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Bhakti Ka Marg

Aarya, Chandrabhanu · 2009/09

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.."
प्राइम
4
भक्ति का मार्ग
अर्यावं
सन्ध्या, अग्निहोत्र,प्रार्थना, उपासना के अतिरिक्त
योगाभ्यास के पूर्व-साधन सविस्तर दिए गए हैं।
सम्पादक
पं० चन्द्रभानु उपदेशक ।
प्रकाशक
लाला दौलतराम ऐण्डसन्ज़
पुस्तक विक्रेता लुहारी दरवाजा, लाहौर
ने
प्रकाशित किया।
मुद्रक- रजुरे गाल मिरिटङ्ग वर्क्स, लाहौर।
बमवार १०००],
सम्वत् विना मूल्य ।)
इंदशकात

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भूमिका। प्रत्येक धर्म में मात्मिक शान्ति प्राप्त करने के लिये कोई ... कोई उपाय अवश्य अवलंयन किया गया है। कोई मतवादी किसी प्रकार और कोई किसी प्रकार एक महानशक्ति की अवश्य पूजा करते हैं। प्राचीन भार्यावर्त में सृष्टि के मारन से लेकर जो जाति श्रय तक निवास करती आई है उसे आर्य कहते हैं और उसने जो उपाय उस महानशक्ति की पूजा का निकाला है वह संध्या नाम से प्रा-वर्न या भारतवर्ष में सुप्रसिद्ध ही है । संध्या का दो समय ही होना प्राचीन ग्रन्पों से प्रमाणित होता है। कई विद्वानों का यह मत है कि संध्या तीन समय ही होनी चाहिये क्योंकि प्रातःकाल शीत का , मध्यान्ह गर्मी की पूर्ण अधिकता और सायं काल गर्मी का अन्त होता है। ऐसी युक्ति श्रीमान पंडित शिवकुमारजी माली गोरखपुर निवासी ने अपनी संध्या में लिखी है। यह युति जिस बल पर स्वयं प्राधित है वह सारा लेख पढ़ने से पाठको को स्वयं ही विदित हो सकता है, परन्तु हमें खंडन करने से यहां कोई प्रयोजन नहीं है। केवल इतना ही लिखते हैं कि सर्दी का अन्त तथा गर्मी का अन्त या प्रातः और सध्याचे दोनों समय तो सापेक्ष ठीक हुए परन्तु गर्मी की पूर्णाधिकता यंद तथा दोपहर का समय प्रापने किस युक्ति से निकाला। प्रस्तु। .

।
इस पुस्तक में भाप दयानंद कृत पंचमहायज्ञविधि तथा
नित्यकर्मपद्धति.आदि से चुनझर प्रातःकाल के प्रार्थना के मंत्र
संध्या और उपासना तथा प्राणायामावधि प्रघा और व्या-
ख्या सहित लिखी गई है। विशेष कर परमात्मा के सामने ।
निरभिमान पूर्वक वैठकर जो सची प्रात्मा से प्रार्थना निकल
सकती है वह पं० चन्द्रभानु जी ने बड़ी योग्यता पूर्वक लिली
बीच में गाने के योग्य ईश्वरस्तुति के भजन है। यदि
प्रत्येक प्रार्य परिवार में प्रतिदिन विधि पूर्व संध्योपासना,
प्रार्थना, प्राणायाम, हवनादि हुआ करें तो मनुष्यों को बहुत
सुभात्मिक शान्ति लाभ हो सके। जो पुरुप अपने रचने वाले,
• पालन पोपण करनेवाले सब रक्षकों के रक्षक और ज्येष्ठंकि प्रभु
को नित्य प्रातःसायं विशुद्ध अन्तःकरण से स्मरण नहीं करता,
उसकी उन्नति इस क्षणभंगुर जीवन में होनी बहुत कठिन हो
जाती है। मनुष्य
विनर
सहायता भी नहीं कर सकता।
इसलिये जो परमसहायक है उसका मनोमन्दिर में प्रतिदिन
जो सादर करते हैं, जो उनको अपने पवित्र हृदय के सिंहासन
पर नित्य ही बिठाकर दर्शन करते हैं उन्हें कौनसी वस्तु
अप्राप्य हो सकती है। इसलिए भगवान की प्रतिदिन संध्यो
पासना द्वारा पूजा-सत्कार करना आर्यमात्र का कर्तव्य है।
ऐसी पुस्तकों की सब समय ही आवश्यकता है, जितना इस
प्रकार की पुस्तकों का प्रचार बढ़ेगा उतना ही मनुष्य समाज
दिन.२ मुली होता जाएगा।
कविराज-श्रीविद्याधर विद्यालंकार
आयुर्वेदयास्त्री रसाला बाजार, लाहौर ।
के कुछ

प्रोम
* भक्ति का
१-यह ज्ञात हो कि प्रार्थना वही 'फदायक हुशार
करती है जो सच्ची हो, और सच्चे हेदप से की जायः सच्ची
मार्थना तब समझी जाती है कि जिन वस्तुओं के लिए प्रार्थना
की जाय, उन की प्राप्ति के लिए पूरा २ यत्न भी किया जाय ।
.:. २-माचमन मन्त्र में जो प्रान्ति की प्रार्थना की गई है,
यह भी नय ही सफल होगी, जब के हम प्रार्थना के पश्चाव
पूरे २ शान्त होजावें मानो सचमुच ही शान्ति का चूंट पी
लिया है।
३- इन्द्रिय-स्पर्श के ऋषि वाक्यों में जो ज्ञानन्द्रियों के
नाम दोहराये गये हैं, उन का अभिप्राय इन्द्रिय के गोलक
तथा इन्द्रिय की शक्ति का है।
४-प्राण शब्द,जो दो बार भाया है, उस में ५ प्रार
तथा ५ उप-प्राणों का मतलय है. जिन के निम्नलिखित नाम
तथा कान है।
५-पंच प्राण ।
११) प्राण वायु-जो दृश्य में रह कर मुस्त्र के रारते
अन्दर खेचता है।
।

।
(२) अपान वायु- जो गुदा में रहता है, मल मूत्र के
थाहर निकालने का कार्य करता है।
(३) समान वायु-यह नाभि में रहता है, जठराग्निकी
सहायता से भोजन के रस को फोक से जुदा करता है।
(४) उदान वायु-कण्ठ में रहता है, माणों को बाहर
निकालता है, वोलने तपा गाने का काम इप्सी,से होता
(५) व्यान वायु-जो सारे शरीर में रह कर रसों को
सव स्थानों पर पहुंचाता है, पसीना जाता है तथा रुधिर को
परिभ्रमण कराता है।
उप प्राणाः।
(१).नाग वायु-जो डकार लाने तथा वमन (क) कराने
का कार्य करता है।
(२) कर्म-वायु-जिस से पलों का झपझना, अङ्गों का
सिकुड़ना तथा फैलाना होता है।
(३) फिकल वायु:-जो भूख लगाता है और छौंक लाता है
'. () देवदत्त वायु-जो जम्भाई (उबासी) लाता है।
(५) धनंजय वायु-जीवन समय में स्मरण कराने का
कार्य करता है और मृत्यु पश्चात् शरीर को फुलाता है।
.

(७) प्राणायाम के लक्षण । स व्याहुतिं स प्रणवां गायत्रिं शिरसासह । त्रिपठेदायतः प्राणः प्राणायाम स उच्यते ॥६॥ अर्थः-प्रणव व्याहुतियां और शिरोभाग * के सहित गायत्रि मन्त्र से तीन बार प्राण वायु को रोक कर पढ़ने को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम का फल। प्राणञ्चेदिङ्यापिवेत् परिमितं भूयोऽन्यया चरेत् पीत्वापिङ्गलसमीरणमलं वध्वा त्यजेत् बामया। सूर्याचन्द्रमसावनेनविधिना विद्वयं ध्यायत शुद्धा नाड़िगणाभवन्तियमिनाम्मासत्रयादूर्ध्वत अर्थः-यदि प्राण वायु ईडा बाई नासिका से पीये तो . (परिमित) कुम्भक में यथाशक्ति रोक दहिनी 'नासिका से घोड़े, फिर दहिनी नासिका से स्त्रींच कर याई से छोड़े, इसी प्रकार सूर्य और चन्द्रमा अर्थात् दाई बाई नासिका से प्रति * प्रापोज्योतिरसोमृतब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् । इति शिरोभागः ।

(८)
दिन प्राणायाम का अभ्यास करने से संयमी का ३. मास के
उपरान्त नाड़ी चक गुर हो जाता है।
दधन्तेरामायमानानाम् धातुनांहि यथामलाः ।
तथेन्द्रियाणां दान्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात
(मनुस्मृिति)
अर्थ:- जैसे अग्नि में रुपाने से धातुओं के मल नष्ट हो
जाते हैं ऐसे ही प्राणों के निग्रह से इंद्रियों के दोष भी भस्म
हो जाते हैं।
योगांगाऽनुष्षनात् अशुद्धि क्षये ज्ञानदी-
तिरादिवेका ख्यातः ।
(पातञ्जलि)
अर्थः-प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश
और शान का प्रकाश होता है और जब तक परम गति नहीं,
तब तक उसके आत्मा का ज्ञान निरंतर बढ़ता रहता है।
पवित्रता।
पाठकगण सब से प्रथम शारीरिक और मानसिक त्रुरि
करनी चाहिये जिसकी विधि मनु महाराज इस प्रकार
लिखते हैं:-

. (,). अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूताऽऽत्मा बुद्धिज्ञानेन शुध्यति अर्थ:-जल से शरीर की शुद्धि होती है, सच बोलने से भन शुद्ध होता है, विद्या और तप से आम्मा और बुद्धि शान से शुद्ध होते हैं । शारीरिक शुद्धि के लिये मनुष्य को चाहिये कि मातःकाल सूर्योदय से प्रथम ग्राम बाहर कुछ दूर जाकर मलमूत्र को त्याग करना चाहिये । नीन बारमूत्रंद्रिय को मिट्टी लगाकर धोये तथा ५ पांच बार गुना को मिट्टी लगाकर धोना चाहिये, तत् पश्चात् १० चार केवल बाम दस्त को मिट्टी बंगाकर धोना चाहिये, और ७ बार दोनों हाथों को मिट्टी से धोवे, १५ के लगभग शुद्ध जल लेकर कुर्ला करें, तत् पश्चात् दंत धावन (दांतन) करके स्नान करे, प्रांखों पर जल केकाटे. लंगावे, ( इससे अधि-रोग की निवृत्ति होती है ) वालों में कंघी करे, इस प्रकार शारीरिक शुद्धि करने के पश्चातूमानसिक शुद्धि करे, किसी एकान्त स्थान में बैठकर मनको रागद्वेपादि दूषित और असत्य वृत्तियों से यत पूर्वक हटाकर ईश्वर न्यायादि गुणों का चिंतन करे.! पाठकगण यह स्मरण रक्खो जब तक मनुष्य अंदर से शुद्ध नहीं होता, तब तक-वह पूरा २ शुद्ध नहीं कहला सकता यदि कारण यस वाहर न जासके तो घर में ही सब क्रिया करनी चाहिये।

मृत्तिकानां सहलैस्तु उदक कुम्भ शतैरपि ।
न शुध्यन्ति दुरात्मानो येषां भावो न निर्मलः५
दक्षस्मृतिः
अर्थ:-चाहे हजारों मन मिट्टी और सैकड़ों पानी के
कलयों से शरीर को क्यों न धो वह दुरात्मा शुद्ध नहीं होता,
जिस का भाव पवित्र नहीं अर्थात जिसका मन अपना कल्याण
तथा अन्य के लिये दुःख होने की प्रमिलाया रखता हो, ऐसे
मनुभ्य कदापि शुद्ध नहीं हो सकते, अथवा जिन मनुष्यों का
आत्मीय ज्ञान माया-मोह जंजाल से नए हो गया है, वे
असुर वाई प्रधम मनुष्य परमेश्वर को कभी नहीं पासंकते,
परमेश्वर के पाने के वे हो अधिकारी हैं, कि जिन्होंने काम,
कोध, लोभ, मोह, अहंकार, तथा राग, द्वेष, ईर्षा पर विजय
पाकर शास्त्रोक्त प्रवल तपस्या से निज इंद्रिय ग्राम को जीत
लिया है।
अतः शारीरिक शुद्धि की अपेक्षा मानसिक पवित्रता की
परम मावश्यकता है। क्योंकि यही परमेश्वर प्राप्ति के साधनों
में प्रवल साधन है। यदि किसी समय मनुश्य शारीरिक शुद्धि
न भी कर सके तो मानसिक ईि करके भी संध्या में बैठ
सकता है। किन्तु प्राचमन तथा मार्जन के लिये संध्या समय
अब का होना परम मावश्या है। 'चन्द्रभानुअम्मी
+
-

