Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Paychit-sanghar
Front matter
प्रकाशक,
नाथूराम प्रेमी,
मंत्री, माणिकचन्द्र-जैनमन्थराला,
होरावाग, मुंबई नं. ४
AMA
चित्तामणि सरखाराम देवल,
पविभव प्रेस,' सन्ददग ऑफ इंडिया,
सोसायटीज होम, रॉटस्ट रोट,
गिरगावचम्बई
ग्रन्ध-परिचय । इस संग्रह प्रायश्चित्त-विषयक चार अन्य प्रकाशित हो रहे हैं । लभी तक इस पिचका कोई भी अन्य प्रकाशित नहीं हुलाया और न इस विषयके हत्तलितित मन्द हो सर्वत्र मुलभ है ।तएव जैनधर्मके जिज्ञामलों के लिए यह मग्रह विकुल हो गर्व होगा । इसके द्वारा एक ऐसे विषयको जानकारी होगी जिसने जैन- धके बड़े बड़े विद्वान् भी लपरिचित है। दापिन्ड, छेदशास, प्रायश्चित्त-यूलिया और नक्लन-प्रापदित ये चार प्रन्य इस संग्रह है। 'वेद' शब्द प्रायश्चित्तस हो पर्यायवाची है। १-छेदपिण्ड । यह अन्य प्राकृतमें है । इसकी मस्कृतच्छाया श्रीयुत प० पानी ने द्वारा कराई गई है । उन्य बन्ती गाथा (F० ३६० ) के नुमर उसका गायापरिनाम और सेक (अनुष्टुप् ) परिमाण ४२० होना चाहिए, परन्तु वर्तमान पकी गापामा ६२ है। आन पडता है कि उस ६० न्मरको गापाका पाठ लेखको समासे एक युद्ध हो गया है। उसमें - नर, की जगह 'पासहर,' दा इतीले मिलना जुलता हुआ केई और पटना चाहिए। क्योकि ::रों ददे हिसबसे बद भी इसकी कमान ४०० के हो लगभग है और :: नपान ४.० नो हो भन्ने हैं। बनान्द प्रतियो देखन्ने इस म सधन हो जाएगा। इन अन्दर सशोधन दो प्रनों परसे दिया गया है, एक पुग्ने देने टेरपी इतिपरसे- कोर एलई-और दस्री 'मटारर रिटल रिन्च इन्स्टि ' एन्क प्रतिपरसे- यहुत पर है। प्रत्यारे इरश्ने प्रेमान पदरीप्रमादर्डको एनसेलेन्दिनदिई भएपनि मिली डोनोंने दिले लिस्वा पर मेई दी । परन्तु द६ हर ही हाल लिसीन्दर रहा नहीं है। चन्दननन्दिकाचा 6 6 SEPTET, (४) परन्तु अनेक पुस्तकालयोमे यह स्वतंत्र रुपसे भी मिलता है । इसके कर्ता इन्द्र- नन्दि योगीन्द्र है, जो संभवतः नन्दिसंघके आचार्य थे। यह नहीं मालूम हो सका कि उनके गुरुका क्या नाम था और वे निश्चय रूपसे कब हुए हैं अय्यपार्य नामके एक विद्वान्ने शकसंवत् १२४१ (शाकाद्वे विधुवार्धिनेत्रहिमगौ सिद्धार्थसवत्सरे) में 'जिनेन्द्रकल्याणाभ्युदय' नामका संस्कृत ग्रन्थ बनाया है। उसकी प्रशस्तिमें लिखा है.- वीराचार्यसुपूज्यपादजिनसेनाचार्यसंभाषितो, य पूर्व गुणभद्रतरिवसुनन्दीन्द्रादिनन्दर्जित । यश्चाशाधरहस्तिमल्लकथितो यश्चैकसन्धिस्ततः, तभ्यः स्वाहृत्सारमध्यरचितः स्याज्जैनपूजाक्रमः ॥ अर्थात् वीराचार्य, पूज्यपाद, जिनसेन, गुणभद्र, वसुनन्दि, इन्द्रनन्दि, आशाधर, हस्तिमल्ल और एफसन्धिके ग्रन्थोंसे सार भाग लेकर मैंने यह पूजाक्रम रचा है। इससे मालम होता है कि अय्यपार्यसे पहले उक्त आचार्योंके ऐसे ग्रन्थ वर्तमान थे जिनमे पूजाविषयक विधान ये अथवा जो केवल पूजाविषयक ही ये और उनमे इन्द्रनन्दिका भी कोई पूजाग्रन्थ था । और ऐसी अवस्थामें इन्द्रनन्दिका समय शक संवत् १२४१ अयीत् विक्रमसवत् १३७६ के पहले निश्चित होता है। यह छेदपिण्ड जिस इन्द्रनन्दिसंहिताका एक भाग है, उसमें भी एक अध्याय पूजाविषयक है और उसका नाम पूजाप्रक्रम है । इससे यही खयाल होता है कि अय्यपार्यने जिनका उल्लेख किया है वे यही इन्द्रनन्दि होगे । परन्तु इसी इन्द्र- नन्दिसहिताके दायभाग प्रकरणको अन्तिम गाथाओंसे इस विषयमे कुछ सन्दह हो जाता है। वे गाथायें ये है पुव्वं पुज्जविहाणे जिणसेणाइवीरसणगुरुजुत्तइ । पुज्जस्सयाय (1) गुणभद्दसूरिहिं जह तहुद्दिहा ॥६६॥ वसुणंदि-इदणदि य तह य मुणी एयसंधि गणिनाहं (हिं) रचिया पुजविही या पुवक्कमदो विणिद्दिहा ॥ ६४ ॥ गोयम-समतभद्द य अयलंक सु माहणंदिमुणिणाहिं । वसुणदि-इंदणदिहि चिया सा संहिता पमाणाहु ॥६५॥ ।
(५) मंहिताको जिस प्रति हमने ये गापा रिओ है वह बहुत ही लशुद्ध है और इस कारण चयपि इनसे पूरा पूरा र सट विवोध नहीं होता है, फिर भी ऐसा मालूम होता है कि इन इन्द्रनन्दिमहिलाले भी पहले कोई इन्द्रनन्दिमहिना थी, जिले इस महिताके ती प्रमाण मनसे कहते है और इन्द्रनन्दिका बनाया हुआ बोई पूजालन्य भी था । यदि वह ठीक है और हमरे समझने केई म नहीं है तो फिर छेदपिट कर्तक समय पार्यके पहले न्नों माना जा सकता। इन गायानोमे दमुनन्दि, एक्त्तन्धि, और नापन्न्दका भी नाम आया है। इनमेंसे वनुनन्दिका ममय विक्रमको बारहवीं शताब्दिके लगभग निश्चित दिया जा उन है और एक्सन्धि पमुन्दिसे भी कुछ पोरे हुए है । ब्व रहे नाघनन्दि, मो यदि वे फन्दरन्दाचार्य से पहले कहे जानेवाले मुत्रमिदनापनन्दि आचार्य नहीं है और दूसरे माधन्दि है जिन्होंने मापनन्दिनावर चार नाना रन- कन्डी नन्दकी रचना की है और जिन्न नई हुई एक नंदितांका में देख स० पापा दुर्ल चन्द ने अपने अन्यसूची रिता है, तो उनका समन पर्नर विचरित्र की वि० स्वन १३६७ निदर किना है और ऐसी दनाद- पिड बर्नाका नन्द उनमे विक्रम चौदहवीं शान्दिके पूर्वावर पद मान्न होगा । परन्तु न ना रह नरससे निधन हो जयपहा. परिवरित ने जिनका नाम निस्चिार उन्हीका 377 उस गपाल है, तब तर इन पिटले नः पर अदिर जोर नई दिन मकना । फिर में यह दात हो निसन्देह हर जा सकते है टवट दर्ग विकार : दीदिवे पररे ते कदापिही है। जिनेन्द्रराजयुदर र इन्द्रदहित के पूर्व र पा. जिन जिल्लाको पूजा- पन्योका विभ, ऐसा दुह चन्द संत जन्म- पूर्वले नबन है। पर हनने से सर पर ९.४ को देने की मा० १९:। २ प्रन्य पद नपा है। पर मानिरचनावाद ।
(६) संहिता। ... लिखी हुई प्रतिपरसे नकल की थी। हम नहीं कह सकते कि यह सूची कहाँ तक प्रामाणिक है; फिर भी सुना गया है कि वाबाजीने जगह जगहके अन्यभाण्डारोको स्वयं देखकर इसे तैयार किया था। कई ग्रन्थों के नामके साथ यह भी लिखा है कि उक्त ग्रन्थ अमुक जगह मौजूद है। १ वीरसेनस्वामी पूजाकल्प। २ वसुनन्दिस्वामी ३ माघनन्दि सहिता (वृन्दावनके घर है)। ४ जिनसेन पूजाकल्प, पूजासार। ५ इन्द्रनंदि पूजाकल्प ( सस्कृत), सहिता । ६ गुणभद्र पूजाकल्प। ७ देवनन्दि (पूज्यपाद)... पूजाकल्प । ८ एकसन्धि पूजाकल्प । ९ हस्तिमल्ल गणधरवलय-पूजाकल्प । इनमेसे वीरसेन, जिनसेन, गुणभद्र और पूज्यपादके पूजाविषयक स्वतत्र ग्रन्योका उलेय अभी तक किसी भी ग्रन्थमें देखनेमें नहीं आया है। इस लिए इस घातकी वडी भारी आवश्यकता है कि उक्त ग्रन्थ संग्रह किये जायें और उनका अच्छी तरह स्वाध्याय किया जाय । सभव है कि वीरसेन, जिनसेन आदि नामोके धारक अन्य आचार्योंने इनकी रचना की हो । क्योकि हमारे यहाँ एक नामके भनेक आचार्य होते रहे हैं। इन्दनन्दि नामके और भी कई आचार्य हो गये हैं। उनमेसे एक तो वे हैं जिनका उल्लेख गोम्मटसार कर्मकाण्डकी ३९६ वी गाथामे किया गया है और जिनके पास सिद्धान्तग्रन्थोंका श्रवण करके कनकनान्द मुनिने ' सस्वस्थान' की रचना की है.- वर इदणंदिगुरुणो पासे सोऊण सयलसिद्धतं। सिरिकणयणदिमुणिणा सत्तहाणं समुदिहं ॥ १६ ॥ गोम्मटसारके कर्ताका समय विक्रमकी ११वीं शताब्दि है, अतएव ये इन्दनन्दि लगभग इसी समयके आचार्य है।
(७) - अवलोत्की मल्णिप्रशस्तिमें स्तिा है:- दुरितग्रहनिग्रहानयं यदि भो भूरिनरेन्द्रवन्दितम् । ननु तेन हि भव्यदहिनो भजत श्रीमुनिमिन्द्रनन्दिनम् । यह प्रसात्ति शक संवर १०५० (वि० सं० ११८५) में उत्तीर्ण को गई है, तः संभव है कि गोन्नदारोधिखित इन्द्रनन्दि, और इस प्रशस्तिमें जिनको प्रशंसा की गई है वे इन्दनन्दि, दोनों एक ही हो । श्रुतावतार' के कर्ता भी इन्दनन्दि नामके आचार्य है । हमारा अनुमान है किये भी गोन्टवार और मल्लियेणप्रशस्तिके इन्दनन्दिसे भिन्न होंगे। क्यों कि श्रुतावतारमें वीरसेन और जिनसेन भाचार्य तककी ही सिद्धान्त रचनाका उल्लेख है । यदि वे नेमिचन्द्र नावाने पोठे हुए होते, तो वहुत संभव है कि गोन्सारका भी लेख करते । नौतिसार (समयमन) के कर्ता भी इन्द्रनन्दि नामके नाचार्य है. परन्तु वे गोम्मटसारके कर्ताके पीछे हुए हैं, क्यों कि उन्होंने नीतिसारके ७.३ लोकने मिवन्द्रका उलेख किया है (प्रभाचन्द्रो नेमिचन्द्र इत्यादि मुनिसत्तमः) । मत एव से पहले इन्दनन्दि तो नहीं हो सकते । बहुत संभव है कि वे और इस इन्दनन्दसंहिता का एक ही हों। २-छेदशास्त्र। इसका दूसरा नगन 'छेदनति' भी है। क्यों कि इसने नवति या ९० गाया है। यह भी प्राकृतने है। इसके साथ एक छोटीसी वृत्ति नी है। परन्तु इससे न तो मूत्प्रन्यके कर्ताका नाम मालूम हो सकता है और न वृत्तिके कर्ताका । और ऐसी दशामें इसके बननको समय तो निश्चित ही क्या हो सकता है। इस अन्य भी समादन और संशोधन केवल एक ही प्रतिके आधारसे हुआ है और यह प्रति वदईके तेरहयो मन्दिरका वह प्राचीन गुटका है जो नतिशय जोन शो गलितपृष्ट होकर भी प्रायः इद्ध है और हमारे नुनान जो ४००-५०० (१) श्रुतावतारके नुदित पाठमें जिन्सेनके बदले 'जयसेन ' है। (२) मुदित अन्य ९४ गापामान है।
(८) - चर्प पहलेका लिखा हुआ है। इसकी दूसरी प्रति प्रयत्न करनेपर भी कहाँ प्राप्त न हो सकी। इसकी भी संस्कृतच्छाया पं० पन्नालालजी सोनीद्वारा कराई गई है। ३-प्रायश्चित्त-चूलिका। यह ग्रन्थ सस्कृतमें है और सटीक है । मूल अन्यकी शोकसख्या १६६ है। यह भी केवल एक ही प्रतिके आधारसे छपाया गया है और वह प्रति पुनके 'भाण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टिट्यूट' की है जो प्रायः अशुद्ध है और संवत् १९४२ की लिखी हुई है। दूसरी प्रति नहीं मिल सकी। इस ग्रन्थको प्रशस्तिमें लिखा है. यः श्रीगुरूपदेशेन प्रायश्चितस्य सग्रहः । दासेन श्रीगुरोर्डब्धो भव्याशयविशुद्धये ॥१ तस्यैपा ऽनूदिता वृत्तिः श्रीनन्दिगुरुणा हि सा। विरुद्ध यदभूत्र तत्क्षाम्यतु सरस्वती ॥२ इससे मालूम होता है कि मूलग्रन्थके कर्ता श्रीगुरुदास हैं और वृत्तिके कर्ता श्रीनन्दिगुरु है । मूलकर्ताका नाम बिल्कुल अपरिचतसा और विलक्षणसा मालूम होता है। बल्कि हमें तो इसके नाम होनमे सन्देह होता है । ' दासेन ' और श्रीगुरोः' ये दो पद अलग अलग पडे हुए हैं और इनका अर्थ यही होता है, कि श्रीगुरुके दासने बनाया । आश्चर्य नहीं जो टीकाकारको मूलफर्ताका नाम न मालूम हो और उन्होने साधारण तौरसे यह लिख दिया हो कि यह श्रीगुरुके एक दासका बनाया हुआ है और म इसकी वृत्ति रचता हूँ। और यदि 'श्रीगुरुदास' यह नाम ही है, तो हम अभी तक उनके सम्बन्धमे कुछ भी नहीं जानते है । इस नामरे किसी भी आचार्यका नाम देसने सुननेमे नहीं आया । टीकाके कर्ता श्रीनन्दि गुरु है। चाराधीश महाराज भोजके समयमें श्रीचन्द्र नाम के एक विद्वान् हो गये है। (१) परिकम-सूत्र-पूर्वानुयोग-पूर्वगत-चूलिका पच । स्युर्दृष्टिवादभेदा --अभिधानचिन्तामणि।
