफलम् ।
स्वधर्मकर्माभिरतो नितांतं सच्छास्त्रपारङ्गमतामुपेतः ।
कलाकलापे कुशलो विलासीयः पार्थिवाव्दे कुलपार्थिवः स्यात्१९
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पार्थिव संवत्सर हो वह मनुष्य अपने धर्मकर्मम
तत्सर, श्रेष्ठ शास्त्रोंके पारको जानेवाला कलाओंके समूहमें कुशल और विलास
करनेवाला होता है ॥ १९ ॥
अथ व्ययसंवत्सरजातफलम् ।
सौख्येऽतिरक्तो व्यसनाभिभूतो भीतो न किंचिद्वहणादृणी स्यात् ।
जातः पुमानस्थिरचित्तवृत्तिव्ययाभिधाने व्ययकर्मशीलः ॥२०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें व्ययनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य सोख्यमें
आसक्त, व्यसनों करफे सहितभयको थोड़ा भी नहीं ग्रहण करनेवाला, कर्जवन्त,
चित्तकी वृत्ति जिसकी स्थिर नहीं है और खर्च करनेवाला होता है ॥ २० ॥
अथ सजित्संवत्सरजातफलम् ।
राजगौरवमहोत्सवः शुचिर्मानवः पृथुतनुमहीपतिः।
वेरिवर्गविजयोद्यतः सदा सर्वजिच्छरदि यस्य संभवः ॥२१॥

-
अथ
भाषाटीकासहित।
(११)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सर्वजित् संवत्सर होता है वह मनुष्य राजा
करके गौरवको प्राप्त, बड़े उत्सव सहित, पवित्र, मोटी देहवाला, राजा और शत्रु-
ओंका जीतनेवाला होता है ।।,२१ ॥
अय सर्वधारिसंवत्सरजातफलम् ।
भूरिभृत्यबहुभोगसंयुतः सुन्दरश्च मधुरानभुक्सदा ।
धीरतागुणयुतोऽतिधारणः सर्वधारिणि च यस्य संभवः ॥२२॥
जिस मनुष्यके जन्मकाल सर्वधारी संवत्सर होता है वह मनुष्य बहुतसे
नौकर और बहुत भोगसहित, सुन्दर, मीठा अन्न सानेवाला, धीरतासहित और
गुणों करके युक्त होता है ।। २२ ॥
विरोधिसंवत्सरजातफलम् ।
वक्ता विदेशाटनतां प्रपन्नः कुटुंबसौख्याय च योऽतिधूर्तः।
जनेन साकं गतसख्यवृविरोधिवर्पप्रभवो नरः स्यात् ॥२३॥
जिम मनुष्य के जन्मकालमें विरोधी संवत्सर होता है वह मनुष्य बड़ा बोलने
वाला परदेश घूमनेवाला, कुटुम्बके समूहसे युक्त, सौख्यके वास्ते बड़ा धूर्त और
मनुष्यके साथ मित्रतारहित होता है ॥ २३ ॥
अथ विकृतिसंवत्सरजातफलम् ।
निर्धनः किल करालतां गतो दीर्घपूर्वबहुगर्वसंयुतः ।
चारुबुद्धिरहितोऽप्यसौहृदो मानवो विकृतिवर्पसंभवः॥२४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें विकृतिनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य धनहीन,
विकरालताको प्राप्त पहिलेके बड़े आभिमानसहित, सुन्दर बुद्धि रहित और मित्रता-
रहित होता है ॥ २४ ॥
अथ खरसंवत्सरजातफलम।
कामातुरो धूसरकामकांतिः कठोरदीर्घश्च न सारवाक्यः ।
केशी च लज्जाविधिवर्जितःस्यानर खराब्दप्रभवोऽतिदीर्घः २९॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें खरनाम संवत्सर होता है वह मनुष्प कामातुर
मलिन देहकी कांदिवाला, कठोर, दीव, असार वाणी बोलनेवाला, क्लेशयुक्त लजा
फरके रहित और अत्यन्त दीर्घ होता है ॥ २५ ॥
अय नन्दनसंवत्सरजातफलम् ।
तडागवापीगृहकूपकर्ता सदानदानाभिरुचिः शुचिः स्यात् ।
विलासिनीनंदनजातहों नरो भवेन्नंदनवर्पजातः ॥२६॥

(१३) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें नंदननाम संवत्सर होता है वह मनुष्य तालाब वावड़ी, मकान, कुआँ बनानेवाला और हमेशा अन्नदानमें प्रीति करनेवाला, पवित्र और स्त्रियोंके साथ आनन्दको प्राप्त होता है ॥ २६ ॥ अथ विजयसंवत्सरजातफलम् । संग्रामधीरः सुतरां सुशीलो भूपालमान्यो वदतां वरेण्यः । दाता दयालुः किल वेरिहंता यस्य प्रसूतिविजयांभिधाने॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें विजयनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य युद्धमें धीर, निरंतर श्रेष्ठ शीलवाला, राजा करके माननीय, बोलनेमें श्रेष्ट, दाता, दयावान् और शत्रुओंका नाश करनेवाला होता है ॥ २७ ॥ अथ जयसंवत्सरजातफलम् । शास्त्रप्रसंगे विदुपां विवादी मान्यो वदान्यो रिपुवर्गहता । जयामिलापी विषयानुरक्तो जातोजयाब्दे मनुजो महौजाः२८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें जयनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य शास्त्रके प्रसंगमें विद्वानोंसे विवाद करनेवाला, माननीय, शत्रुओंको मारनेवाला, जयकी इच्छा रखनेवाला, विषयोंमें आसक्त और बड़ा पराक्रमी होता है ॥ २८ ॥ अथ मन्मथसंवत्सरजातफलम् । भूपाविशेषः सहितश्च योपाविलासशीलोऽमृतवाकलाज्ञः । सद्गीतनृत्याभिरतश्च भोक्ता यो मन्मथाब्दे जननं प्रपन्नः ॥२९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मन्मथनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य विशेष आभूषणोंसहित, स्त्रीके साय विलास करनेवाला, मीटी वाणी बोलनेवाला, कला- ओंका जाननेवाला, श्रेष्ठ गीत नृत्यों में तत्पर और भोगोंका भोगनेवाला होता है ।। २९ ॥ अय दुर्मुखसंवत्सरजातफलम् । क्रूरोद्धतो निंद्यमतिश्च लुब्धो वक्रास्यवाह्वनिरघप्रियः स्यात् । विरुद्धभावो बहुदुएचेयो यो हायने दुर्मुखनानि जातः ॥३०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें दुर्मुखनाम संवत्सर होता है यह मनुष्य करता- सहित, दुष्ट बुद्धिवाला, लोभी और जिसके मुस, बाँहें और पैर टेडे, विरुद्ध गील और बडी दुष्ट चेष्टावाला होता है ।। ३०॥

भाषाटीकासहित। (१३) - अय हेमलंबसंवत्सरजातफलम् । तुरंगहेमाम्बरधान्यरत्नैर्युतो नितांत सुतदारसौख्यः। समस्तवस्तुग्रहणैकवुद्धियों हेमलंबे पुरुषोऽभिजातः ॥ ३१ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें हेमलंबनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य घोड़े और सोना, वस्त्र, धान्य और रत्नोंसहित, निरंतर पुत्र और स्त्रीके सौख्यको प्राप्त सब चीजोंके ग्रहणमें एकबुद्धिवाला होता है ।। ३१ ॥ अथ विलम्वसंवत्सरजातफलम् । धूतोऽतिलुब्धोऽलसतां प्रपन्नः श्लेष्माधिकः सत्त्वविवर्जितश्च । प्रारब्धकार्य नितरां प्रलापी विलंबसंवत्सरसंभवः स्यात्।।३२॥ जित मनुष्यके जन्मकालमें विलंबनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य धूर्त, बड़ा लोभी, आलस्यसहित, कफप्रकृतिवाला, बलहीन और प्रारब्ध कायोंमें निरंतर प्रलाप करनेवाला होता है ।। ३२ ॥ अय विकारिसंवत्सरजातफलम् । दुराग्रही सर्वकलाप्रवीणः सुसंग्रही चञ्चलधीश्च धूर्तः। अनल्पजल्पस्ससुहृद्विकल्पो विकारिसंवत्सरजो नरः स्याद३३ जिम मनुष्यके जन्मकालमें विकारिसंवत्सर हो वह मनुष्य झूठा हट करने- वाला, सब कलाआम प्रवीण, सब चीजोंका संग्रह करनेवाला, चञ्चलचद्धि, धूर्त, बहुत बोलनेवाला और मित्रोंसे कल्पना करनेवाला होता है ॥ ३३ ॥ अथ शार्वरीसंवत्सरजातफलम् । वणिक्क्रियायां कुशलो विलासी नैवानुकूलश्च सुहृजनानाम् । अनेकविद्याभ्यसनानुरक्तः संवत्सरे शार्वरिनानि जातः॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शर्वरी संवत्सर होता है वह मनुष्य व्यापारके काममें चनुर, विलास करनेवाला, मित्रोंका विरोधी और अनेक प्रकारकी वियाओका अभ्यास करनेवाला होता है ॥ ३४ ॥ अब प्लवसंवत्सरजातफलम् । कामी प्रकामं धनवांश्च शश्वत्सेवादरो दारहतार्थतप्तः। सुगुप्तद्धिश्चपलस्वभावः प्लवाभिधानाव्दभवो नरः स्यात्।।३५॥

(१४) जातकामरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्लवनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य अत्यन्त कामी, धनवान, निरंतर सेवा करके आदर पानेवाला, स्त्रियोंसे संतापको प्राप्त, गुसबुद्धि और चपलस्वभाव होता है ॥ ३५ ॥ अथ शुभकृत्संवत्सरजातफलम् । सौभाग्यविद्याविनयैः समेतः पुण्यैरगण्यैरपि दीर्घजीवी। स्यान्मानवः सूनुधनोरुसंपद्यस्य प्रसूतिः शुभकृत्समासु ॥३६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभकृत संवत्सर हो वह मनुष्य सौभाग्य और विद्या नम्रता करके सहित, बहुत पुण्यों करके युक्त, बड़ी उमरवाला और वह पुत्र, धन और संपदासे सौख्य पाता है ॥ ३६ ॥ अथ शोभनसंवत्सरजातफलम् । सर्वोन्नतश्चारुगुणो दयालुः सत्कर्मकती विजयी विशेषात् । कांतो विनीतः शुभदृक्प्रवीणो यः शोभने वत्सरके हि जातः३७ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शोभन नाम संवत्सर होता है वह मनुष्य ऊँचे शरीरवाला, सुंदर गुणोंसहित, दयावान्, श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, विजयको प्राप्त, सुंदर, नम्रतासहित, श्रेष्ठ नेत्रोंवाला और प्रवीण होता है ।। ३७ ॥ अथ क्रोधिसंवत्सरजातफलम् । क्रूरेक्षणः क्रूरतरस्वभावः स्त्रीवल्लभः पर्वततुल्यगर्वः। स्यादन्तरायः परकार्यकाले क्रोधी भवेत्कोधिशरत्प्रसृतः ३८|| जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्रोधी संवत्सर हो वह मनुष्य क्रूर दृष्टिवाला, दुष्टस्वभाववाला, स्त्रीका प्यारा, पहाडके समान अभिमानी, पराये कार्य विगाड़नेवाला और क्रोधी होता है |॥ ३८॥ अय विश्वावसुसंवत्सरजातफलम् । सपुत्रदारः सुतरामुदारो नरः सदाचाररतोऽतिधीरः। मिप्यानभुक्सर्वगुणाभिरामो विश्वावसौ यस्य भवत्प्रसूति:३९ जिस मनुष्य के जन्मकालमें विश्वावमु संवतार होता है वह मनुष्य पुर और स्वीसहित, निरंतर उदार, हमेशा आचारमें तत्सर, अतिधर्यवाला, मिष्टान्न खानेवाला और सम्पूर्ण गुणोंकरके युक्त होता है ।। ३९ ॥

भाषाटीकासहित । (२५) अथ पराभवसंवत्सरजातफलम् ।। धनस्य धान्यस्य च नैव किंचित्सुसंग्रहोऽत्यंतकठोरखाक्यः । आचारताल्पत्वशठत्वयुक्तो पराभव यस्यभवत्प्रसूतिः ॥१०॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें पराभव संवत्सर होता है वह मनुष्य धन धान्य करके रहित चाहे कितना संग्रह करे, कठोर वाक्य बोलनेवाला, आचारता और थोड़ी शठना सहित होता है ॥ ४० ॥ अय प्लवङ्गसंवत्सरजातफलम् । भवेदलं चंचलचित्तवृतिन स्यात्प्रवृत्तः खलु साधुकायें । धूर्तः सदाचारविचारहीनः प्वङ्गजो वै मनुजः कृशाङ्गः॥ ४ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्लवङ्ग संवत्सर होता है वह मनुष्य परिपूर्णतासहित चंचल चित्तवृत्तिवाला, श्रेष्ठ कार्यमें प्रवृत्ति नहीं करे, धूर्त, दमेशा आचार विचार रहित और दुर्बलदेह होता है॥४१॥ अय कीलकसंवत्सरजातफलम । रूपेण मध्यः प्रियवाग्दयालुर्जलाभिलापी त्वनुवेलमेव । स्थूलानिसन्मौलिरलंबलीयान्किलारिकील-किलके प्रसुतः १२ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कीलक संवत्सर होता है वह मनुष्य स्वरूपमें मध्यम, प्यारी काणी बोलनेवाला, दयावान, वारंवार जलकी इच्छा करनेवाला, स्थूलपैर, श्रेष्टगिर और बल करके पूर्ण होता है।॥ १२ ॥ अथ सौम्यसंवत्सरजातफलम् । पण्डितो हि धनवान्बहुभोगी देवतातिथिरुचिः शुचिरुचैः । सात्त्विक कृशकलेवरयष्टिःसौम्यवत्सरभवो हि नरस्यात् ४३॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मौम्प संवत्सर होता है वह मनुष्य पंडित, धनवान, बड़ा भोगी, देवता और अतिथिमें प्रीति फरनेवाला, बड़ा पविन, साविक स्वभाव और दुर्बल देहवाला होता है ॥ १३ ॥ अय साधारणसंवत्सरजातफलम् । इतस्ततः संचलनानुरक्तो लिपिक्रियायां कुशलो विवेकी । क्रोधी शुचिर्भोगनिवृत्तचेताःप्राणीति साधारणजःप्रणीतः॥३॥ ।

जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें साधारण नाम संवत्सर होता है वह मनुष्य इधर उधर
चलने फिरनेमें तत्पर, लेखक्रिया कुशल, विवेकी, क्रोपसहित और पवित्र भोगसे
संतुष्टचित्तवाला होता है ।। ४४ ॥
अथ विरोधकृसंवत्सरजातफलम् ।
महेश्वराराधनतत्परः स्यात्नोधी विरोधी सततं वहूनाम् ।
परामुखस्तातवचस्थतीव विरोधकृन्नानि च यस्य जन्म४६॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें विरोधकृतसंवत्सर हो वह मनुष्य शिवजीकी आराधना
करनम तत्पर, क्रोधयुक्त, बहुत जनोंसे विरोध करनेवाला और पिताकी आज्ञासे
अत्यन्त विमुख होता है ॥१५॥
अथ परिधाविसंवत्सरजातफलम् ।
विद्वान्सुशीलञ्च कलाप्रवीणःसुधीश्च मान्यो वसुधाधिपानाम् ।
च्यापारसंप्राप्तमहाप्रतिष्टापुमान्भवेद्वै परिधाविजन्मा ॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें परिधावी संवत्सर होता है वह मनुष्य विद्वान, सुन्दर
शीलवाला, कलाओंमें प्रवीण, श्रेष्ठ बुद्धिवाला, राजा करके माननीय और व्यापारमें
बड़ी प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है ।। ४६ ॥
अथ ममादिसंवत्सरजातफलम् ।
दुष्टोऽमिमानी कलहानुरक्तो लुब्धः कुटुंबाभिरतश्च दीनः ।
स्यादल्पधीहितकर्मकर्ता प्रमादिजन्मा मनुज-प्रमादी॥४७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ममादी संवत्सर होता है वह मनुष्य दुष्ट, अभिमानी
कलहमें आसक्त, लोभी, कुटुम्घमें तत्पर, दीन, थोड़ी बुद्धिवाला, बुरे कर्म करने
वाला और आलसी होता है ॥ १७ ॥
अथ आनन्दसंवत्सरजातफलम् ।
स्यादरिदारश्चतुरोऽतिदक्षः शश्वत्सुतानन्दभरप्रपूरः।
प्राज्ञ कृतज्ञसुतरां विनीतोऽप्यानंदजातो मनुजो वदान्यः४८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम आनंदनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य बहुत स्त्रियों-
वाला, चतुर, अत्यन्त दक्षा निरंतर पुत्रोंके आनंदसे भरपूर पंडित, कृतजा नितांन
नम्रतासहित और उदार होता है ॥ १८॥
अय राक्षससंवत्सरजातफलम् ।
रस्त्वकर्मा कलहानुरक्तः सत्यक्तसद्धर्मविचारसारः।
दयाविहीनश्च ससाहसोऽपि भवेन्नरो राक्षसजातजन्मा ॥१९॥

भाषाटीकासहित। (१७) - जिस मनुष्य के जन्मकालमें राक्षसनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य क्रूर खोटे कर्म करनेवाला, कलहमें तत्पर, श्रेष्ठ धर्म और श्रेष्ठ विचारोंको त्यागनेवाला, दयारहित और साहसी होता है ॥ १९ ॥ अथ नलसंवत्सरजातफलम् । समृद्धिशाली जलसस्यसंपद्वैश्यानुवृत्तौ कुशलः सुशीलः । स्यादल्पवित्तो बहुपालकश्चजातो नलादे चपलो मनुष्यः५०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें नलनाम संवत्सर होता है वह मनुष्प श्रेष्ठ बुद्धिवाला, खेती करके धन पैदा करनेवाला, वैश्यवृत्ति करनेमें चतुर, श्रेष्ठ, सुशील, थोड़े धन- वाला, बहुत जनोंका पालन करनेवाला और चपल होता है ।। ५०॥ अय पिंगलसंवत्सरजातफलम् । पिङ्गेक्षणो गहितकमकर्ता स्यादुद्धतश्चंचलवैभवाच्यः । त्यागी शठोऽत्यंतकठोरवाक्योजातो नरः पिंगलनामधेये।।५।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें पिंगलनाम संवत्सर हो वह मनुष्य पीले नेत्रोंवाला, निषिद्ध कर्म करनेवाला, उद्धत, चंचल, वैभव, करके सहित, त्यागी, शठ और अत्यन्त कठोर वाक्यवाला होता है ॥५१॥ अय कालयुक्तसंवत्सरजातफलम् । अनल्पजल्पः प्रियतामुपेतस्त्वसाधुवुद्धिर्विधिना वियुक्तः । कलिप्रसंगे किल कालरूपो यःकालयुक्तप्रभवः कृशांगः॥५२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कालयुक्त संवत्सर होता है वह मनुष्य बहुत बोल- नेवाला, भीतिसहित खोटी बुद्धिवाला, विधियों करके वियुक्त, कलह करनेवाला और विकरालरूप होता है ।। ५२ ॥ अय सिद्धार्थसंवत्सरजातफलम् । उदारचेता विलसत्प्रसादो रणाङ्गणप्राप्तयशाः सुवेपः । नरेंद्रमंत्री बहुपूजितार्थी सिद्धार्थजातो मनुजः समर्थः ॥५३॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिद्धार्थी संवत्सर हो वह मनुष्य उदारचित्त, दया- वान, संग्राममें यशको प्राप्त, मुन्दर पवाला, राजाका मंत्री और बहुत जनांकरके पूजनीय होता है ॥ ५३॥ अय रोद्रसंवत्सरजातफलम् । भयंकरः पालयिता पशूनां शश्वत्परीवादपरोऽतिधूर्तः। जातापकीर्तिःखलचित्तवृत्तिनरोऽतिरौदः खलु रोदजन्मा॥५४॥ " (१८) जातकाभरण । जिस मनुप्यके जन्मकालसे रौद्रनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य भयंकर पशु- ओंका पालनेवाला, निरंतर विवादतत्पर, अत्यन्त धूर्त, अपयशका भागी, दुष्टचित्त , वृत्तिवाला और रौद्र स्वरूप होता है ॥ ५५ ॥ अय दुर्मतिवर्पजातफलम् । स्ववाक्यनिर्वाहमहाभिमानः प्रसन्नताहीनतरो नरः स्यात् । कामी प्रकामं दुरितप्रवृत्तियों दुर्मतिर्दुमतिवर्पजातः ॥१९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें दुर्मति संवत्सर हो वह मनुष्य अपने वाक्यूके पालनेम बड़ा अभिमानी, प्रसन्नतारहित, कामी, यथेष्ट पापकर्ममें प्रवृत्त और दुष्टबुद्धि होता है ॥ ५५ ॥ अथ दुंदुभिसंवत्सरजातफलम् । नित्यं नरेन्द्रापितगौरवः स्याद्जाश्वभूहेमसमन्वितश्च । तौर्यत्रिकप्रीतिरतीव जातश्चेन्मानवो दुंदुभिनामधेये ॥१६॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें इंदर्भिसंवत्सर हो वह मनुष्य राजा करके गौवरको प्राप्त, हाथी घोड़ा धरती सुवर्ण सहित, गीत वाद्य और नृत्यमें अतीव प्रीति करनेवाला होता है ।। ५६ ॥ अथ रुधिरोद्गारिसंवत्सरजातफलम् । आरक्ताक्षः क्वचिदपि महाकामलाद्यामयानां प्रादुर्भावादतिकृशतनुर्जायतेऽत्यंतरोपः। पादद्वंद्वे भवति कुनखो हस्तयुग्मेऽथवा स्या- च्छत्रादुःखं ब्रजति रुधिरोद्वारिजन्मा मनुष्यः॥५७ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें रुधिरोदारी संवत्सर होता है वह मनुष्य लाल नेत्रों- वाला बड़े २ फामला आदि रोगोंके प्रादुर्भावसे अत्यन्त दुर्बल देहवाला, बड़ा क्रोधी और दोनों पैरोंमें टेढ़े नख हों और हाथोंके भी काले नाखून हों तथा शस्त्रसे दुःखको प्राप्त होता है ।। ५७ ॥ अथ रक्ताक्षिसंवत्सरजातफलम् । आचारधर्माभिरतो नितांतं मनोभवोत्कर्पतरो नरः स्यात् । अन्याधिकत्वं सहतेनकिंचिद्रक्ताक्षिजातोऽक्षिरुजान्वितश्च॥१८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें रक्तासि संवत्सर हो वह मनुष्य आचार धर्मम मत्सर, कामी, पड़ी भारी परायी अधिकता नहीं सहनेवाला और नेनरोग- रारा होता है ।। ५८॥

भापार्टीकासहित ।
अथ क्रोधनसंवत्सरजातफलम् ।
स्यादतरायो हि परस्य कायें तमोगुणाधिक्यभयंकरश्च ।
परस्य बुद्धि प्रहरेत्प्रकामं यो हायने क्रोधननाम्नि जातः॥९॥
'जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्रोधननाम संवत्सर हो वह मनुष्य पराये कार्यम
विघ्न करनेवाला, अधिक क्रोधी, भयंकर स्वरूप और परायी वृद्धिका अत्यन्त हर-
नेवाला होता है ॥ ५९॥
अथ क्षयसंवत्सरजातफलम् ।
उपार्जितार्थव्ययकृन्नितान्तं सेवारतो निष्ठुरचित्तवृत्तिः ।
सत्कर्ममार्गेऽल्पमनःप्रवृत्तिः क्षयाभिधाने जननं हि यस्य॥६०॥
इति श्रीदेवज्ञडण्डिराजविरचिते जातकामरणे
संवत्सरजातफलाध्यायः॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षयनाम संवत्सर होता है वह मनुष्य पैदा किये
हुए धनको व्यय करनेवाला, निरंतर सेवामें तत्पर, कठोरचित्त और श्रेष्ठ कर्म
करनेमें थोड़ी मनकी वृत्तिवाला होता है । ६० ॥
इति श्रीवंशपरेलीस्थगोडवंशावतंसनीयलदेवप्रसादात्मजगौरीपुत्रराजज्योतिपिक-
पण्डितश्यामलालम्तायां श्यामसुंदरीमापाटीकायां पष्टिंसंवत्सरजातफलवर्णन
नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ अयनजातफलमाह तत्र उत्तरायणजातफलम् ।
शश्वत्प्रसन्नो ननु सूनुकांतासंतोपयुक्तोऽतितरां चिरायुः।
नरः सदाचारपरोऽप्युदारो धीरश्च सौम्यायनजातजन्मा ॥१॥
जो मनुष्य उत्तरायणसूर्यमें पैदा हो वह मनुष्य निरंतर प्रमत्र, निश्चय कर
पुत्र और स्त्री करके सन्तोपको प्राप्त, बड़ी उमरवाला, हमेशा आचाग्में तत्पर
उदार और धीरवान होता है ॥ १॥
अय दक्षिणायनजातफलम।
अखर्वगः कृषिकर्मकर्ता चतुष्पदाढयोऽतिकठोरचित्तः ।
शठोऽप्यसयो ननु मानवानां याम्यायने नाजनने प्रपन्नः॥२॥
जो मनुष्य दक्षिणायनमें जन्मता है वह मनुष्य बड़ा अभिमानी, खेती करने
वाला, चतुप्पदामहित, अत्यन्त कठोरचित्त और वाट तया किमीकी वानको
महनेवाला नहीं होता है॥२॥

(२०)
जातकाभरण।
अथ ऋतुजातफलमाह-तनादौ वसंतमतुजातफलम् ।
कंदर्परूपो मतिमान्प्रतापी सङ्गीतशास्त्रे गणिते प्रवीणः ।
शास्त्रप्रभूतामलचैलचेता वसंतजन्मा मनुजः प्रसन्नः॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वसन्त हो वह मनुष्य कामदेवसमान रूपवाला, बुद्धि-
मान, प्रतापी, गाने बजानेमें प्रवीण, गणितशास्त्रमें चतुर, बहुत शास्त्रोंका जानने-
वाला, सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाला और प्रसन्नचित्त होता है ॥ १ ॥
अय ग्रीष्मऋतुजातफलम् ।
ऐश्वर्यविद्याधनधान्ययुक्तो वक्ता प्रलम्बामलकेशपाशः।
भोगी भवेन्नीरविहारशीलो यो ग्रीष्मकालोद्भवतां प्रसन्ना२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्रीष्मस्तु हो वह मनुष्य ऐश्वर्य और विद्या, धन,
अन्न करके सहित, बहुत बोलनेवाला, बहुत बड़े लम्बे सुन्दर केशावाला, भोगी
और जलमें विहार करनेमें शील जिसका, ऐसा होता है ॥२॥
अय वर्तुजातफलम् ।
संग्रामधीरो मतिमान्प्रतापी तुरंगमप्रेमकरः सुरूपः ।
कफानिलात्मा ललनाविलासी वोद्भवश्वापि विचित्रमंत्रः॥३॥
जो मनुष्य वर्षाऋतुमें पैदा हो वह मनुष्य युद्धमें धैर्यवाला, बुद्धिमान्, प्रतापी,
घोड़ेसे भीति करनेवाला, रूपवान्, कफ और वात करके सहित, स्त्रियोंमें विलास
करनेवाला और विचित्र सलाहवाला होता है ॥ ३ ॥
अथ शरहतुजातफलम् ।
अपूर्णरोपः पुरुपोऽनिलात्मा मानी धनी कर्मरुचिःशुचिस्यात् ।
रणप्रियो वाहनसंयुतश्च ऋती शस्त्रानि च यस्य जन्म॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शरद मतु हो वह मनुष्य क्रोधहीन, वातप्रकृति-
वाला अभिमानी, धनवान, कौमें प्रीति करनेवाला, पवित्रदेह, संग्राम जिसको
प्यारा और वाहनों करके सहित होता है ॥ ४॥
अथ हेमंऋतुजातफलम् ।
नरेंद्रमंत्री चतुरोऽप्युदारो नरो भवेच्चारुगुणोपपन्नः।
सत्कर्मधर्मानुरतो मनस्वी हेमंतजातः सततं विनीतः॥५॥

भाषाटीकासहित ।
(२१)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें हेमन्त ऋतु होती है वह मनुष्य राजाका मंत्री, चतुर,
उदार, श्रेष्ठ गुणोंकरके सहित, श्रेष्ठ कर्म धर्मसहित और निरंतर नम्रतासहित
होता है ॥ ५॥
अय शिशिरऋतुजातफलम् ।
मिष्टान्नपानानुस्तो नितांतं क्षुधान्वितः पुत्रकलत्रसौख्यः।
सत्कर्मवेपः पुरुषः सरोपो बलाधिशाली शिशिरर्तुजन्मा ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शिशिरऋतु हो वह मनुष्य मिष्टान्नपानमें तत्पर, क्षुधा-
सहित, पुत्र और स्त्री सहित सौल्यवान्, श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, क्रोधसहित व पर-
वान होता है॥ ॥
अथ मासजातफलमाह-तत्रादौ चैत्रजातफलम् ।
सत्कर्मविद्याविनयोपपन्नो भोगी नरः स्यान्मधुरानभोजी।
सत्पात्रमित्रानुरतश्च मन्त्री चैत्रोद्भवश्चापि विचित्रमंत्रः ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चैत्र मास होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ कर्म और विद्या
विनयसहित, भोगी, मधुर अन्नका खानेवाला, सत्पुरुषोंसे मित्रता करनेवाला,
राजाका मंत्री तथा विचित्र मन्त्रवाला होता है ॥ १॥
अथ वैशाखमासजातफलम् ।
सुलक्षणः पुण्यगुणानुशीलः पुमान्बलीयान्द्रिजदेवभक्तः ।
कामी चिरायुर्जलपानशीलः स्यान्माधवे बांधवसौख्ययुक्तः॥
जिम मनुष्यके जन्मकालमें वैशाखमास होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ लक्षणवाला,
पुण्य गुणोंमें शीलवाला, बुलवान, देवता और ब्राह्मणोंका भक्त, कामी, बड़ी उमर-
बाला, जलपानमें शील और भाइयों के सौख्यसहित होता है ॥२॥
अथ ज्येष्टमासजातफलम् ।
क्षमान्वितश्चञ्चलचित्तवृत्तिविदेशवासाभिरुचिश्च तीनः ।
विचित्रबुद्धिः खलु दीर्घसूत्रो ज्येष्ठोद्भवः श्रेष्ठतरो नरः स्यात्
जिम मनुष्यके जन्मकालमें ज्येष्ठमास होता है वह मनुष्य क्षमामहित, चंचल
चित्तवाला, परदेशमें वास करनेवाला, तीव्र, विचित्र बुद्धिवाला, बहुत देग्में काम
करनेवाला और श्रेष्ठ मनुष्य होता है ॥३॥
अय आपादमासजातफलम् ।
बहुव्ययोऽनल्पबचोविलासःप्रमादशीलो गुरुवत्सलश्च ।
सदाग्निमांद्यः शुभकर्मकृत्स्यादापाढजो गाढतराभिमानः ॥४॥

.
(२२)
जातकाभरण।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें आपाड़मास होता है वह मनुष्य बहुत खर्च करने
माला, वहुत बोलनेवाला, आलस्य करनेवाला, गुरुका भक्त, हमेशा मन्दाग्निरोग-
वाला, शुभ कर्म करनेवाला और बड़ा अभिमानी होता है ॥ ४ ॥
अथ श्रावणमासजातफलम् ।
पुत्रैश्च पौत्रैश्च कलत्रमित्रैः सुखी व तातस्य निदेशकर्ता।
लोकप्रसिद्धः कफवान्वदान्यो गुणान्वितः श्रावणमासजन्मा५
जित मनुष्यके जन्मकालमें श्रावण मास हो वह मनुष्य पुत्र पौत्र स्त्री और मित्रों
करके मुखी और पिताकी आज्ञा पालन करनेवाला, संसारमें प्रसिद्ध, कफ सहित
और गुणों करके युक्त होता है ।। ५ ॥
अथ भाद्रपदमासजातफलम् ।
श्रीमान्भवेत्क्षीणकलेवरश्च दाता च कांताश्रुतजातसौख्यः ।
सुखे च दुःखेऽविकृतो हि मत्यों भवेन्नरो भाद्रपदाप्तजन्मा ६
जिस मनुष्यके जन्मकाल में भाद्रपद मास होता है यह मनुष्य लक्ष्मीवान, क्षीणश-
रीर, दानी, स्त्री और शास्त्रसे सौख्य पानेवाला तथा सुख और दुःखमें विकृत नहीं
होता है ॥ ६ ॥
अथ आश्विनमासजातफलम् ।
विद्वान्धनी राजकुलप्रियश्च सत्कार्यकर्ता बहुभृत्ययुक्तः ।
दाता गुणज्ञो बहुपुत्रसंपत्स्यादाश्चिनेऽश्वादिसमृभियुक्तः ।।७।।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें आश्विन मास हो वह मनुष्य विद्वान धनवान,राजाका
प्यारा. श्रेष्ठ कार्य करनेवाला, बहुत नौकरोंवाला, दानी, गुणका जाननेवाला, बहुत
पुन-संपत्ति और अश्वादि समृद्धियुक्त होता है ॥ ७ ॥
अय कार्तिकमासजातफलम् ।
सत्कर्मकर्ता बहुवाग्विलासो धनी लसत्कुंचितकैशपाशः।
कामं सकामः कयविक्रयार्थी सत्कृत्यकृत्कार्तिकजातजन्मा ८
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कार्तिक मास हो वह मनुष्य श्रेष्ठ फर्मकरनेवाला,
बहुत वाणी बोलनेवाला, धनवान, रेहे बालोंवाला, कामी, ऋय विक्रय अर्थी तथा
अच्छे काम करनेवाला होता है ॥ ८॥
अथ मार्गशिरमासनातफलम् ।
सत्तीर्थयात्रानिरतः सुशीलः कलाकलापे कुशलो विलासी।
परोपकर्ता धृतसाधुमार्गों मार्गोद्भवो वे विभः समेतः ॥ ९॥

-
भापाटीकासहित।
(२३)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मार्गशिरमास हो वह मनुष्य श्रेष्ठ, तीयोंकी
यात्रा करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ शीलवाला, कलाओंके समूहमें चतुर, पराया उपकार
करनेवाला, श्रेष्ठ मार्गको धारण करनेवाला तथा वैभवसहित होता है ॥ ९ ॥
अथ पौपमासजातफलम् ।
परोपकारी पितृवित्तहीनः कष्टार्जितार्थव्ययकृविधिज्ञः।
सुगुप्तमंत्रः कृतशास्त्रयत्नः पौपे विशेषात्पुरुषः कृशाङ्गः॥१०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पौष मास हो वह मनुष्य पराया उपकार करने-
वाला, पिताके.धनसे रहित, कष्टसे धन पैदा करनेवाला, थोड़ा खर्च करनेवाला, गुप्त
मंत्र करनेवाला, शास्त्रमें यल करनेवाला तथा दुर्बलदेह होता है ॥ १० ॥
अयमाघमासजातफलम।
सन्मंत्रविद्वैदिकसाधुयोगो योगोक्त विद्याव्यसनानुरक्तः ।
बुद्धेविशेषानिहतारिसंघो माघोद्भवः स्यादनघो मनुष्यः।।१।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें माघमास होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ मंत्रोंका जान-
नेवाला, वेदका जाननेवाला, साधु-योगवाला, योगशास्त्रोक्त विद्याके व्यसनमें तत्पर,
बडी बुद्धिमत्तासे शउदलका नाश करनेवाला, अपापी होता है ॥ ११॥
अथ फाल्गुनमासजातफलम् ।
परोपकारी कुशलो दयालुर्बलान्वितः कोमलकायशाली ।
विलासिनीकेलिविधानशीलो यः फाल्गुनेफल्गुवचोविलासः१२
जिस मनुष्यके जन्मकालमें फाल्गुन मास हो यह मनुष्य पराये उपकार
करनेमें कुशल, दयावान्, कोमल शरीरवाला, स्त्रियोंके साय विलास करनेवाला
और निसार वचन बोलनेवाला होता है ॥ १२ ॥
अय मलमासजातफलम् ।
विहीनमतिः सुचरित्रविविधतीर्थकरश्च निरामयः ।
सकलवल्लभ आत्महितंकरः खलु मलिम्लुचमाससमुद्भवः१३
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मलमास होता है वह मनुष्य विषयमें होनबुद्धि-
वाला, श्रेष्ठ चरित्रसहित, रोगरहित, अनेक तीर्थयात्रा करनेवाला, सबका प्याग
और अपने जनोंका हित करनेवाला होता है ॥ १३ ॥
अथ पक्षनातफलमाह तत्रादौ शुलपक्षजातफलम् ।
चंचच्चिरायुः सुतरां सुशीलः श्रीपुत्रवान्गोमलकायकांतिः।
सदा सहर्पश्च विनीतकालश्चजन्मकालस्तु वलक्षपक्ष॥१॥

.
~
(२४)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्लपक्ष हो वह मनुष्य बड़ी उमरवाला, निरं-
तर श्रेष्ठ शीलवाला, लक्ष्मी और पुत्रवान, कोमलदेहकांतिमान्, हमेशा आनंद-
सहित तथा नम्रतासहित होता है ॥ १॥
अथ कृष्णपक्षजातफलम् ।
प्रतापशीलो विबलश्च लोलः कलिप्रियः स्वीयकुलोद्धतश्च ।
मनोभवाधिक्ययुतो नितांत सितेतरे यस्य नरस्य जन्म ॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कृष्णपक्ष होता है वह मनुष्य प्रतापी, शीलवान,
निर्बल, चंचल, कलह जिसको प्रिय, अपने फुलसे विपरीत और अत्यंत कामी
होता है ।॥ २॥
अथ दिनरात्रिजातफलमाह-तत्रादौ दिवाजातफलम् ।
तेजस्वी पितृसाहश्यश्चारुदृष्टिनुपप्रियः ।
वंधुपूज्यो धनाढ्यश्च दिवाजातो नरो भवेत् ॥७॥
जिस मनुष्यका जन्म दिनमें हो यह मनुष्य तेजवाला, पिताके तुल्य, सुंदर नेत्र-
वाला, राजाओंका प्यारा, भाइयों करके पृज्य और धनवान होता है ॥ १ ॥
अथ रात्रिजातफलम् ।
मंदडम्बहुकामार्तः क्षयरोगी मलीमसः ।
क्रूरात्मा उन्नपापश्च निशि जातो नरो भवेत् ॥२॥
जिस मनुष्यका जन्म रात्रिमें हो वह मनुष्य चुंधे नेत्रवाला, बहुत कामातुर,
क्षयरोगवाला, मलिनचित्तवाला, दुष्टात्मा और पापोंसे आच्छादित होता है ॥२॥
अथ तिथिजातफलमाह तत्रादौ प्रतिपदाजातफलम् ।
वहुजनपरिवारश्चारुविद्यो विवेकी
कनकमणिविभूपावेपशाली सुशीलः।
अतिसुललितकांतिभूमिपालाप्तवित्तः
प्रतिपदि यदि सूतिर्जायते यस्य जन्तोः॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें प्रतिपदा तिथि हो वह मनुष्य बहुत जन और
परिवारवाला, मुंदर विद्यावान, विवेकी, सोना मणि और आभूषण सहित, श्रेष्ठ
शीलवाला, अति मुंदर फातिवाला और राजासे धनको प्राप्त करता है ॥ १ ॥
अथ द्वितीयाजातफलम् ।
दाता दयालुणवान्विवकी चंचत्सदाचारविचारधन्यः।
प्रसन्नमूर्तिबहुगीतकीतिर्मयोंद्वितीयातिथीसंभवः स्यात् ॥२॥

भापाटीकासहित।
(२५)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें द्वितीया तिथि हो वह मनुष्य दानी, दयावान्, गुण-
वान् और विवेकी होता है और निरंतर श्रेष्ठ आचार और विचारोंमें धन्य, प्रसन्न
मूर्ति और बहुत यशवाला होता है ॥२॥
अथ तृतीयाजातफलम्।
कामाधिकश्चाप्यनवद्यविद्यो बलान्वितो राजकुलाप्तवित्तः ।
प्रवासशीलश्चतुरो विलासी मर्त्यस्तृतीयाप्रभवोऽभिमानी ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तृतीया तिथि हो वह मनुष्य अधिक कामी, निदोष
विद्यावाला, बलवान्, राजा करके धन प्राप्त करनेवाला, परदेशमें रहनेवाला, चतुर,
विलासयुक्त और अभिमानी होता है ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थीजातफलम् ।
ऋणप्रवृत्तिबहुसाहसः स्याद्रणप्रवीणः कृपणस्वभावः।
द्यूते रतिर्लोलमना मनुष्यो वादी यदि स्याजनने चतुर्थी॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुर्थी तिथि हो वह मनुप्य ऋणमें प्रवृत्ति करनेवाला,
बडा साहसी, संग्राममें प्रवीण, जुआ खेलनेवाला, चंचलमन तथा विवाद करने-
वाला होता है ॥४॥
अथ पंचमीजातफलम् ।
सम्पूर्णगात्रश्च कलत्रपुत्रमित्रान्वितो भूतदयान्वितश्च ।
नरेंद्रमान्यस्तु नरो वदान्यः प्रसूतिकाले किल पञ्चमी चेत्॥५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पञ्चमी तिथि हो वह मनुष्य पूर्णशरीर, स्त्री और पुत्र,
मित्रों सहित, माणीमात्र पर दया करनेवाला राजमान्य तया दाता, होता है ॥ ५ ॥
अय पष्ठीजातफलम् ।
सत्यप्रतिज्ञो धनसूनुसंपदीोरुजानुमनुजो महौजाः ।
प्रकृएकीर्तिश्चतुरो वरिष्ठः पट्टयां प्रजातो व्रणकीर्णगावः॥६॥
जिम मनुष्यके जन्मकालमें पष्ठी तिथि हो वह मनुष्य सत्य प्रतिज्ञा करनेवाला,
धन पुत्रोंकी संपदा सहित, बडी जंघा और जानुवाला, बडा पराक्रमी, वडी, कीर्ति-
वाला, चतुर, श्रेष्ठ और पापयुक्त देहवाला होता है ॥ ६ ॥
अय सप्तमीजातफलम् ।
ज्ञानी गुणज्ञो हि विशालनेत्रः सत्पात्रदेवार्चनचित्तवृत्तिः।
कन्याग्रजो वै परवित्तहा स्यात्सप्तमीजो मनुजोऽरिहंता ॥७॥

जातकामरण!
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सप्तमी तिथि हो वह मनुष्य ज्ञानी, गुणवान, वडे
नेत्रोवाला, श्रेष्ठ मनुष्य और देवताओंके पूजनमें चित्त लगानेवाला, कन्या संतान
पैदा करनेवाला, पराया धन हरण करनेवाला और शत्रुओंका नाश करनेवाला
होता है ॥७॥
अथाष्टमीजातफलम् ।
नानासंपत्सनुसौख्यः कृपालुः पृथ्वीपालप्राप्तविद्याधिकारः।
कांताप्रीतिश्चंचला चित्तवृत्तिर्यस्याटम्यां जन्म चेन्मानवस्य ८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमी तिथि हो वह मनुष्य अनेक पुत्र और संप-
त्तिका सौख्य पानेवाला, दयावान् , राजा करके विद्याके अधिकारको प्राप्त, खियोंमे
प्रीति करनेवाला और चंचल चित्तवाला होता है ।॥ ८ ॥
अथ नवमीजातफलम् ।
पराङ्मुखो बंधुजनस्य कार्ये कठोरखाक्यश्च सुधीविरोधी।
नरः सदाचारगतादरःस्याद्यस्य प्रसूतौ नवमी तिथिश्चेत्॥९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवमी तिथि हो वह मनुष्य अपने कुटुम्बियोंके कार्यसे
विमुख, कठोर वाणी बोलनेवाला, पडितोंका विरोधी और सदाचारमें आदरहीन
होता है ॥९॥
अथ दशमीजातफलम् ।
धर्मैकबुद्धिर्भववैभवादयः प्रलंबकण्ठो बहुशास्त्रपाठी ।
उदारचित्तोऽतितरां विनीतोरम्यश्चकामी दशमीभवःस्यात् ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें दशमी तिथि हो वह मनुष्य धर्म करनेमें ही बुद्धि
रखनेवाला, फल्याण और वैभव करके सहित, लेवे कंठवाला, बहुत शास्त्रोंका पढ़ने-
सल, उदारचित तथा अत्यन्त नम्रता सहित और कामी होता है ॥ १॥
अथैकादशीजातफलम् ।
देवद्विजानितदानशीलः सुनिर्मलांतःकरणः प्रवीणः ।
पुण्येकचित्तोत्तमकर्मकृत्स्यादेकादशीजो मनुजः प्रसन्नः ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एकादशी तिथि हो वह मनुष्य देवता और ब्राह्मणोंका
पूजन करनेवाला, प्रत और दान करनेमे है शील जिसका, कुशल और शुद्धान्त:-
करणवाला, पुण्यमें ही है मन जिसका, उत्तम कर्म करनेवाला और प्रसन्न चित्तवाला
होता है ॥ ११ ॥

(२८) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें अमावास्या तिथि हो वह मनुष्य शांतचित्त, नाता पिताका भक्त, क्लेशसे प्राप्त धनवाला, धनके प्राप्त करनेकी इच्छावाला, मनु- प्योंमें माननीय, कांति रहित और दुर्बलदेह होता है ॥ १६ ॥ अय वारजातफलमाह-तत्रादौ रविवारजातफलम् । शरोऽल्पकेशो विजयी रणाग्रे श्यामारुणः पित्तत्यप्रकोपः। दाता महोत्साहयुतो महौजा दिने दिनेशस्य भवेन्मनुष्यः॥३॥ जो मनुष्य रविवार के दिन पैदा होता है वह मनुष्य शूर वीर, थोड़े केशों- वाला, संग्राममें यशको प्राप्त होता है और श्यामता लिये लालवर्णवाला, पित्तके समृहसे कोपित, दानी, बड़ा उत्साह्वाला व पराक्रमी होता है ॥ १॥ अथ सोमवारजातफलम् । प्राज्ञः प्रशांतः प्रियवाग्विधिज्ञः शश्वनरेंद्राश्रयवृत्तिवर्ती। सुखे च दुःखे च समस्वभावो वारे नरःशीतकरस्य जाता२॥ जिस मनुष्यका जन्म चंद्रवारको होता है वह मनुष्य चतुर, शांतचित्त, प्यारी वाणी बोलनेवाला, विधियोंको जाननेवाला, निरंतर राजाके आश्रय करके आजीविका करनेवाला तथा मुख और दुःखमें एकसा स्वभाववाला होता है ॥ २॥ अय भीमवारजातफलम। वकोक्तिरत्यंतरणप्रियः स्यानरेंद्रमंत्री च धरोपजीवी । सत्त्वान्वितस्तीत्रतरस्वभावो दिने भवेन्नावनिनंदनस्य ॥३॥ जिस मनुष्यका जन्म मंगलवारको होता है वह मनुष्य टेढी वाणी बोलने वाला, संग्राम जिसको प्यारा, राजाका वजीर, पृथिवी करके आजीविका करनेवाला, बलवान और अति तीव स्वभाववाला होता है।॥ ३ ॥ अथ बुधवारजातफलम। सद्रूपशाली मृदुवाग्विलासः श्रीमान्कलाकौशलतासमेतः । वणिक्रियायांहि भवेदभिज्ञःप्राज्ञो गुणज्ञो ज्ञदिनोद्भवोयः॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुधवार होता है वह मनुष्य श्रेष्ट रूपवाला, मीठी वाणी घोलनेवाला, श्रीमान् फलाम कुमार, वणि व्यवहारमें निपुण, विद्वान और गुणोंका जाननेवाला होता है ॥१॥ अथ गुरुवारजातफलम। विद्वान्धनी सर्वगुणोपपन्नो मनोरमःक्ष्मापतिलब्धकामः। आचार्यवर्यश्च जनप्रियः स्याद्वारे गरोयस्य नरस्य जन्म ॥५॥ सुप भाषाटीकासहित । (२९) जिस मनुष्यका जन्म गुरुवारको होता है वह मनुष्य विद्वान्, धनवान, सम्पूर्ण गुणोंसहित, मनका हरनेवाला, राजा करके कामनाको प्राप्त, श्रेष्ठ आचाय और मनुष्योंका प्यारा होता है ॥ ५ ॥ । अय भृगुवारजातफलम् । सुनीलसत्कुंचितकेशपाशः प्रसन्नवेपो मतिमान्विशेषात् । शुक्लांबरः प्रीतिधरो नरः स्यात्सन्मार्गगो भार्गववारजन्मा॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें भृगुवार होता है वह मनुष्य सुंदर, नीलवर्णके धुंध- वाले बालोंवाला, प्रसन्नचित्त, विशेष बुद्धिमान, सफेद वस्त्रोंको धारण करनेवाला, प्रीति करनेवाला और श्रेष्ठ मार्गपर चलनेवाला होता है ॥ ६॥ अथ शनिवारजातफलम् । अकालसंप्राप्तजराप्रवृत्तिर्वलोज्झितो दुर्बलदेहयष्टिः। तमोगुणी क्रौर्यचयाभिभूतः शनेदिने जातजनुमनुष्यः॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनिवार होता है वह मनुष्य विना समयके आये बुढ़ा- पेको प्राप्त, बलहीन, ईल देहवान्, तमोगुणी और कूरस्वभाववाला होता है ॥ ७ ॥ अथ नक्षत्रजातफलमाह तत्रादापश्चिनीनक्षत्रजातफलम् । सदैव सेवाभ्युदितो विनीतः सत्यान्वितः प्राप्तसमस्तसंपत् । योपाविभूपात्मजभूरितोपास्यादश्विनी जन्मनि मानवस्य ॥१॥ जिस मनुष्यका जन्म अश्विनी नक्षत्रमें हो वह मनुष्य हमेशा सेवा करनेवाला, नत्रतासहित, सत्ययुक्त, सम्पूर्ण प्रकारकी संपत्तियोंको प्राप्त, स्त्री और आभूपण तया पुत्रादिकों करके बड़े सन्तोपको प्राप्त होता है ॥१॥ अथ भरणीनक्षत्रजातफलम् । सदाधकीतहि महापवादनानाविनोदैश्च विनीतकालः। जलातिभीरुश्चपलः खलश्च प्राणी प्रणीतो भरणीभजातः॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें भरणी नक्षत्र होता है वह मनुष्य सदा अपयश भागी, बड़ी निंदा करके युक्त, अनेक विनोदों करके समयको व्यतीत करनेवाला, जलसे अधिक डरनेवाला, चपल और स्खलस्वभाववाला होता है ॥२॥ अथ कृत्तिकानक्षत्रनातफलम् । क्षुधाधिकः सत्यधनैर्विहीनो वृथाटनोत्पन्नमतिः कृतमः । कठोरखाग्गतिकर्मकृत्स्याच्चेत्कृत्तिका जन्मनि यस्य जंतो.३॥

(३०)
जातकाभरण।
जिसमनुष्यका जन्म कृत्तिका नक्षत्रमें होता है वह मनुष्य अधिक क्षुधावाला,सत्य
और धन रहित, विनाकार्य घूमनेवाला, कृतन और कठोर वाणी बोलनेवाला तथा
निन्दित फर्म करनेवाला होता है ॥ ३ ॥
अथ रोहिणीनक्षत्रजातफलम् ।
धर्मकर्मकुशलः कृपीवलश्चारुशीलविलसत्कलेवरः ।
वाग्विलासकलिताखिलाशयो रोहिणी भवति यस्य जन्मभम्॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें रोहिणी नक्षत्र हो वह मनुष्य धर्मकर्ममें कुशल खेती
करनेवाला, सुन्दर शीलवाला, सुन्दर शरीर, वाणियोंसे सभी आशयोंका प्रकट
करनेवाला होता है ।॥ ४॥
अथ मृगशिरनक्षत्रजातफलम् ।
शरासनाभ्यासरतो विनीतः सदानुरक्तो गुणिनां गुणेषु ।
भोक्ता नृपस्नेहभरेण पूर्णः सन्मार्गवृत्तो मृगजातजन्मा॥५॥
जिस मनुष्यका जन्म मृगशिर नक्षत्रमें होता है वह मनुष्य धनुपविद्याके अभ्या-
समें तत्पर, नम्रतासहित, गुणियोंके गुणोंमें हमेशा तत्पर, भोग करनेवाला, राजाके
स्नेहसे पूर्ण व श्रेष्टमार्गकी वृत्ति करनेवाला होता है ॥ ५॥
अय आ नक्षत्रजातफलम् ।
क्षुधाधिको रूक्षशरीरकांतिवन्धुप्रियः कोपयुतः कृतघ्नः ।
प्रसूतिकाले च भवेत्किलार्दा दयाईचेता न भवेन्मनुष्यः ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें आनक्षत्र हो वह मनुष्प अधिक भूखवाला
शरीरवाला, कोषसहित, भाइयोंका प्यारा, कृतान और निर्दय चित्त होता है ॥ ६॥
अय पुनर्वमुनक्षप्रजातफलम् ।
प्रभूतमित्रः कृतशास्त्रयत्नः सद्रत्नचामीकरभूपणाभ्यः।
दाता धरित्रीवसुभिः समेतः पुनर्वसुर्यस्य भवेत्प्रसूती॥७॥
निस मनुष्यके जन्मकालमें पुनर्वसु नक्षत्र होता है वह मनुष्य बहुत मित्रों-
वाला, शास्त्रका पढ़नेवाला, श्रेष्ठ रल और मोनेके आभूषणोंमहित, दानी, बहुत
धरती और धनोंसे युक्त होता है ॥ ७ ॥
अय पुष्य नक्षत्रजातफलम् ।
प्रसन्नगावः पितृमातृभक्तः स्वधर्मसक्तो विनयानुयुक्तः । .
भवेन्मनुष्यः खलु पुष्यजन्मा सन्माननानाधनवाहनान्यः॥८॥

भाषाटीकासहित ।
(३१)
जिस मनुष्य के जन्मकालमें पुष्य नक्षत्र होता है वह मनुष्य प्रसन्नदेह, पिता और
माताका भक्त, अपने धर्ममें भासक्त, विनयसहित, सम्मान और अनेक प्रकारके
धन वाहनांवाला होता है ॥ ८॥
अथालेपानक्षत्रजातफलम् ।
वृथाटनः स्यादतिदुएचेष्टः कष्टप्रश्चापि वृथा जनानाम् ।
साईं सदों हि वृथापितार्थः कंदर्पसंतप्तमना मनुष्यः॥९॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें आश्लेषा नक्षत्र हो वह मनुष्य व्यर्थ भ्रमण करने
वाला, अत्यन्त दुष्टचित्त, वृथा ही मनुष्योंको कष्ट देनेवाला, धनको वृया खर्च
कग्नेवाला और कामकला करके दुःखचित्त होता है ।।,९ ॥
अथ मधानक्षत्रजातफलम् ।
कठोरचित्तः पितृभक्तियुक्तस्तीवस्वभावस्त्वनवद्यविद्यः ।
चेजन्मभं यत्य मघानघःसन्मतिःसदारातिविघातदक्षः॥१०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मघा नक्षत्र हो वह मनुष्य कठोर चित्तवाला, पिता-
की भक्तिसहित, तीवस्वभाववाला और अनवद्यविद्य-अर्थात् अनिन्द्य विद्यावाला,
पापरहित, श्रेष्ठ बुद्धिवाला, हमेशा शत्रुओंका नाश करनेवाला होता है ॥ १० ॥
अथ पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रजातफलम् ।
शूरस्त्यागीसाहसी भूरिभर्ता कामार्तोऽपि स्याच्छिरालोऽतिदक्षः।
धूर्तः करोऽत्यंतसंजातगर्वःपूर्वाफल्गुन्यस्ति चेजन्मकाले ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र हो वह मनुष्य शूरवीर,
त्यागी, साहसी, बहुत नोकरोंबाला, काम करके दुःखी श्रेष्ठ केशोवाला, अत्यंत
चतुर, धूर्त, उन तथा अभिमानी होता है ॥ ११ ॥
अय उत्तराफाल्गुनीनक्षत्रजातफलम् ।
दाता दयालुः सुतरां सुशीलो विशालकीतिर्नृपतेः प्रधानः।
धीरो नरोऽत्यंतमृदुर्नरः स्याचेदुत्तराफाल्गुनिका प्रसूती॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र हो वह मनुष्य द्वानी, दयालु,
अत्यन्त सुशील, बड़ी कीर्तिवाला, राजाका वजीर, धैर्यवान् और अत्यन्त
कोमल होता है ॥ १२॥
अय हस्तनक्षत्रजातफलम् ।
दाता मनस्त्री सुतरां यशस्वी भूदेवदेवार्चनकृत्प्रयत्नात् ।
प्रसूतिकाले यदि यस्य हस्तो हस्तोद्गता तस्य समस्तसंपत्॥१३॥

(३२) जातकामरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें हस्त नक्षत्र हो वह मनुष्य दानी, उदारमन, अत्यन्त यशवाला, ब्राह्मण और देवताओंके पूजनमें यल करनेवाला होता है और उसके हाथसे सब तरहकी संपत्ति होती है ॥ १३ ॥ प्रतापसंतापितशत्रुपक्षो नयेऽतिदक्षश्च विचित्रवासाः । प्रसूतिकाले यदि यस्य चित्रा वुद्धिर्विचित्रा खलु तस्य शास्त्रे१४ अथ चित्रानक्षत्रजातफलम् । जिस मनुष्यके जन्मकालमें चित्रा नक्षत्र हों उस मनुष्यके प्रतापसे शत्रुजन संतापको प्राप्त होता है, नीतिमें चतुर, विचित्र वस्त्र पहिरनेवाला और शास्त्रों विचित्र वाला होता है ।। १४ ॥ अय स्वातीनक्षत्रजातफलम् । कंदर्परूपः प्रभया समेतः कांतापरप्रीतिरतिप्रसन्नः । स्वाती प्रसूतौ मनुजस्य यस्य महीपतिप्राप्तविभूतियुक्तः।। १५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें स्वाती नक्षत्र हो वह मनुष्य कामदेवके समान रूपराला, कांतिसहित, खियोंसे अधिक प्रीति करनेवाला, अत्यंत प्रसन्न और राजा करके वैभवको प्राप्त होता है ।। १५ ।। विशाखानक्षत्रजातफलम् । सदानुरक्तोऽमिसुरक्रियायां धातुक्रियायामपि चोग्रसौम्यः । यस्य प्रसूतीच भवेद्विशाखा सखा न कस्यापि भवेन्मनुष्यः१६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें विशाखा नक्षत्र हो वह मनुष्प अग्निहोत्र और देवताओंकी क्रिया में तत्पर और धातु क्रियाओंका जाननेवाला, उप और सौम्य स्वभाव होता है और वह किसीका मित्र नहीं होता है ।। १६ ॥ अय अनुराधानक्षवजातफलम् । सत्कांतिकीर्तिश्च सदोत्सवः स्याज्जेता रिपूणां च कलाप्रवीणः। स्यात्संभव यस्यकिलानुराधा संपद्विशाला विविधा च तस्य जिस मनुष्पके जन्मकालमें अनुराधा नक्षत्र हो वह मनुष्य श्रेष्ठ कांति और कीर्ति और सदा उत्सवसहित शत्रुओका जीतनेवाला, कलायाम प्रवीण होता है और विशाल संपत्तिवाला होता है ॥ १७ ॥ अय ज्येष्ठानक्षत्रजातफलम् । सत्कांतिकीर्तिर्विभुतासमेतो वित्तान्वितोऽत्यंतलसत्प्रतापः । श्रेष्ठप्रतिष्टो वदतां वरिष्ठो ज्येष्टोद्भवः स्यात्पुरुपो विशेपात८ भापाटीकासहित । (३३) जिस मनुष्यके जन्मकालमें ज्येष्टा नक्षत्र हो वह मनुष्य श्रेष्ठ कांति और कीर्ति तथा वैभवसहित, धनवान, प्रताप करके शोभित, श्रेष्ठ प्रतिष्ठावाला, बोलनेवालोंम श्रेष्ठ होता है ।॥ १८ ॥ अथ मूलविचार । मुलं विरुद्धावयवं समूलं कुलं हरत्येव वदति संतः । चेदन्यथा सत्कुरुते विशेषात्सौभाग्यमायुश्च कुलाभिवृद्धिम् १९ जिस मनुष्य के जन्मकालमें अभुक्तमूल हो वह बालक जड़से कुलका नाश करता है और अभुक्तमूल न हो तो वह सौभाग्य और आयुका बढ़ानेवाला तथा कुलकी वृद्धि करता है ऐसा विद्वानोंका क्थन है ॥ १९ ॥ अय अमुक्तमूलमाह। ज्येष्ठांत्यपटिकैका च मूलस्यायघटीद्वयम् । अभुक्तमूलमित्युक्तं तत्रोत्पन्नशिशोमुखम् ॥२०॥ अश्वपीणि नालोक्य तातेन शुभमिच्छता। तदोपपरिहारार्थ शांतिकं प्रोच्यतेऽधुना ॥ २१ ॥ अब अभुक्तमूल कहते है-ज्येष्ठा नक्षत्रके अंतकी एक बड़ी और मूल नक्षनफे आदिकी दो घडी अभुक्तमूल कहाती है, इनमें पैदा हुए बालकका मुख शुभकी इच्छा करनेवाला पिता आठ वर्षतक न देखे। अब उस अभुक्तमूलजात दोपरो दूर करनेकी शाति कहते है ॥ २०॥ २१ ॥ अथ मूलशातिप्रकारः। रत्नैः शतौपधीमूलैः सप्तमृद्भिः प्रपूरयेत् । शतच्छिद्रं घटं तस्मान्निःसृतेन जलेन हि ॥२२॥ बालकाम्बापितृस्नाने विप्रैः सम्पादिते सति । जपहोमप्रदाने च कृते स्यान्मंगलं ध्रुवम् ॥ २३ ॥ विरुद्धावयवे मूले विधिरेवं स्मृतो बुधैः । मुनीनां वचनं सत्यं मंतव्यं क्षेममीप्सुभिः ॥२॥ अब मूरजातशाति कहते है नवरत्न, सो औषधियाी जड, सात मृत्तिकाओंसे पूर्ण और सौ छेदके घडेमसे निकलते हुए जस्करके ॥ २२ ॥ पैदा हुआ, वारक और माता पिता स्लान फ्रें, बाह्मणोंके कहे हुए वाक्पसे जप, होम, दान करके निश्चय मंगल होता है ॥ २३ ॥ विरुद्ध मूर्लोकी यह विधि पंडितजनोंने कही है। ३ (३४) जातकाभरण। कल्याणकी इच्छावाले पुरुष मुनीश्वरोंके वचनको सत्य माने ॥ २४ ॥ (और विधिपूर्वक मूल, आक्षेपा और ज्येष्ठा-शांति भाषामें बनाये हुए अन्य बीजातको सविधि वर्णित है जिसको आवश्यकता हो वह स्त्रीजातकमें देख ले. वह खीजातक खेमराज श्रीकृष्णदासके यहां चम्बईमें छपा है ।) अय मूलपादजातफलम् । मूलस्य पादत्रितये क्रमेण पितुर्जनन्याश्च धनस्य रिष्टम् । चतुर्थपादः शुभदो नितांत सापै विलोम परिकल्पनीयम्।।२५॥ जिस बालकका जन्म मूलनक्षत्रके पहिले चरणमें हो वह पिताको कष्ट, दूसरे चरणमें माताको क्ष्ट, तीसरे चरणमें धननाश कहना चाहिये और चतुर्थ पाद हमेशा शुभ है । इसी तरह आश्लेषा नक्षत्रका उलटा फल जानना चाहिये अर्थात चतुर्थचरणमें पिताका नाश, तीसरे चरणमें माताका नाश, दूसरे चरणमें धनषा नाग करता है और आश्लेपा नक्षत्रका पहिला चरण शुभ है ।। २५ ॥ अथ विशेषमूलमाह । कृष्णे तृतीया दशमी वलक्षे भूतो महीजाकिबुधः समेतः । चेज्जन्मकाले किल यस्य मूलमुन्मूलनं तत्कुरुते कुलस्य॥२६॥ दिवा सायं निशि प्रातस्तातस्य मातुलस्य च । पशूनां मित्रवर्गस्य क्रमान्मूलमनिष्टदम् ॥२७॥ जिस मनुष्यका जन्म कृष्णपक्षकी तृतीया, मंगलवार और दशमी शनैश्वर वार और शुक्लपक्षकी चतुर्दशी, बुधवार सहित हो और मूल नक्षत्र हो ऐगे समयमें जन्मा बालक समग्र कुलका नाश करता है ॥ २६ ॥ दिन, सन्ध्या रात्रि, प्रातःकालमें जन्म हो तो क्रमकरके पिता, माता, पशु और मित्रवाँको मृत अनिष्ट फल देते है ॥ २७॥ अथ पुरुपाकृतौ मूलाश्लेषाफलमाह । मूनि पञ्च मुखे पञ्च स्कंधयोटिकाप्टकम् । गजाश्च भुजयोयुग्मं हस्तयोर्हदयेऽएकम् ॥२८॥ युग्मं नाभौ दिशो गुह्ये पट् जान्वोः पटू च पादयोः । विन्यस्य पुरुपाकारे मूलस्य फलमादिशेत् ॥२९॥ अब पुरुषाकृतिम मूल और आश्लेषा नक्षत्रका फल कहते है-मनुष्पाकार व रूप बनाने और शिरमें पांच घडी, मुखमें पांच, दोनों कन्याम आट, दोनों (३५) भाषाटीकासहित। वाहोंमें आठ और हायोंमें दो, हृदयमें आठ ॥२८॥ तूंदीमें २, कमरेमें दशा जांचम ६, पैरोंमें ६ इस तरह पुरुपाकृति मूलकी घड़िये स्थापन करे ॥ २९ ॥ अथ पुरुषाकृतिमूलघटीफलम् । छत्रलाभः शिरोदेशे वदने पितृघातकम् । स्कंधयोर्वहत्वं च वायुम्मे त्वकर्मकृत् ।। ३० ॥ हत्याकरः करद्वद्वे राज्याप्तिर्हदये भवेत् । अल्पायुर्नाभिदेशे च गुह्ये च सुखमद्भुतम् ॥३१॥ जंघायां भ्रमणप्रीतिः पादयोर्जीविताल्पता। घटीफलं किल प्रोक्तं मूलस्य मुनिपुंगवः ॥ ३२ ॥ अब पुरुपाकृतिमूलोंकी घटीका फल कहते हैं-शिरकी घटियोंमें पैदा हो तो छत्रलाभ करावे, मुखकी घटी पिताका नाश करे और दोनों कंधोंकी टीमें पैदा हो तो भार वहन करनेवाला हो, दोनों बाहोंकी घटीमें जन्में तो खोटे कर्म करे ॥ ३० ॥ और दोनों हाथोंकी घटीमें हो तो हत्या करनेवाला हो और हदयकी घटीम पैदा हो तो राज्यकी माप्ति करावे और नाभिकी घटीमें पैदा हो तो थोड़ी उमर करे और कमरकी घड़ीमें पैदा हो तो अदमुत सुस करावे ॥३१॥ और जाओंकी घटीमें पैदा हो तो भ्रमण करनेवाला हो और पैरोंकी घड़ीमें थोडा जीवे यह भूलकी घड़ियोंका फल श्रेष्ठ मुनियोंने कहा है ॥ ३२॥ ॥चकम् ॥ सिर मुरा कंधा भिजा हाय हृदय नाभि कमर देर मंग १० विज्ञेयं विबुधैः सर्व सा तच विपर्ययात् ॥ ३३ ॥ जो पहिले पुरुपाकृति मूलनक्षत्रकी घड़ी वर्णन की हैं और उनफा फल फहा है वह आशेषा नक्षत्रम घड़ी तया उनका फल उलग जानना चाहिये ।। ३३ ।। अय मूलाइलेपामुहर्तस्वामिन आह । राक्षसो यातुधानश्च सोमशुक्रफणीश्वराः । पिता माता यमः कालो विश्वेदेवा महेश्वरः॥३०॥ शख्यिश्च कुबेरश्च शको मेघो दिवांकरः। गंधर्वो यमदेवश्च ब्रह्मा विष्णुर्यमस्तथा ॥३५॥ ८ १ ६ पटी (३६) जातकाभरण!; ईश्वरो विष्णुरुद्रौ च पवनो मुनयस्तथा । पण्मुखो भृङ्गिरीटी च गौरीनानी सरस्वती ।। ३६ ॥ प्रजापतिश्च मूलस्य त्रिंशद्वै क्षणनामकाः। 'विपरीता पुन या आश्लेपाजातबालके ॥ ३७ ॥ एक नक्षत्रके तीस मुहूर्त होते हैं, एक मुहूर्त दो घड़ीका होता है, उन मुहूतोंके स्वामी कहते हैं-राक्षस १ यातुधान २ सोम ३ शुक्र ४ फणीश्वर ५ पिता ६ माता ७ यम ८ काल ९ विश्वदेवता १० महेश्वर ११ ॥ ३४ ॥ शर्व १२ कुबेर १३ शुक्र १४ मेघ १५ दिवाकर १६ गंधर्व १७ यम १८ ब्रह्मा १९ विष्णु २० यम २१ ॥ ३५॥ ईश्वर २२ विष्णु २३ रुद्र २४ पवन २५ मुनि २६ स्वामी कार्तिक २७ ,गिरीटी २८ गौरी सरस्वती २९ ॥ ३६ ॥ प्रजापति ३० ये मूलनक्षत्रके ३० तीस नुहूतोंके स्वामी कहे हैं और आश्लेपानक्षत्रमें इनके विपरीत ( उल्टे) मुहूतोंके स्वामी जानने चाहिये ॥ ३७॥ अथ मुहूर्तजातफलम् । प्रथमे द्वितीये पप्टे चाटमेऽष्टादशेतथा । त्रयोविंशे च नवमे परिवारभयंकरः ॥ ३८ ॥ अब मूल और आश्लेपानक्षत्रके मुहूर्तों में उत्पन्न बालकका फल कहते हैं- पहिले, दूसरे, छठे, आटवें, अठारहवें, तेईसवें, नववे, मुहूर्तमें जो बालक पैदा हो तो परिवारका नाश करता है ॥ ३८ ॥ ॥अथ मुहूर्तेशचक्रम् ॥ मुहूर्त २०/११/१२/१३ १४ १५ २ ३ ४ ६ ८ ९ मुहूतेश मुहूर्त राक्षस यातुधान2/गंधर्व दिवाकर १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ २५/२६/२७/२८/२९ ३० B - विष्णु ईश्वर मुहतेश विष्णु स्वा.कार्तिक 2,गरीटि गारी सरस्वती मजापति

भापाटीकासहित ।
(३७)
॥ अथाश्लेपानक्षत्रस्य मुहूर्तेशचक्रम् ॥
४
६
७
AN
में
यम
प्रजापति
गर्व
दिवाकर
१६/१७/१८१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६/२७/२८/२९
गौरी
सरस्वती
भृगरीदि
स्वा.कार्तिक: महेश्वर
विश्वेदेव
मुहूर्वेश मुहतेश
न
यातुधान
राक्षस
अय मूलवृक्षः।
वेदाःसप्तगजाः८काष्ठाः १० खेटारवाणाश्च५ पशिवाः।
११ मूलस्तंभत्वचः शाखा पत्रं पुष्पं फलं शिखा ॥ ३९ ॥
अब मूलवृक्ष कहते हैं-मूल वृक्षकी जड़में ४ चार स्तंभमें ७ सात छालमें ८
आठ शाखाओंमें दश १० पत्तोंमें ९ नौ फूलोंमें ५ पांच फलोंमें ६छ और
शिखामें ११ ग्यारह घड़ियोंको स्यापन करना चाहिये ॥ ३९ ॥
अय मूलवृक्षफलम् ।
मूलवृक्षविभागेषु मंगलं हि फले दले ।
अमंगलं फलं विद्याच्छेपभागेपु निश्चितम् ॥४०॥
अब मूल वृक्षकी घड़ियोंका फल कहते है-मूलवृक्षके अंगविभागोंमें फल और
पुष्पोंकी घड़ियोंम पैदा हो तो श्रेष्ठ फल जानों और अन्य अंगोंकी घड़ियोंमें पैदा
हो तो नष्ट फल फहना चाहिये ॥१०॥
अथ मूलस्य शुभाशुभम् ।
पादे मुहूर्ते वेलायां वृक्षे च पुरुपाकृतौ ।
अनिष्टमशुभाधिक्ये शुभाधिक्ये शुभं फलम् ॥ ११ ॥
जो मूल नक्षत्रमें चरण मुहूर्त वेला और मूल वृक्षों और पुरसाकृतिमूलोंके विंचा-
रसे जो अधिरपक्षाम शुभ फल आवे तो शुभफल पहना चाहिये और नष्ट जो फल
अधिक पाया जाय तो नेष्ट ही पहना चाहिये ॥४१॥

जातकाभरण। . अथ पितुर्नक्षत्रजातफलम् । तातस्य जन्मभं यस्य प्रसूतिर्यदि जायते । तातं वा भ्रातरं ज्येष्ठं रिष्टं स कुरुतं ध्रुवम् ॥ ४२ ॥ जो मनुष्य पिताके नक्षत्रमें पैदा हो वह बालक पिताको अथवा भ्राताको जरूर रोगी करता है, अथवा पिता वा ज्येष्ठभ्राताका नाश करता है ।। ४२ ॥ तस्य शांतिमाह। मूलवच्छांतिकं तत्र विधेयं हि विचक्षणः । भूमिरत्नानि हेमान्नं देयं विप्रेषु भक्तितः ॥ ४३ ।। जो बालक अपने पिताके नक्षत्रमें पैदा हो तो मूलनक्षत्रके समान कही हुई शांति करनी चाहिये तथा धरती रल सोना और अन्न ब्राह्मणको दान करके देवे॥४३॥ अथमूलनक्षत्रजातफलम। सुखेन युक्तो धनवाहनाढयो हिंस्रो बलाढ्यः स्थिरकर्मकर्ता । प्रतापितारातिजनो मनुष्यो मूले कृती स्याज्जननं प्रसन्नः॥४४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मूल नाम नक्षत्र होता है वह मनुष्य सुखसहित धन और वाहन सहित, हिंसा करनेवाला बलसहित, स्थिर कर्म करनेवाला, गजनोंको संताप देनेवाला और चतुर होता है ॥ १४ ॥ अथ पूर्वाषाढानक्षत्रजातफलम् । भूयोभूयस्तोयपानानुरक्तो भोक्ता चञ्चद्राग्विलासः सुशीलः । नूनं संपज्जायते तस्य गाढा पूर्वापाढा जन्मभं यस्य पुंसः॥४५॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें पूर्वापाड़ा नाम नक्षत्र हो वह मनुष्य वारंवार जेल पीनेमें आसक्त, भोग करनेवाला, निरन्तर वाणीका विलास फरनेवाला, श्रेष्ठशील और बहुत धनवाला होता है ॥१५॥ अथ उत्तरापाटानक्षत्रजातफलम् । दाता दयावान्विजयी विनीतः सत्कर्मकर्ता विभुतासमेतः । कांतासुतावाप्तसुखो नितांत वैश्वे सुवेपः पुरुपोऽभिमानी॥४६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें उत्तरापाड़ा नक्षत्रं हो चद्द मनुष्य दानी, दयावान् युद्धमें जयको प्राप्त नम्रतासहित, अच्छे फर्म करनेवाला, ऐश्वर्यमदिन. मी और पुत्रोंसे पूर्ण, सुंसको प्राप्त और अभिमानी होता है ।। १६ ।।

भाषाटीकासहित ।
(३९),
अथ अभिजिजातफलम् ।
अतिसुललितकांतिः संमतः सज्जनानां
ननु भवति विनीतश्चारुकीर्तिः सुरूपः।
द्विजवरसुरभक्तिय॑क्तवाङ्मानवः स्या-
दभिजिति यदि सूर्तिभूपतिः स स्ववंशे ॥४७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अभिजित् नक्षत्र हो वह मनुष्य अत्यन्त शोभायमान
कांतिवाला, सत्पुरुषोंका सम्मत, नम्रतासहित, कीर्तिमान, रूपवान, देवता और
ब्राह्मणों की भक्ति करनेवाला, पंडितोंकीसीं वाणी बोलनेवाला और अपने वंशमें
राजा होता है ॥ १७॥
अय श्रवण नक्षत्रजातफलम् ।
शास्त्रानुरक्तो बहुपुत्रमित्रः सत्पात्रभक्तिविजितारिपक्षः ।
प्राणी पुराणश्रवणप्रवीणश्चजन्मकाले श्रवण हि यस्य ॥४८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें श्रवण नक्षत्र हो वह मनुष्य शास्त्रों में तत्पर, बहुत पुत्र
और मित्रोंवाला, सत्पुरुषोंका भक्त, शत्रुओंका जीतनेवाला और पुराण श्रवण कर-
नेमें प्रवीण होता है || ४८॥
अथ धनिष्ठानक्षत्रजातफलम् ।
आचारयुक्तादरचारुशीलो धनाधिशाली बलवान्कृपालुः।
यस्य प्रसूतौ च भवेद्धनिष्ठामहाप्रतिष्टासहितो नरः स्यात्॥१९॥
'जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनिष्ठा नक्षत्र हो वह मनुष्य आचारयुक्ती आदरका
देनेवाला, सुन्दर शीलवाला, आधिक धनवान, बलवान, दयाल और बड़ी प्रतिष्ठा-
वाला होता है।॥ १९॥
अथ शतभिपानक्षत्रजातफलम् ।
शीतभीरुरतिसाहसिदाता निष्ठुरो हि चतुरो नरो भवेत् ।
वैरिणामतिशयेन दामणो वारुणोडुनि च यस्य संभवः॥५०॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें शतभिषा नक्षत्र हो वह मनुप्प गीतसे डरनेवाला,
साहसी, दाता, कठोरचित्त, चतुर और गउओंको अतिगय काये. वारुण
होता है ॥५०॥
अय पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रनातफलम् ।
जितेंद्रियः सर्वकलासु दक्षो जितारिपक्षः खलु यस्य नित्यम् ।
भवेन्मनीपा सुतरामपूर्वी पूर्वादिका भाद्रपदा प्रमृती ॥५१॥

(१०)
जातकाभरण।
जिस मनुप्यके जन्मकालमें पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र हो वह मनुष्य इंद्रियोंका जीतने-
वाला, सब कलाओंमें चतुर, शत्रुओंका जीतनेवाला और निरंतर अपूर्व बुद्धिवाला
होता है।॥५१॥
अथ उत्तराभाद्रपदानक्षत्रजातफलम् ।
कुलस्य मध्येऽधिकभूपणं च नात्युच्चदेहः शुभकर्मकर्ता ।
यस्योत्तराभाद्रपदा चजन्यां धन्यो भवेन्मानधनो वदान्यः ५२
जिस मनुष्यके जन्मकालमें उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र हो वह मनुष्य अपने कुलमें
अधिक आभूपण स्वरूप, न अत्यन्त उंची देहवाला, श्रेष्ठ कर्मका करनेवाला धन्य
होता है ।। ५२ ॥
अथ रेवतीनक्षत्रजातफलम् ।
चारुशीलविभवो जितेंद्रियः सद्धनानुभवनैकमानसः ।
मानवो ननु भवेन्महामती रेवती भवति यस्य जन्मभम्॥५३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें रेवती नक्षत्र हो वह मनुष्य सुन्दर शीलवाला, इंद्रि-
योका जीतनेवाला, श्रेष्ठ धनवाला और बड़ा बुद्धिमान होता है ।। ५३ ॥
अय बृहज्जातकोक्तनवांशफलमाह-तत्रादौ प्रथमनवांशजातफलम् ।
विनीतो धर्मशीलश्च सत्यवादी दृढव्रतः।
विद्याव्यसनशीलश्च जायते प्रथमांशके ॥१॥
जो मनुष्य पहिले नवांशमें पैदा हो वह मनुष्य नम्रतासहित, धर्ममें शीलवाला,
सत्य बोलनेवाला, दृढ प्रतिज्ञावाला और विद्याको पढनेवाला होता है ॥१॥
अय द्वितीयनवांशजातफलम।
उत्पन्नविभवो भोक्ता संग्रामेपु पराजितः ।
गंधर्वप्रेमदासक्तो जायते द्विनाशके ॥ २॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें द्वितीय नवांश हो वह मनुष्य उत्पन्न किये हुए वैभ-
बांका भोगनेवाला, युद्धमें हारनेवाला और वेश्यास्त्रीमें आसक्त होता है ॥ २ ॥
अथ तृतीयनवांशजातफलम ।
स्वीजितश्चानपत्यश्च मायायुक्तोऽल्पवीर्यवान् ।
वीरविद्याविचारज्ञो जायते विनाशके ।।३।।
जिस मनुष्यका जन्म तीसरे नवांशम हो वह मनुष्य स्त्रियों करके जीना हुआ,
पुनहीन, इंद्राजाली फरनेवाला, थोड़े बलवाला, शूर वीर और विद्याफे विचारको
जाननेवाला होता है ॥ ३॥

..
भापाटीकासहित ।
। अथ चतुर्थनवांशजातफलम्।
बहुस्त्रीसुभगः पूज्यो जलसेवी धनान्वितः ।
नृपसेव्यथवामात्यश्चतुर्थांश प्रजायते ॥४॥
जिस मनुष्यका जन्म चतुर्थ नवांशमें हो वह मनुष्य बहुत स्त्रियोंवाला, श्रेष्ट भाग-
वाला पूजनीय,जलसेवामें तत्पर, धनवान्, राजसेवी, अथवा राजाका मंत्री होता है।
अथ पंचमनयांशजातफलम् ।
बहुमित्रनृपामात्यो बंधुमित्रसुखान्वितः ।
महत्प्रतिष्ठामाप्नोति संजातः पंचमांशके ॥५॥ .
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमनवांश हो वह मनुष्य बहुत मित्रोंवाला, राजाका
मंत्री, कुटुंबीजन और मित्रोंसे मुखसहित बड़ी प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है ।। ५ ॥
अथ पष्टनवांशजातफलम् ।
जितवैरिगणो वीरो दृढसौहदकारकः ।
जायते मण्डलाधीशो नरः पष्टांशकोद्भवः ॥ ६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठा नवांश हो वह मनुष्य वैरियोंको जीतनेवाला,
शूरवीर, पक्की मित्रता करनेवाला और देशका स्वामी होता है ॥ ६ ॥
अय सप्तमनवांशजातकलम् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र पृथ्वीनाथकलायुक्तः ।
सेनापतित्वमाप्नोति संजातः सप्तमांशके ॥७॥
जिस मनुष्यका जन्म सातवें नवांशमें होता है वह मनुष्य सब जगह निर्वधन
होकर विचरनेवाला, गजाओंकी कलासहित और सेनाका मालिक होता है ॥७॥
अय अष्टमनवांगनातफलम् ।
उदारधीः क्षितिख्यातो धनधान्यव्यपोहितः ।
कोपी दुर्जनतप्तांगो नरो जातोऽष्टमांशके ॥ ८॥
जिस मनुष्यफा जन्म अष्टमनचांगमें हो वह मनुष्य उदार बुद्धिवाला, धरती पर
प्रसिद्ध, धन और अन्नको दूर करनेवाला, क्रोधी और खोटे. आदमियोंसे संतापको
माल होता है॥८॥
अय नवमनवांगजातफलम् ।
दीर्घजीवी प्रसन्नात्मा विद्याभ्यासी सदासुखी ।
ज्ञाता धर्मी धनी मान्यो जायते नवमांशके ॥ ९॥

- (४२) जातकाभरण। जिस मनुष्यका जन्म नवम नवांशमें हो वह मनुष्य बड़ी उमरवाला, प्रसन्न देह विद्याका पढ़नेवाला, हमेशा सुखी, ज्ञाता, धर्म करनेवाला, धनवान और माननीय होता है ।। ९ ॥ अथ योगजातफलमाह-तत्रादौ विष्कंभयोगजातफलम् । शश्वत्कांतापुत्रमित्रादिसौख्यं स्वातंत्र्यं स्यात्सर्वकार्यप्रसङ्गे। चंच होत्पादने मानसं चेद्विष्कंभे वै संभवो यस्य जंतोः ॥१॥ जिस मनुष्यका जन्म विष्कंभयोगमें हो वह मनुष्य निरन्तर स्त्री, पुत्र और मित्रादिकोंसे सौख्यको प्राप्त, सब कामोंमें स्वाधीनताको प्राप्त और शोभायमान देहवाला होता है ॥ १ ॥ अथ प्रीतियोगजातफलम् । वक्ता चंचद्रूपसंपत्तियुक्तो दातात्यन्तं स्यात्प्रसन्नाननश्च । जातानंदः सद्विनोदप्रसङ्गो धर्म प्रीतिःप्रीतिजन्मा मनुष्यः।।२।। जिस मनुष्यके जन्मकाल में प्रीतिनाम योग होता है वह मनुष्य बहुत बोलने- वाला, सुंदरस्वरूप और संपत्तिवाला, प्रसन्नमुख, बड़ा दानी, आनंदको जानने वाला, श्रेष्ठ विनोदयुक्त और धर्ममें प्रीति करनेवाला होता है ।। २ ।। अय आयुष्मद्योगजातफलम् । अर्थात्यर्थ साहसेरन्वितश्च नानास्थानोद्यानपानप्रवृत्तिः। यस्यायुष्मत्संभवः संभवेद्वै स्यादायुष्मान्मानवो मानयुक्तः।।३।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें आयुष्मान योग हो वह मनुष्य धनसे पूर्ण, साहस करके सहित, अनेक स्थान और जंगलमें जानेकी इच्छा रखनेवाला, मानसहित और बड़ी उमरवाला होता है ॥ ३ ॥ अय सौभाग्ययोगजातफलम। ज्ञानी धनी सत्यपरायणः स्यादाचारशीलो वलवान्विवकी। सुश्लाघ्यसौभाग्यविराजमानः सौभाग्यजन्मा हि महाभिमानी जिस मनुष्य के जन्मकालमें सौभाग्ययोग हो वह मनुष्य ज्ञानवान्, धनवान, सत्पमें तत्पर, श्रेष्ठ आचारवाला, बलवान, चतुर जनामे प्रगंमाको प्रातः नौभाग्य- युक्त और बड़ा अभिमानी होता है ॥४॥ अय गोभनयोगजातफलम। सत्वरोऽतिचतुरः सदुत्तरश्वारुगौरवयुतश्व सन्मतिः । नित्यशोभनविधानतत्परः शोभनो भवति शोभनोद्भवः ॥५॥ .

भापाटीकासहित।
(४३)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शोभन नाम योग होता है वह मनुष्य बहुत फुर्तीला,
चतुरतायुक्त, ठीक जबाव देनेवाला, सुन्दर, गौरवसहित, श्रेष्ठ बुद्धिवाला और नित्य
ही शुभकार्यमें तत्पर होता है ॥६॥
अयातिगण्डयोगजातफलम् ।
सदामदोऽथो गलरुक्सरोपो विशालहस्तांत्रिरतीवधूतः ।
कलिपियो दीर्घहनुमनुष्यः पाखण्डिकः स्यादतिगंडजातः॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अतिगंडनाय योग हो वह मनुष्य हमेशा अभिमान-
सहित, गलेकी बीमारीवाला, क्रोधसहित, विशाल हाथ पैरोंवाला, अत्यन्त धूर्त,
कलहप्रिय, बड़ी ठोड़ीवाला और पाखंडी होता है ॥ ६ ॥
अथ सुकर्मयोगजातफलम् ।
हृष्टः सदा सर्वकलाप्रवीणः ससाहसोत्साहसमन्वितश्च ।
परोपकारी सुतरां सुकर्मा भवेत्सुकर्मा परिसूतिकाले ॥ ७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सकर्मनाम योग हो, वह मनुष्य हमेशा प्रसन्नचित्त,
सब कलाओं में प्रवीण, श्रेष्ठ पराक्रमी, पराये उपकारमें तत्पर और अतिश्रेष्ठ कर्म
करनेवाला होता है ।। ७॥
अथ धृतियोगजातफलम् ।
प्राज्ञो वदान्यः सततं प्रहृष्टः श्रेष्ठः सभायां चपलः सुशीलः ।
नयेन युक्तो नियमेन धृत्या धृत्याहये यस्य नरस्य जन्मा८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धृति योग हो वह मनुष्य चतुरतायुक्त, दानी, निरं-
तर प्रसन्न, सभामें श्रेष्ठ, चपल, श्रेष्ठ शीलवाला और नीतिसहित नियमका धारण
करनेवाला होता है ॥ ८॥
अय शूलयोगजातफलम् ।
नरोदरिद्रामयसंयुतश्च सत्कर्मविद्याविनविरक्तः ।
यस्य प्रसूतौ यदि शूलयोगो शूलव्यथा तस्य भवेत्कदाचित्॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शूलनाम योग होता है वह मनुष्य दरिद्र और
रोगसहित, श्रेष्ठ कर्म और विद्या विनयसे रहित हो तया उसको कभी कभी शूल-
रोगकी व्यथा होती है ॥ ९ ॥
अय गण्डयोगजातफलम् ।
धूर्तः सुहृत्कार्यपराङ्मुखश्च केशी विशेपात्परुपस्वभावः ।
चेत्संभवे यस्य भवेच गण्डः प्रचंडकोपः पुरुषः प्रदिष्टः ॥३०॥

. जातकाभरण। जिस मनुष्य के जन्मकालमें गंडनाम योग होता है वह मनुष्य धूर्त, मित्रांके कामसे विमुस, क्लेशका पानेवाला, विशेष रूपसे कठोरस्वभाववाला और बड़े क्रोधका करनेवाला होता है ॥ १० ॥ अथ वृद्धियोगजातफलम् । सुसंग्रहप्रीतिरतीव दक्षो धनान्वितः स्यात्कयविक्रयाभ्याम् । प्रसूतिकाले यदि यस्य वृद्धिर्भाग्याधिधिनियमेन तस्या॥१३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृद्धिनाम योग होता है वह मनुष्य सब चीजोंके संग्रह करनेमें रत, अत्यंत चतुर, क्रय और विक्रय करनेसे धनवान् और नियम रके भाग्यकी वृद्धिवाला होता है ॥ ११ ॥ अय ध्रुवयोगजातफलम् । निश्चला हि कमला सदालये संभवेच्च वदने सरस्वती। चारुकीर्तिरपि स धुवं तदा चेद् ध्रुवो भवति यस्य संभवे।।१२।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें ध्रुवनाम योग हो उस मनुष्यके घरमें अचल लक्ष्मी सदा रहती है और उसके मुखमें सरस्वती वास करे तथा निश्चित सुन्दर कीर्तिवाला होता है ॥ १२ ॥ अथ व्याघातयोगजातफलम् । क्रूरोऽल्पदृष्टिः कृपया विहीनो महाहनुः स्यादपवादवादी । असत्यतानीतिरतीच मर्यो व्याघातजातः खलु घातकर्ता१३॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें व्याघात नाम योग होता है वह मनुष्य ऋरस्वभाव बाला, थोड़ी दृष्टिवाला, दयारहित, ऊँची ठोड़ीवाला, झूठी निंदा करनेवाला, अमत्य- तामें अत्यंत प्रीति करनेवाला और घात करनेवाला होता है ॥ १३ ॥ अथ हर्षणयोगजातफलम। सुस्निग्धगात्रः कृतशास्त्रयत्नः सुरक्तभूपावसनानुरक्तः । प्रसूतिकाले यदि हर्पणश्चेत्स मानवो वे रिपुकपणः स्यात्१४ जिस मनुष्यके जन्मकालमें हपणनाम योग होता है वह मनुष्य चिकनी देवाला, शास्त्रका पढ़नेवाला, रंगीन वस्खोंम पहिरनेवाला, मुंदर आभूपणों सहित गटओंका नाश करनेवाला होता है ।। ११ ।। अय वज्रयोगजातफलम् । सुधीःसुबन्धुगुणवान्महाजाः सत्यान्वितो रत्नपरीक्षकास्यात् । प्रसूतिकाले यदि वज्रयोगः स वज्रयुक्तोत्तमभूपणादयः ।। १५॥ .

. भापाटीकासाहित ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें वज़नाम योग होता है वह मनुष्य सुन्दर बुद्धिवाला सुन्दर. बन्धुओंवाला, गुणवान् महापराक्रमी; सत्यसहित रत्नोंकी परीक्षा करने वाला और हीरोंसे जडे हुए आभूपणोंसे पूर्ण होता है ॥ १५ ॥ अथ सिद्रियोगजातफलम्। उदारचेताश्चतुर मुशीलः शास्त्रादः सारविराजमानः ।। प्रसूतिकाले यदि सिद्धियोगो भाग्याभिवृद्धिःसततं हि तस्य३६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिद्धिनाम योग होता है वह मनुष्यः उदारचित्त, चतुर, श्रेष्ठ शीलवाला, शास्त्रका जाननेवाला, बल करके युक्त और निरंतर उसके भाग्यकी वृद्धि होती है ॥ १६ ॥ अथ व्यतीपातयोगजातफलम् । उदारवुद्धिः पितृमातृवाक्ये गदातमूर्तिश्च कठोरचित्तः । परस्यकार्येव्यतिपाततुल्यो नर खलु स्याव्यतिपातजन्मा १७॥ :- जिस मनुष्यके जन्मकालसें व्यतीपातनाम योग हो वह मनुष्य पिता माताके वचनमें उदार बुद्धि रखनेवाला, रोगयुक्त देहवाला, कठोरचित्त और पराये कार्यको बिगाडनेवाला होता है ॥ १७ ॥ अथ वरीयान्योगजातफलम् । उत्पन्नभोक्ता विनयोपपन्नो द्रव्याल्पतासययतासमेतः। सुकर्मसौजन्यतया वरीयान्भवेद्वरीयान्प्रभवे हि यस्य ॥१८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वरीयान् नाम योग हो वह मनुष्य उत्पन्न किये भोगीका भोगनेवाला, नम्रतासहित, थोडे धनवाला, श्रेष्ठ कार्यमें खर्च करनेवाला, श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, श्रेष्ठजन होता है ॥ १८ ॥ अय परियोगज्ञानाला । असत्यसाक्षीः प्रतिभूर्वहूनां व्यक्तात्मकमी क्षमयां विहीनः । दक्षोऽल्पभक्षो विजितारिपक्षस्त्वर्पितो वै परिघोद्भवास्यात्१९ जिस मनुष्य के जन्मकालमें परिघ योग होता है वह मनुष्य झूटी गवाही देने वाला, बहुतॊकी जमानत करनेवाला, प्रकट. कौवाला, क्षमारहित, चतुर, थोडा भोजन करनेवाला, शत्रुओंका जीतनेवाला और निर्भय होता है ।। २९ अथ शिवयोगजातफलम् । सन्मंत्रशास्त्राभिरतो नितांतं.जितेंद्रियश्चारुशरीरयहिः। योगःशिवो जन्मनियस्यजंतोः सदाशिवंतस्यशिवप्रसादावर०

जातकाभेरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें गंडनाम योग होता है वह मनुष्य धूर्त, मित्राके
कामसे विमुस, क्लेशका पानेवाला, विशेष रूपसे कठोरस्वभाववाला और बड़े
क्रोधका करनेवाला होता है ॥ १० ॥
अथ वृद्धियोगजातफलम् ।
सुसंग्रहप्रीतिरतीव दक्षो धनान्वितः स्यात्क्रयविक्रयाभ्याम् ।
प्रसूतिकाले यदि यस्य वृद्धिर्भाग्याधिवृद्धिनियमेन तस्य।।११॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृद्धिनाम योग होता है वह मनुष्य सब चीजोंके
संग्रह करनेमें रत, अत्यंत चतुर, क्रय और विक्रय करनेसे धनवान् और नियम
करके भाग्यकी वृद्धिवाला होता है ॥ ११ ॥
अथ ध्रुवयोगजातफलम् ।
निश्चला हि कमला सदालये संभवेच्च वदने सरस्वती !
चारुकीर्तिरपि स ध्रुवं तदा चेदू ध्रुवो भवति यस्य संभव॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ध्रुवनाम योग हो उस मनुष्यके घरमें अचल
लक्ष्मी सदा रहती है और उसके मुखमें सरस्वती वास करे तथा निश्चित
मुन्दर कीर्तिवाला होता है ॥ १२ ॥
अथ व्याघातयोगजातफलम् ।
क्रूरोऽल्पदृष्टिः कृपया विहीनो महाहनुः स्यादपवादवादी।
असत्यताप्रीतिरतीच मत्यों व्याघातजातः खलु घातकर्ता१३॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें व्याघात नाम योग होता है वह मनुष्य करस्वभाव
बाला, थोड़ी दृष्टिवाला, दयारहित, ऊँची ठोड़ीवाला, झूटी निंदा करनेवाला, अमत्य-
तामें अत्यंत प्रीति करनेवाला और घात करनेवाला होता है ॥ १३ ॥
अथ हर्पणयोगजातफलम।
सुनिन्धगात्रः कृतशास्त्रयनः सुरक्तभूपावसनानुरक्तः ।
प्रसूतिकाले यदि हर्पणश्चेत्स मानवो वे रिपुकर्पणः स्यात्१४
जिस मनुष्य के जन्मकालमें हर्षणनाम योग होता है वह मनुष्य चिकनी देहवाला,
शावफा पढ़नेवाला, रंगीन वस्त्रोंका पहिरनेवाला, सुंदर आभूपणों महित गटाका
नाग करनेवाला होता है ॥ १४ ॥
अय वनयोगजातफलम।
सुधीःसुबन्धुर्गुणवान्महीजाः सत्यान्वितो रत्नपरीक्षकस्यात् ।
प्रसूतिकाले यदि वज्रयोगः स वज्रयुक्तोत्तमभूपणाढ्यः ॥१५॥

.. भापाटीकासहित । (४५) जिस मनुष्य के जन्मकालमें वज्रनाम योग होता है वह मनुष्य सुन्दर बुद्धिवाला सुन्दर बन्धुओंवाला, गुणवान् महापराक्रमी, सत्यसहित रनोंकी परीक्षा करने वाला और हीरोंसे जड़े हुए आभूपोंसे पूर्ण होता है ।। १५ ।। अथ सिद्धियोगजातफलम् । उदारचेताश्चतुर सुशील शास्त्रादः सारविराजमानः । प्रसूतिकाले यदि सिद्धियोगो भाग्याभिवृद्धि सततं हि तस्य१६ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिद्धिनाम योग होता है वह मनुष्य. उदागचेत्त, चतुर, श्रेष्ट शीलवाला, शास्त्रका जाननेवाला, बल करके युक्त और निरंतर उमके भाग्यकी वृद्धि होती है ॥ १६ ॥ अथ व्यतीपातयोगजातफलम । उदाखुद्धिः पितृमातृवाक्ये गदातमूर्तिश्च कठोरचित्तः । परस्यकायैव्यतिपाततुल्यो नरःखलु स्याव्यतिपातजन्मा १७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालसें व्यतीपातनाम योग हो वह मनुष्य पिता माताके वचनमें उदार बुद्धि रखनेवाला, रोगयुक्त देहवाला, कठोरचित्त और पराये कार्यको बिगाडनेवाला होता है ॥ १७ ॥ अथ वरीयान्योगजातफलम् । उत्पन्नभोक्ता विनयोपपन्नो व्याल्पतासययतासमेतः । सुकर्मसौजन्यतया वरीयान्भवेद्वरीयान्प्रभवे हि यस्य ॥१८॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें वरीयान नाम योग हो वह मनुष्य उत्पन्न किये भोगोंका भोगनेवाला, नम्रतासहित, थोडे धनवाला, श्रेष्ठ कार्यमें खर्च परनेवाला, श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, श्रेष्ठजन होता है ॥ १८ ॥ अथ परिघयोगजातफलम् । असत्यसाक्षी प्रतिभूबहूनां व्यक्तात्मकर्मा क्षमया विहीनः । दक्षोऽल्पभक्षो विजितारिपक्षस्वधर्पितो वै परिघोद्भवःस्यात्१९ जिस मनुष्य के जन्मकालमें परिघ योग होता है वह मनुष्य झूठी गवाही देने- वाला, बहुतोंकी जमानत करनेवाला, प्रकट कौवाला, क्षमारहित, चतुर, थोडा भोजन करनेवाला, शत्रुओंका जीतनेराला और निर्भय होता है ।। १९ ॥ अय शिवयोगजातफलम। सन्मंत्रशास्त्राभिरतो नितांत जितेंद्रियश्चारुशरीरयष्टिः । योगःशिवो जन्मनियस्यजंतोः सदाशिवंतस्यशिवप्रसादाव२० जांतकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें शिवनाम योग होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ मन्त्रशाखमें तत्पर, अत्यन्त जितेन्द्रिय, सुन्दर देहवाला और हमेशा शिवजीकी कृपासे कल्या- णको प्राप्त होता है ।। २० ॥ अथ सिद्धियोगजातफलम् । जितेन्द्रियः सत्यपरोऽतिगौरः सर्वेषु कार्येष्वतिकोविदश्च । भवेत्प्रसूतौ यदिसिद्धियोगः सिद्ध्यंतिकार्याणिकृतानितस्य२१ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिदि योग हो वह मनुष्य इंद्रियोंका जीतनेवाला सत्यमें तत्पर, अत्यन्त गौर, सब कार्योंमें अत्यन्त चतुर होता है और जिन कामाको करे वे सब कार्य उसके सिद्ध होते हैं ॥ २१ ॥ अथ साध्ययोगजातफलम् । नूनं विनीतश्चतुरः सुहासः स्वकार्यदक्षो नितशत्रुपक्षः । सन्मंत्रविद्याविधिनेव सर्व संसाधयेत्साध्यभवो हि दक्षः॥२२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें साध्यनाम योग होता है वह मनुष्य निश्चय करके नम्रतासहित, चतुर, हास्ययुक्त, अपने कार्यमें कुशल, शत्रुओंका जीतनेवाला और श्रेष्ठ मंत्रविद्यासे सब कार्योंका साधनेवाला होता है ।। २२ ॥ अय शुभयोगजातफलम् । शुभप्रचारः शुभवाग्विलासः शुभस्य कर्ता शुभलक्षणश्च । शुभोपदेशं कुरुते नराणां यस्य प्रसूती शुभनामयोगः ॥२३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभयोग होता है वह मनुष्य शुभकार्यका प्रचार करनेवाला, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, शुभ करनेवाला और शुभ लक्षणोंसहित श्रेष्ठ उपदेशोफा फरनेवाला होता है ॥ २३ ॥ अय शुक्लयोगजातफलम् । जितेन्द्रियः सत्यवचा महोजा वाम्बादसंग्रामजयाभ्युपेतः । सन्मानशुक्लांबरधारणेच्छुः शुक्लोद्भवो वैभवसंयुतः स्यात्।।२४॥ जिस मनुष्य के जन्मफालमें शुक्लनाम योग हो वह मनुष्य इन्द्रियोंफा जीतने साला, सत्य बोलनेवाला, घडा पराक्रमी, शाखार्य करने तथा गुदमें जयको माम, सम्मानको प्राप्त और सफेद वस्त्र धारण करनेकी इच्छापाला होता है ॥ २४ ॥ अय प्रलपोगजातमाटम। विद्याभ्यासेऽत्यंतप्रीतिः सचेता नित्यं सत्याचारजातादरश्च । शांतो दांतो जायते चारुका ब्रह्मा योगःसंभवे यस्य सः२६॥

भोपाटीकासहित । (४७) जिस मनुष्यके जन्मकालमें ब्रह्मानाम योग हो वह मनुष्य विद्याके पढ़नेमें अत्यन्त प्रीति करनेवाला, सुचित्त, हमेशा सत्य आचारमें आदर करनेवाला, शांत, तप कानेवाला और सुन्दर कर्म करनेवाला होता है ॥ २५॥। अथ ऐंद्रयोगजातफलम् । प्राज्ञो वलीयान्विपुलामलश्रीयुक्तः कफात्मा हि भवेन्महौजाः। निजान्वये वै मनुजो नरेन्द्रस्त्वैन्द्रोद्भवश्वारुतरप्रभावः॥२६॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें ऐंद्रनाम योग होता है वह मनुष्य चतुर, बलवान्, बहुत धनवाला, कफकी प्रकृतिवाला, बड़ा पराक्रमी और अपने वंशमें राजा होता है ॥ २६ ॥ अथ वैधृतियोगजातफलम् । चंचलश्च कुटिलः खलमैत्रः शास्त्रभक्तिरहितो हृतचित्तः । साध्वसे मनसि तस्य नो धृतिर्वैधृतिर्भवति यस्य जन्मनि ॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वैधृतिनाम योग हो वह मनुष्य चञ्चल, कुटिल, दु से मित्रता करनेवाला, शास्त्रभक्तिसे रहित, हतचित्त और भयमें अधीर होता है ॥ २७॥ अथ करणफलमाह-तत्रादौ ववकरणजातफलम् । कामी दयालुबलवान्सुशीलो विचक्षणः शीघ्रगतिः सभाग्यः । ववाभिधाने जननं हि यस्य नानाविधा तस्य भवेत्सुसंपत्।।।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें बवकरण हो वह मनुष्य कामी, दयावान, बलवान, श्रेष्ठ शीलवाला, बड़ा चतुर, जल्दी चलनेवाला,भाग्यवान् हो और उसके अनेक प्रकारको सम्पत्ति होती है ।। १ ।। अथ बालवकरणजातफलम्। शूरतातिविलसदलबत्तासंयुतो भवति चारुविलासः । काव्यकृद्धितरणप्रवणश्चेदालवेऽमलमतिश्च कलाज्ञः ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमे बालव करण हो वह मनुष्य शूर वीर, अत्यन्त बलवान, सुन्दर विलास करनेवाला, काव्य करनेवाला, दान करनेमें तत्पर बड़ा चुद्धिमान और कलाओंका जाननेवाला होता है ॥ २ ॥ अथ कौलवकरणजातफलम् । कामी प्रगल्भोऽभिमतो बहूनां नूनं स्वतंत्रो बहुमित्रसख्यः। बलान्वितो कोमलवाग्विलासः श्रेष्ठ कुलेकौलवजातजन्मा॥२॥ - - (४८) } जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें कौलवनाम करण हो वह मनुष्य कामी, बुद्धिमान, बहुतोंको प्यारा, स्वाधीनताको प्राप्त, बहुत मित्रोंसे मित्रता करनेवाला, वलसहित, कोमलवाणी बोलनेवाला और अपने कुलमें श्रेष्ठ होता है ॥ ३ ॥ अथ तैतिलकरणजातफलम् । चारुकोमलकलेवरशाली केलिलाससुमनाश्च कलाज्ञः । वाग्विलासकुशलोऽतिसुशीलस्तैतिले विमलधीश्चलहक्स्यात् जिस मनुष्यके जन्मकालमें तैतिलकरण हो वह मनुष्य सुन्दर कोमल देहवाला, केलि विलासमें प्रीति करनेवाला, कलाप्रवीण, वाणीविलासमें चतुर, अतिश्रेष्ठ शील- वाला, निर्मल बुद्धि और चंचल नेत्रोंवाला होता है ॥ ४ ॥ अथ गरकरणजातफलम् । परोपकारे विहितादरश्च विचारसारश्चतुरो जितारिः। शूरोऽतिधीरः सुतरामुदारो गरे नरश्चारुकलेवरश्च ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें गरकरण हो वह मनुष्यं पराया उपकार करनेवाला, विचार करनेवालों में उत्तम,चतुर, शत्रुओंका जीतनेवाला, शूर वीर, अति धैर्यवान्, अत्यन्त उदार और सुन्दर शरीखाला होता है ॥५॥ अथ वणिजकरणजातफलम् । कलाप्रवीणः सुतरां सहासः प्राज्ञो हि सन्मानसमन्वितश्च । प्रसुतिकाले वणिजोहि यस्य वाणिज्यतोऽर्थागमनं हि तस्थ६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वणिजनाम करण हो वह मनुष्य कलाओंमें प्रवीण, अत्यंत हास्ययुक्त, चतुर, . सन्मानसहित और व्यापारसे धन पैदा करनेवाला होता है ॥ ६॥ अथ विष्टिकरणजातफलम्। चारुवक्रचपलो वलशाली हेलयासिदलितारिकुलश्च । जायते खलमतिर्वदुनिद्रो यस्य जन्मसमये खलु भद्रा ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें विष्टिकरण हो वह मनुष्य मुंदर मुखवाला, चपला बलवान, अनायास ही तलवारसे नुओंके कुलका नाश करनेवाला, दुष्टयुद्धि और बहुत सोनेवाला होता है ॥ ७ ॥ अथ शकुनिकरणजातफलम् । अतिसुललितबुद्धिमत्रविद्या विधाने गुणगणसमवेतः सर्वदा सावधानः। . -- भापाटीकासहित । ननु जनकृतसंख्यः सर्वसौभाग्ययुक्तो भवति शकुनिजन्मा शाकुनज्ञानशीलः ॥ ८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शकुनिनाम करण हो वह मनुष्य अत्यंत सुन्दर बुद्धिवाला, मंत्रविद्याके विधानमें चतुर, गुणोंके दलसहित, हमेशा सावधान, मनुष्योंसे मित्रता करनेवाला, सम्पूर्ण सौभाग्य पदार्थोसहित और शकुनका जाननेवाला होता है ॥ ८॥ अथ चतुष्पदकरणजातफलम् । नरः सदाचारपराङ्मुखः स्यादसंग्रहः क्षीणशरीरयधिः। चतुष्पदे यस्य भवेत्प्रसूतिश्चतुष्पदात्सत्त्वयुतो मनुष्यः ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुष्पद नाम करण हो वह मनुष्य हमेशा सदा- चारसे रहित, किसी वस्तुका संग्रह नहीं करे, क्षीण शरीरवाला और चौपायों के बलवाला होता है ।। ९॥ अथ नागरणजातफलम् । दुःशीलवक्रचलनो बलवान्खलात्मा कोपानलाहतमतिः कलिकृत्कुलार्यैः । द्रोहात्कुलक्षयभवादतिदीर्घकाले जातो हि नागकरणे रणरंगधीरः ॥१०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमे नागकरण हो वह मनुष्य खोटे स्वभाववाला, उलटा चलनेवाला, बलवान, दुष्टात्मा, क्रोधामिसे नष्ट बुद्धिवाला, कुलके श्रेष्ठ पुस्पोंसे क्लह करनेवाला, कुटका शट, वैरसे कुलका नाश करनेवाला और मंग्राममें धीर होता है।॥१०॥ अथ किंस्तुघ्नकरणजातफलम् । धर्मेऽप्यधमै समता मतेः स्यादङ्गेऽप्यनङ्गे विवलत्वमुच्चैः । मैत्र्याममैत्र्यां स्थिरता न किंचित्किस्तुनजातस्य हि मानवस्य३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें विस्तुन्न करण होता है वह मनुष्य धर्म और अधर्मम बराबर होता है, देहमें और काम-क्रीड़ामें निर्बल, मिनता और गत्रुता उसकी स्थिर कभी न रहे ॥ ११ ॥ अय गण्डांतजातफल्म्। पौष्णादिगंडांतभवो हि मर्त्यः क्रमेण पित्रोरशुभोऽग्रजस्य ।

(५०४
जातकाभरण।
तथा च सत्यं त्रिविध प्रजातः सर्वाभिघातं कुरुते वदंति॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नक्षत्रगंडांत हो वह मनुष्य माता पिताका नाश
फरेगा और तिथिगंडांतमें उत्पन्न हुआ अपने ज्येष्ठ भ्राताका नाश करता है
और लनगंडांतमें पैदा हुआ आप नष्ट होता है और तीनों गंडांत कासमें
पैदा हो तो सबका नाश करता है ॥ १॥
अय गणजातफलमाह-तत्रादौ देवराणजातफलम् ।
सुस्वरश्च सरलोक्तिमतिः स्यादल्पभोजनकरो हि नरश्च ।
जायते सुरगणेऽन्यगुणज्ञः सुज्ञवर्णितगुणो द्रविणाब्यः ॥१॥
जो चालक देवगणमें पैदा हो वह श्रेष्ठ शब्दवाला, सीधी उक्ति बुद्धिवाला
थोड़ा' भोजन करनेवाला और गुणोंका जाननेवाला, विद्वानोंसे वर्णनीय
गुणवाला और धनी होता है ॥ १॥
अथ मनुष्यगणजातफलम् ।
देवद्विजा भिरतोऽभिमानी धनी दयालुर्वलवान्कलाज्ञः ।
प्राज्ञः सुकांतिः सुखदोबहूनां मयो भवेन्मयंगणे
प्रसूतः
॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मनुष्यगण हो वह मनुष्य देवता और ब्राह्मणों के
पूजनमें तत्पर, अभिमानी, धनवान्, दुयाल, बलवान्, कलाओंका जाननेवाला,
चतुर, श्रेष्ठ-कांतिवाला और बहुत जनोंको सुख देनेवाला होता है ॥२॥
अथ राक्षसगणजातफलम् ।
अनपजल्पश्च कठोरचित्तः स्यात्साहसी क्रोधपरोद्धतश्च ।
शीलवृत्तः कलिकृद्धलीयान्रक्षोगणोत्पन्ननरो विरोधी॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें राक्षसगण हो वह मनुष्य बहुत बोलनेवाला, कठो-
रचित्त, साहसी, क्रोधवाला, बुरे शीलवाला, फलह करनेवाला, बलवान् और
विरोध करनेवाला होता है ॥ ३ ॥
अथ लग्रजातफलम्-तत्रादी मेपलग्नजातफलम् ।
चंडाभिमानी गुणवान्सकोप सुहृद्विरोधी च सखा परेपाम् ।
पराक्रमप्राप्तयशोविशेपो मेपोदये यः पुरुपोऽतिरोएः॥१॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें मेप लग्न हो वह मनुप्प बड़ा अभिमानी, गुणवान,
मोधी, मित्रोंफा वैरी होता है और अन्यजनोंका मित्र होता है, पराक्रमसे विशेष
प्रशंसावाला और अन्यजनोंका मित्र होता है ॥ १ ॥

भाषाटीकासहित। अथ वृपलग्गजातफलम् । गुणाग्रणी स्याबविणेन पूर्णो भक्तो गुरुणांहि रणप्रियश्च । धीरश्च शूरः प्रियवाक्प्रशांतःस्यात्पूरुपो यस्य वृपो विलगे ॥२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृषभ लम हो वह मनुष्य गुणवानामें अग्रणी धनसे पूर्ण, गुरुओंका भक्त, संग्रामप्रिय, धैर्यवान, शूर, वीर, प्यारी वाणी बोलने वाला और शांतस्वरूप होता है ॥२॥ अथ मिथुनलग्रजातफलम् । भोगी वदान्यो बहुपुत्रमित्रः सुगूढमन्त्रः सधनः सुशीलः । .तस्य स्थितिः स्यान्नृपसंनिधाने लग्ने भवेद्वै मिथुनाभिधाने३॥ जिस मनुष्यका जन्म मिथुन लग्नमें हो वह मनुष्य भोगी, दाता, बहुत पुत्र और मित्रोंवाला, छिपे हुए मंत्रवाला, धनी, श्रेष्ठ शीलवाला होता है और उसका रहना राजाके पास होता है ।। ३ ॥ अथ कर्कलग्नजातफलम् । मिष्टान्नभुक्साधुरतो विनीतो विलोमबुद्धिर्जलकेलिशीलः । प्रकृष्टसारो नितरामुदारो लग्ने कुलीरे हि नरो भवेद्यः॥ ४ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्क लग्न हो वह मनुष्य मिष्टान्नका खानेवाला, साधुओंमें तत्पर, नम्रतावाला, उलटी बुद्धिाला, जलमें विहार करनेवाला, अनेक चीजोंके सारको जाननेवाला निरंतर उदार होता है |॥ ४॥ अथ सिंहलग्नजातफलम् । कृशोदरश्चारुपराक्रमश्च भोगी भवेदल्पसुतोऽल्पभक्षः । संजातबुद्धिर्मनुजोऽभिमाने पञ्चानने संजनने विलग्ने ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंह लुग्न हो वह मनुष्य दुर्बल पेटवाला, सुन्दर पराक्रमवाला, भोगी और थोड़े पुनोवाला, थोड़ा भोजन करनेवाला और आभिमानमें उसकी बुद्धि होती है ॥ ५ ॥ अथ कन्यालग्नजातफलम । कामक्रीडासद्भणज्ञानसत्त्वकौशल्यायैः संयुतः सुप्रसन्नः । लने कन्या यस्यजन्यांजघन्यांकन्यां क्षीराब्धेरवाप्नोति नित्यम्॥६॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें कन्या लग्न हो वह मनुष्य अधिक कामी, श्रेष्ठ गुणवाला और ज्ञान तथा बलसहित चतुरता आदिमें युक्त, श्रेष्ठ, प्रसन्न और अंतमें लक्ष्मीको प्राप्त करता है ।। ६ ।। .

