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Tirth Vidhan Paddhatti

Sharma,vishvanath · 2012/08

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TIDYA
HI1361
मुद्रा-पं० विहारीलाल शुला
शुक्ला प्रिंटिंग प्रेम,
लापन

। भूमिकाः श्री गणेशाय नमः ॥ तीथ शब्द का मामान्य अर्थ होता है कि जिसके द्वारा पापादि से तेरा जाता है अर्थात् पापों के अथवा अज्ञानादि के फल रूप दुःख सागर में डूबने से बचा जाय । वह तीर्थ शब्द याच्य कहलाता है। तीर्थ शब्द के अनेक अर्थ होते हैं अर्थात् तीर्थ बहु शब्द वाच्य है। यथा-अङ्ग ठ म्लस्य तले ब्राझ तीर्थ प्रचक्षते रूयनं गुली मूलेदने देवं पित्र्य तयों रधः ॥ मनु ॥ याश्यवल्क्यस्मृति में भी लिखा है कनिष्ट देशिन्य गुष्ट मूना न्यमं करस्यच प्रजापति तीर्थं। और अमभाग में देव तीर्थ और प्रदेशिनी तर्जनी तथा अङ्गुष्ट के बीच में पितृ तीथकहलाता है । अतः इन इन स्थानों से ही ग्रह्या आदि देवताओं के लिये तर्पणादि का जल छोड़ना चाहिये शंध्योपासन आदि के समय ब्राहम तीर्थ से आचमन करना चाहिये प्राजापत्य तीर्थ काही नाम ऋपि तीर्थ है। क्योंकि कनिष्ठिका के मल पृथ्वी अन्तरिक्षय स्वर्ग में साढ़े तीन कोटि तीर्थ है। परन्तु यहां तो वर्णनीय केदारादि पृथ्वी के ही नीर्थ स्थावर मुख्य है । इसका कारण यह है कि जिस प्रकार रस रुधि- रादि सात धातुओं वाले एक हो शरीर में कोई अंग पवित्र कोई मध्यम कोई निकृष्ट माना जाता है। यथा -ऊर्व नार्मेध्य तर पुरुषः परि कीर्तितःयस्मात्मेध्यतगत्वस्यमुख मुक्त तप भुवाः । मनु०॥ अतएव पृथ्वी का कोई खास स्थान अथवा जलाशय अति पवित्र माना जाता है। अतः वही मुख्य तीर्थ कहलाता है। पृथ्वी में कहीं पापाण गृत्ति का आदि अंशो में सत्व गुणी प्रभाव है । और कहीं जल में स्वच्छता पवित्रता आदि गुण हैं इसीलिये इन भूमिस्य केदारादि तीर्थों में जप तरदान स्नानं नर्गण पिण्ड श्राद्ध पद रात्रि निव सादि रेतोदकपान मत्र विन् करने का बड़ा महात्म शात्रों में वर्णित है। अर्थात् मत्यादि मप धर्मों का आचरण करने से तीर्थ मेवी ( यात्री ) उत्तम फल को पाता है। और जन्म जन्मान्तरीय कर्म बन्धनों को दूर कर निर्माणपद (मोक्ष) को भी प्राप्त कर लेना है: गृहम्पी के लिये तीर्थाटन तीर्य सेवन ही एक येसा शान्ति प्रद मार्ग है जिसमे जाकर मम क्षण के लिये अपने सभी मंझटों को भूनकर परमात्मा के चिन्तन में लग लग जाता है। तथा ममंगादि के पारणा पत्य वोजना मयंम पर रहना महर्निश भगद् भमित में लीन होजाना दया शीलता क्षमता दानता आदि का होना सुलभ होजाता है । जिससे यह तीर्थ यात्री अपने सर्व प्रकार के पापों से तैर कर इस संसार सागर से भी पार होकर अन्त में स्वर्ग मुस का अनुभव करने लगता है । इन्ही तीर्थों में मनुष्य के लिये विशेप सद्य लाभादिक फल कहे गये हैं। इसी कारण ज्ञानि महपियों ने तथा अवतारी पुरुषों ने तीथों का ज्ञान महात्म स्थापित किया है। अतः एव पूर्व काल में ही विरक्त ज्ञानी पुरुप वळी केदार काशी आदि तीयों में यागगा (हरद्वार ) के एकान्त स्थान में निवास करते हैं। इन विरक्त ज्ञानी तथा उत्तम कोटि के धार्मिकों से भिन्न मध्यम कोटिके माधारण मनुष्य बहुत से हैं। उन सब के लिये तीर्थ सेवन सबसे अधिकतर उपयोगी है जिसका होना पूर्व पुराय के अनुशार स्थिर है। ब्रह्म पुराण मै लिखा है कि-यो य क-श्चि तीर्थ यात्रा गच्छेत् । सु सयतः स च पूर्व गृहे. स्त्रे वृतो वास शुचिर प्रमत सं पूजयेद् भक्ति रसाद् गणेशम् ॥ देवान् पिनन् ब्राह्मणान् पूजयेच एवं कुर्वतस्तस्य तीर्थे यदुक्त फल तत्स्या नात्र सन्देह एवं इत्यादि अनेक शास्त्रों से कथित तीर्थ सम्बधी कर्तव्य कर्मों की विहित ता होने से तदनुसार तीर्थ यात्रा करने से मुख्य शुभ फल मिलता है। अत. में अपनाभूत पूर्व लिखिन तीर्थ क्रमं पदति की पूर्व त्रुटियों को न्यूनाधिक रूप स नया उक्त पद्धति के प्रथम सरफर गीय प्रकाशक महोदय ने पद्धति लेखक के अलिखित प्रमाणों से भूमिका लेखक के साथ अप्रिय शब्दों का उल्लस पिया उसके लिये उक्त पद्धति के लेखक को अमान्य हुये । जिसके कारण उक्त महोदय की आज्ञा का पालन कर पूर्व पद्धति की सबही त्रुटियों को न्यूनाधिक रूप से यथा (অষতি मों) विधः इस द्वितीय मस्करण तीर्थ विधान नामक पद्ध तिको चिम्नतकिग जो सभी पुरोहिताई कर्म कराने वालों के लिये अत्यन्त ही उपयोगी रहेगी। पद्धति का प्रकाशित करने का अधिकार मप्रदरता कोही रहेगा यद्यपि आजकल तीथों में प्रचलित कम्मों के परने वाली बहुत पद्धतियों प्रकाशित होगई हैं और हो रही हैं किन्तु ये कोई तो विरमन और कोई सक्षिप्त होने के कारण चर्म कराने में नन पुरोहितादियों को विशेष मौकर्य नहीं प्रतीत होता है और अब इस पद्धति में मुझे पूर्ण विवरणाम है कि मभी कर्म कराने याले पुरोहितों की या पठनाईयां दूर करदी गई यदि मंग्रह करते हुये तथा प्रेश द्वारा भी त्रुटियां रह गई तो पिजन मूचिन पर जमा करेंगे। यहां पर 'प्रत्यन्त सेद से लिसना पड़ता है कि स्वर्गवाशी पं० रखोदत्त शन्मा पोस्ती तथा स्वर्गवाशी पं० तारादत्त जी शर्मा कुञ्चिली इन पितरो की कृपा से मुझे कुञ्चिल देशीय तथा अन्य देशीय पद्धति अद्धध- यनार्थ प्राप्त हुई जिनके द्वारा मुझे इस विषय पर राष्ट्र सेवा कुछ ही अंशों पर करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। और अपने मान्नीय आठ सयाना अठारह वीशी पञ्च पजडा मण्डली का सादर अभिवादन करते हुये अपना शुख शौभाग्य प्रकट करता हूँ कि जिनके द्वारा श्री केदारनाथ संस्कृत विद्यालय शोणित पुर में स्थापित होकर जिसके सुमंचालक तथा शिलान्यास स्वर्गीय पण्डिन् नारायणदत्त शर्मा शास्त्री लाल मोहरिया तथा स्व. पं जगन्नाथ शर्मा वगवाड़ी तथा-स्व. पं० विहारीलाल शर्मा सेमवाल तथा पं० रामकृष्ण जी शर्मा पोस्ती जी द्वारा हुआ इन्हीं महपियों की श्रशीम कृपाओं से इस अन्धकार मय जगन् में अपनी पूर्व संस्कृती का स्वप्न देखा जिसके फल स्वरूप अन्य संग्रह कर्ता के सम्मतीय तथा संशोधक कविरत्न पं० भोलादत्त शर्मा शास्त्रो प० हरिशंकर शर्मा त्रिपाठी व्याकणंचाय' तथा पं० पीताम्बरदत्त शर्मा सेमवाल शास्त्री तथा प० रघुनाथ प्रसाद शर्मा पुरोहित शास्त्री जी द्वारा हुवा। तथा श्रीमान् ५० पुरुषोत्तमदत्त जी शर्मा वगवाड़ी वी ये यल यल बी। तथा पं. शिव प्रसाद जी शम्मा बगवाड़ी वी ये यल एल बी पगुणानन्द शर्मा साली बी० ए० तथा पमहिमानन्द जी शम्मा मेठानी शास्त्री तथा पंतुलशीराम जी शर्मा पोस्ती तथा १० दिवाकर दत्त जी शर्मा नेमवाल तथा 4 स्यामादत्त जी शम्मा पुरोहित प्रवृत्ति आदि शज्जनों ने अनेक प्रकार से अन्य पुराणों द्वारा तया विषय सूचनाओं द्वारा सहायता पहुंचाकर अनुगृहीत किया। तथा अन्य संग्रह कर्ता के सर्वोश सहायक श्रीमान् टा० नरेन्द्र सिंह भण्डारी एम० ए० महोदय ने श्री पं० विहारी लाल शर्मा शुक्ला प्रेटिंग प्रेस लखनऊ द्वारा मुद्रित कराकर सफल परिश्रम किया क्योंकि श्राप उपरोक्त सम्जनों ने अपना २ अमूल्य समय नष्ट कर और मेरे इस पूज्य पितरों के स्मृति उपलत कार्य पर महान कृपा की जिसका कि मैं आभारी हूँ। शुभभूयात् ॥ गन्छनः स्थल क्यापि भरतेव प्रमादतः । इसन्धि दुर्जनास्तत्र समादयति सम्जनाः ॥ इति शम् ।। लेरक- प्रशा- पं० विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया पुरोहित श्री केदारनाथली गदयाल उसर प्रश तीर्थ विधान पद्धतिः (ग्रंथ सशोधन कतु: स नम्र किंचिन वेदनम् ) अयि हृद्या. भावुका पाठक महोदयाः इत्थं त्रुवतो मम चेतसि समु देसि महान् पर्षोल्लाम । यदिय तीर्थ विधान पद्धति वाजपेयी पं० विश्वनाथ शर्मण लालमोहरियो पाढयेन शोणित पुर गुप्तकाशी गढ़वाल मण्डल वास्तव्येन समस्त तीर्थ कर्मा नुरागिण| पुरोहिता नां कृते तीर्थ कर्मतथा देवी पूजनादी नवरात्र विधाना दिना द्वितीय संस्करणे किचि नमात्र वृद्धितया विविधा गम पुराण ग्रन्थेभ्य स्ती- र्थादि कर्म मम्पादनाय संगृद्य सर्गीय स्वोय कनिष्ट पितृव्य श्री के० संस्कृत विद्या लयस्य प्रथम संस्थापक पण्डित श्री नारायण दत्त शास्त्रिणां स्मृति, उपनये । तीथं विधान पद्धतिः मदन्ति के च सं शोचनाय प्रदत्ताप्तीन् । मयायिहि नकर कमल स्वर्णाक्षर विलिखित तीर्थ विधान सरणि रासादितो पलभ्या द्यो पान्त यथा मति सं शोषिता तदर्थ मेपदयालु महानुभावो भूयो भूयो धन्य वादाहः । यतो लोको पकाराय महता श्रमेण विरच्य प्रकाश्यं नीता । अतो मन्थ प्रचारायः तीर्थ फर्म प्रवर्तकाः पुरोहिता अपरे कर्म काण्ड विशेषताः सचना यहुशो विनि वेद्यन्ते यत्किल प्रन्यो ऽय समस्त पाठशाला (विद्यालयेपु) सकल छात्राणां पाठ्य पुस्तकेपु निधाय मर्यो परवये प्रचार णीय स्याद्धित कर उपयोगी च प्रतीयतेनि निवेदनन्मम मामत्क:-कविरत्न पं० भोला दत्त शास्त्री थाला भूतपूर्व अध्यापक माखाड़ी मंस्कृत पाठशाला मीर घाट काशी बनारस । श्री के. मस्कृन विद्यालय शोणितपुर गुप्तकाशी गढ़वाल श्री रघुनाथ कोनि संस्कृत विद्यालय देव श्याग गढ़वाल ।

तीर्थ विधान पद्धतिः श्री हरिशंकर त्रिपाठी साहित्य केशरी व्याकरणा चार्य -- श्रीकेदारनाथ संस्कृत विद्यालय प्रधानाध्यापक महोदयानां सम्मतिः अद्य महान् प्रमोदाऽवमरोऽयं यन्मयेयं लेखनी तत्र सम्मति दानाय प्रचार्यते । यदर्थ एतावन्तं कालं सर्वे पुरोहिता विद्वांसः साभिलापाः सोत्कण्ठाश्चासन् । मन्ये तीर्थ कर्म प्रवर्तकानां पुरोहितानां पाठक महोदयानां विदुषां चकृते नताहगन्यकर्म काण्ड पुस्तकं यथा वदुपकारक यथा विविध पूजा समलतं । तीर्थ विवान पद्वति, नामक पुस्तकं मयाः दृष्टं तत्र काल प्रभावेण कर्म काण्ड पद्धति लुन प्रायता मुपगता । सम्प्रतिमहती दुख स्यामालोच्य तोकस्य महो पकाराय गढ़वाल मण्डलान्तर्गत गुप्त- काशि पार्श्व वर्ति-शोणितपुर ग्राम वास्तव्य विद्या रसिक पण्डित श्री विश्वनाथ शर्म वाजपेय लालमोहरिया, इत्यु पनामकेन नेपालराज्य (राष्ट्र ) पुरोहितेन विरचित मतीय मनोहरं तीर्थ विधान पद्धति नामक पुस्तकं वर्तने श्रोत-स्मात विधिना कर्मकाण्डो पयोगि विविध विषय मन्निवेश नमनोहरं विधिवन्यास-प्रतिज्ञा-मन्त्र भेद पुरस्सरंकन विवन्यते । एतादृशं अन्य रत्नं सम्यगा लोच्य ब्रह्मानन्दः समभनि। अनेक अन्यतः भवद्भिर्महता प्रयत्नेन सारमुद धृत्य प्रकाश्यते । स्थले- स्थले समुपयुक्त टिप्पण्यादिभिः सर्वेषान्तु नूनमेव बहुप कृतम् । मेयं महतोन्यूनता संस्करणे नैतेन परितति । संस्करण मिदं ममेपामवश्य मेघो पाइयनां भजते । वस्तुनः परिक्षाध्यक्ष महोदयः कर्मकाण्डपरीक्षामु. प्रन्योऽयं नियोजितः स्याचदिनून मेव भारतीयानां महानुप कारोमयेन् । इति मदीयो विश्वासः । सरयं प्रन्यः संप्रायः प्रचारणोयान । इति संम्रा विरामि॥ जावाः पूर्व मनेक शाम कुराना विग भविष्यन्निनी. मन्तीत्येय तयापि कैरनन युथै लोको पकार आमा । इंटक तीर्थ विधान पद्धति रिमं यन्नेन नो निर्मिता। धन्याः मन्तु मुदा मुटा विरचिता भी विश्वनायेनया ॥१॥ पण्डित श्री हरिशंकर शर्मा त्रिपाटी मागे-प्यारणां पाय.

. तीर्थ विधान पद्धतिः आर्य बौदिक धर्म समु पास का विद्वांसः । भारतेऽस्मिन् विविधानि पुस्तकानि सन्ति कानि चितु कार्य सम्पादने विपमानिकानिचितु सरलानि तीर्थेषु गत्वा मर्ने तीर्थ कर्म कर्तारः स कार्याणो साव यन्ति कार्याणीतु येन केनाप्यु पायेन साध्यन्ते एव किन्तु बौदिक कर्म कतृणां सहृदया नां कर्ण फुहरिपु इदं तिरोहितं नस्यात् यद् वाजपेय यशा उपमन्यगोत्रा वसः ६० विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया महोदय संगृहितेमां तीर्थ- विधान पद्धति मवलोक्य नितरां मोदते मन्मनः यहि पूर्वा पेक्षया न्यून विपयेभ्यः सम्पृरिता निखिल कर्म कतृणांञ्च सौख्याय वर्धिता अतीवी पयोगी च वर्तते तीर्थपु वा अन्य पर्वा वसरेषु यदाकदापि अनया पद्धत्यानुसारेण पूजा पाठ पिएड तप्पणादि कर्म कारयितु अविज्ञो पिविज्ञो भवति सर्वेर्षा मुपकाराय च अति परि श्रमेण सगृहिताः अतः धन्य यादा हाः इमे महानु भावाः लुप्न बौदिक धर्मस्य महती रक्षा कृता सवें तीर्थ पुरोहिताः तथा चान्य पुरोहिताः पद्धति संग्रह कतु' मत्साह वर्धन्ताम् बहु पल्लव्य यिनेनकिम् इति शम् ।। श्री मतक पं० पीताम्बर दक्ष शर्मा शास्त्री सेमवाल द्वि० अ० श्री के. संस्कृत विद्यालय शोणितपुर गुप्तकाशी गढ़वाल उ० प्रदेश श्री मान नालमोहरियाजी मुमें यह जानकर अत्यन्त प्रशन्ना हुई कि आप तीर्थविधान पद्धति प्रकाशीत करने जारहे हैं, यद्यपि श्राप अनेक शास्त्र विशारद मेधात्री पंडित है हो तथापि कर्मकान्ड की दृष्टी से आपका स्थान विशेष ऊचा है क्योंकि कर्मकान्ड के स्तर को नन्नत करनेके हेतु आप जो अनवरत प्रयत्नशील रहते है फल स्वर तीर्थ फर्म पद्धति श्रादि प्रयाप्त साक्षी है, यहां यह कहना आवश्यक होगा कि समय २ पर अपके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों ने किन महान् त्रुटियों की पूर्ती की है विशेषतः तीर्थ पुरोहित ब्राह्मणों के लिए भापकी यह महान देन है, अस्तु आज मी मुझे पूर्ण आशा तथा विश्वाम है भगवदनुपहसे आपकी नीधविधानपद्धति अवश्य ही सबके लिए उपयोगी सिद्ध वनकर कमकान्ड जगनमें चूडामणि की तरह देदीप्यमान होकर मापके मन कमल को विकशित करने के लिए मूर्यका रूप धारण करेगी भगवान हमारी पाशा को ममल करें यही हमारी कामना है। भवदीय- दि४-४.५४ रघुनाथप्रसाद पुरोरिव शास्त्री मौना मविप्राम पो. गुप्तकाशी, जिला गदवास पौड़ी . } विषयाऽनुक्रमणिकाः .... .... विपय संख्या १मालोधारणम् २अथ प्रातःस्मरण सुक्तम् ३ गणेश स्तुतिः ४नमस्काराः ५ हेमादिस्त स्तान सङ्कल्पः ६ श्रथ नद्यादी नित्य स्नान म०७ ७ गहा पूजनम् अथस्वस्ति वाधनम् गणेश पूजनम १० अथभूत शुद्धिः ११ अय गणेशाथर्वशीर्षम १२ पथ सङ्कल्पम् १३ दीपकलशपुण्याह वाननम् २५ १४ नानीमुग श्राम विधिः १२ अप नित्य श्राद्ध प्रयोग १६ अतीर्थ भाव विधि १७ अथ शप्यादानम अप भूमिदानम १६ कादिष्ट भाद्र पृष्ठ संरया विषय संख्या पृष्ठसंख्या १ | २६ अथ शिव महिम्न स्तो० १२१ १३. अथ देवी पूजनम् १) ३१ अथ देव्या भाति वेदोक्त १३४ २/३२ अथ देव्या अथर्वशीर्षम् १३५ २] ३३ अथ हवन विधिः ३४ अथ सूर्योपस्थान प्रयोगः १५० १२ / ३५ अथ प्रायश्चित्तगोदान : १७५ १४ | ३६ सर्व प्रायश्चितगोदान सं०१७ १५ ३७३ प्रतिष्ठा गोदान सं० १७७ १२ ३८ पापा पनोद धेनु दानम् १५८ ३६ प्राणा पनोद धेनुदानम १५० ४० अथ मोतधेनुदानम ४१ तिल दान विधि: ४२ इत्यान्ति धेनु दान : ४३थय देशदान संकल्प: ४१ ४४ अथ गोदाने विशेष. ४५ अध ग्रनयन प्रयोगः ४६ अथ भावणी योग: ४७ प्रयात्मगतीन अथ पाया प्रयोग ५६/४ वश मुकाम प्रय गुप्त पाशीदान प्र. ४४ अप अपिमानम् २२ मध शिवाय शीम् ५० प्रयोग योग शिवा पराधमानतो.५१ सय मीय मिति : ४श्य प्राय प्रतिष्ठा ८२/५३ पास मी भादम २५ पय महामत्युजपमन्याप ३भी माम' २६ थय शिITTER ११ अमाद्रीमार.४ स्थायोग UTTA पnि R नाम १६ १६ पसरत योग ... 00.