, उनका' पुराणसार' नामक एक अन्य है। यह विक्रम संवद १०७० का बना हुआ है। उसकी प्रतिमे उन्होंने लिखा है कि नागरसेन नामक साचार्यसे महापुराण पड़कर श्रीनन्दिने शिष्य नुज्ञ श्रीचन्द्र ननिने यह ग्रन्य दनाचा । इनी तरह गवार्य मुनान्दिने अपने प्रावकाचार भी एक प्रोनन्दिका उल्लेख किया है जो उनकी गुत्तरमराने थे।-श्रीनन्दिन्नपनन्दि-मिचन्द्र और वन्दिावनन्दिन्न समय पारहवीं शताब्दि है, अत: उनके दादा गुत्के गुरु वन्य ही उनसे ३०० वर्ष पहले हुए होंगे और इस तरह संभवत श्रीचन्द्र के गरु और वनुनन्दिके परदादा- गुरु एक ही होंगे। पदि प्राचवित्तटीचाके पर्ता श्रीनन्दिगुर और श्रीचन्द गुरु श्रनन्दिं एक ही हो, तो रहना होगा कि यह बैग विन्नी ११३ मतादिनी वन हुई है। और नी दनाने मूल मन्य उन्ले नी पहले दना हुभा होना चाहिए। ४-प्रायश्चित्त ग्रन्थ । यह अन्य श्रीयुत्त ५० लत रामो दशावती स्तिो हुः एक प्रति अपार हो पाया गया है। इनकी में कोई दरी प्रति नहीं मिल मोम काल श्रावके प्रारक्षितमा निस्म है और मग करना ८८ है । ने को प्रगति आदि नहीं है। देर सदर हनने : मन श्रीनहारनेव पर गया हुआ है परन्तु बात पता है कि देव- रातिक सादि महान् प्रन्यो इन हदेवरे भिर करते विद्वान् हेगे और दर्द नहीं दे सक-प्रनिपाउरे एके रचयिता हो । निमय हो चुरादिलका निपटने कर्म १.६ मतान्दिके पद हुए हैं। उन्हें देरा, मनन, एनिमी का पन्त, साधर-प्रतिपाठ किकर, निन्द-2-22 (१)पाका दुल वनीका दरेकर पर प्रदर उल्लेख में किरा है। (२) यो नर ४ १९८.९९ में प्रवास (: देगा,...६ । , , (१०) प्रन्यों के पातसे पर अपने प्रन्यमें दिये हैं । म एउथे इन सा अन्यकताओं पाके विद्वान् है, यह कहने में कोई संकोच नदी हो सकता । दग प्रन्धकी रचना-शैलीगेसी मालूम होता है कि न तो यह उपना मानी ही है और न भ लाख की रचनाओं के समान इसमें सार प्रोताहा है। इसका 'मोक्ला 'शब्द-जो यीमों जगह आया-सस्कृत नही किन्तु देश- भाषाका है और भावाहु-महिमा ( रा: १, अ० १०) में भी यह मोकला रूपमे व्यरदत हुआ है। गुजराती और मारवाहीमें मोकला' शब्द विपुलता या अधिताका वाचक है। लघु अभिषेक और मोकला अर्थात् बड़ा अभियेक । कनी- टक देशके भट अफलकदेवकी रचनामें इस शब्दका प्रयोग असगत ही दिराता है। और भी ऐसी कई बातें है जिनसे इसकी अर्वाचीनता प्रस्ट होती है। जैसे अनेक अपराधोंके दण्टमें गौओंका दान और ताम्बूलदान । जहाँ तक हम जानते है अनेक आचार्योंने 'गौ-दान' का निपेष किया है। इसके सिवाय इस अन्यका पहले तीन प्रायश्चित्त-अन्यों के साथ मतभेद भी मालूम होता है, उदाहरण के लिए इसका यह श्लोक देखिए- जननीतनुजादीनां चाण्डालादिस्त्रियामपि । संभोगे सति शुद्धयर्थं पंचाशदुपवासका।। इसके अनुसार माता पुत्री चाण्डाली आदिके साथ व्यभिचार करनेवालेको पंचाशत् उपवास करना चाहिए, परन्तु अन्य तीनों प्रायश्चित्त-ग्रन्थों में इस पापका प्रायश्चित्त ३२ उपवास लिखा है। इसी तरह अन्यान्य पापोंके प्रायश्चित्तके सम्बन्धमें भी मतभेद है। विद्वानोको इस मतभेद पर भी खास तौरसे विचार करना चाहिए। अन्तमे में इतना और कहकर अपने निवेदनको समाप्त करेंगा कि ग्रन्थ- कर्ताओके समय-निर्णयमा मैंने जो यह प्रयत्न किया है वह अपनी छोटीसी बुद्धिके अनुसार किया है । वहुत सभव है कि मेरे अनुमान गलत हो और ऐसी दशामे मैं अपनी भूलोंको सुधारनेके लिए सदा तत्पर हूँ । परन्तु कोई महाशय यह समझ लेनेकी कृपा न करें कि मैं जान बूझकर किसीको प्राचीन या अर्वाचीन ठहरानेका प्रयत्न करता हूँ। मैं ऐसे प्रयत्नको बहुत ही घृणित समझता हूँ। वई, निवेदक- आषाढ़ सुदी ३ सं० १९७८ वि० नाथूराम प्रेमी।
(११) माणिकचन्द्रजैनग्रन्थमाला। यह प्रन्यनाला स्वर्गीय दानवीर सेठ मानिकचन्द हीराचन्दजीके स्मरणार्य और जैनसाहित्यले उद्धारार्य निकाली गई है। इसने दिगम्बर जैन सम्प्रदायके अलभ्य और दुर्लभ संस्कृत प्राकृत अन्य प्रकाशित होते हैं। इसके द्वारा प्रकाशित हुए प्रन्य केवल लागतके मूल्य पर बेचे जाते हैं, जिससे उन मिल्ना सर्वसाधारणके लिए सुल्म हो जाय। बभीतर इस माल ने १८ अन्य निकल चुके हैं। यदि धर्मात्मा भाइयोंसे बराबर सहायता मिलती रही तो इसके द्वारा सैकडों अपूर्व प्रन्योंका उद्धार हो जामगा। इसके अन्योचो खरीदकर पटना, मन्दिरोंने स्थापित करना और समर्थ विद्धानेको बॉटना, यह प्रत्येक जैनीका कर्तव्य होना चाहिए। ब्याह शादी उत्सव, प्रतिष्ठा मेला लादि प्रत्येक मौके पर इस जन्यमालाको सहायत देने और दिलने चाहिए। जो धर्ममा किसी अन्यकी कमसे क्म २०० प्रतियॉ खरीद लेते हैं, उनका चित्र और लरपत्र उस प्रन्यको तमाम प्रतियोंमें छपवा दिया जाता है। सौ रुपये से अधिक इकरत सहायता करनेवालोंको मारके सब प्रत्य भेटमें दिये जाते हैं। -मंत्री।
(१२) मणिकचन्द दि० जैन ग्रन्थमालामें प्रकाशित पुस्तकोंकी सूची । 2) ... . ॥) ... : : ।) ... DO ... ... ... ... १ लघोगस्वयादिसंग्रह ( लघीयत्रयतात्पर्यत्ति, लघुसर्वज्ञसिद्धि, वृहत्सर्वज्ञसिद्धि ) २ सागारधर्मामृत सटीक ३ विक्रान्तकौरवीय नाटक ४ पार्वनाथचरित्र ५ मैथिलीकल्याण नाटक ६ आराधनासार सटीक ७ जिनदत्तचरित ८ प्रद्युम्नचरित ९ चारित्रसार १० प्रमाणनिर्णय ११ आचारसार १२ त्रैलोक्यसार सटीक १३ तत्त्वानुशासनादिसग्रह ( तत्त्वानुशासन, इष्टोपदेश सटीक, नीतिसार, श्रुतावतार, श्रुतस्कन्ध, वैराग्य- मणिमाला, ढाढसीगाथा, तत्त्वसार, ज्ञानसार, मोक्षपंचाशिका, अध्यात्मतरंगिणी, पात्रकेसरी- स्तोत्र, अध्यात्माष्टक, द्वात्रिंशतिका) १४ अनगारवर्मामृत सटीक १५ युक्त्यानुशासन सटीक १६ नयचक्रसंग्रह (आलापपद्धति, नयचक्र द्रव्य- स्वभावप्रकाशक नयचक्र) १७ पट्माभृतादि सग्रह १८ प्रायश्चित्त-सग्रह . ... 1) ११) m) ... -) ... une) ३) ... .
ग्रन्य-सूची।
दृष्टाने
छेदपिण्ड
छेदनावं
प्रायश्चित्त-वृलिका
प्रायश्चित्त-ग्रन्थ
...
...
...
...
१०४-६४
(१२) मणिकचन्द दि० जैन ग्रन्थमालामें प्रकाशित पुस्तकोंकी सूची। 15) ... ... ... ॥) ... । ... ... ... UR Du ... ... ... ... ... १ लघीवनयादिसंग्रह ( लघीयनयतात्पर्यवृत्ति, लघुसर्वतसिद्धि, वृहत्तर्वज्ञसिद्धि) २ सागारधर्मामृत सटीक ३ विक्रान्तकौरवीय नाटक ४ पार्श्वनाथचरित्र ५ नैथिलीकल्याण नाटक : आराधनातार सटीक ७ जिनदत्तचरित ८ प्रद्युन्नचरित ९ चारित्रसार १० प्रमाणनिर्णय ११ आचारसार १२ त्रैलोक्यसार सटीक १३ तत्वानुशासनादिसंग्रह (तत्त्वानुशासन, इटोपदेश सटीक, नीतितार, श्रुतावतार, श्रुतत्कन्ध, वैराग्य- मणिनाला, ढाटसीगाथा, तत्त्वसार, ज्ञानसार, मोक्षपंचाशिमा, अध्यात्नतरगिणी, पात्रकेसरी- स्तोत्र, अध्यात्माष्टक, द्वात्रिंशतिका) १४ अनगारधर्मामृत सटीक १५ युक्त्यानुशासन सटीक १६ नयचक्रसग्रह (आलापपद्धति, नयचक्र व्य- स्वभावप्रकाशक नपचक्र) १७ पयामृतादि संग्रह १८ प्रायश्चित्त-संग्रह न) १) पात्र) ... ... ... 1) ... ... ३) ...
(१५) ७७ आद्यग्रन्थत्रयाणां प्रकरणसूची। प्रकरणं पृष्ठ-संख्या:-क्रमेण । दत्ताधिकार १ ज्यमनहानताधिभारः १०४ द्वितन्तृतीचमहावतापिगारः ८१-११-११२ तुर्यमहताधिकारः 10 ११४ वनमहारताधिकारः... पटनाधिकार ११८ सनितिप्रकरण ११८ नापासनितिन ... १२२ एपन्ममित्तिर १३ ८४ ८४ ... ८५ ... ८६ ... ... ८९ प्रति पनामिति १२५ ९ ... २७ . ९१ लन्दन्नन्न तिधिकार. स्थितिजन्म विकारः उत्तराधिकारः ९ ... ... ६:३ दारताधिकारः 2.? ० . ... ... ... - ... ० विवर . .
“ (१५) ... ... ... ... १३ ८४ आद्यग्रन्धत्रयाणां प्रकरणसूची। प्रकरणं पृष्ठ-संख्या मेण । सूत्गुनाधिकारः १ १०४ न्यममहामताधिकारः १०४ द्वितंचतृतपमहानताधिकारः ८१-१११-११२ चतुर्पमहताधिकारः १० ८२ ११४ चन्महानताधिकारः... .. पवनाधिकारः ६५ ११८ निनिनिप्रकरण नापासनितिप्रकरण १८ ८६ १२२ एपनमामित्र हादानपिनसमितिः ८९ १२८ पिन्सन्नि १२८ इन्द्रियरोधाधिकर. १२९ लेचाधिकार. ... पहावस्कृतिक ८४ ... ११८ ... ... ... ... २ ... . ... ... ९१ २७ रूरून अदन्नम्न धितराधिकारः स्थितिजनकविकार स्नराधिकार चूलिका :: ... . ... ... ... .. . उभय ... . ... .
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KUCACH!.17 BHAIRODAN SATHIA, JAIS LIBRIR, BIKANER, RAJPUTANA, ॐ नमो वीतरागाय । प्रायश्चित्तसंग्रहः। بع श्रीन्द्रनन्दियोगीन्द्र-विरचितं छेदपिण्डम् । विच्छिण्णकम्नबंधे णिच्छयणयमस्तिऊण अरहते। वोच्छामि छेइपिंड पायच्छित्तं पणमिऊणं ॥१॥ विच्छिन्नकर्मवंधान् निश्चयनयमाश्रित्य अर्हत । वक्ष्यामि च्छेदपिण्डं प्रायश्चित्तं प्रगम्य ।। रितिसादयमूलुत्तरगुणादिचारे पमादप्पेहि । जादे पायच्छित्तं णिसुणह कमसो जहाजोग्गं ॥२॥ ऋषिश्रावकमूलोत्तरगुणातिवारे प्रभावदान्यान् । जाते प्रायश्चित्तं निशृगुत क्रमशो यथायोन्यः ।। पायच्छित्तं छेदो मलहरणं पावणासणं सोही। पुण्ण पवित्तं पावणमिदि पायाच्उत्तनाम ।।३।।
२ प्रायश्चित्तसंमहे- M Arvin. प्रायश्चित्तं छेदो मलहरणं पापनाशन शुद्धि । पुण्य पवित्रं पावनमिति प्रायश्चित्तनामानि ॥ मूलगुण संठाण गुरुमा तह य पंचकल्लाणं । मासियमिदि पज्जाया णायब्वा पंचकल्लाणा ॥४॥ मूलगुण सस्थानं गुरुमास तथा च पनकल्याण । मासिकमिति पर्याया ज्ञातव्या पचकल्याणाः ।। णिब्बियडी पुरिमंटलमायांमं एयटाण खमणमिदि । कल्याणमेगमेदेहिं पंचहिं पंचकल्लाणं ॥ ५॥ निर्विकृतिः पुरिमण्डल आचाम्ल एकस्थानं क्षमणमिति । कल्याणमेक एतैः पंचभिः पंचकल्याण ॥ उववासपंचए वा आयंबिलपचए व गुरुमासा दे । निवियडिपंचए वा अवणीदे हादि लहुमासं ॥६॥ उपवासपंचके वा आचाम्लपचके वा गुरुमासा. ॥ निर्विकृतिपंचके वा अपनीते भवति लघुमासः ॥ णाऊण पुरिससत्त चित्तं वयसथिरायिरत्तं च । एकम्मि य कल्लाणे अवणीदे भिण्णमासा से ॥७॥ ज्ञात्वां पुरुषसत्व चित्तं व्रतस्थिरास्थिरत्वं च । एकम्मिन् च कल्याणे अपनीते भिन्नमासाः तस्य । आयामं सतिभाग दो दो णिन्धियडि एयठाणाई। पुरिमंडलेगभत्ता चउरो बारस विउस्सग्गे ॥ ८ ॥ आचाम्ल सत्रिभागं द्वे द्वे निर्विकृती एकस्थानानि । पुरिमण्डलैकभक्ताः चत्वारः द्वादश व्युत्सर्गाः ॥ ..
