Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shripal Raja Ka Raas (sachitra)

Shri Jinharshji Gani · 2010/09

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श्रीपाल.
द्रव्यस०
शुभ नाम
॥२॥
द्रव्यसहायकोंके शुभ नाम-
४२५ शा० ताराचंदजी तगाजी, चूंडा, मारवाड,
५० शेठ मूलचंदजी सोभागमलजी फलोधीवाले, मुंबई.
१०१ शा० छोगमलजी नथाजी, चूंडा
४१ शा० मोतीजी उदाजी, पादरली, मारवाड.
१०१ झवेरी-केसरीचंद कल्याणचद, सुरत,
३१ शा० खिमाजी छगनलाल, चूंडा.
१०१ शा० जीताजी खुमाजी, कवरारा, मारवाड.
२५ शा० जेरूपजी लखाजी, चांद्राई.
१०० शेठ किसनलालजी संपतलालजी लूणावत, पाली, मारवाड.
२५ शेठ फतेचंदजी सीहाल, पाली, मारवाड.
५१ शेठ गणेशमलजी सोभागमलजी, मुंबई
२५ शा० शिवाजी वाघाजी, खिवाणदी
५१ शेठ भीमराजजी देवीचदजी, तींवरीवाले, मुंबई.
२५ शा० मोणसीभाइ वीरचंद, कच्छभुज.
५१ शेठ हरखचंद शिवजी, कच्छभुज.
२१ शा० सेसमलजी हंसाजी, पादरली, मारवाड.
५१ शा० भीकमचंदजी नवलाजी, चूंडा, मारवाड
११ शा० पूनमचंदजी गुलावचंदजी, दूझाणा, मारवाड.
५१ शा० फोजमलजी कपूरचंदजी, शिवगंज
५ शा० दलीचंदजी नाथाजी, दूझाणा.
५१ शा. केसरीमलजी नरसींगजी, गुडाबालोतरी.
५ शा० रतनचंदजी धूलाजी, गुडाबालोतरा.
५१ शा० माणकचंद थावरभाइ (स्वबंधु मोहनलाल थावरभाइके सर ५ शा० फोजमलजी केशाजी, सेवाडी.
णार्थ), कच्छमांडवी.
४ शा० प्रतापमलजी चुनीलालजी.
५१ शेठाणी फूलकुंवरबाई, कलकत्ता.
३ शेठ रिद्धिलालजी, मुउनवाला,
॥२॥

समर्पण.
॥
समर्पण-
बादलब्धिममलंकृत विद्वशिरोमणि शमदमाद्यनल्पगुणगणरत्नभंडार अनुयोगाचार्य पश्यासप्रवर
परमपूज्य प्रातःम्मरणीय गुरुदेव श्रीमत् केशरमुनिजी महाराज !
आपने उस बालकको आबालकालसे निरंतर अपने पास रखकर ज्ञानादिक गुणोंमें स्थिर रहने के लिये जो अनुपम
प्रयास किया, हरएक वसत विविध प्रकारकी शिक्षाओं द्वारा उन्मार्ग प्रवृत्तिसे बचाया, और पापाणसम हृदयकोभी ज्ञानां-
कुरोंमे पाठवितकर माहित्यसेवाका अनुरागी बनाया, इत्यादि असीम उपकारोंकी स्मृतिमें आपकाही संपादित व संशो-
धिन और आपके ही अमृतमय उपदेशसे प्रकाशित होता हुआ यह ग्रंथरत्न "श्रीपाल राजाका रास” आपहीके स्वर्गीय
पुण्यात्माको विनय भक्ति श्रद्धापूर्वक विनम्नभावसे सादर समर्पित है.
विनीत-
आपका चरण सेवक
बुद्धि
ला
॥३॥

श्रीपाल.
प्रस्तावना-
-
प्रस्तावना
॥४॥
जनवमें माी ऐसी वस्तु है कि-जिसके आराधनसे जीव संमारममुद्रसे पार हो सकता है । धर्मागधनके विविधप्रकागेम
नापागधननी एक है. जो मबमें प्रधानता पाया हुआ है, उस नवपदकी महिमागर्भित यह श्रीपाल राजाका रास आज पाठकोंके
मामने रखा जाना है, जोति-विक्रम संवत् १६४० के बर्प, पाटण शहरमें श्रीसरतरगच्छगगनांगणनभोमणि शकुंजगमहात्म्यराम-
उपमिनिभरमपंचाफाराम आदि विविधगमोंके रचयिता कविचक्रचूडामणि महोपाध्याय श्रीजिनहर्पजी गणिवरका बनाया है
उद्देश-गद्यपि प्रतुन गसके शिवाय इन्हिं कविवरने एक दूसराभी श्रीपालरास बनाया है, जो अत्यंत संक्षिप्त है, परंतु प्रस्तुत
'राम'का बा देह अतिविस्तृन या अतिमश्रित न होनेसे ओलीके दिनों में सुखपूर्वक समाम किया जा सकता है, एवं कृतिभी बहुत सरल
और भाववाहि रोचक है, इनकी पहली आवृत्ति रायबहादूर वायू धनपतसिंहजी दूगड मुर्शिदाबाद निवासीने छपवाइ थी, उसमें बहुत
अगनियां थीं और टाइपभी कलकत्तेके थे, जिसमे बांचनेमे बडी असुविधा थी और वह प्रति अब मिलतीभी नहीं, इत्यादि कारणांसे
उसकी पुनगपत्ति छपवानकी भावना वर्गस्य पूज्य गुम्देवके हृदयमें जागृत हुइ ।
नपभात् उपी हुई प्रति परमेही यथाशक्ति सशोधन करके प्रेसकॉपी तयार करवाई, वादमे एक प्रति हस्तलिखित बीकानेर निवासी
इतिहासप्रेमी माहित्यमेवक सुश्रावक अगरचंदजी नाहटा द्वारा मिली, जोकि ज्यादा अशुद्ध नहींथी, उसके आधारपर कॉपीका संशोधन
किया गया और पूज्य गुरुदेवकी देवरेवमेही रास छपभी गयाथा, सिर्फ प्रस्तावना तथा ओलीकी विधि एवं चित्रादिका काम बाकी
॥४॥

प्रस्तावना.
रहा ग. मो पिचारम एवं अन्यान्य कार्यकी व्यग्रतामें कुछ टाइम निकल गया, इतनेमें "श्रेयांसि बहुविनानि" इस नियमानु-
गार मंथन् १९९३ के कार्तिक शु० ६ के रोज परमपूज्य गुम्देवका अकस्मात् स्वर्गवास होजानेसे इसके प्रकाशनमें अधिक विलंब हुआ।
पाले शिर याया कि कठिन शब्दोंके अर्थ टिप्पनीम देदिये जॉय और पहले फारममें कियाभी वैसाही, परंतु संयोगकी प्रतिकू-
नगारे कारण आगे बैंगे न करके केवल मूलही छपवाया है ।
गलनको कारण कविवरका परिचय यहां नहीं दिया गया. जाननेकी अभिलापावाले वांचक गण देवचंद लालभाइ जैन
गुणकोगर फंउ मुग्न डाग प्रकाशित "आनंदकाव्यमहोदधि" मौक्तिक चोथैकी प्रस्तावना आचार्य श्रीबुद्विसागरसूरिजी लिखित,
या मोहनलाल हलीनंद देमाइ मोलीमिटर लिखित "गुर्जर कविओ" नामकी पुस्तक देखलें।
इसके प्रकाशनमें पूज्यपार प्रातःस्मरणीय स्वर्गस्य गुरुदेवके अमृतमय उपदेशसे जिन जिन महानुभावोंने उदार चित्तसे द्रव्य सहा-
मारे अपनी न्यायोपार्जिन लक्ष्मीको सफल करी है, जिनके नाम टाइटलपेजके मुखपृष्ठपर दिये गये हैं, उन सबको यहां धन्यवाद
दिला ना?, अन्य बनवानों कोभी से माहित्यमेवाके शुभकार्यम इनका अनुकरण अवश्य करना योग्य है ।
नमें-गापि इनका मुद्रण व संशोवन कार्य स्वर्गल पूज्य गुरुदेवके करकमलासे बडी सावधानीके साथ हुआ है, तथापि छाडास्थिक
मामालानुसार दृष्टिगत गा प्रेम के कर्मचारियोंफी गफलतसे जो कोई अशुद्वि दृष्टिगत हो तो सजनासे नम्र प्रार्थना है कि वे सुधारके पढ़ें।
गर्ग अनुगोगानार्य विद्वतशिरोमणि परमपूज्य गुरुदेव पंन्यासजी-श्री १००८श्रीकेशरमुनिजी महाराज इस श्रीपालरासके संपादक
THशोक, अनः उतिदै ति उनका उछ जीवनपरिचय करादिया जाय, इस लिये उनका सक्षिप्त जीवनपरिचय यह आगे दिया जाता है-
॥ ५ ॥

श्रीपाल, रास जीवन- परिचय. % 3D ॥६ इस ग्रंथके संपादक विद्वत् शिरोमणि अनुयोगाचार्य स्व० पंन्यासप्रवर श्रीमत्केशरमुनिजी महाराजका संक्षिप्त जीवनपरिचय- मारवाड देशकी राजधानी जोधपुरसे दक्षिणमे २० कोशके फासले पर चूंडा नामका एक सुरम्य गाम है, वहांपर वि० सं० १९३२ के माघ वदि अमावसको आधीरातके समय शुभलग्नमे आपका जन्म हुआथा, पिताका नाम शाह रतनाजी एवं माताका नाम रंभादेवी था, आपका खुदका नाम गृहस्थपनमें केसरमलजी था, बाल्य अवस्थासे ही ज्ञानाभ्यास तथा धार्मिक क्रियाओंकी तरफ रुचि अच्छी थी। संवत् १९४६ मे आप मुंबई आकर व्यापारमे जुडे और थोडेही दिनोंमे अपने बुद्धिबलसे व्यापार क्रियामे कुशलता प्राप्त करके एक सराफी दुकान उपर भागीदारीमें स्वतंत्र व्यापार करने लगे जिससे आर्थिक लाभ अच्छा होने लगाथा, इधर मुंबई में सबसे पहले सविज्ञसाधुओंका विहारद्वार खोलनेवाले शांतस्वभावी जगत्पूज्य शासनप्रभावक खरतरगच्छगगनांगणदिनमणि क्रियोद्धारक श्री १००८ श्रीमोहनलालजी महाराजका पधारना मुंबईमे पहले प्रथम संवत् १९४७ मे हुआ, व्याख्यानादिमें आते जाते केसरमलजीको महाराजसाहेवका कुछ परिचय हुआ त्योंही कुछ वैराग्यवासनाभी प्रगटी, जबकि १९५१ के वर्ष दूसरी वख्त महा- राजसाहेवका पधारना मुंबईमे हुआ तबसे महाराजजीके परिचयमें केसरमलजी विशेष आने लगे, ज्यों ज्यों अधिक परिचय होता गया त्या त्यों आपकी धार्मिक रुचि वढने लगी, वह इतनेंतक बढी कि जो इस असार संसारको सर्वथा त्यांगकर दीक्षित होजानेकी भावनामे परिणत होगइ, परंतु वह भावना मुंबइमें सफल होनी मुश्किलथी, कारणकि- सगे संबंधी भाइ बंधु आदि तमाम कुटुंवियोंकी मौजूदगीमे मोहनीयकर्मकी प्रवलतासे अनेक विघ्न आनेकी संभावना थी, अतः आपने अपनी भागीदारीका फैसला पहले करलिया, बादमे परम- 4567

जीवन-
परिचय.
श्रीपान.
॥ ७॥
पाश्री १००८ श्रीमोहनलालजी महागजकी रजामे मालवेमें जाकर रतलामके निकटवर्ति वांगरोद गाममें महाराजके ही विद्वान्
शिष्य श्रीमान राजमुनिजी महाराज के शुभ हम्नसे विक्रम सं० गुजराती १९५२ तदनुमार हिंदी १९५३ के आपाढ सुद पंचमीके शुभ दिनको
भागानी हीमा अंगीकार करी और पूज्यपाद श्रीमान मोहनलालजी महाराजकी आज्ञानुसार श्रीहेममुनिजी महाराजके शिष्य बने ।
पहला चोगाना रतलाम हुआ, पूज्य श्रीमान् राजमुनिजी महाराजकी अध्यक्षतामें अध्ययन शुरु किया, क्रमशः प्रतिक्रमणादिकी
पा पूरी को दुमती पं, जबकि आपका चौमामा दीक्षा गुरु श्रीमान राजमुनिजी महाराजके साथ सादडी (मारवाड)में था, व्याकरण
पटना शुरु करदिया,चौमासा उतरे बाद महाराजमाहेवकी आज्ञासे आपने विहार किया और अहमदाबाद पधारकर पूज्य श्रीमोहनलालजी
गागर नागनगे अपने आत्माको पवित्र फिया, यहांपर स्वर्गस्य पूज्य आचार्य श्रीजिनयशःसूरिजी, उसवख्तके श्रीमान् यशो-
मुनिजी महारानके पास आपने बडी दीक्षाफे योगोद्वहन किये और पेयापुरमे उन्ही महाराजके शुभहस्तसे आपकी बडी दीक्षा हुइ ।
तीगग नोगामा अहमदाबादमें पूज्य श्रीमान् यशोमुनिजी महाराज आदिके साथमें और चौथा पांचवॉ चौमासा जाम-
नगर में पूज्य श्रीदेवमुनिजी महागजके साथमे हुआ, इतनेतकमे व्याकरणादिका अभ्यास आपके ठीक होगयाथा, यहींपर आपने
कल्पसूत्रती टीका मुशोधिका व्याख्यानम यांचनी शुरु करीथी, छठ्ठा सातवॉ चौमासा सुरत-मुंबईम महाराज साहेबके साथ हुआ,
गुगमेती अभ्यामकी तरफ लक्ष्य अन्लाया, अन्यके साथ फजूल बातचीत आदि प्रपंचम प्रवृत्ति कमथी, अतः दिनोदिन अभ्यास
माना गया, थोडेही वर्षों में व्याकरणम सारस्वत चंद्रिका तथा सिद्धांतकौमुदी, न्यायमें तर्कसंग्रह मुक्तावली तथा स्याद्वादमंजरी आदि एवं
हान्य कोप नया सिसांनाफाभी शान अन्डा सपादन किया ।
॥.७ ॥

श्रीपाल.
जीवन-
परिचय.
॥ १०॥
विनश्वर शील औदारिक शरीरको त्यागकर आप स्वर्गको सिधारगये, बस फिर क्या कहनाथा, यह दुःखद समाचार थोडीही देरमें
विजलीके वेगसे आखी मुंबईमे एवं तारद्वारा अन्यत्रभी सब जगह फैलगये, उसी समयसे दर्शकोंकी जो भीड शुरु हुइ वह रात्रिको
११ बजेतक एवं दूसरे दिन सवेरे पांच वजेसे ९ बजेतक एकसरखी लगी रही।
सप्तमीके दिन आपके देहको वालकेश्वर लेजानेके लिये ठीक ९ बजे हजारों मनुष्योंकी मेदिनीके साथ संस्कार यात्रा निकाली गयी,
रस्तेमें कइ फोटु लिये गये, एक अमेरिकन तो गिरगामसे साथ हुआ सो वालकेश्वर संस्कारभूमितक पैदल चला, रस्तेमें ५-६ फोटु उसने लिये,
अंतमें फोटु लेनेमे किसी तरहकी रुकावट न करनेकी बाबत संघका महान् उपकार मानता हुआ १० रु० धर्मादेमें देकर अपने स्थानको गया ।
ठीक ११ बजे आपके देहको लेकर सब लोक वालकेश्वर वाणगंगाके पास समुद्रके किनारे हिंदुस्मशानभूमिमें पहुंचे, वहां योग्य
स्थानपर हजारों मनुष्योंके समक्ष केवल चंदनसे आपका अग्निसंस्कार किया गया, उस दिन मुंबई के बहुतसे बाजार बंध रहेथे ।
आपहीने इस ग्रंथका संशोधनादि किया है अतः पाठकोंकी जानकारीके लिये आपका कुछ जीवन परिचय देना उचित समझा गया,
तदनुसार जो कुछ बना यथा ज्ञात जीवनपरिचय यह उपर दिया गया है, स्थलसंकोचके कारण हालतो इतनेसेही विराम लेताहुँ, इति शम् ।
संवत् १९९३, मौन एकादशी
महावीर जिन मंदिर, मंडोवर खरतर अनुयोगार्य-श्रीमत् केशर मुनिजी गणिवर चरणाज चंचरीकांतेवासि
उपाश्रय, पायधुनी, मुंबई.
बुद्धिसागर
नम्र प्रार्थी-
॥ १०॥

भिलपन श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचित समराविन पञ्चग्रस्थानमयसूरिमन श्रीखरतर गच्छकी वर्तमान संविज्ञशाखाके आधाचार्य
स्तुत्यष्टक.
॥१२॥
श्रीजिनयशःसूरीश्वर स्तुत्यष्टक-
परनामगिरगणानित, खरतराख्यगणं मुतपस्विनं । सुविहिताप्तजिनेश्वरमार्गगं, प्रवरसूरियशःसुगुरुं - स्तुवे ॥ १॥ मरुधरस्थितयो-
पुरोषण, ननाशकागविभूषण । करनन्द कुंवत्सरजन्मकं, प्रवरसूरियशःसुगुरु स्तुवे ॥ २ ॥ स्वजनकार्पित जेठमलाभियं, सं
गरमागरदीशिल । मगुग्दत्तयगोमुनिनामकं, प्रवरसूरियशःसुगुरुं स्तुते ॥ ३ ॥ सुमुनिमोहनमोहनशिष्यकं, प्रवचनाष्टकमातृविशोभितं ।
रिम पचममाननभार के, प्रारमुरियशःमुगु रतुवे ॥ ४ ॥ समययोगसुयोगविधायक, गजैश के कुंवत्सर पं० पदं । सकळसूत्रविदं मुनिसत्तम,
भारमरियमा युगुग सो ॥ ५ ॥ संगरसाहेऊरिपदं गत, प्रवरसूरिगुणौवविशोभित । प्रशमशान्तदमञ्च जितेन्द्रिय, प्रवरसूरियशःसुगुरुं स्तुवे
॥ ६ ॥ माकपागदावागारा, राकलनीननिकायपिालकं । खरतर दशधा यतिधर्मपं, प्रवरसूरियशःसुगुरुं स्तुवे ॥ ७ ॥ खमुनिवेदेविधौ
T:, मिपाणिभूमिनले गरे । अनशनं प्रविधाय दिवं गत, प्रवरसूरियशःसुगुरुं स्तुवे ॥ ८ ॥ पठति यः सुगुरोरिदमष्टकं, प्रतिदिनं
गुमनालया जी । नमनइन्टितमा परन न, स लभने वरकीर्तियशःसुखम् ॥ ९॥
॥११॥

क
श्रीपाल.
जीवन-
परिचय.
॥८॥
संवत् १९५९ का मुंबईका चौमासा पूरा हुए बाद महाराजसाहेबकी आज्ञासे पंन्यासजी श्रीमान् यशोमुनिजी महाराज आदि
८ साधुओंने मारवाडकी तरफ विहार किया उनमें आपभी शामिलथे, संवत् १९६० का चौमासा गुरुदेव श्रीमोहनलालजी
महाराजकी आज्ञासे अन्य दो साधुओंके साथ आपने शिरोहीमें किया, यह सबसे पहला स्वतंत्र चौमासा आपकाथा, इसके बाद
प्रायः अधिकांश चौमासे आपके स्वतंत्रही हुए।
आपकी व्याख्यान शैली बहुत प्रशंसनीयथी, हरएक वस्तुका प्रतिपादन करतेहुए इसतरह भिन्न भिन्न करके समझातेथे कि मूर्खसे
मूर्खभी वस्तुस्वरूपको भलिप्रकार समझ सकताथा। वादशक्तिभी ऐसीहीथी, प्रश्नकार चाहे जैसे जटिल प्रश्न क्यों न करले, परंतु आपकी
तरफसे युक्ति व प्रमाण पूर्वक ऐसा उत्तर मिलताथाकि-जिससे प्रश्नकारको आगे कुछ बोलनेका अवकाशही नहीं रहता, लेखन कलाभी कुछ
कम नहीथी, इस वातकी सावीतिके लिये आपके बनाये ग्रंथ प्रश्नोत्तरविचार, प्रश्नोत्तरभंजरी, हर्षहृदयदर्पण आदि' विद्यमान
है, जिनका प्रत्युत्तर युक्ति व प्रमाण पूर्वक आजतक किसीसे नहीं दिया गया, इसप्रकार आपकी योग्यताके कारणही खरतर गच्छकी
वर्तमान संविज्ञशाखाके प्रथम आचार्य श्रीमान जिनयशासूरिजी उसवख्तके पंन्यासजी श्रीयशोमुनिजी महाराज कि, जिनका फोटु
इसी पुस्तकमे आपकी दहेनी तरफ दिया गया है, उन्होंने संवत् १९६६के वर्ष लश्कर (गवालियर) में भगवती पर्यंत सूत्रोंके योगोद्वहन कराके
आपको गणिपद तथा पंन्यास पदसे अलंकृत कियेथे, उन्हि पूज्य गुरुदेवके साथमें आपने सम्मेत शिखरजी आदि तीर्थोंकी यात्रा करीथी।
आपने चालीस वर्षसे कुछ अधिक समयतक निर्मल चारित्र पाला, इस दीर्घकालीन श्रामण्य पर्यायमें कच्छ दक्षिण और पंजाबके
शिवाय प्रायः सभी देशोंमें ज्यादा कम आपका विहार हुआ है, आगे लिखे जानेवाले स्थलोंमें आपके चौमासे इस प्रकार हुए हैं-
-
॥८॥

पिन श्रीमानब्धिमुनिजी महाराज रचित समराधित पञ्चप्रस्थानमयसूरिमन्त्र श्रीखरतर गच्छकी वर्तमान सविज्ञशाखाके आधाचार्य
स्तुत्यष्टक.
श्रीराल,
श्रीजिनयशासूरीश्वर स्तुत्यष्टक-
गशिरगणार्जिन, खरनराख्यगण मुनपखिन । सुविहिताप्तजिनेश्वरमार्गग, प्रवरसूरियशःसुगुरुं -स्तुवे ॥ १॥ मरुधरस्थितयो-
पुरोषण, तारीगसांगारभूषणं । कडुनन्दकुंवत्सरजन्मक, प्रारमूरियशःसुगुरुं स्तुने ॥ २ ॥ वजनकार्पित जेठमलाभिवं, सं
कमरदीनिन । मगुरुदत्यशोमुनिनामकं, प्रारमरियशःमुगुरुं स्तुवे ॥ ३ ॥ सुमुनिमोहनमोहनशिष्यक, प्रवचनाष्टकमातृविशोभितं ।
मापार कं, पाररियशःमुगुरुं स्तुरे ॥ ४ ॥ समययोगसुयोगविधायकं, गजैशरोडकुवत्सर पं० पदं । सकलसूत्रविदं मुनिसत्तम,
अरगरियशः मुगुरु नो ॥ ५ ॥ लंगरसाइकुरिपदं गत, पारसूरिगुणौवविशोभितं । प्रशमशान्तदमञ्च जितेन्द्रिय, प्रवरसूरियशःसुगुरु स्तुत्रे
॥ ६ ॥ कायमदाषागार, राफउजी निकायविपालकं । खरतरं दशधा यतिधर्मपं, प्रवरमरियशःसुगुरुं स्तुवे ॥ ७ ॥ खमुनिवेदैविधौ
रमन, नििितभूमिनले गरे । अनशनं प्रविधाय दिवं गतं, प्रवरमुरियगःसुगुरुं स्तुत्रे ॥ ८ ॥ पठति यः सुगुरोरिदमष्टकं, प्रतिदिनं
गुनगा नया मी गमनास्टितमन परत न, स लभने वरकीर्तियश.सुखम् ॥ ९॥
॥११॥

श्रीपाल.
जीवन-
परिचय.
रास
॥ १०॥
विनश्वर शील औदारिक शरीरको त्यागकर आप स्वर्गको सिधारगये, बस फिर क्या कहनाथा, यह दुःखद समाचार थोडीही देरमें
विजलीके वेगसे आखी मुंबईमे एवं तारद्वारा अन्यत्रभी सब जगह फैलगये, उसी समयसे दर्शकोंकी जो भीड शुरु हुइ वह रात्रिको
११ वजेतक एवं दूसरे दिन सवेरे पांच बजेसे ९ बजेतक एकसरखी लगी रही।
सप्तमीके दिन आपके देहको वालकेश्वर लेजानेके लिये ठीक ९ बजे हजारों मनुष्योंकी मेदिनीके साथ संस्कार यात्रा निकाली गयी,
रस्तेमे कइ फोटु लिये गये, एक अमेरिकन तो गिरगामसे साथ हुआ सो वालकेश्वर संस्कारभूमितक पैदल चला, रस्तेमें ५-६ फोटु उसने लिये,
अंतमें फोटु लेनेमें किसी तरहकी रुकावट न करनेकी बाबत संघका महान् उपकार मानता हुआ १० रु० धर्मादे में देकर अपने स्थानको गया ।
ठीक ११ वजे आपके देहको लेकर सब लोक वालकेश्वर बाणगंगाके पास समुद्रके किनारे हिदुस्मशानभूमिमें पहुंचे, वहां योग्य
स्थानपर हजारों मनुष्योंके समक्ष केवल चंदनसे आपका अग्निसंस्कार किया गया, उस दिन मुंबई के बहुतसे बाजार बंध रहेथे
आपहीने इस ग्रंथका संशोधनादि किया है अतः पाठकोंकी जानकारीके लिये आपका कुछ जीवन परिचय देना उचित समझा गया,
तदनुसार जो कुछ बना यथा ज्ञात जीवनपरिचय यह उपर दिया गया है, स्थलसंकोचके कारण हालतो इतनेसेही विराम लेताहं, इति शम् ।
संवत् १९९३, मौन एकादशी
महावीर जिन मंदिर, मंडोवर खरतर अनुयोगार्य-श्रीमत् केशर मुनिजी गणिवर चरणाज चंचरीकांतेवासि
उपाश्चय, पायधुनी, मुंबई.
बुद्धिसागर
नम्र प्रार्थी-
॥१०॥

विपन श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचिन समराधित पञ्चप्रस्थानमयसूरिमन श्रीखरतर गच्छकी वर्तमान संविज्ञशाखाके आधाचार्य
स्तुत्यष्टक-
श्रीपाल.
RS
॥१२॥
श्रीजिनयशासूरीश्वर स्तुत्यष्टक-
नगमभिष्टगणानितं, सरतराख्यगणं नुतपखिनं । सुविहिताप्तजिनेश्वरमार्गगं, प्रवरसरियशःसुगुरुं - स्तुवे ॥ १॥ मरुधरस्थितयो-
पपुगेपणं, नतारोगकांगविभूषणं । करडुनन्दे कुंवत्सरजन्मकं, प्रवरसूरियशःसुगुर स्तुवे ॥ २ ॥ वजनकार्पित जेठमलाभिघ, सं
भकिशनरीजिन । सगुरुदत्तयशोमुनिनामकं, प्रयररियशःसुगुरु स्तुवे ॥ ३ ॥ सुमुनिमोहनमोहनशिष्यक, प्रवचनाष्टकमातृविशोभितं ।
मिमदाप्तधारके, प्रारमरियशःसुगुर स्तुचे ॥ ४ ॥ समययोगसुयोगविधायकं, गजैशरोडेकुवत्सर पं० पदं । सकळसूत्रविदं मुनिसत्तम,
राग्गियामुगुरं नो ॥ ५ ॥ लंगर साऊरिपद गत, प्रवरसूरिगुणौवविशोभितं । प्रशमशान्तदमन जितेन्द्रियं, प्रवरसूरियशःसुगुरु स्तुवे
॥ ६ ॥ HTIमदाबागारा, सकलजीवनिकायविपालक । खरतरं दशधा यतिधर्मपं, प्रवरसूरियशःसुगुरुं स्तुवे ॥ ७ ॥ खमुनिवेदैविधी
गित., निपातिभूमितले गरे । अनशनं प्रविधाय दिन गतं, प्रवरमुरियशःसुगुरुं स्तुवे ॥ ८॥ पठति यः सुगुरोरिदमष्टकं, प्रतिदिनं
शुभगा नया नमनदग्टिनमत्र परत्र च, स लभते वर कीर्तियश मुखम् ॥ ९॥
11
॥११॥

श्रीपाल.
स्तुत्यष्टक.
रास
॥१२॥
कवित्वलब्धिसंपन्न श्रीमल्लब्धिमुनिजी महाराज रचित वादिगजकेसरी विहितसकलागमयोगानुष्ठान अनुयोगाचार्य पंन्यासप्रवर
श्रीकेशरमुनिजी गणिवर स्तुत्यष्टक-
यस्याभवन्मरुधरस्थसुरम्यचूण्डा--प्रामे मुनेः कर-गुणा-कंशशाङ्क वर्षे । जन्म प्रशान्तवदनस्य जितेन्द्रियस्य, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स
जीयात् ॥ १ ॥ यो मालवस्थितजनाकुलवाङ्गरोद-प्रामेऽग्नि-बाणे-बंग-भूमिगृहीतदीक्षः । वैराग्यरङ्गसुतरङ्गितभावतोऽभूत्, पन्यास केशरमुनिः
सुगुरुः स जीयात् ॥ २॥ योऽभूलसत्खरतरामलशिष्टिरक्तो विद्वद्वरः सुविहितोऽवर्गमक्रियावान् । श्रीआर्य मोहनमुनिप्रवरप्रशिष्पः, पन्यास
केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ३ ॥ पन्न्यासयुग्गणिपदं प्रवराय गोप-'फ्रेङ्गे शरीर-रस-नन्द-शशाङ्क वर्षे । यस्मै प्रदायि गुरुणा प्रविधाप्य
योगान्, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ४ ॥ येनार्हतीयसमये कथित यथार्थ-सत्यखरूपममलं मुनिना प्रदर्य । स्पष्टीकृतः प्रबलसाग,
रिकप्रपञ्चः, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ५॥ विद्वत्तयोर्जितकुपक्षगणानिरस्यी-हच्छिप्टिकृत्खरतरीयगणोऽखिलोऽपि । वाचंयमेन
च जर्जागरितो यकेन, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ६ ॥ प्रश्नोत्तरादिबहवो रचिता वरिष्ठा, ग्रन्थाः शिवार्थिभविबोधकरण येन ।
सत्पञ्चदुर्धरमहाव्रतधारकेण, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ७ ॥ संवद्गुणौकखर्गभूमिसमे च मुम्बा-पुयाँ सुरालयमगात्सुसमाधिपूर्वं ।
ध्यायश्च पञ्चपरमेष्ठिनमस्कृतिं यः, पन्यास केशरमुनिः सुगुरुः स जीयात् ॥ ८ ॥ सद्बुद्धिदं गुरुगुणाघपवित्रितं यः, श्रद्धालरष्टकमिदं प्रपठेत्सदैव
उत्पद्यते झटिति सुव्रतरनलब्धि-श्रीबुद्धिसागरतरङ्गगणश्च तस्य ॥ ९॥
आज्ञा । (१) ज्ञान। (२) पुरे। * प्रकटीकृत.। (३) प्रवल। (४) निराकृत्य । (५) सावधानीकृत । (६) लक्ष्मी।
॥१२॥

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== مم गीमालालजी महारसमे मुल्यशिय पोरगी- TETriram प्रथम आचार्य- श्रीनिनयशामरीश्वरजी महागज. दीक्षा 7-10 पर मूरिपर मर्ग दीक्षा जन्म १९९३ १९५३ १९७० HTTोधपुर भाग मनमागद पापापुरी नि जो, मान्य थे निगमे मर गदा गुरुगन थे, उपम ने एगी। समे महागा मोटन-लालजी नोले गगे गा? भगिपर डाके, यश का पुर? गे॥१ गा गगंग आप गार के प्रथम सूरीश थे, म TET 7, मगर गरनगंके ईश रे। पागपुरीमें चोर नपार, करगो ग्वर्गमन मे मर जिनयगः-सूरीश मेरी गरण, ॥२॥ (मागर frTTTT मोगालाल) श्रीसिद्रुचक्र या नवपद मण्डल. (सरी-जीपणचद मारपदके सौजन्यसे सम्प्राप्त) कुष्ठादिरोगशमकं भवसिन्धुपोतम्, दुष्याष्टकर्मतृणवन्हिमचिन्त्यशक्तिम् । सम्पत्करं परमयोगिनतं नमामि, श्रीसिद्धचक्रपदमक्षयधामदात ॥२॥ सर्वज-सिद्ध-गणि-पाठक-साधु-सम्य- क्त्व-शान-सद्रत-तपोऽद्धपदानि सन्तु । मे श्वेत-लोहित-सुपीत-हरित्-सुनील- श्वेतादिवर्णरुचिराणि लसत्सुखाय ॥२॥ (कविवर्य श्रीलब्धिमुनिजी महाराज) श्रोगरतरगन्टगगनागगनभोमणि-जगदा-श्रीमोहनलालजी महाराज के प्रशिप्यरत-पादलभिसपन-अनुयोगाना- पंन्यासप्रवर श्रीकेशरमुनिजी महाराज. गणि-प० पद स्वर्गाम १९३२ १९६६ चूडा वागरोद लश्कर (गवालियर) मुबई जो विश्वमै बहुमान्य मोहन-लालजी मुनिराज ये; उन पूज्यके विद्वान सुन्दर, शिप्यके भी शिष्य थे। निजधर्मके निन्दक न क्यों, हो वे भले सबसे बड़े, उन वादिगजके सामने ये, केसरी रहकर खरे ॥ १ ॥ फिर धर्मके आक्षेपको, करते सदैव सुदूर थे, प्रेमी फियाके थे तथा शुभ, शान्तरस भरपूर थ। ऐसे महा मुनिराज हमसे, छोड़कर जाते रहे। पन्याग श्रीकेशरमुने!, मुझ नमन वारवार है ॥ २ ॥ (माम्नर-विजयचद मोहनलाल) नि मा प्रेग