प्रश्रया
..-
विषयानुक्रमणिकाः
विपय संरया पृष्ट संग्या । विषय मंग्या
५४ अथ श्री चक्र पूजनम्
२३५ ६. अथ श्रीशरत्कालीय नव०२७८
५८ श्रीचक्र पूजन यंत्रम् २३७ ७० अथ श्री दुर्गा सप्तशती प्र२७८
५६ पात्र स्थानम्
२४ ७१ श्री सब तो भद्र मण्डलम् २७८
६० पीठ पूजा माह ३४८ | ७२ अथ महा महाष्टमीवन प्र०३२
६१ अथ उपचार पूजनम
५४ अथ कुमारी पूजनम्
६२ श्रथ मन् चएही विधानम् २६५ ७५ श्रय श्रीविष्णु अनन्तपू० ३३०
६३ श्रथ त्रिमूर्ति पूजनम २६८७६ अथ श्री पावती (माघ) पू३५२
.६४ अथ श्री बटुक पूजनम्
२६६ ७७ अथ श्री रेतोदकपान विधि३६३
६५ थथ हीविध प्रकार मा०२६६ ७८ श्राभिषेक विधिः
.६६ श्री देव्या आतिः
२७० ७६ अथ आशीर्वाद मन्त्रा ३६४
६७ अथ श्री अग्नि स्थापनम् २७५ ८. अथवंशाएकाः
३६५
६. अथ श्री अग्नि पूजनम २७६८१ समाप्तः
श्री तीर्थ विधान पद्धत्याऽनुक्रमणिकाः
विद्वजनानां अभिप्रायाः
नोट-पुस्तक
वृहद्रो जाने के कारण घेद मम्म भी छोटे ही अक्षरों में
मिया ॥3E"

श्री केदारनाथजी
कार्यालय श्री केदारनाथ मन्दिर कमेटी
श्री माननीय १० जी
मादर अभिवादन
श्रापकी तीर्थ विधान पद्धति की पुस्तक प्राप्त हुई धन्यवाद । पुस्तक
बहुत सुन्दर है आपको इस प्रयास के लिये बधाई है, यहाँ तीर्थ विधान
पद्धति की कमी थी आपने उसे पूरा कर दिया।
.
नारायणदत्त बहुगुण
सेक्रेटरी श्री केदारनाथ
मन्दिर, कमेटी
३१-७-५४
श्री कालीमाताजी
कार्यालय मंदिर श्री कालीमठ गढ़वाल
तत्रभवान् श्रीमान् पं० जी सादर प्रएम् !
आज श्रापकी तीर्थ विधान पद्धति की १ पुस्ता उपलब्ध हुई।
सयन्यवाद ! पुस्तक बहुत सुचार है अापको इस प्रयास के लिए बधाई
है। यहा तोर्य विधान पद्धति की न्यूनता थी श्रापने उमे पूरा
कर दिया।
नारायणसिंह राना मठ मठापति
मंदिर कालीमठ

पक-मैनेजर श्री केदारनाय संस्कृत विद्यालय शोणितपुर गुप्तकाशी गदवाल। प्रापक- -श्री विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया मौजा शोणितपुर गुप्तकाशी गढ़वाल महोदय आपकी लिखी हुई तीर्थ विधान पद्धति विद्यालय को उपलब्ध हुई पुस्तक प्रत्येक कर्म करने के लिये उपयुक्त एवं प्रशसनीय है। अतः विद्यालय की ओर से आपको हार्दिक धन्यवाद है श्रापकी शुभ कामनाओं की सफलता चाहते हैं। मैनेजर राजनारायण श्री केदारनाथ लंस्कृत विद्यालय शोणितपुर, पो० औ० गुप्तकाशी गढ़वाल दिनांक १६२.५५ श्रीमान् पं० विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया प्राम-शोणितपुर गुप्तकाशी गढ़वाल आपके द्वारा प्रकाशित "तीर्थविधान पद्धति" नामक पुस्तक प्राप्त हुई। उसको देसने से इस समय जो कर्मकान्ड में आवश्यकता थी उसका आपने इस पुस्तक में पूर्ण संग्रह किया । पुस्तक अत्यन्त उपयोगी है। इसके लिये भापकों हार्दिक धन्यवाद । भिपक चूडामणि प० प्रेमवल्लम शास्त्री रजिस्टई वैद्य पो० सिंगाही (खीरी) दिनांक ३ मार्च १९५५ ई० PRIME MINISTER'S SECRETARIAT, INDIA. पत्र संख्या ५-६४.५४. New Delhi-2. the I0 अगस्त १९५४. प्रिय महोदय, आपका ३० जुलाई का पत्र तथा साथ में भेजी हुई 'तीर्थ विधान पद्धति' नाम की पुस्तक प्रधान मंत्री सचिवालय में प्राप्त हुई। तदर्थ धन्यवाद। भवदीय- श्री विश्वनाथ शर्मा लालनोहरिया, पो० श्रीकेदारनाथ, जि० गदवाल, उत्तर प्रदेश । (सर्व प्रकाश) प्राइवेट सेक्रेटरी श्री ५ नेपाल सरकार श्री माननीय प्रधान मंत्रीज्यूको सचिवालय नेपाल २७-७-०११ पत्र संख्या" प्रिय महाशय, तपाईले २०११ कार्तिक ११ प्र० मा पठाउनु भएको पत्र तथा तिर्थ विधान पद्धती सधन्य धाद, प्राप्त भये कोले सूचित गरेकोछु । भी विश्वनाथ शर्मा, लालमोहरिया पंडा, पो० गुप्तकाशी, गढ़वाल, उत्तर प्रदेश। भवदीय- Bayसनाल, विष्णुसाद सनाल, प्राइमेट सेक्रेटरी, प्रधान मन्त्री, नेपाल

श्री दर पुलचोक काठमाण्डो
इण्डियन इग्वेशी नेपाल
श्रीमान पं० विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया परडा,
आपका कृपा पत्र तथा तीर्थ विधान पद्धति प्राप्त हुआ, जिसके लिये
श्रापको हार्दिक धन्यवाद, इमारे यहाँ पर सभी लोग श्रापमा प्रशंशा
आपका शुभेच्छु-
प्रा० से० केदारमणि शर्मा पाध्याय
२६-१.५४
कार्यालयसं०मा० स० लि. लमगौंडी गुप्तकाशी गढ़वाल
श्री विश्वनाथजी शर्मा लालमोहरिया गुप्तकाशी गढ़वाल उ० प्र०।
श्रादरणीय पं. जी आपकी लिखित तीर्थ विधान पद्धनि नाम को
पुस्तक माम मम्मति को प्राप्त हुई। पुस्तक कर्मकण्ड के लिये अत्यन्त
उपयोगी है। प्रापने पूर्व भी कर्मकाण्ड के विषय पर एक पुस्तक लिखी
थी जिसको कि परिवद्धिन कर यर्मशएडी जनों का महान उपकार
किया, आपली इम पुस्तक मे ममान भारत भी परिचित है।
तुम प्रारम लिक लमगडी पापहार्दिक धन्यवाद देती
है।और यागा करती है कि आप अपना 3. यार्य करने रहेंगे । पयागन
मार गिरायुपा के लिये भगगन में प्राधना करती है।
भवदीय
(मोदर) शिययुमार गाड़ी

तीर्थ विधान पद्धतिः ओं नमो ब्रह्मणे नमो अस्त्वग्नये नमो पृथिव्यै नमः श्रोप- धीभ्यः ।नमो वाचे नमो वाचस्पतये नमोघिणवे महतेकरोमि।।प्रा०॥ orror@r.HOROLOr... Or:":::::.:OTHERE: Br: RITET: arrer..... ... Isr: or ::.: ..::HOTE: TY ब्राह्मण पूजनम् ओं भू० मुंव स्व ब्रह्मणे इदमासनं -स्यासनम् । ओं भू० भुव स्व. ब्रह्मणे इदं पाद्य-सुपाद्यम् । ओं भूः भुवः स्व ब्रह्मणे इद मय॑म् अस्वयम् । ओं भू० मुंघ. स्व ब्रह्मणे इदमाचम नीयम्। ओं भू० मुंव स्व ब्रह्मणे गन्धापान्तु-मौमङ्गल्य चास्तु । अक्षतापान्तु प्रायुप्यमस्तुपुष्पाणि पान्नु-सौश्रियमस्तु नाम्यूल पान्तु-ऐश्वर्यमस्तु० दक्षिणा पान्तु-बहुदेय चास्तु | नमोऽस्त्व नन्ताय सहल मूतये सहस्र पादाशि-शिरोरुवाहरे। सहस्र नाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्त्र काटी युग वारिणेनमः ॥ सकलारायने. स्वर्चित मग्नु । ब्राह्मण -अस्तु म्वनिन मितिप्रतिवदेन ॥ पस्ति मन्त्रार्या सफलाः सन्तु ॥ तथास्तु-इति प० ॥ प्रकाशा- ग्रन्धकार-विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया श्री केदारनाथनी, जि० गढ़वाल उत्तर प्रदेश RRBERISPEAREER BEATED श्रीगणेशाय नमः मङ्गलोच्चारणम् । ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा ऽ स्वस्ति नः पूषाविश्ववेदाइ। स्वस्ति नस्तादोऽअरिष्टनेमि ऽ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ १॥ ॐ भद्रकर्णेभि ऽ शृणुयाम देवो भद्रम्पश्ये माक्षभिर्य जत्रा । त्थिरैरङ्ग- स्तुष्टुवा , सस्तनू मियशेमहि देवहितं यदायु ॥ ॥ तम्पत्की- भिरनुगच्छेमदेवाऽ पुत्रैातृभिरुत वा हिरण्ये ऽ। नाकङ्ग भगाना ऽ सुकृतस्य लोके तृतीये पृष्ठेऽअवि रोचने दिव 5 ॥३॥ अथ प्रातः स्मरणसुक्तम् हरि-ॐ प्रातरग्नि म्प्रानरिन्द्र छ हवामहे प्रातम्मित्रावरुणो प्रातरश्श्विना । पातम्भगम्पूपणम् ब्रह्मणस्पतिम्प्रातऽसोम मुतरुद्न्द्र छ हुयेम ॥ १॥ प्रातरजितम्भगमुग्प हुवेमवयम्पुत्रमदितेर्यो विधा। आबुद्ध श्चिद्यम्मन्नयमानस्तुररिश्चद्राजाचिद्यम्भगम्भक्षील्याह ॥ २ ॥ भगप्पणे त गसत्य राधो भगे मान्धिय मुदयाद दन्न ।। भगप्रणे तनय गोभिरश्श्चर्भगम्प्रनृभिन्न वन्त: स्याम ॥ ३॥ उतेदानीम्भगवन्त स्यामो तपित्त्याउत मद्धयऽ अन्नहाम् । उत्तोदिता मघवन् न्सूर्यस्य ब्बयन्देवाना सुमतो स्यामः ॥ ४ ॥ भगऽएव भगवॉ ऽअस्तुदेवास्तेन वयम्भगवन्त ऽस्याम ! तन्त्वाभग सऽइनोवीतिसनोभगपुर एतामवेद ॥५॥ समद्धरायोपसो नमन्त दधिक्काव शुनये पदाय । अर्वाचीनं व्वसु विद्रम्भगन्नोरथमिवाश्वा व्याजिन 5 अायहन्तु ॥ ६॥ श्रश्वा वर्तीग्र्गोमतीनऽउपासोव्वीरवती 5 सदमुछन्तु भद्रा 5। घृतन्दुहाना विश्वत ऽ पपीता यूपं पात स्वस्तिमि 5 सदा न5॥७॥ इति प्रातः स्मरणसूतम्। गणेश स्तुति-स. चिः। प्रातः स्मरामि गणनायमनाय बन्धुं सिन्दूरपूर्णपरिशोभितगण्ड- युग्मम् । उद्दण्ड विध्न परिगण्डन चण्ड दण्डमासण्डलादि सुरनायक पृन्द बन्यम् !! प्रातर्नमामि चतुरानन यन्धमानमिन्छानुकूलमखिलं । वरदानम् । तं तुन्दिसं विरगनाधिपयशमूत्रं पुत्रं पिलास चतुरं शिवयोः शिवाय । प्रातर्भजाम्य भयदं सलु भक्त शोक दावानलं गणविमु [ २ ] वरफुजरास्यम् । अज्ञान कानन विनाशन हव्याहमुत्साह वर्धन मह सुतमीश्वरस्य श्लोकरयमिद पुण्य सदा साम्राज्य दायकम् । प्रातरुत्याय सतत य पठेत्प्रयत पुमाम् ॥ नमस्काराः। श्री महागाधिपतये नम | इष्टदेवताभ्यो नम । कुलदेवताभ्यो नम । प्रामदेवताम्यो नम । स्थानदेवताभ्यो नम । वास्तुदेवताभ्यो नम । वाणिहिरण्यगर्भाच्या नम । श्री लक्ष्मीनारायणाभ्या नम । श्री उमामहेश्वराभ्या नम । हेमाद्रिकृतः स्नान सङ्कलपः अथ हेमाद्रित्त स्नान सङ्कल्प --आचम्य प्राणानायम्य ॥ श्रीमन्म हागणाधिपतये नम 1 श्री गुरुभ्योनम | श्री सरस्वत्यैनम । वेटायनम | वेदपुरुपायनम । इप्टदेवताभ्यो नम । कुल देवताभ्यो नम । ग्रामदेवता भ्योनम । स्थान देवताभ्यो नम । श्री वास्तुदेवताम्योनम । एतत्कर्म प्रधान देवताम्योनम । सर्वेभ्यो न्वेभ्यो नम । सभ्यो ब्राह्मणोम्योनम । अविघ्न मस्तु । सुमुस श्चैक दन्तश्च कपिलो गनर्णक । लम्बोदरश्च विक्टो विप्ननाशो गणाधिप । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षोभाल चन्द्रोगनानन । द्वादशै तानि नामानि य पठे च्छणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा समामे सङ्कने चैव निम्नस्तस्य न जायते । शुक्लानरधर देवशशिवर्ण चतु मुजम् ।। प्रसन्न वदन ध्यायेस विघ्नो पशान्तये । अभीप्सित्तार्थ सिद्धार्थ पूनितोय मुरा सुरै ॥ सर्व विघ्न हरस्तस्मै गणाधिपतयेनम || सर्वमङ्गल मागलये शिवे सर्वार्थ साधिक । शरण्ये यम्बके गौरि नारायणि नमो स्तुवे । वन तुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रम ! निविप्न कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वा॥ वागीशाचा सुमनस सार्था नामुपागमे । य नत्वा त्या स्युम्त नमामिगजाननम् || गणाय नमस्त्य नमस्कृत्य पितामहम् । विष्णू रद श्रिय वीं वन्दे भतया मास्वनीम् । स्थान क्षेत्रम नमस्कृत्य दिन नाय निशाररम् । धरणी गर्भ मम्भूत शशि पुन वृहस्पतिम् ॥ दैत्याचार्य नमस्त्य म्यपुत्र शनैश्चरम । राहु केतु नमस्कृत्य यजारम्भे विशेषत । शमादि देवता सर्यानृपीश्चैव तपायनान् । गर्ग मुनि नमस्त्य नारद पर्वत तया ॥ यमिष्ट मुनि शाल विश्वामित्र घ गाभिलमा अगम्त्य च पुलम्न्य च दशमित्र पराशरम । भरद्वान माण्डव्यम् याहरल्क्य 'चा गालवम् ॥ अन्य रिमास्तपीयुमा घर शास्त्र विरक्षा वान्मर्यान् अगि पत्याद शुभ कर्म ममारभेतमाम नेर्ण जय नेपा पुनम्नग परानय । ये मिन्दी वर श्यामो हृदय स्थो जनार्दनः ॥ अग्रतः श्री नृसिंह श्च पृष्टतो देवकीमुतः । रक्षता पार्श्वयोर्देवो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ॐस्वस्ति श्रीमुकुन्द सच्चिदानन्दस्य ब्रह्मणोऽनिर्वाच्य माया शक्ति बिजम्भिता विद्या योगात् काल कर्म स्वाभावाविभूत महत्तत्त्वोदिताहकारोद्भूत वियदादि पन्च महा भूतेन्द्रिय देवतानिर्मितेऽएडकटाहे चतुर्दश लोकात्मके लीलया तन्मध्य. वर्ति भगवतःश्री नारायणस्य नाभिकमलोद्भत सकल लोक पितामहस्यब्रह्मण सृष्टि कुर्वतस्त दुद्धरणाय प्रजापति प्रार्थितस्य समस्त जगदुत्पत्ति स्थिति लयकारणस्य जगद्रक्षा शिक्षा विचक्षणस्य प्रणत पारिजातस्य अच्युता नन्त वीर्यस्य श्रीमद्भगवतो महापुरुपय अचिन्त्या परिमित शक्त्या ध्येय मानस्य महाजलोद्य मध्ये परिभ्रमणा नाम नेक कोटि ब्रह्मण्डा नामे कतमे ऽन्यक्तमहदहकार पृथिव्यप्ते जो वाट्वा काशा द्या वरण रावृत्तै अस्मि- न्महति ब्रह्माण्ड खण्डे आधार शक्ति श्री मदादि वाराह दंष्ट्रामविराजिते कूर्मानन्त वासुकि तक्ष ककुलिक कर्कोटक पद्म महा पद्म शबाधष्ट महा नागैनियमाणे ऐरावत पुण्डरीक वामन कुमुदा अन पुष्पदन्त सार्वभौम सुप्रती काष्ट दिग्गज प्रतिष्ठिता नाम तल वितल सुतल तलातल रसातल महातल पाताल लोकानामुपरिमागे भूर्लोक भुवोक स्वर्लोक महोर्लोक जनोलोक सपोलोक सत्य लोकाख्य सप्त लोका नामधो भागे चक्र वाल शैल महावलय नागमध्य वर्तिनो महाकाल महाफणिराज शेपस्य सहस्र- फणानां मणि मण्डल मण्डिते दिग्दन्ति शुण्डो त्तम्भिते अमरावत्य शोकवती भोगवती सिद्धवती गान्धर्ववती कांच्यवन्त्य लगावती यशोवती. तिपुण्य पुरीप्रतिष्ठते इन्द्राग्नि यम निति वरुण वायु कुवेरेशानाष्ट दिक्पाल प्रतिष्ठिते वर ध्रुवा घर सोमया प्रभञ्जना नल प्रत्यूष प्रभापास्याप्ट वसुभिर्विराजिते दरत्र्यम्बक रुद्र मृग व्याधा पराजित कपाली भैर य शम्मु फपदि वृपा कपि बटु रूपाख्यै कादश मट्टै संशोमितेरुद्रोपेन्द्र सवितृधा तृत्वष्टर्यमेन्द्रे शानभग मित्र पूपास्य द्वादशादित्य प्रकाशिते यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणाध्यान समाध्यष्टाङ्ग निरत वसिष्ट वाल खिल्य विश्वामित्र दत्त कात्यायन, कौण्डिण्य, गौतमा गिरस पाराशर्य ध्यास पाल्मीक शुक शौनक भरद्वाज सनक सनन्दन सनावन सनत्कुमार नारदादि मुख्य मुनिभिः पवित्रते लोका लोरा चलवलयिते लवणे सुर समुरा सपिदधिक्षोरोदक युक्त सप्तार्णवपरिते जम्यूप्लक्ष शालमलि पुरा फोश्च शाक पुष्परारय सप्त द्वीपयुने इन्द्र कांस्य ताम्रगमस्ति नाग सौम्य गन्धर्ष धारण मारतेति गय खण्ड मरिडते मुघणगिर पर्णिको पेत महासरी म्हाकार पंपाश कोटि योजन विस्तीण भूमण्डले अयोप्या मधुरा माया काशी काब्च्यवन्तिका द्वारा यतीति मप्तपुरी प्रतिष्टिने महा [४] किमु प्रदस्थले शाल ग्राम शम्भल नन्दि प्रामेति प्राम य विराजिते चम्प- कारण्य वद्रिशारण्य दण्डकारण्या बुंदारण्य धर्मारण्य पद्मारण्य गुह्यारण्य जम्बुकारण्य विन्ध्यारण्य द्राक्षारण्य नहुपारण्य काम्यकारण्य द्वैतारण्य नैमिपारण्यढीनामध्ये सुमेरु निषध कूट शुभ्रकूट श्रीफूट हेमफूट रजतट चित्रकूट विकूट किष्किन्ध श्वेताद्रिकट हिम विन्ध्या चलानां हरि वर्ष किम्पुरूप वर्ष योश्च दक्षिणं नव सहस्र योजन विस्तीर्णे भरतखण्डे मलया- घल मह्याचलविन्धया चला नामुन्तरेण स्वर्णप्रस्थ चण्डप्रस्थ सूत्तिक आवं- तकरमणक महारमणक पाञ्चजन्यसिद्दल लंकाअशोक चत्य लकावती-सिद्ध- बती गान्धव वत्यादि पुण्यपुरी विराजिते नर वएडोपद्वीप मरिडते दक्षिणा या स्थित रेणुका द्वय सूकर काशी काञ्ची कलिकाल बटेश्वर कालांतर महाकालेति नको सर युते द्वादश ज्योतिलिङ्ग गहा (भागीरथी) (गौतमी) गोदाक्षिप्रा यमुना सरस्वती नर्मदा तापीपयोप्णिी चन्द्रभागा. कावेरी मन्दाग्निी प्रबग कृष्ण घेण्या भीमरथी तुग भद्रामलायहा कृत माला ताम्रपर्णविशालाक्षी वन्जुला चर्मण्यवती वेत्रवती भोगावती विशोका कौशिकी गण्डकी वासिष्टी प्रमदा विश्वामित्री फाल्गुनी चित्र काश्यपी सरयू सनपाप हारिणी रतोया प्रणीता वत्रा वक्र गामिनी सुवर्णरेखा शीणामा नाशिनी शीगाकुश वर्तिनी ब्रह्मा नन्दा महितन- येत्य नेक पुण्य नर्दभिविलसते ब्रह्मपुत्र सिन्धु नदादि परम पवित्र जल विराजिते दिमवन्मेरु गोवर्धन प्रौच चित्रकूट हेमकूट महेन्द्रमलय सान्द्र कीलपारि यात्राद्यनेक पत्रत समन्विते मत माल्यकिष्किन्ध ऋपि गति महाना ममन्विते श्रङ्ग बन कलिंग काश्मीर काम्बोज सोपरि सौराष्ट्र महाराष्ट्र मगध नेपार करेंल धारेल पाञ्चाल गोद मालय मजय सिंहलद्रविड कर्नाटक ललाट क्रदाट घरहाट पानाट पाएड्य निपध मागय आन्ध दशार्णव मोजकुरु गान्धार विदर्भ विदेह बाह्रीक वर्वर कैकेय कौशल विराट शूरमन कॉकाम कैस्ट मत्यस्य मद्या रमिक ग्गजूरी- यावन मलेच्छ जालन्धरति सिद्धयत्यन्य देश विशेष भाषा भूमिपाल विचित्रने इला वृत युग भद्रासनु मालफिम्पुरुपरमणक हिरण्यमयादि नय यापारी मध्ये भात नएढे यरल चम्पक पाटलाज पुन्नाग जातिवर वीररमाल यहार केनश्यादि नानारिधि कुसुम म्नर कविराजिते कोकन्तु हिरएप गंगकुरुजावुद मणि की यटशाल प्राम मकर मथुरा गया निष्क. मान लोशालपोतम मिश्रमाम वहीनि चतुर्दश गुय यिनसिते जम्बूढी कुरक्षेत्रादि ममम् मध्योपायाः पश्चिमदिग भागे पुल मेरोदक्षिणदिग्भाग सिध्यय निशे श्री शैलम्य वायव्य देश कशा पेशयोमध्ये मत्स्य पूर्म वाराह भूमिह वामन परशुराम रामकृष्ण पुद पत्कीवि दशाश्वारा मध्ये चौद्धावतारे गङ्गादिसरिद्भिः पाविते एवं नव सहस्र योजन विस्तीर्ण भारत वर्षे निखिल जन पावन परम भागवतोत्तम शौनकादि निवासिते नैमिषारण्ये आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मा यतैक देशे सूर्यान्वयभू भृत्प्रष्ठिते श्री मन्नारायण नामि कमलोद्भूत सकल जगत्स्रष्टुः परार्द्ध द्वय जीविनो ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे एक पञ्चासत्तमे वर्षे प्रथम मासे प्रथम पक्षे प्रथम दिवसे अह्नो द्वितीये यामे तृतीये मुहूर्ते रथन्तरादि द्वात्रिंश कल्पानां मध्ये श्रष्टमे श्वेतवाराह कल्पे स्वायम्भुवादिमन्वन्तराण मध्ये सप्तमें वैवस्वतमन्वन्तरे कृत त्रेता द्वापर कलि संतकानां चतुर्णा युगानां मध्ये वर्तमाने अष्टा विंशति तमे कलियुगे तत्प्रथमे विभागे (पादे) श्री मन्नृपविक्रमाात् श्री मन्नृप शालिवाहनाद्वा यथा संख्या गमेन चान्द्रसावन सौर नक्षात्रादि प्रकारेण गतानां प्रभवादि पष्टि सम्वत्सराणां मध्ये अमुक नाम्नि संवत्मरे उत्तरगोलावलम्बिनि श्री मार्तण्ड मण्डले अमुकता अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथी अमुक वासरे अमुक नक्षत्रे अमुक योगे अमुक करणे अमुक राशिस्थे चन्द्रे अमुक स्थे सूर्ये अमुक स्थिते देवगुरो शेपेषु प्रहेषु यथा यथा स्थान स्थितेषु सत्सु एवं गुण विशेषेणविशिष्टायां शुभ पुण्य तिथी अमुक शर्मणः (भार्यया सहाधिकृतस्य) ममइहजन्मनि जन्मान्तरे वा वाल्य यौवन वार्धक्या वस्थासु वाक्मणि पांद पायू पस्थ प्राण रसना चतुः स्पर्शन श्रोत्रमनोभिश्चरित-ज्ञाता ज्ञात कामा काम महापातको- पपात कादि सश्चिवानां पापानां ब्रह्महनन सुरापान सुवर्णस्तेयगुरु तल्यगमन तत्संसर्गरूपमहा पातकानां बुद्धि पूर्वकाणां मनो वाकाय कृतानां बहु कालाभ्यस्तानां उपपासकानां च स्पृष्टास्पृष्ठ संकरी करणमन्तिनी करण पात्री करण जातिभ्रंश करण विहिता करण कमलोप जनितानां रसविक्रय कन्या विक्रय हय विक्रय गो विक्रय स्वरोष्ट्र विक्रय दासी विक्रय प्रजादि पशु विक्रय स्वगृह विक्रय नीली विक्रय अक्रय विक्रय पण्य विक्रय जल चरादि जन्तु विक्रय स्थल चरादि विक्रय खेचरादि विक्रय सम्भूतानां निरर्थक वृक्षच्छेदन रणानपा करण ब्रह्मस्वापहरण देवस्वाप हरण राजस्वापि पर द्रव्याप हरण तैलादि द्रव्यापि हरणफलादि हरण लोहादि हरण नाना वस्तु हरण रूपाणां ब्राह्मण निन्दा गुरुनिन्दा वेद निन्दा शास्त्र निन्दा पर निन्दामदय भक्षणा भोध्य भोजना चोप्य चोपणा लेह्य लेहना पेय पानास्पृ. श्य पर्शना श्राव्य प्रवणहिंस्य हिंसना वन्द्य वन्दना चिन्त्य चिन्तना याज्य याजना पूज्य पूजन सारण मान पितृ तिरस्कार स्त्री पुरुष प्रीति भेदन परस्त्रीगमन विधवागमन वैश्यागमन दासीगमन चाण्डालादि हीन जाति गमन गुदगमन रजस्वला गमन पश्चादिगमन रूपाणां फूट साक्षित्व पैशून्य बाद मिथ्या पवाद म्लेच्छ सम्मापए ब्रह्मद्वेपकरण प्रवृत्तिहरण चि- [] पछेन पर वृत्तिहरण रूपाणामित्रवञ्चन गुरुवश्चन स्वामि वञ्चनासत्य भापण गर्भ पातन पथि ताम्बूल थवर्णहीन जाति सेवन परान भोजन गणान भोनन लशुन पलाण्डु गृञ्जन भत्तण तालवृक्ष फलम क्षणोच्छिष्ट मनणमाजारोच्छिष्ट भक्षण पर्युपितान भक्षणरूपाणा पक्ति भे करण भ्रूणहिंसा पशुहिंसा पालहिंसाधनेक हिंसोद्भू तानाशौचत्यागस्नान त्याग सन्ध्यात्यागौ पासनाग्नि त्याग वैश्वदेव त्याग रुपाणा निषिद्धा चरण कुग्रामवास ब्रह्मद्रोह गुरुद्रोह पितृ मातृ द्रोह पर द्रोह पर निन्दात्मस्तुतिदुष्ट प्रतिमह दुखन स सर्गरूपाणा गोयान वृपभयान महिपी यानगर्दभयानोष्ट थाना नयानभृत्याभरण स्वग्राम त्याग गोत्रत्याग कुलत्याग दूरस्थमन्त्रण विप्राशाभेदना वन्दिताशीर्वाग्रहणपतित सम्भापणस्पाणा पतितजन पक्तिभोजनाह सङ्गम वृथा मनोरथादि पापाना तथा महा पापोपपापाम्या नानायानिपु यत्कृतम् । धालमावेन यत्पाप जुत्तृडथै च यत्कृतम् ।। आत्मार्थ चैव यत्पाप परार्थे चैव यत्कृतम । तीर्थेपु चैवयत्पाप गुवज्ञातम् च यत् ।। रागद्वेपादि नितं काम क्रोधेन यत्सम् ॥ हिंसानिद्रादिजपामभेद टचाच यन्मया ॥ देहामि मानन पाप सर्वदा यन्मया कृतम् । भूतभव्य च यत्पाप भविष्य चैर गीतमि ।। शुष्क माद्र च यत्पाप जानता 5 जानता एतम् । महलघु च यत्पाप तन्मे नाशय जाह्रवि ॥ ब्रह्महायद्यप स्तेयी तथैवी गुरुतल्पग ॥ महापापानि चत्वारि तत्ससर्गी तु पञ्चम् अति पासक मन्यच्च सन्न्यून मुप पातमम् । गोयधो ध्रात्यता स्तेय ऋणाना चानप क्रिया अनाहिताग्निता पण्यविक्रय परिवेदनम् । इन्धनार्थे द्रुमच्छेद स्त्री हिमोपवि जीवनम् ।। हिंसाया नाविधान चभृतका ध्यापन तथा प्रथमा श्रममारभ्ययरिकजिकिल्बिप कृतम् ॥ पृमि कीटादिइननयत्किञ्चित्त प्राणिहिंसनम् । माता पित्रो रशुश्रुपा तद्वाक्या करण तथा । अपूय पूजन चैव पूज्याना च व्यतिक्रम ॥ अनाश्रमस्थ वाग्न्यादि देवापु श्रूपण तया पर कायापहरण परद्रव्योप जीवनम् । ततोऽज्ञानरत वापि कायिक वाचिक तथा ।। मानस त्रिविध पाप प्रायश्चत्तेरे नाशितम् । तस्मादशेष पापेम्य स्नाहि त्रैलोक्य पावनि । निष्पापो ऽस्म्यध्युनावि प्रसादा त्तर नान्यथा ॥ स्त्रीणां विशेष:-पाणिग्रहण मारम्य स्वकर्मा परिपालनम् । इन्द्रयाभिरति पुमु नाना योनिपुयामत ।। कृमि कीटादि हनन पतिभेदा कि सथा सण स्मनाचार मनसा दोप कल्पनम् । तत्सनं नाशये तिमगंगे वयानया नया 1] इत्यादि प्रकीर्ण पातकाना एतत्काल पर्यत मनिताना लघुम्यून मूरमाण व नि:शेष परिहारार्थ दशावरान दशावरान् पशापरान् धाममासहितान् एक विंशति पुरुषा गुतु अझलोका यधि पश्चा ।

