Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Sugamkaumudha Bhag-i

Sharma,gangashaya · 2012/08

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०-८ .... व्याकरणग्रन्थाः। नाम. की.रु.आ.ट.म.रु.आ. ३२३ लघुशब्देन्दुशेखर काशीके छा. ३२४ सिद्धान्तकौमुदीअष्टाध्यायी, गणपाठ, घातुपाठ, लिङ्गानुशासन पा०अक्षर मोटाजिल्द खे ४-० ०-१२ ३२५ अष्टाध्यायी,गणपाठ, धातुपाठ कादि.... खे १-० ३२६ सिद्धांतफौमुदी अतिउत्तम और बारीक टैपमें छपफे तैयार है.. ३२७ लघुसिद्धान्तकौमुदी टिप्पणीसहित जिल्द अक्षर बडा सूत्र और वृत्ति खुलासेवार है. क ०-१२ ०-२, ३२८ तथा सादा जिल्द क ०-१००-१॥ ३२९ लघुसिद्धान्तकौमुदी टिप्पणीसहित छोय क ३३० सिद्धान्तचन्द्रिका सुबोधिनीटीका भौर तत्त्वदीपिकासह संपूर्ण ३३१ सिद्धान्तचन्द्रिका उत्तरार्द्ध सुबोधिनी और तत्त्वदीपिकासह खे २-० ३३२ सिद्धान्तचन्द्रिका सटीक पूर्वार्द्ध सुबोधिनी और तत्त्वदीपिका टीका ख २-० ३३३ तत्त्वयोधिनी कौमुदीके पृष्ठाईसह पूर्वार्द्ध १ २-८ ३३४ रूपमालाव्याकरणका पइलिङ्गविभाग ने ०-६ ३३५ " सन्धिभागः, अव्ययार्थभागः प्रयोगविधिसं. ग्रहः (कारकसमासतद्धितादिक) किया- कलापः आख्यातचद्रिका धातुरूपभेदः श्लोकयोजनिकोणय ३३६ सन्धिविभाग ३३७ अव्ययार्थविभाग ३३८ प्रयोगविधि क ३३९ कारकसमासतद्धितादिक क्रियाकलाप आख्या- तचन्द्रिका धातुरूपभेद श्लोकयोजनिकोपायर ०-६ ०-१ ३४० सारस्वत चद्रकीर्ती उत्तरार्ध २-० ३४१ सारस्वतसटीक प्रसादटीका क ०-१२०-२ ३४२ सारस्वतमूल पूर्वार्द्ध जिल्द टाईपका.... क ........ खे १-३-२ .... .... ....

.... .... . ३४३ सारस्वत तीनों वृत्ति क -१२०-२ ३४४ सारस्वत चन्द्रकीतिटीकासह परमोत्तम क ३४५॥ "तथा रफ कागजफा क ३४६ सारस्वत भा०टी० (व्याकरण) ३४७ कारकवादार्थ शाब्दबोध व्याकरणन्याय क ३४८ सारस्वत माधवीटीकासमेत ३४९ धातुरूपावलि लघुधातुपाठसहित क ०-३ ०-10 ३५० शब्दरूपावलि एकाक्षरीकोष सहित क ०-१॥ ०-11 ३५१ समासचक्र ०-१ -1 1 ३५२ समासकुसुमावलि ३५३ लघुकौमुदी भा० टी. अतिउत्तम क २-० ३५४ सिद्धातचद्रिका उत्तरार्ध सुबोधिनी, तत्वदिपीका सस्कृत टीका और भापाटीकासह छपती है ३५५ बालसंस्कृतप्रभाकर नवीन संस्कृत शिखने- वालेको बहुत उपयोगी है ०-८ -१ ३५६ संस्कृतनामावली भापाटीका के ०-२ .-1 ३५७ लिङ्गबोध व्याकरण भाषाटीका खे ०-२ .-1 ३५८ रघुभाष्य साररसतका ३५९ कारकस्वरूप भापाटीका सहित [व्याकरण] ख ०-६ ३६० सिद्धान्त चदिका मूल खे ०-१००-१ ३६१ मर्यप्रकाशिका (व्याकरण) पढनेवारीको अती उपयोगीहै भाषाभाष्यभीहै। ३६२ शब्दल मनोरमा .. (फाशी) ५. ०-१२ ३६३ सस्कृतारोहण भापाटीका समेत ३६४ सस्कृतप्रदीप भापाटीया अतिउत्तम ३६५ सस्कृतशिक्षामंजरी र ०-१॥ ०-१ गोविंदराजीय भूपण, तनिश्लोकी, रामानुजी इन तीनों टीकामासहित- श्रीमद्भाल्मीकीयरामायण. महाशयो! देखो इस अपूर्व भूपणटीकाकी पांडित्यशैली, सुगमता, विचारचातुर्य मादि सय मद्धत गुण को चमकते .... .... .... ०-८ ....

है. देखो 'भूपण' यह नाममी कमा अन्वर्थ वसा गया है
जिसके श्रवणमानसेही कल्पना होता है कि रामायणरूपी
मगवान् रामचंद्रजी की मूर्तिको टीकारूपी अलंकारोंसे मलफूल
किया है और ऐसीही टीकाकारने कल्पना फर रचना की है,
देखो-कि उक्त मगवान्के बालकांडरूपी पादको टीकारूपी
मणिमंजीर (पायजेय), अयोध्याकांडरूपी जघनको पीतांवर,
भारण्यकांडरूपी काटको रत्नमेखला ( कोंदनी ), किष्किंधा.
फांडरूपी हृदय और कंठको मुक्ताहार (मोतियोंका कंठा ),
मंदरकांडरूपी ललाटफो शृंगारतिलक, युदकांटरूपी शिरको
रत्नकिरीट और उत्तरकांडरूपी ऊपरके मागको मणिमुकुट,
इस तरह ये गहने अर्पण कर रामायणरूपी भगवानको
सजाया है. तो इस व्याख्या क्या कम है कुछ नहीं फिर
लेनेमें क्या हरजहै सट लीनिये भोर इसका पाठ कर अपना
जन्म कृतार्थ कीजिये. यह २५ रुपये कीमतका पुस्तक
लेनेवालोंको मगवद्गुणदर्पणमाष्य मादि व्याख्यानयसमेत
विष्णुसहसनाम मेंट मिलेगा.
मालविकाग्निमित्रं. (नाटकम् )
वालयोधिनीटीकायुतम् ।
विदितघरमेव सविदुपामस्मिन् सिल भारत विविधसस्कृतमिद्या
पारापारपरीणस्य निखिएपण्डितमण्डलीमण्डनायमानस्य कविवरस्य श्रीया
रिदासस्य तानि स्वामायिौपम्यादिगुणगुणित सुजनमान्य सुप्रसिद्ध माल
विकामिमिन नाम नाटकम् । अस्य रचनासौन्दर्यादि वर्णन तु एतत्वतः
कविवर्तिनः कालिदासस्य "पुरा स्वीनी गणनामसङ्गे " इत्यादिना
जगीयमानकीर्तिनसायमानत्वात्पीनरुतस्यायेत । एव निसर्गरमणीयस्या
स्य नाटास्य रुपात्वायने व्यवहाररुपरक्षितत्वेन एन्द्रस्नान सरलव्या
रयामन्तराऽस्य यथार्यज्ञाने प्राशुलभ्यार्यमनुधावतो वामनानिय चेखिद्यमा
नबुध्य विद्वद्वरेधविद्यावाचस्पत्युपाधिभी राशीवडेस्रोपाव्हः श्रीयुतआपा
शास्तिभिरिय बालबोधिनी नाम व्यारयाऽकारि । मस्यां च व्यापरणच्छ.
न्दोऽलकारादिविषयाणा ययायथ प्रतिपादनादस्यार्थज्ञाने व्यारयेयमतीशे
पयोगिनीति सर्वे रसज्ञा विद्वांसोऽस्याः समहेण कृतार्थीकुर्वन्तु व्यारयाकारा

४ नलमानविस्तरणति शुभम् । विदाकुर्वन्तु पुस्तकमिद मोहमयीसभापति पल्याणनगरस्य सुप्रसिद्ध " लक्ष्मीपंकटेश्वर " नामक मुद्राक्त्रतो लभ्यमत पत्रादिप्रेषण तव कर्तव्यमिति जिघृक्षष इति ॥ मूल्यमस्स ग्राहकसो कार्य पेपर सपादो रूपयः (१) मन्वितार्थप्रकाशिकाख्यव्याख्यासहित- श्रीमद्भागवत. (व्याख्याग्रन्थसंख्या ७००००) यह टीका बूंदी महाराजाभित पं० गंगासहायजीने बनाई है. इसमें मल्लिनाथके ढंगपर अन्वयक्रमसे सरल और कठिन सब श्लोकोंका अर्थ सुगम रूपसे लिखा है और टीकामें जिन जिन कातोंका लिखना आवश्यक है वे सब संक्षेप और- सुगमतासे लिख दी हैं इसमें श्रीधरजीकी टीकाकी तो प्रायः सन बात आमई और बहुतसी बातें वोषिणीसारार्थसंदर्शिनी आदिसेभी लीगई है और सुगमता अन्वयक्रम और संक्षेपपर पूरी दृष्टि रक्खी मई है इस टीकाके शेषमें भागवतोपयोगी वेदांत सांख्यादिक कितनेक मत सुगम रीतिसे लिख दिये हैं. इसमें किसी मतका पक्षपात अथवा खंडन नहीं किया गया है । सब मतोंके माचार्योंका आदरपूर्वक स्मरण किया गया है. और भामवतके स्कंध और प्रकरणोंका अभिप्राय और श्लोकोंके छन्द तथा अध्यायोंके श्लोकोंकी गणना लिख दी है औरभी बहुत बातें हैं. इसका मूल्य अत्यल्प केवल १२ रुपये. देखनेसे मालूम होमा. पुस्तक समग्र छप चुका. नमूना मंगालो. काशि- आदि ठिकानेके विद्वानोंकी शेकडो सम्मति आई हैं.

सुगमकोंमुदी. विदेशी विद्वान्भी प्रायः इस बातको सादर स्वीकार करते हैं कि हजारसे ऊपर लोकप्रसिद्ध भाषाओं में संस्कृत भाषा अधिक ललित, मधिक निदोप और अधिक प्राचीन है। व्याकरण विना उसमें पूर्ण कुशलता प्राप्त नहीं होती है । यद्यपि व्याकरण ग्रंय अनेक हैं परंतु यह सवही लोगोंकी सम्मति है कि पाणिनि व्याकरण सबसे अधिक प्रामाणिक सर्वोपजीवी और व्यभिचारन्यूनतादि दोपरहित है । परंतु पाणिनि व्याकरण अति कठिन होनेसे बालकोंके समझमें आने योग्य नहीं है । काशिकावृत्ति यद्यपि सुगम है परंतु उसमें विस्तार बहुत है, धातुपाठ नहीं है और प्रक्रियाक्रम नहीं है इसलिये अल्पबुद्धिवालोंके भनुकूल नहीं हो सकती है। सिद्धान्तकौमुदी चाहे प्रक्रियानुकूल और निर्दोष है तथापि वह कठिन होनेते बालकोंके उपयोगी नहीं है और उसमें विस्तारभी अधिक हैं। तथापि सर्वांगपूर्ण और निदोप सिद्धान्तकौमुदी ही जानकर बालकोंके उसमें प्रवेशके लिये वरदराजने लघुकौमुदीकी रचना की है। उसमें यद्यपि विस्तार न करनेपरभी कितनेही उपयोगी विषय लिखे गये हैं तथापि सिद्धा न्तकौमुदीमें प्रवेश करने के लिये जितने विस्तारकी अपेक्षा है उससे दुगुना विस्तार कर दिया गया है, बालकों के उपयुक्त सुगमता उसमें नहीं है, बालकों के अनुपयोगी बहुश्रेयसि इत्यादि शब्द, त्वे, द्वे इत्यादि अव्यय, कटे ह इत्यादि पातु लिखकर अनेक उपयोगी धातु तथा अव्यय छोड दिये गये हे इन कारणीसे वहभी मन्दमात लोगोंके उपयोगी नहीं है किन्तु जो कोई लघकौमुदी पढताभी है तो उसे व्याकरणका पूर्ण ज्ञान होनेके लिये सिद्धान्तकौमुदी पढना पडता है और इस तरह अनन्य गतिसे लघुकौमुदी दुबारा पढनी पड़ती हैं । इस कारण मुझ मन्दमतिने अपने जैसे मन्दमति लोगोंके उपयोगके लिये, अपने अनुभवके अनुसार सिद्धान्तकोमदीके लौकिक शब्दोंके प्रकरणके तीन खंड कर दिये हैं और इसका नाम सुगम- सिद्धान्तकौमुदी रक्खा है। इसमें बालबोधके लिये प्रथम सुगम फिर उत्तरोत्तर फठिन इस रोतिसे और इसी क्रमसे विपययोजना की है जिससे पढ़ने में वालकोंको क्रम कमसे सिद्धान्तकौमुदीका पूरा पूरा ज्ञान हो नाय। इसके प्रथम खंडमें बहुत प्रसिद्ध समस्त शब्द, भव्यय और धातु हैं, लघुकौमुदीके समान प्रमाण होनेपरभी उसकी अपेक्षा चौगुने धातु है और जो शब्द अव्ययं तथा धातु अप्रसिद्ध हैं उन्हें छोड़ दिया गया है । इतने परमी प्रथमखंडके दो माग किये गये हैं । प्रथमखंड के प्रथम भागमै पालक उपयोगी सुगम भार सामान्य विषय ह जिनस उन्हें सिद्धान्तकौमुदी तया अन्य शास्त्रोंमे प्रवेश करनेकी योग्यता होजाय । इस छोटेसे ग्रयमें सुगमतासे सन्धि, सुप्, तिङन्न, मिच, सन, या यलुइ, नामधातभावार्म, कृदत, यारक, समास, ताहेत, स्त्रीप्रत्ययका सामान्य चोय होजाता है। प्रयम खडके द्वितीय भागमे प्रथम भागके चचेरचाये माय समस्त सधि, सुबन्त भव्यय जो लोकप्रसिद्ध ह और सब धातु है इसलिये मध्यसमुवीके अध्ययनसे अधिक फल होता है। सामान्यत प्रचारमें आनेवाले णिजन्तादि विषय जो प्रथम खडमें नहीं लिखे गये उनका मध्यखडमे उल्लेख है । इसमें समस्त बचेहए कारक, सारे बचे हुए कर्म समस्त सटीक परिभाषा, सर्वोत्तम सटीक लिंगानुशा- सन लिखा गया है इसलिये मध्य खडके अध्ययनसे प्राय पूरी पूरी व्युत्पत्ति होजाती है । व्युत्पत्ति के लिये तीसरे खडकी अपेक्षा नहीं रहती है। प्रथम और द्वितीय खडमे जो विषय शेष रह गये है जो अप्रसिद्ध है, जिनका प्रचार बहुत थोडा है वे तृतीयखडमै हे इसमे गौणादिशब्द, मप्रसिद्ध धातु णिजन्तसे बचे हुए उणादिक, सटीक गणपाठ, सर्वशष फक्तिकादि विषय तृतीय खडमें दिये गये है । इसलिये जो केवलं भन्य शास्त्रोंमें प्रवेश करनेके लिये व्याकरण पढना चाहें वे प्रथमखडका भाग भाग मयवा समय प्रथमखड पढे ! जो लोकप्रसिद्ध महाकाव्यादि सर्व प्रयोगोंकी व्युत्पत्ति परना चाहते हों वे दोनोंखड पढलै और जिनकी इच्छा सर्वलौकिक प्रयोगीसहित पूर्ण व्युत्पत्तिको हो वे तीसरे खडकाभी अभ्यास करले । यही इस सुगम सिद्धांतकौमुदीका प्रयोजन है। श्रीकृष्ण दासजीके पुत्र सेठगगाविष्णुजीके रक्ष्मीवकटेश्वर यत्रालयमे इसके ये दो खड मुद्रित होके प्रस्तुत आपके हाथमही है, तृतीय खड छप रहा है तृतीय खड छपजाने पूर्व जो मूल्य देंगे उन्हें ३ रुपयेमें और छपजानेके अनन्तर ४ में मिलेगी । इति शुभम् । श्रीमान् बुदीनरेशका आश्रित विद्वानोका विकर गंगासहायशर्मा. पुस्तके मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णू श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवेकटेश्वर " छापाखाना. कल्याण-मुम्बई. " श्रीः। श्रीपरमेश्वराय नमः ॥ अथ सुगमकौमुदीप्रारम्भः। श्रीशन्नत्वा त्रिभिः खण्डेविभज्य सुगमाध्वना ।। भट्टोजिकृतकौमुद्याः कुर्वे सुगमकौमुदीम् ॥१॥ तत्रादौ प्रायोपयोगी वालाहः प्रक्रियाकमः ।। अतिसंक्षेपतः प्रोक्तः शेपो विस्तरतस्ततः॥२॥ अइउण् १ ऋलक् २ एओङ् ३ ऐऔच ४ हयवरट् ५लण्६ भमङणनम् ७शभञ्८ घढधप् ९ जवगड- दश १० खफछठयचटत ११ कपय १२ शपसर १३ हल्१४॥ , एषामन्त्या इतः। हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । लण्मध्ये त्वित्संज्ञकः॥ हलन्त्यम् ११३।३॥ उपदेशेन्त्य हलित् । उपदेश आयोचारणम् ।। आदिरन्त्येन सहेता १।३।७१॥ अन्त्येनेता सहित आदिमध्यगानां स्वस्य च मंज्ञा। यथा अण् इति अइऊनां संज्ञा । अच् इति अइटमलए बोऐऔ एपां संज्ञा। अणादयः प्रत्याहारा उच्यन्ते । तेषु इतान्तु न ग्रहणम् यथा अचि णकडानां न ग्रहणम् ॥ उकालोज्यस्वदीर्घप्लुतः ॥ १२॥२७॥ उ१ऊ २ ऊ ३ एपां काल इव कालो यस्य सोच क्रमादस्वदी- पतसंज्ञः । यथा अ१ आ २ ३ इ १ ई २ई ३ २ १७२ ऊ ३ऋ१२ ऋ३ ल १ ल ३ अयं दीपों नास्ति ए २१३ त अची नाना भेदा यथासम्भवम् । एओ ए और हरगोदात्ताःहस्योदात्तः एर्चा हस्सा हस्वाः हस्त्रानुदात्ता हस्वानुदात्तः न सन्ति ह्रस्वाः हस्वस्तारताः स्वरितः दोघांदात्ताः दोघोदात्ताः अचाम्प्रत्येक यथासम्भसमष्टादश भदा. । ल ए ओ ऐ औ ह्रस्वोदात्तानुनासिकः द्वस्वोदात्तानुनासिकः हस्वोदात्ताननुनासिका इस्त्रोदात्ताननुनासिकः हस्वानुदात्तानुनासिकः हस्वानुदात्तानुनासिकः एचा इस्या न सन्ति हस्वानुदात्ताननुनासिकः ह्रस्वानुदात्ताननुनासिकः हस्यस्वरितानुनासिकः हस्वस्वरितानुनासिकः हस्वस्वरिताननुनासिक. हस्वस्वरिताननुनासिकः दीर्घोदात्तानुनासिकः दीघोदात्तानुनासिकाः दीर्घोदात्ताननुनासिकः दीघोदात्ताननुनासिकाः दीर्घानुदात्तानुनासिक. दीर्धानुदात्तानुनासिकाः अस्य दोषों नास्ति दीर्घानुदात्ताननुनासिकः दीर्घानुदात्ताननुनासिकाः दीर्घस्वरितानुनासिकः दीर्घस्वरितानुनासिकाः दीपस्वरिताननुनासिकः दीर्घस्सरिताननुनासिकाः प्लुतोदातानुनासिकः प्लुतोदात्तानुनासिका प्लुतोदात्तानुनासिकाः प्लुतोदात्ताननुनासिकः | प्लुतोदात्ताननुनासिकः प्लुतोदात्ताननुनासिकाः प्लुतानुदात्तानुनासिकः । प्लुतानुदात्तानुनासिका प्लुतानुदात्तानुनासिका:- प्लुतानुदात्ताननुनासिकः प्लुतानुदात्ताननुनासिकः । प्लुतानुदात्ताननुनासिकाः प्लुतस्वारतानुनासिकः प्लुतस्वारतानुनासिकः प्लुतस्सरितानुनासिकाः •प्लुतस्वीरताननुनासिकः। प्लुत्तस्वरिताननुनासिकः प्लुतस्वरिताननुनासिकाः अयं दौधों दीर्घाः दीर्घा सुगमकौमुद्याः। दीर्घानुदात्ताः नास्ति दीर्घानुदात्ता दीर्घस्यारताः दौर्धस्वरिताः प्लुतोदात्ताः प्लुतोदात्तः प्लुतोदात्ताः : प्लुताः प्लुतानुदात्ताप्लुतानुदात्तःप्लुतानुदात्ता |प्तस्वरिता. प्लुतस्वारेतः| प्लुतस्वरिता.

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । एचो हस्वा न सन्ति ओ २ ओ ३ ऐ २ऐ ३ औ२ औ३। एवं वस्वादिभेदभिन्नोऽच् प्रत्येकमुदात्तादिमेदेन त्रिधा । एवं स नववि. धोऽपि प्रत्येकमनुनासिकाननुनासिकत्वाभ्यान्विधा । तथादि । उच्चैरुदात्तः १।२।२९ ॥ ताल्वादिषु सभागेपु स्थानेपूर्वभागे निष्पन्नोऽजुदात्तसंज्ञः।। नीचैरनुदात्तः १।२।३०॥ समाहारः स्वरितः १।२।३१॥ उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मो समाहियेते यस्मिन्सोञ्चू स्वरितसंज्ञः॥ मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः १ । ११८॥ मुखसहितनासिकयोचार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः में आँ इँ "ई इत्यादि-तदित्थम् । अइउऋ एषां वर्णानां प्रत्ये. कमष्टादश भेदाः । लवर्णस्य द्वादश तस्य दीर्घामावात् । एचामपि. द्वादश तेपां इस्वाभावात् ॥ इति १ अंशः। यथा अथ वर्णानां स्थानमयलाः । अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः । इचुयशानां ताल । ऋटुरपाणां मूर्दा । लतुलसानां दन्ताः । उपूप- ध्मानीयानामोठी । अमडणनानां नासिका च । एदेतोः कण्ठतालु । ओदौतोः कण्ठोष्ठम् । वकारस्य दन्तोष्टम् । जिह्वामूलीयस्य जिहा- मूलम् । नासिकाउनुस्वारस्य । यत्नो द्विधा । आभ्यन्तरो वाह्यश्च । आयः पञ्चधा । स्पृष्टेपत्स्पृष्टेपद्विवृतविवृतसंवृतमेदात् । तत्र स्पृष्टं प्रयतनं अयाम् । ईपत्स्पृष्टं यणाम् । ईपदिवृतं शलाम्। विवृतम- चाम् । तस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम् । प्रक्रियादशायान्तु विवृतमेव। वाह्य एकाशधा श्वासाघोपविचारा नादघोषसंवारा उदात्तानुदा. तस्वरिताः महाप्राणोऽल्पप्राणश्चेति । झमघदधाः हकारोऽनुस्वास्थ नादघोपसंवारमहाप्राणाः । शरो विसर्ग क पौ खफछठयाश्र श्वासाघोषविवारमहाप्राणाः । चयः श्वासाघोपविचाराल्पप्राणाः।

(स्थानप्रयत्नचक्रम् ।) पर्णा स्थानानि वर्णाः आभ्यतरप्रयताः वर्णा. बाह्यमयल: अाधा कपगसिगाः कण्ठ. फण्टनासिरम् अ १३ चउजज्ञयशाः उऊऊ३ पश्यभापध्मानीया प्रयोगे सवृतम् प्र- अआआ ३ ईईई ब्रियायां रिवृत्तम् । ३ उऊ ३ ऋक नादधोपसंपाराल्प. ऋ३ लल् ३ एए । प्राणोदात्तानुदात्त. आया ३ इईई ३ ३ ऐऐ३ ओओ३ सरिता: औ औ३ लन ३ एए. ३ एऐ३ पिवृतम् ओओ३ औधी ३ हरभघटधातु नादघोपसंसर- महामाणा. ममम३इडहरणा ण सुगमकौमुद्याः। सारा: ताटुनासिपम् ओटी घोटनासिरम् मूर्ती मुनासिरम् दन्ता दन्दनासिरम् वण्ठतालु कण्ठाटम् दन्तोष्टम् जिहामूलम् नाासमा लण३तपदपरस कखगघङ चछज सन दिडदण तथ धन पफनभम खफ उठयापस- पिसर्ग कापी एए३पेप३ पोओ ३ ओक 7 जिदामूरीयः अनुसार. यरला चटतकप ईपरस्पृष्टम् श्वासाघोपरिया- रमहाप्राणाः श्वासाघोषनिगरा- रूपमाणाः नादघोषसग- शल्पप्राणाः सपसह 'ईपदिकृतम् यरलरघणनड मजदगर प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । यणी नमो जशश्च नादघोपसंवाराल्पप्राणाः । अचः श्वासाघोपवि. वाराल्पमाणोदात्तानुदात्तस्वरिताः । यमा वेदे एव प्रसिद्धाः॥ तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् १ । १।९॥ ताल्वादिस्थानमाभ्यन्तरप्रयत्नश्चेत्येतइयं यस्य येन तुल्यं त- न्मिथः सवर्णम् । यथा अ१ आ २ आ ३ एते. मिथः सवर्णाः । कखगघङ एते च ॥ ऋलवर्णयोमिथः सावण्ये वाच्यम् ॥ * ॥ अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः १।३।६९ ॥ प्रविधीयमानोऽण उदिच सवर्णस्य संज्ञा । अत्रैवाः परेण णकारेण । कुचुटुतुपु एते उदितः । तदेवम् अ इत्यष्टादशानां संज्ञा। तथा इकारोकारौ । ऋकारस्त्रिंशतः एवम्लकारोपि । एचो द्वादशा- नाम् । एदैतोरोदौतोश्च न मिथः सावर्ण्यम् । ऐऔसूत्रारम्भसा- मर्थ्यात् । अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधा । तेनाननु- नासिकास्ते द्वयोर्दयोः संज्ञाः । तपरस्तत्कालस्य १।१।७० ॥ तः परो यस्मात्स च तात्परश्चोच्चार्यमाणः समकालस्यैव संज्ञा । यथा ॥ अदेडणः १।३।२॥ अदेङ् च गुणसंज्ञः। अत्र अत् इति तपरोकारः हस्वानामेव पण्णां सञ्ज्ञा एवन्तात्पर एङ् दीर्घाणामेव पण्णां पण्णां संज्ञा॥ वृद्धिरादेच १।१।१॥ आदेच वृदिसंज्ञः॥ परः सन्निकर्पः संहिता ११४।१०९॥ वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः ॥ सुप्तिङन्तं पदम् १।४।१४ ॥ सुबन्तं तिडन्तश्च पदसंज्ञम् ।।

सुगमकौमुद्याः। स्थानेऽन्तरतमः ११११.५०॥ प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः ॥ इति संज्ञाप्रकरणम् । इति २ अंशौ। " 'इको यणचि६।१।७७॥ इका स्थाने यण् स्यादपि संहितायां विषये । सुध्युपास्यः । धद्वित्वादि वक्ष्यते । मध्यरिः धात्रंशः लाकृतिः ॥ एचोऽयवायावः ६१११७८॥ } एचः क्रमादय अन् आर् आव एते स्युरचि ।। यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ॥ ३ ॥१०॥ समसंबंधी विधिर्यथासंख्यम् । हरये । विष्णवे । नायक: पावकः॥ - आद्गुणः६.११८७॥ अवर्णादाचे पूर्वपरयोरेको गुणादेशः । उपेन्द्रः । रमेशः । गगोदकम् ॥ उपदेशेऽजनुनासिक इत् ११३।२॥ उपदेशेऽनुनासिकोऽजित्संज्ञः । प्रतिज्ञानुनासिक्याः पाणिनी. याः। लणसूत्रस्थोऽकारोऽनुनासिकः प्रतिज्ञातः । तेन सदोचार्य- माणो रेफ: उरण रपर इत्यत्र रलयोः संज्ञा ।। उरण रपरः१।१।५१॥ ऋ इति विंगतः संज्ञेत्युक्तन्तस्थाने योऽण् स रपरः सन्ने प्रव तते । तेन कृष्णद्धिरित्पादावर नवकार इत्यादापल आन्तरत- म्यात् । कृष्णाः । दलोपादिकं वक्ष्यते । तबल्कारः॥ वृद्धिरेचि ६।१।८८॥ प्रश्यिारीविभारम्भ ग बाला विमा मा मारित्यारोग्यादी पपमा का शिक्षितम् । तस प्रक्रियाभ्यासदार म्पासागियो शायानीनि अमपिप्पते ।

. मथमखण्डस्य प्रथमो मागः । आदेचि वृद्धिरेकादेशः । गुणापवादः। कृष्णकत्यम् । गद्गीयः । देवैश्वर्यम् । कृष्णौत्कण्ठयम् ॥ अकः सवर्णे दीर्घः६।१।१०१॥ अफः सवर्णेत्रि परे दीर्घ एकादेशः । दैत्यारिः। रमात्र । श्रीशः । विष्णूदयः । होतृकारः ॥ एडः पदान्तादति ६।३.११०९॥ पदान्तादेडोति परे पूर्वरूपमेकादेशः । हरेश्व । विष्णोऽध ।। अदर्शनं लोपः १११.६० ॥ प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञम् ॥ लोपः शाकल्यस्य ८।३ । १९ ॥ अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोलोंपो वाशि परे । पूर्वत्रासिद्धम् ८।२।१॥ सपादसप्ताध्यायी प्रति त्रिपाद्यसिद्धा। त्रिपाद्यामपि पूर्व प्रति परं शास्त्रमासद्धम् । इति लोपस्यासिद्ध- त्वान्न सन्धिः। हर इह । हरयिह । विष्ण इह । विष्णविह । श्रिया एषः । श्रियायेपः । गुरा अयम् । गुरावयम् ॥ इति ३ अंशाः। पृतप्रगृह्या अचि नित्यम् ६।११ १२८ ।। प्लुताः प्रगृह्याश्चाचि नित्यं प्रकृत्या ॥ अचोऽन्त्यादि टि ११११६४॥ अचाम्मध्ये योन्त्यः स आदिर्यस्य तहिसंज्ञम् ॥ दूराभूते च ८।२।८४॥ दूरात्संबोधने यदाक्यं तस्य टेः प्लुतः । एहि कृष्णा ३ अत्र गौश्चरति ॥ ईदूदेद्विवचनं प्रगृह्यम् १ । १।११॥

।
सुगमकीमुद्याः।
ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यसंज्ञम् । हरी एतौ । विष्णू इमौ । गों
अमू । पचेते इमौ॥
अदसो मात्.१।१ । १२॥
। अस्मात्परावीदूती प्रगृह्यौ । अमी ईशाः । अमू आसाते ।।
चादयोऽसत्वे १।४।५७॥
अद्रव्यार्थाश्चादयो निपातसंज्ञाः ॥
ओत् १1१1१५॥
आदन्तो निपातः प्रगृह्यः । अहो ईशाः ॥
स्तोः श्रुनाश्चः ८।४।१०॥
सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवौ स्तः ।
हरिश्शेते । रामश्चिनोति । सञ्चित् । शाङ्गिंजय ॥
शात् ८।४।४४॥
शात्परस्य तोश्चन । प्रश्नः । अनाति ॥
ष्टुना ष्टुः ८।४।४१॥
स्तो हुना योगे पुः । रामषष्ठः । रामष्टीकते । पेटा । तट्टीका ।
चक्रिण्डौकसे ॥
न पदान्ताहोरनाम् ८।४।४२॥
पदान्ताहोरनामः स्तोः पर्न । पट्सन्तः। पट्ट ते । नेह। पण्णाम् ॥
अनाम्नवतिनगरीणामिति वाच्यम् ।। * ।।
पण्णवतिः पण्णगर्यः॥
तोः पि८।४।४३॥
तवर्गस्य पकारे परे न पुत्वम् । सन्पष्ठः ।।
झलाञ्जशोऽन्ते ८।२।३९ ।।
पदान्ते झलां जशः । वागीशः ।।
।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ८1१1४५॥ यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको बा । एतन्मुरारिः। एतमुरारिः । स्पर्शस्यैव । नह चतुर्मुखः ॥ प्रत्यये भाषायां नित्यम् ॥ * ॥ चिन्मयम्॥ तोलि ८181६०॥ तवर्गस्य लकारे परे परसवर्ण' । तल्लयः । विद्यालिखति । नकारस्यानुनासिको लकारः ॥ खरिच८181५५॥ खरि झलाञ्चरः । तत्पुत्रः । पट्पदः । ककुप्पदेश । झयो होऽन्यतरस्याम् ८।४।६२॥ पदान्ताज्झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः । घोपस्य महामाणस्य हस्य तादृशो वर्गचतुर्थ एव । वाग्धरिः । वारहरिः । तद्धविः । तद्हविः ॥ इति ४ अंशाः। शश्छोटि ८।४।६३॥ पदान्ताज्झयः परस्य शस्य छो वाटि दस्य जत्वे चर्वम् । त- च्छिवः । तशिवः॥ छत्वममीति वाच्यम् ॥ ॥ तरलोकेन । तच्श्लोकेन ॥ मोऽनुस्वारः ८।३।२३॥ मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि ॥ अलोऽन्त्यस्य १।११५२॥ षष्ठीनिर्दिष्टान्त्यस्यादेशः । हार वन्दे ॥ अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ८।४।५८॥

. सुगमकीमुधाः । अङ्कितः । अञ्चितः। कुण्ठितः । शान्तः । गुम्फितः ॥ या पदान्तस्य ८।४।५८॥ . पदान्तस्यानुस्वारस्य याय परसवर्णों वा । वोषि त्वं करोपि। सय्यन्ता।संयन्ता । संत्सर संवत्सरः। यहॊलोकम् । यं लोकम् ॥ आद्यन्तौ दकितौ १1१1१६॥ टितकिती यस्योक्तौ तस्य क्रमादायन्ताश्यवौ स्तः॥ ङमो ह्रस्वादचि ङमुणनित्यम् ८।३।३२ ।। ह्रस्वात्परो यो डम् तदन्तं यत्पदं ततः परस्याचो नित्यं डमुट आगमः । उकारोऽनुनासिकत्वादित् । इत्संज्ञालोपौ च सूत्रप्रवृ- त्तिकाले एव प्रयोगादहिखे भवत ॥ तस्य लोपः ११३।९॥ तस्येतो लोपः । प्रत्यङ्न्डात्मा । सुगण्णीशः । सन्नच्युतः ॥ अत्रानुनासिका पूर्वस्य तु वा ८।३।२॥ अत्र रुमकरणे रोः पूर्वस्यानुनासिको वा ॥ अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः ८।३॥४॥ अमुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्मात्परोज्नुस्वारागमः ।। विरामोऽवसानम् १।४।११०॥ वर्णानामभावोऽवसानसज्ञः॥ खरवसानयोर्विसर्जनीयः ८।३।१५।। खरि अवसाने च रेफस्य विसर्गः पदान्ते ॥ नश्छव्यप्रशान् ८.३॥७॥ अम्परे छवि नान्तस्य पदस्य रुः नतु प्रशानशब्दस्य ।। विसर्जनीयस्य सः८1.३३४॥ खरि । चक्रिसायस्व । राजेंश्चित्रम् । इति ५ अंशाः।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । ११
छे च६।१।७३॥
हस्वस्य छ परे तुक संहितायाम् । गच्छति । स्वच्छा । जश्त्वं
चुत्वञ्चर्वम् । शिवच्छाया ॥
दीर्घात् ६।१।७५॥
दीर्घस्य छे तुक । चेच्छिद्यते ॥
पदान्तादा ६।१।७६॥
दीर्घस्य पदान्तस्य छे तुग्या । लक्ष्मीच्छाया । लक्ष्मीछाया।
अचो रहाभ्यां द्वे ८।४।४६॥
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो हे वा हर्यनुमावः।
इर्यनुभावः । नास्ति । नास्ति ।
अनचि च८1१।४७॥
अंचः परस्य यरो देवा न त्वचि । धात्रंशः । धात्रंशः।।
झलां जश झशि ८।४१५३ ॥
इति धस्य दः॥
हलोऽनन्तराः संयोगः ३1३१७॥
अभिरव्यवहिता हलः संयोगसज्ञाः ।।
संयोगान्तस्य लोपः ८।२।२३॥
संयोगान्तं यत्पदं तदन्तस्य लोपः । इति प्राप्ते ॥
यणः प्रतिरोधो वाच्यः ।। ॐ ॥
सुद्धयुपास्यः । सुध्युपास्यः॥
झसोझर संत्रण ८1१1१५॥
हलः परस्य झरो लोपो वा सवर्णे झरि । कृष्णदिः कृष्णाः
विसर्जनीयस्य सः । विष्णुस्त्राता
वा शरि ८ । ३.३६॥
शरि विसर्गस्य विसर्ग एवं वा । हरिः शेते । हरिश्शेते ॥

१२ सुगमकामुद्याः। कुप्पोक पौ च ८।३।३७ ॥ 'कवर्गे पवर्गे च परे क्रमादिसर्गस्य जिहामूलीयोपध्मानीयौ विस- गंश्च । सत्त्वापवादः । हरि : करोति । हरिः करोति । हरि ४ पाति । हरिः पाति ॥ अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा १।१।६६ ।। अन्त्यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः ॥ इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य८1३1४१॥ इकारोकारोपधस्यामत्ययस्य विसर्गस्य षः कुप्वोः । निष्पत्यू- हम् । आविष्कृतम् । दुष्कृतम् ॥ ससजुपो रुः८।२।६६॥ पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः । जश्त्वापवादः । हरिर्वन्द्यः॥ अतो रोरतादप्लुते ६।३।११३ ॥ अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुतेति । भो भगो इति यत्वा- पवादः । शिवोऽर्थ्यः। रोः किम् । प्रातरत्र । हशि च ६।१।११४॥ अप्लुतादतः परस्य रोरुहशि । शिवो वन्द्यः। रोः किम् धात- गच्छ॥ भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि ८।३।१७॥ एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशः आशि । देवा इह देवायिह ।। हलि सर्वेपाम् ८।३।२२॥ मोमगोअघोअपूर्वस्य यस्य लोपो इलि । भो देवाः । भगो नमस्ते । अघो याहि । देवा नम्याः॥ रोरि ८।३।१४॥ रेफस्य रेफे परे लोपः॥ एलोपे पूर्वस्य दीपोंऽणः६।३।१३१॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमा ढकाररेफलोपानिमित्ते ढकाररेफात्मके वर्णे परे पूर्वस्याणो दीर्घः। पुना रमते । हरी रम्यः । मनस रथ । इत्यत्र रुत्वे कृते हशि चे- त्युत्वे रोरीति लोपे प्राप्ते रोरीत्यस्यासिद्धत्वादुत्वमेव । मनोरथः ।। एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनसमासे हलि ६।१।१३२॥ अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्तस्य लोपो हलि नतु नसमासे एप विष्णुः । स शम्भुः ॥ इति संधयः । इति ६ अंशाः । पुंसि' रामो हरिः सुश्रीः प्रधीः शम्भुः स्वभूः पिता ॥ धाताऽथ राजयज्वानी दण्डी धीमान् मरुत् पचन ॥१॥ ददविद्वान् सेदि- वांश्च वैधा अष्टादशोदिताः॥ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ११२॥४५॥ धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तश्च वर्जयित्वाऽर्थवच्छब्दरूपं प्रातिपदिक- संज्ञम् ॥ कृत्तद्धितसमासाश्च ११२।४६॥ कृत्तद्धितान्तौ समासश्च प्रातिपदिकसंज्ञाः । अत्रालयवार्थी व्युत्पत्तिस्तद्रहिता डित्यादयः शब्दा अव्युत्पन्नाः तेषामर्थवत्सूत्रेण प्रातिपदिकसज्ञा व्युत्पत्तिमन्तो रक्षितदागरथिराजपुरुपादयः रक्षणकर्ता दशरथापत्यं राजसम्बन्धी पुरुष इत्येपामवयवास्तेिषां कृत्तद्धितेत्यनेन सज्ञा रामशब्दे च मृगविशेषादावव्युत्पत्तिपक्षस्त- प्रार्थवत्सूत्रेण सज्ञा। रमन्ते योगिनोति श्रीराम व्युत्पत्तिपक्षस्तत्र कृतद्धितेत्यनेन सज्ञा एवमग्रेऽपि यथायोग्यम् । स्वोजसमौट्छष्टाभ्यांभिसडेभ्यांभ्यस्ङसिभ्यां भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् ४।१।२॥ उचन्तादावन्तात्मातिपदिकाच परे स्वादयः प्रत्ययाः मी १ अनाजन्ता इलन्ताश्च पुदिना शन्दा कमवित्रा न्याना व्यवधानेन ताप्लेखस्य निष्फरपात् । एवं खालीवयोग।

. सुगमकौमुद्याः। जस् प्रथमा । अम् औट् शस् द्वितीया। टा भ्याम् मिस तृतीया। के भ्यां भ्यम् चतुर्थी । डसि भ्यां भ्यस् पञ्चमी । डस् ओस् आम् पष्ठी । डि ओर सुप् सप्तमी । इति मायां संज्ञाः ॥ चुटू१1३।७॥ प्रत्ययाद्यौ चुटू इतौ ॥ लशकतद्धिते १।३।८॥ तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या लशकवर्गा इतः॥ न विभक्तो तुस्माः ११३॥४॥ विभक्तिस्थास्तवर्गसकारमकारा इतो न ॥ विभक्तिश्च १।४।१०४॥ सुप्तिडौ विभक्तिसंज्ञौ ॥ सुपः१।४।१०३॥ सुपः त्रीणि त्रीणि वचनानि प्रत्येकमेकवचन द्विवचनबहुवच. नसंज्ञानि ॥ ब्येकयोर्दिवचनैकवचने १ ॥ ४ ॥२२॥ द्वित्त्वैकत्वयोरेते स्तः॥ बहुषु बहुवचनम् १।४।२१॥ बहुत्वे एतत्स्यात् । रुत्त्वविसौ । रामः ॥ सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ १।२।६४॥ एकविभक्तौ यानि सरूपाण्येव दृष्टानि तेपामेक एव शिष्यते । एकशेपश्चायमनैमित्तिकत्वेऽन्तरङ्गत्वाद्विभक्त्युत्पत्तेः पूर्वमेवेति ॥ प्रथमयोः पूर्वसवर्णः६।१।१०२॥ अका प्रथमाद्वितीययोराचे पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः ॥ नादिचि६,१११०४॥ मवर्णादिचि न पूर्वसवर्णदीर्घः। रामी । -- २६ प्रमथरखण्डस्य प्रथमो भागः। अतो गुणे ६।१।९७॥ अपदान्तादतो गुणे पररूपमेकादेशः । इतेि 'पररूपे प्राप्ते पर- स्वात्पूर्वसवर्णदीर्घः । रामाः ॥ एकवचनं संबुद्धिः२।३।४९॥ संवोधने प्रथमाया एकवचनं संबुद्धिसंज्ञम् ॥ यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादिप्रत्ययेऽङ्गम् 98।१३॥ यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादि शब्दरूपं तस्मिन् प्रत्यये परेऽङ्गसंज्ञम् ॥ एड्रह्मस्वात्संबुद्धेः ६।११६९॥ एङन्ताद्व्स्वान्ताचाङ्गाल्लुप्यते संबुद्धेश्चेत् । हे राम हे रामौ । हे रामाः ॥ अमि पूर्वः६।१।१०७॥ अकोम्याच पूर्वरूपमेकादेशः । रामम् । रामौ ॥ इति ७ अंशाः। तस्माच्छसो नः पुंसि ६।१।१०३ ॥ पूर्वसवर्णदीर्घात्परो यः शसः सस्तस्य नः पुंसि ।। अट्रकुप्पानुम्व्यवायेऽपि ८1१।२॥ अट्रकवर्गपवर्गआइनुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासम्भवं मिलितैश्च व्यव- धानऽपि रपाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे । इति प्राप्ते ॥ पदान्तस्य ८।४।३७॥ पदान्तस्य नस्य णो नारामान ।। टाङसिङसामिनात्स्याः७।। १२॥ अदन्तादगाहादीनामिनादयः । रामेग ।। सुपि च ७।३।१०२॥ यादी सुप्पत्तोगस्य दीर्घः । रामाभ्याम् ॥

1. सुगमकौमुयाः।
-
.
१६
अतो भिस ऐस ७।११९॥
अदन्तादनादिस ऐस ॥
अनेकालशित्सर्वस्य १।११५५॥
अलोन्त्यस्येत्यस्यापवादः । रामैः ॥
डेयः ७1१1१३॥
अतोनात्परस्य डे इत्यस्य यः॥
स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ १।११५६॥
आदेशः स्थानिवत्स्यान्न तु स्थान्यलाश्रयविधी तेन डेर्यस्य
सुप्त्वात्सुपि चौति दीर्घः । रामाय । रामाभ्याम् ।।
बहुवचने झल्येत् ७।३।१०३॥
सलादी बहुवचने सुप्यतोऽङ्गस्यैकारः। रामेभ्यःजय बाधिता।
पावसाने ८१४१५६॥
अवसाने झलाञ्चरो वा । रामात् । पक्षे जश्त्वम्। रामाद् । रामा-
भ्याम् । रामेभ्यः । रामस्य ।
ओसि च ७।३।१०४॥
ओति परेऽतोङ्गस्य एकारः । रामयोः ॥
ह्रस्वनद्यापो नुटू ७191५४ ॥
हस्वान्तानद्यन्तादावन्ताचाडात्परस्यामो नुत् ॥
नामि६।४।३॥
अजन्तागस्य दीर्घः । रामाणाम् 1 रामे । रामयोः।।
मादेशमत्यययोः ८१३१५९॥
इकुभ्यां परस्यापदान्तस्पादेशः प्रत्ययावयवश्च या सस्तस्प
मर्दन्यः । रामेषु । एवं कृष्णादयोऽम्पदन्ताः ॥
जसि च ७।३।१०९॥
सान्तस्यास्य गुणः हरितार्ग दियः ।।

प्रथमखण्डस्य प्रथमा भागः। १७ - हस्वस्य गुणः ७।३।१०८॥ संबुद्धी । हे हरे ॥ शेपो ध्यसखि १।४।७॥ अनदीसंज्ञी द्वस्वी याविदुतौ तदन्त सखिवज घिसंज्ञम् ।। आङो नाऽस्त्रियाम् ७१३ । १२० ॥ घेः परस्याङो ना स्यादस्त्रियाम् । हरिणा ॥ घेर्डिति ७।३।११३॥ घिसंज्ञकस्य डिति सुपि गुणः । हरये ॥ डसिडन्सोश्च ६।११११०॥ एडी ङसिङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः । हरेः ॥ अच्च घेः७।३।११९॥ इदुद्भ्यां परस्य डेरीत् घेरन्तादेशश्चाकारः । हरी । एवं कन्या- दयः ॥ भूवादयो धातवः १।३।१॥ क्रियावाचिनो भ्वादयो धातुसंज्ञाः ।। अचि नुधातुभ्रुवां खोरियङवङौ ६।४।७७॥ नुमत्ययान्तस्य इव!वर्णान्तस्य धातो— इत्येतस्य चाङ्गस्ये. यहुवङावजादी मत्यये ॥ डिच्च १1११५३॥ डिदनेकालप्यन्त्यस्यादेशः । सुश्रीः । सुथियो । एवं यवक्रीप्र- भृतयः ॥ एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ६।४।८२॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तद- न्तस्याऽनेकाचोङ्गस्य यणजादौ प्रत्यये । प्रधीः । मध्यौ । प्रध्यः । शम्भुहरिवत् । एवं भान्वादयः । स्वभूः । स्वभुवौ ॥ -- । -- .. सुगमकौमुद्याः। सुडनपुंसकस्य 3191४३॥. स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरलीबस्य ॥ ऋतो डिसर्वनामस्थानयोः ७।३।११०॥ गुणः । इति प्राप्ते ॥ ऋदुशनस्पुरुदंसोनेहसां च ७।१।९४ ।।.. ऋदन्तानामुशनसादीनाञ्च अनडसंबुद्धौ सौ ।। सर्वनामस्थाने चासंबुद्धौ ६।४।८॥ नान्तस्योपधाया दीर्घः असंधुदौ सर्वनामस्थाने ।' अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ११२१४१॥ हल्ङयाब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल ६।७।६८॥ हलन्ताही? यो ड्यापौ तदन्ताञ्च पर सुतिसीत्येतदपृक्तं हल्लु- प्यते ॥ '' प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् 191६२॥ प्रत्यये लुप्तेपि तदाश्रितं कार्य स्यात् । नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ८।२।७॥ प्रातिपदिकसंज्ञकं यत्पदन्तदन्तस्य नस्य लोपः । पिता। पितरी॥ ऋत उत्६।१।१११ ।। ऋदन्तादनात् डसिडसोरति उदेकादेशः । रपरत्वम् ।। रात्सस्य ८।२।२१॥ रात्संयोगान्तस्य तस्यैव लोपो नान्यस्य । पितुः ।। वर्णात्रस्य णत्वं वाच्यम् ॐ॥ पितृणाम् । एवं भ्राधादयः ॥ अप्ठन्तृचस्वस्नप्तृनेतृत्व क्षत्तृहोत्पोत्पशास्त- णाम् ६।४।११॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो मागः ।
अवादीनामुपधाया दीर्घोऽसंबुद्धी सर्वनामस्थाने । धाता ।
धातारी इत्यादि । शेपं पिवत् । गजा । राजानी ।।
स्वादिष्वसर्वनामस्थाने १।४।१७॥
कप्पत्ययावधिपु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्व पदसंज्ञम् ।।
यचि भम् १।४।१८॥
यकारादिप्वजादिषु च कप्पत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्था-
नेषु पूर्व भसंज्ञम् ॥
आकडारादेका संज्ञा १४।१॥
इत ऊर्दू कडाराः कर्मधारय इत्यतः प्रागेकस्यैव संज्ञा । या
पराज्नवकाशा च । तेन शसादावचि भसंज्ञा नतु पदसंज्ञा ।।
इति ९ अंशाः।
न डिसम्बुद्धयोः ८।२।८॥
नस्य लोपो न डी संबुद्धौ च । हे राजन् ॥
अल्लोपोऽनः ६।४।१३४॥
अङ्गावयवोऽसर्वस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याकारस्प
लोपः। जजोहः। राज्ञः । राज्ञा । पदत्वानलोपः । राजभ्याम् ॥
नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुम्विधिषु कृति ८।२।२॥
सुवादिविधौ कृति तुग्विधौ च नलोपोसिद्धो नान्यत्र राजाश्वः॥
विभापा डिझ्योः६।४।१३६॥
अनावयवोऽसर्वनामस्थानयजादिस्वादिपरो योऽन् तस्याकारस्य
लोपो वा डिश्योः । राज्ञि । राजनि । गजमु । यज्वा ॥
न संयोगाद्वमन्तात् ६।४। १३७ ॥
वकारमकारान्तसंयोगात्परस्यानोकारलोपो न । यज्वनः ।
इन्हन्पूपार्य्यम्णां शौ ६।४।१२॥
झणः॥

सुगमकीमुद्याः । एषां शावेवोपधाया दीपों नान्यत्र । सोच६।४।१३॥ इनादीनामुपधाया दीर्घः असंबुद्धौ सौ । दण्डी दण्डिनी॥ अवसंतस्य चाधातोः६।४।१४॥ अत्यन्तस्य धातुभिन्नासन्तस्य च उपधाया दीर्घोसंबुद्धौ सौ ॥ उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः७।११७०॥ अधातोलागतो नलोपिनोऽञ्चतेश्च नुम् सर्वनामस्थाने ॥ मिदचोऽन्त्यात्परः १११॥४७॥ अचाम्मध्ये योऽन्त्यस्तस्मात्परस्तस्यैवान्त्यावयवो मित्स्यात् ॥ संयोगान्तस्य लोपः धीमान् । धीमन्तौ । हे धीमन् । धीमतः इत्यादि । मरुत् । मरुतौ । पचन । पचन्तौ । एवं शनन्तभवच्छब्दस्य भवन् । सन् ॥ उभे अभ्यस्तम् ६।११५॥ पाष्ठदित्वप्रकरणे ये हे विहिते ते उभे समुदिते अभ्यस्तसंज्ञे ।। नाभ्यस्ताच्छतुः ७।११७८॥ । अभ्यस्तात्परस्य शतुषुम्न । ददत् । ददतौ ॥ सान्तमहतः संयोगस्य ६।४।१०।। सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्योपधाया दीर्घोसंबुद्धी मर्वनामस्थाने । विद्वान् ।। नश्वापदान्तस्य झलि ८।३।२४॥ नस्य मस्य चापदान्तस्य शल्यनुसारः । विद्यासी॥ वसोः संप्रसारणाम् ६।४।१३१॥ वस्वन्तस्य मस्य संमसारणम् ॥ इग्यणः संप्रसारणम् १1१1१५॥' यणः स्थाने प्रयुज्यमानो य इ स संप्रसारणसंज्ञः ॥ .

प्रथमरसण्डस्य प्रथमो मागः ।
संप्रसारणाच६।१।१०८॥
संमसारणादचि पूर्वरूपमेकादेशः । विदुषः ॥
वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ८।२।७२ ॥
सान्तवस्वन्तस्य संसादेश्च दः पदान्ते । विद्वद्भ्याम् । निषेदि-
वान् ॥
अकृतव्यूहाः पाणिनीयाः ॥
निमित्तं विनाशोन्मुखं दृष्ट्वा तत्मयुक्तं कार्य न कुर्वन्तीत्यर्थः। तेन
बलादित्वं नाशोन्मुखं दृष्ट्वा इटमेव न कुर्वन्ति । निपेदुपः । निपंदि-
वयाम् । वेधाः । हे वेधः । वेधोभ्याम् ।।
इति पुलिगाः॥
इति १० अंशाः इति प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ।
स्त्रिया रमा मातिर्गारी श्रीधेनुर्भूचमूयुधः ॥ शरदा च सरि-
माडिति द्वादश कीर्तिताः॥
अजाद्यताम्।।१४॥
अजादीनामदन्तस्य च वाच्यं यत् स्वीत्वं तर द्योत्ये टापू ।
अजारमा ॥
पिद्गोरादिभ्यश्च ४।११४१॥
पिट्यो गौरादिभ्यश्च स्त्रिया डी ॥
यस्येति च ६।४।१४८।।
मस्येवर्णावर्णयोलापस्तद्धिते इति च । नर्तकी। गौरी इत्यादि।
रमा॥
औङ आपः ७१ १११८॥
आवन्तादगात्परस्याड' शी। ग्मे । रमा ॥
संबुद्धौ च ७।३।१०६ ।।
आप एकारः संबुद्धी । हे रमे ॥

सुगमकीमुद्याः । आङि चापः७।३।१०५॥ आडयोसि चावन्ताङ्गस्य एकारः । रमया ॥ याडापः७।३।११३॥ आपः परस्य डिवचनस्य याडागमः। रमायै । रमायाः २। रमाणाम् ॥ डेनम्नद्याम्नीभ्यः७।३।११६॥ नद्यन्तादावन्तान्नीशब्दाच डेराम् । रमायाम् । एवं दुर्गादयः । मतीःमत्या ॥ डिति ह्रस्वश्च १।४।६॥ इयडुवइस्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिंगावीदूतौ स्वौ चेव- गोवर्णी स्त्रिया या नदीसंज्ञी डिति ।। आणनद्याः७।३।११२॥ नद्यन्तात्परेषां डितामाद ॥ आटश्च ६।११९०॥ आटीच वृद्धिरेकादेशः । मत्यै । मतये । मत्याः । मतेः । नदीत्वे औदिति डेरौत्वे प्राप्त ॥ इदुग्याम् ७।३।११७॥ नदीसंज्ञकाभ्यामिदुझ्या डेरामु पक्षेञ्च घेः । मत्याम् । मतौ। शेष हरिवत् । एवं बुद्धयादयः । गौरी ॥ दीर्घाजसि च ६।१११०५॥ दीर्घाजमि इचि च न पूर्वसवर्णदीर्घः 1 गोर्यो । यू स्याख्यो नदी १।४।३॥ इदन्तौ नित्यस्वीलिडो नदीसंज्ञी ॥ अम्बार्थनद्यो स्वः७।३।१०७॥ अम्बार्थाना नद्यन्ताना च हसः संवृद्धा । हे गौरि । गीर्याः । एवं नयादयः । श्रीः। श्रियो ।।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो मागः । '२३ नेयवस्थानावस्त्री ११४।४॥ इयडुबडोः स्थितियोस्तावीदूती नदीसंज्ञो न स्तः । स्त्रीशन्द- स्तु स्यात् । हे श्रीः । श्रिये। श्रिये ॥ वामि ॥४॥५॥ इयडुवइस्थानौ स्याख्यौ ईदूती आमि वा नदीसंज्ञा स्त्री तु नि- त्यम् । श्रीणाम्। श्रियाम् । धेनुमतिवत् । भूः श्रीवत् । चमः । घम्वै । युत् । युद् । युधौ । युधः । शरत् । शरद् । शरदौ ॥ चोः कुः ८१२।३०॥ पदान्ते च । वाक् । वार। पाचौ । सरित् । सरिन् । सरितौ । प्रावृट् । प्रावृड् । मापौ। इति स्त्रीलिङ्गाः ॥ इति ११ अंशाः । फ्लीवे ज्ञानं वारि मधु नाम ब्रह्म च दण्डि च॥ जगदत्पचचक्षुः पय एकादशोदिताः ॥१॥ अतोऽम् ७।१।२४॥ अतोऽङ्गात् क्लीवात्स्वमोरम् । ज्ञानम् ॥ नपुंसकाच १७1१1१९॥ क्लीवात् परस्य औड: शी। यस्येति लोपे प्राप्ते ।। औङः इयां प्रतिपेधः ॥ ज्ञाने ॥ जशशसोः शिः ७।१।२०॥ क्लीवादनयोः शिः॥ शि सर्वनामस्थानम् १ । १॥४१॥ नपुंसकस्य झलचः७।१।७२॥ - झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीवस्य नुम् सर्वनामस्थाने । ज्ञानानि । 'पुनस्तद्वत् । शेष रामवत् । एवं फलादयः ॥ ग - सुगमकीमुयाः। प्रत्ययस्य लुकलुलुपः१1१६१॥ एतैः शब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमादेतत्संज्ञम् ॥ स्वमोनपुंसकात् ७।११२३॥ क्लीवादङ्गात्स्वमो छ । वारि॥ , इकोऽचि विभक्तौ ७।१।१३ ॥ इगन्तस्य क्लीवस्य नुम् अचि विभक्ती । वारिणी ॥ वृद्धयौत्वतृवभावगुणेभ्यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन * ॥ वारीणि ॥ न लुमताङ्गस्य १।१।६३ ॥ लुकलुलुपशब्दै प्ते तन्निमित्तमङ्गकार्य न तेन सम्बुद्धिनिमित्तो गुणो न । हे वारि । अस्यानित्यत्वात्पक्षे गुणः । हे वारे । आजो ना । वारिणा॥ नुमचिरतज्वद्भावेभ्यो नुट्र पूर्व विप्रतिषेधेन * ॥ वारीणाम् । मधु । मधुनी । नाम नानी। नामनी । नामानि । सम्बुद्धौ नपुंसकानां नलोपो वा * ॥ हे नाम । हे नामन् । ब्रह्म । ब्रह्मणी । ब्रह्माणि । हे ब्रह्मन् । हे ब्रह्म । दण्डि । दण्डिनी। दण्डीनि । जगत्। जगती । जगन्ति ।। आच्छीनद्योर्नुम् ७।१।८०॥ अवर्णान्तादङ्गात्परो यः शतुरखयवस्तदन्तस्याङ्गस्य नुम् वा शीनयोः । तुदन्ती । तुदती । माती । मान्ती ।। शपूइयनोनित्यम् ७१११८१॥ शपश्यनोरात्परो यः शतुरखयवस्तदन्तस्याङ्गस्य नित्यं नुम शीनद्यो । पचन्ती। दीव्यन्ती । ददत् । ददती ।। वानपुंसकस्य ७।११७९ ।। अभ्यस्तात्परो यश्शता तदन्तस्य प्लीवस्य नुम् वा सर्वनाम- स्थाने ददन्ति । ददति । अथ नुम्सग्रहपयम् । शतरलीबमुटेि शी प्रथमखण्डस्य प्रथमो मागः । शीनद्योरपि शपश्यनः ॥ अन्यायत्तयोर्वा नुम्नाभ्यस्तादेषु शो तु वा ॥ १॥ धनुः । धनुपी॥ नुविसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ८।३। ५८॥ एतैः प्रत्येकं व्यवधानेऽपि इण्कुभ्यां परस्य सस्य पः । धनपि । धनुर्ध्याम् । धनुःषु । धनुष्यु । एवं चक्षुर्ह विरादयः । पयः । पयांसि । पयोभ्याम् ॥ इति नपुंसकलिङ्गाः ।। इति १२ अंशाः ।। अथ संवादयस्त्रिलिङ्गाः। सर्वादीनि सर्वनामानि १।१।२७॥ सर्वादीनि शब्दरूपाणि सर्वनामसंज्ञानि । सर्व, विश्व, उम, उ- भय, डतर, डतम, अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत्, त्व, नेम, सम, सिम, पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम् । स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् । अन्तरं वहियोंगोपसंव्यानयोः । त्य, तद्, यद्, एतद्, इदम् : अदस्, एक, द्वि, युप्मद्, अस्मद, मवत, किम् ॥ तत्र पुति ॥ जसः शी७।१।१७॥ अदन्तात्सर्वनाम्नो जसः शी । सर्वे ॥ सर्वनामः स्मै ७।१।१४॥ अतः सर्वनाम्नो डे: स्मै । सर्वस्मै । ङसिङयो स्मास्मिनौ ७।१1१५॥ अतः सर्वनाम्नः । सर्वस्मात् ।। मामि सर्वनामः सुट् ७१११५२॥ अवर्णान्तात्सर्वनाम्नी विहितस्यामः सुद् । सर्वपाम् । सर्वस्मिन् शेष रामवत् । एवं विश्वादयः ॥ उभशब्दो नित्यं दिवचनान्तः । उभो उभौ इत्यादि । उतरडतमौ प्रत्ययो । ततस्तदन्ता ग्राह्याः ॥ सर्गदर्शनी त्रिगितापलक्षम्याच मुसेन बोधाय निरिमीतः पृयड्न्यासः । । २ ६ सुगमकीमुद्याः। पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञा याम् 191३४॥ एतेपां व्यवस्थायामसंज्ञायां सर्वनामसंज्ञा गणपाठात्सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा । पूर्व पूर्वाः । स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो न्य- वस्था । दक्षिणाः गाथकाः कुशला इत्यर्थः। संज्ञायान्तु उत्तराः कुरवः ।। पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ७।१।१६॥ एभ्यो डसिडयोः स्मास्मिनौ वा । पूर्वस्मात् पूर्वस्माद् । पूर्वाद पूर्वाद् । पूर्वस्मिन् । पूर्वे । एवं परादीनामपि शेष सर्ववत् ।। स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् १1१।३५॥ ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य प्राप्ता संज्ञा जसि वा। स्वे स्वाः आत्मीया इत्यर्थः । आत्मान इति वा । अन्यत्र स्वाः ज्ञात. योऽर्था वा॥ अन्तरं बहियोगोपसंव्यानयोः ११११३६॥ बाह्ये परिधानीये चार्थेऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता संज्ञाजसि वा । अन्तरे अन्तराः वा गृहाः शाटका वा । बाह्याः परिधानीया वा इत्यर्थः । त्यदादीनामः ७।२।१०२॥ एषामकारोऽन्तादेशी विभक्तौ ॥ , द्विपर्यन्तानामेवेष्टिः॥ त्यदादेः संबोधनं नास्तीत्युत्सर्गः ॥ तदोः सः सावनन्त्ययोः ७।२।१०६॥ त्यदादीनां द्विपर्यन्तानां तयोरनन्त्ययोः सः सौ । स्यः। त्यौ । सः। तो ।ते। एषः। एतौ। एते ॥ इदमो मः७।२।१०८॥ सौ अत्वापवादः ॥ इदोऽय् पुंसि ७१२।१११॥ Punyy २७ प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । 'इदम इदः अय् सौ पुति । अयम् ॥ दश्च ७।२।१०९॥ इदमो दस्य मा विभक्तौ । इमौ ॥ अनाप्यकः७.१२।११२॥ अककारस्येदम इदोऽन् आपि विभक्ती । अनेन ।। इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ २।४।३२॥ अन्वादेशविपयस्येदमोऽनुदात्तोऽश् आदेशस्तृतीयादौ । अश् साकच्कार्थः ।। इति १३ अंशाः ॥ द्वितीयाटौस्स्वेनः २।४।३४॥ द्वितीयायां टीसोश्च परतः इदमेतदोरेनादेशोऽन्वादेशे। किंचि- कार्य विधातुमुपात्तस्य कार्यान्तरं विधातुं पुनरुपादानमन्वादेशः। यथाऽनेन व्याकरणमधीतम् एनञ्छन्दोऽध्यापयति । अनयोः प- वित्रं कुलम् एनयोः प्रभूतं स्वम् । एनम् ॥ हलि लोपः ७।२।११३॥ अककारस्य इदम इदो लोप आपि हलादौ विभक्तौ ।। नानर्थके लोन्त्यविधिरनभ्यासविकारे । आद्यन्तपदेकस्मिन् १1१।२१॥ एकस्मिन् क्रियमाण कार्यमादाविवान्त इव स्यात् । आभ्याम् ॥ नेदमदसोरको ७।१।११॥ अककारयोरिदमदसोर्भिस ऐस् न । एभिः । अस्मै । एभ्यः। अस्मात् । अनयोः । एपाम् । अस्मिन् । एषु ॥ अदस औ सुलोपश्च ७।२।१०७॥ अदस औकारोन्तादेशः सौ परे सुलोपश्च । असौ ॥ अदसोऽसे दुदोमः ८।२।८० ॥ ..

। २८ सुगमकौमुद्याः। असान्तस्यादसो दात्परस्य उदूतौ दस्य मश्च । हस्वव्यञ्जनयो- हस्त्रो दीर्घस्य दीर्घः । अमू । जसः शी। गुणः ॥ एत ईद्वहुवचने ८।२।८१॥ अदसी दादेत ईदस्य मश्च बढाक्तौ । अमी। पूर्वत्रासिद्धमिति विभक्तिकार्य प्राक् पश्चादुत्वमत्वे । अमुम् । अमू । अमूत् ।। नमुने ८१२॥३॥ नाभावे कर्त्तव्ये कृते च मुभावो नासिद्धः । घिसंज्ञा । अमुना। अमूभ्याम् । अमीभिः । अमुष्मै । अमुष्मात् । द्विशब्दो द्विवचना- न्तः । दौ । दौ । द्वाभ्याम् । द्वयोः ॥ किमः कः७१२११०३।। विभक्तौ । अकसहितस्यापि कः । कौ।। अथ स्त्रियाम् ॥ टाप् । सर्वा। सर्वे॥ सर्वनामः स्याङ्स्यश्च ७।३।११४॥ आवन्तान्तात्सर्वनाम्नो डिन्तः स्याडापश्च स्वः । सर्वस्यै । सर्व- स्याः । सर्वासाम् । सर्वस्याम् ।। शेष रमावत् ॥ एवं विश्वादयः ।। उमयी। उभय्यो । स्या । त्येसाते । या ।ये। एपा। एते।। यः सौ७२।११०॥ इदमो दस्य यः सी। इयम् । इमे । इमाः । अनया। आभ्याम् । मसी । अम् । अमूः । अमुया । अमुष्यै । अमुष्याः। एका। एके। दे।व। माती भवत्यो । काके । लीये । सर्वम् । स । सर्वा. णि। पुनस्तद्वत् । शेपं पुंवत् । एवं विश्वादयः॥ अद्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ७१११२५ ॥ एभ्यः प्लीयेभ्यः स्वमोर आदेशः॥ दे।६।४।१४३॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः।
२९
डिति परे भस्य टेलॉपः । डित्वसामर्थ्यात् अभस्यापि । कतरत्
कतरद् । कतरे । कतरााण । हे कतरत् । शेपं पुंवत् । एवं कतमत् ।
इतरत् । अन्यत् । अन्यतरत् । अन्यतमस्य तु अन्यतममित्येव ।।
एकतरात्प्रतिपेधः॥ॐ॥
एकतरम् ॥
इति १४ अंशाः॥
त्यद्। त्ये । त्यानि । तत् । यद् । एतद् । इदम् । इमे।
इमानि ॥
अन्वादेशे नपुंसके एनद्वक्तव्यः॥॥
एनन् । एने। एनानि । एनेन । एनयोः । अदः । अमू । अ.
मूनि । एकम् । एके । । । । । भवत् । भवती । भवन्ति । सोलुंका
लुप्तत्वात्कादेशो न । किम् । के। कानि । अथ युष्मदस्मदी ।
डेप्रथमयोरम् ७।१।२८॥
युष्मदस्मद्भ्यां . इत्यस्य प्रथमा द्वितीययोश्वाम् ॥
वाहौ सौ ७।२१९४॥
अनयोर्मपर्यन्तस्य व अह इत्यादेशी सौ॥
शेपे लोपः ७१२।९०॥
आत्वयत्वनिमित्तेतरविभक्तावनयोरन्त्यलोपः । त्वम् । अहम् ॥
युवावौ द्विवचने ७।२।९२॥
दयोरुक्तावनयोर्मपर्यन्तस्य युवाची विभक्तौ ॥
प्रथमायाश्च द्विवचने भापायाम् ७१२१८८॥
इहानयोराकारोऽन्तादेशः । युवाम् । आवाम् ॥
यूयवयौ जसि ७।२।९३ ॥
मपर्यन्तस्य । यूयम् । वयम् ॥
त्वमावेकवचने७।२।९७॥
-

- + सुगमकौमुद्याः। एकस्योक्तौ अनयोर्मपर्यन्तस्य त्वमौ विभक्ती॥ द्वितीयायाञ्च ७१२।८७॥ . . अनयोः आकारः। त्वाम् । माम् । युवाम् । आवाम् ॥ शसो न ७/११२९॥ आभ्यां परस्य शसो नकारः ॥ आदेः परस्य १।११५४॥ : परस्य यदिहितन्तत्तस्यादेः स्यात् । अलोन्त्यापवादः । इति शसोकारस्य नकारः । संयोगान्तस्य लोपः। युष्मान । अस्मान् ॥ योऽचि ७।२।८९॥ • अनयोर्यकारादेशोऽजादी विभक्तौ । त्वया । मया ॥ युष्मदस्मदोरनादेशे ७।२।८६॥ अनयोः आकारादेशे हलादी विभक्ती। युवाभ्याम् । आषा- भ्याम् । युष्माभिः । अस्माभिः ॥ तुभ्यमझौ ङयि ७।२।९५॥ अनयोर्मपर्यन्तस्य तुभ्यमह्यौ डयि । शेपे लोपः । तुभ्यम् । मह्यम् । युवाभ्याम् । आवाभ्याम् ।। भ्यसो भ्यम् ७।१।३०॥ आभ्यां भ्यसो भ्यम् अभ्यम् वादेशः। युष्मभ्यम् । अस्म- भ्यम्॥ एकवचनस्य च ७।१।३२॥ आभ्यां उसेः अत् । त्वत् । मत् । युवाभ्याम् । आवाभ्याम् ॥ पञ्चम्या अत् ७।१।३१॥ आभ्यां पञ्चम्या भ्यसोत् । युष्मत् । अस्मत् ।। युप्मदस्मद्भ्यां उसोऽश ७।१।२७।। तवममौ उसि ७।२।९६॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । अनयोर्मपर्यन्तस्य तवममी ङसि । तव ।मम । युवयोः ।आय- योः । त्वयि । मयि । युवयोः । आवयोः ॥ साम आकम् ७१११३३॥ आभ्यां परस्य आम आफै स्यात् ।सुद् तु न स्यात् । युष्माकम्। अस्माकम् । त्ययि । मयि । युवयोः । आवयोः । युष्मासु । अस्मासु ॥ इति १५ अंशाः। युष्मदस्मदोः पष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ ८1१।२० पदात्परयोरपादादी स्थितयोः पष्ठचादिविशिष्टयोस्तयोर्वान्नावी ती चानुदात्ती॥ बहुवचनस्य वस्नसौ ८॥१॥२१॥ उक्तविधयोस्तयोः पष्ठयादिवहुवचनान्तयोर्वस्नसी वान्नावोर- पवादः॥ तेमयावेकवचनस्य ८॥१॥२२॥ उक्तविधयोस्तयोष्पष्ठीचतुर्येकवचनान्तयोस्ते मे ॥ त्वमा द्वितीयायाः८।१।२३॥ उक्तविधयोस्तयोदितीयकवचनान्तयोस्त्वा मा । श्रीशस्त्वावतु मापीह दत्तात्ते मे शर्म सः ॥ स्वामी ते मेऽपि स हरिः पातु वामपि नौ विभुः ॥ १॥ सुखं वान्नी ददात्वीशः पतिर्वामपि नौ हरिः॥सोऽव्यादो नः सुसं वो नो देवात्सेव्योन यः स नः ॥२॥ नेह त्वाम्पातु । वेदैशेपैः संवेद्योऽस्मान कृष्णः सर्वदाऽवतु । एते आदेशा अनन्वादेशे वा । अन्वादेशे नित्यम् । धाता ते भक्तोस्त तव वा । तस्मै ते नम इत्येव । विभक्तिसत्वे एवं नेह इति युष्म- त्पुत्रो ब्रवीति ॥ इति सर्वादयः॥ अत्र साम इति भाग्निः सुटो निवृत्त्यर्थ ससुटनिर्देश इति व्याख्यातार । तदेय स्पष्टमुक्त सुट तु न स्यादिति ।

-- सुगमकीमुद्याः। स्वरादिनिपातमव्ययम् १११॥३७॥ खरायो निपाताश्चाव्ययसंज्ञाः । स्वर् अन्तर् प्रातर पुनर इत्यादयोऽने वोध्याः ॥ अव्ययादाप्सुपः२।४1८२॥ अव्ययादिहितस्यापः सुपश्च लुक् । स्वः । अन्तः । चादयोस- वे । च वा ह अह एव इत्यादयोऽपि अग्रे वोध्याः॥ प्रादयः ११४।५८॥ अद्रव्यार्थाः पादयो निपातसंज्ञाः । प्र परा अप सम् अनु अव निस निर दुन दुर वि आइ नि अधि आपि अति सु उदू अभि प्रति परि उप एते प्रादयः ।। उपसर्गाः क्रियायोगे १।४।६९॥ गतिश्च ११४।६०॥ मादयः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञा गतिसंज्ञान स्युः ॥ तद्धितश्चासर्वविभक्तिः ११११३९॥ यस्मात सर्वा विभक्तिोंत्पद्यते स तद्धितान्तोऽव्ययसंज्ञः। सर्वतः । सर्वत्र । तत्र शालायाम् । परिगणनं करिष्यते ॥ कृन्मेजन्तः १११॥ ३९ ॥ कृयो मान्त एजन्तश्च एतदन्तमव्ययम् । स्मारम् । स्मारम् । जीवसे । पिवध्यै॥ क्त्वातोसुनकपुनः१1१1१०॥ एतदन्तमव्ययम्। कृत्वा । प्रणम्य । उदेतोः । विसपः इत्यादि। अव्ययीभावश्च 9111४१॥ आधिहरि । अव्ययानां लिङ्गकारकसंख्याभावादैकरूप्यम् । वष्टि भागरिरलोपमवाप्योरुपसर्गयोः ॥ आपञ्चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा।अवगाहः । वगाहः अपिधानम् । पिधानम् ॥ इत्यव्ययानि । इति १६ अंशाः। ।

प्रथमखण्डस्य प्रयमा मा अथाख्यातम् तत्र धातुभ्यो लकाराः धातवस्तु द्विविधाः। अकर्मकाः सकर्म- काश्च । तत्राद्या यथा । सत्तायामुदये स्नेहे मोहस्नान विशुद्धिषु । शयनासनलज्जासु जीवने मरणे अधि ॥१॥ त्वरायां क्रीडने नृत्ये रोदनस्थितिदीप्तिषु ॥ भये स्यन्दे च सन्देहे स्वेदस्पक्षियेष्वपि ॥२॥ मदोद्वेगप्रकम्पेषु व्यथाजागरवृद्धिपु ॥ जरायां स्वदनोत्प- त्योर्मूत्रणे हदने तथा ॥३॥ विकासे मीलने हासे नाशस्फूर्तिस- मृद्धिषु । तोपे दोपे विरागे च विषादोन्मादसिद्धिपु॥४॥प्रभातोड्डी- तिदम्भेषु शुल्लिमादिगुणेषु च ॥ध्वाने क्लैब्ये दरिद्रत्वे ग्लानिगर्वश्रमे- ष्वपि ॥५॥ क्षोभप्रस्रवणाद्यर्थे धातवः स्युरकर्मकाः॥अन्ये सकर्मकाः शेपो विपयोऽग्रेऽभिधास्यते॥६॥भू सत्तायाम लेकारास्तु लट् लिट् लुद् लद् लेट् लोट् लङ् लिङ्लुङ् लङ् इति दश एषु लेट् छन्दस्येव ।। लः कर्मणि च भावे चाकमकेभ्यः३।४।६९ ॥ लकाराः सकर्मकेम्यः कर्मकौरकर्मकेभ्यो भावकोंः स्युः ॥ वर्तमाने लट् ३1२ 1 १२३॥. वर्तमानक्रियावृत्तेर्धातोर्लट् । अटाविती । उच्चारणसामर्थ्याल- स्य न इत्त्वम् । कर्तृविवक्षायां भू ल् इति स्थिते ॥ तिप्तसझिसिप्थस्थमिप्वसमसूतातांझथासाथांव- मिड्वहिमहिङ्३।४।७८॥ एतेऽष्टादश लस्यादेशाः॥ लः परस्मैपदम् ।। ४।९९ ॥ लादेशा एतत्संज्ञाः तङानावात्मनेपदम् १।४।१००॥ तइशानचकानचौ चैतत्संज्ञाः ॥ पूर्वसंज्ञापवादः ।, १ यद्यपि काराणामय प्रमः पाणिनिना न प्रोक्तः नापे प्रक्रियानुगुणः किन्तु पालना सुखेन चौघाय. लट रडू लोट् लिई लुट् लृट् ल्हू र लिट् इति मो योग्यस्तथापी टित् डित् लकारभेदमात्रफलकोयं क्रमः प्राचामनुरोधादास्त ।

सुगमकौमुद्याः। अनुदात्तडित आत्मनेपदम् ११३।१२॥ अनुदात्तेत उपदेशे यो डिन्तदन्ताच धातोर्लस्यात्मनेपदम् ।। स्वरितभितः कर्वभिप्राये क्रियाफले ११३॥७२॥ स्वरितेतो जितश्च धातोलस्य आत्मनेपदम् वर्तुगामिनि कियाफले ॥ शेपात्कर्तरि परस्मैपदम् १।३।७८॥ आत्मनेपदनिमित्तहीनाद्धातोः कर्तरि परस्मैपदम् ।। तिङ-स्त्रीणि त्रिणि प्रथममध्यमोत्तमाः ११४३०१|| तिड उभयोः पदयोस्त्रयस्त्रिकाः क्रमादेतवसंज्ञाः ।। तान्येकवचन द्विवचनबहुवचनान्येकशः १।४।१०२॥ लब्धप्रयमादिसंज्ञानि तिडस्त्रीणि त्रीणि क्रमादेतत्संज्ञानि ।। युष्मयुपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः तिड्वाच्यकारकवाचिनि युष्मदि प्रयुज्यमाने प्रयुज्यमाने च मध्यमः॥ अस्मद्युत्तमः ११४।१०७॥ तथाभूते अस्मादे उत्तमः ।। शेपे प्रथमः ११४।१०८॥ मध्यमोत्तमयोरविषये प्रथमः ॥ इति १७ अंशाः ।। भूति इति स्थिते ॥ तिशित्सार्वधातुकम् ३1४1११३॥ तिडः शितश्च धात्वाधिकारोक्ता एतत्संज्ञाः ।। आर्द्धधातुकं शेपः३।४1११४॥ तिङ्कशिट्योभ्यो धातोरिति विहित एतत्संज्ञः ॥ •4

भवथ ।।
प्रथमखण्डस्य प्रथमो मागः।
लिट च३1४1११५॥
लिडादेशस्तिडार्दधातुकसंज्ञ एव स्यात् ।।
लिङाशिपि३।४।११६॥
आशिपि लिडस्तिडार्दधातुकसंज्ञ एवं ॥
कर्तरि शए ३।१।६८॥
कत्रर्थे सार्वधातुके पर धातोः शम् । शपावितौ ॥
सार्वधातुकार्द्धधातुकयोः ७।३।८४ ॥
अनयोः परयोः इगन्ताङ्गस्य गुणः । भवति । भवतः ॥
झोऽन्तः ७।११३॥
प्रत्ययावयवस्य शस्यान्तादेशः । भवन्ति । भवसि । भवथः ।
अतो दीपों यभि७।३।१०१॥
अतोङ्गस्य दीर्घो यजादी सार्वधातुके । भवामि । भवाः ।
भवामः । सः भवति । तौ मवतः । ते भवन्ति । त्वं भवसि
इत्यादि योज्यम् ।।
परोक्षे लिट् ३।२।११५॥
भूतानद्यतनपरोक्षार्थवृत्तेर्धातोलिट् । लस्य तिवादयः ।।
परस्मैपदानां गलतुसुस्थलथुसणल्वमाः३।४।८२॥
लिटस्तिवादीनां माण्णलादयो नव स्यु ॥
भुवो बुक् लुइलिटोः६।४।८८॥
भुवो बुक् लुइलिटाराचे । गुणवृद्धयोर्वाधकः ॥
लिटि धातोरनभ्यासस्य ६।११८॥
लिटि परे अनभ्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य हे स्तः
आदिभूतादवः परस्य तु द्वितीयस्य । भूत् भूव ब इति स्थिते ॥
पूर्वोऽभ्यासः ६।११४॥
पाठद्वित्वप्रकरणे ये दे विहिते तयोः पूर्वाभ्याससंज्ञः ॥

३ सुगमकोमुद्या। हलादिः शेषः ७।४।६०॥ अभ्यासस्यादिहल् शिष्यते । अन्ये हलोलुप्यन्ते । इति वलोप.॥ हस्वः७।४।६९॥ अभ्यासस्याची हस्तः ।। भवतेरः७।४।७३।। भवतेरभ्यासोकारस्य अः स्याल्लिारी ।। अभ्यासे चर्च ८।४।५४॥ अभ्यासे झलाञ्चर' स्युर्जशश्च अशा जशः खयाश्चरः । तत्रापि प्रकृतिजशा प्रकृतिजशः प्रकृतिचरा प्रकृतिचरः ॥ असिद्धवनाभात् ६।४।२२।। इत उर्द्धमापादसमाप्राभीयम् । समानाश्रये तस्मिन् कर्तव्ये तदसिद्धम् । इति युकोऽसिद्धत्वादुवडि प्राप्ते ॥ बुग्युटाबुवयणोः सिद्धौ वक्तव्यौ ॥ ॥ वभूव । बभूवतुः । बभूवुः॥ आर्द्धधातुकस्येइ बलादेः ७॥२॥३५॥ वलादेरार्धधातुकस्येडागमः । यभूविथ । वभूवथुः । वभृव । बभूव । वभूविव । वभूविम ॥ इति २८ अंशाः ॥ अनद्यतने लुद ३।३।१५॥ भविष्यति अनद्यतने धातोढुंद ॥ स्यतासी ललुटोः३।१॥३३॥ धातोः स्वतासी एती स्तः ललुटोः परतः । शवाद्यपवादः ।इद्॥ लुटः प्रथमस्य डारौरसः२।१।८५॥ अस्य डारीरस् यते श्मात्स्युः । टेलॉपः ॥ तस्वं लघु १1१1१०॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। पुगन्तलघूपधस्य च ७॥३॥८६॥ पुगन्तस्य लघूपधस्य च अङ्गस्येको गुणः सार्वधातुकार्दधातु- कयोः । भवित् आ अत्रेको गुणे प्राप्ते ।। दीधीवेवीटाम् ११११६॥ दीधीवेव्योरिटश्च गुणवृद्धी न । भविता ।। तासस्त्योर्लोपः ७१४१५० ॥ तासेरस्तेश्च लोपः सादौ प्रत्यये । रिच ७।४।५१॥ रादौ प्रत्यये प्राग्वत् । भवितारौ । भावतारः । भवितासि । भवितास्थः । भवितास्थ । भवितास्मि । भवितास्वः। भवितास्मः॥ लुट् शेपे च ३।३।१३॥ भविष्यदर्थाद् धातोर्लट् । भविष्यति । भविष्यतः । भविष्य- न्ति । भविष्यसि । भविष्ययः । भविष्यथ । भावष्यामि । भविष्यावः । भविष्यामः ।। लोट् च ३।३।१६२॥ विध्यादिवर्थेषु ॥ आशिपि लिङ्लोटौ ३।३। १७३ ॥ एरु.३।४।८६॥ लोट इकारस्य उः । भवतु ॥ तुह्योस्तातडाशिष्यन्यत्तरस्याम् ७।१।३५ ।। आशिपि तुह्योस्तात वा परत्वात्सर्वादेशः । भवतात् ॥ लोटो लड्बत् ३1४1८५॥ लोटो लङ इव कार्यन्तेन तामादयः सलोपश्च ॥ तस्थस्थमिपान्तान्तन्तामः ३।४।१०१॥ डितो लस्य तसादिचतुर्णा तामादयः ।।

३८ सुगमकौमुद्याः। नित्यहितः३।४।९९॥ सकारान्तस्य डिदुत्तमस्य नित्यं लोपः। अलोऽन्त्यस्य । भव- ताम् । भवन्तु ॥ से_पिञ्च ३।४।८७॥ लोटः सेर्हिः सोगपिच ॥ अतो हेः६।४।१०५॥ अतः परस्य हेर्लुक भव । भवतात् । भवतम् । भवत ॥ मेनिः३।४।८९॥ लोटो मर्निः ।। आडुत्तमस्य पिञ्च ३।४।९२॥ लोट उत्तमस्य आट् स पिञ्च । भवानि । भवार । भवाम ॥ अनद्यतने लङ्३।२।१११॥ अनधनभूतार्थवृत्तेर्धातोल ॥ लुललइक्ष्वडुदात्तः६।४।७१॥ एषु परेष्वङ्गस्याद् स चोदात्तः ॥ इतश्च३।४।१००॥ डितो लस्य परस्मैपदमिदन्तं यत्तस्य लोपः। अभवत् । अम- वताम् । अभवन् । अमवः। अभवतम् । अभवत । अभवम् । अम- वाव । अभवाम ॥ इति १९ अंशाः । विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्३। -- एष्वर्थेषु द्योत्येषु वाच्येषु वा लिडू ॥ यासुट परस्मैपदेपूदात्तो डिच्च ३।४।१०३ ॥ लिडः परस्मैपदानां यासुट् स चोदात्तो डिच्च ॥

३
प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः ।
सुदतियोः३।४।१०७॥
लिडस्तथयोः सुत् ॥
लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य ७।२।७९॥
सार्वधातुकलिडोऽनन्त्यस्य सस्य लोपः। इति सुटो लोपः।
यासुटः सस्यापि लोपे प्राप्ते ॥
अतो येयः ७।२।८०॥
अतः परस्य सार्वधातुकालेडो यास इय ॥
लोपो व्योलि ६।१।६६॥
वकारयकारयोलोंपो चलि । भवेत् । भवेताम् ।।
झेर्जुस ३।४।१०८॥
लिडो झेर्जुम् । भवेयुः । भवेः । भवेतम् । भवेत । भवेयम् ।
भवेव । भवेम ॥
किदाशिपि३।४।१०४॥
आशिपि लिडो यासुद् कित् ।।
स्कोस्संयोगाद्योरन्ते च ८।२।२९॥
पदान्ते झलि परे च यः संयोगस्तदायोः सकारककारयोलाप
इति सलोपः॥
कृिति च १।११५॥
गिकिडिनिमित्ते इग्लक्षणे गुणवृद्धी न स्तः। भूयात् ।
भूयास्ताम् । भूयासुः । भूयाः । भूयास्तम् । भूयास्त । भूयासम् ।
भूयास्व । भूयास्म ॥
लुङ्३।२।११०॥
भूतार्थवृत्तेर्धातोलुंड् ॥
माङि लुड्३।३।१७५॥
सर्वलकारापवादः॥
स्मोत्तरे लङ्च ३।३।१७६॥

सुगमकीमुद्याः। स्मोत्तरे माडि लह लुइ च ॥ च्लि लुङि३।११४३॥ शवायपवादः ॥ च्ले सिच ३।१।४४॥ इचाविती ॥ गातिस्थाधुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु २।४ ७७॥ इणादेशगातेः स्थाधुपिवतिभूभ्यश्च सिचो लक परस्मैपदे ॥ भूसुबोस्तिङि ७।३।८८॥ भूसू एतयोः सार्वधातुके तिडि गुणो न ।। अस्तिसिचोऽपृक्ते ७।३।९६॥ विद्यमानाल्सिचोऽस्तेश्चापृक्तहल ईद सियो लुप्तत्वान्नेट् ।अभूत् । अभूताम् ॥ सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ३।४।१०९॥ सिचोऽभ्यस्तादिदेश्च परस्य डितो झर्जुम् । इति प्राप्ते ॥ आतः३।४।११०॥ सिजलुक्यादन्तादेव झेर्जुस् । अभूवन् । अभूः । अभूतम् । अभूत । अभूवम् । अभूव । अभूम ॥ न माड्योगे६।४।७४॥ अडादौ न । मा भवान भूत् । मा स्म भवत् भूदा ॥ लिनिमित्ते लङ् क्रियातिपत्तौ ३।३ । १३९॥ हेतुहेतुमद्भावादि लिनिमित्तं तत्र भविष्यत्यय लड् स्यात् क्रियाया अनिष्पत्तौ। अभविष्यत् । अभविष्यताम् । अभविष्यन् । अभविष्यः । अभविष्यतम् । अभविष्यत । अभविष्यम् । अभ- विष्याव। अभविष्याम ॥ इति २० अंशाः । इति प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ।

प्रमयखण्डस्य प्रथमो भागः ।
४१
भू प्राप्तावात्मनेपदी।
टित आत्मनेपदानां टेरे३।४।७९ ॥
टितो लस्यात्मनेपदाना टेरेत्वं स्यात् । भवते ॥
सार्वधातुकमपित् १।२।४॥
अपित् सार्वधातुकं डिदत् ॥
आतो डितः७।२१८१॥
अतः परस्य डितामात इय् ॥
थासस्से ३।४।८०॥
टितो लस्य थासः से । भवेते । भवन्ते । भवसे । भवेथे ।
भवध्वे । अतो गुणे भवे । भवावहे । भवामहे ॥
लिटस्तझयोरेशिरेच ३।४।८१ ॥
लिडादेशयोस्तझयोरेशिरेच् एतो स्तः ॥
इणः पीध्वंलुलिटां धोऽङ्गात् ८।३।७८॥
इण्णन्तादगात्परेपामेपा धस्य मूर्धन्यः॥
विभापेटः ८।३।७९॥
इणः परस्मादिटः परेषामेपा धस्य वा मूर्धन्यः । वभूवे । वभू.
वाते । वभूविरे । बभूविषे । बभूवाथे । वभूविट्वे । वभूविध्वे ।
वभूवे । वभूविवहे वभूविमहे ॥
धि च ८।२।२५॥
धादी प्रत्यये सलोपः॥
ह एति ७।४।१२॥
तासस्त्योः सस्य ह एति परे । भविता । भवितारौ । भवि-
तारः । भवितासे । भवितासाये । भविताध्ये । भविताहे । भविता
स्वहे । भवितास्महे । भविष्यते । भविष्यते । भविष्यन्ते । भविष्यसे।
भविष्येथे । भविष्यध्वे । मविष्ये । भविष्यावहे । भविष्यामहे ।।
आमेतः३181९०॥
--

४२ । -- . सुगमकौमुद्याः। लोट एकारस्याम् ॥ सवाभ्यां वामौ ३।४।९१ ।। सवाभ्यां परस्य लोट एतः क्रमात् व अम् एतौ स्तः ।। एत ऐ३।४।९३॥ लोडुत्तमस्य एत ऐ । भवताम् । भवेताम् । भवन्ताम् । भवस्व । भवेथाम् । भवध्वम् । भवै । भवावहै । भवामहै । अभवत । अमवेताम् । अभवन्त । अभवथाः । अभवेथाम् । अमवध्वम् । अभवे । अभवावहि । अभवामहि ॥ लिङः सीयुत् ३।४।१०२॥ झस्य रन् ३।४।१०५॥ लिडो झस्य रन् । इटोऽत् ३।४।१०६॥ लिडादेशस्येटोत् । भवेत । भवेयाताम् । भवेरन् । भवेथाः । भवेयाथाम् । भवेध्वम् । भवेय । भवेवहि । भवेमहि । भविपीष्ट । भविपीयास्ताम् । भविपीरन् । भविपीष्ठाः। भविपीयास्थाम् । भविषीदम् । भविपीध्वम् । भविषीय । भविषीवहि। भविपीमहि ।। आत्मनेपदेवनतः७।१५।। अनकारात्परस्य आत्मनेपदेषु झस्यात् । जमविष्ट । अमवि- पाताम् । अमविपत । अभावष्टाः । अभाविपाथाम् । अमवि- इम् । अभविध्वम् । अमविपि । अभविष्याहे । अविष्मा । अभविष्यत । अमविप्येताम् । अभविष्यंत । अमविष्ययाः । अभविष्येथाम् । अमविष्यध्वम् । अभविष्ये अमविष्यावहि । अमविष्यमहि । ते प्राग्धातोः११४१८०॥ ते गत्युपसर्गसंज्ञका धातोः माझ प्रयोज्याः। ममवतीत्यादि। इति २१ अंशाः।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। रक्ष पालने । रक्षति । ररक्ष । रक्षिता । रक्षिष्यति । रक्षतु । अरक्षत् । रक्षेत् । रक्ष्यात् । अस्तिसिच इति ईट् ॥ वदवजहलन्तस्याचः७।२।३॥ वदेजेहलन्तस्य चागस्याचो वृद्धिः सिचि परस्मैपदेषु । इति प्राप्ते ॥ नेटि ७।२।४॥ इडादौ सिचि उक्तन्न ॥ इट ईटि ।। ८।२।२८॥ इटः परस्य सस्य लोप ईटि । सिजलोप एकादेशे सिद्धो वाच्यः ॥ अरक्षीत् । अरक्षिष्टाम् । सिजभ्यस्तति झेर्जुम् । अरक्षिपुः । अरक्षी। अरक्षिष्टम् । अरक्षिष्ट। अरक्षिपम् । अरक्षिष्व । अरक्षिष्म । अरक्षिष्यत् । चर्च अदने । जल्प व्यक्तायां वाचि । पस्ज गतौ ॥ धात्वादेः पःसः६।१६४॥ सज्जति । अयमात्मनेपद्यपि । सज्जते । गर्ज शब्दे ॥ कुहोश्चः७।४।६२॥ अभ्यासस्य कवर्गहकारयोश्चवर्गः । जगर्न । मन्थ विलोडने ॥ अनिदितां हल उपधायाः किति ६।४।२४॥ हलन्तानामनिदितामङ्गानामुपधाया नस्य लोपः किति डिति च । मथ्यात् । मथ्यास्ताम् । खादृ भक्षणे। चखाद। जीव प्राणधा- रणे । जिजीव । वुक्क मपणे । फुल्ल विकसने । टुओस्फुर्जा वन- निर्घोपे ॥ आदिर्भिटुडयः ३।३।५॥ उपदेशे धातोसद्या एते इतः॥ उपधायां च ८।२।७८॥ धातोरुपधाभूतयो रेफवकारयोर्हल्परयोः परत इको दीर्घः ॥

४४
॥
सुगमकौमुद्याः।
शपूर्वाः खयः ७।४।६१
अभ्यासस्य शपूर्वाः खयः शिष्यन्तेऽन्ये हलो लुप्यन्ते । हलादि-
रित्यस्यापवादः । स्फूति । पुस्फूर्ज । मुर्छा मोहसमुच्छाययोः ।
मूर्च्छति । कूज अव्यक्ते शब्दे । खेल चलने ॥
एच इग्नस्वादेशे १।१।४८॥
आदिश्यमानेषु ह्रस्वेषु एच इगेव स्यात् । चिखेल । टुनदि
समृद्धी ।
इदितो नुम् धातोः ७।१।६८॥
नन्दति । इदित्वान्नलोपो न । नन्द्यात् । रागि रहि लगि गती।
ऋदि आह्वाने रोदने च । खजि गतिवैकल्ये। णिदि कुत्सायाम् ॥
णो नः६।१।६५॥
धात्वादेः । निंदति । वृहि वृद्धौ शब्दे च ॥
उरत् ७।४।६६॥
अभ्यास ऋकारस्य अत् प्रत्यये। रपरत्वम् । हलादिः शेपः ।
ववृंद । टन शब्दे । स्तनति ।।
अत उपधायाः७।२।११६॥
उपधाया अतो वृद्धिजिति णिति च प्रत्यये ॥
णलुत्तमो वा ७।१।९१॥
उत्तमो णल् वा णित् । तस्तान । तस्तनतुः। तस्तान । तस्तन ।।
अतो हलादेर्लयोः ७।२१७॥
हलादेलघोग्यारस्य वा वृद्धिरितादी सिचि परस्मैपदे । अस्ता-
नीत् । अस्तनीत् ॥
इति २२ अंगाः।
गद व्यक्तायां वाचि । ग्रन गती । वनेः पृथग्रहणात् । नित्यं
पाडेः । अमानीत् । भल आयुगमने ।।
अतो लान्तस्य ७॥२२॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । अत्समीपौ यो रौ तदन्तस्याङ्गस्यातो वृद्धिः परस्मैपदे सिचि टि अतो हलादेरनयोरपवादः। अश्वालीत् । स्खल संचलने । गल अदने दल विशरणे । ददाल ॥ असंयोगाल्लिट कित् ११२॥५॥ अंसयोगात्परोऽपिल्लिट् फित् ॥ अत एकहलमध्येऽनादेशादोलिटि ६।४।१२० ॥ लिनिमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्गन्तदवयवस्यासंयुक्तहल्- मध्यस्यस्यात एत्वमभ्यासलोपश्च किति लिटि ॥ थलि च सेटि ६।४ । १२१॥ मागुक्तम् । आदेशश्चेह वैरूप्यकृदेव गृह्यते । तेन दहचरादी प्रकृतिजशूचरांतेषु सत्स्वपि एत्वादि स्यादेव । देलतुः । देलिथ । अदालीत् । मह पूजायाम् ॥ हृयन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् ७१२।५॥ हमयान्तस्य क्षणादेय॑न्तस्य श्वयतेरेदितश्च वृद्धिर्नेडादी पर- स्मैपदे सिचि । अमहीत् । हसे हसने अहसीत् । चिती संज्ञाने । पुगन्तेति गुणः । चेतति । चिचेत ॥ कृिति चेति गुणनिषेधः । चिचिततुः । चित्यात् । अचेतीत् । जिमु अदने । शुच शोके । वृपु सेचनहिंसासंग्लेशनेषु । वर्षति । उरत् । ववर्ष ॥ ऋदुपधेभ्यो लिटः कित्वं गुणात् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ ववृपतुः । घुपिर्विशब्दने ।। इर इत्संज्ञा वाच्या ॥ इरितो वा ३1३१५७॥ इरितो धातोः च्लेरड् वा परस्मैपदे । अधुपत् । अघोषीत् । च्युतिर आसेचने श्युतिर् श्चतिर क्षरणे। अट गतौ ॥ अत आदेः ७।४।७०॥ अभ्यासस्यादेरतो दीर्घः । पररूपापवादः । आट॥

--
सुगमकौमुद्याः।
आडजादीनाम् ६।४।७२॥
लुङादौ । आटश्च । आटत् । आटीत् । मा मवानटीत् । अत
सातत्यगमने । अर्च पूजायाम् ॥
तस्मानुड् दिहलः ७१४१७१॥
अनेकहलो धातोदी/भूताकारात्परस्य नुट् । आनर्व। आर्वत् ।
अर्ज अर्जने । अर्द गती याचने च ॥
इति २३ अंशाः।
ईर्ण्य ईर्ष्यायाम् ॥
संयोगे गुरु १।४।११॥
संयोगे परे हस्वं गुरुसंज्ञम् ॥
दीर्घ च ३।४।१२॥
गुरुसंज्ञम् ॥
इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः ३।३।३६॥
इजादियों गुरुमान् ऋच्छत्यन्यस्तत आम लिदि ॥
। आमः२।४।८१ ।।
आमः परस्य लुक् । लिङादेशापवादत्वाल्लावस्थायामेव लुक् ॥
कृदतिङ् ३।१।९३॥
सन्निहिते धात्वधिकारे तिभन्नः प्रत्ययः कृत्संज्ञः । इति
लिटः कृत्त्वात् कृत्तद्धितेति प्रातिपदिकत्वे सुबुत्पत्तिः कृन्मेजन्त
इत्यामन्तस्याव्ययत्वात् सुपो लुक् ।।
कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि३।११४० ॥
आमन्तालिट्पराः कृभ्वस्तयोऽनुप्रयुज्यन्ते ।।
अचो णिति ७१२१११५॥
जिति णिति च परेजन्ताङ्गस्य वृद्धिः । ईञ्चिकार । द्वित्वा-
त्परत्वाद्याणि प्राप्ते ॥
-
.

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। द्विवचनेऽचि १।११५९॥ द्वित्वनिमित्तेचि परेञ्च आदेशो न स्याद् द्वित्वे कर्तव्ये यणि कृते तु अनन्कत्वाद्वित्वं न स्यात् । ईर्ष्याञ्चक्रतुः ॥ एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् ७।२।१० ॥ उपदेशे यो धातुरेकाजनुदात्तश्च ततः परस्य वलाद्यार्द्धधातुकस्येद नाईश्चिकर्थ । ईर्ष्याञ्चकृव । कृतः कर्तृगे फले आत्मनेपदे प्राप्ते ।। आम्प्रत्ययवत् कृभोऽनुप्रयोगस्य १।३।६३ ॥ आम्मकृत्या तुल्यमनुप्रयुज्यमानात् कृलोऽप्यात्मनेपदम् । तच्च पूर्ववदेव नतु ततो विपरीतम् । तेन एधाञ्चक्रे इत्यादौ परस्मैपदं न। ईर्ष्याञ्चकारेत्यादौ तह न । भ्वसोस्तु कर्तृप्रत्यये तड्न पृथगस्तिग्रहण- सामर्थ्यानास्ते भावः । ईर्ष्यामासाईयौवभूवाअनुदात्ता वक्ष्यन्ते । उक्ष सेचने उक्षाञ्चकार। एज कम्पने । इखि इगि गतौ । इवांचकार । उछि उछे। अथ वेटः । ते च स्यसिचूसीयुट्तासिषु यथासम्भव- मिडूविकल्पवन्तः । त्वथू तनूकरणे ॥ स्वरतिसूतिसूयतिधूनूदितो वा७।२।४४॥ स्वरत्यादेख्दितश्च परस्य वलाद्याधातुकस्येट् वा । तत्वक्षिथ । स्कोरिति कलोपः । तत्वष्ठ । तत्वक्षिव । तत्वव । वक्ष्यमाणन्यादि- नियमाल्लिटि नित्यमेवेडिति परे । एवं रधादिष्वपि । त्वक्षिता। त्वष्टा । त्वक्षिष्यति ॥ पढोः कासि ८।२।४१॥ त्वक्ष्यति । इटि अत्वक्षीत् । इडभावे वदति वृद्धिः । अत्वा- सीत् ॥ झलो झलि ८॥२॥२६॥ झलः परस्य सस्य लोपो झलि अत्वाष्टाम् । पिधू शास्त्रे माङ्गल्ये च । स्वरतीति वेट्र। सिसेधिथ ॥ झपस्तथोझै धः ८।२।४॥

सुगमकौमुद्याः। झपः परयोस्तथयोधों नतु दधातेः । सिषेद्ध । सिषिधिय । सि- पिध्व । मतान्तरे तु लिटि नित्यमिट् । सेधिता । सेद्धा। सेधिष्यति सेत्स्यति असेधीत् । वबजेति वृद्धिः। असत्सीत् । असैद्धामि- त्यादि। इति २४ अंगाः॥ अनुदात्ताश्च- उदन्तदन्तरुणुष्णुयौतिस्नुपाश्चिडीशीश्रिच वृइवृत्रीच ॥स्युः तिवः सेट इमेऽथ चान्ये एकाजजन्ता अनिटोऽनुदात्ताः॥१॥ कान्तेपु शक्ल एकः ॥१॥ चान्तेषु पच् मुच रिच वच विच सिचः पटू ६ ॥ छान्तेषु प्रच्छेकः १॥ जान्तेषु त्यज् निजिर भज भञ्ज भुज् भ्रस्ज मस्ज् यज युज् रुज रज विजिर स्वा सञ्ज सृजः पंच- दश १५॥ दान्तेषु अद् क्षुद् खिद् छिद् तुद् नुद् पद्य मिद् विद्य विन्द् शद सद स्विद्य स्कन्द हदः पंचदश १५ ॥धान्तेषु ऋध क्षुध् बुध्य वन्ध युध रुथ् राध व्यध शुध साध सिध्या एकादश ११ ॥ नान्तेपु मन्यहनी द्वौ २ ॥ पान्तेषु आप क्षिप छुप तप तिप् तृप्य- दृप्य लिप लुप् वप शप स्वप सृपस्त्रयोदश १३॥ भान्तेषु यम रभ लभस्त्रयः ३ ॥ मान्तेषु गम् नम् यमरमश्चत्वारः ४॥ शान्तेषु कुश दंश दिसू दृश् मृश् रिश रुश लिश् विशस्पृशो दश १०॥ पान्तेषु कृप विप् तुप् द्विप दुप् पिप् पुष्य विषु शिप् शुष श्लिष्या एकादश ११ ।। सान्तेषु घसबसती द्वौ २ ।। हान्तेपु दह दिह दुह नह मिह रुह लिह वहोऽष्टौं ८॥ अनुदान्ता हलन्तेषु धातवो यधिकं शतम् ॥ सरूपधातुव्यावृत्त्यै युक्ता इत्संज्ञका इह ।। १ ।। अथानिटः॥ त्यज हानौ । थलि एकाच इति इनिपेधे प्राप्त ॥ कृसभृवस्तुद्रुश्रुवो लिटि ७।२।१३॥ झादिभ्य एव लिट इण् न स्यादन्यस्मादनिटोऽपि न निषेधः ।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम् ७।२।६३॥ उपदेशेऽजन्तात्तासौ नित्यानिटो धातोः थल इण्न ।। ऋतो भारद्वाजस्य ७।२।६३॥ तासी नित्यानिट ऋदन्तादेव थलो नेइ ऋदन्तमिन्नात्परस्य न निषेधः भारद्वाजस्य मते॥ अयमत्र संग्रहः॥ अजन्तोऽकारखान्चा यस्तास्यानिट् थलि वेडयम् ।। ऋदन्त ईद नित्यानिट् काद्यन्यो लिटि सेड् भवेत् ॥ १॥ तत्यजिथ । तत्य- क्थ । त्यक्ष्यति । वदव्रजेति वृद्धिः । अत्याक्षीत् । अत्याक्ताम् । अत्याधुः। तप संताप। तेपिथ। ततप्य । तप्ता। अताप्सीत् । णम महत्ये शब्दे च । नमति । नेमतुः । नेमिथ । ननन्थ । वदबजेति वृद्धिं बाधित्वा ॥ यमरमनमातां सक्च ७।२।७३॥ एपां सक् एभ्यः सिच इद् च परस्मैपदे । अनंसीत् । अनंसि- धाम् । अनसिपुः । क्षि क्षये । चिक्षाय । चिक्षयिथ । चिक्षेथ । चिक्षियिव । क्षेता॥ अकृत्सार्वधातुकयोीर्षः ७।४।२५॥ अजन्तागस्य दीर्घः यादी प्रत्यये नतु कृत्सार्वधातुकयोः । क्षीयात् ।। सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु ७।२।१॥ इगन्ताङ्गस्य वृद्धिः परस्मैपदे सिांचे । अझैपीत् । अक्षेष्टाम् ।' त्यादि ॥ इति २५ अंशाः। घृ सेचने । घरति । जघार । जघ्रथुः। जघर्थ । जनिवधर्ता॥ ऋद्धनोः स्ये ७।२।७०॥ आभ्यां स्यस्येट् । घरिष्यति ॥ ३ सुगमकौमुद्याः। रिङ्शयग्लिङ्य ७।४।२८॥ शे यकि यादावार्द्धधातुके लिङि च ऋतो रिङ् । रीङि प्रकृते रिविधिसामर्थ्यात् । दीपों न । घ्रियात् । अघापीत् इत्यादि ।स्म चिन्तायाम् ॥ ऋतश्च संयोगादेर्गुणः ७।४।१०॥ ऋदन्तस्य संयोगादेरङ्गस्य गुणः लिटि । परत्वाण्ण्यल्यप्ययम् । रपरत्वम् । उपधावृद्धिः । सस्मार । सस्मरतुः । स्मरिष्यति ॥ गुणोऽतिसंयोगाद्योः ७।४।२९॥ • अतः संयोगादेव॑दन्तस्य च गुणः यकि यादावार्द्धधातुके लि- डि च । स्मर्यात् । अस्मात् । सन्नन्तादात्मनेपदं वक्ष्यते । दैः शोधने । दायति ॥ आदेच उपदेशे शिति ६।१॥ ४५ ॥ उपदेश एजन्तस्य धातोरात्वं स्यान्नतु इत्संज्ञकशादौ प्रत्यये ॥ आत औ णलः ७।११३४॥ आदन्ताद्धातोर्णल औ । ददौ ॥ आतो लोप इटिच ६।४।६४॥ अजायोराईधातुकयोः किदिटोः परयोरातो लोपः। द्वित्वा- त्परत्वाल्लोपे प्राप्ते द्विवचनेचेति निषेधाद् द्वित्वे कृते आलोपः। ददतुः । ददुः। दादथ । ददाथ। ददिव। ददिम । दाता । दास्यति । दायात्। दायास्ताम् । सगिटौ । अदासीत् । अदासिष्टाम् । अदा. स्यत् । ग्लै म्लै हर्षक्षये । ग्लायति । जग्लौ । जग्लिथ । जग्लाथ ॥ वाऽन्यस्य संयोगादेः६।४।६८॥ स्थाभिन्नस्य संयोगादेर्धातोरात एत्वं वार्द्धधातुके किति लिडे । ग्लायात् । ग्लेयात् । ध्यै चिन्तायाम् । मिह सेचने । मिमेहिथ ।। होटः८।२।३१॥ इस्य ढः झलि पदान्ते च ॥

५१ प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। ढो ढे लोपः ८।३।१३॥ मेढा । मेक्ष्यति ॥ शल इगुपधादनिटः क्सः३।१।४५॥ इगुपधो यः शलन्तोऽनिडधानुस्ततः परस्ये च्ले क्सः । अमि- क्षत् । अमिक्षताम् ॥ इति परस्मैपदिनः । काशृ दीप्तौ। प्रकाशते । चकाशे । काशिता । काशिष्यते । काशताम् । अकाशत । काशेत । काशिशीष्ट । अकाशिष्ट । अका- शिष्यत । भास दीप्तौ। भाप व्यक्तायां वाचि।शिक्ष विद्योपादाने । भिक्ष भिक्षायाम् । चेष्ट चेष्टायाम् । लोच दर्शने । वदि अभिवाद- नस्तुत्योः । वन्दते । यती प्रयत्ने । येते । येताते । मुद हर्षे । ईक्ष दर्शने । ईक्षांचक्रे । एध वृद्धौ ॥ अथानिटः॥ कुङ्शब्दे । धृङ् अवध्वंसने ॥ उश्च१।२।१२॥ ऋवर्णात्परौ झलादी लिइ तड्परः सिचेत्येती कितौ । धृपीष्ट ॥ ह्रस्वादङ्गात् ८।२।२७॥ सिचो लोपो झलि। अधृत । त्रैङ् पालने । तत्रे । अत्रास्त । हद पुरीपोत्सर्गे। अहत्त । अहत्साताम् । रम रामस्ये ।रेमे । रप्स्यते । डुलभप् प्राप्तौ । इत्यात्मनेपदिनः ।। टुयाच याच्यायाम्। धाबु गतिशुद्धयोः । हिक अव्यक्ते शब्दे ॥ अथानिटः॥ डुपचप् पाके। पेचतुः । पेचिय। पपक्थ । पक्ता । अपाक्षीत् । अपक्त । धृ धारणे । धरति । धरते । दधार । भ्रतुः । दधर्थ। दध्रिव । दधिपे । धर्ता । धरिष्यति । ध्रियात् । धृपीष्ट । अधाप त् । अधृत। भृञ् भरणे । बभर्थ । बभूव । लुडादौ मर्ता । इत्यादि धृञ्चत् । अमृत ।। इति उभयपदिनः ।। इति भ्वादयः ।। इति २६ अंशाः।

सुगमकौमुद्या।
अद् भक्षणेऽनिट् परस्मैपदी॥
अदिप्रभृतिभ्यः शपः२।४।७२ ॥
लुक । अत्ति ॥
लिटयन्यतरस्याम् २११1१०॥
अदो घस्ल वा लिटि । जघास ॥
गमहनजनखनघसा लोपः कृित्यनङि६।४।९८॥
एपामुपधाया लोपः कृिति न त्वा ॥
शासिवसिपसीनाञ्च८१३१६०॥
इणकुभ्यां परस्यैपां सस्य पः । जक्षतुः । यसेस्तासावभावात
थलि नित्यमिद । जघसिथ ॥
इडत्त्यतिव्ययतीनाम् ७।२।६६॥
एभ्यस्थलो नित्यमिद् । आदिथ । अत्ता ॥
हुझल्भ्यो होघैः ६।४। १०१॥
होझलन्तेभ्यश्च हेधिः। अद्धि ।
अदः सर्वेषाम् ७।३।१००॥
अदः परस्यापृक्तसार्यधातुकस्याट् सर्वमते । आदत् ॥
उस्यपदान्तात् ६।१।९६॥
अपदान्तादवर्णादुसि पररूपमेकादेशः । अधुः ।।
लुड्सनोर्घस्ल २।४।३७॥
अदो घस्ल लुडि सनि च ॥
पुपादिद्युताइदितः परस्मैपदेषु ३।११५५ ॥
दिवादिस्यपुपादेर्युतादेलं दितश्च च्लेरइ परस्मैपदे । अधसत् ।
नसोरल्लोपः६।४।१११॥
श्रस्यास्तश्चाकारस्य लोपः सार्वधातुके हिति । स्तः । संति ।
अस मुवि ।
आसि ।।

. प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । अस्तेर्भूः२।४।५२॥ आर्द्धधातुके । वभूव । भविता । इत्यादि ॥ वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च ६।४।११९॥ घोरस्तेश्चैत्वं स्यादौ परे । अभ्यासलोपश्च । आभीयत्वेन एत्व- स्यासिद्धत्वादधिः। एधि । स्तात् । स्तम् । लङि । अस्तिसिच इति ईद । आसीत् ।। हु दानादानयोः आदाने प्रीणने च । परस्मैपद्यनिद् ॥ जुहोत्यादिभ्यः श्लुः २।४।७५ ॥ ८ शपः॥ श्लौ६।१।१०॥ धातो । जुहोति ॥ अभ्यस्तात् ७।११४॥ झस्य । हुश्नुवोः सार्वधातुके ६।४।८७ ॥ जुहोतेः नुप्रत्ययान्तस्य चानेकाचो संयोगपूर्वोवर्णस्य यणजादौ सार्वधातुके । उवङोऽपवादः। जुह्वति ॥ भीहीभृहुवां *लुवच्च ३।१॥३९॥ एभ्यो लिटयाम् वाऽमि । श्लाविव कार्यञ्च । जुहवाञ्चकार । जुहाव । होता ॥ जुसि च ७।३। ८३॥ अजादी जुसीगन्ताङ्गस्य गुणः। अजुहयुः। जुहुयात्। इह गुणो न । भाष्ये पिच डिन्न डिच पिन्न इति व्याख्यानात् विशेपविहि- तेन डित्त्वेन पित्त्वस्य वाधात् स्यात् । अहीपीत् ॥ देिव क्रीडाविजिगीपाव्यवहारयुतिस्तुतिमोदमदस्वप्मकान्तिग- तिषु॥ दिवादिभ्यः इयन ३।१।६९॥

सुगमकौमुद्याः।
कर्व सार्वधातुके । इदमग्रेऽप्यनुवर्तते । शपोऽपवादः ।। ,
स्वादिभ्यः श्नुः३।११७३॥
तुदादिभ्यः शः३।१।७७॥
रुधादिभ्यः श्नम् ३।११७८॥
गुणं वाधते ॥
तनादिकृभ्य उः३।११७९॥
क्यादिभ्यः श्ना३।१।८१॥
हलि च ८।२।७७॥
रेफेवान्तधातोरुपधाया इको दीर्घा हलि । दीव्यति । देविता ।
इत्यादि । पुत्र अभिपवेनिट्र उभयपदी। अभिपवः सपनं पीडनं
सानं मुरासन्धानश्च । मुनोति । मुनुतः । मुन्वन्ति ।
लोपश्चास्यान्यरस्यां म्वोः ६।४।१०७ ।।
असंयोगपूर्वो यः प्रत्ययोकारस्तदन्तागस्य या लोपो म्यो।
मन्यः । मुनुवः । सुन्चहे । मुनुवहे ॥
उतश्च प्रत्ययासंयोगपूर्वात् ६।४।१०६ ॥
असंयोगपवा यः प्रत्ययोकारस्तदन्ताददात्परस्य दे?छ । मुनु।
स्तुसुधूभ्यः परस्मैपदेपु ७१२१७२॥
सिर इट् । अमारीत् । अगोष्ट । तुद व्ययनेनिमगपदी ।
तुदति । तुदसे । तोता ॥
लिङसिचावात्मनेपदेषु १।२।११।।
यामीपाटलः परी दरम्यादी टि गिधी किनापात्मनेपदेषु ।
तुगी । अतारमीत् । अवा। भारगानाम् ॥ धिर मारणे
उभयपनिट । रणदिराप्रमोग्लोणत्यम्यागिटत्यानुगाः
पागणीन्द्रमा समानामन्या गटापास
भरगन् । मान्धाम । समयन ।।

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । दश्च८।२।७५॥ धातोर्दस्य पदान्तस्य सिपि रुर्ग । अरुणत् । अरुणः । अरुधत् । अरौत्सीत् ॥ इति २७ अंशाः । तनु विस्तार उभयपदी सेट् । तनोति । तन्वः। तनुवः । तनुते । तनिता॥ अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो' झलि किति ६।४।३७॥. अनुनासिकान्तानामेषां वनतेश्च लोपः झलादी कृिति । यमिर- मिनमिगमिहनिमन्या अनुदानोपदेशाः । तनु क्षणु क्षिणु ऋणु तृणु घृणु वनु मनु तनोत्यादयः ॥ तनादिभ्यस्तथासोः २।४।७९॥ तनादेः सिचो वा लुक तथासोः । अतत । अतनिष्ट । अतथाः। अतनिष्ठाः । डुकृञ् करणेनिट् उभयपदी । करोति ॥ अत उत् सार्वधातुके ६।४।११० ॥ उप्रत्ययान्तकृतोऽत उत्सार्वधातुके कृिति । कुरुतः ।। नित्यं करोतेः ६।४।१०८॥ करोतेः प्रत्ययोकारस्य नित्यं लोपो वमयोः । कुर्वः । कुर्मः। कुरुते । कर्ता । हिलुकोसिद्धत्वादुत्वम् । कुरु ॥ ये च ६।४।१०९॥ कृन उलोपो यादौ प्रत्यये । हलि चेति दीर्ये प्राप्ते॥ न भकुच्र्छराम् ८।२।७९॥ भस्य कुच्छरोश्च उपधाया न दीर्घः । कुर्यात् । अकृत । अस्य विशेपो वक्ष्यते । डुक्रीच् द्रव्यविनिमये उभयपनि । क्रीणाति ॥ श्राभ्यस्तयोरातः ६।४।११२॥

सुगमकौमुद्याः। अनयोरातो लोपः कृिति सार्वधातुके ॥ ई हल्ययोः ६।४।११३॥ नाभ्यस्तयोरात ईत्सार्वधातुके कृिति हलि न तु घुसंज्ञस्य । कीणीतः । क्रीणन्ति । क्रीणीते । कोणाते । कोणते । नेता । सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वचवर्मवर्ण चूर्णचुरादिभ्यो णिच ३ । ११२५ ॥ चुर स्तेये ॥ गुणः ॥ सनाद्यन्ता धातवः३।११३२॥ सनादयः कमेणिडन्ताः प्रत्यया अन्ते येपान्ते धातुसंज्ञाः । सन्नाद्याः सन् काम्यणिच् क्यचक्यपी क्यड्डाचारविप् यइ यगा- येयडी णि तिः शप् गुणायादेशाः । चोरयति ॥ णिचश्च १।३।७४॥ णिजन्तादात्मनेपदम् कर्तृगामिनि कियाफले । चोरयते ॥ कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि३।१।३५ ॥ कामृधातोः प्रत्ययान्तेभ्यश्वाम् नतु मन्त्रे ।। कास्यनेकान्ग्रहणं कर्तव्यम् * ॥ एवं च प्रत्ययग्रहणं सूने न कार्यमित्याहुः । क्लीवाञ्चक्रेइत्या- द्यर्थवामिति परे॥ अयामन्तालाय्येत्न्विष्णुषु ६।४।५५ ॥ आमादिपु णेरय लोपापवादः । चोरयाञ्चकार । चोरयाञ्चके ।। णेरनिटि६।४।५१॥ अनिडादावार्द्धधातुके णेलाप । चोर्यात् ॥ मिश्रिदुश्रुभ्यः कर्तरि चङ्:३।१॥४८॥ ण्यन्तात् श्यादिभ्यश्च । च्लेश्चइ कर्तृलुडि णिलोपात्परत्वादेरने- काच इति यणि प्राप्ते॥

णिच् । भावयति । णिचि अच आदेशो न स्यादित्वे कर्तव्ये ।।
प्रयमरखण्डस्य प्रथमा
ण्यल्लोपावियङ्यणगुणवृद्धिदीर्धेभ्यः पूर्वविप्रतिपे-
धेन ॥
इयडू । अततक्षत् । यण । आटिटत् । गुणः । कारणा । वृद्धिः
कारकः । दीर्घः कार्यते ॥
गौ चड्युपधाया ह्रस्वः७।४।१॥
चइपरे णौ यदङ्गं तस्योपधाया ह्रस्वः ।।
चङि६।१।११॥
अनभ्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य हे अजादेस्तु द्विती-
यस्य ॥
दीपों लघोः ७१४।९४॥
चइपरे णौ यल्लघु तत्परो योङ्गस्यावयवो लघुरभ्यासस्तस्य
दीर्घः स्याण्णावग्लोपेऽसति । अचूचुरत् ॥
इति २८ अंशाः।
भज विश्राणने ॥
सन्वल्लघुनि चङ्परेनग्लोपे ७।४।९३ ॥
चड्परे णौ यलघु तत्परो योङ्गस्यावयवोभ्यासस्तस्य सनीर
कार्य स्याण्णावग्लोपेऽसति ॥
सन्यतः ७।४।७९॥
अभ्यासस्यात इः सनि । दीर्घा लघोः । अवीभजत् । लोक
नाग्लोपिशास्वृदिताम् ७।४।२॥
णिच्यग्लोपिनः शासेमदिताञ्चोपधाया दस्खो न चट्परेणी।
अलुलोकत् ॥
दर्शने ॥
भुवोऽवकल्कने ॥

५८
• •
सुगमकौमुद्याः।
ओः पुयणज्यपरे ७।४।८०॥
सनि परे यदङ्ग तदवयवाभ्यासोकारस्यत्वं परर्गयराजकारेष्ववर्णपरेषु
परतः। अवीभवत् । अवीभवत । अथादताः । कथ वाक्यप्रबन्धे ।।
अतो लोपः६।४।४८॥
आईधातुकोपदेशकाले यददन्तन्तस्यातो लोप आईधातुके।
अचः परस्मिन् पूर्वविधौ १ । १७॥
परनिमित्तोऽजादेशः स्थानिवत् स्थानिभूतादचः पूर्वत्वेन दृष्टस्य
विधौ कर्तव्ये । इति अल्लोपस्य स्थानिवद्भावांन्न वृद्धिः । कथयति ।
अचकथत् । अग्लोपित्वान्नदीर्घसन्वद्भावी ।
इते भ्वादयश्चराधता धातवः ।
कण्डू गात्रविधपणे ॥
कण्डादिभ्यो यक्३।११२७॥
कण्डादयो धातवः प्रातिपदिकानि चेति द्विधा तत्र धातुभ्यः
स्वार्थे यक् । कण्डूयति कण्डूयते । अकण्डूयिष्ट ।।
तत्प्रयोजको हेतुश्च ॥४॥५५॥
कर्नुः प्रयोजको हेतुसंज्ञः कर्वसंज्ञश्च ॥
हेतुमति च ३ । १ ॥२६॥
प्रयोजकव्यापारे प्रेपणादी वाच्ये धातोणिच् । भवन्तं प्रेरयति
भावयति । अबीभवत् । रक्षयति ! अररक्षत् । खादयति । नाग्लो-
पिशास्वदिताम् ! अचखादत् । हादयति । अजितदत् । शील.
यति । अशीशिलत् । नादयति । अनीनदत् । चेतयति । अची-
चितत् ॥
धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा३।१॥७॥
इषिकर्मण इपिणैककर्टकाद्धातोः सन बेच्छायाम् ॥
सन्यङोः६।१॥९॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः। सन्नन्तस्य यङन्तस्य च प्रथमैकाची वस्तीजादेस्तु द्वितीयस्य। इति द्वित्वम् ।। सनि ग्रहगुहोश्च ७।२।१२ ॥ अहेर्गुहेरुगन्ताच्च सन इण न॥ इको झल् ११२।९॥ इगन्ताज्झलादिः सन् कित्। बुभूपति । जिजीविपति । सन्यतः निनदिपति ॥ अज्झनगमां सनि ६।४।१६॥ अजन्तानां हनः इडिणिकादेशगमेश्च झलादी सनि दीर्घः । चिक्षीपति ।। पूर्ववत्सनः १।३।६२॥ सनः पूर्वो यो धातुस्तेन तुल्यं सन्नन्तादप्यात्मनेपदम् । डिड- यिपते ॥ धातोरेकाचोहलादेः क्रियासमभिहारे य३।१॥२२॥ पौनःपुन्यं भृशार्थश्च क्रियासमभिहारस्तस्मिन्धोत्ये एकाची हलादेर्धातोर्यक॥ गुणो यङ्लुकोः ७।४।८२॥ अभ्यासस्य गुणः या यड्लुकि च। पुनः पुनर्भृशं वा भवति वोभूयते । बोभूयाञ्चके । अवोभूयिष्ट । दीर्घोऽकितः ७।४।८३॥ अकितोऽभ्यासस्य दी? यङि यड्लुकि च । रारक्ष्यते ॥ यस्य हलः ६।४।४९॥ हला परस्य यशब्दस्य लोपः आर्द्धधातुके। आदेः परस्य । रार. क्षांचा रारक्षिता॥ इति २९ अंशाः।