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ॐ श्रीसिद्धचक्राय नमः श्रीखरतरगच्छनभोमणि आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरीश्वर वाचक श्रीसोमगणि- शिप्य महोपाध्याय श्रीशांतिहर्ष गणि शिष्य कविवर महोपाध्याय श्रीजिनहर्प गणिकृत श्रीनवपद महात्म्य गर्भित श्रीपाल राजाका रास. दूहा-श्रीअरिहंत अनंतगुण, धरीये हीयडे ध्यान । केवल ज्ञान प्रकाश कर, दूर हरण अज्ञान ॥ १॥ चउद राज ऊपर रहे, सिद्ध अनंत समृद्धि । मुगति युवति सुख भोगवे, दायक अविचल सिद्धि ॥२॥ आचारिज पय युग नमू, पाले पंचाचार । गुण छत्रीस विराजता, आगम अरथ भंडार ॥ ३॥ कर जोडी नित प्रति नमू, चोथे श्रीपाल, रास. ॥ २॥ पद उवज्झाय । द्वादशांग मुख उपदिसे, भवियण जण सुखदाय ॥ ४ ॥ अढी द्वीपमाहे नमू, साधु सकल गुणवंत । सुमंति गुपति सूधी धरे, राखे 'जगना जंत ॥५॥ पंच परमेष्ठि नमी करी, आणी भाव विसाल। श्रीश्रीपाल नरिंदनो, रचसु रास रसाल ॥ ६॥ मंत्र यंत्र जडि ओषधी, आछे अवर अनेक । पिण नवकार 'समो न' को, जोवो आणि विवेक ॥७॥ सिद्धचक्र आराधीये, गुणीये श्रीनवकार । भवसायर तरीये सुगम, जईये मुगति मझार ॥ ८॥ नवपंदनो महिमा कहूं, सांभलजो नर नार!। सांभलतां सुख.पामसो, सफल हुसे अवतार ॥९॥ ढाल १ ली. चोपईनी-जंबू नामे द्वीप विसाल, दक्षिण भरत छे तास विचाल । देस कह्या बत्रीस हजार, · मगधदेस रिद्विवंत अपार ॥ १॥ वीर जिणेसर आव्या घj, सकल देशमें उत्तम भणुं । राजगृही नगरी गुणभरी, जाणे रची ॥ २॥ +9 ॥ ३ ॥ महियल मुरपुरीं ॥ २॥ कूआ वावि सरोवर घणा, विवहारीयानी नहीं कांई. मेणा। तिण नयरी श्रेणिक नरनाह, जिणंवर आण धरे उच्छाह ॥ ३॥ न्याये पाले नरवरें राज, सारे सहुना वांछित काज । मंत्रीसर छे अभयकुमार, च्यारे बुद्धिनो धारणहार ॥४॥ किणिहिक अवसर त्रिभुवनस्वामि, राजगृहीने पासे गामि । समवसर्या तिहां आवी करी, सहु हरख्या मन आणंद धरी ॥ ५॥ गौतमने दीधो आदेस, जाओ राजगृही सुविसेस । तव गौतम आव्या तिहां वही, लोक सहु हरख्या गहगही॥६॥ बांदण आव्या श्रेणिक राय, नगर लोक पिण वांदण जाय। आपे प्रभु गणधर उपदेस, सजल जलद अनुहार विसेस ॥ ७॥ अहो भव्य प्राणी! तुम्हे सुणो, ए मानव भव दुर्लभ गिणो। आर्य क्षेत्र उत्तम कुल जाणि, ते पिण दुर्लभ छे मन आणि ॥ ८॥ १ जमीन उपर । २ देव नगरी । ३ कमी । ४ राजा । ५ तीनलोकके स्वामी वीरप्रभु । ६ पाणी सहित | ७ मेघके । ८ समान । ॥३॥ -- श्रीपाल. ॥६॥ कण कंचणसुं भरी रे लाल, जाणे अलका नाम महा०, ए० ॥ ७॥ लोक तिहां सहु को सुखी रे लालं, साधे त्रिणे वर्ग महा० । पाले जिनवर आगन्या (आज्ञा) रे लाल,8 जेथी पामे स्वर्ग महा०, ए०.॥८॥राजा राजे तिणे पुरी रे लाल, प्रजापाल इणे नाम महा० । न्याय निपुण पुहवी तिलो रे लाल, रूपे जाणे काम महा०, ए० ॥९॥ तास घणी अंतेउरी रे लाल, तेहमें दोइ अत्यंत महा० । रूप अधिक रलियामणी रे लाल, सोभागिणी गुणवंत महा०, ए० ॥१०॥ पहिली सोहर्ग सुंदरी रे. लालं, सोहँग तणो निधान महा० । बीजी पिण. अधिकी वली रे लाल, रूपसुंदरी अभिधान महा०, ए० ॥११॥ रूपे रंभा हरावती रे लाल, सुख विलसे सुकमाल महा। बीजी जिन हरखे' कही. रे लाल, अलबेलानी ढाले महा०, ए०॥१२॥ सर्व गाथा ३५॥ १ अलकापुरी नामकी देवनगरी । २पृथ्वीके तिलक तुल्य । ३ कामदेव। ४ सौभाग्य । ५ नाम की। ६ नामकी अप्सरा देवी ।

श्रीपाल.
दूहा-पहिली मिथ्यात्वी कुले, अवर जैन कुल जाणि । जैन शास्त्र रूपसुंदरी, भणी
सुधारसवाणी ॥ १॥ समकित गुण निर्मल धरे, जाणे अरथ विचार । धरम थकी चूके
नहीं, जो हुवे लाख प्रकार ॥२॥ शिवशासन विद्या भणी, सोहगसुंदरी. नार ।
मिथ्या मति राती रहे, चाले निज आचार ॥३॥ सोकि पणे वे सुंदरी, पिण अत्यंत
सनेह । आप आपणा धर्मसुं, रंगे राती जेह ॥४॥ प्रीति परस्पर अतिघणी, एक
जीव तनु दोइ । पिण निज निज मतने विषे, विसंवाद नित होई ॥५॥
ढाल ३ जी. “धन धन संप्रति राजा साचो” एहनी अथवा “सेनूंजे साधु अनंता
सीधा" एहनी- जोवो दृष्टिरांग अति गिरुओ, छूटे दोहिलो एह रे । दृष्टिराग राता
नर नारी, किमहि न समझे तेह रे, जोवो० ॥१॥ दृष्टिराग करी सोहगसुंदरी, उत्थापे
१ चीनी । २ अमृत । ३ एकही पतिकी दो स्त्रियां, जिसको शोक कहते हैं। ४ शरीर । ५ खमतका राग-प्रेमबंधन ।'
॥ ७॥

श्रीपाल.
॥४॥
धरम तणी सामग्री लही, श्रीजिनधर्म करो ऊमही । इण भव पामे रिद्धि समृद्धि, परभव
पामे अविचल सिद्धि ॥ ९॥ इम गौतम दीधो उपदेस, सांभलियो नर नारि नरेस ।
पहिली ढाल एही अटकलो, कहे 'जिनहर्ष' 'हिवे सांभलो ॥ १० ॥ सर्व गाथा १९॥
दूहा-दान सील तप भावना, भेद धरमना च्यार । इह भव परभव एहथी, लहीये
सुख श्रीकार ॥ १ ॥ दान सील तप मांहि जो, चोथो भाव भिलंत । तो कारज सीझे
सहू, वंछित सकल मिलंत ॥२॥ निश्चल मन राखी करी, परिहरि मननो ताप ।
भाव विशुद्ध हीयडे धरी, जपीये नवपद जाप॥३॥अरिहंत १ सिद्ध २ सूरीस वर ३,
उवज्झाया ४ मुनिपति ५। दंसण ६ नाण ७ चरित्त ८ तप९, इणसुं धरीये चित्ति ॥४॥
ढाल २ जी. अलबेलानी- ए नवपद आराधीये रे लाल, आणी निरमल भाव
महाराजा रे । एहथी सहु सुख संपजे रे लाल, भवसायरनी नाव महा०, ए० ॥१॥
१
॥४॥

नवपद संघाते जपे रे लाल, सिद्धचक्र (सड्ड) चउ साल महा० । ते लहे मंगल मालिकारे लाल, जिम लह्यां नृप श्रीपाल महा०, ए० ॥२॥ श्रेणिक कहे भगवन ! कहो रे लाल, कुण ते नृप श्रीपाल महा० । किम पामी सुख संपदा रे लाल, किम लह्यां भोग रसाल महा०, ए० ॥३॥ गौतम कहे मगधेसने रे लाल, आराध्यो सिद्धचक्र महा० । रोग गयां वंछित लह्यां रे लाल, जाणे अभिनव शक महा०, ए. ॥ ४॥ श्रीगौतम ! मुझने कहो रे लाल, एहनो सह अधिकार महा० । सांभलवा मन ऊमह्यो रे लाल, सुणसे सह नर नार महा०, ए० ॥५॥ दक्षिण भरते दीपतो रे लाल, मालव देस विख्यात महा० । दुरभिक्ष न पडे जिहां कदी रे लाल, केही कहीये वात महा०, ए०॥६॥ तिणे देसे नयरी भली रे लाल, उज्जेणी अभिराम महा० । धण १ माटे चार वर्ष । २ राजा । ३ मगधदेशके स्वामी श्रेणिक । ४ नवा उत्पन्न हुआ इंद्र । ५ दुकाल। ६ क्या। ७ कहें । ८ मनोहर। NE श्रीपाल. ॥६॥ । कण कंचणसुं भरी रे लाल, जाणे अलका नाम महा०, ए० ॥ ७॥ लोक तिहां सहु को सुखी रे लालं, साधे त्रिणे वर्ग महा० । पाले जिनवर आगन्या (आज्ञा) रे लाल, जेथी पामे स्वर्ग महा०, ए० ॥ ८॥ राजा राजे तिणे पुरी रे लाल, प्रजापाल इणे नाम महा० । न्याय निपुण पुहवी तिलो रे लाल, रूपे जाणे काम महा०, ए०॥९॥ तास घणी अंतेउरी रे लाल, तेहमें दोइ अत्यंत महा। रूप अधिक रलियामणी रे लाल, सोभागिणी गुणवंत महा०, ए० ॥१०॥ पहिली 'सोहर्ग सुंदरी रे लालं, सोहँग तणो निधान महा० । बीजी पिण अधिकी वली रे लाल, रूपसुंदरी अभिधान महा०, ए० ॥११॥ रूपे रंभा हरावती रे लाल, सुख विलसे सुकमाल महा। बीजी जिन हरखे' कही. रे लाले, अलबेलानी ढाले महा०, ए०॥१२॥ सर्व गाथा ३५॥ १ अलकापुरी नामकी देवनगरी । २पृथ्वीके तिलक तुल्य । ३ कामदेव । ४ सौभाग्य । ५ नाम की । ६ नामकी अप्सरा देवी "

श्रीपाल.
दहा-पहिली मिथ्यात्वी कुले, अवर जैन कुल जाणि । जैन शास्त्र रूपसुंदरी, भणी
मुधारसवाणी ॥१॥ समकित गुण निर्मल धरे, जाणे अरथ विचार । धरम थकी चूके
नहीं, जो हुवे लाख प्रकार ॥२॥ शिवशासन विद्या भणी, सोहगसुंदरी नार ।
मिथ्या मति राती रहे, चाले निज आचार. ॥३॥ सोकि पणे वे सुंदरी, पिण अत्यंत
सनेह । आप आपणा धर्मसुं, रंगे राती जेह ॥४॥ प्रीति परस्पर अतिघणी, एक
जीव तनु दोइ । पिण निज निज मतने विषे, विसंवाद नित होई ॥५॥
ढाल ३ जी. “धन धन संप्रति राजा साचो” एहनी अथवा “सेव॒जे साधु अनंता
सीधा” एहनी-- जोवो दृष्टिरांग अति गिरुओ, छूटे दोहिलोः एह रे । दृष्टिराग रांता
नर नारी, किमहि न समझे तेह रे, जोवो ॥१॥ दृष्टिराग करी. सोहगसुंदरी, उत्थापे
१ पीजी । २ अमृन । ३ एकही पतिकी दो त्रियां, जिसको शोक कहते हैं। ४ शरीरं । ५ खमतका राग-प्रेमबंधन ।'
॥ ७ ॥

श्रीपाल. रास. . १० ॥ वरस पांचनी ते थंई, दीठां परम प्रमोद ॥४॥ भणिवा सारिखी थई, बुद्धितणो भंडार। मातपिता देखी करी, इणपरि करे विचार ॥५॥ " ढाल ४ थी. "हरीया! मन लागो” एहनी, कन्या दोइ भंणावीये, भणिवा अवसर एह रे, दोइ कन्या (भणावीये) भरें। बालपणे सहु आवडे, नाण विन्नाण अछेह रें, दो० ॥१॥ सुभदिन सुभ मुहूरत घडी, भणिवा ठवी बे बाल रे, दो० । सुरसुंदरी सिवभूतिने, मयणा सुबुद्धि नीसाल रे, दो० ॥२॥ प्रथम सुता पंडित कन्हे, भंणे सदा चित लाइ रे, दो । गणित लिखित लक्षण कला, तर्क साहित्य' संहाइ रे, दो० ॥ ३॥ ज्योतिष) क वैद्यक सहु भण्या, भरहे संगीत पुराण रे, दो। मंत्र जंत्र जडी ओषधी, थई सिवसास्त्रनी जाण रे, दो० ॥४॥ रागरंगे सहु रीझवे, गावे वीणं बजाई रे, दो० । १ शरीरमें रहे चक्र आदि । २. न्यायशास्त्र । ३ काव्यशास्त्र । ४ भरत नामका नाटक ग्रंथ । ५,अढारे पुराण शास्त्र । PROR ॥ १० ॥ .

रास.
श्रीपाल रसीयाना मन मोहती, दीठी आवे दाइ रे, दो० ॥५॥जोवन रूपे आगली, अणीयाला
दोइ नैण रे, दो० । मुखडे जीयो चंद्रमा, अवे सुधारस वैण रे, दो० ॥६॥ रूप
अधिक सोहे वली, चतुराई गुणमेलि रे, दो० । सोवन मुद्रा मणि जडी, दूधे साकर
भेलि रे, दो० ॥७॥ भणी गुणी चोसठ कला, अपछरने अणुहार रे, दो० । पहिले गुण-
ठाणे थई, गुरु संगति सुविचार रे, दो० ॥८॥ मिथ्यात्वी सिरसेहरो, सिवभूति पंडित
तेह रे, दो० । शिष्यणी पिण सुरसुंदरी, तेहवी कीधी तेह रे, दो० ॥९॥ मिथ्यामत
थापे घj, तत्त्वर्थकी विपरीत रे, दो० । काने पिणं न गमे सुण्यो, जैनधर्म मुं प्रीत रे,
दो० ॥ १०॥ हवे बीजी कन्यातणो, सुणो पठन अधिकार रे, दो० । शास्त्र भण्या
जिनमततणा, आगम अरथ विचार रे, दो० ॥ ११॥ चोसठ महिलानी कला, जाणे
गुरु मुपसाय रे, दो० । अवसरे धर्म करे वली, प्रणमे जिनंवर पाय रे, दो० ॥ १२ ॥
॥ ११ ॥

*
श्रीपाल.
रास.
--
॥८॥
जिनधर्म रे । मलिन कुचेल नहीं पवित्राई, स्युं ते ब्रोडे कर्म रे, जोवो० ॥२॥
रूपसुंदरी कहे सांभलि बहिनी !, कसिये कंचण जेम रे । कीजे धर्म परीक्षा करीने,
आले न जपीये' एम रे, जोवो० ॥३॥ धरम धरम सहु कोई भाषे, पिण अंतर
असमान रे । साकर लूण सरीखा दीसे, काच पाँच समवान रे, जोवो० ॥४॥ सूरज
खजूये जिवडो अंतर, अंतर राजा रंक रे।अरकं दूध गोदूधे अंतर, अंतर सुख आतंक
रे, जोवो० ॥५॥ चंदन आक धत्तूरे अंतर, अंतर विष पीयूष रे । जैन धर्म
(समो नहीं कोई) मोटो जगमांहे, जेहथी जाये दूष रे, जोवो० ॥६॥ धरम अनेक
अछे जगमांहे, पिण ते हिंसा मूल रे, धरम जैन अधिको जोवंतां, जीवदया अनुकूल
रे, जोवो० ॥७॥ एक धरमथी शिव सुख लहीये, दहीये कर्म कठोर रे । एक थकी
१ खराव ( मलिन ) वस्त्र । २ झूटा कलंक । ३ बोलना । ४ मणि । ५ आकका दूध । ६ कष्ट-दुःख । ७ अमृत । ८ मोक्ष
॥८॥

पिंड पापे भराये, लहीये नरक अघोर रे, जोवो० ॥ ८॥ धरमतणी चरचा माहोमांहे,
करे अहोनिसि एम रे। प्रीति रीतिसुं वे वे सुंदरी, पाले पूरो प्रेम रे, जोवो० ॥९॥
मुग्वे समाधे इणपरि रहती, धरती पिउसुं रंग रे । विषयतणा सुख विलसे बहुपरि,
दिनदिन अति उठेरंग रे, जोवो० ॥ १०॥ काल न जाणे किमही जातो, पिउ प्रिया
इक राग रे । कहे 'जिनहर्ष' ढाल ए त्रीजी, गावो आस्या राग रे, जोवो० ॥ ११ ॥
दूहा-सुख विलसंती वे जणी, जनमी पुत्री दोइ । राय करे उच्छव घणो, हीय. हर-
पित होइ ॥१॥ राणी सोहगसुंदरी, दरीभरी गुणप्रेम । तासु सुता सुरसुंदरी,
नाम बुलावी तेम ॥२॥ रूपसुंदरी वीजी प्रिया, तेहनी पुत्री जेह । मयणासुंदरी
तेहनो, नाम ठव्यो गुणगेह ॥३॥ पांच धाइ पालीजतां, करतां ख्याल विनोद ।
१ गरीरमें रहा आत्मा । २ रात दिन । ३ पतिसे । ४ भोगवते हैं । ५ उल्लसित मनसे । ६ स्त्रीभार । ७ गुणगुफा । ८ प्रेमपोषक ।
॥ ९॥

श्रीपाल.
॥ १० ॥
week
वरस पांचनी ते थई, दीठां परम प्रमोद ॥४॥ भणिवा सारिखी थई, बुद्धितणो
भंडार। मातपिता देखी करी, इणपरि करे विचार ॥५॥' ""
ढाल ४थी. "हरीया! मन लागो” एहनी, कन्या दोइ भणावीये, भंणिवा अवसर एह
रे, दोइ कन्या (भणावीये) भणे। बालपणे सहु आवडे, नाणं विन्नाण अछेह रे, दो० ॥१॥
सुभदिन सुभ मुहूरत घडी, भणिवा ठवी बे बाल रे, दो । सुरसुंदरी सिर्वभूतिने, मयणा
सुबुद्धि नीसाल रे, दो० ॥२॥ प्रथम सुता पंडितः कन्हे, भणे सदा चित लाई रे,
। गणित लिखित लक्षण कला, तर्क साहित्य' 'संहाई रे, दो० ॥३॥ ज्योतिष)
क वैद्यक संह भण्या, भर, संगीत पुराण रे, दो० । मंत्र जंत्र जडी ओषधी, थई
सिवसास्त्रनी जाण रे, दो० ॥४॥रागरंगे सहु रीझवे, गावे वीणं बजाइ रे, दो० ॥
१ शरीरमें रहे चक्र आदि । २ न्यायशास्त्र । ३ काव्यशास्त्रः। ४ भरत नामका नाटक ग्रंथ । ५,अढारे पुराण शास्त्र ।
॥ १० ॥

श्रीराला
॥ ११ ॥
।
गुण-
रसीयाना मन मोहती, दीठी आवे दाइ रे, दो० ॥५॥जोवन रूपे आंगली, अणीयाला
दोइ नेण रे, दो० । मुखडे जीत्यो चंद्रमा, श्रवे सुधारस वैण रे, दो० ॥६॥ रूप
अधिक सोहे वली, चतुराई गुणमेलि रे, दो० । सोवन मुद्रा मणि जडी, दूधे साकर
भेलि रे, दो० ॥७॥ भणी गुणी चोसठ कला, अपछरने अणुहार रे, दो०। पहिले
ठाणे थई, गुरु संगति सुविचार रे, दो० ॥८॥ मिथ्यात्वी सिरसेहरो, सिवभूति पंडित
तेह रे, दो० । शिष्यणी पिण सुरसुंदरी, तेहवी कीधी तेहं रे, दो० ॥ ९॥ मिथ्यामत
थापे घणुं, तत्त्वर्थकी विपरीत रे, दो । काने पिण न गमे सुण्यो, जैनधर्म सुं प्रीत रे,
दो० ॥ १०॥ हवे बीजी कन्यांतणो, सुणो पठन अधिकार रे, दो० । शास्त्र भण्या
जिनमततणा, आगम अरथ विचार रे, दो० ॥ ११॥ चोसठ महिलानी कला, जाणे
गुरु सुपसाय रे, दो० । अवसरे धर्म करें वली, प्रणमे जिनंवर पाय रे, दो० ॥१२॥
॥ ११ ॥

श्रीपाल. ॥ १२ ॥ जैन भाव सघला लहे, निश्चयने विवहार रे, दो० । कहे 'जिनहर्ष' चोथी थई, ढाल इणे अधिकार रे, दो० ॥ १३॥ सर्व गाथा ६९॥ दूहा-जिनमत धर अध्यापके, कुमरी भणावी जेह । मिथ्यामत राचे नही, धरम रंगाणी देह ॥१॥ एकज सत्ता दुविध नय, काल त्रिण गति च्यार। अस्तिकाय पांचे छए, द्रव्य सात नय धार ॥२॥ आठ करम नव तत्त्व तिम, दसविध मुनिवर धर्म । पडिम इग्यारस बार व्रत, जाणे एहवा मर्म॥३॥ मूलुत्तर कम्मपयडि, इगसो अट्ठावन्न । कर्म- बंधना हेतु पिण, जाणे सत्तावन्न ॥ ४॥ बंध उदय उदीरणा, सत्ता जाणे तेह । सुहुम विचार सवे लहे, प्रवचन भाख्या जेह ॥५॥ ढाल ५ मी. “इडर आंबा आंबली रे"एहनी-सुंदरि ए सुरसुंदरी रे, जोवन पहूंती जोर । भणी गुणी सगली कला रे, चतुरपणे चित्त चोर ॥ १ ॥ सुगुणनर ! जोवो .. - ॥१२॥ मर PAN

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पा
रा
जा
का
रा
स
अभ्यंतर सभामें बैठा हुआ
राजा प्रजापाल अपनी दोनों राज
पुत्रीयोके विद्याभ्यासकी परीक्षा
ले रहा है।
S
( पत्रांक १३)

-- रास. श्रीपाक. पुण्यविशेप, पुण्ये लंहीये रिद्धि अशेष, पुण्ये लहीये प्रभुता पेखि, वारू पुण्यतणा फल देखी, सु० ॥ २॥ रूपवंत गुण लवणिमा रे, विद्या प्रभुता सार । मदना कारण छे सहू रे, पिण मद न करे लिगार, सु० ॥३॥ इक दिन अभ्यंतर सभा रे, बेठो राय उल्लास। वोलावी वे निज सुता रे, साथे पाठक तास, सु० ॥४॥ विनयवती निज तातने रे, आवी कीधी सलाम। चकित थई सगली सभा रे, रूप निरखी अभिराम, मु० ॥ ५॥ खोले बेसारी सुता रे, राजा धरिय विवेक । बुद्धि परीक्षा कारणे रे, दीधी समस्या एक, सु० ॥ ६ ॥ राइ कह्यो पद छेहलो रे, “पुण्ये लहीये एह" । गुणवंती मुरसुंदरी रे, बोली ततखिण तेह, सु०॥ ७ ॥ धन यौवन डाहापणो रे, रोगरहित निज देह । मनवल्लभ मेलावडो रे, “पुण्ये लहीये एह", सु० ॥ ८॥ रलियायत राजा थयो रे, सांभलि तास वचन । कुमरी अध्यापक भणी रे, लाख गमे दीधो धन, सु० ॥ १३ ॥ भीमा. रा.

श्रीपाल. ॥ १४ ॥ ॥९॥ लोक खुस्याल सहू थया रे, रंज्या राणी भूप। सहु को लोक कहे इसूं रे, एतो सरसति रूप, सु० ॥ १०॥ तुझे पिण मयणासुंदरी ! रे, समस्या पूरो एह । अनुमति लहि निज तातनी रे, कहे कुमरी गुणगेह, सु० ॥११॥ विनय विवेक प्रसन्नता रे, सीलसुं निर्मल देह। शिवपदनो मेलावडो रे, “पुण्ये लहीये एह", सु० ॥ १२॥ मात पिता हरषित थया रे, हरख्या लोक न जात। प्राये मिथ्यात्वी भणी रे, न गमे उत्तम वात, सु० ॥ १३॥ उत्तमने उत्तम गमे रे, नीचने नीच सुहाइ । ढाल थई ए पांचमी रे, कहे 'जिनहर्ष' बनाइ, सु० ॥१४॥ सर्व गाथा ॥ ८८॥ दूहा-कुमरीनी इणपरि करी, बुद्धि परीक्षा राय। आगलि जे थाये हिवे, ते सुणज्यो चितलाय॥१॥कुरुजंगल देसे अछे, संखपुरी इण नाम । नगरी तेहनो राजवी, दमि- तारि अभिराम ॥ २ ॥ उज्जेणी राजातणी, नितप्रति सारे सेव । निज बदले एकण ॥ १४ ॥ 1 FAS

॥१५॥
वरस, मूंक्यो अंगज हेव ॥ ३ ॥ नाम तास छ अरिदमन, अरि दमि कीधा जेर ।
जाणे सूरति कामनी, नारि रहे नित घेर ॥४॥ भमरो केतकि गंधसुं, मांडि रहे
जिम मोह । तिम सुख पामे नारियां, कुमर निहाली सोह ॥ ५॥
दाल ६ ठी. “मुजरो मानो हे जालम जाटणी” ए जाटणीना गीतनी-मदन मनोहर
कुमर कलानिलो, देखी जोवन वय सुकमाल, कुमरी मोही हो कुमर सुजाणसुं। सुरसुंदरी
मुख पंकज भाल, नयणे जोवे हो फिर फिर कुमरने, पामे सुख मुख तास निहाल, कु०
॥१॥ दीठां हीयडो हेजे ऊलसे, दीठां पाखे अंदोह, कु० । एतो अणखाधे पाणी रसो,
एहयो पापीरे मोह, कु० ॥२॥ ढांक्यो न रहे किम ही नेहलो, जो करे कोडि उपाय,
कु० । आग छिपाई घास पलालमें, परगट ते खिणमांहे थाय, कु० ॥३॥ चोवा चंदन
कुसुमनी वासना, छानी धरीये छिपाय, कु०। तो हि खिणमाहे परगट हुवे, तिम ए नेह
-
॥ १५॥

श्रीपाल. दिखाय, कु० ॥ ४॥ बापे जाण्यो नेह सुंतातणो, पुत्री! सांभल तूं सुविचार, कु०। जे मन माने जेहसुं प्रीतडी, ते परणावू भरतार, कु०॥५॥ हीयडे हरखी कुमरी इम कहे, लोक तणी तजि लाज, कु० । वांछयो वर पामुं तो एहने, परणावो महाराज!, कु० ॥६॥ अथवा तुझे मुझने परणावसो, माहरे तेह प्रमाण, कु० । बाप दीयो वर कन्या वरे, ते सुकुलीणी सुजाण, कु० ॥७॥ तुमथी लहीये वंछित बापजी!, तुमथी सुख लहीये श्रीकार, कु० । पोतानी जाणी सुखिणी करो, तुझे माहरे किरतार, कु० ॥८॥ इण वचने राजा तूठो कहे, जाणी अंतरभाव, कु० । ए अरिदमन कुमर पुत्री ! वरो, जुगतो सरल सभाव, कु० ॥९॥ सहु कोने मन मानी वातडी, भलो कह्यो महाराय, कु० । सरीसा सरीसी ए जोडी मिली, आवी सहु कोने दाय, कु० ॥ १०॥ लोक सहु को राजाने कहे, होस्ये इहां रंगरोल, कु०।एह जमाई सोभे तुम घरे, जिम मुख सोभे C i रास. श्रीपrs. 1 नंबोल, कु०॥११॥राजा पिण रलीयायत थई करी, कीधो वचन प्रमाण, कु०। छट्ठी ढाल सगाइ नृप करी, कहे 'जिनहर्प' सुजाण, कु० ॥ १२॥ सर्व गाथा ॥ १०५॥ दूहा-हिवे मयणाने पूछीयो, पिण बोले नहीं तेह । नीची दृष्टि निहालती, मुखडे लाज करेह ॥ १॥ पुनरपि राजा पूछीयो, पुत्री ! मुझने भाष । ताहरा मनमाहे हुवे, वरनी जे अभिलाप ॥२॥ वार वार इम पूछतां, कुमरी थई सलाज । मुख मुलकी कहे तातने, पूछणसुं स्यो काज ? ॥३॥ चतुर विचक्षण छो तुम्हे, जाणो छो सहु नीति । कुलकन्याने पूछीये, एह नहीं जुगती रीति ॥ ४ ॥ कुलवंती कहो किम कहे ?, मुझ परणावो एह । मात पिता जेहने दीये, तेहिज वरसुं नेह ॥ ५॥ निश्चयसुं जो जोईये, ते पिण बाह्य निमित्त । सुख दुख पामे प्राणीयो, निज निज पूरवक्रित्त ॥६॥ ढाल ७ मी. "मया मोहि दिखणी आणि मिलाइ” एहनी-मयणा कहे सुणो तातजी! -- r ॥ १७॥ T श्रीपाल, ॥१८॥ - रे, पूरव लिखित प्रमाण । ते सघलो आवी मिले, होजी केहो इहां विन्नाण ? ॥१॥ पिताजी!, कर्म सबल जगमांहि, कर्म करे तेहिज हुवे, होजी सुख दुख अरति उच्छाहि, पि० ॥ २॥ जिण वेलाये जेहवा रे, जीवे कीधा कर्म ।उदय थया तिण अवसरे, होजी लहीये फलनो मर्म, पि० ॥३॥ रंक फेडी राजा करे रे, राजा फेडी रंक । एहवो कुण ? फेडी सके, होजी कर्म लिख्या जे अंक, पि० ॥४॥ राय कहे पुत्री ! सुणो रे, तुं मुझ प्राण आधार । वार वार तुझने कहूं, होजी मांगो वंछित भरतार ॥ ५॥ सुताजी!, हुं सबलो जगमाहि, मुझ तूठे सहु संपजे, होजी सुख दुख अरति उछांहि, सु० ॥६॥ माहरी आस्या सहु करे रे, निबलाने बलवंत । हूं तूठो दालिद्र गमू, होजी रूठो जाणि कृतंत, सु०॥७॥ रंक प्रते राजा करूं रे, राय भणी करूं रंक । सबला ते पिण माहरी, होजी माने मनमां संक, सु० ॥८॥ करण मते ते हूं करूं रे, सुख दुख माहरे हाथ । ॥१८॥ SAM N

भीगाट.
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-
रूठो जमघर मोकलु, होजी तूठो करुं नरनाथ, सु०॥ ९ ॥ वलतूं मयणा वीनवे रे,
तात! सुणो मुझ वत्त । तुमने पिण करमे किया, होजी राजन! राज निमित्त, पि०
॥ १० ॥ जेहने पोते पुन्य छे रे, तेहने तूसे राय। पुन्य विना तूसे नहीं, होजी जो
करे लाख उपाय, पि० ॥ ११ ॥ छोरू पिण मोटा तणा रे, सुखीया दुखीया होइ ।
सहु कर्मनो, होजी गरव म करज्यो कोइ, पि० ॥ १२॥ थाप्यो कुमरी कर्मने
रे, उत्थाप्यो नृप वैण । रीसवसे थयो आकरो, होजी कीधा राता नैण, पि० ॥ १३॥
गरव करे खोटो जिके रे, तेहमें किसो सवाद ? । ढाल थई ए सातमी, होजी 'जिन हरष'
सुता नृप वाद, पि० ॥ १४॥ सर्व गाथा॥ १२५॥
दूहा-रीसाणो नृप इम कहे, रेरे मूढ गमार! । तूं लीला सुख भोगवे, ते सहू मुझ
उपगार ॥१॥ पहिरे कंचण आभरण, नव नव वेस बणाय । खाणा पीणा खेलणा,
कारण
के सह
॥ १९ ॥

श्रीपाल,
रास.
has
॥ २० ॥
ते सहू मुझ पसाय ॥ २॥ मयणा कहे सुणो तातजी!, हूं तुम्ह कुल उत्पन्न। में पामी
सुख साहिवी, ते मुझ पोते पुन्न ॥३॥ मयणा इणिपरि भाषतां, राजा थयो कृतंत ।
जिम पावक घृत सींचीयो, वाधे झाल अत्यंत ॥ ४ ॥ भाग्यहीण ए दीकरी, दीसे
छे परतक्ष । कह्यो न माने माहरो, लीयो न मेल्हे पक्ष ॥ ५॥ क्रोध वसे थयो रातडो,
धमधमीयो नरनाह । सगपण बेटी बापनो, भागो मन उच्छाह ॥६॥
ढाल ८ मी. नायकानी-मयणा कहे सुणो तातजी! रे, इवडी म करो रीस मोरा
तातजी! रे, । जाण तुझे सहु वातनारे लाल, तुझे मोटा अवनीस मो०, मयणा०॥१॥
फोगट गरव न कीजीये रे, गरवे सहु गुण जाइ मो० । इंद्र नरेंद्र पिण गर्वथीरे लाल,
लघुता पणो लहाइ मो०, म०॥ २॥ तुझे कहो जे हूं करूं रे, सुखीया दुखीया लोक
मो० । करता हरता हूं सहीरे लाल, ते तो इमही फोक मो०, म०॥३॥तुझ सेवाथी
॥ २० ॥