छेदपिण्डम् । ३ अहसयणमोक्कारा उववातो वा हवंति उववासे । उहे पुण ते तिउणा छ वा एगकल्लाणं ॥९॥ अष्टशतनमस्कारा उपवासो वा भवन्ति उपवासे । षष्ठे पुनस्ते त्रिगुणा. पष्ठं वा एककल्याण ॥ णवपंचणमोक्कारा काउसग्गम्मि होति एगम्मि । एदेहिं बारसेहिं उववासो जायदे एल्को ॥ १० ॥ नवपंचनमस्कारा कायोत्सर्गे भवन्ति एकन्मिन् । एतैर्दादशभि उपवासो जायते एक ॥ आयंविलम्हि पादूण खमणपुरिमंडले तहा पादो। एयहाणे अद्धं निब्धियडीओ य एमेव ॥ ११ ॥ आचान्ले पादोनं क्षमणपुरिमण्डले तथा पादः । एकन्याने अर्थ निर्विवतो व एक्मेव ।। मजारपदप्पमाणं पुटर्वि सलिलं च चुलयपरिमाणं । दीवतिहामित्तरिंग करपल्लवजणियय वाउं ॥१२॥ मार्जारपदप्रमाण पृथिवी नदिई च चुलुकपरिमाणं । दीपशिखामात्रानिं करपल्लवजानित वायुम् ॥ मुहिपमाणं हरिदावयवं जो घायए पमादेण। पायच्छित्तं तस्स दु एकेको तणविउस्तग्गो ॥१३॥ मष्टिनमाणं हरिताव्यवं य घातयेत् प्रमादेन । प्रायश्चित्त तम्य तु एकैक तनुन्युन्मर्गः ॥ १ हंगामसून स एलके लिछेदा दिनुपन्ते । - ।
४ प्रायश्चित्तसंग्रहे- nnnnnn Ashornhof एइंदियादिचउरिदियंतजीवे जदा पमादेण। दप्पेणुवघादे जो कोवि मुणी थूलगुणधारी ॥ १४ ॥ एकेन्द्रियादिचतुरिन्द्रियान्तनीवान् यदा प्रमादेन । दर्पण उपघातयेत् यः कोऽपि मुनिः स्थूलगुणधारी ॥ काउस्सग्गुववासा दायब्वा तस्स पाणगणणाए। उत्तरगुणियस्स पुणो इंदियगणणाए दायव्वा ॥१५॥ कायोत्सर्गोपवासा दातव्याः तस्मै प्राणगणनया । उत्तरगुणिने पुन इन्द्रियगणनया दातव्याः ॥ अहवा पयत्तअपयत्तचारिणो तह यिरस्स अयिरस्स। काओसग्गुववासा इंदियगणणाए पाणगणणाए ॥१६॥ अथवा प्रयत्नापयत्नचारिणो तथा स्थिरस्यास्थिरस्य । कायोत्सर्गोपवासा इन्द्रियगणनया प्राणगणनया ॥ वारसछच्चदुतिण्हं इगिवितिचउरिदियाण मोहवणे । णियमजुदो उववासो तप्पडिबद्धो तवो अहवा ॥ १७॥ द्वादशपट्चतस्त्रायाणा एकद्वित्रिचतुरिन्द्रियाणा मर्दने । नियमयुत उपवासः तत्प्रतिवद्धं तपोऽथवा ॥ तिछणववारसगुणिदाणेयाण घायणे सनियमाई । इगिवितिचदुछहाई तप्पडिबद्वो तवो अहवा ॥१८॥ त्रिषट्नवद्वादशगुणितानामेकेन्द्रियादीना घातने सनियमानि एकद्वित्रिचतु.पठानि तत्प्रतिवद्ध तपोऽथवा ॥ 9 १ कोइ स. पुस्तके । २ मूलगुणधारी स. पुस्तके।
छेदपिण्डम् । 4-4- पपणारतगणिदाणं पुण एयाणं घायणे हवे छेदो। सप्पविक्षमणं कल्लाणपंचयं तत्तवो अहवा ॥ १९॥ पंचदशगुणितानं पुन. एकेन्द्रियादीनां घातने भवेच्छेदः । मप्रतिक्मणं कल्याणपंचकं तत्तपोऽथवा ॥ एवं पायच्छित्तं अयत्तवारिस्त होइ दायन्वं । जत्तेण तत्त तु एदत्तद्धं भणंति परे ॥ २० ॥ एतत्लायश्चित्त अयत्नवारिण. भवति दातव्यं । यत्नेन चरत. सलु एतन्य अब भगन्ति परे ।। मूलत्तएणधारी पमादेतहिदो पमादरहिदो य । एझेझो वि थिराथिरभेदेणं होइ दुविधप्पो ॥२२॥ मोत्तरगुणधारी प्रनादमहित प्रमादरहितश्च । एकोऽपि स्थिरान्थिरभेदेन भवति द्विविक्रमः ॥ तेति असणिधादे उवाता तिणि उडमय उहं। मासिय पणगंतिय तियखनगं म्हंलघुमातमिगिवारे ॥२२॥ तेमां अमानवते उपवना त्रय षष्ठं अय पठं । नानि पंचनं इति = त्रिजलमगं षष्ठं ल्बुमान एकदरे छह लहुमास मातिय मूलडाणोववासतिग छ । तह भिजनमातातियमिदिकमसो होदि बहुवारे ॥१३॥ पृष्ठं लचुनासः नामिक मूलल्यानं उपासनिकं पष्ठं । तण भिल्मायः मालिकमिति वनशो भवति बहुवारे ।। १पुरण.ख. पुन्दरे । २६न्दरहिदो पन्दरहदोच..।
६ प्रायश्चित्तसंग्रहे- -- rrrr vadav सतरमेदं देयं सष्णिवधे पुण णिरंतरं देयं । चदुवारहि य परदा सबत्य विहोदि मूलखिदी २४ ।। सान्तरमेतद् देय सनिवधे पुनः निरन्तर देयं । चतुर्वारेभ्यः च परतः सर्वत्रापि भाति मूलक्षितिः॥ बालिच्छीगोघादे णियदसणभयवसा समावण्णे। तिणि य मासा छह तस्स य अद्धं तदन्द्धं च ॥ २५॥ वालस्त्रीगोचाते निजदर्शनभयवशात्समापन्ने । त्रयश्च मासा पष्ठ तस्य च अर्ध तदर्ध च ॥ विरदो व सावओ वा तिविहो जदि संजदस्स उवरि दु । उवयरणादिनिमित्तं अप्पाणं धादए को वि ॥ २६ ॥ विरतो वा श्रावको वा त्रिविध यदि संयतस्योपरितु ! उपकरणादिनिमित्त आत्मान घातयेत् कोऽपि ॥ ताण वधे संजादे वारसमासा तहेव छम्मासा । तिणि य मासा छहं दिवट्टमासो य दायव्यं ॥ २७ ॥ तेषा वधे सजाते द्वादशमासा तथैव पण्मासाः । त्रयश्च मासा पष्ठ द्वयर्धमासश्च दातव्य. ॥ सेवडयभगववंदगकावालियभोयपमुहपासंडा। जदि सजदस्स कस्स वि उवरि विवादादिहेदूहि ॥ २८॥ श्वेतपटकभगववन्दककापालिकभोजप्रमुखपापंडा । यदि संयतस्य कस्यापि उपरि विवादादिहेतुभि. ॥ 11 १ उत्तममध्यमभेदेन त्रिविध श्रावक । २दायब्वा से. ।
A रिमानर, (राजपुताना छेदपिण्यम् । अप्पाणं विणिवाति तस्स छहं तु होइ छम्मासं। तदिक्खियाण तत्भत्ताण बहे पुणु तदद्धद्धं ॥ २१॥ आत्मान विनिपातयन्ति तस्य पष्ठ तु भवति पण्मासं । तदीक्षितानां तद्भक्तानां वधे पुन तदर्धाधै ॥ बंभणधादे अह य मासा एयंतरेण उववासा । खत्तियवदस्ससुद्दाण धावणांओ उण तदद्धद्धं ॥ ३० ॥ ब्राम्हणवाते अष्टौ च मासा एकान्तरेण उपवासा । क्षत्रियवैश्यशूद्राणा घातनत. पुन. तदर्धाधै ।। अह य उच्च दोणि य मासा एयंतरेत्ति विति परे। टोसु वि उवएसेसु छडं आदिए अंते ॥ ३१॥ अष्टौ च षट् चत्वार द्वौ च मासा एकान्तरे इति ब्रुवन्ति परे। द्वयोरपि उपदेशयोः पष्ठ आदिके अन्ते ।। णियसमयजादिकुलधम्ममुक्कस्सायरणधारयाण बहे। एसा सुद्धी मज्झिमजहण्णधादे तद्धद्धा ॥ ३२ ॥ निनसमयजातिकुलधमें उत्कृष्टाचरणधारकाणां वः । एपा शुद्धि मध्यमजयन्यवाते तदर्धार्धा ॥ मेसासमहितखरकरहाजादीगांमचउप्पयवहम्हि । अंतादिछहसहिया मासयंतरवासा॥ ३३ ॥ मेषाश्वमहिपतरकरभाऽजादिनामचतुप्पदवघे । अन्तादिषष्ठसहिता मासार्धा एकान्तरेणोपवासा ॥ १ तदद्ध क । २ पापणे ख.। ३ तदद्ध क । ४ आदीय नेवस.। मेवादिनामवासिना चतुलदान वधे।
गत तामा पmतम १६U1EME १५ Film १, १६... 1.71 ni in in पालानिमामि । शामरस न पहाता ॥ २५ ॥ पादिसामयिन ए 1 1 11111 कोषम्य दी.: १५ rifictiti आपण भात पायपि 11१।। युत्त पमा जादा यदि ॥२५॥ आगे मनि पायर्या । उक्त प्रमानातम मानि एमति ॥ अह य सत्त य छन्दु उपवासाहति इमरियाण। चउरिदियतेदियवेदियपदपियाण वह ॥ ३७ ॥ अष्टौ च मप्त च पट चत्वार उपवामा भवन्ति अतिमरता । चतुरिन्द्रियत्रीन्द्रियहीन्द्रियन्द्रियाणा वये ॥ कोमलहरियतिणंकुरपुजस्सवर पमाददोसण । पाए पडियम्मि हवे उववासा सप्पदिकमणी ॥ ३८ ॥ कोमलहरिततृणाङ्करपुजस्योपरि प्रमाददोषेण । पादे पतिते भवेत् उपवास. सप्रतिक्रमणः ॥ १ तदुगुण स.
छेदपिण्ठम् । २ एवं वितिचउरिदियपुंजाणं उवरि पडियए पाए । सपडिझमण दोणि य तिणि य चत्तारि उववासा ॥ ३९ ॥ एव द्वित्रिचतुरिन्द्रियपुंजाना उपरि पतिते पादे । सप्रतिक्रमण द्वौ च त्रयश्च चत्वार उपवासा. ॥ सप्पंडयाणमुवरि पाए पडियम्मि अहव चंकमिए । कल्लाणियाणमुचरिं पडिकमणं पंच उववासा ॥ ४० ॥ सर्पतामुपरि पादे पतिते अथवा चक्रमिते । कल्याणिकानामुपरि प्रतिक्रमणं पंच उपवासा ।। पढमवद-इति प्रथमव्रत । गणिणा चत्तणिहेण व सेसेहिं असण्णिएण केण वि वा । अप्पम्मि मुलावादे अदिण्णगहेणे य अप्पम्मि ॥४१॥ गणिना त्यक्तनिवहेन वा स्नेहेन असन्निहतेन केनापि वा। आत्मनि मृपावादे अदत्तग्रहणे च आत्मनि ।। विण्णादे अणुकमसो छेदो आलोयणा विउस्सग्गो। सप्पडिक्कमणी एगो उववासो दोषिण उववासा॥ ४२ ॥ विज्ञातेऽनुक्रमश. छेद आलोचना व्युत्सर्गः । सप्रतिक्रमण एक उपवास द्वौ उपवासौ ।। अप्फालिऊण हत्थं पुरदो समयस्स लोयपुरदो वा । जदि वददि मुसाबाद तो सहाणं च मूलखिंदी ॥ ४३ ॥ १ गहणम्मि अप्पम्मि । २ अस्या अने इयमपि गाथा समुपलभ्यते ख पुस्तक दम्मसुवण्णादीयं गहिदं जदि मुणदि ससमओ। अहवा एय परियत्त लोगो सटाणं च मूलखिदी ॥१॥ दममुवर्णादिक गृहीतं यदि जानाति स्वस्मयः । अथवा इत परो लोक संस्थान च मूलक्षितिः ।
• १० प्राचित्तममहे- R माकान्ग रम्नं पुर.. ममगम्य पुरतो i | गदि यति मातन मंगाना में दि । अहया समाप्त:उभयतिकरणामांसभासिस । काउस्सम्गो इमितिउजवासा सप्पणिमणा ॥४४॥ अया माशासमझामगधिकरणमामाणिण । कायोत्सर्ग पाडगुपासाः सप्रतिमणाः ।। सुण्ण पञ्चासे अण्णादे णाद अदत्तगहणमि। काउस्सग्गी गित्ति उपवासा सप्पदिधामणा ॥४५॥ शून्ये प्रत्यक्षे अज्ञाते ज्ञाते अदत्तग्रहणे । कायोत्सर्ग एकद्विव्युपवासा सप्रतिक्रमणा ॥ एदं पायच्छित्तं पमादी एगवारदोसस्स । दप्पेण य बहुवार कयस्स पुण पचकल्लाण ॥४६॥ एतत्प्रायश्चित्तं प्रमादतः एकवारदोषम्य । दपेण च बहुवारं कृतम्य पुन पचकल्याणं ॥ विदिय तदिय वद-इति द्वितीयं तृताय त । अवंभभासिणित्थीआहिलासतदंगफासंणि च्छेदो। आलोयणा य काउस्सग्गो नियमोवधासो य ॥४७॥ अब्रह्मभापिण. स्व्यभिलापतदङ्गस्पर्शने छेदः । आलोचना च कायोत्सर्गः नियमोपवासश्च ॥ १ सो क. । २ . क । ३ फासणे स. । ४ सप्रतिक्रमणोपवासश्च ।
व्वपिण्डन् । बाण चिंतिपय महिलं जत्त पनाहोतेण । इंदियखलगं बायदि तत्त तिरत्तं हवद वो ॥१८॥ हा चिन्तयित्र व माँ यन्य प्रमादोषेण । इन्द्रियान्न नायने तत्य त्रिरात्रं भवति छेदः ।। ताल्टोजोनिअपुरंतो जदिणियत्त दिविरत्तो। रूपडिकन्क्वात्तो दायब्बो तस्तिमो च्छेहो ॥ ११ ॥ यंत्राटो यो अन्त्यन् यदि निवृत्तदिविरत। मनिकमावले इतन्य नन्यायं छेद. ॥ जो अमन तेवड़ि विरतो तत्तो तई अविणाई। तरडिमल्लापपंचयं तत्त दायन्वं ॥ ५ ॥ र वन्त बने विरत नक्ष -कृत् अविनातं । मनिनन्ना बन्यत तन्य वतन्यं ॥ बहुतो वि मेहुणं जो त्वदि उपजेहिं अनुणि तत्त। एयंतरोदवाता माता अहव उन्माता ॥५२॥ बोरे युनं च. ने अन्य जान तन्य । एजन्न मन जो तेवदि में परेहि विनाइन्क्वारन्नि। पायच्छित तत्तदुदाय मूलनित्ति ॥ ५२। चने नन्ह परे. विज्ञान एक्वारे । प्रचलित्य नुवानन्य भनिरिति ।। ६.रू..२ नमन १२ प्रायश्चित्तसंग्रहे-- जो देवमण्यतिरियउवसग्गजादं सु जदि अबंभं । सपडिक्कमणं कल्लाणपंचयं होदि देयं से ॥ ५३॥ यः देवमनुप्यतिर्यगुपसर्गजातं सुभजते अब्रम्ह । सप्रतिक्रमण कल्याणपंचकं भवति देयं तस्य ॥ एक्केक्कदिणुग्घाडं कल्लाणं कुणदि देवअचंभे । तिरिए दोदोदिवसुग्घाडं मणुए अणुग्घोडं ॥ ५४ ॥ एकैकदिनोद्घाट कल्याणं करोति देवे अब्रम्हणि । तिरश्चि द्विद्विदिवसोद्धाट मनुने अनुद्धाट । जो णियमवंदणाणं मज्झे एक्कं च दो च किरियाओ। सज्झायजुदा तिण्णि व काऊण परिस्समादीहिं ॥ ५५ ॥ यः नियमवन्दनयोर्मध्ये एका च द्वे च क्रिये । स्वाध्याययुतान्तिस्रो वा कृत्वा परिश्रमादिभिः ।। सुत्तो पदोससमए रेदं पस्सदि खु तस्सिमो च्छेदो । सपडिक्कमणं खमणं णियम खमणं च णियमो य ॥५६॥ सुप्तः प्रदोपसमये रेतः पश्यति खलु तस्याय छेद. । सप्रतिक्रमण क्षमण नियम. क्षमण च नियमश्च ॥ रयणिविराम सज्झायणियमवंदणाण मज्झम्हि । पचं च दो व तिणि य किरियाउ सम णिउ य पमुत्ती॥५७॥ रजनिविरामे स्वाध्यायनियमवन्दनाना मन्ये । एका च द्वे वा तित्रश्च क्रिया समाप्य च प्रमुप्तः ॥ ६. स. पुस्तके । सान्तर । निरन्तरम् । ८ मझायनियमभिणदणाण *पाट ।
छेदपिण्डम् । १३ रेदं पस्सदि जदि तो दायव्वं तस्स सणियमं खवणं । सपडियमणं खमणं सपदिकमणं तहा छहं॥५८॥ रेत. पश्यति यदि ततः दातव्यं नस्य सनियम क्षमणं । सप्रतिक्रमणं क्षमणं सप्रतिक्रमणं तथा षष्ठं ॥ सपडिकमणुववासदिवसे खवणाई वेणि चति परे । रयणीए पुत्वपच्छिमजामे णियम वजुत्ताई ॥ ५९॥ सप्रतिक्रमणोपवासः दिवसे क्षमणे द्वे ब्रुवन्ति परे । रजन्या पूर्वपश्चिमयामे नियमोपयुक्ते ॥ अवसेसणिसासमए सुज्झदि नियमेण दिहए रेदे । दिवसम्मि सुत्तओ जदि परसदि तो छह पडिकमण ॥६०॥ अवशेपनिशासमये शुद्धयति नियमेन दृष्टे रेतसि । दिवसे मुत चदि पश्यति तत. षष्ठं प्रतिक्रमणं ॥ चरन्यं वद-इति चतुर्थे । एंगवराडयकागिणिपणचेलाई पमाददोसेण । अप्पं परिग्गहं जो गेण्हदि निग्गंथवदधारी॥६१ ॥ एकवराटकवाकिणीपणचेलानि प्रमाददोपेण । अल्पं परिग्रहं य. गृहाति निर्गन्धवतधारी ॥ आलोयणा य काउत्सग्गो खमणं च णियमसंजुत्तं । सपडिक्कमणुववासो कमसो छेडी इमो तस्स ॥६॥ १ विशतिवराजा एकाकान्पिी चनु करिना एस. पण । २ टी स.