सुगमकौमुद्याः। योऽचि च २।४।७४॥ यडोऽच्मत्यये लुक् । चान्तं विनापि बहुलं लुक् । अयमनैमित्ति- कत्वादादी भवति । ततः प्रत्ययलक्षणेन यडन्तत्वाद्वित्वम् । शेषा- कतरि परस्मैपदम् । चर्करीतं चेत्यदादौ पाठाच्छपो लुक् । रितपा शपानुवन्धेन निर्दिष्टं यद्गणेन च ॥ यत्रैकाग्रहणं चैव पञ्चैतानि न यइलुकि ॥१॥ इत्यपि स्मरणीयम् । इयं परिभाषा निर्मूला इत्यप्याहुः॥ यङो वा ७।३।९४॥ यडन्तात्परस्य हलादेः पितः सार्वधातुकस्येड् वा । भृसुवोरिति गुणनिषेधो यड्लुकि भाषायां न । बोभूतु तेतिक्ते इति छन्दसि निपातनात् । वोभवीति । बोभोति । वोभूतः । वीभुवति । बोभ- वाञ्चकार । बोभविता । अवोभवीत् । अवोभोत् । अबोभूताम् । अवोभवुः । वोभूयात् । वोभूयाताम् । वोभूयात् । वोभूयास्ताम् । अवोभूवीत् । अवोभोत् । अवोभूताम् । अवोभूवुः । अबोमवि. ष्यदित्यादि । राष्टि। रारष्टः । रारक्षति । रारक्षि । हो । राराहि । अरारक्षीत् । अरारद लाडे अरारक्षीत् ।। सुप आत्मनः क्यच३।११८॥ इपिकर्मण एपितसंवन्धिनः सुवन्तादिच्छार्थे वा क्यच् ॥ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः २।४।७१॥ एतयोरवयवस्य सुपो लुक् ॥ क्यचि च ७।४।३३॥ अस्य ईत् । आत्मनः पुत्रमिच्छति पुत्रीवति ॥ नः क्ये १।४।१५॥ क्याच क्यडि च नान्तमेव पदन्नान्यत् । समिध्यति ॥ क्यस्य विभापा ६।४।५०॥ हलः परयोः क्यच्क्यडोलोपो वाऽर्दधातुके । समिधिता। समिध्यिता॥

स्यादिषु परेषुभावकर्मणोर्गम्यमानयोः स्यादीनामिडागमश्च । अय- उपदेशे योञ्च् तदन्तानां हनादीनांच चिणीवाङ्गकार्य वा स्यात् मिद् चिण्वभावसंनियोगशिष्टत्वात्तदभावे न । माविता । भविता । प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । काम्यञ्च ३।१।९॥ उक्तविपये। पुत्रकाम्यति । यशस्काम्यति ॥ उपमानादाचारे ३।१।१०॥ उपमानाकर्मणः सुबन्तादाचारेऽर्थे क्यच् । पुत्रमिवाचरति पुत्री- यति च्छात्रम् ॥ अधिकरणाच ॐ ॥ प्रासादीयति'कुटयाम् ॥ कर्तुः क्यङ्सलोपश्च ३ । १।११॥ उपमानात्कर्तुः सुवन्तादाचारे क्यङ् वा। सान्तस्य तु कर्तृवाच- कस्य लोपो वा क्यड वेत्युक्तेः । पक्षे वाक्यं कृष्ण इवाचरति कृष्णायते । ओजायते। अप्सरायते ॥ सर्वप्रातिपदिकेभ्यः क्विव्या वक्तव्यः ॥ सुप इति न संबध्यते । तेन पदकार्य न ।। वेरपृक्तस्य ६।१।६७॥ अपृक्तस्य वस्य लोपः। कृष्णति ॥ भावकर्मणोः १।३।१३॥ लस्यात्मनेपदम् ॥ सार्वधातुके यक्३ ।। ६७॥ धातोर्यक् भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके । मावे प्रथमैकवचनमेव । अनभिहिते कतरि तृतीया । त्वया मया अन्यैश्च भूयते वभूवे ॥ स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेन्झनग्रह- दृशां वा चिण्वदिट् च ६।४।६२॥

सुगमकौमुद्याः। भाविष्यते । भविष्यते । भूयताम् । अभूयत । भूयेत । भाविषीष्ट । भविपीष्ट ॥ चिण् भावकर्मणोः३।१।६६॥ च्लेश्चिण भावकर्मवाचिनि तशब्दे ॥ चिणो लुकू ६।४।१०४॥ चिणः परस्य तशब्दस्य लुक् । अभावि । अभाविष्यत । अभ- विष्यत । कर्मणि तड् । अनुभूयते आनन्दश्चैत्रेण त्वया मया च । अनुभूयेते । अनुभूयन्ते । त्वमनुभूयसे। अहमनुभूये । इत्यादि । रक्ष्यते। अरक्षि ॥ इत्याख्यातम् । इति ३० अंशाः। इति प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः। धातोः३।११९१॥ अधिकारः॥ तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् ३ । ११९२॥ धात्वधिकारे सप्तम्यन्ते कर्मणीत्यादी वाच्यत्वेन स्थितं कुम्मा- दि तद्वाचकं पदमुपपदसंज्ञम् ।। कृदतिङ् । वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् ३ । ११९४ ॥ अस्मिन्धात्वधिकारेऽसरूपोऽपवादमत्ययः उत्सर्गस्य वाधको वा स्यधिकारोक्तं विना ॥ कृत्याः३।१।९५॥ 'तव्यत्तव्यानीयर्यण्ण्यश्यपूकेलिमरः कृत्यसंज्ञाः ॥ कृतरि कृत ३।४।६७॥ फुत्मत्ययः कर्तरि स्यात् ॥ तयोरेव कृत्यक्तखलाः३।४।७०॥ एते मावकर्मणोरे ॥ तव्यत्तव्यानीयरः३।११९६॥

चस्य जस्य च कुत्वं घिति ण्यति च प्रत्यये । पाक्यम् ॥
चाल्लिडू। पाठय' । पठिता । त्व कन्या वहे. ॥
प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः।
धातोरेते प्रत्ययाः स्युः । एधितव्यम् । एधनीयम् त्वया।
नावे एकत्वं क्लीवत्वञ्च । चेतव्यश्चयनीयो वा धर्मस्त्वया । चेतव्या
सम्पत्तिः । चेतव्यं धनम् ॥
केलिमर् च ॥
पचेलिमाः मापाः । कर्मणि प्रत्ययः॥
अचो यत् ३।११९७॥
अजन्ताद्धातोर्यत् । चेयम् । जेयम् ॥
वान्तो यि प्रत्यये ६।१।७९॥
यादी प्रत्यये ओदीतोखावी । श्रव्यम् ॥
धातोस्तन्निमित्तस्यैव ६।१।८०॥
यादौ प्रत्यये धातोरेचश्चेदवावी तर्हि तन्निमित्तस्यैव । भव्यम् ।
तन्निमित्तस्य किम् । ओयते । औयत् ॥
ओरावश्यके ३।१।१२५ ॥
उवर्णान्ताद्धातोर्ण्यत् अवश्यंभावे द्योत्ये। अवश्यं भवितुं योग्यं
भाव्यम् । श्राव्यम् ॥
पोरदुपधात् ३।११९८॥
पवर्गान्ताददुपधाद्यत् । शप्यम् । लभ्यम् । सारूप्यान्न ण्यत् ।
तव्यदादयः स्युरेख । शप्तव्यम् । शपनीयम् ।।
ऋदुपधाचाक्लपितेः३।१।११०॥
क्यप् ।वृत्यम् । वृध्यम् ॥
ऋहलोय॑त् ३।१।१२४॥
ऋवर्णान्तादलन्ताच धातोर्ण्यत् । हार्यम् । वाह्यम् ॥
चजोः कुपिण्ण्यतोः ७।३।५२॥
अहे कृत्यतृचश्व ३।३।१६९॥

सुगमकौमुद्याः।
शकि लिङ्च ३।३ । १७२॥
शक्ती लिङ् । चात्कृत्याः । वाह्यः । वहनीयः । त्वं मा
वहः॥
ण्वुल्तृचौ ३ । १ । १३३॥
धातोः॥
युवोरनाको ७।१।१॥
युवुएतयोरनुनासिकयोः अन अक एती स्तः। कारकः ।
कर्ता॥
नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः ३ । १ । १३४॥
नन्द्यादेयुः ग्रह्यादणिनिः पचादेरच् । नन्दनः । लवणः ।
निपातनाण्णः । ग्राही॥
आतो युक् चिणकृतोः ७।३ । ३३ ॥
आदन्तस्य युक् चिणि निति णिति कृति च । स्थायी । पचः।
पचादिराकृतिगणः । सर्वधातुभ्य एवान् इति प्रादुः ।।
इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः३।१ । १३५॥
एभ्यः कः । क्षिपः । कृमः । ज्ञः। प्रियः ।।
ऋत इद्धातोः ७।१।१००॥
रपरत्वम् । फिरः॥
आतश्चोपसर्गे ३।१।१३६॥
कः । कुगतिपादयः इति वक्ष्यमाणन गमासः । मुग्लः । माः॥
आशिपिच ३।१।१५०॥
आशीपियार्धानान । जीवताजीवकः । नन्दकः ॥
कर्मण्यण् ३।२।१॥
पर्मण्युपपदे धातोरण ॥
उपपदमति २।२।१९॥

पौनःपुन्ये द्योत्ये सुप्युपपदे णिनिः। क्षीरपायेिण उशीनराः।
सप्तमीपञ्चमीभिन्नेशप उपपदे जनेर्डः । अजः। द्विजः। जनि-
प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः ।
उपपदं समर्थन नित्यं समस्यते अतिडन्तश्चायं समासः। प्राति.
पदिकत्वम् । सुपो लुक् । कुम्भं करोतीति कुम्भकारः ।।
आतोऽनुपसर्ग कः३।२।३॥
आदन्ताद्धातोरनुपसर्गात् कर्मण्युपपदे का स्यात् । गोदः । पा.
णित्रम् । नेह । गोसंदायः॥
क्विपूच ३।२।७६॥
अयमपि दृश्यते ॥
हस्वस्य पिति कृति तुक ६।१।७१ ॥
कृत् ॥
इति ३१ अंशाः।
सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये ३।२१७८॥
अजात्यर्थे सुपि धातोणिनिः ताच्छील्ये द्योत्ये । उष्णमोजी ।
उपजीवी ॥
कर्तर्युपमाने ३।२।७९॥
णिनिः । उष्ट्रकोशी ॥
व्रते ३।२।८०॥
णिनिः । स्थण्डिलशायी॥
बहुलमाभीक्ष्ण्ये ३।२।८१॥
मृते इत्यधिकृत्य ॥
अन्येष्वपि दृश्यते ३।२।१०१॥
भिन्नादपि काकान्तरेशप कचित् । परिसा ॥
सक्तवतू निष्ठा १1१।२६॥
एती निष्ठासंज्ञौ ॥

सुगमकौमुद्याः।
निष्ठा ३।२।१०२॥
भूतार्थवृत्ते तोर्निष्ठा स्यात् । नातं मया। स्तुतस्त्वया विष्णुः ।
विष्णुर्विश्वं कृतवान् ॥
युकः किति ७।२।११॥
श्रिज एकाजुगन्ताच गिकितोरिण् । न श्रितः भूतम् भूतवान् ॥
गत्यकर्मकश्लिपशीस्थासवस जनरूहजीर्यतिभ्यश्च
३।४।७२॥
कर्तरि क्तः स्याद्भावकर्मणोश्च । गङ्गाङ्गतः। गङ्गां प्राप्तः । सातः
सः। पक्षे प्राप्ता गङ्गा तेनेत्यादि । शेपं वक्ष्यते ॥
मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च ३।२। १८८॥
वर्तमाने क्तः । राज्ञां मतः । इष्यमाण इत्यर्थः । बुद्धः पूजितः।
चात् शीलितो रक्षितः क्षान्त आक्रुष्टो जुष्ट इत्यादि ।
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे३।२।१२४॥
पचन्तं चैत्रम्पश्य ॥
आने मुकू ७१२१८२॥
अदन्ताङ्गस्यातो मुक आने परे । पचमानं चैत्रं पश्य । प्रथमा-
समानाधिकरणेपि कचित् । सन् ब्राह्मणः ।।
तो सत्३।२।१२७॥
शतृशानची सत्संज्ञी॥
लटः सदा ३।३।१४॥
करिष्यन्तं करिष्यमाणं पश्य । प्रथमासमानाधिकरणेऽपि
कचित् । करिष्यतीति करिष्यन् ।।
आक्केस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिपु ३।२।१३४॥
विपममिव्याप्य वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तच्छीलादिपु कर्टपु
योध्याः॥

कियार्थायां क्रियायामुपपदे भविष्यदर्थे धातोरेतौ स्तः। अव्य- यकृतो मावे । घटं कत्तु याति । घर्ट कारको याति ॥ कमिन्ने कारके घज्ञ। मासः।संज्ञायामिति प्रायिकम् । लामो लब्धः। कृत्यल्युट इत्यतः प्राक् मावे अकर्तरि च कारके इति ६७ प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः । तन् ३।२।१३५॥ कर्ता कटम् ॥ चलनशब्दार्थादकर्मकााच ३।२।१४८॥ चलनार्याच्छब्दार्थाचाकर्मकाद युनू । चलनः। शन्दनः। इत्यादि। अनुदात्तेतश्च हलादेः३।२।१४९॥ अकर्मकााच । वर्तनः । वर्द्धनः ।। कुधमण्डार्थेभ्यश्च ३।२।१५१ ॥ . क्रोधनः । मण्डनः ॥ सनाशंसभिक्ष उः३।२।१६८॥ चिकीर्षुः । आशंसुः । भिक्षुः॥ अन्येभ्योऽपि दृश्यते ३।२।१७८ ॥ किम् । छिद् । मिद् । मितहादिभ्यः डुः । मितदुः । शतदुः । तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियायाम् ३।३।१०॥ समानकर्तृकेषु तुमुन् ३।३।५८॥ इच्छार्थेष्वेककर्तृकपूपपदेषु धातोस्तुमुन् । इच्छति मोक्तम् ।। भावे ३।३।१८॥ सिद्धावस्थापन्ने धात्वर्थे वाच्ये धातोर्पञ् । पाकः पाकौ ॥ अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ३।३।१९॥ दयमप्यनुवर्तते ।। एरच ३।३।५६॥

.. सुगमकौमुद्याः। जयः ।नयः ॥ ऋदोरम् ३।३।५७॥ करः। गरः । लवः । यवः स्तवः ॥ घभर्थे कविधानम् ॥ मस्थः । विघ्नः॥ हितः क्रिः३।३।८८॥ अयमथुच भाव एव ।। केर्मम् नित्यम् ४।४।२०॥ किमत्ययान्तान्नित्यं मा निर्वृत्तेऽर्थे । पाकेन निवृत्तं पक्तिमम् ।। भावप्रत्ययान्तादिमबक्तव्यः ॥ निर्वृत्तेऽथें । त्यागिमम् । पाकिमम् ।। द्वितोऽथुच ३।३।८९॥ वेपथुः । श्वयथुः॥ इति ३२ अंशाः। स्त्रियां क्तिन् ३।३।९४॥ स्त्रीलिङ्गे भावादी क्तिन् । धजोऽपवादः । अजपी न्तु परत्वाद्धा- धते । कृविः । चितिः । स्तुतिः॥ तितुत्रतथसिसुसरकसेपु च ७।२।९॥ एपान्ने । दीप्तिः । स्फायी । स्फातिः । संपदादिभ्यः छिः । सम्पत् । विपत् । क्तिनपि । संपत्तिः । पिपत्तिः ॥ अप्रत्ययात् ३।३।१०२॥ प्रत्ययान्तेभ्यो धातुभ्यः बियामकारमत्ययः । चिसो । पुत्र- काम्पा ॥ गुरोश्च हलः३।३।१०३॥

अन्तर्दा ।
प्रथमखण्डस्य प्रथमो भागः ।
गुरुमतो हलन्तात् स्त्रियामकारप्रत्ययः । ईहा। जहा॥
पिद्भिदादिभ्योऽङ्३।३।१०४॥
पिझ्यो भिदादिभ्यश्च स्त्रियामङ् । जरा । त्रपा । भिदा विदारणे
भित्तिरन्या। छिदा । क्रपेः संप्रसारणं च । कृपा ।।
आतश्चोपसर्ग ३।३।१०६॥
अङ् । प्रदा । उपदा । श्रदन्तरोरुपसर्गवदृत्तिः । श्रद्धा ।
ण्यासथंथो युच ३।३ । १०७॥
कारणा । आसना। श्रन्थना।।
रोगाख्यायां ण्वुल बहुलम् ३।३।१०८॥
प्रच्छर्दिका । कचिन्न । शिरोतिः॥
धात्वर्थनिर्देशे ण्वुल वक्तव्यः ॥
आसिका । शायिका इश्तिपी धातुनिर्देशे। पचिः। पचतिः॥
वर्णात्कारः।।
अकारः । रादिफश्च । रेफः । रकारः । मत्वर्याच्छः वाहुलकात् ।
अलोपः मत्वर्थीयः ॥
इणनादिभ्यः ॥
आजिः । आतिः ॥
इञ् वपादिभ्यः॥
वापिः । वासिः॥
इक् कृष्यादिभ्यः ॥
कृपिः । गिरिः॥
आक्रोशे नश्यनिः३।३।११२॥
ननि उपपदे अनिः आक्रोशे । अजीवनिस्ते भूयात् ॥
कृत्यल्युटो बहुलम् ३।३ । ११३॥

७० सुगमकौमुद्याः। यत्र विहितास्ततोऽन्यत्रापि स्युः। स्नात्यनैनोत मानीयं चूर्णम् । दीयतेऽस्मै दानीयो विप्रः । राज्ञा भुज्यन्ते राजभोजनाः शालयः॥ नपुंसके भावे क्तः३।३।११४॥ कालसामान्ये॥ ल्युट् च ३।३।११५॥ हसितम् । हसनम् ॥ करणाधिकरणयोश्च ३।३।११७॥ ल्युट् । इध्मपत्रश्चनः । गोदोहनी । खलः । प्राकरणाधिकरण- योरित्यधिकारः॥ पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ३।३।११८॥ आकुर्वन्त्यस्मिन् आक्र.॥ हलश्च ३।३।१२१॥ घज्ञ । रमन्ते योगिनोति रामः ।। ईपहःसुषु कृच्छाकृच्छ्रार्थेषु खल ३ । ३। १२६॥ एषु दुःखसुखार्थेपृपपदेषु खल् । दुष्करः कटो भवता । सुकरः। ईपत्करः॥ आतो युच ३।३ । १२८॥ खलोऽपवादः। ईपत्पानः सोम इत्यादि । आवश्यकाधमर्ययोणिनिः योणिनिः३।३ । १७० ॥ अवश्यकारी । शतन्दायी ।। कृत्याश्च३।३।१७१ ।। आवश्यकाधमर्ययोः । अवश्यं हरिः सेव्यः । सतिन्देयम् ।। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम् ३।३। भ७४॥ धातोः क्तिय क्तश्चाशिपि संज्ञायाम् । म वितात् । भूति । दे. पदत्तः॥

प्रथमखण्डस्य प्रथमो मागः । अलंखल्लो प्रतिपेधयोःप्राचां क्त्वा ३।४।१८॥ मतिमेधार्थयोरलंखल्वोरुपपदयोः रत्वा । अलं दत्त्वा । पीत्वा समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ३1४।२१ ॥ समानकर्तृकयो त्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः का । भुक्त्वा व्रजति । भुक्त्वा पीत्वा व्रजति ॥ समासे न पूर्व क्त्वोल्यप् ७1१1३७॥ अव्ययपूर्वपदेऽनङ्समासे क्त्यो ल्यए । प्रकृत्य ॥ आभीक्ष्ण्ये णमुल च ३।४।२२।। पौनःपुन्ये द्योत्ये पूर्वविपये णमुल् । चात त्क्वा । दित्वम् । स्मारं स्मारं नमति शिवम् । स्मृत्वा स्मृत्वा ॥ उपमाने कर्मणि च३।४।४५॥ कर्मणि कर्तरि चोपमाने उपपदे धातोर्णमुल् ।। कपादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः३।४।४६॥ घृतनिधायन्निहितं जलम् । अजनाशं नष्टः ॥ इति कृत् । इति ३३ अंशाः। प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा २।३।४६॥ प्रातिपदिकार्थमात्रै लिङ्गमात्राद्याधिक्ये संख्यामात्रे च मथमा स्यात् । उच्चैः । नीचैः । कृष्णः । श्रीः । ज्ञानम् । अलिङ्गा निय- तलिङ्गाश्च । प्रातिपदिकार्थमात्र इत्यस्योदाहरणम् । अनियताल- ङ्गास्तु लिङ्गमात्रायाधिक्यस्य । तटः। तटी। तटम् । परिमाण- मात्रे द्रोणो ब्रीहिः । द्रोणरूपं यत्परिमाणं तत्परिच्छिन्नो व्रीहि- रित्यर्थः । वचनं संख्या । एकः । दौ । वहवः ।। सम्बोधने च २१३1४७॥ इह प्रथमा। हे राम!!

७२
सुगमकौमुद्याः।
कारके 181२३॥
इत्यधिकृत्य ॥
कर्तुरीप्सिततमं कर्म ११४।१९॥
कर्तुः क्रियया आप्तमिष्टतमं कारक कर्मसंज्ञम् ।।
अनभिहिते २।३।१॥
इत्यधिकृत्य ।।
कर्मणि द्वितीया २।३।२॥
अनुक्ते कर्मणि द्वितीया । हार मजति ॥
उभसर्वतसोः कार्याधिगुपर्यादिषु त्रिषु ।।
द्वितीयानेडितान्तेपु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते ॥
उभयतः कृष्णम् । सर्वतः कृष्णम् । उपर्युपरि लोकम् । इत्यादि ।।
स्वतन्त्रः कती १।४।५४॥
क्रियाया स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्तृसंज्ञः ।।
साधकतमं करणम् १|४|१२॥
कियासिद्धी प्रकृष्टोपकारकं करणसंज्ञम् ॥
कर्तकरणयोस्तृतीया २।३।१८॥
अनभिहित कर्तरि करणे च तृतीया।रामेण वाणेन हतो वाली।
प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् * ॥
मकृत्या चारुः । प्रायेण याज्ञिक । इत्यादि ।
सहयुक्तेऽप्रधाने २।३।१९।।
सहार्थेन युक्ते प्रधाने तृतीया । पुत्रेण सहागराः पिता एवं
सामभूतियोगेऽपि ॥
विनापि तद्योगं तृतीया ॥
पुनेणागत ॥
कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम् १।१।३२॥

प्रयमखण्डस्य प्रथमो मागः।
दानस्य कर्मणा यमभिप्रेति स संप्रदानसंज्ञः॥
चतुर्थी सम्प्रदाने २।३।१३॥
विप्राय गां ददाति ॥
तादय चतुर्थी वाच्या *
मुक्तये हरि भजति ॥
नमःस्वतिस्वाहास्वधालंवपड्योगाच २।३। १६॥
एभियाँगे चतुर्थी । हरये नमः । इत्यादि ।
ध्रुवमपायेऽपादानम् १।४।२४॥
अपायो विश्लेषस्तस्मिन् साध्ये धुवमवधिभूतं कारकमपादानसंज्ञम् ।।
अपादाने पञ्चमी २।३।२८॥
ग्रामादायाति । धावतोऽश्वात्पतति ।।
अन्यारादितरतें दिक्छन्दाऽभूत्तरपदाजाहियुक्त २१३१२९
एभिर्योगे पञ्चमी । अन्यः भिन्नः आरात् इतरः ऋते वा
कृष्णात् । चैत्रात्पूर्वः फाल्गुनः । प्राक् प्रत्यक् दक्षिणा । दक्षणाहि
वा ग्रामात् ॥
इति ३४ अंशाः।
दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च २।३।३५॥
प्रातिपदिकार्थमात्रे एभ्यो द्वितीया चात्पञ्चमीतृतीये । ग्रामस्य
दूर दूरात दूरेण वा । एवमन्तिकयोगे । असत्त्ववचनस्यैव । नेह ।
पष्टी शेपे २।३।५०॥
कारकमातिपदिकार्थव्यतिरिक्तः स्वस्वामिभावादिः शेपस्तत्र
पष्ठी । सज्ञः पुरुषः।कर्मादीनामपि सम्वन्धमात्रविवक्षायां पाठयेव ।
सतां गतम् । सर्पिपो जानीते । मातुः स्मरति । इत्यादि ।
कर्तृकर्मणोः कृति २।३।६५॥
दूरः पन्थाः॥
३

७४
सुगमकामुद्याः।
कृद्योगे कर्तरि कर्मणि च षष्ठी । कृष्णस्य कृतिः। जगतः कर्ता
कृष्णः ॥
न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतनाम् २१३ । ६९॥
एपा प्रयोगे पष्ठी न । कुर्वन् कुर्वाणो वा सृष्टिं हरिः । हार
दिक्षुः । अलंकरिष्णुर्वा दैत्यान् घातुको हरिः ।।
कमेरनिषेधः ॥
लक्ष्म्याः कामुको हरिः। जगत्सवा मुसं कर्तुम् । विष्णुना हवा
दत्याः । दैत्यान् हतवान् हरिः । ईपत्करः प्रपञ्चो हरिणा । तृन्निति
प्रत्याहारः। शानन् । सोम पवमानः। चाना । आत्मानं मण्डयमान ।
शत् । वेदमधीयन् । तृन् । कर्त्ता लोकान् ।।
द्विपः शतुर्वा ॐ॥
• मुरस्य मुरं वा द्विपन् । सर्वोऽयं कारकपष्टया प्रतिषेधः । मेरे
पठी तु स्यादेव । ब्राह्मणस्य कुर्वन् । नरक्स्य जिष्णुः ।।
आधारोऽधिकरणम् १।४।४५॥
वर्तुकर्मदाग तन्निष्टक्रियाया नाधारः पारमधिकरणसंज्ञम् ॥
सप्तम्यधिकरणे च२।३।३६॥
अधिकरण सप्तमी । चाहगन्तिकार्थेन । पापियो पगि-
कोऽभिव्यापक्याधासिधा व आस्ते।म्याल्या परति । मोक्ष
इच्छास्ति । गर्वस्मिन्नामानि । बनस्य रे अन्तिके वार दुगन्ति-
पार्थभ्य इनि पिमत्तित्रयेण सह चतसोध विमतयः पग्निाः॥
यस्य च भागेन भाषलक्षणम् २१३।३७॥
यस्प क्रियया मियान्तर एस्पते ततः मतगी । गोए दुआमा-
नामु गतः॥
यतश्च निर्धारणम् २१३१११॥
जातिगुणपियामि. गमुदापदिस्य धारण नि
M. मनी । राणा पया माया गर्ग गांधु
न

७५ प्रथमखंडस्य प्रथमां भागः। वा कृष्णा बहुक्षीरा । गच्छतां गच्छत्सु वा धावञ्छीघ्रः । छात्रा- णां छात्रेषु वा मैत्रः पटुः ॥ इति कारकप्रकरणम् ॥ इति ३५ अंशाः। अव्ययीभावः२।११॥ अधिकारोग्यम् ॥ अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यद्धयर्थाभावात्ययासं. प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययोगपद्यसादृश्य- संपत्तिसाकल्यान्तवचनेषु २।११६॥ विभक्त्यर्थादिपु वर्तमानमव्ययं समर्थेन सुबन्तेन मह समस्यते सोऽव्ययीभावः ॥ प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् १।२।४३॥ समासशास्त्रे प्रथमानिर्दिधमुपसर्जनसंज्ञम् ॥ उपसर्जनं पूर्वम् २१२।३०॥ समासे उपसर्जनं प्राक प्रयोज्यम् । अव्ययीभावश्चेत्यव्ययत्वम्। हरी इति अधिहरि । अत्र हरि डि अधि इत्यलौकिक विग्रहवा- क्यम् ॥ अव्ययीभावश्च २।४।२८॥ अयं नपुंसकम् ॥ ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ११२॥४७॥ अजन्तस्य । गा पातीति गोपास्तस्मिन्नित्यधिगौपम् ।। नाव्ययीभावादतोऽम् त्वपञ्चम्याः२।४।८३ ॥ अदन्तादव्ययीभावात् सुपो न लुक् । तस्य पञ्चमी विना अमा- देशः। कृष्णस्य समीपम् उपकृष्णम् ॥ तृतीयासतम्योर्वहुलम् २।४।८४॥ अम् उपकृष्णम् उपकृष्णेन उपकृष्णम् उपकृष्णे | मक्षिका- सुगमकीमुद्याः । णामभावः निर्मक्षिकम् । विष्णोः पश्चाद् अनुविष्णु । योग्यतावी- प्सापदार्थानतिवृत्तिसादृश्यानि यथार्थास्तेषु।रूपस्य योग्यम् अनुरू पम् । वीप्सायां विकल्पः । अर्थमर्थ प्रति प्रत्यर्थम् । शक्तिमनति- क्रम्य यथाशक्ति ॥ इत्यव्ययीभावः ।। तत्पुरुपः२।१॥२२॥ अधिकारोऽयम् ॥ द्विगुश्च २।१।२३॥ तत्पुरुपसंज्ञः ॥ कर्तृकरणे कृताबहुलम् २।१।३२॥ कतरि करणे च तृतीया कृदन्तेन वहुलं समस्यते।हरिणा त्रातः हरित्रांतः । नखनिभिन्नः॥ षष्ठी २१२१८॥ सुबन्तेन । लोकस्य पतिः लोकपतिः ।। विशेषणं विशेष्येण बहुलम् २ । १।५७ ॥ भेदकं समानाधिकरणेन भेद्येन बहुलं समस्यते ॥ तत्पुरुपः समानाधिकरणः कर्मधारयः११२।४२॥ वृद्धश्चासौ पुरुषश्च वृद्धः पुरुष इति वा वृद्धपुरुषः । वृद्धौ च ती पुरुषौ च वृद्धपुरुपौ । वृद्धाश्च ते पुरुषाश्च वृद्धपुरुषाः । एवमग्रेपि द्विवचन बहुवचने ज्ञेये । नीलोत्पलम् । नीलोत्पले नीलोत्पलानि ।। पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु ६।३।४२॥ कर्मधारये जातीयदेशीययोश्च परतो भाषितपुंस्कात्पर उडभावो यस्मिन् तथाभूतं पूर्व पुंवत् । फुल्ललता । फुल्ललते । पुल्ललताः ॥ उपमानानि सामान्यवचनैः२१११५५॥ समानाधिकरणः । धन इव श्यामःघनश्यामः ॥ उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे २१११५६॥ ..

७७ प्रयमवंडस्य प्रथमो भागः । उपमेयं व्याघ्रादिभिः समानाधिकरणैः समस्यते साधारणधर्म- स्यामयोगे । पुरुषो व्याघ्र इव पुरुषव्याघ्रः । माकृतिगणोध्यम् ॥ तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च २।११५१॥ तद्धितार्थे विपये उत्तरपदे परे समाहारे च वाच्ये दिक्संख्ये समानाधिकरणे न समस्येते ॥ संख्यापूर्वो द्विगुः२।११५२॥ तद्धितार्थत्यत्रोक्तः संख्यापूर्वो द्विगुः स्यात् ।। द्विगुरेकवचनम् २।४।१॥ द्विग्वर्थः समाहारः एकवत् ॥ स नपुंसकम् २।४।१७॥ समाहारे दिगुदद्वश्व नपुंसकम् । परवल्लिङ्गापवादः । पञ्चानां पात्राणां समाहारः पञ्चपात्रम् । शेपो दिगुर्वक्ष्यते ॥ इति ३६ अंशाः । नञ् २१२१६॥ सुपा सह समस्यते ॥ नलोपो नमः ६।३१७३॥ उत्तरपदे । अब्राह्मणः ॥ तस्मानुडचि ६।३।७४ ॥ लुप्तनकारान्नज उत्तरपदस्यानादेर्नुट् । अनश्वः ।। कुगतिप्रादयः २।२।१८॥ समर्थन नित्यं समस्यन्ते । कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः । ऊरी- कृतम् । सुग्लः प्रज्ञः इत्यादि तु उपपदसमासेनापि सिद्धम् । आदिग्रहणमगत्यर्यम् । प्रगतः आचार्यः आचार्यः । दुराचारः पुरुपो दुष्पुरुषः । सुस्वभावः पुस्पः सुपुरुषः ॥ ऊयांदिच्चिडाचश्च ३।४।६१॥

७८ सुगमकीमुद्याः। एते क्रियायोगे गतिसंज्ञाः । उरीकृत्य । शुक्लीकृत्य । पट- पटाकृत्य ॥ एकविभक्ति चापूर्वनिपाते १।२।४४॥ विग्रहे यन्नियतविभक्तिकं तदुपसर्जनसंज्ञं स्यानतु तस्य पूर्व- निपातः॥ गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य ११२॥४८॥ उपसर्जनं यो गोशन्दः स्त्रीप्रत्ययान्तं च तदन्तस्य प्रातिपदि- कस्य हस्वः । अतिमालः । निष्कौशाम्विः अयमपि आदिसमासः॥ उपपदमति२।२।१९॥ कुम्भं करोतीति कुम्भकारः । इह कुम्भ अस् कार अ इत्यलो. किक प्रक्रियावाक्यम् ॥ इति तत्पुरुषः ॥ शेपो बहुव्रीहिः२।२।२३ ॥ अनेकमन्यपदार्थे २।२।२४॥ अनेकं प्रथमान्तमन्यस्य पदस्यार्थे वर्तमानं वा समस्यते । अप्र- थमार्थे समानाधिकरणानां बहुव्रीहिरिति फलितम् । प्राप्तमुदकं यं प्राप्तोदको ग्रामः । ऊढरयोऽनडान् । उपहृतपशू रुद्रः। उद्धृतोदना स्थाली । पीताम्बरो हरिः । वीरपुरुषो ग्रामः॥ स्त्रियाः पुंवभापितपुंस्कानूङ्समानाधिकरणे स्त्रि- यामपूरणीप्रियादिषु ६।३।३४ ॥ तुल्ये प्रवृत्तिनिमित्ते यदुक्तपुंस्कं तस्मात्पर ऊड भावो यत्र तथाभूतस्य स्त्रीवाचकशब्दस्य पुंवाचकस्येव रूपं समानाधिकरणे स्त्रीलिङ्ग उत्तरपदे नतु पूरण्यां प्रियादी च परतः । गोस्त्रियोरिति हस्वः । चित्रगुः । रूपवद्भार्यः॥ तेन सहेति तुल्ययोगे २।२।२८॥ तुल्ययोगे वर्तमानं सहेत्येतत्तृतीयान्तेन प्राग्वत् ।। वोपसर्जनस्य ६।३। ८२॥

प्रयमखंडस्य प्रथमो भागः। ७२ । बहुव्रीहेरख्यवस्य सहस्य सो वा। पुत्रेण सह सपुत्रो गतः, सह- पुत्रो वा ॥ नवृतश्च ५।४।१५३॥ नद्यन्तोत्तरपदादृदन्तोत्तरपदाच्च बहुबीहे: कम् ।। केणः ७।४।१३॥ के परे णो हस्व इति हस्ते प्राप्ते ॥ न कपि ७।४।१४॥ कपि परे हस्वी न । सपत्नीकः । वहुकर्तृकः ।। इति बहुव्रीहिः॥ चाथै द्वंद्वः २।२।२९॥ अनेक सुवंतं चार्थे वर्तमान वा समस्यते । स द्वंद्वः इतरेतर- योगे । धवखदिरी । समाहारे संज्ञापरिभापम् । समाहारस्यैक्यादे- कत्वम् ।। इति वंदः ॥ इति समासाः ॥ इति ३७ अंशाः। तस्यापत्यम् ४।१।९२॥ पष्टयन्तात्कृतसन्धेः समर्थादपत्येऽर्थे उक्ता वक्ष्यमाणाश्च अणा- दयः प्रत्यया वा ॥ तद्धितेप्वचामादेः ७१२/११७॥ जिति णिति च तद्धिते परेश्चामादरचो वृद्धिः । किति च ७।२।११८॥ किति तद्धिते तथा । आदिवृद्धिरन्त्योपधावृद्धी वाधते ।। ओर्गुणः६।४।१४६॥ उवर्णान्तस्य भस्य गुणस्तद्धिते । उपगोरपत्यगैपगवः ॥ अत इञ्४।१।९५॥

८० - सुगमकौमुद्याः । अदन्तं यत्प्रातिपदिकं तत्प्रकृतिकात्पष्ठयन्तादि अपत्येऽर्थे । दाक्षिः॥ स्त्रीभ्यो ठक् ४।१।१२० ॥ स्वीप्रत्ययान्तेभ्यो ढक अपत्ये ।। आयनेयीनीयियः फळखयां प्रत्ययादीनाम् ७/१२॥ वैनतेयः ॥ इतश्चानिमः ४।११ १२२॥ इकारान्ताइयचोऽपत्ये टक् न त्विजन्तात् । दौलेयः । नैधेयः । आत्रेयः॥ तदधीते तद्वेद ४।२।२९॥ अत्रार्थे अणादयः ॥ नय्याभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वी तु ताभ्यामैच ७॥३३॥ पदान्ताभ्या यकारवकाराभ्या परस्य न वृद्धिः । किंतु ताभ्या पूर्वी क्रमादैचावागमौ । वैयाकरणः ॥ शेपे ।।१९२॥ अपत्यादिचतुरर्थ्यन्तादन्योऽर्थः शेषस्तत्राणादयः । चक्षुषा गृह्यते चाशुपं रूपम् ॥ तत्र भवः४।३।५३॥ अत्राणादयः । स्रुघ्ने भवः सौनः॥ तस्येदम् ४।३।१२०॥ अत्राणादयः । औपगवम् ।। वृद्धिर्यस्याचामादिस्तदृद्धम् १।१।७३ ॥ यस्य समुदायस्याचा मध्ये आदिवृद्धिस्तदृद्धसंज्ञम् ।। त्यदादीनि च १।१।७४॥ वृद्धसंज्ञानि ।।

प्रथमखंडस्य प्रथमो भागः । वृद्धाच्छः ४२१११४॥ शालीयः । तदीयः॥ का नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा ॥ देवदत्तः देवदत्तीयः॥ तेन तुल्यं क्रिया चेदतिः५1५1११५ ॥ ब्राह्मणवदधीते ॥ तस्य भावस्त्वतलौ९।११११९॥ गोत्वम् गोवा ।। पःप्रत्ययस्य १।३।६॥ प्रत्ययस्यादिः प इत् ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ५१११ १२४॥ ष्य चाहावे । जाडयम् । ब्राह्मण्यम् ॥ संख्याया अवयवे तयप्५।२॥४२॥ पञ्चतयम् ॥ द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा ५।२।४३॥ द्वयं द्वितयम् । त्रयं त्रितयम् ॥ तस्य पूरणे डट् ५१२१४८॥ एकादशः॥ नान्तादसंख्यादेर्मट् ५।२।१९॥ डदो मडागमः । पञ्चमः ॥ पट्कतिकतिपयचतुरान्थुक् ९।२।५१॥ एषां थुगागमो डटि । पष्ठः । चतुर्थः ॥ चतुरइछ्यतावाद्यक्षरलोपश्च ॥ तुरीयः तुर्यः॥ देस्तीयः५१२१५४॥

:-
८२
सुगमकौमुद्याः।
द्वितीयः॥
वेः संप्रसारणश्च ५।२।५५ ॥
तृतीयः॥
विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् ५।२।५६॥
एभ्यो डटम्तमडागमो वा ॥
तिविंशतेर्डिति ६।४।१४२॥
विशतेर्भस्य तिशब्दस्य लोपः डिति । विंशतितमः विशः।
एकविंशतितमः एकविंशः । शतादेर्नित्यं तमट् वक्ष्यते ॥
इति ३८ अंशाः।
तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् ५।२।९४॥
गोमान् ॥
मादुपधायाश्च मतोवायवादिभ्यः ८।२।९॥
मवर्णावर्णान्तान्मवर्णावाँपधाच यवादियोत्परस्य मतोमस्य
वः । किंवान् । ज्ञानवान् । विद्यावान् । लक्ष्मीवान् ।
तसो मत्वर्थ १।४।१९॥
तान्तसान्तौ मसंज्ञौ मत्वर्थे प्रत्यये । यशस्वान् । मास्वान् ।
यवादेस्तु । यवमान् । भूमिमान् ॥
झयः८।२।१०॥
झयन्तान् मतोर्मस्य वः । विद्युत्वाने ।।
प्राणिस्थाधातोलजन्यतरस्याम् ५।२।९६ ॥
चूडालः चूडापान ।।
अत इनिठनौ द.२११५॥
वा । दण्डी॥
ठस्येकः ७।३।५०॥
अङ्गात्परस्येकादेशः । दण्डिकः दण्डवान् ।।
-

प्रयमसंडसम प्रयमो मागः।
अस्मायामेधास्रजो विनिः५।२।१२१ ॥
यशस्वी यशस्वान् । इत्यादि ।।
संख्याया विधार्थे धा५।३।४२॥
कियामकारे वर्तमानात्संख्यागन्दात्स्वार्थधा । पर्धा ।।
अतिशायने तमविष्टनोद।३।५५॥
अतिशयविशिष्टार्थत्तेः स्वार्थ पती । अयमेपामनिमयेन
आत्या आढयतमः । लघुतमः ।।
६।४।१५५॥
टेलीप इठेमे यस्मु । लधिष्ठः ॥
तिङश्च५।३।५६॥
तिडन्तादतिशये घोत्ये तमप ॥
तरतमपी घः१३१२२॥
एती घसंज्ञी ॥
किमेत्तिङव्ययपादाम्बऽद्रव्यप्रक।४।११॥
किम एदन्तात्तिडोऽव्ययाच यो घस्तदन्तादामुर्नतु द्रव्यमकरें।
किन्तमाम् । पचतितमाम । उस्तमाम् । पदन्ताश्यते । द्रव्यमको
तु उस्तमस्तरुः॥
द्विवचनविभज्योपपदे तरखीयसुनौ५.३१५७ ।।
द्वयोरेकस्यातिशये विमक्तव्ये चोपपदे मुपतिइन्तात् एती
स्तः । पूर्वयोरपवादः । अयमनयोतिगयेन लघुलंघुतरः लगी.
यान । उदीच्या प्राच्येभ्यः पटुतराः पटीयांसः । किन्तगम् ।
पचतितराम् । उभस्तराम् । द्रव्यमकर्षे तु उस्तरस्तरुः ॥
अत्यन्तस्वार्थे पिकन्तरपमयटः ॥
बहुतरकम् । अल्पान्तरम् । जलमयम् ॥
संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुत्र ५।४।१७॥

८४
} सुगमकौमुद्याः।
क्रियाजन्मगणनवृत्तेः संख्याशब्दात्स्वार्थ कृत्वसुन् । पञ्चकृत्वो
द्वित्रिचतुभ्यः सुच् ५।४।१८॥
दि । त्रिः । चतुः॥
एकस्य सकृच्च५।४।१९॥
सकृदित्यादेशः चात्सु । सकृद् भुते॥
कृभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरि चिः५।४।५०॥
अभूततद्भावे इति वाच्यम् ॥
विकारात्मतां प्राप्नवत्या प्रकृती वर्तमानादिकारशब्दात् स्वार्थे
चिर्वा करीत्यादिभिर्योगे ।
अस्य च्यौ ७।४।३२॥
अवर्णस्य ईत् च्ची । वरपृक्तस्य । अकृष्णः कृष्णः सम्पद्यते
तं करोति कृष्णीकरोति । ब्रह्मी भवति । गंगास्यात् ॥
च्चौ च ७।४।२६॥
च्ची परे पूर्वस्य दीर्घः । शुचीभवति । पटूस्यात् ।।
रीऋतः ७।४।२७॥
अकृयकारेऽसार्वधातुके यकारे चा च दन्ताङ्गस्य रीड् ।
मात्रीकरोति ॥ इति तद्धिताः ॥
इति ३९ अंशाः।
खियामित्यधिकृत्य ॥
अजायतष्पाप्॥
अजा । एडका । इत्यादि । खदा ।।
प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः ७।३।४४॥
प्रत्ययस्थात्कात् पूर्वस्य आत इत् आपि परे स आप मुपः परो
न चेत् । सर्विका । कारिका । मलाशब्दात् साथै पनि ततापिच
इति स्वः॥

८६ सुगमकौमुद्याः। कृदिकारादक्तिनः ॥ रानिः रात्री ॥ पुंयोगादाख्यायाम् ४।३।४८॥ या पुमाख्या पुंयोगात् स्त्रियां वर्त्तते ततो डीप् । गोपस्य स्त्री गोपी॥ स्वाङ्गाचोपसर्जनादसंयोगोपधात् ।। ११५४॥ असंयोगोपधमुपसर्जनं यत्स्वाङ्गं तदन्तात्मातिपदिकाद्वा डीम् । केशानतिकांता अतिकेशी अतिकेशा । चन्द्रमुखी चन्द्रमुखा । संयोगोपधातु । सुगुल्फा । उपसर्जनात्किम् । शिखा ॥ जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ४ । १।६३ ॥ जातिवाचि यन्न च स्त्रियान्नियतमयोपधमदन्तं ततः स्त्रिया डीप् । तटी । घटी। औपगवी । कठी । बबची । स्त्रीविषयातु बलाका ॥ इति स्त्रीप्रत्ययाः॥ इति ४० अंशाः। *- आद्यखण्डे पूर्वभागः पाणिनीये प्रवेशकृत् । वालानां वोधदः पूर्णः श्रीहरेश्वरर्पितः ॥ १॥ इति प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः । समाप्तोऽयं प्रथमाध्यायः। अत्राशाः सूचिनिमित्यै कल्पिताः खदिवह्नयः। तश्चत्वारिंशताध्यायोऽष्टाध्यायीयं भवेत्ततः ॥१॥ सूच्या पादाः कादिसान्तैर्वर्णे (३२०) त्रिंशदीरिताः। पादोंऽशैर्दशभिई स्वदीर्घाणेच्कल्पितैरिह ॥ २ ॥ पाणिनीयेऽटके सूत्रैविंशत्याशोङ्कसूचितैः । यहाडैरेव कौमुद्यामष्टके चाशसूचनम् ॥ ३ ॥ इति श्रीमद्भट्टोजिदीक्षितकृतकौमुद्याः प्रतिविम्वरूपायां सुग- मकौमुद्यामाद्यखण्डे पूर्वभागः समाप्तः ।

प्रयमखंडस्य द्वितीयो मागः । सामान्ययोगी वालाहः प्राक् मोक्तः प्रक्रियाक्रमः । तज्ज्ञानां हेतवे सोऽद्य विशेषेण निगद्यते ॥ १ ॥ यणो मयो द्वे वाच्ये * ॥ मय इति पञ्चमी यण इति पठीति पक्षे यस्यापि वा द्वित्वं तेन चत्वारि रूपाणि । सुद्धयुपास्यः । द्दय ध्य्यु ध्यु । एवं मद्धरिः । इत्यादी । हर्यनुभवः हर्यनुमयः । न यस्ति न ह्यस्ति ।। . हलो यमा यमि लोपः ८।४।६४ ॥ हलः परस्य यमौ लोपो वा यमि । लोपे द्वित्वामारे चैकयन्तु- ल्प रूपम् । लोपफलं तु आदित्यो देवतास्येति आदित्यं हविः । यमा यमीति यथासंख्यत्वान्माहात्म्यमित्यादी न । तरल्कारः । यण इति पञ्चमी मय इति पष्ठीति पक्षे कस्य द्वित्वम् । लस्य त्वन- चि चति तेन तवल्कारादौ रूपचदुष्टयम् ॥ शरः खयो रे ॥ विस्थ्थली त्रिस्थली । खय इति पञ्चमी शर इति पष्टौति पक्षे वत्स्सरः वत्सरः ॥ गोयूँनी छन्दसि । अध्वपरिमाणे च * ॥ ओतो गव्यूतिः॥ एत्येधत्यूठसु ६।१।८९॥ - अवर्णादेजाधोरेत्येधत्योरूठि च वृदिरेकादेशः। उपति । पे. धते । प्रष्ठौहः॥ अक्षादूहिन्याम् ॥ । अक्षौहिणी सेना ।। स्वादीरोरणोः ॥ खैरः। वैरी। स्वैरिणी॥ प्रादूहोटोव्यषैष्येषु ॥

सुगमकौमुद्याः। प्रौहः । प्रौढः । उदेति तान्तन्नतु क्तवत्वन्तस्येकदेशः अनर्थक- त्वात् । तेन प्रोढवानित्यत्र न वृद्धिः । मौदिः । प्रैषः प्रेष्यः॥ ऋते च तृतीयासमासे *॥ सुखार्तः ॥ प्रवत्सतरकम्बलवसनादेशानामृणे ॥ प्राणमित्यादि। उपसर्गादतिधातौ ६।१।९१ ॥ अवर्णान्तादुपसर्गाकारादौ धातौ वृद्धिरेकादेशः । उपार्छति। ऋत्यक इत्यपीह न॥ वासुप्यापिशलेः ८।१।९२॥ अवर्णान्तादुपसर्गादादौ सुन्धातौ वृद्धिर्वा । प्रापभीयति प्रर्षभीयति । लकारस्यापि ग्रहणात् । माल्कारीयति प्रल्कारीयति । तपरत्वादीघे न । उपत्रकारीयति उपर्कारीयति ॥ ऋत्यकः६।१।१२८॥ पदान्ता अक ऋति परे प्रकृत्या स्युर्हस्वश्च वा । होतऋकारः॥ ब्रह्म ऋषिः ब्रह्मर्पिः । होत ऋकारः॥ ऋति सवर्णेवा ॥ मध्ये द्वौ रेफौ अभितोज्मक्तिश्च । होत्ऋकारः होतृकारः ॥ लति सवर्णे ल्ल वा ॥ मध्ये द्वौ लकारी अमितोभक्तिश्च । उभयत्र पाक्षिक प्रत्यक इति प्रकृतिभावः । होट लकारः होत्लकारः होतकारः ।। एङि पररूपम् ६।११९४॥ आदुपसर्गादेडादौ धाती पररूपमेकादेशः। प्रेजते । उपोपति ।। एडादौ सुन्धातो वा ॥ उपेडकीयति उपैडकीयति ॥ एवं चानियोगे * ॥

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः। क्वेव मोक्ष्यसे । आनेयोगे किम् । तवैव ॥ शकन्भ्वादिषु पररूपं वाच्यम् तच्च टेः ॐ ॥ शकन्धुः । कर्कन्धुः । सीमन्तः केशवेशे । सीमान्तोऽन्यः मनीपा । पतंजलिः । सारंगः पशुपक्षिणोः । साराङ्गोऽन्यः । आकृ- तिगणोऽयम् । मातडः॥ इति ४१ अंशाः। ओत्वोष्ठयोः समासे वा *॥ स्थूलोतुः स्थूलौतुः । बिम्बोष्ठः विम्बीष्ठः ॥ ओमाङोश्च ६।११९५॥ ओमि आडि चात्परे पररूपमेकादेशः। शिवाया नमः । शिवेहि अब आ इहि । अवेहि अत्रैत्येधतीति वृद्धिनंति पुरस्तादपवादपरि- मापाया वक्ष्यते ॥ उस्योमावाटः प्रतिषेधः ॐ ॥ उसि ओमाडोश्च परयोराटः पररूपं नेत्यर्थः । उस्रामैच्छत औत्रीयत् । औंकारीयत् । औढीयत् ।। अव्यक्तानुकरणस्यात इतो६।१९८॥ ध्वनेरनुकरणस्ययोच्छब्दस्तस्मादेती परे पररूपमेकादेशः। पटत् इति पदिति । एकाचो न । श्रदिति ।। नामेडितस्यान्त्यस्य तु वा ६।१।९९॥ आमेडितस्य मायुक्त न । अन्त्यस्य तु तकारमात्रस्य वा डाचि बहुलं । इति वाहुलकाहित्वम् ।। तस्य परमानेडितम् ८।११२॥ द्विरुक्तस्य परं रूपमाछेडितसंज्ञम् । पटत् पटेति, पटत् पट- दिति ॥ सर्वत्र विभापा गोः६।१।१२२॥

सुगमकीमुद्याः। लोके वेदे चैडन्तस्य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्ते | गो अग्रम् गोऽयम् ॥ अवङ् स्फोटायनस्य ६।१ । १२३ ॥ अचि परे पदान्ते एडन्तस्य गोरवड़ वा। गवायम् । व्यवस्थि. तविभापया गवाक्षः॥ इन्द्रे च ६।१।१२४॥ गोरवड् इन्द्रे । गवेंद्रः॥ इकोऽसवणे शाकल्यस्य हस्वश्च ६।१।१२७ ॥ पदान्ता इकोसवणेचि परे प्रकृत्या स्युः द्वस्वश्च वा । चकि अत्र चस्यत्र । हरी एतौ इत्यादी नास्य प्रवृत्तिः । प्लुतप्रगृह्या इत्यन नित्यग्रहणात् ॥ न समासे ॥ वाप्यश्व.॥ सिति च ॥ पार्थम् ॥ ऋत्यकः ॥ ब्रह्म ऋपिः ब्रह्मापि. ॥ समासेऽपि ॥8॥ सप्त ऋषीणा सप्तपीणाम् । वाक्यस्य टेः प्लुत उदात्तः ८।२।८२ ।। इत्यधिकृत्य ॥ प्रत्यभिवादेऽशूदे ८।२।८३॥ अशूद्रविपये प्रत्यभिवादे यद् वाक्य तस्य टेः प्लुतःमो आयु- ष्मानधि देवदत्ता ३॥ स्त्रियां न * ॥

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः। मो मायुप्मती भवगार्गि। नाम गोत्रं या यग्रान्ते प्रयुज्यते त- र सुतः । नेह । आयुष्मानधि ।। भोराज्यन्यविशां वा ॥ आयुष्मानधि भोः ३ । आयुष्मानेधीन्द्रयर्मा ३ न । आयुष्मा. नेधीन्द्रपालिता ॥ हेदेप्रयोगे हेहयोः ८।२। ८५ ॥ पतयोः प्रयोगे दूराद्धृते यदाक्यं तन हैहयोग्य प्लुतः । हे ३ राम । राम है ३॥ गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्यकैकस्य प्राचाम् ८।२।८६॥ दूरासंयोधने यदाक्यं तस्य ऋदिन्नस्यानन्त्यस्यापि गुगेरी पर्यायेण प्लुतः । दे ३ वदत्त । देवदा ३ त । देवदत्ता ३ । प्राचा- मिति योगविमागात्सर्वप्लुतरिकल्पः ॥ अप्लुतबदुपस्थिते ६।१।१२९॥ उपस्थितोऽनार्प इति शन्दस्तस्मिन् परेप्ट तोऽप्लतचन् । अप्लु. तकार्य यणादिकं क्गेति मुश्लोकेति ॥ ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् मणीवति तु इवाथै वशब्दो वाशब्दो वा वोध्यः ॥ निपात एकाजना-१1१1१४।। एकोनिपात आवर्जः प्रग्रहाः । इ इन्द्रः । अनाङित्युक्तेडि. दाकारः प्रगृद्य एव । आ एवं नु मन्यमे । आ एव हि तत् । डित्तु न प्रगृयःईपदुष्णम् ओष्णम् । वाक्यस्मग्णयोरहिन् अन्यत्र डिदिति विवेकः ॥ इति ४२ अंशाः। संबुद्धो शाकल्यस्येतावना १३॥ १६॥ संबुदिनिमित्तक ओकागे वा प्रयोऽ वैदिरहती । विष्णो इनि विष्णविति॥ .

९२
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सुगमकौमुद्याः।
उभः १1१।१७॥
उज इतौ वा प्रागुक्तम् । उ इति विति ॥
ॐ१।१।१८॥
उज इतौ दीघोऽनुनासिकः प्रगृह्यश्च । ॐ इत्ययमादेशो वा । ॐ
इति विति ।।
मय उभो वो वा ८।३।३३॥
मयः परस्य उजो वो वाचि । किमु उक्तम् किम्वुक्तम् । वस्या
सिद्धत्वान्नानुस्वारः॥
ईदूतोच सप्तम्यर्थे १1१। १९ ॥
सप्तम्यर्थे पर्यवसन्नमीदूदन्तं प्रगृह्यम् । ययी आस्ते । तनू इति
छन्दसि ॥
अणो प्रगृह्यस्यानुनासिकः ८।४।६७ ॥
अप्रगृह्यस्याणोऽवसानेनुनासिको वा । दाधं दधि ॥
उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ८।४।६१॥
उदः परयोः स्थास्तंभोः पूर्वसवर्णः। आदेः परस्य । उत्थानम् ।
उत्थ्यानम् । उत्तम्भनम् । अत्र सस्य थः । तस्य झरोझरीति वा
लोपः । तदभावे थस्यैव श्रवणं नतु चर्वम् । चत्वै प्रति थस्यासि-
दत्वात् ।।
मो राजि समः क्वौ ८।३।२५॥
किबन्ते राजतौ परे समो मस्य म एव । सम्राट् ॥
हेमपरे वा ८।३।२६॥
मपरे हकारे परे मस्य म एव स्यादा । किम् मलयति किं
मलयति ॥
यवलपरे यवलावेति वक्तव्यम् ॥
किरह्याकिव् हलयाते । किल् हादयति । पक्षे विह्यः। इत्यादि।
नपरेनः ८।३।२७॥

प्रथमखंडस्य द्वितीया भागः । नपरे हकारे परे मस्य नो वा । किन हते कि हुते॥ णोः कुकूटुक् शरि ८।३।२८॥ इकारणकारयोः कुक्टुकावागमौ वा शरि । तयोरसिद्धत्वाज- इत्वन्न ॥ चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेः ॐ ॥, मा खपष्ठः प्राङ्क्षष्ठः प्राङ्पष्ठः । सुगण षष्ठः सुगण द् पष्टः सुगण षष्ठः ॥ डः सिधुट ८।३।२९॥ डात्परस्य सस्य धुड़ा । पदत्सन्तः पट्सन्तः॥ नश्च ८।३।३०॥ नान्तात्पदात्परस्य सस्य घुड़ा । सन् त्सः सन्सः॥ शि तुक् ८।३।३१॥ पदान्तस्य नस्य शे परे तुग्वा । सञ्छंभुः। सञ्च्छंभुः सञ्च्शंभुः सशंभुः । इह तुक्छत्वचलोपानां विकल्पात् अछी अचछा अच- शानशापिति रूपचतुष्कम् ॥ आङ्माङोश्च६।१।७४॥ एतयोश्छे तुक् । पदान्तादेति विकल्पापवादः। आच्छादयति । माच्छिदत् ॥ समः सुटि ८।३।५॥ समोरुः सुटिभिलोन्त्यस्य अनुस्वारानुनासिको विसर्गः विसर्ज- नीयस्य सः एतदपवादे वा शरीति पाक्षिक विसर्ग प्राप्ते ।। संपुकानां सः ॥ संस्कृती संस्कर्ता समो वा लोपमेक इति भाष्यम् । लोपस्यापि रुपकरणस्थत्वादनुस्वारानुनासिकाभ्यामेकसमपि रूपद्वयम् । दिस- तूक्तमेव । तत्रानचीति द्वित्वे त्रिसमपि रूपयम् । अनुस्वारविसर्ग- जिह्वामूलीयोपध्मानीययमानामकारोपरि शपु च पाठेनाऽनुस्वारस्या.

सुगमकीमुद्याः।
प्यच्त्वात् । अनुनासिकवतां त्रयाणां शरः खयः इति कवित्वे षट् ।
अनुस्वारखतामनुस्वारस्यापि द्वित्वे द्वादश। एपामष्टादशानांतकारस्य
द्वित्यै वचनान्तरेण पुनर्दित्वे एकतं द्वितं त्रितमिति चतुष्पश्चाशत् ।
अणोऽनुनासिकत्वेऽष्टोत्तरं शतम् ॥
पुमः खय्यम्परे ८।३।६॥
अम्परे खयि पुम्शब्दस्य रुः। संपुकानामिति सः। पुस्को-
किलः पुंस्कोकिलः। पुंस्पुत्रः पुंस्पुत्रः। ख्याजादेशेन । पुख्यानम् ॥
नृन्पे ८।३।१०॥
ननित्यस्य रुर्वा पकारे । न पाहि पाहि पाहि
नं: पाहि नन् पाहि ।।
कानानेडिते ८।३।१२॥
कानकारस्य रुः स्यादामेडिते परे । संघुकानामिति सः। यहा ।।
कस्कादिषु च ८।३।४८॥
एविण, उत्तरस्य विसर्गस्य पोऽन्यत्र तु सः। कुप्पोरित्यस्या-
पवादः । काँस्कान् कांस्कान् । कस्कः । कौतस्कुतः । सर्पिष्कु-
ण्डिका । आकृतिगणोऽयम् ।।
इति ४३ अंशाः।
शपरे विसर्जनीयः ८।३।३५॥
शपरे खरि विसर्जनीयस्य विसर्जनीयो न त्वन्यत् । कः त्सरुः।
कुप्पोरित्यस्य विषयेप्ययमेव । घनाघनः क्षोभणः । इह सत्वं
जिह्वामूलीयश्च न ॥
खपरे शरि वा विसर्गलोपः ॥
रामस्थाता रामःस्थाता रामस्थाता। त्रैरूप्यम् ॥
सो पदादौ ८।३।३८॥
विसर्गस्य सो पदाद्योः कुप्वोः । पाशक्ल्पककाम्येष्विति वृत्तिः।
राम् । यशस्कल्पम् । यशस्कम् । यशस्काम्यति ॥
।

प्रथमरखंडस्य द्वितीयो भागः । अनव्ययस्येति वाच्यम् ॥ प्रातःकल्पम् । काम्ये रोरेव नेह । गीः काम्यति ॥ इणः पः८।३।३२॥ इणः परस्य विसर्गस्य पः पूर्वविपये । सर्पिप्पाशम् इत्यादि । नमस्पुरसोर्गत्योः ८।३।४०॥ गतिसंज्ञयोरनयोर्विसर्गस्य सः कुप्वीः । नमस्क्रोति । साक्षा- त्प्रभृतीने चेति वा गतिसंज्ञा । तदमावे नमः करोति । पुरस्मगति । पुरोव्ययमिति नित्यं गतिसंज्ञा । इदुदुपधस्येत्यनेन एकादेशगात्र- निमित्तकस्य न पत्वम् । मातुः कृपा ॥ मुहुसः प्रतिपेधः ॥ मुहुःकामा ॥ तिरसोऽन्यतरस्याम् ८।३।४३॥ सो वा कुप्वोः । तिरस्कता तिरस्कर्ता ।। द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वोऽथे ८।३।४३॥ कृत्वोर्थे वर्तमानानामेषां विसर्गस्य पोवा कुप्वीः । द्विष्करोति द्विःकरोति । इत्यादि ॥ इसुसोः सामर्थ्य ८।३।४४॥ एतयोविमर्गस्य षकारो वा कुप्वोः । सर्पिष्करोति सकिरोति धनुष्करोति धनुःकरोति ॥ नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य ८।३।४५॥ इसुसोर्विसर्गस्यानुत्तरपदस्थस्य समासे नित्यं पः कुप्वोः । सर्पि- कुण्डिका । धनुष्कपालम् ।। अतः कृकमिकसकुम्भपात्रकुशाकर्णीप्यनव्ययस्य ८।३।४६॥ अकारादुत्तरस्यानव्ययस्य विसर्गस्य समासे नित्यं सकारादेशः करोत्यादौ परे नतूत्तरपदस्थस्य । अयस्कारः । अयस्काम इत्यादि। ।

सुगमकामुघाः। अपाशिरसी पदे ८।३।४७॥ समासेजुत्तरपदस्थस्य एतयोर्विसर्गस्य सः पदशब्दे परे । अध स्पदम् । शिरस्पदम् । कस्कादिषु च । भास्करः । भोस् भगोस् अघोस् इति सान्ता निपाताः । तेषा रुत्वे यत्त्वे च ॥ व्योलघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य ८।३।१८॥ पदान्तयोर्यवयोलघूञ्चारणौ यचौ वा शि ।। ओतो गार्ग्यस्य ८।३।२०॥ ओकारात्परस्य पदान्तस्यालघुप्रयत्नस्य यकारस्य नित्यं लोप.। मो अच्युत । लघुपयत्नपक्षे भोयच्युत ॥ उभिच पदे ८।३।२३॥ अवर्णपूर्वयोः पदान्तयोर्यवयोलोंप उत्रि परे । स उ एकाग्निः । रोऽसुपि ८।२।६९॥ अहो रेफादेशो नतु सुपि । रोरपवादः । अहरहः । अहर्गणः । सुपि तु अहोभ्याम् । अत्राहनिति रुत्वम् ।। रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम् * ॥ अहोरूपम् । गतमहो रात्रिरेषा । अहोरात्रः । अहोरथंतरम् ॥ अहरादीनां पत्यादिषु वा रेफः * ॥ विसर्गापवादः । अहपतिः । गीतिः । धूर्पतिः । पक्षे विस- गोंपध्मानीयो । सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् ६।१।१३४॥ सस् इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि । पादश्वेलोपे सत्येव पूयंत । सेमामविडिप्रमृतिम् । सैप दाशरथी रामः । लोपे चोदिति किम् । स एवमुक्त्वा बचनम् । अवधारणान्नेह । सोऽहमाजन्मशुद्धानाम् ॥ इति मायोविशेपसन्धिप्रकरणम् ॥ इति ४४ अंशाः। .

१७ प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । अथ पुल्लिङ्गादिषु प्रायो विशेपशब्दाः । प्रथमचरमतयाल्पाईकतिपयनमाश्च १1१1३३॥ जसः कार्य प्रति सर्वनामसंज्ञा वा । प्रयमे प्रथमाः । तयः प्रत्य- यस्ततस्तदन्ता ग्राह्याः। द्वितये द्वितयाः । शेष रामवत् । नम नेमाः। शेष सर्ववत् ॥ तीयस्य ङित्सु वा * ॥ द्वितीयस्मै द्वितीयायेत्यादि । निर्जरः ।। जराया जरसन्यतरस्याम् ७।२।१०१॥ जगशब्दस्य जरस वा अजादी विभक्तौ । एकदेशविकृतस्यान- न्यत्वात् जरशन्दस्य जरम् । निर्जरसा । निर्जरसः । इत्यादि । पक्षे हलादौ च रामवत् । मिसि निर्जरः । इत्येकम् ॥ पहनोमासहनिशसन्यूपन्दोपन्यक छकन्नदन्नासन्छ- सुप्रभृतिषु ६।११६३॥ पादादीनां शसादा पदादय आदेशा वा ॥ मांसपृतनासानूनां मांस्पृत्स्त्रवो वा शसादौ ॥ पादः । पादौ । पादाः । पादम् । पादौ । पदः पादान । दतः। दता । दयामित्यादि । मासः । मासा । माभ्याम् । यूप्णः । यूप. भ्याम् । यूणि यूपणि । पक्षे रामवत् । एवं दन्तादीनां स्वस्वलिङ्गे रूपाणि ज्ञेयानि । विस्तरमयान्न सर्वेपां लेखः। तत्र पुंसि पाददन्त- मासयूपाणां पद् दत् मास यूपन् इति । स्त्रियां नासिकानिशापृत- नानां नस निश् पृत् इति । लीये हृदयअसज्यकत्सकदका- स्यमांसानां हृद् असन् यकन् शकन उदर आसन् मांस इति । 'क्लीवयोः दोप्सान्योः दोपन स्तु इति । पदनिति सूत्रे प्रभृतिग्र- हणं प्रकारार्थम् । तेन शसादेन्यत्राप्यादेशः । पदंघ्रिश्चरणोखि- याम् । पदादयः स्नुपर्यन्ताः पृथगेव गन्दा इत्यके । शमादिवि- पयाणि प्रकृत्यन्तराण्येव पदादय इति परे । यद्गः ॥

९८ सुगमकौमुद्याः। संख्याविसायपूर्वस्याह्नस्याहनन्यतरस्यां डौ६।३।११०॥ संख्यादिपूर्वस्याहस्याहनादेशो वा डी परतः। द्वयोरहोर्भवो यहः। यदि यहनि । यते । एवं विगतमहळगः । अतः सायः सायातः । व्य। इत्यादि ।। आतो धातोः६।४।१४०॥ आदन्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः । विश्वपाः । विश्वपौ । विश्वपः । हे विश्वपाः । एवं शंखध्मादयः। धातोः किम् । हाहान् । हाहै । हाहाः । हाहौः । शेपं विश्वपावत् । आत इति योगविभागादधातोरपि क्वचिदालोपः । क्त्वः नः । आतो नाप इति वार्तिकात् आबन्तभिन्नाः सर्वे आदन्ता विश्वपावत् इति परे॥ अनङ् सौ ७।१।९३॥ सख्युरङ्गस्यानडादेशोऽसम्वुदौ सौ । सखा । हे सखे ॥ सख्युरसम्बुद्धौ ७।११९२॥ सख्युरङ्गात्पर संवृद्धिवर्ज सर्वनामस्थानं णित्कार्यकृत् । अचो. णिति । सखायौ । सख्या। सख्ये ॥ ख्यत्यात्परस्य ६।३।११२॥ खितिशब्दाभ्यां खीतीशब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ड- सिडसोरत उत् । सख्युः ॥ औत् ७।३।११८॥ इदुल्यां डेरौत् । सख्यौ ॥ पतिः समास एवं ११४१८॥ पतिशब्दः समास एव घिसंज्ञः । पत्या । पत्ये इत्यादि । समासे तु भूपतिना ॥ इति ४५ अंशाः। है प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । कतित्रिशब्दौ नित्यं वहुवचनान्ती ।। बहुगणवतुडतिसंख्या ११११२३॥ एते संख्यासंज्ञाः ॥ डति च १1१।२५॥ डत्यन्ता संख्या पट्संज्ञा ।। पड्भ्यो लुक् ७।३ । २२॥ पड्भ्यः परयोर्जश्शसो क । लुका लुप्तत्वाजसि चेति गुणौ न । कति । कति । इत्यादि । अस्मद्युष्मद्पट्संज्ञास्त्रिषु सरूपाः त्रयः॥ त्रयः७।११५३॥ त्रिशब्दस्य त्रयादेश आमि । त्रयाणाम् । पपीः । पप्यो । पपीम् । पपीन् । पप्याम् । डौ पपी । एवं ययीवातप्रम्यादयः । उन्नीः । धातुना संयोगस्य विशेषणद्यण् स्यादेव । उन्यो । डी उन्न्याम् । एवं ग्रामणीः । सेनानीः ॥ गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण नेप्यते ॥ शुद्धधियौ । परमधियो । दुर्धियः इति तु दुस्थिता धीर्यपा- मिति विग्रहे दुरो धीशब्द प्रति गतित्वामावात् । एवं वृश्चिकभिय इति । वृश्चिकसंबन्धिनी भीरिति विग्रहात् । नीः । नियौ । नियाम् ॥ न भूसुधियोः ६।४।८५॥ एतयोर्यण न अचि सुपि परे । सुधीः । सुधियौ ।। ओः सुपि६।४। ८३॥ धात्वक्यवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातुस्तद- न्तस्यानकाचोङ्गस्य यणजादी सुपि । खलपूः । खलप्वा ।। तृत्वकोष्टुः ७।१ । ९५॥ कोटुशब्दस्तृजन्तेन तुल्यं भवति असंबुद्धौ सर्वनामस्थाने । को- छुस्थाने क्रोष्टशब्दः प्रयोज्य इत्यर्थः । क्रोष्टा । क्रोटारी । क्रोएन् ।

। १०० सुगमकौमुद्याः। विभाषा तृतीयादिष्वचि ७।१।९७॥ अजादिपु तृतीयादिषु क्रोएा तज्वत् । कोपा । नुमचिरेति नुट् । कोष्टूनाम् । क्रोष्टार । कोट्रोः । पक्षे हलादौ च शम्भुवत् । हूहूः । हो । हूहूम् । स्वभूः । स्वभुषौ । सुल्वौ । परमलुचौ ॥ वर्षाभ्वश्च ६।४।८४॥ अस्योवर्णस्य यणचि सुपि । वर्पाभ्वी । हम्भवतीति दृभ्भूः । उणादिषु दृम्भ्वी । हूहूवत् ॥ दृन्करपुनःपूर्वस्य भुवो यण वक्तव्यः || इन्भ्वम् । करवा । दीर्घपाठे तु कर एव कारः । कारभ्वी । पुनभ्यौं । दृग्भूकाराभूशब्दी तु स्वयंभूवत् । ननादयो धावत् । उद्गातुरपि दीर्घः । उद्गातारौ । ना। नरौ । हे नः ।। नृच६।४।६॥ नृइत्यस्य नामि वा दीर्घः । नृणाम् नृणाम् । कृ त अनयोरनु- करणे प्रकृतिवदनुकरणमिति वैकल्पिकातिदेशादित्ये रपरत्वम् । की: किरौ । किरः । तीः । तिरौ । तिरः । इत्यादि गीत् । इत्वाभावे तु कृ । क्रौ । कः । कृन् । इत्यादि । डे' । डयौ । एवं सेः। स्मृतेः॥ गोतो णित् ७।१।९०॥ गोशब्दात्परं सर्वनामस्थानं णित्कार्यकृत् ।। औतोऽमशसोः६।३।९३ ॥ ओकारादमासोरच्याकार एकादेशः । गौ । गावी । ग्राम् । गाः॥ मोतो णिदिति वाच्यं विहितविशेषणं च ॥ मुद्यौः । स्मृतीः । हे मानो । इत्यादी सारोशगन्तादिदित- स्वाभावान्न णित् ॥ रायो हलि ७१२१८५॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः। रेशब्दस्याफारोन्तादेशो हलादी विमक्ती । राः। रायो । गभ्याम्।। इति ४६ अंशाः। हो ढः VIDYA man मुलोपः। लिट् लिड् । लिही। लिइभ्याम् । लिट्स लिदत्म ।। दादे तोघः ८।२।३२॥ उपदेशे दादे तोहस्य घः झलि पदान्ते च ॥ एकाचो यशो भए झपन्तस्य स्वोः ८।२।३७॥ धातोरवयवो य एकाच झपन्तस्तदययरस्य वो मप में ध्ये पदान्ते च । धुक् धुम् । दुही ।। वा दुहमुहष्णुहप्णिहाम् ८।२।३३॥ एपां हस्य वा घो झलि पदान्ते च । धुरम् टड । धृक्ष घदसुवइत्सु ॥ वाह ऊत् ६।४।१३२॥ भस्य वाहः सम्प्रसारणमूटू । वृद्धिः । विश्वौहः विश्वाहा ।। चतुरडुनहोरामुदात्तः ७।१।९८ ॥...... 20746 एतयोराम् सर्वनामस्थाने स चौदात्तः॥ सावनडुहः ७।१।८२॥ अस्याकारात् नुम् सौ परे। संयोगान्तलोपस्यामिद्धत्वान्नलोपो न । अनहान् ॥ अम् सम्बुद्धौ ७।१।९९ ॥ चतुलडुहोरम् सम्बद्धी । हे अतइन । मुझस्थिति दः । अनडुङ्ग्यामित्यादि ।। सहेः साडः सः ८।३।५६॥ साइरूपस्य महेः सस्य मूर्द्धन्यः। तुगपाट् । तुगसाहाँ चत्वारा पट्चतुर्व्यश्च ७।११५५॥ LIBRARIE

१०२
सुगमकौमुद्याः।
। पटूसंज्ञकेभ्यश्चतुरश्च परस्य आमो नुडागमः । चतुर्णामू चतुर्ष ॥
मो नो धातोः ८।२।६४॥
धातोर्मस्य नः पदांते नत्वस्यासिद्धत्वान्नलोपो न । प्रशान् ।
प्रशान्भ्याम् । वृत्रहा । वृत्रहणौ ॥
एकाजुत्तरपदे णः ८।४।१२॥
एकाजुत्तरपदं यस्य तस्मिन्समासे पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य
प्रातिपदिकान्तनुविभक्तिस्थस्य नस्य नित्यं णः॥
हो हुन्तेणिन्नेषु ७।३।५॥
जिति णिति च प्रत्यये नकारे च परे हन्तेईस्य कुत्वम् । वृत्रतः।।
हन्तः ८।४।२२॥
उपसर्गस्थानिमित्ताद्धन्तेर्नस्य णः । पहण्यात् ॥
अत्पूर्वस्य ८।४।२२॥
हन्तरत्पूर्वस्यैव नस्य णः नान्यस्य । प्रनन्ति । वृनना । एवं
शाङ्गिन्यशास्विन्नर्यमन् पूपन् ।
मघवा बहुलम् ६।४।१२८॥
मघवनशब्दस्य वा त इत्यन्तादेशः । उपधादीर्घः । संयो.
गान्तलोपस्यासिद्धत्वं तु वाहुलकान्न । मघवान् । मघवन्तौ । हे
मघवन् । मघवतः । पक्षे मघवा । सुदि राजवत् ।।
श्वयुवमघोनामतद्धिते ६।४।१३३॥
अन्नन्तानां मसंज्ञकानामेपामतद्धिते संप्रसारणम् । मघोनःशुनः।।
न संप्रसारणे संप्रसारणम् ६।११३७॥
संप्रसारणे परतः पूर्वस्य यणः संप्रसारणं न । युनः । युना।।
इति ४७ अंगाः।
अर्वा ॥
अर्वणस्त्रसावनमः६।४।१२७॥

प्रथमसण्डस्य द्वितीयो भागः । नमा रहितस्यानिइत्यस्याङ्गस्य ह इत्यन्तादेशो नतु मा । अवन्ती । अर्बयाम् । अनमः किम । अनर्वाणी यजरत ॥ पथिमथ्यभुक्षामात् ७।१।८५ ॥ एपामाकारोन्तादेशः सा ।। इतोत्सर्वनामस्थाने ७। १।८६॥ पथ्यादेरिकारस्याकारः सर्वनामस्थाने ॥ थोन्थः ७।१।८७ ॥ पथिमथोस्थस्य म्थादेशः सर्वनामस्थाने । पन्थाः। पन्थानी ॥ भस्य टेलोपः७।१।८८॥ मसंज्ञकस्य पथ्यादेष्टेलॉसः । पथः । एवं मन्थाः । समुक्षाः ॥ प्णान्ता पट्१।१।२४॥ पान्ता नान्ता च संख्या पदसंज्ञा । पच । पश्च ।। नोपधायाः ६।४।७॥ नान्तस्योपधाया दीर्घो नामि । नलोपः । पञ्चानाम् । पूर्व सप्तादयः॥ अष्टन आ विभक्तौ ७।२।८४ ॥ अटनी हलादी विभक्ती जश्शसोच वा आत्वम् ।। अष्टाभ्य औश ७ । १ ।२१॥ कृताकारादृष्टनः परयो इशसोरोश । अष्टौ । अष्टौ । अष्टामिः । अष्टानाम् । आत्वामारे अष्ट २ । इत्यादि पंचरत् ।। ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुप्णिगफ्युजिकुञ्चां च३।२।५९॥ एभ्यः फिन् । तत्र निरुपपदात् युजेः छिन् । कृदतिइ । वेर- युजेरसमासे ७।१।७१॥ युजेः सर्वनामस्थाने नुम् असमामे ॥ पृक्तस्य ॥

१०४ सुगमकौमुद्याः। किन्प्रत्ययस्य कुः ८।२।६२ ।। किन्प्रत्ययो यस्मात्तस्य कवाँऽन्तादेशः पदान्ते । नस्य डा। युङ्युञ्जौ । युजः । युजा । समासे तु सुयुक् । युज समाधी इत्यस्य तु न नुम् । तेन युक् । खन् । खी। व्रश्चभ्रस्जे । ति पत्वम् । जश्त्वेन डः । राष्ट्र राइ । सुपि पक्षे धुद चर्वम् । तस्यासिद्धत्वाच्चयो द्वितीया इति टतयोष्ठथौ न । न पदान्तादिति फुत्वन्न । राट्सु रादत्सु । पढोः कः सि इति तु न जश्त्वं प्रत्यासि- द्धत्वात् । विभ्राड् विश्वस-ट्इ । परिमृ-टूइ । वश्चति सूत्रे भ्राजः फणादेर्ग्रहणम् । अन्यस्य विभ्राक् ।। परौ बजेः पः पदान्ते ॥ परावुपपदे व्रजेः विप्दी! पदान्ते पत्वं च । परिवाट्-ड्र ॥ विश्वस्य वसुराटोः ६।३।१२८॥ विश्वशब्दस्य दीन्तादेशो वसी राट्रशन्दे च परे । विश्वावसुः। राडिति' पदान्तोपलक्षणम् । विश्वाराड् । विश्वाराड्भ्यां । नेह । विश्वराजी । स्कोरिति सलोपः । भृट् भृड् । भृजी । ऋतावुप- पदे यजेः किन् । ऋत्विक्-ग् । रात्सस्य । ऊर्ग । अझै । सुपात्-ट् । सुपादौ ॥ पादः पत्६।४।१३०॥ पाच्छन्दान्तं यदङ्गं में तदवयवस्य पाच्छब्दस्य पदादेशः । सुपदः । मुपदा । सुपायामित्यादि । अग्निमत्-टू । अग्निमा । अग्निमयामित्यादि । इति ४८ अंशाः। अञ्चेः सुप्युपपदे छिन् अनिदितामिति नस्य लोपः। प्राइ। प्राची॥ अचः६।४। १३८॥ एसनस्याश्चमस्यातो लोपः॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । चौ ६।३।१३८॥ लुप्ताकारनकारेऽश्चती परे पूर्वस्याणो दीर्घः । माचः । प्रत्यङ् । अच इति लोपस्य विषयेऽन्तरङ्गोऽपि यण् न प्रवर्तते । अकृतव्यहाः इति परिभाषया । प्रतीचा । विष्वगञ्चतीति विग्रहे ॥ विश्वग्देवयोश्च टेरद्रयंचतावप्रत्यये ६।३१९२॥ अनयोः सर्वनाम्नश्च टेरद्रयादेशो वमत्ययान्तेऽश्चता। विश्वव्यद। विष्वद्रीचः । एवं देवव्यङ् । उदङ्॥ उद ईत् ६।४।१३९॥ उदः परस्य लुप्तनकारस्याश्चतेमस्याकारस्य ईत् । उदीचः ।। समः समि६।३।९३॥ वप्रत्ययान्तेऽञ्चती परे समः समिरादेशः । सम्यइः । समीचः ।। सहस्य सधिः ६।३।९५॥ सध्यः । सधीचः॥ तिरसस्तियलोपे ६।३।९४॥ अलुप्ताकारेऽश्चती अमत्ययान्ते परे तिरसस्तिरिः । तिर्यइ । तिरश्चः॥ नाञ्चः पूजायाम् ६।४।३० ॥ पूजार्थस्याञ्चतेः उपधाया नस्य लोपो न । नलोपामागन्न ' नुमकारलोपी । प्राङ् । प्राञ्चौ । प्राश्चः । प्राइभ्याम् । प्राइस्पु माइक्षु प्राइषु । एवं पूजार्थे प्रत्यादयः। कुश्चः। किनि नलोपामा- वोऽपि निपात्यते । कुड्।क्रुञ्ची । क्रुभ्यामित्यादि । पयोमुक-र। सुवृट्-ड् । सुवृश्ची॥ वर्तमाने पृपन्महदहजगच्छतृवच उगित्वानुम् । महान् । महान्तौ । महता॥ जक्षित्यादयः पट् ६।११६॥ जक्षादयः पडन्ये जक्षिीतश्च सप्तम एते अभ्यस्तसंज्ञाः । जस- सुगमकौमुद्याः। त् द् । जक्षती । एवं जाग्रत् द्। दरिद्रत-द्। शासत्-द् । चकासत्-ट् । दीध्यत्-ट् । वीव्यत् । छान्दसत्वात्परस्मैपदम् । गुप्-व् । गुपौ ॥ त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्च ३।२।६० ॥ अज्ञानार्थाद् दृशेर्द्धातोः कञ् चात् किन् ।। आ सर्वनाम्नः६।३।९१॥ सर्वनाम्न आकारान्तादेशो दृग्श्वतुषु कुत्वस्यासिद्धत्वात्पः । ततो डगकाः । ताइक्र । तादृशौ । विद्-ड । विशौ।। नवी ८।२।६३॥ नशेः कवर्गोऽन्तादेशो वा पदान्ते । नक्-ग् । नट् ड् । नशौ। स्पृशोऽनुदके किन् ३।२।५८॥ अनुदके सुप्युपपदे स्पृशेः क्विन् । घृतस्पृक् ग् । घृतस्पृशौ । किन्प्रत्यय इति वहुव्रीहेः किप्यपि कुत्वम् । स्पृक्-ग् । पडगकाः माग्वत् । धृपेः किन् द्वित्वं निपात्यते दधृक् । दधृषौ । रत्नमुट्-ड्र रत्नमुपी । पट्-इ । पङ्गिः॥ प्रत्यये भाषायां नित्यम् ॐ॥ पण्णाम् । दमेडोंस डित्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः। पत्वस्या- सिद्धत्वाद्भुत्वविसर्गौ । दोः। दोपौ । पदन्निति वा दोपन् । दोष्णः। दोष्णा । दोपः । दोषा। सान्तमहत इत्यत्र सान्तसंयोगोऽपि प्रातिपदिकस्यैव गृह्यते । तेन सुष्टु हिनस्तीति सुहिन् । सुहिंसौ । सुहिन्भ्याम् । उगिदवामित्यत्राग्रहणं नियमाथै धातोश्चेदुगि- कार्य तश्चितरेवति । तेनेह न । ध्वत् द् । ध्वदूभ्याम् । एवं सत् ।। पुंसोऽसुङ् ७१११८९॥ सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुंसोऽसुइ । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसी । पुंसः । पुंभ्याम् । उशना । उशनसौ ।। अस्य संबुद्धावनङ् नलोपश्च वा वाच्यः ॥ हे उशनन हे उशन है उशनः । उशनीभ्याम। अनेहा।

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । १०७ अधातोरित्युक्तेर्न दीर्घः । सुषु वस्ते सुवः । सुवसी । पिण्डं असते पिण्डग्रः पिण्डग्लः ।। इति पुल्लिङ्गाः। इति ४९ अंशाः। विभापा द्वितीयातृतीयाभ्याम् ७।३।११५॥ आभ्या परस्य डितः स्याड् वापश्च दस्वः । द्वितीयस्यै द्विती. यायै।अम्बार्थनधोईस्वः । हे अम्ब । हे अक। हे अल्ल । असंयुक्त- डलकवतान्न । हे अम्बाडे । हे अम्बाले । हे अम्बिके । जरा। अजादौ जरस । जरसौ। जरसम् । पक्षे हलादी च रमावत् । निशा- निश । निशः। व्रश्चेति पः । निड्भ्याम् । व्रश्चेति सूने धातोरित्यनु- वृत्तौ तु निज्भ्याम् । श्रुत्वम् । निशु। कुत्वं तु न जश्त्वस्यासिद्ध- त्वात् । गोपा विश्वपावत् ॥ त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ ७।२ । ९९ ॥ स्त्रीलिङ्गयोरेतयोरेताबादेशी विभक्ती॥ न पटूस्वस्रादिभ्यः ४।१।१०॥ पदसंज्ञकेभ्यः स्वस्रादिभ्यश्च टापडीपौ न । स्वस्रादयः स्युः खसमात्यारननांतिस्रो दुहिता चतस्रः ।। अचिर ऋतः७।२।१०।। तिसृचतसृएतयोः ऋकारस्य रेफादेशोऽचि । गुणदीपोत्वानाम- पवादः । तिस्रः॥ न तिसृचतसृ६।४।४॥ एतयोर्नामि दीर्घो न । तिसृणाम् । स्त्री। हे स्त्रि॥ स्त्रियाः६१७९॥ स्त्रीशब्दस्य इयडजादौ मत्यये । खियो। वाम्शसोः६।४।८०॥ अमि शसि च परे स्त्रिया इयड् वा । त्रियम् स्त्रीम् । स्त्रियः खीः। स्त्रियै । स्त्रियाः। स्त्रीणाम् । स्त्रियाम् । प्रधीशब्दस्य वृत्तिका .

१०८ सुगमकौमुद्याः। रादीनां मते लक्ष्मीवद्रूपम् । कैयटमते पुंवत् । प्रकृष्टा धीरिति विग्रहे तु लक्ष्मीवत् । अमि शसि च प्रध्यम् । प्रध्यः । सुष्टु धीर्य- स्याः सा मुछु ध्यायति वेति विग्रहे तु वृत्तिमते सुधीः श्रीवत् । मतान्तरे पुंवत् सुषु धीरिति विग्रहे तु श्रीवदेव । ग्रामणीः पुंवत् । धेनुमतिवत् ।। स्त्रियां च ७।१।९६॥ स्त्रीशची क्रोष्ठशब्दस्वजन्तवद्रूपं लभते । डीप् ! कोणी । वधू- गौरीवत् । भूः श्रीवत् । हे सुभूः । स्वस्त्वपाणिनीयः । पाश्चः कवयस्तु सुभूशब्द द्वस्वं प्रयुञ्जते । खलपूः पुंवत् । पुनर्भूः । पुन- भ्वौं । हस्वः । हे पुनर्भु । पुनर्वम् । एकाजुत्तरेति णः । पुनर्भू. णाम् । भेकजाती कैयटमते हे वर्षाभूः। मतान्तरे हे वभु । पुनर्न- वायां तु सर्वेषाम् । हे वर्षाभु । वर्षाभ्यौ । स्वयंभूः पुंवत् । स्वसा। स्वसारी । द्योगोंवत् । नौग्लौंवत् ।। नहो धः ८।२।३४॥ नहो हस्य धः झाले पदान्ते च । उपानत्-ट् । उत्पूर्वात् णिहः किन्निपातनात्तलोपपत्वे कुत्वम् । जश्त्वचत्वे उष्णिक ग् ॥ दिव औत् ७।११८४॥ दिविति प्रातिपदिकस्य और सौ । द्यौः । दिवो ॥ दिव उत्६।१।१३१॥ दिवोऽन्तादेशः उकारः पदान्ते । शुभ्याम् । चतुरश्चतम् । चतमः। चतमणाम् । सृजेः पिन् अमागमश्च निपात्यते । सक्-। अप्. गन्दो नित्यं बहुवचनान्तः । आपः । अपः ।। अपो भि७।४।१८॥ अपस्तकारो मादी प्रत्यये । अहिः । दिय-र । दशः पिनधि- धानादन्यत्रापि पुत्वम् । दृक्-ग । सह जुपते इति सजः। रामुपा। सजूभ्याम् । राजूप्पु मजूःषु ॥ इति मीलिंगाः ॥ इति ५० अंशाः । इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः।

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः। अजरशब्दस्य सौ अजरमित्येव । सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य इति परिमापया अजरसी । अजरे। अजरांसि । अज- राणि । अजरसम् अजरम् । श्रीपं ज्ञानवत् ॥ अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनदात्तः ७।१।७५॥ एपामनङ् टादावाच स चोदात्तः । दना । दनि दधनि । तद- न्तस्याप्यनङ् । अतिदना । एवमस्थ्यादि । चत्वारि । रोऽसुपि अहर्भाति । विभापाडिश्योः । अह्नी । अहनी । अहानि ॥ अहन् ८।२।६८॥ अहन्नित्यस्य रुः पदान्ते। अहोभ्यामोरात्सस्याऊ-गं । ऊर्जी । उनर्जि । नरजानां संयोगः । तिर्य-ग् । तिरश्री। तिर्यश्चि । पूजा. यान्तु तिर्यक । तिर्यश्ची ॥ इति नपुंसकलिङ्गाः॥ सर्वादिषु उभयशब्दस्य द्विवचनं नास्तीति कैयटः । अस्तीति हरदत्तः । जसि स्थानिवद्भगावन तयान्तत्वात् प्रथमचरमैति विकल्प प्राप्तेऽन्तरङ्गत्वान्नित्यैव संज्ञा । उभये । समः सर्वपर्यायः । तुल्यप- यस्तु नेह गृह्यते । समे सासमास्तुल्याः । एकशब्दः संख्यायां नित्यैकवचनान्तः ॥ अन्तरं बहियोगेति गणसूत्रेऽपुरीति वक्तव्यम् * ॥ अन्तरायां पुरि। सर्वाद्यन्तस्यापि सर्वनामसंज्ञा तेन परमसर्व- त्रति प्रल् । परमभवकानित्यकच ॥ न बहुव्रीही १ । १ । २९॥ बहुवीही चिकीर्पिते सर्वनामसंज्ञा न । त्वकं पिता यस्य त्वत्क- पितृकः । मत्कपितृकः । समासात्मागेव प्रक्रियावाक्ये संज्ञानिषेधः अन्यथा लौकिकविग्रहवाक्य इव तत्राप्यकच प्रवर्तेत स च समासे- ऽपि श्रूयेत । अतिक्रान्तो भवकन्तमतिमवकानितिवत् । भाष्यका- रस्तु त्वकत्पितृकः मकत्पितृक इत्यगीकृत्य सूत्रं प्रत्याचख्यौ॥ यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् ॐ ॥ संज्ञोपसर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः । अतः संज्ञाकार्यमन्तुर्गण-

सुगमकौमुद्याः।
कार्यं च तेषा न भवति । सवा नाम कश्चित्तस्मै सर्वाय देहि । अति-
क्रान्तः सर्वमतिसर्वस्तस्मै अतिसर्वाय । अतितत् ॥
तृतीयासमासे १1१1३०॥
अत्र सर्वनामता न । मासपूर्वाय । तदर्थवाक्येऽपि न । मासेन
पूर्वाय ॥
द्वन्द्वे च १1१1३१॥
इन्दे उक्ता संज्ञा न । वर्णाश्रमतराणाम् ॥
विभापा जसि १1१।३२॥
जसाधारं यत् कार्य शीभावाख्यं तत्र कर्तव्ये इन्द्रे उक्ता संज्ञा
वा। वर्णाश्रमेतरे वर्णाश्रमेतराः । शीभावं प्रत्येव विमापातो नाकच
किन्तु क एव । वर्णाश्रमेतरकाः। स्त्रियाम् ॥
विभापा दिक्समासे बहुव्रीहौ १११।२८ ॥
अत्र सर्वनामता वा । उत्तरपूर्वस्यै उत्तरपूर्वायै । दिड्नामा-
नीत्युक्ते प्रतिपदोक्ते समास एव । नेह । योत्तरा सा पूर्वा यस्या
मुग्धायास्तस्यै उत्तरपूर्वाय । अन्तरस्यै बाह्यायै अन्तरायै पुर्य ।
क्लीवे । कतरत् कतरद् । कतमत् । संज्ञागौणयोः । कतरम् । अति-
कतरं कुलम् । अन्यत् । अन्यतरत् । दौ । दी । परमदी । विनाम
कश्चित् । द्विः । अतिदिः ॥
इति ५१ अंशाः।
इदमः ककारयोगे अयकम् । इमकी । इमकेन । परमसः ।
संज्ञाया गौणत्वे च । त्यदू । त्यदी। अतित्यद् । अतित्यदी । यः।
एपः। अन्वादेशे एनमित्यादि । एनाम् ॥
अदसः सौ ओत्त्वप्रतिपेधः साफच्कस्य वा वक्तव्यः
सादुत्वं च ॥
प्रतिषेधसनियोगशिष्टमुत्वं तदभावे न प्रवर्तते । अगकी।
..। अमुकदशन्दस्वव्युत्पन्नमदः पर्यायभूत शन्दानरम ॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । १११ समानवाक्ये निघातयुष्मदस्मदादेशाः ॥ एकतिङ् वाक्यम् । नेह । ओदनं पच तव भविष्यति । इह तु स्यादेव । शालीनां ते ओदनं दास्यामीति ॥ न च वाहाहैवयुक्ते८।१॥२४॥ चादिपञ्चकयुक्ते नैते आदेशाः हरिस्त्वां मां च रक्षतु । कथं त्वां मांबा न रक्षेदित्यादि साक्षायोगेश्यं निषेधः । परंपरासम्बन्धे स्यादेव । हरो हरिश्च मे स्वामी ॥ पश्याथैश्वानालोचने ८ । १।२५॥ अचाक्षुपज्ञानार्धातुभिर्योगे नैते आदेशाः। चेतसा त्वां समी- क्षते । परम्परासम्बन्धेऽपि न । भक्तस्तव रूपं ध्यायति । आलोचने तु भक्तस्त्वा पश्यति चक्षुपा ॥ सपूर्वायाः प्रथमाया विभापा ८1१।२६॥ विद्यमानपूर्वात्प्रथमान्तात्परयोरनयोरन्वादेशेऽपि एते आदेशावा स्युः । भक्तस्त्वमप्यहन्तेन हरिस्त्वां त्रायते स माम् । त्वामेति वा ।। सामन्त्रितम् २।३।४८॥ सम्बोधने या प्रथमा तदन्तमामंत्रितसंज्ञम् ॥ आमन्त्रितं पूर्वमविद्यमानवत् ८।१।७२॥ अग्ने तव । सर्वदा रक्ष देव न इत्यत्र तु रक्षेत्याश्रित्यादेशः ॥ नामन्त्रितेसमानाधिकरणे सामान्यवचनम्८।१।७३॥ विशेष्यं समानाधिकरणे विशेषणे आमंत्रिते परे नाविद्यमान- वत् । हरे दयालो नः पाहि ॥ विभापितं विशेषपचने ८111७४ | बहुवचनान्तं विशेष्यं समानाधिकरणे विशेपणे आमन्त्रिते परे अविद्यमानवदा । यूयं प्रभवः । देवाः शरण्याः। युष्मान् भने । यो मजे इति वा । इहान्चादेशेप वैकल्पिका आदेशः। इति ५२ अंशाः।

- ११२ सुगमकीमुद्याः। स्वरादिनिपातमव्ययम् १।१।३७॥ ते चादिवर्णक्रमेण लोके प्रसिद्धा लिख्यन्ते । अन्तर । अभी- क्षणम् । अंजसा । अतीव । अद्धा । अनिशम् । अनुपदम् । अन्त- रा । अन्वक् । अपष्टु । अमुत्र । अरम् । अर्वाक् । असांप्रतम् । अवश्यम् । अस्तम् । आरात् । आविम् । आशु । ईपत् । उच्चैस् । उपा। उपजोपम् । उपांशु । ऋधक । ऋते । कामम् । कु।जोपम् । झटिति । झगिति । तरसा । तिरस् । तिर्यक् । तूर्णम् । तृष्णीम् । तूष्णीकाम् । दिवा । दुष्ठ । दोपा । द्राक् । धिक् । नक्तमानमस् । नाना । निकपा। निकामम् । नीचैस् । न्यक् । परम् । परश्वम् । पराक। पुनःपुनर । पुनर् । पुरतस । पृथक् । प्रकामम् । प्रत्यक । प्रत्यहम् । प्रसह्य । प्रातर् । प्रादुस् । प्रायशस् । प्रायस् । प्रेत्य । बलात् । भुवर । भूयस् । भूर् । मंक्षु । मनाक । मिथस् । मिथुस् । मिथ्या । मुधा । मुहुर्मुहुस् । मुहुस् । मृपा । युगपत् । युक्तम् । रहस् । रोदसी । वरम् । वहिस् । विहायसा । विना । विश्वक् । विष्वक् । वृथा । शनैस् । शम् । शान्तम् । श्वसासंवत् । सत्यम् । सपदि । समन्ततः । समन्तात् । सनत् । सनात् । समया । सना । समुपजोपम् । सह । साक्षात् । साचि । सामि । साक् । सायम् । सुदि । सुष्ट । स्थाने । स्वयम् । स्वर । स्वस्ति । हिरुक। ह्यस् । आकृतिगणोऽयम् ॥ चादयो सत्वे ॥ अ। अकस्मात् ! अग्रे । अघोम् । अङ्ग । अचिरम् । अह । अथ । अथकिम् । अथवा । अथो । अन्तरेण । अपि । अपिच । आपतु । अभि । अमा। अयि । अये । अररे । अरे । अरेरे । अलम् । असकृत् । अस्ति । अस्तु । अहह । अहो । अहोयत । अदाय । आ। आइ । आम् । आः । आहो। आहोस्वित् । इ । इति।इति हाइवाउारताउन् । उताहो । उम् । उरी । उरी जरी। ऋतम् । ए । एवाएवमाएकपदे । ऐ। ओ। ओम् । आकचित् । ।

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । कदाचन । कदाचित् । कम् । किंस्वित् । किंच । किंचना किंचित् । कि । किल । किन्तु । किन्नु । किम् । किमुा किमुताकिंवा । किल । कुत्रचित् । कृतम् । कचनाकचित् । खलु । चन । चित् । चिरम् । चिररात्राय । चिरस्य । चिरात् । चिराय ! चिरेण । चेत् । छंबट । जातु । तत् । तथा च । तथापि । तथाहि । तावत् । तु । ते। दर । दिष्ट्या । न । नञ् । ननु । ननु च । न चेत् । न वा । न वै । नहि । नाम । नास्ति । नितराम् । नु । नृनम् । नो । परमम् । पाट् । प्याट् । पुरा । प्रगे। प्रत्युत । प्राध्वम् ।माहौफट् । वत । वलात् । भगोस् । भवतु । भृशम् । भोस् । मम । माइ। मास्म । मेयत् । यच । यथायथम् । यथातथम् । यथार्हम् । यथारत् । ययास्वम् । यदा । यदि नाम । यदि । यदुत । यद्यपि । यावत् । रेवत् । यदि । वरमावपटू । वा । वाव । विपु । वै । वौषट् । शश्वत् । शुमम् । श्रत् श्रीपट् । सत् । सकृत् । सत्रा । सह । समम् । संप्रति । सम्यक् । स्म । साकम् । सांप्रतम् । सार्द्धम् । मुचिरम् । मुतराम् । स्वधा । स्वाहा । स्वित् । ह । हहो । हर्छ । हंडे । हत। हम् । हला। हा। हिही। हीही । हुम् । एम् । है । है । हो । हो । अयमप्याकृतिगणः ।। इति ५३ अंशाः। उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च ॐ ॥ अवदत्तम् सुवन्तविभाक्तमतिरूपकाः । अहम् । अन्तरेण । अन्योन्यस्य । अह्राय । अग्रे। अक्स्मात् । एकपदे । कृतम् । चिरेण । चिराय । चिररात्राय । चिरात् । चिरस्य । ते । तेन । पर्याप्तम् । प्रगे । प्राद्धे । मम । मे। मात्रायाम् । येन । गत्री वेलायाम् । शुभम् । हेती । अथ तिङन्तविभक्तिमतिरूपकाः । असि । अस्ति । अस्तु । अस्मि । आस । आह । पहिान याति । न वर्तते । नास्ति । पश्यत । पश्य । पूर्यते । ब्रूहि । मवति । भवतु । मन्ये । याति । वर्तते । विद्यते । शंके । स्वरप्रतिरूपकाः । अाया। इ।ई। उ । ऊ । ऋ ।। ल । लाए । ऐ । ओ। श्री - ११४ सुगमकीमुद्याः। प्रादयः । ते चोक्ताः । शेषा अव्यया गणपाठे वोध्याः । एपामर्थी अपि तत्रैव ॥ तद्धितश्वासर्वविभक्तिः॥ तमिल् । बल् । अ । अत् । दााहिल् । अधुना । दानीम् । यम्। उत् । आरि । समसण । एद्यवि । छ । एद्युम् । शुस् । थाल् । थमु । अस्ताति । असि । अतसुन् । रिल् । रिटातिल । आति । एन । आच् । आहि । धा। ध्यमु । धमुझ । एधाच । शम् । तसि।चि । साति । त्रा।डाच । अम् । आम् । कृत्वसुन् । सुन्। धा। तसि । वति । ना।नाइ । इति । तेनेह नापचतिरूपम् । तसिल्। कुतः। यतः । ततः। अतः । इतः। अमुतः । परतः पूर्वतः। सर्वतः। परितः । अभितः । इत्यादि । त्रल् । कुत्र । यत्र । तत्र । अत्र । सर्वत्र । इत्यादि । ह । इह । कुह । अत् । क । दा। सर्वदा। सदा । एकदा । अन्यदा । कदा । यदा। तदा । हिल । तर्हि । यहि। एतर्हि । कहि। अधुना । अधुना । दानीम् । इदानीम् । तदानीम् । द्यस् । सधः । छ । अद्य । एद्यवि । परेद्यवि । एयुम् । पूर्वेद्यः । अन्येयुः।अन्यतरेयुः।इतरेयुः।अपरेयुः।अधरेयुः उभयेयुः उत्तरेयुः । हुस् । उभयद्युः । उत् । परुत् । आरिपरारि । समसण । ऐषमः । थाल् । तथायिथा।थमु । इत्थम् । अस्ताति । पुरस्तात् । अधस्तात् । अवस्तात् । अवरस्तात् । परस्तात् । असि । पुरः । अधः। अवः । अतसुचू । दक्षिणतः । उत्तरतः । अस्ताते छ । प्राक् । उदछ । प्रत्यक् । अवाक् इत्यादि । रिल् । उपरि । रिष्टातिल । उपरिष्टात् । आति । पश्चात् । उत्तरात्।अधरात्।दक्षिणात् । एनम् । उत्तरेण । दक्षिणेन । अधरेण । पूर्वेण । इत्यादि । आन् । उत्तरा । दाक्षिणा। आहि । उत्तराहि । दक्षिणाहि । धा । द्विधा । इत्यादि । ध्यमुञ् । ऐकध्यम् । धमुज । द्वैधम् । त्रैधम् । एधान् । द्वेधा । त्रेधा । शस् । बहुशः । अल्पशः।इत्यादि । तसि । कृष्णतः। आदितः । मध्यतः। उरस्तः । इत्यादि । चि । कृष्णीभवति । इत्यादि । साति । अग्निसाद्भवति । इत्यादि । त्रा। देवत्रा क्रोति । इत्यादि । डाचा ।

प्रथमसण्डस्य द्वितीयो भागः। पटपटाकरोति । सपनाकरोति । इत्यादि । एकदिक्त सि । उरस्तः। पतिः । ब्राह्मणवत् । इत्यादि । ना। बिना । नाज़ । नाना । आम् । पचतितराम् । सुतराम् । अम्। छन्दसि । प्रतं । नयमतरम् । कृत्वसुचू । पंचकृत्वः । इत्यादि । सुन् । दिः । निः। सकृत् । धा। बहुधा । इत्यादि । इत्यव्ययानि ॥ इति ५४ अंशाः। अथाख्यातम् । फलं व्यापारश्च धात्वर्थः । यथा पचो विक्तित्तिः फलं तदनुकूलोधिश्रयणादिर्व्यापारः तन धातुपाठे प्रायो विक्लि- त्यादिरूपस्य पाकादेः फलस्यार्थतया निर्देशः तदनुकुलो व्यापार एव क्रिया तदाचित्वं विना धातुत्वस्यैवाभावात्सर्वधातूना किया वाच्या । व्यापारो भावना सेवोत्पादना सैव च क्रिया तर फल- व्यापारयोरेकनिष्ठतायामकर्मकः धातुस्तयोर्द्धर्मिभेदे सकर्मक उदा. हत.। मकर्मकस्यापि हेतुचतुष्टयेनाकर्मकता । धातोरर्थान्तरे वृत्ते- त्विर्थेनोपसंग्रहात् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया ।। वहति भारम्। नदी वहति । स्यन्दत इत्यर्थः । जीवति । नृत्यति । अत्र प्राणधारणगात्रविक्षेपार्थयोर्जीवनृत्योरर्थेन कर्मणो माणगा- योः उपसंग्रहादकर्मकता। प्रसिद्धेर्यथा । मेघो वर्पति । कर्मणोड- विवक्षातो यथा । हितान्नयः सशृणुते स किं प्रभुः । अत एवं आडो यमहनः समो गम्पृच्छिभ्यामित्यादी हनिगम्यादेरपि वक्ष्य- माणाऽकर्मकता न विरुद्धा अत एव च यथालक्ष्यमन्तारितण्यर्थ- तायामकर्मकोऽपि सकर्मकः । प्रेरणाशत्यागे मकर्मकोप्यर्मका। यथा । गजो मदं क्षति । गजस्य मद' क्षरति । रविस्तपति । रविललाट तपति । गत्युपसर्गसंज्ञा धातोः प्राकू प्रयोज्या इत्युक्त- । म् । उपसर्गास्त्वर्थविशेपस्य द्योतका । प्रभवति पराभवतीत्यादी विलक्षणार्थापगतेः । उक्तश्च । उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नी. यते । प्रहाराहारसहारविहारपरिहाखदिति ॥ धात्वर्थ वाधते माहिः कश्चित्तमनुवर्तते । तमेव विशिनष्टयन्योऽनर्थकोऽन्यः प्रयुज्यते ।

१२६ सुगमकौमुद्याः। क्रमेण यथा । प्रतिष्ठते । प्रस्मरति । प्रहरति । इत्यादि। आद्रियते। अधीते । व्याप्रियते । इत्यादि। अनुगच्छति । आगच्छति।संस्करो. तीत्यादिप्रेक्षते । वीक्षते । निहन्तीत्यादि । धातुपु सत्ताद्यर्थनिर्देश- चोपलक्षणम् । यागात्स्वर्गों भवतीत्यादावुत्पद्यत इत्याद्यर्थात् । किञ्च नकारजावनुस्वारपञ्चमौ झलि धातुषु पकारजः सकारस्तु पावर्ग- स्तवर्गजः॥ आनि लोट ८।४।१६॥ उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य लोडादेशस्यानीत्यस्य नस्य णः । प्रभवाणि । दुरः पत्वणत्वयोरुपसर्गत्व न । दुःस्थितिः । दुर्भवानि । अन्तःशब्दस्यादिविधिणत्वेषूपसर्गत्वम् । अन्तर्दा । अन्तर्दिः । अन्तर्भवाणि ॥ नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्साति- वपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च ८।४।१७॥ उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य नेर्नस्य णः स्यात् गदादिषु । प्रणि- गदति । प्राणनदति ॥ शेपे विभापा कखादावपान्त उपदेशे ८।४।१८॥ उपदेशे कादिखादिपान्तवर्जे गदनदादेरन्यस्मिन् धाती परे उप- सर्गस्थानिमित्तात्परस्य नेनस्य णत्वं वा । प्रणिभवति । मनिभवति॥ उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य ८।४।१४॥ उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य णोपदेशस्य धातोर्नस्य णः समा. सेऽसमासेपि च । नाद्यानाटिनृत्यनाथूनाधनधनृनर्दानन्दं विना णोपदेशाः। प्रणिन्दाते । अय प्रसङ्गात् पोपदेशाः । स्त्येसेक्स- स्तृसृजमृप्स्तृतोऽन्ये ये स्युस्तवर्गस्वरयुक्तसाद्याः । एकाच पते क्लि पोपदेशाः षष्कष्विदष्वप्वदष्यपाध्मिडश्च । सात्पदाद्योः॥ पत्पन्न । अनुसज्जति । इहोपसीणामसमस्तत्वेऽपि संहिता . मर्थमखण्डस्य द्वितीयो भागः । नित्या तदुक्तम् । संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ कर्तरि कर्मव्यतिहारे १।३।१४॥ क्रियाविनिमये द्योत्ये कर्तरि लस्यात्मनेपदग । व्यतिमाते । व्यविरक्षन्ते । कर्मव्यतिहारविवक्षायां व्यत्युपसर्गयोगं विनाप्यात्म- नेपदम् ॥ न गतिहिंसार्थेभ्यः १।३।१५॥ व्यतिगच्छन्ति । व्यतिघ्नन्ति ।। हसादीनामुपसंख्यानम् ॥ हसादयो हसप्रकाराः शब्दक्रियास्तेभ्योऽपि नात्मनेपदम् । व्यतिहसन्ति । व्यतिजल्पन्ति ॥ इतरेतरान्योन्योपपदाच ११३।१६॥ नात्मनेपदम् । इतरेतरम् । व्यतिभवन्ति ।। परस्परोपपदाच न * ॥ परस्परं व्यतिभवन्ति । एवं न गतीत्यादि निषध विना सर्व- धातुभ्यः कर्मव्यतिहारे आत्मनेपदं तत्कार्यं च ज्ञेयम् । वल्ग गतः । तर्ज भर्सने । तर्द हिंसायाम् । गर्द-नर्द शब्दे । कर्द कुत्सिते शब्द। सर्व-गर्व गती। गर्व हिंसायाम्। फक्छ नीचैर्गतौ । चक्षु यच गती । आशीलिंङि कित्त्वात् उपधाया नस्य लोपः। चच्यात् । चच्या- स्ताम् । शंसु स्तुतौ दुर्गतौ च । णील वर्णे । नीलति । प्रणालति । मील निमेषणे । भील समाधौ। क्रीड विहारे । क्रीडोर्नुसंपरिभ्यश्च १।३।२१ ॥ एभ्य आडश्च । क्रीड आत्मनेपदम् । अनुक्रीडते इत्यादि ।। अनोः कर्मप्रवचनीयान॥ १ उपसर्गादिवशनात्मनेपदादिक तत्तद्भातसनिधारे गिरीतपत पद याम्यात्य प्रारण गणवेशान्तर्भतमतो न तस्य पृयड्न्यास. । ।

सुगमकौमुद्याः। बालमनुक्रीडति । तृतीयाथै इति कर्मप्रवचनीयता । समो कूजने । संक्रीडते । कूजने तु संक्रीडति रथचक्रम् । कील बन्धने । लुञ्च अपनयने । लुच्यात् । कुञ्च-कुञ्च कौटिल्याल्पीभावयोः । कुच्यात् । क्रुञ्चेस्तु । उपधालोपो न अस्य ओपधत्वेनैवेष्टत्वादि- त्याहुः । कुश्यात् । तुम्प हिंसायाम् । तुतुम्प । तुतुम्पतुः । संयो. गात्परस्य लिटः कित्त्वाभावान्नलोपो न । आशीलिडि तु कित्त्वा- अलोपः । तुप्यात् । प्रात्तुम्पती गवि कर्तरि इति पारस्करादिगणे पाठात्सुट् । प्रस्तुम्पति गौः । श्तिपा निर्देशाद्यइ । लुकि न प्रतोतु. म्पीति । चूप पाने । रूप भूपायाम् । शूल रुजाया संघोपे च । कूज अव्यक्ते शब्दे । भूप अलङ्कारे । मूल प्रतिष्ठायाम् । म्लेच्छ अव्यक्ते शब्दे । मिम्लेच्छ । वेल्ल-क्ष्वेल चलने । प्रेड-लोडाउन्मादे। शोण वर्णगत्योः। शुशोण । धोत्रं गतिचातुर्ये । शौट्ट गर्ने । शुशौट । त्वगि गतौ कम्पने च । कडि मदे । काक्षि काक्षायाम् । ध्वाक्षि घोरखासिते च । लाच्छि लक्षणे । वाछि इच्छायाम् । ििग लिगि गतौ। शिघि आघ्राणे । लुवि अर्दने । चुवि वक्त्रसंयोगे । कुथि हिंसासंक्लेशनयोः । जुगि वर्जने । लुटिलुठि स्तेये । मुडि खण्डने । शुठि कुठि प्रतिघाते।गुजि अव्यक्ते शब्दे ।। इति ५५ अंशाः। हस शन्दे । जहास । कप हिंसायाम् । चकपतु. । कण कण ध्वन भण शब्दे । भप मर्क्सने । हठ प्लुति शठत्ववलात्कारपु। स्खल संचलने । गल अदने ।लल विलासे । चल कम्पने । चर गतिभक्ष- णयोः । चेरतुः । अचारीत् ॥ उदश्चरः सकर्मकात् ११३।५३ ।। तडानौ । धर्ममुच्चरते ॥ समस्तृतीयायुक्तात् ११३॥५४॥ रथेन संचरते । व्यवहितेऽपि । रथेन समुदाचरते । जप व्य- ताया वाचि मानसे च । अजापीत अजपीत् । णट नृती। णद स्थानिवत्त्यालघूपधगुणो न । धिनोति । धिनुतः। धिन्वति । धिन्वः धिनुवः । धिन्मः धिनुमः । इलह । धिनु । नित्यत्वादुकारलोपा- त्पूर्वमा धिनवाव । एवं कृषि हिंसाकरणयोगतीचा चमु बदने। प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । अव्यक्ते शब्दे । पट व्यक्तायां वाचि । मण रण शब्दे । रट परि- भापणे । जट संघाते। पट गती 1 रद विटेखने । रस शब्द । लड विलासे।लप व्यक्तायां वाचि । लसपणकीडनयोगशट रुजाधि- शरणगत्यवसादनेपु । शसु हिंसायाम् । दन्त्यान्तः । शशास ॥ न शसददवादिगुणानाम् ६।४।१२६॥ दासेर्ददेवकारादीनां गुणशन्देन भावितस्य च योऽकारस्तस्प एत्वाभ्यासलोपा न । शगसतुः । शशमः । बोपदेवादयस्तु न शसति सूत्रे शश प्लुतगती इति द्वितालव्यं धातुं गृहन्ति तेषां मते दन्त्यान्तस्य शेसतुरित्यादि द्वितालव्यस्य शशशरित्यादि । खिट घासे । पुप पुष्टी । पोपति । अपोपीत् । प्लुप दाहे । लुठ उपधात । लुड विलोडने । लुल विमर्दने सात्रः । कुच शन्दे तारे। गृह पृद्धौ शब्दे च । मृपु सेचने । घृपु संघ । हषु अलीके । स्तु- टिर विशरणे । अब रक्षणगतिकांतिमीतिहप्त्यवगमप्रवेशश्रवणस्वा- म्यर्थयाचनक्रियेच्छादीप्त्यवाप्यालिंगनहिंसादानभागवृद्धिषु । बई पूजायाम । अञ्च गतिपूजनयोः । म्लुचु गती ॥ स्तम्भुनचुम्लुचुचुग्लुचुग्लुञ्चश्विभ्यश्व३।१।२८॥ एभ्यः च्लेर वा नलोपः । अम्लुचत् । अम्लोचीत् । धिवि मीणने। धिन्विकृण्व्योर च ३।१।८०॥ अनयोरकारोन्तादेश उप्रत्ययश्च शविपये । अतो लोपः। तस्य ३ प्टिकमुचमां शिति ७।३।७५॥ एपामचो दीर्घः शिति॥ आङि चम इति व्यक्तव्यम् ॥

। - - १६० सुगमकौमुद्याः । आचामति । चमति । अचमीत् । कटे वावरणयोः । अफ- दीत् । टियु निरसन ॥ सुधातुष्टिवुषकतीनां सत्वप्रतिपेधः ॥ ठीवति । अस्य द्वितीयस्थष्ठो वेति वृत्तिः । तिष्ठेच । टिष्ठेव । फल निष्पत्ती॥ तृफलभजत्रपश्च६।४।१२२॥ एपामत एत्वमभ्यासलोपश्च किति लिटि सेटि थलि च । फेलतुः । अफालीत् । एवं त्रिफला विशरणे । ईय॑ ईर्ष्यायाम् । इञ्चिकार । उठी विवासे । प्रायेण विपूर्वः। व्युच्छति । व्युच्छा- श्चकार । ऊप रुजायाम् । इदि परमैश्वर्य । क्ति निवासे रोगाप- नयने च ॥ गुप्तिकिझ्यः सन् ३ । ११५॥ मानवधदानशान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य ३१११६॥ सूत्रद्वयोक्तेभ्यः सन्मानादीनामभ्यासेकारस्य दीर्घश्च । गुपेनि- न्दायाम् । तिजेः क्षमायाम् । क्तेिया॑धिमतीकारे निग्रहे अप- नयने संशय च । माने जिज्ञासायाम् । बधेश्चित्तविकारे । दानराजवे । शानेनिशाने । गुपिप्रभृतयः किभिन्ना निन्दाद्यर्थका एवानुदा- तो दानशानौ च स्वरितेतौ एते नित्य सन्नन्ताः । अर्थान्तरे त्वननुवधकाथुरादयः धातोरित्यविहितत्वात् सनोन नार्दधातुक- त्व तेनेगुणौ न । सन्यडोः अभ्यासकार्यम् । चिकित्सति विकि- त्सत इत्यपि कश्चित् । अतो लोपः। चिकित्सांचकार ।। इति ५६ अंशाः। उप दाहे ॥ उपविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् ३ । ११३८॥ एभ्यो लिग्याम्वा । ओपाञ्चकार॥ अभ्यासस्यासवणे ६।४।७८॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । अभ्यासस्येवर्णोवर्णयोरियडबडी असवर्णेचि । उपोप । ऊ- पतुः । ऊपः । इह सवर्णदीर्घस्याभ्यासग्रहणेन ग्रहणाद्धस्वः प्राप्ती न भवति सकृत्प्रवृत्तत्वात् । आगत्वादि पर्जन्यवलक्षणमवृ- त्या हस्ते कृते ततः सवर्णदीर्घः । वार्णादाङ्गं वलीयः इति न्या- यात् परत्वाच्च । धूप सन्तापे॥ गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः ३।१।२८॥ एभ्य आयप्रत्ययः स्वार्थे । धूपायति । धूपायांचकार ।। आयादय आर्द्धधातुके वा ३।१।३१ ॥ दुधूप । धूपायिता धूपिता । अधूपायीत् अयूपीत् । उख-उग्वि गतौ । ओखति । उचोख । ऊखतुः । उलति । उलांचकार ।। अय घटादयः । ते च द्विधा । केचित् घटादिगण एवापूर्वतया प- ठिताः । केचित्तु अन्यत्र पठिता अपि मित्कार्यार्थ घटादिष्वपि पठिताः । तत्र घटादयस्वरत्यन्तास्त्रयोदश पितोऽपि तेभ्यः पि- द्भिदादिभ्योऽङ् । घटा । व्यथा । प्रया इत्यादिघटादयो मित इति । मितस्तु फणान्ताः सर्वेऽपि तेषां मित्कार्य च णिच्येव ।। मितां ह्रस्वः६।४।९२॥ मितामुपधाया हस्वो गौ परे । लगयति । णिजन्ताकर्मणि लुडि तस्य तादेशे चलौ तस्य चिणि णिलोपे च ॥ चिण्णमुलोदीपोऽन्यतरस्याम् ६।४।९३॥ चिण्परे णमुल्परे च णौ मितामुपधाया दीर्थो वा । अलागि अलगि । आमीक्ष्ण्ये णमुलि लागं लागं लग लगम् । एवं सर्वेषु घटादिपूदाहार्यम् । स्वस्वगणकार्य च । लगति । ललाग । लगतुः । अलगीत् । इत्यादि ज्ञेयम् । तत्राधाः प्रसिद्धाश्चान खण्डे लिख्य- न्ते । लगे संगे। क्रय हिंसायाम् । ज्वर रोगे। बल चलने । दृ मये। ज्यादेरनुवादोऽयम् । अपूर्व एवेत्यन्ये । अक-अग कुटिलाया गता। रगे सङ्गे। चक तृप्तौ । हेड वेष्टने । हेड्डधातोरनुवादोज्यमित्याहः । परे तु असाम्प्रदायिकोऽस्य पाठः । सति पाठे त्वपूर्व एवायं नयन E

१२२
सुगमकौमुद्याः।
वाद इत्याहुः । णिजन्ते सर्वे घटादयो वक्ष्यते । अथ फणादयः ।
फण गती । अयं मतभेदेन घटादिष्वपि ।।
फणाञ्च सप्तानाम् ६।४।१२५॥
एषां वा एत्वाभ्यासलापी किति लिटि सेटि थाले च । फेणतु:
फफणतुः । स्वन शब्दे । स्वनतुः सस्वनतुः । शेषा वक्ष्यन्ते ।।
अथ ज्वलादयः ॥ ज्वल दीप्ती । अज्वालीत् । वल प्राणने धान्या.
वरोधे च । बेलतुः । वेलुः । पत्ल गती ॥
पतः पुम् ७।४।१९॥
अडि । अपप्तत् । टल वैलव्ये । पुल महत्त्वे । हल विलेखने ।
टुवम् उद्दिरणे । वादित्वान्नेत्वाभ्यासलोपौ । वमतुः। वेमतुरित्यपि
भागवृत्तौ । तदभाष्यादी न दृष्टम् । अवमीत् । षिघु गत्याम् ।
सेधति । सात्पदायोरिति निषेधे प्राप्ते ।।
उपसर्गात्सुनोतिसुवतिस्यतिस्तौतिस्तोभतिस्थासे-
नयसेधसिचसञ्जस्वनाम् ८1३।६५॥
उपसर्गादिनिमित्तादेषां सस्य पः। निषेधति ।।
सदिरपतेः८।३।६६॥
प्रतिमिन्नोपसर्गस्यादिणः सदेः सस्यः पः॥
स्तन्भः ८।३।६७॥
सौत्रस्य सस्य पः । प्रतेरपि । वाहुमतिष्टम्मधिवृद्धमन्युः ।।
अवाचालम्बनाऽऽविदूर्ययोः ८।३।६८ ॥
अवास्तन्मेरेतयोरर्थयोः षः॥
वेश्च स्वनो भोजने ८।३।६९॥
व्यवाभ्यां स्वनतेः सस्य पः भोजने ॥
परिनिविभ्यः सेवसितसयसिसहसुटस्तु वनाम्
।३।७०॥
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प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः । १२३
एभ्यः परेषामेपां सस्य पः ॥
प्राक्सितादड्व्यवायेऽपि ८।३।६३ ॥
सेवसित इत्यत्र सितशब्दात्पाग्ये सुनोत्यादयस्तेपामव्यवाये-
ऽपि पत्वम् । न्यषेधत् । न्यपेधीत् । न्यपेधिष्यत् ।।
स्थादिष्यभ्यासेन चाभ्यासस्य ८।३।६४॥
प्राक्सितात्स्थादिष्वभ्यासेन व्यवायेऽपि पत्यम् एपामेव चाभ्या-
सस्य नतु सुनोत्यादीनाम् । निपिपेध । निपिपिधतुः ॥
सेधतेगेतौ ८।३।११३॥
गत्यर्थस्य सेधतेः पत्वं न । गंगां विसेधति । भ्रमु चलने ।
वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुत्रसिटिलपः३।१।७०॥
एभ्यः श्यन् वा कर्तरि सार्वधातुके । भ्रम्यति भ्रमति। दिवादी
भ्राम्यति ॥
वा भ्रमुत्रसाम् ६।४।१२४॥
एपामेत्वाभ्यासलोपौ वा किति लिटि सेटि थलि च । भ्रमतुः
बभ्रमतुः । अभ्रमीत् । कथे निष्पाके । मथे विलोडने । क्षर संच.
लने । चल कंपने । कुच संपर्चनकौटिल्यप्रतिष्टम्भविलेखनेए । बुध
अवगमने । कस गतौ । शेपा वक्ष्यन्ते ॥ अथ दो यजादी ॥ यद
व्यक्तायां वाचि ॥
वचिस्वपियजादीनां किति ६।१।१५॥
बचिस्वप्योर्यजादीनां च संप्रसारण किति ॥
ग्रहिन्यावयिव्यधिवप्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जती-
नां डिति च६।१।१६॥
एपा किति डिति च संप्रसारणम् ॥
लिट्यभ्यासस्योभयेपाम् ६।१।१७।।
वच्यादेप्रेहादेश्वाभ्यासस्य संप्रसारणं लिटि । उवाद ॥

१२४ सुगमकीमुद्याः। परनित्यांतरंगापवादानामुत्तरोत्तरं वलीयः। संप्र- सारणं तदाश्रयं च बलवत् । सकृद्दतौ विप्रतिषेधे यदा- धितं तदाधितमेव । पुनः प्रसङ्गविज्ञानात्सिद्धम् पुनः प्रसङ्गविज्ञानाद् द्वित्वम् ॥ ऊदतुः । उद्यात् । अवादीत् ॥ भासनोपसंभापाज्ञानयनविमत्युपमंत्रणेषु वदः १ ३।४७॥ आत्मनेपदम् । शाखे बदते । भृत्यानुपपदते । शास्त्रे वदते । क्षेत्र वदते । गेहे विवदन्ते । परदारानुपवदते ॥ व्यक्तवाचा समुच्चारणे १।३।४८॥ संप्रवदन्ते ब्राह्मणाः । नेह । संभवदन्ति खगाः॥ अनोरकर्मकात् ११३।४९॥ व्यक्तवाग्विपयादनुपूर्वावदेरात्मनेपदम् । अनुवदते कठः कल पस्य ॥ विभापा विप्रलापे ११३१५०॥ विरुद्धोक्तिरूपे व्यक्तवाचां समुच्चारणे उक्तं वा । विप्रवदंते विश वदन्ति वा वैद्याः ॥ अपाद् बदः ११३।७३॥ अपवदते । कभिप्राय एव । नेह । अपवदति ॥ विभापोपपदेन प्रतीयमाने १।३।७७ ॥ स्वरितत्रितः, णिचश्च, अपारदः, समुदाड्भ्यः, अनुपसर्गाज्ज्ञः इति पञ्चसूत्र्या यदात्मनेपदं विहितं तत्समीपोचारितेन पदेन कियाफलस्य कर्तृगामित्वे द्योतिते वा । वं पुत्रमपदते अपर- दति वा॥ इति ५७ अंशाः। - .