शकोटियोजन विस्तीर्णेऽस्मिन्भुमण्डले सप्तर्षि मण्डलपर्यन्तं वालुकाभिः कृतराशेः वर्षसहस्रा वसाने एकैक वालुका पकर्प क्रमेण सर्वराश्यपकर्प- समित काल पर्यन्तं ब्रह्मलोके ब्रह्म सायुज्यता प्राप्त्यर्थ कुरुक्षेत्रादि सर्व तीर्थप स्नान पूर्वकं सहस्रगोदान जन्य फल प्राप्त्यर्थ तथा ममसमस्त. पितृणां आत्मनश्च विष्णवादि लोक प्राप्तये अधीतानामध्येष्य माणानां चा ध्यायानां स्थापनविच्छेदकोश पोपण दन्त विवृति, द्रुवृत्तद्रुतोधारित वर्णानां पूर्व सवर्णानां गलोपलम्बितविवृतोपारित वर्णनामूशिष्टा स्पष्ट वर्ण विघटनादिभिः पठितानां श्रुतीनां यद्या तया मत्वं तत्परिहारायं अष्टत्रिशदनध्यायाध्ययने रथ्या सञ्चरतः शूद्रस्य शृएयतोऽध्ययने म्लेच्छा- न्त्यजादे शृण्वतो ऽध्ययने ऽशुचिदेशे ऽध्ययने प्रात्मनोशुचित्वेऽअध्ययने भतर स्वरानुस्वारपदच्छेद करिटका व्यञ्जन हस्व दीर्घ प्लुत कएठ तालु मूर्धन्योप्ठ्य दन्त्य नासिका नुनासिक रेफजिह्वा मूली यो पध्मानीयो दाता नुदात्त स्वरिता दीनां व्यतये नो वारेमाधुर्याक्षर व्यक्तिहीन त्वा धनेक प्रत्यवाय परिहार पूर्वकं सर्वस्य वेदस्य मवीयत्व सम्पादन द्वारा यथाव फल प्राप्त्यर्थ श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ देव ब्राह्मण सवितृ सूर्यनारायण सनिधी गद्गाभागीरथी मन्दाकिनी-अलक नन्दायां अमुक तीर्थे वा प्रयाहाभिमुसं स्नानमहं करिष्ये । इतिसङ्कलप्प स्नायान-[यदि यजमानो वेदाधिकारी न स्यात्तीह तेनायं संकल्पः पुराणोक्त विधिना कार्यः उपाध्या- येन तत्करतः कारयितव्यश्च ॥] इति हेमाद्रिकृतः सङ्कल्प प्रयोगः । अयनद्यादौनित्य स्नान प्रयोग : -शुचिर्भूत्वाकर्ता शुभ्रां यया देश सम्भवां या मृदमाद्र गोमयं फुशानू तिलावतानूसुरभीणि पुप्पाणिभरमं चादाय तीर्य तटे गन्छेत् । तदनन्तरंमूर्यामुग्म स्तीर्थानि- प्रार्थयेत् । वीयं प्रार्थना, नमामिगद्ग तव पाद पवनं मुगमुरे दिव्य रूपम् । मुक्तिं च मुसिंघ ददासिनित्यं भावानुसारेण सदा नराणाम् ।। यागति योग युकानांमुनीना मूपरेतसाम । सागतिःसर्व जन्तूनां गौतमी तीर यामिनाम् ॥ पुरा धानि तीयांनि गद्गाद्याः मरितम्तया। भागच्छन्नु पविद्याणि स्नानकालेमदामम || त्वं रामा मर्व वीर्या नां त्वमेव जगतः पिना । याचिहं देदिमे तीर्थ तीर्थ रामनमोस्तुते ।। अपामधिपतिस्त्वं च तीयेषु यसतिम्त्व ! धमणाय नमस्तुभ्यं लाना नुशांप्रयच्छमे ॥ अधिष्टाध्य प्रसीयानांतीयप विपरन्नि याः देवता स्ताः अपग्मन्नु स्नानाशांमम मयंदा गड़े पयमुने चैव गोदावरि मरस्वमि । (१) निमामिने भारपारि नैमिचिम्नानेमादि मौसममा महत्वइनि देस्नानापन्न कारपनि ।

[ ८ ] नदे सिन्धो कावेरि जलेऽस्मिन् सन्तिधिं कुरु ! इते सम्प्रार्थ्य हस्ती पादीप्रक्षाल्याचम्य संकल्पः-अद्यपूर्वो चारित एवं गुण विशेषण विशिष्टापांशुभ पुण्य तिथी मम श्रात्मनः श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थ मम इह जन्मनि जन्मान्तरे वा का यक याचिक मानसिक वाचिक सां सर्गिक ज्ञाता ज्ञात स्र्शा स्पर्शभुक्तामुक्त पीतापीतादिसकल पातकनिरास पूर्वक मासनभोजन शयन गमनादि प्वनृतभाषणादि दोप निराप द्वारा श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थममुक वीर्थस्नानमहं करिष्ये ॥ इतिसंकल्प पश्वान्-- तीर्थामिमन्त्रणम्--ॐठरु हि राजा व्यरुणश्चकारसूर्य्याय पन्यामन्न- वेतवाऽर | अपरे पादा प्रतिघातवे करतापवक्ता दृदया विधश्चित् । नमीवरुणायाभिष्टितोवरुणस्य पाशाः॥ १॥ इतिमन्त्रेण न्युञा अलिहस्ते- न तोयमभिमन्त्रयेत् ॥ जलावर्तनम् ॐ ये ते शतंवरुणये सहस्रं यज्ञिया पाशा विवतामहान्तः । तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तुमरुतः स्वाः ॥ २ ॥ पा• गृ० इति पूर्णाञ्जलिनापोहणम्--॥ सुमिन्त्रया नऽप्रापऽश्रोपधयऽसन्तु ॥ ३॥ इतिमन्त्रेण लाञ्जलिंगृहीयात् ॥ तीर्थ तटे जल प्रक्षेपणम्'-दुम्मिन्नियास्तस्मैसन्तुयोरम्माद्धेष्टियञ्चबन्दिप्मऽ ॥ ४ ॥ मृत्तिका लेपनम् इदं विष्णुर्यिचक्रमेवेद्यानिदये पदम् । समूढ- मस्य पारमुरे स्वाहा ।। ५॥ अश्वशान्ति स्थक्रान्ते विष्णुकान्ते वमुन्धरे । उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शववाहुना !! मृत्तिके ब्रह्म पूतासि काश्यपे नाभि वन्दिता । लयाहतेन पापेन गच्छामि परमां गतिम् ॥ मृत्तिके हरमे पापं यन्मया दुप्वं कृतम् । इतिसंप्रयं । नाभिमावंतीर्थ जलं प्रविश्य सूर्याभिमुग्यं स्थित्वाम्नायात् । वनमन्त्रः-ॐ श्रापोऽअस्म्मान्मातर शुन्ध यन्तु घृतेन नो घृतप्यूव पुनन्तु । विश्व हि रिप्पम्पबन्ति देवीs ॥६॥ इनिमन्त्रणनिमय पुनः ॐ उदि दाम्बऽ शुचिरा पूतऽएमि ॥७॥ इतिमन्त्रेणद्वितीय वारं निमज्य, पुनस्तूष्णीं निमज्योन्मज्या चामे) (२) विष्णुरमृति:-प्रमाविष्णु बरुद्रश्वधर्वमो मिति नोच्यते। मम्मन्ते ऽसुरस्याने नभ्यतेच युनुमिः ॥ (३)तिमन्त्रेण जलंदक्षिण हस्ता अलिमिदंदिगवत त्रिवार मा य येत् ॥ भ्रामयेत् ॥ (४) निमन्त्रणय लियं मुदकं स्वरानन्मनमाविचिन्त्य तनाय स्ववाम भागवार्थवटे दिपेत् ॥ (१) गृतिका मादाय सम्पा.त्रिभागा लत्या प्रथम मागं वाम रस्ते गृहीत्वा तेन नामरपः करि प्रदेश मनुलेश्येत् । हस्तं प्रदाल्य ॥ (२) पुनस्ते नैव हस्तेन दिदीयमागेन यस्ति उर जंघे चरणो करो चरत्येक त्म्ही त्रिनिनुलिप्य पुन ई प्रदास्यानम्य वीचोदकं नमस्ट्यात् ॥(1) दिमन्वय तृतीय मागेन दवियन सारादि नामिपयन्द्रा निगापाययुपलियास्तं मवाल्या चम्प वीय दर नमरस्यात् ।।

[ ] गोमवलेपनम् अप्रमप्र चरन्ती ना मोषधीनां वनेक्ने । वासां वृषभ पन्नीनां पवित्रं काय शोधनम् ॥ तन्मे रोगांश्च शोकांश्च पाप मेहर गोमय। ( इति मन्त्रण गोमयमभिमंत्र्य )। ॐ मॉ नस्तोके तनये मा नऽआयुपिमानो गोपु मा नोऽअश्वपुरीरिषऽ मानो ब्बीरान्नुह भामिनो बधीहविष्म्मन्सासदमित्त्वा- हवामहे ।। ८ ।। भस्मलेपनम्, क्षेपकम्-जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमेनि भस्म, सर्व हवाइदं भस्म, मन एतानि च पिभस्मानीति ॥ ॐ प्रसहयभस्म्मना योनिम पश्च पृथिवी मग्ने, स । सृज्य मातृभिष्टव ज्योतिषम्मा न्युनरासदऽ२ ॥ ६ ॥ इति क्षेपकम् मार्जनम्-ॐ इमम्में व्यरुणश्श्रुधी हवमट्या चमृत्य, स्वामवस्युराचके । १० ॥ तत्त्वायामि ब्रह्ममणा बन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविवि: अहेडमानो यारणेह वोद्धयु रुश समानऽआयुऽ२प्रमोपीऽ२ ॥११॥ त्वन्नोऽअग्नेब्बरुणस्य- विद्वान्देवस्य हेहोऽअवयासिसीष्ठाऽ२ यजिष्ठो ब्यन्निहतमा२ शोशुचानो विश्वाद्वेषा ७ सिप्प्रमुमुग्ध्यरम्मत् । १२ ॥ सत्त्वन्नोऽअग्ग्ने वमोभवोती नेदिष्ठोऽ अस्याऽ उपसोव्युष्टौ, अवयव नोघमण . राणोब्बीहि मृडीक. सुहबॉन एधि । १३ ॥ मापोमौषधीहि . सी म्नो धामनों राज स्ततों वरुणनो मुञ्च । १४ ॥ उदुत्तमं व्यरुणपाश मम्म- वाधर्मनिा मध्यम नथाप अथाव्बय मादित्य व्रते तवानागसो ऽअदितये श्याम । १५ ।। मुञ्चन्तु मा शपस्थ्या दथो वरुण्यादुत अथोयमस्य पड्वीशारसर्वस्म्मा द्देव किल्विषात् । १६॥ अवभृथनि चुम्पुणनिचेहरसि निचुम्पुणःऽ१ । अवदेवेदेव कृतमेनोयासिप मवमत्त्यै मर्त्य कृतम्पुर राणों देवरिपप्पाहि । १७ ॥ (इतिमन्त्रैः सर्वागा. निमार्जयित्वा । पश्चात्तूष्णीस्नात्वाचम्य) पुनदर्भमार्जनम ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्तानऽ ऊर्जे दधातन महरेणाय चक्षसे । १८ ॥ योव:शिव तमो रसस्तस्य भाजयतेह न उशतीरिंच मातरः । १६॥ तस्म्माऽअरगमाम वो पस्य दयाय जिन्वथ आप जन यथा च नःs । २०॥ इदमांपऽप्रवहता वयञ्च मलञ्चयत् यश्चामि दुद्रोहा नृतं ध्यम शेपेऽभीरुणम् आपामा तस्म्मादेनस ऽपवमानश्चमुश्चतु ॥ २१ ॥ रविष्म्मतीरिमाऽापौ इविधम्मो ऽआर्विवासति हविष्मांन्देवोऽश्राद्धरो ४पूर्णाअलिति मन्त्रेण सोदकं गोमयं सूर्याय दर्शयिता तेन त्रिवार मानि ललाटा दिपादतल पर्यन्तानि मल्लेपन वदनुलिप्प क्षातयेत् ॥१॥ इति मन्त्रेण ललाटा द्यनेषु मस्म लेपनं कृत्वा ॥२ 1 वत्र सजलेन कुश त्रयेण नाभि दक्षिण पार्श्वमारम्य शिरो नीत्वा नामि वामपान पर्यन्तं मात्मानं पापयेत् ॥