( ११ ) ब्राझेमुहूत्तें बुध्यो धर्मार्थों चानुचिंतयेत् । कायः क्लेशांश्च तन्मूलान् वेद तत्त्वार्थमेवच प्रातःकाल निद्रा त्यागने के समय निम्नलिखित मंत्र पढ़ने चाहियें:- ओं प्रातरग्निं प्रातरिद्रं हवामहे प्रातमित्रा वरुणा प्रात रश्विना । प्रातर्भगं पूषणम् ब्रह्म- ‘णस्पतिम् प्रातस्सोम मुतरुद्रं हवेम् ॥१॥ अर्थ:-हम प्रकाश स्वरूप तथा प्रकाश देने वाले परमेश्वर को ऐश्वर्य युक्त ऐश्वर्यवान् प्रभु को प्राण उदान के समान प्यारे प्रभु को तथा इनको स्थिर रखने वाले प्रभु को सूर्य चंद्र के रचने वाले प्रभु को बुलाते हैं । और प्रातःकाल समय में स्तुति करते हैं, ग्रह्मांडपति पुष्टिकर्ता ऐश्वर्ययुक्त अंतर्यामी तथा पापियों को रुलाने वाले जगदीश्वर की स्तुति करते हैं। ओं प्रातर्जितम् भगमुग्रम् हुवेमवयम् पुत्र मदितेयोंविधर्ताः। आध्रश्चिद्य मन्यमानस्तुर- श्चिद्राजाविधम् भगम् मक्षित्याहः ॥ २ ॥ तथा । १२. ) अर्थ:--ऐश्वर्य के दाता। तेजस्वि जयशील सूर्य को पैदा करके धारण करने वाले, तथा सरंको जानने वाले, दुष्टों के दंड दाता, सबको धारण करने हारे भगवान को सेवन, करता हूं ॥ २॥ ओं भग प्रणेत भंगसत्यराधोभगेमाधिप मुंदवाद दन्तः । भग प्रणोजनयगोभिर श्वैर्भ- ग प्रनृभिवन्तः स्याम ॥ ३॥ . अर्थ:- हे भजनीय ! सब के उत्पादक प्रेरक ऐश्वर्यप्रद प्रभो! हमें बुद्धि दो, और रक्षा करो, और हम गाय घोड़ें नया उत्तम मनुष्यों स नियुक्त हों ॥ ३ ॥ ओं उतेदानीम् भगवन्तः स्यामोत प्रपि- स्व उतमध्ये अन्हास् । उत्तोदिता मघवन्सू- यस्य वयं देवानां सुभते स्यामः ॥ ४॥ . मर्थः- ई भगवन् । प्रांपकी कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग इस समय उत्तमता की प्राप्ति में ऐश्वर्य युक्त हो, तथा हे अनंत द्रव्य देने हारे प्रभो ! हम इस प्रातः समय उत्तम विद्वान् धार्मिक लोगों की प्रज्ञा सुमति में प्रवृत्त होवे, या रहें॥४॥ .

( १३ )
ओं भगराव भगवान् अस्तु देवास्तेनवयं
भगवन्तः स्याम । तन्त्वा भगं सर्वइज्जोहः
वाति सनो भगपुर एताभवह ॥ ५ ॥
अर्थ:-हे समस्त प्रवर्य संपन्न प्रभो! जिससे आपकी
सब लोग निश्चय रूप से प्रशंसा करते हैं, सो हे प्रभो ! प्राप.
इस समय इस हमारवृक्ष में अग्रगामी तथा सत्कर्मों के बढ़ाने
हारे होमो, जिससे कि हम ऐश्वर्थसंपन्न होकर संसार के उप-
कार में तन, मन, धन से प्रवृत्त हो.और श्राप की पूजा करते
रहे॥५॥
अर्थ सहित वैदिक सन्ध्या।
१---आचमन मन्त्राः।
ओं शंनो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये ।
शंयोरभिलवन्तु नः ॥१॥
अर्थ:-हे सर्व प्रकाशक सर्वव्यापक तथा सबको मानंद'
देने हारे प्रभो ! मनोवांछित भानंद सुख भोगने और पूर्ण
सुख की प्राप्ति के लिये इमें कल्याणकारी हूजिये और सुस
की वर्षा चारों ओर से हम पर वर्षाइये ॥१॥

.
..
। १४ ) .
२-इन्द्रिय-स्पर्श मन्त्राः।
ओं वाक् वाक्-हे सब की रक्षा करने हारे
प्रभो ! मेरी वाणी और जिला को शुद्ध पवित्र और मोटी
बनाओ।
ओं प्राणःप्राणः-हे सर्व रक्षक प्रभो! मेरे प्राण
तथा उपप्राण निरंतर अपना कार्य करने में पूच रहे
और मेरे वशर्वर्ती होकर रहें।
ओं चक्षुः चक्षुः--हे व्यापक जगदीश्वर ! मेरे
दोनों नेत्र निरंतर शुभ देखने वाले हों।
ओं श्रोत्रं श्रोत्रं--हे सर्वान्तर्यामिन् पूभो !,
• मेरे कान शुद्ध पवित्र कल्याणकारिणी वाणी को सुनें ।
ओं नासिः---ई सक्षक पूभो ! मेरी उत्पादक
शक्ति बलवान् हो ।
जगत्
पते ! मेरा हृदय तथा
अंतःकर्ण शुद्ध तथा निर्मल रहे।
ओं कंठः-हे नियामक प्रभो ! मेरा कंठ इमेशा
सुंदर शब्द युक्त रहे।
ओं हृदयम्
-हे
-

, ( १५ ) ओं शिरः--हे अखिलेश्वर ! मेरा मस्तिष्क हमेशा तरोताजा तथा नवीन आविष्कार कर्ता हो। ओं वाहुभ्यां यशोबलम्-हे व्यापक पूभो ! मेरे दोनों भुजाओं को यश और बलकी प्राप्ति कराओ। ओं करतल कर पृष्ठे:-हे रक्षक परमेश्वर ! मेरी इथेकी तथा हथेली की पीठ रोग रहित होकर ताईन पालन करती हुई मुझे यश बल देने हारी हो । (इन उपरोक्त ऋषि वाक्यों द्वारा जिस २ अंगका नाम आवे उस २ अंग को छना चाहिये और मनकी प्रवृत्ति भी उधर ही करनी चाहिये) ३-मार्जन मंत्राः। ओं भुः पुनातु शिरसि -प्राणों से प्यारा पर- मेश्वर ! तथा सारे जगत् का प्राण- जो परमेश्वर है, वह शिर को पवित्र करे। ओं भुवः पुनातुं नेत्रयो -दुःख रहित दुःख से छुड़ाने हारा पूभु आंखों को पवित्र करे ।

से
(१०)
ओं स्वः पुनातु कंठे सुखों के देने वाला सुख
स्वरूप परमात्मा कंठ को पवित्र करे।
औं संहः पुनातु हृदये -सव वड़ा सबका
पूज्य ईदर हृदय को शुद्ध करे।
ओं जनः पुनातु नाभ्याम् --सब जगत् का
परमेश्वर ! नाभि को पवित्र करे।
ओं तपः पुनातु पादयोः----पापियों को दंड देने
वाला प्रभु
! पैरों को पवित्र करे।
ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि--सत्य स्वरूप
अविनाशी परमात्मा शिर को फिर पवित्र करें।
‘ओं खंब्रह्म पुनातु सर्वत्र सर्व व्यापक महान्
प्रभु सवको पवित्र करे।
'( उपरोक्त मंत्रों से जिप्त.२ अंगका नाम श्रावे, उस २
पर मध्यमा अंनामिका उंगली से अलं, के खेटे थेने
चाहियें )
अंगः

। १७ ) ४-प्राणायाम मन्त्रः । ओं भुः ओं. भुवः ओं स्वः ओं महः ओं जनः प्राणप्रिय, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, सर्वपूज्य, सवा पित ओं तपः ओं सत्यम्। सर्वशक्तिमन् न्यायकारी एक रस (उपर्युक्त मन्म का प्रथ माजंन मन्त्र में भी भागया है। इस उपर्युक्त मन्त्र को बढ़ते हुए, प्रथम स्वप्रण वायु. व करने के लिए बाई नासिका द्वारा धीरे २ बाहर का वायु खेंच कर कोष्ट में पूरक करे, फिर कोट में वायु पूर्ण हुए २ समय पर भी इस मन्त्र का जाप करे । और फिर दहनी नासिका द्वारा शनैः शनैः घायु को छोड़े और मन्त्र जपता जाय, इसी प्रकार फिर दहनी नासिका द्वारा सेंच कर मन्न पढ़ें और रोक कर मन्त्र पढ़ें, और बाई नासिसा से छोड़ता हुमा मन्त्र पढ़े, इस प्रकार ३ तीन आवृत्ति करने से १ प्रा. णायाम होता है अर्थात् सवार मन्त्र पढ़ने ले ३ प्राणायाम होता है। ऐसी १० प्राणायाम नित्य प्रति प्रातःसाय करने से चित्तं की शुद्धि और मन की एकाग्रता अवश्य होती है, प्रारोग्य बढ़ता है तथा अनेक ग्रारीरिक रोगों से मनुष्य छूट जाता है । मनुष्य के शरीर में ७२ करोड ७२ लाख १० हजार २०० एक नाड़ी हैं प्राणायाम करने से इन सम्पूर्ण नाड़ियों की हवा शुद्ध क्षेत्राती है।

(१८ ५.--अघमर्षण मन्त्रः। नों तश्च सत्यञ्चासीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो राज्यंजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥ १॥ ओं समुद्रादर्णवा दधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वश्य लिषतोवशी ॥२॥ ओं सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् दिवञ्च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥३॥ १० मण्डल १० सू० १६... अर्थ--पूर्ण प्रकाश स्वरूप परमेश्वर की सापर्य से वेद और प्रकृति भली प्रकार प्रकाशित हु, और उसी सामर्थ से अलर हुई, और उसी से मेव एण्डल तथा समुद्र बना . ॥ १ ॥ मेघ मण्डल और समुद्र बनने के पीछे दिन और रात्रि वन कर काल विभाग हुआ ||२|| जगद्धर्ता परमात्मा ने सूर्य चन्द्र को तथा प्रकाशमान "और प्रकाश-रहित लोकों को रचा तथा इन के मध्यस्थ आकाश तथा अन्य लोक लोकान्तरों को बनाया ||३॥ ग्रिप सूचना-इस मन्त्र में यह बतलाया गया है कि परमात्मा के सहब स्वभाव से वह सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है . . बेद से लेकर चिंची पर्यन्त जो यह जगत है, सो यह सब ईश्वर के सामर्थ्य से ही प्रकाशित हुना है, और ईश्वर सब को उत्पन्न करके तथा सब में व्यापक होकर अन्तर्यामी-रूप से सब के पाप पुण्यों को देखता हुआ सत्य न्याय से यथा- धत् फल देना है। इसी अन्तर्यामी के साक्षात्कार से मनुष्य के हृदय की गांट खुल जाती है । जैसाकि लिखा है-भिद्यते हृदय ग्रन्थी विद्यन्ते सर्व संशयाः । दीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् द्रिष्टे परावरे) मनसा परिक्रमा मन्त्रः। ओं प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षिता दित्या इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु यो३ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥१॥ अर्थ-पूर्व दिशा में प्रकाश स्वरूप स्वामी अन्धकार से, रक्षा करने वाला है, सूर्य की किरणे * वाण रूप हैं, * जिस प्रकार वाग्गों से अपनी रक्षा होती हैं और शत्रुओं का नाश किया जाता है, इसी प्रकार मृर्य की किरणें से अनुकूल सेनियों की रचा और विरसेवा करने वालों का नाश होता है।

(२०) उस स्वामि के लिए आदर हो, रक्षक के लिए आदर हो, उन वाणों के लिए आदर हो, इन सब के लिए. आदर हो, जो हम से द्वेष करता है, जिससे हम द्वेष करते हैं, उस द्वेप भाव को इन अधिपति रक्षक वाणों: के दाढ़ (न्याय ) में रखते हैं। - विग्रप सूचना--स्वामी रचक और उस के बनाए हुए सूर्य प्रादि पदार्थो से हमारी रक्षा हो और हमारे द्वेष भाव का नारा हो, तथा हम सव मापसं में मित्र होकर-रहै। ओं दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपति स्तिरश्चि- राजी रक्षिता पितर इषवः। तेभ्यो नमोऽधि- पतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नमः एभ्योअस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥ २॥ अर्थ-दक्षिण दिशा में परमेश्वर्यवान् रूपी राजा (स्वामी ) वेद विरुद्ध चलने वाले दुष्टजनों के कुसंग स्प हानि से ज्ञानि पुरुषों के सत्य उपदेश रूपी वाणों द्वारा हमारी रक्षा करने वाला है ॥२॥ ( शेष पूर्ववत् ) * ऋतपः पितरः शतपय २-३-२-२४ २-५-२-१२ ग्वेद मण्डल १ मुक्त १६४ मन्त १२ सायणभाष्य ( २२ ) विशेष सूचना- इस मन्त्र में यह बतलाया गया है कि हे परमेश्वर | श्राप हमारे दहनी नर भी हैं और टेढ़ी चाल वाले सादिक से तथा कुटिल नीति वाले मनुष्यों से पितरों द्वारा (अर्थात् बुजुर्गो शानियों उपदेशको द्वारा ज्ञान दिला कर हमारी रक्षा करते हैं ॥२॥ . "पितर अर्थात् वुजुर्ग हमेशा दहनी तरफ बैठते हैं [पितर का अर्थ ब्राह्मण अन्यों में मनु मी माया है ] ओं प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपति पृदाकू रक्षितान्नमिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नसो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु यो३ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दधमः ॥३॥ अर्थ-हे सर्वोत्तम ईश्वर ! आप पश्चिम अर्थात् पीर की तरफ हैं, । होकर , और अन ओषधियों द्वारा विषधार्म जहरीले माणयों से हमारी रक्षा करते हैं । अन्न वाण तुल्य हैं । शेप पूर्ववत् ।। ३ ॥ विशेष सूचना-इस मन्त्र में यह भाव दर्शाया गया है कि सर्वोत्तम परमेश्वर हमारी पीठ के पीछे भी है और वहीं शन तथा प्रोषधियों द्वारा हमारी रक्षा करता है । (प्रन तथा प्रोषधियां हमेशा पीछे भण्डार में ही रखी रहा करती ।