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः । १२५ दुओश्वि गतिवृद्धयोः॥ विभापा श्वेः६।११३०॥ श्वयतेः संप्रसारणं वा लिटि यडि च । शुशार । शुशुवतुः ॥ श्वयतेलियभ्यासलक्षणप्रतिपेधः ॥ तेन लिटयभ्यासस्येति संप्रसारणं न । शिवाय । शिश्वियतुः। शूयात् ॥ जृस्तंभ्विति ॥ च्लेरङ् वा ॥ श्वयतेरः ७।४।१८॥ भयत्तेरिकारस्थ अकारोडि । अश्वत् ।। विभापा धेट्रव्योः३।१।४९ ॥ आभ्यां चलेश्चइ वा कर्तलुडि चार्ड' इति धित्वम्। अशिश्वियत। हयन्तेति न वृद्धिः। अश्वयीत् । शेषा वक्ष्यन्ते ॥अथ वेडनिदः ।। तत्र अनिटश्च गधेन पूर्वमुक्ताः झटिति स्मरणार्थ श्लोकरोच्यन्ते । उदन्तदन्तरुणुणुयौतिस्नुवश्विडीशीनि च वृद्धवृलो च। स्यु - तवः सेट इमेऽथ चान्ये एकाजजन्ता अनिटोऽनुदात्ताः॥१॥ हलन्तेषु शक्नोति पच्चरिचश्च विचिर्मुश्चतिः सिञ्चतिः पृच्छमझौ । त्यजि- मर्जती रञ्जनेनेक्तिभृज्जाः भुजिः स्याद्भजियज्ञ मवेयुजूरुजी च ॥१॥ स्वञ्जविजिरजिसञ्जखिदः क्षुछिनुदपद्यनुदोभिदविन्ते । विद्यति विद्यति सीदति चात्ति स्कन्दहदी शदशुध्यतिबुध्यौ ॥ २॥ रुधिः सराधियुधिवन्धिसाधयः ऋधेिः क्षुधिः सिध्यतिविध्यती हनिः । मन्यापतृप्यत्यथ लिम्पलुम्पती दृप्यस्वपो सर्पतिवपशपक्षिपः ॥३॥ तेपति च्छुपति तयभी रभिलभूगमी अथ नमिर्यमी रमिः। दंशह- शूदिशतिमृशारशीरुशिलिशस्पृशत्यथ विशत्यनुकुशिः ॥४॥ देष्टि तुष्यकृपत्वेपत्यथ दुष्यति पुष्यति । पिनाष्ट विष् ततः शुष्य- त्यथ श्लिष्यति शिप तथा ॥५॥ स्यावसतिश्च धसिर्दहदेग्धीदो- १श्रित्यन्त समाहारहन्द अत होनत्यम् ।

१२६ सुगमकौमुद्याः। ग्धिनहीवाहलेविरुहश्च । मेहतिरित्यनुदात्तहलन्ताः संकलिता यधिक शतमेते ॥ ६ ॥ गुपू रक्षणे । गोपायाञ्चकार । जुगोपिय जुगो. प्थ । गोपायिता गोपिता गोप्ता । गोपाय्यात् गुप्यात् । अगो. पायीत अगोपीत् । अगीप्सीत् । अगौप्ताम् । अज गतिक्षेपणयो। अजति ॥ अजेय॑घापोः२।४।५६॥ अजेर्वी आदेश जाईधातुकविषये घामपं च वर्जयित्वा । वला- द्याईधातुके वेष्यते । विवाय । विव्यतुः । विव्युः । इह वकारस्प हल्परत्वात् उपधाया च इति दीर्घ प्राप्ते अचः परस्मिन्निति स्था- निवद्भावेनापरत्वम् । न च न पदान्तति निषेधः। स्वरदीर्घयलोपेषु लोपाजादेश एव न स्थानिय दिति वार्तिकोक्तेः । थलि एकाच इती पिनपेधे प्राप्ते कृसभृवृइति कादिनियमादिट् प्राप्नोति अन हि प्रकृत्या. श्रयः प्रत्ययाश्रयो वा यागनिनिषेधः स लिटि चत्ताह कादिभ्य एव नान्येभ्य इति।ततश्चतुर्णा थाल भारद्वाजानियमप्रापितस्य वमादिषु क्रादिनियममापितस्य चेटो निषेधार्थम् । एवमिटि प्राप्त पुनरवस्ता- स्वदित्यनेन निषेधे प्राप्त भारद्वाजमतेन पुनर्निपेधनिवृत्या विक्ल्पः नच स्तुदुसुश्रुवामपि थलि विकल्पः शंक्यः। अचस्तास्वादेति उप- देशे त्वत इति च योगदयप्रापितस्यैव हि प्रतिपेधस्य भारद्वाजनि- यमो निवर्तकः अनन्तरस्येति न्यायात् । विवयिथ विवेथ । आ- जिथ । विव्यथुः । विव्य । विवाय विषय । विव्यिव । विव्यिम। आजिव । माजिम । वेता। अजिता । वेष्यति । अजिप्यति । अजतु । आजत् । गजेत् । वीयात । अवैषीत् । आजीत् । अवे. ध्यत् । आजिष्यत् । रिप रुप हिंसायाम् ॥ तीपसहलुभरुपरिपः७।२।४८॥ इच्छत्यादेः परस्य तादेरादधातुक्रयेट वा । गैपिता ध। रोपिता गेष्टा । त प्लवनतरणयोः । तरति ।। ऋच्छत्वृताम् ७।४।११॥ + प्रयमखंडस्य द्वितीयो भागः। १२७ तोदादिकमच्छेमधातोतां च गुणो लिटि परत्वात् णल्यपि । गुणः । उपधाद्धिः । गुणशब्दमाविताकारवत्त्वान्निपेधे प्राप्ते तृफ- लेत्येत्त्वाभ्यासलोपी। तेरतुः॥ घृतो वा ७।२।३८॥ धृवृजभ्यामदन्ताधेटो दीघों वा नतु लिटे । तरिता तरीता ॥ ऋत इद्धातोः॥ गुणवृद्धी परत्वादाधेते । तार्यात् । सिचि वृद्धिरिति वृद्धिः। अतारीत् ।। सिचि च परस्मैपदेषु ७।२।४० ॥ वृत इटी दीर्घो न । अतारिष्टाम् कर्मव्यतिहार आत्मनेपदे तु ॥ लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु ७।२।४२ ॥ वृतः परयोलिइसिचोरिड् वा ताडे । न लिडि ७१२१३९॥ वृतो लिड इटो दीघों न । तरिपीष्ट । उश्चेति कित्यम् । ती- पीट । अतरिष्ट अतरीष्ट अतीष्ट । इति ५८ अंशाः। तथू तनूकरणे ॥ तनूकरणे तक्षः ३।११७६॥ इनुर्वा शब्धिपये। तक्ष्णोति तक्षति वा काष्टम् । अन्यत्र वाग्मिः संतक्षति भत्संयतीत्यर्थः अतक्षीत् । पक्षे अताक्षीत् । अक्षव्याप्ती।। अक्षोऽन्यतरस्याम् ३11 ७५ ।। इनुः शब्धिपये । अक्ष्णोति अक्षति । अणुवन्ति । आनक्षिय आनष्ठ । अक्षिता अष्टा । अक्षिष्यति अक्ष्यति । अक्ष्णोतु । आसीत् । मा भवानक्षीत् । अक्षिष्टाम् । अनिद्रत्वे मा मवानाक्षीत् । आयाम । क्रमु पादविक्षेपे । वा भ्राशोत श्यन्वा ।।

१२८
.
सुगमकौमुद्याः।
क्रमः परस्मैपदेषु ७।३। ७६॥
कमेटीर्घः परस्मैपदपरे शिति । काम्यति कामति ।।
स्नुक्रमोरनात्मने पदनिमित्ते ७।२ । ३६ ।।
अनैवेद् । अक्रमीत् ॥
वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः १।३।३८॥
आत्मनेपदम् । ऋषि क्रमते बुद्धिः । न मतिहन्यत इत्यर्थः ।
अन्ता । कंस्यते । अस्त । अध्ययनाय नमते क्रमतेऽस्मिन्
शास्त्राणि ॥
उपपराभ्याम् ||३९॥
वृत्त्यादिप्वाभ्यामेव मर्न तृपसर्गान्तरपूर्वात् । उपक्रमने । परा.
क्रमते । नेह । संक्रामति ।।
आङ उद्गमने १।३।४०॥
आक्रमते सूर्यः॥
ज्योतिरुद्गमन एव ॥
नेह । आक्रामति धूमो हयंतलात् ॥
वेः पादविहरणे १।३।११॥
साधु विक्रमते वाजी॥
प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम् ११३१४२॥
प्रोपपूर्वादारम्भार्थात् क्रमेरात्मनेपदम् । प्रक्रमते । उपक्रमते ।।
अनुपसर्गादा १।३।४३॥
कामति क्रमते । कन्ता ) कंस्यते ॥ अयानिटः सन्दिर
गतिशोपणयोः । चस्कन्दिथ चस्कन्थ । स्कन्ता । स्कन्स्यति ।
नलोपः । स्कद्यात् । इरित्वादड् वा । अस्कदत् । अस्कान्सीत् ।
अस्कान्ताम् । अस्कान्सुः ।।
वेः स्कन्देरनिष्ठायाम् ८।३१७३॥

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः। १२९ पत्वं वा । कृत्येवेदम् । अनिष्ठायामिति पर्युदासात् । विष्फन्ता विस्कन्ता । निष्ठायां तु । रिस्कनः। परेश्च ८।३।७४॥ परेः परस्य स्कन्देः सस्य पो वा । योगविभागादनिष्ठायामिति न सम्बध्यते । परिष्कन्दनि परिस्कन्दति । परिष्कपणः परिस्कन्नः। पत्वपक्षे णत्वम् । न च पदद्वयाश्रयतया बहिरङ्गत्वात्पत्वमसिद्धम् । धातूपसर्गयोः कार्यमन्तरङ्गमित्यभ्युपगमात् । पूर्व धातुरुपसर्गेण युज्यते ततः साधनेनेति भाष्यम् । पूर्व साधनेनेति मतान्तरे तु न णत्वम् । तप सन्तापे । तेपिथ ततप्य । तप्ता। अताप्सीत् ।। उद्विभ्यां तपः१।३।२७॥ अकर्मकात्तडानौ । उत्तपते । वितपते । दीप्यते इत्यर्थः ।। स्वाङ्गकर्मकाच ॥ उत्तपते स्वपाणिम् । नेह । चैत्रो मैत्रस्य पाणिमुत्तपति । सृप्ल गती। सर्पति ।। अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् ६।३।६९॥ उपदेशेऽनुदात्तो य ऋदुपधस्तस्य अम् वा झलादावकिति । सप्ता सर्मा । असृपत् । दह भस्मीकरणे । देहिथ । दादरिति घः ।दद- ग्ध । दग्धा । धक्ष्यति । अधाक्षीत् । अदाग्धाम् । अधाक्षः । यम मैथुने । येभिय ययब्ध । अयाप्सीत् । घस्ल अदने । शपि वला- द्यार्दधातुके लुडि क्मरचि चास्य प्रयोगो न सर्वत्र । घस्ता ॥ सः स्यार्द्धधातुके ७।४।४९ ॥ सस्य तः सादावादधातुके । घत्स्यति । लदित्वात् च्लेरडू। ययात् ॥ इति ५९ अंशाः। वस निवासे॥अयं यजादिः । उवास । शासिवसि इति पः।ज- पतुः । उध्यात् । वत्स्यति । और शोपणे । पाके। स्त्यै शब्द- संघातयोः । क्षये। द्वै स्वमे । णे वेष्टने । दाण् दाने ॥ .

सुगमकौमुद्याः। पानाध्मास्थानादाणश्यतिसतिशदसदां पिवजिघ्रध- मतिष्ठमनयच्छपश्यर्छधौशीयसीदाः ७।३।७८॥ पादीनां पिवादयः स्युः इत्संज्ञकशकारादी प्रत्यये । यच्छति दाता। प्रणियच्छति । अव्यवायेऽपीष्यते । प्रण्ययच्छत् ॥ । दाधायदा १।१।२०॥ दाण-डुदाज-दो-दे-डुधाइ-पेटी घुसंज्ञाः॥ एलिङि६।४१६७॥ घुमास्थागापाजहातिसो एपामात एत्वमाईधातुके किति लिडि । देयात् । गातिस्थेति सिचो लुक । अदाताआता उस्य पदांतात् । अदुः॥ दाणश्च सा चेचतुर्थ्यथै १।३१५५॥ सम्पूर्वादाणस्तृतीयान्तेन युक्तात्तडानौ तृतीया चेचतुयर्थे । दास्या संयच्छते । व्यवधानेऽपि । दास्या सम्प्रयच्छते । सन्ददे । सन्दासी॥ स्थायोरिच ११२।१७॥ अनयोरिदादेशः सिच कित् तडि । हस्वादगात् । समदित । समदिपाताम् । पा पाने । पिवादेशोऽदन्तः । तेन उपधागुणो न । पिवति । पेयात् । अपात् । ध्मा शब्दाग्निसंयोगयोः । धमाते । ध्मेयात् । मायात् । अध्मासीत् । म्ना अभ्यासे । मनति । घ्रा गन्धोपादाने । जिघ्रति । प्रेयात् घायात् ॥ विभापा प्राधेट्शाछासः२।४।७८ ॥ एभ्यः सिची लुक वा परस्मैपदे । अघ्रात् । अघ्रासीत् । धेट् पाने । प्रणिधयति । दधौ । दधिय दधायाधेयावाविमापा धेडिति यह द्वित्वम् । अदधत । अदधताम् । पक्षे अधात् । अधासीत् ॥ इति ६० अंशाः । इति द्वितीयाध्यायस्य दितीयः पादः। । an

१३१
प्रथमसंडस्य द्वितीयो भागः ।
छा गतिनिवृत्ती तिष्ठति । तस्थी । स्यात् । अस्थात ।।
समवप्रविभ्यः स्थः११३।२२॥
आत्मनेपदम् । सन्तिष्ठते । समस्थित । समस्थिपाताम ।
आङः प्रतिज्ञायाम् ॥
शब्दं नित्यमातियते ॥
प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च १1३।२३ ॥
गोपी कृष्णाय तिष्ठते । आगयं प्रकाशयतीत्ययः । संगय्य
कर्णादिषु तिष्ठते यः । कर्णादीन्निणेतृत्वेनाश्रयतीत्यर्थः ।।
उदोऽनूर्द्धकर्मणि १।३।२४ ॥
मुक्तावृत्तिष्ठते । ऊर्ध्वकर्मणि तु पीठादत्तिष्ठति । ईहायामेर ।
नेह । ग्रामाच्छतमुत्तिष्ठति ॥
उपान्मंचकरणे ११३१२५॥
आग्नेय्याग्नीध्रमुपतिष्ठते॥
उपादेवपूजासंगतिकरणमित्रकरणपथिप्विति वा-
च्यम् ॥
आदित्यमुपतिष्ठते । गङ्गा यमुनामुपतिष्ठते । रथिकानुपतिष्टते ।
पंथाः मुनमुपतिष्ठते ।।
वा लिप्सायाम् ॥
प्रभुमुपतिष्ठते उपतिष्ठति वा ।।
अकर्मकाच १।३।२६॥
उपात्तिष्ठतेरकर्मकादात्मनेपदम् । भोजनकाले उपतिष्ठते ।ग
शब्दे । गेयात् । अगासीत् । व्यतिगायति । जि जयभिमवे च ।।
सल्लिटोजें: ७।३।२७॥
जयतेः सनि लिटि च योभ्यासस्ततः परस्य कुत्वम् । जिगाय।
अजेपीत् ॥

१३२ सुगमकौमुद्याः। विपराभ्यां जेः ११३॥ १९॥ तडानी । विजयते । पराजयते । व्यजेष्ट । जु रहास । हु गता। द्रोता । दूयात् । णिश्रिद्रुम् इति चइ । चडि अदुद्रुवत् । व्यति. द्रवन्ति । एवं सु गतौ । पु प्रसवैश्वर्ययोः । सवति । सोता । स्थैर्ये । श्रु श्रवणे ॥ ध्रुवः शृच ३।११७४॥ श्रवः शृ इत्यादेशः इनुप्रत्ययश्च कर्बर्थे सार्वधातुके । शपोऽप- वादः । शृणोति । हुश्नुवोरिति यण् । शृण्वन्ति । शृण्वः शृणुवः शुश्रोथ । शुश्रुव । शुश्रुम । शृणु ॥ अतिश्रुशिभ्यश्च * ॥ समोऽकर्मकेभ्य एभ्यस्तडानावित्यर्थः । संशृणुते । समोर । सन्नन्तादपि च तडानौ वक्ष्येते । म गतिप्रापणयोः । अच्छति । उरत् । ऋच्छत्यताम् णलि गुणे उपधावृद्धिः । आर । आरतुः । इडत्यत्तिव्ययतीनाम् । आरिथ । ऋद्धनोः स्ये । अरिष्यति । आट् आटश्च । आर्छत् । अर्यात् ।। सतिशास्त्यत्तिभ्यश्च ३ । ११५६॥ एभ्यः च्लेरड् कर्तरि टुडि । इत्य तु न लुप्तशपा शासिना साहचर्यात् सयंत्यो|होत्यादिकयोरेवान ग्रहणात् । आषीत् । समृच्छते । समारे । समाराते । समारिरे । उश्च। समृपीष्ट । समात । समार्पाताम् । समार्पत । माडि तु मासमृत । मासमृपाताम् । मासमृपत । स गती । शीघ्र गती । धापति । अन्यन सरति ।। इति ६१ अंशाः। पन सड्ने । दंशपञप्वनां शपि६।१।२५॥ रमेश्च ६।४।२६॥ एपा गपि नलोपः । पजति । ससञ्जिय ससड्क्य । राता । ।

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः । दश दशने । दशति । ददंशिथ ददंष्ठ । दंष्टा । दश्यात् । दक्ष्य. ति । अदांक्षीत् । गम्लु गती। इषुगमियमाञ्छः ७।३।७७॥ एपां छः शिति । गच्छति । जगाम | गमहनेत्युपधालोपः । जग्मतुः । जगमिथ जगन्थ । गन्ता ॥ गमेरिट् परस्मैपदेषु ७।२।५८ ॥ गर्मः परस्य सकारादेः इट् तडानयोरभावे । गमिष्यति । च्ले. रङ । अगमत् ॥ समोगमृच्छिभ्याम् १ ॥३॥२९॥ अकर्मकाभ्यामात्मनेपदम् । संगच्छते ! संगंस्यते ॥ वा गमः ११२।१३॥ गमः परौ झलादी लिसिची वा कितौ । कित्त्वे अनुदात्तीप- देशेति मलोपः । संगसीष्ट पक्षे संगसीट । समगत समगस्त । यमु उपरमे । शपि यच्छति । शेपं णमवत् ।। . आङो यमहनः१।३।२८॥ आत्मनेपदम् । आयच्छते । आयस्त । यमो गंधने ११३।१५॥ परदोषाविष्करणे यमः सिच कित् । उदायत । गन्धने किम् । उदायस्त पादम् । आकृष्टवानित्यर्थः ।। उपाधमः स्वकरणे 31३१५६।। उपाद्यमः स्वीकारे आत्मनेपदम् । मार्यामुपयच्छते॥ विभापोपयमने ११२/१६॥ यमः सिच् किवा । विवाहे रामः सीतामुपायत उपायंस्त वा। उदवोदेत्यर्थः। गन्धनाङ्ग उपयमे तु पूर्वविप्रतिषेधान्नित्यं कित्त्वम् ।। समुदाङ्म्यो यमोऽग्रंथे १।३।७३ ॥ अग्रंथे इति च्छेदात्रीहीन संयच्छते। भारमुद्यच्छते । वसमा-

१३४
सुगमकीमुद्याः।
यच्छते । ग्रन्थे तु उद्यच्छति वेदम् । विभापोपपदेनेति । स्वं व्रीहि
संयच्छति संयच्छते वा । दृशिर प्रेक्षणे। पश्यति ।।
विभाषा सृजिशोः ७१२।६५॥
आभ्या थल इद् वा ॥
सृजिशोझल्यमकिति ६।१।५८॥
अनयोः अमागमो झलादावकिति दद्रष्ट । ददर्शिथ ।।
ऋशो डि गुणः ७।४।१६॥
ऋवर्णान्तानां दृशेश्च गुणो डि । अदर्शत् । अडभावे ॥
नहशः३।११४७॥
दृशः च्ले क्सो न । अद्राक्षीत् । अद्राष्टाम् ॥
अतिश्रुशिभ्यश्च ॥
सम्पश्यते। संददृशे । संक्षीए । समदृष्ट । समक्षाता । समद
'क्षत । सन्नन्तादात्मनेपदं वक्ष्यते । कृप विलेखने । अनुदात्तस्ये.
त्यम् वा । ऋटा की।
स्पृशम्शकृपतृपहपां च्ले सिज्वा ॥
अक्राक्षात् अकार्षीत् । अकृक्षत् । अथ ज्वलादिषु । शद्ल
शातने ॥
शः शितः ११३।६०॥
शिद्भाविनोऽस्मादात्मनेपदम् । शीयते । शेदिय शशत्थ ।
शत्ता । अशदत्। पद्ल विशरणगत्यवसादनेषु । सीदति । सेदतुः।
सदेः परस्य लिटि ८।३।११८॥
सदेरभ्यासात्परस्य पत्वं न लिटि । निषसाद । निपेदतुः ।
सत्ता क्रुश आह्वाने रोदने च । क्रोधा । सः। अरुक्षत् । रुह
वीजजन्मनि प्रादुर्भावे च । रोठा । रोक्ष्यति । अरुक्षत् । शेपा
वक्ष्यन्ते ॥ इति परस्मैपदिनः॥
इति ६२ अंशाः।
-

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः । १३५ वल्म भोजने।वल्भते । ववल्भे । बल्भिता । बल्मिष्यते । वल्भ. ताम् । अवल्मत । वल्मेत । वरिभपीष्ट । अवल्भिष्ट । अवल्मिष्यत। पर्द कुत्सिते शब्दे । बर्ह परिभापहिंसाच्छादनेषु । श्रम्भु-सम्भु प्रमादे । स्पर्द्ध संघर्ष । कत्य श्लाघायाम् । चकत्थे । गल्म धार्थे । गई कुत्सायाम् । घट्ट चलने । दक्ष वृद्धौ शीघ्रार्थे च, मक्ष अदने । परस्मैपद्ययमित्येके। नित्यचुरादिरयं नतु भ्वादिरिति परे । वाधु पिलोडने । बवाधे। राम शब्दे । शाड श्लाघायाम्।ला सामर्थ्य । श्लाघृ कत्थने।भाम क्रोधे । भ्राज दीप्तीहाद अव्यक्ते शब्दे । द्वादी सुरखे च । टीकृ गतौ । दीक्ष मौण्डयेज्योपनयननियमनतादेशेषु । शीक सेचने । क्ली अधाष्टय । क्षीच मदे । कुर्द क्रीडायामेव । कूर्दते । धुक्ष संदीपनक्लेशनजीवनीयेषु । पूयी विशरणे । पूद क्षरणे । यी शब्दे उन्दे च । घूर्ण भ्रमणे । वेट वेटने । देव देवने । पे सेवन । टुवेप कंपने । रेट अव्यक्ते शब्दे । रेभ शब्दे । हेड अनादरे। हेपृ-हे अव्यक्त शब्दे । ग्लेपृ गतौ दैन्ये कम्पने च । ढौक गती । चडि कोपे । पचि व्यक्तीकरणे । लघि गती मोजननिवृत्तौ च । रभि शब्दे । लवि शब्दे अवलंसने च । शकि शंकायाम् । आइसि इच्छायाम् । श्लथि शैथिल्ये । स्कमि-एमि प्रतिबन्धे । केपि टभेष्टकारमौपदेशिकमाहुः । स्पादि, किंचिञ्चलने । काठे शोके । कपि चलने । प्रथि कौटिल्ये । कडि मदे। मडि परिमापणे। मडि विभाजने । हिडि गत्यनादरयोः । पिडि संघाते । भि गात्रविनामे । कच बन्धने । दद दाने । ददते । न शसेति निषेधान्नत्वाभ्यासलोपौ । दददे । दददाते । दददिर। दध धारणे । देधे । पच सेवने सेचने च । पुत्र गतौ । वल संवरणे संचरणे च । कल शब्दसंख्यानयोः । वद आस्वादने । अयमनुभवे सकर्मक रुचावकर्मकः। असु अदने । धुभु स्तम्भे । स्तोमते । स्फुट पिकसने । ऋज गतिस्थानार्जनोपार्जनेषु । अर्जतो नुडविधी ऋकारैकदेशी रेफो हल्त्वेन गृह्यते तेनानकहत्त्वान्नु । आवृजे। भृजी मर्जने। ईह चेष्टायाम् । ईहांचके। ऊयी तन्तुसंताने। एष गती १३६ सुगमकौमुद्याः। एपते । डीह विहायसा गती। इयते । डिडये । डिटिचढ़े डि- डियध्वे । पूइ पवने । पवते । ताय संतानपालनयोः ।। दीपजनबुधपूरितायियायिभ्योऽन्यतरस्याम्३।१।६१ ॥ एभ्यः च्लेश्चिण वा एकवचने तशन्दे परे। घिणो लुकाअतायि । अतायिष्ट । स्फायी-ओप्यायी वृद्धौ। लिड्योश्च६।११२९॥ लिटि यडि च प्यायः पीभावः । पिप्ये। पिपियरे । अप्यायि । अप्यायिष्ट कास शब्दकुत्सायाम् । कासते। कासाचके । कासिता। नाथू-नाधू याच्ोपतापैश्वर्याशीपु ॥ आशिपि नाथः॥ अस्याशिष्येवात्मनेपदम् । नाथते । अन्यर नाथति । केचित् नाधेोपदेशतामाहुः। मान पूजायाम् । मीमासते । बध बन्धने। मष्त्वम् । बीभत्सते । तिज निशाने । तितिक्षते । गुप गोपने । जुगुप्सते। पण व्यवहारे स्तुतौ च । पनिसाहचर्यापणरेपि स्तुताव- वायः अन्यत्र पणते इत्यादि । वणिजा पणाया इति भट्टिळ- चहारेऽपि प्रायुत । स्तुतावनुबन्धस्य केवले चरितार्थत्वात् आया- न्तानात्मनेपदम् । पणायति । पणायाञ्चकार । पेणे । पणायितासि पणितासे । पगाय्यात् । जमी गात्रविनामे ॥ रधिजभोरचि ७।११६॥ एतयोर्नुमागमोश्च । जम्भते । कमु कान्ता ।। कमणिङ्३।११३०॥ स्वार्थ । कामयते । कामयाचके। चकमे । कामायता कभिता। णिश्रीति च । काम इ अत इति स्थिते । णिलोपन उपधाहस्वः। सन्वद्भावः । सन्यतः । दीपों लघोः । अचीकमत । णिडमावे॥ कमेश्लेश्च वाच्यः ॥ अचकमत ॥ इति ६३ अंशात r 4

प्रयमसंहस्य द्वितीया मागः।
दय दानगतिरक्षणहिंगादाने ।
दयायासश्च३।११३७॥
दय भय आग पग माम लिटि । दयाभो । दवितीयम
दयिणीयम् । अय गती । अगा।
उपसर्गस्यायतो ८।२।१९।।
अयतिपरस्योपरागस्य यो फम्तस्य टः । प्लायते । पलायते ।
निस्सोरुत्वस्याशिदत्यान लत्तम । निग्यते । दुग्यते । निदंगे.
स्तु । निलयते । दुलयते । प्रत्यय इति पिणो रूपम् ॥
अनुदात्तेत्वलक्षणमात्मनेपदमनित्यम् ॥
उदयति । उह पितः । उहते ॥
उपसर्गादस्यत्यूह्योती ॥
आत्मनेपदम् । समूहति समदते ।।
उपसर्गादस्व उहतेः ७।१।२३ ॥
यादी मिति । समुद्यात् । समुहा ।। अथ शुतायाःगुन
धुतिस्वाप्योः संप्रसारणम् ७।४।६७ ॥
मनयोः अभ्यामस्प संमसारणम् । दिगुते ।।
द्युयो लुङि ११३१९१॥
गुतादिभ्यो लुदः परस्मैपदं वा । पम्मपदेर । अयुतत् ।
अयोतिष्ट । रुच दीप्तापमिप्रीती च । घुट परिपर्चने । म गंव.
लने । शुभ दीनी विवा वर्ण । मु विधाने । अनमन् । अयं.
भिष्ट । भंशु-संमु अपयंसने । धम अपर्वमने गा च ॥ अय
घटादयः ॥ घट चेष्टायाम् । घटने । जघटे । घटादिमित्कार
घटयति । अघाट अघाटे । घाई घारम् । घरं घटम इत्यादि।
मथ मख्याने । पमये व्यय मयमंचलनयोः॥
व्ययो लिटि७।११६८॥
व्ययोभ्यासस्य संमसारणं लिटि । विव्यये । मद मदने । त्रि-
-

सुगमकौमुद्याः। त्वरा संभ्रमे । एते पितः ॥ अथ फणाधा ॥ टुभ्रातृ दीसौ । भे. ने । वभ्राजे । भ्राजतेरिह पाठः फणादिकार्यार्थः । पूर्व पाठस्तु प्रश्वादिपत्वाभावार्थः । तत्र हि राजिसाहचर्यात् फणादरेव ग्रहणम्॥ अथ वेटः ।। क्षमूप् सहने ॥ म्वोश्च ८।२।६५॥ मान्तस्य धातोर्मस्य नः वमयोः । चक्षण्वहे चक्षमिमहे । अक्ष- मिष्ट अक्षस्त । त्रपूप् लजायाम् । वेपे । पाते । त्रप्ता त्रपिता। सह मर्पणेभिभवे च । ज्वलादिः । तीपेति वेद । सहिता ॥ सहिवहोरोदवर्णस्य ६।३।११२॥ अनयोखर्णस्य ओत् दलोपे । सोढा । गाहू विलोडने । जघाले। जगाहित, जगाहिध्ये जगावे । गाहिता । ढोढे लोपः । गाढा । गृह ग्रहणे ॥ लिसिचावात्मनेपदेषु ॥ घृक्षीष्ट गृहिपष्टि । च्ले क्सः। अक्षत ॥ क्सस्याचि ७।३।७२॥ अजादौ ताडि । सस्य लोपः। अधृक्षाताम् । अघृक्षन्त ॥ अथ शुतादिष्वेव वृतादयः॥ वृतु वर्तने । वृद्भ्यः स्यसनोः १।३। ९२॥ - वृतादिभ्यः परस्मैपदं वा स्ये सनि च न वृद्भ्यश्चतुर्यः ७।२१५९॥ एभ्यः सकारादेरादधातुकस्येपन तडानयोरभाववियति चर्ति- प्यते । अवृतत् अवार्तष् । अवस्य॑त् अवर्तिव्यत् । एवं वृधु वृद्धी। शृधु शब्दकुत्सायामास्यन्दू प्रस्रवणे।सस्यन्देसस्थन्दिपे सस्यन्त्से । सस्पन्दिध्ये सस्यन्ध्ये । स्यन्दिता स्यन्ता । वृद्धयः इति परस्मैपदे इटविकल्प वाधित्वा चतुर्ग्रहणसामर्थ्यान्न वृद्भय इति इदनिषेधः । स्वन्स्यति । स्थन्दिष्यते स्यन्त्स्यते । स्यन्दिपीष्ट स्करसीट पर- प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः । स्मैपदपक्षेऽइ नलोपः । अस्यदत् अस्यन्दिष्ट अस्यन्त । अस्य- न्त्साताम् । अस्यन्त्सत् । अस्यन्दिष्यत् अस्यन्तस्यत ॥ अनुविपर्यभिनिभ्यः स्यन्दतेरपाणिषु ८।३ । ७२ ॥ एभ्यः परस्याप्राणिकर्षकस्य स्यन्दतेः सस्य पो वा। अनुष्य- न्दते अनुस्यन्दते वा जलम् । अप्राणिपु किम् । अनुस्यन्दते हस्ती। अप्राणिवित्युक्तेः । मत्स्योदके अनुष्यन्देते इत्यत्रापि पक्षे पत्वं भवत्येव । प्राणिषु नेत्युक्तौ तु न स्यात् । कृपू सामर्थे । कृपो रोलः ८।२।१८॥ कृपो रेफस्य लः। ऋकारस्य लकारः। कल्पते । चकृपे । इत्यादि स्पंदिवत् ॥ लुटि च कूपः १।३।९३ ॥ लुटि स्यसनोश्च क्लृपेः परस्मैपदं वा ॥ तासि च लपः ७।२।६० ॥ क्लपः परस्य तासे सकारादेराईधातुकस्य चेण न तडानयोर- भावे । कल्सासि कल्पितासि । कल्प्सासे ॥ अथानिटः ॥ मिड् ईपद्धसने । क्रादिनियमान्नित्यमिट् ॥ विभापेटः ॥ सिष्मियिढे सिष्मियिध्वे । अस्मेष्ट । पुद्द मुट् च्युइ वृद्ध गती । श्यैड गतौ । गाइ गतौ । गाते । गाते । गाते । जगे। गातासे । इट एत्त्वे कृते वृद्धिागे । लड् इटि।अगे। गेत । गेयाता- म् । गैरन् । गासीष्ट । गाइकुटादिभ्य इत्यत्र इडादेशस्यैव ग्रहणं न त्वस्य तेनाडित्वाद् घुमास्था इतीत्वं न । अगास्त । मेड् प्रणिदाने । प्रणिमयते । नेर्गदेत्यत्रास्यापि ग्रहणमिष्यते । वन परिष्वने। नलोपः । स्वजते । परिष्वजते ।। अंथिग्रंथिदम्भिस्वञीनां लिटः कित्वं वेति ॥ व्याकरणान्तरम् । सरवजे सस्य । सस्वजिपे सस्वञ्जिषे ।

सुगमकीमुद्याः। स्वता । स्वक्ष्यते । स्वजेत । वडक्षीर । रमु कोडायाम् । ज्व- लादिः । रमते ॥ व्यापरिभ्यो रमः ११३८३॥ परस्मैपदम् । विरमतीत्यादि । व्यरंसीत् ।। । उपाच १1३1८४॥ उपरमति ॥ विभाषाकर्मकात् १।३। ८५॥ उपाद्मेरकर्मकात्परस्मैपदं वा । उपरमति र परमते वा । इत्यात्म- नेपदिनः ॥ इति ६४ अंशाः। चाय पृजानिशामनयो । चायति चायते । चचाये । पच सम- चाये । युधिर बोधने । अबुधत् । अवोधीत् । अयोधिष्ट । दीपज- नेत्यन दिवादेखे ग्रहणादन चिश् न । अस गतिदीयादानेषु । विज्ञ सेवायाम् । श्रयति श्रयते । श्रयिता । चड् अशिथि यत् । दान खण्डने । दीदासति दीदासते । एवं शान तेजने । शीशासति । अर्थविशेपे सन् अन्यत्र । दानयति । शानयति । खनु अवदारणे । जनसनेत्युपधालोपः। चरमतु.॥ ये विभापा६।१।४३॥ जनप्सनसनामात्वं वा पादौ हिति । खायात् खन्यात् । लप कान्तौ । श्यन् वा । लपति लपते । भ्रष्ट गतौ भ्रंशने च । मेधु मेधा हिंसनयोः सङ्गमे च राज दीप्ती । फणादिः । रेजतु । ररजतु । रेजे । राज ॥ अथ वेटः ।। गुहू सवरणे ।। ऊदुपधाया गोहः ६।४।८९ ॥ गुह उपधाया ऊत् गुणहेतावनादौ प्रत्यये । गृहति गृहते । गृहिता गोहा । अगृहीत् । अधुक्षत् ।। लुवा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये ७१३१७३॥

प्रथमखंडस्य द्वितीयो भागः। एप क्सस्य लुग्वा दन्त्ये ताडे । अगूढ | अधुक्षत । अघु- क्षन्त । अगुहहि । अधुक्षावहि ॥ अथानिटः ॥ मज सेवायाम् । भेजतुः। भेजे । रञ्ज रागे। रजति रजते । शप आकोशे । शपथ शशष्य । शेपिपे । शप उपालम्भे । अकर्तृगेऽपि फले तडानी । कृष्णाय शपते । विप दीप्तौ । अस्विक्षत् । तडि अत्विक्षाताम् । अत्विक्षन्त ॥ अथ पट् हजन्ता यजादयः ॥ यज देवपूजासंगति- करणदानेषु । इयाज । ईजतुः । ईजुः । इयजिय इयष्ठ । ईने । इज्यात् । डुवा बीजसंताने छेदने च । प्रणिवपति । उखाप । ऊपतुः । उप्यात् । वह प्रापणे । प्रणिवहति । उबोट । वोढा । अवोट्सम् ।। प्रादहः११३१८१॥ परस्मैपदम् । प्रवहति । परेप इत्यत्र योगविभागात्परेरपीति केचित् । परिवहति । वेञ् तन्तुसंताने वेभो वयिः२।४।११॥ वा लिटि । अहिज्येति यकारस्य प्रासे ।। लिटि वयो यः६।१।३८॥ चयो यस्य संप्रसारणं न स्यालिटि । ऊयतुः ॥ वश्वास्यान्यतरस्यां किति ६ ११३९ ॥ वयो यस्य वो वा किति लिटि । उपतुः । वयस्तासावभावात् । थलि नित्यमिट् । उयिथ । कये । ऊवे । वयादेशाभावपक्षे ॥ वेभः६।१॥४०॥ वेजो न संप्रसारणं लिटि । ववी । वस्तुः । व्यञ् संवरणे ॥ न व्यो लिटि ६।१।४६॥ व्येत्र आत्वं न स्यालिटि । विव्याय । विव्ययतः। इडत्त्यत्तीति इट् । विव्ययिथ । वीयात् । हेन् स्पर्दायां शन्दे च ।।

१४२ सुगमकौमुद्याः। अभ्यस्तस्य च६।१।३३॥ अभ्यस्तीमविष्यतो वेजः संप्रसारणम् । ततो द्वित्वम् । जुहाव । जुहुवतुः॥ लिपि प्तिचि हश्च ३१११५३ ॥ एभ्यश्च्लेरड् । आतो लोपः । अहत् । अहत । अवास्त ॥ निसमुपवि-यो ह्वः १।३।३० ॥ तडानौ । निद्वयते॥ स्पीयामाङः १।३।३१॥ कृष्णश्चाणूरमाद्वयते । णीञ् पापणे । नयति नयते । नेता ॥ सम्माननोत्सञ्जनाचार्यकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु नियः१।३।३६॥ आत्मनेपदम् । शास्त्रे नयते । दण्डमुन्नयते । माणवकमुपनयते । तत्वं नयते । कर्मकरानुपनयते । कर विनयते । शत विनयते ॥ कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि १।३।३७॥ नियः कर्तृस्थे कर्मणि यदात्मनेपदं प्राप्तं तच्छरीरावयवभिन्न एव स्यात् । क्रोधं विनयते । नेह गहुँ विनयति । हज् हरणे । हरति हरते ॥ हरतर्गतताच्छील्ये ॥ आत्मनेपदम् । पैतृकमश्वा अनुहरन्ते । पितु. प्रकार अनुशील- यन्तीत्यर्थः ॥ कर्मव्यतिहारे हरतेरप्रतिषेधः ॥ संमहरन्ते राजानः ॥ इति भ्वादयः ॥ इति ६५ अशाः। जयादादयः ।। क्षु शब्दे ।। उतो वृद्धिलकि हलि७।३।८९ ॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीया भागः । लुग्विपये उतो वृद्धिः पिति हलादा सार्वधातुके नत्वभ्यस्तस्य । क्षीति । क्षाविता । पिच डिन्न डि पिन्नति माप्यम् । तेन लिडि उतो वृदिर्न । क्षुयात् । यु मिश्रणे अमिश्रणे च । णु स्तुती ।। । आङि नुप्रच्छयोः ॥ तडानी। आनुते । रु शन्दे ।। तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके ७।३।९५॥ एभ्यः परस्य सार्वधातुकस्य हलादेस्तिड ईडा रीति वीति । रुतः रुवीतः । रुयात् रुवीयात् । क्ष्णु तेजने । क्ष्णीति ।। समाक्ष्णुवः ११३॥६५॥ तडानौ । संक्ष्णुते । ष्णु प्रस्रवणे । स्रीति । सविता । कर्मव्य- तिहारादावात्मनेपदे तु स्नुक्रमोरिति नियमान्नेट । सोता । सौ. प्यते । असोट । विद ज्ञाने। विदो लटो वा ३।४।८३॥ वेत्तेर्लटः परस्मैपदानां णलादयो वा । वेद । विदतुः । वेत्ति । वित्तः । विवेद । विदाञ्चकार । विदांकुर्वन्त्वित्यामि गुणामावनि- पातनालिटयप्यामि न गुणः ॥ विदार्थन्वित्यन्यतरस्याम् ३११४१ ॥ वेत्तेलादधाम् गुणामावो लोटो लुछ लोडन्तकृयनुप्रयोगश्च वा निपात्यते । पुरुपपचनेनेह विवक्षिते । विदाङ्करोतु । विदांकुरु तात् । इत्यादि । शेर्नुस् । अविदुः । दश्चेति सिपि रुवा । अवे । अवेत् । अवेदीत् ॥ विदिपच्छिस्वरतीनामुपसंख्यानम् ॐ ।। समोऽकर्मभ्यः एतेभ्यस्तङानी इत्यर्थः । तत्र संविते । संविदाते॥ वेत्तेषिभापा ७१११७॥ वेत्तेः परस्य झादेशस्यातो रुडागमा वा । मंद्रिते । संविदते ।

।
-
१४४
मुगमकीमुद्याः।
समवेदिष्ट । वश कान्ती । वष्टि । उवाश । उष्टात् । अवट् । औ.
धाम् । उश्यात् । उश्यास्ताम् । अम् भुवि । प्रागुक्तः । कर्मव्य.
तिहारे । व्यतिस्ते । व्यतिपाते । व्यतिपते । व्यतिथे । व्यतिध्वे ।
व्यतिहे । व्यत्यस । व्यतिपीत । व्यत्यास्त ।।
उपसर्गप्रादुर्ध्यामस्तिर्यच्परः ८।३। ८७ ॥
उपसर्गेऽणः प्रादुसश्च परस्यास्तेः सस्य पः स्यायकारेऽचि च
परे । निष्यात् । प्रादुण्यात् । निपन्ति । प्रादुःपन्ति । यपरः
किम् । अमिस्तः ॥ रुदादिपु चत्वारः स्वत्वनिदसु ॥ उदिर
अश्रुविमोचने॥
रुदादिभ्यस्सार्वधातुके ७।२।७६ ॥
एभ्यो वलादेः सार्वधातुकस्पेटू । रोदिति । रुदितः । रुदिहि ॥
रुदश्च पञ्चभ्यः ७।३।९८॥
इलादेः पितः सार्वधातुकस्यापृक्तस्य ईद ।।
अडू गायंगालंघयोः ७।३।९९ ॥
अरोदीत् । अरोदत् । अरुदिताम् । अन्तरङ्गत्वाद्यासुर । रुद्यात् ।
श्वस-अन प्रोणने । श्वसिहि । अश्वसीत् ॥
अनितेः८।४।१९॥
उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्यानितेर्नस्य णः । प्राणिति । अथ
सप्त जक्षादयोऽभ्यस्तसंज्ञाः ।। जक्ष-मक्ष हसनयोः। अयं रुदादि-
प्वपि । जक्षिति । झस्य अत् । जक्षति । सिजभ्यस्तेति झेर्जुम् ।
अजक्षुः । जागृ निद्राक्षये। जागर्ति । जाग्रति । जागराञ्चकार
जजागार॥
जायो विचिण्णलडित्सु ७।३।८५ ॥
जागर्तेर्गुणो विचिषणलडिन्योन्यस्मिन् वृदिविपये प्रतिषे.
धविपये च। जजागरतुः। अजागः। जुसि चेति गुणः। अजागरुः।
जागर्यात् । अजागरीत् । दरिद्रा दुर्गती । दरिद्राति ॥

मृजेरिको वृदिर्धातप्रत्यये हित्यजादी वेष्यते । मार्टि । मृष्टः । मृजन्ति मान्ति । माक्षि । मृष्ठः । मृष्ठ ॥ अथानिटः ॥ दाप प्रथमखंडस्य द्वितीया मागः इद्दरिद्रस्य ६।४।११४॥ दरिदातेरिकारो हलादौ कृिति सार्वधातुके । दद्रितः। श्राभ्य- स्तयोरातः। दरिद्रति । दरिद्राञ्चकार । ददरिद्रापित्येके । दरिद्रातरार्द्धधातुक आलोपः लुङि वा सनि ज्युलि' 'ल्युटि च न * ॥ दरिद्रिता । अदरिद्रात् । अदरिद्रिताम् । अदरिदुः । दरिद्रियात् दरिद्रयात् । अदरिद्रीत् । इट्सकौ । अदरिद्रासीत् ॥ इति ६६ अंशाः। शासु अनुशिष्टी॥ शास इदहलोः६।४।३४॥ शास उपाधाया इदडि हलादौ किति च । शिष्टः । शासति ॥ शाही ६।५।३५॥ शास्तेः शादेशो हो। तस्याभीयत्वेनासिद्धत्वादिः । शाधि ।। तिप्यनस्तेः ८।२।७३॥ पदान्तस्य सस्य दस्तिपि न त्वस्तेः । ससजुपोरित्यस्यापवादः। अशात्-अशाद् ॥ सिपि धातो रुवा ८।२।७४॥ पदान्तस्य धातोः सस्य रुर्वा पक्षे जश्त्वेन दा अशाः। अशात्-द। सर्तिशास्तीत्यड् । अशिपत् । अशासिष्यत् । चकास दीप्तो। चकाधि । अचकात्-अचकाद् । अचकासुः। अचकाः। अचकात् । दीधीवव्यौ छान्दसौ । मृजूप् शुद्धौ ॥ मृजेवृद्धिः ७।३।११४॥ लवने । दाति ॥ । ७

om
सुगमकीमुद्याः।
लङः शाकटायनस्यैव ३।४।१११॥
आदन्ताल्लडो शेर्जुस् वा । अदुः । अदात् । दायास्ताम् । अ.
दासीत् । पा रक्षणे । पायास्ताम् । अपासीत् । मा दीप्ती । रा
दाने । ला, आदाने च । मा, पूरणे । श्रा पाके । ष्णा शोचे ।
या पापणे । वा गतिगन्धनयोः । मा माने । नेर्गदेत्यत्रास्य न
ग्रहणम् । मेयात् । ख्या प्रकथने । अयं सार्वधातुक्मात्रविषयः।
सम्पूर्वस्य ख्यातेः प्रयोगेनेति न्यासकारः । द्राकुत्सायाम । प्रणि-
द्राति । प्सा भक्षणे । प्रणिप्साति । इण् गतौ ॥
इणो यण् ६।४।८१॥
अजादी प्रत्यये । यन्ति । इयाय ॥
दीर्घ इणः किति ७।४।६९॥
इणः अभ्यासस्य दीर्घः किति लिटि । ईयतुः । ईयुः । ऐत् ।
आयन् ॥
एतेलिङि७।४।२४॥
उपसर्गात्परस्य इणोऽणो हस्व आर्ट धातुके किति लिडि । नि-
रियात् । अणः किम् । समेयात् । समीयादिति तु भ्वादिस्य ॥
इणो गा लुङि २।४ । १५॥
गातिस्थेति सिचो टक । अगात् । इन स्मरणे । इडिको नित्य-
मधिपूर्वी॥
इण्वदिक इति वक्तव्यम् * ॥
अधियन्ति । अध्यगात् । आर्द्धधातुकाधिकारोक्तस्यैवातिदेश
इति मते यण् न । ससीतयो राघवयोरधीयन्निति भहिः। कु शब्दे ।'
कौति । हन् हिंसागत्योः । प्रणिहन्ति । अनुदात्तोपदेशेति नस्य
लोपः । हतः । जनहनेति उपधालोपः। हो हन्तरिति कुत्वम् ।
नन्ति ॥
वमोवा ८१४॥२३॥

- प्रथमखडस्य दिताया.मागः। १४५ । उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य हन्तेर्नस्य णो वा वमयोः । प्रहमि महन्मि । एवं वस्मसोः । जनतुः ।। अभ्यासाच ७।३।५५॥ अभ्यासात्परस्य हन्तेर्हस्य कुत्वम् । जघनिथ जघन्य । हनि- प्यति । हतात् ॥ इन्तेजः ६।४।३६॥ हो । आभीयत्वेन जस्यासिद्धत्वान्न हेर्लुकू । जहि । अहन् । आर्द्धधातुके २।४।३५॥ इत्यधिकृत्य ॥ हनो वध लिङि२॥४॥४२॥. लुङि च २।४।४३॥ वधादेशोऽदन्तः । अतो लोपः । वध्यात् । अवधीत् । आडो यमहनः इति तडानौ। तत्र आहते । आनाते । आनते । आहसे। आहध्वे । आने । आहवहे । आजप्ने । आनीत । आवधिपीष्ट ॥ आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् २।४।४४॥ हनी वधादेशो वा लुडि आत्मनेपदेषु । आवधिष्ट । आवधि- पाताम् ॥ हनः सिन् १।२।१४॥ कित् । आहत । आइसाताम् । वच् परिमापणे । वक्ति । अय- मन्तिपरो न प्रयुज्यते । बहुवचनपर इत्यन्ये । झिपर इत्यपरे। उवाच । वग्धि । उच्यात् ।। अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ्.३।११५२॥ एभ्यश्लेरः ।। वच उम् ७१४॥२०॥ अडि । अवोचत् ।। चकरीतं च ॥

१४८ सुगमकौमुद्याः। यइलुगन्तमदादी परस्मैपदे बोध्यम् । जिष्यप् शये । रुदादिः। स्वपिति । सुष्वाप । सुपुपतुः । सुष्वपिथ सुष्वप्य । स्वप्ता । सु- प्यात् ।। इति परस्मैपदिनः ॥ इति ६७ अंशाः। आशासु इच्छायाम् । आशास्तं । आशशासे । णिजि शुद्धौ। निले वृजि वर्जने । वृते। शिजि अव्यक्ते शब्दे । वस आच्छादने । वबसे । पृची संपर्चने । ईर गती कम्पने च । शीड स्वप्ने ।। शीङः सार्वधातुके गुणः ७।४।२१॥ विति चेत्यस्यापवादः । शेते । शयाते ॥ शीडो रुटू ७॥१६॥ शीडः परस्य झादेशस्याऽतो रुडागमः । शेरते । शयिता। आस उपवेशने । आसाञ्चके । आध्वम् । ईड स्तुती । ईट्टे ॥ ईशा से७।२१७७॥ ईडजनोधं च ७१२१७८॥ ईशीड्जना सेवेशब्दयोस्सार्वधातुकयोरिट् । ईडिपे । ईडिध्वे । इंडिष्य । ईडिध्वम् । विकृतिग्रहणेन प्रकृतेरग्रहणात् लडि । ऐट्वम् । ईश ऐश्वर्य । ईशिपे । पूड प्राणिगर्भविमोचने । सूते। सुपुचे। सोता सविता। भूसुवास्तिडि । सुवै ॥ अथानिटः ॥ इड् अध्ययने । अधीते॥ गाङ् लिटि २।४।१९॥ इडी गाइ लिटि लावस्थाया लिटि विवक्षिते पा । अधिजगे। अध्येता । अध्यये । गुणायादेशयोः कृतयोरुपसर्गस्य यण । पूर्व धातुरुपसर्गेणेति दर्शनेऽन्तरगाढणात्पूर्व सवर्णदीर्घः प्राप्तः। णेरध्ययने वृत्तमिति निर्देशान्न भवति । अध्यैत । परत्वादियह तत आद वृद्धिः । अध्ययाताम् । अध्ययि ।। विभापा लुडूलङोः २।४।५०॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । इडो गाङ्॥ गाङ्कुटादिभ्योऽणिन्डित् ११२।३।। गाडादेशात् कुटादिभ्यश्च परे जिणिभिन्नाः प्रत्ययाडितः स्युः। घुमास्थागापाजहातिसां हलि ६।४।६६ ॥ पपामात ईत् हलादौ कृित्या धातुके । अध्यगीष्ट अध्यष्ट । अध्यगीष्यत अध्येष्यत । ढुड् अपनयने । हुते । जुहुवे । चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि । चष्टे । इकारोऽनुदात्ती युजर्थः । विचक्षणः । नुम् तु न ! अन्तेदित इति व्याख्यानात् ।। चक्षिङः ख्याञ् २।४।५४॥ आईधातुके ॥ वा लिटि२१४१५५॥ अत्र भाष्ये खशादिरयमादेशः । असिद्धकाण्डे शस्य यो वेति स्थितम् । जित्वात् पदद्वयम् । चल्यो चख्ये । चक्शौ चक्शे । अस्यतिवक्तीति स्लेरड् । अख्यत् अख्यत । अक्शासीत् अ. शास्त । वर्जने क्शान नेष्यते । समचक्षिष्टेत्यादि ॥ इत्यात्मने- पदिनः ॥ अर्ण आच्छादने ॥ ऊर्णोतविभापा ७।३।९० ॥ वा वृद्धिहलादौ पिति सार्वधातुके । अणौति उणोंति । अर्णते ।। ऊोतेराम् न ॥ नन्द्राः संयोगादयः६।११३॥ अचः पराः संयोगादयो नदरा दिर्न । नुशब्दस्य द्वित्वम् । णत्वस्यासिद्धत्वात् । पूर्वत्रासिद्धीयमद्वित्वे इति त्वनित्यम् । उमौ साभ्यासस्येति लिङ्गात् । अर्णनाव ॥ विभापोः ११२॥३॥ इडादिः प्रत्ययो वा डित् । अनुविय अणुनविथ । उविता उMविता ॥

सुगमकीमुद्याः।
गुणोऽपृक्ते ७१३१९५॥
जोतेर्गुणोऽपृक्त हलादी पिति सार्वधातुके । वृदयपवादः ।
औणात् औः । अर्णयात ऊर्णयात् । ऊर्णविपीष्ट ऊर्णविषीष्ट ।
औघुजी ।।
ऊोतेविभापा ७१२१६॥
इडादी सिचि परस्मैपदे वा वृद्धिः । पक्षे गुणः । और्णावीत् ।
और्णाविष्टाम् । और्णवीत् ॥ अथानिटः ॥ टुञ् स्तुती । स्तौति ।
स्तवीति । तुष्टुव । तुष्टुम । स्तुसुधन्भ्यः इति इद् । अस्तावीत । ब्रज
व्यक्तायां वाचि॥
अवः पञ्चानामादित आहो अवः ३।४।४८ ॥
वो लटः परस्मैपदानामादितः पञ्चानां णलाद्याः पंव वा ।
अवः आहादेशश्च । आह ॥
आहस्थः ८।२।३५॥
झलि आत्थ ॥
ब्रुव ईट् ७।३। ९३॥
सुवः परस्य हलादेः पित ईट् । ब्रवीति । हते ॥
ब्रुवो वचिः २181॥
आर्दधातुके । उवाच । ऊचतुः । ऊचे । ब्रवीतु । भूयात् ।
डिन पिन्नेत्यपित्वात् ईटू न वक्ष्यति । वच उम् । अवोचत् । द्विप
अप्रीती । द्विहि । अवेट् ॥
द्विपश्च ३।४।११२॥
लडो अर्जुन वा । अदिषुः। अदिपन । दिक्षीट । दिह उपचये ।
प्रणिदेग्धिः । दिग्धे । धेक्षि । अधेक् । अधिक्षत् । अधिक्षत ।
सस्य लपक्षे । अदिग्ध । अदिग्धाः अदिहाहि । एवं दुइ प्रपू-

प्रथमखंडस्य हिताया मागः रणे। लिह आस्वादने । लेदि । लीडः ॥ इत्युभयपदिनः । इत्य- दादयः॥ इति ६८ अंशाः। । 4. पृ पालनपुरणयोः । दीर्घान्तः। स्वान्तः इति केचित् ।। अतिपिपत्योश्च ७।४।७७॥ अभ्यासस्येकारोन्तादेशःश्ली। पिपर्ति ॥ उदोष्ठ्यपूर्वस्य ७।३।११॥ अनावयवौष्ठयपूर्वो य ऋत्तदन्ताङ्गस्य उत् । गुणवृद्धी इम वाधेते। पिपर्ति । पिपूर्तः । पिपुरति । पपार ॥ शृप्राहस्वो वा ७।४ । १२॥ एपां किति लिटि द्वस्वो वा पक्षे गुणः । पपरतुः पातुः । अपिपः । अपिपरुः । शेपम् आर्द्धधातुके तृवत् । इस्थले इत् । परीता परिता । अपारीत् । अग्रे सर्वेऽनिटः । पृ पालनपूरणयोः । हस्वान्तः । पिपत्ति । पिपृतः । पिमति । प्रियात् । अपापीत् । आहार त्यागे । जहाति.। ईहल्ययोः ।। जहातेश्च ६।४।११६॥ 'इदा हलादी शिति सार्वधातुके । पक्षे ईः । जहितः जहीतः ॥ आ च हो ६।४।११७॥ जहातेही परे आस्यात् चादिदीती। जहाहि जहिहि जहीहि ।। लोपो यि ६।४।११८॥ जहातेरालोपो यादी सार्वधातुके । जह्यात हेयात् । लिभीमये ॥ भियोऽन्यतरस्याम् ६।४।११५॥ इकारो वा हलादी किति सार्वधातुके । विमितः विमीतः । विभयाञ्चकार विमाय । ही लजायाम् । जिहति । ऋगती। इयर्ति । इय॒तः । इति । गुणः । आर । आरतुः । थलीट् ।

१५२
।
सुगमकौमुद्याः।
आरिथ । अर्चा । इयराणि । ऐयः । ऐयताम् । ऐयरुः । इ.
तात् अर्यात् । अङ् गुणः । रत् । अर्चिनु इत्यात्मनेपदम् ।
तत्र समियते । समियाते । समियते । समारे । समाराते । अङ्
समारत । समारताम् । मा समरत ।मा समरताम् । इत्यादि ।
इति परस्मैपदिनः ॥ माङ् माने शब्दे च ॥
भृभामित् ७१४ । ७५ ॥
भृज्ञ माङ् ओहाङ् एषां त्रयाणामभ्यासस्य इत् श्लौ । प्राण
मिमीते । मिमाते । मातासे । ओहाङ् गतौ । जिहीते । इत्या
त्मनेपदिनी ॥ डुदान दाने । प्रणिददाति । दत्तः । ददति । दत्ते ।
दाता । देहि । देयात् । अदात् । अदित ॥
आङो दो नास्यविहरणे ११३१२०॥
आडो दाजो मुखविकसनादन्यत्र वर्तमानात्तडानी । विद्यामा
दत्ते । नेह । मुखं व्याददाति । आस्येत्यविवक्षितम् । विपादिक
व्याददाति ।।
पराङ्गकर्मकान निषेधः ॥
व्यादत्ते परस्य मुखम् । डुधाधारणपोपणयोः । प्राणदधाति ।
दधस्तथोश्च ८१२।३८॥
द्विरुक्तस्य झपन्तस्य धामो वशो भए तथयोः स्वोश्च परतः
धत्तः । दधाति । धहि । धेयात् । अधात् । अधित डुभृञ् धारण
पोपणयोः। विमति । विभूव । णिजिर शौचपोषणयोः ।
णिनां त्रयाणां गुणः श्लो७।४।७५ ॥
णिविविषामभ्यासस्य गुणः श्लो। नेक्ति ।।
नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके ७।३। ८७ ॥
लघूपधगुणो न । नेनिजानि । विजिर् पृथग्भावे । विष्ट
व्याप्ती ।। इति जुहोत्यादयः॥
इति ६९ अंशाः।
J

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः। १५३ टिम आद्रीभावे । ब्रीड चोदने लज्जायां च । त्रसी उद्देगे । वा भ्राशेति श्यन्वा । त्रस्पति प्रसति । सतुः तत्रसतुः । पुष्प विकसने । पुह. चक्यर्थे । तृप्तावित्यर्थः । प्लष दाहे । कुथ पूती- भावे । पुथ हिंसायाम । इप गतौ । इह तीपेति नेविकल्पः । जप क्योहानौ । जीति । जजरतुः । जेरतुः । जरिता जरीता । जस्तम्भिवति वा चलेरङ् । ऋशोङि गुणः । अजरत् । अजा- रीत् । अजारिष्टाम् । पियु तन्तुसंताने । सीव्यति । छि निर. सने । छीव्यति । केपीहमें न पठन्ति ॥ अथ नृतेः प्राक् पुपा- दयः ॥ भ्रंशु अधःपतने । भ्रश्यति । पुपादीति च्लेरङ् । अभ्र. शत् । असु क्षेपणे ॥ अस्यतेस्थुक् ७।४।१७॥ अङि । आस्थत् । पर्यास्थत् । उपसदिति वा आत्मनेप. दम् । अस्यतिवक्तीत्यङ् । पर्यास्थत । निरस्पति निरस्यते । यसु प्रयत्ने । यसोऽनुपसर्गात् ३।११७१॥ श्यन् वा ।। संयसश्च३।१।७३॥ यस्यति यसति । संयस्यति संयसति । क्षुम संचलने । प्लप दाहे । कुप क्रोधे । गुप व्याकुलत्वे । ऋधु वृद्धौ । गृधु अभिका- क्षायाम् । नितृप पिपासायाम् । हष तुष्टौ । दसु उपक्षये । पुपा- दिष्वेव शमादयः । शमु उपशमे ॥ शमामष्टानां दीर्घः श्यनि ७।३।७४॥ प्रणिशाम्यति । अशमत् । भ्रम अनवस्थाने । वा भ्राशेति वा श्यन् तत्र दीर्घः । भ्राम्यति । अन्यत्र भ्रमाते । लमु ग्लानी। क्लाम्यति । श्यन्नभावे ष्टिबुक्लम्विति दीर्घः । क्लामति । तमु का क्षायाम् । दमु उपशमे । श्रम तपसि खेदे च ! मदी हर्षे ॥ अथ बेटः ॥ क्षमू सहने । अषित् । शान्तिः । स्वादिस्तु पिन् । क्षमा।

१५४ सुगमकौमुद्याः। क्षाम्यति । चक्षण्व चक्षमिव । इति शमायाः । पुपादिषु क्लिदू आर्दीभावे । रुप हिंसायाम् । लुभ गाये । तीपति वेट् । रोषिता रोटा लोमिता लोब्धा । अथ पुपादिष्वेव रधादयो वेटः । तृपपी अनुदात्तौं । रध हिंसासंसध्योः ॥ रधादिभ्यश्च ७।२।४५॥ बलाघाईधातुकस्य वेट । ध्यति । चि नुम् । ररन्ध । रं- धतुः । रन्धिय रद्ध । ररन्धिव रेव ॥ नेत्यलिटि रधेः ७१११६२॥ लिड्वर्जे इटि रधेर्नुम्न । रधिता रद्धा । अरधत् । णश अदर्शने । नेशिथ ॥ मस्जिनशोलि ७।११६०॥ नुम् । ननंष्ठ । नेशिव नेश्व॥ नशेः पान्तस्य ८।४।३६॥ णत्वं न । प्रनंष्टा । नृप मीणने । ततर्पिय तत्रप्य ततर्थ । लिटि सेडेवेति परे । त्रप्ता तर्ता तर्पिता। स्पृशमशेति सिज्ञ वा। अताप्सीत् अतीत् अत्राप्सीत् । अत्पत् । एवं दृए हर्पमोह- नयोः । अदासीदित्यादि । दुह जिघांसायाम् । वा दृहेति वा घः । दुद्रोग्ध दुद्रोढ । अद्रुहत् । एवं मुह वैचित्ये । णिह प्रीती। ष्णुह उद्गिरणे । एषु वा ढः ।। इति रधादयः ॥ नृती गानवि- क्षेपे॥ सेऽसिचि कृतवृतदतदनृतः ७।२।१७॥ एभ्यः परस्य सिस्मिन्नस्य सादेरार्द्धधातुकस्येडा । नाष्यति नयति ।। अथानिटः ।। क्षिप रणे। क्षिप्यति । क्षेसा । छो छेदने । ओतः श्यनि ७१२१७१॥ लोपः। यति । छाता । सिचो वा लुक ! अच्छात् । अच्छा• - गात्रप्रक्षरणे । पिधु संरादौ । ऋध क्रोधे । शुध शौरे । तुप वृतु-चावृतु वरणे । वृत्यते । वावृत्यते । बारांश्चक्रे । दीपी दीप्तौ। दीपजनोत वा चिण् । अदीपि । अदीपिष्ट । एवं पूरी आप्यायने । प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । सीत् । दो अवखण्डने । प्रणिति । देयात् । अदात् । शो तनूक- रणे । अशासीत् । पोऽन्तकर्मणि । अभिष्यति । अमिससा । प्रणि- ष्यति । सेयात् । असात् । असासीत् ॥ इति ७० अंशाः । इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः । राध संसिद्धौ। राधोऽकर्मकाद्धावेव ॥ राधधातोरकर्मकादेव श्यन् । वृद्धावित्युदाहरणमात्रम् । राध्य- ति । रराधतुः । हिंसार्थस्य सकर्मकत्वादन राधो हिंसायामित्ये- त्वाभ्यासलोपौ न । राथिय । राधा । व्यध ताडने । अहिज्येति संप्रसारणम् । विध्यति । विव्याध । विविधतुः । विव्यधिथ विव्यद्ध ॥ अथ वागृतः प्राक् पुषादयः ॥ पुप पुष्टी । पोष्टा । पुपादीत्यड् । अपुपत् । क्षुध बुभुक्षायाम् । क्षोदा । क्षुधित इति तु वसतिक्षुधोरिट् । श्लिप आलिङ्गने ।। श्चिपः३।१।४६॥ अस्मात्परस्य अनिटश्लेः सः॥ आलिङ्गने ३।१।४६॥ लिपश्लेरालिङ्गन एव क्सो नान्यत्र । आश्लिक्षत कन्या देव- दत्तः । नेह । समश्लिपजतु काष्ठम् । अप्रत्यासत्ताविह लिपिः। कर्मण्यनालिङ्गने सिजेव न तु क्सः । एकवचने चिण् । अश्लेषि। अश्लिक्षाताम् । अश्लिक्षताअश्लिष्ठाः । अश्लिवम् । विदा-निविदा प्रीतौ । दुप वैकृत्ये । शुष शोपणे ॥ इति परस्मैपदिनः । वाथ शब्दे । काश दीप्तौ । हरी गतित्वरणहिंसनयोः । ग्लिश उपतापे । गूरी हिंसागत्योः । जनी प्रादुर्माये ॥

सुगमकौमुद्याः।
ज्ञाजनोर्जा ७।३।७९॥
अनयोर्जादेशः शिति । जायते । जज्ञे ॥
जनिवध्योश्च ७।३।३५॥
अनयोः उपधाया न वृद्धिश्चिणि णिति कृति च । अजनि ।
अजनिष्ट । अथ स्वादिरोदित् । डी विहायसा गतौ । डीयते ।
दूड् परितापे । अथ स्वादिरोदित् वेट् । पूड प्राणिप्रसवे । सूयते ।
लिटि नित्यमिट् । सुपुषिपे । स्वरतीति वेट् । साता सविता ॥ अ.
थानिदः ॥ माड् माने शब्दे च । ईट् गती । ईयते । अयांचवे।
प्रीड प्रीतौ । पिप्रिये । पीड् पाने । मन ज्ञाने । खिद दैन्ये ।
विद सत्तायाम् । युज समाधौ । युध संप्रहारे । अनोरुध कामे ।
पद गतौ । प्रणिपद्यते॥
चिण् ते पदः३।१।६०॥
पदेश्लेश्चिण स्यात्तशब्दे। अपादि । तप ऐश्वर्य वा । अयमैश्वर्ये
वा तश्यनी लभते । अन्यत्र शप् परस्मैपदवान् । तप्यते ।
तप्ता । बुध अवगमने । भुत्सीष्ट । अबोधि । अबुद्ध । सृज वि.
सर्गे । सृजिशोरित्यम् । स्रष्टा । सूक्षीष्ट । असृष्टाअथ स्वादिष्वो-
दित्सु । दीड क्षये ॥
दीडो युडचिहिति६।४।३६।।
दीडः परस्याजादेः हितः आईधातुकस्य युद्ध ॥
बुग्युटावड्यणोः सिद्धौ ॥
दिदीये ॥
मीनातिमिनोतिदीड ल्यपि च ६।४।५०॥
एपामा ल्यपि चकारात् अशित्येनिमित्चे । दाता । दास्यते।
धीद आधारे । मीड हिंसायाम् । रीड सपणे । लीद् श्लेषणे ॥
विभापा लीयतेः६।११५१॥
लीलीडोरात्र वा अशित्येविषये ल्याप च । लेता। लाता ॥

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः। इत्यात्मनेपदिनः। पुपादिः । शक विमापितोऽमर्पणे । उमय- पदीत्यर्थः । अयं सेट् इत्येके । शेकिथ । अनिद इत्यन्ये । शकिय शशक्य । मृप तितिक्षायाम् ॥ परेम॒पः ११३१८२॥ परस्मैपदम् । परिमृष्यति ॥ अयानिटी ॥ रा रागे । नलोपः । रज्यति रज्यते । रक्षा । शप आक्रोशे । णह बन्धने । नहीं धः। नेहिय ननद । दिवादिराकृतिगंणः । तेन सीयते मृग्यतीत्यादि । इति दिवादयः॥ इति ७१ अंशाः। जिधृपा प्रागल्भ्ये । परस्मैपदी सेट् । धृष्णोति । धृष्णुवन्ति । ऋधु वृद्धी । आनई । नुविधी ऋकारकदेशो रेफो हल्वेन गृह्यते तेनानेकहत्त्वान्नुट् । दम्भु दम्भने । दनोति । ददम्म । लिटो वा कित्वं नलोपः । तस्याभीयत्वेनासिद्धी । दम्भेश्च एत्वाभ्यासलोपी चाच्यो । देभतुः ददम्भतुः। इदं कित्वं पिदापतिपयकमित्येके | अपिद्विपक मित्यन्ये । दम्भिता । कृप प्रीणने। अनादित्वाण्णवन्न । हप्नोति। अथानिटः पक्षि हिंसायाम् । टुटु उपतापे । प्रीती। साथ संसिद्धौ । शक्ल शक्ती । आप्ल व्याप्ती । हि गती वृद्धी च ॥ हेरचडि७१३१५६॥ अभ्यासात्परस्य हिनोतहस्य कुत्वं नतु चडि । निधाय ॥ हिनुमीना ८।४।१५॥ उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य एतयोर्नस्य णः । पहिणोति । राध संसिद्धौ॥ राधो हिंसायाम् ६।३।१२३॥ एत्वाभ्यासलोपौ किति लिटि सेटि थलि च । अपरेधतुः । अप. रधुः ॥ इति परस्मपदिनः ॥ अशू व्याप्ती संघाते ॥ अभोतेश्च ७।४।७२॥

m सुगमकौमुद्याः। दीर्घाभूतादभ्यासावर्णात्परस्य नुट् । आनशे । अशिता अष्टा। इत्यात्मनेपदी ।। सुज् प्रागुक्तः॥ सुनोतेः स्यसनोः ८।३ । ११७॥ स्ये सनि च सुजःपो नाविसोष्यति।अभिपुणोति। अभ्यपुणोत्। अभिसुपाव । स्तृञ् आच्छादने । ऋतश्च संयोगादेः । स्तरि• पीष्ट स्तृपीष्ट । अस्तरिष्ट अस्तृत । धूञ् कम्पने । वेट् । दुधविथ दुधोथ । वमयोस्तु परमपि स्वरत्यादिविकल्पं बाधित्वा पुरस्तात्म- तिपेधकाण्डारंभसामर्थ्यात् युकः कितीति निषेधे प्राप्त क्रादिनि- यमानित्यमिट् । दुधुविव । धोता धविता । स्तुसुधूभ्य इतीट्। अधावीत् । वृञ् वरणे ॥ पभूयाततंथजगृम्भवपर्थेति निगमे ७।२।४६॥ एषां वेदे इडमावो निपात्यते । तेन भाषायां थलीट् । ववरिया ववृष । वृत्तो वा । वरिता वरीता । लिसिचोरात्मनेपदेषु न लिङि । वरिपीष्ट वृपीष्ट । अवारीत् । सिचि च परस्मैपदेषु । अवा- रिटाम् । अवरिष्ट अवरीष्ट अवृत ॥ अथानिटः ॥ चिञ् चयने । प्रणिचिनोति ।। विभापा चेः७।३।५८॥ अभ्यासात्परस्य चिनः कुत्वं वा सनि लिटि च । चिकाय बिचाय । शिश् निशाने। पिञ् वन्धने। घुकम्पने । कृज हिंसा- याम् । डुमिञ प्रक्षेपणे । आत्वम् । ममौ । मिम्यतुः ॥ इत्युभयप- दिनः॥ इति सुनोत्यादयः॥ इति ७२ अंशाः। चर्च परिमाणमनियो । पूर्ण भ्रमणे ।चल विलसने । मिप स्पर्दायाम् । हिल भावकरणे । शिल उञ्छे । मिल श्लेपणे । लिख अक्षरविन्यासे । पुण कर्मणि शुभे । शुभ शोमार्थे । धुर भीमार्थ- शब्दयोः । पुर अग्रगमने । भी ग्रन्थे । तृप तृप्तौ । दृप उल्लेशे । पृण प्रीणने । मृड सुखने । उन्ज आर्जवे । उज्न उत्सर्गे । उच्छी प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । विवासे । उछि उच्छे । विच्छ गती। विच्छायति । विच्छायां- चकार । विविच्छ । स्पृशमशेति सिजविकल्पः पुपादेरेव । अत्र तु नित्यं सिन् । अतीत् । ऋच्छ गतीन्द्रियमलयमूर्तिमायेषु । ऋच्छत्यताम् । आनछंतुः । समो गमृच्छिभ्याम् । समृ. च्छते । समृच्छिष्यते । व्यच व्याजीकरणे । अहिज्या । वि. चति । विव्याच । विविचतुः । अव्याचीत् अव्यचीत् । च्यचेः कुटादित्वमनसि इति तु कृत्येव न विह ॥ अथ तुम्फात्मा कुटा- दयः । कुट कौटिल्ये । कुटति । गाइकुटादिभ्य इति डित्वम् । चुकुटिथ चुकोट । चुकुट । कुटिता। अकुटीत् । खुड-ध्रुड संवरणे। ग्रुट छेदने । वा भ्राशेति श्यन् वा । त्रुटति ट्यात । छुर छेदने । नमकुईराम् । छुर्यात् । स्फुर संचलने । कुच संकोचने । चुट छेदने। पुट संश्लेपणे। मुट आक्षेपममर्दनयोः। स्फुट विकसने । ध्रुव गतिस्थ- र्ययोः। णू स्तवने । नुवति । अनुवीत् । धू विधूनने । धुवति । अधुरी- त् । अथ तम्फादी । तुम्फ हिंसायाम् । अनिदितामिति नलोपे ॥ शे तृम्फादीनानुम् वाच्यः ॐ ॥ येन्त्र नकारानुपक्तास्ते तुम्फादयः । तुंफति । आशिपि । तु. फ्यात् ।तम्फ तृप्ती।गुम्फ अन्यने । उम्म पूरणे अय दो किंगदिपु। कृविक्षेपे । किरति । चकार । चकरतुः । करिता करीता। कार्यात। अकारीत् ॥ किरतौ लवने ६।१।१४०॥ उपात् किरतेः सुट् छेदेऽर्थे । उपस्किरति ॥ अडभ्यासव्यवायेऽपि सुटू कात्पूर्व इति वक्तव्यम् * ॥ उपास्किरत् । उपचस्कार ॥ हिंसायां प्रतेश्च ६।१।१४१॥ उपात् मतेश्च किरतेः सुट् हिंसायामाअपस्थितिापतिस्किगते ॥ किरतेर्हर्पजीविकाकुलायककरणेप्वात्मनेपदमिति वाच्यम् ॥

सुगमकामुद्याः। हर्षादयो विषयाः । तत्र हपो विक्षेपस्य कारणम् । इतरे फल।। अपाचतुष्पाच्छकुनिष्वालेखने ६।१११४२।। अपात किरतेः सुटू ।। सुडपि हदिप्वेव वक्तव्यः ॥ अपास्किरते वृपो हष्टः । कुकुटो मक्षार्थी । श्वा आश्रपार्यो । हादिषु किम् । अपकिरति कुसुमम् । इह तड्सुटी न । हपोदि. मात्राविवक्षायां यद्यपि तद् प्राप्तस्तथापि सुडभावे नेष्यते इत्याहुः । गजोपकिरति । गृ निगरणे ।। अचि विभापा ८१२॥२१॥ गिरते रेफस्य लत्वं वाजादौ । गिति गिलति ॥ अवादग्रः१।३।५१॥ आत्मनेपदम् । अवगिरते । गृणातिस्त्ववपूर्वो न प्रयुज्यते ।। समाप्रतिज्ञाने ११३१५२॥ शब्दं नित्यं सङ्गिरते ॥ अथ वेटः ॥ ओवश्शू च्छेदने । वृश्चति । वनश्च । ववश्चतुः । वाश्चिथ पत्रष्ठ । लिटयभ्यासस्येति संप्रसारणे न रेफस्य ऋकारः । उरत् । तस्याचः परस्मिन्निति स्थानिवद्मा- पान्न संप्रसारण इति वस्यीत्वन्न । ब्राश्रिता व्रष्टा । व्रश्चिण्यति व्र- क्ष्यति । दृश्यात् । अवश्चीत अवासीत् । तृह एंडू-स्तुहू हिंसायाम। तर्हिता तर्दा । अहीत् अताईक्षीत् । अतार्दाम् । स्तहिता स्तम् । इषु इच्छायाम् । इच्छति । एपिता एटा। कृती छेदने । मुचादिः॥ शे मुचादीनाम् ७।१।१९॥ नुम् । कृन्तति । सेसिचीति वेट । कतिष्यति कस्यति । अ- कत्तीत् ॥ इति ७३ अंशाः। अयानिटः ॥ भुजो कौटिल्ये । रुजो भड्ने । छुप स्पर्शे । टुम- स्नो शुद्धौ । मस्जिनशोरिति नुम् । मस्जेरन्त्यात्पूों नुम् । मर्मस्थ प्रथमखण्डस्प दितीयो मागः । १६१ ममजिय । महा। पदम विशरणगत्यवसादनेषु । शदल मातने। दी भ्यादिवत् । विश प्रदाने । विशति ॥ नेशिः १।३।१७॥ आत्मनेपदम् । निविगते । स्पृश संसर्भने । स्मात स्पष्टी। म स्मासीत् अस्पार्टादित्यादि । अस्पृक्षत् । मृग मामगंने । अम्रा. क्षीत् अमासीत् । अमृात् । मन विसर्ग । थलि वेद अम् । गग. निथ सनष्ठ । स्रष्टा । प्रच्छ जीप्सागाम् । किंगदिः । पृच्छति । पप्रच्छतुः । मष्टा । अप्रासीत् । आदि नुख्योः। आपृच्छते । विदिमच्छि इति तडानी। तत्र संपृच्छते । सममष्ट । सममक्षाताम् । खिद परिघाते मुचांदिः। सिन्दति ॥ अथ दो युटादी ।। गु परीपो. सगें । जुगुपिय जुगुथ । गुता । गुप्यति । अगुपीन् । अगुताम् । अगुपुः ।। इति परस्मैपदिनः ।। गुरी उपमने । मोलमनी नीडने। लजते । जुपी प्रीतिसेवनयोः ओरिजी मगचलनयोः । उहिजते ।। विज इट् ११२॥२॥ विजेरिडादिः प्रत्ययो डिदत् । उदिजिता फूड मान्द। कुटादिः। कुविता ।। अथानिटः ॥ पृद्ध व्यायामे । व्याप्रियते । व्यापता । मृङ्माणत्यागे॥ म्रियतेलुंलिडोश्च ११३१६१॥ लुलिडो शितश्च प्रकृतिभूतान मृदसह नान्यत्र । नित्य स. रार्थम् । म्रियते । ममार । दी किरादी । इ आदरे । आदियते । धृह अवस्थाने । प्रियते । फुड शन्दे । यदिः । कुता ॥ इत्या. त्मनेपदिनः ॥ मिल मङ्गमे । मिलति मिलते ।। अयानिरः ॥ दिश अतिसर्जने । देशदिक्ष्यति। णुद मेरणाभ्रस्न पामजान मनत। भ्रस्जोरोपधयोरमन्यतरस्याम् ६।४।११॥ भ्रस्ने रेफस्पोपधायाश्च स्याने रमागमो वा आर्दधातुके ।गे. पधयोनिवृत्तिः । वम । पमजंतुः । यज । भ्रष्टा मी। क्लिति रमागमं वापित्ता संप्रसारणं पूर्वविप्रतिपेन ॥

१६२ सुगमकीमुद्याः। भृज्ज्यात् । क्षिप प्रेरणे । क्षिपति क्षिपते ॥ अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः ११३१८०॥ परस्मैपदम् । अभिक्षिपति । इत्यादि । कृप विलेखने । भ्वादि- वत् क्सः अम् च वा । तङि तु लिसिचाविति कित्यादम् न । अ. कृष्ट । अकृक्षाताम् । अक्षन्त । हिसितः माफ मुचादयः॥ मुचल मोक्षणे । मुञ्चति मुश्चते । मोक्ता । विट्स लाभे । व्याघ्रभूत्यादिमने सेकः । वेदिता । भाष्यादिमतेनिवः । परिवेत्ता । लुप्ल छेदने। लिप उपदेहे । लिपि सिचीत्य तडि तु वा । अलिपत् अलिपत अलिप्त । एवं पिच क्षरणे । सिंचति ॥ इति तुदादयः ।। इति ७४ अंशाः। अथ रुधादयः ॥ हिसि हिंसायाम् ॥ नान्नलोपः६।१।१२३॥ अमः परस्य नस्य लोपः । हिनस्ति । जिहिंस । तिप्यनस्तेः । अहिनत-अहिनद् । सिपि धातो रुवा पक्षे जश्त्वेन दः । आहिनः अहिनत् । पृची संपर्के । पृणक्ति । पचिंता । अपृणक् । वृजी वर्जने । ओविजी मयचलनयोः । विज इट् । विविजिथ । विजिता। अविना । अविजीत् । तृह हिंसायाम् ।। तृणह इम् ७।३।९२॥ तहः श्नमि कृते इमागमः हलादी पिति । तृणेढि । तृण्ढः । अतृणेट् । उन्दी क्लेदने । उन्दाञ्चकार। मौनत् ॥अथ वेटः ॥ अजू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु । अनक्ति । अनजानि । आनक् ॥ अनेः सिचि७१२१७१ ॥ अझेः सिची नित्यमिट् । आजीत्। कृती वेष्टने । आर्दधातुके तुदादिवत् ॥ अथानिटः ॥ भंजो आमर्दने । मनक्ति । भला । पिष्ल संचूर्णने । पिनष्टि । हेर्दिः । जश्त्वम् । झरो झरीति वा ढलोपः। पिण्ढि पिण्टि । अपिनट् । लैरङ् । अपिपत्। एवं शिष्ल विशेषणे । भुज पालनाभ्यवहारयोः । मुनक्ति ।।

प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः ।
भुजोऽनवने १।३।३६॥
आत्मनेपदम् । ओदनं भुक्ते ।। इति परस्मैपदिनः ।। लिइन्धी
दीप्तौ । इन्धे । इन्त्से । इन्धितासे ।। अथानिटी ।। खिद दैन्ये ।
खिन्ते । विद विचारणे ।। इत्यात्मनेपदिनः ।। अथोमयपदिनोऽनिटमा
युजिर योगे । युनक्ति । युते ॥
प्रोपाभ्यां युजेरयज्ञपात्रेषु १।३।६४ ॥
तडानी॥
स्वराधन्तोपसर्गादिति वाच्यम् ॐ ॥
प्रयुक्त । उपर्युक्ते । उद्युड़े। छिदिर वैधीकरणे । भिदिर
विदारणे । विचिर पृथग्भावे । रिचिर विरेचने । क्षुदिर संपेपणे ॥
इत्युभयपदिनः ॥ इति रुधादयः ॥ तनाद्याः कृशं विना सर्वे सेटः।
वनु याचने । वनुते । अयं चान्द्रमते परस्मैपदी । वनोनि । मनु
अवयोधने । मनुते ॥ इत्यात्मनेपदी ॥ अथोभयपदिनः ॥ पणु
दाने । ये विभाषा । सायात् सन्यात् ॥
जनसनखनां सन्झलोः६।४।४२॥
एपामाकारोन्तादेशो झलादी सनि झलादौ बिति च । असात ।
असनिष्टाक्षणु-क्षिणु हिंसायाम् । यन्तेति न वृद्धिः । अक्षणीत् ।
क्षेणोति । संज्ञापूर्वकत्वात् उप्रत्ययनिमित्त उपधागुणो न भवती-
त्यात्रेयादयः। भवतीत्यन्ये । क्षिणोति । एवमग्रेपितृणु अदने ।
डुकृञ् करणे । मायुक्तः ॥
संपरिभ्यां करोतो भूपणे ६।३।१३७॥
समवाये च ६।१।१३८॥
संपरिपूर्वस्य करोतेः सुटू भूपणे संघे चार्थे। संस्कुर्वन्ति । अलं-
कुन्ति ! संघीभवन्ति वा । संपूर्वस्य क्वचिदभूपणेशप सुट् । संस्कृत
भक्षा इति ज्ञापकात् ॥
उपात् प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु च ॥१॥३९॥

सुगमकीमुद्याः। उपात् कृत्रः सुद् एष्वर्थेषु चात् पूर्वोक्तार्थयोः । उपस्कृता कन्या। भूपिता उपस्कृताः समुदिताः एधोदकस्योपस्कुरुते । उप- स्कृत भुंक्ते । विकृतमित्यर्थः । उपस्कृतं वृते । वाक्याध्याहारे- णेत्यर्थः॥ सुटू कात् पूर्वः६।११३५॥ अडभ्यासव्यवायपि इत्युक्तम् । संचस्कार । संचस्करतुः । कृसमसूत्रे ऋतो भारद्वाजस्यति सूत्रे च ॥ कृमोऽसुट इति वक्तव्यम् * ॥ तेन ससुद्कात्परस्येद् । संचस्करिथ । सुटि गुणोतीति गुणः । ऋतश्च संयोगादेरिति इट् च न । संस्क्रियात् । संस्कृषीष्ट । समस्कृत ॥ गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृतः १।३।३२॥ आत्मनेपदम् । उत्कुरुते । सूचयतीत्यर्थः । श्येनो वार्तकामु- दाकुरुते । हरिमुपकुरुते । परदारान् प्रकुरुते । एधोदकस्योपस्कु- रुते । गाथाः प्रकुरुते । शतं प्रकुरुते ।। अधेःप्रसहने ११३१३३॥ शत्रुमधिकुरुते । क्षमतेभिभवति वा ॥ वेः शब्दकर्मणः १।३।३४॥ स्वरान विकुरुते । नेह । चित्तं विकरोति कामः।। अकर्मकाच १।३।३५॥ वेः कूल इत्येव । छात्रा विकुर्वते ॥ अनुपराभ्यां कृमः ११३॥ ७९ ॥ परस्मैपदम् । अनुक्रोति । पराकरोति ! मावकर्मणोः कर्मकर्तरि चन ॥ इति तनादयः ॥ इति ७५ अंशाः ।

विष्टनाति । अवष्टभ्नोति अवष्टभ्नातिाअवतष्टंभ । स्तंभु इत्यहवा। अस्तमत् । अस्तंभीमान्यष्टमत् । व्यष्टम्भीत् । स्तुनोति स्तुभ्नाति ॥ प्रथमखण्डस्य द्वितीयों मांगः । दुक्रीज् द्रव्यविनिमये । प्रागुक्तः ।। परिव्यवेभ्यः क्रियः १।३।१८॥ अकर्मभिप्रायेप्यात्मनेपदम् । परिक्रीणीते इत्यादि । मन्य विलोडने ॥ हलः नः शानज्झौ ३।११८२॥ हलः परस्य श्नः शानच् आदेशः हौ । मथान । खच भृ. तमादुर्भावे । अतिकान्तोत्पत्तावित्यर्थः । खच्चाति । वान्तोऽय- मित्येके ॥ कित्वपक्षे॥ च्योः शूडनुनासिके च ६।४। १९ ॥ सतुकास्य छस्य वस्य च क्रमात् छा उछ एती स्तः अनुनासिके को झलादौ च विति । खौनाति । चखाव । खविता । शानचः पर- वादूठि कृते हलन्तत्वाभावान्न शान । खौनीहि । कुन्थ कुथ संश्लेषणे संक्लेशे च । पुष पुष्टौ । मुप स्तेये । मृद क्षोदे । अश भोजने । ग्रन्य सन्दर्भ । नलोपः । अध्नाति । श्रन्यिग्रन्थीत्यादिना एत्वाभ्यासलोपावण्यत्र वक्तव्यो * ॥ इति हरदत्तादयः । यतुः । थुः । इदं कित्वं पितामपि इति सुधाकरपक्षे । ग्रेथिय । ग्रंथिता । एवं ग्रंथ विमोचनप्रतिहर्पणसं. दर्भपु । शुभ संचलने ॥ शुभ्नादिषु च ८।४।३९ ॥ णत्वन्न । क्षुम्नाति । स्तम्भु रोधने स्तम्भे च । स्तुन्भु रोधन निष्कोपणे च । स्कन्भु रोधने स्तम्मे च। स्कुन्भु रोधने धारणेच॥ स्तंभुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुभ्यः नुश्च ३।७।८२॥ चात् श्ना । आधाश्चत्वारः सौत्राः परस्मैपादनः । विष्टनोत सुगमकौमुद्याः। वेः स्कनातेनित्यम् ८।३। ७७॥ सस्य पः। विष्कन्नोति विष्कनाति । स्कुनोति । स्कुभाति । अथ हिशः प्राक् प्वादयः। कृ हिंसायाम् ।। प्वादीनां द्वस्वः ७।३।८०॥ शिति । कृणाति । ऋच्छत्यताम् । चकार । चकरतुः । युका कितीत्यस्य कादिनियमेन वाधः । चकरिव । लिटं विनार्द्धधातुके तृवत् । एवमन्येऽपि ऋदन्ताः । गृ शब्दे । जृ क्योहानौ । वृ वरणे भरणे च । शृ हिंसायाम् । अस्य किति लिटि शमामिति हस्वपक्षे यण । अन्यत्र गुणः । शशरतुः शश्रतुः । शशरिख शश्रिव । एवं दृ विदारणे ॥ अथ वेटः ॥ क्लिशू विवाधने । कुप निष्कोपणे ॥ निरः कुपः ७॥२॥४६॥ निरः परस्य कुपो बलाघार्दधातुकस्येड वा । निष्कोपिता निष्फोटा । निरकोपीत् । निररुक्षत् । इप आभीण्ये । तीपेत्यत्र अस्य इपेर्न ग्रहणमिति केचित् । ग्रहणमिति परे । एपिता एटा ॥ अयानिटः॥ बन्ध बन्धने । वनाति । मन्त्स्यति । अमान्त्सीत् । पूर्वप्रासिद्धमिति ममावात्पूर्व झलो झलीति सिज्लोपः । प्रत्य- यलक्षणेन सादिप्रत्ययमाश्रित्य मभावो न प्रत्ययलक्षणं प्रति सिज्. लोपस्पासिद्धत्वात् । अवान्धाम् । अमान्सुः ॥ अथ दो यादी ल्यादी च । ज्या वयोहानौ । अहिज्योति कृते ॥ हला ६।४।२॥ अद्भावयवाद्धलः परं यत् संप्रसारणं तदन्ताङ्गस्य दीर्घः । इति दोघे कृने प्वादीनामिति तस्वः । जिनाति । जज्यो। ज्ञा अवयो- धने । जानाति । अतो दीपों यनीति सिदावपि जादे दीर्यनि- देशसामान हस्तः।। अपनवे ज्ञः १1३1४४॥ आत्मनेपदम् । गतमपजानीते ॥ *अकर्मकाच ११३।१५॥ .

१६७ प्रथमखण्डस्य द्वितीयो भागः । सर्पियो जानीते॥ संप्रतिभ्यामनाध्याने १।३।४६॥ शतं संजानीते । प्रतिजानीते । अनाध्याने इति योगो विभ- ज्यते । तेन अकर्मकाचेत्यस्य प्राप्तिरपि वार्यते । मातरं मातुर्वा संजानाति । शेपत्वविवक्षायां पष्ठी ॥ अनुपसर्गाज्ज्ञः १।३।७६ ॥ आत्मनेपदम् । गां जानीते । विभापोपपदेन प्रतीयमाने । स्वं यज्ञं जानीते जानाति वा । सन्नन्तादात्मनेपदं वक्ष्यते । इति पर- स्मैपदिनः ॥ वृद्ध सम्भक्तौ । वृणीते । वने । ववृषे । ववृट्वे । वरिता वरीता। अवरिष्ट अवरीष्ट । अवृत ॥ इत्यात्मनेपदी ॥ ञ् शब्दे । ग्रह उपादाने । गृह्णाति गृहीते ॥ ग्रहो लिटि दीर्घः ७।२।३७॥ एकाची ग्रहेविहितस्येटो दीर्घः नतु लिटि । ग्रहीता । लिटि । जग्रहिथ । गृह्यात् । ग्रहीपीष्ट हयंतेति न वृद्धिः। अग्रहीत्।अग्रही- थम् ॥ अथ पट् प्वादयः। पञ्च ल्वादयः ॥ पूज्ञ पवने । पुनाति । लून छेदने । कृञ् हिंसायाम् । धूज्ञ कम्पने । आर्द्धधातुके धूनो- तिवत् । एवं स्तृञ् आच्छादने । तथा वृश् वरणे । आशिपि वू- र्यात् । वरिपीट ॥ अथानिटः ॥ पित्र वन्धने । प्रीञ् तर्पणे कान्ती च। श्रीज्ञ पाके । मीञ हिंसायाम् । मीनाति । प्रमीणाति । मी- नातीत्येविषयमात्वम् । ममौ । मिम्यतुः ॥ इत्युमयपदिनः ॥ इति क्यादयः॥ इति ७६ अंशाः। पुल महत्त्वे संघाते च । चुर्वत् । दुल उत्क्षेपे । मुद संसर्गे । चुद संचोदने । पुथ मापायाम् । मुट संचूर्णने। चुट छेदने । तिज निशाने । अतीतिजत् । टकि बन्धने । टङ्केति पाठ्ये इदित्करणं सर्वचुरादेणिचः पाक्षिकत्वे लिङ्गम् । तेन चिन्त्यात् । चिन्त्यते सुगमकौमुद्यौः। इत्यादी नलोपो नेत्याहुः । असंयोगोपधस्य इदितो णिविक- स्पार्थमित्येके । तेपामपि नित्यं णिजिति परे । एवं इरित उदित इंदित प्रकारान्ताश्च पाक्षिकणिच इत्याहुः । पृ पूरणे । पारयत्ति परति । टङ्कयति । टङ्कयात् । पचि विस्तारवचने । मडि भूपायां हर्षे च । खडि-कार्ड भेदने । वटि विभाजने । छदि संचरणे। तसि अलङ्करणे । चिति स्मृत्याम् । पिडि संघाते । कुठि-गुठि वेष्टने । यत्रि संकोचे । यन्त्रति पाठयम् । एवन्तत्रिमत्रिप्रभृती। "लक्ष दर्शनाङ्कनयोः। घट संघाते । नट अवस्यन्दने । पट मापा- याम् । तड आघाते । लड उपसेवायाम् । यत निकारोपस्का. रयोः । बंध संयमने । क्ल क्षेपे । पश बंधने । वस स्नेहच्छेदाप- हरणेषु । चर संशये । पाल रक्षणे । अपीपलत् । क्षल शौच. कर्मणि । अचिक्षलत् । लिप श्लेपणे। अशिश्लिपत् । स्फुट भेदने । अपुस्फुटत् । चर्च अध्ययने । अचचर्चा गर्न शब्दे । घट्ट चलने। वर्ण प्रेरणे वर्णने च । छर्द वमने । गई अभिकांक्षायाम् । वर्ध छेदनपूरणयोः । भक्ष अदने । वह भापार्थे हिंसायां च । मार्ज शब्दे । साम-पान्त्व सामप्रयोगे । बुक्क भपणे । कुट्ट छेदनभर्स- नपूरणेषु । लुण्ठ स्तेये । भूप अलंकरणे । मूल रोहणे । शब्द उपसर्गादाविष्कारे । प्रतिशब्दयति । प्रतिश्रुतमाविष्करोतीत्यर्थः । अनुपसर्गाच । शब्दयति । पूद क्षरणे । चूर्ण संकोचने प्रेरणे च । पूज पूजायाम् । म्लेच्छ अव्यक्ताया वाचि । ऊर्ज वलप्रा. णनयोः । औजिजत् । नन्द्राः संयोगादयः । ईड स्तुतौ । ऐडि. उत् । तुल उन्माने । तोलयति । तुलयति इति तु अतुलोपमाभ्या. मिति निपातनसिद्धातुलाशब्दात् तत्रोतीति णौ । श्रण दाने । प्रायेणायं विपूर्वः । विश्राणयति ।। काण्यादीनां वा उपधाया द्वस्वः ॥ प्यन्ताः कणरणभणश्रणलुपहे ठहायिवाणिलोटिलोपयः चाणि- लोठी चेति द्वादश काण्यादयः । व्यशश्राणत् । व्यशिश्रणत् । जमु हिंसायाम् । उदित्सामर्थ्यात्पाक्षिको णिच् । जासयति प्रयमखण्डस्य द्वितीयो मागः। जसति । एवमपि । घुपिर विशन्दने । वा णिचू । घोपयति घो. पति । अङ्वा । अघुपत् । अघोपीत् । ज्ञा नियोगे । अतिद्वीलीरीयीक्ष्माय्यातां पुग्णौ ७।३।३६॥ ज्ञापयति । आजज्ञपत् । पृ पूरणे । पारयति । वा णिच । परति । नित्यमिति परे । ज्ञप ज्ञानज्ञापनयोः।ज्ञपमित्र ।। मितां द्वस्वः॥ ज्ञपयति । अजिज्ञपत् । तज्ज्ञापयत्याचार्य इति तु ज्ञा नियोग इति मागुक्तस्य । यम च परिवेषणे । चान्मित् । परिवेषणमिह वेष्ट- नम् । नतु भोजना नापि वेष्टना । यमयति चन्द्रम् । परिवेष्टत इत्यर्थः। चह परिकल्कने । चहयति । अचीचहत् । अदन्तस्य तु अचचहत् । चपेत्येके । चपयति । वल प्राणने । वलयति । रह त्यागे । रह- यति । अरीरहत् । अदन्तस्य अररहत् । चित्र चयने ।। चिस्फुरोर्णी ६।११५४॥ आत्वं वा । अहिीति पुर। चपयति । चययति । जित्वसाम- ाणिज् वा । प्रणिचयति भनिचयति । इति ज्ञपादयः । नान्ये मितोऽहेतौ स्वाणिचि ज्ञपादिभ्योऽन्ये मितो नेत्यर्थः । घटादयो- ऽपि मितः । ते च केचित्पूर्वमुक्ताः । घटयति । विघटयति । उद्घाटनमिति तु घट संघाते इत्यस्य घाट घाट घटं घटम् । एवं प्रथव्ययनदञित्वरादयः ॥ जनीजप्तसुरओमन्ताश्च ॥ मितः । जुप् जरयति । नृणातेस्तु जारयति ॥ न कम्यमिचमाम् ॐ ॥ मित्वम् । कामयते इत्यादि । अम रोगे । आमयति । एवं शमादीनाममन्तत्वादिमत्युक्तं मित्त्वन्न । अम भ्वादी तस्मातु- : मण्णौ न कम्यमिचमामिति निषेधः । आमयति । सर्व मित्यारणं णिजन्तेषु वक्ष्यते ।। इति ७७ अंशाः। ८ सुगमकीमुद्याः। पीड अवगाहने ॥ भ्राजभासभापदीपजीवमीलपीडामन्यतरस्याम् ७४४॥३॥ एपामुपधाया हस्वो वा चड्परे णौ । अपीपिडत् । अपिपी डत् । कृत संशब्दने ॥ उपधायाश्च७।१।१०१॥ धातोरुपधाभूतस्य मत इत् रपरत्वम् । कीर्तयति ॥ उत् ७ । ४।७॥ उपधाया ऋवर्णस्य स्थाने ऋद्धा चट्परे णी । इरारामपवाद! अचीकृतत् अचिकीर्तत् । प्रथ प्रख्याने । मित्त्वन्न । प्राथयति ॥ अत्स्मृदृत्वरप्रथम्रदस्तृस्पशाम् ७।४।९५॥ एपामभ्यासस्याकारोन्तादेशश्चइपरे णो इत्त्वापवादः । अपप्र. थत् । पृथ प्रक्षेपे । अपीपृथत् अपपर्थत् । भुवोऽवकल्कने । णिन् । मिश्रणे चिन्तने चेत्यर्थः। कृपू अवकल्कने । कल्पयति । अर्ज प्रतियत्ने द्रव्याने च । अर्ह पूजायाम् ॥ आकुस्मादात्मनेपदिनः।। मान स्तम्भे । मानयते । तर्ज-भर्त्स तर्जने । वञ्च प्रलंभने।गूर उद्य मने । मत्रि गुप्तपरिभापणे । शम आलोचने । शामयते । दशि दंशने । दंशयते । इदिवाणिजभावे । दशति । आकुस्मीयमात्म नेपदं णिच्सन्नियोगेनैव । नलोपे तु भ्यादे रेव ग्रहणम् । गल स्रवणे। भल आभंडने । लल ईप्सायाम् । मद तृप्तियोगे । चित संचेतने । विद चेतनाख्यानविवासेषु । चुट छेदने । कूट आमदानेऽवसादने च । कुत्स अवक्षेपणे॥ कुस्मनाम्नो वा ॥ कुस्मेति प्रातिपदिकं तस्माद्धात्वर्थे णिच् वा । यद्वा कुस्म कुत्सि. तस्मयने । इति धातो णिच् । कुस्मयते । अचुकुस्मत । शेषा आकुस्मीया वक्ष्यन्ते ॥ इत्याकुस्मीयाः ॥ आस्वदः सकर्मकात णिच् । लोक-लोच मापायाम्। लोकयति ग्रंथम् । नाग्लोपिशास्त्र दिताम् । अलुलोकत् । तर्क भापायाम् । वह भापार्थे हिंसाया च। । M प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । १७१ स्वाद आस्वादने। पूरी आप्यायने । धूप मापार्थः । दल विदारणे । पद आस्वादने । असिष्वदत् । शेपा आस्वदीया वक्ष्यन्ते ।। इत्यास्वदीयाः । आधुपादा णिच् । पीञ् तर्पणे । मीणयति । धूमीणोरिति हरदत्तपाठे तु प्राययति । प्रयति प्रयते । भृ माता- वात्मनेपदी उदाहृतः। णिच सन्नियोग एवात्मनेपदमित्याहुः । वृज्ञ आवरणे । धृन् धारणे । जु वयोहानी । अर्च पूजायाम् । आध- पीयपाठेनैव गतार्थत्वात् अर्च अर्ह इत्यादीनां वादिपु पाठोऽसा- म्प्रदायिक इति परे। अई हिंसायाम् । स्वरितेत् । अईयति अर्हति अईते । अर्ह पूजायाम् । ईर क्षेपे। मान पृजायाम् । गर्ह निंदने । मार्ग अन्वेषणे । ग्रंथ संदर्भ बंधने च । हिसि हिसायाम् । छद अपवारणे । सरितेत्।वच परिभापणे। बद संदेशवचने । स्वरितेत् । वादयति वदति वदते । अनुदात्तेदित्येके । ववदे । पह मर्पणे । युज संयमने । मृजू शौचालंकारयोः । वृजी वर्जने । आइपद पद्यर्थ । आसादयति आसीदति । असात्सीत् । तनु श्राद्धीपकरणयोः इत्येके । तानयति । उपसर्गाच देय । वितानयति । तनति । वितनति । शिप असर्वोपयोगे । शेपयति । शेपति । शेष्टा । अशिक्षत् । अयं विपूर्वोऽतिशये । धृप प्रसहने । शेषा आधुपीया वक्ष्यन्ते ॥ इत्यापीयाः । हन्त्यर्थाश्च । नवगण्गामुक्ता अपि हन्त्यर्थाः स्वार्थ णिचं लभन्ते ।। इति ७८ अंशाः। अथादन्ताः ।। कल गती संख्याने च । अचकलत् । स्तन-गद देवशब्दे । छद अपवारणे । मह पूजायाम् । रह त्यागे । रस आ- स्वादनमेहनयोः । रच प्रतियत्ने । वस निवासे । वर ईप्सायामाकर्ण भेदने । वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणपचनंषु । ध्वन शब्दोव्यय वित्तम- मुत्सर्गेव्रिण गात्रविचूर्णने । श्रथ दौर्बल्ये । दण्ड दण्डनिपातने। पार कर्मसमाप्तौ । माज पृथकर्मणि । माम क्रोधे । वास उपसेवायाम् । चित्र चित्रीकरणे । छिद्र कर्णभेदने करणभेदने च । मिश्र संपर्के । शील उपधारणासुख-दुःस तलियायाम्।गुण आमंत्रणे केतने च। .

। १७२ ' सुगमकौमुद्या। कूट परितापे परिदाहे च । कूण संकोचने आमंत्रणे केतने च। मूत्र प्रस्रवणे । रूप रूपक्रियायाम् । सूत्र वेष्टने । सूच पैशुन्ये । स्पृह ईप्सायाम् । केत श्रारणे निमन्त्रणे च स्तेन चौर्ये । गवेप मार्गणे । समाज प्रीतिदर्शनसेक्नेषु । कुमार क्रीडायाम् । सङ्केत आमन्त्रणे । निवास आच्छादने । मल धारणालल ईप्सायाम। विडम्ब अनुकर- णतिरस्कारयोः । अत्र अदन्तेष्वपठित्वा डम्बेति डवि इति च वान्तेषु वा पठ्यते । स्वन शन्दे । वीज व्यजने । स्फुट विशरणे। रूप विच्छुरणे। मृप सहने । प्रेडोल चापले । आन्दोल दोल दोलायाम् । गोम उपलेपने । छेद द्वैधीकरणे । अवधीर अव- ज्ञायाम । गण संख्याने । गणयति ।। ई च गणः ७१४।९७॥ गणेरभ्यासस्य ई अश चड़परे णौ । अजगणत् । अनी- गणत् । सद्भग्राम युद्धे । अयमनुदात्तेत् अकारमश्लेपात् । सङ्ग्रामयते ! अससइमामत ॥ आगादात्मनेपदिनः ॥ अर्थ याच्यायाम् । अर्थयते । ओः पुयणज्यपरे इत्यत्र पथयोरिति वक्तव्ये वर्गप्रत्याहारजकारग्रहो लिङ्गम् । णिचि अच आदेशो न स्याद् द्वित्वे कर्तव्ये । यत्र द्विरुक्तावभ्यासोत्तरखण्डस्या- घोचमक्रियायां परिनिष्ठिते रूपे वा अवणों लभ्यते तनवायं निषेधः। ज्ञापकस्य सजातीयापेक्षत्वातातेन अचिकीर्त्तत् इति सिद्धम् । प्रकृते अलोपात् पाद थशब्दस्य द्वित्वम् । तत् उत्तरखण्डेऽल्लोपः आ. थत । एवमहान्योनादिधातुष्वपि अग्लोपित्वान्न दीर्घसन्वद्भा- यो । द्वित्वप्रवृत्तिवेलायामवर्णपरत्वसम्पादकादेशस्यानिनोचो णि- निमित्तक आदेशो न स्याद् द्वित्वे कर्तव्ये इति ज्ञाप्यस्वरूपं चद- ताम्मते तु अर्जियत इत्येव इति ७९ अंशाः। वीर विरान्ती । कुह विस्मापन । शूर विमान्ती । स्थल पी. । गृह ग्रहणे । मृग अन्वेषणे । सन संतानक्रियायाम् । गर्व प्रथमखण्डस्य द्वितीयो मागः । १७३ मानेागयते । अदन्तत्वसामर्थ्याण्णिविकल्पगधातोरन्त उदात्ती लिटि आम् च फलम् । एवमन्यत्रापि ॥ इत्यागीगा। अङ्क पदे लक्षणे च । अन्ध दृष्टयुपधाते । उन परिहाणे । यंग विमानने । अघ पापकरणे । लजि प्रकाशने । लंजयत्ति । अदन्तेषु पाटबला- ददन्तत्वे वृद्धिरित्यन्योलनापयति । एवं वटि विमानने इत्यत्रापि। शाकटायनस्तु अदन्तानां सर्वेषां पुकमाह । कथापयति । गणा. पयति । इत्यादि ॥ बहुलमेतन्निदर्शनम् ॥ अदन्तधातुनिदर्शनमित्यर्थः । तेनान्ये पर्णादयोऽपि योध्याः। अन्ये तु दशगणीपाठो बहुलम् । तेनापठिता अपि सौनलौकिक- चदिका बोध्याः । अपरे तु नवगणीपाठो बहुलं तेनापटितेभ्योऽपि कचित्स्वार्थ णिचू । रामो राज्यमचीकरदिति यथा इत्याहुः चुग- दिभ्य एव बहुलं णिनित्यर्थः इत्यन्ये ।। इति चुरादयः । मन्तु अपराधे । मन्तुज् इत्येके । मन्तूयति मन्तूयते । असून् उपतापे । वल्गु पूजामाधुर्ययोः । केला-सेला विलासे । लेला दीप्ती । मिपज चिकित्सायाम् । महीइ पूजायाम् । हणी लजायाम् । अगद नी. रोगत्वे । गद्गद वारस्खलने । उपस प्रमातीमारे। सपर पूजायाम् । आकृतिगणोऽयम् ॥ इति कण्ड्वादयः ॥ लोकमसिद्धाः मुवन्ताः शब्दाः कलकारान्ताः तादृशाः पाठपठिता धातवश्व समाताः। अथ तेभ्यो मावकर्मणोलकारा द्वितीयखण्डे वक्ष्यन्ते ॥ इति ८० अंगा। इति द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः । द्वितीयोऽध्यायः समासः ॥२॥ खण्डः सुगमकौमुद्याः प्रथमः पूर्णतां गतः॥ एतत्पाठेन बालानां व्युत्पत्ति कुरुतादरिः॥ १॥ इति श्रीमद्भद्योजिकृतकीमुद्याः प्रतिविम्वरूपायां मुगमकीमुद्यां प्रथमः खण्डः समाप्तः ॥? ॥

१७४ सुगमकौमुद्या। अथ द्वितीयः खंडः। -- -- श्रीशं नत्वा मध्यखण्डे मावादी लानथो कृतः ॥ कारकाणि समासादीन शेपार्थानभिदध्महे ॥१॥ व्युत्पत्तिः पूर्णकल्पा स्यान्मध्यखण्डान्तपाटिनाम् ॥ ततोऽध्यधिकमिच्छद्भिस्तृतीयः खण्ड ईक्ष्यताम् ॥ २ ॥ अथ द्वितीयरखण्डस्य प्रथमो भागः । तत्र यद्यपि प्राचा क्रमेण णिजन्तादयो योग्यास्तथापि अन वर्पयोगिन एव विषयाः प्रथममुच्यन्त इति कर्तृलान्तप्रकरणानन्तरं भावादिलान्ताना भृया- नुपयोग.। प्रसङ्गश्च ततो बहूपयोगित्वात्कृत'। कारकाणि चेत्यादि- क्रम उक्त अतो भावकर्मणोलडादयः मावकर्मणोरिति तइ सार्वधा- तुके यकू। भावो भावना व्यापारो भावना सेवोत्पादना सैव च क्रिया। सा च धातुत्वेन सकलधातुवाच्या भावार्थकलकारेणान्यते। युष्मदस्मद्भया सामानाधिकरण्याभावात् प्रथमपुरुषः। तिडाच्य- भावनाया असत्वरूपत्वेन द्वित्वाद्यप्रतीतेन द्विवचनादि । किं त्वेकव- चनमेव । तस्यौत्सर्गिकत्वेन संख्यानपेक्षत्वात् । अनभिहिते कर्तरि तृतीया । त्वया मयाऽन्यैश्च भूयते । बभूवे । स्यसिसीयुट् तासिषु इत्यादिना स्यादिपु चिण्वद्भाव इडागमश्च । अयमिट चिण्वद्भावस. नियोगशिष्टत्वाचदमाये नाइहार्धधातुक इत्यधिकृतं सीयुटी विशेष णं नेतरेपामव्यभिचारात् । विण्वदावादाद्धिः।माविता भविता इत्या- दि । अनुपूर्वो भू. सकर्मकस्तस्मात्कर्मणि लकाराः । तिडोक्तत्वा- कर्मणि न द्वितीया । अनुभूयते आनंदश्चैत्रेण त्वया मया च । अनुभूयते । अनुभूयते । त्वमनुभूयसे । अहमनुभृये । अन्वभावि । अन्वभाविपाताम् अन्वभावपाताम् । णिजन्तस्य तु णिलोपः। भाव्यते । भावयाचके । भावयावभूवे । भावयामासे । इह तशब्दस्य पशि इट एत्वे च कृते ह एतीति हत्त्वं न । तासि साहचर्यादस्ते. रपि व्यतिहे इत्यादी सार्वधातुके एति हत्वप्रवृत्तरित्याहुभाषिता। चिण्वदिट आभीयत्वेनासिद्धत्वाणिलोप. पक्षे भावयिता। भाषि- द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । ष्यते भावयिष्यते । भाव्यताम् । अभाव्यत । भाव्येत । भाविषी- ट भावयिपीष्ट । अभावि । अभाविपातां अभावयिपाताम् । भृ- प्यते । बुभूपांच बुभूषिता । बुभूपिण्यते। वोभूष्यते।यड्लुगंतातु। वोभूयते । बोभवांचके । बोभविता बोभाविता । अकृत्साति दीर्घः। स्तूयते विष्णुः । तुष्टुवे । स्ताविता स्तोता। स्ताविष्यते स्तो- प्यते । अस्तावि । अस्ताविपातां अस्तोपाताम् । गुणोर्तीति गुणः । अर्यते । स्मर्यते । सस्मरे । परत्वान्नित्यत्वाच्च गुणे रपरे कृतेजतत्वा. भावेऽप्युपदेशग्रहणाचिण्यदिट् । आरिता अर्ता । स्मारिता स्मा। गुणोनीत्यत्र नित्यग्रहणानुवृत्तेरुक्तत्वान्नेह गुणः । संस्कियते । अ- निदितामिति नलोपः । सस्यते । इदितस्तु नंद्यते । संप्रसारणम् । इज्यते । अयङि कृिति । शय्यते ॥ तनोतेर्यकि ६।४।१४॥ आकारोंतादेशो वा । तायते तन्यते । ये विमापा । जायते जन्यते॥ तपोऽनुपतापे च ३।१।६४ ॥ तपश्लेश्चिण्न स्यात्कर्मकर्तरि अनुपतापे च । अन्वतप्त पापेन । पापं कर्तृ । तेनाभ्याहत इत्यर्थः । कर्मणि लुः । यद्दा पापेन पुंसा का अशोचि । घुमास्थेतीत्वम् । दीयते । धीयते । आदेच इत्य- त्राशितीति कर्मधारयादित्संज्ञकशकारादी निषेधः । एश आदिशि- वाभावात्तस्मिन्नात्वम् । जग्ले । आतो युछ चिण्कृतोः । दायिता दाता । दायिपीष्ट दासीष्ट। अदायि । अदायिपाताम् अदिपाताम । अधायिपाताम् अधिपाताम् । अग्लायिपाताम् अग्लासाताम् । हन्यते । अचिण्णलोरित्युक्तेर्हनस्तो न । हो हंतेरिति कुत्वम् । घानि- ता हता। यानिष्यते हनिष्यते । आशीलिङ् । वधादेशस्यापवाद- श्चिण्वद्भावः। आर्द्धधातुके सीयुटीति विशेपविहितत्वात्। पानिपीष्ट पक्षे वधिपीष्ट । अघानि । अधानिपाताम् अहसाताम् । पक्ष वधादेशः । अवधि । अवधिपाताम् । आघनिष्यत अहनिष्यत ।

१७६ सुगमकौमुद्याः । नच स्थादिपु चिपदित्यतिदेशावधादेशः स्यादिति वाच्यम् । अंगस्येत्यधिकारादांगस्यैवातिदेशात् ।। इति ८१ अंशाः। गृह्यते । चिण्वदिटो न दीर्घत्वम् । प्रकृतस्य क्लादिलक्षणस्येवेटो ग्रहो लिटीत्यनेन दीर्घविधानात् । ग्राहिता ग्रहीता । ग्राहिष्यते ग्रहीष्यते । ग्राहिपीष्ट ग्रहीपीष्ट । अग्राहि । अग्राहिपाताम् अग्रही- पाताम् । दृश्यते । अदर्शि । अशिपानाम् । सिचः कित्त्वादन । अदृक्षाताम् । गिरते डि ध्वमि चतुरधिकं शतम् । तथा हि चिव- दिटो दीर्घो नेत्युक्तम् । अगारिध्वम् । द्वितीये विटि वृतो चेति वा दीर्घः । अगरीध्वम् अगरिध्वम् । एपां त्रयाणां लत्वं दत्वं द्वित्व- प्रयं चेति पंच वैकल्पिकानि । इत्थं पण्णवतिः । लिइसिचोरिति विकल्पादिडभावे उश्चति कित्त्वम् इत्व रपरत्वं हलि चेति दीर्घः । इणः पीध्वमिति नित्यं ढत्वम् । अगीईम् । ढवमानां द्वित्वविकल्पे अष्टो । उक्तपण्णवत्या सह संकलने उक्ता संख्येति । इइ दीर्घ- श्चिण्वदिद् लत्वे ढत्वे द्वित्वत्रिकं तथा । इत्यष्टानां विकल्पेन चतुर्भिरधिकं शतम् ॥ हेतुमण्ण्यंतात्कणि लः यक णिलोपः । शम्यते मोही मुकुंदेन । चिवदिटि मित्त्वात् विष्णमुलोर्दी! - न्यतरस्पाम् प्रकृतो मितां ह्रस्व एव तु न विकल्पितः। ण्यंतापणी हस्वविकल्पासिद्धेः । दीर्घविधौ हि णिचो लोपो न स्थानिवदिति दीर्घः सिद्धयति । हस्वविधौ तु स्थानिवत्वं दुर्वारम् । भाष्ये तु पूर्व- नासिद्ध न स्थानिवदित्यवष्टभ्य दिर्वचनसवर्णानुवारदीर्घजश्चरः प्रत्याख्याताः । णाविति जातिपरो निर्देशः । दीर्घग्रहणं च मास्त्विति तदाशयः । शमिता शामिता शमयिता । शमिष्यते शामिष्यते शमयिष्यते । यडंतापिणन् । शंशम्यते । शंशामिता । । शंशमयिता । यइलुगन्ताण्णिच्यप्येवम् । भाष्यमते यडंताधिण्यदिटि दीर्यों नास्तीति विशेषः । ण्यंतत्वाभावे । श- मुनिना। U द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। नोदात्तोपदेशस्य मांतस्यानाचमेः ७।३।३४॥ उपधाया वृद्धिर्न स्याचिणि णिति कृति च । अशमि । उदा- त्तोपदेशस्येति किम् । अगामि । मान्तस्य किम् । अवादि। अना- चमेः किम् । आचामि ॥ अनाचमिकमिवमीनामिति वक्तव्यम् ॐ ॥ चिणि आयादय इति णिडभावे अकामि ॥ णिणिचोरप्येवम् * ॥ अवामि । वधू हिंसायां हलंतः । जनिवध्योरिति न वृद्धिः। अ- वधि । जाग्रो विचिण्णडि स्वित्युक्तेन गुणः । अजागारि ॥ भंजेश्च चिणि ६।४।३३॥ नलोपो वा । अभाजि अभंजि ।। विभापा चिण्णमुलोः ७।११६९ ॥ लभेर्नुमागमो वा । अलंमि अलाभि । व्यवस्थितविकल्पत्वात् प्रादेनित्यं नुम् । प्रालंभि । द्विकर्मकाणां तु । गोणे कर्माण दुह्यादेः प्रधाने नीहकृष्वहाम् । वुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया । प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां भयंतानां लादयो मताः ॥ गौर्दुह्यते पयः । अजा ग्राम नीयते । हियते । कृष्यते । उद्यते । बोध्यते माणवक धर्मः । माणवको धर्ममिति वा । देवदत्तो ग्रामं गम्यते । अकर्म- काणां कालादिकर्मकाणां कर्मणि भावे च लकार इष्यते । मासो मास वा आस्यते देवदत्तेन । णिजंतातु प्रयोज्ये प्रत्ययः । मास- मास्यते माणवकः ॥ इति भावकर्मप्रक्रिया ॥ इति ८२ अंशाः। यदा साकर्यातिशयं द्योतयितुं कर्तृव्यापारी न विवक्ष्यते तदा कारकांतराण्यपि कर्तृसंज्ञा लभंते स्वव्यापारे स्वतंत्रत्वात् । तेन पूर्व करणत्वादिसत्वेऽपि संप्रति कर्तृत्वात्कर्तरि लकारः। साध्वसि- छिनत्ति । काष्ठानि पचंति । स्थाली पचति । कर्मणस्तु कर्तृत्व- सुगमकौमुद्याः।" विवक्षायां प्राक् सकर्मका अपि प्रायेणाकर्मकाः। तेभ्यो भावे कर्तरि च लकाराः । पच्यते ओदनेन । भिद्यते काष्ठेन । कर्तरि तु ।। कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः३।११८७॥ कर्मस्थया क्रियया तुल्यक्रियः कर्ता कर्मवत् । कार्याविदेशोऽ- यम्।तेन यगात्मनेपदचिणूविण्वदिटः स्युः कषुरभिहितत्वात्प्रथमा। पच्यते ओदनः । भिद्यते काष्ठम् । अपाचि । अमेदि । ननु भाव लकारे कर्तर्दिनीया स्यात् । अस्मादतिदेशादिति चेन्न । लकारवाच्य एव कर्ता कर्मवत् । लिडयाशिष्याडिति द्विलकारकात् ल इत्यनु- वृत्तेः भावे प्रत्यये च कलकारेणानुपस्थितेः अत एव कृत्यक्तख- लाः कर्मकर्तरि न भवंति किंतु भावे एव । पक्तव्यमोदनेन ।मे. त्तव्यं कुसूलेन । ननु पचिभिद्योः कर्मस्या क्रिया विक्लित्तिर्दिधाभवन च । सेवेदानी कर्तृस्था नतु तत्तुल्या । सत्यम् । कर्मत्वकर्तृ- त्वावस्थाभेदोपाधिकं तत्समानाधिकरणक्रियाया भेदमाश्रित्य व्यवहारः । कर्मणेति किम् । करणाधिकरणाभ्यां तुल्यक्रिये पूर्वोक्ते साध्वसिरित्यादौ मा भूत् । किंच । कर्तृस्थक्रियेभ्यो मा भृत् । गच्छति ग्रामः । आरोहति हस्ती । अधिगच्छति शास्त्रार्थः स्मरति श्रद्दधाति च । यत्र कर्मणि क्रियाकृतो विशेपो दृश्यते।यथा पक्केषु तंडुलेषु । यथा वा छिन्नेषु काष्ठेषु । तत्र कर्मस्था क्रिया नेतरत्र । नहि पक्कापक्तंडुलेष्विव गतागतग्रामेपु वैलक्षण्यमुपलभ्यते । करोतिरुत्पादनार्थः । उत्पत्तिश्च कर्मस्था। तेन कारिष्यते घट इत्यादि । यत्नार्थत्वे तु नैतत् सिद्धयेत् । ज्ञानेच्छादिवद्यत्नस्य कर्तृस्थत्वात् । एतेनानुव्यवस्यमानेऽर्थे इति व्याख्यातम् । कर्तृस्थ- स्वेन यगभावाच्छयानि कृते ओलोपे च रूपसिद्धेः ताच्छील्यादा- वयं चानश नत्वात्मनेपदम् इति ॥ सकर्मकाणां प्रतिषेधो वक्तव्यः ।। अन्योन्यं स्पृशतः । अजा ग्रामं नयति ॥ दुहिपच्योबहुलं सकर्मकयोरिति वाच्यम् ॐ ॥

-- द्वितीयखंडस्य प्रथमी भागः। '१७९ न दुहसुनमा यक्चिौ ३।१।८९॥ एपां कर्मकर्तरि यरिणौ न स्तः । दुहेरनेन यक एव निषेधः। चिण तु विकल्पिष्यते । शप् । लुक् । गौः पयो दुग्धे ।। अचः कर्मकर्त्तरि३।११६२॥ अजंतात् च्लेश्चिण्वा कर्मकर्तरि तशब्दे परे । अकारि अकृत ॥ दुहश्च३।१।६३॥ अदोहि । पक्षे क्सः । लुग्वेति पक्षे लुक । अदुग्ध अधुक्षत । उदुंबरः फलं पच्यते । सृजियुज्योः श्यंस्तु अनयोः सकर्मकयो। कर्ता बहुलं कर्मवत् यगपवादश्च श्यन्वाच्य इत्यर्थः॥ सृजेः श्रद्धोपपन्ने कर्त्तय्येवेति वाच्यम् * ।। सृज्यते सनं भक्तः । श्रद्धया निष्पादयतीत्यर्थः। अनि । युज्यते ब्रह्मचारी योगम् ॥ भूपाकर्मकिरादिसनां चान्यत्रात्मनेपदात् ॥ भूपावाचिनां किरादीनां सन्नन्तानां च यकृचिणा चिवदिट च नेति वाच्यमित्यर्थः । अलंकुरुते कन्या। अलमकृत । अवपिरते हस्ती। अवाकीर्ट । गिरते । अगी । आद्रियते । आहत । किरा- दिस्तुदाद्यन्तर्गणः । चिकीर्पते कटः । अचिकीर्पिष्ट । इच्छायाः कर्तृस्थत्वेऽपि करोतिक्रियापेक्षमिह कर्मस्थक्रियत्वम् ।। न रुधः३।१।६४॥ अस्माच्च्लेश्चिण्न । अवारुद्ध गौः । कर्मकरीत्येव । अवारोधि गौॉपेन ॥ तपस्तपःकर्मकस्यैव ३111८८ ॥ कर्ता कर्मवत् । विध्यर्थमिदम् । एक्कारस्तु व्यर्थ एवेति वृत्त्य- नुसारिणः । तप्यते तपस्तापसः । अर्जयतीत्यर्थः । तपोऽनुतापे च इति चिनिपेधात्सित् । अतप्त । तपःकर्मकस्य इति किम् । उत्त पति सुवर्ण सुवर्णकार न दुहस्लुनमा यचिणा । मस्तुते । माना- । ।

। सुगमकीमुद्याः। विष्ट मानोष्टी नमते दण्डः। अनस्त । अन्तर्मावितण्याच नमिः।। यचिणोः प्रतिपेधे हेतुमण्णिविभामुपसंख्या- नम् ॥ कारयते । अचीकरत । उच्छ्रयते दण्डः । उदशिश्रियत । चि. प्वदिटू तु स्यादेव । कारिष्यते । उच्चयिष्यते । ब्रूते कथा । अको- चत । भारद्वाजीयाः पठन्ति ।। णिश्रन्थिग्रन्थिबभात्मनेपदाकर्मकाणामुपसंख्या- नम् ॥ पुच्छमुदस्यति । उत्पुच्छयते गौः । अन्तर्भावितण्यर्थतायाम् । उत्पुच्छयते गाम् । पुनः कर्तृत्वविवक्षायाम् । उत्पुच्छयते गौः । उदपुच्छत । यचिणोः प्रतिपेधाच्छचडी। श्रन्थिनन्थ्योराधृपी. यत्वाणिजभावपक्षे ग्रहणम् । अन्यति ग्रन्थम् । श्रन्थति मेखषणं देवदत्तः । ग्रन्थते ग्रंथः। अग्रंथिष्ट । श्रन्थते । अश्रन्थिष्ट । कैयादि- कयोस्तु अथ्नीते । प्रथ्नीते स्वयमेव । विकुर्वते सैन्धवाः। वल्गंती. त्यर्थः । वेः शब्दकर्मणः अकर्मकाच इति तङ् । अन्तर्भावित- ण्यर्थस्य पुनः प्रेपणत्यागे। विकुर्वते सैन्धवाः। व्यकारिष्ट ! व्यका- रिपाताम् । व्यकारिपत। व्यकृत । व्यपाताम् । व्यकृपत ।। कुपिरजोः प्राचां श्यन परस्मैपदं च ३।११९०॥ अनयोः कर्मकर्तरि न यक् किंतु श्यन् परस्मैपदं च । आत्मनेप. दापवादः । कुष्यति कुष्यते पादः । रज्यति रज्यते वस्त्रम् । यग. विपये तु नास्य प्रवृत्तिः । कोपिपीष्ट । रशीष्ट ।। इति ८३ अंशाः । इति कर्मकर्टप्रकरणम् ।। अथ कृतां शेषः। वसेस्तव्यत्कर्तरि णिच । वसतीति वास्तव्यः । पवेलिमा माषाः पक्तव्याः। मिदेलिमाः सरला भेत्तव्याः। कर्मणि कलिमर् प्रत्ययः। वृत्तिकारस्तु कर्मकर्तरि चायमिप्यते इत्याद तद्भाष्याविरुद्धम्॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। कृत्यचः८।४।२९॥ उपसर्गस्यानिमित्तात्परस्याच उत्तरस्य मत्स्यस्य नस्य णत्वम् प्रयाणीयम् । अचः किम् । प्रमग्नः ॥ निर्विण्णस्योपसंख्यानम् ॥ अचः परत्वाभावान्नकारेण व्यवधानामाप्राप्त वचनम् । परस णत्वम् । पूर्वस्य हुत्वम् । निविण्णः ॥ विभापा ८1४।३०॥ उपसर्गस्थानिमित्तात्परस्य ण्यन्ताद्विहिलो यः कृत्तत्स्य नस्य णो वा । प्रयापणीयम् प्रयापनीयम् । रिहितविगंपणं किम यका व्यवधाने यथा स्यात् । प्रयाप्यमाणं पश्य। णचे डा उपम र्गत्वं न इत्युक्तम् । दुर्यानम् । दुर्यापनम् ॥ हलश्चेजपधात् ८॥४॥३१॥ हलादेरिजुपधात्कृन्नस्याचः परस्य णो वा। प्रकोपणीयम प्रकोप- नीयम् । हलः किम् । पोहणीयम् । इजुपधात् किम् । प्रापणीयम् ।। इजादेः सनुमः ८।४।३२॥ सनुमश्चेद् भवति तर्हि इजादेहलन्ताद्विहितो यः कृत्तत्स्यस्यैव । प्रेट्सणीयम् । इजादेः किम् । मगि समर्पणे । प्रमगनीयम् । नुम- ग्रहणमनुस्वारोपलक्षणम् । अकुप्वाइ इति स्वप्येवम् । तेनेह न । भेन्चनम् । इह तु स्यादेव । मोम्मणम् ।। वा निसनिक्षनिन्दाम् ८।४।३३॥ एपां नस्य णो वा कृति परे । प्रणिमितव्यम् निमितव्यम् ॥ न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपाम् ८1१।३४॥ एभ्यः फनस्य णो न । प्रभानीयम् प्रभवनीयम् । पून एरोह ग्रहणमिप्यते । पूडस्तु प्रयपणीयः सोमः॥ ण्यन्तभादीनामुपसंख्यानम् ॥ प्रमापनीयम्। क्शाना शस्य यो पा इत्युक्तम् । णत्वप्रकरणोपरि . सुरामकौमुद्याः।। तबोध्यम् । यत्वस्यासिद्धत्वेन शकारव्यवधानान्न णत्यमा प्रख्यानी- यम् । कृत्यल्युटो बहुलम् । सान्त्यनेन स्नानीयं चूर्णम् । दीयतेऽस्म दानीयो विप्रः । अचो यत् । चेयम् । जेयम् । अज्ग्रहणं शक्यम- कर्तुम् । योगविभागोऽप्येवम् । तव्यदादिष्येव यतोऽपि सुपठत्वात् ॥ ईद्यति६।४।६५॥ यति पर आत ईत् । गुणः । देयम् ॥ क्षय्यजय्यौ शक्याथै ६।३१९१॥ निपात्येते । अन्यत्र । क्षेयम् । जेयम् ।। क्रय्यस्तदर्थे ३ । १।८२॥ क्रेतारःक्रीणीयुरिति बुद्धया आपणे प्रसारित कय्यम क्रेयमन्यत् । ग्लेयम् ।। तकिशसिचतियतिजनिभ्यो यद्वाच्यः ॥ तक्यम् । शस्यम् । चत्यम् । यत्यम् । जन्यम् । जनेर्यविधिः स्वरार्थः । ण्यतापि रूपसिद्धेः । नच वृद्धिप्रसङ्गः । जनिवध्योश्च इति निषेधात् ॥ हनो वा यद्धश्च वक्तव्यः ॥ वध्यः । पक्षे वक्ष्यमाणो ण्यत् ।घात्यः। पोरदुपधात् । शप्यम् । लभ्यम्॥ नानुवन्धकृतमसारूप्यम् ॥ अतो न ण्यत् । तव्यदादयस्तु स्युरेव ।। आङो यि७।११६५॥ आडः परस्य लमेर्नुम यादी प्रत्यये विवक्षिते । नुमि कृतेऽदुप- धत्वामावात् ण्यदेव । आलम्भ्यो गौः ॥ उपात्प्रशंसायाम् ७।१।६६॥ उपलम्भ्यः साधुः । स्तुतौ किम् । उपलब्धुं शक्य उपलभ्यः ।। शकिसहोश्च ३।१।८८॥

. द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। १८३ शक्यम् । सह्यम् ॥ गदमदचरयमश्चानुपसर्गे ३।१।१०।। गद्यम् । मद्यम् । चर्यम् ॥ चरेराङि चागुरौ ॥ आचर्यों देशः। गन्तव्य इत्यर्थः। अगुरौ किम् । आचार्यों गुरुः । यमेनियमार्थम् । सोपसर्गान्मा भूदिति । प्रयाम्यम् । निपूर्वात्स्या- देव । तेन न तत्र भवेदिनियम्यम् इति वार्तिकमयोगात् । एतेन अनियम्यस्य नायुक्तिः। त्वया नियम्या ननु दिव्यचक्षुपा इत्यादि व्याख्यातम् । नियमे साधुरिति वा ।। अवधपण्यवयोगीपणितव्या निरोधेपु ३।१।१०१॥ वदेनञ्युपपदे वदः सुपि इति यत्क्यपोः प्राप्तयोर्यदेव सोऽपि गोयामवेत्युभयार्थं निपातनम् । अवयं पापम् । गर्यो किम् । अनुयं गुरुनाम । तद्धि न गर्दा वचनान, च । आत्मनाम गुरोर्नाम नामातिकृपणस्य च । श्रेयस्कामो न गृहीयाज्ज्येष्ठापत्यकलत्रयोः॥ । इति स्मृतेः । पण्या गौः। व्यवहर्तव्येत्यर्थः। पाण्यमन्यत् । स्तुत्य. हमित्यर्थः । अनिरोधोऽप्रतिबन्धस्तस्मिन्विपये वृडो यत् । शतेन वर्या कन्या । वृत्याऽन्या । वह्यं करणम् ३।१।१०२॥ वहन्त्यनेनेति वा शकटम् । करणं किम् । वाह्यम् । वोढव्यम् ।। अर्यः स्वामिवैश्ययोः३।१।१०३॥ ऋ गती अस्माद्यत् । ण्यतोऽपवादः । अर्य्यः स्वामी वैश्यो वा। अनयोः किम् । आर्यों ब्राह्मणः । प्राप्तव्य इत्यर्थः ।। उपसर्या काल्याप्रजने ३।१।१०४॥ गर्मग्रहणे प्राप्तकाला चेदित्यर्थः । उपसर्या गौः । गर्माधानार्थ वृपभेणोपगन्तुं योग्येत्यर्थः । प्रजने काल्या इति किम् । उपसार्या काशी । प्राप्तव्येत्यर्थः॥

। सुगमकौमुद्याः। अजय संगतम् ३।१।१०५॥ नपूर्याजीर्यतेः कर्तरि यत्संगतं चैद्विशेष्यम् । न जीर्यतीत्यज- यम् । तेन संगतमार्येण रामाजय कुरु दुतम् । इति भहिः । मृगैरजर्य जरसोपदिष्टमदेहवन्धाय पुनर्ववन्ध । इत्यत्र तु संगतामति विदोप्यमध्याहार्यम् । संगतं किम् । अजरिता कम्बलः । भाषे तु संगतकर्टकेपि ण्यदेव । अजाय संगतेन ॥ वदः सुपि क्यपंच३।१।१०६॥ उत्तरसूत्रादिह भाव इत्यपकृष्यते । बदेभीवे क्यास्याचाघदनु- पसर्गे सुप्युपपदे । ब्रह्मोद्यम् । ब्रह्मवद्यम् । ब्रह्म वेदः तस्य वदनमि- त्यर्थः । कर्मणि प्रत्ययावित्येके । उपसर्गे तु ण्यदेव । अनुवाद्यम् । अपवाद्यम् ॥ भुवो भावे ३।१।१०॥ क्यपू स्यात् । ब्रह्मणो भावो ब्रह्मभूयम् । सुपीत्येव । भव्यम् । अनुपसर्ग इत्येव । प्रभव्यम् ॥ हनस्तच३।१1१०८॥ अनुपसर्ग सुप्युपपदे हन्ते वे क्यपू स्यात्तकारश्चान्तादेशः ब्रह्मणो हननं ब्रह्महत्या । स्त्रीत्वं लोकात् ॥ एतिस्तुशास्वृदृजुपः क्यप३।१।१०९॥ एभ्यः क्यप् । हस्वस्य पिति कृति तुक । इत्यः। स्तुत्यः। शास इदङ्हलोः। शिष्यः । धृ इति वृजो ग्रहणं न वृङः । वृत्यः । वृङस्तु वार्या ऋत्विजः । आइत्यः । जुष्यः । पुनः क्यवुक्तिः परस्यापि पयतो वाधना । अवश्यस्तुत्यः । शंसिदुहिगुहिभ्यो वा इति काशिका । शस्यं शंस्यम् । दुा दोह्यम् । गुह्यं गोह्यम् । मशस्यस्य श्रः । ईडबन्दवृशंसदुहां ण्यतः इति सूत्रव्यवलाच्छेसेः सिद्धम् । इतरयोस्तु मूलं मृग्यम् ॥ आयूर्वादः संज्ञायामुपसंख्यानम् ॥

अर्धर्चादिः । सरत्याकाशे सूर्यः । कर्तरि क्यनिपातनादुत्वम् । द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । १८५ अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणादिपु । बाहुलफात्करणे क्यम् । अनिदि- ताम् इति नलोपः। आज्यम् । ऋदुपधाचाल्लपित्तेः । वृत् वृत्यम् । वृध् वृध्यम् । क्लपित्योस्तु । कल्प्यम् । चय॑म् । तपरकरणं किम् । कृत् कीर्त्यम् । अनित्यण्यन्ताश्चरादय इति णिजभावे ण्यत् । णिजन्तात्तु यदेव ॥ ई च खनः३।१।१११॥ चात्स्यपू । आद्गुणः । खेयम् । इ च इति हस्वः सुपठः ।। भृभोऽसंज्ञायाम् ३।१ । ११२ ॥ भृत्याः कर्मकराः। भर्तव्या इत्यर्थः । क्रियाशब्दोऽयं नतु संज्ञा। समश्च बहुलम् । संभृत्याः संभार्याः । असंज्ञायामेव विकल्पार्थमिदं वार्तिकम् । असंज्ञायां किम् । भार्या नाम क्षत्रियाः । अथ कयं भार्या वधूरिति । इह हि संज्ञायां समज इति क्यपा भाव्यम् । संज्ञा- पर्युदासस्तु पुंसि चरितार्थः। सत्यम् । विभतेःभू इति दीर्घान्तात्या- देवो ण्यत् । क्या तु भरतेरे । तदनुबन्धकग्रहणे इति परिभाषया। मृजेविमापा ३।१।११३ ॥ मृजेः क्यब्वा । पक्षे ण्यत् । मृज्यः । चनोः कुघिण्ण्यतोः ।। निष्ठायामनिट इति वक्तव्यम् ॥ तेनेह न । गर्व्यम् । मृजेवृद्धिः । मार्यः ॥ न्यवादीनां च ७।३।५३ ॥ कुत्वम् । नावश्चैः इत्युप्रत्ययः ॥ राजसूयसूर्यमृपायरुच्यकुष्यकृष्टपच्याव्यथ्याः ३।१।११४॥ एते सप्त क्यवन्ता निपात्यन्ते । राज्ञा सोतव्योऽमिपवद्वारा निष्पादयितव्यः । यद्दा । लतात्मकः सोमो राजा । स सूयते क- ण्डयतेऽत्रेत्यधिकरणे क्यनिपातनादीर्घः । राजस्यः राजसूयम् । .