प्रायश्चित्तसंग्रह- आलोचना च कायोत्सर्गः क्षमणं च नियमसयुक्त । सप्रतिक्रमणोपवासः क्रमशः छेदोऽय तस्य । अच्छादणं महग्घं जो गेण्हदि संजदो सरागमणो । तस्स दुपायच्छित्तं वे उववासा पडिक्कमणं ॥ १३॥ आच्छादनं महार्य य. गृह्णाति संयत. सरागमनाः । तस्य तु प्रायश्चित्त द्वौ उपवासौ प्रतिक्रमण ॥ पोथियलिहावणत्थं जइ देइ धणं सहस्सगणणाए । कोइ वि कस्स वि तो पोयिय लिहाविऊण सो पच्छा ॥६॥ पुस्तकलेखनार्थ यदि ददाति धनं सहस्रगणनायां । कोऽपि कस्यापि तत पुस्तकं लेखयित्वा स पश्चात् ॥ कुणउ मुणी कल्लाणाइं पंच पडिकमणसुणणपुव्याई । ऊणेम्मि व णाऊणा सोही बहुगम्मि मूलखिदी ॥६५।। करोतु मुनि. कल्याणानि पंच प्रतिक्रमण..."पूर्वाणि । ऊने च ज्ञात्वा शुद्धिः वहुके मूलक्षिति ॥ जो अण्णेसिं दव्वं ठवेइ ठविऊण कुणइ अइलोहं । सठवणाण य काले दीणत्तं दावए नियमं ॥६६॥ य. अन्येपा द्रव्यं स्थापयति स्थापयित्वा करोति अतिलोभं स्थापनाना च काले दीनत्वं दापयेत् नियमं ॥ विक्खाददाणगहणं करेदि गिम्हदि परिग्गह सइरं । तस्स य पायच्छित्तं दायब्वमणुक्रमेणेदं ॥ ६७ घणेऊगा. स पुस्तके पाट । २ ताव गणयणकाले. स पाट वस्थ- । ३ गिम्हदि स.। -
छेदपिण्डम् ।
विख्यातदानग्रहण करोति गृहाति परिग्रहं स्वैर
तस्य च प्रायश्चित्तं दातन्यमनुक्रमेणेदम् ॥
एगुववासो छ अहम मासियं च एयाई।
पडिकमणमपुल्याई चरिमे पुण मूलभूमित्ति ॥ ६८॥
एकोपवान. षष्ठं अष्टमकं मासिकं च एतानि ।
प्रतिक्रमणपूर्वाणि चरमे पुन मुलभूमिरिति ॥
चनं वदं-इति पंचन व्रतम् ।
चउविहमेयविहं वा आहारं संजो जदि णिताए ।
उववासपरित्तो वाहिगिलाणो व जिज ॥ ६९ ॥
चतुर्विधमेकविध वा आहारं संयतो यदि निशि ।
उपवामपरिश्रमत न्याधिन्लानो वोभुज्यते ॥
तो पडिकमणपुरोगं छह खमणं च तस्त दायब्वं ।
उवसग्गेणं सन्वं रत्तिं भुजंतस्त तंठाणं ॥७० ॥
तत प्रतिक्रमणपुरोगं षष्ठं क्षमणं व तम्य दातन्य ।
उपसर्गेण नवे रागै भुनानन्य संस्थानम् ।।
संतो रोयस्तो तहोवतग्गो डिओ णिसण्णो वा।
णिति भोयणम्मि पावइ मासियमेवेत्ति ति परे॥७१॥
सन् रोगानान्त. सोपसर्ग स्थित निषप्यो वा ।
निशि भोजने प्राप्नोति मासिकमेवेति ब्रुवन्ति परे ।
जो रत्तीए चरिचं पविसिय धम्मत्त कुणइ उड्डाहं ।
दायचं से मूलठाणमसंभोगिगो तो य ॥७२॥
१६ प्रायश्चित्तसंग्रहे- - यः रात्रौ चर्या प्रविश्य धर्मस्य करोति उद्दाहं । दातव्यं तस्य मूलस्थानमसंभोगिकः स च ॥ सूरम्मि उग्गमंते अहव छण्णम्मि लोहिदे दे। रविविवे भुंजंतस्स होदि लहुमास पणयदुगं ॥ ७३ ॥ सूर्ये उद्गमे अथवा छन्ने लोहिते श्वेते । रविविम्बे भुनानस्य भवति लघुमासः पंचकद्विकम् ॥ नालीतिगस्त मज्झे जदि भुंजदि संजदो अणाचिण्णं । पुवढे अवरहे व तस्स पणगं हवे छेदो ॥ ७ ॥ नालीत्रिकस्य मध्ये यदि भुनक्ति संयत अनावीर्ण. । पूर्वाह्ने अपराह्ने वा तस्य पचकं भवेत् छेदः ।। रादो दिया व सुविणंतरम्मि महुमजमंसतेवित्त । णिय मुववासो णियमो केवलो सिविणभोजिस ॥ ७२ ।। रात्रौ दिवि वा स्वप्नान्तरे मधुमद्यमांससेविन । नियमोपवासौ नियम केवल स्वप्नभोजिन. ॥ छ वद-इति पष्ट व्रतम् । सुद्धण असुद्धण य उप्पंथेणं गयस्स वायामे । काउस्सग्गो खमणं दायव्यमपुण्णकोसम्मि ॥ ७ ॥ शुद्धेनाशुद्धेन च उत्पथेन गतस्य व्यायामेन । कायोत्सर्ग. क्षमणं दातव्य अपूर्णकोशे ॥ हमसमये गिंभे दिवसणिसा पासुगिदरपयेण । गतिगतिगछच्चउचउचउनवडणवछक्कोसे ।। ७७ ।।
छेदापिण्डम् । घनहिमसमये ग्रीष्मे दिवसनिशयो प्रामुक्तरपयेन । त्रिकत्रिकत्रिकत्रिकषट्चतुःचतु.चतु नवपट्नवपटोशे ॥ समणं उहहम दसम सवणं खमणं च छह अहमयं । समणं समणं खमणं उठं च गदेस्तिमो छेदो ॥७॥ क्षमणं षष्ठं अटमं दशमं क्षमणं क्षमणं व पठं अष्टमकं । क्षमणं क्षमणं तमण षष्ठं च गतेऽन्यायं छेदः ॥ वति परे तिदुतिद्वछचउछचउणवछक्कणवठक्ककोताणं । इगिइगितिचदुरिगिगितिण्णिगिइगिगिदोणि खमणाणि॥७९॥ ब्रुवन्ति परे त्रिद्वित्रिद्विषट्चतु पट्चतु नवपटू नवपटू कोशानां । एकेकत्रिचतुरेकैकद्वित्येकेकैकद्विकानि क्षमणानि ॥ पिच्छं मोत्तूण मुणी गच्छदि जदि तत्तपंडुपरिमाणं । सुज्झदि काओतग्गेण गाउगड़े एयखमणेण ॥ ८॥ पिछे मुक्त्वा मुनि गच्छति यदि सप्तपादपरिमाणं । शुद्धचति कायोत्मर्गेण गन्युतिगते एकतमणेन ॥ डोलियगमणन्मि पुणो पुन्बुत्ततिकालयमलहरणं । वहमाणपुरिसतंसागुणिदं देयं गिलाणस ।। ८१ ॥ दोलिकगमने पुनः पूर्वोचत्रिकालस्यमलहरणं । वहमानपुत्पसंख्यागुणितं देयं न्यानन्य ॥ जाणुपमाणम्मि जले अजंतुबहुलन्मि तोलसणुत्ति । इरिवंतस्स विसोही मुणिणो एगो विउस्तग्गो ॥ ८२ ॥ १सत्तापरिमासाने ढोरियामन्नि खोजमुन्नस ।
प्रायश्चित्तसंग्रहे- जानुप्रमाणे जलेऽजन्तुबहुले षोडशधपीति । ईराणस्य विशुद्धिः मुनेः एको व्युत्सर्गः ॥ जण्हू उरि चउचउरंगुलेसु एगादिगुणदुगुणाई। खमणाई जंतुपउरे पुण अन्भहियाई देयाई ॥३॥ जानूपरि चतुश्चतुरङ्गुलेषु एकादिद्विगुणद्विगुणानि । क्षमणानि जन्तुप्रचुरे पुनः अभ्यधिकानि देयानि ॥ काउस्तगो आलोयणा य णावादिणा णदीतरणे। णावाए जलहितरणे सोही खवणादिपणयंता ॥ ८४ ॥ कायोत्सर्गः आलोचना च नावादिना नदीतरणे । नावा जलधितरणे शुद्धिः क्षमणादिपंचकान्ता । सपरणिमित्तपउंजिददोणीणावादिणा णदीतरणे । अण्णे भणति एगो उववासो तह विउस्सग्गो॥ ८५ ॥ स्वपरनिमित्तप्रयुक्तद्रोणीनावादिना नदीतरणे । अन्ये भणन्ति एक उपवासस्तथा व्युत्सर्गः ॥ वुटुंतएसु णावादिगेसु वाहाहिं जो तरेऊण । णीसरदि तस्स छेदो खमणादिपणगपरियंतो॥ ८६ ॥ ब्रुडत्सु नावादिकेषु वाहुभ्यां यः तीळ । निःसरति तस्य च्छेद क्षमणादिपंचकपर्यन्तः ।। इरियासमिदि-इतीर्यासमितिः। दोण्हं भासंताणं भासंतस्संतरे विउस्सग्गो। भालोयणा दु छक्कम्मदेसणे खमणमेगं तु ॥ ७॥ -- छेदपिण्डम् । १९ द्वयोः भापमाणयोः भाषमाणस्यान्तरे व्युत्सर्गः । आलोचना तु पटू र्मदेशने क्षमणमेकं तु ।। ठेलुतिछुहणं घरसारवणं घरकुड्डिलिंपणं चेव । अंगणवोहारणपाणिआहणणं छेणवालणमिदिछकम्मं ।। ८८ ॥ उखलीकण्डनं गृहसम्माननं गृहकुडिलिंपनं चैव । अंगणवोहारणं पानीयाननं कारीपज्वालनमिति पटुर्म ।। अविरदसुत्तपबोधिस्स गीदणहादिकरणमासिस्स। पुन्चुच्छिण्णपराधपभासिस्स य अहमं देयं ।। ८९ ॥ अविरतसुप्तप्रबोधिनः गीतनृत्यादिकरणभाषिणः । पूर्वच्छिन्नापराधभापिणश्च अष्टमं देयं ।। चाउवण्णपराधं जो भासदि सो अवंदणिज्जो खु । गाणं गणिके कीरदि छेदो पणगादिमासिगंतो से ॥१०॥ चातुर्वापराध यः भाषते सोऽवन्दनीयः खलु । गान गणिक कीर्तयति छेद. पंचकादिमासिकान्तस्तस्य ।। भासासमिदि-इति भाषासमितिः । अण्णाणवाहिदप्पहिं हरिदकंदादिगेसु खद्धसु । सालोयण विउसग्गो समणं पणगं च इगिवारे ॥ ९१५ अज्ञानन्याधिद हरितकन्दादिकेषु खादितेषु । सालोचनो व्युत्सर्गः क्षमणं पंचक च एक्वारे । १ इदं गापासून ख-पुस्तके नास्ति ।
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प्रायश्चित्तसंग्रहे-
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जानुप्रमाणे जलेऽजन्तुबहुले षोडशधपीति ।
ईराणस्य विशुद्धिः मुनेः एको व्युत्सर्गः ॥
जण्हू उवरिं चउचउरंगुलेसु एगादिदुगुणदुगुणाई ।
खमणाई जंतुपउरे पुण अभहियाई देयाई ॥ ८३ ॥
जानूपरि चतुश्चतुरङ्गुलेषु एकादिद्विगुणद्विगुणानि ।
क्षमणानि जन्तुप्रचुरे पुनः अभ्यधिकानि देयानि ॥
काउस्सगो आलोयणा य णावादिणा णदीतरणे।
मावाए जलहितरणे सोही खवणादिपणयंता ॥८४ ॥
कायोत्सर्ग: आलोचना च नावादिना नदीतरणे ।
नावा जलधितरणे शुद्धिः क्षमणादिपंचकान्ता ।।
सपरणिमित्तपउजिददोणीणावादिणा णदीतरणे।
अण्णे भणंति एगो उववासो तह विउस्सग्गो ॥ ८५ ॥
स्वपरनिमित्तप्रयुक्तद्रोणानावादिना नदीतरणे ।
अन्ये भणन्ति एक उपवासस्तथा व्युत्सर्गः ॥
बुद्धतएस णावादिगेसु वाहाहिं जो तरेऊण ।
णीसरदि तस्स छेदो खमणादिपणगपरियंतो॥८६॥
बुडत्म नावादिकेषु बाहुभ्या यः तीवा ।
निःसरति तस्य च्छेदः क्षमणादिपचकपर्यन्तः ।।
दरियासमिदि-दतीर्यासमितिः ।
दोण्हं भासंताणं मासंतस्सतर विउस्सग्गी ।
भालोयणा दु छक्कम्मदेसण खमनमगं तु ॥ ७ ॥
छेदपिण्टम।
हयो भापमाणयाः भाषमागम्यान्तरे न्युन्मर्गः ।
आलेचना न पटू मंदगने क्षमणमकं नु ।।
लुमिदाण घरमारयणं घायुट्रिलिंपणं चंद ।
अंगणवारणपाणिआणणं नणवारणमिदिकम् ॥८t
उपसाटनं गृहसम्मानन राटिदिन पत्र ।
अगणत्रोतागणं पानीयानन कार्ग वाट मनि पाम् |
अदिग्दारनपदाधिरगर गीदणादिकरणामामि ।
परिणपराधएभाग्मिगार य अदम दयं ।'
अजिनागरगिन गाननत्याविnfo !
पकिन गपग माणिय र य ।
Anभापटिमा
गाणं गणिय दानमा पारिfan..।
པས་དཀཱ་ལ་ཙ1; , tii ༑ :མ,, r :
मर गई.. ? .. ,
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प्रायभित्तसम- बहुवारस य पणगं मूलगुणं तह य भूलभूमी य । दायव्या अणुकमसो हरिव सांज ण विरको ॥ ९२ अनारेषु न पन मगुल्दण. तमा न मामिय । दातव्या अनुक्रमश. हरित सादोन दिपिरतः ॥ विसमपयवमिदणिदुदभासिस्कूदावलंयणादीहि । भुत्ते सेह गिलाणेणुववासो छटुमिदराणं ॥ ९३ ॥ विषमपदयमितनिष्ठय्तभापितकुञ्यापलनादिमि । भुक्ते सति लानेन उपवाम पठं इतरेषा ॥ कागादिअंतराए जादे वि परिस्समादिहेदूहिं। असमत्थो जदि भुंजदि तस्सुववासो हवदि छेदो ॥ ९४ कागाद्यन्तराये जातेऽपि परिश्रमादिहेतुभिः । असमथों यदि भुनक्ति तम्योपवासो भवति च्छेदः ॥ गहिदोग्गहम्मि विसरिऊणं पदभुत्तम्मि होदि उववासो। भोयणकाले णादम्मि अंतरायं खु कादव्वं ॥ ९५ ॥ गृहीतावग्रहे विस्मृत्य प्रभुक्ते भवत्युपवास । भोजनकाले ज्ञाते अन्तरायः खलु कर्तव्यः ॥ वटुंतरायगे संजादे भुत्ते सुदम्मि उववासो। सपडिक्कमणो दिटुम्मि अप्पणो छ? पडिक्कमणं ॥ ९६ ।। वृहदन्तरायके संजाते भुक्ते श्रुते उपवासः । सप्रतिक्रमणः दृष्टे स्वयं पष्ठ प्रतिक्रमणं ॥ १-९६ गाथातः ९७ गाथा ख-पुस्तके पूर्व ।
पिण्टमा पंसालगंकोमा मृलगणेयं मरीर पुढं। भृत्तरम य त गुणं उययामायणा दी ॥ १५ ॥ नामक मनि मूरगणैर गर्गरक पृष्टे । भगम्य च तद्विगुण उपनामन्थापना ॥ बलयगजदंतपिच्छदंरकरोगा अत्यु । सासरस सिद्धययादि पुव्यद कदेयं ॥ ९८ ॥ .... ॥ ... . जदि पुण मुहम्मि परसदि सपटिझमणं तु अहम फुजा । गामाए गामंतरचरियाए खमण पटिकमणं ॥ ९९ ।। यदि पुनः मुखे पश्यति सप्रतिक्रमणं तु अष्टम कुर्यात् । ग्रामात् नामान्तरचर्याया क्षमण प्रतिक्रमण ॥ आधाकम्मे भुत्ते गिलाणअगिलाणएण इगिवारे । खमणं छह वहुवारएसु संठाणमूलखिदी ॥ १० ॥ आधाकर्मणि भुक्ते न्लानान्लानाभ्या एकवारे । समण पष्ठ बहुवारेषु सन्थानमूलक्षिती ॥ एसणासमिदी-इत्येपणासमितिः । वियडितणकहचालण ठाणंतरसंकमे विउस्सग्गो। रत्तीए अंधयारे खमणं तच्चालणे गहणे ॥१०१ ।। १ इदं गाथासूत्र स-पुस्तके नास्ति । २ रत्तीए बहुभंधयारे. ख-पाठः॥