. ( २२ हैं और आवश्यकता पड़ने पर निकाली जाया करती है ) इन का सत्कार यही है इन की हमेशा यन पूर्वक रक्षा करनी चाहिए तभी जीवन रह सकता है। ओं उदीचीदिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रचिता शनिरिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो- नमोरक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वोजम्भे दध्मः अर्थ-उत्तर दिशा में शान्त स्वरूप परमेश्वर स्वामी । बिजली, वर्षा, आन्धी रूप वाणों द्वारा कीट, पतंग. पिस्सु, मच्छर तथा अशुद्ध वायु आदि हानिकारक पदार्थों से इमारी रक्षा करता है। शेष पूर्ववत् ॥ ४ ॥ विशेष सूचना--परमेश्वर की लीला कोई नहीं जान सकता, देखते २ पान की आन में प्रांधी, वर्षा, बिजली या जाती है, और जिन जन्तुओं तथा गन्दी वायु से सांसारिक लोग रोगी हुए २ रोते रहते हैं, वह एक दम काफूर होजाते है। यह बात प्रत्यच है कि प्रांधी से मच्छर यादि जन्तु सद माग जाते हैं। घर का मशुद्ध वायु भी निकल जाता है। और वर्षा से शांति प्राप्त हो जाती है तथा चारों भोर मानन्द ही भानन्द हो जाता है।

ओं धवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो- रक्षिता वीरुध इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमोरचितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु यो३ऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः अर्थ-हे सर्व-व्यापक प्रभो ! आप नीचे की ओर ध्यापक है, और काली गर्दन वाले सो से तथा हरित रंग वाले वृक्षों से वनस्पतियों द्वारा हमारी रक्षा करते हैं, आप, के लिए तथा उन वनस्पतियों के लिए सत्कार हो, शेप पूर्ववत् ।। ५॥ विशेष सूचना-इस मन्त्र में यह यतलाया कि वनस्प- -तियों अर्थात् जड़ी बूटियों द्वारा ही कर सर्पो से हमारी होती है और वह नीचे की ओर ही निकलती हैं और नीचे पृथिवी में ही र सर्प रहते हैं। ओं ऊर्ध्वादिग् बृहस्पतिरधिपतिः स्वित्रो रक्षिता,वर्षभिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमोरक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः अर्थ-हे महान मभो ! आप ऊपर की ओर न्या- -

(२४)
पक होकर हमारे स्वामि तथा रक्षक हैं। श्वेत कुष्टादि
रोगों से वर्षा-रूपी वाणों द्वारा हमारी रक्षा करते
आप के तथा उन के लिए. हमारा सत्कार हो, शेष पूर्व
विशेष सूचना-इस मन्त्र में यह बात है कि पंच-तत्त्वों
में प्राकारा ही सब से बड़ा तत्व हैं, अतः यहां पर वृहस्पति
: शब्द ईश्वर के लिए दिया गया है । दूसरे वर्षा भी आकाश
से गिरती है, और वर्षा के बाणों द्वारा कुर की योषधि
तय्यार करके हमारी कुष्ट से रक्षा हो सकती है 1. अथवा
वर्षा का जल एकत्रित करके प्रावश्यकतानुसार उस में स्नान
करें और पी। यही इस का सत्कार है।
उपस्थान मन्त्रः
ओं उद्वयं तमसस्परिस्वः पश्यन्त उत्तरम् ।
देवं देवत्रा सूर्यमगन्मज्योतिरुत्तमम् ॥ १ ॥
यजु० अ०३५ मन्त्र १४
अर्थ-हे परमेश्वर ! आप सब अन्धकार से परे
प्रकाश स्वरूप प्रलय के पीछे भी सदा एक रस वर्तमान
मूर्यादि देवों के प्रकाशक चर अचर के आत्मा ज्ञान
स्वरूप और संव से उत्तम जानकर हम शुद्ध भाव से
आप के शरणागत हुए हैं, हमारी रक्षा कीजिए ॥१॥

.. ( २५ ) মিয়য় सूचना-स मन्त्र में यह यतलाया है कि ईश्वर भशान-सप अन्धकार से परे है, घर प्रचर का आत्मा तथा मानन्द स्वरूप है, जैसे स्वयं प्रकाश प्रभु को मनुष्य ज्ञान चनु से ही देन्न सकता है, और कोई साधन नहीं है। ओं उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥ २॥ यजु० प्र०३३ मन्त्र २१ अर्थ-जिस प्रकाश स्वरूप ईश्वर से वेद प्रकाशित "हुए उस परमेश्वर के आत्मा की प्राप्ति के लिए हम उपासना करते हैं, "उद्वहन्ति केतवः" जिस को श्रुतियों तथा सृष्टि के नियम दृष्टान्त-रूप होकर बतला रहे हैं। विशेष इस मन्त्र का भाव यह है कि वेद और सार ऐश्वर्य प्रभु से ही प्रगट हुभा है. ऐष्टि के नियम तथा वेद, सारे संसार को परमेहर का मार्ग दिखलाते हैं। ओं चित्रं देवानामुदगानीकं चक्षुर्मिक्षस्य वरुणास्थाने आ प्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ॥३॥ यजु०म०१३ मन्त्र ४६ अर्थ-जड़ चेतन जगत् का आत्मा और चर अचर जगत् का प्रकाशक जो सूर्य है, आप उस के ( २६ भगट करने वाले हैं, राग द्वेष रहित पुरुषों के श्राप प्रकाशक हैं, पृथिवी और आकाश आप की सामर्थ्य में हैं। १० गाण १९वें मन को श्राप गति देने वाले हैं। विद्वानों के हृदय में आप चित्रित : प्रकाशित) रहते हैं, दुःख नाश करने वाला जो नल है वह हमारे हृदयों में प्रकाशित रहें।॥३॥ विशेष सूचना-इस मन्त्र में मह बतलाया है, संसार में चित्र विचित्र तथा अद्भुत जो अग्नि सूर्य, चन्द्रादिक पदार्थ , इन सब का प्रकाशक परमेश्वर है और यह सव पदार्थ. परमेश्वर को ही दर्शा रहे हैं, भूमि प्राकाश तथा मध्य लोक सब उस प्रभु की सामर्थ्य में है, वह बल का भण्डार है। हम को चाहिए कि मन बाणी कार्य से पल की याचना करते हुए बलवान होकर जांचें। ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुकमुञ्चरत् । पश्येम शरदः शतंजीवेम शरदः शतशृणुयाम शरदश्शतं प्रबवाम शरदः शत मदीना स्याम शरदः शतं सूयश्च शरदः शतात् ॥ ४॥ य० अ०३६ मन्त्र २४ । अर्थ-जो प्रशु सब का द्रष्टा विद्वानों का हितकारी शुद्ध स्वरूप सृष्टि के पहिले था, अब है, और आगे होगा। उस प्रभु को हम लोग सौ वर्ष तक देखें, सौ वर्ष तक हम लोग जीवें, सौ वर्ष तक सुनें, सौ वर्ष बोलें, किसी के अधीन न रहें, तथा परमेश्वर की कृपा से सौ वर्ष से अधिक भी जीवें, देखें, सुनें, वोलें और और पराधीन न रहें ॥४॥ ८-गायत्री मन्त्रः। ओं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्थ धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ यजु० प्र०३६ मन्न ३ अर्थ-प्राणों से प्यारा दुःखनाशक सुखस्वरूप सब जगत् का उत्पन्न करने हारा, ऐश्वर्य का दाता, सब का प्रकाशक शुद्ध स्वरूप ग्रहण करने योग्य जो 'परमेश्वर है; उस को हम लोग प्रेम भक्ति श्रद्धासे निश्चय करके अपने आत्माओं में धारण करें ( किस लिए) हले हमारी बुद्धियों को बुरे कामों से हटाकर भले कामों में प्रवृत्त करें। ओं नमः शम्भवाय च मयोभवाय क

.
२७.)
नमः शंकरायच मयस्कराय च
शिवाय च शिवतराय च ॥
यजु० अ०१६ मन्त्र ४१
अर्थ-हे संसार के सुख. देने वाले सुख स्वरूप
परमेश्वर ! आपको नमस्कार हो, हे मंगल-स्वरूप मंगल
देने हारे परमेश्वर ! आप को नमस्कार हो, हे कल्याण
स्वरूप कल्याण दाता प्रभो ! आप को नमस्कार हो।
९ वक्तव्या
इस प्रकार सब मन्त्रों के घों से परमेश्वर की उपा
सना करक, मागे समर्पण करें कि हे दयामय ! पाप की
कृपा से जो २ उत्तम काम हम करते हैं, वह सब आप दे
अर्पण हैं, जिससे हम लोग आप को प्राप्त होकर, धर्म
अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त हों।
१०-विशेष वक्तव्य।
मनुष्यं को बिना ब्रह्म-ज्ञान के यथार्थ सुख की प्राप्ति नई
'होसकती, यह बात निःसन्देह है, प्राप्त पुरुषों के वचनों से
प्रमाणित है तथा वेद भी वर्णन करता है।
ओं वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णम
तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्यु
मेति नान्य पंथाविद्यतेऽयनाय ॥ यजु०

अर्थ है.जिज्ञासु ! [अहम् ] में जिस [रातत् ] इस पूर्वोक्त [महान्तम् ] पड़ेर गुणों से युक्त [आदित्य वर्णम्]. मूर्य के तुल्य प्रकाश स्वरूप तमसः] अज्ञान वा अर्धकार से [ परस्तात् ] अलग वर्तमान [पुरुषम् ] स्वस्वरूप से सर्वत्र पूर्ण परमात्मा को [ वेद ] जानता हूं, [तं एव ] उसी को विदित्वा] जानकर आप [मृत्युम्] दुःखदायी मरण को [.अतिएति]. उलंघन कर जाते हो, किन्तु [अन्यः] इस से अलग [पंथा] मार्ग [अयनाय] अभीष्ट- स्थान मोक्ष के लिए न विद्यते] विद्यमान नहीं है। भावार्थ यह है कि यदि मनुष्य इस लोक तथा पर- लोक के सुखों की इच्छा करें, तो सब से अति बड़े स्वयं प्रकाश और मानन्द स्वरूप प्रज्ञान के लेश से पृथक् वर्तमान परमात्मा को जान कर ही मरणादि प्रशाह दुःखसागर से पृथक हो सकते है । यही सुखदायक मार्ग है, इसके अति- रिक्त मुक्ति का कोई मार्ग नहीं- पाठकगण! जब कि यथार्थ शांति का साधन केवल ब्रह्म-विज्ञान ही सिद्ध हुआ, तो फिर अन्य कपोल कल्पित साधनों पर व्यर्थ परिश्रम करना मूर्खता नही तो और क्या .. भतः बुद्धिमान मनुष्य को पूर्ण अधिकारी धन कर ब्रह्मा तक पहुंचने के लिए प्रथम शास्त्रोक्त कर्मकाण्ड करने की धा- वश्यकता है, कर्मकाण्ड के किए विना मनुष्य का मन मलिना है.

(३०)
रहता है और मलिन भन वाले मनुष्य को विवेक की प्राप्ति
अत्यन्त ही दुर्लभ है । 'मलिनमनसः पुग्नोविवाकादिसुदर्लभम्
अतः अधिक बाद विवाद के बिना मनुष्य को सन्ध्योर
पासन तथा अग्निहोत्रादि कर्म अन्तःकरण की शुद्धि के
लिए परम श्रावश्यक हैं, यह वात निर्विवाद है, अतः द्विज
मान के लिए सन्ध्या परम प्रावश्यक कर्म है, और देखिए
संसार में कोई मनुष्य अपने साथ थोडासा मी उपकार
करता है, तो उत्त का बदला जब तक नहीं देदिया जाती,
तब तक उस का अहसान हृदय से दूर नहीं होता । अब
सोचो, जिस दयालु ईश्वर ने हमारे ऊपर असंख्य उपकार
किए हैं, उस परम पिता का सारे दिन भर में सायङ्कार
प्रातःकाल दो समय भी स्मरण न करना क्या'तन्नता का
पाप नहीं है ? धतः छतघ्नता रूपी पाप से बचने के लिए
सन्ध्योपासन का करना मनुष्य मात्र के लिए परम आवश्यक
कर्म है । दूसरे यह भी बात है कि जो मनुष्य दो समय
सन्ध्योपासन करता है (अर्थात् एक प्रकार से ईश्वर से
मिलता है तो उस की रुचि खोटे कर्मों से इटी रहती है,
और वह पाप से बचा रहता है । पाए मनुष्य उस समय
करता है, जिस समय परमेश्वर को भून्द जाता है या यह
समझता है कि परमेश्वर मेरे इस कर्म को नहीं देखता, और
इस का दण्ड मुझे नहीं मिलेगा (तो) जो मनुष्य दोनों समय
सन्ध्योपासन करता है, वहं प्रातःकाल में मायङ्काल तक
और साय बि से प्रातःकाल तक दर को याद रखना है।
--

