Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Kirti Shesh
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कोति शेष संजीय प्रशासन, दिल्ली-६
। सर्वाधिकार : प्रकाशकाधीन
- संस्करण : प्रथम, 1975
0 मूल्य : नौ रुपये
- प्रकाशक : सजीव प्रकाशन
3613, दरियागंज, दिल्ली-110006
0 मुद्रक : संजय प्रिटिंग एजेन्सी द्वारा
कुमार प्रादर्स प्रिटिंग प्रेस, दिल्ली-110032
KIRTI SHESH by Vimala Sharma
Rs. 9.00
R
विमला शर्मा
कीर्तिशष
उन अबलाओं को,
जिनकी मांग माज
सिन्दूर-रहित है।
दो शन्द युद्ध में शत्रु को पराजित करने के लिए अस्त्र-शस्त्र की ही नहीं, अदम्य ‘साहस की भी आवश्यकता होती है। वर्फीले तूफान, हिम-मंडित पहाड़ियां, ठंडा अथाह सागर और शत्रु को सशस्त्र सेनाएँ-प्राणों को हथेली पर रखकर इन सबसे एक-साथ जूझना कम जीवट का काम नहीं। सन् १९७१ में पाक से भीषण युद्ध में एक-एक इंच जमीन को प्राप्त करने के लिए हमारे जवानों ने खून की नदियां बहा दीं । भारत युद्ध-प्रेमी देश नहीं है । अहिंसा में उसका विश्वास है, परन्तु अहिंसा का अर्थ यह नहीं कि शनु हम पर आक्रमण करे और हम अपनी रक्षा मी न करें । अहिंसक वही होता जो हिंसा करने में समर्थ हो पर हिंसा न करे । हमारा शत्रु इस तथ्य को नहीं समझता । उसने चोयी बार हमारी भूमि पर आक्रमण किया। विवशतः भारत को अपनी रक्षा के लिए युद्ध में कूदना पड़ा। इतिहास साक्षी है, भारत ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया । अपने विकास व शान्ति, प्रेम के पौधे को सीचने में ही लगा रहा परन्तु हमारे पनपते विकास को शत्रु देख न सका । उसने शक्तिशाली देशों के साथ मिल कर भारत पर आक्रमण कर दिया। पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर दिया । हम शान्त रहे परन्तु जब पूर्वी पाकिस्तान (प्राधुनिक बंगला देश) में पाकि- स्तानियों की बर्बरता, नृशसता और अमानुपिकता चरम सीमा पर पहुंच गई तब पड़ोसी की सहायता के लिए देश पर बलिदान होने की भावना से प्रोत- प्रोत भारत के जवानों ने इस धुनौती का मुंहतोड़ जवाब दिया । ऐसी विजय प्राप्त की जो इतिहास में स्वणिम अक्षरों में लिखी जाएगी। अपनी पुण्यभूमि पर शहीद हुए योद्धाओं की परम साहसिक और रोमाच- कारी घटनामों का उल्लेख इस कृति में मिलेगा। बंगला देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी, कितने संकटो का सामना करना पड़ा, यह इस कृति से जाना जा सकेगा। माधुनिक काल में उपन्यास मनोरंजन के खोखलेपन से भागे बढ़कर अब जीवन राष्ट्रहित, एवं जगत् की गहनता की प्रानन्दमयी तथ्यपूर्ण व्याख्या करने 21 तक पा गया है । अपनी अनेक विशिष्टताओ के कारण इस युग में उसका सर्वाधिक प्रचार हुआ है। इस सम्बन्ध मे दो मत नहीं हैं। फिर भी पाठक के मनोरजन के लिए कुछ कल्पित कया-वस्तु, पात्र, कथोपकथन तथा वातावरण प्रस्तुत करना ही पड़ता है। इसलिए मैं अनुभव करती हूँ कि उपन्यास की कथा के लिए कोई विशेष नियम नहीं है । उपन्यास की कथा कल्पित होती है और कल्पना पर कोई प्रतिवन्ध नहीं है । लेखक वर्ग कल्पना की ऊँची से ऊंची उड़ान को समेटकर पाठक के लिए प्रस्तुत करता है । इस उपन्यास की कल्पना भारतीय नारी है । प्रिय के साथ सर्वत्र माने जाने की सामाजिक स्वतन्त्रता होते हुए भी उसने मर्यादा नही छोड़ी। अपने प्रात्मीय को देश की रक्षा के लिए समर्पित, कर दिया । बंगला देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना जीवन लगा दिया । पूर्वी पाकिस्तान के कीर्तिशेप होने पर बंगलादेश का जन्म हुमा । यही कल्पना का उद्देश्य था, जिसे जवानों ने प्राण देकर पूर्ण किया। जो जवान बंगला देश की स्वतन्त्रता दिलाने मे बलिदान हो गए, अमर हो गए, भारतीय इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरो में लिखा जायेगा। अन्त में में उनको श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ। विमला शर्मा मादित्य सदन, ३, अशोक रोड, नई दिल्ली-१ एक वह रोज यहां आकर बैठती है। प्राज भी उसकी प्रतीक्षा में बैठी थी। उसे प्राधा थी कि वह कालेज से जाते समय यहाँ होकर जाएगा । परन्तु सन्ध्या हो गई थी, वह अभी तक नही आया था। सूर्य पश्चिम में अस्त होने जा रहा था। पश्चिम की ओर जाते दिनकर को देखकर उसे ऐसा लगा, मानो मोतियो की माला टूट गई हो । कहते है, मानव के जन्म के समय से ही उसके पैरो मे बन्धन होते हैं। 'परन्तु जो वन्धन मानव अपने पाप बनाता है, उसके काटने मे अनेक स्मृतियां या अर्ध-स्मृतियां व्यतीत हो जाती हैं। उसने फिर प्राकाश की ओर देखा-पक्षी अपने घरों को लौट रहे थे। उसने सोचा, इस मंसार के अतिरिक्त एक संसार पोर है, जिसमे पक्षी रहते हैं, जिसमे स्नेह है, विश्वास है । जिसमे खेलने की अवाध स्वतंत्रता है। जब वह नहीं पाया, तो लौट आई और मन में निश्चय किया कि वह कभी उससे मिलने नहीं जाएगी। तीन-चार दिन तक वह वहां आती रही, परन्तु उसके उसे' कौन बताता कि वह कल भी आई थी; दूसरे दिन भी पाई थी, तीसरे दिन भी, चौथे दिन भी निराश होकर, बहुत देर रोकर लौट गई थी । एक दिन वह पाई, मुरझाई-सी, खोई हुई-सी और एकाएक विश्वास से खिल उठी। उस पीपल के वृक्ष के तने पर 'O' शब्द अकित कर दिया गया था। लम्बे वृक्ष की पर्णहीन-सी शाखों को उलझी हुई छाया, हरी नसवारी और पीले रंगो के झरे हुए पतों पर अलसाई हुई सूर्य-किरणों की स्निग्ध विछलन । वह उन्ही पत्तो पर लेट गई तथा उस '0' को देखने लगी-'O' For ८/कीति शेप . Oteen (प्रो फार मोतिन)। प्रोतित तो स्वय वृक्ष के उस पार बंठा था। वह धीरे से गई और उसको भांखों को बन्द कर लिया। उसी समय वन्द प्रोपों से खुली प्रांतो ने कहा-"वताप्रो-कोन ?" "मिताली !" "हो-हो, मिताली ।" मिताली पोलो पर से हाथ हटा देती है। एक लम्बे क्षण तक उनकी मांखें मिलती है । मोतिन ने मिताली को देखा, मिताली ने प्रोतिन को देखा और मूक भाषा में प्रांखों ने एक-दूसरे से क्या कहा, यह तो वातावरण ही बता सकता है । अलसाई हुई सूर्य की किरणें, पीले पत्ते उस समय मौन थे। मिताली ने आँखें उठाई। समीप का वातावरण नारियल भोर कटहल के पेड़ों से घिरा था । गौव ढाका के उत्तर-पूर्व में राजमार्ग के किनारे पर बसा था । मार्च का महीना था । न अधिक सर्दी, न अधिक गर्मी थी। समीप के कुएँ पर बगल में पानी का कलश लिये लम्बे-लम्बे काले धने केशों वाली तरुणियाँ आ-जा रही थी । हरे-पीले रंग के परिधान में युवतियां ऐसे लग रही थी, मानो वसन्त और पतझड़ की ऋतु प्रा-जा रही हों । कुछ युवतियां यौवन को मादकता से पूर्ण थी, तो कुछ यौवन-काल की छाया से दूर जा चुकी थी। उसी समय एक विमान क्षितिज में प्राता देखकर मिताली बोली, "सुना है, शेख मुजीब से बातचीत करने जनरल याह्याखां ढाका आये हुए हैं।" प्रोनिन बोला, "परन्तु बातचीत से सुपरिणाम कुछ नहीं निकलना है। याह्याखा पूर्वी बंगाल को ऐसा सबक सिखायेंगे, जिसको वर्षों तक न भुलाया जा सके।" मिताली ने बंगाली भाषा में कहा, "भापनि कि कोरे जान लेन ? (आपको कसे मालूम ?" प्रोतिन बंगला भाषा में बोला "ग्रामि जानि! (मुझे मालूम है)।" "ता होले प्रामा केलो बोलून । (मुझे भी तो पता लगे)" मिताली ने कहा। "ता होले सोनो, (तो फिर सुनो) ।" मोतिन वगला भाषा में बोला, "पश्चिमी पाकिस्तान से सेना से मरे कीति शेष/६ : . जहाजो के पाने की प्रतीक्षा है । याह्याखाँ ने विमानों से भी सेना और युद्ध- सामग्री मॅगाने का आदेश दे दिया है। तुम देस ही रही हो, सेना ने जनता के शान्तिपूर्ण जुलूसों पर गोलियां चलाना प्रारम्म कर दिया है । ढाका के निकट जयदेवपुर में अनेकों आदमी मारे गए, संकड़ों घायल हुए । याह्याखां राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए वार्तालाप का ढोंग कर रहा है। "पूर्वी वगला तथा पश्चिमी पाकिस्तान की जनता में कोई एकता नही, केवल धर्म की एकता एक पहनू है। दोनों देशों में अधिकाश मुसलमान हैं। दोनो का रहन-सहन, वेशभूपा, रीति-रिवाज एक-दूसरे से भिन्न हैं। दोनों की भाषा-संस्कृति भिन्न हैं। कृषि, खनिज, व शिक्षा की दृष्टि से पूर्वी बगाल पश्चिमी पाकिस्तान से कही अधिक स्तर ऊँचे पर है। फिर भी पूर्वी बगाल का शासन पश्चिमी पाकिस्तान के हाथ मे रहता है । "विकास की दृष्टि से पूर्वी पाकिस्तान मे बीस प्रतिशत तथा पश्चिम पाकिस्तान में अस्सी प्रतिशत विकास हुआ है । केन्द्रीय शासन-सेवा मे रोजगार पन्द्रह : प्रतिशत व विदेशी सहायता बीस प्रतिशत पूर्वी पाकिस्तान को मिली तथा शेष - पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्से में पाई । इतना ही नहीं, पूर्वी पाकिस्तान मे गेहूं का पाटा तीस रुपये प्रतिमन, सरसों का तेल पांच रुपये प्रति लीटर और चावल का भाव पचास रुपया प्रतिमन है, जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में इन वस्तुओं का भाव प्राधा भी नहीं है । पाकिस्तान की स्थापना के बाद से पश्चिम माग के कुलीन तंत्र द्वारा पूर्वी बंगाल का शोपण किस प्रकार किया जा रहा है, उसका सारांश जनता को मालूम हो गया है । पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने कभी भी पश्चिमी पाकिस्तान से नाता तोड़ने की इच्छा प्रगट नहीं की। वस्तुतः याह्याखां की दुरंगी चालों के कारण ही पश्चिमी पाकिस्तान से सम्बन्ध विच्छेद करने और स्वतन्त्रता घोपित करने का समय या गया। याह्याखो की दोहरी चालों का ग्रामास इसी तथ्य से हो जाता है कि एक ओर जहाँ वे समझोता फार्मूते पर वातचीत करने आये हैं, वहां पाक सेना के डिवीजन पर डिवीजन मंगाये जा रहे है ताकि पूर्वी पाकिस्तान के स्वतंत्रता-आन्दोलन का दमन किया जा सके। इससे नगरों में उत्तेजना तथा गहरी निराशा फैल गयी। इसलिए मुजीव ने अहिंसक असह्योग नान्दोलन की घोषणा कर दी। घोषणा की गई कि जब तक पूर्वी बंगाल की जनता के ।
१० / कीति शेप लोकतत्री अधिकार उसको प्राप्त नहीं हो जाते, यह आन्दोलन बन्द नहीं होगा। ढाका तथा अन्य नगरों में सेना ने दमन-चक्र प्रारम्भ कर दिया है जिसके कारण तीन सौ प्रादमी मारे गये और दो हजार के लगभग घायल हुए।" इतना कह पोतिन सूखे अधरों पर जोम फेर कर आगे वोला, 'इसी कारण मैं यहाँ नही पा सका, समय ही नहीं मिला । मुक्ति वाहिनी की गुप्त सभा में उसकी योजना बनाने में व्यस्त रहा।" "मुक्ति वाहिनी......!" "हाँ, मुक्ति वाहिनी । यह वंगला देश को स्वतंत्र करायेगी। कल मुक्ति वाहिनी के प्रतिनिधि ने सरकारी कर्मचारियों को आदेश दिया है कि वे याह्याखां की सरकार का प्रादेश न माने । लोगों को आदेश दिया है कि पाकिस्तान की सरकार को राजस्व न दें। स्कूल-कालेज बन्द कर दिये जायें। साथ-ही-साथ हमे आदेश मिला है कि हम हिंसा का मार्ग न अपनायें।" मिताली बोली, "तमी ढाका रेडियो वंगला देश की प्रशंसा में गीतों का प्रसारण करने लगा। विभाजन के पूर्व राष्ट्र-प्रेम के गीत रेडियो स्टेशन से प्रसारित किये गये। कल से रेडियो स्टेशन का नाम 'ढाका वैतार केन्द्र' रख दिया गया।" उसी समय पोतिन बोला, "राजशाही, सिलहट और चटगांव के रेडियो स्टेशनों से भी राष्ट्र प्रेम के गीत शीध्र प्रसारित होंगे।" "होगे क्या, हुए हैं।" नोतिन बोला, "सूच, मैं तो रात रेडियो सुन नहीं सका । तुम तो रेडियो कालाकार हो, मिताली।" मिताली बोली, "वया युद्ध होगा ?" "अवश्य होगा, मिताली !" "मुजीब और माह्याखां को वार्ता कब नमाप्त होगी "शायद वार्ता याईस-नईम तक चलेगी।" "उसके वाद ?" "यायासो पश्चिमी पारिस्तान चता जायेगा।" "मोर...?" " .
फोति शेष/११ "तुम देखती रहना, क्या होगा।" "क्या होगा?" 'हमारा देश आजाद हो जायेगा।" "सच...!" "हो, मिताली।" "फिर तो मैं...।" "मैं क्या...?" मिताली लजा कर बोली, "कुछ नहीं।" उसी अवस्था में मोतिन बोला, "इस समय व्यक्तिगत प्रेम करने का अवसर नहीं है । राष्ट्र-प्रेम का अंकुर उगाना है और उसी प्रेम के पथ पर चल कर वंगला देश को स्वतंत्रता दिलानी है।" मिताली ने पोतिन को देखा और गोली, "मैं इतनो स्वार्थी तो नहीं हूँ। तुम बोलो तो, मुझे क्या करना होगा ? क्या में भी मुक्ति वाहिनी की सदस्या बन सकती है?" "यह बात तो बाद में देखी जायेगी, तुम रेडियो स्टेगन पर रह कर हमे सहयोग दे सकती हो। याद में तुम्हारी मावश्यकता पड़ी, तो...।" "मैं पीछे नहीं रहेगी।" "मुझे तुम से ऐसी ही भागा थी।" "मोतिन, मैंने तुम से प्रेम किया है, तुम्हें मात्मीय समझा है । मैं तुम्हारे पर-चिह्नों पर नहीं पलूंगी तो मेरा जीवन किस काम पायेगा ?" पोतिन योला, "गुलामी करने से तो मिसारी धनना पछा। दूं प्रपने पदर पनन्त एकत्र का नाक्षात्कार करके लोकसेवा में लग जाने में हो पूर्ण पौर निगूढ मामाग्य है। कपोत स्वतन्त्र रह कर संकद भुगना पसन्द करता है। एक यात पा सदा पान रपनाही मी किमी भी परिस्थिति में मन में परजोरी मत माने देना। पगर महता पाहतो हो, तो मिमी में यारना मन फन्ना । मविप्प पा अनुमन्यान नहीं करना, प्रतीत की चिन्ता नहीं करना । नारी टीम उसो परिमाप महान बनती है, जिस परिमाण में यह मानव मात में पायालय, राष्ट्र के नियम करती है।" मिलानी बोमो, "मुझे तो चिना मगी घो। तरानग के विचार मन में १२/कीति शेप पा रहे थे । बैठी बैठी सोचती रहती थी-न जाने क्यो नही पाये !" "कारण तो तुम्हें बता ही दिया ॥" "अव तो मेरी चिन्ता दूर हो गई।" "सच !" मिताली की आंखों ने कहा, "हां, अब बतानो, क्या करना है ? "हमे देश को स्वतंत्र कराना है।" "लेकिन यह काम बहुत कठिन है । हमारे पास आधुनिक अस्त्र-शस्त्र नहीं "उसकी तुम चिन्ता न करो। हमारे मित्र-देश हमारी गुप्त रूप से मदद करेंगे। उनकी सेना साधारण परिधान में पूर्वी पाकिस्तान पहुंच चुकी है तथा समय-समय पर सहयोग मिलता रहेगा। कल छात्र-छात्रायो की ढाका विश्व- विद्यालय में बैठक हुई थी। उसमे निर्णय किया गया कि छात्र संघ मुक्ति वाहिनी का मुख्य अंग होगा।" "फिर तो यह दिन दूर नही, जव वंगला देश स्वतंत्र हो जायेगा।" "पाशा तो यही है कि इसी वर्ष देश स्वतंत्र हो जायेगा। शेख मुजीव ने अपने भाषण में कहा है, 'यदि मैं किसी कारण आपके वीच न रहूँ तो आप घबराये नहीं । देश के अन्य नेतानों के नेतृत्व मे अपना संघर्ष जारी रखें। मैं रहता हूँ या नहीं, उसका विशेष महत्व नही है।" मिताली बोली, "मुझे ऐसा लगता है, विश्व युद्ध न हो जाए ?" "सम्भव है, परन्तु !" "परन्तु क्या ?" "कोई भी राष्ट्र इतनी शीघ्रता से युद्ध मे नही कूदेगा। हां, गुप्त रूप से एक-दूसरे को मदद अवश्य करेंगे।" "भारत के सम्बन्ध में प्रापका क्या विचार है ?" मोतिन बोला, "किस सम्बन्ध में ?" "इसी विषय पर ।" "यह तो स्पष्ट है, कि भारत शातिप्रिय राष्ट्र है। पड़ोसी राष्ट्र से सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। भारत के नेता वंगला देश की जनता के साथ है।" "क्या भारत से ऐसी कोई मदद आई है, जिस से मुक्ति वाहिनी को मदद -
कीति शेप/१३
मिली हो ?"
"यह एक ऐसा प्रश्न है ,जिसका उत्तर मुक्ति वाहिनी का सदस्य मुगमता
से नहीं दे सकता।"
"क्यों?'
मोतिन प्रसंग बदल कर बोला, "मम्मी से बातें हुई ?"
"क्या कहा ?"
"उन्हें कोई प्रापत्ति नहीं।"
"और पापा को ?"
"उन्होंने भी स्वीकृति दे दी ।"
"फिर ?"
मिताली बोली, "मय तो आपकी स्वीकृति चाहिए ?"
"परन्तु...!"
"परन्तु यया ?"
"मव सम्भव नही हो सकता।"
"क्यों ?"
"ऐसी गम्भीर स्थिति में विवाह कैसे हो सकता है ? मैंने शपथ ली है,
जय तक राष्ट्र स्वतंत्र नही हो जाता, में विवाह नहीं करूंगा।"
"मेरे घर वाले तो मधिक दिन नहीं रुक सकते।"
"ऐगी गम्भीर स्थिति में मला वियाह कैसे हो सकता है ?"
"यह मैं परा जानू ?"
"मिताली, सुम समझने की कोशिश करो।"
"मैं सब जानती हूँ।"
"तुम मुझे गसत समझ रही हो।"
"मैंने कभी गलत नहीं समझा।"
मोतिन बोला, "युट दिन सने में पया पुराई है ?"
"मैं पर पग पहूँगी ?"
"जो मैंने कहा है तुम से।"
"तुरारो मात दूमरी है।"
१४/ कीति शेष "तुम मुझे अपने घर ले चलना, मैं कह दूंगा।" "कव चलोगे ?" "जब तुम कहो।" "कल ।" "इतनी शीघ्र नहीं।" "फिर ?" "कल बताऊँगा, कब चल सकूँगा।" "पाज क्यो नही ?" मिताली ने उठ कर खडी होते हुए प्रदन किया । ओतिन ने उसका अांचल पकड़ लिया। आंचल वक्ष प्रदेश से गिर कर नामि तक आ गया था । एकाएक जाता हुमा सूर्य छोटी-सी बदली मे चला गया । ऐसा लगा मानो उन्नत उरोज की परछाई से वातावरण में अंधेरा छा गया हो। मिताली की प्रांखो ने कहा, "छोड़ दो ।" मोतिन की गरदन ने इधर-उधर होकर कहा, "नही ।" जैसे-जैसे मिताली साड़ी अपनी ओर खीचती जाती थी, वैसे-वैसे प्रोतिन की ओर स्वयं खिंची चली आ रही थी। ऐसा न करती, तो मोतिन के वन्धन से मुक्त न हो पाती। उसी अवस्था में मिताली समीप बैठकर बोली, "तुम समझने की कोशिश क्यों नही करते ? मैं घर पर सब कुछ कह चुकी हूँ । वनी-बनाई बात ने रूप वदल लिया, तो फिर परिस्थितियों से समझौता करना कठिन हो जाएगा।" मोतिन साडी के छोर को छोड़ता हुना बोला, "मेरी दशा पर विचार करो। राष्ट्र की दशा देखो । हमे अपने स्वार्य को ही नहीं देखना चाहिए । राष्ट्र के प्रति भी कुछ कर्तव्य होता है । वह भी हमें पूर्ण करना है ।" मिताली साती का छोर वक्ष पर डालकर बोली, "जैसी तुम्हारी इच्छा।" मोतिन बोला, "प्रदन मेरी इच्छा' का नहीं है, राष्ट्र का है, उसकी स्वतंत्रता का है । मैं तुम्हारे-साय विवाह-मूत्र मे बैंध भी जाऊँ, तो भी कोई लाम नहीं होगा। ऐमी अवस्था मे, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सवंगा। फिर कही-न-वही, कभी-न-कभी मुझे भी शत्रु को गोली का निशाना बनना पड़
कीर्ति शेष/ १५
सकता है । उस समय तुम्हें, तुम्हारे परिवार को अधिक दुख होगा । मेरे लिए,
तुम्हारे लिए हितकर यही है कि इस समय उस विषय पर चर्चा न करें।
कुछ समय के लिए इसे स्थगित कर दे । राष्ट्र स्वतंत्र होने पर मूर्य की किरण
एक नवजीवन लेकर पायेगी । उस समय मै तुम्हे पत्नी रूप में स्वीकार
करूँगा । तव एक हाथ में दो लड्डू होंगे । मन हर्प से नृत्य कर उठेगा। अगर
कल मुझे कुछ हो गया तो तुम"
ओतिन अपनी वात पूर्ण भी न कर पाया था कि मिताली ने उसके अधरों
पर हाथ रखकर कहा, "ऐसा न कहो, पोतिन ! तुम ही मेरी साधना हो,
आत्मीय हो । तुम से ही प्रेरणा मिली, जिसे पाकर में राष्ट्र के प्रति प्रेमातुर
हो गई । तुम अपना काम करो, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी । सारा जीवन
तुम्हारी राह देखूगी।"
श्रोतिन ने अधरो से हाथ हटाकर अपने हाथ में मिताली का हाथ ले
लिया। एक बार उसने मिताली को देखा। उसी अवस्था में लघु-दीर्घ उच्छ्वास
लेकर वोला, "तुम भी तो मेरे साथ रहोगी ?"
"सम्भव न हो सकेगा।"
"क्यों ?"
"वाबा न मानगे।"
"उनकी तुम चिन्ता न करो।"
"फिर मुझे कोई प्रापत्ति नहीं है । वोलो, कब कहां चलना होगा, क्या
करना होगा ?"
"अभी तुम रेडियो स्टेशन पर काम करो। मुझे जब तुम्हारी सेवा की
आवश्यकता होगी, अवश्य स्मरण कहेंगा ।"
"मच्छा! अब चलें।"
"कुछ देर बैठो।"
"नहीं, देर हो जाएगी।"
"न जाने फिर कब मिलें?"
"क्यों ?"
"कुछ पता नही, समय न मिले ।"
, "इतना समय तो निकाला ही जा सकता है?"
१६/ कीति शेष "समय कहाँ निकलेगा ! कल मुझे कई काम करने हैं । आगे का कार्यक्रम भी कम विस्तार लिए हुए नहीं है ।" "कम-से-कम एक बार तो दिन में..." "सम्भव नही हो सकेगा।" "ऐसे तो मैं मर जाऊंगी। तुम्हे देखे बिना मैं नहीं रह सकती। एक बार तो किसी-न-किसी प्रकार मिल जाया करना।" "अच्छा, कोशिश करूंगा।" "वायदा करते हो ?" "हाँ !" प्रोतिन की आँखो ने कहा । उसी समय मिताली अपना सिर मोतिन की छाती पर रखकर बोली, "मुझे भी साथ रखो ताकि दोनो साथ मर सकें।" "अमी तुम्हारी आवश्यकता नही है ।" "परन्तु मुझे तो तुम्हारी आवश्यकता है।" "यह प्रश्न दूसरा है।" "परन्तु मेरे लिए तो पहला है।" पोतिन बोला, "इतनी देर से समझाया हुआ सव व्यर्थ कर दिया । धैर्य से काम लो । समय का चक्र देखो । दुर्गा मां ने चाहा तो हम शीघ्र ही सामाजिक दृष्टि में एक हो जायेगे ।" "क्या अब एक नही है ?" "क्यों नहीं हैं ?" "फिर ऐसा क्यों कहते हो, एक हो जायेंगे।" "मैंने सामाजिक रूप में कहा था ।" मिताली बोली, "मुझे अब सामाजिक रूप में एक होने की चिन्ता नही है। मैंने माज से यह विचार हृदय में निकाल दिया है । मैं तुम्हारे कार्य मे वाघा नही बनूंगी । तुम्हे महयोग दूंगी । विवाह-मूत्र में बांध कर तो तुम्हें वल- रहित करना है। चितायुक्त करना है । वामना का प्रेमी बनाना है-उस वासना का, जो राष्ट्र-सेवा में बाधा बन सकती है 1 बन सकती है क्या, बनती रही है। नारी मानव को कमजोरी है। नारी मानव का हृदय है, मानव का यन है. उत्साह है। परन्तु उत्थान होने के साथ-साय ही पतन भी कीति शेप) १७ है । मैं तुम्हारे लिये पतन नही वसुंगी। अपने प्रेम का बलिदान कर दूंगी। तुम से जीवन पाया है तो उसे तुम्हारे लिए नष्ट भी कर दूंगी।" कुछ क्षण मौन रह कर बोली, "तुम्हें लगन है, जरूर सफलता मिलेगी। बंगला देश स्वतंत्र हो जायेगा। पाक के हाथ से निकल कर जनता सुख की सांस लेगी । जनता मुक्ति वाहिनी के जवानो को स्मरण रखेगी। उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा । मेरी भी पारमा जाग उठी है। मैं भी आज से प्रतिज्ञा करती हूँ, जब तक वंगला देश स्वतंत्र नहीं हो जायेगा, सासारिक सुख स्वीकार नहीं करूंगी।" ओतिन बोला, "मुझे तुमसे ऐसी ही आशा थी।" कहने के साथ ही प्रोतिन ने अपनी गरम सांसें उसके मुंह पर छोड दी और उठकर आकाश की ओर देखा, मानो गरम सांसों को परस्पर आलिंगन करते हुए जाते सूर्य ने देख लिया हो । प्रोतिन धीरे-धीरे मिताली के साथ चल दिया। कुछ दूर चलने पर प्रोतिन अपने पय की ओर चला गया । मिताली उसी पथ की ओर दृष्टि पसार कर खड़ी रही।
दो मार्च ७१ के अन्तिम सप्ताह में उस दिन ढाका मे बड़ी उत्तेजना और कौतूहल की सन्ध्या थी। ज्यो-ज्यो रात बढ़ने लगी, त्यो-त्यों मैनिकों से भरी मोटरें सड़कों पर गुजरती दिखाई पड़ने लगी । रात्रि व्यतीत होने से पूर्व नगर के समी महत्त्वपूर्ण स्थानो पर सैनिको ने मोरचे संभाल लिये । पाकिस्तानी फौज अपनी पूरी बर्बरता के साथ बंगाली प्रजा पर अत्याचार करने लगी। बंगला देश के विभिन्न स्थानों पर तोपो से गोलाबारी करके राष्ट्रीय सम्पत्ति को नष्ट कर दिया, उसमें आग लगा दी। वंगला देश के समर्थक नागरिको को पकड़-पकड कर गोली का शिकार बना दिया और निष्प्राण शरीरों को मार्ग पर ठोकरे खाने के लिए डाल दिया। इतना करके भी सैनिकों ने सन्तोप की सांस नहीं ली। घरो से तरुणियों का अपहरण करके उनके साथ बलात्कार किया। उधर मुक्ति वाहिनी पाकिस्तानी सैनिकों का सामना कैसे कर सकती थी? पाकिस्तानी सैनिक आधुनिक हथियारो से लैस थे। मुक्ति वाहिनी के पास केवल योजना थी। आन्दोलन था। इस आन्दोलन को समाप्त करने के लिए सेना के उच्च अधिकारियो ने रेलवे स्टेशन, रेडियो स्टेशन इत्यादि महत्वपूर्ण स्थानो पर अधिकार करने की योजना बनाई । विश्वविद्यालय का क्षेत्र बंगला देश आन्दोलन का मुख्य केन्द्र था। उसी सायं सैनिको ने छात्रावास पर हमला कर दिया। विश्वविद्यालय क्षेत्र के सैकड़ों छात्र-छात्राओं को गोलियों से भून दिया गया। कुछ भाग गमे, कुछ घायल हो गये, शेप मारे गये। इस वातावरण को देखने पर कोति शेप / १६ मनुष्य का हृदय कांप उठता था । अर्धनग्न छाग्रामो को लाशें, जिनको पहचनना कठिन था, जिनके कानों से कुण्डल कान काट कर निकाले गए थे। हाथों की अंगूठियां, अंगुलियो काट कर बड़ी वेदर्दी से निकाल ली गई थी । कपोलो पर नाखूनो के निभान, वक्ष-प्रदेश पर अत्याचार के चिह्न कर सैनिको के अत्याचारो की कथा कह रहे थे । स्थान को देखकर ऐसा लगता था मानो किसी महायुद्ध की भूमि हो। परन्तु उसमें भी इतना दर्द भरा वातावरण देखने को नहीं मिलेगा। लोगो को मार्ग में गोली से मार दिया गया। विस्तरो पर लेटे नवजात शिशुओं को आंख खोलने से पूर्व ही मो के सामने संगीनो की नोक से मौत के मुंह में डाल दिया गया । इन मानों का दोप इतना ही था कि उनके पति पाकिस्तान के समर्थक नहीं थे। जो मुसलमा पाकिस्तान से अलग होना चाहते थे, उनको और अवामी लीग के समर्थकों को ढूंढ-ढूंढ़ कर मारना और उनको घरों को जलाना प्रारम्भ कर दिया। पाकिस्तानी सेना ने जैसा पाराविक और वबंर पाचरण प्रस्तुत किया वह ससार के तीनों काल में एकमात्र अद्भुत और अप्रत्यागित रहेगा ! मध्यकाल की असभ्य सेना जिस प्रकार हत्या तथा अपहरण करके भोग-विलास का जीवन व्यतीत करती थी, वहुन कुछ वैमा ही पाकिस्तानी सेना ने किया । विश्वविद्यालय में हत्याकाण्ड के समय स्नातक की छात्रा ललिका भी वहाँ थी। परन्तु वह किसी प्रकार भागने में सफल हो गई । वह भागती-हांफती हत्याकाण्ड-क्षेत्र से दूर निकल कर वहां आ गई थी, जहां वह पहले भी कई बार पा चुकी थी । ललिका का मूल निवास स्थान सिलहट था । उसके पिता डा. मिश्रा सरकारी कार्यालय में सहायक सचिव के पद पर ढाका में नियुक्त थे। परन्तु आन्दोलन से पूर्व उनको पदोन्नति करके चटगांव भेज दिया गया। इसलिए वापिक परीक्षा तक ललिका को छात्रावास में रहना पड़ा । इससे पूर्व ललिका मिताली की पड़ोसिन थी। मिताली के घर के सामने ही ललिका अपने पिता तथा बहन के साथ रहती थी। मिताली से लतिका का पूर्व परिचय था। मिताली ने ललिका को देसकर कहा, "ललिका !" -ललिका को प्रांखों. ने हृदय की वेदना कपोलों पर उतार कर बंगाली ..