२२ प्रायश्चित्तसंग्रह- ~~~ वियडितृणकाष्ठचालन स्थानान्तरसक्रमे व्युत्सर्गः ॥ रात्रावन्धकारे क्षमण तथालने ग्रहणे ॥ उप्पण्णं पि कसाए मिच्छाकारं तक्राणे कुज्जा । खवणं चाहारत्तं गदे तेण परं मासियं छेदो ॥ १०२।। उत्पन्नेऽपि कपाये मिथ्याकारं तत्क्षणे कुर्यात् । क्षमणं च अहोरात्र गते तेन परं मसिकं छेदः ॥ आदावणणिक्सेवण-दत्यादाननिक्षेपणासमितिः । हरिदतणंकुरवीजाणुच्चारादिसु कदेसु उवरिं तु । सालोयणविउसग्गो थोवे खमणं तु बहुवारे ॥ १०३ ।। हरिततृणावरबीजानामुच्चारादिषु कृतेषु उपरि तु । सालोचनव्युत्सर्गः स्तोके क्षमण तु वहुवारे ॥ पइटावण-इति प्रतिष्ठापनासमिति । . अप्पयदपयदचारिस्स परसरसघाणचक्खुसोदाणं । अदिचारे इगिवितिचउपचउववासा विउस्सग्गा ॥१०४॥ १ इदं गाथासूत्रं ख-पुस्ते नास्ति । २ अस्मादले क-पुस्तके अधस्तनवर्ती श्लोकोऽपि विद्यते । ख-पुस्तके तु नास्ति । स च प्रायश्चित्तचूलिकास्यस्य ग्रन्थस्य सप्ताशीतितमः । तद्यथा । तृणकाष्ठकपाटानामुद्घाटनविघटने । चतुर्मास्याश्चतुर्थ स्यात् सोपस्थानमवस्थितं ॥
छेदपिण्डम् । ૨2 अप्रयत्नप्रयत्नचारिणोः स्पर्शरसबाणचक्षुःश्रोत्राणा अतिचारे एकद्वित्रिचतु.पंचोपवासा व्युत्सर्गाः ।। इंदियरोध-दती न्दियराधः । मासचउक्कं लोचो वरिसं च जुगं च जस्स वोलीणो। सपटिक्कमणं समणं उटुं तह मातियं छेदो ॥ १०५॥ मासचतुष्कं लोचः वर्षे च युगं च यस्य अतिक्रान्तः । सप्रतिकमणं क्षमणं षष्ठं तथा मासिकं छेदः । अण्णे भणंति चाउम्मासियवरिसियजुगंतपडिकमणे । जादं पि जो ण लोचं देवावह तस्सिमो छेदो ॥ १०६ ॥ अन्ये भणन्ति चतुर्मासिकवार्षिकयुगान्तप्रतिक्रमणे । जातमपि यो न लोचं ददाति तस्याय छेद. ।। सो पुण वाहिगिलाणो जदि णो लोचं करिज उग्घाडं। एदं पायच्छित्तं करेज इयरो अणुग्घाडं ॥ १०७ ॥ स पुन व्याधिन्लान यदि नो लोचं करोति उदाटं । एतत्प्रायश्चित्तं कुर्यात् इतर अनुदाटम् ॥ लोचो वि जदि ण दिण्णोपडिकमणं णिसुणियंण तदिवसे। तो खवणदुर्ग मासियमुग्घाडं तरं (ह) अणुग्धार्ड ॥ १०८॥ लोचोऽपि यदि न दत्त प्रतिक्रमणं निश्रुतं न तद्दिवसे । तत क्षमणद्विकं मासिक उदाटं तथा अनुदाट । रोचो-इति लोच । रोतीयर्थः। २ ल.। ३ तत्तगुरपाई ख।
२४ प्रायश्चित्तसंग्रहे- - ~~~~~ देवगुरुसमयकज्जेहिं जो ण अवखित्तमाणसो कुणइ । सज्झायचउक्कं नियममेकं मथ बंदणं एवं ॥ १०९ ॥ देवगुरुसमयकार्य यः न अवक्षिप्तमानसः करोति । स्वाध्यायचतुप्कं नियममेकमय वन्दना एकाम् ।। पक्सिय अहमियं वा किरिया जो चुक्कए खमणमेकं । तस्स च्छेदो तिणि विउसग्गा खलिदसज्झाए ॥ ११०॥ पाक्षिका आप्टमिकां वा क्रियां यः भ्रंशति क्षमणमेकं । तस्य च्छेदः त्रयो व्युत्सर्गाः स्खलितस्वाध्याये॥ किरियावंदणियमेसु विउस्सग्गुणएसु विहिएसु । अकयाए जोगभत्तीए तहा खवणद्धमिह तुद्धी ॥ १११ ॥ क्रियावंदनानियमेष व्युत्सोनकेषु विहितेषु । अकृतायां योगभक्तौ तथा क्षमणार्द्धमिह शुद्धिः ॥ पक्खं पडि एक्केळं खमणं पडिकमणसुणणसंजुत्तं । कायव्वमेव तस्स य पदिक्कमे दोण्णि उववासा ॥ ११२ ॥ पक्षं प्रति एकक क्षमण प्रतिक्रमणश्रवणसंयुक्तं । कर्तव्यमेव तम्य चातिकमे द्वौ उपवासौ ॥ अह पडिकमणं ण सुयं उववासो पुण कउ जदि हवेज । तो तस्स पायछित्तं दायव्वं एगखमणं तु ॥ ११३॥ अथ प्रतिक्रमणं न श्रुतं उपवास पुनः कृतो यदि भवेत् । तत. तस्य प्रायश्चित्त दातन्य एक्लमणं तु ।। ण सुयाउ जेण पक्खियपडिकमणा तिणिआ देउ । पक्सतवं पडिकमणपुब्वगं तीदपक्वगणणाए देयं से॥११॥ yaa---- - -- छेदापिण्डम् । २५ न श्रुता येन पाक्षिकप्रतिक्रमणा त्रयो दातव्या. । पक्षतपः प्रतिनमणपूर्वकं अतीतपक्षगणनया देयं तस्य । आसाटे संवच्छरपडिकमणे दिजतु वारस उववासा । सिहाकत्तियपुण्णिमपडिकमणे अट्ट दायब्बा ॥ ११५ ॥ आपाडे संवत्सरप्रतिक्रमणे दीयन्तां द्वादश उपवासाः । सितकार्तिकपूर्णिमाप्रतिक्रमणायां अष्टौ दातव्या ॥ फागुणचाउम्मातियपडिकमणे दिज पोतधचउक्कं । कत्तियमाते चदुरो विति परे फग्गुणे अह ॥ ११६ ॥ फाल्गुणचातुर्मासिकप्रतिक्रमणाया ददाति प्रोषधचतुष्कं । कार्तिकमासे चत्वारः ब्रुवन्ति परे फाल्गुणे अष्टौ ॥ णंदीतरपक्वडियं पंचमिदिणपहुदिजामपरपक्से । ठियतेरसोत्ति एडम्मि अंतरे कारणवसेण ॥ ११७ ॥ नन्दीश्वरपक्षन्धितं पंचमीदिनप्रभृतियावत्परपते। स्थितत्रयोदश इति एतम्मिन्नन्तरे कारणवशेन । वरतिय चाउम्मासिय पडिकमण कप्पदे णिसामेदं । तत्तो परं सुणंतत्त तप्पडिक्कमणतुणणजुदा ॥ ११८ ॥ वार्षिकी चातुर्मासिकी प्रतिक्रमणां कल्पते निशामयितुं । तत. परं शृण्वतः तत्प्रतिक्रमणप्रवणयुक्ता ॥ वारस अह य चउरो उववासा विगुणिकण दायब्वा । पस्सियपायच्छित्तं पक्सगर्णणाए दायव्वं ॥ ११९ ॥ १ कत्तिपदिनपडिकन्ने माना 7 दायबा इति त-पुस्तके पाठान्तरम् । २ पक्तिप.त.। ३ निवानेह रु.। ४ पक्तगणनेर दत्यया,ख।
२६ प्रायश्चित्तसंग्रहे- -- द्वादश अष्टौ च नत्वार उपवासा द्विगुणीकृत्य दातव्याः । पाक्षिकमायाश्चत्त पाक्षिकगणनया दातव्य ॥ जो पक्खमासचउमासवरिसमावासयं सुसंखित्तं । कुणइ य पेखयमणुमोदए सयं काउमसमत्थो ॥ १२० ॥ यः पक्षमासचतुर्मासवर्षे आवश्यक सुसंक्षिप्तं । करोति च दृष्ट्वा अनुमोदयेत् स्वयं कर्तुमसमर्थः ॥ पायच्छित्तं कमसो खमणं पणयं च पंचकल्लाणं । गुरुमासचउक्कं पिय दायव्यं से गिलाणस्स ॥ १२१ ॥ प्रायश्चित्त क्रमश. क्षमण पंचकं च पंचकल्याण । गुरुमासचतुष्कं अपि च दातव्यं तस्य म्लानस्य ॥ आवासयपरिहीणो इगिदुगमासे य वाहिदप्पेहिं । तो तस्स हवे छेदो लहुगुरुआमासचउमासा ॥ १२२ ॥ आवश्यकपरिहीन एकद्विमासे च व्याधिदर्पाम्या। तर्हि तस्य भवेच्छेदः लघुगुरुकमासचर्तुमासा. ॥ आवासयपरिहीणो जो उण उभयत्थ वुत्तकालादो। उक्कस्सादो परदो दायव्या मूलभूमित्ति ॥ १२३ ॥ आवश्यकपरिहीनः यः पुनः उभयत्र उक्तकालत । उत्कृष्टतः परतः दातव्या मूलभूमिरिति ॥ आवासयं-इत्यावश्यक। . १ परपक्खय. स । २ इगिदुगमासेहिं ख । ३ सुत्यकालादो. क । ४ अयं गाथासूत्रस्योत्तरार्ध. क-पुस्तके नास्ति, ख-पुस्तकात् संयोजितः । ५ इदमपि क-पुस्तके नास्ति, ख-पुस्तके त्वस्ति । -------- Richar- ------ छेदपिण्डम् । २७ उसग्गदो अणारोगदो कारणवसेण दप्पादो। गिहिअण्णतियलिंगग्गहणेणाचेलवदभंगे ॥ १२४ ॥ उपसर्गतः अनारोगत. कारणशेन दर्पतः। गृह्यन्यतीर्थल्गिग्रहणेन अचेल्नतभंगे ॥ जादे पायच्छित्तं समणं उटुं कमेण संठाणं । मूलं पि य जणणादे दायन्वं एगवारम्मि ॥ १२५ ॥ जाते प्रायश्चित्तं क्षमणं षष्ठं क्रमेण संन्यानं । मलमपि व जनजाते दातन्यं एकवारे । अवेल-इत्यवेत्। पहाणे दंतग्धतणे गिहसजाए य रायदो तयणे। इगिवारे कल्लाणं बहुवारे पंचकल्लाणं ॥ १२६ ॥ न्लाने दन्तवर्षणे गृहिशय्यायां च रागतः शयने। एकबारे कल्याणं बहुबारे पंचकल्याणं ।। बझनदेव सिदिसंबा-इपलब्दन्तमन मितिमया । ठिदिभोयणेगमत्ते जाए दप्पेण एगबहुवारे । भग्गम्मि पणगमासिगदिवसंतवछेदमूलखिदी ॥१२७ ।। न्थितिभोजनकभके जाते दण एकबहुवारे । भन्ने पंचकमासिदिवसतपच्छेदमूलक्षितयः ।। विदर्भयगन्तं-इत स्थिनिर्भकमले। १ ल्यं पूर्वाधः-उत्तरेनति, स-पुस्तकाद स्पोन्ति । २हिर सा ३ दंतरसन स! ४ सिदिसपनं स । ५रुपएखाना ।
૨૮ प्रायश्चित्तसंग्रहे- इंदियसमिदिअदंतवणलोचखिदिसयणभंजणे चेयं । काउस्सग्गुववासा सेसाणं भंजणे तह यं ॥१२८ ॥ इन्द्रियसमित्यदन्तमनलोनक्षितिशयनभजने चैव कायोत्सगोपवासी शेषाणां भंनने तथा च ॥ मूलगुणा-दति मूलगुणा । तरुमूलथिरादावणजोगे भग्गम्मि सप्पडिक्कमणे । एयंतरोववासा चउरो मासा य दायव्वा ॥ १२९ ॥ तरुमूलस्थिरातापनयोगे भगे सप्रतिक्रमणाः । एकान्तरोपवासाः चत्वारो मासाश्च दातव्याः ॥ अण्णे भणंति जोगावसेसदिवसावसाणसमउत्ति । एयंतरोववासा सपडिक्कमणा य दायव्वा ॥१३०॥ अन्ये भणति योगावशेषदिवसावसानसमय इति । एकान्तरोपवासाः सप्रतिक्रमणाश्च दातव्याः ।। तरुमूलजोगर्भग्गं रोगिगं णिसाए जणेसु सुत्तेसु । गुत्तेण वसहिअभंतरम्मि सो-चाविऊण गणी ॥ १३१ ॥ तरुमूलयोगभग्नं रोगाङ्गं ? निशि जनेषु सुप्तेषु । गुप्तेन वसत्यभन्तरे स-आनीय ? गणी ॥ णीहारइ तेसु अणुट्टिएसु जदि रोगपसवणदिणतं । तो तस्स हवादि छेदो सपडिक्कमणं तु मूलगुणं ॥ १३२ ।। १ असइ ख । २ मूलं ख । ३ मणा ख । ४ जोगिग क । ५ अणितिएसुक। दिणता ख।
छेदपिण्डम् । २९ नीहारयति तेषु अनुष्ठितेपु यदि रोगप्रशमनदिनान्तं । तर्हि तस्य भवति च्छेदः सप्रतिक्रमणं तु मूलगुण ।। जो रुक्रवमूलजोगी तटाणं गच्छदे ण वेलाए । सालोयणविउसग्गो पायच्छितं हवे तस्स ॥ १३३ ।। यः वृक्षमूलयोगी तत्स्थान गच्छति न वेलायां । सालोचनव्युत्सर्गः प्रायश्चित्तं भवेत्तम्य ॥ तरुमूलमोवासयतोरणठाणादिजोगतंजुत्तो। अण्णस्स अप्पणो वा वेज्जावञ्चादिकरणहं॥ १३४॥ तस्मूलाभावकाशतोरणस्थानादियोगसंयुक्तः । अन्यस्य आत्मनो वा वैयावृत्यादिकरणार्थ ॥ जदि एग निसं वसहियमज्झे सो वसेदि तहाँ य दायन्वं ।। पायच्छित्तं तस्स दु सपडिक्कमणं खमणमेगं ॥ १३५ ॥ यदि एकां निशां वसतिमध्ये स वसति तथा च दातव्यं । प्रायश्चित्तं तस्य तु सप्रतिक्रमणं क्षमणमेकं ।। अथिरादावणअभोवगासजोगम्मि भग्गए छेदो। मूलगुण पडिकमणं पुरोगपरदेसगमणं च ॥ १३६ ॥ अन्थिरातापनाभ्रावकशयोगे भन्ने छेदः । मूलगुणं प्रतिक्रमणं पुरोगपरदेशगमनं च ॥ ठाणासणादिजोगे णिरवधिगे सम्बहा वि परिचत्ते । पायच्छित्तं कल्लाणपंचयं सपडिकमणं ॥ १३७ ॥ १ तदा यख।
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छेदपिण्डम् । ३१ manna hwhat AMA यदि पुनः परवादिविवादकरणसंन्याससंघकार्याणि । जातानि भवन्ति वर्षाकालयोगस्य मध्ये ।। तो देसंतरगमणं वि ण पडिसिद्ध हवे सुविहिदाणं । सयलरिसिसंघसभयकजं करणिजमेव जदो ॥ १४३ ।। तर्हि देशान्तरगमनमपि न प्रतिसिद्धं भवेत् सुविहितानां । सकलसिंघसमयकार्य करणीयमेव यतः ॥ बारहजोयणमझे जादे सल्लेहणम्मि साहूहि । एगग्गामियभोयणसयणाई अकुणमाणेहिं ॥ १४४ ॥ द्वादशयोजनमध्ये जातायां सल्लेखनायां साधुभिः । एक्यामिकभोजनशयने अकुर्वाणैः ॥ जोगे गहिदम्मि वरिसयालमज्झिम्मि होदि गंतवं । तेणेव कमेणागंतन्वं एसा पुराणठिदी ॥ १४५ ॥ योगे गृहीते वर्षाकालमध्ये भवति गन्तव्यं । तेनैव क्रमेणागन्तव्यं एपा पुराणस्थितिः ॥ संण्णासणकाले पुण जायंतो मुणिवरो जदि पछेन्ज । कइविसूचियादीहिं मलहरणं तस्स दायत्वं ।। १४६ ॥ सन्यासकाले पुन याचमानो मुनिवरो यदि दृश्येत । कृतविसूचिकादिभि मलहरणं तन्य दातव्यं ।। पढमे परखे पणगं अंतिमपस्वेण दोण्णि उववासा । मनिममपक्सेसु पुणो दायबो दोणि पणगं तु ॥ १४७ ॥ १ समुदायकब का २एगगामो, क. । ३-४ इमे गायाभूत्रे ख. पुस्तके नस्तः।
३२ प्रायश्चित्तसंग्रहे- प्रथमे पक्षे पंचकं अतिमपक्षेन द्वौ उपवासौ । मध्यमपक्षेषु पुनः दातव्ये द्वे पंचके । ऐगं णिसन्नदी सतु ? रोधणरोगादिकारणवसेण । अन्नत्थ वरिसयाले जदि वसदि मुणी तदा तस्स ॥ १४८॥ एकत्र निप्ण. सन्ः रोधनरोगादिकारणवशेन । अन्यत्र वर्षाकाले यदि वसति मुनिस्तदा तस्य ॥ अण्णेहिं अविण्णादे देयं पडिकमणमेयखमणं च । णादे आदिमअंतिममज्झिमपखुत्तमलहरणं ॥ १४९ ॥ अन्यैरविज्ञाते देयं प्रतिक्रमणं एकक्षमणं च । ज्ञाते आदिमान्तिममध्यमपक्षोक्तमलहरण ॥ सल्लेहणस्स पक्खे खमियस्स परीसहेहिं भग्गस्त । अण्णं पाणं जाचतयस्स गणिणा वि कुसलेण ॥ १५० ।। सल्लेखनायाः पक्षे समितस्य परीपहैः भन्नस्य । अन्न पान याचमानस्य गणिनापि कुशलेन ॥ पच्छण्णेण अधिच्चतम्मि दिणम्मि सपडिकमणं। उद्विदिणिविट्ठभोजिस्स दिवा खमणं च छहदुगं ॥१५१॥ प्रच्छन्नेन अधित्यक्ते ? दिने सप्रतिक्रमणं । उत्थितनिविष्टभोजिनः दिवा क्षमण च पष्ठद्विकम् ॥ उट्ठिदणिविट्ठभोजिस्स अण्णेहिं विजाणिदस्स दिवसम्मि। लहुमासो गुरुमासो रयणिभोजिस्स पुबुत्तं ॥१५२॥ १ एग णिसण्णदी स दुक। .