तथा मनसा परिक्रमा के मन्नों में जो यह बतलाया है कि
परमेश्वर सब ओर है, अर्थात सर्व-व्यापक है, तो वह ईश्वर.
को सर्व-व्यापक समझ पार कभी सी पाप नहीं कर सकता ।
अतः दिन या रात्रि के संयोग में शुद्ध मित्त होकर मन को
एकान करके अवश्य सन्ध्योपासन करना चाहिए।
जैसाकि :-
'अहरहः संध्यामुपासीत तस्मादहोरात्रस्य
संयोगे ब्राह्मण संध्यामुपासीत । उद्यंतंऽस्तं
यांतम् आदित्यम् अभिध्यायन् ॥
संसार में विचरनेर प्रकृति के ऊपर ले कृत्रिम प्रावरण
को देख कर जो हमारे मन के भाव अशुद्ध हो जाते हैं, उन
का शुद्ध करना बुद्धिमान् पुरुष के लिए सन्ध्या, उपासना,
प्रार्थना तथा प्रशिहोत्र से बढ़कर अन्य कमे नहीं है।
अथेश्वर स्तुति प्राथनोपासनाः ।
ओं विश्वानि देव संवितर्दुरितानि परासुव
यद्भद्रं तन्न आसुव ॥ १॥.. ।
अर्थ-हे सकल जगत् के उत्पत्ति कर्ता ! समग्र
ऐश्वर्ययुक्त शुद्ध-म्बरूप सब सुखों के दाता परमेश्वर !
आप कृपा करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण, दुर्व्यसन और

३२ ) .. दुःखों को दूर कीजिए, जो कल्याण कारक गुण कमें स्वभाव और पदार्थ हैं, वह सब हम को प्रदान कीजिए। ओं हिरण्यगर्भः समवर्ततामे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवीं द्या मुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ २ ॥ अर्थ-जो प्रकाश स्वरूप और जिसने प्रकाश करने हारे सूर्य चन्द्रादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किए हैं, जो उत्पन्न हुए सब जगत् का प्रसिद्ध स्वामी एक ही चेतन स्वरूप था, जो सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व वर्तमान था सो इस भूमि और मर्यादि को धारण धारण कर रहा है, हम कोग उस सुख-स्वरूप शुद्ध परं- मात्मा के लिए ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अति प्रेम से विशेष भक्ति किया करें ॥२॥ ओं य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपा- सते प्रशिषं यस्य देवाः । यस्यच्छायाऽमृत यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥शा अर्थ-जो आत्म-ज्ञान का दाता शरीर आत्मा और समाज के बल का देने हारा जिस की सब विद्वान् लोग है, हम ( ३३ ) उपासना करते हैं, और जिस का प्रत्यक्ष सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं, जिस का आश्रय ही मोक्ष सुखदायक है, जिस का न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही मृत्यु आदि दुःख का हेतु लोम उस सुख-स्वरूप सकल ज्ञान के देने हारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए आत्मा और अन्तःकरण से भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें। ओं य प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशेऽस्य द्विपदश्चतुष्पद: कस्मै देवाय हविषा विधेमः ॥ ४ ॥ यजु० अ० २५ । मन्त्र ३ ॥ अर्थ-जो प्राण वाले और अप्राणी-रूप जगत् का. अपनी अनन्त महिमा से एक ही विराजमान् राना है, जो इस मनुष्यादि और गौ. आदि प्राणियों के शरीर की रचना करता है, हम उस सुख-स्वरूप सकलैश्वर्य के ' देने हारे परमात्मा के लिए अपनी सकल उत्तम सामग्री से विशेष भक्ति करें ॥४॥ ओं येन द्यौरुया पृथिवी च दृढ़ा येन स्वः 1. स्तीभितं येन नाकः ।. यो अन्तरिक्षे रजसों विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेमः ॥५॥ यजु० अ० ३२ । मन्त्र ६ ॥ अर्थ-जिस परमात्मा ने तीक्ष्ण-स्वभाव वाले. सूर्य आदिक भूमि का धारण । जिस जगदीश्वरं ने सुख.. और मोक्ष को धारण किया है, जो आकाश में सब लोकलोकान्तरों को विशेषमान-युक्त -[ अर्थात् जैसे 'आकाश में पक्षी उड़ते हैं वैसे ] सब लोकों को निर्माण करता और भ्रमण कराता है; हम लोग उस सुख-दायक कामना.करने के योग्य पारब्रह्म की प्राप्ति के लिए सब सामर्थ्य से विशेष भक्ति करें ।। ५ ।। ओं प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिता वभूव । यत्कामास्तेज्जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥६॥ ऋ० मं० १० । सू० १२१ । मन्त्र १० ॥ अर्थ-हे सब मजाके स्वाभि परमात्मन् ! आप से भिन्न दूसरा कोई जन इन सब उत्पन्न हुए जड़ चेत- 'नादिकों को नहीं तिरस्कार करता है, अर्थात् आप . सर्वोपरि हैं, जिस २ पदार्थ की कामना वाले हम लोग आप का आश्रय लेवें और बांछा करें, उस की कामना इमारी सिद्ध होचे, जिस से हम लोग धन ऐश्वर्यों के स्वामी होवें ॥६॥ ओं स नो बन्धुर्जनिता स विधाताधामानि वेद भुवनानि विश्वा । यत्रदेवा अमृतमानशा- नास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥ ७॥ यजु० अ० ३२ । मन्त्र १०॥ अर्थ-हे मनुष्यो ! वह प्रभु हम लोगों को भ्राता के समान सुखदायक सकल जगत् का उत्सादक वह सब कर्मों का पूर्ण करनें हारा सम्पूर्ण लोक-मात्र और नाम स्थान जन्मों को जानता है और जिस सांसारिक दुःख सुख से रहित नित्यानन्द-युक्त मोक्ष स्वरूप धारण करने झारे परमात्मा में मोक्ष को प्राप्त होके विद्वान् लोग स्वेच्छा-पूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु आचार्य और राजा तथा न्यायाधीश है, हम लोग मिल कर सदा, उस की भक्ति किया करें।॥ ७॥ ओं अग्ने नयसुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराण- मेनो.भूयिष्टान्ते नम:उक्ति विधेम ॥ ८॥ यजु० अ०४० । मन्त्र १६॥

. ( ३.) अर्थ - हे प्रकाश तथा ज्ञान-स्वरूप ! सब जगत् को ज्ञान तथा प्रकाश देने हारे सकल सुख दाता परमेश्वर ! आप सम्पूर्ण विद्या युक्त हैं, कृपा-करके हम लोगों को विज्ञान का राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अच्छे धर्म-युक्त आप्त लोगों के मार्ग से सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराइये और हम से कुटिलता युक्त पाप रूप कर्म को दूर कीजिए, इस कारण हम लोग आप की बहुत प्रकार की स्तुति-रूप नम्रतापूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनन्द में रहें ॥८॥ नोट-उपर्युक्त माठ मन्त्र प्रत्येक स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध, युवा को कण्ठ होने चाहिए। अथाचमन मन्त्रः । ओं अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥१॥प्रथम आचमन 'अर्थ-यह सुखपद जळ प्राणियों का आश्रय भूत . यह हमारा. कथन शोभन हो । ओं अमृतापिधानमास स्वाहा ॥२॥ दूसरा आचमन अर्थ-यह निश्चय पोषक है। :ओं सत्यं यशः श्रीमयि श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥३॥ । इस से तीसरा आचमन) है,

अर्थ-मेरे मुख
अर्थ-मुझ में सचाई कीर्ति लक्ष्मी स्थित हो ।
नोट-इस के पश्चात् नि लिखित मन्त्रों द्वारा जल से
प्रों का स्पर्श करें।
अङ्गन्यासः।
ओं बाड्य आस्येऽस्तु । ( इस मन्त्र से मुख )
में वाग्न्द्रिय स्थित हो।
ओं नोंमे प्राणोऽस्तु । (इस से नासिका के छिद्र)
अर्थ-मेरे दोनों नासिका के छिद्रों में प्राण वायु वा-
घ्राणेन्द्रिय स्थिर हो।
ओं अक्ष्णोर्मे चक्षु रस्तु । ( इस से दोनों नेत्र )
अर्थ-मेरी आंखों में चक्षु इन्द्रिय स्थिर हो ।
ओं कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु । । इस से दोनों कान-)
अर्थ-मेरे दोनों कानों में श्रवणेन्द्रिय स्थित हो ।
ओं बाह्रोमें बलमस्तु । ( इस से दोनों बाजू )
अर्थ-मेरी दोनों भुजाओं में बल शक्ति हो ।
ओं ऊवोंमें ओजोऽस्तु ।। इस से दोनों जंधा)
अर्थ-मेरी जंघाओं वेग हो।

ओं अरिष्ठानि मे ऽङ्गानि तनूस्तन्वा मे सहसन्तु ( इस मन्त्र से सम्पूर्ण शरीर में मार्जन करना.) अर्थ-मेरा देह और मेरे देह के अवयव, अपहुत अवाधित हों। अथाग्नि होत्रम् । ओं भूर्भुवः स्वः। (यह तीनों ईश्वर के नाम हैं इन का अर्थ सन्ध्या में प्राचुका है) इस मन्त्र से द्विज गृह से अग्नि लावें अथवा कपुर में दीवासलाई लगावें। ओं भूर्भुवः स्वचौरिव भूम्ना पृथिवी वव्व- रिम्णा । तस्याते पृथिवी देवयजनि-पृष्ठेऽग्नि- मन्नादभन्नाद्यायादधे ॥१॥ यजु० अ०३। ०५ अर्थ-विद्वान् लोग, जिसं में यज्ञ करते हैं, ऐसी प्रसिद्ध पृथिवी जिस की पीठ पर अन्तरिक्ष और स्वर्ग- लोक में स्थित नक्षत्रों के बहुमूल्य से जैसे आकाश विराजमान है । ऐसे ही सर्वाश्रय-भूत पर्वादि अन्न को, भस्म करने वाले अग्नि को शुद्ध भक्षण योग्य अन्नो त्पत्ति के लिए मैं यजमान स्थापित करता हूं। - (इस मन्त्र को पढ़ कर अग्नि को रख दे) ओं उवुधस्वाग्ने प्रतिजाराहि त्वमिष्ठापूः- संघमंजेथा मयंच । अस्मिन्सधस्थे अध्मुत्तर- स्मिन् विश्वेदेवा यजमाश्चसीदत ॥ ( इस मन्त्र से अग्नि को सिलगावे) अर्थ-ई ज्ञान-स्वरूप प्रभो! यह अग्नि प्रगट हो और खूब प्रकाशित हो, यह यजमान और यज्ञादि कार्य और धर्मार्थ स्थान बनाना आदि शुम कार्यों को करे, इस अग्निं सहित स्थान में तथा इस से भी उत्तम स्थान में विद्वान् लोग और यजमान बैठे। समिधादानम् । ओं अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेने- ध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया प- शुभिब्रह्मवर्चसे नान्नायेन,समेघय स्वाहा ॥ (इदमग्नये इदन्न मम) (इस मन्त्र से १ समिधा की आहुति देना) * इस मन्त्र से घृत की आहुति दीजाय अगले । मन्त्रों से ३ समिधा की आहुति दीजाय, ऐसे भी कई एक विद्वान् मानत ह ।। .

( ४० ॥
अर्थ--इस अग्नि का यह काष्ठ आधार है, इस काष्ठ
से प्रदीप्त ही बड़े, और हम को भी ईश्वर बढ़ावे, काष्ठसे
पुत्रादि से पशवों से बड़ी कान्ति से . तथा अन्नादि से
भली प्रकार वढ़ावे।
ओं समिधाग्निं दुवस्यत घृतैवोधयताति:
थीम् आस्मिन् हव्या जुहोतन स्वाहा।
( इदमग्नये इदन्ने मम)
अर्थ-हे विद्वान् लोगो ! तुम लकड़ियों से अग्नि को
सेवन किया करो और इस अग्नि को अतिथि के तुल्य.
समझ कर घृतादिकों से प्रकाशित करो, इस ‘अग्नि में
सर्व प्रकार का शाकल्य होमो [ डालो ] ।
ओं सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्र जुहोतन
अग्नये जातवेदसे.स्वाहा ॥
(इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम )
अर्थ है मनुष्यो ! अच्छे प्रकार जलाए हुए शुद्ध
दीप्त वाले सवों में विद्यमान् अग्नि के लिए सब प्रकार
सुद किए हुए घृत को हो ।

