Adarsh Library, Jaipur
Laal Bhahadur Shashtri
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लालबहादुर शास्त्री
(एक महान् नेता को जीवनी)
महावीर अधिकारी
राजपाल एण्ड सन्न, कश्मीरी गेट, दिल्ली
जपान
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अपनी बात यह पुस्तक स्व० सालबहादुर शास्त्री को जीवनकाल में ही लिखी गई थी परन्तु उनको सागकंद-यात्रा के परिणाम भी इसमें सम्मिलित करने की अपनी इच्छा पूरी करते हुए, उनकी मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हो सकी। पोंकि यह विश्वास करना कठिन पा कि उनकी सासकंद-मात्रामा की गेवा में उनका अन्तिम गीमापित यन जाएगी। इन्हीं गानों के माप दिए गए अपने प्रासपन में मैंने यह अभितापा प्राट को कि यदि किमी दिन अपने चरितनायक से अधिक निकट पाने का अवसर मिला तो मह पूर्याम्याग व्यापक अध्ययन का रूप धारण कर सकेगा। यह मयगर उन्होंने नहीं दिया। ये पेयल यह अभियान पीछे छोर गए कि यह पनि बोfrसो नजर गे सामनेवाले रास्ते को देगता है. रिना ठोकर पाए पनता है और मही मंत्रित तक पहुंचना है। उनके प्रिय स्मरण को वर्तमान मे भूतकाल के क्रियापदोगे जोटने में कालम करती रही है, दिल में टीस पैदा होती रही है, लेकिन उनके सभी प्रशंसकों के समान मन मे एक गहरी निष्टा भी रसन्न होती रही है कि मालबहादुर शास्त्री के प्रति छोटे या जिग किगीने भी विस्याम प्रकट किया, उगे उन्होंने कभी झूठा मारित नहीं होने दिया। ये एक महान् परितनायर थे, उन्होंने मारमोत्सर्ग के गिर गजल उदाहरण से यह सिटकर दिया है। प्रपानमन्त्री पद पर उनकी नियुक्ति होने के समय उनकी माता श्री रामदुलारी देवी ने म्हापा-"मैं नासम्हादुर में नानी है कि पाई जान पपी जाए, मगर देश बना रहे।" इम देश में गन्धे पुन मे पह उम्मीः पी जाती है कि वह जीवनान्त अपनी माता के दूरी मान रमेगा । नानबहादुर ने अपनी माता दी उम्मीदों को पूरा किया और भारत माता को उम्मीदो को भी पाfrm 4 । -- उनकी जान भले ही चली गई, लेकिन उन्होंने देश को बचा लिया। पाकि- स्तान के रूप में अंग्रेज़ भारतमाता की पवित्र देह में एक गम्भीर जख्म छोड़ गया था। इस जस्म की ज्यों-ज्यों दवा की गई, वह बढ़ता ही गया। आखिरकार सन् 1965 का वह दिन भी आया जब पाकिस्तान ने चीन की शह पाकर भारत पर आक्रमण कर दिया। लालबहादुर शास्त्री ने गीता के अनन्य उपासक के रूप में यह सिद्ध किया कि "वे लोग धन्य हैं जिन्हें सत्य की रक्षा के लिए युद्ध करने का अवसर मिलता है, जो स्वर्ग के लिए. सीधा मार्ग है। अगर तुम सत्य के लिए युद्ध नहीं करोगे तो अपना कर्तव्य छोड़कर और बुराई ग्रहण कर पाप के भागी बनोगे।" यह उद्धरण भगवद्- गीता का है। शास्त्रीजी के जीवन को भगवद्गीता के पृष्ठों से उठाकर इस पुण्य भूमि पर रखा गया था~यह बात कही जाए तो अक्षरशः सत्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । गांधीजी के शब्दों में उन्होंने चाहा कि "भारत अपनी इज्जत की रक्षा के लिए, बुज़दिली के साथ अपनी बेइज्जती का बेबस साक्षी बने रहने के बजाय हथियार उठा ले..." नेहरू ने भी कहा था, "लड़ाइयां भयंकर होती हैं । उनसे लाखों लोग मरते हैं, बड़ा विनाश होता है । वावजूद इसके सभी एक दिन मरते हैं, और अगर किसी महान् उद्देश्य को पूरा करने में हमें समय से कुछ दिन पहले मरना पड़े तो यह दुःख की बात नहीं है।" शास्त्री जी से अधिक इस कथन को किसने चरितार्थ किया! निश्चय ही इस देश ने अपने परम नायक लालबहादुर के वियोग के गहन दुःख को एक राष्ट्रीय गौरव के रूप में ग्रहण कर लिया है । लाल- वहादुरजी ने युद्ध के क्षेत्र में कभी भारतमाता की कोख को लजानेवाला आचरण नहीं किया ! इस वामनावतार की ललकार मास्को और वाशिंग- टन तक पहुंची। दुनिया की बड़ी-बड़ी राजधानियों के सिंहासन डोल उठे। शान्ति के उपासक के चेहरे पर खेलने वाले रौद्रभाव को देखकर उन सभी क्षेत्रों से शान्ति की पुकार आने लगी, जो आज तक मुंह में राम बगल में छुरी लेकर बातें करते थे। उनके निधन के अवसर पर अमरीका के राष्ट्र- पति ने कहा था कि "उनके जाने के बाद दुनिया जीने के लिए बहुत हकीर मालूम पड़ती है ।" जब कोई चमकता हुमा सितारा टूटता है, तो दुनिया - 5 - की मांगों के मामने अंधेरा छा जाता है। भारत की आजादी के याद रावर्ग पही यह गिनारा महारमा गांधी के रूप में टूटा पा, पिर शहरलाल नेहरू और अन्त में मालबहादुर शास्त्री के रूप में । मालबहादुर शास्त्री के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह पी कि वे अन्त तक पीरज रोपाम मेते थे। पारिसान के गाय का का समझौता करके उन्होंने शान्ति के प्रति अपनी मनिष्ठा का परिमय दिया। यही कारण पाकि पाकिस्तान पे. गाय मुरगरना जर जारी हो गया तो मारा देग उनके साथ हो गया। भारत-पाक युद्ध को दूरम्यारी प्रतिक्रियानो को समाकर जब उनके लिए हमीप्रपानमंत्री का नाम माग तो ये नाराकन्द गए। तागान्द समझोना पूतो मारे विश्व की राजनीति के लिए एक प्रेरक गोमानित है, लेकिन भारत और पाकिस्तान के लिए तो यह एक मुगानरकारी राममोना है। मनहरी नफरत के प्राधार पर यने पारिस्तान फे गाओं ने पिछले अठारह यां में भारत के प्रति जेहाद पापा पारण फर गिया । भारतीय जनता ने काटिन गेमदिन संकट पोपड़ी में भी पानी धर्मनिरपेक्ष नीलियोनही मोटा। मेशिन भाग पो मारमा मे याय- जूद तर तर फोई गुररिणाम निरुतो याला नही पा जब मर पारिसानी नामोरा हृदयगरिवर्तन नहीं होम महान् रार्य के लिए गायीनी महीद हुए । गहना पडेगा कि गिग कार्य को गुमनात गांधीजी कोरादा मेहुई, उगे पूरा करने का ऐतिहागिरधर सालबहादुर शास्त्री सो मिला। पारिस्तान के दोर्पीन पिस्वागपान और पृषागे भरे पापरण में परिवर्तन करना इतना मुलि राममा जाने लगा था जियो-यो यान् पिगारों में भी ग प्रकार की उम्मीद करना छोडगा दिया पारिस्तान के राष्ट्रपति मोहम्मः अम्पूर गाने नानादुर शास्त्री पीसीह मरासि को देगा पा। उन्होंने गात्री मी यो मया पर मनमा दिया पा। उनके मन पर शास्त्रीजीपी मानशेयता का प्रभार पहा । भारत-पारिस्तान के बीग रा पर जो भी न मिदनपामा प्रतीत होता था, यह ग महामानव ने बनायाग गमाप्न र दिया। पास्त्रीजी पी महला रोपाट करना, गन्दो यो पवित बाहर है।
6 अमरीका के उपराष्ट्रपति ह्य वर्ट हम्फे ने उनके प्रति श्रद्धांजलि में वाशिंग- टन में चर्च में की गई प्रार्थना के अवसर पर भाषण करते हुए उन्हें 'मानव- जाति के कल्याण के लिए प्राण अर्पित करनेवाला मानव-जाति का बन्धु' बताया। आपने कहा था कि भारत के एक दूरदृष्टि के पर्यवेक्षक ने प्रधान- मंत्री श्री शास्त्री को 'संकट के क्षण में प्रकाश देनेवाला मिट्टी का दीप' बताया है। श्री हम्फे ने कहा कि यह कल्पना महान् भारतीय कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना से ली गई है । रवीन्द्र ने अपनी एक कविता में कहा है कि जब किसीने पूछा कि सूरज डूबने के बाद जब अन्धकार फैल जाएगा तब क्या होगा, तव सभी चुप हो गए लेकिन मिट्टी के एक दीप ने धीमी आवाज़ में कहा-"मुझे जला दो, मुझसे जितना भी हो सकेगा मैं करूंगा।" यह बात मेरी कल्पना के बाहर थी कि जिस व्यक्ति के जीवन को मैं प्रस्तुत करना चाहता हूं, वह थोड़े ही दिन में दुनिया के महान् नेताओं का भी आराध्य बन जाएगा। जिस समय मेरे सामने यह प्रस्ताव आया था कि तत्कालीन प्रधानमन्त्री की जीवनी लिखू, तो मेरे मन में अधिक उत्साह नहीं आया । एक बात यह थी कि मूल प्रवृत्ति से मैं एक वीरपूजक हूं और मेरे मित्र गवाह हैं कि मैं फ्री स्टाइल कुश्तियों से लेकर बाक्सिग, क्रिकेट, फुटबाल और घुड़दौड़ देखने का शौकीन हूं। बुल-फाइट वाली कोई फिल्म में बिना देखे नहीं छोड़ता। यदि स्पेन में पैदा हुआ होता, तो मैं आज जो कुछ भी हूं, उसकी वजाय वुल-फाइटर होता और शायद उसे ज्यादा पसन्द करता। ये कुछ वातें अपने निवेदन के रूप में कहना आत्माख्यान नहीं, रुचि का परिचय मात्र है । अन्दर से उत्साह का न आना स्वाभाविक था। मैंने लालबहादुर जी को निकट से नहीं देखा था । जब देखा तो पाया कि मुस्कराता हुआ चेहरा, निरभिमान महत्ता के भाव से रंगी आंखें, छोटा कद, लेकिन मजबूत पिंडलियां, ज़मीन पर पुख्तगी से पैर रखने वाले, अपने श्रोताओं को किसी न किसी तरह मोह लेने वाले । मुझे कभी यह कल्पना .
7 नहीं हुई कि दे एक दिन भारत के प्रधानमन्त्री बनेंगे, फिर भी वे प्रधान- मंत्री बने । इतने बड़े यथार्य के सामने गहरे संस्कारों में भी आन्दोलन हो जाता है। मैंने उनके सम्पूर्ण जीवन की अत्यन्त अलज्ञात घटनाओं का अध्ययन किया और पाया कि यह व्यक्ति लालबहादुर शास्त्री भारतीय इतिहास के एक अध्याय का पहला वकं है । वह प्रधानमंत्री न बनता तो यह अध्याय कोरा रह जाता। भारतीय नीतिशास्त्र अचरितार्थ रह जाता। जो कुछ जानकारी प्राप्त करना संभव हुआ, उसीके आधार पर मैंने कुछ लिखा जिमे जीवनी कहिए तो ठीक, लेकिन मेरे विचार से यह एक श्रद्धां- जलि ही है। इस सन्दर्भ में मैं अपने द्वारा एक अनूदित उपन्यास के चरितनायक का उल्लेख भी करना चाहता हूं। नोवेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक हरमन हेय (दिवंगत) के भारतीय भाव, ज्ञान और दर्शन की भूमि पर लिखे गए उपन्यास 'सिद्धार्थ' का नायक सिद्धार्थ संसार का अनुभव प्राप्त करने के लिए एक बड़े सौदागर के यहां काम मांगने जाता है। सौदागर उससे मवाल करता है-आपकी योग्यता क्या है ? गौतम बुद्ध का समकालीन यह ब्राह्मणपुत्र साधना की उच्चतम उप- लब्धियों को निस्तार मानता हुआ पुनः संसार में प्रवृत्त हुआ है । वह उत्तर देता है: में विचार कर सकता हूं। मैं भूखा रह सकता हूं। मैं प्रतीक्षा कर सकता हूं। सौदागर चकित हुआ था। सभी लोग ऐसी बातें सुनकर चकित होते हैं, लेकिन योग्यता के कागजी प्रमाणों के बावजूद सभी यह जान लेते हैं कि साधना के किसो क्षेत्र में इन योग्यतओ के बिना सब कुछ दम्म का योषा पोप बनकर रह जाता है। इनमें से एक भी योग्यता रखने वाला व्यक्ति जीवन-यात्रा मे बहुत आगे जाता है और जिममें ये तीनों योग्यताएं हो, वह सिद्धार्थ बनता है। लालबहादुर शास्त्री के बारे में इन शब्दों के लिखते समय मुझे भार- सोय आत्मा के अपने अन्तर में मूतं दर्शन हुए। हमारी उन जीवन- 8 मान्यताओं को, जो नीति-ग्रंथों के जर्जर पृष्ठों पर अंकित होकर पुस्तका- लयों में आजीवन कारावास की सजा भोगती दीख पड़ती हैं, इन नन्हे-से आदमी ने सड़क पर जीते-जागते रूप में हमारे वीच फिर जिन्दा कर दिया। सैद्धान्तिक ऐश्वर्य से युक्त अतीत को जीवन्त कर दिया । अव तक हमने यही सुना और जाना था कि जमाना बड़ा गलाकाट प्रतिद्वन्द्विता का है, कि यहां बड़े छल-छम से सत्ता मुट्ठी में आती है और कायम रखी जाती है, कि यह युग भावुकता का नहीं, उद्भट बौद्धिक उपलब्धियों का है, एवं संघर्ष का है जहां अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए न जाने क्या-क्या करना पड़ता है और जो नहीं करता, वह सफयेहस्ती से मिट जाता है। यही क्यों ! समाज में ऐसे आदमियों की संख्या बहुत बड़ी है, जो यह मानकर चलते हैं कि तरक्की करने के लिए, रुपया-पैसा, साधन और सुविधा दरकार होती है । तरक्की करना उन्हीं के भाग्य में लिखा है, जो खाते-पीते घरों में जन्म लेते हैं। इन बातों में इतनी बात स्वीकार की जा सकती है कि साधन-सुविधाओं के बीच आगे बढ़ना आसान हो जाता है। परन्तु लालवहादुर शास्त्री के जीवन पर एक नज़र डालिए। ऐसा लगता है कि जैसे ऊपर उठने के लिए साधन-सुविधाएं अभिशाप हों। जो लोग प्रयास करने से पहले ही साहस छोड़ देते हैं, उनके लिए यह जीवनी महान् प्रेरणा का स्रोत बन सकती है। हमारा युग वैज्ञानिक विकास के क्षेत्र में आशातीत सफलताएं प्राप्त कर रहा है । जीवन-हितैपी प्रवृत्तियों में भी इतना विकास हुआ और हो रहा है कि यह विश्वास करने का आश्वासन मिलता है कि शायद एक दिन इन्सान मौत के ऊपर कुदरत हासिल कर ले, लेकिन अजीबोगरीव बात यह है कि आपाधापी भी उतनी ही बढ़ रही है। अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए संघर्ष करता-करता आदमी दूसरे के अस्तित्व को मिटाने में लग गया है। यह स्थिति प्रजातीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर बढ़ती हुई प्रतीत होती है। कहा नहीं जा सकता कि कौन-सी विसंग. तियों के कारण मनुष्य विभ्रांत हुआ, परन्तु यह विभ्रांति सर्वत्र व्याप्त है, समाज का कोई कोना उससे अछूता नहीं। भिन्न राजनीतिक दलों के - , ।
9 बीच विरोध हो, यह बात थोड़ी-बहुत समझ में आती है, लेकिन आज तो एक ही दल के अनेक नेता पारस्परिक विग्रह में जुटे हैं 1 अपनी महान् प्रतिमा, विपुल साधन-सम्पन्नता के सहारे आदमी सेवा के अधिकार को भी अपने लिए सुरक्षित कर लेने के विचार से व्याकुल है । सूद-दर-सूद के हिमाब से समाज में मारक प्रवृत्तियों को बढावा मिल रहा है। क्या हम वास्तव में इस विश्वास के प्रति सचेत हैं कि गलत साधन से गलत ही उद्देश्य की पूर्ति होती है ? क्या हमने इस नारे के वारूपन से अपने को मुक्त कर लिया है कि साध्य की उपलब्धि से ही साधन को सार्थकता बनती है ? हालांकि दुनिया के पिछले चालीस वर्ष के इतिहास ने यह साबित कर दिया है कि साधन का श्रेय ही साध्य का प्रेय है । फिर भी लोगों ने यथार्थ के प्रति आं मूदी हुई हैं। तालबहादुर शास्त्री का जीवन इस बात का साक्षी है जिसने मूक रहकर सेवा की है, उसकी तरफ भी लोगो का ध्यान जाता है, जिसने कभी कुछ प्राप्त करने की इच्छा नहीं की, दुनिया अपना सर्वस्व उसके हाथो सौंपकर आश्वस्त हो जाना चाहती है; जो अपने को किसीसे भी यहा नही मानता, समाज उसे बलपूर्वक सबसे ऊचे आसन पर बैठाना चाहता है । शास्त्रीजी के जीवन मे अहिमा का मय सक्रिय, स्पन्दनयुक्त और परिवर्तनकारी वन रहा है। मुझे हर्ष के साथ ऐसा अनुभव हुआ कि मेरे मन के आदर्श लोकनायक के तीनो ही गुण उनमे विद्यमान हैं । वे कप्ट सह सके हैं, वे स्वय ही नहीं मपरिवार भूसे रह सके हैं, और प्रतीक्षा करने की उन्होंने इन्तहा करके छोड़ी है। यह सही बात है कि भूसे रह मरना सबके बस की बात नही । लोग अक्सर कहते सुने जाते हैं कि सारी दुनिया की तकलीफें झेलने का ठेका उन्होंने ही नहीं लिया है। प्रतीक्षा के स्थान पर तो सुपरिणाम के फौरन सामने न आने पर काम की हड़ताल करने का सिद्धात संभवतः समाज को स्वीकृति पा चुका है। परन्तु यह भी सही है कि प्रतीक्षा न कर सकने वाला इन्सान अपघाती बनता है । यह बात दूसरी है कि वह किसका अपघात करता है, अपना, समाज का, मा वता का या सत्य का । जो जितना करता है, उसका परिणाम इस मे भोगता है। परिणाम से मुक्ति नहीं।
10 इस जीवनी में शास्त्री जी के जीवन की गूल स्थापनाओं की खोज करने की कोशिश की गई है। जो चारे में अधिा सागग्री उपलब्ध नहीं है। उन्होंने अपने बारे में पाराय गुछ भी नहीं कहा है । गहने की अपेक्षा उन्हें गारमाही अपिता पड़ा है। गर्म संभवत: जीवन का सर्वाधिक विश्वस- नीग पराग होता है। तथापि कर्म के पीछे की प्रेरणाएं, संकल्प, निष्ठा और मागताएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं। ये मार्ग के परिणामों पारा पुरारों गे संस्कारों में प्रवेश करती हैं, फलित होती हैं, पता होती हैं और अन्त में एक उज्ज्वल परम्परा का रूप धारण करती है, किसी भी जीपी को प्रस्तुत पारते समय यदि इन बातों का ध्यान रखा जा सके तो जीपनी प्रस्तुत करने का उद्देश्य पूरा होता है। शास्त्रीजी की लोक-रोपा अनेक उपलब्धियों से मंडित हुई है। सामाजिक कार्यकर्ता गाजीपा का एक और निरोधाभास होता है। जो व्यगित तालालिग जगलार उपस्थित नहीं कर सकता, लोगों की आखें उसकी तरफ से फिरने लगती है। जो चमत्कार उपस्थित कर सकता है, उसे परीमता प्राप्त होने लगती है, लेकिन यह विश्वासपूर्वका गाहा जा समाता है कि शास्त्रीजी तालालिक गमलार उपस्थित करने के मोह में पानी नहीं पांसे । उन्होंने पद छोड़ दिया, लेकिन मर्यादा को कभी नहीं razा। उनका जीवन ऐसे लोगों की पीडाजों के लिए सफा देनेवाले मर- हम मा माग गरेगा जिन्होंने अकर्मण्यता से उत्पन्न अनेक कुण्ठानों से अपने-आपको जर्जर बना लिया है। सामीणी की एक विशेषता की ओर संगत न करना उनके पाक्तित्व को महत्वपूर्ण पहलू को नारअन्दाप करना होगा । राजनीति में जन्होंने किसी भी गोड़ पर सच्चाई गो नहीं जोड़ा। बाज की पुनिया में राज्चाई को कूटनीतिका रूप देनेवाले म राजनीतिश थे, जिनका स्थान गांधी और नेहरू के बाद की पीड़ो में सर्वोपरि सुरक्षित पा। यदि उन्हें लड़ना था तो पाहते कि उन्हें लड़ना है। गदि उन्हें लड़ना नहीं था सोपे गह गहते कि उन्हें नहीं लगा है। उनके माध्यम से भारत ने अपनी भानारिका और अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों के प्रति विश्वसनीयता सम्पन्न गी। इस लघु पुस्तक के लेखन के दौरान अनेक अपरारों पर ऐसा अनुभव 11 हुआ कि यदि चरितनायक के आन्तरिक व्यक्तित्व की अधिक अंतरंग झांकी प्रस्तुत की जा सकती तो लेखनी अधिक कृतकृत्य हो सकती थी। अतः इस पुस्तक में संग्रहीत विचारों को मैं एक बड़ी पुस्तक की भूमिका मा पूर्वाभास ही मानता हूं। देश के कामों से फुर्सत न पा सकनेवाली विभूतियों के लिए जीवनीकारों को उपकृत करना संभव नहीं हो पाता। वैसे भी हमारे देश के महापुरुषों की यह परम्परा रही है कि अवकाश के क्षणों में ही वे रचनात्मक साहित्य का साधन बन पाते हैं। पहले ऐसा अवकाश जेल-यात्राओ के दौरान उन्हें मिल जाता था। इस दृष्टि से शायद जेल-यात्रा अधिक उपयोगी थी। हालांकि दिन में अठारह से वीस घण्टे तक कर्तव्य के अधीन रहना भी कारावास से कम नही, परन्तु यह जीवन देने ही देने का है, उससे ग्रहण करने के लिए ऐच्छिक अवकाश ग्रहण करने की परम्परा कायम हो तो कर्म के साथ चिंतन भी रूपायित हो। इस पुस्तक मे उल्लिखित कुछ स्थापनाएं यथार्थ से बेमेल भी हो सकती हैं। उनके पीछे जानकारी का अभाव भले ही हो, वह सद्भावना से हीन मही हैं। पूरी पुस्तक एक संघर्षशील व्यक्ति के जीवन की एक झांकी मात्र है। यदि पढनेवाले इन भावनाओं के साथ एकाकार होने की प्रेरणा प्रहण कर सकें, तो अपने प्रयास को पुरस्कृत मानने का हपं होगा। -महावीर अधिकारी
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लालबहादुर शास्त्री राजनीतिक उत्तराधिकार भारत में सदियों में वीर-पूजा की भावना का प्राधान्य रहा है । किसी एक व्यक्ति के गुणो की चर्चा अथवा समालोचना करते समय हमारे मन में यह भावना सर्वोपरि वन जाती रही है कि वह व्यक्ति देखने-भालने में कैसा लगता है। बुद्धि एवं देह की दृष्टि से वह कितना सौभाग्यशाली है। इन गुणों को अभिव्यक्ति में वह कितना आभिजात्य है । सर्वसाधारण की अपेक्षा उसका व्यक्तित्व कितना अधिक आकर्षक और प्रभावी है। व्यक्तित्व के इन लक्षणों के प्रति मारवस्त होने के उपरान्त ही इस देश का जन-साधारण किसीके प्रति आकृष्ट होता रहा है । यह चलन बहुत पुराना है। इस परम्परागत कसौटी के अनुसार हमारे चरितनायक लालबहादुर शास्त्री बहुत ऊंचे पद पर बैठने का सौभाग्य संभवतः प्राप्त न कर सकें, तथापि वे इस राष्ट्र के प्रधानमन्त्री-पद पर आसीन हुए जहा केवल संयोग से नहीं पहुंचा जा सकता। हमारी राष्ट्रीय प्रतिभा की नीराजना मे इस घटना को एक नया मोड़ ही स्वीकार किया जाना चाहिए । लालबहादुर भास्त्री के जीवन पर प्रकाग डालते समय भले ही तुलना न की जाए, लेकिन यह देखना अनिवार्य हो जाता है कि वीर-पूजा परम्परा के अन्तर्गत इस देश ने उनके राष्ट्रीय रंगमंच पर अवतरित होने के पूर्व अनेक दिग्गजो को अपने मध्य पाया है, जो ज्ञान, त्याग और साधना की दृष्टि से भारत की महान् सास्कृतिक विरासत के जीवन-प्रतीक थे, जिनकी वाणी में भारतीय संस्कृति का स्वर मुखरित होता था। लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी मौर जवाहरलाल नेहरू भारत के इन तीन महापुरुषो ने भारतीय वात्मा के प्रतीक रूप में ही अपने को प्रस्तुत नहीं किया, वरन् उनके चिन्तन और साधना से अन्तर्राष्ट्रीय चिन्तन भी प्रभावित हृया। लालवहादुर के निकट 14 लालबहादुर शास्त्री पूर्ववर्ती महापुरुषों ने जनजीवन के साथ अपना घनिष्ठ रिश्ता कायम किया। वे परम्परागत मानदण्डों के अनुसार एका ऐसे युग के प्रतीक माने जाते रहे, जिसमें आधिभौतिक शक्तियों से मण्डित करके लोकनायकों को महापुरुषों के रूप में स्वीकार किया जाता था। लालबहादुर शास्त्री के उदय से भारतीय जीवन में एक नये अध्याय का समारम्भ होता है। गांधीजी ने संभवतः यह पूर्वकल्पना की थी कि भारत में वह समय आएगा जब कि दरिद्रनारायण का प्रतीक कोई व्यक्ति समाज के सर्वोपरि पद पर अभिषिक्त होगा। विलक्षण एवं लाखों में एक दीख पड़ने वाले न होने पर भी वे भारतीय आस्था-निष्ठा और विश्वास के पात्र बन सके, जव कि नेहरूजी के उत्तराधिकारी बनने के अनेक उम्मीदवार उनके समकालीन राजनीतिक नेताओं में ऐसे अनेक रहे हैं और आज भी विद्यमान हैं, जिनमें से किसीको भी राष्ट्र का भार संभालने के लिए चुना जा सकता था। नेहरूजी के जीवन के अन्तिम दस वर्षों में यह प्रश्न बार- वार उठाया जाता रहा कि उनके बाद इस देश के शासन की बागडोर कोन संभालेगा। इस प्रश्न का उत्तर नेहरूजी ने स्वयं कभी नहीं दिया। आश्चर्य की बात है कि सम्पूर्ण राष्ट्र ने भी इस प्रश्न को अनेक रूपों में प्रस्तुत तो किया, लेकिन उसका स्पष्ट उत्तर कहीं से नहीं आया। गारण यह था कि नेहरूजी ने अपने व्यक्तित्व से लगभग चालीस वर्षों तक राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को अभिभूत रखा । अंग्रेजी राज्य के विरुद्ध संघर्ष के लम्बे दौर में समूचे राष्ट्र ने अनायारा ही अपने भावी राष्ट्रनायक की ऐसी प्रतिमा बना ली थी, कि वह अंग्रेजों की तरह उनकी भाषा बोलेगा, वेश- भपा, खान-पान, रहन-सहन, चिन्तन और सार्वजनिक जीवन में उन्हींके समान अपने को प्रस्तुत करेगा। हालांकि गांधीजी ने इरा प्रतिमा के स्थान पर भारतीयता से मण्डित प्रतिमा की स्थापना की और जवाहरलाल नेहरू ने भी भरसक प्रयास किया कि गांधीजी की परम्परा कायम रहे लेकिन सन् 1930 के बाद का भारत नेहरू के रंग में गहरा रंगा गया। यह युग भारतीय भावभूमि पर पश्चिम के विचारों गे रोपण का प्रतीक बना। यह संयोग की बात है कि जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व ऐसी ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुआ जो सभी दृष्टियों से असामान्य था। एक लालबहादुर शास्त्री 15 समृद परिवार में जन्म लेने और विलायत में जाकर अपने हुक्मरान के बीच रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने का मौका उन्हें मिला था। बीसवीं मवान्दी के प्रारम्भ में जब कि दुनिया मासंवाद के ऐतिहासिक वैज्ञानिक- राजनीतिक दर्शन को स्वीकार करके एक नवीन क्रान्तिकारी युग में प्रवेश कर रही थी, जवाहरलाल नेहरू को इस नवीन क्रान्ति के महान् उन्नायकों के व्यक्तिगत सम्पर्क में आने का अवसर प्राप्त हुआ था। चीन, रूस और यूरोपीय महाद्वीप के अन्यान्य देशों में क्रान्ति का श्रीगणेश करनेवाले महान नेताओं के सम्पर्क में आने और नई मान्यताओ पर अपना अभिमत देने के चुनौतियों से भरे हुए अवसर उनके समक्ष उपस्थित हुए । लाल- बहादुर शास्त्री के पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री एक दुमरी दुनिया के चरितनायक थे। जवाहरलाल नेहरू के अभिमत भारतीय चितनधारा को ही प्रभावित नहीं करते थे, वरन् उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का एक मानक व्यक्तित्व स्वीकार किया जाता था। उनके प्रतापी व्यक्तित्व को यह कुदरत हासिल थी कि उनके समर्थन से विदेशों में भी उनकी चिन्तनधारा मानने वाले व्यक्तित्वों का उदय होता था। बीसवी सदी का इतिहासकार भारत को नेहरू के माध्यम से इस गौरव से मण्डित करेगा कि इस देश ने अपनी ही आजादी हासिल नहीं को, वरन् दुनिया के अनेक गुलाम देशो को आजाद होने की प्रेरणा और सम्बल भी दिया। यह उनके ही समर्थन का प्रताप था कि युगोस्लाविया के राष्ट्र- पति मार्शल टीटो स्टालिन को लौह अधिनायकशाही शासनतन्त्र के खिलाफ बगावत की आवाज बुलन्द करके भी सही-सलामत रह सके और आगे चल कर नेहरूजी के तटस्थ राजनीति दर्शन के एक महान् स्तम्भ बने । यह नहरूजी का हो योगदान था कि अरब देशो की राष्ट्रीय प्रतिभा के प्रतीक कर्नल नासिर एक अन्तर्राष्ट्रीय नेता के रूप में उदित हुए। नेहरूजी ने भाग काई शेक को जापानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक महान् कातिकारी नेता के रूप में देखा। चीन के राष्ट्रीय संघर्ष के इतिहास मे च्याग काई शेक को स्थिति बदल जाने के बाद उभरती हुई नवीन जनवादी शक्तियो को समर्थन दिया और चीन आज एशिया महाद्वीप के मानचित्र पर एक जब- दस्त हकीकत के रूप में मौजूद है । इण्डोनेशिया की आजादी के पीछे नेहरू 16 लालबहादुर शास्त्री का रागर्थन था। उसी तरह से अन्यान्य अफ्रो-एशियाई देशों को मुगित-संग्राम गी सफलता मे पीछे गेहाजी का नैतिक समर्थन था। अपने इरा महान् अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व कारण ये अमो-एशियाई देशों में नवीन शान्ति मे जगका के रूप में रामादृत हुए थे। इन्हीं असाधारण उपलब्धियों कारण उन्होंने राष्ट्रीय पाल्पना को इतना भाच्छादित कर लिया था कि उनके अपने राजनीतिक दल राह- गार्गी तो सम्मोहित थे ही, विरोधी दलों की गतिविधियां भी उन्होंने समर्थन या विरोध के लिए रांचालित होती थीं। नेहरू के चिन्तन पी छाया में कांग्रेसको विरोधी दलों को घोषणापत्रों का निर्माण होता था। उनके एका पातम्प रो विरोधी दलों की हैसियत के बारे में जनता मे विचार बन और विगए जाते थे। ऐसे गहामहिम व्यक्तित्व को स्यागी जवाहरलाल नेहरू के उत्तराधिकारी के बारे में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय धोत्रों में 'नेहरू के बाद फोन' जैसा प्रश्न उपस्थित होना स्वाभाविक था। भारतीय इतिहास में नेहरू गा यह योगदान भी आशंका को साथ सारण किया जाएगा कि रादियों की गुलामी के कारण विकारयुक्त राागा- जिफ संगठन को परिप्यात गारने यो लिए उन्होंने अधिनायकशाही पारान- तंभ को स्वीकार नहीं किया, हालांकि ये ऐरो सभी गुणों रो राम्पा थे और भारतीय जनता को उन्हें पूरा रूप में स्वीकार करने में किसी प्रकार की हिचक नहीं होती। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ये नेतृत्व में इरा देश की स्वतंभता का संग्राम पूर्णतः भारतीय परम्परा के अनुसार लड़ा गया। गांधीजी ने इस लम्बे संघर्ष में महान् भारतीय परम्पराओं गे पुन- गिरण में गोग दिया। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पैनी विश्लेपणयादी बौद्धिकता से पश्चिमी देशों के चिन्तन रो जगताभिकता का समावेश किया। इन तत्वों से संयुगत होगार भारतीय जनता अपने राष्ट्रीय जीवन फी बिगाट रो विगाट परिस्थिति का सामना गारने गे लिए किस तरह अनागारा सम्पन्न हो रही थी, राम्भवतः इसका अनुमान नेहरू को था और उन्होंने गिासी भी अवसर पर आगह और चुनौती उपस्थित होने पर भी अपने उत्तराधिकारी का नागांयान नहीं किया।
लालबहादुर शास्त्री, 17, - । की झांकी न्यूयार्क के सैटरडे रिव्यू', के संपादक नार्मन कमिन्स के साथ, उनके वार्तालाप से मिल जाती है। नामन कज़िन्स ने उनसे यह सवाल पूछा: था कि महात्मा गांधी ने आपको अपने उत्तराधिकारी के रूप मे. चुना था,. आपका उत्तराधिकारी कौन होगा? आपको उत्तराधिकारी चुनना चाहिए.. क्योंकि हो सकता है.कि जनता में यह सामर्थ्य उत्पन्न न हुई हो। लोगों को यह भी धारणा है कि अगर आपने अपना उत्तराधिकारी न चुना तो नेतृत्व के संघर्ष में इस देश की एकता का शीराजा बिखर जाएगा। इन- प्रश्नों का उत्तर नेहरूजी ने यह दिया था कि "इस देश की 40 कोटि जनता में अपने लिए एक नेता का चुनाव करने की सामर्थ्य है । उस काम को करने, की गुस्ताखी मैं नहीं कर सकता। मैं नहीं समझता कि हमारी जनता अपने नेता का चुनाव करने मे विफल हो जाएगी। इस महान कार्य को सम्मान करने के लिए इस देश की जनता पूर्ण रूप से समर्थ है । जब कभी ऐसा अवसर आएगा, इस देश की जनता नेता का चुनाव कर सकेगी और यह चुनाव गलत नहीं होगा।" नेहरूजी की भविष्यवाणी मही साबित हुई। 27 मई, 1964 को नेहरूजी का निधन हुआ। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे राष्ट्रीय धमनी का स्पन्दन रुक गया है। इस देश को कोटि-कोटि जनता शोक से सतप्त किंकर्तव्यविमूड हो गई थी। इस शोकसंतप्त वातावरण मे भी नेहरू,के, आदों पर चलनेवाली जनता निरस्त नहीं हुई। अपने सबसे प्यारे नेता को सोकर भी उसको आस्था डगमगाई नही। 27 मई के .अपराह्नकाल में. राष्ट्रपति के फरमान के मुताबिक गुलजारीलाल नन्दा को प्रधानमन्त्री का. पद ग्रहण करने का आमन्त्रण दिया गया। लेकिन प्रधानमन्त्री का पद ग्रहण करनेवाले नेता की खोज अव्यक्त रूप समस्त जनता के दिलों में कुल- बुनाती रही। यह अनुमान लगाए जाते रहे कि क्या कांग्रेस संसदीय दल गुलजारीलाल नन्दा को ही स्थायी रूप से इस पद के लिए चुनेगा? व्ह भी प्रश्न था कि काग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई के नीश पर यह मुकुट नही पहनाया जाएगा? समानान्तर रूप से समाज ?
18 लालबहादुर शास्त्री क्षेत्रों में यह फुसफुसाहट हो रही थी कि शायद लालबहादुर शास्त्री ही अंत : में इस पद के लिए चुने जाएं। इस सवाल को हल करने में सभी लोगों के दृष्टिकोण अपने-अपने थे, लेकिन नेहरू के प्रति अपार श्रद्धा, निष्ठा और प्रेम के कारण जनता के मस्तिष्क में अनायास यह भावना भर गई थी कि राष्ट्र की बागडोर ऐसे व्यक्ति के हाथ में दी जाए, जिसके प्रति नेहरू के मन में विश्वास की भावना रही हो। ऐसा नहीं कि नेहरूजी ने अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारी के. प्रश्न पर विचार ही न किया हो। सम्भवतः उनके मन में अपने दीर्घ- कालिक समर्थक और राजनीतिक विचारों के सफल उद्घोषक वी० के० कृष्ण मेनन को भी अपना उत्तराधिकारी वनाने का विचार आया हो। सन् 1952 में संयुक्त राष्ट्रसंघ में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता के रूप. में उनकी नियुक्ति करके नेहरू जी ने कृष्ण मेनन को भारतीय राज- नीतिक जीवन में सहभागी होने का संकल्प धारण किया था। कृष्ण मेनन इस पद पर 1962 तक आसीन रहे। अपनी उत्कट प्रतिभा और शक्तिशाली वाग्मिता द्वारा भारत के आग्नेय व्यक्तित्व का प्रतीक बनकर उन्होंने नेहरूजी की विचारधारा को अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच पर स्थापित किया। राजनीतिक विचारधारा की दृष्टि से कृष्ण मेनन ही उनके सबसे अधिक : निकट थे। संयुक्त राष्ट्रसंघ में उनकी सफलता से प्रेरित होकर नेहरू ने सन् 1956 में कृष्ण मेनन को निविभागीय मन्त्री के पद पर नियुक्त किया। 1957 में उन्हें प्रतिरक्षा मंत्री के रूप में कैविनेट मिनिस्टर का पद प्रदान किया। यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रेरणा कृष्ण मेनन की अपनी थी या वे अपने पृष्ठपोषक प्रधानमन्त्री की आन्तरिक इच्छा की पूर्ति का साधन बने कि भारतीय मस्तिष्क में उन्होंने यह विचार बैठाया कि एक समाज- वादी राष्ट्र चीन भारत पर कभी आक्रमण नहीं करेगा। लेकिन पंचशील के घोप और 'हिन्दी चीनी भाई-भाई' की ध्वनि के बीच चीनी नेताओं के दिलों में पनपनेवाली ईर्ष्या, द्वेप और शत्रुता जब 1962 के अक्टूबर मास में आक्रमण के रूप में विस्फुटित हुई तो कृष्ण मेनन के भविष्य का अन्तिम निर्णय हो गया। कुछ ऐसी ही घटनाओं का परिपाक मोरारजी देसाई के बारे में भी .. K 7 115"मा लालबहादुर शास्त्री 19 हुआ नेहरूजी गलत या सही, अपने इस निष्कर्ष में कभी नहीं हट मके कि.. भारत को एक समाजवादी राष्ट्र के रूप में विकसित करने की उनकी कल्पना मोरारजी देसाई द्वारा कृतकार्य न हो सकेगी। कांग्रेस के वामपंथी संसदीय नेताओं ने भरसक यह प्रयास किया कि यह पद गुलजारीलाल नन्दा के ही हाथों में बना रहे। सम्भवतः उनकी मान्यता यह थी कि लालबहादुर शास्त्री नेहरूजी के समाजवादी आदर्जा के साथ न्याय करने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। यथार्य उम धारणा के विप.. रोत था । सन् 1951 में पुरुषोत्तमदाम टण्डन द्वारा काग्रेस अध्यक्ष-पद का त्याग किए जाने पर जिम समय जवाहरलाल नेहरू ने काग्रेस का अध्यक्ष. पद ग्रहण किया था, उन्होंने लालबहादुर शास्त्री को उत्तर प्रदेश सरकार के गृहमन्त्री पद से हटाकर काग्रेम के महामचिव के रूप में नियुक्त किया था। तब से लेकर अल तक लालबहादुर उनके विश्वासपात्र बने रहे। उनकी कर्तव्यनिष्ठा, त्याग और निस्पृहता का उत्तरोत्तर प्रभाव नेहरूजी पर पड़ता गया। मन् 1952 में ही उन्हें रेलमन्त्री पद पर नियुक्त किया गया और 1956 में अरियालर रेल दुर्घटना को अपना उत्तरदायित्व मानकर उन्होने मविपद से त्यागपत्र दे दिया। इस अवसर पर नेहरूजी ने उनसे आग्रह किया था कि इस्तीफा न दें क्योकि वैधानिक रूप से यदि वह जिम्मेदारी रेलमन्त्री की थी, तो उससे कम मम्पूर्ण मन्षि- मण्डत की नहीं थी। इस्नीफा स्वीकार करते हुए उन्होंने लोकसभा में कहा था, "वे एक ऊंचे आदर्शों वाले निष्ठावान व्यक्ति हैं। उनमें बेहतर माया और बन्धु की कलाना करना असम्भव है।" सन् 1957 के चुनाव के उपरांत नेहरू जी ने उन्ह मचार व परिवहन मत्री पद पर नियुक्त किया और सन् 1958 में 3 हे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया । मन् 1961 म ५० गोविन्दवल्लभ पन्त के निधन के उपरान्त गृहमन्त्री पद का भार जिम ममय लालबहादुर शास्त्री को सुपुर्द किया गया, उसी समय यह समझ लेना चाहिए था कि उत्तराधिकार का संघर्ष यदि कभी मामने आया तो नेहरूजी की तरजीह उन्हीके पक्ष में होगी। सन् 1962 में अपनी ऐतिहामिक विलायत-यात्रा पर - " म लालवहादुर शास्त्री रमानना रूजी ने यह आदेश दिया था कि सर्वोच्च स्तर पर ध्यान दिए जानेवाले मलों को लालबहादुर शास्त्री के समक्ष पेश किया जाएं। केवल उच्च रीय नीति-सम्बन्धी मामलों के बारे में उनसे पूछताछ की जा सकती वहुधा लोगों ने यह बात कही है. कि कोई ज्योतिषी भी आज तक यह व घोषणा नहीं कर सका था कि लालवर्हादुर शास्त्री एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। नेहरू के जीवन के अंतिम दिनों में ज्यों-ज्यों उनकी आत्मनिर्भरता कम होती गई, लालबहादुर उनके निकट से निकटतर आते रहें। 1964 के जनवरी मास में नेहरूजी को पक्षाघात का आक्रमण हुआ। चार महीने पहले ही लालवहादुर शास्त्री कामराज योजना के अधीन अलग हुए। लेकिन पुनः उन्हें निविभागीय मन्त्री के स्थान पर नियुक्त किया गया। इसी समय उनके जिम्मे प्रधानमन्त्री एवं विदेशमन्त्री के पद का समस्त भार सौंप दिया गया था। यह भी कहा जाता है कि किसी समय नेहरूजी के मन में यह बात आई थी कि लालबहादुर शास्त्री को लोकसभा के नेता पद पर नियुक्त कर दें, लेकिन कांग्रेस मन्त्रिमंडल में उनका स्थान चौथे दर्जे पर था, अन्य वरिष्ठ नेताओं के विरोध के कारण ऐसा नहीं किया जा सका। 'निविभागीय मन्त्री पद पर आमन्त्रित करते हुए नेहरूजी ने. उनसे कहा था, "मेरा काम करो।" भुवनेश्वर-अधिवेशन के बाद जिस समय नेहरू देहरादून विश्राम से लौट रहे थे तो उन्होंने लालवहादुरजी को प्रधानमन्त्री सम्मेलन में अपने साथ चलने के लिए तैयार रहने का आदेश दिया था। वह समय नहीं आया, लेकिन नेहरूजी के इन संकेतों से यह स्पष्ट हो गया था कि वे लालबहादुरजी को ही अपना उत्तराधिकारी वनान चाहते थे। उत्तराधिकारी की अल्पकालिक खोज निश्चय ही मुगलकाली उत्तराधिकार के संघर्ष का रूप धारण कर लेती यदि कांग्रेस अध्यक्ष तः नेताओं को यह विश्वास होता कि चुनाव के माध्यम से आए उम्मीदवार को जनता स्वीकार कर लेगी। कांग्रेस कार्यसमिति की बै 29 मई को हुई, लेकिन यहां केवल औपचारिक कार्य हुए। दिवंगत प्रघ मंत्री का शोक प्रस्ताव स्वीकार किया गया और उनकी महान राष्ट्रसेव अन्य - . .