२० / कीति शेप भाषा में कहा, "ग्रामि काल रात्तिरेर विश्वविद्यालयेर पारे जड़िये पोडा येके नगछ। (मैं रात विश्वविद्यालय के काण्ड में शिकार होने मे बच गई)" "और अंजिका...?" "अोर समनके कोनी सबोर पाया जाय नाही । (उसका कुछ पता नहीं)" अंजिका ललिका की छोटी बहन थी, जो ललिका के साथ ही छात्रावास मे रहती थी, परन्तु पढने-लिसने तया अन्य कार्यों में ललिका से चतुर और बुद्धिमान थी। मिताली ने कहा, "तातो भालोई होपनि कि जानि प्रो की अवस्थाये 'लाछे । (यह तो अच्छा नहीं हुआ । पता नहीं वह किस अवस्था में होगी)" ललिका बोली, "पडार नेये मालो कि प्लो...! (सनिक कुत्तो के हाथ लगने से तो अच्छा है कि वह ")।" वार्ता बंगाली भाषा मे हो रही थी। दोनों ही उदास और गम्भीर बन गई। ललिका रोने लगी। उसी अवस्था मे ललिका बोली, "बाबा को क्या उत्तर दूंगी ? कैसे कहूंगी कि अजिका सैनिको को हविस का शिकार बन गई ।" मिताली बोली, "चिन्ता न करो, ललिका । सारा देश इसी प्रश्न का उत्तर खोज रहा है। न जाने कितनी अंजिकाएँ मर गई, कितनियो का अपहरण कर लिया गया और न जाने कितनियो ने आत्महत्या कर ली।" "यह वात सत्य है । जो रात मैंने देखा, कहा नहीं जा सकता।" "फिर भी क्या देखा?" उमने अपने परिधान पर दृष्टि डाली और मूक भाषा में कहा, "उसका प्रमाण मै हूं।" मिताली वोली, "चल, पहले कपडे ददल ले । कुछ खा ले, फिर अजिका का पता लगायंगे।' "अब उसका पता क्या लगेगा?" "सव लग जायेगा।" ललिका वस्त्र-कक्ष में कपडे बदलने लगी । कुछ क्षण पश्चात् हल्के नीले रंग के परिधान को धारण करके मिताली के पास आकर बैठ गई। मिताली ने ललिका को देखकर कहा, "सारे वगला देश की मुन्दरता कुराकर दुर्गा माता ने तुम्हारे अन्दर भर दी। सच रानी, अगर तू पकड़ ली कोति शेप/२१ जाती तो--" "प्रात्महत्या कर लेती।" "वे लोग तुझे अवनर न देते।" "क्यो?" "हर समय तुझ पर पहरा रहता।" "कमी तो एकान्त देते।" "परन्तु साधन न होते।" "गला दबा कर मर जाती।" "उस मरने से क्या लाभ होता ?" "वयों ?" "ऐसे तो हर कोई मर सकता है।" "मैं समझी नहीं।" "अच्छा, पहले वता, यह सब कैसे हुआ ?" "क्या बताऊँ ?" "जो कुछ हुमा, संक्षेप में वता।" "मैं और अंजिका साना खा कर कमरे में आकर पढने लगी। कुछ क्षण पश्चात् अंजिका यह कह कर कि दीदी मैं अभी आती हूँ, अपनी सहेली के पास किसी कार्य हेतु चली गई। प्राधा घंटा व्यतीत हो ही पाया था कि छात्रावास में गोली चलने की ध्वनि प्राने लगी। मैं डर गई। गोलियों तथा मनुप्य की ध्वनि से वातावरण या मौन समाप्त हो गया तया सभी छात्र-छात्राएं कमरे से वाहर आ गये । सैनिक कमरों के समीप तक आ गये थे। इस घटना में छात्र अधिक मरे तथा छात्राएं कम ।" "ऐसा क्यों ?" "छान निडर होते हैं । बाहर खड़े रहे। इस लिए गोली का शिकार हो गये। छात्राओं ने कमरों को वन्द करके साडी का फन्दा डाल कर आत्महत्या कर ली। परन्तु पापी सैनिको ने आत्महत्या का अवसर तक नहीं दिया । छात्रायो को फांसी के फन्दो से मुक्त करके उनके साथ दुर्व्यहार किया। इतने पर भी उनका मन नहीं भरा । कुछ छात्राओं को वे अपने साथ मनोरंजन के लिए गए। ऐसी घटना न कभी देखी है, न कमी देखी जायेगी । साडियों रहित - २२ / कीति शेप छात्रानो को बन्दूक की नोक वक्ष प्रदेश पर रखकर सदैव के लिए समाप्त कर दिया। जो छात्राएँ यौवन की मादकता और सौन्दर्य से पूर्ण थीं, उनको अफसरो की भेंट चढ़ा दिया। भगवान् जाने, उनके साथ क्या बीत रही होगी !" ललिका सूखे अधरी से बोली, "यह तो कुछ नही है । जो देखा गया उसको कहा भी नहीं जा सकता। जो छात्राएं वच जायेंगी, वे लज्जा के कारण अपने परिवार में लौट कर न जायेंगी । लौटेंगी भी किस मुंह से, उनका नारीत्व, उनका कौमार्य जो नष्ट हो गया होगा।" मिताली बोली, "देश को स्वतंत्र कराने में न जाने कितनी मांगो का सिन्दूर 'मिट जाता है, कितनी बहनों का नारीत्व लुट जाता है । यह सब फुरवानी तो देनी ही होगी । अत्याचार जो हो रहे हैं, उनको सहना ही होगा। इतना देख कर भी हम स्वतत्र हो गये तो मरने वाले, मिटने वाले मर कर अमर हो जायेंगे ।" नलिका शान्त रही। मिताली बोली, "मोर क्या हुआ ?" "मैंने अंजिका की एक आवाज सुनी, फिर अपने द्वार पर दस्तक अनुभव करके द्वार खोल दिया ! मैंने सोचा कि अंजिका.प्रा गई..परन्तु मंजिका नहीं आई । पाने वाला पा गया। मैंने उसकी इच्छा का विरोध किया। उसने मेरे बाल पकड़कर मेरे मुंह पर एक ऐसी लाल रेखा अंकित कर दी जिससे मेरा स्वामिमान, मेरी मर्यादा का स्तर-बिन्दु मूल्यरहित-सा हो गया ।" कहते- कहते ललिका की प्रांखों के मोती कपोलों की उस लाल रेखा को पार कर गए थे, मानो कपोल फिर से कोमल नीर रूपी अमृत से धुल कर पवित्र हो गए हो । साडी के छोर में मामू पोछ कर बोली, "इसमे पहले कि वह नारीत्व के रग से अपनी वासना में रंग मरता, उसका साथी मेरे कमरे में प्रा गया। 'एक अनार, दो वीमार' वाली कहावत ने मेरी रक्षा कर दी । दोनों वामना के कुत्ते नारी के भूखे थे। वे बंगला देश में पाकिस्तान के समर्थक बनकर नही पाए थे। निजी इच्छा पूर्ण करते पाए थे । अपनी वामना को शान्त करने पाए धे।" मिताली को देखकर ललिका बोली, "दोनो सड़ने लगे और एक-दूगरे को .--- कीति अप गोली से मर गए । छात्रावास में एंधेरा था। विद्युत प्रकाश पूर्व छात्रावास नही था । किसी प्रकार अंधेरे का सहारा वर सहा मधीही मिताली बोली, "चल, अच्छा हुआ ललिका सांस भर कर बोली, "हां, अच्छा तो हुआ, पर ऐसा कब तक चलेगा?" "विपत्ति और गुलामी सदा नही रहती ।" "और रेडियो के समाचार क्या है ?" मिताली बोली, "पाकिस्तानी मंनिकों ने योजनापूर्वक नर-संहार किया । अध्यापकों, पत्रकारों, कार्यकर्तायो और वी० आई० पी० की सूची तैयार की गई। फिर उनको घर से बुला, नदी के किनारे ले जाकर गोली से मार दिया गया । उनकी पुत्री-बहनों को पकड़कर कैम्पों में ले जाया गया । उनको या तो मार दिया गया या सैनिकों के मनोरंजन के लिए कैम्पो में रखा गया ।" ललिका बोली, "पाकिस्तान की जनसंख्या पांच और साढे सात अनुपात से है। पश्चिमी पाकिस्तान के तानाशाही का अनुमान है कि पूर्वी पाकिस्तान से जनसंख्या कम कर दी जाए ताकि भविष्य में बंगालियों का वहुमत ही न रहे । कुछ तो भाग कर भारत चले गये । कुछ संनिकों द्वारा मार दिए जायेंगे। इस प्रकार पाकिस्तान की समस्या हल हो जाएगी।" "ऐसे तो पाकिस्तान की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।" ललिका बोली, "उनका प्रयास तो है । निश्चित योजना के अनुसार नर- संहार करके तीब्रगति से बंगाल की जनसंख्या कम की जा रही है।" उसी समय दीवार घड़ी ने रात्रि के एक बजने का संकेत दिया। घड़ी की पोर देखकर मिताली बोली, "सर्प के द्वारा प्राधा निगल लिये जाने पर मी मेढक मक्खियों को खाता रहता है । उसी प्रकार तृष्णान्य पाकिस्तानी सैनिक अवस्था के ढल जाने पर भी विषय सेवन करता है । तृष्णा की आग सन्तोष के रस को जला डालती है । जैसे कुत्ते मुरदे को खाते हैं, वैसे ही तृष्णा मज्ञानी को खाती है।" उदास भाव से मिताली बोली, "भोग-विलास की तृष्णा ही पाकिस्तानी मंनिकों को हार का द्वार दिखाएगी । एक दिन ऐसा भी पाएगा, जब इन्हें सुरवन्दी कहा जाएगा।"
२४ / कीर्ति शेप
ललिका बोली, "सांप केंचुली को त्याग देता है, परन्तु विष नही
त्यागता ।"
सुन कर मिताली बोली, “अब तुम शयनकक्ष में आराम करो।"
"और तुम...... ?"
"मुझे रेडियो स्टेशन जाना है।"
"प्रव?"
"क्यो?"
"मेरी डयूटी है।"
"कब से ?"
"दो बजे से ।"
"कब तक?"
"सुबह के छह बजे तक ।"
"कव लोटोगी?"
"तुम्हारे उठने से पूर्व ।"
"मुझे नीद ही नहीं पाएगी।"
"मोना तो होगा ही।"
"कोशिश करूंगी।"
"अच्छा, सुदा हाफिज ।" मिताली चली गई। ललिका भी शयनकक्ष की
मोर नली गई । मिताली रेडियो स्टेशन न जाकर प्रोसिन के पास गई ।
मोतिन उसको प्रतीक्षा कर रहा था । द्वार सुला था। मिताली कमरे में प्राकर
बोली, "गाद कोरा, देरी होये गेलो। (क्षमा करना, देर हो गई):"
"एमी, ताते किछु नौय (माग्री, कोई यात नहीं)"
"अच्छा बनायो, कैसे हो?"
"मैं तो ठीक हूँ"तुम ?"
"मैं भी टीक हूँ, परन्तु"।"
मिनामी बोलो, "माज हितविद्यालय में जो हत्याकाण्ड हुमा, उनके बारे
में पता है?"
"परन्तु क्या?"
कीति शेप/२५ "हाँ, वह सब अच्छा नहीं हुआ। न जाने कितनी छात्राएँ मर गई।" "और... ?" "लापता है ?" "और"..?" "आत्महत्या कर गई।" "और... ?" "शेप तुम जानती हो हो।" मिताली की ओर देखकर प्रोतिन बोला, "मुझे एर यौवनमयी, मावनामयी, सौन्दर्यमयी तरुणी चाहिए।" "कि ? (क्या)" मिताली ने ऊँचे स्वर मे कहा । "घबरानो नहीं, ऐसी लड़की, जो डरपोक न हो। सुन्दर हो, चतुर हो । जो जासूसी का काम कर सके।" "मैं ?" "नहीं, तुम नही ।" "क्यो?" "तुम वही ठीक हो।" "मैं भी राष्ट्र सेवा करना चाहती हूँ।" "वहाँ रह कर भी तुम राष्ट्र-सेवा कर सकती हो, राष्ट्र के नाम संदेश देकर कि तुम हम से अलग नहीं हो।" "वह तो ठीक है ।" कुछ सोच कर मिताली बोली, "अाज ही मेरी एक बान्धवी (सहेली) पाक सैनिकों को वर्वरता का शिकार होते-होते बच गई। शायद वह जासूसी का काम कर सके।" "कसी है वह ?" "आपकी कल्पना पर खरी उतरेगी।" "फिर तो हमारी योजना सफल हो जायेगी। कव मिलायोगी उमे?" "जव तुम कहो।" "अभी।" "इतनी रात गये !" "क्यों?" "ऐसो कोई बात नहीं ! यकी थी, सो गई होगी। सुवह उससे पापका . -- २६/कीति शेप परिचय करा दूंगी।" "तुम्हें उस पर विश्वास है न?" "आप चिन्ता न करें।" "अाज ढाका मे गुजरते समय अब भी लाशो की गंध पाती है। छात्रावास से तथा निकटवर्ती क्षेत्र से लडकियो को पकड़ कर छावनी ले जाया गया । ढाका के अतिरिक्त जैसोर, फरीदकोट, तांगल और काहिरा-सभी स्थानों पर यह काण्ड दोहराया गया है | समाचार मिला है कि ढाका के पास एक ग्राम में बन्दूक दिखाकर पाक सैनिकों ने एक बाप को अपनी कन्या के साथ अनुचित मम्बन्ध स्थापित करने को कहा । जब बाप ने विरोध किया तो बाप को बन्दूक की नोक मे मार दिया और यौवनमयी तरुणी को बाप के सामने परिधान रहित करके उसका नारीत्व नष्ट कर दिया। छात्रावास दीवारो पर रक्त के धब्बे, गोलियो के छेद, ये सभी तो पाक सैनिकों की वर्वरता की कहानी कहते "फिर मुक्ति वाहिनी क्या कर रही है ?" "हमने बहुत किया । यदि हम कुछ न करते तो ढाका में ही पाँच हजार हत्याएं होती, जिनकी सूची पाक अधिकारियो ने बनाई थी। पूरे ढाका में एक मी वुद्धिजीवी नहीं मिलता।" "अब भी हर परिवार का कोई न कोई सदस्य मारा गया या लापता उसी समय पोतिन बोला, "कल फिर मैं अल्पाहार के समय घर पर पाऊँगा।" "क्या खायोगे?" "जी खिलामोगी। मसमतों पर सोने वालो के स्वप्न जमीन पर सोने वालो के स्वप्नों से सुन्दर नहीं होते।" "अापकी बात समझ में नही पाती।" "अच्छा है, न समझो। मिताली बोली, "कल मेरे साथ भी अगर कुछ ऐसा हो गया, तब...?" मोतिन बोला, "राष्ट्र के लिये मरने की मावना तुम्हारा साथ देगी। तुम अपनी और क्यों देखती हो ? उनकी ओर देखो, जिनके साथ ऐसा हो चुका है " कीति शेप / २७ और जो जिन्दा हैं।" "उनके जिन्दा रहने से लाम...?" "यह तो बाद में पता लगेगा।" "क्या? - पोतिन बोला, "न जाने कितनी तरुणी कितने संनिकों की इच्छापूर्ति के लिये कैम्पों में हैं । यदि यह भावना पाक सैनिको में न होती तो आज हम-तुम भी जिन्दा न रहते । यह कमजोरी हमारी विजय लेकर आयेगी और पाक का पतन होगा।" "लुटने के बाद विजय प्रायी, उनका पतन हुआ तो फिर क्या लाभ ?" प्रोतिन बोला, "कुरबानी तो करनी ही होगी। कल का कार्यक्रम तुम्हे बताना भूल ही गया । कल हमारी टुकड़ियाँ विभिन्न रेलवे स्टेशनों पर अधिकार कर लेगी, जिनमें कई स्टेशन ऐसे हैं जो हमारी विजय को समीप ला देंगे।" मिताली बोली, "और मेरा काम ?" "रेडियो स्टेशन पर रहना, प्रसारण करना । उसमें मेरी बात का विशेष ध्यान रखना है । एक काम और करना है । ललिका का मी गुप्त रूप से कुछ दिन ध्यान रखना होगा।" "उसे क्या करना होगा ?" "उसका काम बहुत गुप्त है।" "मुझे भी तो पता लगे।" "फिर गुप्त ही क्या हुआ?" "मुझ से भी गुप्त रखोगे ?" "नही, एमी बात नही ।" "फिर ?" ओतिन उसके कपोलो पर चिकोटी लेकर बोला, "तुम से कैसे गुप्त रखा जा सकता है ? तुम तो योजना की शृंखला को कड़ी हो।" मिताली ने लज्जावश प्रसों का आवरण गिरा दिया। चांद-सा मुखड़ा हाथो मे ऐसा लग रहा था मानो सीपी के मध्य मोतो रखा हो । मिताली ने मोतिन को देखा। उसी अवस्या में धीरे से बोली, "इस एकान्त में ऐसा
२८/ कोति शेप
वातावरण पैदा न करो, जिससे मूल कार्य का पथ पथरीला तथा ऊबड़-खाबड़
वन जाए।"
ओतिन अपने हाथो को देख कर वोता, "भूल स्वीकार करता हूँ ?"
"एसी कोई बात नहीं।" मिताली बोली, "मुझे आपत्ति कोई नही है ।
मैं तो तुम्हारी सम्पत्ति की रक्षक हूं। तुम जव चाहो।"
मोतिन ने उसके अधरों पर हाथ रख कर कहा, "वस, अधिक न कहो।"
प्रातः के चार बज चुके थे।
मोतिन बोला, "चलो, तुम्हे छोड पाऊँ ?"
"नही, मैं स्वयं चली जाऊँगी।"
"कोई मिल गया तो...?"
"देखा जायेगा, तुम्हारे साथ जाने में अधिक खतरा है।"
पोतिन सोच कर बोला, "हां, तुम ठीक कहती हो।"
जाते-जाते मिताली कह गई, "मैं प्रातः अल्पाहार पर प्रतीक्षा करूंगी।"
और मिताली चली गई। प्रोतिन द्वार पर खडा उसे देखता रहा।
तीन रात के हंगागे के कारण अाज की सुबह बड़ी मुरदा और उदास थी। और उससे अधिक मुरदा और उदास ललिका थी। उसे चिता थी अंजिका की। न जाने कहां होगी ? जिन्दा भी है या नही ? यदि जिन्दा है और पाक सैनिकों के चंगुल मे आ गई है तो अपनी रक्षा कैसे कर पायेगी ? उसी समय वहाँ पोतिन आ गया । ललिका को देस ओतिन समझ गया कि मिताली इसी के विषय मे बातें कर रही थी। ललिका की मृग की-सी अाँखे थी, लजीले यौवन-मौन्दर्य की प्रतिमा-सी देह । काले रेशम जैसे केश उस समय खुले थे। कुछ वक्ष-प्रदेश पर पड़े थे, कुछ कटि पर लहलहा रहे थे। नीले हलके परिधान तथा खुले केशो में वह ऐसी लग रही थी मानो नीले शुभ्र आकाश मे काली घटा का राज्य हो गया हो। प्रोतिन देखता ही रह गया। मिताली आकर बोली, "कब आये?" "अभी ।" "इनसे मिली, ये है मेरी सहेली ललिका, जिनके विषय में मैने आपसे बात की थी।" प्रोतिन वोला, "इनसे तुमने कह दिया ?" "नहीं, आप ही कहो।" "इनको कोई आपत्ति तो नही होगी ?" ललिका की ओर देखकर मिताली बोली, "आप अपनी बात कहो, योजना बजाओ।"
३०/कोति शेप
ललिका धीरे से आंखें उठा फर वोली, "क्या कुछ मेरे विषय में कहना
'कहो।"
उसी समय मोतिन बोला, "तुम तो जानती ही हो, देश में कैसी अवस्था
ललिका ने वाहा, "मैं केवल जानती ही नही, स्वयं उसका शिकार भी हो
चुकी हूं।"
"फिर तुम को एक काम करना होगा ।"
"जान भी जा सकती है ।"
"कोई बात नहीं।"
"काम कठिन है।"
"मैं करूंगी।"
"काप्टदायक भी है।"
"सहन करूंगी।"
ओतिन बोला, "तुमको जासूसी करनी होगी। कल बंगला देश स्वतंत्र
घोषित कर दिया गया। परन्तु पाक सैना से हमें टक्कर लेनी है । उन्हें देश से
निकालना है। उसमें हमे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता पड़ेगी।"
"मैं अपने देश के लिए सब कुछ कर सकती हूं।"
अोतिन बोला, "तुमको अपना नाम बदलना होगा। काम बदलना होगा।
सभी राज गुप्त रखने होगे। कैसा भी अवसर प्राने पर इस बात का ध्यान
रखना होगा कि कोई राज किसी को पता न लगे ।"
"मैं तन-मन-धन सब कुछ लगा दूंगी।
"इसमे धन को मावश्यकता नहीं है । मन लगा कर काम करना और
तन को रक्षा करना, बुद्धि से काम लेना । तुमको कभी असफलता नही
मिलेगी।"
"मैं सभी आदेशों का पालन करूंगी।"
"फिर हमारा देश अधिक दिन गुलाम नहीं रह सकता । जब तुम जैसी
कीति शेष/३१ नारियां देश में हैं तो फिर गुलामी की जंजीरें स्वयं टूट जायेगी।" "मुझे क्या करना होगा ?" "यह सव मी बता दिया जायेगा।" "कब?" "माज मन्ध्या को बताए स्थान पर मिलना । तुम्हारे काम की सूची तुमको दे दी जाएगी ।" मिताली मेज पर अल्पाहार लगाकर बोती, "पहले कुछ खा लिया जाए।" मोतिन वोला, "जैसी आपको इच्छा।", उसी समय गोलियो के चलने की आवाज आई। ग्राकाश मे विमान की ध्वनि और दूर कही तोपो की ध्वनि से ऐसा लगता था कि जैसे पाक सेना ने फिर कही आक्रमण कर दिया है । प्रोतिन नास्ता न कर चला गया और ललिका से सन्ध्या समय मिलने को कह गया । मिताली ने साथ चलने को कहा, परन्तु पोतिन अकेला ही गया। मोतिन जब उस स्थान पर पहुंचा तो पता लगा कि ढाका के समीप सभी नदियों पर, समी पुलो को हानि पहुंचा दी गई है और मुक्ति वाहिनी की टुकड़ियां गांवों में जाकर गावो को पाक सेना से मुक्त करा रही है। पोतिन के कार्य की रूप-रेखा अतुल तैयार करता था, जो समाज-सेवक था। मुजीव का ममर्थक था। युवक, बहादुर एवं निडर था । समाचारपत्र का सह-सम्पादक था । मुक्ति वाहिनी को टुकड़ी का कमांडर था । उसी को योजना के आधार पर पुलों को हानि पहुंचाई गई थी । चटगाँव, चाँदपुर, सिलहट इत्यादि नगरों में मुक्ति वाहिनी ने पाक सेना का सामना किया और अनेक स्थानों पर विजय प्राप्त की । उसी ने पोतिन को कहा था कि एक तरुणी गुप्तचर के रूप में नियुक्त की जाए जो पाक सैनिकों के कैम्प में जाकर उनके गुप्त कागजो तथा योजना का पता लगाए तथा आधुनिक हथियार और अन्य सामग्री का पता लगाए कि कहां, किस जगह रखी हैं और कराची से जलपोत कब आएगा जिसमें पाक सैनिकों की खाद्य-सामग्री तथा युद्ध-सामग्री होगी।
कीति शेप । ३२ जिस समय प्रोतिन अतुल के योजना-कक्ष में पहुंचा, वह बैठा हुआ बंगला देश का मानचित्र देख रहा था। पोतिन ने जाते ही कहा, "सर, अभी पाकिस्तानी जहाज कुछ दूर पर शोर करते मंडरा रहे थे । हवा को चीरती जहाजों की चीखें कानों में प्रार- पार हो रही थी। क्या ये बमवर्षक थे ? उन्होने बही बम गिराए अथवा पैसे हो चले गए ?" "हाँ, वे बमवर्षक थे । उन्होंन धानमण्डी के क्षेत्र मे बम गिराए । परन्तु कोई अधिक हानि नही हुई । मार्ग में खेलते दो शिशु घायल हो गए जिन्हे मुक्ति वाहिनी उठा कर ले गई । उपचार के पश्चात् उन्हें उनके सरक्षको को सौंप दिया गया। छत पर केश सुखाती एक दुलहन, जिसका विवाह इमी सप्ताह हुआ था, वम लगने से मर गई । हाथ की मेंहदी, मांग का सिन्दूर, तलाट पर लगी विन्दी, और पैरो को पायल सहित उसको अन्तिम यात्रा पूरी कर दी गई । एक गर्भवती युवती भी बमवर्षा का शिकार हुई।" कुछ देर मौन रहकर अतुल वोला, "गुप्तचर का कुछ हुमा ?" "हो गया।" "कोन है ?" "मेरे मित्र की चिर-परिचित मखी है।" "तुमने देख लिया है ?" "धीखा तो नहीं देगी ?" "प्रश्न ही पैदा नहीं होता।" "यह काम कर सकेगी?" "पाशा तो है ।" "उसके कार्य में तुम सह्योग देना।" "परन्तु उमे क्या करना होगा ?" "लो यह कागज, इसमे सब लिखा है ।" कागज देकर अतुल बोला, "क्या वह प्रेम इत्यादि का अभिनय कर मकेगी?" "वयोन कर सकेगी?" "उसने कभी किसी में प्रेम किया है ?"
कोति शेष| ३३ "नारी को प्रेम करना सीखने की प्रावस्यनाता नहीं होती। वह तो जन्म से ही प्रेम करती है। भाई, बहन व परिवार के अन्य सदस्यों से प्रेम करने के सारण ही तो वह परिवार को शुभचिन्तक बनती है।" "इस प्रेम भोर इस प्रेम मे अन्तर है।" "वह ऐसा करने में पीछे नहीं रहेगी।" अतुल चौला, "मैंने इस कागज में सभी बातें लिस दी हैं, जो तुमको करनी हैं । क्या नाम है उस लड़की का?" "ललिका।" "उसका नाम तुम 'जाहिदा' रख दो । नाम, मापा तथा वेपभूपा पाकिस्तानी होनी चाहिए । उसको फैम्प मे फटे हाल में जाना होगा । मुक्ति वाहिनी पर आरोप लगाएगी कि उन्होने उराको अपमानित किया है । इस तरह उनकी विश्वासपात्र बन जाएगी।" पोतिन बोला, "फिर?" "जब वह इतना कर पायेगी, तो उसको अग्रिम योजना की रूपरेखा से अवगत कर दिया जायेगा।" मोतिन बोला, "ठीक है ।" अतुल ने कहा, "तुम चटगांव और ढाका के उपनगरों, तागल, फरीदपुर, मैमनसिंह, रंगपुर में विस्फोट करने की सूची मुक्ति वाहिनी को भेज दी । वैसे मुक्ति वाहिनी ने सतखीरा नगर में अपना घेरा मजबूत कर लिया है । जसोर सेक्टर में अपने उखड़ते परों को फिर सुदृढ़ कर लिया है और इसी संक्टर में ठाकुर गांव पर अधिकार करने के बाद दीनाजपुर की ओर बढ़ते हुए हठई नदी तक पहुंच गई है।" प्रोतिन बोला, "फिर तो वह दिन दूर नहीं, जब हम पूर्ण स्वतंत्र हो जायेंगे।" "हमारा दृढ निश्चय है कि मार्च में हम अपने देश की स्वतन्त्रता की प्रथम वर्षगांठ मनायेंगे।" "क्या यह आवाज मुजीब की है ?" "ऐसा ही समझो।" "धन्य है मुजीब !". ।
३४ / कीर्ति शेप अतुल बगला देश के मानचित्र को देखकर बोला, "मैमनसिंह सैक्टर की कमालपुर चौकी पर हमारा अधिकार हो ही जाएगा । बनूच रेजीमन्ट के पाकिस्तानी सैनिको ने मुक्ति वाहिनी का समर्थन किया है । इसके बाद सिलहट मंक्टर में वहां के शमशेर नगर हवाई अड्डे पर अधिकार करना होगा । उसमे तुम्हारे गुप्तचर का मुख्य कार्य होगा। इसी सेक्टर में गाजीपुर व आस-पास के अन्य क्षेत्रों पर भी हम तुरन्त अधिकार कर लेगे।" उमी समय मुक्ति वाहिनी का एक जवान भाया । उसने बताया कि अभी- अभी मूचना मिली है कि चटगांव बन्दरगाह पर दो गनवोटों को मुक्ति वाहिनी के जवानों ने डुबो दिया । कराची सैनिक-मामग्री ले जाने वाले पाक पोत को पकड़ लिया है । इससे मुक्ति वाहियी को सामग्री तो मिली ही है, पाक सेना के उस क्षेत्र में पैर भी उखड़ गए हैं।" अतुल ने जवान को देखकर कहा, "शाबाश ! बहुत अच्छा !" मागुन्तक चला गया। प्रोतिन ने फिर बंगला देश का ध्वज देखा जो मेज पर कलमदान के समीप विद्युत पंखे की वायु में लहरा रहा था । अतुल कुछ कहना चाहता था। उसी समय फोन की घंटी ने मुंह की बात को रोक दिया । रिसीवर उठाकर बोला, "हलो......मैं बोल रहा हूँ" आज रात को.......ठीक है."आज रात को ही ठीक है। मैं मोतिन को भेज .... अतुल ने रसीवर रख दिया और मोतिन की ओर देखकर बोला, "जानते हो, किसका फोन था ?" "नहीं।" "डाक्टर चौधरी का।" "कोन डाक्टर चौधरी ?" "मुजीव का निजी सहायक ।" "क्या कह रहा था?" "आज रात को वोगरा के उत्तर में सोलह मील दूर गोविन्दगंज के 'निकट तीन पाक वाहन सैनिक-सामग्री लेकर वोंगरा की पोर चलेगे । उन वाहनो को वही पकड़ कर पाक सैनिकों को बन्दी बनाकर सामग्री मुक्ति वाहिनी के जवानों को दे दी जायेगी। यह काम तुमको करना होगा । उन कीति शेष/३५ वाहनों पर 'पूनी सफ' लिखा होगा, जिसमे गोला-बारूद लदा होगा। बोगरा सोलहवी पाल इन्फैटरी डिविजन इन वाहनों का संचालन करेगा। ध्यान रहे, बोगरा नामक प्रमुख नगर पाकिस्तानी सेना को डिविजन का प्रधान कार्यालय है। इस कार्य के लिए तुमको दस लडकी तथा पचास जवान मिलेंगे।" "लड़कियों का क्या होगा ?" अतुल वोला, "तुम भी पागत हो । एक कारवां चलानो, जिसमें उन लड़कियों को लेकर जानो। पाकिस्तानी कुत्ते नारी को देखकर राष्ट्र-सेवा को भूल जायेंगे। लड़कियों के पाम अपनी रक्षा के लिए कटार होनी चाहिये ताकि समय पर वे नारीत्व की रक्षा कर सके । उन्हें शिक्षा दी गई है, वे मर जायेंगी पर अपने आंचल पर दाग नहीं लगने देंगी।" "मुझे कब जाना होगा ?" "लतिका को मेरे पाम छोडकर तुम जाने का प्रबन्ध करो। तब तक मैं ललिका को उसका कार्य समझा दूं।" नोतिन उठने लगा तो अतुल बोला, "और सुनो, मेजर नजीरहुसैन उन वाहनों को रात नौ बजे रवाना करेगा । वह स्वय पालसी तथा बिलासी है। उसको तुमने बन्दी बना लिया तो प्राग लग जाएगी। इसलिए अभी तो तुमको युद्ध-सामग्री और मशीनगने चाहिए । बम उन्ही को लेकर तुरन्त लोटना । तुम्हारे साथ वाहन ड्राइवर भी जायेगे जो वाहन उचित स्थान पर पहुंचाकर मुझे सूचना दे देगे।" प्रोतिन ध्यान से सुनता रहा । उसी अवस्था मे अतुल बोला, "क्या तुम किसी को प्रेम करते हो?" "मुझे उत्तर चाहिए।" "मैं समझा नहीं।" "क्या तुम किसी से प्रेम करते हो?" "किससे?" "वगला देश से।" "यह तो सत्य है । मेरा अर्थ... " ३६ / कोति शेप "नही ऐसी बात नहीं।' "मुझे मेरे गुप्तचर ने सूचना दी थी।" "क्या प्रेम करना पाप है ?" "नहीं।" "फिर ?" "मेरे कहने का अर्थ यह है कि कहीं तुम नारी-प्रेम में राष्ट्रप्रेम का पथ भूल न जानो।" पोतिन बोला, "पहले राष्ट्रप्रेम, फिर नारी-प्रेम । यदि मेरे जीवन में नारी-प्रेम कभी बाधा बना मी तो में उसका त्याग कर दूंगा। परन्तु राष्ट्र- प्रेम की भावना को मरते दम तक मी नहीं छोडूंगा । "सच ! तुम वीर हो।" "परन्तु एक बात है, मर।" "कहो।" "मेरी प्रेरणा नारी है। मैंने उसकी साधना करके ही राष्ट्र-प्रेम का पौधा अपने उर मे उगाया है।" "कौन है वह देवी ?" "मापने नाम तो मुना है ।" "कव?" "रोज ही सुनते है ।" अतुल प्रोतिन का मुंह देखने लगा। उसे उसकी बात का विश्वास नहीं हुमा। इसीलिये अतुल बोला, “यह तो एक पहेली बन गई।" "आपने.......।" मोतिन अपनी बात पूरी भी न कर पाया था कि काल वैल की ध्वनि ने दोनो को शान्त कर दिया । उसी समय अतुल बोला, "शायद कोई है । तुम बैठो, मैं देखता हूँ।" मोतिन बोला, "पाप वैठिये, सर! मैं देखता हूँ ।" "शायद तुम पहचान न मको।" "यह बात तो ठीक है।"
फीति शेप / ३७ "अच्छा, तुम चलो । ललिका को मेरे पास छोड जाना । गाडी नम्बर दस और उनके साथ खर्ट वाहन तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे।" मोतिन पीछे वाले द्वार से चला गया । विद्युत घटी फिर वजी । पुरसी पर बैठे-ही-बैठे प्रतल ने कहा, "कौन ?" इसके पूर्व ही उसने मेज के कागज मेज पर मे हटा कर अपने रिवालवर पर हाथ रस लिया । वाहर से प्रावाज ग्राई, "चाई नम्बर पांच ।" यह वगला देश में मुक्ति वाहिनी का कोड वर्ड था, जिसको अतुल तथा उसके गुप्तचर ही जानते थे । वाई नम्बर पांच अन्दर पा गया । उसके एक हाथ में पट्टी बंधी थी। ऐसा लगता था, जमे हथेली से गोली पार हो गई हो। प्रतुल उसके हाथ को देखकर बोला, "नम्बर पांच, यह क्या हुआ ?" "गोली लग गई।" "कसे ?" "कैम्प में।" "लेकिन तुम तो वहां रसोइया बन कर गए थे, फिर गोली कैसे लग गई ?" "एक लड़की की रक्षा करते समय ।" अतुल ने प्रोखों पर पलकों का प्रावरण डाल दिया । वह समझ गया कि पाक सैनिकों ने उस पर अत्याचार किया होगा । कुछ क्षण मौन रहकर नम्बर पांच बोला, "मैं मेजर का खाना लेकर उस कमरे में गया था, जिसमे मेजर एक बंगाली लडकी के साथ बैठे थे।" अतुल ने कहा, "हूँ।" नम्बर पाँच बोला, "आगे आप भी जानते हैं । जव उसके मुंह में मेजर ने मात डाला, लड़की ने उसका हाथ झटक दिया । मेजर ने उसके मुंह पर एक तमाचा मारा । ऐसा देख कर मेरा खून खौल उठा । मैंने मेजर को उठा- कर जमीन पर पटक दिया । परन्तु मुझे मालूम नही था, उसके पास रिवालवर है। उसने मुझपर गोली चलाई। उसी समय लडकी मेरे सामने प्रा गई। पहली गोली मुझे न लग कर उस मासूम को लग गई जो आज जिन्दा नही है। दूसरी गोली मेरो हथेली पर लगी। वस भाग्य था मेरा कि रिवालवर में
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कीति शेप/ ३६ "फिर" "मैं स्वय ही बुला लूंगा।" नम्बर पांच जाता हुमा वोला, "जनता ने कुमों का पानी पीना छोड़ दिया है, क्योंकि पाक सेना ने कुंओं में विप डाल दिया है । कई कंगों में लाशें भी पड़ी हैं। छोटी नदियो की मछलियां भी कोई नही खरीदता । जनता का मत है कि वे भी ला सा कर मोटी हुई हैं।" अतुल बोला, "बलात्कार और हत्या ही तक पावः सैनिकः मोमिल नहीं रहे । हर घर को उन्होंने एक बार तो रोद ही डाला और जो कुछ भी मिला, उठा कर ले गये।" 'तभी तो लोग रात को बाहर घूमने से डरते है ! पचास हजार लोग भारत जा चुके है ।" अतुल बोला, "पाकिस्तान के तानाशाह नेता बंगाल की जनता को कुचल देना चाहते हैं । वे चाहते हैं, बंगाल की संस्कृति को नष्ट कर दिया जाए ताकि भविष्य में कभी पनपने का नाम न ले । लेकिन पाक नेता यह नहीं जानते-बगाल का बच्चा-बच्चा देश पर मर जायेगा परन्तु अत्याचार सहन नही करेगा। हम ही नही, सारा संसार जानता है कि पाक सेना धर्म के नाम पर अपने मित्रो से सहायता प्राप्त करती है । शायद वै राष्ट्र यह नहीं जानते कि पाक के तानाशाह नेतानो का यह एक ऐसा कदम है, जिसके उठाने से पाकिस्तान स्वयं नष्ट हो जायेगा, अपना विश्वास खो देगा। एक न-एक दिन यह अनुमव करेगा कि जो कदम उठाया गया था, वह अनुचित था।" उसी भाव में फिर बोला, "याद्घिाखा स्वयं एक दिन पदच्युत कर दिया जायेगा या परिस्थितियों के चक्र में प्राकर स्वयं पद त्याग देगा।" "लेकिन नया राष्ट्रपति कौन होगा ?" "कोई भी हो, पाकिस्तान का भाग्य वदल नहीं सकता। विदेश नीति नही बदल सकता । घरेलू समस्याएं ही पाक को खोखला कर देंगी । पाक का कोई भी राष्ट्रपति हो, वह भी उसी वातावरण तथा संस्कृति में पला है. जिसमे उसके भूतपूर्व नेतानो ने जन्म लिया है । फिर आने वाला राष्ट्रपति भी वर्तमान ४०/कीर्ति दोप राष्ट्रपति के पदचिन्हों पर चलेगा। कुछ भी हो, भविष्यवाणी यह कहती है कि पाकिस्तान अपनी घरेल समस्याग्रो का समाधान करते-करते समाप्त हो जायेगा । पाक जिमका अग है, जिससे पाक की उत्पत्ति हुई, उसी का नहीं हो सका, उसका पड़ोसी न वन सका तो दूर के राष्ट्र पाक से क्या माशा रस सकते हैं ? जो रखते भी हैं, उनकी आशा शीघ्र ही निराशा में बदल जायेगी।" नम्बर पांच चला गया । अतुल फिर योजना बनाने में लग गया।
चार अप्रैल के अन्तिम दिनों में मुक्ति वाहिनी के सैनिकों ने स्थान-स्थान पर पाक सैनिको का सामना किया। उन्होंने ढाका, सिलहट आदि बड़े नगरो पर अधिकार कर लिया। पाक की चौकियां भारत सीमा पर समाप्त हो गई। भारत का पूर्वी बंगाल को रास्ता ग्राम होगया। पूर्वी पाक की सीमा पर खड़ा प्रोतिन देख रहा था कि लाशों को कुत्ते खा रहे थे। क्या बच्चे, क्या नर-नारी-सवकी हत्या का यह खुला बाजार देखकर प्रोतिन की प्रांखें भर पाई। उसी दिन उसने देखा कि बंगाली लड़कियों को पकड़-पकड कर कम्पो मे ले जाया गया। उन्हें सैनिकों के मनोरंजन के लिए वेश्याओं के रूप में रखा गया । जो लड़कियां दो सप्ताह पूर्व उठाई गई थी, उन्हे मार कर उनकी लाशें गिद्धों के खाने के लिए मार्ग में फेक दी गई। अधिकतर लाशें उन्ही लड़कियों की थी, जो मोतिन के सामने उस दिन उठाई गई थी। वह वहाँ चल दिया। एक शिविर मे आया, जहां की दशा दयनीय थी। बच्चों का बुरा हाल था। नारियाँ कराह रही थी। उचित खाना न मिलसे के कारण सारा शिविर रोग का शिकार हो गया था। सैकडो वच्चे रने । वह वहां भी अधिक देर नही रुका, उसी समय पर आ गया, जहां मिताली उसका इन्तजार कर रही थी। प्रोतिन को व्याकुल दशा मे देखकर बोली, "माज पारो खाराव खावोर ? (आज अधिक बुरी खबर ।
४२ / कीति शेष पार बोलो ना (कुछ न पूछो)।" मिताली ने फिर कहा, "समझ में नहीं आता, सारा संसार इम अमानुपिक घटना पर चुप क्यो है ?" "हाँ मिताली, अरब, तुर्की, ईरान, मलयेशिया आदि सभी देश मुस्लिम होने के कारण पाक का समर्थन करते है।" "इसीलिए पाक के पाप को देखकर उन्होने आँखें बन्द कर ली।" योतिन बोला, "इतना ही नही, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, फ्रास, जापान आदि भी मौन है।" "कनाडा और प्रास्ट्रेलिया की सरकार भी दबे स्वर में बोलती है।" प्रोतिन रूखे स्वर में बोला, "चीन और अमेरिका ने जो कार्य किया है उससे उन से भारत के सम्बन्ध और विगड जायेगे।" "यह बात ठीक है। उन्होंने पाक सरकार पर इतना जोर नही डाला, जितना बगला देश के राजनीतिक नेताओं पर डाला । अमेरिका ने इस समस्या में नया मोड ले लिया। जो अमेरिका चीन को अपना- शत्रु समझता था, आज उसी से वार्ता करता है।" "अच्छा, तुम को भी अमेरिका के राष्ट्रपति के विशेप सलाहकार हेनरी किसिगर की गुप्त यात्रा का पता लग गया ।" .. "मैं क्या, सारा संसार जानता है । इतना ही नही,-निक्सन साहब भी शायद फरवरी में चीन जाएँ।" "परन्तु अमेरिकी जनता पाक अत्याचारो को देखकर मौन नहीं है।" मोतिन बोना, "जनता केवल आवाज ही उठा सकती है, कुछ कर नहीं सकती।" "ऐसा क्यो ?". "देख लो, तुम्हारे सामने है । अमेरिकी जनता वियतनाम - में हो रहे युद्ध के विरुद्ध भी आवाज उठाती पायी है, पर कुछ हुआ ? कुछ नहीं, और तय तक नहीं हो सकता जब तक नए राष्ट्रपति का चुनाव न हो. और चुनाव नवम्बर १९७२ से पहले होगे नहीं। उसमे पूर्व युद्ध बन्द नही होगा।" पोतिन शान्त रहा । वह कुछ न कह सका। मिताली ने फिर कहा, "ललिका को भेज दिया गया ?" ..