'
जो हुवे रे, मुखीया सहु जगमांहि मो०।तुझ सेवा करता नथीरे लाल, ते तो सुखीया
कांहि ? मो०, म० ॥४॥राय कहे रूठो थको रे, तूं निरधन वर जोगरे दुहागिणि!।
ए मतिसारू नवि मिलेरे लाल, तुझने उत्तम भोगरे दु० ॥ ५॥ मयणा! सुण मुझ
वातडी रे, ताहरे पोते पापरे दु० । तो सूझे तुझ एहरे लाल, पामिस बहु संतापरे
दु०, म० ॥६॥ हठमाती पोतातणे रे, जाणे हूं बुद्धिवंतरे दु०समझावी समझे नहींरे
लाल, अवगुण एह महंतरे दु०, म० ॥७॥ राती निज गुण ज्ञानमें रे, मूरख निगुण
निटोलरे दु० । लेखवती केहने नथीरे लाल, मूढ न जाणे बोलरे दु०, म० ॥ ८॥ हूं
जाणं मुखिणी करूं रे, परणावू वर साररे दु०।पिण माहरो न करे कह्योरे लाल, थाइस
दुःख भंडाररे दु०, म० ॥९॥ मयणा कहे तुझने रुचे रे, ते परणावो नाह मोरा तातजी!
रे । मुझ पोते पुन्य जो हुस्येरे लाल, तो मुझ होस्ये उच्छाह मो०, म० ॥१०॥ गाढेरो
7
-
॥ २१॥

श्रीपाल.
रास.
a॥ २२ ॥
रीसावीयो रे, सांभल(संभलावी) एहवा बोलरे दु० । मोटा बोली दीकरीरे लाल, मुझ
लेखव्यो तृण तोलरे दु०, म०॥११॥मुझने इणे उत्थापीयो रे, थाप्यो वखत सहायरे दु०।
कहे 'जिनहरष' सहू सुणोरे लाल, आठमी ढाल कहायरे दु०, म०॥१२॥ सर्व गाथा १४३ ।
दूहा-रोषातुर नृप देखिने, मंत्री चिंते एम । ठारूं वयण सुधारसे, सीतल थाये जेम
॥१॥ महाराय! रयवाडीये, रमवानो छे लाग । जईये रमवा आज प्रभु!, फूल रह्यो छे
बाग ॥२॥ अंतरगत दाझी रह्यो, क्रोधागनि विकराल। ऊठ्यो तुरत उतावलो, मानि
वचन भूपाल ॥३॥ चरवादार प्रते कहे, करो तुरंग तइयार। हुकम सुणी आण्यो तुरी,
सपलाणो तिणवार ॥ ४॥ चतुरंगसेना परिवर्यो, राय थयो असवार । हिवे आगलि जे
नीपजे, ते सुणज्यो अधिकार ॥५॥
ढाल ९ मी. "रे हमीरीयारे रहि वैरी नैण झकोलतो"एहनी-राय रयवाडी संचर्यो,
॥ २२ ॥

॥ २३ ॥
11
आगलि उडे खेह मंत्रीसर!राजा चकित थई कहे, आवे छे कुण एह मं०, रा०॥१॥
आडंबर करता थका, न धरे किसि प्रवाह मं०।कोलाहल हलबोलसुं, मंत्री कहे सुणि नाह!
राजेसर !, रा०॥२॥ ए पेडो कोढी तणो, सात सयां परिवार राजेसर! । कोढी
सहु भेला थया, व्याप्यो रोग अपार रा०, रा०॥३॥ राजकुंवर एक नान्हडो, आवी
मिलीयो मां(य)हि रा० । ते पिण कोढी फरसथी, उंबर रोग लहाय रा०, रा०॥४॥उंबर
रोग थकी थयो, उंबर राणो नाम रा० । ते आवे छे ए चल्यो, ए असमाधिनो ठाम
रा०, रा०॥५॥ असवारी वेसर तणी, परिवरीयो परिवार रा०। गतनासा चामर धरे,
गलित त्वचा छत्रधार रा०, रा० ॥६॥घंटा हाथे झालिने, मुहर चले गत कर्ण रा०।
लोकांने बीहावतो, मूंडो जेहनो वर्ण रा०, रा० ॥ ७॥ कोढ मंडल अंग ओलगू,
गलितांगुलि मंत्रीस रा०। सर्व गलित कोटवालछे, तेहमें उंबर ईस रा०, रा०॥ ८॥
LASS
॥ २३॥

रास.
श्रीपाल.
॥ २४ ॥
द्रादमंडल कोढे गल्या, दीसंता विकराल रा०सेवक तास दोहागीया, राध रुधिर परनाल
रा०, रा०।९। देसाधिप पासे लीये, मननो मान्यो माल रा०। ना कोई न कही सके,
एहवी एहनी चाल रा०, रा०॥१०॥ तेह भणी बीजी दिसे, चालो श्रीमहाराय! रा०।
जावा द्यो ए कोढीया, जिम दरिसण नवि थाय रा०,रा० ॥ ११ बीजी दिसि राजा
चल्यो, मारग छोडी जाम रा० । कोढीवृंदे निरखीयो, हूकल करता ताम रा०, रा०
॥१२॥आव्या ते ऊतावला, नृप साम्हा तिणवार रा०।तब राजा एहवू कहे, सुण मंत्री !
सुविचार मं०, रा०॥ १३ ॥ परचावो पासे जई, मुह माग्यो द्यो माल मं० । पिण
रहाविज्यो, करिज्यो मुख लालमपाल मं०, रा० ॥ १४॥ हुकम दीयो मुहुताभणी,
बीहंते भूपाल मं० । कहे 'जिनहरष' पूरी थई, नवमी ढाल रसाल मं०, रा० ॥१५॥
दूहा-गलितांगुलि ऊतावलो, उंबरनो परधान । ते पहिली आवी कहे, सांभल हो
॥ २४ ॥

रास. राजान! ॥१॥ उंवरराणो अम्हतणो, साहिब छे सुपराण । माने सहु को तेहने, कोई न लोपे आण ॥२॥ मणि माणिक कंचण रयण, भोजन कूर कपूर। उंवर राणो हुकमसुं, मंगावे भरपूर ॥३॥ अम्हे सहू सेवक नफर, सुखीया तास पसाय । कमी नहीं किण वातनी, पिण मांभल महाराय !॥४॥राणी नहीं राजातणे, ए छे मोटी खोड।इक कन्या द्यों अमभणी, जिम पहुंचे मन कोड ॥५॥ ढाल १० मी. “वात म काढो हो व्रततणी” एहनी-राय कहे किम दीजिये, निज कन्या गुणवंतो रे । रोगी नरने आपतां, जगमें अपजस लहंतो रे, रा० ॥१॥ वलतुं गलि- तांगुलि कहे, ताहरो जस जग गाजे रे । माग्यो ये मालव धणी, एह बिरुद तुझ छाजे रे, रा०॥।॥ के तो कीरति हारीये, के दीजे निज कन्या रे। जेहवी तेहवी अम्हभणी, मानीस्ये ते धन्या रे, रा०॥३॥ पडीयो राय विचारणा, अजुगति वात सुणाई रे। किमही दुरस पडे

श्रीपाल.
10
॥२६॥
नहीं, दोतड पडीयो भाई रे, रा०॥४॥ नृपने मयणा सांभरी, कन्या ए वर जोगी रे।
अविनयनो फल जिम लहे, थाये दुखिणी रोगी रे, रा०॥५॥ कीरति कहो किम हारीये,
दोहिली जे जगमाहे रे। कन्या देतां जस रहे, तो जस गमीये काहे रे, रा०॥६॥ मुझ
मंदिर तुम्हे आवज्यो, इम कही पाछो वलीयो रे। राय गृहांगण आवीयो, सासीनो हलफ-
लीयो रे, रा०॥७॥ तेडी मयणा सुंदरी, राय कहे सुण बेटी ! रे । हूं तुझने सुख चिंतवू,
तूं अवगुणनी पेटी रे, रा०॥८॥ बाप सुकरमी जो हुवे, वंछित वर परणावू रे । हठ परि-
हर सठ बालिका !, दोहग दूरे गमावू रे, रा०॥९॥ जो आपकरमी तूं हुवे, तो वर उंबर
राणो रे। तुझ करमे ए आणीयो, परणेवानो टाणो रे, रा०॥१०॥ मयणा मुलकीने कहे,
वखत लिख्यो वरराजो रे। ते मुझ सिरनो सेहरो, माहरे तेहसुं काजो रे, रा० ॥११॥
राये ते तेडावीयो, सपरिवारसु आयो रे । करमसंयोगे नृप कहे, तूं वर मयणा पायो रे,
॥ २६॥

जुगतून
रास.
+
॥ २७॥
AE
रा० ॥१२॥ उंबर कहे ए राजवी!, वात न जुगती दीसे रे। दसमी ढाल पूरी थई, कहे
'जिनहरप' जगीसे रे, रा० ॥१३॥ सर्व गाथा ॥ १८१॥
दूहा-बायस कंठे कनकनी, जिम सोभे नहीं माल । जोडी नहीं बग हंसली, तिम
मुझने ए बाल ॥१॥राय कहे ए दीकरी, कह्यो न माने मुझ । आप करम माने सही, तिण
आपूंछं तुझ ॥२॥ मुझ दीधो वर आदरे, तो परणावू जोय। करम मांहि तूंहिज लिख्यो,
मुझने दोस न कोय ॥३॥ दया न आणी चित्तमें, नाण्यो नेह लिगार । लोक कहे ए
थयो, करे अधम आचार ॥४॥ उत्तम कोप करे नहीं, करे ते मान प्रमाण । पिण ए
ढाल १मी. वांगरीयानी-उंवर कहे सुण राजवी! रे, माहरी ए नहीं जोडिरे गुणवंता!।
हूँ कोढी रोगे भर्यो रे, रतन लगाई खोडिरे गु० ॥१॥ मुझ सोभे नहीं ए कांता, में पातक
1
॥ २७॥

श्रीपाल. ॥२८॥ कीया अनंता गु० । मुझ देखी सहू बीहंता, तिण एहनो नहीं मुझ कोडरे गु० ॥२॥जो मुझने देवा करे रे, तो कोई मुझ जोगरे गु०। जेहवी तेहवी आपीये रे, हसे नहीं जिम लोगरे गु०॥३॥ए कन्या ने हूं किहां रे, ए हंसी हूं कागरे गु०। सरिखे सरिखो जो मिले रे, तो सोभे महाभाग ! रे गु०॥४॥ अविचार्यु जो कीजिये रे, लोक हसे घर हाणि रे गु० । तुमने एहवू नवि घटे रे, अपजसनी ए खाणि रे गु० ॥५॥ तूं ये पिण हूं ल्यूं नहीं रे, थाओ तुझ कल्याण रे गु०। बीजी ठामे मांगस्यूं रे, उंबरनी ए वाण रे गु० ॥६॥ राय कहे हूं स्यूं करूं रे, एहनो एहवो भाग रे गु० । वांक न को तुझ मुझ तणो रे, ए कन्या तुझ लाग रे गु०॥७॥ मयणा निसुणी एहवू रे, ऊठी तुरत तिवार रे गु० । ए वर लिखीयो भागमें रे, तो हिवे किसो विचार रे गु०॥८॥ उंबर कर निज कर ग्रह्यो मयणा धरीय विवेक रेगु०। कोढी वर पिण आदर्यो रे, छोडी नहीं निज टेक रे गु०॥९॥ ॥ २८॥ है R

।।२९ ॥
उमराउ सामंत जे रे, मंत्रीसर परधान रे गु०। अंतेउर वारे सहू रे, वले नहीं राजान रे
गु० ॥ १०॥ लोक सहू जोइ रह्या रे, दुखभर रोवे सेण रे गु० । मुखमें घाली आंगुली रे,
इण परि भापे वेण रे गु०॥ ११॥ एह अजुगतूं नृप करे रे, कीडी ऊपरि घाव रे गु० ।
पिण कोई न कही सके रे, राजा वदे सो न्याव रे गु०॥१२॥ए थई ढाल इग्यारमी रे,
कोप्यो राय अपार रेगु०। कहे 'जिनहरष' हिवे सुणो रे, आगलि जे अधिकार रेगु०॥१३॥
दूहा-रोवंतां इणपरि सहू, कहे अधम ए भूप।रयण अमूलक कन्यका, किम नांखेछे कूप
॥१॥छोरू कुछोरू जो हुवे, तोही पहिडे नहीं मावीत।भोलपणे एहवो कह्यो, तो ही राजा
चाले नीत॥२॥ छोरू वेचे बाप जो, तो कुण आडोथाय।जोर नचाले रायसुं, सहू करे हाय
हाय॥३॥ दुर्लभ दरसण देखतां, मयणा मोहन वेलि। आंबा एरंड पाखति, रोपे छे गुणगेलि
॥४॥ सगले कीधी वीनती, सहू कह्यो समझाय। कहणा मांहे केहनी, बाकी नरही काय॥५॥
।
॥ २९॥

श्रीपाल. ॥३०॥ ढाल १२ मी. “सुंगुण सनेही मेरे लाला!” एहनी-मयणा निजमन काठो कीधो, जो मुझ वखते ए वर दीधो । तो माहरे ए उंबर राणो, इण भव एहिज प्रीतम जाणो ॥१॥ इहां कोईनो नहीं छे चारो, वांक न कोई इहां (अछे) पितारो।दाय उपाय अनेक विचारो, करम सबल जगमांहि अ(व)तारो॥२॥ मन दृढ देखी कुमरी केरो, राय बल्यो मनमांहि घणेरो। सती शिरोमणि सत्त्व न चूके, लीधो पख सापुरसन मूंके ॥३॥सायर मरजादा जो लोपे, क्षमावंत मुनिवर जो कोपे। शेषनाग मुख जो विष उलटे, तो पिण उत्तम वयण न पलटे॥४॥ पवन डुलायो मेरु न डोले, मोटा दीन वचन नवि बोले। आपद संपद मांहि सरीखा, ते नर बावन वीर सरीखा ॥५॥ करमायत्त सहू ए दीसे, कुमरी निजमन माहे हीसे। एहवू देखी राय परणावी, उंबर राणाने मन भावी ॥ ६ ॥ उंबर कुमरी वेसर चडीया, निज डेराने पंथे ख(प)डीया। नगर लोक सहू ऊभा जोवे, करे कोलाहल डसके ॥३०॥ है रास. श्रीपाद रोवे ॥७॥ एक कहे धिग धिग ए राजा, एहना खोटा थया दिवाजा। कोई कहे ए कुमरी अयाण, राय वचन न कियो परमाण ॥८॥कोई कहे मा मूंडी कीधी, निजकन्याने सीख न दीधी । केई पाठक अवगुण काढे, जिनमतने केई दूषण चाढे ॥९॥ मयणा चाली उंबर संगे, हीयडे हरख धरी उछरंगे । जैन धरम मीजी भेदाणी, किम पलटे तेहनी कहो वाणी ॥ १०॥ वारमी ढाल थई ए जाणो, कुमरी परण्यो उंबर राणो । करमतणी 'जिनहरप!' कहाणी, ज्ञानी विण नवि जाये जाणी ॥ ११॥ सर्व गाथा ॥ २१५॥ दूहा-हिवे वीजी कन्या तणो,जोडेवा वीवाह। तेडावी सिवभूतिने, इम भाषे नरनाह ॥१॥ लगन अनोपम जोइवो, निरदूषण श्रीकार ।सुरसुंदरी परणावीये, करी महोच्छव सार ॥२॥ लगन शुद्ध छे अमुकदिन,एहवा लगन न कोइ।ज्योतिष शास्त्र निहालतां, एहवू कदीक होइ ॥३॥जोसी वचन प्रमाण करी, मांड्यो राय वीवाह। परणावू सुरसुंदरी, अधिको करीउच्छाह४ , ॥ ३१॥ -

श्रोपाल.
रास.
॥ ३२ ॥
ढाल १३ मी, “करडो तिहां कोटवाल” एहनी-प्रीति धरी मनमांहि, राय तेडाव्या हो
साजन आपणा। सगा सणीजा लोक, प्रीति वधारण हो आव्या अतिघणा॥१॥राज-
वीयांने साथि, आव्या हो राजकुमर रलीयामणा । अमरपुरी अवतार, नगर विराजे हो
मनुष्य सुहामणा ॥२॥ डेरा तंबू ताणी, मंडप रचीया हो नव नव भांतिना।रंग मंडपरंगावि,
कारण कीधा हो सगला खांतिना ॥३॥ लौकिक विधि सहु कीध, तेहनो स्यूं कहीये हो
लोक जाणे सहू । आव्यो लगन सुदीस, आरिम कारिम कीधा तिहां बहू ॥४॥ हिवे
अरिदमणकुमार, सुंदरवागा हो अंग बणावीयो। पुरुषतणा सिणगार, कीधा हो सेहुकोने
मन भावीयो॥५॥ चंचल चपल तुरंग, सोवन साकत (पलाण) हो चढीयो नचावतो।
जाणे देवकुमार, मुखडे तंबोल सुरंगा चावतो॥६॥ चवरी मंडपमाहि, कुमर आवीने हो बेठो
तिण समे। बेठा सहू भूपाल, वेह वणावी कंचन कलसमे ॥७॥ सोले ही सिणगार, कुमरी
॥३२॥

रास. वणाया हो सुंदर मनरली। आवी चवरीमाहि, वादलमांहे हो जाणे चमकी वीजली ॥८॥ वेठी वरने पास, सोहे जाणे करि श्रीपति रुकमणी । सोभा अधिक सुहाय, जाणे इंद्राणी इंद्र कन्हे वणी॥९॥फिरीया फेरा च्यारि, च्यारे चवरीमां मंगल वरतीया। कन्या वर कंसार, मांहो मांहे मिली आरोगीया॥१०॥वर कन्या वीवाह, करि परणाव्या हो ढोल घुरावीया। ग्डि धुं धुं धुं घुर्यारे निसाण, भेरि भुंगल वाजा वजडावीया॥११॥थयो सुरंग वीवाह, रंग मुरंग रह्यो वेवाहीयां। ऊभा चारणभाट, विरुदभणे मनडे ऊमाहीयां ॥१२॥थलेवो तिण- वार,जोसी जोडाव्यो रूडी जुगतसुं। एथई तेरमीढाल, कहे जिनहरष'जाणज्यो विगतसुं१३ दूहा-कर मेल्हावे नृप दीया, सोवन रयण भंडार । सुंदर घोडा हाथीया, दासी दास अपार ॥ १॥ बहु मौलिक वागा दीया, रतन जडित सिणगार । सोवन पाए ढोलीया, सउडि(सोडि) तलाई सार ॥२॥ दीधो सवलो दायजो, कहतां नावे पार। प्रीती तिहां देतां ३ । ॥३३॥ " 2

श्रीपाल.
रास.
॥ ३४॥
थकां, न करे कोई विचार ॥३॥ राजा राणीनो घणो, पुत्री ऊपर प्रेम । माल अमा(पो)मो
आपीयो, प्रीति जणावी एम ॥४॥ कीधी बहु पहिरावणी, राजवीयांने रंग । रस राख्यो
जस संग्रह्यो, वाध्यो प्रेम अभंग ॥५॥
ढाल १४ मी. “राजा जो मिले” एहनी-लोक लुगाई मिलीया अछेह, वात करे माहो
मांहि तेह, पुन्ये सहू मिले, पुन्ये मनना मान्या सहू मिले। पुन्ये उत्तम सयण संयोग,
पुन्ये लहीये परिघल भोग, पु० ॥१॥ सुंदर मंदिर रमणि विलास, पुन्ये पहूंचे मननी
आस, पु० । जोवो कुमरीनो पुन्य प्रकास, वंछित वर लह्यो लील विलास, पु०॥२॥ देव-
कुमर सरीखो वरराज, कुमरी अपछरने सिरताज, पु० । सरीखी जोडि जोडी जगदीस,
सुख भोगवस्ये ए निसिदीस, पु० ॥३॥ करसे रूप सफल हिवे देह, जोवन सफल लेस्ये
गुणगेह, पु० । एहवो वर घर रिद्धि पंडूर, लहीये जो हुवे पुन्य अंकूर, पु० ॥४॥ भाग्य-
॥ ३४ ॥

श्रीपाल. वती कुमरी ए धन्य, एह सरीखी नहीं कोई अन्य, पु०।एक बापनी पुत्री दोय, परतिख पुन्य पटंतर जोय, पु०॥५॥ एक कहे वारू को राय, राजा तूठे स्यूं नवि थाय, पु० । एक कहे कुमरी बुद्धिवंत, वाप खुसी करी वरीयो कंत, पु०॥६॥अध्या (पकने) रूने हाथे सिन्दि, भणी गुणी पामी वलि रिद्धि, पु०। एक कहे परतिख फल जोइ, शैव धरमथी स्यूं नवि होइ, पु० ॥७॥ पाछली भवे इणि पूजी गोरि, फल लहिस्ये आगे एतो मोरि, पु० । लोक मिली इण परि करे वात, जीतानाबेली कहि वात, पु०॥८॥ मयणाने पोते नहीं पुन्य, पुन्य विना किम थइये धन्य, पु०।राजवीयांसुं करीय उपाधि, तो जोवो तेहना फल लाधि, पु०॥९॥ इम निज निज मुख बोले बोल, समझ विहूणा निगुण निटोल, पु० । कहे जिनहरप' ए चउदमी ढाल, पाणी पाणीने जास्ये ढाल, पु०॥३०॥सर्व गाथा ॥२४७॥ दूहा-हिवे राजा ताजा प्रघल, विविध भांति पकवान । असन पान खादिम प्रमुख, ॥३५॥ ब

।
रास.
श्रीपाल.
॥३६॥
जुगते जिमाडी जान ॥१॥ ऊपर दीधा अति प्रबल, पान लविंग मुखवास । जस लीधो
जीमाइने, सहू कहे साबास ॥२॥ सगा सहू संतोषिया, खर्यो माल अपार । पुत्री हिवे
वोलाइवा, राजा थयो तयार ॥३॥ हय गय रथ पायक प्रघल, निहस पडे नीसाण। कुम-
रीने माता दीये, सीख भली हित आण ॥४॥
ढाल १५ मी. "इतला दिन हूं जाणती रे हां” एहनी-हिवे ते सोहगसुंदरी रे हां,
पुत्रीने दीये सीख, बाई! सांभलो।सासरीया संतोषिजे रे हां, हलवे भरजे वींख, बा०॥१॥
चतुर सुजाण रे हां, तूं मुझ आतम प्राण, बा० । विद्या विनयनी खाणि रे हां, तुझ
मुखे मधुरी वाणि, बा० ॥२॥ विनय करे परीयण तणो रे हां, स्वजन तणो सुविशेष,
बा० । कुवचन म कहिसे केहने रे हां, किणसुंम करिसे द्वेष, बा०॥३॥ देव तणी परि
मानिजे रे हां, भगति करे भरतार, बा० । कह्यो म लोपे पिउ तणो रे हां, उत्तम संगति
॥३६॥

श्रीराला
धार, वा०॥४॥ सासू नणद जेठाणीयां रे हां, पडिजे सहूने पाय, बा०।सुसरानी सेवा करे
रे हां, सहूने आवे दाय, वा०॥५॥ सूईजे नाह सूतां पछे रे हां, जीमे नाह जीमाडि, वा०।
भोजन वेला घरतणा रे हां, मेल्हे वार उघाडि, वा० ॥६॥ आवे कोई मांगिवा रे हां, न
करे तास नाकार, वा० । पर कर ऊपरि कर करे रे हां, भरजे सुजस भंडार, बा० ॥७॥
रूडो घर देखाडिजे रे हां, चलिजे चतुर आचार, वा० । सुपीहरी कहराविजे रे हां,
करिजे सहूनी सार, वा० ॥८॥ भूख्या दुखीया देखिने रे हां, करिजे करुणा सदीव, बा।
दोलति हत्थी थाईजे रे हां, कठिण करे मत जीव, वा०॥९॥ निसनेहणि मत थाईजे
रे हां, लिखि मोकलिजे लेख, वा० । पुत्री! प्रीतम माणसां रे हां, सुख लहीये देखी देख,
वा० ॥ १०॥ जीवथकी तूं वालही रे हां, तूं अम्ह प्राण सरीख, वा० । कहे 'जिनहरष'
सह भणी रे हां, पनरमी ढाले सीख, वा० ॥११॥ सर्व गाथा ॥२६२॥
॥ ३७॥

श्रीपाल. ॥ ३८ ॥ दूहा-मातपिता पाय लागिने, कुमरी चली पिउ साथ। हय गय पायकसू हिवे, वोलावे नरनाथ ॥१॥ए मंदिर ए मालीया, ए नगरी आहीठाण।मुझने वीसरिस्ये नहीं, रात दिवस सुप्रमाण ॥२॥ सीख करी सहु लोकसुं, नयणे नीर प्रवाह । हीयडो फाटे मायनो, उलट्यो विरह अथाह ॥३॥ गले लागी पुत्रीतणे, माइ करे आक्रंद । प्रेम तणे परवस थई, है है!! मोह नरिंद॥४॥आंसू कुमरी लोयणे, जलधर जिम संजोई। हत्थालि छाला पड्या, चीर निचोइ निचोइ ॥५॥रोतां मृग रोवरावीया, वाट वटाऊ लोक । जातां जीव वहे नहीं, वीछडवानो सोक ॥६॥ कुमरी चाली सासरे, हिलिमिलि सीख करेह । फिरि फिरि जोवे पाछले, डब डब नयण भरेह ॥७॥ हिवे (मयणा) उंबर राणा तणो, सांभलज्यो अधिकार। मनमां निश्चय राखीयो, न धरे दुख्ख लिंगार ॥८॥ ढाल १६मी."बिंदली तो नणद गमाई, म्हारे ल्हौड्ये देवर पाई हे नणदल बिंदली ल्ये" 15

पहनी-उंबर कहे सुण कुमरी!, तूं तो रूपे जाणे अमरी हे सुंदर वयण सुणो । राय अजु-
गति कीधी, मुझ कोढीने तूं दीधी हे सुं० ॥१॥ वयण सुणो मृगनयणी, मृगराजकटी
ससिवयणी हे सुं० । विधिना रूप नीपायो, देखी पोते सुख पायो हे सुं० । ए जोवन तुझ
नीको, सहु नारि तणे सिर टीको हे सुं० ॥२॥ मुझ आणा सिर धारी, कोई पुरुष अवर
सुविचारी हे सुं० । भोगवि तिणसुं भोगा, मन गमता सरस संयोगा हे सुं० ॥ ३॥ हुकम
धणीनो होई, इम करतां दोष न कोई हे सुं। नारि रयण तूं हीरा, हूं नरमें काच कथीरा
हे मुं०॥४॥ तूं तो उत्तम हंसी, हूं वायस जाणि कुवंसी हे सुं०। मुझ हीयडे दुख झाझं,
राय करणी देखी दाझं हे सुं०॥५॥ ते माटे हठ छोडी, मुझ हुकमे करि कांइ जोडी हे
मुं० । मुझ पासे ते रहिस्ये, तुझसुं सुखफल भोगविस्ये हे सुं० ॥६॥ उंबरनी ए वाणी,
मुणि मयणा दुखभराणी हो प्रीतम ! वयण सुणो । नयणे नीर प्रवाहा, कर जोडी कहे
॥ ३९ ॥

श्रीपाल. ॥ ३८॥ ॥ दूहा-मातपिता पाय लागिने, कुमरी चली पिउ साथ। हय गय पायकसू हिवे, वोलावे नरनाथ ॥१॥ए मंदिर ए मालीया, ए नगरी आहीठाण।मुझने वीसरिस्ये नहीं, रात दिवस सुप्रमाण ॥२॥ सीख करी सहु लोकसुं, नयणे नीर प्रवाह । हीयडो फाटे मायनो, उलट्यो विरह अथाह ॥३॥ गले लागी पुत्रीतणे, माइ करे आकंद । प्रेम तणे परवस थई, है है !! मोह नरिंद॥४॥आंसू कुमरी लोयणे, जलधर जिम संजोई। हत्थालि छाला पड्या, चीर निचोइ निचोइ ॥ ५॥ रोतां मृग रोवरावीया, वाट वटाऊ लोक । जातां जीव वहे नहीं, वीछडवानो सोक ॥६॥ कुमरी चाली सासरे, हिलिमिलि सीख करेह । फिरि फिरि जोवे पाछले, डब डब नयण भरेह ॥७॥ हिवे (मयणा) उंबर राणा तणो, सांभलज्यो अधिकार मनमां निश्चय राखीयो, न धरे दुख्ख लिगार ॥८॥ ढाल १६मी."बिंदली तो नणद गमाई, म्हारे ल्हौड्ये देवर पाई हे नणदल बिंदली ल्ये" ॥३८ ।

एहनी-उबर कहे सुण कुमरी!, तूं तो रूपे जाणे अमरी हे सुंदर बयण सुणो । राय अजु- गति कीधी, मुझ कोढीने तूं दीधी हे सुं० ॥ १॥ वयण सुणो मृगनयणी, मृगराजकटी ससिवयणी हे सुं० । विधिना रूप नीपायो, देखी पोते सुख पायो हे सुं० । ए जोवन तुझ नीको, सह नारि तणे सिर टीको हे सुं० ॥२॥ मुझ आणा सिर धारी, कोई पुरुष अवर मुविचारी हे सुं० । भोगवि तिणसुं भोगा, मन गमता सरस संयोगा हे सुं०॥३॥ हुकम धणीनो होई, इम करतां दोष न कोई हे सुं० । नारि रयण तूं हीरा, हूं नरमें काच कथीरा हे सुं०॥४॥ तूं तो उत्तम हंसी, हूं वायस जाणि कुवंसी हे सुं०। मुझ हीयडे दुख झाझं, राय करणी देखी दामु हे सुं० ॥५॥ ते माटे हठ छोडी, मुझ हुकमे करि कांइ जोडी हे सुं० । मुझ पासे ते रहिये, तुझसुं सुखफल भोगविस्ये हे सुं० ॥६॥ उंबरनी ए वाणी, सुणि मयणा दुखभराणी हो प्रीतम ! वयण सुणो । नयणे नीर प्रवाहा, कर जोडी कहे ॥ ३९

श्रीपाल.
॥ ४० ॥
सुणो नाहा ! हो प्री० ॥७॥ चरणे सीस लगावी, कहे सी ए वात सुणावी हो प्री० ।
मनमां जाणी रहिन्यो, फिरि बीजी वार म कहिज्यो हो प्री० ॥८॥ अधम जनम नारीनो,
मेलो जाणे कुंडगारीनो हो प्री०।तजीये सील अमोलो, तो कांजी कोही तूलो हो प्री ०॥९॥
सीयल विभूषा कहीये, सीले जस महीयल लहीये हो प्री० । इणि भव प्रिय तूं मोरे, हूं
चेडी सरणे तोरे हो प्री० ॥१०॥ काम न कोई बीजे, तुझने देखी मन रींझे हो प्री० ।
वाल्हेसर तूं मन माहरे, बलिहारी प्रीतम ! ताहरे हो प्री० ॥११॥ए निश्चय मुझ जोवो,
होणहार हुवे ते होवो होप्री०सोलमी ढाल सुहावे, जिनहरष' सहु सुख पावे हो प्री०॥१२॥
दूहा-सती सिरोमणि मन सुदृढ, निरमल सील सुहाय । इकतारी इम राखतां, अनुक्रमे
रयणि विहाय ॥ १॥प्रहविहसी पूरव दिसे, उदय थयो आदीत । मानुं मयणा सुंदरी,
देखवा सुपवीत ॥२॥ चिहुं दिसि चिडीयां चह चही, बोल्या पंखीवृंद । मानुं मयणाने
॥ ४० ॥

श्रीपाल. ॥ ४२ ॥ कहे, चिरंजीव चिरनंद ॥ ३॥ मयणा वयण कहे हिवे, सुण प्रीतम ! सुसनेह । जईये उलट भावमुं, श्रीरिसहेसर गेह ॥४॥ मयणा उंबर आवीया, वांद्या रिषभ जिणंद।मयणा स्तुति इणपरि करे, हीयडे धरि आणंद ॥५॥ ढाल १७ मी. "आदर जीव! क्षमा गुण आदर" एहनी-जय जय रिषभ जिणेसर साहिब, शिव संपत्ति दातार जी। नाम थकी नवनिधि सिद्धिलहिये, त्रिभुवन जन आधार जी, जय० ॥3॥ तूं करुणा सागर गुण आगर, महीयल महिमावंत जी। सुर नर नायक पाय नमे नित, दसण नाण अनंत जी, जय०॥२॥अजर अमर अविचल अविनासी, नलहे कोई सरूप जी। ज्योतीरूप अरूपी अरिहंत, त्रिभुवन नाथ अनूप जी, जय० ॥३॥ सयंभूरमण बिंदु जल- केरी, संख्या कहे कोई तास जी । तुझ गुण संख्या न लहे कोई, जो सारद मुखवास जी, जय० ॥ ४ ॥ तूं परतिख सुरतरु अवतारी, बलिहारी तुझ नाम जी । तूं सहु जंतु तणो ॥४१

श्रीपाल.
॥४२॥
उपगारी, भव भमतां विश्राम जी, जय० ॥५॥ तुझ नामें पामे वांछित फल, तुझं नामे
बहु बुद्धि जी। तुझ नामे लहीये जस निरमल, तुझ नामे कुल सुद्धि जी, जय० ॥६॥शक
चक्रधर पदवी लहीये, तिणमे किसो विचार जी। मोक्षतणी पदवीनो दाता, तुझ गुण
अधिक अपार जी, जय० ॥७॥ बोधि बीज तुझथी पामीजे, तुझथी लहीये धर्म जी।लब्धि
सिद्धि तुझ नामे थाये, तूटे सगला कर्म जी, जय० ॥८॥ ताहरी ज्योति सकल त्रिभुवनमें,
गावे सगला संत जी। केवल ज्ञान करीने देखे, लोकालोक अनंत जी, जय०॥९॥रोग
सोग तुझ नामे नासे, तुझ नामे समृद्धि जी।तुझ नामे लहे काया 'निरमल, तुझ नामे
रिद्धि वृद्धि जी, जय० ॥१०॥ आस्या पूरे चिंता चूरे, दूर गमे कलेस जी। पुन्य पसाये
दरिसण पाम्युं, पाप गया सुविसेस जी, जय० ॥ ११॥ मयणा इणि परि स्तवना कीधी,
भाव भगति सुविसाल जी। कहे 'जिनहरष' थई ए पूरी, भली सतरमी ढाल जी, जय०॥१२॥
॥ ४२ ॥