१८६ सुगमकीमुद्याः। यहा। पू गैरणे । तुदादिः । सुपति । फर्मणि लोक मेरयति । क्यपो रुट्र । मृपोपपदाददेः कर्मणि नित्यं क्या । मृपोद्यम् । विशेष्यनिनोऽयम् । उच्चायसौन्दर्यगुणा मृपोद्याः । रोचते रु. च्यः । गुपेरादेः कुत्वं च संज्ञायाम् । सुवर्णरजतमिन्नं धनं कुप्यम् । गोप्यमन्यत् । कृष्टे स्वयमेव पच्यन्तै कृष्टपच्याः कर्मकर्तरि । शुद्ध तु कर्मणि कृष्टपाक्याः । न व्यथतेऽव्यथ्यः । भिद्योद्धयो नदे ३ । १ । ११५॥ भिदेरुज्झेश्च क्या उज्झेर्धत्वं च । भिनत्ति कूलं भिद्यः । उज्झ. त्युदकमुद्धयः । नदे किम् । भेत्ता। रज्झिता ।। पुप्यसिध्या नक्षत्रे ३।१।११६॥ अधिकरणे क्यनिपात्यते । पुष्यन्त्यस्मिन्नर्थाः पुष्यः । सिध्य. न्यस्मिसिध्यः॥ इति ८४ अंशाः। .. विपूयविनीयजित्या मुन्नकल्कहलिपु ३ । ११११७॥ पृजनीजिभ्यः क्यप् । विपूयो मुञ्जः । रज्ज्वादिकरणाय शो. धीयतव्य इत्यर्थः । विनीयः कल्कः । पिष्ट औषधविशेष इत्यर्थः । पापमिति वा । जित्यो हलिः । बलेन क्रष्टव्य इत्यर्थः । कृष्टसमी- करणार्थ स्थूलकाष्ठम् । अन्यनु । विपव्यम् । विनेयम् । जेयम् ।। प्रत्यपिभ्यां ग्रहेः३।१।११८॥ छन्दसीति वक्तव्यम् ॥ प्रतिगृह्यम् । अपिगृह्यम् । लोके तु । प्रतिग्राहाम् । अपिग्राह्यम्। पदास्वैरिवाशापश्येषु च ३।३। ११९ ॥ अवगृह्यम् । प्रगृह्यं पदम् । अस्वैरी परतन्त्रः । गृह्यकाः शुकाः। पञ्जरादिवन्धनेन परतन्त्रीकृता इत्यर्थः । वाह्यायाम् । ग्रामगृह्या सेना। ग्रामवहिर्मूतेत्यर्थः । स्त्रीलिङ्गनिर्देशात्पुन्नपुंसकयो । पक्षे .

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । १८७ भवः पक्ष्यः । दिगादित्वाद्यत् । याद्यत आर्यगृयः । तत्पक्षा- श्रित इत्यर्थः ।। विभापा कृवृपोः३।१। १२० ॥ क्यम् । कृत्यम् । वृष्यम् । पक्षे महलोमेत् । कार्यम् । वाम॥ युग्यं च परे ३।१ । १२१ ॥ पत्रं वाहनम् । युग्यो गीः । अत्र क्या कुत्वं च निपात्यते ॥ अमावस्यदन्यतरस्याम् ३।१।१२२॥ अमोपपदादसेरधिकरणे ण्यत् । वृद्धी सत्यां पाक्षिको स्विच निपात्यते । अमा सह वसतोऽस्यां चन्द्राविमावास्या अमावस्या । ऋहलोमेत् । चजोः इति कुत्वम् । पाक्यम् ॥ पाणौ सृजेमेद्वाच्यः ॥ मदुपधलक्षणस्य क्यपोऽपवादः । पाणिभ्यां सृज्यते पाणिस- ा रज्जुः॥ समवपूर्वाच ॥ समवसा ॥ नक्कादेः ७।३।५९॥ पादेर्धातोश्वजोः कुत्वं न । गर्यम् । वार्तिककारस्तु चजोः इति सूत्रे निष्टायामनिटः इति परयित्वा न फादेः इत्यादि मत्याचरयौ। तेन अर्जितर्जिप्रभृतीनां न कुत्वं निष्ठायां सेट्त्वात् । चुम्लुचुप्र. भृतीनां तु धादित्वेऽपि कुत्वं स्यादेव । सूरमते तु यद्यपि विपरीत माप्तं तथापि यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् ॥ अजिवृज्योश्च ७।३।६०॥ न कुत्वम् । समाजः। परिवाजः॥ भुजन्युन्जौ पाण्युपतापयोः ७।३।६१ ॥ एतयोरेती निपात्यो । भुज्यतेऽनेनेति भुजः पाणिः । हलश्च । १८८ सुगमकौमुद्याः। इति पञ् ! न्युजन्त्यस्मिनिति न्युजः । उपतापो रोगः । पाण्यु- पतापयोः किम् । भोगः समुद्गः॥ प्रयाजानुयाजौ यज्ञाते७१३१६२॥ एतौ निपात्यौ यज्ञाङ्गे पञ्च प्रयाजाः त्रयोऽनुयाजाः । यज्ञाओं किम् । प्रयागः । अनुयागः ।। बञ्चेर्गतौ७।३।६३ ॥ कुत्वं न । वश्यम् । गतौ किम् । वयं काष्ठम् । कुटिलीकृत- मित्यर्थः ।। ओक उचः के ७१३।६४॥ उगुणकुत्वे निपात्येते के परे । ओक' शकुन्तवृपलौ । इगुप- धलक्षणः कः । पत्रा सिद्रे अन्तोदात्तार्थमिदम् ।। ण्य आवश्यके ७।३।६५॥ कुत्वं न । अवश्यपाच्यम् । लुम्पेदवश्यमः । कृत्ये तुं काममनसो. रपि । समो वा हितततयोर्मासस्य पचि युधनोः। कर्तुकामः । फर्तुमनाः । सहित संहितम् । मास्पचनी मास्पाकः ।। यजयाचरुचप्रवचर्चश्च ७।३।६६ ॥ प्पे कुत्वं न ! याज्यम् । याच्यम् । रोच्यम् । प्रवाच्यं ग्रन्य. विशेषः । सन् अर्घ्यम् । अदुपधत्वेऽप्यत एव ज्ञापकापण्यत् । त्य- जेश्च त्याज्यम् । त्यजिपूज्योश्च इति काशिका । तत्र पूजेहणं त्यं मायानुक्तत्वात् ॥ ण्यत्प्रकरणे त्यजेरुपसंख्यानम् ॥ इति हि भाप्यम् ॥ पचोऽशब्दसंज्ञायाम् ७।३।६७ ॥ वाच्यम् । शब्दाल्यापातु वाक्पम् ॥ प्रयोज्यनियोज्यौ शक्याथै ७।३।६८॥ प्रयोक्तुं शमः प्रयोज्यः । नियोक्तं शक्यो नियोग्यो भृत्यः॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। १८९
भोज्यं भक्ष्ये ७।३।६९॥
भोग्यमन्यत् ।।
ण्यत्प्रकरणे लपिदभिभ्यां चेति वक्तव्यम् ॥
लाप्यम् । दमिर्धातुष्वपठितोऽपि वातिकबलात् स्वीकार्यः ।
दाभ्यः । ओरावश्यके । लाव्यम् । पाव्यम् ।
आसुयुवपिरपित्रपिचमश्च ३ । १ । १२६ ।।
पुष । आसाव्यम् । यु मिश्रणे । याव्यम् । वाप्यम् । राप्यम।
त्राप्यम् । चाप्यम् ॥
आनाय्योऽनित्ये ३।१ । १२७॥
आइपूर्वान्नयतेयंदायादेशश्च निपात्यते । दक्षिणाग्निविशेष
एवेदम् । स हि गार्हपत्यादानीयतेऽनित्यश्च सततमप्रज्वलनात् ।
आनेयोऽन्यः घटादिः । वैश्यकुलादेरानीतो दक्षिणागिश्च ॥
प्रणाय्योऽसंमतौ३।१।१२८॥
संमतिः प्रीतिविषयीभवनं कर्म व्यापारः । तथा भोगेष्वादरोऽपि
संमतिः। प्रणाय्यश्चौरः । प्रीत्यनह इत्यर्थः । प्रणाय्योऽन्तेवासी ।
विरक्त इत्यर्थः । प्रणेयोऽन्यः ॥
पाय्यसांनाय्यनिकाय्यधाय्या मानहविर्निवाससामिधे-
नीपु३।१।१२९॥
मीयतेऽनेन पाय्यं मानम् । ण्यद्धात्वादेः पत्वं च । आतो युक्
इति युक्। सम्यक नीयते होमार्थमग्निं प्रतीति सानाय्यं हविर्विशेषः।
ण्यदायादेशः समो दीर्घश्च निपात्यते । निचीयतेऽस्मिन्धान्यादिक
निकाय्यो निवासः । अधिकरणे ण्यत् आयो धात्वादेः कुत्वं च
निपात्यते । धीयतेऽनया समिदिति धाय्या ऋक् ।।
ऋतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ ३।१।१३० ।।
कुण्डेन पीयतेऽस्मिन्सोमः कुण्डपाय्यः ऋतुः । संचीयतेऽसी
संचाय्यः ॥

सुगमकौमुद्याः । अग्नौ परिचाय्योपचाय्यसमूह्याः३।११३१ ।। अमिधारणार्थ स्थलविशेष एते साधवः । अन्यत्र तु । परिचयम्। उपचेयम् । संवाह्यम् ॥ चित्याग्निचित्ये च ३।१।१३२॥ चीयतेऽसौ वित्योऽग्निः । अग्नेश्चयनमग्निचित्या ॥ पातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च ॐ ॥ खपा गन्तव्यं गमनीयं गम्यम् । इह लाटा वाधा मा भूदिति पुनः कृत्यविधिः । स्यधिकारादूर्भ वासरूपविधिः । कचिन इति ज्ञाप- यति । तेन तल्युट्तुमुन्वलर्थेषु न इति सिद्धम् । अहे कृत्यह- चश्च । स्तोतुमर्हः स्तुत्यः । स्तुतिकर्मस्तोता स्तुतिकर्ता । लिडा बाधा मा भूदिति कृत्यत्वोर्विधिः ॥ भव्यगय प्रवचनीयोपस्थानीयजन्याप्लाव्यापात्या वा ३।१।६८॥ एते कृत्यान्ताः कर्तरि वा निपात्यन्ते । पक्षे तयोरेवेति सक- मकारकर्मणि अकर्मकात्तु भावे ज्ञेयाः। भवतीति भव्यः भव्यमनेन था। गायतीति गेयः सानामयं गेयं सामानेन वा इत्यादि । शकि लिङ् च । वात्कृत्याः । वोढुं शक्यो वोहव्यः । वहनीयो वाह्यः । लिडा वाधा मा भूदिति कृत्योक्तिः । लाघवादनेनैव ज्ञापनसंभवे भैपादिसूने कृत्याश्च इति सुत्युजम् । अर्हे कृत्यतचोग्रहणं च इति कृत्यप्रकरणम् । ण्वुल्तची कर्तरि कृत् इति कर्थे । युवोरनाकौ । कारकः कर्ता। वोढुमों वोदा। कारिका की। गांकुटा इति डित्त्वम्। कुटिता। अभिणदित्युक्तर्न डिवम् । कोटकः। विज इद । विजिता। हनस्तोऽचिण्णलोः । घातकः । आतो युक् । दायकः । नौदात्तो- पदेशस्य इति न वृद्धिः। शमकः । दमकः। अनिदस्तु नियामकः । जनिवध्योश्च । जनकः। वध हिंसायाम् । वधकः । रधिजमोरचि । संघका। जम्भका नेटयालिटि रधेः। रधिता रद्धा। मस्जिनशोः इति नुम् । मला। नंया नशिता। रमेशब्लिटोः। रम्भका रब्धालमेश्च।

द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः। लम्भकः लब्धा । तीपसह । एपिता एटा । सदिता सोहा । दरि- दातेरालोपः। दरिद्रिता । ण्युलिन । दरिद्रायकः । कृत्यल्युटर इत्येव सूत्रमस्तु । यत्र विहितास्ततोऽन्यत्रापि स्युरित्यर्थात । एवं च पहु- लग्रहणं योगविमागेन कृन्मात्रस्यार्थव्यभिचारार्थम् । पादाभ्यां हियते पादहारकः । कर्मणि बुल् ॥ क्रमः कर्तर्यात्मनेपदविपयात्कृत इनिषेधो वाच्यः ॐ ॥ प्रान्ता । कर्तरि इति किम् । प्रक्रमितव्यम् । आत्मनेपद इति किम् । संक्रमिता । अनन्यभावो विपयशब्दः । तेन अनुपसर्गादा इति विकल्पाईस्य न निषेधः । ऋमिता । तदर्हत्वमेव तद्विषय- त्वम् । तेन क्रन्तेत्यपीति केचित् । गमेरिट इत्यत्र परस्मैपदग्रहणं तङानयोरमावं लक्षयति । संजिगमिपिता । एवं न वृद्भयश्चतुर्थ्यः । विवृत्सिता । तङन्ताण्ण्वुल् । अल्लोपस्य स्थानिवत्त्वान्न वृद्धिः । पापचकः । यलुगन्तातु । पापाचकः ॥ इति ८५ अंशाः। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः । नन्दयतीति नन्दनः । जनमर्दयतीति जनार्दनः मधुसूदनः । विशेषेण भीषयतीति विभी- पणः। लवणः । नन्यादिगणे निपातनाण्णत्वम् । ग्राही । स्थायी। मन्त्री । विशयी । वृद्धयभावो निपातनात् । विषयी । इह पत्व- मपि । परिभावी परिभवी । पाक्षिको वृद्धयमावो निपात्यते। पचा- दिराकृतिगणः। शिवशमरिष्टस्य करे, कर्मणि घटो ठच् इति सूत्रयोः करोतेर्घटेश्चाच्मयोगात् । अच्प्रत्यये परे यइलुम्विधानाय । अतः सर्वधातुभ्योञ्च् । केपांचित् पाठस्वनुबन्धासंजनार्थः । केपांचित्य- पञ्चार्थः । केपांचिद्वाधकवाधनार्थः । पचतीति पचः। नदट् चोरट देवट् इत्यादयष्टितः । नदी। चोरी। देवी। दीव्यतेः इगुपध इति का प्राप्त जारभरा । श्वपचा । अनयोः कर्मण्यणू प्राप्तः। न्यइकादिपु पाठाच्दपाकोऽपि । यडोचि च इति लुक न धातुलोपः इति गुणवृद्धिनिषेधः। चेक्रियः । नेन्यः।लोलुवः। पोपुरः । मरीमनः।

-- १९२ । सुगमकौमुद्याः। चरिचलिपतिवदीनां वा द्वित्वमच्याक्चाभ्यासस्येति वक्तव्यम् ॥ आगमस्य दीर्घत्वसामर्थ्यादभ्यासहस्वी हलादिः शेपश्च न । चराचरः । चलाचलः । पतापतः। बदायदः। हन्तेर्धत्वं च । घत्वम- भ्यासस्योत्तरस्य तु अभ्यासाच इति कुत्वम् । घनाघनः । पाटेणिलु. क्चोक्च दीर्घश्चाभ्यासस्य । पाटूपटः । पक्षे चरः । चलः । पतः । पदः । हनः । पाटः । रानेः कृति इति वा मुम् । रात्रिचरो रात्रि- चरः । इगुपधज्ञामीकिरः कः क्षिपः । लिसः। बुधः। कृशः । ज्ञः। मीणातीति प्रियः । किरतीति किरः। वासरूपविधिना ण्वुल्वचारपि । क्षेपकः । क्षेप्ता । आतश्योपसर्ग याद्यधा इति ण्यम्यापवादः । मुग्ला । मजः॥ पाघ्राध्माघेशःशः३।१1१३७॥ पिवतीति पिवः । जिघ्रः । धमः । धयः । धया कन्या । धेट. टित्वात्स्तनधयी इति खशीव डीप्राप्तः । खोन्यन नेष्यते इति हरदत्तः । पश्यतीति पश्यः । नः संज्ञायां न । व्याघ्रादिभिः इति निर्देशात् ॥ अनुपसर्गाल्लिम्पविन्दधारिपारिवेधुदेजिचेतिसात्ति- साहिभ्यश्च ३।१।३३८॥ शः। लिम्पः । विन्द । धारयः । पारयः । वेदयः। उदेजयः। चतयः सातिः सुखार्थः सौनो हेतुमण्यतः । सातयः । वासरूपन्या- पेन विपि सात्परमात्मा । सात्वन्तो भक्ताः। पह मर्पणे । चुरादिः हेतमपण्यन्तो वा । साहयः । अनुपसर्गात् किम् । प्रलिपः। नौ लिम्पेर्वाच्यः ॥ निलिम्पा देवाः । गवादिषु विन्देः संज्ञायाम् । गोविन्दः । अरविन्दः ।। ददातिदधात्योर्विभापा३।११ १३९॥

द्वितीयसण्डस्य प्रथमो मागः । शः। ददः । दधः । पक्षे वक्ष्यमाणो णः । अनुपसर्गादित्येव । मदः । प्रधः॥ ज्वलितिकसन्तेभ्यो णः३।१।१४०॥ इतिशब्दः आयर्थः । ज्वलादिभ्यः कसन्तेभ्यो णः वा पक्षेत- चू । ज्वालः ज्वलः । चालः चलः अनुपसर्गादित्येव । उज्ज्वलः ।। तनोतेरुपसंख्यानम् ॥ इहानुपसर्गादिति विभाषेति च न संवध्यते । अवतनोतीत्य- बतानः॥ श्याव्यधासुसंस्रवतीणवसावहलिहश्लिपश्वसश्च३।१। १४१॥ श्यैड्रमभृतिभ्यो नित्यं णः । श्यैडोवस्यतेश्चादन्तत्वात्सिद्धे पृथग्रहणमुपसर्गकं याधितुम् । अवश्यायः । प्रतिश्यायः । आत् दायः । धायः । व्याधः । स्रु गती। आपूर्वः मंपूर्वश्च । आस्रावः। संसावः अत्यायः। अवसायः। अवहारः । लेहः । हेपः । श्वासः।। दुन्योरनुपसगै ३।१।१४२॥ णः । दुनोतीति दावः । नीसाहचर्यात्सानुबन्धकाइ दुनोतेरेख णः । दवत्तेस्तु पचायच् । दवः । नयतीति नायः । उपसर्ग तु । प्रदवः । प्रणयः॥ विभापा ग्रहः३।१।१४३॥ णो वा पक्षेञ्च । व्यवस्थितविमापेयम् । तेन जलचरे ग्राहः। ज्योतिपि ग्रहः । भक्तेश्च इति काशिका । मवो देवः संसारच माताः पदार्थाः । भाष्यमते तु प्राप्त्यर्यापुरादिण्यन्तादन् । माः गेहे कः३।११४४॥ गेहे कर्तरि ग्रहेः कः । गृह्णाति धान्यादिकमिति गृहम् । ता. स्थ्यागृहा दाराः ॥ शिल्पिनि खुन ३११।१४५॥

क
१९४
सुगमकीमुद्याः।
क्रियाकौशल शिल्पं तदति कर्तरि पुन् । नृतिखनिरञ्जिभ्य
एव । नर्तकः नर्तकी । खनका खनकी ।
असि अकेऽने च र नलोपो वाच्यः ॥
रजकः रजकी । भाष्यमते तु नृतिखनिभ्यामेव प्युन् । रञ्जुस्तु
कुन्शिल्पिसंज्ञयोः इति छुन् । टापू । रजिका । घुयोगे तु । रजकी ।
गस्थकन् ३।१ । १४६॥
गायतेस्थकन् शिल्पिनि कर्तरि । गायकः ॥
ण्युट्र च३।१।११७॥
गायनः । टित्त्वाद्गायनी॥
हश्च व्रीहिकालयोः३।१।१४८॥
हाको हाडश्च ण्युट् ब्रीही काले च कर्तरि । जहात्युदकमिति
हायनो व्रीहिः । जहाति भाषानिति हायनो वर्पम् । जिहीते
प्रामोतीति वा ॥
प्रमृल्वः समभिहारे वुन् ३।१ । १४९ ॥
समभिहारग्रहणेन साधुकारित्वं लक्ष्यते । प्रवकः।सरका लवकः ।
आशिपि च । जीवतात् जीवकः । नन्दतात् नन्दकः । आशीःप्रयो-
तुर्धर्मः आशासितुः। पित्रादेरियमुक्तिः । कर्मण्यण । कुम्भकार ।
आदित्यं पश्यतीत्यादावनभिधानान्न । गङ्गाधरभूधरादौ तु कर्मणः
शेपत्वविवक्षाया पचायच् । एवं च धरतीति धरः। ततो गङ्गाया धर
इति पष्ठीसमास इत्याहुः । परे तु लक्ष्यानुरोधेन पचादिपु विशि.
पाठकल्पनसामर्थ्यात् ' अणो वाधस्तेन गङ्गा धरतीत्येव विग्रह
शीलिकामिभक्ष्याचरिभ्यो णः ॐ ॥
अणोपवादार्थ वार्तिकम्।मासशीला । मांसकामा । मासमक्षा ।
कल्याणाचारा॥
ईशिक्षमिभ्यां च ॥
इत्याहुः॥
J

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। सुखप्रतीक्षा । बहुक्षमा ॥ बावामश्च३।२।२॥ अणू कापवादः । स्वर्गद्वायः । तन्तुवायः । धान्यमायः । आतोऽनुपसर्गे कः। गोदः पाणिनम् ॥ कविधौ सर्वत्र संप्रसारणिभ्यो डः * ॥ ब्रह्म जिनाति ब्रह्मज्यः सर्वत्रग्रहणादात पसर्गे। आः। महः। सुपि स्थः ३।२।४॥ सुपीति योगो विभज्यते । सुप्युपपदे आदन्तात्कः । दाभ्या पिवतीति द्विपः । समस्थः । विषमस्थः। ततस्थः । सुपि ति- टतेः कः । आरम्भसामर्थ्याद् भावे । आखूनामुत्थानमाखूत्थः ॥ प्रष्टोऽग्रगामिनि ८।३।९२ ॥ प्रतिष्ठत इति प्रष्ठो गौः । अग्रतो गच्छतीत्यर्थः । अग्र इति किम् । प्रस्थः॥ अम्बाम्बगोभूमिसव्यापद्वित्रिकुशेकुशइक्वड्डमनिपु- जिपरमवहिदिव्यग्निभ्यः स्थः ८१३१९७ ।। स्थः इति कात्ययान्तस्यानुकरणम् । पष्टयर्थे प्रथमा। एभ्यः स्थस्य सस्य पः। द्विष्ठ.। निष्ठ.। इत ऊर्ध्व कर्मणि सुपीति दयमप्य- नुवर्तते । तत्राकर्मकेषु सुपीत्यस्य संवन्धः॥ तुन्दशोकयोः परिमृजापनुदोः ३।२।५॥ तुन्दशोकयोः कर्मणोरुपपदयोराभ्या कः ।। आलस्यसुखाहरणयोरिति वक्तव्यम् ॥ तुन्द परिमाति तुन्दपरिमृजोऽलसः । शोकापनुदः । सुख- स्याहर्ता । अलसादन्यत्र तुन्दपरिमार्ज एव । यश्च संसारासार- त्योपदेशेन शोकमपनुदति स शोकापनोदः॥ कप्रकरणे मूलविभुजादिभ्य उपसंख्यानम् ॥

सुगमकौमुद्याः। मूलानि विभुजति मूलविभुजो स्य. । आकृतिगणोऽयम् । महीध्रः । कुध्रः। गिलतीति गिलः ॥ प्रे दाज्ञः३।२।६॥ दारूपाजानातेश्च मोपसृष्टात्कर्मण्युपपदे कः । अणोऽपवादः । सर्वपदः । पथिमज्ञः । अनुपसर्ग इत्युक्तेः प्रादन्यस्मिन्सुपि न कः । गोसंप्रदायः॥ समि स्यः३।२।७॥ गोसंख्यः॥ इति ८६ अंशाः। गापोएक् ३।२।८॥ अनुपसृष्टाभ्यामाभ्या टक् कर्मण्युपपदे । सामगः सामगी । उपसर्ग तु सामसङ्गायः ।। पिवतेः सुराशीध्वोरिति वाच्यम् * ॥ सुरापी । शीधुपी । अन्यत्र क्षीरपा ब्राह्मणी । सुरा पाति रक्ष- तीति मुरापा॥ हरतेरनुद्यमनेऽच् ३१२१९॥ अंशहरः । अनुद्यमने किम् भारहारः ॥ शक्तिलागलाड्डशतोमरयटिघटघटीधनुःषु ग्रहेरुप- संख्यामम् ॥ शक्तिग्रहः । लागलग्रहः । सूत्रे च धार्यर्थे । सूत्रग्रहः । यस्तु सूत्र केवलमुपादत्ते नतु धारयति तत्राणेव । सूरग्राहः ।। वयसि च ३।२।१०॥ उद्यमनार्थ सूत्रम् । कवचहरः कुमारः॥ आङि ताच्छील्ये ३।२।११॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । १९७ पुष्पाण्याहरति तच्छीलः पुष्पाहरः । ताच्छील्ये किम् । भाराहारः॥ अर्हः ३।२।१२॥ अर्हतेरच् कर्मण्युपपदेणोऽपवादः । पृजाऱ्या ब्राह्मणी ॥ स्तम्बकर्णयो रमिजपोः३।२।१३॥ हस्तिसूचकयोरिति वक्तव्यम् ॥ स्तम्बे रमते स्तम्बेरमो हस्ती । तत्पुरुपे कृति इति हलदन्तात् इति वा डेरलुक् । कर्णेजपः सूचकः ॥ शमिधातोः संज्ञायाम् ३।२।१४॥ शम्भवः । शम्बदः । पुनर्धातुग्रहणं बाधकविपयेऽपि प्रवृत्त्य- र्थम् । जो हेत्वादिषु टो माभृत् । शङ्करा नाम परिव्राजिका तच्छीला ।। अधिकरणे शेतेः ३।२।१५॥ खे शेते खशयः॥ पादिपूपसंख्यानम् ॥ पार्श्वभ्या शेते पार्श्वशयः । पृष्ठशयः। उदरेण शेते उदरशयः । उत्तानादिषु कर्तृषु । उत्तानः शेते उत्तानशयः। अवमूर्धशयः । अवनतो मूर्धा यस्य सोऽवमूधी । अधोमुखः शेत इत्यर्थः ।। गिरी डश्छन्दसि ॥ गिरी शेते गिरिशः। कथं तर्हि, गिरिगमुपचचार प्रत्यहं सा सुकेशी इति । गिरिरस्यास्तीति विग्रहे लोमादित्वाच्छः ॥ चरेष्टः३।२।१६॥ अधिकरण उपपदे । कुरुचरः उरुचरी॥ भिक्षासेनादायेषु च ३।२।१७।। भिक्षा चरतीति मिक्षाचरः । मेनाचः । जादायेति ल्यबन्तम् ।

-- १९८ । सुगमकीमुद्याः। आदायचरः । कथम्, प्रेक्ष्य स्थिता सहचरीम् इति । पचादिषु चर- डिति पाठात् ॥ पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्तेः३।२।१८॥ पुरःसरः । अग्रतःसरः । अग्रमग्रेणाग्रे वा सरतीत्यग्रेसरः । सुत्रेय इत्यदन्तत्वमपि निपात्यते । कथं तर्हि, यूयं तदग्रसरगर्वित- कृष्णसारम् इति । वाहुलकादिति हरदत्तः।। पूर्व कर्तरि ३।२।१९॥ कर्तृवाचिनि पूर्वशब्द उपपदे सर्तेष्टः । पूर्वः सरतीति पूर्वसरः । कर्तरि किम् । पूर्व देशं सरतीति पूर्वसारः॥ कृभो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु ३।२।२०॥ एपु द्योत्येषु करोतेष्टः । अतः कृकमि इति सः। यशस्करी विद्या । श्राद्धकरः । वचनकरः ।। दिवाविभानिशाप्रभाभास्करान्तानन्तादिबहुनान्दी- किंलिपिलिविवलिभक्तिकर्तृचित्रक्षेत्रसंख्याजङ्घाबाहहर्य त्तदनुररुःषु३।२।२१॥ एपु कृजष्टः अहेत्वादावपि । दिवाकरः। विभाकरः । निशाकरः। क्स्कादित्वात्सः । भास्करः । वहुकरः । वहुशब्दस्य वैपुल्यार्थ संख्यापेक्षया पृथग्ग्रहणम् । लिपि-लिविशब्दौ पर्यायौ । संख्या- या एककरः । द्विकरः । कस्कादित्वादहस्करः। नित्यं समासेऽनुत्त- रपदस्थस्य इति पत्वम् । धनुष्करः। अरुष्फरः ॥ किंयत्तबहुषु कृमोऽविधानम् ॥ इति वार्तिकम् । किरा । यत्करा । तत्करा । हेत्वादी द वाधि- त्वा परत्वादन् । पुयोगे डीप् । किंकरी ॥ कर्मणि भृतौ ३।२।२२॥ कर्मशब्द उपपदे करोतेष्टः भृती । कर्मक्रो भृतकः । कर्मः कारोन्यः॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः । न शब्दश्लोककलहगाथावरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु३।२।२३॥ एषु कृअष्टो न । हेत्वादिषु प्राप्तः प्रतिपिध्यते । शब्दकार इत्यादि। स्तम्बशकृतोरिन् ३।२।२४॥ व्रीहिवत्सयोरिति वक्तव्यम् ॥ स्तम्बकरितीहिः । शकृत्करिवत्सः । व्रीहिवत्सयौ किम् । स्तम्वकारः । शकृत्कारः॥ हरतेईतिनाथयोः पशौ ३।२।२६ ॥ दृतिनाथयोरुपपदयोहज इन पशी कर्तरि । दृति हरतीति इंति. हारेः । नार्थ नासारज्जूं हरतीति नाथहरिः । पशी किम् । दृति. हारः । नाथहारः॥ फलेगहिरात्मम्भरिश्च ३।२।२६॥ फलानि गृह्णाति फलेग्रहिः । उपपदस्य एदन्तत्वं ग्रहेरिन्प्रत्य- पश्च निपात्यते । आत्मानं बिभर्तीति आत्मभरिः । आत्मनो मुमा- गमः। भृञ इन् । चाकुक्षिमरिः । चान्द्रास्तु आत्मोदरकुक्षिषिति पेठु. ) ज्योत्स्रारम्भमुदरंभरयश्चकोराः इति मुरारिः॥ एजेः खश ३।२।२८॥ ण्यन्तादेजेः खर्॥ अरुपिदजन्तस्य मुम् ६।३।६७ ॥ अरुपी द्विपतः अजन्तस्य च मुमागमः खिदन्त उत्तरपदे न त्वव्ययस्य । शित्त्वाच्छवादिः । जनमेजयतीति जनमेजयः ।। वातशुनीतिलशर्धेष्वजघेट्तुदजातिभ्यः खश उप- संख्यानम् ॥ पातमजा मृगाः॥ खित्यनव्ययस्य ६।३।६६॥

२०० सुगमकीमुद्याः। खिदन्ते परे पूर्वपदस्य तस्वः । ततो मुम् । शुनिधयः । तिलतुदंः। शधजहा माषाः। शोऽपानशब्दस्तं जहातीति विग्रहः । जहातिर- न्तर्भावितण्यर्थः ॥ नासिकास्तनयोधेिटोः३।२।२९॥ अत्र वार्तिकम् ॥ स्तने धेटो नासिकायां धमाश्चेति वाच्यम् ॥ स्तनं धयतीति स्तनधयः। धेष्टित्त्वात्स्तनंधयी नासिकंधमः । नासिकंधयः॥ नाडीमुष्टयोश्च ३।२।३०॥ एतयोरुपपदयोः कर्मणोधेिटीः खशू । यथासंख्यं नेष्यते । नाडिंधमः नाडिंधयः । मुष्टिंधमः मुष्टिंधयः ।। घटीखारीखरीपूपसंख्यानम् ॥ घाटधमः घटिंधय इत्यादि । खारी परिमाणविशेषः । खरी गर्दभी॥ उदिकूले रुजिवहोः३।२।३१ ॥ उत्पूर्वाभ्यां रुजिवहिभ्यां कूले कर्मण्युपपदे खश । कूलमुदुज- तीति कूलमुगुजः । कूलमुद्रहः ॥ वहाभ्रे लिहः ३।२।३२॥ वहः स्कन्धस्तं लेढीति वहलिहो गीः । अदादित्वाच्छपो लुक् । खशो डिवान्न गुणः । अभ्रंलिहो वायुः॥ परिमाणे पचः३।२१३३॥ प्रस्थंपचा स्थाली । खारीपचा कटाहः ॥ मितनखे च ३।२।३४॥ मितंपचा ब्राह्मणी । नवपचा यवागूः । पचिरत्र तापवाची ।। विध्वरुपोस्तुदः ३१२॥३५॥ विधुतुदः । मुमि कृते संयोगान्तस्य लोपः । अरुंतुदः ॥

20746 द्वितीयसंडस्य प्रथमो मागः । असूर्यललाटयोईशितपोः ३।२।३६॥ अस्यमित्यसमर्थनमासः । शिना नः संबंधात् । सर्य न प. श्यन्तीत्यसूर्यपक्ष्या राजदाराः । ललाटंतपः सूर्यः॥ उग्रंपश्येरंमदपाणिधमाश्च ३१२।३७॥ एते निपात्यन्ते । उग्रमिति क्रियाविशेषणं तस्मिभुपपदे : खश् । उग्रं पश्यतीत्युपश्यः । इरोदकं तेन मायति दीप्यतेशी- धनत्वादिति इरम्मदो मेघज्योतिः।इद निपातनात् श्यन्न । पाणयो ध्मायतेऽस्मिन्निति पाणिधमोऽध्या । अन्धकाराघात इत्यर्थः । तर हि सर्पाद्यपनोदनाय पाणयः शन्धन्ते ॥ प्रियवशे वदः खच ३।२।३८॥ प्रियंवदः । वशंवदः ॥ गमेः सुपि वाच्यः ॐ ॥ असंज्ञार्थमिदम् । मितंगमो हस्ती ॥ विहायसो विह इति वाच्यम् । खच्च डिदा वाच्यः॥ विहंगमः विहंगः । मुजंगमः भुजंगः ॥ द्विपत्परयोस्तापेः३।२।३९ ॥ सन् ॥ खचि हस्वः६।१।९।। खचूपरे णी उपधाया वस्वः । विपन्तं परं वा तापयतीति दिर्ष- तपः। परंतपः। घटघटीग्रहणालिङ्गविशिष्टपरिमापानित्या। तेनेह न । द्विपती तापयतीति द्विपतीतापः ।। इति ८७ मंशाः। वाचि यमो व्रते ३१२।४०॥ वाक्शन्द उपपदे यमेः खन् व्रते गम्ये ।। वाचंयमपुरंदरो च ६।३।६९॥

२०२ सुगमकौमुद्या।। वाक्पुरोरमन्तत्वं निपात्यते । वाचंयमो मौनव्रती । व्रते किम् । अशक्त्यादिना वाचं यच्छतीति वाग्यामः ॥ पूःसर्वयोर्दारिसहोः३।२।४१॥ पुरं दारयतीति पुरंदरः । सर्वसहः । सहिग्रहणमसंज्ञार्थम् । भगे च दारेः इति काशिका । बाहुलकेन लब्धमिदमित्याहु! भगं दारयतीति भगंदरः॥ सर्वकूलाभ्रकरीपेषु कपः३।२।४२ ॥ सर्वकपः खलः । कूलंकपा नदी । अभ्रंकपो वायुः । करीपंकपा वात्या। - मेघर्तिभयेषु कृतः ३।२।४३॥ मेघंकरः । ऋतिकरः । भयंकरः । भयशब्देन तदन्तविधिः अभयंकरः। क्षेमप्रियमद्रेऽण् च ३।२।४४॥ एषु कृतोऽण् चात् खच् । क्षेमकरः क्षेमकारः । प्रियंकरः मिय- कारः। मद्रंकरः मद्रकारः । वेति वाच्येऽणग्रहणं हेत्वादि पुटो माभू- दिति । कथं तर्हि, अल्पारम्भा क्षेमकरा” इति । कर्मणः शेषत्व- विवक्षायां पचाद्यन् ।। आशिते भुवः करणभावयोः ३।२।१५॥ आशितशब्द उपपदे भवतेः खन् । आशितो भवत्यनेनाशितं- भव ओटनः । आशितस्य भवनमाशितंभवः ॥ संज्ञायां भृतृवृजिधारिसहितपिदमः३।२।१६॥ विश्व विमतीति विश्वभरः विश्वभरा । रथंतरं साम । इह रथेन तरतीति व्युत्पत्तिमात्रं न त्ववयवार्थानुगमः । पतिपरा कन्या। शत्रुजयो हस्ती । युगंधरः पर्वतः । शत्रुतपः। शत्रुसहः । अरिंदमः। दामः शमनायां तेन सकर्मक इत्युक्तम् । मतांतरे तु अन्तर्भा- वितपयर्थोऽत्र दमिः॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २०३ गमश्च३।२।४७॥ सुतंगमः॥ अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु ङः३।२।४८॥ संज्ञायामिति निवृत्तम् । एषु गमेर्डः । डित्त्वसामर्थ्याभ- स्यापि टेलोपः। अन्तं गच्छतीत्यन्तग इत्यादि । सर्वत्र पन्नयोरुपसंख्यानम् * ॥ सर्वत्रगः । पन्नं पतितं गच्छतीति पन्नगः । पन्नमिति पद्यतेः तान्तं कियाविशेपणम् ॥ उरसो लोपश्च * ॥ उरसा गच्छतीत्युरगः ॥ सुदुरोरधिकरणे ॥ सुखेन गच्छत्यत्र सुगः दुर्गः ॥ अन्यत्रापि दृश्यत इति वक्तव्यम् ॥ ग्रामगः॥ डे च विहायसो विहादेशो वक्तव्यः ॥ विहगः॥ आशिपि हनः३।२।४९ ॥ शष्टं वध्याच्छत्रुहः । आशिपि किम् ! शरघातः ॥ दारावाहनोऽणन्तस्य च टः संज्ञायाम् ॥ दारुशब्द उपपदे आइपूर्वाद्धन्तेरण्टकारध्यान्तादेशो वक्तव्य इत्यर्थः । दार्वाघाटः॥ चारी वा * ॥ चार्वाधाटः चार्याघातः॥ कर्मणि समि च ॥ है - ~ २०४ सुगमकीमुद्याः। कर्मण्युपपदे संपूर्वाद्धन्तेरुक्तं वेत्यर्थः । वर्णान्सहतीति वर्णसं- घाटः। पदसंघाटः । वर्णसंघातः । पदसंघातः॥ अपेक्लेशतमसोः३।२।५०॥ अपपूर्वाद्धन्तेर्डः । अनाशीरर्थमिदम् । क्लेशापहः पुत्रः । तमोपहः सूर्यः॥ कुमारशीर्पयोणिनिः ३१२१५१ ।। कुमारघाती । शिरसः शीर्पभावो निपात्यते । शीर्पघाती ॥ लक्षणे जायापत्योएक् ३१२१५२॥ हन्तेष्टरलक्षणवति कर्तरि । जायानो ना । पतिनी सी ॥ अमनुप्यकर्तृके च ३।२।५३ ।। जायानस्तिलकालकः । पतिघी पाणिरेखा । पित्तनं घृतम् । अमनुष्य इति किम् । आखुधातः शूद्रः । अथ कथं वलभद्रः प्रलम्वनः शत्रुघ्नः कृतघ्न इत्यादि मूलविभुजादित्वात्सिद्धम् । चौर- घाती नगरपातो हस्तीति तु वाहुलकादणि ।। शक्ती हस्तिकवाटयोः३१२१५४॥ हन्तेष्टक् शक्ती द्योत्यायाम् । मनुष्यकर्तृकार्थमिदम् । हस्तिनो ना । कवाटनश्चोरः । कपाटेति पाठान्तरम् ॥ पाणिघताडघौ शिल्पिनि ३१२१५५॥ हन्तेष्टकू टिलोपो घत्वं च निपात्यते । पाणिताडयोरुपपदयोः। पाणियः । ताडघः । शिल्पिनि किम् । पाणिघातः । ताडघातः ।। राजय उपसंस्थानम् ॥ राजानं हंति राजघः॥ आव्यसुभगस्थूलपलितनग्नान्धप्रियेषु व्यर्थेष्वच्ची कृमः करणे स्युन् ३।२।५६॥ एषु व्यर्थेष्वच्च्यन्तेषु कर्मसूपपदेषु कृतः ख्युन् । अनाढय.

विद् । आममत्ति आमात् । सस्यात् । अनन्ने किम् । अन्नादः॥ द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । -२०५ माढयं कुर्वन्त्यनेन आढयंकरणम् । अच्ची किम् । आढयीकुर्व- न्त्यनेन । इह प्रतिषेधसामर्थ्याल्ल्युडपि नेति काशिका माष्यमते तु ल्युटू स्यादेव । अच्चावित्युत्तरार्थम् ।। कर्तरि भुवः खिष्णुच्खुकभी ३।२।५७॥ आढ्यादिपु व्यर्थेष्वव्यन्तेषु भवतेरेती स्तः।अनाढ्य भान्यो भवतीति आढचंभविष्णुः । आढचंभानुकः। स्पृशोऽनुदके किन् । घृतस्पृक् । कर्मणीति निवृत्तम् । मन्त्रेण स्पृशतीति मन्त्रस्पृक् । ऋत्विग्दधृस्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिऋञ्चां च । व्याख्यातम् । त्य- दादिषु दृशोरनालोचने कञ्च । समानान्ययोश्चेति वाच्यम् ॥ सदृक् । सदृशः । अन्यादृक् । अन्यादृशः ॥ क्सोऽपि वाच्यः ॥ ताक्षः । सदृक्षः । अन्यादृक्षः।। सत्सृद्धिपद्रुहदुहयुजविदभिदच्छिदजिनीराजामुपस- गैऽपि किपू३१२१६१॥ एभ्यः किम् उपसर्गे सत्यसति च सुप्युपपदे । शुसत् । उप- निपत् । अण्डसूः। प्रसूः। मित्रविट् । प्रदिट् । मित्रधुन । मधुक् । गोधुक् । प्रधुक् । अश्वयुक् । प्रयुक् । वेदवित् । निविदित्यादि । अग्रग्रामाभ्यां नयतेों वाच्यः ॥ अग्रणीः । ग्रामणीः॥ भजो ण्विः३।२।६२॥ सुप्युपसर्गे चौपपदे मजेणियः । अंशमाकू । प्रभाक् ।। ।” अदोऽनने ३१२१६८॥ व्ये च३१२१६९॥

२०६ सुगमकीमुद्याः। अदेविट् । पूर्वण सिद्धे वचनमणवाधनार्थम् । कव्यात् आममा- सभक्षकः । कथं तर्हि, कव्यादोऽनप आशरः इति । पकमासशब्द उपपदेणू । उपपदस्य ऋव्यादेशः पृपोदरादित्वात् ।। दुहः कन्धश्च३।२१७० ॥ कामदुघा॥ अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ३।२।७५ ॥ उन्दसीति निवृत्तम् । मनिन्धनिव्वनिविच एते प्रत्यया धातोः॥ नेइशि कृति ७।२।८॥ वशादेः कृत इण्न । सुशर्मा। प्रातरित्वा ।। विड्डनोरनुनासिकस्यात् ६।४।४१॥ विजायत इति विजावा । ओण अवावा । विच् । रोद, रेट्, सुगणू॥ विप्रच३।२।७६॥ अयमपि दृश्यते । सत्सद्विप इति त्वस्यैव प्रपञ्चः । उखास्रत् । पर्णध्वत् । वाहभ्रट् ॥ इति ८८ अंशाः। अन्तः८।४।२० ॥ पदान्तस्यानितेर्नस्य णत्वं स्यादुपसर्गस्थानिमित्तात्परश्चेत् । हे प्राण । शास इत् इतीत्वम् । मित्राणि शास्ति मित्रशीः॥ आशासः को उपधाया इत्त्वं वाच्यम् ॥ आशीः । इत्त्वोत्त्वे । गीः। पूः॥ इस्मन्बन्विपु च६।४।९७॥ एषु गदेईस्वः । तनुच्छत् । अनुनासिकस्य कि इति दीर्घः । मोनो धातोः । प्रतान् । प्रशान् । लोः इत्युठू। अक्षयः । ज्वर- वर इत्यूटू । जूः । जुरौ । जुरः । तूः । मूः । उ वृद्धिः । जना- द्वितीयखंढस्य प्रथमो भागः । २०७ नवतीति जनीः । जनावी । जनावः । मूः । मुवी । मुवः । सुमूः । सुम्वा । सुम्वः । राल्लोपः । मूर्छा । मू । मुरौ । मुरः। धुर्वी धूः गमः कौ ६।४।४०॥ अनुनासिकलोपः। अङ्गगत् ॥ गमादीनामिति वक्तव्यम् ॐ ॥ परीतत् । संयत् । सुनत् ॥ ऊङ्च गमादीनामिति वक्तव्यं लोपश्च ॥ अग्रेगूः । अंग्रेभूः॥ स्थः कच३।२१७७॥ चात्विम् । संस्थः। संस्थाः। शमिधातोः इत्यचं बाधितुं सूत्रम् । सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये । उष्णभोजी । शीतभोजी । अजाती किम् । ब्राह्मणानामन्त्रयिता । ताच्छील्ये किम् । उष्णं भुते कदाचित् इह वृत्तिकारणोपसर्गभिन्न एव सुपि णिनिरिति व्याख्याय उत्पतिभ्यामाङि सर्तरुपसंख्यानमिति पठितम् । हरदत्तमाधवादि- भिश्च तदेवानुसृतम् । एतच्च भाष्यविरोधादुपेक्ष्यम् । प्रसिद्धश्चो पसर्गेऽपि णिनिः। स वभूयोपजीविनाम् । अनुयायिवर्गः। पतत्यधी धाम विसार । न वचनीयाः प्रभवो जीविभिः इत्यादी॥ साधुकारिण्युपसंख्यानम् ॥ ब्रह्मणि बदः॥ अताच्छील्यार्थं वार्तिकद्वयम् । साधुदायी । ब्रह्मवादी । कर्त- युपमाने । उपपदार्थः कर्ता प्रत्ययार्थस्य कर्तुरूपमानम् । उपू इव कोशति उष्ट्रकोशी । ध्वाङ्करावी । अताच्छील्याथै जात्यर्थ च सूत्रम् । कर्तरि किम् । अपूपानिव भक्षयति मापान् । उपमाने किम् । उपः क्रोशति । व्रते । स्थण्डिलशायी। वहुलमाभीक्ष्ण्ये । क्षीरपायिण उशीनराः ॥ मनः३।२।८२॥

२०८ सुगमफौमुद्याः। सुपि मन्यतेणिनिः । दर्शनीयमानी ॥ आत्ममाने खश्च ३।२।८३॥ स्वकर्मफे मनन वर्तमानान्मन्यतेः सुपि खशू चाणिनिः। पण्टि. तमात्मानं मन्यते पण्डितंमन्यः । पण्डितमानी। खित्यनव्ययस्या कालिमन्या । अनव्ययस्य किम् । दिवामन्या॥ इच एकाचोऽम्प्रत्ययवञ्च६।३।६८॥ इजन्तादेकाचोम्स च स्वाद्यम्वत्विदन्ते परे । औतोम्सोः। गांमन्यः । वाम्शसोः। स्त्रियंमन्यः स्त्रीमन्यः । न । नरंमन्यः । भुर्वमन्यः । श्रियमात्मानं मन्यते श्रिमन्यं कुलम् । भाष्यका- खचनाच्छीशब्दस्य हस्वो मुममोरभावश्च ॥ भूते ३।२।८४॥ अधिकारोऽयम् । वर्तमाने लट् इति यावत् ॥ करणे यजः३१२१८५॥ करण उपपदे भृतार्थायजेणिनिः कर्तरि । सोमेनेष्टवान्सोमयाजी। अग्निष्टोमयाजी॥ कर्मणि हनः३।२।८६॥ पितृव्यघाती । कर्मणीत्येतत् सहे च इति यावधिक्रियते ।। ब्रह्मणवृनेपु किप३।२।८७॥ एषु कर्मसूपपदेपु हन्तेर्भूत किम् ब्रह्महा।भ्रूणहा। वृत्रहा। कि च इत्येव सिद्ध नियमार्थमिदम् । ब्रह्मादिष्वेव हन्तेरेव भूत एव किवेवेति चतुर्विधोत्र नियम इति काशिका । ब्रह्मादिष्वेव किवे- बेति द्विविधो नियम इति भाष्यम् ॥ सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृभः३।२।८९ ॥ सुकर्मादिषु च कृत्रः किम् । त्रिविधोऽत्र नियम इति काशिका ! सुकृत् । कर्मकृत् । पापकृत् । मन्त्रकृत् । पुण्यकृत् । फिवेवेति नियमात्कर्म कृतवानित्यनाण्न । कृत एवेति नियमान्मन्त्रमधीत- ।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। मान्मन्त्राध्यायः अन न किम् । भृत एपेति नियमान्मन्त्रं करोति करिष्यति वेति विवक्षायां न किम् । स्वादिष्वेवेति नियमाभावाद- भ्यस्मिन्नप्युपपदे फिपू । शास्त्रकृत् । भाष्यकृत् ॥ सोमे सुभः३।२।९०॥ सोमसुत । चतुर्विधोत्र नियम इति काशिका। एवमुत्तरसूत्रेऽपि ॥ अग्नीचेः३।२।९१॥ आग्निचित् ।। कर्मण्यग्याख्यायाम् ३।२।९२॥ फर्मण्युपपदे कर्मण्येव कारके चिनोतेः फिपू अग्याधारस्थलविशे- पस्याख्यायाम् । श्येन इव चितः श्येनचित् ।। कर्मणी निर्विक्रियः३१२१९३॥ कर्मण्युपपदे विपूर्वात् क्रीणारिनिः॥ कुत्सितग्रहणं कर्तव्यम् ॥ सोमविक्रयी । घृतविक्रयी । दृशे क्वनिए ३।२।९४॥ फर्मणि भूत इत्येव । पारं दृष्टवान् पारदश्वा । राजनि युधि कृमः३।२।९५ ॥ कानेप्। युधिरन्त वितण्यर्थः। राजाने योधितवान् राजयुध्या। राजकृत्वा ॥ सहे च ३।२।९६॥ कर्मणीति निवृत्तम् । सहयुध्वा । सहकृत्वा । सप्तम्यां जनेर्डः३।२।९७॥ सरसिजम् । मन्दुरायां जातो मन्दुरजः । डयापोः इति हस्वः।। पञ्चम्यामजातो३।२।९८॥ जातिवादिशब्दवजिते पञ्चम्यन्त उपपदे जनेईः। संस्कारजः । अष्टमः॥

- . २१० ! सुगमकौमुद्याः। उपसर्गे च संज्ञायाम् ३१२।९९॥ प्रजा स्यात्संतती जने ॥ अनौ कर्मणि ३।२।३०० अनुपूर्वाजनेः कर्मण्युपपदे डः । पुमासमनुरुध्य जाता पुमनुजा।। अन्येष्वपि दृश्यते ३१२,१०१॥ अन्येष्वप्युपपदेषु जनेर्ड. । अजः। द्विजः । ब्राह्मणजः । अपि- शब्दः सर्वोपाधिव्यभिचारार्थः । तेन धात्वन्तरादपि कारकान्तरे- ध्वपि कचित् । परितः खाता परिखा। तक्तवतृ निष्टा । निष्ठा । स्नातं मया । स्तुतस्त्वया विष्णुः । विष्णुर्विश्व कृतवान् । निष्ठायामण्यदर्थे ६।४।६०॥ ण्यदर्थों भावकर्मणी ततोऽन्यन निष्ठाया क्षियो दीर्घः ।। क्षियो दीर्घात् ८।२।४६॥ दीर्घात क्षियो निष्ठातस्य नः । क्षीणवान् । भावकर्मणोस्त क्षित. कामो मया। युफ किति । श्रित. श्रितवान् । भृत भृतवान् । क्षुतः ॥ जर्णोवद्भावो वाच्यः ॥ तेन एकाचत्वान्नेट् । अर्गुतः । नुतः । वृतः॥ रदाभ्यां निष्टातो नः पूर्वस्य च दः ८।२।४२॥ रेफदकाराभ्या परस्य निष्ठातस्य नः निष्ठापेक्षया पूर्वस्य धा तोर्दकारस्य च । शमत इत् रपरः णत्वम् । शीर्णः । बाहिरग- त्वेन वृद्धरसिदत्वान्नेह । कृतस्यापत्य कार्तिः । भिन्नः । छिन्नः ।। संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः ८।२।४३॥ निष्ठातस्य नः । द्राण. । स्त्यानः । शानः ॥ लादिभ्यः ८।२।१४॥ एकविंशते नादिभ्यः प्राग्वत् । लूनः । ज्यानहिज्या । जीनः। -- द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २११ दुग्वोर्दीर्घश्च । दु गतौ । दूनः । दुदु उपताप इत्ययं तु न गृह्यते । सानुबन्धकत्वात् । मृदुतया दुतया इति माघः । गूनः । पूजो विनाशे । पूना यवाः । विनष्टा इत्यर्थः । पृतमन्यत् । सिनोते- सकर्मकर्तृकस्य । सिनो ग्रासः । ग्रास इति किम् । सिता पाशेन सूकरी । कर्मकर्तृक इति किम् । सितो ग्रासो देवदत्तेन । ओदितश्च ८।२।४५॥ भुजो भुग्नः । टुओश्वि उच्चूनः । ओहाक प्रहीणः । स्वादय ओदितः इत्युक्तम् । सूनः सूनवान् । दूनः दूनवान् । ओदिन्मध्ये डीड: पाठसामांन्नेट् । उड्डीनः ।। द्रवमूर्तिस्पर्शयोः श्यः ६।११२४ ॥ द्रवस्य मूतौ काठिन्ये स्पर्श चार्थे श्यैडः संप्रसारणं निष्ठायाम्।। श्योऽस्पर्शे ८।२।४७॥ श्यैडो निष्ठातस्य नः स्यादस्पर्शेर्थे । हल इति दीर्घः । शीनं घृतम् । अस्पर्श किम् । शीतं जलम् । द्रवमूर्तिस्पर्शयोः किम् । संश्यानो वृश्चिकः । शीतात्संकुचित इत्यर्थः ।। प्रतेश्च६।११२५॥ प्रतिपूर्वस्य श्यः संप्रसारणं निष्ठायाम् । प्रतिशीनः ।। विभापाऽभ्यवपूर्वस्य ६।१।२६॥ श्यः संप्रसारणं वा । अभिश्यानं अभिशीनं घृतम् । अवश्यानोड वशीनो वृश्चिकः । व्यवस्थितविभापेयम् । तेनेह न । समवश्यानः ॥ इति ८९ अंशाः। अञ्चोऽनपादाने ८१२॥४८॥ अञ्ची निष्ठातस्य नः स्यान्नत्वपादाने ।। यस्य विभापा ७॥२॥१५॥ यस्य क्वचिद्विभापयेड्विहितस्ततो निष्ठाया इण्न । उदितो वा २१२ सुगमकीमुद्याः। इति क्त्वायां वेट्त्वादिह नेट् । समनः । अनपादाने किम् । उद क्तमुदकं कूपात् । नत्वस्यासिद्धत्वात् ब्रश्च इति पत्वे प्राप्त ॥ निष्ठादेशः पत्वस्वरप्रत्ययेविधिषु सिद्धो वाच्यः ॥ वृक्णः । वृषणवान् ॥ • परिस्कन्दः प्राच्यभरतेषु ८।३।७५ ॥ पूर्वेण मूर्धन्ये प्राप्ते तदभावो निपात्यते । परिस्कन्दः । प्राच्यति किम् । परिष्कन्दः परिस्फन्दः । परेश्च इति विकल्पः । स्तन्भे: इति पत्वे प्राप्ते ॥ प्रतिस्तब्धनिस्तब्धो च ८।३ । ११४॥ अत्र पत्वं न॥ दिवोऽविजिगीपायाम् ८।२।१९ ॥ दिवो निष्ठातस्प नः अविजिगीपायाम् । यूनः । विजिगीपायां तु द्यूतम् ॥ निर्वाणोऽवाते ८।२।५०॥ अवात इति च्छेदः । निःपूर्वाद्वातेनिष्ठातस्य नत्वं वातश्चेत्कर्ता न। निर्वाणोऽग्निमुनिर्वा । वाते तु निर्वातो पातः ।। शुपः कः८।२।५१॥ निष्ठातस्य । शुष्कः ॥ पचोकः८२१५२॥ पक्कः॥ क्षायो मः८१२१५३॥ क्षामः॥ स्त्यः प्रपूर्वस्य ६।११२३॥ प्रात्स्त्यः । संप्रसारणं निष्ठायाम् ॥ प्रस्त्योऽन्यतरस्याम् ८॥२॥५४॥ निष्ठातस्य मो वा। प्रस्तीमः । प्रस्तीतः । प्रात् । किम् स्त्यानः।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २१३ अनुपसर्गात्फुल्लशीवकृशोल्लाघाः ८।२।५५॥ त्रिफला पुल्लः । निष्ठातस्य लत्वं निपात्यते । क्तवत्वेकदेश- स्यापीद निपातनमिष्यते । पुल्लवान् । क्षीवादिषु तु क्तमत्यय- स्यैव तलोपः । तस्यासिद्धत्वात्माप्तस्येटोऽभावश्च निपात्यते । क्षीवो मत्तः । कृशस्तनुः । उल्लाघो नीरोगः । अनुपसगाई किम् ।। आदितश्च ७।२।१६॥ आकारतो निष्ठाया इएन । ति च ७।४।८९॥ चरफलोरत उत् तादौ किति । प्रफुल्तः । पक्षीवितः। प्रकृ- शितः। प्रोल्लाधितः । कथं तर्हि, लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम् इति । फुल्ल विकसने । पचायच । सूत्रं तु फुल्तादिनिवृत्त्यर्थम् ॥ उत्फुल्लसंफुल्लयोरुपसंख्यानम् ॐ ॥ नुदविदोन्दवाग्राहीभ्योऽन्यतरस्याम् ८।२।५६॥ एभ्यो निष्ठातस्य नो वा । नुन्नः नुत्तः । विद विचारणे । रोधादिक एव गृह्यते उन्दिना परेण साहचर्यात् । विन्नः वित्तः । वेत्तेस्तु विदितः । विद्यतेर्विन्नः। उन्दी। श्वीदितो निष्ठायाम् ७।२।१४॥ श्वयतेरीदितश्च निष्ठाया इण्न । उन्नः उत्तः । त्राणः जातः । घ्राणः प्रातः । हीणः हीतः ॥ न ध्याख्यापृमूर्छिमदाम् ८।२।१७॥ एभ्यो निष्ठातस्य नत्वं न । ध्यातः । ख्यातः । पूर्तः । रालोपः। मूर्तः । मत्तः ॥ वित्तो भोगप्रत्यययोः८/२१५८॥ विन्दतेनिधान्तस्य निपातोऽयं मोग्ये प्रतीते चार्य । विचं ध- नम् । वित्तः पुरुषः । अनयोः किम् । विन्नः । विमापा गमहन इति कसी वेट्त्वादिह नेट् ॥

सुगमकौमुद्याः। -- -- भित्तं शकलम् ८।२।१९॥ भिन्नमन्यत् ॥ ऋणमाधमण्ये ८।२१६०॥ ऋधातोः क्ते. तकारस्य नत्व निपात्यते आधमर्थ्यव्यवहारे । ऋतमन्यत् ॥ स्फायः स्फी निष्ठायाम् ६।५॥२२॥ स्फीतः॥ इश निष्ठायाम् ७।२।४७॥ निरः कुपो निष्ठाया इट् । यस्य विभाषा इति निषेधे प्राप्त पुनविधिः। निष्कुपितः ॥ वसतिक्षुधोरिट्र ७१२।१२॥ आभ्या क्वानिष्ठयोनित्यमिट् । उपितः । क्षुधितः।। अञ्चेः पूजायाम् ७१२१५३॥ पूजार्थादश्चः क्त्वानिष्ठयोरिट् । अश्चितः । गती त्वक्तः ॥ लुभो विमोहने ७१२१२४॥ लुमः क्वानिप्रयोनित्यमिट् नतु गायें । लुभितः। गाध्ये तु लुब्ध.॥ क्विशः पत्यानिष्ठयोः ७।२।५० ॥ इड्डा । क्लिश उपतापे । नित्य प्रासे । किशु विवाधने । अस्य रत्वाया विकल्पे सिद्धेशपि निष्ठाया निषेधे प्राप्ते विकल्प । क्लि- शितः लिए। पूडश्च७।२।११॥ पृडः क्त्वानिष्ठयोरिडा॥ पूडः क्त्वा च १॥२॥२२॥ पूडः क्त्वा निष्धा च सेट् किन्न । पवितः पूतः । क्त्वाग्रहण- मुत्तरार्थम् । नोपधात् इत्यत्र हि क्त्वव सवध्यते ॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २१५ निष्ठा शीस्विदिमिदिक्ष्विदिधृपः १।२ । १९॥ एभ्यः सेनिष्ठा किन्न । गयितः गयितवान् । अनुबन्ध निर्देशो यङ्लुषिवृत्त्यर्थः । शेश्यितः शेश्यितवान् ।। आदिकर्मणि निष्टा वक्तव्या ॥ आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ३।४।७१ ॥ आदिकर्मणि यः क्तः स फर्तरि चाद्भावकर्मणोः॥ विभापा भावादिकर्मणोः७।२।१७॥ भाव आदिकर्मणि चादितो निष्टाया इड्डा । प्रस्वेदितश्चैत्रः । प्रस्वेदितं तेन । निविदा इति भ्वादिरन गृह्यते । बीहिः साहच. र्यात् । स्विद्यतेस्तु स्विदित इत्येव । जिमिदा-जिविदा दिवादी भ्वादी च । प्रमेदितः प्रमेदितवान् । प्रवेदितः प्रक्ष्वेदितवान् । प्रधर्पितः प्रर्पितवान् । धर्पितं तेन । सेट् किम् ।। प्रस्विन्नः । प्रस्विन्नं तेनेत्यादि। मृपस्तितिक्षायाम् १।२।२० ।। सनिष्ठा किन्न । मर्पितः मर्पितवान् । क्षमायां किम । अपमृ- पितं वाक्यम् । अविस्पष्टमित्यर्थः ॥ उदुपधाद्भावादिकर्मणोरन्यतरस्याम् १।२।२१॥ उदुपधात्परा भावादिकर्मणोः सेनिष्ठा वा किन्न । द्युतितं घोति. तम् । मुदितं मोदितं साधुना । प्रद्युतितः प्रद्योतितः । प्रमुदितः प्रमोदितः साधुः । उदुपधात् किम् । विदितम् । भावेत्यादि किम् । रुचितं कार्पापणम् । सेट् किम् । अष्टम् । शधिकरणेभ्य एवेष्यते नेह । गुध्यतेधितम् ॥ निष्टायां सेटि६।४।५२॥ णेर्लोपः। भावितः भावितवान् । श्वोदितः इति नेट संप्रसारण- म् । शूनः । दीप्तः । गुहू गृहः । वनु वतः । तनु,ततः । पतेः सनि वेदत्वादिडमावे प्राप्ते द्वितीया श्रित इति सूत्रे निपातनादि ।

२१६
सुगमकीमुद्याः।
पतितः । सेसिचि इति वेदत्वात्सिद्ध कृन्तत्यादीनामीदित्त्वेनानि-
त्यत्वज्ञापनादा। तेन धावितमिभराजधिया इत्यादि । यस्य विभाषा
इत्यत्रैकाच इत्येव । दरिद्वितः॥
क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलनम्लिएविरिन्धफाण्टवाटानि म-
न्थमनस्तमासक्ताविस्पष्टस्वरांनायासभृशेषु ७।२।१८॥
शुन्धादीन्यष्टावनिहानि निपात्यन्ते समुदायेन मन्यादिषु वा-
च्येषु । द्रवद्रव्यसंपृक्ताः सक्तवो मन्थः मन्यनदण्डश्च । क्षुब्धी
मन्यश्चेत् । स्वान्तं मनः । ध्वान्तं तमः । लग्नं सक्तम् । निष्ठानत्व-
मपि निपातनात् । म्लिष्टमविस्पष्टम् । विरिब्धः स्वरः । म्लेच्छ रेम
अनयोरुपधाया इत्वमपि निपात्यते । फाण्टमनायाससाध्यः कपा
यविशेषः । माधवस्तु नवनीतभावात्मागवस्थापन्नं द्रव्यं फाण्टमिति
वेदभाष्य आह । वाढं भृशम् । अन्यत्र तु क्षुभितम् । धुन्धो
राजेति त्वागमशास्त्रस्यानित्यत्वात् । स्वनितम् । ध्वनितम् । लगि-
तम् । म्लेच्छितम् । विरोभितम् । फणितम् । वाहितम् ॥
धृपिशसी बयात्ये ७१२।१९॥
एतौ निष्ठायामविनय एवानिटी । धृष्टः । विशस्तः । अन्यत्र
धर्पितः। विशासितः । भावादिकर्मणोस्तु वैयात्ये धृपिर्नास्ति। अत
एव नियमार्थमिदं सूत्रमिति वृत्तिः । धृपेरादित्त्वे फलं चिन्त्य-
मिति हरदत्तः । माधवस्तु भावादिकर्मणोरवैयात्ये विकल्पमाह ।
धृष्टं धर्पितम् । प्रधृष्टः प्रधर्पितः ॥
दृढस्थूलबलयोः७॥२॥२०॥
स्थूले बलवति च निपात्यते । दृह-हि वृद्धौ । तस्येडभावः
तस्य ढत्वं हस्य लोपः इदितो नलोपः। दृहितः । इहितोऽन्यः ।
प्रभो परिवृढः ७॥२॥२१॥
वृह वृहि वृद्धौनिपातनं प्राग्वत् । परिहितः। परिहितोऽन्य।
• कृच्छ्रगहनयोः कपः७।२॥२२॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २१७ कपो निष्ठाया इन एतयोरर्थयोः । कष्टं दुःखं तत्कारणं च । स्या कष्टं कृच्छ्रमाभीलम् । कष्टो मोहः । कष्टं शास्त्रम् । दुरवगा- हमित्यर्थः। कषितमन्यत् ।। घुपिरविशब्दने ७१२।२३॥ धुपिर्निष्ठायामनिट् । घुष्टा रज्जुः । अविशन्दने किम् । घुपितं वाक्यम् । शब्देन प्रकटीकृताभिप्रायमित्यर्थः ॥ अर्दैः संनिविभ्यः ७।२।२४ ।। एतत्पूर्वादनिष्ठाया इण्न । समर्णः । न्यर्णः । व्यर्णः । अर्दि- तोऽन्यः॥ अभेश्चाविदूर्ये ७।२।२५॥ अभ्यर्णम् । नातिदूरमासन्नं वा । अभ्यर्दितमन्यत् ॥ णेरच्ययने वृत्तम् ७।२॥२६॥ ण्यन्तादृत्तेः क्तस्येडभावो णिलुक्चाधीयमानेऽर्थे । वृत्तं छन्द- छात्रेण संपादितम् अधीतमिति यावत् । अन्यत्र तु वर्तिता रज्जु.॥ शृतं पाके ६।११२७॥ श्रातिश्रपयत्योःक्त शृभावो निपात्यते क्षीरहरिपोः पाके । शृ- तं क्षीरम् । स्वयमेव विलिन्नं पकं वेत्यर्थः । क्षीरहविामन्यत्तु । श्राणं अपितम् ॥ चा दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पटच्छन्नज्ञप्ताः ७।२।२७॥ एते णिचि निठान्ता वा निपात्यन्ते । पक्षे, दमितः। शमितः। पूरितः । दासितः । स्पाशितः। छादितः । ज्ञपितः ॥ इति ९० अंशाः । इति तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पाद' । रुप्यमत्वरसंघुपास्वनाम् ७।२।२८॥ एभ्यो निष्ठाया इड्डा । रुपितः रुष्टः । आन्तः अमितः । तूर्णः त्वरितः । अस्यादित्त्वे फलं मंदम् । संघुष्ट, संघुपितः । आस्वान्तः आस्वनितः॥

पी वा निष्ठायाम् । व्यवस्थितविभाषेयम् । तेन स्वाङ्गे नित्यम्।
पीन मुखम् । अन्यत्र । प्यानः पीनः स्वेदः । सोपसर्गस्य न ।
शितः शातः । छितः छातः । व्यवस्थितविभापात्वात् व्रतवि-
पये श्यतेर्नित्यम् । संशितं व्रतम् । सम्यक्संपादितमित्यर्थः। सं.
मप्यानः। आइपूर्वस्यान्धूधसोः स्यादेव । आपीनोन्धुः । आपी
एपामिकारोऽन्तादेशः तादी किति । ईत्वदद्भाक्योरपवादः।
घुसंज्ञक्स्य दा इत्यस्य दद् स्यात्तादी किति । चर्पम् । दत्तः।
२१८
सुगमकीमुद्याः
हर्लोमसु ७।२।२९॥
हपेनिष्ठाया इसा लोमसु विपये । हृष्टं हषितं लोम ॥
विस्मितप्रतिपातयोश्च १ ॥
हृष्टो हपितो मैत्रः । विस्मितः प्रतिहतो वेत्यर्थः । अन्यत्र तु
हपु अलीके । उदित्त्वानिष्ठायां नेट् । हप तुष्टौ । इट् ॥
अपचितश्च ७१२।३०॥
चायतेनिपातोऽयं वा । अपचितः अपचायितः ॥
प्यायःपी६।१।२८॥
नमूधः॥
हस्वः। महन्नः ॥
हादो निष्ठायाम् ६।४।९५॥
द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति ७।४।१०॥
दितः । सितः । मा माइ । मे मितः । स्थितः॥
शाच्छोरन्यतरस्याम् ७।१।११॥
शितो ब्राह्मणः । व्रतविषयकयत्नवानित्यर्थः ।।
दधातहिः ७।४।४२॥
तादी किति । अभिहितम् । निहितम् ।।
दो दरोः ७।४।४६॥
घो: किम् । दातः । तान्तो वायमादेशः । न चैवं विदत्तमित्यादा-

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । २१७ कपो निष्ठाया इण्न एतयोरर्थयोः । कष्टं दुःखं तत्कारणं च । स्या कष्ट कृच्छ्रमाभीलम् । कष्टो मोहः । कष्ट शास्त्रम् । दुरखगा- हमित्यर्थः । कपितमन्यत् ।। घुपिरविशन्दने ७।२।२३॥ घुषिनिष्ठायामनिट् । घुष्टा रज्जुः । अविशब्दने किम् । घुपितं वाक्यम् । शब्देन प्रकटीकृताभिप्रायमित्यर्थः ॥ अर्दैः संनिविभ्यः ७१२।२४ ॥ एतत्पूर्वादनिष्ठाया इण्न । समर्णः । न्यणः । व्यर्णः । अदि- तोऽन्यः॥ अभेश्वाविदूर्ये ७।२।२५॥ अभ्यर्णम् । नातिदूरमासन्नं वा । अभ्यर्दितमन्यत् ॥ णेरध्ययने वृत्तम् ७।२।२६॥ ण्यन्ताद्वृत्तेः क्तस्येडभावो णिलुक्वाधीयमानेऽर्थे । वृत्तं छन्द- छात्रेण संपादितम्।अधीतमिति यावत् । अन्यत्र तु वर्तिता रज्जुः॥ शृतं पाके६।११२७॥ श्रातिश्रपयत्योः क्ते शृभावो निपात्यते क्षीरह विपोः पाके । शृ. तं क्षीरम् । स्वयमेव विक्लिन्नं पकं वेत्यर्थः । क्षीरहविया॑मन्यत्तु । श्राणं श्रपितम् ॥ वा दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्ताः ७।२।२७॥ एते णिचि निष्ठान्ता वा निपात्यन्ते । पक्षे, दमितः । शमितः । पूरितः । दासितः । स्पाशितः । छादितः । ज्ञपितः ॥ इति ९० अंशाः । इति तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः । रुष्यमत्वरसंघुपास्वनाम् ७।२।२८॥ एभ्यो निष्ठाया इड्दा । रुपितः रुष्टः । आन्तः अमितः । तूर्णः त्वरितः । अस्यादित्त्वे फलं मंदम् । संघुष्टः संघुपितः । आस्वान्तः आस्वनितः।।

२१८ सुगमकौमुद्याः। हपेर्लोमसु ७।२।२९॥ हपेनिष्ठाया इड्वा लोमसु विषये । हृष्टं हपितं लोम ॥ विस्मितप्रतिपातयोश्च ॥ हृष्टो हपितो मैत्रः । विस्मितः प्रतिहतो वेत्यर्थः । अन्यत्र तु । हा अलीके । उदित्वान्निष्ठाया नेट् । हृप तुष्टौ । इद् ॥ अपचितश्च ७१२१३०॥ चायतेनिपातोऽयं वा । अपचित. अपचायितः ।। प्यायःपी६।१।२८॥ पी वा निष्ठायाम् । व्यवस्थितविभाषेयम् । तेन स्वाङ्गे नित्यम् । पीनं मुखम् । अन्यत्र । प्यानः पीनः स्वेदः । सोपसर्गस्य न । मप्यानः । आइपूर्वस्यान्धूधसोः स्यादेव । आपीनोन्धुः । आपी. नमूधः॥ हादो निष्ठायाम् ६।४।९५॥ हस्वः । महन्नः ॥ यतिस्यतिमास्थामित्ति किति ७१४।४०॥ एपामिकारोऽन्तादेशः तादौ किति । ईत्वदद्भावयोरपवादः । दितः । सितः । मा माइ । मेड् मितः । स्थितः ॥ शाच्छोरन्यतरस्याम् ७।४।११ ॥ शितः शातः । छितः छातः । व्यवस्थितविमापात्वात् व्रतवि- पये श्यतेर्नित्यम् । सशितं व्रतम् । सम्यक्संपादितमित्यर्थः । सं- शितो ब्राह्मणः । बतविषयकयत्नवानित्यर्थः॥ दधातेहिः ७१४॥४२॥ तादी किति ! अभिहितम् । निहितम् ॥ दो दद्दोः७।४।१६॥ घुसंज्ञकस्य दा इत्यस्य दद् स्यात्तादौ किति । चतम् । दत्तः । घोः किम् । दातः । तान्तो वायमादेशः । न चैवं विदत्तमित्यादा- द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २१९ बुपसर्गस्य दस्ति इति दीर्घापत्तिः । तकारादी तदिधानात् दान्तो वा धान्तो वा । न च दान्तत्वे निष्ठानत्वं धान्तत्वे झपस्तथोः इति धत्वं शङ्कयम् । संनिपातपरिभाषाविरोधात् ॥ अच उपसर्गात्तः७181४७॥ अजन्तादुपसर्गात्परस्य दा इत्यस्य घोरचस्तः तादी किति । चर्वम् । प्रत्तः । अवत्तः । अवदत्तं विदत्तं च प्रदत्तं चादिकर्मणि । सुदत्तमनुदत्तं च निदत्तमिति चेष्यते ॥ चशब्दाद्यथाप्राप्तम् ॥ दस्ति ६।३।१२४॥ इगन्तोपसर्गस्य दीर्घः दादेशो यस्तकारस्तदादावुत्तरपदे। खरि च इति चळमाश्रयात्सिद्धम् । नीत्तम् । सूत्तम् । धुमास्था इतीत्त्वम् । धेट् । धीतम् । गीतम् । पीतम् । जनसन इत्यात्वम् । जातम् । सातम् । खातम् ॥ अदो जग्धिपप्ति किति २।४।३६॥ ल्यबिति लुप्तसप्तमीकम् । अदो जन्धिः स्याल्लयपि तादौ किति च । इकार उच्चारणार्थः । ध्वत्वम् । झरो झरि । जग्धः । आदि- कर्मणि क्तः कर्तरि च । प्रकृतः कटं सः । प्रकृतः। कटातेन निष्ठा- यामण्यदर्थे इति दीर्घः । क्षियो दीर्घात् इति नत्वम् । प्रक्षीणः सः॥ वा क्रोशदैन्ययोः६।६।६१॥ क्षियो निष्ठायां दी? वाऽऽक्रोशे दैन्ये च । क्षीणायुर्भप । क्षि- तायुर्वा । क्षीणोऽयं तपस्वी | क्षितो वा॥ निनदीभ्यां नातेः कौशले ८।३।८९॥ आभ्यां सातेः सस्य पः कौशले गम्ये । निष्णातः शास्त्रेषु । नद्या नातीति नदीष्णः । सुपि इति कः॥ सूत्रं प्रतिष्णातम् ८।३।९० ॥ प्रत्तेः सातेः पत्वम् । प्रतिष्णातं सूत्रम् । शुद्धमित्यर्थः । अ- न्यत्र । प्रतिसातम् ।।

२२० सुगमकौमुद्याः। कपिष्ठलो गोत्रे ८।३।९१॥ कपिष्ठलो नाम यस्य कापिष्ठलिः पुत्रः । गोत्रे किम् । कपीनां स्थलं कपिस्थलम् ॥ विकुशमिपरिभ्यः स्थलम् ८।३।९६॥ । एभ्यः स्थलस्य सस्य पः । विष्ठलम् । कुष्ठलम् । शमिष्ठलम् । परिष्ठलम् । गत्यर्थाकर्मकश्लिपशीइस्थासवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च । गङ्गां गतः । गङ्गां प्राप्तः । म्लानः सः । लक्ष्मीमाश्लिष्टो हरिः । शेषमधिशयितः । वैकुण्ठमधिष्ठितः । शिवमुपासितः । हरिदिन- मुपोपितः । राममनुजातः । गरुडमारूढः । विश्वमनुजीर्णः । पक्षे, प्राप्ता गङ्गा तेनेत्यादि । तोऽधिकरणे च धौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः३।४।७६॥ एभ्योऽधिकरणे क्तः चाद्यथाप्राप्तम् । ध्रौव्यं स्थैर्यम् । मुकुन्द- स्यासितमिदमिदं यात रमापतेः । मुक्तमेतदनन्तस्येत्यूचुर्गोप्यो दि- दृक्षवः ॥ पक्ष आसेरकर्मकत्वात्कर्तरि भावे च । आसितो मुकुन्दः। आसितं तेन । गत्यर्थभ्यः कर्तरि कर्मणि च । रमापतिरिदं यातः। तेनेदं यातम् । भुजेः कर्मणि । अनन्तेनेदं भुक्तम् । कथं भुक्ता ब्राह्मणाः इति । भुक्तमस्ति एपामिति मत्वर्थीयोऽन् । वर्तमान इत्यधिकृत्य ॥ भीतः क्तः३।२।१८७॥ विश्विदा-क्षिन्नः । जिइन्धी-इदः । मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च ३।२। १८८ ॥ मतिरिहेच्छा युद्धेः पृथगुपादानात् । राज्ञां मतः इटः । तैरि- प्पमाण इत्यर्थः । बुद्धः । विदितः। पूजितः । अर्चितः । चका- रोऽनुत्तममुभयार्थः । शीलितो रक्षितः । क्षान्त आकृष्टो जुष्ट इत्यादि । नपुमके मारे क्ता लीवत्वविशिष्टे मारे कालसामान्ये तल्युटी ल्युदेति । जल्पितम् । शयितम् । इसितम् । जल्यनम् । सपनम् । मनम् ॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २२१ सुयजोई निः३।२।१०३॥ सुनोतेर्यजेश्च इनिए भृते । सुत्वा । सुत्वानी। यज्वा । यज्वानी ॥ जीर्यतेरतृन् ३।२।१०४॥ भूत इत्येव । जरन् । जरन्तौ । जरन्तः । वासरूपन्यायेन नि- छापि । जीर्णो जीर्णवान् ॥ छन्दसि लिटू ३।२।१०५॥ लिटः कानज्वा३।२।१०६॥ कसुश्च ३।२।१०७॥ इह भूतसामान्ये छन्दसि लिट् । तस्य विधीयमानौ कसुकान. चावपि छन्दसाविति त्रिमुनिमतम् । कवयस्तु बहुलं प्रयुञ्जते । तं तस्थिवांसं नगरोपकण्ठे श्रेयांसि सर्वाण्यधिजग्मुपस्ते । इत्यादि । वस्वेकाजादसाम् ७।२।६७॥ कृतद्विवचनानामेकाचामादन्तानां घसेश्च वसोरिट् नान्येपाम् । एकाच आरिखान् । आत-ददिवान् । जक्षिवान् । एपां किम् । बभूवान् ॥ भापायां सदवसश्रुवः ३।२।१०८॥ सदादिभ्यो भूतसामान्ये भापायां लिड्वा । तस्य च नित्यं कसुः । निपेदुपीमासनबंधधीरः । अध्यपुपस्तामभञ्जनस्य । शुश्चवान् ॥ उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च ३।२।१०९॥ एते निपात्यन्ते । उपपूर्वादिणो भापायामपि भूतमात्रे लिड़ा। तस्य नित्यं कसुः । इट् । उपेयिवान् । उपेयुपः स्वामपि मूर्तिम- ग्याम् । उपयुपी । उपत्यविवक्षितम् । इपिवान् । समीयिवान् । नपूर्वादश्नानेः क्वसुरिडभावश्च । धृतजयधृतेरनाशुपः इति भारविः । अनुपूर्वादचे कर्तरि कानच् । वेदस्यानुवचनं कृतवाननूचानः ।। विभाषा गमहनविदविशाम् ७१२१६८॥

. २२२ सुगमकौमुद्याः। ऐभ्यो वसोरिडा । जग्मिवान् जगन्वान् । जग्निवान् जघन्वान् । विविदिवान् विविद्वान् । विविशिवान विविधान् । विशिना साहच. र्यादिन्दतेर्ग्रहणम् । वेत्तेस्तु विविद्वान् । नेडशि कृति इतीनिषेधः। शेश्च । दशिवान् ददृश्वान् । लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधि- करणे । पचन्तं चैत्रं पश्य । आने मुक् । पचमानं चैत्रं पश्य । लडित्यनुवर्तमान पुनलड्रग्रहणमधिकविधानार्थम् । तेन प्रथमा सा- मानाधिकरण्येपि कचित् । सन्ब्राह्मणः ॥ माझ्याक्रोश इति वाच्यम् ॐ ॥ मा जीवन्यः परावज्ञा दुःखदग्धोगपि जीवति । माडि लुड इति प्राप्ते एतद्वचनसामर्थ्याल्लद् ॥ संवोधने च ३।२।१२५॥ हे पचन हे पचमान ॥ लक्षणहेत्वोः क्रियायाः ३।२। १२६ ॥ क्रियायाः परिचायके हेतौ चाथै वर्तमानाद्धातोर्टटः शतशा- नचौ स्तः । शयाना भुञ्जते यवनाः। अर्जयन्वसति । हरिं पश्य- मुच्यते । हेतुः फलं कारणं च । कृत्यचः । प्रपीयमाणः सोमः ॥ ईदासः ७।२।८३॥ आसः परस्यानस्येत् । आदेः परस्य । आसीनः ॥ विदेः शतुर्वसुः ७।१।३६॥ वेत्तेः परस्य शतुर्वसुरादेशो वा । विदन् विद्वान् विदुपी ॥ लटः सदा ३।३।१४॥ व्यवस्थितविभाषेयम् । तेनाप्रथमासामानाधिकरण्ये प्रत्ययोत्तर- पदयोः संवोधने लक्षणहेत्वोश्च नित्यम् । करिष्यन्त करिष्यमाणं पश्य । करिष्यतोऽपत्यं कारिष्यतः । करिष्यक्तिः ।हे करि- प्यन् । अर्जयिष्यन्वसति । प्रथमासमानाधिकरणेऽपि कचित् । करि- प्यतीति करिष्यन् ॥

पूङयजोः शानन् ३।२।१२८॥ वर्तमाने । पवमानः । यजमानः ॥ ताच्छील्यवयोवचनशक्तिपु चानश् ३।२।१२९॥ एष द्योत्येषु कर्तरि चानशू । भोगं भुलानः। कवचं विभ्राणः । नु निन्नानः ॥ इचार्योः शत्रकृच्छिणि ३।२।१३० ॥ आभ्यां शत् स्यादकृच्छिणि कर्तरि । अधीयन् । धारयन् । अकृच्चिणि किम् । कृच्छ्रेणाधीते धारयति ॥ द्विपोऽमित्रे ३।२।१३१ ॥ द्विपञ्छत्रुः॥ सुभो यज्ञसंयोगे ३।२।१३२ ॥ सर्वे सुन्वन्तः। सर्वे यजमानाः सत्रिणः॥ अर्हः प्रशंसायाम् ३।२।१३३ ॥ अर्हन् ॥ इति ९१ अंशाः। आकस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिपु । तृन् । कर्ता क्टम् ॥ अलंकृनिराकृ प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुच्यपत्रपवृत्त- वृधुसहचर इष्णुच ३।२।१३६॥ अलंकरिष्णुः । निराकरिष्णुः । प्रजनिष्णुः । उत्पचिष्णुः । उत्पतिष्णुः उन्मदिष्णुः । रोचिष्णुः । अपत्रपिष्णुः । वर्तिष्णुः । वर्धिष्णुः । सहिष्णुः । चरिष्णुः । णेश्छन्दप्ति ३।२।१३७॥ वीरुधः पारयिष्णवः ॥ भुवश्च३।२।१३८॥

२२४ सुगमकौमुद्याः। छन्दसीत्येव । भविष्णु' । कथं तर्हि, जगत्प्रमोरप्रभविष्णु वैष्ण- वम् । इति निरकुशाः कवयः । चकारोऽनुक्तसमुच्चयार्थ । भ्राजिष्णु रिति वृत्ति । एवं क्षयिष्णुः । नैतद्भाष्ये दृष्टम् ॥ ग्लाजिस्थश्च ग्स्नुः ३।२।१३९॥ छन्दसीति निवृत्तम् । गिदयं नतु कित् । तेन स्थ ईत्वं न । ग्ला- स्नुः। गित्त्वान्न गुणः । जिष्णु । स्थास्तुः। चाइवः । श्युकः किति इत्यत्र गकारप्रश्लेपानेटू । भूष्णुः ॥ दशेश्छन्दस्युपसंख्यानम् ॥ दक्ष्णवः पशव.॥ सिगृधिधृपिक्षिः क्रुः३।२।१४०॥ उस्नुः । गृध्रुः । धृष्णुः । क्षिप्नुः ।। शमित्यष्टाभ्यो घिनुण ३।२।१११॥ उकार उच्चारणार्थ इति काशिका । अनुवन्ध इति भाष्यम् । तेन शमिनितरा शमिनीतरेत्यत्र उगितश्च इति हस्तविकल्पः । न चैव शमी शमिनावित्यादी नुम्प्रसङ्गः । झल्ग्रहणमपकृष्य झल- न्तानामेव तद्विधानात् । नोदात्तोपदेशस्य इति वृद्धिनिषेध । शमी। तमी। दमी। श्रमी । त्रमी । भ्रमी । क्लमी। प्रमादी। उत्पूर्वा. न्मदेः अलकृजादिसूत्रेणेष्णुजुक्तो बासरूपविधिना घिनुणपि । उन्मादी। ताच्छीलिकेषु वासरूपविधिर्नास्ति इति तु प्रायिकम् ॥ संपृचानुरुधाङ्चमाझ्यसपरिसृसंसृजपरिदेविसंज्वर- परिक्षिपपरिरटपरिवदपरिदहपरिमुहदुपद्विपद्रुहदुयुजा- क्रीडविविचत्यजरजभजातिचरापचरामुपाभ्याहनश्च ३।२।१४२॥ घिनुण । सपर्की । अनुरोधी।आयामी। आयासी । परिसारी। ससर्गी। परिदेवी । संज्वारी। परिक्षेपी । परिराटी। परिवादी । प- रिदाही । परिमोही । दोषी । वेपी । द्रोही । दोही । योगी।

जु इति सौत्रो धातुर्गती वेगे च । जवनः । बनमणः । द. न्द्रमणः । सरणः । पूर्वण सिद्ध पदग्रहणं लपपतपद इत्युक्ना बाधा मा भूदिति । तेन वाच्छीलिकेपु परस्परं वासस्पविपिना स्तीति तेनालंकृतस्तुन्न । क्रुधमण्डार्थभ्यः । क्रोधनः । रोषणः। द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः । २२५ आक्रीडी । विवेकी । त्यागी । रागी। भागी । अतिचारी । अप- चारी । आमोपी । अभ्याघाती । वौ कपलसकत्थसम्भः३।२। १४३॥ विकापी । विलासी । विकत्थी । विस्रम्भी॥ अपेच लपः३।२।१४४॥ चादौ । अपलापी।विलापी। प्रेलपमृगुमथवदवसः ३।२। १४५॥ प्रलापी। प्रसारी । प्रद्रावी । प्रमाथी। प्रवादी । प्रवासी। निन्दहिंसक्किशखादविनाशपरिक्षिपपरिरटपरिवादिव्या- भापासूयो बुञ् ३।२।११६॥ पञ्चम्यर्थे प्रथमा एभ्यो वुझ् । निन्दकः । हिंसक इत्यादि । ण्वुला सिद्धे वुवचनं ज्ञापकं तच्छीलादिषु वासरूपन्यायेन तृजा. दयो नेति ॥ देविक्रुशोश्चोपसर्गे ३ । २ । १४७॥ आदेवकः। आक्रोशकः। उपसर्गे किम् । देवयिता । कोष्टा । च. लनशब्दार्थादकर्मकायुचू चलनः । चोपनः । कम्पनः । शब्दनः । खणः । अकर्मकात् किम् । पठिता विद्याम् । अनुदात्तेतश्च ह- लादेः । वर्तनः । वर्धनः । अनुदात्तेतः किम् । भविता । हलादेः किम् । एधिता। अकर्मकात् किम् । वसिता वस्त्रम् ॥ जुचक्रम्यदन्द्रम्यसृगृधिज्वलशुचलपपतपदः ३ । २।१५०॥ मण्डनः । भूषणः॥ .

जसं संततमित्यर्थः । कम्रः। हिंस्रः। दीपः । सनागसमिक्षा
वेत्तेर्नुमिपेश्छत्व च निपात्यते । वेत्ति तच्छीलो विन्दुकान
आगमहनजनः किकिनौ लिट्नsill
द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २२७
मृघस्यदः क्मरच३।२।१६०॥
समरः । घस्मरः । अमरः ।।
भनभासमिदो घुरच ३।२।१६१ ॥
मगुरः । भासुरः। मेदुरः ।।
विदिभिदिच्छिदेः कुरच ३।२।१६२॥
विदुरः । मिदुरम् । छिदुरम् ॥
इण्नशजिसर्तिभ्यः करम् ३।२।१६३ ॥
इत्वरः इत्वरी । नश्वरः । जित्वरः । मृत्वरः ॥
गत्वरश्च३।२।१६४॥
गमेरनुनासिकलोपोपि निपात्यते । गत्वरी ।।
जागुरूकः३।२।१६५॥
जागर्तेरूकः । जागरूकः ॥
यजजपदांयङः३।२।१६६॥
एभ्यो यडन्तेभ्य ऊकः । दशामिति भाविना नलोपेन निर्देशः।
यायजूकः । जञ्जपूका। दन्दशूकः ॥
नमिकम्पिस्म्यजसकमहिंसदीपोरः ३ । २।१६७ ॥
नमः । कम्पः । स्मेरः जसिर्न पूर्वः क्रियासातत्ये वर्तते ।
चिकीर्षुः । आशंसुः । भिक्षुः ॥
विन्दुरिच्छुः३।२।१६९ ॥
क्याच्छन्दसि ३।२।१७०॥
देवाञ्जिगाति सुनयुः॥

२२८ सुगमकौमुद्याः। आदन्तादृदन्ताद्गमादिभ्यश्च किकिनी स्तश्छन्दसि ती च लिइत् । पपिः सोमम् । ददिर्गाः । बधिर्वज्रम् । जग्मियुवा । जनिर्वृत्रम- मित्रियम् । जज्ञिः । भापायां धाकृरगमिजनिनमिभ्यः। दधिः । चकिः । सनिः । जग्मिः । जज्ञिः । नेमिः ॥ सासहिवावहिचाचलिपापतीनामुपसंख्यानम् * ॥ यडतेभ्यः सहेत्यादिभ्यः किकिनी पतेनींगमावश्च निपात्यते ॥ स्वपितृपोर्नजिङ ३।२। १७२॥ स्वमक् । तृष्णक् । तृष्णजौ । तृष्णजः । धृपेश्च इति वाच्य- मिति काशिकादौ । धृष्णक् ॥ श्रृवन्धोरारुः ३।२ । १७३ ॥ शरारुः। वन्दारुः ॥ भियः कुल्लकनौ ३१२ । १७४॥ मीरुः । भीलुकः॥ कुकन्नपि वाच्यः ॥ मीरुकः॥ स्थेशभासपिसकसो वरच ३।२।१७५ ॥ स्थावरः । ईश्वरः । भास्वरः । पेस्वरः । कस्वरः॥ यश्च यङः ३।२।१७६॥ यातर्यडन्तादरच् अतो लोपः। नस्य अचः परस्मिन् इति स्थानिवद्भावे प्राप्ते न पदान्तेति तस्य यलोपं प्रति स्थानिवद्भावनि- पेधात् लोपो व्योः इति यलोपः। अल्लोपस्य स्थानिवत्त्वमाश्रि- त्यातो लोपे प्राप्ते वरे लुप्तं न स्थानिवत् । यायावरः ।। इति ९२ अंशाः। भाजभासधुर्विद्युतोजिजुग्रावस्तुवः किए ३१२। १७७॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २२९ विभ्राट् । भाः। भासौ। धूः । धुरी । विद्युत् । ऊर्क । पूः । पुरौ । दृशिग्रहणस्यापकर्षाज्जवतेदीर्घः । जूः। जुवौ । जुवः यायश- ब्दस्य धातुना समासः सूत्रे निपात्यते । ततः किम् । ग्रावस्तुत् ।। अन्येभ्योऽपि दृश्यते ३१२।१७८॥ क्विप् । छित् भिदू दृशिग्रहणं विध्यन्तरोपसंग्रहार्थम्। कचिद्दीर्घः। क्वचिदसंप्रसारणं कचिद्दे क्वचिद्धस्वः। तथा च वार्तिकम् ।। किबचिप्रच्छयायतस्तुकटग्रुजुश्रीणां दीर्घोऽसंप्र- सारणं च ॥ विब्वचीत्यादिनोणादिसूत्रेण केषांचित्सिद्दे तच्छीलादौ तृना वाधा मा भूदिति वार्तिके ग्रहणम् । वक्तीति वाक् । पृच्छतीति प्राट्। पाशी। आयतं स्तौति आयतस्तूः । कटं प्रवते कटपूः। जुरुक्तः श्रय- ति हरिं श्रीः। द्युतिगमिजुहोतीनां द्वे च । दृशिग्रहणादभ्याससंज्ञा दिद्युत् । जगत् । जुहोतेदर्दीर्घश्च । जुहूः । दृ भये । अस्य तस्वश्च । दीर्यति ददृत् । ध्यायतेः संप्रसारणं च । धीः ॥ भुवः संज्ञान्तरयोः३।२।१७९ ॥ मित्रभूर्नाम कश्चित् धनिकाधमर्णयोरन्तरे यास्तष्ठति विश्वासार्थ स प्रतिभूः॥ विप्रसंभ्यो डसंज्ञायाम् ३।२।१८०॥ एभ्यो भुवो डुः नतु संज्ञायाम् । विभुर्व्यापकः । प्रभुः स्वामी संभुर्जीनता। संज्ञायां तु विभूर्नाम कश्चित् ॥ मितद्वादिभ्य उपसंख्यानम् ॥ मितं द्रवतीति मितद्वः । शतदुः । शंभुः । अन्तर्भावितण्यों- ऽत्र भवतिः॥ धः कर्मणि ट्रन् ३।२।१८१॥ धेटो धाजश्च कर्मण्यर्थे एन् । धात्री जनन्यामलकीवसुमत्युप- माषु॥

. सुगमकौमुद्याः । दानीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे ३।२।१८२॥ दाम्न्यादे. प्रकरणेऽर्थे । दान्त्यनेन दात्रम् । नेनम् । तितुनथेति नेद । शवम् । योत्रम् । योक्रम् । स्तोत्रम् । तोत्रम् । सेत्रम् । सेक्रम्। मेम् । पत्रम् । दंष्ट्रा । नधी ॥ हलसूकरयोः पुवः३।२।१८३॥ पूडपूजोः करणे प्रन् । तचेत्करणं हलसूकरयोरवयवः । हलस्य सूकरस्य वा पोत्रम् । मुखमित्यर्थः ॥ अतिलूधूसूखनसहचर इत्रः३।२।१८४॥ अरित्रम् । लवित्रम् । धवित्रम् । सवित्रम् । खनित्रम् । सहि- प्रम् । चरित्रम् ॥ पुवः संज्ञायाम् ३१२११८५॥ पवित्रम् । येनाज्यमुत्पूयते यच्चानामिकावेष्टनम् ॥ कतरि चर्पिदेवतयोः ३।२।१८६॥ पुष इत्रः ऋषौ करणे देवताया कतरि । ऋपिर्वेदमन्त्रः । तदु- क्तमृपिणेति दर्शनात् । पूयतेऽनेनेति पवित्रम् । देवताया तु अग्निः पवित्र समा पुनातु ॥ उणादयो बहुलम् ३।३।१॥ एते वर्तमाने संज्ञाया च बहुल केचिदविहिता अप्यूह्याः । संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च तत. परे । कार्याविद्यादनूबन्धमेत- च्छास्त्रमुणादिषु ॥ भूतेऽपि दृश्यन्ते ३।३।२॥ भविष्यति गम्यादयः३।३।३॥ दाशगोनी संप्रदाने ३।४।७३॥ एती संमदाने कारके निपात्येते।दाशन्ति तस्मै दाश। गा हन्ति तस्मै गोमोतिथिः॥ .

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः ।
भीमादयोऽपादाने ३।४।७४॥
भीमः । भीष्मः । प्रस्कन्दनः । प्ररक्षः । मूर्खः । खलतिः॥
ताभ्यामन्यत्रोणादयः३।४।७५॥
संप्रदानापादानपरामर्शार्थताभ्यामिति । ततोऽसौ भवति तन्तुः।
तं तदिति वमीचरितं तदिति चर्म। तुमुन्ण्वुलौ क्रियाया क्रिया
म् । कृष्णं द्रष्टुं याति कृष्णं दर्शको याति । अत्र वासरूपेण
जादयो न पुनवुलुक्तेः । समानकर्तृकेषु तुमुन् । अक्रियार्थोपपदा-
मेतत् । इच्छति भोक्तम् । वष्टि वाञ्छति वा ॥
शकधृपज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहाहस्त्यिर्थेषु तुमुन्
३।४।६५॥
एपूपपदेषु धातोस्तुमुन् । शक्नोति मोक्तुम् । एवं धृष्णोत्यादौ ।
अर्थग्रहणमस्तिनैव संवध्यते अनन्तरत्वात् । अस्ति भवति विद्यते
वा भोक्तुम् ॥
पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु ३।४।६६॥
पर्याप्तिः पूर्णता तदाचिषु सामर्थ्यवचनेषूपपदेपु तुमुन् । पर्याप्ती
मोक्तुं प्रवीणः । कुशलः । पटुरित्यादि । पर्याप्तिवचनेषु किम् ।
अलं भुक्त्वा । अलमर्थेषु किम् । पर्याप्त मु । प्रभूततेह गम्यते ।
नतु मोक्तुः सामर्थ्यम् ॥
कालसमयवेलासु तुमुन् ३।३।१६७॥
पर्यायोपादानमर्थोपलक्षणार्थम् । कालार्थपूपपदेषु तुमुन् । कालः
समयो वेलानेहा वा भोक्तम् । प्रेपादिग्रहणमिहानुवर्तते । तेनेह न ।
भूतानि कालः पचतीति वार्ता॥
भाववचनाश्च३।३।११॥
भाव इत्यधिकृय वक्ष्यमाणा घनादयः क्रियायां क्रियाया
भविष्यति स्युः । यागाय याति ॥

-
२३२
सुगमकौमुद्याः।
अण् कर्मणि च ३।३ । १२॥
कर्मण्युपपदे क्रियार्थायां क्रियाणां चाण् । प्युलोऽपवादः। का-
पडलायो ब्रजति । परत्वादयं कादीन् बाधते । कम्बलदायो ब्रजति।।
पदरुजविशस्पृशो घम् ३।३।१६॥
भविष्यतीति निवृत्तम् । पद्यतेऽसौ पादः । रुजतीति रोगः ।
विशतीति वेशः । स्पृशतीति स्पर्शः।
स स्थिरे ३।३।१७॥
स इति लुप्तविभक्तिक सतः स्थिरे कर्तरि पञ् । सरति काला-
न्तरमिति सारः ।।
व्याधिमत्स्यालेषु चेति वाच्यम् * ॥
अतीसारो व्याधिः । अन्तर्रावितण्यान सरतिः । रुधिरा.
दिकमतिशयेन सारयतीत्यर्थः । विसारो मत्स्यः । सारो बले दृढांशे
च। मारे । पाकः पाकी।
स्फुरतिस्फुलत्योपभि६।१।४७ ॥
अनयोरेच आत्वं पनि । स्फारःस्फाल । उपसर्गस्य पनि
इति वक्ष्यमाणेन दीर्घः । परीहारः । इकः काशे। नीकाशः । नो.
दातोपदेश इति न वृद्धिः । शमः । आचमादेस्तु । आचामः ।
कामः । वामः । विश्राम इति त्वपाणिनीयम् ।।
स्यदो जवे ६।४।२८॥
स्पन्देपनि नलोपो वृदयमावश्च निपात्यते । स्पदी वेगः ।
अन्यत्र स्पन्दः॥
अबोदधामप्रश्रयहिमश्रयाः ६।४।२९ ॥
अपोदोभलंदनम् । एप इन्धनम् । ओन उन्दनम् । अन्येनेलोपी
पदघमारध । यस्तरिय कारणे संज्ञायाम् ।।
पनि च भापकरणयोः६।४।२७॥
ग्नसोपः । रागः । अनयोः फिम् । रम्पत्यस्मिन् रङ्गः ।

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। मास्यत इति प्रासः । संज्ञायाम् इति प्रायिकम् । को भवता लामो लब्धः । इत उत्तरं मारे अकर्तरि कारके इति कृत्यल्युटो वहुलम् इति यावयमप्यनुवर्तते ॥ परिमाणाख्यायां सर्वेभ्यः३।३।२०॥ घञ् । अजपोर्वाधनार्थमिदम् । एकस्तण्डुलनिचायः । दी शूर्पनिष्पाची । द्वौ कारी॥ दारजारो कर्तरि णिलुक्च ॐ ॥ दारयन्तीति दाराः । जारयन्तीति जाराः ॥ इङश्च३।३।२१॥ घा । अचोऽपवादः । उपेत्यस्मादधीयते उपाध्यायः ॥ अपादाने स्त्रियामुपसंख्यानं तदन्ताच्च वा डीप * ॥ उपाध्याया उपाध्यायी। शृ वायुवर्णनिवृतेपु * ॥ शृ इत्यविभक्तिको निर्देशः । शारो वायुः । करणे घझ । शारो वर्णः । चित्रीकरणमिह धात्वर्थः । निवियते आत्रियतेनेनेति निवृतमावरणम् । वाहुलकात् करणे क्तः। गौरिखाकृतनीशारः प्रायेण शिशिरे कृशः । अकृतमावरण इत्यर्थः ।। उपसर्गे रुवः३।३।२२॥ घञ् । संरावः । उपसर्गे किम् । खः ।। अभिनिसः स्तनःशब्दसंज्ञायाम् ८।३।८६॥ अस्मात्स्तनः सस्य मूर्धन्यः । अभिनिष्टानो वर्णः। शब्दसंज्ञायां किम् । अभिनिःस्तनति मृदङ्गः॥ समियुद्रुदुवः ३।३।२३ ॥ संयूयते मिश्रीक्रियते गुडादिमिरिति संयावः पिष्टविकारोऽपूप- विशेषः। संद्रावः। संदावः ।। थिणी भुवोऽनुपसर्ग ३।३।२४॥ --

२३४
सुगमकीमुद्याः।
श्रायः । नायः । भावः । अनुपसर्गे किम् । प्रश्नयः । प्रणयः ।
प्रभवः । कथं प्रभावो राज्ञः । इति प्रकृष्टो मार इति प्रादिसमासः।
कथं राज्ञो नय इति वाहुलकात् ।।
वौ क्षुश्रुवः ३।३।२५॥
विक्षावः । विधावः । चौ किम् । क्षयः । श्रवः ।।
अपोदोनियः३।३।२६॥
अवनायोऽधोनयनम् । उन्नायः ऊर्धनयनम् । कथम् उन्नयः ।
उत्प्रेक्षा इति बाहुलकात् ॥
प्रे दुस्तुनुवः३।३।२७॥
प्रद्रावः । प्रस्तावः । इति किम् । द्रवः । स्तवः । सवः ॥
निरभ्योः पूल्लोः ३।३।२८॥
निष्पूयते शूदिभिरिति निष्पावो धान्यविशेषः । अभिलावः
निरभ्योः किम् । पकः । लकः ॥
इति ९३ अंशाः।
उन्योः३।३।२९॥
उद्गारः । निगारः । उन्न्योः किम् । गरः ॥
कृ धान्ये ३।३।३०॥
कृ इत्यस्माद्धान्यविषयकादुन्न्योर्घ । उत्कारी निकारो धा.
न्यस्य विक्षेप इत्यर्थः । धान्य क्मूि । भिक्षोत्करः । पुष्पनिकरः ॥
यज्ञे समिस्तुवः३।३।३३॥
समेत्य स्तुवन्ति यस्मिन्देशे छन्दोगाः स देशः। संस्तावः । यजे
किम् । संस्तवः परिचयः॥
प्रेस्त्रोऽयज्ञे३।३।३२॥
अयज्ञे इति छेदः । यज्ञे इति प्रकृतत्वात् मस्तारः । अयज्ञे
किम् । बाईपः प्रस्तारो मुष्टिविशेषः॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । प्रथने वावशब्दे ३ ॥३॥ ३३॥ विपूर्वात्स्तृणावर्घ । अशब्दविषये प्रथने । पटस्य विस्तरः । प्रथने किम् । तृणविस्तरः । अशब्दे किम् । ग्रन्थविस्तारः ।। छन्दोनानि च ३।३।३४॥ सः इत्यनुवर्तते । विष्टारपश्छिन्दः । विस्तीर्यन्तस्मिन्नक्षरा- णीत्यधिकरणे घन ततः कर्मधारयः ।। छन्दोनानि च ८।३।९४॥ विपूर्वात्स्तृणावर्घजन्तस्य सस्य पत्वं छन्दोनाम्नि । इति पत्वम् ॥ उदि ग्रहः३।३।३५॥ समि मुटौ ३।३।३६॥ मल्लस्य संग्राहः । मुष्टी किम् । द्रव्यस्य संग्रहः ॥ परिन्योनीणोधूताभ्रेपयोः३।३।३७॥ परिपूर्वानयतेनिपूर्वादिणश्च घन क्रमेण द्यूतेऽभ्रेपे च विपये । परिणायेन शारान्हन्ति । समन्तान्नयनेनेत्यर्थः। एपोन्त्र न्यायः उ- चितमित्यर्थः। ताभ्रेषयोः किम् । परिणयो विवाहा न्ययो नाशः। परावनुपात्यय इणः ३।३।३८॥ क्रममाप्तस्यानतिपातोऽनुपात्ययः । तब पर्यायः । अनुपात्यये किम् । कालस्य पर्ययः । अतिपात इत्यर्थः ॥ व्युपयोः शेतेः पर्याये ३।३।३९॥ तव विशायः । तव राजोपशायः । पोये किम् । विशयः । संशयः । उपशयः समीपशयनम् ॥ हस्तादाने चेरस्तेये ३1३1४०॥ हस्तादान इत्यनेन प्रत्यासचिरादेयस्य लक्ष्यते । पुष्पप्रचायः । हस्तादाने किम् । वृक्षाग्रस्थानां फलानां यष्टया प्रचयं करोति । अस्तेये किम् । पुष्पप्रचयचौर्येण ॥ है सुगमकौमुद्याः। निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च का३।३।४१॥ एपु चिनोतेर्घस्यात आदेश्व ककारः। उपसमाधानं राशीकरणं तच धात्वर्थः । अन्ये प्रत्ययार्यस्य कारकस्योपाधिभूताः । निवासे- काशीनिकायः। चितौ-आकायमग्निं चिन्वीत । शरीरे-चीयतेऽ- स्मिन्नस्थ्यादिकमिति कायः । समूहे-गोमयनिकायः । एषु किम् । चयः । चः क इति वक्तव्ये आदेरित्युक्तेर्यड्लुक्यादेख इति । गोमयानां निकेचायः। पुनःपुना राशीकरणमित्यर्थः ।। संघे चानौत्तराधर्ये ३।३।४२॥ चेर्घआदेश्च कः। भिक्षुनिकायः। प्राणिनां समूहः संघः। अनी- त्तराधर्ये किम् सूकर निचयः । संघे किम् । ज्ञानकर्मसमुच्चयः ॥ कर्मव्यतिहारे णच स्त्रियाम् ३।३।४३ ॥ स्त्रीलिड्ने भावे णच् ॥ णचः स्त्रियाम५।४।१४॥ न कर्मव्यतिहारे ७।३।६॥ अन ऐज्न । व्यावक्रोशी । व्यावहासी । अभिविधौ भाव इनुण ३।३।४४ ॥ अणिनुणः५।४।१५॥ इनण्यनपत्ये इति वक्ष्यमाणः प्रकृतिभावः । सांराविणं वर्तते ।। आकोशेऽवन्योHहः ३।३।१५॥ यवनि पतयोमेहेर्घ शापे । अवग्राहस्ते भूयात् । अमिमय इत्यर्थः । निग्राहस्ते भूयात् । बाध इत्यर्थः । आक्रोशे किम् । अव- ग्रहः पदस्य । निग्रहश्वोरस्य ॥ प्रेलिप्सायाम् ३1३।४६॥ पात्रमप्रादेण चरनि मिचः॥ परो यक्षे३।३।१७॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २३७ उत्तरः परिग्राहः। स्स्येन वेदेः स्वीकरणम् ॥ नौ वृ धान्ये ३।३।४८॥ वृ इति लुप्तपञ्चमीकमानीवाराः । धान्ये किम् । निवरा कन्या । क्तिन्चिपयेपि वाहुलकादम् । प्रवरा सेतिवत् ॥ उदि श्रयत्तियोतिपूद्रुवः३।३।४९॥ उच्छ्रायः । उद्यावः । उत्पावः । उद्मावः । कथं पतनान्ताः । समुच्छ्याः इति बाहुलकात् ॥ विभापा ङि रुप्लुवोः ३।३।५०॥ पाराकआरवः। आप्लावः आप्लवः॥ अवे ग्रहो वर्पप्रतिबन्धे ३।३।५१॥ विमापेति वर्तते । अवग्रहः अवग्राहः । वर्षप्रतिवन्धे किम् । अवग्रहः पदस्य ॥ प्रे वणिजाम् ३।३।५२॥ मे नहेर्घञ्चा वणिजां संवन्धी चेत्मत्ययार्थः । तुलासूत्रमिति यावत् । तुलाभग्राहेण चरति तुलाप्रग्रहण ।। रश्मौ च ३।३।५३॥ भग्रहः प्रयाहः ॥ वृणोतेराच्छादने ३।३।५४॥ विमापा प्र इत्येव । प्रबारः॥ परौ भुवोऽवज्ञाने ३।३।५५॥ परिभावः परिमवः। अवज्ञाने किम् । सर्वतो मवनं परिमवः। एर- च् । चयः। जयः॥ भयादीनामुपसंख्यानं नपुंसके क्तादिनिवृत्त्यर्थम् ॐ ॥ भयम् । वर्षम् । ऋदोरम् । करः । गरः । शरः । यवः । लवः । स्तवः । पकः॥

२३८
सुगमकौमुद्याः।
वृक्षासनयोर्विष्टरः ८।३।९३॥
अनयोर्विपूर्वस्य स्वः पत्वं निपात्यते । विष्टरो वृक्ष आसनं च ।
वृक्ष इति किम् । वाक्यस्य विस्तरः ॥
ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च३।३।५८॥
अप् । घनचोरपवादः। ग्रहः । वरः । दरः । निश्चयः । गमः॥
वशिरण्योरुपसंख्यानम् ॥
वशरणः॥
धभर्थे कविधानम् * ॥
मस्यः । विघ्नः।
द्वित्वप्रकरणे के कृभादीनामिति वक्तव्यम् ॐ ॥
चक्रम् । विलिदम् । चनसः ॥
उपसर्गेऽदः३१३१५९॥
जपू॥
घभपाश्च २।४।३८॥
अर्घरल स्याद् चयपि च । प्रघसः । विधसः । उपसर्ग
किम् । घासः ॥
नौण च३१३१६०॥
नौ उपपदे पदेणः अप्च । न्यादः । निघसः॥
व्यघनपोरनुपसर्ग ३।३।६१॥
अप् । व्यधः । जपः । उपसर्गे तु, माध्याधः । उपजापः ।।
स्वनहसोर्या ३।३।६२॥
अपसे पन्त । स्वनः स्थानः । इस हामः । अनुपमर्गे
पापा मम्बान । महामः॥
यमः समुपनिविपु च ३।३।६३॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । २३९ एष्वनुपसर्गे च यमेरप्पा । संयमः । संयामः उपयमः। उप- मः । नियमः नियामः । वियमः । वियामः यमः यामः॥ नौ गदनदपठस्वनः३।३।६४ ॥ अब्बा । निगदः निगादः । निनदः निनादः । निपठः पाठः । निस्वनः निस्वानः ।। कणो वीणायां च३।३।६५॥ नावनुपसर्गे च वीणाविषयाच कणतेरब्बा । वीणाग्रहणं प्राद्य- म् । निक्कणः निकाणः। कणः काणः । वीणाया तु । प्रक्वणः काणः॥ नित्यं पणः परिमाणे३।३।६६॥ अए । मूलकपणः । शाकपणः । व्यवहारार्थ मूलकादीनां परिमितो मुष्टिर्बध्यते सोऽस्य विषयः । परिमाणे किम् । पाणः ॥ मदोऽनुपसर्गे ३।३।६७ ॥ धनमदः । उपसर्गे तु, उन्मादः ॥ प्रमदसंमदी हर्षे ३।३।६८॥ हर्षे किम् । प्रमादः । संमादः ।। समुदोरजः पशुषु ३।३।६९॥ संपूर्वोऽजिः समुदाय उत्पूर्वश्च प्रेरणे तस्मात्पशुविपयकादम् । मघापोः इत्युक्तेर्वीभावो न । समजः पशूना संघः । उदजः शूना प्रेरणम् । पशुषु किम् । समाजो ब्राह्मणानाम् । उदाजः त्रियाणाम् ।। अक्षेपु गहः३।३।७॥ अक्षशब्देन देवनं लक्ष्यते । तत्र यत्पणरूपेण ग्राह्य तत्र ग्रहः ति निपात्यते । अक्षस्य ग्लहः । व्यात्युक्षीमाभिसरणलहामदी- न्यन् । अक्षेषु किम् । पादस्य ग्रहः ॥ प्रजने सतः३।३।७१॥

२४२
मुगमकीमुद्याः।
डुपचप-पाक्न निर्वृत्तं पत्रिमम् । डुवप्-उप्तिमम् । द्वितोऽथुच ।
टुवेपृ वेपथुः-श्वयथुः॥
यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षोऽनङ्-३।३।९०॥
यज्ञः । याचा । यतः । विश्नः । प्रश्नः । प्रश्ने चासन्न इति
ज्ञापकान संप्रसारणम् । डित्त्वं तु विश्न इत्यत्र गुणनिधाय । रक्ष्णः॥
स्वपो नन् ३।३।९१ ॥
स्वमः॥
उपसगै घोः किः३।३। ९२॥
प्रधिः । अन्तर्षिः । उपाधीयतेऽनेनेत्युपाधिः ।।
कर्मण्यधिकरणे च ३।३।९३॥
कर्मण्युपपदे घोः किः अधिकरणेऽर्थे । जलानि धीयन्तेऽस्मि-
निति जलधिः । स्त्रिया क्तिन् । घजोऽपवादः । अजपौ तु परत्वा-
द्वाधते । कृतिः । चितिः । स्तुतिः । फायी । स्फातिः । स्फीति-
कामः इति तु प्रामादिकम् । तान्ताद्धात्वर्थे णिचि अच इ. इति
वा ममाधेयम् ॥
श्रुयजीपिस्तुभ्यः करणे ॥
श्रूयतेऽनया श्रुतिः । यजेरिपेश्च । इष्ठिः । स्तुतिः ।।
ऋल्लादिभ्यः क्तिनिष्टावद्वाच्यः ॐ ॥
तेन नत्वम् । गीणिः । लूनिः । धूनिः। यूनिः । हादः इति
योगविभागात् क्तिनि ह्रस्वः । प्रहन्निः । ति च । चूर्तिः । फुल्तिः ।।
चायतेः क्तिनि चिभावो वाच्यः ॥
अपचितिः । संपदादिभ्यः किम् । संपत् । विपत् । क्तिनपी.
प्यते । संपत्तिः । विपत्तिः ।।
स्थागापापनोभावे ३।३।९५॥
। क्तिस्यादडोऽपवादः । प्रस्थितिः । उपस्थितिः । संगीतिः ।

द्वितीयरसण्डस्य प्रथमो भागः। २८३ मंपीतिः । पक्तिः । कथम् अवस्था संस्था इति । व्यस्थायाम इति ज्ञापकात् ॥ अतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च ३।३।९७ ॥ अवतेः ज्वर त्वर इत्यूट । अतिः स्वरार्थं वचनम् । उदात्त इनि हि वर्तते । यूतिः । जूतिः । अनयोर्दीर्घत्वं च निपात्यते । स्यने: मातिः । यतिस्यतिमास्था इतीचे प्राप्त इत्यामागे निपात्यते । सनोते जनमन इत्यात्वे कृते स्गर्थ निपातनम् । हन्तेहिनोतेयो। हतिः । कीर्तिः ॥ ब्रजयजोभीवे क्यप् ३।३।९८॥ व्रज्या । इज्या ॥ संज्ञायां समजनिपदनिपतमनविदपुत्रशीभिणः ३।३।९९॥ ममजादिभ्यः स्त्रियां भावादी क्या स चोदात्तः संज्ञायाम ।। अजेः क्यपि वीभावो नेति वाच्यम् ॥ समजन्त्यस्यामिति समज्या सभा। निपीदन्त्यस्यामिति निषद्या आपणः । निपतन्त्यस्यामिति निपत्या पिच्छिला भूमिः । मन्य- तेऽनयेति मन्या गलपार्थशिरा । विदन्त्यनया विद्या । मुत्याभि- परः । शय्या । भृत्या । ईयतेऽनया इत्या शिविका ॥ कृमः श च ३।३।१००॥ कृतः इति योगविभागः । कृनः क्या कृत्या श च । चा- क्तिन् । क्रिया कृतिः ॥ •इच्छा३।३।१०१॥ इपेभीवे शो यगमावश्च निपात्यते । इच्छा ।। परिचर्यापरिसर्यामृगयाटाव्यानामुपसंख्यानम् ॥ शो यक्च निपात्यते । परिचर्या पूजा । परिसर्या परिसरणम् । अत्र गुणोप । मृग अन्वेपणे । चुरादावदन्तः । अतो लोपामा- . ।

२४४
सुगमकौमुद्याः।
वोऽपि । शे यकि णिलोपः । मृगया । अटतेः शे यकि ट्यशब्दस्य
द्वित्वं पूर्वभागे यकारनिवृत्तिर्दीर्घश्च । अटाटया ॥
जागतॆरकारो वा ॥
पक्षे शः । जागरा जागर्या । अमत्ययात् । चिकीपी । पुत्रका-
म्या । गुरोश्च हलः । ईहा । ऊहा । गुगेः किम् । भक्तिः । हल
किम् । नीतिः॥
निष्ठायां सेट इति वक्तव्यम् * ॥
नेह । आप्तिः । तितुत्र इति नेट् । दीप्तिः ।।
तितुत्रेष्वगृहादीनामिति वाच्यम् ॐ ॥
निगृहीतिः । निपठितिः । पिद्भिदादिभ्योऽड् । । ऋदृशोऽ.
डि गुणः । जरा । अपूप् त्रपा । भिदा । विदारण एवायम् ।
भित्तिरन्या । छिदा । मृजा ।।
क्रपेः संप्रसारणं च ॥
कृपा ॥
चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्व ३ ।३।१०५॥
अड् युचोऽपवादः । चिन्ता । पूजा । कथा । कुम्बा । चर्चा ।
आतश्चोपसर्ग । प्रदा । उपदा ॥
श्रदन्तरोरुपसर्गवदृत्तिः ॥
श्रद्धा । अन्तर्धा । उपसर्गे घोः किः इत्यनेन किः । अन्तर्धि
ण्यागश्रन्यो युन् । कारणा । हारणा । आसना । श्रन्थना ॥
पट्टिवन्दिविदिभ्यश्चेति वाच्यम् ॐ ॥
घटना । बन्दना । वेदना॥
इपेरनिच्छार्थस्य ॥
अन्वेषणा॥
परेवा ॥
पर्येपणा । परीष्टिः ॥
।
.