: . के लिए कृतज्ञता प्रापित की गई प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए दो दिनलाई फिर बैठक बुलाई गई। इस वंठक में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों माहम 42 नेता उपस्थित थे, 15 मुख्यमंत्री और 6 नेता विशिष्ट आमन्त्रितों की हैसियत से बुलाए गए थे। इस सभा का अन्तिम निर्णय यही आया कि प्रधानमन्त्री का चुनाव ममम्मति से होना चाहिए । काग्रेस अध्यक्ष कामराज के कपर यह काम मौंपा गया कि वे कांग्रेस नेताओं को सर्वसम्मत राय का पता चलाएं। इस बात का कांग्रेस और कामराज के इतिहास में उल्लेख किया जाएगा कि उन्होंने कुछ घण्टों में लगभग नार सौ नेताओं से व्यक्तिगत और दलो से सम्पर्क स्थापित किया और यह स्पष्ट हो गया कि लालबहादुर शास्त्री के कन्धो पर यह मार डाला जाएगा। भारत के प्रधानमंत्री पद पर ऐसे व्यक्ति का प्रतिष्ठित होना, इस सत्य का सूचक है कि हमारी आजादी के 50 वर्षों के संघर्ष ने यदि व्यक्ति- पूजा की भावना को उत्पन्न किया तो एक ऐसी राष्ट्रीय प्रतिमा का भी निर्माण किया जो ममय पड़ने पर अपनी समग्रता को एक व्यक्ति के रूप में भी निरूपित कर मकती यो। लालबहादुर इमी समप्र अकिंचनता के प्रतीक बनकर प्रधानमंत्री के पद पर बैठे और भारतीय जनता ने उनके रूप में अपना ही साक्षात्कार किया। यह प्रश्न हमेशा ही पूछा जाएगा कि लालबहादुर शास्त्री के इस महान् उत्थान के पीछे कौन-सा रहस्य था? सास ऐंजेल्स मे ट्वेन्टिएय सेंचुरी फाक्म के चेयरमैन स्पाइरोस स्कोरास ने रूस के तत्कालीन प्रधान• मन्त्री शरचोव से उनकी अमरीका-यात्रा के दौरान यह प्रश्न पूछा था, "मैं एक यूनानी शरणार्थी के रूप में अमरीका आया था और आज एक विशाल कार्पोरेशन का अध्यक्ष है। क्या आपके समाज में किसी व्यक्ति को उन्नति करने का अवसर प्राप्त हुआ है ?" घश्योव: "श्री स्कोरास ने बताया कि वे 12 वर्ष की आयु से काम कर रहे हैं, लेकिन मैं तो तब से काम कर रहा हूं, जब से मैंने अपने पैरों पर सड़ा होना मीखा पा। 15 वर्ष की आयु तक मैंने एक गडरिये के ग्वाले की तरह काम किया। उसके बाद एक फासीसी मालिक को खान में काम 22 लालवहादुर शास्त्री किया, फिर एक वेल्जियम फैक्ट्री में काम किया और आज मैं इस देश का प्रधानमंत्री हैं।" कुछ ऐसी ही कहानी लालबहादुर शास्त्री की है। भारत की आजादी के पूर्व उन्होंने तपस्या का ही जीवन व्यतीत किया। आजादी के बाद उन्हें काम करने का अवसर मिला और उन्होंने कर्त्तव्य की हर परीक्षा में काम- यावी हासिल की । शास्त्रीजी के व्यक्तित्व में विनय थी। उनके अस्तित्व का भान तव तक नहीं होता था, जब तक उनकी स्पष्ट, तर्कयुक्त मुंशि- याना तकरीर शुरू न हो जाती। उनके प्रत्येक शब्द में एक आत्मीयता ध्वनित होती थी । वे आत्म-भर्त्सना के व्यामोह से अपने को मुक्त नहीं कर पाते थे। कभी-कभी अवसर न होते हुए भी ऐसा भाव प्रकट करते थे; यह भावना उनकी युक्ति थी और शक्ति भी। उनके चेहरे से हमेशा एक आश्चर्य-मिश्रित भावना झलकती थी, जिसे पढ़ा जाता तो पता चलता कि प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के दुर्लभ अवसर की प्राप्ति से वे स्वयं चकित नहीं थे। वे अपने जीवन की प्रार- म्भिक अकिंचनताओं को भूलते नहीं थे। जब कभी अवसर आता तो वैभव की दुनिया से सहसा अपने अन्तर की दुनिया में चले जाते । जान-बूझकर वे अपनी साधुता का प्रदर्शन नहीं करते । उनके चेहरे पर यह संकल्प भी देखा जा सकता था कि चुनौती आने पर वे बड़े से बड़ा बलिदान कर सकते हैं । राजगद्दी छोड़ने का मोह उन्हें एक क्षण के लिए भी नहीं हिच- कने देगा। यही उनकी वह शक्ति थी, जिसने उन्हें सबसे आगे की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। उनके राजनीतिक जीवन का एक-एक क्षण गंभीर निष्ठा और आस्था से सम्पन्न रहा है। उन्होंने किसीको अपना प्रतिस्पर्धी अथवा शत्रु नहीं माना । डा. राजेन्द्रप्रसाद के बाद इन्हें भारतीय राजनीतिक रंगमंच का अज्ञातशत्रु कहा जा सकता था। किसी सिद्धांत के प्रति उनका आग्रह नहीं था। वे सिद्धांतकार के रूप में ख्यात होना नहीं चाहते थे। न वे अति- वादी थे। सहिष्णु थे और अपने को सच्चाई का एकमात्र और अन्तिम अलम्बरदार नहीं मानते थे। ऐसा कोई भी सामाजिक क्षेत्र नहीं था, जिस के लिए वे अमान्य हों, या जिसके एकमात्र प्रतिनिधि होने का वे दावा 1 सालबहादुर शास्त्री 23 करते रहे हों। उनकी लोकप्रियता का रहस्य यही था। उनके चेहरे पर इतनी भोली मामूमियत मुसकराती थी कि प्रधानमंत्री पद की महत्ता को उनके कर्म ढूढना होता था। उनके सम्पर्क में थाने वाला शायद ही कोई ऐमा व्यक्ति रहा हो, जो उन्हें देखकर यह न कह उठा हो-ओह. जब ये प्रधान मन्त्री बन मक्ते हैं तो मैं क्यो नहीं बन सकता? अपनी इमी विगिष्टता के कारण वे जनता के साथ अपने पद के सहभागी बनते थे और कभी किसीकी ई के पात्र नही वने। केवल एक अन्तर था, जिसके कारण वै भीड मे खोए नही, खो नहीं सकते थे। उनके निर्णय मुविचारित और परिपक्व होते थे। वे एक तपोनिष्ठ संगठनकर्ता थे। मध्यवर्ती मार्ग का अनुगरण करने के कारण उन्हे झगडे निपटाने और विरोधी दलों मे समा. हार उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता सहज ही प्राप्त हुई थी। उनके निर्णय निष्पक्ष और न्यायपूर्ण होते थे। उन्हें अपना स्वायं दिखाई नहीं देता था । माथियो का विश्वास करते थे, अग्रेजों के प्रति भक्तिपूर्ण अनु- राग रखते और छोटो वे प्रति सहिष्णुता। उनके व्यक्तित्व के इस महान् गुण का अध्ययन करने की जरूरत नहीं। लाला लाजपतराय की सर्वेण्टम आफ पीपुल्स मोसाइटी के कर्मचारी पद मे लेकर कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में सार्वजनिक जीवन में उन्हें दो विरोधी एवं महान् व्यक्तियों के मध्य सकुशल रहने का अच्छा-खामा अनुभव मिला। उत्तर प्रदेश मे उन्हे पण्डित गोविन्दलभ पन्त और रफी अहमद किदवई के प्रति समान रूप में निष्ठा रमनी पड़ी। केन्द्रीय राजनीति में उन्हें जवाहरलाल नेहरू और पुष्पोत्तमदाम टंडन, दोनों के प्रति समान भक्ति रखनी पड़ी । अनेक अवमरो पर उन्होने टूटते गम्बन्धी को जोडा। उनके निस्पह परामर्श को स्वीकार करके सभी मानोप की मांग लेते थे । दीर्घकालीन सार्वजनिक जीवन में उन्होंने जून 1964 के प्रथम सप्ताह मे काफी पहले यह विश्वास स्थापित कर दिया था कि भले हो उनके मस्तिष्क में महान् विचारो का तूफान न उठना हो, लेक्नि स्वी. फत सिद्धांत के अनुसार अपने कर्म को ढालने में उनकी ममता पाना मुश्किल था। मौलिकता की दृष्टि में उन्हें अपने समकालीन विचारको में । ।
-- 24 "लालबहादुर शास्त्री भले ही सर्वोच्च स्थान न दिया जा सके, लेकिन अपने सुपुर्द किए गए 'कार्यों की पूर्ति वे जितनी तत्परता के साथ करते थे, उसके लिए महान् 'संकल्प-शक्ति की आवश्यकता होती है । 'लालबहादुर शास्त्री ने नेहरूंजी का स्नेह अर्जित किया था। जन्म 'से उन्हें इतना रुतवा नहीं मिला था कि आजादी के संघर्ष में शौक के रूप में शरीक होते और अपने वर्ग के किसी महापुरुष की नज़र में चढ़कर 'नेताओं की पहली पंक्ति में उठाकर खड़े कर दिए जाते । प्रादेशिक राज- 'नीति से केन्द्र में बुलाए जाने के बाद अपनी कर्मनिष्ठा से एक के बाद दूसरे उत्तरदायित्व को सफलतापूर्वक वहन करने की क्षमता उन्होंने अर्जित और स्थापित की थी। नेहरूजी और पण्डित पन्त को छोड़कर शायद ही दूसरा कोई 'मन्त्रिमंडलीय सहयोगी ऐसा होगा, जिसे प्रशासन का इतना व्यापक ज्ञान था। विभिन्न पदों पर काम करते हुए उन्होंने अनेक उप- लब्धियां प्राप्त की थीं, जिनके लिए देश की कृतज्ञता प्राप्त करने का सोभाग्य उन्हें मिला । "भाषा को लेकर दक्षिण और उत्तर के बीच पड़ने वाली दरार को उन्होंने राष्ट्रभाषा विधेयक द्वारा पाट दिया। असम के भापायी दंगों को समाप्त करने से लिए शास्त्री फार्मूले ने अमोघ औषधि का काम किया था। अकालियों के धार्मिक आन्दोलन के विस्फोट को शमन करनेवाले भी लालबहादुर ही थे। केरल में कम्युनिस्टों के खिलाफ संयुक्त मोर्चे के पीछे भी उन्हींका संगठन था । संयुक्त मंत्रिमण्डल से केरल-केसरी पट्टम तानु पिल्लं को पंजाव का गवर्नर बनाना और कांग्रेस को केरल में शासन की बागडोर देने का कार्य भी उन्होंकी देख-रेख में हुआ था। शास्त्रीजी ने नेपाल के कम्युनिस्ट चीन की ओर बढ़ते हुए झुकाव को भारत की ओर मोड़कर पुनः घनिष्ठ सम्बन्धों का रूप दिया। शेख अब्दुल्ला की रिहाई के पीछे भी लालबहादुर जी की प्रेरणा थी। स्वयं नहरूजी ने शास्त्रीजी के ऐसे निश्चय को ऐसी ही साहसिकता पुकारा था जिसमें जान-बूझकर संकट सिर पर ओढ़ा जाता है । शेख को कश्मीर में खुला ही नहीं छोड़ा गया, उन्हें विदेश-यात्रा करने का मौका भी दिया गया। उनको वह हर मौका दिया गया जिससे उनके चेहरे पर पड़ा हुआ नकाव हट जाए और समूचा देश हकीकत को समझ ।
लालबहादुर डा. ले!'दशेस अब्दुल्ला की एच साप्रिदायिकता दुनिया के सामने देपर्दा 'हो गई। कश्मीर आज भी सही-सलामत है । पवित्र बाल की चोरी और पुन:प्रतिष्ठापना और कश्मीरी जनता के लिए और भी अधिक स्वाधीनता 'को प्रदान करना लालबहादुर शास्त्री का हो काम यां। केवल यह निष्कर्ष निकाल लेना काफी नहीं है कि उन्होंने जो किया, उसका श्रेय नेहरूजी को सद्भावनाओं के कारण मिला निहरूजी के सद्भावना किसे प्राप्त नहीं थी ? "नदीसा के बीजू पटनायक को भी नेहरूजी ने आगे लाने की कोगिता की थी। घूमकेतु की तरह वह उड़ीसा को राजनीति में चमके । उंडीसा के मुख्यमन्त्री रहते हुए भी नेहरूजी के दफ्तर में उनके लिए एक कक्ष सुरक्षित किया गया था। सन 1952 में नेहरूजी ने जयप्रकाश नारायण को भी कांग्रेस में लेकर उपप्रधानमन्त्री 'चनाने का प्रयास किया था। चिन्तामणि देशमुख को भी उन्होंने इतनी आत्मीयता दी थी कि राजनीतिक क्षेत्रो में उनके लिए वढी-बही अटकलें लगाई जानी शुरू हो गई थी। स्वयं इन्दिराजी को इतना अवसर दिया गया कि वे अपने व्यक्तित्व को राष्ट्रीय व्यापकता दे म। इन सबको जिस समय अवसर मिल रहे थे, लालबहादुरजी' तब भी उनके एक सैनिक की हैसियत से अपने हितों को भूलकर ऐतिहासिक कार्यों के सम्पादन में दिलो. जान में लगे हुए थे। इसमें सन्देह नही कि नेहरूजी को सद्भावना मिलने पर यदि वे उमका विवेकपूर्ण उपयोग न कर पाते, तो प्रधानमन्त्री पद जो उन्हें मिला, नही मिलता। भारत-पाकिस्तान युद्ध के पूर्व बहुत कम लोग यह विश्वास कर सकते थे कि लगभग 5 फुट के कद वाला यह प्रधानमन्त्री दृढता को हिमालय सरीसी ऊंचाई को प्राप्त कर सकेगा। लालबहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व पर गाजियन' ने अभिमत दिया था कि मांस्त्रीजी कदोकामत मे नंगण्य दीस भले पडते हों, लेकिन वैसे नहीं हैं। "लालबहादुर शास्त्री अभिनेता किस्म के भावुक नेता नहीं हैं। उनका लघु शरीर प्राय. अप्राकृतिक रूप मे निमित प्रतीत होता है, उनका स्वर सात, लेकिन अन्तरात्मा मे निस्सृत होता-सा प्रतीत होता है। उनके व्यक्तित्व के धारों तरफ घोटाले का वातावरण नहीं है। ये विनीत भाव से ।
26 लालवहादुर शास्त्री . सम्पन्न हैं, लेकिन अपनी शक्ति से सुपरिचित हैं । सभी संराधकों (कन्सी- लियेटर) की तरह उनमें इतिहाई पुरुतगी है। मौनावस्था में उनकी इस विशेषता को उनके मुख पर पढ़ा जा सकता है। किसीके प्रश्न की प्रति- क्रिया में उनके मुखमण्डल पर तीक्ष्णता और दृढ़ता उभर आती हैं। उनकी आंखों में चमक है, आर्द्रता है, लेकिन सतर्कता भी है। उनकी अंग्रेजी सावधानी से संवारी हुई और गरिमायुक्त होती है, लेकिन नेहरू के समान नहीं, क्योंकि वे उस भापा में सोचते थे। "भारत के पवित्रता, धैर्य और संकल्पशीलता जैसे गुणों का पराभव अन्धविश्वास और अकर्मण्यता में होता है । शास्त्री के साथ ऐसा नहीं है। वे हिन्दू धर्म में निष्ठा के साथ विज्ञान की शक्ति में भी आस्था रखते हैं। कर्म उनका दर्शन है। बर्नार्डशा, बर्टेड रसल और जूलियन हक्सले उनके प्रिय लेखक हैं । उन्होंने सन् 1942 के बाद नैनी जेल में कारावास के दिनों में मैडम क्यूरी की जीवनी का हिन्दी में अनुवाद किया था। मैडम क्यूरी के जीवन ने उन्हें इसलिए आकृष्ट किया था कि वे सेवापरायण थीं और वैज्ञानिक भी...1 "शास्त्री नेहरू से उतने भिन्न नहीं हैं, जितने दिखाई पड़ते हैं। अपनी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि और रुचियों के कारण वे मुख्यतः भारतीय हैं, लेकिन भारत के भविष्य के बारे में उनकी बुनियादी मान्य- ताएं नेहरू जैसी ही हैं । यदि वे काम के बोझ से अपने को ध्वस्त नहीं कर देते, और जिन्हें भारत का मित्र होना चाहिए ऐसे लोग उनकी सहायता करते हैं तो वे शंकाशील दुनिया के सामने यह सिद्ध कर देंगे कि भारतीय जनतन्त्र का अस्तित्व किसी एक महामेधावी व्यक्ति पर निर्भर नहीं है। महान् दायित्व स्वीकार करने की घड़ी उनके जीवन में जिस समय आई, तो उन्होंने शीश झुकाकर उसका स्वागत किया। 'आम मत' और 'सामूहिक नेतृत्व' के आविष्कर्ता कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नाडार ने इन दोनों उद्बोधनों से यह स्थापित किया था कि 'नेहरू-जैसे महान व्यक्ति की पूर्ति असम्भव' होते हुए भी यह देश अपने कामकाज का संचालन कर सकता है। शास्त्रीजी इस सामूहिक नेतृत्व के नारे से न तो विचलित हुए और न दुःखी। शायद हमेशा की भांति समूह को व्यक्ति में आत्मसात् लालवहादुर शास्त्री 27 करने की प्रतिमा उनमें थी । लालबहादुर शास्त्री के पक्ष में कामराज नाहार ने 'आम मत' होने का निष्कर्ष गुलजारीलाल नन्दा, मोरारजी देमाई, जगजीवनराम और श्रीमती इन्दिरा गाधी को बताया था तो सम- ग्वयवादी शास्त्री की आत्मा जैसे अपने इन महामहिम सहामियों की आत्माओं में प्रविष्ट कर गई थी। 'आम मत' के हामी न होते हुए भी मोरारजी देसाई ने कहा था कि कठिनाइयो के समय प्रसन्न रहना ही उनका जीवन-दर्शन है। दो जून को संसद भवन के सेष्ट्रन हाल में कार्य- बाहक प्रधानमन्त्री ने प्रधानमन्त्री पद के लिए लालबहादुर शास्त्री का नाम रमा संकल्प और मोरारजी देसाई ने उगका अनुमोदन किया । इस्पात मे भी अधिक कठोरता के स्वामी मोरारजी के जीवन में इस तिथि मे निष्काम कर्म का सूत्रपात हुआ, यह गास्त्रीजी के सौहार्द का प्रताप था । यह प्रास्त्रीजी का सौभाग्य भी था क्योकि उनके सौभाग्य का सिंहद्वार प्रशस्त करने वाती नेहरू की आत्मा, जो उनके जीवन काल में 'एरता के सूत्र में बांधने वाली दाक्ति' का काम करती थी, आज एकता की भावना लाने बाली भक्ति के रूप में काम कर रही थी। इस अवसर पर लालबहादुर शास्त्री ने बहुत सक्षिप्त भाषण किया था। उन्होंने कहा था कि मैं समाजवाद को स्थापना के लिए प्रयाम करूंगा" गम्भीर राष्ट्रीय क्षति के वाद हमे हिम्मत से काम लेना है और जो काम नेहरू अधूरे छोड गए हैं, उन्हें पूरा करना है...।" इस भाषण के दौरान लालवहादुरजी इतने भावाभिमूत हो गए ये कि वे कुछ मिनट तक चोल नही सके थे। उनकी आखो से आंगू वह रहे थे, गला इतना भर आया था कि उनका स्वर विलकुल अस्पष्ट हो गया था। इसी बीच पिसीने उन्हें पानी का गिलाम लाकर दिया था। कोई प्रधानमत्री अपने पूर्ववर्ती को इससे अधिक सच्ची श्रद्धाजति अपित नही कर सकता । इस पद की म्पर्धा मे आए महामहिम व्यक्तित्व शायद इस कुर्मी में बंटे उनमे अधिक भारीभरकम दौस पड़ते लेकिन उनकी आसो मे आंगू नही आ सकते थे। कारण कि लालवहादुर शास्त्री के रूप में राष्ट्रीय आत्मा इस पद पर आसीन हो रही थी, जो नेहरू के निधन से सम्पूर्ण राष्ट्र की रूप मे मूर्त हो चुकी थी।
28 लालबहादुर शास्त्री -- इस मूर्त व्यथा की पूतप्रेय आत्मा की शक्ति लेकर ही मनोनीत प्रधान- मन्त्री के रूप में उन्होंने अपने निवास स्थान पर मौलश्री के. वृक्ष के नीचे बैठकर दो सौ विदेशी और भारतीय पत्रकारों के समक्ष यह घोषित किया था कि "मैं श्री नेहरू की घरेलू और परराष्ट्र नीतियों का पालन करूंगा। शांतिपूर्ण उपायों से मैं नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के लिए, कार्य करूंगा। विदेशी मामलों में मैं सव देशों के प्रति मित्रता की नीति पर चलूंगा और सैनिक संगठनों में नहीं पड़ेगा।" संकल्पन और आयोजन की विराट प्रेरणा के महावट नेहरू के उत्तराधिकार के भार को वहन करने वाले उनके अनन्य साथी और मित्र के मुंह में अनुवर्तन की घोषणा का यही सर्वश्रेष्ठ अवसर था और इस अवसर को शास्त्रीजी ने कभी अपने हाथ से फिसलने नहीं दिया। - . 1 " . . बाल्यकाल . " लालबहादुर शास्त्री के वाल्यकाल का अध्ययन करने पर सहसा इस निष्कर्ष पर पहुंचने का मन होता है कि जिन लोगों का प्रारम्भिक जीवन वैभव-विलास में व्यतीत होता है, सम्भवतः वे जीवन के कटु यथार्थ के अनुभूतियों से वंचित रह जाते हैं और गमलों में लगाए गए फूलों के समा जीवन की सम्पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाते । शास्त्रीजी का जीवन वार मनोविज्ञान की उन धारणाओं को भी पराजित करता है जिसके अनुस यह कहा जाता है कि कष्टों, अभावों और वंचनाओं से आच्छादित वा मस्तिष्क अनेक कुंठाओं के शिकार हो जाते हैं, जो जीवनपर्यन्त सामा जीवन के मार्ग में बाधा उपस्थित, करती हैं। उनके पारिवारिक, सा जिक और राजनीतिक जीवन में आश्चर्यजनक सन्तुलन का परि मिलता है। इनका जन्म 2 अक्तूबर, 1904 को मुगलसराय में हुआ। इनके । शारदाप्रसाद श्रीवास्तव धनाढ्य नहीं थे परन्तु उत्तरप्रदेश के का परिवारों की उच्च सांस्कृतिक परम्परा, बौद्धिक विकास तथा उच्च तर Por.. . कलर्क पद पर नियुक्त हो गए थमिकता है कि.गाजी का लालबहादुर मात्रा 29. व्यतीत करने के आदर्श मे प्रेरित एक कुलीन । कुलीन परिवार के सदस्य थे। पदो.. में वे एक शिक्षक थे। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में जीवन आर्य को सम्पूर्णता को प्राप्त होता तो नन्हें की जीवन को जीवन को विकट परिस्थितियों में मे ने गुर्जरना पड़ना । नन्हे अभी हद वर्ष का हा था कि उमके सिर में पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया उसे शायद यह, ----------- से अपने ही पेरो रामदुलारीदेवी अल्पावस्था में वैधव्य को प्राप्त हो गई। माना के लिए नन्हे हो एकमात्र, आश्रय और महारा था। धर्मपरायणा मा के लिए तो यह गंगामाता को हो देन बन गया । गगा के दर्द पुत्र नन्हे को दादावावस्था की दो कहा.. निमा प्रचलित हैं । हो सकता है कि दोनों व हानिया एक ही कहानी के रूप हों। एक कहानी है कि रामदुलारीदेवी इलाहाबाद के मेले में पुष्पस्नान . के लिए गई। नन्हे उम समय केवल दो माह का था। गंगा पार करते हुए बच्चा उनको गोद में फिसन पहा ! मां ने तो मोच लिया कि नन्हे गगा मैया के अंक में समा गया, लेकिन वह मुरी नौका में बैठे हुए किसान को टोकरी में गिर गया था। इघर मा अपने गिशु के वियोग में बेहाल हो रही थी, उधर किमान खुश हो रहा था कि गगा मैया से उमे इतना मूल्यवान प्रसाद प्राप्त हुआ। इस कहानी के अनुमार बच्चा चार दिन वाद वापस मिला। दूसरी मान्यता यह है कि जब नन्हे तीन महीने का पानो उमको माता गंगा-स्नान के लिए गई। वे बच्चे को घाट पर नहला रही पी मि इतने में भीड़ का रेला आया। वे स्वय भी गिर गई और बच्चा भी उनक हाथ से छूटकर एक किमान की टोकरी में जा गिरा । दुखी मा अपन बच्च को घर-घर खोजती फिरी। बाद में पुलिम में मूचना दर्ज कराई गई और उनको सहामता से नन्हे यापम मिल गया । आश्चर्य होता है कि नन्हे अगर वापम न मिलना नो क्या हाता आश्चर्य ठीक उसी तरह का है कि अगर भगवान् कृष्ण माना ददरी के 30 लालवहादुर शास्त्री यहां से यशोदा की गोद में न गए होते, और जमना पार करते समय उनका चरणस्पर्श करने आए जल को देखकर घबराए वासुदेव बच्चे समेत डूब जाते तो क्या होता? गंगा के रेत में खेलते हुए नन्हे के जीवन पर पुण्यसलिला गंगा का प्रभाव बहुत अंशों में था। गंगा ने उन्हें तैराक बनाया । वाढयुक्त गंगा को तैरकर पार करने का सामर्थ्य जिस वालक ने अल्पायु में ही कर लिया हो उसके बारे में दो ही भविष्यवाणियां की जा सकती थीं। या तो वह मल्लाह या मछियारा बनेगा या एक ऐसा महा- पुरुप जो जीवन की कठिन से कठिन बाढ़ में से अपने को सुरक्षित पार निकाल ले जाएगा। उनके बचपन से गंगा का वेहद निकट का रिश्ता है। यदि समय होता और अपने मित्रों के इस सुझाव को मान लेते कि उन्हें अपना आत्मचरित लिखना चाहिए, तो वे शायद गंगा पर एक स्वतन्त्र अध्याय ज़रूर लिखते । उनके प्रारम्भिक जीवन की विपन्नावस्था के बारे में एक कहानी यह भी प्रचलित है कि वे प्राइमरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने जाते समय गंगा तैरकर पार करते थे । शायद इस कहानी में अतिशयोक्ति ही अधिक है। अधिक विश्वसनीय कहानी यह है कि एक बार मेला देखने के लिए लाल- बहादुर अपने बालमित्रों के साथ गंगा पार गए। दिन-भर मेले में घूमने के बाद जब सब लोग लौटने लगे तो लालवहादुर पीछे को ठिठक गया। एक-एक करके सभी साथी नौकाओं में वैह गए और घर के लिए रवाना हो गए तो लालवहादुर गंगा में कूद पड़े और तैरकर घर जाने लगे। गंगा का पाट आधा मील चौड़ा था। चौड़ाई और गहराई की दृष्टि से किसी भी मौसम में गंगा को पार करने वाले को वीर माना जाता है। फिर लालवहादुर तो वच्चा ही था। नन्हे ने अपने साथियों से कह दिया था कि वह अभी और मेला देखेगा। वास्तविकता यह थी कि उसके पास नाव का किराया अदा करने के लिए पैसे नहीं थे। स्वाभिमानी लालवहादुर अपने मित्रों को अपनी स्थिति का भान नहीं होने देना चाहता था । तैराकी में केवल कौशल की प्राप्ति काफी नहीं होती। बाजुओं में ताकत की ज़रूरत भी होती है । लाल- बहादुर को शायद अपनी कुव्वते-बाजू पर अभिमान था। इसीलिए जब लालवहादुर शास्त्री 31 कभी जल की चुनौती उन्हें मिली, वे हमेशा लंगोटाबन्द हो गए । वमे दो बार वे डवते-डूबते बचे थे। एक बार तो अपने शिक्षक का तीन वर्षका बच्चा उन्होंने अपने कंधे पर बैठाया हुआ था। आश्चर्य है कि बने का अवसर उपस्थित होने लगा था तालाय के ठहरे हुए पानी मे, वेगवती सरिताओं ने उन्हें कभी धोसा नहीं दिया। उनके प्रारम्भिक जीवन के इन तत्त्वों का प्रभाव आगे चलकर उनके मित्रो और महकमियों के चुनाव पर भी पडा। शायद नेहरू के रूप में उन्हे वेगवती गगा का जीवन-रूप मिला और उन्होने बहरे हुए जल के महाशयो को विदाई का प्रणाम कर लिया। वाल्यकाल के संस्कार ही व्यापक जीवन का आधार बनते हैं। ये संस्कार उन्हें अपने ननिहाल में प्राप्त हुए। पिता के देहावसान के बाद रामदुलारीदेवी अपने पिता के घर चली गई। वही लड़की होने के कारण वे अपने पिता को प्रिय पुत्री यो। लालबहादुर को भाई-भतीजों, नाती-पोती और नातिनो-पोतियो से भरा कुनवा मिला। स्वय शास्त्रीजी का कहना पा कि उनके पिता जीवित होते तो भी शायद उन्हें इतना प्यार न कर पाते । छठी रक्षा तक वे अपने नाना हजारीलाल के घर मुगलसराय में ही रहे । इस जमाने की घटनाओ का लोगो को अधिक पता नहीं है। यह देखने में आया है कि नाना के घर पर पलनेयाले बच्चे प्राय: उदासीन, काम- चोर और झगदान हो जाते हैं। उन्हें या तो अधिक प्यार मिलता है या निहायत उपेक्षा, लेकिन लालवहादुर के प्रारम्भिक जीवन मे ऐसी कोई ठा कभी देखने में नहीं आई। दस वर्ष की आयु में छठी कक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने मुगल. सराप छोड दिया और वाराणसी में अपने मौसा रघुनाथप्रमाद के यहा चले आए ताकि हाईस्कूल में प्रवेश कर सके । रघुनाथप्रसाद एक आदर्श गृहस्थ थे। उनका जीवन निष्काम कर्म का श्रेष्ठ उदाहरण था। बनारस म्युनिसिपलिटी में हैड पलक थे। उस जमाने में हेडवलकं को गरीब नहीं कहा जा सकता था। यह वात दुमरी है कि वे अपने परिवार को उतनी सुख-सुविधा नहीं दे पाते थे, जितनी देना चाहते थे । बढे परिवार का सचा- लन करना और लोम का संवरण करना मुश्किल काम होता है। रघुनाथ 32 लालबहादुर शास्त्री प्रसाद ने कष्ट सहे लेकिन ऐसा आचरण नहीं किया.जिससे बच्चों के सामने. कोई गलत मिसाल बन जाए. इन दिनों वनारस के जीवन में प्राच्य विद्याओं के अभ्युत्थान का दौर चल रहा था। घर-घर में योग साधना, तपश्चर्या और दार्शनिक उप- लब्धियां प्राप्त करने की ओर झुकाव था, यह नगर बीसवीं सदी के प्रार-- म्भिक चरण में अनेक योगियों, सन्तों और फ़कीरों का. विचरण क्षेत्र रहा, है। लालवहादुर के मौसा. एक, सद्गृहस्थ के रूप में प्रेरक जीवन व्यतीत करते थे। साठ वर्ष की आयु में अवकाश ग्रहण, करने के बाद उन्होंने एक, दुकान चलाई ताकि अपनी आमदनी में वृद्धि कर सकें। विकट परिस्थितियों, में गृहस्थ जीवन के ऐसे संचालन का लालबहादुर ने खुली आंखों..देखा था । सम्भवतः मौसा के निष्काम जीवन का ही..प्रभाव है कि शास्त्रीजी तपे तो जी भरकर, लेकिन संग्रह की तरफ ध्यान देने का कभी विचार ही, उनके मन में नहीं आया। सन् 1935 और 45 के बीच. शास्त्रीजी के पारिवारिक जीवन की आर्थिक कठिनाइयों, को ज़ो.लोग जानते हैं, उन्हें यह विश्वास करने में कभी कठिनाई नहीं हुई कि वे पिछले जन्म में प्रारंभ. की गई अपरिग्रह साधना की पूर्ति, जो शायद अधूरी रह गई.थी, इस जन्म, में कर रहे थे। घर के प्रभाव और हरिश्चन्द्र हाई स्कूल के वातावरण.ने. नन्हे के जीवन को नवीन सांचे में ढाल दिया। डी० आर०. मनकेकर ने शास्त्रीजी:- की जीवनी में उल्लेख किया है कि, इतनी छोटी उम्र में ही उन्होंने सन्तों, की वाणी से एकात्म कर लिया था। गुरु नानक के एक पद को उन्होंने. अपने जीवन का नियामक मन्त्र बना लिया थाः नानक , नन्हे ह.. रहो, जैसे नन्ही दव,। और रूख सूख जाएंगे, दूब खूब.की.खूब ॥ वास्तव में नन्हे के लघु आकार ने उसे सन्तोष और धीरज से काम लेने की आन्तरिक प्रेरणा दी थी और. खामोशी के साथ अपने अन्य गुणों.. का विकास करके सबकी प्रशंसा अजित करने का संकल्प..पैदा कर दिया. था। उसे अपने लघु. आकार-प्रकार का. वोध ही नहीं था, उसे यह भी. . ला-2 लालबहादुर शास्त्री 33 ध्यान रहता था कि पिता के न होने के कारण वह दूसरों को तरह अराजक और उद्दण्ड जीवन व्यतीत नही कर सकता। जब यह 6 वर्ष का था तो बहुत-से बन्धु-मित्रों के माप एक सार्वजनिक उद्यान पर आक्रमण में नन्हे भी दारीक हो गया। दूसरे साथियों ने फल-फूल की नौरोज उहाई, लेकिन नन्हे ने एक फूल तोड़ा ही था कि माली इस वाल सेना की ओर शोर मचाता हुआसपका बिहे छोकरे तो भाग गए, घेचारा नन्हे सहा रह गया। माली ने जब उसकी अच्छी मरम्मत कर दी तो नन्हे ने माली से रहा, "मेरे पिता नहीं हैं, इसीलिए तुम मुझको इस तरह पीट रहे हो?" "तब तो और भी जरूरी है बेटा, कि तुम अच्छा आचरण करो।" मासी ने कहा। माली ने जिस कठोर यथार्य की ओर संकेत किया था, लालबहादुर के जीवन मे तो वह जैसे रम ही गया था। पढ़ाई में ही चमका धान रहता । गणित में उसकी गति मरे विषयों के समान नहीं हो सकी। ज्यामिति और अल्जवरा में निपुणता प्राप्त होने के कारण वह इस कमी को पूरी कर लेता था। अंग्रेजी भाषा में उमकी विशेष गति थी ।