कीति शेप/४३ "हां।" "कहाँ ?" "यह तो अतुल ही जानता है ।" "तुमको नहीं मालूम ?" "मैं इस विषय में अभी कुछ नहीं कह सकता।" "वयो?" "मुझे ऐसा ही आदेश है।" "किसका ?" "योजना-निर्देशक का ।" कुछ क्षण मौन रहकर प्रोतिन बोला, "घबराने की कोई बात नहीं है। हमारे आदमी उसके साथ है । जहाँ वह है, उसी स्थान पर हमारा विशेप दूत भी है ।" "उसे क्या करना होगा ?" "पाक सेना की गतिविधि की रूपरेखा हम तक पहुंचानी होगी।" "वह ऐसा कर सकेगी?" "पाशा तो है ।" "कहीं उसकी सुन्दरता इस कार्य में बाधक न बन जाए ?" "ऐसा नहीं होगा । वह इतनी चतुर और बुद्धिमान है कि अपना काम सुगमता से निकाल लेगी।" "तुम तो एक दिन मे ही इतना जान गये । कही तुम पर जादू तो नहीं कर गई ?" "मुझ पर जादू कर गई, तभी तो मैं कह रहा हूँ।" मिताली समीप आकर बोली, "ऐसा न कहो, फिर मेरा क्या होगा ?" "यह तो तुम जानो।" "तुमको कुछ मालूम नही ?" मोतिन क्षणिक मुसकरा कर वोला, "नही।" मिताली अांखें उठाकर बोली, "मैं रोने लगूंगी।" "और इससे अधिक तुम कर ही क्या सकती हो ?" मिताली को आंखें भर आयी थी । वह उन्ही आँखों से बोली, "योतिन ।"
४४ | कीति शेप
मिताली ने नोतिन को देसा और प्रोतिन ने मिताली को । बोला, "मरे,
तुम तो
सचमुच रोने तगी। पगली, तुम भी क्या समझ बैठौं ! मेरे ऊपर वह
जादू कर गई, यह सच है, परन्तु अपनी बुद्धि का, योग्यता का, न कि योवन
की मादकता का ।"
कथन के साथ ही एक बार फिर मिताली ने मोतिन को देखा और साड़ी
के छोर से मांसू पोंछ लिए । बोली, "तुमने तो मेरे प्राण ही निकाल दिये
प्रोतिन मुसकराकर प्रेमातुर स्वर में बोला, "मा भी जल्दी गये ।"
मिताली पोतिन को देखकर बोली, "अंजिका का अभी कुछ पता नहीं है,
कहीं ललिका को भी कुछ न हो जाए ।"
"मैं पहले भी कह चुका हूँ और आज भी कह रहा हूँ, देश के लिए प्राण
देना गर्व की बात है। न जाने कितनी ललिका चली गई, कितनी लापता हैं
और कितनी ही मिताली चली जायेंगी।"
"मुझे अपनी चिन्ता नहीं है।"
"फिर ?"
"दूसरे के विषय में सोचना पड़ता है । पाप मुझे भेज दो, सुशी-खुशी
चली जाऊँगी."
"समय प्राया, तो तुमको भी जाना होगा।"
"मैं अपना सौभाग्य समझूगी ।" मोतिन को प्रोर देखकर बोली, "फिर
कब ..... ?"
"अभी नही ।"
"क्यो ?"
"अभी तुम जहाँ हो, वही पर काम करो।"
"वहाँ पर तो मैं काम कर ही रही हूं।"
"वह सेवा भी तुम्हारी कम नहीं है।"
मिताली बोली, "अब तुम कुछ खा लो, सुवह मे तुमने कुछ खाया
नही।"
"इच्छा नहीं है ।"
"ऐमे कब तक चलेगा। कुछ खायोगे तभी कुछ कर सकोगे । काम करने के
कीति शेप / ४५ लिए खाना बहुत आवश्यक है।" "कुछ विशेप बनाया है ?" "नही, वही भात, जो रोज बनता है ।" कहते के साथ ही मिताली रसोई घर की ओर चली गई ! प्रोतिन मन-दृष्टि को लेकर फिर विचार-श्रृंखला में बंधा हुअा शिविर में पहुंच गया। एक दिन बंगला देश के सामने सबसे बड़ी समस्या युद्ध के दौरान पैदा हुए शिशु वन जायेगे । उनकी देख-भाल कैसे की जायेगी ? उनकी प्रभागी माताओं का जीवन फिर से कसे सुखमय बनाया जाएगा? उमी शिविर में पद्मा नाम की एक तरुणी भी थी, जिसने अपने बारे में बताने से इनकार कर दिया था। पूर्वी बंगाल में गंगा नदी को पद्मा नदी कहते है, जो शान्ति और पवित्रता का प्रतीक है। उसे 'पद्मा' जैसा नाम भी पसन्द था। कुछ समय पूर्व वह तरुणी किसी की पत्नी तथा बच्ची की मां थी। अब उसका कोई और नाम था । लेकिन प्राज पूर्वी बंगाल में पाकिस्तानी सेना ने पद्मा नदी के पास सोए हुए शहर को तहस-नहस कर दिया । इसी नगर में पद्मा नाम की वह महिला अपने बच्चो के साथ रहती थी। पाक दरिन्दो ने इस महिला के निकट सम्बन्धियों को मार डाला और वह स्वयं बलात्कार का शिकार बन गई । किसी प्रकार वह अपने प्राण बचा कर पाक सैनिकों के पंजों से निकलकर शिविर में प्रा गई । यह महिला प्राज गर्भवती है। पूर्वी बंगाल में हजारों की संख्या में ऐसी पदमा, सुलताना, कावेरी और कृष्णा ऐसी परिस्थिति में हैं। सनमें से बहुतो ने तो अपना असली नाम बताने से इनकार कर दिया, ताकि नई परिस्थिति के अनुसार अपने को ढाल सके। उनके साथ जो अमानुपिक व्यवहार हुआ है, उसकी याद भुला सके। पदमा यह अनुभव करती है कि सम्भवतः उस दुर्भाग्यपूर्ण सन्ध्या को उसके पति और बच्चों को मार दिया गया था । उसने अपने पति की कराह सुनी थी। मान वह चाहती है कि लोग समझे कि 'पद्मा' नाम को नारी मर पच्चीस वर्ष की पद्मा ने कालेज की शिक्षा पाई थी । पूर्वी बंगाल के कई अन्य छात्रों को भौति वह भी उप विचारों की छात्रा थी। बाद में उसने ४६ / कौति शेष सरकारी कर्मचारी से विवाह कर लिया। वह गृहस्थी चलाने लगी । उसने भी स्वाधीन बंगला का स्वप्न देखा था। लेकिन उसे पता न था कि एक दिन वह भी स्वाधीनता-संग्राम के भंवर में फंस जायेगी। पद्मा के अलावा कई और नारियां भी शिविर में थी, जिनके साथ बलात्कार किया गया था। फिर वे अपने परिवार मे लौटकर नहीं गई । प्राज भी हजारों नारियाँ शिविर में है। इनमें वे शामिल नहीं हैं, जो मार दी गई या जिनके बारे में पता नहीं लग सका । आज तो नहीं, वंगला देश के स्वाधीन होने के बाद एक बड़ी समस्या इन बच्चों की होगी जो मां-बाप के मर जाने के कारण अनाथ हो गए हैं । मिताली समीप आकर बोली, "खाना लगा दिया गया है, चलो, उठो।" प्रीतिन उदास मुद्रा में प्राज्ञाकारी शिशु को भौति उठ कर खाने की मेज के समीप पहुंच गया । उस समय उसने मुख से न कह, केवले पाखें उठाकर कहा, "तुम भी खामो, मिताली।" नोतिन कुरसी पर बैठ गया । मिताली कमरे के बीच दरवाजे पर किवाड़ का महारा लेकर खडी हो गई। वह इस ढंग से खड़ी थी जैसे मीनाक्षी के मन्दिर में बनी अनेक मूर्तियों में से एक मूर्ति हो । उसी कमरे में एक चित्र लगा था। उस चित्र में एक तरुणी किवाड़ का सहारा लिये खड़ी थी, जिसके एक हाय में पुस्तक थी । सीधै पल्ले की साड़ी पहने, मागे की ओर लटकती हुई एक चोटी, उमरा हुआ वक्षस्थल, गोल-गोल मरा हुग्रा चेहरा और उसमें झांकते हुए खंजन पक्षी जैसे नयन । उस समय वड़ा ही आकर्षक लग रहा था मिताली का वह चित्र ! मन चाहता था कि हमेशा इसी प्रकार वह सामने खड़ी रहे पौर वह जी भरकर उमे देवता रहे। यह चित्र रक्षाबन्धन पर प्रोतिन ने अपने कमरे से पीचा था। रक्षाबन्धन के एक दिन पहले जब मिताली कालेज में मिली, तो कहा, "कल रक्षावन्धन है । पापा ने तुम्हें घर पर बुलाया है।" मोतिन ने मुमकरा कर कहा, "क्या रासी बांधने का विचार है ?" "हटो ! कुछ सोच-समझ कर बोला करो । राखी बांधने के प्रतिरिक्त मोर मों कर काम हो सकता है ।"
सीति दोप/४७ "युरा मान गई ?" "तुम बात ही ऐसी कहते हो।" "अच्छा यह बतानो, खिलापोगी क्या ?" "जो तुम कहो।" "पनीर-काजू वाले चावल और मछली।" "स्वीकार है।" "एक शतं और है, फोटो भी देना होगा।" "यह भी स्वीकार है।" उस दिन पोतिन देर से पाया । मिताली दरवाजे पर खडी प्रतीक्षा कर रही धी। प्रोतिन ने मिताती को इस मुद्रा मे खडी देखा तो कमरे का बटन दबा कर एक चित्र खीच लिया। यह वही चित्र है, जो कमरे में लगा है। ओतिन कुर्सी पर बैठ कर चित्र को देखता रहा। मिताती ने लज्जा से नीचे की ओर पलकें झुका ली। प्रोतिन उठा और मिताली के समीप आकर खड़ा हो गया। अनायास ही प्रोतिन के दोनों हाथ उसके कन्धो पर आ गये । लज्जा से मिताली ने मुंह नीचे झुका लिया । एक हाथ से उसकी ठोड़ी ऊपर करते हुए प्रोतिन ने कहा, "तुम कितनी सुन्दर हो ! क्षण मर को उसके नेत्र उठे, फिर वोझिल पलके झुक गई । रह-रह कर उसका उमरा हुअा वक्ष सांसो के साथ उठ-उठ कर गिर रहा था। उस समय मिताली प्रसन्न थी। जैसे. पाला मारी हुई वनस्पति सूर्य की किरण को स्पर्श पाकर लहलहा उठती है। चमेली की मुरभाई हुई कलियां जिस प्रकार चन्द्रमा का शीतल प्रकाश पाकर खिल उठती है । -मोतिन ने उसकी सीप जैसी आँखो मे झांक कर देखा। मावातिरेक में उसकी आँखों में प्रसन्नता के आंसू छलछला रहे थे। पोतिन बोला, "तुम रो रही हो।" उसने साडी के आँचल से आँसू पोंछते हुए कहा, "तुमयो क्या हो गया - "वाद में बताऊँगा, पहले मेरे साथ कुछ खा लो।" प्रोतिन ने कहा । मिताली विरोध न कर सकी। ग्याने के समय वह प्रोतिन का साथ देती रही। उसकी इच्छा न होते हुए ४८/ कीति शेप भी उसे ऐसा करना पड़ा । स्नेह-मरी दृष्टि से मिताली ने कुछ भात प्रोतिन के मुंह में डाला तो उसकी अंगुलियाँ फंस गई प्रोतिन के दांतों के मध्य । पल भर के लिये वह तडप उठी। मुक्ति मिलने पर बोली, "बडे वैमे हो !" यह कहने के साथ ही वह अपनी कोमल अंगुलियो को देखने लगी जिनमें एक लाल रेसा अकित हो गई थी। श्रोतिन ने व्यंग्य-मरे स्वर में कहा, "लामो, सहला दूं।" मिताली ने अलसाए नेत्रो से एक बार उसकी ओर देखा और फिर आँखे दूसरी ओर फेर लीं। खाना समाप्त हो गया था। प्रोतिन धीरे से बोला, "वास्तव में खाना अच्छा बना था।" "बना रहे हो या वास्तव में ?" "बना नही रहा, सच कह रहा हूँ।" "धन्यवाद ।" मुसकान-भरे स्वर मे मिताली ने कहा । "एक बात बतायोगे?" "कहो ।" "सच-सच बतानो, हृदय के किसी कोने में मेरे लिये स्थान है ? मैं चाहती हूँ, जीवन भर तुम्हारा साथ दूं। सदा साथ रहूँ ! आपसे कभी वियोग न हो । मैं अपलक नेत्रों से प्रापको देखकर सब कुछ पा सकूँ ।" "तुम समझदार होकर यह क्या मूरों का प्रलाप कर रही हो?" "यौवन मूर्ख बना ही देता है।" 'तुम मुझसे क्या चाहती हो?" "मृत्यु के समय मेरा शरीर आपके पैरो में हो, बस और कुछ नहीं चाहती।" "किस रूप में मेरे साथ रहना चाहती हो?" "जिस प्रकार तुम रस सको । मैं अकेली रहना नहीं चाहती। पता नही कव'कोन पशु मा जाए भोर तब मुझे फिर से पाने के लिये ब्रह्माण्ड का कोना-कोना भी छान डालोगे, तब मीन मिल सकूगी।" "राष्ट्र के लिये मैं अपने को वनिदान कर दूंगा । अपनी भावनामों को नष्ट कर दूंगा। तुम मेरो प्राण हो, मेरी साधना हो। अपने प्राण भी
कीति शेप/४६
प्रसन्नता से राष्ट्र के लिये त्याग दूंगा।"
"मैं अपनी भूल स्वीकार करती हूँ। परन्तु .."
"परन्तु क्या?"
.
"मैं तुमसे प्रेम करती हूं।"
"यह तो नारी का स्वभाव है।"
"परन्तु नारी जीवन में एक बार प्यार करती है। मैं तुम्हारे बिना
जिन्दा नहीं रह सकती।"
"मैं तुमसे उतना ही प्रेम करता हूँ, जितना राष्ट्र से । परन्तु प्रथम स्थान
राष्ट्र का है।"
"तभी तो मैं कहती हूं कि मुझे भी अपने साथ रखो, ताकि साथ-साथ
मर सके । चार हाथ मिलकर अधिक काम कर सकेंगे। मैं अपने प्राणों का
बलिदान कर दूंगी, परन्तु तुम्हारी छाया में।"
प्रसन्न मुद्रा में प्रोतिन आँखो से बोला, "जैसी तुम्हारी इच्छा । कल मैं
तुम्हे अतुल से मिलवाऊँगा और उससे स्वीकृति प्राप्त करके आगे कोई योजना
बनाऊँगा।"
मिताली मी आँखों से हँस दी और उसी मुद्रा में प्रोतिन को देखने लगी।
पाँच दूसरे दिन प्रात: प्रोतिन अतुल से मिला । अतुल प्रोतिन को देखकर बोला, "वास्तव मे तुम बहुत बहादुर हो। ललिका ने भी अपना काम बहुत चतुरता से किया है । अमी मेरे पास मूचना पाई है कि पाकिस्तान ने. गलत प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया है। फिर भी ऐसे प्रचार से कर्णधारों को अपना विवेक नहीं सोना चाहिए। पाकिस्तान ने अपने प्रचार में कहा है कि जो शरणार्थी भारत पहुंच गए है, उन्हें वापस भेज दो। परन्तु हमें विश्वास है, भारत कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिससे हमारी मित्रता को पांच आए।" "सुना है, भारत ने कह दिया है कि वह उनको तभी लौटायेगा, जब वह उनके जीवन और अधिकार सुरक्षित समझेगा।" "ठीक है, प्रोतिन ! मारत हमारा मित्र है । न कभी उसने अत्याचार किया है और न सहन करता है। इतना ही नहीं, भारत सरकार ने घोषणा की है कि वह बंगला देश की जनता को लोकतंत्रीय मांग का समर्थन करती उसी समय रेडियो ढाका ने प्रसारण किया, "यह ढाका वेतार केन्द्र है । अब आप मिताली से ममाचार मुनें । अभी मूचना मिली है कि राजशाही, सिलहट और चटगांव के रेडियो स्टेशनों ने भी मुजीव के प्रादेशों के अनुसार कार्य करना शुरू कर दिया है। सारे पूर्व बंगाल ने वास्तविक पर्यो में मुजीव के मादेशों के अनुसार कार्य करना शुरू कर दिया है। सारे पूर्व बंगाल में वास्तविक प्रयों में मुजीव को ही शासन सत्ता हो गई है। माजकल कीति दोग/५१ हुमा, । मुजीव को पश्चिम पाकिस्तान में नजरबन्द किया हुआ है । उन पर अनेक दवाव तथा अत्याचार किए जा रहे हैं। समाचार समाप्त हुए । अव राष्ट्रीय गान मुनें ।" रेडियो बन्द करते हुए मोतिन ने कहा, "ऐसा लगता है, सैनिक अदालत मुजीव पर मुकदमा चलाया जाएगा और उनको मृत्यु-दण्ड दिया जायेगा।" "मुकदमा तो चलेगा, परन्तु मृत्यु-दण्ड शायद न दिया जाए। यदि ऐसा तो बंगला देश में आग भडक जाएगी।" अतुल बोला । "मित्र देश भी तो गान्त नहीं बैठेगे।" “यह भी सत्य है ।" अनुल योला फिर कुछ क्षण मौन रहकर आगे वोला, "इस पर तो वाद में विचार करेंगे। पहले हमें यह देखना है कि कुष्टिया, निदह और जसोर में पाकिस्तानी सेना ढाका की अोर पा रही है। अब हमें टाका की रक्षा करनी है । यह भी पता लगा है कि चांदपुर, खुलना, वागेमाल से भी सेना ढाका की पोर आ गई है । इसके लिए तुम नदियों और नालों पर बने हुए शेप पुलों को भी वारद से उडा दो जिससे पाक सेना आगे न बढ सके । विना पुल के तोपें और मोटर गाड़ियां नदी-नालों को पार नहीं कर सकती।" "सर, अभी हमे पुल नहीं तोडने चाहिए । समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए । हमें सचेत रहना चाहिए । 'समय पाने पर पुल को उडाना ठीक होगा।" "यह भी ठीक है । ललिका अपने काम में कहां तक सफल हुई है ?" "वहां पहुंचना कठिन होगा।" "यह तुम कह रहे हो?" पोतिन मौन रहा, उत्तर न दे सका और उसी क्षण द्वार खोल कर बाहर निकल आया। वह सीधा अपने गुप्त सामग्री कक्ष मे गया । वहां से पाकिस्तानी-थल-सेना की वर्दी पहन कर पाक कम्प' की ओर चल दिया, जहाँ मेजर जनरल हैदरअली योजना कक्ष का प्रधान था। उसी योजना कक्ष से ललिका को गुप्त योजना की रूपरेखा लोनी थी, जो हैदरअली के सहायक महमूद के पास थी। यह बात सत्य है कि ललिका बहुत.चतुर थी। यौवनमयी थी । परन्तु
५२/कीति शेष
महमूद भी कम चतुर नही था । गत जीवन में वह तीन पत्नियो को तलाक
देकर चौथी पत्नी को विप दे चुका था और अब ललिका पर-उसकी प्रॉसे
थी।
वर्दी तथा आधुनिक गन लिए हुए प्रोतिन द्वार पर खड़ा महमूद और
ललिका की वार्ता सुन रहा था। उसी समय ललिका ने कहा, "अच्छा हुआ
महमूद मैया, तुम मुझे मिल गए, नहीं तो मुक्ति वाहिनी मेरी इज्जत बरबाद
कर देती।"
महमूद आँख उठाकर बोला, "कल से तुम एक ही वात की रट लगाये जा
रही हो, महमूद भैया । केवल महमूद भी तो कह सकती हो।"
कल की ललिका और आज की जाहिदा ने कहा, "लेकिन इससे क्या
होता है । कहने से तुम.....।"
"जब कुछ नही होता, तब कहती क्यों हो?"
"जैसा तुम चाहो ।"
वह जाहिदा के पास आकर बोला, "तुम विश्वास करो। अब तुम यहाँ
सुरक्षित हो । सभी पाकिस्तानी एक से नहीं होते ।"
"हर करेला कडवा होता है।" जाहिदा वोली, "मन्दिर से निकलने वाला
हर प्रादमी पुजारी या भक्त नहीं होता।"
"मयखाने से निकला हर प्रादमी शराबी नहीं होता।"
"परन्तु वदनाम तो होता है ।"
"तुम तसवीर का एक पहनू देखती हो।"
'खोटा सिक्का दोनों तरफ से ही खोटा होता है।"
ललिका कह तो गई । जब उसने महमूद को देखा तो उसकी आँखें लाल
थी।
उसी समय ललिका बोली, "वस, बुरा मान गए। मैं तो तुम्हारी परीक्षा
ले रही थी।" और कहने के साथ ही समीप पाकर अभिनय-मुद्रा में उसकी
छाती पर सिर रख दिया ।
महमूद अपने भाव का कुछ प्रदर्शन कर पाता, उससे पूर्व ही ललिका सिर
उठाकर बोली, "मैं तो इन गोलियो की आवाज सुन-सुनकर तंग मा गई हूँ।
मल्लाह जाने, कद खत्म होगी यह पावाजे !"
कीर्ति शेप/ ५३
महमूद बोला, "तुम मुनती क्यो हो, कान बन्द कर लो।"
"पपा बात करते हो ! मेरे देश में गोलियां चल और मैं मुनना भी न
चाहूं।" कथन के साथ ही उसने खिड़की का दूसरा द्वार भी खोल दिया और
फिर समीप माफर बोली, "ऐमे कब तक चलेगा ?"
महमूद उसके नयनों में अपना प्रतिविम्ब देखकर बोला, "तुम चाहो, तो
आज स्कवा दें।"
"मेरे पाहन से क्या होता है ?"
"वयों, होता क्यों नही, तुम प्राज्ञा दो ।"
"मुझे विश्वास है, तुम सफल होगे।"
"परन्तु मुझे नहीं !"
"ऐसा क्यो ?"
"न जाने क्यों?"
"तुम अपने मन की बात तो कहो।"
"तुम 'मया' शब्द का मम्बोधन वन्द करो, तो कहूं।"
जाहिदा क्षणिक भुमकराई और बोली, "चलो...... ।'
"कहाँ ?"
"शयन-कक्ष में," मांखों के संकेत से पांखों ने पलकों के पर्दे के अन्दर से
"बहुत शीघ्र ही अपनी राह पर आ गई।"
"समझोता जो करना है।"
"किससे?"
"परिस्थितियों से !"
"लेकिन में एक बात से डरता हूं।"
"वोलो ।" जाहिदा ने कहा ।
"हैदरअली का प्रादेश है कि"....?"
"वोलो, मौन क्यों हो गए ?"
"तुम उसके लिए सुरक्षित हो।"
"यह हैदरअली का आदेश है और तुम मान लोगे?"
"नौकरी जो ठहरी ।"
५४ / कीति शेप "फिर मेरे हाथ की चूडियां तुम पहन लो ।" उसने चूड़ियां उतार कर महमूद को और बढ़ा दी और फिर उसकी पोर देख कर मौन हो गई। उसकी आँखो का अभिनय-जल कपोलों पर आ गया। उसने इससे अधिक और कुछ नहीं कहा । पलके झुकाए गयन-कक्ष की ओर चली गई। पलंग पर तकिये पर सिर रख कर वह अद्धंलेटी मुद्रा में गम्भीर बन गई । कुछ क्षण रुककर महमूद भी उसी शयन-कक्ष में आ गया, जहाँ जाहिदा गम्भीर मुद्रा में लेटी थी। महमूद प्रेमातुर वाणी मे वोला, "तुम तो बहुत भावुक हो।" जाहिदा ने आँख उठाकर एक क्षण देखा, परन्तु अधरों से कुछ कहा नहीं। भीगी आँखों से कहा, "तुम भी तो बहुत कायर हो।" "हैदरअली को जरा भी शक हो गया तो मुझे गोली से उड़ा देगा ।" "और जब वह मेरा नारीत्व पशुता की गोली से उडायेगा, तब तुम देख सकोगे ?" "कदापि नहीं ।" "फिर कोई उपाय सोचो।" महमूद मौन रहा। जाहिदा उसी मुद्रा में बोली, "मैं उसे गोली मार दूंगी।" "तुम.. ?" "जव उसकी शक्ल देखोगी तो अचेत हो जानोगी।" "सभी मुसलमान तुम्हारी तरह कायर और डरपोक नही होने । लामो रिवालवर, तुमको गोली मार दूं।" कयन के - साथ ही ; क्षणिक मुसकरा कर जाहिदा ने महमूद को पलंग पर बैठने का संकेत किया । उस समय महमूद विचार-मग्न था। वह सोच रहा था, किसी प्रकार जाहिदा को यहां से निकाल कर ले जाना चाहिये, नहीं तो प्राज की रात मद्यपान करके वह जाहिदा की मांग करेगा। महमूद पलंग पर बैठकर वोगा, "मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा । परन्तु "परन्तु क्या ?"