. [१०] हविमोऽस्तु सूर्प-२२।। देवीरापोऽ अपानपादयोयड उम्मिहविष्या इन्द्रियायानन्मदिन्तम । तन्देवेम्यों देवनादत्त शुकपेद्धयो येपाम्मागरस्थ स्शदा १२३ ॥ कापिरसिसमुद्रदृस्यत्त्या तित्याऽ उन्नयामि ममापाड- अद्भिरगमत सोपभिरोषधीs२ | २४ ॥ अपोटेवा मधुमतीरमण स्वती राजपरिश्चातानाड यानिम्मित्रा थरुणा बभ्यपि बन्या भिरिन्द्रमनयनत्यरातीs २५॥द्रपदादिव मुमुचान १ स्पिनर सातो मलादिन पूतम्यपविणे वाज्यमाप-शुन्धन्तु मैनसऽ ! २६॥ शनीदेवीरमिष्टय आपोमवन्तु पीतये शय्योरभि श्रवन्तु नऽ । २७ ॥ अपा. रस मुद्दषयस सूर्य सन्त , समाहितम् । श्रपा छ रसस्य थोरसस्त ब्योगह्वाम्म्युत्तम मुपग्राम गृहीतोसीन्द्रायत्त्वा जुष्टतमम् । अपो देवो रूपज मधुमतीर यक्ष्माप प्रजाम्व्य-तासा मात्थाना दुजिता मोषधयः सुपिप्पला ७१।२६ ॥ पुनन्तुमा पितर सोभ्यास -पुनन्तुमा पितामहा पुनन्तुष्प्रपितामहा पवित्रेण शतायुषा विश्वमायु ऽयश्श्नथे । ३१ ।। अग्नायू . पिपवस श्रासुबो उर्जमि, पश्चन 5 पारे वाधव दुच्छनाम् । ३२ । पुनन्तुमादेवसखऽ पुनन्तु मनसा थिय-पुनन्नु विश्वा भूतानि जामद ऽ पुनीहिमा ६३३१ पविण पुनीहिमाशुकोणदेवदीयत्वग्नेयत्वात् । ऽनु १३४ायतेपनि अमप्प्यिग्ने वितत मन्तरा ब्रह्ममतेन पुनातुमा ।३।। पवमानऽसाऽ श्रदय न- पवित्रण विचणिs यst पोता म पुनातुमा । ३६ १ उमाम्न्यान्यव सवित ऽपनिन्त्रेण सवेन च माम्पुनीहिबिश्वत-1 ३७ ।। बैरव देवी पुनती दयागादयस्यामिमा वयस्तन्वोव्यी तप्रष्ठाऽ तयामदन्त ऽ सधमादेपुटयय स्याम पतयोरयीणाम् ।३८ ॥( इति मन्त्रे मर्जियित्वापश्चा दुदक स्पृशेत् ।।) तत-ॐ विपसिम्मी पुनातु देवो मा सविता पुनारवन्छिद्रेण पपिनोंणसूय्यस्यरश्म्मिर्मि-तस्यते पच्चि जपते पवित्रतस्य पत्तामा पुनेतच्छकेयम्।३६व्याक्यतिा पुनास्वन्छि दुद्रेण पत्रिण सूर्य्यस्य ररिम्ममि-तत्य० ॥ ४० ॥ देवो मा सविता पुनावरिंद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रहिम्ममि-तस्य । ४१ ॥ सत-ॐ पुनातु इमम्मे ब० ॥४२॥ इति मनेण ॐ पुनातु त्वाया। ४३॥ इति मंत्रण ॐ भुव पुनातुस्यो श्र। ४४।। ( इति मत्रण)ॐ स्व पुनातु-स aisa | ५५ ।। ( इतिमात्रेण )ॐ मह पुनातु-मापो (१)इति मन्त्रेण नामकर माजंयत् ॥ (२) इति मण नाम रथो मा येत् ॥ (1) इति माय मांडे मा. ||(v) अपामागैस्तथा दूर्वाभिमान प्रापयादिनैमित्तिक लाने कुर्शननु नित्य स्नाने ॥

[ ११ मौप० । ४६ ॥ (इतिमंण) ॐ जनः पुनातु-उदुत्तमम् 1200 (इति मंत्रण) ॐ तपः पुनातु-मुजन्तु मा०1४८॥ (इतिमंत्रण) ॐ सत्यं पुनातु-अवभृथ नि० ।४६ ॥ (इति मंत्रण ) ॐ तत्सवितुर्व 1 ५० ॥ सर्व पुनातु ॥ (इति कुशैर्मार्जयित्वा) ॥ अपामार्गेण मार्जनम् (क्षेपकम् ) ॐ अपाधमपकिल्बिपमप कृत्त्यामयोरप अपोमार्गत्त्व मरम्मदपऽ२ ष्ष्वप्न्यसुवः । ५१ ॥ (इति मंत्रणापामार्गेखिभि- मर्जियेत् ॥ ततः-दुर्घाकुरेणं मार्जनम्-ॐ काएडा काण्डा स्पोहन्ती पम्प परुप स्प्परि एवानोदूबेपतनु सहस्रेण शतेन चः ॥५२॥ (इति क्षेपकम् ) (इति मंत्रेण दुर्वामि त्रिभिर्जियेत् ) ॥ अघमर्षणम् ततोवक्ष्यमाणपट पक्षाणामन्यतमे नान्तर्जले ममोऽनुच्छ्छ्व सन्न घमणं कुर्यात् तद्यथा ॐ द्रुपदादि । ५३ ॥ (इति वात्रिः पठेत् ) | आयङ्गोऽ पृश्निरक्क्रमी दुसदनन्मातरम्पुरः । पितरम्वाप्रयन्स्वः। ४॥ ( इतिवात्रिः पठेत् )। सशिरसं प्राणायामं वात्रिः पठेत् ।। यथा-ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितु० स्वरोम् । ५४ ।। इति सप्त व्याहृति (पूर्विकांस शिरस्कां गायत्री वात्रिः पठेत् ।। ॐ इति वात्रिः पठेत ) विष्णु ध्यानम् --यद्वापरमात्मानं विष्णु शेष शायिनं सायुधस श्री कमेकाप मनसाध्यायेत् ) एवं स्नान कृतस्यात् ।। स्नानाङ्ग तर्पणम्-ॐ ब्रह्मादयो देवा स्तृप्यन्ताम् । ॐ भूर्देवास्तु । ॐ भुवर्देवा स० ॐ स्वर्देवास्तृ० ॐ भूर्भुवः स्वर्देवास्तु ॐ सनकादिद्वै पायनाक्ष्यो ऋषय स्तृप्यन्ताम् ॐ भूपय स्तु ॐ भुवऋ पयस्त ॐ स्व पयस्तु ॐ भूर्भुवःख ऋपयस्त० ॐ कठयेवाड नलादय. पितर स्तृप्यन्ताम ॐ भूः पितर स्तृ०. ॐ भुवः पितर स्तृ८. ॐ व पितर स्तु: ॐ भूर्भुवः स्वःपितर स्तृ० ॥ (ततः प्रायम्य सव्येन यक्ष्म तर्पणं कुर्यात् )। यमतर्पणम्-यन्मया दूपितं तोयं शारीरमल सम्भवान् । तस्य पापस्य शुद्धयर्थ यक्ष्म तत्ते तिलोदकम् ॥ (इति मंत्रण तीर्थ सटे तिलमिभं जलाञ्जलिं निक्षिपेत् ।।।) पश्चात् लतादिकेषु शिखोदक त्यागः-लतागुल्मेषु वृक्षेषु पितरो ये व्यवस्थिताः । ते सर्वे तृप्ति मायान्तु (१) प्रथमे देवतर्पणे पूर्वाभिमुखः सन्कुशवयं गृहीत्वा तदप्रैः सम्ययेन देवतीय नोङ्कारपूर्वकं देवेभ्य एकैक मालिंदनात् ॥ (२) द्वितीये ऋष्यादि तपणे उद्गप्रान् दर्मानधृत्वा तदनिधीत्या प्रजापति सीधै नोहाापूर्वक मृषिभ्यो द्रौद्वापसलीदेयौ । (३) तृतीये पितृ तांणे भुनान्दचिणा अमूलान् दर्भान्धृत्वाप सन्येन पितृतीय नोहारपूर्वक पितृभ्यती स्त्रीनालीन्दद्यात् ।। इति नद्यादौनित्य लान प्रयोगः।। (४) उक्ताः ॥