साम तौर से उसका उच्चारण वहुन सही होता था । इन्स्पेक्टर के मुआयना करने के अवसर पर अंग्रेजी पाठ का वाचन करने के लिए लालबहादुर को हो नमूने के तौर पर चुना जाता था और उसे प्रशसा भी मिलती थी। शान्त स्वभाव और अपने काम से काम रखने की प्रवृत्ति के कारण सालबहादुर को स्कूल के उडत लड़कों के अत्याचारो से मुक्ति मिली। असाधारण अध्येताओं में गिनती न होने पर भी वे अपने शिक्षकों के अत्यन्त प्रिय शिष्य रहे । लालबहादुर के मानसिक क्षितिज पर गुरु-कृपा से एक दूगरी ही दुनिया का उदय हो रहा था। स्वराज्य-प्राप्ति को पुकार देश के कोने-कोने में उठ रही थी। लालबहादुर उस समय के महान राजनीतिक नेताओं के भाषणो का पारायण करता और देशभक्ति की भावना उसके हृदय में हिलोर पैदा कर देती 1 इन्ही दिनों में उसे भारत के दो महान् नेताओं के दर्शन करने और उनका राष्ट्रीय उद्बोपन सुनने का अव• सर प्राप्त हुआ। मंयोग था कि जिस समय लोकमान्य तिला बनारम पधारे, लालबहादुर शहर से पचाम मील दूर था। रेल यात्रा करके अपने 34 लालवहादुर शास्त्री प्रिय नेता के दर्शन करने और उनके प्रेरक विचारों को सुनने के लिए उसके पास पैसा नहीं था । वह हाथ मीड़कर इस असमर्थता पर दुःखी हो-होकर रह जाता। लेकिन उसने साहसं करके कुछ पैसा उधार ले ही लिया और बनारस आकर 'स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है' के उद्बोधनदाता का भाषण सुनने का सौभाग्य प्राप्त किया। भारतीय राजनीति के सैद्धान्तिक सन्धिकाल में लालबहादुर की प्रतिभा का संवर्धन हो रहा था। यह वह युग था जव गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए ही थे। इससे पूर्व लोकमान्य तिलक का व्यक्तित्व भारतीय राजनीतिक रंगमंच पर राष्ट्र की स्वाधीन चेतना का प्रतीक बन चुका था। प्रथम विश्व महायुद्ध में अंग्रेजों की स्थिति संकटापन्न थी और ईवान डी वेलरा ने आयरलैंड में क्रान्ति का शंखनाद प्रारम्भ कर दिया था। महात्मा गांधी के आगमन से स्वाधीनता-आन्दोलन का स्वर बदल गया । लालबहादुर ने बारह वर्ष की आयु में ही गांधीजी के भी दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त किया। शास्त्रीजी के मानस पर गांधीजी के व्यक्तित्व की अमिट छाप पड़ने का कारण भी शायद यही था। गांधीजी सन् 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर बनारस आए थे। लॉर्ड हार्डिग्ज विश्वविद्यालय भवन का शिलान्यास करने आए थे। पंडित मदनमोहन मालवीय की विशेष इच्छा से गांधीजी भी इस अवसर पर पधारे थे । रत्नखचित वेशभूपा में दमकते हुए अनेक भारतीय महाराजा भी उपस्थित थे। अध्यक्षता दरभंगा के महाराज कर रहे थे। गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार और भारतीय महाराजाओं के विरुद्ध डटकर भाषण किया । उन्होंने स्वदेशी और स्वराज्य की चर्चा की, और भारतीय समाज की आंतरिक फूट की ओर अपने श्रोताओं का ध्यान आकर्पित किया। उन्होंने क्रान्तिकारियों के देश-प्रेम की चर्चा की, लेकिन रक्तिम क्रान्ति के स्थान पर सत्याग्रह का मार्ग ग्रहण करने का आग्रह किया। उन्होंने विदेशी सरकार की अधीनता स्वीकार करके प्रसन्न होनेवाले महाराजाओं को सम्बोधित करके कहा था : "राजाओ, जाओ और अपने रत्न वेच दो !" उनके खरे और पैने भापण को सुनकर बड़े-बड़े अहलकार और राजे- । सालबहादुर शास्त्री .35 महाराजे मभा भवन छोड़कर चले गए थे। अन्त में सुध होकर सभा के अध्यक्ष दरभंगा के महाराज भी समा-भवन से चले गए थे। श्रीमती एनी वैसेण्ट ने गांधीजी के भाषण के प्रति क्षोम प्रकट किया या, लेकिन जनता आदि मे अन्त तक मन्त्रमुग्ध होकर उन्हे मुनती रही पी। लालवहादुर इस रोमांचकारी निर्भीकता के हाथों लुट गया था। मोटी धोती, काठियावाड़ी मगरसा और सिर पर पगड़ी धारण करने वाले गांधी का स्वर बनारस के विश्वनाथ मन्दिर मे लेकर गली-गली में गुज रहा था। गांधीजी देमने मे एक विपन्न काठियावाही किसान से अधिक नहीं थे। लेकिन उनके स्वर में गीता के भगवान की प्रतिच्छवि थी। लाल- बहादुर के कोमल मानम पर इस तेजोमय वातावरण का प्रभाव पड़ा। वीनवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में पिता का स्थान हर बालक के मन में इन्ही नेताओं ने ग्रहण कर लिया था। लालबहादुर का मन दृढ और मंफल्सशील होता जा रहा था । वह अपने स्म में महाभारत के कृपाचार्य के दर्शन करने लगा था। लालवहादुर वाल स्काउट में भर्ती हो गया था। सरकार-समर्थित चंडेन पावेल के स्काउट दल मे नही, वरन् भारत सेवा-ममिति के बाल स्काउट दल में । इम दल के सदस्य की हैगियत से वह अपने साथियों के माय शिक्षा और ममाज-मेवा-गिदिरों में भाग लेता। ब्रिटिश राज के कारण उत्पन्न मारतीय जनता के कष्टों और दु.खो के बारे में वह अपनी राय जाहिर करता था। राष्ट्र को तेजोमय आत्मा ने उसके कोमल हृदय में वास कर लिया था। लालबहादुर ने अपने भावी जीवन को संभवत: इमी समय से दालना शुरू कर दिया था। उनके बालसाथी निमुवननारायणसिंह ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि बचपन से ही लालबहादुर अपने निजी कार्यों के लिए किमी दूसरे पर निर्भर करना पसन्द नहीं करते थे। "वे अपने जूतों को खुद ही गाठ लेते थे और अपने कपडे भी स्वयं ही सी लिया करते थे। विद्यार्थी जीवन-काल में वे भारी वाग्मी नहीं थे, लेकिन वे यह भली माति जानते थे कि उनके मस्तिष्क में क्या है।"17 वर्ष की आयु तक वे हरिश्चंद्र कालेज में पढ़ते रहे। हालाकि अपने घर का दे ही एकमात्र सहारा थे। ।
36 लालवहादुर शास्त्री उन्हींको परिवार के दायित्वों की पूर्ति करनी थी। लेकिन समाज के दायित्वों के प्रति कर्तव्य-बोध की भावना ने उन्हें अकिंचन नहीं होने दिया । परिवार की सीमाएं इतनी बलवान् न साबित हो सकीं कि वे हाईस्कूल पास करके कहीं क्लर्की में लग जाते और कोल्हू के बैल की तरह विदेशी शासन को सहन करते रहते। उनके विद्यार्थी-काल में और भी सैकड़ों साथी रहे होंगे, लेकिन लालवहादुर शास्त्री ने सबसे अलग अपनी दिशा शायद चुन ली थी। वह अपने पाठ्यक्रम के साथ इण्डियन नेशनल कांग्रेस की गतिविधियों का पारायण करता । गोपालकृष्ण गोखले, विपिनचन्द्र पाल, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी के भाषणों का भी अध्ययन करता। इन्हीं नेताओं के पुण्यप्रसाद से उसकी आत्मा में प्रकाश पैदा हुआ। सत्याग्रह-आन्दोलन में भाग लेने के लिए जब उसने अध्ययन छोड़ा तो बड़ी श्रद्धा के साथ लड़कों ने उसे घेरकर अपनी अभ्यर्थना प्रकट की थी। यह अभ्यर्थना ही उसकी एकमात्र पूंजी और शक्ति बनी। सोया सिंह जागा जल, पृथ्वी और आकाश तीनों तत्त्वों के विद्यमान रहते हुए भी घट का निर्माण तव तक नहीं होता, जब तक कि कुशल कुम्भकार के हाथों तीनों तत्त्वों का समायोग न हो जाए। लालवहादुर के मन की स्थिति भी यही थी। निष्कामेश्वर मिश्र के रूप में उसे एक कुशल कुम्भकार की प्राप्ति हुई। वैसे तो निष्कामेश्वर मिश्र हरिश्चन्द्र हाई स्कूल में गणित और अंग्रेजी के शिक्षक थे, लेकिन उनके अध्यापन के विषयों की कोई सीमा नहीं थी। मंझोले कद, तेजोमय नेत्र और दीप्तिमान मुखमण्डल वाले इस अध्यापक को भारतीय परम्परा के उन शिक्षकों की श्रेणी में रखा जा सकता था जो अपने शिष्यों को साक्षर ही नहीं बनाते, उनकी अन्तश्चेतना को भी संवारते - निकामेश्वर मिश्र अपने शिष्यों को प्राचीन.भारतीय शौर्य की कहा-- सामाहादुर शास्त्री 37 नियों मुनाते थे।स्काउट मास्टर की हैसियत से वे उन्हें बाहर ले पाते और शिविरो मे उन्हें महात्मा तिलक के 'स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' का रहस्य मममाते । महाराणा प्रताप और शिवाजी द्वारा मड़े गए स्वाधीनता-संग्राम से लेकर वे उन्हें शान्तिकारियों के कारनामों से भी परिचित कराते। कहते है इन्हीके आग्नेय विवारों के प्रभाव में 16 वर्ष की आयु में लालवहादुर का रभान क्रान्तिकारी गतिविधियोकी तरफ हुआ पा। यगर सन् 1920 में गांधीजी फिर बनारम न आते नो हो सकता था कि लालबहादुर क्रान्तिकारी दल में प्रवेश कर जाते । लालबहादुर शास्त्री जब कहते थे कि उनके जीवन पर सबसे अपिर प्रभाव गांधीजी का है तो यह बात गलत नहीं थी। गांधीजो भारतीय राजनीति में घूमकेतु की तरह आए और राजनीतिक क्षितिज पर उनका इन्द्रधनुपी व्यक्तित्व एक छोर मे दूमरे छोर तक छा गया । चम्पारन मत्याग्रह द्वारा गांधीजी ने नील उगाने वाले किसानों को अंग्रेज प्रमुओं की दासता से मुक्त करने का अंद प्राप्त किया पा। गुलामी की प्रथा के समाप्त होने पर भी ग्रिटिश गरकार ने अपने उपनिवेशों मे इण्डेंचहं लेवर के रूप में 5 वर्ष के अनुबंध के बहाने भारतीय नागरिको को मजदूरों में जबरन भर्ती करने की प्रथा को कायम रखा हुआ था । यफोका में मफल संघर्ष के बाद गांधीजी ने इस प्रथा पर प्रहार किया। गुजरात में घड़ा जिले के किसानों की मुक्ति के लिए गांधीजी ने सफल हडताल की थी। रौलेट ऐक्ट के विरोध के दौरान जलियावाला काण्ड पटिन हो चुका था। इन्ही दिनों 12 अप्रैल को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने गांधीजी को पत्र लिसा था:..."इस संकट की घड़ी में आप एक महान् नेता के रूप में हमारे मध्य याए । आपने भारतीय विश्वाम की पुन: स्थापना की, जो कि गुप्त प्रतिहिंसा और भयजनित कायरता का विरोध करती है। आपने पहा है, जैसा महात्मा बुद्ध ने अपने ममय में किया था; "फ्रोध पर महिमा की गति में विजय प्राप्त करो, बुराई पर सन्चाई की गक्ति से विजय प्राप्त करो।" सन् 1920 में महारमा तिलक का देहाव- मान हुमाया और उनके अन्तिम सम्म भारत के प्राणों में बस गए "जब तक स्वराग्य प्राप्त नहीं होगा भारत समद नहीं हो सकता।
38. लालबहादुर शास्त्री L अस्तित्व के लिए स्वराज्य अनिवार्य है।" लालबहादुर के कोमल मस्तिष्क पर इतिहास के इस महामहिम अध्याय का प्रभाव पड़ रहा था। इण्डियन नेशनल कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में गांधीजी का 'सिविल नाफरमानी' का प्रस्ताव भारी बहुमत से स्वीकार कर लिया गया । असह- योग मान्दोलन का उद्देश्य यह था कि लोग सरकारी पदवियों का परित्याग ३. दें, सरकार को किसी प्रकार का सहयोग न दें, शिक्षा-संस्थाओं, न्यायालयों, महाविद्यालयों का बहिष्कार हो। लगान न दिया जाए, विदेशी माल का बहिष्कार किया जाए और हाथ की कताई-बुनाई की जाए ताकि राष्ट्रीय आन्दोलन की सफलता के लिए हर व्यक्ति अधिक से अधिक योग- दान करे। गांधीजी के इस आह्वान को देश ने सुना और उसे स्वीकार किया। इसी सन्देश को लेकर गांधीजी फिर एक बार बनारस आए थे। लालवहादुर के सामने एक भारी चुनौती आई । एक तरफ उनके नाते- रिश्तेदार उन्हें यह समझा रहे थे कि अध्ययन को छोड़कर वह अपने जीवन में विनाश और विपत्तियों को न्योता दे रहा है और दूसरी तरफ राष्ट्र की पुकार थी। सत्याग्रहियों का पहला जत्था जब हरिश्चन्द्र हाई स्कूल के सामने से गुज़रा तो लालवहादुर, त्रिभुवननारायणसिंह और अलगूराय कक्षा का परित्याग करके असहयोग आन्दोलन में शरीक हो गए। लालवहादुर की आयु उस समय 16 वर्ष की थी। हाई स्कूल सर्टि- फिकेट के लिए परीक्षा में बैठने के थोड़े ही दिन वाकी रह गए थे, लेकिन उसके अन्तर का सोया सिंह जाग उठा था । हरिश्चन्द्र स्कूल से विदा होते समय की झांकी उनके पुराने शिक्षक श्री वेनीप्रसाद गुप्त ने इस प्रकार प्रस्तुत की है : "इन परिस्थितियों में जब बालक लालवहादुर ने महात्मा गांधी के आह्वान पर स्कूल छोड़ने का निश्चय किया तो सचमुच मुझे बड़ा आघात लगा।" " एक दिन हम लोग खेल के मैदान में बैठे हुए थे। वहां लालबहादुर और त्रिभुवन ने आकर चरण-स्पर्श किया और कहा, 'मास्टर साहब, अव आज्ञा दीजिए। सन् 1921 का महात्मा गांधी का आन्दोलन शुरू हो गया था। उन्होंने छात्रों को स्कूल छोड़कर असहयोग आन्दोलन में भाग लेने का । सालबहादरपास्त्री 39 आदेश दिया था। मैं बहुत घबड़ाया। मेरे ये दोनों छात्र बहत मेधायी और प्रतिभाशाली थे। अपनी कक्षा में बहुत तेज थे। मैंने समभाया, 'पहने हाई- स्कूल पाम कर लो, नव स्कूल छोडो। तुम दोनों को स्कॉरगिप भी मिस सकता है। उस समय सत्याग्रह करने पर तुम्हारा बहुत नाम होगा।'' " दोनों ने कहा-'अच्छा मास्टर साहब, विचारकर जवाब देंगे।'' दूसरे दिन फिर आए। बोले-'मास्टर साहय, हम लोगों ने विचार कर लिया है । गाधीजी की पुकार है । भव हम लोगो का मन यहां नहीं लग रहा है। दोनो बालपो ने मेरे पैर छुए और हम लोगो ने सच्चे हृदय से आशीर्वाद देकर विदा किया।" संकल्प की घोषणा करके फिर उसे पूरा करना, यह विशेषता लाल- वहादुर मे प्रारम्भ से ही थी। अमहयोग आन्दोगन में उनकी पहली शिर- फत अधिक महत्वपूर्ण नहीं थी । उन्हें पुलिस थाने ले जाया गया और पूछ- ताछ करके छोड़ दिया गया। फिर भी जीवन में एक नया मोड़ आ चुका था। यह निर्णय करना कठिन हो रहा था कि ये आन्दोलन में कूद पड़ें या किर मे विद्यारम्भ करें। इन दिनो उन्हें सुप्रसिद्ध दार्शनिक डा० भगवान- दास के सम्पर्क में आने का अवसर मिला। उन्होंन परामर्श दिया कि धे काशी विद्यापीठ में दाखिल हो जाएं और अपने अधूरे अध्ययन को पूरा करके भावी जीवन का कार्यक्रम निर्धारित करें। यासी विद्यापीठ की स्थापना सुप्रसिद्ध देशभक्त, विद्वान् और महा- पुष्प गियप्रसाद गुप्त की प्रेरणा से हुई पो। असहयोग आन्दोलन के दौरान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पदत्याग करनेवाले प्राध्यापनो ने इस विद्यालय को विशुद्ध भारतीय शैली पर संचालित करने का संकल किया पा जिगका उद्देश्य राष्ट्रीयता को जगाना या हा भगवानदास इसके प्रिमिपल ये । प्राध्यापको में आचार्य नरेन्द्र देव, डा. मम्पूर्गानन्द, आचार्य जे० वी० कृपलानी और श्रीप्रकाम जैसे उद्भट विद्वान् और राजकर्मी थे। इस विद्यालय के आंगन मे स्वतन्त्रता की उन्मुक्त वायु सेवरित होती थी। विद्यार्थी पाठ्यक्रम को रस्सी में फंसे नहीं थे। वे निर्भीक होकर राजनीतिक मतवादी पर बहस करते । स्वाधीनता-संग्राम के सचालन के लिएम.तिलक और गांधी के मध्य इन दिनों यह विवाद चल रहा पा कि हिमा-मा का 40 लालबहादुर शास्त्री अनुसरण किया जाए अयवा अहिंसा का । शायद ही कोई विद्यालय, महा- विद्यालय या विश्वविद्यालय ऐसा होगा जहां इस विषय पर वाद-विवाद न होता हो । विद्यालय ही क्या, शायद इस देश का कोई ही व्यक्ति या परि- वारऐसा होगा जिसने इस विवाद से अपने को मुक्त रखा हो। काशी विद्या- पीठ इस दिशा में अग्रणी था। वहां केवल इसी विषय पर दाद-विवाद नहीं होता था। विद्यापीठ के तत्कालीन आचार्यों में एक भी ऐसा नहीं था जिसने भारतीय राजनीति में किसी न किसी क्षेत्र में अपनी छापन छोड़ी हो । यहां के वाद-विवादों में स्वाधीनता-आन्दोलन की मीमांसा हो नहीं होती थी, यहां स्वतन्त्र भारत की कल्पना को यथार्थ मानकर उसकी भावी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था पर भी विचार होता था। गांधीजी के प्रभाव से स्वदेशी और उसके साथ कुटीर उद्योग की संकल्पना आई थी। उन दिनों भी लालवहादुर अपने सुधीर स्वर से यह कहते सुने जाते थे कि भारत को कुटीर उद्योग का विकास करते हुए अन्त में भारी उद्योगों का ही निर्माण करना चाहिए। बहुत कम लोगों को यह सौभाग्य मिलता है कि आचार्यों के साथ उन्हें अच्छे सहपाठी भी मिलें । लालबहादुर के सहपाठियों में अलगूराय शास्त्री, त्रिभुवननारायणसिंह, वालकृष्ण केसकर, राजाराम शास्त्री, हरिहरनाथ शास्त्री, विभूतिभूषण मिश्र जैसे विद्यार्थी थे । लालबहादुर ने चार वर्ष तक विद्यापीठ में अध्ययन किया। हालांकि विद्यापीठ की मुख्य प्रतिभा राज- नीति थी, लेकिन लालवहादुर ने दर्शन विषय अपने लिए चुना था । उस अवधि में उसने खुली आंखों, समझदारी के साथ अध्ययन किया और जमकर धोटा भी लगाया था। टाल्सटाय के अध्ययन की ओर उसका ध्यान सर्वप्रथम गया। उसका कारण शायद यह था कि गांधीजी का सम्पूर्ण सत्या- ग्रह आन्दोलन महपि टाल्सटाय के सत्य, प्रेम और अहिंसा के आधार पर टिका था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द के साहित्य और जीवन का भी उसने पारायण किया। अतिरिक्त पठन में महात्मा लेनिन भी सम्मिलित थे। इस विराट अध्ययन का सुपरिणाम यह हुआ कि दर्शन विषय में लालवहादुर को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। फिर भी उनके जीवन पर डा० भगवानदास के समन्वयवाद का लालबहादुर शास्त्री 41 प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता पा । डा० भगवानदास के पवित्र जीवन, सौम्य भव्य व्यक्तित्व और दर्शन के उद्भट पाण्डिस्य से प्रभावित होना स्वाभाविक था। हा. भगवानदास की दार्शनिक मीमांसाओं ने साल- बहादुर के मानरा के समस्त प्रकोष्ठों को प्रकाशित किया और सभी वाता- यनों को उन्मुक्त कर दिया। उसका मन पूर्वाग्रहों से मुक्त हो गया। स्वतन्त्र चिन्तन की शक्ति उदय हुई। संकल्प धारण करने और उसकी पूर्ति के लिए सम्पूर्ण निष्ठा से प्रयत्नशील होने का संस्कार जाग्रत हुआ। लालबहादुर शास्त्री इन सुन्दर क्षणों को स्मरण करते समय डा० भगवान- दास के प्रति श्रदा से अभिभूत हो जाते थे। कासी विद्यापीठ में अध्ययन को अपि सालबहादुर के जीवन की आधार- शिसा बनी। प्रतिदिन यह छ:-सात मील पैदल चलकर कालेज पहुंषता पा। कालेज से पर जाने के समय तो उसे सोलह मौल पैदल पलकर जाना पड़ता था। उसका जीवन ऐमे टिमटिमाते हुए चिराग की भांति जलता रहा, आंधी और तूफान में भी जिनकी माती नरजकर रह जाती है. युझती नहीं । उसके जीवन में उरमगं और मापना के अतिरिक्त पायद युछ नहीं था। कठिन से कठिन परिस्थिनियो का मकर मुकाबला करना और फिर उन्हें आशीप के रूप में शक्ति बना लेना ही उसकी एकमात्र अमित पी। उमकी पहली गिरफ्तारी शायद जवाहरलाल नेहरू रो कुछ दिन पहले ही हुई थी। लेकिन यह बडे याप का बेटा नही था। वह सो इरा देश के उन कोटि-कोटि नवयुवकों में से या जिनके मौनों मे कुछ कर गुजरने को उत्कट मभिलाषा रहती है, लेकिन जिनके पैर मंगार के भार के नीचे असमय में ही मराड़ा जाते हैं । पर सालबहादुर यानी संकल्पनाति के वन पर सहा हो रहा था। किमी के व्यक्तित्व की ऊचाई इम वान में नहीं आनी पाहिए कि वह उन्नति में कितने अंचे शिक्षर पर पहुंचा, वरन् इस बात मे वारनी चाहिए कि वह व्यक्ति यहा मे चला और बीपन की कौन-मी मनिता पहचा। ये विचार अमरीका के भुमिद नीग्रो शिक्षामास्त्री पुएर टी. वाशिंगटन में है। क्या यह बान भारतीय मनिहाम में अभिमान के मार उल्लिखित नहीं होनी चाहिए कि लालबहादुर शास्त्री मिट्टी में ग उटा मौर 42 लालवहादुर शास्त्री हिमालय पर्वत के समान ऊंचे सामाजिक पद पर पहुंच गया? उसके सम- कालीन राजकर्मियों में शायद कोई शून्य को विराट का रूप देने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर सका । लालबहादुर शास्त्री की लौकिक उपलब्धियों के पीछे सर्वाधिक सारगर्भित सत्य यह है कि उसने कोई योजना बनाकर व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक जीवन के किसी पद पर आसीन होने की अभिलाषा को मन के किसी भी प्रकोष्ठ में ठहरने ही नहीं दिया । यह भी कहा जा सकता है कि वह शायद अकिंचन आरम्भ से इतना अभिभूत था कि उसे यह स्वी- कार करना पड़ा कि 'लालवहादुर, तुझसे जो बन सकता है कर, राष्ट्रमाता के प्रति तेरा जो देय है उसे समर्पित कर, तुझमें वह चमक कहां कि उषा वेला में उगे और दुनिया तेरी अरुणिमा के समक्ष नतमस्तक हो जाए।' शायद वह सामान्य जन लालवहादुर ही होगा जिसके प्रशान्त मुस्कानमय मुखमण्डल को देखकर नोबल लारिएट हरमन हेस ने लिखा था कि 'जीवनबोध से शून्य सामान्य जन, और जीवन के समस्त ज्ञान-गरिमा से सम्पन्न रागातीत परमहंस के मुखमण्डल पर खिलनेवाले निश्छल हास्य में कोई अन्तर नहीं होता।" काशी विद्यापीठ छोड़ने के बाद लालवहादुर के सामने यह प्रश्न माया कि अब वह क्या करें। उन्होंने लोकसेवा मण्डल के साथ काम करना पसन्द किया। अपने बालमित्र और सहपाठी अलगूराय शास्त्री की देखरेख में उन्होंने मुजफ्फरपुर में अछूतोद्धार का कार्य प्रारम्भ किया। उनकी तत्परता और लगन और कठोर श्रम का पुरस्कार था कि लाला लाजपत- राय का ध्यान शास्त्रीजी के प्रति आकर्षित हुआ और वे लोकसेवक मण्डल के आजीवन सदस्य बना लिए गए। लोकसेवक मण्डल का निर्माण लाला लाजपतराय ने गांधीजी की प्रेरणा से सन् 1921 में किया था। गांधीजी ने ही उसका उद्घाटन किया था। इस संस्था का उद्देश्य सच्ची लोक-सेवा करना ही नहीं था, वरन् सच्चे लोकसेवकों का निर्माण करना भी था। वस्तुत: लोकसेवक-मण्डल उनके राजनीतिक जीवन का प्रथम सोपान बना । सन् 1926 में लाला लाजपतराय के देहावसान के उपरान्त स्व० पुरुपोत्तमदास टण्डन उसके अध्यक्ष नियुक्त हुए। लोकसेवक मण्डल का प्रधान कार्यालय इलाहाबाद चला आया और उसके साथ लालबहादुर लालबहादुर शास्त्री. 43 शास्त्री भी इलाहाबाद चले गए। इस संस्था में काम करते समय शास्त्री जी को 60 रूपये मासिक भत्ता मिलता था जो आगे चलकर 100 रुपये प्रतिमास हो गया था। शास्त्री जी ने यह स्वीकार किया था कि 'इम मंडल को आजीवन सदस्यता के कारण ही मुझे अपने देश की सेवा करने का सबसे अधिक मौका मिला। मण्डल के सहारे ही मुझे 'लोकसेवक' के मच्चे अयो का भान हुआ। सन् 1927 में शास्त्रीजी का पाणिग्रहण ललितादेयी के माय हुआ। ललिताजी की आयु विवाह के समय 17 वर्ष की थी। वे अपने पति मे आयु मे 6 धपं छोटी थी। 9 वर्ष की आयु से हो वे शिव की उपासिका हैं। पति और परिवार के प्रति उनको एकलयता का ही सुपरिणाम पा किशास्त्रीजी को देशीवा करने का निर्वाध अवसर मिला। शास्त्रीजी ने स्वीकार किया है : "मुझे माज तक कभी पारिवारिक समस्या का भान नहीं हुआ। मैं घर में माता और पा-पीकर चला जाता। इसमे मुझे गाधी. जी तथा नेहरू सरीखे दो कठोर परिश्रमी महापुरुषो के बीच अपनी शक्ति के उपयोग का काफी समय मिल गया।" श्रीमती ललितादेवी ने यह आजीयन माना है कि जब तक उनके पति प्रमन्न, स्वस्थ और दूसरों के लिए उपयोगी हैं, तब तक उन्हें यह चिन्ता नहीं होती कि वे क्या करते हैं । शिवोपासिका ललिताजी ने भी जीवन के इस रहस्य को जान लिया या कि 'सुप तो अपने मे से ही मिलता है न कि बाहर से । न तो धन हो और न पद ही किसीके मन को सुख पहुवा सकते हैं। वह तो आन्तरिक, आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति से ही प्राप्त होता है। ऐसी विचारवती और पति के जीवन को सोक-मेवा के लिए सहेजकर रखनेवाली पत्नी शास्त्रीजी को मिली जो दहेज में अपने साथ लौकिक सामग्री में एक चर्या और कुछ गज सादी साथ लाई थी, लेकिन कितनी आत्मिक सम्पदा अपने साथ लेकर आई, यह बात शायद शास्त्रीजी को भी उस समय विदित न हुई होगी।
44. लालबहादुर शास्त्री राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ जिन दिनों लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद में प्रवेश किया, यह नगर समूचे देश की राजनीतिक धमनी होने का महत्त्व प्राप्त कर चुका था। जवाहरलाल नेहरू और पुरुषोत्तमदास टण्डन शहरी राजनीति के ही नहीं, देहाती जीवन के अलमबरदार माने जाते थे। कुछ अर्थों में इलाहा- बाद जिले और उत्तरप्रदेश के किसानों में जागृति लाने का श्रेय नेहरू से अधिक पुरुषोत्तमदास टण्डन को है। लालबहादुर शास्त्री को इन दोनों ही महापुरुषों की कृपा और सद्भावना प्राप्त हुई थी। जवाहरलाल नेहरू ने ही उन्हें जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव का कार्यभार संभालने की प्रेरणा दी थी। बाद में वे उसके अध्यक्ष बने और 1930 से 36 तक इस पद पर आसीन रहे । इस बीच में वे इलाहाबाद म्युनिसिपैलिटी के सदस्य भी चुने गए । वे इलाहावाद इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के भी सदस्य बने और 4 वर्ष तक इस पद पर कार्य करते रहे । म्युनिसिपैलिटी में उन्हें स्व० आर०एस० पंडित और श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित के साथ कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ था। समितियों से संबंधित कार्यों में कौशल प्राप्त करने का अवसर उन्हें इन्हीं 6 वर्षों में प्राप्त हुआ। कांग्रेस के पदाधिकारी के रूप में लालवहादुर शास्त्री को एक कुशल राजनीतिक संगठनकर्ता के रूप में आगे आने का अवसर मिला। मोतीलाल नेहरू इन्हें पुत्रवत् स्नेह करते थे। जवाहरलालजी इनकी निष्ठा, त्याग और तत्पर सिपाही की भांति काम करने के गुण पर मुग्ध थे। जब कभी अवसर आता वे इन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास करते थे। शास्त्रीजी ने स्वयं स्वीकार किया था, "उन्हींके संकेत पर मैं जिला और नगर कांग्रेस कमेटी का मन्त्री और अध्यक्ष बना। जब वे यू० पी० सी० सी० के अध्यक्ष बने तो उन्होंने मुझे उसका महामन्त्री बना लिया। इसी तरह सन् 1951 में जब वे स्वयं कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो मुझे महामन्त्री बना लिया। उन्हें मुझमें कुछ ऐसा विश्वास था कि वे जो कोई काम मेरे सुपुर्द करेंगे उसे मैं भलीभांति कर सकूँगा।" इलाहाबाद के जीवन में भी उनका सारा समय संगठन की सेवा और एक ग्रंथ सालबहादुर शास्त्री 45 स-यात्राओं में ही गजरा।एक मत्यापही के आशं गुणों से मम्मन्न लाप. वहादुर ने 1931-33 और 1933-34 के मान कारावास में विताए । मन् 1930 से 1945 तक के 15 वर्षों में से शास्त्रीजी के जीवन का नौ वर्ष का समय जेल में ही गुजरा। जेल-जीवन में भी उन्होंने सदैव एक आदर्श सत्याग्रही होने का परिचय दिया। जेल में ही उन्होंने काट, हीगेल. हैरोरुह लास्को, यदण्ड रसेल, आल्हअस हमले और माक्र्म-लेनिन का अध्ययन किया। जेल में ही उन्होंने महम पूरी की जीवनी का अध्ययन किया। उन्होंने 'भारत छोड़ो' आन्दोलन के इतिहास के रूप में भी प्रारम्भ किया था, जिसे पूरा न कर सके। जेल में ही उन्हें एक आरमानुशासित, साहमी और तपस्वी व्यक्ति के रूप में निसरने का अवसर मिला। देशभक्त जेल-यात्रियों में अनेक ऐसे ये जो आदेश की याद में वहकर जेल के फाटकों के पीछे पहुंच गए थे। ऐमें लोग छोटी-छोटी मुधि- पाओं, जैसे बीड़ी-सिगरेट के लिए जेल अधिकारियों के सामने गिडगिडात थे। लालबहादुर शास्त्री ने कभी विमो मुविधा यो इच्छा प्रकट नहीं की धरन वे अपना लैम्प भी अपने जेल सहयात्री को देकर स्वयं कड़वे तेल में दिये मे काम चलाते थे। एक यार उन्होंने एक सीम में टाल्सटाय का अन्ना फरेनिना' पर डाला था। उनका जेल जीवन इतना नियमित और अनुशामित था कि उनके साथी उन्हें देखकर हैरान रह जाते थे। फिर भी जेल अधिकारियों के अत्याचारों और दमन के मुकाबले वे ही सबसे आगे रहते थे। अपने व्यक्तिगत मुस-सुविधा के बड़े से बड़े मोह से महज मुक्न होना दम सत्याग्रही के लिए बिलकुल सामान्य बात थी। एक बार जब ये नैनी जेल में थे, उनकी पुत्री के सस्त बीमार होने का समाचार प्रापा। उनके पैरोल पर रिहा होने की बात उठी। रिहाई के लिए जेल अधिकारियो को यह लिखित सारवासन देना पडना था कि वन्दी फिमी आन्दोलन में भाग नहीं लेगा। हालाकि सामबहादुर शास्त्री का किमी आन्दोरन में भारीक होने का कोई विचार नही पा, लेकिन उन्होंने कोई लिखित माश्वासन देने साफ इन्कार कर दिया। आत्मसम्मानी शास्त्री के मनस्वी एवं सच्चे जीवन का परिचय जेलर को था। अन्तत: उमने इन्हें बिना रिमी शतक 46 लालवहादुर शास्त्री 15 दिन के लिए रिहा कर दिया। शास्त्रीजी घर पहुंचे तब तक उनकी पुत्री चल बसी थी। शास्त्रीजी के व्यामोह-मुक्त तापस जीवन का एक और उदाहरण जेल- यात्रा के दिनों में मिलता है। एक बार उनका पुत्र बीमार पड़ा। पता चला कि बच्चा 'टायफायड से पीड़ित है। शास्त्रीजी को सूचना दी गई। शास्त्रीजी के सामने फिर वही समस्या उपस्थित हुई । वे किसी भी कीमत पर अपने सिद्धांत से डिगने वाले नहीं थे। जेल-अधिकारियों ने उन्हें केवल एक सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहा कर दिया। शास्त्रीजी जब घर पहुंचे तो बच्चे को 104 डिग्री बुखार था । टायफायड के बुखार में एक सप्ताह की अवधि का कोई महत्त्व नहीं होता। जेल-अधिकारियों ने इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया कि लिखित आश्वासन दिए बिना वे एक सप्ताह की अवधि को बढ़ाने में पूर्णतः असमर्थ हैं। संयोग ऐसा था कि ज्यों-ज्यों पैरोल की अवधि समाप्त होने को आ रही थी, बच्चे की हालत विगड़ती जा रही थी। थर्मामीटर का पारा 106 के अंक को छू रहा था। एक तरफ सिद्धांत था और दूसरी तरफ अपने जिगर के टुकड़े का जीवन था। बच्चे के चेहरे पर उनकी आंखें टिकी थीं। समय की गति जैसे रुक गई थी। बच्चा प्रायः निश्चेतन था। उसके होंठों से परिक्लान्त स्वर आ रहा था: "बाबूजी, मत जाइए बाबूजी !" बुखार की तेजी से बच्चे के होंठों पर सोजिश आ गई थी। यह ऐसा वक्त होता है जब पत्थर के दिल भी पिघल जाते हैं। शास्त्रीजी की आंखें भी आंसुओं से तर-बतर हो उठी थीं। लेकिन इस लघु गौतम ने एकबारगी झटके के साथ अपने को व्यामोह से मुक्त कर लिया। उपस्थितों को अभि- वादन किया और मजबूत कदमों से बाहर निकल गया। उनके लिए ऐसा करना कैसे सम्भव हुआ ! जब कि वे स्वयं अपने साथियों को पैरोल पर रिहाई लेकर अपने ज़रूरी कामों को पूरा करने का परामर्श देते रहते थे। इतनी अविचल इच्छाशक्ति का स्वामी होना साधारण बात नहीं। गरीवी के भयंकर त्रास के समक्ष सीधे खड़ा रहना सामान्य परीक्षा नहीं होती। अपने जेल-जीवन में ही शास्त्री प्राणायाम और योगासन करते थे। व जिस !