(५२)
जातकाभरण।
अथ तुलालग्नजातफलम् ।
गुणाधिकत्वादविणोपलब्धिर्वाणिज्यकर्मण्यतिनैपुणत्वम् ।
पद्मालया तनिलये न लोला लग्ने तुला चेत्स कुलावतंसः॥७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुला लग्न हो वह मनुष्य गुणोंमें अधिक धनको
प्राप्त करनेवाला, व्यवहार कार्यमें अत्यन्त निपुण तथा उसके स्थानसे लक्ष्मी नहीं
हटती और अपने कुलमें प्रकाशवान होता है ॥ ७॥
अथ वृश्चिकलनजातकफलम् ।
शूरो नरोऽत्यंतविचारसारोऽनवद्यविद्याधिकतासमेतः ।
प्रसूतिकाले किल लग्नशाली भवेदलिस्तस्य कलिः सदेव।।८।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिक, लम हो वह मनुष्य शूर वीर, अच्छा
विचार करनेवाला, श्रेष्ठ विद्याओंकी अधिकतासे युक्त और हमेशा क्लेशको प्राप्त
होता है ॥ ८॥
अय धनुर्लग्नजातफलम् ।
प्राज्ञश्च राज्ञः परिसेवनज्ञः सत्यप्रतिज्ञासुतरां मनोज्ञः ।
सुज्ञः कलाज्ञश्वधनुर्विधिज्ञश्चन्नुर्धनुर्यस्य जनुस्तनुः स्यात्॥९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनुर्लग्न हो वह मनुष्य चतुर, राजाकी सेवा
करनेवाला, सत्यप्रतिज्ञावाला, निरंतर मनको जाननेवाला, विद्वान्, कलाओंका जान-
नेवाला और धनुर्विद्याको जाननेवाला होता है ॥ ९॥
अथ मकरलग्नजातफलम् ।
कठिनमूर्तिरतीव शठः पुमानिजमनोगतकद्वहुसन्ततिः ।
सुचतुरोऽपि च लुब्धतरो वरो यदि नरो मकरोदयसंभवः १०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर लग्न हो वह कठोरमूर्ति, अत्यन्त शठ,
अपने मनका काम करनेवाला, बहुत पुत्रोंवाला, अच्छी चतुरतासहित, अधिक
लोभी और श्रेष्ठ होता है ॥ १० ॥
अथ कुम्भलग्नजातफलम।
लोलस्वांतोऽत्यंतसंजातकामश्चञ्चदेहः स्नेहकृन्मित्रवर्गे ।
सस्यारम्भ संभवेयुक्तदम्भश्चत्स्यात्कुंभे संभवो यस्य लग्ने॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भ लग्न हो वह मनुष्य चंचल, अपने हृदयमे
कामको माप्त, सुन्दर देह, मित्रगणोंसे प्रीति करनेवाला; अत्रका आरंभ करनेवाला
और क्रोधी होता है ॥ ११ ॥

भाषाटीकासहित ।
अथ मीनलग्नजातफलम् ।
दक्षोऽल्पभक्षोल्पमनोभवश्च सदनहेमा चपलोऽतिधूर्तः ।
स्याना च नानारचनाविधाने मीनाभिधाने जनने विलग्ने ३२
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनलग्न हो वह मनुष्य चतुर, थोडा भोजन करने-
वाला तथा अल्पकामवाला, श्रेष्ठ रल और सुवर्णवाला, चपल, अत्यन्त धूर्त और
अनेक तरहकी रचना करनेवाला होता है ॥ १२ ॥
भवेदलं लमबल यथोक्तं विलग्नकाले प्रबले प्रसूतौ ।
तस्मिन्बलोने यदि वा विलग्ने युक्तेक्षिते क्रूरखगैस्तथाल्पम्१३
जिस मनुष्यके जन्मकालमे लग्न बलवान हो तो कहा हुआ पूरा फल होता है
और जो लन निर्बल हो अथवा पापयुक्त हो अथवा पापग्रह देखता हो तो थोडाफल
करता है ॥ १३ ॥
नन्वेवमुदाहतानां संवत्सरादिफलानां समयनियमाभावात्
निराधारकत्वेन फलादेशः कथं सम्यग्घटतीति व्यर्थमेव,
किमर्थमुक्तमिति चेन्न समयनियमोऽप्यस्ति तथा हि-
निश्चयकर संवत्सरादिका फल निराधार कहा है और उसके प्राप्त होनेका समय
भी नहीं कहा है तो वह निराधार फल किस प्रकार घट सकता है, तो पूर्वोक्त फलका
कहना व्यर्थ है, किस वास्ते कहा ऐसा तो न कहो क्योंकि समयनियम भी है
इसलिये कहते है
उक्तानि संवत्सरपूर्वकाणां फलानि तत्प्राप्तिरिति प्रकल्प्या।
सांवत्सरं सावनवर्पपस्यपाकेध्यनर्तुप्रभवं खरांशोः॥ १४ ॥
जो पहिले कहा संवत्सरादिका फल कहा है उसके प्राप्त होनेके समयकी कल्पना
करते है, संवत्सरका फल सायन वर्षपतिकी दशामें कहना चाहिये और अयन मटका
फल सूर्यकी दशामें कहना चाहिये ॥ १४ ॥
अथ पूर्वोक्तसंवत्सराणा फलप्राप्तिसमयमाह-
मासोद्भवं मासपतेस्तथेदोर्गणोडुपक्षप्रभवं च यत्स्यात् ।
तिथिप्रभूतं करणोद्भवं च चन्द्रान्तरेऽर्कस्य दशाविभागे ॥१५॥
वारोद्भवं वारविमोविचिन्त्य योगोत्थमिन्द्रकवलान्वितस्य ।
लग्नोद्भवं लमपतेर्दशायां हम्भावपुराशिजमेवमूह्यम् ॥ १६ ॥

जातकाभरण। और महीनेका फल मासपतिकी दशामें कहना चाहिये और मण तथा नक्षत्रफल और पक्षफल भी चंद्रमाकी दशामें कहना चाहिये और तिथिजात और करणजात फल चंद्रमाके अन्तरमें सूर्यकी दशामें कहना चाहिये ॥ १५ ॥ और वारजात फल वारके स्वामीकी दशामें रहना चाहिये और योगजातफल सूर्य चंद्रमा जो अधिक बली हो उसकी दशामें कहना और लमजात फल लग्नपतिकी दशामें कहना चाहिये और दृष्टिभाव राशि इनका फल इनके स्वामीकी दशामें कहो ।। १६ ।। अथ डिंभाख्यचकम् । डिंभाख्यचक्र रविभाच्च भानां त्रयं न्यसेन्मूर्ध्नि मुखे त्रयं च । हे स्कंधयोझै भुजयोर्द्वयं च पाणिद्वये वक्षसि पञ्च भानि ॥३॥ नाभौ च लिंगे च तथैकमेकं वे जानुनो पादयुगे भपम् । पुंसा सदा वै परिकल्पनीयं मुनिप्रवर्यैः फलमुक्तमत्र ॥२॥ अब डिभारयचक्र कहते हैं-डिभाख्यचक्रके विषयमें सूर्यके नक्षत्रसे नक्षत्रोंश न्यास करे, वे शिरपर तीन, मुखमें तीन, दोनों कन्धोंपर एक एक और दोनों बांहों- पर एक एक, दोनों हाथोंपर एक एक, छातीपर पांच नक्षत्र स्थापित करे ॥ १ ॥ नाभिमें एक, लिंगपर एक और दोनों जांधोंमें दो दो और तीन तीन दोनों पैरोंपर पुरुषोंके हमेशा कल्पना करे, यहां मुनीश्वरोंके कहे हुए फलको कहा है ॥ २ ॥ अथ डिंभाख्यचके नक्षत्रन्यासफलमाह- सदनचामीकरचारुवत्रविचित्रवालव्यजनातपत्रैः। विराजमानो मनुजो नितांत मौलिस्थले भं नलिनीप्रभोश्चेत्३॥ मिष्टाशनानां शयनासनानां भोक्ता च वक्ता सततं प्रसन्नः । स्मिताननो ना वदनानुयात भानोमवेद्रं जनने हि यस्या वृपांशको वंशविभूपणश्च महोत्सवार्थ प्रथितः प्रतापी। नरोऽतिशूरोऽतितरामुदारो दिवाकरोडस्थितमंशके चेत्॥५॥ जो पालक शिरके नक्षों में पैदा हो तो श्रेष्ठ रल और मोना मुन्दर बम व्यजन छयासे गोभित वह मनुष्य गोभाको प्राप्त होता है, जो सूर्यके गिरके नक्षनमें पदा हो ॥ ३ ॥ और जो सूर्यके मुसके नक्षत्रमें पैदा हो तो वह बालक मीटे भोजन, गया और आसनोंका भोग परनेवाला और • बोलनेराला नया निरंतर प्रसन्न रहता है और इसमुसवाला होता है ॥ ४॥ और जो कंधोके भापाटीकासहित ! नक्षत्रम पैदा हो तो वह मनुष्य वंशमें आभूपणके समान, बडे उत्सवों सहित अग्रणी, प्रतापवाला, प्रबल वीर और अत्यन्त उदार होता है ॥५॥ त्यक्तस्वदेशः पुरुषो विशेषाद्र्वोदतः शौर्ययुतो नितांतम् । विदेशवासाप्तमहत्प्रतिष्टो मार्तंडभं बाहुगतं प्रसूतौ ॥ ६ ॥ वदान्यतासद्गणवर्जितश्च पण्यादिरत्नादिपरीक्षकश्च । सत्यानृताभ्यांसहितो हि मत्यो दिवामणेभै यदि पाणिसंस्थम्७ भूपालतुल्यः स्वकुले सुशीलो बालो विशालोत्तमकीर्तिशाली। शास्त्रे प्रवीण परिसूतिकाले वक्षस्थले चेनलिनीशभं स्यात् ८ जो बालक बाहोंके नक्षत्रोंमें पैदा हो वह मनुष्य अपने देशको विशेष करके त्याग देता है और बड़ा अभिमानी, अत्यन्त वीरतासे युक्त और पादेशमें वास कर बडी प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है और जो सूर्यके हाथोंके नक्षत्रमें पैदा हो ॥६॥ वह बालक उदार, श्रेष्ठ गुणसे रहित, व्यापारमें रत्नोंकी परीक्षा करनेवाला, सच और झूठसहित होता है ॥ ७॥ और जो बालक सूर्यकी छातीके नक्षत्रोंमें पैदा हो वह मनुष्य राजाके समान अपने कुलमें होता है और श्रेष्ठ शीलवाला, विशाल, श्रेष्ठ यशवाला और शास्त्र में प्रवीण होता है ॥ ८॥ क्षमासमेतो रणकर्मभीरुः कलाकलापाकलनैकशीलः । धर्मप्रवृत्तिः सुतरामुदारो नाभीसरोजेऽम्बुजबंधुताराः ॥९॥ कंदर्पधुर्योज्झितसाधुकर्मा सङ्गीतनृत्याभिरुचिः कलाज्ञः । चेजन्मकाले नलिनीशभं स्याद्यस्थले सोऽतुलकीर्तियुक्तः ॥ १०॥ नानादेशानेकधा संप्रचारः कायॊत्साहचंचल- क्षामगावः । धर्मों मर्त्यः सत्यहीनश्च नूनं जानुस्थाने- भानुभं जन्मनि स्यात् ॥ ११॥ कृपिक्रियायां निरतोऽल्प- धर्मः शज्झितः सेवनकर्मकर्ता । तारा यादि स्यादरविंद- बन्धोः पादारविंदे च नरस्य सुतौ ॥ १२ ॥ जिसके जन्मकालमें सूर्यके नाभिका नक्षत्र हो वह मनुष्य दयासंयुक्त संग्राममें डरपोक, क्लाओंके समूहमें रचना करने में चतुर, शाम्रमें प्रवीण धर्ममें वृत्ति रखने- वाला निरन्तर उदार होता है ॥ ९॥ और जिसके जन्मकालमें सूर्यके गुह्यस्य- लका नक्षत्र हो वह मनुष्य वडा कामी, साधुक्मोंसे रहित, श्रेष्ठ गीत और जातकाभरण। नृत्य में प्रीति करनेवाला, कलाओंको जाननेवाला होता है और बड़े यावाला होता है ॥ १० ॥ और जिसके जन्मकालमें सूर्यके जानुके नक्षत्र हों वह मनुष्य अनेक देशमें अनेक तरहका प्रचार करनेवाला, कार्यमें उत्साही, चंचल, दुर्बल देहवाला, धूर्ततायुक्त सत्यसे रहित होता है ॥ ११ ॥ जिसके जन्मकालमें सूर्यके पैरोंका नक्षत्र हो वह मनुष्य खेतीकी क्रिया कुशल, थोड़े धर्म करनेवाला, शत्रुरहित और सेवाका काम करनेवाला होता है ॥ १२ ॥ अथ हस्वदीर्घागज्ञानमाह । बस्वा मीनवृपाजघटा मिथुनधनुर्किमृगमुखाश्च समाः। वृश्चिककन्यामृगपतिवणिजा दीर्घाः समाख्याताः ॥३॥ एभिर्लग्नादिगण्यैः शीर्पप्रभृति नृशरीराणि । सदृशानि विजायंतेस्थितगगनचरैश्चैव तुल्यानि ॥२॥ इदं लगतः संकाशात्कालपुरुपाकारचक्रं द्रष्टव्यम् ॥ अब हस्व दीर्घ राशि फहते हैं-मीन, वृप, मेप, कुंभ, ये राशि छोटी हैं और मिथुन, धन, कर्क, मकर ये सब अर्थात् न छोटी हैं न बड़ी है और वृश्चिक, कन्या, सिंह, तुला ये राशि बड़ी हैं ॥ १ ॥ ये राशि लग्नसे लेकर शिर आदिसे लेकर मनुष्यके शरीरके अंगोंका छोटा बड़ा समान जानना चाहिये ॥ २॥ ये लग्नके समाशसे लेकर काल पुरुपके शरीरका आकार चक्रमें छोटा बड़ा जान लेना चाहिये। अय द्वादशभावानां फलानि । भिन्नं द्वादशधा विधाय विलसच्चनं च तत्र न्यसेत् लग्नाबादश राशयोऽतिविशदा बामाङ्गमार्गक्रमात् । अङ्कया तत्र नभश्चरा स्फुटतरा राशी च यत्र स्थिता- स्तेभ्यः साधुफलं त्वसाधुसुधिया वाच्यं हि होरागमात् ॥१॥ पहिले बारह स्थान बनावे वहां चक्र करके न्यास कर फिर लमसे लेकर चारहों राशियों को वाय अंगसे ऋम करके अंक स्थापित कर उन राशिके अंकाम ग्रह स्थापित करे, उसको जन्मकुण्डली कहते हैं, उममे अच्छा पुरा फल ज्योतिषशास्त्रके जाननेवाले विचार फेरें ॥ १॥ अथ तनुभावे किं विचारणीयम् । रूपं तथा वर्णविनिर्णयश्च चिह्नानि जातिवयसः प्रमाणम् । सुखानि दुःखान्यपि साहसंच लग्ने विलोक्यं खलुसर्वमेतत्।।२।

भापाटीकासहित । अब तनुभावका विचार कहते हैं-उस तनुभावसे क्या क्या विचार करना चाहिये, लग्नसे रूप और वर्णका निर्णय, देहके चिह्न अवस्थाका प्रमाण, सुख और दुःस और साहस ये सब लमसे विचार करने चाहिये ॥ २ ॥ अथ तनुभावविचार। विलोकिते सर्वखगर्विलग्ने लीलाविलासैः सहितो दलीयान् । कुले नृपालो विपुलायुरेख भवेन युक्तोऽरिकुलस्य हंता ॥३॥ दीपायुयोग.३ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सम्पूर्ण ग्रह लग्नको देखते हो तो वह मनुष्य हास्यविलास युक्त और बलवान होता है कुलमें राजा हो, बड़ी उमरखाला, भयरहित, शत्रुओंके कुलको नारा करता है ॥ ३ ॥ 1. शु.स च राजयोगः४ दरिद्रयोगः ४ सौम्यास्त्रयो लग्नगता यदि स्युःकुर्वति जातं नृपतिं वि- नीतम् । पापास्त्रयो दुःखदः रिद्रशोकैयुतं नितांत बहु- भक्षकंच॥४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें तीन शुभग्रह लममें बैठे हों तो वह मनुष्प नम्रनायुक्त गजा होता है और जो तीन पापग्रह लग्नमें बैठे हो तो वह मनुष्य दुःख दरिद्र शोक करके सहित अत्यंत भोजन करनेवाला होता है ॥४॥ श्रेष्टयोग:५ लमायूनपडप्टकेऽपि च शुभाः पापेन युक्तेक्षिता मंत्री दण्डपतिःक्षितेरधिपतिःत्रीणां बहूनां पतिः। दीर्घायुर्गदवर्जितो गतभयः सौंदर्यसत्यान्वितः सच्छीलो यवनेश्वरनिगदितो मर्त्यःप्रसन्नम्मदा

(५८).
जातकाभरण।
जो जन्म लग्नसे सातवें, छठे, आठवें, शुभग्रह बैठे हों और पापग्रहोंसे युक्त न हों
और न दृष्ट हों तो वह मनुष्य राजाका मंत्री,फौजका मालिक,धरतीका स्वामी, बहुत
खियोंका पति, बड़ी उमरवाला, रोगरहित, भयहीन, सुंदरता और मित्रता सहित,
श्रेष्ठ शीलवाला और हमेशा प्रसन्न होता है यह यवनाचार्यने कहा है ॥ ५ ॥
अथार्कादिग्रहाणां तु गुणवर्णविनिर्णयः ।
आकारोऽपि शरीरस्य प्रोच्यते मुनिसंमतः ॥६॥
अब मुनिमतानुसार सूर्यादि ग्रहोंके गुण वर्णका निर्णय और शरीरके आकार
कहते हैं ॥ ६ ॥
अथ सूर्यस्वरूपम् ।
शूरो गभीरश्चतुरः सुरूपः श्यामारुणश्चाल्पककुंतलश्च ।
सुवृत्तगात्रो मधुपिंगनेत्रो मित्रोहि पित्तास्थ्यधिको न तुंगः ७॥
अब सूर्यका स्वरूप कहते हैं-शूर, वीर, गम्भीर, चतुर, श्रेष्ठ रूप, श्याम, लाल
, थोड़े बाल, सुडौल शरीर, शहदके समान पीले नेत्र, पित्तप्रकृति, अस्थिमें सार
न बहुत लंबा न बहुत छोटा ऐसा सूर्यका स्वरूप है ॥ ७ ॥
अथ चंद्रस्वरूपम् ।
सद्वाग्विलासोऽमलधीः सुकायो रक्ताधिकः कुञ्चितकेशकृष्णः।
कफानिलात्माम्बुजपत्रनेत्रो नक्षत्रनाथैः सुभगोऽतिगौरः॥८॥
अब चन्द्रमाका स्वरूप कहते हैं-श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, निर्मल बुद्धिवाला,
अधिक रुधिरवाला, घूघरवाले काले बालवाला, कफ वायुकी प्रकृतिवाला कमलपत्र
समान नेत्रवाला सुन्दर और अत्यंत गौर होता है ॥ ८॥
अय भौमस्वरूपम् ।
मजासारो रक्तगौरोऽत्युदारो हिंसः शूरः पैत्तिकस्तामतश्च ।
चंडः पिंगाक्षो युवाऽखर्वगर्वः खर्वश्चोर्वी सूनुरग्निप्रभास्यात्।।९।।
अब मंगलका स्वरूप कहते हैं-मेदामें सार, लाल गौरवर्ण, अत्यंत उदार, हिंसा
करनेवाला, शूरवीर, पित्तप्रकृतिवाला, क्रोधी, प्रचंड, पीले नेत्रवाला, जवान, बड़ा
अभिमानी, अमिके समान कांतिवाला, छोटा शरीर होता है ॥ ९ ॥
अय बुधस्वरूपम ।
श्यामः शिरालश्च कलाविधिज्ञः कुतूहली कोमलवात्रिदोषी।
रजोधिको मध्यमरूपधृक्स्यादाताम्रनेत्रो द्विजराजपुत्रः ॥१०॥

(५९). भापाटीकासहित। अब बुधका स्वरूप कहते हैं-काले बाल, अनेक कलाओंकी विधि जानने- वाला, हास्य करनेवाला, मिष्टभाषी, त्रिदोषयुक्त अधिक रजोगुणवाला, मध्यम रूप और लाल नेत्रवाला होता है ॥ १०॥ अय गुरुस्वरूपम् । ह्रस्वाकारश्चारुचामीकरामः सम्यक्सारः सुस्वरोदारबुद्धिः। दक्षःपिंगाक्षःकफी चातिमांसःप्राज्ञैःसुकीर्तितो जीवसंज्ञः११ अब बृहस्पतिका स्वरूप कहते हैं-छोटा आकार, सुन्दर सोनेके समान कांति. वाला, मेदामें सार, श्रेष्ठ शब्दवाला, उदार बुद्धिवाला, चतुर, पीले नेत्रवाला, कफप्रकृतिवाला, मोटी देहवाला और बुद्धिमान् होता है ।॥ ११ ॥ अथ भृगुस्वरूपम् । सजलजलदनील श्लेष्मलश्चानिलात्मा कुवलयदलनेवो वक्रनीलालकश्च । सुसरलभुजशाली राजसञ्चातिकामी मदयुतगजगामी भार्गवः शुकसारः॥ १२ ॥ अब शुक्रका स्वरूप कहते हैं-मैघके समान नीलवर्णवाला, कफयुक्त, वात- प्रकृति, कमलपत्रसे नेत्रवाला, टेढ़े नीले बाल, सीधी बांहोंवाला राजसी प्रकृतिका, तथा अत्यन्त कामी,अभिमानसहित, हाथीकीसी चाल चलनेवाला और चीर्यमें सारवाला होता है ॥ १२ ॥ अथ शनिस्वरूपम् । श्यामलोऽतिमलिनश्च शिरालः सालसश्च जटिलः कृशदीपः। स्थूलदंतनखपिंगलनेत्रो युक्छनिश्च खलतानिलकोपैः ॥ १३॥ अब शनैश्चरका स्वरूप कहते है-काला वर्ण, मलिन अति स्वरूप, रोमोसहित आलस्पयुक्त, जटाओंको धारण करनेवाला, दुर्वल और लम्बा देह मोटे दांत, मोटे 'नख तथा पीले नेत्रवाला, दुष्टतासहित और वातविकारवाला होता है ।। १३ ॥ अथ शरीराकारादिज्ञानम् । लग्नस्य नंदांशपतेहिं मूयां मूर्तिः समाना बलशालिनो वा । स्यादिंदुनंदांशपतेस्तु वर्णः परं विधार्याः कुलजातिदेशा॥१४॥ अब शरीराकारादि वर्णन करते हैं-लग्नमें जिस नवांशका उदय हो उस नवांगनाथके समान मनुष्यका स्वरूप कहना चाहिये अथवा लग्नेश बंटवान हो उसके समान मूर्ति कहनी चाहिये और चंद्रमा जिस नवांगमें बैठा हो उसके स्वामकि समान वर्ण कहना चाहिये और कुल, जाति, देश, विचार कर फल (६०) जातकाभरण। कहना चाहिये । यथा फाश्मीरदेशमें तया विलायतमें सब गौर ही पैदा होते है तो उस देशमें सबको श्याम मत कहना और जालिके अनुसार विचार करना, जैसे नागरजाति, खत्री जातिके लोग बहुधा गौर होते हैं, जैसे भील किरात कोलजातिके लोग काले होते हैं उन लोगोंको काला ही कहना चाहिये ॥ १४ ॥ अथ अंगन्यासः। सत्त्वं भवेयुः शशिमूर्यजीवास्तमो यमारौ च रजोज्ञशुक्रौ । त्रिंशल्लवे यस्यगतो दिनेशो वाच्योगुणस्तस्यखगस्य नूनम् १५ शिरोऽक्षिणी कर्णनसा कपोलौ हनुर्मुखं च प्रथमे हकाणे । कंठांसदोर्दण्डककुक्षिवक्षः क्रोडं च नाभिस्त्रिलवे द्वितीये॥१६॥ बस्तिस्ततो लिंगगुदे तथाण्डावूरू च जानू चरणौ तृतीये। क्रमेण लग्नात्परपूर्वपट्के वाम तथा दक्षिणमंगमत्र ॥१७॥ चंद्रमा,सूर्य और बृहस्पति ये सत्त्वगुणके स्वामी हैं और शनैश्चर, मंगल तुमो- गुणके स्वामी हैं। बुध शुक्र रजोगुणके स्वामी होते हैं। सूर्य जिस २ त्रिंशांशमें बैठा हो उस २ त्रिशांशका स्वामी जो ग्रह हो उसीके गुणकी अधिकता मनुष्यमें कहना चाहिये ॥ १५ ॥ शरीरके तीन भाग कहना जो लग्नमें पहिले द्रेष्काणका उदय हो शिर, आँख, कान, नासिका, गाल, ठोड़ी,. मुखपर्यंत बारहों अंगोंका एकभागमें जानना चाहिये, द्वितीय द्रेष्काणका उदय हो तो कंठ, कंधा, बाहु, पार्थ, वक्षस्थल, पेट, नाभि द्वितीय भाग हैं और जो तीसरे द्रेष्काणका उदय हो ॥ १६ ॥ तो पेट्ट, लिंग, गुदा,जा, चरण 'दोनों तृतीय भाग हैं वह क्रम करके छ. छः अंगोंके भाग वाम दहिने अंग चक्रमें कल्पना करनी चाहिये ॥ १७ ॥ प्रथमद्रेष्काणचक्रम्। द्वित्तीपद्रेष्काणचक्रम्। हवीयद्रेष्काणचक्रम् । द.अग वा.अग फधा चूतड चूतड कधा चाद्र चार कान नाक अंडकोश 'नाक ধার कुक्षि गाल मुख गाल टोडी ठोडी हृदय नाभी जंघा लिंग) जया उदर चरण चरण . अथ अणमशकादिज्ञानम् । मत्स्यं तिलं लक्ष्म बलानुसारं कुर्वन्ति सौम्या वणमन पापाः। स्वांशस्वभागस्थिरगाश्च लक्ष्मयुक्तक्षिताःसौम्यनमश्चरेद्रैः १८ मच्छी, तिल, लहसन, ग्रहोंके वलके समान पहना चाहिये. जो शुभग्रह तो पूर्वोक्त चित्र पहना चाहिये और जो पापग्रह जिस थंगमें बलवान हो तो भोपाटीकासहित । (६१) व्रण रहना चाहिये, जो ग्रह अपने नवांश वा अपने द्रेष्काणमें स्थिरराशिमें हो तो पूर्वोक्त, चिह्न स्थिर करना चाहिये, जो शुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट अंग हो तो मस्सा, तिल, लहसन कहना चाहिये ॥ १८॥ अथ व्रणकारणमाह। रवणः काष्ठचतुष्पदोत्थं शृंग्याम्बुचारिप्रभवः शशाङ्कात् । कुजाद्विपाम्यत्रकृतश्च चांभॊमःशनैश्वापि मरुदृपयाम्॥१९॥ जो पूर्वोक्त व्रणकारक सूर्य हो तो काठसे और चौपायासे कहना चाहिये और चंद्रमा चणादिकारक होतो शीगके मारनेसे वा जलचर जीवके काटनेसे चिह कहना . चाहिये और मंगलसे विप आग्नि अस्वकृत चिह्न कहना चाहिये और बुध, मंगल, शनैश्चरोंसे मनुष्यकृत वा पत्यरके लगनेसे चिह्न कहना चाहिये ॥ १९ ॥ अथ व्रणनिश्चयज्ञानम् । कुर्याद्रणं क्रूरखगो रिपुस्थो युक्तः शुभैलक्ष्म तिलं च दुष्टः । ग्रहत्रयं यत्र बुधान्वितं स्यात्तत्र व्रणोऽङ्गे खलु राशितुल्यः॥२०॥ जो पापग्रह छठे बैठे हों तो अणका चिह्न करते है और शुभग्रह बैठे हो तो लह- सन वा तिल करते है अथवा छठे पापग्रह बैठे हों और उनको शुभग्रह देखते हों तो भी पूर्वोक्त फल कहना यानी लहसन वा तिल कहना और जिस अङ्गमें तीन ग्रह बुधके सहित बैठे हों तो जरूर ही उस अंगमें राशिके तुल्य संख्यक वणके चिह्न कहने चाहिये ॥२०॥ • स्वबाहुवीर्येण भाग्यवान् योग । मेपे शशांकः कलशे शनिश्चेदानुर्धनुस्थश्च भृगुम॒गस्थः तातस्य वित्तं न कदापि भुक्ते स्वबाहुबीर्येण नरो वरेण्यः॥ २१॥ जिस मनुप्यके जन्मकालकी मेपराशिम चन्द्रमा, कुम्भराशिमें शनैश्चर, धनराशिमें सूर्य और मकरराशिम शुरु बैठा हो तो वह पिताके धनको कभी नहीं भोगता है अर्थात् अपनी भुजाके बलसे श्रेष्ठताको प्राप्त होता है ॥ २१॥ चतुर्प केन्द्रेषु भवंति पापा वित्तस्थिताश्चापि च पापखेटाः। नरो दरिद्रोऽतितरां निरुक्तो भयंकरश्चात्मकुलोद्भवानाम् ॥२२॥ २ १२ श ११ ५ ७ ६ ८ इ .

जातकाभरण। धनवान् योगः २४ ५ ४ जिस मनुष्पके चारों केंद्रोंमें पापग्रह बैठे हों और धनभावमें भी पापग्रह बैठे हों तो वह मनुष्य दरिद्री होता है और अपने कुलके मनुष्योंके वास्ते भयंकर होता है ॥ २२॥ राजसी बुद्धियोगः२३ सुतस्थितो वा यदि मुर्तिवर्ती बृहस्पती राज्य- गतः शशांकः । नरस्तपस्वी विजितेंद्रियश्च स्याद्राजसो बुद्धिविराजमानः ॥ २३ ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें पंचमभावमें वा लग्नमें वृहस्पति कैग हो और दशमें चन्द्रमा बैठा हो तो वह मनुष्य तपस्वी, इंद्रियोंका जीतनेवाला और राजसी बुद्धिसे शोभायमान होता है ॥ २३ ॥ कन्यायां च तुलाधरे सुरगुरुमेपे वृपे वा भृगुः सौम्यो वृश्चिकराशिगः शुभखगैदृष्टः कुल-इ श्रेष्ठताम् । नूनं याति नरो विचारचतुरोऽप्यो- दार्यजातादरो नित्यानंदभरो गुणर्वरतरो २० निष्ठापरो वित्तवान् ॥२४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्या या तुलाराशिमें वृहस्पति, मेप वा वृपराशिम शुक्र और बुध वृश्चिक राशिमें बैठे हों और शुभग्रहोंसे दृष्ट. हों तो कुलकी श्रेष्ठ ताको प्राप्त होता है तथा वह मनुष्य विचारमें चतुर, संसारमें उदारताके मानको प्राप्त होकर हमेशा आनंदसाहित और गुणोंमें श्रेष्ठ तया निष्ठावान् और धनवान होता है ॥२४॥ चौर्ययोग:३५ पष्ट ससौरौ भवतोवुधारौ नरो भवेच्चौर्यपरो- नितांतम् । स्वकर्मसामर्थ्य विधविशपात्पराङ्. निपाणीन्कुगुणी छिनत्ति ॥२५॥ जिप्त मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें शनैश्वर सहित बुध और मंगल बैठे हों वह मनुष्य चौर्यमें तत्सर होताम.ग.) है और अपने फर्मके सामर्थ्य हीन होता है, पराये हाथ पैर काटनेवाला गुणी होता है ।। २५ ॥ १२ १ ব্য ४ १० सू. २ ८ भाषाटीकासहित । चौर्यप्रसङ्गयोगः २६ प्रसूतिकाले किल यस्य जतोः कर्केजश्चन्म- करे महीजः । चौर्यप्रसंगोद्भवचंडदण्डाच्छा- खादिखण्डानि भवंति नूनम् ॥ २६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालकी कर्कराशिमें शनैश्चर और मकर राशिमें मंगल बैठा हो तो वह मनुष्य चोरोंके संगसे पैदा हुआ जो बड़ा भारी दंड उस दण्डके द्वारा उसके हाथ पैरके खंड होते हैं ॥ २६ ॥ अथ वज्रेण मृत्युयोगः। वनेण मृत्युपोग. २७ कुंभे च मीने मिथुनाभिधाने शरासने स्यु- यदि पापखेटाः । कुचेष्टितः स्यात्पुरुषो नितांतं वज्रेण नूनं निधनं हि तस्य ॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुंभ,मीन, मिथुन, धनुराशिमें सब पापग्रह बैठे हों तो वह मनुष्य अत्यंत बुरी चेष्टावाला, वज्रपतनसे उसका मरण होता है ॥ २७ ॥ अनेकतीर्थकृद्योगः २८ अथ अनेकतीर्थद्योगः । यस्य प्रसुतौखलु नैधनस्थः सौम्यग्रहः सौम्य- निरीक्षितश्च । तीर्थान्यनेकानि भवति तस्य नरस्य सम्यङ्मतिसंयुतश्च ॥२८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें शुभग्रह बैठे हों और उनको शुभग्रह देखते हों तो वह मनुष्य अनेक तीर्थोंका करनेवाला और बुद्धिसे युक्त होता है ॥ २८ ॥ नीचकर्मयोगः२९ अथ नीचकर्मकृयोगः। बुधत्रिभागेन युते विलग्ने केंद्रस्थचन्द्रेण - निरीक्षिते च । शिष्टान्वये यद्यपि जातजन्मा - स्यान्नीचकर्मा मनुजः प्रकामम् ॥२९॥ ५ बृ. सू. अश ११ ३ ८ ५ - ma जातकाभरण। च म. ठा.स. एते हि योगाः कथिता मुनींद्रे सान्द्रं बलं यस्य नभश्वरस्य । कल्प्यं फलं तस्य च पाककाले सुनिर्मला यस्य मतिस्तु तेन३६ ये योग मुनीश्वरोंसे कहे गये हैं। सम्पूर्ण ग्रहोंके बलसे कहा हुआ"फल उन ग्रहोंकी दशामें श्रेष्ठ बुद्धिमान पुरुप कहे ॥ ३५॥ अथ धनभावविचारमाह-तत्र धनभवनाकि कि चिंतनीयम् । स्वर्णादिधातुक्रयविक्रयश्च रत्नादिकोशोऽपि च संग्रहश्च । एतत्समस्तं परिचिंतनीयं धनाभिधाने भवने सुधीभिः ॥ ३ ॥ अब धनभावका विचार कहते हैं-धनभावसे सुवर्ण आदि धातुओंका क्रय विक्रय, रल और खजानाका विचार एवं उनका संग्रह करना, यह सम्पूर्ण धन- भावसे पंडितजन विचार करें ॥१॥ धनहीनयोगः२ अथ धनहीनयोगः धनहीनयोगः भानुभूतनयमानुतन्जेश्वे- इनस्य भवनं युतदृष्टम् । जायते च मनुजो धन- हीनः किं पुनः कृशश- शीक्षितयुक्तम् ॥२॥ जिसके जन्मकालमें सूर्य, मंगल और शनैश्चर धनभावमें बैठे हो वा देखते हों तो वह मनुष्य धनहीन होता है और जो क्षीण चन्द्रमा भी देखता हो अथवा युक्त हो तो क्या कहना है ? अर्थात् अवश्य ही धनहीन होता है ॥ २ ॥ धनवानयोगः३ अथ धनवत्तायोगः। धनवत्तायोगः३ धने दिनेशोऽतिधनानि नूनं करोति मन्देन न चेक्षितश्च । शुभाभिधाना धनभावसंस्थानानाधना- भ्यागमनानि कुर्युः||शा जिसके धनभावमें सूर्य वैठा हो और शनि देवता हो तो वह अतिधनवान होता है और जो धनभावमें शुभग्रह बैठे हों तो वे अनेक प्रकारका धन प्राप्त परते हैं ॥३॥ शा स.

भापाटीकासहित। (६७) . चं. धनवनायोगः धनहीनयोगः गीर्वाणवंद्यो द्रविणोप- यातःसौम्येक्षितश्चेवविणं करोति । सोमेन दृष्टो धनभावसंस्थः सोमस्य सूनुधनहानिदःस्यात्॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृहस्पति धनभावमें बैठा हो और शुभग्रह देखते हों तो धनवान करते हैं और जो धनभावमें बुध बैठा हो और चन्द्रमा देखता हो तो धनकी हानि करता है ॥ ४॥ धनप्रतियन्धकयोगः ५ अथ धनमतिबन्धकयोगः। धनस्थितो ज्ञेन विलोकितश्च कृशः शशांको- ऽपि धनादिकानाम् । पूर्वार्जितानां कुरुते विनाशें नवीनवित्तप्रतिबंधनं च ॥५॥ चु. रा.यु. जिस मनुष्य के जन्मकालमें धनभावमें क्षीण चन्द्रमा बैठा हो और उसको बुध देशता हो तो पहिलेका इकट्ठा किया हुआ धनादि वस्तुओंका नाश करता है और नये धनादिकोंका प्रतिवन्या होता है ॥५॥ धनप्राप्तिपोगः६ धनप्राप्तियोगः६ वित्तस्थितो दैत्यगुरुः रा. करोति वित्तागमं सोम- सुतेन दृपः। स एव सौ. म्यग्रदयुक्तदृष्टः प्रकृष्ट वित्ताप्तिकरोनराणाम्॥६॥ जिम मनुष्पके जन्मकालमें धनभावमें शुक पेठा हो और बुध देखता हो तो पनकी प्राप्ति कराता है और जो शुक्रको सब शुभग्रह देखते हो तो वह मनुप्याक होता है ॥ ६ ॥ चत पनरी प्राप्ति फ्रानेव (७०) जातकाभरण। दृष्टे शुभानां शुभयोगतो वा भवेत्प्रसूतिनियमेन तेपाम् ॥ १॥ अथ चतुर्थभावसे क्या विचार करना चाहिये वह कहते हैं-मित्र और ग्राम, चौपाये और धरतीका उद्यम इनका चतुर्थ भावसे विचार करना, चतुर्थभावको, शुभग्रह देखते हों अथ वा शुभग्रहोंका योग हो तो पूर्वोक्त पदार्थोंकी अधिकता होती है ॥१॥ परिवारक्षयकारकयोगः२ अथ परिवारक्षयकारकयोगः।। लग्ने चैव यदा जीवो धने सौरिश्च संस्थितः। सप्तमे भवने पापाः परिवारक्षयंकराः ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें बृहस्पति, धनभावमें, (म.रा. शनैश्चर बैठा हो और सातवमें पापग्रह बैठे हों तो ये परिवारका नाश करते हैं ॥२॥ परिवारनाशयोगः३ माननाशयोगः३ पापैस्त्रिभिश्चंद्रमसि प्र- दृष्टे स्यान्माननाशः शुभ- दृष्टिहीने । व्ययास्तलग्ने- प्वशुभाः स्थिताश्चेत्कुर्वति ते वै परिवारनाशम् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीन पापग्रहोंसे चन्द्रमा दृष्ट हो और शुभग्रह न देखते हों तो मानका नाश होता है । एको योगः। जो चारहें सातवें लग्नके विपे पापग्रह बैठे हों तो परिवारका नाश करते हैं ॥ ३ ॥ अथ माहा योगः। शनिर्धने सञ्जनने यदि स्याल्लग्ने विलग्ने मावदायोगः । सुरराजमन्त्री । सिंहीसुतः सप्तमभावयातो जातस्य जन्तोर्जननी न जीवेत् ॥ ४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चर दूसरे और लग्नमें वृहस्पति, सातवें राहु पैठा हो तो उस मनुष्यकी माता जीवित नहीं रहती है ॥४॥ रा.श. मै. व. श. मं. म क . .

भाषाटीकासहित । (७१) अथ सुतभावविचारः। अथ सुतभावे किं किं चिंतनीयम् । बुद्धिप्रबंधात्मजमंत्रविद्या विनेयगर्भस्थितिनीतिसंस्थाः। सुताभिधाने भवने नराणां होरागमज्ञैः परिचिंतनीयाः॥१॥ अब पंचमभावसे क्या क्या विचार करना चाहिये वह कहते हैं बुद्धिका प्रबंध, पुत्र, मंत्र, विद्या, नम्रता, गर्भस्थाते और नीति ये सब बातें मनुष्योंके जन्मकालमें पंचमभावसे ज्योतिषी लोग विचार करें॥ १॥ लग्ने द्वितीये यदि वा तृतीये विलमनाथः प्रथमः सुतः स्यात् । तुर्यस्थितेऽस्मिश्च सुतो द्वितीयः पुत्री सुतो वेति पुरः प्रकल्प्यम्र जिस मनुष्यक जन्मकालमें लग्नेश लग्न, द्वितीय वा तृतीयस्थानमें बैठा हो तो पहिले पुत्र पैदा होता है और जो लग्नेश चतुर्थ बैठा हो तो पहिले कन्या, पीछे पुत्र पैदा होता है, इसी तरहसे पुन कन्या, कन्या, पुत्रोंका विचार करना चाहिये ॥२॥ सुताभिधानं भवनं शुभानां योगेन दृष्ट्वा सहितं विलोक्य । संतानयोग प्रवदेन्मनीपी विपर्ययत्वे हि विपर्ययः स्यात् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें शुभग्रहोंकी राशिहो और उसमें शुभग्रह बैठे हों और शुभग्रह देखते हों तो संतानवान् करता है । जो पंचमभाव पापग्रहसे युक्त और दृष्ट हो तो संतानहीन होता है ॥ ३ ॥ सन्तानभावो निजनाथहएः संतानलब्धि शुभदृष्टियुक्तः । करोति पुंसामशुभैः प्रदृष्टः स्वस्वाम्यदृष्टो विपरीतमेव ।।४।। जिस मनुष्य के जन्मकालमें पंचमभाव पंचमेशसे दृष्ट हो और शुभग्रहसे दृष्ट हो तो संतानकी प्राप्ति होती है और पंचमभाव पापग्रहोंसे दृष्ट हो अथवा युक्त हो और अपने स्वामीसे भी दृष्ट हो तो संतानहीन होता है॥४॥ लग्ने वित्ते तृतीये वा लग्नेशोऽपत्यमग्रिमम् । तुर्ये जन्म द्वितीयस्य पुरः पुन्यादिजन्म च ॥५॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें लग्न, द्वितीय अथवा तृतीय भाव लग्नेश बैठा हो तो पहले पुत्र पीछे कन्या पैदा होती है और लग्नेश चतुर्थमें हो तो पहिले कन्या पीछे पुत्र होता है । १।३।२। ६ । ९! ११ भावस्थित लग्नेश हो तो पहिले पुत्र पीछे पन्या और चतुर्य ६ । ८।१०। १२ इन भावोंमें हो तो पहिले कन्या पीछे पुत्र पैदा होता है ।। ५॥

4.
४
६
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१
रिश्म.
१०
१०
१
(७२)
जातकाभरण।
चाल्ये सन्तानयोगः६
सन्तानहीनयोगः
| विदेहसंस्थाभृगुभौमचन्द्राः
सन्तानमादौ जनयंति नू-
३चं.
नम् । एते पुनर्धन्विगता
न कुर्युः
कुयुः पश्चात्तथादौ
गदितं महद्भिः॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र, मंगल, चन्द्रमा मिथुन, कन्या, मीन राशि:
में बैठे हों तो पहिले पुत्रसंतानको पैदा करें और पूर्वोक्त ग्रह धनमें बैठे हों तो
आदि अन्तमें संतान नहीं होती हैं ।। ६ ।।
संतानभावे गगनेचराणां यावन्मितानामिह दृष्टिरस्ति ।
स्यातत्संततिस्तत्प्रमिता नृसंज्ञेनराश्च कन्याः प्रमदाभिधानः७
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें जितने ग्रहोंकी दृष्टि हो उतनी संख्याकी
सन्तान होती है, पुरुप ग्रह देखते हों तो उतने पुत्र होते हैं और स्वीसंज्ञक यह देखते
हों तो उतनी ही कन्या उत्पन्न होती हैं ॥ ७ ॥
संतानभावांकसमानसंख्या स्यात्संततिति वदंति केचित् ।
नीचोच्चमित्रादिगृहस्थितानां दृष्ट्या शुभं वा शुभमभकानाम् ८
पंचमभावमें जितनी संख्याकी राशि हो उतने प्रमाणको संतान होती है यह
किसी किसीफा मत है और जो नीच उच्च मिनक्षेत्रीय स्वक्षेत्रीय गृहमें बैठे हो
अथवा उनको शुभग्रह देखते हों तो शुभ सन्तति होती है ॥ ८ ॥
नवांशतुल्यप्रभवात्र संख्या दृष्टया शुभानां द्विगुणावगम्या ।
विष्टा च पापग्रहदृष्टियोगा मिश्रा च मिश्रग्रहदृष्टितोत्र ॥९॥
पंचमभावमें जितनी संख्याका नवांग हो उतनी संख्याको सन्ताने होती हैं और
उस नवांगको पापग्रह देखते हों तो सन्तानले द्विगुणा करना चाहिये और उम
नवांगको पापग्रह देखते हो वा युक्त हों तो दुःखसे सन्तान होती है और जो शुभ
पाप दोनों तरहके ग्रह बैठे हों तो मिश्रित फल मिलता है ॥९॥
सुताभिधाने भवने यदि स्यात्खलस्य राशिः खलखेटयुक्तः ।
सौम्यग्रहालोकनवर्जितश्च संतानहीनो मनुजस्तदानीम् ॥१०॥

श.रा. श. .. भापाटीकासहित । (७३) जिस मनुष्यके जन्मकालके पंचमभावमें पापग्रहोंकी राशि हो और पापग्रहयुक्तं 'दो और शुभग्रह नहीं देखते हों तो वह मनुष्य संतानहीन होता है ॥ १० ॥ (संतानहीनयोगः ११ कविः कलत्रे दशमे मृगांकः पातालयाताश्च खला भवति । प्रसूतिकाले यदि मानव ते संतानहीनं जनयंति नूनम् ॥ ११ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र सातवें और दशवें चंद्रमा और चतुर्थ भावमें पापग्रह बैठे हों तो वह मनुष्य संतानहीन, होता है ॥ ११ ॥ सुते सिताशे च सितेन दृष्ट बहून्यपत्यानि विधोरपीदम् । दासीभवान्यात्मजभावनाथे यावन्मितेशे शिशुसंमति-स्यात१२ जिस मनुष्यके जन्मकालके पंचमभावमें शुक्रका नवांश हो और शुक्र देखता हो तो बहुत संतान होती हैं और चंद्रमाका नवांश हो तो भी विशेष संतानवाला होता है और पंचम भावका स्वामी जितनी संख्याके नवांशमें हो उतनी संख्याके दासीजातपुत्र कहना चाहिये ।। १२ ।। शुक्रन्दुवगैण युते सुताख्ये युक्तेक्षिते वा भृगुचन्द्रमोभ्याम् । भवंति कन्याः समराशिवगै पुत्राश्च तस्मिन्विपमाभिधाने॥१३॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें पंचमभावमें शुक्र वा चंद्रमाका वर्ग हो और शुक्र वा चंद्रमासे युक्त वा दृष्ट हो तो समराशिके वर्ग होनेसे कन्यासंतान होती है और विषमसंक्षक राशि हो तो पुत्रसंतान होती है ॥ १३ ॥ भीतपुरलाभयोगः १५ मंदस्य राशिः सुतभावसंस्थो मंदेन युक्तः शशिनेक्षितश्च । दत्तप्रजाप्तिः शशिवबुधे- ऽपिक्रीतःसुतस्तस्य नरस्य वाच्यः॥9 जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर वा कुंभ राशि पंचम हो और शनैश्चरसे युक्त हो एवं उसको चंद्रमा देखता हो तो उस मनुष्यको दत्तकपुत्रकी प्राप्ति होती है और चंद्रमाके समान बुधयोग हो तो एसको मोल लिया पुत्र प्राप्त होता है |॥ ११ ॥ ७ (७४) जातकाभरण। रा ४ १० ६ १० ४ १ मृतप्रजायोगः १५ संतानाधिपतेः पञ्चपष्टरिःफस्थिते खले । पुत्राभावो भवेत्तस्य यदि जातो जातो न जीवति ॥१५॥ मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभवनका स्वामी जहां बैठा हो वहांसे पंचम छठे अथवा बारहें पापग्रह बैठे हों तो उस मनुष्यके पुत्रका अभाव होता है, कदाचित् पैदा भी हो तो जीवे नहीं ॥ १५ ॥ अथ पुन पुत्रलाभयोगः। पुनर्भूपुत्रलाभयोगः १६ मंदस्य वगै सुतभावसंस्थे निशाकरस्थेऽपि चवीक्षितेऽस्मिन् । दिवाकरणोशनसा नरस्य पुनर्भवासंभवसूनुलब्धिः ॥ १६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें शनैश्चरका च. वर्ग हो, उसमें चंद्रमा बैठा हो और उसको सूर्य और शुक्र देखते हों तो उस मनुष्यको द्वितीय औरतमे पुत्रलाभ होता है ॥ १६ ॥ अथ क्षेत्रजपुत्रलाभयोगः । शनैर्गणः सद्मनि पुत्रभावे बुधेक्षिते यो रविभूमिजाभ्याम् । पुत्रो भवेत्क्षेत्रभवोऽथवाधे गणेऽपि गेहे रविजेन दृष्टः॥ १७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें शनैश्चरका पवर्ग हो और बुध देखता हो और सूर्य, मंगल देखते हों तो उस मनुष्यके वीमें अन्य करके पुत्र पैदा होता है और जो पंचमभावमें बुधका पवर्ग हो रमको गनेश्वर देखता हो तो भी पूर्वोक्त फल कहना चाहिये ॥ १७॥ नवांशका पञ्चमभावसंस्था यावन्मितः पापखगेः प्रदृष्टाः। नश्यतिगर्भाःखलुतत्प्रमाणाश्चद्रीसितं नो शुभखेचराणाम् १८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें जो नवांग पंचमभावमें हो और उसको जितने गपग्रह देखते हों उस मनुष्यके उतने ही गर्भ नागको प्राप्त होते हैं परन्तु जो गुभग्रह न देखते हों तो ॥१८॥ भूनन्दनो नन्दनभावयातो जातं च जातं तनय निहंति । दृष्टो यदा चित्रशिखण्डिजन भृगोः सुतन प्रथमोपपन्नम्।।१९॥

भाषाटीकासहित।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मंगल पांचवें बैठा हो उसके जितने पुत्र पैदा होते हैं
वे सब नाशको प्राप्त होते हैं और जो केतु देखता हो अथवा शुक्र देखता हो तो
पहिले पैदा हुआ ही पुत्र नष्ट होता है ।॥ १९ ॥
अय रिपुभावविचारः।
वैरित्रातः क्रूरकर्मामयानां चिंता शंका मातुलानां विचारः।
होरापारावारपारं प्रयातरेतत्सर्व शवभावे विचित्यम् ॥४॥
छठे भावसे क्या क्या विचार करना चाहिये सो कहते है:-दुश्मन, क्रूर कर्म,
रोग, चिंता और शंका एवं मामाका विचार करना चाहिये ऐसा ज्योतिपशास्त्रके
पार जानेवाले पंडित विचार करें ॥१॥
दृष्टियुतिर्वा खलखेचराणामरातिभाकेरिविनाशनं स्यात् ।
शुभग्रहाणां प्रतिष्टितोऽत्र शबूद्गमोऽप्यामयसंभवः स्यात्।।२।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठा भाव पापग्रहों करके दृष्ट वा युक्त हो तो शत्रु-
ओंका तथा रोगोंका नाश होता है और जो छठा भाव शुभग्रहो करके युक्त वा दृष्ट
हो तो शत्रुओंकी उत्पत्ति और रोगोकी प्राप्ति होती है ।। २ ॥
अप जायाभावविचारः।
रणागणे चापि वणिक्रियाश्च जायाविचारागमनप्रमाणम् ।
शास्त्रप्रवीणौर्ह विचारणीयं कलत्रभावे किल सर्वमेतत् ॥ १॥
अब सप्तमभावसे क्या क्या विचार करना चाहिये उसे कहते है-संग्राम, स्त्री,
व्यापार, यात्राका प्रमाण इन सब बातोंको सातवे भावसे ज्योतिषी लोग
विचार करें।॥ १॥
स्वीलाभयोगः।
मूर्ती कलवस्य नवांशको वा द्विपकभावस्त्रिलवः शुभानाम् ।
अनेन योगेन हि मानवानां स्यादङ्गनानामचिरादवातिः॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न और सप्तमभावमै शुभग्रहांका नवांश वा
द्वादशांश वा द्रेष्काणका उदय हो उस मनुष्यको शीघ्र ही स्त्रीका लाभ
होता है ॥२॥

तं रा. म. (७६) जातकाभरण। खीमाप्तियोगः स्त्रीहीनयोगः सौम्यैर्युक्तं सौम्यंमसौम्य- दृष्टं जायागेह देहिनाम- नाप्तिम् ॥ कुर्य्यान्नून वैपरीत्यादभावो मिश्रत्वेन प्राप्तिकाले प्रलापः॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सप्तमभाव शुभग्रहों करके युक्त हो और शुभग्रह पाए- ग्रहों करके दृष्ट हो, उस मनुष्यको स्त्रीप्राप्ति होती है और जो सप्तमभाव पापग्रहाँ करके युक्त हो और मिश्र ग्रहों करके दृष्ट हो तो स्वीकी प्राप्ति होनेके समय स्त्री नहीं माप्त होती है ॥ ३ ॥ मी. यु शु. शु. एक्रयेपुवयोगः लग्नाद्यये वा रिपुमंदिरे वा दिवाकरेंदू भवत- स्तदानीम् ॥ स्यान्मानवस्यात्मज एक एव भार्यापि चैकेति वदंति संतः॥४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें लग्नसे बारह वा छठे भावमें सूर्य चंद्रमा बैठे हों तो उस मनुष्यको एक ही सी, एवं एफ ही पुर माप्त होता है ॥४॥ . १ ३ घण्यासतियोगः ५ गंडांतकालेऽपि कलवभावे भृगोः सुते लम- गतेऽकजाते । वंध्यापतिः स्यान्मनुजस्तदानीं शुभेक्षितं नो भवन खलेन ॥५॥ निम मनुष्य के जन्मकालमें सतमभावमें गंटांत लग्न हो और गुरु सात पेठा हो और लग्नमें शनिवार वटा हो तथा सममभाव शुभग्रहों परके दृष्ट न हो भीर ममममारमें पापग्रहोंगरी राशिहो तो पर मनुष्य वांझ स्वीका-पाने होना है॥५॥ . १० प.७ श.म, भापाटीकासहित। (७७) सीपुत्रहीनयोगः६ व्ययालये वा मदनालये वा खलेषु बुद्धयाल- यगे हिमांशौ। कलत्रहीनो मनुजस्तनूजैविव- जितः स्यादिति वेदितव्यम् ॥६॥ जिस मष्यनुके जन्मकालमें बारहवें, सातवें स्थानमें पापग्रह बैठे हों और पंचमभावमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य स्त्रीपुत्र करके हीन होता है ॥ ६ ॥ प्रसूतिकाले च कलवभावे यमस्य भूमीतनयस्य वरें। ताभ्यां प्रदृष्टे व्यभिचारिणी स्याद्र्तापि तस्या व्यभिचारकर्ता॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सप्तमभावमें शनैश्चर वा मंगलका पड्वर्ग हो और शनिश्चर मंगल करके दृष्ट हो तो उसकी स्त्री व्यभिचारिणी होती है और उसका पति भी व्यभिचारी होता है ।। ७ ॥ करत्रहीनयोगः८ स्त्रीलाभयोगः८ शु-दुपुत्रौ च कलत्रसं- स्थी कलत्रहीनं कुरुतो नरं तौ । शुभेक्षितौ तौ वयसो विरामे कामंच रामालभते मनुष्यः॥८॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र और बुध सातवें बैठे हों उसका विवाह नहीं होता है और पूर्वोक्त योग हो एवं शुभग्रह देखते हों तो उसको अन्त्य (वृद्धा) अवस्थामें स्त्रीका लाभ होता है ।। ८॥ स्त्रीभावयोगः९ शुक्रंदुजीवशशिजैः सकलैस्त्रिभिश्च द्वाभ्यां कलाभवने च तथैककेन । एपां गृहे विपम- भैरवलोकित वा संति स्त्रियो भवनवर्गखग- स्य भावाः॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र, चन्द्र, बृहस्पति और बुध चारों वा तीन, दो वा एक ग्रह सातवें बैठे हों और इन्हीं ग्रहोंकी सारी विपम सातवें बैठीं हो और यही ग्रह सतमभावको देखते हों तो उतनी स्त्री पहनी चाहिये ॥९॥ ४ २ ३ शुयु. ९.चं.

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(७८)
जातकाभरण।
कलवभावे च नवांशतुल्या नरस्य नार्यों ग्रहवीक्षणादा।
एकैकभौमार्कनवांशके च जामित्रभावस्थवुधार्कयो; ॥ १०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें जितनी संख्याके नवांशका उदय हो
और जितने ग्रह देखते हों उस पुरुपके उतने ही विवाह कहना और मंगल
सूर्यका नवांश सातवें हो और सूर्य बुध बैठे हों तो एक ही विवाह कहना
चाहिये ॥ १०॥
शुक्रस्य वर्गेण युते ,कलो बर्बागनाप्ति गुवीक्षणेन ।
शुक्रेक्षिते सौम्यगणेऽङ्गनानां बाहुल्यमेवाशुभवीक्षणान्न ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सप्तम भावमें शुक्र ग्रहका वर्ग हो और शुक्र देखता
हो वह बहुत स्त्रियांवाला होता है आर शुभ ग्रहका वर्ग सातवें हो और शुक्र'
देखता हो तो भी बहुत स्त्रियोंवाला होता है और जो पापग्रह देखते हों तो विवाह
नहीं होता है।॥ ११ ॥
महीसते सप्तमभावयाते कांतावियुक्तः पुरुपस्तदा स्यात् ।
मन्देन दृष्टे म्रियतेऽपिलब्ध्वाशुभग्रहालोकनवर्जितेऽस्मिन् १२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें मंगल बैठा हो वह मनुष्य स्त्रीहीन होता है
और सातवें भावको शनैश्चर देखता हो और एक भी शुभग्रह नहीं देखता हो तो
स्त्री प्राप्त होनेके बाद मर जाती है ॥ १२ ॥
पत्नीस्थाने यदा राहुः पापयुग्मेन वीक्षितः ।
पत्नीयोगस्तदा न स्याद्भूतापि म्रियते चिरात् ॥ १३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सप्तम भावमें राहु बैंठा हो और दो पापग्रह
देखते हों तो स्त्री नहीं माप्त होती और जो प्राप्त भी हो तो बहुत दिनोंतक नहीं
जीती है।॥ १३ ॥
पष्टे च भवने भौमः सप्तमो राहुसंभवः ।
अष्टमे च यदा सीरिस्तस्य भार्या
जीवति ।। १४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें मंगल और
सातवें राहु और आठवें शनैश्चर बैठे हों उसकी औरत
नहीं जीती है।॥ १४ ॥

स . . भाषाटीकासहित । (७९) अय संक्षेपतोऽष्टमभावविचारः। नद्युत्तारात्यंतवैषम्यदुर्ग शस्त्रं चायुः संकटे चेति सर्वम् । रंध्रस्थाने सर्वदा कल्पनीयं प्राचीनानामाज्ञया जातकः 19॥ अब अष्टम स्थानसे क्या क्या विचारना चाहिये उसे कहते हैं:-नदीका पार उतरना, अत्यन्त भयंकर स्थान, किला, शस्त्र, आयु, संकट ये सब बातें अष्टम- भावसे हमेशा ज्योतिषी लोग विचारें, यह प्राचीन आवाोंने कहा है ॥ १॥ अथ मरणयोगः। मरणयोगः२ तुर्यस्थाने यदा भानुःशशिना च विलोकितः। यदि नो वीक्षितः सौम्यैमरणं तत्र निर्दिशेत्२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें अष्टमस्थानमें सूर्य वैठा हो उसको शनैश्चर देखता हो और कोई शुभग्रह नहीं देखते हों तो मनुष्यका मरण कहना चाहिये ॥ २॥ होराविद्भिश्वाष्टमस्थानपाते नानाभदैर्यत्फलं, 'तत्मदिष्टम् । रिटाध्यायश्चापि निर्याणके वा यत्नान्नून प्रोच्यते तञ्च सर्वम्॥३॥ ज्योतिषशासवेत्ताओंने अष्टमस्थानके अनेक भेदों करके जो फल कहे हैं वे सब रिटाध्यायके विपे वा निर्याणके विपे यत्लसे निश्चय करके कहेंगे ॥ ३ ॥ अय भाग्यमावविचारः। धर्मक्रियायां हि भवेत्प्रवृत्तिर्भाग्योपपत्तिर्विमलं च शीलम् । तीर्थप्रयाण प्रणयः पुराणः पुण्यालये सर्वमिदं प्रदिष्टम् ॥ १ ॥ अय नवमभावसे क्या क्या विचार करना चाहिये उसे कहते हैं:-धर्मके कामाम प्रवृत्ति और भाग्योदय, श्रेष्ठ शोल, तीयोंकी यात्रा, नीति और पुराण ये मव नबमभावसे विवारने चाहिये ।।१।। विहाय सर्व गणकैविचिन्त्यं भाग्यालयं केवलमत्र यत्नात् । आयुश्चमाता च पिता व वंशो भाग्यान्वितेनैव भवंति धन्याः२ ज्योतिषी लेग सब विषयोंको छोड़कर यहां यलसे पहले माग्यका विचार करें, क्योंकि भाग्यसंपन्न होने से मनुष्य दीर्घायु होता है और माता पिता एवं ममस्त कुल्बाले धन्यवाद पार होते हैं ॥२॥ मूर्तेश्चापि निशापतेश्च नवमं भाग्यालय कीर्तित तत्तत्स्वामियुत्तेक्षिते कुरुते भाग्यस्य देशोद्भवम् ।

ग (८०) जातकाभरण । चेदन्यैर्विषयान्तरेऽत्र शुभदाःस्वोच्चाधिपाः सर्वदा कुर्युर्भाग्यमलाघवेति विवला दुःखोपलब्धि पराम्॥३॥ जन्मलग्नसे वा चन्द्रमासे जो नवमस्थान है वह भाग्यभाव कहाता है । जो नवम भाव अपने स्वामी करके युक्त वा दृष्ट हो तो उसका अपने देशमें भाग्योदय होता हैं और जो नवमभावको शुभग्रह देखते हों और अपना स्वामी न देखता हो तो उसका भाग्य परदेशमें उदय होता है और जो भाग्येश अपने उच्चमें हो तो उसका हमेशा भाग्योदय होता है और जो भाग्यका स्वामी निर्वल हो और भाग्यभारको पापी ग्रह देखते ही तो दुःखसे भाग्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ भाग्येश्वरो भाग्यमतोऽस्ति किं वासुस्थानगःसारविराजमानः। भाग्याश्रितः कोऽस्ति विचार्य सर्वमन्जल्पमल्पं परिकल्पनीयम् जो नवमभावका स्वामी नवममें बैठा हो अथवा केंद्र ११४।७।१० वा त्रिकोण ५१९ मे बैठा हो तो वह भाग्यवान होता है, नवमेशके बलावलसे अधिक समन्यून भाग्य कहना चाहिये ॥ १ ॥ अथ भाग्यवद्योग । भाग्यवद्योग ५ तनुत्रिसूनूपगतो ग्रहश्चेद्यो वाधिवीयों नवमं प्रपश्येत् । यस्य प्रसूतौ स तु भाग्यशाली विलासशीलो बहुलार्थयुक्तः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न. पंचम, तीसरे ग्रह बैठे हों और अधिक बल करके नवम भावको देखते हाँ तो वह मनुष्य भाग्यवान्, विलासमें शीलवाला एवं बहुतधनसे सम्पन्न होता पुलावंतसयोग ६ चेद्भाग्यगामी खचरः स्वगेहे सौम्येक्षितो यस्य नरस्य सूतौ । भाग्याधिशाली स्वकु लावतंसो हंसो यथा मानसराजमानः || जिस मनुष्यके जन्मकारमें जो भाग्यमवनमें अपने घरंपर ग्रह बैठा हो और शुभग्रह करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य भाग्य- वान् अपने कुरमें प्रकाशवान होता है, जैसे हम मानममगंवग्में, मुख पाता है ६ पृ. म ३ १ १० ८ ५ ३ ३.४ ३ भाषाटीकासहित। (८१) मंत्रयोगः७ पूर्णेन्दुयुक्तौ रविभूमिपुत्रौ भाग्यस्थितौ सत्त्व- समन्वितौ च । वंशानुमानासचिवं नृपं वा कुर्वति ते सौम्यदृशं विशेपात् ॥ ७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पूर्ण चंद्रमा युक्त सूर्य मंगल नवममें वलसहित वैठे हों वह मनुष्य अपने वंशके समान राजाका मंत्री या राजा होता है जो नवमभावको शुभग्रह देखते हों ।। ७ ।। लक्ष्मीवद्योगः८ स्वोचोपगो भाग्यगृहे न भोगो नरस्य योगः कुरुते सुलक्ष्म्याः । सौम्येक्षितोऽसौ यदि सौ. म्यपालं दंतावलोत्कृष्टविलासशीलः ॥ ८॥ २२४ जिस मनुष्यके जन्मकालमें उच्चराशिगत कोई ग्रह नवममावमें बैठा हो तो उस मनुष्यका लक्ष्मी योग करता है और नवमभावको शुभग्रह देखते हों तो वह मनुष्य हाथियोंके विला. सको प्राप्त होता है ॥ ८॥ अथ दशमभावविवारः। व्यापारमुद्रानृपमानराज्यं प्रयोजनं चापि पितुस्तथैव । महत्पदाप्तिः खलु सर्वमेतद्राज्याभिधाने भवने विचार्यम् ॥१॥ अब दशमभावसे क्या क्या विचार करना चाहिये सो कहते हैं-व्यापार, रुपया, राजमान और राजकीय प्रयोजन और पिता और बड़े पदफी प्राप्ति ये सब निश्चय करके दशमभावसे विचारने चाहिये ॥ १॥ समुदितमृपिवयैर्मानवानां प्रयत्ना- दिह हि दशमभावे सर्वकर्मप्रकामम् । गगनगपरिदृष्टया राशिखेटस्य भावः सकलमपि विचित्यं सत्त्वयोगात्सुधीभिः॥२॥ प्राचीन ऋपियोंने कहा है-दगमभारसे यत्नपूर्वक सम्पूर्ण कमोसा साधन प्रहांसी दृष्टिं राशिनहफे भाव करके सम्पूर्ण वलावलसे पंडितजन विचार करें ॥२॥ तनोः सकाशादशमे शशांके वृत्तिर्भवेत्तस्य नरस्य नित्यम् । नानाकलाकौशलवाग्विलासः सर्वोद्यमः साहसकर्मभिश्च ॥३॥ * जिस मनुष्य के जन्मकालमें लग्नसे चंद्रमा दशमभावमें बैठा हो तो उस मनुष्यकी बलान्विताद्वर्गपतेस्तु यद्वा वृत्तिभवेत्तस्य खगस्य पाके ॥४॥ और जन्मलग्नसे वा चंद्रमासे जो दशममें ग्रह बलवान् बैठा हो तो उस मनुष्यकी .(८२) जातकाभरण। वृत्ति अनेक कलाओंकी कुशलता करके और वाग्विलास और सर्वोत्तम साहस फर्म करके धन पैदा करनेकी होती है ॥ ३ ॥ तनोः शशांकादशमे क्लीयान्स्याज्जीवनं तस्य खगस्य वृत्त्या। वृत्ति और आजीविका उसी ग्रहके समान कहना अथवा पड्वर्गपति जो बलवान हो तो उसी ग्रहकी वृत्तिको उसकी दशामें कहना चाहिये ॥ ४ ॥ दिवामणिः कर्मणि चन्द्रतन्वोव्याण्यनेकोद्यमवृत्तियोगात् । सत्त्वाधिकत्वं नरनायकत्वं पुष्टत्वमङ्गे मनसः प्रसादः ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा वा लग्नसे दशममें सूर्य बैठा हो तो वह मनुष्य अनेक उद्यम करके अनेक योगोंसे अनेक नको प्राप्त करता है और जो सूर्य बलवान हो तो वह राजा पुष्टशरीर और प्रसन्नमन होता है ॥ ५॥ लग्नेंदुतः कर्मणि चेन्महीजः स्यात्साहसः कौर्यनिपादवृत्तिः। नूनं नराणां विपयाभिसक्तिर्दूरे निवासः सहसा कदाचित् ॥६॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें लग्नसे वा चंद्रमासे दशमभावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य साहस करके क्रोधसे निपादवृत्ति करके धनलाभ करता है और वह मनुष्य विषयोंमें आसक्त, परदेशमें वास करनेवाला साहसी होता है ॥ ६ ॥ लग्नेदुभ्यां कर्मगो रौहिणेयः कुर्याद्रव्य नायकत्व बहूनाम् । शिल्पेऽभ्यासःसाहस सर्वकार्ये विद्ववृत्त्या जीवितं मानवनाम् जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न वा चंद्रमासे दशमभावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य अनेक धन और अनेक पुरुषोंफा स्वामी, शिल्पविद्यामें अभ्यास करनेवाला.. साहसी, सर्व फार्मोंमें विद्वानोंकी वृत्ति करके आजीविका करनेवाला होता है ॥७॥. विलग्नतःशीतमयूखतो वा माने मघोनः सचिवो यदा स्यात् । नानाधनाभ्यागमनानि पुंसां विचित्रवृत्त्या नृपगौरव च ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न वा चंद्रमासे दशमभावमें बृहस्पति वैठा है. । वह मनुष्य अनेक प्रकारसे धनका लाभ करनेवाला, विचित्र वृत्ति फरके राजगीर वको प्राप्त होता है ॥ ८॥ .

भापाटीकासहित ।
(८३)
होरायाश्च निशाकरागुसुतो मेपूरण संस्थितो
नानाशास्त्रकलाकलापविलसद्वृत्त्यादिशेज्जीवनम्।
दाने साधुमति तथा विनयतां कामं धनाभ्यागमं
मानं मानवनायकादविरल शीलं विशालं यदा ॥ ९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न वा चन्द्रमासे दशममें शुक्र वैठा हो वह मनुष्य
अनेक शास्त्रकी कलाओं के समूहकी विलासवृत्तिसे आजीविका करनेवाला, दान
करनेमें साधुवुद्धि, उत्तम शील, काम करके धनको मास, राजासे प्रतिष्ठा
पानेवाला, श्रेष्ठ और विशाल शीलयुक्त होता है ॥९॥
होरायाश्च सुधाकराद्रवितुतः सूतौ खमध्यस्थितो
वृत्तिं हीनतरां नरस्य कुरुते कार्य शरीरे सदा ।
खेदं वादभयं च धान्यधनयोहीनत्वमुच्चैर्मन-
श्चित्तोद्वेगसमुद्भवेन चपलं शीलं च नो निर्मलम् ॥ १० ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लगसे वा चन्द्रमासे शनैश्चर दशम बैठा हो वह मनु-
प्य हीनवृत्ति करनेवाला, दुर्बल रहे, खेदयुक्त, विवाद करनेवाला, धन धान्य करके
हीन, चित्तमें अत्यन्त उद्वेग पैदा होनेसे चपल और शील निर्मल नहीं होता है॥१०॥.
सूर्यादिभिव्योमचरेविलग्नादिदोः स्वपाके क्रमशो विकल्प्या ।
अर्थोपलब्धिर्जनकाजनन्याः शत्रोहिताद्धातृकलत्रभृत्यात् ११
जिस मनुप्यके जन्मकालमें लग्न का चन्द्रमासे मूर्य दगममें बैठा हो तो
से धनलाभ कहनां और चन्द्रमा दशममें हो तो मातासे धनलाभ कहना
हेये और मंगल दाममें बैठा हो तो शनुसे धनलाभ कहना, युध दशममें बैग
'तो मिनसे धनलाभ कहना और वृहस्पति हो तो भाईमे धनलाभ कहना, शुक्र
में हो तो स्त्रीसे धनलाभ कहना और शनैश्वर दाममें हो तो नौकरसे धनलाभ
ना चाहिये ।। ११॥
रवीन्दुलनास्पदसंस्थितांशे पतेस्तु वृत्त्या परिकल्पयेत्ताम् ।
सदीपघोणीदितृणैः सुवर्णर्दिवामणित्तिविधिविध्यात् ।।१२॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें सूर्य, चन्द्रमा, लग्न इन तीनॉम जो वली होरस
मभावमें जो नवांशका उदय हो उस नवांगपतिमे वृदिरा विचार करना चाहिये
दिगमस्थित नपांगपति सूर्य हो तो श्रेष्ठ ओपपी और उर्ण, तृण, मुवर्ण
रके वृत्ति पहना ॥ १२ ॥

जातफाभरण।
नक्षत्रनाथोऽत्र कलवतश्च जलाशयोत्पन्नपिक्रियादेः।
कुजोऽमिसत्साहसधातुवःसोमात्मजः काव्यकलाकलापैः १३
जो दशमनवांशपति चन्द्रमा हो तो वीफरके, जलाशप करके उत्पन्न खेती
करके आजीविका कहनी चाहिये और जो मंगल नवांशपति हो तो साहस और
धातु शख करके आजीविका कहनी और बुध नवांशपति हो तो कान्यकी कला-
ओंके समूह करके आजीविका करनेवाला होता है ॥ १३ ॥
जीवो द्विजान्मोचितदेवधर्मैःशुको महिष्यादिकरौप्यरत्नैः।
शनैश्चरो नीचतरप्रकारैः कुर्यात्नराणां खलु कर्मवृत्तिम् ।। १४॥
कर्मस्वामी ग्रहो यस्य नवांशोपरि वर्तते ।
तत्तुल्यकर्मणो वृत्ति निर्दिशति मनीपिणः ॥ १५ ॥
और जो दशमनवांशपति बृहस्पति हो तो ब्राह्मणों करके श्रेष्ठ धर्म और टेवा-
राधन करके वृत्ति कहना और शुक्र नवांशपति हो तो महिषी, बांदी तया रलों
करके आजीविका करनेवाला होता है और शनैश्चर हो तो नीचकोसे धनकी
आजीविका करता है ॥ १४ ॥ दशमभावका स्वामी जित नवांशमें बैठा हो उसीचे
समान कमाकरके अपनी आजीविका करनेवाला होता है यह बुद्धिमानोंने कहा है॥१५॥
मित्रारिंगेहोपगतेनभोगेस्ततस्ततोऽर्थः परिकल्पनीयः ।
तुंगे पतंगे स्वगृहे विकोणे स्यादर्थसिद्धिनिजवाहुवीर्यात्।।१६।।
लग्रार्थलाभोपगतैः सीयः शुभैभवेद्र्धनसौख्यमुच्चैः ।
इतीरितं पूर्वमुनिप्रवर्यवेलानुमानात्परिचिंतनीयम् ॥ १७ ॥
जो मित्र दात्रुके घरमें यह बैठे हों तो उन्हींसे धनलाभ पहना और उच्चमें पा
स्वक्षेत्र मूलत्रिकोणमें सूर्य हो तो अपने वाहुबलसे धन पैदा करता है। १६॥जिस मनुः
प्यके जन्मकालमें लम, धन लाभस्थानों में शुभग्रह बलसहित वैठे हों यह मनुष्य के धारी
सौख्यसहित होता है यह पूर्वाचायोंने कहा है, ग्रहों के बलसे विचार कर फल कहना।'
अथ लामभावविचारः।
गजाभवहेमांवररत्नजातमान्दोलिकामंगलमण्डनानि ।
लाभः किलपामखिलं विचार्यमेतत् लाभस्य रहे गृह ः १६५
अब ग्यारहवें भावसे क्या क्या विचार करना चाहिये-हाथी, घोड़ा, सोग
वस, रल, पालपी, मंगल, मकान और लाभ ये सब बातें निश्चय कर
घरस ज्योतिषी विचारे ॥१॥

A भाषाकासहित । (८५) सूर्येण युक्ते च विलोकित वालाभालये तस्य गणोऽत्र चेत्स्यात् । भूपालतश्चोरकुलात्कलेवा चतुष्पदादेर्बहुधा धनाप्तिः ॥ २ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य करके युक्त वा दृष्ट ग्यारहवाँ भाव हो अथवा ग्यारहवें भाव पडू वर्गमें हो तो राजा या चोर कलहसे चौपायों करके बहुत प्रकार करके धनकी प्राप्ति कहना चाहिये ।।२।। चंद्रेण युक्तं च विलोकितं वा लाभालयं चंद्रगणाश्रित चेत् । जलाशयस्त्रीगजवाजिवृद्धिः पूर्ण भवेत्क्षीणतरे विलोमम् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवाँ भाव चंद्रमा करके युक्त वा दृष्ट हो और चन्द्रमाका पड़र्ग हो तो वह मनुष्य जलाशय, स्त्री, गज (हाथी), घोडॉकी वृद्धि करता है, जो पूर्णचन्द्रमा, हो तो और क्षीणचंद्रमासे पूर्वोक्त पदायोंका नाग लाभालय मङ्गलयुक्तदृष्टं प्रकृष्टभूपामणिहेमलन्धिः। विचित्रयात्रा बहुसाहसं स्थानानाकलाकौशलघुद्धियोगैः॥४॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवाँ भाव मङ्गल करके युक्त वा दृष्ट हो और मंगलका पवर्ग हो तो आभूपण, सोनाकी प्राप्ति और विचित्र यात्रा, बहुत साहत और अनेक कलाओंमें कुशलता बुद्धि करके होती है ॥ ४॥ लामे सौम्यगणाश्रिते सति युते सौम्येन संवीक्षिते नानाकाव्यकलाकलापविधिना शिल्पेन लिप्या सुखम् । युक्तिव्यमयी भवेद्धनचयः सत्साहसेरुद्यमः सख्यं चापि वणिग्जनैहुतरं क्लीवनृणां कीर्तितम् ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें बुध बेटा हो वा युक्त हो और चुपका 'पवर्ग हो तो वह मनुष्य अनेक काव्योंके समूहसे और शिल्प करके लिसनेसे बहुत मुख धन पाता है, मिले हुए पदार्थों परके धनका संग्रह करनेवाला, श्रेष्ठ साहस और उद्यम फरफे बनियोंसे मित्रता फरफे अथवा नपुनकोसे धनके लामवाला पहना चाहिये ॥५॥ यज्ञक्रियासाधुजनानुयातो राजाश्रितोत्कृष्टकृपो नरः स्यात् । द्रव्येण हेमप्रचुरेण युक्तो लाभे गुरोगयुगीक्षण चेत् ॥६॥ जिस मनुष्पफे जन्मकारमें हसति पारहवें भावमें बटा हो पा युक्त हो और हस्तविया पइयर्ग हो तो यह मनुष्य माक्रियामे, मत्पुरुषाफे संगो, राजा

जातकाभरण।
आश्रयसे बहुत धन पैदा करनेवाला, अत्यन्त कृपालु और द्रव्य सुवर्ण करके सहित
होता है ॥ ६॥
लाभालये भार्गववर्गयातं युतेक्षितं वा यदि भार्गवेण ।
वेश्याजनैर्वापि गमागमैर्वा सद्रौप्यमुक्ताप्रचुरस्वलब्धिः ॥ ७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें शुक्रका पड्वर्ग हो और शुक्र करके
युक्त वा दृष्ट हो तो उसको रंडियों करके परदेश जाने व आनेसे श्रेष्ठ चांदी, मोती
और बहुत धन प्राप्त होता है ॥ ७॥
लाभवेश्मनि शनीक्षितयुक्ते तद्गगेन सहित सति पुंसाम् ।
नीललोहमहिपीगजलाभो ग्रामवृन्दपुरगौरवमिश्रः॥८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें शनैश्चरका पइवर्ग हो, शनैश्चर करने
युक्त वा दृष्ट हो तो उस मनुष्यको नील, लोहा, महिपी, हाथी (घोड़ों ) का राम
और ग्रामोंके समूहसे बड़े गौरव और धनका लाभ कहना चाहिये ।। ८ ॥
युक्तक्षिते लाभगृहे सुखाख्ये वर्गे शुभानां समवस्थितेऽपि ।
लाभो नराणां बहुधाथवास्मिन्सर्वग्रहयुक्तनिरीक्ष्यमाणे ॥ ९॥
जो लाभस्थान शुभ ग्रहोकरके युक्त वा दृष्ट हो और शुभग्रहोंका पड्रवर्ग हो और
सब ग्रह लाभ भावमें बैठे हों अथवा देखते हों तो बहुत प्रकारसे धनरान
होता है ॥९॥
अथ व्ययभावविचारः।
हानिदान व्ययश्चापि दण्डो निबंध एव च।
सर्वमेतद्ययस्थाने चिंतनीय प्रयत्नतः॥१॥
व्ययभावसे क्या क्या विचारना चाहिये-हानि और दान, खर्च, दंड, बंधत
पारहें स्थानसे विचारना चाहिये ॥ १॥

सू भापार्टीकासहित । (८७) धननाशयोगः३ पूर्णेन्दुसौम्येज्यसिता व्ययस्थाः कुर्वन्ति संस्था धनसंचयस्य । प्रात्यस्थिते सूर्यसुते कुजेन युक्तक्षिते वित्तविनाशनं स्यात् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बारहें भावमें पूर्ण चंद्रमा और बुध, बृहस्पति, शुक्र, वारहें बैठे हों तो वह धनका संग्रह करनेवाला होता है और जो बारहें शनैश्चर बैठे हो और मंगल करके दृष्ट हो वा युक्त हो तो धनका नाश कहना चाहिये ॥ ३ ॥ अथ भावफलोपयुक्तत्वेन रिष्टाध्यायो निरूप्यते । पुत्रवीनाशयोगः लग्नेन्द्रोश्च कलत्रपुत्रभवने स्वस्वामिसौम्यै- ग्रहयुक्त वाथ विलोकिते खलु तदा तत्प्राप्ति- रावश्यकी । लग्ने चेत्सविता स्थितो रविसु- m तोजायाश्रितो मृत्युकृज्जायायाश्च महीसुतः सुतगत कुर्यात्सुतानां क्षतिम् ॥ १॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नसे वा चंद्रमासे सप्तम पंचमभाव अपने स्वामी करके वा शुभग्रह करके युक्त वा दृष्ट तो पुत्र वा सीमाप्ति अवश्य कहना चाहिये और जो लग्नमें सूर्य बैठा हो और शनैश्चर सात वैठा हो तो स्त्रीको मृत्यु कहना चाहिये और जो पंचमभावमें मंगल बैठा हो तो पुनोंका नाशं करता है ॥ १॥ स्वीनारायोगः २ असौम्यमध्यस्थितभार्गवश्चेत्पातालले खल- खेटयुक्ते । सोन्यैरहटे भृगुजे च पत्नीनाशो भवेत्पाशहुताशनायः ॥ २॥ जो पापग्रहोंफे धीचमें शुक्र बैठा हो और चतुर्य और अष्टम भावमें पापग्रह बैठे हों और शुभग्रहों करके शुक्र अट हो तो उसकी खी फांसी करके वा अग्नेि आदि करके मरती है ।।२।। ७. स.

स. "(८८) जातकाभरण। दंपतीकाणयोगः३ सीहीनयोगः३ दिवाकरेन्दू व्ययवेरियां- तौ जायापती चैकविलो- चनौ स्तः ।। कलत्रधर्माः त्मजगौ सिताकौ पुमा-म. न्भवेत्क्षीणकलत्र एव ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य चंद्रमा बारह या छठे बैठे हों वह स्त्री पति दोनों काणे होते हैं और जो सप्तम, नवम, पंचम भावामें शुक्र सूर्य वैठे हों तो वह मनुष्य स्त्रीहीन होता है ॥ ३ ॥ भसंधियाते च सिते स्मरस्थे तनौ प्रयत्नेन तु भानुसूनी । वंध्यापतिः स्यान्मनुजस्तदानीं सुतालयं नो शुभदृष्टयुक्तम् ।।४।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें शुक राशिकी संधिमें बैठा हो और लग्नमें शनैश्चर बैठा हो और पंचमभावमें कोई शुभग्रह नहीं बैठा हो, न देखता हो तो वह मनुष्य बांझस्त्रीका पति होता है ॥ ४ ॥ स्त्रीपुत्रहीनयोगः५ क्रूराश्च होरास्मररिःफयाताः सुतालये हीन- बलः कलावान् । एवं प्रसूतो किल यस्य में. योगो भवेत्स भार्यातनयविहीनः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह लग्न सप्तम, व्यपः भावमें बैठे हों और पंचममें हीनवली चंद्रमा बैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न मनुष्य स्त्री.पुन करके हीन होता है ॥५॥ पुत्रजापाहीनयोगः६ स्त्रीखोरुपयोगः यूनेऽर्कजारी सभृगू शशां- कादपुत्रभाय कुरुतो नरं तौ । स्यातां नृनार्यो- खगी स्मरस्थी सौम्ये ९ नृनायोंः६ ह शान भापाटीकासहित । जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमासे सातवें स्थानमें सूर्य, मंगल, शुक्र बैठे हों वह मनुष्य स्त्री पुत्र करके हीन होता है, जो सप्तम भावमें पुरुषग्रह बैठे हों और शुभग्रह देखते हों तो पुरुपको स्वीका सौख्य कहना और जो स्त्रीके सातवें स्वीयह बैठे हों और शुभग्रह देखते हों तो स्त्रीको पुरुपका सुख होता २११ अथ व्यभिचारियोगः। परखोरवयोगः७ उभयव्यभिचारियोगः७ सितेऽस्तयाते शनिभौम वर्ग भौमार्कदृष्टे परदार गामी । मंदारचन्द्रा यदि चमे संयुताः स्युः पोश्चल्य सतौरमणीनरौ स्तः॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र सातवें वैठा हो, मकर, कुंभ, मेप, वृश्चिक्रराशिमें और उसको मंगल शनि देखते हों तो वह मनुष्य परायी वीमें रत रहता है और जो सातवें भावमें शनैश्चर, चंद्रमा, मंगल बैठे हों और शुक्र फरके युक्त हों तो वे स्त्री पुरुष दोनों व्यभिचारी होते हैं ॥ ७ ॥ परस्परांशोपगतौ रवीन्दू रोपामय ती कुरुतो नराणाम् । एकैकगेहोपगतो तु तो वा तमेव रोग कुरुतो नितान्तम् ||८|| जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य चंद्रमा परस्पर नवांशमें बैठे हों तो वे सी पुरुप दोनों क्रोधी होते हैं और फेवल सूर्य चंद्रमाके नवांशमें बैठा हो तो पुरुप रोगी, क्रोधी होता है और फेवल चन्द्रमा सूर्यके नवांशमें बैठा हो तो खी गेगिणी होती है ॥ ८॥ अन्धयोगः ९ भन्धयोगः९ मंदावनीसूनुरवीन्दवश्च- इन्धारिवित्तव्ययभावस स्थाः। आंध्यं भवेत्सा- रसमन्वितस्य खेटस्य दोषात्पुरुषस्यनूनम्॥९॥ था मा.. नर्म.

(९० जातकाभरण। स में. जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चर, मंगल, सूर्य, चंद्रमा अष्टम, छठे, दूसरे वारहें बैठे हों वह मनुष्य अंधा होता है और बलसहित हों तो ग्रहके योगसे पुरुष अंधा होता है ॥९॥ मृगालिगोकर्कटकास्त्रिकोणे प्रसूतिकाले खलखेटयुक्ताः। निरीक्षिता वा जनयति जातं कुठेन युक्तं प्रवदंति संतः॥१०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर, वृश्चिक, कर्क, वृप यह राशि नवम पंचममें बैठे हों या पापग्रह देखते हों वा युक्त हो तो वह मनुष्य कुष्ठरोगवालां होता है ॥ १०॥ कर्णनाशयोगः १० मंदार्कचंद्रास्त्रिसुतायधर्म सौम्येन युक्तानच ... विक्षिताश्चताकर्णप्रणाशजनयंति नूनं स्मर- श. स्थितास्ते दशनाभिघातम् ॥ ११॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चर सूर्य चंद्रमा तीसरे, पंचम, ग्यारहे, नवममें बैठे हों और कोई शुभग्रह न तो साथ हो न देखता हो तो उस मनुष्यफे कर्ण नष्ट होते हैं और पूर्वोक्त योग सातवें हो तो उसके दांतोंका नाश होता है ॥ ११ ॥ पिशाचस्वभावयोगः १२ नेयोपघातयोगः १५ ग्रस्ते विधौ लागताश्च पापास्त्रिकोणगाजन्मपि शाचकस्य । ग्रस्त विधी लग्नगते तथेव नेगोपघा- तः खलु कल्पनीयः॥१२॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें चन्द्रमा पापग्रहोंके साय वैठा हो और लग्न, पंचम, नवममें पापग्रह बैठे हों तो वह पिशाचस्वभाववाला होता है और जो पापा युक्त चन्द्रमा लममें बैठा हो तो नेपाका विधात कहना चाहिये ॥ १२ ॥ স্থায় भापाटीकासहित। १९१), ६. वातरोगयोगः १३ वीयविकारयोगः १३ लग्गस्थिते देवपुरोहितेऽस्ते शनौ च वाताधिकता नितान्तम् । जीवे विलग्ने बनिनन्दनेऽस्ते मदोतः में. स्यात्पुरुषो विशेषात्१३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें वृहस्पति व सातवें शनैश्वर बैठा हो तो उस मनुष्यके शरीरमें वातरोग होता है और वृहस्पति लग्नमें और मंगल सातवें बैठा हो तो यह मनुष्य वीर्यविकारवाला होता है ॥ १३ ॥ धाताधिकयोगः १४ चावाधिक्योगः १४ स. में मं. - स्मरे त्रिकोणे धरणीत- नृजे शनी तनी वा पवन- म.प्रकोपः । क्षीणेन्दुमन्दी व्ययभावयाती तदापि वाताधिकता नराणाम् ॥ १४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सातवें, नवम, पंचममें मंगल बैठा हो और शनैश्चर लग्नमें वैटा हो तो वातविकार मनुष्यरो कहना और क्षीणचन्द्रमा शनैश्चर पारहें वैठा हो तो भी वातरोगकी अधिस्ता कहनी चाहिये ॥ १४ ॥ रानारापोगः १५ नीचपोग.१५ वंशच्छेदकरः शशांकभृगुजः क्रूरैः स्वकामाम्बुगेः शिल्पी केंद्रगतार्किणा बुधयुतन्यशे समालोकितः। अन्ते देवगुरी राम, दिनेश्वरयुतस्यांशे च दासी- युतो नीचः कामगयोः खरांशुशशिनोः सारेण संदृष्टयोः॥१५॥ प . "

'(१२)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चन्द्रमा शुक्र पापग्रहों सहित द्वितीय सप्तम चतु-
में बैठे हों वह मनुष्य वंशनाश करनेवाला होता है और केंद्रमें शनैश्चर बैठा
हो, बुधके द्रेष्काणमें और बुध करके दृष्ट हो तो शिल्पी होता है, जिसके बारहे
बृहस्पति सूर्यके नवांशमें बैठा हो वह दासी करके सहित होता है और
जिसके सातवें सूर्य, चन्द्रमा बैठे' हों और शनैश्चर करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य
नीच होता है ॥ १५ ॥
वयो राशि स्वनक्षत्रमेकीकृत्य पृथक्पृथक् ।
द्विचतुस्त्रिगुणं कृत्वा सप्ताप्टरसमाजितम् ॥ १६॥
आद्यन्तयोभवदुःखी मध्ये शून्य धनक्षयः ।
स्थानत्रयेऽभ्रशेप तु मृत्युः सांकेषु वैजयी ॥ १७ ॥
इति श्रीदेवज्ञढुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे भावो-
पयोगिरिष्टाध्यायः समाप्तः ॥ २ ॥
उमर, राशि और जन्मनक्षत्र इन तीनोंके अंकोंको एकत्रित कर अलग अलग
तीन जगह स्थापित करना । पहिली जगहमें दोसे गुणे, दूसरी जगहमें चारसे
गुणे और तीसरी जगहमें तीनसे गुणे । पहिली जगहके गुणे अंकोंमें सातका
भाग देवे, दूसरी जगहके अंकोंमें आठका भाग देवे और तीसरी जगहके
अहोंमें छः का भाग देवे ॥ १६ ॥ जो पहिले और अन्तके गुणे हुए अंकोंमें
शून्य आवे तो दुःख कहना चाहिये, वीचके अंकमें शून्य आवे तो धनका
क्षय कहना चाहिये और जो तीन स्थानोंमें शून्य आवे तो उसी वर्षमै मृत्यु
कहना चाहिये और, तीनों जगह अंक शेष रहे तो उस वपमें जय कहना
चाहिये ॥ १७॥
इति श्रीवंशवरेलीयराजज्योतिपिकपण्टितश्यामलालम्तायां श्यामसुंदरीमापाटीका
मायोपयुक्तरिष्टाध्यायः ॥२॥

अफ स्पादिग्रहमाफलाध्यायमारंभः ।।
अथ लग्नभावस्थितफलम् ।
लग्नेऽल्पकचः क्रियालसतनुः क्रोधी प्रचण्डोन्नतो
पामी लोचनरुक्सुकर्कशतनुः शूरोऽक्षमी निघृणः ।
फुल्लाक्षः शशिभे क्रिये स्थितिहरः सिंहे निशांधः पुमा-
न्दारिद्र्योपहतो विनएतनयः संस्थस्तुलासंज्ञिके ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लममें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य थोड़े केशवाला,
काम करनेमें आलसी, बड़ा कोधी, ऊंचा शरीर, खुजली रोगसहित नेत्रोंका
रोगी, कर्कश शरीरवाला, शूर वीर, क्षमारहित और निर्दय होता है। जिसके
कराशिवती सर्य लग्नमें हो उसके कमल सरीखे नेत्र होते है और मेपराशि-
वर्ती सूर्य हो तो न्यायमार्गी स्थितिको हरण करता है और सिंहराशिवती
सूर्य हो तो उसको रतीधी आती है और तुलराभिवर्ती सूर्य हो तो वह मनुम्प
दरिद्री व पुत्रहीन होता है ॥ १ ॥
अथ धनभावास्थितसूर्यफलम् ।
धनस्तोत्तमवाहनवर्जितो इतमतिः सुजनोज्झितसौहृदः ।
परगृहोपगतो हि नरो भवेदिनमणेविणे यदि संस्थितिः॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य धन, पुत्र
और अच्छी सवारी करके रहित, बुद्धिन, मित्रतास हीन और पराये घरमें वास
परता है ॥२॥
अय तृतीयभावस्थितसूर्यफलम् ।
प्रियंवदः स्यादनवाहनाढ्यः सुकर्मचित्तोऽनुचरान्वितश्च ।
मितानुजः स्यान्मनुजोवलीयान्दिनाधिनाथे सहजेऽधिसंस्थे३॥
जिन मनुष्य के जन्मकारम तीसरे भावमें सूर्य वैटा हो यह मनुष्य मीठी
वाणी बोलनेवाला, पन और वाहनों परके सहित अच्छे कामोंमें मनसे लगा,
नेवाला, नोकगें पके सहित, योडे भाइयाँवारा योर अधिक बलाद
होता है ॥३॥

.
(९४)
जातकाभरण।
अय चतुर्थभावस्थितसूर्यफलम् ।
सौख्येन यानेन धनेन हीनं तातस्य चित्तोपहतप्रवृत्तम्।
चलनिवासं कुरुते पुमांस पातालशाली नलिंनीविलासी ॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुर्थ भावमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य सौल्य
और सवारी तथा धनकरके हीन, वापसे वैर करनेवाला और एक जगह नहाँ
वास करनेवाला होता है ।। ४ ॥
अथ पंचमभावस्थितसूर्यफलम् ।
स्वल्पापत्य शैलदुर्गेशभक्तं सौख्यैर्युक्तं सक्रियाविमुक्तम् ।
भ्रान्तस्वांत मानव हि प्रकुर्यात्सूनुस्थाने भानुमान्वर्तमानः ।।६।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य थोड़ी सन्ता-
नवाला, पार्वती और शिवका भक्त, सौख्यरहित, अच्छे कर्मों तया धन करके
.हीन और भ्रमित चित्तवाला होता है ॥५॥
अथ पष्ठभावस्थितसूर्यफलम् ।
शश्वत्सौख्येनान्वितः शत्रुहंता सत्त्वोपेतश्चारुयानो महोजाः।
पृथ्वीभर्तुःस्यादमात्यो हि मर्त्यःशधुक्षेत्रे मित्रसंस्था यदिस्यात्
जिस मनुष्य के जन्मकालमें छठे भावमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य निरन्तर सौत्य-
सहित, वरियोंफो मारनेवाला, बलवान् अच्छे रथ वा सवारी फरफे सहित, बहुत
तेजवान और राजाफा मंत्री होता है ॥ ६ ॥
अथ सप्तमभावस्थितगर्यफलम् ।
श्रिया विमुक्तो हतकायकांतिर्भयामयाभ्यां सहितः कुशीलः ।
नृपप्रकोपार्तिकृशो मनुष्यः सीमंतिनीसद्मनि पद्मिनीश॥ ७ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सातवें भाव में सूर्य वैटा हो तो वह मनुष्य धनद्दीन
देवपी शोभा परके रहित भय और रोगों करके सहित, दुष्ट स्वभावाला, गजाये
नोधकरके दुःसको माप्त और फूल होता है ॥ ७॥
अय अष्टमभावस्थितगर्यफलम् ।
नेत्राल्पत्वं शत्रुवर्गाभिवृद्धिबुद्धिभ्रंशः पूरुपस्यातिरोपः ।
अर्थाल्पत्व कायमंगे विशेपादायुःस्थाने पद्मिनीमाणनाथ।।८।।
जिस मनुष्यये अहमभावमें सूर्य पटा हो यह मनुष्य छोटे नेवासा या मन्द
रविाला, गवर्गयी टिमदिवाभ्रशुटि, पड़ा प्रोपी, थोडे धनवाया और पिरोप-
परफे दुर्वर देहवाला होता है ॥८॥

भोपार्यकासहित । (९५) अघ नवमभावस्थितसूर्यफलम् । धर्मकर्मविरतश्च सन्मतिः पुत्रमित्रजसुखान्वितः सदा । मातृवर्गविपमो भवेन्नरस्त्रित्रिकोणभवने दिवामणौ ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें नरममावमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य धर्मकर्ममें तत्पर, श्रेष्ठ बुद्धिवारा, पुत्र और मित्रों द्वारा हमेशा सुखी और मातृपक्षी लोगोंसे चैर करनेवाला होता है ॥ ९॥ अथ दशमभावस्थितस्यफलम् । सद्युद्धिवाहनधनागमनानि नूनं भूपप्रसादसुतसौख्यसमन्वि- तानि । साधूपकारकरण मणिभूषणानि मेपूरणे दिनमणिः कुरुते नराणाम् ॥ १०॥ 'जिस मनुष्यके दशमभावमें सूर्य बैठा हो तो यह निश्चय जानिये कि वह मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धिवाला,श्रेष्ठवाहन और धनसे संपन्न, राजापी कृपा और पुत्रोंके सौख्यसहित, साधुओंफा उपकार करनेवाला और मणियोंकरके युक्त आभूपणोंवाला होता है॥२०॥ अथ एकादशभावस्थितसूर्यफलम् । गीतिप्रीतिं चारुकर्मप्रवृत्तिं चचत्कीति वित्तपूर्ति नितान्तम् । भूपात्प्राप्ति नित्यमेव प्रकुर्यात्प्राप्तिस्थाने भानुमान्मानवानाम् । जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहें भावमें सूर्य वैठा हो वह मनुष्य गानेमें प्रीति परनेवाला, श्रेष्ठ कमोंमें प्रवृत्त होनेवाला, बड़े यशहाला नितांत धनकरके पूर्ण और राजाफरके नित्य ही धनलाभ फरनेवाला होता है ॥ ११ ॥ अय व्ययभावस्थितसूर्यफलम। तेजोविहीने नयने भवेतां तातेन साकं गतचित्तवृत्तिः । विरुद्धबुदिळयमावयाते कांते नलिन्याः फलमुक्तमार्यः ॥३२॥ जिस मनुष्यके जन्मसारमै व्यपभावमें सूर्य वैग हो वो पण्डितोंने कहा है कि वह मनुष्य नेनों के तेनसे रहित, पितासे वैर करनेवाला और सबसे विरुद्ध बुद्धि- पारा होता है ।। १२॥ अय समभावस्थितचंद्रालम् । दाक्षिण्यरूपधनभोगगुणवरेण्य- चन्द्रे कुलीरवृपभाजगते विलये।

जातकाभरणन उन्मत्तनीचबधिरो विकलोऽथ मूकः । शेपेषु ना भवति हीनतनुर्विशेपात् ॥१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्क, वृष, मेष राशिवती चंद्रमा लग्नमें बैठा हो वह मनुष्य चतुर, रूपवान, धन और भोग, श्रेष्ठ गुणोंकरके सहित होता है और जो कर्क, वृप, मेष राशिके विना अन्य राशियोंमें चंद्रमा लग्नमें बैठा हो तो मनुष्य उन्मत्त यानी मतवाला, नीच, बहिरा, विकलदेह और गूगा होता है । १॥ अथ धनभावस्थितचंद्रफलम् । सुखात्मजद्रव्ययुतो विनीतो भवेन्नरः पूर्णविधुद्धितीये । क्षीणे स्खलद्वाग्विधनोल्पबुद्धिन्यूनाधिकत्वे फलतारतम्यम्२ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पूर्ण चंद्रमा धनभावमें बैठा हो वह मनुष्य सुख और पुत्र धन करके सहित, नम्रताकरके युक्त श्रेष्ठ होता है और जो क्षीणचंद्रमा धनभावमें हो तो वह मनुष्य तोतला, धनरहित, थोड़ी बुद्धिवाला होता है और जो चंद्रमा न तो पूर्णवली हो और न हीनवली हो पूर्ण और हीनके अंतर्गतका हो तो उसका फल कमबढ़ती विचार करके कहना चाहिये ॥ २॥ अय सहजभावस्थितचंद्रफलम् । हिंसः सगर्वः कृपणोऽल्पबुद्धिर्भवेज्जनो बंधुजनाश्रयश्च । दयाभयाभ्यां परिवर्जितश्च द्विजाधिराजे सहजे प्रसूती ॥३॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें तीसरे भावमें चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य हिंसा परनेवाला, बड़ा अभिमानी, कृपण, अल्पबुद्धि, बंधुजनोंका आश्रय करनेवाला दया और भयसे हीन होता है ।। ३ ॥ अथ चतुर्थभावस्थितचंद्रफलम् । जलाश्रयोत्पनधनोपलब्धि कृप्यंगनावाहनसूनुसौख्यम् । प्रसूतिकाले कुरुते कलावान्पातालसंस्थो द्विजदेवभक्तिम् ॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुर्थभावमें चंद्रमा बेटा हो वह मनुष्य जलाश्रयोंसे उत्पन्न धनको प्राप्त करनेवाला, सेती और स्त्री तथा सवारी और पुत्रों सहित, प्राह्मण और देवताओंका भक्त होता है,॥ ४ ॥ अथ पंचमभावस्यचंद्रफलम् । जितेंद्रियः सत्यवचाः प्रसन्नो धनात्मजावाप्तसमस्तसौख्यः । सुसंग्रही स्यान्मनुजः सुशीलः प्रसूतिकाले तनयालयेऽब्जे॥५॥ .

5 1 . भाषाटीकामहित (९७) जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें चन्द्रमा बैठा हो वह-मनुष्य इन्द्रियों का जीतनेवाला, सत्यवादी, प्रसन्न, धन और पुत्रोंकरके सब सुखको प्राप्त, श्रेष्ठ संग्रह करनेवाला और शीलवान होता है ॥ ५॥ अय रिपुभावस्थितचन्द्रफलम् । मंदाग्निः स्यानिर्दयः क्रौर्ययुक्तोऽनल्पालस्यो निष्ठुरो दुष्टचित्तः रोपावेषोऽत्यंतसंजातशत्रुः शत्रुक्षेत्रे रात्रिनाथे नरः स्यात् ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य मंदाग्नि- रोगवाला, दयारहित, क्रूरतासहित, बड़ा आलसी, कठोर, दुष्टचित्त, क्रोधवान् और बहुत शत्रुओंवाला होता है ॥ ६ ॥ अय सप्तमभावस्थितचंद्रफलम् । महाभिमानी मदनातुरश्च नरो भवेत्क्षीणकलेवरश्च । धनेन हीनो विनयेन चैवं चन्द्रेगनास्थानविराजमाने ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य बड़ा अभिमानी, कामातुर, दुर्वल देहवाला, धन और नम्रतारहित होता है ॥७॥ अथाष्टमभावस्थितचंद्रफलम् । नानारोगः क्षीणदेहोऽतिनिस्वश्चौरारातिक्षोणिपालाभितप्तः। चित्तोद्वेगाकुलो मानवः स्यादायुःस्थाने वर्तमाने हिमांशे८ जिम मनुष्यके जन्मकालमें आठवें भावमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य अनेक रोगों करके दुर्वल देहवाला, धनहीन, चोर और शत्रु तथा राजा करके संताप प्राप्त और मनके उद्वेग करके व्याकुल होता है ॥ ८॥ अथ नवमभावस्थितचन्द्रफलम् । कलत्रपुत्रद्रविणोपपन्नः पुराणवात श्रवणानुरक्तः । सुकर्मसत्तीर्थपरो नरः स्यायदा कलावानवमालयस्थः ॥९॥ जिसके जन्मकालमें चन्द्रमा नवम भावमें बैठा हो वह मनुष्य स्त्री पुन धन फ्रके सहित, पुराणस्थाके सुननेमें तत्पर, अच्छे कर्म और श्रेष्ठतीर्थ करनेमें युक्त होता है ॥९॥ अथ दशमभावस्थितचन्द्रफलम् । क्षोणीपालादर्थलब्धिर्विशाला कीर्तिमूर्तिस्सत्त्वसंतोपयुक्ता । चंचल्लक्ष्मी शीलसंशालिनीस्यान्मानस्थानेयामिनीनायकश्वेत.

(९८)
जातकामरण।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें दशमभावमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य राजाओं
फरके धन प्राप्त करनेवाला, बड़े यशवाला, सुन्दर रूप और चल संतोष करके
सहित, बड़ी लक्ष्मी और शीलवती स्त्रियोंवाला होता है ॥ १० ॥
अवैकादशभादस्थित्तचन्द्रफलम् ।
सन्माननानाधनवाहनाप्तिः कीर्तिश्च सद्भोगगुणोपलब्धिः ।
प्रसन्नतालामविराजमाने ताराधिराजे मनुजस्य नूनम् ।। ११॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य अनेक
प्रकारके सन्तान और धन वाहनोको प्राप्त करनेवाला, यश और श्रेष्ठभोग तया
गुणोंको प्राप्त करनेवाला और प्रसन्नताको माप्त होता है ॥ ११ ॥
अय व्ययभावस्थितचन्द्रफलम् ।
हीनत्वं वै चारुशीलेन मित्रवैकल्यं स्यान्नेत्रयोः शत्रुवृद्धिः।
रोपावेशः पूरुपाणां विशेषात्पीयूपांशौ द्वादशे वेश्मनीह ॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चारहें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठशील और
मित्रों करके रहित और आंखोंमें विकलताको प्राप्त, शत्रुओंकी वृद्धिको प्राप्त और
क्रोधित होता है ।। १२ ॥
अथ लनभावस्थितभीमफलम् ।
अतिमतिभ्रमतां च कलेवरं क्षतयुतं बहुसाहसमुद्यताम् ।
तनुभृतां कुरुतेतनुसंस्थितोऽवनिसुतो गमनागमननि च ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य बुदिमें भ्रम और
घावयुक्त देहवाला, हठ करके सहित, जाने मानेका काम करता है ॥ १ ॥
अय धनभावस्थितभौमफलम् ।
अधनतां कुजनाश्रयतां तथा विमतितां कृपयातिविहीनताम् ।
तनुभृतो विदधाति विरोधतां धननिकेतनगोऽवनिनंदनः ॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें दूसरे भावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्प धनहीन
दुष्टजनोंका आश्रय करनेवाला दुष्टबुद्धि और कृपारहित होता है ।। २.
अय सहजभावस्थितभीमफलम् ।
भूपप्रसादोत्तमसौख्यमुच्चेरुदारता चारुपराक्रमश्च ।
धनानि च भ्रातृसुखोज्झितत्वं भवेन्नराणां सहजे महीने ॥३॥

*
भापाटीकासाहित ।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे भावमें मंगल बैठा हो, वह मनुष्य राजाकी
कृपासे उत्तम सौख्यको प्राप्त उदारतासहित, श्रेष्ठ, पराक्रमवाला धनवान और
भाइयों के सुख से हीन होता है ॥ ३॥ .
अथ चतुर्थभावस्थितफलम् ।
दुःख-सुहृद्वाहनतः प्रवासोः कलेवरे रुग्वलताऽवलत्वम् ।
प्रसूतिकाले किल मंगलाख्ये रसातलस्थे फलमुक्तमायः ॥ ४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चतुर्थ भावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य मित्रजनों-
करके और संवारीसे दुःखको प्राप्त,परदेशमें रहनेवाला अधिक रोगों करके निर्बल
देह होता है श्रेष्ठ जनोंने कहा है ॥ ४॥
अय पंचमभावस्थभौमफलम् ।
कफानिलायाकुलता कलवान्मित्राच्च पुत्रापि सौख्यहानिः।
मतिविलोमा विपुलात्मजेऽस्मिन्प्रसूतिकाले तनयालयस्थे ५||
जिस मनुष्य के जन्मकालमें पंचमभावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य कफ और
वांतरोग करके पीडित, स्त्री, मित्र पुत्रोंके.सुखको नहीं प्राप्त और उलटी बुद्धि-
वाला होता है ॥ ५॥
अय शत्रुभावस्थितभौमफलम् ।
प्राबल्य स्याजाठराविशेषाद्रोपावेशः शत्रुवर्गोपशांतिः ।
सद्भिःसंगोनंगवुद्धिनराणां गोत्रापुत्रे शत्रुसंस्थे प्रसूतौ ।।६।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें मंगल बैठा हो उस मनुष्यकी जठरागि
अधिक प्रबल होती है, क्रोधितस्वरूप, शत्रुओंका नाश करनेवाला, सज्जनपुरुषोंका
संग करनेवाला और कामकलामें वृद्धि हमेश रखता है ॥ ६ ॥
अंय सप्तमभावास्थितभौमफलम् ।
नानानथैर्व्यर्थचिंतोपसगैरिनातान हीनदेहम् ।
दारागारात्यंतदुःखप्रतप्तं दागगारेऽगारकोऽयं करोति ॥७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें मंगल बैठा हो तो वह मनुष्य अनेक
अनर्थोकरके, व्यर्थ चिंता करके और शवसमूहकरके पीडित होता है और खीज-
नित दुःखकरके संतापित होता है ॥ ७ ॥
अथाष्टमभावस्थितभीमफलम् ।
वैकल्यं स्यानत्रयोर्दुभंगत्वं रक्तात्पीडा नीचकर्मप्रवृत्तिः ।
बुद्धरांध्यं सज्जनानां च निन्दारंभ्रस्थाने मेदिनीनंदनेऽस्मिन् ॥८॥

(१००)
जातकाभरण।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें अष्टमभावमें मंगल बैठा हो उस मनुष्यके आंखोंमें
विस्लता होती है और दुर्भगताको प्राप्त वह रक्तविकारकरके पीडित नीचकमर्मि
उसकी प्रवृत्ति और बुद्धिका अंधा होता है ॥ ८॥
अथ नवमभावस्थितभौमफलम् ।
हिंसाविधाने मनसः प्रवृत्तिं भूमीपतेर्गौरवतोऽल्पलब्धिम् ।
क्षीणं च पुण्यं द्रविर्णनराणांपुण्यस्थितःक्षोणिसुतः करोति ॥९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवमभावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य हिंसा करनेमें
मनकी प्रवृत्ति करनेवाला, राजाकरके अल्प गौरवताको प्राप्त और पुण्य और धनको
नाश करनेवाला होता है ॥ ९॥
अय दशमभावस्थितभौमफलम् ।
विश्वभरापतिसमत्वमतीव तोपं
सत्साहसं परजनोपकृतौ प्रयत्नम् ।
चंचद्विभूपणमणीन्विविधागमांश्च
मेपूरणे धरणिजः कुरुते नराणाम् ॥ १०॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें दशमभावमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य राजाके
समान अत्यंत आनन्दको माप्त, श्रेष्ठ साहस करनेवाला, पराया उपकार यत्नसे करे,
सुन्दर आभूषण, मणि और अनेक प्रकारसे लाभ करता है ॥ १० ॥
अधैकादशभावस्थितभीमफलम् ।
ताम्रप्रवालविलसत्कलधौतरक्तवस्त्रागमं सुललितानि च वाहनानि।
भूपप्रसादसुकुतूहलमंगलानि दद्यादवाप्तिभवने हि सदावनेयः ११
जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें मंगल बैटा हो. वह मनुष्य तांग
और मूंगा, सोना और वस्रोंको प्राप्त और मुंदर सवारी सहित, राजाकी कृपासे
श्रेष्ठ पौतुक मंगलोंको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
अथ द्वादशभावस्थितभीमफलम् ।
स्वमित्रवैरं नयनातिवाधां क्रोधाभिभूतं विकलत्वमंगे।
धनव्ययं बन्धनमल्पतेजो व्यये धराजो विदधाति नूनम् ॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बारहवें मंगल बैठा हो वह मनुष्य अपने मित्रोंस वैर
करनेवाला, नेनोंकी बीमारी सहित, नोपयुक्त, शरीरमें विरलताको प्राप्त, धनका
नाश करनेवाला, बंधनका भागी और थोड़े तेजवाला होता है ॥ १२ ॥

(१०१)
भाषाटीकासहित ।
अथ लग्नभावस्थितबुधफलम् ।
शांतोविनीतः सुतरामुदारो नरः सदाचारपरोऽतिधीम् ।
विद्वान्कलाज्ञो विपुलात्मजश्व शीतांशुसूनौ जनने तनुस्थ।।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लगभावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य शांत और
नम्रतासहित, अत्यन्त उदार, हमेशा आचारमें तत्पर, धैर्यवान, विद्वान् कलाओको
जाननेवाला और बहुत पुत्रोंवाला होता है ॥ १ ॥
अथ धनभावस्थितबुधफलम् ।
विमलशीलयुतो गुरुवत्सलः कुशलताकलितार्थमहत्सुखः।
विपुलकांतिसमुन्नतिसंयुतो धननिकेतनगे शशिनन्दने ॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य निर्मल शील-
वाला, चौंका प्यारा, कुशलतासहित, बड़े सुखको प्राप्त और बडी शोभा करके
उन्नतिको माप्त होता है ॥२॥
अय तृतीयभावस्थितबुधफलम् ।
साहसानिजजनैः परियुक्तश्चित्तशुद्धिरहितो हतसौख्यः।
मानवः कुशलिंतेप्सितकर्ता शीलभानुतनयेऽनुजसंस्थे ॥ ३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तृतीपभावमें उप बैठा हो वह मनुष्य हठकरके अपने
सम्बन्धियोंके साथ रहता है, चित्तशुद्धिविहीन, सौख्यरहित और अपने दिलके
माफिक काम करनेमें चतुर होता है ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थभावस्थितबुधफलम् ।
सराहनैर्धान्यधनैः समेतः संगीतनृत्याभिरुचिर्मनुष्यः ।
विद्याविभूपागमनाधिशाली पातालगे शीतलभानुसूनौ ॥ ४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुर्यभावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ वाहन और
अन धन सहित, गानविद्या और नृत्यमें रुचि रसनेवाला तथा विद्या और भूप-
णोंको प्राप्त करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
अथ पंचमभावस्थितबुधफरम् ।
पुत्रसौख्यसहित वहुमित्रं मन्त्रवादकुशलं च सुशीलम् ।
मानवं किल करोति सलील शीतदीधितिसुतः सुतसंस्थः ॥५॥
जिस मनुष्य के पंचम भावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य पुत्रोंके सौख्यसहित, बहुत
मित्रोंवाला, मन्त्रबादमें चतुर, श्रेष्ठ गीलवाला लीला करके साहित होता है ॥५॥

- " (१.३ जातकाभरण। अर्थ शत्रुभावस्थितचुधफलम् । वादप्रीतिः सामयो निष्ठुरात्मा नानारतिवातसंतप्तचित्तः । नित्यालस्यव्याकुलः स्यान्मनुष्यः शत्रुक्षेत्रे रात्रिनाथा- त्मजेऽस्मिन् ॥ ६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य झगड़ा करने में प्रीतिवाला, रोगयुक्त, कठोरहृदय, अनेक शत्रुआके उपद्रव करके संतप्ताचेत्त, हमेशा आलसी और व्याकुल होता है ॥ ६ ॥ अथ सप्तमभावस्थितबुधफलम् । चारुशीलविभवैरलंकृतः सत्यवाक्यनिरतो नरो भवेत् । कामिनीकनकसूनुसंयुतः कामिनीभवनगामिनीदुजे ॥ ७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ शीलवाला, वैभव करके शोभित,सत्य बोलनेमे तत्पर और स्त्री सुवर्ण पुत्र करके सहित होता है ७ अथाष्टमभावस्थितबुधफलम् । भूतप्रसादाप्तसमस्तसंपन्नरो विरोधी सुतरां सुगर्वः । सर्वप्रयत्नान्यकृतापहर्ता रन्ध्रे भवेच्चन्द्रसुतः प्रसूतौ ॥ ८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य भूत प्रेतोंकी कृपासे सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्राप्त, बहुत विरोध करनेवाला, अभिमान सहित सम्पूर्ण बलोंकरके अन्यके क्येि कर्मको हरनेवाला होता है ॥ ८॥ अथ नवमभावस्थितबुधफलम् । उपकृतिकृतिविद्या चारुजातादरः स्या- दनुचरधनसूनुप्राप्तहों विशेषात् । वितरणकरणोधन्मानसो मानवश्चे- दमृतकिरणजन्मा पुण्यधामागतोऽयम् ॥ ९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवम भावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य उपकार कर- नेवाला, श्रेष्ठ विद्याका जाननेवाला और आदर करनेवाला, नौकर धनपुत्रों को हपको प्राप्त और संसारसे तरनेका उद्यम करनेवाला होता है ॥ ९॥ अथ दशमभावस्थित धपरम् ।। ज्ञानप्रज्ञः श्रेष्ठकर्मा मनुष्यो नानासंपत्संयुतो राजमान्यः। चञ्चल्लीलावाग्विलासादिशाली मानस्थाने वोधने वर्तमाने१०

भापाटीकासहित।
जिस मनुष्यके दशमभावमें बुध.,बैठा हो वह मनुष्य ज्ञानमें चतुरश्रेष्ठ कर्म
करनेवाला, अनेक प्रकारकी संपत्तियोंकरके संयुक्त, राजमान्या सुंदरलीलाओंकरके
सहित और वाणीके विलासमें श्रेष्ठ होता है ॥ १० ॥
अथैकादशभावस्थितबुधफलम् ।
भोगासक्तोऽत्यंतवित्तो विनीतो नित्यानंदश्चारुशीलो बलिष्ठः।
नानाविद्याभ्यासकृन्मानवःस्याल्लाभस्थाने नंदने शीतभानो॥१॥
जिस मनुष्य जन्मकालमें ग्यारहे भावमें बुध बैठा हो वह मनुष्य भोगमें
आसक्ता अत्यंत धनवाला, नम्रतासहित, नित्य ही आनंदको प्राप्त, श्रेष्ठ शीलवाला
बलवान् और अनेक विद्याओंका अभ्यास करनेवाला होता है ॥ ११ ॥
अथ व्ययभावस्थितबुधफलम् ।
दयाविहीनः स्वजनोज्झितश्च स्वकार्यदक्षो विजितात्मपक्षः ।
धूर्तो नितांत मलिनोनरम्स्याययोपपनेद्विजराजसूनौ ॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वारहें बुध बैठा हो, वह मनुष्य दयारहित अपने
जनोंकरके रहित और अपने कार्यमें चतुर और अपने पक्षको जीतनेवाला, अत्यंत
धूर्त और मलिन होता है ॥ १२ ॥
अथ तनुभावस्थितगुरुफलम् ।
विद्यासमेतोऽभिमतोहि राज्ञां प्राज्ञः कृतज्ञो नितरामुदारः।
नरोभवेच्चारुकलेवरश्च तनुस्थिते चित्रशिखंडिसूनौ ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नभावमें बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य विद्या करके
सहित,राजाओंका प्यारा, चतुर,कृतज्ञा अत्यंत उदार और सुंदर शरीरवाला होता है।।१.
अथ धनभावस्थितगुरुफलम्।
सद्रूपविद्यागुणकीर्तियुक्तः सत्यक्तवैरोऽपि नरो गरीयान् ।
त्यागी सुशीलो द्रविणेन पूर्णो गीर्वाणवंधे द्रविणोपयाते ॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ
रूप विद्या गुण यश करके सहित, वैरको छोड़नेवाला, श्रेष्ठ, त्यागी, शीलवान् और
धन करके पूर्ण होता है ॥२॥
अय सहजभावस्थितगुरुफलम् ।
सौजन्यहीनः कृपणः कृतनः कांतासुतप्रीतिविवर्जितश्च ।
नरोऽग्निमांद्याबलतासमेतः पराक्रमे शक्रपुरोहितेऽस्मिन् ॥ ३ ॥

-
(११.४)
जातकाभरण ।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे भावमें वृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य
मित्रता करके रहित, कृपण, कृतघ्न, स्त्री तथा पुत्रकरके प्रीतिरहित और मंदाग्नि
रोगकरके बलहीन होता है ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थभावस्थितगुरुफलम् ।
सन्माननानाधनवाहनाद्यैः संजातहर्पः पुरुषः सदैव ।
नृपानुकंपासमुपात्तसंपदंभोलिभृन्मंत्रिणि भूतलस्थे॥४॥
जिस मनुष्य जन्मकालमें चतुर्यमें वृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य सम्मान '
और अनेक प्रकारके धनवाहनादिकों फरके हमेशा आनंदको प्राप्त, राजाकी कृपा.
फरके संपदाको माप्त होता है ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमभावस्थितगुरुफलम् ।
सन्मित्रमंत्रोत्तममंत्रशास्त्रमुख्यानि नानाधनवाहनानि ।
दद्याद्रुः कोमलवाग्विलासं प्रसूतिकाले तनयालयस्थः॥५॥
जिस मनुष्यफे जन्मकालमें पंचमभावमें वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ
मित्र और श्रेष्ठ मंत्रशास्त्र और अनेक प्रकारफे धन वाहनोंको प्राम और फोमलवाणी
बोलनेवाला होता है ॥५॥
अय शत्रुभावस्थितगुरुफलम् ।
सद्गीतविद्याइतचित्तवृत्तिः कीर्तिप्रियोऽरातिजनप्रहर्ता।
प्रारब्धकार्यालसकृन्नरः स्यात्सुरेंद्रमंत्री यदि शसंस्थः॥६॥
जिम मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें वृहस्पति चैटा हो वह मनुप्य
गीत और श्रेष्टविद्यापरफे हीन अर्थात् दुष्ट गान और खोटी विधाओम तत्पर,
अपना यदा निगमको प्यारा, ओंका नाश करनेवाला, पारध कार्यमें आलमी
होता ॥६॥
अय मतमभावास्थितगुरफलम् ।
शास्त्राभ्यासासक्तचित्तो विनीतः कांतावितात्यंतमंजातसौख्यः।
मंत्री मयः काव्यफर्ता प्रसूती जायाभावे देवदेवाधिदेवे ॥ ७ ॥
जिम मनुप्पफे जन्मकालमें मातवे भारमें पदसति घटा हो वह मनुष्य भाग
अभ्यास करनेवाला, नम्रनामहित, झी और पनफर अन्य माम्पको माम,
रानाफा मंत्री भीर पाम्प पनेरास्ता होता?॥७॥

. भाषाटीकासहित। अथाष्टमभावस्थितगुरुफलम् । प्रेष्यो मनुष्यो मलिनोऽतिदीनो विवेकहीनो विनयोज्झितश्च । नित्यालसः क्षीणकलेवरः स्यादायुर्विशेषे वचसामधीशे ॥ ८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें बृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य दूत अर्यात हलकारेकी वृत्ति करनेवाला, मलिन, अत्यन्त दीन, विवेकरहित, नम्रताहीन हमेशा आलसी और दुर्बलदेह होता है ॥ ८ ॥ अथ नवमभावस्थितगुरुफलम् । नरपतेः सचिवः सुकृती कृती सकलशास्त्रकलाकलनादरः । व्रतकरो हि नरो द्विजतत्परः सुरपुरोधसि वै तपसि स्थिते ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवम भावमें वृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य राजाका मंत्री श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, चतुर, सर्वशास्त्रोंके विचारमें मनको लगानेवाला, त करनेवाला और ब्राह्मणों की सेवा में तत्पर होता है ॥ ९ ॥ अथ दशमभावस्थितगुरुफलम् । सद्रानचिह्नोत्तमवाहनानि मित्रात्मज श्रीरमणीसुखानि। , यशोभिवृद्धिं बहुधा विधत्ते राज्ये सुरेज्ये विजये नराणाम्॥१०॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें दशमभावमें बृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ राजाके चिह्न छत्रचामरादि और उत्तम वाहनों करके सहित, मित्र, पुत्र, लक्ष्मी और स्त्रीके सुखसहित तथा बहुधा यशकी वृद्धिको धारण करता है ॥ १० ॥ अयैकादशभावस्थितगुरुफलम् । सामर्थ्यमांगमनानि नूनं सद्वस्त्ररत्नोत्तमवाहनानि । भूपप्रसादं कुरुते नराणांगीवाणवन्द्यो यदि लाभसंस्थः ॥११॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें ग्यारहें भावमें बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य साम- र्थ्यसहित धनका निश्चय लाभ करनेवाला श्रेष्ठवस्त्र, उत्तम रत्न और वाहनोंको प्राप्त करनेवाला और राजाकी कृपासहित होता है ॥ ११ ॥ अय व्ययभावस्थितगुरुफलम् । नानाचित्तोरेगसंजातकोप पापात्मानं सालसं त्यक्तलनम्। बुद्ध्या हीन मानवं मानहीन वागीशोऽयं द्वादशस्थः करोतिः॥१२॥ -

(१०६)
जातकामरण:
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बारहें भावमें बृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य अनेक
प्रकारके चित्तके उद्वेगों:करकेः क्रोधसहित, पापी, आलसी, त्याग की है लज्जा
जिसने, बुद्धिकरके हीन और मानरहित होता है ॥ १२ ॥
अथ 'लग्नभावस्थितशुक्रफलम् । ?, Es,
बहुकलाकुशलो विमलोक्तिकृत्सुबदनामदनानुभावः पुमान् ।
अवनिनायकमानधनान्वितो भृगुसुते तनुभावगते सति ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य बहुत कलाम
चतुर, सुन्दरवाणीवाला, श्रेष्ठ स्त्रीके साथ कामकलासाहत, राजा,करके मान और,
धन सहित होता है ॥ १॥
अथ धनभावस्थितशुक्रफलम् ।
सदन्नपानाभिरतं नितांत सदस्रभूपाधनवाहनाढ्यम् ।
विचित्रविद्यं मनुजं प्रकुर्याद्धनोपपन्नो भृगुनन्दनोऽयम् ॥२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ अन्न
और पान करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ वस्त्र, भूपण, धन वाहनोंसे युक्त और विचित्र
विद्याका जाननेवाला होता है ॥ २ ॥
अय तृतीयभावस्थितशुक्रफलम् ।
कृशांगयष्टिः कृपणोदुरात्मा द्रव्येण हीनो मदनानुतप्तः ।
सतामनिटो बहुदुष्टचेटो भृगोस्तनूजे सहजे नरः स्यात् ।। ३॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें तृतीयभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य दुर्बल अंगों-
वाला, कृपण, दुष्टात्मा, धनहीन, कामदेवसे सन्तोषित, सत्पुरुपोंको दुःख देनेवाला
और बहुत दुष्ट चेष्टावाला होता है ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थभावस्थितशुक्रफलम् ।
मित्रक्षेत्रग्रामसद्वाहनानां नानासौख्यं वंदनं देवतानाम् ।
नित्यानंदं मानवानां प्रकुर्याहत्याचार्यस्तुर्यभावस्थितोऽयम् ।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चतुर्यभावमें शुक्र वैटा हो वह मनुष्य मित्र और
खेत, ग्राम और वाहनोंका अनेक सौख्य पानेवाला, देवताफी वंदना करनेवाला
तया हमेशा आनंदफो प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
अयं पंचमभावस्थितशुक्रफलम् ।
सकलकाव्यकलाभिरलंकृतस्तनयवाहनधान्यसमन्वितः।
नरपतेर्गुरुगोरखभाङ्नरो भृगुसुते सुतसंनि संस्थिते ॥५॥

भाषाटीकासहितः। (१०७); जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें शुक्र 3हो वह सम्पूर्ण काव्य कलाओं सहित, पुत्र, वाहन और अन्न करके सहित और राजा करके बड़े गौरवको प्राप्त होता है। अय शत्रुभावस्थितशुक्रफलम् । अभिमतोन भवेत्प्रमंदाजने ननु मनोभवहीनतरो नरः । विबलताकलितः किल संभवे भृगुसुतेऽरिंगतेऽरिभयान्वितः॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भाव में शुक्र बैठा हो वह मनुष्य खियोंका प्यारा नहीं, 'निश्चय करके कामदेवसे हीन, 'निर्वलतासहित और शत्रुओके भय से. युक्त होता है ।..६.॥ अथ सप्तमभावस्थितशुक्रफलम् । बहुकलाकुशलो जलकेलिकृद्रतिविलासविधानविचक्षणः । अतितरां नटिनीकृतसौहृदः सुनयनाभवने भृगुनन्दने ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य बहुत कलाओंमें चतुररा: जलक्रीडा : करनेवाला, विपर्य करने में बड़ा चतुर और अत्यन्त चंचल खियोंसे मित्रता करनेवाला होता है ॥७॥ अथाष्टमभावस्थितशुक्रफलम। प्रसन्नमूर्तिपमानलब्धः शठोऽतिनिःशंकतरः सगर्वः। स्त्रीपुत्रचिंतासहितःकदाचिन्नरोऽष्टमस्थानगते सिताख्ये।। ८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य प्रसन्नरूप, रा करके मानको प्राप्त, शठ, अति निर्भय, अभिमानी. और कभी स्त्री पुत्रोंका चिंता करनेवाला होता है ॥८॥ अथ नवमभावस्थितशुक्रफलम् । अतिथिगुरुसुराचातीर्थयात्रार्पितार्थः प्रतिदिनधनयानात्यंतसंजातहर्पः। मुनिजनसमवेपः पूरुपस्त्यक्तरोपोका भवति नवमभाव संभवे भार्गवेऽस्मिन् ॥९॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें नवमभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य अतिथि गुरु देवताओंका पूजन करनेवाला, तीर्थयात्रामें सर्च किया है धन जिसने, हर एक दिन धन और वाहनों करके हर्षको प्राप्त, मुनीश्वरोंके समान वेष धारण कर- नेवाला और क्रोधरहित होता है ॥९॥ . J-

(१.८)
जातकामरण.
अथ दशमभावस्थितशुक्रफलम् ।
सौभाग्यसम्मानविराजमानः सानार्चनध्यानमना धनान्यः ।
कांतासुतप्रीतिरतीव नित्यं भृगोः सुते राज्यगते नरस्य ॥३०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक दशममें बैठा हो वह मनुष्य सौभाग्य और
सम्मानसे विराजमान, लान-पूजन-ध्यानमें मनको लगानेवाला, धनवान और
खी पुत्रोंमें नित्य ही अत्यन्त प्रीति करनेवाला होता है ॥ १० ॥
अयैकादशभावस्थितशुक्रफलम् ।
सङ्गीतनृत्यादरता नितांत नित्यं च चिंतागमनानि नूनम् ।
सत्कर्मधर्मागमचित्तवृत्ति गोःसुतोलाभगतो यदि स्यात्॥१३॥
जिस मनुष्यके एकादशभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ गीत और नृत्यमें
अत्यन्त प्रीति करनेवाला, नित्य ही यात्राकी चिंता करनेवाला, श्रेष्ठ कर्म और
'धर्ममें चित्तको लगानेवाला होता है ॥ ११ ॥
अथ व्ययभावस्थितशुक्रफलम् ।
सन्त्यक्तसत्कर्मगतिविरोधी मनोभवाराधनमानसश्च ।
दयालुतासत्यविवर्जितश्च काव्ये प्रसूतौ व्ययभावयाते ॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें व्ययभावमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य श्रेठ कर्मके मार्गको
त्यागनेवाला,कामदेवके विषे चित्तको लगानेवाला,दया और सत्यरहित होता है।॥१२॥
अथ तनुभावस्थितशनिफलम् ।
प्रसूतिकाले नलिनीशसूनुः स्वोच्च त्रिकोणगिते विलग्ने ।
कुर्यानरं देशपुराधिनार्थ शेपेष्वभद्र सरुज दरिद्रम् ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नभावमें तुला, मकर, कुंभ राशिगत शनैश्चर बैठा
हो वह मनुष्य देश नगरका स्वामी (राजा) होता है और अन्यराशिगत शनैश्चर
लग्नमें बैठा हो तो वह मनुष्य दुःखी और रोगसहित दरिद्री होता है ॥ १॥
अथ धनभावस्थितशनिफलम् ।
अन्यालयस्थोव्यसनाभितप्तो जनोज्झितःस्यान्मनुजश्वपश्चाता
देशांतरे वाहनराजमानो धनाभिधाने भवनेऽर्कसूनी ॥ २ ॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें धनभावमें शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य व्यसनो
साहित और मनुष्योंसे त्यागा हुआ होता है। जो उच्चस्वक्षेत्रके बिना अन्यराशियों
में शनि बैठा हो तो और जो तुला मकर कुभराशिवर्ती शनैश्चर हो तो वह मनुष्य
'परदेशमें वाहन और राजमान्यताको प्राप्त होता है ॥२॥

A भाषाटीकासहित। (१०९) अथ तृतीयभावस्थितशनिफलम् । राजमान्यशुभवाहनयुक्तो ग्रामपो बहुपराक्रमशाली। पलको भवति.मूरिजनानां मानवो हि रविजे सहजस्थे ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तृतीयभावमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य राजासे माननीय, श्रेष्ठ वाहनोंकरके सहित, ग्रामपति, बड़ा बलवान् और बहुत आदमियोंका पालनवाला होता है ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थभावस्थितशनिफलम् । पित्तानिलक्षीणवलं कुशीलमालस्ययुक्तं कलिदुर्बलांगम् । मालिन्यभाजमर्नुजं विदध्यासातलस्थो नलिनीशजन्मा ॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चरे चतुर्थभावमें बैठा हो वह मनुष्य पित्त- वातसे क्षीणवलवाला, दुष्टशीलवान्, आलस्यसहित, झगडेसे दुर्बल देहवाला और मलिनताका भागी होता है ॥ ४ ॥ अय पंचमभावस्थितशनिफलम् । सदा गदक्षीणतरं शरीरं धनेन हीनत्वमनंगहानिम् । प्रसूतिकाले नलिनीशपुत्रः पुत्रस्थितः पुत्रभयं करोति ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य हमेशा रोगसे दुर्चलदेहवाला, धनहीन और कामदेवकी हानिवाला तथा पुत्रोंके भय वाला होता है ॥ ५॥ अथ रिपुभावस्थितशनैश्चरफलम् । विनिर्जितारातिगणो गुणज्ञः सुज्ञाभ्यनुज्ञापरिपालकः स्यात् । पुष्टाङ्गन्याष्टिः प्रबलोदरामिनरोऽर्कपुत्रे सति शत्रुसंस्थे ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भावमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य शत्रुदलको जीतनेवाला, गुणोंका जाननेवाला, ज्ञानी जनोंकी आज्ञा माननेवाला, पुष्टदेहवाला और बलवान है जठरामि जिसकी ऐसा होता है ॥ ६ ॥ अथ सप्तमभावस्थितशनिफलम् । आमयेन बलहीनतां गतो हीनवृत्तिजनचित्तसंस्थितिः। कामिनीभवनधान्यदुःखितः कामिनीभवनगे शनैश्चरे ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकार में सातवें भावमें शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य रोगसे निर्वलताको प्राप्त और दुराचारी मनुष्योंसे मित्रता करनेवाला, स्त्री, घर और अन्नसे दुःसित होता है ।। ७॥. , (११०) जातकाभरणः। ......अयाष्टमभावस्थितशनिफलम् । कृशतनुर्ननु दद्रुविचर्चिकाप्रभवतो भयंतोपविवर्जितः । अलसतासहितो हि नरोभवेनिधनवेश्मनि भानुसुते स्थित ॥८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य दुर्बलदेह, निश्चय कर दाद रोग और फुड़ियोंकी वीमारीवाला, भय और सन्तोपसे हीन, आलस्यसहित होता है ।। ८॥ अथ नवमभावस्थितशनिफलम् । . धर्मकर्मसहितो विकलांगो दुर्मतिर्हि मनुजोऽतिमनोज्ञः। संभवस्य समये किल कोणस्त्रित्रिकोणभवने यदि संस्थः ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवमभावमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य धर्मकर्म सहित, विकलदेह, दुष्टबुद्धि और अत्यन्त सुन्दर होता है ॥९॥ अथ दशमभावस्थितशनिफलम् । राज्ञः प्रधानमतिनीतियुतं विनीतं सद्रामवृन्दपुटभेदनकाधिकारम् । कुर्य्यानरं सुचतुरंद्रविणेनंपूर्ण मेपूरणेहितरणेस्तनुजः करोति ॥१०॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें दशमभावमें शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य राजाका मंत्री, नीतियुक्त बुद्धिवाला, नम्रतासहित, श्रेष्ठ ग्रामों के समूह और नगरका अधि- कारी, चतुर और धनकरके सहित होता है ॥ १० ॥ अथैकादशभावस्थितशनिफलम् । कृष्णाश्वानामिंद्रनीलोणकानां नानाचंचद्रस्तुदंतावलानाम् । प्राप्तिं कुर्यान्मानवानांबलीयान्प्राप्तिस्थाने वर्तमानोऽर्कसूनुः ११ जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य काले घोड़े और इंद्रनील मणि, कर्ण वस्त्र और बड़े हाथियोंके लाभको प्राप्त होता है ११ अथ द्वादशभावस्थित शनिफलम् । दयाविहीनो विधनो व्ययातः सदालसो नीचजनानुयातः। नरोंऽगभंगोज्झितसर्वसौख्यो व्ययस्थिते भानुसुते प्रसूती १२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें चारहवें भावमें शनैश्चर वैटा हो वह मनुष्य दयासे रहित, धनहीन, खर्च करके दुःसी, हमेशा आलसी, नीच मनुष्योंका साथी और अंगभंगसे सर्व सौख्यरहित होता है ॥ १२ ॥ ..