' (.४१ ओं तन्त्वा समिद्भिरंगिरोघृतेन वर्द्धयामसिं वृहच्छोचायविष्ठय स्वाहा ॥. (इदमनये अङ्गिरसे इदन्न मम, इस से तीसरी समिधा। अर्थ--सब को. प्राप्त होने वाला वा गमनशील अग्नि गार्हपत्य आहवनीय आदि रूप से प्रसिद्ध है, इस को समिधाओं से धृत से बढ़ाओं प्रकाश छेदनादि गुणों के कारण बढ़े और अति, बलवान् प्रकाशित हो। ओं अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्द्धस्व चेद्ध वर्धय चास्मान् प्रजया पशुभि- ब्रह्मवर्चसे नान्नाचेन समेधय स्वाहा । (इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम) इस मन्त्र से५ धृताहुति देना। निम्नलिखित मन्त्रों से वेदीके चारों और जल प्रवाह करें। ओं अदितेऽनु मन्यस्व । ( इस मन्त्र से पूर्व में ) अर्थ-हे अखण्डनीय परमात्मन् आप हमें अहिंसादि सम्पादनार्थ अनुकूलमति दीजिए। ओं अनुमतेऽनुमन्यख । ( इस मन्त्र से पश्चिम ) अर्थ-हे अनुगत व्यापक ज्ञान स्वरूप! अनुकूल- भति दीजिए। * इस मन्त्र का अर्थ पीछे आचुका है। " ( ४२ ) ओं सरस्वत्यनु मन्यस्व । ( इस से उत्तर दिशा में) अर्थ-हे प्रशस्त ज्ञान स्वरूप ! अनुकूलपति दीजिए। ओं देव सवितः प्रसुव यज्ञ पति भगाय दिव्यो गन्धर्वः के तपुः केतन्नः पुनातु वाचस्प- तिर्वाचनः स्वदतु ॥ यजु दक्षिण दिशासे चारों ओर अर्थ--हे प्रकाशक सर्वोत्पादक ईश्वर ! आप ऐश्वर्य के लिए शिल्पादि विविध यज्ञों को उत्पन्न कीजिए भौर यज्ञों के पालक राजा का भी उत्पन्न कीजिए। आप शुद्ध पृथिवी के धारक विज्ञान के पवित्र की हो, हमारी चुद्धि को पवित्र करो और आप वाणी के स्वामी हो, अतः हमारी वाणी को शुद्ध वनाओं। अथ आधारावाज्यहुति। ओं अग्नये स्वाहा । इदमनये. इदन्न मम ॥ (उत्तर में माहुति.देनी चाहिए) अर्थ-प्रकाश परमात्मा के लिए वा भौतिक अमि. के लिए सुहुत हो। ओं सोमाय स्वाहा । इदं सोमाम इदन्न मम ।। (दक्षिण में प्राहुति देना)

अर्थ -सोम रसादि के लिए वा परमात्मा की प्री-
त्यर्थ सुहत हो।
ओं प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये इदन्न मम ॥
(मध्य भाग में)
अर्थ-प्रजाओं के पालक के लिए सुहुत हो ।
ओं इन्द्राय स्वाहा । इदमिन्द्राय इदन्न मम ॥
(मध्य भाग में)
अर्थ-ऐश्वर्य सम्पन्न के लिए सुहुत हो ।
व्याहृति आहुतियां।
ओं भूरग्नये स्वाहा । इदमग्नये इदन्न मम ॥
अर्थ--अग्नि रूप ईश्वर के लिए सुहुत. हो ।
ओं भुवायवे स्वाहा । इदं वायवे इदन्न मम ।।
अर्थ-चायु रूप व्यापक ईश्वर के लिए सुहुत हो।
ओं. स्वरादित्याय स्वाहा । इदमादित्याय इदन्न मम।।
अर्थ-आदित्यवत् प्रकाशक ईश्वर के लिए सुहुत हो ।
प्रातःकाल के मन्त्रः॥
ओं सूर्योज्योतिज्योति सूर्यः स्वाहा ॥
१

(४४.)
अर्थ-[ सूर्य ] चरों का आत्मा परमेश्वर ! ज्योति-
योतिः ] चमकीले पदार्थों का भी प्रकाशक [ सूर्यः]
च्यापक परमेश्वर ! (ऐसे परमेश्वर की आज्ञा पालन
करके सारे जगत् के उपकारार्थ एक आहुति देता हूं:)
ओं सूर्योवच्चोज्योतिर्वचः स्वाहा ।।
अर्थ-[ सूर्यः ] तेनमय परमेश्वर ! [ वर्चः] विद्या
विज्ञान प्रकाश के देने हारा है, [ज्योतिः ] सूर्य प्रकाश
जिस प्रकार सर जगह फैल जाता है, वैसे ही परमेश्वर
[ वर्चः ] ब्रह्मतेज देने वाली विद्याओं का प्रचार हम से
करावे ।
ओं ज्योतिः सूर्यः सूर्योज्योतिः स्वाहा ।।
अर्थ-[ सूर्यः ] सारे संसार में प्रकाश करने वाला
है, [ सूर्यः ] सारे संसार का पति है, ज्योतिः] प्रकाश
वथा ऐश्वर्या का दाता है, ऐसे प्रभु की प्रसन्नता के
लिए हम हवन करते हैं।
ओं सजुर्देवेन सवित्रा सजुरुषसेन्द्रवत्या-
जुषाण सूर्यावेतु स्वाहा ।।
अर्थ- देवेनप्रकाश डालने वाली [ सवित्रा]
ब्रह्मबुद्धि से [ उपसा, इन्द्रवत्या ] सुन्दर रङ्ग विरङ्गी
-1

(४५)
उषा के साथ [ सजुः ] मिला हुआ [ सूर्यः ] सूर्यलोक
[सजुः ] सब जगह वरावर [जुषाणः । सेवन करता
हुआ व्यास होकर हवन किए हुए पदार्थों को आनन्द से
[ वेतु] दूर २ पहुंचाने के लिए ग्रहण करें।
सायङ्काल मन्त्रः॥
औं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ॥
ओं अग्निर्व!ज्योतिर्वर्चः स्वाहा ॥
ओं अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा ।।
ओं सजदेवेन सवित्रा सजुरात्रेन्द्रवत्याजु-
षाणो अग्निर्वेतु स्वाहा * ॥
प्रातःसायं दोनों समय आहुति
देने के मन्त्रः॥
ओंभूरग्नये प्राणाय स्वाहा ॥इदमग्नये प्राणाय इदन्नमम
* इन सायंकाल के मन्त्रों में सूर्य की जगह अग्नि शब्द प्रयुक्त
किया गया है, क्योंकि सूर्य के अस्त होने पर यदि कोई ज्योति है तो
यह अग्नि ही है शेष शब्दों का बही अर्थ है । जो प्रातःकाल के मन्नों
का है।

-
अर्थ-यह इविः उस अग्नि के लिए है, जो हमारा
भाण है।
ओं भुवायवे खाहा ॥ इदं वायवे इदन्न मम ।।: .
अर्थ-यह हवि उस वायु के लिए है, जो हमारा
अपान है।
ओं स्वरादित्याय स्वाहा ॥ इदमादित्याय इदन्न मम।।
अर्थ-यह हवि उस सुख-स्वरूप आदित्य के लिए
है, जो हमारे व्यान को शुद्ध करें।
ओं भूर्भुवः स्वरग्नि वायव्यदित्येभ्यःप्राणापा-
नव्यानेभ्यः स्वाहा ॥ इदमनि वाधवादित्येभ्यः
प्राणापान व्यानेभ्य इदन्न मम ।।
अर्थ-अग्नि, वायु, आदित्य परमेश्वर हमारे माण.
अपान, व्यान को बल-युक्त करके शुद्ध करें।
ओं आपोज्योति रसोऽमृतम् ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम
अर्थ-[ आपः ] शान्त [ ज्योतिः ] प्रकाश-स्वरूप
[ रसः ] मनुष्य स्वरूप [ अमृतम् ] अमृत [ब्रह्म] बड़ा
[भूः) सर्वाधार [प्राण ] 'भुवः सर्वव्यापक [ अपान ]
'स्वा सुख-स्वरूप।

.. इस मंन्त्र में परमेश्वर के नाम लेकर माहुति दी गई हैं
ओं यां मेधाम् देवगणाः पितरश्वोपासते
तया मा मद्य मेधयाने मेधाविनं कुरु स्वाहा ।।
अर्थ-[ यां] जिस बुद्धि को देवगण पितर लोग
धारण करते हैं, उस सात्विकी बुद्धि से मुझ को आज
हे प्रकाश स्वरूप ईश्वर ! मेधा युक्त कीजिए।
ओं विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद्भद्रं तन्न आसुव ।
अर्थ- हे देव शुद्ध स्वरूप परमेश्वर ! आप कृपा
करके हमारे सम्पूर्ण दुर्गुण दुर्व्यसन और दुःखों को
दूर कीजिए, जो कल्याण कारक गुण कर्य स्वभाव और
पदार्थ हैं वह सब हम को दीजिए ।
ओं हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातः
पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवीं द्यामुतेमा'
कस्मै देवाय हविषा विधेम ।।
अर्थ- जो स्त्र प्रकाश स्वरूप और जिस ने प्रकाश
करने हारे सूर्य चन्द्रादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण

( ४ ) किए हैं, जो उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रसिद्ध स्वामी एक ही चेतन-स्वरूप था जो सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व वर्तमान था। सो इस भूमि सूर्यादि को धारण कर रहा है, हम लोग उस शुद्ध स्वरूप पर- मात्मा के लिए ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अंति प्रेम से विशेष भक्ति किया करें। ओं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भगों देवस्य धीमहिधियोयोनः प्रचोदयात् । स्वाहा ।। (इस मन्त्र का अर्थ पीछे सन्ध्या में आ चुका है.) ओं सर्वं वै पूर्ण छ स्वाहा ॥

(.)
* प्रार्थना *
हे ति नाच प्रमो जब आप हमारे अयांत हदयों में प्रगट
होवोगे तमी हमारे अशांत हदय सुद भाव को छोड़कर शांत
होंगे, और सभी हमारे हदय से काम क्रोध जो दुःख दायक
पत्रु हैं वद छिन्नमित होने । और शांतिदेवी अपना प्रासन
विज्ञा कर विराजमान होगी। है पिता! इस भवसागर में
प्रापक विना और कोई हमें शांति दाता नहीं है । हे प्रमो!
इस दुन्त रुप संसार में ऐसा कोई हमारा प्यारा यन्धु नहीं
है जो हमारे दुःख भरे कमयााकन्दन को सुनकर धीरज और
ति दे। दयामय ! इस शमय संसार में हमारा प्रात्मा
जो कम्पायमान दोरहा है। इसको सहारा देने द्वारे एक मात्र
भार ही है। इसलिये है शांति विधायक! आपको छोड़कर
और किससे शांति मिक्षा मांगे।
यदि किसी सांसारिक मनुष्य से मंगते हैं, तो वे भी
हमारी ही तरह प्रांत होरहे हैं । इसलिये वे सुखदायक
पिता धाप ही प्रीतापमय प्रज्वलित ज्वाला से. जलते हुओं
को पांत कर सकते हैं। आप ही तृष्णा कपी अग्नि से जलते
एमों को अपनी दयारूपी जलकी वर्षा से शांत करोगे। हे
प्रभो ! विषय भेग रूपी भग्नि से तपते हुओं को पचाने वाला
और कोई नही है। पाना प्रथम प्रापने भनेक ऋषि मुनियों
को गति दी है। प्रभो भाप सो शांति के निधि हैं । हम माप
को स्थागकर कही जावें और अपने सात प्रात्मा को कहां.
-
.
गांव करें।

M 1. '५० ) पिता जी इस कष्ट सागर में पड़े हुए चिता रूपी अग्नि में जलते नो स्वार्थरूपी भूभल में लिपटे हुओं अमान की रात्री में सोते हुओं और अधर्मरूपी सप्त में तपते हुंगों को 'आपके विना कौन सुख शांति देने वाला है, करुणानिधै। इस 'भयंकर समय में यदि आप हमारी सुध नः वेंगे तो हम दुःख सागर में टुकड़े होकर गिर जावेंगे तो फिर बताईये आपकी करुणा किस काम प्रावेगी? हे दीन जन सहायका माप हमारे पिता है हमे पूर्ण पाया है कि आप अपने पुत्रों की प्रार्थना अंधश्य श्रवण करेंगे, अयांत हृदयों को शांत करेंगे। हे मंगल- मूर्ने! जो मनुष्य सांसारिक आश्रयों को छोड़कर प्रापका सयों यांचंक बनकर पाप से प्रार्थना करता है, वह कैसा ही प्रशांत क्यों न हो भाप उसे एक बार तो शांति का प्रसाद दे ही देते हैं, और सुखमय कर देते हो । इसलिये हे अमरत्व दाता, पिता आप हमारे हृदय कमल में अपना आसन स्थापन करो, जिससे हम आपके स्वरूप का अनुभव करते हुए पारंम्बार यापको नमस्ते करें। हे जीवन दाता। आप हमें सुगुण गुणों से सुभूषित करो। हाय २ पिता जी हम कैसे मन्दभाग्य है कि हम सां सारिक तुच्छ नर नारियों के भय से तो पाप करने से बचते है, परन्तु . आपकी शक्ति जो. सर्वत्र व्याप्त है, उससे निर्मय होकर मन माने कुकर्म और पाप कर.रहे हैं। पिताजी ज्यू र आप से निर्भय होते हैं, त्यू २ दुःखों का पर्दत हमारे ऊपर माता है। ममो धन्य है उस नर नारी को जिसे प्राप जी. जब तक हो का.मय है तथा जो आपकी महिमा को हराते संपनी जीभ सें भापका मधुर नाम लेकर अपने प्रापको पवित्र करते है। सुमार्ग प्रकायक प्रभो! आप हमको पलर बारम्बार याद करन्न सिखलाओ, और विषय सुखों से हटाओ,प्रभो विषय सुखी मनुष्य को धर्म के मार्ग से गिराने वाले हैं प्रभु हम विषय सुखों में लिप्त रहेंगे तब तक सन्मार्ग प्राप्त होना कठिन है। हे सन्मार्ग प्रदर्शक इस दुःख रूप भयानक मार्ग से निकालकर अपने आनंदमय सुमार्ग में चलामो, भों शांतिः ।। भजन । प्रभू चांद मैं हूं चकोरा। तुम हो कमल फूल मैं रसका भोरा। - ज्योति तुमारी का मैं हूं पतंगा। आनंद घन तुम ही मैं बनका मोरा ॥१॥ जैसे है चुम्बक की लोहे से प्रीति । आकर्षण करे मोहे लगातार तोरा ॥२॥ पानी बिना जैसे हो मान व्याकुल । ऐसे हि-तड़फाचे तुमरा विछोड़ा ॥३॥ इक बूंद. जलका में प्यासा हूं भगवन । अमृत की करो.वर्षा हरो ताप-मोरा ।।४।।