लामबहादुर शास्त्री 47 किसी जेल-यात्री को मोटा और देगा देखते उसे प्राणायाम और योगासन करने का परामर्श देते थे। उन्हें अपने जेल जीवन में राजपि पुस्पोत्तमदास टण्डन में साथ रहने का भी गौभाग्य मिला, जिन्होंने अपरिग्रह और स्वाभिमान को भारतीय राजनीतिक जीवन में प्रतिप्टिन रिया था। उन्हें जवाहरलाल नेहरू के माय भी कारावास में रहने का अवसर प्राप्त हुआ जिनका व्यक्तित्व कोच के ममान पारदर्शी और बेचैन रहना था। उन्होंने सागर की अतल गहराई और पर्वतों को सनातन ऊयंता को अपने आस- पास के लोगों के जीवन में देखा था। उनको वृष्टि मुग-दु.स के प्रति समदी हो गई। उनके राजनीतिक गुरु और भियता राजपि टण्डन ने उनके बारे में प्रारम्भ में ही कह दिया था, 'समन्वय स्थापित करने, पाठिन परिस्थितियों को अनुकूल बनाने और गमझौते कराने में उनकी प्रतिभा अद्वितीय है।" सन् 1952 में नेहरू सरकार के सदस्य होने के बाद वे काग्रेस और भारत सरकार के समन्वय एवं समाधानकर्ता और समझोता कराने वाले बन गए। नेहरूजी के शब्दों में "उच्चतम व्यक्तित्व वाते, निरन्तर सजग और कटोर श्रमशील व्यक्ति का नाम है लालबहादुर शास्त्री।" कभी-कभी यह अनुमान करने को जी चाहता है कि भारतीय इति- हास की प्रथम अद्ध शताब्दी ने इतने महान् व्यक्तियों को इस देश के आंगन मे विसर दिया, पपा ऐसा कभी हो पाता यदि अग्रेज हाकिम की भयानक यातनाओं से भरी जेलें पहा न होती । महान् प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्तियो को भी साधना की राह से गुजरना पड़ता है। लालबहादुर शास्त्री के जीवन में 9 वर्ष के कारावास की अवधि को किसी हठयोगी पो दीर्घकालीन तपस्या को समता में सहन हो रखा जा सकता था। जैल-जीवन ने उन्हें समय पर सोने और ममय पर उठ्ने, समुचिन एवं अराहार, सदाचरण, सनिष्ठा, आत्म-परिहार एव नियमित व्यायाम का अभ्यासी बनाना। मे सभी गुण साधुओं के गुण बताए गए हैं। इन गणो को आत्मसात करने से कोई भी व्यक्ति सहन रूप में पामिक बन जाता है। यदि किसी सोककर्मी मे इन गुणो का प्रादुर्भाव हो जाए तो उम कर्मयोगी के लिए संसार का कौन-सा पद है जो अप्राप्य हो। जब कभी लालबहादुरजी को श्रो 48 लालवहादुर शास्त्री का अवसर मिला उन्होंने अपनी असाधारण कार्यक्षमता का परिचय दिया। सन् 1936 तक इलाहाबाद में स्थानीय प्रशासन में कौशल प्राप्त करने के बाद वे व्यापकतर राजनीतिक सेवा-क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए लखनऊ चले गए। कांग्रेस ने जब प्रांतीय विधानमण्डलों के लिए चुनाव लड़ने का निश्चय किया तो लालबहादुर शास्त्री भी श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित के साथ इलाहाबाद के निर्वाचन क्षेत्र से असेम्बली में निर्वाचित हो गए। कम लोग जानते थे कि उत्तरप्रदेश ने भूमि-सुधार की दिशा में जो तत्परता और क्रान्तिकारिता का परिचय दिया उसके पीछे लालवहादुर जसे 'छोटे' आदमी का भी महान् योगदान था। यू०पी० कांग्रेस ने एक गैरसरकारी समिति की स्थापना की थी, जिसका काम जमींदारी प्रथा का अध्ययन करना, किसानों की स्थिति का पता लगाना और देहातो अर्थ- व्यवस्था का अध्ययन करना था। भूमि-सुधार के लिए सुझाव देना कोई आसान कार्य करना नहीं था। सदियों से चलीआई जमींदारी और सामन्ती प्रथा देहाती जीवन में गहरी जड़ें जमाए हुए थी। महाजनों का बोलवाला था। अधिकांश किसानों और जमींदारों का जीवन महाजनों के सूद दर- सूद के शिकंजे में कसा हुआ था । समस्याएं अनेक थीं लेकिन प्राचीन परम्पराओं को जड़ें इतनी गहरी थीं कि किसी भी आकस्मिक परिवर्तन से ग्रामीण जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता था। कपि-प्रधान संयुक्त प्रांत में राजनीतिक क्षेत्र में भी पामीदारों का काफी प्रभाव था। ऐसी कठिन परि- स्थितियों में भूमि-सुधार का प्रारूप प्रस्तुत करना सरल काम न था। इस समिति के अध्यक्ष थे पुरुषोत्तमदास टण्डन और संयोजक थे लालवहादुर शास्त्री। एक आन्दोलनकर्ता और दलीय संगठन में निष्णात लालबहादुर शास्त्री के सामने अनौपचारिक रूप में यह पहली प्रशासनिक परीक्षा थी। इस परीक्षा में भी वे सफल सिद्ध हुए। काशी विद्यापीठ की दर्शनशास्त्री की परीक्षा के समान यहां भी उन्हें प्रथम श्रेणी के अंक प्राप्त हुए। इस रिपोर्ट के तैयार करने में उनके अव्यवसाय की झांकी उनके पुराने मिग और सहयोगी विश्वननारायणसिंह के संस्मरणों में इस ला-3 मालबहादुर गास्त्री 49 प्रकार है: "जब मैं बीते दिनों की याद करता हूं तो शास्त्रीजी के गम्बन्ध में मेरे सामने एक सुन्दर नक्शा सिंच जाता है । ये मत्यनिष्ठ ही नहीं, वह ही कर्मट, अकथ काम करने वाले, तपोनिष्ठ व्यक्ति थे। 35-36 की बात है, वे उत्तरप्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा स्थापित उत्तरप्रदेश भूमि-सुधार कमेटी के मन्त्री थे और बाबू पुरुषोत्तमदाम उसके गभापति । उस कमेटी में जिम परिश्रम में उन्होने दिन-रात काम किया, उसके दर्शन उम वक्त गय लोगों ने किए होंगे, जो उस समय शास्त्रीजी के माय रहे। वे रात- दिन उम कमेटी के सम्बन्ध में कुछ लिखते-पढते रहते थे। रात को 11-12 वज जाते थे। लेकिन उनका काम सत्म नहीं होता था। तब मैं और शास्त्री जी माथ ही रहते थे। मेरी एक छोटी भतीजी ने एक दिन मुझसे पूछा, 'चाचा, शास्त्रीजी दिन-रात काम क्यों करते हैं ? इतने छोटे, फमडोर से आदमी हैं, इन्हें इतना काम नहीं करना चाहिए। लेकिन वे यहां किमी को गुनते । बाद में इस विषय पर जब यह रिपोर्ट प्रकागित हुई तो उसने मारे देश को एक प्रशस्त मार्ग दिपनाया। धीरे-धीरे सभी राज्यों ने उस रिपोर्ट को स्वीकार किया। बाद में दोबारा जब काप्रेस गामन में आई सो उसने इस रिपोर्ट के आदर्श पर पूरी तरह देश ने जमीदारो-उन्मूलन किया। यह रिपोर्ट कानून के गम्भीर अध्ययन, समस्या के पूर्ण निदान और भाषिक प्रबन्ध को दृष्टि से इतनी गटी हुई और मम्पूर्ण थी कि उसमें कांग्रेग के महाविद्वान् नेता भी प्रभावित हो उठे। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन उच्च गरकारी पदाधिकारी भी उनके उग बड़े काम में प्रभावित । अय तक अफगर लोग ही प्रशासनिक मामलों के एकमात्र अधिकारी पनि माने जाते थे। यह रिपोर्ट प्रस्तुत करने के अतिरिक्त इन दिनों में लालबहादुर साम्बी को अपनी विधायक एवं प्रशासनिक प्रतिभा के प्रयोग का अधिक अवमर मही मिला। लगभग ढाई वर्ष तक गामनरूर रहने के उपरान्त मन् 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के गुरू होने पर काग्रेग ने पदत्याग कर दिया। लालबहादुर शास्त्री के लिए शानद यह ममय और भी कठिन बनकर आने 50 लालवहादुर शास्त्री । वाला था। अंग्रेज़ शासकों ने जनतन्त्र और आजादी के नाम पर नात्सीदाद और फासिस्टवाद के विरुद्ध मोर्चा तो कायम कर दिया था लेकिन अपनी साम्राज्यशाही और औपनिवेशिक दासता को वे अपनी प्रजा के सिर से हटाने के लिए तैयार नहीं थे। कांग्रेस के समक्ष भी ऊहापोह की स्थिति थी। एक तरफ उसके सामने सत्य, अहिंसा सौर उच्च मानवीयता के सिद्धांत थे और दूसरी और हिटलर और मुसोलिनी डिक्टेटरों का विरोध करनेवाली ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्प करके देश को आजाद करने का प्रश्न था। हिटलर ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया और 3 सितम्बर, सन् 1939 को इंग्लैंड ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। वाय- सराय ने केन्द्रीय विधानमण्डलों से भी परामर्श करने की आवश्यकता अनु- भव नहीं की और अगले ही दिन यह घोषित कर दिया कि भारत जर्मन के विरुद्ध युद्धरत है । यह घोषणा भारत को उसकी गुलामी की कचोट पहुंचाने वाली थी । कांग्रेस ने सरकार से अपने युद्ध-उद्देश्य स्पष्ट करने को कहा। इस पूछताछ का उद्देश्य यह था कि सरकार यह घोपित कर दे कि युद्ध की समाप्ति पर वह भारत को आजादी दे देगी। यदि ऐसा आश्वासन मिल जाता तो कांग्रेस ब्रिटिश सरकार की सहायता करती, लेकिन उन्होंने फिर वही कहानी दोहराई कि आजादी मिलने से पूर्व साम्प्रदायिक विवाद का निर्णय होना जरूरी है। भारत को भली-भांति स्मरण था कि प्रथम विश्व-युद्ध में उसने अंग्रेज़ सरकार की सहायता की थी और युद्ध के उपरान्त उसे रौलेट ऐक्ट तथा जलियांवाला बाग गोलीकाण्ड इनाम में मिले थे। कांग्रेस कार्यसमिति के सामने अब कोई चारा नहीं रह गया। उसने प्रान्तीय सरकारों को यह हुक्म दिया था कि वे 31 अक्तूबर, 1939 को अपने पदों का त्याग कर दें ब्रिटिश सरकार का कहना था कि वह भारत को आजादी देने के लिए तैयार है क्योंकि वह उनकी गर्दन में बंधा हुआ भारी पत्थर है, लेकिन वह क्या कर सकती है। भारत अभी आजादी प्राप्त करने के लिए योग्य ही नहीं है। यह देखना हमारा नैतिक कर्तव्य है कि वहां कोई गृहयुद्ध न हो एव अल्पमतों तथा अन्य वर्गों के हित पूर्णतः सुरक्षित रहें।
सालबहादुर शास्त्री 51 । तत्कालीन वायसराय लाई लिनलिथगो किसी प्रकार का प्रशासन देने के लिए तैयार नहीं थे । उपर जुलाई, 1940 तक युद्ध का एक नाजियों के पक्ष में होता जा रहा था। डेनमार्क, हालंह बेन्जियम और नावे ने सम- पंग कर दिया था। जनमत्रीय सिद्धातों को समयंक कार्यसमिति ने यह निश्चय किया कि काम को प्रिटिश सरकार की सहायता करना चाहिए। गोधोजी इम निश्चय से महमत नहीं होमके और उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। वायसराय अपनी कौगिल में परामर्शदाता पद देने में कुछ भी अधिक करने के लिए तैयार नहीं थे। अन्त में महात्मा गापो ने व्यक्तिगत मस्यामह आंदोलन करने का निश्चय किया। सबसे पहले सत्याग्रही के रूप में दिनोग भावै चुने गए। उन्होंने युद्ध-विरोयो भाषण किया और उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तारी हुई। लालबहादुर का नम्बर बहुत पीछे नहीं था। वर्ष के समाप्त होते-होते 11 कार्यसमिति सदस्य, 176ए० आई० मो० गी० सदस्य, 59 भूतपूर्व मंत्री और विधानमण्डलों के लगभग 400 सदस्य जेलों में डाल दिए गए। 1941 के मध्य तक लगभग 14 हजार लोग एक साथ जेल में पहुंच गए। इस प्रकार के सत्याग्रह का कोई सुपरिणाम निकलते न देखकर गाधी जो ने दिसम्बर 1941 को मत्याग्रह वापस ले लिया। सरकार ने सभी यन्दियों को रिहा कर दिया। यह शायद यमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट का आग्रह था कि ब्रिटिश मरकार ने मर स्टेफर्ड क्रिप्म को भारतीय राज- नीतिक गतिरोप को समाप्त करने के लिए भारल भेजा। यह मिशन मफल नहीं हुआ । उपर जापानी आशंना आगे वरना जा रहा था। वह रेडियो मै निरन्तर यह घोषित कर रहा था कि वे भारत को आजाद करने आ रहे हैं । संयोग की बात थी कि मही सुभाषचन्द्र वोस, जिन्होन 1938 में हरिपुरा काप्रेम में अध्यक्ष पद को ग्रहण किया था और जिन्हे मिपुरा में गांधीजी के विरोध के बावजूद पट्टाभि नीनारामया को हराकर पुनः कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया था, अव आजाद हिन्द फौज के मर्वोच्च सेनापति की हैमियत से पुन. भारत की धरती पर पर रसने जा रहे थे। जवाहरलाल नेहरू ने यह कहना शुरू कर दिया था रिमानी 52 लालवहादुर शास्त्री आक्रांता का मुकाबला करने के लिए भारतीय जनता घर-फूंक नीति का पालन करे और सरदार पटेल का कहना था कि जनता अंतिम सांस तक युद्ध करेगी । लेकिन गांधीजी इस विपम स्थिति की गम्भीरता को समझते धे। वे जानते थे कि अगर देश को कोई सुनिश्चित दिशा न दी गई तो अराजकता फैल सकती है। इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि भारतीय स्वाधीनता-संग्राम को एक ऐसा मोड़ दिया जाए ताकि सारी शक्ति अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने में एक साथ लगा दी जाए; वम्बई में 8 अगस्त, 1942 को 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव स्वीकार किया गया और देशव्यापी मांदोलन छिड़ गया। 'करो या मरो' का नारा गांधीजी ने भारत को दिया। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद देशव्यापी गुरिल्ला युद्ध छिड़ गया। ब्रिटिश सरकार ने कठोरतापूर्वक इस आंदोलन का दमन किया। थोड़े ही दिनों में एक हजार आदमी मारे गए और लगभग 3 हजार घायल हुए। इसी दमन का चक्र चलाते हुए तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्स्टन चचिल ने अपनी ऐतिहासिक गर्वोक्ति में कहा था कि वे ब्रिटिश साम्राज्य को दिवालिया बनाने के लिए प्रधानमंत्री नहीं बने हैं । इस कशमकश और प्राणों की वाजी लगाने वाले मुक्ति-संग्राम में लालबहादुर शास्त्री 'करो या मरो' के नारे को चरितार्थ कर रहे थे। बम्बई के स्मरणीय अधिवेशन से लालबहादुर ० पी० के जत्थे के साथ वापस आए। पुलिस उन की ताक में थी। वे पुलिस के चंगुल से बचने के लिए इलाहाबाद स्टेशन पर न उतरकर नैनी स्टेशन पर ही उतर गए थे। उनके साथियों ने उन्हें प्लेटफार्म रेलिंग के पार सशरीर उतार दिया । अपने भूमिगत जीवन का प्रारम्भ उन्होंने आनन्द-भवन से ही शुरू किया। वे एक इप्लीकेटिंग मशीन पर काम करते और भारी तादाद में प्रचार-साहित्य वितरित करते । उनके लिखे हुए यौद्धिक प्रचार साहित्य को सम्भवतः उनको सन् '42 के इतिहास में स्थान मिला होता । लेकिन उनका यह गुप्त अड्डा पुलिस की नज़र में आने लगा। एक दिन सहसा पुलिस ने आनन्द-भवन पर छापा मारा, लेकिन गनीमत रही कि वह श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित को गिरफ्तार करके ही लौट गई। शास्त्रीजी को यह भान होने लगा था कि आनन्द-भवन में रहना शास्त्री यू० लालबहादुर शास्त्री 53 खतरे से साली नही । इसलिए वे केशवदेव मालवीय के घर में चले गए। तारीफ यह कि केशवदेव खुद किसी दूसरे स्थान पर हिने हुए थे। गाम्धीजी ने देहानों में घूम-घूमकर लोगों को प्रोत्साहित करना और आदेश देना जारी रखा। उनी अपनी गिरफ्तारी का प्रकरण भी अत्यन्त रोमावकारी और माहमिक है । इस दुर्घर्ष भूमिगत योद्धा के कारनामों से पुलिस तंग आ गई थी, लेकिन वे पकड़ में नहीं आते थे। शास्त्रीजी के मित्र अलगूराय शास्त्री कहते थे कि अपने छोटे कद के कारण पुलिस को नजर बचाने में वे दूसरो को अपेक्षा हमेगा अधिक मौभाग्यशाली मिद हुए । अन्त में शास्त्रीजी ने यह नोटिरा बंटवाया कि वे 20 अगस्त को 5 बजे इलाहाबाद चौक में घंटाघर के समीप कानून तोड़ेंगे और व्याख्यान देंगे। इस घटना का वर्णन उनके पुराने मायी रामसिंह ने इन पदों में किया है : "जिस दिन उन्हे व्याख्यान देना था, कुछ पुलिस के अफसर शास्त्रीजी के घर गए और उनकी माता तथा पली से कहा कि शास्त्रीजी अगर हो, तो उन्हें अपने को गिरफ्तार करा देना पाहिए। वे लोग नहीं चाहते कि शाम के वक्त वे चौक पहुंचे, जहा किसी भी समय गोलियां चल सकती हैं। गाताजी ने यहा कि हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि शास्त्रीजी घर में नही हैं । अतएव हम आपको किमी प्रकार सहायता नही कर मरते। शास्त्रीजी को भी इस बात की चिन्ता थी कि वे टोक समय पर चोक में पहुंच पाएंगे अथवा नहीं । उन्होने यह भी सोचा था कि वहां पहुंचने से पहले उन्हें अपनी माता, पत्नी और बच्चों से मिल लेना चाहिए । वे जहां थे, वहा से लगभग साढे चार बजे अपने घर पहुंचे। घर में सवने मिलकर वे चौक जाने के लिए तैयार हो गए। उनकी माता और पत्नी दोनो चिन्तित थी। उन्होने आग्रह किया कि वे अवश्य ही साथ जाएगी। शास्त्रीजी ने कोई रास्ता न देस उनमें बहा कि अच्छा वे भी साथ चलें । शास्त्रीजो पैदल थोड़ी दूर नले, लेकिन माता और पानी के माप होने के कारण वे सबके साथ एक ही ताणे में बैठ गए। तागा चलता रहा और हर क्षण शास्त्रीजी समझने रहे कि अब गिरफ्तार होगे। तांगा बासिर घटापर पहुंच ही गया। वहा हजारों की भीड़ इकट्ठी थी। लोगों को कम विश्वास 54 लालवहादुर शास्त्री था कि शास्त्रीजी वहां पहुंच भी पाएंगे । जब लोगों ने उन्हें देखा तो हज़ारों के मुंह से प्रशंसा के शब्द निकले। " घंटाघर के दायें-बायें, आगे और पीछे फौजी गाड़ियां खड़ी थीं। फौजी ट्रक भी मौजूद थे, जिनपर फौज के लोग संगीन ताने हुए चारों तरफ अपनी निगाह रखे हुए थे। सारा दृश्य उन्होंने बड़ा भयावना बना रखा था। शास्त्रीजी ने यह समझ लिया कि तांगे से वे कहीं और जा नहीं सकते। फिर वे उसी तांगे पर खड़े हो गए। तांगेवाला भी घबराया कि उसका क्या होने जा रहा है । परन्तु उसकी सहानुभूति शास्त्रीजी के साथ थी। ज्यों ही वे तांगे पर खड़े हुए, उन्होंने कहा, "सरकार को यहां रहने का कोई अधिकार नहीं है और उसे फौरन भारत से चला जाना चाहिए, त्यों ही पुलिस के अफसरों ने आकर शास्त्री जी को गिरफ्तार कर लिया। .."पास में ही कोतवाली थी। शास्त्रीजी को वहां ले जाया गया। उनकी माता और पत्नी भी वहां तक तांगे में साथ गई। जब उन्हें कोतवाली के अन्दर ले जाया गया तो स्वभावतः उनकी माता को चोट लगी और उन्होंने भी पुलिस के लोगों से कहा, 'मुझको भी गिरफ्तार करके ले चलो' । इस प्रकार अग्नि-पुंज के समान वे 'करो या मरो' के व्रत को पूरा करते रहे । उनका जीवन जेल में जितना तपा, उससे अधिक यातनाएं उन्होंने जेल से बाहर भोगी। उनके चेहरे पर शिकन कभी नहीं देखी गई नंगी संगीनों के सामने भी उनके कदमों में कोई कम्पन कभी नहीं देखा गया। रचनात्मक मोर्चे पर, संगठन सम्बन्धी उलझनों को संभालने में वे जितने सफल थे, उतने ही वीर संकट के समक्ष सीना खोल देने में भी थे। यह भी एक आश्चर्य है कि परम्परा से शिक्षा, विद्वता और कलम का कौशल दिखानेवाले कायस्थ परिवार में उत्पन्न लालवहादुर अपनी कुल परम्परा में वीरता का उन्मेप करने में सफल हुए । आत्मत्याग को वीरता का रूप देनेवाले इस विचक्षण लघु सेनानी की देह की धातु को उन दिनों भी कोई देखता तो उसे यह भविष्यवाणी करने में कठिनाई नहीं होती कि वे दुर्लघ्य बाधाओं को पार करके, उनपर अपनी विजय-पताका फहराकर उतने ही शान्त और मधुर भाव से आसपास की भीड़ से कहेंगे, "आपको यकीन नहीं था न?" - लालबहादुर शास्त्री 55 नई दुनिया सन् 1942 को अगस्त क्रान्ति देश को आजादी दिलानेवाली थी। यह स्यापता बहुत हद तक सही है। कांग्रेस नेता अगस्त 1942 मे जून 1945 तक जेलो में रहे। इस बीच देश का राजनीतिक ढांचा प्राय: बदल गया। दिनीय विश्व महायुद्ध को लोक-युद्ध को गज्ञा देनेवाले कम्युनिस्ट काप्रेम ग पृषर हो गए। मोहम्मदअली जिना जिन्हें 1937 के चुनाव में सिर्फ 5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे, अब मुस्लिम लीग के जनक वन गर थे। ये मुसलमान जो लोग को राजनीतिक हैसियत देने में हिचकते थे, अब धीरे- धीरे उमके निकट सरकते जा रहे थे । मोहम्मदअली जिन्ना ने मन् 1940 में लीग के लाहौर अधिवेशन में पाकिस्तान की स्थापना का प्रस्ताव स्वीकार करा लिया था। काग्रेस नेताओं की अनुपस्थिति में अंग्रेज सरकार की मदद से जिन्ना गाहा की लीग ने मुसलमानो के दिलो पर पानिस्तान फी परिमल्पना यो च्छी तरह जमा दिया पा। यह प्रश्न पूछना अत्यन्त भगान नहीं होगा कि या नगरा कान्ति ये दौरान याप्रेम जी महायट. यूट का घेरा कम हो गया था। यांग्रेग की नैतिक लडाई में भी अन्नर आ गया क्योकि इम आन्दोलन के दौरान दोनो ओर पलकर हिमा वरती गई। सशस्त्र युद्ध द्वारा आजादी हामित करने की इच्छा मोगों के दिलो में फिर से पैदा हो गई। अनुभवी नेताओं की अनुपस्थिति में वहादुर जनना ने घोटे गमय के लिए समानान्तर प्रशासन भी स्थापित कर लिया लेकिन यह अंग्रेजी गरकार के विरोध में अधिक दिन तक न टिक न मको। महत्त्व- पूर्ण परिणाम यही निपला कि आजादी को याग पुलिस और ना की चरवों में भी पहुंच गई। राजनीतिक एकता वी जयदस्त हानि के बावजूद अग्रेज सरकार दमनकारी ग्यापात दो दवापर नहीं बैठ गकी। उघर ब्रिटिग, अमरीकी और हमी तामन के तिकोने आक्रमण के मामने 7 मई, 1945 को जर्मन सरकार ने घुटने टेक दिए । नाजी हिटलर ने आत्महत्या पर ली। जापान अभी भी नह रहा था। सरकार ने गोवा कि कांग्रेस नेताओ को जेल मे मुत कर दिया जाएगा तो जापान का अन्न भी शोघ्र ही हो जाएगा। यह अनुमान गरत नहीं था, कि अमरीका .
56 लालवहादुर शास्त्री हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम न गिराता तो द्वितीय विश्व- महायुद्ध सुदूर पूर्व में इतने शीघ्र समाप्त नहीं होने वाला था। इंग्लैंड में चचिल के अनुदार दल का भाग्य-सूर्य अस्त हो गया और लेबर पार्टी शासनारूढ़ हो गई। भारत के मित्र और दूरदर्शी प्रधानमंत्री श्री एटली ने सितम्बर 1945 में यह घोपित किया कि भारत को प्रांतीय स्वशासन फिर से प्रदान किया जाएगा, केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों के चुनाव किए जाएंगे और एक संविधान सभा का निर्माण होगा जो इस देश के लिए एक संविधान बनाएगी और वायसराय की सलाहकार परिपद् का पुनर्गठन होगा। इस घोषणा का देश-भर में हर्प के साथ स्वागत किया गया। इसके पूर्व कि हम लालवहादुर शास्त्री की राजनीतिक रंगस्थली उत्तरप्रदेश की चर्चा करें यह कहना असंगत न होगा कि इस चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली, परन्तु राजनीतिक शक्तियों का रंग पलट गया था और संकटपूर्ण भविष्य के आसार नज़र आने लगे थे। केन्द्रीय विधानमण्डल में कांग्रेस को 91 प्रतिशत स्थान प्राप्त हुए और आठ प्रांतों में उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। मुस्लिम लीग को केन्द्रीय विधानमण्डल में केवल 31 स्थान प्राप्त हुए लेकिन वंगाल और सिंध में उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया। पंजाब में कांग्रेस की मदद से यूनिय- निस्ट पार्टी ने मंत्रिमण्डल का निर्माण किया। यह बात अब पूर्णतः स्पष्ट हो गई थी कि मुस्लिम लीग की मर्जी के विना अंग्रेज़ सरकार से किसी प्रकार का राजनीतिक समझौता होना असम्भव था। लालवहादुर शास्त्री की जबर्दस्त संगठन-प्रतिभा, मूक सेवाभाव एकान्त निष्ठा का ही पुरस्कार था कि पंडित गोविन्दवल्लभ पन्त ने उन्हें यू०पी० पार्लमेंटरी बोर्ड का मंत्री बनाया। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान का दायित्व पूरी तरह लालवहादुर शास्त्री के कन्धों पर आ गया। शास्त्रीजी फिर एक बार अवसर के अनुरूप महाप्रयास में जुट गए। उत्तरप्रदेश कांग्रेस कमेटी का दफ्तर ही उनका घर बन गया। वे संस्था के सभी अंगों ते भलीभांति परिचित थे। प्रांत के किसी भी कोने से आए कांग्रेस कार्यकर्ताओं से वे सुपरिचित थे। नये कार्यकर्ताओं को कभी यह सालबहादुर शास्त्री 57 अनुभव न होने देते थे कि वे उनसे अपरिचित हैं। एक बार मिलकर कभी न मुलाए जाने और दूसरी मेंट में नाम लेकर सम्बोधित होने पर कोई भी कार्यकर्ता उनपर मुग्ध हो जाता था। विवरण की विस्तृत जानकारी और अमुक कार्य के लिए अमुक कार्यकर्ता को योग्यता को परपना और उसमें विश्वास पैदा करना ये लालवहादुर की विदोषताएं थी, जिनके रहते वे अपने राजनीतिक अग्रजों को दृष्टि में उत्तरोतर ऊंचे उठते गए। मुस्लिम लीग के अनौपचारिक गढ़ उत्तरप्रदेश में पाग्रेस को भारी विजय प्राप्त । पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त कांग्रेस संस्था और प्रशासन में नये रखन का संचार करना चाहते थे। वे यह चाहते थे कि नौजवान कार्यकर्ता प्रशासन में आएं. प्रशिक्षण प्राप्त करें और महत्त्वपूर्ण पदों पर काम करें; पडित पंत ने लालबहादुर शास्त्री को अपना संसदीय सचिव नियुक्त पर लिया। संसदीय सचिवों की गूची में इनके माप केशवदेव मानवीय, चन्द्र- भानु गुप्ता और जगनप्रमाद रावत जैसे लोग भी थे। ये सभी नेता मरी श्रेणी के अत्यन्त मुघर, प्रतिमासम्पन्न और शक्तिशाली नेताओं में गिने जाने पे। लेकिन वे शायद अपनी महत्त्वाकाक्षा के तूफान को सहन करने में उतने समयं नहीं थे, जितने सालबहादुर शास्त्री। पडित पन्त देर तक काम करने के अम्पस्त थे। लालबहादुर शास्त्री भी उनकी छाया में समान उन्हीके पदचिह्नो पर चलने वाले थे। आगे चलकर ऐसा सयोग होने लगा कि वे साय-साय दातर छोडते । प्रायः पहिन पत की गाड़ी में बैठकर ही वे घर जाते । इस तरह उन्हे पहित पन्न के चेहद निकट आने का अवसर मिला ।पहिन पन्त व्यक्तियों के भारी पारसी थे। उन्हें भी यह अवसर मिला कि निकट से इम उमरते दाविरव का अध्ययन कर सकें। फलत. उगी नेता के मुग से, जो अपने विरोधियों द्वारा अपनी पत्तव्यनिष्ठ काठी. रता के लिए 'कुमायू का नरभक्षी चोता' पुकारा जाता था, सालवहादुर ने "प्रियदर्शी, कटोर परिश्रमी, निष्ठावान्, विश्वसनीय और विवादमुक्त होने जम विशेषण प्राप्त किए। अपनी कर्तव्यनिष्ठा को प्रदर्शित करने के अनेक अवसर भी लाल- यहादुर शास्त्री को मिले। सन् 1947 में जब रफी अहमद किदवई को 58 लालबहादुर शास्त्री नेहरूजी ने केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में बुला लिया तो पंडित गोविन्दवल्लभ पन्त ने शास्त्रीजी को उत्तरप्रदेश के पुलिस एवं यातायात मंत्री के पद पर नियुक्त किया। राजनीतिक जीवन में इसे आकस्मिक उन्नति ही माना जाएगा, लेकिन काम चाहे जितना कठिन क्यों न हो उसके अनुरूप ऊंचा उठने की असाधारण श्रम-साधना से शास्त्रीजी सदैव सम्पन्न रहे । उत्तर- प्रदेश का पुलिस विभाग अंग्रेज सरकार के भक्तों से भरा पड़ा था। लोग के प्रभाव के कारण कुछ साम्प्रदायिक मनोवृत्तिवाले अफसर भी पुलिस में थे। वे दिन साम्प्रदायिक दंगों और झगड़े-फसादों के थे। किसी भी मंत्री के लिए इस स्थिति में संतुलित रहना कठिन था। लालवहादुर शास्त्री ने प्रांतीय रक्षादल का व्यापक संगठन किया। इस दल का काम साम्प्रदा- यिक झगड़ों को शांत करने में पुलिस तथा गैर सरकारी संगठनों की सहा- यता करना था। आगे चलकर यह दल समाजविरोधी आचरण करने वाले तत्त्वों को समाप्त करने में प्रशासन का सहायक बना । शास्त्रीजी ने अनेक जेल यात्रियों को इस रक्षा दल में भर्ती करके उन्हें ऊंचे पदों पर स्था- पित किया। पुलिस की शासक प्रवृत्ति में नया मोड़ पैदा किया। आज यही प्रान्तीय रक्षादल राष्ट्रीय जनसेना के रूप में विकसित किया जा रहा है। परिवहन मंत्री के रूप में उनके सुधार को अत्यन्त प्रगतिशील माना जाता है। उत्तरप्रदेश के पौरुपेय क्षेत्र में जहां आज तक भी गिनी-चुनी महिलाएं राजनीति में हैं; शास्त्रीजी ने राष्ट्रीयकृत परिवहन में महिलाओं को बस-कण्डक्टरों के स्थान पर नियुक्त किया। उनके इस आदेश को जानकर सरकारी अहलकारों का अमला और जनता दोनों चकित रह गए। शास्त्रीजी को लोगों को सहसा चकित कर देने का अभ्यास बहुत पुराना था। जीवन-दर्शन सामान्यतः हर व्यक्ति किसी न किसी जीवन-दर्शन से प्रेरित होता है। हो सकता है कि उसका जीवन-दर्शन इतना अस्पष्ट और अविकसित हो लालबहादुर शास्त्री 59 नही पा, कि किसी खूबमूरत परिभाषा में न यांधा जा सकता हो। यह जरूरी भी नहीं होता। जिस नौका में बैठकर आदमी नदी पार करता है, या समुद्र- यात्रा करता है, यह जरूरी नहीं कि नौका कि निमिति की सभी विशेष- ताओ गे मुपरिचित हो। अलबता जर डुवा देनेवाले तूफानों में मे कोई नौका सुरक्षित वट तक ले जाती है, तो यह जरूरी हो जाता है कि उसके कील-काटो को पुत्रगी को जाना-परमा जाए। मालयहादुर मारत्री के प्रधानमंत्री पद पर आगीन होते ही इस देश के जनमानम में एक अजीब कौतूहल पैदा हुआ। कारण शायद यह था कि वे महमा आकृष्ट करनेवाले व्यक्तित्व के स्वामी नहीं ये । यदि लालबहादुर भास्त्री प्रधानमत्री न बन पाते, तो नि:मदेह अनेक लोगो को सहानुभूनि- जनित दुप होता, लेकिन बन गए तो कौतूहल हुआ और हर व्यक्ति के मीने मे एक राहत की उच्वास निकल गई-'चलो, ठीक हुआ'-लोगों ने गोचा। पायद इसलिए नियह ठिगना व्यक्ति अविजेय नहीं था, दूर 'छोटा आदमी' था। मवमे गे एक या गबके चंगुल से निकलकर किधर जागकता पा! कैमे लालयहादुर शास्त्री लोगों के दिलों में और दुनिया के दिलो मे अनायास यह आत्मीयतापूर्ण विश्शाम पैदा कर सके ? यह रहस्य प्रेरित करता है कि गहराई मे उनके जीवन-दर्शन में पैठा जाए। शास्त्रीजी ने अपने जीवन में कभी यह नहीं कहा कि मैं 'ऐमा हूं और मेरी मान्यताएं अमुक है ।' जो वे थे उगका परिचय देनेवाने काम उन्होंने अनेक फिए । काम सभी लोग करते हैं । एक कापं मुपरिणाम में पुरस्कल होता है, दूसरा केवल कार्य होता है। कार्य किए बगैर व्यक्तिमत्ता बनती ही नहीं । शास्त्रीजी के जीवन दर्शन को निरूपित करने का प्रयास मान एक दुस्माग भी हो सकता है, किन्तु अन्य मे संज्ञा तक पहुंचने याला व्यक्ति किसी न किसी सुनिश्चित विचार, धेय और निष्ठा के बिना चल नहीं सकता । शायद चलने की चेतन प्रेरणा को ही जीवन-दर्शन कहते हैं । एक ऐगे रास्ते पर चलकर मजिल तक पहुंचना, जहा बड़ी तेजी से चलनेवालो का जमघट हो, अपने-आपमे एक महान उपलब्धि होती है। कुछ यात्री तो दूमरो को अच्छी तरह चलते देखकर ही थक जाते हैं । कुछ यह सोचकर किनारे हो जाते हैं कि घलने मे क्या ताभ, जब किस्मत में 60 लालवहादुर शास्त्री -- सबसे पीछे रहना ही लिखा है। ऐसी निराशा के चक्र में फंसने की अपवाद- रहित परिस्थितियां शास्त्रीजी के जीवन में हमेशा रही हैं। लोग यह भूल जाते हैं कि विद्यार्थीकाल में देशभक्ति ने जब राजनीति का वाण उनको मार दिया था तब भी उन्होंने दर्शन को ही अपना विषय चुना था। शायद वे कन्फ्यूशस के इस उपदेश से सुपरिचित होंगे कि अपने-आपको जान लेना ही दुनिया को जान लेना है। गीता में कहा गया है कि जो मनुष्य कर्म में अकर्म को देखता है, वह मनुष्यों में ज्ञानी मनुष्य है । वह योगी है और उसने अपने सब कर्मों को कर लिया है । जब तक मनुष्य अनासक्त भावना से कर्म करता है, उसका मानसिक सन्तुलन विचलित नहीं होता। प्राणायाम साधक और योगासनों में प्रवीण लालबहादुर शास्त्री के जीवन के प्रत्येक मोड़ पर आसक्ति अपने सुन्दर मुखड़े पर आवरण डालकर निराश लौट गई। उन्होंने जीवनपर्यन्त के.वल कर्म किया। इलाहाबाद जिले की कांग्रेस कमेटी से लेकर उत्तरप्रदेश के पुलिस मंत्री और भारत सरकार के स्वराष्ट्र मन्त्री और प्रधानमन्त्री बनने तक केवल कर्म ही कर्म ! एक व्यक्ति जो अपने सरीखे दूसरे को संभाल नहीं सकता, जिन विभागों में देश के चुने हुए शरीरवान लोग छोटे से लेकर बड़े पदों पर काम करते हैं, उन विभागों को संभालने में शास्त्रीजी के मन में हीनभाव क्यों नहीं पैदा हुआ ? इसका उत्तर है, "जो उदासीन (निस्पृह या तटस्थ) की भांति गुणों द्वारा विचलित न होता हुआ बैठा रहता है, जो यह समझता हुआ कि केवल गुण ही कर्म कर रहे हैं, अविचलित एवं अलग रहता है। 'जो सुख और दुःख को समान समझता है, जो अपने आत्म में ही स्थित रहता है, जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्णखण्ड को समान समझता है, जो प्रिय और अप्रिय वस्तुओं में एक-सा रहता है, जिसका मन स्थिर और निन्दा और स्तुति को एक- सा समझता है। जो मान और अपमान में समान रहता है, जो मित्रों और शत्रुओं के प्रति एक-सा है -जो अनन्य भक्तियोग से सेवा करता है।" वह व्यक्ति क्या है--स्थितप्रन, और वह कौन था--लालवहादुर शास्त्री। ये शब्द प्रशंसा के नहीं हैं। इन्हें जीवन में ढले हुए दर्शन का अनु- ..
लालबहादुर मास्त्री 61 लिन मंधान मात्र नममा जाना चाहिए । रेलवे स्टेशन पर पड़ा हुआ पुलिस. मन जिस व्यक्ति को परिचय दिए जाने पर भी, अपना मन्त्री मानने के लिए विश्वास न जुटा सके, उस व्यक्ति के पौधे के मूक्ष्म को समझने के अधिक मन्द-महिमा का आना स्वाभाविक है । कठोपनिषद मे कहा गया : "यह विश्ववृक्ष जिसरी जड़ें कार की ओर हैं और शाखाएं नीचे पी ओर, पावन है।" जोयक्ति सघर्ष की विषम गे विपन स्थिति में इमपाश्वत मत्य से नजर मिलाए रखता है, यह आकार में लघुता प्राप्त होने पर भी महत्ता को प्राप्त होता है । शास्त्रीजी के जीवन को देवो तो वह निर्भीक, निस्संग अभिमान और मोह गे मुक्त, बुरी आमक्तियों को जीतनेवाला, फर्मरूपी भक्ति में मंलग्न, गुरुभक्त, मित्रो अभिभावकों के प्रति नन, वडो का आगीप लेने के लिए सालायित जीवन की एक लम्बी कहानी गे अधिक कुछ भी नहीं थे। भारतभूमि कर्मयोगियों मे कभी सानी नहीं रहो । मापना की लम्बी अवधि में विशेषणों और गुणों को चरितार्य करनेवाले महामहिम व्यक्तित्वों की विरामत का हकदार बनना मरन नही होता। तोकमान्य व्यक्ति अनेक ही मक्ते हैं. लेकिन भारत ने यह पद बाल गगाधर निरक को दिया, 'महारमा' को संज्ञा मोहनदास करमचन्द गाधी को मिली। 'युवक मम्राट' जवाहरलाल नेहरू, 'आधुनिक चाणवर' पक्राी राजमोगलाचार्य, देश- रत्न' तथा 'अजानराव ढाक्टर राजेन्द्रप्रमाद, राजपि पुरुषोत्तमदाम टइन 'पंजाव केमरी' लाला लाजपतराय माने गए। आनेवाली पीढ़ियों के लिए इन विशेषगो को अजित करने की स्थिति वामानी से बनने वाली नही थी नेग्नि जीवन में न उपमेव और उपमानो का जन्म होता है। दम नवीन परम्परा रा श्रीगणेश लालबहादुर शास्त्री में शुरू हो गया। आगामी पीढ़ियों के लिए वे मार्ग प्रशस्त कर गए। महामारत के नाम्निावं में उल्लेख है कि अप्रियस्य च पयस्य वक्ता श्रोता च दुर्गम.।' एक महापुरुष का क्यन है कि यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे होठ वृटियों में दचे, तो गावधानी में पाच वातों का ध्यान सो: किस विषय में तुम्हें बोजना है, किममे तुम्हें बोरना है, और कंगे, कय मोर.
62 लालबहादुर शास्त्री । कहां बोलना है। लालवहादुर शास्त्री के सार्वजनिक जीवन या कारावास के जीवन के जहां कहीं भी कुछ संस्मरण मिले, उनमें उनकी यही विशेषता बार-बार दोहराई जाती रही कि व दूसरे के दृष्टिकोण को भली प्रकार सुनकर अपनी बात कहते थे। दूसरे के मन में पैठकर अपनी बात कहते थे। उनके समीप कार्य करने वाले लोगों को सदैव यह अभिमान करने का अवसर मिलता था कि उनकी क्षमता और प्रतिभा लालबहादुर शास्त्री से किसी प्रकार कम नहीं, लेकिन लालवहादुर अपने ध्येय की ओर एकान्त- अखण्ड निष्ठा से बढ़ते थे, साथ चलने वालों को अपने कन्धे का सहारा देते थे और यह इच्छा रखते थे कि उनका सहयात्री उनसे पहले ही मंजिल पर पहुंच जाए, तो वे अधिक सुखी होंगे। फलत: दूसरों की उपलब्धियां उनकी उपलब्धियां बन जाती थीं, दूसरों की पीड़ा उनकी पीड़ा बन जाती थी और दूसरों का सुख उनका सुख बन जाता था। उनके जीवन-दर्शन को समन्वयवादी कहा जाता है । यह एक गवेषणा का विषय है कि शास्त्रीजी ने इस जीवन-दर्शन को अंगीकार करके अपने सार्वजनिक आचरण का निर्धारण किया था अथवा परिस्थितियों से जूझ- जूझकर यह अनुभूति प्राप्त की थी कि समन्वय के विना 'साथ चलने की उक्ति चरितार्थ नहीं हो सकती । डा० भगवानदास के श्री चरणों में बैठ- कर उन्होंने दर्शनशास्त्र का पारायण किया था। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव लालवहादुर शास्त्री पर था। उन्होंने अपने आचार्य के व्यक्तित्व का वर्णन इन शब्दों में किया है, "एक अद्भुत व्यक्तित्व, उच्च सौन्दर्यबोध से सम्पन्न, तथापि इतना सरल, अपनी रुचियों और आदतों में इतना भद्र। दर्शनशास्त्र पर उनके भाषण प्रभावित करने वाले होते थे। उनके दृष्टि- कोण में हमेशा एक ताज़गी रहती थी।" डा० भगवानदास स्वयं समन्वयवादी दार्शनिक माने जाते थे। लाल- बहादुर शास्त्री ने किसी मतवाद के प्रति कभी कोई आग्रह व्यक्त नहीं किया। उनके बारे में उचित जानकारी के अभाव में कुछ मिथ्या धारणाएं भी बनीं। उनके प्रशंसकों और आलोचकों ने दवे स्वर में कभी-कभी उन्हें वर्चस्विताहीन कबीरपंथी पुकारा, लेकिन तथ्यों से यह धारणा ईर्ष्यालु सिद्ध होती है। दरअसल ऐसे शब्द बोलना जो दूसरों को बुरे न लगें, जो -- - लालवहादुर शास्त्री 63 सत्य ही, प्रिय हो और हितकारी हों, ऐसे वक्ता को दुर्वल नही वागी का तपीबहा गया है। मंहम क्यूरी को जीवनी के अनुवाद ग्रन्थ को भूमिका में उन्होंने अपनी मान्यताओं को मक्षिप्त झाकी प्रस्तुत की थी, जिमसे उनके जीवन- दर्शन की प्रारम्भिक रूपरेसा अंशत: स्पष्ट होती है : " श्रीमती क्यूरी की जीवनी मैंने जेल मे पढी। मुझपर जो उसका गहरा प्रभाव पड़ा उसीके फलस्वरूप यह पुस्तक है। श्रीमती क्यूरी की छोटी पुत्री ईव क्यूरी द्वारा लिखित जीवनी का अंग्रेजी अनुवाद विनोट गीन ने किया है। उगका ही अनुवाद करने का मैने प्रयत्न किया है। अनु- वाद स्वतन्त्र है । पुस्तक को छोटा कर दिया है । अनेक अध्यायो के बहुत- ने अरा छोड़ दिए हैं और कुछ को दो मे विभाजित कर दिया है और नाम भी दूसरे रख दिए है। गमस्त पुस्तक में अंग्रेजी अनुवाद फे भायो को लेकर उसे परिवर्तित स्वरूप तथा अपनी भाषा मे रखने की चेष्टा की । "जेल में प्राय: छोटी-छोटी चीजें भी बडी प्रतीत होती हैं। त्वचा की निर्वलता के साथ-साय मस्तिष्क पर भी एक विशेष प्रकार का प्रभाव पड़ता है और बन्दी माधारणत अधिक भावध हो जाता है । परन्तु जेन-जीवन के कारण श्रीमती पूरी की जीवनी का मुझपर अधिक प्रभाव पहा, ऐसा मैं नही गमभना। मेरी वयरी पी जीवनी जो भी पढेगा, प्रभावित होगा और उसका जीवन उगे असाधारण तथा महान् प्रतीत होगा। माधन बहुत क्षीण नथा मार्ग कटकाकोणं रहते हुए भी एक बानिका न वत. प्रथाम से जितनी भी मफलता प्राप्त की, वह प्रत्येक नर-नारी के लिए अनुकरणीय है। हमारे देश के रहन वालो में यह धारणा बनी हुई है कि यूरोप की महिलाए केवल मुसी जीवन बिताने की पोज में रहती हैं तथा सय मुविधाए सुलभ होने म उनको कुछ काम करना नही पटता और उनकी रुचि मिनेमा, पेल, वेश-भूषा और प्रेमालाप मे हो रहा करती है। मेरी का जीवन इस धारणा को समूल नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। "हमारे देश में कन्याओ ने जहा कुछ शिक्षा प्राप्त की कि वे काम म दूर भागती हैं, कोम्यिक जीवन के छोटे-मोटे उतरदायित्व म घबरान 64 लालवहादुर शास्त्री लगती हैं, सेवक और सेविकाओं की उन्हें प्रतिक्षण आवश्यकता प्रतीत होती है और अपने से काम करने का अभ्यास छूट जाता है । थोड़ा-सा धन जिसके पास आ जाए उसकी भी यही दशा होती है। मेरी ने उच्चतम शिक्षा प्राप्त की और कुछ धनोपार्जन भी किया, परन्तु अपने हाथ से काम करना बन्द नहीं किया। गृह-कार्य, बच्चों की सेवा-सुश्रूपा तथा कुटुम्ब का सब उत्तरदायित्व वह अन्त तक नि:संकोच भाव से निभाती रही। "वैसे तो मेरी में एक नहीं अनेक गुण थे, परन्तु उसकी ত वातें विशेप थीं। महान् वैज्ञानिक होते हुए भी वह समाज और देश को नहीं मूली थी। पोलैंड की स्वतन्त्रता उसे सदा प्रिय रही। अपने विशेपं प्रयत्नों से उसने वहां एक रेडियम भवन की स्थापना की । फ्रांस में भी वह ऐसी संस्था और प्रयोगशाला स्थापित करने में सफल हुई । महासमर के अव- सर पर तो उसका कार्य अभूतपूर्व रहा। बुद्धि प्रधान होते हुए भी नैतिकता को वह किसी तरह कम महत्त्व नहीं देती थी। उसके जीवन में नैतिक विशृंखलता के लिए कोई स्थान नहीं था। उसमें ज्ञान और कर्म का सुन्दर समन्वय दीख पड़ता है। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े काम में वह जीवनपर्यन्त समान रस लेती रही। पुस्तक- लेखन और अध्ययन तथा अनुसंधान और आविष्कार को ही उसने प्रधानता नहीं दी, जीवन के जिस क्षेत्र में उसने भाग लिया, उसे सतत कर्मशील रहकर सुन्दर बनाने का यत्न किया। "मेरी को किसी धर्म में विश्वास नहीं था। यह कुछ लोगों को उसके जीवन की एक कमी जान पड़ेगी। परन्तु धर्म का वर्तमान स्वरूप बाह्य रीति-रिवाज़ और दैनिक कृत्यों का एक पुंज बन गया है और धार्मिक जगत् के विचार तया व्यवहार में असीम अन्तर दिखाई पड़ता है। यह अचम्भे की बात नहीं कि कोई सत्यनिष्ठ व्यक्ति इस विरोधात्मक परि- स्थिति तथा रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह कर वैठे। धर्म के मूल तथा आध्या- त्मिक स्वरूप को समझने तथा थोड़ी आस्था रखनेवाला व्यक्ति धर्म की वर्तमान अवस्था से भी निराश न होकर अपने जीवन में उसका सन्तुलन कर सकता है। मेरी ने इसका निराकरण अपने मानव-प्रेम तथा महान ला-4.