छेदपिण्डम् । ३३ AAAA sh उत्थितनिविष्टभोजिनः अन्यैः विज्ञातस्य दिवसे । लघुमास. गुल्मासः रजनीभोजिन. पूर्वोक्तं ॥ उत्तगुगं-इत्युत्तरगुना। अण्णाणअहंकारहिं एगबहुवारमासए छेदो। अप्पासुगे वसंतस्तववासो पणय मासिगं मूलं ॥१५३॥ अज्ञानाहंकाराभ्यां एकबहुवारमाश्रित्य छेदः । अप्रासुके वसतः उपवासः पंचकं मासिकं मूलं ॥ अण्णाणधम्मगारवहेदर्हि गामपुरघरारंभे । भासंतरसुवसोही पणगं संठाणगं मूलं ॥ १५४ ॥ अज्ञानधर्मगर्वहेतुभिः ग्रामपुरगृहारंभान् । भाषमाणस्योपशुद्धि. पंचकं संस्थानकं मूलं ॥ पूजारंभ जो कारवेदि अण्णाणदो गिहत्थेहि । इगिवारे सालोयण विउसग्गो खमणमेगं तु॥१५५ ॥ पूजारम्भं य कारयति अज्ञानतो गृहत्यैः । एकवारे सालोचनः व्युत्सर्गः क्षमणमेकं तु ॥ बहुवारेसु य पणगं सपदिक्कमणं तु तस्स दायत्वं । जाणंतस्सिगिवारे सपडिक्कमणं पणगमेगं ॥ १५६ ॥ वहुवारेषु च पचकं सप्रतिक्रमणं तु तत्य दातव्यं । जानानत्य एकवारे सप्रतिक्रमणं पंचकमेकं ॥ १ नगाणधम्मगारवेहि जदि गामपुरपरारंभ इति द-पुस्तके पाठ । २ वा. स। an ३४ प्रायश्चित्तसंग्रहे- बहुवारे गुरुमासो दायव्यो तस्स पडिकमणं । छज्जीवणिकायाणं यहूण घायम्मि मूलखिदी ॥ १५७ ॥ बहुवारे गुरुमासो दातव्यस्तस्य सप्रतिक्रमणः । पडूनीवनिकायानां बहूना घाते मूलक्षितिः ॥ तित्ययरादीणमवण्णवादिणो संघस्स अयसकारिस्स । पभटुवदसमासेविणाय खमणं सपडिक्कमणं ॥ १५८ ।। तीर्थकरादीनामवर्णवादिने सघस्य अयशस्कारिणे । प्रनष्टवतममासेविने क्षमण सप्रतिक्रमण ॥ वाहिपडिकारहेदु धमणं च विरयणं सिरावेधं । णियदेहे काराविदगुणिणो छटुत्तवं छेदो ॥ १५९ ॥ च्याविप्रतिकारहंतु वमन च विरेचनं च सिरावध । निनदेह कागपिनमुनये पष्टतपः छेदः ।। अण्ण भगति पदं पायच्छित सदप्पदासस्स । वृत्तपमादमावस्स हाइ एयरस अद्धमिदि ॥ १६० ॥ अन्य मणन्ति एतत्प्रायश्चित्त सदर्पदागम्य । उन प्रमादनातम्य मति एनम्य अमिनि । जो दमनपद धनुण संजदीविहारिजा पारनंतमय मृदगुणं हाइ दापय ६१॥ ६. मादाय म. विहन् । अ.पति तस्य च मुआग पनि दातव्यं ।। aumAR छेदपिण्डम् । ३५ विजाचोजणिमित्तं मंतं चुपणाणि मूलकमणं च । जो कुणदि ताव्हेटुं तत्ववातो सपदिकमणो ॥१२॥ विद्यातोधनिमित्तं मंत्रं वानि मूलमं च । य करोति सातुं तन्योपवामः सप्रतिक्रमणः ॥ सालोयणविउसग्गो तुत्तत्यं चोरियाए गेहंतो। पुच्छाविणयविहीणो दितो वि य पुच्छमगणतो ॥ १६३ मालेचनन्युत्सर्ग सूत्राथै चुर्या गृहन् । पृच्छाविनयविहीन ददत् अपि च पृच्छामगणयन् ।। उत्तत्यमुवादितंतो अत्तमाहिं सिक्खयाण जो कुणह । सुदगुरुनिण्हवगो जो तस्त र समपं हवदि छेदो॥ ४॥ सूत्रार्यनुनदिशन् असमाधि शियाणां यः करोति । श्रुतगुरनिन्हवको र तत्य व क्षमणं भवति च्छेदः ॥ सिक्खंतो तुत्तत्यं अणिमातो चेव गच्छदि परत्यं । कोहादिकारणेहिं तत्त चउत्यं हवे छेदो ।। १६५ ॥ शिक्षन् मूत्राथै अनियमत चैव गच्छति परत्र । कोषादिकारणै. तन्य चतुथै भवेच्छेदः ।। संथारमतोहितत्त पयदापयदचारिणो होति । समणदूं समणं च अण्णे खमणं च पणगं च ॥ १६६४ संस्तरमशोषयतः प्रयत्नाप्रयत्नवारिणः भवति । क्षमणाचे क्षमगं च च जन्यन्निन् क्षमणं च पंचकं च ।। मूलरून र. । २ न्देहेहें. ६ टिनिस । ददाति। ४ प्रायश्चित्तसंग्रहे- - णहे अयउवयरणे तस्सुच्छेहंगुलप्पमाणाई । खवणाई देति केई घणंगुलपमाणाई परे ॥ १६७ ॥ नष्टे अयउपकरणे तस्योत्सेधाङ्गुलप्रमाणानि । क्षमणनि ददति केचित् घनाङ्गुलप्रमाणानि परे ॥ जिणपडिमागमपोच्छयणासे खमणादिएगकल्लाणं । मणिरयणकणयपडिमाणासे पणगादिमासियं छेदो। १६८।। निनप्रतिमागमपुस्तकनाशे क्षमणायेककल्याण । मणिरत्नकनकप्रतिमानाशे पंचकादिमासिकं छेदः ॥ सेसुवयरणविणासे ख्वादाणं च धादकरणे य । काउस्सग्गो छेदो मणदुप्परिणामकरणे य ॥१६९ ॥ शपोपकरणविनाशे रूपादीना च घातकरणे च । कायोत्सर्ग. छेदः मनोदुप्परिणामकरणे च ॥ जवि य अण्णगणादो णियगणमज्झयणहेदुणायादा । तसि पि तारिसाणं आलोयणमेव ससि (सु)द्धी॥ १७० । यऽपि च अन्यगणत: निनगणे अध्ययनहेतुना आयाताः । तेषामपि तादृशानां आलोचना एव सशुद्धिः ॥ आरियादिरिसीहि य आणावियदीवयपवंचेण । सपणासादिमित्तं जिणभवणं जा पमाण ॥ १७१ ।। आचार्यादि-अपिमिः आदापितदीपकचन । सन्यामादिनिमित निनमपनं यदि प्रमादेन । १६ मायाम्स-गुन ११ मावात पू १६२ गायकाय ५५.. दी। दमकानब स-नयमन । --more- Apke .
दपिण्डम् । दई हवेज तो तो पन्खुवासं करेज संघवई । तिमि पडिकमणी पंच पंच उववातपरियंत ॥१७२ ।। दग्धं भवेत्तर्हि स पक्षोपवासं कुर्यात् संवपतिः । तिव. प्रतिक्रमणा पंचपंचोपवासपर्यन्ताः ॥ अह जइ सत्तिविहीणो तो तिष्णि दुवालसाई कुणउ मुणी। तिणि पडिकमणंताई तप्पडिबद्धो तवो अएवा ॥ १७३ ।। अथ यदि शक्तिविहीन तहिं त्रीन् उपवामान् करोत भनिः । त्रीणि प्रतिक्रमणान्तानि तत्प्रतिबद्धं तपोऽयवा ॥ वृरिका-इनि चूरिका। तप पर्याय मूल आलोयण पटिकमणो उभय दिवेगो तहा दिउस्सग्गो । तव परियायच्छेदो मूलं परिवार सदरमा ॥ १७४ ॥ आलेचना प्रतित्र मण उभय विवेक तथा त्यन्मर्ग । परिहार प्रदान ॥ एवं दसविध स्मए पायच्उित्तं रिसीगण भणियं । तं रिसेस दोसेख जायदे दि पपासेमो ॥ ७॥ एउ ददादिध मनरे प्रायश्चित्त इगोन भनिन । तत्व सोप न जाने ति प्रणाम !! आदादादिलोमगर भामगाटियम दा। मग्गिाभादी भाग गए।१३। 7 1 ३६ प्रायश्चित्तसंग्रहे-- -- ^^^ANA "AAAAAAAnnar णडे अयउवयरणे तस्सुच्छेहंगुलप्पमाणाई। खवणाई देति केई घणंगुलपमाणाई परे ॥ १६७ ।। नष्टे अयउपकरणे तस्योत्सेधाङ्गुलप्रमाणानि । क्षमणनि ददति केचित् धनाडुलप्रमाणानि परे ॥ जिणपडिमागमपोच्छयणासे खमणादिएगकल्लाणं । मणिरयणकणयपटिमाणासे पणगादिमासियं छेदो॥ १६८।। जिनप्रतिमागमपुस्तकनाशे क्षमणायेककल्याणं । मणिरत्नकनकप्रतिमानाशे पंचकादिमासिकं छेदः ।। सेमुवयरणविणासे खवादीणं च घादकरणे य । काउस्सग्गो छेदो मणदुप्परिणामकरणे य ॥१६९ ॥ शेषोपकरणविनाशे रूपादीना च घातकरणे च । कायोत्सर्गः छेदः मनोदुष्परिणामकरणे च ।। ज वि य अण्णगणादो णियगणमन्सयणहेदुणायादा । तसि पि तारिसाणं आलोयणमेव संसि (सु)द्धी॥ १७० ।। यऽपि च अन्यगणतः निनगणे अव्ययनहतुना आयाताः । तेषामपि तादृशाना आलोचना एवं सशुद्धि. ॥ धारियादित्सीहि य आणाधियदाययपयंचेण। सपणासादिमित्तं जिमवणं जा पमापण ॥ ११ ॥ आचार्यादि-ऋमिमि, भातापितापमापन। सन्यामादिनिमितं निनकन यदि प्रमादेन ।। . १६ मायाव-पु. गावात पू १११ गावासाथ पचा। दी। १६६ मायाधिसमजवन
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३८ प्रायश्चित्तसंग्रहे- आतापनादियोगग्रहणं उद्रामकादिगमनं वा । गणिगणवृषभादीनां अपृच्छमानेन येन कृतं ॥ पोत्थयपिच्छकमंडलुवक्कलयादि परेसिमुवयरणं । तेसिं परोक्खदो णियकज्जेणुवभोगियं जेण ॥ १७७ ॥ पुस्तकपिच्छिकाकमंडलुवल्कलादि परेपां उपकरणं । तेपा परोक्षतः निजकार्येण उपभोगितं येन ॥ गणहरवसहादीणं भणियं ण कयं पमादेदोसेण । सो आलोयणमित्तेण सुज्झए गुरुसयासम्हि ॥ १७८ ।। गणधरवृषभादीना भणितं न कृतं प्रमाददोषेण । म आलोचनामात्रेण शुद्धयति गुरुसकाशे ॥ जे गच्छादो संहाहिवादिकजेण निग्गया मुणिणो । पंचसमिदा तिगुत्ता जिदिदियपरीसहा वीरा ॥ १७९ ॥ ये गच्छतः संचाधिपतिकार्येण निर्गता मुनय । पंचसमिता त्रिगुप्ता जितेन्द्रियपरीपहा वीरा ॥ पंथादिचारपमुहादिचारं संसोधया हु तद्दियहं । तसिं पुणागयाणं आलोयणमेव संसोही ॥ १८०॥ पथ्यतिचारप्रमुखातिचारं सशोधका हि तदिवस । तेषां पुनरागतानां आलोचनमेव सशुद्धिः ॥ जैविय अण्णगणादो णियगणमन्झयणहंदुणायादा । तेसि पि तारिसाणं आलायणमेव ससुद्धी॥ १८१ ।। १ पमाददा अंग. मु। प्रमादत यंन । २ पा. मा ३ पीग. सादर गाथामूत्र पूर्वनाप (१०) आगतं ।
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प्रायश्चित्तसंग्रहे- 6 चक्खिदियादिदुप्परिणामे पेसुण्णकलहअन्भक्खाणे । वेजाविधपमादे सज्झायझाणवाधादे ॥ १८६ ॥ नक्षुरिन्द्रियादिदुष्परिणामे पैशून्यकलहाभ्याख्याने । वैयावृत्यामादे स्वान्यायाध्ययनव्याघाते ॥ गोयरगयरस लिंगुहाणे अण्णस्रा संकिलेसे य । जिंदणगरहणजुत्तो णियमो वि य हादि पडिकमणं ॥ १८७॥ गोचरगतम्य लिंगोत्याने अन्यस्य सकेशे च । निन्दनगहणयुक्त. नियमोऽपि भवति प्रतिक्रमण ॥ पकि.मण-ति प्रतिकाणं । लाचणानमिणिदियादिचारंगकोरागमणेस । समिणमिमाय पियणियमा आलायणा उभयं ॥१८८॥ टोनन्द्रियानिवार शमानेषु । निशिमान पिन नियम आदानना उमयं ।। पपियवा मामियमवरियादिनाममुचियरं । ,011 (1 मणिमय ॥ १८५॥ 'ife .in ... दिदी | 1.५५.९ it eff 24 ।। is Strif धामा । निदानदानावित रिलागी । १२.॥
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M ४२ प्रायश्चित्तसंग्रहे- ससिणिद्धभूमिगमणे हरिदतणादीणमुवरि चंकमिदे। पंकभंतरगमणे जाणुमिदजलप्पवेसे य ॥ १९५ ।। सस्निग्धभूमिगमने हरिततृणादीनामुपरि चंक्रमिते । पंकाम्यन्तरगमने जानुमितजलप्रवेशे च ॥ अण्णणिमित्तपउंजिद्दोणीणावादिणा णदीतरणे । उच्चारं पस्सवणं काऊणं उववासयागमणे ॥ १९६ ॥ अन्यनिमित्तप्रयुक्तद्रोणीनावादिना नदीतरणे । उच्चारं प्रस्रवण कृत्वा उपवासकागमने ॥ पोत्थयजिणपडिमाफोडणम्मि पंचविहथावरविधादे। रत्तीए असमदेखिददेसे तणुमलविसग्गे य ॥ १९७ ॥ पुस्तकजिनप्रतिमास्फोटने पचविधस्थावरविधाते । रात्री अदृष्टदेशे तनुमलविसर्गे च ॥ एक्को काउस्सग्गो पायच्छित्तं जिणेहिं पण्णत्तं । वितिचरिदियघादे वियतियचउरो विउस्सग्गा ।। १९८ ॥ एक. कायोत्सर्ग प्रायश्चिन जिनः प्रज्ञप्तं । द्वित्रिचनुरिन्द्रियवाते ठिकत्रिकचत्वारो व्युत्साः ॥ उज्जोए पहिलिहियं दाउं संधारयं णिसि पसुत्तो । उव्वत्तणपरियत्तणणिग्गमणविवज्जिदो पयदा ॥ १९९ ।। उद्याते प्रति वित्त आदाय सम्तरक निशि प्रमुप्तः । उद्वर्तनपरिवर्तननिर्गमनविवर्नितः प्रयन्नः ॥ व वनपागनोख। १ पाडगम्मि. स, पानने। -a-mountain गाना रोगाम मेरा मेर मन्दारका छेदपिण्डम् । ४३ वादेप, रासपूतागा. जदि संथारसमीवे पेच्छइ पंचिंदियं सुदं सूरुदये । तो तस्स हवे छेदो पंचविउस्सग्गपरिमाणो ॥२०० ।। यदि संस्तरसमीपे प्रेक्षते पंचेन्द्रिय मृतं सूर्योदये । तर्हि तस्य भवेच्छेदः पंचव्युत्सर्गपरिमाणः ।। दिवसियरादियपक्खियचउमासियवरिसयादिकिरियाण। चरिमे ऊणखूणणिमित्त एगो विउस्सग्गो ॥ २०१॥ देवसिरात्रिकपाक्षिकचातुर्मासिकवार्षिकादिक्रियाणां । चरमे ऊनाधिक्यनिमित्त एको व्युत्सर्ग ।। सिद्धंतसुणणवक्खाणावसाणे अंगपटुदिपुव्वाणं । परियणायसाणे ऊणखूणणिमित्तं विउस्सग्गो॥ २०२।। सिद्धान्तश्रवणव्याग्न्यानावसाने अगप्रभृतिपूर्वाणां । परिवर्तनावसाने उनाधिक्यनिमित्त त्यत्सर्गः ॥ विउनग्गी इति ब्यनार्ग । णिबियटी पुरिमंडल आयंबिलमेयठाण समणमिदि। एसो तवोत्ति भणिओ तदोदिताणप्पहाणेहि । २०३ ।' निर्विकृतिः परिमल आचारं एकम्पान अममिति । एतत्तप इति भणित तपोविधानप्रधान. ।। पुध पुध या मिस्सो वा उग्घाटोदा ता माटो। उम्माहिर परदो पत्थि तदो दीरजिपतिये ॥२०४।' परदादी स. E-पुरन : ४४ प्रायश्चित्तसंग्रहे-- - प्रथक् पृथवा मिश्र वा उद्धाट वा तथा अनुदाट । पण्मासैश्च परतः नास्ति तपो वीरजिनतीर्थे । उग्घाटो संतरिदो वीसमणजुदो तदण्णहा इदरो। वाहिगिलाणादीणं पढमो इदराण पुण श्वरो । २०५॥ उद्घाटं सान्तरितं विश्रमणयुक्त तदन्यथा इतरत् । व्याधिग्लानादीना प्रथमं इतरेपा पुनः इतरत् ।। उव्यत्तण परियत्तण कंईवण उंटणं पसारणयं । कुबंतो अपमन्जिदेहो पणयारिहो होई ॥ २०६ ॥ उद्वर्तनं परिवर्तनं कंड्यनं आकुंचन प्रसारण । कुर्वन् अप्रमार्जितदेहः पंचका) भवति । कुटुं खंभं भूमि वक्कलयादीण अप्पडिलिहित्ता। आमासइ उहंघइ वइसइ तो होइ पणयं से ॥२०७॥ कुड्यं स्तम्भ भूमि वल्कलादींश्च अप्रतिलिस्य । आश्रयति उत्तिष्ठति वसति तर्हि भवति पंचकं तस्य ।। वियडिं तिण कटुं वा रादो व दिया व अप्पडिलिहिता। गेण्हतो चालतो पणयरिहो कप्पयवहारे ॥ २०८ ॥ वियडिं तृण काष्ठं वा रात्रौ दिवि वा अप्रतिलिख्य । गृह्णन् चालयन् पंचकाहः कल्पव्यवहारे । उच्चारं पस्सवणं कलिं च पासाणचियडियादीयं । अपमज्जिददेसम्मि विकिंचंतो होइ पणयरिहो ॥२०९॥ १ कंडूभणा. क । २ सोइ क । ३ सो. ख ।