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २४५
रोगाख्यायां ण्वुल्लहुलम् ॥
प्रच्छर्दिका । प्राहिका । विचचिका ।।
कचिन्न ॥
शिरोतिः ॥
धात्वनिर्देशे ण्वुल्वक्तव्यः ॐ ॥
आसिका । शायिका । इश्तिपादय उक्ताः। पचिः पचतिः ।
अकारः ककारः। रादिफः रेफः। मत्वीयः । आजिः । जातिः।
वापिः । वासिः । कृषिः । गिरिः॥
संज्ञायाम् ३।३।१०९।।
अन धातोर्तुल् । उद्दालकपुष्पमञ्जिका ॥
विभाषाख्यानपरिप्रश्नयोरिञ्च ३।३।११० ॥
परिप्रश्न आख्याने च गम्य इन चाण्ण्पुल विभापोक्तेर्यथाप्राप्त
मन्येऽपि । का त्व कारि कारिका किया कृत्या कृति वाकार्षीः ।
सर्वा कारिं कारिका क्रिया कृत्या कृति वाकार्पम् । एवं गणिं
गणिका गणनाम् । पाचिं पाचिका पचा पक्तिम् ॥
पर्यायाहणोत्पत्तिषु ण्वुच ३।३।१११॥
पर्यायः । परिपाटी क्रमः । अर्हणमहः योग्यता । पर्यायादिषु
द्योत्येषु ण्युज्वा । भक्त आसिका । शायिका । अग्रगामिका ।
भवानिक्षुभक्षिकामहति । ऋणे-इक्षुभक्षिका मे धारयति । उत्पत्ती-
इक्षुमक्षिका उदपादि । आमोशे नभ्यनिः अजीवनिस्ते शठ भृ-
यात् । अप्रयाणिः । कृत्यल्पुटो बहुलम् । भावे । वर्तरि च कारके
संज्ञायामिति च निवृत्तम् । राज्ञा भुज्यन्ते राजभोजनाः शालय.।
नपुंसके भावेक्तः। ल्युट् च । हसितं हसनम्। योगविभाग उत्तरार्थः।
कर्मणि च येन संस्पर्शात्कर्तुः शरीरसुखम् ३।३।
११६॥

सुगमकीमुद्याः।
येन स्पृश्यमानस्य कर्तुः शरीरसुखमुत्पद्यते तस्मिन्र्मण्युपपदे
ल्युट् । पूर्वेण सिद्धे नित्यसमासाथ वचनम् । पयःपानं सुखम् ।
तरि इति किम् । गुरोः नापनं मुसम् । नेह गुरुः कर्ता वितु कर्म ।।
इति ९५ अंशाः।
-
वायो २।४।२७॥
अजेर्वी वायौ । प्रवयणम् । प्राजनम् । करणाधिकरणयोश्च ।
ल्युट् । इध्मप्रवश्वनः कुठारः । गोदोहनी स्थाली । खलः। प्राकर•
णाधिकरणयोरित्यधिकारः ॥
अन्तरदेशे ८।४।२४॥
अन्तःशब्दाद्धन्तेर्नस्य णः । अन्तर्हणनम् । देशे तु अन्तर्हननो
देशः । अत्पूर्वस्येत्येव । अन्त+न्ति । तपरः किम् । अन्तरघानि ।।
अयनं च ८१४१२५॥
अयनस्य णोऽन्तःशब्दात्परस्य । अन्तरयणम् । अदेश इत्येव ।
अन्तरयनो देशः ॥
पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ३।३। ११८॥
छादेर्धेऽद्युपसंगस्य ६।४।९६॥
दिप्रभृत्युपसर्गहीनस्प छादेईस्वः धे परे । दन्ताश्छाद्यन्तेऽनेन
दन्तच्छदः । आकुर्वन्त्यस्मिन्नाकरः ॥
गोचरसंचरवहव्रजव्यजापणनिगमाश्च३।३।११९॥
घान्ता निपात्यन्ते । हलश्व इति वक्ष्यमाणस्य घजोऽपवाद ।
गावश्चन्त्यस्मिन्निति गोचरो देशः । संचरन्तेऽनेन संचरो मार्गः ।
वहन्त्यनेन वहः स्कन्धः व्रजः । व्यजस्तालवृन्तम् । निपातनाही.
भावो न । आपणः पण्यस्थानम् । निगच्छन्त्यनेन निगमश्छन्दः।
चावप.। निकपः॥
अवे तृस्रो ३।३। १२० ॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २४७
अवतार: कूपादेः । अवस्तारो जवनिका । हलश्च । रमन्त
योगिनोऽस्मिन्निति रामः । अपमृज्यतेऽनेन व्याध्यादिन्त्यिपा-
मार्गः । विमार्गः । समूहनी ।।
अध्यायन्यायोधावसंहाराश्च.३।३ । १२२॥
अधीयतेऽस्मिन्नध्यायः॥नियन्त्युावन्ति संहरन्त्यनेनेति विग्रहः।।
अवहाराधारावायानामुपसंख्यानम् * ॥
उदकोऽनुदके ३ । ३ । १२३ ।।
उत्पूर्वादश्चतेर्घञ् नतूदके । घृतमुदच्यते उध्रियतेऽस्मिन्निति
घृतांदकश्चर्ममयं भाण्डम् । अनुदके किम् । उदकोदश्चनः ।।
जालमानायः३।३।१२४॥
आनीयन्ते मत्स्यादयोऽनेनेत्यानायः । जालम् इति किम् ।
आनयः॥
खनो घ च ३।३ । १२५॥
चादञ् । आखनः आखानः । पित्करणमन्यतोऽप्ययमिति
ज्ञापनार्थम् । तेन भगः पदमित्यादि ।
खनेडेडरेकेकवका वाच्याः ॥
आखः । आखरः आखनिक आखनिकवकाएते खनित्रवचनाः।
ईपद्दुःसुपु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् । करणाधिकरणयोरिति निवृत्तम् ।
कृच्छे-दुष्करः क्टो भवता । अकृच्छ-ईपत्करः सुक्रः॥
निमिमीलियां खलचोरात्वं नेति वाच्यम् * ॥
ईपनिमयः । दुष्प्रमयः । सुविलयः । निमयः । मयः । लयः।।
उपसर्गात् खल्पभोः७।११६७॥
उपसर्गादेव लभेर्नुम् । ईपत्प्रलम्भः । दुष्प्रलम्भः 1 सुप्रलम्भः ।
उपालम्भः । उपसर्गात् किम् । ईपल्लमः लाभः ।।
न सुदुभ्यो केवलाभ्याम् ७।१।६८॥

२४८ सुगमकौमुद्याः। उपसर्गान्तररहिताभ्यां सुदुभ्या लभेर्नुम्न खल्योः । मुलभम् । दुर्लभम् । केवलाभ्यां किम् । सुप्रलम्भः । अतिदुर्लम्भः । कथं तर्हि अतिसुलभमतिदुर्लभमिति । यदा स्वती कर्मप्रवचनीयौ तदा भवि- प्यति॥ कर्तृकर्मणोश्च भूकृभोः३।६। १२७ ॥ कर्तृकर्मणोरीपदादिपु चोपपदेषु भृकृत्रोः खल् यथासंख्यं ने प्यते कर्तृमणी च धातोरव्यवधानेन प्रयोज्ये । ईपदादयस्तु ततः प्राक् ॥ कर्तृकर्मणोश्व्यर्थयोरिति वाच्यम् ॥ खित्वान्मुम् । अनाढ्यन दुःखेन भृयते दुराढयम्भवम् । ईप दाढयम्भवम् । स्वादयम्भवम् । ईपदाढयङ्करः । दुराव्यङ्करः । स्वा ढयङ्करः । व्यर्थयोः किम् । आढयेन सुभ्यते । आतो युच् खलीपादः । ईपत्पानः सोमो भवता । दुष्पानः ॥ भापायां शासियुधिशिधृपिभ्यो युज्वाच्यः ॐ ॥ दुःशासनः । दुर्योधन इत्यादि । पात्पदान्तात् ८।४।३४॥ नस्य णो न । निष्पानम् । सर्पिष्पानम् । पात् किम् । निर्णयः। पदान्तात् किम् । पुष्णाति । पदेऽन्तः पदान्तोऽयमिति सप्तमीस- मासोऽयम् । तेनेह न । सुसर्पिष्केण । आवश्यकाधमयॆयोणिनिः। अवश्यंकारी । शतंदायी । कृत्याश्च । आवश्यकाधमर्ययोरित्येव । अवश्यं हरिः सेव्यः । शतं देयम् । क्तिक्तौ च संज्ञायाम् । तितुन इति नेट् । भवतातिः ॥ न क्तिचि दीर्घश्च ६।४।३९ ॥ मनिटां वनतितनोत्यादीनां च दीर्घानुनासिक्लोपौ न स्त. क्तिीचे परे। यन्तिः । रन्तिः। वन्तिः । तन्तिः॥ सनः क्तिचि लोपश्चास्यान्यतरस्याम् ६।४।१९॥

A
द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः ।
२४९
सनोतेः क्तिच्यात्वं वा लोपश्च वा। सनुतात् । सातिः सतिः
मन्तिः । देवा एनं देयासुदेवदत्तः । अलंखल्लोः प्रतिपेधयोः प्राचां
क्त्वा । प्रायां ग्रहणं पूजार्थम् । अमैवाव्ययेन इति नियमानोपपद-
समासः । दोदरो' । अलं दत्त्वा । घुमास्था । पीत्वा खलु । अलं.
खल्योः किम् । माकार्षीत् । प्रतिषेधयोः किम् । अलंकारः ।।
उदीचां माङो व्यतीहारे ३।४ । १९ ॥
व्यतीहारेऽर्थे माडः क्त्वा । अपूर्वकालार्थमिदम् ॥
मयतेरिदन्यतरस्याम् ६।४।७०॥
मेड इकारोऽन्तादेशः वा ल्यपि । अपमित्य याचते अपमाय ।
उदीचाग्रहणाद्ययाप्राप्तमपि । याचित्वा अपमयते ॥
परावरयोगे च ३।४।२० ॥
परेण पूर्वस्यावरेण परस्य योगे गम्ये धातोः क्त्वा । अप्राप्य
नदी पर्वतः । परनदी योगोऽन पर्वतस्य । अतिक्रम्य पर्वतं स्थिता
नदी । अवरपर्वतयोगोऽत्र नद्या. । समानकर्तृकयोः पूर्वकाले । भु.
तवा व्रजति । द्वित्वमतन्त्रम् । स्नात्वा भुक्त्वा पीत्वा व्रजति । अनु-
दात्त इत्यनुनासिकलोपः । विष्णु नत्वा स्तौति ॥
स्वरत्यादेः शुकः किति इति नित्यमिडभावः पूर्ववि-
प्रतिपधेन ॥
स्वृत्वा । सूत्वा । धूत्वा ।
क्त्वि स्कन्दिस्यन्दोः ६।४।३१॥
एतयोनेलोपे न स्यात्क्त्वि परे। स्वन्त्वा। अदित्वादिडा । स्य-
न्त्वा स्यन्दित्वा ॥
न क्त्वा सेटू १।२।१८॥
सेट् क्त्वा किन्न । गयित्वा । सेट् किम् । कृत्वा ॥
मृडमृदगुधकुपक्किशवदवसः क्त्वा ॥२७॥

- सुगमकौमुद्याः। एभ्यः सेट् क्त्वा कित् । मृडित्वा । क्लिश. तत्या इत्ति वेट् । क्लिशित्वा क्लिग । उदित्वा । उपित्वा । रुदरिद इति नित्वम् । रुदित्वा । विदेत्वा । मुषित्वा । गृहीत्वा ।। नोपधात्थफान्ताद्वा॥२॥२३॥ सेट् ता कित्स्यादा । श्रथित्वा श्रन्थित्वा । गुफित्वा गुम्फि त्वा । नोपधात् पिम् । पोथित्वा । रेपित्वा । वञ्चिलुभवृतश्च १।२।२४॥ सेट् क्त्या किदा । वचित्वा वञ्चित्वा । लुचित्वा लुञ्चित्वा । ऋतित्वा अर्तित्वा ॥ तृपिमृपिकृशेः काश्यपस्य १।२।२५ ॥ प्रभ्यः सेट्र तवा विद्वा । तृपित्वा तर्पित्वा । मृपित्वा मर्पित्वा । कृशित्वा कर्शित्वा । रलो व्युपधात इति वा वित्त्वम् । इतित्वा योतित्वा । लिखित्वा लोखत्वा । रलः किम् । सेवित्वा । व्युपधात किम् । वर्तित्वा । हलादे. क्म् ि। एपित्वा । सेट् किम् । भुक्त्वा । वसतिक्षुधोरिट् । उपित्वा । क्षुधित्वा क्षोधित्वा । अञ्चे. पूजायाम् इति नित्यमिट् । अश्चित्वा । गती तु अक्त्वेत्यपि । लुभित्वा लोभि- त्वा ।लुमो विमोहने इतीद् । विमोहने तु । लुब्धया। जवश्च्योःक्त्वि ७।२१५५॥ आभ्या परस्य क्त्व इर् । जरीत्वा जरिवा। प्रश्चित्वा ।। उदितो वा ७१२१५६॥ उदितः परस्य क्व इड्डा । शमित्वा । जनुनामिक्स्य कि इति दीर्घ । शान्ता । नत्वा टेवित्वा ।। इति ९६ अंशा। कमश्च रित्व ६।४।१८॥ प्रमठपधाया वा दीर्घः। अलादी तिव परे । मावा न्वा । झाल किम् । प्रमिता। पडश इति वेद । पवित्वा प्रत्या।। ।

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २५१ जान्तनशां विभापा६।४।३२॥ जान्तानां नशेश्च नलोपो वा क्तिव परे। मक्त्वा भइक्त्वा । रक्त्या ग्इक्वा । मस्जिनशोः इति नुम् । तस्य पक्षे लोपः । नष्ट्वा नंष्टा । ग्धादिभ्यश्च इतीदपक्षे । नगित्वा ।। झलादाविति वाच्यम् ॥ नेह । अञ्जित्वा । अदित्यादेट्पक्षे । अत्त्या अत्तता । जन- मन इत्यात्वम् । खात्वा खनित्वा । यतिस्यति इतीत्वम् । दित्वा । मित्या । मित्वा । स्थित्वा । दधानः। हित्वा । जहातेश्च वित्व ७।४।४३ ॥ हित्या । हाडस्तु हात्वा । अदो जरिधः । जग्ध्वा । ममाड. नपूर्व तयो ल्यप् तुक । प्रकृत्य । अन- किम् । अकृत्वा । पर्युदासाश्रयणान्नेह । परमकृत्वा ।। पत्ततुकोरसिद्धः ६।१।८६॥ पत्वे तुफि च कर्तव्ये एकादेशशासमसिद्धम् कोमिचत् । । पत्वं न । अधीत्य । प्रेत्य । हस्वस्य इति तुक् ।। वा ल्यपि ६।४ । ३८॥ अनुदात्तोपदेशानां वनतितनात्यादीनामनुनामिकलोपो या न्यात्यपि । व्यवस्थितविभापेयम् । तेन मान्तानिटां वा नान्ता- निटां बनादीनां च नित्यम् । आगत्य । आगम्य । प्रणत्य । प्रणम्य । प्रहत्य । प्रमत्य । प्रयत्य । वितत्य । अदा जन्धिः ।। अन्तरङ्गानपि विधीबहिरङ्गो ल्यबाधते ॥ जग्धिविधी ल्यग्रहणात् तेन हित्वदत्वात्वे त्वदीयत्वगृटिटी ल्यपि न । विधाय । प्रदाय । प्रवन्य । प्रस्थाय । प्रक्रम्य । आप. न्छय । प्रदीव्य ॥ न ल्यपि ६।४।६९॥ ल्यपि परे घुमास्थादेरीत्वं न । धेट । प्रधाय । प्रमाय । प्रगाय । ।

सुगमकौमुद्याः। प्रपाय । प्रहाय । प्रसाय । मीनातिमिनोति इत्यात्वम् । प्रमाय ! निमाय । उपदाय । विभापालीयते। विलाय मिलीय । णिलोपः। उत्तार्य । विचार्य। ल्यपि लघुपूर्वात् ६।४।५६॥ लघुपूर्वात्परस्य णेरयादेशो ल्यपि । विगणय्य । प्रणमय्य । प्र. वेभिदय्य । लघुपूर्वात् किम् । संप्रधार्य ॥ विभापापः ६।४।५७॥ आमोतेणैरयादेशो वा ल्यपि । प्रापय्य प्राप्य ।। क्षियः ६।४।५९॥ क्षियो ल्यपि दीर्घः । प्रक्षीय ।। ल्यपि च ६।१।४१॥ वैजो त्यपि मंप्रसारणं न । प्राय ॥ ज्यश्च ६।१।४२॥ प्रज्याय ॥ व्यश्च ६।१।४३॥ उपव्याय॥ विभापा परेः६।१।४४॥ परेव्यंजो वा संप्रसारणं ल्यापे । तुकं बाधित्वा परत्वात् हल: इति दीर्घः । परिवीय परिव्याय । कथं मुखं व्यादाय स्वपिति निमील्य हसति इति । व्यादानसंमीलनोत्तरकालेऽपि स्वापहासयो- रनुवृत्तेस्तदंशविवक्षया भविष्यति । आमीक्ष्ण्ये णमुल्च स्मार स्मार नमति शिवम् । स्मृत्वा स्मृत्वा । पायं पायम् । भोज भोजम् । श्रावं श्रावम् । चिण्णमुलोः इति णमुल्परे णी वा दीर्घः । गोम ... गामम् । गमं गमम् । विमापा विष्णमुलोः इति नुम्वा । लम्भ लम्मम् । लाभ लाभम् । व्यवस्थितविभापयोपसृष्टस्य नित्यं नुम् । प्रलम्भं प्रलम्भम् । जाग्रोऽविचिण इति गुणा जागरं जागरम् । ण्य- न्तस्याप्येवम् ।।

। द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । न यधनाकाक्षे ३।४।२३ यच्छब्द उपपदे पूर्वकाले यत्माप्तं तन्न । यत्र पूर्वोत्तरे क्रिये त- द्वाक्यमपरं नाकांक्षते चेत् । यदयं मुड़ते ततः पठति । इह क्त्वाण- मुलौ न । अनाकांक्षे किम् । यदयं भुक्त्वा व्रजति ततोऽधीते ।। विभापाप्रथमपूर्वेपु ३।४।२४॥ आभीक्ष्ण्य इति नानुवर्तते । एपूपपदेषु समानर्तृकयोः पूर्व- काले क्त्वाणमुली वा। अग्रेभोज व्रजति । अग्रेभुक्त्वा । प्रथमं भो. जम् । प्रथमं भुक्त्वा । पूर्व भोजम् । पूर्व भुक्त्वा । पक्षे लडादयः । अग्रे भुङ्क्ते ततो व्रजति । आभीक्ष्ण्ये तु । पूर्वविप्रतिषेधेन नित्यमेव विधिः । अग्रे भोज भोज व्रजति । भुक्त्वा भुक्त्वा ॥ कर्मण्याकोशे कृमः खमुभ् ३।४।२५॥ कर्मण्युपपद आकोशे गम्ये चौरंकारमाकोशति । क्रोतिरुचा- ग्णे । चौरशब्दमुच्चार्येत्यर्थः ।। स्वादुमि णमुल ३।४।२६॥ स्वार्थेषु कृत्रो णमुल् । एककर्तृकयोः पूर्वकाले पूर्वपदस्य मा- न्तत्वं निपात्यते । असादुं स्वादुं कृत्वा भुङ्क्ते स्वादुकार भुङ्क्ते। संपन्नंकारम् । लवणकारम् । संपन्नलवणशब्दौ स्वादुपर्यायौ। वा- मरूपेण क्त्वापि । स्वादुकृत्वा भुते॥ अन्यथैवंकथमित्थंसुसिद्धाप्रयोगश्चेत् ३।४।२७॥ एपु कृती णमुल् । सिद्धोऽप्रयोगोऽस्यैवंभृतश्चेत्कृषव्यर्थत्वात्म- योगानह इत्यर्थः । अन्यथाकारम् । एवंकारम् । कथंकारम् । इत्थंकारं भुते । इत्थं भुत इत्यर्थः । सिद्ध इति किम् । शिरोऽन्यथा कृत्वा भुते॥ यथातथयोरसूयाप्रतिवचने ३।४।२८॥ कृत्रः सिद्धाप्रयोग इत्येव । अस्यया प्रतिवचने । यथाकारमह मोक्ष्ये । तथाकारं भोक्ष्ये । किं तबानेन । ।

सुगमकौमुद्याः।
कर्मणि शिविदोः साकल्ये ३।४।२९॥
कर्मण्युपपदे णमुल् कन्यादर्श वरयति । सर्वाः कन्या इत्यर्थः ।
ब्राह्मणवेद भोजयति। यं यं ब्राह्मणं जानाति लभते विचारयति
नातं सर्व भोजयतीत्यर्थः ॥
यावति विन्दजीवोः३।४।३०॥
यावद्वेदं भुते । यावल्लभते तावदित्यर्थः । यावज्जीवमधीते ।।
चौदरयोः पूरेः३।४।३१॥
कर्मणीत्येव । चर्मर स्तृणाति । उदरपूरं भुते॥
वर्पप्रमाण उलोपश्चास्यान्यतरस्याम् ३।४।३२॥
कर्मण्युपपदे परेर्णमुल स्यादूवारलोपश्च वा। समुदायेन वर्षमा-
नाण्ये गम्ये । गोष्पदपूरं वृष्टो देवः । गोष्पदपं वृष्टो देवः । अस्य
इति किम् । उपपदस्य मा मृत् । मूपिकाविलप्रम् ॥
चेले कोपेः३।४।३३॥
चेलार्येषु कर्मसूपपदंषु गोपेणमुल वर्षप्रमाणे । चेलनोपं वृष्टो
देवः । यत्रकोपम् । वसननोपम् ॥
निमूलसमूलयोः कपः३।४।३४॥
कर्मणीत्येव कपादिष्वनुमयोगं वक्ष्यति । अत्र प्रकरणे पूर्वकाल
इति न संबध्यते । निमूलपापं कपति।समूलकापं कपति । निमूलं
ममूलं कपतीत्यर्थः । एकम्यापि धात्वर्थस्य निमूलादिविशेषणसं.
बन्धादः । तेन सामान्यविशेषमाग्न विशेषणविगेप्यमाः ।।
शुष्कचूर्णमक्षेपु पिपः ३१४१३५ ॥
पपु कर्ममु पिपेर्णमुल । शुष्पं पिनष्टि । शुष्कं पिनष्टीत्यर्थः ।
चूर्णपेपम् । मक्षपेपम् ॥
समूलाकृतजीयेपु हन्कृग्रहः ३।४।३६॥
फर्मणीन्येव । गमन्यानं इन्नि । अतकार फगेनि । जीवपाई

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २५५
गृनाति । जीवतीति जीवः । इगुपधलक्षणः कः । जीवन्त
गृहातीत्यर्थः॥
करणे हनः३।४।३७॥
पादघातं हन्ति । पादेन हन्तीत्यर्थः । यथाविध्यनुप्रयोगार्थः ।
मन्नित्यसमासार्थोऽयं योग। भिन्नधातुसंबन्धे तु हिंसानां च
इति वक्ष्यते॥
स्नेहने पिपः३।४।३८॥
स्निह्यते येन तस्मिन्करणे पिपेर्णमुल । उदपेपं पिनष्टि । उदकेन
पिनष्टीत्यर्थः ॥
हस्ते वर्तिग्रहोः३।४।३९ ।।
हस्तार्थे करणे । हस्तवर्त वर्तयति । वर्तम् । हस्तेन गुलिका
क्गेतीत्यर्थः । हस्तग्राहं गृह्णाति । ग्ग्राहम् । पाणिग्राहम् ॥
स्वे पुपः३।४।४०॥
करण इत्येव । स्व इत्यर्थग्रहणं तेन स्वरूपे पर्याये विशेपे च
णमूल् । सपोपं पुष्णाति । धनपोपम् । गोपोपम् ।।
अधिकरणे बन्धः३।४।११॥
चक्रवन्धं बध्नाति । चक्रे पन्नातीत्यर्थः ।।
इति ९७ अंशाः।
संज्ञायाम् ३।१।१२।।
नातेर्णमुल्संज्ञायाम् । क्रौञ्चरन्धं उद्ध' । मरिकारन्वम् ।
अट्टालिकावन्धम् । बंधविशेषाणा संज्ञा पताः॥
कर्को वपुरुपयो शिवहोः ३।४।१३ ॥
जीवनाशं नश्यत्ति । जोवो नश्यतीत्यर्थः । पुरुषवाह वहति ।
पुरुपो बहतीत्यर्थः॥
ऊर्वे शुपिपूरोः ३१४।४४॥

२५६ सुगमकौमुद्याः। अवं कर्तरि । ऊर्ध्वशोपं शुष्यति । वृक्षादिरूद्म एव तिष्ठन्छु- ध्यतीत्यर्थः । ऊर्ध्वपूरे पूर्यते । ऊर्ध्वमुख एव घटादि वर्षोदकादिना पूर्णो भवतीत्यर्थः॥ उपमाने कर्मणि च ३।४।४५॥ चात्कर्तरि । घृतनिधायं निहितं जलम् । घृतमिव सुरक्षितमि- न्यर्थः । अनकनाशं नष्टः । अजक इव नष्ट इत्यर्थः । कपादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः३ । ४।४६॥ यस्माण्णमुलुक्तः । स एवानुप्रयोक्तव्य इत्यर्थः । तथैवोदाहृतम्।। उपदंशस्तृतीयायाम् ३।४।४७॥ इतः प्रभृति पूर्वकाल इति संवध्यते । तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतर- स्याम् इति वा समासः । मूलकोपदंशं भुते । मूलकेनोपदंशम् । दश्यमानस्य मूलकस्य भुजि प्रति करणत्वात्तृतीया।यद्यप्युपदंशिना सह न शाब्दः संवन्धस्तथाप्यायोऽस्त्येव कर्मत्वात् । एतावतैव सामर्थ्येन प्रत्ययः समासश्च तृतीयायामेति वचनसामर्थ्यात् ॥ हिंसार्थानां च समानकर्मकाणाम् ३।४।४८॥ तृतीयान्त उपपदेनुप्रयोगधातुना समानकर्मकाद्धिसार्थात् णमुल् । दण्डोपघातं गाः कालयति । दण्डेनोपघातम् । दण्ड- ताडम् । समानकर्मकाणाम् इति किम् । दण्डेन चोरमाहत्य गाः कालयति । सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्पः३।४।४९ ॥ उपपूर्वेभ्यः पीडादिभ्यः सप्तम्यन्ते तृतीयान्ते चोपपदे णमुल् । पार्थोपपीड शेते । पार्श्वयोरुपपीडम् । पार्थाभ्यामुपपीडम् । बजोपरोधं गाः स्थापयति । ब्रजेन बने उपरोधं वा । पाण्युपकर्प थानाः संगृह्णाति । पाणावुपकर्षम् । पाणिनोपकर्पम ॥ समासत्ती३।४।५०॥ तृतीया सप्तम्योर्धातोर्णमुल संनिक गम्यमाने । केशमा युध्यन्ते । वेगेपु गृहीत्वा । हस्तग्राहम् । हस्तेन गृहीत्वा ।। .

- संज्ञार्थमासेवायामिह पुनार्वेधिः । गेहानुप्रवेशमास्ते गेहं गेहमनुः द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २५७ प्रमाणे च३।४।५१॥ तृतीयासप्तम्योरित्येव । यंगुलोत्कर्ष खण्डिकां छिनत्ति । व्यंगु. लेन चंगुले चोत्कर्षम् ॥ अपादाने परीप्सायाम् ३।४।५२ ॥ परीप्सा त्वरा । शय्योत्थायं धावति ॥ द्वितीयायां च ३।४।५३॥ परीप्सायामित्येव । यष्टिग्राहं युध्यन्ते । लोप्टग्राहम् ॥ अपगुरो णमुलि ६।११५३॥ गुरी उद्यमने इत्यस्यैचोवात् णमुलि । अस्यपगोरं युध्यन्ते । अस्यपगारम् ॥ स्वाङ्गेऽध्रुवे ३।४। ५४॥ द्वितीयायामित्येव । अध्रुवे स्वाङ्गे द्वितीयान्ते धातोर्णमुल् । भूविक्षेपं कथयति । भुवं विक्षेपम् । अधुवे किम् । शिर उत्क्षिप्य येन विना न जीवनं तद् ध्रुवम् ॥ परिक्लिश्यमाने च ३।४।५५॥ सर्वतो विवाध्यमाने स्वाङ्गे द्वितीयान्ते णमुल् । उरः प्रतिपेपं युध्यन्ते । कृत्स्नमुरः पीडयन्त इत्यर्थः । उरोविदारं प्रतिचस्करे नखः । ध्रुवार्थमिदम् ॥ विशिपतिपदिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः ३। द्वितीयायामित्येव । द्वितीयान्त उपपदे विश्यादिभ्यो णमुल् । व्याप्यमान आसेव्यमाने चार्थे गम्ये गेहादिद्रव्याणां विश्यादि- क्रियाभिः साकल्येन संबन्धो व्याप्तिः । क्रियायाः पौनःपुन्यमा सेवा । नित्यवीप्सयोः इति द्वित्वं तु न भवति । समासेनैव स्वभा- वतस्तयोरुक्तत्वात् । यद्यप्यामीक्ष्ण्ये णमुलुक्त एव तथापि उपपद- २८८ सुगमकौमुद्याः। प्रवेशम् । गेहमनुप्रवेशमनुप्रवेशम् । एवं गेहानुप्रपातम् । गेहानु प्रपादम् । गेहानुस्कन्दम् । असमासे तु गेहस्य णमुलन्तस्य व पर्यायेण द्वित्वम् ॥ अस्यतितृपोः क्रियान्तरे कालेपु ३।४।५७ ॥ क्रियामन्तरयति व्यवधत्त इति क्रियान्तरः तस्मिन्धात्वर्थ वर्त- मानादस्यतेस्तृष्यतेश्च कालपाविपु द्वितीयान्तेपूपपदेषु णमुल । यहात्यासंगाः पाययति व्यहमत्यासम् । यहतर्पम् व्यहन्तर्पम् । अ- त्यसनेन तर्पणेन च गवां पातक्रिया व्यवधीयते । अद्य पाययित्वा। व्यहमतिक्रम्य पुन' पाययतीत्यर्थः ।। नाम्यादिशिग्रहोः ३।४।५८॥ द्वितीयायामित्येव । नामादेशमाचष्टे । नामग्राहमादयति ।। अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृमः क्त्वाणमुलौ३।४।५९॥ अयथापिताख्यानं नाम । अप्रियस्याः प्रियस्य च नीच: कथनम् । उच्चैःकृत्य । उच्चैः कृत्वा । उच्चैः कारमप्रियमाचष्टे । नीचे:- कृत्य । नीचैःकृत्वा । नीचै कारं प्रियं ब्रूते ॥ तिर्यच्यपवर्गे ३।४।६०॥ तिर्यकशब्दे उपपदे कृशः क्त्वाणमुलौ समाप्तौ गम्यायाम् तिर्यकृय तिर्यक वा गतः तिर्यकारम् । समाप्य गत इत्यर्थः । अपवर्गे किम् । तिर्यकृत्वा काष्ठं गतः ।। स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्योः३।४।६३॥ मुखतः कृन्य गतः मुखतः कृत्वा । मुखताकारम् । मुखतोभृय । मुखतोभूत्वा । मुखतोभावम् ।। नाधार्थप्रत्यये च्च्यर्थे।४।६२॥ नाधार्थमत्ययान्ते च्च्यविपये उपपदे कृभुवीः क्त्वाणमुली। अनाना नानाकृत्वा नानाकृत्य नानाकारम् । विनाकृत्य विनाकृत्वा विनाकारम् । नानाभ्य नानाभूत्वा नानाभावम् । अनेक द्रव्यमेकं ।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । कृत्वा एकधाभूय एकधाभूत्वा एकधाभावम् । एकधाकृत्य एकधा- कृत्वा एकधाकारम् ॥ तूष्णीमि भुवः३।४।६३॥ तूष्णींशब्द उपपदे भुवः क्त्वाणमुला । तृष्णीभृय तृष्णीभृत्वा तृष्णीभावम् ॥ अन्वच्यानुलोम्ये ३ । ४।६४ ॥ अन्वक्शब्द उपपदे आनुकूल्ये गम्ये भुवः क्त्वाणमुली। अन्व- ग्भ्य आस्ते । अन्वग्भूत्वा अन्वम्भावस् । अग्रतः पार्थतः पृष्ठतो वानुकूलो भूत्वा आस्त इत्यर्थः । आनुलोम्ये किम् । अन्वरभूत्वा- तिष्ठति । पृष्ठतो भृत्वेत्यर्थः । इति कृत् ।। इति ९८ अंशाः। अनभिहिते कर्मादौ द्वितीयादय उक्ताः । अभिहिते तु कर्मादी प्रातिपदिकार्थे इति प्रथमैव । अभिधानं तु प्रायेण तिड्कृत्तद्धित- समासैः। तिङ्-हरिः सेव्यते । कृत्-लक्ष्म्या सेवितः। तद्धितः-शतेन क्रीतः शत्यः । समास:-प्राप्त आनन्दी यं प्राप्तानन्दः । कचिन्नि पातेनाभिधानम् । यथा, विषवृक्षोपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसांप्रतम् । असांप्रतमित्यत्यनयुध्यत इत्यर्थः ।। तथायुक्तं चानीप्सितम् ११४१५०॥ इप्सिततमवत्कियया युक्तमनीप्सितमपि कारक कर्मसंज्ञम् । गमं गच्छंस्तृणं स्पृशति । ओदनं भुञ्जानो विपं भुते ॥ अकथितं च १४५१॥ अपादानादिविशेपैरविवक्षितं कारकं कर्मसंज्ञम् । दुह्यापच्द- ण्डरुधिच्छिचित्रूशासुजिमथ्मुपाम् । र्मयुक्स्यादकथितं तथा न्यानीहकृष्वहाम् ।। दुहादीनां द्वादशानां नीप्रभृत्तीनां चतुर्णाच कर्मणा याज्यते तदेवाकथितं कर्म इति परिगणनं कर्तव्यमित्यर्थः । गां दोग्धि पयः । वलिं याचते वसुधाम् । अविनीतं विनयं या चत । तण्डुलानोदनं पचति । गर्गाञ्छतं दण्डयति । ब्रजमवरु- २६० सुगमकीमुद्याः। णद्धि गाम । माणवकं पन्यानं पृच्छति । वृक्षमवचिनोति फलानि माणवकं धर्म नृते गास्ति या । शतं जयति देवदत्तम् । सुधा क्षी- रनिधि मथ्नाति । देवदत्तं गतं मुष्णाति । ग्राममजा नयति हरति कति वहति वा । अर्थनिवन्धनेयं संज्ञा । बलि भिक्षते वसुधाम् । माणपकं धर्म मापते अभिधत्ते वक्तीत्यादि । कारकं किम् । माणव. कस्य पितरं पन्थानं पृच्छति अकर्मकधातुभियोगे देशः कालो भावो गन्तव्यो:- ध्वा च कर्मसंज्ञक इति वाच्यम् ॐ ॥ स्वपि । मासमास्ते । गोदोहमास्ते । कोशयास्ते ।। गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता सणौ १।४।५२॥ गत्वाद्यर्थाना शब्दकर्मणामकर्मकाणा चाणौ य' कर्ता स जी र्म स्यात् । शत्रूनगमयत्स्वर्ग वेदार्य स्वानवेदयत् । आशयचामृतं देवान्वेदमध्यापयविधिम् ॥ आसयत्सलिले पृथ्वी यः स मे श्रीह- रिगतिः । गति इत्यादि किम् । पाचयत्योदनं देवदत्तेन । अण्य- न्ताना किम् । गमयति देवदत्तो यज्ञदत्तं तमपरः प्रयुते । गमयति देवदत्तेन यज्ञदत्त विष्णुमित्रः॥ नीवह्योन ॥ नाययति वाहयति वाभार भृत्येन ॥ नियन्तकर्तृकस्य वहेरनिषेधः * ॥ पाहयति रथं वाहान्सूतः ।। आदिखायोन*॥ आदयति खादयति वान्नं वटुना ।। भवरहिंसार्थस्य न ॥ भक्षपत्पन्न बटुना। हिसार्थस्य पिम् । गक्षयति वलीव- न्सस्पम् ॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २६१ जल्पतिप्रभृतीनामुपसंख्यानम् ॥ जल्पयति भापयति वा धर्म पुत्रं देवदत्तः ।। दृशेश्च ॥ दर्शयति हरि भक्तान् । सूत्रे ज्ञानसामान्यार्थानामेव ग्रहणं नतु तद्भिशेपार्थानामित्यनेन ज्ञाप्यते । तेन स्मरति जिघ्रति इत्यादीनां न । स्मारयति प्रापयति देवदत्तेन ॥ शब्दायतेन ॥ शब्दाययति देवदत्तेनाधात्वर्थसंगृहीतकर्मत्वेनाकर्मकत्वात्माप्तिः । येषां देशकालादिभिन्नं कर्म न संभवति तेजाफर्मकाः नत्वविवक्षि- नकर्माणोऽपि । तेन मासमासयति देवदत्तम् इत्यादी कर्मत्वं भ- इति । देवदत्तेन पाचयति इत्यादी तु न । हकारन्यतरस्याम् १।४।५३॥ हकोरणी यः कर्ता स णी वा कर्मसंजः । हारयति कारयति चा भृत्यं भृत्येन वा क्टम् ।। अभिवादिदृशोरात्मनेपदे वेति वाच्यम् * ॥ अभिवादयते दर्शयते देव भक्तं भक्तेन वा ॥ अधिशीइस्थासां कर्म १४॥४६॥ अधिपूर्वाणामेपामाधारः कर्म स्यात् । अधिशेते अधितिष्ठति अध्यास्ते वा वैकुण्ठं हरिः ।। अभिनिविशश्च १।४।४७॥ अभिनीत्येतत्संघातपूर्वस्य विशतेराधारः कर्म स्यात् । अभिनि- विशते सन्मार्गम् । परिक्रयणे संप्रदानम् इति सूत्रादिह मण्डूक- त्यान्यतरस्यां ग्रहणमनुवर्त्य व्यवस्थितविमापाश्रयणात्कचिन्न । पापेऽभिनिवेशः॥ उपान्वध्यासः ॥४॥४८॥ उपादिपूर्वस्य वसतेराधारः कर्म स्यात् । उपवसति अनुवसति अधिवसति आवसति वा वैकुण्ठं हरिः॥ .

२६२
सुगमकीमुद्याः।
अभुक्त्यर्थस्य न ॐ॥
वने उपवसति । उभसर्वतसौः कार्या विगुपर्यादिषु त्रिषु ।
द्वितीयाडतान्तेषु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते॥ उभयतः कृष्ण गोपा।
सर्वतः कृष्णम् । धिक् कृष्णाभक्तम् । उपर्युपरि लोक हरिः ।
अध्यधिलोकम् । अधोधोलोकम् । अभितःपरित समयानिक्पा
हापतियोगेऽपि। अभितः कृष्णम् । परित. कृष्णम् । समया ग्राम
निकपा लकाम् । हा कृष्णाभक्तम् । तस्य शोच्यत इत्यर्थः । बुभु
शितं न प्रतिभाति किंचित् ॥
इति ९९ अंशाः।
अन्तरान्तरेण युक्ते २१३१४॥
आभ्या योगे द्वितीया । अन्तरा त्वा मा हरिः । अन्तरेण हरि
न सुखम् ॥
कर्मप्रवचनीयाः १।४।८३॥
इत्यधिकृत्य ॥
अनुर्लक्षणे १।४।८४॥
लक्षणे द्योत्येनुरुक्तसंज्ञः । गत्युपसर्गसज्ञापवादः ।।
कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया २।३।८॥
एतेन योगे द्वितीया । जपमनुप्रावपत् । हेतुभूतजपोपलक्षित
चर्पणमित्यर्थः । परापि हेतौ तृतीयानेन वाध्यते । रक्षणेत्यभृत
इत्यादिना सिद्धे पुन' मंजाविधानसामर्थ्यात् ।।
तृतीयाथै ११४।८५॥
जस्मिन्योत्येनुमक्तसंज्ञः । नदीमन्वयसित्ता सेना । नया सह
मंयद्रेत्यर्थः । पित्र वन्धने क्तः ॥
हीने ११४।८६॥
हीने पोत्पेनुः प्राग्वत् । अनुहरि मुराः । हरेहींना इत्यर्थः ।।
उपोऽधिके च ११४१८७॥

२६३ द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । अधिक होने च द्योत्य उपेत्यव्ययं प्रासंज्ञम् अधिके सप्तमी वक्ष्यते । हीने उपहार सुराः॥ लक्षणेत्यंभूताख्यानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः १।४।९०॥ एष्वर्थेषु विषयभृतेषु प्रत्यादय उक्तसंज्ञाः लक्षणे वृक्ष-प्रति परि नु वा विद्योतते विद्युत् । इत्थंभूताख्याने भक्तो विष्णुं प्रति पनि नु वा । मागे लक्ष्मीहरि प्रति परि अनु वा । हरेर्भाग इत्ययः । सायां वृक्ष वृक्षं प्रति परि जनु या सिञ्चति । अत्रोपमर्गत्वाभा- न पत्वम् । एपु किम् । परिपिञ्चति ॥ अभिरभागे १।।९१ ॥ भागवर्जे लक्षणादावभिरुक्तसंज्ञः स्यात् । हरिमभिवर्तते भक्तो 'मभि । देवं देवमभिसिञ्चति । अभागे किम् । यदत्र ममाभि- त्तिहीयताम् ॥ अधिपरी अनर्थको १।४।९३॥ उक्तसंज्ञी। कुतोऽध्यागच्छनि । कुतः पर्यागच्छनि । गतिसं. माधात् । गतिर्गतौ इति निघातो न । सुः पूजायाम् १।४। ९४॥ मुसिक्तम् । सुस्तुतम् अनुपमर्गत्वान्न पः । पृजायां किम् । पतं किं तवात्र । आक्षेपोऽयम् ।। अतिरतिक्रमणे च १।४।९५॥ अतिक्रमणे पूजायां चाति उक्तसंज्ञः । अतिदेवान्कृष्णः ॥ अपिः पदार्थसंभावनान्यवसर्गगहासमुच्चयेषु ॥४॥१६॥ एषु द्योत्येष्वपिरुक्तसंज्ञः । सर्पिपोऽपि स्यात् । अनुपसर्गत्वान्न संभावनाया लिडू । तस्या एव विषयभूते भवने कर्तृदौर्लभ्यम- के दौर्लभ्यं द्योतयन्नपिशब्दः स्यादित्यनेन संवध्यते । सर्पिपः पष्ठी त्वपिशब्दवलेन गम्यमानस्य विन्दोवयवावयविभावसं- धे इयमेव ह्यपिशब्दस्य पदार्थद्योतकता नाम । द्वितीया तु नेह : • सुगमकीमुद्याः ।। प्रवर्तते । सर्पिपो विन्दुना योगो न त्वपि नेत्युक्तत्वात् । अपि स्तुयाद्विष्णुम् । संभावनं शक्त्युत्कर्षमाविष्कर्तुमत्युक्तिः । अपि- स्तुहि । अन्वयसर्गः कामचारानुज्ञा। धिग्देवदत्तमपि स्तुपादृष- लम् । गहीं। आपसिश्च । अपिस्तुहि । समुनये ॥ कालाधनोरत्यन्तसंयोगे २।३।६॥ इह द्वितीया मास कल्याणी मासमधीते । मासं गुडधानाः। क्रोश कुटिला नदी । कोशमधीते । कोश गिरिः । अत्यन्तसंयोगे किम् । मासस्य दिरधीते । कोशस्यैकदेशे पर्वतः ॥ दिवः कर्म च ११४।४३॥ *दिवः साधकतम कारक कर्मसंज्ञ स्याघात्करणसंज्ञम् । अक्षेर- शान्या दीव्यति ॥ अपवर्ग तृतीया २।३१६॥ अपवर्गः फलप्राप्तिः तस्यां द्योत्यायां कालाध्वनारत्यन्तसंयांगे तृतीया । अह्ना क्रोशेन वानुवाकोऽधीतः अपवर्ग किम् 1 मासम. धीतो नायातः॥ येनांगविकारः२1३।२०॥ येनाङ्गेन विकृतेनागिनो विकारो लक्ष्यते ततस्तृतीया । अक्षणा काणः । अक्षिसंबंधिकाणत्वविशिष्ट इत्यर्थः । अङ्गविकारः किम् । अक्षिकाणमस्य ।। इत्यंभूतलक्षणे २।३।२१॥ कंचित्कार प्राप्तस्य लक्षणे तृतीया ।जटाभिस्तापसः। जटाज्ञा प्यतापसत्वविशिष्ट इत्यर्थः॥ संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि २।३। २२ ॥ संपूर्वस्य जानातेः कर्मणि तृतीया वा । पित्रा पितरं वा संजा- नीते॥ हेतौ २।३।२३॥

सुगमकीमुद्याः। किम् । पुष्पेभ्यो बने स्पृहयति । ईप्सितमात्र इयं संज्ञा । प्रकर्षविव- क्षायां तु परत्वात्कर्मसंज्ञा । पुष्पाणि स्पृहयति । क्रुघद्रुहेासूयार्थानां यं प्रति कोपः१।४।३७॥ कुधार्थानां प्रयोगे यं प्रति कोपः स उक्तसंज्ञः। हरये क्रुध्यति द्रुह्यति ईर्ण्यति असूयति । ये प्रति कोपः किम् । भार्यामीय॑ति । मैनामन्योऽद्राक्षीदिति । क्रोधोऽमर्पः। द्रोहोपकारः । ईर्ष्याऽक्षमा । असूया गुणेषु दोपाविष्करणम् । द्रोहादयोपि कोपप्रभवा एवं गृह्यन्ते । अतो विशेषणं सामान्येन यं प्रति कोपः इति ।। क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म १॥ ४।३८॥ सोपसर्गयोरनयोर्योगे यं प्रति कोपस्तत्कारकं कर्मसंज्ञम् । क्रूरमभिक्रुध्यति । अभिद्रुह्यति ॥ राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः १।४। ३९ ॥ एतयोः कारकं संप्रदानम् । यदीयो विविधः प्रश्नः क्रियते । कृष्णाय राध्यति ईक्षते वा । पृष्टो गर्गः । शुभाशुभं पर्यालोच- यतीत्यर्थः ॥ प्रत्याङ्भ्यां श्रुवः पूर्वस्य कर्ता १।४।४०॥ आभ्या परस्य शृणोतोंगे पूर्वस्य प्रवर्तनरूपव्यापारस्य कर्ता संप्रदानम् । विप्राय गां प्रतिशृणोति आशृणोति वा । विप्रेण मां देहीवि प्रवर्तितस्तत्मतिजानीत इत्यर्थः॥ अनुप्रतिगृणश्च १।४।११॥ आभ्या गृणातेः कारकं पूर्वव्यापारस्य कर्तृभूतमुक्तसंज्ञम् । होत्रेऽनुगृणाति । प्रतिगृणाति । होता प्रथम शंसति । तमध्वर्युः प्रोत्साहयतीत्यर्थः ॥ परिक्रयणे संप्रदानमन्यतरस्याम् ११४।४४॥ नियतकालं भृत्या स्वीपरणं पग्रियणं तस्मिन् साधकतम कारखं संमदानसंज्ञं या । शतेन शताय या परिक्रीतः ।।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः । तादर्थ्य चतुर्थी वाच्या ॥ मुक्तये हरि भजति ॥ कृपि संपद्यमाने च ॥ भक्तिर्मानाय कल्पते संपद्यते जायत इत्यादि । उत्पातेन ज्ञापित च ॥ याताय कपिला विद्युत् ॥ हितयोगे च ॥ ब्राह्मणाय हितम् ।। क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः २।३।१४॥ क्रियार्था किया उपपदं यस्य तस्य स्थानिनोपयुज्यमानस्य तुमुनः कर्मणि चतुर्थी। फलेभ्यो याति । फलान्याहतु यातीत्यर्थः। नमस्फुमों नृसिंहाय । नृमिहमनुकूलयितुमित्यर्थः । एवं स्वयंमुरे नमस्कृत्य इत्यादापि ॥ तुमर्थाच्च भाववचनात् २।३।१५॥ भाववचनाश्च इति सूत्रेण यो रिहितस्तदन्तायतुर्थी स्यात् । या- गाय याति । यष्टुं यातीत्यर्थः ।। उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिलीयसी ॥ नमस्करोति देवान् । प्रजाभ्यः स्वस्ति । अग्नये स्वाहा । पितृ- भ्यः स्वधाअलमिति पर्याप्त्यर्यग्रहणम् । तेन दैत्येभ्यो हरिरलं प्रभुः समर्थः शक्त इत्यादि । प्रभ्वादियोगे पष्ठ्यपि साधुः । तस्मै प्रम- चति । स एपां ग्रामणीः इति निर्देशात् । तेन 'प्रभुव॒भृपुर्मुवनत्र- यस्य' इति सिद्धम् । वपडिन्द्राय । चकारः पुनर्विधानार्थः । तेना- शीविवक्षायां परामपि चतुर्थी चाशिपि इति पष्टी वाधित्वा चनु- येव भवति । स्वस्ति गोभ्यो भूयात् ।। मन्यकर्मण्यनादरे विभापाऽप्राणिपु २।३।१७।। प्राणिवतं मन्यतेः कर्मणि चतुर्थी वा स्याचिरस्कारे । न त्वां .

" २६८ सुगमकीमुयाः। तृणं मन्ये तृणाय वा । श्यना निर्देशात्तानादिकयोगे न । न त्वां तृणं मन्ये॥ अप्राणिष्वित्यपनीय नौकाकानशुकशृगालवर्जेष्वि- ति वाच्यम् ॥ तेन न त्वां नावं मन्य इत्यत्राप्राणित्वेऽपि चतुर्थी न । न त्वां शुने मन्य इत्यत्र माणित्वेऽपि भवत्येव ॥ गत्यर्थकमणि द्वितीयाचतुर्यों चेष्टायामनध्वनि २। ३।१२॥ अवभिन्ने गत्यर्थानां कर्मण्येते स्तश्चेष्टायाम् । ग्राम ग्रामाय वा गच्छति । चेष्टायाम् किम् । मनसा हरि ब्रजति । अनध्वनि इति किम् । पन्थानं गच्छति । गन्त्राधिष्ठितेऽध्वन्येवायं निषेधः । यदा तूत्पथात्पन्था एवाका भेतुमिष्यते तदा चतुर्थी भवत्येव । उ- त्पथेन पथे गच्छति ॥ इति १०१ अंशाः। ध्रुवमपायपादानम् । कारकमित्येव । नेह । वृक्षस्य पर्ण पतति ॥ जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसंख्यानम् * ॥ पापाजुगुप्सते विरमति । धर्मात्ममाद्यति ॥ भीत्रार्थानां भयहेतुः ११४॥२५॥ भयार्थानां त्राणार्थानां च प्रयोगे भयहेतुरपादानम् । चौराद्वि- मेति । चौरात्रायते । भयहेतुः किम् । अरण्ये विभेति त्रायते वा ।। पराजेरसोढः १।४।२६॥ परानेः प्रयोगेऽसह्योऽर्थोऽपादानम् । अध्ययनात्पराजयते । ग्लायतीत्ययः । असोढः किम् । शम्पराजयते । अमिभवती. त्यर्थः॥ वारणार्थीनामीप्सितः १।४।२७॥ . प्रवृत्तिविघातो वारणम् । वारणार्थानां धातूनां प्रयोग ईप्सितो- दितीयखण्डस्य मयमा मागः । यांमादानम् । यवेम्यो गां वारयति । ईमितः किम् । योम्यो गां वारयति क्षेत्रे॥ अन्तर्षी येनादर्शनमिच्छति १।४।२८॥ व्यवधाने सति यत्कर्षकस्यात्मनो दर्शनस्यामारमिच्छति तद- पादानम् । मावनिलीयते कृष्णः । अन्तर्धा किम् । चांगन दि क्षने इच्छतिग्रहण किम् । अदर्शनेच्छायां सत्यां सत्यपि दर्शन यथा स्यात । देवदत्तायज्ञदत्ता निलीयते ॥ आख्यातोपयोग १1१।२९ ।। नियमपूर्वकविद्यास्वीकारे वक्ता प्राक्मंशः । उपाध्यायादधीते । उपयोगे किम् । नटस्य गाथां शृणोति ॥ जनिकर्तुः प्रकृतिः१।४।३०॥ जायमानस्य हेतुरपादानम् । ब्रह्मणः प्रजाः मजायन्ते ॥ भुवः प्रभवः१।४।३१॥ भवनं भूः भूकर्तुः प्रमरस्तथा । हिमवता गगा प्रमाति । तत्र प्रथम प्रकाशत इत्यर्थः॥ ल्यन्लोपे कर्मण्यधिकरणे च ॥ मासादात्मेक्षते । आसनात्मेक्षते । प्रामादमारुहा आराने उपविश्य प्रेक्षत इत्यर्थः । श्वशुगजिदेति । श्वशुरं वीक्ष्येत्यर्थः। गम्यमानाऽपि क्रिया कारकविमक्तीनां निमित्तम् । कस्मात् नद्याः॥ यतश्चाध्यकालनिर्माण तत्र पञ्चमी । तद्युक्ताघ्वनः प्रथमासप्तम्यौ । कालात्सप्तमी च वक्तभ्या 8 ॥ वनाझामो योजनं योजने वा । कार्तिक्या आग्रहायणी मासे । अन्यारादितगर्ने इत्यादिभियोगे पञ्चमी विहिता तत्र अन्य इत्यर्य- ग्रहणम् । इतरग्रहणं प्रपश्चार्यम् । अन्यो भिन्न इनगे वा कृष्णात । आरादनात् । ऋते कृष्णान् । पूर्वी प्रामात् । दिगि दृष्टः शन्दो दिशब्दः । तेन संप्रति देशालवृत्तिना योगेपि भवति । चत्रा २७० सुगमकौमुद्याः। त्पूर्वः फाल्गुनः । अवयववाचियोगे तु न । तस्य परमानेडितम् इति निर्देशात् । पूर्व कायस्य । अञ्चूत्तरपदस्य तु दिक्शब्दत्वेऽपि पष्ठयतसर्थ इति षष्ठी बाधितुं पृथग्ग्रहणम् । प्राक् प्रत्यम्वा ग्रामात् । आच दक्षिणा ग्रामात् । आहि-दक्षिणाहि प्रामात् । अपादाने पञ्चमी इति सूने कार्तिक्या प्रभृति इति भाष्यप्रयोगात्मभृत्यर्थ- योगे पञ्चमी । भवात्मभाते आरभ्य वा सेव्यो हरिः। अपपरिवहि: इति समासविधानाज्ज्ञापकादहियोगे पञ्चमी । ग्रामादहिः ।। अपपरी वर्जने १।४।८८॥ एतौ वर्जने कर्मप्रवचनीयौ ॥ आङ्गमर्यादावचने ११४।८९॥ आइ मर्यादायामुक्तसज्ञः । वचनग्रहणादभिविधावपि ॥ पञ्चम्यपाङ्परिभिः२।३।१०॥ एतैः कर्मप्रवचनीयोंगे पञ्चमी । अप हरेः परि हरेः सं- सारः । परिरत्र वर्जने । रक्षणादौ तु। हरि परि आमुक्तेः संसारः। आसक्लाहह्म । प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः ११४१९२॥ एतयोर्ययोः प्रतिरुक्तसज्ञः ॥ प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात् २।३।११॥ अन कर्मप्रवचनीगैयाँगे पञ्चमी । प्रद्युम्न कृष्णात्मति । तिरे- भ्यः प्रतियच्छति माषान् ॥ अकर्तृणे पञ्चमी २।३।२४॥ कर्तृवर्जित यहण हेतुभूत तत. पममी । शताबद्ध अवतार पिम् । शतेन वन्धितः ॥ विभापा गुणेऽस्त्रियाम् २।३।२५॥ गुणे हेतावस्वीरिड्ने पञ्चमी वा । जाड्यात् जाडयेन वा बद्धः। गुपो किम् । धनेन कुरम् । अम्विया किम् । वुद्धया मुक्त' । वि- 'द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २७१ भाषा इति योगविमागादगुणे स्त्रियां च कचित् । एमादमिमान । नास्ति घटोऽनुपलब्धेः॥ पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् २॥३॥३२॥ एभियाँगे तृतीया स्यात् । पश्चमी द्वितीयेच अन्यतरस्यांग्रहणं समुच्चयार्थम् । पञ्चमीद्वितीये चाऽनुवर्तते पृथयांमण रामात् राम वा । एवं विना नाना। करणे च स्तोकाल्पकृच्छकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य २।३।३३॥ एभ्योऽद्रव्यरचनेभ्यः करणे तृतीयापञ्चम्या स्तः । स्तोरेन स्तो- कादा मुक्तः । द्रव्ये तु, स्तोकेन विषेण हतः ।। पष्ठी हेतुप्रयोगे २।३।२६॥ हेतुशब्दप्रयोगे हेती द्योत्ये पष्ठी । अन्नस्य हेतोर्वसति ॥ सर्वनाम्नस्तृतीया च २।३।२७॥ सर्वनानो हेतुशब्दस्य च प्रयोगे हेती योत्ये तृतीया पटी च । केन हेतुना वसति । कस्य हेतोः॥ निमित्तपर्यायप्रयोगे सर्वासां प्रायदर्शनम् ॥ कि निमित्तं वसति । केन निमित्तेन । स्म निमित्तायेत्यादि । एवं किंकारणम् । को हेतुः। किं प्रयोजनम् इत्यादि । मायग्रहणाद- सर्वनाम्नः प्रथमाद्वितीये न स्तः । ज्ञानेन निमित्तेन हरिः सेव्यः। ज्ञानाय निमित्तायेत्यादि। पठ्यतसर्थप्रत्ययेन २।३।३० ॥ एतद्योगे पष्ठी । दिक्छन्द इति पञ्चम्या अपवादः । ग्रामस्य दक्षिणतः । पुरः पुरस्तात् । उपरि उपरिष्टात् ॥ एनपा द्वितीया २।३।३१॥ एनवन्तेन योगे द्वितीया । एनपा इति योगविमागास्पष्टयपि। दक्षिणेन ग्राम ग्रामस्य वा । एवमुत्तरेण ।।

२७२
सुगमकौमुद्याः।
दूरान्तिकार्थः षष्ठयन्यतरस्याम् २।३।३४॥
एतोंगे पष्टी पञ्चमी च । दूर निकटं ग्रामस्य प्रामाहा ।
इति १०२ अंशाः।
ज्ञोऽविदर्थस्य करणे २१३१५१॥
जानातेरज्ञानार्थस्य करणे शेपत्वेन विवक्षिते पष्ठी। सर्पिणी
ज्ञानम् । शेपे पष्ठीति पष्ठीसिद्धावपि प्रतिपदविधाना पष्ठी न
समस्यते । इति समासनिवृत्तये प्रकरणम्
अत एव तिडन्तं
नोदावियते । सपिंपो जानीते, इत्यादी तु शेपे पष्ठीत्येव षष्ठी-
त्याहुः । काशिकादौ तु ज्ञोऽविदर्थत्यादी तिडन्तमुदाहृतम् । अ.
न्येऽपि बद्दवस्विडन्तमुदाहरन्ति ।।
अधीगर्थदयेशां कर्मणि २।३।१२॥
एपां कर्मणि शेपे पष्ठी । मातुः स्मरणम् । सर्पिपो दयनमी-
शनं वा॥
कृतः प्रतियने २।३।५३॥
प्रतियत्नो गुणाधानं कृतः कर्मणि शेपे पष्ठी स्याहणाधाने ।
एधोदकस्योपस्करणम् ॥
रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः२।३।५४॥
मावकर्तृकाणां ज्वरिवर्जितानां रुजार्थानां कर्मणि शेपे पष्टी।
चौरस्य रोगस्य रुजा॥
अज्वरिसंताप्योरिति वाच्यम् * ॥
रोगस्य चौरज्वरः चौरसंतापो वा । रोगकर्तृकं चारसंवन्धि ज्व.
रादिकमित्यर्थः॥
आशिपि नाथः२।३।५५॥
आशीरर्थस्य नायतेः शेपे कर्मणि षष्ठी । सर्पिपो नाथनम् ।
आशिपि इति किम् । माणवकनाथनम्। तत्संबन्धिनी याच्जेत्यर्थः।।
.

द्वितीयखण्डस्य प्रयमो मागः। २७३ जासिनिग्रहणनाटकाथपिपां हिंसायाम् २।३॥५६॥ हिसायनामेपा शेपे, कर्मणि पष्ठी । चौरस्योज्जासनम् । निमो संहता विपर्यस्तो व्यस्तो वा । चौरस्य निमहणनं प्रणिहननं निह- ननं प्रहणनं वा। नट अवस्यन्दने चुरादिः। चौरस्योन्नाटनम् । चौरस्य काथनम् । परस्य पेषणम् । हिंसाया किम् । धाना- पेपणम् ॥ व्यवहपणोः समर्थयोः२।३।१७॥ शेपे कणि पष्ठी। यूते क्रयविक्रयन्दरहोरे चानयोस्फुस्वार्थता। शतस्य व्यवहरणं पणनं वा । समर्थयोः किम् । शलाकाव्यवहार । गणनेत्यर्थः । ब्राह्मणपणनं स्तुतिरित्यर्थः । दिवस्तदर्थस्य २।३१५८॥ बृतार्थस्य क्रियविक्रयरूपव्यवहारार्थस्य च दिवः कर्मणि पष्टी। शतस्य दीव्यति । तदर्थस्य किम् । ब्राह्मणं दीव्यति । स्तोतीत्यर्थः॥ विभापोपसर्गे २।३।२९॥ पूर्वयोगापवादः । शतस्य शतं वा प्रतिदीव्यति ।। प्रेप्यववाहविपो देवतासंप्रदाने २।३।६१॥ देवतासंप्रदानकेर्थे वर्तमानयोः प्रेष्यब्रुवोः कर्मणो हविर्विशेषस्य चाचकाच्छब्दात्पष्ठी । अग्नये छागस्य हरिपो वपाया मेदसः मेय अनुबाह वा॥ कृत्वोर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे २।३।६४॥ कृत्वोर्थाना प्रयोग कालवाचिन्यधिकरणे शेपे पष्ठी । पञ्चक- त्वोझो भोजनम् । द्विरह्रो भोजनम् । शेपे किम् । हिरहन्यध्ययनम्। क्र्तृकर्मणोः कृति । गुणकर्मणि वेष्यते । नेताश्वस्य सुनस्य खुनं वा । कृति किम् । तद्विते मा भृत् । कृतपूर्वी कटम् ।। उभयप्राप्ती कर्मणि २१३१६६॥

२४
सुगमकौमुद्याः।
"भयोः प्राप्तियस्मिन्कृति तत्र कर्मण्येव पष्ठी । आश्चयों गवां
'दोहोऽगोपेन । स्त्रीप्रत्यययोरकाकाग्यो यं नियमः । भेदिका
विभित्सा वा रुद्रस्य जगतः । शेपे विमापा । स्त्रीप्रत्यय इत्येके ।
विचित्रा जगतः कृतिहरेः हरिणा वा । केचिदविशेषेण विभाषामि-
‘च्छन्ति । शब्दानामनुशासनमाचार्यण आचार्यस्य वा ॥
तस्य च वर्तमाने २।३।६७॥
वर्तमानार्थस्य तस्य योगे पष्ठी । नलोक इति निषेधस्यापवादः।
राज्ञां मतो बुद्धः पूजितो वा ।।
अधिकरणवाचिनश्च २।३।६८॥
क्तस्य योगे पष्ठी । इदमेपामासितं शयितं गतं भुक्तं वा ।।
असनोभविष्यदाधमर्ययोः २।३।७०॥
भविष्यत्यकस्य भविष्यदाधमयार्थनश्च योगे पष्ठी न । सतः
पालकोवतरति । व्रजंगामी । शतंदायी ॥
कृत्यानां कर्तरि वा २।३।७१ ॥
पष्ठी । मया मम वा सेव्यो हरिः । कर्तरि इति किम् । गेयो
माणवकः साम्नाम् । भव्यगेय इति कर्तरि यविधानादनभिहितं
कर्म । अत्र योगो विभज्यते कृत्यानाम् । उभयमाप्तौ इति न इति
चानुवर्तते । तेन नेतव्या बजे गावः कृष्णेन । ततः कर्तरि वा
उक्तोऽर्थः॥
तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम् २।३।७२।।
तुल्यायोगे तृतीया वा स्यात्पक्षे पष्ठी । तुल्यः सदृशः समो
वा कृष्णस्य कृष्णेन वा । अतुलोपमाभ्यां किम् । तुला उपमा वा
कृष्णस्य नास्ति॥
इति १०३ अंशाः।
चतुर्थी चाशिष्यायुप्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः ।
३।७३॥
*

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। २७५. एतदर्थोंगे चतुर्थी वा पक्षे पष्ठी आशिपि । आयुष्यं चिं जीवितं कृष्णाय कृष्णस्य वा भृयात्। एवं मद्रं भद्रं कुशलं निगमयं मुखं शम् अर्थः प्रयोजनं हितं पथ्यं वा भूयात् आशिपि किम् । देवदत्तस्यायुष्ममस्ति । व्याख्यानात्मवत्रार्थग्रहणम् । मभद्रयोः पर्यायलादन्यतरो न पठनीयः॥ तस्येन्विपयस्य कर्मण्युपसंख्यानम् ॥ अधीती व्याकरणे । अधीतमनेनेति विग्रहे इटादिभ्यश्च इति कर्तरीनिः॥ साध्वसाधुप्रयोगे च ॥ साधुः कृष्णो मातरि । असाधुर्मातुले । निमित्तात्कर्मयोगे निमित्तमिह फलम् । योगः संयोगसमवायात्मकः । चर्मणि दीपिनं हन्ति दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति सीनि पुष्कलको हतः ॥ हेतौ तृतीयात्र प्राप्ता । सीमाण्डकोशः । पुष्क- लको गन्धमृगः । योगविशेपे किम् । वेतनेन धान्यं लुनाति । यस्य च भावनेति सप्तम्युक्ता । अर्हाणां कर्तृत्वेऽनहींणामकतत्वे तद्वैपरीत्ये च । सत्सु तरत्सु असन्त आसते । असत्सु तिष्ठत्सु सन्तस्तरन्ति । सत्सु तिष्ठत्सु असन्तस्तरन्ति । असत्स तग्त्सु सन्तस्तिष्ठन्ति ॥ पष्ठी चानादरे २।३।३८॥ अनादराधिक्ये भावलक्षणे पष्ठीसप्तम्यो । रुदति रुदतो वा मात्राजीत् । रुदन्तं पुत्रादिकमनादृत्य संन्यस्तवानित्यर्थः स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च२।३।३९॥ एतैः सप्तमियाँगे पष्ठीसप्तम्यौ । पष्ठ्यामेव प्राप्तायां पाक्षिकम- सम्यथै वचनम् । गवां गोषु वा स्वामी । गवां गोषु वा प्रस्तः । गा एवानुभवितुं जात इत्यर्थः ।, आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम् २।३।१० ॥

२७६ “सुगमकीमुंद्याः ।। आभ्यां योगे 'पष्टीसप्तभ्यो स्तस्तात्पर्यय आयुक्तो व्यापा- रितः आयुक्तः कुशलो वा हरिपूजने हरिपृजनस्य वा । आसेवा- याम किम् । आयुक्तो गीः शकटे । ईपद्यक्त इत्यर्थः ॥ पञ्चमी विभक्त २।३।४२॥ विभागो विभक्तं निर्धार्यमाणस्य यत्र भेद एव तत्र पश्चमी । माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्य आढयतराः ॥ साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः २१.३।४३॥ आभ्यां योगे सप्तमी स्यादर्चायाम् नतु प्रतेः प्रयोगे । मातरि साधुनिपुणो वा । अर्चायां किम् । निपुणो राज्ञो भृत्यः । इह तत्वकथने तात्पर्यम् ॥ अप्रत्यादिभिरिति वक्तव्यम् ॥ साधुनिपुणो वा मातरै प्रति पर्यनु वा ॥ प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च२।३।४४॥ आभ्यां योगे तृतीया स्याचात्सप्तमी । प्रसित उत्सुको हरिणा हरौ वा ॥ नक्षत्रे च लुपि२।३।१५॥ नक्षत्रे प्रकृत्यर्थे यो लुप्संज्ञया लुप्यमानस्य प्रत्ययस्यार्थस्तत्र वर्तमानात्तृतीयासप्तम्यो । अधिकरणे-मूलेनावाहयेद्देवीं श्रवणन विसर्जयेत् । मूले श्रवण इति वा । लुपि किम् । पुष्ये शनिः॥ सप्तमीपञ्चम्यो कारकमध्ये २।३१७॥ शक्तिद्वयमध्ये यौ कालाध्वानी ताभ्यामेते स्तः । अद्य मुक्त्वायं यहे यहादा मोक्ता । फर्छशक्पोर्मध्येभ्यं काल: । इहस्थोऽयं क्रोशे कोशादा लक्ष्यं विध्येत । कर्तृकर्मशक्त्योर्मध्येऽयं देशः । अधिक- शब्देन योगे सप्तमीपञ्चम्याविष्यते । तदस्मिन्नधिकम् इति य. स्मादधिकम् इति च सूत्रनिर्देशात् । लोके लोकादाधिको हरिः ॥ अधिरीश्वरे 181९७॥

--- २७८ सुगमकौमुद्याः। रुपः । तिडा-पर्यभूषयत् । नाना-कुम्भकारः । धातुना-कटमः । अजस्रम् । तिडां तिङा-पिवतखादता खादतमोदता । तिङ सुपा-कृन्त विचक्षणति यस्यां क्रियायां मा कृन्तविचक्षणा । एही. डादयोऽन्यपदार्थ इति मयूरव्यंसकादौ पाठयात्ममासः । समर्थः पदाविधिः इति प्राग्व्याख्यातमनुसन्धेयम् ।। प्राकडारात्समासः२।१।३॥ कडाराः कर्मधारये इत्यतः प्राक् समास इत्यधिक्रियते ॥ सह सुपा२।१४॥ सह इति योगो विमज्यते । सुवन्तं समर्थेन सह समस्यते । योगविभागस्येप्टसिद्धयर्थत्वात्कतिपयतिडन्तीत्तरपदोऽयं समासः । स च छन्दस्येव । पर्यभृपयत् । अनुव्यचलत् । सुपा सुप्सुपा सह सस्यते । समासत्वात्मातिपदिकत्वम् । सुपो धात्विति सुपो लुक् । भृतवं चरट् इति निर्देशाद् भूतशब्दस्य पूर्वनिपातः । पूर्व भूतो भूतपूर्वः । इवेन समासो विभक्त्यलोपश्च । जीमूतस्येव ।। अव्ययीभावः२।११५॥ अधिकारोऽयम् । अव्ययं विभक्तीति सूत्रेऽध्ययमिति योगो विमज्यते । अव्ययं समर्थन समस्यते सोऽव्ययीभावः । दिशयोर्म- ध्यमपदिशम् । क्लीवाव्ययं त्वपदिशं दिशोमध्ये विदिक स्त्रिया- मित्यमरः । अथ विमत्त्यर्थादिए। हरी इत्याधि हरि । सप्तम्यर्थस्यै- पात्र योतकोऽधिः । अत्र निपातेनामिहितेऽप्यधिकरणे वचनसाम- र्थ्यात्सप्तमी । समीपे-कृष्णस्य समीपमुपकृष्णम्। समया ग्रामम् । निकपा लकाम् । आराधनादित्यत्र तु नाव्ययीमावः । अभितः परित. अन्पारात् इति द्वितीयापञ्चम्पोरिधानसामर्थ्यात् । मद्राणां समृद्धिः मुमद्रम् । बहुलग्रहणात्समद्रमुन्मत्तगङ्गमित्यादी मतम्या नित्यमम्मावः । यस्नानां वृद्धिद्धर्यवनम् । विगता ऋद्धिवृद्धिः । मक्षिकाणाममावो निर्मक्षिकम् । हिमस्यात्ययोतिदिमम् । अत्ययो ध्वंमा निद्रा मप्रति न युग्पत इत्यतिनिद्रम् । दरिदशन्दस्य प्रकाश २८० सुगमकीमुद्याः । अपविष्णु संसारः अपविष्णोः । परिविष्णु पगिविष्णोः। बहिर्वनं बहिर्वनात् । प्राग्वनं प्राग्वनात् ॥ इति १०५ अंशाः। आइमर्यादाभिविध्योः२।१।१३॥ एतयोराइ पञ्चम्यन्तेन वा समस्यते सोऽव्ययीभावः । आमु- क्ति संसारः आमुक्तेः । आवालं हरिमक्तिः आवालेभ्यः । लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये २।१।१४॥ आभिमुख्यद्योतकावमिमती चिदवाचिना सह माग्वत् । अभ्यग्नि शलमाः पतन्ति अनिमामि । मत्यनि अग्नि प्रति ॥ पारे मध्ये पष्टया वा२।१।१८॥ पारमध्यशब्दी पष्ठ्यन्तेन सह वा समस्येते । एदन्तत्वं चान- योनिपात्यते । पक्षे पष्ठीतत्पुरुषः। पारेगङ्गादानय गङ्गापारात् । मध्येगङ्गात् गङ्गामध्यात् । महाविभापया वाक्यमपि । गङ्गायाः पारात् । गङ्गाया मध्यात् ॥ समासान्ताः५।४।६८॥ इत्यधिकृत्य ॥ अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः५।४।१०७॥ शरदादिभ्यष्टच्स्यात्समासान्तोऽव्ययीमावे । शरदः समीपमुप- शरदम् । प्रतिविपाशम् । शरद् विपाश अनम् मनस् उपानह दिव् हिमवत् अनडुइ दिश दृशू विश चेतस् चतुर् त्यद् तद् यद् कियत् जराया जरस् च उपजरसम् । प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्णः य. स्येति च प्रत्यक्षम् । अक्षणः परम् इति विग्रहे समासान्तविधानसा- मर्थ्यांदव्ययीभावः। परोऽशे लिट् इति निपातनात्परस्यौकारादेशः। परोक्षम् । परोक्षा क्रिया इत्यादि तु अर्श आधचि । समक्षम् । अन्वक्षम् ॥ अनश्च५।४।१०८॥

२८१ दितीयतण्डस्प प्रथमो मागः। अन्नन्तादम्पयामाराव ।। नस्तद्धिते ६।४।१४॥ नान्तस्य मस्य टेलीपस्तटिते । उपगनम् । अध्यागम् ।। नपुंसकादन्यतरस्याम् ५।४।१०९॥ मन्नन्त यल्लीर्य तदन्तादव्यगीमागया। उपचमम् उगनम।। झयः५|४|१११॥ समन्तादगगीमागहमा । उपसमिधं उपमामिन् ।। गिरेश्च सेनकस्य २।४।११२॥ गिर्यन्तादव्ययीमावाहमा उपगिर रपांगतिइत्यव्ययामा। तत्पुरुपः२।१।२२॥ माग्यायीहरधिकारः॥ द्विगुश्व२।१॥२३॥ दिगुरपि तत्पुरुषगंशः। इदं सत्र त्यतुं शक्यम् । गरुयारोटि. गुरोति पठित्वा पाग्यलेन संज्ञादयसमावेशस्त्र मुवचत्वान् । समामान्तः प्रपोजनम् । पागनम ।। द्वितीयाश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नः२११। २४॥ टिनीयान्तं धिनादिप्रकृतिकः पुषन्तः मह वा ममम्पने स तत्पुरुषः । फष्णं श्रितः कृष्णश्रितः । दुःखमतीनो दुःपातीनः । गम्यादीनामुपसंख्यानम् * ॥ ग्राम गमी प्रामगी । अग्नं युमुसुग्नमुक्षुः॥ पूर्वसदृशसमोनार्थकटहनिपुणमिश्रलक्ष्णः २।३१३३ ॥ तृतीयान्ततः मावत् । मामः । मानमरमः। ममः। अनाप मापन कापापणम् । मापागलम् । बगरलाः । आचार- निपुणः । गुटमियः। आगारश्तभ्यः मिश्रमाणे मानगंस्पारि

२८२
मुगमकीमुद्याः।
ग्रहणम् । मिश्रं चानुपसर्गमसंधी इत्यत्रानुपसर्गग्रहणात् । गुडसमि-
श्राधानाः॥
अवरस्योपसंख्यानम् ॥
मासेनावरी मासावरः । कर्टकरणे कृता बहुलम् । हरिनातः ।
नखमिन्नः । कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम् । नखनिभिन्नः।
कर्तृकरणे इति किम् । मिक्षामिरुपितः । इतादेपा तृतीया ।
बहुलग्रहणं सर्वोपाधिव्यभिचारार्थम् । तेन दानेण लूनवान् इत्यादी
न । कृता किम् । काष्ठः पचतितराम् ।।
अन्नेन व्यञ्जनम् २ 11३४॥
संस्कारकद्रव्यवाचकं तृतीयान्तमन्नेन प्राग्वत् । दना ओदनो
दध्योदनः । इहान्तर्भूतोपसेकक्रियाद्वारा सामर्थ्यम ॥
भक्ष्येण मिश्रीकरणम् २।१।३५॥
गुडेन धाना गुडधानाः । मिश्रणक्रियाद्वारा सामर्थ्यम् ॥
चतुर्थी तदर्थार्थवलिहितसुखरक्षितैः२।१।३६॥
चतुर्थ्यन्तार्थाय यत्तद्वाचिनार्थादिभिश्च चतुर्थ्यन्तं वा प्राग्वत् ।
तदर्थेन प्रकृतिविकृतिभाव एव । बलिरक्षितग्रहणाज्ज्ञापकात् ।
यूपाय दारु यूपदारु । नेह । रन्धनाय स्थाली । अश्वघासादयस्तु
पष्ठीसमासा.॥
अर्थेन नित्यसमासो विशेष्यलिङ्गता चेति वक्तव्यम् ॥
द्विजायायं द्विजार्थः सूपः । द्विजार्था यवागूः । द्विनाथ पयः।
भृतवलि । गोहितम् । गोमुखम् । गोरक्षितम् ॥
पञ्चमी भयेन२।११३७॥
चोराट् भय चोरभयम् । पष्ठी-राजपुरुषः ।।
भयभीतभीतिभीभिरिति वाच्यम् ॥
वृकभीतः।।
स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन २।१।३९ ।।

दितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २८३ स्तोकान्मुक्तः । अल्पान्मुक्तः । अन्तिकादागतः। अभ्याशादा. गतः । दूरादागतः । रिमकृष्टादागतः । कृच्छादागतः । पञ्चम्या. स्तोकादिभ्यः इत्यटक ॥ याजकादिभिश्च २।२।९॥ एमिः षष्ठयन्तं समस्यते । तुजकाभ्यां कर्तरि इत्यस्य प्रतिप्रस- वोऽयम् । प्राह्मणयाजकः । देवपूजकः ।। गुणात्तरेण तरलोपश्चेति वक्तव्यम् ॐ ॥ तरयन्तं यद्वणवाचि तेन सह समासस्तग्लोपच । न निर्धा- रणे इति पूरणगुण इति च निषेधस्य प्रतिप्रसवोध्यम् । सोपां श्वेत- तरः सर्ववेतः । सर्वेषां महत्तरः सर्वमहान् ॥ इति १०६ अंशाः। कृयोगा च पष्ठी समस्यत इति वाच्यम् ॐ ॥ इध्मस्य वचन इध्मत्रश्चनः ॥ न निर्धारणे २१२।१०॥ निर्धारणे या पष्ठी सा न समस्यते । नृणां दिनः श्रेष्ठः ॥ प्रतिपदविधाना पष्ठी न समस्यत इति वाच्यम् ।। सर्पिपो ज्ञानम् ॥ पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधिकरणे न२। २॥११॥ पृरणाद्यर्थः सदादिभिश्च पष्ठी न समस्यते । पूग्ण-मता पष्ठः । गुणे-काकस्य कार्ण्यम् । ब्राह्मणस्य शुरुषः । यदा प्रग्णादिना दन्ता इति विशेष्यं ज्ञातं तदेदमुदाहरणम् । आनेत्योऽयं गुणेन निषेधः । तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणत्वात् इत्यादिनिर्देशात । तेन अर्थ- गावं बुद्धिमान्य इत्यादि सिद्धम् । मुहितार्यास्तस्याः । पलानां सुहितः । तृतीयासमामस्तु स्पादेव । स्वरे विशेषः । सत्-द्विजस्य २८४ सुगमकीमुद्याः। कुर्वन् कुर्वाणो वा । किंकर इत्यर्थः । अव्ययम्-ब्राह्मणस्य कृत्वा । पूर्वोत्तरसाहचर्यात्कृदन्ययमेव-गृह्यते । तेन तदुपरि इत्यादिसिद्ध- मिति रक्षितः। तव्यः-ब्राह्मणस्य कर्त्तव्यम् । तव्यता तु भवत्येव । स्वकर्तव्यम् । स्वरे भेदः समानाधिकरणे । तक्षकस्य सर्पस्य विशे. पणसमासस्त्विह बहुलग्रहणान्न । गोर्धेनोः इत्यादिपु पोटायुवति इत्यादीना विमक्त्यन्तरे चरितार्थानां परत्वादाधकः षष्ठीसमासः प्राप्तः सोऽप्यनेन वार्यते ॥ तेन च पूजायाम् २।२।१२॥ मतिबुद्धि इति सूत्रेण विहितो यः क्तस्तदन्तेन षष्ठी न सम- स्यते । राज्ञा मतो बुद्धः पूजितो वा । राजपूजितः इत्यादी तु भूते क्तान्तेन सह तृतीयान्तस्य समासः॥ अधिकरणवाचिना च २१२॥१३॥ तेन पष्ठी न समस्यते । इदमेपामासितं गतं भुक्तं वा ॥ कर्मणि च २।२।१४॥ उभयमाप्ती कर्मणि इति या पष्ठी सा न स मस्यते । आश्चयों गवां दोहोऽगोपेन ॥ तृजकाभ्यां कर्तरि २।२।१५॥ कर्थतजकाभ्या पठ्या न समासः । अपां स्रष्टा । व्रजस्य भर्ता । ओदनस्य पाचकः । कर्तरि किम् । इक्षूणां भक्षणमिक्षुभ क्षिका। पत्यर्थमर्दशब्दस्य याजकादित्वात्समासः । भूभर्ता । कथं तर्हि, घटाना निर्मातुस्त्रिभुवनावेधातुश्च कलहः इति । शेषषष्ठ्या समासः इति कैयटः॥ कर्तरि च२॥२॥१६॥ कर्तरि षष्ठ्या अकेन न समासः । भवतः शायिका। नेह तृजनुवर्तते । तद्योगे कर्तुरमिहितत्वेन कर्तृपष्ट्या अभावात् ।। नित्यं क्रीडाजीविकयोः२।२।१७॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २८५ पतयोरर्थयोरकेन नित्यं पष्ठी समस्यते । उद्दालकपुष्यमञ्जिका। क्रीडाविशेषस्य संज्ञा । संज्ञायाम् इति भावे बुल । जीविकायां दन्तलेखकः । तत्र क्रीडायां विकल्पे जीविकायां तृजकाभ्यां कतरि इति निषेधे प्राप्ते वचनम् ।। पूर्वापराघरोत्तरमेकदेशिनकाधिकरणे २।२।१॥ अवयविना सह पूर्वादयः समस्यन्ते । एकत्वसंख्याविशिष्टश्रेद- चयवी । पष्ठीसमासापवादः । पूर्व कायस्य पूर्वकायः । अपरकायः। एकदेशिना किम् । पूर्व नामेः कायस्य । एकाधिकरणे किम् । पूर्वरात्राणाम्। सर्वोऽप्येकदेशोभा समस्यते । संख्याविसाय इति ज्ञापकात् । मध्यादः । सायाह्नः । केचित्तु सर्व एकदेशः कालेन ममस्यते न त्वद्वैव ज्ञापकस्य सामान्यापेक्षत्वात् । तेन मध्यरात्रः । उपारताः पश्चिमरात्रगोचरात् इत्यादि सिद्धम् इत्याहुः ॥ अधै नपुंसकम् २।२।२॥ समांशवाच्यर्धशब्दो नित्यं क्लीवे प्राग्वत् ।। एकविभक्तावपष्टयन्तवचनम् ॥ एकदेशिसमासविषयकोऽयमुपसर्जनसंज्ञानिपेधः । तेन पञ्चखटी इत्यादि सिध्यति । अर्ध पिप्पल्या अर्धपिप्पली । क्लीने किम् । ग्रामाः । द्रव्यैक्य एव । अर्धं पिप्पलीनाम् ॥ सप्तमी शोण्डैः२।१।४०॥ सप्तम्यन्तं शौण्डादिभिः प्राग्वद्वा । अक्षेषु गौण्डोक्षशीण्डः अधिशब्दोऽत्र पठ्यते । अपडक्षेत्यादिना अध्युत्तरपदात् सः। ईश्वराधीनः ॥ संज्ञायाम् २।१।४४॥ मप्तम्यन्त मुपा प्राग्वत्संज्ञायाम् । वाक्येन संज्ञानवगमानित्य- ममासोऽयम् । अग्ण्ये तिलकाः। वने कोरुकाः। हलदन्तात्सप्तम्याः इत्यलुक ।। क्षेपे २।१।१७॥

२८६ J सुगमकीमुद्याः । मप्तम्यन्तं क्तान्तेन माग्वन्निन्दायाम् । अवतप्ते नकुलस्थित त एतत् ॥ पात्रे समितादयश्च २।११४८॥ एते निपात्यन्ते क्षेपे । पाने समिताः भोजनसमय एव संगता न तु कार्ये । गेहे शूरः। गेहे नदी । आकृतिगणोध्यम् । चकारोव- धारणार्थः । तेनैपा समासान्तरे घटकतया प्रवेशो न । परमाः पाने समिताः॥ पूर्वकालकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकर- णेन२।१।४९॥ विशेषणं विशेष्येण इति सिद्धे पूर्वनिपातनियमार्थ सूत्रम् एकशब्दस्य दिक्संख्ये संज्ञायाम् इति नियमवाधनार्थं च । पूर्व स्नातः पश्चादनुलिप्तः स्नातानुलिप्तः । एकनाथः । सर्वयाशिकाः । जरनैकायिकाः।पुराणमीमासकाः। नवपाठकाः । केवलवैयाकरणाः ।। इति १०७ अंशाः। दिक्संख्ये संज्ञायाम् २।११५० ॥ समानाधिकरणेन इत्यापादपरिसमाप्तेरधिकारः । सज्ञायामेव इति नियमार्थ सूत्रम् । पूर्वेपुकामशमी । सप्तर्षयः । नेह । उत्तरा वृक्षाः । पञ्च ब्राह्मणाः ॥ तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च २।३।५।। तद्धितार्थे विषयउत्तरपदे च परतः समाहारे च वाच्ये दिक्स ख्ये प्राग्वदा । पूर्वस्या शालाया भव. पौर्वशालः । समासे कृते दिक्पूर्वपदादसंज्ञाया अ. इति ः॥ सर्वनानो वृत्तिमात्रे पुंवद्भावः * ॥ अपरशालः । पूर्वा शाला प्रिया यस्येति त्रिपदेवहुव्रीही कृते प्रियाशब्द उत्तरपदे पूर्वयोस्तत्पुरुषः । तेन शालाशब्द आकार उदात्त.। पूर्वशालाप्रिय । दिक्षु समाहारो नास्त्यनभिधानात् ।

. द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः । २८७ ख्यायास्तद्धिता। पपणां मातॄणामपत्यं पाण्मातुरः । पञ्च गावो नं यस्येति त्रिपदे पहुबीहावरान्तरतत्पुरुपस्य विकल्पे प्राले इन्ट- पुरुपयोरुत्तरपदे नित्यसमासवचनम् ।। गौरतद्धितलुकि ६।४।९२॥ गोऽन्तात्तत्पुरुषाच्स्यात्समासान्तो न तद्धितलुकि । पञ्चगव. निः । उत्तरपदे त्रयाणां लोकानां नाथस्त्रिलोकनाथ इत्यप्युदाह- न्ति । तादृशान्यन्ये न मन्यन्ते । पञ्चानां गवां समाहारः । ख्यापूर्वो दिगुः । दिगुरेकवचनम् । स नपुंसकम् । पञ्चगवम् । देगोरिति डीए । पञ्चपानम् । विशेषण विशेष्येण बहुलम् । लमुत्पलं नीलोत्पलम् । बहुलग्रहणात् कचिन्नित्यम् । कृष्णसर्पः। चिन्न । रामो जामदग्यः॥ • पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यप्तमानमध्यमध्यमवीराश्च २। पूर्वनिपातनियमार्थमिदम् । पूर्ववैयाकरणः । अपराध्यापकः । अपरस्यार्धे पश्चभावो वक्तव्यः ॥ अपरश्वासावर्धश्च पश्चार्यः । कथम् एकवीर इति । पूर्वकालक ति बाधित्वा परत्वादनेन समासे वीरकै इति हि स्यात् । बहुलम- णाद् भविष्यति ॥ श्रेण्यादयः कृतादिभिः२।११५९॥ श्रेण्यादिषु च्व्यर्थवचनं कर्तव्यम् ॥ अश्रेणयः श्रेणयः कृताः श्रेणीकृताः॥ केन नविशिष्टेनान २11६० ॥ नश्चिशिष्टेन तान्तेनानक्तान्तं समस्यते । कृतं च तदकृतं च कृताकृतम् ॥ शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपस्योपसंख्या- नम् ॥

। २८८ सुगमकौमुद्याः। माकप्रियः प्रार्थिवः शाकमार्थिवः । देवत्रालणः ॥ सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः २।११६१॥ संदयः । वक्ष्यमाणेन महत आकारः । महवियाकरणः । पूज्य- मानः : किम् । उत्कृष्टो गौः। पादुट्टत इत्यर्थः । किंक्षेपे२।१६४॥ कुत्सितो राजा किंगना यो न रक्षति । पुंवत् कर्मधारयजाती- यदेशीयेषु पूग्णीप्रियादिष्वमाप्तः पुंवद्भावोऽनेन विधीयते । महा- नवमी । कृष्णचतुर्दशी। महामिया । तया कोपधादेः प्रतिपिदः पुंबद्मावः फर्मधारयादी प्रतिप्रसूयते । पाचकली। दत्तमार्या । पञ्चममार्या । सौनमार्या। मुकेशमार्या । ब्राह्मणमार्या । पर्व पाचकजातीया । पाचकदेशीया इत्यादि । प्रशंसावचनेश्च २।१।६६॥ पंतः सह जातिः प्राग्वत् । गोमतलिका । गोमचधिका। गोमाण्डम् । गपोटः । गोतहजः । प्रगस्ता गीरित्यर्थः । मत- दिवादयो नियतलिला नतु विमेष्यनिम्नाः । जातिः किम् । कु. मार्ग मतालिया। मयूरव्यंसकादयश्च २।१।७२।। पते निपात्पन्ने । मपूरी नंगपः मयूरगंगरः । गंगको गः । उदर पारा चोगारगम । निधि र प्रचित व निध. मगम् । नास्ति रिंचन गम्ग गोगांचनः । नास्नि गुनापि भयं पम्प गोगुनोमयः। अन्यो गनागनान्तरम् । निदेव चिन्माप्रम् ॥ आख्यानमारयातेन क्रियासानत्ये॥ গত বিষণা না শামিম খাসবিদরা। पापादामोदना ॥ पीटाइयोऽन्यपदायें ॥ pi पमिनारमा परिपतम् । सरका.

द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः । २८९ ठादुत्सृज देहीति यस्यां क्रियायां सोद्वरोत्सृजा । उद्धमविधमा । असातत्यार्थमिह पाठः॥ जहिकर्मणा बहुलमाभीक्ष्ण्ये कर्तारं चाभिदधाति ॥ जहीत्येतत्कर्मणा बहुल समस्यते आमीक्ष्ण्ये गम्ये । समासन चेत्कर्ताभिधीयत इत्यर्थ.। जहिजोडः । जहिस्तम्बः । नज्ञ। अत्रा- ह्मणः । अनश्वः । अर्थाभावेऽव्ययीभावेन सहाय विकल्प्यते । रक्षोहागमलब्धसंदेहाः प्रयोजनम् इति । अद्भुतायामसंहितम् इति च भाष्यवार्तिकप्रयोगात् । तेन अनुपलब्धिः । अविवादः । अवि- घ्नम् । इत्यादि मिद्धम् । नजो नलोपस्तिडि क्षेपे । अपचसि त्वं जाल्म । नेकधा इत्यादौ तु नशब्देन सह सुपा इति समासः ।। नभ्राणनपानवेदानासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकन- क्षवनकनाकेषु प्रकृत्या ६।३।७५ ॥ पाद् इति शत्रन्तः । वेदाः इत्यसुन्नन्तः। न सत्या असत्याः न असत्या नासत्याः । न मुञ्चतीति नमुचिः । न कुलमम्य । न ख- मस्य । न स्त्री पुमान् । स्त्रीपुंसयोः पुंमकमावो निपातनात् । न क्षरतीति नक्षत्रम् । क्षीयतेः क्षरतेर्वा क्षत्रमिति निपात्यते । न कामतीति नकः । कमेडः । न अक्मस्मिन्निति नाकः ॥ नगोऽप्राणिवन्यतरस्याम् ६।३।७७॥ नग इत्यत्र नअकृत्या वा । नगाः अगाः पर्वताः । अप्राणिपु इति किम् । अगो वृपलः । शीते न ॥ इति १०८ अंशाः। कुगतिपादयः । कुपुरुषः । ऊर्यादिचिडाचश्च । उरीकृत्य । शुक्लीकृत्य । पटपटाकृत्य ॥ कारिकाशब्दस्योपसंख्यानम् * ॥ कारिका क्रिया कारिकाकृत्य ॥ अनुकरणं चानितिपरम् १।४।६२॥ T २९० सुगमकौमुद्याः। खाद्कृत्य अनितिपरं किम् । खाडिति कृत्वा निरष्टीवत् ।। आदरानादरयोः सदसती १।४।६३ ।। सत्कृत्य । असत्कृत्य ॥ भूपणेऽलम् १।४।६४॥ अलंकृन्य । भूषणे किम् । अलं कृत्वौदनं गतः । पर्याप्तमित्यर्थः । अनुकरणम् इत्यादिनिसूत्री स्वभावात्कृञ्चिषया ।। पुरोऽव्ययम् १ । ४।६७॥ पुरस्कृत्य ॥ तिरोऽन्तौ १।४।७१॥ तिरोभूय ॥ विभापा कृभि ११४।७२॥ तिरस्कृत्य तिर कृत्य तिर कृत्वा ।। साक्षात्प्रभृतीनि च १ । ४।७४॥ कृषि वा गतिसंज्ञानि स्युः ॥ च्व्यर्थ इति वाच्यम् ॐ ॥ साभात्कृय साक्षात्कृत्वा । रवणं कृत्य लवणं कृत्वा । मान्तत्वं निपातनात् ॥ अनत्याधान उरसिमनसी १।४।१५॥ उरसिकृत्य उरसिकृत्वा । अभ्युपगम्येत्यर्थः । मनसिकृत्य मन- सिकृत्वा । निश्चित्येत्यर्थ । अत्याधानमुपश्लपणं तत्र न । उरसि कृत्वा पाणिं शेते ॥ नित्यं हस्ते पाणावुपयमने १।४।७॥ कृषि । उपयमनं विवाहः। स्वीकारमानम् इत्यन्ये । हस्ते कृत्य । पाणी कृत्य । कुगतीत्यत्र प्रादिग्रहणमगत्यर्थम् । सुपुरुषः । अत्र वातिकानि। प्रादयो गताद्यर्थ प्रथमया । प्रगत आचार्यः प्राचार्य। अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थ द्वितीयया । अतिप्रान्तो मालामतिमाल । ।

" द्वितीयखण्डस्य प्रयमो मागः । २९१ अवादयः अष्टाद्यर्थे तृतीयया । अवष्टः कोकिलयावको किटः। पर्यादयो ग्लानाद्यय चतुर्था । परिग्लानोऽध्ययनाय पर्यध्ययनः । निरादयः कान्ताद्यर्थे पञ्चम्या । निष्क्रान्तः कौशाम्ब्याः निष्की- शाम्बिः। कर्मप्रस्चनीयानां प्रतिषेधः। वृक्षं प्रति । उपपदमतिङ् । कुम्भकारः । गतिकारकोपपदानां कृमिः सह समासवचनं माफ सवुत्पत्तेः । व्याघी । अश्वक्रीती । कच्छपी । इदं परिभाषाम: *स्फुटीभविष्यति ॥ अमेवाव्ययेन २।२।२०॥ अमेव तुल्यविधानं यदुपपदं तदेवाव्ययेन सह समस्यते । स्वादुकारम्। नेह। कालसमयवेलास तुमुन् । कालः समयो वेला वा भोक्तम् । अमेव इति किम् । अग्रेभोजम् । अग्रे भुक्त्वा । विमा- पाने प्रथमपूर्वेपु इति क्त्वाणमुलौ । अमा चान्येन च तुल्यविधान- मेतत् ।। तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम् २।२।२१ ॥ उपदंशस्तृतीयायाम् इत्यादीन्युपपदान्यमन्तेनाव्ययेन सह वा समस्यन्ते । मूलकेनोपदशं भुक्ते मूलकोपदंशम् ॥ क्त्वा च २।२।२२॥ तृतीयाप्रभृतीन्युपपदानि क्त्वान्तेन सह वा समस्यन्ते । उचैः- कृत्य उचैः कृत्वा । अव्ययेऽयथाभिमेत इति क्त्वा । तृतीयान- भृतीनि इति किम् । अलंकृत्वा । खलुकृत्वा ॥ तत्पुरुपस्याङ्गुले संख्याव्ययादेः५।४।८६॥ संख्याव्ययादेरंगुल्यन्तस्प तत्पुरुषस्य समासान्तोऽस्यात् ।। 'अंगुली प्रमाणमस्य व्यंगुलं दारु । निर्गतमंगुलिभ्यो निरंगुलम् ॥ अह सबैकदेशसंख्यातपुण्याच रात्रः ५।४।८७॥ ' एभ्यो रात्ररस्याचात्संख्याव्ययादेः । अहर्ग्रहणं हन्दार्थम् । अहश्च रात्रिश्चाहोरात्रः । सर्वा गतिः सर्वरात्रः। पूर्व रात्रैः पूर्वरात्रः।

२९२ सुगमकीमुद्याः। संख्यातंरात्रः । पुण्यरात्रः । यो राज्योः समाहारो दिरात्रम् । अतिक्रान्तो रात्रिमतिरात्रः राजाहःसखिभ्यष्टच ५।४।९१ ॥ एतदन्तात्तत्पुरुषाच् । परमराजः। अतिराजी । कृष्णसखः ॥ अहटखोरेव ६।४।१४५॥ एतयोरेव परतोष्टिलोपः स्यान्नान्यत्र । उत्तमाहः। अहनी. भृतो व्यहीनः क्रतुः । तद्धितार्थे द्विगुः । तमधीष्टः इत्यधिकारे द्विगोर्वा इत्यनुवृत्तौ रात्र्यहःसंवत्सराच इति खः । लिङ्गविशिष्टप- रिभाषाया अनित्यत्वान्नेह । मद्राणां राज्ञी मद्रराज्ञी ॥ अहोऽत एतेभ्यः५।४।८८॥ सर्वादिभ्यः परस्याहन्शब्दस्याहादेशः स्यात्समासान्तेपरे ।। अहोऽदन्तात् ८।४।७॥ अदन्तपूर्वपदस्थाद्रेफात्परस्यानोहादेशस्य नस्य णः । सर्वाह्नः । पूर्वाह्नः । संख्याताः । द्वयोरगोभवः । कालाहञ् । द्विगोर्खगनपत्ये इति ठजो लुक् । यद्गः । खियामदन्तत्वाट्टाप । यहा । व्यदप्रियः । अत्यह्नः ।। क्षुमादिषु च ८।४।३९॥ एपु णत्वं न स्यात् । दीर्घागी प्रावृट् । एवं चैतदर्थमन इत्यद- न्तानुकरणक्लेशो न कर्तव्यः । प्रातिपदिकान्त इति णत्ववारणाय । क्षुम्नादिपु पाठस्यावश्यकत्वात् । अत. इति तपरकरणान्नेह । पग- गतमहः पराह्नः॥ न संख्यादेः समाहारे ५।४।८९॥ समाहारे वर्तमानस्य संरयादेरगादेशो न । संख्यादेः इति स्प. धार्थम् । द्वयोरहोः समाहारो व्यहः । व्यहः ॥ इति १०९ अंशाः।

नौशब्दान्ताद्विगोष्टच नतु तद्धितलुकि । द्वाभ्यां नौम्यामागतो द्विनावरूप्यः । द्विगोर्लगनपत्ये इत्यत्र अचि इत्यस्यापकर्षणादला- देने लुक् । पञ्चनावप्रियः । द्विनावम् । त्रिनावम् । अतद्रितलुकि द्वितीयखण्डस्य प्रथमो मागः । उत्तमैकाभ्यां च ५।४।९०॥ आभ्यामहादेशो न । उत्तमशब्दोऽन्त्यार्थः पुण्यशब्दमाह । पुण्यकाभ्याम् इत्येव सूत्रयितुमुचितम् । पुण्याहम् । सुदिनाहम् । सुदिनशब्दः प्रशस्तवाची । एकाहः । उत्तमग्रहणमुपान्त्यस्यापि संग्रहार्थम् इत्येके । संख्यातादः ॥ अनोश्मायःसरसां जातिमंज्ञयोः५।४।९॥ टच्स्याज्जाती संज्ञायां च । उपानसम् । अमृताश्मः । काला- यसम् । मण्डूकसरसम् । इति जातिः । महानसम् । पिण्डाश्मः । लोहितायसम् । जलसरसम् । इति संज्ञा ॥ ग्रामकोटाभ्यां च तक्ष्णः५।४।९५॥ ग्रामस्य तक्षा ग्रामतक्षः । साधारण इत्यर्थः । कुट्यां भवः कौटः स्वतन्त्रः । स चासौ तक्षा च कौटतक्षः ॥ अतेः शुनः५।४।९६॥ अतिश्वो वराहः। अतिश्वी सेना ॥ उपमानादप्राणिषु ५।४।९७॥ अप्राणिविषयकोपमानवाचिनः शुनष्टच । आकर्षःश्वाकर्षश्वः अप्राणिपु किम् । वानरः श्वेव वानरश्वा ॥ उत्तरमृगपूर्वाच्च सक्नः५।४।९८॥ चादुपमानात् । उत्तरसक्थम् । मृगसक्थम् । पूर्वसक्यम् । फल- कमिव सक्यि फलकसक्थम् ॥ नावो द्विगः५।४।९९॥ इति किम् । पञ्चभिौमिः क्रीतः पञ्चनौः ॥ अर्धाच ५।४।१०॥

सुगमकामुद्याः। अर्धान्नावष्टच् । नार्धम् अर्धनावम् । क्लीवत्वं लोकात् ॥ खार्याः प्राचाम् ५।४।१०१॥ द्विगोरर्धाच खार्याष्टज्या । दिसारम् दिसारि । अर्धवारम् अर्धवारि ॥ द्वित्रिभ्यामञ्जलेः५।४।१०२॥ टज्वा द्विगी । यञ्जलम् द्यञ्जलि । अतद्रितलुकि इत्येव । द्वाभ्यामअलिभ्या क्रीतो व्यञ्जलिः ॥ आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः ६३।४६॥ महत आकारोन्तादेश. समानाधिकरण उत्तरपदे जातीये च परे । महादेवः । महाजातीय । समानाधिकरणे किम् । महत. सेवा महत्सेवा । लाक्षणिकं विहाय प्रतिपदोक्तः सन्महत् इति समासो ग्र- हीष्यत इति चेत् महाबाहुर्न स्यात्तस्मात् लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रति- पदोक्तस्य इति परिभाषा नेह प्रवर्तते समानाधिकरणग्रहणसाम- र्थ्यात् । आत् इति योगविभागादात्वं प्रागेकादशभ्यः इति निर्दे- शादा । एकादश । महतीशब्दस्य पुंवत्कर्मधारय इति पुंपदावे कृत आत्वम् । महाजातीया ।। महदात्वे घासकरविशिष्टेषूपसंख्यानं पुंवभावश्च ॥ असमानाधिकरण्यार्थमिदम् । महतो महत्या वा घासो महा घासः । महाकर. । महाविशिष्टः । अष्टनः कपाले हविपि । अष्टा- कपालः । गवि च युक्ते । गोशब्दे परे युक्त इत्यर्थे गम्येऽष्टन आ- त्वम् । अष्टागवं शकटम् । अच्मत्यन्वव इत्यन अच् इति योगा भागाबहुव्रीहावप्यचू । अष्टाना गवा समाहारोऽष्टागवम् । तद्युक्तत्वा च्छकटमष्टागवमिति वा ।। ब्यटनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः ६।३।४७ ॥ आत्। द्वौ च दश च द्वादश द्याधकादशेति वा। द्वाविंशतिः। अष्टादश । अष्टाविंशतिः । अबहुव्रीत्यगीत्योः किम् । वित्रा. व्य शीतिः ॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः । २९५ प्राक्शताद्वक्तव्यम् ॥ नेह । द्विशतम् । द्विसहस्रम् ।। त्रयः६।३।४८॥ त्रिशब्दस्य त्रयम् स्यात्पूर्व विपये । प्रयोदश । त्रयोविंशतिः । बहुव्रीही तु निर्दश त्रिदशाः । मुजथ बहुव्रीहिः । अंशीती तु ध्यशीतिः । प्राक्छतात् इत्येव । त्रिशतम् । त्रिसहस्रम् ॥ विभापा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेपाम् ६।३।४९॥ व्यप्टनोस्रश्च प्रागुक्तं वा स्याचत्वारिंशदादा परे । द्विचत्वारिंशत् द्वाचत्वारिंशत् । अष्टचत्वारिंशत् अष्टाचत्वारिंशत् । त्रिचत्वारिंशत् जयश्चत्वारिंशत् । एवं पश्चाशत्पष्टिसप्ततिनवतिपु॥ एकादिश्चैकस्य चादुक् ६।३।७६ ॥ एकादिर्न प्रकृत्या स्यादेकस्य चादुगागमश्च । नजो विशत्या समासे कृत एकशब्देन सह तृतीया इति योगविभागात्समासः । अनुनासिकविकल्पः। एकेन न विंशतिः एकानविंशतिः। एकाट्न- विंशतिः । एकोनविंशतिरित्यर्थः ।। पप उत्वं तृदशधासूत्तरपदादेः ष्टुत्वं च धासु वेति वाच्यम् ॥ पोडन् पोडश । पोहा पडूधा । समाहारे द्विगुईन्द्रश्च । नपुंसक- मित्युक्तमूपिञ्चगवम् । अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः । पञ्च. मूली । आवन्तो वा । पञ्चरवट्वी पश्चरवट्सम् । अनो नलोपश्च वाच द्विगुः स्त्रियाम् । पञ्चतक्षी पञ्चतक्षम् ॥ पात्रायन्तस्य न॥ । पञ्चपात्रम् । त्रिभुवनम् । चतुर्युगमित्यायन्यदपि लिङ्गानुशा- सने ज्ञेयम् । सामान्ये नपुंसकम् । मृदु पचति । प्रातः कमनीयम् । इति तत्पुरुषः।। इति ११० अंशाः । इति तृतीयाध्यायस्य तृतीयः पादः।

सुगमकीमुद्याः। शेपो यहुबीहिः । अनेकमन्यपदार्थ । प्राप्तोदका ग्राम इत्यादि। प्रथमायें तु न । वृष्टे देवे गतः । व्यधिकरणानामपि न । पञ्चभिः (क्तमस्य ।। प्रादिभ्यो धातुजस्य याच्यो चाचोत्तरपदलोपः ॥ अविद्यमानपुत्रोऽपुत्रः । अस्ति इति विमक्तिमतिरूपक्मव्ययम् । अस्तिक्षीरा गौः । खियाः पुंवदित्यादिना घुबडायः । चित्रा गावो यस्येति लौकिकविग्रह चित्रगुः । रूपवार्यः । चित्रा जरती गार्यस्येति विग्रहेअनेकोक्तेर्वनामपि वहुव्रीहिः । अत्र केचित् । चित्रा जरतीगुः जरती चित्रागुर्वा । एवं दीर्घातन्वी जहः । तन्वीदीर्घा जहः । त्रिपदे वहुव्रीही प्रयम न पुंवत् । उत्तरपदस्य मध्यमेन व्यवधानात् । द्वितीयमपि न पुंवत् । पूर्वपदत्वाभावात् । उत्तरपदशब्दो हि समासस्य चरमावयवे रूढः । पूर्वपदशब्दस्तु प्रथमावयवे इति वदन्ति । वस्तुतस्तु नेह पूर्वपदमाक्षिप्यते । आनइ ऋतः इत्यत्र यथा तेनोपान्त्यस्य पुंवदेव चित्रा जरद्गुः इत्यादि। अत एव चित्राजरत्यौ गावौ यस्येति द्वन्द्वगर्भऽपि चित्राजरद्गुः इति भाष्यम् । कर्मधारयपूर्वपदे तु द्वयोरपि पुंवत् । जरचित्रगुः । कर्मधारयोत्तरपदे तु चित्रजरगवीकः । पूरण्यां तु ॥ अप्पूरणीप्रमाण्योः५।४।११६॥ पूरणार्थप्रत्ययान्तं यत्स्त्रीलिङ्गं तदन्तात्प्रमाण्यन्ताच वहुव्रीहेरप् । कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणा ताः कल्याणीपञ्चमा रात्रयः। स्त्रीप्रमाणी यस्य स स्वीप्रमाणः । (वभावप्रतिषेधोऽप्प्रत्ययश्च प्रधानपुरण्यामेव । रात्रिः पृरणी वाच्या चेत्युक्तोदाहरणे मुख्या। अन्यत्र तु नवृतश्चेति कप् । कल्याणी पञ्चमी यत्र स क्ल्याणप- ञ्चमीकः पक्षः । अत्र तिरोहितावयवभेदस्य पक्षस्यान्यपदार्थतया रात्रिरप्रधानम् । बहुकर्तृकः। अप्रियादिपु किम् । क्ल्याणीप्रियः । मिया । मनोज्ञा । कल्याणी । सुभगा। दुर्भगा । भक्तिः । सचिवा । स्वसा । कान्ता । क्षान्ता । समा । चपला। दुहिता ।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। २९७ वामा । अबला । तनया .। सामान्ये नपुंसकम् । दृढं भक्तिर्यस्य स दृढभक्तिः स्त्री॥ तसिलादिष्याकृत्वसुचः६।३।३५॥ तसिलादिष्वाकृत्वसुजन्तेषु परेषु स्त्रियाः पुंवत। परिगणनं कर्त- व्यम् । अव्याप्त्यतिव्याप्तिपरिहाराय तसौ । तरप्तमपौ । चरट्- जातीयरौ । कल्पप्देशीयरी । रूपप्पाशपौ । थाल् । तिल्थ्यनौ । बहीषु वहुत्र बहुतः । दर्शनीयतरा दर्शनीयतमा । घरूप इति वक्ष्यमाणो हस्वः परत्वात्पुंबद्भाव, वाधते । पडितरा पहितमा । पटुचरी पटुजातीया । दर्शनीयकल्पा दर्शनीयदेशीया । दर्शनी- यरूपा । दर्शनीयपाशा । वहुथा। प्रशस्ता वृकी वृकतिः । अजा- भ्यो हिता अजथ्या॥ शसि बह्वल्पार्थस्य पुंवभावो वक्तव्यः ॐ ॥ वहीभ्यो देहि बहुशः । अल्पाभ्यो देहि अल्पशः । त्वतलो"- णवचनस्य । शुक्लाया भावः शुक्लत्वम् । गुणवचनस्य किम् । का भावः कर्वीत्वम् । शरदः कृतार्थता इत्यादौ तु सामान्ये नपुंसकम् । मस्याढे तद्धिते । हस्तिनीनां समूहो हास्तिकम् । अढे किम् । रौहिणेयः । स्त्रीभ्यो ढक इति ढोऽत्र गृह्यते । अग्नेक इति ढकि तु पुंवदेव । अनायी देवतास्य स्थालीपाकस्यागेयः । सपत्नीशब्दस्विधा । शत्रुपर्यायात्सपत्नशब्दाच्छारिवादित्यान्डी- न्येकः । समानः पतिर्यस्या इति विग्रहे विवाहनिवन्धनं पतिश. ब्दमाश्रित्य नित्यस्त्रीलिङ्गो द्वितीयः । स्वामिपर्यायपतिशब्देन भा- पितपुंस्कस्तृतीयः । आधयोः शिवायण । सपत्न्या अपत्यं सा- पत्नः। तृतीयाच लिङ्गविशिष्टपरिभाषया पत्युत्तरपदलक्षणो ण्य एवं न त्वण ।, शिवादी रूढयोरेव ग्रहणात्सापत्यः । ठक्छसोश्च । भवत्याश्छात्रा भावत्काः भवदीयाः । एतद्वार्तिकम् एकतद्धितेच इति सूत्रं च न कर्तव्यम् । सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवभावः इति भाष्यकारेष्टया गतार्थत्वात् । मर्वकाम्याते । सर्विका भार्या यस्य २९८ मुगमकीमुद्याः। सर्वकमार्यः । सर्वप्रिय इत्यादि । पूर्वस्यैवेदम् । मखपाजाज्ञादा इति लिगात् । तेनाकच्येक्शेषवृत्तौ च न । सर्विका सर्वाः। कुक्कु- ट्यादीनामण्डादिषु । कुछुट्या अण्डं कुक्कुटाण्डम् । मृग्याः पदं मृगपदम् । मृगक्षीरम् । काकशावः ॥ क्यङ्मानिनोश्च ६।३।३६॥ एतयोः परतः पुंवत् । एनीवाचरत्येतायते । श्येनीवाचरति श्येतायते । स्वभिन्नां कांचिद्दर्शनीयां मन्यते दर्शनीयमानिनी। दर्शनीयां स्त्रियं मन्यते दर्शनीयमानी चैत्रः॥ न कोपधायाः६।३।३७॥ कोपधायाः स्त्रियाः न पुंवत् । पाचिकामार्यः । रसिकाभार्यः । भद्रिकायते । मद्रिकामानिनी ॥ कोपधप्रतिपेधे तद्धितबुग्ग्रहणम् ॐ ॥ नेह । पाका भार्या यस्य स पाकमार्यः ।। इनि १११ अंशाः। संज्ञापूरण्योश्च ६।३।३८॥ अनयोर्न पुंवत् । दत्ताभार्यः । दत्तामानिनी । दानक्रियानिमित्तः खियां पुंसि च संज्ञाभूतोऽयमिति भाषितपुंस्कत्वमस्ति । पञ्चमी. भार्यः । पञ्चमीपाशा ।। वृद्धिनिमित्तस्य च तद्धितस्यारक्तविकारे ६।३।३९॥ वृद्धिशब्देन विहिता या वृद्धिस्तद्वेतुर्यस्तद्धितोरक्तविकारार्थ- स्तदन्ता वी न पुंवत् । स्रौनीभार्यः। माथुरीयते । माथुरीमानिनी। वृद्धिनिमित्तस्य किम् । मध्यममार्यः तादेवस्य किम् । काण्डला- वमार्यः । वृद्धिशब्देन किम् । तावमार्यः ।रक्ते तु, काषायी कन्या यस्य स कापायकन्यः । विकारे तु, हैमी मुद्रिका यस्येति हममुद्रिक । वृद्धिशब्देन वृद्धि प्रति फलोपधानाभावादिह पुंवत् । वैयाकरणमार्यः। सौवश्वमार्यः॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः । २९९ स्वाङ्गाचेतः६।३।४०॥ स्वागाद्य ईकारस्तदन्ता स्त्री न पुंवत् । सुकेशीभार्यः । स्वाहात् किम् । पटुभार्यः । ईतः किम् । अकेशभार्यः ।। अमानिनीति वक्तव्यम् ॐ ॥ सुकेशमानिनी ॥ जातेश्च६।३।४१॥ जातेः परो यः स्त्रीप्रत्ययस्तदन्तं न पुंवत् । शूद्राभार्यः । ब्राह्म- णीभार्यः । सौत्रस्यैवायं निषेधः तेन हस्तिनीनां समूहो हास्तिक मित्यत्र भस्याढे इति तु भवत्येव ॥ संख्ययाव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये२।२।२५॥ संख्येयार्थया संख्ययाव्ययादयः समस्यन्ते स बहुव्रीहिः । दशानां समीपे ये सन्ति त उपदशाः । नव एकादश वेत्यर्थः । बहुव्रीहौ संख्येये इति वक्ष्यमाणो डच् ॥ तिविंशतेर्डिति ६।४।१४२॥ विंशतेर्भस्य तिशब्दस्य लोपः स्याड्डिति । आसन्नविंशाः। विशतेरासन्ना इत्यर्थः । अदूरत्रिंशाः । अधिकचत्वारिंशाः। दो वा त्रयो वा द्वित्राः । द्विरावृत्ता दश द्विदशाः । विंशतिरित्यर्थः ॥ दिङ्नामान्यन्तराले २।२।२६॥ दिशो नामान्यंतराले वाच्य प्राग्वत् । दक्षिणस्याः पूर्वस्याश्च दिशोऽन्तरालं दक्षिणपूर्वा । नामग्रहणाद्यौगिकानां न । ऐन्द्रयाश्च कौवेर्याश्चान्तरालं दिक् ॥ तत्र तेनेदमिति सरूपे २।२।२७ ॥ सप्तम्यन्ते ग्रहणविषये सरूपे पदे तृतीयान्ते च प्रहरणविषय इदं युद्धं प्रवृत्तमित्यर्थे समस्येते कर्मव्यतिहारे द्योत्ये स बहु- ब्रीहिः । इतिशब्दादयं विषयविशेपो लभ्यते। इसमासान्तो वक्ष्यते । तिष्ठद्गुप्रभृतिष्षिअत्ययस्य पागदव्ययीभावत्वमव्य- ।

३०० सुगमकौमुद्याः। यत्वं च । जन्येषामपि दृश्यते इति दीर्घः । केशेषु केशेषु गृहीत्वेदं युद्धं प्रवृत्तं केशाकेशि । दण्डैश्च दण्डैश्च महत्येदं गुदं प्रवृत्तं दण्डा- दण्डि । मुष्टीमुष्टिाओर्गुणः। अवादेशः। वाहूवाहवि । ओर्गुण इत्यत्र ओरोत् इति वक्तव्ये गुणोक्ति. । संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः इति ज्ञापयितुम् । तेन स्वायंभुवः इत्यादि सिद्धम् । सरूपे इति किम् । इलेन मुसलेन । तेन सहेति तुल्ययोगे वोपसर्जनस्य सपुत्रः सह- पुरः । तुल्ययोगवचनं प्रायिकम् । सकर्मकः । सलोमकः ॥ प्रकृत्याशिपि६।३।८३॥ सहशब्दः प्रकृत्या स्यादाशिपि । स्वस्तिराज्ञे सहपुत्राय । महामात्याय ॥ अगोवत्सहलेष्विति वाच्यम् ॥ सगवे । सवत्साय । सहलाय ॥ बहुव्रीही संख्यये डजबहुगणात् ५।४।७३ ॥ संख्येये यो बहुव्रीहिस्तस्माड्डच् । उपदशाः । अवहुगणात किम् । उपबहवः । उपगणाः । अन स्वरे विशेपः॥ संख्यायास्तत्पुरुपस्य वाच्यः ॐ ॥ निर्गतानि त्रिंशतो निस्त्रिंशानि वर्षाणि चैनस्य । निर्गतस्त्रिं. शतागुलिभ्यो निस्त्रिंशः खङ्गः। बहुव्रीही सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्पन् ५।४।११३ ॥ व्यत्ययेन पष्ठी । सागचाचिसक्थ्यक्ष्यन्तादहुबीहेः पन् । दीघे सक्थिनी यस्य स दीर्घसक्यः । जलजाक्षी । स्वाङ्गात् किम् । दीर्घसक्यि शक्टम् । स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः । अक्षणोऽदर्शनात इत्यच॥ अंगुले रुणि५।४।११४॥ अंगुल्यन्तादबीदे पर दारुण्यर्थे । पञ्चांगुलयो यस्य तत्प भांगुलं दारु । अंगुरिराशावय धान्यादिरिसेपणकाष्ठमुच्यते ।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । वहुव्रीहेः किम् ।टे अंगुली प्रमाणमस्या व्यंगुला यष्टिः । तद्धितार्थ तत्पुरुपे तत्पुरुपस्यांगुले: इत्यच् । दारुणि किम् । पञ्चांगुलिईस्तः॥ दित्रिभ्यां प मूनः५।४।११५॥ आभ्या मूर्ध्नः पः बहुव्रीहो । दिमूर्ध । त्रिमूर्धः ॥ नेतुर्नक्षत्रे अव्वक्तव्यः * ॥ मृगो नेता यासा ता मृगनेत्रा रात्रयः । पुष्यनेत्रा.॥ अन्तर्वहिन्यां च लोग्नः ५।४।११७ ॥ आभ्या लोम्नोऽपू बहुव्रीहो । अन्तर्लोमः वहिलामः ।। इति ११२ अंशाः। अन्नासिकायाः संज्ञायां नसंचास्थूलात् ५।४।११८॥ नासिकान्तादहुव्रीहेरच् । नासिकाशब्दश्च नसं प्रामोति नतु स्थूलपूर्वात् ॥ पूर्वपदात्संज्ञायामगः ८।४।३॥ पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य नस्य णः स्यात्संज्ञायां नतु गकार- व्यवधाने । दुरिव नासिकास्य गुणसः। खरणसः । अगः किम् । ऋचामयनमृगयनम् । अणगयनादिभ्यः इति निपातनाण्णत्वाभाव- माश्रित्य अगः इति प्रत्याख्यातं भाष्ये । अस्थूलात् किम् । स्थू. लनासिकः॥ खुरखराभ्यां वा नम् ॥ खुरणाः खरणाः । पक्षेजपीष्यते । खुरणसः ।। उपसर्गाच५।४।११९॥ प्रादेयों नासिकाशब्दस्तदन्ताबहुव्रीहेरच नासिकाया नसादेशश्च । असंज्ञार्थं वचनम् । उन्नता नासिका यस्य स उन्नसः । उपस- ईदनोत्परः इति सूत्रं तद् भक्त्वा भाष्यकार आह ॥ उपसर्गाद्रहुलम् ८१४॥२८॥ - . ३०२ सुगमकौमुखाः। उपसर्गस्यानिमित्तात्परस्य नसो नस्य णः बहुलम् । प्रणसः॥ वेगों वक्तव्यः ॥ विगता नासिकास्य विनः॥ ख्यश्च ॥ विख्यः । कथं तर्हि, विनसा हतवान्धवा इति महिः । विग- तया नासिकयोपलक्षितेति व्याख्येयम्॥ सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्रेणीपदाजपद- प्रोष्टपदाः ५।४।१२०॥ एते बहुव्रीहयोऽप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शोभनं प्रातरस्य सुमातः । शोमनं श्वोऽस्य सुश्वः । शोभनं दिवास्य सुदिवः । शारे- खि कुक्षिरस्य शारिकुक्षः । चतम्रोऽश्रयोस्य चतुरश्रः । एण्या इव पादावस्यैणीपदः । अजपदः । मोटो गौस्तस्येव पादावस्य मोष्टपदः।। नित्यमसिप्रजामेधयोः ५।४।१२२ ।। नन्दुःमुभ्यः इत्येर । अमजाः । दुष्प्रजाः । मुमजाः । अमेधाः। दुर्भधाः । मुमेधाः॥ धर्मादनिच केवलात् ५।४ । १२४ ।। फेवलारपूर्वपदात्परो यो धर्मशन्दस्तदन्ताद्धामीदरनिन् । कल्या. णधर्मा । पेबलात् किम् । परमः स्योधर्मो यस्पेति त्रिपदे यानीही मा भृत् । स्वगन्दी हार न केवलं पूर्वपदं किन्तु मध्यमत्वादापेक्षित कम् । मंदिग्धसाध्यधर्मा इत्यादी तु पर्मधारयपूर्वपदो पानीतिः। पंच परमम्बधर्मा इत्यपि सापेष । नितिधर्मा । अनुछिप्ति धर्मा यादिवत् । पूर्वपदं हु बहुमीहिणा क्षिप्यते ।। दक्षिणमा लुपयोगे ५121१२६॥ दामगि म प्रण यस्य दक्षिणमा मृगः । प्याधेन इतरण पः॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः । ३०३ इच् कर्मव्यतिहारे ५।४। १२७॥ कर्मव्यतिहारे यो बहुव्रीहिस्तस्मादिच्समासान्तः । केशाकेशि । मुसलामुसलि ॥ द्विदण्ड्यादिभ्यश्च ५।४ । १२८॥ तादर्थं चतुयेंपा एपां सिद्धयर्थमिच्प्रत्ययः। द्वौ दण्डौ यस्मि- न्यहरणे तद्विदण्डि प्रहरणम् । दिमुसलि । उमाहस्ति । उभया- हस्ति ॥ प्रसंभ्यां जानुनो ः६।४।१२९॥ आभ्यां परयोर्जानुशन्दयो रादेशी बहुव्रीही । प्रगते जानुनी यस्य प्रजुः । संजुः॥ ऊर्वाद्विभाषा ५।४।१३०॥ उर्ध्वजुः । ऊर्धजानुः॥ धनुषश्च ५।४।१३२॥ धनुरन्तस्य वहुव्रीहेरनडादेशः । शाईधन्वा॥ वा संज्ञायाम् ५।४। १३३ ॥ शतधन्वा । शतधनुः ।। जायाया नि५।४।१३४॥ जायान्तस्य वहुव्रीहेनिडादेशः । लोपो व्योर्वलि । पुंवदूभावः। युवतिर्जायास्य युवजानिः॥ गंधस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः ५ । ४ । १३५ ॥ एभ्यो गन्धस्येकारोन्तादेशः । उद्गंधिः । पूतिगन्धिः । सुग. न्धिः । सुरभिगन्धिः॥ गंधस्येत्वे तदेकान्तग्रहणम् ॥ एकान्त एकदेश इवाविभागेन लक्ष्यमाण इत्यर्थः । अत्र गुण- चाचिनो गन्धशब्दस्य ग्रहणमित्याशयः । मुगंधि पुष्पं सलिलं च ।

सुगमकौमुद्याः ।। विशेष्यभूतान्यपदार्थगतगंधस्यैव ग्रहणमिति वृत्त्यादिमते तु सुग- न्धि पुष्पमित्येव साधु सुगंधि सलिलम् । अयुकच्छदगुच्छमुग- न्धयः इत्यादित्वसाधु । अत एव महिः । आघ्रायिवान् गन्धवहः सुगन्ध इति । तदेकान्तेति किम् । शोभना गंधा द्रव्याण्यस्य स सुगंधः । आपणिकः॥ अल्पाख्यायाम् ५।४। १३६॥ सूपस्य गंधो लेशो यस्मिंस्तत्स्पगन्धि भोजनम् । वृतगन्धि । गन्धो गन्धक आमोदे लेशे संबंधगर्वयोः । इति विश्वः॥ उपमानाच्च ५।४।१३७॥ पद्मस्येव गन्धोऽस्य पद्मगंधिः ॥ पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः ५।४।१३८ ॥ हस्त्यादिवर्जितादुपमानात्परस्य पादशब्दस्य लोपो वहुव्रीही। स्थानिद्वारेणायं समामान्तः । व्याघ्रस्येव पादावस्य व्याघ्रपात् । अहस्त्यादिभ्यः किम् । हस्तिपादः । कुसूलपादः ॥ संख्यासुपूर्वस्य ५।४।१४० ॥ पादस्य लोपः समाप्तान्तो बहुव्रीहौ । दिपात् । मुपात् ।। वयसि दन्तस्य दतृ ५।४।१४१॥ संख्यासुपूर्वस्य दन्तस्य दत् इत्यादेशो क्यसि । द्विदन् । चतु- देन । पट्र दन्ता अस्य पोडन् । सुदन् । सदती । वयसि किम् । द्विदन्तः करी । सुदन्तो नटः ।। इति ११३ अंशाः। सुद्धहदो मित्रामित्रयोः५।४।१५०॥. मुदुा हृदयस्य हृद्मावो निपात्यते । मुद्दन्मित्रम् । दुईदमि- पः। अन्यत्र सुहृदयः । दुईदयः॥ उरम्प्रभृतिभ्यः कपू५।४।१५१॥ व्यूढोरस्कः। प्रियसर्पिष्कः। इह पुमान् । अनहान् । पयः। नौः। लक्ष्मीः । इत्येकाचनान्तानि पठयन्ते । दिवचनबहुवचनान्तभ्यस्तु द्वितीयखंडस्य प्रथमा भागः । शेषाद्विभाषा इति विकल्पन कप । द्विपुमान् । द्विपुंस्कः । अर्था- नञः । अनर्थकम् । नञः किम् । अपार्थम् । अपार्थकम् ॥ इनः स्त्रियाम् ५।४।१५२॥ बहुदण्डिका नगरी ॥ अनिनस्मन्ग्रहणान्यर्थवता चानर्थकेनापि तदन्तविधि प्रयोजयन्ति ॥ बहुवारिग्मका स्त्रियाम् किम् । बहुदण्डी । वहुदण्डिको ग्रामः।। शेपाद्विभापा ५।४। १५४ ॥ अनुक्तसमासान्ताच्छेपाधिकारस्थाद्वहुव्रीहः कन्वा । महायश- स्कः । महायशाः । अनुक्त इत्यादि किम् । व्याघ्रपात् । सुगंधिः प्रियपथः । शेपाधिकारस्थात् किम् । उपवहवः । उत्तरपूर्वा । सपुत्रः । तन्त्रादिना शेषशब्दोऽर्थद्वयपरः ॥ आपोऽन्यतरस्याम् ७।४।१५॥ कप्यावन्तस्य हस्वो वा । बहुमालाकः बहुमालकः । कबभावे बहुमालः ॥ न संज्ञायाम् ५।४।१५५॥ शेपात् इति प्राप्तः कन संज्ञायाम् । विश्वे देवा अस्य विश्वेदेवः।। ईयसश्च ५।४।१५६॥ ईयमन्तोत्तरपदान्न का । वहवः श्रेयांसोऽस्य बहुश्रेयान् । गो- स्त्रियोः इति हस्वत्वे प्राप्ते ॥ ईयसो बहुव्रीहेर्नेति वाच्यम् ॐ ॥ वयः श्रेयस्योऽस्य बहुश्रेयसी। वहुव्रीहेः किम् । अतिश्रेयासेः ।। निष्प्रवाणिश्च ५।४।१६०॥ कवभावोन निपात्यते । प्रपूर्वाद्वयतेल्युट् । प्रवाणी तन्तुवाय. शलाका । निर्गता प्रवाण्यस्य निष्प्रवाणिः परः । समाप्तवानः । नव इत्यर्थः ॥

३०६ सुगमकौमुद्याः। सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ २।२।३५॥ सप्तम्यन्तं विशेषणं च बहुव्रीही पूर्व प्रयोग्यम् । कण्ठेकालः । अत एव ज्ञापकायधिकरणपदो वहुव्रीहिः । चित्रगुः ॥ सर्वनामसंख्ययोरुपसंख्यानम् * ॥ सर्वश्वतः । विशुक्लः । मिथोऽनयोः समामे संख्यापूर्व शब्दपर- विप्रतिषेधात् । धन्यः । संख्याया अल्पीयस्याः। द्वित्राः । द्वन्दे घि द्वादश वा पियस्य । गुडप्रियः । प्रियगुडः ।। गड्डादेः परा सप्तमी ॥ गडुकण्ठः । कचिन्न । वहेगडुः ॥ निष्ठा२।२।३६॥ निष्ठान्त वहुव्रीही पूर्वम् । कृतकृत्यः ।। जातिकालसुखादिभ्यः परा निष्ठा वाच्या * ॥ सारङ्गजग्धी । मासनाता । मुखजाता। प्रायिकं चेदम् । कृत- कटः । पीतोदकः॥ वाहिताम्यादिषु २।२।३७॥ आहितानिः अन्याहितः । आकृतिगणोऽयम् ॥ प्रहरणार्थेभ्यः परे निष्ठासप्तम्यौ ॥ अस्युद्यतः। दण्डपाणिः । कचिन्न । विवृतासिः।इति बहुव्रीहिः। चार्थ द्वन्दः । समुच्चयान्वाचयेतरेतरयोगसमाहाराश्चार्थाः । पर- स्परनिरपेक्षस्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः । अन्यतरस्पानुप- निकत्वेऽन्वाचयः। मिलितानामन्वय इतरेतरयोगासमूहः समाहारः। तत्रेश्वरं गुरुं च मजस्व इति समुपये भिक्षामट गां चानय इत्यन्वा. चये च न समासोऽसामर्थ्यात् । धवखदिरी ! संज्ञापरिमापम् । अनेकोक्तेः होटपोतनेष्टोद्गातारः। द्वयोईयोद्धं कृत्वा पुनदे तु आनइ ऋत इति वक्ष्यमाणे आनडि होता पोता नेप्टोद्गातारः॥ राजदन्तादिषु परम् २१२॥३२॥ .