श्रीपाल,
॥ १३ ॥
दूहा-इम स्तवना करतां थकां, अंतर भाव विसाल। जिन कंठेथी ऊछली, कुसुम माल
ततकाल ॥१॥ माला साथे उछल्युं, जिनवर कर फल जाम । उंबर मयणा वयणथी,
ते फल लीधुं ताम॥२॥ माला मयणा संग्रही, वचन कहे तिणवार। स्वामी! ताहरा देहनो,
रोग गयो निरधार ॥३॥आपणसुं सुप्रसन थया, कृपावंत भगवंत । रोग मिटीने सुख हुस्ये,
सही जाणेज्यो कंत!॥४॥ वंदी ऊठ्या भावसुं, धरता मन आणंद । भाव भगति बहु
जुगतिसुं, वांद्या श्रीमुनिचंद ॥५॥ मीठी अमृत सारिखी, सीतल चंदन जाणि । आगलि
बेसी सांभले, श्रीगुरु केरी वाणि ॥६॥
ढाल १८ मी. “ रहो ४ वालहा” एहनी- मुनिवर इणिपरि उपदिसे, धरम करो चित
लाइ भवियण! आउ अथिर जिनवर कह्यो, अंजलि जल जिम जाइ भ०, मु०॥१॥
जीवतणी जयणा करो, संजम तप श्रीकार भ० । एहथी सिवसुख पामीये, नर सुर सुख
मर
॥ ४३ ॥

45
श्रीपाल.
॥४४॥
दातार भ०, मु०॥२॥ इणपरि दीधी देसना, ऊठ्या सहु नर नार भ० । मेयणा मुनिवर
ओलखी, पूछे गुरु तिणवार भवि०, मु०॥३॥ए नर कुण तुझ संगते, सुभ लक्षण गुण-
वंत भ० । मयणा भाषे रोवती, सगलो निज विरतंत भ०, मु०॥४॥ ते तो दुख मुझने
नथी, पिण सांभल मुनिराय! भ० । एह सबल दुख मुझ भणी, जिनसासन निंदाय भ०,
सतीय सिरोमणि इम कहे ॥ ५॥ सिव सासन उत्तम कहे, असमझ मूरख लोक
भ० । जिनसासन परभावना, थाये तो जाये सोक भ०, स०॥६॥ते माटे मुझने कहो,
कोइक दाय उपाय भ० । तुम्हसूं छांनो क्यूंही नहीं, उपगारी मुनिराय भ०, स० ॥७॥
दुष्ट व्याधि मुझ पति तणो, जो किमही ए जाय भ० । तो अपजस सगलो टले, जिन-
सासन दीपाय भ०, स०॥८॥गुरु कहे सांभल श्राविका!, अमचो नहीं आचार भ० ।
सावद्य सेवू नहीं अम्हे, मंत्रादिक परिहार भ०, मु० ॥९॥ धरम थकी सुख पामस्यो,
॥ ४४ ॥

श्रीपाल. धरमे भोग संयोग भ० । धरमे सिवपद संपदा, धरमे देह निरोग भ०, मु० ॥१०॥ निर- वद्य एक उपाय छे, चउदे पूरव सार भ० । जेहथी सहु सुख पामीये, नवपद श्रीनवकार भ०, मु०॥११॥अरिहंत १ सिद्ध २ सूरिसरू ३, उवज्झाया ४ सहुसाध ५भ० । दसण६ नाण ७ चरण ८ वली, तप ९ नवपद आराध भ०, मु० ॥१२॥ मयणाने मुनिवर कह्यो, नवपदनो अधिकार भ० । ढाल अढारमी एतले, थई 'जिनहरष' विचार भ०, मु०॥१३॥ दृहा-ए नवपद संपददियण,उदारण त्रयलोय। जिनसासननोसार ए,एहथी चिंतित होय मंत्र यंत्र एथी अधिक, कोई नहीं संसार। कल्पवृक्षथी ए अधिक, भव भव सुख दातार ॥२॥ जे सिदा जे सीझस्ये, सीझे छे वलि जेह । ते नवपदना ध्यानथी, एहमां नहीं संदेह ॥३॥ ढाल १९ मी. "चतुर सनेही मोहनां" एहनी-ए नवपद महिमा सांभलो, ए सम अवर न कोई रे। एहनी मोटिम महियले, दिन दिन अधिकी होई रे, ए०॥१॥ए नवपदथी ॥४५॥ ACCI

श्रीपाल.
नीपजे, सिद्धचक्र सुविचारो रे । सकल सिद्धि दायक कह्यो, ज्ञानी शास्त्र मझारो रे, ए०
॥२॥ चोवीसे जिन थापिये, षोडश विद्या देवी रे । शासन देवी देवता, ग्रहगण उचित
ठवेवी रे, ए०॥३॥ खेत्रपाल दिगपाल जे, सपरिवार थापीजे रे।यंत्र करी विधि पूजिये,
तउ(तो)वंछित फल लीजे रे, ए०॥४॥ उत्तम तप संजम धरी, त्रण योग थिर राखी रे । निर-
मल ध्यान धरी करी, ध्यावे जिनवर साखी रे, ए०॥५॥थाये ततखिण निर्जरा, अनुक्रमे
केवल लहीये रे । मोक्ष एहना जापथी, करम कठिन निरदहीये रे, ए०॥६॥ संसारी
सुख पिण सहू, लहीये एहने जापे रे। भव भवनां पातिक कीया, प्राणी पलमां कापे रे,
ए० ॥ ७ ॥ परमोत्तम तुझने कह्यो, ए सिद्धचक्र सरूपो रे। समता रस मनमा
धरी, ए आराधि अनूपो रे, ए०॥८॥ निरमल सील धरी करी, मन पर द्रोह निवारी रे।
सुजस सुभावे विस्तरे, जापे एह जयकारी रे, ए०॥९॥ आसू चैत्र सातम थकी, आंबिल
S
॥४६॥

श्रीपाल,
रास.
करी नव दिवसो रे । अष्टप्रकारे पूजीये, ध्यान धरी जगदीसो रे, ए० ॥१०॥ पंचामृत
पूजा करे, नवमे दिन मनरंगो रे । पचखे आंबिल गुरु मुखे, पामे सौख्य अभंगो रे, ए०
॥ ११ ॥ ढाल कही उगणीसमी, सिद्धचक्र अधिकारो रे । मयणा सुख लहिस्ये हिवे,
कहे 'जिनहरप' अपारो रे, ए० ॥ १२॥ सर्व गाथा ३३३ ॥
दूहा-नवओली आंबिल कीयां,पूरो एतपहोई।ऊजमधूंउचित करे,पामे नवनिधि सोइ?
मयणा कहे करजोडिने,भगवन!पूछं तुझाऊजमणानी विधि कहो,समझावीने मुझ॥२॥मुनि
कहे सांभल श्राविका!, एहनी विधिछे भूरि। नाम मात्र तुझने कहूं, पामिस सुख भरपूरि॥३॥
ढाल २० मी. “आश्रय कारण ए जगजाणीये" एहनी-तप ऊजमणुं रे मुनिवर दाखवे,
मयणाने हित आण । तप फल ऊजमणाथी पामीये, पूरण तप सुप्रमाण, त०॥१॥ सालि
प्रमुख पंचवरण तणा घणा, ढोवे धान प्रधान। सिद्धचक्रनी तिहां करे थापना, धारी निर-
॥४७॥

श्रीपाल.
॥४८॥
मल ध्यान, त०॥२॥ अरिहंतादिक नवपद आगले, ठावे श्रीफल गोल । गौघृत उज्जल
खंड मिश्रित करी, जेथी होइ रंगरोल, त०॥३॥ अरिहंतपदे धवलो गोलो ठवे, कर्के-
तन अठ रयण । चोत्रीस हीरारे वली मांहे ठवे, वंछित संपत्ति लयण, त० ॥४॥
सिद्धपदे इकत्रीस प्रवालडा, राता माणिक अष्टारक्त चंदन लेपित गोलक धरे, टले उप-
द्रव कष्ट, त०॥५॥ पंच मणी गोमेद छत्रीसनो, सूरिपदे ठवे गोल।पंचवीस ठावे पाठक-
पदे, नील रतननीरे ओल, त०॥६॥ रिष्ट रतन सगवीसे मुनिपदे, सतसठि एकावन्न ।
सित्तरने पंचास उलासमुं, मुगता सेस सुमन्न, त०॥७॥ निज निज वरणे रे वस्त्रादिक
ठवे, नवपद तणे समेलि । खाजा दोठारे नुकती लाडुआ, झाझी साकर भेलि, त० ॥८॥
खारिक खुरमारे द्राख सोपारीयां, निमजाने नालेर। इत्यादिक नव नव आगलि धरे, पामे
मोटिम मेर, त०॥९॥इम ऊजमणुंरे मनरंगे करे, आणी भावविसाल।कहे 'जिनहरष'
॥४८॥

लहे सिवसंपदा, ए थइ वीसमी ढाल, त० ॥ १० ॥ सर्व गाथा ॥ ३४६ ॥
दूहा-इणपरि जे ए तप करे, दुष्ट कुष्ट क्षय खास।रोग सोग दालिद्र दुख,थाये सहुनो नास
॥3॥दोहागिण वंध्यापणुं, विसकन्यादिक दोष। स्त्रीने एथाये नहीं, पुन्य तणुंहोइ पोष ॥२॥
संघभणीगुरु उपदिस्युं, ए नर लक्षणवंत। जिनशासन दीपावस्ये, भगति करोमनखंत ॥३॥
सात खेत्र जिनवर कह्या, श्रावक पुन्य पवित्र । साते सचवाये सही, साहमी भगति विचित्र ४
इम निसुणी सहु को करे, उंवर भगति अपार ।रहिवामंदिर आपीया, धन कण कंचन सार ५
ढाल २१ मी. "सोझितरो सिकदार" एहनी-हिवे उंबर निज नारि वयण मनमां धरी
हो लाल व०, सदगुरु हितउपदेस हीयामें अनुसरी हो लाल ही० । सिद्धचक्रनी पूजा
सीखी गुरुसांनिधे हो लाल सी०, जाणे बुद्धिप्रमाण सुजाण भली विधे हो लाल सु०
॥ १॥ आव्यो आसु मास महूरत सुभ दिने हो लाल म०, सिद्धचक्रनो तप आरंभ्यो
॥४९॥

श्रीपाल
॥ ५० ॥
सुभमने हो लाल आ० । तन मन वचन पवित्र करी जिनमंदिरे हो लाल क०, पूजा
श्रीजिनराय अपाय दूरे करे हो लाल अ० ॥२॥ सिद्धचक्रनी पूजा कि आठ प्रकारनी
हो लाल कि०, मयणा उंबर दोइ करे विस्तारनी हो लाल क० । आंबिलनो पचखांण
मन ऊमही हो लाल क०, सुगुरु वचन सुप्रमाण हीयामे गहगही हो लाल ही०
॥३॥ दिन दिन ओछो रोग हुवे इण जापथी हो लाल हु०, तूटे करम कठोर विछुटे
पापथी हो लाल वि०।नवमे दिवस विसेस न्हवण पंचामृते हो लाल न्ह०, सिद्धचक्रनी
पूजा
रचे सुभमन हिते हो लाल र०॥४॥ स्नान करी मन रंग न्हवण जल छांटीयो
हो लाल न्ह०, रोग गयो ततकाल नीरोगी तनु थयो हो लाल नी० । जाणे रतिपति रूप
अनूप विराजीयो हो लाल अ०, नवपद महिमा अधिक जगतमां गाजीयो हो लाल ज०
॥५॥ सिद्धचक्रने न्हवणे अवर सहु रोगीया हो लाल अ०, कंचण वरणी देह थया
॥ ५० ॥

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MA
श्री
IIITAL
पा
ल
श्रीपाल कुमर और मयणासुंदरी
जिनमंदिरसे अपने स्थानको जाते
हुए सामनेसे आती हुइ अपनी
माताको देखके श्रीपाल कुमर माता
के चरणो नमस्कार कर रहा है।
जा
का
रा
M
PRAur
(पत्रांक ५१)
AVRUT SAVAR PRCSS
BOMBAY

श्रीपाल.
॥५१॥
नीरोगीया हो लाल थ० । मयणा पतिनो रूप निहाली इम कहे हो लाल नि०, गुरुनो ए
उपगार मुजस महीयल लहे हो लाल सु०॥६॥उंबर देवकुमार सरूपे आगलो हो लाल
स०, सहुना टलीया रोग धरम थयो ऊजलो हो लाल ध०। फलीय मनोरथ माल कुमर
मयणा तणी हो लाल कु०, कीरति वाधी लोक मझार घj घणी हो लालम०॥७॥ महिमा
श्रीजिनधर्म सुगुरुनो निरखीयो हो लाल सु०, देव धरम गुरु भक्ति कुमर करे हरखीयो
हो लाल कु० । जिनगृहथी इक दिवस नीसर्या दंपती हो लाल नी०, साह्मी आवि नारि
ओलवी सुभमती हो लाल ओ०॥८॥पाये लागे तास कुमर हरक्षेकरी हो लाल कु०, हीयडे
हेज अपार सजल आंख्यां भरी हो लाल स० । मायडी पुत्र वियोगसुं वेदन उपसमी हो
लाल वे०, ढाल थई 'जिनहरप' कहे इकवीसमी हो लाल क०॥९॥सर्व गाथा॥३६०॥
दूहा-कुमर कहे सुण मातजी!, बहु दिवसे मिलीयाह । ऊमाहो सफलो थयो, दुख-
॥ ५१॥

* 1

REG
श्रीपाल,
.
॥ ५२ ।।
नीरोगीया हो लाल थ० । मयणा पतिनो रूप निहाली इम कहे हो लाल नि०, गुरुनो ए
उपगार सुजस महीयल लहे हो लाल सु०॥६॥उंबर देवकुमार सरूपे आगलो हो लाल
स०, सहुना टलीया रोग धरम थयो ऊजलो हो लाल ध० । फलीय मनोरथ माल कुमर
मयणा तणी हो लाल कु०, कीरति वाधी लोक मझार घणुंघणी हो लाल म०॥७॥ महिमा
श्रीजिनधर्म सुगुरुनो निरखीयो हो लाल सु०, देव धरम गुरु भक्ति कुमर करे हरखीयो
हो लाल कु०। जिनगृहथी इक दिवस नीसर्या दंपती हो लाल नी०, साह्मी आवि नारि
औलखी मुभमती हो लाल ओ०॥८॥पाये लागे तास कुमर हरखेकरी हो लाल कु०, हीयडे
हेज अपार सजल आंख्यां भरी हो लाल स० । मायडी पुत्र वियोगसुं वेदन उपसमी हो
लाल वे०, ढाल थई जिनहरष' कहे इकवीसमी हो लाल क०॥९॥सर्व गाथा॥३६०॥
दूहा-कुमर कहे सुण मातजी!, बहु दिवसे मिलीयाह। ऊमाहो सफलो थयो, दुख-
॥ ५१॥

* रास. श्रीपाल. ॥५२॥ दोहग टलीयाह ॥१॥ मयणा सासू जाणिने, पायपडी तिणवार। माता! तुझ वहुअर थकी, हूं नीरोग विचार ॥२॥ माय कहे वहुअर सहित, जीवे कोडिवरीस । अविचल जोडी तुम्हतणी, इम दीधी आसीस ॥ ३॥ आलिंगन देई करी, पूछे कुसल सरीर।माता! तुझ परसादथी, हूं थयो आज सधीर ॥४॥ इतला दिवस किहां हुता?, मात! कहो मुझ वात । जणणी कहे सुत आगले, पूरवला अवदात ॥५॥ ढाल २२ मी."मारोलाल पीयेरंग छोतरा”एहनी-तुझने पूछी पुत्र! हूं चली, उज्जेणीथी कोसंबी पहूंती रे। मुनिवर दीठो एक देहरे, वांदी मनमां गहगहती रे, तु०॥१॥ में दाख्यु मुनिने एहवं, इण नगरी वैद्यनो वासो रे । आवी पुत्र रोग पडींगणो, पूछवा तेहने पासो रे, तु०॥२॥ भगवन ! कहो पुत्र कहीये हुस्ये?, निराबाध मुनि तव भाँखेरे।तुझ सुत कोढी टोले भल्यो, निजनाथ करीने राखे रे, तु०॥३॥उंबर राणा नामे कर्यो, परण्यो मालवपति

रास.
श्रीपाल.
बेटी रे । मयणासुंदरी नामे भली, सीलवंती गुणमणि पेटी रे, तु०॥४॥ सदगुरु वचने
दंपति, भावे सिद्धचक्र आराधे रे। कंचणवरणी काया थई, निज (जिन) धर्म भली परि
साधे रे, तु०॥५॥ उज्जेणीमें सुखसुं रहे, इम सुणि थई हरष सनाथो रे। इहां आवी हूं
मिलवा भणी, तुझने दीठो बहू साथो रे, तु०॥६॥सासू वहू पुत्र सुखे रहे, करता जिनधर्म
उमेदे रे । इक दिन जिनवर पूजा करी, अंग अग्र मली विहुं भेदे रे, तु० ॥७॥ एहवे
अवसर हिवे सांभलो, मयणासुंदरीनी माता रे। राणी रूपसुंदरी गुणभरी, नृपसुं रीसावी
जाता रे, तु०॥८॥जई वेठी निजभाई घरे, पुन्यपाल कृपाल कहावे रे। दुख सोक घणो
मनमा करे, मयणा विण खिण न सुहावे रे, तु०॥९॥कितलेक दिवसे दुखतजी, जिन-
धर्म करे मनरंगे रे। आवी जिनवर दरसण भणी, तव देखे कुमरसुंरंगे रे, तु०॥१०॥
एतो अमर कुमर रूपे भलो, फिरि फिरि ते साह्मो जोवे रे। जोतां जोतां तिण ओलखी,
॥ ५३॥

ढाल २३ मी , “ ईढोणी चोरी रे " एहनी - मयणा निसुणी बोलडा मा मोरी रे , संका . श्रीपाल. ॥ ५४ ॥ एतो मयणा पुत्री होवे रे, तु०॥११॥ पुत्री पासे कोई ए नवो, राणी मनमां भरमाणी रे। जिनहरष' कहे सहु आगले, बावीसमी ढाल वखाणी रे, तु०॥१२॥सर्व गाथा ३७७॥ दूहा-कोढी पति छोडी करी, अवर पुरुषसुं प्रीत । तजि आचार सतीतणो, कीधो इण विपरीत ॥१॥ एहवी एह न जाणीये, मयणा जिनमत जाण । रजनी करवा किम घटे ?, दिवस करे जे भाण ॥२॥ अथवा बलीयो कर्म छे, करमे दुरमति होइ । रूडा मुंडा स्यूं करे, पहूंचे जोर न कोइ ॥ ३॥ कुल निकलंक कलंकीयो, जिनसासन दुखाय । पुत्री मूई दुख नहीं, पिण दुख सह्यो न जाय॥४॥माता इणि परि दुख करे, मयणा केड़े बेसि कांपे पुत्री कृत अधम, हीयडामांहि पेसि ॥५॥ ॥ ५४ ॥ आवी मनमांहि सुता हूं तोरी रे। चैत्यवंदन पूरुं करी मा मोरी रे, वंद्या, जिनवर उच्छांहि तोरी रे । तुम्हने दुख करवू नहीं मा मोरी रे , एहवी किम करीये वातसुता हूं तोरी रे ॥२ ॥ मोरी रे , तुझ पुत्रीथी निरधार सुता हूं तोरी रे । पूरव तजि पश्चिम दिसे मा मोरी रास. सुता हूं तोरी रे॥१॥ करवंदन मायने करी मा मोरी रे, सांभल माहरा अवदात सुता हूं श्रीपाल. साह्मो हरख वधारीये मा मोरी रे, पुत्री वर देखी सरीर सुता हूं तोरी रे। रोगगयो जिन- धर्मथी मा मोरी रे, म करो मन दिलगीर सुता हूं तोरी रे ॥३॥ मालु थाये नहीं कदे किम ऊगे? कहो दिनकार सुता हूं तोरी रे ॥४॥ अजी लगे छोडे नहीं मा मोरी रे सायर अपणी मरजाद सुता हूं तोरी रे । हरख विनोद हीये धरो मा मोरी रे, परिहरि मन विखवाद सुता हूं तोरी रे॥५॥एहवे कुमरनी मायडी मा मोरी रे, बोली मुखे मीठी वाणि सुता ए तोरी रे । मुझ सुत नीरोगी कीयो मा मोरी रे, उत्तम गुणनी खाणि सुता ए तोरी रे॥६॥ धन धन ताहरी कूखडी मा मोरी रे, उपनी मयणा जिहां आय सुता ए तोरी रे। CHEESE ॥ ५५ ।।

श्रीपाल.
रास.
सीले सीता सारिखी मा मोरी रे, इणमें खोडि न कांय सुता ए तोरी रे ॥७॥ तुम सुता
बाई! जगतमां मा मोरी रे, निरमल पाम्योजसवास सुता ए तोरी रे।संतति जेहने एहवीमा
मोरी रे, जनम जीवित धन तास सुता ए तोरी रे॥८॥मिली वेवाहिण बे तिहां मा मोरी
रे, रूपसुंदरी मिट्यो संदेह सुता ए तोरी रे।धन धन मयणासुंदरी मा मोरी रे, जिण पाल्यो
सील निरेह सुता एतोरी रे॥९॥ निरमल कुल दीपावीयो मा मोरी रे, धरम उतार्यो आले
सुता ए तोरी रे।कहे 'जिनहरष' पूरी थई मा मोरी रे, ए त्रेवीसमी ढाल सुता ए तोरी रे १०
दूहा-रूपसुंदरी मयणा प्रते,पूछे धरीय सनेह।तुझपति नीरोगी थयो,ते मुझ संभलावेही
सावद्य देहरे बोलतां,थाये निसिही भंग।मुझ घरे जई कहिसुं सहू,चालो धरि मनरंग॥२॥
मंदिर आवी आपणे,कही सगली ही वात। सिद्धचक्र आंबिल तणो, ए महिमा विख्यात॥३॥
कुमर तणी माता प्रते, पूछे मयणा माय। वंसादिक तुम्ह पुत्रनो, बाई ! मुझ सुणाय ॥४॥
25
-
-
॥५६॥

ढाल २४ मी. “केकेई वर लाधो” एहनी-हिवे कहे कुमरनी मायडी, अंगदेस सुरंग विख्यात रे, वेवाहिण! तुम्हे सुणो। नगरी चंपा तिहां अतिभली, नरनारी सुखी दिनरात रे, वेवा० ॥१॥ सिंहरथराजा तिहां राजीयो, परजा पाले सुत जेम रे, वेवा० । कमलप्रभा पटरागिनी, कुंकण नृप बहिनी प्रेम रे, वे० ॥२॥ बहु देवी देव आराधतां, सुत जायो रुपे काम रे, वे० । नृपलखमी लीला पालस्ये, श्रीपाल दीयो तसु नाम रे, वे० ॥३॥ सुत दोइ वरसनो ते थयो, राजा सूले पीडाय रे, वे० । तिण रोगे मृत्यु लह्यो सही, हाहारव नगरी थाय रे, वे०॥४॥मतिसागर मंत्री बुद्दिनिलो, सैसव वय आपे राज रे, वे०।श्रीपाल भूपालनी आ (ज्ञा) गन्या, मंत्रीस चलावे काज रे, वे०॥५॥ राज्य करंतां केइक दिन थया, काको श्रीपालनो ताम रे, वे० । अजितसेन नामे अछे, राज्य लेवानो थयो काम रे, वे० ॥६॥ द्वेप धरे मंत्री रायसुं, सामंत साथे करे भेद रे, वे० । दोइ जणने हणिया ॥ ५७ ॥ PRESS

--
ल.
॥ ५८॥
कारणे, करे मंत्रणा करिवा छेद रे, वे०॥७॥ मंत्री जाणी ते वातडी, संभलावी मुझने
तेह रे, वे० । मंत्रीसर कहे राणी! सुणो, जतने राखो सुत एह रे, वे०॥८॥जीवस्ये तो
राज्य हुस्ये वली, सुत एकज ए दही दूध रे, वे० । तिण कारणि ए लेई करी, जाओ तुम्हे
आस्या लूध रे, वे०॥९॥ केडेथी अम्हे पिण जाइस्यूं, नाठां विण कुसल न होइ रे वे।
मंत्रीना वयण सुणी इसा, नाठा हूं ने सुत दोइ रे, वे ॥१०॥ एकलडी हूं राते चली,
छानी नवि जाणी केण रे, वे० । नंदन कडीए पंथ चालवू, कांटा भागे पाएण रे वे०॥११॥
धरती ऊंची नीची घj, अथडाउं तनु सुकमाल रे, वे० । दुख एक हतो पति मरणनो,
राज्यभ्रष्ट थया सुत बालरे, वे०॥१२॥ वयरीनो भय मनमां घणो, इम चलतां रात विहाइ रे,
वे।एतले थई ढाल चोवीसमी, जिनहरष' कही चितलाइ रे, वे०॥१३॥सर्व गाथा ४०९॥
दूहा-दुखभर इणपरिचालतां,नीठथयो परभात। कोढीनो टोलोसबल,आगलि एकदिखात
ॐ
॥ ५८॥

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रास.
॥3॥कमला ते देखी करी, मनमां थइ भयभ्रांत । कडीए बालक एकली, न लहे चित्त निरांत
॥२॥रोवे जोवे दह दिसे, कोढी करुणावंत । दुखिणी देखी मुझभणी, पूछे सहु वृतंत ॥३॥
ए बंधव सहु ताहरा, तूं अम्ह बहिन सरीख । पूछी बात कही सहू, आपी रूडी सीख ४
ढाल २५ मी. देशी मांनां दरजणरी-देइ इम आसासना रे, निरभय कीधी जाम । वर
वेसर बेसारिने,ओढाडी चादर ताम रे॥१॥सांभलज्यो आगे वात रे,जिम मीठी लागे, भागेरे
भागे मनना दुख, दोहग भागे, ए आंकणी, इण अवसर केडे थकी रे, आव्या अरि असवार।
रोस भर्या आयुध धर्या रे, मुख बोलंता मार मार रे, सांभल०॥२॥ पेडाने आवी कहे रे,
तुम्हे दीठी इक नार। पासे सुंदर दीकरो, रूपे रतिपति अवतार रे, सांभल०॥३॥पेडो कहे
तुम्हे सांभलो रे, अम्ह पासे छे पाम। ते तुम्हने आपुंअम्हे, आवे जो कोई काम रे, सांभल.
॥ ४॥ सुभटे जाण्युं रोगीया रे, कोई न दीसे पास । इहां ऊभां जुगतो नहीं, रोग भये
ANS
॥ ५९॥

श्रीपाल.
SROR
रास.
दूरे गया नास रे, सांभल०॥५॥ उंबर रोगे पीडीयो रे, अंग थयो बिदरंग । पुत्रपडींगणो
पूछती, हूं गई कोसंबी द्रंग रे, सांभल० ॥६॥ तिहां जईने लोकने रे, पूछ्यो वैद्यनो गेह ।
लोक मुखे में सांभल्यो, तीरथ भणी पहुंतो तेह रे, सांभल०॥७॥हूं रही तिहां वासर घणा
रे, जोती वैद्यनी वाट।साधु थकी सुध लही सहू, मननो मिटीयो उचाट रे, सांभल०॥८॥
हूं आवी इहां पूछती रे, अंगज मिलिवा काज।हूं कमला ए माहरो, सुत जाणज्यो सिरताज
रे, सांभल०॥९॥ कमलाने वचने करी रे, राणी थई निसंक । पुत्री गुणवंती सती, एहने
किम लागे ? कलंक रे, सांभल०॥१०॥ निरखि जमाई सामुहो रे, तृपति न पामे लेस।
मुझ पुत्रीनो जोईज्यो, फलीयो कांइ भाग्य विसेस रे, सांभल०॥११॥रूपसुंदरी सुख पामीयो
रे, उलसीया सहु अंग । ढाल थई पचवीसमी, 'जिनहरष' थया उछरंग रे, सांभल०॥१२॥
दूहा-पुन्यपालने सहु कह्यो,रूपसुंदरीजई गेह।मामे तेडी निज घरे,आण्या घणे सनेह १
॥६०॥

श्रीपाल.
मुंदर मंदिर आपीया, आपी धननी कोडि।पंच विषय सुख भोगवे, वे जण प्रेम सजोडि ॥२॥
एक दिन राजानीसर्यो,पासे कुमर आवास।दीठी मयणा कुमरसुं,करती विविध विलास ॥३॥
मयणा कोई बीजो कयों, सुंदर पुरुष सरूप । कोढी परिहरियो परो, इम मनचिंते भूप॥४॥
पहिलो क्रोधवसेण में,काम अजुगतो कीधाबीजो मयणामयणवसि,लंछण मुझ कुल दीध ५
ढाल २६ मी. “पीछोलारी पाले आंवा दोइ मोरीया म्हारा लाल आंवा०” एहनी-पुन्य-
पाल ततकाल जणावे रायने म्हारा लाल ज०, भाणेजीनी वात सहू समझायने म्हारा लाल
म०। आव्यो नृप आवास कुमरने ऊमही म्हारा लाल कु०, प्रणमे मयणा कुमर चरण मन
गहगही म्हारा लाल च० ॥१॥ लज्जावंत नरिंद कहे बाई! सुणो म्हारा लाल क०, में
तुझने मतिहीण दीयो छे दुख घणो म्हारा लाल दी० । मुझ अविनय अपराध असाध्य
विसारजे म्हारा लाल अ०, उत्तम गुण गुणवंत! हीयामें धारजे म्हारा लाल ही० ॥२॥

श्रीपाल.
॥६२॥
मयां विनय महंत मधुर वयणे कहे म्हारा लाल म०, दोसन को तुम्ह तात! करम फल
सहू लहे म्हारा लाल क० । सुख दुख करम संयोग सहू आवी मिले म्हारा लाल स०, करम
महा बलवंत न टाल्यो ही टले म्हारा लाल न० ॥३॥इम जाणी तुम्हे तात! जिणेसर धर्मसुं
म्हारा लाल जि०, नव तत्त्वराचो राय! म राचो भर्मसुंम्हारा लाल म०। इम निसुणी नरनाथ
धरम अंगीको म्हारा लाल ध०, अपकारे उपकार सुता ते आचर्यो म्हारा लाल सु०॥४॥
वाल्हीने वलि विनय वहे गुण संग्रहे म्हारा लाल वहे०, धर्म पमाडे जेह जगतमें जस लहे
म्हारा लाल ज० । कुमरी सम श्रीपाल जमाई निरखीयो म्हारा लाल ज०, ऊलट अंग
न माइ हीयामें हरखीयो म्हारा लाल ही० ॥५॥ कीधो वांको राय कहे थयो पाधरो
म्हारा लाल क०, मूंग मांहे जाणे घीय ढुल्यो थयो ए खरो म्हारा लाल दु०॥ पुत्री ए पुन्यवंत
फल्यो पुन्य एहने म्हारा लाल फ०, श्री जिनधर्म पसाय थया सुख जेहने म्हारा लाल थ०
५
॥ ६२॥

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श्री
पा
JAMADARAJA
ल
रा
जा
का
रा
श्रीपालजीको हाथीपर बैठाके
धामधूमसे प्रजापाल राजा अपने
राजदरवारमें ले जा रहा है।
( पत्रांक ६३)
AHRUT SAGAR PRESS, BOMBAY J

-- श्रीपाल, ॥६॥ गज ऊपरि आरोपि जमाई पुत्रिका म्हारा लाल ज०, लेई गयो निज गेह करी आरात्रिका म्हारा लाल क० । गोरी गावे गीत नगारा वाजीया म्हारा लाल न०, आडंबर उच्छाह गुणी जन गाजीया म्हारा लाल गु०॥७॥धण कण कंचण माल महेल नृप आपीया म्हारा लाल म०, सारी नगरी मांहि सुजस थिर थापीया म्हारा लाल सु०। कुमर चड्यो रयवाडी रमवा किणि समे म्हारा लाल र०, देखे लोक अपार सहुने मन गमे म्हारा लाल स०॥८॥पूछे माहो मांहि कुमर ए कुण अछे म्हारा लाल कु०, एक कहे नृप धूअ धणी बीजो न छे म्हारा लाल ध०। वचन सुण्यो श्रीपाल विच्छाय थयो घणूं म्हारा लाल वि०, छावीसमी 'जिनहरप' ढाल इण परि भणूं म्हारा लाल ढा०॥९॥ सर्व गाथा ४३९ ॥ दूहा-रयवाडीजई आवीयो, पिण मनमें दिलगीर।जननी पूछे आज तूं, एहवो किम? कहे वीर! १ चिंता मनमाहे किसी,पुत्र! कहो मुझ तेह। चिंता कारण मायने,कुमर कहे ससनेह २ ॥ ६३ ।।

श्रीपाल.
॥६४॥
माहरे गुणे न ओलखे, तात गुणे नवि कोइ। मात गुणे नपिछाणीये, तिण मुझ चिंता होइ३
सुसरा नामे ओलखे, सुसराथी परसिद्ध । तिहां रहिवो जुगतो नहीं, शास्त्रे कह्यो निसिद्ध ४
माय कहे मुझने गम्युं, सैन्य सजी ल्ये राज । अरिदल जीपो आपणा, वंस वधारो लाज ५
कुमर कहे माता! सुणो, सुसराने बल राज। लेवू मुझने नवि घटे, करसुं निजबल काज ६
ढाल २७मी. “मन मधुकर मोही रह्यो” एहनी-परदेसेजाई करी, लाऊंलच्छि कमाय रे।
भुजबल लेस्युंबापनो,राज्य अरि समझाय रे,पर०॥१॥माता कुमर भणी कहे,तूंवच्छ! नान्हो
बाल रे।वाट विषम परदेसनी, अटवी नदीयां नाल रे, पर०॥२॥ कुमर कहे कायर भणी,
दोहिलो छे परदेस रे।मनमांसापुरसां तणे, भय नावे लवलेस रे, पर०॥३॥मयणासुंदरी
वीनवे, काया छाया जेम रे ।हूं तुम्ह साथे आवसुं, तुम्ह पाखे रहुं केम रे, पर० ॥४॥
तूं पगबंधन कामिनी!, भमवू मुझ निसदीस रे। कामकरूं के जालवू, दुक्कर विसवा वीस रे,
॥ ६४ ॥