[ १२ ] मयोत्सृष्टै शिसोदक ।। (इतिमन्त्रेण स्वदक्षिणभागेशियापं निध्यीडयेत् तवोधौते वाससी परिधाय भरमादिधारयेत् ततोगृहे अजेन ) इति ।। गहा पूजनम् । तीर्थे गत्वा जलस्पर्शनपूर्वक गङ्गा प्रणम्य भूतशुद्धि सविधाय सूर्यपूजन कृत्य च नारिकेलादि फल ताम्बूल चार्पयित्वा पानी प्रक्षाल्य आचम्य प्रथमयानाया प्रायश्चित्सकल्प कुर्यात् । अद्येत्यानि अमुकोऽह द्वादशादिषडब्द सार्वान्द एकाद वा प्राजापत्याम्नायीभूतहिरण्य माक्षणाय दास्ये इति ब्राह्मणाय सुवर्ण दत्ता गहाम्भसि प्रविश्य स्नात्याचम्य कुशतिलजलान्यादाय अद्यत्यादि अमुकोऽह यामच्छेगनाय वरपरो भाषर्य सहसान्तस्वर्गमहित्व प्राप्तिकामो वपन करिष्ये ।। इति संकल्प । अथ मन्त्र श्रात्मन शुद्धिकामो या पितृणां मुक्ति हेतवे पर चकरिष्यामिनीरेऽह तक जाहवि १ ॥ शनि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च पेशानाश्रित्य तिष्ठन्ति तस्मात् फेशाषपाम्यहम् । महापापोपपापाश्च केशलोमनखा द्विजा । छुरिचिन्नन्तु सर्वात ते मे दोषा पतन्त्यः । इति जलमुत्सृज्य मुण्डन कृत्वा ।। अनेन मन्त्रण गल्ला प्रार्थयेत् ॥ ॐ नमो देवाधिदेवाय शितिकरटाय दिण्डिनि । रुद्राय चापहस्याय निणे वेधमे नम ॥ सरस्वती च साविनी बेदमाता गरीयसी । सानिध्यन्तुभवत्वत्र नीर्थपाप प्रणाशनी इति मम्प्रार्घ्य दुशतिल नलान्यादाय ॥ ॐ विष्णु ३ । श्रोग्रमपुराणपुरुषोचमाय श्रीमत्समस्तजगदुत्पतिस्थितिप्रलयकारस्य रक्ष शिक्षा विचक्षणस्य पर्णपारिजातस्य अध्युतानन्तवीर्यस्य श्रीमद्भगवतो महापरुपस्य श्रीमदादिनारायणस्यावित्या परिमित शक्त्याधियमाण महाजलौघमध्य परिश्रममाणस्यानेकोटिनझाएडानामेकट्य महद्द कारपृथव्यतेजोवामानाशायावरणरायते प्रमाण्डरसएडयोमध्ये श्राधार शक्तिर्मान ताम्रादिग्गडोपरिमिते सप्तपातालस्योपरिमाग मनराला पस्याधो भाग महाकाल शेपस्य. सहसाणायमसिद्धने दिल न्तिदन्तशुण्डर दरहेन लोकालिन सरणमुरारिधिदुग्धक्षीरोदार्णव परिविते पम्युप्लव सालमलिकवुशमीच माप पुपरसप्तद्वीपेदीपिते मारतवर्षे भारतसरडे अयोध्या मयुगमाया फाशी फाची अवन्तिका नारायती कुमनेने पुकादि नाना सीथ युगे धर्म भूमी मध्यरेमायां पूर्वदिमागीरध्या परि मतोरे सकल सृष्टि पराजय वीमानां प्रक्षो दिलायपरास्य प्रथमादे प्रयममा प्रथमदिनम प्रनिनिवियागत तत्रिय मुसे प्रथमपटिकायां [ १३ ॥ सप्तमे चैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतिमे युगे कलियुगस्य प्रथमे चरणे वौद्धावतारेऽअमुक नाम वत्सरे महान क्षन्ने च एवं विधि पञ्चाङ्गादिके अमुक नाम दिवसे नक्षत्रे एवं विधि, अमुक योगेऽमुक नाम कर्णेशुभ मुहुर्तेऽमुक समयेऽमुकराशिस्थितेरवोऽमुकरोशिस्थिते चन्द्रेऽमुकराशि स्थितेभीमेऽमुक राशिस्थिते बुधेमुकराशि स्थिते देवगुरौअमुक राशिस्थिते शुक्रमुकऽराशिस्थिते शनीअमुक राशिस्थते केवोऽमुक राशिस्थिते राही एवं गुण विशेपेण विशिष्टायां अमुकऋतौअमुक मासेऽमुक पतेऽमुकतिथौ अमुकगोत्रोत्पन्नो अमुक राशिः॥ अमुक नामाहं ममेह जन्मनि जन्मान्तरे वा संचितानां पातकानां ब्रह्महनन मध्यपान सुवर्णस्तेय गुरुतल्प गमनक्षत्संर्सगकरूप बुद्धि पूर्वकानां मनोवाक काय कृतानां महापातकानां बहुकालाभ्यस्तानां उपपातकानां स्पृष्टास्पृष्ठ सकरीकरणं अपात्रिकर्ण जाति भ्रश करण रसविक्रय गोविक्रय खरोष्ट्र महिपी विक्रय अजादि पशु विक्रय ब्राह्मण दुर्भापण निरर्थकट्ठमच्छेदनमानया कर्ण ब्रह्मस्वहरण जाति भ्रश करण रविदेवराज स्वापहरण ब्राह्मणनिन्दा वेदनिन्दा शिवनिन्दा अभक्ष्य भक्षणं अभोज्यभोज्यं अचोघ्याऽऽचोपणं अपेयापानं अस्पृश्य स्पर्शनं अश्राव्यस्य श्रवणं यात्राणम् अहिंस्याऽऽहिं सनम् अवन्ध्याऽऽवन्धनम् अचिन्तचिन्तनम् अयाच्याऽऽयाचनम् अपूज्यपूजनम् व्यतिक्र मातृपितृतिरस्करणं स्त्री पुरुप प्रतिभेदनम् परस्त्रीगमनं पशुयोनि गमनं अयोनिबीज व्यापनम् कुटसाक्षित्वा माद मिथ्यापवाद परद्रोह पर हानि चौर्य करणं म्लेच्छसं भाषणम् म्लेच्छसंहासनम् ब्रह्म द्वेपणं स्वामी भेदनं मित्र वचनम् भार्यानिन्दनम् गर्भपातनम् रजस्वला मुखास्वादनम् निषिद्धकालमैथुनम् दासीगमनं वैस्या गमनम् सम्भाषण स्पर्शनम् परान्न भोजनम् क्रमुपान पात्र भोजनम् गणिकान भोजनम् निकृष्टान्नभोजनम् पंक्ति भेद करम् खिसहभोजनम् परशेष मोजनम् लघुस्यूल सुक्ष्मण पर्वकराहु केतु पराग निमित्त कुरुक्षेत्राधिकरण क्षेत्रीय संग दानक सुवर्ण मारदान जन्य फल दश गुण विध्वंशदानक गङ्गास्नान फल सहस्र गुण फल प्राप्ति कामः श्रुतिस्मृत्ति वेद पुराणोक्त समस्त फल प्राप्त्यर्थ पूर्वोक्त प्रायश्चित्ता निवृत्ति पूर्वक पश्चिमवाहिन्याः श्रीगङ्गायाः चैतस्थाः सचैलं स्लानमहं करिष्ये ॥ इति स्नात्वा तत्प्रार्थना०-|| महापापो पपापंच नानायोनिषु यत्कृतम् । चाल भावादिक पापं पर द्रोदादिकॉम्तथा ॥१॥ देहादिः मानसं पापं सर्वदायन्मया कृतम् । भूतभव्यं भविष्य च पापेदं देववन्धनम ॥२॥ तस्मा दशेष पापौघान् किल्विपाश्तयाबहि, शरणागत दीनार्थ स्नाहिजाहथि- [ १४ ] सर्वदा ॥३॥ गपापंगतं दुश्वं गतं में व्याधिवन्धनम् ॥ निस्पापास- धुनादेवि प्रसादातवनान्यथा ॥४॥ उत्तीर्य धोतवासांसि परिधाय स्नान वासांसि ब्राह्मणाय दद्यात् ॥ सन्ध्यावन्दननित्यकर्मादिकं कृत्वा । ततो गङ्गां पूजयेन् ।। गणपति नमस्कृत्य--अध्यंसंस्थाप्य आचप्य प्राणायाम कृत्वा अधेत्यादि अमुकोई सकल पापक्षयपूर्वकं । श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फल प्रामये यथो पमिलित सालंकारैः श्रीगङ्गापूजन महं करिष्ये ॥ ध्यानशिवकर निपएणां शुभ्रवस्त्रां त्रिनेत्रां, फलघृत कलशोध सात्सला मोत्यभीष्टाम् विविहरि रूपांसि सिन्धु कोठार चुए कलितसिनदुकूला जाह्नवी वां नमामि ॥ चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च सर्वा वयव शोभिवाम, रक्त कुम्मा सिता भोजां वरदो नलसत्कराम, सीत वस्त्रोपरीघाना मुक्तामणि विमुपिताम्, एवं सत्सु सौम्यां च चन्द्रायुत समप्रमात् ॥२॥ इति ध्यावा गङ्गायै नमः अावाहनम्, आसनम् मापस्तानम् मधुपर्कम् श्राचमनीयम-धनम् सर्व भूपादिकैः सौम्येलोक लजा निवारवाममो पपादितर्वस्त्र प्रसन्ना भवमातरः ॥ धूपम्दशाङ्गा गुग्गुलं धूपं सुगन्धि सुमनोहरम, प्रार्थ सर्व देवानां गृहाण परमेश्वरि ॥ दोपम् ॥ ग्रहाण मङ्गलं दीपं घृतवर्ति समन्वितम् ! रुद्रनेत्र नमोस्तुभ्यम् ब्रह्म मूर्ति नमो नमः। अथ नैवद्यम् ।। नैषय गृह्यतां देवि नानाभक्ष्यसमन्वितम् मयोपपादितं देवि नैवेद्य प्रति गृयताम | ताम्थूलम् ।। अयद्वादश नाममिर्गहां पूजयेत् ।। ॐ नमो भगवत्यै नमः ॥ ॐ नमो नारायण्यै नमः ॥ॐ नमो हराय नमः।। ॐ नमो गङ्गाय नमः ॥ ॐनमो विश्वमुखाय नमः ॥ॐ नमो मृताये नमः ॥ॐ नमो दवाये नमः ॥ॐ नमः शिवाय नमः ॥ ॐ नमोरेवत्यै नमः ॥ ॐनम प्रत्यै नमः॥ ॐ नमो नन्दिन्ये नमः॥ ॐनमः ।। स्वारायै नमः।। इति द्वादश नाममिः सम्पूग्य अथ प्रार्थना-परदार परद्रव्यपरदोहोघुमेमति विपरममा भरेगा प्रसादा तव मुमते ।। पायं दद्यात् || दो मथल्प ॥ अद्याऽमुफो सफल पापक्षय द्वाग श्रीगङ्गाया पूजनस्य मांगपल प्रात्यथं मिदं सुवर्णऽमुक्तीर्यवासिने प्रामणाय सुम्पमदं सम्प्रदरे अभिपेयाठादिकं कुत्यांन् इति गहापूजनम अथ स्वस्ति यापनम् । श्री स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धभवाः स्वस्तिनः पूषा विश्ववेदाः। भ्यस्तिनम्नादों प्रष्टि नेमिः स्वस्तिनी वृहस्पतिर्दधातु ॥ यो पयः पृयिम्यां पय ओपयोपु पयोदिय्यन्तरिघे पयोधाः। पयस्यतिः प्रदिराः [ १५ ] सन्तु मह्यम् ।। २॥ ॐ विष्णो रराटमसि विष्णो श्नस्थो विष्णो स्यूरसि, विष्णो ध्रुवोसि । वैष्णवमसिविष्णवेत्वा ॥ ३॥ ॐ अग्नि देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रो देवता मरुतो देवता विश्वेदेवादेवता बृहस्पतिदेवतेन्द्रोदेवता वरुणोदेवता ॥ ४॥ ओं द्यो शान्तिरन्तरिक्ष छ शान्ति प्रथिवी शान्ति राप शान्ति रोपधय शान्ति वनस्पतय शान्तिविश्वे देवा शान्तिब्रह्म शान्ति शान्ति रेव शान्ति सामाशान्तिरेधि । विश्वानि देव सवितुदु रितानि पराशुत्र । यद्भद्र तन्न पासुव ॥ शान्ति , शान्ति , शु शान्ति । भवतु ।। गणेश पूजनम् सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गज कर्णक । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिप । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानन । द्वादशैतानि नामानि य पछेच्छणुयादपि । विद्यारम्भे विधाहे घ प्रवेशे निर्गमे तथा। सप्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। शुक्लाम्बरधर देव शशिवर्ण चतुर्भुजम् । प्रसन्न वदन ध्यायेत् सविघ्नोपशान्तये । “भीप्सितार्थ सिद्धयर्थं पूजितोय सुरासुरै। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नम । सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमो ऽस्तुते । सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेपाममङ्गलम् । येषा हृदिस्थो भगवान मगलायतनो हरि ॥ तदेव लग्न सुदिन तदेव ताराबल चन्द्रवल तदेव विद्यावल दैवबलतदेवलक्ष्मी पते सेडिम युग स्मरामि ॥ लाभम्पेषा जयस्तेषा कुतस्तेषा पराजय । येषामिन्दि वरश्यामो हृदयस्थोजनार्दन । यत्र योगेश्वर कृष्णो या पार्थो धनुर्धर ॥ तत्र श्रीविजयो भूति ध्रुवा नीति मतिर्मम ॥ सर्वेष्वारम्भ कार्येषु त्रयस्त्रि भुवनेश्वरा । देवादिशन्तुन सिद्धिं ब्रह्मशान जनार्दन । विनायक गुरु भानु ब्रह्म विष्णु महेश्वरान् सरस्वती प्रणम्यादौ सर्वकार्याथ सिद्धये ।-श्री इति गणेश समीपे हस्तस्थ दुर्वाक्षत पुष्पाणिं सस्थाप्य ।। तिलकुशलान्या दाय ॥ सङ्कल्पम् ।। ॐ नम परमात्मने पुराण पुरुपोत्तमाय श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया । प्रपर्तमानस्याच प्रमाणो द्वितीये प्रहरार्धे श्रीश्रोतयाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे प्रथम चरणे जम्मूद्वीपे भरत सएडे मारत वर्षे आय्यावर्तान्तर्गत क्षेत्रे हिमवत्पर्वतकदेशे केदारखण्डान्तर्गत मुमेरु दक्षिण पार्वेऽलकना मन्दाग्निी ममीपे पष्टि सम्वत्सराणा मध्ये अमुक नान्नि सम्बामरे अमुकाऽयने [ १६ ] अमुक अाची अमुक मासे अमुक पने अमुक वासरे अमुप तिथी अमुक नजरे अमुक राशिस्थिते चन्द्रे अमुक राशिस्थिते श्री सूर्य अमुक राशिस्थिते देवगुरौ शेपेषु प्रहेषु यथा यथा राशिस्थान स्थितेषु सत्नु एवं गुण विशेपेण विशिष्टायारामपुण्य तिथी (ममाऽत्मन ) श्रुति स्मृति पुराणोक्त फनप्राप्त्यर्थं मम ऐश्वर्याभिवृद्धयर्थम् । प्राप्तालदम्याश्चिरकाल सरक्षणार्थम सकल मनईप्सितकामना ससिद्वयर्थम् । लोके वा सभाया राजद्वारे या सर्वत्र यशोविजय लाभादि प्राप्त्यर्थम् । इहजन्मनि जन्मान्तरे वा सकल दुरितोपशमनार्थ ।। तथा च मम सभार्यस्य सपुत्रस्य समान्धवस्य अग्नित कुटुम्ब सहितस्य मपशो समस्त भय व्याधि जरा पीडा मृत्यु परिहार द्वारा श्रायुरारोग्य श्वर्याभिवृद्धयर्थम् तथा मम जभ राशेरखिल कुटुम्यस्य या जन्म राशे सकाशाद्ये केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादशस्थान स्थितर प्रहास्तै सूचित मूचयिप्यमाण च यत्सर्वारिष्टतद्विनाशद्वारा एकादश- स्थान स्थित बच्छुभ भल प्राप्त्यर्थम् । पुत्रपौत्रादि सन्तररविच्छिन्न वृद्दयर्थम् । श्रादित्यादि नवग्रहानुकूलता सिद्धयर्थम् । नथा इन्द्रादि दशदिकपाल प्रस नना सिद्धयर्थम् । अघिदेविकाऽधिभौतिकाऽध्यात्मिक । त्रिविध तापो पशमनाथम् । धर्मार्थ काम मोक्षलाभावाप्त्यर्थ च। ॐ भूर्भुव स्व अमुक कर्मणि धर्मार्थकाम हेतवे ( अमुक पन्चायतन देवता प्रीत्यर्थ) गणपत्यादि देवता प्रीतये । एवमेव क्लशस्थापन पुण्याह नाचन कर्मणि तादी कार्य निवि नार्थ गणपति पूजन करिष्ये । (इति सङ्कल्प) शुद्ध मानसैताक्षते ।-हे हे रम्ब त्वमे ह्यहि अम्निमा पत्रकात्मन सिद्धि युद्धिपते यक्षलक्ष लाभ पितु पित ॥ नागम्य नाग हारत्य गणराज चतुर्भुज । भूपित स्वायुधैदिव्य पाराश परश्वधै थानाहयामि पूजार्थ रक्षार्थ च मम क्रतो । इहागत्य गदागर पूजास्तुश्च रनमे ॥ श्रावा व गणेशन्तम् । पूनाइये प्रपूजया ॥ पनन्ते देव मपितरर्यक्ष प्राह हस्पतये । ब्रह्मणेतेन यम मय तेन यापति तेन मामर ॥ मनोजूतिर्नुपता माज्यस्य वृहस्पनियशमिमतनो त्वरिष्ट यज्ञ समिम दधातु । विश्वे देवामाह मा यन्नामों प्रतिष्ठेति प्रतिष्टाप्य । ॐ नसामान्य ते माति पियंजु , छन्दो गणपतिर्देवता गणपत्यावाहने विनियोग ।। ॐ गणानारया गणपदिशाम प्रियाणान् प्रियपति। हवामहे पिता निधिपति यामई यसो मम पापनानिगर्भधमात्य मामि गर्भधॐ भूध म्ब गपिते हागन्देति । अथासनम्- गुग्गय समानुमा गणारिपतये नम । गालामनमोशत्र विघ्नपुम्ल ॥अथ । १७ ] निवारय । ॐ पुरुष : एवेद सवंग्यद्भूतं रहनभाव्यम् । उतामृत स्वस्ये शानोयदन्ने नाति रोहति ॥ इति श्रासनम् समर्पयामि ।। पाद्यम् --उमापुत्राय देवाय सिद्धम् वन्द्यायते नमः । पाद्यं गृहाण देवेश विराज नमोस्तुतेः। ॐ एतावानस्य महिमातो जयायॉश्च पूरुषऽ- पादोः । स्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्या मृतन्दिवि । इति पाद्यम् ममर्पयामि । अथार्म्यम् । एकदन्त महाकाय नागयज्ञोपवीतक। गणाधि देव देवेश गृहाणाय नमोस्तुते । ॐ त्रिपा दूधउदैत्पुरुषऽ- पाहोस्येहा भासुनः। ततो विष्ष्वव्यक्रामत् साशना नशनेऽअभि ॥२१॥ इति अर्धम्। समर्पयामि ॥ अथ आचमनम् । मर्वतीर्थ समायुक्त सुगन्धि निर्मल जलम् श्राचम्यतां मयादत्तं गृहीत्वा परमेश्वर ॐ ततो विराङ्ग जायत विराजोऽअधि पुरुप :ऽसजातोऽअ परिमयत परचाभूमिमयो पुर : ॥ २५ ॥ श्रानमनीयं समपयामि स्नानम् ॥ गहा सरस्वती रेवा पयोष्णीनर्मदाजलैः। सापितोऽसि मया देव तथा शान्ति कुरुष्वमे ॥ ॐ स्माद्यज्ञा सहुत : सम्भृतम्पदा ज्यम् पशुंम्ताँश्चक्के वायळ्या नारण्याग्माम्या श्चये। इति स्नानं समर्पयामि ॥ [अथ क्षेपकम् ]- अथ पञ्चमृतास्नानम्-(एक मन्त्रेण पश्चामृत स्नानम् ।। पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतम् । पञ्चामृत मयानीतं स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ।। ॐपञ्च नद्य: सरस्वतीमपि यन्ति स स्रोतस SI सरस्वती तु पञ्चधा सोदेशेभवत् सरित् ।। २७ ॥ इति पञ्चामृत स्नान समर्पयामि । पञ्चामृत स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समपयामि । शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयम् समपयामि । अथवा पृथग्मन्त्रेण पञ्चामृत स्नानम् ।-सत्र पयः स्नानम्-कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥ ॐ पय पृथिव्याम्पयऽओषधीषु पयो दिव्य्यन्तरिते पयोधा : । पयस्वती : अदिश: सन्तु मह्यम् । इति पयः स्नान समर्पयामि । पयः स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदक नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ।। दधिम्नानम्-(पयः सन्नु समुद्भूतं मधुराम्ल शशिभम् । दध्यानीतं मयादेव स्नानार्य प्रतिगृह्यताम् ।। ॐ दधिकान्योऽत्रकारिपजिष्णोऽरश्वस्त्र ब्याजिन् : सुरभिनो मुगाफर प्रणायु पितारि पन् ॥ ॥ इति दधिरनानं ममर्पयामि विधि म्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदक स्नानान्ते प्राधमनीय ममर्पयामि ।। अप घृतस्नानम् । नवनीत ममुत्लर्भ मर्य मन्तोपकारकम् । पृत नुम्य दायामि स्नानार्य प्रति गमताम || ॐ पृम्मिमिले। प्लमस्ययोनि पृते रिभवोएवम्यस्पधाम अनुपमा या मादयत्व रगाह [१८] कृतं वृषम व्यतिव्यम ॥३०॥ इति घृतस्नानं समर्पयामि-धृतलानान्ते शुद्धोदकस्तान समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ॥ (अथ मधुस्नानम् ॥) व पुष्प समुद्भूत सुखाटु मधुरमधु । तेज पुष्टिार दिव्यं नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ मधुव्वाताऽऋताय ते मधुक्षरन्ति सिन्धव ऽ मादीन्न 5 सन्त्वोषधी 5 ॥ ३१ ॥ मधुमक्त मुतोपसो मधु मत्यार्थिर ऽरज - मधुयोरस्तु न 5 पिता ॥ ३२ ॥ मधु मान्नो व्बनस्पति मधुमा २ अस्तु सुर्च माद्धी गयो भन्नु न.॥ ३३ ॥ इति मधुस्नान समर्पयामि । मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नान- समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानान्ते पाचमनीय समर्पयामि ॥ अथ शर्करास्नानम्-इहसार समुद्भूना शर्करा पुष्टिकारिका । गलापहारिका दिव्या स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥-ॐ श्रा. रसस्य पोरमस्त को ग्रहाम्भ्युत्तममुपयाम गृहीतो मीन्द्रायत्त्वा जुष्टङ्ग लाम्येष ते योनिरिन्द्राय वाजष्टतमम् ।। ३४ ॥ ॐ भूर्भुष घ गणपति देवताभ्यो नम शास्मानान्ते शूद्वोदकरनान समपयामि । शुद्धोटरस्नानान्ते पाचमनीय समपयामि । -अष्ट गन्धोदक स्नानम्-मलया चलसम्भूत चन्दनागर सम्भवम् । चन्दन देव देवेश स्नानायं प्रतिगृह्यताम् ।। - ॐ गन्धद्वारा दुराधर्षा नित्य पुष्टा करीपिणीम् । ईश्वरौं सर्वभूताना तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ३५ ॥ (लक्ष्मा मुक्त मन्त्र ) भूर्भूव स्य श्रीगणपति देवताभ्यो नम पष्ट गन्धोदक स्नान समर्पयामि ॥ पष्ट गन्धोदकरनानान्ते शुद्धोदयस्नान समर्पयामि ॥ शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीय समर्पयामि ॥ -प्रय उद्वर्तन स्नानम् ॥ नाना सुगन्धि द्रव्यं च चन्दन रजनीयुतम् ।। दर्तन मया दत्त स्नानार्थ प्रति गृह्यताम् ॥ ॐ सुनाते । शु पच्यनाम परपा परु । गन्धस्ते सोम भवतु मदाय रसोऽ अच्च्युत ॥ ३२॥ ॐ भूर्भुव स्व श्री गणपति देवताभ्यो नम सद्वर्तन स्नान समर्पयामि || उद्वर्तन स्नानन्ते शुद्धोदकस्नान ममर्पयामि ॥ शुद्धादक स्नानान्ने प्राधमन समर्पयामि ।। तत पन्चामृतादि स्नानान पूजा- ॐ भूभुत व श्री गणपतिदेवताभ्यो नम वस्त्रोपरस्त्रार्थे अवतान समायामि यज्ञोपवीचार्थेऽशा ममर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । नाना पग्मिल सौभाग्य व्याणि ममर्पयामि । धृप दर्शयामि दीप दर्शयामि। -शरोपहार नयेयम् ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय साहा । ॐ ध्यानाय स्वाहा । ॐ ममानाय स्वा।। ॐ शनाय स्वाहा नेये। ममर्पयामि । नेवेद्यान्ने हल प्रशासनायं मुम प्रसालाना जलसमपंयामि परोसना पुगीका भाग्यूल समर्पयामि । हिरण्यमुरादक्षिणा मर्पयामि पूछत्तिस्य दयामि । प्रदिया समर्पयामि । मन्त्र पुष्प [१] युक्त नमस्कारं समर्पयामि ॥ विशेषार्थ्य-रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षकः । भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात् । वरद त्वं वरं देहि वातिं वाब्छितार्थद । अनेन सफलार्येण फलदोऽस्तु सदा मम ।। प्राथनां समर्पयामि ॥ अर्पणम्-अनेन पञ्चामृतादि स्नानाङ्ग भूतपूजा- कृतेन ॐ भूर्भुवः स्वः श्री गणपतिदेवता प्रीयन्तां नमम ॥ (निर्माल्यं विसृज्य) पुनश्च ( पञ्चायतन ) गणपतिदेवताभ्यो गन्धाक्षापुष्पाणि समर्प ।। -सत्र यथा-हरिः ॐ ॐ सहस्त्र शीर्षा० ॥ ३३ ॥ पुरुषऽ५० ॥ ३४ ॥ एतावनास्य० ॥ ३५॥ त्रिपादूर्द्धऽ० ॥ ३६ ॥ ततेव्विराड. ॥ ३७ ॥ तस्माद्यज्ञात्स० ॥ ३८ ॥ तस्माइयज्ञात्सर्वहुतऽऋच : सामानि जज्ञिरे । छन्दा ॐ सि जज्ञिरे तम्माद्दयजुतस्म्मादजायत ॥३॥ तस्म्मादश्वाऽ अजायन्त ये के चोभयादत्तऽगावोह जज्ञिरे तस्म्मात्तम्मा. ज्जाताऽ अजावय: ॥ ४० ॥ यज्ञम्वर्हिषि प्रौक्षन्पुरुप जातमग्नत s: । तेन देवा : अजयन्तसाद्धयाऽऋषयश्श्चये ॥ ४१ ॥ यत्पुरुष व्ययु : कतिधाव्यकल्प्पयन । मुखाङ्किमस्यासीस्क्रिम्बाहू किमूरुपादाs- उच्च्यते ।। ४२ ।। ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्वाहू राजन्य कृत 5 उस्तदस्य यद्वैश्य : पया ॥ शुद्घोऽअजायत ।। ४३ ॥ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोऽ: सूर्योऽअजायत श्रोत्राद्घायुश्चप्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥ ४४ ॥ नाम्च्याऽपासीदन्त रिक्ष ॥ शीरणादयोऽ समवर्तत । पद्भ्याम्भूमि हिश 5 श्रोत्रा तथा लोकॉ IS अकल्पयन् ।। ४५ ॥ यत्पुरुपेण हविषा देवा यज्ञमतन्न्वत । व्यसन्तो स्यासी दाज्ज्यड ग्रीसम्मs इध्म :शरद्धवि ॥ ४६ ॥ सप्तास्या सन्पारिधया स्त्रिsः सप्त समिध कृताः। देवा यहयज्ञं तन्वाना : अवन्दन्न्पुरुपम्पशुम ॥ ४७ ।। यज्ञेन यज्ञ मय जन्त देवास्तानि धर्माणिप्रथमान्यासन । तेहनाक महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साद्धचा 5: सन्ति देवा ॥४॥स • च यथा-ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष में शान्ति : पृथिवी शान्तिराप : शान्तिरोपधय : शान्ति : वनस्पतय 5: शान्तिर्विश्वे देवा : शान्ति र शान्तिः सर्व शान्ति रेव शान्ति : सामाशान्तिरेधि ।। ५० ॥ यतो यच : समोहसे ततो नोऽअभयङ्करु शन्नः कुरु प्रजाम्भ्यो- मयन्न पशुम्य:॥५१ ।। ॐ सर्वेषां वाऽएप वेदाना रसोयत्साम सर्वेपामेवैनमेत दाना , रसेनामिपिचति ।। ५२ ॥ (माझणमन्त्रः)। ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तिर्भवतु । ॐ अमृताविपेकोऽस्तु ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगणपतिदेवताभ्यो नमः अभिषेकं समर्पयामि । ( इति क्षेपकम् ) ।। पश्चात् देवतीर्थ धृत्वा । ततो देवायाचमनम्-ॐ केशवाय नमः स्वाहा । ॐ नारायणाय नमः स्वाहा । ॐ माधवाय नमः स्वाहा- भूव [२०] इत्याचमनं समर्पयेत् ।। हस्तपतालनम् । ॐ गोविन्दाय नसः ।। वस्त्रम् - सर्वभूमाधिक सौम्य लोक लना निवारणे । मयोप पादिते तुम्य वासप्ती प्रतिगृयताम् ।।-तम्मा ग्यशात्स हत 5 अचसा० ॥ ५२ ॥ भूभुव स्व श्रीगणपतिदेवताभ्यो नम वस्त्रं समर्पयामि । ७ वस्त्रा- भारेऽशतान् अथ यज्ञोपवीतम्-नवमिस्तन्तुभियुक्त निगुए देवतामय अवीत चात्तीय गृहाण परमेश्वर ॥ ) ॐ तस्मादशवा 5 अ०॥५३॥ -ॐ भूर्भुव स्व श्रीगणपति देवताभ्यो नम यज्ञोपत्रीत समर्पयामि ॥ यज्ञोपवीता भावेऽवतान )॥ अय गन्धम्-ॐ ( श्रीखण्ड चन्दन विय गन्याच सुमनोहर पिलेपनसुरश्रेष्ट धन्दन प्रतिगृहाताम् ॥ ) ॐ तय्यज्ञम्बर्हि पिप्पीचन्पुरुष जातमग्नत। तेन दे०॥ ५४॥ स्व गएपसि दरताभ्यो नम गन्धम् समर्पयामि ॥ (श्रथ अक्षता ।। अक्षताश्च सुरश्रष्ठ कुछ कुमाता सुशोभिता । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः ॐ अनमीमदन्तप्रिया 5 अधूषत । अत्तोपत स्वमानवोब्बिप्पानविठयामतियो जान्विन्दते इरि ॥५५॥ ॐ भूव व व गणपति देवताभ्यो नम अक्षवान्समर्पयामि इति क्षेपकम् । अथ पुष्पाणि-माल्यादानि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो । मयानातानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर ॥ ॐ यसुरुषव्यदधु० ॥५६॥ ॐ भूर्भुध स्त्र गणपत्ति देवताम्यो नम. पुष्पाणि ( मोमाग्यद्रव्य सहित ) ममर्पयामि ॥ ( देवेप गध सामाग्यदल्यादीनि अनामिका गुप्टेन अर्पयेत् अय गणेशाय दुर्वासार्पणम।-विष्णवादि सर्वदेवाना दुर्गवं प्रीतिदा मदा । नौरसागर सम्भूते दश वृद्धि की भव ।।)-ॐ कापडासारदात्रीइन्ती परुप परपरि । पानी दूबे पवन सत्येण शतेन च ॥ १६॥ अय धूपम् । बनस्पति रसोइतो गन्धात्यो गन्ध ३तम श्रायेय मदेशना धूरोऽय प्रतिगृह्यताम् । ॐ प्राणोस्य मुर मामी हादूगजन्य - कृत (रू तदस्य० ॥ ६४ ॥ भुपुर्द स्त्र गणपति देवताम्यो नम घूप दशयामि ॥ अथ पृवपरित नीराजन दोपम-(प्राध्य व पनि मयुप्त बदना योजित मया । दीप गृहाण देवेरा त्रैलोक्य सिमिरा ॥ ॐ चन्द्रमा मनमो० ॥ ६५ ॥ *मुनु स् गगपनि लाग्यो नम पृत रिम नीराजन पोप दर्शयामि । श्रम नेयेयम् ) रात मयुर मधुर मातु चोत्तमम् । उपाहार समायुक्त नेयम् प्रतिगृपनाम् । ॐ नाम्न्याऽप्रामीबन रिशशी ॥६६॥ ॐाणाय म्याहा ॐ अपानाप माह । ॐ ज्यानाय स्वाहा नाप मा ममानाय शहा । ॐ भू-भोगणपति दलायो नम नैवेरा समर्पयामि । वेयानेपा नीयम्न पनीशीर । २१ ] लवङ्गादि कपूर परिवासितम् ॥ प्राशनार्थ कृतं तोयं गृहाण परमेश्वर ॥) उत्तरापोशन हस्त प्रच्छालनं मुरवप्रच्छालनं आचमीनयं च समर्पयामि ।। मुख वासार्थे ताम्बूलम् ( पूगीफल महद्दिव्य नागवल्ली दलैर्युतम् । एला चूर्णादि संयुक्त ताम्बूल प्रतिगृह्यताम् । ॐ यत्पुरुपेण० ॥६॥ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगणपत्ति देवताभ्यो नमः॥ ताम्बूलं समर्पयामि ( अथ क्षेपक) फलं-इदं फल मयादेवस्थापितं पुरतस्तव । तेनमे सफला वाप्तिभयेज्जन्मनि जन्मनि । ॐ या 5: फलिनीा 5 अफलाऽअपुष्पा य्याश्वपुष्प्पिणी। बृहस्पति प्रसूत स्तानो मुम्चन्वहस ॥६॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगणपति देवपाभ्यो नमः फल समर्पयामि ॥ (दक्षिणा) हिरण्य गर्भ गर्भस्थं हेम । वीजं विभावसोः। अनन्त पुण्य फलद मतः शान्ति प्रयच्छमे ॥) ॐ हिरण्य गर्भ : सम वचतांग्रे भूतस्य जात : पतिरेक 5 आसीत् । सदाधार पृथिवी न्द्यामुतेमाङ्क स्म्मै देवाय हविषा विधेम ।। ६६ ॥ ॐ भूभुवः स्वः श्रीगणपति देवताभ्यो नमः दक्षिणा समर्पयामि ।। अथ-कर्पू रार्तिक्यम्-कदली गर्भसम्भूत कपूरंच प्रदीपितम् आरार्तिक्यमह कुर्वे पश्य मे वरदो भव ।। ॐ इद हवि: पज ननम्मे 5 अस्तु दशवीर ५ सवंगण स्वस्तये । श्रात्मासनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्ल्न्य भयसनि ॥ अगिनीः 5 पजाम्बहुलाम्मेकरो स्वन्नम्पयो रेतो ऽ अम्मा सुधत्त ॥ ७० ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीगणपति देवताभ्यो नमः कर्पूरातिश्य दर्शयामि ॥ ( इति क्षेपकम् ।। ) प्रदक्षिणा- ( यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानिवै । तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ।।) ॐ सप्तास्या० ॥७१ ॥ ॐ भूभु वः स्वः श्रीगणपति देवताभ्यो नम आतिक्य सहितां प्रदक्षिणा समर्पयामि ॥ ॥ अथ मन्त्रः पुष्प युक्तो नमस्कारः ॥ (नाना सुगन्ध पुष्पाणि यया कालोद्भवानि च । पुष्पान्जलि मया दत्ता गृहाण परमेश्वर || ॐ यज्ञेन यक्षः ।। ७२ ॥ ॐ मुमुवः स्वः श्रीगणपति देवताभ्यो नमः मन्त्र- पुष्पाञ्जलियुक्त नमस्कारं समर्पयामि प्रार्थना-विघ्नेश्वराय वरदाय सुर प्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिनाय नागाननाय श्रुरियन विभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ।। [ क्षमापनम् ॥ ] आवाहन नजानामि नजानामि तवार्चनम् । पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।। गतं पापं गतं दुख गतं दारिद्य मेवच-पागता सुख मम्पत्तिः पुण्याश्च सवदर्शनात् ॥ अन्यथा शरणनास्ति त्वमेव शरण मम तस्मात्कारुण्यमावेन रक्षस्व परम- स्वर । मन्त्र हीनं क्रियाहीन भक्तिहीनं सुरेश्वर । यत्पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे ।। यदक्षर प्रद भ्रष्टं मातादीन च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ( इति क्षेपकम् ) अर्पणम्-भनेना वाहना सन पाद्यार्थ्या [ २२ चमनीय स्नानवस्रो पवीत गम्धपुष्प धूप दीप नैवेद्यताम्यूल दक्षिणा प्रदक्षिणा मन्त्र पुष्प रूपैः पोडशो पचारः अन्योपचारश्च यथा ज्ञानेन यथा मिलितो पवार द्रव्यैः कृतेन पूजनारथ्य कर्मणा भूभुवः स्वः श्रीगणपति देवताः प्रोयन्तां न मम ॥ ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ।। (इति श्रीगणपति देवता पूजनम् ।। अथ भूतानिशुद्धि। फर्ता कर्मदिवसे प्रातरुत्थाय स्नाका नित्यकर्म समाप्य दीपाय गन्धाक्षतपुष्पादीन समय॑ श्रापम्य पुष्पाञ्जलिं समपयेत्- शुक्लाम्बरधरं विष्णु शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रमन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये । लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजय । यपामिन्दी- वरश्यामो हृदयस्थो जनाईनः ।। इति विष्णवे समर्पयेत् । वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥२॥ इति गणेशार समर्पयेत् । ततोऽस्थापन कुर्यात् , गन्धादिना- भूमौ त्रिकोण वृत्तं चतुरतमएडलं च लिखिया तदुपरि श्रासनम् आसनस्योपरि पात्रम् पात्रस्योपरि पवित्रस्थो वैष्णन्यौ इति पविन्न निक्षिपेत् “शन्नोदेवीति जलम् "ओं शन्नोदेवीभिप्रय आपो भवन्तु पीतये । शंथ्योरभिक्षवन्तु नः । इति जलेनापूर्य "गड़े च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्वदे मिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु, इति अकुशमुद्रया तीर्थान्यावाश गन्धाक्षतपुषादि तूष्णी निक्षिप्य अर्धपात्रं सुसम्पन्नमस्तु ३ नेन जलेन श्रात्मानं करिष्यमाण श्रीसूर्यादि पचदेवपूजन कर्मणि निर्विनता सिद्धये मम सकलमनोरथसिद्धयर्थन्च भगवतः सूर्यदेवस्य पीतये सूर्यदेवपूजा सामग्री प सम्प्रोक्ष्य प्राणायामप्रयं विधाय पुण्डरीकाक्षाय स्मरणम् । अय ध्यानम्-ध्येयः मा सविनमण्डलमध्यवर्ती । नारायणः मरसिजामरसन्निविष्टः । केयूरवान मकरकुण्डलवाव किरीटी हारी हिरएमयवपु नशचक्रः ॥ १॥ नतः सूर्यमावास्येत् "ॐ भूधः स्वः कविदेशोदव काश्यपगोत्र रक्तवणं भगवन् सूर्य्य हान्य हतित पूजार्थ यामायाहयामि इत्याबाह्य अध दद्यात् । एहि सूर्य सहस्रांशो जोराशे जगत्पते । अनुकम्मय मां भक्त्या गृणाघ दिवाकर। नतो गन्धारते: सूप्यं पूजयेत् । ॐ आकृष्णेन (जसा वर्तमानो निवेशयन- मृतमय हिरण्ययेन मपिता रथेन वेदो यानि मुग्नानि पापन् इनि [ २३ ] ॐ आदित्याय नमः इति मन्त्रेण च नीराजनान्तं सम्पूज्य | धूप दीपं नैवेद्यं पुष्पाणि च सूर्याय समर्पयेत् ॥ अथ ध्यानम् ॥ आदित्य च नमस्कार ये कुर्वन्ति दिने दिने । जन्मान्तरसहस्रण दारिद्रय नोपजायते। इति ध्यात्या ततः सर्पपाततैर्भूतोत्सादनं कुर्यात् ॥ अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचः सर्वतो दिशम् । सर्वेषामविरोधेन ब्रह्मकर्म समारभे। अपस-पन्तु । भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः। ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया, इति । निर्गच्छतां च भूतानां वम दद्यात् स्ववामतः । तालत्रयेण सर्वान्विध्नानुत्सार्य । पृथ्वि त्वयेति मेरुपृष्ठऋषिः सुतलं छन्दः, कूर्मों देवता आसनोपवेशने विनियोगः ।। ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोकाः देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वञ्च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥ ततो गन्धाक्षतपुष्पैः। ॐ आधारशक्तथै पृथिव्यै नमः ॐ कूर्माय नमः ॐ शेषनागाय नमः ॐ चित्तशक्तये नमः इत्यासनं सम्पूज्य पुनरर्घ संस्थाप्य च पूजासङ्कल्पं कुर्यात् 'गन्धादिना भूमौ त्रिकोणवृत्तं चतुरस्र मण्डलब्ध लिखित्वा तदुपरि श्रासनं आसनस्योपरि पात्रम् पात्रस्योपरि पवित्रं पवित्रस्थो वैष्णव्यो-इति निक्षिपेत् । शन्नो देवीति जलम् ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शैय्योरभिस्रवन्तु नः । इति जलेनापूर्य गङ्ग च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु, इत्यड कुशमुद्रया तीर्थान्यावाह्य गन्धाक्षतपुष्पाणिं तुष्णी निक्षिप्य अर्धपात्रं सुसम्पन्नमस्तु ३ तेन जलेन अस्मानं, करिष्यमाण अमुककर्मणि निर्विघ्नतया कार्य- सिद्धयर्थं सकलेप्सितसिद्धयर्थञ्च श्रीमहागणपतिदेवप्रीत्यर्थमिमां पूजा. सामग्रीञ्च सम्प्रोक्ष्य प्राणायामत्रयं विधाय पुण्डरीकाक्षाय स्मरणम् । ततः प्रार्थनाभ्यां नमः । मातृपितृचरणकमलाभ्यां नमः। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राहाणेभ्यो नमो नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । निर्विघ्नमस्तु। अथ गणेशाथर्वशीर्षम् । ॐ नमस्ते गणपतये । स्वमेव प्रत्यक्ष तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कासि | स्वमेव केवलं धर्तासि । त्वमेव केवलं हसि। त्वमेव सर्व ग्बविल्दं ब्रह्मासि । त्व साक्षादात्मासि नित्यम् । ऋतं वच्मि । सत्य वच्मि । अव वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अशनू चानमवशिष्यन् ॥ अव पश्चातान । श्रव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोध्यात्तात् । अवा. धरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् । त्वं वार मयस्त्वं चिन्मयः ।