कीति शेप/५५ "तुमको मेरी बनना होगा ।" "विश्वास नही तुमको, बतायो, अव और मैं कहां जा सकती हूँ ? मुक्तिवाहिनी ने मेरे मां-बाप, भाई-वहन सम्रको मौत के घाट उतार दिया।" "यह बात मेरी समझ में नहीं पाई । मुक्तिबाहिनी ने तो सबकी रक्षा की है । उमने किसी पर गोली नहीं चलाई।" "तुम तो यहाँ बैठे हो । वाहर निकल कर देखो, तो पता लगे, क्या हो महमूद के विचारों ने पलटा खाया और सोचने लगा, "यह रूपमयी है, सुन्दर है और सौन्दर्य के आधार पर पौवन के पथ पर खड़े होकर नारी की कामना करना कोई पाप नही है।" "मैं तुम से प्रेम करता हूँ।" "देख लो, प्रेम का सम्बन्ध प्रात्मा से होता है।" "मैं समझता हूँ।" "फिर पालन भी करना होगा।" "जब विवाह हो जायेगा, तो पालन पर विचार करना ?' जाहिदा क्षणिक मुसकरा पड़ी और महमूद की ओर देख कर बोली, "मुझे जितना देखना था, समझना था, देख-समझ लिया। अब तुम जानो। मुझ मे इत्तनी शक्ति नहीं कि मैं तुम्हारी उपेक्षा कर दूं और मैं तुम से कह दूं कि मैं तुम्हारी नहीं । अब यह जीवन तुम्हारा है।" महमूद के नधर जाहिदा के अधरो से परस्पर मिल ही जाते, यदि प्राकाश में स्टारफाइटर विमान शयनकक्ष के ऊपर से उड़ कर न जाते । ये विमान जामनगर विराम-स्थल स्थित रक्षा-प्रतिष्ठानो पर बम गिराने के लिये थोडी ऊँचाई से उड़ने का पूर्व अभ्यास कर रहे थे। फ्लाइट रहमानखां इस विमान को उडा रहा था जो महमूद का चचेरा भाई था। रहमानखां की वडी वहन महमूद का निकाह पढ़ा गया था। परन्तु महमूद ने उसे दो वर्ष पूर्व तलाक दे दिया था। इस कारण उनमे आपस मे शत्रुता थी, जो आज भी इन दो परिवारों में चली आ रही थी। शान्त मुद्रा में महमूद को खड़ा देख कर जाहिदा योली, "ऐसा कव तक चलेगा ?"
"५६ / कीति शेप महमूद जाहिदा को विश्वासपात्र समझने लगा था। उसी भाव से कहा, "सच तो यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान के हाथ से पूर्वी पाक चला जायेगा । आज नहीं तो कल वंगला देश स्वतंत्र हो जायेगा और मुजीव को मुक्त करता होगा । याह्यिाखां की सरकार का पतन होगा। शायद कोई दूसरा, भुट्टो भी हो सकता है, पश्चिमी पाकिस्तान का राष्ट्रपति वने।" "यह सब तुम कैसे जानते हो?" "हमारी योजना केवल कागजों तक ही रह जाती है। इतनी निष्प्राण योजना प्राजकल चल रही है कि कहते है कुछ और करते हैं कुछ। ऐसी ही योजना चलती रही, तो पाक घुटने टेक कर बैठ जायेगा । विदेश नीति में तो पाक बुरी तरह पराजय खा चुका है।" "फिर पाक ऐसा क्यो करता है ? शान्ति से मित्र देशो के साथ मिल कर विकास क्यों नहीं करता ? भारत को देखो, विकास के पथ पर बढ़ता ही जा "पाक को यही तो जलन है। इसी कारण तो वह कई वार युद्ध के मैदान मे कूद चुका है । और जानती हो परिणाम, क्या हुमा ? गत युद्ध में जो हानि पाक सरकार को उठानी पड़ी, उसकी पूर्ति मौत के मन्तिम दिन तक भी नहीं हो सकेगी।" जाहिदा वोली, "इस योजना पर तो फिर विचार हो जायेगा, पहले भाज की रात के बारे में विचार कर लो।" महमूद राष्ट्र को सारी मोजना भूल गया । यह भाकारा से नीचे गिर कर पृथ्वी पर मा पड़ा। वह प्याकुल-सा होकर बोला, "कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा।" जाहिदा बोली, "बाहर क्तिने पहरेदार है ?" "कोई गिनती ! क्यों?" "यहां से चलना मम्भव हो मकता है "फिर चला जाए।" "ऐमे नही ।"
कीर्ति शेप / ५७
"मार्ग साफ करके ।"
"अर्थात् ।"
"हैदर अली ने तुम पर प्रोस उठाई, तो उसकी मौत से हमारा रास्ता
साफ होगा।"
"कहीं ऐसा न हो, तुम वन्दी बना लिये जानो।"
"उसका खून तुम करना।"
जाहिदा वक्ष पर हाथ रस कर बोली, "मैं ?"
"हां, तुम । इस प्रकार में सुरक्षित रहूंगा और तुम्हारी अधिक मदद कर
सकूँगा।"
जाहिदा ने कहा, “इतनी अच्छी योजना बनाते हो, फिर पाक पराजय का
दर्पण क्यों देखता है ?"
"वहां हमारी योजना नहीं होती । हमे तो निर्देश का पालन करना होता
"क्या सभी योजनाएँ पहले यहां पाती हैं ?"
"अधिकतर निर्देश गुप्त रूप से कोड नम्बर से आते हैं, जिसका ज्ञान कम
ही अधिकारियो को होता है।"
बातों ही बातो मे जाहिदा ने महमूद से कोड शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर
लिया और उसे इस बात पर सहमत कर लिया कि यदि हैदर अली ने कोई
अनुचित कदम उठाया, तो उसे अपने किये की सजा अवश्य मिलेगी।
महमूद ने देखा कि मेज पर 'जानीवाकर' रखी थी। उसी उठी दृष्टि को
जाहिदा ने भी देखा। जाहिदा ने अनुमान लगाया कि अब महमूद मद्यपान
करेगा।
।
जाहिदा का अनुमान ठीक निकला । महमूद मेज की ओर चलने लगा।
उसी समय जाहिदा ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा, "ऐसे नहीं, नहीं
तो हैदर अली से विजय प्राप्त नहीं कर सकोगे।"
लम्बी साम लेकर महमूद बोला, "मैं स्वीकार कर चुका हूं, तुम मानो
या न मानो। प्यार करके नारी किसी को जाने योग्य नहीं रहने देती।
किन्तु..."
"किन्तु क्या ?"
५८/ कीति शेप "उसके प्रेम की एक कसोटी नहीं होती। इसलिये मैं नारी-मक्त नहीं बन सका।" , जाहिदा ने कहा, "तुम्हारा सुख मेरा सुख है । तुम यह न समझना कि मैं तुम्हारा हित नहीं चाहती। मुझे दुख है कि तुमको शरीर-कान्ति मिली है स्निग्ध मोम की, किन्तु हृदय मिला है कठोर स्फटिक शिला का ।" उसी समय जाहिदा को महमूद ने अपनी वाहुनो मे प्रावद्ध करना चाहा । महमूद की रक्तिम अांखो में भेड़िये फुदक रहे थे। महमूद प्यासे अधरों को जाहिदा के अधरो के समीप लाने की मुद्रा मे था। उसी क्षण जाहिदा मेज के समीप जाकर बोली, "इच्छा है ?" "आज मैं रोमियो हूँ, मेरी जूलियट।" "अभी नहीं, पहले अपना आश्वासन पूरा करो। मैं जूलियट की भूमिका में खरी उतरूंगी।" "मेरी मांग तुम से नही, तुम्हारे रूप से, यौवन से है।" "मैं जानती हूँ। वह भी मेरी इच्छा के विना पूर्ण नही कर सकते।" "जिस लड़की से मेरी शादी हुई थी, उसे मैं विलकुल प्यार नहीं करता था। किन्तु वह सोने की चिड़िया थी। उसका बाप ए०ए० खान जूट, दियासलाई, मूती कपड़ा, जहाजरानी, प्लाई वुड का एकमात्र व्यापारी था । परन्तु उसकी लड़की को भी मैंने तलाक दे दिया।" "इन बातो से लगता है, तुम नारी-प्रिय नही हो।" "यह बात नहीं थी। उसके प्रेमियो की संख्या कम नहीं थी।" "यह तो तुम जान चुके हो कि मुक्ति वाहिनी ने मेरे अंगो में क्षीणता ,ला "यह बात बीसवी सदी में पाश्चर्य की बात नही है।" "यह बात तो सत्य है । आज के समाज को देखकर मै तुम्हारी वात का समर्थन रखने का बल रसती हूँ! यह नादिरशाही पाक को सोखला करके रस देंगी। साय के पांच वगने लगे थे । हैदर के आने का समय हो गया था। महमूद चिन्तित था; सौन्दर्यशालिनी रूपमयी जाहिदा को भी प्राप्त न कर सका भौर न ही योजना सम्बन्धी कागजों को देख सका।
कीति शेप / ५६
उसी समय महमूद वोला, "तुम कुछ चाय इत्यादि का आदेश दौ, तब तक
मैं गुप्त कक्ष में जाकर कुछ सरकारी काम कर लूं।"
"मैं भी साथ चलूंगी। तुम्हारा मन वहनाती रहूंगी।"
"नहीं, वहाँ प्रवेश वजित है।"
"मेरे लिये भी?"
"तुम्हारी जाहिदा के लिये भी ?"
"हाँ, सब के लिये।"
"महमूद की फियान्सी के लिये भी ?"
मनुप्य भी कितना पागल होता है ! नारी के यौवन की मादकता देखकर
सब कर्तव्य भूल जाता है। चाहे उनके बीच प्रेम-चरित्र या प्रेम-व्यक्तित्व को
छूने वाले किसी तत्व के बारे मे कोई मौलिक समझोता भी न हो, इच्छा भी
न हो, पर एक एसी विवशता होती है।
"प्राचीन युग की अभिसारिका हो तुम ।" महमूद बोला ।
"मुझे मालूम नहीं, तुमने प्रेम शास्त्र पढ़ा भी है कि नहीं।" जाहिदा ने
मुसकरा कर कहा।
महमूद बोला, "चलो, प्रादेश-निषेध बाद में देखा जायेगा" फिर जाहिदा
को ओर देखकर बोला, "मनुष्य यहाँ पर आकर हार जाता है । तुमने किसी
लोकोत्तर-गुण की अपेक्षा नहीं की। तुम्हारे व्यक्तित्व में, तुम्हारे साधनों
में और तुम्हारी उपलब्धियों में कुछ ऐसा अद्वितीय था कि तुम्हारी उपेक्षा
करना सम्भव न हो सका।"
"चाहने न चाहने का, किसी-किसी पर अधिकार नही होता है।"
"यह विवशता होती है कि मनुष्य नारी को स्वेच्छा से सुन्दर, सबसे
सम्पल और सबसे अधिक अपना मान लेता है।"
बातो ही बातों में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर वे गुप्त कक्ष मे चले
गये।
उस दिन वह गुप्त योजना की रूप-रेखा विस्तारपूर्वक प्राप्त नहीं कर
सकी। संक्षेप में जो कुछ जान पायी, वह अपने संकेत से प्रोतिन को वता
दिया और उसी संक्षिप्त रूप-रेखा से अतुल ने प्रोतिन के सहयोग से दिनाजपुर,
राजशाही छावनियो का एक-दूसरे से सम्बन्ध तोड़ दिया ।
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कीति शेष | ६१ + के साथ बलात्कार करना, कीचड़ उछालना, उमे मार्गभ्रप्ट करना, मद्य के नशे में चूर रहना तुमको खूब सूझता है । तुम कोडे हो, सड़ांध में पड़े हो । इस सड़ाघ मे, इस सड़न-मरी पीड़ा में, मानव के इस उन्माद में क्या जीवन है ? धया भावना है ? केवल युग-युगों की भत्र्सना है, जैसे कोई किलविला रहा है। मनुष्य ने वासना-तृप्ति की इच्छा, मेल और उन्माद में जीवन बिता दिया । वासना की लपटें ऐसी उठती हैं कि जला कर रख देती हैं । अतएव चेप्टा करके भी महमूद अपने उत्तप्त और विक्षिप्त हुए मानस को शान्त-स्थिर करने में असफल रहा। जाहिदा समीप के कमरे में खडी वाल खोल कर कंघी कर रही थी। घने काले केश वक्ष प्रदेश पर पड़े ऐसे लग रहे थे मानो कुंज में कोकिला पंख फैलाये हो । उस समय वह गाना भी गुनगुना रही थी- होगा अपमान हमारी गोली का ! गाली के बदले गाली बरमा सकते हैं, पर होगा अपमान हमारी गोली का ! भीख मांग कर हम मी "सेवर" लगा सकते है, पर होगा अपमान पंटनों की होली का शीश झुकाकर हम भी जान बचा सकते है, पर होगा अपमान शहीदो की कुर्वानी का ! पराग के लुट जाने का हमको गम नहीं है, पर होगा अपमान तिलक की शुभ होली का ! चढी वारात द्वार से हम लौटा सकते है, पर होगा अपमान शृंगार मेज पर 'धरती का कर्ज' नामक पुस्तक पड़ी थी। उसी पुस्तक में एक कागज पड़ा था जो बहुत महत्वपूर्ण था । न जाने महमूद कब किस प्रकार इस कागज को भूल गया था। उसी कागज के माथ एक नक्शा भी था, जिसमें कब, कहां, किसके आदेश पर क्या होता था, इसका पूर्ण विवरण था । यही कागज था, जिसके लिए जाहिदा को एक मास यहाँ रहना पड़ा। उसने वह कागज तथा नक्शा पुस्तकं से निकाला और डुप्लीकेटर से उसकी कापी करके पुस्तक में रख दिया और उसकी सुरक्षित नकल वक्षप्रदेश की ६२ / फीति दोप घाटी में छिपा ली। दूगरे पमरे में हैदरप्रती महमूद से कह रहा था, "कुछ समझ में नह प्राता, सारी योजनाएं फटे दूध की मांति पानी में मिल रही हैं । ऐसा लगता है कोई गुप्तचर हमारे भेद लेकर मुक्ति वाहिनी को देता है । चटगांव के दक्षिण कोक्म बाजार के हमले की योजना, हवाई अड्डे के सभी क्षेत्रों को योजना, बिजलीघर, वायरलेस स्टेदानों को योजना-सब निष्काम हुई, कराची से सैनिक सामग्नी लेकर माने वाला पाक पोत भी पकड़ लिया गया। इतना ही नहीं, बारीमाल के पास एक व्यापारी जहाज को भी पकड़ लिया गया। मटियर की वी० कम्पनी के शिविर में घुसकर मुक्ति वाह्निी मशीनगन, वारुद तथा वम उठाकर ले गई और पचास सैनिक मारे गए।" महमूद बोला, "हमें इस पर फिर ने विचार करना होगा।" "हां, महमूद । गुप्तचर का पता लगाना होगा।" "नही तो वह दिन दूर नहीं, जय हमको मात्म-समर्पण करना होगा और बंगला देश आजाद हो जायेगा।" हैदरअली बोला, "मुझे तो ऐसा लगता है, वही तुम्हारी जाहिदा का यह काम न हो?" "क्या बात करते हो, सर ! जाहिदा स्वयं मुक्ति वाहिनी की सताई हुई है। फिर वह ऐसा कैसे कर सकती है?" "तुम मूर्ख हो, महमूद ! तुम नहीं जानते, वह मुझे भी और तुम्हे भी उल्लू बनाकर अपना काम कर रही है।" "मुझे तो विश्वास नहीं होता।" 'मुझे तो पूर्ण विश्वास है ।" "प्रमाण ?" "इसके लिये तुम एक काम करो । ग्राज रात उसे मेरे निजी कक्ष में भेज दो। प्रमाण तुमको मिल जायेगा । यदि तुम ऐसा नहीं कर सके तो मैं समभंगा, तुम भी उसके साथ हो।" "मैं उसके साथ अवश्य हूँ । परन्तु इस कार्य में मेरा कोई हाथ नहीं है। फिर भी मैं अपने को निर्दोष समझते हुए जाहिदा को आपके पाम भेज सकता हूँ.। लेकिन एक बात है, विना नारी की इच्छा के उसके पास कोई नहीं--" कीति शेष/६३ - "यह काम तुम मुझ पर छोड दो।" "फिर आप विश्वास रखें। मैं अपने पक्ष में सभी प्रकार का त्याग कर दूंगा।" -- हैदर बोला, "मुझे ऐसी ही आशा थी।" "यदि जाहिदा दोपी निकली तो......?" हैदर पुन: बोला । "गोली चलाने का अधिकार तुमको है ।" महमूद ने कहा । "मैं किसी भूल को केवल भूल समझ कर नहीं छोडता । मैं उसे भी कर्म का भोग मानता हूँ और मजा भी भोग से मिलती है ।" महमूद की ओर देखकर हैदर वोला, "मुझे अभी गवर्नर डा० ए०एम० मलिक के पास जाकर उनके मंत्रीमण्डल और वरिष्ठ अधिकारियो से वार्ता करनी है। अभी उनका निजी सचिव प्राया था। गवर्नर साहव बहुत घबराये हुए हैं। तब तक तुम जाहिदा से बात करो और पता लगाने का प्रयाम करो।" कन्धे पर हाथ रख कर पुनः बोला, "तुम्हारी रात भी फीकी और उदास नही जायेगी । उस का भी मैंने प्रबन्ध कर दिया है।" हैदर चला गया । महमूद गम्भीर हो गया। वह उसी मुद्रा में जाहिदा के पास गया । जाहिदा के बाल अभी भी खुले थे। वह विश्राम कुरमी पर बैठी थी। उस समय उसने साटन का गरारा तथा कुरता पहन रखा था । दुपट्टे का काम खुले बाल कर रहे थे। महमूद ने एक दृष्टि से उसे देखा। जाहिदा खड़ी हो गई। महमूद के निकट प्रा गई । उसी समय महमूद ने उसे अपनी बाहों में भर लिया और कहा, "सच बता, तेरे मन मे क्या है ?" जाहिदा ने अपना सिर उसकी छाती पर रख दिया। शायद उसके हृदय की तेज धड़कनों को भी कान लगा कर सुन लिया। उसी अवस्था में उस ने कहा, "तुमको क्या लगता है ?" महमूद अपने हाथ की हथेली से उस के कोमल गोरे कपोलों को सहलाने लगा । उसी अवस्था मे वह जाहिदा के मुंह पर झुक गया । उसको गर्म सासे पाने लगा और कहा, "अब तेरे मन में क्या है ?" "मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो।" "यह नहीं होगा !अब तुझको मुझसे कोई दूर नहीं कर सकता।"
६४/ कीर्ति शेप ॥ " "है दरअली भी नही ?" "नहीं।" "वह तो अनेक वार इच्छा का प्रदर्शन कर चुका है।" "उमने प्राज भी अनुरोध किया है ।" "प्राज्ञा या अनुरोध ?" "दोनो का अर्थ यहाँ एक ही है।" "तुमने क्या कहा "कहा' "बोलो।" "पालन होगा।" "फिर मैं तैयारी करूं?" "तुम तैयार हो "हैदर की प्राज्ञा तुमको माननी होगी और मुझे तुम्हारी प्राज्ञा का पालन करना होगा । जीवन में एक-न-एक दिन किसी को तो अपना बनाना ही है। महमूद न सही, हैदर सही।" "तुम बहुत निर्लज्ज हो।" "अपना चेहरा पहले दर्पण में देखो। जिसका महल शीशे का हो, वह दूसरो के पत्थर नहीं मारता ।" "उसने कहा है, तुम मुक्ति वाहिनी को गुप्तचर हो ।" "तुमको क्या लगती हूँ ?" जाहिदा का चेहरा एक नयापन लेते-लेते रह गया । यदि जाहिदा बुद्धि से काम न लेती तो महमूद को एहसास हो जाता। नारी जितनी मूर्ख होती है उतनी चतुर भी होती है । अपने पक्ष में हमेशा विजयी होती है । जब परास्त होती है तो दव कर रह जाती है । वन्धनमुक्त होकर जाहिदा ने एक बार महमूद को देखा, जिसकी प्राखें कामुक लग रही थी। उस समय जाहिदा ने सोचा, यदि प्राज तनिक भी सन्देह हो गया तो महमूद जिन्दा नहीं छोड़ेगा । महमूद स्वर पर मार डाल कर बोला, "कुछ समझ में नहीं पाता, क्या करूं?"
कीति शेप / ६५ "अपराधी तुम्हारे सामने है, निर्णय करो। मैं अपना समर्पण करने को तयार हूँ। जिस प्रकार भी तुम विश्वास कर सको, वह कार्य करने मे मुझे कोई आपत्ति नहीं है । पर तुम अपने वारे में सोचो। तुम्हारे वास की प्राज्ञा है । पालन न किया तो नौकरी से हाथ धोना पडेगा और पालन किया, तो मुझसे । अब तुम को निर्णय करना है-नौकरी चाहिए या......!" : "मुझे दोनों ही चाहिए।" "ऐसा तो संभव न हो सकेगा।" "क्यो नही होगा, अवश्य होगा।" "कैसे?" खून करके ।" किसका ? मेरा •?" "नही, हैदर का।" "फिर तो तुम्हारी मौत निश्चित है । कोई दूसरा उपाय सोचो।" "मैं तुमको हैदर के पास भेज दूंगा । यदि उसने वार्तालाप के अतिरिक्त पौर कोई कदम उठाया, तो तुम अपनी रक्षा करना।" "किस तरह ?" "उत्तर में बहुत कुछ प्राश्चर्यपूर्वक सुनने के बाद जाहिदा बोली, "फिर मैं अपनी रक्षा स्वयं करूंगी।" कथन के साथ पहले जाहिदा कुछ मुसकराई; फिर कुछ संकुचित हो उठी । एक बार पलकें उठी और गिरी । फिर तत्काल बोली, "मैं कर भी क्या सकती हूँ, मैं उस सूर्य के प्रकाश में चल रही हूँ, जो बदली. और अंधेरे में अपनी गति की एक छाया के समान दिखाई पड़ता है। ऐसी छाया, जो कभी इधर-उधर, कभी पीछे रहती है और कमी-कमी तो दिवाई मी नहीं पड़ती।" महमूद कुछ बोल नहीं सका, उसके अधर एक कम्पन-सी लेकर रह गये । जाहिदा ने दुपट्टा उठाकर वक्ष प्रदेश पर डाल लिया। जाहिदा बोली, "कुछ कहना चाहते थे, पाप ? जान पड़ता है, किसी उलझन में हैं !" कालान्तर में बातें प्रायी गई हो गई। दोनों कोई निर्णय नहीं कर पाये। उसी अवस्था में गम्भीर मुद्रा मे जाहिदा के भरे नयन पोर कम्पित ६६ / कीति शेप अधर देखकर महमूद और भी समीप पाकर बोला, "जान पड़ता है, ये बातें अभी समाप्त नहीं होगी। इसलिये अच्छा है, पहले चाय पी लें।" जाहिदा एक बार फिर मुसकराई। महमूद बोला, "बस इसी प्रकार मुसकराती रहो, तो मेरे इस जीवन का क्षण-क्षण पल-पल कृतार्थ हो जायेगा । मुझे तुम्हारी चिन्ता नये ब्लेड-सो काटती आ रही है ।" एकाएक जाहिदा का दुपट्टा यक्षप्रदेश से हट कर उसकी गोद में आ गिरा । संयोग की बात है उस समय महमूद जाहिदा के उन्नत उरोजों पर इष्टि डाले था । उसे ऐसा लगा मानो हिम पिघल कर नीचे धरातल पर मा गया हो और दो वर्फ के टुकडे पिघलने से रह गये हो । उन्ही वर्फ के टुकड़ों के बीच वह कागज रखा था, जिसका एक किनारा स्पष्टरूप से दिखाई दे रहा था। एकाएक महमूद जाहिदा के पीछे आ गया और कन्धे पर हाथ रखकर बोला, "अब तुम विधाम करो, बहुत थक गई हो। तब तक मैं कोई विधि सोच कर उसे अन्तिम रूप दे लेता हूं।" जाहिदा कुछ जान गई थी। कुछ समझ गई थी । उसने वक्षप्रदेश पर दुपट्टा रख कर कहा। "पीछे क्यो खड़े हो गये" एकाएक बाहर से आवाज प्रायो, "माग न पाये, निकल न जाये !" उसी आवाज के मध्य गोलियो का चलना प्रारम्भ हो गया । "मुझे लगता है, तुम मुक्ति वाहिनी को गुप्तचर हो।" "चलो, पता तो लग गया।" "पब मैं तुमको जिन्दा नहीं छोड़गा।" जाहिदा का हाथ पकाह कर 'महमूद ने उसके गोरे कोमल कपोलो पर अंगुलियों के निशान अंकित कर जाहिदा बोली, "कायर लोग इससे अधिक कर भी क्या सकते हैं।" "मैं तुमको गोली मार दूंगा।" "पाक के पास ऐमी कोई गोनी नहीं है, जो जाहिदा के हृदय को छु "दिये।
कीति शेप/६७ महमूद अपनी पिस्तौल निकाल कर बोला, "भव बोलो।" जाहिदा वोली, "मूखं सैनिक, तुम अपनी जान को चिन्ता करो, मेरी नहीं । याहर मुक्ति वाहिनी को गोलियां तुम्हारा इन्तजार कर रही हैं।" महमूद ने क्रोध मे पिस्तौल का घोड़ा दबाया, परन्तु जाहिदा मुसकराई और महमूद के समीप आकर बोली, "इसमें गोलियां नहीं हैं । तुमने इसमें गोलियां नहीं देखी, तुम मेरा रूप ही देखते रहे । अय- तुम......।" जाहिदा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पायी थी कि उसी समय एक गोली पाकर महमूद की छाती मे रागी और वह वही गिर गया । संयोग की बात है, मोतिन ने पुकारा, "ललिका !' परन्तु ललिका कोई उत्तर न दे सकी । वह भी उस वम के फट जाने से घायल हो गई थी, जो योजना कक्ष को नष्ट करने के लिए डाला गया था । मोतिन ललिका के समीप आ गया । उसका सिर अपने घुटनो पर रखकर बोला, "यह क्या हो गया।" ललिका ने अधखुली आँखो से कहा, "मोतिन !' बम ललिका के पैरों के समीप आकर फटा था। उसके दोनो पैरो से रक्त निकल रहा था । दोनों पैरो का रक्त निकलकर द्वार की ओर बहने लगा । ऐमा लग रहा था मानो हिमालय की गोद से गंगा-जमुना निकलकर बह उठी हो । कितना दर्द था गंगा-जमुना के सगम मे ! ललिका ने आँखें खोली, परन्तु उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया । वह कुछ देख नहीं पायो । उसने पाँखें बन्द कर ली । ललिका को उसी समय उपचार-केन्द्र में पहुंचाया गया । मोतिन इस दृश्य को देखकर उदास हो गया । वह गम्भीर अवस्था में अतुल के पास आकर बोला, "सर, ललिका... "क्या हुआ ललिका को ?" "उसकी अांखें जाती रही।" अतुल के मुह से एकाएक निकल कर रह गया, "मोह......! मैं उपचार केन्द्र चलूंगा ।" "अभी डाक्टर ने मना किया है । कल सायं तक उससे कोई नहीं मिल सकता।" - ......
६८/कीर्ति शेष "यह अच्छा नहीं हुआ, प्रोतिन ।" "लेकिन हर्ष की बात यह है, वह अपनी जान पर खेल कर गुप्त योजना की नकल कर तायी है और मोतिन ने अतुल को वे कागज दे दिये। अतुल बोला, "बहुत खूब ! अब हमारा काम आसान हो जाएगा। इसमें एक बात बहुत महत्वपूर्ण है और वह यह कि पाक सरकार को उसके मित्रो ने प्राश्वासन दिया है कि वह शरदकाल में भारत पर आक्रमण कर दे। हम उसका साथ गुप्त रूप में देंगे।" "हमे यह भारत सरकार को बता देनी चाहिए।" "नहीं, अभी नहीं । समय आने पर मारत स्वयं पाक की चाल समझ जाएगा।" "मुझे ऐसा लगता है, इसमें अधिक हाथ मुस्लिम देशों का है।" "यह बात मत्य है । परन्तु अनेक और राष्ट्र मी है, जिनका हाथ पाक सरकार पर है।" प्रोतिन बोला, "ललिका ने बताया था, योजना के गुप्त कागजों में कुछ कोड शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनका अर्थ ललिका बता सकती है।" "ललिका की आँखें जाने से मुक्ति वाहिनी को बहुत दुख सहन करना होगा । ऐसा हीरा हाथ से चला गया, एक ऐसे मोती की प्राव उतर गई जो स्वतत्रता के ताज मे तगने योग्य था। विधि के अमिट विधान को कोई नहीं जानता।" अतुल ने कहा। श्रोतिन गम्भीर मुद्रा मै अतुल के सामने खड़ा रहा । अतुल विचारमग्न मुद्रा में प्रशान्त बना रहा । उस दिन का कार्यक्रम इस घटना से दो घंटे विलम्ब से हुग्रा। उस रात पोतिन मिताली से भी नहीं मिल सका । उपचार केन्द्र में ललिका की देख-रेख करता रहा । प्रातः जब ललिका की प्रांखों को पट्टी सुली, तो ललिका को क्षणिक मी दुख न हुआ। उसकी ज्योति-रहित भारी अंत: करण से आज भी देख सकती थी। मोतिन की हृदय की वेदना गालों पर उतर पायो । वह कभी उसकी प्रोखों को देखता, कभी उसके अंगुली रहित पैरों को।" जब ललिका को आभास हुआ कि पास बैठा प्रौतिन कुछ गम्भीर और न
कीति शेप/६६
उदास है, तो वह अत्यन्त मधुर स्वर में बोली, "प्रोतिन, समीप भायो ।
अपना हाथ मेरे हाथ मे दो, मैया !"
मोतिन समीप आ गया । अपने हाथ को ललिका के हाथ मे देकर मौन
ललिका उसकी आँखों पर हाथ रखकर बोली, "नोतिन, तुम रोते हो!
एक बहन की आँखें चली जाने पर, पैर की अंगुलियां नष्ट होने पर रोया
नही करते । न जाने कितनी बहनों की आँखें चली गई। मांग उजड़ गई।
लाज चली गई । मुझे देखो, मुझे कोई पीड़ा नहीं । कोई वेदना हृदय मे नही ।
मुझे तो हर्प है कि मैं अपना काम कर मकी। राष्ट्र के काम आयी । मैं तो
कहती हूं, मेरा पूर्ण शरीर भी राष्ट्र के लिए नष्ट हो जाये, काम आ जाये, तो
मेरा सौभाग्य होगा।"
मोतिन मौन एव गम्भीर बना रहा । उसने कुछ कहा नहीं । केवल इतना
किया कि अपनी आँखो को सुखा लिया ।
ललिका वोली, "भैया, मिताली कैसी है ?"
"ठीक है।" संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
"उससे कहना, मुझसे मिल ले।"
"अाजकल वह रात-दिन रेडियो स्टेशन पर हो रहती है।"
"फिर मुझे एक ट्रांजिस्टर ही ला दो । कम से कम उसकी आवाज तो
सुन सकूँगी।"
"ममी मॅगा देता हूँ। तुम विधाम करो।"
"नही, भैया ! मुझे यहाँ से ले चलो, मैं ठीक हूँ। मुझे अभी बहुत से
काम करने हैं।"
"पहले तुम ठीक तो हो जायो।"
"नहीं, बहुत देर हो जाएगी। मैं इतनी देर प्रतीक्षा नहीं कर सकती।"
"अभी डाक्टर तुमको अवकाना नहीं देगा ।"
डाक्टर पा गया । डाक्टर ललिका को देखकर बोला, "वहुत बहादुर
लड़की हो।"
ललिका वोली, "डाक्टर, मुझे मुक्ति चाहिए । मेरा दम घुटा जा रहा
है। मुझे अपना काम पूर्ण करना है । मुझे जाने दो।"
.
७०/ कौति शेप डाक्टर ललिका को लिटा कर बोला, "अभी तुमको विश्राम की आवश्यकता है। फिर भी मैं तुमको जल्दी ही मुक्त कर दूंगा।" "डाक्टर, तुम भी पोतिन भैया के कहने में आ गये।" मोतिन बोला, "डाक्टर, क्या ललिका की आखे फिर से ज्योति नहीं पा सकती?" "दूसरी आंखों का प्रवन्ध करना होगा। यह इस समय.. ऐसी परिस्थिति में सम्भव नहीं है।" प्रोतिन विचारों में खो गया। दूसरी प्राखो का प्रवन्ध करना होगा । लतिका फिर से देख सकती है। उसकी आँखो में ज्योति पा सकती है । राष्ट्र को ललिका को आवश्यकता है । इसकी आँखों का प्रवन्ध करना ही होगा। वह इन्हीं विचारो की शृखला में बँधा, उपचार केन्द्र से बाहर निकाल गया। संसद पय पर आ गया, जिस पथ की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान पाक अत्याचार की कहानी मूक भाषा मे कह रहे थे। वह उसी पथ पर चलता गया........"चलता गया । कहा नहीं जा सकता, कब वह पार्क में जाकर मुक्ति वाहिनी के नेताओं के साथ अग्रिम कार्य- क्रम बनाने में लग गया।
सात उस रात पोतिन देर तक नही सो सका । हृदय मे नितान्त वेदना लिये विचार-मग्न बना रहा । सारी परिस्थिति नितान स्पष्ट हो जाने पर भी वह यही सोच रहा था कि ललिका के माय अन्याय तो नहीं हो रहा। ऐसा तो नही है कि वह इस आधात को सहन न कर पाए । ललिका की अवस्था को वह भूल नही पायां । रह-रह कर उसका मन ललिका की ओर ही पहुंच जाता । वह जितना भूलता था, उतना ही अधिक स्मरण आता था। उसके आँखों की ज्योति, पैरों की अंगुलियां अब कभी लौट कर नहीं आ सकेगी। वह पहले ही पीड़ा-युक्त थी। बहन अजिका को खो चुकी थी, जो न जाने किस अवस्था में होगी? आज जिन्दा भी है या सदैव के लिये मौन हो गई है, कौन कह सकता है ? ललिका के लिये कुछ करना होगा । उसकी वहन अंजिका को खोजना होगा । उसको नेत्र-ज्योति तभी मिल सकती है, जब कोई स्वस्थ आँखें मिल सके। आधुनिक संकटकालीन परिस्थिति में यह सब सम्भव नही हो सकता। यह भाग्य की कैसी विडम्ना है कि सुख-सरिता को दुख-सागर में लाकर डाल दिया है। पीड़ाओं के पालने में निद्रा भला कब आती है ? हृदय की वेदना कब मौन होने देती है ? इस दुख-सागर की लहरों में लालका डूबकर रह जायेगी। उसे मिताली का स्मरण पाया और पाया उस शिविर का, जिसमें अनेकों अवला नारी ललिका की-सी अवस्था मे पीडायुक्त क्षण व्यतीत कर रही थीं। उसके विचारो की शृंखला टूट गई । तब द्वार पर दस्तक सुन कर यह बोला, .