-
भाषाटीकासहित।
(१११३
तन्वादिस्थशनेः प्रोक्तं यच्च भावोद्भवं फलम् ।
राहोस्तदेव विज्ञेयं मुनीनामपि संमतम् ।। १३ ॥
जो तन्वादिभावस्य भावजानित फल शनैश्चरका कहा है वही अर्थात् शन-
श्वरके समान राहुका भी फल जानना चाहिये । यह निश्चयकर मुनीश्वरोंकी
सम्मति है ॥ १३ ॥
अय फलमानमाह।
स्वोचस्थितः पूर्णफलं हि धत्ते स्वः हितः हि फलामेव ।
फलांघिमात्रं रिपुमंदिरस्थश्वास्तं प्रयातः खचरो न किंचित् १४
जो ग्रह अपने उच्चमे बैठा हो वह पूर्ण फल-देता है, जो ग्रह स्वक्षेत्र वा मित्ररा-
शिमें बैठा हो वह ग्रह आधा फल देता है, जो ग्रह शत्रु क्षेत्रमें बैठा हो वह चतुर्थांश
फल देता है, जो ग्रह अस्तंगत है वह कुछ भी फल नहीं देता है ॥ १४ ॥
'अय तनुभावस्थितराहुफलम् ।
लग्ने तमो दुष्टमतिस्वभाव नरं च कुर्यात्स्वजनानुवंचकम् ।
शीर्षव्यथाकामरसेन संयुतं करोति वादे विजयं सरोगम् ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें राहु बैठा हो वह मनुष्य दुष्टबुद्धि, खोटे स्व-
भाववाला, अपने संबंधियोंको ठगनेवाला, शिरका रोगी, एवं वीर्य करके सहित,
झगडेमें जीतनेवाला और रोगसहित होता है ॥ १॥
अथ धनभावस्थितराहुफरम् ।
धनगतो रविचन्द्रविमर्दनो मुखरतांकितभावमथो भवेत् ।
धनविनाशकरो हि दरिद्रतां खलु तदा लभते मनुजोऽटनम् २
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें राहु वैग हो तो वह मनुष्य अप्रिय वाणी
बोलनेवालेके भावको प्राप्त, धनका नाश करनेवाला, दरिद्री और भ्रमण करनेवाला
होसा है ॥२॥
अथ सहजभावस्थितराहुफलम् ।
दुश्चिक्येरिभवं भयं परिहरॅल्लोके यशस्वी नरः
श्रेयो वादिभवं तदा हि लभते सौख्यं विलासादिकम् ।
भ्रातॄणां निधनं पशोच मरणं दारिदयभावेर्यतं
नित्यं सौख्यगणः पराक्रमयुत कुर्याच्च राहुः सदा ॥३॥

(११२) जातकाभरण जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे राहुविठा हो तो वह मनुष्य शत्रुओंसे होने- वाले भयको नाश करनेवाला, संसारमें यश व कल्याण और ऐश्वर्पको माप्त और सौख्यविलासादिकोंका लाभ करनेवाला, भ्राताओंकी मृत्युकर्ता, पशुओंकी मृत्यु फरनेवाला, दरिद्रतासहित एवं नित्य ही सौख्य-समूह व बलसे सम्पन्न होता है ॥३॥ अथ चतुर्थभावस्थितराहुफलम् । सुखगते रविचन्द्रविमर्दने सुखविनाशनतां मनुजो लभेत् । स्वजनतां सुतमित्रसुखं नरो न लभते च सदाभ्रमणं नृणाम् जिस मनुष्यके चतुर्थभावमे राहु बैठा हो तो वह मनुष्य दुःखी कुटुम्ब और पुत्रं मित्रों करके सुखको नहीं प्राप्त और हमेशा भ्रमण करनेवाला होता है ।। ४॥ अथ पंचमभावस्थितराहुफलम् । गतसुखो नहि मित्रविवर्धनं ह्युदरशूलविलासनिपीडनम् । खलु तदा लभते मनुजोभ्रमं सुतगते रविचन्द्रविमर्दने ।। ५ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमभावमें राहु बैठा हो वह मनुष्य सुखहीन, मित्ररहित, पेट में दर्दको प्राप्त, विलासकी हानिको प्राप्त और निश्चय करके भ्रमको प्राप्त होता है ॥५॥ अथ रिपुभावस्थितराइफलम् । शत्रुक्षयं द्रव्यसमागमं च पशुप्रपीडां कटिपीडनं च । समागमं म्लेच्छजनैर्महाबलं प्राप्नोति जन्तुर्यदि पष्ठगस्तमः ६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे भाव राहु बैठा हो वह मनुष्य वैरियोंका नारा करनेवाला, धनवान, पशुओंको पीड़ा करनेवाला, कमरमें दर्दको प्राप्त, म्लेच्छोंकी संगति करनेवाला और बड़ा बलवान होता है ॥ ६ ॥ • अय सममभावस्थितराइफलम् । जायाविरोधं खलु वा प्रणाशं प्रचण्डरूपामथ कोपयुक्ताम् । विवादशीलामथ रोगयुक्तां प्राप्नोति जन्तुर्मदने तमे च ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें राहु धैठा हो तो वह मनुष्य सीसे विरोध करनेवाला अथवा स्त्रीया नाग परनेवाला होता है और उसे प्रचण्डरूपा क्रोधसहित, झगड़ा करनेवाली एवं रोगिणी स्त्री मिलती है ॥ ७ ॥ अयाटमभावस्थितराइफलम् । अनिएनाशं खलु गुह्मपीडां प्रमेहरोग वृपणस्य वृद्धिम् । प्रामोति जन्तुविकलारिलाभ सिंहीसुते वा खलु मृत्युगेहे ॥८॥ ए . भाषांटीकासहित । (११३) जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमंभावमें राहु बैठा हो तो वह मनुष्य अनिष्टना- शको प्राप्त निश्चय करके लिंग गुदा आदि गुप्त स्थानोंमें पीडाको प्राप्त, ममेहरोग- वाला अंडवृद्धिसहित और विकलताको प्राप्त होता है।॥ ८॥ अय नवमभावस्थितराहुफलम् । धर्मार्थनाशः किल धर्मगे तमे सुखाल्पता वै भ्रमणं नरस्य । दरिद्रता बन्धुसुखाल्पता च भवेच लोके किल देहपीडा ॥९॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें नवमभावमें राहु बैठा हो तो वह मनुष्य धर्म अर्यके नाशको प्राप्त, अल्प सुखवाला, भ्रमण करनेवाला, दरिद्री और थोड़ा- भाइयोंके' सुखको पाता है ॥९॥ अय दशमभावस्थितराहुफलम् । पितुर्नो सुखं कर्मगो यस्य राहुः स्वयं दुर्भगः शत्रुनाशं करोति । रुजो वाहने वातपीडां च जंतोर्यदा सौख्यगोमीनगःकष्टभाजम्१० जिस मनुष्यके जन्मकालमें दशमभावमें राहु बैठा हो तो उसे पितांका सुख नहीं प्राप्त होता आप भी दुष्ट भाग्यवाला, वैरियोंका नाश करनेवाला, वाहनोंको रोगदाता, वातकी पीड़ा सहित होता है और जो वृप वा मीनराशिवर्ती राहु हो तो सौख्य और कष्टका भागी होता है ॥ १०॥ अथैकादशभावस्थितराहुफलम् । लाभे गते यदि तमे संकलार्थलाभं सौख्याधिकं नृपगणाद्वि- विधं च मानम् ॥ वस्त्रादिकांचनचतुष्पदसौख्यभावं प्राप्नोति सौख्यविजयौ च मनोरथं च ॥ ११॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्यारहें भावमें राह बैठा हो वह मनुष्य सब प्रकारसे धनको लाभ करनेवाला, अधिक सौख्यको प्राप्त, राजाओंके समूहकरके अनेक मंकारके मानसहित, वस्त्रादिक सुवर्ण चौपायोंके सौल्यका भागी, सौख्य, विजय और मनोरथको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ अय व्ययभावस्थितराहुफलम् । नेत्रे च रोगं किल पादधातं प्रपंचभाव किल वत्सलत्वम् । दुष्टे रतिं मध्यमसेवनं च करोति जातं व्ययगे तमे वा ॥१२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें व्यय भावमें राहु बैठा हो वह मनुष्य नेत्रोंका रोगी, में घाव, प्रपंच करनेवाला, प्रीतियुक्त, दुष्ट जनामः रति जिसकी और मध्यम पुरुषोंकी सेवा करता है ॥ १२ ॥ .

। (११४) जातकाभरण ।। अथ तनुभावस्थितकेतुफलम् । यदा लग्नगश्चेच्छिखी सूत्रकर्ता सरोगादिभोगो भयव्यग्रता च । कलबादिचिंता महोद्वगता च शरीरे प्रबाधा व्यथा मारुतस्य।।।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें केतु बैठा हो वह मनुष्य स्त्रकर्ता होता है, रोगादिकों करके सहित भयसे व्यग्रचित्त, स्त्रियोंकी-चिन्ता उद्देगसहित और बात विकारयुक्त शरीर होता है ॥ १ ॥ अय धनभावस्थितकेतुफलम् । धने चेच्छिखी धान्यनाशो धनं च कुटुंवाद्विरोधो नृपाइन्यचिंता। मुखे रोगतासंततं स्यात्तथाच यदा स्वे गृहे सौम्यगेहेऽतिसौख्यम् २ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनभावमें राहु बैठा हो वह मनुष्य धन धान्यका नाश करनेवाला, कुटुम्बसे विरोध करनेवाला, राजासे धनकी चिन्ता करनेवाला, मुखमें रोग हमेशा होवे और जो केतु अपनी राशिमें वा शुभ ग्रहकी राशिमें वा धनभावमें बैठा हो तो अत्यन्त सौख्यको पाता है ॥२॥ अथ तृतीयभावस्थितकेतुफलम् । शिखी विक्रमे शत्रुनाशं च वादं धनं भोगमैश्वर्यजोऽधिकं च । भवेइन्धुनाशः सदा बाहुपीडासुखं स्वोच्चगेहे भवोद्वेगता च३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तृतीय भावमें फेतु बैठा हो वह मनुष्य शओंका नाश करनेवाला, शत्रुओंसे झगड़ा करनेवाला, धनभोग ऐश्वर्यके तेजको अधिक माप्त, भ्राताओंका नाश करनेवाला, हमेशा बाहोंमें पीड़ा करनेवाला होता है और अपने उच्चमें पेतु बैठा हो तो मुखको करता वा उद्वेग देता है ।। ३ ।। अथ चतुर्थभावस्थितकेनुफलम् । चतुर्थे च मातुः सुखं नो कदाचित्सुहद्धर्गतः पितृतो नाशमेति । 'शिखी बंधुहीनः सुखं स्वोच्चगेहे चिरं नैति सर्वेः सदाव्यग्रताच जिस मनुष्यके जन्मकालमें चतुर्थ भावमें केतु बैठा हो वह मनुष्य माताका मुख फभी नहीं पाता, मित्रवर्ग और पितामे नागको प्राप्त, भ्राताहीन होता है और उच्चराशिमें फेतु बैठा हो तो वह पूर्वोक्त मव प्रकारके सौख्योंको प्राप्त, थोड़ा मुखी, • हमेशा व्यग्रचित्त होता है ॥ ४ ॥ अय पंचमभावस्थितनुफलम् । यदा पंचमे यस्य केतुश्च जातःस्वयं स्वोदरे घातपातादिकष्टम् । स बंधुप्रियः संततिः स्वल्पपुत्राः सदा स्वं भवेदीर्ययुक्तो नरश्च ५ । भाषाटीकासहित । (११५) जिस मनुष्यके पंचमभावमें केतु बैठा हो वह मनुष्य अपने उदरमें क्षत आर गिरनेसे कटको प्राप्त और भाइयोंसे प्यार करनेवाला थोड़े पुत्रवाला और हमेशा बलसाहित होता है ॥५॥ अथ रिपुभावस्थितकेतुफलम् । 'शिखी यस्य पष्टे स्थित वैरिनाशो भवेन्मातृपक्षाच्च तन्मानभंगः । चतुष्पत्सुखं द्रव्यलाभो नितांत न रोगोऽस्य देहे सदा व्याधिनाशः ॥ ६॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें छठे भावमें केतु बैठा हो वह मनुष्य शत्रुओंका नाश करनेवाला और मामाके पक्षसे मानभंगको प्राप्त, चौपायोंसे सुखी, हमेशा धनका लाभ करनेवाला, निरोगी और सदा देहव्याधिका नाश करता है ॥ ६॥ अय सप्तमभावस्थितकेतुफलम् । शिखी सप्तमे मार्गतश्चित्तवृत्तिं सदा वित्तनाशोऽथवा वारिभूतः । भवेत्कीटगे सर्वदा लाभकारी कलवादिपीडा व्ययो व्यग्रता च॥७॥ जिस मनुष्यके सातवें भावमें केतु बैठा हो तो वह मनुष्य मार्गकी चिन्तामें चित्तको वृत्ति रखनेवाला, हमेशा धनका नाश शत्रुओंकरके होता है और वृश्चिक- राशिवर्ती केतु हो तो हमेशा लाभ करनेवाला, कलत्रादिकोंको पीड़ा, व्यय और चित्तको व्यग्रता होती है ।। ७ ।। अथाष्टमभावस्थितकेतुफलम् । गुदे पीडनं वाहनेव्यलाभो यदा कीटगे कन्यके युग्मगे वा । भवेच्छिद्रगे राहुछाया यदा स्यादजे गोलिगे जायते चातिलामः८ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टमभावमें पेतु बैठा हो उस मनुष्यफी गुदामें पीड़ा होती है और जो केतु कर्फ, कन्या, मिथुनराशिका हो तो वाहन और धनका लाभ करता है और जो वृश्चिक, मेष, वृप, राशिवर्ती हो तो अत्यन्त लाभ कराता है।॥ ८॥ अथ नवमभावस्थितकेतुफलम् । यदा धर्मगः केतवः क्लेशनाशः सुतार्थी भवेन्म्लेच्छतो भाग्यवृद्धिः। सहेत व्यथां वाहुरोग विधत्ते तपोदानतो हास्यवृद्धिं करोति ॥९॥ जिस मनष्यके जन्मकालमें नयमभाव केतु वेश हो वह मनुष्य अंगका

जातकाभरण।
।
नाश करनेवाला, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला, म्लेच्छोसे जिसकी भाग्यवृद्धि होती
है और म्लेच्छोंसे पीड़ा भी होती है और बाहोंमें रोगवाला, तप और दानसे
हास्य वृद्धिको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
अथ दशमभावस्थितकेतुफलम् ।
पितुनों सुखं कर्मगो यस्य केतुः स्वयं दुर्भगः शत्रुनाशं करोति ।
रुजो वाहने वातपीडांचजन्तोर्यदाकन्यकास्थः सुखीकष्टभाक्च १०
जिस मनुष्यके जन्मकालमें दशमभावमें केतु बैठा हो तो उस मनुष्यको पिताका
सौख्य नहीं होता, किन्तु दुष्टभाग्यवाला, वरियोंका नाश करनेवाला, रोगयुक्त,
वाहनोंकी पीडा प्राप्त, वातरोग सहित होता है और जो वही केतु कन्याराशिवर्ती
हो तो सुख और दुश्व दोनोंका भागी होता है ।॥ १० ॥
अथैकादशभावस्थितकेतुफलम् ।
सुभाषी सुविद्याधिको दर्शनीयः सुभोगः सुतेजाः सुवस्त्रो-
ऽपि यस्य । गुदै पीडयते सन्ततेर्दुभंगत्वं शिखी लाभगः
सर्वकालं करोति ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एकादशभावमें केतु बैठा हो तो वह मनुष्य श्रेष्ठ
वाणी बोलनेवाला, श्रेष्ठ विद्यावाला, अधिक दर्शनीय स्वरूपवाला, श्रेष्ठ भोगों-
करके युक्त श्रेष्ठ तेजवाला, सुन्दर वस्त्रोंसहित और गुदामें रोगवाला तथा दुष्ट-
पुत्रोंवाला होता है ॥ ११॥
अथ व्ययभावस्थितकेतुफलम् ।
शिखी रिम्फगः पादनेत्रेषु पीडा स्वयं राजतुल्यो व्ययं वै करोति ।
रिपोर्नाशनं मानसे नैव शर्मरुजा पीडयते वस्तिगुह्यं सरोगम् १२॥ ।
इति श्रीदेवनइंडिराजविरचिते तन्वादिद्वादशभावस्थित-
ग्रहभावफलाऽध्यायः ।। ३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें केतु बारहें बैठा हो तो वह मनुष्य पैर और नेत्रोंमें
पीड़ावाला, राजतुल्य वैभवको खर्च करनेवाला, शहओंका नाश करनेवाला, मनमें
दुःखी, एवं वस्ति और गुदाके रोग करके पीडित होता है ॥ १२ ॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मजज्योतिषिक-पंडितश्यामलाल
कृतायां श्यामसुन्दरीमापाटीकायां तन्वादिमावस्थितमहमावफलाप्यायः ॥ ३ ॥

श्रीगोवर्द्धनधारिणे नमः।
अफ दृष्टिशीलाध्यायमारंभः
DAI
अथ ग्रहाणां दृष्टिमाह।
दृष्टिदिक १० चितये ३ गृहे नव ९ शरे ५वेदा ४ एके ८ काम
७ पश्यंत्यविधुज्ञदैत्यगुरवः पादाभिवृद्धया क्रमान
मंदेज्यक्षोणिभूनां चरणद्विचरणा वह्निपादं तथैव ।
पूर्णाः पश्यति भावं मुनिवरभणितिः सर्वतन्त्रेषु धीराः ॥ १॥
अब ग्रहोंकी दृष्टि कहते हैं-सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र क्रमसे चरण वृद्धिद्वारा
इन स्थानोंको देखते हैं अर्थात् ३ । १० एक चरण ९.५ दो चरण ४ 1 ८ तीन
चरण ७ पूर्ण चारों चरणसे देखते हैं। इसी तरह शनैश्वर, मंगल और वृहस्पति
एक चरण, दो चरण, तीन चरण, चारों चरण देखते हैं ऐसा सब ग्रन्योम धीर
मुनीश्वर कहते हैं । अर्थात् शनैश्चर, १० । ३ । पूर्ण ९.५ एक चरण ४१९
दो चरण ७ तीन चरण । वृहस्पति ९ १५ पूर्ण ११८ एक चरण [७ । दो चरण
१० ॥ ३ तीन चरण । मंगल ४१ ८ पूर्ण ७ एक चरण १० । ३ दो चरण ९५
तीन चरणसे देखता है ॥ १॥
अय ग्रहाणां दृष्टिचक्रम्।
राशि
१
३
४
५
६
७
८
९
१२
०
.
१
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३
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२
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.
३
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.
.
४ |
अय मेपादिगृहे स्वौ ग्रहदृष्टिफलमाह,
तर भामगृहे रवी चन्द्रदृष्टिफलम।
दानधर्मबहुभृत्यसंयुतः कोमलामलतनुहप्रियः ।
आवनेयभवने विरोचने शीतदीधितिनिरीक्षिते सति ॥२॥

(११८)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपवृश्चिक राशिमें स्थित सूर्यको चंद्रमा देखता
हो तो वह मनुष्य दान और धर्म "सहित, 'बहुंत नौकरोंवाला, कोमल और निर्मल
देहवाला और अपना घर उसको बड़ा प्यारा होता है ।। २ ।।
अथ भीमगृह रखी भौमदृष्टिफलम् ।
क्रूरो नरः संगरकर्मधीरश्चारक्तनेजांघिरलं बलीयान् ।
भवेदवश्यं कुजगेहसंस्थे दिवामणौ क्षोणिसुतेन दृष्टे ॥ ३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमं सूर्य मेप वृश्चिक राशिमें बैठा हो और उसको मंगल
देखता हो तो वह मनुष्य क्रूर, संग्राममें धीर और उसके आँखें पैर लाल वर्ण और
पूर्ण बलवान होता है ॥ ३॥
अय भौमगृहे खौ बुधदृष्टिफलम् ।
सुखेन सत्त्वेन धनेन हीनः प्रेष्यः प्रवासी मलिनः सदैव ।
भवेदवश्यं परवान्मनुष्यः सहस्ररश्मौ कुजभे ज्ञदृष्टे ॥ ४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य मेप वृश्चिक राशिमें बैठा हो और उसको
बुध देखता हो तो वह मनुष्य सुख और पराक्रम तथा धनकरके हीन, दूतोंका
काम करनेवाला, हमेशा परदेशमें वास करनेवाला, मलिन और परायेके वशमें
रहनेवाला होता है ॥ ४ ॥
अथ भीमगृहे खी गुरुदृष्टिफलम् ।
दाता दयालुबहुलार्थयुक्तो नृपालमन्त्री कुलधुर्यवर्यः ।
स्यान्मानवो भूतनयालयस्थे पत्यौ नलिन्या:किल जीवदृष्टे ५
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य मेप वृश्चिक राशिमें बैठा हो और उससे
बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य राजाका मन्त्री, दाता, दयावान्, बहुत धन-
वाला और अपने कुलमें श्रेष्ठ अग्रणी होता है ॥ ५॥
अथ भामगृहे रवी भृगुदृष्टिफलम् ।
हीनाङ्गनामीतिरतीव दीनो धनेन हीनो मनुजः कुमित्रः ।
त्वग्दोपयुक्तः क्षितिपुत्रगेहे मित्रेऽधिसंस्थे भृगुपुत्रदृष्टे ॥६॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें सूर्य मेप वृश्चिकराशिमें वैग हो और उसको शुक्र
देखत्ता हो तो वह मनुष्य हीनवर्णकी खीफे साथ प्रीति करनेवाला, अत्यंत दीन,
दुष्टमित्रावाला और उसकी त्वचा विकार होता है ॥६॥

. भापाटीकासहित। अयं भीमगृहे खौ'शनिदृष्टिफलम। उत्साहहीनों मलिनोऽतिदीनो दुःखान्वितो वै विमतिर्नरः स्यात् । काते नलिन्याः क्षितिजालयस्थे प्रसूतिकाले रविजेन दृष्टे ॥७॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सूर्य मेपवृश्चिक राशि बैठा हो और उसको शनि देखता हो तो वह मनुष्य उत्साहरहित, मलीन, अत्यन्त दीन, दुःखसहित और बुद्धिहीन होता है ॥ ७॥ अय शुरुगृहे खौ चन्द्रदृष्टिफलम् । वराङ्गनाप्रीतिकरो नितांतं स्याद्भरिभार्यः सलिलोपजीवी । दिनाधिराने भृगुजालयस्थे कलानिधिप्रेक्षणतां प्रयाते॥८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य वृष वा तुला राशिमें बैठा हो और उसको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य श्रेष्ठस्त्रियोंसे आत प्रीति करनेवाला, बहुत खियों- वाला और जलके व्यापारसे आजीविका करनेवाला होता है ॥ ८॥ अथ शुक्रगृहे वो भीमदृष्टिफलम् । संग्रामधीरोऽतितरां महौजाः सुसाहसप्राप्तधनोरुकीर्तिः। क्षीणो नरः स्याभृगुमंदिरस्थे सहस्ररश्मी कुसुतेन दृष्टे ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य वृष वा तुलाराशिमें बैठा हो और उसको मंगल दीखता हो तो वह मनुष्य संग्राममें धैर्यवाला, अत्यन्त तेजवाला श्रेष्ठ साहस करके धनको प्राप्त करनेवाला और यशस्वी होता है ।। ९ ।। अथ शुक्रगृहे खौ बुधदृष्टिफलम् । संगीतसत्काव्यकलाकलापे लेखक्रियायां कुशलो नरः स्यात् । प्रसन्नमूर्तिभृगुवेश्मयाते प्रद्योतने सोमसुतेन दृष्टे ॥ १० ॥ जिस मनुष्य जन्मपालमर्यप पालाशमा हो और अपो उपा देखता हो तो वह मनुष्य संगीत विद्या और सत्काव्यकी कलाओंके समूहको जाननेवाला और लेखक्रियामें कुशल, प्रसन्नमृति होता है।॥ १० ॥ अय शुक्ररहे खो गुरुटिफलम् । वंशानुमान नृपतिप्रधानः सद्रत्नभूपाद्रविणान्वितो वा । भीरुर्नरः शुक्रग्रहं प्रयाते हटे रवी देवपुरोहितेन ॥११॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सूर्य वृप वा तुलाराशिम बंग हो और उसने बृहस्पति देवता हो वह मनुष्य अपने वंशके समान राजाका प्रधान मंत्री श्रेष्ठ ग्ल और भूषण धन सहित, एवं डरपोक होता है॥११॥ .

(१२०)
जातकाभरण।
अथ शुक्रगृहे खौ शुक्रदृष्टिफलम् ।
सुलोचनः कांतवपुः प्रधानो मित्रैरमित्रैः सहितः सचितः।
भवेन्नरो दैत्यगुरोहेऽर्के संवीक्षिते दैत्यपुरोहितेन ॥ १२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको शुक्र
देखता तो वह मनुष्य सुन्दरनेत्रोंवाला, शोभायमान देह व प्रधान होता है और
शत्रु मित्रोंकरके सहित, तथा चिन्तायुक्त होता है ॥ १२ ॥
अथ शुक्रगृहे खी शनिदृष्टिफलम् ।
दीनोऽर्थहीनोऽलसतां प्रपन्नो भार्यामनोवृत्तिविभिन्नवृत्तः ।
असाधुवृत्तामययुङ्नरः स्याच्छुक्रालयेऽऽकसुतेन दृष्टे ॥१३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको शन-
श्चर देखता हो तो वह मनुष्य दीन, धनहीन, आलस्यसाहित और स्त्रीके साथ भिन्न
मनवाला, दुष्ट आचरण करनेवाला और रोगयुक्त होता है ॥ १३ ॥
अथ सौम्यगृहे रखौ चंद्रदृष्टिफलम् ।
मित्रैरमित्रः परिपीडितश्च विदेशयातोऽपि धनेन हीनः ।
निरंतरोद्वेगकरो नरः स्यात्सौम्यालये हरिणांकदृष्टे ॥१४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मिथुन वा कन्या राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको
चंद्रमा देखता हो तो वह मनुष्य मित्र और शत्रुओं फरके परिपीडित, परदेश जाने-
पर भी धनहीन, एवं हमेशा उदास रहनेवाला होता है ॥ १४ ॥
अथ सौम्यगृहे रवी भौमदृष्टिफलम् ।
रिपुभयकलहाथैः संयुक्तोऽत्यंतदीनो
रणजयविधिहीनोऽत्यंतसंजातलजः।
भवति ननु मनुष्यः सालसश्चापि इंसे
बुधभवननिवासे लोहिताङ्गेन दृष्टे ॥ १५॥
जिस मनुष्यके जन्मफालमें मिथुन वा फन्याराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको
मंगल देखता हो तो वह मनुष्य शत्रुओं परफे भयभीत,फलहादिकरके युक्त, अत्यन्त
दीन, संग्राममें हारनेवाला, अत्यन्त लज्जाको प्राप्त और आलसी होता है ॥ १५ ॥
अय सौम्यगृहे रवी बुधदृष्टिफलम् ।
भूपप्रसादोन्नतिमात्मजानां सहति नो शटजनाप्तमित्राः ।
प्रसूतिकाले नलिनीवनेश बुधर्मसंस्थे च बुधेन दृष्टे ॥ १६ ॥

भाषाटीकासहित । जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन वा कन्याराशिगत सूर्य बुधकरके दृष्ट हो तो वह मनुष्य राजाकी कृपासे पुत्रोंके ऐश्वर्यसे उसके मित्र और शत्रु हमेशा संतापको प्राप्त होते हैं ।। १६ ॥ अय सौम्यगृहे खौ गुरुदृष्टिफलम् । सुगुप्तमन्त्रोऽतितरां स्वतन्त्रः कलत्रपुत्रादिजने सगर्वः । भवेन्नरः शीतकरात्मजः दिवाकरे देवगुरुप्रष्टे ॥ १७ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन वा कन्याराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य छिपे हुए मन्त्रवाला, अत्यन्त स्वतन्त्र और स्त्री पुत्रादिकोंके होनेसे गर्ववाला होता है ।। १७ ॥ अथ सौम्यगृहे भृगुदृष्टिफलम् । विदेशवासी चपलो विलासी विपानिशस्त्रांकितमूर्तिवर्ती । पृथ्वीपतेत्यिकरो नरः स्यादक बुधवॆ भृगुपुत्रदृष्टे ॥ १८ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन वा क्न्धाराशिमें सूर्य वठा हो और उसको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य परदेशका वासकरनेवाला, चपल, विलास करनेवाला और उसका देह विष, अग्नि, शस्त्रकरके अंकित और राजाका दूत होता है ॥१८॥ अथ सौम्यगृहे खौ शनिदृष्टिफलम् । धूर्तोऽतिभृत्यो गतचित्तबुद्धिनिजैः सदोद्विग्रमना मनुष्यः । दिवाकरे शीतकरात्मजः निरीक्षित भास्करिणा.प्रसूती॥१९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन वा कन्याराशि सूर्य वैठा हो और उसको शनैश्वर देखता हो तो वह मनुष्य धूर्त, बहुत नौकरोंवाला, बुद्धिहीन और उद्विग्न चित्त होता है ॥ १९॥ अथ चन्द्रग्रहे खौ चन्द्रदृष्टिफलम् । पण्येश्च पानीयभवैर्महार्थी पृथ्वीपतिर्वा सचिवश्च रौदः। भवेन्नरो जन्मनि चण्डरश्मी काटकस्थे शिशिरांशुष्टे २०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य जलसंबंधी व्यापार करके बडा धनगन, राजा वा रानमन्त्री तथा बडा उग्र (प्रचण्ड) होता है ॥ २० ॥ अय चन्द्रगृहे रखी भौमष्टिफलम् । स्वबन्धुवगै गतचित्तबुद्धिः शोफादिरोगैश्च भगंदरैर्वा । पीडा नराणां हि कुलीरसंस्थे दिवामणौ क्षोणिसुतेन दृष्टे२१ (१२२) जोतकाभरण। । जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्फराशिमें सूर्य-चठा हो और उसको मंगल देखना 'हो तो वह मनुष्य अपने बंधुवगोंसे चित्तको दूर करनेवाला और सूजनके रोग का भगन्दर रोग करके पीडित होता है ॥ २१॥ अथ चन्द्रगृहे स्वौ बुधदृष्टिफलम् । विधायशोमानविराजमानो भूपानुकंपाप्तमनोऽभिलापः। निरस्तशश्च बुधेन दृष्टे काटकस्थे धुमणौ नरः स्यात् २२ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें स्थित सूर्यको वुध देखता हो तो वह मनुष्य विद्या और यश तथा मानकरके विराजमान, राजाको कृपासे मनकी अभि- लापाको प्राप्त और शत्रुओंकरके रहित होता है ॥ २२ ॥ अथ चन्द्रगृहे रवी गुरुदृष्टिफलम् । कुलाधिकश्चामलकीर्तिशाली भूपालसम्प्राप्तमहापदार्थः । भवेन्नरःशीतकरक्षपाते दिवामणी वाक्पतिवीक्ष्यमाणे ॥२३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें स्थित सूर्यको वृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य अपने कुलमें श्रेष्ठ, निर्मलयशवाला एवं राजाकरके बड़े पदको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ अथ चन्द्रगृहे रवौ भृगुदृष्टिफलम् । स्वीसंश्रयात्रधनोपलब्धिः परस्य कृत्ये हृदये विपादः। निशाकरागारकृताधिकारे दिवाकर शुक्रनिरीक्ष्यमाणे ॥२४॥ -जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको शुक्र देखना हो तो वह मनुष्य स्त्रीके आश्रयसे वस्त्र और धनको प्राप्त करनेवाला और परायचे काममें हृदयसे विपाद करनेवाला होता है ।। २४ ॥ अथ चन्द्रगृहे वो शनिदृष्टिफलम् । कफानिलातः पिशुनोऽन्यकार्य स्यादतरायश्चपलस्वभावः। केशी नरः शीतकरःसंस्थे दिवामणी मंदनिरीक्ष्यमाणे ॥२५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिम सूर्य बैठा हो और उसको प्रभार देखता हो तो वह मनुष्य कफ वातफरके दुःसी और पराये कार्य विन डालनेवाला चपल स्वभाववाला और देशी होता है ।। २५॥ अय निजागारगते रखी चन्द्रदृष्टिफलम् । धूर्ती गभीरः क्षितिपालमान्योधनोपलव्धार्थयुतः प्रसिद्धः। 'मित्र निजक्षेत्रगते प्रसूती नक्षत्रनाथेन निरीक्ष्यमाणे ॥२६॥ .

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भाषाटीकासहित
जिस मनुष्यके जन्मकालम .सूर्य-सिंहराशिमें बैठा हो और उसको चन्द्रमा
देखता हो तो वह मनुष्य धूर्त और गम्भीर राजासे: मानको पानेवाला, धनकी
प्राप्तिसे शक्तिशाली, एवं प्रसिद्ध होता है ।। २६ ।।
अथ निजागारगते रखो भीमदृष्टिफलम् ।
नानाङ्गनाप्रीतिरतीव धूर्तः कफात्मकः क्रूरतरश्च शूरः।
महोद्यमः स्यान्मनुजःप्रधानः सिंहस्थितेऽकै कुसुतेन दृष्टे ॥२७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य सिंहराशिमें बैठा हो और उसको मंगल
देखता हो तो वह मनुष्य अनेक स्त्रियोंमें मीति करनेवाला, अत्यन्त धूर्त, कफ
प्रकृतिवाला और अत्यन्त क्रूर तथा शूरवीर, उद्यमी होता है ॥ २७ ॥
अथ निजागारगते रखौ बुधदृष्टिफलम् ।
धूतॊ नृपानुव्रजनः सुसत्त्वो विद्रपियो लेखनतत्परश्च ।
भवेन्नरः केसरिणि प्रयाते दिवामणौ सौम्य निरीक्ष्यमाणे॥२८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमे सूर्य सिंहराशिमें बैठा हो और उसको बुध देखता
हो तो वह मनुष्य धूर्त, राजाकी आज्ञामें चलनेवाला, बलवान, पंडितोंमें प्रीति
करनेवाला और लेखक होता है ॥ २८ ॥
अथ निजागारगते रवौं गुरुदृष्टिफलम् ।
देवालयारामतडागवापीनिर्माणकर्ता स्वजने प्रियश्च ।
भवेन्नरो देवपुरोहितेन निरीक्षितकै मृगराजसंस्थे ॥ २९॥
जिस । मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य सिंहराशिम बैठा हो और उसको बृहस्पति
देखता हो तो वह मनुष्य देवताओंके स्थान, बगीचों और तालाब बावड़ीका
बनानेवाला तया अपने जनोंसे प्रीति करनेवाला होता है ।। २९ ॥
अय निजागारगत रवी भूगुष्टिफलम् ।
त्वग्दोषरोपापयशोऽभिभूतो गतोत्सवः स्वीयजनोज्झितश्च ।
स्यान्मानवः सत्यदयाविहीनः पञ्चाननेऽ भृगुजेन दृष्टे ॥३०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिहराशिम सूर्य बैठा हो और उसको शुक देखता.
हो तो वह मनुष्य त्वचाके दोपवाला, क्रोधसहित, अपयशका भागी उत्सव रहित,
अपने जनों परके त्यागा हुआ, सत्य और दयारहित होता है ॥ ३० ॥
अय निजागारगते रखौ शनिदृष्टिफलम।
शठो नरः कार्यविघातकर्ता संतापयेदात्मजनांश्च नूनम् ।
नरो मृगेंद्रोपगते दिनेशे दिनेशपुत्रण निरीक्ष्यमाणे ॥३१॥

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उसको बुध देखता हो तो वह मनुष्य धातुक्रिया और काव्य, कला और फयाओ-
का जाननेवाला, श्रेष्ठ वाक्य और श्रेष्ठ मंत्रादिकी विधिर्म चतुर तथा सत्पुरपाई
दृष्ट हो तो वह मनुष्य राजाफा मन्त्री, अपने कुलमें गजा, फलाकी विधि जाननान
(१२४)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य सिंहराशिमें बैठा हो और उसको शनिश्चर
देखता हो तो वह मनुष्य शठ, कामका बिगाडनेवाला, अपने कुटुम्वाको संताप
देनेवाला होता है ॥ ३१॥
अथ गुरुगृहे रवी चन्द्रदृष्टिफलम् ।
कामकांतिसुतसौख्यसमेतो वाग्विलासकुशलः कुलशाली ।
स्यानरः सुरपुरोहितभस्थे भास्कर हिमकरण हि दृष्टे ॥३२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य धन मीन राशिमें बैठा हो और उसको
चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य शोभायमान देहवाला, पुत्रसौख्यसहित, वाणीके
विलासमें कुशल एवं कुटुम्बवाला होता है ॥ ३२ ॥
अथ गुरुगृहे खौ भौमदृष्टिफलम् ।
संग्रामसंप्राप्तयशोविशेषो वक्ता विमुक्तानुजनानुसंगः ।
स्थिराश्रमो जीवगृहस्थितेऽके भौमेन दृष्टे पुरुपः प्रचण्डः ॥३३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको मंगल
देखता हो तो वह मनुष्य संग्राममें विशेष यशको पानवाला तया वक्ता होता है
और अपने मनुष्यके संगसे रहित स्थिर आजीविका करनेवाला और प्रचण्ड
होता है ।। ३३॥
अथ गुरुगृहे खौ बुधदृष्टिफलम् ।
धातुक्रियाकाव्यकलाकथाज्ञः सदाक्यमंत्रादिविधिप्रवीण।
सतां मतः स्यात्पुरुपो दिनेशसौम्येक्षिते जीवगृहोपयात॥३४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन और मीन राशिमें वृहस्पति बैठा हो और
पृजित होता है ॥ ३४॥
अय गुरुगृहे रवी गुरुष्टिफलम् ।
नृपालमन्त्री कुलभूमिपालः कलाविधिज्ञोधनधान्ययुक्तः ।
विद्वान्पुमान्भानुमतीज्यगेहे संदृष्टदेहेऽमरपूजितेन ॥ ३५ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिमें सूर्य बैठा हो और वृहस्पति पर
और धन धान्य सहित विद्वान् होता है ॥ ३५ ॥

1 भाषाटीकासहित। अथ गुरुगृहे खौ भृगुदृष्टिफलम् । सुगंधमाल्यांबरचारुयोपाभूपाविशेषानुभवाप्तसौख्यः। भवेन्नरो देवपुरोहितः प्रद्योतने दानववन्यदृष्टे ॥ ३६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन और मीन राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य सुगंधवाली माला और सुगंधित वस्त्र धारण करने- वाला, सुन्दर स्त्री और आभूषणोंका सौख्य भोगता है ।। ३६ ॥ अथ गुरुगृहे खौ शनिदृष्टिफलम् । परानभुङ्नीचनरैः प्रवृत्तश्चतुष्पदप्रीतिकरो नरः स्यात् । सूर्ये सुराचार्यगृहे प्रयाते निरीक्षिते भानुसुतेन सूतौ ॥ ३७॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें धन और मीनराशिमें सूर्य बैठा हो और उसको शनैश्वर देखता हो तो वह मनुष्य पराये अन्नको भोजन करनेवाला, नीचपुरुषामें प्रवृत्ति करनेवाला और चौपार्योंसे प्रीति करनेवाला होता है ।। ३७ ॥ अथ शनिगृहे वो चन्द्रदृष्टिफलम् । नारीप्रसङ्गेन गतार्थसौख्यो मायापटुश्चंचलचित्तवृत्तिः। भवेन्मनुष्यः शनिवेश्मयाते सहस्ररश्मौ हिमरश्मिहरे ॥३८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर और कुंभ राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य स्त्रीके संगसे धन और सौख्यका नाश करने गाला, माया करनेमें चतुर और चञ्चलचित्तवाला होता है ॥ ३८॥ अथ शनिगृहे खौ भौमदृष्टिफलम् । परफलहहतार्थो व्याधिवैरप्रतप्तस्त्वतिविकलशरीरोऽत्यंतचिं- तासमेतः । भवति ननु मनुष्यः संभवे तिग्मरश्मौ गतवति सुतगेहे दृष्टदेहे कुजेन ॥ ३९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य शत्रुओंसे झगड़ा करके धनको नाश करनेवाला और व्याधि और करके दुःखी, अत्यन्त व्याकुल देहवाला और बहुत चिन्तावाला होता है ॥ ३९॥ अथ शनिगृहे खौ बुधदृष्टिफलम् । कीवस्वभावः परचित्तहारी साधूज्झितः शूरतरो नरः स्यात् । दिवाकरे शीतकरात्मजेन दृष्टे प्रसूतौ शनिमंदिरस्थे ।। ४० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर व कुंभ राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको : -

*
(१२६)
जातकाभरणा
बुध देखता हो तो वह मनुष्य हिजडोंफेसा स्वभाववाला, पराये चित्तको हरण कर-
नेवाला, साधुओं करके रहित और शूरवीर होता है ॥ १० ॥
अथ शनिगृहे रवी गुरुदृष्टिफलम् । । ।
सत्कर्मकर्ता मतिमान्वहूनां समाश्रयश्चारुयशां मनस्वी ।
. स्थान्मानवो भानुसुतालयस्थे भानौ च वाचस्पतिना प्रदृष्टे४१
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मकर अथवा कुम्भ राशिमें सूर्य बैठा हो और उसको
बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, बुद्धिमान, बहुत पुरुषोंका
पालनेवाला और श्रेष्ठ यशवाला, मनस्वी होता है ॥४१॥
अथ शनिगृहे रवी भूगुष्टिफलम् ।
शङ्खप्रवालामलरत्नवित्तं वराङ्गनाभ्योऽपि धनोपलब्धिम् ।
करोति भानुर्ननु मानवानां शन्यालयस्थो भृगुजेन दृष्टः।। ४२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर, कुम्भ राशिमें सूर्य वैठा हो और उसको शुक्र
देखता हो तो वह मनुष्य शंख, मूंगा, निर्मल रत्न धनसे संपन्न और सुन्दर स्त्रियों के
द्वारा धनकी प्राप्ति करनेवाला होता है ।। ४२ ॥
अथ शनिगृहे रवी शनिदृष्टिफलम् ।
प्रौढप्रतापाद्विजितारिपक्षः क्षोणीपतिप्रीतिमहाप्रतिष्ठः ।
प्रसन्नमूर्तिः प्रभवेन्मनुष्यः शन्यालये शनिना प्रदृष्टे ॥१३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभ राशिमें सूर्य वैठा हो और उसको शनै-
श्वर देखता हो तो वह मनुष्य बड़े प्रतापसे शत्रुओंका जीतनेवाला और राजाची
प्रीतिसे बड़ी प्रतिष्ठाको प्राप्त प्रसन्नमूर्ति होता है ॥ ४३ ॥
इति मेपादिगृहे वो फिलम् ।
अथ मेपादिगृहे चन्द्रप्रतिग्रहदृष्टिफलम् । तबादौ
मेपे शशाड्दे सूर्यदृष्टिफलम् ।
उपस्वभावोऽपि मृदुर्नतानां धीरो धराधीश्वरगौरवाढयः।
नरो भवेत्सङ्गरंभीरुरेव मेपे शशाले नलिनीशष्टे ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपरागिमें चन्द्रमा बैठा हो और उसको सूर्य देखना
हो तो वह मनुष्य उमस्वभाववाला, नम्र जनोंसे नम्र, धैर्यवान, राजा करके संमा
नित और संग्राममें डरपोक होता है ॥ १ ॥
अथ मेपगृहे चन्द्रे भौमदृष्टिफलम् ।
विपीग्निवातावमयं कदाचित्स्यान्मृत्रकृच्छं महादाश्रयश्च ।
• दंताभिपीडा निविडा जडांशी मेपस्थिते भूमिसुतेन दृष्टे ॥२॥

११२७) 4 भापाटीकासहित। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिमें चंद्रमा- बैठा हो और उसको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य विप, आग्नि, वात वा हथियारसे भयको पानेवाला, कभी कभी मूत्रकृच्छ्र रोगवाला, बड़े लोगोंसे आश्रय पानेवाला, दांत और नेत्रोंकी पीडा करके सहित होता है ॥२॥ अथ मेपराशिगते चन्द्रे.बुधदृष्टिफलम् । विलसदमलकीर्तिः सर्वविद्याप्रवीणो द्रविणगुणगणाढ्यः संमतः सज्जनानाम् । भवति ननु मनुष्यो मेपराशौशशांके: ... शशधरसुतहष्ट श्रेष्ठसंपत्प्रतिष्ठः॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मफालों मेंपराशिमें चंद्रमा. बैठा हो और उसको बुध देखता हो तो वह मनुष्य प्रकाशवान्, निर्मल यशको प्राप्त करनेवाला, : सर्व विद्याओं प्रवीण और धन तथा गुणोंके समूहकरके युक्त, सज्जनपुरुषोंकी सम्मति सहित और श्रेष्ठ संपत्ति करके प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥ अथ मेपराशिगते चन्द्रे गुरुदृष्टिफलम् । नृपप्रधानः पृतनापतिर्वा कुलानुभावादहुसंपदाढयः । भवेन्नरः कैरविणो वनेशे मेपस्थिते गीष्पतिना प्रदृष्टे ॥ ४॥ जिस. मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत चंद्रमाको बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य राजाका मंत्री अथवा फौजका स्वामी होता है और अपने कुलके समान बहुत संपदाओं करके युक्त होता है ॥ ४ ॥ अय मेपराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् । योपाविभूपाधनसूनुसौख्यभोक्ता सुवक्ता परिमुक्तरोपः । स्यात्पुरुषो मेपगतेऽमृतांशी निरीक्ष्यमाणे भृगुणा गुणज्ञः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत चंद्रमाको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य स्त्री, आभूषण, धन और पुत्रके सौख्यको भोगनेवाला, श्रेष्ट वक्ता, क्रोध- रहित और गुणोंका जाननेवाला होता है ॥ ५ ॥ अथ मेपराशिगते चंद्रे शनिदृष्टिफलम् । गदयुत हतचित्तसमुन्नति विगतवित्तमसत्यमसत्सुतम् । क्रियगतोऽकसुतेन निरीक्षितो हिमकरो नरं कुरुते खलम् ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत चंद्रमाको शनैश्वर देखता हो तो वह मनुष्य रोगसहित, चित्तकी उन्नति करके नष्ट, धनहीन, झंट वोटनेवाला एवं दुष्टप्रकृतिवाला और दुपुत्रोंवाला होता है ॥ ६ ॥ .

(१२८) जाताभरण। अय पराशिगते चन्द्रे रविदृष्टिफलम् । कृपिक्रियायां निरतोविधिज्ञः स्यान्मांत्रिको-वाहनधान्ययुक्तः। नरो नितांत चतुरः स्वकार्ये दृष्टे दिनेशेन वृपेशिशांके ।। ७ ।। जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृपराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो तो वह मनुष्य खेतीके काम करनेमें तत्पर और खेतीकी विधिको जाननेवाला, मंत्री एवं वाहन और धान्य करके युक्त होता है ॥ ७ ॥ अय वृषराशिगते भौमदृष्टिफलम् । कामातुरश्चित्तहरोङ्गनानां स्यात्साधुमित्रः सुतरां पवित्रः । प्रसन्नमूर्तिश्च नरो वृपस्थे शीतद्युतौ भूमिसुतेन दृष्टे ॥ ८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य कामातुर, स्त्रियोंके चित्तको हरनेवाला, सत्पुरुपोंका मित्र, अतिशय पवित्र और प्रसन्न मूर्ति होता है ॥ ८ ॥ अथ वृपराशिगते चन्द्रे बुधदृष्टिफलम् । प्राज्ञ विधिज्ञ समेतं इन्वितं भूतहिते रतं च । गुणाभिराम मनुज प्रकुर्याबृपे शशांकः शशिजेन दृष्टः ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत चंद्रमाको बुध देखता हो तो वह मनुष्य चतुर, विधियोंका जाननेवाला, कृपालु, हर्पयुक्त, जीवोंके हित करनेमें तत्पर गुणों करके सहित होता है ॥९॥ अथ वृपराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् । - ज़ायात्मजानन्दयुतं सुकीर्ति धर्मक्रियायां निरतं च पित्रोः। भक्तौ प्रसक्तं मनुजं प्रकुर्या वृपस्थितेन्दुर्गुरुणा प्रदृष्टः ॥१०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें घृपराशिगत चन्द्रमाको बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य स्त्री और पुत्रोंके आनंद सहित, श्रेष्ठ कीर्तिवाला, धर्म क्रिया तत्पर माता पितापी भक्ति, आसक्तचित्तवाला होता है ॥ १० ॥ अथ वृपराशिगते चन्द्रे भुगुदृष्टिफलम् । भूपणाम्वरगृहासनशय्यागंधमाल्यचतुरंत्रिसुखानि । आतनोति सततं मनुजानां चन्द्रमा वृपगतो भृगुदृष्टः ॥ ११॥ और . और भाषाटीकासहित। (१२९) जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य आभूपण वस्त्र गृह भोजन सुगंधिवाला और चौपायोंके सुखसहित होता है ॥ ११ ॥ अथ वृषराशिगते चन्दे शनिदृष्टिफलम् । कलानिधिः पूर्वदले वृपस्य शनीक्षितश्चनिधनं जनन्याः। करोति सत्यं मुनिभिर्यदुक्तं तथापराध खलु तातघातम् ॥ १२॥' जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिके पूर्वभागमें चन्द्रमा बैठा हो और उसको शनैश्चर देखता हो उस मनुष्यकी माता मृत्युको प्राप्त होती है और जो नृपराशिके पराईभागमें चन्द्रमा बैठा हो और उसको शनैश्चर देखता हो तो उसके पिताका नाश करता है यह मुनीश्वरोंने कहा है ॥ १२ ॥ अथ मिथुनराशिगते चन्द्र रविदृष्टिफलम् । प्राजं सुशीलं द्रविणेन हीनं क्लेशाभिभूतं सततं करोति । नरं च सर्वोत्सवदं प्रमूतौ द्वन्द्वे स्थितो भानुमता च दृष्टः॥१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो तो वह मनुष्य चतुर, श्रेष्ठ शीलबाला, धनहीन, निरन्तर क्लेशसहित और सम्पूर्ण उत्सवो- का प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ अथ मिथुनराशिगते चन्द्र भौमदृष्टिफलम् । उदारदारं चतुरं च शूरं प्राज्ञं च सुझं धनवाहनायैः । युक्तं प्रकुर्यान्मिथुनस्थितेन्दुनिरीक्षितो जन्मनि भूसुतेन॥ १४॥ जिस मनुष्यके जन्मकार में मिथुनराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो वह मनुष्य उदारचित्तवाला, चतुर, शूरवीर, बुद्धिमान, सुज्ञ और धनवाहनादिसे युक्त होता है ॥२४॥ अय मिथुनराशिगते चन्द्र बुधदृष्टिफलम् । धीरं सदाचारमुदारसारं नरं नरेन्द्राप्तधनं करोति । निशाधिनाथो मिथुनाधिसंस्थो निशीथिनीनाथसुतेन दृष्टः१५ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मिथुनराशिगत चन्द्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य धैर्यवान, हमेशा आचारसहित, उदार राजाफ्रके धनको मात करता है॥१५॥ अथ मिथुनराशिगते चन्द्र गुरुदृष्टिफलम् । विद्याविवेकान्वितमर्थवन्तं ख्यातं विनीतं सुतरां सुपुण्यम् । करोति मत्य मिथुनाघिसंस्थो निशीथिनीशो गुरुणा प्रहपः१६

(१३०)
जातकाभरण!
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिगत चन्द्रमाको बृहस्पति देखता हो वह
मनुष्य विद्या और निवेकसहित, धनवान, प्रसिद्ध, नम्रतासहित और निरन्तर
पुण्यवान होता है ॥१६॥
अय मिथुनराशिगते चन्द्रे भृगुदृष्टिफलम् ।
वस्त्रप्रसूनान्नवराङ्गनाभ्यः सदाहनेभ्यश्च विभूपणेभ्यः ।
करोति सौख्य हि सुधामयूखो द्वन्दस्थितो जन्मनि शुकदृष्टः१७
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मिथुनराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह
मनुष्य वस्त्र पुष्प अन्न श्रेष्ठ स्त्रीकरके सहित, श्रेष्ठ वाहन और आभूषणोंका सौख्य
लाभ करता है ॥ १७॥
अथ मिथुनराशिगते चन्द्रे शनिदृष्टिफलम् ।
धनांगनावाहननन्दनायैविश्लेपमायाति विहितत्वम् ।
नरो हि नीहारकरे नृयुग्मे निरीक्षिते भानुसुतेन सूतौ ॥ १८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिगत चन्द्रमाको शनैश्चर देखता हो वह
मनुष्य धन, स्त्री तथा वाहन पुत्रादि पदार्थोंसे हीन और निंदा करनेवाला
होता है ।। १८॥
अथ कर्कराशिगते चन्द्रे रविदृष्टिफलम् ।
निरर्थककेशकरं विकीपाश्रय दुर्गकृताधिकारम् ।
कुर्यात्कलावान्परिसूतिकाले कुलीरसंस्थो नलिनीशदृष्टः ॥१९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
निष्प्रयोजन नीचजातिके मनुष्योंसे क्लेश करनेवाला और राजाके आश्रयसे दिले.
पर आधिकार करनेवाला होता है ।। १९ ।।
अथ कर्कगते चन्द्रे भीमदृष्टिफलम् ।
दक्षं च शूरं जननीविरुद्ध क्षीणांगयष्टिं मनुजं करोति ।
कुलीरसंस्थः परिसूतिकाले दृष्टः कलावान्किल मंगलेना॥२०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्फराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो वह
मनुष्य चतुर, शूरवीर, माताके विरुद्ध और दुर्वलदेहवाला होता है ॥२०॥
अथ कर्कराशिगते चन्द्रे बुधदृष्टिफलम् ।
दारार्थपुत्रोन्नतिनीतिसौख्यं सेनापति वा सचिवं मनुष्यम् ।
कर्काघिसंस्थः कुरुते हिमांशुर्हिमांशुपुत्रेण निरीक्ष्यमाणः॥२१॥

भापारीकासहित।
(१३१)
निस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत चन्द्रमाको चुप देखता हो वह मनुष्य
स्वी धन पुत्रकी उन्नति, नीतिके सौख्यसहित, फौजका मालिक वा राजाका मंत्री
होता है ॥ २१॥
अथ कर्कराशिगते चन्द्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
नृपाधिकारं गुणिनं नयज्ञं सुखान्वितं चारुपराक्रमं च ।
करोति जातं यदि चक्रवर्ती पीयूपमूर्तिगुरुणेक्ष्यमाणः ॥ २२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत चन्द्रको वृहस्पति देखता हो वह मनुष्य
राजा करके अधिकारको प्राप्त, गुणवान, नीतिका जाननेवाला, सुख सहित और
श्रेष्ठ पराक्रमवाला, चक्रवर्ती राजा और शुद्धमूर्ति होता है ॥ २२ ॥
अय कर्कराशिगते चन्द्रे भृगुहाष्टिफलम ।
सदत्नचामीकररत्नभूपावराङ्गनासौख्ययुतं नितान्तम् ।
नर निजागारगतः करोति सुधाकरःशुक्रनिरीक्ष्यमाणः ॥ २३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्फराशिगत चंद्रमाको शुक देखता हो वह मनुष्य
श्रेष्ठ रल और सुवर्ण सहित और रत्लयुक्त भृपणोंका व श्रेष्ठ स्त्रीका निरंतर सौख्य
पाता है ॥ २३ ॥
अथ कर्कराशिगते चन्द्रे शानदृष्टिफलम् ।
सत्येन हीनं जननीविरुद्धं सदाटनं पापरतं गतार्थम् ।
करोति जातं निजगेहगामी चेद्यामिनीशोरविजेन हपः ॥२४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कगशिगत चंद्रमाको शनैश्वर देखता हो तो वह
मनुष्य सत्यरहित, माताका विरोधी, हमेशा भ्रमण करनेवाला, पापमें तत्पर और
धनहीन होता है ।। २४॥
अथ सिंहरागिगते चन्द्रे रविदृष्टिफलम् ।
गुणयुतं सततं नृपतिप्रिय नरपदं च विलम्बितसंततिम् ।
हरिगतो वितनोति निशाकरः खरकर प्रविलोकनसंयुतः॥२॥
जिम मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चंद्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
गुणोंसहित, निरंतर राजाका प्यारा, श्रेष्ठ अधिकारको प्राप्त और देरमे संतानको
प्राप्त होता है ॥ २५॥
अथ सिंहराशिगत चंद्रे भौमदृष्टिफलम् ।
नरपतेः सचिवो धनवाहनात्मजकलत्रसुखो हि भवेन्नरः।
हरिणलक्ष्मणिकेसरिणि स्थिते क्षितिसुतेन ननुपविलोकिते ॥२६॥

(१३२) जातफाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चंद्रमाको भौम देखता हो वह मनुष्य राजाका मंत्री तथा धन, वाहन, पुत्र, स्त्रीके सुखसहित होता है ॥ २६ ॥ अय सिंहराशिगते चंद्रे चुधदृष्टिफलम् । धनाङ्गनावाहननन्दनेभ्यः सुखप्रपूरं हि नरं करोति । द्विजाधिराजो मृगराजसंस्थो द्विजाधिराजात्मजसंप्रहरः॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चंद्रमाको दुध देखता हो वह मनुष्य धन, स्त्री तथा वाहन पुत्रादिकोंके सुखसे पूर्ण होता है ।॥ २७ ॥ अय सिंहराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् । बहुश्रुतं विस्मृतसाधुवृत्तं कुर्यानरं भूमिपतेः प्रधानम् । चन्द्रो मृगेन्द्रोपगतोऽमरेंद्रोपाध्यायदृष्टिः परिमृतिकाले ॥२८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चंद्रमाको गुरु देखता हो वह मनुष्य बहुश्रुत, माधुवृत्तको भूलनेवाला और राजाका मंत्री होता है ।। २८ ॥ अथ सिंहाराशिगते चन्द्रे भृगुदृष्टिफलम् । स्त्रीवैभवं वै गुणिनं गुणज्ञं प्राज्ञ विधिज्ञं कुरुते मनुष्यम् । पीयूपरश्मिर्जनने यदि स्यात्पञ्चाननस्थो भृगुसूनुदृष्टः॥२९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य स्त्रीपयुक्त वैभवसहित, गुणवान्, गुणोंका जाननेवाला, चतुर और विधियोंका जाननेवाला होता है ।। २१ ॥ अय सिंहराशिगते चंद्रे शानदृष्टिफलम् । कांतावियुक्तः कृपिकर्मदक्षो दुर्गाधिकारी हि नरोऽल्पकार्थः। सिंहोपयाते सति शीतभाना निरीक्षिते सूर्यसुतेन सूती ॥३०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत चंद्रमाको शनैश्वर देखता हो वह मनुष्य खो रहित, खेती करनेमें चतुर, राजाके किलेका स्वामी और थोडे धनवाल होता है॥ ३०॥ अय कन्याराशिगते चंद्रे रविष्टिफलम् । भूमीशकोशाधिकृतं सुवृत्तं भार्यावियुक्तं गुरुभक्तियुक्तम् । जातंचकन्याश्रितशीतरश्मिस्तनोतिजन्तु खररश्मिाष्टः॥३१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराभिमें चंद्रमा बैटा हो और उसको सूर्य देखता हो वह मनुष्य राजाके सजानेका मालिक, श्रेष्ठ वृत्तिवाला, खीरहित और गुरुकी भक्तिम तत्पर होता है ।। ३१ ॥

भापाटीकासहित ।
(१३३)
अथ कन्याराशिगते चंद्रे भीमदृष्टिफलम् ।
हिंसापरं शूरतरं सकोपं नृपाश्रितं लब्धजय रणादौ ।
कुमारिकासंश्रितशीतभानुभूसूनुदृष्टो मनुजं करोति ॥ ३२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें चंद्रमा बैठा हो उसको मङ्गल देखता
हो वह मनुष्य हिंसामें तत्पर, अति शूरवीर, क्रोधसहित, राजाका आश्रय करने-
बाला और संग्राम आदिमें जयको प्राप्त होता है ॥ ३२॥
अथ कन्याराशिगते चंद्रे बुधदृष्टिफलम् ।
ज्योतिर्विद्याकाव्यसंगीतविद्य प्राज्ञ युद्ध लब्धकीति विनीतम् ।
कुर्यान्नूनं मानव मानवतं कन्यास्थोऽज.दुजेन प्रदृष्टः॥३३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा बैठा हो उसको बुध देखता हो वह मनुष्य
ज्योतिपशास्त्र और काव्य तथा सङ्गीत विद्याओंका जाननेवाला, चतुर संग्राममें
यशको प्राप्त और नम्रतासहित होता है ॥ ३३ ॥
अथ कन्याराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
भूरिबंधुमवनीपतिप्रियं चारुवृत्तशुभकीर्तिसंयुतम् ।
मानवं हि कुरुतेऽङ्गनाश्रितश्चंद्रमाः सुरपुरोहितेक्षितः ॥ ३४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें चन्द्रमा बैठा हो उसको बृहस्पति
देखता हो वह मनुष्य बहुत भाइयोंवाला, राजाका प्यारा और श्रेष्ठ वृत्ति करके
सुन्दर यशवाला होता है ।। ३४ ॥
अथ कन्याराशिगते चंद्रे भृगुदृष्टिफलम् ।
विलासिनीकेलिविलासचित्तं कांताश्रितं भूपतिलब्धवित्तम् ।
कुर्यानरं शीतकरः कुमार्या स्थितः सित्तेन प्रविलोकितश्च॥३५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें चंद्रमा बैठा हो उसको शुक्र देवता
हो तो वह मनुष्य वेश्याके साथ विलास करने में चित्तवाला, खीका आश्रित और
राजाकरके धनको प्राप्त करता है ॥ ३५ ॥
अय कन्याराशिगते चंद्रे शनिदृष्टिफलम् ।
निष्किञ्चनं हीनमति नितांत स्त्रीसंश्रयादाप्तधनं जनन्या ।
हीन प्रकुर्यात्खलु कन्यकायां गतो मृगांकोऽर्कसुतेन दृष्टः॥३६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिगत चंद्रमाको शनैश्चर देखता हो यह
मनुष्प धनहीन, बुद्धिरहित, निरंतर स्त्रीके आश्रयसे धनको प्राप्त करनेवाला और
मातासे हीन होता है ॥ ३६॥

..
(१३४).
जातकाभरण।
अथ तुलाराशिगते चंद्रे रविदृष्टिफलम् ।
सदाटनः सौख्यधविहीनः सदङ्गनासूनुजनार्वहीनः ।
मित्रैरमित्रैश्च नरोऽतितप्तस्तुलाधरे शीतकरेऽकदृष्टे ॥ ३७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम तुलाराशिगत चंद्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
हमेशा भ्रमण करनेवाला, मुख और धनसे हीन श्रेष्ठ स्त्री और पुत्रोंसे रहित तथा
मित्र और शत्रुओंसे संतापको प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥
अथ तुलाराशिगते चंदे भौमदृष्टिफलम् ।
बुद्ध्या परार्थाकरणैकचित्तं मायासमेतं विपयाभितप्तम् ।
करोति जातं हि तुलागतेंदुनिरीक्ष्यमाणो धरणीसुतेन ॥३८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिगत चंद्रमाको मंगल देखता हो वह
मनुष्य बुद्धिकरके दूसरेके धनमें चित्त करनेवाला, मायासहित और विषयास संता-
पको प्राप्त होता है ॥ ३८॥
अथ तुलाराशिगते चंद्रे बुधदृष्टिफलम् ।
कलाविधिज्ञं धनधान्ययुक्तं वक्तृत्वविद्याविभवैः समेतम् ।
कुन्निरं शीतकरस्तुलास्थः प्रसूतिकाले शशिजेन हपः॥३९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नुलाराशिगत चंद्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य
कलाओंकी विधिका जाननेवाला, धनधान्यसहित, बोलनेकी विद्या और वैभव
सहित होता है ॥ ३९ ॥
अथ तुलाराशिगते चंद्रे गुरुष्टिफलम् ।
विचक्षणो वस्त्रविभूपणेषु क्रयेऽथवा विक्रयताविधाने।
तुलाधरे शीतकरो नरः स्यादृष्टः शुनासीरपुरोहितेन ॥४०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नलाराशिगत चंद्रमाको वृहस्पति देखता हो वह
मनुष्य वस्त्र और आभूषणों के कार्यमें चतुर तथा वम और आभूषणों के खरीदने
और बेचनेमें चतुर होता है ॥ १० ॥
अथ तुलाराशिगते चंद्रे भृगुष्टिफलम् ।
प्राज्ञस्त्वनेकोद्यमसाधितार्थः स्यात्पार्थिवानां कृपया समेतः ।
हृष्टो नरः पीनकलेवरश्च जूके मृगांके भृगुजेन हो ॥ ४ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें तुलाराशिगत चंद्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य
चतुर, अनेक उद्यमकरके अर्थसिद्धि करनेवाला, गजाओंकी कृपाकरके साहिर
मरानचित्त और पुष्ट देहवाला होता है ॥ ४१ ॥

भापाटीकासहित । (१३५) अथ तुलाराशिगते चन्द्रे शनिदृष्टिफलम् । धनैश्च धान्यैर्वरवाहनैश्च युतोऽपि हीनो विषयोपभोगैः। भवेन्नरस्तौलिनि जन्मकाले कलानिधौ भानुतनूजदृष्टे ॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिगत चन्द्रमाको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य धन और धान्य तया श्रेष्ठ वाहनों करके सहित और विपयभोगसे रहित होता है ।। ४२॥ अथ वृश्चिकराशिगते चन्द्रे रविदृष्टिफलम् । सवृत्तिहीन धनिनं जनानामसद्धमत्यंतकृतप्रयासम् । सेनानिवासं मनुजं प्रकुर्यात्ताराधिपःकौlगतोऽकदृष्टः॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ वृत्तिरहित, धनवान्, मनुष्योंको असह्य, अत्यन्त उद्यम करनेवाला और सेनामें रहनेवाला होता है॥४३॥ अथ वृश्चिकराशिगते चन्द्रे भौमदृष्टिफलम् । रणाङ्गनावाप्तयशोविशेपो गभीरतागौरवसंयुतश्च । भूपानुकंपासमुपात्तवित्तो नरोऽलिनीन्दौ क्षितिजेन टे॥४४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो वह मनुष्य युद्धमें विशेष करके यशको मास, गम्भीरता, गौरख सहित और राजाकी कृपासे धनको पैदा करनेवाला होता है ।। १४ ॥ अय वृश्चिकराशिगते चन्द्र बुधदृष्टिफलम् । वाग्विलासकुशली रणशीलो गीतनृत्यनिरतश्च नितांतम् । कूटकर्मणि नरो निपुणः स्याबृश्चिके शशिनि चन्द्रजष्ट४५ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको बुध देवता हो वह मनुष्य बोलनेमें चतुर, युद्ध करनेवाला, गीत और नृत्यमें तसर, झंठे काम बडा चतुर होता है ।। ४५॥ अथ वृश्चिकराशिगते चन्द्र गुरुदृष्टिफलम् ! लोकानुरूपः सुतरां सुरूपः सत्कर्मकृद्वित्तविभूपणादयः। स्यान्मानवोजन्मनिशीतरश्मी संस्थऽसिनीज्येननिरीक्ष्यमाण ४६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको वृहस्पति देखता हो वह मनुष्य संसारकी इच्छाके समान चलनेवाला, मुन्दर रूपवान्, }ष्ट कमाका करने वाला तथा धन और आभूषणोंकरके सहित होता है ॥ १६ ॥.

(१३६) जातकाभरण! अथ वृश्चिकराशिगते चन्द्रे भृगुदृष्टिफलम् । प्रसन्नमूर्तिः समुदारकीर्तिः कूटक्रियाज्ञो धनवाहनाढ्यः। कांताहतार्थः पुरुपोऽलियाते शीतद्युतौ दैत्यगुरुप्रदृष्टे ॥४७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालफे वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य प्रसन्नमूर्ति, उदार यशवाला, छल छिद्रको जाननेवाला, धन वाहनों सहित और स्त्रियों- करके उसका धन नष्ट होता है ।। ४७ ॥ अथ वृश्चिकराशिगते चन्द्र शनिदृष्टिफलम् । स्थानभ्रंशं दैन्यनाशाल्पवित्तं नीचापत्यासत्त्वयक्ष्मप्रकोपम् । कुर्याच्चंद्रः सूतिकालेऽलिसंस्थश्छायापुत्रप्रेक्षणत्वं प्रयातः॥४८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमाको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य, स्थानभ्रष्ट, दीनताका नाश करनेवाला, थोडे धनवाला, नीच संतानवाला, बलहीन और राजयक्ष्मा रोगवाला होता है || ४८॥ अथ धनराशिगते चंद्रे रविदृष्टिफलम् । प्रौढप्रतापोत्तमकीर्तिसंपत्सद्वाहनान्याहवज जयं च । नृपप्रसादं कुरुते नराणां ताराधिपश्चापगतोऽदृष्टः॥ ४९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य बडे प्रतापवाला, उत्तम यशवाला, संपदा सहित, श्रेष्ठ वाहनोंवाला, संग्राममें यशको पानेवाला और राजकृपासहित होता है ॥ १९ ॥ अथ धनराशिगते चंद्रे भीमदृष्टिफलम् । सेनापतित्वं च महत्प्रतापं पद्मालयालंकरणोपलब्धिम् । कुन्निराणां हरिणाङ्क एप शरासनस्थोऽवनिजेन दृष्टः ॥५०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चन्द्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य फौजका मालिक, बड़े प्रतापवाला, लक्ष्मीका स्थान और आभूपोंका लाभ करनेवाला होता है ॥ ५० ॥ अथ धनराशिगते चन्द्रे बुधदृष्टिफलम् । सदाग्विलासं बहुभृत्ययुक्तं कुर्यानरं ज्योतिपशिल्पविद्यम् । तुरङ्गजंघे हि कुरङ्गजन्मा कुरङ्गलक्ष्मप्रभवेण दृष्टः॥५१॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चन्द्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ वाणीके विलास और वहुन नौकरवाला, ज्योतिष और शिल्पविद्याका जाननेवाला होता है ।। ५१ ॥

भाषाटीकासहित। अथ धनराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् । महापदस्थो धनवान्सुवृत्तो भवेन्नरश्चारुशरीरयष्टिः । धनुर्धरे शीतकरे प्रयाते निरीक्षिते शक्रपुरोहितेन ॥५२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चद्रमाको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य बड़े अधिकारको प्राप्त, धनवान, श्रेष्ट वृत्तिवाला और सुंदर शरीर- वाला होता है ।। ५२॥ अथ धनराशिगते चंद्रे भगुदृष्टिफलम् । संतानार्थात्यन्तसंजातधर्मः शश्वत्सौख्येनान्वितो मानवः स्यात् । तारास्वामी चापगामी प्रसूतौ दैत्यामात्यप्रेक्षणत्वं प्रयातः॥५३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालम धनराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य संतान, धन तथा धर्मको प्राप्त और निरंतर सौख्यसहित होता है ॥५३॥ अथ धनराशिगते चन्द्रे शनिदृष्टिफलम् । सत्त्वोपेतं नित्यशास्त्रानुरक्तं सद्वक्तारं मानवं च प्रचण्डम् । कोदण्डस्थस्तीक्ष्णरश्श्यात्मजेन दृष्टसूतौशीतरश्मि करोति ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चन्द्रमाको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य बलसहित, नित्य शास्त्रमें आसक्त, श्रेष्ठवक्ता और प्रचंड प्रतापी होता है ॥ ५ ॥ अथ मकरराशिगते चन्द्रे रविष्टिफलम् । गतधनो मलिनश्चलनप्रियो हतमति खलु दुःखितमानसः। हिमकरे मकरे च दिवाकरे क्षितितनौ हि नरः प्रभवेद्यदि ॥५५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चन्द्रमाकोः सूर्य देखता हो वह मनुष्य धनहीन, मलिन, भ्रमणमें प्रीति करनेवाला, बुद्धिहीन और निश्चय करके दुखित होता है ॥ ५५ ॥ अथ मकरराशिगते चन्द्रे भौमदृष्टिफलम् । अतिप्रचण्डो धनवाहनाढयः प्राज्ञश्च दारात्मजसौख्ययुक्तः। स्यान्मानवो वैभवभानितांतं मृगे मृगांकेऽवनिजन दृष्टे ॥ ५६ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो वह 'मनुष्य अत्यंत प्रचंड, धन और वाहनकरके साहित, चतुरा खी और पुत्रोंके मुख- सहित और निरन्तर वैभवकरके सहित होता है ।। ५६ ॥

खेतीके वलसहित, जुआ खेलनेवाला, राजाके आश्रित, धर्मम तत्पर होता है ॥६॥ (१३८) जातकाभरण। अय मकरराशिगते चंद्रे बुधदृष्टिफलम् । बुद्धयाहीनो निधनस्त्यक्तगेहो गेहिन्याधैरुज्झितःपूरुपः स्यात् । आर्केकेरस्थावरे शीतरश्मी पीयूपांशोरात्मजेन प्रदृष्टे ॥५७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चंद्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य बुद्धिहीन, धनरहित घरका त्यागनेवाला और स्त्रीपुत्रोंकरके त्यामा जाता है ॥ १७ ॥ नृपात्मजः सत्ययुतो गुणज्ञः कलत्रपुत्रादियुतो नरः स्यात् । मृगानने जन्मनि यामिनीश वाचामधीशेन निरीक्ष्यमाणे ॥५८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चंद्रमाको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य राजपुत्र, सत्यहित, गुणोंका जाननेवाला और स्त्रीपुत्रसहित होता है ।। ५८ ॥ अथ मकरराशिगते चंद्रे भृगुदृष्टिफलम् । सुनयनो धनवाहनसंयुतः सुतविभूपणवस्त्रसुखी नरः । कुमुदिनीदयिते मृगसस्थिते भृगुसुतेन जनो ननु वीक्षिते ॥१९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चंद्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य सुन्दर नेत्रोंवाला, धन और वाहनसहित और पुत्र और मुख सहित होता है ।। ५९ ॥ अथ मकरराशिगतचंद्रे शनिदृष्टिफलम। महालसो मंदधनस्त्वसत्यो मलीमसः स्याद्व्यसनाभिभूतः । पीयूपमूर्तिर्यदि नकवर्ती त्रिमूर्तिपुत्रेण निरीक्ष्यमाणः ॥ ६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चंद्रमाको गनेश्वर देखता हो वह मनुष्य बड़ा आलसी, धनहीन, सत्यरहित, मलीन और व्यसनी होता है ॥ ६० ॥ अथ कुम्भराशिगते चन्द्रे रविदृष्टिफलम् । कृपीवलः कैतवसंयुतश्च नृपाश्रितो धर्मरतो नरः स्यात् । पीयूपमूर्तिर्यदि कुंभगामी त्वम्भोजिनीस्वामिनिरीक्ष्यमाणः॥६॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें कुंभराशिगत चन्द्रमाको मूर्य देखता हो वह मनुष्य अय कुम्भराशिगते चन्द्रे भीमदृष्टिफलम् । धनभवनजनित्रीतातविश्लेपयुक्तो विपमतमपदार्थोत्पादकोऽनल्प जल्पः। भवति मलिनचित्तोऽत्यंतधूतों हि मर्त्यः शशिनि कल शयाते वीक्षिते भूसुतेन ॥ ६२॥ भूषण वखाके

भापाटीकासहित।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत चन्द्रमाको मंगल देखता हो वह
मनुष्य मकान, धन तथा मातापिताके वियोगको प्राप्त और बड़े कठिनपदायोंको
पैदा करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मलिनचित्त और अति धूर्त होता है । ६२॥
अथ कुम्भराशिगते चन्द्रे वुधदृष्टिफलम् ।
विषयसौख्यरतोऽशनसंविधारुचिरतीव शुचिः प्रियभाषणः।
युवतिगीतसुनीतिकृतादरो घटगतेंदुरिह ज्ञनिरीक्षितः ॥ ६३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत चन्द्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य
विषय, सौख्यसहित, भोजनविधानका जाननेवाला, अत्यन्त पवित्र, प्यारी वाणी
बोलनेवाला, स्त्रियोंकी गीत जाननेवाला और श्रेष्ठ नीतिसे स्त्रियोंका आदर करने
वाला होता है ।। ६३ ॥
अथ कुम्भराशिगते चंन्द्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
महीपुरग्रामसुखादिसौख्यं भोगान्वितं साधुजनप्रवृत्तिम् ।
कुर्यानरं श्रेष्ठतरं घटस्थो निशाकरः शक्रगुरुप्रदृष्टः॥ ६४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुंभराशिगत चन्द्रमाको गुरु देखता हो वह मनुष्य
धरती, नगर, प्रामादिके सुखों सहित, भोगोंसे युक्त सत्पुरुपोंमें प्रवृत्ति करनेवाला
और श्रेष्ठ पुरुष होता है ॥ ६४ ॥
अथ कुम्भराशिगते चंदे भृगुदृष्टिफलम् ।
मित्रात्मजस्त्रीगृहसौख्यहीनों दीनो जनोत्सारितगौरवः स्यात् ।
निशाकरे कुंभधरे प्रसूती संवीक्षिते दानवपूजितेन ।। ६५ ।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य
मित्र और पुत्र, स्त्री तथा मकानके सौख्यसे रहित, दीन और गौरव रहित होता है६५
अथ कुम्भराशिगते चन्द्र शनिदृष्टिफलम् ।
खरोष्ट्रबालावतरादिलाभं कुस्त्रीरत धर्मविरुद्धवृत्तिम् ।
करोति मयं हि घटेऽधितिष्ठनिशाकरोभास्करसूनुदृष्टः ॥६६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत चन्द्रमाको शनैश्वर देखता हो वह
मनुष्य गधे, ऊंट, नवीन घोडौंका लाभ करनेवाला, खोटी स्त्री तसर और धर्म
विरुद्ध वृत्तिवाला होता है ।। ६६॥
अथ मीनराशिगते चंद्रे रविष्टिफलम् ।
मनोद्भवोत्कर्पमतीव सौख्यं सेनापतित्वं बहुवित्तवृद्धिम् ।
सत्कर्मसिद्धिं कुरुते हिमांशुझपे दिनेशेन निरीक्ष्यमाणः॥६॥

(१४०) जातकाभरण । जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य कामदेवके सीख्यको अत्यंत प्राप्त करनेवाला, फौजका मालिक, बहुत धनकी वृद्धि और श्रेष्ठकोंकी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ६७ ॥ अथ मीनराशिगते चंद्रे भीमदृष्टिफलम् । पराभिभूत कुटलाधिसख्यं सौख्योज्झितं पापरतं नितांतम् । करोति जातं हि निधिः कलानां मीनस्थितो भूमिसुतेन दृष्टः ६८ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चंद्रमाको मङ्गल देखता हो वह मनुष्य शत्रुओंसहित, कुलटा स्त्रीसे मित्रता करनेवाला, सुखसे रहित और निरन्तर पापमें तत्पर होता है ॥ ६॥ अथ मीनराशिगते चंद्रे बुधदृष्टिफलम् । वरांगनासूनुसुखानि नूनं मानं धनं भूमिपतेः प्रसादम् । कुर्यानराणां हरिणांक एप वैसारिणस्थो ज्ञनिरीक्ष्यमाणः ७९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चंद्रमाको बुध देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ स्त्री पुत्रों के मुखोंको प्राप्त और राजाकी कृपासे मान तथा धन प्राप्त करता है ॥६९ अथ मीनराशिगते चंद्रे गुरुदृष्टिफलम् । उदारदेहं सुकुमारदेहं सनेहिनीसूजुधनादिसौख्यम् । नृपं विदध्यात्पृथुरोमगामी तमीपतिक्पितिवीक्षितश्चेत् ।।७ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चन्द्रमाको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य उदारचित्त, सुकुमार, श्रेष्ठ स्त्री और पुत्र धनादिका सौख्य पानेवाला राजा होता है ॥ ७० ॥ अथ मीनराशिगते चढ़े भृगुदृष्टिफलम् । सद्गीतविद्यादिरतं सुवृत्तं विलासिनीकेलिविलासशीलम् । करोति मत्यै तिमियुग्मराशौ शीतद्युतिर्जन्मनि शुक्रदृष्टः॥७१ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चन्द्रमाको शुक्र देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ गीत, श्रेष्ठ विद्यादिमें तत्पर, श्रेष्ठ वृत्तिवाला और स्त्रीके साथ विलास करनेम शील जिसका ऐसा होता है ॥ ७१ ॥ अय मीनराशिगते चंद्रे शनिदृष्टिफलम् । कामातुरे दारसुतर्विहीनं नीचांगनांसख्यमविक्रम च । नीहाररश्मिः शफरं प्रपन्नो नरं विदध्याद्रविसनुदृष्टः ।। ७२ ।।

भापाटीकासहित । जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चन्द्रमाको शनैश्चर देखता हो बहु मनुष्य फामातुर, स्त्री और पुत्रोंसे रहित, नीच खियोंके साथ मित्रता करनेवाला और बल. हीन होता है ।। ७२ ॥ इति मेपादिराशौ चन्द्रप्रतिग्रहदृष्टिफलम् । अथ मेपादिराशौ भौमप्रतिग्रहष्टिफलम्- तत्र स्वभे भौमे रविदृष्टिफलम् । प्राज्ञःसुवक्ता पितृमातृभक्तो धनिप्रधानोऽतितरामुदारः। नरो भवेदात्मगृहे महीजे सरोजिनीराजनिरीक्ष्यमाणे ॥१॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें मंगल बैठा हो और उसको सूर्य देखता हो वह मनुष्य चतुर, श्रेष्ठ वक्ता, पिताका भक्त, धनवाना में श्रेष्ठ और अत्यन्त उदार होता है ॥ १ ॥ अथ स्वभे भौमे चन्द्रदृष्टिफलम् । अन्याङ्गनासक्तमतीव शूरं कृपाविहीनं हतचौरवर्गम् । नरं प्रकुर्यानिजधामगामी भूमीतनूजो द्विजराजदृष्टः ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें मंगल बैठा हो और उसको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य परायी स्त्रीमें आसक्त, बड़ा शूरवीर, कृपारहित और चोराको मारनेवाला होता है ॥२॥ अथ स्वभे भौमे बुधदृष्टिफलम् । पण्याङ्गनालंकरणैकवृत्तिविचक्षणोऽन्यद्रविणापहारी। भवेन्नरः स्वक्षगते प्रसूतौ क्षोणीसुते सोमसुतेन दृष्टे ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिकराशिमें मंगल बैठा हो और उसको वुध देखता हो तो वह मनुष्य वेश्याके अलंकार और वस्त्र बनवानेमें एक चित्त रसने- वाला, बड़ा चतुर और पराया धन हरनेवाला होता है |॥ ३ ॥ अथ स्वभे भौमे गुरुदृष्टिफलम। वंशेऽवनीशो धनवान्सकोपो नृपोपचौरः कृतचौरसख्यः। आरे निजागारगते नरः स्यत्सूतौ सुराचार्यनिरीक्ष्यमाणे॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपवृश्चिक राशिमें मङ्गल बैठा हो और उसको बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य अपने वैशमैं राजा, धनवान, क्रोधसहित, राज- चिह्नों सहित और चोरोंसे मित्रता करनेवाला होता है ॥४॥ अथ स्वभे भामे भृगुदृष्टिफलम् । भूयोभूयो भोजनोत्सुक्ययुक्तः कांताहेतोर्यानचिन्ता नितांतम् । पाणी पुण्ये कर्मणि प्रीतिमान्स्यात्स्वः भीमे भार्गवेण प्रहरी (१४२) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें मंगल बैठा हो उसको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य वारंवार भोजनकी इच्छा करनेवाला और स्त्रीके निमित्त सफरकी हमेशा चिंता करता है ॥ ५ ॥ अथ स्वभे भौमे शनिदृष्टिफलम् । मियोज्झितं मातृवियोगतप्तं कृशाङ्गायष्टिं विपमं कुटुम्बे । ईयाविशेपं पुरुपं विदध्यात्कुजः स्वभस्थोऽकसुतेन दृष्टः ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें मङ्गल बैठा हो वह मनुष्य मित्रोंसे त्यागा हुआ, माताके वियोगसे संतापको प्राप्त, दुर्बल देहवाला, कुटुम्बका विरोधी और बहुत ईर्ष्यासहित होता है ।। ६ ॥ अथ शुक्रगृहस्ये भौमे रविदृष्टिफलम् । कांतामनोवृत्तिविहीनमुच्चैर्वनाद्रिसंस्थानरुचिं विपक्षम् । प्रचण्डकोपं कुरुते मनुष्यं कुजः सितागारगतोऽदृष्टः ॥७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिगत चन्द्रमाको सूर्य देखता हो वह मनुष्य स्त्रीके मनकी वृत्तिसे रहित, बड़े बड़े वन और पर्वतोंमें रहनेकी इच्छा कर- नेवाला, शत्रुहीन और बड़ा क्रोधी होता है ॥ ७ ॥ अथ शुक्रगृहस्थे भीमे चन्द्रदृष्टिफलम् । अम्बाविरुद्धः खलु युद्धभीरुङ्गनानामपि नायकश्च । स्यान्मानयो भूतनये सिता नक्षत्रनाथेन निरीक्ष्यमाणे ॥८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिमें मङ्गल बैठा हो वा उसको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य माताके विरुद्ध, निश्चय कर संग्राममें डरपोक और बहुत स्त्रियोंका स्वामी होता है ॥ ८॥ अथ शुक्रगृहस्थे भीमे बुधदृष्टिफलम् । शास्त्रप्रवृत्तिः कलहपियः स्यादनल्पजल्पोऽल्पधनागमश्च । सत्कायकांतिः पृथिवीतनूजे सितालयस्थे शशिजन दृऐ ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिमें मङ्गल वटा हो व उसको अध देखता हो वह मनुष्य शास्त्रमें प्रवृत्तिवाला, लड़ाई जिसको प्यारी, बहुत बोलने 'वाला, थोड़े धनका आगम हो और उसका देह शोभायमान होता है ॥९॥ अथ शुक्रगृहस्ये भामे गुरुदृष्टिफलम् । बंधुप्रिये स्यानिरतोऽतिभाग्यः सङ्गीतिनृत्यादिविधिप्रवीणः । भोणीतनूजे भृगुजङ्ख्याते निरीक्षिते वाक्पतिना प्रसूती ।। १०॥ .

भापाटीकासहित । (१४३) जिस मनुप्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिमें स्थित मंगलको वृहस्पति देखता हो वह मनुष्य भाइयोंकी भीतिमें तत्पर अत्यंत भाग्यवान और गीत त्यादि विधिमें चतुर होता है ॥ १० ॥ अथ शुक्र-गृहस्ये भौमे गुरुदृष्टिफलम् । सुश्लाघ्यनामा क्षितिपालमंत्री सेनापति; बहुसौख्ययुक्तः। स्यान्मानवः शुक्रगृहोपयाते निरीक्षिते भूमिसुतेन तेन ॥ ११॥ जिसमनुष्यके जन्मकालमें वृष तुला राशिमें मंगल बैठा हो व उसको शुक्र देखता हो वह मनुष्य प्रशंसाके योग्य, राजाका मंत्री अथवा फौजका मालिक और बहुत सौख्यप्तहित होता है ॥ ११ ॥ अथ शुक्रगृहस्थे भौमे शनिदृष्टिफलम् । ख्यातो विनीतो धनवान्सुमित्रः पवित्रघुद्धिः कृतशास्त्रयत्नः । नरः पुरग्रामपतिः सितः भूनंदने भानुसुतेन दृष्टे ॥ १२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप वा तुलाराशिम मंगल बैठा हो वह मनुष्य प्रसिद्ध, नम्रतासहित, धनवान, श्रेष्टमित्रोंवाला, पवित्रधुद्धि, शास्त्रमं यत्न करने- वाला और नगर वा ग्रामका पति होता है ॥ १२ ॥ अथ बुधगृहे भौमे रविदृष्टिफलम् । विद्याधनैश्वर्ययुतं ससत्त्वमरण्यदुर्गाचलकेलिशीलम् । कुर्यानरं सोममुतालयस्थः क्षोणीसुतः सूर्यनिरीक्ष्यमाणः॥१३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुधकी राशि (मिथुन, कन्या) में मंगल बैठा हो व उसको सूर्य देखता हो वह मनुष्य विद्या धन ऐश्वर्यकरके सहित, वलयुक्त, वन- पर्वतोंमें तथा किलेमें रहनेवाला होता है ॥ १३ ॥ अथ बुधगृहे भौमे चंददृष्टिफलम् । संरक्षणे भूपतिना नियुक्त कांतारति सत्त्वयुतं सतोपम् । भूमीसुत संजनयेन्मनुष्य बुधक्षसंस्थः शशिना प्रहः ॥१४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्या, मिथुन राशिमें मंगल बैठा हो उसको चंद्र देखता हो वह मनुष्य राजाद्वारा अपनी रक्षाके लिये नियुक्त किया हुआ, सीमें तत्पर, बलसहित तथा संतोपवाला होता है ॥ १४ ॥ अय बुधगृहे भौमे बुपष्टिफलम् । अनल्पजल्पं गणितप्रगल्भं काव्यप्रिय चानृतचारुवाक्यम् । दौत्ये प्रयासैः सहितं प्रकुर्याद्वरातनजो ज्ञगृहे ज्ञदृष्टः ॥१५॥ .

जातकाभरण। अपने जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत मंगलको सूर्य देखता हो वह मनुष्य अपने प्यारोंसे प्रीति करनेवाला और शत्रुओंको दुःख देनेवाला तया वन पर्वत कुओंमें रहनेवाला होता है ॥२५॥ अथ सिंहस्थभौमे चंद्रदृष्टिफलम् । अपुष्टमूर्तिः कठिनस्वभावश्चाम्बाविनीतो निपुणः स्वकार्ये । तीवः पुमांश्चारुमतिः प्रसूतौ सिंहे महीजे हिजराजदृष्टे ॥२६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिमें मंगल बैठा हो और उसको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य पुष्ट शरीरवाला, कटिन स्वभाव, मातासे नम्र, कार्यमें चतुर, तीव्र और सुन्दर बुद्धिवाला होता है ।। २६ ।। अथ सिंहस्थभौमे बुधदृष्टिफलम् । सत्काव्यशिल्पादिकलाकलापे विज्ञोऽपि लुब्धश्चलचित्तवृत्तिः । स्वकार्यसिद्धौ निपुणो नरः स्यात्मिहे महीजे शशिजेन दृष्ट॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत मंगलको बुध देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ काव्य और शिल्पादि कलाओंके समूहको जाननेवाला, लोभी, चंचल वित्त वृत्तिवाला और अपने कार्यके साधनमें चतुर होता है ॥ २७ ॥ अथ सिंहस्ये भौमे गुरुदृष्टिफलम् । प्रशस्तबुद्धिर्नृपतेः मुहम्च सेनाधिनाथोऽभिमतो बहूनाम् । विद्याप्रवीणो हि नरः प्रसूतौ जीवेक्षिते सिंहगते महीजे ॥२८॥ जिस मनुष्य के जन्मकाल सिंहराशिगत मंगलको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धिवाला, राजाका मित्र, फौजका मालिक, बहुत मनुष्यों के मनोरथ पूर्ण करनेवाला और विद्यामें प्रवीण होता है ॥ २८॥ अथ सिंहस्थे भीमे भृगुदृष्टिफलम् । गर्वोन्नतोऽत्यन्तशरीरकांति नागनाभोगयुतः समृद्धः । भूमीसुते सिंहगते प्रसूती निरीक्षित दैत्यपुरोहितेन ॥२९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत मंगलको शुक देखता हो वह मनुष्य अभिमान फरके उंचा, अत्यंत मुन्दर शोभायमान देहवाला, अनेक स्त्रियांक साथ भोग करनेवाला और सम्पूर्णसमृद्धिसहित होता है ॥ २९ ॥ भवेनिवासोऽन्यगृहेऽतिचिन्ता वृद्धाकृतित्वं द्रविणोज्झितत्वम् । भवेन्नराणां धरणीतनूजे सिंहस्थिते भानसुतेन दृष्टे ॥ ३०॥ .

F
भापाटीकासहित ।
(१४७)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत मंगलको शनैश्चर देखता हो
वह मनुष्य पराये घर वास करनेवाला, अत्यन्त चिन्ताकरके युक्त, बूढोंके समान
स्वरूपवाला और धनहीन होता है ॥ ३० ॥
अथ गुरुभवनस्ये भौमे रविदृष्टिफलम् ।
वनाद्रिदुर्गेषु कृताधिवास कर सभाग्य जनपूजितं च ।
करोति जातं धरणीतनृजो जीवर्शयातस्तरणिप्रदृष्टः॥३१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिमें बृहस्पति बैठा हों और सूर्य देखता
हो तो वह मनुष्य वन, पर्वत किला कोटमें वास करनेवाला, क्रूरस्वभाववाला, भाग्य-
चान और मनुष्यों करके पूजनीय होता है ॥ ३१ ॥
अथ गुरुभवनस्ये भौमे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
विदिधिज्ञं नृपतेरसह्यं कलिप्रिय सर्वनिराकृतं च ।
प्राज्ञ प्रकुन्मिनुजं धराजो जीवसंगः शीतकरणदृष्टः॥ ३२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिम मंगल बैठा हो और चन्द्रमाकी
दृष्टि हो तो वह मनुष्य पण्डितोंकी विधिका जाननेवाला, राजाको नहीं माननेवाला,
लड़ाई जिसको प्यारी और जनोंकरके त्यक्त, एवं बुद्धिमान होता है ।। ३२ ।।
अथ गुरुभवनस्थे भौमे बुधदृष्टिफलम् ।
प्राज्ञ च शिल्पे निपुणं सुशीलं समस्तविद्याकुशलं विनीतम् ।
करोति जातं खलु लोहितांगः सौम्येन दृष्टो गुरुगेहयातः॥३३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिवती मंगलको बुध देखता हो वह
मनुष्य चतुर, शिल्पविद्या में निपुण, श्रेष्ठ शीलवान, सर्व विद्याओंमें चतुर और
नम्रतायुक्त होता है ॥ ३३ ॥
अथ गुरुभवनस्य भीम गुरुद्दीष्टफलम् ।
कांतातिचिन्तासहितं नितांतमरातिवर्गः कलहानुरक्तम् ।
स्थानच्युतं भूमिसुतःप्रकुर्य्याज्जीवेक्षितो जीवगृहाधिसंस्थः३४
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिम मंगल बैठा हो और वृहस्पति
करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य स्त्रीको अत्यन्त चिन्ता करनेवाला, निरन्तर दुश्मनोंसे
लड़ाई करनेवाला और स्यानसे भ्रष्ट होता है ॥ ३४ ॥
अय गुरुभवनस्थे भौमे भृगुदृष्टिफलम् ।
उदारचेता विपयानुरक्तो विचित्रभूपापरिभूपितश्च ।
भाग्यान्वितःस्यात्पुरुपोऽवनीजे जीवसंगे दानवपूज्यहरे ॥३५॥

(१४८)
जातकाभरण।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें धन मीन राशिम मंगल बैठा हो और उसको शुत्र
देखता हो तो वह मनुष्य उदार चित्तवाला, विषयोंमें आसक्त, अनेक प्रकारके
गहनों करके भूपित और भाग्यवान होता है ॥ ३५ ॥
अथ गुरुभवनस्थे भौमे शनिदृष्टिफलम् ।
कायकांतिरहितश्च नितांत स्थानसंचलनतोऽपि च दुःखी।
अन्यकर्मनिरतश्च नरः स्याज्जीवधामि कुसुतर्कजदृष्टेः ॥३६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिमें मंगल बैठा हो और शनिकरके
दृष्ट हो तो वह मनुष्य देहकी कांति करके रहित, अनेक स्थानों में भ्रमण करनेसे
दुःखी हो और पराये कार्यमें तत्पर होता है । ३६ ।।
अथ शन्यागारगते भौमे रविष्टिफलम् ।
कलत्रपुत्रार्थसुखैः समेतं श्याम सुतीक्ष्णं सुतरां च शूरम्
कुर्य्यानरं भूतनयोऽर्कदृष्टश्चार्कात्मजागारगतः प्रसूतौ ।। ३७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत मंगलको सूर्य देखता हो तो
वह मनुष्य निरन्तर स्त्री पुत्र धनके सुख करके सहित तरुणस्वरूप, तीक्ष्ण और बड़ा
शूरवीर होता है ॥ ३७॥
अथ शन्यागारगते भौमे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सद्भूपणं मातृसुखेन हीन स्थानच्युतं चञ्चलसौह्रदं च ।
उदारचित्तं प्रकरोति जातं कुजोऽकजस्थः शशिना प्रहए:३८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभ राशिगत मंगलको चन्द्रमा देखता है तो
वह मनुष्य श्रेष्ठ आभूषणों करके सहित, माताके सुखसे हीन, स्थानभ्रष्ट,
मित्रतावाला और उदाराचित्त होता है ।। ३८॥
अथ शन्यागारगते भौमे बुधष्टिफलम् ।
प्रियोक्तियुक्तोऽटनवित्तलब्धः सत्त्वान्वितः केतवसंयुतश्च ।
अभीनरो मंदगृह प्रयाते पृथ्वीसुते चन्द्रसुतेन दृष्टे ।। ३९ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभ राशिगत मंगलको बुध देखता हो वह
मियवाणी बोलनेवाला, भ्रमण करनेसे धन प्राप्त करनेवाला वलसहित, जुए करके
सहित और भयरहित होता है ॥ ३९॥

भापाटीकासहित । (१४९) अय शन्यागारगते भौमे गुरुदृष्टिफलम् । दीर्घायुषं भूपकृपागुणाव्यं बंधुप्रियं चारुशरीरकांतिम् । कार्यप्रलापं जनयेन्मनुष्यं जीवेक्षितो मन्दगृहे महीजः॥४०॥ जिस मनुष्यके मकर कुंभ राशिवर्ती मंगलको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य बड़ी उमरवाला, राजाकी कृपाकरके सहित, गुणकरके युक्त, भाइयोंको प्यारा, सुन्दर देहकी कांतिवाला और कार्यमें बहुत बोलनेवाला होता है ॥ १० ॥ अथ शन्यागारते भौमे भृगुहारीफलम् । सद्भोगसौभाग्यसुखैः समेतः कांताप्रियोऽत्यंतकलिप्रियश्च । क्षोणीसुते मन्दगृह प्रयाते निरीक्ष्यमाणे भृगुणा नरः स्यात्॥४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत मंगलको शुक देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ भोग सौभाग्य सुखकरके सहित, स्त्रियोंका प्यारा और जिसको कलह अत्यन्त प्यारा ऐसा होता है ॥११॥ अथ शन्यागारगते भौमे शनिदृष्टिफलम् । नृपाप्तवित्तो वनिताविपक्षी बहुश्रुतोऽत्यन्तमतिः सकटः । रणप्रियः स्यादरणीतनूजे मंदेक्षिते मंदगृहं प्रयाते ॥ ४२ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भराशिगत मंगलको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य राजाक्रके धनको प्राप्त करनेवाला, स्त्रीके साथ वैर करनेवाला, बहुचत वड़ी बुद्धिवाला, कष्टसाहित और संग्राम उसको प्यारा लगता है ॥ ४२ ॥ इति मेपादिराशिगते भौमे ग्रहदृष्टिफलम् । अथ मेपादिराशिगते बुधे ग्रहदृष्टिफलम् । तत्र भामगेहे बुधे रविष्टिफलम् । बंधुप्रियं सत्यवचोविलास नृपालसगौरवसंयुतं च । करोति जातं क्षितिसनुगेहसंस्थो बुधो भानुमता प्रदृष्टः॥ १॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशिगत वुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य भाइयों का प्यारा, सच्चा बोलनेवाला, विलासयुक्त, श्रेष्ठ राजाओंसे मान पानेवाला होता है॥१॥ अथ भीमगृहे बुधे चन्द्रदृष्टिफलम् । सद्गीतनृत्यादिरुचिः प्रकाम कांतारतिहिन भृत्ययुक्तः । कौटिल्यभावस्यान्मनुजः कुजः सोमात्मजे शीतकरप्रहार॥

(१५०)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशिमें बुरी बैठा हो और उसको चंद्रमा
देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ट गीत नृत्यादिमें प्रीति करनेवाला, कामसहित, स्त्रीमें, मीति
करनेवाला, वाहन और नौकरोंसे सहित और कुटिल होता है ॥ २ ॥
अथ भौमगृहे बुधे भौमदृष्टिफलम् ।
भूपप्रियं भूरिधनं च शूरं कलाप्रवीणं कलहोयतं च ।
क्षुधान्वितं सननयेन्मनुष्यं सौम्यः कुजः कुसुतेन दृष्टः॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम मेप वृश्चिक राशिगत बुधको मंगल देखता हो वह
मनुष्य राजाका प्यारा, बहुत धनवाला, शूरवीर, कलाओंमें चतुर, लडाई करन्में
उद्यत और क्षुधाकरके सहित होता है ॥ ३ ॥
अथ भौमगेहे बुधे गुरुदृष्टिफलम् ।
सुखोपपन्नं चतुरं सुवाक्यं कांतासुतायैः सहितं प्रसन्नम् ।
करोति मत्यै कुजगेहगामी सोमात्मजो वाक्पतिना प्रदृष्टः॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत बुधको बृहस्पति देखता हो
वह मनुष्य सुख करके सहित, चतुर, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, स्त्री पुत्रादि सहित
और प्रसन्नचित्त होता है ।। ४ ।।
अथ भौमगेहे बुधे भृगुदृष्टिफलम् ।
कांताविलासं गुणगौरवाढयं सुहृत्प्रियं चारुमतिं विनीतम् ।
करोति जातं शशिजः कुजः संस्थश्च शुक्रेण निरीक्ष्यमाणः५
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें बुध बैठा हो तो और उसको
शुक्र देखता हो वह मनुष्य स्त्रियों के साथ विलास करनेवाला, गुण और गौरवस-
हित, मित्रोंका प्यारा, मुन्दरबुद्धिवाला एवं नम्रतासहित होता है ॥५॥
अथ भौमगेहे बुधे शनिदृष्टिफलम् ।
सुसाहसं चोग्रतरस्वभावं कुलोत्कलिप्रीतिमसाधुवृत्तिम् ।
करोति मत्यै हरणाङ्कसूनुभॊमक्षसंस्थः शनिना प्रदृष्टः ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशि वुध बैठा हो और उसको शनि-
श्वर देखता हो तो वह मनुष्य श्रेष्ठ साहसवाला, क्रूरस्वभाववाला, कुलसे कलह
करनेवाला, प्रीति और श्रेष्ठ वृत्तिसे रहित होता है ॥ ६ ॥
अय शुक्रगेहे युधे रविष्टिफलम् ।
दारिद्यदुःखामयतप्तदेहं परोपकारातिरतं नितांतम् ।
शांत सुचित्तं पुरुपं प्रकुर्यात्सौम्यो भृगुक्षेत्रयुतोऽदृष्टः ॥ ७ ॥

भाषाटीकासहित।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिमें बुध बैठा हो और सूर्य करके दृष्ट
हो वह मनुष्य दरिद्र और दुःख तथा रोगों करके संतापित देहवाला, पराया उप-
कार करनेमें नितांत तत्पर, शांतस्वभाव और शुद्धचित्त होता है ॥७॥
अथ शुक्रः वुधे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
बहुप्रपञ्च धनधान्ययुक्तं दृढव्रतं भूमिपतिप्रधानम् ।
ख्यातं प्रकुर्यान्मनुजं हि सौम्य शुक्रर्भसंस्थःशशिना प्रदृष्टः ॥८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुलाराशिम बुध बैठा हो और चन्द्रमाकरके
दृष्ट हो वह मनुष्य बहुत प्रपंच करनेवाला, धनधान्यसहित, दृढमविज्ञावाला राजाका
मन्त्री और प्रख्यात होता है ॥ ८ ॥
अथ शुक्रः बुधे भौमदृष्टिफलम् ।
राजापमानादिगदप्रतप्तं त्यक्तं सुहृद्भिविपयैश्च नूनम् ।
कुर्यानरं सोमसुतः सित· स्थितो धरापुत्रनिरीक्ष्यमाणः ॥ ९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत बुधको मंगल देखता हो वह
मनुष्य राजासे अपमान किया हुआ, रोगसे संतापित, मित्र और विषयोंसे रहित
होता है ॥ ९॥
अथ शुकः बुधे गुरुदृष्टिफलम् ।
देशोत्तमग्रामपुराधिराजं प्राज्ञं गुणझं गुणिनं सुशीलम् ।
कुर्यानरं चन्द्रसुतः सितर्भसंस्थासुराचार्यनिरीक्ष्यमाणः॥१०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृष तुला राशिगत बुधको बृहस्पति देखता हो वह
मनुष्य उत्तम देश, ग्राम तथा उत्तम नगरोंका स्वामी (राजा), चतुर, गुणोंका
जाननेवाला, गुणवान और श्रेष्ठशीलवाला होता है ॥ १० ॥
अथ शुक्रः बुधे भृगुदृष्टिफलम् ।
अतिसुललितवेप वस्त्रभूपाविशेपै-
युवतिजनमनोज्ञ मन्मथोत्कर्पहर्पम् ।
अतिचतुरमुदारं चारुभाग्यं च कुर्या-
गुगृहगतसौम्यो भार्गवेण प्रदृष्टः ॥ ११ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृप तुला राशिम बुध बैठा हो और शुक्र करके दृष्ट
हो वह मनुष्य अत्यन्त मुन्दर वेपवाला, वस्त्र और भूपोंसे युक्त, खियोंको मिय
और कामदेवके उत्कर्षसे हर्पको प्राप्त, अत्यन्त चतुर, उदार और श्रेष्ठ भाग्यवाला
होता है ॥ ११॥

(१५२) जातकाभरण! अथ शुक्रः बुधे शनिदृष्टिफलम। कलत्रमित्रात्मजयानपीडासंतप्तचित्तं सुखवित्तहीनम् । कुर्यानरं शत्रुजनाभिभूतं मंदेक्षितो ज्ञः सितधामगामी ॥१२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत बुधको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य स्त्री, पुत्र मित्र और वाहनके दुःखसे संतप्तचित्त और सुख और धनसे हीन तया शत्रुजनोंसे तिरस्कृत होता है ॥ १२ ॥ अय स्वक्षेत्रस्ये बुधे रविदृष्टिफलम् । सत्योपेतं चारुलीलाविलासं भूमीपालाप्राप्तमानोन्नति.च । चञ्चत्क्षीणं चापिकुर्यान्मनुष्यः स्वक्षेत्रस्थश्चंद्रपुत्रोऽकदृष्टः ।१३ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत बुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य सत्यसहित, सुंदरलीलाका विलास करनेवाला, राजासे मान और उन्नतिको प्राप्त और चञ्चलतारहित होता है ॥ १३ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्थे बुधे चन्द्रदृष्टिफलम् । अनल्पजल्पोऽमृततुल्यभाषी कलिप्रियो राजसमीपवर्ती । भवेन्नरःसोमसुते स्वगेहे निरीक्ष्यमाणे मृगलाञ्छनेन ॥ १४ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुध मिथुन कन्या राशिमें बैठा हो और चंद्रमामे देखा गया हो वह मनुष्य बहुत बोलनेवाला, बहुत मीठी वाणी बोलनेवाला, लड़ाई जिसको प्यारी और राजाके पास रहनेवाला होता है ॥ १४ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्ये बुधे भीमदृष्टिफलम् । प्रसन्नगात्रं कुटिलं कलाझं नरेंद्रकृत्ये सुतरां प्रवीणम् । जनप्रियं संजनयेन्मनुष्यं भौमेक्षितो ज्ञःस्वगृहेऽधिसंस्थः॥१५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्या मिथुन राशिगत बुधको मंगल देखता हो वह मनुष्य प्रसन्नदेह, चुगलखोर, फलाओंका जाननेवाला, गजाफे कृत्पमें नितांत प्रवीण और मनुष्योंका प्यारा होता है ॥ १५ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्ये बुधे गुरुदृष्टिफलम् । वह्वर्थसामर्थ्य विराजमानं सद्राजमानाप्तपदाधिकारम् । सुतं प्रकुर्यानिजमन्दिरस्थः सौम्यः प्रदृष्टः सुरपूजितेन ॥१६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत बुधको वृहस्पति देखता हो वह मनुष्य बहुत धनवाला, सामर्थ्यकरके साहित, श्रेष्ठ राजाके मानसे अधिकारको प्राप्त और बहुश्रुत होता है ।। १६ ॥

भापाटीकासहित। (१५३) अथ स्वक्षेत्रस्थे बुधे भृगुदृष्टिफलम् । नरेंद्रद्वतो विजितारिखगः संधिक्रियामार्गविधिप्रगल्भः । वारांगनासक्तमनोऽभिलापः शुक्रेक्षिते से निजभे नरः स्याव॥१७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्याराशिगत बुधको शुक्र देखता हो वह मनुष्प राजाका दूत, वैरियोंको जीतनेवाला, दोनोंकी संधि करानेमें चतुर, वेश्या- स्त्री आसक्त और मनकी अभिलापाको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥ अथ स्वक्षेत्रस्ये बुधे शनिदृष्टिफलम् । प्रारम्भसिद्धि विनयं विशेपात्सद्वस्त्रभूपादिसमृद्धिमुच्चैः । कुर्यात्नराणाममृतांशुजन्मा स्वमंदिरस्थो रविसूनुदृष्टः॥ १८ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्याराशिगत बुधको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य प्रारम्भ किये कार्यको सिद्ध करनेवाला, नम्रतासहित, श्रेष्ठ वस्त्र और आभूप- णादि समृद्धियोसहित होता है ॥ १८ ॥ अथ कर्कस्थे बुधे रविदृष्टिफलम् । कांतानिमित्ताप्तमहाव्यलीको द्रव्यव्ययात्यंतकृशांगयष्टिः । बहूपसोऽपि भवेन्मनुष्यः कुलीरगे ज्ञे नलिनीशदृष्टे ॥ १९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य स्त्रीके निमित्तसे पूर्ण पीडाको प्राप्त, धनका व्यय करनेवाला, अत्यन्त दुर्बलदेह और बहुत उत्पातोंसहित होता है ॥ १९ ॥ अथ कर्कस्थे बुध चन्द्रदृष्टिफलम् । वस्त्रादिशुद्धौ मणिसंग्रहे च गृहादिनिर्माणविधौ प्रवीणः । प्रसूनमालाग्रथनेऽपि मर्त्यः कुलीरगे से शशिना प्रष्टे ॥२०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बुधको चंद्रमा देखता हो पर मनुष्य वस्त्रादिकोंकी शुद्धि, मणियोंका संग्रह करने और मकानादिस्थानोंके बनानेमें चतुर और फूलोंकी माला गूयनेमें भी चतुर होता है ॥ २० ॥ अथ कर्कस्ये बुधे भौमदृष्टिफलम् । स्वल्पश्रुतं चार्थरतं च शूरं प्रियंवदं कूटविधौ प्रवीणम् । कुर्यानरं शीतकरस्य सूनुः कुलीरसंस्थेऽबनिसूनुदृष्टे ॥ २१ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बुधको मंगल देखता हो वह मनुष्य थोडा शास्त्रका जाननेवाला, अर्थमें तत्पर, शूर वीर, प्यारी वाणी बोलनेवाला और झुट बात बोलनेमें चतुर होता है ॥ २१ ॥ .