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । ३०७ एषु पूर्वप्रयोगार्ह परम् । दन्तानां राजा राजदन्तः ॥ धर्मादिष्वनियमः॥ अर्थधर्मों धर्मार्यो । दम्पती । जम्पती जायापती । जायाश- ब्दस्य जम्माको दम्भावश्च वा निपात्यते । आकृतिगणोऽयम् ।। द्वन्द्वे घि२॥२॥३२॥ द्वन्द्वे घिसंशं पूर्वम् । हरिश्च हरश्च हरिहरी ।। अनेकप्राप्तावेकत्र नियमोऽनियमः शेपे * ॥ हरिगुरुहराः । हरिहरगुरवः ॥ अजायदन्तम् २१२।३३॥ इदं इन्हे पूर्वम् । ईशकृष्णौ । बहुवनियमः : अश्वरथेन्द्राः इन्द्राश्वरथाः । घ्यन्तादजाद्यदन्तं विप्रतिषेधेन । इन्द्राग्नी ॥ अल्पाच्तरम् २।२।३४॥ शिवकेशवी । ऋतुनक्षत्राणां समाक्षराणामानुपृव्येण । हेमन्त- शिशिरवसन्ताः । कृत्तिकारोहिण्यो । समाक्षराणां किम् । श्रीष्मव- सन्ती। लघ्वक्षरं पूर्वम् । कुशकाशम् । अभ्यर्हितं च । तापसपर्वती। वर्णानामानुपूय॑ण । ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः । भ्रातुायसः । युधिष्टिरार्जुनी॥ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् २ । ४।२।। एपां द्वन्द एकवत् । पाणिपादम् । माङ्गिकपाणविकम् । रथि- काश्वारोहम् । समाहारस्यैकत्वादेकत्वे सिद्ध नियमार्थ प्रकरणम् । प्राण्यगादीनां समाहार एव यथा स्यात् ॥ इति ११४ अंशाः । - गवाश्वप्रभृतीनि च २।४।११॥ यथोचारितानि माधूनि स्युः । गवाश्वम् । दासीदासमित्यादि ।। न दधिपयआदीनि २।४।१४॥

सुगमकीमुद्याः। पतानि नकवत्स्यः । दधिपयसी। इध्मावहिंपी। निपातनादीर्घः। ऋक्सामे । वाइमनसे ॥ आनङ्ऋतो द्वन्द्वे ६।३। २५ ॥ विद्यायोनिसंबंधवाचिनामृदन्तानां दन्दे आनड् स्यादुत्तरपदे परे । होतापोतारी । होतपोतनेष्टोद्गातार. । मातापितगे। पुत्रे. न्यतरस्याम् इत्यतो मण्डकप्लत्या पुत्रे इत्यनुवृत्तेः । पितापुत्री ।। देवताद्वन्द्वे च ६।३।२६॥ इहोत्तरपदे पर आनड्र । मित्रावरुणौ । वायुशब्दप्रयोगे प्रति- पेधः । अग्निवायू । वावग्नी। पुनर्द्वन्द्वग्रहणंप्रसिद्धसाहचर्यस्य परिग्र- हार्थम् । तेन ब्रह्मप्रजापती इत्यादी नानइ । एतद्धि नैकहविर्भागत्वेन श्रुतं नापि लोके प्रसिद्धसाहचर्यम् ॥ ईदग्नेः सोमवरुणयोः ६।३।२७॥ देवताइन्टे ॥ अग्नेः स्तुत्स्तोमसोमाः ८।३। ८२॥ अग्नेः परेपामेपां सस्य पः समासे । अग्निष्टुत् अग्निष्टोमः । अग्नीपोमो । अग्नीवरुणौ ॥ इदृद्धौ ६।३।२८॥ वृद्धिमत्युत्तरपदे अग्नेरिदादेशो देवताबन्दे । अनामरुती देवते अस्य आग्निमारुतं कर्म । अग्नीवरुणो देवते अस्प अग्निपारुणम् । देवताद्वन्दे च इत्युभयपदवृद्धिः । अलौकिकवाक्य आनडमीत्वं च वाधित्या इत् । वृद्धौ किम् । आनेन्द्रः। नेन्द्रस्य परस्य इत्युत्तरपद- वृद्धिप्रतिषेधः । विष्णा न । अग्नावैष्णवम् ।। दिवो द्यावा ६।३।२९ ॥ देवताहन्दे उत्तरपदे । द्यावाभूमी । द्यावाक्षमे ।। दिवसश्च पृथिव्याम् ६३1३०॥

. द्वितीयखंडस्य प्रथमो भौगः । ३०९ दिवः इत्येव चाड्यावा । आदेशेऽकारोचारणं सकारस्य रुत्वं मा भूदित्येतदर्थम् । योश्च पृथिवी च दिवस्पृथिव्या द्यावापृथि- व्यौ । छन्दसि दृष्टानुविधिः । द्यावाचिदस्मै पृथिवी दियस्पृयिव्यो- रतिः इत्यत्र पदकारा विसगै पठन्ति ॥ उपासोपसः६।३।३१॥ उपस्शब्दस्योपासादेशो देवताइन्द्रे । उपासा स्यम् ॥ मातरपितरावुदीचाम् ६।३।३२॥ मातपितरौ । उदीचां किम् । मातापितरी ॥ द्वन्द्वाचुदपहान्तात्समाहारे ५।४।१०६॥ चवर्गान्ताद्दपहान्ताय द्वन्द्वादृच्ममाहारे । वाक् च त्वक्च वा. रत्वचम् । त्वक्स्रजम् । शमीदृपदम् । वाक्त्विपम् । छनोपानहम् । समाहारे किम् । प्रावृट्शरदा । इति द्वन्द्वसमासः ॥ सरूपाणामेकशेपः । रामौ । रामाः। विरूपाणामाप समाना- र्थानाम् । वक्रदण्डश्च कुटिलदण्डश्च वक्रदण्डौ कुटिलदण्डौ । वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेषः १।२।६।। यूना सहोक्ती गोत्रं शिष्यते गोत्रयुवप्रत्ययमात्रकृतं चेत्तयोः कृत्नं वैरूप्यम् । गार्यश्च गार्यायणश्च गाग्यौं । वृद्धः किम् । गर्गगार्यायणी । यूना किम । गायेगौँ । तल्लक्षणः किम् । भागवित्तिभागवित्तिकौ । कृत्स्नं किम् । गार्यवात्स्यायनी ॥ स्त्री पुंवञ्च ११२॥६६॥ यूना सहोक्तौ वृद्धा स्त्री शिष्यते तदर्थश्च पुंवत् । गार्गी च गाायणौ च गर्गाः । अस्त्रियाम् इत्यनुवर्तमाने पननोश्व इति लुक । दाक्षी च दाक्षायणश्च दाक्षी ॥ पुमान् स्त्रिया ११२।६७॥ खिया सहोक्ता पुमाञ्छिष्यते तल्लक्षण एवं विशेपश्चन् । हंसी च इंसश्च हंसा॥

सुगमकौमुद्याः। भ्रातृपुत्री स्वसृदुहितृभ्याम् २।१।६८॥ भ्राता च स्वसा च भ्रातरौ । पुत्रश्च दुहिता च पुत्रौ ॥ नपुंसकमनपुंसके नैकवचास्यान्यतरस्याम् १।२।६९॥ अक्लीवेन सहोक्तो क्लीय शिष्यते तच वा एक्वत्तल्लक्षण एव वि. शेपश्चेत् । शुक्ल पटः । शुक्ला शाटी । शुक्लं वस्त्रम् । तदिदं शुक्लम् । तानीमानि शुक्लानि ॥ पिता मात्रा ११२।७०॥ मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्यते । माता च पिता च पितरौ मातापिनरी वा ॥ श्वशुरुः श्वश्वा १।२।७१ ॥ श्वचा सहोक्तौ श्वशुरो वा शिष्यते तल्लक्षण एव विशेपश्चेत् । श्वभूश्च श्वशुरश्च श्वशुरौ श्वश्रूश्वशुरौ ।। त्यदादीनि सनित्यम् ११२१७२ ॥ सर्वैः सहोक्तौ त्वदादीनि नित्य शिष्यन्ते । स च देवदत्तय तौ। त्यदादीना मिथ. सहोक्तौ यत्पर तच्छिष्यते । स च यश्च यो । पूर्वशेपोप दृश्यते इति भाष्यम् । स च यश्च तौ । त्यदा- दितः शेषे पुनपुसकतो लिङ्गवचनानि । सा च देवदत्तश्च तौ । तच्च देवदत्तश्च यज्ञदत्ता च तानि । पुन्नपुसक्योस्तु परत्वान्नपुसक शिष्यते । तच्च देवदत्तश्च ते॥ अइन्द्रतत्पुरुपविशेपणानामिति वक्तव्यम् ॥ कुष्टमयूर्याविमे । मयुरीकुछुटाविमौ । तच सा च अर्धपिप्प- ल्यो ते ॥ ग्राम्यपशुसंघेवतरुणेपु स्त्री १।२।७३ ॥ एषु सहविवक्षाया स्त्री शिष्यते । गुमान्सिया इत्यस्यापवादः। गाः इमा। ग्राम्य इति किम् । रुरव इभे । पशुग्रहण किम् । ब्राह्मणा इमे । सधेषु निम् । एती गावी । अतरुणेषु किम् । वत्सा इमे ।।

. द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः । अनेकशफेष्विति वाच्यम् ॐ ॥ अश्वा इमे । इह सर्वत्रकशेषे कृतेऽनेकसुबन्ताभावाद्दन्द्वो न । तेन शिरसी शिरांसि इत्यादी समासस्येत्यन्तोदात्तः । प्राण्यङ्गत्वादेक- चभावश्चन । पन्थानौ पन्यानः इत्यादौ समासान्तो न । इत्येकशेषः॥ इति ११५ अंशाः। ऋक्पूरन्धूः पथामानक्षे५।४।७४ ।। अ अनक्ष इति च्छेदः । ऋगायन्तस्य समासस्य अप्रत्ययोऽ- न्तास्यवः । अक्षे या धूस्तदन्तस्य तु न । अर्धर्चः । अनृचबतचा- बध्येतर्येव । नेह । अनक साम । बहक सूक्तम् । विष्णोः पृर्वि- ष्णुपुरम् । क्लीवत्वं लोकात् । विमलापं सरः॥ धन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत् ६।३ । ९७ ॥ अप इति कृतसमासान्तस्यानुकरणम् । पष्ठयर्थे प्रथमा एभ्योऽ. पस्य ईत् । द्विर्गता आपो यस्मिन्निति दीपम् । अन्तरीपम् । प्रती- पम् । समीपम् । समापो देवयजनमिति तु समा आपो यस्मिन्निति वोध्यम् । कृतसमासान्तग्रहणान्नेह । स्वप् । स्वपी । अवर्णान्तादा। प्रेपम् परेपम् । पापम् । परापम् ॥ उदनोर्देश ६।३।९८॥ अनो' परस्यापस्य उद्देशे अनूपो देशः । राजधुरा । अक्षे तु अक्षधः । दृढधूरक्षः । सखिपथोरम्यपथो देशः॥ अच्अत्यन्ववपूर्वात्सामलोग्नः५।४।७५॥ एतत्पूर्वात्सामलोमान्तात्समासादच् । प्रतिसामम् । अनुसामम् । अवसामम् । प्रतिलोमम् । अनुलोमम् ॥ कृष्णोदक्पाण्डुसंख्यापूर्वाया भूमेरजिष्यते ॥ कृष्णभूमः । उदग्भूमः । पाण्डुभूमः । ख्याया नदीगोदावरीभ्यां च । पञ्चनदम् । सप्तगोदावरम् । अच् इति योगविभागादन्यत्रापि । पद्मनामः॥ विभूमः प्रासादः। सं.

। ३१२ सुगमकीमुद्याः। अक्ष्णोऽदर्शनात् ५।४।७६ अचक्षुःपर्यायादक्ष्णोऽच् समासान्तः । गामक्षीव गवाक्षः ।। अचतुरविचतुरसुचतुरस्त्रीपुंसधेन्वनडुहर्सामवाङ्मन साक्षिद्ववदारगवोर्वष्ठीवपदष्टीवनक्तंदिवरात्रिंदिवाइर्दिवस- रजसनिःश्रेयसपुरुपायुपध्यायुपत्र्यायुपर्यजुपजातोक्षमहो- क्षवृद्धोक्षोपशुनगोष्टश्वाः ५।४।७७ ॥ एते पञ्चविंशतिरजन्ता निपात्यन्ते । आद्यास्त्रयो बहुव्रीहयः । अविद्यमानानि चत्वार्यस्य अचतुरः । विचतुरः । सुचतुरः ।। त्र्युपाभ्यां चतुरोऽजिष्यते ॥ त्रिचतुराः। चतुर्णा समीपे उपचतुरा.। तत एकादश द्वन्द्वाः । स्त्रीपुंसौ । धेन्वनडुहौ । ऋक्सामे । वाइमनसे । अक्षिणी च भुवी चाक्षिभुवम् । दाराश्च गावश्च दारगवम् । ऊरू च अष्टीवन्ती च ऊर्वष्ठीवम् । निपातनाहिलोपः । पदष्ठीवम् । निपातनात्पादशब्दस्य पद्भावः । नक्तं च दिवा च नक्तंदिवम् । रात्री च दिवा च रात्रि- दिवम् । राप्रेर्मान्तत्वं निपात्यते । अहनि च दिवा चाहर्दिवम् वीप्साया इन्दो निपात्यते । अहन्यहनीत्यर्थः । सरजसमिति सा- कल्येच्ययीभावः । वहुधीही तु सरज. पङ्कजम् । निश्चितं श्रेयो + नि.श्रेयसम् । तत्पुरुप एव नेह । निश्रेयान्पुरुषः । पुरुषस्यायुः पुरुपायुपम् । ततो द्विगुः । यायुपम् । न्यायुपम् । ततो इन्द्रः ऋग्यजुपम् । ततस्त्रय' कर्मधारयाः । जातीक्षः । महोक्षः । वृ- दोक्ष' । शुनः समीपमुपशुनम् । टिलोपाभाव संप्रसारणं च निपा- त्यते । गोष्ठेऽश्या गोष्टश्व' । ब्रह्मइस्तिभ्या वर्चसः५।४।७८॥ अच् । ब्रह्मवर्चसम् । हस्तिपर्चसम् ।। पल्यराजभ्यां चेति वक्तव्यम् ।

। द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः ३१३ पल्यवर्चसम् । राजवर्चसम् ॥ अवसमन्धेभ्यस्तमसः५।४।७९ ॥ अवतमसम् । सन्तमसम् । अन्धयतीत्यन्धम् । पचायच । अ. 'न्धं तमोऽधतमसम्॥ श्वसो वसीयःश्रेयसः५।४।८०॥ वसुशब्दः प्रशस्तवाची तत ईयसुनि वसीयः । श्वसशब्द उत्तर- पदार्थप्रशंसामाशीकृिपयतामाह । मयूरव्यंसकादित्वात् समामः । धोरसीयसम् । श्वःश्रेयसं ते भूयात् ॥ अन्ववतप्ताद्रहसः५।४।८१॥ अनुरहसम् । अवरहसम् । तप्तरहसम् ।। प्रतेरुरसः सप्तमीस्थात् ५।४।८२॥ उरसि इति प्रत्युरसम् । विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः ।। अनुगवमायामे ५1१1८३॥ एतन्निपात्यते दीर्घत्वे । अनुगवं यानम् । यस्य चायामः इति समासः॥ द्विस्ताका त्रिस्तावा वेदिः५।४।८४॥ अच्प्रत्ययष्टिलोपः समासश्च निपात्यते । यावती प्रकृती वेदि- स्ततो द्विगुणा त्रिगुणा काश्वमेधादी तनेदं निपातनम् । वेदिः इति किम् । द्विस्तावती निस्तावती रज्जुः ।। उपसर्गाधनः५1१1८५॥ प्रगतोऽध्वानं प्राध्वो रथः ॥ न पूजनात् ५।४।६९॥ पूजनार्यात्परेभ्यः समासान्ता न स्युः । सुराजा । जतिराना । स्वतिभ्यामेव नेह । परमराजः । पूजनात् किम् । गामतिकान्तोऽ- तिगवः । बहुव्रीही सक्थ्यक्ष्णोः इत्यतः प्रागेवायं निषेधः । नेह । सुसक्थः । स्वक्षः ॥

1 मुगमकीमुद्याः। किमः क्षेपे ५।४।७०॥ क्षेपे यः किंगन्दस्ततः परं यत्तदन्तात्समासान्ता न स्युः । कु- त्सितो राजा किंराजा । किसखा । किंगी। क्षेपे किम् । विराजः। मिखः । किंगवः ॥ नभस्तत्पुरुपात्५।४।७१॥ ममामान्तो न । अराजा । असखा । तत्पुरुषात् किम् । अधुरं कटम् ॥ पथो विभापा५।४।७२॥ नसपूर्वात्पथी वा समासान्तः। अपथम् । उपन्याः। तत्पुरुपात् इत्यर । जपयो देशः । अपचं वर्तते । इनि मर्यममासान्ताः ॥ अलुगुत्तरपदे ६।३।१॥ अगधिपाः प्रागानड उत्तरपदाधिकारस्त्वापादसमाप्तेः ।। पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः ६।३।२॥ प्रभ्यः पभम्पाः अनुफ उत्तरपदेस्तोन्मुक्तः। एवमन्तिकार्य- दृगकरणेभ्यः । उत्तप्पटे रिम । निप्पान्नः नोगानिस्तीकः ॥ ब्राह्मणाच्छंसिन उपसंख्यानम् ॥ मारणे पिदिनानि मापनागः प्राधणानि तानि सतीति प्रामगारगी पिम्पिगपः । टिनीचा पगम्युपमर सानादेर ।। सोनःसदोम्भस्तमसस्तृतीयायाः ६।३।३॥ भीनमा गृनमित्यादि । मनस उपसंख्यानम् ॥ मातम । मापन गनमित्य ॥ पुंगानुनो जनुपान्य इति च ॥ मा पुमाग पुंगानुपान्यो मायः ।। १६ अंशाः .

इतायखण्डस्य प्रथमा भागः । ३१५ मनसः संज्ञायाम् ६।३।४॥ मनसा गुप्ता ॥ आज्ञायिनि च ६।३।५॥ मनसः इत्येव । मनसा ज्ञातुं शीलमस्य मनसाज्ञायी ।। आत्मनश्च ६।३।६॥ आत्मनस्तृतीयाया अलुक ।। पूरण इति वक्तव्यम् १ ॥ पूरणप्रत्ययान्त उत्तरपद इत्यर्थः । आत्मना पञ्चमः । जनार्द- नस्त्वात्मचतुर्थ एव । इति बहुव्रीहिर्वोध्यः । पूरणे किम् । आत्म- कृतम् ॥ वैयाकरणाख्यायां चतुर्थ्याः६।३।७॥ आत्मनः इत्येव । आत्मनेपदम् । आत्मनेभाषा । तादयें चतुर्थी । चतुर्थी इति योगविभागात्समासः ॥ परस्य च ६।३।८॥ परस्मैपदम् । परस्मैभाषा॥ हलदन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम् ६।३।९॥ हलन्ताददन्ताच सप्तम्या अटुक् संज्ञायाम् । त्वचिसारः॥ गवियुधिभ्यां स्थिरः ८।३१९५॥ आभ्यां स्थिरस्य सस्य पः । गविष्ठिरः । अत्र गवीति वचना- देवालुक् । युधिष्ठिरः । अरण्येतिलकः । अत्र संज्ञायाम् इति सप्तमीसमासः । हृाभ्यां च । हादिस्पृक् । दिविस्पृश् ॥ अमूर्धमत्तकात्स्वाङ्गादकामे ६।३।१२।। कण्ठेकालः । उरसिलोमा । अमूर्धमस्तकात् किम् । मूर्धाशेखः मस्तकशिखः । अफामे किम् । मुखे कामोऽस्य मुखकामः॥ तत्पुरुपे कृति बहुलम् ६।३।१४॥

सुगमकौमुद्याः। स्तम्बरमः स्तम्बरमः। कर्णेजपः कर्णजपः । कचिन्न । कुरुचरः। प्रावृदशरत्कालदिवा जे ६।३।१५॥ प्रावृपिजः । शरदिनः । कालेजः । दिविजः। पूर्वस्वायं प्रपश्चः ।। घकालतनेषु कालनामः ६।३।१७॥ सप्तम्या विमाषया लुक् । घर-पूर्वाह्नतरे पूर्वाह्नतरे । पूर्वाहेतमे पूर्वाह्नतमे । काल:-पूर्वाङ्गेकाले पूर्वाह्नकाले । तनः-पूर्वाहेनने पूर्वा- इतने ॥ शयवासवासिष्वकालात् ६।३।१८॥ खेशयः खशयः । ग्रामेवासः ग्रामवासः । ग्रामवासी ग्राम- वामी। हलदन्तात् इत्येव । भूमिशयः। अपी योनियन्मतुपु । अप्सु योनिरुत्पत्तिपस्प सोऽमुपोनिः। अप्मु भयोऽप्सव्यः । असुमन्ता- पाज्यमागी । अत्र मतुषु इत्यत्र मतिषु इति युक्तः पाठ इति परे॥ नेन्सिद्धबध्नातिषु च ६१३१ १९ ॥ इन्नन्तादिषु सप्तम्या अलुन । स्थण्डिलगायी। सांकाश्यसिद्धः। चक्रवन्धः॥ स्थे च भापायाम् ६।३।२०॥ सप्तम्या अलुग्न। ममम्थः। मापायां किम् । कृष्णोऽस्या सरेयः॥ पष्टया आक्रोशे ६।३।२१।। चौरस्य कुलमा जानोगे किम् । बामणकुलम् ।। वाग्दिक्पश्यद्भ्यो युक्तिदण्डहरेषु ॥ पायोयुक्तिः । दिगोदण्डः । पश्यतोहरः ।। आमुप्यायणामुप्यपुत्रिकामुप्यकुलिकेति च ॥ अमुप्यापत्यमामुप्यायणः । नडादिलात्कार । अमुच्य पुनस्य मार आमुप्पनिका । मनोज्ञादित्यादृश् । एषमामुप्पलिया। देवानां प्रिय इति च मृ || सत्पर देवमियः ॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। ३१७ शेपपुच्छलांगूलेषु शुनः ॥ शुनःशेपः । शुनःपुच्छः । शुनोलांगूलः ॥ दिवश्व दासे १ ॥ दिवोदासः॥ पुत्रेऽन्यतरस्याम् ६।३।२२॥ पष्ठ्याः पुत्रे परेऽलुवा निन्दायाम् । दास्याः पुत्रः दासीपुत्रः। निन्दायां किम् । ब्राह्मणीपुत्रः ।। ऋतो विद्यायोनिसंवन्धेभ्यः ६।३।२३॥ विद्यासंबंधयोनिसंबंधवाचिन ऋदन्तात्पष्ठ्या अलुक् । होतुर- न्तेवासी होतुःपुत्रः। पितुरन्तेवासी पितुःपुत्रः ॥ विद्यायोनिसंबन्धेभ्यस्तत्पूर्वोत्तरपदग्रहणम् ॥ नेह । होतृधनम् ॥ विभापा स्वसृपत्योः६।३।२४॥ ऋदन्तात्पठ्या अलुगू वा स्वस्पत्योः परयोः॥ मातुःपितुामन्यतरस्याम् ८।३।८५ ॥ आभ्यां स्वसुः सस्य पोवा । समासे मातुःष्वसा मातुःस्व- सा। पितु:वसा पितुःस्वसा । लुक्पक्षे तु ॥ मातृपितृभ्यां स्वसा ८।३।८४ ॥ आभ्यां परस्य स्वसुःसस्य पः समासे । मातृष्वसा। पितृष्वमा । असमासे तु मातुः स्वसा । पितुः स्वसा । इत्यलुक्समासाः।। घरूपकल्पचेलवगोत्रमतहतेषु ड्योऽनेकाचो द्व- स्वः६।३।४३ ॥ भाषितपुंस्कायो डी तदन्तस्यानेकाचो द्वस्वः । वरूपकल्पप्पत्य- येषु परेषु चेलडादिषु चोत्तरपदेषु । ब्राह्मणितरा । ब्राह्मणितमा । ब्राह्मणिरूपा । ब्राह्मणिकल्पा । ब्राह्मणिचेली । ब्राह्मणिब्रुवा ।

३१८ सुगमकौमुद्याः। ब्राह्मणिगोत्रेत्यादि । बनः पचायचि वच्यादेशगुणयोरभावोऽपि निपात्यते । चेलडादीनि वृत्तिविषये कुत्सनवाचीनि तैः कुत्सिता. नि कुत्सनः इति समासः । डयः किम् । दत्तातरा । भाषित- पुस्कात् किम् । आमलकीतरा । कुवलीतरा ॥ नद्याः शेपस्यान्यतरस्याम् ६।३।४४॥ अडयन्तनद्या ड्यन्तस्यैकाचश्च धादिए हस्त्रो वा । ब्रह्मवन्धु. तरा ब्रह्मबंधूतरा । खितरा स्वीतरा । कृनद्या न । लक्ष्मीतरा ।। उगितश्च ६।३।१५॥ उगितः परा या नदी तदन्तस्य धादिषु हस्वी वा । विदुपितरा। हस्वाभावपक्षे तु तसिलादिषु इति पुंवत् । विदत्तरा । वृत्त्यादिषु पिदुपीतरा । इत्यप्युदाहृतं तन्निर्मूलम् ।। उदकस्योदः संज्ञायाम् ६।३।५७ ।। उदमेघः॥ उत्तरपदस्य चेति वक्तव्यम् ॐ ॥ क्षीरोदः ॥ पेपं वासवाहनधिषु च ६।३।५८॥ उदपेषं पिनष्टि उदयासः । उदवाहनः । उदधिर्घटः । समुद्रे तु पूर्वेण सिद्धम् ॥ इति ११७ अंगाः। . इको हस्तोऽङयो गालवस्य ६।३।६१॥ इगन्नम्यारयन्तस्य दम्बी वा उत्तरपदे । ग्रामणिपुरः ग्राम. नीपुरः। यः किम । रमापतिः। अत्यः इति किमागीरीपतिः। गालामाणं जार्थम । अन्यतरस्याम इत्यनुत्तेः ॥ इयवझ्भाविनामव्ययानां च नेति वाच्यम् ॐ ॥ श्रीगभूमः । श्रीमाः ॥

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः।
अभ्रकुंसादीनामिति वक्तव्यम् ॐ ॥
भृकुंसः भूकुंसः । भृकुटिः भूकुतिः । अकारोऽनेन विधीयत
इति व्याख्यान्तरम् । भ्रकुंसः । भ्रकुटिः । भुवा कुंसो भापणं
शोभा वा यस्य स स्त्रीवेपवारी नर्तकः । भुवः कुटिः कौटिल्यम् ।।
यापोः संज्ञाछन्दसोबहुलम् ६।३।६३ ॥
खतिपुत्रः । अजक्षीरम् ॥
त्वे च ६।३।६४॥
त्वप्रत्यये डयापोर्वा तस्वः । अजत्वम् अजात्वम् । रोहिणित्वम्
सोहणीत्वम् ॥
इष्टकेपीकामालानां चिततूलभारिषु ॥
इष्टकादीनां तदन्तानां च पूर्वपदानां चितादिषु क्रमादुत्तरपदेषु
ह्रस्वः स्यात् । इष्टकचितम् पक्केष्टकचितम् । इपीकठूलम मुझेपीक.
तूलम् । मालभारी उत्पलमालभारी ॥
कारे सत्यागदस्य ६।३।७०॥
मुम् । सत्यंकारः । अगदंकारः ॥
अस्तोश्चेति वक्तव्यम् ॐ ॥
अस्तुंकारः॥
धेनोभव्यायाम् ॥
धेनुभव्या॥
लोकस्य पृणे ॥
लोकंपृणः । पृणः इति मूल विभुजादित्वात्कः ॥
इत्येऽनभ्याशस्य *॥
अनभ्याशमित्यः । दूरतः परिहर्तव्य इत्यर्थः ॥
भ्राधाग्योरिन्धे ॥
भ्राष्ट्रमिन्धः । अग्निमिन्धः ।।

सुगमकौमुद्याः। गिलेऽगिलस्य ॥ तिमिागेलः । अगिलस्य किम् । गिलगिल ॥ गिलगिले च ॥ तिमिगिलगिलः॥ उप्णभद्रयोः करणे ॥ उष्णंकरणम् । भद्रकरणम् ॥ रात्रेः कृति विभापा ६।३ । ७२॥ रात्रिचरः रात्रिचरः । रानिमटः राज्यट. । अखिदर्थमिद सूत्रम् । ग्विति तु अरुदिपत् इति नित्यमेव वक्ष्यते । रानिम्मन्यः ।। समानस्य च्छन्दस्य मूर्धप्रभृत्युदर्केषु ६।३।८४॥ समानस्य सः उत्तरपदे नतु मूर्धादिषु । अनुभ्राता सगीः। अनुससा मयूथ्यः। योनः सनुत्यः । तत्र भव इत्यर्थ सगर्भसयूथ- सनुतायत् । अमूर्धादिषु किम् । समानमूर्धा । समानप्रभृतयः । समानोदः । समानस्य इति योगो विभज्यते । तेन सपक्षः साध- पै सजातीयमित्यादि सिद्धमिति कागिका । अथवा सह- मन्द. सहावचनोऽस्ति । सदृशः सख्या ससखीति यथा । तेनायम. मापदविग्रही पानीहि । समानः पक्षोऽस्येत्यादि । ज्योतिर्जनपदराविनाभिनामगोत्ररूपस्थानवर्णवयो- वचनरन्धुपु ६।३।८५॥ पण टादगमुत्तरपदंए समानस्य मः । सम्योतिः । सजनपद इत्यादि। चरणे ब्रह्मचारिणि ६।३।८६ ।। प्रामवारिण्युत्तरपदे ममानस्य मः चणे समानत्वेन गम्यमाने । माणगापा प्रत्यय. नदध्यानार्थ वनमपि न तशातीनि मना गमा: म मम्रधागे ।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः।
तीर्थे ये ६।३।८७॥
तीर्थ उत्तरपदे यादो प्रत्यये विवक्षिते समानस्य सः । सतीर्थः
एकगुरुकः । समानतीयवासी इति यत्प्रत्ययः ॥
विभापोदरे ६।३।८८॥
यादी प्रत्यये विवक्षित इत्येव । सोदर्यः ममानोदर्गः ॥
हगहशवतुषु ६।३।८९॥
सहक सदृशः॥
दृक्षे चेति वक्तव्यम् ॥
सदृक्षः तुरुत्तरार्थः ॥
इदंकिमोरीशकी ६।३।९०॥
दृग्शवतुपु इदम ईश किमः की । ईदृक् ईदृशः । कीदृक्
कीदृशः । वतूदाहरणं वक्ष्यते ॥
दृक्षे चेति वक्तव्यम् ॥
ईदृक्षः । कीदृक्षः । आसर्वनाम्नः दृक्षे च । तादृक् तादृशः
तावान् तादृक्षः । दीर्घः मत्वोत्वे । अमूदृशः अमूदृक् अमूदृक्षः ।।
ज्योतिरायुपः स्तोमः ८।३। ८३॥
आभ्या स्तोमस्य सस्य मूर्धन्यः समासे । ज्योतिष्टोमः ।
आयुष्टोमः । समासे किम् । ज्योतिषः स्तोमः ।।
सुपामादिषु च ८।३१९८॥
सस्य मूर्धन्यः । शोभनं साम यस्य सुपामा । सुपन्धिः ।।
एतिसंज्ञायामगात् ८।३।९९॥
सस्य मूर्धन्यः। हरिपेणः । एति किम् । हरिसक्थम् । संज्ञाया
किम् । पृथुसेनः । अगकारात्किम् । विष्वक्सेनः । इण्कोरित्येव ।
सर्वसेनः ।।
नक्षत्रादा ८।३।१०० ॥

३२२
सुगमकौमुद्या।
एतिसस्य संज्ञायामगकारान्मूर्द्धन्यो वा । रोहिणीपेणः । रोहि.
णीसेनः । गकारात्तु शतभिपवसेनः । आकृतिगणोऽयम् ।।
अपष्टयतृतीयास्थस्यान्यस्य दुगाशीराशास्था-
स्थितोत्सुकोतिकारकरागच्छेपु ६।३।९९ ॥
अन्यशब्दस्य दुगागमः आशीरादिपु परेषु । अन्यदागीः ।
अन्यदाशा । अन्यदास्था । अन्यदास्थितः । अन्यदुत्सुकः ।
अन्यदूतिः । अन्यद्रागः । अन्यदीयः। अपष्ठी इत्यादि किम् ।
अन्यस्यान्येन वाशीरन्याशीः । कारके छे च नायं निषेधः । अ.
न्यस्य कारकोऽन्यत्कारकः । अन्यस्यायमन्यदीयः । गहादेराकृति-
गणात्वाच्छः ।।
अर्थ विभापा६।३।१००॥
अन्यदर्थः अन्यार्थः ॥
इति ११८ अंशाः।
कोः कत्तत्पुरुपेऽचि६।३।१०१॥
अजादावुत्तरपदै । कुत्सित्तोऽश्वः कदश्वः । कदन्नम् । तत्पुरुषे
किम् । कूट्रो राजा ।।
त्रौ च ॥
कुत्सितास्त्रयः कवयः ॥
स्थवदयोश्च ६।३।१०२॥ ।
कद्रथः । करदः॥
तृणे च जातौ ६।३।१०३॥
कतणम् ॥
कापथ्यक्षयोः६।३।१०४॥
कापयम् । काक्षः । अक्षशब्देन तत्पुरुषः । अक्षिशब्देन बहु
बीदिवा ॥

द्वितीयखंडस्य प्रथमो मागः । ईपदर्थे ६।३।१०५॥ ईपज्जलं काजलम् । अजादारपि पग्त्वात्कादेगः । काम्लः ॥ विभापा पुरुपे ६।३।१०६॥ कापुरुषः । कुपुरुषः । अप्राप्तरिभाषेयम् । ईपदर्थ हि परिम- तिषेधानित्यमेव । ईपत्पुरुपः कापुरुपः ॥ कवं चोणे ६।३।१०७॥ उष्णशब्द उत्तरपदे कवं का च वा । कवोष्णम् । कोणम् । कदुष्णम् ॥ पृपोदरादीनि यथोपदिष्टम् ६।३ । १०९ ॥ पृपोदरप्रकाराणि शिष्टयथोचारितानि तथैव साधूनि । पृपदुदर पृपोदरम् । तलोपः । वारिवाहको बलाहकः । पूर्वपदस्य वः । उत्तरपदादेश्च लत्वम् । भवेदांगमासः सिंहो वर्णविपर्ययात् । गूढोत्मा वर्णविकृतेर्वर्णनाशात् पृपोदरम् ॥ दिक्शब्देभ्यस्तीग्स्य तारभावो वा । दक्षिणतारम् दक्षिणतीरम् । उत्तरतारम् उत्तरतीरम्॥ दुरोदाशनाशदभध्येपूत्वमुत्तरपदादेः टुत्वं च ॐ ॥ दुःखेन दाश्यते दूडाशः । दुःखेन नाश्यते दूणाशः । दुःसेन दभ्यते दूडमः । खत्रिभ्यः दभेनेलोपो निपात्यते । दुःखेन ध्यायतीति दूढयः । आतश्च इति कः । ब्रुवन्तोऽस्यां सीदन्तीति बृसी । अवच्छन्दस्य वृ आदेशः । सदेरधिरुग्णे डट् । आकृतिग- णोऽयम् ॥ नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु को ६।३।११६॥ विवन्तेषु परेषु पूर्वपदस्य दीर्घः । उपानत् । नीवत् । प्रावृट् । मर्मावित् । नीरुक् । अभीरुक् । मतीपट् । परीतत् । की इति किम् । परिणहनम् । विमापा पुरुषे इत्यतो मण्डकप्लुत्या विमापा अनु. वर्तते । सा च व्यवस्थिता । तेन गतिकारकयोखे नेह । पटुरुक् । तिग्मरुक्॥ .

३२४
मुगमकीमुद्याः।
वले६।३।११८॥
वलमत्यये परे दीर्घः संज्ञायाम् । कृपीपलः ।।
मतो बह्वचोऽनजिरादीनाम् ६.३१ ११९॥
अमरावती । अनजिरादीना किम् । अजिरवती । बहवः किम् ।
बीहिमती । संज्ञायाम इत्येव नेह । वलयवती ॥
शरादीनां च ६।३।१२० ॥
शरावती।
उपसर्गस्य घ-यमनुष्ये बहुलम् ६।३ । १२२ ॥
उपसर्गस्य बहुलं दीर्घः घअन्ते परे नतु मनुष्ये । परीपाकः
परिपाकः । अमनुष्ये किम् । निपाठः ॥
इकः काशे ६।३ । १२३॥
इगन्तस्योपसर्गस्यैव दीर्घः काशे । वीकाशः । नीकाशः। इका
किम् । प्रकाशः ॥
अष्टनः संज्ञायाम् ६।३।१२५ ॥
उत्तरपदे दीर्घः । अष्टापदम् । संज्ञाया फिम् । अष्टपुत्रः ।।
नरे संज्ञायाम् ६।३।१२९॥
विश्वानरः॥
मित्रे चाँ६।३।१३०॥
विश्वामित्रः । ऋपौ किम् । विश्वामित्रो माणवक ॥
पानं देशे ८।४।९॥
पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य पानस्य नस्य णत्वं देशे गम्ये ।
क्षीरं पानं येषा ते क्षीरपाणा उशीनराः । सुरापाणाः प्राच्याः ।
पीयत इति पानम् । कर्मणि ल्युत् ।।
वा भावकरणयोः ८१४।१०॥
पानस्य इत्येव । क्षीरपानम् क्षीरपाणम ।।

द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भाग। गिरिनयादीनां वा ।। गिरिनटी गिरीणदी । चक्रनितम्बा चमाणितम्बा ॥ प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु च ८।४।११ ।। पूर्वपदस्थानिमित्तात्परस्य एषु स्थितस्य नस्य णो वा । प्रातिप- दिकान्ते-मापवापिणौ । नुमि-त्रीहिवापाणि । विभक्ती-मापवापे ण ! पक्षे मापवापिनावित्यादि । उत्तरपद यत्मातिपदिकं तदन्तस्यैव णत्वं नेह । गर्गाणा भगिनी गर्गभगिनी । अत एव नुम्ग्रहणं कृतम् । अङ्गस्य नुम्विधानात्तद्भक्तो हि नुम् न तूत्तरपदस्य । किं च प्रहिण्वन् इत्यादी हिवेर्नुमो णत्वार्थमपि नुम्ग्रहणम् । मेन्वनम् इत्यादी तु क्षुम्नादित्वान्न । युवादेन ॐ॥ रम्ययूना । परिपक्कानि । एकाजुत्तरपदे णः । नित्यम् इत्यु- कम् । वृत्रहणी । हरिं मानयतीति हरिमाणी । नुमि-क्षीरपाणि विभक्ती-क्षीरपेण रम्यविणा ॥ कुमति च ८।४।१३॥ क्वर्गवत्युरपदे प्राग्वत् । हरिकामिणी । हरिकामाणि । हरि- कामेण ॥ पदव्यवायेऽपि ८।४।३८॥ पटेन व्यवधानेऽपि णत्वं न । मापकुम्भवापेन । चतुरङ्गयोगेन ।। अतद्धित इति वाच्यम् ॥ आगोमयेण । शुष्कगोमयेण ॥ कुस्तुम्वुरूणि जातिः६।१।१४३॥ अत्र मुण निपात्यते । कुस्तुम्वुरुर्धान्याकम् । क्लीवत्वमतन्त्रम् । जाति किम् । कुतुम्बुरूणि । कुत्सितानि तिन्दुकीफलानीत्यर्थः । अपरस्पराः क्रियासातत्ये ६।१।१४४॥ मुण् निपात्यते । अपरस्परा' सार्थाः गच्छन्ति । सततमावेच्छे- ३२६ सुगमकौमुद्याः। देन गच्छन्तीत्यर्थः । क्रिया इति किम् । अपरपरा गच्छति । अपरे च परे च सदैव गच्छन्तीत्यर्थः ।। गोप्पदं सेवितासेवितप्रमाणेपु ६।१।१४५॥ मुद् सस्य पत्वं च निपात्यते गापः पद्यन्तेस्मिन्देशे स गोभिः सेवितो गोष्पदः । असेविते अगोष्पदान्यरण्यानि । प्रमाणे । गो. प्पदमा क्षेत्रम् । सेवित इत्यादि किम् । गोः पदं गोपदम् ।। आस्पदं प्रतिष्ठायाम् ६।१।१४६॥ आत्मयापनायस्थाने मुद् निपात्यते । आस्पदम् । प्र इति किम् । आपदापदम् ॥ आश्चर्यमनित्ये ६।१।१४७॥ अहते सुद् । आश्चर्य यदि स भुञ्जीत । अनित्ये किम्। आचर्य कर्म शोभनम् ॥ वर्चस्केऽवस्करः६।१।१४८॥ कुत्सितं वर्षों वर्चस्कमन्नमलम् । तस्मिन् सुद् । अवकीर्यत इत्यवस्करः । वर्चस्के किम् । अवकरः ।। अपस्करो रथाङ्गम् ६।१।१४९ ॥ अपकरोभ्यः॥ विष्किरः शकुनिर्विकिरो वा ६।१।१५०॥ पक्षे विकिरः । वावचनेनैव सुदिकल्पे सिद्धे विकिरग्रहणं त- स्यापि शकुनेरन्यत्र प्रयोगो मा भूदिति वृत्तिस्तन्न भाष्यविरोधात्।। प्रतिप्कशश्व कशेः६।१।१५२।। कश गतिशासनयोः इत्यस्य प्रतिपूर्वस्य पवायचि सुट् निपा. त्यते पत्वं च । सहायः पुरोयायी वा । प्रतिष्कश इत्युच्यते । कशेः किम् । प्रतिगतः कशां प्रतिकशोऽश्वः । यद्यपि कशेरेव कशा तथापि कोरिति धातोर्ग्रहणमुपसर्गस्य प्रतेर्ग्रहणार्थम् । तेन धात्वन्तरोपसर्गान॥

द्वितीयखण्डम्य प्रथमो भागः।
३२७
प्रस्कण्यहरिश्चन्द्रावृपी ६।१ । १५३ ॥
हरिश्चन्द्रग्रहणममन्यार्थम् । ऋषी इति किम । प्रकमी देशः ।
हरिचन्द्रो माणवकः॥
मस्करमस्करिणो वेणुपरिव्राजकयोः ६।१ । १५४॥
मकरशब्दोऽव्युत्पन्नस्तस्य मुडिनिश्च निपात्यते । वेणु इति
किम् । मकगे ग्राहः । मकरी समुद्रः॥
कारस्करो वृक्षः ६।१।१५६॥
कार कगेतीति कारस्करो वृक्षः । अन्यत्र कारकरः । केचिनु
कस्कादिष्विदं पठन्ति न सूत्रेषु ।।
पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् ६।१।१५७ ॥
एतानि ससुदकानि निपात्यंते नाम्नि । पारस्करः किष्किन्धा ।।
तहतोः करपत्योश्चौरदेवतयोः सुट तलोपश्च ।।
तात्पूर्व चर्येन दकारो योध्यः । तदृहतोदकारतकारी लुप्यते ।
करपत्योस्तु सुद् चौरदेवतयोः इति समुदायोपाधिः । तस्करः।
बृहस्पतिः॥
प्रायस्य चित्तिचित्तयोः॥
प्रायश्चित्तिः । प्रायश्चित्तम् । वनस्पतिरित्यादि । आकृति-
गणोऽयम् ॥ इति समासाश्रया विधयः ॥
इति ११९ अंशाः।
सर्वस्य द्वे ८1१1१॥
इत्यधिकृत्य ॥
नित्यवीप्सयोः ८।१४॥
आमीक्ष्ण्ये वीप्सायां च धोत्ये पदस्य दिवचनम् । आमीक्षण्यं
तिडन्तेष्वव्ययसंज्ञककृदन्तेपु च । पचति पचति । मुक्त्वा भु.
क्त्वा । वीमायाम् । वृक्ष वृक्षं सिञ्चति । ग्रामो ग्रामो रमणीयः ।।

३२८ सुगमकौमुद्याः। परेवर्जने ८1११५॥ परि परि वनेभ्यो वृष्टो देवः । वङ्गान्परिहत्येत्यर्थः ।। परेवर्जने वावचनम् ॐ ॥ परि वङ्गेभ्यः॥ उपर्यध्यधसः सामीप्ये ८1११७॥ उपर्युपरि ग्रामम् । ग्रामस्योपरिष्टात्समीपे देश इत्यर्थः । अध्य- वि सुखम् । सुखस्योपरिष्टात् समीपकाले दुःखमित्यर्थः । अधोऽयो लोरम् लोकस्याधस्तात्समीपे देश इत्यर्थः ।। वाक्यादेशमन्त्रितस्यासूयासंमतिकोपकुत्सनभर्स- नेषु ८।१।८॥ असूयायाम्-सुन्दर सुन्दर वृथा ने सौन्दर्यम् । संमती-देव देव वन्द्योऽसि । कोपे-दुर्विनीत दुर्दिनीत इदानी ज्ञास्यसि । कुत्सने- धानुष्क धानुष्क वृथा ते धनुः । भर्सने-चोर चोर घातयिष्यामि त्वाम् ॥ एकं बहुव्रीहिवत् ८1१।९॥ द्विरुक्त एकशब्दो वहुव्रीहिवत् । तेन सुब्लोपपुंबद्भावी एक- मक्षरम् । इह द्वयोरपि सुपो कि कृते वहुव्रीहिवद्भावादेव प्रातिप- दिक्त्वात् समुदायात्सुप् । एकैकयाहुत्या इह पूर्वभागे पुंवद्भावा- द्विग्रहे विशेषः । न बहुव्रीही इत्या पुनर्वहुव्रीहिग्रहणं मुख्यवहु- बीहिलाभार्थम् । तेनातिदिष्टबहुव्रीही सर्वनामतास्त्येवेति प्राञ्चः । वस्तुतस्तु भाष्यमते प्रत्याख्यातमेतत् । सूत्रमतेऽपि बहुव्रीह्यर्थेऽ- लोकके विग्रहे निपेधकं नतु वहुव्रीहावितीहातिदेशशङ्केच नास्ति । रावस्मै देहि ॥ आवाधे च ८।१।१०॥ पीडाया द्योत्यायां दे स्तो वहुवी हिवञ्च । गतगतः विरहात्पी. ड्यमानस्येयमुक्तिः । वहुनीहिबद्भावात्सुब्लुक् । गतगता । इह पुंचद्भावः ॥

। द्वितीयखंडस्य प्रथमो भागः। कर्मधारयवदुत्तरेषु ८।१।११॥ इत उत्तरेषु द्विवचनेषु कर्मधारयवत् कार्यम् । प्रयोजनं सुब्लो- पांबद्भावान्तोदात्तत्वानि ॥ प्रकारे गुणवचनस्य ८1१1१२॥ सादृश्ये द्योत्ये गुणवचनस्य हे स्तस्तच्च कर्मधारयवत् । कर्म- धारयवदुत्तरेषु इत्यधिकारात् तेन पूर्वभागस्य पुंबद्भावः । समासस्य इत्यन्तोदात्तत्वं च । पटुपट्टी पटपटुः । पटुसदृशः । ईपत्पटु- रिति यावत् । गुणोपसर्जनद्रव्यवाचिनः केवलगुणवाचिनश्चेह गृह्य- न्ते । शुक्लशुक्त रूपम् । शुक्लशुक्लः पटः ।। आनुपूज्य हे वाच्ये ॥ मूले मूले स्थूलः । संभ्रमेण प्रवृत्ती यथेष्टमनेकधाप्रयोगो न्याय. सिद्धः । सर्प सर्प बुध्यस्व बुध्यस्व । सर्प सर्प सर्प बुध्यस्व वुध्यस्व बुध्यस्व ॥ क्रियासमभिहारे च ॥ लुनीहि लनाहीत्येवायं लुनाति । नित्यवीप्सयोः इति सिद्ध भृशार्थे द्वित्वार्थीमदम् । पौनःपुन्येऽपि लोटा सह समुचित्य द्योतकतां लव्धुं वा ॥ कर्मव्यतिहारे सर्वनाम्रो द्वेवाच्ये। समासवच बहुलम् ॥ बहुलग्रहणादन्यपरयोर्न समासवत् । इतरशब्दस्य तु नित्यम् ॥ असमासवद्भावे पूर्वपदस्थस्य सुपः सुर्वक्तव्यः ॥ अन्योन्यं विप्रा नमन्ति । अन्योन्यौ। अन्योन्यान् । अन्योऽन्येन कृतम् । अन्योन्यस्मै दत्तमित्यादि । अन्योन्येषां पुष्करैरामृशन्त इति माधः । एवं परस्परम् । अत्र कस्कादित्वादिसर्गस्य सः। इतरेतरम् । इतरेतरेणेत्यादि । स्त्रीनपुंसकयोरुत्तरपदस्थाया विभक्तेराम्भावो वाय- क्तव्यः ॥ .

सुगमकौमुद्याः। अन्योन्याम् । अन्योन्यम् । परस्पराम् । परस्परम् । इतरेतराम्। इतरेतरं वा । इमे ब्राह्मण्यो कुले वा भोजयतः । अत्र केचित् । आमादेशो द्वितीयाया एव भाष्यादी तथैवोदाहतत्वात् तेन स्त्री- नपुंसकयोरपि तृतीयादिषु पुंवदेव रूपमित्याहुः । अन्ये तूदाहरण. स्य दिङ्मात्रत्वात्सर्वविभक्तीनामादेशमाहुः । दलहये टावभावः । क्लीये चाटिरहः स्वमोः समासे सोरलुक चेति सिद्धं बाहुलका- त्रयम् । तथाहि । अन्योन्यं परस्परमित्यत्र दलद्वयेपि टाप् प्राप्तः नच सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे इति पुंवद्भावः । अन्यपरयोरसमासवद्भा. वात् । नच दिवचनमेव वृत्तिः । यां यां प्रियः प्रेक्षत कातराक्षी सा सा इत्यादावतिप्रसङ्गात् । अन्योन्यमितरेतरम् इत्यत्र व अडु तरादिभ्यः इत्यद्ड् प्राप्तः । अन्योन्यसंसक्तमहखियामम् । अन्यो- न्याश्रयः परस्पराक्षिसादृश्यम् । अदृष्टपरस्परैः इत्यादी सोलुंक्च प्राप्तः । सर्वं बाहुलकवलेन समाधेयम् । प्रकृतवार्तिकभाष्योदाहरणं खियाम् सूत्रे अन्योन्यसंश्रयम् त्वेतदिति भाष्यं चात्र प्रमाणमिति । अकृच्छ्रे प्रियसुखयोरन्यतरस्याम् ८1१1१३ ॥ प्रियप्रियेण ददाति प्रियेण वा । सुखसुखेन ददाति सुखेन वा । द्विवचने कर्मधारयवद्भावात्सुपि लुकि तदेव वचनम् । तेप्रिय- मपि वस्त्वनायासेन ददातीत्यर्थः ॥ यथास्वे यथायथम् ८1१1१४॥ यथास्वम् इति वीप्सायामव्ययीभावः । योऽयमात्मा यचा. त्मीयं तद्यथास्वम । तस्मिन् यथाशब्दस्य दे क्लीवत्वं च निपात्यते। यथायथं ज्ञाता । यथास्वभावमित्यर्थः । यथात्मीयमिति वा ॥ इन्द्रं रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमणयज्ञपात्रप्रयोगाभि- व्यक्ति ८1१1१५॥ द्विशब्दस्य दिवचनं पूर्वपदस्याम्भावोत्वं चौत्तरपदस्य नपुंसकत्वं च निपात्यत प्रवर्येषु । तर रहस्यं इन्दशब्दस्य वाच्यम् । 'इतरे विषयभृताः दन्द्र मन्त्रयते । रहस्यमित्यर्थः । मर्यादास्थित्यः द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । नतिक्रमः । आचतुरं हीमे पशवो इन्दं मिथुनायन्ते । माता पुत्रेण मिथुनं गच्छति । पौत्रण प्रपौत्रेणापीति मर्यादार्थः । व्युत्क्रमणं पृथगवस्थानं इंदं व्युत्क्रान्तादिवर्गसंवन्धन पृथगवस्थिताः । इन्द यज्ञपात्राणि प्रयुनक्ति । इंदं संकर्षणवासुदेवी अभिव्यक्ती । साह- चर्येणेत्यर्थः । योगविभागादन्यत्रापि इन्द इष्यते । इति द्विरुक्ति- प्रक्रिया ॥ इति १२० अंशाः। इति तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः तृतीयोऽध्यायः समाप्तः । इति द्वितीयखण्डस्य प्रथमो भागः। अथ द्वितीयो भागः। तत्रादौ बहूपकारकत्वात्पाणिन्यष्टकपठिताः परिमापा लिख्यन्ते । काश्चित्तु परः परिभापात्वेनानुल्लिखिता अपि तत्साम्यं मत्वामंदबुद्धिना मया तासु न्यस्यन्ते । तत्र, उरण रपरः। एच् इग्नस्वादेशे । अलोन्त्यस्य । आदेः परस्य । डेिच । अनेकाल शित्सर्वस्य । प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् । न लुमतागस्य । पूर्वत्रा- सिद्धम् । मिदचोऽन्त्यात्परः । एताः स्वस्वस्यलेषु व्याख्याताः। अथ पूर्वत्र व्याख्याता अपि विशेषप्रदर्शनार्थ लिख्यन्ते । स्थानेऽ- न्तरतमः । तेन सुध्युपास्य इत्यत्र इकारस्य यकार एव सोपि प्राप्यमाणानां मध्य एव । तेन तत्रानुनासिको न । तथा जलौघ इत्यत्र त्रिमात्र औकारो न । स्थानार्थगुणप्रमाणैरान्तर्य चतुर्दा । स्थानतः सुध्युपास्यः इत्यादौ । अर्थतः तृज्वत् कोठः इत्यत्र । क्रोष्टशब्दस्य कोष्ट एव नतु तृजन्तोऽपि वक्रादिः।गुणतः प्रयत्नादेः। झयो ह इत्यत्र प्रयत्नसाम्यात् हस्य वर्गचतुर्थः । विद्वान् लिखती- त्यत्रानुनासिकनस्य 'तादृशो लः । प्रमाणतः अदसो मेरित्यत्र हस्वव्यञ्जनयोहस्वः दीर्घस्य दीर्घः । स्थानत आन्तर्य वलीयः। तेन चेता इत्यत्र गुणे कार्य स्थानसाम्यात् इकारस्कार एव नतु प्रमाणतोऽकारः । तमन्ग्रहणं किम् । वाग्घरिरित्यत्र महाप्राणमा. त्रसाम्येन द्वितीयो न नादमात्रसाम्येन तृतीयश्च न किन्तूभयसा.

३३२ सुगमकोमुद्याः। म्येन चतुर्थ एव । यथासंख्यमनुदेशः समानाम् । तेन एचोऽयवा- याव इति चतुर्णामेचां क्रमेणायादयः । अन्यथा एचां प्रत्येक पर्यायेण ते स्युः । अणुदित्सवर्णस्य चामत्ययः । तेन इको यणचीत्यादी इग्मिरभिश्च स्वस्वसवर्णा दीर्घा अपि संगृह्यन्तेऽतः सुध्युपास्यः सुध्याशय इत्यादावपि यण् । अविधीयमानः किम् । अस्मै इत्यादी त्यदादीनाम इत्यनेन अनुनासिकोकारो यया न स्यात् । तपरस्तत्कालस्य । तेन रमाये इत्यत्र अतो गुण इत्यनेन याडाकारस्य पररूपं न । गगोदकामत्यत्र अदेड्गुण इत्यत्राताग्रह- णादाद्गुण इति निमात्र ओकारो न । दिर्वचनेच । ईय॑धाती व्याख्यातम् । परे तु द्वित्वनिमित्तेचि अजादेशः स्थानिरूपमाप- द्यते द्वित्व एव कर्तव्ये इति व्याचक्षते। तत्र यणादेशे कृतेऽपि पुनः कृभावो भवति ततो द्वित्वे कृते तु पुनर्यणादेशरूपमवतिष्ठते इति तुल्यं फलम् ॥ असिद्धवदवाभात् ॥ तेन एधि शाधीत्यादा एत्वशाभावयोः कृतयोरपि तयोरसिद्ध- त्वेन झलन्तत्वात् हुझल्भ्य इति हेर्डिः । समानाश्रये किम् । वपुपः अत्र पाधातोः वसोर्यसंप्रसारणं तदातो लोप इदि च इत्यालोपे कर्तव्य नासिद्धम् । आलोपो हि वसो सम्प्रसारणं तु विभक्ताविति व्याश्रयत्वात् ॥ आद्यन्तौ टकिती॥ डमो हृस्वादित्यत्र व्याख्यातम् । अवयवत्वं चात्र समीपे सदृशे वा उपचारात् ।। स्थानिवदादेशोऽनविधौ। डेर्य इत्यत्र व्याख्यातम् । तथा सुध्युपास्य इत्यत्र यकारस्य स्थानिवद्भावनाञ्चत्वमाश्रित्याश्नचि चेति द्वित्वनिषेधो न शङ्कयो- विधित्वात् । अविधिश्चतुर्दा । तत्राला विधौ यथा । व्यूढोर- स्केन । अत्र सकारस्य स्थानिवत्त्वेन विसर्गवदट्त्वमाश्रित्याव्य- - द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। ३३३ वाय इति णत्वंन । अलः परस्य यथाद्यौः पन्थाः इह हलाया- दिलोपो न । अलो विधौ यथा । छुफामः । इह लोपो व्योलीति लोपो न । न चोत्त्वविधिसामर्थ्यम् । युयानमित्यादी वस्य साय- काशत्वात् । अलि विधी यथा । यजेः क्तः । क इष्टः । इह एशि चेत्युत्त्वं न॥ आकडारादेका संज्ञा ॥ हलन्तेषु राजन्शब्दे व्याख्यातम् । आक्डारीयमकरणादन्गन तु यथोचितमनेकसंज्ञानां समावेशोऽपि भवति । यथा सर्वशरदे मर्वनामप्रातिपदिक्संज्ञयोः तथा तव्यदादी कृत्कृत्यप्रत्ययसंशानां समावेगः॥ अचः परस्मिन् पूर्वविधौ ॥ तन पूर्वविधावियन द्विधा समासः। पूर्वस्य विधापिति समारी कथयतीत्यत्र न वृद्धिरिति व्याख्यातम् । पूर्वस्माद्विधाविति समारी तन्वन्ति तन्वते । इह यणादेशस्य स्थानिवद्भावान्नेट । अभ हि तनित्य निमित्तं तच्च स्थानिभूतादुकारात्पूर्वामिति ॥ न लोपः सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति॥ तेन राजाश्व इत्यादी सवर्णे दीर्घ कर्तव्ये नलोपो सिद्धोन भवति।सुवाश्रितो विधिः सुब्बिधिः । तेन राजभ्याम् राजभ्यः रा- जभिरित्यानात्वमेत्वम॑स्त्वं च न । स्वरविधी पञ्चामम् । दिक्संख्ये संज्ञायामिति समासे नलोपे कृते अवर्णान्तं पूर्वपदं जातमित्यर्म चावणे यच् व्यच् इति पूर्वपदायुदात्तत्वं प्राप्त नलोपस्यासिद्धत्वान्न भाति । संज्ञाविधी पश्चनार्य इत्यादौ नलोपे कृतेऽपि ष्णान्ता प- डिति पटसंज्ञा प्रति नलोपस्यासिद्धत्वान्न पट् । ससादिभ्य इति या न भवति । कृति तुग्विधौ तु वृत्रहभ्याम् इत्या ब्रह्मभूणेति विहितं किपमाश्रित्य इस्वस्यति तुइ नाकृतीति किम् । वृत्रहन्छ वमित्यादी डे चेति तुक् स्यादेव ॥ इति १०१ अंशाः।

सुगमकीमुद्याः। न मुने॥ तेन अमुना इत्पन मुभावस्य सिद्धत्वेन पित्वात आडो नामा- वः सिद्धयति । कृते च नामारे मुभावः सिद्ध एव । तेन मुपि चेति दीर्णोऽपि न भवति । परे तु कृते इति न व्याख्येयम् । तत्र हि स- निपातपरिभाषया दीर्घत्ववारणसंभवादित्याहुः॥ वासरूपोऽस्त्रियाम्॥ तेन महलोपत् इत्यादयोऽपवादा: नव्यदादीनां विकल्पेन वाधकाः । अतस्तव्यदादयोपि पक्षे स्युरेव । कार्यम् । कर्तव्यम् । करणीयम् । असरूपः किम् । पोरदुपधादित्यादयो ण्यदादीनां नित्यवाधका एव । लभ्यम् । शप्यम् । अस्त्रिया किम् । मृना इत्यादौ पिद्भिदादिभ्योऽडित्यादिभिः क्तिन्वाध्यत एव ।। स्वरूपं शन्दस्याशब्दसंज्ञा १।१।६८॥ शब्दस्य स्वं रूपं संज्ञि शब्दशास्त्रे या संज्ञा ता विना । तेन अ- ईक इत्यग्निशब्दादेव ढस् न वह्नयादिशब्दात् । अशब्दसंज्ञेति किम् । उपसर्गे घोः किरिति दाधाभ्य एव किः यथा स्यात् । घुइ शब्द इत्यतो मा भूत् ॥ पष्ठी स्थानेयोगा १।१।४९ ॥ अनिरितमंबन्धविशेपा पष्ठी स्थानेयोगा बोध्या । स्थानं च प्रसङ्गः । तथा च इको यणचीत्यादी पष्टीप्रसङ्गार्थका । तथा च अच्परकस्येक उच्चारणमसङ्गे यणुच्चार्य इत्यादिग्र्थः ।। येन विधिस्तदन्तस्य १1११७२॥ विशेषणं तदन्तस्य संज्ञा स्वस्य च रूपस्य । तेन एरच इत्य- नेन इकारान्तादिकाररूपाच्च धातोरन् । तेन, चयः । जयः । अयः।। समासप्रत्ययविधौ प्रतिपेषः ॥ तेन द्वितीयाश्रितेत्यनेन कृष्णश्रित इत्यनैव समासो नतु कृष्ण- मुपाश्रित इत्यन नडादिभ्य' फक् इति । नडस्यापत्यं नाडायन इत्यत्रैव स्यान्नतु सूत्रनडस्यापत्यं सौमनाहिरित्यति ।।

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। ३३५ उगिद्वर्णग्रहणवर्जम् ॥ महान्तमतिक्रान्ता अतिमहती । महच्छन्दस्य गौरादित्वेऽप्यु. पसर्जने पिद्गौरति डीपोप्रवृत्ते मगितश्चेत्युगिदन्तान् डीप् । एवं वर्णग्रहणे । अत इञ् । दाक्षिः ।। इको गुणवृद्धी १1१।३॥ गुणवृद्धिशब्दाभ्या यत्र गुणवृद्धी विधीयेते तक इति पठ्य न्त पदमुपतिष्ठते । यत्र साक्षात्स्थानी न निर्दिष्टः सार्वधातुकार्ध- धातुकयोः सिचि वृद्धिरित्यादौ तत्रवेयं परिभाषा प्रवर्तते न त्वची- अणितीत्यादौ स्थानिनिर्देशात् । गुणवृद्धिशब्दाभ्यामिति किम् । त्यदादीनामः । इमे । दिव औत् । द्यौः । विधीयत इति किम् । यत्र त्वनुवादो वृद्धिर्यस्थाचामादिरित्यादौ तक इति नोपतिष्ठते । अनुवादे परिभाषाणामनुपस्थितेरिति भावः ।। अचश्च १।२।२८॥ हस्वदीर्घप्लतशब्दैर्यत्राविधीयते तत्राच इति पष्ठचन्तं पदमुप- तिष्ठते । तेन ह्रस्वो नपुंसके इत्यादी प्रातिपदिकान्तस्य अचो जस्तः । श्रीप कुलम् । नतु सुवाम् ब्राह्मणकुलम् इत्यादी । हस्वे. त्यादि किम् । दिव उत् । युभ्याम् ।। तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य १ । १ । ६६ ॥ सप्तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्य वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य पूर्वस्य बोध्यम् । यथा दध्युदकम् । अत्रोकारस्य मा भृत् । अव्यवहित- स्यैवेति किम् । अग्निीचदत्र । सोमसुत्र । तस्मादित्युत्तरस्प ११११६७॥ पञ्चमीनिर्देशन क्रियमाण कार्य वर्णान्तरेणाव्यवहितस्य परस्य योध्यन् । तेन तिट्टतिड इति निघात उत्तरस्येव । अग्निमी ।नेह । ईडे अग्निम् । अव्यवहितस्येति किम् । उत्संस्थान उत्संस्तम्भनमि- त्यादा उदस्थेति पूर्वसवों न प्रवर्तते । ।

सुगमकीमुद्याः। स्वरितेनाधिकारः ११३॥११॥ स्वरितत्त्वयुक्तं शब्दस्वरूपमधिकृतं बोध्यम् । प्रतिज्ञास्वरिताः पाणिनीयाः । कियरमधिकार इत्यन तु व्याख्यानमेव शरणम् । यदा स्वरित दृष्टे सति नाधिकारः अधिकारी निवर्तते इत्यर्थः । का स्वरितोऽधिकारार्थः कश्च तन्निवृत्यर्थ इत्यत्रापि व्याख्यानमेव शरणम् । यदा अधिकः कारोधिकारः । अधिक कार्य गौणेऽपि शास्त्रप्रवृत्तिरित्यर्थः । तथा च गौणमुख्यन्यायो यन नेष्यते अपादानाधिकरणादी तन स्वरितः पाठ्यः किञ्च अधिका कारः कृतिरियं यत्पूर्वः सन् परं बाधते । तथा च नुमचिरतज्वद्भावेभ्यो। बुडित्यादि वक्ष्यमाणपूर्वविप्रतिपेधाः सर्व संगृहीता भवन्ति । तत्र स्वरितपाठेनैव गतार्थत्वादित्यादि । न पदान्तद्विवचनवरेयलोपस्वरसवणानुस्वारदीर्घज- श्रीधिषु १।११५८॥ पदस्य घरमावयवे द्विवचनादौ च कर्तव्ये परनिमित्तोऽजादेशो न स्थानिवत् । अचः परस्मिन्नित्यस्यायं निषेधः । पदान्ते-कानि संतीत्पर अस्तेरलोपस्यात्वमाश्रित्य यण् न । द्विवचने-सुद्धयुपा- स्यः । यस्य इत्वमाश्रित्यानधि चेति द्वित्वनिषेधो न । वरे-याया- वरः । यातेर्यडन्ताद् यश्च यड इति वरच । अतो लोप. तस्य अचः परस्मिन्निति स्थानिवद्भावे प्राप्ते यलोपं प्रति स्थानि- बद्भावनिषेधात् लोपो व्योरिति यलोपः । स च आतो लोप इटि चैत्यालीपे कर्तव्ये वरे लुप्तत्वात् न स्थानिवत्। यलोपे-यातिःयाते- र्यडन्तात् क्तिच् जतो लोपः । यलोपः अहोपस्य स्थानिवत्त्वादातो लोपः स चाहोपः यलोपे कार्य न स्थानियत् । तेन पुनर्यलोपः । स्वरे-चिकीर्षकः । सनोतो लोपः लितीति कारेकारस्योदात्तत्वे फर्तव्ये न स्थानिवत् । सवर्णानुस्वारयोः-शिष्टि । श्रसोरहोपो न स्थानिवत् । दीर्घ-प्रतिदीना जशि-सग्धिश्च मे अटनं ग्धिः । देः क्तिनि बहुलं उन्दसीति घस्ल घसिमसोहलीत्युपधारोपः झलो द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः । झलीति सलोपः । तकारस्य धत्वं घस्य झलां जशिति जश्त्वं तत्र कर्तव्ये उपधालोपो न स्थानिवत् । समानस्य छन्दसीति समान- स्य सः । समाना धिः सरिधः । चरि-जक्षतुः । जक्षुः । घसेलिटि अतुस् उस् च गमहनेत्युपधालोपः। खरि चेति चत्वं प्रति न स्था. निवत् । भाष्ये तु पूर्वत्रासिद्धे न स्थानिवदित्यवष्टभ्य द्विवचनसब- र्णानुवारदीर्घनश्चरः प्रत्याख्याताः । तद्रीत्या तु सलोपे धत्वे च कर्तव्ये स्यानिवभावशङ्केच नास्तीति । इति १२२ अंशाः। विप्रतिपेघे पर कार्यम् १॥ ४॥२॥ कचित्परस्परलब्धावकाशयोकत्र समावेशो विप्रतिषेधः स एव तुल्यवलविरोधस्तन परं कार्य स्यात् । तेन वृक्षेभ्य इत्यत्र सुपि चेत्यतः परत्वादहुवचने झल्येत् इत्येव भवति ।। अन्तादिवच्च ६।३।८५॥ योऽयमेकादेशः स पूर्वस्यान्तवत्परस्यादिवत् स्यात् । यथा ब्रह्म- वन्धरित्यत्र ब्रह्मवन्धुरिति प्रातिपदिकम् । ऊङ प्रतिपादिकं तयोर्य एकादेशः स प्रातिपदिकस्यान्तवद् भवति । तेन ड्यात्मातिपदि- कादिति स्वादिविधिर्भवति । वृक्षावित्यत्र मुवीकारः असुवकारः तयोरेकादेशः सुप आदिवद् भवति । तेन मुवन्तत्वात्पदसंज्ञा वर्णा- श्रयविधावन्तवद्भावो नेष्यते । तेन खट्टाभिरित्यत्रान्तबद्भावा- दतो मिस ऐस् न भवति । एवं प्रार्छति उपार्च्छतीत्यादौ पदा. न्तबद्भावेन रेफस्य न विसर्गः । उभयथर्वा इत्यादिनिर्देशाच्च ।। समर्थः पदविधिः२१११॥ पदसम्बन्धी यो विधिः स समर्थाश्रितो वोध्यः । सामथ्र्य द्विधा । व्यपेक्षा एकार्थीमावश्च । तत्राझाक्षादिवशात्परस्परसम्बन्धो व्यपेक्षा सैव वाक्ये । यथा गज्ञः पुरुपोऽनश्चेति । तत्र ह्यपेक्षायां सत्यां सन्निहितेन योग्येन च संबंधोभ्युपेयते । एकार्थीभावश्च गजपुरुषइत्यादि वृत्तावेवाम च प्रक्रियादशायां पृथगर्थत्वेन प्रथम- सुगमकीमुद्याः। गृहीतार्थस्य विशिष्टेकार्थत्वरूपः स एवेह गृह्यते । पदग्रहणं किम् । वर्णविधी समर्थपरिभाषा मा भूत् । तेन तिष्ठतु दध्यानय तक मित्यन सामथ्याविपि यण् भवत्येव । समर्थ इति किम् । पश्यति कृष्णं श्रितो देवदत्तमित्यादी कृष्णश्रित इति समासो न भवति । कचिच सापेक्षत्वेऽपि भाष्यादिप्रामाण्यादत्तिरङ्गीक्रियते । किमोदनः शालीनाम् । केपां शालीनामोदन इत्यर्थः । सक्त्वाटक- मापणीयानाम् । आपणीयानां सक्तूनामाढकमित्यर्थः ।। न वेति विभापा १११॥४४॥ निषेधविकल्पयोर्विमापासंज्ञा । विमापा श्वरित्यादिपु प्रतिषेध- विकल्पाउपतिष्ठते । तत्र प्रतिषेधेन समीकृते विपये पश्चादिकल्पः प्रवर्तते । शुशाव शिश्वायेत्यत्राप्राप्तौ विकल्पः । शिशुवतुः शिश्वि- यतुरित्यादौ तु वचि स्वपीति नित्यप्राप्ताविति विवेकः । अत्रेदं वोध्यम्।इतिशब्दः काकाक्षिन्यायेनोभाभ्या सम्बध्यते।स च पदा- र्थविपर्यासकृत् । तेन निषेधो विकल्पश्च न वाशब्दार्थः संज्ञी वि- भाषाशब्दार्थो विकल्प' संज्ञा उभयत्र विमापार्थ चेदं सूत्रम् । प्राप्तविभापायामप्राप्तविभापाया च नास्योपयोगः । प्राप्तविभाषायां भावाशस्य सिद्धत्वेन विमापाश्रुत्या पक्षे भवतीति भावाशमनूद्य पक्षे न भवतीत्यभावाशमानकरणात् । अप्राप्तविभापायां तु अभा- वाशस्य सिद्धत्वेन पक्षे न भवतीत्यभावाशमनूद्य पक्षे भवतीति भावाशमानकरणात् । विमापा श्वेरित्युभयत्र विभाषाया तु यदि विधिमुखेन प्रवृत्तिस्तर्हि पित्स्वेव संप्रसारणविकल्पः स्यात् । कित्सु यजादित्वादचिस्वपीति नित्यमेव स्यात् । अथ प्रतिपेधमुखेन प्रवृ- त्तिस्तर्हि कित्स्वेव प्रवृत्तिः स्यान्नतु पित्सु । परनित्यान्तरङ्गापवा- दानामुत्तरोत्तरं वलीयः । पराद् नित्यं यथा, तुदादिभ्यः शः। तुदति । रुदादिभ्यः श्नम् ।रुणद्धि। परमपि लघूपधगुणं बाधित्वा नित्यत्वात् शश्नमौ । तथा धिनवार । धिनवाम । परमपि लोप- श्वास्यान्यतरस्या म्वोरित्युकारलोपं बाधित्वा नित्यत्वादाडुत्तम स्पेत्याट् । परादन्तरङ्गं यथा। उमये देवमनुप्या.। इह प्रथमचरमेति द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। परमपि विकल्पं बाधित्वा सर्वांदीनीति सर्वनामसंज्ञाविमक्तिनिरपे- सत्वनान्तरङ्गत्वात् । तथा स्रवतेणिश्रीति चडि द्वित्वे उपधागुणा- दन्तरगत्वादुवड् । असुस्रवत् । परादपवादो यथा । परमप्यनेका- लिति सर्वादेश बाधित्वा डिचेत्यन्तादेशः । दना । दन्ने । अ- स्थिदवीत्यनइ । नित्यादन्तरङ्गं यथा । ग्रामणिनी कुले । नित्य- मपीकोचीति नुमं बाधित्वा हसो नपुंसक इति इस्वः कृने तु नुमि अनजन्तत्वात् इस्वो न स्यात् । अन्तरङ्गादपवादो यथा दैत्यारिः । श्रीशः । परमपि सवर्णदीर्घ वाधित्वा अन्तरङ्गत्वादा- गुणे यणि च प्राप्तेऽपवादत्वात्सवर्णदीर्घः । तथा उन्यौ । रन्यः । सुल्वौ । सुल्वः । इत्यत्रान्तरङ्गत्वादियडि उवडि च प्राप्तेऽपवाद- वादेरनेकाच इत्योः सुपीति च यण् । यद्यपवादोऽन्यत्र चरि- तार्थः तार्ह परान्तरङ्गाभ्यां बाध्यत एव । तथाहि डिवेत्येतदन- न्यार्थडकारयुक्तेष्वनडादिषु चरितार्थत्वात्ताताड न मवर्तते । किन्तु परेणानेकाशिदित्यनेन वाध्यते । जीवतात् । भवतात् । अपने इन्द्रम् । ग्रामे इह । सर्वे इत्यम् । अत्र अयज इ इन्द्रम, ग्राम इ इह, मई इ इत्थमिति स्थिने अन्तरङ्गेण गुणेन सवर्णदीर्घो वाध्य- ते । तस्य समानाश्रये दैत्यारिः श्रीश इत्यादी चरितार्थत्वात् ।। कृताकृतप्रसंगि नित्यं तद्विपरीतमनित्यम् ॥ यया मच्छति इत्यादो सावकाशस्य शस्य तुतोदेत्यादी साब- काशस्य गुणस्य च तुदतीत्यादौ परादपि गुणान्नित्यत्वाच्छ एर । शो हि गुणे कृते कृते च प्रसङ्गी गुणस्तु अकृत एव । शे कृते तु शे तस्य डित्त्वादू गुणो न भवति ।। असिद्धं बहिरंगमन्तरङ्गे॥ वहिरङ्गापेक्षयान्तर्गतानि अन्तर्भूतानि अगानि निमित्तानि यस्य तदन्तरङ्गम् एवमन्तरङ्गापेक्षया वहिर्भूतान्यङ्गानि यस्य तद्वहिर- नम्। तत्रान्तरङ्गे कार्य कर्तव्ये बहिरङ्गमासिद्धम् । यथा पचावेदाम- त्यत्र आद्गुणे कृते एत ऐ इति ऐकारो न भवति बहिरणतया ३४० सुगमकौमुद्याः । गुणस्यासिद्धत्वात् । शेपाः परिभाषास्तृतीये खण्डे व्याख्यास्यन्ते। इति १२३ अंशाः। अथ णिजन्ताः ॥ ओः पुयज्यपरे । अपीपवत् । अवीभवत् । अमीमवत् । अयीयवत् । अरीखत् । अलीलवत् । अजीजवत् ।। स्रपतिशृणोतिद्रवतिप्रवतिप्लवतिच्यवतीनांवा ७ । ४।८१॥ एपामभ्यासोकारस्य इत्वं वा सनि अवर्णपरे धात्वक्षरे परेरामसि- स्रवत् । असुस्रवत् । नाग्लोपि इति इस्वनिषेधः। अशशासत्। अडुढी- कत् । अचीचकासत् । मतान्तरे अचचकासदिति वक्ष्यते । अग्लोपि इति सुब्धातुप्रकरण उदाहरिष्यते । ण्यन्तामिचि पूर्व विप्रतिपेधा- दपवादत्वादा वृद्धि बाधित्वा णिलोपः । चोरयति । णौ चडीति हस्वः। दी? लघोः । न चाग्लोपित्वाइयोरप्यसम्भवः । ण्याकृति- निर्देशात् । अचूचुरत् ।। गौच संश्चङोः६।१।३१॥ सम्परे चङ्परे च णौ श्वयतेः संप्रसारणं वा । संप्रसारणं तदा- श्रय कार्य च बलवत् । अतः संप्रसारणं । पूर्वरूपम् । अशूशवत् । अलघुत्वान्न दीर्घः। अशिश्वयत् ।। स्तम्भुसिवुसहां चङि ८।३।११६॥ उपसर्गनिमित्त एपो सस्य पो न स्याचङि । अवातस्तम्मत् । पर्यसीपिवत् । न्यसीपहत् । आटिटत् । आशिशत् । बहिरङ्गोऽप्यु- पधाहस्वो द्वित्वात्मागेव । ओणेदित्करणाल्लिङ्गात् मा भवानिदि- धत् । एजादविधती विधानान्न वृद्धिः । मा भवान्मदिधत् । नन्द्राः इति नदराणां न हित्वम् । आन्दिदत् । आहिडत् । आर्चिचत् । उन्ज आर्जवे । उपदेशे दकारोपधः । भुजन्युजी पाण्युपतापयोः इति मूत्रे निपातनादस्य यः । स चान्तरङ्गोऽपि द्वित्वषिपये नन्द्राः इति निषेधानिशब्दस्य द्वित्वे कृते प्रवर्तते नतु ततः प्राक् । दकारो. धारणमामयति । आजिजत् । अजादेरित्येर नेह । अदिद्रपत् ।।

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। ३४१ रभेरशब्लिटोः ७।११६३॥ रभेर्नुमचि नतु शब्लिटोः । अररम्भत् ॥ लभेश्च ७।११६४॥ अललम्मत् । हेरचडि इति सूत्रे अचडि इत्युक्तेः कुत्वं न । अजीहयत् ॥ अत्स्मृहत्वरप्रथमृदस्तृस्पशाम् ॥ असस्मरत् । अददरत् । तपरत्वसामर्थ्यादत्र लघोर्न दीर्घः ।। विभापा वेष्टिचेप्टयोः ७।४।९६॥ अभ्यासस्यात्वं वा स्याचड्परे णौ। अववेष्टत् अविवेष्टत् । अच- चष्टत् अचिचेष्टत् । भ्राजभास इत्यादिना बोपधाहस्वः। अविभ्रजत् अबभ्राजत् । काण्यादयः प्रागुक्ताः तेषामुपधाह्रस्वो वा । अची. कणत् अचकाणत् ॥ स्वापेश्चङि६।१।१८॥ ण्यन्तस्य स्वपेश्वडि संप्रसारणम् । असूपुपत् ।। शाच्छासाह्यान्यावेपां युक् ७।३।३७॥ णी पुकोऽपवादः । शाययति । वाययति । हः संप्रसारणम् ६।११३२॥ सन्परे चडूपरे च णौ वः संप्रसारणम् । अजूहवत् अजुहावत् ॥ लोपः पिबतेरीचाभ्यासस्य ७॥४॥४॥ पिवतेरुपधाया लोपः स्यादभ्यासस्य ईदन्तादेशश्च चइपरे णौ। अपीप्यत् । अर्तिही इति पुक । अर्पयति हेपयति । व्लेपयति । रेपयति । यलोपः। क्नोपयति । मापयति । स्थापयति ॥ तिष्ठतेरित ७।४।५॥ उपधाया इदादेशश्चइपरे णौ । अतिष्ठिपत् ।। जिघ्रतेर्वा ७।४।६॥

३४२ सुगमकीमुद्याः। अजिविपत् अजिघ्रपत् । उत् । अचीकृतत अधिकीर्तन् । अवीवृतत् अववर्तत् । अमीमृजत् अममार्जत् ॥ पातौँ लुग्वक्तव्यः॥ पुकोपवादः । पालयति ॥ वो विधूनने जुक् ७।३।३८॥ वातेर्जुस्याण्णी कम्पेथ । वाजयति । कम्पे किम् । केशान्वा- पयति॥ विभापा लीयतेः॥ लीलोर्नुग्लुकावन्यतरस्यां स्नेहविपातने ७३॥३९॥ लीयतेलातेश्च क्रमानुग्लुकावागमौ वा णो सेहवे । विलीन- यति । विलापयति विलालयति वा घृतम् । ली इति ईकारमश्लेपा- दात्वपक्षे नुग्न । स्नेहद्रवे किम् । लोहं विलापयति ।। प्रलम्भनाभिभवपूजासु लियो नित्यमात्वमशिति वाच्यम् ॥ . लियः संमाननशालीनीकरणयोश्च ११३७०॥ लीइलियोMन्तयोरात्मनेपदं स्यादकर्तृगेऽपि फले पूजाभिभव योः प्रलम्मने चार्थे । जटाभिापयते । पूजामधिगच्छतीत्यर्थः । श्येनो वर्तिकामुलापयते । अभिभवतीत्यर्थः । बालमुल्लापयते । वञ्चयतीत्यर्थः ॥ विभेतेहेतुभये ६।११५६॥ विभेतेरेच आत्वं वा प्रयोजकाद् । भयं चेत् ॥ भीस्म्योर्हेतुभये ११३।६८॥ ण्यन्ताभ्यामाभ्यामात्मनेपदं स्यादेतोश्चेद् भयस्मयो । सूने मयग्रहणं धात्वर्थोपलक्षणम् मुण्डो भापयते ।। भियो हेतुभये पुक् ७१३।१०।।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । भी ई इति ईकारः प्रश्लिष्यते ईकारान्तस्य मियः पुक् स्याण्णी हेतुभये । भीषयते॥ नित्यं स्मयतेः६।११५७॥ स्मयतेरेचो नित्यमात्वं णौ हेतोः स्मये । जटिलो विस्मापयते । हेतोश्चेद्भयस्मयावित्युक्तेनेह । कुञ्चिकयैनं माययति। विस्माययति । कथं तर्हि विस्मापयन्विस्मितमात्मवृत्तौ इति । मनुष्यवाचा इति करणादेव हि तत्र स्मयः । अन्यथा शानजपि स्यात् । सत्यम् । विस्माययन् इत्येव पाठ इति सापदायिकाः । यद्वा मनुष्यवाक् प्रयोज्यकर्ती विस्मापयते । तया सिंहो विस्मापयन्निति ण्यन्ताण्णी शता इति व्याख्येयम् ॥ स्फायो वः७।३।४१॥ णौ । स्फावयति ॥ इति १२४ अशाः। शदेरगतो तः ७।३।४२॥ शदेो तोऽन्तादेशः न तु गतौ । शातयति । गतौ तु गाः शादयति गोविन्दः। गमयतीत्यर्थः। रुहः पोऽन्यतरस्याम् ७।३।१३॥ णी । रोपयति । रोहयति ॥ क्रीजीनां णौ ६।१॥४८॥ एपामेच आत्वं णौ । क्रापयति । अध्यापयति । जापयति ॥ णौ च संश्चडोः२।४।५१॥ सन्परे चइपरे च णौ इडो गाड्दा । अध्यजीगपत् । अध्या. पिपत् ॥ सिध्यतेरपारलौकिके ६।१।४९॥ ऐहलौकिकेऽर्थे विद्यमानस्य सिध्यतेरेच आत्व णौ । अन्नं सा- धयति निष्पादयतीत्यर्थः । अपारलौकिके किम् । तापसः सि- ३४४ सुगमकीमुद्याः। ध्यति । तत्व निश्चिनोति तं प्रेरयति सेधयति तापसं तपः ।। प्रजने वीयतेः६।११५५॥ अस्येच आत्वं वा णी प्रजनेऽर्थे । वापयति वाययति वा गाः। पुरोवातः गर्भ ग्राहयतीत्यर्थः ।। जदुपधाया गोहः॥ गृहयति ॥ दोपो णी ६।४।९.॥ दुपः इति सुवचम् । दुष्यतेरुपधाया ऊणौ । दूपयति ।। वा चित्तविरागे६।४।९१॥ विरागोऽप्रीतता । चित्तं दूपयति दोपयति वा कामः । मितां हस्वः । तत्र केचिन्मितः प्रागुक्ताः । इदानी सर्व उच्यन्ते । तत्रादौ त्वरत्यन्तात्रयोदशानुदात्तेतः पितश्च । घट चेष्टायाम् । घटते । इत्यादिरूपाणि । ज्ञेयानि अनुवादरूपाणां तु स्वस्वगणे रूपाणि भवन्ति । घटादयो मितः इति मित्संज्ञा । तत्फलं तु णौ मितां वस्वः इंति चिपणमुलोर्दीर्घोऽन्यतरस्याम् इति चोक्तम् । घटयति । वि- घटयति । कथं तर्हि कमलवनोद्घाटनं कुर्वते ये प्रविघाटयिता । समुत्पतन्हरिदश्वः । कमलाकरानिव इत्यादि शृणु। घट संघाते इति चौरादिकस्येदम् । नच तस्यैवार्थविशेपे मित्वार्थमनुवादोऽयमि- ति वाच्यम् । नान्ये मितोऽहेतौ इति निषेधात्। अहेतौ स्वार्थे णिचि ज्ञपादिव्यतिरिक्ताश्चरादयो मितो नेत्यर्थः । व्यथ भयसंच- लनयोः। प्रथ प्रख्याने । प्रस विस्तारे । म्रद् मर्दने । स्वद स्खदने । स्वदनं विद्रावणम् । क्षजिगतिदानयोः । मित्त्वसामर्थ्यादनुपधा- लेषि विष्णमुलोः इति दीपीवकल्पः। अक्षञ्जि अक्षालि। क्षञ्ज क्षअम्।क्षाझं क्षाञ्जम्। क्षति अनिदितमपि वोपदेवः पठति । दक्ष गातेहिंसनयोः । योऽयं वृद्धिशध्ययोरनुदात्तेत्सु पठितस्तस्येहार्थ- विशेपे मित्वार्थोऽनुवादः । क्रप कृपायां गतौ च । कदि-कदि-लदि वैकल्ये। वैकल्ये इत्येके । प्रयोऽप्यनिदित इति नन्दी । इदित इति द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः । स्वामी । कदि ऋदी-इदिती । ऋद-लद इति चानिदिताविति मैत्रेयः । कदि-ऋदि-लदीनामाहानरोदनयोः परस्मै पदिपूक्तानां पुनरिह पागे मित्वार्थ आत्मनेपदार्थश्च । सित्वरा संभ्रमे । घटा- दयः पितः । पित्वात कृत्सु अड् वक्ष्यते । घटा व्यथा इत्यादि । अथ फणान्ताः परस्मैपदिनः ॥ ज्वर रोगे । गड सेचने । गडति । जगाड । हेड वेष्टने । हेड अनादरे इत्यात्मनेपदिपु गतः । स एवो त्सृष्टानुवन्धोऽनूयतेऽर्थविशेपे मित्वार्थम् । परस्मैपदिभ्यो ज्वरादि- भ्यः प्रागेवानुवादे कर्तव्ये तन्मध्येऽनुवादसामर्थ्यात् परस्मैपदम् । हेडति । जिहेड । गती, हिडयति । अहिडि अहीडि । अनादरे तु हेडयति । परे तु असांप्रदायिकोस्य पाठः । सति साम्पदा- यिकत्वे तु अपूर्व एवायं नत्वनुवाद इत्याहुः । वट-मट परिमा- पणे । वट वेष्टने, भट भृतौ इति पठितयाः परिभापणे मित्वार्थोऽ- नुवादः । नट नृतौ इत्यमेव पूर्वमपि पठितं तनायं विवेकः । पूर्वप- ठितस्य नाट्यमर्थः। यत्कारिपु नटव्यपदेशः । वाक्यामिनयो नाट्यम् । घटादौ तु नृत्तं नृत्यं चार्थः । यत्कारिपु नर्तकव्यप- देशः । पदामिनयो नृत्यम् । गात्रविक्षेपमानं नृत्तम् । केचित्तु घटादी नट नतौ इति पठन्ति गती इत्यन्ये। णोपदेशपर्युदासवाक्ये भाष्यकृता नाटि इति दीर्घपागत् घटादिोपदेश एव । एक प्रती- घाते । स्तकति चिक तृप्तौ । दृप्तिमतीपातयोः पूर्व पठितस्य तृप्ति- मात्रे मित्वार्थोऽनुवादः । आत्मनेपदिपु पठितस्य परस्मैपदिष्वनु- वादात्परस्मैपदम् । कखे हसने । एदित्वान्न वृद्धिः । अमरवीत् । रगे शङ्कायाम् । लगे संगे। हगे-छगे-पगे-ष्टगे-संगे-स्थगे संवरणे। कगे नोच्यते । अस्यायमर्थ इति विशिष्य नोच्यते क्रियासामा- न्यार्थत्वात् । अनेकार्थत्वादित्यन्यै । अक-अग कुटिलायां गती। कण-रण गती चकाण। रराण। चण-शण-श्रण दाने च । गण गती इत्यन्ये । श्रथ-लय-क्रय क्लथ हिंसाः । जासिनिमहण इति सूत्र कायेति मित्त्वेपि वृद्धिनिपात्यते। काययति । मित्त्वं तु निपातना- त्परत्वात् चिण्णमुलोः इतिदीर्घ चरितार्थम् अथि। अक्राथि ।

३४६ मुगमकीमुद्याः। ऋथं जयम् । कार्य प्रायम् । वन च हिंसापामिति शेपः । वनु च नोच्यते । यनु इत्यपूर्व पवायं धातुर्नतु तानादिकस्यानुवादः। उदित्रणसामर्थ्यात् । तेन क्रियासामान्ये वनतीत्यादि । प्रवन- यति । अनुपमृष्टस्य तु मित्त्व विकल्पो वक्ष्यते । ज्वल दीप्ती । णमत्ययार्थ पठित एवायं मित्चार्थमन्द्यते । मज्वलयति । हल. सल चलने । प्रहलयाति । प्रहालयति । स्मृ आध्याने । चिंतायां पठित्तस्य आध्याने मित्त्यार्थोऽनुवादः । आध्यानमुत्कण्ठापूर्वकं स्मरणम्। दृ भये ह विदारणे इति यादेरयं मित्त्वार्थोऽनुवादः । दृणन्तं प्रेरयति दरयति। भयादन्यन दारयति । धात्वन्तरमेवेदमिति मते तु दरतीत्यादि केचित् घटादी अत्स्मृहत्वर इति सने ६ इति दीर्घस्थाने हस्वं पठन्ति । तन्नेति माधवः । नृ नये । श्यादिषु पठितस्यानुवादः । नयादन्यन, नारयति । श्रा पाके । श्र इति कृतात्वस्य श्रा इत्यदादिकस्य च सामान्येनानुकरणम् । लुग्वि- करणालुग्विकरणयोरलुग्विकरणस्य लक्षणमदिपदोक्तयोः प्रतिपदो क्तस्यैव ग्रहणम् इति परिमापाभ्याम् । श्रपयति । विक्लेदयतीत्यर्थः । पाकादन्यत्र श्रापयति । स्वेदयतीत्यर्थः । इति १२५ अंशाः। मारणतोपणनिशामनेषु ज्ञा॥ निशामनं चाक्षुपज्ञानम् इति माधवः । ज्ञापनमात्रम् इत्यन्ये । निशानेषु इति पाठान्तरम् । निशानं तीक्ष्णीकरणम् । एष्वेवार्थेषु जानातिर्मित् । ज्ञपमिञ्च इति चुरादौ । ज्ञापन मारणादिकं च तस्यार्थः। कथं, विज्ञापना भर्तृषु सिद्धिमेति इति तज्ञापयत्याचार्य: इति च । शृणु माधवमतेञ्चाक्षुपज्ञाने मित्त्वाभावात् । ज्ञापनमात्रे मित्वमिति मते तु ज्ञा नियोगे इति चौरादिकस्य । धातूनामने- कार्थत्वात् । निशानेनिति पठतां हरदत्तादीनां मते तु न काप्य- नुपपत्तिः। कुम्पने चलिः॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । चल कम्पने इति ज्वलादिः । चलयति शाखाम् । कम्पना- दन्यत्र तु शीलं चालयति । अन्यथा करोतीत्यर्थः । हरतीत्यर्थः इति स्वामी । सूत्रं चालयति । क्षिपतीत्यर्थः । छदिर ऊर्जने । छद अपवारणे । इति चौरादिकस्य स्वार्थे णिजभारे मित्त्वार्थोऽयमनु- वादः । अनेकार्थत्वादूर्जेरथे वृत्तिः । छदन्तं प्रयुक्त छदयति । वल- वन्तं प्राणवन्तं वा करोतीत्यर्थः । अन्यत्र छादयति । अपवारयन्तं प्रयुक्त इत्यर्थः । स्वार्थ णिचि तु छादयति । बलीभवति प्राणीम- वति अपवारयति वेत्यर्थः॥ जिह्वोन्मथने लडिः॥ लड विलासे इति पठितस्य मित्त्वार्थोऽनुवादः । उन्मथनं ज्ञाप- नम् । जिह्वाशब्देन पष्ठीतत्पुरुपः । लडयति जिह्वाम् । तृतीयात- त्पुरुपो वा । लडयति जिया। अन्ये तु जिहाशब्देन तव्यापारी लक्ष्यते । समाहारद्वन्द्वोऽयम् । लडयात शत्रुम् । लडयति दधि । अन्यत्र लाडयति पुत्रम् । मदी हर्पग्लेपनयोः । ग्लेपनं दैन्यम् । देवादिकस्य मित्त्वार्थोऽयमनुवादः । मदयति । हर्पयति ग्लेपयति वेत्यर्थः । अन्यन मादयति । चित्तविकारमुत्पादयतीत्यर्थः । ध्वन शब्दे । मित्त्वार्थमयमनूद्यते । ध्वनयति घण्टाम् । अन्यत्र ध्वान- यति । अस्पष्टाक्षरमुच्चारयतीत्यर्थः । अत्र भोजः दलिवलिस्वालि- रणिध्वनित्रपिक्षपयश्च इति पपाठ । तत्र ध्वनिरणी उदाहती। दल विशरणे । वल संवरणे । स्खल संचलने । त्रपूप् लज्जायाम इति गताः । तेषां णौ दलयति । वलयति । स्खलयति । त्रपयति । क्ष क्षये इत्यस्य कृतात्वस्य पुका निर्देशः । क्षपयति । स्वन अवतं, सने । शब्द इति पठितस्यानुवादः । स्वनयति । अन्यत्र स्वानयति । घटादयो मितः। मित्संज्ञा इत्यर्थः ॥ जनी→पूनसुरनोऽमन्ताश्च ॥ मितः इत्यनुवर्तते । जृष् इति पित्वनिर्देशाजीर्यतेस्रहणम् । जु- णातेस्तु जारयति । केचित्तु जनीजृष्णसु इति पठित्वा ष्णसु निर- सन इति देवादिकमुदाहरन्ति ॥

. मुगमकीमुयाः। ज्वलह्वलझलनमामनुपसर्गादा॥ एपां मित्त्वं वा । प्राप्त विमापेयम् । ज्यलयति । ज्यालयति । उपसृष्टे तु नित्यं मित्त्वम् । प्रज्वलयति । कथं वर्हि प्रश्वालयति उन्नामयतीति । घमन्तात् तत्करोति इति णी कथ संक्रामयतीति । मितां इस्वः इति सूत्रे वा चित्तविरागे इत्यतो वा इत्यनुवर्त्य व्य- वस्थितविमापाश्रयणादिति वृत्तिकृत् । एतेन, रजो विश्रामयन् राज्ञा धुर्यान्विश्रामयेति सः । इत्यादि व्याख्यातम् ॥ ग्लास्नावनुवमां च ॥ अनुपसर्गादेषां मित्त्वं वा। आधयोरमाप्ते इतरयोःप्राप्ते विभाषा॥ न कम्यमिचमाम् ॥ अमन्तत्वात्माप्तं मित्वमेपांन । कामयते । आमयति । चामयति। शमोऽदर्शने ॥ शाम्यतिर्दर्शने मिन्न। निशामयति रूपम् । अन्यत्र तु, प्रणयिनी निशमय्य वधूः कथाः । कथं तर्हि, निशामय तदुत्पत्तिं विस्तरात् गदतो मम इति । शम आलोचने इति चौरादिकस्य धातूनाम- नेकार्थत्वाच्छ्वणे वृत्तिः शाम्यतिवत् ।। यमोऽपरिवेपणे॥ यच्छति जनातोन्यत्र मिन्न । आयामयति । द्राघयति । व्यापारयति वेत्यर्थः। परिवेषणे तु यमयति । ब्राह्मणान मोजय- तीत्यर्थः । पर्यवसितं नियमयन् इत्यादि तु नियमवच्छन्दात्तत्करो- तीति णौ बोध्यम् ॥ स्खदिर अवपरिभ्यां च ॥ मिन्नेत्येव । अवस्वादयति । परिस्वादयति । अपावपरिभ्यः इति न्यासकारः । स्वामी तु न कमि इति नजमुत्तरात्रिसूच्यामनु- वर्त्य शमः अदर्शने इति चिच्छेद । यमस्तु अपरिवेषणे मित्वमाह । तन्मते पर्यवसित नियमयन् इत्यादि सम्यगेव । उपसृष्टस्य स्वदेश्चे- दवादिपूर्वस्पैव इति नियमात्मस्वादयतीत्याह । तस्मात्सूत्रद्वय उदा.

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ३४९ हरणप्रत्युदाहरणयोर्व्यत्यासः फलितः । इदं च मतं वृचिन्यासादि- विरोधादुपेक्ष्यम् । फण गतौ। न इति निवृत्तमसंभवात् । निषेधात्पू- मसौ न पठितः फणादिकार्यानुरोधात् । फणयति । इति घटादयः समाप्ताः। फणेः प्रागेवेति केचित् । तेषां मते फाणयतीत्येव ।। रले! मृगरमणे नलोपो वक्तव्यः ॥ मृगरमणमाखेटकम् । रजयति मृगान् । मृग इति किम् । रञ्ज- यति पक्षिणः। रमणादन्यत्र तु रञ्जयति मृगांस्तृणदानेन ।चुरादिषु ज्ञपादिश्चि । चिस्फुरोर्णौ । चपयति चययतीत्युक्तम् । चिनोतस्तु चापयति चाययति । स्फारयति स्फोरयति । अपुस्फरत् अपु- स्फुरत् ॥ इति १२६ अंशाः। उभौ साभ्यासस्य ८।४।२१॥ साभ्यासस्यानितेरुभी नकारौ णौस्तो निमित्ते सति। प्राणिणत्।। ईर्ष्णतेस्तृतीयस्येति वक्तव्यम् * ॥ तृतीयव्यञ्जनस्य तृतीयकाच इति वार्थः । आये पकारस्य द्वित्वं वारयितुमिदम् । द्वितीये तु अजादेर्द्वितीयस्य इत्यस्यापवाद- तया सन्नन्ते प्रवर्त्तते । ऐर्पियत् ऐर्पिष्यत् । द्वितीयव्याख्यायां णिजन्ताचङि पकार एवाभ्यासे श्रूयते हलादिः शेषात् । द्वित्वं तु द्वितीयस्यैव । तृतीयाभावेन प्रकृतवार्तिकामवृत्तेः॥ वुधयुधनशजनेछुद्रुस्रुभ्यो णेः १।३।८६ ॥ एम्यो ण्यन्तेभ्यः परस्मैपदम् । णिचश्व इत्यस्यापवादः । वोधयति पद्मम् । योधयति काष्ठानि। नाशयति दुःखम् । जनयति सुखम् । प्रीति भक्तजनस्य यो जनयते इति त्वसाधु। अध्यापयति। प्रापयति । प्रापयतीत्यर्थः । द्रावयति । विलापयतीत्यर्थः । स्राव- * यति । स्पंदयतीत्यर्थः ॥ निगरणचलनार्थेभ्यश्च ११३।८७॥

सुगमकौमुद्याः। निगारयति । आशयति । भोजयति । चलयति । कम्पयति ॥ अदेः प्रतिपेधः ॥ आदयवे देवदत्तेन । गतिवुदि इति कर्मत्वम् आदिखायोर्न इति प्रतिषिद्धम् । निगरणचलन इति सूत्रेण प्राप्तस्यैवायं निषेधः । शेपादित्यकर्नभिप्राये परस्मैपदं स्यादेव । आदयत्यन्नं वटुना ॥ अणावकर्मकाञ्चित्तवत्कर्तृकात् ११३१८८॥ ण्यन्तात्परस्मैपदम् । शेते कृष्णम्तं गोपी शाययति ।। न पादम्याङयमाङयसपरिमुहरुचिनृतिवदवसः १।३।८९॥ एभ्यो ण्यन्तेभ्यः परस्मैपदं न । पिवतिर्निंगरणार्थः । इतरे चित्तवत्कर्तृकाकर्मकाः। नृतिश्चलनार्थोऽपि । तेन सूत्रद्वयेन प्राप्तिः । पाययते । दमयते । आयामयते । आयासयते । परिमोहयते । रोचयते । नर्तयते । वादयते । वासयते ।। धेट उपसंख्यानम् ॥ धापयेते शिशुमेकं समीची । अकभिप्राये शेषात् इति परस्मै- पदं स्यादेव । वत्सान्पाययति पयः । दमयन्ती कमनीयतामदम् । भिक्षां वासयति ॥ णेरणौ यत्कर्म णौ चेत्स कर्तानाध्याने।३।६७॥ प्रयन्तादात्मनेपदं स्यादणी या क्रिया सैव चेण्यन्तेनोच्यते । अणी यत्कर्मकारकं स चेपण्णी कर्ता स्यान्न त्वाध्याने । णिचश्च इति सिद्धेश्कीभप्रायार्थमिदम् । कभिप्राये तु विभापोपपदेन प्रतिपेधेनेदमेवेष्यते । कर्तस्थभावकाः कर्तुस्थक्रियाश्चोदाहरणम् । तथा हि । पश्यति भवं भक्ताः । चाक्षुपज्ञानविषयं कुर्वन्तीत्यर्थः । प्रेरणांशत्यागे पश्यति भवः । विपयो भवतीत्यर्थः । ततो हेतुम- पिणच । दर्शयन्ति भवं भक्ताः । पश्यन्तीत्यर्थः । पुनर्ण्यर्थस्यावि- चक्षायां दर्शयते भवः । इह प्रथमतृतीययोदितीयचतुर्थयोश्वावस्था योस्तुल्पोऽर्थः । तत्र तृतीयायां न तड् । क्रियासाम्येभ्यणी 1 द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः। कर्मणो णौ कर्तृत्वाभावात् । चतुर्यों तु तड् द्वितीयामादाय क्रि. यासाम्यात् । प्रथमायां कर्मणो भवस्य कर्तृत्वाच्च ।एवम् आरोहन्ति हस्तिनं हस्तिपकाः । न्यग्भावयन्तीत्यर्थः । तत आरोहति हस्ती । न्यग्भवतीत्यर्थः । ततो णिच् । आरोहयन्ति । आरोहन्ती. त्यर्थः । तत आरोहयते । न्यग्भवतीत्यर्थः । यदा । पश्यन्त्यारो' हन्तीति प्रथमकक्षा प्राग्वत् । ततः कर्मण एव हेतुत्वारोपाणिन् । दर्शयति भवः । आरोहयति हस्ती । पश्यत आरोहतश्च प्रेरयती- त्यर्थः । ततो णिज्भ्यां तत्प्रकृतिभ्यां च उपात्तयोईयोरपि प्रेपण- योस्त्यागे दर्शयते आरोहयते इत्युदाहरणम् । अर्थः प्राग्वत् । अत्र पक्षे द्वितीयकक्षायां न तड् । समानक्रियत्वाभावाणिजर्थस्याधि- क्यात् । अनाध्याने किम् । स्मरति वनगुल्म कोकिलः । स्मरयति वनगुल्मः । आगमः क्षमायाम् । ण्यन्तात् आत्मनेपदम् । आग- मयस्व तावत् । मा त्वरिष्ठा इत्यर्थः॥ गृधिवच्योः प्रलंभने १।३।६९॥ प्रतारणेऽर्थे ण्यन्ताभ्यामाभ्यामात्मनेपदम् । माणवकं गर्द्धयते । वञ्चयते । प्रलम्भने किम्। श्वानं गर्द्धयति । अभिकांक्षामस्योत्पाद- यतीत्यर्थः । अहिं वश्चयति । वर्जयतीत्यर्थः ॥ मिथ्योपपदात्कृतोऽभ्यासे ।।३।७१॥ णेः इत्येव । पदं मिथ्या कारयते । स्वरादिदुष्टमसकृदुधारयती- त्यर्थः । मिथ्येति किम् । पदं सुष्टु कारयति । अभ्यासे किम् । पदं सकृन्मिथ्या कारयति ॥ गौ गमिरवोधने २।४।४६॥ इणो णौ गमिन बोधने । गमयति । बोधने तु प्रत्याययति। इण्वदिकः । अधिगमयति ॥ हनस्तोऽचिण्णलोः७।३।३२॥ हन्तेस्तोऽन्तादेशश्चिण्णल्वर्ने जिति णिति च । हो हन्तरिति कुत्वम् । घातयति । निवृत्तप्रेपणादातोहेतुमण्णौ शुद्धन तुल्योऽर्थः।

। ३५२ सुगमकौमुद्याः। तेन, मार्थयन्ति शयनोत्थितं मिया इत्यादि सिद्धम् । एवं सर्म- केषु सर्वेषह्यम् ॥ इति णिजन्ताः॥ इति १२७ अंशाः। अय सन्नन्ताः। अतुमिच्छति । घस्ल इडमावः सस्य तः। जिघत्सति ॥ रुदविदमुपग्रहिस्वपिप्रच्छः संश्च ११२।१८॥ एभ्यः संश्च क्त्वा च कितौ । रुरुदिपति । विविदिषति । मुमु- पिषीत । सनिग्रहगुहोश्च । अहिज्येति संप्रसारणम् । सनः पत्व- स्यासिद्धत्वागण्मावः । जिघृक्षति । सुषुप्सति ॥ किरश्च पञ्चभ्यः ७।२।७५॥ गृदृद्धृड्प्रच्छ एभ्यः सन इट् । पिपृच्छिपति। चिकरिपति । जिगारपति । जिगलिपति । अत्रेटो दीर्घो नेष्टः । दिदरिपते । दिधरिपते । उद्दिधीपुरिति तु भ्वादेधृवोयम् ॥ हलन्ताच १।२।१०॥ इक्समीपादलः परो झलादिः सन् कित् । गुहू । जुघुक्षति । विभित्सति । इकः किम् । यियक्षते । झल् किम् । विवर्द्धिपते । हल्ग्रहणं जातिपरम् । तुंहू-तिवृक्षति तिहिपति । संल्लिटोर्जेरिति कुत्वम् । अज्झन्निति दीर्घः । जिगीपति । जिघांसति । विभाषा चः। चिकीपति । चिचीपति ॥ सनि च २।४।४७॥ इणो गमिः सनि नतु योधने । जिगमिपति । वोधने-प्रतीषि- पति । इण्वदिकः । अधिजिगमिपति । फर्मणि तड् । परस्मैपदे- वित्युक्तेर्नेट् । अज्झन्निति दीर्घः । जिगांसाते । अधिजिगांसाते। इडिणिकादेशगतेरित्युक्तेर्गच्छतेने दीर्घः जिगंसाते । संजिगंसते॥ इङश्च२।४।४८॥ गमिः सनि । अधिजिगांसते ।।

द्वितीयखण्डस्य दितीयो भागः। ३५३ रलोव्युपधाद्धलादेः संश्च १।२।२६॥ उकारेकारोपधादलादेरलन्तात् परी क्त्वासनी सेटी वा किती। द्युतिस्वाप्योरिति संमसारणम् । दिद्युतिपते दिद्योतिपते । रुकाच- पते रुरोचिपते । लिलिखिपति लिलेखिपति । रलः किम् दिदे- विषति । व्युपधात् किम् । विवर्तिपते । हलादेः किम् । एपिपिप- ति । इह नित्यमपि द्वित्वं गुणेन वाध्यते । उपधाकाय हि दित्वा- त्मवलम् । ओणेऋदित्करणस्य सामान्यापेक्षज्ञापकत्वात् ।। तनिपतिदरिद्रातिभ्यः सनो वा इट्वाच्यः ॥ तनोतेर्विभापा६।४।१७॥ अस्योपधायाः दीर्घो वा झलादी सनि । तितांसति तिवसति तितनिपति॥ आशंकायां सन् वक्तव्यः ॥ श्वा मुमूर्षति । कूलं पिपतिपति ॥ सनिमीमाधुरभलभशकपतपदामच इस७।४।५४॥ एपामच इस सादी सनि ॥ अत्र लोपोऽभ्यासस्य ७।४।२८॥ सनिमीमेत्यारभ्य यदुक्तं तत्राभ्यासस्य लोपः । स्कोरितिस- लोपः। पित्सति । दिदरिदिपाते । दिदरिद्रासति । डुमिञ् मी आभ्यां सन् । कृतदीर्घस्य मिजोशप मीरूपत्वात् सः सीति तः मित्सति मित्सते । मा मित्सति । माङ् मेङ् मित्सते । दो दाण दित्सति । देङ् दित्सते । दाञ् दित्सति दित्सते । धेट धित्सति । धार धित्सति धित्सते । रिप्सते । लिप्सते । शक्ल शिक्षति । शिक्षेर्जिज्ञासायाम् आत्मनेपदमनुवर्तते । धनुपि शिक्षते । शक्तो भवितुमिच्छतीत्यर्थः । शकदिवादिः उभयपदी । शिक्षति शिक्षते । पित्सते ॥ राघोऽहिंसायां सनीस वाच्यः॥

३५४ सुगमकौमुद्याः रित्सति । अहिंसायां तु आरिरात्सति ॥ इट सनि वा ७।२।११॥ वृद्धवृज्ञभ्यामृदन्ताच सन इसा । तितरिपति वितरीपति । तितीति विवरिपति विवरीपति बुवूपति । वृद्ध वुवूर्पते विवरिषते । दुध्वूपति ॥ स्मिपूड्ज्वशां सनि ७।२१७४॥ स्मिङ्पू ऋ अंजू अश् एभ्यः सन इट् । सिस्मयिपते। पिप- विपते अरिरिपति । इह रिस्शब्दस्य द्वित्वम्। इस इति सनोऽवयवः कार्यभागिति कार्यिणो निमित्तत्वायोगात् द्विवचनेचीति न प्रवर्तते। अञ्जिजिपति । अशिशिपते । उभौ साभ्यासस्य । प्राणिणिपति । ओर पुयज्यपरे । पिपावयिपति । यियावयिपति । विभावयि- पति । रिरावयिपति । लिलावयिपति । जिजावयिषति । पुयणुजी- ति किम् । नुनावयिपति । अपरे किम् । बुभूपति । स्रवतीतीत्वं वा । सिनावयिपति । सुस्रावयिपतीत्यादि । अपरे इत्येव । शुश्रू- पते । पूर्ववत्सनः निविविक्षते । शदेः शितः म्रियतेलुइलिडोश्चेति सूत्रद्वये सनो न इत्यनुवर्त्य वाक्यभेदेन व्याख्येयम् । तेन शदमू- डोस्त न । शिशत्सति । मुमूर्षति ॥ ज्ञाश्रुस्मृशां सनः १।३।१७॥ सन्नन्तानामेपामात्मनेपदम्। धर्म जिज्ञासते। शुश्रूपते । सुस्मूर्पते दिदृक्षते ॥ नानोः१।३।५८॥ पुत्रमनुजिज्ञासति । पूर्वसूत्रस्यैवायं निषेधः। अनन्तरस्येति न्या यात् । तेनेह न । सर्पिपोऽनुजिज्ञासते। सर्पिपा प्रार्तितुमिच्छति इत्यर्थः । पूर्ववत्सन इति तइ । अकर्मकायेति केवलाविधानात् ॥ प्रत्याभ्यां श्रुवः १।३।५९॥ आभ्यां मन्नन्ताच्छुप उक्तं न । प्रतिशुरूपति । आशुभूपति कर्माचनीयात् स्पादेव । देवदत्त प्रतिशुभूपते । शपिकान्मतुवर्थी द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः याच्छैपिको मतुवर्थिकः । सरूपः प्रत्ययो नेष्टः सन्नन्तान्न सनि- प्यते ॥ तेन शालीये भव इति वाक्यमेव । नतु च्छान्ताच्छः । विरूपस्तु अहिच्छत्रे भव आहिच्छत्रीयः। धनवानस्यास्ति इत्येव विरूपस्तु स्यात् । दण्डिमान्।इच्छासन्नन्तान्न सन् । स्वार्थसन्नन्तातु स्यादेव । जुगुप्सिपते ॥ इति सन्नन्ताः ।। इति १२८ अंशाः। अथ यडन्ताः। धातोरेकाच इत्यादिना यइविधाने धातोरित्यु- क्तिरार्द्धधातुकरवाय । तेन ध्रुवो वचिरित्यादि । एकाचः किम् ।पुनः पुनर्जागर्ति । हलादेः किम् । भृशमीक्षते।भृशं शोभते रोचते इत्यत्र यङ् नेति भाष्यम्। पौनःपुन्ये तु स्यादेव । शोशुभ्यते । रोरुच्यते।। सूचिमूनिमूत्र्यव्यय॑शूर्णोतिभ्यो यङ् ॥ सोसूच्यते । सोसूयते । मोमूत्र्यते।एकाच्त्वाभावेन पोपदेशत्वा- भात्पत्वं नायस्य हलः। आदेः परस्य । अतो लोपः। सोसूचाञ्चके । सोसूचिता । दी? कितः । अटाट्यते ॥ यङिच ७।४।३०॥ अतः संयोगादेच ऋतो गुणो याङ । यकारपरस्य रेफस्य न द्वित्वनिषेधः । अरार्यते इति भाष्योदाहरणात् । अरार्यते । अरा- रिता । ऊर्गोनूयते । वेभिद्यते । अल्लोपस्य स्थानिवत्त्वान्नोप- धागुणः । वेभिदिता। नित्यं कौटिल्ये गतौ ३।११२३॥ गत्यर्थात्कौटिल्येऽर्थे एव यङ् नतु क्रियासमभिहारे । कुटिलं व्रजति वाव्रज्यते ॥ लुपसदचरजपजभदहदशगृभ्यो भावगर्हायाम् ३।१।२४॥ सासयते ॥ जपजभदहदशभञ्जपशां च ७।४।८६॥ एभ्यो धात्वर्थगर्हायामेव यड़ । गर्हित लुम्पति लोलुप्यते ।

सुगमकौमुद्याः। अभ्यासस्य नुक यड्लुकोः । नुकानुस्वारो लक्ष्यते स च पदान्तवाच्यः । जाप्यते । जंजप्यते इत्यादि । चरफलोश्च ७१४१८७॥ अभ्यासस्यातो नुक् यइलुकोः ।। उत्परस्यातः ७।४।८८॥ चरफलोरभ्यासात्परस्यात उत् यङ्लुकोः । हलि चेति दीर्घः ।। चञ्चूर्यते । चंचूर्यते । पम्फुल्यते पंफुल्यते ॥ यो यङि ८१२१२०॥ गिरते रेफस्य लत्वं यडि । जोगल्यते । धुमास्था इतीत्वम् । देदीयते । पेपीयते । सेपीयते । विभाषा श्वेः । शोशूयते । शे. धीयते । यडि च । सास्मयते । रीट्टतः । चक्रीयते । सुद । संचे- स्क्रीयते ॥ नुगतोऽनुनासिकान्तस्य ७।४।८५॥ अनुनासिकान्तस्यांगस्य योऽभ्यासोऽदन्तस्तस्य नुक् । नुका - स्वारो लक्ष्यत इत्युक्तम् । यययम्यते यंयम्यते । तपरत्वसामर्थ्यात् भूतपूर्वदीर्घस्यापि न । वामाम्यते । ये विगापा । जाजायते जञ्ज- न्यते । हन्तहिंसायां यडि नी । जेनीयते । अन्यत्र जंघन्यते ॥ रीगृदुपधस्य च ७।४।९०॥ ऋगुपधस्य धातोरभ्यासस्य रोक् यड्लुकोः । वरीवृत्यते । क्षु. भ्रादी, नरीनृत्यते । जरीगृह्यते । चलीक्लप्यते ॥ रीगृत्त्वत इति वक्तव्यम् ॥ वरीवृत्यते । परीपच्छचते॥ ई प्राध्मोः ७१४।३१॥ जेनीयते । देध्मीयते ।। आयडिय हिति ७।१।२२॥ नीडोयडादेशो यादी शिति परे । शाशय्यते । अभ्यासस्य विहितं तथापि यलुकि भवत्येवेति न्यासः।श्तिपा शपेति त्वनित्यं द्वितीयखण्डस्य ,द्वितीयो भागः । तस्वः। ततो गुणः। डोटीक्यते । तोत्रौक्यते । इति यङन्ताः। अथ यङ्लुगन्ताः । गर्द । जागर्दीति । जागाः । जागतः । ही जागर्दि । सिपि दश्चेति रुा ।रोरि ठूलोप इति दीर्घः। अजागाः। अजागत् । नानदीति । नानत्ति । सिपि अनानः । अनानत् लुङ् अनानादीत् अनानदीत् । चिती। नाभ्यस्तस्येति गुणनिषेधः। चेचितीति चेचेति । अचेचितीत अचेचेत् अचेचेः । अचे- चेत् । लुङि अचेचेतीत् ।। रुनिकौ च लुकि ७।४।९१॥ ऋदुपधस्य धातोरभ्यासस्य रुक् रिक् रीक् एते आगमाः यङ्लुकि ॥ ऋतश्च७।४।९२॥ ऋदन्तधातोरपि तथा ।ववृतीति परिवृतीति वरीवृतीति । वर्व- त्ति । वर्वतिता । गणनिर्दिष्टत्वान्न वृद्भय इति न। वर्वतिष्यति । अव- वृतीत् । अव । सिपि दश्चेति रुत्वपक्षे रोरि । अवर्वाः । गणनि- र्दिष्टत्वादइन । अवर्वीत् ३ । चरीति ३ । चर्कर्ति चरिकर्ति चरीकर्ति । चर्कतः ३ । चर्कति ३। चर्कराञ्चकार ३१ चर्करिता । अचरीत् ३ । अचर्कः ३ । चर्कयात् ३ । आशिपि रिङ् । च- कियात् ३ । अचर्कारीत् ३ । ऋतश्चेति तपरत्वान्नेह । कृ विक्षेपे । चाकति । तातर्ति । तातीर्चः । तातिरात । तातीहि । तातराणि । अतातरीत् । अतातः । अतातीर्त्ताम् । अतातरुः । अतातारीत् । अतातारिष्टामित्यादि । जङ्गमीति । जगन्ति । अनुदात्तोपदेशेत्य- नुनासिकलोपः । जगतः । जमति । म्वोश्च । जङ्गन्मि । जङ्गवः । एकाग्रहणान्ननिपेधः । जगमिता । अनुनासिकलोपस्यामीयत्वे- नासिद्धत्वान्न हेलृक् । जगहि। मो नः। अजगन् । अनुबन्धनिर्देशान च्लेरङ् । हयन्तेति न वृद्धिः । अजङ्गमीत् । अनङ्गमिष्टाम् । इनो यङ्लुक् । यद्यपि अभ्यासाचेति कुत्वं हन्तरिति रितवन्तमनुवर्त्य ३५८ - सुगमकौमुद्याः। गुणो यइलुकोरिति सामान्यापेक्षज्ञापकात् । जंघनीति जंघन्ति । जंघतः । जन्नति । जंघनिता । श्तिपा निर्देशाज्जादेशी न घिहि । अजंघनीत् । अजंघन् । जंघन्यात् । आशिषि तु । वध्यात् । अव- धीत । अवधिष्टमित्यादि । वधादेशस्य द्वित्वं न स्थानिवत्त्वेन अ. नभ्यासस्येति निषेधात् । तद्धि समानाधिकरणं धानोविशेपणम् । बहुव्रीहिवलात् आइपूर्वात्तु आडो यमहन इत्यात्मनेपदम् । आज- घालुकालुप्ते प्रत्ययलक्षणत्वाभावात् स्वपिस्यमीत्युत्वं न रुदादिभ्य इति गणनिर्दिष्टत्वादिण्न । सास्वपीति सास्वप्ति । सास्वप्सः । सा- स्वपति । असास्वपीत् । असास्वपू। सास्वप्यात् । आशिपि वचि- स्वपीत्युत्वम् । सासुप्यात् । असास्वपीत् । असास्वपीत् । गृह ग्रहणे । जर्ग्रहीति ३ । जर्टि । जर्मूढः ३ । जगृईति ३ । अज- धर्ट्स ३ । गृहातेस्तु जाग्रहीति । जाग्राहि । तसादी डिनिमित्त सम्प्रसारणम् । तस्य वहिरङ्गत्वेनासिद्धत्वान्न रुगादयः । जागृढः। जागृहति । जाग्रहीपि । जाघ्रक्षि । जाग्रहिता । ग्रहो लिटि इति दीर्घस्तु न तत्रैकाच इत्यनुवृत्तेः । माधवस्तु दीर्घमाह ! तदाप्य- विरुद्धम । जधीति ३ । जर्गदि ३ । जग्रुद्धः ३ । जधिति ३ । जधीपि ३ । जर्घसि ३ । अनर्गधीत् ३ । इडभावे गुणः । हलडयादिलोपः मप्मावः। जश्त्वच अजर्व ३ । अजदाम् । मिपि दीति पक्षे रुत्यम् । अजर्घाः ३ । अजर्गधीत् ३ । अजर्ग- दियाम् ३ ॥ इति यड्लुगन्ताः॥ इनि १२९ अंगाः । नः क्ये । मनिपातपरिमापया क्यचो यम्य लोपोन। गव्यां- चार । गव्यिनारानाव्यांचसार । नायिता । नलोपः । गनीय. नि । प्रत्ययोचरपदयो । त्वयनि । मद्यनि । एकार्थयोः इत्येव । युप्मपनि । अम्मद्यति । इति च। गीर्यनि पूर्वनि। धातोः इत्येव । नेह दिवामिच्छति दिव्यानि । ६ पुरमिच्छनि पुर्यनीति माधवोतं - 4 द्वितीयखंडस्य द्वितीयो मागः । 'प्रत्युदाहरणं चिन्त्यम् । पृर्गिरोः साम्यात् । दीव्यतीति दीर्घस्तु पाचः प्रामादिक एव । अदस्यति । रीकृतः॥ कीयति॥ । क्यच्च्योश्च ६।४। १५२॥ हलः परस्यापत्ययकारस्य लोपः क्ये चौ च । इति वक्ष्यमाणयनी स्य लोपः । गार्गीयति । वाच्यति । अकृत्सार्व इति दीर्घः । कवीयति । समिध्यति । क्यस्य विमापा । आदेः परस्य अतो लोपः । तस्य स्थानिवत्त्वालघूपधगुणोन । समिधिता समिध्यिता॥ मान्तप्रकृतिकसुबन्ताव्ययाच क्यच न ॥ किमिच्छति । इदमिच्छति । स्वरिच्छति ॥ अशनायोदन्यधनायाबुभुक्षापिपासागधंपुष४३४॥ क्यजन्ता निपात्यन्ते । अशनायति । उदन्यति । धनायति । बुभुक्षादी किम् । अशनीयति । उदकीयति । धनीयति ॥ अश्वशीरवृपलवणानामात्मप्रीतो क्यचि ७/१३५१॥ एपां क्यचि असुगागमः । अश्ववृपयोमैथुनेच्छायाम् । अश्व- स्थति बडवा । वृपस्यति गौः।। क्षीरलवणयोलालसायाम् ॐ॥ क्षीरस्यति बालः । लवणस्यत्युप्रः॥ सर्वप्रातिपदिकानां क्यचि लालसायां सुगसुको ॥ दधिस्यति दध्यस्यति । मधुस्यति मध्वस्यति । काम्यच । पुत्र- काम्यति । इह यस्य हलः इति लोपो न ।अनर्थकत्वात् । यस्य इति संघातग्रहणमित्युक्तम् । यशस्काम्यति । सर्पिष्काम्यति । मान्ता- व्ययेभ्योऽप्ययम् । किंकाम्यति । स्वःकाम्यति । आचारे क्यडु- क्तः । तत्र मान्तस्य लोपस्तु क्यङ्संनियोगशिष्टास च व्यवस्थितः। ओजसोऽप्सरसो नित्यमितरेषां विभापया । ओजःशब्दो वृत्तिवि- .