७२/ कोति शेप "कौन?" "द्वार खोलो, मैं मिताली हूँ !" प्रोतिन ने द्वार खोल कर कहा, "तुम इस समय यहाँ और ऐसी धवराई हुई अवस्था मे ! क्यों, क्या बात है ?' मिताली धीरे स्वर मे बोली, "सब कुछ लुट गया।" "क्या मतलब?" "ईस्ट बंगाल राइफल्स के सैनिकों ने मशीनगनों का प्रयोग करके ढाका के पूर्वी क्षेत्र की औरतो-बच्चो को मौत के घाट उतार दिया।" उसकी मांखों से खारा नीर वह उठा । वह उसी मुद्रा में बोली, "ग्रामी प्रामादेर परिवारे अगलाई बेचे आछौ ! (अब में परिवार में अकेली रह गई है।)" "अाखिर तुमने भी राष्ट्र को प्राहुति दे ही दी। अब वह दिन दूर नही, जब पाक सैनिकों को मुंह की खानी पड़ेगी।" कुछ क्षण मौन रह कर प्रोतिन बोला, "मां-बाप के शव सुरक्षित हैं ?" "सब किंछई माटि माधे देवे गर्छ । (सव मतवे में दब गये)।" "यह अच्छा नही हुमा ।" मिताली आँखो को पोंछती हुई बोली, "ईश्वर जो करता है, अच्छा ही फरता है । अगर ईश्वर को यह स्वीकार था तो ऐसे ही सही । बंगला देश को दुखी जनता को देखकर हृदय कांप उठता है । न जाने कौन-सा दिन होगा, जब यह अत्याचार समाप्त होगा?" "पाप का घड़ा भरने में समय लगता है।" "पाप का घड़ा मब कुछ नष्ट होने के बाद भरा, तो क्या लाभ ?" "कुछ पाने के लिये खोना पड़ता है।" "खोया सेर और पाया तोला, तो इस अनुपात से कौन सन्तुष्ट होगा?" "स्वतंत्रता'का तोला गुलामी के मेरो से कहीं ज्यादा लाभदायक है ।" मिताली बोली, “सुना है, ललिका की प्रांखों की ज्योति जाती रही।" "हो!" मोतिन ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। मिताली ने कहा, "वह तो पहले ही बहुत दुखी थी, अब तो उसके पर दुसों का पहाड़ टूट पड़ा।" - "तुम भी तो कम दुखी नही हो । मां-बाप, भाई-बहन सब अमर हो कोति शेष / ७३ गये।" मिताली नितान्त गम्भीर बन कर बोली, "पाक सैनिकों के हाथों में पड़ने - थी। मार्ग में सतरा था। दुख इतना ही है कि मन्तिम दर्शन भी न कर सकी। कम से कम एक बार देख लेती, तो मन को शान्ति प्राप्त हो जाती।" मोतिन उदास भाव से दपंण को देख कर बोला, "चलो, अब उसी जगह चलते हैं।" "क्यों ?" "हम मी कायर नहीं है । परिवार के शव मलबे में से निकाल कर उनका दाह-संस्कार करेंगे।" "मैं तुमको नहीं जाने दूंगी। मेरे पास शेप रहा ही क्या है ? जो बचा है, उसे भी खो दं?" मोतिन बोला, "ऐसे अवसर पर हमको गान्त नहीं बैठना चाहिए। मरना तो एक दिन है ही। आज ही मर गये, तो क्या हो जायेगा ?" "राष्ट्र को हमारी वहुत आवश्यकता है।" मिताली ने कहा । "जो मर गये, उनको चिन्ता न करो, जो जिन्दा हैं, उनकी ओर देखो। उनकी रक्षा करो।" कुछ रुक कर मिताली पुनः बोली। "वे तुम्हारे भाई-बहन थे, मां-बाप थे।" "मैं उनके प्रति आदर प्रगट करती हूँ। ईश्वर से प्रार्थना है, उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे । इमसे अधिक उनके लिये कुछ नहीं किया जा सकता।" "तुम बहुत निर्मोही हो।" "तुम्हारे कारण । तुम्हारे उपदेश ने, राष्ट्र के प्रति भावना ने मुझे निर्मोही बना दिया ।" एक क्षण मिताली ने प्रोतिन को देखा, प्रोतिन ने मिताली को देखा और दूसरे क्षण प्रोतिन ने मिताली का मिर अपनी छाती से लगाकर कहा, "धन्य है वह मां, जिसने तुमको जन्म दिया।" उस समय मिताली की आँखो पर पलकों का आवरण पड़ा था। भावना- भयी मिताली ऐसे शान्त खडी थी, मानो नीर-मरे सागर जलपोत खड़ा हो। जैसे संगीतकार की स्वर-रहित वीणा संगीतकार की गोद में पड़ी हो ।
७४/ कौति शेप इस वार मिताली नही वोली, उसके अधर बोल उठे, "यद्यपि यह कोई नहीं जानता कि जीवन कहां ले जायेगा और आंधियों के समान अकस्मात किसको कहाँ फेंक देगा।" रात आधी से अधिक व्यतीत हो गई थी। चारो मोर घोर अंधेरा था। प्रकाश की किरण खोजने पर भी न दिखाई देती थी। ढाका नगर घोर अंधेरे का प्रदेश लग रहा था। कभी-कभी कही से जानवरों की आवाज की जगह गोली तथा वम को ध्वनि कानों के पर्दो से टकरा कर लोट जाती। उसी आवाज के मध्य चीखते-पुकारते मानव का बोल सुनाई पड़ता था । ओतिन मिताली को बन्धन-मुक्त करके बोला, "तुम थोड़ा विश्राम कर लो।" "और तुम ?" "मुझे जाना है।" "कहाँ ?" "मुक्ति वाहिनी मेरा इन्तजार कर रही है । अतुल की योजना की रूप- रेखा मेरे पास है।" बहुत रोकने पर भी प्रोतिन नहीं रुका। वह उसी अंधेरी रात में चला गया। उसे उस रात दो काम करने थे। मुक्ति वाहिनी के सहयोग से मिताली के तथा आसपास के मवानो से शवों को निकाल कर उनकी अन्तिम क्रिया पूर्ण करनी थी और ढाका नगर में भूमिगत अधिकारियो की खोज करनी थी, जिमका सकेत ललिका ने दिया था। दोनो ही कार्य कठिन थे। रोगनी के अभाव में कोई कार्य भी सुगम न था। अधेरे में किया ही क्या जा सकता था? ढाका में कर्फयू और ब्लैक ग्राउट था। टेलीफोन के तार प्राय: काट दिये गये थे उस रात पोतिन ने वहां जाकर देखा, शव क्षत-विक्षत हैं। अधिकार पहचाने नहीं जा सके। ऐसा लगता था, पंक्ति में खड़े करके नशीनगनों मे भून दिया गया हो। बच्चों तथा बूढो को उठाकर फेंक दिया हो । प्राभूपण तथा कीमती माल उठाकर ले गये हों। यौवनमयी नारियो के शव कम मिले । ऐसा लगता था, उनको जिन्दा ही अपने साथ ले गये हैं। प्रातिन ने शवो को एक ही ।
कोति शेप / ७५ -- खाई में खोद कर डाल दिया और प्रामुमो के पुष्प से श्रद्धांजलि देकर दूसने कार्य को पूरा करने चल दिया । स्थान का पता लगाने में तो मुक्ति वाहिनी सफल हो गई, परन्तु स्थान तक पहुंचना कठिन था। पहरा इतना सस्त था कि चिड़िया तक पर नही मार सकती थी। प्रोतिन का दल पांच सौ गज की दूरी पर खड़ा हो गया । वह । अपनेएक साथी से बोला, "काम कठिन है।" साथी ने उत्तर दिया, "चलो, मर ही जायेंगे, और क्या होगा ?" "मरने से हमारा काम पूरा नहीं हो सकता । हमको बुद्धि से काम लेना होगा। आज रात यह काम नहीं होता, तो कोई बात नही । प्रातः अतुल मे विचार करके माना होगा । अव दिन निकलने में अधिक देर नहीं है । सायी ने कहा, "सूचना के अनुसार यहाँ कितने आदमी है ?" "लगभग सौ।" "और हम दो सौ।" "परन्तु खाली हाथ । हमारे पास केवल वोस मशीनगन है और उनमे गोली सीमित है ।" "मैं तो कहता हूँ, बढ़ चलो । पाक सैनिक इतने वफादार नहीं है, जो मव जाग रहे हौं । दस-पांच अधिक से अधिक पहरेदार होगे । उनको हम जाते ही दबोच लेंगे।" श्रोतिन सोच कर वोला, "ठीक है, दुर्गा मां का नाम लेकर बीस मशीन- गन लेकर आगे बढ़ो । शेष पीछे संकेत की प्रतीक्षा करें।" 'बीस मशीनगन मैन चल दिये।' प्रोतिन बोला, “ठहरो, एक मशीनगन मुझे दो । मैं आगे चलूंगा, शेष मेरे पीछे रहना।" सौ गज चलने पर प्रोतिन बोला, "शिविर को चारों ओर से घेर लो। मेरी गोली चलने पर फायर शुरू कर देना । हिम्मत न हारना, दुर्गा मां हमारे साथ है ।" उस रात पोतिन की पीठ पर थैला था, जिसमें बम तथा बारूद थे। मुक्ति वाहिनी के पास देशी बन्दूके, हथगोले तथा ईटें थी। सौ वर्ष पुराने है हथियार, जो टकों, मोटरों तथा मशीनगनों का सामना करने के लिए पूरी - --- 1 -- - ७६ / कीति शेप तरह समर्थ न थे । वगला देश के नागरिक, जिन्होंने प्रत्याचार के मारे मुकने से इनकार कर दिया था, सीने पर गोली खाने को तैयार थे। बगला देश का वच्चा-बच्चा इस नृशसता तया पैशाचिकता का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए शपथ खा चुका था 1 क्रान्ति की यह आग दासता के बन्धन तोड़कर ही बुझनी थी। मोतिन एक स्थान पर जाकर रुक गया और जमीन पर लेट गया, क्योकि उमे एक प्राकृति-सी नजर पायी। उसने सतर्कता से अपनी पीठ पर से थेला उतार लिया और धीरे से अपने साथी से कहा, "तैयार रहना, मैं हथगोला फेंकता हूँ।" साथी ने कहा, "सतरा बढ़ सकता है।' "खतरा तो मोल लेना ही होगा।" कथन के साथ ही उसने ग्रेनेड की पिन निकाल कर हथगोला प्राकृति के ऊपर फेंक दिया। एक ऊंची ध्वनि के साथ वम फट गया । प्रोतिन ने कहा, "ग्रामो, बढ़ चलो।" प्रोतिन ने देखा, शस्त्रागार जल उठा था। पाक सैनिको के शव क्षत- विक्षत पड़े थे। फायरों की आवाज सुनाई देने लगी । शेप वचे पाक सैनिकों की गोली चलने लगी । लाशो के ढेर लगने लगे । मुक्ति वाहिनी को भी अपने भनेक जवानो से हाथ धोना पडा । मुक्ति वाहिनी प्रागे बढती गई और पाक सैनिको से उलझ पड़ी। मुक्ति वाहिनी के सामने पाक मंनिक कम थे। वे भागने लगे । समय मोतिन ने उनकी अोर मशीनगन का मुंह करके टर-टर्र "टरं-टरं की ध्वनि ने उनकी जीवन-लीला समाप्त कर दी। गोलियो की बौछार से सैनिक कटे वृक्ष की भांति गिरने लगे। एकाएक मर्चलाइट जल उठी। उसी प्रकाश में मोतिन ने देखा कि मचं लाइट मेरे निकट है । प्रातिन ने उम सचं लाइट को समाप्त करना उचित ममभा। उसने कुछ क्षण मोचा। उमी समय उनके माथी ने कहा, "क्या सोच रहे हो? बोलो, उड़ा दूं?" पोनिन ने नुछ उनर न दिया। उसने येले से एक धम निगल कर दांतों उमी कात 1 X से ग्रेनेड पिन खोल कर उस सर्च लाइट पर फेंक दिया। एक भयानक धमाका हुमा । सर्च लाइट क्षण भर में नष्ट हो गई। पाक सैनिकों में हलचल मच गई । मुक्ति वाहिनी के इम अाक्रमण से युद्ध की प्राग और भडक गई। कुछ क्षण बाद ही गोलियों की आवाज से सारा अाकाश गूंज उठा। पाक 'सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका तथा ईरान से भेजा हुआ वारूद, ; गोलो तथा छोटी मशीनगनों से पाक को हाथ धोना पडा । यह मुक्ति वाहिनी की एक महान् विजय थी। X X x पाक के शासको की दमन नीति में कोई कमी नही पायी । मुक्ति वाहिनी के आक्रमण से वह विस्तार पकड रही थी। पाक के अत्याचारो से वंगला देश जल रहा था । जिन्दा चिताएं जलाई जाने लगी थी। तोपो के मुंह से मौत बरस रही थी। बंगलादेश निवासी उसका जवाब दे रहे थे । ढाका लाशो का नगर बनता जा रहा था। परन्तु फिर भी मुक्ति वाहिनी के वीर सिपाही भागे बढते जा रहे थे । मरने की चिन्ता न करके वे राष्ट्र के लिये कुर्वानी देने के लिये निरन्तर प्रागे बढ़ रहे थे। लोग निहत्ये थे। कुछ के पास देशी बन्दूकें, ई टे तथा लाठियां थी। औरतें मकानो की छत पर गरम पानी लेकर बैठी थी। मुक्ति वाहिनी की सलाह के अनुसार घर के द्वार बन्द करके छत पर से गरम उवतता पानी पाक सैनिको पर फेंका जाता था। परन्तु पाक की मशस्त्र अपरिमित मेना के सामने टिकना अत्यन्त कठिन था। पाक पड्यत्र में जो एक चक्रव्यूह था, उसका आभास तो सबको था, । पाक रेडियो प्रचार कर रहा था कि यह पाक का गृह- युद्ध है, किसी भी राष्ट्र का हस्तक्षेप सहन नहीं किया जायेगा। कोई आकर उन महिलानी से पूछे, जिनके नग्न उरोजो पर राइफल चला दी गई थी। वस्त्र-रहित करके जिन्हें वृक्ष के तने से बाँध कर अचेत अवस्था में छोड़ दिया गया था। यदि यह पाक का गृह युद्ध था, अन्तरंग मामला था, तो पाक सैनिक वर्वरता का ऐसा नग्न नृत्य क्यों कर रहे थे ? वे इस्लाम का नाम लेकर यौवन की हाट क्यो न लगा रहे थे? परन्तु सब मौन । .
कीनि शेप ७८ कौन है, जो आजादी की सांस नहीं लेना चाहता ? कौन दासता पसन्द करता है ? गुलामी के टुकड़े खाने से भूखे रहना अधिक हितकर है । परतंत्रता पाश में जकड़े रहने से किसका दम नही घुटता ? युद्ध की विभीपिका किसी को सहन नहीं होती । मुक्ति वाहिनी की विजय हो रही थी। पाक की सेना पोछे हटने लगी। फिर भी पाक सैनिकों की स्थिति काफी मजबूत थी । लोग ढाका छोड़ने पर मजबूर हो रहे थे। क्या यह गृह-युद्ध था? इसका उत्तर किसी के पास न था। फायरो तथा तोपों का स्वर बुरी तरह से गूंज रहा था । टेक लोगों को रोदते-कुचलते आगे बढ़ रहे थे। न जाने कितने आदमी टैकों के नीचे कुचल गये। सड़क लाशो तथा रक्त से भरी थी। परन्तु बंगला देश की जनता का भी कम साहस नहीं था। मेन बाजार मे एक टैक चला जा रहा था । अनुज नाम का एक नवयुवक अपनी पीठ पर वम बांधकर टेक के सामने कूद पडा। क्षण भर में टैक गतिरहित हो गया ओर अनुज शहीद । उसी दिन वीस पाक सैनिकों ने पांच यौवनमयी युवतियों को घेर लिया। उनको वस्त्र-रहित करके कवरा करने का आदेश दिया । जव एक नवयुवती ने नृत्य करने के लिये इनकार कर दिया, तो एक सैनिक ने पाटोमैटिक गन को यौवनमयी के उरोजो पर रख कर उसे गोली का निशाना बना दिया। वे शेप नवयुवतियों को अपने साथ ले जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी मकानों की छत से उबलता हुआ पानी तथा ईटों का वरसना प्रारम्भ हो गया। सैनिक औरतों को छोड़कर अपने प्राण बचाने के लिए नौ-दो-ग्यारह हो गये। ऐसी कितनी घटनाएं हैं, जिनका जनता को ज्ञान नहीं है । बंगला देश की जनता को उस समय उनका ग्रामास होगा, जब जनवरी, फरवरी में भावी प्रबंध सन्तानों की सूची तैयार की जायेगी। पच्चीस गर्भपात केन्द्रो में अब तक वीस हजार गर्भपात हो चुके हैं । यह विवरण सरकारी सूचना के अनुमार है। स्त्रिया गर्भपात केन्द्र में नहीं गयी, अात्महत्या करके मर गई, उनके विषय में घुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी अनुमानानुसार दो लास स्त्रियां अवैध बच्चों को जन्म देने की अवस्था में है। इन बच्चो का क्या भविष्य होगा? अभागी लड़कियां, मनाथ बच्चे-- जो कीति शेष / ७६ - बंगला देश के सामने समस्या बन कर रह जायेंगे । नारियों का अन्तर्मन संशक और विकल हो उठा है। वे अपने भाग्य पर आंसू बहा कर पीडा को सहन करेगी या मर जायेंगी। ऐसी-ऐमी घटनाएं है, जिनको देख-मुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। खून खौल उठता है । इनसान कहलाने वाले इनसानियत के नाम से घृणा करने लगते है। लेकिन समय किसी का साथ नहीं देता। आज नहीं, तो कल पाक की बन्द आँखें खुलेंगी। पाश्चर्य की बात है, सत्ता के भुखमुहे ने भी पाक सरकार का समर्थन किया । वह याह्यिाखां की अंगुली पर खेल गया। शायद याह्याखां नहीं जानता था कि भुट्टो एक दिन पाक का राष्ट्रपति होगा और याह्यिाखाँ केवल पाक का एक साधारण नागरिक । विश्वविद्यालय के अविवाहित प्राध्यापकों के लिये बनाये गये स्थान पर मौत का नंगा नाच भुट्टों के संकेत पर हुआ था। ढाका की हिन्दू वस्तियो को नौसेना ने अपने विशेप क्रोध का शिकार बनाया । ढाका के उपनगरों में हिन्दू किसानो का बाहुल्य था । उनको सेना ने घेर कर उनके घरों में आग लगा दी। मारी सम्पत्ति राख कर दी। शायद ही हिन्दू बस्तियों में कोई ऐसा नागरिक हो, जो पाक सैनिकों का शिकार न बना हो । बहुत दिनो तक ढाका और नारायणगज क्षेत्र में सड़कों पर औरतों के शवों को गिद और सियार नोच-नोचकर वीभत्स दृश्य प्रस्तुत करते रहे । 'यही दशा रही, तो वंगला देश वरवाद हो जायेगा, नष्ट हो जायेगा।' अतुल अपने कमरे में बैठा सोच रहा था, 'हमे पडोसी देश की सहायता लेनी चाहिये । भरयाचार तथा पापाचार की फिल्म पड़ोसी देश को दिखाकर मदद की प्रार्थना करनी चाहिये ।' मायं को मतुल अपने पड़ोसी देश की राजधानी में पाया और दो घंटे तक वार्ता करके मदद का पूर्ण प्राश्वासन ले गया । उसे प्रोत्साहन मिला । वह शेर की भौति गरज उठा। उसी दिन से गुप्त रूप से बंगला देश को शस्त्र तथा सेना का महयोग मिलने लगा।
. प्राठ - 'यह तार तार ढाका है। दिन के पाठ बजे हैं। अव मिताली से समाचार सुनें । आज राष्ट्रपति याह्मिासां ने पश्चिम पाकिस्तान से घोपणा की है, हम दस दिन के अन्दर ही भारत से युद्ध में मिलेंगे। मुक्ति वाहिनी से निपटने पाने के कारण पाकिस्तान ने इस समस्या को दूसरा रूप देने का प्रयास किया है। उसने इसे भारत-पाक संघर्ष का रूप देने की योजना बनाई है। याझिखों ने पाक सरकार पर आरोप लगाया है कि मुक्ति वाहिनी भारत सरकार की विना वर्दी की सेना है, जिस पर भारतीय शस्त्र हैं और उनका कमाण्ड भारत सरकार कर रही है। 'इस प्रकार पाक सरकार ने भारत को शत्रु मान कर भावी युद्ध के लिए सचेत कर दिया। इनके उत्तर में दिल्ती में प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचारपत्रो मे प्रथम पृष्ठ पर लिखा है कि भारत को बंगला देश की जनता से सहानुभूति है, परन्तु उसके अन्तरंग मामलों में वह हस्ताक्षेप नही 'भारत सरकार ने बंगला देश से गये हुए युद्ध-पीड़ित लोगो के लिये शिविर सोल दिये हैं। भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार अब तक साठ हजार बंगाली भारत के शिविरों में शरण लिये हुए हैं। 'भारत की प्रधानमंत्री बंगलादेश के कार्यवाहक राष्ट्रपति संयद मगरल इस्लाम और अन्य अधिकारियों से वार्ता करने का विचार कर रही हैं। भारत के विदेश मंत्री स्वर्णसिंह अगले मास संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भाग लेने न्यूयार्क जायेंगे । वे प्रधानमंत्री की ओर से ऊयान्ह से अनुरोध करेंगे कि -
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१२/ कीति शेष "गम, - धैर्य, हिम्मत।" "इससे पेट नहीं मरेगा।" "साली भी तो नही रहेगा।" "ऐसे कब तक काम चलेगा ?" "जब तक अन्तिम सांस है।" "फिर वह दिन भी दूर नही, जव अन्तिम सांस भी प्राकर चला जायेगा।" "इतनी कमजोर न समझो ।" "अधिक बलवान भी नहीं हो।" "माना, तुम्हारा कथन मिथ्या नहीं है, परन्तु......।" "परन्तु क्या ?" मिताली ने कहा, "मेरे पास तो अभी सुस शेप है । उनको देखो, जो सब कुछ सो चुके हैं।" "तुम भी तो... "नहीं, मेरे पास तुम हो । हिम्मत है, राष्ट्र के प्रति भावना है । अपना मुरक्षित यौवन है । और मुझे इससे अधिक क्या चाहिए ?" पोतिन मधुर स्वर मे बोला, "राष्ट्र की नीव तुम जैसी नारियो के साहस पर ही टिकी है । फिर भी जिन्दा रहने के लिए खाना आवश्यक है । कागज मे लिपटा मात देकर बोला, "लो, कुछ सालो।' क्षणिक मुसकरा कर मिताली बोली, "मेरी बहुत चिन्ता है।" "नही ।" "फिर यह मात...... ?" "इसमें मेरा अपना स्वार्थ छिपा है।" मिताली ने मात ले लिया और उठकर बाहर चली गई। दस वर्ष के एक "शिमु को मात देकर घोली, "लो, तन्नू कुछ खा लो।" तन्नू एक प्रमागा लहका था, जिसकी मां तथा वहन को पाक मेना के 'दानवो ने गोली से उड़ा दिया था। वह किसी प्रकार भागकर रेनिगो चला आया । तन्नू प्रात काल मे भूखा- 'पीकर बुझा ली थी, परन्तु भूख नहीं मिट . प्यास .
कीर्ति शेप/८३ और मिताली की ओर से इप्टि हटा, एकदम भात खाना प्रारम्भ कर दिया । यह सब पोतिन ने देखा और देसा मिताली के हृदय की पीड़ा को, जो प्रसों के मार्ग से वह निकसी थी। मोतिन ने समीप माफर मिताली के कन्धे पर हाथ रख कर कहा, "सच, तुम पूज्यनीय हो।" मिताली ने कहा, "मुझ से अधिक इस भात की जरूरत इस बच्चे को थी।" "कौन है यह ?" "एक प्रमागा।" "इसे शिशु निकेतन में छोड़ देते हैं।" "नहीं, इसे मैं अपने पास रखूगो।" "ऐसे तो हजारो बच्चे हैं, जो अाज अपने प्रांसुओं से पाक-दानवता की रहानी कह रहे हैं।" "जो आँखों से दूर हैं, उनका प्रश्न तो बाद में उठेगा । जो प्रांखों के सामने हैं, उनको कैसे दूर कर दूं?" "तुम इसको देखमाल करोगी या डयूटी पर रहोगी ?" "इसकी देखमाल तो दुर्गा माँ करेगी ।" कुछ क्षण मौन रहकर बोली, "मेरी इच्छा है, बंगला देश स्वतंत्र होने पर ऐसे शिशुओं तथा नवजात शिशुओं के पालन का भार उठाऊँ।" "यह बहुत बड़ा काम है।" "तुम साथ दोगे, तो सरल हो जाएगा।" "मैं तैयार हूं।" मिताली ने एक हलकी मुसकान से प्रोतिन को देखा और बिना कुछ कहे अपना सिर मोतिन की छाती पर रख दिया । दोनो की सांसें मिती; परस्पर मिलकर अलग होने से पूर्व मादा सांस ने कहा, "अलग तो नहीं कर दोगे?" नर सांस ने कहा, "अशुभ बातें नहीं सोचा करते।" इस कथन के साथ ही मिताली बोली, "प्रायो, अन्दर चलें । कोई ममाचार आ सकता है।" तन्नू की ओर देखकर गेली, "तन्नू, कही जाना नहीं।" .
८४/कीति शेप
तन्नू कुछ नहीं बोला । गरदन हिला कर प्राज्ञा-पालन का आश्वासन
उसने अवश्य दे दिया ।
उसी समय प्रोतिन ने कहा, "यह बच्चा गूंगा तो नहीं है ?"
"यह तो मैंने सोचा भी नहीं था ।"
उसी समय तन्नू से मिताली ने कहा, "तुम वोल नहीं सकते ?"
तन्नू ने गरदन हिला कर 'ना' का संकेत कर दिया ।
मोतिन ने कहा, "तुमको इसका नाम कैसे पता लगा? इसकी कहानी
तुम कैसे जान पायी ?"
"कल जब यह यहाँ पाया, इसके साथ एक आदमी था, उसी के द्वारा
मुझे इसकी पीडा का ज्ञान हुा ।"
मोतिन बोला, "इसके न वोलने का क्या कारण है, कुछ कहा नहीं जा
सकता।"
मिताली उसके समीप बैठकर ममतामयी वाणी में बोली, "पहले बोलता
था।"
तन्नू ने संकेत से कहा, "हाँ ।"
"यब ?"
"नहीं।"
"वयों ?"
तन्नू ने टूटी बंगला मे लिखकर कुछ संकेत से बताया कि रात मेरी माँ
को छत पर लटका कर फांसी दे दी और मेरी विवाहित बहन को रात भर
वस्त्र-रहित रखा । दीदी को अपमानित करने में उन्होंने कोई कसर नहीं
रखी। एक-एक की वासना का शिकार बनती हुई बेचारी अचेत हो गई।
उस भवस्था में एक पाक सैनिक उसके वक्ष-प्रदेश की घाटी के मध्य रमकर
कामुक पुस्तक पड़ता रहा और प्रातः होने पर दीदी के दोनों उरोजों को काट
कर अपने पालतू कुत्ते को खिला दिया ।
इस घटना को देखकर में इतना पवरा गया कि भय से मेरी मावान
न निकामी मोर प्रय
मिताली ने मोतिन को देखा । मोनिन ने मिताली को देसार अपनी रष्टि
उमके पक्ष-प्रदेश पर टिका दी।
कीर्ति मेप/८५ मिताली कुछ कहते न बना । तन्नू को छाती से लगाकर वह बिलख उठो । उसका दुसी मन पीड़ा का सागर बन गया। मोतिन भरे स्वर में वोला, "ऐमी दर्दनाक घटना विश्व में पहली बार देखने को मिली है । इससे अधिक पशुता और क्या हो सकती है ?" मिताली गम्भीर मुद्रा मे बोली, "इस बच्चे के गूंगे होने का कारण भय है। यह अवश्य बोलेगा। मेरी प्रार्थना है, इसे आप अपने घर पर रख लो।" "ठीक है. जैसी तुम्हारी इच्छा। इसे उपचार केन्द्र मे ललिका के पास छोड देता हूँ। दोनो का मन लगा रहेगा। यह उसकी मदद कर सकेगा, वह इसका ध्यान रखेगी।" "अव कमी है ललिका ? मुझे तो जाने का समय नहीं मिलता।" कथन के साथ ही मिताली खडी होकर प्रसारण कक्ष की ओर चल दी। तन्नू भान्त मुद्रा में भात खाता रहा। पोतिन साथ चलता हुआ बोला, "उसके पैर के घाव मे मैप्टिक हो गया है । पर घुटने के नीचे से काटना होगा।" मिताली देर की रुकी साँस लेकर वोली, "पैर कव कटेगा ?" "माज सायें, मेरे पहुंचने पर।" "मेरी ओर से क्षमा मांग लेना ! मेरा जाना सम्भव न हो सकेगा। तन्नू को साथ ले जाना।" मोतिन ने गरदन हिलाकर हाँ कर दी। वह कुछ बोल न सका । मिताली कुरसी पर बैठकर उदास मुद्रा मे बोली, "मेरी योजना केसी लगी?" "यह प्रश्न दूसरा है । पहले राष्ट्र से पापियो को निकालना होगा। बाद में तुम्हारी योजना पर विचार करेंगे। मेरी भी अभी कई योजनाएँ अधूरी मिताली बोली, "मैं जान सकती हूँ।" "एक का सम्बन्ध तुम से है और दूसरो योजना मे में ललिका को उसके नेत्रो को ज्योति वापिस लाकर दूंगा।" तुम्हारा साथ दूंगी।" "मुझे पूर्ण आशा है, और फिर मैं अकेला कर भी क्या सकूँगा ?"
८६/ कोति गेप मिताली घडी देसकर बोली, "अगले ममाचार का समय होने वाला है। प्राज्ञा चाहूंगी।" पोतिन बोला, "मैं भी चलूंगा।" "फिर कब प्रायोगे?" "जब चाहो ।" "मैं तो कहती हूँ, जामो ही नहीं।" "इतना प्राज्ञाकारी नहीं हूं।" प्रोतिन मुसकान-मरी दृष्टि से बोता ! "जानो, परीक्षा की कसौटी पर खरे उतरे।" मिताली प्रोखों से बोली और अधरो से कहा, "तन्न को लेकर जा रहे हो ?" प्रोतिन व्यंग्य-माव से बोला, "पहले उत्तर मे कुछ शंका रह गई है क्या ?" X मिताली के गोरे गालों पर क्षणिक लाली आ गई । वह शान्त न रह सकी, न कुछ कह सकी । समय के प्रभाव के कारण व्यंग्य का उत्तर मी न दे सकी। पतके उठाकर जाते हुए मोतिन को देखती रही और देखती रही उस अबोध शिशु को, जो अंगुली पकड़कर छीटदार काली-लाल सडक पर जा रहा था । X X X उपचार केन्द्र में जाकर मोतिन ने देखा कि ललिका के पैर में पट्टी बंधी थी। ललिका धीर और गम्भीर थीं। डाक्टर मोतिन को देखकर बोला, "ललिका, मोतिन आ गया।" ललिका ने कहा, "मैया, आ गये ।" कथन के साथ ही ललिका ने अपना हाथ खोजने की मुद्रा में फैला दिया। पोतिन ममीप आकर ललिका का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, "कैसी हो, ललिका ?" ललिका ने कहा, "मैं प्रसन्न हूँ, तुम अपनी कहो।" "मैं तो ठीक हूं।" ललिका बोली, "मैया, डाक्टर कहता है तुम्हारा पर काटना पड़ेगा । क्या यह सत्य है ?" "नहीं, ऐसी बात नहीं है । घाव को धोकर फिर से पट्टी बांधने से काम कीर्ति शेप | । चल जायेगा।" "फिर पाप ही डाक्टर को समझायो।" "मैं अभी बात करता हूँ, तुम चिन्ता न करो।" "मैं देख नहीं सकती, परन्तु समझ तो सकती हूं।" मोतिन ललिका के दुख-मुख को ही सर्वोपरि मानने लगा था । वहन के अति जो प्यार एक भाई अपित कर सकता है, वही अोतिन ने ललिका की दिया । परन्तु प्राज मोतिन चिन्तित था। उसी उपचार केन्द्र के सामने एक मन्दिर भी था, जिसकी चांदी की मूर्ति तो पाक मैना उठाकर ले गई थी, पत्थर की मूर्ति तब भी मन्दिर में थी । उस मन्दिर में भी प्रोतिन ललिका के लिये पूजा करने गया । लोहे के सीकचो के अन्दर देवता की प्रतिमा स्वयं उदास थी । फिर प्रोतिन की पूजा का महत्व क्या हो सकता था, यह तो स्वयं भगवान् भी नही जानता । ललिका की अवस्था उस समय ऐसी नहीं थी कि वह सुख और संतोप- अनुभव करती। उन क्षणों मे ऐसा प्रामास भी नहीं हुआ कि मनुष्य का जीवन श्रेष्ठ है, सफल है; अपितु वह अनुभव कर रही थी कि जीवन दुख की प्राग है, जिसमें तपटें उठती हैं । अन्धकार के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं दिखाई दे रहा था । ललिका प्रोतिन के हाथ पर से हाथ हटाकर बोली, "मुझे दुख है, मै राष्ट्र की सेवा न कर सकी।" प्रोतिन बोला, "कौन कहता है ? राष्ट्र तो कमी तुम्हा ऋण नहीं उतार सकता । तुमने राष्ट्र को वह सम्पत्ति दी है, वह गुप्त योजना दी है, जिसके आधार पर राष्ट्र पाक सेना का मुकाबला कर सकता है।" "उमका क्या किया?" "किसका?" "योजना की अन्तिम रूपरेखा तुम जानते हो?" "हां, पाक मारत पर आक्रमण करेगा।" "ठीक है....."ठीक है । यही हैदर अली ने कहा था। ईरान से आने वाली सामग्री प्राप्त होते ही पाक मारत पर हमला कर देगा।" "यह तो यह्यिाखां ने भी अपने भापण में कह दिया है।"
८८ / कीति शेप फिर तो निश्चित है, "पाक भारत पर हमला कर देगा।" "लेकिन..।" 'लेकिन क्या ?" 'देखो, ऊँट किस करवट बैठता है।" "योजनानुसार पाक की हार होगी। महमूद ने बताया था, योजना की रूप-रेखा में अधिक जान नहीं है । इसलिए पाक को पीठ पर गोली खानी होगी।" ललिका कुछ क्षण मौन रह कर वोली, "चीन, अमेरिका, ईरान तथा अन्य मुसलिम राष्ट्रों के दम पर पाक भारत मे युद्ध करेगा। बाद में पता लगेगा कि कितने दोस्त हैं और कितने दुश्मन ।" प्रोतिन शान्त-माव से वोला, "सबको अपनी करनी का फल पृथ्वी पर ही मिल जाता है, फिर उस फल से पाक ही क्या बच सकेगा ?" "स्वतंत्रता कोई निजी मामला नहीं है, बल्कि एक सामाजिक समझौता है। काल का चक्र घूम रहा है। उस चक्र में भी गति है। मुष्टि है तो संघर्ष भी है । उसमे ज्योति के जो स्फुल्लिग फूटते हैं, वे सब के लिए एक-से सिद्ध नहीं होते।" नोतिन वोला, "किसी के लिये वे प्रकाश के कण हैं।" तलिका बोली, "मेरे जैसी के लिये फूस के जंगल में एक चिनगारी के समान ।" "ऐसी वात नही, ललिका । सबके लिये जो सम्भव है, काल के चार चरण उमे असम्भव धना डालते हैं । फल जितना ज्यादा गलता है, वीज उतना ही मस्त होता है।" ललिका की ओर देखकर मोतिन पुनः बोला "परिवर्तन की भक्ति शरीर मे नही, बुद्धि में होती है ।" ललिका समझ गई थी। वह दुखो रह कर प्रोतिन की पीड़ा को नहीं बटाना चाहती थी। उसे कुछ ऐसा प्रामास हुआ, मानो मोतिन के साथ कोई मोर भी है। ललिका बोली, "साथ मे और कौन है ?" प्रोतिन ललिका को तन्नू की कहानी बताकर बोला, “यह प्रय तुम्हारे पान हो रहेगा । तुम्हारी देस-रेख में यह अपना दुप भूल जायेगा। मां को
कीति शेष / ८६
भूल जाये, दीदी याद न आये, इसे ऐसा प्यार करना।"
उसी समय ललिका ने हाथ से खोज कर कहा, "तन्नू मेरे पास रहेगा,
मेरी आँखें बनेगा।"
अोतिन सरल भाव से बोला, "यह मैं बताना भूल गया था कि यह बोल
नहीं सकता।
ललिका तन्नू के हाथों को अधरों से लगाकर बोली, "मैं देख नहीं सकती,
यह बोल नहीं सकता।"
ओतिन ने आत्मीयता दिखाते हुए कहा, "अाजकल जो घटनाएँ घट रही
हैं, उन्हें न देखना ही अच्छा है । तुम मुझसे, अांखों वालों से अधिक सुखी
हो। तुम को एक पीड़ा है-देख नहीं सकती। आँखो वालों के अनेक पीडाएँ
हृदय मे दवी पड़ी है।"
ललिका साड़ी के छोर से नीर-भरी आँखें पोछते हुए बोली, "मैया, अजिका
का किसी शिविर में पता लगा ?"