(१५४).
जातकाभरण।
अथ कर्कस्थे बुधे गुरुदृष्टिफलम् ।
प्राज्ञो विधिज्ञो विधिनातिशाली सद्वाग्विलासोऽवनिपालमान्यः ।
स्यान्मानवो जन्मनि सोमसनौ कुलीरगामिन्यमरेज्यदृष्टे ॥२२॥
जिप्स मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बुधको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य
चतुर, विधिका जाननेवाला, बडा भाग्यवान् और श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला
होता है ॥ २२॥
अथ कर्पत्ये बुधे भृगुदृष्टिफलम् ।
प्रियंवदश्चारुशरीरभाक् च सङ्गीतवाद्यादिविधौ प्रवीणः ।
स्यान्मानवो दानववंद्यदृष्टे काटकस्थेऽमृतमानुसूनौ ॥२३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बुधको. शुक्र देखता हो वह मनुष्य
प्यारी वाणी बोलनेवाला, सुन्दर शगरवाला, गीत और बाजोंकी विधिमें चतुर
होता है ॥ २३ ॥
अथ फर्कस्ये बुधे शनिदृष्टिफलम् ।
गुणैविहीनं स्वजनैर्वियुक्तमलीकदभानुरतं कृतघ्नम् ।
करोति मत्यै परिसूतिकाले कुलीरगो ज्ञो रविसूनुदृष्टः ॥२४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें कर्क राशिगत बुधको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य
गुणोंसे हीन, अपने मित्र तथा भाई बंधुआंसे रहित, झूठ बोलने तथा दंभमें तत्पर
और कृतन होता है ।। २४ ॥
अथ सिंहस्थे बुधे रविदृष्टिफलम् ।
कृपाविहीनं च चलस्वभाव सेयं च हिंसाभिरतं च रौद्रम् ।
क्षुद्रं प्रकुन्मिनुज प्रसूती बुधोऽकदृष्टो मृगराजसंस्थः ॥२६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत बुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
कृपारहित, चंचल स्वभाववाला, 'पीसहित, हिमा करनेमें तत्पर, क्रूर और क्षुद्र
होता है ।। २५॥
अथ सिंहस्ये वृधे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
रूपान्वितं चारुमति विनीत सङ्गीतनृत्याभिरतं नितांतम् ।
सद्वृत्तवृत्तं कुरुते हि मर्त्य चन्द्रेक्षितः सिंहगतो युधाख्यः॥२६॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत बुधको चन्द्रमा देखता हो तो वह
मनुष्य रूपवान्, युन्दर बुद्धिवाला नम्रतासहित, गीत और नृत्यमें नितांत तत्पर
और श्रेष्ठ वृत्तिका करनेवाला होता है।॥ २६ ॥

भापाटीकासहित।
(१५५)
अथ सिंहस्थे बुधे भौमदृष्टिफलम् ।
कन्दर्पसत्त्वोज्झितमुक्तवृत्तं क्षतांकित हीनमति विचित्रम् ।
सुदुःखितं संजनयेत्पुमांसं भौमेक्षितः सिंहगतः शशीजः॥२७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत बुधको मंगल देखता हो वह मनुष्य
कामदेव और पराक्रम रहित, चरित्रहीन, घावोंसे अंकित, बुद्धिहीन, विचित्र
और दुःखसहित होता है ।। २७ ।।
अथ सिंहस्थे बुधे गुरुष्टिफलम् ।
कोमलामलरुचिः कुलवर्यश्चारुलोचनयुतश्च समर्थः ।
वाहनोत्तमधनो मनुजः स्यादिन्दुजे हरिगते गुरुहटे ॥ २८॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत सुधको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य
कोमल निर्मल रुचिवाला, कुलमें श्रेष्ठ, सुन्दरनेत्र, सामर्थ्यवान, उत्तम वाहन और
धनवान होता है ॥ २८॥
अथ सिंहस्ये बुधे भृगुदृष्टिफलम् ।
सद्रूपशाली प्रियवाग्विलासो नृपाश्रितो वाहनवित्तयुक्तः ।
भवेन्नरः सोमसुते प्रसूतौ सिंहस्थिते दानववन्द्यदृष्टे ॥ २९ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चतुर्थ भावमें सिंहराशिगत बुधको शुक्र देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ रूपवाला, मिष्ट वाणी बोलनेवाला, विलासयुक्त, राजाफे आश्रित,
वाहन और धनसहित होता है ।। २९ ॥
अथ सिंहस्थे बुधे शानिष्टिफलम् ।
स्वेदोद्मोद्भूतमहोग्रगंध विस्तीर्णगात्रं च कुरूपमुग्रम् ।
सुखेन ही मनुजं प्रकुन्मिदेक्षितः सिंहगतो यदि ज्ञ॥३०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत बुधको शनैश्वर देखता हो उस मनु-
ज्यकी देहमें पसीने करके दुर्गध आती है, बड़ी देहवाला, कुरूप, उग्र, मुखहीन
होता है ॥ ३०॥
अथ गुरुभवनस्थे बुधे रविष्टिफलम् ।
शूलाश्मरीमेहनिपीडिताङ्गो भङ्गोज्झितः शांतिमुपागतश्च ।
स्यात्पूरुपोगीपतिवेश्मसंस्थे निशीथिनीस्वामिसुतेऽकहऐ३१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत बुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
शूल, पथरी, प्रमेहरोगसे पीडित, मनकी तरंगसे रहित और शांतिको प्राप्त
होता है ॥ ३१॥

जातकाभरण। अथ गुरुभवनस्थे उधे चन्द्रदृष्टिफलम् । लेखक्रियायां सुतरां प्रवीणः सुसंगतः साधुसुहाजनानाम् । नरः सुखी शीतमयूखपुत्रे चन्द्रेक्षित जीवगृहं प्रयाते ॥ ३२ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत बुधको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य लेखक्रिया में बड़ा चतुर, श्रेष्ठ संगति करनेवाला, साधु और मित्रोंका संग किये मुखी होता है ॥ ३२॥ अथ गुरुभवनस्थ बुधे भौमदृष्टिफलम् । परम्पराचोरवनस्थितानां स्युलेखका धान्यधनैविहीनाः। नरास्तु नीहारकरप्रस्तौ जीवालये मंगलदृष्टदेहे ॥ ३३ ॥ जिन मनुष्योंके जन्मकालमें धन मीन राशिगत बुधको मंगल देखता हो वे मनु 'प्य बाप दादेसे लेकर चोर होते हैं और वनमें रहते हैं और उनके नाम राजमें लिखे जाते हैं और अन धनसे रहित होते हैं ।। ३३ ।। अथ गुरुभवनस्ये बु गुरुदृष्टिफलम् । विज्ञानशाली स्वकुलावतंसो नृपालकोशालयलेखकर्ता । भर्ता बहूनां मनुजस्तु सौम्ये जीवेक्षिते जीवगृह प्रयाते ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिम अध बैठा हो उसको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य ज्ञानवान अपने कुलमें शिरोमणि और राजाके खजाने में लिखनेवाला और बहुतजनोंका स्वामी होता है ॥ ३४ ॥ अथ गुरुभवनस्ये उधे शुक्रष्टिफलम् । भूपामात्यापत्यलेखाधिकारं चौर्यासक्तं सौकुमार्येण युक्तम् । द्रव्योपेत मानवं सोमसूनुर्जीवक्षस्थः शुक्रएः करोति ।। ३९॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें धन मीन राशिगत बुधको शुक्र देसवा हो वह मनुष्य रानाफा मन्त्री, लेखके अधिकारको मास, चोरोंमें आसक्त, मुकुमारता सहित और धनवान होता है ॥ ३५ ॥ अय गुरुभयनस्ये युधे शनिदृष्टिफलम् । बहनभोक्ता मलिनः कुवृत्तः कांतारदुर्गाचलवासशीलः। कार्योपयुक्तो न भवेन्मनुप्यो जीवतंगो ज्ञोऽर्कसुतेन दृष्टः॥३६|| भाषाटीकासहित । जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत बुधको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य बहुत अन्न खानेवाला, मलिन, दुष्टवृत्ति रखनेवाला, वन और पर्वतोंमें वास करनेवाला और कामके लायक नहीं होता है । ३६ ॥ अथ शन्यालयगे बुधे रविदृष्टिफलम् । प्रारब्धकार्याकलितप्रतापं सन्मल्लविद्याकुशलं कुशीलम् । कुटुम्बिनं संजनयेन्मनुष्यं बुधः शनिक्षेत्रगतोऽर्कदृष्टः ॥ ३७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत बुधको सूर्य देखता हो वह मनुष्य अपने प्रारब्ध करके प्रतापसहित, श्रेष्ठ मल्लविद्यामें कुशल, दुष्टशील और कुटुम्बी होता है ॥ ३७॥ अथ शन्यालयगे बुधे चंद्रदृष्टिफलम् । जलोपजीवी धनवांश्च भीरुः प्रसूनकन्दोद्यमतत्परश्च । पुमान्भवेदानुसुतालयस्थे बुधे सुधारश्मिनिरीक्ष्यमाणे ॥३८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभराशिमें बुध बैठा हो, उसको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य जलसम्बन्धी कार्यसे आजीविका करनेवाला, धनवान, डर- पोक तथा फूल और कंदकरके उद्यम करनेवाला होता है ॥ ३८ ॥ अथ शन्यालयगे बुधे भौमदृष्टिफलम् । जीडालसस्तब्धतरस्वभावः सौम्यः सुखी वाक्चपलोऽर्थयुक्तः। स्यान्मानवोभानुसुतक्षसंस्थे दृऐऽजसूनौ क्षितिनन्दनेन ॥३९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत बुधको मंगल देखता हो वह मनुष्य लज्जा और आलस्य करके सहित, कड़े स्वभाववाला, सौम्यमूर्ति, सुखी, चप- लवाणी बोलनेवाला और धनवान होता है ।। ३९ ॥ अथ शन्यालयगे बुधे गुरुदृष्टिफलम् । धान्यवाहनधनान्वितः सुखी ग्रामपत्तनपतिर्महामतिः। भानुसूनुभवनेऽब्जनंदने देवदेवसचिवेक्षिते नरः ॥ ४० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत बुधको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य अन्न और वाहन तथा धनकरके सहित, सुखी, ग्राम और नगरका स्वामी तथा बडा बुद्धिमान होता है ॥ ४० ॥ अप शन्यालयगे बुधे भूगुदृष्टिफलम् । बहुप्रजासंजनकं कुरूपं प्राज्ञोज्झितं नीचजनानुयातम् । कामाधिकं संजनयेन्मनुष्यं शुक्रेक्षितोज्ञशनिगेहसंस्थः ॥४१

जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत बुधको शुक्र देखता हो वह मनु-
प्य बहुत संतानका पिता, कुरूप, चतुरतारहित, नीचजनोंका सायी और अधिक
कामी होता है ॥४१॥
अथ शन्यालयगे बुधे शनिदृष्टिफलम् ।
सुखोज्झितं पापरतं च दीनमकिंचनं हीनजनानुयातम् ।
करोति मर्त्यः शनिधामसंस्थःसौम्यस्तमोहंतृसुतेन दृष्टः॥४२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भराशिगत बुधको शनैश्चर देखता हो वह
मनुष्य सुखरहित, पापमें तत्पर, दीन, धनरहित और हीनजनोंका संग करनेवाला
होता है ॥ ४२ ॥
इति मेषादिराशिगे बुधे ग्रहदृष्टिफलम् ।
अथ मेपादिराशिगे गुरौ ग्रहाष्टफलमू-
तत्र भीमःगे गुरौ विदृष्टिफलम् ।
असत्यभीरुबहुधर्मकर्ता ख्यातश्च सद्भाग्ययुतो विनीतः।
भवेन्नरो देवगुरौ प्रयाते भीमस्य गेहे रविहएदेहे ॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत बृहस्पतिको सूर्य देखता हो
वह मनुष्य असत्यसे डरनेवाला, बहुत धर्म करनेवाला, विख्यात, श्रेष्ठ भाग्यसहित
और नम्र होता है ॥१॥
अथ भामर्थगे गुरौ चन्द्रदृष्टिफलम।
ख्यातो विनीतो वनितानुयातः सतां मतो धर्मरतः प्रशांतः ।
जातो भवेद्भूमिसुतक्षयाते वाचां पतो शीतकरण दृष्टे ॥२॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिमें वृहस्पति बैठा हो और चन्द्रमा
करके दृष्ट हो वह मनुष्य प्रसिद्ध, नम्रतासहित, स्त्रीका प्यारा, श्रेष्ठ पुरुपोंकी सलाइ
लेनेवाला, धर्ममें तत्पर और शंतस्वभाव होता है ॥२॥
अथ भीमदंगे गुरौ भौमदृष्टिफलम् ।
क्रूरोऽतिधूतः परगर्वहर्ता नृपाश्रयाज्जीवनवृत्तिकर्ता ।
भर्ती बहूनां ननु मानवः स्याज्जीवे कुजः च कुजेन दृष्टे ॥ ३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत वृहस्पतिको मंगल देसता हो
वह मनुष्य कूर, वडा धूर्त, दूसरोंके अभिमानको नष्ट करनेवाला, राजाके आश्रयमे
आजीविका करनेवाला और बहुत मनुष्योंका स्वामी होता है ॥ ३ ॥

भापाटीकासहित ।
(१५९)
अथ भौमसंगे गुरौ बुधदृष्टिकलम् ।
सद्वृत्तसत्योत्तमवाग्विहीनश्छिद्रप्रतीक्षी प्रणयानुयातः ।
मयो भवेत्कैतवसंप्रयुक्तो वाचस्पती भौमगृहे ज्ञहण्टे ॥ ४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत वृहस्पतिको बुध देखता हो वह
मनुष्य सदाचार और सत्य उत्तमवाणी करके रहित. दूसरेका छिद्र देखनेवाला,
नम्र मनुष्योंका साथी और धूर्त होता है ॥ ४ ॥
अथ भौमर्शगे गुरौ भृगुदृष्टिफलम् ।
गन्धमाल्यशयनासनभूपायोपिदम्बरनिकेतनसौख्यम् ।
संप्रयच्छति नृणां भृगुणा चेदीक्षितः सुरगुरुः कुजसंस्थः ॥५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत बृहस्पतिको शुक देखता हो वह
मनुष्य गंध, माला, शय्या, भोजन, आभूपण, स्त्री, वस्त्र, स्यान इन सब चीजोंके
सौख्यको पाता है ॥ ५॥
अय भौमरंगे गुरौ शनिदृष्टिफलम् ।
लुब्धं रौद्र साहसः संयुतं च मित्रापत्योद्भूतसौख्योज्झितं च।
कुर्यान्मन्वे निष्ठुरं देवमन्त्री धात्रीपुत्रक्षेत्रगो मन्ददृष्टः ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप, वृश्चिक राशिगत वृहस्पतिको शनैश्चर देखता
हो वह मनुष्य लोभी मूर, हठसहित, मित्र और संतानके सुखसे रहित और सलाह
करनेमें कठोर होता है ॥६॥
अथ शुक्रः गुरौ रविदृष्टिफलम् ।
संगराप्तविजयं क्षतगात्र सामयं च बहुवाहनभृत्यम् ।
मंत्रिणं हि कुरुते सुरमंत्री दैत्यमंत्रिग्रहगो रविदृष्टः ॥७॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृष तुला राशिमें वृहस्पति बैठा हो और सूर्यसे दृष्ट
हो वह मनुष्य युद्धमें जयको माप्त, घावसहित, शरीररोगसहित, बहुत वाहन और
नाफरोंवाला राजाका मन्त्री होता है ॥७॥
अय शुभ गुरी चंदृष्टिफलम् ।
सत्येन युक्तं सततं विनीतं परोपकाराभिरतं सुचित्तम् ।
सद्भाग्यमानं कुरुते मनुष्य जीवः सितःऽमृतरश्मिदृष्टः॥ ८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूप तुला रामिगत बृहस्पतिको चंद्रमा देखता दो वह
मनुष्य सत्यसहित, निरन्तर नम्रतायुक्त, पराया उपकार करनेवाला और श्रेष्ठ चित्त
व श्रेष्ठ भाग्यवाला होता हे ॥ ८॥

(१६०)
जातकाभरण।
अथ शुक्रः गुरौ भौमदृष्टिफलम् ।
भाग्योपपन्नं सुतसौख्यभाजं प्रियंवदं भूपतिलब्धमानम् ।
नरं सदाचारपरं करोति भौमेक्षितज्यो भृगुजालयस्थः ।।९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुलाराशिगत बृहस्पतिको मंगल देखता हो वह
मनुष्य भाग्यसहित, पुत्रसौख्यको प्राप्त, मीठी वाणी बोलनेवाला, राजा करके प्राप्त
किया है मान जिसने और हमेशा आचारसहित होता है ॥९॥
अथ शुक्रबै गुरौ बुधदृष्टिफलम् ।
सन्मन्त्रविद्यानिरतं नितांतं भाग्यान्वितं भूपतिलब्धवित्तम् ।
चञ्चत्कलाझं पुरुपं प्रकुर्याद्गुरु गुक्षेत्रगतो ज्ञदृष्टः॥ १० ॥ .
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुलाराशिमें बृहस्पति बुध करके दृष्ट हो वह
मनुष्य श्रेष्ठ मंत्र और श्रेष्ठ विद्यामं तत्पर, नितांत भाग्यसहित, राजासे धन प्राप्त
करनेवाला, मुन्दर और कलाओंका जाननेवाला होता है ॥ १० ॥
अथ शुक्रः गुरौ भृगुदृष्टिफलम् ।
धनान्वितं चारुविभूपणाढयं सद्वृत्तचित्तं विभवैः समेतम् ।
करोति मर्त्य सुरराजमन्त्री शुक्रालयस्थो भृगुसूनुदृपः ॥११॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृपतुलाराशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखता हो वह
मनुष्य धन और भूपणसहित, श्रेष्ठ वृत्ति चित्त जिसका और ऐश्वर्यवान होता है।११॥
अथ शुक्रः गुरौ शनिदृष्टिफलम् ।
सत्पुत्रदारादिसुखैरुपेतं प्राझं पुरग्रामभवोत्सवाढयम् ।
नरं प्रकुर्याचतुरं सुरेज्यो दैत्येज्यभस्थोऽर्कसुतेन दृष्टः ॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत वृहस्पतिको शनैश्चर देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ पुत्र श्रेष्ठ स्त्रियोंके मुखकरके सहित, चतुर, नगर और ग्राममें
उत्सव करके सहित और चतुर होता है ॥ १२ ॥
अथ बुधः गुरौ रविदृष्टिफलम् ।
सत्पुजदारं धनमित्रसौख्यं श्रेष्ठप्रतिष्ठाप्तविराजमानम् ।
नरं प्रकुर्यात्सुरराजमन्त्री रविप्रदृष्टो बुधवेश्मसंस्थः ॥ १३ ।।
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मिथुन कन्याराशिगत बृहस्पतिको सूर्य देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ पुत्र और स्त्री, धन तथा मित्र सौख्यसहित, श्रेष्ठ प्रतिष्ठाको प्रार
शोभायमान होता है ॥ १३ ॥

भाषाटीकासहित ।
(१६१)
अथ बुधः गुरौ चन्द्रदृष्टिफलम्।
गुणान्वितं ग्रामपुरोपकारं विराजमान बहुगौरवेण ।
कुर्यानरं देवगुरु धर्मसंस्थो निशानाथनिरीक्ष्यमाणः ॥ १४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत वृहस्पति चन्द्रमा करके दृष्ट हो
वह मनुष्य गुणोंसे युक्त, ग्राम और नगरोंमें उपकार करनेवाला, बहुत गौरवसे
शोभायमान होता है ॥ १४ ॥
अथ बुधः गुरी भौमदृष्टिफलम् ।
संग्रामसंप्राप्तजयं क्षताङ्गं धनेन सारेण समन्वितं च ।
करोति जातं विवुधेन्द्रमन्त्री बुधालयस्थः क्षितिसूनुदृष्टः ॥१५॥
जिस मनुष्यके जन्मफालमें मिथुन कन्या राशिगत वृहस्पतिको मंगल देखता
हो तो वह मनुष्य संग्राममें जय पाता है और घावसहित देहवाला, धन तथा परा-
क्रमसे संपन्न होता है ॥ १५॥
अथ बुधः गुरौ बुधदृष्टिफलम् ।
सन्मित्रदारात्मजवित्तसौख्यो दक्षो भवेज्ज्योतिपशिल्पवेत्ता ।
स्याचारुभापी पुरुपः प्रकामं जीवे बुधः च बुधन दृष्टः ॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत बृहस्पतिको बुध देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ट और स्त्री पुत्र धन सौख्यसहित, चतुरं, ज्योतिष और शिल्पशा-
खका जाननेवाला और ययेष्ट मुन्दर वाणी बोलनेवाला होता है ।। १६ ॥
अय बुधलं गुरी भृगुदृष्टिफलम् ।
धनाङ्गनासूनुसुखरुपेतः प्रसादवापीकृषिकर्मचित्तः ।
भवेत्प्रसन्नः पुरुपः सुरेज्ये दैत्येज्यदृष्टे बुधवेश्मसंस्थे ॥ १७ ॥
जिस मनुष्य जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखना
हो वह मनुष्य धन और सी पुत्रोंके मुसमाहित, मकान, बावड़ी और खेतीय
काममें चित्त लगानेवाला, एवं प्रसन्नचित्तवाला होता है ॥ १७ ॥
अब मुझे गुरी गनिदृष्टिकलम ।
नरेंद्रसगौरवसंप्रयुक्तं नित्योत्सर्व पूर्णगुणाभिरामम् ।
नरं पुरग्रामपतिं करोति गुरुजगेहे शनिना प्रष्टः ॥ १८॥

(१६२) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत बृहस्पतिको शनैश्वर देखता हो तो वह मनुष्य राजा करके श्रेष्ठ गौरवको प्राप्त होता है और नित्य ही उत्सव सहित, गुणांसे पूर्ण, नगर तथा ग्रामोंका पति होता है ॥ १८ ॥ अथ कुलीरस्थे गुरौ रविदृष्टिफलम् । दारात्मजार्थोद्भवसौख्यहानि पूर्व च पश्चात्खलु तत्सुखानि । कुर्य्यानराणां हि गुरु सुराणां कुलीरसंस्थो रविणा प्रदृष्टः॥१९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बृहस्पतिको सूर्य देखता हो तो वह मनुष्य स्त्री, पुत्र और धन करके उत्पन्न सौख्यको पाहिले नाश करता है और पिछली अवस्था पूर्वोक्त पदार्थोंका सौख्य होता है ॥ १९ ॥ अथ कुलीरस्थे गुरी चन्द्रदृष्टिफलम् । नरेंद्रकोशाधिकृतं सुकांत सद्वाहनार्थादिसुखोपपन्नम् । सदृत्तचित्तंजनयेन्मनुष्यं कर्कस्थितेज्योशनिना हि दृष्टः॥२०॥ जिस मनुष्यफे जन्मकालमें फर्फराशिगत बृहस्पतिको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य राजाके खजानेका स्वामी, श्रेष्ठकांतिवाला, श्रेष्ठवाहन और धनके सुखस- हित, एवं श्रेष्ठवृत्तिमें चित्त लगानेवाला होता है ।॥ २० ॥ अथ कुलीरस्थे गुरौ भौमदृष्टिफलम् । कुमारदाराम्बरचारुभूपाविशेपभाजं गुणिनं च शूरम् । प्राज्ञ क्षताङ्गं कुरुतेमनुष्यंकर्कस्थितेज्योऽवनिजेन दृष्टः ॥२१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत बृहस्पतिको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य वालक और स्त्री तथा सुन्दर वस्त्र भूपणों से सम्पन्न, गुणरान, शूरवीर और प्रणरोगवाला होता है ॥ २१ ॥ अथ कुलीरस्थे गुरौ बुधदृष्टिफलम् । मित्राश्रयोत्पादितसर्वसिद्धिः सट्टत्तिबुद्धिर्विलसत्प्रतापः । मन्त्री नरः कर्कटराशिसंस्थे गीर्वाणवन्ये शशिसूनुदृष्टे ॥२२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें फर्कराशिगत वृहस्पतिको सुध देखता हो वह मनुष्य मित्रोंके आश्रयसे सर्वसिद्धियोंको प्राप्त करनेवाला, श्रेष्ठ वृत्तिवाला, श्रेष्ट बुद्धि, एवं बडे प्रतापवाला और राजाका मन्त्री होता है ।। २२ ।।

भापाटीकासहित।
वह्वङ्गनावेभवमङ्गनानां नानासुखानामुपलब्धयः स्युः।
कुलीग्याते वचसामधीशे निरीक्षिते दैत्यपुरोहितेन ॥२३ ।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखता हो तो वह
मनुष्य बहुत स्त्रियोंके वैभवको भोगनेवाला और स्त्रियोंके अनेक सौख्योंको प्राप्त
करता है ॥ २३ ॥
अथ कुलीरस्थे गुरी शनिदृष्टिफलम् ।
सम्मानभूपागुणचारुशीलः सेनापुरग्रामपतिर्नरः स्यात् ।
अनल्पजल्पः खलु कर्कटस्थे वाचस्पती सूर्यसुतेन दृष्टे ॥ २४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत वृहस्पतिको शनैश्चर देखता हो तो वह
मनुष्य सम्मान और भूपण तया गुणोंसे सम्पन्न, श्रेष्ट शीलवाला, फौज, नगर एवं
ग्रामका स्वामी और बहुत बोलनेवाला होता है ॥ २४ ॥
अथ सिंहस्ये गुरौ रविदृष्टिफलम् ।
व्ययान्वितं ख्यातमतीव धूत नृपाप्तवित्तं शुभकर्मचित्तम् ।
नरं प्रकुर्यात्सुरराजपूज्यः सूर्येण दृष्टो मृगराजसंस्थः ॥२५॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत बृहस्पतिको सूर्य देखता हो तो वह
मनुष्य खर्च करनेवाला, प्रसिद्ध, बड़ा धूर्त, राजासे धनलाम करनेवाला और शुभ
कर्ममें चित्त देनेवाला होता है ।। २५ ॥
अथ सिंहस्ये गुरौ चंद्रदृष्टिफलम् ।
प्रसन्नमृति गतचित्तशुद्धि स्त्रीहेतुसंप्राप्तधनं वदान्यम् ।
कुर्यात्पुमांस वचसामधीशः शशांकदृष्टः करिवैरिसंस्थः ॥ २६ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत बृहस्पतिको चंद्रमा देखता हो तो वह
मनुष्य प्रसन्नमूर्ति और चित्त शुद्धिसे हीन और स्त्रीके कारणसे धन लाभ करनेवाला
एवं दानी होता है ॥ २६ ॥
अय सिंहस्ये गुरी भीमदृष्टिफलम् ।
मान्यो गुरूणां गुरुगौरवेण सत्कर्मनिर्माणविधी प्रवीणः।
प्राणी भवेत्केसरिणि स्थितेऽस्मिन्गीर्वाणवंद्यऽवनिजेन दृष्टे ॥२७॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत वृहस्पतिको मंगल देखता हो वह
मनुष्य बड़े मान और बड़े गौरवकरके सहित और श्रेष्ठ यमके निर्माण करने
चतुर होता है ॥२७॥

जातकाभरण। अथ सिंहस्थे गुरौ बुधदृष्टिफलम् । गृहादिनिर्माणविधौ प्रवीणो गुणाग्रणीः स्यात्सचिवो नृपाणाम् । वाणीविलासे चतुरो नरः स्यासिहस्थिते देवगुरौ ज्ञदृष्टे ॥ २८ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत बृहस्पतिको बुध देखता हो वह मनुष्य मकानादिकोंके बनवानेके काममें चतुर, गुणोंमें अग्रणी, राजाका मन्त्री और वाणी विलासमें चतुर होता है ॥ २८॥ अथ सिंहस्ये गुरौ भृगुदृष्टिफलम् । भूमीपतिप्राप्तमहापदस्थः कांताजनप्रीतिकरो गुणज्ञः । भवेन्नरो देवगुरौ हरिस्थे निरीक्षिते चासुरपूजितेन ॥२९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य राजाके दिये हुए बड़े पदको पानेवाला, खियोंमें प्रीति करनेवाला और गुणोंका जाननेवाला होता है ॥ २९ ॥ अथ सिंहस्थे गुरौ शनिदृष्टिफलम् । सुखेन हीनं मलिनं सुवाचं कृशायटिं विगतोत्सवं च । करोति मयं मरुताममात्यः सिंहस्थितः सूर्यसुतेन दृष्टः ॥ ३० ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत वृहस्पतिको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य सुखकरके हीन, मलिन, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, दुर्बल देह और उत्सवरहित होता है ॥ ३०॥ अथ स्वगेहस्थे गुरी विदृष्टिफलम् । राज्ञा विरुद्धत्वमतीव नूनं सुहज्जनेनापि च वैमनस्यम् । शरद्गमः स्यानियतं नराणांजीवको स्वगृहं प्रयाते ॥ ३१॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत वृहस्पतिको सूर्य देखता हो वह मनुष्य राजाके अत्यन्त विरुद्ध, मित्रोंसे वर करनेशाला और वगै जिसके हमेशा रहते हैं ऐसा होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३१ ॥ अय स्वगेहस्ये गुगै चन्द्रष्टिफलम् । सुगर्वितं भाग्यधनाभिवृद्धया प्रियाप्रियत्वाभिमतं विशेषात् । करोति जातं सुखिनं विनीतं चन्द्रेक्षितो देवगुरुः स्वभस्थः ॥३२|| जिस मनुप्यके जन्मालमें धन मीन गागगन वृहस्पतिरो चंद्रया देखना हो वह मनुष्य भाग्य और धनवृद्धिमे अभिमान पात और मोफा प्याग, मुखयुत्ता और नम्रतासहित होता है ।। ३२॥ " भापाटीकासहित । अय स्वगेहस्थे गुरौ भौमष्टिफलम् । बणाङ्कितं सङ्गरकर्मदर्श हिंसापरं कातरस्वभावम् । परोपकाराभिरतं प्रकुर्याद्गुरुः स्वभस्थः क्षितिजेन दृपः॥३३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत वृहस्पतिको मंगल देखता हो वह मनुष्य फोडे करके अंकित, युद्धमें चतुर, हिंसा करनेवाला, क्रूर स्वभाव और पराये उपकार करनेवाला होता है ।। ३३ ॥ अथ स्वगेहस्ये गुरौ बुधदृष्टिफलम् । नृपाश्रयप्राप्तमहाधिकारी दाराधनैश्वर्यसुखोपपन्नः । परोपकारादरतैकचित्तो नरो गुरौ स्वःगते ज्ञहटे ॥ ३४॥ . जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत बृहस्पति बुध करके दृष्ट हो यह मनुप्य राजाके आश्रयसे बडे अधिकारको प्राप्त, स्त्री-ऐश्वर्य, धन, सुख सहित और परायेके उपकार एवं सम्मान करनेमें एकचित्त होता है ॥ ३४ ॥ अय स्वगेहस्ये मुरौ भृगुदृष्टिफलम् । सुखोपपन्नं सधन प्रसन्नं प्राज्ञ सदेश्चर्यविराजमानम् । नूनं प्रकुर्यान्मनुजं सुरेज्यो दैत्येज्यदृष्टो निजमंदिरस्थः॥३५॥ जिस मनुष्य के जन्मकालम धन मीन राशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखता हो वह मनुष्य मुखसे सम्पन्न, धनवान्, प्रसन्न, चतुर और हमेशा ऐश्वर्यसहित विराजमान रहता है।॥ ३५॥ अय स्वगेहस्ये गुरी शनिदृष्टिफलम् । पदच्युतं सौख्यसुतेविहीनं संग्रामसंजातपराभव च। करोति दीनं स्वगृहे सुरेज्या सूर्यात्मजेन पविलोक्यमानः।।३६।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत वृहस्पतिको दानेश्वर देखता हो वह मनुष्य अधिकारसे पतित, मुख और पुत्रोंसे रहित तया युद्ध में पराजयको प्राप्त होता है ।। ३६ ॥ अथ शनिक्षेत्रगते गुरी रविदृष्टिफलम् । प्रसन्नकांतिं शुभवाबिलास परोपकारादरतासमेतम् । कुले नृपालं कुरुते सुरेज्यो मंदालयस्थो यदि भानुदृष्टः॥३७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत वृहस्पतिको सूर्य देखता हो वह मनुष्य अमन कांतिमान, श्रेष्ठ वाणी चोलनेवाला, परापा उपारादरमे फरनेवाला और अपने गुलश पालम होता है॥ ३७ ।।

जातकाभरण। अथ शनिक्षेत्रगते गुरौ चन्द्रदृष्टिफलम् । कुलोदहस्तीवमतिः सुशीलो धर्मक्रियायां सुतरामुदारः। नरोऽभिमानी पितृमातृभक्तो जीवे शनिक्षेत्रगतेन्दुदृष्टे ॥३८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चरकी राशि १०।११ में बृहस्पति बैठा हो और चन्द्रमा करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य कुलको धारण करनेवाला, तीवबुद्धि, शीलवान, धर्मक्रिया करनेमें अत्यन्त उदार अभिमानी,माता और पिताका भक्त होता है।॥३८॥ अथ शनिक्षेत्रगते गुरौ भीमदृष्टिफलम् । स्यादर्थसिद्धिपतेः प्रसादात्कीर्तिः सुखानामुपलब्धिरेव । सुतौ सुरेज्येशनिमंदिरस्थे निरीक्ष्यमाणे धरणीसुतेन ॥३९॥ 'जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत बृहस्पतिको मंगल देवता हो वह मनुष्य राजाकी कृपासे धनकी मिद्धिको प्राप्त और सुखकी प्राप्ति करनेवाला होता है ३९ अथ शनिक्षेत्रगते गुरी बुधदृष्टिफलम् । शातं नितांत वनितानुकूलं धर्मकियाथै निरतं नितांतम् । करोति मत्यं मरुतां पुरोधा बुधेन दृष्टः शनिमंदिरस्थः॥४०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत वृहस्पतिको बुध देखता हो वह मनुष्य सदा शांत स्वभाववाला, निरन्तर स्त्रीके वशीभूत और धर्मक्रियाओंम अत्यन्त तत्पर रहता है ।। ४० ॥ अथ शनिक्षेत्रगते गुरौ भृगुदृष्टिफलम् । विद्याविवेकार्थगुणैः समेतः पृथ्वीपतिप्राप्तमनोऽभिलापः । स्यात्पुरुषः सूर्यसुतर्क्षसंस्थं जीवे प्रसूती भृगुजेन दृष्टे ॥४१॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत वृहस्पतिको शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य विद्या, विवेक, धन, एवं गुणोंसे सम्पन्न और राजा करके मनकी अभि- लापाको प्राप्त करता है ॥ ११ ॥ अथ शनिक्षेत्रगते गुरी शनिदृष्टिफलम् । कामं सकामं सुगुणाभिरामं सद्मार्थप्राप्ति धनधान्ययुक्तम् । ख्यातं विनीतं कुरुते मनुष्यं मंदेक्षितो मंदगृहस्थजीवः ॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत वृहम्पतिको गनेश्वर देखना हो तो वह मनुष्य कामनाको माप्त, श्रेष्ठ गुणामहित, मकान और अर्थकी प्राप्ति सहित धनधान्ययुक्त, प्रसिद्ध और नम्रतासहित होता है ॥ १२ ॥ इनि शनिक्षेत्रगते गुरी प्रहदृष्टिफटम् । 1

भापाटीकासहित।
(१६७)
अय मेपादिराशिगे भृगौ ग्रहदृष्टिफलम्-तत्रादौ .
भौमसंगते शुक्रे रविष्टिफलम् ।
कृपाविशेष नृपतेनितांतमतीव जायाजनितव्यलीकम् ।
कुर्य्यान्नराणां तरणिप्रष्टः शुक्रो हि वक्रस्य गृह प्रयातः॥१॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशिगत शुक्रको सूर्य देखता हो वह
मनुष्य विशेष करके निरन्तर राजाकी कृपावाला और अत्यन्त खी करके किये हुए
कपटसे दुःखी होता है ॥१॥
अय भौमर्शगते शुक्रे चन्द्राष्टिफलम् ।
श्रेष्ठप्रतिष्ठं चलचित्तवृत्तिं कामातुरत्वाद्विकृति प्रयातम् ।
करोति मत्यै कुजगेहयातौ भृगोः सुतः शीतकरण दृष्टः ॥२॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शुक्रको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य
श्रेष्ठ प्रतिष्ठावाला,चश्चलचित्तवृत्तिवाला और कामातुरतासे विकारको प्राप्त होता है २
अथ भौमसंगते शुके भौमदृष्टिफलम् ।
धनेन मानेन सुखेन हीन दीनं विशेषान्मलिनं करोति ।
नूनं धरित्रीतनयालयस्थः शुक्रो धरित्रीतनयेन दृष्टः ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शुक्रको मंगल देखता हो वह
मनुष्य धन, मान और सुख करके रहित, विशेष दीन और निश्चित रूपसे मलिन
होता है ।। ३॥
अय कुजगते शुक्रे बुवाष्टफलम् ।
अनार्यमर्थात्मजनैविहीनं स्वबुद्धिसामर्थ्यपराङ्मुखं च ।
क्रूरं परार्थापहरं नरं हि करोति शुक्रः कुजमे ज्ञहटः ॥ ४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशिगत शुक्रको बुध देखता हो वह
मनुष्य खोटा और धन तथा अपने सम्बन्धियोंसे रहित, अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से
रहित, क्रूर और पाये धनको हरनेवाला होता है॥४॥
अय भौमगते शुके गुरुष्टिफलम् ।
कलत्रपुत्रादिसुखैः समेत सत्कायकांति सुतरां विनीतम् ।
उदारचित्तं प्रकरोति मत्य जीवेशितो दैत्यगुरुः कुजः ॥५॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शुरुको वृहस्पति देखता हो
वह मनुष्य स्त्री और पुत्रादिकोंके मुखसहित, श्रेष्ठ देह, शोभायमान, निरन्तर नम्रता
सहित और उदार चित्तवाला होता है ॥ ५॥

.
(१६८),
जातकाभरण।
अथ भौमसंगते शुक्रे शनिदृष्टिफलम् ।
सुगुप्तवित्ताभिनतं प्रशांत मान्यं वदान्यं स्वजनानुयातम् ।
करोति जात क्षितिपुत्रगेहे संस्थः सितो भानुमतेन दृष्टः ||६||
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो वह
मनुष्य गुप्तधनवाला, शान्तस्वभाव, माननीय, बहुत दान देनेवाला और अपने
अनोंकी सम्मात सहित होता है ॥ ६॥
अथ स्वगेहगते शुक्रे रविदृष्टिफलम् ।
वराङ्गन्नाभ्यो धनवाहनेभ्यःसुखानि नूनं लभते मनुष्यः ।
प्रसूतिकाले निजवेश्मयाते सिते पतङ्गेन निरीक्ष्यमाणे ॥ ७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत शुक्रको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
श्रेष्ठ स्त्रियों करके तथा धन वाहनों करके निश्चय मुखको प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
अथ स्वगेहगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
विलासिनीकेलिबिलाससक्तः कुलाधिपालोऽमलवुद्धिशाली।
नरःसुशीलःशुभवाग्विलासःस्वीयालयस्थेस्फुजितीन्दुहृष्टे ॥८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुलाराशिगत शुक्रको चन्द्रमा देखता हो वह
मनुष्य वेश्याओंके विलासमें आसक्त, अपने कुलका पालनेवाला, निर्मल बुद्धिवाला,
मुशील और श्रेष्ठ वाणीके बोलनेमें चतुर होता है ॥ ८ ॥
अय स्वगेहगते शुक्र भीमदृष्टिपालम् ।
गृहादिसौख्योपहतं नितांतं बलिप्रसंगाभिभवोपलब्धिम् ।
कुर्य्यान्नराणां दनुजेंद्रमन्त्री स्वक्षेत्रसंस्थः क्षितिपुत्रदृष्टः ॥९॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृप तुलाराशिगत शुक्रको मङ्गल देखता हो तो वह
मनुष्य गृहादि सौख्यासे रहित और लड़ाई में अपमानको माप्त होता है ॥९॥
अय स्वक्षेत्रगते शुक्रे बुधाष्टफलम् ।
गुणाभिरामं सुभगं प्रकामं सौम्यं सुसत्त्वं धृतिसंयुतं च ।
स्वक्षेत्रगो देत्यगुरुः प्रकुन्निरं तुपारांशुसुतेन दृष्टः ॥१०॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृप तुलाराशिगत शुक्रको बुध देना हो तो
वह मनुष्य गुणवान, यथेष्ट मुन्दर, सौम्यस्वभाववाला, बलवान् और पर्य
सहित होता है ॥ १०॥

भापाटीकासहित ।
अथ स्वक्षेत्रगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
सद्धाहनानां गृहिणीगुणानां सुमित्रपुत्रद्रविणादिकानाम् ।
करोति लब्धि निजवेश्मयाते भृगोः सुते भानुसुतेन दृष्टे ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत शुक्रको बृहस्पति देखता हो तो
वह मनुष्य श्रेष्ठ वाहन और स्त्री तथा गुण, श्रेष्ठ मित्र धनादिक सम्पूर्ण वस्तुओंको
प्राप्त करता है ।॥ ११ ॥
अथ स्वक्षेत्रगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् ।
गदाभिभूतोहतसाधुवृत्तःसौख्यार्थहीनो मनुजोऽतिहीनः।
भवेत्प्रसूतौ निजवेश्मयाते भृगोः सुते भानुसुतेन दृष्टे ॥ १२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृष तुला राशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो वह
मनुष्य रोगी, साधुवृत्तिसे हीन, सौख्य और धनहीन होता है ॥ १२ ॥
अथ बुधवेश्मगते शुक्रे रविदृष्टिफलम् ।
नृपावरोधाधिकृतं विनीतं गुणान्वितं शास्त्रकृतप्रवेशम् ।
कुर्यानरं दैत्यगुरुः प्रसृतौ सौम्यक्षसंस्थो रविणा प्रदृष्टः॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको सूर्य देवता हो वह
मनुष्य राजाके रनवासकी ड्योढ़ीका अफसर, नम्रतासाहत, गुणयुक्त और शास्त्रका
जाननेवाला होता है ॥ १३ ॥
अथ बुधवेश्मगते शुक्ने चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सदनवस्त्रादिसुखोपपन्न नीलोत्पलश्यामलचारुनेत्रम् ।
सुकेशपाशं मनुजं प्रकुर्यात्सौम्यक्षसंस्थो भृगुरिंदुष्टः॥ १४ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको चन्द्रमा देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ अन्न वस्त्रादि मुखसहित और नीलकमलके समान श्याम मुन्दर
नेत्रोंवाला और मुन्दर वालोवाला होता है ॥ १४ ॥
अथ बुधवेश्मगते शुक्रे भौमदृष्टिफलम् ।
भाग्यान्वितःकामविधिप्रवीणः कांतानिमित्तं द्रविणव्ययःस्यात्।
कुर्यात्नराणामुशनाः प्रकामं बुधसिंस्थः कुसुतेन दृष्टः ।।१५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको मंगल देखता हो
वह मनुष्य भाग्यसहित, कामकला, चतुर और वीके निमिच धनसा व्यप कर-.
नेवाला कामी होता है ॥ १५॥

जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्क रागिगत शुक्रको चन्द्रमा देवता हो वह मनुम्य
(१७०)
जातकाभरण.
अथ बुधवेश्मगते शुक्रे बुधदृष्टिफलम् ।
प्राज्ञं महावाहनवित्तवृद्धि सेनापतित्वं परिवारमौख्यम् ।
कुन्निराणामुशनाः प्रवीणं बुधर्मसंस्थश्च बुधेन दृष्टः ॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको बुध देखता हो वह
मनुष्य चतुर, बडा भारी वाहन और धनकी वृद्धिवाला, फौजका मालिक, परिवा-
रके सौख्यसहित और बुद्धिमान होता है ॥ १६ ॥
अथ बुधवेश्मगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
सद्बुद्धिवृद्धि हुवैभवाव्यः प्रसन्नचेताः सुतरां विनीतः।
मयों भवेत्सौम्यगृहोपयाते दृष्टे सिते देवपुरोहितेन ॥ १७ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको वृहस्पति देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धिवृद्धिसहित, बहुत वैभवसहित, प्रसन्नचित्त और निरंतर नम्र
होता है ॥ १७ ॥
अथ बुधवेश्मगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् ।
पराभिभूतं चपलं विविक्तं सुदुःखितं सर्वजनाज्झितं च ।
मत्यै करोत्येव भृगोस्तनूजः सोमात्मज: रविजेन दृष्टः ॥२८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो
वह मनुष्य अपमान करके सहित, चपल स्वभाव, अकेला, दुःखसहित और मनुः
प्योंसे त्यागा हुआ होता है ॥ १८॥
अथ कर्कराशिगते शुक्रे रविदृष्टिफलम् ।
सगेपयोपाकृतहर्पनाशः स्यात्पूरुपः शत्रुजनाभिभूतः ।
दैत्याचिते कर्कटराशियाते निरीक्षितेऽहपतिना प्रसूती ॥ १९ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें काशिगत शुक्रको सूर्य देखता हो वह मनुष्य ऋोष
करके स्वीकृत हर्पका नाश करनेवाला और वैरियों.करके पीडित होता है ॥ १९ ॥
अथ कर्कराशिगते शुके चन्द्रदृष्टिफलम ।
कन्याप्रजापूर्वकपुत्रलाभमम्बां सपत्नी बहुगीग्वाणि ।
कुन्निराणां हरिणादृष्टः कुलीरगो भागवतामधेयः ॥२०॥
गौरव
पहिले सड़की पीछेसे लडफा पदा करता है और विमात.वाला तथा वडा
शाली होता है ॥२०॥

भापाटीकासाहेत।
(१७१)
अथ कर्कराशिगते शुक्रे भौमदृष्टिफलम् ।
कलासु दक्षो हतशत्रुपक्षो बया च सौख्येन युतो मनुष्यः।
परंतु कांताकृतचिंतयातों भौमेक्षिते कर्कटगे सिते स्यात् ॥२१॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें कर्कराशिगत शुक्रको मंगल देखता हो वह मनुष्य
कलाओंमें चतुर, शधुओंका नाश करनेवाला, बुद्धि तथा सौख्य सहित और स्त्री
करके चिन्ताको प्राप्त होता है ॥ २१ ॥
अथ कर्कराशिगते शुके बुधदृष्टिफलम् ।
विद्याप्रवीणं गुणिनं गुणनं कलत्रपुत्रोद्भवदुःखतप्तम् ।
जनोज्झितंचापि करोति मर्त्य काव्यः कुलीरोपगतो ज्ञदृष्टः२२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शुकको बुध देखता हो वह मनुष्य
विद्यामें प्रवीण, गुणवान्, गुणोंका जाननेवाला, स्त्री पुत्रोंकरके अत्यंत दुःखसे संता-
पको प्राप्त और मनुष्योंसे त्यागा जाता है ।। २२ ॥
अथ कर्कराशिगते शुके गुरुदृष्टिफलम् ।
अतिचतुरमुदारं चारुवृत्तिं विनीत-
मतिविभवसमेतं यामिनीसूनुसौख्यम् ।
प्रियवचनविलासं मानुयं संविधत्ते
सुरपतिगुरुदृष्टो भार्गवः कर्कटस्थः ॥२३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शुक्रको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य
अत्यंत चतुर, उदार, सुन्दरवृत्तिवाला, नम्रतासहित, माति और वैभवसहित स्त्री
पुत्रोके सौख्यवाला और प्यारी वाणी बोलनेवाला होता है ॥ २३ ॥
अय कर्कराशिगत शुक्र शनिदृष्टिफमम् ।
सद्वृत्तसौख्योपहतं गतार्थ व्यर्थप्रयत्न वनिताजितं च ।
स्थानच्युतं संजनयेन्मनुष्य मंदेक्षितः कर्कगतः सिताख्यः२४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें कर्कराशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य
श्रेष्ठवृत्ति और सौरयरहित, धनहीन, व्यर्थ परिश्रम करनेवाला, स्त्री करके जीता गया
और स्थानसे पतित होता है |॥ २४॥
अय सिंहराशिगते गुके रविष्टिफलम् ।
स्पतिसंवदितचित्तवृत्तिः कांताश्रयोत्पन्नधनो मनुप्यः ।
कमेलकाधैर्यदि वा युतः स्यादक्षिते सिंहगते सितास्ये ॥२५॥

(१७२)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको सूर्य देखता हो वह मनुष्य स्प-
करके चित्तवृत्तिको बढानेवाला, स्त्रीके आश्रयसे धनको लाभ करनेवाला अथवा
ऊंट गधे घोडासे धन लाभ करता है ॥ २५ ॥
अथ सिंहराशिगते शुक्रे चंद्रदृष्टिफलम् ।
नूनं जनन्याश्च भवेत्सपत्नी पत्नीविरोधो विभवोद्भवश्च ।
यस्य प्रसूतौ दनुजेंद्रमन्त्री चन्द्रक्षितःसिंहगतो यदि स्यात्॥२६॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको चंद्रमा देखता हो उस मनु-
प्यकी माता दो होती हैं और वह स्त्रीसे विरोध करनेवाला तथा ऐश्वर्यसहित
होता है ॥ २६ ॥
अथ सिंहराशिगते शुक्र भीमदृष्टिफलम् ।
नृपप्रियं धान्यधनैरुपेतं कन्दर्पजातव्यसनाभिभूतम् ।
करोति मत्यै मृगराजसंस्थो भृगोस्तनजोऽवनिजेन दृधः॥२७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको मंगल देखता हो वह मनुष्य
राजाका प्यारा, अन्न धन सहित और कामकलाके व्यसनों सहित होता है ।। २७ ।।
अय सिंहराशिगते शुक्रे बुधदृष्टिफलम ।
धनान्वितं संग्रहचित्तपत्ति लुब्धं स्मराधिक्यविकारनिंद्यम् ।
दैत्येंद्रमन्त्री कुरुते मनुष्यं सिंहस्थितः सोमसुतेन दृष्टः ॥२८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको बुध देखता हो वह मनुष्य धन
सहित, संग्रह करनेमें चित्तवाला, लोभी और कामदेवकी अधिकतासे बुरे विकारोंको
प्राप्त होता है ।॥ २८॥
अप सिंहाशिगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
नरेंद्रमन्त्री धनवाहनाढयो बह्वङ्ग-नानन्दनभृत्यसौख्यः।
विख्यातकर्मा च भृगोस्तनूजे जीवेक्षिते सिंहगते नरः स्यात्
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको बृहसति देखता हो वह मनुष्य
• राजाका मन्त्री, धन बाहन सहित, बहुत स्त्री पुत्र नौकरोंके सौख्यवाला और प्रमिद
कामोंका करनेवाला होता है ॥ २९॥
अय सिंहराशिगते शुक्रे गानिदृष्टिफलम् ।
नृपोपपम सर्वसमृद्धिमाज दंडाधिकारेऽप्यथ वा नियुक्तम्
करोति मत्यै मृगराजवर्ती देत्याचितः सूर्यमुतेन दृष्टः॥ ३० ॥

भापाटीकासहित।
(१७३)
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य
राजाके समान सम्पूर्ण समृद्धियोंका भागी और फौजदारीके महकमेंका अफसर
होता है ।। ३० ॥
अथ गुरुगेहगते शुके रविष्टिफलम् ।
रौद्रं प्राझं भाग्यसौभाग्यभाजं सत्त्वोपेत वित्तवन्तं विशेषात् ।
नानादेशप्राप्तयानं मनुष्यं कुर्याच्छुको जीवमे भानुदृष्टः॥३१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शुक्र सूर्यसे दृष्ट हो वह मनुष्य क्रूर,
चतुर, भाग्य और सौभाग्यका भागी, वलसहित, विशेष धनवान और अनेक देशोंकी
यात्रा करनेवाला होता है ॥ ३१ ॥
अथ गुरुगेहगते शुक्र चंद्रदृष्टिफलम् ।
सद्राजमानेन विराजमान ख्यातं विनीतं बहुभोगयुक्तम् ।
धीरं ससारं हि नरं करोति भृगुरुक्षेत्रगतोऽजष्टः ॥ ३२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शुक्रको चन्द्रमा देखता हो वह
मनुष्य श्रेष्ठ राजमानसे विराजमान, प्रसिद्ध, नम्रतासहित, बहुत भोगसहित, धीर
और बलवान होता है ।॥ ३२ ॥
अथ गुरुगेहगते शुके भौमटाष्टिफलम् ।
द्विपामसा धनिनं प्रसन्न कांताकृतप्रेमभरं सुपुण्यम् ।
सद्वाहनाढ्यं कुरुते मनुष्यं भौमेक्षितेज्यालयगामिशुकः॥३३॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें धन मीन राशिगत शुक्रको मंगल देखता हो वह मनु-
ज्य वैरियोंको नहीं सहन होनेवाला, धनवान, प्रसन्न, स्वीकृत प्रेमसे सहित, श्रेष्ठ
पुण्यवान् और श्रेष्ठ वाहनों सहित होता है ॥ ३३ ॥
अय गुरुगेहगते शुक्रे बुधष्टिफलम् ।
सद्धाहनार्थीम्बरभूपणानां लाभ सदन्नानि सुखानि नूनम् ।
कुनिराणां गुरुमंदिरस्थो दैत्यार्चितः सोममुतेन दृष्टः॥३४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमे धन मीन राशिगत शुक्रको बुध देखता हो वह मनुष्य
श्रेष्ठ वाहन, धन, वस्त्र, आभूपणका लाभ करनेवाला और श्रेष्ट अनोफे सुखसहित
होता है ॥ ३४॥
अथ गुरुगेहगते शुक्रे गुरुदृष्टिफलम् ।
तुरंगहेमाम्बरभूपणानां महागजानां वनितासुखानाम् ।
करोत्यवाप्ति भृगुजः प्रसूतौजीवेक्षितो जीवगृहाश्रितश्च ॥३५॥

(१७५)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शुक्र वृहस्पतिसे दृष्ट हो वह मनुष्य
'घोडे, सोना, वस्त्र,आभूषण, बडे हाथी और स्त्रियोंके सुखोसहित होता है ॥ ३५ ॥
अय गुरुगेहगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् ।
सद्भोगसौख्योत्तमकर्मभानं नित्योत्सवोत्कर्पयुतं सुवित्तम् ।
करोति मर्त्य गुरुगेहयातो दैत्यार्चितो भानुसुतेक्षितश्च ।। ३६ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शुक्रको सूर्य देखता हो वह मनु-
'प्य श्रेष्ठ भोग, उत्तम सौख्य और कर्मोंका भागी, नित्य उत्सवसहित और बड़े
धनवाला होता है ॥ ३६॥
अथ शनिक्षेत्रगते शुक्रे रविष्टिफलम् ।
स्थिरस्वभावं विभवोपपन्ने महाधनं सारविराजमानम् ।
कांताविलासैः सहितं प्रकुर्याद भृगुः शनिक्षेत्रगतोऽदृष्टः॥३७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको शनि देखता हो वह
मनुष्य स्थिर स्वभाववाला, वैभवसहित, मणियुक्त, वलसे विराजमान और स्त्रीके
'विलासों सहित होता है ।। ३७॥
अथ शनिक्षेत्रगते शुक्रे चन्द्रदृष्टिफलम् ।
ओजस्विनं चारुशरीरयष्टिं प्रकृष्टसत्त्वं धनवाहनाढयम् ।
करोति मत्य शनिगेहयातो भृगोः सुतःशीतकरण दृष्टः॥३८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको चन्द्रमा देखता हो कर
•मनुष्य ओजस्वी,सुन्दर शरीरवाला,बडा बलवान,धन और वाहनों सहित होता है।८
अथ शनिक्षेत्रगते शुक्रे भीमदृष्टिफलम् ।
श्रमामयाभ्यामतितप्तमूर्तिमनर्थतोऽर्थक्षतिसंयुतं च ।
कुर्यानरं दानवराजपूज्यः कुजेक्षितः सूर्यसुतालयस्थः॥ ३९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको शनैश्वर देखता हो वह
मनुष्य श्रम और रोगसे अत्यन्त तमस्वरूपवाला और अनर्यसे धनका नाश करने
घाला होता है ॥ ३९ ॥
अय शनिक्षेत्रगते शुक्रे बुधदृष्टिफलम् ।
विद्विधिज्ञ धनिन सुतुष्टं प्राज्ञ सुसत्त्वं बहुलप्रपंचम् ।
सदाग्विलासं मनुज प्रकुर्याद भृगुः शनिक्षेत्रगतो ज्ञहः॥४०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको चुप देखता हो कर
मनुष्य पंडितोंकी विधिका जाननेवाला, धनी, मनुष्ट, चतुर, वलमहित, बडा प्रपंची
और श्रेष्ठ वाणीका विलास करनेवाला होता है ॥ १० ॥

भापाटीकासहित । (१७५) अथ शनिक्षेत्रगते शुके गुरुदृष्टिफलम् । सनन्धमाल्यांबरचारुवायसंजातसंगीतमचिः शुचिश्च । स्यान्मानवो दानवराजपूज्ये सुरेज्यदृष्टे शनिमन्दिरस्थे॥४१॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको बृहस्पति देखता हो. वह मनुष्य श्रेष्ठ गंध, माला, वस्त्र, सुन्दर बाजे सहित संगीतविद्याका जाननेवाला और पवित्र होता है ॥४१॥ अथ शनिक्षेत्रगते शुक्र शनिदृष्टिफलम् । प्रसन्नगात्रं च विचित्रलाभ धनाङ्गनावाहनसूनुसौख्यम् । कुर्य्यान्नरं दानववृन्ददेवो मन्देशितो मन्दगृहाधिसंस्थः॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शुक्रको शनैश्चर देखता हो वह मनुष्य प्रसन्न देह, अनेक वस्तु लाभ करनेवाला, धन और स्त्रीपुत्रोंके सौख्य- सहित वाहनवाला होता है ॥ ४२ ॥ इति मेषादिराशिगते शुक्र ग्रहदृष्टिफलम् । अथ भीमालयस्ये शनौ रविदृष्टिफलम् । लुलायगोजाविसमृद्धिमाज कृपिक्रियायां निरतं सदैव । सत्कर्मसक्तं जनयन्मनुष्यं भौमालयस्थः शनिरकदृष्टः ॥१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको सूर्य देखता हो वह मनुष्य भैंसे, गैया, बकरी, भेडकी समृद्धिवाला, खेतीके काममें हमेशा तत्पर और श्रेष्ठ कर्ममें आसक्त होता है ॥ १॥ अथ भौमालयस्थे शनी चन्द्रदृष्टिफलम् । नीचानुयात चपलं कुशीलं खलं सुखाथैः परिवर्जितं च । कुर्यादवश्य रविजो मनुष्यं शशीक्षितो भूसुतवेश्मसंस्थः ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य नीचोंकी संगतिवाला, चपल, दुष्टशील, खल, सुख और धनरहित होता है ॥२॥ अय भौमालयस्ये शनीभीमदृष्टिफलम् । अनल्पजल्पं गतसत्पराथै कार्यक्षति यातविशेपवित्तम् । करोति जातं ननु भानुसूनुः कुजेन दृष्टः कुजवेश्मसंस्थः ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको मङ्गल देखता हो

(१७६)
जातकाभरण।
वह मनुष्य बहुत बोलनेवाला, पर सम्पदासे रहित, कार्य नाश करनेवाला और
विशेष धनहीन होता है ॥३॥
अय भौमालयस्ये शनौ बुधदृष्टिफलम् ।
चौर्यकर्मकलहादितत्परं कामिनीजनगतोत्सवं नरम् ।
ज्ञेक्षितो हि कुरुतेऽर्कनन्दनो भूमिसुनुभवनाधिसंस्थितः ॥४॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेष वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको बुध देखता हो वह
मनुष्य चोरी करनेवाला, कलहम तत्पर, स्त्री और उत्सव रहित होता है ॥ ४ ॥
अय भौमालयस्ये शनों गुरुदृष्टिफलम् ।
सुखधनैः सहितं नृपमन्निणं नृपसमाश्रितमुख्यतयान्वितम् ।
सुरपुरोहितवीक्षितभानुजोऽवनिजवेश्मगतः कुरुते नरम् ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको बृहस्पति देखता हो
वह मनुष्य मुख और धनकरके सहित, राजाका मन्त्री और राजाके आश्रयकरके
मुल्यताको प्राप्त होता है ॥५॥
अथ भौमालयस्थे शनी भृगुष्टिफलम् ।
बहुप्रयाणाभिरत विकांति पापाङ्गनासक्तनति विचित्तम् ।
करोति मर्त्य क्षितिजालयस्थो भानोस्तनूजो भृगुजेन दृष्टः॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिगत शनैश्चरको शुक्र देखता हो वह
मनुष्य बहुत यात्रा करनेवाला, कांतिरहित, पापिनी स्त्री आसक्त और बुद्धि करफे.
दुःखी होता है ॥६॥
अथ भृगुजालयस्थे शनी रविष्टेफलम् ।
विद्याविचारे प्रचुरोऽतिवक्ता परान्नभोक्ता विधनश्च शांतः
भवेन्नरस्तिग्मकरेण दृष्टे सूर्यात्मजे भार्गववेश्मसंस्थे॥ ७ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृप तुलाराशिगत शनैश्वरको सूर्य देखता हो वह
मनुष्य विद्याफे विचार अधिक, बड़ा वक्ता, पराया अन्न खानेवाला, धनहीन
और शांत होता है ॥ ७ ॥
अय भृगुजालयस्ये शनी चन्द्रदृष्टिफलम् ।
नृपप्रमादाप्तमहाधिकारं योपाविभूपाम्बरजातसौख्यम् ।
बलान्वितं सजनयेन्मनुष्यं मन्दः सितः हरिणांकष्ट ॥८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत शुकको गनेश्वर देखता हो वह
मनुष्य राजाको कृपासे बडे अधिकारको प्राप्त, स्त्री और भूषण तथा बाँके
सोल्यको मात और वलवान होता है।॥ ८॥

-
धन-
भाषाटीकासहित ।
अय भृगुजालयस्ये शनी भीमदृष्टिफलम् ।
संग्रामकार्यामिरतं नितांतमनल्पजल्प च महत्प्रसादम् ।
कुर्यानरं तिग्मकरस्य सूनुर्भूमूनुदृष्टोः भृगुजालयस्थः ॥ ९ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृष तुला राशिगत शनैश्चरको मंगल देखता हो तो
वह मनुष्य युद्धके काममें तत्पर, निरंतर बहुत बोलनेवाला और बड़ी कृपावाला
होता है।॥९॥
अथ भृगुजालयस्थे शनी बुधदृष्टिफलम् ।
कांतारतो नीचजनानुयातो विनोदहास्याभिरतो गतार्थः ।
क्लीवादिसख्यश्च भवेन्मनुष्यः शनौ सितः शशिसूनुदृष्टे।।३०॥
जिस मनुष्यके जन्मकारमें वृप तुला राशिगत शनैश्चरको बुध देखता हो तो वह
मनुष्य स्त्रीमें आसक्त, नीचपुरुषोंका साथी, विनोद और हास्यको करनेवाला,
हीन और हिजडासे मित्रता करनेवाला होता है ॥ १० ॥
अथ भृगुजालयस्थे शनी गुरुदृष्टिफलम् ।
परोपकारे कृतचित्तवृत्तिः परस्य दुःखेन सुदुःखितश्च ।
दातोद्यमी सर्वजनप्रियश्च मन्दे सितः गुरुणा प्रदृष्टे ॥११॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृप तुला राशिगत शनैश्चरको बृहस्पति देखता हो
वह मनुष्य पराये उपकारमें चित्त करनेवाला, परापे दुःख करके आप दुःखी. दाता
एवं समस्त प्राणियोंको मिय और उद्यमी होता है ॥ ११ ॥
अथ भृगुजालयस्थे शनी भृगुदृष्टिफलम् ।
रत्नादिलामं वनिताविलासं जलाधिकत्वं नृपगौरवाप्तिम् ।
कुर्यान्नराणां तरणेस्तनूजः शुक्रेक्षितः शुक्रगृहं प्रयातः ॥१२॥
जिस मनुष्य जन्मकालमें वृप तुला राशिगत शनैश्वरको शुक्र देखता हो तो
वह मनुष्य रत्नादिपदार्थीका लाभ करनेवाला, खोके विलासमें आसक्त, पानीकी
अधिकतावाला और राजाकरके गौरवको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥
अथ बुधबै शनौ रविदृष्टिकलम् ।
सुखोज्झितं नीचरतं सकोपमधार्मिकं द्रोहकरं सुधीरम् ।
कुर्यानरं तिग्मकरस्य सूनुर्भानुमदृष्टो बुधमंदिरस्थः ॥ १३ ॥
जिम मनुष्य के जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शनैश्चर बैठा हो व उसको
सूर्य देखता हो तो वह मनुष्य मुखरहित, नीचोंकी संगति करनेवाला, कोथी, अधमी
एवं वर करनेवाला और धैर्यवान होता है ॥ १३ ॥

(१७८) जातकाभरण। अथ बुधक्षं शनौ चन्द्रदृष्टिफलम् । प्रसन्नमूर्तिपतिप्रसादात्प्राप्ताधिकारोन्नतिकार्यवृत्तिः । कांताधिकारोयदि वानर स्यान्मन्दे ज्ञभस्थेऽमृतरश्मिदृष्टे॥१४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्याराशिगत शनैश्चरको चन्द्रमा देखता हो तो वह मनुष्य प्रसन्नमूर्ति राजाकी कृपाकरके अधिकारको प्रास, ऊंचे कार्योंमें वृत्ति करनेवाला और खियोंका अधिकारी होता है ॥ १४॥ अथ बुधः शनी भौमदृष्टिफलम् । प्रकृष्टवुद्धिं सुतरां विधिज्ञ ख्यातं गभीरं च नरं करोति । सोमात्मजक्षेत्रगतोऽर्कसूनुभूसूनुदृष्टः परिसूतिकाले ॥ १५ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्याराशिगत शनैश्चरको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य बडा बुद्धिमान, अतिशय विधिका जाननेवाला, प्रसिद्ध व गम्भीर होता है ॥ १५॥ अथ बुधः शना बुधदृष्टिफलम् । धनान्वितं चारुमति विनीतं गीतप्रियं सङ्गरकर्मदक्षम् । शिल्पेऽप्यभिज्ञ मनुज प्रकुर्यात्सौम्येक्षित सौम्यगृहस्थमन्दः१६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शनैश्चरको बुध देखता हो तो वह मनुष्य धनसहित, सुन्दर बुद्धिवाला, नम्रतासहित, गीत जिसको प्रिय, मंग्रामक कार्यमें चतुर और शिल्पका जाननेवाला होता है ।। १६ ।। अथ बुधर्मी गनी गुरुदृष्टिफलम् । राजाश्रितश्चारुगुणैः समेतः प्रियः सतां गुप्तधनो मनस्वी । भवेन्नरो मन्दचरो यदि स्याज्ज्ञराशिसंस्थः सुरपूज्यदृष्टः॥१७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या राशिगत शनैश्चरको बृहस्पति देखता हो तो वह मनुष्य राजाका आश्रय करनेवाला, मुन्दर गुणों करके सहित, सत्पुर- पोका प्याग और गुप्तधनवाला तथा उदार होता है ॥ १७ ॥ अथ बुधळे शनी भृगुदृष्टिफलम। योपाविभूपाकरणे प्रवीणं सस्कर्मधर्मानुरतं नितांतम् । स्त्रीसक्तचित्तं प्रकरोति मयं सितेक्षितो भानुसतो ज्ञदृष्टः।।१८ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन कन्या गशिगत शनैश्चरफो शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य नीफे आभूषण बनवानेमें चतुर, श्रेष्ठ कर्म और धर्म निरन्तर पर तया बियाम आसक्तचित्तवाला होता है।॥ १८ ॥ t .

.
भाषाटीकासहित ।
(१७९)
: अथ कर्कस्ये शनी रविदृष्टिफलम् ।
आनन्ददारदविणैविहीनः सदानभोगेरपि वोज्झितश्च ।
मातुर्महाकेशकरो नरः स्यान्मन्दे कुलीरोपगतेऽदृष्टे ॥ १९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम कर्कराशिगत शनैश्चरको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
आनन्द और स्त्री धन करके हीन हमेशा अन भोग करके हीन और माताको बड़ा
क्लेश देनेवाला होता है ।। १९ ।।
अथ कर्कस्थे शनी चन्द्रदृष्टिफलम् ।
निपीडित बन्धुजने जनन्यां नूनं धनानामभिवर्द्धनं च ।
कुर्यानराणां धुमणेस्तनूजः कुलीरसंस्थो द्विजराजदृष्टः ॥२०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्चरको चन्द्रमा देखता हो वह
मनुष्य बन्धुजनाको पीडा देनेवाला और माताको दुःख देनेवाला, धनकी वृद्धि-
साहित होता है ॥ २० ॥
अथ कर्कराशिगते शनी भौमदृष्टिफलम् ।
गलदलः क्षीणकलेवरश्च नृपार्पितार्थोत्तमवैभवोऽपि ।
स्यान्मानुपो भानुसुते प्रसूतौ कर्कस्थिते क्षोणिसुतेन दृष्टे॥२१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्वरको मंगल देखता हो वह
मनुष्य बल करके हीन, क्षीण देहवाला, राजाके दिये हुए धन करके वैभववाला
होता है ।॥ २१॥
अथ कर्कराशिगते शनी बुधाष्टिफलम् ।
वाग्विलासकठिनोऽटनबुद्धिश्चेष्टितर्वहुविधैरपि युक्तः।
दम्भवृत्तिचतुरोऽपि नरः स्यात्कर्कगामिनि शनौ बुधदृष्टे॥२२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्वरको बुध देखता हो वह मनुष्य
वाग्विलासमें कठिन और भ्रमण, करनेवाला और मनोवांछित फलको प्राप्त एवं
पाखण्ड करनेमें चतुर होता है ॥ २२ ॥
अथ कर्कराशिगते शनी गुरुदृष्टिफलम ।
क्षेत्रपुत्रगृहंगेहिनीधनै रत्नवाहनविभूषणैरपि ।
संयुतो भवति मानवो जनी जीवष्टियुजि कर्कगे शनी ॥२॥
जिम मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्वरको वृहस्पति देखता हो वह
मनुष्य पृथ्वी, पुत्र, मकान और खी, धन, स्ल और वाहन आभूपणोंकरके मम्पन्न
होता है ॥२३॥

(१८०)
जातकाभरण।
अय कर्कराशिगते शनी भृगुदृष्टिफलम् ।
उदारतागौरवचारुमानः सौन्दर्यवर्यामलवाग्विलासैः।
नूनं विहीना मनुजा भवेयुः शुक्रेक्षिते कर्कगतेऽकपुत्रे ॥ २४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्चरको शुक्र देखता हो वह मनुष्य
उदारता एवं गौरव करके युक्त, अच्छे प्रकार मान करके सहित और अधिक सुन्द
रता तथा निर्मल वाणी विलास करके हीन होता है ।। २४ ॥
अथ सिंहराशिगते शनौ रविदृष्टिफलम् ।
धनेन धान्येन च वाहनेन सद्भत्तिसत्योत्तमचेष्टितैश्च ।
भवेदिहीनो मनुजःप्रसूतौ सिंहस्थिते भानुसुतेऽकरहे।॥२५॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत शनैश्चरको सूर्य देखता हो वह मनुष्य
धन, धान्य, वाहन, श्रेष्ठ वृत्ति, सत्य और उत्तम चरित्रों करके हीन होता है ॥२५॥
अथ सिंहराशिगते शनी चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सदत्नभूपाम्बरचारुकीर्ति कलत्रमित्रात्मजसौख्यपूर्तिम् ।
प्रसन्नमूर्ति कुरुतेऽर्कसूनुर्नर हरिस्थो हरिणांकहप्पः ॥ २६ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत शनैश्वरको चन्द्रमा देखता हो वह
मनुष्य श्रेष्ठ रत्न, आभूषण, वस्त्र, सुन्दर यश, स्त्री, मित्र और पुत्रादिकोंके सुखसे
पूर्ण और प्रसन्नमूर्ति होता है ॥ २६ ॥
अथ सिंहराशिगते शनौ भौमदृष्टिफलम् ।
संग्रामकर्मण्यतिनैपुणः स्यात्कारुण्यहीनो मनुजः सकोपः ।
क्रूरस्वभावो ननु भानुसूनी सिंहस्थिते भूमिसुतेक्षिते च॥२७॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत शनैश्चरको मंगल देखता हो वह
मनुष्य संग्रामकर्ममें अत्यन्त निपुण, करुणाहीन, क्रोधी, और ऋरस्वभाववाला
होता है ॥२७॥
अथ सिंहराशिगते शनी बुधदृष्टिफलम् ।
धनाङ्गनासूनुसुखेन हीन दीनं च नीचव्यसनामिभूतम् ।
करोति जातं तपनस्य सूनुःसिंहस्थितः सोमसुतेक्षितश्च ॥२८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत शनैश्वरको बुध देखता हो वह मनुष्य
धन, स्त्री और पुत्र सुख फरके हीन, दीनतासहित और नीच व्यसनोंके करनेसे
तिरस्कृत होता है ॥२८॥

भाषायकासहित ।
(१८१)
अय सिंहराशिगते शनी गुरुदृष्टिफलम् ।
सन्मित्रपुत्रादिगुणैरुपेतं ख्यातं सुवृत्तं सुतरां विनीतम् । .
नरं पुरग्रामपतिं करोति सौरिहरिस्थो गुरुणा प्रदृष्टः ॥ २९ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें सिंहराशिगत शनैश्चरको वृहस्पति देखता हो वह
मनुष्य श्रेष्ठ मित्र और पुत्रादि युक्त, गुणोसहित, प्रसिद्ध, श्रेष्ठ वृत्तिवाला अत्यन्त
नम्रता सहित पुर और ग्रामका पति होता है ॥ २९ ॥
अथ सिहराशिगते शनी भृगुष्टिफलम् ।
धनैश्च धान्यैरपि वाहनैश्च सुखैरुपेतं वनिताप्रतप्तम् ।
कुर्यान्मनुष्यं तपनस्य सूनुः पञ्चाननस्थो भृगुसूनुदृष्टः ॥३०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमे सिंहराशिगत शनैश्चरको शुक्र देखता हो वह
मनुष्य धन और अन्न तथा वाहनके सुखसे सम्पन्न और स्वीसे सन्तापको प्राप्त
होता है ॥ ३०॥
अय गुरुगेहगते शनी रविदृष्टिफलम् ।
ख्याति धनाप्ति बहु गौरवाणि स्नेहप्रवृत्तिं परनन्दनेषु ।
लभेन्नरो देवगुरोरगारे शनैश्चरे पद्मिनि नाथदृष्टे ॥ ३३॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमे धन मीन राशिगत शनैश्चरको सूर्य देखता हो वह
मनुष्य प्रसिद्ध धनको प्राप्त करनेवाला, बहुत गौरवको प्राम और पराये पुत्रमे प्रीति
करनेवाला होता है ॥ ३१॥
अथ गुरुगेहगते शनौ चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सदृत्तशाली जननीवियुक्तो नामदयालंकरणप्रयातः।
सुतार्थभार्यासुखमाङ् नरः स्यात्सौरे सुरेज्यालयगेऽजदृष्टे ३२
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन गशिगत शनैश्चरको चन्द्रमा देखता हो वह
मनुष्य श्रेष्ठ वृत्ति करनेवाला, मातासे रहित और दो नामों करके गोभित एवं पुत्र,
धन, बीके मुख भोगनेवाला होता है ॥ ३२॥
अथ गुरुगेहगते शनी भीमदृष्टिफलम् ।
वातान्वितं लोकविरुद्धचेष्टं प्रवासिनं दीनतरं करोति ।
नरं धरासूनुनिरीक्ष्यमाणो मार्तण्डपुत्रः सुरमंत्रिणो भे॥३३॥
जिस मनुष्य के जन्मकालम धन मीन राशिगत शनैश्वरको मंगल देखता हो वह
मनुष्य वातरोगसहित, संसारमें मनुष्योंके विपरीत चल्नेवाला, परदेशमें रहनेवाला
तथा अत्यन्त दीन होता है ॥३३॥

*(१८२) जातकाभरण । अथ गुरुगेहगते शनी बुधदृष्टिफलम् । गुणाभिरामो धनवान्प्रकामं नराधिराजाप्तमहाधिकारः। नरः सदाचारविराजमानः शनी ज्ञदृष्टे गुरुमंदिरस्थे ॥ ३४ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शनैश्चर बुधको देखता हो वह मनुष्य श्रेष्ठ गुणोंकरके सहित, धनवान्, कामी, राजा करके बड़े अधिकारको प्राप्त और हमेशा श्रेष्ठ आचरण करनेवाला होता है ॥ ३४ ॥ अथ गुरुगेहगते शनी गुरुदृष्टिफलम् । नृपप्रधानः पृतनापतिर्वा सर्वाधिशाली बलवान्सुशीलः। स्यान्मानवो भानुसुते प्रसूतौ जीवेक्षिते जीवगृहं प्रयाते ॥३५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन राशिगत शनैश्चरको बृहस्पति देखता हो वह मनुष्य राजाका मन्त्री, अथवा फौजका स्वामी (जनरल ), सब कार्योको करनेवाला, बलवान् एवं सुशील होता है ॥ ३५ ॥ अथ गुरुगेहगते शनौ भृगुदृष्टिफलम् । विदेशवासी बहुकार्यसतो द्विमातृपुत्रः सुतरां पवित्रः । स्यान्मानवो दानवमंत्रिदृष्टे मन्देऽमराचार्यगृहं प्रयाते ॥ ३६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन मीन गशिवती शनैश्चरको शुक्र देखता हो वह मनुष्य परदेशमें रहनेवाला, बहुकायोंमें आसक्त, दो माताका पुत्र और अत्यन्त पवित्र होता है ॥ ३६॥ अथ स्वगेहगते शनी रविदृष्टिफलम् । कुरूपभार्यश्च परान्नभोक्ता नानाप्रयासामयसंयुतश्च । विदेशवासी प्रभवेन्मनुप्यो मन्दे निजागारगतेऽर्कदृष्टे ॥३७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शनैश्वरको सूर्य देखता हो वह मनुष्य रे म्हणाली सीमा, ति, परम, अन्य सानेपला, अनेक प्रयागमहित रोगसहित और परदेशका वासी होता है ॥ ३७ ।। अथ स्वगेहगते शनी चन्द्रदृष्टिफलम् । धनाङ्गनाढ्यं वृजिनानुयातं चलस्वभाव जननीविरुद्धम् । कामातुरं चापि नरं प्रकुर्यान्मन्दस्वभस्थोऽमृतरश्मिदृष्टः||३८|| जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत गनेश्वरको चन्द्रमा देखता हो वह मनुष्य पन और स्त्री सहित, दुःख करके पैदा हुआ, चपल स्वभाववाला, माताके विरुद्ध और कामातुर होता है ।। ३८ ॥

*
भाषाकासहित ।
अय स्वगेहगते शनी भौमदृष्टिफलम् ।
शूरः क्रूरः साहसी सद्गुणाढ्यः सर्वोत्कृष्टः सर्वदा हृष्टचित्तः ।
ख्यातो मर्त्यश्चात्मजस्थेऽकपुत्रे धात्रीपुत्रप्रेक्षणत्वं प्रयात॥३९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभ राशिगत शनैश्चरको मंगल देखना हो
वह मनुष्य शूरवीर, क्रूर, साहसी, अच्छे गुणोंकरके सहित, सर्वजनोंमें उत्कृष्ट,
हमेशा प्रसन्न रहनेवाला और प्रसिद्ध होता है ॥ ३९ ॥
अथ स्वगेहगते शनी बुधदृष्टिफलम् ।
सदाहनान्साहसिकान्ससंत्त्वान्धीरांश्च नानाविधकार्यसक्तान् ।
करोति मान्ननु भानुपुत्रः स्वक्षेत्रसंस्थाशशिपुत्रदृष्टः ॥४०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुंभ राशिगत शनैश्चरको बुध देखता हो
वह मनुष्य श्रेष्ठ वाहनसहित, उत्साहसहित, बलवान् धीर और अनेक प्रकारके
कार्यों में आसक्त होता है ॥ ४० ॥
अय स्वगेहगहे शनी गुरुदृष्टिफलम् ।
गुणान्वितं क्षोणिपतिप्रधान निरामयं चारुशरीरयष्टिम् ।
कुर्यान्तरं देवगुरुप्रदृष्टश्चंडांशुसूनुनिजवेश्मसंस्थः ॥ ४१ ।।
जिम मनुष्यके जन्मकालमै मकर कुम्भ राशिगत शनैश्चरको बृहस्पति
देखता हो तो वह मनुष्य गुणोंसे संपन्न, राजाका मंत्री, रोगरहित, एवं मुन्दर
शरीरवाला होता है ॥ ४१ ॥
अय स्वगेहगते शनी भृगुदृष्टिफलम् ।
कामातुरं सन्नियमेन हीन भाग्योपपन्नं सुखिनं धनाढयम् ।
भोक्तारमीशं कुरुते स्वभस्थो खेः सुतो भार्गवसूनुदृष्टः ॥४२॥
इति श्रीदेवशदुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे
ग्रहदृष्टिफलाध्यायः॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकर कुम्भ राशिगत शनैश्वरको शुक्र देखता हो
वह मनुष्य कामातुर, श्रेष्ठ नियमसहित, भाग्यसहित, मुखवान्, धनवान, भोग
भोगनेवाला और लक्ष्मीका स्वामी होता है ॥ १२॥
इति श्रीवंशवरेलीस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मनज्योतिषिक-पंडितश्यामलाल-'
कृतायां श्यामसुन्दरीमापाटीकायां प्रहदृष्टिफलवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

(१८१)
जातकाभरण ।
अथ राशिफलानि-तत्र मेपराशिगतसूर्यफलम् ।
भवति साहसकर्मकरों नरो रुधिरपित्तविकारकलेवरः ।
क्षितिपतिर्मतिमान्सहितस्तदा सुमहसा,महसामधिपे क्रिये॥१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत 'सूर्य बैठा हो वह मनुष्य साहसके काम
करनेवाला, रुधिर और पित्तविकारयुक्त देहवाला, भूमिका मालिक अतिशय
तेजस्वी और बुद्धिमान होता है ॥ १॥
अथ वृपराशिगतसूर्यफलम् ।
परिमलैविमलैः कुसुमासनेः सवसनः पशुभिस्सुखमद्भुतम् ।
गविंगतो हि रविजलभीरुतां विहितमाहितमादिशते नृणाम् २
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत सूर्य बैठा हो वह मनुष्य दूर
जानेवाली गन्धयुक्त पुष्प और शय्या और उत्तम वस्त्र और पशुओंके अद्भुत
सौल्यको पानेवाला, जलसे डरनेवाला, मनुष्योंके लिये हित एवं कर्तव्य कोका
उपदेश करनेवाला होता है ॥२॥
अथ मिथुनराशिगतसूर्यफलम् ।
गणितशास्त्रकलामलशीलतासुललिताद्भुतवाकप्रथितो भवेत् ।
दिनपतौ मिथुने ननु मानवो विनयतानयतातिशयान्वितः॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन राशिगत सूर्य वैठा हो वह मनुष्य गणितशा-
स्रकी कलाको जाननेवाला, निष्कपट शीलवाला, शोभायमान, अद्भुत वाणी बोल.
नेवालोंमें अग्रणीय, विनयसहित, अतिशयकरके नीतियुक्त होता है ॥ ३ ॥
अथ कर्कराशिगतसूर्यफलम् ।
सुजनतारहितः किल कालविजनकवाक्यविलोपकरो नरः ।
दिनकरे हि कुलीरगते भवेत्सधनतासहिताधिकः ॥ ४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत सूर्य बैठा हो तो वह मनुष्य मनुष्यता
रहित, कालका जाननेवाला, पिताके वाक्यको नष्ट करनेवाला, धनवान् और धन-
वानोंमें अग्रणीय होता है॥४॥
अथ सिंहराशिगतसूर्यफलम् ।
स्थिरमतिश्च पराक्रमताधिको विभुतयाद्भुतकीर्तिसमन्वितः।
दिनकरे करिवैरिंगते नरो नृपरतो परतोपकरो भवेत् ।। ५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत सूर्य बैठा हो वह मनुष्य स्थिर बुद्धि
वाला, अधिक बलवान, अपनी संपत्तिके द्वारा · अद्भुत ,कीर्तिवाला गजाम न
और पराया सन्तोप करनेवाला होता है ॥५॥

- भाषाटीकासहित। अथ कन्याराशिगतसूर्यफलम् । दिनपतौ युवतौ समवस्थिते नरपतेद्रविणं हि नरो लभेत् । मृदुवचाः श्रुतगेयपरायणः सुमहिमा महिमापिहिताहितः॥६॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें कन्याराशिगत सूर्य बैठा हो वह मनुष्य राजासे धन प्राप्त करनेवाला, कोमलवाणी बोलनेवाला, गाना सुननेवाला और बडे महत्त्वको पानेवाला, एवं अपने पराक्रमसे शत्रुओंको वशमें रखने वाला होता है ॥ ६ ॥ अथ तुलाराशिगतसूर्यफलम् । नरपतेरतिभीरुरहनिशं जनविरोधविधानमघ दिशेत् । कलिमनाः परकर्मरतिघंटे दिनमणिर्न भणिद्रविणादिकम् ||७|| जिस मनुष्य के जन्मकालमें तुलाराशिमें सूर्य वैठा हो वह मनुष्य रात दिन राजासे अत्यन्त डरने वाला, मनुष्योंसे विरोध करनेवाला, पापकर्म करनेवाला, कलह ( झगडा) करनेवाला, पराये कर्ममें प्रीति करनेवाला होता है और उसको द्रव्यादिक मणिय नहीं प्राप्त होती ॥ ७ ॥ अथ वृश्चिकराशिगतसूर्यफलम् । कृपणतां कलहं च भृशं रुपं विपहुताशनशस्त्रभयं दिशेत् । अलिगतः पितृमातृविरोधितां दिनकरो न करोति समुन्नतिम्८ जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत सूर्य बैठा हो वह मनुष्य कृपण, अतिशय करके कलह करनेवाला, विष अग्नि शस्त्रसे भयको प्राप्त, पिता माताका विरोधी और उन्नतिरहित होता है ॥ ८॥ अथ धनराशिगतसूर्यफलम् । स्वजनकोपमतीव महामति बहुधनं हि धनुर्धरणो रविः । स्वजनपूजनमादिशते नृणां सुमतितो मतितोपविवर्द्धनम् ॥९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धन राशिगत मूर्य बैठा हो तो वह मनुष्य अपने मित्रोंसे क्रोध करनेवाला, बडा बुद्धिमान्, बहुत धनवाला, मित्रोंका पूजन करने- चाला और श्रेष्ठ बुद्धिद्वारा संतोपका बढानेवाला होता है ॥ ९ ॥ अथ मकरराशिगतसूर्यफलम् । • अटनतां निजपक्षविपक्षतामधनतां कुरुते सततं नृणाम् । मकरराशिगतो विगतोत्सव दिनविमुर्न विभुत्वसुखं दिशेत् । जिम मनुष्य के जन्मकालमें मकरराशिगत मूर्य वैठा हो वह मनुष्प भ्रमण कर- .

(१८६)
जातकाभरण।
नेवाला, अपने जनोंसे विरोध रखनेवाला, निरन्तर धनहीन, उत्सवराहत और विभू-
तिका सुख नहीं पाता है ॥ १० ॥
अथ कुम्भराशिगतसूर्यफलम् ।
कलशगामिनि पंकजिनीपतौ शठतरो हि नरो गतसौहृदः।
मलिनताकलितोरहितः सदा करुणयारुणयातसुखो भवेत् ११
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिमें सूर्य बैठा हो वह मनुष्य शठता सहित,
मित्रता रहित, मलिनतायुक्त, करुणाहीन और रुधिर प्रकोप होनेमे दुःखी
होता है ॥ ११ ॥
अथ मीनराशिगतसूर्यफलम् ।
बहुधनं क्रयविक्रयतः सुखं निजजनादपि गृह्यमहाभयम् ।
दिनपतौ गुरुभेऽभिमतो भवेत्सुजनतो जनतोपदसन्मतिः॥१२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत सूर्य बैठा हो तो वह मनुष्य क्रय विक्रय
करके बहुत धन पानेवाला, अपने मनुष्योंसे भयको प्राप्त, श्रेष्ठ जनों करके मनु
प्योंको तोप करनेवाला और श्रेष्ठ बुद्धिवाला होता है ॥ १२ ॥
अथ मेपराशिगतचन्द्रफलम् ।
स्थिरधनो रहितः सुजनैनरः सुतयुतः प्रमदाविजितो भवेत् !
अजगतो द्विजराज इतीरितं विभुतयाद्भुतया स्वसुकीर्तिभाक१३
जिस मनुप्यके जन्मकालमें मेपराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य स्थिर धन-
वाला होता है और श्रेष्ठ जनोंकरके रहित, पुत्र सहित, स्त्री करके पराजित व
अद्भुत वैभवसे अच्छी कीर्ति पाता है ।। १३ ॥
अथ वृपराशिगतचन्द्रफलम् ।
स्थिरगतिं सुमतिं कमनीयतां कुशलतां हि नृणामुपभोगताम् ।
वृपगतो हिमगु शमादिशेत्सुकृतितः कृतितश्च सुखानि च १४
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य स्थिर गति-
वाला, श्रेष्ठ बुद्धिवाला, शोभायमान, कुशलताको प्राप्त, बहुत नौकरोंवाला, श्रेष्ठ
कायांसे और कुशलतासे सौख्य पाता है ॥ १४ ॥
अथ मिथुनराशिगतचन्द्रफलम् ।
प्रियकरः करमत्स्ययुतो नरः सुरतसौख्यभरो युवतिप्रियः ।
मिथुनराशिगते हिमगौ भवेत्सुजनताजनताकृतगौरवः ॥१५॥

भापाटीकासहित
(१८७)
जिस मनुष्यके जन्मकालम मिथुनराशिगत चंद्रमा वैवा हो वह मनुष्य प्रिय
करनेवाला, हाथोंमें मछलीके आकारवाली रेखावाला, मैथुनके सौख्यसहित, आति-
शय करके त्रियोंका प्यारा, एवं सजन होता है और मनुष्य उसका गौरव
अथ कर्कराशिगतचंद्रफलम् ।
श्रुतकलाबलनिर्मलवृत्तयः कुसुमगंलधजलाशयकेलयः ।
किल नरास्तु कुलीरगते विधौ वसुमतीसुमतीप्सितलब्धयः१६
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य शास्त्रमें कुशल,
बलवान्, शुद्धचित्त, पुष्पोंसे गंध सूचनेवाला, जलमें क्रीडा करनेवाला, धरती करके
संहित और श्रेष्ठ बुद्धिसे मनोरयको प्राप्त करनेवाला होता है ॥ १६ ॥
अथ सिंहराशिगतचंदफलम् ।
अचलकाननयानमनोरथ गृहकलिं च गलोदरपीडनम् ।
द्विजपतिमंगराजगतो नृणां वितनुते तनुतेजविहीनताम् ॥१७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहगशिगत चंद्रमा बैठा हो वह मनुष्य पर्वत और
जंगलकी यात्राका मनोरथ करनेवाला, घरमें कलह करनेवाला, गले और पेटमें
पीडाको प्राप्त और शरीरके तेजरहित होता है ॥ १७ ॥
अय कन्याराशिगतचन्द्रफलम् ।
युवतिगे शशिनि प्रमदाजनप्रबलकेलिबिलासकुतूहलैः।
विमलशीलसुताजननोत्सवेःसुविधिनाविधिनासहितःपुमान १८
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य खियोंके
साथ अधिक विलास करनेवाला, कुतूहल करके श्रेष्पशील कन्याकी मन्तानके उत्सव
सहित, श्रेष्ठ भाग्यवान् और उत्तम कृत्वाला होता है ।॥ १८ ॥
अथ तुलाराशिगतचन्द्रफलम् ।
वृपतुरंगमविक्रमविक्रमो द्विजसुरार्चनदानमनाः पुमान् ।
शशिनि तौलिगते वहुदारभाग्विभवसंभवसञ्चितविक्रमः॥१९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य बैल
बोटॉफ ममान पराक्रमवाला, एवं ब्राह्मणोंका पूजन करनेवाला, बहुत सिगाशाला,
वभा और प्रतिष्ठा फरफे पराक्रम प्राप्त करनेवाला होता है ॥ १९ ॥

.
(१८८)
जातकाभरण।
अथ वृश्चिकराशिगतचन्द्रफलम् ।
शशधरे हि सरीसृपगे नरो नृप दुरोदरजातधनक्षयः ।
कलिरुचिर्विवलः खलमानसः कृशमनाःशमनापहतो भवेत्र
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत चन्द्रमा बैठा हो उसका राजा अथवा
.जुए करके धन नष्ट होता है, कलहमें प्रीति करनेवाला, निर्बल देहवाला, दुष्ट मन-
चाला एवं दुर्बल देहवाला और शान्तिरहित होता है ।। २० ॥
अथ धनराशिगतचन्द्रफलम् ।
बहुकलाकुशलः प्रबलो महाविमलताकलितः सरलोक्तिभाव ।
शशधरे तुधनुर्धरंगे नरो धनकरो न करोति बहुव्ययम् ॥२१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य बहुत कामोमें
चतुर, अधिक बलवान्, निर्मलता करके सहित, सीधी वाणी बोलनेवाला, धनवान
और बहुत खर्च नहीं करता है ॥ २१ ॥
अथ मकरराशिगतचन्द्रफलम् ।
कलितशीतभयः किल गीतवित्तनुरुपासहितो मदनातुरः ।
निजकुलोत्तमवृत्तिकरः परं हिमकरे मकरे पुरुपो भवेत् ॥२२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य पानी
करके डरनेवाला, गानविद्याका जाननेवाला, रूखा शरीर, कामातुर और अपने
कुलमें उत्तम वृत्ति करनेवाला होता है ॥ २२ ॥
अथ कुम्भराशिगतचन्द्रफलम् ।
अलसतासहितोऽन्यसुतप्रियः कुशलताकलितोऽतिविचक्षणः ।
कलशगामिनि शीतकरे नरःप्रशमितःशमितोररिपुत्रजः॥२३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम कुम्भगशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य आलस्य
सहित, पराये पुत्रसे प्रीति करनेवाला, कुशलतासहित, अत्यन्त चतुर, शान्त स्वभाव
वाला और वैरियोंका नाश करनेवाला होता है ॥ २३ ॥
अथ मीनराशिगतचन्द्रफलम् ।
शशिनि मीनगत विजितेंद्रियो बहुगुणः कुशलो जललालसः।
विमलधीः किल शस्त्रकलादरस्त्ववलताबलताकलितो नरः २४
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मीनराशिगत चन्द्रमा बैटा हो वह मनुष्य इन्द्रियाँवा
जीतनेवाला, बहुत गुणावाला, कुशल, जलफी लालसापाला, निर्मल बुद्धिवाला,
डायविद्या प्रवीण और निईल देहवाला होता है ॥ २४ ॥

भाषाटीकासहित । (१८९) अय मेपराशिगतभौमफलम् । क्षितिपतेः क्षितिमानधनागमैः सुवचसा महसा वहुसाहसैः। अवनिजः कुरुते सततंयुतं त्वजगतो जगतोऽभिमतं नरम् ॥२६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य राजा करके धरती और मान धनको प्राप्त करनेवाला, श्रेष्ठ वाणी, एवं तेजवाला, बहुत साहसी और मसारका प्यारा होता है ।। २५ ॥ अय पराशिगतभौमफलम् । गृहधनाल्पसुखं च रिपृदयं परगृहस्थितिमादिशते नृणाम् । अविनयानि वृपस्थितः क्षितिसुतोऽतिसुतोद्भवपीडनम् ॥२६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपाशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य घर और धनका थोड़ा सुख पानेवाला, शत्रुओंसहित, पराये घरमें वास करनेवाला अत्यन्त पुत्रजनित पीडाको पाप्त, अनीति और अग्निरोगसहित होता है ॥ २६ ॥ अथ मिथुनराशिगतभीमफलम् । बहुकलाकलनं कुलजोत्कलिं प्रचलनप्रियतां च निजस्थलात् । ननु नृणां कुरुते मिथुनस्थितः कुतनयस्तनयप्रमुखासुखम् २७ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिगत मंगल बैग हो वह मनुष्य बहुत कलाओंकी रचना करनेवाला, अपने कुटुम्बके पुरुषोंसे फलद परनेवाला, अपने स्थानसे यात्रा प्रिय और पुत्रादिकोंसे सौख्य पानेवाला होता है ।। २७ ।। अय कर्क राशिगतभीमफलम् । परगृहस्थिरतामतिदीनतां विमतितां शमितां च रिपूदयः । हिमकरालयगे फिल मंगले प्रवलयावलया कलह ब्रजेत् ॥२८॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें कर्करागिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य पराये घरमें वास करनेवाला, अत्यन्त दीन, शद्धिहीन, गनुओंके उपद्रवसे शांत और बलवान बीमे कलह करनेवाला होता है ।। २८॥ अय सिंहराशिगतभीमफलम् । अतितरां सुतदारसुखान्वितो इतरिपुषिततोद्यमसाहसः । अवनिजे मृगराजगते पुमाननवतानयताभियुतो भवेत् ॥२९॥ जिस मनुष्य जन्मकालमें सिंहराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्प अत्यन्त पुत्र और सीके सौरयको पानेवाला व शओंका नाश करनेवाला, वडा उद्यमी ' और माहसी, अनीति आर नीति सहित होता है ।। २९ ।।

जातकाभरण।
अथ क्याराशिगतभीमफलम् ।
सुजनपूजनताजनताधिको यजनयाजनकर्मरतो भवेत् ।
क्षितिसुते सति कन्यकयान्विते त्ववनितोवनितोत्सवतःसुखी३०
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य मंसारम
श्रेष्ठ जनोंकरके पूजनीय मनुष्यों के साथ सौख्य सहित, यज्ञ करे और करावे
और वियोंके उत्सवकर्मसे सुखी होता है ।। ३० ॥
अथ तुलाराशिगतभीमफलम् ।
बहुधनव्ययतांगविहीनतागतगुरुप्रियतापरितापितः।
वणिजि भूमिसुते विकलः पुमानवनितो वनितोद्भवदुःखितः३१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य बहुत धन
खर्च करनेवाला, अंगविहीन, बडे जनोंसे प्रेमरहित, संतापको प्राप्त, विकलता.
सहित और स्त्रियोंसे दुःखको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥
अय वृश्चिकरामिगतभीमफलम् ।
विषहुताशनशस्त्रभयान्वितःसुतसुतावनितादिमहत्सुखम् ।
वसुमतीसुतभाजि सरीसृपे नृपरतः परतश्च जयं व्रजेत् ॥ ३२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य विप और
अग्नि तथा शस्त्रके भयको प्राप्त, लड़का, लडकी एवं वनिता (स्त्री) आदिके बड़े
सौग्यको प्राप्त, गजामें रत और शत्रुओंसे जयको प्राप्त होता है ॥ ३२ ॥
अथ धनुराशिगतभीमफलम् ।
स्थतुरंगमगौरवसंयुतः परमरातितनुशतिदुःखितः।
भवति नावनिजे धनुपिस्थिते सुवनितो वनिताभ्रमणप्रियः॥३३॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें धनराशिगत मंगल बैदा हो वह मनुष्य रथ और घो?
तथा गौग्वसहित व्रणरोगसे पीडित,श्रेष्ट स्त्रीवाला और भ्रमण करनेवाला होता है३३
अथ मकरराशिगत भीमफलम् ।
रणपराक्रमतावनितासुखं निजजनप्रतिकूलतया श्रमः ।
विभवता मनुजस्य धरात्मजे मकरगे करगेवरमा भवेत् ।। ३४||
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य युटम
पराक्रम दिसानेवाला, सीके सौख्यको प्राप्त, अपने कुटुम्बियों के प्रतिकार बड़े
पन्श्रिमको पानेवाला और इस प्रकार वैभववाला होता है कि मानो लक्ष्मी हस्त
गत ही है॥३१॥

भाषाटीकासहित ! अथ कुम्भराशिगतभीमफलम् । विनयतारहितं सहितं रुजा निजजनप्रतिकूलमलकुलम् । प्रकुरुते मनुज कलशाश्रितः क्षितिसुतोऽतिसुतोवदुःखितः३५ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत मंगल हो वह मनुष्य नम्रतारहित, रोगसहित, अपने कुटुंबियों के प्रतिकूल परिपूर्ण खलताको प्राप्त और बहु पुत्र जनित दुःखको प्राप्त होता है ॥ ३५॥ अथ मीनराशिगतभौमफलम् । व्यसनतां खलतामदयालुतां विकलतां चलनं च निजालया। क्षितिसुतस्तिमिनासुसमन्वितो विमतिना मतिनाशनमादिशेत ३६ जिस मनुष्यफे जन्मकालमें मीनराशिगत मंगल बैठा हो वह मनुष्य व्यसनसहित दुष्टतासहित, दयारहित, विकलतासहित, अपने स्थानसे चलनेवाला कुबुद्धिसे उसका नाश होय ॥ ३६॥ अथ मेपराशिगतबुधफलम् । खलमतिः किल चञ्चलमानसो ह्यविरतं कलहाकुलितो नरः। अकरुणोऽनृणवांश्च बुधे भवेदविगते विगते क्षितिसाधनः ३७ जिस मनुष्यके जन्मकालम मेप गशिम बुध बैठा हो वह मनुष्य दुवुद्धि, चञ्चल स्वभाव, निरंतर कलह करके आकुल, बहुत खानेवाला, करुणारहित और धरतीका माधनगहित होता है ॥ ३७॥ अथ वृपगशिगतवुधफलम् । वितरणप्रणयं गुणिनं दिशेबहुकलाकुशलं रतिलालसम् । धनिनमिन्दुसुतोवृपस्थितो तनुजतोऽनुजतोऽतिसुखं नरम्३८ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत उघ बैठा हो वह मनुष्य दान और नम्रतासहित, गुणवान्, बहुत कलाऑमें कुशल, मैथुनकी लालसा करनेवाला, धन- वान्, पुत्र और भ्रातामाके मुखको पाता है ॥ ३८॥ अय मिथुनराशिगतबुधफलम् । प्रियवचोरचनासु विचक्षणो द्विजननीतनयः शुभवेषभाव। मिथुनगे जनने शशिनन्दने सदनतोऽदनंतोऽपि सुखी नरः ३९ .

( १९२) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुन राशिगत बुध बैठा हो वह मनुष्य प्यारके वचन बोलनेकी रचनामें चतुर, दो माताका पुत्र, शुभ वेपवाला, भोगी, स्यान और भोजन करके सुखी होता है ॥ ३९ ॥ अयं कर्कराशिगतनुधफलम् । कुचरितानि च गीतकथादरो नृपरुचिः परदेशगतिर्नृणाम् । किल कुलीरगते शशभृत्सुते सुरततारतता नितरां भवेत्॥४०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य खोटे चरित्र करनेवाला, गीत और कयाका आदर करनेवाला, राजसेवी, परदेश जानेवाला और निरंतर स्त्रियोंके साथ भोग करनेकी इच्छावाला होता है ॥४०॥ अथ सिंहराशिगतबुधफलम् । अनृततासहितं विमतिं परं सहजबैरकरं कुरुते नरम् । युवतिहर्पपरं शशिनः सुतो हरिगतोऽरिंगतोन्नतिदुःखितम्॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिगत बुध बैठा हो वह मनुष्य झुठ बोलने- वाला, हीनबुद्धि, बन्धुगणोंसे वैर करनेवाला, स्त्रियोंके साय आनंद करनेवाला शत्रुओंके कारण उन्नति रहित और दुःखित होता है ।। ४१ ॥ अथ कन्याराशिगतयुधफलम् । सुवचनानुरतश्चतुरो नरो लिखनकर्मपरो हि चरोन्नतिः । शशिसुते युवतीच गते सुखी सुनयनानयनाञ्चलचेष्टितैः ॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ वचन बोलनेमें तत्पर, चतुर, लिखाई करनेमें तत्पर, श्रेष्ठ उन्नतिवाला, मुखी और मुन्दर नेत्रावाली स्त्रीके अंचलकी इच्छा रखनेवाला होता है ॥ ४२ ॥ अथ तुलाराशिगतबुधफलम् । अनृतवाग्व्ययभाक्खलु शिल्पवित्कुचरिताभिरतिर्वहुजल्पकः । व्यसनयुङ्मनुजः सहिते बुधेऽवतुलयातुलयात्वसतायुतः।।४३॥ जिस मनुष्यके तुलाराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य झूठ बोलनेवाला, सर्व करनेवाला, शिल्पविद्याका जाननेवाला, खोटे चरित्रोंमें प्रीति करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, व्यसनसहित और पापयुक्त होता है ॥ ४३ ॥ अय वृश्चिकंराशिगतबुधफलम् । कृपणतातिरतिप्रणयश्रमो विहितकर्मसुखोपहतिर्भवेत् । धवलभानुसुतेऽलिगते क्षतिस्त्वलसतोलसतोऽपि चवस्तुनः४४

.
भाषाटीकासहित।
(१९३)
• जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत बुध बैटा हो वह मनुष्य कृषण-
तामें अत्यन्त प्रीति करनेवाला, वडा मेहनती, श्रेष्ठकार्य और सुखकरके हीन, हानि
और आलस्यसहित, गुणोंमें दोष देनेवाला होता है |॥ १४ ॥
अथ धनराशिगतवुधफलम् ।
वितरणप्रणयो बहुवैभवः कुलपतिश्च कलाकुशलो भवेत् ।
शशिसुतेऽत्र शरासनसंस्थिते विहितया हितयारमयान्वितः४५
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य दान और .
नम्रतायुक्त, बहुत वैभवकरके सहित, कुलका स्वामी, कलाओंमें कुशल, योग्य एवं
हितकारिणी स्त्रियोंके साथ रमण करनेवाला होता है ॥ ४५ ॥
अय मफरराशिगतबुधफलम् ।
रिपुभयेन युतः कुमतिर्नरः स्मरविहीनतरः परकर्मकृत् ।
मकरगे सति शीतकरात्मने व्यसनतासनतःपुरुपो भवेत।।४६||
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य शत्रुभय-
सहित, खोटीबुद्धिवाला, कामकलाराहत, पराये कर्म करनेवाला और व्यसनों-
करके नम्र होता है ॥ १६ ॥
अथ कुम्भराशिगतबुधफलम।
गृहकलिं कलशे शशिनन्दनो वितनुते तनुतां ननु दीनताम् ।
धनपराकमधर्मविहीनतां विमतितामतितापितशत्रुभिः ॥४७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत बुध बैठा हो वह मनुष्य घरमें क्लेश
करनेवाला, दीनताको बढ़ानेवाला, धन पराक्रम धर्मरहित, बुद्धिहीन, और शत्रु-
ऑकरके सन्तापित होता है ॥४७॥
পৰ, মীনাহরনুষ।
परधनादिकरक्षणतत्परो दिजसुरानुचरो हि नरो भवेत् ।
शशिसुते पृथुरोमसमाश्रिते सुवदनावदनानुविलोकनः ॥४८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिमें बुध बैठा हो वह मनुष्य पराया धन
और जायदादकी रक्षा करनेवाला, ब्राह्मण और · देवताओंका सेवक और श्रेष्ठ
खियाके अंगको देखनेवाला होता है ॥४८॥
अय मेपराशिगतगुरुफलम।
बहुतरां कुरुते समुदारतां सुरचितां निजवेरिसमुन्नतिम् ।
विभवतां च मरुत्पतिपूजितः क्रियगतोऽयगतोरुमतिपदः॥४९॥

(१९४)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिमें वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य अत्यन्त
उदार चित्तवाला, शत्रुओंकी उन्नतिसहित, और बडी बुद्धिवाला होता है ॥ ४९ ॥
अय वृपराशिगतगुरुफलम् ।
द्विजसुरार्चनभक्तिविभूतयो द्रविणवाहनगौरवलुब्धयः ।
सुरगुरौ वृपमे बहुवैरिणश्चरणगा रणगाढपराकमैः ॥ ५० ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिमें बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्प ब्राह्मण, देव-
ताओंके पूजन और भक्तिसहित, धन, वाहन और गौरव (प्रतिष्ठा) का लोभी और
गाढ पराक्रमद्वारा शत्रुओंको अपने चरणोंका दास बनानेवाला होता है ॥ ५० ॥
अथ मिथुन राशिगतगुरुफलम् ।
कवितया सहित प्रियवाक्छुचिर्विमलशीलरुचिनिपुणः पुमान् ।
मिथुनगे सति देवपुरोहिते सहितता हिततासहितर्भवेत् ॥५१॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिमें बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य काय
करके सहित, प्यारी वाणी बोलनेवाला, पवित्र, निष्कपट और शीलवाला, चतुर
एवं हितकारी होता है ॥५१॥
अथ कर्कराशिगतगुरुफलम् ।
बहुधनागमनो मदनोन्नतिविविधशास्त्रकलाकुशलो नरः ।
प्रियवचाश्च कुलीरगते गुरौ चतुरंगैस्तुरगैःकरिभिर्युतः ॥५२॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें फर्फराशिमें वृहस्पति वैठा हो वह मनुष्य बहुत धन-
वाला, कामदेवकी उन्नतिसहित, अनेक शास्त्रोंकी फलामें कुशल, प्रिय बोलनेवाला
और घोडे और हाथियोंकरके सहित होता है ।। ५२ ॥
अथ सिंहराशिगतगुरुफलम् ।
अचलदुर्गवनप्रभुतोर्जितो दृढतनुर्ननु दानपरो भवेत् ।
अरिविभूतिहरो हि नरो युतःसुवचसा वचसामधिपे हरी॥५३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिम वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य पर्वत,पिला
(फोट) तया वनका स्वामी, मजबूत, शरीर, दान करनेवाला, गढऑफ वैभवको
हरण फरनेवाला और श्रेष्टवाणी घोलनेवाला होता है ।। ५३ ॥
अथ कन्यारागिगतगुरुफलम् ।
कुसुमगन्धसदम्बरशालिता विमलता धनदानमतिभृशम् ।
सुरगुरी सुतया सति संयुते रुचिरता चिरतापितशवता॥५४॥

भाषाटीकासहित।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य पुष्पोंकी
माला और उत्तम गंध श्रेष्ठ वस्त्र करके सहित, निर्मल, धन और दानमें बुद्धिवाला,
सुन्दर तथा बहुत कालतक शत्रुता करनेवाला होता है || ५४ ॥
अथ तुलाराशिगतगुरुफलम् ।
श्रुततपोजपहोममहोत्सवे द्विजसुरार्चनदानमतिर्भवेत् ।
वणिजि जन्मनि चित्रशिखण्डिजे चतुरतातुरताहिततारिता५५
जिस मनुष्पके जन्मकालमें तुलाराशिमें बृहस्पति चैठा हो वह मनुष्य वेद और
तप, जप, होम, बड़े उत्सवमें तत्पर, ब्राह्मण देवताओंके पूजन और दानमें
बुद्धिवाला, चतुरतासहित, आतुर, अहित करनेवाला और शत्रुओंसहित
होता है ॥ ५५ ॥
अथ वृश्चिकराशिगतगुरुफलम् ।
धनविनाशनदोपसमुद्भवैः कृशतरो बहुदम्भपरो नरः।
अलिगते सति देवपुरोहिते भवनतो बनतोऽपि च दुःखभाक्५६
जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य धनका
नाश करनेवाला, दोपोंकरके उत्पन्न दुर्बल देहवाला, बड़ा पाखंडी और भवन तथा
चनके द्वारा दुःखका भागी होता है ॥ ५६ ॥
अय धनराशिगतगुरुफलम् ।
वितरणप्रणयो बहुवैभवं ननु धनान्यथ वाहनसंचयः ।
धनुपि देवगुरौ हि मतिर्भवत्सुरुचिरा रुचिराभरणानि,च॥१७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिगत बृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य दान
देनेवाला और नम्र, बहुत वैभव और धन वाहनासहित, श्रेष्ठ बुद्धिवाला और
सुन्दर आभूषणोंवाला होता है ।। ६७ !!
अय मकरराशिगतगुरुफलम् ।
हतमतिः परकर्मकरो नरः स्मरविहीनतरो बहुरोपभाक् ।
सुरगुरौ मकरेविदधातिनोजनमनो न मनोरथसाधनम् ॥२८॥
जिस मनुष्य जन्मकालमें मकरराशिगत वृहस्पति धेटा हो यह मनुष्य नष्टयुटि,
पराया फर्म फरनेवाला, फामदेवरहित, अत्यन्त कोधी, मनुप्पोके फामको नाम
फरनेवाला और अपना मनोरथ साधन करनेवाला होता है॥१८॥

(१९६) जातकाभरण अथ कुभराशिगतगुरुफलम् । गदयुतः कुमतिद्रविणोज्झितः कृपणतानिरतः कृतकिलिपः । घटगते सति देवपुरोहिते कदशनो दशनोदरपीडितः ॥५१॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें कुंभराशिमें वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य रोगस- हित, दुष्टबुद्धि, धनहीन, कृपणतामें तत्पर, पाप करनेवाला, दुष्ट भोजन करनेवाला, दांत और पेटकी पीडा युक्त होता है ॥ ५९ ॥ अथ मीनगशिगतगुरुफलम् । नृपकृपाप्तधनो मदनोन्नतिः सदनसाधनदानपरो नरः। सुरगुरी तिमिना सहिते सतामनुमतोऽनुमतोत्सवदोभवेत्॥६०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत वृहस्पति बैठा हो वह मनुष्य राजा की कृपासे धनको पानेवाला, कामकी उन्नतिवाला, घरका साधन करनेवाला, दानमें तत्पर, सत्पुरुपोंका प्यारा और मित्रोंको सुख देनेवाला होता है ॥ ६०॥ अथ मेपराशिगतभृगुफलम् । भवनवाहनवृन्दपुराधिपः प्रचलनप्रियताविहितादरः। यदि च संजननेहिभवेत्कियः कवियुतोवियुतो रिपुभिर्नरः॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमे मेपराशिमे शुक्र बैठा हो वह मनुष्य मकान, वाहन समूह और नगरका स्वामी, यात्राका प्रेमी, आदर सहित, और शत्रुओं करके रहित होता है ॥ ६१ ॥ अथ वृपराशिगतशुक्रफलम् । बहुकलत्रयुतोत्सवगौरवं कुसुमगंधरुचिः कृपिनिर्मितः । वृपगते भृगुजे कमला भवेदविरला बिरला रिपुमण्डली ॥२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृपराशिम शुक्र बैठा हो वह मनुष्य बहुत स्त्री आर उत्सव तथा गौरव सहित, पुष्पोंकी गंधमें रुचि करनेवाला, खेती करनेवाला, बहुत धनवाला और थोडे शत्रुओंवाला होता है ।। ६२ ॥ अथ मिथुनराशिगतशुक्रफलम् । भृगुसुते जनने मिथुनस्थिते सकलशास्त्रकलामलकौशलम् । सरलताललिताकिल भारतीसुमधुरामधुरानरुचिर्भवेत्॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिगत शुक्र बैठा हो वह मनुष्य सम्पूर्ण गास्त्रोंकी फ्लामें कुशल, सीधी शोभायमान मधुर वाणी बोलनेवाला और मीठा खाने में रुचि जिसकी ऐसा होता है ॥ ६३ ।।

भापारीकासहित । अय कर्कराशिगतशुक्रफलम् । द्विजपतेः सदने भृगुनंदने विमलकर्ममतिर्गुणसंयुतः । जनमलं सकलं कुरुते वशं सुकलयाकलयापि गिरानरः ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य श्रेष्ठ कमि बुद्धिवाला, गुणोंसहित, सब आदमियोंको वशमें करनेवाला और अच्छी चतुरतासे मधुर वाणीसहित होता है ।। ६४ ॥ अथ सिंहराशिगतशुक्रफलम् । हरिगते सुरवैरिपुरोहिते युवतितो धनमानसुखानि च । निजजनव्यसनान्यपि मानवस्वहिततो हिततो मनुपोत्रजेत् ॥६६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य खियोंसे धन, मान और सुख पानेवाला, अपने मनुष्यों में व्यसनको प्राप्त, मित्रोंको संतोप कर- नेवाला व शत्रुओंका नाश करनेवाला होता है ॥ ६५ ।। अथ कन्याराशिगतशुरुफलम् । भृगुसुते सति कन्यकयान्विते बहुधनी खलु तीर्थमनोरथः । कमलया पुरुषोऽतिविभूषितस्त्वमितयामितयापि गिरान्वितः ६६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य वडा धन- वान्, तीथों में मनोरथ करनेवाला, लक्ष्मी करके शोभायमान और बडी भारी वाणी करके सहित होता है । ६६ ॥ अथ तुलाराशिगतशुक्रफलम् । कुसुमवस्त्रविचित्रधनान्वितो बहुगमागमनो ननु मानवः । जननकालतुलाकलनं यदा सुकविना कविनाकयतां ब्रजेत्॥६७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिमें शुक्र वैठा हो वह मनुष्य पुष्प और विचित्र वस्त्र धनसहित, बहुत आने जानेवाला और कवियोंका स्वामी अर्थात् उत्तम कविराज होता है ॥ ६७॥ अथ वृश्चिकराशिगतशुक्रफलम् । कलहघातमति जननिंद्यतां प्रजननामयतां नियतं नृणाम् । व्यसनतांजननेलिसमाश्रितः कविरलं विरलं कुरुतेधनम् ॥६८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकगशिगत शुक्र बैठा हो वह मनुष्य कलह तया बात करनेवाला, मनुष्य करके निध, जन्मसे रोगवाला, व्यसन सहित और अत्यन्त योड़ा धनवाला होता है।

1 (१९८) जातकोभरणा अथ धनराशिगतशुक्रफलम् । युवतिसूनुधनागमनोत्सवं सचिवतां नियतं शुभशीलताम् । जनुपिकामुकगः कुरुते कविं कविरति विरति चिरतो नृणाम् ६९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य स्त्री पुत्र धनका आगमन व उत्सवसाहत, राजाका मन्त्री, श्रेष्ठ शीलवाला, कवियों में प्रेम करनेवाला और बहुत कालतक विरतिको माप्त होता है ।। ६९ ॥ अथ मकरराशिगतशुक्रफलम् । अभिरतिस्तु जराङ्गनया नृणां व्ययभयं कृशतामतिचिंतया। भृगुसुते मृगराजगते सदा कविजने विजनेऽपि मनो भवेत् ॥७०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरगशिमें शुक्र बैठा हो वह मनुष्य वृद्ध स्त्रीमें प्रीति करनेवाला, व्यय करनेवाला, भयसहित, दुर्बल देहवाला, अत्यन्त चिंतासहित, कीश्वर और जंगलमें प्रीति करनेवाला होता है ॥ ७० ॥ अथ कुम्भराशिगतगुरुफलम् । उशनसः कलशे जनुपि स्थितौ वसनभूपणभोगविहीनता । विमलकर्ममहालसता नृणामुपगतापगता विरमा भवेत् ॥ ७१ ॥ जिप्त मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत शुक्र बैठा हो वह मनुष्य वस्त्र और आभूपण भोगरहित, अच्छे कोंमें आलस्य करनेवाला और धननाशक होता है ।।७११॥ अथ मीनराशिगतशुक्रफलम् । भृगुसुते सति मीनसमन्विते नरपतविभुता विनता भवेत् । रिपुसमाक्रमण द्रविणागमो वितरणे तरण प्रणयो नृणाम् ॥७२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत शुक्र बैठा हो वह मनुष्य राजारी कृपासे वैभवको प्राप्त, नम्रतासहित, शत्रुओंपर हमला करनेशला, धनको प्राप्त दान करनेमें और तैरनेमें प्रीति करनेवाला होता है ।। ७२ ॥ अथ मेषराशिगतगानिफलम् । धनविहीनतया तनुता तनी जनविरोधतयेप्सितनाशनम् । क्रियगतेऽर्कसुते स्वजनैर्नृणां विपमताशमताशमनं भवेत् ।।७।। जिस मनुष्य के जन्मकालमें मेपराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य धनहीनता करके दुर्बल देहवाला, मनुष्योंसे वर करके मनोरथको नाम करनेवाला, अग्ने मित्रोंसे विरोध करनेवाला और शांतिरहित होता है ।। ७३ ।।

भाषाटीकासहित। अय वृपराशिगतशनिफलम् । युवतिसौख्यविनाशनतां भृशं पिशुनसङ्गरुचिं मतिविच्युतिम् । तनुभृतां जनने वृपभस्थितोरविसुतोविसुतोत्सवमादिशेत्।।७४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें वृपराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य स्त्रीके मुखको नाश करनेवाला, अतिशय दुष्ट मनुष्योंका संग करनेवाला और बुद्धिहीन, एवं पुत्रोत्सवसे रहित होता है ॥ ४ ॥ अथ मिथुनराशिगतशनिफलम् । 'प्रचलनं विमलत्वविहीनतां भवनबाह्यविलासकुतूहलम् ब्रजति ना मिथुनोपगते सुते दिनविभोर्नविभोर्लभते सुखम्७५ जिस मनुष्यके जन्मकाल में मिथुनराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्प ज्यादे चलनेवाला और निर्मलतासे रहित, मकानके बाहर हास्य विलास आनंद करने वाला तया सुखको नहीं लाभ करता है ।। ७५ ॥ अथ कर्कराशिगतशनिफलम् । शशिनिकेतनगामिनि भानुजे तनुभृतां कृशता भृशमवया । वरविलासकरा कमला भवेदविकलं विकलं रिपुमण्डलम्॥७६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य दुर्बल देह- वाला, माता करके रहित, श्रेष्ठ विलासका करनेवाला, धनवान् और शत्रुओंका नाश करनेवाला होता है ।। ७६ ॥ अथ सिंहराशिगतानिफलम् । लिपिकलाकुशलैश्च कलिप्रियो विमलशीलविहीनतरो नरः। रविसुते रविवश्मनि संस्थिते इतनयस्तनयप्रमदार्तिभाव।।७७॥ जिस मनुष्य के जन्मकाल में सिंहराशिगत गनेश्वर बैठा हो वह मनुष्प लेखक्रिया कुदाल, कलह जिसको प्यारी, निर्मलशीलरहित, नीतिरहित और पुत्र खीसे पीडाको प्राप्त होता है । ७७॥ अय कन्याराशिगतगानिफलम् । विहितकर्मणि शर्म कदापि नो विनयतोपहतिश्चलसीदम् । रविसुते सति कन्यकयान्विते विमलताबलतासहितो भवेद७८ जिस मनुष्यके जन्मफालमें फन्याराशिमें शनिश्चर बैठा हो वह मनुष्य जो कुछ काम करे उसमें कल्याण नहीं पाता नम्रताहीन, चलायमान मन मिरतावाला हमेशा निर्बल रहता है ।। ७८॥

(२००) जातकाभरण। अथ तुलाराशिगतशनिफलम् । निजकुलेऽवनिपालबलान्वितः स्मरबलाकुलितो बहुदानदः । जलजिनीशसुते हि तुलान्विते नृपकृतोपकृतो हि नरो भवेत्७९ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तुलाराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य अपने कुलमें राजाके वलसहित, कामदेव करके सहित, बहुत दान देनेवाला और राजासे सम्मान नको प्राप्त होता है ॥ ७९ ॥ अथ वृश्चिकराशिगतशनिफलम् । विपहुताशनशस्त्रभयान्वितो धनविनाशनवैरिंगदार्दितः। विकलता कलिता च समन्विते रविसुते विषुतेटसुखो नरः ८० जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृश्चिकराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य विप, अग्नि, शस्त्रसे डरनेवाला, धनका नाश करनेवाला, शत्रुआंसहित, रोगकरके युक्त, विकलता युक्त और पुत्रहीन होता है ।। ८० ॥ अथ धनराशिगतशनिफलम् । रविसुतेन युते सति कामुके सुतगणैः परिपूर्णमनोरथः । प्रथितकीर्तिसुवृत्तपरो नरो विभवतो भवतोपयुतो भवेत्॥८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें धनराशिमें शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य पुत्रगण करके परिपूर्ण मनोरथवाला, प्रख्यात यशवाला, श्रेष्ठ वृत्तिमें तत्पर, वैभव और सन्तोष- सहित होता है ।। ८१ ॥ अथ मकरराशिगतशनिफलम् । नरपतेरित गौरवृतां व्रजेद्रविपुते मृगराशिगते नरः । अगुरुणा कुसुमैर्मृगजातया विमलया मलयाचलजैः सुखम्८२ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मकरराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य राजाके रामान गौरवको प्राप्त, अगर और पुष्प कस्तुरी तथा चंदनादि सुगंधोंका भोगने- बाला होता है ॥ ८॥ अय कुंभराशिगतशनिफलम् । ननु जितो रिपुभिर्व्यसनावृतो विहितकर्मपराङ्मुखतान्वितः। रविसुते कलशेन समन्विते सुसहितः सहितः प्रचनरः।।८३॥

भापाटीकासहित । (२.१) जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिगत शनैश्वर बैठा हो वह मनुष्य शत्रुओं करके जीता हुआ, व्यसनोंमें आसक्त, कर्तव्य कामे रहित और श्रे मित्रोंवाला होता है ।। ८३ ॥ अय मीनराशिगत शनिफलम् । विनयता व्यवहारसुशीलतासकललोकगृहीतगुणो नरः। उपकृतौ निपुणस्तिमिसंश्रिते रविभवे विभवेन समन्वितः ॥८॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मीनराशिगत शनैश्चर बैठा हो वह मनुष्य नम्रता और व्यवहार सुशीलता सहित, सब संसार उसके गुणोंको ग्रहण करता है और वह सबका उपकार करनेवाला होता है ॥ ८ ॥ अय राशिपती विचारः। बलान्विते राशिफ्तौ च राशी खेटेऽथ वा राशिफलं समग्रम् । नीचोचगेहास्तमयादिभावेन्यूनाधिकत्वं परिकल्पनीयम् ॥ ८५ ॥ जिस राशिका स्वामी राशि या वलसहित राशिगत ग्रह हो तो वह ग्रह राशिका पूरा फल देता है और जो राशिपति नीच उच्च अस्त होकर बैठा हो तो वह कमती बढती फल करता है अर्थात् उच्चमें श्रेष्ठ वा नेष्ट फल पूरा, नीचमें फल हीन . होता है । वीच राशियोंमें त्रैराशिक गणित करके जान लेना चाहिये ।। ८५ ॥ इति राशिफलानि। अय शुभाशुभज्ञानाथ शनिचक्रं विलिख्यते । अध नरामारशनिबारम् । नराकारं लिखेच्चक्रं शनिचक्रं तदुच्यते । वदितव्यं फलं तस्मान्मानवानां शुभाशु- B भम् ॥ १ ॥ जन्मक्षतो यत्र च कुत्र संस्थे मित्रस्थपुर्व प्रथमं विदित्वा । चके नराख्ये खलु जन्मधिष्ण्याविन्यस्य भानि प्रादे- त्फलानि ॥२॥ अब अच्छा चुग फल.जाननेके लिये शनिक लियते हैं, मनुष्पाकार चक्र लिये उमको गनिचा फहते हैं, उन शनिचरसे मनुष्योंको अच् बुग फल जानना चाहिये ॥ १॥ जन्मनक्षत्रम गणना फरके जिग नात्र- पर नश्वर हो यह नक्षत्र, जहां यही स्थित हो अर्थात् निम अंग मान- 4

(२०२)
'जात्तकाभरण।
नक्षत्र आवे वैसा ही निम्न लिखित फल जानो । मित्र और पुत्रका भी ज्ञान
करे । नराकार चक्रमें जन्मनक्षत्रसे अंगोंमें निम्नलिखित स्थापन करके फल कहना
चाहिये ॥२॥
अथ नराकारशनिचके नक्षत्रन्यासमाह-
नक्षवमेकं च शिरोविभागे मुख लिखत्रीणि युगं च गुह्ये।
नेत्रे च नक्षत्रयुगं हृदिस्थं भपंचकं वामकरे चतुष्कम् ॥३॥
वामे च पादे त्रितयं हि भानां भानां त्रयं दक्षिणपादसंस्थम् ।
चत्वारि झक्षाणि च दक्षिणाख्ये पाणी प्रणीतं मुनिनारदेन॥४॥
उस नराकार शनिचक्रपर १ एक नक्षत्र शिरपर लिखे और ३ तीन नक्षत्र-
मुखपर और दो २ नक्षत्र लिंगपर और नेत्रोंपर दो २ दो २ नक्षत्र धरे, ५ नक्षत्र
हृदयपर स्थापित परे, बायें हाथ पर ४ चार ॥ ३ ॥ वायें पैरपर ३, दाहिने
भैरपर ३, दाहिने हायपर ४ चार नक्षत्र स्थापन करना चाहिये, यह नारद मुनिने
कहा है।
अय नक्षत्रन्यासेन शनिनक्षत्रफलम् ।
रोगोलाभो हानिराप्तिश्च सौख्यं वधः पीडा सप्रमाण च लाभः ।
मन्दे चके मार्गगे कल्पनीयं तदैलोम्याच्छ्रीघ्रगेस्युः फलानि ॥५॥
अब नराकार शनिचक्रमें नक्षत्रोंका फल कहते हैं:-जो शनिनक्षत्र शिरपर
आवे तो रोग करे, मुखमें पड़े तो लाभ, गृह्य स्थानमें पड़े तो हानि, नेत्रोंमें पड़े
तो धनलाभ, हृदयमें पडे तो सुखी रहे, बाय हायमें पड़े तो बन्धन पावे, वायें पैरमें
पड़े तो पीड़ा, दाहिने पैरमें पडे तो यात्रा करावे और दाहिने हाथमें पड़े तो लाभ
कराता है॥५॥
अय सर्वतोभद्रचकम् ।
अथातः संप्रवक्ष्यामि चक्र त्रैलोक्यपदीकम् ।
विख्यात सर्वतोभद्रं सद्यः प्रत्ययकारकम् ॥१॥
अब इसके बाद तीनों लोकोंका प्राश करनेवाला शीघ्र ही विश्वास करानेवाला
सर्वतोभद्र चक्र कहते हैं ॥१॥
अय चक्रमवारमाह ।
याम्योत्तराः प्रागपराश्च कोटा नवात्र चके मुधिया विधेयाः।
स्वरक्षवर्णादिकमत्र लेख्यं प्रसिद्धभावाच्च मया निरुक्तम् ॥२॥

भापाटीकासहित ।
(२०३)
अब सर्वतोभद्र बनानेका प्रकार कहते हैं: दक्षिण उत्तर पूर्व पश्चिम नौ कोष्ठ
का चक्र पंडितजन विधान करें उस चक्रम अपने वर्णस्वर और जन्म नक्षत्र लिख-
कर जो ग्रह जिस नक्षत्र पर हो वह ग्रह नक्षत्रपर वेधित हो उस करके भावसे.
प्रसिद्ध अच्छा बुरा फल में कहता हूं ॥२॥
अय वेधफलमाह-
भ्रमो भवेद्रेऽरज च हानिर्व्याधिः स्वरे भीश्च तिथी निरुक्ता।
राशी च वेधे सति विघ्नमेवं जन्तुः कथं जीवति पञ्चवेधे ॥३॥
अब ग्रहोंके वेधका फल कहते हैं:-जो जन्मनक्षत्रपर पापग्रहोंका वेध हो तो
भ्रम करते हैं और जन्म अक्षरपर पापग्रहोंका वेध हो तो हानि कहना और जन्म
स्वर पर पापग्रहका वेध हो तो व्याधि कहना चाहिये और जन्म तिथि पर ग्रहोंका
वेध हो तो भय कहना और जन्म राशिपर वेध हो तो विन कहना चाहिये और
जन्म नक्षत्र अक्षर स्वर तिथि राशि इन पांचोंको पापग्रह वेधे तो वह
जीव नहीं जीता है ॥ ३॥
अथ वेधप्रकारमाह।
भरण्यकारी वृषभं च नन्दा भद्रां तकार श्रवणं विशाखाम् ।
तुलां च विध्येदनलासंस्थो ग्रहोऽत्र चक्रे गदितं स्वरज्ञः॥४॥
वकारमौकारमुकारदास्र स्वाती रकारं मिथुनं च कन्याम् ।
तथाभिजित्संज्ञकमंच विध्येद्ब्रह्मक्षसंस्थोहि नभश्वरेन्द्रः ॥५॥
कर्क ककारं च हरि पकारं चित्रांच पोष्णं च तथा लकारम् ।
अकारकं वैश्वभमत्र विध्येदलं नभोमण्डलगो मृगस्थः॥६॥
अब वेधमकार कहते हैं:-भरणी नक्षत्र और अकारका चेव और वृपराशि नंदा
तिथिका वेध होता है और भद्रा तिथि तकार श्ररण विगारसा नक्षत्र तुलाराशि और
कृत्तिका नगरका वेध होता है॥१॥ वकार वर्ण औकार उकार अश्विनी नक्षत्र-
पर वेध होता है तया स्वाती नक्षत्र और रफारफा देव होता है, मिथुन फन्यारा
वेध कहना, इसी प्रकार अभिजित्पर रोहिणी नक्षत्रका वेष होता है 14 ॥ फर्क-
राशि और फरारफा वेष फहना चाहिये,सिंदागिपर पकारका पेप होता पिता
और रेवतीपर रफारफा वेध रहना चाहिये और ओकार मकारया मारराभिम
वेष होता है ॥ ६॥

(२०४)
जातकाभरण।
एवं वेधः सर्वतोभद्रचके सर्वक्षेभ्यश्चितनीयः सुधीभिः ।
दद्यादेधः सत्फलं.सौम्यजातोऽत्यन्त कष्टं दुष्टवेधः करोति ॥७॥
यस्मिन्नृक्षेसंस्थितोवेधकर्ता पापः खेट-सोऽन्यमं याति यस्मिन् ।
काले तस्मिन्मङ्गलंपीडितानांप्रोक्तं सद्भिनीन्यथास्यात्कदाचित्८
इस प्रकार सर्वतोभद्र चक्रमें सम्पूर्ण नक्षत्र और राशियोंका वेध पंडितजन
'चिन्तन करें, जो शुभग्रहोंका वेध हो तो श्रेष्ठ फलको देता है और पापग्रहों का
वेध दुष्ट फलको करता है ।। ७ ॥ जिस नक्षत्रमें वेध करनेवाला ग्रह बैठा हो
शुभग्रह हो तो शुभफलको देता है और पापग्रह अन्त्य नक्षत्रमें प्राप्त हो और वेध
करता हो तो पीडा करता है ॥ ८ ॥
॥ अथ सर्वतोभद्चकम् ॥
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अय मर्यकालानरचक्रम ।
सूर्यकालानलं चक्रं स्वरशास्रोदितं हि यत् ।
तदहं विशदं वक्ष्ये चमत्कृतिकरं परम् ॥ ३॥
त्रिशूलकाग्राः सरलाश्च तिवः किलोद्धरेखा परिकल्पनीयाः ।
रेखावयं मध्यगतंच तब दे व कोणोपरिगे विधये ॥२॥

भाषाटीकासहित।
(२०५)
त्रिशुलकोणांतरगान्यरेखा तदप्रयोः शृंगयुगं विधेयम् ।
मध्ये त्रिशूलस्य च दण्डमूलात्सव्येन भान्यर्कभतोऽभिजिच्च ॥३॥
अव सूर्यकालानल चक्र कहते हैं। स्वरशास्त्र में कहा हुआ जो सूर्यकालानलचा
है उसको विस्तार करके मैं कहता हूं, यह सूर्यकालानल चमत्कार करनेवाला है ।
॥ १ ॥ त्रिशूल है अग्रभागमें जिसके ऐसी सीधी रेखा तीन लिखे उनको ऊपरको
मुख कर स्यापित करना और तीन रेखा उन रेखाओंके वीचमें तिरछी करे और
दो दो रेखा चारों कोणाम करे ॥ २ ॥ विशूल और कोणके बीचमें एक रेखा और
करना चाहिये । उस रेखाके आगे दो शृंग वनावे, बीचमें जो त्रिशूलकी रेखा है
उस रेखाकी जड़से लेकर दाहिनी तरफको अभिजित् सहित सूर्यके नक्षत्रसे लेकरके.
अहाईस नक्षत्र लिखने चाहिये ।। ३ ।।
अथ सूर्यकालानलचक्रम् ।
.
११/१६
२३
२५
से
२८
३.
अय सूर्यकालानलचकाचारः।
स्वनामभं यत्र गतं च तत्र प्रकल्पनीय सदसत्फलं हि।
तलस्थानितये कमेण चिंता वधश्च प्रतिबंधनानि ॥४॥

(२०६) जातकाभरण। शृंगद्वये रुक्च भवेद्धि भंग शुलेषु मृत्युः परिकल्पनीयः । शेपेषु धिष्ण्येषु जयश्च लाभोऽभीष्टार्थसिद्धिर्बहुधा नराणाम् ५ श्रीसूर्यकालानलचक्रमेतद्दे च वादे च रणप्रयाणे । प्रयत्नपूर्व ननु चिंतनीयं पुरातनानां वचनं प्रमाणम् ॥६॥ अब अपने नामका नक्षत्र जिस जगह स्थित हो उस क्रम करके अच्छा बुरा ‘फल विचार करे । नीचेके तीन नक्षत्रोंमें अपना जन्मनक्षत्र हो तो चिंता, वध, बंधने क्रम करके करते हैं ॥ ४ ॥ और दोनों शृंगामें जन्मनक्षत्र हो तो रोगभय होता है, त्रिशूलमें जन्मनक्षत्र हो तो मृत्यु करता है और वाकीके नक्षत्रोंमें जन्मनक्षत्र हो तो जय, लाभ, अभीष्ट सिद्धि अनेक प्रकारोंकी होती है ॥ ५ ॥ यह सूर्यकालानलच. ऋका विचार रोग, विवाद, युद्ध, एवं यात्रामें यलपूर्वक विचारना चाहिये, यह पूर्वाचार्य गर्ग वशिष्टादिकोंने कहा है ॥ ६ ॥ अय चंद्रकालानलचक्रम् । कर्नाटकेन प्रविधाय वृत्तं तस्मिंश्च पूर्वापरयाम्यसौम्ये । वृत्ताद्वहिः संचलित विधेये रेखे त्रिशूलानि तदग्रकेपु ॥ १ ॥ कोणाश्च रेखाद्वितयेन साध्याः पूर्वत्रिशूले किल मध्यसंस्थम् । चान्द्रं लिखेद्रं तदनुक्रमेण सव्येन धिष्ण्यानि बहिस्तदन्ते २ अब चंद्रकालानलचक्र कहते हैं: पहिलेकी तरह गोल मण्डल बनावे, उम मण्ड- लमें दो रेखा पूर्व पश्चिम दक्षिण उत्तर बनावे, गोल मण्टलकी वे रेखा जो बाहर हो. जावें उन रेखाओंके अग्रभागमें प्रिशूल बनाना चाहिये ॥ १ ॥ और फोनों के बीचम दो रेखा सीधी ईशान, नत्य और आग्नेय, पश्चिममें करे । पूर्वक विझूलके बीच चंद्रमाका नक्षत्र लिखे, फिर क्रमसे अभिजित्साहित दक्षिण गतिमे बाहर और भीतर नक्षत्र स्थापन करने चाहिये ॥२॥ अथ चंद्रकालानलनक्षत्रफलम् । कालानलं चक्रमिदं हि चांद्रं रणप्रयाणादिपु जन्यभं चत् । त्रिशूलसंस्थानिधनाय नूनमन्तर्वहिस्थ त्वशुभप्रदं हि ॥ ३ ॥ यह जो चंद्रकालानलचा फहा है उसको युद्ध ममयमें और यात्राकालमें विचा- रना चाहिये जो जन्मनक्षत्र विद्यालमें आई तो अवश्य मृत्यु कहना चाहिये और त्रिशूल के बाहर भीनर जन्मनक्षत्र आये तो शुभ फल दाताहता भापाटीकासहित। (२०७) ॥अथ चंद्रकालानल चक्रम् ॥ २८१ 11 ४ २५ ११ दम १८ १२ २० 12 १३ अय गोवरफलम्। नृजन्मराशेः खचरप्रचारैर्यगोचरैः साहितिकैः प्रणीतम् । स्थूलं फलं तत्किल संप्रवच्मि वालावबोयप्रदमभ्रगानाम् ॥३॥ अब गोचरफल कहते है:-मनुष्योंके जन्मराशिसे ग्रहोंके संचारसे जो गोचर करके संहिताकारोंने फल कहा है वही मोटा फल बालकोंके वोपके अर्थ पहले में कहता हूँ ॥ १॥ अय गोचरेण द्वादशधा सूर्यफलम् ।. गतिर्भयं श्रीर्व्यसनं च दैन्यं शत्रुक्षयो यानमतीव पीडा । कांतिक्षयोऽभीष्टवरिष्ठसिद्धिलाभोव्ययोऽकस्य फलं क्रमेण ॥२॥ जन्मके सूर्य, यात्रा, दूसरे सूर्य, भय, तीसरे सूर्यमें धन प्राप्त होता है, चौथ सूर्यमें व्यसन होता है, पांचवें सूर्यमें दीनता होती है, छठे सूर्यमें शष्टनाश होता है सात सूर्यमें यात्रा होती है. आठवेंमें अत्यन्त पीडा होती है, नवम सूर्यमें फांति- क्षय होता है, दशम सूर्यमें वांछितसिद्धि होती है, ग्यारहें सूर्यमें लाभ होता है और वारहें सूर्यमें खर्च होता है ॥२॥ .