[ २४ ] स्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममय ।वं सच्चिदानन्दो द्वितीयोऽमि। त्वं प्रत्यक्ष नहामि । त्वबानमयो विनानमयोऽसिस जगदिद त्वयि लयमेष्यति ! मवं जगदिदं त्वयि प्रत्येति । भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ स्व पत्ता रिवार पदानि । त्वं गुणत्रयातीत । ल देह त्रयातीतः । त्वं काल यातीत । त्वं वस्था या तीत । वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ! त्व शक्तित्रयात्मकः । त्वां योगिनीध्यायन्ति नित्यम् । त्व ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्व सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्नं ब्रह्म- भूर्भुव. स्वरोम् । गणावीन्पूर्वमुच्चार्य वर्णादीस्तदनन्तम् । अनुम्बार' पातर । अन्दुलसितम् । तारेणरुद्धम् एतत्त व मनुस्वरूपम् । गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तर- रूपम् । नादः सन्धानम् । स हितासन्धिः। सैषा गणेश विद्या गणक ऋपि. निचद्गायत्री छन्दः। गणपतिर्देवता । ॐग गणपतये नमः । एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डायधीमहि । तन्नोदन्ती प्रचोदयात् । एकदन्त चतुईस्त पाशमङ कुशधारिणम् । रदब्च वरदं हस्तैविभ्राणं मूपकध्वजम् । रक्त लम्बोदर शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक गन्यानुलिप्तास रस्पूष्पैः मुपूजितम् । भक्तानुकम्मिन देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतच मध्यादी प्रहवे पुरुषात्परम् । एष ध्यायति यो नित्यं मयोगी योगिनां घर । नमो मतपतये नमो गणपतये नम. प्रथमपतये नमस्तेऽस्तु लम्पो. दरायादन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः। एतदथर्व- शीर्ष योऽधीते । स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स सर्व विघ्नन वाध्यते स मर्गत सुममेघने । म पञ्च महापापात्प्रमुच्यते । माय मधीयानो दिवस कुन पापं नाशयति । प्रातरधीयानोपति कृतंपा नाशयति । सायप्रातः प्रयुनानो अपापो माति सांगा धीयानोऽप विघ्नो भवति धममर्थ काम मौनव्यविन्दति । इदमथर्वशीर्षमशिष्याय नटेयम् । यो यदि मोहाहाम्यति । स पापियान भवति । महन्नावर्तनाथ ये काममधीते त तमनेन मापयेत् । अनेन गणपतिमभिपिचति । मवाग्मी भवति । चतुष्र्यामनयनाति । स विद्यागम् भनि । पर्वण पाक्पम् । मसारण विद्यान्न विभेदि पदा पनेनि । यो दुर्याह रेयंजनि । स यमर मोमबति। यो लायंसति । म बाधित फलमवाप्नोति । यः मायम दियवनि । म मलभते । म मनभने । मष्टो माणन मामा। मूर्य पर्यो भनि । सूर्य महे महानयां प्रतिमा मनिया गाजयामि मन्त्री मानि। महाविघ्नीमायने । महा. दीपायगुणा महारत्यारयात्यमुध्यने । स पियदि समर्थ रिपरि सय पर्ष वेदप्युपनिषत् । शान्ति शान्ति शान्ति इनिगा सकलमन [ २५ ] सङ्कल्पं । ॐ विष्णुर्विष्णु विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्यब्रह्मणो द्वितीयेपरार्धे भीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमै कलियुगेकलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतखण्डे भारतवर्षे प्राविनिर्गतक्षेत्रे हिमवत्पर्वतैकदेशे केदारखण्डान्तर्गत- वद्रिकाश्रमेसुमेरु दक्षिणपार्वेऽलकनन्दा मन्दाकिन्योर्मध्ये ( समीपे ) पष्टिसंवत्सराणां मध्येऽनुकनामसंवत्सरे अमुकाऽयने अमुकऋतौ अमुक- मासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमुमतिथौ अमुफनक्षत्रे, अमुकराशिस्थिते चन्द्रे अमुकराशिस्थिते देवगुगै शेषेषु ग्रहेषु यथायथं राशिस्थान- स्थितेषु सत्सु एवं गुणविशेषे विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ गोत्रोत्पन्न. अमुकराशि अमुक शर्मा-धर्मा-गुप्तो वा-ममाऽत्मनः श्रतिस्मृति- पुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थ मम ऐश्वर्याभिवृद्धयर्थम् । अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थम् । प्राप्तलक्ष्म्याश्चिरकालसंरक्षणार्थम् । ईप्सितकामनासं- सिद्धर्थम् । लोके वा सभायां राजद्वारे वा सर्वत्र यशोविजयलाभादि- प्राप्त्यर्थम् । इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितो पशमनार्थ । तथा मम सभार्यस्य स पुत्रस्य सयान्धवस्य अखिलकुटुम्बसहितस्य सपशोः समस्तभयव्याधिजरापीडामृत्युपरिहारद्वारा आयुरारोग्यैश्व. भिवृद्धयर्थम् । तथा मम जन्मराशेरखिलकुटुम्मस्य वा जन्मराशेः सकाशाद्ये केचिद्विरुद्धचतुर्थाष्टमद्वादशस्थान स्थिवरग्रहास्तै. सूचितं सूचयिष्यमाणं च यत्सर्वारिष्टं तद्विनाशद्वारा एकादशस्थानस्थितयच्छुभ- फलमाप्त्यर्थम् । पुत्रपौत्रादिसन्ततेरविनिवृद्धयर्थम् । आदित्यादिन- वग्रहानुकूलतासिद्धयर्थम् । तथा इन्द्रादिदशदिक्पालप्रसन्नता सिदयर्थम् । प्राधिदेविकाऽआधिभौतिकाऽध्यात्मिकत्रिविध तापोपशमनार्थम् । धर्मार्थ- काममोक्षफनप्राप्त्यर्थ च । ॐ भूर्भुवः । स्वः श्रीअमुकपञ्चायतनदेवता- प्रीत्यर्थ यथा ज्ञानेन यथामिलिगोपचार द्रव्यः पुरुषसूक्तन ध्यानाऽवाह. नादिषोडशोपचारः वा पूजनमहं करिष्ये । दीपकलशपूजनम् पुण्याहवाचनम् । -अपसर्पन्तु ये भूता ये भूता भूमिमाश्रिताः॥ ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥ अप झामन्तु भृतानि पिशाचाः मर्थतो दिशम् ।। सर्वेषामविरोधेन शिवकर्म समारमेन् । इति सर्पपाक्ष. तान् विकीर्य, आत्मरक्षां शिववन्दनेन कुर्यान । तत्र क्रमः ईश्वर:य नम. ततः- पर्ने । आग्नेयेसराय नम आग्नेये ॥ यमेश्वराय नमदक्षिण | नि तीश्वराय नम नेत्ये ॥ वरुणेश्वराय नम पश्चिमे ॥ वाय येश्व राय नम वायव्ये ।। सोमेश्वराय नम उदीच्याम्! ईशानेश्वराय नम ईशाने ॥ श्राफाशेधराय नम अर्थायाम् ॥ अनन्तेश्वराय नम पृथि व्याम् । सर्वेश्वराय नम । सत ॐ नमो भगवते रुद्राय ।। इति मन्त्रेण प्राणायामनय कुर्यात् तत्र पूरके ॥ ३६॥ कुम्भके ॥ १२ ॥ रेचके ॥ १२ ॥ मन्त्रसल्या ॥ तन प्राचार्य दीपकलशगणेशादीना पूजा कुर्यात् । तत्प्रकारश्च यथा अथ दीपपूजा। पृष्ठो दिवति प्रज्वाल्य, ॐ पृष्टो दिनि पृष्ठोऽअग्नि पृथिव्या पृष्टो विश्वा श्रीपोराविवेश ।। जाना महमा प्रष्टोऽअग्नी सनो दिया सरिष सातु नक्तम् ! नमो स्त्वनन्तायेति पूजयेत् ।। नमोस्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरो. रुवाहवे ॥ सहननाम्ने पुरुपाय शाश्वते सहस्रकोटियुग धारिणे नमः। नमस्ते इत्यादिना प्रणमेत् ॥ नम कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने । नमस्ते केशमानन्त वासुदेव नमोस्तुते ।। वासनाद्वासुदेवस्य धासित भुवन- यम् ।। मर्पभूतनिसामामि वासुदेव नमोस्तुते ॥ शुभ भपतु कल्याण मारोग्य शुममपद । मम शत्रुविनाशाय दीपज्योउिनमोस्तु ते ॥ इति दीपपूना ।। -अथ कलशस्थापनम् ।। ईशानदिग्भागे s प्रण मुशोभित वैजसं मृण्मय यह कलश धान्योपरि स्थापयेत् । तत्प्रकाररय यथा- দুদীবি মুদি সহীহ। মুণি মুন্সিবিলি fuরাখা विश्वस्य सुमनस्य धर्षी , प्रधिनी यच्छ वृथिवीं ६ पृथिवी माह । मी यान्यममीति धान्य सस्थाप्य ॥ ॐ धान्यमसि चिनुहिदेवा त्राणायचोदानायमा व्यानात्वा । दीपमनुमितिमायुपेधान्देवाय मत्रता दिरण्यपाणि प्रतिगृस्णात्त्वन्द्रि नेण पाणिना पदपत्वा महीना मदीना पयासि ॥ पानिति कलश स्थापयेत् ॥ ॐ आजिम यलश मधाचा विशन्त्विनर ॥ पुनाजी नियतस्तसान महलं घुस्योरधारा पयस्वती पुनर्मा विशता यि ॥ मम्मे इत्यादिना गग पत्या-िना पतीयनल प्रतियन् ॥ॐ इमम्मे पाणधीनमा मृत्य ॥ लाभ यम्युरायो । ग घ यमुने चैव गदायरि माम्यति । नमः मित्यु पायो जन्मिन्मानवियुकाया प्रीपथी रिति मापधी प्रक्षिप्य ॐ या पोपची पूर्या जाता ये ग्गवियुग पुग। मनेनुषगा म.. रात पामानि मल पहिएयगर्म इनि परानानि । एप गर्भ ममता मनम्य काम पहिरेक मासीत् ॥ मदार थियी. नमुनेमाम्मैग्याय पिया विधेम ) या पनिनी शिल पालमा ॐयानोपांगता पर पुलिस पदाति समूदा प्रजा- । २७ ] स्तानो मुञ्चन्त हसः ।। यवोसीति यवान-।। ॐ यवोसि यक्या. स्म पो यवयारातोदिवेत्वान्तरिक्षायत्त्वा पृथिव्यै स्वाशुन्धन्ताँलोकाः पित्रसदनाः पितृपदनमसि ॥ गन्धद्वागमिति गन्धम् ॐ गन्धद्वारा दुराधर्षा नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरी. सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ति परुषः परुपः सरि ।। एवानो दुर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ॥ स्योना पृथिवीति मृदः ॥-स्योना पृथिवि नोभवानृक्षरा निवेशनी ॥ यच्छानः शर्म सप्रथाः ॥ अश्वत्थेव इति पञ्चपलवैस्तन्मुखमाच्छ ॥ ॐ अश्वत्येवो निषदनं पर्णे वो व सतिष्कृता ।। गोमाज इकिला सथयत्सनवथ पूरुषम् ॥ वृहस्पते इति वस्त्रयुग्नेन वेष्टइत्वा ।। ॐ वृहस्पतेऽअति यदर्योऽअर्हाद्युमद्विमाति क्रतु मज्जनेषु ॥ यहीदयच्छवसऽऋतप्रजाततदस्मासु, द्रविणं घेहि चित्रम् ।। उप रामगृहीतोसि वृहसतये वैपलेयोनिवृहस्पतयेत्वा ।। पतेनेति इध्यक्षतभूपयित्वा ।। ॐ प्रजापतेनबदेता न्यन्यो विश्वारूपाणि परितात्रभूव ॥ यकामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्तु वय स्याम पतयो रयोणाम् । पूर्वाति कलशोपरि पूर्णपात्रं निधाय पूर्णादवि परापत सुपुर्णा पुनरापत ॥ वश्नेव विक्रीणा वहा इपमूर्ज शतक्रतो॥ तत्र तत्त्वायामिति वरुणमावाह्य पञ्चोपचारैः पूजयेत् ॥ ॐ तत्वायामि ब्रह्मणावन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः ॥ अहेड मानो वरुणेह वोदपुरुश समान आयुः प्रमौपौः॥ तत्रैव सर्वे समुद्रा इति तीर्था- न्यावाहयेत् ।। सर्प समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः ॥ श्रायान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः ॥ ततः कलशं स्पृष्ट्वाऽभिमन्त्रयेत् ।। कल शस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ॥ मूले त्वस्य स्थितौ ब्रह्मा मध्ये मातृगणः स्मृतः । कुक्षौ तु सागगः सप्त सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।। ऋग्वे- दोऽय यजुर्वेदः सामवेदोह्यथर्वणः ।। अङ्गश्च सहिताः सर्वे कलशं तु ॥ ततः कलशं प्रार्थयेत् ॥ देव दा नवसंवाहे मध्यमाने महोदधौ । उत्पन्नोसि तदा कुम्मः विधृतो विष्णुना स्वयम् ॥ त्वत्तो ये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिता। त्वयि तिष्ठन्ति भुतानि त्वयि प्राणा, प्रतिष्ठिता | शियः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः ।। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः ॥ त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेपि यतः कामफनप्रदाः। त्वत्प्रसादादिमं यज्ञ फन मीहे जलोद्भव । सान्नि- ध्ये कुरुमेदेव प्रसन्नो भव सर्वदा ।। . ब्राहाणेभ्यो नमः सम्पूज्य । अधेत्यादि अमुकोहं मम अमुक- कर्मणि पुण्याहवाचनात्यकर्म कर्तु मैमियामोङ गुलीव कासने दम्पति- दैवतरमुकगोत्रान् अमुकर्मणो माह्मणान् पुण्याहवाचकत्वेन युष्मान - [२८] वृणे स्वस्ति प्रतिषधनम् ॥ ॐ कारपूर्व विप्रस्य भवेरपुण्याहवाचनम् । ततोप्रतवान् क्षिप्वा । ततोऽवनितजानुमण्डल कमलमुकुलसहरा मञ्जलिं शिरसा धारयेत् । दक्षिणेन पाणिना सुवर्णपूर्णकलश धारयित्वा अगानि धारयित्वा अनानि शेत् । शिरसि मे सौभाग्यमस्तु मस्तके श्रीकान्तिरस्तु चदपो सुतेजोस्तु श्रोत्रयो अबणेन्द्रियमस्तु इत्यङ्गानि स्पृशन् । ॐ दीर्घा नागानद्यो गिरयस्त्रीणि विष्णुपदानि च । तेनायु प्रमाणन पुण्य पुण्याह दीर्घमायुरस्तु | शिया आप मन्तु सौमनध्य मस्तु अक्षत चारिष्टम् चास्तु गन्धा पान्तु सौमगल्य घास्तु पुष्पाणि पान्नु सौ श्रेयमस्तु । अक्षता पान्तु बहुदेय च नोस्तु शान्ति पुष्टितुष्टी श्रीयशो विद्या विनयो बहु पुन चायुष्य चास्तु । य कृत्वा सर्व वेद यशक्रिया करणकर्मा रम्भा शुभा शोमना प्रपतन्ते तमहमोकार मादि कृत्वा ऋग्यजु सामाथर्वणाशीर्वचनं बहुऋषिसम्मत समनुज्ञात भवद्भिरनु ज्ञात पुण्य पुण्याहम् वाचयिस्ये, वाच्यताम् ॥ भद्र कर्णेमि श्रृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा | स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुवा सस्तनु भिन्यशे महि देवहित यदायु ॥ ॐ देवानामा सुमति जुयना देवाना । रातिरमिनो निवर्तताम् । देवाना । सस्यमुपसेदिमा वय देवान आयु प्रतिरन्तु जीवसे । दीर्घायुस्त ओपधे खनिता यस्मै च त्या स्वनाम्यहम् ।। अथात्वदीर्घायुभूवा शत वत्शाविरोहतात् ॥ न तदा । सिन पिशाचा स्तरन्ति न्यानामोर प्रथमज ॥ घेतन् । यो विमर्ति दाक्षायण । हिरण्य सदेवेषु कृणुते दीर्घमायु । ॐ द्रविणोदा द्रविण सस्तु: रस्यद्रविणोदा सनरस्य प्रय. सदा द्रविणोदा वीरवती मिपनो द्रविणों दारा सने दीर्घमायु ॥ सविना पश्चात् सविता पुरस्तात् । सवितोत्तरातात् सवितावरात्तात् । सवितान सुन्तु सर्वताति सवितानो रासता दीर्घमायु ॥ नमो नमो भपति जायमानोऽह्रा केनुरुषसामेत्यग्रम् ।। भाग देवेभ्यो नियात्याचप्रचन्द्र मास्तिरस्ते दीर्घमायु ॥ उच्चादिविद विणानन्तो अस्थुये अस्वदा सहने मूर्येण । हिरण्यदा अमृतत्य भजन्ते यासोदा साम प्रतिरन्तु श्रायु । प्रतजपयम नियमतपस्याभ्यायकर मनदानविशिष्टाना सपा प्रामणाना मन समाधीयताम् ।। समाहित मनस स्म । प्रमादन्तु भवन्त । प्रसमा स्म । शान्तिरस्तु पुष्टिरस्तु तुधियस्तु वृद्धिरस्तु ऋद्विग्स्तु अविप्नमस्तु आयुष्यमस्तु आरोग्यमस्तु फमममृद्धिास्तु वेदममृद्धिरस्तु शास्त्रसमृदिरम्नु पुत्रपौत्रसमृद्धिरस्तु इष्ट मम्पदस्तु ।। ततो पहिरवृतान् तिपेन् । अरिनिरसनमस्तु । यत्पा रोग शोकमयाणातत्तरे प्रतिहतमस्तु । सन पुनमाननम् । यचथ्य मरम्नु उत्तरे कर्मण्यशिन रस्तु कनरोत्तरमहरहरमिद्धिास्तु । उत्तरोत्तरा [ ] कियाः शुभाः शोमनाः सम्पद्यन्ताम || तिथिफरण मुहर्वनक्षत्रमह लग्ना. धिदेवताःप्रीयन्ताम् । तिथिकाणे सुमुहर्ते सनक्षत्रे समहे सलग्ने सदैवते प्रीयेताम् । दुर्गा पाञ्चाल्यो प्रीयेताम् । अग्निपुरोगा विश्वेदेवाः प्रीयं- ताम् । इन्द्रपुरोगा मरुद्गणाः प्रीयन्ताम् । वसिष्ठपुरोगा ऋपिगणाः प्रीयन्नाम् । महेश्य पुरोगा: अमामातरः प्रीयन्ताम् । अरुन्धतीपुरोगाः पतिव्रताः प्रीयन्ताम् । विष्णु पुरोगाः सर्वदेवा प्रीयन्ताम् । ब्रह्मपुरोगाः सवेदाः प्रीयन्ताम् । आदित्य युगेगा: मवेप्रहाः प्रीयन्ताम् । प्रहाच प्रामणाश्च प्रीयन्नाम् । श्रीसरस्वत्यो प्रीयेताम् । श्रद्धामाहेश्वरी प्रीयताम् । भगवती मृद्धिकरी प्रीयताम् । भगवती पृद्धिकरी प्रीयताम् । भगवती तुष्टिकरी प्रीयताम । भगरती पुष्टिकरी प्रीयताम् । भगवन्तो विप्नविना- यको प्रीयेताम् । सर्वाः कुनदेवनाः प्रीयन्ताम् । सर्वापामदेवताः प्रोयन्ताम् । सर्वा इष्टदेवताः प्रोयन्ताम् । पुनरक्षताना पहिस्त्यागः । हस्ताश्च प्रक्ष- विद्विषो हस्ताश्च परिपन्थिनः । हस्ताश्च कर्मणो विश्नकर्तारः शत्रवः पराभवं यान्तु शाम्यन्तु घोराणि शाम्यन्तु पापानि शाम्यन्वीतयः । पुनर्मार्जनम् । शुभानि वर्धन्तां शिवा प्रापः सन्तु । शिया अतिथयः सन्तु। शिवा ऋतयः सन्तु । शिवा अग्नयः सन्तु । शिवा अतिथयः सन्तु । शिवा पाहुतयः सन्तु । शिवावनस्तय. मन्तु । शिवा श्रोपधयः सन्तु । अहोरात्रे शिवे स्याताम् । निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्पतु फलवत्यो न ओपधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् । इति योग- क्षेमो वै तत्र कल्पते यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते क्लुप्तप्रजानां योगक्षेमो भवति ।। शुक्राङ्गारकबुधवृहस्पतिशनैश्वरराहुकेतु सोमसहिताः आदित्य- पुरोगाः सर्वे ग्रहा प्रीयन्ताम् । भगवान्पर्जन्यः प्रीयताम् । भगवान्स्वामी महासेनः प्रीयताम् । भगवान्नारायणः प्रीयताम् । पुण्यं पुण्याह वाघ. यिष्ये ब्राह्मणा व युर्वाच्यताम् । ब्राह्म पुण्यमहर्यच्च सृष्टयुरपालन- कारकम् । वेदवृक्षोद्भवं नित्यं तत्पुण्याहं धुवन्तुनः ॥ भो ब्राह्मणाः मम गृहे अमुक कर्मणि पुण्याह भवन्तो घू वन्तु ॐ पुण्याह ॥ ३ ॥ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्नु मनसाधियः पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदाः पुनीहि मा ॥ पृथिव्यामुघृता यान्नु यत्कल्याणं पुराकृतम् । ऋपिभिः सिद्ध गन्धर्वः तत्कल्याणं त्रु वन्तु नः भो ब्राह्मणा मम गृहे अमुकर्मणि कल्याण भवन्तो छ वन्तु ॥ ॐ कल्याण ॥३॥ यथेमा वाचं कल्याणि मावदानि जनेभ्यः । ब्रह्मराजन्याभ्या . शूदायचार्याय च स्वाय चार- णाय च ॥ प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भृयासमयं मे कामः समृद्ध यतामुपपादौ नमतु ॥ सागरस्य यथा ऋद्धिर्महालक्ष्यम्यादिभिः कृताः ।। सम्पूर्ण संप्रभावा च तां च ऋद्धिं भवन्तो त्रु चन्तु ॥ ॐ ऋद्घयताम् ।