"नहीं।"
"अव नही मिलेगी ?"
"अवश्य मिलेगी।"
"कहाँ मिलेगी ? मर गई होगी।"
"अंजिका तुम्हारी बहन है ! तुम्हारी तरह चतुर तथा वीर है। वह मर
नहीं सकती। मार कर पायेगी ! मेरा मन कहता है, वह जहाँ भी है, सुरक्षित
"हो सकता है भारत चली गई हो।"
"यह भी सम्भव हो सकता है।"
उसी समय मुक्ति वाहिनी का एक जवान उपचार केन्द्र मे पाकर मोतिन
के कान मे कुछ कह कर बोला, "जल्दी करो।"
मोतिन जवान के साथ बिना कुछ कहे-गुने उपचार केन्द्र से बाहर निकल
गया। कहां गया, यह सब गुप्त था।
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. कीति शेष / ६१ प्राप्त कर सकते हैं ! उनकी सारी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं। परन्तु ऐसे मनुप्य मूलतः नष्ट ही होते है। सदा सिर पर रखे हुए और स्नेह से पाले हुए बाल भी एक दिन रंग बदल जाते हैं।" "मैं तुम्हारे कहने का अर्थ नही समझी ।" "तुम्हें जिंदा रहना होगा ! अपने राष्ट्र का ध्वज फहराता देखना कौन पसन्द नहीं करेगा? दोपो को करने की अपेक्षा परदोप-दर्शन और दोपों का चिन्तन अधिक पतन करने वाला होता है।" "मैं इस पाप का भार कैसे उठाऊँगी?" "जहां गोलियां भी निष्फल होती हैं, वहां नारियां सफल होती हैं । मृत्यु से घृणा करना साहस का काम है।" : "लेकिन जहाँ जीवन मृत्यु ने भी अधिक भयानक हो, वहां जीने की हिम्मत करना सबसे बड़ा साहम का काम है।" "तुम अकेली तो नहीं हो?" "मेरे साथ है ही कौन ?" "मैं, मेरी भावना, तुम्हारे उच्च विचार साथ हैं।" "तुम कब तक साथ दोगे?" "पाश्वासन चाहती हो?" "निराशा के भाव पर विजय पाने के लिये तथा भविष्य में एक नई पाशा पाने के लिये विश्वास का होना आवश्यक है ।" तरुणी ने सरल भाव से कहा। "मैं तो समझता हूँ, सुन्दर जीवन ले बढकर कोई कलाकृति नहीं है।" : "जीवन सुन्दर हो तब न...।" "तुम जीवन से बहुत निराश हो गई हो।" "मन्तिम सीमा तक।". "मैं तुम्हारा साथ दूंगा।" "तुम सचाई को नहीं बदल सकते ।" P' "परन्तु उसके प्रति दृष्टिकोण तो बदला जा सकता है।" "नारी के सम्बन्ध में सबसे विचित्र जो है, वह पुरुष है।" अतुल बोला, "इस प्रश्न का उत्तर में नहीं दे सकता। फिर भी तुम्हारी “६४/ कीर्ति शेप मोतिन मन के भाव अधरों से दूर रखकर बोला, "नही । मुझे नाम अच्छा लगा था, इस कारण एकाएक मुंह से निकल गया।" पोतिन ने अंजिका को देखा । मृगी-सी आँखें, अर्धवृत्त लाल अघर, नवीन ऊपा के समान कोमल शरीर-यौवन की मादकता से लदी थी अंजिका । ऐसा लगता था मानो पृथ्वी पर माकाश से कोई अप्सरा उतर आयी हो । वह सौन्दर्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त करके मिस ढाका का ताज पहन चुकी थी। अतुल बोला, "वैठो पोतिन, कुछ जलपान करोगे?" "कैसे इनकार कर सकता हूँ ?" "वोलो, अंडा और वन्द ?" "चलेगा । अंजिका से भी मालूम कर लो।" अंजिका ने कहा, "मैं अण्डा नहीं खाती।" मोतिन बोला, "क्यों, अण्डे में क्या दोष है ?" "प्रश्न वाद-विवाद का नहीं, जलपान का है।" अतुल बोला, "देसा, मोतिन ? कितना सुन्दर जवाय है ! इसे कहते हैं जवाब।" पोतिन ने मंजिका को देसा, मंजिका ने मोतिन को। मंजिफा ने मोतिन को पूर्ण रूप से देपा हो या न देखा हो, परन्तु मोतिन ने मंजिका को पूर्ण रूप से देखा । यह कुछ बोला नहीं, परन्तु पूर्ण रूप से समझ गया था कि अंजिका एक नए मोड़ से गुजर चुकी है । इसके बाद मापस में परिचय दिया गया और तीनो बंट गए.। मोतिन रह-रह कर पंजिया को देखता रहा, जिसके कारीर में सलोना मोप्टय और यौवन-सौन्दर्य को मुरा थी। उसकी प्रसों में कुछ ऐसा विचित्र मापपंग या कि देखने वाला उसमें ड्य-मा जाता पा। मंजिला ये ग विपर हुए थे। परिधान में सलवट पड़ गई थी। उमे परिषय में पता पसा फि मोतिन भगुन का महयोगी है । मुक्ति वाहिनी सगटन में मोमिन का विशेष सहयोग रहा है। मंजिश के मानों की एप मट उमर मरतर में नीष मुर भावी पी। रचित मटकोपनपटी के ऊपर मार पत्रिरा योनी, "मार सायं यो कीर्ति शेप/६५ स्टेशन तथा उपचार केन्द्र पर बम गिराए जायेंगे और ये विमान सायं सात बजे रंगपुर से उड़ान भरेंगे।" अतुल वोला, "तुमको यह कैसे मालूम ?" "मुझे क्या मालूम है और क्या नहीं, यह तुम नही जानते।" "अंजिका !" अतुल ने समीप पाकर कहा, "योलो, और क्या मालूम - "समय आने पर सव बता दूंगी।" "अव क्यो नही ?" "तो फिर सुनो । अव तक मैं मौन रहकर तुम्हारी सुनती रही, अपनी बात मुख से नहीं निकाली थी।" कॉटन की सिन्दूरी साड़ी अंजिका के शरीर पर खूब खिल रही थी। वह कुछ भाव-विभोर होकर अतुल को निहार रही थी। हृदयहारी मुसकान ‘फेंककर अंजिका ने कहा, "तुमको मारने का भार मुझ पर सौंपा गया था। तुम नदी के इस पार खड़े थे, हम नदी के उस पार। पाक कैप्टिन ने तुमको 'देख लिया था। वह तुमको अच्छी तरह पहचानता था । (कुछ रुक कर) इससे पूर्व भी मुझे एक विप का पंकिट कुएं में डालने के लिए दिया गया था। परन्तु मैंने कुएं मे न डालकर पाक सेना के खाने में डाल दिया। इस प्रकार खाना खाने के दस मिनट बाद दो सौ पाक जवान हमेशा की नीद सो गए । कई बार सुन्दरता वरदान बन जाती है । मुझे कैप्टिन ने मारा नहीं। रसोइये को गोली मारकर कहा, "इसने नमक के स्थान पर विष डाल दिया। अनवरअली रसोइया मारा गया । मुझे कैप्टिन ने अपने निजी 'उपयोग के लिए सुरक्षित रखा।" इतना कहकर वह खड़ी होकर भागे बोली, "प्रायो, अन्दर प्रायो, मैं तुमको अपनी पीठ दिखाती हूँ, कैप्टिन ने अपनी इच्छा-पूर्ति के लिए मेरे साथ क्या नही किया।" अतुल गम्भीर मुद्रा में बोला, "मुझे इस बात का माश्चर्य है कि मंजिका जैसी नारी की गोद में सेल कर भी कैप्टिन का व्यक्तित्व बदला क्यों नहीं।" मोतिन वोला, "उनका व्यक्तित्व ही नही होता, इसलिए बदलने का प्रश्न ही नहीं पंदा होता।"
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कोति शेष/६७
अंजिका ने प्रांखें उठा कर कहा, "ललिका जिन्दा है !"
"तुम उसको जानती हो?"
"हाँ । वह मेरी वहन है। मैं और वह साथ ही पढते थे।"
मोतिन बोला, "हां, वह जिन्दा है।"
"वह उपचार केन्द्र में क्यों है ? उसको क्या हो गया ? क्या वह
नी..?"
"नही, ऐसी बात नहीं है । तुमको मानसिक दुख है, उसे शारीरिक घाव
, जो शीघ्र ही भर जायेंगे।"
"मैं उसको देखने चल सकती हूँ ?"
"अभी नहीं।"
"क्यो ?"
"तुम्हारा वहां जाना खतरे से खाली नहीं है। कैप्टिन के विश्वासपात्र
विक तुम्हारी खोज में हैं।"
"तुमको कैसे मालूम ?"
"हम मारे दिन करते ही क्या हैं ? हम जानते है, पाक सेना कब कहाँ
ला डालेगी; कहां विमान से उड़ान भरेगी। किस राष्ट्र से मदद मांग रही
। कौन उनकी महायता कर रहे हैं। कौन उनके विरुद्ध बोल रहे है । पाक
शवनी में कितनी खाद्य सामग्री तथा युद्ध सामग्री है ।"
"तुम मेरे बारे में भी जानते थे ?"
"हाँ । तुम्हारी विप की शीशी हमारे पास है ।"
अंजिका वक्ष पर हाथ रख कर मौन हो गई। वह कुछ कह न सकी।
छ क्षण मौन रह कर बोली, "तुम सब कुछ जानते हो, इसमे कोई सन्देह
ही। परन्तु मैं भी कम नहीं जानती।"
"क्या तुम्हारी जानकारी राष्ट्र के काम आ सकती है ?"
"मैंने इन माठ मास में किया ही क्या है ? बदला लेने की भावना मेरे
दय में तडप रही है। एक लपट उठती है, ज्वाला का रूप ले बैठती है ।
ब तक मैं कैप्टिन की पीठ पर कोड़े मार-मार कर उसे लाल न कर दूंगी,
न्ति नही बैलूंगी।
अतुल बोला, "हमारी संस्कृति ऐसा नही कहती। अहिंसा को परम धर्म
६६/ कीति शेप अतुल अजिका के वक्ष पर पड़े श्याम केशो को देखकर धीर भाव से बोला, "तो तुम मुझे मारने पायी थी ?" अंजिका का मुंह लटक गया । अतुल की अन्तिम वात से वह विकम्पित हो उठी । क्षण भर अतुल की ओर देखकर बोली, "मैंने सोचा, प्राण बचाने का अच्छा अवमर है । मैं विप की शीशी सुरक्षित स्थान पर रखकर नदी में कूद गई । सच पूछो तो मैं कूदना नहीं चाहती थी क्योंकि वहां रहकर भी मैं राष्ट्र के लिए अधिक हितकर सिद्ध हुई हूं। परन्तु उनके अत्याचारों से हृदय मे इतने घाव हो गए थे कि और स्थान ही नहीं रहा था।" "वे मुझको मारना क्यो चाहते हैं ?" "इसके दो कारण है । एक तो तुम मुक्ति वाहिनी का संचालन कर रहे हो, दूसरे तुम......।" "बोलो।" अंजिका ने प्रोतिन को देखकर कहा, "सत्य कड़वा होता है, तुम कडवा क्यो सुनने लगे ?" अतुल बोला, "तुम कडवा सुनने की बात करती हो, मैं उसे पान करने को तैयार हूं, मगर.....!" "मगर क्या?" "मगर राष्ट्र का चढता हुअा फहराता ध्वज देखने के बाद ।" अजिका ने प्राख पलको के पर्दे में ले जाकर कहा, "इन वातो को छोडकर पहले रंगपुर से उडान भरने वाले विमानों को गिराने मा प्रबन्ध करो।" "उनकी तुम चिन्ता न करो।" मोतिन वोला, "रंगपुर के हवाई अड्डे का रनवे नष्ट कर दिया गया है। वहाँ से प्रोई विमान उड़ान नही भर सकता।" अतुल ने कहा, "हमने कच्ची गोलियां नहीं खेली। तुम्हारा कंप्टिन भी हमारे अधिकार में है। वह उसी समय बन्दी बना लिया गया था। मोतिन को सूचना भेज कर यह काम समय पर ही करा दिया था।" मोतिन बोला, "यदि मुझे उपचार केन्द्र में देर न लगती तो मैं शेप पाक संनिकों को भी पकड़ने में सफल हो जाता।" मोतिन की ओर देख कर अतुल ने पूछा, "अब ललिका कैसी है ?" मैंने कीर्ति शेप/६७ अजिका ने आँखें उठा कर कहा, "ललिका जिन्दा है !" "तुम उसको जानती हो?" "हाँ । वह मेरी वहन है । मैं और वह साथ ही पढ़ते थे।" घोतिन बोला, "हां, वह जिन्दा है।" "वह उपचार केन्द्र में क्यों है ? उसको क्या हो गया ? क्या वह "नहीं, ऐसी बाल नही है । तुमको मानसिक दुख है, उसे शारीरिक घाव है, जो शीघ्र ही भर जायेगे।" "मैं उसको देखने चल सकती हूं?" "अभी नहीं।" "क्यो ?" "तुम्हारा वहां जाना खतरे से खाली नहीं है। कैप्टिन के विश्वासपात्र सेवक तुम्हारी खोज में है।" "तुमको कैसे मालूम ?" "हम सारे दिन करते ही क्या है ? हम जानते है, पाक सेना कब कहाँ गोला डालेगी; कहाँ विमान से उड़ान भरेगी। किस राष्ट्र से मदद मांग रही है। कौन उनकी सहायता कर रहे हैं। कौन उनके विरुद्ध बोल रहे है ।, पाक अवनी में कितनी खाद्य सामग्री तथा युद्ध सामग्री है।" "तुम मेरे बारे में भी जानते थे ?" "हो । तुम्हारी विप की शीशी हमारे पाम है ।" पजिका वक्ष पर हाथ रख कर मौन हो गई। वह कुछ कह न सको।। बुछ क्षण मौन रह कर बोली, "तुम सब कुछ जानते हो, इसमें कोई सन्देह नहीं। परन्तु मैं भी कम नहीं जानती।" "क्या तुम्हारी जानकारी राष्ट्र के काम प्रा सकती है ?" "मैंने इन पाठ मास में किया ही क्या है ? बदला लेने की भावना मेरे हृदय में तड़प रही है । एक लपट उठती है, ज्वाला का रूप ले बैठती है । जब तक मैं कैप्टिन की पीठ पर कोई मार-मार कर उसे लाल न कर दूंगी, शान्त नहीं वःगी। अतुल बोला, "हमारी संस्कृति ऐसा नहीं कहती। महिंसा को परम धर्म 16/कीति दोप मानने वाले हाथ कोड़ा कसे उठा सकते हैं ? तुम अपने विचार बदल दो। बदले की भावना मन से निकाल दो। हम कष्टित को बन्दी बना कर सरकार के हवाले कर देंगे। अपराध की सजा वह स्वयं भोगेगा। स्वर्ग तथा नरक इस पृथ्वी पर ही हैं।" "तुम मेरे स्थान पर होते तो...?" "तो भी उसे क्षमा-दान कर देता । मैं अपनी यात्मा की आवाज को नहीं दवा सकता।" "सच पूछो तो तुम मेरे लिये देवता बन कर आकाश से उतरे हो।" अतुल बोला, "मेरे व्यक्तित्व को परिभाषा कुछ और ही है।" वायु के तीव्र वेग से खिड़की एकाएक खुल गई। अंजिका का 'ध्यान बाहर की ओर खिंच गया। उसने कुछ पूछना चाहा किन्तु फिर कुछ सोच कर मौन ही रह गई।
दस ते हो।" समय व्यतीत होता गया । अतुल और अंजिका एक-दूसरे के निकट पाते रहे-वैसे ही, जैसे दो पहाड़ी वृक्ष अपनी शाखाप्रो के आयामों द्वारा एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं । कभी-कभी समय मिलने पर प्रोतिन भी वहां चला नाता । अंजिका पहले ही प्रोतिन के व्यक्तित्व से प्रभावित थी; किन्तु जब इसका नवीन पाकर्षण ज्ञात हुआ, तो वह आह्लाद से चंचल हो उठी। उसी नाव से वोली, "यह भेद आपने आज तक क्यो छिपाये रखा ? यह कल झे ललिका ने बताया था कि तुम उसे बहन मे अधिक मादर-सम्मान "मैं ऐसा न करता, तो अंजिका, वह कमी को मर गई होती। पर से आचार, प्रांखों से अन्धी ललिका को सहारे की भावश्यकता है।" "आज उसके पैर की बैसाखी बन कर मा जायेगी, वह चल सकेगी। पचार केन्द्र से उसे छुट्टी मिल जायेगी। कल से यह हमारे पास ही रहेगी। उसकी देख-रेख मैं करूंगी।" "तुम ऐसा करोगी, तो उसके दिन भी कट जायेंगे "यह तो मेरा बहन के प्रति कर्तव्य है।" मोतिन बोला, "माज अतुल बाबू कहाँ गये ?" "कुछ कह कर नहीं गये।" "फिर भी ?" "प्रात: कह रहे थे, सायं को देर से लौटूंगा।" सायं का समय था । सूर्य पश्चिम की मोर चला जा रहा था। गुलाबी " १००/कीति शेप सर्दी पड़ रही थी। अजिका वोली, "माज तीन दिसम्बर है।" पोतिन बोला, "फिर क्या हुआ, कोई खास घटना घटने वाली है क्या?" "मुझे कुछ ऐसा आभास हो रहा है कि पाक..।" तमी अतुल आ गया और अजिका के समीप पाकर बोला, "अंजिका, तुम्हारी वात सत्य निकली। पाक ने भारत पर हमला कर दिया है ।" "और भारत ने..." "अभी भारत की प्रधानमंत्री कलकत्ता में है । तुरन्त राजधानी पहुंच रही हैं। रात के बारह बजे प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम एक सन्देश प्रसारित करेंगी।" मोतिन बोला, "मारत के पास युद्ध के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं नही है।" "क्या भारत बगला देश की सहायता करेगा ?" "अाज की रात गुजर जाने पर पता लगेगा।" उस सारी रात पाकिस्तानी विमान भारत के प्रमुख हवाई अड्डों पर बार-बार वम-वर्षा करते रहे । पठानकोट श्रीनगर, आगरा, अम्बाला, जोधपुर, आदमपुर, अमृतसर आदि अड्डो को नष्ट करने का प्रयास किया गया। भारतीय हवाई अड्डों पर बम-वर्षा करके भारत की वायु सेना की शक्ति कम करने का याह्यिाखां का उद्देश्य था। उसी रात पाक ने दो डिवीजन पैदल सेना तथा टेक युद्ध में लगा दिये । प्रोतिन प्रांखे मलता हुआ वोला, "पाक सन् १९६५ मे मी मुंह की सा कर रह गया था, ऐसा ही अबकी भी होगा।" अतुल बोला, "यदि आज जम्मू-श्रीनगर मार्ग को पाक सेना काट देती है तो काश्मीर को रसद पहुंचाना बहुत कठिन हो जायेगा।" "भारतीय रेडियो एक-एक घंटे बाद प्रसारण कर रहा है। अभी पता लगा है कि अमृतसर-लाहौर सडक पर भी टैंकों का जमाव है। हुसैनीवाला के पास भी पाक टक देखे गये है।" मंजिका बोली, "पाप लोग चिन्ता न करें, वंगला देश में केवल वीस विमान शेप रह गये हैं। पाक वायु सेना कुछ भी नही कर सकती।" . -- कीति शेप/१०१ उसी समय भारतीय रेडियो ने प्रसारण शुरू किया। अंजिका बोली, "जरा खवर सुनो।" दाजिस्टर में से ध्वनि प्रायी, "प्रात: के सात बजे हैं । अब अाप अशोक वाजपेयी से समाचार सुनें । भारत-पाक-युद्ध जोरो पर है। भारत ने आज संकटकालीन स्थिति की घोषणा करके पाक के हमले को रोकने के लिए फौजी कार्यवाही प्रारम्भ कर दी है। "रात के बारह बजे भारतीय विमानो ने पाक के अड्डो पर वम गिराये। सरगोधा, कांदेरी, रावलपिंडी के हवाई अड्डी पर भी बम गिराये गये । पाक के तीन विमानो को क्षति पहुंची। भारतीय सेना की तोपों ने उन तोपों को ठंडा कर दिया, जो गत सप्ताह मे तैयार सडी थी। "बंगला देश को मुक्ति दिलाने के लिए भारतीय जल-थल-वायु सेना ने पांच तरफ से अाक्रमण कर दिया है । समाचार समाप्त हुए।" उसी समय प्रोशिन खड़ा हो गया । अतुल बोला, "उठो, भारतीय फौजों का साथ दो । अंजिका, तुम भी चलो। पाक की रेत की दीवारें अाज टूट जाएंगी। बंगला देश मुक्त होकर रहेगा ।" अजिका बोली, "जब तुम जैसे गुप्तचर बंगला देश में होगे, तो फिर क्यों न बंगला देश मुक्त होगा।" अतुल ने अंजिका की ओर देखा । प्रोतिन कुछ समझा, कुछ नही । । अतुल बोला, "तुम जानती थी?" "मैंने पहले भी सकेत दिया था। कैप्टिन के द्वारा मुझे पता लगा था कि तुम भारतीय नागरिक हो और मुक्ति वाहिनी सेना की मदद करने के लिए कलकत्ता से यहां आए हो।" मोतिन बोला, "सर?" "मुझे आज्ञा थी, प्रोतिन, कि मैं किसी कोन्यानो न दूर केवल एक आदमी जानता था।" "कोन ?" 'मुजीब।" "फिर कैप्टिन को कैसे पता लगा "यह मैं नहीं जानता।" . 4 १०२/कीति शेप "इसीलिए उसने अंजिका को भेजा था।" "हो सकता है।" अंजिका बोनी, "वह मी मूल पाकिस्तान-निवासी नहीं है। "तो फिर ?" "पाक को मित्र-राष्ट्र द्वारा भेंट किया गया एक गुप्तचर ।" "तो फिर वह कंप्टिन नहीं है ?" "नहीं।" "तुमको कैसे पता चला ?" "मुझे उसने स्वयं बताया था ।" अतुल बोला, "राजनीति भी अजीब चीज है । महल को खंडहर, खंडहर, को महल बना देती है।' "अतुल चक्रवर्ती को उसने केवल अतुल बना दिया।" अंजिका मुस्कानन्, मरी मुद्रा में बोली। "तुम तो सब कुछ जानती हो।" अंजिका बोली, "चलो, कहाँ चलना है ? शेप बातें बाद में बताऊँगी। घवरात्रो नहीं, मुझ तक सीमित भेद, भेद ही रहेगा।" "अंजिका! "हाँ ।" आँखों से अजिका बोली। "मैं भारत जाकर तुमको भी गुप्तचर के पद पर लगवाने का प्रयास करूंगा।" "मैं अपना देश नहीं छोड़ सकती।" "फिर मुझे अपना न कहो।" "तुम नदी में से मुझे अपनी गोद में निकाल कर लाए हो । जब मैंने तुम्हारी गोद मे स्थान पा लिया, तो फिर पराया कैसे समझू ?" "हो सकता है, में विवाहित होऊँ।" अंजिका व्यग्यमय मुद्रा में बोली, "पति के अतिरिक्त और भी तो बहुत से रिश्ते होते हैं । पति ही तो सब कुछ नहीं होता।" "मैं तुमको अभी तक नहीं समझ पाया कि तुम्हारे मन में क्या है ?" "राष्ट्र-भावना।" . .
कीति शेप १०३ "और......?" "मात्मीयता।" "किसके प्रति ?" "शुभचिन्तक के प्रति !" "हर बात तुम पहली में करती हो।" "मैं बात तो करती हूँ, सुमानी तो बात भी नहीं करती।" अतुल शान्त हो गया । गम्भीर मुद्रा में व्याकुत बन गया । सुमानी कलकता मे होली-इन-अस्पताल मे नर्स है। आज से पांच वर्ष पूर्व अतुल को एक अपराधी का पीछा करते समय पैर में गोली लग गई थी। इस घटना के कारण अतुल को सुमानी की देख-रेख में 'होली-इन-अस्पताल' में एक मास तक रहना पड़ा था । एक मास बाद अतुल तो घर चला गया, परन्तु सुमानी को मानसिक रोग के कारण अस्पताल में ही रहना पड़ा। आज भी सुमानी अस्पताल में रेत में अंगुली से 'अतुल' लिखती रहती है। वह अतुल के प्रति इतनी आकर्षित हो गई थी कि उसने अतुल से विवाह के लिए अनुरोध किया, किन्तु अतुल ने सुमानी को कोई महत्व नहीं दिया । विमाता के कहने पर अतुल ने सुमानी का अनुरोध ठुकरा दिया। प्रोतिन बोला, "सर, सुमानी......?" अतुल की विचार-शृंखला टूट गई । वह सब कुछ भूल गया । उसके हृदय-पटल पर सुमानो का चित्र फिर से बन गया। उस समय वह अधिक कुछ न कह सका। केवल इतना कहा, "तुम बहुत कुछ जानती हो । केटिन गुप्तचर के पद पर योग्य मानव है । मैं उससे अवश्य मिलूंगा।" "तुमको मिलना भी चाहिए। वह सुमानी का छोटा भाई है।" "निकल......?" "हाँ, केप्टिन निकल । गुप्तचर निकल । सुभानी का छोटा भाई निकल ।" : "वह तो ईरान चला गया था। "हाँ, वह ईरान से,हीं आया है।" • अतुल बोला, "इसका अर्थ यह हुआ कि निकल मेरा':.:::." अजिंका..बोली, "तुम, जानते हो, निकल जानता है. मैं समझ गई.हूँ।
१०४ / कीति शेष . म फिर कहने से क्या लाभ ?" "अंजिका, तुम सब कुछ जानती हो । फिर भी मेरे साथ रहने को तैयार हो?" अंजिका बोली, "अतुल, इसमें तुम्हारा दोष नहीं है । सुमानी का भी दोप नही है । निकल को भी दोपी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उस समय निकल अवोध था।" अतुल बोला, "प्रोतिन, तुम रेडियो स्टेशन चलो । मिताली के काम में सहयोग दो । मैं आता हूँ ।" मोतिन चला गया । अतुल द्वार की ओर देखकर बोला, "तुमने सब पाय साजे कर दिये।" "ऐसा क्यों सोचते हो ?" "मेरे जीवन में तूफान और कांटो के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।" "सब कुछ है, हिम्मत क्यों हारते हो?" "विमाता के कारण घर छोड़ा, फिर भी सुख नही मिला । सुमानी पागल हो गई।" "मुमानी तुमको पाकर फिर मानसिक रोग से मुक्त हो सकती है, मुझे ऐमी प्राशा है।" "हां, अंजिका ! कौन ऐसी मां होगी, जो वेटे को पाकर मानसिक रोग से मुक्त न हो जाएगी?" "तुम उसको एक वार मां कह दो । उसका हृदय उमड़ भायेगा, उसे जीवन-दान मिल जायेगा।" मुमानी निर्धन परिवार में जन्मी तपा पली। उसका विवाह अतुल 'के पिता तोपिन चावर्ती से हुमा था। जब तोपिन को यह ज्ञात हुमा कि विवाह से पूर्व सुमानी के बरेगलं रह चुकी है, तो तोपिन ने मुमानी को घर में निकाल दिया मोर एक वर्ष का शिशु जिसका नाम बाद में प्रतुल रसा, मुमानो को नहीं दिया । इम वेदना से मुमानों के पिता को ऐसा धक्का लगा कि यह दो वर्ष के निकल को छोड कर इस दुनिया से सदैव के लिए चला गया। दुषी ममानी ने नर्म की ट्रेनिंग प्राप्त करके 'होली-इन-हरलाल' में मौकरी कर सी पोर निरल को लिखा-पाकर ईरान भेज दिया, जहाँ यह 1
कीर्ति शेष/ १०५
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गुप्तचर बन गया।
अंजिका बोली, "सोचने से क्या लाभ, जो मां है, वह मां ही रहेगी।
परस्पर दूरी हो सकती है, परन्तु सम्बन्ध तो नही टूट सकता।"
"तुम ठीक कहती हो, अजिका । मैं स्वदेश जाकर मां के चरण स्पर्श कर
उनसे क्षमा मांगूंगा।"
"आज मैं बहुत प्रसन्न हूं।"
"तुमने मुझे जीवनदान दिया है । मेरी सोयी आत्मा को जगाया है । तुम
मेरे लिए सरिता का वरदान सिद्ध हुई हो ।"
"मैं न वरदान है और न ही कोई दैवी । मैं एक साधारण नारी हूँ।"
"नही, अंजिका, नही ! मैं इसके बदले में तुम्हें कुछ नहीं दे सकता।"
"बदले की भावना तो मैंने त्याग दी है । मैं तुम्हारे कथन का अनुकरण
कर रही हूं।"
"अब तो तुम मेरे साथ भारत चलोगी?"
"नहीं, यह कैसे सम्भव हो सकता है ? मैं कैप्टिन के सम्पर्क में रह चुकी
"तुमने तो कहा था कि नदी की गोद से निकाल कर लाये हो, फिर
पराया कैसे समझू ।"
"इन शब्दों की पुष्टि तो मैं आज भी करती हूं कि तुम पराये नहीं हो।
परन्तु नारी-धर्म है कि जिसके अंगों में समा गई, जिसको समर्पण कर दिया,
उसी की हो गई।"
"तो क्या तुम निकल में फिर सम्बन्ध स्थापित करोगी?"
"मुझे करना ही चाहिये ।"
"वह तो बन्दी बन चुका है।"
"मैं प्रतीक्षा करूंगी।"
"क्या वह अव तुमको मिलेगा?"
"जीवन के चौराहे से कभी-न-कमी तो गुजरेगा ही।"
"तुमने तो मुझे भी प्राश्वासन दिया था।"
• "नहीं, मैंने कहा था, नारी कमी मारवासन नहीं देती और मैं जानती थी
कि मेरा-तुम्हारा सम्बन्ध क्या है ?"