(२०८) जातकाभरण। अय गोचरेण द्वादगधा चन्द्रफलम् । सदन्नमर्थक्षयमर्थलाभं कुक्षिव्यथा कार्यविघातलाभम् । वित्तं रुजं राजभयं सुखं चलाभं च शोकं कुरुते मृगांकः ॥३॥ अब गोचर करके चन्द्रमाका फल कहते हैं:-जन्मके चन्द्रमामें श्रेष्ठ अन्न माप्त होता है, दूसरे चन्द्रमा धननाश, तीसरे चन्द्रमामें धनलाभ,चतुर्थ चंद्रमा कोखका रोग, पांचवें चन्द्रमा कार्यसिद्धि, छठे चन्द्रमामें कार्यनाश, सप्तम चन्द्रमामें लाभ अष्टम चन्द्रमा रोग, नवम चन्द्रमामें रानभय, दशम चन्द्रमामें सुख, ग्यारहवें चन्द्रमामें लाभ और बारहवें चन्द्रमामें शोक होता है ॥ ३ ॥ पुत्रधर्मधनस्थस्य चन्द्रस्योक्तमसत्फलम् । कलाक्षये परिज्ञेयं कलावृद्धौ तु साधु तत् ॥४॥ पंचम नवम द्वितीयस्थ चंद्रमाका नेष्ट फल कहा है, सो फल कलाहीन चन्द्र- माका है और जो पूर्ण चंद्र ५ । ९ । २ में हो तो श्रेष्ठफल फरता है ॥ ४॥ अथ गोचरे भौमफलम् । भीतिक्षतिं वित्तमरिप्रवृद्धिमर्थप्रणाशं धनमर्थनाशम् । शस्त्रोपघातं च रुजं च रोग लाभ व्यये भूतनयस्तनोति ॥५॥ अब गोचर करके मंगलका फल कहते हैं: जन्मराशिमें मंगल हो तो भय, द्वितीयमें हानि, तृतीयमें धनलाभ, चतुर्थ शवृद्धि, पंचम धननाश, छठे धनलाभ, सप्तम धननाश, अष्टम शस्त्रसे घात, नवम रोगदाता, दशम रोगको प्राप्त, एकादशी लाभ और वारहवां मंगल खर्च अधिक कराता है ।। ५ ॥ अथ गोचरे बुधफलम्। बंधुं धनं वैरिभयं धनाप्ति पीडां स्थिति पीडनमर्थलाभम् । खदं सुखं लाभमथार्थनाशं कमात्फलं यच्छति सोमसूनुः ॥६॥ अब गोचर करके बुधका फल कहतेहै:-जन्मरागिमें बन्धुलाम फरनेवाला, द्वितीय बुध धनलाभ, तृतीय बुध शनुभय, चतुर्थ सुध धनकी प्राप्ति, पंचम वृध पीडा करनेवाला, छठा बुध स्थिति, सप्तम बुध पीडा, अष्टम बुध धनलाभ, नवम बुध खेद, दशम बुध सुख, ग्यारहवां बुध लाभ और बारहवां बुध धननाशक होता है ॥६॥ अथ गोचरे गुरुफलम् । भीति वित्तं पीडनं वैरिवृद्धिं सौख्यं शोक राजमानं च रोगम् । सौख्यं दैन्य मानवित्तंच पीडां दत्ते जीवो जन्मराशेः सकाशात .

भाषाटीकासहित। (२०९) अब गोचरकी रीतिसे बृहस्पतिका फल कहते हैं: जन्मस्थानपर बृहस्पति, हो तो भय, द्वितीय धन, तृतीय पीडा, चतुर्थ शत्रवृद्धि, पञ्चम सौख्य, छठा शोक, सप्तम राजमान, अष्टम रोग, नवम सौख्य, तया दीनता, दशम मानवृद्धि, ग्यारहवां धनलाभ तथा बारहवां वृहस्पति पीडा करता है ।। ७ ।। अथ गोचरे शुक्रफलम्। रिपुक्षयं वित्तमतीव सौख्यं वित्तं सुतप्रीतिमरातिवृद्धिम् । शोक धनाप्तिं वरवस्त्रलाभ पीडां स्वमर्थं च ददाति शुक्रः॥८॥ अब शुक्रका फल कहते हैं:-जन्मस्थानपर शुक्र हो तो शत्रुनाश, द्वितीयमें धन-- लाभ, तृतीयमें अतीव सौख्य, चतुर्थमें धनलाभ, पञ्चम पुत्रप्राप्ति, छठे शत्रुवृद्धि, सातवे शोक, अष्टम धनलाभ, नवम वस्त्रलाभ, दशम पीडा, ग्यारहवें स्वकीय धनलाभ और बारहवें व्यय कराता है ॥ ८ ॥ अथ गोचरे शनिफलम् । भ्रंशं क्लेशंशं च शत्रुप्रवृद्धिं पुत्रात्सौख्यं सौख्यवृद्धिं च दोपम् । पीडां सौख्यं निर्धनत्वं धनाप्तिं नानानर्थ भानुसूनुस्तनोति॥९॥ गोचर करके शनैश्चरका फल कहते हैं:-जन्मका शनैश्चर भ्रष्ट करता है, द्वितीयमें क्लेश, तृतीयमें क्ल्याण, चतुर्थ, शत्रुवृद्धि, पञ्चम पुत्रोंसे सौख्य, छठे सौख्यवृद्धि, सप्तम क्रोध, अष्टम पीडा, नवम सौख्य, दशम निर्धनता, ग्यारहवें धनलाभ और वारहवें शनैश्चर अनेक अनर्थ कराता है ॥ ९ ॥ अथ गोचरे राहुफलम् । हानि नैःस्वं स्वं च वैरं च शोकं वित्तं वादं पीडनं चापि पापम् । वैरं सौख्य द्रव्यहानि प्रकुर्याद्राहुः पुंसां गोचरे केतुरेव ॥३०॥ अब गोचर करके राहुका फल कहते हैं:-जन्मके राहुमें हानि, द्वितीयमें धन- हीनता, तृतीयमें धनलाभ, चतुर्थमें वैर, पञ्चममें गोक, छठे धनप्राप्ति, सातवें विवाद, अष्टममें पीडा, नवममें पाप, दशममें वैर, एकादशमें सौख्य और वारहवेमें राहु धनहानि करता है । इसी तरह केतुका भी फल जानना चाहिये ॥ १० ॥ राशौ राशौ गोचरे खेचराणामुक्तं पूर्वैर्यत्फलं जन्मराशेः । तन्मानामेकमोत्पत्तिकानां भिन्न भिन्नं दृश्यतेऽश्यमेव ॥११॥ राशिमें गोचर करके ग्रहों का फल जो पूर्वीचार्योंने जन्मराशिसे लेकर कहा है सो फल एक राशिमें उत्पन्न मनुष्योंको जुदा जुदा देखने में आता है, अवश्य करके इममें क्या कारण है ।। ११ ॥

जातकाभरण ।
यस्मिनाशौशीतरश्मिप्रसूती संस्थाप्रोक्तो जन्मराशिः स एव ।
एवंलगेनान्विताः सप्तखटास्ते किं न स्युःप्राणिनांजन्मभानि१२
पुंसामतोऽयो किल राशयः स्युःशुभाशुभान्यत्र फलानि तेभ्यः।
ततश्च रेखामिलनांतरालात्स्पष्टं फलं चाप्टकवर्गयुक्तम् ॥ १३ ॥
मनुष्योंके जन्मकालमें जिस राशिमें चन्द्रमा बैटा हो उसीको जन्मराशि कहते
हैं इसी प्रकार लग्न करके सहित सातों ग्रहोंकी राशि क्यों नहीं होती हैं ॥ १२॥
पुरुषोंकी निश्चय करके आठ ही जन्मराशि होती हैं, उन आठों राशि करके
अच्छा बुरा फल करके रेखा और बिन्दुओंके अन्तर करके ठीक फल अएकवर्ग
करके कहा है ॥ १३ ॥
अथ सूर्याष्टकवर्गमाह।
स्यान्मंदात्कुजतोरविमृतितपोलामार्थकेंद्र-
सूर्यशभाटकम्,
स्थितः शुकादस्तरिपुव्ययेषु च गुरोधर्मा-
सू.चं म...श
..
रिपुत्राप्तियु । चंद्रात्याप्तिरिपुत्रिखपुशशि-
जात्पञ्च विनंदव्ययारिमाप्त्यभ्रगतम्तनो-
त्रिपु मुखोपांत्यारिरिस्फे शुभे ॥ १४ ॥
२६३५६७/३४
४/२०४९/९ १३१६
७.११७/१०/20
८
१०)
११
अथ मूर्यका अष्टवर्ग कहते हैं-शनि, मंगल, सूर्य, सूर्यानिष्टायकम्.
अपने स्थानसे १।२।४।७१८१९१० । ११ स.चि. में . शुश
में शुभ फल देते हैं और शुक्र अपने स्थानमे ७६१RAT
में शुभ फल देता है, बृहस्पति अपने स्थानसे ५
६१.९ । ११ में शुभ फल देता है, चन्द्रमा अपने ३/५/१२/६/
स्थानसे ११ ॥ ६ ॥ ३ । १० में शुभ फल देता है, धुप
अपने स्थानसे ५।३।९।१२।६।११।१० में शुभ
फल देता है और लग्नसे ३।४।६।११।१२ वें स्थानमें
शुभ फल देता है ॥ १४ ॥

|५४५/५६२०/७ ७६५५७७११/१९४८ १०.९७.९९ ११/२०१८1१०१० १२/१०/२२/११॥ ११२१ भापाटीकासहित । (२११) अथ चंद्राष्टकवर्गमाह । अथ चंद्रशुभाष्टकम्. भौमाद्ग्लौर्नवधीधनोपचयगः पत्र्याप्ति- धीस्थोऽर्कजाल्लनाच्चोपचयो खेरुपचयाया- चं. मं. यु..शु.ल.सू स्तेपु शस्तो बुधात् । धीरंधेषु चतुष्टये त्रिषु ६६६/ गुरोः केन्द्राष्टलाभव्यये स्यादेकोपचयास्त- २०) गस्त्रिखभवास्तांबुत्रिकोणे भृगोः ॥ १५॥ अब चन्द्रमाष्टक वर्ग कहते हैं:-चंद्रमा मंगलसे २ । ३।५।९। १० । ११ । स्थानमें शुभफल देता है और शनैश्चरसे ६।३।११।५ में शुभ फल देता अथचंद्रानिष्टाष्टकम् है और लग्नसे ३ : ६। १० । ११ । ११ ।। १ ।। चं. मं....श.ल. स. १० में शुभ फल देता है। सूर्यसे ३ । ६ । १० । ११८१७ में शुभ फल देता है और बुधसे ५८४ | सश६/१/१२ २३.३३ स्थानमें शुभफल देता है और बृहस्पतिसे १।४।७ ७५/५/१०।८।११।१२। स्थानमें शुभफल देता है और चंद्रमा ८७९ अपने स्थानसे १।३।६।१०। ११ । ७ में शुक्रफल देता है और शुक्से ३ । १० । ११ । ७ । ४ । ९.५ में शुभ फल देता है ॥ १५ ॥ ४४६ ५१७/९ ६.४५४ ८८१२८ १२ १०९ १२/१२) अथ भौमाष्टकवर्गः। स्वागौमोऽटचतुष्टयापधनगोजीवात्पडा- अथ भौमाएंकम्. यात्यखे चन्द्रादायरिपुत्रिगो भृगुसुतादृष्टां-पु..शाल.प.चं. त्यलाभारिंगः ।ज्ञापञ्चापरिपुत्रिगोऽकतन- यात्केंद्राष्टधर्मात्यगः सूर्याचोपचयात्मजेषु तनुतख्यायारिखाये शुभः॥ १६॥ ११३६६१११३३ २१५/१०८12)३५६ १६११११७६६११ ७/१२१८२०१० ९/११/११ (२१२) जातकाभरण। अब मंगलका अष्टक. वर्ग कहते हैं-मंगल अपने अथभौमानिष्टाप्टकम स्थानसे १२७४९११०१११ स्थानाम शुभफल देता है और वृहस्पतिसे ६ ॥ १०१११।१२। स्थानामें शुभ म....गर.स फल देता है और चन्द्रमासे ३१६ । ११ । स्थानोमन शुभफल देता है और बुधसे ३।५।६११२ स्थानोंमें ५२२३६४३ शुभफल देता है और शनैश्चरसे १ 12 1७1८1/8/2014 ९.१० ११ । स्थानोंमें मंगल शुभ फल देता है और २०५/२००४ सूर्यसे ३१५१६ । १० । ११ स्थानों में शुभफल देता है। और लग्नसे ११३।६।१०। ११ । स्थानों में शुभ- फल देता है ।॥ १६ ॥ अथ बुधाष्टकवर्गमाह। शुक्रादासुतधर्मलाभमृतिगः सौम्यः कुजा- अथ बुधाष्टकम्. योस्तपः केंद्रायाष्टधने स्वतोऽप्युपचयां- ... त्येकत्रिकोणे शुभः॥कोणांत्यारिभवे खेरिपु- भवाप्टान्त्ये गुरोरिंदुतः खायाष्टारिसुखा- थंगः सुखभवान्त्यैकोऽङ्कपदसूदयात् ॥३७॥ ९७७ १०॥८/९ १२९/१० १२ ६७/६/११॥ १० ११ ९/२०१२ अब बुधका अष्टकवर्ग कहते हैं-बुध शुक्रके स्थानसे १।२३।४।५।८।९।११ स्थानाम शुभ है और मंगल शनैश्चरसे १ । २१४१७१८४९।१०। ११ स्थानों में अथवुधानिष्टाष्टकम् शुभ है और अपनी राशिस १।२।५।६।९।..शश.स.च.म १० १११ । १२ । स्थानों में शुभ है और सूर्यमे १६९३६३३३ १।१२। शुभफल देता है और बृहस्पतिसे ६ । ८ । ११७/०६/२३ १२।१२ शुभफल देता है और बृहस्पतिसे ६ । ८। ११८५ १२ १११ शुभफल देता है और चंद्रमासे ४१२॥ ६॥ ८॥ १०॥ ११ शुभफल देता है और लमसे १ ।२।४। ६।९।११ । १२ बुध शुभफल दाता होता है १७ ११२३१३१११ ५/३/२/५/२३ ६४४३७४४ ९/१३५४९/७५ ६१७/१२४८६ ७८ (१०१८ ११ १०/१० भापोटीकासहित । (२१३) अथ गुरोरष्टकवर्गमाह । गुरोःशुभाटकम्. स्वात्खायानिकेन्द्रस्वनवदशभवाराति- धीस्थश्वशुक्रालयाकेन्द्रायधीपटूस्वनवसु घ.शश.ल.स.च. मं. च कुजात्स्वाटकेन्द्राय ईज्यः । इन्दो - नार्थकोणाप्तिषु सहजनवाटायकेन्द्राष्टगो- ज्ज्ञिात्कोणेऽध्यायखाद्याम्बुधिरिपुषुशने- ख्यन्त्यधीपसुशस्तः ॥१८॥ अब बृहस्पतिका अष्टक वर्ग कहते हैं: वृहस्पति अपने स्थानसे १२२॥३॥७॥१०१११ स्थानामें शुभ- गुरोरनिष्पाष्टकम्. फल देता है और शुक्रसे २।५।६।९।१०१११ स्थानों में शुभफल देता है और लग्नसे राश५६७।८।१०।११ शु. ल.स.चं. म. मुस्थानों में शुभफल देता है और मंगलसे २२।४।७।८।१० P११ स्थानों में शुभफल देता है और चंद्रमासे २१९७८ ६/११ स्थानोंमें शुभफल देता है और सूर्यसे ११२।३। ६.९१२।४।७।८।९।१०।११ स्थानोंमें शुभफलको देता है और बुधसे १ १२ १४ १५ १६ १९ ॥ १० ॥ ११ भावोंमें बृहस्पति शुभफल देता है और शनैश्चरसे ३।५।६।११ बृहस्पति शुभफल देता है ॥ १८ ॥ अथ शुक्राष्टकवर्गम् । खास्तांत्याहितवजितेषु तनुतः शुक्रो विना शक्राप्टकवर्गचक्रम् स्तारिखं चन्द्रात्स्वान्मदनव्ययारिरहिते- शश.द.स.चं म. प्वयियाष्टाप्तियु । मन्दाव्येकरिपुव्य-na यास्तरहितेषीज्यान्नवायाष्टधीखे कोणभवत्रिपद भवधीयन्त्यारिधर्म कुजात् ॥ १९॥ ६.३/३/८/६/३/५७ ८१३ २०) R rajarrror 106 ८४ १५.१११११ ८.१३ (२१४) जातकाभरण। ७१२१४ .039 ७७ ८1८ २०/१०/७ १०] अब शुक्रका अष्टकवर्ग कहते हैं: लग्नसे शुक्र १।२। शुक्रनिष्टाष्टकवर्गच ३ । ४ । ५। ८ १९ । ११ शुभफलको देता है और शाल सु.च.म.दुप, चंद्रमासे १।२।३।४।५।८।९।११ । १२ शुभफलको देता है और अपने स्थानसे शुक्र १ । २१३७३/७३३३३ ४१५1८।९। १० । ११ शुभफलको देता है और /१२६/१०३ २०४४३ सूर्यसे ८ । ११ । १२ शुभफल देता है और शनैश्चरसे ३।४।५।८।९। १० । ११ । शुभफल देता है और बृहस्पतिसे ५।८।९।१० । ११ । शुभफल देता है और बुधसे ३।५।६।९।११ शुभफल देता है. और मंगलसे शुक्र ३ । ५। ६ । ९ । ११ । १२ शुभफलको देता है ॥ १९ ॥ अथ गनेरष्टकवर्गम् । शनेरटकवर्गचक्रम. स्वान्मन्दस्त्रिपडायधीपुरवितोऽटायाद्- द्विकेन्द्रे शुभो भौमात्खायपडत्यधीवियु । तनोः खायाम्बुपद्व्येकगः । ज्ञादायारि- नवांत्यखाटसु भृगोरंत्यायपटूसंस्थित- चन्द्रादायरिपुत्रिगः सुरगुरोरन्त्यायधी- शगः॥२०॥ ५४३६/५/८/६/११ ११९७ १०.२०१० (१३ २१२० 1१२ शनेनिटाएकवर्गच अब शनैश्चरका अष्टक वर्ग कहते हैं:-शनैश्चर अपने स्थानसे ३।५।६।११ में शुभ है और सूर्य १।३।४ । श.ल.स.चं. मं...शु ७८१० । ११ में शुभ है और मंगलसे ३ । ५। ६ । १०। ११ । १२ में शुभ है और लग्नसे ३६९।१०। २३५२३३२११ में शुभ है और बुधसे ६१८४९।१०।१२ में शुभ है ५और शुक्रसे ६ । ११ । १२ में शुभ है और चंद्रसे ३ । ६ । ११ । में शुभ है और वृहस्पतिसे ५। ६।१।१में शुभफल देता है ॥ २० ॥ ७.८५७ ८९ १२)

भापाटीकासहित।
स्थानानि यानि प्रतिपादितानिशुभानि चान्यान्यशुभानिनूनम्।
तयोवियोगादधिकं फलं यत्स्वराशितो यच्छति तद्हेन्द्रः॥२१॥
लग्नकरके सहित सात ही ग्रहोंके जो स्थान कहे हैं उन स्थानोंमें ग्रह शुभफलको
देते हैं और उक्त स्थानोंके विना अन्यस्थानोंमें अशुभ फल करते हैं, शुभाशुभ
स्थानोंका. अन्तर करनसे जो आधिक स्थान हो तो अपनी राशिसे ग्रह फलको
देता है ॥ २१॥
अथ रेखासंख्यामाह-
भुजंगवेदा नवसागराश्च नवाग्मयः सागरसायकाश्च ।
रसेपवो युग्मशरा नववितुल्या क्रमेणाहकवर्गलखाः ॥२२॥
अब रेखाओंकी संख्या कहते हैं-सूर्यकी ४८ रेखा, चन्द्रमाकी ४९, मंगलकी.
३९, बुधकी ९४, बृहस्पतिकी ५६, शुक्रकी ५२, शनैश्चरकी ३९, सर ग्रहोंकी
रेखाओंका योग ३३७ होता है ॥ ३२॥
विलगनाथाश्रितराशितोऽत्र भवंति रेखाः खलु यत्र यत्र ।
विलनतस्तत्र चतत्र राशौ संस्थापनीयाःसुधियाक्रमेण ॥ २३॥
जन्मलग्नका स्वामी जिस राशिमें बैठा हो उस राशिसे जिस जगह रेखा- निश्चय
करके हो वह रेखा लंगसे लेकर उसी उसी राशिमें पंडितजन क्रम करके स्थापन
करें ।।२३ ॥
अथ प्रत्येकरेखाफलमाह.।
क्लेशोऽर्थहानियसनं समत्वं शश्वत्सुखं नित्यधनागमश्च ।
सम्पत्प्रवृद्धिर्विपुलामलश्रीः प्रत्येकरेखाफलमामनन्ति ॥४॥
अब प्रत्येक रेखाका फल कहते हैं:-रेखासे क्लेश,र धनहानि,३ व्यसन, ४ सम,
५ रेखा निरंतर सुख, ६ रेखा नित्य धनप्राप्ति, ७ रेखा संपदाकी वृद्धि करे, ८ रेखा
श्रेष्ठ लक्ष्मी प्राप्त करती हैं। यह फल एकसे लेकर आठ रेखाका कहा है ॥ २४ ॥
इत्येकखेटस्य हि संप्रदिपारेखायुतिश्चाखिलखेटरेखाः।
अएद्विसंख्यास्तुसमास्ततोऽपियथाधिकोना सदसत्फलास्ताः२५
यह एक ग्रहकी रेखाका फल कहा है, सम्पूर्ण ग्रहोंकी रेखासिदि करके फल
कहना चाहिये २८ रेखामें ग्रहोंका फल बराबर होता है, जो २८ रेखासे कमती
हो तो नेष्ट और २८ रेखासे अधिक हो तो श्रेष्ठ फल कहा है ॥ २५ ॥

जातकाभरण।
कः कदा फलदातेत्याह
इलातनूजश्च पतिर्नलिन्याः प्रवेशकाले फलदः किल स्यात् ।
राश्यर्द्धभोगे भृगुजामरेज्यौ प्रान्ते शनीन्दू च सदेन्दुसूनुः२६॥
अव ग्रहों के शुभाशुभ फल देनेका समय कहते हैं, कौन ग्रह किस समय फल
देगा । मंगल और सूर्य राशिके प्रवेशमें फल देते हैं और शुक्र बृहस्पति राशिके
अई भाग व्यतीत होने पर फल देते हैं और शनैश्चर चन्द्रमा राशिके अन्तमें फल.
देते हैं और बुध हमेशा राशिमें फल देता है ॥ २६ ॥
अथांगविभागेन ग्रहारिष्टमाह ।
शिरःप्रदेश वदने दिनेशो वक्षःस्थले चापि गले कलावान् ।
पृष्ठोदरे भूतनयः प्रभुत्वं करोति सौम्यश्चरणे च पाणौ ॥२७॥
कटिप्रदेश जघने च जीवः कविस्तु गुह्यस्थलमुष्कयुग्मे ।
जानूरुदेशेनलिनीशसूनुश्चारेण वा जन्मनिचिन्तनीयम् ॥२८॥
यदा यदा स्यात्प्रतिकूलवर्ती स्वाङ्गेऽस्य दोपण करोतिपीडाम् ।
इदं तु पूर्व प्रविचार्य सर्व प्रश्नप्रसूत्यादिपु कल्पनीयम् ॥२९॥
अब अंगविभागमें ग्रहोंका रिष्ट प्रकार कहते हैं:-सूर्य शिर और मुख, पीडा
करता है और छाती गलेमें चन्द्रमा रिष्ट करता है और मंगल पीठ और पेटमें पीडा
करता है और बुध हाथ पैरोंमें पीडा करता है ॥ २७ ॥ कमर और जंघोंमें बृह-
स्पति पीडा करता है और गुदा अंडकोश, शुक्र पीडा फरता है और जानु तथा
पिंडलियोंमें शनैश्चर पीडा करता है । इसका ग्रहों के चारसे विचार करना चाहिये
॥ २८ ॥ जो जो ग्रह गोचर अष्टकवर्गमें प्रतिकुल हो वह ग्रह अपने कहे हुए
अंगमें अपने दोपको करता है यह पहिले सम्पूर्ण विचार करके प्रश्नकाल वा जन्म-
कालसे वर्षमासादिकोंमें कल्पना करनी चाहिये ॥ २९ ॥
अथ द्विग्रहयोगादिवर्णनम् ।
तत्र मूर्यचंद्रयोगफलम् ।
पापाणयंत्रक्रयविक्रयेषु कूटक्रियायां हि विचक्षणः स्यात् ।
कामी प्रकामी पुरुपः सगर्वः सर्वोपधीशन खो समेते ॥ १ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्यचंद्रमा एक घमें बैठे हों वह मनुष्प पत्थर
और यंत्रोंका घेचनेवाला, माया रचनमें चतुर, कामी और चाहना सहित अभि.
मानी होता है।॥१॥

मापारीकासहित। (२१७) अथ सूर्यभौमयोगफलम् । भवेन्महौजा बलवान्विमूढो गाढोतोऽसत्यवचा मनुष्यः । सुसाहसः शूरतरोतिहिंस्रो दिवामणौ क्षोणिसुताभ्युपेते ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य मंगल एक घरमें बैठे हों वह मनुष्य बडे यश- वाला, श्लवान, मूह, अतिशय करके उद्धत, झूठ बोलनेवाला, साहसी, शूरवीर और हिंसा करनेवाला होता है ॥ २॥ अथ सूर्यत्रुधयोगफलम् । प्रियववाः सचिवो बहुसेक्याजितधनश्च कलाकुशलो भवेत् । श्रुतपटुर्हि नरो नलिनीपतौ कुमुदिनीपतिसूनुसमन्विते ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य बुध एक घरमें बैठे हों वह मनुष्य प्यारी बोलीगला, मंत्री, बहुत सेवा करके इकटा करनेवाला, कलाओंमें कुशल और शास्त्रमें चतुर होता है ॥ ३ ॥ अथ चन्द्रभौमयोगफलम् । आचारहीनः कुटिलप्रतापी पण्यानुजीवी कलहप्रियश्च । स्यान्मातृशत्रुर्मनुजो रुजातः शीतद्युतौ भूसुतसंयुते वै ॥ ४ ॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें चन्द्रमा मंगल एक घरमें बैठे हों वह मनुष्य आचा- ररहित, चुगुल, प्रतापी, व्यापारसे आजीविका करनेवाला, कलह जिसको प्यारा मातृवैरी और रोग करके दुःखी होता है ॥ ४ ॥ अय. सूर्यगुरुयोगफलम् । पुरोहितत्वे निपुणो नृपाणां मन्त्री च मित्राप्तधनः समृद्धः । परोपकारी चतुरो दिनेशे वाचामधीशेन युते नरः स्यात् ॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य बृहस्पति एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य पुगे- हितता में निपुण, राजाका मन्त्री, मित्रतासे धनकी समृद्धिको प्राप्त, पगया उपकार करनेशला और चतुर होता है ॥५॥ अथ सूर्यशुक्रयोगफलम। संगीतवाद्यायुधचारुबुद्धिर्भवेन्नरो नेत्रवलेन हीनः । कांतानियुक्ताप्तसुहृत्समाजः सितान्विते जन्मनि पद्मिनीशा।

(२१८)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य शुक्र एक राशिम बैठे ही वह मनुष्य गाना,
बजाना और शास्त्रविद्यामें मुन्दर बुद्धिवाला, नेत्रोंके वलसे रहित, स्त्रीकरके
सहित और मित्रोंके समाज करके पूण होता है ॥ ६ ॥
अय सूर्यशनियोगफलम् ।
धातुक्रियापण्यमतिर्गुणज्ञोधर्मप्रियः पुत्रकलत्रसौख्यः ।
सदा समृद्धोऽतितरां नरःस्यत्प्रद्योतने भानुसुतेन युक्ते ॥ ७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य शान एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य धातु-
क्रिया और व्यवहारमें बुद्धि रखनेवाला, गुणका जाननेवाला, धर्म जिसको
प्यारा, पुत्र और स्त्रीसे सौख्य पानेवाला और हमेशा अत्यन्त समृद्रियोंस
हित होता है ॥ ७ ॥
अथ चन्द्रबुधयोगफलम् ।
सद्वाग्विलासो धनवान्सुरूपः कृपादचेताः पुरुपो विनीतः ।
कांतापरप्रीतिरतीव वक्ता चंद्रे सचांद्री बहुधर्मकृत्स्यात् ॥ ८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा बुध एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य श्रेष्ठ
वाणीवाला, धनवान, श्रेष्ट रूपवाला, दयाकरके युक्तचित्त, नम्रतासहित, स्त्रीसे
अधिक प्रीति करनेवाला और घड़ा भारी वक्ता होता है ॥ ८ ॥
चन्द्रगुरुयोगफलम् ।
सदा विनीतो दृढगूढमंत्रः स्वधर्मकर्माभिरतो नरः स्यात् ।
परोपकारादरतैकचित्तो शीतद्युती वाक्पतिना समेते ॥ ९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा वृहस्पति एकराशिमें बैठे हों वह मनुष्य
हमेशा नम्रतासहित, मजबूत, छिी सलाह करनेवाला, अपने धर्म और कर्ममें
तत्पर और पराये उपकार करनेमें एकचित्त होता है ॥ ९ ॥
अथ चन्द्रभृगुयोगफलम् ।
वस्त्रादिकानां क्रयविक्रयेपु दक्षो नरः स्याद्व्यसनी विधिज्ञः ।
सुगंधपुप्पोत्तमवस्त्रचित्तो द्विजाधिराजेभृगुजेन युक्ते ॥१०॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें चन्द्रमा शुक्र एकगगिमें बैठे हों वह मनुष्य वस्खा
दिकोंके खरीदने और बेचनेमें चतुर और यमन सहित विधिका जाननेवाला।
मुगन्ध और उत्तम पुष्प वसोंमें चित्त रखनेवाला होता है ॥ १० ॥

भाषाटीकासहित ।
(२१९)
अथ चन्द्रशनियोगफलम् ।
नानांगनानां परिसेवनेच्छुर्वैश्यानुवृत्तिगतसाधुशीलः।
परात्मजः स्यात्पुरुषार्थहीन इन्दौ समन्दे प्रवदंति संतः ॥११॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चन्द्रमा और शनिका योग हो वह मनुष्य अनेक
स्त्रियोंको सेवन करनेकी इच्छावाला, वैश्यवृत्ति करनेवाला, साधु गीलसे रहित, पर-
पुत्र युक्त और पुरुषार्थहीन होता है ।। ११ ॥
अय भौमबुधयोगफलम् ।
बाहुयुधकुशलो विपुलस्त्रीलालसो विविधभेपजपण्यः ।
हेमलोहविधिबुद्धिनिभावः संभवेद्यदि कुजेंदुजयोगः ॥ १२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मफालमें मङ्गल बुध एकराशिमें बैठे हों वह मनुष्य मल्लविद्या
चतुर, बहुत स्त्रियोंकी लालसा करनेवाला, अनेक औषधियों का व्यापार करनेवाला,
सोना और लोहेकी विधिमें बुद्धिवाला होता है ।। १२ ॥
अय भीमगुरुयोगफलम् ।
मंत्रार्थशस्त्रादिकलाकलापे विवेकशीलो मनुजः किल स्यात् ।
चमूपतिर्वा नृपतिः पुरेशो ग्रामेश्वरो वा सकुजे सुरेज्ये ॥ १३ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मङ्गल बृहस्पति एकराशिमें बैठे हों वह मनुष्य मन्त्र
और शस्त्रविद्याकी कलाके समूहमें चतुर शीलवाला, फौजका मालिक अथवा गजा
अथवा नगर वा ग्रामका स्वामी होता है ॥ १३ ॥
अथ भौमभृगुयोगफलम् ।
नानाङ्गनाभोगविधानचित्तो छूतानृतप्रीतिरतिप्रपंचः ।
नरः सगर्वः कृतसर्ववैरो भृगोः सुते भूसुतसंयुते स्यात् ।। १४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मङ्गल शुक्र एक राशिम वैठे हों वह मनुष्प अनेक
स्त्रियोंके भोगविधानमें चित करनेवाला द्यूत और झूठमें प्रीति करनेवाला प्रपञ्चमें
तत्सर, अभिमानसहित और सबसे सैर करनेवाला होता है ॥ १४ ॥
अय भौमशनियोगफलम् ।
शस्त्रास्त्रविसंगरकर्मकर्ता स्तेयानृतप्रीतिकरःप्रकामम् ।
सौख्येन हीनो नितरांनर स्यादरामुतेमंदयुतेऽतिनियः ॥१५॥

(२२०)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मंगल शनैश्चर एकराशिम बैठे हों वह मनुष्य अन्य
और शत्रोंको जाननेवाला, युद्ध करनेवाला, चोरी और झंठमें प्रीति करनेवाला
और निरन्तर सौख्यरहित होता है ॥ १५ ॥
अथ बुधगुरुयोगफलम्।
सङ्गीतविन्नीतिपतिविनीतः सौख्यान्वितोऽत्यंतमनोभिरामः ।
धीरो नरः स्यात्सुतरामुदारः सुंगधभाग्वाक्पतिसौम्ययोगे॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालम बुध वृहस्पति एकराशिमें बैठे हों वह मनुष्य गान
विद्याका जाननेवाला, नम्रतासहित, सौख्ययुक्त, अत्यंत श्रेष्ठ, धैर्यवान, निरंतर
उदार और मुगन्धका भोग भोगनेवाला होता है ॥ १६ ॥
अथ बुधशुक्रयोगफलम् ।
कुलाधिशाली शुभवाग्विलासः सदा सहपः पुरुषः सुवेपः।
भर्ता बहूनां गुणवान्विवेकी सभार्गवे जन्मनि सोमसूनौ ॥१७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुध शुक्र एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य कुलमें
प्रतापी, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, हमेशा हर्षसहित, श्रेष्ठ वेप बहुत नौकरोंवाला
और गुणवान, चतुर होता है ॥ १७ ॥
अथ बुधशनियोगफलम।
चलस्वभावश्च कलिप्रियश्च कलाकलापे कुशलः सुवेपः ।
पुमान्वहूनां प्रतिपालकश्चद्भवेत्प्रसूती मिलनं ज्ञशन्योः॥१८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुध शनैश्वर एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य चञ्चल
स्वभाव, कलह जिसको प्यारा, कलाओंके समूहमें चतुर, श्रेष्ठ वेपवाला और बहुत
मनुष्यांका पालनेवाला होता है ॥ १८ ॥
अथ गुरुशुक्रयोगफलम् ।
विद्यया भवति पण्डितः सदा पंडितरपि करोति विवादम् ।
पुत्रमित्रधनसौख्यसंयुतो मानवः सुरगुरौ भृगुयुक्ते ॥ १९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें बृहस्पति शुरु एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य
विद्याकरके पण्डित, हमेगा पण्डितोंमे विवाद करनेवाला और पुत्र मित्र धनके
सौख्य महित होता है ॥ १९ ॥
अय गुरुगनियोगफलम।
शूरोऽर्थवान्यामपुराधिनाथो भवेयशस्वी कुशलः कलासु ।
स्त्रीसंश्रयप्राप्तमनोरथश्च नरः सुरेज्ये रविजेन युक्ते ॥२०॥

भाषाटीकासहित । जिस मनुष्यके जन्मकालमें बृहस्पति शनैश्चर एक राशिम बैठे हों वह मनुष्य शूरवीर, धनवान्, ग्राम और नगरका स्वामी, यशवाला, कलाओंमें कुशल और सीके आश्रयसे मनोरथ प्राप्त करनेवाला होता है ॥२०॥ अथ शुक्रशनियोगफलम् । शिल्पलेख्यविधिजातकौतुको दारुणो रणकरो नरो भवेत् । अश्मकर्मकुशलश्च जन्मनि भागवे रविसुतेन संयुते ॥२१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र शनैश्वर एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य शिल्प- शास्त्र और लेखनविधिमें चतुर, कौतुकी, घोर युद्ध करनेवाला और पत्थरके काम, कुशल होता है ॥ २१॥ इति श्रीवंशवरेलीस्थगौडवंशावतंस श्रीबलदेवप्रसादालजराजज्योतिपिक-पंडितश्यामलाल कृतायां श्यामसुन्दरीभाषाटीकायां ग्रहदृष्टिफलवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ अध निग्रहयोगाध्यायमारंभः। - अथ सूर्यचंद्रभौमयोगफलम्। शूराश्च यन्त्राश्वविधिप्रवीणापाकृपाभ्यां सुतरां विहीनाः । नक्षत्रनाथक्षितिपुत्रमित्रैरेकत्र संस्थेमनुजा भवति ॥१॥ अब त्रिग्रहयोग कहते हैं:-जिस मनुष्यके जन्मकालमें स. चं. मैं. एक राशिम वैठे हों वह मनुष्य शूरवीर, यंत्र और अश्वविद्याका जाननेवाला, लाज और कृपामे हीन होता है ॥ १॥ अथ सू० चं० बु० योगफलम् । भवेन्महोजानृपकार्यकर्ता वार्ताविधी शास्त्रकलासु दक्षः। दिवामणिज्ञामृतरश्मिसंस्थैः प्राणी भवेदेकगृहं प्रयातैः॥२॥ जिन मनुष्य के जन्मकालमें सू. चं, बु, एफराशिमें बैठे हों वह मनुष्य बड़े यसवाला, राजाका कार्य करनेवाला, वात करनेमें और गारफलामें चतुर होता अय सू० चं० गु० योगफलम् । सेवाविधिज्ञश्च विदेशगामी प्राज्ञः प्रवीणश्चपलोऽतिधूतः। नरो भवेचंद्रसुरेंद्रवंद्यपद्योतनानां मिलने प्रस्तौ।३॥

(२२२) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सू० चं वृ० बैठे हों वह मनुष्य सेवाकी विधि जाननेवाला, परदेश जानेवाला, चतुर, प्रवीण, चपल और अत्यन्त धूर्त होता है ।। ३ ।। अथ सू० चं० शु० योगफलम् । परस्वहर्ता व्यसनानुरक्तो विमुक्तसत्कर्मरुचिर्नरः स्यात् । मृगांकपंकेरुहवंधुशुक्राश्चैकत्र भावे यदि संयुताः स्युः ॥ ४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें सू० चं० शु० एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य पराया धन हरनेवाला, व्यसनोंमें आसक्त और सत्कोंकी रुचिसे रहित होता है ॥ ४॥ अथ सू० चं० श० योगफलम् । परेंगितज्ञो विधनश्च मन्दो धातुक्रियायां निरतो नितांतम् । व्यर्थप्रयासप्रकरो नरः स्यात्क्षेत्रे यदेकत्र रवींदुमन्दाः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें स. चं. श. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य पराये इंगितका जाननेवाला, धनहीन, मन्दबुद्धि, धातुक्रिया निरन्तर तत्पर और वृथा श्रम करनेवाला होता है ॥ ५ ॥ अथ सू० वु० भौ० योगफलम् । ख्यातो भवेन्मंत्रविधिप्रवीणः सुसाहसो निष्ठुरचित्तवृत्तिः। लज्जार्थजायात्मजमित्रयुक्तो युक्तैर्षुधार्कक्षितिजैनरः स्यात् ।।६।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. यु. में. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य प्रसिद्ध, मन्त्रशास्त्रकी विधिमें प्रवीण, श्रेष्ठ, साहसी, कठोर चित्तवाला और लजा, धन, नी एवं पुत्रमित्रोंसहित होता है ॥ ६ ॥ अथ मू० मं० ० योगफलम् । वक्ताऽर्थयुक्तः क्षितिपालमन्त्री सेनापतिर्नीतिविधानदक्षः । महामनाः सत्यवचोविलासः सूर्यारजीवैः सहितैनरः स्यात्।।७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू० मं० ० एक स्थानमें बैठे हों वह मनुष्य वना, धनसहित, राजाका मंत्रीफौजका मालिक, नीतिविधानमें चतुर, तेजस्वी, मत्य बोलनेवाला होता है ॥७॥ अय मू० मं० शु० योगफलम् । भाग्यान्वितोऽत्यंतमतिर्विनीतः कुलीनवाशीलविराजमानः । स्यादल्पजल्पश्चतुरो नरश्चद्भौमास्फुजित्सूर्ययुतिः प्रसृती ॥८॥ --

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भापारीकासहित ।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. मं. शु. एक राशिमें बैठे हो वह मनुष्य भाग्यवान
अत्यन्त बुद्धिमान, नम्रतासहित, कुलीन, शीलवान्, थोडा बोलनेवाला और चतुर
होत है ॥ ८॥
अथ सू० मं० २० योगफलम् ।
धनेन हीनः कलहान्वितश्च त्यागी वियोगी पितृवंधुवगैः ।
विवेकहीनो मनुजः प्रसूतौ योगो यदारिशनैश्चराणाम् ॥ ९॥.
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. म. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य धनहीन
फलहसहित, त्यागी और पिता बन्धुवर्ग करके वियोगी विवेकरहित होता है ।॥ ९ ॥
अथ सू० ० ० योगफलम् ।
विचक्षणः शास्त्रकलाकलापे सुसंग्राहार्थः प्रबलः मुशीलः।
दिवाकरज्ञामरपूजिताना योगे भवेन्ना नयनामयातः ।। १० ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. बु. वृ. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य चतुर,
'शाखाकी कलाके समूहमें प्रवीण, धन संग्रह करनेवाला वडा, बलवान, श्रेष्ठ भील
और नेत्ररोगसे पीडित होता है ॥ १० ॥
अय मू० ० शु० योगफलम् ।
साधुद्धपी निंदितोऽत्यंततप्तः कांताहेतोमानवः संयुतश्चत् ।
दैत्यामात्यादित्यसौम्याख्यखेटावाचाल स्यादन्यदेशाटनश्च १३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. ३. शु; एकभावमें बैठे हों वह मनुष्य साधुओंका
वैरी, निन्दा करनेवाला, स्त्रीके कारण अत्यन्त सन्तापत्र प्राप्त, बहुत बोलनेवाला
और देशोंका भ्रमण करनेवाला होता है ॥११॥
अथ मू० ० ० योगफलम् ।
तिरस्कृतः स्वीयजनैश्च हीनोऽप्यन्यैर्महादोपकरो नरः स्यात् ।
पण्डाकृतिहीनतरानुयातश्चादित्यमन्देन्दुमुतेः समेतैः ॥ १२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें म.उ. शा. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य तिरस्कारको
माप्त, अपने जनोंकरके रहित और भी अनेक दोष करनेवाला हिजडाकोसी आकृति
तया हीनवृत्तिवाला होता है ॥ १२ ॥
अय म० ० ० योगफलम् ।
अप्रगल्भवचनो धनहीनोऽप्याश्रितोऽवनिपतेर्मनुजः स्यात् ।
शूरताप्रियतरः परकायें सादारोऽगुरुभार्गवयोगे ॥ १३ ॥

(२२३)
जातकाभररण
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मू. बृ. शु. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य थोडा
बोलनेवाला, धनरहित, राजाका आश्रय करनेवाला और पराये काममें शूरता करने
वाला होता है ॥ १३ ॥
अथ सू० वृ० श० योगफलम् ।
नृपप्रियो मित्रकलबपुत्रैनित्यं युतः कांतवपुनरः स्यात् ।
शनैश्चराचार्यदिवामणीनां योगे सुनीत्या व्ययकृत्प्रगल्भः॥१४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सू. वृ. श. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य राजाका
प्यारा, मित्र और स्त्री पुत्रों करके सहित, शोभायमान शरीर, अच्छी नीतिसे खर्च
करनेवाला वडा, निर्भय और बोलनेवाला होता है ॥ १४ ॥
अथ सू० शु० श० योगफलम् ।
रिपुभयपरियुक्तः सत्कथाकाव्यमुक्तः
कुचरितरुचिरेवाऽत्यंतकंडूयनातः।
निजजनधनहीनो मानवः सर्वदा स्यात्
कविरविरविजानां संयुतिश्चेत्प्रसूतौ ॥१५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें सू. शु. श. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य शत्रुके
भयसे युक्त, श्रेष्ठ कथा और काव्यरहित, खोटे कामोंमें प्रीति करनेवाला, अत्यन्त
कण्डरोगसे पीडित, अपना धन और वन्धुवर्गसे हीन होता है ॥ १५ ॥
अथ चं० म० ० योगफलम् ।
भवति दीना धनधान्यहीना नानाविधानात्मजनापमानाः।
स्युमानवाहीनजनानुयाताश्चेत्संयुताक्षोणिसेतन्दुसौम्याः॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. म. सु. एक भावमें बैठे हों वे मनुष्य दीन, धन
धान्यरहित, अपने क्युपगोसे अपमानित और नौवनास साध करनेवाले
होते हैं ॥ १६ ॥
अय चं० मं० वृ० योगफलम् ।
त्रणांकितः कोपयुतश्च हर्ता कांतारतः कांतवपुर्नरः स्यात् ।
प्रसूतिकाले मिलिता भवंति चदारनीहारकरामरेज्याः॥ १७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें च. मं. वृ. एक राशिम बैठे हों वह मनुष्य प्रण
करके सहित, क्रोधसहित, पराया धन हरनेवाला, सीमें तत्पर और दोभायमान
शरीर होता है ॥ १७॥

मापाटीकासाहित । :अयचं. मं.'शु. योगफलम् । दुःशीलकांतापतिरस्थिरः स्यादुःशीलकांतातनुजोऽल्पशीलः । नरो भवेजन्मनि चैकभावो भौमास्फुजिचन्द्रमसो यदिस्युः॥१८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. मं. शु. एक राशिमें बैठे हो वह मनुष्य दुष्ट- शीला स्वीका पति, अस्थिर, दुष्टशील माताका संतान और थोड़ा शीलवाला होता है ॥ १८॥ अय चं० मं० श० योगफलम् । शैशवे हि जननीमृतिप्रदः सर्वदाऽपि कलहान्वितो भवेत् । संभवे रविभवेन्दुभूसुताः संयुता यदि नरोऽतिगर्हितः ॥ १९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. मं. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य बालक- पनेमें माताका मृत्यु करनेवाला और हमेशा कलहसहित निंदित होता है ॥ १९ ॥ अथ चं. वु. ३. योगफलम् । विख्यातकीर्तिमतिमान्महौजा विचित्रमित्रो बहुभाग्ययुक्तः । सद्वत्तविद्योऽतितरां नरः स्यादेकत्र संस्थैर्गुरुसोमसौम्यैः ॥२०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. बु. कृ. एकभावमें बैठे हों वह मनुष्य प्रसिद्ध यशवाला, बुद्धिमान, वड़ा प्रतापी, विचित्र मित्रोंवाला, बहुत भाग्यसहित और श्रेष्ठ आचार और विद्यावाला होता है ॥ २० ॥ अथ चं. ६. शु. योगफलम् । विद्याप्रवीणोऽपि च नीचवृत्तःस्पर्धाऽभिवृद्धया च रुचिर्विशेषात् । स्यादर्थलुब्धो हि नरःप्रमृतौ मृगांकसौम्यास्फुजितायुतिश्चत् ॥२१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. बु. शु. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य विद्यामें प्रवीण, नीचवृत्ति करनेवाला, सबसे द्रोह करनेवाला अर्थात् सबंकी निन्दा करनेमें पीति जिसकी, धनका लोभी होता है ।। २१ ॥ अथ चं० बु० श० योगफलम् । कलाकलापाऽमलवुद्धिशाली ख्यातः शितीशाभिमतो नितांतम् । नरः पुरग्रामपतिर्विनीतो बुधेदुमन्दाः सहिता यदि स्युः ॥२२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. व. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य कला- ओंके समूहमें निर्मल बुद्धिवाला, विस्पात, राजाका प्यारा, नगर ग्रामका पति और नम्रतासहित होता है ।। २२ ।। २५

(२२६)
जातकाभरणा
अथ च बृ० शु० योगफलम् ।
भाग्यभाग्भवति मानवः सदा चारुकीर्तिमतिवृत्तिसंयुतः ।
भार्गवेन्दुसुरराजपूजिताः संयुता यदि भवन्तिं संभवे ।। २३ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. बृ. शु. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य भाग्य-
वान्, हमेशा सुन्दर कीर्तिवाला, बुद्धिमान और श्रेष्ठवृत्तिसहित होता है ॥ २३ ॥
अथ चं० बृ० श० योगफलम् ।
विचक्षणःक्षोणिपतिप्रियश्च सन्मन्त्रशास्त्राधिकृतो नितांतम् ।
भवेत्सुवेपो मनुजो महौजाः संयुक्तमन्दंदुसुरेन्द्रवन्धैः ॥ २४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. पृ. श. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य चतुर.
राजाका प्यारा, श्रेष्ठ, मंत्रशास्त्रमें अधिकारी, उत्तम वेषवाला और बड़ा प्रतापी होना
है ॥२४॥
अथ चं० शु० श० योगफलम् ।
पुरोधसां वेदविदां वरेण्याः स्युः प्राणिनः पुण्यपरायणाश्च ।
सत्पुस्तकालोकनलेखनेच्छाः कवीन्दुमंदा मिलिता यदि स्युः२५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें चं. शु. श. एक भावमें बैठे हों वे मनुष्य वेदके
ज्ञाता पुरोहितोंमें श्रेष्ठ, पुण्यकरनेमें तत्पर, श्रेष्ठ पुस्तकोंके देखने और लिखनेवाले
होते हैं ॥ २५॥
अथ मं० ० ० योगफलम् ।
मापालकः स्वीयकुले नरः स्यात्कवित्वसङ्गीतकलाप्रवीणः ।
परार्थसंसाधकतैकचित्तो वाचस्पतिज्ञावनिमूनुयोगे ॥२६ ।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें में. बु. वृ. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य अपने
कुलमें धरतीका पालनेवाला,राजाके समान,काव्य और गाने बजानेकी कलामें प्रवीण
और पराया कार्य साधनमें एकचित्त होता है ॥२६॥
अथ में. वु. शु. योगफलम् ।
वित्तान्वितः क्षीणकलेवरश्च वाचालताचञ्चलतासमेतः।
धृष्टःसदोत्साहपरो नरः स्यादेकत्र यातः कविभौमसौम्यैः।।२७||
जिस मनुष्य के जन्मकालमें मं. इ.शु. एक रागिमें बेटे हों वह मनुष्य धनः
साहित, दुईल देह, बड़ा बोलनेवाला, चंचलतासहित, धृष्ट और नितर उत्साहमें
तत्पर होता है ॥ २७ ॥

भाषाटीकासहित। (२२७) अथ मं० बु० २० योगफलम् । कुलोचनः क्षीणतनुर्वनस्थः प्रेष्यप्रवासी बहुहास्ययुक्तः । स्यानोऽसहिष्णुश्च नरोऽपराधी मंदारसौम्य सहित प्रसूतौ||२८|| जिस मनुष्य के जन्मकालमें में. बु. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य बुरे नेत्री- वाला, दुर्बल देह, वनमें वास करनेवाला, दूतका काम करनेवाला, परदेशी, बहुत हास्यसहित, किसीकी न सहनेवाला और अपराधी होता है ॥ २८ ॥ अथ मं० ० शु० योगफलम् । सत्पुत्रदारादिसुखैरुपेतः क्ष्मापालमान्यः सुजनानुयातः। चाचस्पतिः क्षोणिसुतास्फुजिद्भिः क्षेत्रे यदैकन गतैनरः स्यात्॥२९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें में..श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य श्रेष्ठ पुत्र और सीके सुखसहित,राजाकरके माननीय और श्रेष्ठ जनों के साथ रहने वाला होता है॥२९॥ अथ मं० वृ० श० योगफलम् । • नृपाप्तमानं कृपया विहीन कृश कुवृत्तं गतमित्रसख्यम् । जन्यांच शन्यंगिरसावनीजाः संयोगभाजो मनुज प्रकुर्युः३०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मं. वृ. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य राजा करके मास मान और कृपारहित, दुर्बल, खोटी वृत्ति करनेवाला और मित्रोंकी मित्रतारहित होता है ॥३०॥ अय मं० शु० श० योगफलम् । वासो विदेशे जननी त्वनार्या भार्या तथैवोपहतिः सुखानाम् । देत्येन्द्रपूज्यावनिजार्कजानां योगे भवेजन्म नरस्य यस्य ।।३।। जिस मनुष्य के जन्मकालमें में. शु. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य परदेशमें चास करनेवाला और उसकी माता नीचकुलवाली, वैसी ही उसकी औरत होती है और उसके सुखोंका नाश होता है ॥३१॥ अय घु० वृ• शु० योगफलम् । नृपानुकंप्यो वहुगीतकीर्तिः प्रसन्नमूर्तिविजितारिवर्गः । सौम्यामरेज्यास्फुजितांप्रसूता चसंयुतिःसत्त्वपरो नर स्यात् ३२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बु... एक राशिमें बैठे होवह मनुष्य रानाकी कृपा सहित बहुतयशपाला,प्रसन्नचित्त,शत्रुओंको जीतनेवाला और बलवान होता ॥३२॥ अय बु० पृ० श० योगफलम् । स्थानार्थसबैभवसंयुतः स्यादनल्पजल्पो धृतिमान्सुवृत्तः। शनेश्वराचार्यशशांकपुत्राः क्षेत्रे यदेकत्र गता भवति ॥२३॥ -- (२२८) जातकाभरण! जिस मनुष्यके जन्मकालमें बु.प.श. एक भावमें बैठे हा वह मनुष्य मकान में धन और श्रेष्ठ वैभव सहित बहुत बोलनेवाला,धृतिमान और श्रेष्ठ वृत्तवाला,होता है।॥३३॥ अथ बु० शु० श० योगफलम् । साधुशीलरहितोऽनृतवक्ताऽनल्पजल्पनरुचिः खलु धूर्तः । दूरथाननिरतश्च कलाज्ञो भार्गवज्ञशनिसंयुतिजन्मा ॥ ३४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बु. शु. श. एक राशिमें बैठे हों वह मनुष्य साधु शीलरहित, झूठ बोलनेवाला, बहुत बोलनेवाला, निश्चय धूर्त, बडी दूरकी यात्रा करनेवाला और कलाओंका जाननेवाला होता है ॥ ३४ ॥ अथ वृ० शु० ० योगफलम् । नीचान्वये यद्यपि जातजन्मा नरः सुकीर्तिः पृथिवीपतिः स्यात् । सवृत्तिशाली परिसूतिकाले मंदेज्यशुका मिलिता यदिस्युः॥३५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृ. शु. श. एक भावमें बैठे हों वह मनुष्य नीचवंशम भी चाहे पैदा हो तो भी श्रेष्ठ कीर्तिवाला, धरतीका स्वामी और श्रेष्ठ वृत्ति करनेगला होता है ॥ ३५ ॥ अथ शुभाशुभयुक्तचन्द्रसूर्यफलम् । पापान्विते शीतरुची जनन्या नूनं भवेन्नैधनमामनंति । ताग्दिनेशः पितृनाशकर्ता मिश्रेविमिश्र फलमत्र कल्प्यम्३६॥ शुभान्वितो जन्मनि शीतरश्मियशोऽर्थभूकीतिविवृद्धिलाभम् । करोति जातं सकलप्रदीपं श्रेष्ठप्रतिष्ठं नृपगौरवेण ॥ ३७॥ एकालये चेत्खलखेचराणां त्रयं करोत्येव नरं कुरूपम् । दारिधदुःखैः परितप्तदेहं कदापि गेहं न समाश्रयेत्सः ॥ ३८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रहोंकरके युक्त चन्द्रमा बैठा हो तो माताको निश्चय करके नाश करता है, उसी प्रकार मूर्य पापग्रहों करके सहित हो तो पिताका नाश करता है, मिश्रग्रहोंसे मिश्र फल करता है ।। ३६ ॥ और जो चंद्रमा शुभ ग्रहकरके सहित बैठा हो तो वह मनुष्य यश और धन, कीर्तिकी वृद्धिको प्राप्त होता है और वह मनुष्य श्रेष्ठ प्रतिष्ठा करके सहित, राजाफरके मानको प्राप्त होता है ॥ ३७ ।। जिसके एक घरमें तीन पापग्रह वेटे हों तो वह मनुष्य चुरे रूपवाला, दारिद्य और दुःखों करके सन्तापित कभी घरमें मुख नहीं पाता है ॥ ३८ ॥ इति विग्रहयोगाभ्यायः।

(२२९) भाषाकासहित। अथ राजयोगाध्यायप्रारम्भः । तत्रादौ गणेशस्तुतिः। सद्विलासकलगर्जनशीलः शुण्डिकावलयकृत्प्रतिवेलम् । अस्तु वः कलितभालतलेंदुर्मगलाय किल मंगलमृतिः ॥१॥ अब राजयोग कहते है-तहां पहिले श्रीगणेशजीका ध्यान करते हैं, कैसे है गणेशजी श्रेष्ठ विलासके करनेवाले, मधुर स्पष्ट शब्टके गर्जनशीलवाले, शुण्डको पहुँचीके समान वाग्बार घुमाते हुए, शोभायमान है मस्तकपर चंद्रमा जिनके ऐसे मंगलकी मूर्ति श्रीगणेशजी महाराज मंगलके वास्ते हमारे विनाका नाश करो ॥१॥ अथ राजयोगकथनकारणमाह । भाग्यादिभावप्रतिपादितं यद्भाग्य भवेत्तत्खलु राजयोगः । तान्विस्तरेण प्रवदामि सम्यक्तः सार्थकं जन्मयतो नराणाम्॥२॥ भाग्यादिभाव जो पहिले वर्णन किये हैं सो भाग्य निश्चय करके राजयोगमे होता है, उन राजयोगोंको मैं भले प्रकार वर्णन करता हूं, उन राजयोगोंके उत्पन्न हुएसे मनुष्योंका जन्म सार्थक है ॥ २ ॥ अय राजयोगः। नभश्वराः पंच निजोच्चसंस्था यस्य प्रसूतौ स तु सार्वभौमः । जयः स्वतुंगादिगताःस राजाराजात्मजस्त्वन्यसुतोऽत्रमंत्री ॥३॥ राजयोगः। राजयोगः। जिस मनुष्यके जन्मकालमें पाच ग्रह अपनी उच्चराशिमें बैठे हो। वह मनुष्य समुद्रपर्यंत धरतीका पति सार्वभौमराजा होता है ( एको ९ योगः) और जिसके तीन ग्रह अपने उच्च स्वक्षेत्र मूल निमोणमें बैठे हों वह मनुष्य राजकुलम उत्पन्न हुआ राजा होता है और अन्यजातिमें उत्पन्न राजारा वजीर होता है ॥ ३ ॥ ७ ५ ३ २ १०म. ७ १० (२३०) जातकाभरण। तुंगोपगा यस्य चतुर्नभोगा महापगासंतरणे २१ बलानाम् । दंतावलानां किल सेतुबंधा १. १०म. कीर्तिप्रबन्धा वसुधातले ते ॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चार ग्रह अपने उच्चम बैठे हों उस मनुष्यके साथ हाथियोंके समूह चलते हैं और वह मनुष्य पुलबांधनेमें समर्थ हो उसकी धरतीपर बड़ी कीर्ति होती है ॥ ४ ॥ स्वोच्चे सूर्यशनीज्यभूमितनथैयद्वा विभिलंगगै. स्तेपामन्यतमे हि पोडशमिताः श्रीराजयोगाः स्मृताः। तन्मध्ये निजतुंगगे ग्रहयुगे यद्वैकखेटे विधी स्वः तुंगसमाश्रितैकखचरे लग्ने परे पोडशः॥५॥ अब बत्तीस राजयोग कहते हैं-सूर्य शनैश्चर, बृहस्पति, मंगल अपनी उच्चराशिमें बैठे हों तो चार राजयोग होते हैं अथवा पूर्वोक्त ग्रहों से तीन ग्रह उच्चरादिशगत केन्द्रमें बैठे हों तो बारह राजयोग होते हैं इस तरह सोलह हुए। राजयोगः१ राजयोगः२ राजयोगः३ ३ श १ ७ १० स.. स ११ राजयोगः राजयोगः ५ राजयोगः६ १२ ९ 8 १२ १०. ८ १० ६ ५ भाषाटीकासहित) राजयोग राजयोगः राजयोगः ८ ३ ७ १० १०में ११ ८ म.१० १२) ९ राजयोगः १० राजयोगः ११ राजयोगः १२ ८ ૨૨ (१०मैं. ११ १०. (१०म. १२ राजयोगः १३ राजयोगः १४ राजयोगः १५ ५ ३ १२.१०. बा.७ मं १० (१०,९१३ ११ १२ राजयोगः १६ २ tot. उन्हीं पूर्वोक्त ग्रहों से दो ग्रह अपनी उच्चराशिगत केन्द्रमें बैठे हों और चन्द्रमा कर्कराशिका हो तो बारह राजयोग होते हैं और उन्हीं चार ग्रहोमसे एक ग्रह भी अपनी उच्चराशिगत फेन्द्रमें बैठा हो और चन्द्रमा कर्क राशिमें बैठा हो तो चार राजयोग होते हैं और पूर्वोक्त बारह राजयोग मिलकर सोलह हुए ॥ ५ ॥ यू.४ (२३२) :जातकाभरण। राजयोगः १८ राजयोगः १७ राजयोग: १९ ५ ३ २ वृ.चं, १ ७ यू.४ 10 १० ५ ૨૨ ६ राजयोगः २० राजयोगः२१ राजयोगः २२ १२ ६ स ३ १२ ८ १०म. ७ १० AX १०में ७ वं, १२ १ श ५ राजयोग: २३ राजयोगः २४ राजयोग २५ ६ (चं २ यू.४ १ .१० . १० १२ ३ म.१० १२ ९ राजयोगः२६ राजयोगः२७ राजयोगः८ ९ /१०. म (१०म. यू 11 ३ ५ १२ भोपाटीकासहित। राजयोगः ३० राजयोगः २९ राजयोग:३१ ३ ५ ३ ६ प १० ७ ० ७ १० ९ १२ ११ राजयोगः ३२ वर्गोत्तमेऽमृतकरे यदि वा शरीरे संवीक्षिते (१० च चतुरादिमिरिंदुहीनः। द्वाविंशतिप्रमितया खलं संभवंति योगाः समुद्रवलयक्षितिपाल- कानाम् ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चन्द्रमा वर्गोत्तम नवांशगत लग्नमें बैठा हो अथवा खाली चन्द्रमा लग्नमें चार ग्रहोंको आदि लेकर पांच छः ग्रह लग्नको देखते हों तो वाइस राजयोग होते हैं इन योगोंमें पैदा हुआ मनुष्य समुद्र पर्यन्त धरतीका पालन- वाला होता है ॥ ६॥ राजयोग राजयोगः२ राजयोगः३ ४ ४ १२ द. '५ १ ५ ?? १० १२म. ६ घुशह ५ रा.स. ७ १० ८ राजयोगः४ राजयोगः५ राजयोगः ५ ५ ३ ६ ४ २ ४ an न टा ८ १० १ (२१४) जातकाभरण। राजयोगः७ राजयोगः८ राजयोगः ७ १० च १० चं.८ चं.९ १२ श. १० ४ २ २१ शु युसू, १३ बुशुसू) १ ४ राजयोगः १० राजयोगः ११ राजयोगः १२ ९ १२ १० १२ (१०च. ८ ११चं ८में में १ यू. शु बुद राजयोगः १३ राजयोगः १४ राजयोगः १५ १२ २ श चं.३) M ५ चं. ११म का ५ ४ ७ ६ ११ A মৃত্যু १० श. मं६ १० राजयोगः १६ राजयोगः १७ राजयोगः १८ ७ श डा. ३ चं.८ ३ युस पर १० २ जारापु १० भाषाटीकासहित । (२३५) राजयोगा। राजयोगः १९ राजयोगः २० १० ८ श (१०च. ७में २ २७ (मू५ मं४ राजयोगः२२ इसी प्रकार चन्द्रमा लग्नमें न बैठा हो और न देखता हो और चार वा पांच वा छ: ग्रह लमको देखते ही तो २२ और योग होते हैं। ७ उदग्वसिष्ठो भृगुजश्च पश्चात्प्राग्वाक्पतिर्दक्षिणतस्त्वगस्त्यः । प्रसूतिकाले स भवेदिलाया नाथो हि पाथोनिधिमेखलाया जिस मनुष्यके जन्मकालमें उत्तरमें वशिष्ठ और शुक्र पश्चिममें, पूर्वमें बृहस्पति, दक्षिणमें अगस्त्य हों ऐसे समयमें पैदा हुआ मनुष्य समुद्र है तागडी जिमकी ऐसी धरतीका स्वामी होता है ॥ ७॥ राजयोगः स्वोच्चे मूर्तिगतोऽमृतांशुतनये नके सबके शनौ चापे वागधिपेन्दुभार्गवयुते स्याज्जन्म भूमीपतेः । स्वस्थाने ननु यस्य भूमितुरगो मत्तेभमालामिलसेनांदोलितभूमिगोलकलनं दिग्दतिनः कुर्वते ॥ ८॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें उच्चराशिगत लममें बुध बैठा हो और मक्रराशिम मंगलसहित शनैश्वर बैठा हो और धनराशिम वृहस्पति चन्द्रमा शुरु करके ५ - १ १२ 'म.१०॥ ६ ७ १२ (२३६) जातकाभरण। सहित वैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न हुए राजाके जन्मकालमें उस राजाके घरपर धरती, घोडे, मतवाले हाथियोंके समृहकरके फौज धरतीके ऊपर दिक्पाल हार्थी 'आनन्दको करते हैं ॥८॥ 'राजयोगः 'दिनाधिराजे मृगराजसंस्थे नके सबके कलशेऽर्कसूनौ। पाठीरलग्ने शशिना समेते 'महीपतेर्जन्म महौजसः स्यात् ॥ ९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य, सिंहराशिमें और मकरराशिमें मंगल, कुम्भ राशिमें शनैश्चर, मीनराशिमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य बडा तेजवाला राजा होता है ॥ ९ ॥ राजयोगः राजयोगः महीसते मेपगत तनुस्थे म.१/११ | वृहस्पती वा तनुगे स्व- तुंगे । योगेद्वयेऽस्मिन्नृपती भवेतां जितारिपक्षी नृप-८ नीतिदक्षी ॥१०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत मंगल लग्नमें बैठा हो (एको योगः) अथवा कर्कराशिगत वृहस्पति लग्नमें बैठा हो इन दोनों योगोंमें उत्पन्न मनुष्य शत्रुओं के जीतनेवाले नीतिशास्त्र में राजा होते हैं ॥ १० ॥ राजयोगः वाचस्पतिः स्वोच्चगते विलग्ने मेपे दिनेशः शनिशुक्रसौम्याः । लाभालयस्थाः किल भूमिपालं तं भूतलस्याभरणं गृणंति ॥ ११॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृहस्पति उच्चका होकर लग्नमें बैठा हो, मेपरागिमें सूर्य और शनेश्वर शुभ बुध ग्यारहवें बैठे हो, वह मनुष्य निश्चय करके घरतीका आभूषणरूपी गना होता है ॥ ११॥ ३ ง 3 १ १० ५ १० १२ ११ १० ११ /२०श.) भापाटीकासहित। (२३७), राजयोगः। मन्दो यदा नक्रविलग्नवर्ती मृगेन्द्रयुग्माजतु- लाकुलीराः । स्वस्वामियुक्तं जनयंति नार्थ पाथोनिधिप्रांतमहीतलस्य ॥ १२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चर मकरराशिगत लग्नमें विठा हो और सिंहराशिगत सूर्य, मिथुनमें बुधमेपमें मंगल, तुलाराशिम शुरु, कर्क राशिमें चंद्रमा बैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न हुआ मनुष्य समु- द्रपर्यन्त धरतीका स्वामी (राजा) होता है । यह योग किसी किसी देशमें कभी होता है ॥ १२ ॥ राजयोगः। इन्द्रे दैत्यगुरौ निशाकरसुते मूर्ती च तुग- स्थिते के वक्रशनैश्चरे च शफरे चंद्रामरे- ज्यो स्थिती। योगोऽयं प्रभवेत्प्रसूतिसमये चं यस्यावनीशो महान्वैरिबातमहोद्धतेभदलने पञ्चाननः केवलम् ॥ १३॥ जिम मनुप्यके जन्मकालमें मिथुनराशिम शुरु और बुध लग्नमें कन्याराशिका बैठा हो और मफराशिम मंगल शनैश्चर बैठा हो और मीनराशिगत चंद्रमा बृहस्पति बेटा हो वह मनुष्य शत्रुओंका नाश करनेवाला बड़ा भारी राजा होता है, जो हाथियोंके दलन करनेमें सिंह होता है ॥ १३ ॥ राजयोगः। सिंहोदयेऽस्वजगो मृगांकः शनैश्चरे कुंभ- धरे सुरेज्यः । धनुर्धरै चेन्मकरे महीजो राजाधिराजो मनुजो भवेत्सः ॥ १४ ॥ जिम मनुष्यके जन्मफालमें सिंहराशिगत लग्नमें एवं १०म. विंटा हो, मेपगनिमें चंद्रमा और गनेश्वर कुंभमें पेश होने धन गनिमें गृहस्पति, मरगनिमें मंगल बेटा हो ऐसे योगमें उत्पन्न मनुष्य राना. ओरा राजा होता है ॥ १९ ॥ ९ १० म ८ ३ १३. ध ३ ६ ८ ३ ४७ २ १ & (२३८) जातकाभरण। राजयोगः। मेपे गतो मूर्तिगतः प्रसूती वृहस्पतिश्चास्त- गतः कलावान् । रसातले व्योमगते सित- १०२ श्चेन्महीपतिर्गीतदिगंतकीर्तिः ॥ १५ ॥ ७चं. जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत वृहस्पति बैठा हो, सातवें चंद्रमा बैठा हो और चतुर्थ वा दशम भावमें शुक बैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न राजाकी कीर्ति दिगंतव्यापिनी होती है. अर्याद बड़ा प्रतापी राजा होता है ।। १५ ॥ राजयोगः। गुरुः कुलीरोपगतः प्रसूती स्मराम्बुखस्था भृगुमन्दभौमाः । तद्यानकाले जलधेजलानि भेरीनिनादोच्छलनं प्रयांति ॥ १६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बृहस्पति कर्कराशिगत लग्नमें बैठा हो और सातवें शुक्र और चतुर्थ शनैश्चर, दशम मंगल बैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न हुए राजाकी यात्राके समयमें समुद्रका जल नगाड़े के शब्दसे उछलता है ॥ १६ ॥ प्रसूतिकाले स्फुरदंशुजालः पड्वर्गशुद्धोऽदितिभे स्वभे वा। तुंगे विकोणे स नभश्चरेन्द्रो नरं प्रकुर्यात्खलु सार्वभौमम् १७ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा पड्वर्गमें शुद्ध होकर पुनर्वसु नक्षत्रका फर्क राशिका बैठा हो अथवा उचराशिगत हो वह मनुष्य निश्चय कर समुद्र पर्यंत घर तीका स्वामी होता है ॥ १७ ॥ पड्वर्गशुद्धौ खचरद्वयं चेद्यथोक्तरीत्या जनने नृपस्य । तस्याधिपत्यं खलु किंनरेपु दीपांतरे चात्र न किं धरायाम् १८ जिस मनुष्य के जन्मकालमें पदवर्ग शुद्ध दो ग्रह पूर्वोक्त रीतिसे समान बेटे हाँ उस राजाका आधिपत्य किन्नरोंके विपे और दीपांतरोंमें और पृथ्वीपर होता है।॥ १८॥ तुंगत्रिकोणाधिकारहीनः पड्वर्गशुद्धेनिभिरेव मंत्री । राजा चतुर्भिः खलु सार्वभौमः पंचादिभिर्वाक्पतिनककेन १९॥ ११ ३ वृ८ १० भाषाकासहित । (२३९) जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीन ग्रह उच्च आर मल त्रिकोणके अधिकारस हीन होफर पइवर्गमें शुद्ध बैठे हों वह मनुष्य राजाका वजीर होता है और पूर्वोक्त सतिसे समान चार ग्रह बैठे हों वह मनुष्य राजा होता है और पांच वा छ: ग्रह पड्वर्गम शुद्ध बैठे हाँ वह मनुष्य सार्वभौम राजा होता है और बृहस्पति अकेला ही पड़वर्गमें शुद्ध बैठा हो तो वह राजा होता है ॥ १९॥ राजयोगः वृपे शशी लग्नगतोऽम्बुसप्तखस्था रखीज्या- कसुता भवंति । तदंडयात्रासु रजोऽन्धका- शराहिनेऽपि रात्रिः कुरुते प्रवेशम् ॥ २० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृपराशिगत चंद्रमा लग्रमें बैठा हो और चौथे भावमें सूर्य और सप्तम वृहस्पति और दशममें शनश्चर बैठा हो उस राजाकी घड़ी मात्र यात्रासे फौजके चलनेके कारण 'धरती रजसे अंधकार हो जाता है अर्थात् दिनमें रात्रिका वेश मालूम पड़ता है ॥२०॥ राजयोगः। गुर्विदुसौम्यास्फुजितश्च यस्य मूर्तिविधर्मा- यगता भवंति। मृगेऽसूनुस्तनुगोऽवननमे- .कातपत्रां स भुनक्ति धात्रीम् ॥ २१॥ जिस मनुष्यको जन्मकालमें बृहस्पति और चन्द्रमा, बुध, शुक्र, लग्न तृतीय नवम एकादशमें बेटे हों और मकर- राशिमें शनैश्वर बैठा हो तो वह मनुष्य धरती पर एकछत्रधारी होकर पृथिवीका भोग करता है ॥२१॥ राजयोगः। राजयोगः। तुंगस्थितौ शुक्रबुधौ विलग्ने नके चवको धनुपीज्यचंद्री प्रस- तिकाले किल तो भवे. तामाखण्डलोभूमि- तलेपिसंस्था ॥२२॥ ९ ही श ८ १ ७ ५ ५ १०) ar में ११ १२ ७ घ.३ (२४०) जातकाभरण; जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र.या युध उच्चराशिगत लग्नमें बैठा हो मकरमें मङ्गल, धनराशिमें बृहस्पति, चंद्रमा जिस राजाके जन्मकालमें ऐसा योग हो वह राजा इंद्रके समान धरतीके उपर होता है, अथवा समग्र घरतीका स्वामी होता है ।। २२ ॥ राजयोगः। कर्केऽर्कचंद्रौ सुरराजमन्त्री शवस्थितश्चापि १०म, बुधः स्वतुंगे। कश्चिद्बली लग्नगतः स राजा, राजाधिराजाभिधयालमेव ॥ २३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिमें सूर्य, चंद्रमा बैठे हों और वृहस्पति छठे और बुध अपनी उच्चराशिगत हो और कोई ग्रह लग्नमें बली होफर बैठा हो वह मनुष्य राजाधिराज राजाकरके प्रसिद्ध होता है ।। २३ ॥ राजयोगः। मुरुनिजोचे यदि केन्द्रशाली राज्यालये दान- वराजपूज्यः। प्रसूतिकाले किल तस्य मुद्रा १२ चतुःसमुद्रावधि गामिनी स्यात् ॥२४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बृहस्पति उच्चका होकर केन्द्रमें बैटा हो, दशमभावमें शुक्र वैटा हो ऐसा योग होनेसे उस राजाका रुपया और मोहर चारों समुद्रतक चलता है ।। २४ ॥ राजयोगः। देवाचार्यदिनेश्वरौ क्रियगतौ मेपूरणे क्षोणिजः पुण्ये भार्गवसौम्यशीतकिरणा यस्य प्रसूती स्थिताः । नूनं दिग्विजयप्रयाणसमये सन्ये- रिला व्याकुला चिंतामुद्रहतीति का गतिरहो सर्वसहायाः स्थितेः॥२५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृहस्पति और मर्य मेपराशिगत लग्नमें वेटे हों और दशमभावमें मङ्गल बैठा हो और नवम स्थानमें शुक्र, बुध, चंद्रमा, बैठे हों जिनके जन्मकालमें ऐमा योग हो उस राजाकी दिग्विजय-यात्रा समय फौजकरके धरती व्याकुल हो जाती है और सम्पूर्ण मनुष्य चिंताको करके कहते हैं कि अब क्या गति होनेवाली है ? ॥२५॥ १० ४ ७ ५ ९ १० ११ सु १२ भापाटीकासहित । (२४१) नीचारातिलवोज्झिता बलयुताः सत्यक्तवैराः परं स्फारस्कांतिधरा भवतिखचरा संस्थोपे भार्गवः । भ्रातृणां यदि मंडले समुदितो जीवो भवेत्संभवे देवेस्तुल्यपराक्रमः स च नृपः कोपप्रमृष्टाहितः ॥ २६ ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें नीच और शत्रु नवांशसे राहत वैरसे हीन प्रकाश- वान् कातिको धारण करनेवाले ग्रह हो और शुक्र वृष राशिमें बैठा हो, भ्राटमंडलमें उदयको प्राप्त बृहस्पति बैठा हो ऐसे योगमें उत्पन्न हुआ राजा देवताओं के समान बलवान् क्रोधसे रहित होता है ॥ २६ ॥ বালবী। मेपोदयेऽश्च गुरुः कुलीरे तुलाधरे मंदविधू भवेताम् । भवेन्नु पालोऽमलकीर्तिशाली भूपालमालापरिपालिताज्ञः ॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत सूर्य रनमें वटा हो और वृहस्पत्ति कर्कराशिगत हो और तुलाराशि में शनैश्चर चन्द्रमा बैठा हो ऐसे योग उत्पन्न राजा निर्मल यशवाला हो जिसकी आनाको गजालोग पालन करते हैं ॥ २७ ॥ राजयोगः। मीने निशाकरः पूर्णः सर्वग्रह निरीक्षित । सार्व- भीमं नरं कुर्यादिन्द्रतुल्यपराक्रमम् ।। २८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मीनराशिगत चंद्रमा पूर्ण हो उमको सम्पूर्ण ग्रह देखते हों ऐसे योगसे उत्पन्न राजा चक्रवर्ती इंद्रके तुल्य बलवान होता है ॥२८॥ धने दिनेशाभृगुजीवसौम्या नास्तं गता नो रिपुदृष्टियुक्ताः । स्यात्सङ्कटं तत्कटकं रिपृणां यशःपटो दिग्वसनाय नृनम् ॥ २९॥: जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्यसे दूसरे शुक्रः बृहस्पति बुध बेठे हों न तो मस्तके हो और ना कोई देखता हो पेमे योग रसत्र हुए गजाफे शत्रुओंफी. फोन सामनेसे भाग जाती है और उन शत्रुदलके मगरूपी वमाको नंगे कटेवा है ।।२९ ।। ११ १२) द राजयोगः। में ६ ७ (२४२) जातकाभरण। राजपोगा। सत्त्वोपेतः शुभजननपः पूर्णचन्द्रं प्रपश्ये- द्यस्योत्पत्ती भवति नृपतिनिजितारातिपक्षः। १०. यात्राकाले गजहयरथात्यंततूर्यस्वनानां ब्रह्मांड नोऽखिलमपि भवेत्पूरणार्थ समर्थम् ॥ ३०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें जन्मलनका स्वामी बलवान हो उसको पूर्ण चन्द्रमा देखता हो ऐसे योगमें पैदा हुए राजा शत्रुओंको जीतनेवाले होते हैं, उन राजाओंकी यात्रा समय हाथी, घोडे, रोंके अत्यन्त शब्दों करके सम्पूर्ण ब्रह्मांट पृरित हो जाता है ॥ ३० ॥ राजयोगः। स्वोच्चपु वाचस्पतिसूर्यशुकाः शनीक्षितः शी- तरुचिनिजोच्चे । यद्यानकाले रजसो वितानं रुणद्धि सूर्याश्वविलोचनानि ॥३१॥ जिस मनुष्यके जन्मफालमें वृहस्पति मर्य शुक्र अपने उच्चमें बैठे हों और चन्द्रमा भी उच्च गशिगठ शीश्वर फरके दृष्ट हो ऐसे योगमें पैदा हुए राजापी यायाकालमें पातीपी रजरपे. सामियाना छाया जाता है और सूर्य के अश्वों नेग्रोफो यह रज चंद पर देती है ॥ ३१॥ रामयोगः। नास्तं याताः सुतगृहगताः सौम्यशुक्रामरे- ज्या नको वको रविरहितगो धर्मगो यस्य मन्दः । यात्राकाले किल कमलिनीपुप्पस कोचकर्ता श्रीसूर्योऽपि प्रचलितदलोद्धृतधृली. कृतास्तः॥३२॥ जिम मनुप्यफे जन्मयाग्में पंचमभावमें बुध, आमा, पारपनि घंटे हो परन्तु अस्तंगत नहार गर्यमे रहिन मफगनिमें मंगल घटा दी और नाममार मनिधर रो पेमे योग पदा हुए गनायी यात्रा गमयमें कमलिनी पुन संरोच करती है अर्थात बन्द हो जानी र मोर श्रीमनागपण भी उस राती फोनफे चलनेगे धरतीपी रज पर. अस्त हो जाते हैं ।। ३२ ॥ ८ १० ११ १० पूर ५. ३ दा११ भापाटीकासहित। (२४३) राजयोगः। कन्यालग्नगते बुधेच विबुधामात्ये च जाया- स्थिते भौमाको सहजेऽर्कजोऽरिभवनेऽम्बुस्थे भृगोनंदने । योगेऽस्मिन्मनुजस्य यस्य जननं तच्छासनं सर्वदा राजानः प्रवहन्त्यलं सुवि- मलां मालां व मौलिस्थले ॥ ३३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कन्याराशिगत लग्नमें बुध बैठा हो और वृहस्पति सातवें बैठा हो और मंगल मूर्य सातवें बैठे हों और गनेश्चर छठे और चतुर्य शुक्र चैठे हों ऐसे योगमें जिस मनुष्यका जन्म हो उस राजाके शासनमें हमेशा सब राजालोग मस्तक नवाते हैं ।॥ ३३ ॥ राजयोग. मीनोदये दानवराजपूज्यश्चंद्रामज्यो भवतः कुलीरे । भेपेऽभौमौ नृपतिः किल स्यादा- खण्डलेनापि तुलां प्रयाति ॥३४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मीनराशिगत लग्नमें शुक्रा बैठा हो, और चन्द्रमा, वृहस्पति कर्फमें बैठे हों,मेपराशिम मूर्य, मंगल बैठे हों ऐसे योगमें उत्पन्न हुआ राजा इन्द्रके समान होता है ।॥ ३४ ॥ इति निगदितयोगेर्नीचवंशोद्भवोऽपि भवति हि पतिरुाः किं पुना राजसूनुः । नरपतिकुलजातो वक्ष्यमाणैश्च योगे- भवति नृपतिरेवं तत्समोऽन्यस्य सूनुः ॥ ३५॥ यह योग भने रहे हैं, इस योगामें नीच वंशमें पैदा हुआ भी मनुप्प परतीका स्वामी होता है तो राजाके पुत्र पो नहीं राजा होंगे-अर्यात् जरूर ही राजाधिगन होंगे, अब जो आगे गजयोग कहेंगे उन योगाम स्पन्न हुआ राजाराम पुत्र राजा दोता है और भन्यांशमें पैदा हुए राजा नहीं होंगे ॥ ३५ ॥ १० ५ सयरान्दा ९ १२ १२ म डा.५ चं (२४४) । जातकाभरण। राजयोगः छायासुतो नक्रविलमवर्ती चास्ते प्रसूतौ यदि पुष्पवन्तौ । लाभे कुजो वै भृगुजोऽष्ट- मस्थः स्याद्भूपतिर्भूपकुलप्रमूतः ॥ ३६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शनैश्चर मकरराशिका लग्नमें बैठा हो और सातवें मूर्य, चन्द्रमा बैठे हों, ग्या- रहवें मंगल, अष्टम शुक्र वैठा हो ऐसे योगमें राजवंशमें उत्पन्न हुए मनुष्य राजा होते हैं ॥ ३६॥ सुरासुरेज्यौ भवतश्चतुर्थेऽत्यर्थं समर्थः पृथिवीपतिः स्यात् । कर्कस्थितो देवगुरुः सचन्द्रः काश्मीरदेशाधिपतिं करोति ३७॥ राजयोगः राजयोगः जिस मनुष्यके जन्मकालमें गृहस्पति, शुक्र चौथे बैठे हों ऐसे योगमें उत्पन्न नर अत्यन्त चंश्यू चा वलवान राजा होता है ( एको योगः) और जिसके कर्मराशि- चंश्यू गत चन्द्र बृहस्पति केन्द्रमें बैठे हो वह मनुष्य काश्मीर देशका राजा होता है ॥ ३७ ।। राजयोगः राजयोगः सुरासुरेज्यस्थितदृष्टिरिंदुः स्वोच्च स्थितो भूमिपति करोति । विलोकयन्तः १० परिपूर्णचन्द्र शुक्रज्ञजीवा जनयन्ति भूपम् ॥ ३८॥ जिस मनुष्यफे जन्मफारमें पराशिगत चन्द्रमायो वृहस्पति और शुक्र देखते ही नए मनुष्प राजा होता है और जो परिपूर्ण चन्द्रमाको शुक्र, बुध, बृहस्पति तीनों देखते हों तो वह राजकुलमें उत्पन्न पुरुष गजा होता है ॥ ३८ ॥ पश्येन्मृगांकात्मजमिंद्रमन्त्री विचित्रसम्पन्नृपतिं करोति । एकोऽपिखेटो यदि पंचमांशे प्रसूतिकाले कुरुते नृपालम।।३९H वृ१२) ६ ३ ४ अ. ५ शु शु भाषायीकासहित। जिस मनुष्य के जन्मकालमें बुध वृहस्पति देखता हो तो वह राजकुलोतन्न राजा विचित्र संपत्तियुक्त होता है और जिसका एक भी ग्रह पंचमनवांशमै बैठा हो तो भी वह मनुष्य राजा होता है ॥ ३९ ॥ नक्षत्रनाथोऽप्यधिमित्रभागे शुक्रेण दृष्टो नृपतिं करोति । स्वांशाधिमित्रांशगतोऽथवास्याज्जीवन दृपः कुरुते नृपालम४० जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा अपने अधिमित्रके द्वादशभावमें बैठा हो और शुक्र देखता हो तो वह राजा होता है और जो चंद्रमा अपने नवांश अथवा अधिमित्रके नवांशमें बैठा हो और बृहस्पात देखता हो तो भी राजा होता है ॥ ४०॥ दिनाधिनाथोऽप्यधिमित्रभाव चंद्रेण सम्यक्सुविलोकितोवा । स्यात्तस्कराणां निचये नृपालःसच्छीलशाली सुतरामदार:४१॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें सूर्य अपने अधिमित्रके भावमें बैठा हो और उसको चंद्रमा देखता हो तो वह मनुष्य चोरोंके समूहमें श्रेष्ठ शीलवाला, नितांत उदार राजा होता है ॥४१॥ राजयोगः राजयोग: स्वोचस्थितः सोमसुतः ससोमः कुर्यानरं मागध- देशराजम् । कलाधिशाली २ बलवान्कलावान्करोति भूपं शुभधामसंस्थम् ॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुध कन्याराशिम चंद्रमा फरके सहित बैठा हो वह मनुष्य मगधदेश राजा होता है (एको योगः) और वहीं चंद्रमा कलाओं करके पूर्ण बलवान हो तो वह मनुष्य उत्तमस्थानका राजा होता है॥ ४२ ॥ जन्मेश्वरो जन्मविलनपोवा केंद्रे वली नीचकुलेऽपि भूपम् । कुर्यादुदारसुतरां पवित्रं किमत्र चित्रं क्षितिपालपुत्रम् ।। ४३ ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें जन्मराशि और जन्मलनका स्वामी केंद्र बलवान होकर बैठा हो तो वह मनुष्य नीचकुलमें पैदा हुआ भी उदार, नितान्त पवित्र राजा होता है फिर राजपुत्र के राजा होनेमें क्या आश्चर्य है ॥४३॥ ७ चं) १० १३ सूच११ १० पृ.४ २ शु१२ १० (२४६) जातकाभरण। राजयोगः मेषे दिनेशः शशिना समेतो यस्य प्रसूती स तु भूपतिः स्यात् । कर्णाटकद्राविडकेरला- न्ध्रदेशाधिपानामनुकूलवर्ती ॥४४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिगत सूर्य चंद्रमा फरके सहित हो तो वह राजा होता है । कर्णाटक. द्राविड केरल, आंध्र इन देशोंका स्वामी अथवा इनके राजाओंका आज्ञाकारी होताहै ४४॥ राजयोगः स्वतुङ्गगेहोपगतौ सितेज्यो केन्द्रविकोणेषु गतौ भवेताम् । प्रसूतिकाले कुरुतो नृपालं नृपालजातं सचिवेन्द्रमान्यम् ।। १५ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें अपने उमराशिमें क्द्र वा त्रिकोणमें शुरु बृहस्पति बैठा हो तो वह मनुष्य राज- कुलमें पैदा हुआ राजा होता है और अन्यके कुलमें उत्पन्न मंत्री' होता है।॥४५॥ राजयोगः प्रसूतिकाले मदने धने च व्यये विलग्ने यदि सन्ति खेटाः। ते छत्रयोगं जनयति तस्य प्राक्पुण्यपाकाभ्युदयो हि यस्य ॥४६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सक्षम, द्वितीय, बाग्हें और लममें सम्पूर्ण ग्रह बैठे हों तो छर नाम योग होता है। इसमें उत्पन्न राजा हो, जिसके पूर्वजन्मके पुण्योरा उदय हो वह इस योगमें पैदा होता है ।। ४६ ॥ गनयोगः छायोगः। पापो विलग्ने यदि यस्य पशप सूती दृष्टो भवेचित्रशिख- ण्डिजेन । के गुरुवामग- देवभक्तः प्रासादवापीपुर- कृनरः स्यात् ॥१७॥ म १ १० ९ ७ १० २ १३ ३ भाषाटीकासहित । (२४७) जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह लग्नमें बैठा हो और वृहस्पति करके दृष्ट हो तो वह राजा होता है और जिसके कर्कराशिगत वृहस्पति लग्नमें बैठा हो वह मनुष्य मकान, बावड़ी और नगरका करनेवाला होता है ॥४७॥ राजयोगः। एकोऽपि शस्तः शुभदं स्वतुंगे केन्द्रे पतङ्गो बलवान्प्रष्टः । सुतस्थितेनामरपूजितेन चेन्मानवो मानवनायकः स्यात् ॥१८॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें एक भी शुभग्रह केंद्र उच्चस होकर बैठा हो और बलवान मूर्य करके दृष्ट हो और पंचमभावमें बृहस्पति चैठा हो वह मनुष्य मनुप्पोंका नायक होता है ॥ १८ ॥ मृगराशि परित्यज्य स्थितो लग्ने वृहस्पतिः। करोति पृथिवीनाथ मत्तेभपरिवारितम् ॥ ११ ॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें मकर राशिको छोड़कर बृहस्पति लपमें बैठा हो तो वह गजा मतवाले हाथियोसहित होता है ॥ १९ ॥ राजयोगः। कलाकलापाधिकृताधिशाली चन्द्रो भवेज न्मनि केन्द्रवर्ती । विहाय लग्नं कुरुते नृपालं लीलाविलासाकलितारिवृन्दम् ।। ५० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें परिपूर्ण चंद्रमा लगको छोड कर केंद्रमें उच्चका बैठा हो वह राजा लीला विलासादिसहित) शत्रुओंको नाश करनेवाला होता है ॥५०॥ राजयोगः। केन्द्रगः सुरगुरुःसशशांको यस्य जन्मनि च भार्गवदृष्टः । भूपतिर्भवति सोऽनुलकीर्तिी- चगो न यदि कश्चिदिह स्यात् ॥५१॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें चन्द्रमामहित वृहस्पति केंद्र में बैठा दो और शुक्रकरके दृष्ट हो वह मनुष्य बड़ा यशस्वी राजा होता है, जो कोई ग्रह नीच न बैठा हो ॥५१॥ . चं२ 45

रचमं
(२४८)
जातकाभरण।
राजयोगः।
হাথু
धनस्थिताः सौम्यसितामरेज्या मंदारचन्द्रा
यदि सप्तमस्थाः। यस्य प्रसूतौ स तु भूपतिः
स्यादरातिदेतिक्षतिसिंह एव ॥ १२॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें धनभावमें बुध, शुक, वृह-
स्पति वैठे हों और शनैश्चर, चन्द्रमा, मंगल सातवें बैठे हो
वह राजा होता है, जैसे हाथियोंको सिंह नाश करता है वैसे शत्रुओंका नाश करने-
वाला होता है ॥ १२ ॥
कुम्भाटमांशे शशिनि त्रिकोण मेपऽद्रिभागे धरणीसुतो वा।
वैद्वैकविंशांशगतेऽथवाज्ञ यस्य प्रसूतौ स तु भूपतिः स्यात् ५३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कुम्भराशिके अष्टमनवांश चन्द्रमा त्रिकोणमें बैठा
हो और मेपके सातवें भागमें मंगल बैठा हो और मिथुन राशिके इक्कीसवें विंश-
शम बुध बैठा हो, जिसके जन्मकालमें यह योग हों वह राजा होता है ।। ५३ ।।
कुम्भस्य चेत्पंचदश विभागे कर्के दशांशोपगतो विधुश्चेत् ।
तृतीयभागे धनुपींद्रवंद्यः सिंहे शशांकेऽप्यथवापि भूपः ।। ५४ ॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें कुंभराशिफे पंद्रहवें भागमें और कफराशिफे दशम
भागमें चन्द्रमा बैठा हो और धनके तृतीय भागमें बृहस्पति बैठा हो और मिहके
तृतीयभागमें चंद्रमा हो तो वह राजा होता है ।। ५४ ॥
पुष्येऽश्विभे वाप्यथ कृत्तिकासु वर्गोत्तमे पूर्णतनुः कलावान् ।
करोति जातं खलु सार्वभौमं त्रिपुष्करोत्पन्ननरोऽपि भूपः ॥५५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पुष्य नक्षत्र अथवा अश्विनी वा कृत्तिका में वर्गोत्तम
पूर्ण चन्द्रमा बैठा हो इस योगमें उत्पन हुआ समग्र धरतका राजा होता है और
त्रिपुष्कर योगमें उत्पन्न मनुष्य भी राजा होता है ॥ ५५ ॥
तिथिश्च भद्रा विषमांघ्रिभे चेद्वारे गुरुक्ष्मातनयार्कजानाम् ।
विपुष्करो योग इति प्रदिष्टो वृद्धौ च हानी त्रिगुणाप्तिकर्ता ५६||
जिस मनुष्य के जन्मकालमें भद्रा तिथि और नक्षत्रका प्रथम या तृतीय चरण
और वृहस्पति, मंगल, शनैश्चर वार हों तो निपुपरयोग होता है, जो वृद्धिय मोर
नाशमें त्रिगुण फल करता है, इस योगमें उत्पन्न मनुष्प राजा होता है ।। ५६.।।
मेने च दारोऽप्यथवात्मतुंगं वात्तमे भूमिसुतः करोति ।
महीपति पार्थिववंशजात चान्यं प्रधानं धनिनं समृद्धम् ॥५७॥

श भाषाटीकासहित। (२४९) जिस मनुष्यके जन्मकालमें अनुराधा, अश्विनी नक्षत्रमें अथवा अपनी उच्च राशि मकरम अथवा वर्गोत्तम नांशमें मङ्गल बैठा हो ऐसे योगमें उत्सन्न राजाके वंशमें पैदा हुआ राजा होता है, अन्य वंशमें उत्पन्न धनवान समृद्धिसहित राजाका वजीर होता है ॥२७॥ चेद्भार्गवो जन्मनि यस्य पुण्ये मेपूरणे पूर्णतनुः शशांकः । अन्ये ग्रहा लाभगता भवेयुः पृथ्वीपतिः पार्थिववंशजातः५८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र नवम बैठा हो और पूर्ण चंद्रमा दशम बैठे और बाकी ग्रह ग्यारह बैठे हों तो राजाके वंशमें उत्पन्न मनुष्य राजा होता है ॥५॥ राजयोगः। राजयोगः। उपचयभवनस्थाः सर्वखेटाः ४ शशांकादविगुरुशशिनश्च- भूमिसूनोभवन्ति । त्रितन- यनवमस्थाः कुर्वते ते नरेन्द्र र गजतुरगरथानां सम्पदा राजमान्यम् ॥ ५९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमासे तीसरे, छठे, दशरे, ग्यारहें सब ग्रह बैठे हों (एको योगः) अथवा मंगलसे तीसरे, पांचवें, नवम, सूर्य, बृहस्पति, चंद्रमा बैठे हों तो वह मनुष्य हाथी, घोड़े और रय तया और भी अनेक संपदासहित राजमान्य होता है ।। ५९॥ राजयोगः। सुखे सितज्ञी सहजेऽम्बुजेशास्तिप्टंति खेटाः सुतधानि चान्ये । निजारिराशी नहि कश्चि- दन धात्रीपतिश्चैककृतातपत्रः ॥ ६ ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें चतुर्थ भावमें शुक, युप वैठेगम हो और तीसरे सूर्य, वासी ग्रह पंचममें बैठे हों अपने दायकी राशिमें कोई न हो तो ऐसे योगमें उत्पन्न मनुष्य परतीका एक व्याग राजा होता है॥६॥ सिंहे कमलिनीभता कुलीरस्थो निशाकरः। दृशौ दावपि जीवन पार्थिवं कुरुतः सदा ॥६॥ - . ग 7 - १० १२ राजयोगः।। ८ द १० ८ (२५०) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंहराशिमें सूर्य वैठा हो और कर्कराशिमें चंद्रमा बैठा हो, और बृहस्पति करके दोनों दृष्ट हों तो वह मनुष्य राजा होता है ॥ ६१ ॥ राजयोगः। बुधः कर्कटमारूढो वाक्पतिश्च धनुर्धरे। रविभूसुतदृष्टौ तौ पार्थिवं कुरुते सदा ६२॥ || ११ ६ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बुध कर्कराशिमें बैठा हो और बृहस्पति धनराशिमें बैठे और दोनों सूर्य, मङ्गल करके दृष्ट हो तो वह राजा होता है ।। ६२ ॥ शफरीयुगले चन्द्रः कर्कटे व बृहस्पतिः । शुक्र: कुंभे भवेद्राजागजवाजिसमृद्धिभाक् ६३ जिस मनुष्यके जन्मकालमें भीन वा मेपराशिगत चंद्रमा पैठा हो और कर्कराशिमें वृहस्पति हो और शुक्र कुंभराशिमें बैठा हो तो वह राजा हाथी घोड़ों सहित समृद्धिका भोगी होता है ॥ ६३ ॥ सितदृष्टः शनिः कुम्भे पद्मिनीनायकोदये । चंद्रे जलचरे राशौ यदि राजा तदा भवेत्६४ जिस मनुष्य के जन्मकालमें करके दृष्ट शनैश्चर कुंभराशिमें बैठा हो और सूर्य लग्नमें बैठा हो और चंद्रमा कर्कराशिमें बैठा हो तो वह मनुष्य राजा होता है ॥६॥ राजयोगः। चेखेचरो नीचगृहं प्रयातस्तदीवरश्चापि तदुच्चनाथः। केन्द्रस्थिती ती भवतःप्रस्ती प्रकीतितो भूपतिसम्भवाय ॥६५॥ जिग मनुष्यके जन्मकालमें जो फेंद्रवर्ती ग्रह नीच गशिमें बैठा हो उस राशिका स्वामी जो ग्रह है उसके उचराशिका स्वामी केन्द्र में बैठा हो तो राजाके कुलमें उत्पन्न मनुष्य राजा होता है ।। ६५॥ राजयोगः। २ हार 12 १३ ना १० १२ १० १.४

भापाटीकासहित।
(२५१)
कृत्तिका रेवती स्वाती पुष्यस्थायी भृगोः सुतः।
करोति भूभुजां नाथमश्विन्यामपि संस्थितः॥६६॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें कृत्तिका, रेवती, स्वाती और पुष्य इन नक्षत्रोंमें शुक्र
बैठा हो तो वह मनुष्य राजा होता है, जो अश्विनी नक्षत्रमें शुक हो तो भी पूर्वोक्त
फल जानना चाहिये ॥ ६६ ॥
अथ राज्यप्राप्तिकालमाह।
राज्योपलब्धिर्दशमस्थितस्य विलनगस्याप्यथवा दशायाम् ।
तयोरलामे बलशालिनोवा सद्राजयोगोयदि जन्मकाले ॥६॥
अव राज्यप्राप्तिके कालको कहते हैं, राज्यका जो ग्रह दशममें बैठा हो उस
करके राज्यका लाभ रहना अथवा लग्नमें जो ग्रह बैठा हो उसकी दशा
राज्यका लाभ कहना चाहिये । इन दोनों भावोंके जब कोई ग्रह नहीं बैठा हो
तब सब ग्रहोंमें जो अधिक बलवान् हो उस ग्रहकी दशामें श्रेष्ठ राजयोग कहना
चाहिये ।। ६७॥
इति राजयोगाध्यायः।
अथ राजयोगसंगतिसामुद्रिकाध्यायः।
प्रसूतिकाले प्रबला यदि स्युनूपालयोगाः पुरुपस्य यस्य ।
सद्राजचिह्नानि पदे तदीये भवंति वा पाणितलेऽमलानि ॥१॥
अनामिकामूलगता प्रशस्ता सा कीर्तिता पुण्यविधानरेखा ।
मध्यागुलामणिबंधमाता राज्याप्तयेसाच किलोयरेखा२॥
विराजमान यवलाञ्छनं चेदाष्ठमध्ये पुरुपस्य यस्य ।
भवेद्यशस्वी निजवंशभूषा भूपाविशेषैः सहितो विनीतः ॥३॥
चेद्वारणो वातपवारणो वा वैसारिणः पुष्करिणी सृणिर्वा ।
वीणा च पादौ चरणे नराणां तेः स्युनराणामधिपा वरेण्याः॥२॥

जातकाभरण। अब राजयोगोंके मसंगसे सामुद्रिकाध्याय कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें बलवान् राजयोग हो उसके हाथ और पैरोंमें निर्मल राजचिह्न होते हैं । ॥ १ ॥ अनामिका अंगुलीकी जडसे चली जो रेखा उसको पुण्यविधान रेखा कहते हैं और मध्यम अंगुलीसे चलकर हाथके मणिबन्धतक प्राप्त हुई नो रेखा उसको अर्व रेखा कहते हैं, वह राज्यकी प्राप्ति कराती है ॥२॥ जिसके अंगूठेके बीचमें यवका चिह्न मौजूद हो वह मनुष्य यशस्वी, अपने वंशका भूपणा, बहुत आभूषणों सहित और नम्रतायुक्त होता है ॥ ३ ॥ और जिसके हाथकी हयेलीमें और पैरोम हाथीके सदृश वा छत्रके तुल्य मछलीके समान वा तलैयाके तुल्य या अंकुशके समान वा वीणाके समान रेखा हो वह मनुष्य राजा होता है ॥४॥ आदर्शमालाकरवालशैलहलाश्च तत्पाणितले मिलंति । स्यान्मांडलीकोऽवनिपालकोवा कुले नृपालःकुलतारतम्याव ५ चेद्यस्य पाणौ चरणे च चके धनुर्ध्वजाजव्यजनासनानि । रथाश्चदोलाकमलाविलासास्तस्यालये स्युरीजवाजिशालाः ६॥ स्तंभस्तु कुंभस्तु तरुस्तुरंगो गदा मृदंगोंऽधिकरप्रदेशे । दण्डोऽथवाखंडितरज्यलक्ष्म्या स्यान्मण्डितपण्डितशोण्डकोवा सुवृत्तमौलिस्तु विशालभालचाकर्णनीलोत्पलपत्रनेवः । आजानुबाई पुरुपं तमाहुर्भूमण्डलाखण्डलमार्यवाः ॥ ८॥ जिस मनुष्यके हाथ और पैरोंमें सीसेकी तरह, माला और कमण्डलुके तरह, पर्वत और हलके सदृश रेखाका आकार हो वह मनुष्य एकदेशका राजा अथवा बड़ा राजा अपने कुलके समान होता है ॥५॥और जिसके हाथ पैराम चक, धनुप, ध्वजा, कमल, पंखा और आसनके समान रेखा हो उसके घरपर रथ, घोड़े, पालवी, लक्ष्मीका विलास, हाथी घोडोंकी शाला होती है ॥ ६ ॥ और जिसके हाय पैरोंमें थमलेके समान वृक्ष, घोडा, गदा, मृदंग, दण्डके समान रेखा हो वह मनुष्य अखण्डित राज्यलक्ष्मीको प्रात, पंडितोका शिरोमणि होता है ॥ ७ ॥ जिस मनुष्यमा शिर गोल, चौटा माया और फानों के पासतक चौडे लम्चे नेत्र पमलके तुल्य, पीड़ियोंतक वाहे हों वह पुरुप पृथिवीमण्डलपर इन्द्रफे. ममान राजा होता है।॥ ८॥ नरस्य नासा सरला च यस्य वक्षस्थलं चापि शिलातलाभम । नाभिर्गभीरातिमृदू भवेतामारक्तवर्णी चरणौ स भूपः ॥९॥ ,

भापाटीकासहित।
(२५३)
करतले यदि यस्य तिलो भवेदविरलः किल तस्य धनागमः ।
पदतले च तिलेन समन्विते नृपतिवाहनचिह्नसमन्वितः ॥ १० ॥
प्रसन्नमूर्तिः समुदारचेता वंशाभिमानः शुभवाग्विलासः ।
अनीतिभी रुसाधुनम्रः साम्राज्यलक्ष्मी लभते मनुष्यः ॥ ११ ॥
एतत्फलं राजकुलोद्भवानां स्यान्मानवानां मुनयो वदन्ति ।
प्रकल्पयेदन्यकुलोद्भवानां नूनं तदून स्वकुलानुमानात् ॥ १२ ॥
चिह्नानि यानि प्रतिपादितानि व्यक्तानि सम्पूर्णफलप्रदानि ।
वामे तरंगे च करे नराणां धान्यानि वामे खलु कामिनीनाम१३॥
इति श्रीदेवज्ञढुण्डिराजविरचिते जातकाभग्णे
संगतिसामुद्रिकाध्यायः ॥ ५ ॥
जिस मनुष्यकी नाक सीधी और छाती शिलाके समान और नाभि गहरी और
लाल वर्णके पैर हों वह राजा होता है ॥९॥ जिस मनुष्यके हाथकी हथेलीमें
तिलका चिह्न हो उसको बहुत धन प्राप्त होता है । जिसके पैरोंके तलुवेमे तिलका
चिद हो और वाहन-चिह्न हो वह राजा होता है ॥ १० ॥ जो मनुष्य प्रसन्नमूर्ति
और उदारचित्तवाला हो और श्रेष्ठ वंशमें पैदा हो, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, अन्या-
यसे डरनेवाला, गुरु और साधुओंसे नन हो वह राजा होता है 11, ११ ॥ और
गजवंशके विना अन्य कुलमें पैदा हो तो वह अपने वंशके समान राजलक्ष्मीको
माप्त करता है ।। १२ ।। जो जो चिह्न कहे हैं वे चिह्न प्रकट दीख पडते हो तो पूरा
फल देते है, पुरुषों के दाहिने हाथ, पैर और स्त्रियोंके बायें हाथ पैरमे पूर्वोक्त चिह्न
श्रेष्ठ फल देते हैं ॥ १३ ॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवशावतसश्रीबलदेवमसादारमनगोरीपुत्रराज-
ज्योतिषिपंडितश्यामलालकृताया श्यामसुन्दरीमापाटीकाया
राजयोगसगतिसामुद्रिकाघ्यायः ॥ ५ ॥