छेदपिण्डम् । ४५ उच्चारं प्रतवणं कलिं च पाषाणवियाडिकादिकं। अप्रमार्जितदेशे विकुर्वन् भवति पंचकाहः ॥ कंटय कलिं च पासाणछल्लितणकटुखप्परादीयं । अंगुलिणहदंतेहि छिंदतो होइ पणयरिहो ।। २१० ।। कंटकान् कलि च पाषाणत्वक्तृणकाष्ठखर्परादिकं । अंगुलिनखदन्तै. छिन्दन् भवति पंचकाहः ।। पायच्छित्तं दिण्णं कुव्वंतो जदा अतरिज रोगेण । तो णीरोगो संतो पणयरिहो कप्पववहारे ॥ २११ ॥ प्रायश्चित्तं दत्त कुर्वन् यदा अन्तरियात् रोगेण । तर्हि नीरोग मन् पंचकाह. कल्पव्यवहारे ।। पायच्छित्तं दिपणं कुष्यंतो जो सदेसपरदेसे । गुरुकजं साधिजो मरलयं तस्त आयस्स ॥ २१२ ॥ प्रायश्चित्तं दत्तं कुर्वन् य. बदेशपरदेशे । गरकार्य माधयति महत् नम्य आगनन्य ॥ पुण्यपदिण्णं पायघिउत्तं छंटादिऊण पण तु । दारव्यमेव गुरुणा र भणियं पदयारे ।। २१३॥ पूर्वप्रदत्त प्रायश्चित्त त्यानयिका पंचक । दातत्यमेव गुरा इति भणित कल्यवहारे ।। उप्प पि कसाए मिठादारोन तरूप कुजा। पपय मरोरत्तमदे ते परं मारिदं दी। १९संस-रे।
प्रायश्चित्तसंग्रहे- चतुषष्ठिः गुरुमासाः गोक्षयमातंगखटिकादीनां । निर्ग्रन्थदीक्षादाने प्रायश्चित्तं समुद्दिष्टं । कप्पव्ववहारे पुण छम्मासेहि परं तु णत्थि तयो । इह वडमाणतित्थे तेण य छम्मासियं दिण्णं ॥ २२५॥ कल्पव्यवहारे पुनः घण्मासैः पर तु नास्ति तपः । इह वर्धमानतीर्थे तेन च षण्मासिकं दत्तं ॥ छम्मासियं-इति पाण्मासिक । अण्णं वि य मूलुत्तरगुणादिचारेसु पुत्वमवि य तो। बुत्तो जहारिहमिदो पुरिसे अधिकिच्चे पुण भणिमो ॥ २२६ ।। अन्यदपि च मलोत्तरगुणातिचारेषु पूर्वमपि च तपः । उक्तं यथार्ह इत. पुरुषान् अधिकृत्य पुनः भणामः ॥ आगाढाधंञ्चपयत्तचारिअणुविचिणो सपडिवक्खा। ( अहणरा होति पुणो सोलसधा अक्खसंचारें ॥ २२७ ।। आगाद..."प्रयत्नचार्यनुवीचीकाः सप्रतिपक्षाः । अष्टौ नरा भवन्ति पुनः पोडशधा अससंचारे ॥ 4 १ अविकिच्यमिह मणिमो. फ। २ वच. रा । ३ यणुवीचीगो रा । ४ अस्मा. दंगे ख-पुम्नक इद गाथासूत्र उपलभ्यते। पदमक्व यतगर्द आदिगदे सक्षम (दि) विदियक्सो विणि वि गणतं आदिगदं सम्मदि ( नदि) यया ॥ प्रथमा अन्नगते आवागते मंगामनि द्वितीयाक्ष । द्वापि गत्वान्नं आद्यागते सकामति तृतीयादा ।। गायं गोम्मटसारेऽपि बनत प्रमादमख्यागनाथसर ।
छेदपिण्डम् । MA. AAAAA णिवियडिआदिया जे पुन्बुत्ता पंचएकतीसंते। अक्खाणं संचारण होति ते इह विहं जोगे ॥ २२८ ॥ निर्विकृत्यादिका ये पूर्वोक्ताः पंचैकत्रिंशदन्ताः । अक्षाणां संचारेण भवन्ति ते इह विधं योगे॥ पदमो सुद्धो सोलतसु सेसपण्णारसा णरा कमसो। पण्णारसतवसलागा पढमादीया अणुचरंति ॥ २२९ ॥ प्रथम शुद्ध पोडशेषु शेषपंचदश नरा क्रमशः । पंचदशतप.शलाका प्रथमाठिका अनुचरन्ति ।। अवसेसतयसलागा सोलस पुवुत्तअपुरिसा वि। दो दो चरंति एवं दक्षिणमग्गो समुदिहो ।। २३० ॥ अवशेषतप शलाकाः पोडशा पूर्वोत्ताष्टपुरषा अपि । द्वे द्वे चरन्ति एव दक्षिणमागों ममुदिष्टः ।। उत्तरमन्गेण परमो एवं खेसा परंति दो दो च । अटुण्एं आपल्लो तिण्णि च चत्तारि अवसेसा ॥ २३१ ।। उत्तरमानंग प्रमः एक शेषा. नालिझे दे च । अधानां आदिम तिन्त्रः च नतर अमोपाः ।। अहया पटमे परादे से दो दो तिषिण सोलम्मे । मिस्ससागा देवा ताण हाणं मणर पसेण ॥ २३२ ।। अरवा मे से सान न कि पेटो। निभाया. लम्पनं दामन होगा। --
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डेनपिण्डन् ।
प्रथमा द्वितीया तृतीय चतुर्थी पंचमी पछी त्रयोदशनी ।
सप्तमी अरनी चतुर्दशमी अपि च पचढ़ानी एव ।
णवदसएसारसमी र बारसमी तह र वेव तोलसमी ।
अवारसनी याबीसिना र पुणु वीतिमा चेव ।। २३९ ।।
नोकादशमः च हादशमी तथा व पोडी ।
अटादामी हाकिंगतितनी च पुन विगनितमी रट ।।
सत्तारसनी एणवीतिमा र चील।
रगिसिदिमा तेवीसिमा च छीनतीनदिना' 2 ॥
मजदगी एक नवगतितनी न गिनिननी ।
एकविंशतितमी योनिदशतितमी व पदावित्रिकानी :
सत्तावीसदिमा दिहावीर जपनीसनिमा
इगतीनदिनाय ना मिल्ललल याउ अपरं ॥१५ "
ང་ན་སེམཱ ཀྐུ ཀས་དུད ཤེསྶ, = =- {
-दान्म - मामिमान ।'
अपप्पोमानपरिकतद दरिल एयः।
मरदिता दानाम् ।..
सासर- :-
--
भनि जोमाने ।
कारावामिति :
५२ प्रायश्चित्तसंग्रहे- तपोभूमिमतिक्रामन् मूलस्थान च यः न संप्राप्तः । तस्य पर्यायच्छेदः प्रायश्चित्त समुद्दिष्टं ॥ णियगच्छादो णिग्गय एगागी विहरिऊण पुण आणं । जेतियकालपमाणा पव्वज्जा छिज्जए तस्स ॥२४४॥ निजगच्छतो निर्गत्य एकाकी विहृत्य पुनः आगमन । यावत्कालप्रमाणा प्रव्रज्या छिद्यते तस्य ।। पुव्वं जहुत्तचारी पच्छा पासत्थभावमुववण्णो । जेत्तियेकालं विहरदि मुकधुरो सो समण्णं पुणो ।। २४५ ।। पूर्व यथोक्तचारी पश्चात् पार्श्वस्थभावमुपपन्न । यावत्कालं विहरति मुक्तधुर. स श्रमणः पुनः ।। तेत्तियकालपमाणा पव्वज्जा तस्स छिज्जदि जदिस्स । पासत्थभावमुक्कुस्तुववण्णतुणिम्मलचरितं ॥ २४६ ॥ तावत्कालप्रमाणा प्रव्रज्या तस्य छिद्यते यते । पार्शम्यभावमुक्तस्य उत्पन्नसुनिर्मलचरित्रस्य । तस्सिसाणं सोही सगणत्याहारियणामगहणेण । लोचं काऊण तदो पटिकमणं कुणउ ण हु अण्णं ॥ २४७॥ तस्य शिप्याना शुद्धि म्वगणस्थाचार्यनामग्रहणेन । लोचं कृत्वा तदा प्रतिक्रमण करोतु न हि अन्यत् ॥ पासत्थादीहिं समं आचरंतो सगिप्पमादेण । छम्मासम्भतरदो जदि तद्दोसे णिसेवदि सो ॥ २४८ ॥ १ तक्षाल. स-ग। २ धरो. ख-ग। ३ समणपोलीस-ग। ४ था, क।
छेडपिढन् । न्यादि म अवान् वनमन। मान्यवरती यदि तहोगन् निबनेन । तो ते तबत्ता नई उन्मातेहि परंतु सायन्या । तं पनजान्नुलनुवागयत्त पुणो ॥ २१९ " हें तय क मुद्धि पन पर नय। तय गुलनगन्य पुनः ॥ बलरं ताजा समादपमकाज दिवित रिली। जदि दरदिमिरे तन पंचदिवासियतरछेदो ॥१५॥ ह व सनत्व एकदम ऋी । वन निगः तम्य पदनिकता ॥ प्लायरिदम दिगर दम आयरियस परम्दियस्त। हिनि पारस पुरस्परमवीरदिन। २५१ एक दिन बाद पाकि एवं निविदा अनादितो सात पदा। ची निदिपुगे ना दो। ५.! । रिहरी पनि ! ::
प्रायश्चित्तसंग्रहे- +- योऽपगिमतपराध तपश्छेतेन विना शुद्धिमुपयाति । मभागकरणयोग्य मूलक्षिति दीयते तम्य ॥ पंचमहबदभट्ठो छावासययजिदो गिरणुतावी । उस्सुत्तकारउ तह सच्छंदो मूलसिदिमेदि ॥ २५४ ॥ पचमहावतभ्रष्ट. पडावश्यकवर्जित. निरनुतापी । उन्मूत्रकारकः तथा स्वच्छंद. मूलक्षितिमेति ॥ पासत्थादी चउरो तप्पासे जे परे च पव्वदा । ते सर्व वि य मूलहाणं पावति हु णियत्ता ॥ २५५ ॥ पार्श्वस्थादयश्चत्वार तत्पावें ये परे च प्रव्रजिताः । ते सर्वेऽपि च मूलस्थान प्राप्नुवन्ति हि निवृत्ता. ॥ तेस्सिस्साणं सुद्धी सगणत्यायरियणामगहणेण । लोचं काऊण तदो पडिकमणं कुणह ण हु अण्णं ॥ २५६ तच्छिप्याना शुद्धिः स्वगणस्थाचार्यनामग्रहणेन । लोच कृत्वा ततः प्रतिक्रमण करोतु न हि अन्यत् ॥ संघाहिवस्स मूलं पत्तस्त वि दिज्जदे ण मूलखिदी। उनुाहपसमणत्थं बहुजणमाधारदाएया ॥ २५७ ॥ सघाधिपतेः मूल प्राप्तस्य अपि न दीयते मूलक्षितिः । उद्दाहप्रशमनार्थ बहुजनमाधारदायका. ॥ जदि आयरिओ छेद च मूलभूमि च पत्तओ मरणं । तो तस्स जहाजोग्गं छेदो मूलं च दायव्वं ॥ २५८ ॥ १ इदं गाथामत्र रा-ग पुस्तके नास्ति । पूर्वमप्यागतं ५२ पृष्ठे ।
छेदपिण्डम् । यदि आचार्यः छेद मूलभूमि च प्राप्त. मरणं । तर्हि तस्य यथायोग्य छेदः मूल च दातव्य ॥ कालम्मि असंपत्ते पत्तो छेदं च मूलभूमिं च जदि आयरिओ तो ते तवतुद्धी चेव दायबा ॥ २५९ ॥ कालेऽसप्राप्ते प्राप्त. छेदं च मूलभूमिं च । यदि आचार्यः तर्हि तम्य तप शुद्धि. चैव दातव्या ॥ विजदितवो वि संठाणादीछम्मालखमणपरंतो। अवि तत्तमासपेरंतो वा अपणं ण वायव्यं ॥ २६० ।। दीयते तपोऽपि मन्थानादिपण्मानक्षमणपर्यन्त । अपि सप्तमासपर्यन्त वा अन्यन्न दातव्यं । आयरियस्स दु मुलंदितो तयलेव मूलभूमी लो। पावदि उद्धाहकरो धम्मत्त जलोवहकरो तो ॥ २६१ ॥ आचार्यत्य तु मूलं ददन् न्व्यमेव मूलभूमि म । प्राप्नोति उद्दाहकरः धर्मन्य यगोवधकर च ।। मल्-इनि मुलम् । मूलखिदी वोलीणो सहसंभोगरत जो ६ जोगो दु। सो पावदि परिहारं पायच्छितं ति दिति जिणा ॥ २६२ । मूलक्षितिं त्यक्त्वा समभोगन्य यश्च ( अ ) योन्यन्तु । मप्राप्नोति परिहार प्रायश्चित्त इति अवन्ति निनाः ।। तं पिअ अणुपद्धावणपारंचिगभेदो त्वं विहं । सगणपरगणविभेनेणि अगुपडावणं दुविरं ॥ २६३ ।'
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, पिण्टम। १० नादान एक मौनरनी पन पंन उपवामान । सल्या न पान्यन् गमयति जयन्येन म माथुः ।। उसेणं उछम्मासे उबवासिरूण पारितो। गमा बरिसाणि वारिस अणुपट्टयगो गणणिबद्धो ॥ २६९ । उत्कृष्टेन पण्मामान उपोय पारयन् । गमयति वर्षाणि द्वादश अनुपम्यापको गणनिवद्धः ।। मगो-दति स्वगनुपन्थान्म् । परगणअणुपट्टवगो वि एरिसो चेव किं तु जम्मि गणे। उप्पण्णा ते दोसा दुप्पादीएहिं पुन्बुत्ता ॥ २७० ॥ पन्गणानुपम्यापकोऽपि एतादृशश्चैव किन्तु यस्मिन् गणे । उत्पन्ना ते दोपा दर्पादिकै पूर्वोक्ता । तेणायरिएण य सो परगणमणुपहविज साहू । तत्यतणाइरियंते आलोचदि सो तदो दोसे ॥ २७१ ॥ तेनानायेंण च स परगणं अनुपन्याप्यते माधुः । तत्रत्याचार्यान्ते आलोचयति म तत दोपान् ॥ आलोयणं सुणित्ता पायच्छित्तं ण दितएण पुणो। तेण वि आयरिएणं अण्णत्थणुपटुविजदि जदि सो ॥ २७२ ॥ आलोचन श्रुत्वा प्रायश्चित्तं न ददता पुनः । तेनापि आचार्येण अन्यत्र अनुम्थाप्यते यतिः स. ॥ तेण वि अण्णत्येवं तिण्णि य चत्तारिपंचछस्सत्ता । आयरियाण समीवे अणुपहाविजड़े कमतो ॥२७३ ॥ -- ५८ प्रायश्चित्तसंग्रहे- - तेनापि अन्यत्रैव त्रिचतु.पंचपट्साप्ताना । आचार्याणा ममीपे अनुपस्थाप्यते क्रमशः || पच्छिमगगिणा वि पुणो पुट्युत्तालोचिदायरियपासं । अणुपटविदो संतो णियंत्तिणेदि तप्पासं ॥ २७४ ।। पश्चिमगणिनापि पुनः पूर्वोक्तालेचिताचार्यपार्छ । अनुपस्थापितः सन् निवृत्यैति तत्पाई ॥ सो वि जहण्णं मज्झिममुकतं वा पुरोदिदं छेदं । दाउं तस्लायरिओ चरावए पुदयविधिणे ॥ २७५ ।। सोऽपि जघन्य मध्यमं उत्कृष्ट वा पुरोदित छेदं । दत्वा तम्मै आचार्य. चारयति पूर्वविधिनैव ॥ परगण-इति परगणानुपस्थानम् । तित्थयरगणधराणं आयरियाणं महड्डिपत्ताणं । संघस्स पवयणस्स य आसादणकारओ पावो ॥ २७६ ॥ तीर्थकरगणवराणा आचार्याणा महद्धिप्राप्ताना । सघम्य प्रवचनम्य च आसादनाकारक पाप ॥ रायापराधकारी रायामचाण तह य वदनो । रायग्गमहिसिपडिसेवगो य धम्मदहो तह य ॥ २७ ॥ राजापराधकारी राजामात्यान् तथा च वन्दमान । राजाग्रमहिपीप्रतिसेवकश्च धर्मधुक तथा च ॥ जो एवविहदोसो चाउवण्णस्त तवणसंघस्स। मज्झम्मि पंचतालं दाऊणं सो संघहवाहिरओ ॥ २७८ ।।