- .. (:५२ ) हे जगत माता! 'आप को धन्य है, आप गिरतों को सहारा देने वाली हो । हम निराश्रय आप की धरण प्राप हम निर्दोष निरंपराधियों को निकृष्ट दशा से निकालने वाला अापके बिना और कौन है.। हेमातः ! हम सब भाई दुर्व्यसनों दुराचारों से दुःखित सुविन तृषित खेधित दीन हीन और पराधीन होकर आप की ओर निहार रहे हैं, इस नीच दया में हमारा लालन पालन करने वाला प्राप के भरितिक और कोई नहीं है, इसलिए हम निल्त्साही, निर्दल तेजहीन होकर श्राप की शरण आए हैं । आशा.है आप हमारे कोटानकोट पापों पर इंष्टि न डाल कर. अपना सहारा दोगी । हे जग- ज्जननि 1 हम आप की आज्ञा उलङ्घन करने वाले कुपात्र पुत्र होगए हैं । लेकिन हमें आशा है कि अवश्य करुणा करोगी, और अनाश्रय सन्तान को अपना धाश्रय दोगी। क्योंकि कुमाता भी अपनी सन्तान ले प्रेम ही किया करती है, और श्राप तो हमारी सुमाता हैं। इस अनाथ चालकों का आपके बिना कोई रक्षक नहीं है, कोई दुःख समुद्र से उद्धार करने वाला नहीं है, आप ही अपनी प्रबल भुजा से उद्धार करो। हे विश्वपालिनि तो हमारे सुधार के लिए कोई यत्न शेष नहीं छोड़ा, सृष्टि की प्रादि में ही शिक्षा का भण्डार वेद ऋषियों से प्रात्मा में दिया, यह तो हमारा ही अपराध है कि ऐसी पवित्र सुख- : मयी पुस्तक का पढ़ना पढ़ाना, 'सुनना सुनाना त्याग कर विषयों में प्रमत्त हुए २. पशु-जीवन व्यतीत कर रात दिन तुमने

(५६)
दुर्गति को प्रास होते चले जारहे है । परन्तु प्राप के सिवाय
इस नीच अवस्था से निकाल कर सुख-धाम में लेजाने वाला
नहीं है । यदि हम स्वयं इस , समुद्र से निकलने की चेष्टा
करते है और ज़रा भी पैर उठाते हैं तो अपनी निर्वलता के
कारण गिर कर वहां के वहां ही फंसे रह जाते है।
जब से हम ने माप का माश्रय त्यागा है, तभी से इन
मलीन विषयों में पड़ कर हमारा उत्तम जन्म व्यर्थ जारहा है
और आप को विलकुल भूल से गय हैं । जगन्नाथ । अब हम
इस दशा में क्या करें, कौन यत्न करें, किस का घाश्रय ले,
जिस से कि इन दुर्व्यसनों से छुटे । पिता जी ! अव तो आप
की-ही प्राशा पाप का ही पाश्रय और आप का ही भरोसा
है । हे दीनदयाल । हमारा अन्तिम शब्द सुनो दुःखों से
निकालकर सुखाश्रय में ले चलो, जहां हमारे मात्मा को
परम आनन्द मिलें । प्रभो ! हमारी सूखी मुझाई हुई हृदय
बाटिका को प्रफुल्लित करो । हे विश्वनाशिनि-! हमारे प्रा-
त्माओं में सत्य सनातन वैदिक धर्म का दृढ़-विश्वास स्थापित
करो, ..जिस से हम अनाथ वालक संसार में मानन्द-पूर्वक
जीवन व्यतीत करके अपने देश, जाति, कुटुम्ब, इष्ट, मित्रों के
सुख के हेतु हो।
हे भक पालक ! आज हम सशी भक्ति से प्रेम-पूर्वक
पाप के सम्मुख पाना चाहते हैं । परन्तु क्या करें हमारे
शिर पर अधर्म का बोझ घरा हुआ है। उस से दये हुए
पाप की तरफ चल नहीं सकते, इस जिए हमारे जन्म के
.

संगृहीत पाप कर्मों के भार से छुड़ाने वाला आप के विना.
कौन है । प्रभो ! इस विश्व में प्राप के सहारे बिना हमारा
सहारा नहीं है। हमारा तो पाप पर ही भरोसा है। पिता
जी । जैसे चिमनी को चारों ओर से स्याही मलीन कर देती
है सही अनेकानेक पापों ने हमारे प्रात्मा को ढक लिया है।
इस ढकने को आप के सिवाय और कौन दूर करने वाला
। हे ज्योति-स्वरूप! हम आप से यही विनय करते हैं
कि याप हमें ऐसा घन तथा पराक्रम दो, कि जब 'जब
हमारा पाप से युद्ध हो तब २ हमारी विजय हो। और उसे
से उखाड़ दें । प्रभो! बिना'माप के यल दिए कोई
कितनी ही तेजस्वी, प्रतापी वली, राजाधिराज योद्धा क्यों न.
हो, यह सब को अपने हस्तगत कर लेता है। परन्तु जो
भाप का सञ्चा-भक्त है, यह उन के समीप तक नहीं पाता।
अतः आप हम को अपना सञ्चा-भक बनाओ, जिस से हम
पापों से अलग रहें । पिताजी! आप के सिवाय हम निर्बल
चालकों का कौन शब्द सुनेगा, और कौन प्रेम करेगा। पिताजी
पिता के बराबर और कौन लालन पालन कर सकता है ।
अखिलेश! जैसे मापने वाह्य प्रकाश के लिए सूर्य उत्पन्न
किया है। ऐसे ही हमारे हृदय में भी ज्योति प्रगट करो,
जिस से हमें अपने शुभाशुभ कर्म मालूम हो जायें, और
अंथुम कर्म का त्याग शुभ कर्म करते हुए अपने मानव जीवन
को व्यतीत करें। हे सचिदानन्द हम भाप से सांसारिक
सुखों की याचना नहीं करते हैं। हमारी याचना कुसंग
..

(. ५५ । कुमार्ग कुष्टा,मादिक कर्मों के निवृत्यर्थ है, या पाप के सभी भक बनने के निमित है भजन [धनाक्षरी ३ ताल] प्रभु मेरे अब तो क्लेश हरो। दुःख भंजन तेरो नाम सुनत हैं इसलिए कष्ट हरो ॥१॥ पाप प्रवाह में बहे जात हैं, अब प्रभु ध्यान घरो ॥२॥ शरण 'आप की हम शरणागत, मत प्रभु क्रोध करो || भक्त तिहारे हम सब, स्वामी किरपा हम पै करो ॥४॥.. चन्द्रभानु अति दुखिया होकर, आप की शरण परो ॥५॥ यतोयतः समीहसे ततो नो अभय कुरु- शंनः कुरु प्रजाभ्यो अभयं नः पशुभ्यः। हे भय निवारकपिता! जहाँ २ पाप चष्टा करते हैं।' वहां से हम को निर्भय करो, हम सब घोर से भयों से व्याकुल होकर प्राप की शरण में प्राए हैं, इस लिए भाज अभयदान देने के लिए हमारे सामने प्रगट हो जाओ, और सब-भयों से रहित कर अपनी अभय गोद में स्थान दान दो यदि यह दान हम किसी सांसारिक मनुष्य से मांगते हैं, वो पद भी यही कहते है कि हम स्वयं भयभीत हैं। हे भय भक पिता हम जिस समय दुःखों से पीड़ित होते हैं, तो संसार में कोई भी हमारा रक्षक रष्टि नहीं मातो। यदि हम ( ५ ) किसी को अपना रचक समझ कर पुकारते हैं, तो यह अनेक प्रकार के भयों से भयभीत हुआ २ हमारी प्रार्तनाद को नहीं सुनता, परन्तु जब हम जरा.भी शाप का ध्यान करते हैं और रोते हुए पाप की शरण में प्राते हैं, तो तत्काल इन पशुओं से बच जाते हैं। परन्तु पिताजी हम ऐसे हतःभाग्य है कि अभय होते ही माप को फिर भूल जाते हैं, और दु- कर्मों में लग कर फिर दुःखी होते हैं । इस लिए, हे नायक प्रभो ! जिन कुकर्मों को हम आप से भिन्न होकर करते कृपा कर उन कर्मों से पृथं करो, और जिन सुकर्मों से हम सर्वथा समय हो सकते हैं, उन कर्मों में हमें प्रवृत्त कीजिए। केवल आप का ही भय हमारे अन्तःकरण में हो । यदि हमें प्राप का भी भय न रहा.तो हम फिर अधर्म में प्रवृत्त हो जायगे रोयेंगे पाटेंगे और हाय २ करेंगे। जिस के हृदय में मभुजी आप का भय होता है, वह पुरुष कभी दीन दुःखी नहीं रहता, वह कभी दुष्कर्म नहीं करता । पित्ताजी! आप की : माशा पालन करने में ही निर्भयता प्राप्त होती है, श्राप के. संहारे बिना और कोई भी पदार्थ नहीं जो अमय दे, सभी पदार्थ भय से लिथड़ पिथड़ होरहे हैं।' पिताजी ! जैसे जङ्गाल के जीव धिकारियों से भयभीत होकर भयानक जंगल की शरण लेते हैं । तथाहि, हम मृत्यु धादिक प्रवल भयों से कम्पित होकर भाप की शरण में आए. है, आप अपने पुत्रों को निर्भय करो। पिताजी! इस संसार- में चोरों से, जारों से, धूतों से, बलियो से, कपटियों से, .

'मर्मियों से मार विषधारी जीव जन्तुओं से रात दिन भय, ही भय दिखलाई देता है । पिताजी ! जहां तक गिनवावें, "माप के माश्रय बिना पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण अघर 'अपर भय ही भय है। परन्तु जो प्रापं के प्राश्रय हैं, जिनके पाप रक्षक हैं, यह मनुष्य सुख-पूर्वक इस संसार रूपी वागांचे में विचरता है। इस लिए हे पिताजी ! रक्षा करो, हमें आप का विश्वास हो, हम.पाप के सच्चे-भक्त बन कर रहें । अनामय हे भक्त 'भयभञ्जन, दीनजन सहायक, कृपानाथ हमारी इस प्रार्थना को स्वीकार कर कहो, तथास्तु तथास्तु तथास्तु | ओं शांतिः ३॥ भजन पिताजी तुम पतित उधारनहार । दीन शरण कंगाल के स्वामी, दुःख के मोचनहार ॥१॥ इस जग माया जाल भ्रमण में, मुझे न सार असार ॥२॥ सत्य ज्ञान विन अन्ध सम ढोलें, करें असत्य आचार ॥ पाप प्रवाह भयङ्कर जल में, डूबत हैं मंझ धार ॥५॥ तुमरी दया विन को समरथ है, करे दनिन को पार ॥४॥ हे धर्म मेरक पिता! हम धर्म रहित अपनी सन्तान को 'धर्मपथ पर चलाओ, अन्यथा हम शीघ्र मृत्यु के मुख में चलें जायेंगे। पिताजी ! धर्म रहित होकर, हमने बहुत कष्ट उठाये मेव हम धर्म से अलग रहना नहीं चाहते, कृपा कर ऐसा.बबंदों कि जिस से हम अधर्म को पराजित करें। जा .