लालबहादुर शास्त्री 65 । धरित्र मे कर लिया था। मानव के लिए उसके हृदय में अगाध प्रेम और आदर पा । दह विमीको यश नहीं पहुंचा मकती थी और न रिमौके उस्थान में माधक थी । अम्नेय की वह प्रतिमनि यो । उसने जीवन में मदा देना ही गीगा, लेना नहीं । न उमे कभी धन की इच्छा हुई और न किमी दूसरे ऐहिक सुरा की। "मेरी का जीवन निनन्देह तप और त्याग का था। उने बड़े से बड़ा नियरने में विलम्ब नहीं होता था। रेडियम को पेटेण्ट न कराने का निश्चर उमने देवतेन्दयते किया। आने दूसरे नोयेल पुरस्कार के धन को बह मूली मेठी पो, और महासमर के ममय उसकी एक-एक पाई उमने काम को अपित कर दो। मत्कार्यों को और उसकी महज प्रवृत्ति थी, रिमी विशेष प्रयत्ल की थावस्यकता उने न होतो।" मेरी ने अपने जीवन काल में ही दडी ख्याति प्राप्त कर नी, परन्तु उसके कारण उममें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। मिति और प्रनता मे किमी प्रकार का अहंकार या अभिमान वसन्न न हो यह एक महान माधना है। मेरी 'मैं' को भूल गई पो, उमने अपने कार्य में अपने को तन्मय कर दिया था। माइस्टाइन के ये सद मेरी के यहप्पन को प्रकट करते हैं- 'स्यातिप्राप्त व्यक्तियों में मेरी ही एक ऐमी थी जिसे प्रसिद्धि ने किमी प्रकार नष्ट नहीं किया।" "इन बातों में यह नहीं समझना चाहिए कि वह कोई ऐनी शक्ति पी जिसमा अनुगरण करना असम्भव हो। मोइ स्नेह, अभिलापाएं और आकांक्षा गयके ममान उगमें भी थी। बनपन से ही उसे अधिक मे यधिक पिचाप्ययन और विदुषी बनने की नालमा पी। अस्पन गरीवी उमें गचिकर नहीं पी, माई वह उमपर गर्वदा मौन ही रही। उसने भी प्रेम किया और निराश, इनका उमै दुःम था। पिपरी जो पनि प्राप्त होने पर उसे गस्ति प्रान हुई मया मनान में उसे मरवा जीवन पूर्ण प्रतीत हमा । गवर्नमेंट द्वारा जो नहायता और सम्मान पिपरी से उसके कार्य में मिलना चाहिा पा उसके न मिलने मे गिन रही। कम्बियों में उगको मोह था, उसे मुग में यह मुफी और दुप में यह दुःखी होती। पाने देश और अपनी नगरी में प्रेम तया मार-मुपरे वस्त्र, स्वउ गृह, वाटिका और .
64 लालबहादुर शास्त्री - लगती हैं, सेवक और सेविकाओं की उन्हें प्रतिक्षण आवश्यकता प्रतीत होती है और अपने से काम करने का अभ्यास छूट जाता है। थोड़ा-सा धन जिसके पास आ जाए उसकी भी यही दशा होती है। मेरी ने उच्चतम शिक्षा प्राप्त की और कुछ धनोपार्जन भी किया, परन्तु अपने हाथ से काम करना बन्द नहीं किया। गृह-कार्य, बच्चों की सेवा-सुश्रूपा तथा कुटुम्ब का सव उत्तरदायित्व वह अन्त तक निःसंकोच भाव से निभाती रही। "वैसे तो मेरी में एक नहीं अनेक गुण थे, परन्तु उसकी कुछ बातें विशेप थीं। महान् वैज्ञानिक होते हुए भी वह समाज और देश को नहीं भूली थी। पोलैंड की स्वतन्त्रता उसे सदा प्रिय रही। अपने विशेपं प्रयत्नों से उसने वहां एक रेडियम भवन की स्थापना की । फ्रांस में भी वह ऐसी संस्था और प्रयोगशाला स्थापित करने में सफल हुई। महासमर के अव- सर पर तो उसका कार्य अभूतपूर्व रहा। बुद्धि प्रधान होते हुए भी नैतिकता को वह किसी तरह कम महत्त्व नहीं देती थी। उसके जीवन में नैतिक विशृंखलता के लिए कोई स्थान नहीं था। उसमें ज्ञान और कर्म का सुन्दर समन्वय दीख पड़ता है। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े काम में वह जीवनपर्यन्त समान रस लेती रही। पुस्तक- लेखन और अध्ययन तथा अनुसंधान और आविष्कार को ही उसने प्रधानता नहीं दी, जीवन के जिस क्षेत्र में उसने भाग लिया, उसे सतत कर्मशील रहकर सुन्दर बनाने का यत्न किया। "मेरी को किसी धर्म में विश्वास नहीं था। यह कुछ लोगों को उसके जीवन की एक कमी जान पड़ेगी। परन्तु धर्म का वर्तमान स्वरूप बाह्य रीति-रिवाज़ और दैनिक कृत्यों का एक पुंज बन गया है और धार्मिक जगत् के विचार तया व्यवहार में असीम अन्तर दिखाई पड़ता है। यह अचम्भे की बात नहीं कि कोई सत्यनिष्ठ व्यक्ति इस विरोधात्मक परि- स्थिति तथा रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह कर बैठे। धर्म के मूल तथा आध्या- त्मिक स्वरूप को समझने तथा थोड़ी आस्था रखनेवाला व्यक्ति धर्म की वर्तमान अवस्था से भी निराश न होकर अपने जीवन में उसका सन्तुलन कर सकता है। मेरी ने इसका निराकरण अपने मानव-प्रेम तथा महान सा-4.
लालबहादुर शास्त्री 65 चरित्र में कर लिया था। मानव के लिए उमके हृदय में अगाध प्रेम और बादर पा । वह किमीको कलेश नहीं पहुंचा सकती थी और न किमोर उत्थान में बाधक थी। अम्नेय को यह प्रनिनि यो । उनने जीवन में सदा देना ही मीमा, लेना नही । न उमे कभी धन की इच्छा हुई और न किमी दूसरे ऐहिक मुप्त को। "मेरी का जीवन निमन्देह तप और त्याग का था। उसे बड़े से बड़ा निर्णय करने में विलम्ब नहीं होता था। रेडियम को पेटेण्ट न कराने का निश्चय उसने देखते-देगते किया । अपने दूसरे नोबेल पुरस्कार के धन को यह भूषी बैठी थी, और महाममर के समय उसको एक-एक पाई उसने ग्राम को अर्पित कर दी। मत्कार्यों की और उसकी महज प्रवृत्ति थी, निमी विदोप प्रयत्न की आवश्यकता न होती।" "मेरी ने अपने जीवन काल में ही बड़ी स्वाति प्राप्त कर ली, परन्तु उमके वारण उसमें कोई परिवर्तन महीं हुआ। प्रमिति और प्रभुना मे किमी प्रकार का अहंकार या अभिमान उत्तन्न न हो यह एक महान साधना है । मेरी 'मैं' को नम गई थी, उसने अपने कार्य में अपने को तन्मय पर दिया पा।। आइंस्टाइन के ये शाद मेरी के पहन को प्रकट करते हैं- 'म्यातिप्राप्त व्यक्तियों में मेरी ही एक ऐमी थी जिम मिति ने किमी प्रकार नष्ट नहीं किया।" इन बातो में यह नहीं समझना चाहिए कि वह कोई ऐनी हरवित थी जिसरा अनुगरण करना असम्भव हो। मोह, स्नेह, अभिलाषाएं और आमा गयके ममान उगमें भी थी। बचपन से ही उगे अपिक में अधिक विद्याप्पन और विदुषी बनने को गालमा यो। अस्पन गरीबी में रचिकर नहीं थी, पाहे वह उगपर नवंदा मौन ही रही। उसने भी प्रेम किया और निराग हुई, इसका उमे दु.प पा । पिरी जो पति के प्राप्त होने पर उगे गति प्रान हुई मया मनान से उगे माना जीवन पूर्ण प्रतीत हमा । गवर्नमेंट द्वारा जो महापता और मम्मान पिमरी को उग पार्य में मिलना चाहिए या उसके न मिलने में सिन्न रही। कटत्रियों में उगको मोह पा, उदरे मुग में वह मुपो और दुरा में वह दुमी होती। अपने देश घऔर अपनी नगरी प्रेम तया साफ..मुपरे वस्त्र, सन्छ गृह, वाटिगा और ।
66 लालवहादुर शास्त्री भ्रमण आदि में उसे रस था। अस्वस्थ रहने से वह घृणा करती। ये सव भावनाएं दूसरे साधारण व्यक्तियों के समान उसमें भी थीं। बस मेरी ने केवल इसका ध्यान रखा कि जीवन में इन भावनाओं को स्थान देते हुए वह उन नैतिक तथा दूसरे वास्तविक सत्य को न भूल जाए जो व्यक्ति और समाज के विकास की आधारशिला है। " महिला होते हुए भी मेरी की समानता थोड़े ही पुरुप कर सकते हैं। उसका जीवन निराशा में आशा, निर्धनता में स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाने वाला है। उससे शिक्षा मिलती है कि मनुष्य कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसका समाज के प्रति कुछ कर्तव्य है। यह आवश्यक है कि दूसरों की पीड़ा तथा जनसमूह की कठिनाइयां उसके हृदय में वेदना उत्पन्न करें, और वह जाने कि जगत में किस प्रकार आचरण करना चाहिए। "व्यक्ति अथवा समाज के विकास में जहां प्रतिबन्ध है, वहां कष्ट और पीड़ा है। विकास और उन्नति का अवसर प्रत्येक क्षेत्र में होना चाहिए-हमारे देश में स्त्रियों की उन्नति का मार्ग अवरुद्ध है। स्त्रियों का अपना व्यक्तित्व है, यह हमें स्वीकार करना है और उनका क्या कर्तव्य है, यह उन्हें स्वयं परखना है । यह पुस्तक शायद इसमें भी सहायक हो।" इस भूमिका को ज्यों का त्यों उद्धृत किया गया है । ध्यान से इस भूमिका को पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसे लालवहादुर शास्त्री ने अपने जीवन का घोषणापत्र ही इस भूमिका में सरल भाव से प्रस्तुत कर दिया था। मैडम क्यूरी के लिए उन्होंने जो कुछ लिखा, वह इन्हीं शब्दों में, वरन् इनसे भी कुछ अधिक चमकते हुए विशेषणों के साथ, शास्त्रीजी के लिए हमेशा लिखा जाएगा। लालवहादुर शास्त्री ने जीवन के किसी भी क्षण से कोई दुस्साहसिक राजनीतिक खेल नहीं खेला। उन्हें मालूम था कि दुस्साहम का अन्त हमेशा अच्छा नहीं निकलता। उन्होंने सुभाष बोस जैसे आग्नेय देशभक्त को लाहौर और कराची अधिवेशनों में आस्था और अनास्था के पहियों के बीच पिसते देखा था। डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना से लेकर फार्वर्ड ब्लाक की स्थापना तक सुभाषचन्द्र बोस भारतीय तरुणाई के महान् नायक बने रहे। लालवहादुर शास्त्री के मन में तरुणावस्था से ही क्रान्तिकारी ।
लालवहादुर शास्त्री 67 आन्दोलन के प्रति सहानुभूति रही, लेकिन मजदूत नौका पर बैठकर तूफान से टक्कर लेने की नीति का उन्होंने कभी परित्याग नहीं किया। एक बार गर मोहम्मद इकबाल ने नेहरूजी को कहा था, "आप एक देशभक्त हैं और जिन्ना एक राजनीतिज्ञ । आपका और उनका क्या मुफा- बला हो सकता है।" यह बात दूसरी है कि जिन्ना की राजनीति सफल हो गई, लेकिन यह उनकी व्यक्तिगत सफलता सिद्ध हुई। पाकिस्तान की जनता इम राजनीति में लाभान्वित नहीं हुई। मास्त्रीजी भी तथाकथित राजनीति के प्रति लगाव नहीं रपते । राजनीति में भी उनका याचरण दार्शनिको जगा होता था। उन्हें यह विश्वास पा कि विरोधी के समक्ष दिल सोलकर रस देना, मे गोव-विचार करने के लिए उचित अवसर देना ही सबसे बड़ी डिप्लोमेमी है। राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने हास्य-विनोद को एक अमोघ अस्त्र बना लिया था। सन् 1949 में जब लालबहादुर शास्त्री उत्तरप्रदेश के गृहमन्त्री थे तो कानपुर में भारत और राष्ट्रमण्डलीय क्रिकेट मंय देखने गए । इस मैच के दौरान छात्रों ने कुछ ऐसी हरकतें कीं, जिनके परिणामस्वरूप पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा । इम पर छात्र उबल पड़े और पूरे मैदान में उन्होंने एक तूफान वरपा कर दिया। लालबहादुर जी ने जो घटनास्थल पर मौजूद थे, छात्रों को समझाया । उनकी एक ही मांग थी कि क्रिकेट के मैदान में लाल पगड़ी नही दिपलाई पढनी पाहिए। अगले दिन छात्रों ने जब पुलिस को फिर देखा तो आपे मे बाहर हो गए। उन्होंने गृहमन्त्री से इस बात को सफाई चाही । सालयहादुर शास्त्री ने मुस्कराते हुए पहा कि आप लोगों को मालूम होना चाहिए कि मैंने मरना वापदा पूरा किया है । आप लोगों ने यह मांग को पो कि मात पगड़ी क्रिकेट के मैदान में नही दिसलाई देनी चाहिए। अगर आप एक भी साल पगडी मंदान में दिया गर्क नो आपके अगंतोष को दूर किया जा मरता है। शास्त्रीजी ने छात्रों के साथ एक जबरदस्त मजा किया था। पुलिम तो मैदान में आई लेकिन उनने माल पगरी के स्थान पर पाकी पगड़ी पहनी हुई थी। ऐमा गास्त्रीजी के आदेश के अनुसार किया गया पा। जात्रों ने जब यह अनुभव किया कि उनके गृहमंत्री ने इस कामपार 68 लालबहादुर शास्त्री मजाक का शिकार उन्हें बना दिया है, तो चारों ओर हास्य-विनोद का वातावरण छा गया और समस्या विना किसी झंझट के समाप्त हो गई। गम्भीर से गम्भीर अवसर उपस्थित होने पर शास्त्रीजी अपनी विनोदवृत्ति को अनुशासित नहीं रख पाते थे। 1964 के नवम्बर मास में वृहत्तर बम्बई म्युनिसिपल कारपोरेशन ने कमला नेहरू पार्क में उनके सम्मान में एक आयोजन किया था। इस पार्टी में काजू, सैंडविच, वेफर, बिस्कुट, फल, ठंडे पेय, चाय, कॉफी, आइसक्रीम इत्यादि प्रचुर मात्रा में थीं। शास्त्रीजी ने कहा कि प्रधानमन्त्री होने के बाद मैं पहली बार किसी पार्टी में शरीक हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री जब कभी दिल्ली आते हैं तब राज्य में खाद्यान्न की कमी की शिकायत करते हैं, लेकिन मैं देखता हूं, यहां खाने-पीने की कमी नहीं । शायद नाईक अब दिल्ली आने पर खाद्यान्न की कमी की शिकायत नहीं करेंगे। श्री नाईक इस समारोह में खुद मौजूद थे। ये दिन थे जबकि श्री नाईक ने केन्द्रीय खाद्य-मन्त्रालय की अन्न-वितरण नीति के खिलाफ जबर्दस्त आवाज उठाई थी। आगे चलकर महाराष्ट्र सरकार ने केन्द्र से शिकायत करने की अपेक्षा दो वर्ष के अंदर राप्य को अन्न-पूर्ति की दृष्टि से आत्म- निर्भर बनाने की घोषणा करना ही बेहतर समझा। मजाक के मूड में जब वे आते थे तो अपने को भी नहीं बख्शते थे। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दिनों में वे बार-बार कहते थे कि अय्यूव साहब ने उनके छोटे कद को देखकर भारत पर हमला कर दिया। सान्ताज हवाई अड्डे पर उन्होंने एक बार महाराष्ट्र के आवास, संचार, सिंचाई और विद्युतगन्त्री श्री मधुसूदन वैराले को देखकर कहा था, कम से कम एक व्यक्ति तो उनके आकार का उन्हें मिला। अन्तरविश्वविद्यालय समारोह के अवसर पर वे एक बार अपनी पोशाक की चर्चा करके लोगों को हंसाते रहे । उन्होंने कहा कि नेहरूजी ने अपनी मृत्यु के कुछ घण्टे पूर्व उनसे यह कहा था कि वे उनके साथ राष्ट्र- मण्डलीय प्रधानमंत्री सम्मेलन में शरीक होने के लिए लंदन चलें। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे क्या-क्या पहनें । शास्त्रीजी ने कहा कि वे पाजामा पहनना नहीं जानते हैं। इस पर नेहरूजी ने कहा कि कपड़े लालबहादुर शास्त्री 69 गिलया तो लें, बाकी बात बाद में देवी जाएगी। शास्त्रीजी ने अत्यन्त विनोद के स्वर में कहा कि उन्होंने जिंदगी में केवल एक ही बार चूडी. दार पाजामा पहना है और उन्हें अनुभव हुआ कि इमे उतारना काफी मुस्किल है। कम लोगों को यह मालूम है कि उत्तरप्रदेश में कायस्थ परिवारों में गादी के समय धुस्त पाजामा और अचकन पहनना रस्म का जरूरी हिस्सा होता है। सार्वजनिक भाषणों के दौरान गम्भीर समस्याओं पर बातें करते. करते महमा उनका विनोद उभर आता पा। एक घार काप्रेमजनो के बीच उन्होंने कहा था कि "आगामी दम वर्षों तक मन्त्रियों को तपस्या का जीयन बिताना पड़ेगा। तपस्या के जीवन में मेरा यह मतलब नहीं कि वे दादी बढ़ाकर, कमण्डल पेकर आपके मामने आएंगे। मेरा कहने का मालय यह है कि अपने अधिकारों का गलत और पादा उपयोग नहीं करेंगे। मैंने ताकीद की थी कि मेरे मकान को सजाने के लिए नया मामान नहीं लिया जाएगा। पुराने सामान में ही मकान सजाया गया । मगर उसमें भी ऐगे-ऐसे गलीचे हैं, जिनपर पलने में डर लगता है। मोनने लगता हूं कि यया जूता उतारकर उनपर चला जाए।" जूना उतारकर पलने का मुहावरा अनेक अर्यों से भरा हुआ है। और अवसर पर यम्बई के घोपाटी मैदान में यह कह रहे थे कि "विना मग और बलिदान की भावना में देश का निर्माण नही किया जा सरता। मैं जो रहता हूं कि लोग महीने में एक दिन पावस न खाएं- उसकी प्रगतिवादी तर्कवित और वंशानिक आलोचना करते हैं। जहां तक मेरा प्रश्न है, मुझे अभी भी याद है कि 1920-21 में अंग्रेजों का राज्य पा, कपड़ा नही मिलता पा, उन दिनों में अंगोडा ही पहनकर काम पलातापा।" इस उक्ति में बटा भारी मजाक नहीं है, लेकिन शास्त्रीजी ने अपने अंगोछा पहने होने की पालना को इस तरह शादों में बाधा पाकिहास्य के फम्मारे फूट पर। कमी-कमी उनकै माय मी रहिया मजाक हुमा है। - 70 लालबहादुर शास्त्री - विनोदपूर्ण स्मरण करते थे । जिन दिनों वे उत्तरप्रदेश के गृहमंत्री पद पर थे, वे आगरा पधारे । आगरा के सरकारी अधिकारियों तथा नागरिकों को उनके आगमन की पूर्व-सूचना थी। भारी संख्या में लोग उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े । पुलिस-अफसर तो विशेष रूप से सक्रिय थे। इत्तफाक यह हुआ कि शास्त्रीजी का डिव्या अपेक्षित स्थान से कुछ आगे निकल गया। अपने स्वभाव के अनुसार वे चुपके से डिब्बे से उतरे और सामने के तीसरे दरजे के गेट से आगे बढ़ने लगे। परन्तु वहां पर एक पुलिस कांस्टेबल तैनात था । उसने इन्हें रोका और कहा : “एक तरफ ठहर जाओ । जानते नहीं हमारे पुलिस मंत्री इसी गाड़ी से आए हैं।" उन्हीं दिनों की एक और घटना है । एक वार शास्त्रीजी दौरे पर जा रहे थे। उनकी कार से कोई दुर्घटना हो गई । प्रातःकाल का समय था । शास्त्रीजी पैदल चलकर थाने में पहुंचे और ड्यूटी पर तैनात दीवान से कहा कि वे उनकी रिपोर्ट दर्ज करे। उन दिनों के थाने, थाने का दीवान, क्या हुकूमत थी उसकी ? इधर शास्त्रीजी सीधे-सादे लिवास में। दीवान ने कहा, "वैठ जाओ, अभी रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी।" हो सकता है दीवान को रिपोर्ट लिखने की वाकई फुर्सत न हो, लेकिन ऐसा होता तो शास्त्रीजी उससे यह न पूछते कि यहां के थानेदार साहब कहां हैं ? दीवान साहब के रहते हुए कोई उनसे यह पूछे कि थानेदार साहब कहां हैं ? इत्तफाक यह हुआ कि थानेदार साहब फौरन ही आ गए और उन्होंने शास्त्रीजी को पहचान लिया, वरना दीवान साहव अपनी मज़ाक को काफी संगीन बनाकर छोड़ते। अवसर की गरिमा को जानकर हाज़िरजवाबी का कमाल भी उनके सभी मित्र अच्छी तरह जानते हैं। शास्त्रीजी उत्तरप्रदेश के गृहमन्त्री थे, तो वनारस जब भी आते थे तो अपने गुरु निष्कामेश्वरजी के घर अवश्य जाते थे। एक बार उनकी पत्नी ने कहा, "वहादुर, तू इतना बड़ा हो गया है और खाली हाथ चला आता है, देख अलगू (अलगूरायजी) जव भी माता है, बच्चे के लिए मिठाई लेकर आता है।" तो शास्त्रीजी ने सरल भाव से कहा, "भाभीजी, मुझे कोई नया काम करने में बड़ा संकोच लगता है। मैं बड़ा नहीं हुआ हूं, केवल बड़ा काम लालबहादुर शास्त्री 11 मुझे करना पड़ता है।" अगर उनके स्थान पर कोई दूसरा होता तो इम सीधे प्रश्न के आने पर वाकई बड़ी मुश्किल में फंस जात! 1 लेकिन जिसने कभी यह माना हो नहीं कि महत्त्वपूर्ण पद पर बैठकर आदमी बडा होता है. वह फैगे दिखाए कि वह बड़ा हो गया है । वे तो मन्त्रिपद पर नियुक्त होने के बाद भी पट करहों को मीकर काम चलाते रहे । मंत्री होना यही यान भले ही हो, लेपिन आपिक दृष्टि में मंत्रियों के वेतन गुजारे-भर के लिए भी काफी नहीं होते। गास्त्रीजी ने एक बार कहा था कि काफी वडे हो जाने पर भी उनके पास इतना पैसा कभी नही हुआ कि बच्चों को धम्बई की पात्रा करा सकते। स्व. निकामेश्वर मिश्र के सुपुत्र राधेकृष्ण मिश्र ने उनके संस्मरणों मे अनेक यन्तरंग वा निमी है। उनकी जमेप्ट कन्या के विवाह के अवसर पर जब यरानो भोजन करने बैठे तो सादा निरामिष भोजन देखकर कुछ लोगों ने यहा, "यह पायस्यों की यारात है, लेकिन इनमे न माग, न मदिरा।" शाम्पीजी ने अविचलित भाव मे कहा कि इस निरामिप भोजन को कृग करके ग्रहण करें। में नाकाहारी हूं. न माम-मदिरा छूना हूं न औरों पो पिताता-पिलाता हूं। एक वरानी ने कहा, "क्या हम प्राह्मणों को यारान में आए हैं ?" 'आप जंगा भी समझे, मेरे मस्कार ऐगे ही पड़ गए हैं।" पास्त्रीजी अपने वर्तमान में कभी साए नहीं। अतीन मे गो देवा या उगे भूलते नहीं थे, भविष्य में जो कुछ घटित हो सकता है उसके लिए हमेगा संपार रहते थे। वे राजनीति में एक सच्चे दार्शनिक के ममान जीते पे। यही कारण है कि उन्हें जनतान्त्रिक जीवन में नवीन परम्परा स्थापित करने का मौभाग्य मिला था।
72 लालबहादुर शास्त्री बृहत्तर प्रशासकीय भूमिका कांग्रेस की संगठन-सम्बन्धी गतिविधियों में लालवहादुर शास्त्री का योगदान एक कार्यकर्ता और नेता की हैसियत से ऐतिहासिक महत्त्व रखता है। आजादी हासिल होने के बाद कांग्रेस के चुनाव में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। सन् 1951 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति, जत्र जवाहरलाल नेहरू और पुरुषोत्तमदास टंडन के मध्य सैद्धांतिक मतभेद उपस्थित होने के कारण एक नाजुक दौर से गुजर रही थी उस समय भी लालबहादुर शास्त्री अपनी विश्वसनीयता और संगठन के प्रति अटूट निष्ठा के कारण संकट के निवारण का साधन वने। कांग्रेस के अध्यक्ष-पद के चुनाव में पुरुपोत्तमदास टंडन की विजय तो हुई थी, लेकिन नेहरूजी ने उनकी कार्यसमिति में रहना स्वीकार नहीं किया। विचार-भेद को समाप्त करने के लिए टंडनजी ने भरसक प्रयास किया लेकिन नेहरूजी का एक ही उत्तर था कि कांग्रेस में जो सैद्धांतिक गिरावट आ गई है उसे समाप्त करने का एक ही तरीका है कि वे अपने विचारों को स्पष्ट रूप से कांग्रेस के सामने रखें। यदि पुरुपोत्तमदास टंडन स्वयं अध्यक्ष पद से इस्तीफा न देते और नेहरूजी उनके स्थान पर कांग्रेस अध्यक्ष न बनते, तो संस्था का शीराजा विखर जाता। मध्यस्थता का कार्य उस समय लालबहादुर शास्त्री के कंधों पर आ गया था। उनके सामने भयंकर दुविधा थी । टंडनजी को वे अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। लोकसेवक मंडल में टंडनजी की अध्यक्षता के अन्तर्गत उन्होंने राजनीति का सबक सीखा था और उनके समर्थन तथा सहयोग से नवीन दायित्वों की पूर्ति करने में सफलता प्राप्त की थी। दूसरी तर जवाहरलाल नेहरू थे जो राष्ट्र के प्रतीक एवं शास्त्रीजी के आदर्श ना थे। वैचारिक दृष्टि से शास्त्रीजी जवाहरलालजी के ही अधिक निकट इस विरोध को समाप्न करने के लिए उन्होंने लखनऊ से नई दिल्ली: यात्रा की थी। जवाहरलालजी से उन्होंने यह मांग की कि मतभेद कीट पाटने का कोई तरीका ज़रूर खोजा जाना चाहिए। शास्त्रीजी ने स्वीकार किया था कि नेहरूजी ने उनकी बात को गम्भीरता से सुना .