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श्री पा ल रा जा का रा In th भरूच आते हुए रस्तेमें पहाडके नज्दीक श्रीपालजीको विद्याधरसे मिलाप हुआ, इनके उत्तरसाधक होनेसे उसकी विद्या सिद्ध हुइ, विद्याधरने प्रसन्न होके दो औप- धियां श्रीपालजीको दी, दोनों जने आगे चले, पहाडके उपर धातुर्वादी (सुवर्णरस सिद्ध करनेवाले) मिले, यहांभी श्रीपालजीके उत्तरसाधक होनेसे सुवर्णरस सिद्ध होगया, तयार हुआ सुवर्ण लेनेके लिये धातुदी लोक हाथ जोडके श्रीपा- लजीको प्रार्थना कर रहे हैं। Ju y 7 + ६ M Saira (पत्रांक ६५) AMRUT SAGAR PRESS BOMBAY

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r ܀ श्रीपाल. रास. । %3D पर०॥५॥जाया जणणी वे भणी, समझावी श्रीपाल रे। नवपद ध्यान धरी करी, चाल्यो लेइ करवाल रे, पर० ॥६॥ गामागर पुर पेखतो, पहुंतो इक वन मांय रे। दीठो बेठो पुरुषने, तरु तले वदन विच्छाय रे, पर०॥७॥ कुमर कहे तूं कुण अछे ?, किम बेठो दिलगीर रे। विद्याधर छं ते कहे, सांभल साहस धीर! रे, पर० ॥ ८॥ गुरुदत्त विद्या मुझ कन्हे, विधे जपी बहु वार रे । उत्तरसाधक बाहिरो, सिद्ध न थाये विचार रे, पर० ॥९॥ तूं उत्तरसाधक हुवे, तो सीझे मुझ काज रे। कुमर सहाये तेहने, विद्या सीधी साज रे, पर० ॥१०॥ विद्याधर दोइ ओपधी, कुमर भणी तव दीध रे।उपगारे उपगारडो, सिद्ध पुरुष पिण कीध रे, पर०॥११॥गुण सांभल जल तारणी, एक जडी छे एह रे।बीजी शस्त्रनिवा- रणी, महिमा तास कहेह रे, पर०॥१२॥ आदर करि तेडी गयो,विद्याधर निजगेह रे।सोवन सिन्दि रस कुंपिका, कुमर सहाय्य करेह रे, पर० ॥१३॥ ढाल कही सत्तावीसमी, वखतावर ।। ६५ ।।

SRE
श्रीपाल.
में
॥६६॥
-
नर जेह रे। कहे 'जिनहरष' जिहां तिहां, सुखीया थाये तेह रे, पर०॥१४॥सर्व गाथा ४५९
दूहा-कुमरभणी क्रितधनकीयो,चाल्यो सीखकरेह। भरुअच्छ नयरे आवीयो, सुखसुं तिहां
रहेह १ इण अवसर हिवे तिणनगर, धवलसेठ धनवंत। पूरे प्रवहण पांचसे,खरीधरीमनखंत
२सुभट सहस दस राखीया,चोकी पहोरा काजानृपआदेस लेई करी, सुभ महूरत दिन साज
॥३॥बलिबाकुल देई करी, वाहण पूर्या जाम।ठाम थकी नवि चालते, धवल चिंतातुर ताम४
ढाल २८ मी."चरण करणधर मुनिवर वंदीये" एहनी-सेठे जई पूछी सीकोतरी, ते कहे
नर बलवंतो जी।बलि आपे तो तुझ वाहण चले, बत्तीस लक्षण (गुण)वंतो जी, से०॥१॥
सांभलि सेठ खुसी मनमां थयो, वीनवीयो जई रायो जी।स्वामी! एक पुरुष मुझ दीजिये,
बलि काजे सुख थायो जी, से०॥२॥राय कहे जे परदेसी हुवे, नर एकलडो अनाथो जी।
ते लेजे माहरी छे आगन्या, अवर म लाए हाथो जी, से० ॥३॥ सुभट धवलना
॥६६॥

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श्री पा रा जा का रा स एक तरफ भरुचके राजसैनिक और दूसरी तरफ धवल शेठके सुभट खड़े हैं, बीचमें खडे हुए श्रीपालजी वीरताके साथ दोनोंसे लड़ रहे हैं Saha स P4 ( पत्रांक ६७ ) AMRUT SAGAR PIESS, BHBAt 3

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श्रीपाल.
1॥ १७ ॥
फिरता जोवता,दीठो तिहां श्रीपालो जी।जाण्युं नर ए परदेसा सहा,लक्षण अंग विसालोजी,
से० ॥ ४॥ सुभट कहे सांभले परदेसीया!, आव्यो ताहरो कालोजी। धवल सेठ हणस्ये
बलि कारणे, रूठो जम विकरालो जी, से०॥५॥ मूंछे वल घाली सीपो(श्रीपाल)कहे, सुभट!
मुणज्यो वातो जी। धवल तणो बलि द्यो चामुंडने, तेहने करीये घातो जी, से०॥६॥सीह
तणी बलि कदे न सांभली, सीपो किम बलि दीजे रे। धमधमीयो रीसे थयो रातडो, कुमर
खराखरि खीजे रे, से० ॥ ७॥ अविचायु वोलो छो एह, लहिस्यो फल ततकालो जी ।
आवी मुभटे कुमरने वीटीयो, मद माता मछरालो जी, से०॥८॥धवल कहे खंडो खंड
कीजिये, एहने एहीज दंडोजी।वरसे तीर सडासड अति घणा,तोमर खडग विहंडोजी, से०
॥ ९॥ नालगोला गडडे गयणंगणे, मोगर गुरज अपारो जी।धसे हसे पोरस अंग ऊलसे,
इम वाहे हथीयारो जी,से०॥१०॥इणपरि जुद्ध थयो अति आकरो, धवल अने श्रीपालो जी।
॥ ६७॥

श्रीपाल. रास. ॥ ६८॥ कहे जिनहरष' पूरी थई एतले, अठावीसमी ढालो जी, से० ॥११॥ सर्व गाथा ४७४॥ दूहा-शस्त्रनलागे कुमरने,जडीतणे परभाव।पिण कुमरे सहुना कीया,नासा केस अभाव प्राण हण्या नहीं केहना, दया तणो भंडार।धवल विचारे चित्तमां, देखी सकति अपार २बल- छोडीजोडी करकमल, धवल कहे ग्रहि पाय।स्वामी! वाहण किम चले, ते कहो कोई उपाय ३ कुमर चलाईंहूं कहे, जो ये लाख दिनार।आरत मीटी आपणी, सेठ भण्यो हांकार ४ धवल सहित वाहण चढी, नवपद जपि थई चाक । सीहतणि परि गाजतो, सीपे मेल्ही हाक ५ ढाल २९ मी."श्रेणिक मन अचरिज थयो” एहनी-तत खिणप्रवहण चालीया, वाज्या भूगल भेरी रे।ताल नगारा वाजीया , महिमा थई अधिकेरी रे, तत०॥१॥लाख दीनार देई कहे, तुम्हे पिण ओलग सारो रे। वरसे स्युं लेस्यो तुम्हे, कीजे तेह विचारो रे, तत० ॥२॥सुभट सहू ल्ये जेटलो, तास जमल मुझ दीजे रे। विषमी करसुं चाकरी, माहरो मुजरो

11 १९॥
रे
लीजे रे, तत० ॥३॥ सेठ कहे खप अम्ह नथी, बेठो भाडोदेई रे।भरीये दरीये चालिया,
मनमें हरप धरेई रे, तत० ॥ ४ ॥ रतन दीप भणी मूंकीया, आया बब्बर कूले रे । जल
इंधण लेवा भणी, ऊतरीया तट मूले रे, तत० ॥५॥ वव्वर राये मोकल्या, दाण लेवाने
काजे रे। सेठ गिणे नहीं तेहने, सुहड तणे वल गाजे रे, तत०॥६॥बब्बरपतिने वीनव्यो,
आवी लागत मांगे रे। सेठ सुरीते ये नहीं, क्रोधागनि तव जागे रे, तत०॥७॥बब्बरपति
सुहडां भणी, हलकार्या जुध मंड्यो रे। सेठ सुहड नासी गया, कायर थया वल छंड्यो रे,
ततः ॥८॥ बब्बरपतिनी जय थई, धवल सेठ बंधाणा रे। कुमर कहे सहु ताहरा, किहां
गया ओलगाणा रे, तत०॥९॥हूं छोडायूं तुझ भणी, तो मुझने स्युं आपे रे। अरध माल
वाहण तणो, हाथोहाथे थापे रे, तत०॥१०॥बोल वंध लेई करी, विचे परमेसर दीधो रे।
ढाल थई उगणत्रीसमी, कहे 'जिनहरप' इम कीधो रे, ततः ॥११॥ सर्व गाथा ४९० ॥
॥ ६९॥

श्रीपाल.
॥ ७० ॥
दूहा-तव धणु तूण धरी करी, केडे धस्यो कुमार।बोलाव्यो महाकालने, जाइस किहां?
गमार!कायर जीपीगरजीयो,पिणमाहरोबल जोइनासिमजाइस रांकज्यूं,जोतूं क्षत्री होइ
२ वयण सुणी पाछो वल्यो, मनमां नाण्यो बीह। बापूकार्या किम रहे ?, साहसीक नरसीह ३
कहे वयण इम कुमरने, रे रे भोला बाल! मुझसुंजो कांकल करिस, पामिस मरण अकाल ४
कांइ मरे रे बालुया !, परकज्जे वेकाम। कुमर कहे मांटी अछे, तो कर मुझसुं संग्राम ५
ढाल ३० मी, “चढ्योरण झूझवा चंडप्रद्योत नृप” एहनी-आवीयो ताम करि जोर बल
फोरतो, बब्बराधीस मन रीस आणी। सुभट थट विकट साथे करी आपणा, रोस चढीयो
वदे असुभ वाणी, आ०॥॥आवरे मूढ !जोरूढ मेल्हे नहीं, आज मृगराज सूतो जगाड्यो।
धरणि धूजावतो सांमुहो आवतो, छोह धरि लोह सुहडे उडाड्यो, आ०॥२॥धरणि धड-
धडीय गडगडिय दम्माम धुनि, दहदिसे परिवर्या सबल सूरा । तुरंग भल पाखर्या शस्त्र
॥ ७० ॥

रास.
हाथे धर्या, नाचता माचता रण सनूरा, आ०॥३॥ वाण वरसे घणा सुहड हाथां तणा,
गयण रवि रयणि अंधार कीधो । भाट भड ऊछली सयल खांडां तणी, कुमरने जे प्रथम
घाव दीयो, आ०॥४॥ झूझतो सत्रु दल सूड करतो प्रवल, गाजतो गाज आवाज करतो।
केवि केवी हण्या सीस दूरे लुण्या, अंग उछरंग धरि जंग फिरतो, आ०॥५॥ अधिक
वाचाल मछराल श्रीपाल इम, घाव घमसाण हेराण कीधा। घाव ठामे रुहिर बिंब धारा पडे,
अरितणा जीव कण काढि लीधा, आ०॥६॥इम लड्यो आथड्यो कुमर अरि सैन्यसुं, बव्वरा-
धीश ततकाल बांध्यो।वंदि करी आपणा साथमें आणीयो, सांमुहो किणही नवि तीर सांध्यो,
आ०॥७॥ धवल छोडावीयो कुमर वंधण थकी, कोप करी खडग धरी राय केडे । मारवा
संचर्यों सेठ वार्यो कुमर, बांधीयो मारतां सुजस फेडे, आ०॥८॥राय महाकालने अभय देई
करी, सहस दस धवलना सुहड सूरा । जेह नाठा हुता कुजस आवीखता, वृत्ति छेदी कीया
॥ ७१ ॥

रास.
श्रीपाल.
॥ ७२ ॥
सहू दूरा, आ०॥९॥ कुमर राख्या सहू वृत्ति देई बहू, अढीसे पोतनो माल लीधो। एतले
ए थई त्रीसमी ढाल तिम, काम 'जिनहरष' एकुमरे कीधो, आ०॥१०॥सर्वगाथा॥५०५॥
दूहा-बब्बरनृप आदरकरी,कहे कुमरने एम।पावन मुझ पुर कीजिये,जिम वाधेमनप्रेम १
कुमर सकल परिवारसुं, पहुंतो नगर मझार।प्रेम प्रीति हितसुं मिल्या, बांधी प्रीति अपार २
करजोडी राजा कहे, मुझ कन्या गुणवंत । मदनसेना नामे निपुण, परणो साहसवंत! ॥३॥
परदेशी नवि ओलखे, न्याति पांति कुल सील। अणजाण्यो परणावतां,थास्ये तुम्हची हील ४
नृप भाषे आकारथी, में जाण्यो कुल सुद्ध । तिण परणावू दीकरी, थाये केम विरुद्ध ? ॥५॥
ढाल ३१ मी. “मुखने मन कलडे” एहनी-परणी तिहां नृप कन्याजी सुखने कारणे, एतो
मदनसेना कृतपुन्याजी सुख० । मणि माणिक सोवन दीधाजी सुख०, प्रीति राखण कुमरे
लीधाजी सुख०॥ १॥ नाटकना नव नव वृंदाजी सुख०, आप्या धरि अधिक आणंदाजी
॥७२॥

रास.
॥ ७३ ॥
मुखः । भलि भाते कुमर चलावेजी सुख०, नृप साथे थई वोलावेजी सुख० ॥२॥ हिवे
प्रवण जलनिधि चाल्याजी सुख०, कांई रतन दीप भणी हाल्याजी सुख०।वाहण जई दीप
उतरीयाजी सुख०, सहु लोक बंदर संचरीयाजी सुख० ॥३॥ भला डेरा ताणी उतंगाजी
मुख०, तिहां कुमर रहे सुख संगाजी सुख० । इणि अवसर एक नर आयोजी सुख०,
आदर देई बोलायोजी सुख० ॥४॥किहांथी आया ? किहां जासो? जी सुख०, कोई दीठो
अवल तमासोजी सुख० । ते कहे तिण ठामेजी
सुख०,
नयरी रत्नसंचया नामेजी
मुख०॥५॥विद्याधर छे तिहां राजाजी सुख०, कांई कनककेतु दिवाजाजी सुख०। कनकमाला
तसु राणीजी सुख०, मयणमंजूषा कन्या जाणीजी सुख०॥६॥ सकल कला गुण ज्ञाताजी
सुख०, जाणे सेहत्थे (स्वहाथे) घडी विधाताजी सुख०। तिहां ऋषभदेवनो देहरोजी सुख०,
जाणे भूमि रमणि सिर सेहरोजी सुख०॥७॥ विद्याधर राय सदाईजी सुख०, पूजे निज तन
। ते पुरुष
॥ ७३ ॥

श्रीपाल,
रास.
।।७४ ।।
मन लाईजी सुख० । नृप कन्या पूजा बणावेजी सुख०, सहु देखीने सुख पावेजी सुख०
॥८॥ इक दिन नृप पूजा दीठीजी सुख०, राजाने लागे मीठीजी सुख० । ए सरिखो वर
कोई जोऊंजी सुख०, तेहने ए कन्या ढोऊजी सुख०॥९॥ इक दिन जिन पूजी कुमरीजी
सुख०, गंभाराथी नीसरी कुमरीजी सुखाततखिण ते बार जडाणाजी सुख०,सहु लोक थया
हैराणाजी सुख० ॥१०॥ कुमरी करे आतम निंदाजी सुख०, धिग धिग हूं पापिणी मंदाजी
सुख०।मुझमें कोई दूषण दीसेजी सुख०, आसातना विसवावीसेजी सुख० ११ इम दुख करि
कन्यारोवेजी सुख०, नृप कुमरीसनमुख जोवेजी सुख०।राजा कहे सांभल बाईजी सुख०, तूं
चिंता म करिस कांईजी सुख०१२ इहां दूषण तुझ नवि कोईजी सुख०,आसातना तुझथीनवि
होईजी सुख०। एकत्रीसमी ढाल थई पूरीजीसुख०, 'जिनहरष! कथाछे अधूरीजी सुख०१३
दूहा- रायकहे सांभल सुता!, इहां दूषणछे मुज्झ। जिनगृहमां मनमांधरी, चिंता वरनी
॥ ७४ ॥

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श्री या ल RRORE जा का श्रीपालजी रत्नद्वीपमें आये और समुद्र के तटपर उतारा किया, जिनदास श्रावकने आकर ऋपभदेव स्वामीके मंदिरका गंभारा जो कि एक मास हुए देवप्रभावसे बंध पडा है उसको उघाडनेके लिये श्रीपालजीको प्रार्थना करी, इस लिये श्रीपालजी अपने कुछ परिवार सहित जिनदास श्रावकके साथ मदिर जा कर, स्नानादि पूर्वक पवित्र वस्त्र पहनके पूजाकी सामग्री सहित “निसिहीरु" करते हुए मंदिर में प्रवेश करते हैं, श्रीपाल- जीकी नजर गभारेपर पडतेही देवप्रभावसे गभारा एकदम खुल जाता है और सवको प्रभुप्रतिमाके दर्शन होते है। TODA ( पत्रांक ७५) रास. श्रीपाल. तुझ सावद्यए आसातना, तेह तणा फल जाणि।वार जडाणा ए सही, तेतले थई सुरवाणिं दोस न कोई कुमरीयह, नरवर दोसन कोइ । जिण कारण जिणहर जडिउ, तं निसुणो सहु कोइ ३जसु नर दिहि होइस्ये,जिणहरु मुक्क दुवार।सोइजमयणमंजूसियह,होएसी भरतार४ सिरि रिसहेसर ओलगणि, हूं चक्केसरी देवी।मासऽम्भितरे तसु नरह,आणेसु निश्चय लेवी ५ राजलोक सहु हरखीया, गयासहु कोई गेह । दिन दिने आवी देहरे, लोग राय निरखेह ढाल ३२ मी. “मोरोमन मोह्यो इण इंगरे" एहनी-आज दिन मासनो छेहलो, जो हिवे तुझथकी बार रे। ऊघडे तो मिले देवनी, वाणी साची निरधार रे, आ०॥१॥ कुमर असवार थई तिहां गयो, साथे परिवार अपार रे।आवीया लोक नृप सुता, हरख धरि मनह मझार रे, आः॥२॥ आवतां तुरत जिनगृह तणा, ऊघड्या झटकि किमाड रे । कुमर जिनराय जुहारीया, भगति बहु भांति दिखाड रे, आ०॥३॥राय मन लाइ देखी रह्यो, नृप सुता थई ॥ ७५ ।।

श्रीपाल. ॥ ७६॥ वसि प्रेम रे। देवी दाखित नर ए सही, एह अमूलिक हेम रे, आ०॥४॥राय पूछे कहो निजचरी,ठामने नाम कुणगामरे।कुमर चिंते मुख आपणे, किम कहुंवात निज नाम रे,आ० ॥५॥ चैत्य जुहारिवा आवीया, तेतले चारण साध रे।देव जुहारि बेठा तिहां, मुनिवर चित्त समाधरे,आ०॥६॥धरम देसणा नृप सांभली, नवपदनो अधिकार रे।एहथी वंछित पामीये, जेम श्रीपाल कुमार रे, आ०॥७॥कवण श्रीपाल ? नरवर कहे, एह बेठो तुम्ह पास रे। चरित्र सह पूछीयां कुमरना, मुनि कह्या धरिय उलास रे, आ० ॥८॥राय कन्या वर ए हुसे, लेस्ये निज बापनो राज रे। देव तणी गति पामस्ये, वली लहिस्ये सिवराज रे, आ०॥९॥ इम कही मुनिवर पांगर्या, नृप सुता कुमरने दीध रे।पाणिग्रहण करी तिहां रहे, सहु मन- वंछित सीध रे, आ०॥१०॥इक दिन कुमर राजा बिन्हे, जिनवर भगति उदार रे। रंगमें भंग आव्यो तिहां, तेतले नगर तलार रे, आं०॥११॥ते कहे स्वामी ! अवधारीये, वणिक इक ॥ ७६ ॥ KA

श्रीपाल.
कपटनो गेह रे।आण भांगी प्रभु! तुम्ह तणी, दाण चोरी पड्यो तेह रे, आं०॥१२॥ तेहने दंड
स्यूं आपीये?,राय कहे हरोप्राण रे। एतले ढाल वत्रीसमी,थई 'जिनहरष!' प्रमाण रे,आ०१३
दूहा-कुमरकहे किमदीजिये, जिनमंदिरे आदेस।प्राणहरण पातिक वरण, कुगति हरण
सुविसेस बंधन छोडावी करी,तेडाव्यो नृप पास।धवल सेठ साक्षात ए, ऐऐ!! लोभ विलास
२छोडाव्यो तिहां सेठने, कीधो तसु उपगार। पुन्य पसाये भोगवे, दिन दिन सुख श्रीकार ३
कुमर चलाऊ हिव थयो, राय जणावी वात।बेटी कुमर चलावीये, प्रवहण सजी विख्यात ४
मणि माणिक मोती घणा, आप्यो माल अपार। राय वोलावी कुमरने, घरे आव्यो सुविचार
ढाल ३३ मी. देशी "कंत! तमाकू परिहरो” एहनी-कुमर सेठ एक वाहणे, बीजा बीजे
पोत मोरा लाल! वे रमणी जाणे पदमणी, हुइ रहीयो उद्योतमो०, कु०॥३॥धवल अधम
देखी करी, चिंते चित्त मझार मो०। ए रिडि ए नारी लही, अपछरने आकार मो०, कु०
३
॥ ७७॥

M
श्रीपाल,
रास.
॥२॥ विरह वियोगे आकुलो, अंतर व्याप्यो दुख मो०। नयणे नाठी नींदडी, भागी त्रिसने
भूख मो०, कु०॥३॥च्यारे मित्र तेडी कहे, देखो एहनी रिद्धि मो० । ए सुंदर दोइ सुंदरी;
इण पामी नव निद्धि मो०, कु०॥४॥गुपत वात तुमे राखिज्यो, किणहि म कहिस्यो गूज्झ
मो०। एहने नांखी जलधिमें, ए नारी द्यो मूज्झ मो०, कु०॥५॥त्रण जण सेठ भणी कहे
बोल्या? बोल मो० । पर उपगारी एहना, गुणनो नहीं कोई मोल मो०, कु० ॥६॥
वाहण चलाव्या ताहरा, कीधो तुझ उपगार मो० । विद्याधर महाकालथी, छोडाव्यो
तिणवार मो०, कु०॥७॥ ते गुण तुझने वीसर्या, इण ऊपरि धर्यो द्रोह मो० । दुरजन तुझ
सरिखो न को, मित्रनो न गण्यो(नाण्यो)मोह मो०, कु०॥८॥ यतः, दुहा-“मैला वांका
चालता, विषमय भीषण देह । खीर पावंतां पिण डसे, सही दुजीहा तेह ॥१॥ मुह कडूआ
अतिनीरसा, छांडे पूरव नेह । मलिन सभाव धरे सदा, खल जाणीजे तेह ॥२॥ सविसं
॥ ७८ ॥

रास. श्रीपाल. इसे विरसा भसे, फिरता सूंघे देह । अवसर ताके आपणो, खान समा खल तेह ॥३॥ धीठा पिण मीठा मुखे,परिणामे दुख हेत। महुरा परि ते छांडीये, दुख रंजन दोष समेत॥४॥" ढाल-कृत(न)घन तूं महापातकी, तुझने पडो धिक्कार मो० । इम कही त्रण ऊठी गया, एक रह्यो तिणवार मो०,कु०॥९॥ ते कहे स्वामी! सुणो,एहसु केहीवात ? मो०।गुण अवगुण नवि जाणीये,कलीये नहीं जसुधात मो०, कु०॥१०॥हूं सोखी छु ताहरो, अवरन सोखी कोइ मो०। काम करिस हूं(सहू) ताहरो, जे जे मुझथी होइ मो०,कु० ॥११॥ भाग्य तुमारो सेठजी!, बुदिमाहरीजाण मो०।थास्ये ढाल तेत्रीसमी, कहे 'जिंनहरष' कल्याण मो०, कु० ॥१२॥ दूहा-धवलकहे धीरजधरी,तूंमुझवाल्हो मित्र । तुझथी सहु सारं हुस्ये,ताहरी बुद्धि विचित्र तेह कुबुद्धि इम कहे, धवल भणी तिणि वार। करज्यो प्रीति विशेषथी, सीपा साथे विचार २ मीठे वयणे रीझवी, उपजावो विसवास । जिम तिम दुसमण मारीये, थई तेहना दास ३ श्रीपाल. रास. ॥८०॥ कपट प्रीति कीजे प्रथम, दीजे निज विसवास।अवसर पामी शत्रुनो, तेतखिण कीजे नास ४ बुद्धि सीखवी धवलने, तिण पापीमतिहीण।रलीयायत धवलो थयो, जांण्यो एह प्रवीण ५ ढाल ३४ मी. मारू रागे जीरावलपुर सांमीस लहीये रे” एहनी-धवल करे हिवे केलि अहोनिसि कुमरसुंरे, मनमें कपट धरंत। हसतो रे हसतो रमतो वयण कहे इसुं रे ॥१॥ तुझ मुख देखी माहरी आंखडीयां ठरे रे, हीयडो हरख भराय । वाल्हा! रे वाल्हा! तुझ विण माहरे किम सरे रे॥२॥ तुझसुंलागी प्रीति अधिक मन माहरे रे, विण दीठांन सुहाय। माहरु रे माहरूं मनडुं वस थयुं ताहरे रे॥३॥ भद्रक कुमर खरो करी जांण्यो तेहने भेला रहे निसदीस। कारज रे कारज थाये जेहसुं जेहने रे ॥४॥ निसि भर सेठ कहे भाई! सुणो माहरा रे, आवो दिखाडं ख्याल । जलमां रे जलमां जलमाणस जाइ तिर्या रे ॥५॥ सरल सभावी आव्यो तुरत कुमर तिहां रे, सेठ कहे इणि डोर। चढीने रे चढिने ५ । ॥८०॥ M . J

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downOM al -------- म . श्री 13.2 . ल ग जा का रा जलचर जीवोंके कुतूहल देखनेके लिये जहाजके किनारे बंधी हुइ मंचिका पर श्रीपालजीको खडे कर के धवल शेठ जहाजमें आ जाता उसका दुर्बुद्धि मित्र मंचिकाके बंधन काट देता है, जिससे श्रीपालजी समुद्रमे गिरजाते है. गिरनेही नव- पदजीका स्मरण करते हैं, उस प्रभावसे और जलतारिणी औषधी- के प्रभावसे एक सगरमच्छकी पीठ पर स्थिर हो जाते है, सिद्ध- चक्रका अधिष्ठाता देव आकर महाय म . --- RC/ KA करता है। (पनांक ८१) चावक हाथे संग्रहो रे , चढि चाल्यो श्रीपाला वसुपाल रे वसुपाल राजा आव्यो सांमुहो । रास. श्रीपाल. 11८१॥ जोवो आवीने इहां रे॥६॥जोवंतां पापी कापी ते दोरडी रे, जलधि पड्यो श्रीपाल। पडतां रे पडतांनवपद जपीयो तिण घडी रे॥७॥मगरमच्छ पूठे तेध्यानथी रे, जलतारणी परमाण। जलना रे जलना संकट न हुवे तेहथी रे॥८॥ मच्छ तणे पूठे बेसी ते गयो रे, कुंकण तट मनरंग। चंपारे चंपा वृक्ष तले सोई रह्यो रे॥९॥ पाखति सुभट घणा देखे जागे तवे रे, विनय करी कहे तेह। अमने रे अमने वसुपाल नृप मूंक्या अछे रे॥१०॥ तुरी पलाणो रे ॥ ११ ॥ आसन वेसण देई कुमर भणी कहे रे, अम्ह घरे जोसी एक । तेहने रे तेहने पूछया कन्या वर कुण लहे रे ॥१२॥ मदनमंजरी बेटी मुझने वालही रे, ए सरिखो वर जोइ। तो मुझ रे तो मुझ मन आस्या पूगे सही रे॥१३॥ढाल थई एतले पूरी चोत्रीसमी रे, कहे 'जिनहरप' निहाल।चिंता रे चिंता कुमर तणी सघली गमी रे॥१४॥सर्वगाथा ५८२ ॥ ८१ ।।

}

श्रीपाट.
॥ ८३ ॥
गयो नाह नगीनो॥४॥हीयडाना दुख किण आगे, कहीये कोई दुख्ख न भागे । मनमोहन
नाह मिलावे, मुह मांगी वधाई पावे ॥५॥ दूहा-पावे अबला दुख घणो, वाल्हेसर
करि सार । किण सारू मेल्ही गया, एकलडी निरधार ॥६॥ चाल-निरधार कहो किम
कीजे, प्रीतम विण केम रहीजे । दरीयो लागे दुखदाई, उदयागत अधम कमाई ॥७॥
परभव केई पातक कीधा, परतिख तेहना फल लीधा। निरदोस पराई जाई, छोडंतां महिर
न आई ॥८॥ दूहा-महिर न आवी प्रीतमा !, हेज नहीं मनमाय । जो मनमां एहवू
हतुं, तो चउरी चढीयो कांय ॥९॥ चाल-चवरी अमची तूं चढीयो, दक्षिण कर करसुं
पकडीयो।तें बोल दीयो वीसारी, परणी छोडी निरधारी॥१०॥ वाट जोस्ये कमला मायडी,
आव्या छो विचमें छांडी। अम्हने इहां आणी नांखी, झुरे पंख विणि जिम पंखी ॥ ११॥
दूहा-पंखी जिम विण पंखडी, फोरी न सके प्राण । प्रीतम दरीयामें पड्यो, कीजे किसो
॥ ८३॥

श्रीपाल.
॥ ८२ ॥
-
दूहा-सुदि दसमी वैसाखनी,पहुर पाछिले जोइ।सायर तटे चंपातले, सूतो ते वर होइ १
वयण मिल्यो जोसी तणो, परणो कन्या एह। लगन देई वसुपाल नृप, परणाव्यो ससनेह।२।
राय कहे कोई काज ल्यो, राखो माहरो मान।थईयायत कामो लीयो, राय अपावे पान॥३॥
धवल कुमरने नांखिने, माया मांडी भूर।रोवे पीटे सडसडे, मनमां वाध्यो नूर ॥४॥सीपा
नारी भणी कह्यो,तुम्ह पति थयो जलपात।जोर नहीं जगदीससुं, पिण मित्र विना नसुहात ५
ढाल ३५ मी. यत्तिनी, राग सोरठ-पिऊ पिऊ करी मयणा रोवे,जूथ भ्रष्ट मृगी परि जोवे।
सांभल प्रीतम ! गुणवंता, अमची कुण करसे चिंता ॥१॥अधविचि छोडी गयो अम्हने,
करुणा नावी कांइ तुम्हने । अम्हे अबलाने एकलडी, परमेसर अम्हने विछडी ॥२॥ दूहा-
विछडी देवे अम्हभणी, छोडी पिउ निरधार। दुखसोयरमांहे पडी, किम पा{ हिवे पार ॥३॥
चाल-पामूं किणपरि
दुखपार,
प्रीतम पाखे किरतार। ब्रोडी गयो नाह नवीनो, हा हा !!
॥ ८२॥

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रास.
श्रीपाल.
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गयो नाह नगीनो॥४॥हीयडाना दुख किण आगे, कहीये कोई दुख्ख न भागे । मनमोहन
नाह मिलावे, मुह मांगी वधाई पावे ॥५॥ दूहा-पावे अबला दुख घणो, वाल्हेसर
करि सार । किण सारू मेल्ही गया, एकलडी निरधार ॥६॥ चाल-निरधार कहो किम
कीजे, प्रीतम विण केम रहीजे । दरीयो लागे दुखदाई, उदयागत अधम कमाई ॥७॥
परभव केई पातक कीधा, परतिख तेहना फल लीधा। निरदोस पराई जाई, छोडंतां महिर
न आई ॥८॥ दूहा-महिर न आवी प्रीतमा !, हेज नहीं मनमांय । जो मनमां एहवू
हतुं, तो चउरी चढीयो कांय ॥९॥ चाल-चवरी अमची तूं चढीयो, दक्षिण कर करसुं
पकडीयो।तें वोल दीयो वीसारी, परणी छोडी निरधारी ॥१०॥वाट जोस्ये कमला मायडी,
आव्या छो विचमै छांडी । अम्हने इहां आणी नांखी, झुरे पंख विणि जिम पंखी ॥ ११॥
दूहा-पंखी जिम विण पंखडी, फोरी न सके प्राण । प्रीतम दरीयामें पड्यो, कीजे किसो
॥८३ ॥

श्रीपाल.
॥ ८४ ॥
विन्नाण॥१२॥चाल-हिवे नाण विन्नाण न सूजे,छाती धडहड इम धूजे। अम्हथी दादुर गुण
जाण, पाणी सरिसा जसु प्राण ॥१३॥पीहर तो परतटे रहीया, प्रीतम विरहागनि दहीया।
प्रमदा इणिपरि विलवंती, दुख रोई राति गलंती॥१४॥दूहा-राति गलंती तिमरडी, पाहणं
फट्टइ जेण। पिण हीयडो फाटो नहीं,थयो कठिन विरहेण१५चाल-प्रिय विरह वियोगे पीडी,
वलि सेठे कुद्रिष्टे भीडी। पामे नहीं किमही थाग, निज प्रीतमसुं बहु राग १६ सतीयां निज
सील सखाई, तेहने तो चिंतन कांई। जिनहरख!' देवी वरदाई, पेंत्रीसमी ढाल सुहाई १७
दूहा-इम विलवंती सुंदरी, रोवंती न रहाय। धवल अधरमी तिण समे, भासे पासे आय
॥१॥हे सुंदरी!तुम्हे सांभलो,म करो मनमें खेद।हूं तुम्हने सारीपरे, राखिस घणे उमेद ॥२॥
विधिविलसित अहिलो नहीं, नहीं केहनो जोर।पिणमुझ वयण मलोपसो, तुमने करूं निहोर
३ वयण सुणीमयणा बिन्हे, जाण्युंएहना काम।सायरमां पिउ नांखीयो, रही अबोली ताम४
॥८४ ॥