.. सुगमकीमुद्याः। पये तदति । ओजायते । अप्सरायते । यशायते । यशस्यते । सर्वप्रातिपदिकेभ्यः किबुक्तः । कविरिखाचरति क्लयति । आशी. लि िकवीयात् । सिचि वृद्धिः इत्यत्र धातोः इत्यनुवर्त्य धातुरेव यो धातुरिति व्याख्यानान्नामधातोर्न वृद्धिरिति कैयटादयः। अक. वयीत् । माधवस्तु नामधातोरपि वृद्धिमिच्छति । अकवायीत् । विरिव वयति । विवाय । विव्यतुः । अवयीत् अवायीत् । श्रीरिख श्रयति । शिश्राय । शिश्रियतुः। पितेव पितरति । आशिपि रिङ । पित्रियात् ॥ अनुनासिकस्य विझलोः क्लिति६।४।१५॥ अनुनासिकान्तस्योपधाया दीर्घः क्वौ झलादौ च किति । इद- मिवाचरति इदामति । राजेव राजानति । पन्या इव पथीनति । मथीनति । ऋभुक्षीणति ॥ भृशादिभ्यो भुव्यच्चेोपश्च हलः३।१।१२।। अभूततद्भावविपयेभ्यो भृशादिभ्यो भवत्यर्थे क्यङ् । हलन्ता- नामेपां लोपश्च।। अभृशो भृशो भवति भृशायते । अच्चेः इति पर्युदासबलात् अभूततद्भावे इति लब्धम् । तेनेह न । क दिवा भृशा भवन्ति । ये रात्री भृशा नक्षत्रादयस्ते दिवा क भवन्तीत्यर्थः। सुमनस् अस्य सलोपः । सुमनायते । चुरादौ संग्राम युद्ध इति प. ठ्यते । तत्र संग्राम इति प्रातिपदिकम् । तस्मात् तत्करोति इति णिच् सिद्धः । तत्संनियोगेनानुबन्ध आसज्यते । युद्धे योऽयं ग्रामशब्द इत्युक्तेपि सामर्थ्यात्संग्रामशब्दे लब्धे विशिष्टपाठो ज्ञापयति । उपसर्गसमानाकारं पूर्वपदं धातुसंज्ञाप्रयोजके प्रत्यये चिकीर्पिते पृथक क्रियते इति । तेन मनःशब्दात्प्रागट् । स्वमना- यत । उदमनायत ।। लोहितादिडाभ्यः क्यप्३।१।१३॥ लोहितादिभ्यो डाजन्ताच भवत्यर्थे क्यम् ॥ वा क्यपः१।३।९०॥

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो मागः । ३६१ क्यपन्तात्परस्मैपदं पा । लोहितायति लोहितायते । अत्र अ. च्चेः इत्यनुवृत्त्याभूततद्भावविपयत्वं लब्धं तच लोहितशब्दस्यैव विशेषणम्। नतु डाचोऽसंभवात् । नाप्यादिशब्दयाह्याणां तस्य मत्या. ख्यानात् । तथा च वार्तिकम् । लोहितडाभ्यः क्यवचनं भृशा- दिष्वितराणि इति । न चैवं काम्यच इब क्यपोऽपि ककारः श्रूयेत । उधारणसामर्थ्यादिति वाच्यम् । तस्यापि भाष्ये प्रत्याख्यानात् । पटपटायति पटपटायते । कृम्वस्तियोग विनापीह डाच । डाज- तात्क्यपो विधानसामर्थ्यात् ॥ कर्मणो रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः३।१।१५।। रोमन्थतपोभ्यां कर्मभ्यां क्रमेण वर्तनायां चरणे चाथै क्यड्। रोमन्थं वर्तयति रोमन्थायते ॥ 'हनु चलन इति वक्तव्यम् ॥ चर्वितस्याकृष्य पुनश्चर्वणमित्यर्थः । नेह । कीटो रोमन्थं वर्तयति । अपानप्रदेशानिःसृतं द्रव्यमिह रोमन्थः । तदनाती. त्यर्थः इति कयटः । चतुलं करोतीत्यर्थः इति न्यासकारहरदत्ती । तपसः परस्मैपदं च । तपश्चरति तपस्यति ।। बाप्पोप्मभ्यामुद्रमने ३।१।१६॥ आभ्यां कर्मभ्यां क्यइ । बाष्पमुद्रमति बाप्पायते । ऊष्मायते ।। फेनाचेति वाच्यम् ॥ फेनायते ॥ शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेषेभ्यः करणे ३ ॥ ३ ॥ १७ ॥ एभ्यः कर्मभ्यः करोत्यर्थे क्यङ् । शब्दं करोति शब्दायो । पक्षे तत्करोति इति णिनपीष्यत इति न्यासः । शन्दयति ।। सुदिनदुर्दिननीहारेभ्यश्च ॥ सुदिनायते ॥ इति १३० अंशाः । इति तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः। YE ३६२ सुगमकीमुद्याः। सुखादिभ्यः कर्तृवेदनायाम् ३।१।१८॥ सुखादिभ्यः कर्मभ्यो वेदनायामर्थे क्यङ् । वेदनाकर्तुरेव चेत् सु. खादीनि । सुखं वेदयते सुखायते । कर्तुग्रहणं किम् । परस्य सुखं वेदयते ॥ नमोवरिवश्चिवड: क्यच ३।१।१९॥ 'करणे इत्यनुवृत्तेः क्रियाविशेषे पूजायां परिचर्यायामाश्चर्ये च । नमस्यति' देवान् । पूजयतीत्यर्थः । वरिषस्थति गुरून् । शुश्रूपत इत्यर्थः। चित्रीयते । विस्मयत इत्यर्थः । विस्मापयत्त इत्यन्ये । पुच्छभाण्डचीवराण्णिङ्३।१।२०॥ 'पुच्छादुदसने व्यसने पर्यसने च । विविध विरुद्धं वोत्क्षेपणं व्यसनम् । उत्पुच्छयते । विपुच्छयते । परिपुच्छयते ॥ भाण्डात्समाचयने ॥ संभाण्डयते । भाण्डानि समाचिनोति । राशीकरोतीत्यर्थः । समबभाण्डत ॥ चीवरादर्जने परिधाने च * ॥ सञ्चीवरयते भिक्षुः । चीवराण्यर्जयति परिधत्ते वेत्यर्थः ।। मुण्डमिश्रलक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततस्तेभ्यो णिच् ३१११२१॥ कृनथे । मुण्डं करोति मुण्डयति । व्रतागोजनतनिवृत्त्योःपयः शुद्रान्नं वा व्रतयति । वस्त्रात्समाच्छादने संवस्त्रयति । हल्या- दिभ्यो ग्रहणे । हलिकल्योरदन्तत्वं च निपात्यते । हलि कलिं वा गृहाति हलयति । कलयति । महद्धलं इलिः । परत्वादृष्टौ सत्या. मपीष्ठपदावेऽगेच लुप्यते । अतः सन्यद्भावदी? न । अजहलत् । अचफलत् । कृतं गृहाति कृतयति । तूस्तानि विदन्ति पितृस्तयति। तूस्तं केशा इत्येके । जटीभूताः केशा इत्यन्ये । पापमित्यपरे । मुण्डादयः सत्यापपाश इत्यत्रैव पटिनुं युक्ताः । प्रातिपदिकादा द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः । ३६३ त्वर्थ इत्येव सिद्ध पाचिद्हणं सापेक्षेभ्योऽपि णिजर्थम् । मुण्ड- यति माणवकम् । मिश्रयत्यन्नम् । श्लक्ष्णयति वखम् । लवणयति व्यजनमिति । हलिकल्योरदन्तत्वार्थम् । सत्यस्यापुगर्थम् । केपाचितु प्रपञ्चार्थम् । सत्यं करोत्याचष्टे वा सत्यापयति ॥ अर्थवेदयोरप्यापुर वक्तव्यः ॥ अर्यापयति । वेदापयति । पाशं विमुश्चति विपाशयति । रूपं पश्यति रूपयति । वीणयोपगायत्युपवीणयति । ठूलेनानुकुष्णा- त्यनुतूलयति । तृणाग्रं तूलेनानुघयतीत्यर्थः । श्लोकरुपस्तौति उपश्लोकयति । सेनयाभियाति अभिपेणयति । उपसर्गात्सुनोति इति पः । अभ्यपेणयत् । प्राक्सितात् इति पः। अभिपिपेणयि- पति । स्थादिष्वभ्यासेन च इति पः। लोमान्यनुमार्टि अनुलोम- यति । त्वच सवरणे ।धः। त्वच गृह्णाति त्वचयति । वर्मणा सनद्यति संघर्मयति । वर्ण गृह्णाति वर्णयति । चूर्णैरखध्वंसते अवचूर्णयति ।। प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमिष्ठवच ॥ प्रातिपदिकाद्धात्वथे णिच् । इष्ठे यथा प्रातिपदिकस्य पुंवद्भावर- मावटिलोपविन्मतुब्लोपयणादिलोपप्रस्थस्फाचादेशमसंज्ञास्तवण्णा- वपि । पटुमाचष्टे पश्यति । परत्वादृद्धौ सत्या टिलोपः । अपीप- दत् । णो चडि इत्यत्र भाष्ये तु वृद्धोंपो बलीयान् इति स्थितम् । अपपटत् ॥ तत्करोति तदाचष्टे । पूर्वस्य प्रपञ्चः। करोत्याचष्ट इति धात्वर्थमात्रं णिजः । लबर्थ- स्त्वविवक्षित ॥ तेनातिकामति॥ अश्वेनातिकामति अश्वयति । हस्तिनातिकामति इस्तयति ॥ धातुरूपंच॥ णिप्रकृतिर्धातुरूप प्रतिपद्यते । चशब्दोऽनुक्तसमुच्चयार्यः । तथा च वातिकम् ।।

w- ३६४ सुगमकौमुद्याः। आख्यानात्कृतस्तदाचष्टे कृटुक प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवच कारकम् इति ॥ कंसवधमाचष्टे कंसं घातयति इह कंसं हन इ इति स्थिते ॥ इनस्तोऽचिण्णलोः ७।३।३२॥ हन्तस्तकारोऽन्तादेशः चिण्णल्वर्जे जित्ति णित्ति । नन्वत्राङ्गसंज्ञा धातुसंज्ञा च कसविशिष्टस्य प्राप्ता ततश्चाइद्वित्वयोपिः । किंच कुत्वतत्वेन स्याताम्। धातोः स्वरूप ग्रहणे तत्मत्यये कार्यविज्ञानात् । सत्यं प्रकृतिवञ्च इति चकारो भिन्नक्रमः । कारकं च चात्कार्यम् । हेतुमण्णिचः प्रकृतेईन्यादेहे तुमण्णी याशं कारक धातावनन्तर्भूतं द्वितीयान्तं यादृशं च कार्य कुत्वतत्वादि तदिहापीत्यर्थः। कंसमजी- घतत्॥ कर्तृकरणाद्धात्वर्थे । कर्तुव्यापारार्थ यत्करणं न तु चक्षुरादिमात्रमित्यर्थः । असिना हन्ति असयति ॥ णिङङ्गानिरसने। अङ्गवाचिनः प्रातिपदिकानिरसनेऽर्थे णिड् । हस्तौ निरस्यति इस्तयते । पादयते ॥ श्वेताश्वाश्वतरगालोडिताह्वरकाणामश्वतरेतकलोपश्च ॥ श्वेताश्वादीनां चतुर्णामश्चादयो लुप्यन्ते णि च धात्वर्थे । श्वे. ताश्रमाचष्टे तेनातिकामति वा श्वेतयते । अश्वतरमाचष्टेऽश्वयते । गालोडितं वाचां विमर्शः तत्करोति गालोडयते । आदरयते । के- .चित्तु णिचमेवानुवर्तयन्ति तन्मते परस्मैपदमपि ।। पुच्छादिपु धात्वर्थे इत्येव सिद्धम् ।। णिजन्तादेव बहुलवचनादात्मनेपदमस्तु मास्तु पुच्छमाण्ड इति गिदावधिः। शेषा नामधातोऽग्ने यक्ष्यते ॥इति नामधातुप्रक्रिया॥ इति १३१ अंशाः।

टेनीयराण्डस्य द्वितीयो मागः ।
अभिज्ञावचने लट ३।२।११२॥
स्मृतियोधिन्युपपटे मानयनने धातोटा मोगरा स्म.
रसि कृष्ण गोकुळे वत्स्यामः । एवं युध्यने चेतराम इत्यादिगोंगे.
ऽपि । तेषामपि प्राग्णादिवर्णन म्मृती पृत्तिमभवान् ।।
न यदि ३।२।११३॥
पयोगे उक्तं न । अभिमानागि कृष्ण पटने यमुमहि ॥
विभाषा साकाहे ३।२।११४॥
उक्तविपये लड़ा । सभ्यलक्षणमावेन सापहवेटाः। म्म.
रसि कृष्ण पने वत्स्यामस्तम गाशाररिष्यामः । वामो रभणं या.
रणं लक्ष्यम् । पक्षेला । पन्छन्दयोगेऽपि न यदि इति याधिया
परत्वाद्विकल्पः। परोसे लिट् । चरार। उत्तमपुरुषे विचत्रिसपादिना
पारोक्ष्यम् । मुप्तो फिल पिटलाप । यह जगद पुरस्तात्तम्य मत्ता
क्लिाइम् ।।
अत्यन्तापहवे लिइक्तव्यः ॥
फलिप्ववारसी। नाई यरिदाअगाम ।।
दशश्वतोर्टड च ३।२।११६॥
मनयोरुपपदयोर्लिंडविपये तर चालिट् । इनि हाकगेगा
पा। शवदकोशकार वा।।
प्रश्ने चासनकाले ३।२।११७॥
प्रष्टव्यः प्रश्नः । आसन्नाले पृन्छयमानेय लिपि रर.
लिटी। अगच्छत्किम् । जगाम किम् । अनामने तु कम जगत रिमा
लट्र स्मे ३।२।११८॥
सियोपरादः । यजति स्म युधिष्ठिरः॥
अपरोक्षे च ३।२।११९॥
भूतानपतने लद स्मयोगे। पवं स्म पिता नीति

सुगमकीमुद्याः ।। ननौ पृष्टप्रतिवचने ३।२।१२०॥ अनद्यतने परोक्ष इति निवृत्तम् । भृते लट् । अकापीः किम् । ननु करोमि भोः॥ नवोविभापा ३।२।१२१ ॥ अकार्षीः किम् । न करोमि । नाकार्षम् । अहं नु करोमि । अहं न्च कार्पम् ॥ पुरि लुङ्चास्मे ३।२।१२२ ॥ अनद्यतनग्रहणं मण्ड्कप्लुत्यानुवर्तते । पुराशब्दयोगे भृतानद्य-। तने विभाषा लुइ चालट् न तु स्मयोगे । पक्षे यथाप्राप्तम् । वस- न्तीह पुरा छात्राः । अवात्मुः । असन् । ऊपुर्वा । अस्मे किम् । यजति स्म पुरा । भविष्यतीत्यनुवर्तमाने ।। यावत्पुरानिपातयोलट्३।३।४॥ यावहड्ने। पुगभुते। निपातावती निश्चयं द्योतयतः। निपातयोः फिम् । यावदास्यते तावदोक्ष्यते । करणभृतया पुरा यास्यति । विभापा कदाकोः ३।३।५॥ भविष्यति लट् वा । क्टा कादि वा मुत्ते मोक्ष्यते भोक्ता वा ।। किंवृत्ते लिप्सायाम् ३।३।६॥ भविष्यति लड़ा। क्रं तमं या मोजयगि भोजयिष्यसि मोजयिनामि वा । लिप्मायां पिम् । कः पाटलिपुत्रं गमिष्यति । टिप्स्यमानसिद्धो च३।३।७॥ नियमानेनानादिना भांदेः मिटी गम्यमानाया भविष्यनि गोनं ददानि दास्यनि दाता शाम सग याति गारति गाना या ॥ लोडयलक्षणे च ३१३॥ ८॥ मोरयःपादिलगी गेन तस्मिनये वनमानाटानामविपति मागमे गाधारण गरी ॥

डेतीयखण्डस्य द्वितीया लिङ् चोर्ध्वमोहर्तिके ३।३।९॥ ऊर्भ मुहूर्ताव उर्ध्वमार्तिकः । निपातनात्समास उत्तरपदय- टिश्च। ऊर्ध्व मीहर्तिके भविष्यति । लोडर्थलक्षणे वर्तमानाटातोलि- इलटी वा । मुहूर्तादुपरि उपाध्यायथेदागच्छेत् मागच्छनि आग- मिष्यति आगन्ता वा । अथ त्वं छन्दोधीप्य ॥ वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवदा ३।३ । १३१॥ समीपमेव सामीप्यम् । स्वार्थ प्यय । वर्तमाने लट् इत्सारभ्य उणादयो बहुलम इति यावयेनोपाधिना प्रत्यया उक्तास्ते तथा वर्तमानसमीपे भृते मरिष्यति च वा स्युः । क्दा आगतोऽसि । अयमागच्छामि। अयमागमम् । कदा गमिप्यासि । एप गच्छामि । गमिष्यामि वा॥ आशंसायां भूतवच३।३।१३२॥ वर्तमानसामीप्य इति नानुवर्तते । मविप्पति काले भूतपहर्तमान. वच प्रत्यया वा आशंसायाम । देवशेदवपीटपति पाप्यति या धान्यमवाप्स्म वपामः वश्यामो वा। सामान्पातिदेशे विशेपाननि. देशः तेन ललिटी न॥ क्षिप्रवचने लट् ३।३। १३३ ॥ क्षिपर्याय उपपदे पूर्व विषये लट् । दृष्टिकोन क्षिप्रमाशु त्वरिनं वा यास्यति शीघ्रं वस्यामः । नेति वक्तव्ये लड़ग्रहणं लुटोपि विषये यथा स्यात् । श्वः शीघ्रं वास्यामः ॥ आशंसावचने लिइ३।३। १३४॥ आशंसायाचिन्युपपदे भविष्यति लिड स्पान् ननु भृनन् । . गुरुश्चेदुपेयादाशंसे धीयीय । आशंसे शिममधीगर। नानद्यतनवत्वियाप्रवन्धसामीप्ययोः३।३।१३८॥ त्रियायाः सातत्ये सामीप्ये च लालुटी न । यावजीवमन्नमदा. हास्यति वा । सामीप्यं तुल्यजातीपेनाव्यवधानम् । ये पर्णिमाम्य- ३६८ सुगमकीमुद्याः। तिक्रान्ता तस्यामग्नीनाधीत । सोमेनायष्ट । येयममावास्यागामिनी तस्यामग्रीनाधास्यते । सोमेन, यक्ष्यते ॥ भविष्यति मर्यादावचनेऽवरस्मिन् ३।३। १३६॥ भविष्यति काले मर्यादोक्ताववरस्मिन् प्रविभागेऽनद्यतनवन्न । योऽयमध्वा गन्तव्य आ पाटलिपुत्रात्सम्य यदवरं कौशाम्ब्यास्तत्र रुतून पास्यामः॥ कालविभांगे चानहोरात्राणाम् ३।३ । १३७ ॥ पूर्वसत्र सर्वमनुवर्तते । अहोरात्रसम्बन्धिान विभागे प्रतिपेवार्थ- मिदम् । योगविभाग उत्तरार्थः । योऽयं वत्सर आगामी तस्य यदवरमाग्रहायण्यास्तत्र युक्ता अध्येष्यामहे । अनहोरात्राणां किम् । योऽयं मास आगामी तस्य योऽवरः पञ्चदशरात्रस्तत्राध्ये- तास्महे ।। परस्मिन्विभापा ३।३।१३८॥ अवरस्मिन् वयं पूर्वसूत्रद्वयमनुवर्तते। अप्राप्तविभाषेयम् । योऽयं संवत्सर आगामी तस्य यत्परमाग्रहायण्यास्तत्राध्येष्यामहे । अध्येतास्महे ॥ इति १३२ अंशाः। लिनिमित्ते लङ् क्रियातिपत्तौ ॥ भविष्यतीत्येव । सुवृष्टिश्चेदभविष्यत्तदा सुभिक्षमभविष्यत् ॥ भूते च ३।३।१४०॥ पूर्वसू संपूर्णमनुवर्तते ॥ वोताप्योः३।३।१११॥ वा आ उताप्योः रताप्योः इत्यतः प्राग्भूते लिइनिमित्ते टूड् चेत्यधिक्रियते । पूर्वमनं तु उताप्योः इत्यादी प्रवर्तत इति विवेकः॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । गहोंयां लडपिजात्वोः३।३ । १४२।। आभ्यां योगे लट् कालत्रये गर्दायाम् । लुडादीपरत्वादयं वाधते । अपि जायां त्यजसि जातु गणिकामादत्से गर्हितमेतत् ।। विभाषा कथमि लिङ्च३।३।१४३॥ गर्हायामित्येव कालत्रये लिड चालट् । कथं धर्म त्यजेस्त्य. जति वा । पक्षे कालत्रये लकाराः । अत्र भविष्यति नित्यं लुइ भूते वा । कथं नाम तत्र भवान्धर्ममत्यक्ष्यत् ॥ किंवृत्ते लिङ्लटौ ३।३ । १४४ ।। गर्हायामित्येव । विभाषा तु नानुवर्तते । कः कतरः कतमो वा हरि निन्देत् निन्दिष्यति वा। लड् प्राग्वत् ॥ अनवकृत्यमर्पयोरकिंवृत्तेऽपि ३।३ । १४५ ॥ गर्हायामिति निवृत्तम् । अनवकृप्तिरसंभावना । अमोऽक्षमा । न संभावयामि न मर्पये वा । मवान्हरि निन्देत् निन्दिष्यति वा । कः कतरः कतमो वा हरि निन्देत् निन्दिष्यति वा । लड् भाग्वत् ।। किंकिलास्त्यर्थेषु लट् ३।३।१४६॥ अनवकृत्यमर्पयोरित्येतत् गर्हाया च इति यावदनुवर्तते । किंकिलेति समुदायः क्रोधद्योतक उपपदम् । अस्त्यर्थाः अस्ति- भवतिविद्यतयः । लिडोपवादः। न श्रद्दधे न मर्पये वा किंकिल त्वं शूद्रान्नं भोक्ष्यसे । भवति विद्यते वा । शूद्री गमिष्यसि । अत्र जातुयदोलिड् ३।३।१४७॥ यदायद्योरुपसंख्यानम् ॐ ॥ . लटोऽपवादः । जातु यद्यदा यदि वा त्वाशी हरि निन्देन्नाव- कल्पयामि न मर्पयामि । लड् प्राग्वत् ॥ । यच्चयत्रयोः३।३।१४८॥ यच्च यत्र वा त्वमेवं कुर्याः न श्रद्दधे न मर्पयामि ॥ - लड्न ॥

३७०-
सुगमकीमुद्याः।
गहायां च ३।३।१४९॥
अनवकृत्यमर्पयोरिति निवृत्तम् । यचयत्रयोयोंगे गर्दायां
लिडेच । यच यत्र वा त्वं शुद्धं याजयः । अन्याय्यं तत् ॥
चित्रीकरणे च ३।३। १५०॥
यच यत्र वा त्वं शूद्रं याजयेः । आश्चर्यमेतत् ॥
शेपे लदयदौ ३।३। १५१ ॥
यच्चयत्राभ्यामन्यास्मिन्नुपपदे चित्रीकरणे गम्ये धातोर्लट् ।
आश्चर्यमन्धो नाम कृष्णं द्रक्ष्यति । अयदौ किम् । आश्चर्य यदि
सोऽधीयीत ॥
उताप्योः समर्थयोलिङ्३।३।१५२॥
वाढमित्यर्थेऽनयोस्तुल्यार्थता । उत अपि वा हन्याद, हरिः।
समर्थयोः किम् । उत दण्डः पतिष्यति । अपिधास्यति द्वारम् ।
प्रश्नः प्रच्छादनं च गम्यते । इतः प्रभृति लिनमित्ते क्रियातिपत्ती
भूतेऽपि नित्यो लिङ्॥
कामप्रवेदनेऽकञ्चिति ३।३। १५३ ॥
स्वाभिप्रायाविष्करणे गम्यमाने लिड् नतु कञ्चिति । कामो मे
भुञ्जीत मवान् । अकचिति इति किम् । कचिज्जीवति ॥
संभावनेऽलमिति चेत् सिद्धाप्रयोगे ३।३।१५४॥
अलमज्नि मौदिः संभावनमित्यलमिति च प्रथमया सप्तम्या
च विपरिणम्यते । संभावने लिड् । तचेत्संभावनमलमिति सिद्धा-
प्रयोगे सति । अपि गिरि शिरसा भिन्द्यात् । सिद्धाप्रयोगे किम् ।
अलं कृष्णो हस्तिनं हनिष्यति ॥
विभापा धातो संभावनवचनेऽयदि३।३। १५५॥
पूर्वसूत्रमनुवर्तते । संभावनेऽर्थे धातावुपपदे उक्तेऽर्थे लिड् वा नतु
यच्छन्दे । पूर्वेण नित्ये प्राप्ते वचनम् । संभावयामि भुञ्जीत भो-
क्ष्यते वा भवान् । अयदि किम् । संभावयामि यद्भुञ्जीथास्वम् ॥
-

दितायखडस्य द्वितीया भागः
हेतुहेतुमतोलिङ्३।३।१५६॥
या कृष्णं नमश्चेत्सुखं यायात् । कृष्णं नस्यति चेत्सुखं यास्यति ।
भविष्यत्येवेष्यते नेह । हन्तीति पलायते ॥
इच्छार्थेषु लिङ्लोटौ ३ । ३ । १५७ ॥
इच्छामि भुञ्जीत भुङ्गां वा भवान् । एवं कामये प्रार्थय इत्या-
दियोगे बोध्यम् ।।
कामप्रवेदन इति वक्तव्यम् * ॥
नेह । इच्छन्करोति ॥
लिङ् च ३।३ । १५९॥
समानकर्तुकेषु इच्छार्थपु लिड् । भुञ्जीयेतीच्छति ॥
इच्छाथै यो विभाया वर्तमाने ३।३ । १६० ॥
लिड् पक्षे लट् । इच्छेत् इच्छति । कामयेत् कामयते । विधि-
निमंत्रणे इति लिड् । विधौ-यजेत! निमन्त्रणे-इह मुञ्जीत मवान् ।
आमन्त्रणे-इहासीत । अधीष्टे-पुत्रमध्यापयेद्भवान् । संमश्ने-कि
भो वेदमधीयीय उत तर्कम् । प्रार्थने-भो भोजनं लभेय । एवं लोट् ॥
इति १३३ अंशाः
#पातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च ३।३ । १६३ ॥
अपो विधिः । अतिसर्गः कामचारानुज्ञा । भवता यष्टव्यम् ।
भवान्यजताम् । चकारेण लोटोऽनुकर्षण प्राप्तकालार्थम् ॥
लिङ् चोर्ध्वमौहूतिके ३।३।१६४ ॥
संपादयोऽनुवर्तन्ते । मुहूर्तादूर्ध्व यजेत यजताम यष्टव्यम् ।।
स्मे लोट् ३1३।१६५ ॥
पूर्वसूत्रस्य विषये । लिडः कृत्यानां चापवादः । उर्ध्व मुहूर्ता-
।
यजता स्म ॥
अधीऐच ३।३।१६६॥

----- - . ३७२ मुगमका मुद्याः। स्म उपपदेधी लोट् । त्वं स्माध्यापय ॥ लिङयदि ३।३ । १६८॥ यच्छन्द उपपदे कालसमयवेलासु च लिड । काल: समयो वेला वा यद्भुञ्जीत मवान् ॥ अहे कृत्यतृचश्च॥ चालिइ । त्वं कन्यां वहः॥ शकि लिङ् च ३।३। १७२॥ शक्ती लिड् चात्कृत्याः । भारं त्वं वहेः। माडि लुड् । मा कापीः। कथं मा भवतु मा भविष्यतीति । नायं माड् । किंतु माशब्दः ॥ धातुसंबन्धे प्रत्ययाः३।४।१॥ धात्वर्थाना संवन्धे यत्र काले प्रत्यया उक्तास्ततोऽन्यत्रापि स्युः। तिड्वाच्यक्रियायाः प्राधान्यात्तदनुरोधेन गुणभूतक्रिया- बाचिभ्यः प्रत्ययाः । वसन्ददर्श । भूते लट् । अतीतवासकर्तृक दर्शनमर्थः । सोमयाज्यस्य पुत्रो भविता । सोमेन यक्ष्यमाणो यः पुत्रस्तत्कर्टकै भवनम् ॥ क्रियासमभिहारे लोलोटो हिस्वी वाचतध्वमोः३४॥२॥ पौनःपुन्ये भृशार्थे च द्योत्ये धातोर्लोट् तस्य च हिस्वी । तिडामपवादः । तौ च हिस्वौ क्रमेण परस्मैपदात्मनेपदसंज्ञौ च । तध्वमोपिये तु हिस्वौ वा । पुरुपैकवचनसंज्ञे तु नानयोरति- दिश्यते । हिस्वविधानसामर्थ्यात् । तेन सकलपुरुषचनविषये परस्मैपदिभ्यो हिः कर्तरि आत्मनेपदिभ्यः स्वो भावकर्मकर्तृपु ॥ समुच्चयेऽन्यतरस्याम् ३।४।३॥ अनेकक्रियासमुच्चये द्योत्ये मागुक्तं वा ।। यथाविध्यनुप्रयोगः पूस्मिन् ३1४1॥ आये लोइविधाने लोप्रकृतिभूत एव धातुरनुप्रयोज्यः ॥

द्वितीयखंडस्य द्वितीय मागः । ३७३ समुच्चये सामान्यवचनस्य ३।४।५॥ समुच्चये लोडिधी सामान्यार्यस्य धातोरनुप्रयोगः । अनुमयो- गायथायथं लडादयस्तिवादयश्च । ततः संख्याकालयोः पुरुष- विशेषार्थस्य चाभिव्यक्तिः ॥ क्रियासमभिहारे द्वे वाच्ये ॥ याहि याहीति याति। पुनः पुनरतिशयेन वायानं ह्यन्तस्यार्थः । एककर्तृकं वर्तमानं यानं यातीत्यस्य इतिशब्दस्त्वमेदान्वये तात्पर्य ग्राहयति । एवं यातः । यान्ति । यासि । याथः । याथ । गात- यातेति । यूयं याय याहि याहीत्ययासीत् यास्यति वा । अधी. प्वाधीवेत्यधीते । ध्वंविपये पक्षेऽधीवमधीधमिति । यूयमधीधे । समुच्चये तु सक्तून् पिव । धानाः खादेत्यभ्यवहरति । असं मुं। दाधिकमास्वादयस्वेत्यभ्यवहरते । तध्वमोस्तु पियत खादोत्या. वहरथ । भुंग्ध्वमास्वदध्वमित्यभ्यवहरध्वम् । पक्षे हिस्सी । आप समुच्चीयमानविशेषाणामनुप्रयोगार्थन सामान्यनाभेदान्ययः । पो सक्तून् पिवति धानाः खादति । अन्न भुत्ते दाधियामार। यते । एतेन पुरीमवस्कन्द लुनीहि नन्दनं मुपाण रत्नानि राग- राङ्गनाः । विगृह्य चक्रे नमुचिद्विपा वली य इत्यमस्वास्थ्यमा दिवः ॥ इति व्याख्यातम् । अवस्व न्दनलवनादिरूपा भूताना तनपरोक्षा एककर्तृका अस्वास्थ्यक्रियेत्यर्थात् । इह पुनःपुन न्देत्यादिरर्थ इति व्याख्यानं भ्रममूलकमेव । द्वितीय नियम मभिहार इत्यस्याननुवृत्तेः लोडन्तस्य द्विधापचेश्च । पुरीमा त्यादि मध्यमपुरुषैकवचनमित्यपि केपाच भ्रम छ । संज्ञे इह नेत्युक्तत्वात् ॥

३७० सुगमकौमुद्याः। दन भोक्ष्येथे । भोक्ष्यध्धे । भोक्ष्ये । भोक्ष्यावहे । भोक्ष्यामहे । मन्यसे । मन्येये।मन्यध्वे । इत्यादिरर्थः ॥ इति लकारार्थप्रकरणम्।। इति १३४ अंशाः। तद्धिताः४।१।७६॥ वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तद्धितसंज्ञाः ॥ समर्थानां प्रथमारा ४।११८२॥ इदं पदत्रयमधिक्रियते प्राग्दिशः इति यावत् । सामर्थ्य परि- निष्ठितत्वम् । कृतसंधिकार्यत्वमिति यावत् ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ४।१।८३॥ तेन दीव्यति इत्यतः मागणधिक्रियते ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च ४ ।।८४॥ एभ्योऽण् स्यात्माग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु । वक्ष्यमाणस्य ण्यस्याप- । रे वादः॥ दित्यदित्यांदित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः ४।१।८५॥ दित्यादिभ्यः पत्युत्तरपदाच प्राग्दीव्यतीयेष्वर्थेषु ण्यः स्याद- णोऽपवादः । दैत्यः । अदितेरादित्यस्य वादित्यः प्राजापत्यः । यमाच इति काशिकायाम् । याम्यः । पृथिव्या बाजी । पार्थिवा पार्थिवी । देवाद्यौ । देव्यं दैवम् । वहिपष्टिलोपो यञ्च । बाह्यः। ईकक्च । वाहीकः । स्थानोऽकारः। अश्वत्थामः । पृपोदरादि- त्वात्सस्य तः॥ भवार्थे तु लुग्वाच्यः ॥ अश्वत्थामा । लोनोऽपत्येपु वहुष्वकारः । वाहादीयोऽपवादः । उडुलोमाः उडुलोमान् । बहुपु किम् । औडुलोमिः । गोरजादि- प्रसङ्गे यत् । गव्यम् । अजादि सङ्गे किम् । गोभ्यो हेतुभ्य आ- गतं गोलप्यम् । गोमयम् ॥ उत्सादिभ्योऽम् ४ । १॥८६॥ 5 द्वितायखण्डस्य द्वितीया मागः । औत्सः ।। अग्निकलिभ्यां ढग्वक्तव्यः ॥ अग्नेरपत्याद्याग्नेयम् । कालेयम् ॥ इत्यपत्यादिविकारान्तार्थसा- धारणाः प्रत्ययाः॥ स्त्रीपुंसाभ्यां न स्वभौ भवनात् ।।१।८७॥ धान्यानां भवने इत्यतः प्रागर्थेपु स्त्रीपुंसाभ्या क्रमान्ननजी । स्त्रैणः । पोनः । वत्यर्थे न । स्त्रीपुंवच्च इति ज्ञापकात् । स्त्रीवत् । पुंवत् ।। तस्यापत्यम् ॥ उपगोरपत्यमीपगवः। तस्येदमित्यपत्येऽपि वाधनार्थ कृतं भ- वेत्। उत्सर्गः शेप एवासी वृद्धान्यस्य प्रयोजनम् ।। योगविभागस्तु, मानोरपत्यं भानवः । कृतसन्धेः किम् । सौस्थितिः । अकृतव्यूह- परिमापयासात्थितिर्माभूत् । समर्थपरिभाषया नेह । वस्त्रमुपगो- रपत्यं चैत्रस्य । प्रथमात् किम् । अपत्यवाचकात्पष्ठ्यर्थे मा भृत् । वाग्रहणादाक्यमपि । देवयज्ञि इति सूत्रादन्यतरस्या ग्रहणानुवृत्तेः। समासोऽपि उपग्वपत्यम् । जातित्वान्डीप् । औपगवी। आश्व- पतः । दैत्यः । औत्सः। खैणः । पोसः। अत इञ् । दाक्षिः। बा- हादिभ्यश्च । बाहविः । औदुलोमिः । आकृतिगणोऽयम् ॥ सुधातुरकद च ४।११९७॥ चादिन् । सुधातुरपत्यं सौधातकिः ॥ व्यासवरुडनिपादचाण्डालबिम्बानां चेति वक्तव्यम् ॥ वैयासकिः । वारुडकिरित्यादि । शिवादिभ्योऽण् ४।१।११२ ॥ गोत्रे इति निवृत्तम् । शिवस्यापत्यं शैवः । गाङ्गः । पक्षे ति- कादित्वाल्फिन् । गागायनिः । शुभ्रादित्वाड्ढक् । गाङ्गेयः ।। अवृद्धाभ्यो नदीमानुपीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ४।१।११३॥

३७६
सुगमकामुधाः।
अवृद्धाभ्यो नदीमानुपीनामभ्योऽण् । ढकोऽपवादः । यामुनः ।
नार्मदः । चिन्तिताया अपत्यं चैन्तितः । अवृद्धाभ्यः किम् ।
वासवदत्तेयः । नदी इत्यादि किम् । वैनतेयःतन्नामिकाभ्यः किम्।
शोमनाया अपत्यं शोभनेयः॥
ऋप्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च १1१1११४॥
ऋपयो मन्त्रद्रष्टारः । वासिष्ठः । वैश्वामित्रः । अन्धकम्यः-श्वा-
फल्कः । वृष्णिभ्यः-वासुदेवः आनिरुद्धः शौरिः । इति वाहादि-
स्वादि । कुरुभ्यः-नाकुलः । साहदेवः । इत्र एवाय मपवादो
मध्येऽपवादन्यायात् । अत्रिशब्दात्तु परत्वाड् ढक् । आत्रेयः॥
मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः ४।१।११५॥
संख्यादिपूर्वस्य मातृशब्दस्यौदादेशः अशप्रत्ययश्च । रपरत्वम् ।
दैमातुरः। पाण्मातुरः । सांमातुरः । भाद्रमातुरः । ‘आदेशाथै
वचनम् । प्रत्ययस्तूत्सर्गेण सिद्धः स्त्रीलिङ्गनिर्देशोऽर्थापेक्षः । तेन
धान्यमातुर्न । संख्या इति किम् । सौमात्रः। शुभ्रादित्वाद्वैमात्रेयः॥
कन्यायाः कनीन च ४।१।११६॥
ढकोऽपवादोऽण । तत्संनियोगेन कनीनादेशश्च । कानीनो
व्यासः । कर्णश्च अनूढाया एवापत्यमित्यर्थः॥
स्त्रीभ्यो ठक् ४।१।१२०॥
स्त्रीप्रत्ययान्तेभ्यो ढक् । वैनतेयः । वाहादित्वात्सौमित्रिः ।
शिवादित्वात् सापनः॥
ब्यचः४।१।१२१॥
बचः स्त्रीप्रत्ययान्तादपत्ये ढक् । तन्नामिकाणोऽपवादः । दा-
तेयः । पार्थ इत्यत्र तु तस्येदम् इत्यण । शिवादित्वादिति तु
तत्त्वम् ॥
इतश्चानिभः४।१।१२२॥
इकारान्तायचोऽपत्ये ढक न विनन्तात् । दोलेयः । नैधेयः।
-
आत्रेयः॥

द्वितीयसंडस्य द्वितीयो भागः। कल्याण्यादीनामिनङ्४।१।१२६॥ एपामिनडादेशः ढक्च । काल्याणिनेयः । पान्धफिनेयः॥ कुलटाया वा४।१।१२७॥ इनकमात्र विकल्प्यते । ढक् तु नित्यः । पूर्वणैव कौलदिनेयः । कोलटेयः । सती मिथुक्यन कुलटा या तु व्यभिचारार्थ कुलान्य- टति तस्याः क्षुद्राभ्यो वा इति पक्षे इन् । कालटेरः ।। हृद्भगसिन्ध्यन्ते पूर्वपदस्य च ७१३ । १९ ॥ हृदाद्यन्ते पूर्वोत्तरपदयोग्चामादरचो वृदिनिति णिति किति च । मुहदोऽपत्यं सौहार्दः । सुभगाया अपत्यं सौभागिनेयः । सक्तुप्रधानाः सिन्धयः सक्लुसिन्धवः तेषु भवः साक्तुसन्धयः ।। चटकाया ऐरकू ४।१ । १२८॥ चटकस्येति वाच्यम् ॥ लिङ्गविशिष्टपरिभापया खिया अपि । चटकस्य चटकाया वा- पत्यं चाटकरः॥ स्त्रियामपत्ये लुग्वक्तव्यः ॥ तयोरेव स्यपत्यं चटका । अजादित्वासाप । गोधाया दक्४।१।१२९॥ गौधेरः । शुभ्रादित्वात्पक्षे दक् । गौधेयः ।। आरगुदीचाम् ।। 31 १३०॥ गोधारः । रका सिद्ध आकारोशारणमन्यतो विधानार्थम् । ज. डस्यापत्यं जाडारः। पण्डस्यापत्यं पाण्डारः ।। इति १३५ अंशाः। क्षुद्राभ्यो वा ४ । । १३१॥ अङ्गहीनाः शीलहीनाश्च क्षुद्रास्ताम्यो वा दृक् । पसे देर । काणेर: काणेयः । दार दासेयः॥

३७८ सुगमकौमुद्याः। पितृष्वसुश्छण् ४।१।१३२॥ अणोऽपवादः । पैतृष्वसीयः॥ दकि लोपः४।१।१३३॥ पितृष्वसुरन्तलोपो दकि। अत एव ज्ञापकाइटक । पैतृष्वसेयः॥ मातृप्वसुश्च४।१।१३४॥ पितृष्वसुर्यदुक्तं तदस्यापि । मातृष्वतीयः । मातृप्यसेयः॥ गृष्टयादिभ्यश्च ४।११ १३६॥ ढञ् । अण्डकोरपवादः । गायः । मित्रयोरपत्यम् ऋष्यणि प्राप्ते दञ्॥ केकयमित्रयुप्रलयानां यादेरियः ७॥३॥२॥ एपां यकारादेरियादेशः अिति णिति किति च तद्धिते परे । इति इयादेशे प्राप्ते ॥ दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिकलाशिनेयवाशि- नायनिधौणहत्यधैवत्यसारपेक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि ६। ४।१७४॥ एतानि निपात्यन्ते इति युलोपः। मैत्रेयः । मैत्रेयौ ।। यस्कादिभ्यो गोत्रे २।४।६३ ॥ पभ्योऽपत्यप्रत्ययस्य लुक् तत्कृते वहुत्वे न तु स्त्रियाम् । मित्रयवः।। अत्रिभृगुकुत्सवसिष्टगोतमाङ्गिरोभ्यश्च २।४।६।। एभ्यो गोत्रमत्ययस्य लुक् तत्कृते बहुत्वे न तु स्त्रियाम् । अ- त्रयः । भृगवः । कुत्साः । वसिष्ठाः । गोतमाः । अङ्गिरसः॥ राजश्वशुरायत् ।।१।१३७॥ राज्ञो जातादेवेति वाच्यम् ॥ ये चाभावकर्मणोः६।४।१६८॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ३७९ यादी तद्धिते परेऽप्रकृत्या नतु भावकर्मणोः । राजन्यः । श्व- शुर्यः । जातिग्रहणाच्छूद्रादावुत्पन्नो राजनः ॥ अन्६।४।१६७।। अणि अन्प्रकृत्या इति टिलोपो न । अभावकर्मणोः किम् । राज्ञः कर्म भावो वा राज्यम् ।। ब्राह्मोऽजातौ ६।४।१७१॥ योगविभागोव कर्तव्यः । ब्रामः इति निपात्यतेऽनपत्येणि बाझं हविः । ततो जातो अपत्ये जातावणि ब्रह्मणटिलोपो न । ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः । अपत्ये किम् । ब्राह्मी ओपधिः ॥ क्षवादः४।१।१३८॥ क्षत्रियः । जाती इत्येव । क्षात्रिरन्यः॥ कुलात्खः४।१।१३९॥ कुलीनः । तदन्तादपि उत्तरसूत्रे अपूर्वपदात् इति लिङ्गात् । आढयकुलीनः ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यकी ४।१।१४० ॥ कुलात् इत्येव पक्षे खः । कुल्या कौलेयकः कुलीनः । पदग्रहणं किम् । बहुकुल्यः बाहुकुलेयकः वहुकुलीनः ॥ महाकुलादञ्खौ ४।१।१४१॥ अन्यतरस्याम् इत्यनुवर्तते पक्षे खः । माहाकुलः माहाकुलीनः महाकुलीनः ॥ दुष्कुलाडक्४।१।१४२॥ पूर्ववत्पक्षे खः । दोकुलेयः दुष्कुलीनः ।। स्वसुश्छः ।।१।१४३॥ स्वतीयः॥ भ्रातुर्व्यच १।१।१४१॥ . - ३८० सुगमकीमुद्याः। चाच्छः । अणोऽपवादः । भ्राध्या भ्रात्रीयः॥ व्यन्सपत्ने ४।१।१४५॥ भ्रातुय॑न् अपत्ये प्रकृतिप्रत्ययसमुदायेन शत्री वाच्ये।भ्रातृव्यः शत्रुः । पाप्मना भ्रातृव्येणेति तूपचारात् ।। मनोजीतावभ्यतौ षुक्च ।। १ । १६१॥ समुदायार्थी जातिः । मानुपः मनुष्यः ॥ अपत्यं पौत्रप्रभृत्तिगोत्रम् ।।१।१६२॥ अपत्यत्वेन विवक्षितं पौत्रादिगोत्रसंज्ञम् ॥ जीवति तु वंश्ये युवा ४।१।१६३॥ वश्ये पित्रादौ जीवति पौत्रादेर्यदपत्यं चतुर्थादि तावसंज्ञमेव नतु गोत्रसंज्ञम् ॥ भ्रातरि च ज्यायसि ४।१।१६४॥ ज्येष्ठे भ्रातरि जीवति कनीयांश्चतुर्थादियुवसंज्ञो वा ।। वान्यस्मिन्सपिण्डे स्थविरतरे जीवति ।११६५॥ भ्रातुरन्यस्मिन्सपिण्डे स्थविरतरे जीवति पौत्रप्रभृतेरपत्यं जीव- देव युवसंज्ञं वा । एकं जीवतिग्रहणमपत्यस्य विशेषणम् । द्वितीयं सपिण्डस्य तरनिर्देश उभयोरुत्कार्थः । स्थानेन वयसा चोत्कृष्ट पितृव्ये मातामहभ्रातरि वा जीवति । गार्यस्यापत्यं गाायणः गाग्र्यों वा । स्थविर इति किम् । स्थानवयोन्यूने गार्ग्य एव । जीवति इति किम् । मृते मृतो वा गार्य एव ॥ वृद्धस्य च पूजायामिति वाच्यम् ॥ गोनस्यैव वृद्धसंज्ञा प्राचाम् । गोत्रस्य युवसंज्ञा पूजायांगम्यमा. नायाम् । तनमवान् गाायणः। पूजायाम् इति किम् । गार्यः।। यूनश्च कुत्सायां गोत्रसंज्ञेति वाच्यम् की। गायों जाल्मः । कुत्सायामिति किम् । गाायणः ॥ एको गोत्रे ४।१।९३॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः। ३८१ गोत्र एक एवापत्यप्रत्ययः । उपगोर्गोत्रापत्यमीपगवः । गार्ग्यः । नाडायनः ॥ गोत्राबून्यस्त्रियाम् ४।१।९॥ यून्यपत्ये गोत्रमत्ययान्तादेवापत्यप्रत्ययः । स्त्रियां तु न युव- संज्ञा । गर्गस्य युवापत्यं गाायणः । स्त्रियां गोत्रत्वादेक एव । प्रत्ययः॥ नडादिभ्यः फक्४।१।९९ ॥ गोत्रे इत्येव । नाडायनः । चारायणः । अनन्तरो नाडिः ।। अनृण्यानन्तये विदादिभ्योऽञ् ४।१।१०४॥ एभ्योऽगोत्रे । ये त्वत्रानृपयः पुत्रादयस्तेभ्य आनन्तर्य सूत्रे स्वार्थे ष्यञ् । विदस्य गोत्रापत्यं वैदः । अनन्तरो वैदिः । वा. हादेराकृतिगणत्वादिञ् । पुत्रस्यापत्यं पौत्रः । दौहित्रः॥ गर्गादिभ्यो यन् ।।१।१०५॥ गोत्रे इत्येव । गार्यः । वात्स्यः॥ यभिभोश्च ४।१।१०१॥ गोत्रे यो यनिजी तदन्तात्रुक् । अनाति इत्युक्तेः । आपत्यस्य इति यलोपो न । गाायणः । दाक्षायणः ।। इति १३६ अंशाः। याभोश्च २।४।६४॥ गोत्रे यद्यअन्तमअन्तं च तदवयवयोरेतयो क तत्कृते वहुत्वे नतु खियाम । गर्गाः । वत्साः । विदाः । उवाः । तत्कृते इति किम् । प्रियगार्ग्यः । स्त्रियां तु गार्यः खियः । गोत्रे किम् । दैप्याः। 7 औत्साः । प्रवराध्यायप्रसिद्धमिह गोत्रम् । तेनह न । पौत्राः । दौहित्राः॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् ४।१।१६८॥

सुगमकामुद्याः। जनपदक्षत्रिययोर्याचकादजपत्ये । दाण्डिनायन इति सूत्रे निपातनाहिलोपः । ऐक्ष्वाकः । ऐक्षाको । क्षत्रियसमानशब्दाजनपदात्तस्य राजन्यमपत्यवत् ।। तद्राजमाचक्षाणम्तद्राज इत्यन्वर्यसंज्ञासामर्थ्यात् । पञ्चालाना राजा पाश्चाल: ॥ पूरोरण्वक्तव्यः ॥ पौरखः । पाण्डोडर्थः । पाण्डयः ।। साल्वेयगान्धारिभ्यां च ४।१।१६९ ॥ आभ्यामपत्येऽञ् । वृद्धेत इति ज्यडोऽपवादः । साल्वेयः । गान्धारः । तस्य राजन्यप्येवम् ।। व्य मगधकलिङ्गसूरमसादण ४।१।१७० ॥ अमोऽपवादः । झ्यच् । आङ्गः । वाङ्गः । सोझ.। मागधः । कालिङ्गः । सौरमसः । तस्य राजन्यप्येवम् ॥ वृद्धत्कोसलाजादा ज्यङ् ४ । १ । १७१ ॥ वृद्धात् । आम्बष्ठ्यः । सौवीर्यः । इत् आवन्त्यः । कौसल्यः । अजादस्यापत्यमाजाद्य. ॥ कुरुनादिभ्यो ण्यः ४121 १७२ ॥ कौरव्यः। नेपध्यः। स नैषधस्यार्थपतेः इत्यादौ तु शैपिकोऽ॥ साल्वावयवप्रत्यग्रथकलकूटाइमकादि११७३॥ साल्वो जनपदस्तदवयवा उदुम्बरादयस्तेभ्यः प्रत्यग्रथादिभ्य- त्रिभ्यश्च इज । अशोऽपवादः। औदुम्बरिः । प्रात्यप्रथिः । कालकू- टिआश्मकि । राजन्यप्येवम् ॥ ते तद्राजाः ४।१।१७४॥ अनादय एतत्सज्ञा' स्युः ॥ तद्राजस्य बहुषु तेनैवाऽस्त्रियाम् २।४। ६२॥ बहुप्वर्थेषु तद्राजस्य लुकू तदर्यकृते बहुत्वे नतु स्त्रियाम् ।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । २८३ इक्ष्वाकयः । पञ्चालाः । इत्यादि । कथं तर्हि कौरव्याः पशवः । तस्यामेव रघोः पाण्डयाः इति च कौरव्ये पाण्डये च साधव इति समाधेयम् । रघूणामन्वयं वक्ष्ये । निरुध्यमाना यदुभिः कथंचित इति तु रघुयदुशब्दयोस्तदपत्ये लक्षणया । कम्बोजाल्लुक १४।१।१७६।। अस्मात्तद्राजस्य लुक । कम्बोजः। कम्बोजी ॥ कम्बोजादिभ्य इति वक्तव्यम् ॥ चोलः। शकः। यज्लक्षणस्याणो लुक् । केरलः। यवनः। अमो. लुक । कम्बोजाः। समरे इति पाठः सुगमः । दीर्घपाठे तु कम्बो. जोऽभिजनो येपामित्यर्थः । सिन्धुतक्षशिलादिभ्योऽणजी इत्यण् ।। स्त्रियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च ४।१।१७६॥ तद्राजस्य लुक् । अवन्ती । कुन्ती । कुरूः॥ अतश्व४।१।१७७॥ तद्राजस्याकारस्य स्त्रियां लुकू । शूरसेनी । मद्री । कथं माद्री- सुतौ इति द्वस्व एव पाठः इति हरदत्तः । भर्गादित्वं वा कल्प्यम् ।। न प्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः ४।१११७८ ॥ एभ्यस्तद्राजस्य न लुक् । पाञ्चाली वैदर्भी। आङ्गी । बागी। मागधी । ऐते माच्याः। भार्गी । कारूपी। कैकयी । केकयीत्यत्र तु जन्यजनकमावलक्षणे पुंयोगे टीप्। एवं देवकीत्यत्राप्याहुः । जप- त्यप्रत्यये डीप संज्ञापूर्वकत्वादृदयभाव इति परे । युधा । शुक्रा । आभ्यां यचः इति ढक । ततः सार्थ । पादियाँधेयादिभ्योऽणना इत्यञ् । शारिवायत्रः इति डोन्।अतश्च इति लुकि तु ढगन्तवा- न्डीप्युदात्तनिवृत्तिस्वरः। यौधेयो । शौयी । इत्यपत्याधिकारः। तेन रक्तं रागात् ४।२।१।। रज्यतेऽनेनति रागः । कपायेण रक्तं वस्त्रं कापायम् । माञ्जिष्टम् । रागात् किम् । देवदत्तेन रक्तं वस्त्रम् ॥ नील्या अन् ।

*
३८४
सुगमकीमुद्याः।
नील्या रक्तं नीलम् ॥
पीतात्कन् ॥
पीतकम्
हरिद्रामहारजनाभ्याम *
हारिद्रम् । माहारजनम् ॥
नक्षत्रेण युक्तः कालः४।२।३॥
पुष्पेण युक्तं पौपमहः । पौपी रात्रिः॥
लुबविशेपे ४।२।४॥
पूर्वेण विहितस्य लुप् । पष्टिदण्डात्मककालस्यावान्तरविशेपश्चेन्न
गम्यते । अद्य पुष्पः । कथ तहिं पुष्पयुक्ता पौर्णमासी पोपी
इति । विभापा फाल्गुनीश्रवणाकार्तिकीचैत्रीभ्य इति निर्देशन
पौर्णमास्यामयं लुन्नेति ज्ञापितत्वात् । श्रवणशब्दात्तु अत एव
लुब्युक्तवद्भावाभावश्च । अवाधकान्यपि निपातनानि । श्रावणी ॥
परिखतो रथः४।२।१०॥
वस्त्रैः परिवृतो वास्त्रो रथः। रथः किम् । वस्त्रेण परिवृतः कायः।
समन्तादेष्टितः परिवृत उच्यते । तेनेह न । छत्रैः परिवृतो रथः ॥
पाण्डुकम्बलादिनिः४।२।११॥
पाण्डुकम्बलेन परिवृतः पाण्डुकम्बली । पाण्डुकम्बलशब्दो
राजास्तरणवर्णकम्बलस्य वाचकः । मत्वर्थीयेनैव सिद्ध वचनमणो
निवृत्त्यर्थम् ॥
द्वैपवैयाघ्राद ४।२।१२॥
दीपिनो विकारो द्वैपम् । तेन परिवृतो पो रथः । एवं वयाघ्रः ।।
स्थण्डिलाच्छयितरि व्रते ४।२।१५ ॥
तप इत्येव । समुदायेन चेद्रतं गम्यते । स्थण्डिले शेते स्था.
ण्डिरो मिक्षुः॥
इति १३७ अंगाः।

द्वितीयखण्डस्य दितीयो भीगः ।
संस्कृतं भक्षाः ४।२।१६॥
सप्तम्यन्तादण् संस्कृतेऽर्थे । यत्संस्कृतं भक्षाश्चेत्ते स्युः । भ्राष्ट्र
संस्कृता भ्राष्ट्रा यवाः॥
द्विगोलुंगनपत्ये ४।१।८८॥
द्विगोनिमित्तं यस्तद्धितीजादिरनपत्यार्थः प्राग्दीव्यतीयस्तस्य
लुक् । अष्टसु कपालेषु संस्कृतः अष्टाकपालः पुरोडाशः ॥
शूलोखाद्यत् ४।२।१७॥
अणोऽपवादः । शूले संस्कृतं शूल्यं मांसम् । उखा पात्रवि-
शेपः तस्यां संस्कृतमुख्यम् ।
नष्ठकू४।२।१८॥
दनि संस्कृतम् दाधिकम् ॥
उदश्वितोऽन्यतरस्याम् ४।२।१९॥
ठक पक्षेऽणू॥
इसुसुक्तान्तात्कः ७।३।२१॥
इस उम् उक् त एतदन्तात्परस्य ठस्य कः । उदकेन श्वयति
वर्धत इत्युदश्वित् तत्र संस्कृत औदश्वित्कः । औदश्वितः इसुसोः
प्रतिपदोक्तयोर्ग्रहणन्नेह । आशिषा चरत्याशिपिकः । उपा
चरत्यौपिकः ॥
दोप उपसंख्यानम् ॥
दोभ्यी चरति दोकः॥
क्षीराडन ४।२।२०॥
अत्र संस्कृतं इत्येव संवध्यते नतु भक्षा इति । तेन यवाग्वामपि
भवति । क्षरेयी॥
सास्मिन्पौर्णमासीति ४।२।२१॥
इतिशब्दात् संज्ञायाम् इति लभ्यते । संज्ञायामिति क्वाचिका
पाठस्तु प्रामादिकः । पौपी पौर्णमास्यस्मिन्पोपो मासः ।।
१७
.

+ ३८६ सुगमकीमुद्याः। आग्रहायण्यश्वत्थाट्टक् ४।२।२२।। अग्रे हायनमस्या इत्याग्रहायणी । प्रज्ञादेराकृतिगणत्वादणू । पूर्वपदात्संज्ञायाम् इति णत्वम् । आग्रहायणी पौर्णमास्यस्मिन्ना- ग्रहायणिको माप्तः । अश्वत्थेन युक्ता पौर्णमास्यश्वत्यः । निपात- नात्पौर्णमास्यामपि लक् । आश्वात्यकः ।। विभाषा फाल्गुनीश्रवणाकार्तिकीचैत्रीभ्यः।।२३।। एभ्यष्ठम्बा पक्षेऽण | फाल्गुनिकः फाल्गुनो मासः । श्रावणिका श्रावणः । कार्तिकिकः कार्तिकः । चैत्रिकः चैत्रः॥ सास्य देवता ४।२।२४॥ इन्द्रो देवतास्येति ऐन्द्रं हविः । पाशुपतम् । वार्हस्पतम् । त्यज्यमानद्रव्य उद्देश्यविशेपो देवतामन्त्रः । स्तुत्या च ऐन्द्रो मन्नः। अग्नियो वै ब्राह्मणो देवतया इति तु शैषिकेऽर्थे । सर्वत्राग्नि इति ढक्॥ कस्येत् ।।२।२५॥ कशब्दस्येदादेशः प्रत्ययसंनियोगेन । यस्य इति लोपात्पर- स्वादादिवृद्धिः । को ब्रह्मा देवतास्य कार्य हविः । श्रीदेवतास्य श्रायम् । शतरुद्राद्धश्च । चाच्छः। शतं रुद्रा देवता अस्य शत- रुद्रियं शतरुद्रीयम् । घच्छयोविधानसामर्थ्यात् द्विगोलुंगनपत्ये इति न लक्॥ महेन्द्रादाणौ च ४।२।२९ ॥ पाच्छः । महेन्द्रियं हविः माहेन्द्र महेंद्रीयम् ॥ सोमायण् ४।२।३०॥ साम्यम् । टित्वान्डा । सामी ऋ॥ वाय्वृतुपिपसो.यत् ४।२।३१॥ वायव्यम् । मतव्यम् । रीतः यस्येति च । पिन्यम् । उपस्यम्।। पूर्णमासादण् वक्तव्यः ।।

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। ३८७ पूणों मासोऽस्यां वर्तते इति पौर्णमासी तिथिः॥ पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः ४।२।३६॥ एते निपात्यन्ते । पितुर्भ्रातरि व्यत् । पितुर्धाता पितृव्यः। मा. तुईलचू । मातुीता मातुल! | मातृपितृभ्यां पितरि डामहन् । मातुः पिता मातामहः । पितुः पिता पितामहः । मातरि पिच । मातामही। पितामही॥ अवेर्दुग्धे सोढदूसमरीसचो वक्तव्याः १ ॥ सकारपाठसामर्थ्यान्न पः। अविसोढम् । अविदूसम् । अविमरी- सम् तिलान्निष्फलात्पिञ्जपेजी। तिलपिञ्जः । तिलपेजः । बन्ध्या स्तिल इत्यर्थः । पिञ्जश्छन्दसि डिच । तिल्पिञ्जः।। तस्य समूहः ४।२।३७॥ अत्र अचित्तादनुदात्तादेत्रात केदारादिप्रतिपदाच पृथक् प्र. त्यया वक्ष्यन्ते तान्यरिहत्योदाहरणीयम् । काकानां समूहः काकम् । वाकम् ॥ भिक्षादिभ्योऽण् ४।२।३८॥ भिक्षाणां समूहो भैक्षम् । गर्मिणीनां समूहो गाभिणम् । इह भस्याढे इति पुंबद्भावे कृते इनण्यनपत्ये तेन नस्तदिते इति टिलोपो न । युक्तीनां समूहो यौवनम् । शत्रन्तादनुदात्तादेरञि, यौवतम् ।। गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्समनुष्याजादुञ् ४।२१३९॥ एभ्यः समूहे बुञ् । लौकिकमिह गोतं तचापत्यमात्रम् । युवोरनाको । ग्लचुकायनीनां समूहो ग्लोचुकायनकम् । आक्षक- मित्यादि । आपत्यस्य च इति यलोपे प्राप्ते प्रकृत्या अके राज- न्यमनुष्ययुवानः । राजन्यकम् । मानुष्यकम् ॥ वृद्धाचेति वक्तव्यम् ॥ वाईकम् ॥

३८८
सुगमकौमुद्याः।
केदाराद्यञ्च ४।२।४०॥
चाटुञ् । कैदाय कैदारकम् ॥
गणिकाया यनिति वक्तव्यम् ।
गाणिक्यम् ॥
ठ-कवचिनश्च ४।२।३१॥
चात्केदारादपि । कवचिनां समूहः कावचिकम् । कैदारिकम् ॥
ब्राह्मणमाणववाडवायत्।।२।४२॥
ब्राह्मण्यम् । माणव्यम् । वाडव्यम् ।।
पृष्टादुपसंख्यानम् ॥
पृष्टयम्॥
ग्रामजनबन्धुभ्यस्तल् ४।२।४३ ॥
आमता । जनता। वन्धुता ॥
गजसहायाभ्यां चेति वक्तव्यम् ॥
गनता । सहायता । अनः सः व्रती । अहीनः । अहर्गणसा.
ध्यमुत्याः क्ररित्ययः । प्रती किम् । आइः । इह खण्डिकादि.
स्वादम् । अगष्टसोरेव इति नियमाहिलोपो न ।।
पी णस वक्तव्यः ॥
सिति च १1१।१६॥
गिति पो पूर्व पदगंज्ञम् । अमत्वादोर्गुणो न । पशूनां समूह
पार्थम
अनुदात्तादेन 2121४४॥
पापातम । मागरम ॥
चरणेभ्यो धर्मवत ।।२।१६॥
पाटकमा छान्दोग्यम।
चरित्तदस्तिनोटक।।२।१७॥

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः । ३८९ साक्तकम् । हास्तिकम् । धैनुकम् ॥ केशाश्वाभ्यां य छावन्यतरस्याम् ॥२॥ १८ ॥ पक्षे ठगणी । कैश्य कैशिकम् । अश्वीयम् आश्चम् ॥ पाशादिभ्यो यः४।२।४९॥ पाश्या। तृण्या। धूम्या ।वन्या।वात्या ॥ खलगोरथात् ४।२।५०॥ खल्या । गव्या। रथ्या।। इनित्रकटयचश्च ४।२।५१॥ खलादिभ्यः क्रमात् । खलिनी । गोत्रा । रथकट्या ॥ खलादिभ्य इनिर्वक्तव्यः ॥ डाकिनी । कुटुम्बिनी । आकृतिगणोऽयम् ।। इति १३८ अंशाः। तदस्यां प्रहरणमिति क्रीडायां णः ४।२।१७॥ दण्डः प्रहरणमस्यां क्रीडायां दाण्डा । मौष्टा ॥ घभः सास्यां कियेति भः४।२।५८ ॥ घान्तात्क्रियावाचिनः प्रथमान्तादस्यामिति सप्तम्यर्थ स्त्रीलिङ्गे अमत्ययः । धनः इति कृद्रहणाद्गतिकारकपूर्वस्यापि ग्रहणम् ॥ श्येनतिलस्य पाते ६।३।७१ ॥ श्येनतिल एतयोर्मुमागमः अप्रत्ययपरे पातशब्द उत्तरपदे । श्येनपातोस्यां वर्तते श्यैनंपाता मृगया । तिलपातोऽस्यां वर्तते तैलंपाता स्वधा । श्येनतिलस्य किम् । दण्डपातोऽस्यां तिथी वर्तते दाण्डपाता तिथिः । तदधीते तद्देद ॥ कतूक्थादिसूत्रान्तादृक् ४।२१६०॥ ऋतुविशेषवाचिनामेवेह ग्रहणं तेभ्यो मुख्यायेंभ्यो वेदितरि तत्मतिपादकग्रन्थपरेभ्यस्त्वध्येतरि । आग्निष्टोमिकः । वाजपेयिका ३९० सुगमकीमुद्याः। उक्थं सामविशेषः तल्लक्षणपरो ग्रन्थविशेपो लक्षणयोक्थम् । तद. धीते वेद वा आक्थिकः । मुख्यार्थातक्यशब्दाहगणों नेष्यते । न्यायम्-नैयायिकः । वृत्तिम्-वार्तिकः। लोकायतम्-लौकायतिक इत्यादि ॥ सूत्रान्तात्त्वकल्पादेरेवेष्यते ॥ सांग्रहसूत्रिका । अकल्पादेः किम् । काल्पसूत्रः ।। विद्यालक्षणकल्पान्ताचेति वक्तव्यम् ॥ वायसविधिकः। गौलक्षणिक ।आश्वलक्षणिकरापाराशरकल्पिकः। अङ्गशवधर्मत्रिपूर्वाद्विद्यान्तान्नेति वक्तव्यम् ॥ आङ्गविद्यः । क्षात्रविद्यः । धार्मविद्यः । त्रिविधा विद्या त्रिविद्या तामधीते वेद वा त्रैविद्यः ।। आख्यानाख्यायिकेतिहासपुराणेभ्यश्च ॥ यवक्रीतमाधिकृत्य कृतमाख्यानमुपचाराद्यवक्रीतम् । तदधीते वेति वा यावक्रीतिकः । वासवदत्तामधिकृत्य कृता आख्यायिका वासवदत्ता । अधिकृत्य कृते ग्रन्थे इत्यर्थे वृद्धाच्छः। तस्य लुबा. ख्यायिकाभ्यो बहुलम् इति लुप् । ततोऽनेन ठक् । वासवदत्तिका ऐतिहासिकः । पौराणिकः ॥ सादेः सादेश्च लुग्वक्तव्यः || सर्ववेदानधीते सर्ववेदः। सर्वतन्त्रः। सवार्तिकः । द्विगोर्खक इति लुक । द्वितन्त्रः॥ इकन्पदोत्तरपदाच्छतपटेः पिकन्पथः ॥ पूर्वपदिकः । उत्तरपदिक । शतपथिकः । शतपथिकी । पष्टिप- थिक । पष्टिपथिकी। क्रमादिभ्यो वुन् ४।२१६३॥ क्रमकः । क्रमपदशिक्षामीमांसाकमादिः ॥ प्रोक्ताल्लुक ४१२१६४॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः । प्रोक्तार्थकप्रत्ययात्परस्याध्येवेदिवप्रत्ययस्य टुर । पणनं पणः । घनर्थ कविधानम् इति कः । सोस्यास्तीति पणी तस्य गोनापत्यं पाणिनः॥ गाथिविदथिकेशिगणिपणिनश्च ६।१।१६५ ।। एतेऽणि प्रकृत्या इति टिलोपोन । ततो यूनि इरा । पाणिनिः। पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम् वृद्धाच्छः इसथ इत्यण तु न । गोत्रे य इन्तदन्तादिति वक्ष्यमाणत्वात् । ततोऽध्यवेदिनणी लुफ स्वरे स्त्रियां च विशेषः । पाणिनीयः पाणिनीया ॥ सूत्राच कोपधात् ४ । २।६५ ॥ सूनवाचिनः ककारोपधाध्येतवेदितप्रत्ययस्य लुक । अमोक्तार्थ आरम्भः अष्टावध्यायाः परिमाणमस्याष्टकं पाणिनेः सनम् । तदधीयते विदन्ति वा अष्टकाः ।। छन्दोब्राह्मणानि च तद्विपयाणि ४।२।६६॥ छन्दांसि ब्राह्मणानि च मोक्तप्रत्ययान्तानि तद्विपयाणि अध्ये- हवेदिवप्रत्ययं विना न प्रयोज्यानीत्यर्थः। कठेन प्रोक्तमधीयते कठाः । वैशम्पायनान्तेवासित्वाणिनिः । तस्य कटचरकात् इति लुक् । ततोऽण् । तस्य प्रोक्ताल्लुक् ।। तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नानि ४।२।६७ ॥ उदुम्पराः सन्त्यस्मिन्देश औदुम्बरः ।। तेन निर्वृत्तम् ४।२।६८॥ कुशाम्बेन निवृत्ता कौशाम्बी नगरी ॥ तस्य निवासः१।२।६९ ॥ शिवीनां निवासो देशः शैवः ॥ अदूरभवश्व ४।२।७० ॥ विदिशाया अदूरमा नगरं वैदिगम् । चकारण प्रागुक्तात्रयोऽ- र्थाः संनिधाप्यन्ते तेन वक्ष्यमाणप्रत्ययानां चातुर्गयस्त्वं मिध्यति।। .

३९२
सुगमकौमुद्याः।
जनपदे लु ४।२।८१॥
जनपदे वाच्ये चातुर्थिकस्य लुप् ॥
लुपि युक्तवव्यक्तिवचने ११२।२१॥
लपि सति प्रकृतिवलिङ्गवचने । पञ्चालानो निवासो जनपद:
पञ्चालाः । कुरवः । अङ्गाः । बङ्गाः। कलिङ्गाः ॥
विशेपणानांचाजातेः १।२।५२॥
लुरर्थस्य विशेषणानामपि तदलिङ्गवचने स्तो जाति वर्जयित्वा।
पञ्चाला रमणीयाः । गोदी रमणीयौ । अजातेः किम् । पश्चाला
जनपदः । गोरी ग्रामः। हरीतक्यादिपु व्यक्तिः । हरीतक्याः
फलानि हरीतक्यः॥
खलतिकादिपु वचनम् ॥
खलतिकस्य पर्वतस्यादूरमवानि खलतिकं वनानि ।।
मनुष्यलपि प्रतिषेधः ॥
मनुष्पलक्षण लुनर्थे विशेषणानां न । लुवन्तस्य तु भवती-
त्यर्थः। चचा अभिरूपः॥
इति १३९ अंशाः ।
वरणादिभ्यश्च ४।२।८२॥
अजनपदार्थ प्रारम्भः। वरणानामदृरम नगरं वरणा ।
शकराया वा ४।२।८३॥
जस्मामातुरधिपस्य वा लुप् ॥
ठक्टोच४।२।८४॥
नगया पताम्नः । वक्ष्यमाणे कुमुदादा गहादी च पाठसाम
यापोटका। याग्रहणमामर्यात्पक्ष जागियोऽण तस्य
होगा। पर रूपाणि । सांग मारे गारिक शरीयं
नोकियाम्किम् ॥

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः ।
कुसुदनडवेतसेभ्यो इतुप ४।२।८७ ।।
कुमुद्रान् । नडान् । वतस्वान् । आधयोः झयः इत्यन्ये मादु-
पधायाः इति वक्ष्यमाणेन कः ॥
महिपाच्चेति वक्तव्यम् ॐ ॥
-महिष्मान्नाम देशः॥
नडशादाड्रडलच्४।२।८८॥
नङ्गलः । शादो जम्बालघासयोः इत्यमरः । शादलः ।।
शिखाया क्लच ४।२।८९ ॥
शिखावलम् ॥ इति चातुरर्थिकाः ॥
शेपे ४।२।९२॥
अपत्यादिचतुरर्थ्यन्तादन्योऽर्थः शेपस्तत्राणादयः । चक्षुपा
गृह्यते चाक्षुपं रूपम् । श्रावणः शब्दः । औपनिषदः पुरुषः
दृपदि पिष्टा दार्पदाः सक्तवः। उलूखले क्षुण्ण औलूखलो यावकः ।
अश्वैरुह्यत आश्वो रथः । चतुर्भिरुह्यते चातुरं शकटम् । चतुर्दश्यां
दृश्यते चातुर्दशं रक्षः । शेपे इति लक्षणं चाधिकारश्च । तस्य
विकार इत्यतः प्राक्छेपाधिकारः ॥
राष्ट्रावारपारादखौ ४।२।९३ ॥
आभ्यां क्रमाद्वखौ शेपे । राप्रियः । अवारपारीणः॥
अवारपाराद्विगृहीतादपि विपरीताचेति वक्तव्यम् ॥
अवारीणः । पारीणः । पारावारीणः । इह प्रकृतिविशेपाद्वादय.
ट्युटयुलन्ता । प्रत्यया उच्यन्ते । तेपां जातादयोऽर्थविशेपाः
समर्थविभक्तयश्च वक्ष्यन्ते ॥
ग्रामाद्यखभौ ४।२।९४॥.
ग्राम्यः ग्रामीणः॥
कुलकुक्षिग्रीवाभ्यः श्वास्यलंकारेषु ४।२।९६॥

सुगमकौमुद्याः।
कोलेयकः श्वा कोलोऽन्यः । कौशयकोऽसि कौक्षोऽन्यः। अवे-
यकोऽलंकारः योन्यः॥
नद्यादिभ्यो ढक् ।।२।९७॥
नादेयम् । माहेयम् । वाराणसेयम् ॥
दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् ४।२।९८ ॥
दक्षिणा इत्याजन्तमव्ययम् । दाक्षिणात्यः। पाश्चात्त्यः। पौरस्त्यः।।
कापिश्याः ष्फक् ४ । २ । ९९ ॥
कापियां जानादि कापिशायनं मधु कापिशायनी द्राक्षा ॥
धुप्रागपागुदक्प्रतीचो यत् ४।२।१०१॥
दिव्यम् । प्राच्यम् । अराच्यम् । उदीच्यम् । प्रतीच्यम् ॥
अव्ययात्त्यप्४।२।१०४॥
अमेहकतसित्रभ्य एव । अमान्तिकसहायार्थयोः । अमात्यः ।
इहत्यः । कत्यः । ततस्त्यः । तत्रत्यः । परिगणनं किम् । उपरि-
टादव औपरिष्टः । अव्ययानां ममात्रे दिलोपः । अनित्योऽयं
वहिपटिलोपविधानात् । तेनेह न । आरातीयः । शाश्वतीयः ।।
त्यनेधुंव इति वक्तव्यम् ॥
नित्यः॥
निसो गते*
हस्वात्तादौ तद्धिते ८।३।१०१॥
हस्सादिणः परस्य सस्य पः तादी तद्धिते । निर्गतो वर्णाश्रमे-
भ्यो निष्टयवाण्डालादिः । अरण्याण्णः । यारण्याः सुमनसः ॥
दृरादेत्यः । दूरेत्यः । उत्तरादाहस । आत्तराहः ॥
ऐपमोहाः श्वसोऽन्यतरस्याम् ।।२।१०५॥
प्रयागना पक्षे यक्ष्यमाणा टयुटशुली । ऐपमत्स्यम् ऐपम:
मनम् । वस्त्य हस्तनम् । वस्यं श्वस्तनम् । पसे शोरस्तिकं
वाप्ने । गरिमापामादिस्तहटमा त्यहादीनि च ॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । .. वृद्धाच्छ:४।२।११४॥ शालीयः । मालीयः । तदीयः॥ एङ् प्राचां देशे १ । १।७५ ॥ एड् । यस्याचामादिस्तबद्धसंझं वा देशाभिधाने । एणीपचनीयः गोनर्दीयः । भोजकीयः । पक्षेऽणि ऐणीपचनः । गौनर्दः । भोजकटः । एड् किम् । आहिच्छत्रः। कान्यकुब्जः॥ भवतप्टक्छसौ ४।२।११५॥ वृद्धावत एती भावत्कः । जश्त्वम् । भवदीयः । वृद्धात् इत्यनुवृत्तेः । शचन्तादणेव । भावतः ॥ काश्यादिभ्यष्टभिठौ ४।२।११६ ॥ इकार उच्चारणार्थः । काशिकी काशिका । वैदिकी वैदिका ॥ आपदादिपूर्वपदात्कालान्तात् । आपदादिराकृतिगणः । आप- कालिकी आपत्कालिका । नगरात्कुत्सनप्रावीण्ययोः ४।२। १२८॥ नगरशब्दाढु कुत्सने प्रावीण्ये च गम्ये । नागरकश्चौरः शिल्पी वा । कुत्सन इति किम् । नागरा ब्राह्मणाः ॥ अरण्यान्मनुष्ये ४।२।१२९ ॥ बुञ् । अरण्याण्णः इत्यस्यापवादः ॥ पथ्यध्यायन्यायविहारमनुष्यहस्तिप्विति वाच्यम् ॥ आरण्यकः पन्था । अध्यायो न्यायो विहारो मनुष्यो हस्ती वा। वा गोमयेषु ॥ आरण्यका आरण्या वा गोमयाः ॥ गहादिभ्यश्च ४।२।१३८ ।। छ। गहीय'। मुखपार्श्वतसोर्लोपश्च । मुखतीयम् । पार्वतीयम् । अव्ययाना ममात्रे टिलोपस्यानित्यता ज्ञापयितुमिदम् । कुम्ज- सुगमकौमुद्याः। नस्य परस्य च । जनकीयम् । परकीयम् । देवस्यच । देवकीयम् । स्वस्य च । स्वकीयम् ॥ राज्ञःकच ४।२।१४०॥ वृद्धत्वाच्छे सिद्ध तत्सनियोगेन कादेशमा विधीयते । राज- कीयम् ।। पर्वताच ४।२।१४३॥ पार्वतीयः॥ विभाषा मनुष्ये ४।२।१४४॥ मनुष्यभिन्नेऽर्थे पर्वताच्छो वा पक्षेऽण् । पर्वतीयानि पार्वतानि वा फलानि । अमनुष्ये किम् । पार्वतीयो मनुष्यः ।। युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ्च ४।३।१॥ चाच्छः पक्षेऽण् । युवयोः युष्माकं वा अयं युष्मदीयः। अस्मदीयः॥ तस्मिन्नणि च युष्माकास्माको ४।३।२॥ युष्मदस्मदोरेतावादेशी खञ्यणि च । यौष्माकीणः । आस्मा- फोनः । योष्माकः । आस्माकः ।। तबकममकावेकवचने ४।३।३॥ एकार्थवाचिनोयुष्मदस्मदोस्तवकममको खन्याण च । ताव- कीनः तावकः । मामकीनः । मामकः । छे तु प्रत्ययोत्तरपदयोश्च । त्वदीयः । मदीयः । उत्तरपदे त्वत्पुनः । मत्पुनः ।। मध्यान्मः४।३॥८॥ मध्यमः॥ असांप्रतिके ४।३।९॥ मध्यशब्दादमारप्रत्ययः साप्रतिकेऽर्थे । उत्कर्षापकर्षहीनो मध्यो वैयाकरणः । मध्यं दारू । नातिहस्व नातिदीर्घमित्यर्थः ।। इति १४० अंगाः । इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ।

सायंचिरंपाहेप्रगेऽव्ययेभ्यटयुट्युलो तुटू च ४।३।२३॥ द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ३९७ कालाट्ठञ् ४।३।११॥ कालवाचिभ्यपत्र । मासिकम् । सांपत्सरिकम् । सायपातिकः । पौनापुनिकः । कथं तर्हि शार्वरस्य तमसो निषिद्धये इति कालि- दासः । अनुदितौ पसराग इति भारविः । समानकालीनम् । पाकालीनमित्यादि च । अपभ्रंशा एषते इति प्रामाणिकाः । तत्र जातः इति यावत्कालाधिकारः ॥ श्वसस्तुद च ४।३।१५॥ श्वसशब्दाचा तस्य तुडागमश्च ।। द्वारादीनां च ७।३।४॥ द्वारस्वरस्वाध्यायव्यल्कशस्वस्तिस्वरस्फ्यकृतस्वादुमृदुश्वमश्चन्य एषां न वृद्धिरैजागमश्च । शीवस्तिकम् ॥ संधिवेलायूतुनक्षत्रेभ्योऽण् ४।३।१६॥ संधिवेलादिभ्य ऋतुभ्यो नक्षत्रेभ्यश्च कालवृत्तिभ्योऽणू । संधि- वेलायां भवं सांधिवेलम् । ग्रैष्मम् । तैपम् । संधिवेला संध्या अ. मावस्या प्रयोदशी चतुर्दशी पौर्णमासी प्रतिपत् । संवत्सरात्फल- वर्णनीः । सांवत्सरं फलं पर्व वा सांवत्सरम् । सांवत्सरिकमन्यत् ।। प्रावृप एण्यः४।३।१७॥ मावृषेण्यः ॥ वाभ्यष्ठक४।३।१८॥ वर्षासु साधु वार्षिकं वासः । कालात्साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु इति साध्वर्थे । सर्वत्राण्च तलोपश्च ४।३।२२॥ हेमन्तादण् तलोपश्च वेदलोकयोः । चकारात्पक्षे ऋवण् । हैम. नम् । हैमन्तम् ॥

सुगमकौमुद्याः ।
सायमित्यादिभ्यश्चनुभ्योऽध्ययेभ्यश्च कालवाचिभ्यष्टयुटयुलौ
तयोस्तुट् च । तुटः प्रागनादेशः । अनद्यतन इत्यादिनिर्देशात् ।
सायंतनम् । चिरंतनम् । प्राहप्रगयोरेदन्तत्वं निपात्यते। प्रातनम्।
मगेतनम् । दोपातनम् । दिवातनम् ॥
चिरपरुत्परारिभ्यस्त्रो वक्तव्यः ॥
चिरत्नम् । परुत्नम् । परारित्नम् । अग्रादिपश्चाडिमच् ।
अग्रिमम् । आदिमम् । पश्चिमम् । अन्ताच । अन्तिमम् ॥
विभापा पूर्वाहापरालाभ्याम् ४।३।२४॥
आभ्या ट्युटयुलो वा स्तस्तयोस्तुट् च पक्षे ठज । पूर्वाह्नेतनम्।
अपराह्नतनम् । घकालतनेषु इत्यलुक् । पूर्वाह्नः । सोढोऽस्येति वि.
आहे तु पूर्वाह्नतनम् । अपराह्नतनम् । पौर्वाह्निकम् । आपराह्निकम् ॥
तत्र जातः ।।३।२५॥
सप्तमीसमर्थाजात इत्यर्थेऽणादयो घादयश्च । सुघ्ने जातः
सौनः । औत्सः । राप्रियः । अवारपारीण इत्यादि ॥
प्रावृपष्ठक्४।३।२६॥
एण्यस्यापवादः । प्रापि जातः प्रावृषिकः ॥
संभूते ४।३।४१॥
सुघ्ने संभवति सौनः॥
कोशादृञ् ४।३।४२॥
कौशेयं वस्त्रम् ॥
कालात्साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु ४।३।४३॥
हेमन्ते साधुईमन्तः प्राकारः । वसन्ते पुष्प्यन्ति वासन्त्यः
कुन्दलताः । शरदि पच्यन्ते शारदाः शालयः ।।
उप्ते च ४।३।४४॥
हेमन्त उप्यन्ते हैमन्ता यवाः ॥
आश्वयुज्या वृञ् ४।३।४५॥

+
अव्ययीभावात् इत्येव । वेश्मन्यन्तरन्तवैश्मम् । तत्र भवमा-
द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः । ३९९
ठमोऽपवादः । आश्वयुज्यामुप्ता आश्वयुजका मापाः ।।
ग्रीष्मवसन्तादन्यतरस्याम् ४।३।४६॥
पक्षे ऋत्वः । गृष्मकं ग्रैष्मम् । वासन्तकं वासन्तम् ।।
तत्र भवः ४।६।५३ ।।
सुघ्ने भवः सोमः । राष्ट्रियः॥
दिगादिभ्यो यत् ४।३।५४॥
दिश्यम् । वय॑म् ।
शरीरावयवाच्च ४।३।५५॥
दन्त्यम् । कर्ण्यम् ॥
दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यस्त्यहेर्टन ४।३।५६॥
दातयम् । कोक्षेयम् । कलशिर्घटस्तत्र भवं कालशेयम् ।।
ग्रीवाभ्योऽच ४।३१५७॥
चाड्ञ् । वयं ग्रैवम् ॥
गम्भीराभ्यः४।३।२८॥
गम्भीरे भवं गाम्भीर्यम् ॥
पञ्चजनादुपसंख्यानम् ॥
पाञ्चजन्य: ॥
अव्ययीभावाच्च ४।३।५९॥
परिमुखं भयं पारिमुख्यम् । परिमुख्यादिभ्य एवेष्यते नेह ।
औपकूलः॥
अन्तःपूर्वपदा ४।३।६०॥
न्तर्वेश्मिकम् । आन्तर्गणिकम् ॥
अध्यात्मादेशभिप्यते ॥
अध्यात्म भवमाध्यात्मिकम् ॥

४०. सुगमकीमुद्याः। अनुशतिकादीनां च ७।३।२०॥ एपांमुभयपदवृद्धिः निति णिति किति च । बाधिदविकम् । आधिभौतिकम् । ऐहलौकिकम् । पारलौकिकम् । अध्यात्मादिर- नुशतिकादिश्चाकृतिगणः ।। जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः ४।३ । ६२॥ जिह्वामूलीयम् । अङ्गुलीयम् ॥ कर्णललाटात्कनलंकारे ४।३।६५॥ कर्णिका । ललाटिका ॥ तत आगतः४।३।७४॥ मुन्नादागतः सौनः॥ विद्यायोनिसंवन्धेभ्यो वुन् ४।३। ७७ ॥ औपाध्यायकः । पैतामहकः॥ ऋतष्ठन् ४।३।७८॥ बुजोऽपवादः । होरकम् । मातृकम् ॥ पितुर्यच ४।३।७९॥ चाहञ् । रीट्टतः यस्य इति लोपः । पित्र्यं पैतृकम् ॥ नभः शुचीश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणानाम् ७॥३॥३०॥ नत्रः परेषां शुच्यादिपञ्चानामादरचो वृद्धिः पूर्वपदस्य तु वा निदादौ परे आशौचं अशीचम् । आनैश्वर्यं अनश्वर्यम् । आक्षेत्रज्ञ अक्षत्रज्ञम् । आकौशलं अकौशलम् । आनपुणं अनैपुणम् ॥ प्रभवति ४।३।८३॥ ततः इत्येव । हिमवतः प्रभवति हैमवती गङ्गा ॥ विदूराम्भ्यः ४.३१८४॥ विदूरात्प्रभवति चैदूर्यो मणिः॥ अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ४।३।८७॥

द्वितीयरखण्डस्य द्वितीयो भागः । ४०१ तत इत्येव । शारीरकमाधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शारीरकीयः । शारीरक भाष्यमिति त्वभेदोपचारात् ।। शिशुक्रन्दयमसभद्वन्द्वेन्द्रजननादिभ्यश्छः ४।३।८८॥ शिशूनां क्रन्दनं शिशुक्रन्दः । तमधिकृत्य कृतो ग्रन्थः शिशु- कन्दीयः । यमस्य सभा यमसमम् । क्लीयत्वं निपातनात् । यमस. भीयः । किरातार्जुनीयम् । इन्द्रजननादिराकृतिगणः ।। इति १४१ अंशाः। सोऽस्य निवासः ४।३। ८९॥ स्रुघ्नो निवासोस्य स्रोनः॥ अभिजनश्च ४।३।९०॥ मुन्नोऽभिजनोऽस्य सौनः । यत्र स्वयं वसति स निवासः । यन पूर्वरुपितं सोऽभिजनः इति विकः ॥ तेन प्रोक्तम् ।।३।१०१॥ पाणिनिना प्रोक्त पाणिनीयम् ।। तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् ४ । ३ । १०२ ।। छन्दो ब्राह्मणानि इति तद्धिपयता । तित्तिरिणा मोक्तमधीयते तैत्तिरीयाः॥ काश्यपकौशिकाभ्यामृपिभ्यां णिनिः ४।३।१०३॥ काश्यपेन प्रोक्तमधीयते काश्यपिनः ।। कलापिवैशम्पायनान्तवासिभ्यश्च ४।३।१०४॥ कलाप्यन्तेवासिभ्यः । हरिगुणा प्रोक्तमधीयते हारिद्रपिणः । वैशम्पायनान्तेवासिभ्य आलम्बिनः ॥ शौनकादिभ्यश्छन्दसि ४।३।१०६॥ छन्दस्यभिधेय एभ्यो णिनिः । गानकेन प्रोक्तमधीयते शान- किनः॥

४०२ सुगमकीमुद्याः। कठचरकाल्लुक ४।३।१०७॥ आभ्यां प्रोक्तमत्ययस्य लुक् । कठेन मोक्तमधीयते कठा। चरकाः॥ पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः४।३।११०॥ पाराशर्येण प्रोक्तं भिक्षुसूत्रमधीयते पाराशरिणो भिक्षकः । शैलालिनो नटाः॥ कर्मन्दकृशाश्वादिनिः ४।३।१११॥ भिक्षुनटसूत्रयोः इत्येव । कर्मन्देन प्रोक्तमधीयते कर्मन्दिनो भि- क्षवः । कृशाश्विनी नटाः ॥ तेनैकदिक् ४।३।११२॥ सुदामा अद्रिणा एकदिक्सौदामनी ॥ तसिश्च ४।३।११३॥ स्वरादिपाठादव्ययत्वम् । पीलुमूलेन एकदिक् पीलुमूलतः ।। उरसो यच्च ४।३।११४॥ चात्तसिः । अणोऽपवादः । उरसैकदिगुरस्यः। उरस्तः ॥ उपज्ञाते ४।३।११५॥ तेन इत्येव । पाणिनिनोपज्ञातं पाणिनीयम् ॥ कृते ग्रन्थे ४।३। ११६॥ वररुचिना कृतो वाररुचो ग्रन्थः ॥ संज्ञायाम् ४।३।११७॥ तेन इत्येव । अग्रन्थार्थमिदम् । मक्षिकाभिः कृतं माक्षिकं मधु ।। क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ्।।३।११९॥ तेन कृते संज्ञायाम् । क्षुद्राभिः कृतं क्षौद्रम् । भ्रामरम् । वाट- रम् । पादपम् । तस्येदम् ॥

आभ्यामण विकारे एतयोः पुगागमश्च । नापुपम् । जानुपम् ।।
मयतयोर्भापायामभक्ष्याच्छादनयोः ४।३।१४३॥
द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः।
उपगोरिदमोपगवम् ॥
इन्द्रादुन्वैस्मैथुनिकयोः ।।३।१२५॥
काकोलू किका । कुत्सकुशिकिका ॥
वैरे देवासुरादिभ्यः प्रतिपेधः ॐ ॥
देवासुरम् ॥
गोत्रचरणादुन् ४।३ । १२६॥
औपगवकम् ॥
चरणाद्धर्माम्नाययोरिति वक्तव्यम् ॐ ॥
काठकम् । समाप्ताः शैपिकाः ।।
तस्य विकारः४।३।१३४॥
अश्मनो विकारे टिलोपो वक्तव्यः ॥
अश्मनो विकार आश्मः । भास्मनः । मार्तिकः ।।
अवयवे च प्राण्यौपधिवृक्षेभ्यः ४।३।१३५॥
चाद्विकारे । मयूरस्यावययो विकारो वा मायूरः। मौर्य काण्ड
भस्म वा । पैप्पलम् ॥
विलादिभ्योऽण् ४ । ३ । १३६॥
घेल्वम् ॥
कोपधाच ४।३।१३७॥
अण् अजोऽपवादः। तर्कु तार्फवम् । तैत्तिडीम् ॥
वपुजतुनोः पुक् ४।३।१३८ ॥
ओरञ् ४।३।१३९॥
देवदारखम् । भाद्रदारवम् ॥

४०४ सुगमकीमुद्याः। प्रकृतिमात्रान्मयड्डा विकारावयवयोः । अश्ममयम् । आश्म- नम् । अभक्ष्य इत्यादि किम् । मौद्गः सूपः। कार्पासमाच्छादनम् ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः ४।३।१४४॥ आम्रमयम् । शरमयम् ॥ एकाचो नित्यम् ॥ खड्मयम् । वाड्मयम् । कथं तर्हि आप्यं अम्मयम् इति तस्येदम् इत्यण्णंतात्स्वार्थ व्यञ् ॥ गाश्च पुरीपे ४।३।१४५॥ गोः पुरीपं गोमयम् ॥ पिटाच्च ४।३।११६॥ मयद् विकारे । पिष्टमयं भस्म । कथं पैष्टी सुरेति सामान्यवि- वक्षाया तस्येदम् इत्यण ॥ संज्ञायां कन् ४१३ १४७॥ पिष्टात् इत्येव । पिष्टस्य विकारविशेषः पिष्टकः । पूपोऽपूपः पिष्टका इत्यमरः ॥ क्रीतवत्परिमाणात् ।।३। १५६॥ प्राग्वहतेष्ठक इत्यारभ्य कीतार्थे ये प्रत्यया येनोपाधिना परि- माणाद्विहितास्ते तथैव विकारेऽतिदिश्यन्ते । अणादीनामपवादः । निष्केण क्रीतं नैष्क्किम् । एवं निष्कस्य विकारोऽपि नैष्किकः । शतस्य विकारः शत्यः शतिकः॥ एण्या ढ४।३।१९९।। ऐणेयम् । एणस्य तु ऐणम् ॥ गोपयसोर्यत् ४।३ । १६०॥ गव्यम् । पयस्यम् ॥ द्रोश्च ।।३। १६३॥

४०६ विदारी। बहुलग्रहणान्नेह । पाटलानि पुष्पाणि । मालानि मूला. द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः। दुर्वृक्षस्तस्य विकारोवयवो वा द्रव्यम् । माने वयः ४।३।१६२॥ द्रोः इत्येव । हुवयम् । योतवं दुवयं पाय्यमिति मानार्थकं त्रयम् । इत्यमरः ।। फले लुकू ४।३ । १६३॥ विकारावयवप्रत्ययस्य लुक् फले ॥ लुक तद्रितलुकि ११२॥४९॥ तद्धितलुकि सत्युपसर्जनस्त्रीप्रत्ययस्य लुक इति डीपो लुक । भामलक्याः फलमामलकम् ॥ पक्षादिभ्योऽण् ४।३।१६४ ॥ विधानसामर्थ्यान्न लुकू । लाक्षम् ॥ न्यग्रोधस्य च केवलस्य ७।३।१०५॥ अस्य न वृद्धिरेजागमश्च । नेयग्रोधम् ॥ जम्बा वा ४।३।१६५॥ जम्बूशब्दात्फलेऽवा । जाम्बवम् । पक्षे और तस्य लुक । लुपच ४।३।१६६ ॥ जम्बाः फलमत्ययस्य लुब्बा टुपि युक्तरत् । जम्ब्याः फलं जम्बूः ॥ फलपाकशुपामुपसंख्यानम् ॥ व्रीहयः । मुद्गाः ।। पुष्पमूलेपु बहुलम् ॥ मल्लिकायाः पुष्पं मल्लिका । जात्याः पुष्प जाती । विदार्या मूल नि । वाहुलकात्कचिल्लुक । अशोकम् । करवीरम् ॥ जम्बूः॥

२०६
सुगमकीमुद्याः।
हरीतक्यादिभ्यश्च ४।३।१६७ ॥
एभ्यः फलप्रत्ययस्य लुप् ॥
हरीतक्यादीनां लिङ्गमेव प्रकृतिवत् ॥
हरीतक्याः फलानि हरीतक्यः॥
कंसीयपरशव्ययोर्यभभौ लुक्च ४।३।१६८॥
कंसीयपरशव्यशब्दाभ्यां यत्रो छयतोश्च लुक् । कंसाय हित
कंसीयम् । तस्य विकारः कांस्यम् । परशवे हितं परशव्यम् । नस्य
विकारः पारशवः ।। इति प्राग्दीव्यतीयाः समाप्ताः ॥
इति १४२ अंशाः।
.
प्राम्बहतेप्टक् ४।४।१॥
तद्वहतीत्यतः प्राक् ठगधिक्रियते ॥
तदाहेति माशब्दादिभ्य उपसंख्यानम् ॥
माशब्दः कारि इति य आह स माशब्दिकः ॥
स्वागतादीनां च ७।३।७॥
ऐन । स्वागतमित्याह । स्वागतिकः । साध्वारिकः स्वागस्या-
पत्यं स्वाङ्गिः । व्यङ्गस्यापत्यं व्याङ्गिः ।व्यडस्यापत्यं व्याडिः ।
व्यवहारेण चरति व्यावहारिकः । स्वपती साधु स्वापतेयम् ॥
आही प्रभूतादिभ्यः॥
अमृतमाह माभूतिकः । पार्याप्तिकः ॥
पृच्छतो सुनातादिभ्यः॥
मुनातं पृच्छति सौनातिका सोखशायनिकः । अनुशतिकादिः॥
गच्छतो परदारादिभ्यः॥
पारदारिकः । गोरुतल्पिकः ।।
तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ४।४।२॥

अपमित्येति ल्यवन्तम् । अपमित्य निर्वृत्तमापमित्यकम् । द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। अक्षैर्दीव्यति आक्षिकः । अभ्या खनति आभ्रिकः । अक्षेर्जयति आक्षिकः । अर्जितमाक्षिकम् ॥ संस्कृतम् ४।४।३॥ दना संस्कृतं दाधिकम् । मारिचिकम् ॥ तरति ४।४।५॥ उडुपेन तरति औडुपिकः ॥ नौ यचष्ठन् ४।४।७॥ नाविकः । घटिकः । बाहुभ्यां तरति वाहुका स्त्री॥ चरति ४।४।८॥ तृतीयान्ताद्गच्छतिभक्षयतीत्यर्थयोष्टक् । हस्तिना चरति हा. स्तिकः । शाकटिकः । दन्ना भक्षयति दाधिकः ।। वेतनादिभ्यो जीवति ४|४|१२॥ वेतनेन जीवति वैतनिकः । धानुष्कः । वस्नायविक्रयाट्टन् ४।४।१३॥ वस्नेन मूल्येन जीपति वानिकः । क्रयविक्रयग्रहण संघातीवर- हीतार्थम् । क्रयविक्रयिकः । ऋयिकः । विकयिकः ॥ आयुधाच्छ च ४।४।१४॥ चाहन् । आयुधेन जीवति आयधीयः आयुधिकः ॥ निर्वृत्तेऽक्षयूतादिभ्यः ४ । ४ । १९ ॥ अक्षतेन निवृत्तमाक्षयूतिकं वैरम् । क्त्रेर्मम् नित्यम् । कृतिमम्। पवित्रमम् । भावप्रत्ययान्तादिमप् । पाकिमम् । त्यागिमम् ।। अपमित्ययाचिताभ्यां ककनी ४।४।२१॥ याचितेन निवृत्तं याचितकम् ॥ लवणाल्लुक्४।४।२४॥

४०८
सुगमका मुद्याः ।
लवणेन संसृष्टो लवणः सपः । लवणं गाफम् ॥
मुद्गादण्४।४।२५॥
मीन ओदनः ।।
व्यञ्जनेरुपसिक्ते ४।४।२६॥
ठक । दना उपसिक्तं दाधिकम् ।।
ओजःसहोऽम्भसा वर्तते ४।४।२७॥
ओजसा वर्तते औजसिकः शरः । साहसिकशीरः । आम्भसि-
को मत्स्यः॥
तत्प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम् ।।४।२८॥
द्वितीयान्नादस्मादर्तत इत्यस्मिन्नर्थ ठक् । क्रियाविशेषणत्वा.
द्वितीया । प्रतीपं वर्तते प्रातीपिकः । आन्वीपिकः । प्रातिलोमिकः
आनुलोमिकः । प्रातिकृलिकः । आनुकूलिकः ॥
परिमुखं च ४।४।२९॥
परिमुखं वर्तते पारिमुखिकः । चात्पारिपाधिकः ।।
प्रयच्छति गद्यम् ४।४।३०॥
दिगुणाथै द्विगुणं तत्प्रयच्छति द्वैगुणिकः । त्रैगुणिकः ।।
वृद्धवृधुपिभावो वक्तव्यः १ ॥
वाधुपिकः ॥
कुसीददशैकादशात्प्टन्टचौ ४।४।३१॥
गर्यार्थाभ्यामाभ्यामेतौ स्तः प्रयच्छतीत्यर्थे । कुसीदं वृद्धिम्त
दर्थ द्रव्यं कुसीदं तत्प्रयच्छतीति कुसीदिकः कुसीदिकी । एकाद
शार्थत्वादेकादश ते च ते वस्तुतो दश चेति विग्रहेऽकारः समा
सान्त इव सूत्रे निमात्यते । दर्शकादशिकः । दशैकादशिकी
दशैकादशान्प्रयच्छतीत्युत्तमर्ण एवेहापि तद्धितार्थः ।।
शब्ददईरं करोति ४।४।३४ ॥

तदस्य इत्येव । असिः प्रहरणमस्य आसिकः । धानुष्कः ॥
मड्ड्डकवादनं शिल्पमस्य माइडुकः माइडकिकः । झारः
द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः ।
४०९
शब्दं करोति शान्दिकः । दार्दुरिकः ॥
पक्षिमत्स्यमृगान्हन्ति ४।४।३५॥
स्वरूपस्य पर्यायाणां विशेषाणां च ग्रहणम् । मत्स्यपर्यायेंषु
मीनस्यैव । पक्षिणो हन्ति पाक्षिकः । शाकुनिकः । मायूरिकः ।
मात्स्यिकः । मैनिकः । शाकुलिकः । मार्गिकः ।हारिणिकः ।
सारङ्गिकः ॥
धर्म चरति ४।४।४१॥
धार्मिकः ॥
अधर्माचेति वक्तव्यम् ॥
आधर्मिकः ।।
समपायान्समवैति ४।४।१३॥
सामवायिकः । सामूहिकः॥
परिपदो ण्यः ४।४।४४॥
परिपदं समति पारिपद्यः ॥
सेनाया वा ४।४।४६॥
ण्यः पक्षे ठक् । सैन्याः सैनिकाः ।।
शिल्पम् ४।४।५५॥
मृदगवादनं शिल्पमस्य मार्दङ्गिकः ॥
मइडुकझर्झरादणन्यतरस्याम् ४ । ४।५६॥
झाझरिकः॥
प्रहरणम् ४।४।२७॥
परश्वधाट्टञ्च ४।४।५८॥
पारश्वधिकः ॥
१८

-
सुगमकीमुयाः।
शक्तियटयोरीककू ४।४।५९॥
शाक्तीकः । याष्टीकः ॥
इति १४३ अंशाः।
अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः४।४।६०॥
तदस्य इत्येव । अस्ति परलोक इत्येवं मतिर्यस्य स आस्तिकः ।
नास्तीतिमतिर्यस्य स नास्तिकः । दिष्टमिति मातर्यस्य स दैष्टिकः।
शीलम् ४।४।६१॥
अपूपमक्षणं शीलमस्य आपूपिकः ।
छत्रादिभ्यो णः४।४।६२॥
गुरोदापाणामावग्णं छत्रं तच्छीलमस्य छात्रः॥
कार्मस्ताच्छील्ये ६।४।१७२॥
काम इति ताच्छोल्ये णे टिलोपो निपात्यते । कर्मशीलः
कामः । नस्तद्धिते इत्येव सिद्धे अण्कार्य ताच्छीलिके णेशप । तेन
चौरी तापसीत्यादि सिद्धम् । ताच्छील्ये किम् । कार्मणः ॥
तत्र नियुक्तः४।४।६९॥
आकरे नियुक्त आकरिकः॥
अगारान्तान् ४।४।७०॥
देवागारे नियुक्तो देवागारिकः ।।
प्राग्घिताद्यत् ४।४।७५ ॥
तस्मै हितम् इत्यतः प्राग्यदधिक्रियते ।।
तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् ४।४।७६॥
रथं वहति रथ्यः। युग्यः । वत्सानां दमनकाले स्कन्धे यत्काष्ठमा-
सज्यते स प्रासङ्गः । बहुति प्रासद्यः॥
धुरो यहको ४।४।७७॥
हाल च इति दी प्राप्ते न भकुर्छराम् । धुर्यः धौरेयः ।।

मृल्यः । सीतया समितं सीत्यं क्षेनम् । तुलया संमित तुल्यम् ॥ ४११ द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । खः सर्वधुरात् ४।४।७८॥ सर्वधुरं वहतीति सर्वधुरीणः ॥ एकधुराहक च४।४।७९ ॥ एकधुरं वहति एकधुरीणः एकधुरः ।। शकटादण्४।४।८०॥ शकटं वहति शाकटो गीः ।। हलसीराक् ४।४।८१॥ हलं वहति हालिकः । सरिकः ॥ संज्ञायां जन्या ४।४।८२॥ जनी वधूः तां वहति प्रापयति जन्या । धनगणं लन्धा ४।४।८४॥ तृन्नन्तमेतत् । धनं लब्धा धन्यः । गणं लब्धा गण्यः॥ वसंगतः ४।४।८६॥ वश्यः परेच्छानुचारी॥ संज्ञायां धेनुप्या ४।४।८९ ॥ धेनुशब्दस्य पुगागमो यप्रत्ययश्च स्वार्थ निपात्यते संज्ञायाम् । धनुष्या वन्धके स्थिता इत्यमरः ।। गृहपतिना संयुक्तेश्यः ४।४।९।। गृहपतिर्यजमानस्तेन संयुक्तो गार्हपत्योऽग्निः ॥ नौवयोधर्मविपमूलमूलसीतातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्य- वध्यानाम्यसमसमितसंमितेषु ४।४।९१॥ नावा तार्य नाव्यम् । वयसा तुल्यो वयस्यः । धर्मण प्राप्यं धर्म्यम् । विषेण वध्यो विष्यः । मूलेनानाम्यं मूल्यम्। मूलेन समो धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते ४।४।९२ ।।

४१२ सुगमकामुद्याः। धर्मादनपेतं धर्म्यम् । पथ्यम् । अर्थ्यम् । न्याय्यम ॥ छन्दसो निर्मिते ४।४।९३॥ छन्दसा निर्मितं छन्दस्यम् । इच्छया कृतमित्यर्थः ।। उरसोऽण् च ४।४।९४॥ चायत् । उरसा निर्मितः पुन औरसः उरस्यः ।। हृदयस्य प्रियः४।४।९५॥ हृयो देशः । हृदयस्य हल्लेख इति हृदादेशः ॥ तत्र साधुः४।४।९८॥ अग्रे साधुः अत्र्यः । सामसु साधुः सामन्यः । ये चाभावकर्म- णोः इति प्रकृतिभावः । कर्मण्यः । शरण्यः ।। प्रतिजनादिभ्यः खञ् ४।४।९९ ॥ प्रतिजन साधु. प्रतिजनीनः । सायुगीनः । सार्वजनीनः । वैश्वजनीनः॥ भक्ताण्णः४।४।१०॥ भक्ते साधवो भाक्ताः शालयः ।। परिपदो ण्यः ४।४।१०१॥ पारिपयः । परिपद इति योगविभागाण्णोऽपि । पारिपदः ॥ पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ट ४।४।१०४॥ पयि साधु पाथेयम् । आतिथेयम् । वसनं वसतिस्तन साधुर्वा- सतेयी रानिः । स्वापतेयं धनम् ।। सभाया यः४।४।१०५॥ सभ्यः॥ समानतीर्थवासी ४।४।१०७॥ साधुः इति निवृत्तम् । वसतीति वासी । समाने तीर्थे गुरौ वस- तीति सतीयः ॥

द्वितीयखंडस्य द्विताया समानोदरे शयित ओ चोदात्तः ४।४।१०८॥ समाने उदरे शयितः स्थितः समानोदर्यो भ्राता ।। सोदरायः४।४।१०९॥ सौदर्यः । अर्थः प्राग्वत् ॥ इति प्राग्घितीयाः ।। प्राक् क्रीताच्छः५।१।१॥ तेन क्रीतम् इत्यतः पाक्छोऽधिक्रियते ॥ उगवादिभ्यो यत् ५।१।२॥ प्राव क्रीतादित्येव । उवर्णान्ताद्वादिभ्यश्च यत् । छस्यापवादः।। तस्मै हितम् ५।१५॥ वत्सेभ्यो हितो वत्सीयो गोधुक् । शङ्कचे हितं शङ्कव्यं दारु । गव्यम् । हविष्यम् ॥ शरीरावयवायत् ५। १।६॥ दन्त्यम् । कण्ठयम् ॥ नत्रासिकायाः ॥ नस्यम् । नाभ्यम् ये चतद्धिते ६।११६१॥ यादौ तद्धिते परे शिरःशब्दस्य शीर्षन्नादेशः । शीर्पण्यः । तद्धिते किम् । शिर इच्छति शिरस्यति ॥ वा केशेषु ॥ शीर्पण्याः शिरस्या वा केशाः अतिशीर्प इति वाच्यम् * ॥ अनादौ तद्धिते शिरसः शीर्षादेशः । स्थूलशिरस इदं स्थोल- शीर्पम् ॥ खलयवमापतिलवृपब्रह्मणश्च ५।११७॥

४१४
सुगमकौमुद्याः।
खलाय हितं खल्यम् । यव्यम् । माष्यम् । तिल्यम् । वृष्यम् ।
ब्रह्मण्यम् । चाद्रथ्या।।
अजाविभ्यां थ्यन् ५।११८॥
अजथ्या। यूथिः । अविथ्या ।।
आत्मविश्वजनभोगोत्तरपदात्वः ५।१।९॥
आत्मावानौ खे६।४।१६९।।
एता से प्रकृत्या । आत्मने हितमात्मनीनम् । विश्वजनीनम् ॥
कर्मधारयादेवेष्यते॥
पष्ठीतत्पुरुपाडवीहेश्च छ एव । विश्वजनीयम् ॥
पञ्चजनादुपसंख्यानम् ॥
पञ्चजनीनम् ।।
सर्वजनादृञ् खश्च ॥
सार्वजनिकः सर्वजनीनः ।।
महाजनाह॥
माहाजनिकः । मातृभोगीणः । पित्भोगीणः । राजमोगीनः ।।
आचार्यादणत्वं च ॥
प्राचार्यमोगीनः॥
सर्वपुरुपाभ्यां णठभो ५ 131१०॥
सर्वाणो वेति वक्तव्यम् ॐ ॥
गम्भ हितं गावं मयिम् ॥
पुरुपादयविकारसमूहतेनकृतेषु ।।
माध्यमारप्रयोगात्त त्यस्य द्वन्द्वमध्ये निगः । पुरुषस्य वधः
पारपेयः। नस्पेटम इत्यांग प्रामे पुरुषम्य पियार पाम्पेयः। प्राणि.
ग्मतादिभ्योऽत्र इत्यानि प्राप्त समूऽध्याणि मा एकास्निोऽपि

४१५ द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। परितः पौरुषेयवृता इव इति माधः । तेन कृते ग्रन्थगण प्राप्ते अग्रन्ये तु प्रासादादावमाप्त एवेति विवेकः ॥ छयतोः पूर्णोध्यधिः ॥ इति १४४ अंशाः। प्राग्वतेप्ठञ् ५।१।१८॥ तेन तुल्यम् इति वतिं वक्ष्यति ततः प्राक् ठनधिक्रियते ॥ आदिगोपुच्छसंख्यापरिमाणादृक् ५। १ । १९॥ तदर्हति इत्येतदभिव्याप्य ठजधिकारमध्ये ठजोऽपवादष्टगधिकि यते गोपुच्छादीन् वर्जयित्वा ।। असमासे निष्कादिभ्यः ५।१।२०॥ आात् इत्येतत् तेन क्रीतम् इति यावत्सप्तदशमञ्यामनुवर्तते । निष्कादिभ्योऽसमासे ठक् आह-येष्वर्थेषु । नैष्किकम् । समासे परिमाणान्तस्याऽसंज्ञाशाणयोः ७।३।१७॥ उत्तरपदवृद्धिः जिदादौ । परमनैष्किकः । असंज्ञा इति किम् । पञ्च कलापाः परिमाणमस्य पाञ्चकलापिकम् । तदस्य परिमाणम् । इति ठन् । असमासग्रहणं ज्ञापकं भवति इत्यतः प्राक्तदन्तविधिः इति । तेन सुगव्यम् यवापूप्यमित्यादि । इत ऊर्ध्वं तु संख्यापूर्वपदानां तदन्तग्रहणं प्राग्यते- रिष्यते तच्चालुकि ॥ पारायणिकः । द्वैपारायणिकः । अलुकि इति किम् । दाभ्यां शूर्पाभ्यां क्रीत द्विशूर्पम् । दिपेण क्रीते शूर्पाद मा भृत् किंतु शताच्च ठन्यतावशते ५।१।२१॥ शतेन क्रीतं शतिकं शत्यम् । अशते किम् । शतं पारमाणमस्य शतकः संघः । इह प्रत्ययार्थी वस्तुतः प्रकृत्यर्थान्न भिद्यते । तेन ठन्यतौ न किंतु कनेव । असमासे इत्येव । द्विशतेन क्रीतं द्विशतकम्।। तु ठञ् ॥ ठञ् । दिशौर्पिकम् ॥

- सुगमकौमुद्याः।। संख्याया अतिशदन्तायाः कन् ५।११२२॥ संख्यायाः कन् आहीयेऽर्थे न तु त्यन्तशदन्तायाः । पञ्चमिः फ्रीतः पञ्चकः वहुकः । त्यन्तायास्तु साप्ततिकः। शदन्ताया: चा. त्वारिंशत्कः॥ वतोरिडा ५।११२३॥ वत्वन्तात्कन् इदा । तावतिकः तावत्कः ॥ विंशतित्रिंशद्यां कुन्नसंज्ञायाम् ५।११२४॥ योगविभागः कर्तव्यः । आभ्या कन् । असंज्ञायां तु हुन्कनोऽ- पवादः । विशकः । त्रिंशकः । संज्ञायां तु विशतिकः। त्रिशतिकः॥ शतमानविंशतिकसहस्रवसनादण् ५। १।२७॥ एभ्योऽण् । ठन्कनामपवादः । शतमानेन क्रीतं शातमानम् । वैशतिक्म् । साहस्रम् । वासनम् ॥ अध्यर्धपूर्वद्विगोलुंगसंज्ञायाम् ५। १।२८।। अध्यर्थपूर्वाद्विगोश्च परस्याहीयस्य लुक् । अध्यर्धकंसम् । द्विकं- सम् । संज्ञायां तु पाञ्चकलापिकम् ।। विभापा कापणसहस्राभ्याम् ५111२९ ॥ लुम्वा । अध्यर्धकापणम् अध्यर्धकापीपणिकम् । द्विका पणम् द्विकार्षापणिकम् । औपसंख्यानिकस्य टिठनो लुक् । प- क्षेऽध्यर्धपणिकम् । विप्रतिकम् । अध्यर्धसहस्रम् अध्यर्धसाहस्रम् । दिसहस्रं । दिसाहस्रम् । इह ठवादयत्रयोदश प्रत्ययाः प्रकृता- स्तेषां ममर्थविभक्तयोऽर्थाश्चाकासितास्त इदानीमुच्यन्ते । तेन क्रीतम् ५। ११३७॥ ठम् । गोपुच्छेन कीतं गौपुच्छिकम् । साप्ततिकम् । मास्थि- कम । ठक् । नैष्किकम् ॥ तस्य निमित्तं संयोगोत्पातौ५।११३८॥ मयोगः संबंधः उत्पातः । शुमाशुमसचकः । शतिकः शत्यो द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ४१७ वा । धनपतिसंयोगः शत्यं शतिकम् । दक्षिणाक्षिस्पन्दनं शतत्य निमित्तमित्यर्थः ॥ वातपित्तश्लेष्मभ्यः शमनकोपनयोरुपसंख्यानम् ॥ वातस्य शमनं कोपनं वा वातिकम् । पैत्तिकम् । श्लैष्मियम् ॥ संनिपाताचेति वक्तव्यम् ॥ सांनिपातिकम् ॥ गोयचोऽसंख्यापरिमाणावादेर्यत् ५।१।३९ ॥ गोनिमित्तं संयोग उत्पातो वा गव्यः । यचः । ध यः । यशस्यः । स्वर्ग्यः । गोयचः किम् । विजयस्य वैजयिकः । असं. ख्या इत्यादि किम् । पञ्चानाम् । पञ्चकम् । सप्तकम् । प्रास्थिम् । खारीकम् । अश्वादि । आश्विकम् । आश्मिकम् ॥ ब्रह्मवर्चसादुपसंख्यानम् ॥ ब्रह्मवर्चस्यम् ॥ पुत्राच्छ च ५।१॥४०॥ चाद्यत् । पुत्रीयः पुत्र्यः॥ सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणंभी५।१४१॥ सर्वभूमेनिमित्तं संयोग उत्पातो वा सार्वभौमः पार्थिवः । सर्व- भूमिशब्दोऽनुशतिकादिपु पठ्यते । तस्येश्वरः२।११४२॥ तत्र विदित इति च ५।१।४३॥ सर्वभूमेरीश्वरः सर्वभूमौ विदितो वा सार्वभौमः पार्थिवः। लोकसर्वलोकाठञ् ५।११४४॥ वत्र विदितः इत्यर्थे । लौकिकः । अनुशतिकादित्यादुभयपद- वृद्धिः । सार्वलौकिकः ॥ । : तस्य वापः५११४५॥