सासयहादुर मास्त्री 73 । एक ही दिन में प्रातः, मध्याह्न और रात्रि को गास्त्रीजी से मेंट करने लिए राजी होना ही इस बात का मवून पा कि यदि हिनजी विरक्ति में भरकर स्वयं इस्तीफा न देते तो भी स्वयं सासयहादुर शास्त्री निश्चय ही कोई तरीका निकाल मते जिसमें दोनों नेता एक-दूसरे के निकट आ जाते । इसमे भी बड़ी चुनौती शास्त्रीजी के समक्ष उम समय उपस्थित हुई जब अध्यक्ष-पद स्वीकार करने के बाद नेहरूजी ने उन्हें राजधानी में बुलाकर कांग्रेसका महामधिव पद स्वीकार करने का निमन्त्रणा दिया। शास्त्रीजी ने एक क्षण के लिए भी झिझक नहीं महमूग की और उत्तरप्रदेश सरकार के गृहमंत्री पद को छोड़कर वे दिल्ली आ गए। यह वह समय था जबकि देश नये सविधान को स्वीकार करने के उपरान्त पहली यार आम चुनाव की तैयारी कर रहा था। कांग्रेग संगटन को सनित करना और देश भर में पनावों के लिए उचित उम्मीदवारों को ढूंढना, पनाव अभियान का तारता और सक्रियता के गाय संचालन करना अत्यन्त कठिन कार्य था, लेरिन पास्त्रीजी ने इस चुनौती भो स्वीकार करके अपने काम में रात और दिन एक कर दिया था। इन दिनों वे नेहरूजी के गाय उनके तीनमति निवासस्थान पर ठहरते थे। उनकी व्यस्तता का अनुमान इमी यान में लगाया जा सकता है कि उन्होने साना पिलानेवाले सेवक को यह आदेश दे दिया था कि भोजन का समय आने पर यह उनको पाली चुपचाप कमरे में रम जाया करें । बहुधा यह होता था कि यह पाली ज्यो की त्यों रगी रह जाती थी। इस चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कांग्रेस के उच्च नेताओं में सेकर क्षेत्रीय कार्यकर्ताओ सक से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित किया था। सारे देशा दौरा किया था। हर महत्त्वपूर्ण निर्वाचन-क्षेत्र मे पुनाय प्यूह की रमना की थी। इस चुनाव में काप्रेम को आसानीत सफलता प्राप्त हुई। इस गफलता का श्रेय शास्त्रीजी के हिस्से में कम नहीं माना जा सकता। चुनाव के बाद नेहरूजी ने उनमे आग्रह किया कि ये राज्यसभा के लिए चुनाय सहना स्वीकार करें। यह आमन्त्रण शास्त्रीजी ने स्यीवार किया और वे राग्यगमा के सदस्य बन गए। इसके बाद अपनी कमंटला के बल पर उनके कन्धो पर मन्यान्य मन्त्रि-पों का भार सौपा गया 74 लालबहादुर शास्त्री विलक्षण संयोग की बात है कि सन् 1957 में जवकि देश पुन: आम चुनाव के लिए तैयारी कर रहा था। शास्त्रीजी की सेवाएं कांग्रेस-प्रचार अभियान का संगठन करने के लिए पुन: उपलब्ध हो गई। इसके बाद सन् 1962 के चुनाव में नेहरूजी को फिर शास्त्रीजी की संगठन-क्षमता पर निर्भर करना पड़ा। नेहरूजी, श्रीमती इन्दिरा गांधी और लालवहादुर ने मिलकर कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची तैयार की। सम्भवतः यह शास्त्री जी का अनुरोध था कि इस चुनाव में कम से कम एक-तिहाई कांग्रेस उम्मीदवार नई पीढ़ी के ही चुने गए। कांग्रेस में नये रक्त के संचार करने की जरूरत काफी वक्त से महसूस की जा रही थी। राजनीति का कोई भी विद्यार्थी इस बात से असहमत न होगा कि व्यापक प्रशासकीय अनुभव के साथ-साथ कांग्रेस-संगठन के सार्वदेशिक व्यक्तित्व से इतना निकट परिचय उनके किसी भी समकालीन कांग्रेस नेता को प्राप्त नहीं हो सका था । अपने-अपने क्षेत्रों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जो निश्चय ही दलीय स्थिति की दृष्टि से शास्त्रीजी की अपेक्षा वरिष्ठ थे, उनका प्रभाव संगठन के माध्यम से उस सीमा तक सार्वदेशिकता प्राप्त नहीं कर सका, जितना शास्त्रीजी को प्राप्त हुआ। संभवतः यह महत्त्वपूर्ण अनागत भविष्य में अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को पूरा करने का परोक्ष निमन्त्रण था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में शास्त्रीजी को पहली बार रेल तथा यातायात का विभाग सौंपा गया। उनके समय में यह विभाग मन्त्रिमण्डलीय दृष्टि से विदेश मन्त्रालय, स्वराष्ट्र मन्त्रालय, वित्त तथा वाणिज्य-उद्योग मन्त्रालय के बाद पांचवें नम्बर पर आता था। पहली ही बार केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में प्रवेश और पांचवें नम्बर में मन्त्रालय की जिम्मेदारी का मिलना इस बात का साक्षी था कि जवाहरलाल नेहरू को उनकी कार्य- क्षमता में अटूट विश्वास था। इस दायित्व को स्वीकार करने के बाद उन्होंने एक प्रशासक के कर्तव्य की पूर्ति के लिए अपने-आपको वैज्ञानिक कार्य-पद्धति के प्रतीक रूप में ढाल लिया था। पुराने आई० सी० एस० अफसरों के अभिमान की दीवार को तोड़कर मन्त्रालय के कार्य को गतिमान् बनाना, पहले के ढांचे में सुधार करना और नवीन सुधारों के लिए भूमिका तैयार करना आसान काम नहीं लालवहादुर शास्त्री 75 पाशास्त्रीजी की काम करने की अपनी दली पी। जिम मन्त्रालय मेव गम्बद्ध होते, उसकी फाइलों में एक विद्यार्थी की तरह डूब जाते थे। प्रत्येक विषय की पृष्ठभूमि में विस्तृत परिचय प्राप्त करते थे। विवरण और यांकहे उनकी अंगुलियों पर आ जाते थे। इस तरह फाइलों के जाल में ये अपने यो मुवा परके अपने स्वतन्त्र निष्कर्ष निकालते थे। तब वे विभागीय अफसरोगे बातचीत करते थे। स्पष्ट, गोद्देश्य शब्दों में अपने मन्तव्य प्रकट करते थे, उनके आदेशों में वही उलझन या गंशय नहीं होता था। घे अपने अफगरों गे मम्मानपूर्ण व्यवहार ही अजित नहीं करते थे, अपनी भारल्यन शक्ति में उन्हें प्रभावित भी करते थे और उनमें एक उत्साहपूर्ण कर्मनिष्टा भी जगाते थे। दपतरी काम-काज पर अधिकार प्राप्त करने के बाद वे मंसद के समक्ष जटिल में जटिल प्रश्न का उत्तर देने के लिए पार रहने थे। कार्य की जो प्रणाली उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अपनाई उगी का व्यवहार प्रमागीय कार्य में भी परते थे। वे अपने अफगरों के सुझाव धैर्यपूर्वक गुनते थे, सहानुमति के माप उनपर विचार-विमर्श करते थे, अपने सुझावों को उनके कन्धों पर थोरते नहीं थे परन् मम्मिलित रूप गेनिश्चय करके फिर अफगगे को अपने कार्य में पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान कर देने । रेलमन्त्री पो मियत मे शास्त्रीजी ने अनेक उल्लेरानीय कार्य किए। विभाजन के बाद रेल यातायात-व्यवस्था प्राय. हिन्न-भिन्न हो गई थी। विकाम-योजनाओ की पूर्ति के लिए साजो-सामान ठीक समय मोहम्रा फरना, यन्न तथा औद्योगिक विकास की प्रगति के लिए आवश्यक मामग्री का एक स्थान से दूसरे स्थान तक नियन समय पर पहुंचाना आवश्यक था जय कि हालत यह थी कि रेल यातायान को अविश्वसनीयता के कारण मडक यातायात के प्रति लोगोरा आकर्षण बह रहा था, क्योंकि ज्यादा भाडा देने के बाद भी उन्हे यह विश्वास था कि महक परिवाहन द्वारा उनका सामान उचित समय पर मुरक्षित रीति में पहब जाएगा। मालवाही हिन्धों का अभाय, और प्रबन्ध की अव्यवस्था के कारण रिश्वत का बाजार गर्म हो रहा था। जिसे भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता ही माना जा सकता था। लती मालगाड़ियों, गाड़ियों और रेगने:- 76 लालवहादुर शास्त्री चोरी की घटनाओं में बहुत अधिकता हो गई थी। लालवहादुरजी ने रेलवे- बोर्ड की सहायता के लिए एक सुरक्षा परामर्शदाता की नियुक्ति की, जिसको यह काम सौंपा गया कि वह पहले मोजूद वाच एण्ड वार्ड संगठन को मजबूत और सक्रिय बनाने के लिए उचित उपायों की सिफारिश करे। इरा परामर्श का सुपरिणाम यह हुआ कि रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (रेलवे सुरक्षा विभाग) बना। रेलवे सुरक्षा विभाग के महानिदेशक को दोहरा स्थान प्राप्त हुआ। उरो रेलवे बोर्ड में सुरक्षा सम्बन्धी निदेशक भी बना दिया गया। राज्य पुलिस की सहायता से रेलवे सुरक्षा पुलिस ने चलती गाड़ियों और रेलवे मालगोदामों से चोरी पर भारी रोक लगा दी। चोरी गए माल के लिए विभागीय मुआवज़ों की रकम में भी बहुत कामी आ गई। जनता में रेलवे की त्रुटिपूर्ण कार्यप्रणाली के प्रति बढ़ते हुए असंतोप को दूर करने के लिए उन्होंने रेलवे प्रयोक्ता सलाहकार समितियों का आंचलिक और डिवीजनल आधार पर संगठन किया। केन्द्र में एक राष्ट्रीय रेलवे प्रयोक्ता सलाहकार समिति की स्थापना की। इन समितियों के सुझावों पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता था। इस पद्धति से व्या- पारिक जगत् में रेल-यातायात के लिए पुनः विश्वास की भावना में वृद्धि रेल विभाग का मायद ही कोई पहलू ऐसा रहा हो, जिसे उनके सुधार- यादी व्यक्तित्व का संस्पर्श न मिला हो। उन्होंने एक ऐफीशिएन्सी व्यूरो की भी स्थापना की जिसका काम पुरानी कार्यप्रणाली के स्थान पर, जो नवीन परिस्थितियों में नाकारा साबित हो चुकी थी, रेलों को अधिक उप- योगी बनाने के लिए नवीन कार्यप्रणाली का सुझाव देना था। इस अनु- संधान केन्द्र की सेवाएं अत्यन्त उपयोगी साबित हुई। इससे कार्यप्रणाली को अधिक उपयोगी बनाने, विभिन्न क्षेत्रों और शाखाओं पर काम के परि- णाम का निर्धारण करने में भी सुविधा हुई। इस अनुसंधान के परिणाम- स्वरूप यह पता लगा कि पूर्वी रेलवे पर काम का दबाव अधिक है और जैसे-जैसे औद्योगिक प्रसार होगा, लोहे और कोयले के यातायात के परि- माण में वृद्धि होगी, पूर्वी रेलवे की कार्यक्षमता और कुशलता पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। शास्त्रीजी ने पूर्वी रेलवे को दो एकांशों में विभा- - मानम्हादुरगास्त्रो 7 । नि मादिगा पुरानी दार नागर गाना से एक स्वनात्र दराई बनारसेमिनरी रेन बना दिसा पोरनामों अनन्त मागिर औदोगिर विरान को नजर में ग्यत हा उन्होंने दिन रेन नपा अब रेनदे को भी प्रशासनिक मुविधा के लिए क्षेत्रीय प्रशासन इकाइनों में काट दिया। अब तक केवल उत्तर और पूर्वी रेलव-गान में ही क्षेत्रौर प्रगासन-प्रजाली प्रचलित पी। मन् 1955-56 में मेन्दसन के मिकन्दराबाद और बम्बई जिवीजनों पा उद्घाटन हुमा । अगले वर्ष गन्दन रेलवे, पश्चिमी रेलवे विभागों में भी क्षेत्रीय प्रशासन प्रणाली प्रारम्भ की गई। रेन माहे के पूरे दावे का अध्ययन करके उचित परामर्श देने के लिए उन्होंने रामस्वामी मुदानियर ममिति का निर्माण किया। गास्त्रीजी के मन्त्रित्वकाल में चितरजन कारखाने के उत्पादन में लगभग अस्मी प्रतिशत की पद्धि हुई। प्रतिवर्ष इस फारसाने में दो मी इंजिनों का उत्पादन होने गा। जी.बी.कोटक की अध्यक्षता में उन्होंने एक और गमिति का निर्माण किया जिसका काम रेल-इंजिनों और डिब्बों के लिए कल-पु और निर्माण में प्रयुक्त होने याने सामान का उत्पादन करने के उसयों का मुभाव देना पा। मास्त्रीजीपी अपनी विपना यह थी कि उनके कार्यों में माम लोगों के हिनो की उपेक्षा नहीं होती थी। उनके शासनकाल में तीसरे दर्जे के यापियों के लिए सविधाओ में आमातीत वृद्धि हुई। उन्होंने पहले के प्रथम ग्रेणी के हिम्चों के स्थान पर हितीय श्रेणी के हियों को ही मान्यता दी और उन्हें प्रपम श्रेणी वा बना दिया। उनका विषार पा कि ममूचे रेल- पपो पर केवल दो स्थान बना दिए जाएं -प्रथम और हिलीय, मेकिन एंगा नहीं हो सका। तीसरे दर्जे के यात्रियों के लिए गोने के स्थान सुरक्षित परने और पात्रा में पानी मगा सकने की मुविधा का भी उन्ही के काल में श्रीगणेग हआदिल्ली से कलकत्ता, बम्बई धौर मदाग में पिए -सम्म गाड़िया भी पलाई गई। मास्त्री ने पापी बम तक इन पद पर पाम किया। इनमेशामन म ।
78 लालबहादुर शास्त्री । यात्रियों को अधिक सुविधाएं मिलीं, व्यापारिक और औद्योगिक सामान के यातायात में नियमितता उत्पन्न हुई, लेकिन रेलवे कर्मचारी यूनियन को भी उन्होंने सन्तोप दिया। उनकी समन्वय नीति, निष्कपट आचरण के सामने आग उगलने वाले ट्रेड यूनियन नेताओं को शरारत करने का अवसर नहीं मिलता था। प्रशासनिक जीवन के प्रत्येक प्रकोष्ठ को उन्होंने प्रकाशमान किया। सरकारी मशीन में ऐसी सुविधा होती है कि विभागीय प्रमुख चाहे तो ज़िम्मेदारी दूसरों पर टाल सकता है। शास्त्रीजी ने हमेशा यह समझा कि विभागीय अध्यक्ष की हैसियत से उनके विभाग में घटित होने वाली घट- नाओं का उत्तरदायित्व उन्हींके कन्धों पर है। इस वैधानिक उत्तरदायित्व की पूर्ति करने का अवसर तब आया जब कि सन् 1956 के अगस्त मास में महबूबनगर रेल-दुर्घटना हुई। इस दुर्घटना में 112 आदमियों की जान गई थी। शास्त्रीजी ने नेहरूजी से कहा था कि दुर्घटना की ज़िम्मेदारी उनकी है, अत: उन्हें इस्तीफा देने की इजाजत दी जाए। प्रधानमन्त्री ने उनका इस्तीफा लेने से इन्कार कर दिया। इस दुर्घटना का प्रभाव उनके मन पर धुंधला भी न हो पाया था कि मद्रास में आरियालूर रेल-दुर्घटना हो गई। इस दुर्घटना में 144 लोगों का जीवन गया। शास्त्रीजी विचलित हो उठे। उन्होंने मन्त्रिपद से त्याग-पत्र दे दिया और इस बार उसे वापस नहीं लिया हालांकि सैकड़ों-हजारों तार और पत्र नेहरूजी को प्राप्त हुए थे कि शास्त्रीजी का इस्तीफा मंजूर न किया जाए। इस अवसर पर नेहरूजी ने उनके कांग्रेस में एक दलीय कार्यकर्ता के सहयोग-सम्पर्क एवं एक मन्त्री के रूप में उनके साथ काम करने की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उनकी मंत्री और वन्धुत्व को अपने लिए सौभाग्यपूर्ण और स्पृहणीय बताया था। यह भी शायद सौभाग्यपूर्ण संयोग ही था कि नेहरूजी को लालवहादुर शास्त्री की सेवाएं संगठन के लिए पुन: प्राप्त हो गई। सन् 1957 के चुनाव-संग्राम सेनापति शास्त्री इलाहावाद पश्चिमी निर्वाचन-क्षेत्र से लोक सभा के लिए चुने गए। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में उन्हें इस बार संचार और परिवहन मन्त्रि-पद पर नियुक्त किया गया। उनके अल्पकालीन शासन में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं। विशाखापट्टनम् का शिप विलिग गई मामबहादुर गास्त्री 79 भी संचार और परिवहन मन्त्रालय में सम्बद कर दिया गया। दूसरी घटना पी इस मन्त्रालय के अन्तर्गत पोस्ट और टेलीग्राफ धर्मचारियों को अनूतपूर्व हड़ताल,नेक्निशास्त्रोत्री ने इस कठिन स्पिति से सभी पक्षों को उधार दिया। शीघ्र ही उन्हें एक नये पद वा भार संभालना पड़ा। टी.टी. कृष्णामावारी के वित्त-मन्त्री पद से त्यागपत्र देने के बाद उन्हें वाणिग्य एवं उद्योग मन्त्री के पद पर नियुक्त किया गया। कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हुआ ही था कि वे अक्तूबर 1959 में इलाहाबाद क्षेत्रका दौरा करने गए। यहां उन्हें दिल का दौरा पहा । इस रोग के माक्रमण का वर्णन मलितादेवी शास्त्री रे गम्दी में इस प्रकार हुआ है. "मैंने सचिवों को डाक्टरो योगीघ्र सूचना देने के लिए सगाया तथा अपनी सहमी को उनके पास ही रहने को कहकर मैं मीधी प्रार्थना-गृह में अपने भगयान मे सिकागत करने जा पहुंची। "मैं धीमी। पागल हूं. है मेरे भगवान् ! म पगली है। या यही तेरी मर्जी है मेरे देवता, कि मुझे और मेरे बच्चों को यह मर देगना पढ़ें! 'हस्पताल में गाट पर पर मेरे पनिदेव के प्राणों की रक्षा में सारदारी का समूह निरन्तर संघर्ष कर रहा था, तब मैं अपने भगवान में बार-बार यही दुहरा रही यो। किन्तु मेरी सहाई तो उम मोरि शक्ति से पी और उसने मेरी प्राधना सुन ली। मेरे पतिदेव यच गए और अनेको वर्षों तक जनता. जनार्दन की सेवा के लिए मेरे भगवान् ने उन्हें जीवनदान दिया।" उन दुराद दिनी और रातों का स्मरण करते उनकी मांसो से सासू वह रहे थे। यह देखने में आता है कि वापिसर एवं उद्योग विभाग को समासने घासे मन्त्री के लिए अपनी सोरप्रियता को बनाए गना बठिन होता है । इस देश में यह बात और भी मुश्किल होती है। एक तरफ देश रा अपना पोपित लक्ष्य यह था कि सार्वजनिक और निजी बौद्योगिक क्षेत्र में समा- नान्तर पलते हुए भी भारत में समाजवाद को स्थापना पप प्रशस्त हो 80 लालबहादुर शास्त्री और दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में भी उदासीनता की भावना पैदा न हो। निजी क्षेत्र की कार्यक्षमता के आधार पर उद्योगों के प्रसार में सहायता मिलती है. निजी पूंजी बाज़ार में आती है। इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि निजी क्षेत्र के सुरक्षित और खुशहाल बने रहने से गैर समाजवादी आर्थिक व्यवस्था वाले देश सहकारिता के आधार पर नये धन्धे खोलने के लिए प्रेरित होते हैं। ऐसे औद्योगिक एवं व्यापारिक क्षेत्र जिनका सीमा सम्बन्ध राष्ट्रीय जीवन को अनिवार्य करार दी गई वस्तुओं के उत्पादन से नहीं है, निजी क्षेत्र में ही उन्नति कर सकते हैं। सरकार ने इसी दृष्टि रो निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की नीति स्वीकार की है। शास्त्रीजी के कार्यकाल में व्यापारिक समुदाय खुश रहा, हालांकि कम्पनी कानून के बारे में उन्होंने जो निर्णय दिए, वे निजी क्षेत्र की कम्पनियों के लिए अनुकूल नहीं पड़ते थे। उन्हींके समय में विदेशी मुद्रा का संकट बढ़ा, परन्तु उन्होंने इस संकट को भी संभाला। इन तमाम परिस्थितियों में उन्होंने व्यापारिक समुदाय में अमित्र नहीं बनाए । उनकी सचाई और ईमानदारी कभी भी संदिग्ध नहीं रही। सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक प्रसार में उन्होंने ऐसे अनेक काम किए, जिनसे छोटी मशीनों के निर्माण में अभूतपूर्व प्रगति हुई । सोवियत यूनियन एवं चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से उन्होंने हैवी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन की स्थापना करवाई। इस निगम की स्थापना के बाद ही भारी पौंड्री, फोर्ज, भारी मशीन निर्माता कारखाना और माइनिंग मशीनें तैयार करने का कारखाना तैयार हो सका। रांची का भारी मशीनों का कारखाना वस्तुतः भारी मशीनों के निर्माण में एक युगान्तरकारी कदम सिद्ध हुआ। उसी कारखाने में बनी मशीनों के आधार पर बोकारो इस्पात कारखानों के कार्य को भारत सरकार ने अपने ही बल पर खड़ा करने का संकल्प किया था। बंगलौर के हिन्दुस्तान मशीन टूल्स कारखाने का विस्तार हुआ। नांगल उर्वरक कारखाने में उत्पादन बढ़ा । जापान की सहायता से वंगलोर में थोड़ी कीमत की घड़ियां बनकर बाजार में आई। भोपाल में बिजली के ला.5 लालबहादुर शास्त्री 81 . भारी सामान का उत्पादन शुरू हुआ। उनके कार्यकाल में औद्योगिक उत्पादन के सभी लक्ष्य पूरे हुए। अनेक मदों में उत्सादन का परिणाम निर्धारित लक्ष्य से 15 प्रतिशत कार पहुंच गया। निजी बौद्योगिक क्षेत्र की उदासीनता भंग हुई। सभी क्षेत्रो में नय उद्योगो की स्थापना के लिए मन्त्रालय ने एक बड़ी संख्या में आवेदन-पत्रों को स्वीकार किया। तक. नीकी एवं वित्तीय सहकार के क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई । शास्त्रीजी के कार्यकाल में औद्योगिक दृष्टि से पिछडे हुए इलाको मे सार्वजनिक क्षेत्र के सात भारी उद्योगों की परियोजनाएं स्वीकार की गई। शास्त्रीजी ने देहाती क्षेत्र में कुटीर उद्योगो की स्थापना को बल दिया। उनका ही संकल्प था कि औद्योगिक विकास को कृषि के विकास के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इसमें मादेह नहीं कि यदि वे इस मायालय में रहते तो उनकी योजना के अनुसार 25-30 वर्ष मे ग्रामीण क्षेत्रो को युटीर उद्योगो से गुजान करने में बड़ी सहायता मिलती। किमानो के बीच राजनीतिक जीवन शुरू करके, उन्होंने सदैव ही यह ध्यान रखा कि उनकी हालत में सुधार किए बिना देश को सुमहाल समझना बेकार होगा। भारी उद्योगों की अपरिहार्यता को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने हमेशा यही माना कि देहातों में कुटीर उद्योगों की स्थापना में एक नवीन स्फूनि का संचार होगा और अन्न-उत्पादन में वृद्धि होगी। लालबहादुर शास्त्री ने प्रशासनिक एवं राजनीतिक संगठनात्मक गतिविधियो मे अपनी सफलताओ मे यह साबित कर दिया था कि काग्रेस में उनके अतिरिक्त दूसरा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जो इन दोनों तत्वों का समाहार कर सके। सम्भवत: यही कारण था कि अप्रैल, 1961 में जब पडित गोविन्दवल्लभ पन्त का निधन हुआ, स्वराष्ट्रमन्त्री पद के लिए लालवहादुर शास्त्री को ही चुना गया। यह पद ऐमा था जिसमे राष्ट्रीय जीवन के दिन-प्रतिदिन के सबालन का सीधा सम्बन्ध था। लालबहादुरजी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और स्वराष्ट्रमन्त्री पद के समक्ष जितने भी दायित्व थे उनकी पूति का सकरप धारण कर लिया। उनके पूर्ववर्ती पंडित पन्त की कार्यपद्धति यह थी कि वे किसी भी समस्या को तब तक टालते रहते थे, जब तक कि परिस्थितिया .
82 लालबहादुर शास्त्री कदम उठाने के लिए मजबूर हो न कर दें । असम की भाषा-समस्या किसी भी समय विस्फोटक रूप धारण कर सकती थी, यह 1960 के भाषाई दंगों से स्पष्ट हो चुकी थी। पंजाब में भाषाई सूवे की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही थी और शिरोमणि अकाली दल के नेता मास्टर तारासिंह सरकार से जूझने की अंतिम तैयारी कर रहे थे। कश्मीर में शासन के विरुद्ध भ्रष्टा- चार के आरोप आन्दोलन का रूप धारण करते जा रहे थे। ऐसी परि- स्थितियों में शान्ति एवं व्यवस्था की स्थापना करना, राज्यों के अन्दर राजनीतिक विग्रह मिटानेवाले नेताओं को उनके उचित स्थान पर रखना और एक शान्तिपूर्ण वातावरण कायम करना ज़रूरी था । शास्त्रीजी पद- ग्रहण करने के पहले ही दिन से इन समस्याओं का निदान खोजने में जुट गए। असम में भापाई दंगे अप्रैल 1960 में शुरू हुए और मई 1961 में उनका विषाक्त रूप प्रकट हो गया। जुलाई 1960 में 40 हजार बंगा- लियों को उनके घर से निकाल दिया गया। 32 हज़ार बंगाली पश्चिमी बंगाल में शरण लेने पर बाधित हुए । गांव के गांव जला दिए गए । कांग्रेस दल भापा के मामले पर बट गया था। राज्य के अन्य राजनीतिक दल भापाई आवेश में दंगाइयों से मिल गए थे। असम की 87 लाख आवादी में बंगलाभापी लोगों की संख्या लगभग 18 लाख है, लगभग 10 लाख आदिवासी भी रहते हैं, जिनकी अलग-अलग भापाएं हैं। राज्य सीमा- पुनर्गठन आयोग ने भापाई आधार पर पुनर्गठन करते समय यह सिद्धान्त बनाया था कि जिस राज्य में एक भापा को बोलनेवाले 70 फीसदी या उससे अधिक लोग हों, वहां एक राजकीय भापा स्वीकार की जानी चाहिए। लेकिन यदि 30 प्रतिशत आवादी दूसरी भाषा बोलने वाली है, तो ऐसे राज्य को द्विभापी राज्य घोषित किया जाना चाहिए। 1951 की जनगणना से यह पता लगा था कि राज्य के 55 प्रतिशत लोग असमिया बोलते हैं और केवल 19 प्रतिशत लोग बंगलाभापी हैं, लेकिन बंगालियों का यह आरोप था कि जनगणना के समय ईमानदारी से काम नहीं लिया गया, क्योंकि असम के कम से कम 33 प्रतिशत लोग बंगला बोलते हैं। मई 1961 में कछार जिले में जहां पर बंगाली बहुमत है, दंगे शुरू हुए - । सालवहादुर शास्त्री 83 जिममें कि ।। आदमी मारे गए और 70 घायल हुए। पुलिम के सामने इम भाषाई समस्या को शांत करने का कोई उपाय दिसाई नहीं देता था। समस्या इतनी भयंकर हो चुकी थी कि शान्ति एवं व्यवस्था कायम करने के लिए सेना की सहायता लेनी पड़ी थी। भापाई वर्गों मे परस्पर इतनी कटुता, घृणा और अविश्वास पैदा हो गए थे कि मान्ति कायम रखकर समस्या पर धीरज के साथ विचार करने की अपीलें ये कार माबित हो रही थी। बंगलाभापियो के प्रति महानुभूति प्रकट करने के लिए पश्चिमी वगाल में हहताल गुरू हो गई थी और सीमावर्ती इलाकों में दंगे शुरू हो गए थे। लालबहादुर शास्त्री ने इस समस्या को तत्काल हल करने का फैमला किया। 31 मई, 1961 को वे आसाम गए। उन्होंने दोनो पक्ष के नेताओं मे बातचीत की और भाषा-समस्या को हल करने के लिए एक फार्मला पेरा किया। पास्त्री-फार्मूला इस प्रकार है- (1) असम के राजभाषा-कानून में संशोधन किया जाए ताकि मह- कमा-परिषद्-धारा को समाप्त किया जा सके। (2) कछार तवा स्वायत्तशामी पर्वतीय जिलो और सरकार के मध्य अंग्रेजी में उस समय तक लिखा-पढ़ी की जाए, जब नक अग्रेजी का स्थान हिन्दी को प्राप्त नहीं हो जाता। (3) सरकारी स्तर पर अभी अग्रेजो का प्रयोग जारी रखा जाए और तदुपरान्त अंग्रेजी और असमिया का समानान्तर प्रयोग किया जाए। (4) भाषाई अल्पसख्यको को भारत सरकार के 19 सितम्बर, 1956 के स्मृति-पत्र के अनुमार सुरक्षा प्रदान की जाए। (5) यह स्पष्ट कर दिया जाए कि विधान के अनुच्छेद (3) के अनुमार समस्त अधिनियन विभा अध्यादेश का इत्यादि सरकारी गजट मे अग्रेजी मे ई र मिन होवे रहने, में भी जहा वे राजभाषा कानून के अन्न मिया में (6) जिला स्तर पर विकासोनात्रों के किनार व्यवस्था की जानी चाहिए।
84 लालबहादुर शास्त्री (7) कछार में चलनेवाला आन्दोलन समाप्त कर दिया जाना चाहिए। (8) इस आन्दोलन से सम्बन्धित समस्त वन्दियों को मुक्त करने पर सरकार विचार कर सकती है, यदि उसे यह विश्वास हो जाए कि आन्दोलन पुन: नहीं चलाया जाएगा । हिंसा तथा तोड़-फोड़ के काम करने वाले लोग इसके अन्तर्गत नहीं रहेंगे। इस फार्मूले की श्रेष्ठता का परिचय इसी बात से मिल जाता है कि नेहरूजी ने उसके बारे में कहा था-"श्री लालबहादुर शास्त्री ने जो फार्मूला रखा है, वह बहुत अच्छा है । उसके अनुसार भाषिक अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा के प्रयोग की स्वतन्त्रता है। प्रशासन तथा शिक्षा में और राज्य प्रधान कार्यालय के साथ सम्बन्धों में बंगला भापा के प्रयोग की पूर्ण स्वतन्त्रता है । इससे अधिक की वास्तव में कोई आशा नहीं कर सकता धा- 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग भावनात्मक संकोच-ग्रन्थि में बंध गए हैं । यह बात कभी-कभी समस्या के हल में बाधा उत्पन्न करती है। ऐसे वाद-विवाद खड़े होते हैं, जो ठोस तत्त्वों से सम्बन्धित नहीं होते हैं । हमें वास्तविकता को ओझल नहीं करना है।" सचाई यह है कि वास्तविकता चाहे जिसकी दृष्टि से ओझल रही हो, लेकिन लालबहादुर शास्त्री की दृष्टि से वह कभी मोझल नहीं रही। मास्टर तारासिंह, जो काफी समय से पंजाबी सूबे के निर्माण के लिए सरकार से टक्कर लेने के लिए मचल रहे थे, सन् 1961 के अगस्त मास में पंजाबी सूवे की मांग और पंजाब सरकार के खिलाफ आरोपों की सूची लेकर मैदान में आ गए । सूबे के निर्माण के लिए मोर्चे निकाले गए और प्रदर्शन आरम्भ हो गए । मास्टर तारासिंह का सबसे बड़ा अभियोग यह था कि राष्ट्रीय सेवाओं में सिखों के साथ भेदभाव वरता जाता है शास्त्रीजी ने इस आरोप की जांच के लिए एक कमीशन की नियुक्ति कर दी, जिसकी जांच के बाद मास्टर तारासिंह के अभियोग वेबुनियादीसावित हो गए। अपने आग्रह को जारी रखकर मास्टर तारासिंह ने 48 दिन की भूख हड़ताल जारी रखी, लेकिन उनकी तरफ किसीकी भी सहानुभूति पूर्ण दृष्टि नहीं गई, उल्टे यह हो गया कि अकाली दल में मास्टर तारा सालबहादुर शास्त्री 85 मिह के 14 वर्ष से चलते आ रहे नेतृत्व को चुनौती देने वाले संत फतेहसिंह मैदान में आ गए 1 मास्टर तारासिंह ने यह चुनौती दी थी कि यदि पंजावी मूर्य का निर्माण नहीं होगा तो वे अपने शरीर में आग लगा देंगे। सम्भ- यतः उनकी यह चुनौती विध्वंसपूर्ण सिद्ध हो सकती थी, लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि स्वराष्ट्रमंत्री पद पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है, जो राजनीति की कला में उनसे भी बड़ा मास्टर है। स्वराष्ट्रमंत्री की हैसियत से शास्त्रीजी को प्रथम राजनयिक नेपाल- यात्रा इस देश को विदेशी मामलों को सुलझाने को दृष्टि से व्यावहारिक नीति अपनाए जाने का साक्ष्य प्रस्तुत करती है । दिसम्बर 1960 में नेपाल नरेश ने जिस समय मन्त्रिपरिषद् को भंग करके शासन सत्ता को अपने हाथ में ले लिया था, उस समय भारत सरकार की ओर से कुछ ऐसी बातें कही गई थी, जिनसे न केवल नेपाल-नरेश के मन में भ्राति उत्पन्न हो गई यो, परन् नेपाली जनता के मन में भी गलतफहमियां पैदा हो गई थी। इन गलतफहमियों के पीछे एक लम्बा इतिहास या। सन् 1959 में नेहरूजी ने मंसद में यह कहा था कि नेपाल और भूटान पर आक्रमण भारत पर आक्रमण समझा जाएगा और दिसम्बर 1950 में जिस राजा महेन्द्र ने कोइराला सरकार को भंग करके शासन की बागडोर अपने हाथ में संभाल ली थी तब भी नेपाल में भारतीय प्रतिक्रिया को गलत समझा गया था। नेपाल और भारत की सीमा पर उन दिनों और उसके बाद नरेश विरोधी नेपाली तत्वो ने जो कार्रवाइयां की थी, उन्हें भी भारत की तरफ से चलाई गई कारंवाई समझा गया। राजा महेन्द्र ने यह घोषित कर दिया था कि उनका देश किसीका पिछलग्ग नहीं बनेगा और अपने कटु अनुभवों के आधार पर उन्होंने दलीय राजनीति का जो परिणाम भोगा है, उसे किसी भी विदेशी शक्ति के कहने पर नहीं बदलेगा। परन्तु, स्थिति यह थी कि नेपाल चीन और पाकिस्तान की ओर आकर्षित होता जा रहा था। नेपाली राजदूत ने कहा था कि नेपाली विद्रोही आधुनिक ढग के जो गस्त्रास्त्र काम में ला रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भारत सरकार नेपाल पर हमले को बढ़ावा दे रही है । इन उद्गारो से प्रेरित होकर मारांत चेन-यो ने यह कहा था कि यदि नेपाल पर हमला हुआ तो चीन उसकी रक्षा 86 लालबहादुर शास्त्री 1 करेगा। नेपाल की विदेशी नीति पर चीन का प्रभाव दिनोंदिन बढ़ने से भारत सरकार चितिन्त हुई, तो उन्होंने लालवहादुर शास्त्री को ही इन गलतफहमियों को दूर करने के लिए नेपाल भेजा । शास्त्रीजी के व्यक्तित्व का जादू यह था कि वे अत्यन्त कटुता से भरे वातावरण में भी अपने सौम्य स्वरूप से विचलित नहीं होते थे। उन्होंने काठमांडू पहुंचने पर कहा था कि भारत से रवाना होते समय मेरे मन में प्रसन्नता हो रही थी कि मैं विदेश जा रहा हूं, किन्तु यहां आकर ऐसा लगा कि जैसे मैं अपने ही देश में हूं। समस्याओं के निराकरण को प्रस्तुत करने की सामर्थ्य शास्त्रीजी में जिस अनुपात में बढ़ती जा रही थी, संभवतः समस्याओं की गति में भी वही अनुपात पैदा हो गया था। कश्मीर का प्रश्न सन् 1948 से ही भारत सरकार के मस्तिष्क पर एक बोझ बना हुआ है। संभवतः यह श्रेय लालबहादुर शास्त्री को ही प्राप्त होना था कि कश्मीर की नाजुक सम- स्याएं उन्हीं के हाथों सुलझाई जाएं। 26 दिसम्बर, 1963 को श्रीनगर की हजरत बल मस्जिद से पवित्र वाल चोरी हो गया। यह पवित्र वाल मुस्लिम पैगम्बर मुहम्मद साहब का है, जिसे शाहजहां के शासनकाल में एक फकीर बुखारा से लाया था, जिसे बादशाह शाहजहां ने एक सुन्दर मस्जिद झील के किनारे बनवाकर स्थापित किया था। वाल के बारे में एक दूसरा मत यह भी है कि सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में वह वीजापुर से लाया गया था और शाहजहां उसे हज़रत बल की दरगाह में लाया था। यह बाल लगभग 3 इन्च लम्बा और काला है तथा साढ़े तीन इन्च गोल कांच की नली में रखा हुआ है। नली के दोनों ओर से चांदी का ढक्कन लगा हुआ है। पवित्र वाल का चोरी होना जैसे कश्मीर में साम्प्रादायिक ज्वालामुखी फूट पड़ना था। राजनीतिक आन्दोलन शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य यह था कि वख्शी गुलाम मुहम्मद द्वारा नामांकित शमसुद्दीन मंत्रिमंडल को समाप्त किया जाए, शेख अब्दुला की रिहाई के लिए आन्दोलन चलाया जाए और जनमत संग्रह की मांग को हकीकत बनाया जाए। इस आन्दो- लन में वे सभी लोग एक मोर्चे पर आ गए जो बख्शी गुलाम मुहम्मद के लालबहादुर शास्त्री 87 खिलाफ थे, शेख अब्दुल्ला और पाकिस्तान के समर्थक थे। इस आन्दोलन से नेहरूजी के मस्तिष्क में भी वेचनी पैदा हो गई। उन्होंने लालवहादुर शास्त्री के कन्धों पर यह भार सौंपा दे समस्या का कोई भी समाधान सोनें; नेहरूजी का समर्थन उन्हे प्राप्त होगा। इन दिनो शास्त्रीजी बिना विभाग के मत्री थे। नेहरूजी के व्यक्तिगत प्रतिनिधि की हैसियत से ही वे जनवरी को श्रीनगर गए थे। पवित्र वाल तो मिल गया, लेकिन अब यह प्रश्न या कि उसका दीदार करके उसकी पहचान कराई जाए अथवा नही। यह संकल्प श्री लालबहादुर शास्त्री का ही था कि उन्होंने इस महान सकट को अपने सिर पर ओड़ लिया। आशका यह व्यक्त की जा रही थी कि यदि, जिन पोरो को पवित्र बाल का दीदार करने के लिए नियुक्त किया जाएगा, उन्होंने यह कह दिया कि वह मूल पवित्र अवशेप नही है तो क्या होगा? बड़े से बडे संकट को अनायास चुनौती के रूप में स्वीकार करने का अन्याम शास्त्रीजी को पा। यह तय किया गया कि कश्मीर के पन्द्रह मुस्लिम पीर दीदार करेंगे। कुरान की आयतो की प्रतिध्वनि के मध्य पवित्र वाल का दीदार हुआ। यह प्रमाणित हो गया कि यह वही पवित्र बाल है। दीदार के समय फकीर मिरसमाह मौजूद थे और सघर्ष समिति के नेता मौलाना मसूदी भी मौजूद एक बार पवित्र बाल को प्रामाणिकता साबित होने पर कश्मीर को सड़को पर लोग उछल-कूदकर नाचने-गाने लगे। इस्लाम जिन्दावाद के नारे युलन्द हुए। तीन सौ वर्षों से रखे गए पवित्र वाल को खोज पर इतना होन्माद हुआ कि महिलाओं ने अपने बुर्के उतार फेंके और पुरुषों ने अपनी टोपिया और पगडिया उछाल दी। हिन्दुओ की ओर से शखनाद किया गया । हजारो व्यक्ति उल झील के पान कृतज्ञता ज्ञापन के लिए प्रार्थना करने लगे। श्रीनगर में सदरे-रियामत ने ग्यारह हिंदू, मुस्लिम और सिस पूजास्थलो पर प्रार्थनाए करने का आदेश जारी किया। पवित्र वाल की चोरी एक भयानक पड्यन्त्र था। स्वम नेहरूजी ने उसकी प्रतिक्रियाओ की कल्पना करते हुए यह वहा था कि जिस व्यक्ति ने यह कार्य किया है, वह भारत वा और कश्मीर का मित्र नही हो मस्त' 88 लालवहादुर शास्त्री बाद में उन्होंने कश्मीर सरकार को पवित्र वाल की प्राप्ति पर बधाई दी और कश्मीर की जनता के लिए उसे सौभाग्य का सूचक बताया। यह घटना कश्मीर के जीवन में इतनी महत्वपूर्ण थी कि यदि उसे सावधानी के साथ संभाला न गया होता तो स्थिति बिगड़ सकती थी। लालवहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के समस्त पड्यन्त्रों को परास्त कर दिया । हिन्दू- मुसलमानों के मध्य फिर से भाईचारे की भावना पैदा हो गई । सम्भवतः इस सद्भावना का ही सहारा था कि लालवहादुर शास्त्री ने कश्मीर की राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखने वाले अनेक निर्णय किए जिनमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई। कश्मीर में समस्याएं अनेक हैं । शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद से बख्शी गुलाम मुहम्मद ने कश्मीर पर एकच्छन राज्य स्थापित किया था। उनके खिलाफ कुनवापरस्ती और भ्रष्टाचार के आरोप होते हुए भी राजधानी में अनेक लोगों का यह विचार था कि वख्शी साहब शासन से अलग रहकर भी यदि कश्मीर सरकार से निकट रिश्ता बनाए रखेंगे तो स्थिति काबू में रहेगी। बख्शी गुलाम मुहम्मद के बाद शमसुद्दीन कश्मीर के मुख्यमन्त्री बनाए ज़रूर गए थे लेकिन जनता को इससे सन्तोप नहीं था, क्योंकि सरकार के पीछे अभी तक बख्शी गुलाम मुहम्मद की सत्ता मौजूद थी । लालबहादुर शास्त्री ने बख्शी दल की लोकप्रियता का भली भांति अध्ययन कर लिया था। उन्होंने यह निश्चय किया कि जब तक इस दल के प्रमुख को समाप्त नहीं किया जाएगा, तव तक कश्मीर के शासन पर भरोसा नहीं किया जा सकता । शास्त्रीजी ने इन दोनों नेताओं से बातचीत करके उन्हें इस बात पर राजी कर लिया कि शमसुद्दीन इस्तीफा दे देंगे। 27 फरवरी को शमसुद्दीन ने नेशनल कांफ्रेंस के विधायकों की सभा बुलाई और उसमें अपना त्यागपत्र प्रस्तुत कर दिया। यह आश्चर्य ही माना जाएगा कि अगले दिन गुलाम मुहम्मद सादिक को पार्टी का नेता चुना गया और उनके नाम का प्रस्ताव बख्शी गुलाम मुहम्मद ने ही किया। प्रशासनिक व्यवस्था कायम करने के बाद शास्त्रीजी ने यह निश्चय किया कि कश्मीर की स्थिति को तब तक विश्वसनीय नहीं माना जा लालवहादुर शास्त्री 89 सकता जब तक दोस अब्दुल्ला को रिहा नहीं कर दिया जाता। यह प्रश्न नेहरूजी के मस्तिष्क में भी बहुत दिन से बचनो पंदा कर रहा था। शास्त्रीजी ने संसद के समक्ष अत्यन्त आत्मविश्वास के साथ यह कहा कि अब ऐमी स्थिति आ गई है कि दोष अन्दल्ला के बारे कोई अन्तिम निर्णय करना पड़ेगा। यदि किसी एक आदमी को हमेशा के लिए कारावास में बन्द करके कश्मीर को अपने हक में रखना है, तो वे इस स्थिति को पसन्द नहीं करेंगे। साफ गब्दों में उन्होंने कहा कि ऐसा कश्मीर नही चाहिए जिसके पीछे किसी व्यक्ति को भी यातना दी गई हो । हमारी निष्ठा को यह कसौटी है कि दोख अब्दुल्ला को रिहा किया जाए और फिर भी कश्मीर को अपने हक मे रखा जाए। कश्मीर के मुख्यमन्त्री गुलाम मुहम्मद सादिक शेख की रिहाई के पक्ष में नहीं थे, लेकिन शास्त्रीजी के परामदां से 8 अप्रैल को उन्हें रिहा कर दिया गया। इस रिहाई पर नेहरूजी को भी प्रतिक्रिया यह थी कि यह एक जान-बूझकर ओढ़ा गया खतरा है। संसद में इस रिहाई के खिलाफ विरोधी दलों ने तूफान खड़ा कर दिया। शास्त्रीजी अब भी अविचलित थे। हालाकि स्वयं उन्हे और नेहरूजी के मन में यह आशंका नहीं थी कि रिहाई के तत्काल बाद दशेस अन्दुल्ला कश्मीर को एक स्वतन्त्र राज्य बनाने के लिए इतने ऊंचे स्तर पर इतनी ऊंचाई के साथ अपने स्वर बुलन्द - करेंगे। शेख अब्दुल्ला के तौर-तरीके देखते हुए भी शेख अब्दुल्ला को हज जाने की इजाजत दी गई। उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया कि वे पाकिस्तान जाकर भारत और पाकिस्तान के समक्ष ऐसे प्रस्ताव रखेंगे कि दोनों देश एक-दूसरे के निकट याएं और कश्मीर का मसला हमेशा के लिए निर्णीत हो जाए । लालबहादुर शास्त्री को अपने दृष्टिकोण पर इतना विश्वास था कि दोख अब्दुल्ला लंदन भी गए और उन्होंने स्वतन्त्र कश्मीर की वकालत की, शास्त्रीजी के चेहरे पर शिकन नही आई। शेस माहय जिस समय अल्जीयर्स मे चाऊ-एन लाई से मिले और ऐमी सबरें आई कि उन्होने चीन जाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया सो शास्त्रीजी ने कठोरतापूर्वक कहा था कि "यदि शेख चीन जाते हैं, तो सरकार इमे देश 90 लालवहादुर शास्त्री के विरुद्ध विद्रोह की कार्रवाई समझेगी।" शेख अब्दुल्ला चीन नहीं गए। उन्हें दुनिया के सामने खुला छोड़ दिया गया कि वे अपने पक्ष को पूरी आजादी के साथ दुनिया के सामने रख सकें। शेख को जो कहना था उन्होंने कहा। भारत अव भी अक्षुण्ण है। कश्मीर की स्थिति ज्यों की त्यों है, वरन् वह पहले की अपेक्षा भारत का अधिक अविच्छिन्न अंग है। उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी था। विरोधी दलों ने प्रतापसिंह करों के खिलाफ कई आरोपों का अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया था। इन आरोपों की जांच के लिए दास आयोग की नियुक्ति हुई। इन आरोपों में से दो आरोपों को दास-आयोग ने सही माना था। जून सन् 1964 में प्रतापसिंह करों ने 8 वर्ष तक पंजाव पर एकच्छत्र राज्य करने के बाद त्यागपत्र दे दिया । लालबहादुर शास्त्री तब तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो चुके थे । प्रतापसिंह कैरों के स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति का मुख्य- मंत्री पद के लिए चुना जाना एक अनपेक्षित वात मानी जाती थी। इस कार्य की व्यक्तिगत जिम्मेदारी शास्त्रीजी के कन्धों पर आती थी, लेकिन उन्होंने इस संकट को सामान्य रूप से दैनिक राजनीतिक काम-काज की तरह समाप्त कर दिया। केरल में एक और समस्या थी, जिसको हल करना आसान नहीं था । केरल के कम्युनिस्ट मन्त्रिमण्डल के पतन के बाद कांग्रेस और प्रजा- समाजवादी दल की मिली-जुली सरकार का निर्माण हुआ। प्रजासमाज- वादी नेता पट्टम थाणु पिल्ले मुख्यमन्त्री पद पर नियुक्त किए गए। कांग्रेस के उपमुख्यमन्त्री आर० शंकर के लिए इस संयुक्त मन्त्रिमण्डल में काम करना मुश्किल हो गया। उनकी मांग थी कि मुख्यमन्त्री मन्त्रि मण्डल के परामर्श से ही महत्त्वपूर्ण मामलों पर नीति का निश्चय करें पट्टम थाणु पिल्ले अपने वैधानिक अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थे आपसी संघर्ष से विरोधी दलों के लिए शासन को बदनाम करना सरर हो गया। मन्त्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने लगे राज्य में फिर से तूफानी वातावरण पैदा हो गया। लालबहादुर शास्त्र ने अपनी इस समस्या को भी हल कर लिया। पट्टम थाणु पिल्ल को ।