11८५ ॥ ढाल ३६मी.देशी “वाणिणि वाउली रे, जसोदा फौजां पाछी वालि"एहनी- इण अवसर गयणंगणे रे, मिलीयो घनघोर अंधार, देवी चक्केसरी रे।मयणानी वाहरे आई, धाई वाहर आई धाइने, लागी नहीं कांई वार दे। पवन चिहुंदिसि ऊपड्या, सायर कल्लोल अपार दे० ॥१॥ जलनिधिना जल ऊछल्या रे, ऊधाण चट्या असमान देवाहण लागा डोलिवा, जाणे चंचल पीपल पान दे० ॥२॥ वीज झलामल झलहले रे, बीहावती बाल गोपाल दे० । घोर घटा करि ऊनम्यो, जलधर वरसे असराल दे० ॥३॥लोल कल्लोल हिलोलतो रे, वाजे दधि गाजे पूर दे।लोक सोक भय ऊपनो, कायर थयां सूर विनूर दे०॥४॥खांडा हत्थउ भैरवो रे, कर डमरूने डाक दे।तिण अवसर प्रगट्यो तिहां, आव्यो मारंतो हाक दे०॥५॥ माणिभद्र वीजो वली रे, पूरणभद्र कपिल सरीर दे०॥ पिंगल चोथो दाखीयो, सिद्ध- चक्रना च्यारे वीर दे०॥६॥मोगर हाथे साहिया रे, अन्याई करे चकचूर दे।सेवक श्रीजिन- AREE

श्रीपाल.
॥८६॥
रायना, प्रगट्याजाणे अंकूर दे॥७॥ कुमुद अंजण वली वामणोरे, पुष्पदंत चोथो सुर नाम
दे दंड धरा अति आकरा,पडीहार च्यारे अभिराम दे०॥८॥हाथे चक्र भमाडतीरे, झलकंत
अत्यंत उद्योत दे० । वयण इसा मुख भाषती, प्रगटी चक्केसरिनी जोत दे०॥९॥रे रे!
वीर! एहने ग्रहो रे, दुरबुद्धि प्रथम इणे दीध दे।ए पापी हणवो सही, अनरथ जिणे एहवो
कीध दे० ॥१०॥वीरे झाली बांधीयो रे, अवलंब्यो कूवा थंभ दे। ऊंधे मुख दुखीयो कीयो,
हणीयो फल पाम्यो दंभ दे०॥११॥ भये चकित धवलो भणे रे, तुम्ह सरणे मयणा माय! दे।
राख राख मारण थकी, में झाल्या ताहरा पाय दे०॥१२॥ निजगुण साम्होजोइज्योरे, माहरा
अवगुण म निहाल दे। उत्तम गुणकारी हुवे, 'जिनहरख!' छत्रीसमी ढाल दे० ॥१३॥
दूहा-ताम चक्केसरि इम भणे, तूंरे पापिष्ट! अनिष्ट। में तुझक्यो जीवतो, मयणा सरणे
प्रविष्ट ॥१॥दोइ मयणा कर जोडिने, भाषे विनय वसेण।सार करी माता! तुम्हे; विसमे
॥८६॥

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श्री पा त श्रीपालजीको दोनों रखीयोके ध्यानयलसे समुद्र में एकदम तोफान अठता है, चक्रेश्वरी आदि देवगण आके प्रगट होते है, दुर्बुद्धि मित्रको क्षेत्रपाल शिक्षा देता है, धवलशेठ श्रीपालजीकी दोनों स्त्रीयोंका शरण लेता है, जिससे चक्रेश्वरी देवी उसको जीवता छोडती है, दोनों स्त्रीयें अपने शील रक्षणके लिये चक्रेश्वरीसे प्रार्थना कर रही हैं। WATATUD का ग म । (पत्रांक ८६) M द AVM withor

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रास.
श्रीपाल.
॥८७॥
अवसर एण ॥२॥ देवीवाक्यं-वच्छा ! वल्लह तुम तणो, गिरूई रिद्धि समेउ । मास-
ऽम्भितर निच्छइण, मिलस्ये धरो म खेउ ॥३॥ एम भणेविणु(कहिने) चक्कहरि, परिमल
गुणहि विसाल । मयणह कंठे पख्खिवे, सुरतरु कुसुमह माल ॥४॥ तुम्हह दुष्ट न
देखस्ये, मालह तणे प्रमाण ।एम भणेविणु (भणिने) चक्कहरि, देवि गई नियठाण ॥५॥
ढाल ३७ मी."ते मुझ मिच्छामि दुक्कडं" एहनी-हिवे वाहणकुंकण जई, ऊतरीया जाम।
धवलो भलो लेई भेटणो, भेट्यो राजा ताम, हि० ॥१॥राय खुसी थई सेठने, दिवरावे
पान । थईयायतने ओलख्यो, थयो हीयडे हेरान, हि० ॥२॥ए नीकल्यो किम जीवतो,
वैरी विकराल। वली मुझथी अधिको थयो, हीयडे ऊठी झाल, हि० ॥३॥ कोई उपाय करूं
हिवे, जिम रूसे राय। एहने जीव रहित करे, जिम भावठ (कष्ट) टलि जाय, हि० ॥४॥डुंब
कुटुंव आव्यो तिहां, सेठे आदर दीध।काम कहो करिसुंअम्हे, सवालाखधन लीध, हि०॥५॥
॥ ८७॥

श्रीपाल. रास. , 11८८॥ राय जमाई जोहणे, धन यूं सवा कोडि । डूंब भणे ए सोहिलं, काम करसुंदोडि, हि० ॥६॥ रावले डूंब जई करी, गाया भला गीतावली विशेषे ते दिने, रीझाव्यो राय चीत, हि० ॥७॥ नृप तूठो बीडा दीये, गायन नलीयंत।राय जमाई सेहत्थे, लीउं जो दीयंत, हि० ॥८॥हुकम दीयो श्रीपालने, वसुपाल नरिंद।बीडा देवाने गयो, नवि जाणे फंद, हि०॥९॥गायन सहु ऊठी करी,सीपा कंठ विलग्ग। एक भणे पुत्र! ओलख्यो,इम रोवा लग्ग,हि०॥३०॥एक कहे भाइ ! मिल्यो, बहु दिवसे आज।नारि थई इक डूंबणी, बेठी करीलाज,हि०॥११॥माय थई माया करे, रहे रहे हिवे पूत! झाली बांह बेसारीयो, वलीयो घर सूत, हि० ॥१२॥ राजा अचरिज पामीयो, जोवो दैव सरूप । ढाल थई सेंत्रीसमी, 'जिनहरष' अनूप, हि० ॥१३॥ दूहा-कोप चढ्यो राजा कहे,बांभण डाभुं आज।ए कन्यावर दाखव्यो, गमीसहूमें लाज १ वली नृप पूछे कुमरने, दाखवीये निज वंस। निज जीभे सीपो कहे, कुल कीजे न प्रसंस॥२॥ , ॥८८॥ , ,

रास.
श्रीपाल,
चतुरंगी सेना सजो, मंडावो भारत्थ । तिण वेला तुम्हे जाणिज्यो, कुल लहिस्ये मुझ हत्थ
॥३॥अथवा प्रवहण मांहि छे, दोइ नारी गुणवंति । कुल कहिस्ये ते माहरो, मिटस्ये मननी
भ्रांति ॥४॥ भूपति तेडी नारि वे, मूंकी पुरुष प्रधान। आवी हीयडे ऊमही, पूछे तव राजान ५
दाल ३८ मी. देशी "कोइलो परवत धुंधलो रे लो” एहनी- वोली तव विद्याधरी रे लो,
अंगदेस भूपाल रे राजेसर! सिंहरथ राय कमलातणो रेलो, ए नंदन श्रीपाल रे नरेसर!,
यो०॥१॥ पूरव वात सहू कही रे लो, एहनी छं वे अम्हे नार रे रा०। नृप सुणि अचरिज पामी-
यो रेलो, पाम्यो चित्त चमकार रे न०, वो० ॥२॥ ततखिण वांध्यां ढूंबडा रे लो, दीधी मार
अपार रे रा०। हुकम कीयो हणवा तणो रे लो, गायन बोल्या तिण वार रे न०,
बो०॥३॥
चांक अम्हारो को नथी रे लो, सगपण पिण नहीं कोई रेरा धवल अछे एक वाणीयो रेलो,
पापीमां धूरि होइ रे न०, वो० ॥४॥धन आपी अम्हने घणो रे लो, एह कराव्यो काज रे
॥ ८९॥

श्रीपाल.
१९०॥
,
रा० । खोटो बोलीजे किसुंरे लो, तुम्ह आगले महाराज! रे न०, बो०॥५॥राय भर्योरीसे
घणूं रे लो, पाठवीया निज दूत रे रा० । धवल भणी बांधी करी रे लो, लेवा तुरत पहूत रे
न०, बो०॥६॥बांह अपूठी बांधिने रे लो, लाया वेग तलार रे रा० । वाहो (मारो) बार
मलाविसोरेलो, धवल तणो सिरधार रे न०, बो०॥७॥मारंतो छोडावीयो रे लो, करुणा
करी श्रीपाल रेरा।वछीयायत ए वाणीयो रे लो, हणीये किम ? भूपाल! रेन०, बो० ॥८॥
बंधनथी छोडावीयो रे लो, दिवराव्यो सनमान रेरा०।सापुरुस रीस धरे नहीं रेलो, वलि
न करे अभिमान रे न०, बो० ॥९॥ त्रिहुं मयणासुंभोगवे रे लो, सुख गमतां निसदीस रे
रा०। कुमर प्रताप निहालिने रेलो, सेठ धरे मन रीस रेन०, बो०॥१०॥कुमर सूतो भूमि
सातमी रेलो, वली मांड्यो मनद्रोहरेरा० । निसिभर बांधी डोरडी रे लो, मूंकी चंदन गोह
रेन०, बो०॥११॥हणवा कुमर भणी चढ्यो रे लो, पालीकर संबाहि रे रा० । पाली सहित
॥ ९ ॥

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... श्री पा EXTENKTAXTELAX ल रा जा का रा 1 ठाणा नगरीमें अपने महलकी तसावी मजलपर श्रीपालजी अकेले सो रहे थे, इधर धवलशेठ मौका पाके महलकी पूंठमें गया और चंदनगोहके पगमें रस्सी (डोरी) चांधकर उसको उपर चढाइ, जब कि वह चंदनगोह सातवीं मजलपर जाके स्थिर हो गइ तब कमरमें तलवार बांधकर श्रीपालजी को मारनेके लिये खुद धवलशेठ रस्सी पकडकर उपर चढने लगा, पापका घडा भर जानेके कारण आधे भागसे रस्सी टूट गइ, नीचे पड़ते हुए हृदयमें तलवार घुस जानेसे मर कर नरकों गया, सवेरे नगरके लोक एकत्र होकर विविध चातें करने लगे, श्रीपालजीभी हकीकत सुनके सज्जनताके कारण आके उदास हुए पासमें बैठे है। ( पत्रांक ९१) -- Pornr Camerkar.br AMRUT SAGAR PRESS BONBAY 3 रास. श्रीपाट, पाछो पड्यो रे लो, खूती हीयडा मांहि रे न०, वो० ॥ १२॥ ततखिण प्राण तज्या तिहां र लो, धवल गयो जम लोक रे रा०। देखी सहु कहे एहवो रे लो, पातिक न हुवे फोक रे न०, वो० ॥१३॥माठी करणीथी इणे रे लो, फल पाम्या ततकाल रे रा० । कहे 'जिनहरष' भले भलो रे लो, कह्यो अडत्रीसमी ढाल रे न०, बो ० ॥१४॥ सर्व गाथा ६५८ ॥ दूहा-क्रोध लोभ श्रीपालना, मनमां नहीं लिगार । प्रेतकार्य करि धवलनो, कीधो इम उपगार ॥१॥ तेडीने आसासना, सेठपुत्रने दीध। पिता तणो धन आपीयो, लोकांमें जसलीध ॥२॥ कोसंवी संप्रेडीयो, उत्तमनी ए रीति । खीरनीर जिम सापुरुस, पाले पूरी प्रीति ॥३॥ ढाल ३९मी. देशी “नणदल! हे नणदल!,चूडले जोवन झिल रहियो” एहनी-साजन! हो साजन!, इक दिन रयवाडी गयो, सीपो मनमें रंग। साजन ! सेवक साथि लेई करी, बेसी चपल तुरंग ॥१॥ सा० पुन्य कथा तुम्हे सांभलो, पुन्य कीयां आणंद । सा० कष्ट टले ॥ ९१॥ .

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हूँ रास. श्रीपाल. पाछो पड्यो रे लो, खूती हीयडा मांहि रे न०, वो० ॥ १२॥ ततखिण प्राण तज्या तिहां र लो, धवल गयो जम लोक रे रा०। देखी सहु कहे एहवो रे लो, पातिक न हुवे फोक रे न०, बो० ॥१३॥माठी करणीथी इणे रे लो, फल पाम्या ततकाल रे रा० । कहे 'जिनहरष' भले भलो रे लो, कह्यो अडत्रीसमी ढाल रे न०, वो ० ॥ १४ ॥ सर्व गाथा ६५८ ॥ दहा-क्रोध लोभ श्रीपालना, मनमां नहीं लिगार । प्रेतकार्य करि धवलनो, कीधो इम उपगार ॥१॥ तेडीने आसासना, सेठपुत्रने दीध। पिता तणो धन आपीयो, लोकांमें जसलीध ॥२॥ कोसंवी संप्रेडीयो, उत्तमनी ए रीति । खीरनीर जिम सापुरुस, पाले पूरी प्रीति ॥३॥ ढाल ३९मी. देशी "नणदल! हे नणदल!,चूडले जोवन झिल रहियो” एहनी-साजन! हो साजन!, इक दिन रयवाडी गयो, सीपो मनमें रंग। साजन! सेवक साथि लेई करी, बेसी चपल तुरंग ॥१॥सा० पुन्य कथा तुम्हे सांभलो, पुन्य कीयां आणंद । सा० कष्ट टले ॥ ९१॥ R

श्रीपाल.
रास.
॥ ९२॥
संपति मिले, जिम श्रीपाल नरिंद, सा० पु०॥२॥सा० आगलि वनमा ऊतयों, दीठो सार-
थवाह। सा० पूछ्यो कुमर किहां थकी, आव्या किण पुरमांह, सा० पु०॥३॥ सा० अच-
रिज कोई निहालीयो, कांई अपूरव वात।सा० तेह कहे कांतिथकी, आव्यो सुण वडगात!,
सा० पु०॥४॥ सा० इहां थकी सो जोयणे, कुंडल नगर वसंत । सा० मकरकेतु राय
रागिनी, कपूरतिलका गुणवंत, सा० पु०॥५॥ सा० गुणसुंदरी तेहनी सुता, विद्या रूप
प्रसाद । सा० परणे नर ते मुझ भणी, जीपे वीणा नाद, सा० पु० ॥६॥ सा० नरपति
नंदन बहु मिल्या, सीखे वीणा चाल । सा० वात इसी तिण नर कही, घर पहुंतो श्रीपाल,
सा० पु०॥७॥सा० ते अचरिज जोवा भणी, लागी मनमें खंत । सा० भाव धरी नव-
पद जपे, तन मन करी एकंत, सा० पु०॥८॥सा० नवपद भगत प्रत्यक्ष थयो, श्रीविम-
लेसर यक्ष।सा० तूठो सीपाने कहे, मांग मांग वर दक्ष!, सा० पु०॥९॥ सा० गुण रंज्यो
॥ ९२॥

रास. श्रीपाट. सीपा भणी, आले निरमल हार।सा पहियों कंठे मोहन करे, जाये जिहां जाण हार, सा० पु० ॥१०॥ सा० हार तणी महिमा कही, सुर पहुंतो निज ठाण । सा० कुमर गयो कुंडलपुरे, पहिरी हार सुजाण, सा० पु०॥११॥सा० रूप रच्यो वामन तणो, गयो अखाडा साज।सा० भणिवा पाठक! तुम्ह कने, हूं आव्यो छं आज, सा० पु०॥ १२॥ सा० वीणा कला मुझ सीखवो, मुझने पिण छे हूंस।सा० राजकुमरीने रीझवू, नांदुंमगज विधूंस, सा० पु०॥१३॥ सा० नृप नंदन हड हड हस्या, वोल्यो वामण साच। सा० हूंस करे वरवा तणी, किहां कंचण किहां काच, सा० पु०॥१४॥सा० राय कुमर आवो मिली, माहरे पासे आज । सा० राजकुमरि तेड्या सहू, नाद परीक्षा काज, सा० पु०॥१५॥सा० वामण पिण साथेगयो, राज- कुमरि आवास । सा० ढाल ए उगणचालीसमी, कही 'जिनहरष' उल्लास, सा० पु०॥१६॥ दूहा-वीणासुर सहुए कर्यो, तंतउतार्या राग।पिण किणहीना नादसुं, कुमरीचित्त न लाग ॥ ९३।। .

5
श्रीपाल.
॥९४॥
१॥ वीणा मांगी वामणे, आपे कुमरी अचंभ। आरंभ कीधो नादनो, थंभ्या सहु जिम थंभ
॥२॥सहु को देखे वामणो, नृपकन्या श्रीपाल। कुमरीवर वरवा भणी, कंठ ठवी वरमाल ॥३॥
रूप अनूप कीयो प्रगट, चंपापति तिण वार । मकरकेतुमन हरखसुं, परणावीयो कुमार॥४॥
आप्याकंचण मणिरयण, आप्यावर आवास। कुमर तिहांसुख भोगवे, वारूलीलविलास ५
ढाल४०मी. देशी “प्यारो प्यारो करती” एहनी-एक दिन रमवा नीकलीयो,वाटे एक पंथी
मिलीयो। कुमरे परदेसी कलीयो, पूछे अचरिज अटकलीयो होलाल॥१॥कहो पंथी! किहां
जासो ?, किहांथी आया मुझ भासो। दीठो कोई तुम्हे अवल तमासो, मुझ आगलि तेह
प्रकासो होलाल,क०॥२॥पंथी कहे चतुर सुजाण !, कुंडनपुर नयर मंडाण।आव्यो तिहांथी
सुप्रमाण, जाइस हूं पुर पैठाण हो लाल, क० ॥३॥ कणयापुरमांहे आयो, राजा विजयसेन
कहायो। राणी कनकमालामन भायो, जिणे पुन्य थकी सुख पायो हो लाल,क०॥४॥त्रैलोक्य-
,
॥ ९४ ॥

श्री पा कुडलपुर नगरमें वीणानादके चादमें जीतजानेपर गुणसुंदरी राज- पुत्रीके साथ होता हुआ श्रीपालजी का विवाह दृश्य। म H +- (पत्रांक ९४) AON

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-- A रास. श्रीपाल. , मुंदरी तसु बेटी, जाणे रूप कला गुण पेटी। पासे रहे सुंदर चेटी, मननी आरति जिणे मेटी हो लाल, क० ॥५॥ कन्या थई जोवनवंती, दीठी वापे मलपंती। वर जोग्य थई गुणवंती, सरिखे पूगे मन खंती हो लाल, क०॥६॥ सयंवर मंडप मंडाउं, सहू देसाधिप तेडाउं । इण सरिखो जो वर पाउं, तो वेटीने परणाउं हो लाल, क०॥७॥इम चिंतवि चित्त मझारा, मंडप रचीया विस्तारा।जगमाहे नरसिरदारा,आव्या लेई परिवाराहो लाल,क०॥८॥बत्रीस जोयण इहांथी थाये, काल्हे वरिस्ये मनभाये। सीपो सांभलि तिहां जाये, पंखी जिम गयण पुलाये हो लाल,क०॥९॥ कणयापुर माहे आयो,खुंधानो(कुज)रूप बणायो।अचरिज देखण उमाह्यो, देखी मंडप सुखपायो होलाल, क० ॥१०॥प्रतिहार न ये पेसेवा, हथसंकलो दीयो देखेवा। आयो जिनहरख' वरेवा, चालीसमी ढाल कहेवा हो लाल, क० ॥११॥सर्व ६९३ दहा-पूठभाग ऊंचो घणो, ऊर सांकडोप्रदेस। ऊंची नीची नासिका, माथे कपिला केस ॥९५॥ , श्रीपाल. . ॥१॥पूठे ढूबड कूबडो, मोटो माथी जास। दांत गदहडा सारिखा, तेहवा दांतऊजास॥२॥ कोटगली वांकी नली, पिंज़र नयन विसात । लाल पडे होठ लडवडे, इसो बणायो गात ॥३॥राजहंस सम राजवी, बेठा करे कलोल । काग सरीखो कूबडो, आवी उभो लोल॥४॥ ढाल ४१ मी.देशी श्रीचंद्रप्रभुप्राहुणोरे" एहनी-कहोखूधा! नरपति कहे रे,किम ऊभा? इहां आज रे। जिणे कारणे बेठा तुम्हे रे, ऊभो छु तिणे काज रे, क०॥३॥ हड हड हसीया राजवी रे, रूप बण्यो वाह वाह रे!! तुझ सरिखो वर किहां मिले रे, एहवां राजवीयां मांह रे, क० ॥२॥ कन्या नरवाहन चढी रे, स्वयंवर कीधो प्रवेस रे। ढोल दमामा वाजीया सखर बणाव्या वेस रे, क०॥३॥श्रीपाल रूप मूलगो रे, देखे कन्या तेह रे।प्रमुदित चित्त थयो घणो रे, लागो निविड सनेह रे, क०॥४॥तीखे नयणे ताडिने रे, जोवे वारंवार रे । चुंबक लोह तणी परे रे, मन मिलीयो तिणवार रे, क० ॥५॥प्रतीहारी आवी हिवे रे, , , ॥ ९६ ॥ . 3 4 रास. श्रीपाल. लाल छडी ले हाथ रे । स्वयंवर विचमें माल्हती रे, राजकुमरी करि साथ रे, क० ॥६॥ राजवीयांने ओलखे रे, जाणे देस विदेस रे।वंस तणी विरुदावली रे, संभलावे सुविसेस रे, क०॥७॥ छोडि चली सहु राजवी रे, जिम भाद्रवडे(भाद्रवे)छाण रे।थांभा पूतलीने मुखे रे, देवतणी थई वाण रे, क० ॥८॥तथाहि-“यदि धन्यासि विज्ञासि, जानासि च गुणांतरं। तंदैनं कुम्जकाकार,वृणु वत्से! नरोत्तमं॥१॥” देव तणी वाणी सुणीरे, कुब्जगले वरमाल रे। घाली कन्याये वर्यो रे, मूंकी सहु भूपाल रे, क० ॥९॥धडहडीया कोपे करी रे, मानी नर मूंछाल रे।कहता रेरे!! कूवडा!रे, मेल्हे परि वरमाल रे, क०॥१०॥मक्यां मूंकां जीवतो रे, नहीं तो मूंकांजमलोकरे।राजसुताने कारणे रे, कांइ मरेतूं फोकरे,क०॥११॥काइ अदेखा राजवी! रे, कांइ बडो करो रोस रे । रूप न पाम्यो जो तुम्हे रे, तो केहनो कहो दोस रे, क० ॥१२॥ नाक तणा मलनी परे रे, तुम्हने तज्या इणे बाल रे। आदरमान देई घणो रे, . ।

S
श्रीपाल.
रास.
|९८ ॥
,
मुझ कंठे ठवी वरमाल रे, क० ॥१३॥भाग्य विना नवि पामीये रे, रायसुता सुकुमाल रे।
कहे 'जिनहरष' मषी (लखी) जिस्यो रे,इकतालीसमी ढाल रे, क०॥१४॥सर्व गाथा७११॥
दूहा-एहवा वयण सुणी करी, भड भडीया भूपाल। मारो मारो कूबडो, पाडी ल्यो वरमाल
१ इम कही ऊठ्या मारवा, खूधे देखाड्या हाथ। कायर थई नासी गया, मांडे कुण भारथ २
खूध पराक्रम देखिने, विजयसेन राजान। तव बोल्यो वछ ! आपणो, प्रगटो रूप बलवान ३
रूप कीयो निज मूलगो, जाणे अभिनव काम।राजा रलीयायत थयो, कुमरी सम वर पाम ४
परणावी नृप अंगजा, उच्छव करी अपार। सुंदर मंदिर आपीया, रयण कणय सिणगार ५
सीपो वर सुंदर प्रवर, त्रैलोक्यसुंदरी नार । जोडी जोडी सारिखी, हूंस हुइ किरतार ॥६॥
ढाल ४२मी, देशी “वायूँ रे सवायो वयर हूं माहरो रे" एहनी-रायसभाये आव्यो चर
एकदा रे, कहे निसुणो श्रीपाल!। देवक पट्टण धण कंचण भर्यो रे, राय तिहां धरापाल, रा०
॥ ९८॥

रास. श्रीपाट. १ J ॥ १ ॥गुणमाला गुणमाला रागिणी रे, तेहने पुत्री रे एक । श्रृंगारसुंदरी जाणे सुरसुंदरी जाणे विनय विवेक, रा०॥२॥श्रीजिन सासनना प्रवचन तणो रे, जाणे सयल विचार। पंच सखी छे ते पिण तेहवी रे, मांहो मांहे प्यार, रा०॥३॥प्रथम पंडिता १ बीजी नाम विचक्षणा २ रे, प्रगुणा ३ निपुणा ४ छेक। तिम दक्षा ५ जाणो सखी पांचमी रे, तन जूआ मन एक, रा० ॥४॥ पांच सखी आगल कहे कुमरी रे, जे नर जिनमत जाण। ते वर वरवो आपणने सखी! रे, श्रीजिन आण प्रमाण, रा०॥५॥ जेह समस्या रे मननी पुरिस्ये रे, ते आपण भरतार । पांचे सहाए रे समस्या पद कर्या रे, जिनमत जाणणहार, रा० ॥६॥ एहवी वाणी रे सांभलि राजवी रे, आव्या पंडित जाण।अवर समस्या रे पूरवे ते सह रे, पिण मन भाव अयाण, रा० ॥ ७॥ इम ते कुमरी रे रहे छे परखती रे, पिण न मिले संकेत। कुमर सुणीने रे मनमांहे धर्युरे, कुमरी वरिवा हेत, रा०॥८॥ हार प्रभावे रे

श्रीपाल.
॥१०॥
,
आव्यो पाटणे रे, पहूंतो कन्या आवास । सुंदर सहजे रे रूप सुहामणो रे, निरखी हरखी
उलास, रा०॥९॥कुमरे पूछ्यो रे चित्त समस्या कहो रे, निज मन धारी जेह।कुमरी केरी
रे प्रेरी पंडितारे, तव बोली गुणगेह, रा०॥१०॥समस्या पदं “मन वांछित फल होइ ॥१॥"
सखीमुखे ते रे एणे जो कही रे, तो सेमुख (स्वमुखे) कुण काम। हार ठवीने रे कंठे पूतली
रे, मुख बोलावे ताम, रा०॥११॥ए किम बोले रे पत्थर पूतली रे, अचरिज लहे नृपबाल ।
ढाल थई ए बेतालीसमी रे, कहे 'जिनहरष' रसाल, रा०॥ १२॥ पुत्तली वचनं यथा-
दूहा-अरिहंताइ सुनवह पद, निय मन धरे जे कोइ। निश्चय ते नर नारियह, मनवां-
छित फल होइ ॥ १॥ अथ विचक्षणा पठति-“अवर म झंखो आल॥२॥” पुत्तलिका
कथयति-अरिहंत देव सुसाहू गुरु, धम्म तु दया विसाल। मंतुत्तम नवकार पर, अवर
म झंखो आल ॥२॥प्रगुणा पठति-“करहु सफल अप्पाण ॥३॥" पुत्तलिका भणति-
॥१०॥

रास.
श्रीपाल.
॥१०॥
,
आराहो धुरि देवगुरु, यो सुपत्ते दाण । तव संयम उवयारडो, करहु सफल अप्पाण ॥३॥
निपुणा पठति- "जित्तो लिख्यो निलाडि॥४॥" पुत्तलिका वदति-रे मन!अप्पा खंच करि,
चिंता जाल म पाडि । फल तित्तो ही पामीये, जित्तो लिख्यो निलाडि ॥४॥ ततो दक्षा
पठति-"तसु तिहुअण जण दास ॥५॥" पुत्तलिका जल्पति-अत्थि भवंतर संचियो, पुन्न
समग्गल जास । तसु बल तसु मइ तसु सिरि य, तसु तिहुअण जण दास ॥५॥ कुमर
समस्या पूरची, हरखी कुमरी चित्त । ए वर मुझ पुन्ये मिल्यो, पूरव भवनो मित्त ॥६॥
ढाल४३ मी. देशी “मोती द्योने हमारो, राजिंदा!मोती द्योने" एहनी-राजा सुणि रीझ्यो
चतुराई, ए वर सरिखो मिलीयो बाई । जोइज्यो पुन्याई तणा फल, जोइज्यो पुन्याई,
ए आंकणी॥१॥पुन्याईए आवी मिलीयो,जाणे अकाले आंबो फलीयो जो०,पंच सखी साथे
नृपवाला, सीपा कंठे ठवी वरमाला जो० ॥२॥राजा परणावी निजकन्या, लोक सहू भाषे ए
,
॥१०॥

श्रीपाल.
॥१०२॥
धन्याजो।पंच प्रकार विषय सुख विलसे, पुन्यथकी आस्या सहु फलसे जो०॥३॥भाटभणे
आसीस भली परे, चिरंजीवो महाराय कुमर वर जो०।अचरिज एक अपूरव दीठो, कोल्ला-
गपुर रिद्धि समृद्धि अनीठो जो०॥४॥राय पुरंदर जाण पुरंदर, राणी विजयादे अति सुंदर
जो। बेटी गुणपेटी जयसुंदरी, रूपे अभिनव रति मति मंदिर जो० ॥५॥कुमरी प्रतिज्ञा
करी रहि थिरता, राधावेध साधे सोई भरता जो० । बाप कन्याने काजे तेडाव्या, दिसि
दिसिना देसाधिप आव्या जो०॥६॥ पिण ते किण ही वेध न साध्यो, कुमरी मन उच्छाह
न वाध्यो जो।भाट भणी बहु दान देईने, कुमर चल्यो निजहार लेईने जो०॥७॥ कोल्ला-
गपुर ऊडीने आयो, राधावेध सझी सुख पायो जो० । जयसुंदरि कन्या वर वरीयो, राये
वीवाह सबल आचरीयो जो० ॥ ८॥ दोइ जण झीले सुख सायरमें, सरिखी जोडि मिली
निज करमें जो० । तिण अवसर मामो तेडावे, नर मेल्हीने खबर करावे जो०॥९॥कुमरे
॥१०२॥

रास. मीपाट. , पिण निज पुरुष पठाया, नारी तेडण सैन्य बुलाया जो० । बंधु सहित सहु सुंदरि आई, सना बहुत मिली मनभाई जो०॥१०॥हयदल गयदल पयदल मिलीयो, चालंतां अहिपति सलसलीयो जो० । सात सायरनो जल झलफलीयो, जाये किणही नहीं वल कलीयो जो ॥११॥स्थानापुरी नयरी उतरीयो, मातुल निरखी हरखमन धरीयो जो०।मामे करि अभिषेक सुदिवसे, राजा पद दीधो मन हरसे जो० ॥१२॥ पुन्य पसाये लह्या सुख ताजा, श्री श्रीपाल थया महाराजा जो०।तेंतालीसमी ढाल वखाणी, कहे जिनहरष' वखत नीसाणी जो०॥१३॥ दूहा-दस दिसि केरा राजवी, आवी लागा पाय। हय गय कंचण मणि रयण, लेई भेट्यो राय १ हिवे श्रीपाल नरेस वर, लेई सैन्य अपार।चाल्यो उज्जेणी भणी, मिलवा जननी नार२ विचि सोपारे पाटणे,जई दीधो मेल्हाण(डेरो)। परदल आव्योजाणिने, राय मेल्यो दीवाण ३ श्री श्रीपाल नरिंदने, आवी लागो पाय। कर जोडीने वीनवे, स्वामी ! करो पसाय ॥४॥ ॥१०॥ ,

श्रीपाल.
॥१०४॥
महासेन नृप कुमरी, डसीयो अंग भुयंग । तिलकसुंदरी विषभरी, तिण दुख राय भयंग
समसाणे ते ले गया, दुख पीडित भूपाल। तुम्ह मिलिवा तिण वासते, नाव्यो अहो कृपाल!६
ढाल४४ मी. देशी “परदेशी यार! मेरी अंखीयां लगी” एहनी-परउपगारी साहसधीर,
समसाणे पहुंतो वडवीर । उपगारी लाल! ताके पाय नमीजे, पाय नमीजे ताकी सेवा कीजे
उ०पए आंकणी।नयणे मुझ देखालो बाल, ए जीवाडिस हूं ततकाल, उ०॥१॥दीठी कन्या
मृतक समान, महामंत्रनो कीधो ध्यान, उ०। कुमरी कंठे ठवीयो हार, ततखिण बेठी थइ
तिणवार, उ०॥२॥ विष ऊतरीयो निर्विष प्राण, वाज्या हरष तणा नीसाण, उ०। राजा
महासेन हरख्यो अपार, भेट करे मणि रयण भंडार, उ०॥३॥परणावी निज कन्या तेह,
तिलकसुंदरी घणे सनेह, उ० । देव तणी परे विलसे भोग, पाम्या पुन्यतणे संयोग, उ०
॥४॥ आणो करि चाल्यो श्रीपाल, कटक सुभट दल बहुल विसाल, उ० । सैन्य चढाई
॥१०४॥

रास.
।
-
श्रीपाल.
॥१०५॥
ON
कीधी भूपाल, चडत नगारा थइ करनाल, उ०॥५॥देस देसना राये संजुत्त, चलतां माल-
वमाहे पहुत्त, उ० । उज्जेणी आयो श्रीपाल, चर मुख सांभलीयो भूपाल, उ०॥६॥ त्रिण
कण कापड जल मांहे लीध, गढ रोहो मालव पति कीध, उ० । सायर वींटी लंका जेम,
उज्जेणी वींटी रह्यो तेम, उ०॥७॥चिंतातुर नगरीना लोक, अधिक उदासी रहे ससोक,
उ०राति पडी तव थयो उजमाल, चाल्यो माय मिलण श्रीपाल, उ०॥८॥समरे निसि-
पति जेम चकोर, मेहागम जिम चाहे मोर, उ०। मधुकर आवे मालति दाइ, मयणासुंदरी
तिम अधिक सुहाइ, उ०॥९॥सहु अंतेउर तेडीसाथ, निर्भय थई पहूंतो घर नरनाथ, उ०॥
माइ ! उघाडो मंदिर बार, तुम्ह सेवक जिम करे जुहार, उ०॥१०॥ उलसी मयणासुंदरीनी
देह, बाइ! तुम्ह सुत सादज एह, उ० । झटकि उघाड्यां घरना बार, मिलीया माय सुत
विरह निवार, उ० ॥११॥ लागी वहू सहू सासू पाय, मयणासुंसगली मिली आय, उ० ।
॥१०५॥