(२५४) जातकाभरण। अथ राजमङ्गयोगाध्यायप्रारम्भः। १२ ३ १०च 498 सुन ५ ७ राजभंगयोगः राजभंगयोगः शत्रुक्षेत्रगतैः सर्वगों- १३ त्तमयुतैरपि।राजयोगा विनश्यति बहुभिर्नीच- गैगृहैः ॥ १॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें शकी राशिमें सब यह बैठे हों और चाहे नवांशमें वर्गोतम हो तो राजयोग नए होते हैं (एको योगः) अथवा बहुत ग्रह नीचराशिमें बैठे हों तो भी राजयोग नष्ट हो जाते हैं ।। १ ।। राजभनयोगः चन्द्र वा यदि वा लमं ग्रहो नैकोऽपि वीक्षते। तथापि राजयोगानां भंगमाह पराशरः ॥२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें चन्द्रमाको पा लग्नको फोई एक भी ग्रह नहीं देखता हो तो सब राजयोग भंग हो जाते हैं, यह पराशर कहते हैं ॥२॥ राजभंगयोगः स्वांशे रखो शीतकरे विनष्टे दृष्टे च पापैः शुभदृष्टिहीन । कृत्वापि राज्यं च्यवते मनुष्यः पश्चात्सुदुःखं लभते हताशः॥३॥ जिस मनुष्य जन्मपालमें सूर्य अपने नवांशमें बैठा हो और क्षीण चन्द्रमाको पापग्रह देखते हों और शुभ ग्रह नहीं देखते हों तो वह मनुष्य पहिले गज्य करे पीछेसे दुःखको माप्त आगाहीन हो जाता है।॥३॥ उल्काव्यतीपातदिने तथैव नैघातिके केतुसमुद्भवे वा । चेद्राजयोगेऽपि च यस्य सूतिनरो दरिद्रोऽतितरां भवेत्सः ॥४॥ ८शु २ ९स पुर मं वृ५ ४ १ M भापाकासहित । जिस मनुष्य के जन्मकालमें उल्कापात हो अथवा व्यतीपातयोग हो, अथवा धरती कम्पायमान हो वा फट जावे या जन्मके समयमें केतु तारेका उदय हो तो वह समय राजयोगोंमें पैदा हुआ मनुष्य दरिद्री होता है ॥ ४ ॥ राजयोगः। ट ६ सु. ७ १० तुलायां नलिनीनाथः परमं नीचमाश्रितः। निर्दिष्टराजयोगानां दलनोऽथ भवेध्रुवम् ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें तुलाराशिगत सूर्य परम नीच राशिमें बैठा हो तो पहिले कहे हुए सब राजयोग नष्ट हो जाते हैं ॥५॥ ४ राजभंगयोगः। । ४ ३ १० ५ मृगलग्ने सुराचार्यः परमं नीचमाश्रितः । राजयोगोद्भवस्यापि कुरुतेऽतिदरिद्रताम्॥६॥ १०३ जिस मनुष्य के जन्मकालमें मकरलग्नमें वृहस्पति परम नीचराशिगत बैठा हो तो राजयोगोम पैदा हुआ मनु- प्य अत्यन्त दरिद्री होता है ॥ ६ ॥ राजभंगयोगः। रानभंगयोगः। वाचस्पतावस्तगते ग्रहें- द्रास्त्रयोऽपि नीचेषु घटो- विलग्ने । एकोऽपि नीचे दशमेऽपि पापा भूपाल- योगा विलयं प्रयांतिजा जिस मनुष्यके जन्मपालमें सात अस्तरा हो और तीन ग्रह नीच राशिम बैठे हों और जन्मलम कुम्भ हो तो सम्पूर्ण राजयोग नष्ट हो जाते हैं (फो पोगः) । अथवा एक भी ग्रह रग्नमें नीचराशिका पेठा हो और दगममें पापग्रह बैठे हो तो उस मनुष्यफा राजपोग नष्ट हो जाता है ॥७॥ म ८५ ७ १० ६

जातकाभरण।
राजभंगयोगः।
-
५
७२६
प्रसूतौ दानवामात्यः परमं नीचमाश्रितः ।
करोति पतनं नूनं मानवानांमहापदात् ॥ ८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुक्र परम नीचराशिगत
बैठा हो तो वह मनुष्य राजयोगसे नष्ट होता है ॥ ८॥
१०
राजभंगयोगः।
बु
स
रा
चं
शु
यदि तनुभवनस्थो राहुरिंदुप्रदृष्टः सहजरि-
पुभवस्था भानुमंदावनेयाः । शुभविरहित-
केन्द्ररस्तगैर्वापि सौम्यैर्भवति नृपतियोगो
व्यर्थ एवेति चिंत्यम् ॥ ९॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें राहु लमवती बैठा हो और चंद्रमा देखता हो
और तीसरे, छठे, ग्यारहें, सूर्य, शनैश्चर, मंगल बैठे हों और शुभग्रह केंद्रसे
बाहिर हों वा शुभग्रह सप्तममें चैटे हों तो उस मनुष्यके राजयोग खाली
जाते हैं ॥९॥
राजयोगः।
राजयोगः।
२
सू
३
४
१०२
में
५
७
केन्द्रेणु शून्येपु शुभैन-
भोगैरस्तं गतर्नीचगृह-
स्थितैर्वा । चतुर्ग्रहा-
प्यरिमंदिरस्थैर्नृपालयो
गाःप्रलय प्रयांति॥३०॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चारों केन्द्रोंमें कोई शुभग्रह नहीं बेटा हो (एफो
योगः)। अथवा केन्द्रोंमें जो ग्रह बैठे हों वे अस्तगत हों (द्वितीयो योगः)।
अथवा नीच राशिगत हो (हतीयो योगः) वा चारों केन्द्रोंमें गवगभिगन ग्रह
बैठे हो तो राजयोग नष्ट हो जाता है।॥ १० ॥

भापाटीकासहित । (२५७) सर्वेऽपि पापा यदि कण्टकेषु नीचारिंगा नो शुभदृष्टियुक्ताः। नीचारिरिस्फेषु च सौम्यसंज्ञा राज्ञां हि योगो विलयं प्रयाति॥११॥ इति श्रीदेवज्ञदुटिराजविरचिते जातकाभग्णे राजभंगयोगाध्यायः ॥ ६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सम्पूर्ण पापग्रह जो केन्द्र १।४।७। १० में बैठे हों और नीचराशि वा शत्रुक्षेत्री हों, किसी शुभग्रह करके दृष्ट न हों अथवा नीच शत्रुराशिगत बारहें बैठे हो तो राजयोग नागको प्राप्त होता है ।॥ ११ ॥ इति श्रीवंशवरेलीस्थगौटवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मजगैरीपुत्रराजज्योतिपिक--पंडितदया- मलालकृतायां श्यामसुन्दरीभापाटीकायां राजभंगयोगाध्यायः ॥६॥ अथ पञ्चमहापुरुषाध्यायप्रारम्भः। " ये महापुरुपसंज्ञका नृपाः पंच पूर्वमुनिभिः प्रकीर्तिताः । वच्मि तान्सुसरलान्महोक्तिभी राजयोगविधिदर्शनेच्छया ।। स्वगेहतुङ्गाश्रयकेन्द्रसंस्थैरुच्चोपगैर्वावनिमुनुमुख्यः । क्रमेण योगा रुचकाख्यभद्रहंसाख्यमालव्यशशाभिधानाः॥२॥ अब पंच महापुरुप योगाध्याय कहते हैं जो महापुरुषसंज्ञक राजा पांच पहिले मुनीश्वरोंने वर्णन किये हैं उन पांच महापुरुषाको गजयोगविधि दर्शनकी इच्छासे सरल बडी उक्ति करके कहता हूं ॥ १ ॥ जिस मनुप्यके जन्मकालमें अपने घरमें अपने उच्चमै भीमादि पांच ग्रह बैठे हों तो क्रम करके मंगलसे रुचक, बुधसे भद्र, बृहस्पतिसे हंस, शुक्रने मालव्य और शनैश्चर करके शाकनाम योग होते हैं ॥२॥ रुचकयोग:४ भद्रयोगः ५ दंसपोगः६ . ११८ ०१ Kuster ६ ६७ १० १० २० १२२ २७ ११ १०१ ७ (२५८) जातकामरण। माउपयोगः सशकयोगः अथ रुचकयोगफलम। दीर्घायुः स्वच्छकांतिर्वहुरु- AUR धिरबलः साहसाच्चाप्तसिद्धि श्चारुभूनीलकेशः समकर- चरणो मंत्रविच्चारुकीतिः। रक्तश्यामोऽतिशूरो रिपुबलमथनःकम्बुकण्ठो महौजाः क्रूरो भक्त सु- राणां द्विजगुरुविनतः क्षामजानरुजंघः ॥३॥ खट्वांगपाशवृषकार्मु- कचक्रवीणावज्रांकहस्तचरणः सरलांगुलः स्यात् । मंत्राभिचारकु- शलस्तुलयेत्सहस्रं मध्यं च तस्य गदितं सुखदैर्घ्यतुल्यम् ॥४॥ सह्यस्य विन्ध्यस्य तथोजयिन्याः प्रभुः शरत्सप्ततिजीवितोऽसौ । शास्त्राग्निचिह्नोरुचकाभिधाने देवालये सन्निधनं प्रयाति ॥५॥ अब रुचकयोगजनित राजाके लक्षण कहते हैं-वडी उमरवाला, निर्मलफांति- वाला, बहुत रुधिरके बलवाला, साहसकरके कार्यकी सिद्धिको प्रास, सुन्दर भौंह- वाला, नील वर्ण के बालोंवाला, हाथ पैर समान, एकसे मंत्रका जाननेवाला, मुन्दर यशवाला, लाली लिये श्यामवर्णवाला, अत्यन्त शूरवीर, शत्रुओंके बलका नाश करनेवाला, शंखके समान कंठवाला, बड़ा पराक्रमी, रस्वभाव, देवताओंका भक्त ब्राह्मण और गुरुओंसे नम्र, दुर्वल जानु, उरु और जांघोंवाला होता है ॥३॥ वटवांग और फांसी और बैल और धनुष, चक्र, वीणा और वन इन चिह्नोंक- ग्के अंकित हाथ पैर जिसके, सीधी अंगुलियोंवाला, मंत्रोंके अभिचारमें कुशल, तुलाके मान करके एक हजार पल तोल जिसके देहका भार होना है, लम्बा मुख होता है ॥ ४ ॥ सह्य और विन्ध्याचल और उज्जयिनीका राजा होता है और पचहत्तर वर्षकी आयु पाता है और शख तथा आने चिह्न करके सहित देवताके स्थानमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥५॥ अथ भद्रयोगफलम् । शार्दूलप्रतिमानवो द्विपगतिः पीनोरुवक्षस्थलो लम्बापीनसुवृत्तवाहुयुगलस्तत्तल्यमानोच्छ्रयः । कामीकोमलसूक्ष्मरोमनिचयैः संरुद्धगण्डस्थल: प्राज्ञः पंकजगर्भपाणिचरणः सत्त्वाऽधिको योगवित ॥६|| भापाटीकासहित । (२५९) शहासिकुञ्जरगदाकुसुमेधुकेतुचक्राव्जलांगलविचिह्नितपाणिपादः। यानागजेंद्रमदवारिकृताभूमिःसत्कुंकुमप्रतिमगंधतनुः सुघोपः।।७॥ सद्रूपगोऽतिमतिमान्खलु शास्त्रवेत्ता मानोपभोगसहितोऽतिनिगूढगुह्यः । सत्कुक्षिधर्मनिरतो सुललाटपट्टो धीरो भवेदसितकुंचितकेशपाशः ॥ ८ ॥ स्वतंत्रः सर्वकार्येषु स्वजनं प्रति न क्षमी। युज्यते विभवस्तस्य नित्यमर्थिजनैः परेः॥९॥ भालं तुलायां तु भवेत्सुरत्ने श्रीकान्यकुब्जाधिपतिभवत्सः । भदोद्भवः पुत्रकलत्रमौख्योजीवन्नृपालःशरदामशीतिम्॥ १० ॥ अब भद्रमंज्ञक गजाफे मुलक्षण कहते है-मिहके समान हायीकीसी चाल चलनेवाला, मोटी जांघोंबाला, पुष्ट छातीवाला, लम्बी पुष्ट बांहोंवाला और मुजा- फि प्रमाण ऊँचा, कामी और कोमल महीन रोमांक समृहमे ढका हुआ गंडस्थल जिमफा, चतुर, कमलपत्रके समान हाथ और पैगंवाला, अधिक बलवान, योग- माखका जाननेवाला होता है ॥ ६ ॥ शंख और तलवार और हाथी, गदा, कम- लपुप्प और वाण, पताका और चक्र, चंद्रमा, हल इत्यादि चिट्ठीसे अंकित हाय पैर जिमफे और उम राजाकी यात्राफे समय हाथियोंके मदके जल से धरती गीली होती है और सिग्के ममान मुगंधित देवाला, श्रेष्ठ आवाजवाला होता है ॥ ७ ॥ श्रेष्ट स्पवाला, बुद्धिमान, निश्चयकरके शास्त्रका जाननेवाला, मान और भोगी महित, छिपा हुआ गुह्यस्थल जिमका, श्रेष्ठ कुक्षिवाना, धर्म, तत्पर, श्रेष्ठ माथेवाला, धैर्यवान, काले वालांवाला होता है ॥ ८॥ और भद्रगजा सब पामा स्वतंत्र, अपने मित्रोंपर क्या करनेवाला और उम गजाफे वैभवको नित्य ही अतिथिलोग भोगते ॥९॥ और भद्रनाम गजाफा देहफा भार नुलामान १००० पल होता है और वह राजा कान्यकुब्ज देगम स्वामी, पुर और मो. माम्र- महिन अम्मी वर्षकी आयु पाना है ॥ १० ॥ अयममहापुरुषारक्षणम् । रक्तास्योन्नतनासिकः सुचरणो इंसः प्रसनेंद्रियो गौरः पीनकपोलरक्तकग्जो हंमन्वनः श्रेष्मलः । -

कमनी बढती देहवाला नाही, जिगो अंगकी मांध गली नहीं, यमर जिगरी
(२६०)
जातकाभरण।
शङ्काजाङ्कुशमत्स्यदामयुगले खटांगमाला घटे
चञ्चत्पादकरस्थले मधुनिभे नेत्रे सुवृत्तं शिरः ॥ ३१॥
जलाशयग्रीतिरतीव कामीन याति तृप्ति वनितासु ननम् ।
उच्चोऽजुलैवें पडशीतितुल्यैरायुभवेत्पण्णवति-समानाम् ॥ १२॥
बाहीकदेशांतरशूरसेनगांधर्वगंगायमुनांतरालान् ।
भुक्का बनाते निधनं प्रयाति हंसोऽयमुक्तोमुनिभिः पुराणैः ॥ १३॥
अब हंसनामक राजाके लक्षण कहते हैं-हेमनामक गजाया लाल मुख.
ऊँची नाक, मुन्दर पैर, प्रसन्न इंद्रियांवाला, गोरे और पुष्ट गालोंवाला, लाल
अंगुलियांवाला इसके समान शब्दयाला, कफप्रकृतिवाला और शंख, कमल,
अंकुश, मछली और खट्वांग, माला, कुम्भ इन चिह्नी करके अंकित हाय पर
जिसके, शहदके समान आभावाले नेत्र, गोल गिरवाला होता है ॥ १६॥ और
जलकी जगहमे मीति करनेवाला, अत्यंत कामी, वियोंमे तृप्तिको ग्राम नहीं और
छियासी अंगुल ऊँचा शरीर और छयानवे वर्षकी आयु पाता है ॥ १२ ॥
और हंसराजा वाहीफ, शूरसेन देश, गांधार देश, गंगायमुनाके बीचपी
भूमिका राजा होता है और वनके बीच मृत्युको प्राप्त होता है ऐमा पहिले
मुनीश्वरोंने कहा है ॥ १३ ॥
अथ मालम्पन्नृपतिलक्षणमाह-
अस्थूलोप्टोऽथ विषमवपुर्नेव रिक्तांगसंधि-
मध्ये क्षामः शशवररुचिईस्तिनासः सुगंडः ।
सद्दीप्ताक्षिः समशितरदो जानुदेशाप्तपाणि-
मालव्योऽयं विलसति नृपः सप्ततिवत्सराणाम् ||३||
यक्रं प्रयोदशमितांगुलमस्यदीतिर्यग्दशांगुलमितं श्रवणांतगलम्।
मालव्यसंज्ञनृपतिःसभुनक्तिनृनलाटांश्चमालयकसिंधुमुपारियात्राना
अब मालव्यनृपक्षिय लक्षण पहने १ माराव्पनामफगना पनरोटीशन
गटली, चन्द्रमा ममान विपासा, लीना, सुन्दर पालीवाला होना श्रीर
मालाराज वगयर मफेद दागावागा, आजानुबाद, व प, गनर ७० वशी
आयुतर गम्य भागमा ११॥ नाद अंगुल मुग जिया लम्या, दम अंगुल
चांडा, मालपनाम गालावा. माटरगा, गिटे, पारिमार
राज्यसे भोगता है।॥ १५॥

भापारीकासहित !
(२६१)
लघुद्विजास्यो द्रुतगः सकोपः शठोऽतिशूरो विजनप्रचारः ।
बनाद्रिदुर्गेषु नदीपु सक्तः प्रियातिथि तिलघुः प्रसिद्धः ॥ १६॥
नानासेनानिचयनिरतो दन्तुरश्चापि किंचि-
दातोवादे भवति कुशलश्चंचलः कोलनेत्रः।:
स्त्रीसंसक्तः परधनहरो मातृभक्तः सुजंघो
मध्ये क्षामः सुललितयती रंध्रवेधी परेपाम् ॥१७॥
पर्यकशंखशरशास्त्रमृदंगमाला-
वीणोपमा खलु करे चरणे व रेखाः।
वर्षाणि सप्ततिमितानि करोति राज्य
सम्यक्शशाख्यनृपतिः कथितो मुनीन्द्रः॥ १८ ॥
केन्द्रोच्चगा यद्यपि भूसुताद्या मार्तण्डशीतांशुयुता भवति ।
कुर्वति नोर्वीपतिमात्मपाके यच्छति ते केवलसत्फलानि ॥ १९॥
इति श्री दै० दुण्डिराजवि० जात० पञ्चमहापुरुपलक्षणाध्यायः ॥ ७॥ .
अब अगनाम नृपतिके लक्षण कहते हैं:-दाशफनामक राजा छोटे दांतापाला.
जल्दी चलनेवाला, क्रोधसहित, झट, अत्यन्त शूरवीर, वन पर्वताम प्रचार
करनेवाला और नीम आमक्त, अतिथियांका प्यारा, बहुत छोटा नहीं व प्रमिद्ध
होता है ॥ १६ ॥ अनेक फौजोंके दल करके महित, ऊँचे दांतोंवाला, किंचित्
धातुके विवाद में चतुर, बडा चञ्चल, मूकरकेने नेत्रवाला, खीम सक्त, पग धनका
हरनेवाला, माताका भक्त श्रेष्ठ जांघोंवाला, कमरसे दुर्बल, मुन्दबुद्धि, पगये
छिद्र देखनेशला होता है।॥ १०॥ गय्या और शंख, बाण, तलवार और मृदंग,
माला और वीणांक ममान निश्रय कर जिमके हाय पनि रेखा होती है और
शगस्नान राजा मत्तर ७० वर्षकी उमग्तक राज्यभोग करता है यह मुनीभाने
कहा ॥ १८ ॥ और पृवोक्त केन्द्र ११११७:१० में भीमादि पांचों या
उनमें बटे हों और चन्द्रमा वा मर्यफे यम युक्त हो तो प्राक्त गनयोग नहीं करते
काल श्रेष्ठ फल देत॥ १९ ॥
पनि श्रीमतीरथराजम्योतिपिकारितश्यामलालस्तायां श्यामसुन्दरीभाषा-
टायां पपमहापुरषनभगवर्णनाभ्यायः ॥ ७ ॥

जातकाभरण. अथ कारकयोगाध्यायप्रारम्भः । मूलत्रिकोणस्वगृहोचसंस्था नभश्चराः केन्द्रगता मिथः स्युः। ते कारकाख्या मुनिभिः प्रणीता विज्ञेय आज्ञाभवने विशेषः ॥३॥ जो ग्रह अपने मूलत्रिकोणी गशिमें अथवा अपनी ही राशिम या अपने उच्च राशिमें केन्द्र शा१० में प्राप्त हों तो वे ग्रह आपसमें कारक कहाते हैं परन्तु केन्द्रमें भी दशम स्थान स्थित ग्रह विशेष कारक होते हैं ॥ १ ॥ प्रालेयरश्मियदि मूर्तिवर्ती स्वमंदिरस्थो यदि तुंगयातः । सूर्याङजारामरराजपूज्या परस्परं कारकसंज्ञकाः स्युः ॥२ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्य लग्नमें सिंह वा मेपराशिका बैठा हो तो सूर्य, शनैश्चर, बृहस्पति ये परस्पर कारक संज्ञक होते है ॥२॥ शुभग्रहे लग्नगते च खाम्बुस्थितो ग्रहः कारकसंज्ञकः स्यात् । तुंगत्रिकोणे स्वगृहांशयातास्तेऽपीहमाने तपने विशेषात् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभग्रह लग्नमें बैठे हों अथवा दशम चतुर्थ मैठे हों व ग्रह कारक होते है और उच्च चा मूलत्रिकोणी वा अपनी राशि वा अपने नवां- शामें बैठे होकर दशममें हो तो विशेष कारक होते हैं ॥ ३ ॥ वशिस्थितो यस्य शुभो न भोगो लयं विलग्नं च लवे स्वकीये । केन्द्राणि सर्वाणि शुभान्वितानि तस्यालये श्रीः कुरुते निवासम्।। केन्द्रस्थिता गुरुविलग्नपजन्मनाथा मध्ये वयस्यतितरां वितरंति भाग्यम् । शीपोदयाङ्मयुभयभेषु गता भवेयु- रारंभमध्यमविरामफलप्रदास्ते ॥ ५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सूर्यसे दूसरे घरमें शुभग्रह बैठे हों और जन्मलग्न अपने नवांशमै हो और चारों केन्द्रोम भी शुभग्रह बैठे ही उसके मकानमें लक्ष्मी - वास करती है ॥४॥ जिस मनुष्यके बृहसति और समका स्वामी जन्मगसिवा स्वामी केन्द्रमं बटे हों तो उस मनुष्यका भाग्य जवानीम उदय भाषाटीकासाहित । होता है और शीर्णोदय राशिगत बैठे हो और उभयोदय राशिगत ग्रह हों तो बालकपन, जवानी और बुढापेमें फल देते हैं ॥५॥ नीचान्वये यद्यपि जातजन्मा मंत्री भवेत्कारकखेचरेंद्रैः। राजान्वये यस्य भवेत्प्रमूर्तिभूमीपतित्वं.स कथं न याति ॥६॥ इति श्रीदेवज्ञहुंदिराजविरचिते जातकाभरणे कारकयोगाध्यायः ॥ ८ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कारकयोग हो और वह नीचवंशमें पैदा हो तो मन्त्री होता है और जो राजाके वैशमें पैदा हो तो वह क्यों नहीं राजा होगा अर्थात् अवश्य राजा होगा ॥ ६॥ इति श्रीवंशवोलीस्थगौ वंशावतंसराज ज्योतिषिकपंडितश्यामलालकृतायां श्यामसुन्दरीभापाटीकायां कारफयोगवर्णनाध्यायः ॥ ८ ॥ अथ नाभसयोगाध्यायप्रारंभः । अथ रज्जु-मुसल-जलयोगानाह- मुसदयोगः। रज्जुयोगा। नलपोगः। २ शुम १२ 1 रा ११ म V १० १० ९६ ५ ७ में मवें चरस्था अपि वा स्थिरस्था द्विदेहसंस्थायदि वा भवति । कमणरज्जुर्मुसलं नलश्च योगत्रयं स्यादिदमाश्रयाख्यम् ॥ १ ॥ अब आश्रयादि तीन योग कहते हैं जो सब मह चर राशियाम वैरे होतो मनुनाम योग होता है और सब ग्रह स्थिररागियोम बेटे हों तो मुसलमान योग होना है और सब ग्रह दिस्वभावराटीयोंमें बैठे हों तो नबनान योग होता है, ये सीन आधपयोग कहे हैं॥१॥ *

दा
(२६२)
जातकाभरण।
मालापोगः। अथ मालाव्यालयोगद्वयम् ।
च्यालयोगः।
केंद्रनये सौम्यखगैस्तु
माला खलग्रहालस-
शु
माह्वयः स्यात् । इदं तु
स्
योगद्वितयं दलाख्यं परा-
शरेण प्रतिपादितं हि।
जिस मनुष्य के तीन केन्द्रोंमें सब यह बैठे हो तो मालायोग होता है और
तीन केन्द्रोंमें पापग्रह बैठे हो तो व्यालयोग होता है ये दो योग परागरने दल
कहे हैं ।। २ ।।
मालायोगा।
मालायोगः।
मालायोगः
चं
बुश
६.
धू
च्याख्योगः
ज्यालयोग.
व्यासयोगः
a
श
स
में
म
३
में
गदायोग।
गदायोगः।
गदाशकदविहंग,गाटकयोगानाह-
आसन्नद्रवयगैर्गदाख्यो
लग्रास्तसंस्थेः शकटः स-
मेतैः। खबंधुयार्षिहगः ।
प्रदिष्टःशृंगाटक 'लग्रन-
वात्मजस्थैः ॥३॥

२६.. युवा सचं भापाटीकासहित । गदायोगः। गदायोगा। जिस मनुष्यके जन्मकालमें पास पासके केन्द्रोंमें सब ग्रह के ही तो गदानाम योग होता है, वह गदायोग चार प्रकारका होता है-लग्नचतुर्थमें सब ग्रह हो (एको योगः ), चतुर्य सप्तममें सब मह बैठे हों (द्वितीयो योगः ), सप्तम दशमम सब ग्रह बैठे हो ( तृतीयो योगः ) दाम लग्नमें सब ग्रह बैठे हों तो (चतुर्थो योगः ) यह चार तरहका गायोग कहा है। अब शकट्योग और विहङ्गयोग कहते हैं-जो लम सप्तममें सब ग्रह परे हो तो शकट्योग होता है और जिसके चतुर्थ दशममें सब यह बैटे हों तो विहङ्गनामयोग होता है। अब शृङ्गाटक योग कहते हैं-जो लग्न पंचम नवममें सब ग्रह पढ़ें तो शृङ्गा- टक योग होता है । अब हलयोग कहते हैं-द्वितीय, छठे, दशममें सब ग्रह पड़े हों (द्वितीयो योगः) और तृतीय, सप्तम, एकादशमें सब ग्रह पडे हो ( नृतीयो योगः) और चतुर्थ,अष्टमा वारहें सब ग्रह पढ़ें तो ( चतुर्थो योगः) ये चार योग होते ही।३।। शकदयोगः। विहनयोगः। हाटकयोगः। सुपू HARE मका यय हलनामयोगः। धनारिखस्थैत्रिमदायगेर्वा चतुर्थरंध्रव्ययसंस्थितेवी। नभस्तलस्थेहलनामयोगः किलादितोऽयं निखिलागम ॥४॥ दलयोगा। हरयोगः। हरयोगः।

. (२६६), जातकाभरण। अब हल नाम योग कहते हैं सो तीन प्रकारका है २।६।१० सब ग्रह - पड़ें (एको योगः), ३ १७ । ११ सब ग्रह पडें (द्वितीयो योगः), ४।८। १२ सब ग्रह पड़े तो (तृतीयो हल नाम योगः ), यह योग सम्पूर्ण ज्योतिपवेत्ताओंने कहा है ॥४॥ अथ वज्रयवकमलयोगानाह- लमस्मरस्थानगतैः शुभाख्यैः पापैश्च मेपूरणबंधुयातैः । वज्राभिधस्तर्विदरीतसंस्थैर्यवैश्चमित्रैः कमलाभिधानः ॥५॥ अब वन, यव, कमल तीन योग कहते हैं-जिस मनुष्यके लग्न सप्तममें शुभग्रह पड़े और पापग्रह चौथे दशममें पडे तो वन नाम योग होता है और चतुर्थ दशम शुभ ग्रह पड़ें और लग्न सप्तममें पापग्रह पड़े तो यव योग होता है और चारों केन्द्रोंमें शुभाशुभ दोनों तरहके सब ग्रह पडें तो कमल नाम योग होता है । ये योग उस देशमें होते हैं जहांकी पलभा आठसे ज्यादा होंगी ॥५॥ वज्रयोगः। यवयोगः। कमलयोगः। सू में चव रा सूर्याचतुर्थे कविचन्द्रसून कथं भवेतामिति नैव युक्तौ । यवाख्यवनी त्विदमामनंति तत्रोपपत्तिं परिदर्शयामि ॥६॥ अब भारतवर्षीय भी तीनों योग कहते हैं इससे शंका दूर हो जायगी,सूर्यसे चीथे घरमें बुध शुक्र नहीं हो सकते हैं तो यव वज्र योगोंको नहीं मानना चाहिये अत: उन योगोंकी उपपत्ति दिखाता हूं ॥६॥ विलनपार्थद्वयवर्तिनी चे. ज्ज्ञशुक्रजीवान्यतमो वि- लग्ने । कुजार्किचंद्रा-खज- लस्मरस्था वज्रं विलोमाच यवो निरुक्तम् ॥७॥ स क ६ मंशा सू स यु च भाषाटीकासहित। (२६७) जन्मलग्नसे दूसरे वारहें बुध -शुक्र बैठे हों और बृहस्पति मं. श. चं. ये योग कारक हों तो पूर्वोक्त योग होते हैं, इस प्रकार भारतवर्षमें भी योगांका होना संभव है सो चक्रमें देखलो ॥७॥ सनभोगैयदि नाभसाख्यो व्यालाख्यमाल त्रिभिरेव खेटेः। कथं भवेतामिति चिंतयंति मुनिप्रणीतं कथमन्यथा स्यात् ८॥ सम्पूर्ण ग्रहोंकरके तया नाभस योग तीन ग्रहोंकरके व्याल और माला योग हों तो क्या सम्पूर्ण नाभस योगमसे व्यालमाला योगमें दोष आ जाये, तो क्या मुनियोंका कहा हुआ झुठा हो जायगा ॥ ८ ॥ अथ वापीयोगः। वापीयोगः। त्यक्त्वा केंद्राणि चेत्खेटाः शेपस्थानेषु सं- स्थिताः । वापीयोगो भवेदेवं गदितः पूर्व- सूरिभिः॥९॥ अब वापीयोग कहते हैं:-चारी केंद्रस्थानोंको छोड़प करके ग्रह अन्य स्थानोंमें बैठे हों तो वापीयोग होता है यह पहिलेके आचार्योंने कहा है ॥ ९ ॥ अथ यूपशरशक्तिदंडयोगानाह- यूपयोगः। शक्तियोगः। लग्नाच्चतुर्थात्स्मरतः ख- मध्याचतुर्ग्रहस्थैर्गगनेच- रेन्द्रः क्रमेण यूपश्चश- रश्च शक्तिर्दण्डःप्रदिष्टः खलु जातकः॥१०॥ दण्डयोगः। अब यूप, शर, शक्ति, चार योग कहते हैं-ससे चतुर्य- भावतक सब ग्रह पहें तो भूप नाम योग है और चतुर्यमे सममतक सब ग्रह परें तो गर नाम योग और सातबसे दमाम तक सब मह दा चंश सप घरयोगः। शु प्द ब शु श चं स (२६८) जातकाभरण। पडं तो शक्तियोग और दशमभावसे लग्नपर्यंत सब ग्रह हो तो शक्तियोग होता है यह ज्योतिषी लोगोंने कहा है ॥ १० ॥ अथ नौ-कृट-छत्र-धनुष-अर्द्धचन्द्रयोगानाह- नौकायोगः। धनुर्योगः। लग्नाचतुर्थात्स्मरतः ख- मध्यात्सप्तर्मगैनौरथ कू- टसंज्ञः। छत्रं धनुश्वान्य- गृहप्रवृत्तनापूर्वकर्योग इ- हार्धचंद्रः ॥ ११॥ कूटयोगः। छत्रयोगः। अब नौका, कूट, छत्र, धनुप और अर्धचन्द्र योग कहते हैं-जिसके लग्नमे लेकर सातवें भावतक मव ग्रह पडे तो नौका योग होता है और चतुर्थसे लेकर दशम भावतक मब ग्रह पडें तो कृटयोग होता है और सप्तमसे लेकर लग्नतक सब ग्रह पड़े तो छत्र- 'योग होता है और दशमसे लेकर चतुर्थतक सब ग्रह पडं तो धनुपयोग होता है तथा चार केन्द्रोंके अतिरिक्त अन्य सात स्थानोंमें सब ग्रह पडें तो अर्धचन्द्र योग होता है ॥ ११ ॥ अथ चक्रसमृद्रार्द्धशशियोगानाद- चरुयोगः। समुद्रयोगः। तनोधनाचेकगृहान्तरेण सूखु स्युःस्थानपट्कं गगनेच- रेन्द्राः । चक्राभिधानाच समुद्रनामा योगा इती- हाकृतिजाश्च विंशत् १२ जिसके लममे लेकर एक राशि वीचमें देक गशियाम सब ग्रह पढ़ें तो चक्रयोग होता है और दूमरे भावसे लेकर एक भाव बीचमें छोडकर सब ग्रह पर नो ममुद्रयोग होना ॥ १२ ॥ स में भ में 4 भापाटीकासहित। भद्रंचन्द्रयोगः। अर्द्धचन्द्रयोगः। अर्द्धपन्द्रयोगः। च दा बु यु ' ए श ठा नं मं अर्द्धचन्द्रयोगः। अर्द्धचन्द्रयोगः। भचन्द्रयोगः। च ३ श श में स सू में पु यू अथ गोराटिमातयोगानाह- मचन्द्रयोगः। अर्दचन्द्रयोग। ये योगाः कथिताः पुराव- हुतरास्तेपामभावे भवद्गो- लैश्चैकगतेयुगं द्विगृहगैः शुलस्निगेहोपगेः। केदारश्च चतुर्प सर्वखचरेः पाशेस्तु पंचस्थितः पदस्थेर्दामिनिका .च सप्तगृहगेझेणेति संख्या इमे ॥ १३॥ नानाप्रकारेः किलकालविद्रियोंगा महद्भिः परिकीर्तिता ये॥ तत्कर्तृपाको हि फलं तदीयं वलानुमा- नेन विचिन्तनीयम् ॥ १४॥ जो ये पहिले बहुतमे योग रहे हैं इनके न होनेगे जो एक भावमें मर ग्रह पहें तो गोलयोग होता है और दो स्यानाम मब ग्रह पड़ें तो युगयोग होगी और तीन भावाम सब पर पड़े तो गुलयोग होता है और चार भावाम मच ..

(२७०)
जातकाभरणा
अह पड़े तो केदारयोग होता है, पांव भावाम सब ग्रह पड़े तो पाशनाम योग
होता है, छ: भावों में सब ग्रह पडें तो दामिनीयोग होता है और सात भावोंमें
सब ग्रह पडें तो वीणायोग होता है । यह संख्या योगकी कही है ॥ १३ ॥ अनेक
प्रकारसे निश्चय करके ज्योतिपशास्त्रवेत्ता महर्पियोंने जो ये योग वर्णन किये उन
योगकारक ग्रहोंकी दशामें बलके अनुसार उनका फल चितवन करें ॥ १४ ॥
अथ रम्जुयोगफलम् ।
चञ्चद्रूपेणान्विताः क्रौर्यमाजो जातोत्साहा क्रूरकार्य नितांतम् ।
रज्जूयोगोत्पन्नमा स्वदेश ह्यन्यस्मिन्वै संचरन्त्यर्थलब्ध्यै१६
जिस मनुष्यके जन्मकालमें रज्जुनामक योग होता है वह मनुष्य श्रेष्ठ रूपवाला,
दुःखका भागी, दुष्ट कामोंमें नितान्त उत्साही, परदेशम विचरनेवाला, और
धनको प्राप्त होता है ॥ १५ ॥
अथ मुसलयोगफलम् ।
नानामानानधान्योपपन्नः पुत्रैलक्ष्म्या राजते राजतेजाः ।
पृथ्वीपालस्याश्रितः स्यात्सहो हर्पोत्कवाप्तिकृन्मौसलेयः॥१६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मुसलयोग होता है वह मनुष्य अनेक ज्ञान और
धान्य सहित पुत्र और लक्ष्मी करके राजतेज करके शोभाको माप्त, राजाका
आश्रित, हर्पकरके सहित और हर्पको उत्कर्पताकरके पूर्णताको प्राप्त
होता है ।। १६ ।।
अथ नलयोगफलम।
शश्वत्पूर्णापूर्णरत्नैः स्वगेहा राजस्नेहाः पुण्यदेहाश्च माः।
कीर्त्या युक्ताः सर्वदा तेन देवा देवायेषां जन्मकाले नलश्वेत्॥१७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमै नलनाम योग होता है वह मनुष्य निरन्तर ग्लों
करके सहित अपने घरमें होता है और राजासे प्रीति करनेवाला, पुण्यवान देह-
वाला और कीर्तिसहित हमेशा होता है ॥ १७ ॥
अथ मालायागफलम् ।
युमित्रैश्चारुभूपाविशेपे नायानेरन्वितास्ते भवंति।
यपां पुंसां सूतिकाले हिमाला मालादोलाकामिनीकेलिशीला १८
जिस मनुष्पके जन्मकालमें मालापोग हो वह मनुष्य पुत्र और मित्रों पर
माहित, श्रेष्ठ आभूपणांसहित अनेक. मवारी करके महिन और नियाम क्रीडा
करनेवाला होताहे॥१८॥

भोपाटीकासहित ।। (२७१) अय सर्पयोगफलम् । भोक्तान्य स्यात्रस्य रौद्रो हरिद्रो निद्रोत्साहोरुट्समुद्रोऽप्यभन्दः । दुर्दपःस्याचापकाराय सापः सर्पः सूतौ यस्य मर्त्यस्य योगः ॥१९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सर्पनामयोग होता है वह मनुष्य पराये अनका भोगनेवाला, क्रोधी, दरिद्धी, निद्राका उत्साही, बडे रोगसहित, अमंगलकारी, खोटे अभिमानवाला और परायी वडाई करनेवाला होता है ॥ १९ ॥ अथ गदायोगफलम्। नानाशास्त्रानेकमंत्रानुरक्तो गीत वाद्ये कोविदश्चापि यज्जा। रौद्रोद्वेपी देपिववियुक्तो युक्तो योपाभूपणाधैर्गदायाम् ॥ २० ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाल में गदायोग हो वह मनुष्य अनेक शास्त्र और अनेक मन्त्राम तत्पर, गाने बजानेमें चतुर, यज्ञ करनेवाला, उग्र वैर करनेवाला, शत्रुओं- करके युक्त, भूपणसहित स्त्रियोंवाला होता है ॥ २० ॥ अयशकटयोगफलम् । दीनो हीनो वैभवेनार्थमित्रैर्यस्योत्पत्तावाप्तकाश्योऽप्यवश्यम् । याति प्रीति प्राप्य मर्त्यः कुयोपांत्यत्कायोगे शाकटेयस्यजन्म२१ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शकटयोग होता है वह मनुष्य दीन, मित्र, वैभव और धनसे रहित, जन्मसे कृशता सहित, खोटी बीको पाकर त्याग करनेवाला मुखी होता है ॥ २१ ॥ अथ विहंगयांगफलम् ! येपां सूतौ मानवानां विहंगो भोगो योगोत्पन्नसौख्यं न तेषाम् । याने प्रीतिनित्यमेव प्रवासासेवार्थानामल्पता जल्पतार्थः ।। २२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें विहंगयोग होता है वह मनुष्य भोगोंमदित. योगा- करके उत्पन्न सौख्यवाला, यात्रा प्रीति, नित्य ही परदेश जानेवाला और पड़त बोलनेवाला होता है ।। २२ ।। अथ शृंगाटफपोगफलम् । भूयोकपःसाहसी संगरेच्छुःसौख्यैर्युक्तोऽत्यंतबुद्धिनरः स्यात् । प्रीतिर्गच्छेत्पूर्वपत्न्याः सपत्न्या द्रोई चैवं शृङ्गपूर्वमुखादे ॥२३॥ जिस मनुष्य जन्मकालमें शृंगाम नाम योग होता है यह मनुष्यं उसेमारी, (२७२) जातकाभरण: साहसी, युद्धकी इच्छा करनेवाला, सौख्यसहित, वटा बुद्धिमान और पहिली स्त्रीसे वैर करनेवाला होता है ॥ २३ ॥ अथ हलनामयोगफलमाह- प्रेप्योऽयुक्तःसाधुभिमित्रवर्गःकृप्याजीवीदुःखितोऽत्यंतभुक्स्यात्। उत्पत्ति यो लाङ्गलाख्ये प्रयाति याति क्लेशं निर्धनत्वात्प्रकामा जिस मनुष्यके जन्मकालम हल नाम योग होता है वह मनुष्य दूत, साधु और मित्रोंकरके रहित, खेती करके आजीविका करनेवाला, अत्यंत दुःखोंका भोगी होता है और अत्यन्त क्लेशों को प्राप्त, धनहीन होता है ॥ २४ ॥ अथ वज्रयोगजातफलम् । आये भागे जीवितस्यांतिम च सौख्योपेतो भाग्यवान्मानवःस्यात् । मध्ये भागे भाग्यहीनः प्रकामं कामक्रोधैरन्वितो वज्रयोगे ॥२५॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें वज्र नाम योग होता है वह मनुष्य पहिली अवस्थाम जीविकाको प्राप्त, अंतम सौख्यको प्राप्त, भाग्यवान होता है और जवानी में पूर्ण- तया भाग्यहीन, काम क्रोध करके सहित होता है ।। २५ ॥ अथ यवयोगफलम। मध्ये भागे धर्मकामार्थसंपत्सौख्यैर्युक्तः स्याद्विनीतो वदान्यः नित्योत्साहः सद्वते तु प्रशांतः शांतकोधो यः प्रसूतो यवाख्ये२६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें यवनाम योग होता है यह मनुष्य जवानी उमरमें धर्म, काम, अर्थ, संपत्ति और सौख्य और नम्रता महित, उदार, हमेगा उत्साही श्रेष्ठवृत्तिवाला शांतचित्त और क्रोधरहित होता है ॥ २६ ॥ अथ कमलयोगफलम। नित्यं हर्पोत्कर्पशाली बलीयांश्चञ्चत्कांतिौतिकीर्तिमनुष्यः । योगे सूतिश्चेत्सरोजे सराजाराज्ञो वंशे वा भवेदीर्घजीवी ॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कमल नाम योग होता है वह मनुष्य हमेशा बड़े हर्पवाला, बलवान, मुन्दर कांतिपाला, यशवान, राजाके वंशम उत्पन्न और बड़ी उमरवाला होता है ॥२७॥ अथ वापीयोगफलम। दीर्घायुः स्यादात्मवंशावतंसः सौख्योपेतोऽत्यंतधीरो मनीपी। चञ्चद्वाक्यःसन्मनाः पुष्पवापी वापीयोगेयः प्रमूतः प्रतापी॥२८॥ .

भापाटीकासहित ।
(२७३)
जिस मनुष्य के जन्मकालम वापी योग होता है वह मनुष्य बड़ी उमरवाला, अपने
वंश प्रतापी, सौख्यसहित, अत्यन्त धीर, सुन्दर वाणी बोलनेवाला. श्रेष्ट मन,
फूलोंकी वाटिका करनेवाला और प्रतापी होता है ॥ २८ ॥
अथ यूपयोगजातफलम् ।
धीरोदारो यज्ञकर्मानुसारो नानाविद्यासद्विचारो नरो वै।
यस्योत्पत्ती वर्तते यूपयोगी योगो लक्ष्म्या जायते तस्य नूनम्.२९: .
जिस मनुष्यके जन्मकालमें यूपनाम योग होता है वह मनुष्य धैर्यवान, उदार,यज्ञकर्ममें
तत्पर, अनेक विद्या और श्रेष्ठ विचार करनेवाला लक्ष्मी करके साहित होता है ॥३९॥
अथ शरयोगफलम् ।
हिंस्रोऽत्यन्तं शिल्पदुःखैः प्रततः प्राप्तानन्दः काननांते शरजः ।
मत्यायोगे यःशरेजातजन्मा जन्मारंभात्तस्यन क्वापि सीख्यम३०
जिस मनुष्यके जन्मकाल शर नाम योग होता है वह मनुष्य हिंसा करनेवाला
शिल्पका जाननेवाला, दुःखोंसे सन्तापको प्राप्त, वनमें आनन्दको, प्राप्त विद्याका
जाननेवाला और जन्मसे कभी सौख्यको प्राप्त नहीं होता है ॥३०॥
अथ शक्तियोगफलम् ।
नीचेरुच्चैः प्रीतिकृत्सालसश्च सौख्यैरजितो निर्बलश्च ।
वादे युद्धे तस्य बुद्धिविशालाशालासौख्यस्याल्पता शक्तियोगे३१
जिस मनुष्यके जन्मकालमें शक्तियोग होता है वह मनुष्य नीचे ऊँचे मनुष्योंसे
प्रीति करनेवाला आलस्यसहित, सौख्य और धनसे गहित, विवाद और युद्ध में उसकी
विशाल बुद्धि और स्थानका सौख्य योडा होता है ।॥ ३१ ॥
अथ दण्डयोगजातफलम् ।
दीनो हीनोन्मत्तसंजातसख्यः प्रेष्यद्धपी गोरजेर्जातवेरः ।
कांतापुत्ररर्थमिविहीनो हीनो बुद्धया दण्डयोगाप्तजन्मा ॥३२॥
जिस मनुष्पके जन्मकालमें दंडनाम योग हो वह मनुष्य दीन हीन उन्मत्तासे
मित्रताको मास, दूतसे वैर करनेवाला, अपने कुटुम्बियोंसे वैर करनेवाला, मी, पुत्र,
धन, मियों करके हीन और बुद्धिरहित होता है ॥ ३२ ॥
अथ नौकायोगजातफलम।
ख्यातो लुब्धो भोगसौख्यविहीनो यो नोयोगे लब्धजन्मा मनुप्यः ।
केशी शश्वचंचलस्वांतवृत्तिवृत्तिस्तेयोद्भुतधान्येन तस्य ॥ ३३ ॥

(२४) जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें नौकायोग हो वह मनुष्य प्रसिद्ध लोभी और भोग सौख्यसे रहित, क्लेश पानेवाला, अत्यन्त चञ्चल चित्तवृत्तिवाला, चोरी करनेवाला और अन्नसहित होता है ॥ ३३ ॥ अथ कूटयोगजातफलम् । दुर्गारण्यावासशीलश्च मल्लो भिल्लप्रीतिानधनो निंद्यकर्मा । धर्माधर्मज्ञानहीनश्च कूटः कूटप्राप्तोत्पत्तिरेवं मनुष्यः ॥३४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कूटयोग होता है वह मनुष्य वन पर्वतामें वाम करने वाला, पहलवान्, भीलोंसे प्रीति करनेवाला, धनद्दीन, निन्दित कर्म करनेवाला, धर्म अधर्मके ज्ञानरहित और चुगली करनेवाला होता है ॥ ३४ ॥ अथ छत्रयोगजातफलम् । प्राज्ञी राज्ञां कार्यकर्ता दयालुः पूर्व पश्चात्सर्वसौख्यरुपेतः । यस्योत्पत्ती छत्रयोगोपलब्धिलब्धिस्तस्य च्छत्रसञ्चामरादौ३५ जिस मनुष्पके जन्मकालमें छत्रयोग होता है वह मनुष्य चतुर, राजाओंका कार्य करनेवाला, दयावान्, बालकपन, और बुढापेमें सब सौख्योंको प्राप्त और वह श्रेष्ठ छत्र और चमरकी प्राप्ति करनेवाला होता है ॥ ३५॥ अथ कार्मुकयोगजातफलम् । आये भागे चांतिमे जीवितस्य सौख्योपेतः काननाद्रिप्रचारः। योगेजातः कार्मुके सोऽतिगोगर्वोन्मत्तापत्तिकृत्कार्मुकास्त्रः॥३६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें कार्मुक योग होता है वह मनुष्य बालकपन और बुढापेमें सौख्य पानेवाला और वन पर्वतोंमें रहनेवाला, बडा अभिमानी, गरी उन्मत्ततासे आपत्तिको प्राप्त और धनुप धारण करनेवाला होता है ॥ ३६ ।। अथ अर्धचन्द्रयोगजातफलम् । भूमीपालप्राप्तचञ्चत्प्रतिष्ठः श्रेष्ठः सेनाभूपणार्थीम्बरायेः। चेदुत्पत्तो यस्य योगोऽईचन्द्रश्चंद्रः साझादुत्सवाथै जनानाम् ३७ जिम मनुष्यफे जन्मफालमें अर्धचन्द्रनाम योग होता है यह मनुष्य गजाम श्रेष्ठ प्रतिष्ठाफो प्राप्त, श्रेष्ठ मेना और आभग्ण धनववादिगहित, मनुष्याक इन्गव अर्थ चन्द्रमा समान होता है ॥ २७ ॥ .

भापारीकासहित ।
(२७९)
अथ चनयोगजातफलम् ।
श्रीमद्रूपोऽत्यंतजातप्रतापो भूयो भूयोपायनैरन्वितः स्यात् ।
योगे जातःपूरुषो यस्तुचके चक्रे पृथ्व्याशालिनी तस्य कीर्तिः३८
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चकनामक योग होता है वह मनुष्य लक्ष्मीवान, रूप
बाला, बड़ा प्रतापी, वारंवार नजर लेनेवाला और उस राजाका यश समय धरती-
पर होता है ॥ ३८॥
अथ समुद्रयोगजातफलम् ।
दानी धीरश्चारुशीलो दयालुःपृथ्वीपालप्राप्तसौख्यः प्रकामम् ।
योगे जातो यः समुद्रे स धन्यो धन्यो वंशस्तेन नूनं नरेण ॥३९॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें समुद्र योग होता है वह मनुष्य दानी, धर्यवान् .
सुंदर शीलवाला, दयावान, राजा करफे सौख्यको प्राप्त वह पुरुप धन्य और उसमे
उसका वंश धन्य होता है ॥ ३९ ॥
अथ गोलयोगजातफलमाह ।
विद्यासत्त्वौदार्यसामर्थ्यहीना नानायासा नित्यजातप्रवासाः।
येपां योगः संभवे गोलनामा नानासत्यप्रीतयोऽनीतयस्ते ॥१०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें गोलयोग होता है वह मनुष्य विद्या और बल, उदा-
रता और सामर्थ्यसे रहित, अनेक दुःसोंको प्राप्त, हमेशा परदेश जानेवाला और
अनेक अमत्योंमें मीति करता है ॥ १० ॥
अथ युगयोगजातफलम् ।
पाखंडेनाखण्डितप्रीतिभाजो निर्लनाः स्युधर्मकर्माप्रयुक्ताः।
पुत्ररथैः सर्वथा ते वियुक्ता युक्तायुक्तज्ञानशुन्या युगाख्ये ॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें युगनाम योग होता है यह मनुष्य पारखण्ड में पूरी
प्रीति करनेवाला, लजारहित, धर्मकर्मरहित, पुत्र और धनसे हीन और युक्त अयुक्त
शानसे शून्प होता है ॥४१॥
अथ शूटयोगजातालम।
युद्धे वादे तत्परावातिशुराः कराः स्वांते निष्टुरा निर्धनाश्च ।-
योगो येषां सूतिकाले हिशुल शूलमायास्तेजनानां भवेति ॥२२॥

(२७६)
जातकाभरण।
जिस मनुष्यके जन्मकालम शूलनामक योग होता है वह मनुष्य युद्ध और
विवादमें तत्पर, वडा क्रूर स्वभाव, कठोरचित्त धनहीन हो और संसारी मनुष्योंको
शूलके समान होता है ॥ १२ ॥
अथ केदारयोगजातफलम।
सत्योपेताश्चार्थवतो विनीताः कृष्योत्सुक्याश्वोपकारादराश्च ।
योगे केदारेनरास्तेऽपि धीरा धीराचाराचापितेषां विशेपात ॥४३॥
जिस मनुष्कके जन्मकालमें केदारयोग होता है वह मनुष्य सत्यसहित, धनवान,
नम्रतासहित, खेती करके उत्साह करे, आदरसे उपकार फरनेवाला, धैर्यवान् और
श्रेष्ठ आचारखाला होता है ।। ४३ ॥
अथ पादयोगजातफलम् ।
दीनाकारास्तत्पराश्चापकारे बन्धेनार्ता भूरितल्पाः सदम्भाः।
नानाना पाशयोगे प्रजाता जातारण्यप्रीतयः स्युर्मनुष्या॥४४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पाशयोग हो वह मनुष्प दीनस्वरूप, चुराई पर
में तत्पर, बंधन करके दुःखी, बहुत खियोंवाला, क्रोधसहित और अनेक अनर्य
सहित, इनमें प्रीति करनेवाला होता है ॥ १४ ॥
अथ दामिनीयोगजातफलम् ।
जातानन्दो नंदनाद्यः सुधीरो विद्वान्भूपाकोशसंजाततोपः ।
चंचच्छीलोदारबुद्धिप्रशस्तःशस्तःस्ता दामिनी यस्य योगः॥४५॥
जिस मनुप्यके जन्मकालमें दामिनी योग हो वह मनुष्य आनन्दको प्राप्त, पुरा
सहित, धर्मपान, विद्वान, आभूषण और राजानेमे मनोपको प्राम, धरतील,
उदार वृद्धि, श्रेष्ठ होता है ॥ ४ ॥
अय वीणायोगजातफलम।
अर्थोपेताः शास्त्रपारंगताश्च सङ्गीतज्ञाः पोपकाः स्युर्वहूनाम् ।
नानासौख्येरन्विताम्तुप्रवीणावीणायोगे प्राणिनांजन्म यपाम १६||
जिग मनुप्पर. जन्मशाल में वीणा योग हो यह मनुष्य धनहित, ग्राम पार
जानेगला, यहुन नोरा पालन करनेवाला और अनेर, गाग्यमानि गर
होता ॥ ४६॥
मोक्तरतनभिसाव्यश्वयोगःस्यात्संवपांप्राणिनां जन्म कामम् ।
तस्मादेतेऽत्यंतयत्नादपाः पूर्वाचार्यातके संग्रदिष्टाः ॥ १७ ॥

भापारीकासहित। (२७७) एवं योगानां फलं शालिनी-सट्टत्तैर्व्यक्तं युक्तियुक्तं निरुक्तम् । तस्मात्प्राज्ञैः सत्कवीनामनूनं सौख्यं चैवं जातकेकोमेलोक्त्या॥४८॥ इति श्रीदेवज्ञदुढिराजविरचिते जातकाभरणे नाभसयोगाध्यायः ॥ ९॥ ये जो इतने नाभस कहे हैं सो सम्पूर्ण प्राणियोंके जन्मकालमें विचार करना चाहिये, इनको अत्यन्त यत्नसे पूर्वाचार्योंने विचारकरके कहा है ॥ ४७ ॥ इस मकार ये नाभसयोग शालिनी छन्दमें युक्तियों करके युक्त कहे है, इस कारणसे चतुर जन और कविजन सौख्यको प्राप्त हों, कोमल उक्तिकरके कहे हुए जातक अन्य करके विचार कर फलको कहें ॥१८॥ इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मजज्योतिषिक-पडितश्यामलाल- फुताया श्यामसुन्दरीभापाटीकाया नामसयोगाध्यायः ॥ ९॥ अथ रश्मिजातकाध्यायप्रारंभः । अर्यकादिपंचरश्मिफलम् । येपां नराणां किरणाः प्रसूता एकादितः पंचभवेति यावत् । तेसर्वथा दुःखदरिद्रभाजो नीचप्रिया नीचकुलाः खलाश्च ।। १ ।। जिस मनुष्यके एक रश्मिसे लेकर पांच रश्मितक ग्रहकी हो वह मनुष्य हमेशा दुःख और दारिद्रयको भोगनेवाला, नीचौका प्यारा और नीच कुलमें उत्पन्न, दुष्ट होता है ॥१॥ अथ दशरश्मिफलम् । पंचादितः खेदुमिताश्च यावन्मरीचयस्ते जनयंत्यवश्यम् । नरान्विदेशेऽभिरतान्सुदीनान्भाग्येन हीनान्प्रतिपालितांचा जिस मनुष्यके जन्मकालमें पांचसे लेकर दश रश्मिता ग्रहोंकी ही वह मनुष्य परदेशमें तत्सर, दीन, भाग्यहीना निरंतर दूसरोंमे पालन किया, दुःखी होता है।

जातकाभरण ।
.
अथ पञ्चदशरश्मिफलम् ।
परं दशभ्यस्तिथयस्तु यावत्ते भानवो मानवमल्पकार्थम् ।
धर्मप्रियं संजनयंति नूनं कुलानुरूपं मुखिनं सुवेपम् ॥ ३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें दशसे लेकर पंद्रह रश्मितक बलयुक्त ग्रह हों वह
मनुष्य थोड़े धनवाला होता है । धर्म जिसको प्यारा, अपने कुलके समान
रूपवाला, सुखी और श्रेष्ठ वेपवाला होता है ॥ ३ ॥
अथ विंशतिरश्मिफलम।
पंचेंदुतो विशतिरेव यावद्भस्तयस्ते मनुजं सुशीलम् ।
कुवैति सत्कीर्तिकरं सुधीरं वंशावतंसं कुशलं कलासु ॥ ४ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंद्रहसे लेकर बीस पर्यन्त रश्मि हों वह मनुष्य
शीलवान्, श्रेष्ठ कीर्तिवाला, धैर्यवान्, अपने वंश प्रकाशवान,
क्लामें
कुशल होता है ॥४॥
अय पञ्चविंशतिरमिफलम् ।
यस्य प्रसूती च नखा मयूखास्तद्भाग्यरेखा सुहृदां सुखाय ।
पंचाधिका विंशतिरत्र यावत्तावत्फलाधिक्यमनुक्रमेण ॥५॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वीस वा पच्चीस पर्यन्त रश्मि हों वह मनुष्य मित्रों के
लिये मुख देनेवाला हो, क्रमसे अधिक अधिक फल कहना चाहिये ॥५॥
अथ त्रिंशद्रश्मिफलमा
यावत्रिंशत्संमिता पंचवर्गा येपा सूतौ चन्मयूखा नराणाम् ।
भूमीपालात्प्राप्तसौख्याः प्रधाना नानासंपत्संयुतास्ते भवंति ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसपर्यन्त रश्मियां हों वह मनुष्य राजाकरके सौख्य-
को प्राप्त राजाका दीवान होता है और अनेक संपत्तिसहित होता है ॥ ६ ॥
अथ एकत्रिंगद्राश्मिफलम।
यंपां नूनं मानवानां प्रस्तावेकत्रिंशत्संख्यकाश्चन्मयूखाः।
विख्यातास्ते राजतुल्या प्रधाना नानासेनास्वामिनःसंभवंति ॥७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एफतीम राश्मियां हों वह मनुष्य संसारमें प्रसिद्ध
राजाके समान वा राजाफा वजीर अनेक सेनाओंका स्वामी होता है ॥७॥

भाषाटीकासहित । (२७९) अथ द्वात्रिंशदाश्मफलम् । प्रसूतिकाले किरणा नराणां द्विविप्रमाणा यदि संभवंति । नानापुराणामथवा गिरीणां ते स्वामिनो ग्रामशताधिपा वाटा जिस मनुष्य के जन्मकालमें बत्तीस ग्रहकी रश्मियां हों वह मनुष्य अनेक नग- रोका बसानेवाला, अनेक पर्वतोंका स्वामी और सौ ग्रामोंका पति होता है ॥ ८ ॥ अथ त्रयस्त्रिंशद्रश्मिफलम् । रामाग्निभिश्चापि युगाग्निभिर्वा करैर्नरस्य प्रसवो यदि स्यात् । क्रमात्सहस्रं त्रिसहस्रकं च ग्रामान्स पातीति वदंति केचित्॥९॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें तेतीस वा ३४ रश्मियां हों वह मनुष्य एक हजार वा तीन हजार ग्रामोंका स्वामी होता है ऐसा कोई कहते हैं ॥ ९ ॥ अथ पंचत्रिंशद्रश्मिफलम् । पंचत्रिसंख्यैः खलु यो मयूखैर्जातो भवेन्मण्डलनायकश्च । विलाससत्वामलशीलशाली यशोविशेषाधिककोशयुक्तः॥१०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पैंतीस रश्मि ग्रहोंकी हों वह मनुष्य एक देशका राजा होता है और विलासयुक्त, पराक्रमी, निर्मल शीलवान, बड़े यशवाला और बहुत खजानेवाला होता है ॥ १० ॥ अथ पत्रिंशद्रश्मिफलम् । रसाग्निसंख्येश्च नगाग्निसंख्यैर्जातो मयूखैः खलु यः क्रमेण । ग्रामान्मनुष्यः स तु साधलक्षलक्षत्रयं पाति महाप्रतापात॥११॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें ग्रहोंकी ३६ रश्मियोंका योग हो वह मनुष्य डेढ लाख ग्रामोंका स्वामी होता है और जिसके सैंतीस रश्मियां हों वह मनुष्य तीन लाख ग्रामोंका स्वामी होता है॥११॥ अथाष्टत्रिंशद्रश्मिफलम् । यस्य प्रसूतौ किरणप्रमाणमष्टत्रिसंख्यैः स भवेन्महीजाः। भूमीपतिर्लक्षचतुष्टयं हि ग्रामान्प्रशास्तींद्रसमानसंपत् ॥१२॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें ग्रहोंकी अडतीस रश्मियोंका योग हो वह मनुष्य बड़ा पराक्रमी राजा, चार लाख ग्रामोंके ऊपर हुक्म चलानेवाला, इन्द्रके समान संपत्तिवाला होता है ।। १२ ।।

(२८०), जातकाभरण' अथैकोनचत्वारिंशद्रश्मिफलम् । नवनिसंख्याजनने मयूखा विख्यातकीर्तिपतिर्भवेत्सः । प्रौढप्रतापाद्गरुडस्वरूपो गर्वोद्धतारातिभुजंगमेष्ठ ॥ १३ ॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें उनतालीस रश्मियोंका योग हो वह मनुष्य प्रसिद्ध यशवाला राजा होता है, बडे प्रतापवाला, शत्रुओंके अभिमानको नष्ट करनेवाला जैसे गरुडजी सपोंके विषे प्रतापी होते हैं ॥१३॥ अथ चत्वारिंशदाश्मफलम् । खाधिप्रमाणः किरणः प्रसूतः क्षोणीपतिस्तद्विजयप्रयाणे । भवंति सेनागजगजितानां प्रतिस्वनाः खे घनजितानि ॥१४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चालीस रश्मियोंका योग होता है वह मनुष्य राजाओंका जीतनेवाला और उस राजाकी फौजसे हाथियोंकी गर्जनाके शब्द होते हैं जैसे आकाशमें मेघ गर्जते हैं ॥ १४ ॥ अर्थकचत्वारिंशद्रश्मिफलम् । मयूखजालं परिस्तिकाले यस्यैकवेदाह्वयकं नरस्य । द्वयंभोधिवेलामलमेखलाया भवेदिलाया परिपालकः सः॥१५॥ जिस-मनुष्यके जन्मकालमें इकतालीस रश्मियोंका योग हो वह मनुष्य दो समुद्रकी है मेखला जिसकी ऐसे पृथिवीमण्डलका स्वामी, चक्रवर्ती राजा होता है ॥ १५ ॥ अथ द्विचत्वारिंशद्रश्मिफलम् । यमलजलधितुल्यो वा गुणाधिप्रमाणो भवति किरणयोगश्चेन्नराणां प्रसूती। अतुलबलविलासत्रासितारातिवर्गा- स्त्रिजलधिवलयायाः पालकास्ते पृथिव्याः॥१६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें बयालीस वा ततालीस रश्मिपोका योग हो वह मनुष्य बडे बलके विलाससे शत्रुओंको त्रास करनेवाला, तीन समुद्र हैं कंकण जिमके ऐसी धरतीका पालन करनेवाला होता है ॥ १६ ॥ अथ चतुश्चत्वाग्दिश्मिफलम् । सूती वेदयुगप्रमाणकिरणाश्चेत्सार्वभौमः स ना यत्सेनाजलधी गलन्मदजला दंतावलाः शलताम् । यांति च्छत्रविचित्रिताः कमटतां मीनवध्वजा मीनता नौकात्वं च रथास्तथायुधरुविकलोलमालातलात् ॥१७॥ ..

भापाटीकासहित।
(२८१)
जिस मनुष्यके जन्मकालम चौवालीस रश्मियोंका योग हो वह मनुष्य
सार्वभौम नामका.राजा होता है उस राबाकी फौज घोडा हाथी पैदल और सवारों
सहित दिशाओंको विजय करनेवाली डका निशान और मत्स्य पताका सहित संत्रा-
मकी इच्छा करनेवाली आनन्दको करती हुई शत्रुओंको मूछित करती है ॥ १७ ॥
अथ पञ्चचत्वारिंशद्रश्मियोगफलम् ।
पञ्चाधितश्चेत्परतो भवंति गभस्तयो जन्मनि मानवानाम् ।
ते देवतानामपि दुर्जयाः स्युर्दीपान्तरोद्गीतयशोविशेपाः ॥ १८ ॥
इति श्रीदेवज्ञदुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे
रश्मिजातकाध्यायः ॥ १०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पैंतालीस रश्मियोंका योग हो अथवा इससे अधिक
हो तो वह मनुष्य देवताओं करके भी कठिनतासे जीता जाय और दीपट्टीपान्तराम
उसका यश गाया जाता है ॥ १८ ॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मजराजज्योतिषिकपंडित.
श्यामलालकृतायां श्यामसुन्दरीमापाटीकायां
राश्मजातकाध्यायः ॥ १०॥
अथ ग्रहाणां दीप्ताद्यवस्थामाह-
दीप्तस्तुंगगतः खगो निजगृहे स्वस्थो हिते हर्पितः
शांतः शोभनवर्गगश्च खचरःशक्तः स्फुरद्रश्मिभाक् ।
लुप्तः स्याद्रिकलः स्वनीचगृहगो हीनः खलः पापयुक्
खेटो यः परिपीडितश्च खचरैः स प्रोच्यते पीडितः ॥१॥
अव दीमादि ग्रह कहते हैं-जो ग्रह अपने उच्चमें बैठा हो वह दीप्त कहाता है
और जो अपनी राशिमें बैठा हो वह स्वस्य कहाता है और जो ग्रह मित्रकी राशिम
बैठा हो वह हर्पित कहाता है और जो ग्रह ग्रहोंके शुभ वर्गमें बैठा हो वह गान्त
कहाता है और जो यह पूर्ण किरणोंवाला हो वह शक्त कहाता है और जो ग्रह सूर्य
करके अस्त हो वह विकल कहाता है । अपनी नीचराशिम बैठा हुआ ग्रह दीन
कहाता है और जो पापग्रहों करके युक्त हो वह ग्रह सल कहाता है, और ग्रहों
करके पीडित हो वह ग्रह पीडित पहाता है ॥ १॥

(२८२) जातकाभरण। अथ दीप्तग्रहफलम् । दीप्ते प्रतापादतितापितारिगलन्मदालंकृतकुंजरेशः। नरो भवेत्तनिलये सलीलं पद्मालयालंकुरुते विलासम्॥२॥ अब दीप्तमहका फल कहते हैं-जो ग्रह दीस अवस्थामें बैठा हो वह अधिक प्रताप करता है और उसके शत्रु सन्तापको माप्त होते हैं और चुचियाय रहा है मद जिनके ऐसे हाथियोंका स्वामी होता है और उसके घरमें लक्ष्मी विलास करती है ॥२॥ अथ स्वस्थग्रहफलम् । स्वस्थे महावाहनधान्यरत्नविशालशालाबहुलत्वयुक्तः । सेनापतिः स्यान्मनुजो महौजा वैरित्रजावाप्तजयाधिशाली॥३॥ अथ स्वस्थ ग्रहका फल कहते हैं जो ग्रह स्वस्थ होता है वह बड़े वाहन और • धान्यसाहित बडे स्थानोंमें रहनेवाला, फौजका मालिक, बड़ा पराक्रमी, शत्रुओंसे जय पानेवाला होता है ॥ ३ ॥ अथ हर्पितग्रहफलम् । हर्पिते भवति कामिनीजनोऽत्यन्तभूपणचयव्रजवित्तः । धर्मकर्मकरणकमानसो मानसोद्भवचयो हतशत्रुः ॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें हर्पित ग्रह होता है वह मनुष्य वियों करके हर्पको प्राप्त, अधिक भूपण और धनसहित होता है और धर्म कर्मका करनेवाला, शत्रुदलपा नाम करनेवाला होता है ॥ ४ ॥ अथ शान्तग्रहफलम् । शांतोऽतिशांतो हि महीपतीनां मंत्री स्वतन्त्रो बहुपुत्रमित्रः । शास्त्राधिकारी सुतरां नरः स्यात्परोपकारी सुकृतेकचित्तः॥५॥ अब शांत ग्रहका फल करते हैं-शांत ग्रह अत्यन्त शांत स्वभाव करनेवाला, राजाका मंत्री, खुद मुख्त्यार, बहुत पुत्र मित्रोंवाला, शासका अधिकारी, पगया उपकार करनेवाला और श्रेष्ठ कमाम चित्तयुक्त होता है ॥५॥ शक्तोऽतिशक्तः पुरुपो विशेपात्सुगंधमाल्याभिरुचिः शुचिश्च । विख्यातकीर्तिः सुजनः प्रसन्नो जनोपकारिजनप्रहन्ता ॥६॥ अव शक्तग्रहका फल कहते हैं-याक्तग्रह अत्यन्त बलवान, सुगन्य और पुशेयी मालाओम प्रीति करनेवाला, पवित्र प्रसिद्ध यशपाला श्रेष्ठ मनुष्य, प्रगन) मरा उपकार करनेवाला और महको मारनेवाला होता है ॥६॥ . ।

भापायकासहित ।
(२८३)
अथ विकलग्रहफलम् ।
हतबलो विकलो मलिनः सदा रिपुकुलप्रबलश्च गलन्मतिः ।
खलसखः स्थलसंचलितो नरः कृशतरः परकार्यगतादरः ॥७॥
अब बिकल ग्रहका फल कहते हैं-विकल ग्रहवाला मनुष्य बलहीन, मलिन,
हमेशा उसके वैरी बलवान हों, बुद्धिहीन, दुष्ट मित्रोंवाला, स्थानसे चलनेवाला,
दुर्बल देह और पराये कार्यको बिगाडनेवाला होता है ।। ७ ॥
अथ दीनग्रहफलम् ।
दीनेऽतिदीनोऽपचयेन तप्तः संप्राप्तभूमीपतिशवभीतिः।
संत्यक्तनीतिः खलु हीनकांतिः स्वजातिवरं हि नरः करोति ॥८॥
अब दीन ग्रहका फल कहते हैं-दीन ग्रहवाला मनुष्य अत्यन्त दीन, शत्रुओं
करके संतापित, राजाकरके भयको प्राप्त, नीतिरहित, निश्चयकर कांतिरहित और
अपनी जातिसे वैर करनेवाला होता है ॥ ८॥
अथ खलग्रहफलम् ।
खलाभिधाने हि खलै कलिः स्यात्कांतातिचिंतापरितप्तचित्तः।
विदेशयानं धनहीनता च प्रकोपता लुप्तमतिप्रकाशः ॥ ९ ॥
अब खलग्रहका फल कहते हैं जो खलग्रह हो तो वह मनुष्य दुष्ट, स्वीकी चिंता
वाला, अत्यन्त सन्तापको माप्त, परदेशयात्रा करनेवाला, धनहीन, कोधसहित और
बुद्धिहीन होता है ।। ९॥
अथ पीडितग्रहफलम् ।
पीडित भवति पीडितः सदा व्याधिभिर्व्यसनतोऽपि नितांतम् ।
याति संचलनतां निजस्थलान्याकुलत्वनिजवंधुचिंतया ॥१०॥
इति श्रीदेवनदाण्डिराजविरचिते जातकाभरणे
दीप्तादिग्रहफलाध्यायः ॥ ११ ॥
अब पीडित ग्रहका फल कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें पीडित यद ही वह
मनुष्य पीडाको प्राप्त, हमेशा व्याधिसहित, व्यसनयुक्त, अपने स्थानमे चलनेवाला
व्याकुलताको प्राप्त और भाइयोंकी चितावाला होता है ॥ १० ॥
इति श्रीवैशबरेलीस्थगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मजगौरीपुत्ररामज्योविपिक-
पंहितसामलालस्तायां श्यामसुन्दरीमापाटीकायां दीप्तादिफलाध्यायः ॥११॥

(२८४)
जातकाभरण! .
अथ स्थानादियुक्तग्रहफलम् ।
तत्रादौ स्थानबलयुक्तग्रहफलम् ।
परां विभूति जनयत्यवश्यं बलाधिकत्वं महसः प्रवृद्धिम् ।
नानाधनं कौशलगौरवादि कुर्यादलं स्थानबलोपपन्नः ॥ १॥
अव स्थान बलयुक्त ग्रहका फल कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें स्थान-
बली ग्रह हो वह मनुष्य परायी विभूति करके सहित, अधिक बलवान, उत्सवकी
वृद्धिवाला, अनेक धन और कुशलतासहित, गौरवयुक्त होता है ॥ १ ॥
अथ दिग्बलयुक्तग्रहफलम् ।
आशावलं यस्य भवेत्प्रकृष्टं खेटः स्वकाष्टां नियमन नीत्वा ।
विशिष्टलाभं कुरुते दशायां पुंसां निजद्रव्यविमिश्रितं हि ॥२॥
अब दिग्बली ग्रहका फल कहते हैं-जिस मनुष्य के जन्मकालमें ग्रह दिग्बली हो
वह मनुष्य अपनी दशाके नियमसे बड़े लाभका करनेवाला, अपनी दशाम होता
है और अपने धनको प्राप्त होता है ।। २ ।।
अथ कालबलयुक्तमहफलम् ।
शत्रुक्षयं भूगजवाजिवृद्धिं शौय च रत्नाम्बरसंपदं च ।
लीलाविलास विमलां च कीर्ति कुर्याद्वहःकालबलाधिशाली ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें कालबली ग्रह हो वह मनुष्य शत्रुओंका नाश कर
नेवाला, धरती हाथी घोडोंकी वृद्धिवाला, वीरतासहित, रल और वस्त्रकी सम्पदाको
प्राप्त, लीलाओंका विलास करनेवाला और निर्मल यशवाला होता है ॥ ३ ॥
अथ सौम्यवलियहफलम।
आचारशीचशुभसत्ययुताः सुरूपा-
स्तेजस्विनः कृतविदो द्विजदेवभक्ताः ।
पुष्पाम्बरोत्तमविभूपणसादराश्च
सौम्यग्रहर्वलयुतैः पुरुषा भवति ।। ४ ।।
अब सौम्यग्रहका फल कहते हैं-जिम मनुष्य के जन्मकालमें शुभग्रह बलवान हो
यह मनुष्य आचार करके पवित्र, शुभ और सत्यसाहित, मुन्दरूपवाया, तेज-
स्वी, देवता और ब्राह्मणोंका भक्त, उत्तम पुष्प और वय आभूषणों करय महित
-
होता है ॥४॥

भापाटीकासहिता
(२८५)
लुब्धाः कुकर्मनिरता निजकार्यनिष्ठाः
साधुद्धिपः स्वकुलहाश्च तमोगुणाढ्याः ।
क्रूरस्वभावनिरता मलिनाः कृतघ्नाः
पापग्रहे वलयुते पुरुपा भवंति ॥५॥
द्वौ वा त्रयो वा बलिनो भवंति फलप्रदानत्वमिति प्रकल्प्यम् ।।
जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह अधिक बली हों वह मनुष्य लोभी, खोटे
काम तत्पर, अपने काममें निष्ठा रखनेवाला, साधुओंका वैरी, तमोगुण सहित,
क्रूरस्वभाववाला मलिन, कृतघ्न होता है |॥ ५ ॥ जिस मनुष्यके दो वा नीन ग्रह
बलवान हों तो पूर्वोक्त शुभाशुभ फल कहना चाहिये ।
अथ नैसर्गिकवलमाह ।
मंदारसौम्येज्यसितेंदुसूर्या यथोत्तरं स्युर्वलिनो निसर्गात ॥६॥
अब ग्रहांका नैसर्गिक बल कहते हैं-शनैश्चरसे अधिक बली मंगल और मंग-
लसे बुध और बुधसे वृहस्पति और बृहस्पतिसे शुक्र और शुक्रसे चन्द्रमा और
चन्द्रमासे अधिक बली सूर्य नैसर्गिक वल पाता है ॥ ६ ॥
अथ चेष्टावलयुक्तग्रहफलम् ।
कचिद्राज्यं कचित्पूजां कचिद्रव्यं कचिद्यशः ।
ददाति खेचरश्चित्रं चहावीर्यसमन्वितः॥७॥
अब ग्रहाका चेष्टावल कहते हैं-जो चेष्टा वीर्यमें युक्तग्रह हो तो कभी गज्य और
कभी पूजा, कभी धन, कभी यसको माप्त होता है ॥ ७ ॥
अय दृशिवलिग्रहफलम।
दुष्टप्रदः सौम्यनिरीक्षितश्चेदुएं फलं नो सकलं ददाति ।
करेक्षितः सत्फलदोऽपि चैवं विचारणेयं खलु हग्वलस्य ॥८॥
इति श्रीदेवजहँटिगजविरचिते जातकाभरणे स्थानादियुक्तहरूलाध्यायः ॥ १२ ॥
अब दृष्टिवली ग्रहों का फल कहते हैं:-जो युग फल देनेवाला ग्रह शुभग्रह करके
दृष्ट हो तो वह मनुष्यको पूर्ण दुष्ट फल नहीं देता है और पापग्रह देखता हो तो
अच्छे फलको देनेवाला ग्रह भी शुभ फल नहीं देता, यह दृष्टिवली ग्रहका विचार
कना चाहिये ।। ८॥
इति श्रीवंशपरेलीयराजज्योतिपिकटितश्यामालालायां श्याममुन्दरीमार-
टीवायां स्थानादिसतमहालगन्यायः॥ १२॥

(२८६)
जातकाभरण।
अथ सूर्ययोगाध्यायप्रारंभः।
तत्रादौ वोश्यादियोगाः।
खेचरा दिनमणेविधुवज्य द्वादशे च धनभे झुभये वा।
वोशिवेश्युभयचर्यभिधानाः प्राक्तनैः समुदिता इति योगा॥१॥
अब वोश्यादि योग कहते हैं--सूर्यसे चन्द्रमाको छोडकर बारहें, दूसरे और दोनों
तरफ ग्रह बैठनेसे वोशि वेशि उभयचरी योग होते हैं, यथा जहां कहीं सूर्य बैठा
हो उस सूर्यसे चन्द्रमाके विना कोई ग्रह वारहें बैठा हो तो वोशी योग होता है
और दूसरे कोई ग्रह हों तो वेशी योग होता है और सूर्यसे बारहें दूसरे दोनों
तरफ ग्रह बैठा हो तो उभयचरी नाम योग होता है ॥१॥
अथ वोशियोगफलम् ।
स्यान्मंददृष्टिबहुकर्मकर्ता पश्यत्यधश्चोन्नतपूर्वकायः ।
असत्यवादी यदि वोशियोगो प्रसूतिकाले मनुजस्य यस्या२।।
अब वोशियोगका फल कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मफालमें वोशि योग हो वह
मनुप्य Lधी आंखोंवाला, बहुत कार्य करनेवाला, नीचेको देखनेवाला, ऊंचे देहवाला
और झूट बोलनेवाला होता है ॥ २॥
अय वेशियोगफलम् ।
चेत्संभवे यस्य च वेशियोगो भवेद्दयालुः पृथुपूर्वकायः।
स्याद्वाग्विलास्यालसतासमेतस्तियक्प्रचारः खलु तस्य होः ॥३॥
अब वेशियोगका फल कहते हैं-जिस मनुष्य जन्मपालमें वेची योग हो वह
मनुष्य दयावान, मोटी देहवाला, वाग्वेलाममें कुशल, आलमी और तिग्छ निगा-
हवाला होता है॥३॥
अय उभयचरीपोगफलम।
सर्वसहः स्थिरतरोऽतितरांसमृद्धःसत्त्वाधिक समशरीरविराजमानः ।
नात्युच्चक-सरलहक्प्रवलामलश्रीयुक्त किलोभयचरीप्रभवोनराम्यात
सूर्यस्य वीयर्यात्खचरानु साराद्राश्यशयोगात्मविचार्य सर्वम् ।
न्यून समं वा प्रबलं नराणां फलं सुधीभिःपरिकल्पनीयम् ॥५॥

भापाटीकासहित ।
(२८७)
अव उभयचरी योगका फल कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें उभयचरी
नाम योग होता है वह मनुष्य सबकी सहनेवाला, स्थिर स्वभाववाला, अत्यंत समू-
द्धियोसहित, अधिक बलवान, एकसी देहवाला,अत्यन्त उंचा नहीं, सीधी दृष्टि और
अधिक लक्ष्मीसहित होता है ॥ ४ ॥ सूर्यके वीर्यसे ग्रहोंके अनुसार राशि अंगके
योगसे विचार करे, न्यून वा सम वा प्रबल फल पंडितजन कल्पना करें ॥५॥
अथ चन्द्रयोगाध्यायप्रारम्भः । तत्र-
मुनफाउनफादुरुधराकेमद्रुमपोगानाह-
द्विजपतेर्धनगैः सुनफा भवेद्ययगतैरनफा रविवर्जितः ।
दुरुधराः खचरैरुभयस्थितैमुनिवरैरुदिता महदादरात् ॥ १ ॥
चन्द्रमासे दूसरे भावमें ग्रह बैठे हों तो मुनफा योग होता है और चन्द्रमासे
बारहवें कोई ग्रह बैठे हों तो अनफा योग होता है और चन्द्रमासे दूर और वारहवें
दोनों तरफ ग्रह बैठे हों तो दुरुधरानाम योग होता है, ये मुनीश्वरोंने कहे हैं ।। १ ॥
अथ केमद्रुमयोगमाह।
निशाकराजन्मनि खेचरेंद्रा धनव्ययस्थानगता न चेत्स्युः।
वदंति केमद्रुमनामयोग लक्ष्मीवियोगं कुरुते स नूनम् ॥२॥
अब केमद्रुमयोग कहते हैं-चन्द्रमासे धन और वारहवें दोनों तरफ ग्रह कोई
नहीं हो तो मुनीश्वर केमद्रुम नाम योग कहते हैं इसमें पैदा हुआ मनुष्य लक्ष्मी-
हीन होता है ॥२॥
अथ सुनफायोगफलम् ।
निजभुजार्जितमानसमुन्नतो विशदकीर्तियुतो मतिमान्सुखी ।
ननु नरः सुनफाप्रभवो भवेत्ररपतेः सचिवः सुकृती कृती॥३॥
अब सुनफा योगका फल कहते हैं-अपनी भुजाओं करके मानको इकट्ठा करने
वाला, बडे यशवाला, बुद्धिमान, मुखी, राजाका मंत्री और श्रेष्ठ कृत्य करने-
चाला होता है ॥३॥
अथ अनफायोगफलम्।
उदारमूर्तिगुणकीर्तिशाली कंदर्पकेलिः शुभवाग्विलासः।
सवृत्तियुक्तः सततं विनीतः प्रभुनरः स्यादनफाभिधाने ॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अनफा योग हो वह मनुष्य उदारमूर्ति, गुणवान्,
यशवाला, कामकलासाहित, श्रेष्ठ वाणी बोलनेवाला, श्रेष्ठ वृत्ति करनेवाला, निरन्तर
नम्रतासहित और स्वामी होता है ॥ ४ ॥

.
(२८८)
जातकाभरण।
अथ दुरुंधरायोगफलम् ।
द्रविणवाहनवाहवसुंधरासुखयुतं सततं कुरुते नृपम् ।
दुरुधरातितरां जितवैरिणं सुनयनानयनाञ्चललालसम् ॥५॥
अब दुरुधरायोगका फल कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें दुरुधरा योग हो
वह मनुष्य धन वाहन और घोडे धरतीके निरंतर सुखवाला, राजा, शत्रुओका
जीतनेवाला और श्रेष्ट स्वीफे नेत्रांचलकी लालसा करनेवाला होता है ॥ ५॥
अथ केमद्रुमयो गजातफलम् ।
विरुद्धवृत्तिमलिनः कुवेपः प्रेष्यो मनुष्यो हि विदेशवासी।
कांतासुहृत्सूनुधनैविहीनो केमद्रुमे भूमिपतेः सुतोऽपि ॥ ६॥
अब केमद्रुमयोगका फल कहते हैं-केमद्रुमयोगमें पैदा हुआ मनुष्य उलटी वृत्ति-
वाला, मालन, चुरे वेपवाला, परदेशका वासी और स्त्री मित्र पुत्र तथा धन करके
हीन होता है चाहे राजाका पुत्र हो ॥ ६ ॥
अथ केममभंगमाह-
केंद्रादिगामी यदि यामिनीशः स्यात्पद्मिनीनायकतः करोति।
विभ्राजमानोन्नतिनैपुणानि कनिष्ठमध्योत्तमतायुतानि ॥ ७ ॥
अब केमद्रुमभंगयोग कहते हैं-जो सूर्यगे चन्द्रमा केंद्रमें बैठा हो तो उस बार
की ज्ञान, मान, उन्नति, निपुणता अधम होती है और सूर्यसे पणफग्में चन्द्रमा हो
तो पूर्वोक्त फल सम कहना और सूर्यमे आपोलिमस्थान में चन्द्रमा बेटा हो तो
पूर्वोक्त फल उत्तम
पदना चाहिये ॥ ७॥
पालेयरश्मिः परिसूतिकाले निरीक्ष्यमाणः सकलेनभोगः ।
नरं चिरंजीवितसार्वभौमं करोति केमद्रुममाशु हत्वा ।।८।।
जिम मनुष्य जन्मकालमें चन्द्रमायो मय ग्रह देखते हों वह मनुष्य यात कारः
तक जीनेवाला, राजाफे ममान होना है और मिट्टम योगको नाग करता है. १८११
चतुर्प केन्द्रेषु भवंति खेटा दुष्टोऽपि केमद्रमयोग एपः ।
विहाय केमद्रुमतां नितांत कल्पद्रुमः स्यात्किलसत्फलाप्त्या।९।।
जिरा मनुष्य जन्मालमें चागे पंद्राम ग्रह हो.तो दुष्ट केमद्रुम योग भी
दो तो नितांत फेमम योगपो दर कार्य कल्पद्रुम नाम योग होता है और अंग
फलयो प्राम फगता है ॥९॥

भापाटीकासहित। (२८९) क्षितिसुतयुतजीवे सूतिकाले तुलायां विलसति नलिनीनां नायकः कन्यकायाम् । विधुरपि यदि शेपैनेक्षितो मेपवर्ती जनयति नृपतीद्रं हंति केमद्रुमं च ॥ १० ॥ इति श्रीदेवज्ञदुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे सुनफाअनफादियोगाध्यायः ॥१३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मंगलकरके सहित बृहस्पति तुलाराशिम बैठा हो ओर सूर्य कन्याराशिमें बैठा हो और मेपराशिगत चन्द्रमा हो और बाकीके कोई ग्रह उसको नहीं देखते हों तो वह पुरुष राजा होता है, केमद्रुम योगका नाश करता है ॥ १०॥ इति श्रीवशबरेलीस्थराजज्योतिपिक-पाडेतश्यामलालकृताया श्यामसुन्दरी- भापाटीकाया मुनफादियोगाध्याय ॥ १३ ॥ . - अथ प्रव्रज्याध्यायप्रारंभः । येपां सूतौ राजयोगा नराणां प्रत्रज्या चेत्तापसास्ते भवेयुः। वक्ष्ये संक्षेपेण तांस्तापसानां योगोत्पन्नान्समतान्प्राक्तनानाम्॥१॥ जिस मनुष्यके जन्मकाल्मे राजयोग हो और प्रव्रज्यायोग भी हो तो वह मनुष्य तपस्वी होता है, उन तपस्वी योगोंको मैं संक्षेपसे पूर्वाचायॉकी सम्मति लेकर कहता हूं ॥१॥ अथ चतुरादिभिर्ग्रहः प्राज्यायोग ।। ग्रहश्चतुभिर्यदि पंचभिर्वा पड्भिस्तथैकालयसंस्थितैश्च । नश्यति सर्वे खलु राजयोगात्राजको योग इति प्रदिष्टः ।।२।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें चार वा पांच अथवा छ: ग्रह एक राशि के हो तो उस मनुष्यके सम्पूर्ण राजयोग नष्ट हो जाते है, देवल यह संन्यास ही योग कहा जाता है ॥२॥ अन्यग्रहालोकनवर्जितश्चजन्मेश्वरो नैव शनि प्रपश्येत् । मंदोऽपि नो जन्मपति विसत्वंदीक्षाविचक्षाप्रचुरोनर स्यात् ॥३॥ जिम मनुष्यके जन्मकाल्में और ग्रहोंकी दृष्टिसे जन्मलग्ना स्वामी रहित हो (२९०) जातकाभरण। और लग्नेश शनैश्चरको न देखता हो और शनैश्चर बलहीन लग्नेशको न देखता हो तो वह दीक्षा लेकर संन्यासी होता है ॥ ३ ॥ जन्माधिराजो रविजत्रिभागे कुजार्कजांशेऽर्कजवीक्षितश्च । करोति जातं कुटिलं कुशीलं पाखण्डिकं मंडनतत्परं च ॥ १॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नका स्वामी शनैश्वरके द्रेष्काणमें मंगल वा शनैश्चरके नवांशमें बैठा हो और उसको शनैश्चर देखता हो तो वह मनुष्य कुटिल, दुष्टशील, पाखण्डका मण्डन करनेवाला तपस्वी होता है ॥ ४॥ होराशीतकरामरेंद्रसचिवाः सौरेण संवीक्षिताः पुण्यस्थे सुरमंत्रिणि प्रणयकृतीर्थाटनैर्मानवः । कोण पुण्यग्रहाश्रितेऽध्यखचरैवेक्षिते दीक्षितः स्यान्नूनं तदपि प्रसूतिसमये सद्राजयोगोद्भवः ॥५॥ जिस मनुष्यका जन्म चन्द्रमा वा वृहस्पतिकी लग्नमें हो और शनैश्वर देखता हो और नवमभावमें बृहस्पति बैठा हो तो वह मनुष्य विख्यात तीयों में घूमनेवाला साधु होता है और नवम, पंचम, शुभग्रह बैठा नहीं देखता हो तो भी संन्यासी होता है, चाहे उसके जन्मकालमें राजयोग हो ॥ ५॥ अथ प्रवन्याभेदमाह- प्रावाजिकोऽर्कादिवलकमेण वैखानसः खपरधृक्सलिंगी। दण्डी यतिश्चक्रधरश्च ननस्तत्प्रच्युतोजन्मपतो जित स्यात् ॥६॥ अब प्रवज्याके भेद कहते हैं-सूर्यादिकोंफे बलपरफे सन्यासयोग पहना चाहिये। सन्यासयोगफारक ग्रहोंमें सूर्य अधिक बली हो तो वह मनुष्य रेखानस (वनमें रहा हुआ) संन्यासी होता है । वैखानस उन तपस्वियोंको कहते हैं जो तपस्वी अग्निहोत्र करनेवाला, पर्वत, वन, नदीके किनारे आश्रम बनाकर रहे, तपस्या करनेवाला, सूर्यफा आराधन करता है और जो चंद्रमा संन्यासयोगकारक ग्रहाम अधिक वती हो तो वह मनुष्प कपाली संन्यासी होता है, वृद्धश्रावरमतो धारण फरनेवाले, हिंसागे रहित, भस्म करके मफेदवर्ण देहवाले, और सोममिद्धांत में तत्पर, कपालोंफो धारण करनेवाले, नंगे रहनेवाले, शिवजीकी दीक्षावाले, उपनाम फरनेवाले, शस्य और पमलके ममान भोभायमान, सरिक संन्यागी पहाता है और संन्यासयोगकारक ग्रहोंमें मंगल अधिक वली हो तो यह मनुष्य लिंगी। गेलए वस्त्र धारण करनेवाला संन्यामी होता है, अपनी घटि करके. देवताओंकी उपासना करनेवाला, भिखारहित, पांदुरम्य पहिनेवाग, भीष मांगनेवाला. लाल कपड़े पहिनेवाला, इंद्रियाको जीवनेवाला, गन्यामी

भापाटीकासहित।
(२९१)
होता है और बुध बली हो तो देडी संन्यासी होता है तया कपटका करनेवाला
गारुडी मंत्रोंका आराधन करे, मयूरतंत्रके मतमें स्थित, मांसका खानेवाला दंडी
कहाता है और जिसके संन्यास योगकारक ग्रहोंमें वृहस्पति बलवान हो तो यती
तपस्वी एक दंड अथवा तीन दंडोंको धारण करनेवाला, गेरुआ कपडे पहिरनेवाला,
बानमस्य धर्मस्थित, ब्रह्मचर्यको प्राप्त. तीथोंमें नान करनेवाला होता है और
सन्यास योग करनेवाले ग्रहों में शुक्र अधिक बलवान हो तो वह चक्रका धारण
करनेवाला,पशुपतिपक्षकी दीक्षामें स्थित हमेशा व्रत करनेवाला होता है और संन्याम
योगकारक ग्रहोंमें शनैश्वर अधिक वली हो तो वह नंगा संन्यासी पाखंडनतम स्थित
ननवत धारण करनेवाला, श्रावक्मतमें स्थित, कठिन तपस्या करनेवाला होता है
और जो संन्यास योगकारक ग्रह किसी ग्रहते युद्ध में हारा हो, अथवा जन्मपति
पराजित हो तो वह संन्याससे पतित हो जाता है ॥ ६ ॥
एकस्थानस्थितैः खेटः सर्वैश्च बलसंयुतैः ।
निरम्बरा निराहारा योगमार्गपरायणाः ॥७॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एक स्थानमें सम्पूर्ण वलयुक्त ग्रह बैठे हों व
संन्यास योगकारक हो तो वह मनुष्य नंगा होकर भोजन त्याग कर योगमार्गमें
तत्पर होता है।॥ ७॥
एकस्थाने खेचराणां चतुणां योगश्चेत्स्यान्मानवानां प्रसृतौ ।
ते स्युर्भूमीपालवंशऽपि जाताः कांतारांतर्वासिनः सर्वथैव ॥८॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एक राशिमें चार ग्रहोंका योग बलवान हो यह
मनुष्य राजाके वंशमें भी पैदा हुआ हमेशा वनमें वास करनेवाला होता है ॥ ८ ॥
पंचखेचरपतिर्यदि सूतौ भूपतेरपि सुतः स च नित्यम् ।
कंदमूलफलभक्षणचित्तोऽत्यंतशांतिविजितेन्द्रियशवः ॥ ९ ॥
जिस मनुष्यक जन्मकालमें पांच ग्रह एक भावमें संन्यास योगकारक बैठे हो
वह मनुष्य राजाका भी पुत्र हमेशा कन्द मूल, फल भोजन करनेमें चित्त करने
बाला, अत्यन्त शान्त, इंद्रियोंका जीतनेवाला होता है ॥ ९ ॥
एकत्र पुण्णां गगनेचराणां प्रसूतिकाले मिलनं यदि स्यात् ।
ते केवलं शैलशिलातलेपु तिष्ठति भूपालकुलेषु जाताः ॥१०॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें एक स्थानमें संन्यास योगकारक ग्रहोंका योग हो
यह मनुष्य चाहे राजाके वंशमें पैदा हो तो भी पर्वतों को मिलाके तले वास करने
वाला होता है ॥१०॥

(२९२)
जातकाभरण।
प्रवाजितानामथ भूपतीनां योगद्वयं चेत्प्रबलं प्रसूतौ ।
फलं विरुद्ध ह्यनुभूय पूर्व ततो ब्रजेद्राज्यपदाधिकारम् ॥११॥
इति श्रीदेवज्ञहँडिराजविरचिते जातकाभरणे
प्रव्रज्याध्यायः॥ १४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मव्रज्यायोग और राजयोग दोनों बलवान हों तो वह
मनुष्य विरुद्ध फल भोगकर साधु हो करके भी राजा होता है ॥ ११ ॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवंशावतंसराजज्योतिषिकपंडितश्यामलालकृतायां
श्यामसुन्दरीभाषाटीकायां प्रव्रज्यायोगाध्यायः ॥ १४ ॥
अथारिष्टाध्यायारंभः।
रिटाध्यायाधीनमायुर्नराणां यस्मात्तस्मादिष्टमा प्रवच्मि ।
यस्याभावे साधितायु-प्रमाणे प्रामाण्यं स्यात्संभवे सर्वथैव ॥
मनुप्योंका आयुय अरिष्टयोगोंके आधीन होता है इसवास्ते पहिले औरष्टयोग
कहते हैं-जिसके औरटयोग न हो उसका आयुर्दाय साधन किये हुए आयुके प्रमा
णके तुल्य दीर्घायु होता है ॥ १॥
रिटयोगः२
अयारिष्टयोगाः।
भौमालयेऽकरिशनीन्दुदृष्टे गृहेऽएमे चित्रशि-
स खण्डिसूनुः । अष्टमूर्ति गुणात्र योगे प्राण-
वियोग लभते मनुष्यः॥२॥
अब अरिष्टयोग कहते हैं-जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप
वृश्चिक नगि गत वृहस्पाते अष्टममें घेटा हो और सूर्य
मंगल, शनैश्चर, चंद्रमा करके दृष्ट हो और शुक्र नहीं देखता हो तो वह मनुष्य थोड़े
फाल जीता है॥२॥

श स भापाटीकासहित। अथ त्रिवि रिष्टयोगः। त्रिभिधपरिष्ट योगः३ पटाष्टमे वापि चतुष्टये वा विलोमगामी कुज- मंदिरस्थः । बलान्वितेनापनिजेन दृष्टो व म स्त्रिभी रिष्टकरः शनिः स्यात् ॥३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे वा आठवें या केंद्र २१४७११० में वक्री होकर शनैश्चर बैठा हो और वल करके मंगल उसको देखता हो तो वह मनुष्य तीन वर्षमें रोग पाता है ॥ ३ ॥ नवमवर्षे मृत्युयोगः५ अथ नवमवर्षे मृत्युयोगः। चंद्रार्कयुग्जन्मनि भानुसूनुः करोति नूनं निधनं नवाब्दैः। जिस मनुष्यके जन्मकालमें चन्द्रमा और सूर्य करके सहित शनैश्चर बैठा हो उस मनुष्यको नवम वर्नमें मृत्यु होता है। अथ मासेन मृत्युयोगः। मासेन मृत्युयोगः४ मासेन मंदावनिसूनुसूर्याश्छिद्रेऽरिगेहाश्रि- ततासमेताः॥४॥ जिस मनुष्य के जन्मकालमें शनैश्चर, मंगल और सूर्य मिलकर अष्टम वा छठे बैठे हों वह मनुष्य एक मासमें मृत्युको प्राप्त होता है॥४॥ एकाल्दे मृत्युयोगः५ एकोऽपि पापोऽष्टमगोऽरिगेहे पापेक्षितो- ऽब्देन-शिशुं निहन्यात् । सुधारसो यद्यपि येन पीतः किमत्र चित्रं न हि येन पीतः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें एक भी पापग्रह अष्टम वा छठे बैठा हो और पापग्रह करके देखा हुआ हो तो . में -- रा (२९४) जातकाभरणा उस बालकने चाहे अमृत क्यों नहीं पिया हो तो भी एक वर्षमै मृत्युको प्राप्त होगा, फिर क्या आश्चर्य है कि जिसने अमृत नहीं पिया है एक वर्षमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥५॥ अथ पष्ठव रिष्टयोगः। पष्ठवर्ष रिष्टयोगः ६ पष्ठवर्षे रिटयोगः ६ सूर्येन्दुगेहे दनुजेंद्रमन्त्री व्ययाटमारिस्थितसौम्य- खेटः । सर्वैः प्रदृष्टः खलु पभिरब्दैर्जातस्य जंतोर्वि- शु५/शु५ शु५ तनोति रिटम् ॥६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सिंह वा कर्कराशिगत झुक छठे आठवें वारहें बैठा हो और शुभ ग्रह उसको सब देखते हों तो उस वालकको छठे वर्ष रिष्ट होता है । ६ ॥ अथ चतुर्भिवरिष्टयोगः। चतुर्वर्षे रिष्टयोगः७ चतुर्व रिष्टयोगः७ १०चं सोमस्य सूनुर्यदि कर्क- टस्थः पष्ठेऽष्टमे वा भवने ||११ विलनात् । चन्द्रेण दृष्टो- ऽन्दचतुष्टयेन जातस्य जंतोःप्रकरोति रिटम्॥७॥ निग मनुष्यके जन्मकारमें फराशिगत बुध लनसे छठे वा आटवें स्थानमें बैम ही और चन्द्रमा करके दृष्ट हो तो टस वालकको चौथे वर्षम, अग्धि करता है।॥ ७॥ केतूदयो भे प्रभवेच्च यस्मिस्तस्मिन्प्रसूतियदि यस्य जंतोः । स्यात्तस्य मासद्वितयेन नाशो विनिश्चयेनेति वदंति पूर्वे ॥८॥ जिस मनुष्परा जन्म धूम्रकेतु ताराके उदयके नक्षनमें हो वह बालक दो माम, निश्चय करके मरता है॥ ८॥ १२ घ१० ७ २ भाषादीकासहित । अथ शीघ्रमृत्युयोगः। भीघ्रमृत्युयोगः ९ शीप्रमृत्युयोगः ९ १२ १० १२ ७ १ १०सा १२ म ६ ८ भ११ मेपूरणेऽकों धरणीसुतस्य गेहेऽथवार्कात्मजधामसंस्थः । पापैरनेकैश्च निरीक्ष्यमाणः प्राणेवियोगं स तु याति तूर्णम् ॥ जिस मनुष्यके जन्मकाल्में दशमभावमें सूर्य मेष वृश्चिक वा मकर कुम्भ राशिमें बैन हो और पापग्रह देखते हों तो वह बालक शीघ्रही मृत्युको पाना है ॥ ९ ॥ अथ सप्तमवर्षे मृत्युयोगः। लग्ने भवंति द्वेष्काणाः शृंखलापाशपक्षिणाम् । सपापा मरण कुर्युः सप्तवपन संशयः ॥ १० ॥ जिस मनुष्पके जन्मकालमें जन्मलग्नमें निगड पाश पक्षि द्रेष्काण हो और पाप- प्रयुक्त हों तो वह बालक सातवें वर्षमें मरता है इसमें संशय नहीं है ॥१०॥ मीन कर्क राशिका अंतिम और वृश्चिक राशिश मयम द्वितीय द्रेकाण निगड संजक होता है, वृष राशिका पहिला, मकरमा पहिला द्वितीय द्रेष्काण पाश पहाता है और तुला राशिका द्वितीय और अंतिम, सिंह रामिका पहिला, कुम्भ राशिमा पहिला द्रेष्काण पशिसंतक होता है ॥ १० ॥ दयान्द पोहगाने या मृत्युयोग." दशा या पो." राहुभवेज्जन्मनि केंद्र- वर्ती क्रग्रहश्चापि निरी- क्षितश्चेत् । करोति वपर्द- शभिविनाश वदति वा पोडशभिश्च केचित् ॥१॥ त 'जातकाभरण। जिस मनुष्यके जन्मकालमें राहु केंद्र १।४।७।१० वर्ती बैठा हो और पापग्रह उसको दखते हों तो उस बालकका दशवें वपमें नाश करता है, किसी आचार्यके मतमें सोलहें वर्ष मृत्यु करता है ॥११॥ स अथाष्टवर्षे मृत्युयोगः। अष्टवर्षे मृत्युपोगः १ पष्टा एमस्थाः शुभखेचरेंद्राः पापास्त्रिकोणे यदि जन्मलयात् । क्रूरेसितास्ते निधन विध्युर्वपीटकेनेव खलप्रदृष्टाः ॥ १२ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें छठे आठवें शुभ ग्रह घेठे हों और पापग्रह पञ्चम नवम बैठे हों और पापग्रहोंसे दृष्ट हों तो आठवें वर्षमें मृत्यु करते हैं ॥ १२ ॥ /५ अथ शीघ्रमृत्युपोगः। शीप्रमरपुपोगः १६ गीमरपुयोगः ॥ सूतिकाले भवेच्चंद्रः पटो वाटमसंस्थितः । बाल- स्य कुरुते सद्यो मृत्यु पापविलोक्तिः ॥ १३॥ जिस मनुप्पये. जन्मपालमें चन्द्रमा छटेवा आठवें घटा दो और पापना देगते हो तो यह धारपानी इत्युको मान होता॥१३॥ शुभाशुभालोकनतुल्यतायां यश्चतुभिर्नियनं तदानीम् । न्यूनाधिकत्वे मुधिया विधेयनराशिकनव विनिश्रयोऽयम् ११ रा भायारीकासहित । (२९७) जो पठाष्टमस्थित चन्द्रमाको शुभ ग्रह और पापग्रह दोनों वरावर देखते हो तो वह बालक चौथे वर्षमै मृत्युको माप्त होता है और जो कमती शुभग्रह देखते ही पापग्रह ज्यादे देखते हों या पापग्रह कमी देखते हों और शुभग्रह ज्यादे देखते हों तो त्रैराशिक गणितसे अरिष्टका विचार करना चाहिये ।। १४ ॥ "पष्टेटमे मासि मरणयोगः १५ षष्टेटमे माप्ति मरणयोगः१५ হয় सम धनांतगैर्वाऽरिमृतिस्थि- तैर्वा धर्माएमस्थैर्व्ययश- अगैर्वा करग्रहे यो जनन प्रपन्नः पप्टेऽएमे मासि मृति प्रयाति ॥ १५॥ सस जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह दूसरे वारहे बैठे हो 'एको योगः' अथवा के आठवें वेठे हों 'विनीयो योगः'अथवा अष्टम नव- ममें बैठे हों तो 'तृतीयो योग दशम अथवा छठे वार स्थानमें वेटे हों शम तो वह बालक छठे वा आठवें महीनेमें मरता है ॥ १५ ॥ मासेन मृत्पुयोगः१६ दा पठाएमस्थाः शुभखेचरेद्रा विलोमगैः पाप- खगेः प्रदृष्टाः । शुभैरहष्टा यदि ते भवति मासेन नूनं निधनं तदानीम् ॥ १६॥ जिस मनुष्यके जन्मपालमें के आटवें शुभ ग्रह बैठे हों और वफ्री होकर पापी ग्रह देखते हो और शुभ ग्रह नहीं देसते हो तो वह मनुष्य एक मासमें मृत्युको मार होता है ।। १६ ॥ २ सूध्दा सू८ ३ ११ १२ ४म (२९८) जातकाभरण। अथ राशिसमानवर्षे मृत्युयोगः। समानवर्षे मृत्युयोगः १७ सश्श्श विलमजन्माधिपती भवेतामस्तंगतावष्टरिपु- श व्ययस्थौ । जातस्य जंतोमरणप्रदौ तो वदंति राशिप्रमितैर्हि वः ।। १७ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें जन्मलग्न और जन्मराशिका स्वामी छठे आठवें बारहें अस्तगत होकर बैठे हों तो वह बालक राशिके तुल्य वपोंमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १७॥ अथ राशिसमानवर्षे मृत्युयोगः । चतुर्थमासे मरणयोगः १८ राशिसमानव मृत्युयोग- १८ होराधिपः पापखगैः प्रदृष्टः अतुर्थमासे मृतिकृन्म- तिस्थः । जन्मेश्वर- १० १२ स्तन्निधने दिनेशः शुक्रेक्षि- तोऽब्दैर्भवनप्रमाणः ॥१८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें जन्मलग्नका स्वामी अष्टम बैठा हो और पापग्रहोंमें दृष्ट हो तो वह चौथे मासमें मृत्युको प्राप्त होता है और जन्मलग्नका स्वामी अष्टम बैठा हो और शुक्र सूर्यसे दृष्ट हो तो वह वालक राशिके समान वपोंमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥ १८॥ श्रीघ्रमृत्युयोग १९ माखन मरणयोग १९ होराधिपः पापयुतः स्म- रस्थः करोति नाशं खलु । जीवितस्य । मासेन जा न्माधिपतिस्तु तद्वत्पापा- न्वितो रंध्रगृहाश्रितश्च १९ जिस मनुप्यके जन्मकालमें लग्नका स्वामी पापग्रह सहित मप्तम चैटा हो तो वह बालक शीघ्र मर जाता है (एको योगः) और लग्नेग पापग्रहसहित अष्टम भावमें बैठा हो तो एक मासमें बालक मर जाता है ।।१९।। . ८ ९श ३ ३ ३ ६ ५ ९ बुरुरा ७ ८ रागम -- (११ २ ५ ४ भापाटीकासहित । (२९९) नवमान्देमृत्युयोगः२० युक्तो भवेदारदिवाकराभ्यां निशाकरश्चा- रुखगैर्न दृष्टः । स्वसूनुगेदोपगतो विनाश करोति वर्षे नवमेऽर्भकस्य ॥२०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चन्द्रमा सूर्य मंगल करके सहित पञ्चम स्थानमें बुधकी राशिमें बैठा हो तो वह मनुष्य नवम वर्षमें मृत्युको प्राप्त होता है ।। २० ॥ शीनमरणयोग शीघ्रमरणपोगः लगास्तरंभ्रान्त्यगते श. शांके पापान्वित सौम्यख- गैरदृष्टे । केंद्रपु सौम्यग्रह- वर्जिनेषु कीनाशदेश्च हि शिशुः प्रयाति ॥२१॥ चमंश जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्न सप्तम अष्टम चन्द्रमा पापग्रहों करके सहित वैठा हो और शुभ ग्रहोंसे अट हो और कोई शुभ ग्रह फेन्द्रमें न बैठे हों तो वह वालक यमलोक्यो शीघ्र ही जाता है२१ अब शीघ्रमृत्युयोगः। रन्थालये वाथ चतुष्टयेपु खलग्रहाणां मिलनं यदि स्यात् । कलानिधी क्षीणकलाकलाप लगस्थिते नश्यति यः प्रस्तः २२ थोप्रमृत्युपोगा २५ च समं में श्री. थी. स सुध -- सराश पु १२ (३००) जातकाभरण। शी. थी. जिस' मनुष्यके जन्मकालमें अष्टम वा केन्द्रस्थानमें पापग्रह बैठे सपा) हों और क्षीण चन्द्रमा लग्नमें बैठा हो तो वह वालंक शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥२२॥ वज्रमुष्टियोगः २३ अथ वचमाष्टयागेः। यमुष्टियोगः३३ लग्ने कुलोरेऽप्यथालिसं. ज्ञे खलग्रहाः पूर्वदले यदि स्युः । सौम्यः परार्धे खलु १श घनमुप्पियोंगोऽयमुक्तः प्र करोति रिप्टम् ॥२३॥ जिम मनुष्य जन्मकालमें जन्मलन कर्क वा पत्रिक हो और पापग्रह सनसे लेफर सातव भावतक घंटे हों और शुभग्रह मातवें घर लेफर लापर्यन्त बैठे हों को पनमुष्टि नाम योग होता है, इसमें पैदा हुआ यालय अरिएको प्राप्त होता हार॥ शीप्रमापुपोग: २४ व्ययारिरंधेपु शुभाभिधानात्रिकोणकेन भवंति पापाः । सरोजवन्धोरुदये प्रमृतियः स्याऽन्यलोकं त्वरया स याति ।। २१॥ निग मनुष्यफ. जन्मपालमें पाये और 2 भाट शुभ ग्रा घटेरों और शिलोग पेन्द्र में riti और चन्द्रमा रम यंटा हो तो बाद पालपी मुत्युशे मान दा ११ परावादमापुपांगा. मौरस्यालयसंस्थो देवगुरूनिधनभावगी लग्नात् । पापमददृप्टतर्नियनायकादो दि तुल्य: स्यात् ॥२५॥ जिम मनुष्क जमरा पर रामगार रपि भार STER मां का बालबार दिन सामान ग + - में thy भापाटीकासहित । 2001 (३०१) शीनमरणयोगः २६ रंध्रांबुजायाभवनेषु खेटा विधौ च पापद्वय- मध्ययाते । यस्य प्रसूतिः स तु याति कामं यमस्य धाम प्रवदन्ति पूर्वे ॥२६॥ जिस बालकके जन्मकालमें अष्टम चतुर्थ सप्तम भावों में चन्द्रमा पापग्रहोंके बीच में बैठा हो वह वालक शीघ्र ही यमलोकको जाता है ।। २६ ।। सध्यादये भांत्यगताश्च पापाश्चंद्रस्य होरा यदि जन्मकाले। चतुर्ष केंद्रेषु शशांकपापाः स याति वालः किल कालगेहम्२७ जिस बालकके सायं प्रातःकालकी सन्ध्यामें जन्म हो और पापग्रह राशिके अन्तमें बैठे हों और चन्द्रमाकी होरामें जन्म हो और चन्द्रमा करके सहित पापग्रह' केन्द्रमें बैठे हों तो वह बालक शीघ्र मर जाता है ॥ २७ ॥ मात्रा सह मरणयोगः२८ स्माष्टमस्था यदि पापखेटाः पापेक्षिताः साधुखगैन दृष्टाः । करोति रिष्टं त्वरया कस्य साकं जनन्याभिमतं बहूनाम् ॥२८॥ जिस चालकके जन्मकालमें सातवें आठवें पापग्रह बैठे हों और पापग्रह देखते हों और शुभ ग्रह नहीं देखते हों तो वह बालक मातासहित अरिष्टको मात होता है ।। २८॥ मात्रा सह मरणयोगः २९ अय मात्रा सह मृत्युयोगः। मात्रा सह राखेणमृ. निजोपरागे त्वशुभान्विते- न्दुर्लग्नस्थितो भूमिसुतोड़- प्रमस्थः। ततो जनन्या सह वालकस्य मृत्युस्तथा के सति शस्त्रघातः ॥२९॥ य w AA - (३०२) जातकाभरण। अपने ग्रहण के समय पापग्रहके सहित चन्द्रमा लग्नमें वैग हो और मंगल अष्टम बैठा हो तो वह वालक मातामहित मृत्युको प्राप्त होता है और सूर्य पापग्रह सहित लग्नमें बैठा हो और मंगल अष्टम बैठा हो और सूर्यग्रहण के समयका जन्म हो तो चह वालक माताकरके सहित हथियारमे मारा जाता है ॥ २९ ॥ भचिरेण मृत्युयोगः ३० मचिरेण मृत्युपोगः३० भूमीसुते वाकसुते विलग्ने भानी स्मरस्थानगते- ऽन्यथा वा। युक्ते तयो- रन्यतमेन चंद्रेऽचिरेण मृत्युःपरिवेदितव्यः ॥३०॥ ६० ३० जिग वालय के जन्मपालम मंगर वा निभा र प्रमें घटा हो और मूर्य गानों बेटा हो अथवा रममें मपं, गात मंगर पानी पर टाहो और अन्य ग्यानाम चन्द्रमा बटा हो नो या पारप. यो पाग्में मृत्युमो प्रान होना है.॥ 7 पपिपिलमाष्टमधाममत्वः भीण विधा द्वा- दशभाषयाते । केंद्रपु मौम्या न भवंति नृनं शिशोस्तदानों निधन प्रकल्ल्यम ॥३१॥ जिम मनुपरे जमा NREE P भार घटेहा और भीगनमा बाटा में शुमान दोदोरमा ?

श भाषायकासहित । शीघ्रमरणयोगः ३१ शीघ्रमृत्युपोगः ३२ त्रिकोणकेंद्रेषु भवंति पापाः शुभग्रहालोकन- वर्जिताश्चेत् । लग्नोपयाते रासति भास्करे वा निशा-म कोरिष्टसमुद्भवःस्यात् ३२ जिस वालकके जन्मकालमें पंचम नवम और केंद्रोंमें पापग्रह बैठे हों उनको शुभ ग्रह नहीं देखते हों और लग्नमें सूर्य अथवा चंद्रमा हो तो उस बालकको शीघ्र ही रोग होता है ।। ३२ ॥ नवमेदे मृत्युयोगः ३३ भानुभानुतनयोशनसास्युश्चेत्प्रसूतिसमये खलयुक्ताः । यद्यपींद्रगुरुणा परिदृष्टा रिपदास्तनुभृतां नवमेऽन्दे ॥ ३३ ॥ जिस वालकके जन्मकालमें सूर्य, शनैश्चर और शुक्र पाप ग्रहों करके युक्त हों और उनको वृहस्पति नहीं देखता हो तो उस बालकको नवमवर्पम रोग होता है ॥ ३३ ॥ . मंशा नवमवर्षे मृत्युयोगः ३४ १ ४ १० कामिनी भवनगस्तु हिमांशुर्लग्नगो मृति- २१ पतिः शनिदृष्टः । रिएदो नवसमाभिरी. रितो जातकज्ञमुनिभिः पुरातनैः ॥ ३४ ॥ जिस मनुष्य जन्मकालमें सातवें चंद्रमा बैठा हो, लग्नमें अष्टमभावपति बैग हो, उसको शनैश्चर देखता हो तो उस वालफको नवमवर्षमें रोग होता है ।। ३४ ॥ दृष्टे रिप्टे नाम दृप्टेऽस्यकाले प्रालेयांशी स्वालयं वा विलग्नम् । वीर्योपेत संगते पापडण्टे शक्त्या युक्त मृत्युकालोऽन्दमध्ये ३५॥

शची (३०१) जातकाभरण। नहीं कहे हुए रिष्टकालमें एक वर्ष में रिट करता है और जिस रिष्ट योगमं सम- यका नियम नहीं कहा है उसमें योग करनेवाले ग्रहोंके बीच जो ग्रह वली हो उसकी राशिमें जब चंद्रमा आवे तब मृत्यु करता है अथवा चंद्रमा जन्म लग्नमें जिस राशिका है उसी राशिम वा लग्नमें फिर अपने चारकरके भावे तब मृत्यु करता है अथवा बलवान पापग्रह देखते हों तब मृत्युको देता है ॥ ३९ ॥ मृत्युयोग:३६ लग्गत्रिकोणांतिमसप्तरंधे चन्द्रे सपापेऽप- चयं प्रयाते । शुमैन युक्ते यदि न प्रदृष्टे रिष्टं भवेदन किमत्र चित्रम् ॥ ३६ ॥ जिस बालकके जन्मकालमें लग्न और पंचम नवम सातवें अंटम चंद्रमा पापग्रहों करके सहित हो तया न शुभग्रह देखते हों और न शुभग्रह युक्त हों तो उसकी मृत्यु हो इसमें क्या आश्चर्य है ॥३६॥ पंचमेन्देि मृत्युयोगः ३७ सूर्यज्ञजीवाः शनिभौमयुक्ताः सूर्यास्मेदाश्च यदीन्दुयुक्ताः । प्रसूतिकाले मिलिता यदि स्युर्नाशः शिशोरव्दकपंचकेन ॥ ३७ ॥ जिस बालकके जन्मकालमें सूर्य, बुध, बृहस्पति चंद्रमा एक भावमें पड़ें ( एको योगः) अथवा शनि, मंगल, शुत्र चन्द्रमा एक भावमें पडें (द्वितीयो योगः) अथवा सूर्य, मंगल शनिश्चर चन्द्रमा एक भावमें बैठे हों तो वह बालक पांच वर्षमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥ विलग्ननाथो भवनप्रमाणैर्विनाशं कुरुते रिपुस्थः । मासेर्टकाणाधिपतिलवेशो दिनैर्मुनींद्राः प्रवदंति सर्वे ।। ३८ ॥ जिस बालकके जन्मकालम लमका स्वामी छछे बैठा हो तो जिस राशिम बैठा हो उस राशिसमान वर्षोंमें मृत्यु करता है और द्रेष्काणका स्वामी छठे बैठा हो तो उतने महीनेमि मृत्यु करता है और नवांगपति छठे घेटा हो तो इतने दिनाम मृत्यु करता है यह सब मुनीश्वरोंनि पहा है ॥ ३८॥ म. सू .