छेदपिण्डम् । - य एवविधोपः चातुर्वर्ण्यन्य श्रमणसवन्त्य । मध्ये पंचताल दत्वा स संबवाह्यः ।। एसो अवंदणिजो पंचमहापागोत्ति घोसित्ता। पायच्छित्तं दाउं सदेसदो धाडिदो तंतो ॥ २७९ ॥ एष अवन्दनीय पंचमहापातकीति घोषयित्वा । प्रायश्चित्तं दत्वा स्वदेशतो याटित सन् ॥ गंदण अण्णदेते जत्य य धम्म ण ाणए लोओ। तत्थत्थिरूण पायच्छित्तं आचरट गणिदिण्णं ॥ २८० ॥ गत्वा अन्यदेशे यत्र च धर्म न जानाति लोक.। तत्र न्थिन्वा प्रायश्चित्त आचरतु गणिदत्तम् ॥ तं पुण तपरगणहिवअणुपटुबगस्त जारितं दिण्णं तारितमेवेदस्त वि जहण्णमुत्तमिदरं वा ॥ २८१ ।। तत्पुन विपरगन्यितानुसन्थापकम्य याश दन । तादृशमेवैतन्यापि जयन्य उकृष्ट इतरता ।। पारं अंचदि परदेसमेदि गच्छदि जड़ो तो एतो। पारंचिगोत्ति भण्णदि पायच्छितं जिणमदम्मि ॥ २८२ ॥ पार अंचति परदेशमति गच्छति यतन्तत एए । पारचिन इति मन्यते प्रायश्चित जिनमते ।। एवं पायच्छितं कप्पयवहारभारिप भणियं । जीदेविस एव विधी प्वरिततयोमासिदिच्छगुरुमासा२८३ एवं प्रायश्चित्त मन्यन्हरभाषिन भनिन् । नीत अरिम बनिदि. नवनि मत मानिक सिगमामाः ।।
६०
प्रायशित्तसंग्रह-
आदितिगसंघमणो भवभीर जिपरीसही धीरो।
गीदत्या वृद्धधम्मो चरति पारंचिगं भिासू ॥ २८४ ॥
आदिमनिसहनन. भाभीरुः जितपरीणहा धीर. ।
गीतार्थ. इटवर्मा नरनि पारसिक भिसुः ॥
पानिम-दति पारचि।
परिणामपञ्चपण सम्मत्त उज्झिऊण मिच्छत्तं ।
पविजिऊण पुणरवि परिणामयसेण सो जावो ॥ २८ ॥
परिणामप्रत्ययेन सम्यक्त्व उज्जित्वा मिथ्यात्व ।
प्रतिपद्य पुनरपि परिणामवशेन स जीवः
जिंदणगरहणजुत्तो णियत्तिऊणो पदिविज सम्मत्तं ।
जं तं पायच्छित सद्दहणासण्णिद हादि ॥ २८६ ॥
निन्दनगर्हणयुक्तः निवर्त्य पतिपद्यते सम्यक्त्वं ।
यत्तत्प्रायश्चित्त श्रद्धानसज्ञित भवति ॥
जदि पुण विराहिऊण धम्म मिच्छत्तमुवगमो होदि ।
तो तस्स मूलभूमी दायव्वा लोयविदिदस्स ॥ २८७ ॥
यदि पुनः विराध्य धर्म मिथ्यात्वमुपगमो भवति ।
तर्हि तस्य मूलभूमिः दातव्या लोकविदितस्य ।
सदहणा-इति श्रद्धानम्।
एवं दसविधपायच्छित्त भणियं तु कप्पववहारे ।
जीदम्मिपुरिसभेद णाउंदायन्वमिदि भणियं ॥ २८८ ॥
छेदपिण्डम् । एवं दशाविषप्रायश्चित्तं भगित तु कपन्यवहाँ । जीते पुरवभेद जान्वा दातव्यमिति भणितं ॥ निमिपानिधनं-इनि भिप्रायधिन गमामम् । जं समणाणं वुत्तं पायच्छितं तह जमाचरण तेसिं चेव पउत्तं तं समीणंपिणायब्वं ॥२८९ ॥ यत् श्रमणानामुक्त प्रायश्चित्तं तथा यत् आवरणम् । तेषां चैव प्रोक्तं तत् श्रमणीनामपि ज्ञातव्यम् ॥ णवरि परियायछेड़ो मृलढाणं तहेब परिहारो। दिणपडिमा वि य तीसं तियालजोगो य वत्थि ॥ २ ॥ नवरि पर्यायच्छेदो मूलन्यानं तथैव परिहार । दिनप्रतिमापि च तारां त्रिकाल्योगश्च नेवालि ॥ थिरअथिराणजाणं पमादप्पोर्हि एगबहुवारं । सामाचारदिचारे पायच्छित्तं इमं भणियं ॥ २९१ ।। स्थिरात्थिराणानार्याणा प्रमाददाभ्यां एकाहुवारम् । मामाचारातिचारे प्रायश्चित्तं इद भगितम् ।। फाउत्तगो खमणं खमणं पणगं च पणग च्टुं च । छ तहेव मातिगमेवमितीणं पि दायव्वं ॥२९२ ॥ कायोत्सर्गः क्षमणं क्ष्मणं पंचकं च पंचकं षष्ठं च । षष्ठं तथैव मासिकमेवं ऋषीणामपि दातन्यम् ।। एकस्त वत्थजुयलस्सेझस्स गोणिया एककथाए। पासुगजलेण पक्तालणम्मि एमो विउत्सग्गो ॥ २९३॥ ,
६०
प्रायश्चित्तसंग्रहे-
m
आदितिगसंघदणी भवभीरू जिदपरीसतो धीरो।
गीदत्थो दृढधम्मो चरदिपारंचिग भिक्खू ॥ २८४
आदिमत्रिसहनन. भवभीरुः जितपरीपहः धीर. ।
गीतार्थः दृढधर्मा चरति पारश्चिक भिक्षुः ॥
पारचिग-इति पारचिक ।
परिणामपच्चएणं सम्मत्त उज्झिऊण मिच्छत्तं ।
पटिवजिऊण पुणरवि परिणामवसेण सो र्जा
परिणामप्रत्ययेन सम्यक्त्व उज्झित्वा मिथ्यात्व
प्रतिपद्य पुनरपि परिणामवशेन स जीवः
जिंदणगरहणजुत्तो णियत्तिऊणो पडिविज र
जंत पायच्छित सद्दहणासण्णिदं होदि ॥२
निन्दनगर्हणयुक्तः निवर्त्य पतिपद्यते सम्यक
यत्तत्प्रायश्चित्त श्रद्धानसहित भवति ॥
जदि पुण विराहिऊणं धम्म मिच्छत्तमुवगमी
तो तस्स मूलभूमी दायव्वा लोयविदिदस्स ।।
यदि पुनः विराध्य धर्म मिथ्यात्वमुपगमो भवति ।
तर्हि तस्य मूलभूमिः दातव्या लोकविदितस्य ॥
सदहणा-इति श्रद्धानम्।
एवं दसविधपायच्छित्त भणियं तु कप्पववहारे ।
जीडम्मि पुरिसभेद णाउंदायन्वमिदिभणियं ॥ २८८ ॥
- । उदपिण्टम् । -निद (गायत पचवती यदि विरती जायते तत. करोतु नाणि दिवमानि । आगन्ननिर्मितीक्षमणाना एकतरकं तु ॥ समायदेवबंदमणियमादियाओ सध्याकिरियाओ। मोणेण कुणउ तिणि विदिणाणि तो तुरियदिवसम्मि॥२९९॥ वा-यायदेववदननियमादिका मर्वकिया । मौनन करोतु त्रीप्यपि दिनानि तत. तुरीयदिवसे ।। पच्छण्णए पएसे पासुगसलिलेण एगकलसेण । पक्खालिदण गत्त गुरुमूले गिण्हड बढ़ाई ॥ ३० ॥ प्रच्छन्ने प्रदेशे प्रागकमल्लेिन एककलगेन । प्रक्षाल्य गात्र गुत्मूले गृह्णातु व्रतानि ।। जदि पुण चंडालादी लिविज विरती कहिं पि विरदो वा। तो जलव्हाण किचा उयवासं तहिणे कुणर ॥ ३०१ ॥ यदि पुन चाडालादीन् मृगेत विरती कथमपि विरतो वा । तर्हि जल्म्नान कृत्वा उपवाम तद्दिने करोतु ॥ जलबदसतेहि हवे पहाण तिविहं तु तत्थ जलग्हाणं। गिहिणो विरदाणं पुण वनमंतेहिं पुणो कहियं ।। ३०२ ॥ जल्बतमत्रै. भवेत् म्नान त्रिविध तु तत्र जलम्नानम् । गृहिणो विरतानां पुनः ब्रतमत्राभ्या पुनः कथितम मी मम्मत-इति धनगीनां समाप्तम् । ॥ ॥ जापापच्छित सन-दुस्तं।
६२ प्रायश्चित्तसंग्रहे- w . एकस्य वस्त्रयुगलस्य एकस्या गौणिकायाः एककथायाः । प्रासुकजलेन प्रक्षालने एको व्युत्सर्गः ॥ अप्पासुगजलपक्खालणम्मि एगो हवेइ उपवासो। पत्तादणं पक्खालणे वि णादूण दायव्वं ।। २९४ ॥ अप्रासुकजलप्रक्षालने एको भवति उपवासः । पात्रादीना प्रक्षालनेऽपि ज्ञात्वा दातव्यम् ।। पहरेणेकेणखया सिपिजंती जलेण पहरेणं । अवरेगेणंतिम्म इमट्टिया जा जिणायदणे ॥ २९५ ॥ ॥ .. लावाविज्जइ जद सा कुड्डादीएसु इयाणं बा। वेण्णिसहस्सा तो से छहाई वेषिण पडिकमणं ॥ २९६ ॥ लागयति यदि सा कुड्यादिकेषु इष्टकान् वा । द्विसहस्राणि पठानि द्वे प्रतिक्रमणे ।। एवं मट्टियजलपरिमाण जादूण थोवमिदरं वा । अण्णत्थ वि दायव्यं पायच्छित्तं जहाजोग्गं ॥ २९८ ।। एवं मृत्तिकानलपरिमाण ज्ञात्वा म्तोक इतरहा । अन्यत्रापि दातव्य प्रायश्चित्त यथायोग्यम् ।। पुप्फवदी जदि विरदी जायदि तो कुणउ तिणि दिवसाणि । आवंविणिवियटीखमणाणं एकादरगं तु ॥ २९८॥ १ समग च एगटाणा पवान्तर य-ग-गुम्न।
छेवपिण्टम् । तेणिह समयपयारंण जमणोयज्मणं गिहन्यण ॥ काऊण दोसमुद्री अडियन्या पयत्तेण ॥ ३१९ ।। तनह प्रजाग जनमनोवर्जन गृहन्येन । कृत्वा दोपशुद्धि अनुष्ठातल्या प्रयत्नेन । उरपरिसप्पादणं घाटे जादन्मि तिष्णि उववासा। णिहिट्ठा गिहिवग्गस छेदयवहारकुमलेहिं ॥ ३२ ॥ उप रिम्पोदीना वांत जाते त्रय उपवासाः । निर्दिष्टा गृहिगन्य च्छेदन्यवहारकुशलैः ।। वियलिदियाण घाडे काउत्तग्गा तर्दिदियपमाणा । इह पुण काउत्तागो अहसयउत्सालपरिमाणो ।। ३२१ ।। विकलेन्द्रयाणां बाते कायोल्मा तदिन्द्रियप्रमागा । इह पुन कायोमर्ग अष्टशतोच्छामपरिमाण । विरदाणं पि महब्बयकयादिचारस्त एडहो चेव । काउस्तागो अण्णत्य पुवमणिदो त्ति विति परे ॥ ३२२ ॥ বিনিল নাইনটিন্যান্য নানান । कायोमर्ग. अन्यत्र पूर्वभगित इति त्रुवन्ति परे । अण्णा वि अत्यि अणुगुणतिरसावयईसणादिचाराणं । गिहिणो सोही य तं पि व संखवणं पवक्वामि ॥ ३२३ ।। अन्यापि अस्ति अगुगुणशिनानदर्शनातिवाराण । गृहिगां शुद्धिश्च तामपि च मंझेपेण प्रबन्यामि ।। पंचतिचउनिहाई अणुगुणसिस्तावयाइं होंति तहि । ए के अदिचारा पंचव अदिझमादीया ॥ ३२४ ।
प्रायश्चित्तसंग्रहे- जिनभवनाङ्गणदेशे गोमयगोमूत्रदुग्धदधिभिः । घृतसहितः कारापयित्वा सप्तमहामण्डलानि स्फुट । तो तं मुडियसीसं वइसारिय मंडलेसु उसु कमसो। जलपंचदव्यघयदहिपयगंधजलाहि पुण्णेहिं ॥ ३१४॥ ततः त मुडितशीप वेशयित्वा मडलेषु पटमु क्रमशः। जलपचद्रव्यवृतदधिपयोगन्धनलैः पूर्ण. ॥ वरवारपहिं समं अहिसिंचिय संघसंतिघोसेण । पच्छा सत्तममंडलठियरस से संघसमवाओ॥ ३१५॥ वरवारिभि समं अभिपिच्य संवशान्तिघोषेण । पश्चात् सप्तमण्डलम्थितस्य तस्य संघसमवायं ॥ जलपुप्फक्खयलेसादाणेहि परममंगलासीहि । अहिणंदियंगसोहिं देउ फुडं जिणग्यतमेओ ॥ ३१६ ॥ जलपुप्पाक्षतपादानः परममगलाशीभिः । अभिनदिताङ्गशुद्धि ददातु स्फुट जिनवतसमेता ॥ तो णियभवणपइटो जिणमहिमं संघमायणं कुणऊ । लोयाण चित्तगहणं च वत्थधणभोयणादीहिं ॥ ३१७ ॥ ततः निजभवनप्रविष्ट जिनमहिमा संघभोजनं करोतु : लोकाना चित्तग्रहण च वस्त्रधनभोजनादिभिः ॥ पाओ लोओ चित्तं तस्स मणोचित्तगाहयं कम्मं । लोयस्स जं तमेव हि पायच्छितं ति जिणवुत्तं ॥ ३१८ ॥ प्रायो लोको चित्त तस्य मनः चित्तग्राहकं कर्म । लोकस्य यत्तदेव हि प्रायश्चित्तमिति निनोक्तम् ॥
पि नम्बरमा म किया।" काण होगात्री अादियात्रा पर्यनज ॥ ३१९.. नैना प्रजनन वर्गन गगन । का माशि नहाया प्रपतन ।। उत्पत्तिप्पाीण घाट जादम्मि तिषिण उपवासा। णिदिदा निहिबगरम छेदवार मलेरी ॥ ३२ ॥ जपरिपाटीमा यात जात अय उपवासाः । निर्दिया गृहिर्गम्य सोडव्याहारकगले. !! पियलिदियाण घाद काउरसग्गा तदिदियपमाणा । ह पुण फारसगो अहमय उत्सासपरिमाणो।। ३२६ । विकलेन्द्रियाणा गते कायोत्या तदिन्द्रियप्रमागा । इह पुन. कायोन्मर्ग अटशनोच्छामपरिमाण । विरदाणं पि मययकयादिचारस्त पदो चेव । काउत्सग्गो अण्णय पुस्यमणिदो त्ति विति परे ॥ ३२६ विरतानामपि महानतकृतातिचारणा एतावानेव { कायोत्सर्ग. अन्यत्र पूर्वभणित इति त्रुवन्ति परे ।। अण्णा वि अत्यि अणुगुणसिक्खावयदसणादिचाराणं । गिहिणो सोही य तं पि य ससंवेण पवस्वामि ॥ ३२३ अन्यापि अस्ति अणुगुणशिक्षाबतदर्शनातिचाराणा । गृहिगां शुद्धिश्च तामपि च सोपेण प्रवक्ष्यामि ।। पंचतिचउबिहाई अणुगुणसिक्सावयाई होति तहिं । एकेके अदिचारा पंचव अदिलमादीया ॥ ३२४ ।