१०६/कीति शेप है "निकल ने तुम्हारे साथ बलात्कार किया है, विवाह नहीं।" "यह तुम्हारी मूल है। विवाह भी समर्पण है और बलात्कार भी। विधि मे, इच्छा में अन्तर कह सकते हो, वाकी है समर्पण ही।" "कमी कहती हो, पीठ पर मार के निशान हैं, कभी कहती हो, समर्पण किया है।" "तुम कुछ भी समझो, अतुल ! नारी एक बार जिसकी हो जाती है, विधि और वातावरण चाहे पृथक-पृथक हों, नारी को उसे ही अपना पति मान लेना चाहिए । उसी में नारी जाति की भलाई है, उसी में समाज का हित है।" "परन्तु पुरुप भी उमे पत्नी माने तव न ?" ."पुरुष पर तो कोई नियम ही लागू नहीं होता । वह तो नियम-मुक्त "ऐसी दशा मे तुम अकेली यहां रह सकोगी ?" "अब ललिका मिल गई है, उसकी देख-रेख करूंगी। फिर पिताजी का पता लगाकर कुछ सोचूंगी।" "ऐसी अवस्था में तुम्हारे पिता तुम को देखकर, ललिका को देखकर सहन कर सकेंगे ?" "ललिका की दशा देखकर उनको दुख नही होगा । मैं जब तक वन्धन- मुक्त हो जाऊँगी या कह दूंगी, मैंने विवाह कर लिया।" संयोग की बात है, उसी समय एक गोली खिड़की से आयी और अंजिका के वक्ष पर जा लगी । अतुल ने पिस्तौल निकाल कर सिड़की की ओर देखा- सामने कैप्टिन खडा था। अंजिका उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गई। अतुल भी कम चतुर नही था। उसने मंजिका को छोड़कर निकल पर गोली चला दी । निकल वही ढेर हो गया । अतुल ने निकल को देखा, वह प्राण त्यागने वाला ही था । अतुल उसको उठा कर अजिका के पास ले गया। 'अजिका टूटते शब्दों में वोली, "यह तुमने क्या किया, अतुल ? तुमने मुझे ही विधवा बना दिया। वह जैसा भी था, था तो तेरा पति ।" कथन के साथ ही अजिका ने निकल को देखा। उस समय तक निकल प्राण त्याग चुका था।
बुरीचन्द पर अधिकार
करावादमदापोती..
दूसरा जवानलारामको मोर
कीति शेष / १०७
अंजिका बोली, "पति अगर पापी हो, अत्याचारी हो तो राष्ट्र का, नारी
का शत्रु है ।
अतुल वोला, "न यह कल तुम्हारा था, न आज ही है। इसने एक माय
दो हत्या करके नरक का द्वार खोज लिया है ।"
अंजिका अाँखें बन्द करती हुई वोली, "अच्छा हुग्रा मेरी मौत इमक हायों
हो गई। यह भी बुरा नहीं है कि यह भी मारा गया। एक पापी कार
विदा हो गया।"
"अंजिका !" अतुल बोला।
अंजिका मे अधखुली आंखों से कहा, "मुझे क्षमा कर देना।"
"क्षमा तो मुझे मांगनी चाहिए।"
"तुम क्षमा के पात्र नही, पूजा के पात्र हो।" द इन्ट गर्दा
अंजिका ने अन्त मे कहा, "जय वगला देश ! जय बंगना र
अतुल को खो ने खारा नीर वहा कर कहा, "'
अब अंजिका कहाँ थी? वह तो सदैव के लिए मंटर
"अाज भारत सरकार ने बंगला
देकर अंगदादी।"
खाई में बैठे मुक्ति वाहिनी के जान दे :
उसी खाई में भारतीय बटन। उन ग्राम में प्रविष्ट
होकर ढाई सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र विकार कर दिया था। दीवानपुर
जिले में भारतीय सेना फूलदाही काम नही थी।
दिन चटगांव बन्दरगाह पर हम उंटी औददा दिया गया।
दिन बंगला देश में चार महिना मारह विमान र
गये । युद्ध प्रारंभ होने पर दिल दे।
गई।
१०८ / कीर्ति शेप "काजीपुर क्षेत्र व कुछ ममन सिंह क्षेत्र पर आज हमारा अधिकार है।" जवान खाई से बाहर निकल कर बोला। पैदल सेना ब्रह्मपुत्र की अोर वढने लगी। उनको विश्वास था कि हम वगला देश को स्वतंत्रता दिलाकर जायेगे। वे आगे वढे चले जा रहे थे। दूमरी मेना जंसोर को आजाद करा कर ढाका की ओर बढ़ रही थी। इस टुकड़ी को भी ढाका पहुंचने मे अधिक दिन नही लगने थे । उसी थल सेना मे एक 'राजपूत जवान था जिसके हाथ में गोली लग गई थी। उसने प्रयमो- पचार के लिए इनकार कर दिया । उसने कहा, "मैं घाव पर पट्टी ढाका में ही वांधूंगा।" दूसरे ने कहा, "मैंने भी कसम खाई है कि ढाका मे ही पानी पिऊंगा, जब तक ढाका नहीं पहुँचूंगा, तब तक पानी को हाथ नही लगाऊंगा।" तीसरे जवान ने आकाश की ओर देखकर कहा, "तेरी भाभी की कसम, भोपाल । ढाका पहुँचने पर एक-एक को चुन कर मारूंगा।" राजपूत जवान का नाम भोपाल सिंह था, जो बीकानेर का रहने वाला था। दूसरा जवान भी इसी के साथ थल सेना में मरती हुअा था। उसको भोपाल प्यार मे 'मरियम' कहता था। भोपाल बोला, "मैं भी बापू से वादा करके आया हूँ कि पीठ पर गोली नही साऊंगा।" मरियम वोला, "मैं भी तेरी भाभी मे कह कर पाया था कि दस पाक तेरे नाम के, दस अपने नाम के तथा दो पाक सैनिक मुन्ना के नाम के मार कर पाऊँगा।" मामने सौ गज की दूरी पर पाफ मेना के जवान सहे थे जो तोप से गोले वरमा रहे थे। इधर भोपाल तथा मरियम एक ही तोप को चला रहे थे। भोपाल बोला, "वोम, गोला यहाँ गिरे ?" "कहीं भी डाल दे, भोराल । पर दम मार दे।" "अरे, तू दम की बात करता है । एक पंटा रस जा, मनी लेट जायेंगे। देयता जा । यापू की यमम, एटी या दूध याद दिसा दूंगा।" तोप चली। माराम में नोम टटने लगे । पाक का टम दरडे-टुकड़े हो
कीति शेष / १०६
गया।
उसी समय सोपाल बोला, "देख मरियम, अपनी आंखों से देख ले।
बापू से कहना पड़ेगा तुझे कि तेरे बेटे ने माँ का दूध हलाल कर दिया।"
"तेरी भाभी की कसम, भोपाल । तेरे निशाने तो अर्जुन के निशाने को
भी मात कर गये । ऐसे निशाने लगाता रहा तो पाक क्या, चीनी भी चीन
छोड़ कर भाग जायेंगे।"
भोपाल बोला, "अब की बार गोला उस पेड़ के पास डाला जाये, वहां से
अधिक गोली निकल रही हैं।"
"ठीक है।"
. "हो जा तयार ।"
"चला दे।"
"गया।"
"उड़ गई।"
"जल गई।"
"मर गये।"
शाबाद
"वो पाया।"
"रेत में गिर गया।"
"कोई मरा?"
"नहीं।"
"घायल हुआ
"मवाल ही पैदा नहीं होता।"
"कितने रह गये?"
"दो सौ।"
"अब की बार दस जाएँ ?"
"जाएं।"
"भर दे।"
"भर दी।"
"छोड़ दूं?"
११० / कोति शेप "हाँ।" "मशीन गन पर गिरा?" "हां, दस लुढक गये।" "अब तक चालीस मर गये?" " दोनो वातों में मस्त हो गये । युद्ध चलता रहा । पाक सेना पीछे हटती रही। उसी समय एक गोली पाकर भोपाल की छाती में लगी । भोपाल गिर गया । मरियम ने भोपाल को गिरते देखा। वह उसे उठाने लगा। भोपाला बोला, "दोस्ती पूरी कर दे । मुझे मारने वाला जिन्दा न रहे । उसको छाती में छेद कर दे.........कर दे........ मरियम, कर दे। मेरे मरने से पहले कर दे ।" उसी समय वहां मूवेदार मोरासिंह मा गया और बोला, "भोपाल ! भोपाल ने कहा, "मेरे वापू से कह देना, तेरे भोपाल ने पीठ मे गोली नही खायी। मेरी लाश उनको दिखा देना ताकि सीने में लगी गोली बापू देख सकें।" मरियम वोला, "तुम्हें मारने वाला तुमसे पहले चला गया।" उसी समय कैप्टिन के. सिंह ने कहा, "पाक सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया।" "भला जब भोपाल जैसे जवान होंगे तो पाक आत्मसमर्पण नहीं करेगा तो और क्या करेगा ?" मरियम ने भोपाल को देखा और हैट उतार कर हाय में ले लिया। .
ग्यारह तेरह दिन की लड़ाई के बाद पूर्वी पाकिस्तान को कोति शेप होने पर बंगला देश का जन्म हुआ। स्वतंत्र बगला देश के रूप में पूर्वी बंगाल एक नया राष्ट्र बना। पाकिस्तानी सेनाओं के कमाण्डर ले० ज० नियाजी ने भारतीय सेना के सामने प्रात्मसमर्पण कर दिया । ढाका में जनरल अरोड़ा ने आत्मसमर्पण के समझौते पर हस्ताक्षर करके बंगला देश की सरकार के महासचिव और अन्य तीन अधिकारियों को सैनिक शासन संमलवा दिया। परन्तु इस निश्चय के साथ कि स्थिति सामान्य होने तक भारतीय फौज वंगला देश में ही रहेगी। जिस दिन बंगला देश को स्वतत्र करना था, उसी दिन तथा इससे पूर्व जनरल मानेकशाह ने पाक अधिकारियों से अपील की कि वे प्रात्मसमर्पण कर दें। यह सन्देश जनरल नियाजी को मध्यान्ह के बाद मिला । उसने कहा, "मैं तो पहले ही प्रयास कर रहा हूँ कि यह रक्तपात रोका जाए।" इतना कहने पर भी नियाजी ने सेना को आत्मसमर्पण का भादेश नहीं दिया, जब कि वह जानता था, ढाका चारों ओर से भारतीय सेना तथा मुक्ति वाहिनी से घिरा है। भारतीय सेना के सामने अब तक दस हजार पाक सैनिक मात्मसमर्पण कर चुके थे। सायं को भारतीय सेना ने सैनिक कार्यवाही बन्द कर दी। परन्तु चार पटे तक प्रतीक्षा करने पर भी नियाजी का कोई सन्देश नही पाया तो रात को भारतीय सेना ने फिर 'ढाका पर तोपों तथा विमानों से बम गिराना ११२/कीति शेष प्रारम्भ कर दिया। तमी नियाजी का सन्देश पाया कि पाक सेना जनरल अरोडा के सामने प्रात्मसमर्पण करने को तैयार है। पाकिस्तानी सेना के प्रात्मसमर्पण का समाचार सारे शहर में फैल गया। लोग 'जय बंगला' के नारे लगाते सड़कों पर आ गये । भारतीय सेना को फूलों के हार पहनाये गये। नौ माह के मीपणतम कप्टों के बाद ढाका प्राज अानन्द मे डूब गया । क्या वच्चे, क्या नर-नारी 'जय भारत' 'जय बंगला' की ध्वनि लगा-लगा कर नृत्य कर रहे थे । उसी नृत्य में मिताली को प्रोतिन ने देखा और बोला, "अाज स्वप्न साकार हो गया। 'बगला देश' आजाद हो गया।" मिताली बोली, "इसमे तुम्हारा बहुत सहयोग रहा है।" "सभी का सहयोग था । तुम्हारा क्या कम था ?" "मैं तो केवल तुम्हारी छाया थी।" "हम एक-दूसरे के बल पर एक-दूसरे से प्रेरणा लेकर काम करते मिताली पोतिन का हाथ पकड कर एक वृक्ष के नीचे ले पायी । उसी वृक्ष के नीचे खडी होकर बोली, "तुमने हथेली पर जान लेकर इस तेरह दिन के युद्ध मे जो काम किया है वह बंगला देश के इतिहास में स्वर्ण-अक्षरों से लिखा जायेगा।" मोतिन ने मिताली को देखा। मिताली ने प्रोतिन को देखा और देखा वृक्ष पर बैठे उस जुगल परेवा को जो डाल पर बैठे एक दूसरे से प्रालिगन- बद्ध थे। मानो उनकी मी बंगला देश के स्वतंत्र होने का हर्प हो । परेवा की मुद्रा मे भावनामयो मिताली खो गई । मोतिन उसके अधरों पर गर्म सांस छोडकर मौन हो गया, जैसे ठडा पानी पड जाने पर उवला पानी शान्त हो जाता है । उसी भावना में, उसी मुद्रा में मिताली बोली, "अब तो हम......।" मोतिन मिताली के बालो में हाथ डालकर बोला, "क्या अब हम एक नहीं हैं ?" "विधिवत् रूप मे।" "विवाह भी तो एक गुलामो है ।"
कीति शेप / ११३ 14 "यह तो पूर्वजो का एक नियम है । समाज का एक बन्धन है, एक संयोग है । तुम इसको गुलामी कहते हो, मैं इसको एक बन्धन ।" मोतिन उसकी आँखों में देखकर बोला, "बन्धन भी तो गुलामी का ही दूसरा रूप है ।" मिताली ने आंखें बन्द कर ली और बोली, "फिर कर दो न वन्धन- 'मुक्त । क्यों गुलामी में रहते हो?" पोतिन को ध्यान आया कि मिताली उसके बन्धन में है । उसने एक बार उसकी बन्द आँखों को देखा, फिर लालिमा लिए कपोलो पर हलकी-सी चपत लगाकर बोला, "जब तुमने आत्मसमर्पण कर ही दिया तो जेनेवा समझौते के अनुसार तुमसे उचित व्यवहार करना पड़ेगा।" "क्या जेनेवा समझौते मे यह कहा गया है कि विवाह न करो, वाल सहलानो, भावना-मुक्त हो जायो ?" मोतिन धीरे से बोला, "परी पगली, नारी कुछ भी है, है तो मां । विवाह न होगा, तो मां न होगी। मां न होगी, तो ममता न होगी। बचपन न होगा, तो यौवन न होगा। मैं न होऊंगा, तो तुम न होमोगी। इसलिए विवाह तो करेगे ही। परन्तु......।" मिताली बन्धन मुक्त होकर बोली, "फिर परन्तु ! जब तक परन्तु रहेगा, मैं और तुम एक नहीं हो सकते । परन्तु को दूर करना होगा।" मोतिन बोला "चलो, उठो । अगर तुम्हे विश्वास नहीं है तो बुला लो ग्राह्मण को, करो रीति-रिवाज पूरे ।" मिताली हर्ष में पुलकित हो गई। वह प्रोतिन को छाती से लगकर बोली, "तुम सरे उतरे, में तो परिहास कर रही थी। मुझे क्षमा कर दो।" मोतिन प्रांखों से हम दिया और प्रेमातुर वाणी में बोला, "मिताली।" मिताली ने सरल भाव में कहा, "हूँ।" "चलो । ललिका का पता लगाय, कौसी है ?" "कहाँ है इस ममय?" "अतुल के निवाम-स्थान पर।" मिताली उसी समय कुछ सोच कर बोली, "प्रतुल यहाँ पर है ?" "उसका तो मुझे भी नहीं मालूम । वैसे प्राज प्रतुल को रेसकोर्स मे होना “११४ / कीर्ति शेप “चाहिए । युद्ध-विराम तथा प्रात्म-समर्पण के कागजो पर हस्ताक्षर होने हैं।" मिताली कुछ क्षण मौन रही फिर अतुल के निवास की ओर चलती हुई बोली, "ढाका में कुल कितने पाक सैनिक थे?" "लगभग २४ हजार।" "और सारे बगला देश में ?" "६० हजार, जिनमें लगभग सौ अफसर हैं।" "भारत को भी सैनिक क्षति अवश्य हुई होगी ?" "कुछ ठीक नहीं कहा जा सकता, पर यह युद्ध था इसलिए क्षति तो 'आवश्यक है । भारत सरकार का अनुमान है कि एक हजार सैनिक वीर गति को प्राप्त हुए । तीन हजार घायल हुए । सो लापता हैं । यह संख्या लगभग चार हजार है। इसमें वह सख्या शामिल नहीं है, जो पश्चिमी मीचों पर लड़े थे।" "और पाक की क्षति ?" "सैनिक क्षति के आंकड़े अभी प्राप्त नहीं हुए। परन्तु पाक ने ६५ विमान, २४४ टैक, ४ युद्धपोत, २ पनडुब्बी तथा अन्य संनिक सामग्री को खोया है । इस युद्ध मे भारत को कुछ क्षेत्र भी छोड़ना पड़ा । लेकिन अधिक क्षेत्र पाक को खोना पडा । भारत ने पाक के ३६ हजार वर्गमील पर अधिकार कर "लिया।" मिताली बोली, "मुना है, ब्राह्मण वारिदा में भारतीय सेना को पाक सैनिकों की खाइयों मे नंगी मृत या अचेत लडकियां मिली हैं ।" "हाँ, जीवितों में से अधिकाश गर्भवती हैं। उन्ही में से एक लड़की ने बताया कि ढाका छावनी में सैकड़ो यौवन को मादकता से पूर्ण लड़कियों को पकड़ कर लाया जाता था, उनमें से एक मैं भी थी।" विलखते हुए उस लड़की ने बताया था, "मुझे घर से उठाकर लाये थे । लाकर कतार में खड़ा कर दिया। हमारे वस्त्र पहले ही उतार लिये थे। मैंने अपने वालों को वक्ष पर डाल लिया । उस समय एक पाक सैनिक पाया और बोला, "देखने दो, मेरी रानी । ये फिर किस काम मायगे?' पाक सैनिक मात, पांसें उठाकर देखते और अपनी इच्छानुसार मुन्दर लडकी को साथ ले जाते । यदि कामुक कुत्तों की इच्छा पूर्ण करने में मानावानी करती तो पहले उनके साप कोति शेप / ११५ । बलात्कार किया जाता, फिर उन्हें गोली मार दी जाती।" मिताली बोली, "यह ढाका, जैसोर, फरीदकोट आदि स्थानो पर अधिक हुमा है । परन्तु सबसे अधिक ढाका मे ।" "न जाने कितनी लड़कियां ऐसी हैं !" "लगभग दो लाख ।" "उनको कौन अपनायेगा?" "अब बगला देश के सामने सबसे बड़ी यही समस्या है। गर्मपात केन्द्र भी खोल दिए गए है । गर्भपात कराये जा रहे है ।" "प्रश्न गर्भपात का नही, उनके नारीत्व का है, जो लोट. कर नहीं आ सकता।" प्रोतिन बोला, "हां, वह तो अब लौट कर नही पा सकता।" मिताली बोली, "इस समस्या का समाधान क्या होगा ?" उसी समय पोतिन ने एक बाग देखा । उसी बाग में एक मार्वजनिक ‘नल था। नल के पास एक बेंच था। मोतिन को प्यास लगी थी। सर्दी का समय था । प्रोतिन नल मे बहते पानी को देखकर बोला, "कुछ देर बैठ कर चलेंगे। थक गए, कई रात से सो नहीं सका । आज कुछ प्राराम मिला है।" मिताली बोली, "घर पर ही आराम करना । अब दूर ही कितना रह गया है।" "नही, मिताली, बहुत थक गया हूँ। अव चला नही जाता । कुछ आराम कर लूं तो चलूं ।" "जैसी इच्छा ।" मोतिन पानी पीकर वैच पर बैठ गया और थकान-सी अनुभव करता हुमा बोला, "अब बोलो, क्या कह रही थी ?" मिताली समीप ही बैठी थी। बाएं हाथ को मोतिन के कन्धे पर रखकर बोली, "यदि मेरे साथ ऐसा हो जाता, तो?" "मेरी भावना में कोई अन्तर न भाता।" "वयो" "अयोकि उसमें तुम्हारा दोष नहीं होता। हीरा हीरा ही रहता है। उसके ११६ / कीति शेप गुणों में क्या अन्तर पड़ता है, चाहे वह महल में रहे या झोपड़ी में।" "परन्तु नारीत्व और हीरे में तो अन्तर है।" मोतिन बोला, "पारस मणि सोना उगलती है। महत्व तो सोने का है, पारस मणि का नहीं ।" "यदि तुम्हारी मांति सव इस प्रकार सोचें, तो दो लाख लड़कियो की मांग में सिन्दूर भर सकता है । फिर से उनके हाथों में मेहदी रचाई जा सकती है । वे डोली में बैठकर दुलहन बनने का स्वप्न देख सकती हैं।" "इस पर भी विचार करना होगा।" "यह कम कडी समस्या नहीं है।" "मुझे सहयोग मिले तो यह समस्या भी हल हो जाएगी।" "कैसे ?" "हमे शिशु-निकेतन सोलने होंगे । नारी-निकेतन खोलने होगे । उन अवैध शिशुमो का भार सरकार उठायेगी जो शिशु निकेतन में जन्म लेंगे या छोड़ दिए जायेंगे।" "यह तो सारे बंगला देश में खोलने होगे ?" "हाँ, मुरय-मुख्य शहरों में खोलने होंगे । ढाका में चार शिशु-निकेतन तथा इतने ही नारी-निकेतन सीलने होगे।" "बाद में बच्चे कहाँ जायेंगे ? नारी किसकी छाया में रहेगी ?" "देश-विदेश में भेजकर उन लोगो को दे दिए जायेगे, जिनको बच्चो की आवश्यकता है। कई राष्ट्र ऐसे है, जिनकी जनसंरया कम है । उनको बच्चों की आवश्यकता है।" "यह सरकारी योजना है या केवल तुम्हारा मत ?" "यह मेरी बात है। परन्तु सरकार को यह सुझाव देना होगा । यदि सरकार नहीं करेगी तो मुक्ति वाहिनी स्वयं करेगी।" "मुक्ति वाहिनी यह भार भी उठाएगी ?" "क्यों नहीं ? यह हमारी योजना का दूसरा चरण है।" मिताली बोली, "और पतित तडकियों ?" "मुक्ति वाहिनी के किशोर जवानों ने फैसला किया है कि वे ऐसी लड़कियों से ही विवाह करगे, जो पाकिस्तानी दरिन्दो की हवित का शिकार हो गई है।" .
कीर्ति शेप/११७ "कितने ऐमे जवान है ?" "दो हजार जवानो ने मौखिक रूप से अपना समर्थन दे दिया है।" "केवल दो हजार ?" "यह तो शुरूपात समझो। वाद मे देश के युवको से अपील की जाएगी कि वे इन युवतियो को अपना लें, जो कामुक भावना में पिस गई है।" मिताली ने सरल भाव से कहा, "यह योजना सफल हो गई तो वंगला देश की एक विशाल समस्या का समाधान हो जाएगा।" मोतिन बोला, "हां, मिताली । परन्तु .... "परन्तु क्या ?" "मुझे ऐसा अवसर नही मिल सकेगा। मुझ से भी ऐसा कहा गया है कि मैं पतित नारी मे विवाह करूं।" मिताली को करंट-सा लगा। वह निष्प्राण-मी बन गई। कुछ कहते न बना । ऐसे प्रश्न का वह क्या उत्तर देती? पोतिन ने मिताली को देखा, मिताली ने मोतिन को । दोनों एक-दूसरे को परस्पर देखकर मौन बने रहे। कुछ क्षण वाद मिताली बोली, "उनका अनुरोध तो गलत नहीं है।" "तुमको स्वीकार है ?" "तुम त्याग कर सकते हो तो मिताली को भी कमजोर न समझना । मैं भी त्याग कर सकती हूँ, परन्तु एक बात माननी होगी।" "कहो।" "मुझे विवाह करने के लिए नहीं कहोगे ।" "क्या तुम कुंआरी ही रहोगी ?" "वों, तुमको शक है ?" "नहीं, ऐसी बात नहीं है पर यह अच्छा नहीं लगता । मेरे कारण तुम अविवाहित रहो । मैं कामुक बन जाऊँ, तुम भावुक बनी रहो । यह कैसे चलेगा, जीवन कैसे घटेगा?" प्रय तो वात त्याग और बलिदान को है। त्याग के मार्ग पर दूसरी वातों को महत्व नहीं दिया जाता। मुझे भी अपना सिर ऊंचा करना है। मेरा मोतिन अपने मियो मे सिर झुकाये, यह मैं कैसे सहन कर सकती हूँ विवाह करो, मैं खुशी-सुगी वधू को मार्शीवाद दूंगी। जव नुम इतना त्याग ?
११८/कीर्ति शेप कर सकते हो, दलित फूल मस्तक पर लगा सकते हो तो मैं क्या इतना-सा भी बलिदान नहीं कर सकती ?" "मिताली !" मोतिन ने सूखे अधरो मे कहा । "उपहास न समझो, प्रोतिन, मैं प्रसन्नता से कह रही हूँ। ऐसा अवसर पाये, तो मिर न झुकाना । प्रथम विवाह तुम ही करना, तुमको मेरी कसम ।" "तुम धन्य हो, मिताली।" मिताली मौन हो गई। पोतिन बोला, "मेरे कहने का बुरा न मानना ।" "ऐसा क्यों करेगी ?" "चलो, फिर चलते है।" मोतिन बोला । "चलो, जैसी तुम्हारी इच्छा ।" "यदि आपत्ति हो, तो अव मी.......।" "मैंने कहा न, मुझे गर्व है । मेरा प्रोतिन आदर्श का मार्ग खोलेगा। एक अबला पतिता से विवाह करके समाज को नया मार्ग दिखायेगा । एक नया पय होगा, जिस पर वगला देश की पतित नारी चलकर अपना जीवन-साथी सुन सकती है, नया जीवन पा सकती है, समाज में उच्च स्थान रस सकती से "मुझे ऐसी पागा नही थी कि तुम इस प्रार्थना को स्वीकार कर लोगी।" "फिर तुमने नारी की भावना को समझा ही नहीं । नारी प्रेमो के लिये हर त्याग कर सकती है। प्रेम के कारण जिन्दा रह सकती है, तो मर भी सकती है । प्रेम स्वार्थ नही, त्याग और वतिदान सिखाता है।" मोतिन ने मिताली को देखा और उदाभ भाव से कहा, "मैं तुम्हारा सदा प्राभारी रहूँगा, ऋणी रहूंगा।" और इतना कहने के साथ ही बेंच पर उठकर चल दिया। मिताली का अंतर्मन मॅवर में फसे व्यक्ति की भांति व्याकुल होने लगा। विचार सावन के बादलों को भौति उसके मस्तिष्क के भाकाश में मेहराने सगे । उसका मन्तमंन मिलस उठा। माज सुशी के साथ-साथ वह दुषी भी थी। उसका मन भारी होता जा रहा था। सोचने लगो-विवाह एक कम कीति शेष / ११६ . है, मैं उससे इन्कार नहीं करती। किन्तु भावनाओं और सुखद कल्पनाओं के ध्वंसावशेप पर जब कर्म का प्रासाद चिना जाता है, तब नीरसता को भूकम्पीय तरंगें नीव में घुस कर समस्त प्रासाद को धराशायी करने लगती हैं और... और · फिर......" उसके मन का संसार सूना था। वह शान्त चली जा रही थी। मार्ग' में अधिक वातें न हो सकी। उसने मन-ही-मन कहा-'पोतिन ने अनुरोध किया है, प्रार्थना की है और अनुरोध व प्रार्थना में अधिकार से अधिक शक्ति होती है । स्त्री पर पुरुष के अधिकार का अर्थ है मृत्यु और अनुरोध व प्रार्थना का अर्थ है त्याग । "मकेला क्षितिज ही उपा पर अपना अधिकार समझने लगे तो क्या होगा? श्रोतिन पर राष्ट्र का भी अधिकार है। "मैं राष्ट्र के लिये प्रोतिन का त्याग कर दूंगी। यह मेरा कर्तव्य है। मैं इसे प्राभार नहीं समझूगो । क्योकि आभार के उतरने पर तो सम्बन्ध टूट जाते. हैं । मैं किसी मूल्य पर सम्बन्ध तोड़ने को तैयार नहीं।" विचारों की श्रृंखला में बंधी मिताली प्रोतिन के साथ मार्ग पर चलती रही।
वारह वी० वी० सी० ने अपने प्रसारण में कहा कि युद्ध में पराजय के वाद पश्चिमी पाकिस्तान की जनता मे याह्यिाखाँ के प्रति गहरा असन्तोष पैदा हो गया है। याशिाखा ने अत्यन्त अपमानजनक प्रात्मसर्पण तथा जनता के असन्तोप के कारण राष्ट्रपति के पद से त्याग-पत्र दे दिया है और भुट्टो ने सत्ता संभाल ली है। भुट्टो ने याह्यिाखां के वफादार पदाधिकारियो को पदच्युत कर दिया। सिन्ध के गवर्नर जनरल रहमान को हटा कर मुमताजअली को गवर्नर बना दिया । वाईस परिवारो के पासपोर्ट रद्द कर दिये गये । उनसे कहा गया कि जो पूजी विदेश के बैंको में जमा कराई है वह पाकिस्तान बैंको में जमा करायें । कहा गया है कि साठ प्रतिशत व्यापार तथा इतना ही वैक व्यवसाय इन परिवारों के अधिकार में या । यह प्रसारण वी०वी० सी० ने दिसम्बर मास में किया था। जनवरी के प्रथम सप्ताह में वी० वी० सी० ने कहा कि शेख मुजीव लन्दन जा रहे हैं। लेकिन वहाँ से वंगला देश जायेंगे या नहीं, इस कथन की पुष्टि बी० बी० सी० ने उस प्रसारण में नहीं की। माज के प्रसारण में यी० बी० सी० ने कहा कि शेस मुजीव पाज लन्दन पहुँच गये हैं। यहाँ से दिल्ली होते हुए बंगला देश पहुंचेंगे। माज टेलीफोन पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांयी से वार्ता की है । वगला देश के विदेश मत्रालय को सूगना भेज दी गई है । ढाका के हवाई अड्डे पर जनता उनके स्वागत का प्रबन्ध कर रही है।
कीति शेप / १२१ . , इस प्रसारण को सुन कर प्रोतिन ललिका से बोला, "हमारी सब इच्छाएं पूर्ण हो गई।" ललिका मोतिन के निवास स्थान पर थी। तन्नू को शिशु निकेतन में छोड़ दिया गया था जिसका संचालन गत सप्ताह से मिताली कर रही थी। मिताली 'अपने अतिरिक्त समय मे शिशु निकेतन की सहसंचालिका का भार संभाल रही थी। उसके शिशु निकेतन मे पांच सौ अवैध शिशु पालनों मे पड़े, 'मुसकराते रहते, रोते रहते । ललिका ने कहा, "लेकिन अतुल का कुछ पता नहीं लगा।" "हाँ । कहा नहीं जा सकता, वह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गया या लापता है।" ललिका बोली, "हो सकता है, स्वदेश लौट गया हो, पर कह कर तो जाता।" "गुप्तचर था, गुप्त ढंग से चला गया होगा !" "नहीं, ऐसा नही हो सकता। वह किसी दुर्घटना का शिकार हो गया, मुझे तो ऐसा लगता है।" "हो सकता है, परन्तु ऐसी अशुभ बातें मुख से क्यों निकाली जाएँ ?" "अब किया भी क्या जा सकता है ? कुछ भी हो, अतुल का अभाव राष्ट्र को खटकेगा । काश, वह आज होता, इस योजना को अन्तिम रूप देता। साथ ही मुक्ति वाहिनी सहयोग देती तो राष्ट्र की एक बहुत बड़ी समस्या का समा- धान हो जाता।" ललिका कुछ क्षण वाद बोली, "मैं चाहती हूँ कि घर पर एक पत्र लिखू । दादा आकर ले जायेंगे । जो हो गया वह तो लौट कर नही पा सकता।" "दादा को दुःख होगा," प्रोतिन ने सांस रोक ली, "तुम्हारी दशा उनसे देखी नही जायेगी।" "दादा समझ बैठे होगे कि दोनों लड़कियां मर गई या दानवो के हाथ पड़ गई। पर जव उनको पता लगेगा कि अंजिका राष्ट्र को समर्पित हो गई और ललिका ने अपनी ज्योति राष्ट्र को दे दी तो उनका हृदय हर्प से नाच उठेगा । उनका सिर सम्मान से ऊंचा उठ जायेगा।" "मैं सोचता हूँ, तुम कुछ दिन पोर विश्राम करती। प्रांखों को प्राप- । .
१२२/कीति शेष रेसन होने पर दादा को सूचना देते तो अधिक अच्छा होता।" "नहीं, प्रोतिन ! अव प्रांसों का क्या करना है ? मुझे अपनी नेय-ज्योति जाने का जरा भी दुःख नहीं है । मुझे प्रसन्नता है कि मैं राष्ट्र की कुछ सेवा कर सकी। इससे बड़ा सौभाग्य मेरा और क्या हो सकता है ?" "तुम्हे आजाद वगला देश को देखने के लिये इन प्रोसों की प्रावश्यकता है । फहराता हुप्रा ध्वज क्या तुम देसना पसन्द नही करोगी?" "मानव की सभी इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होती। जो मिला है उसी पर सन्तोप करके जीवन में नया मार्ग सोजना है । नया पथ पाना है।" "इन बातो मे दम नहीं है। यह तुम मुझको समझाने का प्रयास कर रही हो।" "नही, श्रोतिन ! ऐमी वात नहीं है । यदि मुझे कोई दुख होता तो तुमसे अवश्य कहती।" "लेकिन मुझे तो दु.ख है।" "लामो, वह दुःख मुझे दे दो। मेरा हृदय बहुत विशाल है। मुझे अपने आमू, अपनी पीडा दे दो और तुम पीड़ामुक्त हो जाओ।" "यह सव इतना सरल नही है।" "सरल तो बनाने से बनता है।" "फिर प्रयास करो।" "ग्राज्ञा दो" " "नही, प्रार्थना समझना ।" "कहो "मेरी प्रार्थना स्वीकार करनी होगी!" "इनकार कैसे कर सकूँगी ?" तुम को एक काम करना होगा ।" "बोलो।" "मुझे डर लगता है।" "कसा डर ? दीदी से भी कोई डरता है ?" "मैं तो डरता हूँ, ललिका ने मोतिन का हाथ अपने हाथ मे लेना चाहा ! समीप में रसी कीति शेप / १२३ " बंसासी हाय लगकर नीचे गिर गई । उसी समय ललिका बोली, "मुझ पर विश्वास करो। मैं अन्तिम सांस तक भी तुम्हारी पाना को नही टाल सकती। पर एक बात है, उस प्राज्ञा या प्रार्थना में मेरे सुख तथा तुम्हारे दुःख का प्रामाम न हो।" मोतिन बोला, "फिर कहने से कोई लाभ नहीं।" "इसका अर्थ यह हुआ कि तुम मुझमे कोई ऐसा काम करवाना चाहते हो जो तुम्हें पीडा दे, मुझे मुस दे । ऐसी प्राज्ञा में मानने को तैयार नहीं हूँ।" फिर मेरे यहाँ पाने का क्या लाभ हुअा ?" "क्या तुम यहाँ लाभ खोजने पाते हो ? मोतिन कोई उत्तर न दे सका । वह मौन रहा। उसी समय द्वार पर कम्बल ओढ़े अतुल दिखाई पडा । जनवरी का मास था । कड़ाके को सर्दी पड रही थी । सन्ध्या का समय था । ललिका ने कहा, "कौन ?" पोतिन ने कहा, "अतुल वावू ।" ललिका ने सड़ी होने का प्रयल किया, परन्तु एक ही झटके से नीचे गिर गई । शरीर का सन्तुलन न बन सका । मोतिन वैसाखी उठाकर ललिका को देकर बोला, "मेरा हाथ पकड़ो।" तब तक अतुल समीप आ गया था। वह कुछ बोला नही, केवल देखता रहा । उसने पोतिन को देखा, सलिका को देसा । मोतिन बोला, "कहाँ रह गये थे, अतुल बाबू ?" अतुल कुरसी पर बैठकर बोला, "इधर पाने का अवसर न मिल सका।" ललिका बोली, “कैसे हो तुम? मैं देख तो नहीं सकती, पर सुन तो सकती हूँ। बोलो।" "ठीक हूँ।" "चलो, यह सुनकर मन को सन्तोष हुमा ।" ललिका बोली। अतुल उसी धौर भाव मे वोला, "मिताली कैसी है ?" "ठीक है।" "तुमको कुछ पता है ?" गकिस वारे में ?"