४१८ मुगमकौमुद्याः। उप्यतेऽस्मिन्निति वापः क्षेत्रम् । प्रस्थस्य वापः प्रास्थिकम् । द्रौणिकं । खारीकम् ॥ तदस्मिन्वृद्धयायलाभशुल्कोपदा दीयते ६।१।४७॥ वृद्धिीयत इत्यादि क्रमेण प्रत्येक संबंधादेववचनम् । पश्चा- स्मिन् वृद्धिः । आयः । लाभः । शुल्कम् । उपदा वा । दीयते । पश्चकः । शतिकः । शत्यः । साहस्रः । उत्तमर्णन मूलातिरिक्तं ग्राह्यं वृद्धिः । ग्रामादिषु स्वामिग्राह्यो भाग आयः। विक्रेत्रा मूल्यादः धिकं ग्राह्य लामः। रक्षानिर्देशो राजभागः शुल्कः। उत्कोच उपदा।। चतुर्थ्यर्थ उपसंख्यानम् ॥ पञ्चास्मै वृद्धयादिर्दीयते पञ्चको देवदत्तः । सममब्राह्मणे दानम् इतिवदधिकरणत्वविवक्षा वा ॥ तदस्य परिमाणम् ।।१।२७॥ प्रस्थं परिमाणमस्य प्रास्थिको राशिः ॥ संख्यायाः संज्ञासंघसूत्राध्ययनले ६।१।५८॥ पूर्वसूत्रमनुवर्तते ॥ तत्र संज्ञायां स्वार्थे प्रत्ययो वाच्यः ॥ यहा धेकयोरितिवत्संख्यामात्रवृत्तेः परिमाणिनि प्रत्ययः ।। पञ्चैव पञ्चकाः शकुनयः। पञ्च परिमाणमपामिति वा संघे पञ्चकः। सूत्रेऽष्टकं पाणिनीयम् । संघशब्दस्य प्राणिसमूहे रूढत्वात्सूत्रं पृथगुपात्तम् । पञ्चकमध्ययनम् ।। इति १४५ अंशाः। स्तोमे डविधिः ॥ पञ्चदश मन्त्राः परिमाणमस्य पञ्चदशः । सप्तदशः । एक- विगः । सोमयागेपु छन्दोगैः क्रियमाणा पृष्टयादिसंज्ञिका स्तुति स्तोमः॥ -- द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः । ४१९ पतिविंशतित्रिंशचत्वारिंशत्पञ्चाशत्पष्टिसप्तत्यशी- तिनवतिशतम् ५। ११५९॥ एते रूढिशब्दा निपात्यन्ते ।। तहति ५।११६३॥ लब्धुं योग्यो भवतीत्यर्थे द्वितीयान्ताहादयः । श्वेतच्छत्रम- इति श्वैतच्छत्रिकः॥ शीपच्छेदाद्यच्च ५। १।६५॥ शिरश्छेदं नित्यमर्हति शीर्पच्छेद्यः शेर्पच्छेदिकः । यहकोः सन्नियोगेन शिरसः शीर्षभावो निपात्यते ॥ दण्डादिभ्यो यत् ५।१।६६॥ एभ्यो यत् । दण्डमर्हति दण्डयः । अर्घ्यः । वध्यः ।। कडङ्करदक्षिणाच्छ च ५।१।६९ ॥ चाद्यत् । कडं करोतीति विग्रहेऽत एव निपातनात्खच् । कडंकर मापमुद्गादिकाष्ठमर्हतीति कडंकरीयो गौः कडंकर्यः । दक्षिणाम. ईतीति दक्षिणीयः दक्षिण्यः ।। यज्ञविग्भ्यां घखनौद।१।७१॥ यथासंख्यमायज्ञमृत्विज वार्हति यज्ञियः।आदिजीनो यजमानः।। यज्ञविम्भ्यां तत्कहितीत्युपसंख्यानम् ॥ यज्ञियो देशः। आविजीन ऋत्विक् ॥ इत्याहीयाः ॥ जतः परं ठमेव ॥ पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ६।१।७२ ।। पारायणं वर्तयति पारायणिश्छात्रः । तुरायणं यज्ञविगेपः। तं वर्तयति तोरायणिको यजमानः । चान्द्रायणिकः ।। संशयमापन्नः५।१।७३ ॥ संशयविषयीभूतोऽर्थः साशयिकः ॥

पटिकाः पटिरात्रेण निघुदाब
रात्रशब्दलीपश्च निपात्य यो वाच्यिन्ते ।।
तत्र च दीयते कात्रको धान्यविषाद
घगाय भवत्।।९६
तस्मै प्रभवति सोवा प्रावृषेण्यम् । शाग्डम् ।।
योगाद्यच्च५१तापादिभ्यः५19190
चाह । योगाय प्रमापिकः । सांग्रामिकः ॥
कर्मण उकञ् ५।११०२ ॥
४२०
सुगमकीमुद्याः।
i.
पथः कन् ५।१।७९॥
पो डीपर्यः । पन्थानं गच्छति पथिकः पथिकी ॥
पन्योण नित्यम् ५1१।७६॥
पन्यानं नित्यं गच्छति पान्यः पान्था ।
कालात् ५।१।७८॥
व्युष्टादिभ्योऽण् इत्यतः प्रागधिकारोऽयम् ॥
तेन निवृत्तम् ५।११७९॥
अगा निवृत्तमाह्निकम् ॥
तमधीप्टो भृतो भूतो भावी ५। १
अधीष्टः सत्कृत्य व्यापारितः । भृतो में
स्वसत्तया व्याप्तकालः । भावी तादृश एy
मधीष्टो मासिकोऽध्यापकः । मासं
मासं भूतो मासिको व्याधिः।
वहुवचनमतन्त्रम् ।
प्रापि दीयते कार्य परिते ॥
धिकारः॥
संतापाय प्रभवति सांत
फर्मणे प्रभवति कार्मुकम् ॥
यः यौगिकः॥

द्विता समयस्तदस्य प्राप्तम् ५।३।१०४॥ समयः प्राप्तोऽस्य सामयिकम् ॥ ऋतोरण ५।१।१०५॥ ऋतुः प्राप्तोऽस्य आर्तवम् ॥ उपवस्त्रादिभ्य उपसंख्यानम् ॥ उपयस्ता प्राप्तोऽस्य औपवस्त्रम् । प्राशिता प्राप्तोऽस्य प्राशिवम्।। कालाद्यत् ५।१।१०७॥ कालः प्राप्तोऽस्य काल्यं शीतम् ।। प्रयोजनम् ५। ३१०९॥ तदस्य इत्येव । इन्द्रमहः प्रयोजनमस्य ऐन्द्रमहिकम् । प्रयोजन कलं कारणं च ॥ ऐकागारिकट् चौरे ५।३।११३॥ एकमसहायमगार प्रयोजनमस्य मुमुपिपोः स ऐकागारिकश्चौरः।। आकालिकडायन्तवचने ५।१।१११॥ समानकालावाद्यन्तौ यस्येत्याकालिकः । समानकालस्याकाल आदेशः। आशु विनाशीत्यर्थः । पूर्वदिने मध्याह्नादाउत्पद्य दि- नान्तरे तत्रैव नश्वर इति वा ।। आकालाटुंश्च ॥ आकालिका विद्युत् ।। इति ठषधिकारः॥ तेन तुल्यं किया चेदतिः५।१।११५॥ ब्राह्मणेन तुल्यं ब्राह्मणवदधीते । क्रिया चेत् इति किम् । गुण- तुल्ये मा भूत् । पुत्रेण तुल्यः स्थूलः ॥ तत्र तस्येव ५।१ । ११६॥ मथुरायामिव मथुरावत्सुन्ने प्राकारः । चैत्रस्पेव चित्रवन्मत्रस्य गावः॥

४२२ सुगमझौमुद्याः तहम् ।। १ । ११७ ।। विधिमर्हति विधिवत्पूज्यते । क्रियाग्रहणं मण्डूकप्लुत्यानुवर्तते तेनेह न । राजानमर्हति छत्रम् ॥ तस्यभाषत्त्वतलो५।१।११९॥ प्रकृतिजन्यवोधे प्रकारो भारः। गोभीवो गोत्वं गोता । त्वान्तं क्लीबम् । तलन्तं स्त्रियाम् ॥ आ च त्वात् ५।१।१२०॥ ब्रह्मणस्त्व इत्यतः प्राक्त्वतलावधिनियेते । अपवादः सह समा- वेशार्थ गुणवचनादिभ्यः कर्मणि विधानार्थ चेदम् । चकारो नन- भ्यामपि समावेशार्थः । स्त्रिया भावः स्त्रैणं स्त्रीत्वं स्त्रीता । पौनं पुंस्त्वं पुंस्ता॥ न न पूर्वोत्तत्पुरुपादचतुरसंगतलवणवटयुधकतरसल- सेभ्यः५।१।१२१॥ इतः परं ये भावप्रत्ययास्ते नञ्तत्पुरुषान्न चतुरादीन वर्जयि- त्वा । अपतित्वम् । अपटुत्वम् । नपूर्वात् किम् । वार्हस्पत्यम् । त- त्पुरुषात् किम् । नास्य पटवः सन्तीत्यपटुस्तस्य भाव आपटवम् । अचतुर इति किम् । आचतुर्यम् । आसंगत्यम् । आलवण्यम् । आवश्यम् । आयुध्यम् । आकत्यम् । आरस्यम् । आलस्यम् ॥ पृथ्वादिभ्य इमनिज्या ५।१।१२२॥ बावचनमणादिसमावेशार्थम् ॥ र ऋतो हलादेलघोः ६।१।१६१॥ इलादलंघोकारस्य रस इष्टेमयस्सु॥ टेः६।४।१५५॥ भस्य टेर्लोपः इष्टेमेयस्सु । पृथो वः प्रथिमा पार्थवम् । म्रदि- मा मार्दवम् ॥ वर्णदृढादिभ्यः प्यञ्च५।३।१२३।।

द्वितीयसण्डस्य द्वितीयो मागः । चादिमनिच । शाक्ल्यं शुल्लिमा । दाढर्यम् । पृथुमृदुभृशकश. दृढपरिवृढानामेव रत्वम् । द्रहिमा । पो डीपर्थः । औचिती। याथाकामी ॥ इति १४६ अंशाः। गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ॥ चाद्भावे । जडस्य कर्म भावो वा जाड्यम् । मूहस्य मारः कर्म वा मौढ्यम् । ब्राह्मण्यम् ।। अर्हतो नुम् च ॥ अर्हतो भावः कर्म वा आर्हन्त्यम् आर्हन्ती । ब्राह्मणादिराकृ. तिगणः॥ यथातथयथापुरयोः पर्यायेण ७।३।३१॥ नञः परयोरेतयोः पूर्वोत्तरपदयोः पर्यायेणादेरचो वृद्धिनिंदा- दौ । अयथातथाभाव आयथातथ्यं अयथातथ्यम् । आयथापुर्य अयथापूर्यम् । आपादसमाप्तेर्भावकर्माधिकारः ॥ चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपसंख्यानम् ॥ चत्वारो वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम् । चातुराश्रम्यम् । प्रैस्वर्यम् । पाङ्गु- ण्यम् । सैन्यम् । सान्निध्यम् । सामीप्यम् । औपम्यम् त्रिलोक्य- मित्यादि । सर्वे वेदाः सर्ववेदास्तानधीते सर्ववेदः । सर्वादेः इति चतुर्वेदस्योभयपदवृद्धिश्च ॥ चतुरो वेदानधीते चतुर्वेदः स पब चातुर्वैयः । चतुर्विद्यस्य इ. ति पाठान्तरम् । चतुर्विद्य एव चातुर्वद्यः ।। स्तनाद्यन्न लोपश्च५।१।१२६ ॥ न इति संघातग्रहणम् । स्तेनचार्य पचायन् । स्तनस्य भावः कर्म वास्तेयम् । स्तेनात् इति योग विभज्य स्तन्यमिति व्यन न्तमपि केचिदिच्छन्ति । लुक् । स एव सर्विवैद्यः॥

४२४
सुगमकीमुयाः।
सख्युर्यः५।११ १२६॥
सख्युविः कर्म वा सख्यम् ॥
दूतवणिग्भ्यां च ॥
दूतस्य भावः कर्म वा दूत्यम् । वणिज्यम् इति काशिका ।
माधवस्तु वणिज्याशब्दः स्वभावात्स्त्रीलिङ्गः भाव एव चार प्रत्ययो
नतु कर्मणि इत्याह । भाष्ये तु दूतवणिग्भ्या च इति नास्त्येव ।
ब्राह्मणादित्वाहाणिज्यमपि ॥
कपिज्ञात्योर्डक्२।१।१२७ ॥
कापेयम् । ज्ञातेयम् ॥
पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्५ । ११ १२८ ॥
सेनापत्यम् । पौरोहित्यम् ॥
राजाऽसे ॥
राजशब्दोऽसमासे यकं लमत इत्यर्थः । राज्ञो भावः कर्म वा
राज्यम् । समासे तु ब्राह्मणादित्वात्प्पञ् । आधिराज्यम् ।।
प्राणभृजातिवयोवचनोदात्रादिभ्योऽञ् 41५1१२९ ।।
माणभृजातिः । आश्चम् । औट्रम् । वयोवचनम् । कौमारम् ।
कैशोरम् । औदात्रम् । आन्नेनम् । सौष्ठवम् । दौष्ठवम् ॥
हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ५1१1१३०॥
देहायनम् । हायनम् । यौवनम् । स्थाविरम् ।।
श्रोत्रियस्य यलोपश्च ॥
श्रीनम् । कुदालचपलनिपुणपिशुनकुतुहलक्षेत्रज्ञा युवादिषु प्रा.
झणादिषु च पश्यन्ते । कौशल्यं कौशलमित्यादि ।।
इगन्ताच्च लघुपूर्वात् ५1१1१३१॥
शुवर्भावः कर्म वा शौर्वम् । मौनम् । कथं काव्यम् । कविशन्दस्य
मोपधाद्गुरूपोत्तमादुञ् ५ । १ । १३२ ।।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः। ४२५
रामणीयकम् । आभिधानीयकम् ॥
सहायादा ॐ॥
साहाय्यं साहायकम् ॥
द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च ५। १1१३३॥
शेष्योपाव्यायिका । मानोज्ञकम् ।।
गोत्रचरणाच्लाघात्याकारतवेतेषु ५।१।१३४ ॥
अत्याकारोऽधिक्षेपः । तदवेतस्ते गोत्रचरणयोर्भावकर्मणी
प्राप्तः अवगतवान्वा । गार्गिकया श्लाघते । गार्यत्वेन विकत्थत
इत्यर्थः । गार्गिकयात्याकुरुते । गार्गिकामवेतः॥
होत्राभ्यश्छः५।३ । १३५॥
होत्राशब्दोऽत्र ऋत्विग्याची स्त्रीलिङ्गः। बहुवचनाविशेषग्रहणम् ।
अच्छावाकस्य भावः कर्म वा अच्छावाकीयम् । मैत्रावरुणीयम् ।
ब्रह्मणस्त्वः५।१ । १३६॥
होत्रावाचिनो ब्रह्मशब्दात्त्वः। छस्यापवादः । ब्रह्मत्वं नेति वाच्ये
त्ववचनं तलो वाधनार्थम् । ब्राह्मणपर्यायाद्रह्मन्छन्दात्तु त्वतली ।
ब्रह्मत्वं ब्रह्मता ॥ इति नञ्स्नमधिकारः॥
धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ५।२११॥
भवन्त्यस्मिन्निति भवनम् । मुद्गानां भवनं क्षेत्रं मौद्रीनम् ॥
वीहिशाल्योर्डकू ५।२।२॥
बेहयम् । शालेयम् ।।
यवयवकपष्टिकायत् ५।२।३॥
यवानां भवनं क्षेनं यव्यं यवक्यम् । पष्टिक्यम् ।।
विभापा तिलमापोमाभङ्गाणुभ्यः ५।२।४॥
यद्वा पक्षे खञ् । तिल्यं तैलीनम् । माष्यं मापीणम् । उम्यं
औमीनम् । भङ्गयं माङ्गीनम् । अणव्यं आणवीनम् ॥

- ४२६ सुगमकौमुद्याः। यथामुखसंमुखस्य दर्शनः खः५।२।६॥ मुखस्य सदृशं यथामुखं प्रतिविम्बम् । निपातनात्सादृश्येऽव्य- यीभावः । समं सर्वं मुखं संमुखम् । समशब्दस्यान्तलोपो निपा- त्यते । यथामुखं दर्शनो यथामुखीनः । सर्वस्य मुखस्य दर्शन: संमुखीनः ।। तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्र व्याप्नोति ५।२।७॥ सर्वादः पथ्याद्यन्ताहितीयान्तात्खः । सर्वपथान व्यामोति सर्वपथीनः । सर्वाङ्गीणः । सर्वकर्माणः । सर्वपत्रीणः। सर्वपानीणः॥ आप्रपदं प्राप्नोति ५।२।८॥ पादस्याग्रं प्रपदं तन्मर्यादीकृत्य आप्रपदम् । आप्रपदीनः पटः॥ अनुपदसर्वान्नायानयं वद्धाभक्षयतिनेयेषु५।२।९॥ अनुरायामे सादृश्ये वा । अनुपदं वद्धा अनुपदीना उपानत् । सर्वान्नानि भक्षयति सर्वान्नीनो भिक्षुः । अयानयः स्थलावशेषः । तेनेयोध्यानयीनः शारः ॥ परोवरपरंपरपुत्रपौत्रमनुभवति ५।२।१०॥ पराश्चावराश्चानुभवतीति परोपरीणः। अवरस्योत्वं निपात्यते । पराश्च परतराश्चानुभवति परंपरीणः । प्रकृतेः परंपरभावो नि- पात्यते । पुत्रपौनाननुभवति पुत्रपौत्रीणः । परम्पराशब्दस्तु अव्युत्पन्नं शब्दान्तरं स्त्रीलिङ्गं तस्मादेव स्वायें प्याज पारम्प- र्यम् । क्यं पारो वर्यवदिति असाधुरेव । सप्रत्ययसंनियोगेनैव परो- वंगत निपातनात् ॥ अवारपारात्यन्तानुकामंगामी५॥२॥११॥ असारपार गामी पवारपारीणः । अपारीणः । पारीणः । पारा- वाराणः । अत्यन्तं गामी अत्यन्तीनः । भृशं गन्तेत्यर्थः। अनुकामं गामी अनुमामानः यथेष्ट गन्ता ॥ इति १४७ अंगाः।

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः। ४२७ समांसमां विजायते ५।२।१२॥ यलोपोचशिष्टविभक्तरलुक च पूर्वपदे निपात्यते । समाममीना गौः । समासमीना सायव प्रतिवर्षे प्रसूयते इत्यमरः ।। खप्रत्ययानुत्पत्ती यलोपो वा वक्तव्यः । समासमा पिजायते समाया रामायां वा ॥ अद्यश्वीनावटब्धे ५।२।१३॥ अद्य श्वो वा विजायत जयश्वीना वडवा जामन्नममत्यर्थः । केचित्तु विजायत इति नानुवर्तयन्ति । अद्यश्वीन मरणम् । जासन- मित्यर्थः ॥ आगवीनः ५।२।१४॥ आइपूर्वानोः कर्मकरे सप्रत्ययो निपात्यते । गोमत्यर्पणपति यः कर्म करोति स आगवीनः ।। अनुग्वलंगामी६।२।१५॥ अनुगु गोः पश्चात्पर्याप्तं गच्छति अनुगवीनो गौपाला अध्धनोः यत्खौ ५।२।१६।। अध्वानमलं गच्छति अधन्यः अध्वनीनः ।। ये चाभावकर्मणोः॥ आत्मावानौ खे इति सूनाभ्या प्रकृतिभावः ।। अभ्यमित्राच्छ च ५।२।१७ ॥ चायत्खौ । अभ्यमित्रीयः अभ्यमिन्य अभ्यमित्रीणः । अमि- प्राभिमुखं मुमु गच्छतीत्यर्थः॥ गोष्ठात्ख भूतपूर्व ५।२।१८॥ गोष्ठो भूतपूर्वः। गौष्ठीनो देगः ॥ अश्वस्यैकाहगमः५।२॥ १९॥ यकाहेन गम्यत इत्येकाहगम आश्वीनोभ्या ।। .

सुगमकीमुद्याः। शालीनकौपीने अधृष्टाकार्ययोः५१२॥२०॥ शालाप्रवेशमईति शालीनोऽधृष्टः । कूपपतनमर्हति कौपीनं पापम् । तत्साधनत्वाचनोप्यत्वात्पुरुपलिङ्गमपि तत्संबन्धात्तदा- च्छादनमपि ॥ बातेन जीवति ५॥२॥२॥ वातेन शरीरायासेन जीवति नतु बुद्रिवभवेन स जातीनः ।। साप्तपदीनं सस्यम् ५।२१२२॥ सप्तभिः पदैरवाप्यते नाप्तपदीनम् ॥ हेयंगवीनं संज्ञायाम् ५॥२॥२३॥ ह्योगोदोहस्य हियङ्गुरादेशी विकारार्थ खञ्च निपात्यते । दुह्यत इति दोहः क्षीरम् । ह्योगोदोहस्य विकारो हैयङ्गवीनं नवनीतम् ।। तस्य पाकमूले पील्लादिकर्णादिभ्यः कुणब्जाहचौ ५।२॥२४॥ पीलूनां पाकः पीलुकुणः । कर्णस्य मूलं कर्णजाहम् ॥ पक्षात्तिः५१२॥२५॥ मूलग्रहणमात्रमनुवर्तते । पक्षस्य मूलं पक्षतिः ॥ तेन वित्तश्च प्रचणपो ५।२।२६॥ यकारः प्रत्यययोरादी लुप्तनिर्दिष्टस्तेन चस्य नेत्संज्ञा । विद्यया वित्ती विधचचुः विद्यापणः ॥ विनम्भ्यां नानाभो न सह ५॥२॥२७॥ असहाथै पृथग्माचे वर्तमानाभ्यां स्वार्थे मत्यया । विना । नाना॥ वेः शालच्छष्टचीदा२॥२८॥ क्रियाविशिष्टसाधनवार्थकात् स्वार्थे । विस्तृतम् । विशालम् । विशाटम् ।। संप्रोदश्च कटप ५१२१२९॥

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो मागः । संकटम् । प्रकटम् । उत्कटम् ।। अलावृतिलोमाभङ्गाभ्यो रजस्युपसंख्यानम् ॥ अलाबूनां रजः अलाबूकटम् ॥ गोष्टजादयः स्थानादिपु पशुनामभ्यः ॥ गवां स्थानं गोगोष्ठम् ॥ संघाते कटच॥ अवीनां संघातोऽविकटः ॥ विस्तारे पटच ॥ अविपटः ॥ द्वित्वे गोयुगच् ॥ द्वापुरी गोयुगम् ॥ पढ्त्वे पङ्गवच् ॥ अश्वपङ्गवम् ॥ स्नेहे तैलच ॥ तिलतैलम् । सर्पपतलम् ॥ भवने क्षेत्रे शाकटशाकिनी ॥ इक्षुशाकटम् । इक्षुशाकिनम् ।। अबात्कुटारच५।२।३०॥ चात्कटम् । अवाचीनोग्नकुटारः । अवकटः ॥ नते नासिकायाः संज्ञायां टीटनाटभ्रटचः॥२॥३१॥ अवात् इत्येव । नतं नमनम् । नासिकाया नत अवटीटम् अपनाटम् अवभ्रटम् । तद्योगान्नासिकावटीटा । पुरुपोऽप्यवटीटः।। नेविडज्विरीसचौ५१२॥३२॥ निविडम् । निविरीसम् ॥ इनपिटच्चिकचि च५।२।३३॥

सुगमकौमुद्या। नेः इत्येव । नासिकाया नतेभिधेये इनपिटचौः प्रत्ययौ प्रकृ. तेशिकचीत्यादेशौ च ॥ कप्रत्ययचिकादेशौ च वक्तव्यौ । चिकिनम् । चिपिटम् । चिकम् ।। क्किन्नस्य चिल्पिलश्चास्य चक्षुपी॥ क्लिन्ने चक्षुषी अस्य चिल्लः । पिलः ॥ चुल च॥ चलः॥ उपाधिभ्यां त्यकन्नासनारूढयोः ५१२१३४॥ संज्ञायाम् इत्यनुवर्तते । पर्वतस्यासन्नं स्थलमुपत्यका । आरूढ़ स्थलमधित्यका॥ कर्मणि घटोऽठच ५।२॥३५॥ घटत इति घटः। पचाधर । कर्मणि घटते कर्मठः पुरुषः॥ तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच ५।२।३६ ॥ तारकाः संजाता अस्य तारकित नभः । आकृतिगणोऽयम् ।। प्रमाणे द्वयसज्दन मात्रचः९।२।३७ ॥ तदस्य इत्यनुवर्तते । उरु प्रमाणमस्य ऊरुदयसम् ऊरुदनम ऊरुमात्रम् ॥ प्रमाणे लः॥ गमः । दिष्टिः । वितरितः॥ द्विगोनित्यम् ॥ द्वादशमी प्रमाणमस्य द्विशमम् ॥ प्रमाणपरिमाणाभ्यां संख्यायाश्चापि संशये मात्रज्व ..॥ सममात्रम् । म्यमानम् । पश्चमात्रम ।।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः ।
वत्वन्तात्स्वार्थे द्वयसज्मावची बहुलम् ॐ ॥
तावदेव तावड्यसम् । तावन्मात्रम् ।।
पुरुपहस्तिभ्यामण्च ५।२।३८॥
पुरुपः प्रमाणमस्य पौरुषं पुरुपद्रयसम् । हास्तिनं हस्तिद्वयसम्॥
यत्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप् ५।२।३९ ॥
यत्परिमाणमस्य यावान् । तावान् । एतावान् ॥
किमिदंभ्यां वोपः ५।२।४० ॥
आभ्यां वतुप्स्यावस्य च घः। कियान् । इयान् ॥
किमः संख्यापरिमाणे डति च ५।२।११॥
चाहतुप् तस्य च वस्य घः। काःसंख्या येपान्ते काते कियन्तः।।
संख्याया अवयवे तयप् ॥
पञ्चतयम् ॥
द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्या॥
दयं द्वियतम् । वयं त्रियतम् ॥
उभादुदात्तो नित्यम् ।।२।४४॥
उभशब्दात्तयपोऽयच् स चायुदात्तः । उभयम् । वृत्तिविषये
सर्वत्र नित्यम् । उभयसुखम् ॥
इति १४८ अंशाः।
तदस्मिन्नधिकमिति दशान्ताड्डः ५।२।१५ ।।
एकादशाधिका अस्मिन्नेकादशं शतम् ॥
शतसहस्रयोरेवेप्यते ॥
नेह । एकादशाधिका अस्यां विंगती॥
प्रकृतिप्रत्ययार्थयोः समानजातीयत्व एवेप्यते ॥
नेह । एकादश मापा अधिका अस्मिन्सुवर्णशते ।।

४३२
सुगमकौमुद्याः।
अथ पूर्वखण्डोक्तसंख्यापूरणमकरणशेपः ॥
बहुपूगगणसंघस्य तिथुक् ५।२१५२॥
डटि पूगसंघयोरसंख्यात्वेऽप्यत एव डट् । बहतिय इत्यादि ।।
वथोरिथुक् ५।२१५३॥
डटि । यावतिथः॥
नित्यं शतादिमासार्धमाससंवत्सराच्च ५।२।५७॥
शतस्य पूरणः शततमः । एकशततमः । मासादेरत एव उद्।
मासतमः ॥
पष्टयादेश्वासंख्यादेः५।२।५८॥
पष्टितमः । संख्यादेस्तु विंशत्यादिभ्यः इति विकल्प एव ।
एकपष्टः एकपष्टितमः इति ॥
तत्र कुशलः पथः५।२१६३ ॥
वुन् । पथि कुशलः पथिकः ॥
स्वाभ्यः प्रसिते ५।२।६६ ॥
कन् केशेषु प्रसितः केशकः केशरचनातत्परः ॥
उदराठगाधूने ५।२।६७॥
अविजिगीपौ ठक् । कनोऽपवादः । बुभुक्षयात्यन्तपीडित उदरे
प्रतित आदरिकः । आयूने किम् । उदरकः । उदरपरिमार्जनादी
असक्त इत्यर्थः ।।
तन्वादचिरापहृते ५।२१७०॥
तंत्रकः पटः । प्रत्यन इत्यर्थः ।।
ब्राह्मणकोणिके संज्ञायाम् ५।२।७१॥
आयुधजीविनो ब्राह्मणा यस्मिन्देशे स ब्राह्मणकः । अल्पमन्न
यस्यां सा उष्णिका यवागृ: । अन्नशब्दस्योष्णादेशी निपात्यते ।।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । शीतोष्णाभ्यां कारिणि ५१२।७२।। शीतं करोतीति शीतकोऽलसः । उष्णं करोतीत्युष्णकः शी. घ्रकारी॥ अधिकम् ५।२।७३॥ अध्यारूढशब्दात्कनुत्तरपदलोपश्च ।। अनुकाभिकाभीका कमिताद।२।७४ ।। अन्वमिभ्या कन्नभेः पाक्षिको दीर्घश्च । अनुकामयते अनुकः । अभिकामयतेभिकः अमीकः ।। पार्श्वनान्विच्छति ५।२।७५ ।। अनृजुरुपायः पार्थं तेनान्विच्छति पार्श्वकः ॥ अयःशूलदण्डाजिनाभ्यां उक्ठभौ ५।२१७६ ॥ तीक्ष्ण उपायोग्यःशूलं तेनान्विच्छति आयःशूलिकः साह- सिकः । दण्डाजिनं दम्मः तेनान्विच्छति दाण्डाजिनिकः ।। शृङ्खलमस्य बन्धनं करभे५।२ । ७९ ॥ शृहलका करमः॥ उत्क उन्मनाः५।२।८०॥ उद्गतमनस्कवृत्तेरुच्छन्दात्स्वार्थ क्न् उत्कः उत्कण्ठितः ।। कालप्रयोजनाद्रोगे ५१२८१॥ कालवचनात्प्रयोजनवचनाच कन् रोगे । द्वितीयेऽहनि भयो द्वितीयको ज्वरः । प्रयोजनं कारणं रोगस्य फलं वा । विषपुष्पैर्ज- नितो विषपुष्पकः । उष्णं कार्यमस्य उष्णकः । रोगे किम् । द्वितीयो दिवसोऽस्य ॥ श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते ५।२।८४॥ श्रोत्रियः।वा इत्यनुवृत्तेश्छान्दसः ॥ श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनो ५।२।८५॥

४३४ सुगमकौमुद्याः। श्राद्री श्राद्धिकः॥ पूर्वादिनिः५।२।८६॥ पूर्व कृतमनेन पूर्वी ॥ सपूर्वाच्च ५।२।८७॥ कृतपूर्वी ॥ इष्टादिभ्यश्च ५।२।८८॥ इष्टमनेन इष्टी । अधीती॥ छन्दसि परिपन्थिपरिपरिणौ पर्यवस्थातरिदा२।८९॥ लोके तु परिपन्थिशब्दो न न्याय्यः ॥ अनुपद्यन्वेष्टा ६।२।९०॥ अनुपदमन्वेष्टा गवामनुपदी । साक्षादृष्टरि संज्ञायाम् ५।२१९१॥ साक्षाद्या साक्षी ॥ क्षेत्रियच परक्षेत्रे चिकित्स्यः ५।२।९२ ॥ क्षेत्रियो व्याधिः । शरीरान्तरे चिकित्स्यः अप्रतिकार्य इत्यर्थः।। इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुएमिन्द्र- दत्तमिति वा२।२।९३॥ इन्द्र आत्मा तस्य लिङ्ग करणेन कर्तुरनुमानात् । इतिशब्दः प्रकारार्थः । इन्द्रेण दुर्जयमिन्द्रियम् ।। अथ मत्वर्थीयप्रकरणशेषः । भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगे:- विशायने सम्बन्धेऽस्ति विवक्षायां भवन्तिमतुबादयः ॥ अस्तिवि- वक्षायां ये मतुवादयो विधीयंते ते भूमादिषु विषयेषु भवतीति वार्तिकार्थः । भून्नि-गोमाव । यवमान् । निन्दायाम-ककुदावर्तिनी कन्या। प्रशंसा-रूपवान् । नित्ययोगे सीरिणो वृक्षाः । अति- पिने-उदरणी कन्या। संसर्गे । दण्डी-संसर्गः संयोगः तेन द्वितीयखण्डस्य द्वितीय भागः । दण्डीति संयुक्त दण्ड एवोच्यते नतु गृहावस्थितदंडोपि । बसो सम्प्रसारणम् । विदुष्पान् । तसौ मत्वर्थ इति मत्यम् ।। गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः ॥ शुक्लो गुणोऽस्यास्तीति शुक्ल: पटः । कृष्णः । संज्ञायाम् ८।२।११॥ मतोमस्य वः। अहीवती । मुनीवती। शरादीनां च इति दीर्घः।। आसन्दीवदष्टीवच्चक्रीवत्कक्षीवद्रुमण्वचर्मण्यती ८।२।१२ एते पट् संज्ञायां निपात्यन्ते । आसनशब्दस्यासन्दीभावः । आसन्दीवान् ग्रामः । अन्यत्रासनवान् । अस्थिशब्दस्याष्ठीभावः । अष्ठीवान् । अस्थिमानन्यत्र । चकशब्दस्य चक्रीभावः । चक्री- वान्नाम राजा । चक्रवानन्यत्र । कक्ष्यायाः संप्रसारणम् । कक्षीवा- नामर्षिः। कक्ष्यावानन्यत्र । लवणशब्दस्य रुमण्भावः। रुमण्वान्नाम पर्वतः । लवणवानन्यन । चर्मणो नलोपाभावोणत्वं च । चर्मण्वती नाम नदी । चर्मवत्यन्यत्र ॥ उदन्धानुदधौ च ८।२।१३॥ उदकस्योदन्भावो मतायुदधौ संज्ञायां च । उदन्यान्समुद्र ऋषिश्च ॥ राजन्वान्सौराज्ये ८।२।१४॥ राजन्वती भृः । राजवानन्यत्र॥ इति १४९ अंशाः । सिध्मादिभ्यश्च ५।२।९७॥ लज्या । सिध्मलः सिध्मवान् । अन्यतरस्यां ग्रहणं मतुप्समुच्च- यार्य नतु प्रत्ययविकल्पार्थम् । तेनाकारान्तेभ्य इनिठनौ न ॥ वातदन्तवलललाटगलानामूच॥ वातूलः ॥

मुगमकीमुद्याः। अर्णवः॥ गाण्ड्यजगात्संज्ञायाम् ५।२।११०॥ हवदीर्घयोर्यणा तन्त्रेण निर्देशः । गाण्डिवम् । गाण्डीवमर्जुः नस्य धनुः । अजगवं पिनाकः ॥ काण्डाण्डादीरनीरचौ९।२।१११॥ काण्डीरः । आण्डीरः॥ रजःकृप्यासुतिपरिपदो वलच् ५।२१११२॥ रजस्वला स्त्री । कृपीवलः । वले इति दीर्घः । आमुतीवलः । शौण्डिकः । परिषदलः । पर्पत् इति पाठान्तरम् । पर्पदलम् ॥ अन्येभ्योऽपि दृश्यते ॥ भ्रायल शत्रुवलः। वले इत्यत्र संज्ञायाम् इत्यनुवृत्तेर्नेह दीर्घः॥ दन्तशिखात्संज्ञायाम् ५१२।११३ ॥ दन्ताक्लो हस्ती। शिसारला केकी ।। ज्योत्स्नातमिस्राङ्गिणोर्जस्विन्नूर्जस्वलगोमिन्मलिन- मलीमसाः५१२।११४॥ मत्वर्थे निपात्यन्ते । ज्योतिष उपधालोपो नश्च प्रत्ययः ।ज्यो- स्ना। तमस उपाधाया इत्वं रचा तमित्रा । स्त्रीत्वमतन्त्रम्। तमि- मम् । शृङ्गादिनन् । शृङ्गिणः। ऊर्जसो वलच । तेन वाधा मा भूः दिति विनिरपि । ऊर्जस्वी उर्जस्वलः । ऊजोऽसुगाम इति वृत्तिस्तु चिन्त्या। उर्जस्वती इतिवदसुन्नन्तेनैवोपपत्तेः । गोशब्दामिनिः । गोमा । मलशब्दादिनस् । मलिनः। ईमसच्च । मलीमसः ।। अत इनिठनौ ५।२।११५॥ दण्डी दण्डिकः । एक्स्वरात कृतो जाते मातम्याच न तो स्मृ- तो। एकाक्षरात्-सवाद । कृता-कारखान् । जाते:-व्याघ्रवान् । सप्तम्यां-दण्डोऽस्त्यस्या सा दण्डवती शाला। कचित्कृतो जाते. श्वापि भवति । कार्यों कार्यिकः । तण्डली तण्डुलिकः ।। - ।

द्वितीयसण्डस्य द्वितीयो भागः। बीह्यादिभ्यश्च ५।२।११६॥ - बीही ब्रीदिकः । नच सर्वेभ्यो ब्रीझादिभ्य इनिटनापिष्यते । तहिं शिखामालासंज्ञादिभ्य इनिः। यखदादिभ्य इकः। अन्येम्य उभयम् ॥ तुन्दादिभ्य इलच ५।२।११७॥ चादिनिठनी मतुप च । तुन्दिलः तुन्दी तुन्दिकः तुन्दवान् । उदरपिचण्डयवव्रीहि ॥ स्वाङ्गादिवृद्धी ॥ विवृध्युपाधिकात्स्याङ्गवाचिन इलजादयः । विवृद्धी कर्णी यस्य स कर्णिलः कर्णी कर्णिकः कर्णवात् ॥ रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् ५।२।१२० ।। आहतं रूपमस्यास्तीति रूप्यः कापीपणः । प्रशस्त स्पमस्या- स्तीति रूप्यो गौः । आहत इति किम् । रूपवान् ।। अन्येभ्योऽपि दृश्यते ॥ हिम्याः पर्वताः । गुण्या ब्राह्मणाः । अस्मायेति विनिः किन्न- न्तत्त्वात्कुः । सग्वी॥ आमयस्योपसंख्यानं दीर्घश्च ॥ भामयावी॥ शृङ्गवृन्दाभ्यामारकम् ॥ शृङ्गारकः । वृन्दारकः ।। फलबहाभ्यामिनच *॥ फलिनः । वहिणः ॥ हृदयाञ्चालुरन्यतरस्याम् । इन्ठनी मतुप् च । हृदयालु हृदयी हृदयिकः हृदयवान् ॥ इति १५० अंशाः । इति चतुर्याध्यायस्य तृतीयः पादः ।

मुगमकीमुयाः। शीतोष्णतप्रेभ्यस्तदसहने ॥ शीतं न सहते शोतालुः । उष्णालुः । स्फायितचि इति रक् । तृपः पुरोडाशः । तं न सहते तृपालुः। तृमं दुःखम् इति माधवः ।। हिमाञ्चलुः ॥ हिम न सहते हिमेलुः ॥ वलादूलः ॥ बलं न सहते बठूलः ॥ वातात समूहे च ॥ वातं न सहते वातस्य समूहो वा वातूलः ॥ तपर्वमरुद्रयाम् ॥ पर्वत: मरुत्तः ॥ जाया युम् ५।२।१२३॥ सित्वात्पदत्वम् । उर्णापुः। अत्र छन्दसि इति केचिदनुवर्तयन्ति । युक्तं चैतत् । अन्यथा हि अशुभमोः इत्यत्रवोर्णाग्रहणं कुर्यात् ।। वाचो ग्मिनिः५१२।१२४॥ घाग्रमी गदयवान् ॥ आलजाटचो बहुभापिणि ५।२। १२५ ॥ कुत्सित इति वक्तव्यम् । कुत्सितं बहु भापते वाचालः वा- चारः। यस्तु सम्पम्बहु मापत्ते स वाग्मीत्येव ।। स्वामिनेश्वर्ये ५।२११२६॥ ऐश्वर्यवाचकात्स्वदशम्दान्मत्वर्थे आमिनन् । स्वामी । अर्शआदिभ्योऽन् ५॥२॥ १२७॥ अशोत्यस्य विद्यन्ते अर्शसः । आकृतिगणोऽयम् ॥ इन्द्रोपतापगात्प्राणिस्थादिनिः५।२।१२८॥ इन्द्रः । कटकालयिनी । शमपुरिणी । उपतापो रोगः ।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः। कुष्ठी । किलासी । गर्यो निन्द्यम् । कसदावर्ती । काक्तालुकी । प्राणिस्थात् किम् । पुष्पफलवान् घटः ।। प्राण्यगान ॥ पाणिपादवती । अतः इत्येव । चित्रकललाटिकावती। सिद्ध प्रत्यये पुनर्वचनं ठनादिवाधनार्थम् ।। वातातीसाराभ्यां कुक् च ५।२।१२९॥ चादिनिः । वातकी। अतीसारकी ।। रोग चायमिष्यते ॥ नेह वातवती गुहा ॥ पिशाचाच्च॥ पिशाचकी ॥ वयसि पूरणात् ५।२११३०॥ पूरणप्रत्ययान्तान्मत्वर्थ इनिः वयसि द्योत्ये । मासः संवत्सरो वा पञ्चमोऽस्यास्तीति पञ्चम्युष्टः । ठन्वाधनार्थमिदम् । वयसि किम् । पञ्चमवान् ग्रामः ॥ सुखादिभ्यश्च ५।२।१३१ ।। इनिर्मत्वर्थे । सुखी । दुःखी । मालाक्षेपे* ॥ माली ॥ धर्मशीलवर्णान्ताच्च ६।२।१३२ ॥ धर्माद्यन्तादिनिर्मत्वर्थे । ब्राह्मणधर्मी । ब्राह्मणशीली । ब्राह्मण- वर्णी ॥ इस्ताज्जातौ ५।२।१३३ । हस्ती । जाती किम् । हस्तवान्पुरुषः॥ वर्णाद्ब्रह्मचारिणि ५।२।१३४ ॥

४४२
सुगमकीमुद्याः।
वणीं।
पुष्करादिभ्यो देशे ५।२।१३५॥
पुष्करिणी पद्मिनी । देशे किम् । पुष्करवान्करी ।।
वाहूरुपूर्वपदादलात् ॐ ॥
बाहुवली । ऊरुवली ॥
सर्वांदेश्व*॥
सर्वधनी । सर्ववीर्जी ॥
अर्थाच्चाऽसंनिहिते ॥
अर्थी । संनिहिते तु अर्थवान् ॥
तदन्ताच॥
धान्यार्थी । हिरण्यार्थी ॥
बलादिभ्यो मतुवन्यतरस्याम् ५।२। १३६॥
बलवान वली । उत्साहवान् उत्साही ॥
संज्ञायां मन्माभ्याम् ५।२। १३७॥
मन्नन्तान्मान्तचिनिर्मत्वर्थे । प्रथिमिनी । दामिनी । होभिनी।
सोमिनी । संज्ञाया किम् । सोमवान् ॥
कंशंभ्यां वभयुस्तितुतयसः५।२। १३८॥
क्म् गम् इति मान्ती । कम् इत्युदकमुखयोः। शम् इति सुखे ।
आभ्या सप्त प्रत्ययाः । युस्यसोः सकारः पदत्वार्थः। कंवः।
भः । युः । कतिः। तुः। कंतः । कंयः। शवः । शंमः शंयुः।
गतिः। गंतुः गंतः । शंयः । अनुस्वारस्य वैकल्पिकः परसवर्णः ।
वसरयारपरस्यानुनासिरा वयो।
तुन्दिवलिपटेर्भः५।२। १३९ ॥
गृटा नामिस्तुन्दिः । मूर्धन्योपधोऽयम् इति माधवः । तुन्दिमः।
। यटिमः । पामादित्वादलिनोऽपि ।।
-

यतः। ततः । अतः । इतः। अमुतः। बहुतः । यादेस्तु द्वाभ्याम् ।। किंसर्वनामवहुभ्यः परस्य तसेस्तमिलादेशः। स्वरार्थ विभक्त्यय द्वितीयसण्डस्य द्वितीयो भागः। ४४३ अहंशुभमोर्युस् ५।२।१४०॥ अहम् इति मान्तमव्ययमहंकारे । शुभमिति शुभे । अहंयुः आई- कारवान् । शुभंयुः शुमान्चितः ।। प्राग्दिशो विभक्तिः ५।३।१॥ दिक्छन्देभ्य इत्यतः प्राग् वक्ष्यमाणाः प्रत्यया रिमक्तिमंजाः ॥ अथ स्वार्यिकाः प्रत्ययाः । समर्थानाम् इति प्रयमात् इति च निवृत्तम् । वा इति त्वनुवर्तत एव ।। किंसर्वनामबहुभ्योऽध्यादिभ्यः५।३।२॥ किमः सर्वनाम्रो बहुशब्दाचेति माग्दिशोधिक्रियते ॥ इदम इश५।३।३॥ माग्दिशीये परे । इशोऽपवादः ।। एतेतौ रथोः५।३।४॥ इदम एत इत इत्येती स्तः रेफय कागदी प्राग्दिव्यतीये परे। एतदोऽन् ५।३।५॥ योगविभागः कर्तव्यः। एतदः। पतेती स्तो ग्योः। अन् । एतदः इत्येव । जनेकाल्वात्सर्वादेशः । नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ॥ सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि५।३।६॥ प्राग्दिशीये दकारादी प्रत्यये परे सर्वस्य सो वा ॥ पञ्चम्यास्तसिल् ५।३१७॥ पञ्चम्यन्तेभ्यः किमादिभ्यस्तसिर वा ॥ कु तिहोः ७।२।१०४॥ किमः कु स्यात् ताटो हादौ च विभक्ती परतः। कुतः कम्मात् । तसेश्च ५।३।८॥ च वचनम् ॥

४४४ सुगमकौमुद्याः। पर्यभिभ्यां च ५॥३॥९॥ आभ्यां तसिल ।। सर्वोभयार्थाभ्यामेव ॥ परितः सर्वत इत्यर्थः । अभितः । उभयत इत्यर्थः ॥ सप्तम्यास्त्रल् ५।३।१०॥ कुत्र । यत्र । तत्र । बहुत्र । इदमोहः५।३।११॥ त्रलोऽपवादः । इशादेशः । इह ।। किमोऽत् ५।३।१२॥ वाग्रहणमपकृश्यते । सप्तम्यन्तात्किमोटा पक्षे त्रम् ॥ काति ७१२ १०५॥ किमः कादेशः अति । क । कुत्र ॥ वाऽह च च्छन्दसि ५।३।१३॥ कह स्थः । कुह जग्मथुः ॥ इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ।।३।१४।। पञ्चमीसप्तमीतरविमत्यन्तादपि तसिलादयो दृश्यन्ते । दृशि- ग्रहणादवदादियोग एव । सभवान् । ततोभवान् । तत्रभवान् । तंभवन्तम् । ततोभवन्तम् । तत्रभवन्तम् एवं दीर्घायुः । देवानां- प्रियः । आयुष्मान् ॥ सर्वेकान्यकियत्तदः काले दा५।३।१५॥ सप्तम्यन्तेभ्यः कालार्थेभ्यः स्वार्थे दा । सर्वस्मिन् काले सदा । सर्वदा । एकदा । अन्यदा । यदा । कदा । तदा । काले किम् । सर्वत्र देशे ॥ इदमोहिल् ५।३।१६॥ सप्तम्यन्तात्काले इत्येव । हस्यापवादः। अस्मिन् काले एतहि । काले किम् । इह देशे ॥ क ४४५ मकारवृत्तिभ्यः किमादिभ्यस्थाल् खार्थे । तेन प्रकारेण द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो मागः । अधुना ५।३।१७॥ इदमः सप्तम्यन्तात्कालवाचिनः स्वार्थऽधुनाप्रत्ययः । इश । स्य इति लोपः। अधुना ॥ इति १५१ अंशाः। दानी च ५।३।१८॥ इदानीम् ॥ तदो दा च ५।३।१९॥ तदा तदानीम् । तदो दावचनमनर्थकं विहितत्वात् ।। अनद्यतनेहिलन्यतरस्याम् ५।३।२१ ॥ काहे कदा । यहि यदा । तर्हि तदा । एतस्मिन्काल एतहि ॥ सद्यः परुत्परायेपमः परेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येधुरन्यतरेयु- तरेयुरपरेधुरधरेधुरुभयेधुरुत्तरेयुः ६।३।२२॥ एते निपात्यन्ते । समानस्य समावो यश्चाहनि । समानेऽहनिः यः । पूर्वपूर्वतरयोः परः । उदारी च संवत्सरे । पूर्वस्मिन् वत्सरे छत् । पूर्वतरे वत्सरे परारि । इदम इर् समसण प्रत्ययश्च । संवत्स- । अस्मिन्संवत्सरे ऐपमः । परस्मादेद्यव्यहनि परस्मिन्नहनि परे- वि । इदमोऽश द्यश्च । अस्मिन्नहनि अद्य । पूर्वादिभ्योऽष्टभ्योऽहन्ये- म् । पूर्वस्मिन्नहनि पूर्वेयुः । अन्यस्मिन्नहनि अन्येयुः । उभयो. सोरुभयेयुः॥ धुश्चोभयादक्तव्यः * ॥ प्रकारवचने थाल् ५।३।२३ ॥ उभयद्युः॥ [था। यथा ॥ इदमस्थमुः५।३।२४॥

सुगमकौमुद्याः। . थालोऽपवादः॥ एतदो वाच्यः ॥ अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्यम् ।। किमश्च५।३१२५॥ केन प्रकारेण कथम् ॥ इति १५२ अंशाः। दिक्छन्देभ्यः सप्तमीपञ्चमीप्रथमाभ्योऽदिग्देशकाले- प्वस्तातिः२।३।२७॥ मप्तम्याद्यन्तेभ्यो दिशि रूढेभ्यो दिग्देशकालवृत्तिभ्यः स्वा- यस्तातिप्रत्ययः॥ पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्चैपाम् ५।३।३९॥ एभ्योऽस्तात्यर्थेसिपत्ययः । तद्योग चैपां क्रमात् पुरः अध अबू इत्यादेशाः ।। अस्ताति च ५।३।१०॥ अस्ताती परे पूर्वादीनां पुरादयः । पूर्वस्यां पूर्वस्याः पूर्वा वा दिक पुरः पुरस्तात् । अधः अधस्तात् । अबः अवस्तात् ॥ विभापाऽवरस्य ५॥३॥४१॥ अपरस्पास्तादौ परेऽन् स्पादा । अवस्तात् अवरस्तात् । एवं देशे काले च । दिशि रूढभ्यः किम् । ऐद्रयां वसति । सप्तम्याद्य न्तेभ्यः किम् । पूर्व प्रामं गतः। दिगादिवृत्तिभ्यः किम् । पूर्व- स्मिन् गुरी वसति । अस्ताति च इति ज्ञापकादसिरस्तानि न बाधते ॥ दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् ५।३।२८॥ अस्तातेरपवादः । दक्षिणतः । उत्तरतः ॥ विभाषा परावराभ्याम् ५।३।२९।।।

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द्वितीयखण्डस्य इताया भागः।
परतः । अवरतः। परस्तात् । अवरस्तात् ॥
अञ्चेलृक् ५।३।३०॥
अश्वत्यन्तादिक्छन्दादस्तातेलुं । लुक्तद्धितलुकि । प्राच्या
पाच्याः प्राची वा दिक् प्राक् । उदक । एवं देशे काले च ।।
उपर्युपरिष्टात् ५।३।३१॥
अस्तातेर्विपये ऊर्ध्वशब्दस्योपादेशः रिलिरष्टातिलौ च प्रत्ययो ।
उपरि उपरिष्टादा वसति आगतो रमणीयं वा ।।
पश्चात् ५।३।३२॥
अपरस्य पश्चभाव आतिश्च प्रत्ययोऽस्तातेर्विपये ॥
उत्तराधरदक्षिणादातिः५।३।३४॥
उत्तरात् । अधरात् । दक्षिणात् ॥
एनवन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः५।३।३५॥
उत्तरादिभ्य एनब्वा स्यादवध्यवधिमतोः सामीप्ये पञ्चम्यन्तं
विना । उत्तरेण । अधरेण । दक्षिणेन । पक्षे यथास्वं प्रत्ययाः ।
इह केचिदुत्तरादीनननुवर्त्य दिक्छन्दमात्रादेनपमाहुः । पूर्वेण ग्रा-
मम् । अपरेण ग्रामम् ॥
दक्षिणादाच ५।३।३६॥
अस्तातर्विपये । दक्षिणा वसति । अपञ्चम्याः इत्येव । दक्षि-
णादागतः॥
आहि च दूरे ५।३।३७॥
दक्षिणाहूरे आहिः स्यात् चादाच । दक्षिणाहि दक्षिणा ।।
उत्तराच्च ५।३।३८॥
उत्तराहि उत्तरा॥
संख्याया विधार्थे धा ५।३।४२॥
चतुर्धा । पञ्चधा॥

४४८ सुगमकौमुद्याः। अधिकरणविचाले च ५।३।१३॥ द्रव्यस्य संख्यान्तरापादने संख्याया था । एक राशि पञ्चधा एकादो ध्यमुभन्यतरस्याम् ५।३1४४ ॥ ऐकध्यम् एकधा॥ द्वियोश्च धमुम्।।३।४५॥ आभ्या धा इत्यस्य धमुञ् वा । दैध विधा । त्रैधं विधा। धमुजन्तात् स्वार्थे डदर्शनम् । पथि वैधानि ॥ एधाच५।३।१६॥ देधा । धा। याप्ये पाशप्५।३।१७॥ कुत्सितो मिपक् भिपक्पाशः ॥ एकादाकिनिचासहाये ६।३।५२॥ 'घात्कन्लुकौ । एका एकाकी एककः ॥ भूतपूर्वे चरट् ५।३१५३॥ आढ्यो भूतपूर्व आदयचरः । अनिशायने । लघुतमः लघिष्ठः ।। अजादी गुणवचनादेव ५।३१५८॥ इठनीयसुनौ । गुणवचनादेव । प्रथिष्ठः प्रथीयान् । नेह । पाच- कतरः । पाचकतमः ।। तुश्छन्दसि ५१३१५९॥ दन् । सृजन्तादिष्ठन्नीयसुनौ। तुरिटेमेयासु ६।१।१५४॥ हशम्दस्य लोपः इष्टेयेयासु परेषु । अतिशयेन कर्ता करिष्ठः। दोहीयसी धेनुः ॥ प्रशस्यस्य श्रः५।३।६०॥

४४९
वहोः परयोरिमेयसोर्लोपः वहोश्च । भूरादेशः। ममा मृयान् ।।
द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः ।
अस्य श्रादेशः अजायोः॥
प्रकृत्येकाच ६।४।१६३॥
इछादिष्वेकाच् प्रकृत्या । श्रेष्ठः श्रेयान् ।।
ज्य च ५।३।६१॥
प्रशस्यस्य ज्यादेशः इष्ठेयसोः । ज्येष्ठः ।।
ज्यादादीयसः६।४।१६० ॥
आदेः परस्य । ज्यायान् ॥
वृद्धस्य च ५।३।६२॥
ज्यादेशः अजायोः । ज्येष्ठः ज्यायान् ।।
अन्तिकबाढयोनॆदसाघो ५।३। ६३ ॥
अजायोः । नेदिष्ठः नेदीयान् । साधिष्ठः साधीयान् ॥
स्थूलदूरयुवतस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं पूर्वस्य च
गुणः६।४।१५६॥
एषां यणादिपरं लुप्यते पूर्वस्य च गुण इष्टादिषु । स्थविष्ठः ।
दविष्ठः । यविष्ठः । इसिष्ठः । क्षेपिष्ठः क्षोदिष्ठः । एवमीयस ।
दस्वसिमक्षुद्राणां पृथ्वादित्वाद्रासिमा । सेपिमा । क्षोदिमा ।।
प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धप्रदीर्घवृन्दारकाणां
प्रस्थस्फवहिगर्पिचन्द्राधिवृन्दाः ६।४ । १५७॥
प्रियादीनां फ्रमात् प्रादयः स्युरिष्टादिषु । मेष्टः । स्येष्ठः। स्केटः।
वरिष्ठः । वंहिष्ठः । गरिष्ठः । वर्षिष्ठः । प्रपिष्टः । द्वाविष्टः । पृ.
न्दिष्ठः । एवमीयसुन् । प्रेयान् । मियोरुवहुलगुरुदीर्याणां पृथ्वा.
दित्वात्मेमेत्यादि।
वहोर्लोपो भू च बहोः ६।११.१५८ ॥
इष्टस्य यिट्र च६।४।१५९ ॥

सुगमकौमुद्याः। वहोः परस्य इप्ठस्य लोपः बिडागमश्च । भूयिष्ठः ।। युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् ५।३१६४॥ एतयोः कनादेशो वा इष्टेयसो । कनिष्ठः कनीयान् । पक्षे । य- विष्ठः । अल्पिष्ठ इत्यादि ॥ विन्मतोलुक् ५।३।६५॥ विनी मनुपश्च लुक् इष्ठेयसोः अतिशयेन सम्वी सजिष्ठः सनी- यान । अतिशयेन त्वम्वान् त्वचिष्ठः त्वचीयान् ॥ प्रशंसायां रूपपु५।३।६६॥ सुबन्तात्तिडन्ताच । प्रशस्तः पटुः पटुरूपः । प्रशस्तं परति पचविरूपम् ॥ ईपदसमाप्तौ कल्पन्देश्यदेशीयरः ५।३।६७ ॥ ईपद्वनी विद्वान् विद्वत्कल्पः । यशस्कल्पम् । यजु:कल्पम् । विद्देश्यः । विद्वद्देशीयः । पचतिकल्पम् ॥ विभाषा सुपो बहुच्पुरस्तात्तु ५।३।६८॥ ईपदसमाप्ति विशिष्टेऽर्थे सुबन्ताद्रहुज्वाास च मागेय नतु परतः ईपदूनः पटुहुपटुः । पटुकल्पः ।सुपः किम् । यजतिकल्पम् ॥ प्रकारवचने जातीयर ५१३१६९।। प्रकारवति चायम् । थास्तु प्रकारमाने। पटुपकारः। पटुजातीयः।। प्रागिवात्क: ५।३१७०॥ इवे प्रतिकृती इत्यतः प्राकाधिकारः ॥ अव्ययसर्वनानामकच प्राक्टेः५।३।७१॥ तिडश्च इत्यनुवर्तते ॥ कस्य च दुः५।३१७२॥ कान्ताव्ययस्य दकारोऽन्तादेशः अकय । अज्ञाते ५।३।७३॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । कस्यायमश्वोऽश्वकः । उच्चकैः । नीचकैः । सर्वके । विश्वके ।। ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनामप्टेः प्रागकच ॥ अन्यत्र तु सुवन्तस्य प्रागकच ॥ युवकयोः । आवकयोः । युष्मकासु । अस्मकासु। युप्मकाभिः । अस्मकामिः । औकार इत्यादि किम् । त्वयका । मयका ॥ अकप्रकरणे तूष्णीमः काम्बक्तव्यः ॐ ॥ मित्वादन्त्यादचः परः । तूष्णीकामास्ते ॥ शीले कोमलोपश्च ॥ तूष्णींशीलस्तूष्णीकः । पचतकि जल्पतकिाधकित् हिरकुत् ॥ कुत्सिते ५।३।७४॥ कुत्सितोऽश्वोऽश्वकः ।। संज्ञायां कन् ५।३।७५॥ कुत्सिते कन् तदन्तेन चेत्संज्ञा गम्यते । शूद्रकः । राधकः । स्वरार्थ वचनम् ॥ अनुकम्पायाम् ५।३।७६ ॥ पुत्रकः । अनुकम्पितः पुत्र इत्यर्थः ॥ नीतौ च तद्युक्तात् ५।३।७७॥ सामदानादिरूपा नीतिस्तस्यां गम्यमानायामनुकम्पायुक्तात्क- प्रत्ययः । हन्त ते धानकाः । गुडकाः । एहकि । अदाकि । पूर्व णानुकम्प्यमानात्प्रत्ययः । अनेन तु परम्परासंबंधेऽपीति विशेषः । बहचो मनुष्यनामष्टज्या ५।३।७८॥ पूर्वसूत्रद्वयविषये ॥ घनिलचौ च ५।३।७९॥ तत्रैव ।। ठाजादादूर्व द्वितीयादचः५ । ३ । ८३ ॥ अस्मिनमकरणे यष्ठोऽजादिप्रत्ययश्च तस्मिन् प्रत्यये परे प्रकृते. .

४५२
सुगमकीमुद्याः।
'दितीयादच अर्थ सबै लुप्यते । अनुकम्पितो देवदत्तो देविकः
देवियः देविलः देवदत्तकः। अनुकम्पितो वायुदत्तो वायुकः। ठग्रहण
मुको द्वितीयत्वे कविधानार्थम् । वायुदत्तकः वायुकः पितृकः ।।
चतुर्थादच ऊर्ध्वस्य लोपो वाच्यः ।।
अनुकम्पितो वृहस्पतिदत्तो वृहस्पतिकः ।।
अनजादौ च विभापा लोपो वक्तव्यः ॥
देवदत्तकः देवकः॥
लोपः पूर्वपदस्य च * ॥
दत्तिकः दत्तियः दत्तिलः दत्तकः ।।
विनापि प्रत्प्रयं पूर्वोत्तरपदयो लोपो वाच्यः ॐ ॥
देवदत्तः दत्त देवः । सत्यमामा भामा सत्या ।।
उवर्णाल्ल इलस्य च ॥
भानुदत्तः भानुलः ॥
ऋवर्णादपि ॥
सवित्रियः सवितृला। चतुर्थादनजादी च लोपः पूर्वपदस्य च ।
अप्रत्यये तथैवष्ट उवर्णाल इलस्य च । ल इति लोपसंज्ञा प्राचाम् ।।
जातिनाम्नः कन् ५।३।८१॥
मनुष्पनानः इत्येव । जातिशब्दो यो मनुष्यनामधेयस्तस्मात्कन्
स्यादनुकम्पायां नीतौ च । सिंहका शरभकः । रासमकः ।।
द्वितीयं संध्यक्षरं चेत्तदादेलौंपो वक्तव्यः ॥
कहोडः। कहिकः॥
एकाक्षरपूर्वपदानामुत्तरपदलोपो वक्तव्यः वाचाशी-
यस्य ॥
वागाशीर्दतः वाचिकः । कथं पडङ्गुलिदत्तः पडिक इति षषष्ठा-
जादिवचनात्सिदम् ॥

द्वस्वहेतुका या संज्ञा तस्यां गम्यमानायां कन् । पूर्वस्यापवादः ।
हवा कुतू: कुतुपः। कुतः कृतेः रोहपात्रं स्वा सा कुतुपः
आयुधविशेष: कामः । हस्वा सा कास्तरी । गोणीतरी ॥
वत्सतरः। द्वितीयं वयः प्राप्तः। उक्षतर.। अश्वतरः । ऋपमतरः।
किंयत्तदोनिर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् ५।३।९२॥
वा बहनां जातिपरिप्रश्ने डतमच ५।३।९३॥
बहुना मध्ये एकस्य निर्धारणे डतममा । जातिपरिप्रश्ने इति
किनमो भवता कठः ।यतमः ततमः । वाग्र.
द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः।
अल्पे ६।३।८५॥
अल्पं तैलं तैलकम् ॥
ह्रस्वे ५।३।८६॥
हस्वो वृक्षो वृक्षकः ॥
संज्ञायां कन् ५।३।८७॥
वंशकः । वेणुकः ॥
पुमान् । इत्यमरः ॥
यः । सः॥
कुटीशमीशुण्डाभ्यो २ः५।३।८८॥
तस्वा कुटी कुटीरः । शमीरः । शुण्डारः ॥
कुत्वा डुपच ५।३।८९॥
कासूगोणीभ्यां घरच् ५।३ । ९० ॥
वत्सोक्षाश्चर्पभेभ्यश्च तनुत्वे ३।५।९१ ॥
मवृत्तिनिमित्ततनुत्व एवायम् ॥
अनयोः कतरो वैष्णवः । यतर. । ततरः । महाविमापया का
मत्याख्यातमावरे
हणमकजर्थम् । यकः । सक' । महाविमापया यः । सः । किमाइ
कतरः॥

सुगमकीमुद्याः। एकाच प्राचाम् ५।३।९४॥ डतरच डतमच । अनयोरेकतरो भैनः। एपामेकतमः ॥ अवक्षेपणे कन् ५।३।९५ ॥ व्याकरणकेन गर्वितीयेनेतरः कुत्स्यते तदिहोदाहरणमा स्वत: कुत्सितं तु कुत्सित्ते इत्यस्य ।। इति प्रागिीयाः ।। इति १५३ अंशाः। इवे प्रतिकृतौ ५। ३१ ९६॥ कन् । अश्व इव प्रतिकृतिः अश्वकः । प्रतिकृती रिम् । गौरिख गवयः॥ संज्ञायां च ५।३।९७॥ इवार्थ कन समुदायश्चेत्संज्ञा। अप्रतिकृत्यर्थमारम्भः । अश्वसह- शस्य संज्ञा अश्वकः । उप्रकः ॥ लुम्मनुष्ये ५। ३।९८॥ संज्ञाया चेति विहितस्य कनो लुप् मनुष्ये वाच्ये । चञ्चा तृण- मयः पुमान् । चञ्चैव मनुष्यश्चश्वा । धिंका॥ जीविकाथै चापण्ये ५।३।९९।। जीविकाथै यदविक्रीयमाणं तस्मिन्वाच्ये कनो लुप् । वासुदेवः । शिवः । स्कन्दः । देवलकानां जीविकासु देवप्रतिकृतिप्पिदम् । अपये किम् । इस्तिकान्त्रिक्रीणीते ।। शिलाया ढः५।३।१०२॥ शिलायाः इति योगविभागाड्पीत्येके । शिलेव शिलेये शैलेयम् ॥ शासादिभ्यो यत् ५।३।१०३॥ शाखेव शाख्यः । मुख्यः । जघनमिव जघन्यः। अश्य'।

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । द्रव्यं च भव्ये ५।३।१०४॥ द्रव्यमयं ब्राह्मणः॥ कुशाग्राच्छः५।३।१०५॥ कुशाग्रमिव कुशाग्रीया बुद्धिः॥ समासाच्च तद्विपयात् ५।३।१०६॥ इवार्थविषयात्समासाच्छः । काकतालीयो देवदत्तस्य वधः । इह काकतालसमागमसदृशश्चोरसमागम इति समासार्थः । तत्प्रयुक्तः काकमरणसदृशस्तु प्रत्ययार्थः । अजाकृपाणीयः । अतर्कितोपनत इति फलितोऽर्थः॥ पादशतस्य संख्यादेवींप्सायां बुन् लोपश्च ५।४।३॥ लोपवचनमनैमित्तिकत्वार्थम् अतो न स्यानिवत् । पादः पत् । तद्धितार्थ इति समासे कृते प्रत्ययः । वुन्नन्त स्त्रियामेव । द्वौ दो पादी ददाति विपदिकाम् । द्विशतिकाम् । पादशतग्रहणमनर्थकम- न्यत्रापि दर्शनत् । विमोदकिकाम् ॥ दण्डव्यवसर्गयोश्च ५।४।२।। बुन् । अवीप्सार्थमिदम् । वी पादी दण्डित: द्विपदिकां विश- तिका व्यवसृजति । ददातीत्यर्थः ॥ स्थूलादिभ्यः प्रकारवचने कन् ५।४।३॥ जातीयरोऽपवादः । स्थूलकः । अणुकः ॥ अनत्यन्तगतो तात् ५।४।४॥ छिन्नकम् । मिन्नकम् । अभिन्नकम् ।। न सामिवचने ५।४॥५॥ सामिपर्याय उपपदे तान्तान्न कन्। सामिकृतम् । अर्धकृतम् । अनुत्यन्तगतेरिह प्रकृत्यैवाभिधानात्पूर्वेण कन्न प्राप्तः । इदमेव निषेधसत्रमत्यन्तस्वार्थिकमपि कन ज्ञापयति । बहुतरम् ॥ बृहत्या आच्छादने ५।४।६॥

. सुगमकीमुद्याः। कन् । दो प्रावारोतरासगी समी वृद्दतिका तथा । इत्यमरः । आच्छादने किम् । बृहतीछन्दः ॥ अपडक्षाशितंग्वलंकर्मालंपुरुषाध्युत्तरपदात्वा५।४।७॥ स्वार्थे । अपडक्षीणो मन्त्रः। दाभ्यामेव कृत इत्यर्थः। आशिता गावोऽस्मिन्निति आशितंगवीनमरण्यम् । निपातनात्पूर्वस्य मुम् । अलं कर्मणे अलंकर्मीणः । अलंपुरुषीणः । ईश्वराधीनः । नित्योऽयं खः । उत्तरसूत्रे विमापाग्रहणात् । अन्येऽपि केचित्स्वार्थिकाः। प्रत्यया नित्यमिष्यन्ते॥ तमवादयः प्राकानः । ज्यादयः प्राग्वुनः । आमादयः प्राभ- यटः । वृहती जात्यन्ताः समासान्ताश्च इति । विभापाञ्चेरदिस्त्रियाम् ५।४।८॥ अदिक्स्त्रीवृत्तेरञ्चत्यन्तात्मातिपदिकात् खोचा स्वार्थे । प्राक माचीनम् प्रत्यक् प्रतीचीनम् । अवाक् अवाचीनम् । निकृष्टपतिक- टावरेफयाप्यावमाधमाः । इत्यमरः । अन्तिमञ्चतीति अर्याक अर्वा- चीनम् । अदिक् स्त्रियां किम् । प्राची दिक् । उदीची दिक् । दि. ग्रहणं किम् । प्राचीना ब्राह्मणी । स्त्रीग्रहणं किम् । प्राचीन प्रामा- दाम्राः॥ जात्यन्ताच्छ बन्धुनि ५।४।९॥ ब्राह्मणजातीयः । वन्धुनि किम् । ब्रह्मणजातिः शोभना । जा. तैय॑ञ्जक द्रव्यं वन्धु ॥ स्थानान्ताद्विभाषा सस्थानेनेति चेत् ।४।१०॥ सस्थानेन तुल्येन चेत् स्थानान्तमर्थवदित्यर्थः । पितृस्थानीयः पितृस्थानः । सस्थानेन किम् । गोः स्थानम् ॥ अनुगादिनष्टक ५:1811३॥ अनुगदतीत्यनुगादी स एवानुगादिकः ॥ विसारिणो मत्स्ये५।४।१६॥

४५७ १ हितायखण्डस्याइताया भागः अण् । बैसारिणः । मत्स्ये इति किम् । पिसारी देवदत्तः । कृत्वसुचसुची मागुक्ती । पञ्चकृत्वो भुते। द्विभुक्ते । सकृद्मुक्त ।। विभापावहोर्धाऽविप्रकृष्टकाले ५।४।२०॥ अविप्रकृष्ट आसन्नः । बहुधा दिवसस्य मुड़े। आसन्नकाले किम्। बहुकृत्यो मासस्य भुङ्क्ते ॥ तत्प्रकृतवचने मयट् ५।४।२१ ॥ प्राचुर्यण प्रस्तुतं प्रकृतं तस्य वचनं प्रतिपादनम् । भावेऽधिक- रणे वा ल्युट् । आये प्रकृतमन्नमन्नमयमा अपमयम् । यवागृमयी। द्वितीयेऽन्नमयो यज्ञः । अपूपमयं पर्व ।। समूहवच बहुषु५।४।२२॥ सामूहिकाः प्रत्यया अतिदिश्यन्ते चान्मयट्। मोदकाः प्रकृताः मौदकिकं मोदकमयम् । शाष्कुलिकं शष्फुलीमयम् । द्वितीयेऽर्थे मौदकिको यक्षः मोदकमयः ॥ अनन्तावसथेतिहभेपजाभ्यः५।४।२३॥ अनन्त एवानन्त्यम् । आवसथ एवावसथ्यम् । इति ह इति निपातसमुदायः । ऐतिह्यम् । भेपजमेव भैपज्यम् ॥ देवतान्तात्तादर्थ्य यत् ५। ४ । २४ ॥ तदर्थ एव तादर्थ्यम् । स्वार्थे प्यज्ञ । अग्निदेवतायै इदमग्निहे. वत्यम् । पितृदेवत्यम् ॥ पादाभ्यां च ५।४।२५॥ पादार्थमुदकं पाद्यम् । अय॑म् ।। नवस्य नू आदेशोत्नप्तनपखाश्च प्रत्यया वक्तव्याः ॥ नूत्नं नूतनं नवीनम् ॥ नश्च पुराणे प्रात् ॥ पुराणाथै वर्तमानात्प्रशब्दान्नी वक्तव्यः । चात्पूर्वोक्ताः । प्रणं, प्रत्नं । प्रतनं प्रीणम् ॥ २०

सुगमकौमुयाः।
भागरूपनामभ्यो धेयः ॥
भागधेयम् । रूपधेयम् । नामधेयम् ॥
आग्नीध्रसाधारणादञ् ॥
मानीध्रम्। साधारणम् । स्त्रियां डीए । आमाधी। साधारणी॥
अतिथेयः५१।२६॥
तादर्थ्य इत्येव । अतियय इदमातिथ्यम् ।।
देवात्तल् ५।४।२७॥
देवे एव देवता॥
अः कः५।४।२८॥
अविवाविकः ।।
यावादिभ्यः कन् ५।४।२९॥
याव एव यावकः । मणिकः ।।
विनयादिभ्यटक ५।४।३४॥
विनय एव वैनायकः । सामयिकः ।।
उपायो हस्पत्वं च ॥
औपयिकः॥
याची व्याहतार्थायाम्५।४।३५॥
संटिष्टार्यायां वाचि विद्यमानाद्वाक्छन्दात् स्वार्थे ठक् च । संदे.
शवार वाचिक स्यात् । इत्यमरः ।।
तद्युक्तात्कर्मणोऽण ५1१।३६॥
मैंव कार्मणम् । वाचिकं श्रुत्वा क्रियमाणं कर्मेत्यर्थः ।।
मोजाती५१।३७॥
या । औषधं पिचति । अजाती किम् । ओपधयः क्षय
प्रज्ञादिभ्यश्च ५।४।३८॥
4
-

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः।
प्रज्ञ एव भाज्ञः । प्राज्ञी स्त्री । देवतः । यान्धवः ।।
मृदस्तिकन् ५।४।३९॥
मृदेव मृत्तिका ॥
सस्नो प्रशंसायाम् ५।४।४०॥
रूपपोऽपवादः । प्रशस्ता मृन्मृत्सा मृत्स्ना । उत्तरसूत्रे अन्यत.
रस्यां ग्रहणान्नित्योध्यम् ॥
इति १५४ अंशाः।
बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ।।
वहूनि ददाति बहुशः । अल्पशः ॥
बह्वल्पार्थान्मङ्गलामङ्गलवचनम् ॥
नेह । वहूनि ददात्यनिष्टेषु । अल्पानि ददात्याभ्युदायिकेषु ॥
संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् ५।४।४३॥
दो द्वौ ददाति द्विशः । मापं मापं मापशः प्रस्थगः । परिमा-
णशब्दावृत्तावेकार्था एय। संख्यकवचनात् किम् । घटं घदं ददाति।
वीप्सायां किम् । द्वौ ददाति । कारकात् इत्येव ।योद्धयोः स्वामी।
प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः५।४।४४॥
प्रतिना कर्मप्रवचनीयेन योगे या पश्चमी विहिता तदन्तात्तमिः।
प्रद्युम्नः कृष्णतः प्रति ।।
आद्यादिभ्य उपसंख्यानम् ॥
आदी आदितः । मध्यतः । अन्ततः । पृष्ठतः । पार्थनामाकृ.
तिगणोऽयम् । वरेण सरतः । वर्णतः॥
अपादाने चाहीयरुहोः ५।४।१५।।
अपादाने या पञ्चमी तदन्तात्तसिः ग्रामादागच्छति ग्रामतः।
- अहीयरुहोः किम् । स्वर्गाडीयते । पर्वतावरोहति । अमृततद्वारे
चिः॥

४५८
सुगमकीमुद्याः।
भागरूपनामभ्यो धेयः ॥
भागधेयम् । रूपधेयम् । नामधेयम् ॥
आग्नीध्रसाधारणादञ् ॥
आनीध्रम्। साधारणम् । स्त्रिया डीए । आग्नीधी। साधारणी॥
अतिथेय॑ः५।४।२६॥
तादर्थ्य इत्येव । अतिथय इदमातिथ्यम् ।
देवात्तल् ५।४।२७॥
देव एव देवता ॥
अवेः कः५।४।२८॥
अविवाविकः॥
यायादिभ्यः कन् ५।४।२९॥
याव एव यावक । मणिकः ॥
विनयादिभ्यष्टक ५।४।३४॥
विनय एव वैनयिकः । सामयिक ॥
उपायो हस्वत्वं च ॥
औपयिकः
वाचो व्याहृतार्थायाम् ५। ४।३५॥
सदिष्टार्थाया वाचि विद्यमानाद्वाक्छब्दात स्वार्थे ठक् च । संदे.
शवार वाचिक स्यात् । इत्यमरः ॥
तयुक्तात्कर्मणोऽण ५1१।३६॥
कर्मेव कार्मणम् । वाचिक श्रुत्वा क्रियमाणं कर्मेत्यर्थः ॥
ओपधेरजातो५1१1३७॥
स्वार्थ । औषधं पियति । अजातो किम् । ओपधय. क्षेत्रे
प्रज्ञादिभ्यश्च५।१।३८॥
।

द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः ।
प्रज्ञ एव प्राज्ञः । प्राज्ञी स्त्री । देवतः । वान्धवः ॥
मृदस्तिकन् ५।४।३९॥
मृदेव मृत्तिका ॥
सस्नो प्रशंसायाम् ५।४।४०॥
रूपपोऽपवादः । प्रशस्ता मृन्मृत्सा मृत्स्ना । उत्तरसूत्रे अन्यत.
रस्यां ग्रहणान्नित्योऽयम् ॥
इति १५४ अंशाः ।
वह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ॥
बहूनि ददाति बहुशः । अल्पशः ।।
बह्वल्पार्थान्मङ्गलामङ्गलवचनम् ॐ ॥
नेह । वहूनि ददात्यनिष्टेषु । अल्पानि ददान्याभ्युदायकेषु ॥
संख्यैकवचनाच वीप्सायाम् ५।४।४३॥
द्वौ द्वौ ददाति विशः । मापं मापं मापशः । प्रस्थशः । परिमा-
णशब्दावृत्तावेकार्था एव। संख्यैकवचनात् किम् । घटं घटं ददाति ।
वीप्सायां किम् । दो ददाति । कारकोत् इत्येव । द्वयोईयोः स्वामी।
प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः५।४।४४॥
प्रतिना कर्मप्रवचनीयेन योगे या पञ्चमी विहिता तदन्तात्तसिः।
प्रद्युम्नः कृष्णतः प्रति ।।
आधादिभ्य उपसंख्यानम् ॥
आदी आदितः । मध्यतः । अन्ततः । पृष्ठतः । पार्श्वत।आकृ.
तिगणोऽयम् । स्वरेण स्वरतः । वर्णतः॥
अपादाने चाहीयरुहोः ५।४।४५॥
अपादाने या पञ्चमी तदन्तात्तसिः यामादागच्छति ग्रामतः।
अहीयरुहोः किम् । स्वर्गातीयते । पर्वतादवरोहति । अभूततद्भावे
चिः॥
.

४६० सुगमकौमुद्याः। अव्ययस्य च्वावीत्वं न ॥ दोपाभूतमहः । दिवाभूता रात्रिः । एतच अव्ययीभावश्रेत्यत्र भाष्य उक्तम् ॥ क्यच्च्योश्च ६।४। १५२॥ हलः परस्यापत्ययकारस्य लोपः क्ये च्ची च परतः । गार्गीम. वति । चौ च शुचीभवति । पटूस्यात् । अव्ययस्य दीर्घत्वं न इति केचित् । तन्निर्मूलम् । स्वस्ति स्यात् इति तु महाविमापया चेरभावात्सिद्धम् । स्वस्ती स्यात् इत्यपि पक्षे स्यादिति चेदस्तु । यदि नेष्यते तीनभिधानात् चिरेव नोत्पद्यत इत्यस्तु । रीत मात्री करोति ॥ अरुर्मनश्चक्षुश्वेतोरहोरजसां लोपश्च ५।४।५१॥ एषां लोपः चिश्च। अरूकरोति । उन्मनीस्यात् उच्चर्करोति । विचेतीकरोति । विरहीकरोति । विरजीकरोति ।। विभाषा साति कात्स्न्ये ५।४।५२॥ चिविषये सातिर्वा साकल्ये ॥ सात्पदायोः ८।३। १११॥ सस्य पत्वं न स्यात् । दधि सिञ्चति । अनुस्वदते कृत्स्र शस्त्रम- ग्निः संपद्यतेऽग्निमाद्भवति अग्नीभवति । महाविमापया वाक्यमपि । कात्स्न्ये किम् । एकदेशेन शुक्लीमवति पटः ।। अभिविधौ संपदा च ५।४।५३॥ संपदा कृभ्वस्तिभिश्च योगे सातिर्वा व्याप्ती । पक्षे कृम्वस्ति- योगे चिः। संपदा तु वाक्यमेव । अग्निसात्संपद्यते अग्निसाद्भवति । शस्त्रम् अग्नीभवति । जलसात्संपद्यते जलीभवति लवणम् । एक स्या व्यक्तेः सर्वावयवावच्छेदेनान्यथाभावः कास्यम् । वहूनां व्य- मीनां किंचिदवयवावच्छेदेनान्यथात्वं त्वभिविधिः ।। भीनवचने ५।४।५४॥

४६१. द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । सातिः कृभ्वस्तिभिः संपदा च योगे। राजसात्करोति । राज- सात्संपद्यते । राजाधीनमित्यर्थः ॥ देये त्रा च ५।४।५५॥ तदधीने देये त्रा स्यात्सातिश्च । कृभ्वादियोगे विमाधीनं देयं करोति विप्रत्राकरोति । विपत्रासंपद्यते । पक्षे विप्रसाकरोति । देये क्म् ि। राजसाद्भवति राप्रम् ॥ देवमनुष्यपुरुपपुरुमत्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योहुलम् ५।४।५६॥ एभ्यो द्वितीयान्नेभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यश्च त्रा। देवनावन्दे रमे वा। बहुलोक्तेरन्यत्रापि । बहुत्राजीवता मनः॥ अव्यक्तानुकरणाद व्यजवरार्धादनितो डान् ५।४।२७॥ यच् । अवरं न्यून नतु ततो न्यूनम् । अनेकाच इति यावत्ताह- शमधैं यस्य तस्माड्डाच् कृम्वस्तिभिर्योंगे। डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम् ॐ ॥ नित्यमानेडिते डाचीति वक्तव्यम् ॐ ॥ डापरं यदानेडितं तस्मिन्परे पूर्वपरयोर्वर्णयोः पररूपं स्यात् । इति तकारपकारयोः पकारः । पटपटाक्रोति । अव्यक्तानुकरणात् किम् । ईपत्करोति । व्यजवरार्धात् किम् । श्रत्करोति । अवर इति किम् । खरटखरटाकरोति । त्रपटनपटाक्रोति । अनेकाचः इत्येव सूत्रयितुमुचितम् । एवं हि डाचीति परसप्तम्येव द्वित्वे मुवचेत्य- वधेयम् । अनिती किम् । पदितिकरोति ॥ कभो द्वितीयतृतीयशम्बबीजात्कृपो ५ । ४।५८॥ द्वितीयादिभ्यो डाच कृन एव योगे' कर्षणेऽर्थे । बहुलोक्तरव्य- तानुकरणादन्यस्य डाचि न द्वित्वम् । द्वितीयं तृतीयं कर्षणं करोति द्वितीयाकरोति तृतीयाकरोति । शम्वशब्दः प्रतिलोमे । अनुलोम

.
४६२
मुगमकीमुद्याः।
कृष्टं क्षेत्रं पुनः प्रतिलोमं कर्पति शम्नाकरोति । बीजेन सह कर्षति
वीजाकरोति ॥
संख्यायाश्च गुणान्तायाः ५।४।५९॥
कृतो योगे कृषौ डाच् । द्विगुणाकरोति क्षेत्रम् । क्षेत्रकर्मक
द्विगुणं कर्षणं क्रोतीत्यर्थः
समयाच्च यापनायाम् ५।४।६०॥
कृपौ इति निवृत्तम् । कृलो योगे डान् । समयारोति । कालं
यापयतीत्यर्थः॥
सपत्रनिष्पत्रादतिव्यथने ५। ४।६१ ॥
सपत्राकरोति मृगम् । सपुतश प्रवेशेन सपत्रं करोतीत्यर्थः ।
निष्पत्राक्रोति । सपुट्सस्य शरस्यापरपार्थे निर्गमनान्निष्पत्रं रो-
तीत्यर्थः। अनिव्यथने किम् । सपनं निष्पत्रं वा क्रोति भूतरम् ॥
निष्कुलानिष्कोपणे ५।४।६२॥
निष्फुलाकरोति दाडिमम् । निर्गत कुलमन्तरवयवाना समूहो
यस्मादिति बहुव्रीहेड च ॥
सुखप्रियादानुलोम्ये ५।४।६३ ॥
मुखाकरोति प्रियागेति गुरुम् । अनुकूलाचरणेनानन्दयती
त्यर्थः
दुःखात्प्रतिलोम्ये ५।४।६४॥
दुःखाक्रोति । स्वामिनं पीडयतीत्यर्थः ।।
शुलापाके ५।४।६५॥
शूलाकरोति मांसम् । शूलेन पचतीत्यर्थः ।।
सत्यादशपथे।४।६६॥
सत्यारोति माण्डं वणिक् । तिव्यमिति तथ्यं करोतीत्यर्थः।
शपये तु सत्यं क्गेति विप्रः ॥

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ८६३ मद्रात्परिवापणे ५।४।६७॥ मद्रशब्दो मङ्गलार्थः । परिवापणं मुण्डनम् । मद्राक्रोति । मा- गल्यमुण्डनेन संस्करोगीत्यर्थः॥ भद्राच्चेति वक्तव्यम् ॥ भद्राकरोति । अर्थः प्राग्वत् । परिवापणे किम् । भद्रं करोति ॥ इति तद्धिताः॥ इति १५५ अंशाः। स्त्रियामित्यधिकृत्य ॥ अजायतष्टाप् ॥ अजाद्युक्तिींपो डीपश्च वाधनाय । अजा। अत' सट्वा । अजादिभिः स्त्रीत्वस्य विशेषणान्नेह । पश्चाजी । दिगो. इति दी। अत्र हि समासार्थसमाहारनिष्ठं स्त्रीत्वम् । अजा। एडका । अथा। चटका । मूपिका । एपु जातिलक्षणो डीप प्राप्तः। बाला। वत्सा। होढा । मन्दा । विलाता । एषु वयसि प्रथमे इति डीप माप्तः ।। संभवाजिनशणपिण्डेभ्यः फलात् ॐ ॥ संफला । भत्रफला । डयापो' इति इस्वः ॥ सदचकाण्डप्रान्तशतैकेभ्यः पुष्पात् ॥ सत्पुष्पा । प्राक्पुष्पा । प्रत्यक्पुष्पा । शूद्रा चामहत्पूर्वाजातिः ॥ पुंयोग तु शूद्री । अमहत्पूर्वा विम् । महाराही । कुच्चा । उ- ष्णिहा । देवविशा । ज्येष्ठा । कनिष्ठा । मध्यमेति पुयोगेपि को- किला । जातावपि ॥ मूलानमः॥ अमूला । ऋन्नेभ्यो डीप । कर्ती । दण्डिनी ॥

- १६४ सुगमकौमुद्याः। उगितश्च ४।३॥६॥ पचन्ती । भवन्ती । दीव्यन्ती । अत्र प्रागुक्तन्नुम संग्रहपद्य- मनुसन्धेयम् । माती भाती । अदती । जुद्धती । सुन्वती । तुद- न्ती तुदती । रुन्धती । तन्वती। क्रीणन्ती कीणती । भविष्यन्ती भविष्यती उगिदचामिति सूत्रेऽज्ग्रहणेन धातोश्चदुगित्कार्य तह- श्चतेरेव इति नियम्यते । तेनेह न । उखासत् । किश। अनि दिताम् इति नलोपः । पर्णधत् । अश्चतेस्तु स्यादेव । प्राची। प्रतीची ॥ वनोर च ४।१।७॥ बन्नन्तात्तदन्ताच्च प्रातिपदिकात् स्त्रियां डीप रश्चान्तादेशः । वन्निति निष्कानिन्वनिपां सामान्यग्रहणम् । प्रत्ययग्रहणे यस्मात्स विहितस्तदादेस्तदन्तस्य ग्रहणम् । तेन प्रातिपदिकविशेषणात्तद- न्तान्तमपि लभ्यते । सुत्वानमतिक्रान्ता अतिसुत्वरी। अतिधीवरी । शर्वरी॥ वनो न हश इति वक्तव्यम् ॥ हशन्तादातोकिहितो यो वन् तदन्तात्तदन्तान्ताच प्रातिपदि- कान डीब रश्च नेत्यर्थः । ओण अपनयने । वनिप् । विड्वनोः इत्गात्वम् । अवावा ब्राह्मणी राजयुध्वा ॥ बहुव्रीहौ वा ॥ पहुधावरी बहुधीवा पक्षे डाबक्ष्यते ॥ पादोऽन्यतरस्याम् ॥१८॥ पाच्छन्दः कृतसमासान्तस्तदन्तात्मातिपदिकान्डीवा । द्विपदी द्विपाद् ।। टाचि ॥१॥९॥ मचि वाच्यायां पादन्नाहा । द्विपदा ऋक । एकपदा ॥ न पट्स्वस्रादिभ्यः॥ पत्र । चतनः । पञ्च इत्यत्र नलोपे कृतेऽपि ष्णान्ता पद इति द्वितीयखण्डस्य द्वितीया भागः । पटसंज्ञा प्रति नलोपः सुप्स्वर इति नलोपस्यासिद्धत्वात् । न पद- स्वस्त्रादिभ्यः इति न टाप् ॥ मनः४।१।११॥ मन्नन्तान डीप् । सीमा । सीमानी॥ अनो बहुव्रीहेः ४।१।१२॥ अन्नन्ताबहुव्रीहेर्न ङीप् । बहुयज्वा । वहुयज्वानी ॥ डावुभाभ्यामन्यतरस्याम् ४।१।१३ ॥ सूत्रव्योपात्ताभ्यां डाब्बा । सीमा । सीमे । सीमाना । दामा। दामे । दामानौ । न पुंसि दाम इत्यमरः । वहुयज्वा । बहुयज्यं । बहुयज्वानी॥ अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम् ।।१।२८॥ अन्नन्ताद्वहुव्रीहेरुपधालोपिनो वा डीप पक्षे डाडीनिषेधा। बहुराज्ञी । बहुराज्यौ । बहुराजे । वहुराजानौ । प्रत्ययस्थात्कारपूर्व- स्येत्युक्तम् । सर्विका । कारिका । अतः किम् । नौका । प्रत्यय- स्थात् किम् । शक्कोतीति शका । असुपः किम् । बहुपरिवाजका नगरी । कात् किम् । नन्दना । पूर्वस्य किम् । परस्य मा भृत् । कटुका । तपरः किम् । राका । आपि किम् । कारकः ।। मामकनरकयोरुपसंख्यानम् ॥ मामिका । नरान् कायतीति नरिका ॥ त्यक्त्यपोश्च ॥ दाक्षिणात्यिका । इहत्यिका ।। न यासयोः ७।३।४५॥ यत्तदोरस्येन्न । यका । सका । यकाम् । तकाम् ॥ त्यकनश्च निषेधः ॥ अधित्यका । उपत्यका ॥ आशिपि चुनश्च न ॥ . .

सुगमकामुखाः। जीवका । भवका ॥ उत्तरपदलोपे च ॥ देवदत्तिका देवका ॥ क्षिपकादीनां च न ॥ क्षिपका । ध्रुवका । कन्यका । चटका ॥ तारका ज्योतिपि ॥ अन्यत्र तारिका ॥ वर्णकातान्तवे ॥ अन्यत्र वर्णिका ।। वर्तका शकुनी प्राचाम् ॥ उदीचां तु वर्तिका ॥ अष्टका पितृदेवत्ये ॥ अप्टिकान्या॥ सूतकापुत्रिकावृन्दारकाणां वेति वक्तव्यम् * ॥ इह वा अ इति च्छेदः । कात्पूर्वस्याकारादेशो वेत्यर्थः । तेन पुत्रिकाशब्दे डीन इवर्णस्य पक्षे कारः । अन्यत्रेत्वबाधनार्थमकार- स्यैव पक्षकारः । सूतिका सूतकेत्यादि । उदीचामातः स्थाने यकपूर्वायाः ७।३।४६॥ यकपूर्वस्य स्त्रीप्रत्ययाकारस्य स्थाने योऽकारस्तस्य कात्पूर्वस्ये- दा आपि परे । केणः इति हस्तः । आर्यका आर्यिका । चटकका चटकिका । आतः किम् । सांकाश्ये 'भवा सांकाश्यिका । यक इति किम् । अश्विका । स्त्रीप्रत्यय इति किम् । शुभं यातीति शुभंयाः । अज्ञाता शुभंयाः शुभंयिका। धात्वन्तयकोस्तु नित्यम् । मुनयिका । सुपाकिका ॥ इति १५६ अंशाः।

त्त्वाच डीप्पाप्तः यासुटो डित्वेन लाश्रयमनुवन्धकार्य नादेशानाम् येप्यनल्विधाविति निषेधज्ञापनादा। सेपिर्णयी। ऐन्द्री। आरसी। ऊरुद्वयसी । ऊरुदनी । ऊरुमानी । पञ्चतयी। आक्षिकी । लाव. द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ४६७ भौपाजाज्ञास्वान पूर्वाणामपि ७।३ । १७॥ स्वेत्यन्तं लुप्तपष्ठीकं पदम् । एषामत इदा । तदन्तविधिनैव सिद्धे नपूर्वाणामपीति स्पष्टार्यम् । मस्त्राग्रहणमुपसर्जनार्थम् । अन्यस्य तूत्तरसूत्रेण सिद्धम् । एपा द्वा एतयोस्तु सपूर्वयोर्नत्यम् । अन्तर्व- तिनी विभक्तिमाश्रित्य असुपः इति प्रतिषधात् । अनेपका । पर• मैपका । अद्धके । परमहके । स्वशब्दग्रहणं संज्ञोपमर्जनार्थम् । इह हि आतः स्थाने इत्यनुवृत्तं स्वशब्दस्यवातो विशेषणम् । नतु दैप- योरसंभवात् । नाप्यन्येषामव्यभिचारात् । स्वशब्दस्त्वनुपसर्जनमा- त्मीयवाची अकहः । अर्थान्तरे तु न स्त्री । संज्ञोपसर्जनीभृतस्तु कप्रत्ययान्तत्वाद्भवत्युदाहरणम् । एवं चात्मीयायां स्विका परम- विकेति । नित्यमेवेत्वम्। निर्भस्त्रका निर्भस्त्रिका । एपका पपिका। कृतपत्वनिर्देशान्नेह विकल्पः । एनिके एतिकाः । अजका अजि- का । ज्ञका ज्ञिका । दिके दके। निःस्वका नि:स्विका ॥ अभापितपुंस्काच ७।३।४८॥ आदाचार्याणाम् ७।३।१९॥ गनिका गङ्गाका गङ्गका । उक्तपुंस्कात्त शुभ्रिका । बहुप्रीदर्भा- 'पितपुंस्कत्वात्ततो विहितस्य नित्यम् । अज्ञाता अखट्वा अस- डिका । शैपिके कपि तु विकल्प एव ।। अनुपसर्जनात् ४।१।१४॥ अधिकारोऽयम् । युनस्तिः इत्यभिव्याप्य । अयमय स्त्रीप्रत्ययेषु तदन्तविधि ज्ञापयति । टिड्डाण इत्यादि । कुरुचरी । उपसर्ज नत्वान्नेह । वहुकुरुचग । नट् नदी । वक्ष्यमाणेत्या टित्त्वादुगि- इति ज्ञापनान्न भवति । श्नः शानचा गित्वेन कचिदनुवन्धका- णिकी । यादृशी । इत्वरी । ताच्छीलिके णेऽपि चौरी। .

४६८ सुगमकीमुद्याः। नस्नभीककल्युस्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम् ।। बैणी। पोस्नी । शाक्तीकी। आइयंकरणी । नरुणी । तलुनी। यभश्च ४।१।१६॥ यजन्तात्विया डी । अकारलोपे कृते ॥ हलस्तद्धितस्य ६।४।१५०॥ हल उत्तरस्य तद्धितयकारस्योपधाभृतस्य लोपः इति परे । गार्गी॥ अनपत्याधिकारस्थान ङीप् ॥ द्वीपे मवा कैप्या। अधिकारग्रहणान्नेह । देवस्यापत्य दैव्या । देवाद्यजत्रौ इति हि ययाग्दीव्यतीयो न त्वपत्याधिकारपठितः ।। प्राचां ष्फस्तद्धितः४।१।१७।। यजन्तात्ष्फो वा स्त्रियाम् । स च तद्वितः। पइत् । तद्धितान्त- त्वात्मातिपदिकत्वम् । फेणोक्तऽपि स्त्रीत्वे पित्वसामर्थ्यात् पिगौरा- दिभ्य इति डीप् । गाायणी ॥ सर्वत्र लोहितादिकतन्तेभ्यः ४।१11८॥ लोहितादिभ्यः कतशब्दान्तेभ्यो यजन्तेभ्यो नित्यं ष्फः। लौहित्यायनी । कात्यायनी ॥ कौरव्यमाण्डूकाभ्यां च ४।१।१९॥ आभ्या ष्फ' टाप्डीपोरपवाद' । कुर्वादिभ्यो यणी । ढक्न मण्डूकात् इत्यण् । माण्डूकायनी ॥ आसुरेरुपसंख्यानम् * ॥ आसुरायणी॥ वयसि प्रथमे ४।१।२०॥ कुमारी ॥ वयस्य चरम इति वाच्यम् ॥ वधूटी । चिरण्टी । चघूटचिरण्टशब्दी यौवनवाचिनी । अतः | शिशुः॥ ण्यः । कौरव्या- A .

द्वितीयसण्डस्य द्वितीयों मागः।
कन्यायान॥
कन्यायाः कनीन च इति निर्देशात् ॥
दिगोः४।१।२१॥
त्रिलोकी । दिगो रिम् । ध्यनीमा सेना ॥
अपरिमाणविस्ताचितकम्बल्येभ्यो न तद्धितलुकि
४।१।२२॥
अपरिमाणान्ताद्विस्तायन्ताच दिगोडी न तद्वितलुकि सति ।
पञ्चभिरश्वैः क्रीता पञ्चाश्वा । आयटक । अध्यर्ध इति लुक ।
दी विस्तौ पचति दिविस्तायाचिता । दिकम्बल्या। परिमा-
णात्तु दयाढकी तद्धितलुकि किम् । समाहारे पक्षाधी।
काण्डान्तात क्षेत्रे४।१।२३॥
क्षेरे यः कापडान्तो दिगुस्ततो न डीए तदित लुकि दे पाण्डे
प्रमाणमस्या विकाण्डा क्षेत्रमक्तिः । प्रमाणे दयसज इति विहितस्य
मात्रचः । ममाणे लो दिगोर्नित्यम् इति लुक् । क्षेत्रे किम । दिसा.
ण्डी रज्जुः ।।
पुरुपात्प्रमाणेऽन्यतरस्याम् ४ । १ ।२ ।।
प्रमाणे यः पुरुपस्तदन्ताहिगोडींचा तदितलुम्।ि टी पुरुषी
प्रमाणमस्याः सा द्विपुरुपी दिपुरुपा वा परिखा।
ऊधसोऽनङ्६।४।१३१॥
उधान्तस्य बहुव्रीहरनडादेशः खियाम्। इत्यनडियने दादी-
निधेषु प्राप्तेषु॥
बहुव्रीहेरूघसो डीप १।११२५॥
ऊधान्तादबीहेप् िविपाम् । कुण्डोधी । त्रियां किम ।
कुण्डोधी धेनुकम् । इहानडपि न । तद्विधी वियाम् इत्युपसंख्या
नात् ।।

सुगमकीमुद्याः। संख्याव्यायदेमप् ४ । १।२६॥ डीपोऽपवादः। यूनी । अत्यूनी । वहुवीहे ग्त्येिव । ऊधोऽति. कान्ता अत्यूधाः॥ दामहायनान्ताच ४।१।२७॥ संख्यादेवहुव्रीहेर्दामान्ताद्धायनान्ताच डीप् । दामान्ते डाप्प- तिषेधयोः प्राप्तयोर्हायनान्ते रापि प्राप्ते वचनम् । द्विदानी । अव्य- यग्रहणाननुवृत्तेरुद्दामा वडवेत्यत्र डानिषेधावपि पक्षे स्तः । दिहा- यनी बाला ॥ इति १५७ अंशाः। विचतुा हायनस्य णत्वं वाच्यम् * वयोवाचकस्यैव हायनस्य डीव् णत्वं चेष्यते । त्रिहायणी।चतु- हायणी । वयसोऽन्यत्र । विहायना त्रिहायना चतुर्हायना शाला।। नित्यं संज्ञाछन्दसोः ४।१।२९॥ अन्नन्तादहुव्रीहेरुपधालोपिनो डीप संज्ञाछन्दसोः । सुराज्ञी नाम नगरी । अन्यत्र पूर्वेण विकल्प एव । वेदे तु शतमूर्ती ॥ केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृतसुमङ्गलभे- पजाच्च ४।१।३०॥ एभ्यो नवभ्यो नित्य डीप संज्ञाछन्दसोः । अथोत इन्द्र देव. लीर्विशः। मामकी । भागधेयी । पापी । अपरी । समानी। आर्य- कृती । सुमङ्गली । भेपजी । अन्यत्र केवला इत्यादि। मामकग्रहणं नियमार्थम् । अण्णन्तत्वादेव सिद्धेः। तेन लोकेऽसंज्ञाया मामिका ॥ अन्तर्वत्पतिवतोर्नु ४।१।३२॥ एतयो स्त्रिया नुक् । मन्नेभ्यो डीप्। गर्भिण्या जीवद्भर्टकाया च प्रकृतिभागी निपात्येते । तत्रान्तरस्त्यस्या गर्भ इति विग्रहेऽन्तः- નાના નાનાવિખ્યામા કાતો - अग्नायी । कुसितायी । कुसिदायी । कुसिदशब्दो हस्वमध्यो नहु द्वितीयखंडस्य द्वितीयो भागः । मतुनिपात्यते । पतिवत्री इत्यत्र तु वत्त्वं निपात्यते । अन्तर्वत्री। पतिवत्री । प्रत्युदाहरणं तु अंतरस्त्यस्यां शालायां घटः । पतिमती पृथिवी॥ पत्युनों यज्ञसंयोगे ४।१॥३३॥ प्रतिशब्दस्य नकारादेशः यज्ञेन संवन्धे । वसिष्ठस्य पत्री। तत्कर्तृकयज्ञस्य फलभोक्रीत्यर्थः । दंपत्योः सदाधिकारात् । विभाषा सपूर्वस्य ४।१।३४॥ पतिशब्दान्तस्य सपूर्वस्य प्रातिपादिकस्य नो वा। गृहस्य पतिः गृहपतिः गृहपत्नी । अनुपसर्जनस्य इतीहोत्तरार्थमनुवृत्तमपि न पत्युर्विशेषणं किंतु तदन्तस्य तेन बहुव्रीहावपि। दृढपनी दृढपतिः। वृपलपत्नी वृपलपतिः। अथ वृपलस्य पत्नी इति व्यस्ते कथमिति चेत् पत्नीव पत्नीत्युपचारात् । यद्वा । आचारकियन्तात्कर्तरि किए । अस्मिश्च पक्षे पत्नियो पलिय इतीयइविपये विशेषः । सपूर्वस्य किम् । गवां पतिः स्त्री ।। नित्यं सपत्न्यादिषु ४।१।३५॥ पूर्वविकल्पापवादः । समानस्य सभावोऽपि निपात्यते । समानः पतिर्यस्याः सा सपली । एकपत्नी । वीरपत्नी ॥ पूतकतारै च ४।३।३६॥ अस्य स्त्रियामै आदेशो ङीप् च। इयं त्रिसूत्री पुंयोग एवेप्यते। पूतक्रतोः स्त्री पूततायी।यया तु क्रतरः पूताः स्यात्पूतऋतुरेव सा॥ वृपाकप्यग्निकुसितकुसिदानामुदात्तः४।१।३७॥ एपामुदात्त ऐ आदेशः डीए च । वृपाकपः खो वृपाकपायी। हरविष्णू वृपाकपी इत्यमरः । दृपाकपायी श्रीगौर्योः इति च । दीर्घमध्यः ।। मनोरौ वा ४।१।३८॥

सुगमक मुद्याः। मनुशब्दस्यौकारादेशः उदात्तैकारश्च वा ताभ्यां संनियोगशिष्टये डीपू च । मनोः स्त्री मनायी मनावी मनुः ॥ वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः ४।१।३९॥ वर्णवाची योऽनुदात्तान्तस्तोपधस्तदन्तादनुपसर्जनात्प्रातिपदि- कादा डीए । तकारस्य नकारादेशश्च । एनी एता। रोहिणी रोहिता। वर्णानां तणतिनितान्तानाम् इति फिटस्त्रेणादात्तः । त्र्येण्याच शलल्या इति गृह्यम् । त्रीण्येतान्यस्या इति बहुव्रीहिः। अनुदात्तात् किम् । श्वेता । घृतादीनां च इत्यन्तोदात्तोऽयम् । अत इत्येव । शितिः स्त्री। पिशङ्गादुपसंख्यानम् ॥ पिशङ्गी पिशगा। असितपलितयोर्न ॥ असिता । पलिता॥ छन्दसि कमेके ॥ असिनी । पलिक्की । अवदातशब्दस्तु न वर्णवाची किंतु विशु- द्विवाची । तेन अवदाता इत्येव ॥ अन्यतो ङीपू४।१॥४०॥ तोपमिन्नादर्णवाचिनोऽनुदात्तान्तात्मातिपदिकात् स्त्रियां डी। फल्मापी । सारङ्गी । लघावन्ते योश्च वचो गुरुः इति मध्योदा- सावेतौ । अनुदात्तान्तात् किम् । कृष्णा । कपिला ॥ पिगौरादिभ्यश्च ॥ गौरी । नर्तकी । अनडुही । अनलाही ।। पिप्पल्यादयश्च ॐ ॥ याकृतिगणोऽयम् ॥ सूर्यतिप्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः६१।१४९॥ भगम्योपधाया यस्य लोपः स चेद्यः सर्यायवयवः॥

र्वत्र किंतु नीलादोपधी नीली। प्राणिनि च नीली गाः । संज्ञायां द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः । ४७३ मत्स्यस्य क्याम् ॥ सूर्यागस्त्ययोश्छे च ङ्यां च * ॥ तिष्यपुप्ययोर्नक्षत्राणि यलोप इति वाच्यम् ॥ मत्ती । मातरि पिच इति पित्यादेव सिद्धे गांगदिषु माताम- हीशन्दपाठादनित्यः पितां डीप् । दंशा ॥ जानपदकुण्डगोणस्थलभाजनागकालनीलकुशकामु- ककवरावृत्त्यमत्रावपनाकृत्रिमाथाणास्थौल्यवर्णानाच्छा- दनायोविकारमेथुनेच्छाकेशवेशेषु ४ । १॥ ४२ ॥ एकादशभ्यः प्रातिपदिकेभ्यः क्रमादृत्त्यादिप्वयंषु डीप । जा. नपदी वृत्तिश्चेत् । अन्या तु जानपदी । उत्सादित्वादयन्तत्वेन दिष्ट इति डीप्यायुदात्तः । कुण्डी अमत्रं चेत् । कुण्डान्या । कुडि दाहे गुरोश्च हलः इत्यप्प्रत्ययः । यस्तु, अमृते जारजः कुण्डः इति मनुष्यजातिवचनस्ततो जातिलक्षणो डीप मवत्येव । अमोहि स्त्रीविषयत्वाभावादमाप्तो डीप विधीयते नतु नियम्यते । गोणी आश्पनं चेत् । गोणान्या । स्थली अकृत्रिमा चेत् । स्थलान्या । भाजी श्राणा चेत् । माजान्या । नागी स्थला चैत । नागान्या । गजवाची नागशब्दः स्याल्यगुणयोगादन्या शिलादी प्रयुक्त उदाहरणम् । नागी शिला । सर्पवाची तु दैर्यगुणयोगाद् अन्यत्र रज्ज्यादी प्रयुक्तः प्रत्युदाहरणम् । नागा गगनुः । काली वर्णभेन् । कालान्या। नीली अनाच्छादनं चेत् । नीलान्या । नील्या रक्ता शाटीत्यर्थः। नीत्या अन् वक्तव्य इत्यन् । मनाच्छादनेऽपि न स. वा । नीली नीला । कुशी अयोतिकारश्चेत् । कुशान्या । कामुक मैथुनेच्छा चेत् । कामुकान्या । कचरी के गानां संनिवेगन् । . इति १५८ अंगाः। रान्या । चित्रेत्यर्थः ।।

सुगमकौमुद्याः। शोणात्प्राचाम् ।। १।४३॥ शोणी शोणा । वोतो गुणवचनात् । मृद्वी मृदुः। उतः किम् । शुचिः । गुण इति किम् । आखुः ।। खरुसंयोगोपधान्न ॥ खरुः पतिंवरा कन्या । पाण्डः ॥ बह्वादिभ्यश्च ४।१॥४५॥ एभ्यो वा ङी । वही वहुः ॥ कृदिकारादक्तिनः ॥ रात्रिः रात्री । सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके । शकटिः शकटी। अक्तिन्नर्यात् किम् । अजननिः। क्तिनन्तत्वादमाप्ते विध्यर्थं पद्धति- शब्दो गणे पठ्यते । हिमकापिइतिषु च इति पद्भावः । पद्धतिः पद्धती। पुंयोगादाख्यायाम् । गोपी । पालकान्तान्न ॥ गोपालिका । अश्वपालिका ।। सूर्याद्देवतायां चाव्याच्यः ॥ सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या । देवतायां किम् । सूरी। कुन्ती मानु- पीयम् । न केवलं दाम्पत्यलक्षण एव पुंयोगः किन्तु जन्यजनक- लक्षणोऽपि । तेन केकयी देवकीत्यत्रापीति केचित् । परे तु दाम्प- त्यलक्षणा एव पुंयोगः । केकयी । देवकीत्यत्र अपत्यप्रत्यये डीप संज्ञापूर्वकत्वादचामादेर्न वृद्धिरित्याहुः इति प्रागुक्तम् ॥ इन्द्रवरुणभवशवरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुला- चार्याणामानुक ४।११४९॥ पपामानुगागमः स्याद् डीप्वाइन्द्रादीनां पण्णां मातुलाचार्य- योय योग एवेप्यते । तपडीपि सिदे आनुगागममा विधीयते । इतरेषां चतुर्णामुमयम । इन्द्राणी ।।

करणादः क्तान्ताखिया डीप् अल्पत्वे द्योत्ये ॥ अभ्रलिप्ती
द्वित्तीयखण्डस्य द्वितीयो भागः।
हिमारण्ययोमहत्त्वे * ॥
महद्धिमं हिमानी । अरण्यानी ॥
यवाहोपे ॥
दुष्टो यवो यवानी॥
यवनाल्लिप्याम् ॥
यवनानां लिपिर्यवनानी ।।
मातुलोपाध्याययोरानुग्वा ॥
मातुलानी मातुली । उपाध्यायानी उपाध्यायी।
या तु स्वयमेवाध्यापिका तत्र वा ङीय वाच्यः ।
उपाध्यायी उपाध्याया॥
आचार्यादणत्वं च * ॥
आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी । पुंयोग इत्येव । आचार्या स्वयं
व्याख्यात्री ।।
अर्यक्षत्रियाभ्यां वा * ॥
स्वार्थी अर्याणी अर्या । स्वामिनी वैश्या वेत्यर्थः । क्षत्रियाणी
क्षत्रिया। योगे तु अर्यो । क्षत्रियी । कथं ब्रह्माणी इति ।
ब्रह्माणमानयती जीवयतीति कर्मण्यण ॥
कीतात्करणपूर्वात् ४ । ११५०॥
क्रीतान्ताददन्तात्करणादेः स्त्रियां डीम् । वस्त्रक्रीती । कचिन्न ।
धनकीता ।।
द्यौः । अल्पाख्याया किम् । चन्दनलिमाङ्गना ॥
बहुव्रीहेश्चान्तोदात्तात् ४ 1 ११५२॥
वहुवी तान्तादन्तोदात्ताददन्तात् स्त्रियां टीपू ।
तादल्पाख्यायाम् ४|११५१॥

४७६ 4. मुगमकौमुद्याः । जातिपूर्वादिति वक्तव्यम् ॐ ॥ तेन बहुनसुकालसुखादिपूर्वान्न । ऊरुभिन्नी। नेह । बहुकृता ।। जानान्तान ॥ दन्तजाता ॥ पाणिगृहीती भार्यायाम् ॥ पाणिगृहीतान्या ॥ अस्वाङ्गपूर्वपदादा ४।१।५३॥ पूर्वेण नित्ये प्राप्ते विकल्पोऽयम् । सुरापीती सुरापीता । अ. न्तोदात्तात् किम् । वस्त्रच्छन्ना । अनाच्छादनात् इत्युदात्तनिषेधः। अत एव पूर्वेणापि न डीप् ।स्वागायोपसर्जनादित्यादि । अतिके शी अतिकेशा । संयोगोपधातु सुगुल्फा ! स्वाझं त्रिधा । अद्रव- मूर्तिमत्स्वाङ्गं प्राणिस्थमविकारजम् । सुस्वेदा द्रवत्वात् । सुज्ञाना अमूर्तत्वात् । सुमुखा शाला अप्राणिस्थत्वात् । सुशोफा विकारज- त्वात् । अतत्स्थं तत्र दृष्टं च । सुकेशी सुकेशा वा रथ्या। अप्राणि- स्थस्यापि प्राणिनि दृष्टत्वात् । तेन चेत्तत्तथायुतम् । सुस्तनी सुस्त- ना वा प्रतिमा । प्राणिवत्प्राणिसदृशे स्थितत्वात् ।। नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णशृङ्गाच्च ४।११५५॥ एभ्पो वा डीप् । आद्ययोर्ववज्लक्षणो निषेधो बाध्यते । पुरस्तादपवादन्यायात् । ओष्ठादीनां पञ्चानां तु असंयोगोपधात् इति पर्युदासे प्राप्ते वचनं मध्येऽपवादन्यायात् । सहनश्लक्षणस्तु प्रतिषेधः परत्वादस्य बाधकः । तुगनासिकी तुङ्गनासिकेत्यादि । नेह । सहनासिका । अनासिका । अत्र वृत्तिः ।। अङ्गगावकण्ठेभ्यो वक्तव्यम् ॐ ॥ खड्गी स्वनेत्यादि । एतच्चानुक्तसमुच्चयान चकारेण संग्राह्य- मिति केचित् । भाष्यादनुक्तत्वादममाणम् इति प्रामाणिकाः । अत्र वार्तिकानि ॥

वाहन्तात्मातिपदिकान्डीप डीपेवानुवर्तते न डी । दित्यवाद
इतिशब्दः प्रकारे भापायाम् इत्यस्यानन्तरं द्रष्टव्यः । छन्दः
स्यपि क्वचित् । सखी। अशिश्वी । आधेनवो धुनयन्तामगि धीः ।
जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् । आकृतिग्रहणा जातिः । अनुगतसं..
द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः ।
पुच्छाच ॥
सुपुच्छी सुपुच्छा ॥
कवरमणिविपशरेभ्यो नित्यम् ॥
कबर चित्रं पुच्छं यस्याः सा कवरपुच्छी मयूरीत्यादि ।
'उपमानात्पशाच्च पुच्छाच ॥
नित्यमित्येव । उलूकपक्षी शाला । उलूकपुच्छी सेना ।।
न क्रोडादिवह्वचः ४।१।५६॥
क्रोडादेर्ववचश्च स्वाह्यान्न डीप् । कल्याणकोडा । अश्वानामुरः
कोडा । आकृतिगणोऽयम् । सुजघना ।।
इति १५९ अंशाः ।
सहनश्विद्यमानपूर्वाञ्च ४।१।५७॥
सहेत्यादित्रिकपूर्वान्न ड्रीप् । सकेशा । अकेशा । विद्यमानः
नासिका ॥
नखमुखात्संज्ञायाम् ।।११५८॥
डीप् न । शूर्पणखा । गौरमुखा । संज्ञायां किम् । ताम्रमुखी
कन्या॥
दिक्पूर्वपदान् ङी ४।१।६० ॥
दिक्पूर्वपदात्स्वागान्तात्प्रातिपदिकात्परस्य डीपो डीवादेशः ।
प्राइमुखी । आधुदात्तं पदम् ॥
वाहः४।१।६॥
च मे दित्यौही च मे ॥
सख्यशिश्वीति भापायाम् ४।१।१२।।

मुगमकौमुद्याः । स्थानव्यदयेत्यर्थः । तटी । लिङ्गानां च न सर्वमाक् । सकृदा- ख्यातनिर्णाद्या । असर्वलिङ्गत्वे सत्येकस्यां व्यक्ती कथनायत्य- न्तरे कथनं विनापि सुग्रहा जातिः इति लक्षणान्तरम् । वृपली । सत्यन्तं किम् । शुक्ला । सकृत् इत्यादि किम् । देवदत्ता । गोत्रं च चरणैः सह । अपत्यप्रत्ययान्तः शाखाध्येवाची चशब्दो जाति- कार्य लभत इत्यर्थः । औपगवी । कठी । वहृची । ब्राह्मणीत्यत्र तु शाखादिपाठान डीना डीवाध्यते । जातेः किम् । मुण्डा। अस्वीविपयात् किम् । वलाका । अयोपधात् किम् । क्षत्रिया । योपधप्रतिपेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रति- पेधः ॥ हयी । गवयी। मुकयी । हलस्तद्धितस्य इति लोपः। मानुषी॥ मत्स्यस्य ड्याम् ॥ मत्सी॥ पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच ४।१।६४॥ पाकाद्युत्तरपदाजातिवाचिनः स्त्रीविपयादपि डीप् । ओदनपा- की। शंकुकर्णी । शालपणीं। शङ्खपुष्पी। दासीफली । दर्भमूली । गोवाली । ओषधिविशेपे रूढा एते॥ इतो मनुष्यजातेः ४।१।६५॥ डीप् । दाक्षी । योपधादपि । उदमेयस्यापत्यं औदमेयी । मनुष्य इति किम् । तित्तिरिः ॥ उकुतः४।१।६६॥ उकारान्तादयोपधान्मनुष्यजातिवाचिनः स्त्रियामृङ। कुरूः । कुरुनादिभ्यो ण्यः । तस्य खियामवन्ति इत्यादिना लुक् । अयोप- धात् किम् । अध्वर्युः ॥ अप्राणिजातेश्चारज्ज्वादीनामुपसंख्यानम् ॐ ॥ रग्ग्वादिपर्युदासादुवर्णान्तेभ्य एव । अलाब्बा। कर्कन्ध्या। अन- .

द्वितीयखण्डस्य द्वितीयो भागः। ४७९ योदीर्घान्तत्वेऽपि नोंङ् धात्वोः इति विभक्त्युदात्तत्वप्रतिषेध अड: फलम् । प्राणिजातेस्तु कृकवाः । रज्ज्जादेस्तु रज्जः । हनुः ।। वाह्वन्तात्संज्ञायाम् ४।१।६७॥ स्त्रियामूङ् । भद्रवाहः । संज्ञायां किम् । वृत्तपाहुः ।। पङ्गोश्च ४।१।६८॥ पंगूः ॥ श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च * ॥ चादूङ् । पुंयोगलक्षणस्य डीपोऽपवादः । लिङ्गविशिष्टपरिमा- ग्या स्वादयः । श्वश्रुः॥ ऊरुत्तरपदादीपम्ये ४।१।६९॥ उपमानवाचिपूर्वपदमूरूत्तरपदं यत्मातिपदिकं तस्मादूइ । करभोरूः॥ संहितशफलक्षणवामादेश्च ४।१।७०॥ अनौपम्यार्थ सूत्रम् । संहितोसः । सेव शफोरः । शफी सुरी ताविव संश्लिष्टत्यादुपचारात् । लक्षणशब्दादर्श आयन । लक्षणोः। वामोरूः॥ सहितसहाभ्यां चेति वक्तव्यम् ॐ ॥ हितेन सह सहिती उरू यस्याः सा सहितोतः संइते इति सही उरू यस्याः सा सहोसः। यद्दा विद्यमानवचनस्य सहगन्दस्य ऊर्वतिशयमतिपादनाय प्रयोगः ।। संज्ञायाम् ४।११ ७२॥ कबुकमण्डलोः संज्ञायां नियामृ । कटूः। कमण्डलूः। संज्ञायां किम् । कदुः। कमण्डलुः । अच्छन्दोऽथ वचनम ।। शारिवायभो ङीन् ४ । ११७३ ॥ शाहरवादेरो योऽकारस्तदन्ताच जातिवाचिनो डीन । गाई- रखी दी। जातेः इत्यनुवृत्तेः पुंयोगे टीपत्र ।

४७८ सुगमकौमुद्याः । स्थानव्यङ्गयेत्यर्थः । तटी। लिङ्गानां च न सर्वभाव । सकृदा- ख्यातनिर्लाह्या । असर्वलिङ्गत्वे सत्येकस्या व्यक्ती कथनाध्यक्त्य- न्तरे कथनं विनापि सुग्रहा जातिः इति लक्षणान्तरम् । वृपली । सत्यन्तं किम् । शुक्ला । सकृत् इत्यादि किम् । देवदत्ता । गोत्रं च चरणैः सह । अपत्यप्रत्ययान्तः शाखाध्येतृवाची चशब्दो जाति- कार्य लभत इत्यर्थः । औपगवी । कठी । वढची । ब्राह्मणीत्यत्र तु शाखादिपाठान डीना डीष्वाध्यते । जातेः किम् । मुण्डा । अस्त्रीविषयात् किम् । वलाका । अयोपधात् किम् । क्षत्रिया । योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रति- पेधः ॥ हयी । गवयी। मुकयी । हलस्तद्धितस्य इति लोपः। मानुषी ॥ मत्स्यस्य ड्याम् ॥ मत्सी।। पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच ४।१।६४॥ पाकाद्युत्तरपदाजातिवाचिन: स्वीविपयादपि डीप् । ओदनपा- की। शंकुकर्णी । शालपणीं। शङ्खपुष्पी। दासीफली । दर्भमूली । गोवाली । ओपधिविशेपे रूढा एते॥ इतो मनुष्यजातेः४।१।६५॥ डीप । दाक्षी । योपधादपि । उदमेयस्यापत्यं औदमेयी । मनुष्य इति किम् । तित्तिरिः ॥ रुइतः४।१।६६॥ उकारान्तादयोपधान्मनुष्यजातिवाचिनः खियाभूइ । कुरूः । कुरुनादिभ्यो ण्यः । तस्य स्त्रियामवन्ति इत्यादिना लुक् । अयोप- धात् किम् । अधर्युः॥ अप्राणिजातेश्वारज्ज्वादीनामुपसंख्यानम् ॥ ग्यादिपर्युदासादुवर्णान्तेभ्य एव । अलाब्बा। कर्कन्ध्या। अन * माहवादेरमो योऽकारस्तदन्ताय जातिवाचिनो दीन । गाई- द्वितीयसण्डस्य द्वितीयो भागः । योदर्घान्तत्वेऽपि नोङ् धात्वोः इति रिभक्त्युदात्तत्वप्रतिपेध उडः फलम् । प्राणिजातेस्तु कृकवाकुः । रज्ज्यादेस्तु रज्जः । हनुः ॥ बाह्वन्तात्संज्ञायाम् ४।११६७॥ स्त्रियामूङ । मद्रवाहः । संज्ञायां किम् । वृत्तवाहुः ।। पङ्गोश्च ४।१।६८॥ पंगूः ॥ श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च ॐ ॥ चादूइ । पुंयोगलक्षणस्य डीपोऽपवादः । लिगविशिष्टपरिमा- पया स्वादयः । श्वश्रः॥ ऊरुत्तरपदादौपम्ये ४ । ११६९ ॥ उपमानवाचिपूर्वपदमूत्तरपदं यत्मातिपदिकं तस्माद । करभोरूः॥ संहितशफलक्षणवामादेश्च ४।११७० ॥ अनौपम्यार्थ सूत्रम् । संहितोरूः । सैव शफोरू: की सुरी तारिष संश्लिष्टत्वादुपचारात् । लक्षणगन्दादर्श आथन । लक्षणोम्। वामोरूः॥ सहितसहाभ्यां चेति वक्तव्यम् ॐ ॥ हितेन सह सहिती ऊरू यस्याः सा सहितोकः । सहते इति सही ऊरू यस्याः सा सहोरूः। यदा विद्यमानवचनस्य सहगन्दस्य उर्वतिशयप्रतिपादनाय प्रयोगः ॥ संज्ञायाम् ४।१।७२॥ कबुकमण्डल्योः संज्ञायां वियामूह। यहः। कमण्डलः । मनायां किम् । कः। कमण्डलुः । अच्छन्दोग्य वचनम् ।। शारिवाद्यनो डीन् ४।१॥७३॥ खी पदी । जातेः इत्यनुत्तेः पुंयोगे टीपत्र ।।

४८० सुगमकामुयाः। नृनरयोर्वृद्धिश्च १ ॥ इति गणसूत्रम् । नारी ॥ यङश्चा४।१।७४॥ यडन्तात् स्त्रियां चाप् । यष्यडोः सामान्यग्रहणम् । आम्ब- ध्या । कारीपगन्ध्या॥ पायभश्चाबाच्यः * ॥ पातिमाया॥ आवट्याच ४।१।७५॥ अस्माचापू । यत्रश्च इति डीपोऽपवादः । अवटशब्दो गर्गादिः। आवट्या ॥ तद्धिताः ॥ आपञ्चमसमाप्तेरधिकारोऽयं प्रागुक्तः ॥ यूनस्तिः ।। ११७७॥ युवनशब्दात्तिप्रत्ययः स च तद्धितः । लिङ्गविशिष्टपीरभाषया सिद्धे तद्धिताधिकार उत्तरार्थः । युवतिः । अनुपर्सजनादित्येव । बहवो युवानो यस्यां सा बहुयुवा । युवतीति तु यौतेः शचन्ता न्डीपि बोध्यम् ॥ इति स्त्रीप्रत्ययाः॥ इति १६० अंशाः । इति चतुर्थोऽध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः। इति द्वितीय खण्डस्य द्वितीयो भागः । पूर्णो द्वितीयः खण्डोऽयं श्रीशानुग्रहतः सुखम् । संपूर्णकल्पा व्युत्पत्तिं छात्राणा विदधात्यसौ ॥१॥ इति श्रीमट्टोनिदीक्षितकृतसिद्धान्तको मुदीप्रतिविम्वभूतायाः सुगमकौमुद्या द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥२॥ ..

Sugamkaumudha Bhag-i

Author
Sharma,gangashaya
Title
Sugamkaumudha Bhag-i
File name
Sugamkaumudha Bhag-i
Text
OCR done
Citation
1902
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,kalyan Laxmivenkteshwar Mudranalaya
Language
Sanskrit
Pages
483
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313443
Barcode
99999990322130.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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