[. ।।३।। सरस्य ऋद्धिरस्यगन्म ज्योतिरमृता अभूम। दिवम् पृथिध्या प्राध्यो कहामाविदामदेवानस्वोति । स्वस्तिस्तु या विनाशाख्या पुण्यकल्याण वृद्धिदा । विनायकप्रिया नित्य नाव स्वस्ति ब्रु वन्तु न । भो ब्राह्मणा मम गृहे अमुककर्मणि स्वस्ति भवन्तो ब्रुवन्तु ।। ॐ आयुष्मते स्वस्ति ॥३॥ ततो वरुण जलेनाम्रपल्लवगृहीतेन यजमान ब्राह्मण अभिपि चेयु ॥ ॐ स्वस्तिन इन्द्रो वृद्ध श्रवा स्वस्तिन पूषा विश्ववेदा । स्व स्तिनस्तायो अरिष्टनेमि स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु । पय पृथिच्या पय श्रोपधीपु पयोदिप्यन्तरिक्ष पयोधा । पयस्वती प्रदिश सन्तु मह्यम् । विष्णोपटमसि विशोरनस्थो विष्णो स्यूरसिविष्णोध्रुवोसि ।। वैष्णरमसि विपणवे वा । अग्निर्देवता यातोदेवता सूर्योदेवता भन्द्रमा देवता वसनो देवता यहाहति देवता मद्रो देवतादित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता इन्द्रो देवता वरुणोदेवता, मूर्घासिराइ ६ वासि-व- रणध यसि घरणी श्रायुपे त्वा वर्चसेत्या कृष्य वा माय त्वा ।। ॐ धौ शान्तिरन्तरिक्ष , शान्ति पृथिवी शातिराप शान्तिरोपधय शान्ति उनस्पतय शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिब्रह्म शान्ति सर्व शान्ति शान्ति रेव शान्ति सामाशान्तिरेचि ।। विश्वानि देवसवित दुरितानि परासुव यहूद्र तन्न आसुव इत्यभिपेक । ततो यजमानो वरुणदक्षिणासकल्प कुर्यात् अद्येत्यादि अमुकोऽह ममामुककर्मण सानफ्लावाप्तये वदा- तिणार्थमिमानि सापरकराणि सदक्षिणदिकानि तानि पूजिताभ्यो विभय दातुमुल्मृतत् ।। इति । नान्दीमुख प्राविधिः। श्रय नान्दीमुग्यश्राद्धपद्धति प्रारभ्यते ।। तत्र साबहाझे मुहले उत्थाय, ययापदश स्नान सध्यादि नित्यकर्म समाप्य पतरप्टो धतुरो या माझ गान्निमत्रयेत् ॥ ततो घेद्या गणपनिप्सरिता गोर्यादिप उश मानका गतिमानतपुजलेपान्यत्तमप्यधिष्ठान स्थापयेत् ॥ तपा। कला पशालिनपरपरण म्यापान्त सरशोपमपाणि शुद्धासने मार मुम्ब उपविश्य कुशाययशलान्यादाय देशमी सफरय ॥ ॐ अपामुमोद्भूतगणपति सहितपोहपमानजनमह करिये ॥ इति मारूपयेन ॥ रत पुगतानाराय ॥ ॐ गणानान्स्या गणपति याम! पियाणान्या प्रियति । यामहे निधीनान्यानिधिपति यामा समामम ॥ प्राइमजा निगमरमात्वमजामिगर्भग्म | भुव म गए यष्टिानि गएपनि स्थापया ।। छ [ ३१ ] प्रदक्षिण क्रमेण गौर्यादिस्थापनम ॥ ॐ भूर्भुवः स्वगौरि इहागच्छ इह विष्ट ॥ १ ॥ ॐ भूमुवः स्वः पद्म इहागच्छ इह तिष्ठ ।। २॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मेघेइ हा ॐ भूर्भुवः स्वः शचि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ३ ॥ ४॥ ॐ भूर्भुवः स्व. सावित्री हा०॥५॥ ॐ भूर्भुवः स्वः विजये इहा०॥ ६॥ ॐ भूर्भुवः स्वर्जये इहा० ॥ ७ ॥ ॐ भुर्भुवः स्वः देवसेने० ॥८॥ॐ भूर्भुवः स्वः स्वधे इहा। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहे इहा ॥ १० ॥ ॐ भूर्भुवः स्वर्मातर इहागच्छत इह तिष्ठत ॥ ११॥ ॐ भूर्भुवः स्वर्लोकमातर इहागच्छत इह तिष्ठत ॥ १२ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः हृष्टे इहा- ॥ १३ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः पुष्टे इहा० ॥ १४ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः स्तुष्टे इहा० ॥१५॥ ॐ भूर्भुवः स्वदात्मकुलदेवते इहागच्छ इह विष्ठ ॥ १६ ॥ ॐ भूभुवः स्वः श्रीरिहागच्छ इह तिष्ठ ।। १७ ।। इति गणपति सहिता एता मातृः प्रत्येकमोंकारव्याहृतिपूर्वक मावाह्य स्थापयित्वा ॥ ॐ मनोजूति पता- माज्यस्येति प्रतिष्ठां कृत्वा ॥ प्रणादिनमोन्तेन स्वस्व नाम्ना पोडशोप- चारैः पूजयेत् || ततः केनचित्पात्रेण सगुई विलीनघृतमादाय ॐ बसोः पवित्रमसि शतधारं बसोः पवित्रमसि सहस्र धारं देवस्त्वा सविता पुनातु नसोः पवित्रेण शत धारेण व्याः कामदुतः ॥ १॥ इति मन्त्रेण मातृणामुपरि मित्तिलग्नाः सप्त पञ्च वाधारारुत्तरोत्तरक्रमेण पातयेत् ।। ताश्वपूजयेत् ॥ ततः ॐ आयुष्यं वर्धस्य , रायस्पोपमोद्दिम् ।। यह है हिरण्यं वर्चस्व जैत्राया विशतादुमाम् ॥ १ ॥ नतद्रक्षा सिन पिशाचा- स्तरन्ति देवानामोजः प्रथमज धेतत् ॥ यो विमति दाक्षायण, हिरण्य स देवेषु कृणुते दीर्घमायुः ॥ २॥ यदायनन्दाक्षायणा हिरण्य ठ. शतानीकाय सुमनस्यमानाः ।। तन्मऽआवघ्नामि शत शारदायायुष्म । ब्जरदष्टिर्यथासम् ।। ३ ॥ इति वृद्धि सूक्त पठेत् ॥ श्रथ नान्दी श्राद्ध- बादौ गोमयोपलिप्ते देशे श्राद्धसामों संपाद्य प्रागमकुशोत्त- रेष्वा सनेषु प्राड मुखान् दक्षिणापेक्रमानुदगपवर्गान् पदर्भवटन्निवेश्य प्रत्यासनसमीपे तिलतैलेन दीप प्रज्वालयेत् ॥ ततः कर्ता प्रक्षालितफर- चरणः स्यासने उदड मुख उपविश्य सपवित्रोपकुशः सम्येन पाचम्य प्राणानायम्य ॥ सजघनं दक्षिणं जान्वा च्य ॥ ताम्बूनादिकमादाय ।। ॐ श्रद्य करिष्यमाणामुक कर्म निमित्तिकाम्युदायिक श्राद्ध अस्मन्मात्रा- दिनयत्राद्धसम्बधिनः सत्यवसुसंज्ञका विश्र्वे देवाः अनेन ताम्बूलादि तीर्थ यात्रागमने-प्रादौघृत भादंविधेयम् । यानान्ते गृहमागत्य. पूर्ववत् दधि भादंविषयम् ॥ . प्रयोगः॥