लालबहादुर शास्त्री 1 भा गवर्नर नियुक्त करके उन्होंने भार० शंकर को मुख्यमन्त्री बना दिया। मासन की कला मे वे जितने महज भाव से निश्चय करते, उतने ही महज भाव से जन-जीवन से सम्बन्ध रखने वाले विपयों को सभी धगों से स्वीकार करा लेने में भी उन्हें सफलता मिल जाती थी। क्षेत्रीय एवं प्रादेशिक अलगाव की भावनाएं इस देश के राष्ट्रीय नीयन में अनेक वार पृथकतावादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दे चुकी थीं। दक्षिण में द्रविड मुनेत्र कड़गम के नेता श्री अन्नादराई ने हिन्दी के प्रश्न को लेकर यह मादोलन खड़ा कर दिया था कि यदि हिन्दी दक्षिण पर लादी गई तो वे भारतीय संघ में अपने को पृथक कर लेंगे । स्वराष्ट्रमन्त्री की हैगियत गं लालबहादुर शास्त्री ने इन भयकर तत्त्वो पर काबू पाने के लिए यथासमय पेरावन्दी की। गन् 1963 के मई माग में विधिमन्त्री अशोक मेन ने सविधान की उन्नीमवी धारा में मंगोधन प्रस्तुत किया, जिगये अनुगार भारतीय संघ से पृथक होने का प्रचार करनेवाली गतिविधियों को गोद करार दिया गया। यन्नादराई का मुह बन्द करने के लिए स्वराष्ट्रमन्त्री ने सन् 1963 में ही ममद के ममम राजमापा विधेयक प्रस्तुत किया, जिममे यह प्रावधान रखा गया कि 26 जनवरी, मन् 1965 के बाद भी हिन्दी के माय अंग्रेजी का प्रयोग बराबर हाना रहेगा। म विधेयक के प्रस्तुत करने का एक प्रमुख कारण यह था कि जैसे-जैम मन् 1965 का जनवरी माम निकट बाता जा रहा था, दक्षिण में मापा सम्बन्धी कान्दोलन एक राजनीतिक अभियान का रुप ग्रहण कर रहा था और मद्राम की काग्रेस सरकार के मानने कटिनाइया उपम्पिन हो रही थीं। नहाती ने दक्षिणवालों को यह आश्वामन दिया था कि वनमारा देश हिन्दी के माध्यम से कामकाज चलाने में समर्थ नही ही जागा नव नक यंग्रेजी कायम रखी जाएगी। हिन्दीमारी प्रदेशों द्वाराम विद्या का यंदन विरोध किया गया था। इस समस्या को मेरर काग्रेग में ही विरार मात्र उत्पन्न हो गए थे। लेकिन, दरदमी नालवहादराबी यह अनुमका कि यदि वनिच्छुक लोगों के सिर पर हिन्दी गं नादा पाएमा भी उमा न केवल देश के गमकार में बाधा डम्पिन होगी, परन्तु राजनीति अराजक्ता भी उत्पन्न ही माती है। अपनी माददाशी उन्हो 92 लालवहादुर शास्त्री 1962 में तिरुपति में आयोजित पांचवें अखिल भारतीय युवक सम्मेलन में स्पष्ट कर दिया था कि "जब तक हिन्दी का समुचित विकास नहीं हो जाता, देश के सभी लोग उसका अच्छी तरह अध्ययन नहीं कर लेते, अंग्रेजी भाषा को हटाया नहीं जा सकता । अंग्रेजी ही एक ऐसी भाषा है, जो सभी राज्यों में वोली जाती है।" भाषा-सम्बन्धी उदारता की नीति पर अमल करने के बावजूद शास्त्री जी को अपने प्रधानमन्त्री-काल में मद्रास राज्य की ओर से उठाई गई एक जबरदस्त चुनौती का मुकाबला करना पड़ा। 26 जनवरी, 1965 को भापा-सम्बन्धी जो राष्ट्रीय निर्णय किया गया, उसका आशय केवल यह था कि हिन्दी को पहला दर्जा दे दिया जाए और अंग्रेज़ी को दूसरा, लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की ओर से यह आन्दोलन खड़ा किया गया कि दक्षिणवालों का काम तव तक नहीं चलेगा जब तक कि हिन्दी के प्रश्न पर संविधान में संशोधन नहीं हो जाता। इस मांग को पूरा करने के लिए मद्रास राज्य में जो हिंसात्मक कार्रवाइयां हुईं, उन्हें लोमही ही पुकारा जा सकता है । तमिलनाड का यह आंदोलन विद्यार्थी-आंदोलन के रूप में प्रारम्भ हुआ था। लेकिन, उसके पीछे प्रादेशिक भापी और पृथकतावादी तत्त्वों का बोलबाला था। इन हिंसात्मक कार्रवाइयों से द्रवित होकर आचार्य विनोबा भावे ने अनिश्चित काल तक अनशन करने की घोपणा करके सारे देश का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित किया कि राजभाषा अधिनियम में संशोधन की मांग शरारत से भरी हुई है। मद्रास के वयोवृद्ध नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने संविधान के सत्रहवें अनुच्छेद को समाप्त करने का परामर्श दिया था। कांग्रेस के नेताओं में भी भापा के प्रश्न को लेकर जबर्दस्त संघर्प खड़ा हो गया था। केन्द्रीय मन्त्री सुब्रह्मण्यम और अलगेशन ने त्यागपत्र दे दिया और कांग्रेस- अध्यक्ष कामराज नाडार ने केरल में यह कहा कि केन्द्र से हिन्दी में जो भी पत्र आए उसे विना पढ़े रद्दी की टोकरी में फेंक देने में कोई अपराध नहीं है। लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमन्त्री-काल में भापा के प्रश्न को यह एक ऐसी चुनौती थी जिसका कड़ाई के साथ मुकाबला न किया जाता, तो केन्द्रीय मन्त्रिमंडल त्यागपत्र देने पर मजबूर हो सकता था। शास्त्रीजी ने लालबहादुर शास्त्री 93 मुस्प मन्त्रियों की बैठक बुलाकर इम प्रश्न पर अन्तिम प गे विचार दिया। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने यनिय में परिवर्तन करना बमम्भव है। फिर भी उन्होंने यह व्यवम्या शी कि वेन्द्र में द्विभाषा फार्मूले को लम्बी अवधि तक जारी रखा जाए और यह निर्णय विमा कि केन्द्रीय जननेवा आयोग को परीक्षाओं के लिए मंविधान के आठवें परिच्छेद में जल्लिवित सभी क्षेत्रीय भाषाओं को माग दिया जाए । एक समय यह मुझाव भी प्रस्तुत किया गया था कि केन्द्रीय जनमेवा आयोग द्वारा सभी राज्यों के लिए भापिक आधार पर वोटा निर्धारित कर दिया जाए। यह भुनाव अधिक मान्यता प्राप्त नहीं कर मका। लाजवादुर शास्त्री ने यदि समझौते को नीति और राष्ट्रीय मंत्तों को अप्रतिहत रखने के दृढ निश्चय का परिचय न दिया होता तो मन् 1965 के फरवरी माप में बांग्रेस का सिंहामन होल मरता था। उन्होंने सुब्रह्मण्यम और अलगेशन के त्यागपत्रों को स्वीकार नहीं किया। हालाकि देश के कोने-कोने में यह कहा जा रहा था कि मन्त्रियो ने न केवल प्रादेशिक पृथकतावादी विचारों का परिचय दिया है, वरन् शास्त्रीजी के माप विश्वासघात भी किया है, क्योकि ऐसे सस्टपूर्ण समो में ऐमा काम देशद्रोह माना जा सकता था। शास्त्रीजी यह समझते थे कि भापा के प्रश्न पर परसे हुए देशभक्त दाक्षिात्य नेता उत्तेजित हो चुके हैं । इस वातावरण को समाप्त करने के लिए सहिष्णुता का परिचय देना होगा। उन्होंने यह परिचय दिया और दक्षिणी नेताओ की आग्नेयता को सहज ही ठंडा कर दिया। प्रधानमन्त्री पद पर यह अनुमान लगाना बेहद दिलचस्प होगा कि जबकि सारी दुनिया को यह विश्वास था कि नेहरू के बाद कौन' प्रश्न का उत्तर अद भी सोगरा जाएगा, लालबहादुर शास्त्री के अतिरिक्त किमी दूसरे को यह स्पान:- मिलेगा, क्या शास्त्रीजी को भी यह विश्वास या कि यह ध्यान न .. 94 लालबहादुर शास्त्री घटनाओं के क्रम ने यह साबित किया कि लालबहादुर शास्त्री इस स्वाभा- विक प्रक्रिया से अवगत नहीं थे, उनको अपने अनुकूल मोड़ने का उन्होंने कभी प्रयास नहीं किया। सम्भवतः यह अनासक्ति योग ही उन्हें इस पद पर बैठाने में असाधारण सहायक बना। अगस्त 1962 में 'कामराज योजना' आई। इस योजना के सूत्रधार कामराज थे; किन्तु कुछ महीने पूर्व सर्वप्रथम मुख्यमन्त्रियों के एक सम्मेलन में उसकी रूपरेखा बनी थी। योजना का मूल उद्देश्य यह था कि केन्द्र और राज्यों में काफी समय से महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य करने वाले व्यक्ति अपने पद छोड़कर कांग्रेस संस्था के कार्य को संभालें । कामराज की स्थापना यह थी कि कांग्रेस के महत्त्वपूर्ण और योग्य नेताओं द्वारा प्रशासनिक दायित्वों की पूर्ति करने के कारण संस्था के संचालन का कार्य दूसरे दर्जे के नेताओं को करना पड़ता है। ये नेता जनता में पूरी तरह सरकारी योजनाओं के प्रति विश्वास पैदा नहीं कर पाते । अतः जनता का सहयोग भी सरकार को नहीं मिल पाता। पर्दे के पीछे इस योजना के पीछे कहीं यह भाव भी था कि केन्द्र और राज्यों में कुछ मंत्रिगण ऐसे हैं, जिन्होंने सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधि- कार मान लिया है। उसे कायम रखने के लिए वे कांग्रेस में पड्यन्त्री गुटों का निर्माण करते हैं । यदि ये नेता संस्था में लौट आएंगे तो उनके सामने कांग्रेस का संदेश, उसकी विचारधारा और नीतियों को जनता तक पहुंचाने के अतिरिक्त कोई काम नहीं रह जाएगा। हालांकि कालान्तर में यह योजना अपने लक्ष्य से भटक गई । कुछ आलोचकों का यह मत रहा कि इस योजना के पीछे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल से मोरारजी देसाई और जगजीवनराम को निकाल देने का पड्यन्त्र था। उसका दोप जवाहरलाल नेहरू के सिर पर डालना उचित नहीं होगा, क्योंकि वे स्वयं यह सोचते रहे कि वे प्रधान- मन्त्री पद को छोड़कर पुनः काम करें । कांग्रेस उन्हें इतनी प्यारी थी कि यदि कुछ महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के मन्त्रिमण्डल छोड़ने से कांग्रेस का रुतबा बढ़ सकता था तो इससे अधिक प्रियकर सुझाव उनके लिए क्या हो सकता था। सुझाव कामराज की ओर से आया था जिनके मुख्य मन्त्री पद को चुनौती देने वाला मद्रास में कोई नहीं था। नेहरूजी यह कल्पना . ।
पासपी: भी मही पार पाने में किसी का साया. हाना है। it in utuant प्रभागमाची म. पद की कही गाना altim ही उगनवा पिपाkिunifafainाना को निगागाग पाना वाशीamm, 111101 बारामाजमा मान.EKAIमामीन पृषी मारयादा पानी4TRARAMI, HIM Aniream थामा विमान माना का थामी माना गया nisannाता है कि पाग: पाना प. पनामा गंगा मावि . fifin५. जीवन पर्ग या पात्र है, मारवार मानीनyिinnerintent मालवहादरात्री की गायनिक nिglatil.in बड़े नेताओं ने अनुमानही या पायान पागा धापरणया कि धाममा। परिणाम पाया कि गोवा भाग Gharti पायात पूर्णत: गट होगा कि लालबहादुरी पालन पा मारगंभावना परंगा । मुवनामा बधियानी 17 18 10 वर्गमारपी,विन दीवानामा पोटर ग गांव नगर पमो 7 विगान गाने में भी MAK: पापड़ी । नयाग मुरमाया मा धीर नाNLItent कंगमय भी दे प्रायन कपाटाईनिin affai पनियत की, पेनिस प्रतिया T का वामनी गया गया नगर पर्ष गदा परपी दारहीम मामने भाई दिनहरीमा वि.ra व्यक्ति को पवित्र मानावी aft, ne farmer srxy किपिंग की सधी हायागानही जाना पद मा. माननाम्यानमारकहा? गोरया नगा में ही पान वाnिtuk ' 96 लालबहादुर शास्त्री कर आया और वहीं उसका उत्तर भी मिल गया। विषय समिति के समक्ष लालबहादुर शास्त्री ने कांग्रेस अध्यक्ष के आदेश पर नेहरूजी के स्वास्थ्य- सम्बन्धी विज्ञप्ति पढ़कर सुनाई थी। यह अधिकार लालबहादुर को ही दिया गया कि वे नेहरूजी और कांग्रेस के मध्य अन्तरंग संदेशवाहक का कार्य करें; 'जनतन्त्र और समाजवाद' संबंधी भुवनेश्वर प्रस्ताव को पेश करने का कार्य भी। लालबहादुर शास्त्री कांग्रेस के समाजवादी विचारों और नीतियों के प्रवक्ता और उद्घोपक बनने की सामर्थ्य से सम्पन्न नहीं थे; लेकिन लालवहादुर शास्त्री ने कहा-"केवल जनतान्त्रिक समाजवाद ही वह मार्ग है, जिसपर चलकर देश प्रगति और समृद्धि प्राप्त कर सकता है और व्यक्ति की स्वतन्त्र वैयक्तिकता भी बरकरार रह सकती है।" उनकी व्याख्या साधिकार, आत्मविश्वास और आस्था से युक्त था । नपे-तुले, सार्थक वाक्यों में उन्होंने अपनी इस प्रतिभा की छाप दर्शकों पर स्थापित कर दी कि वे अत्यन्त गम्भीर सैद्धांतिक विवेचन और मीमांसा करने में ही समर्थ नहीं हैं, वरन् इन सिद्धान्तों को जन-जीवन के साथ व्यावहारिक संगति भी दे सकते हैं । यह ऐसा अवसर था, जबकि उनकी सामान्य भूल उनके लिए महंगी पड़ सकती थी। यदि वे ऐसे व्यक्तित्व का परिचय देने में असमर्थ होते, जो कांग्रेस की उच्च सैद्धांतिक व्यक्तित्व की गरिमा की रक्षा कर सकता है तो गोपवन्धु नगर में ही उनके भविष्य का निर्णय हो जाता। राजधानी लौटने के उपरान्त भी कांग्रेस नेता द्वारा अनुमान लगाए जा रहे थे कि नेहरूजी अपने कार्यों में किसका सह्योग लेंगे। 22 जनवरी को लालवहादुर शास्त्री की नियुक्ति निविभागीय मंत्री के पद पर उनका काम था कि वे विदेश मंत्रालय, अणु शक्ति विभाग और मंत्रि- मण्डलीय सचिवालय से प्रधानमंत्री के पास आने वाले कागजात को संभालेंगे । आवश्यक होने पर वे प्रधानमंत्री के आदेश प्राप्त करेंगे। लालबहादुर शास्त्री ने 9 जून, सन् 1964 को प्रधानमंत्री पद ग्रहण किया तो जनता के मन में यह भावना जागी थी कि वे अपने कार्य में ला-6 लानवहादुर शास्त्री 97 मफल हों तो देश का सौभाग्य होगा। लोगों को यह उम्मीद नहीं थी कि वे अपना भाग्य एक ऐने व्यशि के हाथों में सो रहे हैं, जो इम देग के सौभाग्य-सूर्य पर छाई विपदाओं के वादलों को अपने नन्हे हाथों में विदीर्ण करके रख देगा । अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में जहां कपों में तो हुए और घुटे हुए पाप अपने-अपने राष्ट्रों की बागडोर संभाले हुए हैं, वहां यह भारत का पांच फुटा प्रधानमंत्री इन देव वी महना के अनुरूप आचरण कर सकेगा! यह कहने में मंकोच नहीं होना चाहिए कि सिनेमाघरो में उनके चित्रों को देखकर लोग अट्टहाम कर उठते थे और आधुनिकता में रंगे भारतीय अपने घोती याले प्रधानमंत्री के लिए बही महानुभूतिपूर्वक यह पहते मुने जाते थे, "वेचारे शास्त्री, लोग उन्हें देखकर हगतेमकी है। लोग हंसते इसलिए कि उनके मन में यह आम्था नहीं थी कि शास्त्री जी का लघु आकार देश की दैत्याकार ममस्याओं के मुकाबले में टिक सकेगा। लेकिन लालबहादुर ने अपने संकलो स्वभाव के अनुसार प्रकट या दचे स्वरो में आने वाले अविश्वासमूचक उपहाम को कोई परवाह न करवं मामन की बागडोर सभाल लो । अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उन्होंने अपने 18 महीने के शासनकाल में एक महान मीमाचिह्न स्यापिन किया जिसमें मागे कदम रखना आने वाले प्रधानमन्त्रियो के लिए आनान नही होगा। उनके कार्यों की गति और घनना इस तरह वट रही थी कि देश का बोद्धिक वर्ग उन्हें धीरे-धीरे चलने की मलाह देने लगा । मन् 1962 के मवतूवर माम मे शास्त्रीजी युगोस्लाविमा यात्रा पर गा । मान टीटो से भेंट करके उन्होंने भारत और युगोस्लाविया बी पारम्परिक मैत्री को मजवून किया और दुनिया को फिर से यह विम्बान दिनाया कि नहरू के बाद तटस्य राष्ट्रो का मगटन रमजान नही होग। अक्तूबर को वे माल टीटो से मिलकर 6 अक्तूबर को बाहिर पर और मक्त अरब गणराज्य के राष्ट्रपति नामिर के साथ वार्ना प्रारम्भ कर दी। 8 अक्तूबर को उन्होंने तटम्प राष्ट्रो के सम्मेलन में भाषण किया और विश्वमाति लिए मूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया। 12 अक्तूबर को कराची में भी पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुहम्मद अय्यूब में बगना की। 1965 के कार माग में उन्होंने वर्मा की क्रान्तिकारी परिषद के अध्यक्ष जनररून. ।
98 लालबहादुर शास्त्री स्थागत किया और इसी गारा अफगानिरतान के प्रधानमन्त्री सभीगाई दिल्ली में बातचीत की। 1965 1 अप्रैल मारा में उन्होंने नेपाल पी सद्- भावना-गानागी। 12 मई को हराकी 8 दिवसीय सद्भावना-यात्रा पर गास्को पहुंच गए। 10 जून को गानाडा पी यात्रा पर शास्त्रीजी मोटापा पहुंच गए। 17 जून को राष्ट्रमण्डल सम्मेलन में लंपन पहुंच गए। 27 जून को उन्होंने काहिरा में राष्ट्रपति नासिर से पुनः गेट पी । गुलाई मारा में शास्त्रीजी नियानी में गालि टीटो रोगिले । राष्ट्रीय गतिविधियों के रांचालन के साथ इतना व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क स्थापित करगे उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि विदेशों में भारत को मिनों गा अभाव नहीं है। गदि कोई उदासीनता है तो उसे दूर करने गे लिए शास्त्रीजी की देह में जो फोलादी तत्व हैं, उनको राहारे पे उरा उदासीनता को दूर कर रामगे। इन अन्तर्राष्ट्रीय यात्राओं के चगत में गोई भी रामय ऐसा नहीं था जवकि देश की सीमा पर पाकिस्तान और चीन की ओर से भयंकर सुनौतियां न दी जा रही हो । सन् 1965 जनवरी गारा से ही पागि- रताग ने गाजर में अपने आभागमा इरादों को पूरा करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी थी। 9 अप्रैल को पाकिस्तान ने भारत की रारदार पौकी पर भागाण गार दिया । उराने या पलाने गा लोंग करते हुए भी भाग लागवन्दी ने आदेश जारी कर दिए थे। सैनिकों की छुट्टियां रद कर दी थी, छट्टी पर गए सैनिकों को वापस बुला लिया था। स्थल, गोरोना एवं यागुरोना को पूरी तरह रात गार दिया था। सिंध, पंजाब और अधिकृत पाएगीर में गुजाहिदों और रजाकारों को सैनिया-विक्षा दी जा रही थी। लाठीदिला और ड्रगाबाड़ी सीमा पर और राजस्थान से लगे लागे पर भी सनिगा जगाच पार रला गा। अप्रैल मे अन्तिम सप्ताह में 25 मील लम्चे गोपर 6 गील अन्दर पुरा कर पूरे ब्रिगेड के साथ वधर हमला गिया था। शास्त्रीजी उन दिनों मेपाल-यात्रा से लौटकर आए थे। शक्ति का जयाय शक्ति से देने का संकल्प धारण करते हुए भी उन्होंने हर अवसर पर गही माहा निगमोसी देश से शुद्ध गरमा गिसी नो हित में नहीं होता। काहिरा-यामा से लौटते समय जब वे कराची में पाकिस्तान के राष्ट्रपति से मिले थे तो उन्होंने गह भाश्वासन दिया था कि सीमा पर होने वाली सालबहादुर शास्त्री 99 घटनाएं बन्द होनी चाहिए क्योंकि इनसे दोनों देशों को लाभ नहीं होता। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया था कि धे झगहों को मिटाने के लिए यातचीत तो करना चाहते हैं, लेकिन चुनाव में फंसे होने के कारण वैसा करने की स्थिति में नहीं हैं। मुंह में पदा और बगल में छुरी लेकर पाकि- स्तान ने जनवरी मास में कजरकोट पर कब्जा कर लिया था। मार्च तक उगने भारतीय मीमा में घुमकर तेरह मौ वर्गगज अन्दर दो चौकियों पर कब्जा कर लिया था। मार्च महीने में दाहापाम विवाद को हल करने के लिए उसने भारत के चारपूची प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था, परन्तु युचक्र यह था कि आक्रमण करके जितनी भी भूमि को वह अपने अधिकार में कर लेगा, उतना ही स्थान विवादास्पद बन जाएगा। भारत उग समय चारों ओर से मुसीबत में फंसा हुआ था। चीनी सरकार की पाह से पाकिस्तान अपने दावों को तल देता जा रहा था। फच्छ के युद्ध में अमरीको गस्त्रास्त्रों का प्रयोग हो रहा था, लेकिन अमरीकी सरकार लहाई बन्दी की अपीलें कर रही थी। और पाकिस्तान की सेना नियमित युद्ध के पंमाने पर हमले कर रही थी। शास्त्रीजी ने 16 अप्रैल को मन नदी पर वेनपाट पर बने पुल का उद्घाटन करते हुए कहा था कि "हम एक इंच भूमि भी किसी को हथिया लेने का मौका नहीं देंगे।" फिर भी संसद में शास्त्रीजी को मुर्गी के दिलवाला कहा गया। विरोधी दल रोप के माय कह रहे थे कि सरकार युद्धविराम का ऐसा कोई रास्ताव स्वीकार न करे, जिममे एक इंच भूमि भी पाकिस्तान को देनी हो। संसद मे शास्त्रीजी ने बड़े धीरज के साथ उत्तर दिया था कि "प्रति- पक्ष के कुछ सदस्य देश की प्रतिष्ठा के लिए सबसे अधिक चिन्तित दिखाई पड़ते हैं. यह बात हम नहीं मान सकते पर सरकार को चलाने की जिम्मेल परी हमपर है । हमें भी कुछ पता है और हमे भी खयाल है कि देश की शिजत किसमें है।" उन्होंने इस रोपपूर्ण वातावरण में भी अपना संपम नही सोया और संमद के ममक्ष उस पत्र का जिक्र किया, जो ब्रिटिश प्रधान मन्त्री ने उन्हें और पाकिस्तान के राष्ट्रपति को लिखा था। भारत सरकार ने 12 अप्रैल को ही युद्धविराम करने और वार्ता करने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। पाकिस्तान चाहता पा कि समझौते 100 लालबहादुर शास्त्री विराम हो जाए और दोनों देश अपनी सेनाएं पीछे हटा लें । शास्त्रीजी ने पुन: स्पष्ट किया कि यथापूर्व स्थिति को कायम करने के लिए एक ही साथ समझौता हुए विना कच्छ के रन में कोई युद्धविराम नहीं हो सकता। आखिरकार ब्रिटिश प्रधानमन्त्री के मूल प्रस्ताव के आधार पर दोनों देशों के बीच 30 जून, सन् 1965 को समझौता हो गया। समझौते के अनुसार पाकिस्तानी सेना भारत द्वारा बताई गई कच्छ. की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के दूसरी ओर चली जाएगी, इसका अर्थ है कि पाकिस्तानी सेना भारतीय क्षेत्र की सभी चौकियों से हट जाएगी । भार- तीय पुलिस वाइपेट की चौकी पर पुनः अधिकार कर लेगी। युद्धविराम के तुरन्त बाद दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक होगी जो इस समझौते को लागू करने में आई कठिनाइयों को दूर करेगी। अधि- कारियों के काम के लिए एक मास की अवधि दी गई है । उसके बाद दोनों देशों के मन्त्रियों की बैठक होगी और उसमें सीमा निर्धारित करने के बारे में फैसला किया जाएगा । यदि युद्धविराम के दो महीने बाद तक त्रयों में फैसला नहीं हो सका तो दोनों सरकारें तीन सदस्यों का एक ट्रिब्यूनल नियुक्त करेंगी। इस ट्रिब्यूनल का एक सदस्य भारत नियुक्त करेगा तथा दूसरा पाकि- स्तान । लेकिन यह दोनों सदस्य भारत या पाकिस्तान के नागरिक नहीं होंगे। ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष दोनों सरकारें मिलकर संयुक्त रूप से बनाएंगी। यदि अध्यक्ष के बारे में दोनों सरकारें फैसला न कर सकें तो राष्ट्रसंघ के महासचिव से अध्यक्ष नामजद करने के लिए कहेंगी। ट्रिब्यूनल का निर्माण युद्धविराम के चार महीने के अन्दर हो जाना चाहिए तथा ट्रिब्यूनल का फैसला दोनों देशों की सरकारों को अनिवार्य रूप से लागू करना होगा। समझौता अविकल रूप में इस प्रकार है : धारा 1: पहली जुलाई, 1965 को दोपहर से युद्धविराम होगा धारा 2 : (1) दोनों ओर की सेनाएं शीघ्रपीछे हटना शुरू कर देंगी। (2) यह कार्य सात दिन में पूरा हो जाएगा। (3) तव भारतीय पुलिस वाड़पेट चौकी संभाल लेगी और इस लालबहादुर शास्त्री 101 पुलिस दल की संख्या 31 दिसम्बर, 1964 को संस्था से अधिक नहीं होगी। (4) भारतीय और पाकिस्तानी पुलिस उम पट्टी पर गश्त लगाने लगेगी, जिमपर वह 1 जनवरी, 1965 को गश्त लगाती पी। गत की संख्या भी 1 जनवरी, 1965 की मस्या में अधिक नहीं होगी। वरमान में गस्त 1964 को वरमान के दौरान की गत से अधिक नहीं होगी। (5) यदि भारतीय और पाविस्तानी पुलिम का संपर्क हो तो वे एक-दूमर के मार्ग में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और 1960 के पश्चिमी पाकि- स्तान भारत-मीमा नियमावली के अनुसार आचरण करेंगे। (6) युद्धविराम के तत्काल बाद दोनों सरकारों के अधिकारी मिलेंगे और फिर उक्त (3 में 5 तक के) पराग्राफों में दी गई मवस्था को साग किए जाने के गम्बन्ध में उत्पन्न समस्याओं पर विचार करने के लिए समय-समय पर मिलते रहेंगे। धारा 3:यह देखते हुए कि: (4) भारत का दावा है कि कोई क्षेत्रीय विवाद नहीं है क्योकि कच्छ के रन के उत्तरी किनारों में लगी सीमा जो अविभाजित भारत के नक्शों में बंकित है निर्विवाद और मान्य सीमारेखा है और केवल स्पनीय सीमापन करना दोप है। (1) पाकिस्तान का दावा है कि करछ के रन में भारत और पारि स्तान के बीच की मीमा 24 समानान्तर के माय-माप जाती है जो कि विभाजन के पूर्व और विभाजन के वाद के दस्तावेजों में स्पष्ट है, इसलिए करीब 3500 वर्गमील इताका विवादास्पद है। (स) 1960 में हुई बातचीत में दोनो सरकारों के मन्त्री इस बात पर सहमत हो गए ये कि कन्य-सिन्ध मीमान्त के बारे में और माकड़े कट्ठे किए जाएं और इस विवाद को मुलभाने के लिए बाद में और धात. चीन की जाए। 1-धारा 2 (6) में उल्लिखित काम गमान करने के तुरन्त बार -यह कार्य पविराम के एक मास के भीतर ही पूरा करना होगा--- दोनों सरकारों के मन्त्रियों की बैठक होगी। इस बैठक में अपने-अपने दावों 102 लालवहादुर शास्त्री के माधार पर सीमा निर्धारण' और सीमांकन के बारे में वे समझौता करेंगे। इस बैठक में और नीचे दी धारा 3 (5) (4) में उल्लिखित ट्रिब्यूनल के सामने प्रत्येक सरकार अपना पक्ष प्रस्तुत करने और उसकी पूरी पुष्टि करने को स्वतन्त्र होगी। 2-युद्धविराम से दो मास के भीतर यदि दोनों सरकारों के मन्त्रियों में सीमा निर्धारण के बारे में कोई समझौता नहीं होगा तो 4 अक्तूबर, 1959 की संयुक्त विज्ञप्ति के अनुसार दोनों सरकारें नीचे (3 में) उल्लिखित ट्रिब्यूनल से अपने दावों के अनुसार सीमा निर्धारण के लिए मांग कर सकती हैं। वे अपने दावों के प्रमाण भी ट्रिब्यूनल के सामने प्रस्तुत फरेंगी। दिन्यूनल का निर्णय अन्तिम होगा और दोनों पक्ष उसे मानने के लिए बाध्य होंगे। 3- इस उद्देश्य के लिए युद्धविराम से तीन मास के भीतर ही एक ट्रिब्यूनल स्थापित किया जाएगा। इसमें तीन सदस्य होंगे जिनमें से एक भी भारत अथवा पाकिस्तान का नागरिक नहीं होगा। दोनों सरकारें एक- एक सदस्य मनोनीत करेंगी और तीसरा सदस्य जो कि अध्यक्ष होगा दोनों सरकारों द्वारा संयुक्त रूप से चुना जाएगा। यदि युद्धविराम से तीन मास की अवधि के भीतर दोनों सरकारें अध्यक्ष के नाम के बारे में सहमत न हो पाएंगी तो राष्ट्रसंघ के महासचिव को अध्यक्ष मनोनीत करने के लिए कहेंगी। ऊपर (3 में) लिखित ट्रिब्यूनल का निर्णय दोनों सरकारों के लिए मानना अनिवार्य होगा। और किसी भी आधार पर निर्णय के बारे में भापत्ति नहीं उठाई जाएगी। दोनों सरकारों के लिए ट्रिब्यूनल का निर्णय यथासंभव शीघ्र से शीघ्र लागू करवाना जरूरी होगा। यदि इन निर्णयों को लागू करने के बारे में कोई कठिनाई पैदा हुई तो वे ट्रिब्यूनल को फैसले के लिए दिए जाएंगे। इस उद्देश्य से ट्रिब्यूनल को निर्णय लागू होने के समय तक विघटित नहीं किया जाएगा। कच्छ समझौते का स्वागत देश द्वारा जैसा होना चाहिए या नहीं हुना। जनता के एक वर्ग ने उसे ब्रिटिश प्रधानमन्त्री की कूटनीति का शिकार होना बताया। अनेक स्थानों पर प्रतिपक्षी दलों ने उसकी मुखाल- लालबहादुर शास्त्री 103 फत में आन्दोलन चलाए । इन आन्दोलनों से शाति में लालवहादुर शास्त्री की निष्ठा हिगी नहीं । प्रधानमन्त्री-पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने प्रथम गन्देश में यहा, "परराष्ट्र नीति में हम मभी देशों सै, चाहे उनके विचार और राजनीतिक प्रणाली हममे भिन्न हो, मित्रता रखने और सम्बन्ध बढ़ाने का प्रयत्न करते रहेंगे। हमारी नीति अन्त- राष्ट्रीय गुटबन्दियो से अलग रहने की रही है और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों मे हमारा रुप और दूमरे देशों के साथ हमारा सम्बन्ध इमी युनियादी नीति पर आधारित होगा । अपने पड़ोसी देशों से हम अपने सम्बन्ध बढ़ाने का विशेष प्रयत्न करेंगे। अपने अधिकाग पड़ोसी मित्रो से हमारा मम्बन्ध मिमता और सहयोग का है । कुछ देशों के साथ कुछ मतभेद हैं। इन्हें हम पान्ति और मेल से, न्याय और आत्मसम्मान के आधार पर मुलझाने का प्रयास करेंगे।" शास्त्रीजी ने अपनी सरकार के सामने दो ही लक्ष्य स्थापित किए ये । एक यह कि देश के विभिन्न वर्गों में एकता स्थापित हो और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए देश आत्मनिर्भर हो जाए। साल किले में 15 अगस्त, 1965 को उन्होने राष्ट्र के नाम सन्देश में कहा था कि "हम रहें या न रहें यह झण्डा रहना चाहिए और मुझे विश्वाग है कि पह झण्डा रहेगा; हम और आप रहें या न रहे, लेकिन भारत का सिर ऊंचा होगा। भारत दुनिया के देशों में एक बहा देश होगा और शायद दुनिया को कुछ देभी सके।" इस देश को इस योग्य बनाने के लिए, कि आत्मनिर्भर होकर अपनी पापित और आध्यात्मिक शक्ति को पुनः प्राप्त करके एक नया सन्देश दे मके, उन्होंने अपने जीवन को प्रत्येक सांस या प्रयोग पिया। 1964 के अक्तूबर मास में उन्होने मुरुपमन्त्रियों के सम्मेलन में मुनाफापोरी के लिए कठोर व्यवस्था करने पर जोर दिया। शास्त्रीजी की नजर में कुछ हिरा नहीं था। फिर भी उनकी नीति दमन और उनीड़न की नहीं थी। राष्ट्रीय संकट के दिनों में उन्होंने अपनी सरकार से वै सभी उपाय मारने का आग्रह किया जिनके जरिये छिपा हुआ सोना बाहर आ जाए. चोरी में बचाया हुआ आयकर काने तहसानों से निकल बाहर आ जाए और उसके 104 लालबहादुर शास्त्री - सुपरिणाम भी सामने आए। कोई नहीं जानता था कि लालबहादुर शास्त्री धीरे-धीरे एक युद्ध-नेता के रूप में विकसित हो रहे हैं। किसी देश पर विजय प्राप्त करना उनका उद्देश्य नहीं था, वरन किसी देश के आक्रमण को सहन करना, और 1962 चीन-युद्ध के अनिर्णीत परिणाम को पुन: दोहराये जाने को राष्ट्रीय मनोवल के लिए वे व्याघात मानते थे। उन्हें यह भी मालूम था कि चीन ने पाकिस्तान के साथ सीमा-समझौता करके लद्दाख के लिए हमेशा के लिए एक ऐसा शत्रु खड़ा कर दिया है, जो अवसर आने पर इस इलाके को भारत से विच्छिन्न करने में उसकी सहायता कर सकता है। श्रीनगर-लेह राजपथे, जो भारत और लद्दाख को मिलाता है, ऐसे क्षेत्रों से गुजरता है, जहां से पाकिस्तानी चौकियां नज़दीक पड़ती हैं। वे चाहे जब हमारे रसद और सैनिक-सामग्री पहुंचाने वाले काफलों पर आक्रमण कर सकते हैं। 16 मई, 1965 को इसी राजमार्ग पर कब्जा करने के लिए करगिल से पाकिस्तानी आक्रान्ता आगे बढ़े और अन्धाधुन्ध गोलीबारी करके युद्ध- विराम रेखा से 8 सौ मीटर तक भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे। यह स्थान दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है जिसकी ऊंचाई 12, 13 और 24 हजार फुट तक है। रक्षा मन्त्रालय के सामने यह सवालं आया कि श्रीनगर-लेह सड़क पर हमेशा प्रतिरक्षात्मक कार्रवाई की जाए अथवा उसका इलाज खोजा जाएं । शास्त्रीजी चाहते तो चुप रह सकते थे । वे चुप नहीं रहे । परिणाम यह हुआ कि मेजर रणधावा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पहाड़ी युद्ध के कौशल, वीरता और दुर्दमनीय साहस का परिचय दिया और पाके की करगिल चौकी पर कब्जा कर लिया। उनका तर्क यहीं था कि अगर संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रेक्षक हमारी सूचनाओं के बावजूदं किन्हीं कारणों से युद्धविराम रेखा की मर्यादा को कायम नहीं रख सकते तो भारत अपनी सहायता स्वयं कर सकता है। 14 हजार फुट ऊंचा काला पहाड़, जो करगिल को सुरक्षित बनाए था, भारतीय सेनाओं ने रौंद डाला। ब्रिटिश और अंगरीको विदेश विभाग पुन: नींद से जोगे। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ने भारत सरकार से अपील करना शुरू कर दिया। अन्ततः 30 जून, 1965 को भारत ने करगिल को खाली कर दिया। संयुक्त राष्ट्र लालबहादुर शास्त्री 105 संघ को यह आश्वासन देना पड़ा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रेक्षक पाकिस्तानी गतिविधियों पर नजर रखेंगे और श्रीनगर-लेह राजमार्ग को किमी प्रकार की हानि नहीं होने देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या इस आक्रमण का उद्देश्य केवल यह था कि कश्मीर में उथल-पुथल पैदा करके उसपर मुजाहिदों द्वारा आक्रमण करा दिया जाए ? नहीं। भारत के प्रधानमन्त्री के सामने यह समस्या केवल प्रतिरक्षा समस्या बनकर नहीं आई थी। उनके सामने यह सवाल था कि सागपात सानेवाले देश के धोतीधारी प्रधानमन्त्री के बारे में पाकिस्तान और उसके मित्र पश्चिमी राष्ट्रों को यह गुमान था कि भारत इस पक्के के सामने विसर जाएगा। पाकिस्तानी 'बाज' यह अनुभव करते थे कि धर्म के नाम पर भारतीय मुसलमान पाकिस्तान के पक्ष में विद्रोह कर उठेगे। कश्मीर के मुसलमान विद्रोह कर लेंगे और भारतीय फौज के सक्रिय होने से पहले ही करमार पर पाकिस्तान का कब्जा हो जाएगा। पश्चिमी समाचारपत्रों के युद्ध संवाददाता काछ के संघर्ष के दौरान यह लिख चुके थे कि पाकिस्तानी सेना अपनी श्रेष्ठ रणसग्ना के सहारे भारतीय सेना को गाजर-मूली की तरह काट डालेगी। अमरीका के राष्ट्रपति ने लालबहादुर शास्त्री को निमन्त्रित करने, उसे स्थगित कर दिया था, क्योकि वे अनुभव करते थे कि इतना सा देश जिसकी कोई सैनिक हैसियत नहीं, वह वियतनाम में अमरीकी नीति को आलोचना करके 1955 के इण्डो-चाइना युद्ध में नेहरू ने जिस करार को समर्थन दिया था, उमीको दोहराने की जुरंत करता है। अमरीका द्वारा उत्तरी वियतनाम पर बमबारी को शान्ति का पातर मानता है। प्रिंटिग सरकार को यह गुंमान था कि भारत किसी भी उत्तेजना के मुकाबले में युद्धविराम रेसा को पार नहीं कर सकेगा और करेगा तो अम- रीकी पटनटैक और स्वर बेधी सैवरजेट उसे तहस-नहा कर देंगे। चीन युद्ध के दौरान भारत को अस्थायी प्रतिकूलता का अपमान भोगना पड़ाया, उसे पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने दिमाग में गहरा दंठा लिया था।