(AA भाषाटीकासहित । षोडशाहे मृत्युयोगः ३८ षोडशाहे मृत्युयोगः ३९ लग्ने शनिः क्रूरनिरीक्षि- तश्चेच्छिशोविनाशं खलु म पोडशाहात् । करोतिमासेन च पापयुक्तः पापविनाशं खलु वत्सरेण ॥ ३९ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग्नमें शनैश्चर बैठा हो और पापग्रह उसे देखते हो तो वह सोलहें दिनमें मरता है और लग्नमें पापग्रह करके युक्त शनैश्चर बैठा हो तो महीने भग्में मर जाता है और पापग्रहों करके युक्त न हो और न पापग्रह देखते हों तो सालभरमें मरता है ॥ ३९॥ खींदुयुक्पाप निरीक्षितो ज्ञश्चैकादशाब्दैः कुरुते विनाशम् । लग्नेऽर्कमन्दावनिजाः कृशेन्दुः स्मरे पडदैरथ सप्तभिर्वा ॥१०॥ सतमान्दे मृत्युयोगः ४० एकादशान्दे मृत्युयोगः४१ जिस वालकके जन्मकालमें सूर्य चन्द्रमा करके युक्त बुध पाप ग्रहों करके दृष्ट हो तो ग्यारहें वर्षमै वह बालक मरता है, जिसके जन्मलग्नमें सूर्य शनैश्चर मंगल बैठे हों और क्षीण चन्द्रमासातवें बैठा हो तो छठे वा सातवें वर्षमें मृत्यु करता है ॥ ४० ॥ पष्ठान्दे मृत्युयोगः। कृशः शशांकः स्मरगो विलने मंदारशुक्रा गुरुहष्टिहीनाः । विनाशनं तेऽब्दकसप्तकेन कुर्वति जातस्य विनिश्चयेन ॥ ११ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षीण चंद्रमा सातवें बैठा हो और' लग्नमें शनि मंगल बैठे हों और शुक्र वृहस्प- तिकी दृष्टिसे हीन हों तो वह वाला सातवें वर्षमें मरता है॥४१॥ च १० ९ शु३ ५ (३०६) जातकाभरण। द्वितीयेऽन्दे मृत्युयोगः। चंद्रः सचांद्रियदि केन्द्रसंस्थः सूर्यांशुलुप्तः कुजमंददृष्टः । वपदयेन प्रकरोति रिष्टं स्पष्टं वशिष्टादय एवमूचुः ॥४२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा बुध केन्द्रमें बैठे हों और सूर्य करके छम हों वह बालक दो वर्षों मरवा है, जो मंगल शनैश्चर देखते हों, यह स्पष्ट वशिष्ठादिक आचार्योंने कहा है ॥ ४२ ॥ वर्षदांते रिटयोगः४३ निशापतिर्लग्नपतेः सकाशाच्चेदष्टमस्थः कृशता प्रयातः । क्रूरैश्च दृष्टश्च शुभैन दृष्टो । वर्पदयांते स करोति रिष्टम् ।। ४३ ।। जिस बालकके जन्मकालमें चंद्रमा लग्नेशसे अष्टम बैठा हो और क्षीण हो और शुभग्रह, नहीं देखते हों और पापग्रह देखते हों; तो वह बालक दो वर्षमें मर जाता है ॥ ४३ ॥ नवमेन्दे मृत्युयोगः। लग्नाधिपः पापखगो नवांश चंद्रस्य च द्वाद- शगः शशांकाव । पापेक्षितो मारयति प्रसूती शिशुं नवाब्दैः खलु कीर्तयंति ॥ ४४ ॥ जिस वालकके जन्मकालमें लमका स्वामी पापग्रह हो और चंद्रमाके नयांशमें बैठा हो और चंद्रमासे बारहें बैठा हो और पापग्रह देखते हों तो वद बालक नवम वर्ष, मरता है ।। १४॥ राशिसमानयमामुपोगा लग्नेश्वरः सूर्यमयूखलुप्तोऽष्टमेश्वरेण प्रविलो- क्यमानः । रिएकरो राशिसमानवपः प्राज्ञे- रुदाहारि नरस्य जन्म ॥१५॥ जिस बालकके जन्मकालमें लगका स्वामी सूर्य पु. परफे न हो और अष्टमेग करके ए हो तो जिम १० ७ ८ म चं श भापाटीफासहित । (३०७) राशिम लग्नेश बैठा हो उस राशिके समान वाम उस बालकको रिष्ट होता है यह पंडितजन मनुष्योंके जन्मकालमें कहते हैं ।। ४५ ॥ सप्तमान्दै मृत्युयोगः। अदृश्यभागे यदि पापखेटा दृश्ये विभागे शुभदा भवंति । स्वर्भानुनामा तनुभाव- गामी जीवत्प्रसृतोऽब्दकसप्तकं हि ॥ १६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह लग्नसे सातवें भाव तक बैठे हों और शुभ ग्रह सातवें भावसे लग्नपर्यंत बैठे हो और लग्नमें राहु वैठा हो तो वह बालक सातवें वर्षमें भरता है ॥ १६ ॥ अय द्वादशाब्दे मृत्युयोगः। द्वादशान्दे मृत्युयोगः। सिंहीसुतः सप्तमभावसंस्थः शनैश्चरादि- त्यनिरीक्षितश्चेत् । नालोकितः सौम्य- खगैस्तु जीवेद्वाणि हि द्वादश यः प्रसूतः ४७ जिस मनुष्यके जन्मकालमें राहु सातवें बैठा हो उसको शनैश्वर और सूर्य देखता हो और शुभग्रह कोई नहीं देखता हो तो वह बालक बारहवें वर्षमें मर जाता है ॥ १७ ॥ समादे मृत्युयोगः४७ सिंहांलिकुंभस्थितसैंहिकेयो विलोकितः क्रूरखगैर्यदि स्यात् । वर्षाणि सप्तैव तदी. यमायुः प्रकीर्तितं जातकशास्त्रविद्रिः ॥ जिस वालकके जन्मकालमें सिंह कुंभ वृश्चिक राशिम राहु बैठा हो और उसको पापग्रह देखते हो तो वह बालक सात वर्पतक जीता है यह जातकपन्योंके जानने- वाले कहते हैं ॥५॥ केतूयः स्यात् प्रथमं ततश्चेन्निर्घातवाताशनयो भवति । यो रौनसाख्यिमुहूर्तजन्मा प्राप्नोति कामं यममंदिरं सः ४९

हो, उसको राहु
गम
(३०८)
जातकाभरणा
जिस मनुष्य के जन्मकालमें धूम्रकेतु तारेका उदय हो और जन्मसे पहिले वा
पीछे निर्धात शब्द हो अथवा प्रचंड वायु चले अथवा वज्रपात हो अथवा जन्म
समयमे रौद्रा सार्प मुहूर्त हो ऐसे समयमें उत्पन्न वालक शीघ्र ही यमलोक जाता है ।
अल्पदिनर्मृत्युयोगः ५०
चद्रं करयुतं क्षीणं पश्येद्राहुर्यदा तदा । दिनैः
स्पल्पतरैलिः कालस्यालयमावजेत् ॥५०॥
मनुष्योंके जन्मकालमें क्षीण चंद्रमा पापग्रहोंकरके युक्त ,
खता हो, वह बालक थोड़े ही दिनमें
यमलोक जाता है ॥ ५० ॥
मातंगे ८ नवभिश्च ९ रामनयने २३ नेत्राश्विभिः २२ साय-
कै ५ रेकेनां १ बुधिभि ४ त्रिलोचनमितै २३ धृत्या १८
व विंश २० न्मितैः । भूने २१ दशभि १० लवैयदि भवे-
न्मेपादिसंस्थो विधुर्वर्भागसमैः करोति निधनं कालोऽय-
मत्रोदितः ॥५१॥
इति श्रीदैवज्ञपण्डितद्वंदिराजविरचिते जातकाभरणे
रिष्टयोगाध्यायः ॥ १५ ॥
जिस मनुष्यका जन्म मेपके आठवें अंशमें और वृपके नवम अंश और मिथुनके
तेईसवे और के वाईसवें सिंहके पाचवें और कन्या पहिले तुलाके चौथे और
वृश्चिक्के २३ धनके १८ मकरके २० कुंभ २१ और मीनराशि दशवें अंगमें
हो वह बालक मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ५१ ॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगौष्ठवंशावतंसराजज्योतिपिकपंडितश्यामलालफतायां
श्यामसुन्दरीमापाटीकाया रिश्वर्णनाध्यायः ॥ १५ ॥

(३०९) भापाटीकासहित । अथारिष्टभंगाध्यायप्रारंभः। १८ 4- १० स म ८ होरागम बहुविस्तरेण रिष्टाख्ययोगा यदपि प्रदिष्टाः । ते रिष्टभंगे यदि नो समर्थाः स रिटभगोऽप्यभिधीयते ततः अब अरिष्टभंग योग कहते हैं-ज्योतिषशाख जाननेवालोंसे बहुत प्रशर करके अरिष्ट योग कहे गये हैं-उन अरिथ्योगोंके भंग करनेमें जो योग समर्थ हों उन अरिष्टभंग योगीको कहते हैं ॥१॥ मरिष्टनाशयोगः भरिष्टनाशयोगः३' पूणें कैविणीपतिर्दिव- चरैः सर्वैः प्रदृष्टस्तदा रिटं हत्यथवा मुहल्लब गतः सद्धीक्षितोऽतिप्रमः क्षीणो वापि निजो- अरिष्टनाशयोगः३ अरिएमाशयोग २ चगः शुभखगैः शुक्रेण च प्रेक्षितो रिष्टं यः समः पागतं स तु हरेसिहो यथा सिंधुरम् ॥२॥ जिस मनुष्यफे जन्मकालमें पूर्ण चन्द्रमाको सम्पूर्ण ग्रह देखते हों वह सब ओरेटोंका नाश करता है (एको योगः) और जो चन्द्रमा मित्रग्रहके नवांशम बेटा हो उसको शुभं ग्रह देखते हो तो भी आरेष्टोंका नाश करता है (दिनीपोयोगः) और जो क्षीण चन्द्रमा भी हो उसको शुभग्रह देखता हो तो भी अरिष्टॉका नाम करता है और अपने उचमें माप्त चन्द्रमाको शुक्र देखता हो तो भी औरष्टका नाश करता है ॥२॥ २८ ७ ब ११ (३१०) जातकाभरण। भरिष्टनाशयोगः३ अरिष्टनाशयोगः३ /२५ (श्चं १० चं रिट निहन्युः शुभदाः शशांकात्पापैविनास्तेऽ- ष्टमशत्रुसंस्थाः । शुभा न्वितःसाधुडकाणवर्तीपीयू पमूर्तिःशमयेत्स रिष्टम्॥३ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चन्द्रमासे सातवें आठवें छठे शुभग्रह बैठे हों तो अरिष्टका भंग करते हैं अथवा शुभग्रहों करके सहित चन्द्रमा शुभग्रहके द्रेष्काणमें बैठा हो तो भी रिष्टयोगोंका भंग करता है ॥ ३ ॥ अरिष्टनाशयोगः४ भरिष्टनाशयोगः शुभग्रहाद्वादशभावसंस्थाः पूर्णः शशी रिष्टहर प्र .. दिष्टः । लग्नेशदृष्टः शु. शुभराशियातो नान्येक्षितो ६ रक्षति रिष्टयोगात ॥१॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभग्रह और पूर्ण चन्द्रमा वारहें बैठे हों तो भी रिष्टयोगको नाश करता है अथवा पूर्ण चन्द्रमा शुभग्रहके द्वादशांशमें बैठा हो. तो भी रिष्टनाश करना है और जो शुभग्रहकी राशिमें चन्द्रमा बैठा हो और उसको लग्नेश देखता हो तो भी रिष्टोंका नाश करता है ॥ ४ ॥ वलक्षपक्षे यदि जन्म रात्री कृष्णेदिवाष्टारिगतोऽपि चन्द्रः । क्रमेण हएः शुभपापखेटेः पितेव वालं परिपालयेत्सः ॥५॥ जिस मनुष्यका जन्म शुक्ल पक्षमें रात्रिके समय हो और कृष्णपक्षमें दिनको हो और क्रमकरके शुभग्रह और पापग्रहों करके चन्द्रमा दृष्ट हो तो वह चन्द्रमा पिताफी तरह बालकको पालता है ॥५॥ १० १० १ १० बुरश १३ ६ श भापाटीकासहित। (३११) भरिटनाशयोगः। स्थितः शशी कूरखगस्य राशौ राशीश्वरेणा- पि विलोकितश्च । तद्वर्गगो वा यदि तेन युक्तः कुर्यादलं मंगलमेव नान्यत् ॥ ६॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा पापग्रहकी राशिमें बैठा हो और गशीश्वर करके दृष्ट हो अथवा राशीश्वर- करके षड्वर्गमें बैठा हो वा राशीश्वर करके युक्त हो तो सब रिष्टोका नाश करके मंगल करता है ।॥ ६ ॥ रिष्टनाशयोगः७ रिटनाशयोगः७ जन्माधिपालो बलवा- निकल स्यात्सौम्यैः सु- हद्भिश्व निरीक्ष्यमाणः । ५ यद्वा तनुस्थः सकलैः प्र- दृष्टो रिष्टं हि चंद्रेण कृतं निहंति ॥ ७॥ जिस मनुष्यके जन्मलनका स्वामी बलवान हो और शुभग्रह अथवा मित्र ग्रह फरके दृष्ट हो (एको योगः ) अथवा लग्नेश लग्नमें बैठा हो और सब नहोकरके दृष्ट हो तो चन्द्रकृत अरिष्टोंका नाश करता है ॥ ७॥ रिटनाशयोगः। स्वोचे स्वभे वा यदि वात्मवर्ग स्थितो हि. तानां च सतां प्रदृष्टः । शुभैर्न पापारियुते- क्षितश्च रिट हरेत्पूर्णकल कलावान् ॥८॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें अपने उच्चमें अयवा अपने राशिमें अथवा अपने पड्वर्ग या मित्रग्रहोंके घरमें चन्द्रमा बैठा हो और निरंतर मित्रग्रहों और शुभ ग्रहों करके दृष्ट हो किन्तु पापग्रह न देखते हों तो वह चन्द्रमा रिष्टोंका नाश करता है ॥ ८ ॥ ३ . ७ ५ जातकाभरण। २।११ ४ ५ ३ ६ ९. ११ रिएभंगयोगः। वाचामधीशो दशमे शशांकाव्यये ज्ञशुक्रौ च खलः किलाये । विलग्नपान्यंबुदृशांत्यलाभे ३ शि११ शुभेक्षितेंदुश्च हरेत्स रिष्टम् ॥९॥ मं१०३ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमासे वृहस्पति दशवें बंटा हो और बारहवें बुध शुक्र वैठे हों और पापग्रह ग्यारहें बेटे और लग्नका स्वामी तीसर वा चौथे वा दशवें या बारहें या ग्यारहें वेटा हो और शुभग्रह चन्द्रमाको देखते हों तो रिटोंका नाश करता है ।। ९॥ अरिष्टनाशयोगः १० प्रसूतिकाले यदि जन्मपालः किलेक्षितो निर्मलखेचरेश्च । बलाधिशाली प्रलयं करोति रिटस्यशीतांशुसमुद्भवश्च ॥ १० ॥ जिस मनुप्यके जन्मपालमें जन्मलग्नका स्वामी पर- वान हो और उसको शुभप्रद देखते हों तो चंद्रपृत रिघोषणा नाश करता है ॥ १० ॥ भवेनिशा जन्मनि पद्मिनीशः पगेचगामी निजवंश्मगो वा। तदंशगो वापि शुभक्षितश्च पूर्णः शशांको निधनं निदंति।।११।। जिग पासपफा गप्रिया जन्म दो धार गृप वा परंगशिगत चन्द्रमा बेटा ते अपवा एप पर के. नवांगमें हो,शुभमहों पये. रट पूर्ण चन्द्रमा हो तो अरिष्ट योगी- फा नारा परता॥११॥ दावेऽग्नि वा गुरुभे शशांक वर्गोत्तमे पूर्णकलाकलापे। विपुष्करे शीतकर दि रिटं प्रकृष्टमयागुलयं प्रयाति ॥ १२॥ निगमाग्न जमा चन्द्रमा पानी गिरा पुष्प नारो अपना वर्गोगनी हो भयरा पर पोगा समारो नागर अग्टिता ना पाता॥१२॥ पादे द्वितीय यदि वा हतीय पुप्यस्य नागधिपनियदि म्यान । या गैहिणीनां चरण द्वितीय नाम्येषितों नमनि मृत्युदोपात १३ १०

४
4.
चं
भाषाटीकासहित।
(३१३)
जिस बालकके जन्मकालमें चन्द्रमा पुष्य नक्षत्रके दूसरे वा तीसरे चरणका
हो अथवा रोहिणी नक्षत्रके द्वितीय चरणका हो और शुभग्रहों करके दृष्ट हो तो
वह चंद्रमा मृत्युदोपसे रक्षा करता है ॥ १३ ॥
रिटईतयोगः १४
रिष्टभंगयोगः१४
कुलीरमेपगश्चंद्रः केंद्रस्था
शुभवीक्षितः । प्रस्तोऽपि ।
रिटभंगाय भवेदन न
संशयः॥१४॥
जिस बालकके जन्मकालमें
कर्क व मेपराशिगत चन्द्रमा केंद्र १ । १।७।१० में बैठा हो और शुभग्रह
देखते हों तो वह वालकके बड़े रिष्टों को दूर करता है ॥ १४ ॥
केन्देषु चेदम्बरमार्गगानां द्वयं यं सौम्यखगो विलग्ने ।
क्षीणोऽपि चद्रः स्मरभावसंस्थः संप्राप्तरिष्टं शमयेदवश्यम् ॥१५॥
इति श्रीदेवज्ञदुढिराजविरचिते जातकाभरणे
चंद्रकृद्रिष्टभंगाध्यायः॥ १६ ॥
जिस बालकके जन्मकालमें केंद्र १।४।७।१० में दो दो ग्रह बैठे हों
और लग्नमें शुभग्रह हों और क्षीण चंद्रमा भी सातवें बैठा हो तो अरिष्टका भंग
करता है॥ १५॥
इति 'श्रीवंशनरेलीस्थराजज्योतिपिकपंडितश्यामलालकृतायां श्यामसुन्दरीभापारीकायां
चंद्रकृद्रिष्टभंगवर्णनाध्यायः॥ १६ ॥
..: अथ सर्वग्रहरिष्टभंगाध्यायप्रारम्भः ।
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मरीचिमालामलकांतिशाली प्रसूतिकाले प्रबलो यदि स्यात् ।
वृहस्पतिमूर्तिगतो निहंति रिटानि नूनं मुनयो वदंति ॥ १॥
जिस बालकके जन्मकालमें निर्मल किरणांबाला प्रकाशवान् वृहस्पति लग्न
बैठा हो तो उस वालफके सम्पूर्ण अरिष्टाका नाश करता है यह मुनीवर
कहते हैं।॥ १॥

जातकाभरण। पापैरवीर्यश्च शुभः सवीर्यः शुभस्य राशौ तनुभावयातं । निरीक्षिते व्योमचरेः शुभाख्यैः संक्षीयते रिटमुपागतं वै ॥२॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रह बलहीन हों और शुभग्रह पूर्ण बली हो और लग्नमें शुभ ग्रहोंकी राशि हो और लग्नको शुभग्रह देखते हों तो सम्पूर्ण रिटयोगोंका नाश होता है ॥ २॥ सौम्यवर्गाश्रिताः पापाः सौम्यवर्गाश्रितः शुभैः । दृष्टा अपि प्रकृष्टं ते रिटं नाशयितुं क्षमाः ॥ ३ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभग्रहोंकी राशिमें पापग्रह बैठे हों और शुभग्रह शुभराशियों में बैठकर उन पापग्रहोंको देखते हों तो अरिष्ट दूर हो जाता है ।। ३ ।। मृत॑स्तु राहुत्रिपडायवर्ती रिटं हरत्येव शुभैः प्रदृष्टः । शीर्पोदयस्थैर्विकृति न यातैरशेपखेटः किल रिष्टमङ्गः ॥४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे छठे और ग्यारहें राहु बैठा हो और उसको शुभ ग्रह देखते हों तो सब रिष्टोंका नाश करता है और जिस मनुष्यके सम्पूर्ण ग्रह ३ । ५। ६ । ७।८। ११ राशियोंमें बैठे हों तो भी रिष्ठोंका नास करते हैं ॥४॥ प्रसूतिकाले विजयाधिशाली शुभो हरेद्रिष्टमपापदृष्टः । कश्चिदहश्चेत्परिवेषगामी क्रूरैः प्रहः किल रिष्टभङ्गः॥५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें शुभग्रह जयको प्राप्त हों और उनको शुभग्रह देखते हों और कोई ग्रह अस्तको भी प्राप्त हो और पापग्रह देखते हों तो भी रिष्टभंग करता है ॥५॥ रजोविहीनं गगनं च खस्थाः स्वस्था भवेयुर्जलदाः सुनीलाः । मंदानिलाश्चेद्विमला मुहूर्ताः प्रसूतिकाले किल रिष्टभङ्गः ॥६॥ जिस बालक जन्मकालमें आकाश साफ हो और ग्रह स्वस्थ हो और मेघ नील वर्णवाले साफ हों, मंद मंद पवन चलती हो और शुभ मुहूर्त हों ऐसे समय में उत्पन्न बालकके सबरिष्ट भंग होते हैं।॥६॥ कुम्भयोनेमुनीनां चेदुद्गमे जननं भवेत् । विलीयते तदा रिएं नूनलाक्षेव वह्निना ॥७॥ जिस वालकके जन्मकालमें अगस्त्यका नारा उदय हो ऐसे समयमें पैदा हो तो रिष्ट नाशको प्राप्त होते हैं जमे अग्नि परके लाव जलता है ॥७॥ m

भाषाटीकासहित ।
वृपजककाख्यविलग्नसंस्थो राहुभवेदिष्टविनाशकर्ता ।
शुभाश्च योगा बहवो यदि स्युस्तथापि रिष्टं विलयं प्रयाति८
जिस बालकके जन्मकालमें मेप वृष कर्क लग्न हो उसमें राहु वैग हो तो
रिष्टनाश करता है और जिसके जन्मकालमें बहुतसे शुभ योग हों तो भी रिष्ट
नाशको माप्त होता है ॥ ८॥
नत्रये लाभरिपुत्रिसंस्थः केतुस्तु हेतुर्निधनोपशांत्यै ।
परस्परं भार्गवजीवसौम्यात्रिकोणगास्तेऽपि हरन्त्यरिटम् ॥९॥
जिस बालकके जन्मकालमें मकर कुंभ मीन राशियोंमें केतु तीसरे वा छठे वा
ग्यारहें बैठा हो तो रिष्ठोंका नाश करता है और जिसके शुक्र वृहस्पति बुध पंचम
नवम बैठे हों तो भी रोगोंका नाश करते हैं ॥ ९ ॥
संध्या भवा वैधृतिपातभद्रागण्डांतयुक्ता अपि जन्मकाले ।
भवंति रिष्टस्य विनाशनार्थ निरंतरा दृश्यदलेऽथ सर्वे ॥१०॥
जिस बालकका जन्म सायं वा प्रातः सन्ध्यामें होया वैधृति व्यतीपातमें हो
अथवा भद्रा गंडांतकालमें जन्म हो और सब ग्रह लनसे लेकर सातवें भावतक बैठे
हो तो सब रिशको नाश करते हैं ॥ १० ॥
न्यायारितुंगेषु गतः पतङ्गो नोपप्लुतो रिएविनाशकर्ता ।
एकगाः पद्विदशायसंस्थाः सर्वेऽपि रिएं शमयति खेटाः
जिस वालकके जन्मकाल में तीसरे छठे ग्यारहें उच्चराशिगत सूर्य बैठा हो और
पापग्रहों फरफे ग्रसित न हो तो रिष्टोंका नाश करता है और जिसके एक राशिमें
छठे तीसरे ग्यारहें सब ग्रह बैठे हों तो रिष्टोंका नाश करते हैं ॥ ११॥
शीतभानोस्तनोर्वापि द्वौत्रयो वाप्यनेकशः।
एकांतस्थास्तदा रिटभंगो भवति निश्चयात् ॥ १२ ॥
जिस वालकके जन्मकालमें चन्द्रमासे वा लग्नसे दो या तीन वा अनेक ग्रह एक
राशिमें बैठे हों तो रिटोका निश्चयकर नाश करते हैं ॥ १२ ॥
पातालयात प्रबलेन्दुदृष्टो निजालयस्थो यदि जन्मकाले ।
देवेंद्रमन्त्री दलयत्यवश्यममङ्गलं रिष्टभवं क्षणेन ॥ १३॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें चतुर्थ भावमें धन वा मीन राशिमें वृहस्पति बैटा हो
उसे बलवान चन्द्रमा देखता हो तो रिष्ठोंका नाश करता है ॥ १३ ॥

जातकाभरण।
लास्थितस्य खेटस्य व्यये वित्त त्रयस्त्रयः।
तत्कालमुद्भवाः खेटा रिटदारणकारिणः ॥ १४॥
जिस बालक्के जन्मकाल्मे लग्नमें कोई ग्रह बैठा हो और दूसरे बारहवें तीन तीन
ग्रह बैठे हों तो उस कालमे पैदा हुआ ग्रह रिटका नाश करता है ॥ १४ ॥
केन्द्रेवापोलिमेष्वेव यदा पणफरेषु च ।
शुभांशस्था ग्रहाः सर्वे रिष्टभंगकराः स्मृताः ॥ १५ ॥
जिस मनुष्य के जन्मकालमें केन्द्र १।४।७।१० वा आपोक्लिम ३ । ६।९
१२ अथवा पणफर २१ ५। ८ । ११ में जो सब ग्रह बैठे हों और शुभ ग्रहके
नवाशमें बैठे हो तो सम्पूर्ण रिष्टोका नाश करते है ॥ १५ ॥
अन्योन्यं हि चतुर्थस्था युग्मभावमुपागताः ।
स्वर्भानुसंयुताः खेटा रिएदोपापहारकाः ॥ १६॥
जिस मनुष्यके जन्मकारमे परस्पर चोये ग्रह युग्मभावमें बैठे हों और राहु करके
सहित हों तो रिष्टोका नाश करते है ॥ १६ ॥
चतुष्टये श्रेष्ठबलाधिशाली शुभो नभोगोऽष्टमगो न कश्चित् ।
विंशन्तिमायुः प्रकरोति नृन दशान्वितं तच्छुभखेटदृष्टः १७
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वलकरके युक्त शुभ ग्रह केन्द्र ११४१७ १० में बैठे
हो और आठवें कोई ग्रह न हो तो वह बालक तीस वर्ष जीता है और पूर्वोक्त
योगकारक ग्रहोंको शुभ ग्रह देखते हा तो चालीस वर्षकी उमर होती है ॥ १७ ॥
निजत्रिभागेऽस्य गृहे गुरुश्चेदायुर्मितिः स्यात्खलु सप्तविंशत् ।
बृहस्पतिस्तुंगगतो विलग्ने भृगोः सुतः केन्द्रगतः शतायुः १८॥
जिस मनुष्य के जन्मकारमें अपने ट्रेकाणमें वृहस्पति बैठा हो तो सत्ताईस
वर्षकी आयु कहना चाहिये और जिसरे वृहस्पति उच्चमे बैठा हो तो और शुरु
केन्द्रमें बैठा हो तो वह सा चर्प जीता है ॥ १८ ॥
लग्ने स्वतु वलशालिनीन्दौ सौम्याःस्वभस्थाः खलु पहिरायुः।
मूलत्रिकोणेषु शुभेषु तुङ्गे लग्ने गुरावायुरशीतिरेव ॥ १९ ॥
जिस बालक जन्मकालमें लग्नमें उनका बल्वान चढमा बैठा हो और
शुभ ग्रह अपनी राशिमें बेठे हों तो साठ वर्षकी आयु कहना चाहिये और जो
शुभग्रह अपने मूल निकोणमें वा उच्चमें बैठे हों तो अस्सी रमकी आयु
पहनी चाहिये ॥ १९ ॥

"1 भापाकासहित । (३१७) लगाएमारीन्दुयुता न चेत्स्युः क्रूराः स्वभस्था यदि खेचरौ द्वौ। १ :बलान्वितावंबरगौ भवेतां जातः शतायुः कथितो मुनीन्द्रः॥२०॥ जिस बालकके जन्मकालमें लग्न और अष्टम छके चंद्रमा न बैठा हो और पाप- ग्रह अपनी राशिम बैठे हों और बलकरके सहित दो ग्रह दशममें बैठे हों तो वह वालक सौ वर्पतक जीता है ॥२०॥ शून्ये रन्ने केंद्रगैः सौम्यखेटेर्लग्ने जीवे नैधनेन्दूदयश्चेत् । नो संदृष्टाः पापखेटैस्तदास्यादायुर्मानं सप्ततिवत्सराणाम्।।२३॥ इति श्रीदेवजहँडिराजविरचिते जातकाभग्णे सर्वग्रह- रिभंगाध्यायः ॥ १७॥ जिस वालकके जन्मकालमें अष्टम स्थानमें कोई ग्रह नहीं हो और शुभग्रह केन्द्र ११४७।१० में बैठे हों और लग्नमें वृहस्पति बैठा हो और अष्टममें पूर्ण चन्द्रमा बैठा हो और लग्नवर्ती बृहस्पतिको कोई पापग्रह नहीं देखते हों तो वह मनुष्य सत्तर वर्पकी आयुको पाता है ॥ २१॥ इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवंशावतंसराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालहतायां श्यामसुन्दरी- भाषादीकायां सर्वमहरतारिष्टमहान्यायः ॥ १७ ॥ अथ सदसदशाविचारणा। राजयोगगृहभावसंभवं रिटयोगजनित व यत्फलम् । तदशाफलगतं यतो भवेत्तेन तत्फलमलं ब्रुवेऽधुना ॥१॥ जो पूर्वमें राजयोग और भावस्थित ग्रहोंका फल अयवा भावोंका फलारिटयोग. अनित फल कहा है सो दशाशलमें होता है सो दशाफल इस कालमें कहते हैं।।१॥ अय देवस्तुतिः। सर्वदेवारदो वरदो वः शारदापि वरदा वदनाब्जे । इंदिरा चखलु मदिरसंस्था प्रस्थिता जलनिधीन्प्रतिकीर्तिः ॥२॥ सब देवताओंफे पूजनीय देव श्रीगणेग आपसे पादान दें और सरस्वती मुखारविन्दमें पास करें और लक्ष्मीजी निश्चयकरके स्थानमें वाम परें और समुद्रपर्यंत कति भयाण यो ॥ २ ॥ .

(३१८)
जातकाभरण।
स्वोच्चे स्वगेहे यदि वा त्रिकोणे वगै स्वकीयेऽथ चतुष्टये वा।
नास्तंगतो नो शुभदृष्टियुक्तो जन्माधिपः स्याच्छुभदःस्वपाके ॥३॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें जन्मपति अपने रञ्चमें या अपनी राशिम हो या
अपने मूलत्रिकोणी हो वा अपने पड्वर्गमें बैठा हो वा केन्द्र १।४।७। १० में
स्थित हो न तो अस्तका हो और न याप ग्रहोंकरके दृष्ट हो तो अपनी दशामें शुभ
फलको देता है ।। ३ ॥
त्रिपष्ठलाभेपु गतेः समस्तैः सौम्यैः सुखार्थाश्च भवंति बाल्ये ।
तत्रैव पापैर्वयसोऽत्यभागे जायार्थपुत्रादिसुखानि सम्यक् ॥४॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें तीसरे छठे ग्यारहें सब पापग्रह बैठे हों और शुभ ग्रह
द्वितीय चतुर्य बैठे हों तो बाल्य अवस्थामें उस पुरुपको सुख देते हैं और पापग्रह
उमरके अंत्यभागमें स्त्री धन पुत्रादिकाके भले प्रकार सुखोंको देते हैं ॥ ४ ॥
तुगे स्वगेहे स्वसुहृद्रहांशे नीचारिभस्थेऽपि च खेचरेन्द्रे ।
मिश्रं फलं स्यात्खलु तस्य पाके होरागमज्ञैः परिकल्पनीयम्॥५॥
जो ग्रह अपने मित्रोंके नवांशोंमें बैठे हों अथवा नवांशोंमें उच्च वा स्वक्षेत्रमें बैठे
हों और भावमें नीच वा शत्रुराशिमें बैठे हों तो वह अपनी दशामें मिश्र फलको देते
हैं यह ज्योतिपशास्त्रवेत्ताओंने कहा है ॥ ५ ॥
वाचां पतिलंगगते स्वतुंगे स्वः दशायत्रिगतश्च सूतौ ।
करोति राज्यं स्वकुलानुमान नानाविधोत्कर्षविशेषयुक्तम् ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें वृहस्पति लग्नमें अपने उच्चमें बैठा हो अथवा अपनी
राशिम हो, दशमें ग्यारहें तसिरे बैठा हो तो वह बृहस्पात अपनी दशामें अपने कुल्फे
समान अनेक प्रकारकी उत्कर्षतासहित राज्य देता है ॥ ६॥
आरोहिणी दशा यस्य खेचरः सत्फलप्रदः।
सत्फलापचयं कुर्यादशा चेदवरोहिणी ॥७॥
जो ग्रह अपनी उच्चराशिसे लेकर आगे पांच राशियोंमें बैठा हो उस ग्रहकी दशा
आरोहिणी कहाती है, वह ग्रहकी दशा श्रेष्ठ फलको देती है और जो ग्रह अपनी
नीचराशिसे लेकर आगेकी पांच राशिम वठा हो उस ग्रहकी दशा अवरोहिणी कहाती
है, वह ग्रहको दशा नेष्ट फलको देती है ॥ ७ ॥

। भापाटीकासहित। (३१९) अथ कर्कराशिगतचन्द्रदशाफलम् । स्त्रीपुत्रमित्रविणोपलब्धि कर्के हिमांशुः कुरुते दशायाम् । जिस मनुष्यके जन्मकालमें कर्कराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह अपनी दशामें स्त्री पुत्र और मित्र धनकी प्राप्ति करता है। अथ भोमराशिगतचन्द्रदशाफलम् । जायापशूनां हनने प्रवृत्तिं करोति पृथ्वीतनुजस्य गेहे ॥८॥ । जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेप वृश्चिक राशिका चन्द्रमा हो वह अपनी दशामें स्त्री और पशुओंके मारनमें प्रवृत्त होता है ॥ ८ ॥ अथ बुधगुरुराशिगतचन्द्रदशाफलम । सच्छास्त्रमित्राधिगमं करोति बुधस्य राशौ गुरुधामसंस्था । जो बुध या वृहस्पतिकी राशिमें चंद्रमा धैठा हो तो श्रेष्ठ शास्त्र और मित्रोंकी मासि अपनी दशामें कराता है । शुक्रराशिगतचंद्रदशाफलम् । नृपप्रसादं विपुलां च लक्ष्मी शुक्रस्य गेहे फलमेतदेव ॥९॥ और जो शुक्रकी राशिमें चंद्रमा हो तो राजाकी कृपासे बहुत धनका लाभ कराता है ।। ९॥ अथ दानिराशिगतचंद्रदशाफलम् । तुपाररश्मिः शनिवेश्मसंस्थः प्रेप्य मनुष्यं कुरुते दशायाम् । अरण्यदुर्गस्थितमाददाति प्रीतिं मरुद्रोगृहनिर्मिती च ॥१०॥ • मित्र चोपचयस्थाने त्रिकोण सप्तमेऽपि वा। पाकेश्वरात्स्थितश्चन्द्रः कुरुते सत्फलां दशाम् ॥ ११॥ इति श्रीदेवज्ञद्वेदिराजविरचिते जातकाभरणे सदसद्दशाविचारणाध्यायः ॥ १८ ॥ जो शनिश्चरकी राशिम चंद्रमा बैठा हो तो वह मनुष्य दूत होता है, धन और फिला-फोटो स्थितिको कराता है, वनवासियोंसे भीति करनेवाला और गी तया मकान बनानेवाला होता है ॥ १० ॥जो चंद्रमा दशाधिपदिमे मित्रोंकी राशिम ३।६।१०१११ स्यानमें अयश ५१९४७ में बैठा ही तो वह अपनी दशा में श्रेष्ठ फलफो देता है ।॥ ११॥ इति श्रीसरेलीयगोदशावतराजरानज्योतिपिपंडितश्यामलालहतायां श्याममुन्दरीभापाटीकायां सदसहगाविचारणाप्यायः॥ २८

(३२.)
जातकाभरण।
अथ रविदशाफलविचारो लिख्यते।
.
भानोर्दशायां हि विदेशवासो भवेत्कदाचिन्ननु मानवानाम् ।
भूवह्निभूपद्विजवयंशस्त्रभैषज्यतोऽतीव धनागमः स्यात् ॥ १ ॥
मंत्राभिचारेऽभिरुचिर्विचित्रा धात्रीपतेः सौख्यविधिविशेषात् ॥
विख्यातकर्माभिरतिर्मतिः स्यादनल्पजल्पे चरणेन चिंता ॥२॥
व्ययश्च दंतोदरनेत्रबाधा कांतासुताभ्यां वियुतश्च चिंता ।
नृपानिचौराहितबंधुवगैः स्वगोवा प्रबलः कलिः स्यात् ||३||
अब सूर्यकी दशाका फल कहते हैं-सूर्यकी दशामें परदेशमें वास निश्चय कर
कभी कभी होता है और धरती, अग्नि, राजा, ब्राह्मण और हवाईसे बहुत धन
प्राप्त होता है ॥ १॥ और मन्त्राभिचारमें विचित्र प्रीति करनेवाला और राजा
करके विशेष मैत्री करनेवाला और प्रसिद्ध कामें प्रीति करनेवाला, बुद्धिमान,
बहुत बोलनेवाला, संग्रामकी चिन्तासहित होता है ॥ २ ॥ खर्च करनेवाला, दांत
और पेट व नेत्रोंमें पीडा सहित, स्त्री पुत्रोंसे वियोगको प्राप्त, चिन्ता सहित, राजा
चोर, शत्रु और बन्धुवर्ग करके और अपने गोती भाइयोंसे प्रबल फलह
होता है ॥ ३॥
अथ परमोच्चगतरविदशाफलम् ।
दशा दिनेशस्य निजोच्चगस्य स्वधर्मकर्माभिरुचिं करोति ।
तातार्जितद्रव्यगृहादिलाभं नानासुखानि प्रमदासुतेभ्यः ॥४॥
जिसके सूर्य अपने उच्चमें बैठा हो तो वह अपनी दुशामें धर्मकर्ममें रुचि कराता
है और पिता करके पैदा किये हुए धन और गृहादिकोंका लाभ कराता है और
अनेक सुख सी पुत्रोंका होता है ॥ ४ ॥
अयोच्चयुतरविदशाफलम् ।
उञ्चच्युतस्यातितरामरिएं कष्टं च रोगान्स्वजनर्विरोधम् ।
खेदेशातीव चतुष्पदानां करोति हानि ननु मानवानाम् ।।५।।
जो उच्चसे पतित हुआ सूर्य हो तो वह अपनी दशा में बहुत गंग और पर
तया अरिहॉफो देता है और अपने जनासे वर फगवे और चौपायोंकी अधिक
हानि कराता है॥५॥

भापाटीकासहित । (३२१) अय वृपराशिस्थितरविदशाफलम् । कांतासुतानां कृषिवाहनानां प्रपीडन स्यानयनाननेषु । हृद्रोगबाधा बहुधा नराणां वृषाधिरूढस्य खेर्दशायाम् ॥ ६॥ जो वृष राशिमें सूर्य बैठा हो तो अपनी दशाम वी और पुत्रोंको पीडा और खेती तथा वाहनोंको पीडा करता है और नेत्र, मुख तया हृदयमें तकलीफ और अनेक तरहके रोगोंकी पीडा होती है ॥ ६ ॥ अथ मिथुनराशिगतरविदशाफलम् । स्थान्मंत्रशास्त्रोत्तमकाव्यकर्ता प्रीतिः पुराणे च भवेन्नराणाम् । कृपिक्रियाधान्यधनैः सुखानि नृयुग्मसंस्थस्य खेर्दशायाम्।।७॥ जो मिथुन राशिमें सूर्य वैठा हो तो अपनी दशामें मंत्रशास्त्र और उत्तमका- व्यमे मीति करावे, पुराणों में प्रीति, खेतीकी क्रिया और अन धन करके सुख करता है ॥ ७॥ अय कर्कराशिगतरविदशाफलम् । ख्यातिपप्रीतिरतीव नित्यं स्त्रीनिर्जितत्वं च महान्प्रकोपः। सुहृनने नूनमनूनपीड़ा कर्काधिरूढस्य खेर्दशायाम् ॥ ८॥ जो फर्फराशिमें सूर्य बैठा हो तो वह प्रसिद्ध, राजासे प्रीतिवाला होता है और खी करके जीता हुआ, वडे क्रोधवाला होता है और मित्रजनोंको बहुत पीडा होती है।॥८॥ अय सिंहराशिगतरविदशाफलम् । दुर्गादरण्ये च कृपिक्रियायां धनान्यनेकानि भवंति नूनम् । स्यात्स्यातिरुचैपगौरवं च कण्ठीरवस्थादशाप्रवेशे ॥९॥ जिसके सिंहरादिगत मूर्य बैठा हो उसकी दशा में किले कोटरो, जंगरसे, रोती करनेसे अनेक धन प्राप्त होते हैं और वह वडा प्रसिद्ध, राजासे गौरवताको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ अय कन्यारादिगतरविदशाफलम् । स्यात्कन्यकानां जननं च भानों देवदिजानामनुपूजनं च । लब्धिः पशूनांच भवेदशायां कन्यागतस्याम्बुजबांधवस्य॥१०॥ जो कन्यागशिम मर्प चैटा हो तो अपनी दगामें कन्या गंतानको पट्टा फग्नेवाला, मानसहित देवताऔर ब्राह्मणोंश पूजन करनेवाला और पशुओंकी प्राप्ति कराता है। २२

(३२२)
जातकाभरण।
अथ तुलाराशिगतरविदशाफलम् ।
क्षेत्रात्मजार्थप्रमदासु पीड़ा चोराग्निभीतिश्च विदेशयानम् ।
नीचत्वमुच्चैः खलु मानवानां तुलाधरस्थस्य खेर्दशायाम्॥११॥
और जो तुलाराशिमें सूर्य वैठा हो तो अपनी दशामें स्थान और पुत्र तथा धन
और स्त्रियोंको पीडा करे और चोर तथा अग्निसे भय करावे और परदेशकी यात्रा
करावे और नीच भावको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
अथ नीचांशयुक्तरविदशाफलम् ।
नीचांशयुक्तस्य वेदशायां सुखेन लाभः परवंचनं च ।
जायानिमित्तोद्यतदुःखलब्धिर्नीचर्भवेत्सख्यविधिनितांतम् १२॥
जो सूर्य परम नीच अंशोंसे निकल गया हो तो अपनी दशामें मुख करके लाभ
और दूसरोंको ठगना तथा धनका लाभ करे और स्त्रीके निमित्तसे दुःख प्राप्त और
नीच पुरुषोंसे मित्रता कराता है ॥ १२ ॥
अथ नीचराशिगताष्टमस्थानरावेदशाफलम् ।
नीचाष्टमस्थस्य रवेर्दशायामुद्विग्नतादोपसमुद्भवः स्यात् ।
पष्ठाश्रितस्य व्रणजन्यपीडा पित्रोश्च वाधा बहुधावगम्या॥१३॥
जो नीचराशिगत सूर्य अष्टमभाव में बैठा हो तो अपनी दशा उद्विग्नताको पैदा
कराता है और नीचराशिगत छठे बैठा हो तो व्रणरोगकी पीडा करावे और पितारी
बहुत प्रकारसे बाधा करता है ॥ १३ ॥
अथ वृश्चिकराशिगतरविदशाफलम् ।
तेजोविशेषाभियुतो नितान्तं विपानिशस्त्रैः परिपीडितश्च ।
पित्राजनन्या गतचित्तशुद्धिः स्यादृश्चिकस्थस्य रखेर्दशायाम्
१४
जो वृश्चिकराशिमें मूर्य बैठा हो तो विशेष तेज करके सहित, विष अग्नि मात्र
करके परिपीडित होता है और माता पितासे चित्त विकारको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
अथ धनराशिगतरविदगाफलम् ।
कलचपुत्रद्रविणादिसौख्यं स्यागौरवं राजकुलाद्विजेभ्यः।
संगीतशास्त्रागमसौख्यमुच्चैश्चापोपयातस्य रवेदशायाम् ॥१५॥
जो धनराशिमें सूर्य वैटा हो तो अपनी दगामें स्त्री, पुत्र और धनका मोत्य
करावे और राजाके कुलसे तया ब्राह्मणोंगे गौरवरी मान फरावे और मंगीवशायमें
भौति फरावे और बडे मुखको प्राप्त होता है ॥ १५ ॥

भापाटीकासहित ।
अथ मकरराशिगतरविदशाफलम् ।
जायात्मजद्रव्यसुखाल्पता स्यादनल्पपीडामयतो नितांतम् ।
भवेत्पराधीनतयातिचिंता नकोपयातस्य रखेर्दशायाम् ॥ १६॥
जो मीनराशिमें सूर्य बैठा हो तो स्त्री, पुत्र और धन व सुखकी कमी
कराता और रोगसे बहुत पीडाको माप्त और पराधीनताकी विशेष चिन्ताको प्रास
होता है ॥ १६ ॥
अथ कुम्भराशिगतरविदशाफलम् ।
हृद्रोगवाधा सुतवित्तकांताचिंताः परान्नादिसुखं न किंचित् ।
शहद्मश्वाप्यतिदीनता स्याद्धटाधिरूढस्य दशाप्रवेशे ॥१७॥
और जो कुम्भराशिमें सूर्य बैठा हो तो अपनी दशामें हृदय रोग और पीडा
करता है और पुत्र धन, स्त्रीकी चिन्ताको प्राप्त, पराये अन्न आदिका सुख नहीं
शत्रुओका भय और अत्यन्त दीनताको प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
अय मीनराशिस्थितरविदशाफलम् ।
स्त्रीवित्तसौख्योपचयः प्रतिष्टा ज्वरादिपीडा व सुतादिकानाम्।
वृथाटनत्वं ननु मानवानां मीने दिनेशस्य दशाप्रवेशे ॥ १८॥
जिसके मीनराशिमें सूर्य बैठा हो तो वह अपनी दशामें स्त्री पुत्र धनके सौख्य-
समूहको प्राप्त बड़ी प्रतिष्ठासहित और पुत्रादिकोंको ज्वरकी पीडा हो तया व्यर्थ
भ्रमण करनेवाला होता है ।॥ १८ ॥
अयोच्चराशिस्थिताष्टमभावस्थितरविदशाफलम् ।
स्वोचस्थितस्याष्टमभावगस्य दशा दिनेशस्य च दोपदा स्यात् ।
पप्ठस्थितस्य नणजातपीडां करोति वाधां च पितुर्जनन्याः ॥१९॥ .
पूर्व भवेत्सूर्यदशाप्रवेशः पित्रोश्च वाधा विविधा तदानीम् ।
लमाद्दशा केशविशेषदाची नक्षत्रनाथस्य देशाविशस्ता ॥२०॥
जो उच्चराशिगत सूर्य अष्टम बैठा हो तो अपनी दगामें दोष करता है और जो
उचराशिगत सूर्य अष्टम बेटा हो तो मणरोगकी पीडा अपनी दशामें फरे और
माता पिताको बाधा करता है ॥ १९ ॥ सूर्यकी दगा मवेशकाठमें माता पिताको
अनेक पीड़ा करती है और लमभावस्थित सूर्पकी दगा विशेष रोगोंको देनेवाली
होती है भार समस्थित चन्द्रमाकी अत्यन्त श्रेष्ठ होती है ॥ २० ॥

(३२४) जातकाभरण। अथ चन्द्रफलानि । आरोहिणी चंद्रदशा नराणां सर्वार्थसिद्धये कथिता विशेषात् । तथावरोहात्कुरुते विलंबं सर्वेषु कार्येषु च बुद्धिमान्धम् ॥ १॥ नक्षत्रनाथस्य दशाप्रवेशे भवेन्नराणां महती प्रतिष्ठा । मंत्रित्वमुच्चैर्नृपतेः प्रसादो भूदेवदेवार्चनताप्रवृत्तिः ॥ २ ॥ सन्मंत्रविद्या विविधा धनाप्ति नाकलाकौशलशालिता च । गंधैस्तिलैश्चापि फलैः प्रसूनैर्वृक्षरलं वा द्रविणोपलब्धिः ॥३॥ ख्यातिः सुकीर्तिविनयाधिकत्वं परोपकाराय मतिर्यशश्च । । इतस्ततः संचलनप्रियत्वं कन्याप्रजासंजननं मृदुश्च ॥ ४ ॥ जलस्य कर्मण्यतिसादरत्वमालस्यनिद्राकुलता क्षमा च । कृष्णादिकर्माभिरुचिःशुचित्वंकफानिलाधिक्यमतीवसत्त्वम् ५ भवेद्विरोधः स्वजनेन नूनं कलिप्रसंगो बहुजल्पता च । चित्तस्थितिर्नैव च साधुकायें सामान्यतः कीर्तितमेतदव ॥६॥ अब चन्द्रमाका फल सामान्यसे कहते हैं-जो चन्द्रमाकी आरोहिणी दशा हो तो सब प्रकारकी सिद्धि विशेषतासे करती है और जो चन्द्रमाकी अवरोहिणी दशा हो तो कार्यसिद्धिमें देर करे और सब कामोंमें मंद बुद्धिको करती है ॥ १॥ चन्द्रमाकी दशाके प्रवेशमें मनुष्य बडी प्रतिष्ठाको प्राप्त राजाको कृपासे बजी- रफी पदवीको प्रात, ब्राह्मण और देवताओंके पूजनमें प्रवृत्ति करता है ॥ २ ॥ श्रेष्ठ मन्त्रविद्या और अनेक प्रकारके धनकी प्राप्ति और अनेक कलाओंमें कुशलताको प्राप्त और सुगन्ध तिल फल पुष्पोंकी वृद्धि और वृक्षों करके पूर्ण धनकी वृद्धिको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ प्रसिद्धता, श्रेष्ठ कीर्ति, नम्रता अधिक, पराये उपकाराम बुद्धि, यशको प्राप्त हो, इधर उधर भ्रमण करनेमें प्रीति, कन्याकी सन्तानको प्राप्त और कोमलता होती है ।। ४ ।। और जलके कामसे बहुत प्रीति और आलस्य तथा निद्रा और व्याकुलता और क्षमाको प्राप्त होता, खेतीके काममें प्रीति, पवित्रतायुक्त, कफ और वातकी अधिकताको प्राप्त, अधिक बलको प्राप्त ॥५॥ और अपने जनोंभे वरको प्राप्त और लडाई करनेवाला, बहुत बोलनेवाला और अच्छे कामोंमें चित्तकी स्थिति नहीं होती यह सामान्य दमासी दशारा भापाटीकासहित। (३२५) अथ मेपराशिगतचन्द्रदशाफलम् । मेपे शशांकस्य दशाप्रवेशे योपात्मजानन्दभरो जनानाम् । विदेशकर्माभिरतिय॑यः स्यात्कायशिरोरुक्सद्दजारिबाधा ॥७॥ जो मेपराशिमें चन्द्रमा हो वो अपनी दशामें मनुष्यको स्त्री और पुत्रोंका आनन्द देता है और परदेशके कामोंमें प्रीति, ज्यादे खर्च करनेवाला, क्रोधसहित, भ्राता और शत्रुओंकी बाधा करता है ।। ७ ॥ अथ वृपराशिगतचन्द्रफलम् । उच्चाधिरूढस्य दशा जडांशोः कुलानुसारं हि ददाति राज्यम् । योपाविभूपात्मजगोतुरंगगजाप्तिसौख्यापचयं जयं च ॥ ८॥ जो पराशिम चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दशामें उस मनुष्यको कुलके समान राज्य देता है और स्त्री और आभूषण और पुत्र, गौ, घोडा, हायी माप्त कराता है और सौख्यसमूह तथा जयको प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अथ मूलत्रिकोणराशिस्थितचन्द्रदशाफलम् । मूलत्रिकोणाश्रितशीतरश्मेदशा विदेशाभिगमं करोति । कृपेःक्रयाद्विक्रयतो धनाप्तिं कफानिलाति स्वजनैर्विरोधम् ९॥ और जो चन्द्रमा वृष राशिके तीन अंगोंसे अधिक अंशाम बैठा हो तो अपनी दशामें परदेशयात्रा करावे, खेती करके क्रय विक्रयसे धनकी माप्ति तया कफ और वातकी पीडा करावे और मित्रोंसे विरोधको कराता है ॥ ९ ॥ अय वृपस्यपूर्वाईपराईगतचन्द्रदशाफलम् । वृपस्य पूर्वाधिगतो हिमांशुः पापान्वितः संजनयेजनन्याः । मृत्युं पराई जनकस्य सौख्यसझंक्षणान्मृत्युसमानरोगम् १०॥ भीर जो पराशिके पन्द्रह अंशके भीतर चंद्रमा पापग्रहयुक्त हो तो माताकी मृत्यु कराता है और जो परांशिक पंद्रह अंशके उपर तीसके भीतर पापग्रदयुक्त चन्द्रमा हो तो पिताको मृत्यु फरे और जो चंद्रमा शुभग्रहयुक्त हो तो माता वा पिताको मृत्युसमान रोग देता है ॥ १० ॥ अग मिथुनराशिगतयंददगाफलम् । द्वंद्वाधिसंस्थेन्टुंदशाप्रवेशे देवद्विजाधिनभोगसंस्थम् । स्थलांत संचलनं किल स्यास्सुखेन सम्यक्ष्मतिवेभवं च ११

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(३२६)
जातकाभरण।
और जो मिथुनराशिमें चन्द्रमा हो तो अपनी दशामें देवता और ब्राह्मणोंका
पूजन धनके भोग सुख कराता है और स्थानांतरमें यात्रा करनेवाला, मुख करके
बुद्धि और वैभवको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
अय कर्कराशिगतचन्द्रदशाफलम् ।
कुलीरसंस्थस्य कलानिधेः स्यात्पाके पशुद्रव्यकृषिप्रवृद्धिः ।
कलाकलापाकलनं च शैले वने रुचिर्गुह्यगदप्रकोपः ।। १२ ॥
जो कर्कराशिमें चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दशामें चौपाये और धन खेतीकी
वृद्धि करावे, कलाओंके समूहकी रचना करनेवाला, पर्वत, और वनोंमें रुचि कर-
नेवाला और गुप्त रोग कराता है ॥ १२ ॥
अय सिंहराशिगतचन्द्रदशाफलम् ।
कण्ठीरवस्थस्य निशाकरस्य पाके नरोऽर्थ लभते च नित्यम् ।
श्रेष्ठां प्रतिष्ठां विकलत्वमंगेऽनंगेऽपि हीनत्वमनुप्रयाति ॥ १३ ॥
जिसके सिंहगशिमें चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दशामें उस मनुष्यको नित्य
ही धन लाभ करावे और श्रेष्ठ प्रतिष्ठाको प्राप्त, शरीरमें विकलतायुक्त और
कामदेवकी हीनताको प्राप्त होता है ॥ १३ ॥
अथ कन्याराशिगतचन्द्रदशाफलम् ।
कन्याश्रितेन्दोश्च दशाप्रवेशे विदेशयानं वनितोपलब्धिः ।
कलाकलापामलबुद्धिवृद्धिः स्वल्पार्थसिद्धिश्च भवनराणाम् १४
जिस मनुष्यके कन्याराशिमें चंद्रमा बैठा हो तो परदेशकी यात्रा और
खोकी प्राप्ति करावे, कलाओंके समूहमें निर्मल बुद्धिकी वृद्धि थोडे धनकी सिद्धि
कराता है ॥ १४ ॥
अथ तुलाराशिगतचंद्रदशाफलम् ।
कलानिधेस्तौलिगतस्य पाके लोलं मनः स्यादनिताविपादः ।
वादश्च कैश्चिद्धनहीनता च प्रोत्साहभंगः खलु नीचसंगः१६॥
जिस मनुष्यके नुलाराशिमें चंद्रमा हो तो अपनी दशामें चञ्चलमन फरावे, सीसे
विपाद फरावे, किसीसे झगडा करावे, धनहीनता हो, उत्साह भंग हो और निश्चय-
कर नीचोंका संग कराता है ।। १५॥
नीचोपयातस्य विधोर्दशायां स्यायाधिवृद्धिहुधा नराणाम्।
वियोजन वै स्वजनेन नूनं गात्राल्पतानल्पविकल्पचिन्ता॥१६॥

भापारीकासहित । जो परमनीची चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दशा में बहुत व्याधिकी वृद्धि मनु- प्योंको करावे और मित्रोंसे वियोग करावे, मानकी हीनता और बहुत चिंताको फराता है ॥ १६ ॥ अथ नीचच्युतचंद्रदशाफलम् । विमुक्तनीचोडपतेर्दशायां भवेदवाप्तिः क्रयविक्रयाभ्याम् । धर्मव्यथाधर्मविधानमल्पमल्पं च सख्यं जनमित्रवर्गः ॥ १७॥ जो परमनीचसे पतित चन्द्रमा वृश्चिकराशिम हो तो अपनी दशामें क्रय और विक्रयसे प्राप्ति कराता है, धर्मकी व्यया, धर्मकी अल्पता और थोडी मित्रताका सौख्य होता है ॥ १७॥ अथ मकरराशिगतचंद्रदशाफलम् । चापोपयातस्य च शीतरश्मेदशाप्रवेशे गजवाजिवृद्धिम् । पूर्वाजितार्थोपहतिनितांतमन्यत्र सौभाग्यसुखानि नूनम् ॥१८॥ और जो धनराशिम चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दशामें हाथी घोडॉकी वृद्धि फरावे और पहिलेका पैदा किया धन नष्ट हो और दूसरे स्थानमें सौभाग्य मुख फराता है ॥ १८॥ अय मकरराशिगतचन्द्रदशाफलम् । हिमकरश्च सदा मकरस्थितः सुतसुखानि धनागमनानि च । वितनुते तनुतामनिलात्तनोरनुदिन गमनागमनानि वै ।। १९ ॥ जो मकरराशिमें चन्द्रमा बेटा हो तो अपनी दशामें पुत्रोंका मुख, धनकी माप्ति फरावे और वातविकारको बढावे और हरएक दिन जाना आना होता है ।॥ १९॥ अप कुम्भराशिगतचन्द्रदशाफलम् । क्रीडा च पीडा व्यसनानि नूनं स्युर्मानवानां तनुता शरीरे । ऋणोपलब्धिश्चलता नितान्त दशाप्रवेशे कलशस्थितेन्दोगा२०॥ जो गुम्भराशिम चन्द्रमा बैठा हो तो अपनी दया कममें पीटा और रोटे प्पानकी माप्ति कराता है और शारीरम दुर्बलता प्राप्त, फर्नकी प्राप्ति और चञ्चलता प्राप्त करता है।॥ २० ॥ भय गोत्तमे कुम्भगमिगनगंदगालम् । वर्गोत्तमस्थस्य घटे दिमाशोर्दशाप्रवेशे बलिभिविरोधः। फलामित्रद्रविणात्मजायेर्भवेद्वियोगो दशनास्यपीडा ॥२७॥ और जो सम्मरामिगत यगोतमी चन्द्रमा हो तो माती दशामें मिली बर-

1
(३२८)
जातकाभरण ।
धान मनुष्यसे वैर करावे, सी और मित्र, धन, संतानका बियोग करावे, दांत और
मुखमें पीडा कराता है ॥ २१ ॥
अथ मीनराशिस्थितचन्द्रदशाफलम् ।
मीनोपयातस्य च शीतभानोर्दशाप्रवेशे हिं जलोद्भवार्थः ।
कलत्रपुत्रादिसुखानि नूनं शत्रुक्षयो बुद्धिविवृद्धिरुचैः ॥२२॥
जो मीनराशिम चद्रमा बैठा हो तो अपनी दशामें जलके सम्बंधसे धनकी
प्राप्ति करावे और स्त्री पुत्रादिकोंका सुख करावे, शत्रुओंका नाश करावे और
बुद्धिकी वडी वृद्धि कराता है ॥ २२ ॥
अथ वर्गोत्तममीनराशिगतचन्द्रदशाफलम् ।
वर्गोत्तमस्थस्य झपे हिमांशोर्दशाप्रवेशे महिषीगजाश्वान् ।
पुत्रादितोपं रिपुनाशमुञ्चर्लभेन्मनुष्यो हि यशोमनीपाम् ॥२३||
जो मीनराशिगत वर्गोत्तमी चन्द्रमा हो तो अपनी दशामें भैंस और हाथी.
घोडोंका सुख, पुत्रादिकोंसे संतोपको प्राप्त और शत्रुओंका नाश करावे और
बडे यशका लाभ कराता है ॥ २३ ॥
अथ व्ययभावस्थितचंद्रदशाफलम् ।
दशाप्रवेशे व्ययभावगेन्दोः पापार्जितद्रव्यसमुद्गमः स्यात् ।
क्षीणे रिपुस्थानगतेहिमांशी सम्यक्फलं प्राग्गदितं तथैव ॥२४॥
जो व्ययभावस्थित चंद्रमा हो तो अपनी दशामें पाप करके धन इकटा करें
और जो क्षीण चन्द्रमा छठे बैठा हो तो भी पहिलेका कहा फल होता है ॥२४॥
अथ नीचराशिगताष्टमभावस्थचन्द्रदशाफलम् ।
नीचस्थितस्याष्टमभावगेन्दोर्दशाप्रवेशे हि गदोद्गमः स्यात् ।
चेत्पापयुक्तो निधनं तदानी जातिच्युति वा लभते मनुष्यः ॥२५॥
जो नीचराशिगत अष्टमभावमें बैठा हो तो अपनी दशामें रोगफी वृद्धि करावे
और जो नीचराशिगत पापमयुक्त चन्द्रमा अष्टममें हो तो मृत्युको देता है अथवा
जातिसे पतित होता है ॥ २५ ॥
अथ भौमदशाफलम् ।
ताराग्रहाः स्वोच्चगृहादिसंस्था वक्रास्तमानानुगता यदि स्युः।
मिश्रं फलं ते निजपाककाले यच्छंति नूनं सुधिया विचित्यम्॥१॥
अब मंगलकी दशाका फल कहते हैं-जो भौमादि पांचतारामह अपने उच्च
वा स्वक्षेत्र वा मूलत्रिकोण वक्रगत वा अस्तंगत हों तो अपनी दशामें मिश्रफलको
देते हैं निश्चयकर इसका विचार बुद्धिमान फरे ॥ १ ॥

भापाटीकासहित। स्यात्पाके क्षितिनन्दनस्य च धनं शघाच धात्रीपते- भैषज्याच्च चतुष्पदादपि तथा नानाविधैरुधमैः । पित्तामृग्ज्वरपीडनं क्षितिपते तिं च नीतिच्युति मूर्छाचंच निजालये कलिरिति प्रोक्तं फलं सूरिभिः॥२॥ मंगलकी दशा में राजासे, हकीमी करनेसे, चौपायोंसे और अनेक प्रकारके उद्यम करनेसे मनुष्यको थनकी प्राप्ति होती है और पित्तकरके रुधिरविकार राजाका भय और नीतिसे भ्रष्ट करता है, मूर्छादिरोग और अपने घरमें कलह कराता है, इतने प्रकारका फल पंडित जनोंने कहा है ॥२॥ मूलत्रिकोणोपगतस्य पाके क्षोणीसुतस्यात्मजदारसौख्यम् । अर्थोपलब्धिः खलु साहसेन रणाणे चारु यशो विशेषात्॥ और जो मंगल मूलत्रिकोणी हो तो अपनी दशामें पुत्र और स्त्रीके सौल्यको प्राप्त और साहस करके धनकी प्राप्ति और संग्राममें सुन्दर यश पाता है ॥ ३ ॥ अथ मेपराशिगतभौमदशाफलम् । मेपोपयातस्य च भूसुतस्य स्युः पाककाले किल मंगलानि । स्यात्संततिः साहसमग्निबाधा नानाविधारातिसमुद्भवः स्यात् जो मेपराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशामें मंगलको करे, सन्तान पैदा होती है और हठ करके अग्निबाधाको प्राप्त और अनेक प्रकारके शव पैदा होते हैं ॥ ४ ॥ अय वृपाशिस्थितभीमदशाफलम् । वृपस्थितस्यावनिनन्दनस्य पाकप्रवेशे पुरुषः सहर्षः । अनल्पजल्पो गुरुदेवभक्तः परोपकारादरतासमेतः ।। ५॥ जो वृपराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशा में पुरुप हर्पको माप्त, बहुत बोल- नेवाला, गुरु और देवताओंकी भक्ति और पराया उपकार करता है ॥4॥ अय मिथुनराशिस्थितभौमदशाफलम् । युग्मस्थितो/तनयस्य पाके प्रवासशीलोऽनिलपित्तकोपः । बहुव्ययः स्यात्स्वजनैर्विरोधो नरः कलाज्ञो नितरां विधिज्ञा॥ जो मिथुनराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशमें परदेश जानेकी इच्छावाला, वातपित्तका कोप, बहुत खर्च करावे, मित्रास विरोध करावे, वह मनुष्य फलाओंका जाननेवाला और नितान्त विधानका जाननेवाला होता है ।। ६ ॥

(३३०). जातकाभरणा अथ कर्कराशिस्थितभौमदशाफलम् । कर्कस्थभौमस्य भवेदशायामुद्यानवह्निप्रभवार्थयुक्तः । नरो हि दारासुतदूरवर्ती केशोपलब्धेबलहीनमूर्तिः ॥ ७॥ जो कर्कराशिमें परमनीचका मंगल बैठा हो तो अपनी दशामें बाग और वन- अग्निसे उत्पन्न धनको प्राप्त, स्त्री और पुत्रोंसे दूर रहनेवाला, क्लेशको प्राप्त और बलहीन होता है ।। ७ ॥ अय नीचांशच्युतभौमदशाफलम् । संत्यक्तनीचांशकुजस्य पाके ख्यातः पुमान्सर्वगुणोपपन्नः । चतुष्पदाढयो बलवानकस्मात्प्रजायते गुह्यरुजाभिभूतः॥८॥ जो कर्क राशिगत मंगल परमनीच अंशोंके बाहर हो तो वह मनुष्य प्रसिद्ध सब गुणोंसहित, चौपायोंकरके युक्त, बलवान और अकस्मात गुह्यरोगसे पीडित होता है ॥ ८॥ अथ सिंहराशिगतभौमदशाफलम् । सिंहाश्रितक्ष्मातनयस्य पाके नून भवेनायकता बहूनाम् । कांतासुताद्यैश्व वियोगता च बाधा तथा हेतिहुताशजाता ॥९॥ जो सिंहराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशा में बहुत मनुष्योंका स्वामी करता है और स्त्री पुत्रों करके वियोगको प्राप्त और शस्त्र तथा अमिकरके पीडित होता अथ कन्याराशिस्थितभीमदशाफलम् । कन्यानुमाताऽवनिनन्दनस्य पाके सदाचारपरो नरः स्यात् । यज्ञक्रियायामपि सादरश्च दारात्मजोवधिनधान्यसोख्यम् १० जो कन्यारागिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशामें आचारमें तत्परताको प्राप्त और यज्ञक्रियाको आदरसे करनेवाला, स्त्री और पुत्र, धन, धान्यके सारयवाला होता है ॥१०॥ अथ तुलाराशिस्थितभीमदशाफलम् । तुलागतेलासुतपाककाले स्याद्र्व्यभार्यावियुतो हि मयः । चतुष्पदाभावकलिप्रसंगहतोत्सवो वे विकलांगयष्टिः ॥ ११ ॥ जो तुलाराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशा में धन और सी फरके रहित और चौपापोंसे हीन और कलहक प्रसंगमें उसाहसे हीन, विकल अंगवाला होता

भापाटीकासहित।
अथ वृश्चिकराशिस्थितभौमदशाफलम् ।
पुमान्भवेदृश्चिकराशिगस्य भौमस्य पाके कृषिकर्मकर्ता ।
स्वसंग्रहे जातमन प्रवृत्तिद्वैपी बहूनामतिजल्पकश्च ॥ १२ ॥
जिसके वृश्चिकाशिमें मंगल बैठा हो वह मनुष्य खेतीका काम करनेवाला और
धनसंग्रह करनेवाला, बहुत जनोंका वैरी और बहुत बोलनेवाला होता है ॥ १२ ॥
अथ धनराशिस्थितभौमदशाफलम् ।
धनुद्धरस्थस्य धरासुतस्य पाकप्रवेशे द्विजदेवभक्तः ।
नरो नरेन्द्राप्तमनोरथः स्यात्कलिप्रसंगोपहतोत्सवश्च ॥१३॥
जो धनराशिम मंगल बैठा हो तो अपनी दशामें देवता और ब्राह्मणोंकी भक्ति
कराता है और राजाकरके मनोरयको प्राप्त और कलहके संगसे उत्तवरहित
होता है ।। १३ ॥
अथ मकरराशिस्थितभौमदशाफलम् ।
वक्रस्य नक्रोपगतस्य पाके राज्योपलब्धिःस्वकुलानुमानात
युद्धे विवादे विजयो नितांतं सदनचामीकरवाजिसौख्यम्१४॥
जो मकरराशिमें मंगल अपने परमोचमें वैटा हो तो अपनी दशामें राज्यकी
मासि अपने कुलके समान करावे, संग्राममें और झगडेमें विजयको प्राप्त हो श्रेष्ठ
रन और सुवर्ण तथा घोडोंका सौख्य देता है ॥ १४ ॥
अयोच्चांशत्यक्तभौमदशाफलम् ।।
उच्चांशमुक्तस्य महीसुतस्य पाके प्रयत्नात्खलु कार्यसिद्धिः ।
शस्त्रान्वेच्छापदतोऽपि भीतिः संतोपजल्पत्वमहाप्रयासाः १५॥
जिसके उसे रहित मंगल सकर रेस हो को अपनी दायें गलसे कार्गको
खिदिको प्राप्त शस्त्रसे वा व्याघ्रादिसे भयको प्राप्त हो, सेतोप हो और विवाद हो
और वडा प्रयास कराता है।॥ १५॥
अब कुम्भराशिस्थितभीमदशाफलम् ।
आचारहीनश्च सुतादिचिंता बहुव्ययोरेगसमाकुलत्वम् ।
कुंभोपयातस्य च मंगलस्य स्यात्पाककाले फलमेतदेव॥१६॥
जो कुम्भराशिमें मंगल बैठा हो तो अपनी दशामें आचारसे रहितः पुत्र पौत्रा-
दिकाफी चिंत्ताको प्राप्त, बहुत खर्च करनेवाला, उद्देगको मास होता है ॥ १६ ॥
अय मीनराशिस्थितभीमदशाफलम् ।
मीनोपयातावनिनंदनस्य दुशाप्रवेशे हि सुतादिचिन्ता ।
व्ययामयत्वं च क्रमोपलब्धिर्विचचिकादविदेशवासाः ॥१७॥

(३३२) जातकाभरण। मीनराशिवर्ती मंगलकी दशा पुत्र और पोतोंकी चिन्ताको प्राप्त, धनका खर्च, रोग, उद्यम करनेसे धनका लाभ, फोडा, फुनसी और दादका रोग व परदेशमें पास कराती है ॥ १७॥ अथ वर्गोत्तमभौमदशाफलम् । संग्रामसंप्राप्तजयाधिशाली बलान्वितोऽत्यंतगुणाभिरामः। वर्गोत्तमांशस्थितभूसुतस्य पाके च नानाविधवस्तुलब्धिः १८॥ जो मंगल वर्गोत्तमी हो तो अपनी दशामें संग्राममें जयको प्राप्त, बलकरके सहित, अत्यंत गुणोंकी सुन्दरताको मास, अनेक वस्तुओंका लाभ कराता है ॥१८॥ अब नीचांशस्थितभौमदशाफलम् । नीचांशसंस्थस्य कुजस्य पाके वृथाटनत्वं मनसो विपादः । फलोन्मुखं कार्यमतीवदूरे नीचत्वमुच्चैर्विगताधिकत्वम् ॥ १९ ॥ जो मंगल नीच नवांशमें बैठा हो तो अपनी दशामें वृथा भ्रमण करावे मनमें विपाद करावे, प्राप्त होनेवाली वस्तु अथवा कार्यासद्धि होनेमें विघ्न पडता है और उच्चतासे रहित अधिकारको नष्ट कराता है ॥ १९ ॥ अथ मूलत्रिकोणराशिस्थितभीमदशाफलम् । मूलत्रिकोणोच्चगृहस्थितस्य कुजस्य कर्माधिगतस्य पाके । राज्योपलब्धिर्विजयो रिपुभ्यः सराहनालंकरणानि नूनम्२०॥ जो मंगल अपने मूलाकोण वा उच्चराशिगत दशमभावमें बैठा हो तो अपनी दशामें राज्यकी प्राप्ति कराता है, शटओसे जयको प्राप्त, श्रेष्ठ सवारी और आभू- पणोंको प्राप्त कराता है ॥२०॥ अथ बुधदशाफलम् । विद्याविवेकप्रभुतासमेतः कृषिक्रियायज्ञविधानचित्तः । महोद्यमावाप्तधनश्व नूनं भवेन्मनुष्यो शशिजस्य पाके ||१।। शिल्पादिकर्मण्यतिकौशलं स्यान्नित्योत्सवोत्कर्पविशप एव । सद्वाद्यगीताभिरुचिर्नवीनसद्भांडभूपागृहनिर्मितत्वम् ॥ २ ॥ कुतूहलैर्भापणहास्यहः कालक्रमत्वं विनयोपलब्धिः । आचार्य विद्वद्गुरुसंमतत्वं कलत्रपुत्रादिसुखोपलब्धिः॥३॥ पीडापि गाढा कफवातपित्तरसंचयोऽर्थस्य च सौम्यपाके । चलावलत्वं प्रविचार्य सर्व शुभाशुभत्वं सुधिया विचिन्त्यम्

भापाटीकासहित ।
(३३३)
अब बुधकी दशाका फल कहते हैं-विद्या, विवेक और प्रभुता करके सहित,
खेतीका काम, यज्ञविधान करनेमें चित्तवाला, बहुत उद्यम करे, धन करके पूर्ण-
ताको कराता है ॥ १॥ शिल्पादिकयोंमें कुशलताकी माप्ति, . हमेशा उत्सवोंकी
माप्ति, श्रेष्ठ वाजा और गीति में रुचि करावे, नवीन श्रेष्ठ वर्तन और आभूषण
मकानोंका बनवाना होता है ॥ २ ॥ कुतुहल, वार्तालाभ और हँसी करके सम-
यको व्यतीत करे, नम्रताको प्राप्त, आचार्य और गुरुसे समानको प्राप्त, स्त्री पुओंके
सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ कफ, वात, पित्त करके पड़ी भारी पीड़ा करावे
और धनसंग्रह नहीं होता है. बुधकी दशामें बलावल विचार कर सम्पूर्ण शुभा-
• शुभ पण्डित जन विचार करके फल कहें ॥ ४ ॥
अथ मेपराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
मेपस्थशीतयुतिशीतपाके नैकत्र संस्थानकरो नरः स्यात् ।
स्तेयानृतयुतशठत्वयुक्तो विमुक्तसौजन्यविधिस्तु निःस्वः ॥५॥
जो मेपराशिमें बुध बैग हो तो अपनी दशामें एक जगह स्थिति नहीं करावे,
चोरी, झूठ, जुआ और शठताको करावे, स्वजनतारहित, धनहीन कराता है ॥ ५ ॥
अथ पराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
पाधिरूढस्य जडाशुसुनोर्दशाप्रवेशे व्ययकृन्मनुष्यः ।
मातुस्त्वनिष्टश्च कलत्रपुत्रमित्रादिचिंता गलरुग्भयातः ॥६॥
वृपराशिगत बुध स्वदशामें मनुष्यको धनका व्यय कराता है, माताको नष्ट
फल कराता है, स्त्रीपुत्रादिकोंकी चिंताको करावे और गलेमें रोग करता है ॥६॥
अथ मिथुनराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
इंद्राधिसंस्थस्य बुधस्य पाके त्वनेकवार्ता बहुजल्पकर्ता।
दारात्मजज्ञातिसुखोपपन्नो नूनं जनन्याश्च सुखेन हीनः॥७॥
जो मिथुनराशिमें बुध बैठा हो तो अपनी दशा अनेक वार्नु फरे, बहुत
वफवाद बके, सौ पुत्र और ज्ञातिके मुखसहित हो और निश्चय कर माताके
सुखसे हीन होता है ॥ ७॥
अय कर्कराशिगतबुधदशाफलम् ।
कळथितस्येंदुसुतस्य पाके विदेशवासाल्पसुखो विरोधी।
मिश्च सत्काव्यकलार्जितार्थोऽत्यर्थे मनुष्यो व्यवसाययुक्तः ८
जो कर्कराशिमें बुध पैदा हो तो अपनी दशामें परदेशका वास करावे, थोडा
मुल और विरोध करावे और श्रेष्ठ काव्यसे धनलाभ करावे और बड़े व्यव-
सायसहित होता है ॥ ८॥

.
(३३४
जातकाभरण।
अथ सिंहराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
सिंहस्थितस्येंदुसुतस्य पाके लोलं भवेद्वैभवमेव धैर्यम् ।
स्वमित्रदारात्मजसौख्यहानिः स्यान्मानवानां मतिहीनता च ९
जो सिंहराशिमें बुध बैठा हो तो अपनी दशामें चञ्चल वैभव और धैर्य होता
है, श्रेष्ठ मित्र और स्त्री पुत्रके सौख्यकी हानि करावे और मतिकी हीनताको
कराता है ॥ ९॥
अथ परमोच्चराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
उच्चाश्रितस्येंदुसुतस्य पाके स्यान्मानवो वै बहुवैभवान्यः ।
लेखक्रियाकाव्यकलानुरक्तो जितारिपक्षश्च सुनीतियुक्तः ॥१०॥
जो बुध अपने परमोच्चमें बैठा हो तो मनुष्यको बहुत वैभवयुक्त कराता है.
लेखकिया और काव्यकी कलामें तत्पर करावे, शत्रुओंको जीते और श्रेष्ठ
नीतियुक्त होता है ॥ १०॥
अथ मूलत्रिकोणांशस्थितबुधदशाफलम् ।
मूलत्रिकोणोपगतस्य पाके विवेकविद्यादिगुणैः प्रपूर्णः ।
विदेशयानानुरतो नरः स्यात्पराक्रमादाप्तधनो विधिज्ञः ॥११॥
जो बुध कन्याराशिगत मूलत्रिकोणी हो तो अपनी दशामें विवेक, विद्या
और अनेक गुणोंकरके पूर्ण होता है, परदेशकी यात्रा करनेवाला, पराक्रमसे धनको
प्राप्त करे और विधिका जाननेवाला होता है ॥ ११ ॥
अथ स्वक्षेत्रे कन्याराशिस्थबुधदशाफलम् ।
तुंगत्रिकोणाक्रमणप्रकर्तुव॒धस्य पाके पशुसौख्यहानिः ।
स्वबंधुवैरं विकलत्वमंगे कलिप्रसंगेऽतिविहीनता स्यात् ॥१२॥
जो बुध कन्याराशिमें स्वक्षेत्रमें हो तो अपनी दशामें पशुओंके सौख्यकी हानि
फरावे, अपने भाईसे वैर फरावे, शरीरमें विकलताको करावे, कलहके प्रसंगसे
हीनताको प्राप्त कराता है ॥ १२ ॥
अथ तुलाराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
तुलागतस्येंदुसुतस्य पाके स्यात्क्षीणता दृङ्मतिवाग्विलासे ।
शिल्पादिकर्मण्यतिनेपुणं च वाणिज्यतोऽर्थःपशुपीडनं च १३
जो तुलाराशिमें बुध बैठा हो तो अपनी दशामें दृष्टिकी क्षीणतासाहित, बुद्धि
और वाग्विलासमें भी क्षीणताको प्राप्त और शिल्पफर्ममें निपुणताको, प्राप्त व्यय
हारसे धनलाभ और पशुकी पीडा देता है ॥ १३ ॥

भोपाटीकासहित ।
अथ वृश्चिकराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
पाके भवेदृश्चिकसंस्थितस्य मृगांकसूनोमनुजोऽल्पतुष्टः ।
आचारकर्मक्रमणानुरक्तो व्ययेन मुक्तः स्वजनैवियुक्तः ॥१॥
जो वृश्चिकराशि बुध वैठा हो तो अपनी दशामें थोडे सन्तोपको प्राप्त, आचार
कर्म करनेमें तत्पर, खर्च करके सहित और अपने जनोंसे रहित होता है ॥ १४ ॥
अथ धनराशिस्थितबुधफलम् ।
शरासनाध्यासनतां गतस्य बुधस्य पाके बहुनायकः स्यात् ।
मन्त्री च नामद्वयतासमेतः कृपिक्रियावित्तयुतो मनुष्यः १६||
जो धनराशिमें बुध बैठा हो तो वह मनुष्य बहुत पुरुपोंका स्वामी होता है और
राजाका मंत्री, दो नामवाला हो, खेतीकी क्रिया और धनसहित होता है ॥ १५ ॥
अथ मकरराशिस्थित धदशाफलम् ।
मृगांकसूनोहि मृगस्थितस्य पाके भवेदारि ऋण नराणाम् ।
बह्वाटनं वै कपटत्त्वमुच्चीचैश्च सख्यं मतिहीनता च ॥१६॥
जो मकरराशिमें बुध बैठा हो तो अपनी दशामें बहुत कर्ज करे, बहुत भ्रमण
करावे और ज्यादा कपट करावे और नीचबुद्धि कराता है ॥ १६ ॥
अय कुम्भराशिस्थितबुधदशाफलम् ।
सौम्यस्य कुंभोपयुतस्य पाके विहीनतेजा मनुजोऽतिनिःस्वः।
मिवादिपीडापरिपीडितात्मा विदेशयानव्यसनानुरक्तः ॥१७॥
जो कुम्भराशिमें बुध बैठा हो तो अपनी दशामें तेजहीन व धनहीन करे,
मित्रों को पीडा करे, परायी आत्माको पीडा दे, परदेशयात्रा करे और व्यसनों में
तत्पर होता है ॥ १७॥
अथ मीनराशिस्थितधदशाफलम् ।
नीचांशसंस्थस्य बुधस्य पाके विवेकसत्योपहितो हि मर्त्यः ।
स्थानांतरस्थो व्यवसायशीलः स्यादल्पलामः कृशकायकांतिः१८
जो बुध मीनराशिगत अपने परमनीचांशमें बैठा हो तो वह मनुष्य विवेक और
सत्परहित और स्थानांतरको प्राप्त, उद्यम करनेमें स्वभाव जिसका, योडे लाभपाला
और दुर्बलं देहवाला होता है ॥ १८ ॥
अय गुरुदशाफलम्।
दशाप्रवेशे त्रिदशार्चितस्य भूपप्रधानाप्तमनोरथः स्यात् ।
सत्कर्मधर्मागमशास्त्रवेत्ता भवेन्मनुष्यः सततं विनीतः॥१॥

(३३६)
जातकाभरणी
यज्ञादिकर्मण्यतिसादरत्वं भवेत्प्रवृत्तिद्विजदेवभक्तौ ।
अत्यर्थमों विभुताविशेपः पुत्रादितोपःपुरुपस्य नूनम् ॥२॥
भूम्यम्बरावादिसुखोपलब्धिर्वलोपपन्नः कुलधुर्यता च ।
गतागतागामिविचारणोचैः सत्संगतिश्चारुमतिधृतिश्च ॥३॥
दाहादिपीडाऽपि गले कदाचिद्विरुद्धभावस्थितितो विचित्यम् ।
सामान्यमेतत्फलमुक्तमार्यैर्वक्ष्येऽधुना यत्प्रतिराशिसूक्तम् ॥४॥
अब बृहस्पतिकी दशाका सामान्य फल कहते हैं-गृहस्पतिकी दशाप्रवेशमें
राजाके मन्त्रीसे मनोरथको प्राप्त, श्रेष्ठ कर्म और धर्मका जाननेवाला, वेद-शासस
वेत्ता, निरन्तर नम्रतासहित होता है ॥ १ ॥ यज्ञादिकामे बहुत आदर पानेवाला
ब्राह्मण देवताओंमें भक्तिकी प्रवृत्ति करनेवाला, वडाईको प्राप्त, धन वैभवकरके
सहित और पुत्रोंसे सुख पानेवाला होता है ॥ २ ॥ धरती, वस्त्र और
घोडोंके सुखको प्राप्त, बलसहित, कुलमें, अग्रगामी, तीनों कालका श्रेष्ठ विचार
फरनेवाला. सत्संग और धैर्यवान होता है ॥ ३ ॥ दाहकी पीडा कभी गलेमें होती
है और अपने घरमें विरोध करनेवाला होता है, यह वृहस्पतिकी दशाका सामान्य
फल आचार्योंने कहा है । अब हरएक राशिस्थित बृहस्पतिका फल कहते हैं ॥४॥
अथ मेपराशिगतगुरुदशाफलम् ।
दशाप्रवेशे विदशार्चितस्य मेपोपयातस्य भवेन्नराणाम् ।
धनं धनेशाबहुनायकत्वं कलत्रपुत्रादिसुखोपलब्धिः ॥ ५ ॥
जो मेपराशिमें वृहस्पति स्थित हो तो उसकी दगाके मवेशम धनको प्राप्त, बहुत
मनुष्योंका स्वामी और स्त्री पुत्रादिकोंके मुखको प्राप्त होता है ॥५॥
वृषोपयातस्य च गीपतेः स्यादशाप्रवेशे पुरुपोऽतिदुःखी ।
विदेशवासी बहुसाहसश्च वित्ताल्पता वित्तगतोत्सवश्च ॥ ६॥
जो परागिमें वृहस्पति हो तो उसकी दशा में मनुष्य अत्यन्त दुःखो माप्त,
परदेशमें वास करनेवाला, वडा साहसी, थोडे धनवाला, धन पर्च करनेवाला और
उत्सवरहित होता है ॥ ६ ॥
अथ मिथुन राशिगतगुरुदमाफलम।
युग्मोपयातस्य वृहस्पतेश्च दशाप्रवेशे पुरुपः शुचिः स्यात् ।
मात्रा च गोत्रप्रभवविरोधी कलत्रवादातिविपादतप्तः ॥ ७ ॥

भापार्टीकासहित । (३३७) जो मिथुनराशिमें बृहस्पति स्थित हो तो मनुष्य पवित्रताको प्राप्त, माता तथा गोत्रके पुरुपोंसे पैरको माप्त और स्त्रीके वाद करके विषादयुक्त होता है ॥७॥ अथ परमोचगतगुरुदशाफलम् । वाचस्पतेरुच्चसमाश्रितस्य स्यात्पाककाले कुलराज्यलब्धिः। विशिष्टनाना प्रथितत्वमुच्चैरुच्चैश्च सख्यं बहुवैभवं च ॥ ८॥ तो अपने परमोच्चांशमें पांच अंशके भीतर कर्कराशिगत बृहस्पति बैठा हो तो अपनी दशामें राज्यकी प्राप्ति कगता है और खितावसहित नामको प्राप्त होता है और बडा नामी, बडे आदमियोंसे मित्रता करनेवाला, बहुवैभवको पात होता है ॥ ८॥ अयोच्चच्युतगुरुदशाफलम् । वाचांपतेरुच्चसमुत्थितस्य पाकप्रवेशे पितृमातृदुःखी । पूर्जितद्रव्यपरिक्षयेण तप्तश्च नानाव्यसनाभिभूतः ।। ९ ।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें बृहस्पति परमोच्चसे रहित उच्चराशिमें बैठा हो वह मनुष्य वृहस्पतिकी दशामें पितामाताके दुःखको प्राप्त, पहिले पैदा हुए धनके नाशसे सन्तापको प्राप्त और अनेक व्यसनों सहित होता है ॥ ९ ॥ अथ सिंहराशिगतगुरुदशाफलम् । सिंहस्थितस्यामरपूजितस्य पाकप्रवेशे धनवान्वदान्यः । नृपाप्तमानो ननु मानवः स्याजायातनूजानुजजातहर्पः ॥ १० ॥ जो सिंहराशिम वृहस्पति बैठा हो तो उसकी दशामें धनवान् और उदार होता है तथा राजाकरके मानको प्राप्त और स्त्री पुत्र भ्राता करके हर्पको प्राप्त होता हैं ॥ १०॥ कन्याराशिगतगुरुदशाफलम्। कन्याधिरूढस्य गुरोर्दशायां भवेन्मनुष्यो नृपमानलब्धः । कांतासुतावाप्तसुखः कदाचिच्छूद्रादिनींचेः कलहप्रसक्तः।। १३ ॥ जो कन्याराशिमें बृहस्पति वैठा हो तो अपनी दुशामें मनुष्यको राजासे मानको मास, स्त्री पुत्रोंसे मुखको प्राप्त, मृद्रादि नीचा करके कटको माष्ठ होता है ॥ ११॥ अथ तुलाराशिगतगुरुदशाफलम् । तुलास्थदम्भोलिभिदिज्यपाके विवेकहीनः प्रमितानभोक्ता' कलबपुत्रकृतशवभावश्चोत्साहहीनो ननु मानवः स्यात् ।। ॥१२॥ २१ . (३३८) जातकाभरण। जो तुलाराशिमें बृहस्पति चैटा हो तो वह मनुष्य विवकरहित, बहुत अन्न खानेवाला, स्त्री पुत्रोंकरके शत्रुभावको प्राप्त और उत्साहरहित होता है ॥ १२ ॥ अथ वृश्चिकराशिगतगुरुदशाफलम् । वृहस्पंतवृश्चिकराशिगस्य दशाप्रवेश मतिमान्समर्थः । प्राज्ञः सुतोत्साहयुतो विनीतोऽनृणी भवेन्ना नियमेन हीनः॥१३॥ जो वृश्चिकराशिमें वृहस्पति बैठा हो तो वह मनुष्य बुद्धिमान, सामर्थ्यवान, चतुर, उत्साहसहित और नम्रता करके युक्त, ऋणसे रहित, नियमसे हीन होता है॥ १३ ॥ अथ मूलत्रिकोणांशराशिगतगुरुदशाफलम् । मूलत्रिकोणांशगतस्य पाके गुरोर्दशायां मतिमान्मनुष्यः । स्यान्मांडलीको यदि वा प्रधानःपित्रान्वितःस्त्रीवचनाऽनुपक्तः।४ जो वृहस्पति धनराशिमें अपने मूलत्रिकोणांशमै बैठा हो तो अपनी दशामें बुद्धि मान करता है, राजा मंडलका स्वामी अथवा वजीर, पिताकरके सहित और स्त्रीके वचनोंमें आसक्त होता है ॥ १४ ॥ अथ स्वक्षेगंशगतगुरुदशाफलम् । नखांशकेभ्यः परतश्च चापे संस्थस्य देवेंद्रगुरोदेशायाम् । कृपिक्रियायज्ञचतुष्पदेषु भवेन्मनुष्यस्य मनःप्रवृत्तिः ॥ १५ ॥ जो बृहस्पति धनगशिम मूलत्रिकोणांशसे रहित अपने स्वक्षेत्रमें बैठा हो तो अपनी दशामें खेतीके काममें और यज्ञकर्मकरके चीपायोंमें मनकी प्रवृत्ति करने वाला होता है ॥ १५॥ अपनीचांशगतगुदगाफलम् । नीचांशसंस्थस्य मृगान्वितस्य गुरोर्दशायां परकर्मकता । मयों भवेजाठरगुह्यरोगी साई वियोगी धनबंधभिश्च ॥ १६॥ जो बृहस्पति मकरराशिम नीचांशगत बैठा हो तो पगये कर्म करनेवाला, पेटमें और गुह्यस्थानमें रोगयुक्त, धन और सम्बन्धियों करके रहित होता है ॥ १६ ॥ अथ नीचांशच्युतगुरुदशाफलम् । वाचस्पते चलवोर्जितस्य पाके निपादाकृपितो धनाप्तिः । भूमीरुहेभ्यो धनवंचनाद्वा शोपलब्धिर्ननु मानवस्य ।। १७ ॥ नीचांशसे पतित मकरराशिगत वृहस्पतिको दशाम निपादकरके खेती करके भाषादीकासहित। (३३९) धनमाप्ति करनेवाला और वृक्षोंकरके, ठगाई करके धन प्राप्त करनेसे क्लेशको प्राप्त करता है।॥ १७॥ अथ कुंपगशिगतगुरुदशाफलम् । पाकप्रवेशे कलशस्थितस्य वाचामधीशस्य नरः कलाज्ञः। विद्याप्रसिद्धयर्थमहामतिःस्यात्कांताविलासानुरतो नितांतम् १८ जो कुभराशिमें बृहस्पति बैठा हो तो अपनी दशामें कलाओंका जाननेवाला और प्रसिद्ध विद्यावाला, बड़ा बुद्धिमान और वीके विलातमें अत्यन्त तत्पर होता है ॥ १८॥ अथ मीनराशिगतगुरुदशाफलम् । झपोपयातस्य च गीष्पतेः स्यादशाप्रवेशे पुरुपो मनीपी। सन्मानसूनुप्रमदादिसंपदाजान्वये यातमहासुखश्च ॥ १९ ॥ जो मीनराशिमें बृहस्पति बैठा हो तो अपनी दशा में श्रेष्ठताको प्राप्त और सन्मान, पुत्र, स्त्री और संपत्ति सहित राजाके वंशम उत्पन्न मनुष्योंसे बड़े सुखो माप्त होता है ।। १९ ॥ अथ भृगुदशाफलम्। दैत्यामात्यः स्वीयपाकप्रवेशे योपाभूपारत्नवस्रोपलब्धिम् । नानामानं मानवानां प्रकुर्यात्कंदपस्याभ्युद्गमामौख्यसुच्चैः ॥ १॥ गीते नृत्येऽत्यंतमंजातहपों विद्याभ्यासप्रीतिकृच्चाहशीलः। बुद्धयाधिक्यश्चान्नदानप्रवृत्तिर्दक्षो मत्यों विक्रये वा क्रये वा ॥२॥ गोवाहनेभ्यो ननु नन्दनेभ्यः सौख्यं भवेनंदननन्दनेभ्यः । पूचार्जितस्य द्रविणस्य लब्धिः कलिः कुलेस्याचलनात्स्यालाच कफानिलाभ्यां किल निर्वलं स्यात्कलेवरं नीचतरैश्च वेरम् । विप्रादिचिंतापरितप्तमेव चित्तं च सख्यं कुजनैः कदाचित् ॥४॥ सामान्यतः प्रोक्तमिदं सितस्य दशाफलं पूर्वमुनिप्रणीतम् । अथोच्यतेऽत्र प्रतिगशिनातं फलं प्रयोज्यं बलतारतम्यात् ॥६॥ अब सामान्यसे शुक्रकी दशाफा फल कहते है:-शुक्र अपनी दशाके मेवेग वो और भूपण तया रल और वोंगी प्राप्ति क्गता है और कामदेवमी दिये बड़ोंके द्वारा सुखकी प्राप्ति करता है ॥ १ ॥ गीत और नृत्यमें बड़े ही प्रामा .

.
(३४०)
जातकाभरण।
विद्या पढ़ने में प्रीति करनेवाला, सुन्दर स्वभावको करता है और बहुत बुद्धिमान,
भनदानमें प्रवृत्ति करनेवाला और चीजोंके क्रय विक्रय करनेमें चतुर होता है ॥२॥
और गायसे, सवारीसे, बेटे, पोतोंसे सुख पाता है और पहिलेके पैदा किये हुए
धनको प्राप्त और कुलमें कलहको प्राप्त और मार्गमें तथा घरमें कलह होता है।॥३॥
और कफ वातकरके निर्बलता होती है और नीचपुरुषोंसे प्रीति हो और
मित्रादिकसि चिंताको माप्त, संतापयुक्त चित्त होता है और कभी कभी दुष्टोसे
मित्रताको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ यह समान्यतः शुक्रका फल बलावल करके पहिले
मुनीश्वरोंने कहा है, अब प्रत्येक राशिस्थित शुक्रकी दशाका फल कहते हैं वह फ्ल
भी शुक्रका बलाबल देख कर कहना चाहिये ॥५॥
अथ मेपराशिगतभूगुदशाफलम।
शुक्रस्य पाके क्रियसंस्थितस्य स्त्रीवित्तसौख्यापचयो नराणाम् ।
सदाटनत्वं व्यसनानि नूनमुद्वेगता चञ्चलचित्तवृत्तिः ॥ ६॥
जो मेपराशिमें शुक्र बैठा हो तो अपनी दशामें स्त्री और धनके सौस्यका नाश,
इमेशा भ्रमण करनेवाला, दुर्व्यसनोंसहित उद्वेगतामहित और चञ्चल चित्तवाला
होता है ।। ६ ॥
अय परागिस्थितभृगुदशाफलम् ।
वृपोपयातोशनसो दशायां कृपिक्रियासत्पशुसौख्यवृद्धिः ।
शास्त्रे मतिः स्यात्सुतरां विचित्रा दातृत्वकन्याजननप्रसादाः ॥
जो पराशिमें शुक्र बैठा हो तो अपनी दशामें खेती तया श्रेष्ठ पशुओं पररे
मौरयकी वृद्धिको मास, शाम्रमें विचित्र बुद्धिवाला, दान करनेमें प्रीति, पन्यारी
संतान पैदा करे और प्रसन्नताको प्राप्त होता है ॥ ७॥
अथ मिथुनरामिगतगुदगाफलम् ।
युग्मगामिभृगुजस्य दशायां मानुपो भवति काव्यकलाज्ञः।
हास्यविस्मयकथारुचिरुचरन्यदेशगमनोत्सुकचित्तः ॥ ८॥
जो मिथुनरागिमें शुक्रवटा हो तो अपनी दगामें मनुष्य काव्ययी पगापा
नाननेवाला और हनीम, विस्मयों, पयामें कचि करनेवाला और पादेश जानेकी
इच्छा करनेवाला होता है ।॥ ८॥
अय पर्फरामिगतभृगुटगाफलम् ।
कोपयातस्य सितस्य पाके भवेन्मनुप्यो निजकार्यदक्षः ।
मार्यान्तराताप्तिसमुत्सुकोऽपि नानाप्रकारोद्यमकृस्कृततः ॥९॥

- . भापाटीकासहित। (३४१) जो कर्कराशिमें शुक्र बैठा हो तो अपनी दशामें अपने काममें चतुरताको माता स्त्रीको प्राप्त, श्रेष्ठ उत्साहको प्राप्त, अनेक तरहके उद्यम करनेवाला और कृतज्ञ होता है ॥ ९॥ अय सिंहराशिगतभृगुदशाफलम् । दैत्येन्द्रवन्धस्य मृगेंद्रगस्य पाकप्रवेश वनिताप्तवित्तः । नूनं भवेदन्यधनोपजीवी पश्चादिपुत्राल्पसुखो मनुष्यः॥ १०॥ जो सिंहराशिम शुक बैठा हो तो अपनी दशामें स्त्री करके धनको प्रास, पराये धनकरके आजीविका करनेवाला और चौपाये आदि तथा पुत्रोंके थोडे सुखको प्राप्त होता है ॥ १०॥ अथ कन्याराशिगतगुदशाफलम् । पाके भवेदानववंदितस्य कन्यास्थितस्यापचयः सुखानाम् । वित्ताल्पता भग्नमनोरथत्वं लोलं मनः स्वस्थलतश्चलत्वम् ११ जो कन्याराशिम शुक बैठा हो तो अपनी दशामें सुखसमूहसहित होता है, धनकी अल्पतासहित और मनोरथ नष्ट, चञ्चलमन और अपने स्थानसे चलने- चाला होता है ॥ ११॥ अथ तुलाराशिगतभृगुदशाफलम् । तुलाधरस्थाऽसुरपूजितस्य दशाप्रवेशे कृपिकृन्मनुष्यः । विशिष्टमानोधनवाहनाढयःस्वजातिसंप्राप्तमहासुखःस्यात् १२॥ जो तुलाराशिमें शुक्र बैठा हो तो उसकी दशामें खेती करनेवाला, श्रेष्ठ मानको माप्त धन वाहनसहित और अपनी ज्ञातिकरके बड़े सुखको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥ अथ वृश्चिकराशिगतगुदशाफलम् । भवेद्भगोवृश्चिकराशिगस्य देशाप्रवेशे पुरुषः प्रवासी । परस्य कार्य निरतः प्रतापी ऋणार्थयुक्तः कलहानुरक्तः॥ १३॥ जो वृश्चिकराशिम शुक्र वैठा हो तो अपनी दशामें परदेशयात्रा करना. पराये कार्यमें तत्पर, बड़ा प्रतापी, कर्ज करके सहित और फलहमें तत्सा कराता है ॥१३॥ अय धनराशिगतभृगुदशाफलम् । चापोपयातासुरपूजितस्य पाके प्रकामं नृपतेः प्रतिष्ठा । कलाकलापाकलन किल स्यात्क्लेशाधिकत्वं द्विपता प्रवृद्धिः १४ (३४२) जातकाभरण। जो धनराशिम शुक्र बैठा हो तो उसकी दशाम कामनासहित होता है, राजासे प्रतिष्ठाको प्राप्त, पलाओंके कलापसहित, क्लेशकी अधिकता सहित और शत्रुताकी वृद्धिसहित होता है।॥ १४ ॥ अथ मकरराशिगतभृगुदशाफलम् । नकस्थशुक्रस्यदशाप्रवेशे स्यात्पूरुपः शत्रुविनाशदक्षः । । श्लेष्मानिलाभ्यां क्विलः कदाचित्कुटुम्बचिंतासहित सहिष्णुः १५ मकरराशिगत शुक्रकी दशामें मनुष्य शत्रुओंके नाश करनेमें चतुर, कफवात होनेसे निर्वल, कभी कभी कुटुम्बकी चिंतासहित और सहनशीलतावाला होता है ॥ १५॥ अथ कुंभराशिगतभृगुदशाफलम् । उशनसः कलशस्थितिकारिणो यदि दशा पुरुपों व्यसनाकुलः । गदयुते वियुतः शुभकर्मणा व्रतहतोऽप्यनृतोक्तिरतो भवत् ॥१६॥ जो कुंभराशिगत शुक्रकी दशा हो तो पुरुप व्यसनों करके व्याकुल, रोगसहित श्रेष्ठ कार्यरहित, व्रतों करके रहित और झूठ बोलनेवाला होता है ॥ १६ ॥ अथ मीनराशिगतभृगुदशाफलम् । दशाप्रवेशे भृगुनन्दनस्य मीनाघिसंस्थस्य नृपप्रधानः। स्यान्मानवोऽत्यंतधनप्रसन्नः कृपिक्रियाभोगभरोपपन्नः ॥१७॥ जो मीनराशिमें शुक्र बैठा हो तो अपनी दशामें राजाका मन्त्री, बहुत प्रसन्नताको प्राप्त और खेतीकी क्रिया आसक्त भोगयुक्त होता है ॥ १७ ॥ अयोचांशगतभूगुदशाफलम् । स्त्रोचांशभाजो भृगुजस्य पाके विलगकमोंपगतस्य मयः। क्षोणीहिरण्योत्तमवारणाद्यैर्यतो भवेढे निजवंशनाथः ॥ १८॥ जो अपने उच्चांझमें शुक्र वैटा हो और लग्न वा दशममें वैटा हो तो अपनी दशामें धरती, सोना और पेड़, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ोंसे संपन्न और अपने वंशाम नाय होता है।॥ १८ ॥ अथ शनिदशाफलम् । भवेदशायां हि शनेश्वरस्व नरः पुरग्रामकृताधिकारः। धीमांश्च दानाधिकृतातिशाली नानाकलाकौशलसंयुतश्च ॥३॥ तुरंगहेमाम्बरकुञ्जरायः संपन्नतां याति विनीततां च । देवद्विजार्चाभिरतो विशेपात्पुरातनस्थानकलब्धसौख्यः॥ २॥ धनसे भाषाटीकासहित। (३२३) देवद्विजेंद्रालयकृत्सुशीलो विशालकीर्तिः स्वकुलावतंतः। आलस्यनिद्राकफवातपित्तजनाङ्गानादब्रुविचचिकातः ॥३॥ सामान्यमेतत्फलमुक्तमत्र शनेर्दशायां गदितं हि पूर्वैः । अथाभिधास्ये प्रतिराशिजाते फलं सुधीभिर्बलतो विचित्यम् अब सामान्यरूपसे शनैश्चरका फल कहते हैं-शनैश्चरकी दशामें मनुष्य नगर और ग्रामके अधिकारको प्राप्त होता है, बुद्धिमान, दानरी अधिक्तासहित, अनेक- कलामें कुशल होता है ॥ १ ॥ घोड़े, सोना, बख, हाथियों करके युक्त, नम्रतास- हित, देवब्राह्मणोंके पूजनमें तत्पर पुराने स्थानोंका सौख्य प्राप्त करनेशला होता है ॥२॥ देवता और ब्राह्मणोंके स्यानांका बनानेवाला, श्रेष्ठशील, बड़ी कीर्तिवाला, अपने कुलमें प्रतापी होता है और आलस्य करके सहित, निद्रायुक्त, कफ, वात पित्तसहित और उसकी स्त्री दाद और फुन्सियोंके रोगसे पीडित होती है ॥३॥ यह सामान्यतः फल शनैश्वरकी दशाका पूर्वाचार्योंने कहा है। अब अगाड़ी हरएक- रागिस्थित शनैश्चरके फलका बलावल के अनुसार विचार करना चाहिये ॥ ४ ॥ अथ भेपराशिगतगनिदशाफलम् । भेषोपयातस्य शनैश्चरस्य दशाप्रवेशे पुरुषो विशेषात् । केशाभिभूतः पतनाप्तदुःखो विचचिकाद्यामयतः कृशांगः ॥५॥ जो मेघराशिमें शनैश्चर बैठा हो तो अपनी दशामें विशेप करके मनुष्य क्लेशों करके सहित और ऊपरसे गिरकर दुःखको प्राप्त और फोड़े फुसीके रोगसे युक्त तथा दुर्बल शरीरवाला होता है ॥ ५॥ अय वृपराशिगतशनिफलम् । वृपोपयातस्य दिनेशसूनोः पाकप्रवेशे मतिमान्मनुष्यः । नरेंद्रसम्मानविराजमानः संग्रामसंप्राप्तयशोविशेषः ॥६॥ जो वृपराशिमें शनैश्चर बैठा हो तो अपनी दशामें मनुष्यको बुद्धिमान करता है और राजा सम्मानसे शोभायमान और युद्धमें यशको प्राप्त विशेष करके होता. अय मिथुनराशिगतशनिदशाफलम् । शनेर्दशायां मिथुनाश्रितस्य नरो भवेच्चारुविलासशीलः । चोरोच्चदारादिजनाद्धनाप्ती रणप्रसंगाचे परोपकारी ॥७॥ जो मिथुनराशि शनैश्चर बैग हो तो उसकी दशा में श्रेष्ट पिलसमें भीलवाला

(३४४)
जातकाभरण।
और चोरोंसे वा स्त्रीसे धनकी माप्ति करनेवाला, संग्रामने वीर और पराया उपकार
करनेवाला होता है ॥ ७॥
अथ कर्कराशिगतशनिदशाफलम् ।
कर्कस्थिताकत्मिजपाककाले लोलं मनः पुत्रकलत्रमित्रैः।
श्रोत्रे च नेत्रे परिपीडनं स्यात्कलेवरं निर्वलतां प्रयाति ॥८॥
जो कर्कराशिमें शनैश्वर बैठा हो तो उसकी दशामें पुत्र स्त्री मित्रोंकरके चञ्चल-
मनवाला और कान, आखोंमें पीडाको प्राप्त और निर्बलताको प्राप्त शरीर होता
है ॥८॥
अथ सिंहराशिगतशनिदशाफलम् ।
पंचाननस्थस्य शनेर्दशायां वाधा भवेदै विविधा नरणाम् ।
दारात्मजायेः कलहप्रसंगस्तुरंगगोदासजनेप्वसौख्यम् ॥ ९ ॥
जो सिंहराशिम शनैश्चर बैठा हो तो उसकी दशामें अनेक तरहफी बापाको
प्राप्त होता है और स्त्री पुत्रादिको फरके फलहको प्राप्त और घोड़े, गी तथा दास-
जनों करके क्लेशको प्राप्त होता है॥९॥
अथ फन्याराशिगतशनिदशाफलम् ।
कन्योपयातस्य शनेर्दशायां भवेत्क्रमेण द्रविणोपलब्धिः।
जलाच भूमीरुहतस्तथोचप्रदेशतश्चापि महाप्रमोदः ॥ १० ॥
जो फ्ल्यागशिमें गनेश्वर वटा हो तो उमरी दमाम प्रामसे धनकी प्रानि पर
नेवाला और जलसे, वृक्षोसे, उसस्थानोंमे और उत्तमदेशसे आनन्दको प्राप्त होता
१॥ १० ॥
अथ तुलाराभिगनानिदनापलम् ।
काले दशायां नलिनीशमृनोस्तुलागतस्योत्तमराज्यलक्ष्मीः ।
-गजाश्चहेमांवररत्नपूर्णा भवेनगणां करुणाधिकत्तम् ॥११॥
जो नुलारातिम वाटा दोनो उसकी दशा में उनम गम्पलक्ष्मीको मामा
हाथी, घोड़े, गोना, गपदा और ग्लॉग्य पूर्ण, अधिक दयावान मनुष्य होता
थप गृश्चिपगगनगनिदाफारम ।
मगरपस्यस्य शनैश्चरस्य पाले नरः मासिकर्मयुक्तः ।
वृथाऽनो वे कृपणोऽनृतश्च नीचानुक्ता दयाविहीनः ॥ १२ ॥

।
भापार्यकासहित ।
(३५५)
जो वृश्चिकराशिमें शनैश्वर बैठा हो तो उसकी दशामें हठकों सहित, व्यर्थ धूम-
नेवाला, कृपण, झूठ बोलनेवाला, नीचोंमें आसक्त और दयारहित होता है ॥१२॥
अथ धनराशिगतशनिदशाफलम् ।
धनुर्धरस्थस्य शनैश्चरस्य पाके नरः स्यात्सचिवो नृपाणाम् ।
संग्रामधीरश्चतुरंप्रियुक्तः कांतासुतानंदविनोदयुक्तः ।। १३ ।।
जो धनराशिमें शनैश्चर बैठा हो तो अपनी दशामें राजाका मंत्री होता है,संग्राममें
धैर्याला, चौपायों सहित, स्त्री और पुत्रोंके आनंद सहित होता है ॥ १३ ॥
अथ मकरराशिगतशनिदशाफलम् ।
शनेर्दशायां मकराश्रितस्य बहुश्रमोत्पन्नधन नराणाम् ।
नपुंसकस्त्रीजनसेवनत्वं विश्वासघातेन धनक्षतिश्च ।।१४।।
जो मकरराशिमें शनैश्वर बैठा हो तो उसकी दशामें बहुत परिश्रम करके धन
पैदा करे, नपुंसक और स्त्रीजनोंकी सेवा करनेवाला, विश्वासघात करके धनकी हानि
करता है ॥ १४॥
अथ कुम्भराशिगतशनिदशाफलम् ।
शनेर्दशायां कलशाश्रितस्य सुखानि नूनं महती प्रतिष्ठा ।
श्रेष्ठत्वमुचः स्वकुले नरस्य कृषिक्रियापुत्रधनादिलब्धिः॥१५॥
जो कुम्भराशिम शनैश्चर बैठा हो तो उसकी दशामें मनुष्य सुख और बडी
प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है और बडोकरके कुलमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है, खेती करके
लाभ, पुत्र और धनकी माप्तिको करता है ॥ १५ ॥
अथ मीनराशिगतशनिदशाफलम् ।
भवेदशायां ननु भानुमुनोर्मीनोपयातस्य च मानवस्य ।
नानापुरमामधनांगनाभ्यः सुखं तथोत्साहविहीनता च ॥३६॥
इति श्रीदेवज्ञडिराजविरचिते जातकाभरणे
दशाफलाध्यायः ॥ १९ ॥
जो मीनराशि दानेश्वर बैठा हो तो उसकी दशामें मनुष्यको अनेक पुर और
माम, धन, स्त्रियोंके सुखको प्राप्त और उत्साहहीन फरता है ॥ १६ ॥
• इति श्रीवंशपरेलीस्थगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मजरानज्योतिपिक-पंडितत्यामलाला-
तायां श्यामसुन्दरीमापाटीपायो दशाफलवर्णनं नामझोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥

(३४६) जातकाभरण। अथ महादशाफलाध्यायः । दशाकाणैश्च तनोः क्रमेण स्यादुत्तमा मध्यतमाधमा च । स्थिरे च का शुभदा चमध्या मिश्रेऽधमा मध्यतमोत्तमा च॥१॥ अब महादशाका फल कहते हैं:-लमकी दशा द्रेष्काण करके श्रेष्ठ मध्यम अधम फलको देती है। जो स्थिर लग्नमें पहिला द्रेष्काण हो तो श्रेष्ठ और मध्यम द्रेष्का- णमें मध्यम और तीसरे द्रेष्काणमें नेष्ट फलको देती हे और द्विस्वभावलग्नमें पहिला द्रेष्काण नेष्ट और दूसरा द्रेष्काण श्रेष्ठ और तीसरा देष्काण मध्यम फल देता है और चरलग्नमें पहिला द्रेष्काण मध्यम और दूसरा देष्काण श्रेष्ठ और तीसरा द्रेष्काण नेष्ट होता है ॥ १॥ शुभानि मध्यानि च निदिनानि फलानि लग्नेशदशोदितानि । तान्येव कल्प्यानि सुधीभिरत्र वलानुमानात्तनुनायकस्य ॥२॥ संशालते यः किल दिग्बलेन खेटः स्वकाष्टां पुरुपं च नीत्वा । महाप्रतिष्ठां कुरुते दशायां नानाधनाभ्यागमनानि नूनम् ॥३॥ पहिले श्रेष्ठ मध्यम अधम ये तीनों प्रकारके फल जो लग्नदशाके कहे हैं सो सब लग्नेगके बलावलं करके कहने चाहिये ॥ २ ॥ जो ग्रह दिग्यलकरके सहित हो वह ग्रह अपनी दशामें बडी भारी प्रतिष्ठा और अनेक तरहका धनलाम कराता है ॥३॥ विलोमगामिग्रहपाककाले स्थानार्थसौख्यान्यतिचंचलानि । प्रवासशीलत्वमतीव जंतोलोंके महत्त्वापचयत्वमेव ॥४॥ ऋजुपयातधुचरस्य के सम्मानसौख्यार्थयशम्प्रवृद्धिः । पष्टाएमद्वादशवर्जितस्य ग्रहस्य पाकेऽभिमतार्थसिद्धिः॥५॥ जो ग्रह वक्रगति हो उसकी दशा में म्यान-धन-सीरय, अति चंचल होता है और पन्देश जानेकी इच्छा करे और मंगामें वटी हानिक प्रात होता है ॥ ४ ॥ और मार्गी ग्रहयो दगामें सम्मान और सौग्य धन यावी वृद्धि होती है व आठ वान्हवे स्थानमे रहित ग्रहयी दशा में इच्छाफलमी प्रानि होती है ॥५॥ नीचारिभस्थस्य च वक्रिणो वा पाके कुकर्माभिरतिर्मनुष्यः । विदेशवासी निजबंधुवर्गस्त्यतो भवेदाग्रहताभियुक्तः ॥६॥ .

भापाटीकासहित ।
(३४७)
स्वर्भानुयुक्तस्य च खेचरस्य दशा वरिष्टाप्यतिरिष्टदा स्यात् ।
पाकावसाने ननु मानवानां दुःखानि हानिश्च विदेशचानम् ॥
जो ग्रह नीचराशिगत शत्रुक्षेत्रमें बैठा हो अथवा वक्री हो उस ग्रहकी दशा
खोटे कर्ममें प्रीति होती है और परदेशमें वास, अपने वन्धुवर्गसे रहित, हठ करके
सहित होता है ।। ६॥ जो राहुयुक्त ग्रह बैग हो तो अपनी दशामें प्रवलरोग देता
है और दशाके अन्तमें दुःख और हानि तया परदेशयात्रा कराता है ॥ ७ ॥
जननराशिजनुस्तनुनाथयो रिपुदशासमये मतिविभ्रमः ।
भयमरेरपि राज्यपरिच्युत्तः खलजनेः कलहो बलहीनता ॥८॥
लग्नेश्वरस्याटमभावगस्य भवेदशायामतिपीडनं हि ।
दशावसानेऽपिच मानवानां भवेत्समाप्तिः खलु जीवितस्य ॥९॥
कुराख्यखेटस्य दशांतराले ऋरग्रहस्यांतरजा दशा चेत् ।
शगमोऽर्थस्य परिक्षयः स्यादायुःक्षयो वति वदेनराणाम् १०॥
जन्मराशि और जन्मलग्नके स्वामीके शवग्रहकी दशा बुद्धिको भ्रम और
शत्रुका भय, राज्यसे पतित होता है, दुष्टजनासे कलह, बलकी हीनता होती है
॥८॥ और जो लमका स्वामी अष्टम भावमें बेटा हो तो उसकी दशाम अत्यन्त
पीड़ा हो और दशाके अन्तमें मनुष्योंके जीवनकी समाप्ति करता है ॥ ९॥ और
पापग्रहफी दशाके वीचमें और पाप ग्रहके अन्तरमं शत्रुकी उत्पत्ति, धनका नाश
और आयुका नाश होता है ॥ १० ॥
दशाप्रवेशेऽपि खगाः सलग्नाः कााः स्फुटास्तत्रं दशापतिश्चेत् ।
लग्नविखायारिंगतोऽथ लग्ने तन्मित्रवर्गः शुभदा दशा सा ॥१॥
श्रेष्टा प्रदिष्ट फलाधिकस्य दुपा दशा कप्टफलाधिकस्य ।
यस्यष्टकरी भवतः समाने फलं विमिश्रं किल तस्य पाके ।। १२॥
दशाप्रवेशे खचरः स्वतुंगे मृलत्रिकोणे यदि वा स्वगेहे।
शुभेष्टवर्गस्थितिकृच्छुभेटे दशारिएहरो भवेत्सः ॥ १३ ॥
इति धादेवादिराजविगचिते जातकाभरणे
महानदाफलाम्पापः ॥ २० ॥

(३४८) जातकाभरण। दशाके प्रवेशकालमें सब ग्रह लग्नसहित स्पष्ट करना और जो दशापति लग्नमें, तीसरे, दशम, ग्यारहें, छठे स्थित हो और दशापतिके मित्रका वर्ग लग्नमें हो वह दशा शुभफलको देती है ॥ ११ ॥ इष्ट फल ज्यादे हो तो उस अहकी दशा श्रेष्ठ होती है और जिस ग्रहका कष्टफल अधिक हो उस ग्रहकी दशा नेष्ट होती है और जिस ग्रहका इष्ट कष्ट दोनों बराबर हों उस ग्रहकी दशामें समानफल कहना चाहिये ॥ १२ ॥ दशाके प्रवेशकालमें जो ग्रह अपने उच्चम वा मूलत्रिकोणमें अथवा अपने क्षेत्रमें वा शुभग्रहके अष्टवर्गमें और मित्रके वर्गम बैठा हो और शुभमित्रोंकरके दृष्ट हो तो उस ग्रहकी दशामें अरिष्टहरण कहना चाहिये ॥ १३ ॥ इति श्रीवंशवरेलीस्थराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकृतायां श्यामसुन्दरीमापाटीकायां महादशाफलवर्णनं नाम विशोऽध्यायः ॥२०॥ अथांतर्दशाफलाध्यायप्रारंभः। अथ प्रवेशे खलु खेचराणामन्तर्दशासूक्ष्मफलप्रसिद्धये । विचारपूर्व सदसत्प्रकल्प्यं फलं सुधीभिर्विधिनोदितेन ॥ ३॥ अंतर्दशा चेदशुभग्रहाणामेकक्षगानां कुरुते संदेव । गदं विवादं रिपुभूपभीति दैन्यं धनस्यापचयं विशेपात्॥२॥ अंतर्दशायां मदनस्थितस्य खेचारिणः स्यान्मरणं गृहिण्याः। रोगः कुभोगः कलहादिभंगः सङ्गश्च निदरण धनस्य ॥३॥ अब अंतर्दशाध्याय कहते हैं:-अब दगाफटके उपरांत सम्मपाल जाननेके लिये अद्दोंकी अन्तर्दशाफा विचार फर अच्छा खरा फल विद्वानोंने कहा है सो यहां कहते हैं ॥ १॥ जो एकगनिमें पापीग्रह बैठे हों और उन्हींफी अन्तर्दशा हो तो दस ग्रहपी. अन्तर्दगामें गेग और झगड़ा, गहभप, दीनता, धनफा नाग विशेष फर होता है ॥२॥ जो ग्रह मातम धैठे हों उनकी अन्तर्दगामें सीका मरण फहना चाहिये और गेग, निधभोग और फरहादि भंग, नीचोंफा मंग आर धनका नाश होता है ॥३॥ खेचारिणामष्टमभावगानामन्तदशा संजनयेदरिटम् । धनस्य नाशं व्यसनानि पुंसां पष्टोपगस्यापि गदप्रवृद्धिम् || भापाटीकासहित । विकोणमेपूरणवेश्मगानामंतर्दशा सौख्यमतीव नित्यम् । करोति लाभ विविध नराणामारोग्यतां मानसमुन्नतिं च ।।५।। जो ग्रह अष्टमभावमें बैठा हो उसकी अंतर्दशामें रोग होता है और धनका नाश, खोटे व्यसन होते हैं और जो ग्रह छठे बैठा हो उसकी अंतर्दशामें रोगकी वृद्धि होती हैं ॥४॥ और पंचम, नवम, दशम भावमें जो ग्रह बैठा हो उसकी अंतर्दशामें अत्यंत सौख्य और अनेक प्रकारके लाभ आरोग्य मानकी उन्नति अथ सूर्यमहादशामध्ये चंद्रांतर्दशाफलम् । करोति चंद्रस्तरणर्दशायां सुवर्णभूपांवरविद्रुमाप्तिम् । समुन्नति मानसुखाभिवृद्धि विरोधिवर्गापचयं जयं च ॥ १ ॥ पङ्केरुहेशस्य चरन्विपाके कुर्यान्मृगांको यदि लाभमुच्चैः । प्रमादमद्भयो ग्रहणी च पाण्डं केपांचिदेतन्मतमत्र चोक्तम्॥२॥ जो सूर्यकी महादशामें चंद्रमाका अंतर हो तो वह मनुष्य सोना और आभूषण मूंगाकी प्राप्तिसहित, ऊँचे मानकी उन्नति अर्थात् बड़े अधिकारको प्राप्त. मुखकी वृद्धिसहित, शत्रुवाँसे जयको प्राप्त होता है ॥ १॥ सूर्यकी दशामें चंद्रमा अंतरमें पड़े तो लाभको प्राप्त होता है और जलके प्रमादसे संग्रहणीरोग और पांडुरोगकी पीड़ा होती है । जो क्षीण चंद्रमा हो तो ऐसा फल जानना चाहिये यह किसी किसी आचर्यका मत्त है ॥ २ ॥ अथ सूर्यमहादशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् । सत्प्रवालकलधौतसुचेलं मङ्गलानि विजयं च विधत्ते । मङ्गलः कमलिनीशदशायां भूमिपालकुलतः किल पुंसः॥३॥ . सूर्यमहादशा में जब मंगलका अंतर होता है तो मनुष्यको मूंगा और सोना श्रेष्ठ वस, अनेक मंगल विजयकी प्राप्ति और रानाके कुलमें मान होता है ॥ ३ ॥ अथ सूर्पदशामध्ये बुधांतर्दशाफलम् । विचिकाइविकारपूर्वः पामामयदेहनिपीडनं स्यात् । धनव्ययश्चापि हतोत्सवश्च विधोः सुते भानुदशांप्रयाते ॥२॥ जो मूर्यकी दशामें बुधका अंतर हो तो खुनलीका विकार, दाद और कंटुरोगसे पीडाको माप्त होता है और धनका पर्च व उत्साह नागको प्राप्त होता है।

(३५०) जातकाभरण। अथ सूर्यमहादशामध्ये गुरोरंतर्दशाफलम् । सदस्रधान्यादिषु संग्रहेच्छा स्वच्छा मतिविप्रसुराचनेषु । भूपाप्तिसम्मानधनानि नूनं भानोर्दशायां चरतींद्रवन्ये ॥ ९॥ जो सूर्यकी दशामें वृहस्पतिकी अंतर्दशा हो तो श्रेष्ठ वस्त्र और अन्नादिकोंके संग्रहको करनेकी इच्छा करे और ब्राह्मण देवताओंके पूजनमें श्रेष्ठ बुद्धि करे आभूषणों को प्राप्त, सन्मान और धनको प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ अथ सूर्यमहादशामध्ये भगोरंतर्दशाफलम् । विदेशयानं कलहाकुलत्वं शूलं च मौलिस्थलकर्णपीडाम् । गाढज्वरं चापि करोति नित्ये दैत्यार्चितो भानुदशां प्रयातः६॥ जो सूर्यकी महादशा में शुक्रका अंतर हो तो परदेशयात्रा, लड़ाई करके व्याकुल और शिर तथा कानमें पीडा और बड़ा भारी ज्वरका रोग होता है ।। ६ ।। अथ सूर्यदशामध्ये अनेरन्तर्दशाफलम् । नीचारिभूमीपतिभीतिरुचैः कण्डूयनाद्यामयसर्भवः स्यात् । मित्राण्यमित्राणि भवंति नृनं शनैश्चरे भानुदशांतरस्थे ॥७॥ जो मूर्यकी दशामें शनैश्वरका अंतर हो तो नीचजनोंसे रै फरावे, राजासे बड़ा भय करावे और कण्डआदि रोग पैदा हों और भित्र निश्चय कर गट हो जाते हैं।७।। अथ चंद्रदशामध्ये वेरंतर्दशाफलम। नरेश्वरागौरवमर्थलाभं क्षयामयाति प्रकृतर्विकारम् । चोरामिवैरिप्रभवां च भीति शीतांशुपाके कुरुते दिनेशः॥१॥ जो चंद्रमाको दशामें मर्यका अंतर हो तो राजा करके गौरव और पनका लाभ हो और क्षयरोग करके पीडित, चिन भ्रम और चोर, अनि तथा गट ओंका भय होता है ॥१॥ अथ चंद्रशामध्ये भामांतर्दशाफलम् । कोशभ्रंशं रक्तपित्तादिदोपं गेपोत्पत्ति स्थानतः प्रच्युतिं च । कुर्यात्पीडां मातृपित्रादिवगभूमीसृनुर्यामिनीनाथपाके ॥२॥ जो चन्द्रमाको दशामें मंगलका अन्तर हो नो इपटे किये हुए धनका नाम, निः पित्तादिरोगोंको मान, स्थानगे पनिन और मानापिनाके कुल्फे मनुप्पांग पीटा होती है ॥२॥.