हे जगदीश्वर! भाप की. कृपा हष्टि बिना इन निवल सिणं भधर्म रूपी खन्दक में गिर जावेगे, न जाने फिर हमारी, क्या. गति होगी। पिताजी ! बड़ी कठिनता से जन्म जन्मान्तर के कुसंस्कारों से दग्ध हुए.२ पाप की शरण माये हैं। इस हमारे असंस्कृत आत्मा को धर्माऽमृतपान करामो। दयामय, यदि आप इस समय धर्मरूपी भमृत न. पिलामोगे तो यह अधर्म लपी व्याल अपने विकपल गाल में धर दवाएगा: इस लिए धाप ही रक्षा करने वाले हैं, आप ही गिरतों को उठाने वाले हैं, आप ही डूबतों को तराने वाले हैं, पाप हो अधर्म की खट्वा से उठाकर वैदिकधर्म की शय्या पर सुलाने वाले हैं, आप ही अधर्मियों के जाल से छुड़ाकर स्वतन्त्रता देने वाले में, आप ही स्वतन्त्रता देकर सर्वोपरि बनाने वालें हैं। इस लिये हम आप ही शरण प्राये हैं। आप ही हमारी विनय सुनकर इच्छा पूर्ण करोगे, पाप हो धार्मिक वन दोगे, जिस से हमारा अन्तरात्मा मलिन वृत्ति, मलिन इच्छा फुचेष्ठा तथा कुसंस्कारों से अलग होकर और सत्य सनातन वैदिक धर्म पर प्रारूद होकर परमानन्द. को प्राप्तं हो, इस लिए आप अपने कोश से धर्म धन देकर धनी करो, ग्राप ही. हमारे सना हैं। ग्राप ही हमारे मालिक है, भाप हो हमारे गुरु हैं, भाप ही हमारे प्राचार्य हैं, भाप ही रक्षक, स्वामी दाता है। हम ने तो कभी भी धर्म पर ध्यान नहीं दिया, हम प्रशानी पालक किंस प्रकार धर्मारमा हो सकते हैं, हम तो मापसे मांगना भी नहीं जानते कि किस प्रकार मांगे, क्या

सद योखें, जिससे कि भाप खुश होकर मिला दें। प्रभुजी।
हमें यह बुद्धि.दो, जिस को धारण करके हम माप की
प्रामा पालन करते हुए, प्राप के कृपा पात्र बनें । हेवृहस्पति।
यह हमारी इच्छा पूर्ण होनी हमारी शक्ति से तो बाहर हैं,
क्योंकि हमारा प्रात्मा अधर्म से भरा हुमा है, वह कर धर्म
की ओर जासकता है । हे सर्वेश्वरप्राप की सहायता
बिना इस कठिन मार्ग पर चलना कठिन है । पिताजी। हम
तो तभी इस. कठोर मार्ग पर चल सकते हैं, जब प्राप
हमारे अपवित्र हृदयों में अपना पवित्र मासन स्थापित
रोगे, और हम दुर्बलों को बल दोंगे तथा अपनी भक्ति में
लगानोगे । हे त्रिलोकेश्वर हमें माशा है कि आप हमारी
प्रार्थना को सुन कर और स्वीकार करके शक्ति दोगे, क्योंकि
श्राप के भिन्न हमारा और कोई सखा और कोई मित्र तथा
और सहायक नहीं है, जो हम को अधर्म से हटाकर धर्म
'पोर प्रेरे, अधर्म के कारागार से निकाल कर प्यार करें ।
पिताजी 1. जिस की ओर जाते हैं, वहीं, घृणा की दृष्टि से
देखता है, इस भापति दशा में पिताजी और कोई हमारा
रक्षक सहाय और धर्म प्रेरक नहीं है । रक्षा करो पिताजी,
बना करो, धन्य हो धन्य हो, पिताजी भापका प्रेम धन्य हो।
भों यांतिः! शांतिः !! शांतिः ॥

(१०) भजन अन्त समय में हे जगदीश मुझ को, तुमरा ही सिमरण तुमरा ही ध्यान हो। लवलीन हो तुझ में चिंत्त वृत्ति मेरी । नब तक के श्वासों में प्राण और अपान हो ॥१॥ योगी के सदृश लगाऊं समाधी । ओंकार अक्षर का वाच्यार्थ.सान हो ॥२॥ न शोक हो न मोह हो न ममता किसी में । न पीड़ा हो तन को न कुछ दुःख भान हों ।३॥ मेरे आत्मा का निवास हो वहां पर।. जहाँ तेरे सुख सल्पत का उत्तम स्थान हो ॥४॥ हे दीन वन्धो! हम अन्धकार में पड़े हुओं को अपनी ज्योति का दर्शन दो, हम सविनय आप को नमस्ते करते भाज हम सब भायंगण पाप के पास अपनी दीनंता दरि गता सुनाने भाप है, आज हम सब आर्यगण आप के द्वार पर अपनी निर्बलता सुनाने प्राए हैं। कृपा करके हम अधीर निर्वलों को धैर्य दो, जिस से कि हम कष्टों के माने पर अधीर दुःखी मुहमान न होकर भाप का चिन्तन करते हुए, 'मानन्द-पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करें । हे सर्वाधार! संसार में सव को सहारा मिल सकता है । परन्तु निर्बल चीन पराधीन पुरुष को प्राप के भिन्न और कोई धरण देने

(६१ )
वाला नहीं है, क्योंकि आप दीनदयाल दीनानाथ और दीन..
पाल, हैं । इस लिए पिताजी! जो आप के दासों का दास
होकर आप की शरण लेता है, उस को-दामुज किसी प्रकार
का दुःख नहीं होता और जो मनुष्य आप का परित्याग
करके और किसी मूर्त्यादिक से प्रार्थना करता है, उस को
लेशमात्र भी सुख नहीं होता । हे पिताजी! हम तो इतने
अवगुणों भरे हुए हैं कि मारे शर्म के प्राप के पास भी नहीं
भासकते, यदि आभी जाय तो शब्द उच्चारण नहीं करसकते,
क्योंकि हम पापी.और कृतघ्न है । पिताजी ! जब हम आप
भकों की और अपनी पया को अवलोकन करते हैं, तो
कृथिवी माकाश और दिन रात का अन्तर पाते हैं, हमें तो
चारों मोर शोक समुद्र प्रज्ञान तथा अन्धकार के अतिरिक
और कुछ भी हष्टि गोचर नहीं होता, दममय जब हम आप
के उपकारों को स्मरण करते हैं, अपनी कृतघ्नताको विचारते
हैं तो हा हाकार के सिवाय कुछ नहीं बनता । पिताजी।
भाप की प्राज्ञा उलङ्घन करके किस प्रकार आप के सन्मुख
मा सकते हैं और किस मुख से शब्द उच्चारण कर सकते हैं
धिक्कार है हमारे जीवन-को कि हम प्राप को सर्वश.सर्वद्रष्य
मान कर भी पाप करते हैं, और फिर बनना चाहते हैं ।
खरे पिताजी। हम प्रारं की सन्तान हैं । दया करो, फिर
ऐसा नहीं करेंगे । हम बुरे हैं भले हैं, ऊंच हैं या नीच हैं,
धर्मात्मा हैं यां पापी हैं, जो कुछ है सो आपके हैं, हमारे

3
२)
'रक्षफ आप है, अब तो रोते हुए भाप के ही पास भाप
इमारी भाषाज़ को आप के बिना कोई नहीं सुन सकता,
कोई विपत्ति से नहीं निकाल सकता, कोई सदति नहीं
सकता, और कोई दया नहीं कर सकता, इस लिए कृपा करी
छपा करो, कृपा करो। भो'शांतिः ३
:
भंजन
पिता. परम सुनिए विनय इक हमारी।
द्वारे पै तेरे हैं आए भिखारी ॥
अति क्लेश से हृदय पीड़ित हमारे । ..
विपत्ति न हम से जाये सहारी॥१॥
है अज्ञान का तिमिर हम सब पै छाया।
दिखाई न देवे है ज्योति तुमारी ॥२॥
असत्य और मिथ्या का लीना सहारा।
कपट दम्भ से आयु सारी है हारी ।।३।।
विषय भोग में गत दिन को विताया।
स्वार्थ ने है. सुध बुध सारा विसारीं ॥ ४॥
दुराचारी दुष्टों का साथ हम को भाया ।
धर्मभाव से सर्वथा हुए आरी॥५॥

- ३ सर्वज्ञ तुझ से भला क्या कहें हम । मनीषी हो तुम जानो अन्दर की सारी ।। ६ ।। आज्ञा तेरी भंग करते रहे हैं। पिता मूर्खता हम से हुई है भारी ॥ ७ ॥ तेरा नाम है पतित पावन दयामय । लेओ शरण में हम को आनन्दकारी ॥८॥ तेरे-यश को गावें सदा सारे रल मिल । होवे अन्त में वास तुझ में हमारी ॥९॥ हे हृदयेश्वर! आज हम सम्पूर्ण भ्रातृगण मिल कर असत्य मार्ग पर चलते हुए दुःखी होकर सत्य की भिक्षा मांगने के लिए आए हैं, आप सत्य स्वरूप हो, जो कुछ 'संसार में सत्य प्रतीत होता है, यह सब आप ही से हैं, संसार में जो नरनारी प्राप से सत्य ग्रहण करके उस के आश्रय रहता है, पंह यावत् दुःखों से छूट कर अमृत को माप्त होता है। इस लिए पिताजी! हमें इस मन्त्र का पाठ (करामो। असतोमा संगमय तमसोमा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतगमय ।

(. हे भक जनेच्छा पूरक हमें असत्य मार्ग से अलग कर सत्य की और बेजाइये ! हमारी सूखी हुई हदय रूप भूमि में सत्य का प्रवाह प्रवाहित कीजिए, जिससे हम सब भार्य- पण सत्य के बन्धन में बन्ध जाय। 'पिताजी जिस प्रकार" किसी खाद्य पदार्थ में मक्खी गिर जाने से बह घृणित हो जाता है तिस ही प्रकार यह अापका दिया पवित्र मनुष्य जन्म विना सत्य के घृणा स्पद हो रहा है: पिता जी व्यव हमें अधर्म के गढ़े से निकालकर अपने सत्य धाम का निवास: दीजिये । हे प्रभु! हमें सत्य के बद्ध से चली करो, जिससे आपकी महिमा का प्रचार करने में सामर्थ्य हो, पिता जी जिस हृदय में सत्य नहीं यह हृदय शून्य है, जिसके आत्मा में आपका विश्वास नहीं उसे कहीं शांति. नहीं, पर जिधर देखता है, महा घोर अंधकार. दिखलाई देता है, उसका हृदयं निन्दित तर अधर्म अत्याचार और असत्य की अग्नि से विदग्ध रहता है पिता जी मनुष्य इस संसार में संपूर्ण ऐश्चर्य सम्पूर्ण सम्पत्ति का मालिक हो सकता है, पंडित भानी ज्ञानी धनवान होकर संसार में ययस्वी भी हो सकता है। परन्तु आप के अटल विश्वास विना संसार में शांति को प्राप्त नहीं हो सकता ।. दीनबन्धो.। क्या हम सारी आयु दुःख में ही व्यतीत करेंगे ? पिताजी ! माप सब की सुध लेने 'वालं हो, कृपा करके माप अपने पवित्र कर कमलों से हमारा

.
(१५)
स्पर्ध-करो और अपने चरणों में रक्खो, पिताजी प्रापजानते
हैं जब छोटे बच्चों को भय होता है तो वह रोता हुआ आंसु
वहांता हुआ दौड़ कर अपने पिता की छाती से लिपट कर
अपने दुःखो.का वर्णन करता है और वहां प्राने से ही उस
के सम्पूर्ण दुःख दूर होजाते हैं, शांति मिल जाती है,अभय हो
जाता है। इसी प्रकार हुमं भी अनेकानेक व्यथाओं से पीड़ित
होकर दुःखों को भोगते हुए रोते पीटते हुए आंसू बहाते आप
के द्वार पर भाए हैं, कृपानाथ कृपा करो ३ । तन्मे मनः शिव
संकल्प मस्तु । हे कल्याण कारक प्रभो ! हम अपने मन की
दशा किस को सुनावें, रात दिन कुविचार, कुसंकल्प उठते
रहते हैं, पिता जी ! हमारे मनको शुद्ध करो, हे दीनानाथ !
जब कभी हम १ कदम आप की तरफ आते हैं तो यह पापी
मन हमाको १० कदम पीछे धकेल देता है, फिर हम ऐसे गढ़े
में जाकर गिरते हैं कि निकलना कठिन हो जाता है । कभी
मोर, कभी अभिमान और कभी क्रोध की चोटी परचढ़ जाते
हैं, पिता जी! समुद्र की लहरों की गिनती होनी सम्भव है
पर.इस पापी मन के कुंसपलकों की संख्या .असंख्यव है, हे
दुःख बिनाशक पिता! आपके बिना हमारी इस हृदय वेदना
को कौन मिटा सकता है, और कौन इस पापी मन को शंख
-

कर सकता है, प्राण नाथ ! आओ हमारे हृदयों में निवास
करो, हम सब मिलकर आप.की पूजा सेवा प्रतिष्ठा करेंगे
और धाप हमें धर्मोपदेश करना जिस से हमारा मन हमारे
वश होए, पिता जी इस हदय मंदिर में आप के विराजमान
होने से ही इसकी शोभा होगी। दीनदयाल हुइय में आपका
निवास नहीं है, वह हृदय नहीं है, बल्कि : श्मशान है, पिता
जी! इस मन ने अपनी तीन कुवासनाओं से हमारी सर्वशक्ति
को नष्ट कर दिया है, यही दुष्ट हमे सांसारिक प्रलोभनों में
फंसाकर हमारी दुर्दशा कराता है, कृपासिन्धु कृपा करके इस
की दुष्टता को दूर करो, पिताजी माज हम सब आर्यगण इस
मन के दुःखों से दुःखित हो कर हाहाकार मचाते आप की
शरण आये हैं क्योंकि आपके अतिरिक्त हमारा और कोई कष्ट
दूर करने वाला नहीं है, पिता जो हमारे घरायर और कौन
हतभाग्य होगा जो रात दिन इस पापी मनके अधीन होकर
दुःखों को भोगता रहे । पिता जी ! हमारे हृदयों में विराजमान
हुजिय, दर्शन दो, और मनको ऐसा दास बनाओ कि आप
को छोड़ कर और किसी पदार्थ में न जाए, आया है कि
हमारी दुःख भरी आवाज़ को सुनोगे और प्राशीर्वाद दोगे
कि तथास्तु ३॥

(१७)
भजन।
- मेरा मन मुझ को कैसे सताचे, कैसे सताव० ।
मैं समझू मन समझे नाही, उल्टे मार्ग में मुझ को लेजावे।
झूट कपट छक शिक्षा देवे, पाप सागर में मुझको डुबावे ।
कभी पूर्व कभी पश्चिम जावे, कभी उत्तर कभी दक्षण धावे।
सत्य संग का संग न करता, खोटी संगत की कथा सुनावे।
मन पापी कपटी अति परवल, मुझ अधीन की पेशन जावे।