श्रीपाल.
रास.
॥१०६॥
-
.
चुम्मालीसमी ढाले थयो सुख्ख,कहे जिनहरषटल्यांसह दुख्ख, उ०॥१२॥सर्वगाथा ७६५
दूहा-राति रही निय मंदिरे, जाया जणणी लेय। आयो दिन अणऊगते, निय दल माहि
वलेय॥१॥प्रात थयो ऊगो दिवस, भाट भणे कल्याण। सेनानी तेडाविने,भासे इणपरि वाण
॥२॥दूत मोकली वेगसुं, राय करावो जाण।कंध कुहाडे आय मिले, जो राखे निज प्राण॥३॥
तो लसकर पाछो वले, रहे ताहरी माम।आण नमाने माहरी, तो कर मुझसुंसंग्राम॥४॥
सेनानी चर मोकल्यो, आव्यो जिहां भूपाल। अम्ह स्वामी बलीयो हठी, परतिख वयरी काल
॥५॥ध कुहाडो करि मिले, तोपाछो वले कटक्का नहीं तो गढ ढंढोलस्ये,लेस्ये नगर झटक्क६
ढाल४५ मी. देशी “बेबे मुनिवर विहरण पांगुर्या रे” एहनी-दूत वयण सुणि उज्जेणी
धणी रे,मनमां कीधो एह विचार रे।सबलांसुं बल मांडीने वृथा रे, कोण करावे लोक संहार रे,
दू०॥१॥ कंध कुहाडो करि अवनीपती रे, सनमुख आवीने ततकाल रे। चतुर समयनो
॥१०६॥

-
रास.
श्रीपाल.
१०७॥
जाण प्रवीण ते रे, भेट्यो महाराजा श्रीपाल रे, दू० ॥२॥ चंपापति तव आवीयो सामुहो रे,
मुसरान दीधो सनमान रे। कंध कुहाडो दूर नखावीयो रे, बे बेठा पासे राजान रे, दू०॥३॥
संतोप्यो सनमान्यो बहु परे रे, मालवपति चिंते मनमांइ रे।पार न दीसे एहनी रिद्धिनो
रे, एहसुं सरभर कहो किम थाइ रे, दू०॥४॥ तात! तुम्हे वर मुझ दीधो हुतो रे, ते पर-
तिख जोइज्यो ए आज रे। कंध कुहाडो जेणे नखावीयो रे, ओलखिज्यो उंबर महाराज रे,
दू०॥५॥मालवपति मनमां विस्मय थयो रे, वपु बपुजोइज्यो अचरिज एह रे।पुन्य सरिखो
जगमें को नहीं रे, एहने फलीयो पुन्य अछेह रे, दू०॥६॥सीपो मयणा निरखी हरखीया रे,
मिलवा आव्या लोक अपार रे।सोहगसुंदरीने रूपसुंदरी रे, मिलिवा आव्यो सहु परिवार
रे, दु०॥७॥श्री श्रीपाल नरेसर तिणि समे रे, दीधो नाटकनो आदेस रे। नाटक वृंद
बुलावो माहरो रे,जोवे सहु नर नारि नरेस रे, दू०॥८॥नाटक आव्यो तिहां मिलि नाचवा रे,
॥१०॥

श्रीपाल.
रास.
॥१०॥
पहिरी सुंदर चरणा चीर रे।कसमसता कंचू हीये कस्या रे, सोहे भूषण सयल सरीर रे, दू०
॥९॥एक नारी लाजे साजे नहीं रे, ते विण न पडे नाटक रंग रे।मांहो मांहे अबला हाकिने
रे, ऊठाडी तेहने मन भंगरे, दू० ॥१०॥नाटकिणी पेठी ते नाचिवा रे, जोवा मिलीया राणो
राण रे। दूहो एक कह्यो तिण अवसरे रे, मनमोहन मुखे मधुरी वाण रे, दू०॥११॥हो-
"किहांमालव किहांशंखपुर, किहांबब्बर किहांनट्ट।सुरसुंदरीनचावीये, दैवेदल्या मरट्ट"
जणणी बाप श्रवणे दूहो सुणी रे, कुमरी नाचती नयणे दीठ रे।नाटकणी थइ ए सुरसुंदरी रे,
स्युं कीधो ए दैवे धीठ रे, दू० ॥१२॥ सहू को देखी मन विस्मय थया रे, है है !!! जोवो
एहना कर्म रे।ढाल थई ए पेंतालीसमी रे, कहे 'जिनहरष' खरो जिन धर्म रे, दू० ॥१३॥
दूहा-सभा मांहि जई कुमरीने, राणी कंठ विलग्गावात असंभव देखिने, दुख भरि रोवा
लग्ग १ राय सुताने पूछीयो, ए स्यो तुझ सरूपाजोई परणाव्यो हुतो, तुझ मनमान्यो भूप २
,
1
॥१०॥

रास. श्रीपाल, 11१०६॥ २ चलतूं मुरसुंदरी कहे, पिता! मुणो मुझ वात । परणी चाली कंतसुं, संखपुर नगर दिखात ३ उतरीया तिहांजई करी,रह्या वगडे बहुदीह।साथ सहू घरमोकल्यो,वेठारह्या अबीहट मारो मारो करती तिहां, आवी धाड अपार ।नासिगयो मुझ नाहलो, मुझ मेल्ही निरधार ५ तिहां झाली मुझ कोलीए, वेची जई नेपाल।मोल देई मालण ग्रही, तिणे वेची ततकाल ६ इम वैचाती अनुक्रम, एक विणजारे लीध । बब्बर देसे जाइने, गणिकाने घरे दीध ७ गणिका नाटक सीखव्यो, हूं थई निपुण प्रवीण । नाटकणी मांहि सिरे, कला ग्रही अकुलीण ८ ढाल ४६ मी. देशी “मोरा साहिव हो" एहनी-हिवे बब्बर हो. नायक महाकाल कि, नाटकनो रसीयो सही। वेश्याने हो. घरे नाटक साथ कि, तेडी तिणे सहू संग्रही। हि०॥१॥ दिन दिन प्रति हो, नाटक नवरंग कि, राय करावे नवनवा।परणावी हो. कन्या निज भूप कि, मयणसेना सुख आलवा। हि० ॥२॥धण कंचन हो. भूषण बहु दीध कि, मयणा पति ॥१०९॥ , श्रीपाल. ॥११०॥ श्रीपालने। दीधा वली हो. नव नाटक वृंद कि, साथे मुझ निहालिने।हि ॥३॥में कीधा हो. नाटक बहुवार कि, मयणा पति आगे खडी। इहां देखी हो. माय बाप कुटंब कि, लज्जा दुख सायर पडी। हि०॥४॥परणावी हो. आडंबर भूर कि, मान घणो मुझ बापनो।सुख सघलां हो. फीटी थयां दुख्ख कि, फल पाम्यो में पापनो। हि०॥५॥मुझ बहिनी हो. मयणा धन धन्न कि, ए सरिखी जग को नही। दुख मिटीया हो. सुख पाम्या एह कि, सील फल्यो एहने सही । हि०॥६॥ कुल खंपणि हो. हूं थई कुलमांहि कि, सह पापिणिमांहि पापिणी। में सेव्यो हो. बहु भांति कुसील कि, लही कमाई आपणी। हि०॥७॥सी दाखू हो. मुझ कर्मनी वात कि, तुम्ह आगलि हिवे हूं कहु। पातकना हो. पुन्यनामाइ बाप! कि, परतिख फल देखो सहु। हि०॥८॥श्रीपाले हो. अरिदमण कुमार कि, तेडाव्यो आदर करी। धण कंचण हो. आपी भरपूर कि, आपी वली सुरसुंदरी । हि०॥९॥सुरसुंदरी हो. अरि- ॥११०॥ ,

रास.
श्रीपाल.
दमण कुमार कि, समकित पाम्या निरमलो। पूरवली हो. परे थाप्यो राय कि, मतिसागर
मति ऊजलो। हि०॥१०॥जे हुंता हो. कोढी सय सात कि, रोग गमी ठाकुर कीया।मोटानो
हा. जोवो उपगार कि, निज सरिखा करि थापीया। हि० ॥११॥ नव राणी हो. पटराणी
कीध कि, शृंगारसुंदरीनी सखी । पांचे वली हो. चवदे ए नारि कि, विलसे अपछर
सारिखी। हि०॥१२॥ नीसाणे हो, हिवे चलीयो राय कि, चंपा ऊपरि चालीयो। जिनहरषे'
हो. एतलो अधिकार कि, ढाल छेतालीसमी कीयो । हि०॥ १३॥ सर्व गाथा ८०५॥
दहा-कटक सुभटनाथट गरट,मिलीया एका एक।सुसरा साला मावला,रणवावला अनेक
रण रसीया कसीया जरद, पहिर्या टोप किरीट।बगतर पहिर्या लोहमय, जाणे काला कीट॥२
पाखरीयाहय वर प्रघल,मद झरता गजराज।गयणंगण छायो गिरद, गोला नाल अवाज ३
इम चलतो चंपापुरी, आव्यो नृपश्रीपाल। भडयुद्धे नासंतां ग्रह्यो, अजितसेन ततकाल ॥४॥
,
॥११॥

. श्रीपाल. , ॥११२॥ , राज लीयो निज भुजबले, बेठो पिता तखत्त। पामी अनुपम संपदा, मोटो जास वखत्त ॥५॥ लज्जाणो राजा घj, मन धरतो विखवाद।नासंतांमाहरोथयो, लोकां विचे अपवाद ॥६॥ अजितसेन मन चिंतवे, हूं हुओ द्रोही अपार।राजलीयो भत्रीजनो, चितवीयो अपकार॥७॥ गोत्र द्रोहथी जस नहीं, नृपद्रोह नीति विणास । बाल द्रोहथी गति नहीं, त्रिण्हे कर्यां अभ्यास॥८॥हिवेदीक्षाजो आदरूं,पालुं संयम सुद्ध।तो छद्रंए पापथी,बेटे करम विरुद्ध॥९॥ इम सुभ भाव विचारतां, चढतांमन परिणाम।ज्ञानावरणी कर्मनो, क्षयोपसम थयो ताम१० ढाल४७मी.देशी हींडोलणानी-सुभ भावना मने भावतां.जातीसमरण उतपन्न,दैव वसे लीयोसंजम. विशुद्ध जाणी रतन्न।सुमति सूधी गुपति पाले. दोष टाले दुष्ट,क्षमा सागर नमत नागर. चतुर चारित्र करे पुष्ट॥१॥धन धन्नमाई!.जे तजे इण परि क्रोध॥ए आंकणी॥महा- ज्ञानी महाध्यानी. अभयदानी जेह, भविकने उपगार करता. चरण करण गुण गेह । विच- ॥११२॥ 25

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१ श्री . PANEEYESEXSATTA र अजितसेन राजासे विजय प्राप्त करके अपने पिताकी गजधानी चंपा नगरीमें श्रीपालजी अपने सैनिको सहित प्रवेश कर रहे है। -- . -- ग जा का ग ग १ SARAL (पत्रांक ११२) -

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1 SVAA VVVVN M 1 अवधिज्ञानी अजितसेन राजऋषि श्रीपालजी व मयणा- सुंदरी को धर्मोपदेश देते हुए पर्वभवका स्वरूप सुना रहे है । ( पत्रांक ११३) USA

रास.
श्रीपाल,
,
॥११॥
रता भूलोक ऊपरि. अजितसेन मुणिंद, आवीया चंपा नयरि अनुक्रमे. लोकने थयो आणंद,
ध०॥२॥ श्रीपाल सांभली सुगुरु आगम. वांदवा मनरंग, आवीयो आडंबरे करि. भाव
भगति अभंग। प्रदक्षिणा त्रिण्हे देइ वंदी. बेठो आगलि राय, देसना इक चित्त निसुणे.
भापे मुनि निरमाय, ध०॥३॥दोहिलो मानव भव चतुर गति. मांहि भमतां एह, देस आरज
सुकुल उतपत्तिः सुगुरु संग लहेह । तत्त्वरुचि पिण दोहिली तिम, श्रवण आगम वाणि,
धर्म उद्यम छोडि आलस. मानव करे सुख हाणि, ध०॥४॥धर्मनो संयोग पामी. कीजीये
जिनधर्म, राज्य लीला सकल संपति. धर्मथी सिवसर्म । देसना मुनिराय दीधी. सांभली
चितलाय, राय हिवे श्रीपाल पूछे. कहो ज्ञानी मुनिराय!, ध०॥५॥ किणे करमे बालरोगी?.
हुवो किम नीरोग ?, रिद्धि पाी एतली किम?. डूंबनो संयोग । केम सायर पड्यो कुसले.
नीकल्यो कहाँ केम ?, नारि परण्यो एह सुंदरि. ज्ञानी पूछयो मुनि एम, ध०॥६॥ मुनि
॥११३॥

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रास.
श्रीपाल.
॥११६॥
रता भृलोक ऊपरि. अजितसेन मुणिंद, आवीया चंपा नयरि अनुक्रमे. लोकने थयो आणंद,
ध० ॥२॥ श्रीपाल सांभली सुगुरु आगम. वांदवा मनरंग, आवीयो आडंबरे करि. भाव
भगति अभंग । प्रदक्षिणा त्रिण्हे देइ वंदी. बेठो आगलि राय, देसना इक चित्त निसुणे.
भाषे मुनि निरमाय, ध०॥३॥दोहिलो मानव भव चतुर गति. मांहि भमतां एह, देस आरज
मुकुल उतपत्तिः सुगुरु संग लहेह । तत्त्वरुचि पिण दोहिली तिम, श्रवण आगम वाणि,
धर्म उद्यम छोडि आलस. मानव करे सुख हाणि, ध०॥४॥धर्मनो संयोग पामी. कीजीये
जिनधर्म, राज्य लीला सकल संपति. धर्मथी सिवसर्म । देसना मुनिराय दीधी. सांभली
चितलाय, राय हिवे श्रीपाल पूछे. कहो ज्ञानी मुनिराय!,ध०॥५॥ किणे करमे बालरोगी ?.
हुवो किम नीरोग?, रिद्धि पामी एतली किम?. डूंबनो संयोग । केम सायर पड्यो कुसले.
नीकल्यो कहाँ केम?, नारि परण्यो एह सुंदरि. ज्ञानी पूछयो मुनि एम, ध०॥६॥ मुनि
॥११३॥

श्रीपाल.
॥११४॥
कहे सांभल तूं नरेसर!. चतुर गति संसार, जीव कर्मे लहे सुख दुख. जाणिजे निरधार ।
करे जेहवा कर्म प्राणी. तेहवा फलअंत, तिणे तूं हिवे ताहरा नृप!. सांभल कर्म वृतंत,
ध० ॥७॥ इणे भरते हिरण्यपुर वर. सिरीकंत नरेस, श्रीमती राणी जग वखाणी. दया
पाले विसेस । राय आखेटक निरंतर. भमे हणिवा जीव, नारि कहे प्रिय! जीव हणतां.
पामीये दुख्ख अतीव,ध०॥८॥ बीहता नासे त्रिणा मुखे ल्ये. क्षत्रि न हणे तास, वारीयो
पिण कह्यो न करे.व्यसन लागो जास। उलंठ लेई सातसे. इक दिन आहेडे जाय, गहन
वनमें निजरे पडीयो. खीणकाया मुनिराय, ध०॥९॥हाथ ओघो देखी राजा. कहे चामर धार,
कोई कोढी एह दीसे. सहु कह्यो तिणवार। यष्टि मुष्टि करिय ताड्यो. सातसे उल्लंठ, साधुने
इम कष्ट दीधो. चीकणी बांधी गंठ, ध०॥१०॥ मुनि भणी उपसर्ग करीने. मृग हणी सुख
पाय, सात सयां वंठ उल्लंठ साथे. आवीयो घरे राय । वली इक दिन गयो मृगया. एकलो
M
॥११४॥

रास.
श्रीपाल,
नरनाह, नदीतटे इक साधु दीठो.नाखीयो सलिल अगाह,ध०॥११॥नदीमांहे देखि दुखियो.
थयो करुणावंत, नदीजलथी काढीयो मुनि. सुमतिवंत महंत । कह्यो निजकृत नारि आगे.
रागिनी कहे एम, अवर जीव न पीडीयेतो. पीडीये मुनिवर केम ?, ध०॥१२॥ साधु हीला
हानि थाये. हास्य रोगी जाणि, निंदा थकी वध बंधना वलि. ताडणादि पिछाणि । इम सुणी
काईक हीये आयो. धर्मनो परिणाम, ढाल सेंतालीसमीएथई. जिनहरष' तमाम,ध०॥१३॥
दूहा-दिवस कितलेके गये, गोखे वेठो भूप।मल भूषित कृशकाय मुनि, दीठो एहवो रूप
॥१॥ सीख वयण गयो वीसरी, सेवकने कहे राय।नगर विटाल्यो डूंबडे, काढो परोधकाय २
तिणे पुरुपे तिमहीज कर्यो,श्रीमति राणी दीठ।कोप करीराजाप्रते, निभ्रंछे धिग धीठ ॥३॥
साधु भणी किम निंदीये, जे गिरुआ गुणवंत।तारे आपण आतमा, परने पिण तारंत ॥४॥
ढाल४८ मी. देशी "धन धन श्रीरिषिराज अनाथी" एहनी-राणीने ओलंभे लाज्यो, ए में
॥११५॥

श्रीपाल.
रास.
॥११८॥
।
सहुयेनरसुरभवकरी, भोगविअनुपमसुख्खानवमेभववलतांसही,लहिस्योअविचलसुख्ख३
ढाल४९मी.देशी"इम धन्नोधणने परचावे"एहनी-इण परे सुगुरुतणी सुणि वाणी,हरख्या
राजा राणी रे। आराधे ऊलट मन आणी, सिद्धचक्र गुण खाणी रे, इ०॥१॥श्रीनवकार गुणे
सुभ भावे, जिनवर पूजा रचावे रे। जैन धरमसुं निजचित्त लावे, जीर्णोद्धार करावे रे, इ०
॥२॥सामायिक पोषध व्रत पाले, कुमति कदाग्रह टाले रे। श्रीजिनवर मारग उजवाले,
पापथकी मन वाले रे, इ० ॥३॥ इण परि सिद्धचक्र आराधी, चढती सुरगति बांधी रे।
इण भव पिण एहवी रिद्धि लाधी, कीरति त्रिभुवन वाधीरे,इ०॥४॥राजाराणीमाइ संजुत्ता,
समकित गुण सुभ चित्ता रे।आयु पूरण करि सुरगति पत्ता, पाम्या भोग समत्ता रे, इ०॥५॥
तिहांथकी चवि नर भव पामी, होस्ये सुर सुख कामी रे। च्यार वार इमसुर नर नामी, नवमे
सहु सिद्धि गामी रे, इ०॥६॥धन धन जगमें श्रीपाल नरिंदा, मयणासुंदरी सुख कंदा रे।पाली
,
॥११॥

रास. श्रीपाल. ॥११॥ जिनवर आण अमंदा, काप्या भव भवना फंदा रे, इ०॥७॥इम श्रीपाल चरित्र मनरागे, श्रेणिक नरवर आगेरे।कह्योगोयम गणहर वडभागे,सांभलतांमति जागे रे,इ०॥८॥तथा- श्रीवीर वांदी श्रेणिक राय, नवपद महिमा सुणी हरखाय रे।आतम नवपद जाणो राय, तस ध्याने ते स्वरूपी थाय रे ॥१॥ एथी देवपाल पुंडरिक गणधर, पाम्या भवनो पार रे। परदेशी राजा सुर अवतार, एम तार्या बहु नर नार रे॥२॥उक्तं च-"श्रीसिद्धचक्र आराधो, मनवांछित कारज साधो रे, भवियां! श्री०॥१॥ए आंकणी। पद पहेले अरिहंत ध्यावो, जम अरिहंत पदवी पावो रे, भ० श्री०॥२॥पद दूजे सिद्ध मनावो, जेम सिद्ध सरूपी होइ जावो रे, भ० श्री०॥३॥ सूरि बीजे गुणवंता,जसना एक जग जयवंता रे, भ० श्री० ॥४॥ चोथे पदे उवज्झाया, जेणे मारग आण बताया रे, भ० श्री०॥५॥साधु सकल गुण धारी, पद पंचमे जग हितकारी रे, भ० श्री०॥६॥ दरिसण पद छठे वंदो, जेम कीरति होय ॥११९॥ ,

श्रीपाल.
.
॥१२०॥
चिरनंदो रे, भ० श्री॥७॥ज्ञान पद सातमे दाख्यो, चारित्र पद आठमें भाख्यो रे, भ.
श्री०॥८॥तप पद नवमे साख्यो, जेम वीरजीने वचने राख्यो रे, भ० श्री०॥९॥श्रीपालने
मयणालीधो, नवमे भवे कारज सीधो रे, भ० श्री०॥१०॥नवपद महिमाजाणी, 'जिनचंद्र'
हीये मन आणी रे, भ० श्री०॥११॥” इम जाणी नवपदसुंराता, सिद्धचक्र जेध्याता रे।नृप
श्रीपाल तणी परे माता, रहे सदा सुखसाता रे, इ०॥९॥ संवत सतरेसे चालीसे, चैत्रादिक
सुजगीसे रे। सातम सोमवार सुभ दिवसे, पाटण विसवा वीसे रे, इ०॥१०॥श्रीखरतर-
गच्छ महिमा धारी, जिनचंदसूरि जय कारी रे । शांतिहरष वाचक सुखकारी, तास सीस
सुविचारी रे, इ०॥ ११॥ कहे 'जिनहरष' भविक नर सुणिज्यो, नवपद महिमा थुणि-
ज्यो रे। उगुणपचासे ढाले गुणिज्यो, निज पातक वनलुणिज्यो रे, इ०१२सर्व गाथा ८६१
॥ इति श्रीसिद्धचक्र महिमोपरि श्री श्रीपाल महाराजाका रास समाप्त मंगलं भवतु ॥
,
,
॥१२०॥

नवपद विधि. श्रीपाट. दिन . प्राम ---- ॥१२॥ लाल ८ २०-८ AM ४ नवपद ओली करण विधि यंत्र- नवपद ओलिकी विधि- नवपद ओलीकी तपस्या शुभ मुहूर्तमें विधिपूर्वक गुरुमुखसे नवकर का०४ वर्ण ! आहार पटॉक नाम गुणणा वाली उचरे, वाद आसोज तथा चैत्रकी सुदि ७ से, जो कोइ तिथि तूटी १, भी नमो अगिताणं २०-१२ १२ श्वेत चॉवल होय तो ६ से ओर जो वधी होय तो ८ से पूनमतक ९ आंविल २.सी नमो सिद्धाणं गहुं | पूरे करने, वर्षमें दो वखत करते साढेच्यार वर्षमें ९ ओली पूरी मी नमो आयरियाणं २०-३६, ३६ पीलो चणा | करनी; ओलीके दिनोंमें हमेशां नीचे लिखे मुजव कार्य करने- नमो उबझायाणं २०-२५ २५ नीलो मूंग १ सांझ सवेर दोनों वखत राइदेवसी प्रतिक्रमण, तथा पडिलेहण, एवं राइ आलोयणा पूर्वक द्वादशावर्तविधिसे गुरु- नगो लोए सबसाहूण २०-२७, २७ कालो उडद वंदन करके गुरुमुखसे पच्चक्खाण करे । श्वेत | चॉक्ल नमो दंमणस्स २ नव मंदिरोंमें या नव प्रतिमाओंके आगे रोज नवपदके नमो नागरस २०-५ नव चैत्यवंदन करे। नमो चारित्तरस २०-१० ३ त्रिकाल देवपूजा तथा दुपहरको आठ थुइसे देववंदन करे। श्री नमो तवरस १ यद्यपि रत्नसागरमे दोप्रतिक्रमणोंके शिवाय तीन वखतयुइसे देववदन करना ... ६१गक समरसपा २, रामासमना की ३, प्रदक्षिणाकी तथा ४ साथियोंकी संख्या। लिसाहे, परतु ऐसे करनेसे पाच वसत देववंदन हो जाते हैं, शास्त्रोंमें पाच देववंदन 13 से रह हजार पुनपा होता नहीं लिखे, राइ देवसी प्रतिक्रमणके दो और एक दुपहरका ऐसे तिन ही लिखे है। . ६७ श्वेत E ५५ ॥१२॥ २०-२ ५० ५

RH
श्रीपाल.
नवपद.
विधि.
रास
॥१२२॥
४ जिस पदके जितने गुणहो उतने साथिये करना, उतने खमासमणे तथा प्रदक्षिणा देना, उतने ही लोगस्सका काउस्सग्ग करना,
एक एक प्रदक्षिणा तथा खमासमणा देके एक एक गुणका नमस्कार कहे ।
५ पदके गुणोंकी संख्यानुसार यंत्रमें लिखे मुजब अथवा हर एक पदका २००० दो हजार गुणणा (माला फेरना) करे ।
६ विधिपूर्वक पञ्चक्खाण पारके एक उन्हा पाणी और एक खानेकी वस्तु, ऐसे दो द्रव्योंसे आंबिल करे, बाद इरियावही-
पडिकमके जयउ सामिय चैत्यवंदन करे ।
पडिलेहण विधि-खमा० इरियावही, खमा० 'इच्छा०संदि०भ०? पडिलेहण संदिसाउं?, इच्छं खमा० 'इच्छा० संदि० भ०!
पंडिलेहण करुं ?, इच्छं' कहके खमा० देके मुहपत्ती पडिलेहे, इसीतरह २ खमा देके 'अंगपडिलेहण संदिसाहुं ?' तथा 'अंगपडिलेहण
करुं?, इच्छं, कहके खमा० देके मुहपत्ती तथा कंदोरा धोतीया पडिलेहे, खमा० 'इच्छकारि भगवन् ! पसाओ करी पडिलेहणा
१ आवश्यक टीका निशीथ चूर्णि प्रत्याख्यानस्वरूपगाथा आदि प्राचीन शास्त्रकारोंने आविलमें एक अन्न और दूसरा पानी इन दो चीजोंके शिवाय तीसरी कोइ
चीज लेना नहीं लिखा, देसो “दोहिं दवेहि अंविलं" निशीथ चूर्णि, तथा "जावइयं उवजुजइ, तावइयं भायणे गहेऊणं । जलनिब्बुडं काउं, भुत्तवं
एस इत्थ विही ॥१॥" अर्थ-जितना (अहार) चाहिये उतना भाजनमें लेकर पानीमें डुवाके ग्वाना, यह आविलमें (आहारका) विधिहै (प्रत्याख्यानखरूपगाथा),
इससे यह बात स्पष्टहै कि-आविलका पच्चक्खाण करके विविध वस्तुए खाना शास्त्र समत नहींहै, नवाग टीकाकार श्रीअभयदेवसूरिजी महाराज अनुत्तरोपपातिक-
दशागकी टीकामें साफ लिसतेहैं कि-"आयंबिलं ति-शुद्धौदनादि" अर्थात्-जिसमें नमक (मीठा) वगेरह कुछभी न पडाहो वैसा शुद्ध ओदन (चावल) आदि
आहार आविलके लायकहै। २ साझको-खमा० 'इच्छा० सदि० भ० ! बहुपडिपुन्ना पोरिसी' कहके। ३ साझको ‘करु' । ४ साझको 'पोसहसाला प्रमा— 2' कहे।
॥१२२॥

नवपद०
विधि.
श्रीपाल.
पटिलहालोजी' कहक थापनाचार्य पडिलेहे, समा० 'इच्छा० संदि० भ० ! उपधिमुहपत्ती पडिलेहुं ?, इच्छं' कहके खमा० देके मुह-
पत्ती पटिलेह, समा० 'इच्छा० संदि० भ०! ओहि पडिलेहण संदिसाहुं ?, इच्छं' खमा० 'इच्छा० संदि० भ० ! ओहि पडिलेहण
कर, ?, इच्छ' कहके बाकी रहे सब कपडे पडिलेहे, काजा निकालके जयणासे परटे, खमा देके इरियावही पडिकमे ।
देववंदन विधि-खमा० देके 'इच्छा० संदि० भ० ! 'चैत्यवंदन करुं?, इच्छं' कहके चैत्यवंदन तथा नमुत्थुणं कहे, खमा०
देके दरियावही, समा० 'इच्छा० संदि० भ०! चैत्यवंदन करूं?, इच्छं' कहके चैत्यवंदन कहे, वाद जं किंचि नमुत्थुणं, अरिहंत-
चेहसाणं आदि कहने हुए देवसी पडिकमणेकी तरह च्यार थुइसे देव वांदे, फिर बैठकर नमुत्थुणं कहके वैसे ही च्यार थुइसे देव वांदे,
बाद चटकर नमुन्धुणं-जाति चेइयाइं०-जावंत केवि साहू-नमोऽर्हत्० कहके स्तवन तथा जय वीयराय कहे, वाद नमुत्थुणं
कटक यमा० देके अविधि आशावना समावे ।
पवस्वाण पारण विधि-खमा० देके इरियावही पडिक्कमे, खमा० 'इच्छा० संदि० भग० ! पञ्चक्खाण पारवा मुहपत्ती
पटिलई?, इच्छं' कहके समा० देके मुहपत्ती पडिलेहे, खमा० देके 'इच्छा० संदि० भ० ! पञ्चक्खाण पारु?, यथा शक्ति' खमा०
'इच्छा० संदि० भ०! पञ्चक्वाण पायु ?, तहत्ति' कहके मुट्ठी बंध करके भूमि उपर स्थापे, वाद भावनागाथा आतीहो तो एक नव-
कार गिणके भावनागाथा बोले उपर १ नवकार गिणे, नहीं तो ३ नवकार गिणे, वाद खमा० देके चैत्यवंदन जय वीयराय तक
फई, फिर २ समा० पूर्वक सज्झायके आदेश मांगके आठ नवकारकी सज्झाय करे ।
१५ न एक साधा ही नमुत्युण फल्नकामी विधि है । २ चल्यवदन तथा सज्झाय करे वाद मुहपत्ती पटिलेहण आदि करनेकाभी विधि है।
॥१२३॥

MS
श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
॥१२४॥
पहले दिन अरिहंत पद आराधन विधि-सवेरे राइ अतिक्रमण, अरिहंत पद आराधन काउस्सग्ग १२ लोगस्सका तथा
गुणणा माला २० या १२, सवेरकी पडिलेहण, गुरुवंदन, पञ्चक्खाण, वासक्षेपपूजा, नव मंदिरादिमें नवपदके नव चैत्यवंदन करे।
अरिहंत पद चैत्यवंदन-जय जय श्रीअरिहंत भानु, भवि कमल विकाशी। लोकालोक अरूपि रूपि, समस्त वस्तु प्रकाशी ।।
समुद्घात शुभ केवले, क्षय कृत मल राशी । शुक्ल चरम शुचि पादसे, भयो वर अविनाशी । २। अंतरंग रिपु गण हणीए, हुए
अप्पा अरिहंत । तसु पद पंकजमें रहत, 'हीरधर्म नित संत । ३।
स्तवन-"पूजो मनरली, हांहो दादा कुशलसूरिद पू०" ए देशी-श्रीतेरम गुण वसिके कंत, कर्मकुं भजे श्रीअरिहंत, मन!
मानले । अष्ट समयमें समय तीन, सर्व आहारथी होवे हीन, मन० ॥१॥ बादर काये मन वच भोग, तनु तनुसे फुन दृढ योग,
मन० । सूक्षम कायते मन वच रोक, निजवियें ताकुं कर फोक, मन० ॥२॥ संज्ञी मात्रके मन व्यापार, बेइंद्रीने वाक्य प्रचार,
मन० । आदि समय रह्यो पनक सुजीव, सूक्षम लह्यो तिण जोग अतीव, मन०॥३॥ एसा योगथी समय एक, हीनासंख गुणो करी
छेक, मन । समयासंखे जोग निरोध, कृत्वा जो लह्यो जोगी सोध, मन० ॥ ४ ॥ वेद समे अनाहारता पाय, 'कुशल' कहे ते
श्रीजिनराय, मन० । तेरमे गुणमें गुण समे देव, आपो सा जगकू नितमेव, मन० ॥५॥
थुइ-सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोकालोक सरूपो जी; केवल ज्ञानकी ज्योति प्रकाशक, अनंत गुणे करी पूरो जी। बीजे
भव थानक आराधी, गोत्र तीर्थंकर नूरो जी; वारे गुणां करी एहवा अरिहंत, आराधो गुण भूरो जी ॥१॥
सिद्ध पद चैत्यवंदन-श्रीशैलेशी पूर्वप्रांत, तनु हीन तिभागी । पुव पओग पसंगसे, ऊरध गति जागी ॥१॥ समय एकमें
॥१२४॥