104 लालबहादुर शास्त्री सुपरिणाम भी सामने आए। कोई नहीं जानता था कि लालवहादुर शास्त्री धीरे-धीरे एक युद्ध-नेता के रूप में विकसित हो रहे हैं। किसी देश पर विजय प्राप्त करना उनका उद्देश्य नहीं था, वरन किसी देश के आक्रमण को सहन करना, और 1962 चीन-युद्ध के अनिर्णीत परिणाम को पुन: दोहराये जाने को राष्ट्रीय मनोवल के लिए वे व्याघात मानते थे। उन्हें यह भी मालूम था कि चीन ने पाकिस्तान के साथ सीमा-समझौता करके लद्दाख के लिए हमेशा के लिए एक ऐसा शत्रु खड़ा कर दिया है, जो अवसर आने पर इस इलाके को भारत से विच्छिन्न करने में उसकी सहायता कर सकता है। श्रीनगर-लेह राजपथ, जो भारत और लद्दाख को मिलाता है, ऐसे क्षेत्रों से गुजरता है, जहां से पाकिस्तानी चौकियां नज़दीक पड़ती हैं। वे चाहे जवे हमारे रसद और सैनिक-सामग्री पहुंचाने वाले काफलों पर आक्रमण कर सकते हैं 16 मई, 1965 को इसी राजमार्ग पर कब्जा करने के लिए करगिल से पाकिस्तानी आक्रान्ता आगे बढ़े और अन्धाधुन्ध गोलीबारी करके युद्ध- विराम रेखा से 8 सौ मीटर तक भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे। यह स्थान दुर्गम पहाड़ियों से घिरा है जिसकी ऊंचाई 12, 13 और 24 हजार फुट तक है। रक्षा मन्त्रालय के सामने यह सवाल आया कि श्रीनगर-लेह सड़क पर हमेशा प्रतिरक्षात्मक कार्रवाई की जाए अथवा उसका इलाज खोजा जाएं। शास्त्रीजी चाहते तो चुप रह सकते थे। वे चुप नहीं रहे । परिणाम यह हुआ कि मेजर रणधावा के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पहाड़ी युद्ध के कौशल, वीरता और दुर्दमनीय साहस का परिचय दिया और पार्क की करगिल चौकी पर कब्जा कर लिया। उनका तर्क यही था कि अंगर संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रेक्षक हमारी सूचनाओं के बावजूद किन्हीं कारणों से युद्धविराम रेखा की मर्यादा को कायम नहीं रख सकते तो भारत अपनी सहायता स्वयं कर सकता है। 14 हजार फुट ऊंचा काला पहाड़, जो करगिलं को सुरक्षित वनाएं था, भारतीय सेनाओं ने रौंद डालों ब्रिटिश और अमरीको विदेश विभाग पुन: नींद से जागे। संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव ने भारत सरकार से अपीलें करना शुरू कर दिया। अन्ततः 30 जून, 1965 को भारत ने करगिल को खाली कर दिया। संयुक्त राष्ट्र - - लालबहादुर शास्त्री 105 संघ को यह आश्वासन देना पड़ा कि संयुक्त राष्ट्रमंप के प्रेक्षक पाकिस्तानी गतिविधियों पर नजर रखेंगे और श्रीनगर-लेह राजमार्ग को किसी प्रकार को हानि नहीं होने देंगे। प्रश्न उठता है कि क्या इस आक्रमण का उद्देश्य केवल यह था कि कश्मीर में उथल-पुयल पैदा करके उसपर मुजाहिदों द्वारा आक्रमण करा दिया जाए ? नहीं। भारत के प्रधानमन्त्री के मामने यह समस्या केवल प्रतिरक्षा ममस्या चनंकर नहीं आई थी। उनके सामने यह सवाल था कि सागपात सानेवाले देश के धोतीधारी प्रधानमन्त्री के बारे में पाकिस्तान और उसके मित्र पश्चिमी राष्ट्रों को यह गुमान था कि भारत इस पक्के के सामने विसर जाएगा। पाकिस्तानी 'बाज' यह अनुभव करते थे कि धर्म के नाम पर भारतीय मुसलमान पाकिस्तान के पक्ष में विद्रोह कर उठेगे। कश्मीर के मुसलमान विद्रोह कर रखेंगे और भारतीय फौज के सक्रिय होने से पहले ही करीर पर पाकिस्तान को मजा हो जाएगा। पश्चिमी समाचारपत्रों के युद्ध संवाददाता कच्छ के संघर्ष के दौरान यह लिख चुके थे कि पाकिस्तानी सेना अपनी श्रेष्ठ रणसज्जा के सहारे भारतीय सेना को गाजर-मूली को तरह काट डालेगी। अमरीका के राष्ट्रपति ने लालबहादुर शास्त्री को निमन्त्रित करते, उसे स्थगित कर दिया था, क्योंकि वे अनुभव करते थे कि इतना शुद्ध देग जिसकी कोई सैनिक हैसियत नहीं, वह वियतनाम में अमरीकी नीति से आलोचना करके 1955 के इण्डो-चाइना युद्ध में नेहरू ने जिंस करार को समर्थन दिया था, उसीको दोहराने की जुरंत करता है। अमरीका द्वारा उत्तरी वियतनाम पर वमवारी को शान्ति का घातक मानता है । ब्रिटिश सरकार को यह गुमान था कि भारत किसी भी उत्तेजना के मुकाबले में युद्धविराम रेसा को पार नहीं कर सकेगा और करेगा तो अम. रीको पटनटंक और स्वर-वैधी संघरजेट उसे तहस-नहस कर देंगे। चीन युद्ध के दौरान भारत को अस्थायी प्रतिकूलताका अपमान भोगना पहा पा, उसे पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने दिमाग में गहरा बैठा लिया था।
106 लालवहादुर शास्त्री यही कारण था कि पाकिस्तान के चीन के साथ मंत्री कर लेने पर भी भारत को तरजीह नहीं दी जा रही थी क्योंकि वे मानते थे कि पाकिस्तान अधिक शक्तिशाली, पुष्ट और विश्वसनीय है। उन्हें यह बात कभी पसन्द नहीं आई कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अन्त- र्राष्ट्रीय जगत में अधिक धाक जमानेवाले मार्शल टोटो, अब्दुल जमाल नासिर, एन्क्रूमा, सुकर्ण और सेकूटोरे जैसे आग्नेय नेताओं में लालबहादुर शास्त्री का भी नाम जुड़ जाए। क्योंकि लालबहादुर शास्त्री ने राष्ट्रपति जानसन के कुछ ही दिन बाद अमरीका-यात्रा के निमन्त्रण को अस्वीकार करके भारतीय स्वाभिमान को प्रतिष्ठित किया था। भारत की शान्तिप्रिय नीति को अब तक दुर्बलता का सूचक माना जा रहा था। यह स्वीकार कर लिया गया था कि नेहरू के बाद देश को एकता के सून में बांधने की शक्ति किसी दूसरे भारतीय में नहीं है। चीन की चुनौतियों से डरकर भारत अपना कश्मीर पाकिस्तान को दे देगा, ताकि वे उसे उसकी गोद से निकालकर फिर अपनी गोद में बैठा सकेंगे। लालबहादुर के सामने केवल कश्मीर से मुजाहिदों को निकाल बाहर करना नहीं था, वरन् अन्दर और बाहर दोनों स्थानों पर निराशा, असमर्थता, दुर्वलता, धिक्कार, अपमान से भरे हुए वातावरण के खिलाफ खड्गहस्त होना था और यह काम आसान नहीं था। पाकिस्तान की तैयारियां एक दिन के लिए भी रुकी नहीं थीं। जाम- नगर में 7 सितम्बर को पाकिस्तानी कैनवरा वम्बार के मार गिराए जाने पर उसके चालक की डायरी में 15 अप्रैल को जो ताकीद दर्ज की गई थी, उसमें जामनगर, आदमपुर, हलवाड़ा, अम्बाला, पालम, आगरा और मुज पर प्रशिक्षण उड़ानें भरने का काम सौंपा गया था। 11 जून को सदर अय्यूब का फरमान जारी हुआ था कि 15 वर्ष की आयु से ऊपर के लड़कों को लाजमी फौजी तालीम दी जाए। 26 मई को पाकिस्तानी मेजर जनरल अख्तर हुसैन मलिक की देखरेख में घुसपैठियों का प्रशिक्षण शुरू हुआ। कप्तान या मेजर के कमान में इन सशस्त्र घुसपैठियों की आठ कम्पनियां तैयार हुई जिनके नाम रखे गए-खालिद, खिलजी, सलाहुद्दीन, कासिम, गज़नवी और वावर। इन टुकड़ियों के नायकों के सामने मुरी में सदर . - लासवहादुर शास्त्री 107 अय्यूब ने उत्तेजनापूर्ण भाषण किया था। जुलाई मास के अन्त में इन मुजाहिदों को धीरे-धीरे युद्धविराम रेगा फै पार उतारना शुरू कर दिया गया 14 अगस्त को मोहम्मददीन नाम के एक गुज्जर से मुजाहिदों की एक टुकड़ी गुलमर्ग के ऊपर दरम्मी घरागाह में मिली। उमे 4 सौ रुपये की उजरत देकर पय-प्रदर्शक के रूप में उसकी 'मेवाएं मरीदने का प्रस्ताव किया गया, लेकिन गुज्जर मोहम्मददीन इतने अधिक मुसल्लह बाहरी लोगों को देखकर चौंक उठा । उसका पहला माम था तन्मगं पाने में इन घुमपैठियो के बारे में सबर देना। इम स्थल मे 50 मील नीचे वे एक दूसरे कदमीरी नागरिक बजीर मोहम्मद से मिले। मेढर क्षेत्र में गुलाठी के पास एक गाव में रहनेवाला वजीर मोहम्मद भी इन घुसपैठियों को देखकर घबराया और उसने सैनिक पड़ाव में उनको उपस्थिति की सूचना पहुंचा दी। श्रीनगर को सूचना दे दी गई। घुसपैठियों की सोज जारी हो गई। पाकिस्तानी पड्यंत्र के कफन में दो कश्मीरी देशभक्त मुसलमानों ने आपिरी कील ठोंक दी। घुमठियो की योजना यह थी कि । और 5 अगस्त के बीच ये घुस- पंठिये चुने हुए केन्द्री पर इकट्ठे होगे। फिर घाटी में घुसकर जम्मू-श्री- नगर सड़क को काट डालेंगे। प्रत्येक वर्ष 8 अगस्त को घाटी के लोग पीर दम्तगीर साह्य के उस में शरीक होने के लिए श्रीनगर जाते हैं । मुजाहिदी की योजना थी कि इस भीड मे मिलकर वे श्रीनगर में दासिल हो जाएगे। 9 अगस्त को शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी की वर्षगांठ मनाई जाती थी। उस अवसर पर 'जनमत संग्रह मोर्चा' और 'एक्सन कमेटी' की तरफ से पाहर में प्रदर्शन किया जाना पा। इस भीड में मिलकर ये मास्त्र घुम- पंठिये सशस्त्र विद्रोह करके रेडियो स्टेशन, हवाई अड्डे तथा अन्य महत्व. पूर्ण केन्द्रो पर कब्जा करने वाले थे। एक दस्ता नोचे बढकर, और दूमरा ऊपर चढ़कर क्रमसः जम्मू-श्रीनगर और श्रीनगर-करगिल सडको पर कब्जा करके घाटी को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त करने वाले । इसके बाद स्था- मीय 'मो?' में से कुछ लोगो को लेकर 'जातिकारी परिषद्' का निर्माण किया जाना पा19 अगस्त कोथीनगर आकाशवाणी में परमीकी 108 लालवहादुर शास्त्री क्रांतिकारी परिपद्' की ओर से जंगे आजादी के लिए पढ़े जानेवाले पर- मान का मसविंदा तैयार करके रख लिया गया था। एक बार फिर कश्मीरियों ने पाकिस्तान के हाथों अपना उद्धार किए जाने से इन्कार कर दिया। इस जेहाद के सिलसिले में पाकिस्तान की ओर से 1963 में चार सौ अड़तालीस वार, 1964 में पन्द्रह सौ बाईस वार और 1965 में प्रथम सात महीनों में अठारह सौ बार युद्धविराम रेखा का उल्लंघन किया गया था। संयुक्त राष्ट्रसंघीय प्रेक्षक दल के जनरल निम्मो ने संयुक्त राष्ट्रसंघीय महासचिव क थान्त को अपनी रिपोर्ट में व्योरेवार पाकिस्तानी घुसपैठ का विवरण दिया था, लेकिन यह दुर्भाग्य था कि सुरक्षा परिपद् या ब्रिटिश-अमरीकी शिविर में भारतीय पक्ष को कभी नहीं सुना गया। बार-बार पाकिस्तान ने कश्मीर के मामले को सुरक्षा परिषद् में उठाया, जवकि शुरू से वही आक्रान्ता था। कश्मीर के प्रश्न पर कोई बातचीत न करने के संकल्प को भारत ने मुस्तैदी के साथ धारण किया तो आगे चलकर पाकिस्तान के विदेशमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा, "भारतीय कुत्ते सुरक्षा परिपद् से चले गए, लेकिन कश्मीर से नहीं !" इस अपमानजनक आचरण के खिलाफ किसीने भी प्रतिवाद नहीं किया ( अमरीका और ब्रिटेन के प्रतिनिधि चुपचाप बैठे रहे। उनके मस्तिष्क से पाकिस्तान को चीन के चंगुल से निकालने की बात अभी भी निकली नहीं। लालवहादुर शास्त्री को केवल पाकिस्तान के खिलाफ लड़ना नहीं था, उनके सामने भारत की प्रतिष्ठा और उसके अस्तित्व को कायम रखने का सवाल था। कश्मीर से घुसपैठियों को खदेड़ने के साथ क्या उन स्थलों पर भी कब्जा किया जाए जहां से वे भारतीय प्रदेशे पर आक्रमण करते थे? यह सवाल प्रतिरक्षा मंत्री और सेनापतियों के सामने था। लालबहादुर शास्त्री ने निर्णय किया कि हां। भारतीय सेना ने पर्वतीय युद्ध के कौशल और शौर्य का परिचय देकर 28 अगस्त के प्रांत: साढ़े दस बजे हाजीपीर पर किस तरह तिरंगा फह- राया, यह सैनिक इतिहास का ज्वलन्त उदाहरण था। यह वह दर्रा था जहां जून 1948 में हमारी फौजें अटक गई थी, लेकिन इस बार पाकिस्तान मानबहादुर शास्त्री 109 को भयंकर हमलोवामुंहतोड़ जवाब देकर भारतीय सेना ने 10 मितम्बर तक उड़ी-पंछ पंक्ति को सीधा करके अपने अधिकार में ले लिया। पाकिस्तान की चाल खुद ही मान खा गई थी। पाकिस्तान ने पहलो मितम्बर को प्रात: चार बजे उम्ब क्षेत्र पर जबदस्त आक्रमण कर दिया। उनका इरादा पा कि इस इलाके में मंबर- जेट विमानों की रक्षा में उनके पंटन टेक अखनूर और जम्मू पहुंचकर कश्मीर से भारत के रेल और सहक मागों को सरम कर देंगे । इरादा यह भी था कि कमूर-रोमकरन मोर्चा पोनकर अमृतसर को घेर लगे और ग्राण्ड ट्रंक रोड से सीने दिल्ली पहुच जाएगे। भारत की राजधानी में यह कल्पना नहीं की गई थी कि पाकिस्तान इतना भयानक कदम उठा सकता है। प्रारम्भ में छम्व और मेमकरन- पमूर मोर्चे पर भारतीय नेना को पीछे हटना पड़ा । भारत के सामने फिर यह घुनौती आई कि क्या पाकिस्तान के खिलाफ फेवल रक्षात्मक युद्ध किया जाए । महासचिव कथान्त ने 2 मितम्बर को भारत और पाकिस्तान से युद्ध रोरने की अपील की। अगले दिन सुरक्षा परिषद् के सदस्यों के मामने उन्होंने करमीर के बारे में रिसेट पेश करते समय यह असमधंडा प्रकट की कि पाकिस्तान से ऐसा कोई आश्वामन नहीं ले सकते कि यह पुलविराम और युद्धविराम रेखा की प्रतिष्ठा करेगा। प्रोन के विदेशमत्री माशंत घेन यी 4 सितम्बर को कराचो पहुचे और 6 घण्टौं तक मुट्टो से कान्रा करते रहे। 5 सितम्बर को अमृतसर पर संवरजेटों से पाकिस्तान ने हमला किया। भारत द्वारा संकल्प धारण करने की पड़ी निकट माती गई। भारत के लघ्वाकार प्रधानमंत्री ने हिमा. मय में भी ऊंचे संकल्प पारण करने को चुनौती स्वीकार की। रक्षामंत्री और स्थल सेनापति में उनके सामने पाकिस्तानी सेना की चाल का मान. विष पेश कर दिया था। उन्होंने मुकाबले के लिए यानी योजना भी ए दी थी, जिसके भनुमार भारतीय मेना को तिहरा मोर्वा कायम करके साहौर की तरफ बड़ना था। इस निश्चय के परिणाम में में सुपरिचित । उन्होने अपना निर्णय दिया और कहा कि मनिक दृष्टि में जो ब्रहरी है. वह किया जाए। फिर भारतीय केना मे नाहौर पर आतमा किया।
110 लालबहादुर शास्त्री दरा इलाके में पाकिस्तान की बढ़ती हुई सेनाओं को रोकने के लिए दूसरा मोर्चा खोला गया। भारतीय सेनाएं लाहौर के फाटकों से जा टकराई। पश्चिमी ताकतों ने फिर कहा कि भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण कर दिया । वहादुर भारतीय जवानों ने अपने शोर्य से पैटन टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया। भारतीय वायुसेना ने अमरीकी संवरजेटों का अभिमान ठंडा कर दिया। लध्वाकार प्रधानमन्त्री ने यह साबित कर दिया कि वह चुनौती आने पर भारत की सोई वीरता को जगा सकता है विजय के उन्माद में कभी-कभी बड़े-बड़े दिमाग भी भ्रमित हो जाते हैं । लालबहादुर शास्त्री के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ। उन्होंने तब के पूर्वी पाकिस्तान (बंगला देश) के खिलाफ कदम नहीं उठाया। उनका इरादा केवल यह प्रदर्शित करना था कि पाकिस्तान इस भ्रम से मुक्त हो जाए कि कश्मीर को हथियार के ज़ोर से ले सकता है । उन्होंने अमरीकी सरकार को कहा कि वह पाकिस्तान को दिए अमरीकी शस्त्रास्त्रों का दुरुपयोग करने से रोके। ऐसा नहीं किया जा सका। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 260 पंटन टैंकों में से 245 को नष्ट कर दिया । पाकिस्तान के कुल 8 सौ से 1 हजार टैंकों में से एक तिहाई से आधे तक तो नष्ट हो गए या पकड़े गए । वायुसेना से भी पाकिस्तान को विभिन्न श्रेणियों के लड़ाकू विमानों को हानि उठानी पड़ी जिनमें 47 सैवरजेट भी शामिल थे। उनकी युद्ध शक्ति शिथिल पड़ती जा रही थी, जबकि भारत ने अपनी पूरी शक्ति का एक तिहाई भी इस्तेमाल नहीं किया था। पाकिस्तान लड़खड़ाने लगा था। भारत का उद्देश्य इससे अधिक नहीं था। वह चाहता था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव द्वारा की गई युद्ध- विराम की अपील को मंजूर कर ले । भारत 14 सितम्बर से ही युद्धविराम करने के लिए राजी हो गया था कि सहसा चीन की तरफ से 16 सितम्बर को एक अन्तिमेत्थम आया। चीन ने कहा कि सिक्किम-तिब्बत सीमा पर भारत ने तिब्बत में सैनिक अड्डे बना लिए हैं और उसके सैनिकों ने 59 याक तथा 8 सौ भेड़ें चुरा ली हैं। तीन दिन का वक्त भारत को दिया गया कि वह इन सैनिकों के अड्डों को गिरा दे तथा याक-मेड़ें लौटा दे। इस चाल के पीछे भारत को भयभीत करना और पाकिस्तान को उकसाना था।
सालबहादुर शास्त्री 111 लालबहादुर शास्त्री ने इस अन्तिमेत्यम के सामने झुकने की बजाय चीन के साथ भी निपटने का संकल्प प्रकट कर दिया । पाकिस्तान के घुटने टूट चुके थे। वह चीन से निराश हो गया। पाकिस्तान द्वारा युद्धविराम प्रस्ताव स्वीकार करते ही चीन ने पोषित किया कि भारत ने संनिक अह गिरा दिए हैं। 22 सितम्बर तक चीन के माक्रमण का इन्तजार करके जुल्फिकार अली भुट्टो ने शाम को युद्धविराम के लिए सहमति प्रकट की। वास्तविक युद्धविराम 23 मितम्बर के प्रात: 3 बजकर 30 मिनट पर हुआ। 22 दिन के आधुनिक महाभारत में लालबहादुर शास्त्री विजयी हुए। मुरक्षा परिषद् ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया कि दोनो देश 5 अगस्त वाली सीमा- रेसा पर यापत हो जाए । संयोग से इस प्रस्ताव पर रूस ने भी सहमति- सूचक हस्ताक्षर किए थे। युद्ध समाप्त होने के याद भी वेचनी निरन्तर बनी हुई थी। पिछले अनुभव के आधार पर यह यहा जा सकता था कि पाकिस्तान गहे जय पुन: युद्ध बारम्भ कर सकता है। देश के मामने आन्तरिक एकता बनाए रखना और हर वक्त युद्ध के संकट के लिए तैयार रहना जरूरी था। लालवहादुर शास्त्री अपनी निस्मीम मानसिक और शारीरिक शक्ति का परिचय दे रहे थे। वे मभी राजनैतिक दलों का विश्वास प्राप्त कर चुके पे। भारतीय राष्ट्र का हर कील-काटा पुस्ता हो गया। भारतीय मुसल. मानों ने अपनी राष्ट्रीयता को मन्देह से ऊपर उठा दिया। भारतीय सेना के जवानों ने भारतमाता का हर अदा कर दिया । इन वोरी में अन्दुल हमीद जैरो तोपची भी थे, जिमने अकेले तीन पाकिस्तानी पंटन टेको को विध्वस्त करके परम वीरता का परिचय दिया। राष्ट्रीय प्रनिभा अपनी रामप्रता को प्राप्त हो गई। पश्चिमी राष्ट्र जो भारत को दुर्वल समभते थे, आश्चर्यचक्ति होकर हमारे पराक्रम को देखते रह गए। वास्तव में भारत-पाक युद्ध के बाद पहली बार पश्चिमी देशो ने यह अनुभव रिया कि यह देश भर आजाद हो गया है और उसे प्रतिकुल गो पर अपना अनुगामी नहीं बनाया जा सकता । लालबहादुर शास्त्री ने राष्ट्र की धमनियों में प्राण 112 लालवहादुर शास्त्री फूंक दिए । उन्होंने 'जय जवान, जय किसान' के नारे को राष्ट्रीय चेतना का रूप दिया। शास्त्रीजी की दृष्टि में देश की रक्षा-शक्ति और खाद्यान्न उत्पादन का सर्वाधिक महत्त्व था और उन्हें सबसे बड़ी चिन्ता यही थी कि रक्षा- शक्ति तथा खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में देश पूर्णतया आत्मनिर्भर वन जाए। अपने भाषण में श्रीशास्त्री ने शान्ति की आवश्यकता पर भी बहुत ज़ोर दिया था । एक अवसर पर उन्होंने कहा था कि "आज मानव जाति के सामने सबसे बड़ी समस्या है शान्ति की स्थापना और निःशस्त्रीकरण । अगणित पीढ़ियों से मानवता को शान्ति की कामना है। राष्ट्रसंघ के सामने सबसे बड़ा काम यही नहीं है कि युद्ध का बहिष्कार किया जाए बल्कि यह भी कि युद्ध नाम की चीज़ को असम्भव बना दिया जाए।" युद्ध के दौरान शास्त्रीजी ने एक महान युद्ध नेता की तरह देश का मार्गदर्शन किया। अक्तूबर मास में वे अग्रिम सैनिक मोर्चों पर भी गए और वीर सेनानायकों का उन्होंने हौसला बढ़ाया। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे अपने छात्र जीवन में महाभारत के पात्रों का अभिनय करने वाला वहादुर विद्यार्थी मंच से उठकर वास्तविक समर-भूमि में उतर आया है। वे जहां कहीं जाते जवानों में स्फूति आ जाती । यह आश्चर्य की बात है कि इतने भयंकर क्षणों में भी उनका चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिला रहता था। वे ही लोग जो फिल्मी पर्दे पर उनकी तस्वीरें देखकर हंसते थे, अव श्रद्धा व हर्षोन्माद में भरकर करतलध्वनि करते अचाते नहीं थे। फिर भी वे जानते थे कि शान्ति ही मनुष्यता का स्थायी भाव है, मानवीय सुख एवं समृद्धि का एकमात्र साधन है। भारत के लिए यह शांति नितान्त आवश्यक थी। उन्होंने युद्धविराम के तत्काल बाद ही रूस के प्रधानमन्त्री कोसीगिन का आमन्त्रण स्वीकार कर लिया था कि वे उनकी मध्यस्थता में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खां से मिलकर स्यायो शांति की खोज करेंगे। पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने कोसीगिन का आमन्त्रण स्वी- कार कर लिया, लेकिन उनकी ज़िद यही थी कि दोनों देशों के बीच झगड़े का कारण कश्मीर है । वार्ता में कश्मीर प्रश्न पर निर्णय होना जरूरी है। लान सातबहादुर शास्त्री 113 लालवहादुर शास्त्री वार-बार यह पोपित कर चुके थे कि परमीर भारत का अभिन्न अंग है और वे किसी भी दात पर अपनी सार्वभौम रासाका समर्पण करने के लिए तैयार नहीं हैं। आसिरफार वह दिन आया जय शास्त्रीजी ने यह स्वीकार किया कि वेताशकंद जाकर रूसी प्रधानमन्त्री कोसीगिन की मध्यस्थता में प्रेसिट अय्यूब से समझौते के बारे में बात करेंगे। 3 जनवरी को प्रधानमन्त्री ताशकंद वार्ता के लिए भारत से रवाना हुए। उनके साप रक्षामन्त्रीधी यशवन्तराय पहाण और विदेशमन्त्री सरदार स्वर्णसिंह गए थे। यह घोषणा रूम के प्रधानमन्त्री श्री एलेफरोई कोसोगिन की महान फूटनीतिक विजय मानी गई । उन्होंने इस अभिशप्त वार्ता को पूरी तरह भंग होने की स्थिति से बचाकर बड़ी चतुराई और धैर्य से रातोंराम ऐगा समझोता तैयार करा लिया जो भारत-पाक गतिरोध को कम करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो। प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री तथा राष्ट्रपति अय्यूम सा दोनों ने ही श्री कोसोगिन की मूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि शक्ति प्रयोग के त्याग के प्रश्न पर पैदा हुए गतिरोप को मंग परने में उन्होंने साधारण सूझ बूझ तथा राजनीतिक युगलता का परिचय दिया। उजवेक मन्त्रिमण्डलीय कक्ष में जहां 4 जनवरी को इस वार्ता का प्रारम्भ हुआ था, वही पर आयोजित एक ऐतिहासिक समारोह में थी कोमोगिन की उपस्थिति में प्रयानमन्त्री श्री शास्त्री सपा राष्ट्रपति अम्यूम माने ताशकंद घोपणापत्र पर हस्ताक्षर किए। नई ताशकंद भावना को प्रतिविम्वित करते हुए तीनों मेता गुसरात हुए एक-दूसरे से हाथ मिलाते हुए टेलीविजन यमरा के सामने खडे रहे। ताशकंद से प्रसारित टेलीविजन व्यवस्था द्वारा सारे यूरो मे हम समारोह को दिया गया तथा भारत-पारिस्तान में इसका विवरण रेडियो पर गना गया। नाशकद-पोषणा में यूटनीतिक सम्बन्ध पुनः स्थापित पर मी, व्यापार तथा संचार-व्यवस्थापन, प्रारम्भ करने पी, जानकी गई सात बादि लोटाने की, युस्यन्दियो पोपोटाने को सतापूर्ण प्रधार बन्द यसै 114 सालबहादुर शास्त्री मीराथा सा स्थिति निर्माण करने को नायरथा गी गई जिससे भारत शामागिरतानबीच लोगोंगा निलमण न हो। पूरा दिन और राह में देर राम श्री मोतीगिन श्री बास्मी तथा राष्ट्र- पनि अयूब से लगातार वार्ता करते रहे और रात में गारीव सेन बजे पागित- प्रगोगन गारोबार में गंदा गतिरोध गो गंग गारने में सफल हुए। गारी रास जगगार ने रामभाग विभिन्न अंगों को मात्र गारने लगे र गगनति गा अंतिम प्रारूप, उसपर हरताक्षर होने से भारीच एक घण्टा पूर्ण ली तयार हुआ था। (1) गारा प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान राजपति एग विषय में राम गिदोनों पक्ष रांगुगा रारदारांप गो गोषणापत्र अनुगान आपरा में अपर पोसियों की तरह रहने गा हर सम्भव प्रयास गरें। शहरांतीग गोषणायन अनुसार, ये आपसी विवादों को निपटाने के लिए माणित-प्रयोग न गारो शरिपूर्ण उगागो गो गाग में लाने में अपने दायित्व गो बार फिर रवीगार गारो है। लमहरारा गरी ६ fin भारत-पाय उपमहाद्वीपों में शांति स्थापना राशा दोनों की जनता माहित-साधन योगों के बीच तनाय जारी रहने से संभव नहीं।गी पृष्ठभूमि में जम्मू-गीर प्रक्षा पर बहरा हुई और दोनों देशों का प्रतिनिधियों ने अपने-अपने पक्ष की स्थापना की। (2) भासा मे प्रगानमंत्री तथा पागिरता राष्ट्रपति इरा घात पर भी राहगाह कि दोनों देश अपनी-अपनी सारन रोगाभोंगो 25 पर- परी, 1966 15 अगरा, 1965 की स्थिति पर चापरा धुला लें और गुलनिराम रे पर गायम रहगार गुसपिराग गीतों को निभाएं। (3) भारत प्रगतिशी पागिरतात राष्ट्रपति परा भात पर राहगा हो गया कि भारत और पाकिस्तान: आपसी सम्बन्ध एग- दुसरे गे सायमी मामलों में हरतक्षेप गाने की नीति पर आधारित होंगे। (4) भाराप्रपानगंगीतमा गागिरकान में राष्ट्रपति रा बात पर राहगा गिधोनों पक्ष एक-दूसरे मे विरार गिराए जा रहे हर किस्म प्रगार गो रोगोंगे जोर ऐरो प्रचार को प्रोत्साहन यंगे जिरारो पोनों देशों लानबहादुर शास्त्री 115 की जनता में मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के विकास में महायता मिले। (5) भारत के प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात के लिए भी गहमत हो गए हैं कि पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुका तथा भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त, दोनों अपने-अपने पदों पर मोट जाएंगे और दोनों देशों के कूटनीतिक अभिकरण सामान्यरूपेण कार्य शुरू कर देंगे। कूटनीनिक सम्बन्धों के निर्वहण के सम्बन्ध में दोनों देश मन् 1961 के वियना-मम्मेलन के प्रस्तायों का पालन करेंगे। (6) भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति दोनों देशों के गीच आर्थिक एवं व्यापार-मम्बन्धों, संचार-गेवाओं एवं सांस्कृतिक विनिमय को फिर से जारी करने के सम्बन्ध में कदम उठाने के लिए भी सहमत हो गए हैं। यही नहीं, भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच वर्तमान ममझौते को पूरा करने की दिशा में प्रयास करने के लिए दोनों नेता सहमत हैं। (7) भारत के प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इरा यान पर भी सहमत हो गए हैं कि वे दोनों पक्षों के युद्धबंदियों के प्रयाण के सम्बन्ध मे अपने-अपने पक्ष के सम्बद्ध अधिकारियों को निर्देश देंगे। (8) भारत के प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात के लिए भी गहमत हो गए हैं कि दोनों पक्ष शरणाथियो, निकामितो एवं अवैध देशान्तरण से सम्बद्ध समस्याओं पर वार्तालाप जारी रमंगे। इस धात पर सहमत हैं कि दोनों देशो के लोगो के सामूहिक देशान्तरण को रोकने के लिए आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण परेंगे। दोनों नेता (हान ही के) संघर्ष के सिलसिले में जान की गई गापत्ति एवं धन-माल आदि लोटाने के सम्बन्ध में भी बातचीत करने के लिए सहमत हो गए हैं। (9) भारत के प्रधानमंत्री सपा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात पर भी सहमत हो गए हैं कि दोनों पक्ष आपमी हित के मामलों पर गौर करने के लिए उच्चतम स्तर पर एवं निचले स्तरों पर भी मिलने-जुलसे रहेंगे । माझी रामम्याओं के सम्बन्ध में आगे क्या-क्या कदम उठाए जाएं, इस मुद्दे पर निरलर प्रतिवेदन प्रस्तुत करते रहने के लिए दोनोपरा भारत-पाक के सांझे संगठनों एवं ममितियों को स्थापना की ।
116 लालबहादुर शास्त्री पर भी सहमत हैं। (10) भारत के प्रधानमंत्री तथा पानिस्तान के राष्ट्रपति सोवियत संघ के नेताओं, सोवियत सरकार एवं व्यक्तिगत रूप से गोवियरा गंध मी मंत्री-परिषद के अध्यक्ष के प्रति, दोनों पक्षों (गारत व पाविरतान) मे लिए संतोषप्रद सिद्ध होने वाली इस बैठक को बुलाने में लिए उगगी रचनात्मक मंत्रीपूर्ण और आदर्श भूमिका को लिए अपना भागार प्रगाट करते हैं। वे उजवेकिस्तान की सरकार तथा जनता के प्रति भी मध्ये हृदय से, उनकी उदारतापूर्ण एवं भावभीनी मेहमाननवाजी गे लिए अपना आभार प्रकट करते हैं । वे गोवियत संघ की मन्त्री परिषद् को अध्यक्ष यो इस घोषणापत्र के गवाह को रूप में आमन्त्रित करते हैं। यह समझौता ऐसा नहीं था, जैसे उससे पूर्व भागा और पाकिस्तान के बीच हुए दूसरे समझौते थे । इस समझौते के अनुगार. दोनों राष्ट्र एका- दूसरे को नृमि से पीछे ही नहीं हट जाएंगे, ये राजनयिक सम्बन्धों को पुनः प्रारम्भ करके घृणा और विद्वेषपूर्ण प्रचार के रास्ते में बिलगुन हट जाएंगे। दोनों देशों के मध्य सांस्कृतिक सद्भावना उत्पन्न पारने के लिए पूरी कोगिग की जाएगी। राष्ट्रपति अय्यूब ने दिवंगन प्रधानमंत्री गगाय के समक्ष खड़े होकर ये गन्द याहे हैं कि मास्त्रीजी बगन गे: लिए गुर्वान हो गा। उन्होंने यह स्वीकार किया है कि दो देशों के ताल्लुमान ग बान पर, निर्भर करते हैं कि उनके नेताओं के बीच यंगे नाल्लुकात रही है। शास्त्री जी ने असम्भव दिखाई पटने वाली स्थिति को अपनी यात्मिक तेजोमयता से बदला है । यह परिवर्तन स्थायी होगा। दोनों देगों के बीन की गमस्याओं को दायित का सहारा विना लिए मुलमाने या अहद, मिर्फ एकाइया बात नहीं है। समस्याएं, अनेक हैं। उनके निराकरण को मान्निपूर्ण मागं मी ग्लोज करने के लिए मन्त्रियों तथा सम्बन्धित अधिकारियों पोसार पर निरन्तर बातचीत होगी। अतीत में दोनों देशों के मंत्रियों और अधि- कारियों के बीच बातचीत हुई, लेकिन पाकिस्तान की ओर से ये याने विफलता और विपमता उत्पन्न करने फलिाही की जानी थीं। गवार के समझौते के पीछे घनघोर लदाई का कल्या नजुर्वा है, और अगन ग. लिए वैचनी भी । पाकिस्तान द्वारा प्रकट की गई मद्भावना और गहकार लालबहादुर शास्त्री 117 एक बार फिर हार्दिकता के साथ दीवार करना चाहिए। संदेह और अविश्वास के रहने पर देश के जवानों और प्रधानमन्त्री की शहादत अगरय जा सकती है। ताशकन्द घोषणा को स्वीकार न करने का विकल्प कोई पा ही नहीं। यो गुलजारी लाल नन्दा ने यह स्वीकार किया कि वे इस घोषणा का पूर्ण पालन करेंगे। लेकिन कांग्रेस सरकार के पालने से पूरी बात नहीं वन माती। समझौते की सफलता के लिए हानि-लाभ का जायजा लेने से अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भाषी सम्बन्धो के सुधार के लिए पूरा देश कसा वातावरण बनाता है। विश्वास और सौहार्द का सम्बन्ध केवल, शामक दल द्वारा नहीं बनाया जा सकता। जनता द्वारा दिखाया गया सौहाद वामान काल के लिए ही नहीं भविष्य के लिए भी यह विश्वास पंदा करता है कि आज जिस चीज को सही माना जाता है, उसे मल नी सही माना जाएगा। समझौते को स्वीकार करते समय यदि, पाकिस्तान के सामने पश्चिमी ताकतों और रूस की सद्भावना सोकर पूर्णत: चीन पर निर्भर करने का खतरा था, तो भारत के सामने भी उससे कम खतरा नहीं है। आज की स्थिति की विषमता और कल के लिए अनुकूलता उत्पन्न करने का एक ही उपाय है कि ताशकन्द घोषणा का समूचा देवा पालन करे। इसी भावना से अपने प्रधानमंत्री के महान बलिदान को प्रतिप्ति किया जा सकता है और भारत शाति का सेनानी बनने का गौरव प्राप्त कर सकता है। ताशकन्द वार्ता के रूप में राष्ट्रीय समृद्धि के राज-पथ का निर्माण करने वाले सालबहादुर शास्त्री के लिए कोई अमित्र नहीं था। वाता ममाप्त होने पर सालवहादुर शास्त्री ने राष्ट्रपति बम्यूब खां ने हाथ मिलाया और अस्पन्न सौहार्दपूर्वक एक-दूसरे से विदाई भी बारित "सुदा हाजि! द्वारा दिए गए भोष के अवसर पर अय्यूब खां ने कहा था-- "शुदा हाफ़िल " शास्त्रीजीने उत्तर दिशा मानन्द रिहा "अच्छा ही हो गया।" "खुदा अच्छा ही करेगा!"बर हामि।
'118 लालवहादुर शास्त्री । राष्ट्रपति अय्यूब खां ने कुछ बातें वार्ता के दौरान उठाई थीं, वे उनका जवाब जल्द से जल्द चाहते थे। शास्त्रीजी ने उन्हें जल्द से जल्द जवाव देने का वायदा किया था। उसके बाद दोनों ने सोवियत प्रधानमंत्री कोसीगिन और उजवेकिस्तान की राष्ट्रपति श्रीमती नसरुद्दीनोवा से हाथ मिलाए और अपने-अपने ठहरने के स्थान के लिए रवाना हो गए। महाप्रयाण सम्पूर्ण राष्ट्र उनके स्वागत की तैयारियां ही कर रहा था कि सहसा यह समाचार मिला कि हृदय को गति रुक जाने से लालबहादुर शास्त्री का देहावसान हो गया ! ताशकन्द समझौते पर हस्ताक्षर किए केवल नौ घन्टे गुज़रे थे। रात्रि को उन्होंने एकाकी भोजन किया था। 11 वले सोने चले गए । एक वजकर बीस मिनट पर उन्हें खांसी आई, कुछ बेचैनी मह- सूस हुई। तत्काल वे अपने चिकित्सक डा० चुग के कमरे में गए। यहां पहुंचते ही वेहोश हो गए। डा० चुग और सोवियत विशेषज्ञों ने शास्त्रीजी के प्राणों की रक्षा करने की सभी कोशिशें की, लेकिन उन्हें कामयावी हासिल हो न सकी। डा० चुग के कमरे में पहुंचने के कुछ ही मिनट बाद वे संसार से चले गए। यह समाचार भारत के लिए ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के लिए वज्राघात के समान प्रतीत हुआ। ताशकन्द-यात्रा पर रवाना होने से पूर्व उनके दामाद कौशलकुमार ने पूछा था कि वापसी कब होगी तो शास्त्रीजी ने कहा था, "मुझे, पता नहीं कब लौटूंगा।" वे युद्ध के मैदान में गए तो देश का मस्तक विजयश्री से मण्डित करके ही चैन लिया। शांति का समर शस्त्रों से लड़े जानेवाले युद्ध से कहीं कठिन होता है। वे ऐसे राजपूत की तरह गए जो वापस न आने के लिए विदा होता है। उन्होंने कहा था, "अब हमें शांति के लिए उसी साहस और संकल्प के साथ संघर्ष करना है, जिससे हमने आक्रमणकारी का मुकाबला किया।" उन्होंने अपना हर वचन पूरा किया। अपने प्राणों की बाजी लगाकर
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120 लालवहादुर शास्त्री काल को गौरव का समय बना दिया। प्रतिभा और विवेक से युक्त, वक्त की चुनौती और संकट का सामना साहस के साथ करने वाले शास्त्रीजी मनुष्य के स्तर से उठकर फरिश्तों की श्रेणी में पहुंच गए। वे इतने विनम्र एवं शांतचित व्यक्ति थे कि उनसे मिलते ही ऐसा लगता था कि जीवन के कटु अनुभवों और हृदयहीन यथार्थों से उनकी रक्षा करने की आवश्य- कता है। देश और शांति का यह अनन्य सेवक जीवनपर्यन्त अपने लिए न जीकर दूसरों के लिए ही जिया । अन्तिम विदाई के समय उसके पास न धन था, न जमीन-जायदाद । आरम्भ से लेकर अंत तक श्रम, धीरज और तपस्या ही उसकी पूंजी थी। उस पूंजी को उसने दिल खोलकर लुटाया । यही पूंजी उसने अपने परिवार और मनुष्यता के लिए उत्तराधिकार के रूप में छोड़ी। भारतीय इतिहास में ऐसे महापुरुषों की संख्या बहुत कम ही है जिन्होंने इतने थोड़े समय में मनुष्यता के लिए इतनी अधिक उपलब्धियां प्राप्त की हों। दलितों, पीड़ितों और साधनहीन लोगों के लिए उनका जीवन-वृत्त अंधेरे में जलते हुए चिरागों की तरह जीवन के महान राज- पथ की ओर संकेत करता रहेगा। मानव-बुद्धि को चकित कर देनेवाली क्षमताओं से सम्पन्न इस लघु आकार मानव के प्रति इतिहास सदैव कुतूहल से देखता रहेगा। उनके बाद कभी कोई आदमी अदना नहीं समझा जाएगा । अभागों के सौभाग्य-सूर्य को विपदाओं और अभावों के वादलों में से चमका देने वाले लालबहादुर शास्त्री की भारतमाता के उन छोटे पुत्रों में गणना की जाएगी, जो बुढ़ापे की टेक बनते हैं । वे चले गए, परन्तु उनकी प्रतिच्छवि मनुष्यता के अन्तस्थल में बस गई है। अतः वे गर नहीं, स्थूल से सूक्ष्म वनकर हमारे बीच अन्सान हो गए हैं। क्योंकि आत्मा कभी मरती नहीं लालबहादुर सी म तिहास के सन्धान को सदैव सुरक्षित करते रहेंगे : -
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