भापाटीकासहित (२५१) अथ चन्द्रदशामध्ये वुधांतर्दशाफलम् । उदारनामांतरलब्धमुच्चैर्ललामगोभूमिगजाश्ववृद्धिम् । विद्याधनैश्वर्यसमुन्नतत्वं कुर्याद्बुधश्चंद्रदशांतराले ॥३॥ जो चन्द्रमाकी दशामें चुधका अन्तर हो तो उदारताकरके विशेरपरको प्राप्त, ध्वजा, गौ, छत्र, धरती, हाथी एवं घोड़ॉफी वृद्धिको प्राप्त विद्या धन ऐश्वर्यकी उन्नतिको प्राप्त होता है ।। ३ ।। अब चन्द्र-शामध्ये गुगेरंतर्दशाफलम् । विशिष्टधर्मो धनधान्यभोगानन्दाभिवृद्धिगजवाजिसंपत् । पुत्रोत्सवश्चापि भवेन्नराणां गुरौ सुगणां शशिकांस्थ॥ जो चन्द्रमाकी दशामें बृहस्पतिका अन्तर हो तो श्रेष्ठधर्म और धन अन्न वा भोगोंकी वृद्धि करता है और हाथी घोड़ोंकी संपदाको प्राप्त और पत्रोत्म करके सहित होता है॥४॥ अथ चन्द्रदशामध्ये शुक्रांतईशाफलम नानाङ्गनाकेलिविलासशीलो जलोद्भवेर्धान्यधनैश्च युकः । मुक्ताफलायाभरणैरपि स्यादिन्दोर्दशायां हि सिने मनुष्यः५ जो चन्द्रमाकी दशामें शुक्रका अन्तर हो तो अनेक स्त्रियों के साय विलास करनेमें शील हो और जलसे पैदा पदार्थ धन करके सहित, मोती ओर आभू- पणोंको प्राप्त होता है ॥५॥ अय चन्द्रदशामध्ये शनेरंत शाफलम् । नरेंद्रचौराहितवह्निभीति कलत्रपुत्रासुखरुक्प्रवृद्धिम् । करोति नानाव्यसनानि न शनिर्निशानाथदशां प्रविष्टः॥६॥ जो चन्द्रमाकी दशामें शनैश्चरका अन्तर हो तो राजा और चोर, शत्रु, अग्निका भय होता है और स्त्री पुत्रोंका दुःख और रोग करके सहित अनेक तरह दुर्व्यसनोंको माप्त होता है ॥ ६ ॥ अय भीमदशामध्ये स्पतिर्दयाफलम् । नानाधनाभ्यागमनानि नून सम्मानवृद्धि मनुजाधिराजात् । चण्डत्वमाजी विजय विध्यागानुर्धरासूनुदशांतरस्थः॥१॥ दुर्गशेलवनसंचलनेच्छा बंधुतातजनितातिावरोधः । मानवो भवति भूतनयान्तर्भास्कर चरति केपि वदंति ॥२॥ जो मंगली दगामें सर्यका अन्तर हो तो अनेक तरहके धनोंका मानिसमा सम्मानकी वृद्धि होती है और रणमें बड़ा बल तथा उपको प्राप्त होता है " जातकाभरण। किसी किसी अचार्यका ऐसा भी मत है कि मंगलकी दशामें सूर्यके अन्तरमें किला-कोट पर्वत वनमें जानेकी इच्छा करे और भ्राता, पिता और मनुष्योंसे विरोध करता है ॥२॥ अय भौमदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफलम् । नित्योत्सवानन्दमहापदानि मुक्ताफलद्रव्यविभूषणानि । मित्रोद्गमं श्लेष्मविकारमिंदु मस्य पाके विचरन्करोति ॥३॥ जो मंगलकी दशामें चन्द्रमाका अन्तर हो तो नित्य उत्सव और आनन्द, बड़े पदको प्राप्त, मोती और द्रव्य आभूषणोंको प्राप्त हो और मित्रोंकी प्राप्ति और कफका विकार होता है ॥ ३ ॥ अथ भौमदशामध्ये बुधान्तर्दशाफलम् । अरातिभूपामयतस्करेभ्यः पीडां वियोग सुतदारमित्रैः। स्वल्पोत्सवो यच्छति चन्द्रसूनु मस्य पाके यदि संप्रविष्टः॥४॥ जो मंगलकी दशामें बुधका अन्तर हो तो शत्रुसे, राजासे, रोगसे और चोरमे पीडा और पुत्र, स्त्री तथा मित्रांकरके वियोग, थोड़ा उत्सव होता है ॥ ४ ॥ अथ भौमदशामध्ये गुरोरंतर्दशाफलम् । कलाधिकत्वं नृपतेर्धनाप्ति कलत्रमित्रात्मजवाहसौख्यम् । सत्कर्मधर्मानुरतत्वमुच्चैर्वृहस्पति मदशां प्रविष्टः ॥ ५॥ जो मंगलकी दशामें वृहस्पतिका अन्तर हो तो वलकी अधिकता, राजा काके धनप्राप्ति, सी और मित्र तया पुत्र और वाहनका सौख्य, श्रेष्ठकर्म और धर्ममें तत्पर होता है ॥५॥ . अयभीमदशामध्ये भृगोरंतर्दशाफलम् । विदेशयानव्यसनामयायेः कुटुंबवाहंद्रविणव्ययश्च । नानाप्रवासेश्चलचित्तवृत्ति मान्तरे दानवराजपूज्ये ॥६॥ जो मंगलफी दगामें शुक्रका अन्तर हो तो परदेशको यात्रा, अनेक व्यसन और रोगोंफरके पीडित, कुटुंबियोंसे झगड़ा, धनका खर्च और अनेक देशों में चित्ती वृत्ति चलायमान होती है ॥ ६ ॥ अय भीमदयामध्ये शानदगाफलम् । कलत्रपुत्रात्मजनेषु वाधा प्राणप्रयाणांतशरीरपीडा। स्वस्थानयानं यदि भानुमनोरंतर्दशा भीमदशांतराले ॥ ७ ॥ जो मंगलफी दगामें दानेश्वरका अन्तर हो तो सी. पुत्र, मित्र जनोंकी पाया. मृत्युतुल्य देहफो पीडा और अपने स्थानमें यात्रा कगता है ॥ ७ ॥ .

भापाटीकासहित।
अथ बुधांतर्दशामध्ये खेरंतर्दशाफलम् ।":
1. तुरंगहेम्नां च सुविद्यमाणां सदवराणामपि वारणानाम् ।
भवेदवाप्तिबहुवैभवानां सौम्यस्य पाके तपने प्रपन्ने ॥ ३॥
स्वस्थानतः संचलनं कदाचिद्गदप्रकोपात्मजजन्मवित्तम् ।
धर्म प्रवृत्तिं कुरुते ज्ञपाके पङ्केरुहेशः प्रवदंति केचित् ॥ २ ॥
जो बुधकी दशा में सूर्यका अंतर हो तो घोडा, सोना, मृगा, श्रेष्टवस्त्र आरै हाथि:
योंकी प्राप्ति कराता है और बहुत वैभवसहित होता है ॥१॥ कोई ऐसा भी कहते हैं
कि अपने स्थानसे यात्रा हो, रोग हो, पुत्रका जन्म हो और धनका लाभ तथा.
धर्ममें मवृत्ति होती है ॥ २॥
अथ बुघदशामध्ये चन्द्रांतर्दशाफलम् ।
पामादिनानामयसंभवः स्यान्मृतप्रजानां जननं विवाहः ।
पित्तप्रकोपः खलु यानपीडा यदा जडांशुदिशां प्रपन्नः ॥ ३॥
जो बुधकी दशामें चन्द्रमाका अंतर हो तो कंडू आदि अनेक रोगोंको पैदा करे,
संतानकी मृत्यु हो और झगडा हो, पित्तका प्रकोप हो व यात्रा में पीडा होती है।३॥
अथ बुधदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् ।
गुह्यामयार्थव्यसने युतः स्यात्कांतासुतप्रीतिविमुक्तचित्तः ।
विलुप्तधर्मो मनुज प्रविष्टे बुधस्य मध्ये वसुधातनूजे ॥४॥
जो बुधकी दशामें मंगलका अंतर हो तो गुह्यस्यानमें रोग हो, व्यसना करके
सहित, स्त्री पुत्रसे प्रीतिरहित चित्त और धर्मका लोप होता है ॥४॥
अथ बुधशामध्ये गुरोरंतर्दशाफलम् ।
कांतासुतानंदयुतोऽरिहन्ता सत्कर्मकृञ्चारुमतिविनीतः ।
मंत्री नरःस्यापितमातृदुःखी वृहस्पती सौम्यदशां प्रयाता॥५॥
जो बुधफी दशामें वृहस्पतिका अन्तर हो तो स्त्री और पुत्रोंसहित आनंदको
प्राप्त, गनुओंका नाश करे, श्रेष्टफर्म करे, मुन्दर बुद्धि, नम्रतासहित, राजाका मंत्री
हो और पितामातासे दुखी होता है।॥५॥
अय सुपदशामध्ये भृगोरंतर्दशाफलम् ।
विबुधसाधुजनातिथिसादरः सुकृतकर्मसमुत्सुकमानसः ।
विविधवस्त्रविभूपणभाड्नरो बुधदशांतरगे सति भार्गवे ॥६॥

(३५४) . जातकाभरण। नानाप्रयासैश्च निरोधनैर्वा शिरोरुजा वापि शरीरभाजाम् । करोति वाघां विबुधांतराले सितः प्रयातः प्रवदंति केचित् ॥ ७ ॥ जो बुधकी दशा शुक्रका अंतर हो तो अनेक. साधुजन और अतिथियोंवा आदर करे, श्रेष्ट कार्यों में उत्साही हो, अनेक वख और आभूषणोंको भोगता है ॥६॥ कोई ऐसा भी कहते हैं-अनेक आयास फरनेसे और वेगको रोकनेसे, मस्त- फपीटा और अनेक प्रकारको मारीरिक पीटा होती है ॥ ७॥ अथ सुपदयामध्ये गनेरंतर्दशामलम् । सत्कर्मधर्मद्रविणानुकंपा कंदर्पहीनो मनुजः प्रलापी। वातामयातोऽतिमृदुस्वभावः सौम्यांतराले नलिनीशसनी ॥८॥ जो सुधफी दगामें शनिश्चरफा अंतर हो तो श्रेप्टएर्म और धर्म, धन और इस पर गहत, पामदेवारफे दर्शन, प्रलाप फरनेवाला, पातरोगपरफे. पीडित और अत्यंत कोमल स्वभाव होता है॥ ८॥ अप गुरुदनामध्ये यंतशालम् । सुतीर्थनानाविधवस्तुलाभ विशिष्टनामांतरमाधिपत्यम् । मानं नरेशाव कुरुते दिनेशो वाचामधीशस्य दशां प्रपन्नः ॥ १॥ जो रातिशी दशा में गता अन्तर सोनी, अमेप in नाम, नामपो मार और पामतपो मानो और गमागे मान पाना ॥१॥ पदामा पन्नास ।

मापारीकासहित । जो बृहस्पतिकी दशामें मंगलका अन्तर हो तो युद्धर्म जयको प्राप्त हो और श्रेष्ठ भोग सुख धनसहित और बड़ा प्रतापी हो ॥ ३ ॥ कोई ऐसा भी कहते है कि शिरमें, गुदामें कभी पीड़ा हो, शत्रुओंसे भय हो और बलका नाश हो और स्थानांतरमें यात्रा करता है ॥ ४ ॥ अथ गुरुदशामध्ये बुधांतर्दशाफलम् । सवुद्धिकौशल्यसुरार्चनानि सदिदिरामन्दिरखाहनानि । कलत्रपुत्रादिसुखानि नूनं कुर्यादबुधो जीवदा प्रपन्नः॥५॥ विदेशायानं चलचित्तवृत्तिर्जलात्प्रमादः शिरसी प्रपीडा। गुरोर्दशायां चरतीन्दुपुत्र केपांचिदेवाच मतं निरुक्तम् ॥६ जो वृहस्पतिकी दशामें बुधका अन्तर हो तो श्रेष्ठ बुद्धि और चतुरता हो। देवताओंका पूजन करे, श्रेष्ठ लक्ष्मी, वाहन, स्थान और स्त्रीपुत्रादिकांके मुखको माप्त होता है ।। ५॥ कोई ऐसा भी कहते हैं कि परदेशकी यात्रा करे, चलाय- मान चिचवाला और जलसे प्रमाद और शिरमें पीड़ा होती है ॥ ६ ॥ अथ गुरुदशामध्ये शुक्रांतर्दशाफलम् । निर्वियोगोऽर्थविनाशनं च श्लेष्मानिलश्चापि कलिप्रसंघः । स्यान्मानवानां व्यसनोपलब्धि गोः सुते जीवदशां प्रयात७ि॥ जो बृहस्पतिकी दशामें शुकका अन्तर हो तो अपने सम्बन्धिपाके वियोगसे 'धनका नाश करे और कफवातकी पीड़ा हो, कलहका संग हो और व्यसनाकी माप्ति करता है ॥७॥ धर्मक्रियायां निरतत्वमुच्चेर्विद्याम्बरान्नादिकसंग्रहश्च । द्विजाश्रयः स्याद्गुरुपाकयाते सिते वदेतीज्यवलं तु फेचित् ॥८॥ कोई ऐसा भी कहते हैं कि, वृहस्पतिकी दशामें शुको अन्तरमें धर्मयों क्रियाओंमें तत्पर, विद्या और वस्त्र तथा अन्नादिकोंका संग्रह हो और ब्राह्मणोंग आश्रित होता है ॥ ८ ॥ अथ गुरुदयामध्ये शनेरंतर्दशाफलम। वेश्यासवद्युतकृपिक्रियायेविलुप्तधर्मार्थयशाः कृशांगः। खरकमेलादियुतो नरः स्याद्वरोर्दशायां चलितेऽर्कसूनौ ॥९॥ जो बृहस्पतिथी दशामें शनैश्चरफा अन्तर हो तो पैश्या, शगव, जुआ तमा खेतीसे नारा दिये हैं धर्म, अर्थ और या जिसने ऐसा और.दुर्चल शरो और गधे और उंटासे सहित होता है ॥९॥ .

जातकाभरण। अथ शुक्रदशामध्ये रध्यंतर्दशाफलम् । भूपभीतिरपि वन्धुनिमित्तं वित्तनाशनमरात्युदयः स्यात् । कोडगण्डनयनेप्वपि पीडा भार्गवे यदि खेविनिवेशः॥१॥ जो शुक्रकी दशामें सूर्यका अन्तर हो तो राजासे भय और सम्बन्धियों धनका नादा और वैरी पैदा हों तथा दोनों हाथोंके मध्यभागमें और गण्डस्थलमें और नेत्रों में पीड़ा हो ॥१॥ अथ शुक्रदयामध्ये चन्द्रान्तर्दशाफ.सम् । शीर्पदंतनखपीडनमुच्चेः कामला च प्रबला फिल पित्तम् । श्वापदादपि भयं च नराणां भार्गवांतरगते हिमरश्मी ॥२॥ भूदेवदेवानिमनःप्रवृत्ती रणांगणे स्याद्विजयो नराणाम् । मातंगकायीद्वनिताश्रयाद्वा लामः सिते चंद्रदशेति केचित॥३॥ जो शुक्रसी दवा, पन्यमाश अन्ना हो तो शिर दांत और नाएनाम पी पीटा दो निक्षपार विचरा फोर ज्यादे दो और घ्यावादियोका भय हो॥२॥ पोई ऐगा भी पदते हैं कि मामग, देवना और प्रियजनमें मनपी मसिहा और सुदमें जप और साथियों पमंग अवग गियोंफ आश्रपसे लाभ रोता अप शुरुतमामध्ये भागांतारलम।

. - भाषाटीकासहित ! (३५७) अथ शुक्रदशामध्ये जीवांतर्दशाफलम् । यज्ञादिसत्कर्मणि सादरवं गतार्थसिद्धिः सुतदारसौख्यम् । महापदानेकविभूपणाप्तिभृगोर्दशायां चरतीन्द्रवन्ये ।।७।। जो शुक्रकी दशामें बृहस्पतिका अन्तर हो तो यज्ञादि श्रेष्ठ कर्ममें प्रीति हो और गये हुए धनकी प्राप्ति होती है, पुत्र और स्त्रीके सौख्यकी प्राति व अनेक आभूप- गोंकी प्राप्ति होती है ॥ ७ ॥ अथ शुक्रदशामध्ये शनरंतर्दशाफ्लम् । मित्रोन्नतिमपुराधिपत्यं वृद्धांगनाकेलिरतीव नित्यम् । स्याद्वैरिनाशोयुशनोदशायां शनैश्चरस्यांतरजा दशा चेत् ।।८।। जो शुक्रकी दशामें शनैश्चरफा अन्तर हो तो मित्रोंकी उन्नति, ग्राम और नगरका अधिकार, बूढी औरतके साथ नित्य ही क्रीडा और शत्रुओंका नाश करता है ॥८॥ अथ शनिदशामध्ये सूर्यातर्दशाफलम् । धनांगनानन्दनबन्धुपीडा गाढापि बाधात्मकलेवरे स्यात् । रिपूनमः संचलनं नलिन्याः पत्यौ स्थिते मंददशांतराले ॥१॥ नो शनैश्चरकी दशामें सूर्यका अन्तर हो तो धन, बी, पुत्र और भाइयोंको पीडा हो और देहमें बड़ी भारी पीडा हो और शत्रुओंकी उत्पत्ति होती है ॥ १॥ अथ शनिदशामध्ये चद्रांतर्दशाफलम् । नित्यं कलिबन्धुजनैर्वियोगो हतिम॒तिर्वापि भवेद्गृहिण्याः। उत्साहसौख्योपहतिनितांत शीतद्युतो मन्ददशांतरस्थे ।। २ ।। जो शनश्वरकी दशामें चन्द्रमाका अन्तर हो तो हमेशा कलह, भावजनोंसे वियोग हो या तो कोई स्त्रीका हरण कर ले वा मर जावे उत्साह और सौन्यका नितांत नाश होता है ॥२॥ अथ शनिदगामध्ये भीमांतर्दशाफलम् । स्वस्थानयान विकलत्वमंगे धनांगनानां च वियोजन स्यात् । सम्मानहानिर्ननु सूर्यसनोदशांतरे भूमिसुतप्रचारे ॥३॥ जो गनेश्वरकी दशामें मंगलया अन्तर हो तो अपने स्थानसे यात्रा करारे, शरीरम विकलता करावे, धन और सीमा वियोग हो र सम्मानकी हानि होती॥३॥ अय शनिदनामध्ये त्यांतर्दशाफलम् । धनाङ्गनासुनुसुखोपपन्नः सद्राजमानेन विराजमानः । विद्वजनानंदकरः कफातों मर्यो भवेन्झे शनिपाकसंस्थे॥॥

(३५८)
जातकाभरण।
जो शनैश्चरकी दशामें बुधका अन्तर हो तो धन और पुत्र तथा स्त्रीके सुख
सहित, श्रेष्ठ राजमानकरके शोभायमान, विद्वानों के संगसे आनन्द करे और कफकी
पीडा करके दुःखी होता है ॥ ४ ॥
अथ शनिदशामध्ये जीवांतर्दशाफलम् ।
कलाकलापे कुशलो विलासी पद्मालयालंकृतचारुशीलः ।
भूपालभूलाभयुतो नरः स्याबृहस्पती मंददशां प्रयाते ॥५॥
जो शनैश्चरकी दशामें बृहस्पतिका अन्तर हो तो कलाओंके समूहमें कुशल,
विलासयुक्त, लक्ष्मी करके शोभायमान, श्रेष्टशील व राजासे धरतीका लाभवाला
होता है ॥५॥
अय शनिदशामध्ये शुक्रांतर्दशाफलम् ।
योपाविभूपासुतसौख्यलब्धिः श्रीग्रामदेशाधिकृतत्वमुच्चैः ।
यशःप्रकाशोऽरिकुलस्य इंता शनेर्दशायामुशन प्रवेशः ॥६॥
जो शनैश्चरकी दशामें शुक्रका अन्तर हो तो स्त्री और आभूपण और पुत्रोंके
सौख्यकी वृद्धि और लक्ष्मी तया ग्राम देशाधिकारकी वडी प्राप्ति कराता है, वडे
यशकी प्राप्ति और शत्रुओंका नाश होता है ॥ ६ ॥
अथ शानदशामध्ये भौमांतर्दशाफलम् ।
अंतर्दशा चेन्नलिनीशसूनोदशांतराले किल मङ्गलस्य ।
भवेत्तदानीं निधनं नराणां यद्यप्यहो दीर्घमवाप्तमायुः ।। ७ ॥
लगनाथरिपुर्लग्नदशायां प्रविशेयदि ।
अकस्मान्मरणं कुर्यात्प्राणिनां सत्यसंमतम् ॥ ८॥
इति श्रीदैवज्ञदुढिराजविरचिते जातफाभरणे
अंतर्दशाध्यायः॥२१॥
जो शनैश्चरकी दशामें मंगलका अन्तर हो तो उस मंगलको अन्तर्दयामें
मृत्युको प्राप्त होता है-चाहे बडी उमरवाला क्यों न हो ॥ ७ ॥ और लरकी
दशामें और लग्नेश शाहकी अन्तर्दशामें अकस्मात् मरण होता है यह सत्या-
चार्यका मत है ।। ८॥
इति श्रीवंशपरेलीस्थगोठवंशावतंसजराज्योतिपिकपंडितश्यामलालम्तायां
श्याममुन्दरीभाषाटीकायां अंतर्दशाध्यायः समाप्तः ॥ २१ ॥

भापाटीकासहित।
अथ दानाध्यायप्रारंभः।
"
ये खेचरा गोचरताऽएवर्गादशाक्रमाद्वाऽप्यशुभा भवति ।
दानादिना ते सुतरां प्रसन्नास्तेनाधुना दानविधि प्रवच्मि ॥३॥
अब दानाध्याय कहते हैं जो ग्रह गोचर, अष्टकवर्ग अथवा दशाकमसे बुरे फल
देनेवाले हों वे दानादिसे नितान्त प्रसन्न होते हैं इससे उन ग्रहोंकी दानविधि अब
कहते हैं ॥ १॥
अथ सूर्यदानमाह-
माणिक्यगोधूमसवत्सधेनुकोसुम्भवासोगुडहेमताभ्रम् ।
आरक्तकं चन्दनमम्बुजं च वदन्ति दानं हि विरोचनाय ॥२॥
अब सूर्यका दान कहते हैं-माणिक, गेहूं, बछडा सहित गाय, लाल कपडा,
गुड, सोना, तांबा,लालचन्दन,कमल,यह सूर्यके निमित्त दान करना चाहिये ।। २ ।।
अयचन्द्रदानमाह-
सद्वंशपात्रस्थिततण्डुलांश्च कर्पूरमुक्ताफलशुभ्रवस्त्रम् ।
युगोपयुक्तं वृषभं च रौप्यं चन्द्राय दद्यादघृतपूर्णकुम्भम् ॥३॥
अब चन्द्रमाका दान कहते हैं-बांसकी डलियामें स्थित चावल, कपूर, मोती,
सफेद कपडा, जुआ सहित बैल और चांदी ये सब चीजें चन्द्रमाके अर्थ दान करे
और घीका भरा घडा देवे ॥३॥
अय भौमदानमाह-
प्रवालगोधूममंसूरिकाश्च वृपोऽरुणश्चापि गुडः सुवर्णम् ।
आरक्तवस्त्रं करवीरपुष्पं तानं हि भौमाय वदंति दानम् ॥४॥
अब मंगलका दान कहते हैं-मूंगा, गेहूँ, मसूर, लाल बैल, गुड, सोना, लाल
कपडा, कनेरके फूल और ताम्र ये सब चीजे मंगलके निमित्त दान दे॥ ४ ॥
अथ बुधदानमाह-
चैलं च नील कलधौतकांस्यं मुद्राज्यगारुत्मकसर्वपुष्पम् ।
दासी च दंतो द्विरदस्य नूनं वदंति दान विधुनन्दनाय ॥५॥
अब बुधका दान कहते हैं-दरा कपडा, सोना, चांदी, फांसीका पात्र और
मूंग, घी, पन्ना, सब तरहके फूल, दासी और हाथीदांत ये सब चीजें बुधके वास्ते
दान करनी चाहिये ॥५॥

(३६.) जातकाभरण। अय गुरुदानमाह- शर्करा च रजनी तुरंगमः पीतधान्यमपि पीतमम्बरम् । पुष्परागलवणे च कांचनं प्रीतये सुरगुरोः प्रदीयताम् ॥ ६ ॥ अब वृहस्पतिका दान कहते हैं-खांड, हलदी, घोडा, चनेकी दाल, पीला कपडा, पुष्पराजमणि, नोन और सोना ये सब चीजें वृहस्पतिकी प्रसन्नताके वास्ते दान करनी चाहिये ॥ ६॥ अय भृगुदानमाह- चित्राम्बरं शुभ्रतरस्तुरंगो धेनुश्च वज्रं रजतं सुवर्णम् । सुतंडुलाज्योत्तमगंधयुक्तं वदति दानं भृगुनन्दनाय ॥७॥ अब शुक्रका दान कहते हैं-चित्र-वरा कपडा, सफेद घोडा, गाय, हीरा और चांदी, मोना, चावल, घी और मुगंधयुक्त पुष्प ये सब चीजें शुरुफे निमिन दान फरना चाहिये ॥ ७॥ अथ शनिदानमाह- मापाश्च तेलं विमलेंदुनीलस्तिला कुलित्था मदिपी च लोदम् । सदक्षिणं चेति वदति नृनं दुष्टाय दान रविनन्दनाय ॥८॥ अब गनेश्वरका दान पहते हैं-उटद, सेल और नीसमणि तिल, पुलथी, भंग, लोहा और दक्षिणा विरुद्ध निश्चरफे. वास्ते दान करना चाहिये ॥ ८॥ अयगदानमाद- गोमेदरत्नं च तुरंगमश्च सुनीलचेलानि च कंबलानि । तिलाश्च तलं खलु लोदमिश्रं स्वनिव दानमिदं वदंति ॥९॥ अध रारा दान पहले ई-गोमेदग्ला पाला पड़ा, नीना पपदा पंपल, लि, तेर धीर लोहा पे गव चीजें गा निमिए दान पानी पारिप ॥९॥ অস্ব মা- भापाटीकासहित । अथ नष्टजातकाध्यायप्रारम्भः। आधानकालोऽप्यथ जन्मकालो न ज्ञायते यस्य नरस्य नूनम् । प्रसूतिकाल प्रवदंति तस्य नष्टाभिधानादपि जातकाच ॥१॥ तज्जातक येन शुभाशुभाप्तिर्जातस्य जन्तोर्जननोपकालात् । तस्मिन्प्रनष्टे सति जन्मकालो येनोच्यते नष्टकजातकं तत् ॥२॥ अब नष्ट जातकाध्याय कहते हैं:-जिन मनुष्योंका गर्भधानकाल और जन्मकाल "निश्चय कर नहीं मालूम हो उन मनुष्योंका प्रतिकाल नष्टजातक करके कहते है ॥ ॥ १ ॥ जिस जातक करके जन्मकालमें मनुष्योंको अच्छे और बुरे फलपी प्राप्ति होती है उसको जातकशास्त्र कहते हैं। उस जन्मकालके नष्ट हो जानेसे फिर जिसमे जन्मकालफा ज्ञान हो उसको नष्टजातक कहते हैं ॥२॥ अथ राशिगुणफविधिमाह- मेपादितः प्रश्नविलमलिप्ता कार्याः क्रमाता मुनिभिः ७ खचंद्रेः १० । गजैश्च ८ वेदै ४ दशभि १० श्च वाणैः ५ शैलै ७ संगैः ८ खचरैः ९ शरैश्च ५॥३॥ शिवैः ११ पतंगे १२ निहताः पुनस्ता विलनगाश्चेभृगुभौमजीवाः । तदा तुरंगेः ७ करिभिः ८ खचंद्र १० गुण्याः शरैरन्यखगा यदि स्युः॥४॥ पहले प्रशसमयकी नाकालिकाको स्पट करके उसकी कलाओंफा पिंड बनाना चाहिये और जो प्रश्नलग्न मेप हो तो उस कालात्मकपिंडको सातसे गुणना चाहिये । वृपको १० दशगुणा करे, मिथुनको ८ से, पर्कको ४ से, सिंहको १० से, कन्याको ५ से, तुलाको ७ से, वृश्चिकको ८ से, धनको ९ से, मकरको ५ से ॥ ३ ॥ कुम्भको ११ से आर मीनलगको १२ से गुणना चाहिये ।। 'अथ ग्रहगुणकावधिमाह- जो लग्नमें--प्रश्नलममें सूर्य बैठा हो तो उस गुणे हुए कलात्मकापिंडको फिर पंचसे गुणना चाहिये और जो चन्द्रमा हो तो भी ५ से गुणे, जो प्रश्नलममें मंगल बैठा हो तो उसको ८ से गुणना चाहिये, जो बुध बैठा हो तो भी ध ७ १० ८ ५ (३६२) जातकाभरण। से गुणना और जो वृहस्पति बैठा हो तो उस गुणे हुए कलापिंडको १० से फिर गुणना चाहिये और जो शुरु बैठा हो तो ७ से गुणना चाहिये । जो शनैश्चर बैठा हो तो वह राशिके गुणकांकोंसे गुण्य हुआ, जो कलापिंड है उसको फिर ५ से गुणना चाहिये ॥३॥४॥ राशिगुणकांकचक्रम्. सृमि.क. सिं.क. तु पृ. } म कुमी पशि ४ | १०.७/८/९ १२ गुणा अथ ग्रहगुणांकचक्रम् । ग्रहद्वयं वा बहवो विलग्ने तदा तदीयगुणकैश्च गुण्याः । एवं कृते कर्मविधानयोग्यो राशिः पृथक्स्थः परिरक्षणीयः॥५॥ जो प्रश्नमालकी लपमें दो अयवा तीन या बहुतसे ग्रह बैठे हों तो परे दुए गुणकांकोंने वारंवार उस फलापिंटयो गुणना चाहिये । इसी तरह गायो अंकोंसे गुणा हुआ पलापिंड, फिर ग्रहफे अंगास गुणा हुआ फलापिंड, फर्म- विधान पी ईई राशिफे सम्पूर्ण अंको अलग एक जगह बड़ी रक्षापे माय स्थित फरना चाहिये ॥५॥ अथ ग्रहगुणकांकचक्रम्. | प्रद লাঙ্গ . ८ ७ अय नक्षमतानमाह- पृथस्थराशिमुनिभिर्विनिप्रस्वाये काणे नन ९ युद्वितीय । यथास्थितोऽयं नव९ वजितोऽन्त्ये भसंनयातो हि विशेपमृक्षमा और जो परिवानगी ईगनि अपार पलापिंट धनायनामे हुई और यहाँ आमे गुणी जो गति गरा गानो गुणकार पहरा देपाण हो तो टममें पड़ा भार होना चाहिये और जो मध्यपान भापाकासहित । हो तो कलापिण्डको जैसाका तैसा रहने देना और अंत्य द्रेष्काण हो तो ९. कलारहित करना चाहिये । फिर उसमें २७ सत्ताईसका भाग देकर जो चाकी. वचे वह अचिनीसे गिनकर जन्मनक्षत्र जानना चाहिये ॥ ६ ॥ अय खीपुत्रमित्रशणां नष्टजातकमकारमाह- स्त्रीपुत्रमिनारिनिमित्तकं चेत्पृच्छाविलग त्वृतुभिश्च वेदैः। त्रिभिः शरैर्युक्तमनुक्रमेण ततो विलगस्य कला विधया ॥७॥ लगस्य राशेर्गुणकेन गुण्याश्चेत्संभवो लगगतग्रहस्य । पुनस्तदीयेन गुणेन गुण्याः प्रायुक्तबद्भ परिवेदितव्यम् ॥८॥ जो कोई मनुष्य स्त्री पुत्रादिके नष्टजन्मपत्र बनवाने का मन करे तो प्रश्नलमही राशिमें छः मिलानेसे खीका और चार मिलानेसे पुत्रका और मन्नलग्नकी राशि तीन मिलानेसे मित्रका और पांच मिलानेसे शत्रुका नटलम जानो । प्रश्नलाकी राशिमें पूर्वोक्त अंक मिलाकर उस लग्नका कलात्मक पिण्ड बनाना चाहिये ॥ ७ ॥ फिर उस कलात्मक पिण्डको राशिमें अंकोंसे गुणकर और जो उस राशिमें ग्रह बैठा हो उसके अंबासे उस कलापिण्डको गुणकर फिर उसको सातसे गुणकर नवयुक्त या स्थिति ९ हीनकर २७ का भाग देकर शेप जन्मनक्षत्र जानना चाहिये परंतु लग्न स्पष्ट स्वदेशी मानसे करना चाहिये ॥ ८ ॥ अथ वर्पज्ञानमाह- दशाहते कर्मविधानराशी प्राग्वनवोनेऽप्यथवाधिकेऽस्मिन् । खाहते शेपमितान्दसंख्यामायुर्गतं तत्खलु पृच्छकस्य ॥९॥ अब वर्षका ज्ञान कहते हैं:-जो पहिले राशिके अंकोंसे और ग्रहोंके अंकोंसे गुणी हुई राशि हो उसमें पहलेकी तरह नौ घटाकर बा मिलाकर उस कलापिण्डको १० से गुणकर उसमें १२० का भाग देकर जो बाकी बचे उतने ही वर्षफी उमर प्रश्नकर्ताकी होती है ॥९॥ अथ ऋतुज्ञानमाह- पट्भिविभक्ते ऋतवो भवंति शेषांकतुल्याः शिशिरादयः स्युः। पूर्वोलकर्मविधान की हुई राशिको दशसे गुणकर ६ का भाग देकर जो वाकी बचे सो शिशिरको आदि लेकर ऋतु कहना चाहिये। अधमासज्ञानमाह- द्विभाजिते शेषकमेकमनं पूर्वापरौ तहतुजौ तु मासो॥१०॥ वह जो कर्मविधान की हुई राशि है रसको १० से गुणकर २ से भाग दे, जो (३६४) जातकाभरण। एक वाकी बचे तो ऋतुका पहिला महीना और शून्य शेष बचे तो ऋतुका द्वितीय मास कहना ( यहां ऋतुके मासकी गणना माघसे जानना) ॥१०॥ अय पक्षज्ञानमाह- अष्टाहते कर्मविधानराशौ प्राग्वनवोनेऽप्यथवाधिकेऽस्मिन् । द्विभाजिते शेषकमेकम_तुल्येऽस्ति पूर्वापरपक्षको स्तः ॥११॥ पहिले कर्मविधान की हुई राशिको आठसे गुणकर पहिलेकी तरह नी घार वा मिलाकर दोका भाग देकर जो एक बाकी बचे तो मासका पहला पक्ष और शून्य बचे तो मासका द्वितीयपक्ष जानना चाहिये ॥ ११ ॥ अय तिथिज्ञानमाह- पंचन्दुभक्ते सति शेपतुल्याः पक्षे च तस्मिस्तिथयो भवति । नक्षत्रतिथ्यानयनाय योग्यादहर्गणाद्वारविचारणात्र ॥ १२ ॥ जो कर्मविधान की दुई राशिम १५ पंद्रहफा भाग दे, जो पापी बचे सो पारी तिथि जानना चाहिये और नक्षगतियिफे योगसे ग्राहलापयादिक ग्रंथोंसे चार साना चाहिये वा टम संवत्का एना देसफर वार जाने ॥ १२ ॥ अथ दिवाराषिजन्मज्ञानम् । सप्ताहते कर्मविधानराशी प्राग्वनवोनेऽप्यथवाधिकेऽस्मिन् । द्विभाजिते शेपकमेकमभ्रं दिवा च रात्री जननं तदानीम् १३॥ और उस कर्मविधान यी दुई रागियो मानमे गुणर नी घटापर या मिरापर दोषा भाग दे, एक बापी पचे चो दिनका जन्म पाना और शून्यं वापी में हो रात्रिका जन्म पहना चाहिये ।। १३॥ अय जन्मममपेटारमानमाद- पंचाहते कर्मविवानराशौ प्राग्वन्नयोनेऽप्यथवाधिकेऽस्मिन् । दिनस्य रात्ररथवा प्रमित्या भक्तेऽवशिष्टं दिनराधिनाडयः १२।। इति श्रीदवादिगनविनते जानरामग्णे नष्ट गावरापापः ॥ २३ ॥ अय पर्मविधानी रानियो पांच गुगरा परंपी ताद नी घटापा की मिलापर दिन वा गतिमानो माग देना, जो मार्ग पर दिनप्रिती की पहियां जान लेना चाहिये ॥१४॥ लहानोरमसEिM यादी मगरीमा Eि२६१ --

भापाटीकासहित।
अथ निर्याणाध्यायप्रारम्भः।
दिनकरप्रमुखनिधनस्थितैर्भवति मृत्युरिति प्रवदेत्क्रमांत् ।
अनलतो जलतो करवालतो ज्वरभवो गदतः क्षुधया तृषा ॥१॥
अब निर्माणाध्याय: कहते हैं:-जो सूर्य अष्टममें बैठा हो तो अग्निकरके और
चन्द्रमा अष्टममें बैठा हो तो जलकरके और मंगल अष्टम हो तो हथियारसे और
बुध अष्टममें हो तो ज्वरकरके और बृहस्पति अष्टममें हो तो रोग करके और शुक्र.
अष्टममें हो तो क्षुधाकरके और शनैश्चर अटममें हो तो प्यासकरके मनुष्यकी
मृत्यु कहनी चाहिये ॥१॥
अथ मरणदेशज्ञानम् ।
स्थिरश्चरो व्यंगसमाह्वयश्च राशियंदा जन्मनि चाष्टमस्थः ।
स्वकीयदेशे विषयान्तरे च मार्ग प्रकुर्य्यान्मरण क्रमेण ॥ २ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें अष्टम स्थिरराशि २।५।८ । ११ हो वह
मनुष्य अपने ही देशमें मृत्युको माप्त होता है और चर राशि ११४।७।१०
इनमेंसे कोई अष्टमभावमें राशि हो तो उस मनुष्यका मरण परदेशमें होता है और
जो द्विस्वभावराशि ३ । ६ । ९ । १२ । इनमसे कोई अष्टमभावमें हो तो उसकी
मृत्यु रास्ते होती है ॥२॥
आयुह खेदविवर्जितं च विलोकयेद्रा बलवान्महेन्द्रः ।
तद्धतुजातं प्रवदंति मृत्यु बहुप्रकारं बहवो बलिष्ठाः ॥३॥
जो अष्टमभावमें कोई ग्रह नहीं बैठा हो तो उस अष्टमभावको जो ग्रह अधिक
वलकरके देखता हो उसी ग्रहके हेतुसे मृत्यु कहना चाहिये और जो अष्टमभावमें
बहुतसे ग्रह बैठे हों या बलवान होकर बहुतसे ग्रह अष्टमभावको देखते हो तो
अनेक कारणोंसे मृत्यु कहनी चाहिये ॥ ३ ॥
अथ मरणहेतुज्ञानम् ।
पित्तं कफः पित्तमथ त्रिदोषः श्लेष्मानिलौ वाप्यनिलः क्रमेण ।
सूर्यादिकेभ्यो मरणस्य हेतुः प्रकल्पितःप्राक्तनजातकज्ञैः॥४॥
जो सूर्य अटम हो तो पित्त करके, चंद्रमासे कफ करके, मंगलसे पित्त करके.
और बुधसे त्रिदोप करके और बृहस्पतिसे श्लेष्मा करके और शुक्र शनैश्वर अधम
हो तो वातविकारसे मृत्यु होती है, यह प्राचीन ज्योतिपवेताओंने कहा है ॥४॥

'जातकामरण ।
युक्तं नैवालोकितं खेवरेन्द्रैर्मृत्युस्थान यो विलग्ने दृकाणः ।
द्वाविंशोऽस्मात्सोऽपि तस्यापिभर्ता कुर्यान्मृत्युं हेतुनास्वेन नूनम्र
अनलतो जलतो यदुदीरितं भवति तत्रिलवाधिपहेतुकम् ।
अथ हकाणफलानि सविस्तरंमुनिवरैरुदितानि वदाम्यहम् ॥६॥
जो अष्टम भावको कोई ग्रह नहीं देखता हो और न अष्टममें कोई ग्रह बैठा
हो तो जन्मलग्नमें जो द्रेष्काण हो उससे बाईसवाँ जो द्रेष्काण है उसके स्वामीके
हेतुसे मरण कहना चाहिये ॥ ५ ॥ अनल वा जल करके जो कहा है सो द्रेष्काणके
स्वामीके हेतु करके कहना चाहिये । अब द्रेष्काणका फल विस्तार पूर्वक जो
मुनीश्वरोंने कहा है सो मैं कहता हूं ॥
अथ मेपस्य द्रेष्काणफलम् ।
मेपस्य पूर्वत्रिलवेन दृष्टे शुभग्रहः पापनिरीक्ष्यमाणैः ।
प्लीहोद्भवो वा विपपित्तजो वा मृत्युस्तदानी परिवेदितव्यः ॥ ७॥
जो मेपराशिमें पहला द्रेष्काण हो और शुभग्रह उसको नहीं देखते हों, किन्तु
पापग्रह देखते हों तो तापतिल्ली रोगकरके अथवा विष या पित्तरोग करके उसकी
मृत्यु कहनी चाहिये ॥७॥
अथ मेपस्य द्वितीयद्रेष्काणफलम् ।
मेपे द्वितीये जलजो वनांते तृतीयके कूपतडागजातः ।
जो मेपका द्वितीय द्रेष्काण हो तो जलजीवोंसे या वनके बीच मृत्यु होता
है और जो मेपराशिमें तृतीय द्रेष्काण हो तो कुएँ वा तालाबसे मृत्यु होती है ॥७॥
अथ वृपस्य प्रयमद्रेष्काणमृत्युकारणम् ।
वृपस्य पूर्व त्रिलवे खरावकमेलकादिप्रभवो हि मृत्युः ॥ ८ ॥
जो वृपराशिका द्वितीय द्रेष्काण हो तो गधे, घोड़े वा ऊंटरों परके मृत्य
होती है ॥ ४॥
अय वृपदिनीयतृतीयद्रेष्काणफलम् ।
द्वितीयके पित्तहुताशचौरेरुबस्थलावादिभवस्तृतीये।
जो पराशिम द्वितीय देकाण हो तो पित्तप्रकोपसे, अनिस अथवा चोग्ये
मृत्यु होती है और जो वृषमें तृतीय द्रेष्काण हो तो ऊंचे स्थल या योहे आटिने
मृत्यु पहनी चाहिये ॥
अय मिथुनस्य प्रथम द्वितीयदेवाणफलम् ।
आये हकाणे मिथुने च वातश्वासेदितीये वृपतविदोपः ॥ ९॥

भाषाटीकासहित । (३६७) जो मिथुनका प्रथम द्रेष्काण हो तो वातविकार और श्वासविकारसे मृत्यु होती है और द्वितीय द्रेष्काण हो तो बैल करके और त्रिदोपकरके मृत्यु होती है ॥९॥ अथ मिथुनस्य तृतीयद्रेष्काणफलम् । गजादितः पर्वतपाततो वा भवेदरण्ये मिथुनांतहक्के । जो मिथुनराशिमें तृतीय द्रेष्काण तो हायी आदि वाहनोंसे वा पहाडके गिरनेसे जंगलमें मरता है। अय कर्कस्य प्रयमद्रेष्काणफलम् । अपेयपानादपि कण्टकाच स्वप्नाच कर्कप्रथमे दृकाणे ॥ १०॥ जो कर्फका पहला द्रेष्काण हो तो जो पीनेलायक नहीं उसके पीनेसे और कांटा लगनेसे व स्वप्न देखनेसे मृत्यु होती है ॥ १० ॥ अय कस्य द्वितीयद्रेष्काणफलम् । विपादिदोपादतिसारतो वा कर्कस्य मध्यत्रिलवे मृतिःस्यात् । जो कर्कराशिका द्वितीय द्रेष्काण हो तो विपादिके दोपसे वा अतीसारदापते मृत्यु होती है। अय कर्कस्य तृतीयद्रेष्काणफलम् । महाभ्रमप्लीहकगुल्मदोपैः कशिहक्के निधनं निरुक्तम् ॥ ११ ॥ जो कर्कका तृतीय द्रेष्काण हो तो बडे भ्रम करके, तापतिल्ली करके अथका गुल्मरोगसे मरता है ॥ ११ ॥ अथ सिंहस्य विद्रेष्काणफलम् । विपाम्बुरोगैः श्वसनाम्बुरोगैरपानपीडाविपशस्त्रकैश्च । क्रमेण सिंहस्थहकाणकेषु नूनं मुनींद्रमरण प्रदिष्टम् ॥ १२ ॥ जो सिंहमें पहला द्रेष्काण हो तो विपसे या जलसे वा रोगकरके मृत्यु कहनी चाहिये और द्वितीय द्रेष्काण हो तो वातरोगसे या जलरोगसे मृत्यु कहनी पाहिये और जो सिंहमें तृतीय द्रेष्काण हो तो गुदाके रोगसे विष वा शस्त्रसे मृत्यु फहनी चाहिये ॥ १२ ॥ अथ कन्याराशेखिद्रेष्काणफलम् । कन्यायहक्केऽनिलमौलिरुग्जो दुर्गाद्रिपाताच नृपेदितीये। खरोष्ट्रशस्त्राम्बुनिपातकांतानिमित्तजातं निधनं तृतीये ॥ १३ ॥ जो कन्यागशिमें पहला द्रेष्काण हो तो वातरोग और शिरके रोगसे मरता है और द्वितीय द्रेष्काण हो तो किला कोटके गिरनेसे वा पर्वतके गिरनेसे मृत्यु -- (३६८. जातकाभरण। होती है और तृतीय द्रेष्काण हो तो गधे, ऊंट, 'हथियार, जलमें गिरनेसे और स्त्रीके निमित्तसे मरण कहना चाहिये ॥ १३ ॥ अथ तुलाराशेखिद्रेष्काणफलम् । तुलाहकाणे प्रथम, निपातात्कलवतो वा पशुतोऽपि मृत्युः । नृनद्वितीये जठरामयैश्च व्यालाजलाचापि भवेत्तृतीये ॥ १४ ॥ जो तुलाराशिमें पहला द्रेष्काण हो तो गिरनेस वा स्त्रीकरके या पशुओंकरके मृत्यु होती है और जो द्वितीय द्रेष्काण हो तो जठररोगकरके मृत्यु कहना और तृतीय द्रेष्काण हो तो सर्पकरके वा जलकरके मरता है ॥ १४ ॥ अथ वृश्चिकस्य त्रिद्रेष्काणफलम् । पूर्व हकाण खलु वृश्चिकस्य मृत्युर्विपानास्त्रभवोऽवगम्यः । भारश्रमाद्वा कदिवस्तिरोगैर्भवेद्वितीये त्रिलवे तु मागे ॥१९॥ जङ्घास्थिभङ्गाश्मकलोएकाप्टैर्भवेत्तृतीये त्रिलवेऽलिराशेः । जो वृश्चिफराशिमें पहला द्रेष्काण हो तो विपसे, अजीर्णसे, वा हथियारसे मृत्युको प्राप्त होता है और जो द्वितीयद्रेष्काण हो तो बोझके श्रमसे, कमर वा वस्तिके रोगसे मरता है ॥ १५ ॥ और जो तृतीय द्रेष्काण हो तो जांधकी हड्डी दृटनेसे, लोहे की कीलसे वा काठसे मृत्यु होती है। अथ धनस्य निद्रेष्काणफलम् । आये हकाणे धनुपो मृतिः स्याद्दामयैश्चापिमरुद्विकारः ॥१६॥ विदाहतो वा विपतः शरादा नाशी दृकाण धनुपो द्वितीये । भवेजलाद्वा जलचारिणो वा क्रोडामयाद्वा धनुपस्तृतीये ॥१७॥ जो धनराशिमें पहला द्रेष्काण हो तो गुदाके रोगसे अथवा वातविकारसे मरता है ॥ १६ ॥ और जो धनमें द्वितीय द्रेष्काण हो तो दाहरोगसे, विपकरफे, वाण करके मृत्यु होती है और मिथुनमें तृतीय द्रेष्काण हो तो जलसे वा जलचार्ग जीवोंसे अथवा कोड स्थानीय रोगसे मृत्यु होती है ॥ १७ ॥ अथ मकरस्य विद्रेष्काणफलम् । पूर्व दृकाण मकरस्य सिंहाव्याघ्राद्वराहाकतो द्वितीये। यादो भुजङ्गेश्च तथा तृतीये चौराग्निशस्त्रज्वरतो हि मृत्युः१८॥

भापाटीकासहित। (३६९) जो मकरमें पहिला द्रेष्काण हो तो शेरसे वा व्याघ्रसे वा सूअरसे वा वृकसे। मृत्युको प्राप्त होता है और जो दूसरा द्रेष्काण हो तो जलचरसे वा सर्पमे मरता है और हाय द्रेष्काण हो तो चोर वा अग्नि वा शस्त्र वा ज्वरसे मृत्युको प्राप्त होता. है।॥ १६ अय कुम्भस्य विद्रेष्काणफलम् । कुम्भस्य पूर्वे बिलवेषु पत्नीसुतोदरव्याधिकृतो द्वितीये । गुह्यामयात्पर्वतपातनाद्वा विपात्तृतीये मुखरुक्पशुभ्यः ॥ १९ ॥ जो कुम्भराशिमें पहिला द्रेष्काण हो तो स्त्री करके, पुत्रकरके वा उदरव्याधिसे. मरता है और जो द्वितीय द्रेष्काण हो तो गुह्यरोग वा पर्वतके गिरनेसे या विपसे मृत्यु होती है और जो तृतीय द्रेष्काण हो तो मुखरोगसे वा चौपायोंसे मृत्यु होती है ।॥ १९॥ अब मीनस्य त्रिद्रेष्काणफलम् । मीनायहक्के ग्रहणीप्रमेहगुल्माङ्गनाभ्यश्च भवेद्वितीये। जलोदरायैश्च गजगहेर्वा जलस्य मध्येपि च नोप्रभेदात् ॥२०॥ प्रांत्ये हकाणे पृथुरोमसंस्थे मृत्युः कुरोगैः परिवेदितव्यः । एवं तदानीं निधनं नियुक्तं नैव प्रदृष्टं गगनेचरेन्द्रः ॥ २१ ॥ जो मीनराशिका पहिला ट्रेष्काण हो तो संग्रहणी और ममेहरोग, गुल्मरोग वा सी करके मृत्युको प्राप्त होता है और जो द्वितीयदेष्काण हो तो जलोदर आदि रोगसे, हाथोंके ग्रहणसे वा जलमें स्नान करनेसे वा नौकादिप्रभेदसे मरता है ॥२०॥ जो मीनराशिका अंतिम द्रेष्काण हो तो बुरे रोगोंकरके मरता है. इस प्रकार मनुष्योंका मरण कहना चाहिये, जो अष्टमभावमें कोई प्रहन बेटा हो और न अष्टमभावको कोई ग्रह देखता हो ॥२१॥ अय शोपान्मृत्युयोगः। शोपान्मृत्पुयोगः २५ पापांतरे शीतकरे कुमार्याःशोपान्मृतिर्वा रुधिरप्रकोपात् ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें चंद्रमा कन्याराशिगत पापी ग्रहोके वीवमें बैठा हो उस मनुष्परी मृत्यु शोप- रोगसे वा रुधिरकोपसे होती है। १ १.

. ग (३७०) जातकाभरण। अथ पाशहुताशनाभ्यां मृत्युयोगः। पाशहुताशनाभ्यां मृत्यु० २३ शुभान्तरे शीतकरेऽष्टमस्थे पातेन पाशेन हुताशनेन ।। २२॥ जो मनुष्यके जन्मकालमें शुभग्रहोंके बीचमें अष्टमभा- में चंद्रमा बैठा हो तो वह मनुष्य गिरनेसे वा फाँसीसे वा अग्निसे मरता है ॥ २२ ॥ अथ भुजंगपाशान्मृत्युयोगः । भुजंगपाधान्मृत्ययोगः२३ पापेक्षितौ पापखगौ त्रिकोणे यद्वाष्टमे बंध- भुजङ्गपाशात्। जिस मनुष्यके जन्मकालमें पापग्रहोंकरके दृष्ट पापग्रह सहिन चंद्रमा पंचम, नवम अथवा अष्टममें बैठा हो तो बंधनसे वा सर्पसे या फाँसीसे वह मनुष्य मरता है । हकाणकाः स्युर्जनने हि यस्य कारागृहे स्यान्मरणं हि तस्य २३॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें पंचमनवमस्थानमें पापग्रह बैठा हो, एक पंचम एक नवम हो तो वह प्राणी बन्धनमें मरता है अथवा फिलेमें वा हवालातमें मरता है. जिसके अष्टमभावमें पाश या निगड वा सर्प द्रेष्काण हो उसमें पापग्रह बैठा हो तो वह मनुष्य द्रेष्काणके समान बन्धनसे मरता है, पाम ट्रेष्काणमें फांसीसे निगढमें चेड़ी करके, सर्प द्रेष्काणमें सर्पसे मृत्युको प्राप्त होता है ।। अथ भायांकृतमरणयोगः। भारतमरणयोग..२४ मीनोदयेऽस्तगते मृगांके सपापके चास्फु- जिति कियस्थे । भार्याकृतं स्यान्मरणं स्वगेहे वदंति सर्वे मुनयः पुराणाः ॥२४॥ जिम मनुष्यके जन्मकालमें मीनलग्न हो, उममें सर्य बेटा हो और सातवें भावमें चंद्रमा पापग्रह सहित बेटा १० :

भापाटीकासहित। (३७१) हो और शुक्र मेपराशिमें बैठा हो तो वह मनुष्य स्वीकृत दोपसे अपने घर मरता है, यह सम्पूर्ण पुराने मुनीन्धरोंने कहा है ॥ २४ ॥ अथ शूलेन मृत्युयोगः । शूलेन मृत्युयोगः २५ शूलेन मृत्युगोगः २५ क्षीणन्दुमदौ गगने चतुर्थे दिनाधिराजोऽवनिजोड- थवा स्यात् । मूर्तित्रि- कोणायगताः खलाख्याः शूलस्य मौलो प्रलयं प्रयांति ॥ २५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षीण चंद्रमा और शनैश्वर दशम चतुर्थभावमें बैठे हों अथवा सूर्य मंगल बैठे हों तो वह प्राणी शूलसे मारता है अथवा लग्न, पंचम, नवम, ग्यारहवें पापग्रह बैठे हों और चंद्रमाकरके युक्त हों तो वह मनुष्य शूलरोगसे मरता है ॥ २५ ॥ अय काष्ठेन मृत्युपोगः। काप्टेन मृत्युयोगः२६ मेपूरणस्थे धरणीतनूजे दिवामणी-भूतल- भावसंस्थे । क्षीणदुमन्दप्रविलोक्यमाने काष्टाभिघातेन वदंति मृत्युम् ॥ २६ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें देशममामें मंगल बैठा हो, सूर्य चतुर्यम बैठा हो और क्षीण चंद्रमा झनचर करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य काष्टके लगनेमे मरता है ।। २६ ॥ Pr स म. श ई अनेक (३७२) । जातकाभरण। अनेकरोगैर्मृत्युयोगः। भनेकरोगेर्मृत्युयोगः २७ धूमाग्निचन्धनेन मृत्युयोगः ३७ क्षीणेंदुभौमार्किदिवाकरैः स्यादायुःखलग्नाम्बुगतै- गंदादेः।मृत्युःखपुण्यो- दयपंचमस्थेस्तैरेव नाना- विधकुट्टनेन ॥२७॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षीण चंद्रमा, मंगल शनैश्चर, सूर्य अष्टम, दशम, लग्न, चतुर्थ बैठे हों तो वह मनुष्य अनेक रोगोंसे मरता है (एको योगः) और जो पूर्वोक्त ग्रह अष्टम, दशम, नवम, लग्नमें पंचम बैठे हों तो वह मनुष्य प्रकारके धूमानिबंधनसे मरता है ॥ २७ ॥ अथ शबहुताशनभूपप्रकोपेन मृत्युयोगः । भय शखहुताशनजो मृत्युयोग: २८ भूसूनुसूर्याकसुता यदि स्युश्चतुर्थजामित्र- नभोगृहस्थाः। कुर्वति ते शस्त्रहुताशभू- पप्रकोपजातं नियमेन मृत्युम् ।।२८।। जिस मनुष्यके जन्मकालमें मंगल, सूर्य, शनैश्चर चौथे सातवें दशम भावमें बैठे हों, वह मनुष्य हथियार वा अग्नि वा राजाके क्रोधसे नियमकरके मरता है ।। २८॥ अथ प्रवासेऽमिवाहनेन मृत्युयोगः । भग्निवाहनेन मृत्युयोगः३९ भग्निवाहनेन मृत्युयोगः३० कुजेंदुमंदाः खजलद्धि- संस्थाः कृमिक्षतेस्ते मर- गं प्रकुर्यः । मेपूरणस्थे रविभौमसोमवेत्प्रवासे- उनलवाहनायेः॥२९॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मंगल, चंद्रमा, शनैश्वर दाम, चतुर्थ, दृमरे बैठे हाँ श शम में श स 22.

सूश में भापाटीकासहित । तो वह मनुष्य कीडों करके वा घावकरके मरता है और जो दशम भावमें सूर्य, मंगल, चन्द्रमा बैठे हों तो वह मनुष्य परदेशमें अग्नि या वाहनादिकोंकरके मरताहै ॥ २९॥ अथ यन्त्रोत्पीडनेन मृत्युयोगः । यन्त्रोत्पीडनेन मृत्युयोगः ३० क्षीणदुमन्दाकयुते विलग्ने भूमीसुते सप्तमभा- वयाते । विनाशन यंत्रनिपीडनेन भवेदवश्य परिवेदितव्यम् ॥ ३०॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षीणचंदमा, शनैश्चर, सूर्य लममें बैठे हों और मंगल सातवें बैठा हो तो वह मनुष्य मन्वसे पिचकर मरता है ॥ ३० ॥ अय विषमूत्रप्रदेशे मृत्युयोगः। विण्मवप्रदेशे मृत्युयोगः ३१ भौमे तुलायां च यमे च कर्क प्रालेयरश्मी रविजालंबस्थे । विण्मुत्रितासंकुलितप्रदेश- विश्य विनाशः परिवेदितव्यः॥३१॥ १० जिस मनुष्यके जन्मकालमें मंगल तुलाराशिम वैठा हो, शनैश्चर कर्कराशिम, चन्द्रमा मकर, कुंभमें बैठा हो तो वह मनुष्य विष्टामूत्रके स्थानमें मरता है ॥ ३१ ॥ अथ वनांतराले मृत्युयोगः। २ श ८ वनांतराले मृत्युयोगः ३२ मेपूरणास्तंम्बुगृहः क्रमेण क्षीणेंदुमन्दाऽवनि- पुत्रयुक्तः । दुगौतराले चे शिलोचये वा वनांतराले प्रलयः किलं स्यात् ॥ ३२ ॥. जिस मनुष्यके जन्मफालमें दशम, सातवें, चतुर्य, स्थानामें क्षीण चन्द्रमा शनैश्वर मंगल क्रमकरके बैठे हो तो वह मनुष्य फिलेकोटमें, या यहाइपर' अथवा जंगलमें.. श मरता है ।.३२॥

(३७४) जातकाभरण। अय गुह्मरोगान्मृत्युयोगः। गुह्यरोगान्मृत्युयोगः३३ बलोपपत्रावनिसूनुदृष्टे क्षीणे विधौ रंध्रगते- कपुने । गुह्यामयादा कृमिहेतुतो वा भवे. दवश्यं मरणं रणादा ॥ ३३ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें क्षीण चन्द्रमा और में शनैश्वर अष्टममें बैठे हों और चलकरके मंगल देखता हो तो वह मनुष्यं गुह्यरोगकरके, कीडोंके हेतुसे अथवा संग्रा. मसे मृत्युको प्राप्त होता है ।। ३३ ।। अथ विहंगेन श्वापदकारणेन च मृत्युयोगः। विहंगेन मृत्युयोगः३४ मित्रे कलत्रोपगते सभौमे मंदेष्टमस्थे च विधौ चतुर्थे । विहंगमश्वापदकारणेन निर्व्याणमाहुर्मुनयः पुराणाः ॥ ३४ ॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें सातवें भावमें मंगल सूर्य बैठे हों और शनैश्चर आठवें और चंद्रमा चौथे बैठा हो तो वह, मनुष्य पक्षियोंकरके वा घोडेकी लातकरफे मरता है ॥ ३४ ॥ अथ भित्तिपतनेन मृत्युयोगः। मिनिपतनेन मृत्युयोग ३१ लगाष्टमत्रिकोणेषु भानुभौमार्कजेन्दुभिः । पार्वतीयो भवेन्मृत्युभित्तिपातभवोऽथवा३५॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें लग, पंचम, नवम वा अष्टम भावमें सू०० शनैश्चर चन्द्रमा वैठे हों तो वह मनुष्य पर्वतपर या दीवालके गिरनेसे मरता है ॥ ३५॥ अय ती मरणयोगः। सौम्येऽएमस्थे शुभदृष्टियुक्त धर्मेश्वरे वा शुभखेचरेंद्रे । तीर्थ मृतिःस्याद्यदि योगयुग्मं तीथे हि विष्णुस्मरणन मृत्युः ३६ से च SAIN सिमा

११
१०
७
भापाटीकासहित ।
(३७)
तीये मरणयोगः ३५
वाये मरणयोगःश
जिस मनुष्यके जन्मकालमे
अष्टम भावमें शुभग्रह बैठे हों और
शुभग्रहों करके दृष्ट हो तो वह मनुष्य
तीर्थ मरता है अथवा नवममावका
स्वामी नवममें हो और शुभग्रहों
करके दृष्ट हो तो भी विष्णुका
स्मरण करके तीर्थमें मरता है ॥ ३६॥
अय अमिप्रवेशेन मृत्युयोगा।
अग्निना मरणयोगः ३७
धर्मस्वामी धर्मगो धर्मसंस्थौ सूर्यक्ष्माजी
चेत्तदाग्निप्रवेशम् । कुर्यात्पत्नी लमजामि-
अनाथौ मित्रे स्यातां नान्यथा सद्धि-
८
७
१२
इति श्रीदेवज्ञहुँदिराजविरचिते जातकाभर निर्माणाध्यायः ॥ २२ ॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें नवमका स्वामी नवममें बैठा हो और सूर्य, मङ्गल
मी नवममें बैठे हों तो वह अग्निमें प्रवेश करके मरता है और जिसके लम और
ससमभावके स्वामी आपसमें मित्र हों अथवा शुभग्रहों करके युक्त हो तो उसकी
सी अग्निमें प्रवेश कर भरती है ॥ ३७॥
इति श्रीपंचवरेलीमरानज्योतिषिकपंडितश्यामलालतायां श्यामसुन्दरीभाषा-
टीकायां निर्याणाध्यायः ॥ २२॥
अथ चन्द्रकृतनिर्याणाध्यायप्रारंभः ।
इति प्रणीतं निर्याण प्राचीनमुनिसमतम् ।
यवनरुदितं यत्र सविस्तरमथोच्यते ॥ ३ ॥

(३७६)
जातकाभरण।
यह जो निर्याणाध्याय माचीनमुनीश्वरोंने सम्मति करके कहा है और यवनाचा-
र्यने कहा है उसको विस्तारपूर्वक कहते हैं ॥ १ ॥
अय मेपराशिस्थितचन्द्रकृतनिर्माणमाह-
धनवान्पुत्रवानुग्रः परोपकरणे रतः ।
सर्वकर्मसमायुक्तः सुशीलो राजवल्लभः ॥२॥
गुणाभिरामः सततं देवब्राह्मणपूजकः।
कोष्णशाकाल्पभोक्ता च ताम्रविस्तृतलोचनः ॥३॥
शूरः शीघ्रप्रमादी च कामी दुर्बलजानुकः।
शिरोव्रणयुतो दाता कुनखी सेवकप्रियः॥४॥
द्विभार्यः संगरे भीरुश्चपलो नितरां भवेत् ।
प्रथमे सप्तमे वर्षे त्रयोदशमिते ज्वरः ॥५॥
पोडश वा सप्तदशे वर्षे स्यात्त विपूचिका ।
तृतीये द्वादशे वापि जलानीतिः प्रजायते ॥६॥
जिस मनुष्यके जन्मकालमें मेपराशिमें चन्द्रमा हो वह मनुष्य धनवान, पुत्रवाना
उग्र, पराया उपकार करनेमें तत्पर, सम्पूर्ण काँसहित, श्रेष्ठ शीलवाला, राजाका
प्यारा होता है॥२॥ गुणोंकरके शोभित, देवता ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला,
थोड़े गरम शाकका थोड़ा भोजन करनेवाला, तांचेके समान लाल नेत्रोंवाला ||३||
शूरवीर, जल्दी मतयाला होनेवाला, कामी और दुर्वलजानुवाला शिरमें व्रण हो,
दाता, कुनखी, सेवकाका प्यारा होता है ॥ १ ॥ दो सियोंवाला, संग्राममें उरने
वाला, निरन्तर चपल हो, पहिले, सातवें व तेरहवें वर्षमें ज्वरफी पीडाहो ॥ ५ ॥
सोलहवें व सत्रहवें वपमें विचिका रोग फहना, तीसरे बारहवें वर्षमें जलसे भय
होता है ॥६॥
पञ्चविंशन्मिते व संतानं च निशांधता ।
द्वात्रिंशत्प्रमिते व शस्त्रघातः प्रजायते ॥ ७॥
कार्यारंभप्रलापी च विदेशगमने रतः ।
कृशांगः शीघ्रगो मानी शुभलक्षणसंयुतः ॥ ८॥
वाताधिक्यः शुभैईले चन्द्रे नवतिसंमिते ।
आयुस्तस्य विनिर्देश्यं कार्तिकस्य सितेतरे ॥९॥

भाषाटीकासहित। (३७७) पक्षे बुधे नवम्यां च निशीथे च शिरोरुजा। निधनं जायते नूनं जन्मनीन्दावनस्थिते ॥ १० ॥ पच्चीसवें वर्षम संतान पैदा हो, रतौंधरोग हो और बत्तीसवें वर्षमें हथियारसे घात हो ॥ ७॥ और कामके आरम्भ करनेमें प्रलाप करनेवाला, परदेश जानेमें तत्पर, दुबैलदेह, जल्दी चलनेवाला, मानी, श्रेष्ठ लक्षणोंसहित होता है ॥ ८ ॥ वातरोग अधिक हो, जो चंद्रमा शुभग्रहोंकरके दृष्ट हो तो नब्बे बरसकी आयु फहना और कार्तिक्के महीनेमें कृष्णपक्षमें ॥ ९॥ बुधवार नवमी तियि रात्रिको शिरमें रोगसे मृत्यु होती है ॥ १०॥ अथ वृषराशिस्थितचंद्रनिर्याणम् । अल्पतेजा नरः स्तब्धः कर्मशुद्धिविवर्जितः । सत्यवागर्थवान्कामी कामिनीवचनानुगः ॥ ३ ॥ चिरायुरल्पकेशश्च परोपकरणे रतः। पितुर्मातुर्गुरूणां च भक्तो भूपतिवल्लभः ॥२॥ सभायां चतुरो नित्यं संतुष्टो येन केनचित् । पीडा स्यात्प्रथमे वर्षे तृतीयेऽग्निभयं दिशत ॥३॥ विपूचिकाभयं विद्यात्सप्तमे नवमे व्यथा । दशमे रुधिरोदारो द्वादशे पतनं तरोः॥४॥ जिप्स मनुष्यके जन्मकालमें पराशिमें चंद्रमा बैग हो वह मनुष्य थोड़े तेज वाला, नम्रतासहित, धर्मशुद्धिसे रहित, सच बोलनेवाला, धनवान और कामी, बिपोशी आज्ञामें चलनेवाला ॥१॥ बड़ी उमरवाला, थोड़े वेशीवाला, पाये उपकारमें तत्पर, पिता, माता, गुरुओंफा भक्त, राजाका प्यारा होता है ॥२॥ सभाके बीचमें हमेशा चतुर, जिस किसी तरह संतुए, पहिले वर्ष , पीडा, तीमरे सर्पमें अग्निफा भय होता है ॥३॥ और सातवें वर्षमै विचिकारोग और नवमवर्षमै व्यथा हो और दश वर्षमें रुधिरविवार और बारहें वर्षमें पेड़से गिरता है ॥४॥ सपांच पोडशे भीतिः पीडा चेकोनविंशके। पञ्चविंशन्मिते तोयाद्यं भवति निश्चितम् ॥ ५॥ शिन्मिते तथा पीडा द्वात्रिंशत्पमितेऽपि च । श्लेष्मलः शांतिभाक्टर सहिष्णुर्बुद्धिमानरः ॥६॥ .

(३७८) जातकाभरण। सौम्यग्रहेक्षिते चन्द्रे पण्णवत्यष्टसंख्यया। आयुर्जन्तोविनिर्देश्यमवश्यं वचनात्सताम् ॥ ७॥ माघमासे नवम्यां च शुक्लपक्षे भृगोदिने । रोहिण्यां निधनं विद्याजन्मनीन्दौ वृपस्थिते ॥ ८॥ और सोलहें वर्षमें सर्पसे भय हो और टन्नीसवें वर्षमें पीडा हो, पञ्चीसवें वर्षमै जलसे भय जरूर हो ॥ ५॥ तीसवें वर्ष और बत्तीसवें वर्षमें पीडा होती है, श्लेष्माकी प्रकृतिवाला, शांतिमान, शूरवीर, सहन करनेवाला, बुद्धिमान होता है ॥ ६ ॥ जो चन्द्रमाको शुभयह देखते हों तो छियानवें वर्षकी उमर पावे यह सत्पुरुषोंका मत है ॥ ७ ॥ माघमास नवमी तिथि शुक्लपक्ष शुक्रवारको रोहिणी नक्षत्रमें मृत्युको प्राप्त होता है ॥ ८॥ अथ मिथुनराशिस्थितचंद्रनिर्याणम् । ग्रामणीश्चतुरःप्राज्ञो दृढसौहृदकारकः। मिष्टान्नाशी सुशीलश्च छिन्नवाक्चललोचनः ।। १ ।। कुटुम्बवत्सलः कामी कुतूहलरतिप्रियः। वयसः पूर्वभागे तु सुखी मध्ये तु मध्यमः ॥२॥ चरमेऽतितरां दुःखी द्विभार्यो गुरुवत्सलः । स्वल्पापत्यो गुणेर्युक्तो नरो भवति निश्चितम् ॥३॥ वृक्षागीः पंचमे व पोडशेऽरिकृतं भयम् । अष्टादशप्रमाणे तु कर्णरुक्परिपीडनम् ॥ ४॥ जिस मनुष्यके जन्मकालमें मिथुनराशिमें चन्द्रमा बैठा हो वह मनुष्य ग्रामाधीश बड़ा चतुर, पक्षी मित्रता फरनेवाला, मीठा भोजन करनेवाला श्रेष्ठशीलवान, छिन्न वाणी बोलनेवाला, चञ्चल नेत्रोंवाला होता है ॥ १ ॥ और कुटुंबफा प्यारा, कामी, हर्पसहित, मैथुनमें प्रीति करनेवाला, वालकपनेमें मुखी और जवानी में मध्यम सुख हो ॥ २ ॥ और बुढ़ापेमें दुःखी, दो स्त्रियोंवाला, गुरुफा प्यारा थोड़ी संतानवाला, गुणोंकरके सहित होता है ॥ ३ ॥ पांचवें वपमें वृक्षसे भय और सोलहें वपमें शत्रुसे भय और अठारह वर्षको अवस्थामें कानके रोगकी पीडा होती है ॥४॥ विशत्या प्रमिते व पीडात्यन्तं प्रजायते । अपविशन्मिते नूनं पीडा स्यान्मृत्युना समा ॥५॥ M भापाटीकासहित। (३७१), भोगी दानरतो नित्यं सत्यधर्मपरायणः । सुभगो विषयासक्तो गीतनृत्यप्रियः सुधीः ॥६॥ शास्त्रज्ञः शुभवाम्जीवेविंशतिं शरदां नरः। वैशाखे शुक्लपक्षे च द्वादश्यां बुधवासरे ॥७॥ मध्याहे हस्तनक्षत्रे निर्याणं खलु निर्दिशेत । इत्युक्तं मिथुनस्थे तु जन्मकाले कलानिधौ ॥ ८॥ और वीसवें वर्षमें बड़ी पीडा हो और अड़तीस वर्षकी उमरमें मृत्युसमान पीडा हो ॥ ५ ॥ भोगी, दानमें तत्पर सत्य धर्ममें तत्पर, श्रेष्ठ भाग्यवाला, विपयमें आसक्त गायन नाचना मिय जिसको, बुद्धिमान होता है ॥ ६॥ शास्त्रका जाननेवाला, श्रेष्ठ वाणी वोलनेवाला और अस्सीवर्षकी उमरतक जीता है, वैशाखमहीना, शुक्लपक्ष, द्वादशी तिथि, बुधवार ॥ ७॥ मध्याह्नके समय हस्तनक्षत्रमें उसकी मृत्यु होती है, यह मिथुनराशिस्थित चन्द्रमाका फल कहा है ॥ ८ ॥ अय कर्कराशिस्थितचन्द्रनिर्याणमाह । परोपकृतिकर्ता च सर्वसंग्रहतत्परः । पुत्रवान्गुणवान्साधुभक्तः पित्रोः स्त्रिया जितः ॥ १॥ अल्पायुः प्रथमे भागे निःस्वो मध्ये सुखी भवेत् । तृतीये धर्मसंसक्तस्तीर्थयात्रापरायणः॥२॥ रेखा तस्य भवेन्नूनं ललाटे मध्यगामिनी। वामांगेऽग्निभयं विद्याच्छीर्षरुक्परिपीडितः ॥३॥ बांधवेर्बहुभिर्युक्तो बहुभार्यः प्रजायते । भग्रहस्थितिवेत्ता च बहुमित्रः प्रियंवदः ॥१॥ अब कर्कराशि स्थित चन्द्रमाका निर्माण कहते हैं-पराये उपकारका करनेवाला, सब चीजोंका संग्रह करनेवाला, पुत्रवान्, गुणी, साधु, पितामाताका भक्ता, खियों- करके जीता हुआ ॥ १॥ अल्पायु होती है और पहली उमरमें धनहीन होता है और जवानीमें सुरखी होता है और बुढ़ापेमें धर्ममें आसक्त, तीर्थयात्रामें तत्पर होता है ॥ २॥ और उसके मायेमें रेखा होती है, वायें अंगमें अग्निका भय होता है, दिर रोगकरके पीड़ित हो ।। ३ ।। चहुत बन्धुगणासहित, बहुत खियाँवाला, नक्षत्रोंकी स्थितिका जाननेवाला बहुत मिओंवाला प्यारी वाणी बोलनेवाला होता है ॥१॥ --

(३८०)
जातकाभरण।
रोगी स्यात्प्रथमे व तृतीये लिंगपीडनम् ।
एकत्रिंशन्मिते वर्षे सर्पतो भयमादिशेत् ॥५॥ .
द्वात्रिंशत्पमिते वर्षे बहुपीडोद्भवो भवेत् ।
पंचाशीतिमितं ब्रूयादायुः पण्णवतिश्च वा ॥६॥
माघे मासि सिते पक्षे नवम्यां भृगुवासरे।
रोहिणीनामनक्षत्रे जेदायुः प्रपूर्णताम् ॥ ७॥
प्रसूती कर्कराशिस्थे कुमुदानन्दने सति ।
पुराणेमुनिभिः प्रोक्तं निर्याणमिति निश्चितम् ॥८॥
पहिले वर्षम रोगी हो, तीसरे वम लिंगपीड़ा हो और एकतीस वर्षमें गरसे
भय होता है ।। ५ ॥ और बत्तीसवें वर्षमें बहुत पीडा हो और पचासी वर्ष अथका
छानये वर्ष की आयु फहनी चाहिये ॥६॥ माघका महीना, शुक्लपक्ष, नवमी तिथि,
शुक्रवार, रोहिणी नक्षत्रमें आयु पूर्ण होतो ६ ॥७॥ जन्मकालमें कर्फराशिगत
चन्द्रमापा यह फल पूर्वाचायाने वर्णन किया है।॥ ८ ॥
अय सिंदरामिंस्थितचन्द्रनिर्माणमाद ।
धनधान्यसमायुक्तः श्रीमांश्च समरप्रियः।
विद्वान्सर्वकलाभिज्ञो विदेशगमने रतः॥१॥
विशालः पिंगलाक्षश्च क्रोधी स्वल्पात्मजो नरः ।
सर्वगः शत्रहन्ता व शिरोरुनिष्टुरो महान् ॥ २॥
भूताद्वाधादिमे वर्षे पंचमेऽन्दऽग्नितो भयम् ।
सप्तमे ज्वरवाधा च नृणां भवति निश्रितम् ॥ ३॥
विचिकोद्भवा पीडा नृणां भवति निश्चितम् ।
विशे व भयं सपदिकविशे प्रपीडनम् ॥ १ ॥

। भापाटीकासहित। (३८१) अष्टाविंशन्मिते वर्षे चापवादभयान्वितः। द्वात्रिंशत्पमिते नूनं वत्सरे परिपीडनम् ॥ ५॥ उदरे सव्यभागे तु वातगुल्मापि संभवः । सुशीलः कृपणोऽत्यंत सत्यवादी विचक्षणः ॥ ६॥ शुभग्रहेक्षित चंद्रे शतायुर्जायते नरः ॥ फाल्गुनस्यासिते पक्षे पंचम्यां भौमवासरे ॥ ७ ॥ मध्याह्ने जलमध्ये च मृत्युनं न संशयः । सिंहराशिस्थिते चंद्रे निर्याणमिदमीरितम् ॥ ८॥ अहाईसवें वर्ष में झगडेका भय हो, बत्तीसवें वपमें बड़ी पीडा हो ॥ ५ ॥ पेटके दाहिनी तरफ वातरोग, गुल्मरोग होता है, श्रेष्ठ शीलवाला, अत्यन्त कृपण, सच बोलनेवाला चतुर होता है ॥ ६ ॥ जो चन्द्रमाको शुभग्रह देखते हो तो सौवर्षकी उमर हो, फागुनके महीनेमें शुक्लपक्षमें पंचमी मंगलवारको ॥ ७ ॥ मध्या- दके समय पानीके वीचमें मृत्यु होती है। यह सिंहराशिस्थितचन्द्रका निर्माण रहा है ॥८॥ अथ कन्याराशिस्थितचंद्रकृतनिर्याणम् । स्वजनानन्दकृन्नित्यं धनवान्बहुसेवकः । प्रवासी च कलाभिज्ञो गुरुभक्तः प्रियंवदः ॥ १ ॥ देवताद्विजवर्याणां भक्तो तत्परमानसः। धर्मकर्मसमायुक्तो जनानामतिदुर्लभः ॥ २ ॥ कन्यकाल्पत्वमापन्नो भूरिपुत्रो भवेन्नरः । शिश्ने कण्ठप्रदेशे च लाञ्छनं निश्चितं भवेत् ॥३॥ वह्निपीडा तृतीयेऽव्दे पंचमे लोचनव्यथा । नवमे द्वारवाधा च त्रयोदशमितऽपि च ॥४॥ अय कन्याराशिस्थित चन्द्रनिर्माण कहते हैं-अपने जोंको हमेशा आनन्द का. नेवाला धनशान, बहुत नौकरोंवाला, परदेश जानेवाला, फाओंका जाननेवाला, बुरुओंका मक्त, प्यारी वाणी बोलनेवाला होता है ॥१॥ देवता और ब्राह्मणोंकी भक्तिमें तत्पर मनवाला, धर्मकर्ममाहित, मनुष्योपो दुर्लभ मनुष्य होता है ॥२॥ योती स्न्याकी सन्तानवाला, बहुत पुत्रोंवाला हो, टमके लिंग और कंट चिन्द्र (३८२) जातकाभरण । हो॥३॥ तीसरे वर्ष आनिकी पीडा हो, पांचवें वर्षमें नेत्रोंका रोग हो और नवम वर्ष और तेरहवें वर्षमें द्वारदेशमै रोग हो ॥ ४॥ तथा पंचदशे वर्षे सर्पतो भयमादिशेत् । एकविंशन्मिते वर्षे पतनं वृक्षभित्तितः॥५॥ अरण्ये शस्त्रघातः स्याद्वर्षे त्रिंशन्मिते.ध्रुवम् । अशीत्यव्दं भवदायुश्चन्द्रे सौम्यग्रहेक्षिते ॥ ६॥ चैत्रकृष्णत्रयोदश्यां निधनं रविवासरे । शीतयुती स्थिते सूतौ कन्यायामिति संस्मृतम् ॥ ७॥ पंद्रहें वपमें सर्पसे भय हो और इफीस वर्ष, वृक्षसे गिरता है वा भीतमे गिरता है॥५॥ तीसवें वर्ष जंगलमें हथियारका घात हो और अस्सी वर्षकी आयु हो जो चन्द्रमाको शुभग्रह देखते हो ॥ ६ ॥ चैत्रवदी तेरस रविवार दिन मृत्य हो । यह कन्यागशिगत चन्द्रमामा फल कहा है ॥ ७ ॥ अथ तुलाराशिस्थितचंद्रकृतनिर्माणमाह । मान्यः सर्वजनेनूनं वस्तुसंग्रहतत्परः । भोगी धर्मपरः श्रीमान्वहुभृत्यो विचक्षणः ॥ १ ॥ वापीकृपतडागादिनिर्मिती सादरः सदा । प्राज्ञः सर्वकलाभिज्ञो नृपाणामतिवल्लभः ॥२॥ मधुरानरसप्रीतिद्विभार्यः पित्भक्तिकृत् । स्वल्पापत्याल्पबन्धुश्च कृपिकर्मविचक्षणः ॥३॥ नयविक्रयसंप्राप्तिदेवब्राह्मणपूजकः । भार्यावचोऽनुगामी च सप्तमेदेऽग्निजं भयम् ॥ ४॥ अब नलागामिगतचंद्रमापा निर्माण कहते हैं-गय जनों फरणे. माननीय बस्तुआये. मंग्रहमें नपा होता है, भोगी, धर्ममें सत्ता, यातनापगंगारा, पहा पर होता है।।। ।। चावडी, कुआ, तालाव आदि म्यानोयो यनानवाला, घर मम्पूर्ण पलाऑफा जाननेगला, गनाऑपा अन्य पागा ? || २ | मीरे अन आर मॉम प्रति करनेवाला हो, दो सिपोंवालापितापी भक्ति पानेगा थोडी मन्तानवाला पोद मायापाला, रोटी गारने पर tant || अपर अप परफे. धनश करनेवासा देवता और प्रामणोंपा जनंगा मी पर नमें पटनेवाला हो, गात म अग्रिमय ठाurt भापाटक्सिहित। (३८३) अष्टमे ज्वरजा पीडा द्वादशे च जलायम् । तरोस्तुरगतः पातः सर्पभीर्वापि विंशके ॥ ५ ॥ एकविंशन्मिते पीडा चंद्रे सौम्यग्रहे स्थिते । पंचाशीतिर्भवेदायुर्वैशाखस्याद्यपक्षके ॥ ६॥ साऽष्टम्यां भृगोवारे निधनं पूर्वयामके । तुलाराशिस्थिते चन्द्रे निर्याणमिति सूचितम् ॥ ७॥ आठवें वर्षमें ज्वरकी पीडा,ग्यारहें वर्षमें जलसे भय होता है और वृक्षसे वा बोटेसे गिरना, सर्पका भय, बीसवर्षकी उमरमें कहना चाहिये ॥ ५ ॥ इक्कीसवें व पीड़ा होती है, जो चंद्रमाको शुभग्रह देखते हों तो पचासीवर्षकी उमर कहना, वैशाखमासके कृष्णपक्षमें ॥ ६॥ आश्लेपानक्षत्रमें शुक्रवारको पहिले पहरमें मृत्यु शेती है। यह तुलाराशिस्थितचन्द्रका निर्याण है ॥ ७ ॥ अथ वृश्निकराशिस्थितचन्द्रनिर्याणमाह । परतापपरः क्रोधी विद्वेपी कलहप्रियः। विश्वासघातकचापि मित्रद्रोही विचक्षणः ॥१॥ असंतुष्टो नपैः पूज्यो विघ्नकर्तान्यकर्मणि । शुभलक्षणसंयुक्तो गुप्तपापश्च विक्रमी ॥२॥ बहुभृत्यश्चतुर्वधुद्विभार्यों जायते पुमान् । प्रथमेऽव्दे ज्वरात्पीडा तृतीये भयमग्मितः ॥३॥ पंचमेऽब्दे वरात्पीडा तथा पंचदशेऽपि च । पंचविंशन्मिते वर्षे पीडा स्यान्महती ध्रुवम् ॥ ४॥ चंद्रे सौम्यग्रहेप्टे नवत्यदान्स जीवति । ज्येष्टे मासि सिते पक्षे दशम्यां बुधवासरे ॥५॥ हस्तनक्षत्रसंयुक्त मध्यराने गते सति । चंद्र वृश्चिकराशिस्थे निर्याणमिति कीर्तितम् ॥६॥ अब वृश्चिफराशिस्थित चन्द्रमाका निर्याण पहते हैं-गामे सपनेवाला, फरनेवाला क्लद जिसको प्यारा, विश्वासघात करनेवाला, मित्रोंगे 'द्रोह करने में चतुर होता है ॥ १ ॥ और सतोपराहत, गमन्प, पगये पामोंमें विन करनेवाला

(३८४)
जातकाभग्ण।
श्रेष्ठ लक्षणसहित, पराक्रमी होता है ॥ २॥ बहुत नौकरीवाला, चार भाइयोंवाला,
दो स्त्रियोंवाला, पहिले वपमें ज्वरकी पीड़ा, तीसरे वर्ष आग्रेसे भय होता है ॥३॥
पांचवें वर्षमें ज्वरसे भय और पंद्रहवें वर्षमें ज्वरका भय और पचीसवें वर्षमें बड़ी
पीड़ा हो ||ll जो चन्द्रमा शुभ ग्रहोंकरके दृष्ट हो तो नब्बे वर्प जीता है, ज्येष्ठमात
शुलपक्ष दशमी बुधवारको ।। ५॥ हननक्षत्रमें आधी रातको मरता है ॥ ६ ॥
अय धनराशिस्यितचन्द्रकृतनिर्याणमाह ।
प्राज्ञो धर्मी सुपुत्रश्च राजमान्यो जनप्रियः ।
द्विजदेवाचने प्रीतिर्वस्तुसंग्रहतत्परः ॥ ॥
सभायां च भवेद्वक्ता सुनखी सुमतिः शुचिः।
स्थूलदंताधरग्रीवः काव्यकर्ता प्रगल्भकः ।।२।।
कुलशाली वदान्यश्च सभाग्यो दृढसौहृदः।
निमयादतलः क्लेशी साहसी विनयान्वितः ॥३॥
शांतः क्षिप्रप्रकोपी च तापसः स्वल्पभुङ्नरः ।
स्वल्पापत्यो सुबंधुश्च पूर्व वयसि वित्तवान् ॥ ४ ॥
अब धनराशिगत चन्द्रमाका निर्याण कहते हैं-चतुर, धर्मवान्, श्रेष्ठपुनावाला,
राजमान्य, मनुष्योंका प्यारा, ब्राह्मण देवताओंके पूजनमें प्रीति करनेवाला
वस्तुओंके संग्रह करनेमें तत्पर होता है ॥ १ ॥ सभाके बीचमें बोलनेवाला मुन्दर
नखोवाला, पवित्र मोटे दांत और ओठ गर्दनवाला, पवित्र, श्रेष्ठयुदिवाला,
काव्यका करनेवाला, प्रगल्भ होता है ॥ २ ॥ श्रेष्ठकुलवाला, भाग्यसहित) दृष्ट
मिनता करनेवाला, पैरोंके तलुए जिसके गहरे, क्लेश पानेवाला, साहसी, नम्रता
सहित होता है ॥ ३ ॥ शांतस्वभाव, जल्दी क्रोध करनेवाला, तपस्वी, थोड़ा
खानेवाला, थोड़े पुत्रोंवाला, श्रेष्ठ भाइयोंवाला और पहली उमरमें धनवान
होता है ॥ ४॥
सबाधःप्रथमे वर्षे महापीडा त्रयोदशे।
अष्टपरिमितं प्राहुरायु पंचसप्ततिः॥५॥
चन्द्रे सर्वशुभैप्टे शतवर्याणि जीवति ।
आपाढस्यासिते पक्षे पंचयां भृगुवासरे ॥६॥

F भापार्यकासहित । निशायां हस्तनक्षत्रे निधनं सर्वथा भवेत् । निर्याणमिति संप्रोक्तं चंद्रसूतौ धनस्थिते ॥ ७ ॥ पहिले वर्षमें बाधा, तेरहवें वर्षमें बड़ी पीड़ा होती है और अड़सठ वा पछत्तर वर्षकी उमर होती है ।। ६॥जो चन्द्रमा सम्पूर्ण शुभग्रहों फरके दृष्ट हो तो सौ वर्ष जीता है, आपादका महीना शुक्लपक्ष पंचमी शुक्रवार ॥ ६ ॥ रात्रिमें हस्त नक्षत्रों सर्वथा मृत्यु होती है, यह धनराशिगत चन्द्रमाका निर्याण कहा है ॥ ७ ॥ अय मंकरराशिगतचन्द्रनिर्याणमाह- धीरो विचक्षणः केशी पुत्रवान्नृपतिप्रियः। कृपालुः सत्यसम्पन्नो वदान्यो शुभगोऽलसः॥३॥ कृष्णतालुः पुमान्नूनं विस्तीर्णकटिरुद्भवेत् । पंचमे वत्सरे पीडा सप्तमे च जलाद्भयम् ॥२॥ दशमे पतनं वृक्षाद्वादशे शस्त्रपीडनम् । विशन्मिते ज्वराबाधा शाखासु पंचविंशके ॥३॥ पंचत्रिंशत्समाकाले वामांगेऽग्निभयं दिशेत् । अब्दानां नवतिर्नुनमायुस्तस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४॥ श्रावणस्य सिते पक्षे दशम्यां भौमवासरे। ज्येष्ठायां निधन नून चंद्रे मकरसंस्थिते ॥५॥ अव मकरराशिगत चन्द्रमामा निर्याण कहते हैं-धीर, चतुर, केशयुक्ता पुत्री- वाला, राजाका प्यारा, दयावान, सत्यसहित, श्रेष्ठ भाग्यवाला. आलसी होता है ॥ ॥ काले तालवाला लम्बी चौड़ी कमरवाला, पांच वर्षमें पीड़ा और सातवें वर्षम जलसे भय होता है ॥२॥ दावे वर्षमै वृक्षसे गिरे, वारदें व शसस भय, बीसवें वर्षमें ज्वरको बाधा, पञ्चीसवें वर्षम अंगाम पीड़ा होती है ॥ ३ ॥ पैंतीसवें वर्षको उमरमें बायें अंगमें अग्निका भय होता है और नये वर्षको उमा होती १॥ ४ ॥ श्रावणका महीना शुलपाम टामी मङ्गलबार ज्येष्ठा नक्षत्रमें मरता है। यह मकरस्य चन्द्रका फल है ॥५॥ अथ कुंभराशिगवचन्द्रनिर्याणमाइ- दाता मिष्टान्नभोक्ता व धर्मकार्येषु सत्वः । प्रियवक्तृत्वसंयुक्तो नरः क्षीणकलेबरः ॥ १॥ २५

श्चरवार ॥ ४ ॥ भरणी नक्षत्रर्म मनुष्यका मरण होता है । यह श्रेष्ट मुनीश्वरन
(३८६)
जातकामरण।
स्वल्पापत्यो द्विभार्यश्च कामी द्रव्यविवर्जितः।
वामहस्ते भवेल्लक्ष्म पीडा प्रथमवत्सरे ॥२॥
पंचमेऽग्निभयं विद्यादथ द्वादशवत्सरे ।
व्यालाद्वा जलतो भीतिरष्टाविंशतिमे क्षतिः॥३॥
चौरेभ्यश्च भवेदायुर्वर्पाणां नवतिध्रुवम् ।
भाद्रे मास्यसिते पक्षे चतुर्थ्यां शनिवासरे ॥४॥
भरणीनामनक्षत्र गृणन्ति मरणं नृणाम् ।
एवमुक्तं मुनिश्रेष्टेश्चन्द्रे जन्मनि कुंभगे ॥५॥
अब कुंभराशिगत चन्द्रमाका निर्माण कहते हैं-दानी, मिष्टान्न भोजन करने
वाला, धर्मकार्यको जलदी करे और प्यारा बोलनेवाला, एवं क्षीणशरीर होता है
॥१॥ थोड़ी सन्तानवाला, दो स्त्रियोंवाला, कामी, धनहीन, बायें हाथमें उसके
चिह्न हो, पहिले वर्षमें पीडा होती है ॥ २ ॥ पांचवें वर्षमें अग्निभय हो, अथवा
बारहवें वर्षमें हो, सर्पसे वा जलसे भय, अठाईसवें वर्षमें घाव ॥३॥ चोरों करके
होता है, नब्बे वर्षकी आयु पाता है, भादोंका महीना, कृष्णपक्ष चतुर्थी, शने-
कुम्भके चन्द्रमाका फल कहा है ॥ ५ ॥
अथ मीनराशिगतचन्द्रनिर्याणमाह-
धनी मानी विनीतश्च भोगी संहृष्टमानसः ।
पितृमातृसुराचार्यगुरुभक्तियुतो नरः
उदारो रूपवाञ्छेप्ठो गंधमाल्यविभूपणः ।
पंचमेऽब्दे जलादीतिरष्टमे ज्वरपीडनम् ।। २॥
द्वाविंशे महती पीडा चतुर्विशन्मितेऽब्दके ।
पूर्वाशागमनं चायुरव्दानां नवतिः स्मृता ॥३॥
आश्विनस्यासिते पक्षे द्वितीयायां गुरोदिने। .
कृत्तिकानामनक्षत्रे सायं मृत्युन संशयः॥४॥

भापाटीकासहित ।
(३८७,
इतीरितं तु निर्याणं यवनाचार्यसंमतम् ।
मीनस्थे यामिनीनाथे भवेदन न संशयः ॥५॥
इति श्रीदेवनदुण्डिराजविरचिते जातकाभरणे प्रत्येक-
राशिस्यचंद्रनिर्माणाध्यायः ।। २५ ।।
अब मीनराशिगत चन्द्रमाका निर्याण कहते हैं धनवान्, मानी, नम्रतासहित,
भोगी, प्रसन्नचित्त होता है और पिता माता देवताओंका पूजन करनेवाला,
गुरुका भक्त होता है ॥ १॥ उदार, सपवान्, श्रेष्ट गंध और पुष्पोंकी माला करके
सुशोभित, पांचवें वपमें जलसे भय, आठवें वर्प, ज्वरकी पीडा होती है ॥ २ ॥
बाईसवें वर्षमे बडी पीडा और चौबीस वर्ष पूर्वकी यात्रा करे और नचे वर्षकी
उमर होती है ॥ ३ ॥ आश्विनका महीना, कृष्णपक्ष द्वितीया तिथि, बृहस्पतिवार,
कृत्तिकानाम नक्षत्र में सायंकालके समय मृत्यु होती है ॥ ४॥ यह निर्याणाध्याय
यवनाचार्य के मतका मीनराशिगत चन्द्रमाका कहा है ॥ ५॥
इति श्रीवंशबरेलीस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मगौरीपुत्रराजज्योतिपिडित-
श्यामलालझतायां श्यामसुन्दरी-नापाटीकायां प्रत्येकाराशिस्थ चन्द्र-
निर्याणनिरूपणं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥
अथ स्त्रीजातकाध्यायप्रारम्भः ।
यजन्मकालादितं नराणां होराप्रवीणेः फलमेतदेव ।
स्त्रीणां प्रकल्प्यं खलु चेदयोग्यं तन्नायके तत्परिवेदितव्यम्॥१॥
जो जन्मकालसे पुरुपोंको ज्योतिषशास्त्र जाननेवालोंने कहा है वही फार
वियोंको भी कहना चाहिये, जो फल खियोंके कहने योग्य नहीं है मो सम्पूर्ण
फल मियाँके स्वामीको कहना चाहिये ॥ १॥
अय स्त्रीणां वैधव्यसौभाग्यमुखसौंदर्यविचारस्यानमाह-
लग्ने शशांक व वपुर्विचित्यं तयोः कलवे पतिवभवानि ।
सुताख्यभावे प्रसवोऽवगम्यो वैधव्यमत्याःकिल कालगेहे ॥२॥
नियोंके जन्मकालमें लन और चन्द्रमासे देहका विचार करना चाहिये और लन,
चंद्रमास सातव भावसे पतिका वैभव फहना चाहिये और पंचमभावने मंगाना
विचार करना और अमस्यानमे वैधव्यदोपका विचार करना चाहिये ॥२॥

(३८८)
जातकाभरण।
अय स्याकृतियोगः।
ख्याकृतियोगः३
लग्ने व चंद्रे समराशियाते कांता नितांत
प्रकृतिस्थिता स्यात् । सद्रत्नभूपासहिताथ
सौम्यनिरीक्षितौ तौ यदि चारुशीला ॥३॥
४च
८
७
सुर
૧૨
१
च
११
४
जिस स्त्रीके जन्मकालमें जन्मलग्न और चंद्रमा दोनों
२।४।६।८।१०।१२ इन राशियोंमें हो तो वह स्त्री खियोंकी प्रकृतिवाली
होती है और जो पूर्वोक्तयोगोंको शुभग्रह देखते हों तो वह स्त्री श्रेष्ठरत्ना युक्त
आभूषणसहित श्रेष्ठशीलवाली होती है ॥ ३ ॥
अय पुरुषाकृतियोगः।
पुरुपाकृतियोगः
तयोः स्थितिश्चेद्विपमाख्यराशी नारी नरा
कारधरा कुरूपा । पापग्रहालोकनयोगयाती
तो चेत्कुशीला गुणवर्जितालम् ॥ ४॥
जिस स्त्रीके जन्मकालमें जन्मलग्न और चंद्रमा दोनों
विषमराशिमें हो १।३।५।७ १९१११ और पूर्वोक्त
लग्नोको पापग्रह देखते हों तो वह स्त्री पुरुषोंकेसे आकारवाली, बुरे रूपवाली,
दुटशीलवाली तथा गुणरहित होती है ॥ ४ ॥
अय त्रिदशांशवशाफलम् ।
लग्नेन्द्रोलवान्कुजस्य भवने शुक्रस्य खात्यंशके
कन्या स्यादतिनिदिता सुरगुरोः साध्वी नितांतं भवेत् ।
दुटा भूतनयस्य नूनमुदिता सौम्यस्य मायाविनी
दासी तिग्ममरीचिसूनुगगनान्यंशे फलानि कमात् ॥५॥
जिस कन्याके जन्मकालमें लन वा चन्द्रमामें जो अधिकवली हो और मंगलकी
गशि शुक्रके विशांशमें हो तो वह कन्या बड़ी निंद्य होती है और वृहस्पतिके
विशांशमें हो तो पतियता होती है और मंगलके त्रिंशांश हो तो दुश होती है
और बुधकै त्रिंशांशमें हो तो माया करनेवाली होती है और दानश्च पिंशांदा
हो तो दामी होती है ॥ ५॥

भाषाटीकासहित । (३८) अब बुधभवने लग्ने त्रिंशांशवशात्फलम् । तारानायकपुत्रभेऽवनिसुते शिल्लवे कार्पटा शौक हीनमनोभवा शशिसुतस्यातीव युक्ता गुणैः । देवाधीशपुरोहितस्य हि भवेत्साध्वी नितांतं तथा खाग्न्यंशेऽर्कसुतस्य सा निगदिता क्लीबस्य भार्या बुधैः ॥६॥ जो लग्न व चंद्रमा बुधकी राशिमें मंगलके त्रिंशांशमें हो तो वह कन्या कपट- स्वभाव करनेवाली होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हो तो कामरहित होती है और सुधके त्रिंशांशमें हो तो बहुत गुणोंवाली होती है और वृहस्पतिके त्रिंशांशमें हो तो निरन्तर पतिव्रता होती है और शनैश्चरके त्रिंशांशमै नपुंसककी स्त्री होती है ॥ ६ ॥ अथ गुरुभवने लग्नेन्दोस्त्रिंशांशवशात्फलम् । देवाचार्यगृहेऽमृतांशुरथवा लग्नं खमद्यंशके भ्रसूनोर्गुणशालिनी सुरगुरोः ख्याता गुणानां गणैः। तारास्वामिसुतस्य चारुविभवा शुकस्य साध्वी भवे- नूनं भानुसुतस्य चाल्पसुरता कांता बुधैः कीर्तिता ॥७॥ और जिस कन्याके जन्मकालमें लग्न वा चन्द्रमा वृहस्पतिके घर मंगलक विशांशमें हो तो वह कन्या गुणवती होती है और वृहस्पति के त्रिशांशमें हो तो गुणोंके गण करके प्रसिद्ध होती है और चुपके विशांशम हो तो सुन्दर वैभववाली होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हो तो पतियता होती है और शनैश्चरके त्रिंगांगमें हो तो वह कन्या मुरतमें थोड़ी प्रीति करनेवाली होती है ॥ ७ ॥ अब भृगुभवने लग्नेटोविंशांशवशाललम् । दैत्याचार्यगृहे सुरेंद्रसचिवस्याकाशवह्नयंशके लने वाप्युडुनायको गुणवती भौमस्य दोष्टचाधिका सौम्यस्यातिकलाकलापकुशला शुक्रस्यचञ्चद्गुणे- युक्तायनिपुणेर्दिवामणिसुतल्यांशे पुनरिति ॥ ८॥ जिम कन्याके जन्मकालमें शुक्रके भवनमें लम वा चन्द्रमा हो और बृहस्पति के त्रिंगांशमें हो तो यह कन्या गुणवती होती है और मंगलके चिंगांगम हो तो अत्यन्त दुष्ट होता है और बुधरे निशांगमें हो तो क्याओके समूहमें फुगल (३९०) जातकाभरण। होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हो तो प्रकाशगुणवाली होती है और शनैश्चरके त्रिंशांशमें हो तो वह पुनर्भू होती है अर्थात् विवाहके बाद दूसरेके धरमें रहती है ॥ ८॥ अथ शनिभवने लगेंदोस्त्रिंशांशवशात्फलम् । मदालयेखाग्निलवे कुजस्य दासी च सौम्यस्य खलाहिवाला। बृहस्पतेःस्यात्पतिदेवता सा बंध्या भृगोर्नीचरतार्कसूनोः ॥९॥ और जो कन्याके जन्मकालमें शनैश्चरकी राशि लग्न वा चन्द्रमा हो और मंग- लका त्रिंशांश हो तो वह कन्या दासी होती है और बुधके त्रिंशांशमें हो तो वह कन्या दुष्टा होती है और वृहस्पतिके त्रिंशांशमें हो तो पतिको ही देवता माननेवाली होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हो तो बांझ होती है और शनैश्चरके त्रिंशांशमें हो तो नीचमें रति करनेवाली स्त्री होती है ॥९॥ अय रविभवने लग्नेदोस्त्रिंशांशवशात्फलम् । लग्ने वा विधुरर्कमंदिरगतो भौमस्य खाग्न्यशके स्वेच्छासंचरणोधता शशिसुतस्यातीव दुष्टाशया। देवाधीशपुरोधसो निगदिता सा राजपत्नी भृगोः पौंश्चल्याभिरता शनेरतितरां पुंवत्प्रगल्भाङ्गना ॥१०॥ जिस कन्याके जन्मकालमें लग्न वा चंद्रमा सूर्यकी राशिम हो और मंगलके.. त्रिंशांशमें हो तो वह कन्या अपनी इच्छानुसार विचरनेवाली होती है और बुधफे त्रिंशांशमें हो तो दुष्टचित्तवाली होती है और वृहस्पतिके त्रिंशांशमें हो तो वह कन्या राजाकी रानी होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हो तो व्यभिचारिणी होती है और शनैश्चरके त्रिंशांशमें हो तो वह कन्या पुरुपाके समान प्रगल्भ होती है ॥ १०॥ अय चंद्रभवने लग्नदोस्त्रिंशांशवशातलम् । चंद्रागारे खाग्निभागे कुजस्य स्वेच्छावृत्तिर्यस्य शिल्पेप्रवीणा! वाचांपत्युः सद्गुणा भार्गवस्य साध्वी मंदस्यप्रियप्राणहंत्री ११॥

भापाटीकाप्तहित ।
(३९१)
जिस कन्याके जन्मकालमें लन्न वा चन्द्रमा कर्कराशिफे हों और मंगलके
त्रिंशांशमें बैठे हों तो वह कन्या अपने इच्छानुसार चलनेवाली होती है और बुधके
विशांगमें बैठे हों तो शिल्पकलामें प्रवीण होती है और वृहस्पतिके विंशांशमें बैठे
हो तो श्रेष्ठ गुणवाली होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें हों तो पतिव्रता होती है और
शनैश्चरके त्रिंशांशमें बैठे हों तो पतिके प्राण लेनेवाली होती है ॥ ११ ॥
अथ स्त्रीस्त्रीमैथुनयोगमाह-
अन्योन्यभागेक्षणगौ सितार्की यद्वा सितः तनुगे घटांशे ।
कंदर्पशांति कुरुते नितांत नारी नराकारकरांगनाभिः॥ १२॥
अव शुभाशुभयोग कहते हैं-जिस कन्याके जन्मकालमें शुकके नवांशमें शनैश्चर
और शनैश्वरके नवांशमें शुक्र बैठा हो और आपसमें देखते हों (एकोयोगः) अथवा
जन्मलग्न तुला हो, उसमें कुंभके नवांशका उदय हो तो वह कन्या नराकार किन्हीं
अन्यस्त्रियों करके अर्थात् किसी प्रकारका लिंग उनकी कमरमें बँधाकर उनके
हाग अपनी कामाग्निकी शांति कराती है ॥ १२ ॥
अय कापुरुपयोगः।
शून्ये मन्मथमंदिरे शुभखगैर्नालोकिते निर्वले ।
बालायाः किल नायको मुनिवरैः कापूरुपः कीर्तितः ।
जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें स्थानमें कोई ग्रह नहीं हों और शुभग्रह नहीं
देखते हों और सप्तमभाव निर्बल हो तो उस कन्याका पति बेवकूफ आलसी होता
है अर्थात् निरुद्यमी होता है ।
अथ क्लीवपतियोगः।
जामित्रं बुधमंदयोर्यदि गृहं पण्डो भवेनिश्चितम् ।
जिस कन्याके जन्मकालमें सप्तमभावमें ३।६ । १० । ११ ये राशियें हों उस
कन्याका पति नपुंसक होता है ।
अय प्रवासगीलमयोगः।
राशौ तत्र चरे विदेशनिरतो यंगे च मिथस्थितिः॥ १३॥
और जिस कन्याफे जन्मफालमें सप्तमभावमें १।४।७।१० ये राशि हो तो
उसका पति परदेशमें रहता है और जो द्विस्वभावरामि ३ ॥ ६॥ ९॥ १२ सातों
हों तो उस फन्यास पति कभी परदेश, कभी घर म्हनेवाला होता ॥ १३ ॥

(३९२) जातकाभरण। अथ पतित्यक्तयोगः। सप्तमे दिनपतौ पतिमुक्ता जिस कन्याके सातवें भावमें सूर्य बैठा हो वह कन्या पति करके त्यागी "जाती है। अथाशताया एव रंडायोगः । क्षोणिजे च विधवा खलु बाल्ये। जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें मंगल बैठा हो वह कन्या वालविधवा होती है ।। अथ विवाहविहीनतायोगः। विवाहविहीनतायोगः। पापखेचरविलोकनयाते मंदगे च युवतिर्जरती स्यात् ॥ १४॥ जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावमें शनैश्चर बैठा हो और उसको पाप ग्रह देखते हों तो वह कन्या कुमारी ही रहकर वृद्धा हो जाती है ॥ १४ ॥ अथ गतालकायोगः। खलैः कलत्रे च गतालका स्यात् जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावमें पापग्रह बैठे हों तो उस कन्याकी मांग -नष्ट होती है। अथ पुनर्भूयोगः। कांताविमित्रैश्च भवेत्पुनर्भूः। चिस कल्पाके मकालमें साहलें भात्य शुभाएल ग्रह बेटे हों उस कन्याका दो वार विवाह होता है ॥ अथ पतित्यक्तायोगः। कलत्रसंस्थे विवले खलाख्ये सौम्यैरदृष्टे विभुना विमुक्ता ॥१५॥ जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावमें बलहीन पापग्रह बैठे हों और शुभ • ग्रहोंकरके अदृष्ट हों तो वह कन्या पतिकरके त्यागी जाती है ॥ १५ ॥ अय परपुरुषगामिनीयोगः। अन्योन्यांशावास्थितौ भीमशुक्रौस्यातां कांता संगतान्यन नूनम् । श

भाषारीकासहित ।
जिस कन्याके जन्मकालमें मंगल शुक्रके नवांशमें बैठा हो और शुक्र मंगलके
नवांशमें बैठा हो तो वह कन्या परपुरुषगामिनी होती है ।
अथ पत्याझ्या दुश्वरीयोगः।
चंद्रोपेतौ शुकवको स्मरस्थावाज्ञैव स्यात्स्वामिनश्चामनंति ॥१६॥
जिस कंन्याके जन्मकालमें चन्द्रमा शुक्र मंगल सातवें बैठे हों वह कन्या पतिकी
आज्ञासे परपुरुषसे रमण करती है ॥ १६ ॥
परपुरुपरतायोगः।
परपुरुपरवायोगः १७
लग्ने सितेन्दु कुजमंदभेस्थौ करेक्षितौ सान्य-
रता जघन्या ।।
जिस कन्याके जन्मकालमें लग्नमें शुक्र चंद्रमा और
मंगल शनैश्चरकी राशिमें बैठे हों और पापग्रहोंकरके दृष्ट
हों तो वह कन्या परपुरुषगामिनी होती है ।।
परपुरुषरतायोगः। परपुरुषरतायोगः। परपुरुपरवायोगः।
१२
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११
१०
७
७
१०
२०
२
विनष्टयोनियोगः।
स्मरे कुजे सार्कसुतेन दृष्टे विनष्टयोनिश्च शुभाशुभांश ।। १७ ।।
जिस कन्याके जन्यकालमें सातवें मंगल बैठा हो और शनैश्चरफरफे दृष्ट हो
और शुभ ग्रह पापग्रहक नवांशमय हो तो उस कन्याफी योनि नष्ट होती
अय ससमभावस्थनवांगालमाह-
भानोभै यदि वा लवः स्मरगृहे संभोगमंदः पतिश्चन्द्रस्याति-
मदो मृदुः क्षितिसुतस्यत्रीप्रियःक्रोधयुक् । विद्वान्जस्व गुरो-
है।॥ १७ ॥

जातकाभरण। वंशी गुणयुतः शुक्रस्य भाग्यान्वितो मंदस्य प्रवयास्तु गूढ- मतिरित्युक्तो बुधैौरिकैः॥ १८॥ जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावमें सूर्यकी राशि नवांश हो उस कन्याका पति संभोगमें मंद होता है और चन्द्रमाकी राशि और नवांश हो तो उसका पति मदयुक्त कोमल होता है और मंगलकी राशि नवांश हो तो उसका पति स्त्रीका प्यारा क्रोधसहित होता है, जो सातवें बुधकी राशि नवांश हो तो उसका पति पंडित होता है और बृहस्पतिकी राशि नवांशमें पति वशी, गुणोंसहित होता है और शुक्रकी राशि नवांश सातवें हो तो उसका पति भाग्यवान होता है और शनैश्चरकी राशि और नवांश सातवें हो तो उस कन्याका पति बूढ़ा, गृहमति, होराशास्त्र के जाननेवालोंने कहा है ॥ १८ ॥ अथ ईर्ष्यान्वितयोगः। ईयान्वितयोगः। शुक्रन्दू स्मरगौ स्त्रियं प्रकुरुतः सेयां सुखे- नान्विताम् जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावमें शुक्र चंद्रमा बैठे हों तो वह कन्या ईर्ष्यासहित और सुखकरके सहित होती है। अथ कलावतीयोगः। कलायतीयोगः। सौम्येंदू च कलासुखोत्तमगुणाम्- और जिस कन्याके सात भावमें चंद्रमा बुध वटे हों तो वह कन्या कलावती, मुखसहित, उत्तम गुणोंवाली होती है भापाटीकासहित। (३९५) अय भाग्यवतीयोगः। भाग्यवतीयोगः। शुक्रंदुपुत्रावथ । चंचद्भाग्यकलाज्ञताभि- रुचिराम्- और जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें भावम शुक्र- चन्द्रमा बैठे हों तो वह कन्या बड़े भाग्यकरके सहित कला- ओंकी जाननेवाली शोभायमान होती है । अथ भूपणाध्यायोगः। भूपणाढ्यायोगः। सौम्यग्रहेंद्रास्तनौ नानाभूपणसद्गुणांबर- सुखा पापग्रहस्त्वन्यथा ॥ १९ ॥ और जिस कन्याके जन्मकालमें शुभग्रह लग्नमें बैठे हों तो वह कन्या अनेक आभूपोंसहित, श्रेष्ठ गुणवती. वस्रोंके सुख पानेवाली होती है और जो पापग्रह सातवें बैठे हों तो दुर्भगा, दुःशीला, नेष्टा-दुष्टा होती है ॥ १९ ॥ अथ वैधव्ययोगः। वैधव्यं स्यात्पापखेटेऽष्टमस्थं रंध्रस्वामी संस्थितो यस्य चांशे । मृत्युः पाके तस्य वाच्योऽङ्गनायाः सोम्यैरर्थस्थानगैः स्यात्स्वयं हि ॥२०॥ जिस कन्याके अष्टमभावमें पापग्रह बैठे हों तो वह विधवा होती है और अष्टम- भावका स्वामी जिसके नवांशमें बैठा हो उस ग्रहकी दशामें मृत्यु कहना चाहिये और जिसके दूसरे भावमें शुभग्रह बैठे हों वह कन्या अपने ही दोपसे मरती अथ शैलाप्रपातान्मृत्युयोगः। सूर्यारो खजलाश्रितो हिमवतः शैलायपा- तान्मृतिः- जिस कन्याफे जन्मकालमें सूर्य, मङ्गल दशम, अयवा चतुर्थ बैठे हों तो वह कन्या हिमालयपर्वतसे गिरकर मरती है। है ॥२०॥ शैलाग्रपातान्मृत्युयोगः स

श
च
(३९६)
जातकामरण।
अथ कृपयापीतो मरणयोगः।
कूपवापीतो मरणयोगः।
भौमेन्द्रर्कसुताः स्वसप्तजलगाः स्यात्कूप-
वाप्यादितः।
जिस कन्याके जन्मकालमें मङ्गल चन्द्रमा शनैश्चर
द्वितीय, सप्तम, चतुर्थ बैठे हों तो वह कन्या कूपमें वा
बावड़ीमें गिरकर मरती है।
अथ बन्धनान्मृत्युयोगः।
वन्धनान्मृत्युयोगः।
सूर्याचन्द्रमसौ खलेक्षितयुतौ कन्यास्थिती
रास बंधनात्-
म
जिस क्न्याके जन्मकालमें सूर्य, चन्द्रमा पापग्रहों करके
युक्त और दृष्ट हों और कन्याराशिमें बैठे हों तो वह फन्या
बन्धनसे मरती है।
अथ जले मृत्युयोगः। जले मृत्युयोगः।
तोचव्यंगविलनसंस्थितिकरी तोये विलग्नाः
स्वतः॥२१॥
और जो सूर्य, चन्द्रमा लग्नमें द्विस्वभावराशिमें बैठे हों
तो वह कन्या जलम दृबकर मरती है ॥ २१ ॥
च
११
३
अथ जलोदरेण मृत्युयोगः।
जलोदरेण मृत्युयोग ।
रविसुतो यदि कर्कमुपागतो हिमकरो
मकरोपगतो भवेत् । फिल जलोदरसं-
जनिता तदा निधनता वनितास व
कीर्तिता ॥ २२॥

शम
सुरा
८
मापाटीकासहित ।
(३९७)
जिस कन्याके जन्मकालमें शनैश्चर कर्क में बैठा हो और चन्द्रमा मकर राशिम
हो तो वह कन्या जलोदररोगसे मरती है ॥ २२ ॥
अथ शस्त्रामिना मृत्युयोगः।
शखाग्निना मृत्युयोगः
निशाकरः पापखगतिरस्थः शस्त्राग्निमृत्यु
कुजभे करोति ॥
जिस कन्याके जन्मकालमें चंद्रमा पापग्रहोंके बीच में
और मेष या वृश्चिकराशिमें हो तो वह कन्या शस्त्र
वा हथियारकरके मरती है ॥
अथ संन्यासिनीयोगः।
संग्यासिनीयोगः।
पापे स्मरस्थेऽन्यखगे च धर्मे किलांगना
प्रबजितत्वमेति ॥२३॥
जिस कन्या जन्मकालमें पापी ग्रह सातवें बैठे हों
और शुभग्रह नवमें बैठे हों तो वह कन्या संन्यासिनी होती
है या घर छोड़कर परदेशमें रहती है ॥ २३ ॥
अथाल्पपुत्रायोगः।
कन्यालिगे सिंहगते शशांके पंकेरुहाक्षी खलु स्वल्पपुत्रा ।
जिस कन्याके जन्मकालमें कन्या, वृश्चिक, सिंहराशिगत चन्द्रमा बैठा हो वह
कन्या थोडे पुत्रोंवाली होती है।
बहुपुत्रायोगः।
पुनालय चेच्छुभखेवरेन्द्रप्ट युत वा बहुता च तैपाम् ॥ २४ ॥
आर जिस फन्पाके जन्मकालमें पंचम भावमें शुभग्रह बैठे हों और शुभग्रहों
के दृष्ट हों तो यह कन्या बहुत पुओंवाली होती है ।॥ २४ ॥

(३९८) जातकाभरण । अथ पुरुपस्वभावप्रगल्भयोगः। शुक्रंदुसौम्या विबला भेवयुः शनैश्चरो मध्यवलो यदि स्यात् । शेषाः सवीर्या विपमे च लग्ने योपा विशेपात्पुरुषप्रगल्भा॥२५॥ जिस कन्याके जन्मकालमें शुक्र, चंद्र, बुध निर्बल हों और शनैश्चर मध्यबली हो, वाकीके ग्रह सब बलवान् हों और लग्न विपमराशिकी हो वह पुरुषोंके स्वभाववाली प्रगल्भा होती है ॥ २५ ॥ अथ ब्रह्मवादिनीयोगः। समे विलग्ने यदि संस्थिताः स्युर्बलान्विताः शुक्रबुधेन्दुजीवाः । स्यात्कामिनी ब्रह्मविचारचर्चा परागमज्ञानविराजमाना ।। २६॥ जिस कन्याके जमकालमें समलग्न हो उसमें वलकरके सहित शुक्र, बुध, चन्द्रमा बृहस्पति वैठे हों तो वह स्त्री ब्रह्मविचार करनेवाली और ब्रह्मज्ञानमें तत्पर होती है ॥ २६ ॥ पूर्वर्यन्मुनिभिः सविस्तरतया स्त्रीजातके कीर्तितं सम्यग्वाप्यशुभं च यन्मतिमता वाच्यं विदित्वा बलम् । योगानां च नियोजयेत्फलमिदं पृच्छाविलग्ने तथा पाणिप्रग्रहणे तथा च वरणे संभृतिकालेऽपि च ॥ २७॥ जो पहिले मुनीश्वरोंने स्त्रीजातकमें विस्तारपूर्वक अच्छा बुरा फल कहा है से बुद्धिमानोंने ग्रहोंका बलापल विचार करके कहना चाहिये । पहिले कहे हुए वियोंके योग उनका विचार प्रश्न कालमें विवाहके समयमें अथवा लडाईके समय अथवा जन्म समयमें विचार करना चाहिये ।। २७ ॥ अथ नारीचक्रमाह- नारीचके मस्तके त्रीणि भानि के भानां सप्तकं स्थापनीयम् ।। प्रत्येकं स्युर्वेदतारा रोजे तिवस्तारा हत्प्रदेशे निवेश्याः॥२८॥ नाभी देयं भत्रयं त्रीणि गुह्ये भानोपिण्याचंद्रधिष्ण्यावधीत्थम् । सत्संतापः शीर्पभे वसंस्थे नित्यं मिष्टान्नानि सौख्योपलब्धिः२९

भापाटीकासहित ।
अब नारीचक्र कहते हैं:-स्त्रियोंके आकारस्वरूप बनाकर मस्तक, तीन नक्षत्र
दे और मुखमें सात नक्षत्र दे और चूंचियाम चार चार नक्षत्र दे और हृदयपर
तीन नक्षत्र दे ॥ २८ ॥ और तीन नक्षत्र दूडीमें दे और तीन नक्षत्र गुह्यस्थानपर
दे, यह सूर्यके नक्षत्रसे लेकर क्रमसे दे। चद्रनक्षत्रतक विचार करे, जो चंद्रनक्षत्र
शिरर्मे पड़े तो सन्ताप करे और मुखके नक्षत्रमें पड़े तो हमेशा मिष्टान्न साया करे
और सुखको प्राप्त हो ॥ ३९॥
कामं स्वामिप्रेमवृद्धिः स्तनस्थे वक्षोदेशावस्थितेऽत्यंतहपः।
पत्युश्चिन्तानन्तवृद्धिश्चनाभौगुह्यस्थेस्यान्मन्मथाधिक्यमुच्चैः ६०
और चूंचियोंके नक्षत्रमें चंद्रनक्षत्र पड़े तो स्वामी यथेच्छ प्रेमकी वृद्धि को
और छातिके स्थानम चंद्रनक्षत्र पड़े तो अत्यंत हर्पको देता है और टूडीके नक्षत्रोंमें
पड़े तो पत्तिको चिता अधिक करावे और गुह्यस्थानमें चन्द्रनक्षत्र पड़े तो वह स्वी
अत्यंत कामवती होती है ।। ३० ॥
अथ ग्रन्थकारस्य देशवर्णनम् ।
गोदावरीतीरविराजमानं पार्थाभिधानं पुटभेदन यत् ।
सद्गोलविद्यामलकीर्तिभाजां मत्पूर्वजानां वसतिस्थलं तत्॥३१॥
गोदावरीनदीके किनारे शोभायमान पार्थनामक नगरमें श्रेष्ठ गोलगांगितमें निर्मल
है यश जिनका ऐसे मेरे पूर्वजोंके रहनेकी जगह है ।। ३१ ।।
तनत्यदैवज्ञनृसिंहसूनुगजाननाराधनजाभिमानः ।
श्रीढुण्डिराजो रचयांबभूव होरागमेऽनुक्रममादरेण ॥ ३५ ॥
इति श्रीदेवज्ञदुण्डिराजचिराचित जातकाभरणे
स्त्रीजातकाध्यायः ॥ २६ ॥
वहाँ नृसिंह देवज्ञका पुत्र श्रीगणेशजीका आराधान करनेवाला दुधिराज
इस जातकाभरणनामक ग्रन्थको रचते हुए। जिसमें जन्मपत्रिका क्रम आदमे
रिसा है ॥ ३२ ॥

(१००) जाताभरण। अथ भाषाकारकृतग्रन्थसमाप्तिः। नंदवाणनिधीन्द्रब्दे फाल्गुनस्य सित दले । पंचम्यां चंद्रवारे च भापापूर्तिमगाच्छुभम् ॥ वंशबरेलीत्यभिधे नगरे गौडान्वये सुजनिः। व्यतनोदिममनुवादं दैवज्ञः श्यामलालाख्यः ॥२॥ श्रीविक्रमादित्यसंवत् १९५९ फाल्गुन मास शुक्लपक्षमें पंचमी तिथि चन्द्रवारको यह श्रेष्ठ भाषा पूर्ण हुई ॥ १॥ वांसबरेलीनामनगरके विपे गोडवेशम माप्त किया है जन्म जिसने सो झ्यामलाल ज्योतिषीने यह भाषा विस्तार की ॥२॥ इति श्रीवंशबरेलीस्थगौवंशावतंसश्रीवरदेवप्रसादात्मनगौरीराजज्योतिपिक-पंडितश्यामलाल- पृताया श्यामसुन्दरीभाषाटीकाया स्त्रीजातकनिरूपण नाम पदिशोऽ याय'।। २६ ।। इति जातकाभरण समाप्त । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, | गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर"स्टीम्-प्रेस, | "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" प्रेम, वम्बई. कल्याण-त्रम्बई.

Shri Jatakabharan

Author
Syam Sundar
Title
Shri Jatakabharan
File name
Shri Jatakabharan
Text
OCR done
Citation
1820
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
412
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312401
Barcode
99999990321192.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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