१२४ / कीर्ति शेप
"अच्छा, पहले एक बात बतायी, क्या तुम्हारा-मिताली का परस्पर झगडा
हो गया है ?"
"नही तो! क्यो?"
"उसने एक विज्ञापन दिया है कि वह उस जवान से विवाह करने को
तैयार है जो युद्ध में अंग-रहित हो गया हो।"
ललिका बोली, "यह कैसे हो गया ?"
मोतिन बोला, "कह नही सकता, शायद राष्ट्र-भावना में भावुक होकर
ऐसा विचार धारण कर लिया हो।" कुछ रुक कर अतुल की ओर देखकर पुनः
वोला, "लेकिन तुमको कैसे मालूम ?"
"समाचार पत्र मे पहा था।"
"कब?"
"कल !"
"पोतिन जानता था परन्तु वह अपने मुंह से कुछ कहना नहीं चाहता था,
वैसे उसके मुख पर सर्दी में भी जल-विन्दु मा गये थे । मन की बात मन ही में
रख कर बोला, "ठीक है उसका निर्णय । उसको ऐसा करना ही चाहिए।
इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलेगी।"
"और तुम..."
"मेरा निर्णय तुम को मालूम है।"
"वह योजना तागू हो गई ?"
"हाँ ।"
"फिर तो मिताली ने एक अच्छा कार्य किया है । नया मागं दिखाया है ।
उमके त्याग की ओर से कोई भी प्रांखें बन्द नहीं कर सकता।"
ललिका ने कहा, "सच, मिताली के इस कार्य की सराहना किये बिना नहीं
रहा जायेगा!"
योतिन बोला, "उसको ऐसा ही करता चाहिए था।"
"क्यों ?"
अतुल योला, "ऐसा तुम्हारा प्रादेशा था या उसको अपनी भावना थी?"
"मेरा कोई प्रादेश नही था।"
अतुल ने विकल नयनों से प्रोतिन की मोर देखकर वहा, "उमने जीवन
कोति शेप / १२५
कंटीले तारों में बांध दिया।"
तभी बुडियाने पाकर कहा, "खाना तैयार है।"
बुढ़िया मोतिन की दासी थी, जिसको मोतिन ने ललिका की देख-रेस
के लिए रस लिया था।
अतुल वोला, “मे भोजन नहीं करूंगा।"
मोतिन बोला, "क्यों?
"इच्छा नहीं है।"
"थोड़ा-सा..."
"विलकुल नहीं।"
ललिका बोली, "चाय इत्यादि तो ले सकते हो?"
"कुछ नहीं।"
"एक गिलास पानी या वह भी नही ?" ललिका वोली ।
"तुम भोजन करो। मैं जो चाहूंगा ले लूंगा।"
बुढ़िया अभी तक आदेश की प्रतीक्षा मै द्वार से लगी खड़ी थी।
ओतिन वोला, " साना मेज पर लगा दो।"
ललिका बोली, "मैं तो नीचे प्रासन पर ही बैठकर खाऊंगी।"
पोतिन ने कहा, "तुम कब-कब कहती हो, आज आसन पर ही, सही।"
कुछ क्षण बाद आसन पर ही थाल लगा दिये गये । ललिका तथा प्रोतिन
भासन पर बैठने से पूर्व बोले, "प्राओ, अतुल !"
अतुल बोला, “वास्तव मे मेरी इच्छा नही है।"
"साने में सभी तुम्हारी पसन्द की वस्तु है-भात, मछली, दही, ग्रापड़,
अचार, सूखी फ्राई दाल ।"
ललिका अतुल के समीप खड़ी थी । ललिका ने जैसे ही उसका हाथ पकड़-
कर उठाना चाहा, तो उसके मुंह से एक चीख निकली और वह वही गिर
गई । उसी समय अतुल खड़ा होकर ललिका को उठाने के लिए तनिक मुका
तो उसके कन्धे पर से कम्बल सरक कर पृथ्वी पर गिर गया । प्रोतिन ने
देखा, अतुल के दोनों हाथ कटे थे ।
ललिका अचेत थो, प्रोतिन गम्भीर बन गया। अनुल मौन खड़ा रहा।
१२६ / कीति शेप श्रोतिन से कुछ कहते भी न बन सका । अतुल शान्त मुद्रा में प्रौतिन को देख कर मौन ही रहा । प्रोतिन को प्रांखें प्रामुग्रो से भरी थी। - X x X x ललिका का पत्र मिलते ही डा० मित्रा ललिका के पास चटगांव से ढाका पहुंच गये । ललिका पिता की छाती मे लग कर विलस उटी । उसके दुख का कारण उसकी मां थी जो अपनी दो पुत्रियों के दुख में रोग-शया पर पड़ी तो फिर उठ नही सकी। समय बीतता गया । ललिका की मां मूख कर कांटा बनती गई और फिर एक दिन हृदय-गति रक जाने से उसकी मृत्यु हो गई। मां को दो यौवनमयी लड़कियो का वियोन सहन न हो सका । ललिका की अांखें भर आयी। डा० मित्रा लतिका को सात्वना देकर बोले, "रोते नही बेटी, तुमने मेरा सिर ऊंचा कर दिया । अपनी नेत्र-ज्योति देकर राष्ट्र को गुलामी की हथकडियो से छुड़ा दिया । तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।" ललिका ने कुछ उत्तर नही दिया । डा० मिश्रा ने ही फिर कहा, "तुम चिन्ता न करो, ललिका । तुमको मैं अमेरिका ले जाऊँगा, वहाँ मेरा मित्र है डा० डब्ल्यू. वाई० डेन, जो मांखों का डाक्टर है । उससे मैं तुमको नेत्र-ज्योति दिलाऊँगा।" ललिका बोली, "मुझे अपनी आँखों का दुख नही है, पापा ! दु.ख मुझे इस बात का है कि आज मैं अपना राष्ट्रीय ध्वज फहराता नहीं देख पा रही हूँ, अजिका को नहीं देख पा रही हूं।" "राष्ट्रीय ध्वज आज नहीं तो कल देख सकोगी और उसी ध्वज मे तुमको अंजिका का प्रतिविम्व दिखाई देगा। ध्वज के मध्य तुमको मां हंसती दिखाई देगी।" "पापा, आप नहीं जानते, अजिका के साथ पाक सैनिको ते क्या-क्या किया है ।" "यह तो मैं नहीं जानता परन्तु इतना अवश्य जानता हूं कि वंगला देश के सामने प्राज सबमे बड़ी समस्या इम लड़ाई के दौरान पंदा हुए दो लास उन बच्चों की है, दिनकी माताएं या तो लापता हैं या मर गई हैं । इन कीर्ति शेष/ १२७ . अभागी मातामों तथा बच्चों का जीवन फिर से कैसे मुखमय बनाया जाये ?" "पापा, सुना है कि अधिशंग वच्चो को कनाडा तथा पश्चिमी जर्मनी ने गोद ले लिया है।" "यह सत्य है कि कुछ बच्चे कनाडा तथा जर्मनी चले गये। कछ का पालन शिशु निकेतन मे हो रहा है। जो महिलाएं इस समय पतिन हो गई हैं २ उनकी देख-भाल महिला पुनस्र्थापन बोर्ड कर रहा है। सरकार के पास साधनों की कमी है। इसलिए जनता तथा निकटतम सम्बन्धियों से अनुरोध किया गया है कि वे इनकी देख-भाल करें। जनता ने अपना हार्दिक सहयोग दिया है।" ललिका बोली, "देशमक्ति की भावना से प्रोत-प्रोत युवा पीढी ने स्वाधी- नता-संग्राम में सक्रिय भाग लिया है । वे ऐसी किसी लडकी से घणा करने की वात सोच भी नहीं सकते क्योंकि परिस्थितियों के कारण ही उनको ऐसी दशा हुई है । अधिकतर युवक मुक्तिवाहिनी के जवान हैं ।" डा० मित्रा बोले, "अाज भी वे महान् विभूतियां जीवित हैं जिन्होने अपना सुख राष्ट्र को अर्पित कर दिया । उनमे एक आदमी ऐसा भी हैं जिसको राष्ट्र सम्मान से विभूपित करेगा, सुतो- "एक लडकी के साथ अत्याचार होते देख कर एक जवान मैदान मे कूद पडा । वह अकेला था जबकि पाक सेना के पचास दरिन्दे थे । वे सब कामुक नशे में थे। "जवान ने कहा, 'इस लडकी को छोड़ दो।' "तुम मरना चाहते हो।' पाक अधिकारी ने कहा । "खडा होकर नहीं, लड़कर मरना चाहता हूँ।' पाक अधिकारी ने उस लड़की को अपशब्द कह कर उसके वस्त्र उतारने आरम्भ कर दिये । जवान से रहा न गया । उमने समीप खडे पाक जवान की बन्दूक छीन कर पाक अधिकारी को वही ढेर कर दिया । उसी समय एक पाक सैनिक ने आदेश दिया, 'इसने हमारे कैप्टिन को मारा है, इसके हाथ काट दिये जाएं।' जवान ने यह सोचकर कि कि इसके जीने से तो इसका मरना अच्छा, सड़की को गोली मार दी।
१२८/कीति शेप
"पाक मंनिक जवान पर टुट पड़े और उसके दोनों हाथ ट्रक के पहिये के
नीचे पीस दिये ।"
ललिका बोली, "उसका नाम आप जानते हैं, पापा ?"
"हाँ । अतुल ।"
"अतुल !" ललिका के मुख से एकाएक निकल गया।
डा० मित्रा वोले, "तुम क्यो चौक पडी ? क्या तुम उसको जानती
हो?"
"हाँ, पापा ! मैं उसको जानती हूँ। वह भी मेरी तरह अमागा है !"
"उसे अमागा मत कहो । बहादुर कहो, राष्ट्र का सच्चा वीर कहो।"
ललिका बोली, "कल ही वह यहां प्राया था। जब मैंने उसकी यह दशा
देखी तो अचेत हो गई। वह मुक्तिवाहिनी का सहसंचालक है।"
"परन्तु मैंने तो सुना है कि वह किसी देश का गुप्तचर है।"
"इस बात का मुझे नही पता । हो सकता है आपकी बात सत्य हो।"
"मिथ्या भी हो सकती है।"
"प्राप विदेश मंत्रालय मे सचिव हैं, इसलिए आपकी बात अधिक सत्य हो
सकती है !"
"बात कुछ भी हो, जिस राष्ट्र मे ऐसी आत्माएं होगी, वह गुलाम नहीं
रह सकता।"
"आप उसे देखें, तो अवश्य प्रभावित होगे।"
"मैं उस जवान से अवश्य मिलना चाहूंगा।"
"पोतिन बाहर गया है। उसके आने पर अतुल को बुलाना सम्भव
होगा।"
मोतिन कहाँ गया है ?"
"प्राज मुजीव पा रहे हैं, लन्दन से मारत होकर। उन्ही का स्वागत
करने हवाई अड्डे पर गया है।"
डा० मित्रा और ललिका घंटो तक एक-दूसरे से अपने मन की सुख-दुस
की बातें करते रहे। कहा नहीं जा सकता, कव उन्होने विश्राम किया, कब
भोजन किया । उस दिन तो उनको इसी मुद्रा मे वार्ता करते शाम हो
गयी।
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१३०/कीर्ति क्षेप "पत्थर मे पडी रेखा अमिट होती है । मैं अपना मार्ग नही बदल सकती।" "तुमने मेरी भावना को समझने का प्रयास नहीं किया।" "इस कथन का मैं विरोध करूगी।" "मेरी पीडा देखो।" "मेरी साधना देखो।" मोतिन ने पेपरवेट रखकर कहा, "मेरा प्राण बनोगी ?" मिताली की आँखों ने कहा, "मैं क्या थी, क्या बन गयी ! प्रोतिन, तुम सुखी रहो, प्रसन्न रहो ! इमी भावना से भरी मिताली अपना सर्वस्व त्याग देगी। तुमने यह कथन सुना हो या न सुना हो पर मैं बता देती हूं, नारी की आरती का थाल एक ही मन्दिर में एक ही देवता के सामने रखा रहता है।" "यही तो मैं कहता हूँ । जो फूल देचता के चरणों पर चढा दिया जाता है वह उठाकर किसी को भेंट नही किया जाता।" "चलो, मैं तो इतना कहती हूँ कि मिताली तैयार है । क्या तुस मान जायोगे?" "मैंने तुम्हारी कौन-सी बात का विरोध किया है ?" "तुम्हारे कहने का अर्थ क्या है ?" मिताली बोली। "मैं तो इतना कहूंगा कि जिस विवाह में तुम उलझी हो, मेरा मत है उस पर विचार न करो। तुम्हारे पास यौवन है, सुन्दर जीवन है ! "इसमे बुराई क्या है ? विवाह तो करना ही है, फिर क्यों न मैं तुम्हारे काम में सहयोग दूं? मैंने तुमको प्रात्मीय समझा है, प्यार किया है, प्रेमी कहा है।" "यह सब तो ठीक है, पर क्या तुमको जीवन के प्रति ममता नहीं है ?" "मैं तुम्हारे प्यार मे, तुम्हारी साधना मे खो गई हूँ। मेरा प्रात्मीय एक ऐसी पतित नारी से विवाह कर सकता है जो पाक के पापाचारियों का शिकार हो गई है, फिर मैं पीछे क्यों रहूं?" कुछ क्षण सोचकर पुनः बोली, "मुझे यह मार्ग किसने दिखाया?" मोतिन मौन था: "बोलो !" .
कीति शेष / १३१ मोतिन ने कुछ उत्तर न दिया ।। "आत्मीय की आत्मा को सुस और शान्ति प्रदान करना ही नारी का 'धर्म है।" . . मोतिन अभी भी मौन था । पुरुप यह तो सहन कर सकता है कि उसकी प्रेयसी उसको न बने, कोई बात नहीं परन्तु उसे दूसरे की बनता देखकर वह कभी सहन नहीं कर सकता । पुरुप सदैव कहता आया है कि नारी को एक का ही होना चाहिए । परन्तु यह प्रश्न जब नारी पुरुष से पूछे कि पुरुष को कितनी नारी का सम्पर्क प्राप्त होना चाहिए, तो वह मौन हो जाता है अथवा कहता है, नारी घर की इज्जत है, शोभा है । नारी उत्तर में यह कहती है कि पुरुष भी दीवार पर लगा पोस्टर नही है जिसे हर कोई प्राकर 'पढ ले । यह उससे सहन नहीं होता। 'इसी विचार धारा में वह कर मिताली व्याकुल थे। उसी समय एक चच्चा मिताली के समीप आकर रोने लगा। वच्चा बडा सुकुमार तथा भोला था । मिताली ने गोद में उठा लिया और दुलार से वक्ष से लगाकर बोली, "मेरा चांद ।" उसी समय उसका ममत्व जाग उठा उसकी आँखें भर आयी। बच्चा अपनी तोतली आवाज में बोला, "जाई मां-जाई मां" (न आई......मां....."न प्राई) मिताती बोली, "मैं तो हूँ, बेटे । मैं तेरी माँ हूँ।" बच्चे ने मिताली को देखा। उसकी आँखो से आंसू गालो पर आ गए थे। बच्चा एक हाथ से आँख मल कर बोला, "ना''ना"ना" (नही .. नहीं "नहीं) "तुम्हारा नाम......?" बच्चा फिर रोने लगा। "बोलो बेटे, तुम्हारा नाम" ...?" "रामू !" बच्चे ने कहा। "मेरा रामू वेटा....."चुप हो जा, विस्कुट मिलेगा।" उस समय बच्चा मिताली के वक्ष से लगा था। बच्चा चुप हो गया,
१३२ / कीति शेप
जैसे दूध-भरे स्तन में मुंह लगा कर वच्चा चुप हो जाता है । कुछ देर बाद
वच्चा गोदी से उतर कर चुपचाप खड़ा हो गया।
तभी प्रोतिन बोला, "वच्चा तुम्हारी ममता पाकर चुप हो गया।"
मिताली ने उसकी आँखों में आंखें डालकर कहा, "मुझे अपनी ममता
पर, अपने प्रेम पर विश्वास है।"
"इसीलिए तो मैं कहता है कि मेरी और देखो, मेरे मन की स्थिति को
समझो।"
"मैंने सदा तुम्हारी ओर देखा और कही भी रहूँ, सदा तुमको देराती
रहूंगी।"
"फिर विवाह करने से क्या ताभ ?"
"तुम विवाह को क्या समझते हो?"
"शारीरिक सम्बन्ध ।"
"इस विवाह से मेरा ऐसा बन्धन नही होगा।"
"फिर ?"
"विवाह तो मेरा हो चुका ।"
"फिर तुमने समाचार पत्र में विज्ञापन क्यो दिया था ?"
"उसमे मेरी एक शतं होगी।"
"क्या ?"
"मैं मात्र उसको परिचारिका रहूंगी।"
"ऐसे कौन विवाह करेगा ?"
"यह तो समय बताएगा।"
"तुम नही जानती, तुम्हारी जिन्दगी कितनी उलझ गई है। साथ ही तुम
नुझमे कितनी समा गई हो, यह मैं तुम्हें नहीं बता सकता हूं।"
मिताली पीडायुक्त वाणी में बोली, "मैं अपना निश्चय नही बदल सकती
और न ही तुमसे इसके लिए अनुरोध कर सकती हूँ। हम दोनों दूर रहकर
भी पास रहेगे। शरीर दो होगे, प्रात्मा एक ।"
"तुम समझने का प्रयास करो।" प्रोतिन बोला।
उसी समय मोतिन की नीरमयी प्रासों से प्रासुनों का गिरना प्रारम्भ
हो गया। यह जव मिताली ने देखा, तो समीप भाकर साड़ी के छोर से उसके
कीति शेप/१३३ प्रांसू पोंछ कर बोली, "पुरुप होकर रोते हो । रोना तो नारी के भाग्य में लिसा है । मैं सोचती हूँ, हम इसी प्रकार घुल-घुल कर मरते रहे, रोते रहे, तो इस बच्चे का क्या होगा, उन बच्चों का क्या होगा ?" "मैं तो इस जीवन से थक गया हूँ। अब अधिक नहीं चल सकता । मैंने रात खुली प्रासो मे व्यतीत की है । मैं तुम्हारा त्याग नहीं कर सकता।" "मेरा या कामुक जीवन का ?" मिताली ने सरल स्वभाव मे कन्धे पर • हाथ रखकर कहा, "मिताली तो वासना का साधन है । मिताली तो जीवन की साधारण मांग है । यह मिताली के यौवन की मादकता बहुत दिन नहीं रहेगी। जो आज है, वह फल नहीं होगा।" "तुम क्या थी, क्या बन गई ?" "वह भावना सब मिट्टी के मोल बिक गई, जिसके लिए तुमको खोजा या।" "मुझे ऐसा लगता है कि मेरे भाग्य मे सुख की रेखा नहीं है ।" मिताली का मन अत्यन्त व्याकुल और पीड़ित था। इस समस्या का समाधान कसे हो ? मिताली ने उसी समय प्रोतिन के चरण पकड़ लिए । श्रोतिन ने मिताली को उठा लिया, अपनी गरम सांसें मिताली की गरम सांसों पर टिकाकर बोला, "मिताली !" "मुझे भिक्षा दो । मुझे अपनी साधना पूर्ण करने दो।" कहते-कहते मिताली ने अाँखें झुका ली। वह अनायास ही झुक गई । ओतिन बोला, "मुझे तुम्हारा ही सहारा है ।" "भाग्य पर विश्वास करते हो?" "मेरा माग्य अच्छा नहीं है।" "विश्वास करो, तुम्हारा साथ ही मेरा जीवनाधार है । मैं तुम्हारे चरणों को घूल हूँ।" "नही, मिताली नही । तुम मेरे मस्तक का तिलक हो । मेरी आराधना "मुझे गलत न समझो । मैं तुमसे दूर नहीं हूँ। तुमको प्यार करती हूँ। तुम्हारी गहराई मे उतरी हूँ । जो कुछ मिला है, ग्रहण किया है । सब तुमसे प्राप्त किया है । लेकिन एक बात कहती हूँ, तुम मिताली को नहीं, उसके
१३४ / कौति शेप
शरीर को प्यार करते हो। तुम मेरी सुन्दरता से इतने आकर्षित हुए कि
अपना अस्तित्व भूल गए, कर्तव्य याद नहीं रहा । नारी की प्रेरणा के दास
मत बनो, भोग को जीवन का लक्ष्य मत बनामो । इच्छात्रों का दास बनना
ही मिताली का तड्पना है।"
मोतिन मौन रहा । वह कुछ कह न सका।
मिताली बोली, "मिताली क्या तुम्हारी दृष्टि मे इन्द्रियों को वासना-तृप्ति
का एक मात्र साधन है, जिसको तुम मसलना-रौंदना चाहते हो ? एक बार
फिर सोचो, जो त्याग दिया, वह त्याग दिया। घाट पर पड़े गोल पत्थर की
भांति करवट मत बदलो।"
समय बहुत हो गया। वातों-ही-बातों में प्रोतिन को आभास हुआ कि
वह गलती पर था। वह भावुक बन गया था। राष्ट्र के लिए जो त्याग दिया,
उसको छोड़ना ही हितकर है ।
मोतिन बोला, "मिताली, जब-जब मेरी आत्मा में कालिख लगी है, उसे.
तुमने मिटाया है । फिर मेरी एक बात मानो।"
"कहीं।"
"इनकार तो नही करोगी?"
"अन्तिम सांस तक प्राज्ञा पालन करूंगी।"
"तुम जानती हो अतुल के दोनो हाथ ट्रक के नीचे कुचल दिए गए !"
"मुझे मालूम है।"
"फिर क्या सोचा ?"
"किस विषय मे ?"
"मैं उमको उपहार देना चाहता हूँ।"
"मैं प्रस्तुत हूँ।" मिताली ने प्रांखों से कहा ।
""मेरा अर्थ यह नहीं था ।"
"मैं स्पष्ट रूप से परिमापा नहीं चाहती। परिचारिका के रूप में मैं
समस्त ऋण उतार दूंगी।"
कैसी महानता थी ! कैसी भावना थी ! राष्ट्र के प्रति ऐसा प्रेम, ऐसा
त्याग कि अपनी प्रेयसी को उपहार रूप में भेंट कर दे, कौन कर सकता है,।
मिताली बोली, "जिस अनुराग और प्रात्मीय भाव से तुमने मुझे प्रेरणा
कीति शेष / १३५ दी, जिस भावनामयी, कल्पनामयी दृष्टि से मुझे देखा है, मैं उसे पाकर ऋणी हूँ। मैं अपने को इस योग्य तो नहीं समझती, किन्तु यदि तुम्हारी प्रेरणा से कर्तव्य पूर्ण कर सको तो मेरा प्रेम अमर हो जाएगा । मैंने तुम्हारी साधना की है, तुम्हें प्रात्मीय समझा है । इसी प्रात्मीयता के हेतु मेरा कर्तव्य है कि तुम्हारा सम्मान रखू । तुम्हारे कार्य में सहयोग दूं। तुम्हारी योजना को सफल बनाऊँ । मैं चाहती तो मावुक बनकर तुमको विवाह-सूत्र मे बाँध लेती, परन्तु वह कार्य मात्र मेरे स्वार्थ की झांकी होता।" "मैं तुम्हारे कथन से सहमत हूँ।" "यतानो, तुम अकेले कब तक घूमते रहोगे ?" "अब मैं अकेला नहीं । तुम्हारी प्रेरणा, तुम्हारे विचार मेरे साथ हैं ।" दोनों जब एक मत हुए तो ऐसे लग रहे थे मानो आकाश मे दो सितारे काले बादलों के हट जाने से फिर से चमक उठे हों अथवा एक डाल के दो पुष्प फिर से महक उठे हों। x X x मुजीब ने अपनी वार्ता में कहा, "अतुल, वंगला देश तुम्हारा ऋणी रहेगा । जो दो हाथ अाज तुम वंगला देश को देकर चले हो, वे हाथ सदैव वगला देश के आकाश में लहराते हुए दिखाई देते रहेंगे । काम करते, प्रेरणा देते हुए उन हायो का प्रतिबिम्ब हम अपने हृदय-पटल पर से कभी नहीं उतार सकेगे।" जब अतुल मुजीव से विदा लेकर पाया, तो मुजीव की आँखों में आंसू था गए; वह रो उठे। उसी दिन शाम को अतुल को ढाका छोडना था । ढाका छोडने से पूर्व वह डा. मित्रा से मिला । डा. मित्रा अतुल के कामों तया यातो से बहुत प्रभावित हुए। डा० मित्रा ने कहा, "ललिका की प्रा बनवा कर जब अमेरिका में लौटूंगा तो कलकत्ता में प्रापसे मिलूंगा।" मतुल बोला, "प्रवश्य दर्शन देना, आप मेरे प्रतिथि होंगे।" डा. मित्रा बोले, "मवश्य प्राऊंगा । ललिका को भी इच्छा है कि प्रतुत - १३६ / कीति शेप वाबू को फिर देखें।" "मैं भी उस पुप्प को हँसता-महकता देखने की कामना करता हूं।" "पापको कामना अवश्य पूरी होगी ।" डा० मित्रा ने कहा । "यह मेरा सौभाग्य होगा।" अतुल जल्दी मे था । अभी उसको बहुत काम करते थे। वह डा० मित्रा से आशीर्वाद लेकर तथा ललिका के लिए शुभकामनाएं प्रकट कर, अपने निवास स्थान पर आ गया। विमान जाने में अभी पांच घटे शेष थे । उसने अपनी पूरी तैयारी कर ली थी। ." सायं को जब अतुल हवाई अड्डे पर पहुंचा, तो वहां पर पहले से ही मिताली तथा प्रोतिन उपस्थित थे। अतुल दोनो को देखकर सहज मुस्करा कर बोला, "अभी एक घंटा शेप है विमान जाने में ।" फिर उसने मोतिन से पूछा, "टिकट ले लिया “जी,” कहते-कहते अतुल पर निगाह डालते हुए बोला, "दो।" 'दो टिकट ?" अतुल ने चौंक कर पूछा। प्रोतिन ने कहा, "हां ।' "दूसरा कौन जा रहा है ?" "मिताली ।" "मिताली?" "हां! मिताली।" "मैं समझा नहीं।" बात करते-करते तीनों प्रतीक्षालय में चले गए। पोतिन बोला, "सर, पापको याद हो, मुक्तिवाहिनी के जवानों ने निर्णय किया था कि वे लोग ऐमी नारी से विवाह करेंगे, जो पाक प्रयाचारी के कारण पतित हो गई हो।" "हां, याद है, तो फिर।" "यही निर्णय मिताली ने भी किया है।" "यह मुझे मालूम है, मैंने समाचार पत्र मे पटा था।" "मिताली को इच्छा है, .. मैं कहना चाहता हूँ कि वह पाप से भापका कीति शेष | १३७ सहयोग चाहती है, साथ चाहती है।" "यह कैसे हो सकता है ? मिताली तो तुम्हारी छाया है । तुम उसके तरु "यह हम दोनों का निर्णय है।" "तुमने यह पक्षपात की दृष्टि से निर्णय किया है, इसलिए यह उचित नही है।" मिताली सरल भाव से बोली, "मुझे स्वीकार करने में आपको क्या आपत्ति है ?" "तुम जिसकी निधि हो, उसी की बनी रहो ! उसी में तुम्हारा हित है, तुम्हारी भलाई है।" मोतिन बोला, "वंगला देश को आपने गुलामी के पंजे से मुक्त करा दिया। अब हमारा भी अधिकार है कि आपको कुछ दें।" "अवश्य दो ! देना चाहिए भी, शुभकामना दो। देने की चीज दो ! यह तो तुम्हारा पागलपन है !" अतुल मोतिन और मिताली की ओर देखकर बोला, "तुमने आपस में कुछ वायदे किये थे, उन्हें पूर्ण करो, जीवन को जीवन वनामो और यह पागलपन छोड़ दो !" "हम दोनों प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि परस्पर विवाह नहीं करेंगे।" मिताली बोली ! प्रोतिन बोला, "हमारा दृढ निर्णय है कि मिताली मापके साथ रहेगी, आपको परिचारिका बनकर रहेगी।" अतुल हंस कर बोला, "खूब, बहुत खूब ! मेरी परिचारिका बनकर मिताली जायेगी, पर उन बच्चो की परिचारिका कौन होगी, जो प्राज शिविरों में, शिशु-निकेतनों में रो रहे हैं। मैं अकेला हूँ। मेरी एक परिचारिका होगी तो फिर दो लाख बच्चों के लिए दो लाख परिचारिकाएँ कहां से लागोगे ? अतः यह विचार छोड़ो । हां, जो प्रादर-प्यार तुमने मुझे दिया है, मैं उसका भाभारी हूँ, उसे कभी नहीं भूल सकता।" भोतिन बोला, "प्रामारी तो हम आपके हैं । प्रापका ऋण कमी नहीं उतार सकते।". "उपहार हेतु कुछ तो स्वीकार करोगे?" मिताली बोली।
! “१३८/कीर्ति शेष अतुल ने मिताली से कहा, "पगली ! नारी उपहार की वस्तु नहीं होती! वह जननी है, मां है ! मां पूजा की वस्तु होती है, उपहार देने की नही। यो समझो कि उपहार मे मैं तुम्हारा स्नेह लेकर जा रहा हूँ ! तुम्हारी याद ही मेरे लिए उपहार है।" उसी समय वहां मुक्ति वाहिनी की सेना के जवान मा गये थे। सव की आँखों मे हर्ष के प्रांसू थे, विदा के मोती थे। प्रोतिन की ओर देखकर अतुल बोला, "तुम मेरे छोटे भाई हो, मेरी वात मानोगे?" प्रोतिन ने सिर झुका लिया। मिताली की ओर देसकर बोला, "तुमको मैंने परिचारिका से भी बडा समझा है । तुम मेरे छोटे भाई की निधि हो, उसी की रहो ! यह पागलपन छोड़ दो, दोनो विवाह-सूत्र बंधकर राष्ट्र का भविष्य सोचो । मलग-अलग रहकर तुम सूख जानोगे।" मिताली मौन रही । प्रोतिन शान्त रहा । अतुल अब प्रोतिन से वोला, "मेरी बात रख लो। मैं तुमने वड़ा हूँ, बडौं की बात मानना छोटो का कर्तव्य होता है। मिताली को तुम मेरी ओर से विदा के समय का उपहार समझो, आशीर्वाद समझो।" विमान जाने का समय हो गया था। उसी समय बंगला भाषा में ध्वनि आयी, "दया कोरे शुनून फ्लाइट नम्बर दसऐर जात्रीगन बीमानेर निकट परिचारिका कादे तादेर पोद्वार खोवोर देवेन ।” (उड़ान नम्वर दस के यात्री विमान के समीप पहुंच कर परिचारिका को अपने प्राने की सूचना दें।) जाते समय अतुल की प्रांखें भरी थी। वह मुक्ति वाहिनी के जवानों को देखकर बोला, "मैं तुम से अनुरोध करता हूं कि मोतिन को प्रतिज्ञा से मुक्त कर दो ताकि मिताली और प्रोतिन एक होकर बंगला देश के ध्वज को ऊंचा रखें।" मिताली की ओर देखकर अतुल बोला, "सदा सुहागवती रहो।” प्रोतिन की ओर देखकर आंखों से वोला, "क्षमा करना, प्रोतिन !" शेष सबकी आंखों में मोती छलका कर वह विमान की पोर चला गया। उमी समय, संयोग की बात है, रेडियो में यह गीत पाना प्रारम्भ - कीति शेष | १३६ हुआ- सम्मान हृदय का लेकर जाओ, प्यारे सेनानी ! हम विदा तुम्हें करते हैं, भर कर नयनो में पानी । हम कभी नहीं भूलेंगे, तुमने जो राह दिखाई ; हम कभी न बुझने देंगे, तुमने जो ज्योति जलाई। चल उन प्रादों पर, जिन को जीवन-मान बनाया, हम कभी न झुकने देंगे, तुमने जो ध्वज लहराया । कर गये क्षमा तुम हंस कर जालिम को हर नादानी । हम विदा तुम्हें करते हैं, भरकर नयनों में पानी । गान चलता रहा । रेडियो से ध्वनि पाती रही गान को और साथ-साथ ध्वनि आती रही चलते विमान की। विमान चला गया। अतुल चला गया। मुक्ति वाहिनी के जवान घले गये। परन्तु मोतिन और मिताली वही खड़े, प्रकाश को देखते रहे और... और देखते रहे आकाश में उड़ते, उड़ कर पल-पल, क्षण-क्षण दूर जाते हुए विमान को!
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