15
नवपद०
विधि.
श्रीपाट.
॥१२५॥
लोर प्रांत, गये निगुण नीरागी । चेतन भूपे आतमरूप, सुदिशा लही सागी ॥२॥ केवल देसण नाणथी ए, रूपातीत स्वभाव ।
मिद भये तमु 'हीरधर्म', बंदे धरी शुभभाव ॥३॥
स्तवन-धारे महलां पर मेह झवृके वीजली, म्हारा लाल ! झबूके०" ए देशी-अष्ट वरस नग मास, हीना कोडी
पूर्वम; म्हागलाल! हीना० । उत्कृष्टे करे वास, सयोगी धाममें; म्हारा० स० ॥ अजोगीके अंत, तजे भव भव्यता; म्हारा० त०।
शला लई कार, दले गुणश्रेणिता; म्हारा० द० ॥१॥ इखाक्षर पंच काल, रहे ते योगमें; म्हारा० २० । तेरस प्रकृतिनो अंत,
करीने अतमें; म्हारा० का० ॥ गमन करे नग रजसे, अक्रिय होयने म्हारा० अ० । पुब पओग पसंग, स्वभाव अवंधने म्हारा०
स्व० ॥२॥ इषु गुण नव परिमाण, जोजन लक्षे कही; म्हारा० जो० । वर्तुल विशदाभास, नीरालंबन सही; म्हारा० नी०॥ मध्ये
जोजन अए, घनाकृति संतमें; म्हारा० ५० | मक्षी पक्षथी हीन, भणी सिद्धांतमेंम्हारा० भ० ॥३॥ तनुपदभारा नाम, शिलासे
जोजन; म्हारा०शि० । लघु अंगुल बत्तीस, प्रमाण अवगाहना; म्हारा० प्र० ॥ वृद्ध धनु शत पंच, गुणांसे हीनता; म्हारा० गु०।
मिलिया एकमेऽनंत, आवाधा नालही; म्हारा० आ० ॥४॥ अष्ट प्राण धरि रम्य, सिरि ही जो सही; म्हारा०सि० । वीजो पद
श्रीसिद्ध धगे मन गेहम; म्हारा० ध० ।। 'कुशल' भये जग जीव, मिलेगा तेहमें; म्हारा० मि० ॥ ५॥
भुट-अर करम दमन करीने, गमन कियो शिववासी जी; अव्यावाध सादि अनादि, चिदानंद चिदरासी जी । परमातम पद
पूरण विलासी, अघ धन दाघ विनासी जी; अनंत चतुष्टय शिवपद ध्यावो, केवलज्ञानी भासी जी ॥ १ ॥
आचार्य पद चत्यवंदन-जिनपद कुलमुख रस अनिल, मित रस गुण धारी । प्रवल घन मोहकी, जिण तें चमुहारी ॥१॥
॥१२५॥

श्रीपाल.
.
रास
नवपद०
विधि.
॥१२६॥
11
ऋज्वादिक जिनराज गीत, नय तन विस्तारी । भवकूपे पापे पडत, जगजन निस्तारी ॥२॥ पंचाचारी जीवके, आचारज पद
सार । तिनकुं वंदे'हीरधर्म', अठोत्तर सो वार ॥३॥
स्तवन-"नणदल ! बींदली ल्ये” ए देशी-खंती खडगथी जेणे, हण्यो क्रोध सुभट सम देणे हो; गणपति गुणपेखी ।
मान महागिरि वयरे, अतिसोभन मद्दव चयरे हो; गण० ॥१॥ दंभ रूप विपवेली, वर अजव कीले ठेली हो; गण । मूर्छा
वेलथी भरीयो, लोह सागर मुत्ते तरीयो हो; गण०॥२॥ मदन नाग मद हीनो, दम शम मंत्रे कीनो हो; गण1 मोह महा मल्ल
ताड्यो, पुण वैराग मुग्गरे पाड्यो हो; गण० ॥३॥ दोषगयंद वस कीनो, धरी उपशम अंकुश लीनो हो; गण० ॥ अंतरंग रिपु
भेद्या, सुरवर पिण जिण निषेध्या हो; गण० ॥ ४ ॥ रस कृति गुणथी लीनो, सूत्र अर्थे आगम पीनो हो; गण० । आचारज पद
एहवो, धरी जीव! 'कुशलता सेवो हो; गण० ॥५॥
थुइ-पंचाचारकुं पाले उजवाले, दोष रहित गुण धारी जी; गुण छत्तीसे आगम धारी, द्वादश अंग विचारी जी । प्रबल सबल
धन मोह हरणकुं, अनिल समो गुण वाणी जी; क्षमा सहित जे संजम पाले, आचारज गुण ध्यानी जी ॥१॥
उपाध्याय पद चैत्यवंदन-धन धन श्रीउवज्झाय राय, शठता धन भंजन। जिनवर दर्शित द्वादशांग, धर कृत जनरंजन॥१॥
गुण वण भंजन मण गयंद, सुयशूणि किय गंजण । कुणालंध लोय लोयणे, जत्थ य सुयमंजण ॥२॥ महाप्राणमें जिन लह्योए,
आगमसे पद तुर्य । तिनपे अहनिश 'हीरधर्म, वंदे पाठकवर्य ॥३॥
स्तवन-“सांवलिया ! अलगा रहोने” एदेशी-हुयने हुयने हुयने, दूरी हुयने चेतन भॉखे शठने, दूरी हुयने । तूं मुझ
॥१२६॥

नवपद०
विधि.
श्रीपाल.
पाम क्यं भावे ?, दू; तुझने कुण बतलावे ?, दु० ॥ ए आंकणी ॥ तो संगे निज पंचेंद्रीनो, रचना चरम भूलाणो । नाणावरणी
चय उपशमसे, भावेंद्री मंडाणो; दू० ॥१॥ द्रव्ये ते परजाप्ते कीना, जाती नाम व्यपदेश । एवं तो गो तुरंग गजादिक, किण
समें उपदंशदृ० ॥ २॥ इत्यादिक बहु मुझकुं शंका, तेरे संगे लागी । नीलवरणकी समतासेती, में भयो तोसुं रागी; दू०
॥३॥ उप कहिये इणीयो भवियानो, अधियां लाभत आय । आधीनां मन पीडा नामे, मायो येन विलाय; दू० ॥ ४ ॥
आधिक्य मरीय वर आगम, मूत्रसे ते उवज्झाय । तत्सेवाते हणि सठताकुं, चेतन ! 'कुशल'ता थाय; दू० ॥ ५ ॥
थुर-अंग इग्यारे चउदे पूरव, गुण पचवीसना धारी जी; सूत्र अरथ धर पाठक कहिये, जोग समाधि विचारी जी । तपगुण
ग आगम पूरा, नय निक्षेपे तारी जी; मुनि गुण धारी बुध विस्तारी, पाठक पूजो अविकारी जी ॥१॥
साधुपद चैत्यवंदन-दसण नाण चरित्त करी, वर शिवपद गामी । धर्म शुक्ल शुचि चक्रसे, आदिम खय कामी ॥१॥ गुण
पमन अपमचते, भये अंतरजामी । मानस इंदिय दमनभूत, शम दम अभिरामी ॥२॥ चारु तिघन गुणगण भर्योए, पंचम पद
मुनिगज । तत्पद पंकज नमतह, 'हीरधर्म के काज ॥३॥
स्तवन-"मालन मालन मती कहीं" ए देशी-निःकपाया जग जन कहे, धारे चउ गति वसनसे रोप हो; मुणिंदजी! रागहीण
भय तूं करे, साहिवा! शिव रमणीसे हेत हो मुणिंदजी! ॥१॥ सर्व प्रमाद तजी रहे, साहिवा! छठे पूरव कोड हो; मु० । शत
मा गम आगम कर, साहिवा! लघुकाले गुण आदि हो; मु० ॥ २ ॥ स्त्यानी निद्रा उदे, पामे कर्म निकंद हो; मु० । प्रचला
निद्रामें रही, साहिया ! पारम गुणनो वास हो; मु० ॥३॥ स्थिति रस घात प्रमुख करे, साहिवा ! जो गुण संख्यातीत हो;
॥१२७॥

श्रीपाल.
नवपद
विधि
॥१२८॥
-
मु० । तो पिण तिण जगमें लही, साहिबा ! त्रिक धन गुणनी ख्यात हो; मु०॥४॥ रयण त्रयसे शिवपथें, साहिवा ! साधन
परवर जीव हो; मु० । साधु हवइ तसु धर्ममें, साहिबा ! 'कुशल' भवतु जगतीव हो; मु० ॥५॥
थुइ-सुमति गुपति कर संजम पाले, दोष बयांलिस टाले जी पटकाया गोकुल रखवाले, नवविध ब्रह्मव्रत पाले जी। पंच महा-
व्रत सुधा पाले, धर्म सुकल उजवाले जी; क्षपक श्रेणि करी कर्म खपावे, दमपद गुण उपजावे जी ॥१॥
दर्शनपद चैत्यवंदन-हुय पुग्गल परिअट्ट, अड्वपरिमित संसार । गंठि भेद तव करी लहे, सब गुण आधार ॥१॥क्षायिक
वेदक शशि असंख, उवसम पणवार । विना जेण चारित्र नाण, नहीं हुवे शिवदातार ॥२॥ श्रीदेव गुरु धर्मनीए, रुचि लच्छन
अभिराम । दर्शनकुं गणि 'हीरधर्म', अहनिश करत प्रणाम ॥३॥
स्तवन-"रामचंद्रके बाग, आंबो मोहि रह्यो री" एदेशी-देव श्रीजिनराज, गुरु ते साधु भण्योरी। धर्म जिनेश्वर प्रोक्त,
लक्षण वोधितणो री ॥१॥ बोधिलाभके काज, सप्तम नरक भलो री । तेण विना सुरलोक, ताते आधिक बुरोरी ॥२॥ मिथ्या
तापे तप्त, वोधही छॉह लहे री । उपशम क्षायिक वेदक, ईश्वर तीन कह्यो री ॥३॥ भवसागर है अपार, फुन अस्ताघ कयो री ।
जसु लाभे ते होय, गोसपद मात्र खरो री॥४॥ यदभावे अप्रमाण, नाण चारित्त भलोरी। वोध धर्ममें जीव, लाभे 'कुशल' कलो री॥५॥
थुइ-जिण पण्णत्त तत्त सूधा सरधे, समकित गुण उजवाले जी; भेद छेद करी आतम निरखी, पशु टाली सुर पा(था)वे जी।
प्रत्याख्याने सम तुल्य भॉख्यो, गणधर अरिहंत सूरा जी; ए दर्शन पद नितनित वंदो, भवसागरको तीरा जी ॥१॥
ज्ञान पद चैत्यवंदन-क्षिणादिक रस राम वह्नि, मित आदिम नाण । भाव मिलापसे जिन जनित, सुय वीस प्रमाण ॥१॥
॥१२८॥

नवपद० विधि. श्रीपाट. ॥१२९॥ भन-गुण पञ्जर ओहि दोय, मण लोचन नाण । लोकालोक सरूप जाण, इक केवल भाण ॥२॥ नाणावरणी नासथीए, चेतन नाण प्रकाश । मप्तम पदमें 'हीरधर्म', नित चाहत अवकाश ॥३॥ स्तवन-"म्हारे अति उछरंगे" ए देशी-जिनवर भापित आगम भणिया, तत्व यथास्थिति गमिया जी म्हारे जगजन तारू । न उत्तम वर नाण कहिये, भविजन अहनिशि चाहे जी; म्हारे जगजन तारू ॥१॥ भक्ष्याभक्ष्य कुपंथ सुपंथा, पेयापेय अग्रंथा जी; म्हारे । देव कुदव अहित हित धारी, जाणे जेण विचारी जी; म्हारे० ॥२॥ श्रुत मति दोय छे इंद्री सारू, तेणे परोक्ष विचार जी; म्हारे० । ओहि मण केवल है वास, जीव परतक्ष सुधारू जी, म्हारे० ॥३॥ अञ्जवि जस्स बले जग जाणे, लोका- दिय अनुमाने जी; म्हारे० । त्रिभुवन पूजे जासु पसाये, धारी शुभ अध्यवसाये जी; म्हारे० ॥४॥ नाणावरणी उपशम क्षयथी, चेतन नाण विलसे जी; म्हारे० । सप्तम पदमें भविजन हरखे, निशदिन 'कुशल'ता निरखे जी; म्हारे० ॥५॥ धु-मति श्रुत इंद्रि जनित कहिये, लहिये गुण गंभीरो जी; आतमधारी गणधर विचारी, द्वादश अंग विस्तारो जी । अवधि मनपर्यय केरल, प्रत्यक्ष रूप अवधारो जी; ए पांच ज्ञानकुं वंदो पूजो, भविजनने सुखकारो जी ॥१॥ चारित्र पद चत्यवंदन-जस्स पसाये साहु पाय, जुग जुग समितेंद । नमन करे शुभ भाव लाय, फुण नरपति वृंद ॥१॥ जंप धुरि अरिहंतराय, करी कर्म निकंद । समिति पंच तिगुप्ति युत, देवे सुक्ख अमंद ॥२॥ इपु कृति मान कपायथीए, रहित लेश शुचिवंत । जीव चरित्तकुं 'हीरधर्म', नमन करत नितसंत ॥३॥ स्तवन-निर्विकल्प अज निर्गुणी, चिदाभास निस्संगसुज्ञानी ! सांभलो । मूर्ती हीन चेतन करे, रूपी पुदगल रंग; सुज्ञानी ॥१२९॥ -- श्रीपाल. नवपद० विधि रास. ॥१३०॥ सांभलो ॥१॥ स्पर्द्धक कारण वर्गणा, कार्य कारण भावः सु० । कृत्वा जोग सुधामता, लब्धासंख स्वभावः सु० ॥२॥ पर्याप्ता लघु जोगमें, वृद्धि लहे जुगमान; सु० । मध्ये वसु समये लहे, अंते द्वौ ते जाण; सु० ॥३॥ सहकारी मानस मुखा, कारण रम्य वलेण; सु० । प्राप्ता घस्र प्रकारता, सप्त प्राभृतका तेण; सु० ॥ ४॥ तद्रोधन रूपी भलो, चेतन संयम धाम; सु० । कर धन मिल पद धर्ममें, 'कुशल' भवतु अभिराम; सु० ॥५॥ थुइ-करम अपचय दूर खपावे, आतम ध्यान लगावे जी; बारे भावना सूधी भावे, सागर पार उतारे जी । षटखंड राजकुं दूर तजीने, चक्री संजम धारे जी; एहवो चारित्र पद नित वंदो, आतम गुण हितकारे जी ॥१॥ तप पदचैत्यवंदन-श्रीऋषभादिक तीर्थनाथ, तद्भव शिव जाण । विहि अंतैरपि बाह्य मध्य, द्वादश परिमाण ॥१॥ वसु कर मित आमोसही, आदिक लब्धि निदान । भेदे समता युत खिणे, दृग्धन कर्म विमान ॥२॥ नवमो श्रीतप पद भलोए, इच्छा- रोध सरूप । वंदनसे नित 'हीरधर्म!', दूर भवतु भवकूप ॥३॥ स्तवन-चारस भेद भण्या जिनराजे, बाह्य मध्य तणा जग काजे रे शिवपद श्रेणि । तिण भव सिद्धि तणा वर ज्ञाता, जिनवर पिण तपना कर्ता रे; शिवपद श्रेणि ॥१॥ समता सहित जिन ते भारी, भली कर्म चमु पिण हारी रे; शिव० । जीव कनकसे कर्म कचोरा, दहे तप पावकका जोरा रे; शिव० ॥ २॥ तप तरुवरना कुसुम है ऋद्धि, देवनरना फल ते सिद्धी रे, शिव० ! पाप सकल है तमनी रासी, तप भानुसे जाये नासी रे शिव० ॥३॥ जस्स पसाये लहिये वारू, लब्धि सगली जगहित कारू रे; ॥१३॥ ---

नवपद०
विधि.
धीपाट.
रास
शिषः । अतिदुपर फुण साध्यता हीना, काम ताते वारू कीना रे; शिव० ॥ ४॥ इच्छा रोधन रूपी कहिये, तप पदही चेतन
बहिये रे शिव० । पाठक 'हीरधर्म' कृपासे, नवपद 'कुशला कुं भासे रे; शिव० ॥५॥
धुइ-दला रोधन तपते भॉख्यो, आगम तेहनो साखी जी; द्रव्य भावसे द्वादश दाखी, जोग समाधि राखी जी । चेतन
निजगुण परिणति पैसे, तेहिज तप गुण दाखी जी; लब्धि सकलनो कारण देखी, 'ईश्वर'सेमुख भॉखी जी ॥१॥
बादमे अष्टद्रव्यले जिनपूजा स्नानादि करके १२ साथिये करे, १२ प्रदक्षिणा तथा खमासमणे देता हुआ आगे लिखे नमस्कार बोले.
अरिहंत पदके १२ गुणोंके खमासमण- नमस्कार-
१ अशोकवृक्ष प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः । २ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
३ दिव्यभनि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः । ४ चामर युग प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
५ वर्ण सिंहासन प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः। ६ भामंडल प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
इंदनि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः । ८ छत्र त्रय प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
९ज्ञानातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः । १० पूजातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः।
११ वचनानिगय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः । १२ अपायापगमातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ।
मध्याहमें ८ युइसे देववंदन, पञ्चक्खाण पारना, आंविल करना, फिर चैत्यवंदन, तीजे पहोरकी पडिलेहण, संध्याको देवदर्शन
आरनि, देवसी प्रतिक्रमण करे बाद राइसंथारा पोरिसी भणाके सोवे ।
॥१३॥

. श्रीपाल. नवपद० विधि. रास ॥१३२॥ . पहले दिनकी तरहही आगेके आठों दिन प्रतिक्रमण पडिलेहण तथा नव मंदिरादिमें नवपदके नव चैत्यवंदनादि विधि करना, फक्त जिस दिन जो पद होवे उस पदके जितने खमासमणे हो उतने लोग्गस्सका काउस्सग्ग करना. उतनी प्रदक्षिणा तथा खमासमणे देना, इतनाही फरक है, इसलिये आगेके दिनोंकी विस्तृत विधि न लिखके केवल खमासमणे दीठ कहनेके नमस्कार ही लिखते हैं- सिद्ध पदके ८ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ अनंत ज्ञान संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। २ अनंत दर्शन संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ३ अव्यावाध गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ४ अनंत चारित्र गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः । ५ अक्षय स्थिति गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ६ अरूपि निरंजन गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः । ७ अगरुलघु गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः। ८ अनंत वीर्य गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः । आचार्यके ३६ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ प्रतिरूप गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । २ सूर्यवत्तेजस्वि गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। ३ युगप्रधानागम गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । ४ मधुरवाक्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। ५ गांभीर्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । ६ धैर्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । ७ उपदेश गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। ८ अपरिश्रावी गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। ९ सौम्य प्रकृति गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः। १० शील गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः । ॥१३२॥ .

श्रीपाल.
नवपद
विधि.
११ अविग्रह गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
१३ अचपल गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
१५ क्षमा गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
१७ ऋगु गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
१९ द्वादयविध तपो गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
२१ सत्यवत गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
२३ अकिंचन गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
२५ अनित्य भावना भायकाय श्रीआचार्याय नमः ।
२७ संमारस्वरूप भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः ।
२९ अन्यत्व भागना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
३१ आश्र भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
३३ निर्जरा भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः ।
३५ योधिदुर्लभ भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः ।
१२ अविकथक गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
१४ प्रसन्न वदन गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
१६ मृदु गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
१८ सर्वसंग मुक्ति गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
२० सप्तदशविध संयम गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
२२ शौच गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः ।
२४ ब्रह्मचर्य गुण संयुताय श्रीआचार्याय नमः।
२६ अशरण भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः ।
२८ एकत्व भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
३० अशुचि भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
३२ संवर भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः
३४ लोकस्वरूप भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
३६ धर्मदुर्लभ भावना भावकाय श्रीआचार्याय नमः।
॥१३३॥

श्रीपाल. नवपद विधि. रास ॥१३४॥ उपाध्याय पदके २५ गुणोंके खमासमण-नमस्कार- १ श्रीआचारांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।२ श्रीसूयगडांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ३ श्रीठाणांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः॥ ४ श्रीसमवायांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ५ श्रीभगवती सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । ६श्रीज्ञाताधर्मकथांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ७ श्रीउपासकदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय०1८श्रीअंतगडदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ९ श्रीअणुत्तरोववाइयदशांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपा०१० श्रीप्रश्नव्याकरणांग सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय० ११ श्रीविपाक सूत्र पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १२ श्रीउत्पादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १३ श्रीअग्रायणीपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १४ श्रीवीर्यप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः १५ अस्तिप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। १६ ज्ञानप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः १७ सत्यप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः।१८ आत्मप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । १९ कर्मप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २० प्रत्याख्यानप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। २१ विद्याप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः । २२ अविध्य(कल्याण)प्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्या० २३ प्राणा(वाय)यामप्रवादपूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपा० । २४ क्रियाविशालपूर्व पाठन गुण संयुताय,श्रीउपाध्यायाय नमः । २५ लोकविंदुसार पूर्व पाठन गुण संयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः। ॥१३४॥ ३ -

नवपद
विधि.
श्रीपाल.
SONG
॥१३५॥
साधु पदके २७ गुणोंके खमासमण-नमस्कार-
१ प्राणातिपात विरमण प्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः । २ मृपावाद विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः।
३ अदत्तादान विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः। ४ मैथुन विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः।
५ परिग्रह विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः । ६ रात्रि भोजन विरमण व्रत संयुताय श्रीसाधवे नमः ।
७ प काय रक्षकाय श्रीसाधने नमः।
८ अप्पकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
५ तेउकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१० वाउकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
११ वनस्पतिकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१२ त्रसकाय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१३ एकेंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१४ वेइंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१५ तद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१६ चउरिंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१७ पंचेंद्रिय जीव रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ।
१८ लोभ निग्रह कारकाय श्रीसाधवे नमः ।
१५ क्षमा गुण युक्ताय श्रीसाधवे नमः ।
२० शुभ भावना भावकाय श्रीसाधवे नमः।
२१ प्रतिलेखनादि क्रिया शुद्धकारकाय श्रीसाधवे नमः । २२ संयम योग युक्ताय श्रीसाधवे नमः ।
२३ मनोगुप्ति संयुत्ताय श्रीसाधवे नमः ।
२४ वचन गुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः ।
॥१३५॥

श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
॥१३६॥
7
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२५ कायगुप्ति संयुक्ताय श्रीसाधवे नमः ।
२६ शीतादि द्वाविंशति परीषह सहन तत्पराय श्रीसाधवे नमः।
२७ मरणांत उपसर्ग सहन तत्पराय श्रीसाधवे नमः।
दर्शन पदके ६७ गुणोंके खमासमण-नमस्कार
१ परमार्थ संस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२ परमार्थ ज्ञातृ सेवनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
'३ व्यापनदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४ कुदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
'५ शुश्रूषारूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
.'६ धर्मरागरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
७ वैयावृत्यरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
८ अर्हद्विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
९ सिद्ध विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१० चैत्य विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
११ श्रुत विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१२ धर्म विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
१३ साधुवर्ग विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१४ आचार्य विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
१५ उपाध्याय विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । १६ प्रवचन विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
१७ दर्शन विनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१८ "संसारे जिनः सार"इति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१९ "संसारे जिनमतं सारं" इति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। २० संसारे जिनमतस्थित साध्वादिसारं इति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शना०
२१ शंका दूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२२ कांक्षा दूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः।
-
॥१३६॥

नवपद
विधि.
श्रीपाल.
२३ विचिकिन्मा दूषण रहिताय श्रीसदर्शनाय नमः। २४ कुदृष्टि प्रशंसा दूपण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२५ तत्परिचय दपण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २६ प्रवचन प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२७ धर्मकथा प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । २८ वादि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
२९ नमित्तिक प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ३० तपस्वि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३१ प्रजात्यादि विद्याभृत्प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ३२ चूर्णाजनादि सिद्ध प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३३ कवि प्रभावकरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३४ जिनशासने कौशल्य भृपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३५ प्रभावना भृपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३६ तीर्थसेवा भूपणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३७ धर्य भृगणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
३८ जिनशासने भक्तिभूषणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
३९ उपशम गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४० संवेग गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४१ निवंद गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४२ अनुकंपा गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४३ आस्तिक्य गुणरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४४ परतीर्थिकादि वंदन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
४५ परताधिकादि नमस्कार वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः । ४६ परतीर्थिकादि आलाप वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
१७ परनीथिकादि संलाप वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ४८ परतीर्थिकादि आसनादि दान वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
४५ परनीधिकादि गंधपुप्पादि प्रेपणवर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः। ५० राजाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
॥१३७॥

श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
॥१३८॥
५१ गणाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५२ बलाभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
५३ सुराभियोगाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः । ५४ कांतारवृत्त्याकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
५५ गुरुनिग्रहाकार युक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
५६ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य मूलमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः।
५७ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मपुरस्य द्वारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शना०५८ सम्यक्त्वं चारित्रधर्मस्य प्रतिष्ठानमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय.
५९ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्याधारमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनाय०६० सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य भाजनमिति चिंतनरूप श्रीसद्दर्शनायक
६१ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य निधिसन्निभमिति चिंतनरूप श्रीस०६२ अस्ति जीव इति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
६३ स च जीवो नित्य इति श्रद्धास्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय०। ६४ स च जीवः कर्माणि करोतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दन ।
६५ स च जीवः कर्माणि वेदयतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीस० ६६ जीवस्यास्ति निर्वाणमिति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनायक
६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायेति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।
ज्ञान पदके ५१ गुणों (भेदों)के खमासमण-नमस्कार-
१ स्पर्शनेद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । २ रसनेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः।
३ घ्राणेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ४ श्रोत्रंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
५ स्पर्शनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः । ६ रसनेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
७ घ्राणेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।। ८ चक्षुरिंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
॥१३॥

नवपद०
विधि.
श्रीपाट.
रान
॥१९॥
५ श्रोत्रंद्रिय अर्थापग्रहाय श्रीमतितानाय नमः।
११ म्पर्शनद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१३ प्राणद्रिय ईहा श्रीमतिनानाय नमः ।
१५ ओडेंद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१७ म्पर्शनंद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
प्राणद्रिय अपाय श्रीमतिनानाय नमः ।
२१ श्रात्रंद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२३ स्पर्शनंद्रिय धारणा श्रीमतिनानाय नमः ।
२५ प्राणद्रिय धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२७ श्रोत्रंद्रिय धारणा श्रीमतिनानाय नमः ।
२५. श्रीप्रक्षर श्रुतवानाय नमः ।
३५ श्रीसंगी श्रुतरानाय नमः ।
३३ श्रीमम्या श्रुतनानाय नमः ।
३५ श्रासादि श्रुतज्ञानाय नमः ।
१० मनो अर्थावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१२ रसनेंद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१४ चक्षुरिंद्रिय ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१६ मन ईहा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
१८ रसनेंद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२० चक्षुरिंद्रिय अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२२ मन अपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२४ रसनेंद्रिय धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२६ चक्षुरिंद्रिय धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
२८ मनो धारणा श्रीमतिज्ञानाय नमः ।
३० श्रीअनक्षर श्रुतज्ञानाय नमः ।
३२ श्रीअसंज्ञी श्रुतज्ञानाय नमः ।
३४ श्रीमिथ्या श्रुतज्ञानाय नमः ।
३६ श्रीअनादि श्रुतज्ञानाय नमः ।
॥१३९॥

श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
रास
॥१४॥
३७ श्रीसपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ।
३८ श्रीअपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ।
३९ श्रीगमिक श्रुतज्ञानाय नमः।
४० श्रीअगमिक श्रुतज्ञानाय नमः
४१ श्रीअंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नमः ।
४२. श्रीअनंगप्रविष्ट श्रुत ज्ञानाय नमः ।
४३ श्रीअनुगामि अवधिज्ञानाय नमः ।
४४ श्रीअननुगामि अवधिज्ञानाय नमः ।
श्रीवर्द्धमान अवधिज्ञानाय नमः।
४६ श्रीहीयमान अवधिज्ञानाय नमः ।
४७ श्रीप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः ।
४८ श्रीअप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः।
४९ श्रीऋजुमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः ।
५० श्रीविपुलमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः।
५१ लोकालोक प्रकाशकाय श्रीकेवलज्ञानाय नमः।
चारित्र पदके ७० गुणों (भेदों) के खमासमण-नमस्कार
१ प्राणातिपात विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२ मृपावाद विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
३ अदत्तादान विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः।
४ मैथुन विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
५ परिग्रह विरमणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६ क्षमा धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
७ आर्जव धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
८ मृदुता धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
९ मुक्ति धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१० तपो धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
॥१४॥

नवपद०
विधि.
भीपाल.
रास
॥१४॥
११ संयम घमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
१३ शौच धर्मस्प श्रीचारित्राय नमः ।
१५ प्रमचर्य धर्मस्प श्रीचारित्राय नमः ।
१७ उदक रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
*१९ वाउ रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२१ बेइंद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२३ चारिद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२५ अनीर रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२७ उपेक्षा संयमम्प श्रीचारित्राय नमः ।
२५ ममार्जन संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३१ वारूसंयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३३ आचार्य यावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३५ तपखि बयामृत्यस्प श्रीचारित्राय नमः ।
३७ ग्लान साधु बयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः।
१२ सत्य धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः।
१४ अकिंचन धर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ।
१६ पृथ्वी रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
१८ तेउ रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२० वनस्पति रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२२ तेइंद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२४ पंचंद्रिय रक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
२६ प्रेक्षा संयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
२८ अतिरिक्त वस्त्रभक्तादि परठवण संयमरूप श्रीचारि०
३० मनः संयमरूप श्रीचारित्राय नमः।
३२ कायसंयमरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३४ उपाध्याय वैयावृत्य रूप श्रीचारित्राय नमः ।
३६ लघुशिप्यादि वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
३८ साधु वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
॥१४॥

श्रीपाल.
नवपद०
विधि.
॥१४२॥
३९ श्रमणोपासक वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः। ४० संघ चयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः।
४१ कुल वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ।
४२ गण वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः।
४३ पशुपंडगादिरहितवसतिवसनब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः। ४४ स्त्रीहास्यादि विकथा वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः ।
४५ स्त्रीआसन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ४६ स्त्रीअंगोपांग निरीक्षण वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः।
४७ कुड्यंतरस्थित स्त्रीहावभाव सुणन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारि०४८ पूर्वभुक्त स्त्रीसंभोग चिंतन वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः।
४९ अतिसरस आहार वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ५० अतिआहार वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः ।
५१ अंगविभूषा वर्जन ब्रह्मगुप्तिरूप श्रीचारित्राय नमः । ५२ अनशन तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
५३ ऊनोदरी तपोरूप श्रीचारित्राय नमः।
५४ वृत्तिसंक्षेप तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
५५ रसत्याग तपोरूप श्रीचारित्राय नमः।
५६ कायकिलेस तपोरूप श्रीचारित्राय नमः।
५७ संलेषणा तपोरूप श्रीचारित्राय नमः।
५८ प्रायश्चित्त तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
५९ विनय तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६० वेयावच्च तपोरूप श्रीचारित्राय नमः।
६१ सज्झाय तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६२ ध्यान तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६३ कायोत्सर्ग तपोरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६४ अनंत ज्ञान संयुक्त श्रीचारित्राय नमः ।
६५ अनंत दर्शन संयुक्त श्रीचारित्राय नमः ।
६६ अनंत चारित्र संयुक्त श्रीचारित्राय नमः।
SE
॥१४२॥

नवपद
श्रीपाट.
रास
॥१४३॥
६७ शोधनिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६८ माननिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
६५ माया निग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः ।
७० लोभनिग्रह करणरूप श्रीचारित्राय नमः
तप पदके ५० गुणों (भेदों के खमासमण-नमस्कार-
१ यारन्कधिक तपसे नमः ।
२ इत्वरिक तपसे नमः।
३ पाए उनोदरी तपसे नमः ।
४ अभ्यंतर ऊनोदरी तपसे नमः ।
५ द्रव्यतः पृचिमक्षेप तपसे नमः ।
६ क्षेत्रतः वृत्तिसंक्षेप तपसे नमः ।
७ फालतः पृत्तिसंक्षेप तपसे नमः।
८ भावतः वृत्तिसंक्षेप तपसे नमः ।
९ फायकिलेस तपसे नमः ।
१० रसत्याग तपसे नमः ।
११ इंद्रिय कपाय योग विपयक संलीनता तपसे नमः । १२ स्त्री पशु पंडकादि वर्जित स्थान अवस्थित संलीनता तपसे नमः।
१३ आलोयण प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१४ पडिकमण प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१५ मित्र प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१६ विवेक प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१७ उन्मर्ग प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१८ तपः प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
१५ छेद मायश्चित्त तपसे नमः ।
२० मूल प्रायश्चित्त तपसे नमः।
२१ अनवस्थित प्रायश्चित्त तपसे नमः ।
२२ पारंचिय प्रायश्चित्त तपसे नमः।
S
॥१४३॥

श्रीपाल.
रास
नवपद०
विधि.
॥१४४॥
२३ ज्ञानविनयरूप तपसे नमः।
२४ दर्शन विनयरूप तपसे नमः ।
२५ चारित्र विनयरूप तपसे नमः ।
२६ गुर्वादिकं प्रति (शुभ मनः प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः।
२७ गुर्वादिकं प्रति (शुभ वचन प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः।२८ गुर्वादिकं प्रति (शुभ काय प्रवृत्ति) विनयरूप तपसे नमः।
२९ औपचारिक विनयरूप तपसे नमः ।
आचार्य वेयावच तपसे नमः ।
३१ उपाध्याय वेयावच्च तपसे नमः।
३२ साधु वेयावच्च तपसे नमः ।
३३ तपखि वेयावच्च तपसे नमः ।
३४ लघु शिष्यादि वेयावच तपसे नमः।
३५ गिलाण साधु वेयावच्च तपसे नमः ।
३६ श्रमणोपासक वेयावच्च तपसे नमः।
३७ संघ वेयावच्च तपसे नमः ।
३८ कुल वेयावच्च तपसे नमः ।
३९ गण वेयावच्च तपसे नमः ।
४० वायणा तपसे नमः।
४१ पृच्छना तपसे नमः।
४२ परावर्त्तना तपसे नमः।
४३ अनुप्रेक्षा तपसे नमः।
४४ धर्मकथा तपसे नमः ।
४५ आर्तध्यान निवृत्ति तपसे नमः ।
४६ रौद्रध्यान निवृत्ति तपसे नमः ।
४७ धर्मध्यान चिंतन तपसे नमः।
४८ शुक्लध्यान चिंतन तपसे नमः ।
४९ वाह्य उपसर्ग सहनरूप तपसे नमः ।
५० अभ्यंतर उपसर्ग महनरूप तपसे नमः ।
.
॥१४४॥

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Shripal Raja Ka Raas (sachitra)

Author
Shri Jinharshji Gani
Title
Shripal Raja Ka Raas (sachitra)
File name
Shripal Raja Ka Raas (sachitra)
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2010/09
Publisher
Mombay, Shri Jinduttsuri Gyanbhandar
Language
Sanskrit
Pages
207
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
326988
Barcode
99999990002470.00
Scanning centre
Banasthali University
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