" ( ६८." अथ स्वस्तिवाचनम्। अमिमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवगृत्विजम् ।' होतार रत्नधातनम् ॥ १॥ स नः पिवेव मूनवेऽने मूपायनों भव ! सचस्वा नः स्वस्तये ॥२॥ ऋ० मं० १ । सू० १॥ मन्त्र १९॥ स्वस्तिनो. मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिर नर्वणः । स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति याचा- पृथिवी सुचेतुना ॥ ३ ॥ वस्तये वायुमुष वामहै सोम स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः । बृहस्पति सर्वगणं स्वस्तये. स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः ॥ ४॥ विश्वे देवा. नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरमिः स्वस्तये । .देवा अव- तृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः ॥५॥ स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति । स्वस्ति न इन्द्र थाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृषि ॥६॥ स्वस्ति पन्थामनुः (६) : चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनदर्दताघ्नता जानता सङ्गमे- महि ॥७॥ ऋ० मं० ५ ० ५१ ॥ ये देवानां यज्ञिया यज्ञियांना मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । ते नो रासन्ता- मुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिमि सदा नः ॥ ८ ॥ ऋ० म०७। अ० ३ । मू० ३५।। येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूषं चौरदितिर- दिवाः । उक्थशुप्मान् वृषभरान्तखम्मसस्तां आदित्यां अनुमदौ स्वस्तये ॥ ९ ॥ नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहदेवासो अमृतत्व मानशुः । ज्योतीरथा अहिमाया अनागसों दिवो वमीण वसते स्वस्तये ॥१०॥ सम्राजो ये सुधो यज्ञमाययुरपरिखता दधिरेदिवि क्षयम् । तां आविवास नमसासुक्तिभिर्मही आदित्या अदिति वस्तये ॥ ११॥ को वा स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन । को वोऽध्वरं तु विजाता अरं करचो नः पर्पदत्यहः खस्तये ॥ १२॥ येभ्यो होत्रां प्रथमामा- येजे मेनुः समिद्धाग्निमनसा सप्तहोवृभिः । त आदित्या १ ७० ) अमयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा खस्तये ॥१३॥ य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसों विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः । ते नः कृतादकृतार्दनसम्पर्यया देवासः पिपृता वस्तये ॥ १४ ॥ भरेप्चिन्द्रं सुइवं हवामहेऽहोमुचं सुकृवं दैव्यं जनम् । अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं चावापृथिवीं मरुतः वस्तये ॥ १५ ॥ सुत्रामाणं पृथिवीं चामनेहसं सुशर्माण- मदिति सुमणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा लहेमा खस्तये ॥ १६ ॥ विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिहुतः । सत्यया वो देवहूत्या हुवमे शृण्वतो देवा अंवसे वस्तये ॥ १७ ॥ अपामीवामपं विधामनाहुतिमपाराति दुर्षिदत्रामघायतः। आरे देवा देपो.अस्मद्युयोतनोरुणः शर्म यच्छता स्वस्तये ॥ १८ ॥ अरिष्टः स मों विश्व एधते म प्रजाभिर्जायतेधर्मणस्परि। यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता वस्तये ॥ १९ ॥ यं देवसोवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हि ते धने प्रातर्यावाणं रथामिन्द्रसानसिमरिष्यन्तमा

७१ )
रुहेमा स्वस्तये ॥२०॥ स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु
खस्त्य३प्सु जने खर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकथेषु योनिषु
खस्ति राये मरुतो दधातन ।। २१ । स्वस्ति रिद्धिप्रपथे
श्रेष्ठा रेण:खस्त्यभि यो वाममेति । सा नो अमा सो
अरणे निंपातु स्वावेशा भवतु देवगोपाः ॥ २२ ॥ ऋ०
मंडल १० ।५० ६३ ।।
इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ देवो वः सविता मार्पयतु
श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागं प्रजाव-
तीरनमीवा । अयक्ष्मा मा वस्तेन ईशत माघश सो ध्रुवा
अस्मिन् गोपतौ स्यात् ववीर्यजमानस्य पशून् पाहि
॥ २३॥ यजु० अ० १ । मन्त्र १॥
आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरी-
तास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद्धे असनमायुवो
रक्षितारो दिवेदिवे ॥ २४ ॥ देवानां भद्रा सुमतिय-
तांदेवानाधराति रभि नोनिवर्त्तताम् । देवाना सख्य-
मुपसेदिमा वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तुजीवसे ॥ २५ ॥

तमीशानंजगतस्तस्थुषस्पतिं धियजिन्वमवसे हूमहे वयम् ।
पूषा नो यथा वेदसामसदृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये
॥ २६ ॥ स्वस्ति न इन्द्रोद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा
विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो
बृहस्पतिर्दधातु ।। २७ ।। भद्रं कर्णेभिः शृणुयामदेवा मद्र
'.. पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभियं-
शेमहि देवहितं यदायुः ।। २८ ।। यजु० अ० २५ । मन्त्र
१४।१५। १८ । १९ । २१ ॥
अग्न आयाहि वीतये गृणानो हव्यदातयः। निहोता
सत्सिबर्हिषि ॥ २९ ॥ त्वमग्ने यज्ञाना छ होता, विश्वेषाः
छ हितः । देवेभिर्मानुषे जने ॥ ३० ॥ साम० छन्द आ.
अपा० १ । मन्त्र १ । २॥
ये त्रिषताः परि यन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रता:
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अयं दधातु मे ॥ ३१ ॥अथर्व
कां०.१ । अनु० १। सू० १ । मन्त्र १॥
इति स्वस्तिवाचनम् ।

( ७३ ७३ ) अथ शान्तिप्रकरणम् । . . शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रात- हव्या.। शमिन्द्रासोमा सुवित्रताय शंयोः शन्न इन्द्रापूषणा चाजसातौ ॥ १॥ शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शन्न: पुरन्धिः शमु सन्तु रायः । शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु ॥ २ ॥ शं नो धांता शमु धर्ती नों अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः । शं रोदसी. बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु ॥३॥ शं नो अग्निज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्चि- नाशम् । शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इपिरो अभिवातु वातः ॥ ४॥ शं नो धावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्ष शये नो अस्तु । शं न ओषधीनिनो भवन्तु शंनो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥५॥ शन्न इन्द्रो वसुभि- देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः । शनो रुद्रो.रुद्रे-

१,७४),
मिर्जलापः शं न स्त्वष्टा नाभिरिह शृणोतु ॥६॥ शना
सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शंनोग्रावाणः शमुः सन्तु यज्ञाः ।
शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु . शं नः स्वः शम्बस्तु
वेदिः ॥७॥ शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नश्चतस्रः
प्रदिशो भवन्तु । शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तुः शं नः
सिन्धवः शमु सन्त्वपिः ॥८॥ शं नो अदितिर्भवतु
व्रतेभिः शंनो भवन्तु मरुतः स्वः । शंनो विष्णु' शम
पूषा नो अस्तु शंनो भवित्रं शम्बस्तु वायुः ॥९॥ शनो
देवः सविता त्रायमाणः शंनो भवन्तूषसों विभाती।
शंनो पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु
शम्भुः ॥ १०॥ शंनो देवाः विश्व देवाः भवन्तुं शं
सरस्वती सह धीभिरस्तु । शमभिषाचः शमु रातिषाचः
शंनो दिव्याः पार्थिवाः शंनो अप्याः ॥ ११॥ शं नः
सत्यस्य पतयो भवन्तु:शंनो अर्वन्तः शसु सन्तु गावः।
शं नः ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शनो भवन्तु पितरों हवेषु
॥ १२ ॥ शंनो अज एकपादेवो अस्तु शनोऽहिर्बुध्न्यः शं

। ७५ समुंद्रः । शंनो अपानपात्पेरुरस्तु शं नः पृश्निर्भवतु देव- गोपा ॥ १३ ॥ ऋ०म० ७ । सू० ३५१ मन्त्र १-१३ ॥ इन्द्रो विश्वस्य राजति । शं नोऽस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे '..१४ ॥ शंनो वातः पवताशं नस्तपतु सूर्यः । शं नः कनिक्रदद्देवः पर्जन्यो अभि वर्षतु ॥ १५ ॥ अहानि शं भवन्तु नः शात्रीः प्रतिधीयताम् । शं न इन्द्रानी भव- तामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या शन्न इन्द्रा पूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयोः ॥ १६ ॥ शंनो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शंथ्यो रभिस्रवन्तु नः ॥ १७॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ॐ शान्तिः । पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्ति- विश्वे देवाः: शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ॥ १८॥ तचक्षुर्देवहितं पुर- स्ताच्छुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत छ भृणुयामः शरदः शतं प्रन्नवाम शरदः शतमदीनाः स्याम-' शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। १९ ।। यजु० अ० ६३ ।'

(७६) मन्त्र८।१०।११। १२ । १७/२४॥ यजाग्रतो दूर मुदति देवं तहु सुतस्य तथैवैति दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकन्तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।। २०. येन 'कर्माण्यपसो मनीपिणो यज्ञे कृष्णवन्ति विदथेषु धीराः । यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्प- मस्तु ॥ २१ ॥ यत्मज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तर- मृतं प्रजासु । यस्मान्नऋने किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ २२ ॥ येनेदं भूतं भुवनं भविप्यत्परि- गृहीतममृतेन सर्वम् । येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ २३ ॥ यस्मिन्वृचः सामयजूधषि यस्मिन् प्रतिष्ठितारथनाभाविवाराः । यस्मिंश्चित्त छ, सर्व- मोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ।। २४ ॥ सुपार- थिरश्वानिव यन्मनुप्यान्नेनीयते ऽभीशुभिर्वाजिन इव । हत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ २५॥ यजु० अ०३४ । मन्त्र १-६॥ : स नः पवस्वं शङ्गवे शं जनाय शंमर्वते । शं राजन्नो: पधाभ्यः ॥२६॥ साम; उत्तराधिक प्रपा०१ मन्त्र १ ॥

(. ७७ )
अभय न करत्यन्तरिक्षमभयं द्यावापृथिवीउभे इमे।
अभयं पश्चादभयं पुरस्तादुत्तरादधरादभयं नो अस्तु ॥२७॥
अभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरोयः। अभयं
नक्तमभय दिवा नः सा आशा मम मित्रं भवन्तु ॥२८॥
अथर्व कां० १९ । सू०.१७ । मन्त्र ५-६ ॥
इति शाति प्रकरणम् ।
..
भया दस्यामि स्तपति भयातपत्ति सूर्यः ।
भयादिंद्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावत्ति पंचमः ॥ १॥ .
अशब्द मस्पर्श मरूप मव्ययम् तथा रसं जित्यमगंधवञ्चयत् ।
अनायनंतं महतः परं भुवं निचाम्पत मृत्यु मुखात्प्रमुच्यते
तमीश्वराणां परमं महेयरं तंदेवतानां परमं च दैवतं ।
पति पतीनां परमं परस्तात् विदामदेवं भुवनेशमीड्यम् ॥३॥
न तत्र सूर्यो भातिन चंद्रतारकं नेमाविद्युतो भांति कुतोऽयमग्निः
तमेव भातमनु भाति सर्व तस्य भासासर्वमिदं विभाति ॥ ४
यो देवोऽग्नौ योऽप्सु योविच भ्रवनमाविवेश ।
य ओपधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवायनमोनमः ॥ ५॥

आरती
'जय जगदीश हरे।भक्त जनन के संकट क्षण में दूर करे।
जो ध्याचे फल पावे दुःख विनशे मनका,
सुख सम्पति घरं आवे कष्ट मिटे तन का ॥१॥
मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी,
तुम दिन और न दूना आश करूं जिसकी ।।२।।
“तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी,
परम ब्रह्म परमेश्वर तुम सब के स्वामी ।। ३।।
तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्ता,
मैं
मूरख
खलकामी कृपा करो भर्ता ।
तुम ही एक अगोचर सब के प्राणपति,
किस विध मिलू दयामय तुमको मैं कुमति ॥५॥
दीना बन्धु दुःख हर्ता तुप रक्षक मेरे,
'अपने हाथ उठाओ द्वार पड़ा हूं तेरे ॥६॥
विषयवस्तीलाओ पाप हरों देवा,
श्रद्धा भक्ति काओ सन्तन की सेवा ॥७॥

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"
४)
रामायण तुलसी कृत, सटीक
मूल्य ४i),५);)
मूल
१॥), २),४)
महाभारत पूर्ण दो जिल्दै सजिल्द"
सवलसिंह सजिल्द
सुखसागर पूर्ण सजिल्द
गीता भाषा टीका
समहात्म्य
१॥)
दोहावली
सत्यार्थ प्रकार २॥), संस्कारविधि १), पञ्चमहायज्ञविधि ।।
" . २)
२॥॥)'.
"
*.
उपन्यास।
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१॥), हनूमान १), नजदमयन्ती), 1-), सावित्री 1), द्रौपदी

-[२]
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Bhakti Ka Marg

Author
Aarya, Chandrabhanu
Title
Bhakti Ka Marg
File name
Bhakti Ka Marg
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/09
Publisher
Lahour, Lala Daulatram And Sons
Language
Sanskrit
Pages
84
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345449
Barcode
99999990233789.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
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