[ ३२ ] द्रव्येण कुशटुरूपा भन्यतो मया निमत्रिता ॥ ॐ आमन्त्रिता स्म । इतिसर्वतो दक्षिणगत मानादिदेवदर्भ वटु निम य एवमेव तदुत्तगी पित्रादि मातामहादि देवदर्मन च प्रमेण निमन्त्र्य वत ॐ अवोधन शोचपरेरिति पठित्या स्वागतम् भवता सुस्वागतमिति प्रार्थयेत् ।। तत पुनस्तान्यूनादिकमादाय ॐ अद्यामुकगोत्राऽस्मन्मातृपितामही मपिता मयोऽमुकामुक देव्यो नान्दीमुख्य अनेन ताम्बूलादिद्रव्येण कुशवटुरूपा भवत्यो मया निमन्त्रिता || ॐ आमन्त्रिता स्म इति निमन्त्र्य एवमेव पित्रादिमातामहादि दर्भवटुद्वय प्रमेण निमन्त्रयेत् ॥ तत ॐ अनोधन शौचपरेरिति पठित्वा ॥ स्वागत भयताम् सुस्वागतमिति प्रार्थयेत् ॥ ततो गन्धपुष्पादियुत पाद्य गृहीत्वा ॐ अद्याऽस्मन्मात्रादिनयसम्बन्धिन सत्यरसुसक्षका विश्वेदेवा एतत्पादाय व स्वाहा नम इति दत्त्वा एवमेव पिनादि मानामहादिदेवम्योप्य दद्यात् ॥ पुन ओं अमुकगोनाऽस्मन्माता पितामही प्रपितामयोऽमुकामुकदेव्यो नादीमुख्य रसत्पादाप त्रेधा विमध्य य स्वाहा नम इति मातृवर्गेऽध दत्वा, पिनादिमातामहादि यगद्यऽप्य प्रमेण दद्यात् ।। तत ओं प्रधाऽस्मन्मात्रादित्रयसम्पधिन मत्य यमुसज्ञका विश्वेदेवा व स्वाहा नम । इति मातृवगदेवेभ्य आप. मनाथ जल दत्वा एवमेव पितृर्गमातामहवर्गदेवेम्योप्याचमन दद्यात् ।। पुन अमुक गोत्रास्मग्मात पितामहीप्रपिता महोऽमुकामुकदेव्यो नारिमुरय इदमाचमन या विभज्य व म्बाहा नम इति मात्रादिम्य आचमन दत्त्वा. पित्रादिभ्यो मातामह म्यश्याचमन दुगत् ॥ तत ओं अनामध्यामेति पठेन् । इति निमन्त्रणम् ॥ तत फर्ता स्वपुरत कर्म- पान जलेनापूर्ण्य गन्धपुष्पादधियवहरित कुशास्तर निक्षिप्य ।। नों कर्मपानं सम्पन्नमिति पूयात् ।। ओं सुसपन्न मित्यनुरागत बों अपवित्र पवित्रो वा० ओं पुण्डरीकाक्ष पुनाविति पठित्वा फुशानीत जलेन मा. दुधीयोपारणानि प्रोक्ष्य प्रों वैष्णन्यै नम ॥ श्रओं काश्यप्यै नम । ओं भूम्यै नम ॥ इति भूमि सम्पश्य ओं विष्णरे नम ॥ इति विष्णु मनो. वाक्कसायनमस्कार मुन्यां॥ ततो दूर्वाशयशलान्यादाय ।। देश कानी महोर्य ओं अद्यामुरुगोताणामम्मन्मातृपितामहीप्रपितामहीना ममुकामुरयाना नान्दीमुनीनाम अमुक्गोत्राणामम्मसिनपिसामपि सामानाममुरामुकामपा नादीमुम्बानाम् नया प-अमुकगोत्रा गामस्मन्मानाम प्रमानामा युद्धप्रमातामहानामुकामुश्शमणा सपनि पानाममुकामनिमित्त मयवमुमाय- विश्य देवपूर्य मपिएडकमा युयिकादम पशिष्ये नि मंकल्प्य ।। ॐ पुरनियाक्षणानुमान ममणपण्यात गायत्री प्रिपिता विष्णु म्म तननमो [ ३३ ] नमस्ते गोविंद पुराणपुरुषोत्तम ॥ इद श्राद्ध हृषीकेश रक्षता सर्वतो दिश ॥ इति सर्वत्र यवान् गौरर्सपषाश्च विकीर्य । वाम कटि सलग्न वखाञ्चले नीवींवघ्नीयात् । तत कूष्माण्ड सूक्त न पावमानेन च जलमभिमन्त्र्य तेन हरित कुशै पाकं प्रोक्षयेत् । अथासनादिदानम् ॥ तत्र तावदुड मुस कुशवययवजलान्यादाय ॥ ॐ अद्याऽस्मन्मा- नादित्रयश्राद्धसम्बधिन सत्यवसुसज्ञका विश्वेदेवा इदमासन वो नम इति कुशप्रयरूप सयव दक्षिणगतमासन पूर्वाप्रमुत्सृनेत् ॥ एवमेव पित्रादिमातामहादिदेवेभ्योऽप्यासनमुत्तरोत्तर दद्यात् ॥ तत ॐ अद्या मुरुगोगारमन्मातृपितामही प्रपितामह्यो नादीमुख्य इदमासन नेधा विभज्य व स्वाहा इत्युच्चार्य मातृवर्गे देवतीर्थेन पूर्णन कुशप्रयमुत्सृनेत् । एवमेव पित्रादिमातामहादि वर्गद्वयोरपि दद्यात् तत ॐ सत्यवसुसज्ञक- विश्वान्देवानावाहयिष्ये इति व यात् । आवाय इत्यनुज्ञात सयवकर ॥ ॐ विश्वे देवा सऽागत शृणुतामऽइम हवम् ।। एद बहिन्निषीदत इत्याबाह्य ॥ ॐ यवोसि यवयास्मद्वेषो यपयारातीरित्यनेन यवान्विकीर्य, ओं विश्वेदेव शृणुतेम हम्मेयेऽ अन्तरिक्षय ऽ उपद्यविष्ठयेऽअग्नि जिह्वाऽ उतवायजनाऽ आमद्याऽस्मिन बहिपिमादयध्वम् ॥ इति जपेत् ॥ विश्वेदेवोत्पत्तिनाम्नोरज्ञाने ।। आगच्छन्तु महाभागाविश्वे देवा महा. बला ॥ ये यत्र योजिता श्राद्धे सावधाना भवन्तु ते ॥ इति श्लोक पठेत् ॥ तत ओं नादीमुखीर्मातरानाहयिष्ये इत्युचार्य आगाहयेत्य नुज्ञात सयवकर ओं उशन्तस्त्वा निधीमह्यशन्त समिधीमहि । उशन्नु- शतऽ श्रावहमातृर्ह विपेऽअत्तवे ओं मातामहान्हविषेऽ अत्तवे इति मन्त्रो. हेन यथा क्रम पित्रादोन्मातामहादश्चिावाह्य ॥ प्रदक्षिण यान्विकिरेत् ।। ततोदेवपूर्वक पसु स्वर्णादिपानेषु प्रतिपान पवित्र द्वय पविन वा निधाय ॐ शन्नोदेवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये ॥ शय्योरभिश्रवन्तुन । इति प्रत्येक पात्रेवपो निषिच्य॥ॐ योसि यययास्मद्वेपो यवयाराती रिति देवपाननयेषु यवान्निक्षिप्य यवोसि सोमदैवत्यो गोसवो देवनि- मित ॥ प्रत्नमद्भि प्रक्ता पुष्टयाना दीमुखाँलोकान् श्रीणाहिन स्वाहा ।। इति मन्त्रेण मानाद्यपानेषु यवान् क्षिपेत् ।। तत्र सर्वर तृष्णी गन्ध पुष्पाणि च दत्त्वा । ॐ अर्धपात सपत्तिरस्विति ॥ अस्त्वर्घपानसपत्ति रित्यनुज्ञातो देवार्घपान वामहस्ते कृत्रा पवित्रे पलाशादिपने पूर्वाने विन्यस्य ओं यादिव्या श्राप पयसा सबभूवुर्याऽअन्तरिक्षा सतपा- ...र्थिवीा ॥ हिरण्यवर्णा यज्ञियास्तानऽआप शिवा सर्ट स्योना सुहवा भवन्तु इत्यभिमत्र्य कुशप्रययवनलान्यानाय ॥ ओं घद्यारमन्मा गादित्रयाद्धसंयधिन मत्यवसुसज्ञका विश्वेश्वा एष वोऽपों नम इति [ ३५ ] जुहोमि स्याहा इति ॥ॐ इद विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्।। समूढमस्य पा सुरे खाडा, इति च पठित्वा ॥ ॐ विष्णोहव्य ] रक्ष इत्यनया स्वा. गष्ट मयो मुखमनख मन्नेऽवगाह्यदमन्नम् इमा श्रापः-इद माज्यम् इदं हवि- रित्युक्त्या ।। ॐ अपहताऽ असुरा रक्षा सिवेदिषद ।। इति यवान् विकीर्य वामकरण पात्रं स्पृशन कुशत्रययवजलान्यादाय ॐ अद्यास्मन्मात्रादि- प्रयश्राद्यसम्बन्धिनः सत्यवसुसंज्ञका विश्वेदेवा इदमन्न घृताद्युपस्कर. सहितं परिविष्टं हव्यममृतरूप वो नमः ॥ इति संक्रुप्यासनदक्षिणा भागे जलमुत्सृजेत् ।। एवमेव पित्रादिमातामहादिदेवेभ्योप्यन्नमुत्सृजेत् ।। पुनः मात्रादिपात्रमालभ्य ॐ पृथिवी ते पात्रं चौरपिधान ब्राह्मणस्य मुखेऽअमृतेऽ अमृतं जुहोमि स्वाहा ॥ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे वैधा निदधे पदम् ॥ समूढ़मस्य पा सुरे स्वाहा ॥ इति पठित्वा ॐ विष्णो हव्य ठ, रक्ष इत्यन्ने अङ्ग प्ठं निवेश्य ॐ अपहता इत्यन्नपात्र परितो यान्विकीर्य वुशययजलान्यादाय ॐ अमुकगोत्राऽस्मन्मातृपितामही- प्रपितामह्योऽमुकामुक देव्यो नान्दीमुख्य इदमन्न घृतायु पस्करसहितं परिविष्टं हव्यममृतरूपं वा विभज्य वः स्वाहा नमः इत्युत्सृजेत् ॥ एवमेव पित्रादिपात्र मातामहादिपात्रं च क्रमेण पात्रालम्भनादिपूर्वक संक्रुप्य दद्यान् ततः ॐ अन्नहीनं क्रियाहीन विधिहीनं च यद्भवेत् ॥ तत्सर्व. मच्छिद्रमस्तु इति प्रार्थ नांदीमुखान्माबादीध्यायन देवपूर्वकं भोजन. पात्रेषु किंचित्किंचिदपो दत्त्वा यथासुखं जुपश्वमितियात ।। ततः प्राग- प्रकुशोत्तरासनो प्रविष्ठः प्रणवव्याहृति पूर्विका सकृत्रिर्वा गायत्री जरत्वा । ॐ मधु मधु मविति च जपेत् ।। मधुयाता इति ब्यूचन पितृमन्त्रान् ॥ ततः ॐ कृणुष्वपाजः प्रसितिन्न पृथ्वी य्याहि राजेवामवॉ- ऽइभेन । तृष्वीमनुष्प्रसितिन्द्र णानोस्तासिव्विद्धयरक्षसस्तपिष्टैः ॥ १॥ तयभ्रमासऽ प्रासुया पतन्त्यनुस्पृशधृपताः शोपुचानः ॥ तपू, प्यो जुह्वा पतङ्गा नसन्दितो विसृज विष्ष्यगुल्कमाः ॥ २॥ प्रतिरप्पशो- धिमृत तृर्णितमा भवा पायु विशो 5 अस्या ऽ अधः । यो नो दूरेऽ अवशठ, सीयोऽ अंत्यग्ने माविष्टे व्यथिरा दर्शात् ॥३॥ उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुप्यन्या मित्रां : प्रोपतात्तिग्महेते ॥ योनोऽअरातिठ, ममियान चक्रे नोचा तवक्ष्यत सन्न शुष्कम् ॥ ४ ॥ ऊद्धाभनपतिविद्या स्मदा विष्णुप्प दैव्यान्यग्ने । अवस्थिरा तनुहि या तु जूनाना मिम- जामिम्प्रमृणीहि शत्रुन । अग्नेष्टना तेजमा सादयामि ॥ ॥ इति रक्षाग्न मूकम ।। ॐ पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसाधियः ॥ पुनन्तु विया, भूतानि जातवेदाः पुनीहि मा ॥१॥ आल्यायन समेतुते विश्वतः माम, वृष्ण्यं भवा वाजस्य समाये ॥२॥ शिरो में श्रीयशो मुग्वं रिषि के शांश्च श्म श्रृंणि ।। राजा मे प्राणोऽ अमृतर्छ, सम्भ्राट चतुर्विराट् श्रोत्रम् ॥३।। जिह्वा भद्र वाड_महो मनो मन्यु खराड् भाम मोदा प्रमोदा ऽ अडगुली रगानि मित्रम्में सह ॥ ४॥ याहू भेवलमिन्द्रिय & हस्ती मे कर्म वीर्यम् ॥ आत्माक्षत्रमुरो मम ।। ५॥ पृष्टीम्र्मे राष्ट्र मुदरमठ, सी प्रीवाश्च श्रोणी ।। ऊरू अरनि जानुनी विशोमेगानि सर्पत ॥६॥ नाभिर्मे चित्त विज्ञानम्पायुमैs पचिति भसत् ।। आनन्दनन्दा वाडौ मे भग सौभाग्य पस जघाम्या पद्धया धर्मो ऽ स्मि विशि राजा प्रतिष्ठित ॥७॥ पय पृथिव्या पय 5 ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधा ।। पयस्वती अदिश सन्तु मह्यम् ॥ ८॥ इति पवमानसूक्तम् ॥ ॐ सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि पोडशर्चपुरुषसूक्तमन्यानि शिवसङ्कल्पप्रभृतीनि पवित्राणि मगलानि च जपेत् । तत सर्वव्यजनोपेतमन्नाद्य सयवमादाय वारिणा- जाव्य प्रागप्रास्तृत कुशोपरि ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा येप्यदग्धा कुले मम ।। भूमी दत्तेन तृप्यन्तु तृप्तायान्तु पर गतिमिति विकीर्य ॥ आचम्य विष्णु स्मृत्वा पुन किंचित्किचिदपो दत्त्वा गायत्री मधुमधुमध्विति व जप्त्वा ॐ सम्पन्नमिति नूयात् सुसम्पन्नमित्यनुज्ञात पिण्डानहं करिष्ये ।। प्रतिपृच्छेत् ।। कुरुष्वेव नुज्ञातो वालुकाभिश्चतुरस्र प्राप्लव मुदक्प्लय वा मण्डलनयं कृत्वा तन्मध्ये 1 ॐ अपहताऽ असुरा रक्षासि येदिषद इति प्रागर्म रेसागय कृत्वा प्रत्येकरेखोपरि, ॐ ये रूपाणि प्रतिगुरूच मानाऽसुरा सन्त स्वाहया चरन्ति ॥ परा पुरोनिपुरोये भरन्त्यग्नि शाल्लोकान्प्रणुदात्यस्मादित्यगारान् भ्रामयेत् । तत्र रेखायोपरि समूलान प्रामानुदगमान्या कुशानास्तीर्य ॐ देमताम्य इति निर्जपेत् ॥ ततो नवपुर केषु जल ययगन्धपुष्पाणि कृत्वा एक पुटकं वामहस्ते कृत्वा कुशादीन्यादाय ॥ ॐ अद्यामुकगोनेऽस्मन्मातरमुकदेवी नादीमुखि अवारनेनियते स्वाहा इति दर्भमूले मात्र अवनेजन दवा एवमेव पिता महीप्रपितामहोम्या मध्यापयो क्रमेण दद्यात् ॥ सत ॐ अद्यामुक गोत्राऽस्मस्पिनरमुकशर्मन् नादींमुम्बा ऽत्रायने निदर ते स्वाहा इति द्वितीयमण्डलस्थितयशश्यमूले पित्रेऽयनेजनं दत्त्या एउमेर पिता माप्रपितामहयोस्तत्तएशमध्याप्रयोरयोजन दद्यात् ॥ एवमेय मावा महादिवदर्भ गूलमा पपु ददगान् । सत सर्वव्यपनोपेत मव्यविध मन्नयुदत्य हुन शेगन्नदार पदरयये मंमिरयनयपिहान बिल्लोप मानिमाय एक पिए मुशागैरमादाय ॐ अमुकगोऽरमन्मातरमुफयि नान्दीमुम्मिएप दधि पदरातन मिश्र पिएहस्ते नम ॥ इयरने जनम मेगा वोजनस्थानेषु मात्रादिम्प पिएडान दद्यात् ।। गत नोभमुर गोत्राs मरिलागुरु रामन्नादी मुग्प पर दधि व मिझ पियाने नम ।।

इति पितृस्याने दद्यात् । ततो दर्भ मूलेषु मूपाणिस्य पिण्डलेपं विमृज्य हस्तौ प्रछाल्याचम्य हरिं स्मरेत् ।। ततो मात्रादि पिएडाभिमुखांजलिं वृद्धा ।। ओं अत्रमातरो मादयध्वं यथा भागमाषायध्वमिति जपित्वा उस ममुखी भूय श्वास नियम्य प्रदक्षिणं परावृत्य, ओं अमीमदन्त मातरो यथा भागमा वृगयिपन , इति जपेत् ॥ एत्र पित्रादि पिण्डाभिमुखो भूत्वा ओं अत्रपितरोमादयध्वमित्यादि जपित्वा मातामहादिपिण्डाभिमुखोभूत्वा ॐ अत्रमातामहादयो मादयध्वमित्यादि जपित्वा 5 सून्नियम्य ॐ अमी- मदन्त पितरो यथाभागमावृपायिपत ॥ ॐ अमीमदन्त मातामहा यथा- मागमा वृपायिपतेति जपेत् ॥ ततोऽवनेजनपान जलेन ॐ अमुक गोत्र मातरमुकदेवि नांदि मुखि अत्र प्रत्यवने निक्ष्वते स्वाहा ।। इति मातृपिंडो- परि प्रत्यवनेजनं दत्वा ॥ एवमेव पितामही प्रपितामहीभ्यां तथा ॐ कगोत्र पितरमुकशर्मन्नांदीमुख अत्रप्रत्यवनेजनंनिक्ष्वते स्वाहा, इति पितृपिंडोपरिदद्यात् ॥ एवमेव पितामहादिभ्यः पंचम्यस्तत्तत्पिडोपरिद- द्यात् ॥ नतो नीवीं विस्रस्य आचम्य ॐ नमो वो मातरो रसाय नमो वो मातरः शेपाय नमो यो मातरो जीवाय नमो वो मातरः स्वाहायै नमो वो मातरो घोराय नमो वो मातरो मन्यवे नमो वो मातरो मातरो नमो यो गृहान्नो मारो दत्तत्तोवो मावरो देम ॥ इति मात्रादि वर्ग नम- स्कृत्य ॥ ॐ नमो पितरो रसाय नमो वः पितरः शोपाय नमो वः पितरो जोवाय नमो वः पितरः स्वाहायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरोदत्त सतो वः पित- गदध्म इति पित्रादि मातामहादि वर्गद्वयं नमस्कुर्यान् ॥ ततः ॐ एतद्वो- मातरो वास इति मात्रादि पिंडेपु सूत्राणि दत्त्वा ।। ॐ एतद्वः पितरो- वास इति पित्रादि पट पिएडेपु प्रति पिण्डं सूत्रं त्रयं दद्यात् ।। ततो गन्ध पुष्प धूप दीप दातामलकमूलयवतांबूल दक्षिणादिभिः प्रतिपिण्डम- भ्यन्यं ।। ॐ शिवा प्रापः सन्तु इति भोजनपात्रपुकिंचिकिज्जलं दत्वा ॐ सौममस्यमस्त्यिति पुष्पाणि ॥ अक्षतं धारिष्टं चास्तु इति ययांश्च दद्यात् ।। ततः ॐ नान्दीमुस्योमातरः पितामहः प्रपितामह्यः प्रीयंतामिति. क्षीर योदकमसय्य स्थान देवः । एवमेव पितरः पितामहाः प्रपितामहाः प्रीयंतामिति पिनादियनें। मातामहाः प्रमातामहाः वृद्धप्रमातामहाः सानिकारच प्रीयन्तामिति मातामहादिवर्ग व प्रत्येकमतय्योदकं दद्यात् ।। ततः कृता जजिः प्राधयेत् ॥ ॐ अधोरा मातरः सन्तु ॐ भघोराः पितरः मन्तु ॥ ॐअपोरा मातामहाः सपत्नीकाःसन्विति चोका । मंत्विस्य- नुगातः ॥ ॐ गोनोवद्धवां दातारो नोमियर्द्धन्ता वेदाः संततिरेयच ।। भवाननो माश्यगमन बढे पनोरम्नु ॥ मनचनोबटुमदनिधारनतमे [ ३८ ] मही! याचित्तारश्चन सन्तु माचयाचिष्मकचन एता सत्याप्राशिप सत्विति ब्रूयात् सस्वित्युत्ते सपवित्रान्कुशान्प्रत्येवं मानादिनयपिण्डे पित्रादिनयपिण्डे मातामहाविनयपिण्दे च वृत्वा । नादोमुत्रीर्मातृपिता मही प्रपितामही नान्दीमुमान पितृपितामह प्रपितामहान ना-दीमुपान मातामझमानामह वृद्धप्रमाता महान् सपत्निकान् स्वाग वाचयिस्य इति पृथ्ना पामतामित्यनुज्ञात ॐ नान्दीमुसो मातृ पितामही प्रपि तामझो नान्दीमुसा पितृपितामह प्रपिता महा नान्दीमुखा मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महा सपरितकाश्च प्रीयन्ता मितिप्रार्थ्य प्रीयन्तामिति द्विजरल्यमानो पिएडेपु जल निपिंचेत् ।। तत सस्रव पानाएयुत्तानीत्य दबदक्षिणा दद्यात् कुशनर यानलान्या दाय, ओं अद्यास्मन्मात्रा विनय श्राद्ध सनधि वैविक द्धि प्रतिष्ठार्थमिमा द्राक्षामलका मूल कादिम्पा दक्षिणा विष्णु दैवत्य'म- मुक्गोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय दातुमहमुत्सजे ॥ इत्युच्चाय्य दद्य त् ।। पपमेन पित्रादि मातामहादि वर्गदेवदक्षिणा दद्यात् । तत ॐ अद्यामुम गोगाणा मातृ पितामही प्रपितामीना नादीमुनीना हत्तं तदाभ्युदयिक श्राद्ध प्रतिष्ठाथमिमा दानामलकाईक मूलकादिरूप दनिणा विष्णु देवत्याममुक गातायामुक्गर्मणे नाझपाय दातुमहमुत्सृज ।। इति मात्रादि वर्ग इक्षिणा दद्यात् ॥ एपमे पितृवर्ग मातामहगारपि दक्षिणा च दद्यात् ।। सन पिण्डानुत्यापयामि इनि पृष्ट्वा ल्यापय इत्यनुज्ञात पिण्डानुत्याप्य पान कृत्वाऽऽत्रायदर्भानुल्मुक च वद्री क्षिपेत् ॥ ततो जलदान पूर्वकम् । ॐ विश्वेदेवा श्रीयन्तामियुराना । श्रीयन्तामित्य नुशाव म्बस्तिभरन्तो यन्तु इति ब्रूया म्यम्तो स्युक्त प्रणिपत्य ॐ यासान यानिनो नाधनेषु बिप्राऽ अमृनाऽ मतमा ॥ अस्यमध्न पिरत मादयान तृष्णायात् पथिभिर्देवयाने || इति मात्रादीन् पिनादीन मातामहादोश्च पिसन ॥ तत ॥ प्रामाराजस्य प्रमरा जाम्यामा या पृथिनीयच म्प ॥ प्रामागता पितग मातरा घामा मोमाऽमृ- तत्वेन गम्यान् ॥ इति पटिया नगी पृत्य रक्षादीप निर्मापण पाणि- म्या त्या दम्नी पाटी प्रताल्यानम्य पिडा गरादिम्योरत्या 5 अट्री पर या विनाप्रमूत घृतानन भोजया । नत टि मानाहि करणा. नन्तर येण्यदेय नियम त्या ॐ प्रमादा युवता म इति पटिन्या कमनि पामो विष्णु मंगो यग्य ग्यान्ने गुनभृत्ययावसानिधि मयुगाहानीयाम् ॥ याम्युयिय पादपद्धति ॥ अप मारीया नादी- भाडा ॥ सत्र नाया गणादि पाशमाया पृनन पृतगरा पूरन प पूर्योकवन इत्या आयुष्यं यस्यमिनि मन्त्राय पटीसन [ ३६ ] उदर मुग्य उपविश्य । आचम्यप्राणा नायम्य ॥ देशकालो सकीय अद्य अर्तव्यामुक कर्म निमित्तक सारल्लिक मादीमुमश्राद्ध करिष्ये ।। इति मकल्पयेत् ॥ तत दक्षिणोत्तर क्रमेण ॐ सत्यपशु सज्ञका विश्वेदेवा नाद मुबा ॐ भूर्भुव व इद 7 पाद्य पानापनेनन पादप्रक्षालन वृद्धि ।। तत ॐ अमुक गोगामात्पितामह प्रपितामह्यो नान्दीमुरय ॐ भूर्भुव स्व इद व पाय पाटावनेजन पारप्रक्षालन वृद्धि ॥ ॐ अमुक गोना स्तृिपितामह प्रपिता महा नादीमुसा ॐ भूर्भुव व इव पा पादारने नन पाद प्रतालनवृद्धि ! ॐअमुस्गोता मानामह प्रमाता पर वृद्वपमानामहा सपत्निका नादीमुसाॐ भूर्भुव म्य इ. पाय पादायने जन पादप्रतानन वृद्धि ।। अथासन गनम् ॥ स पयसुसज्ञकाना विश्वेषा देवाना नानीमुपानाम् ॥ ॐ भू ध म इमामन मुग्नासन स्वाहा त्ति शत्रर सनी दक्षिणात पूर्गप्रमुत्मजेत ॥ एर सर्वत्र ॥ ॐ नान्दोश्राद्ध क्ष गोत्रियेताम् तथा प्राप्तुना भवन्ती प्राप्नुता भवन्ती प्राप्नुवार इति पठेत् ॥ तत ॐ अमुक गोवाणा मातृपितामही प्रपिता मगेना नान्गेमु ीनाम् । ॐ भूभुध व इदमामनम् (मुग्यासन स्वादा, ॐ नान्दी श्राद्ध क्षणे क्रियेता तथा प्राप्नुता भ न्तौ प्राप्नुवाच ।। ॐ अमुक गोत्राणा पितृपितामह प्रपितामहाना नान्टीमुपानाम् ॐ भूर्भुये स इदमासन मुग्नासन स्वाह।। ॐ नान्दीश्राद्धक्षणे क्रियेता तथा प्राप्नुना भरनी प्राप्नयाय ॥ ततो गधादिनम् ।। ॐ सत्यपसु मतभ्यो विस्वेभ्यो देवेभ्यो नान्दीमुग्वेभ्य भूर्मुर स्व ग पायर्चन महा सपद्यता वृद्धि ॥ॐ अमुक गाभ्यो मापितामही प्रपितामोग्य नारीमुनीम्य ॐ भूर्नुब स इद ग-ध्यार्चन स्वाहा सपना वृद्धि ॥ ॐ अमुर गोत्रेम पितृपितामह प्रपितामहे म्यो नादीमुग्म्य ॐ भूर्भुव स इगन्धाचर्यन स्वाहा सपद्यता युद्ध ।। अमुक गोरेयो माताम: प्रमातामह वृद्धप्रमातामहेभ्य सालिफेन्ग्रो नान्दीमुम्बैम्य ॐ भूर्भुव म टुगन्यापन मपद्यता वृद्धि || नतो भोजन निमय द्रव्य दाम ॥ ॐ मयमुममा विश्वेदेवा मादी मुघा ॐ भूर्नु मरद यायुग्म प्रापभोवन पर्याप्त दास्यमान भन्न नियर भून किनिदिममनरपेण साहा मपाधना पृद्धि ॥ ॐ अनु: गोवा पिपनामा प्रतिमा नादीनुमा ॐ भूर्भुव सर यो युग्म नामा ॥ मन मीर मुदक्दानम् ॐ नादीमुग्या मत्परम् माताविरदेवा प्रीयताम् अमुक गोत्रा मा पिनामी पिनायो नारीमुग्ध गिति म पितामहा नादीमुमा द्वितीयगोवामानाम मातामा पुलममातामहा नान्दीमुम्रा मारिनकार प्रीयता । कल [ ४० ] ॐ स्वस्तिनऽइन्द्रो वृद्धश्रवा इति मन्त्रं पठेत् ॥ अथ दक्षिणा दानम् ।। ॐ सत्यवसु संज्ञकेभ्यो विश्वेभ्योदेवेभ्यो नांदीमुखेभ्य. कृतस्य नांदी- श्राद्धस्यफत प्रतिष्ठा सिद्धयर्थं द्राक्षामलकयत्रमूल निष्क्रयो भूतां दक्षिण दातुमहमुत्सृजे ॥ ॐ अमुक गोत्रेभ्यो मातृपितामही प्रपितामहीभ्यो नान्दोमुखीम्यः कृतस्य नान्दीश्राद्धस्य फल प्रतिष्ठा सिद्धयर्थं द्राक्षामलक यवमूल निष्क्रयी भूतां दक्षिणां दातु मह मुत्सृजे ॥ ॐ अमुक गोत्रेभ्य पितृपितामह प्रपितामहेम्यो नांदीमुग्वेम्य. कृतस्य नान्दीश्राद्धस्य फल- प्रतिष्ठा सिद्धियर्थं द्राक्षामलकयवमूल निष्कयीभूतां दक्षिणां दातुमह- मुत्सूजे ॥ ॐ अमुक गोत्र यो मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमातामह वृद्धप्रमातामहेभ्यः सपत्निकेभ्यो नान्दीमुसेभ्यः कृतस्य नादी श्राद्धस्य फलप्रतिष्ठा सिद्धयर्थं द्राक्षामलकयवमूल निष्पयोभूनां दक्षिणांदातुमह- मुत्सृजे ॥ माता पिता महीचैव तथैव प्रपितामही ॥ पितापितामहश्चय सयैव प्रपितामहः ॥१॥ भातामहस्तृिपितावप्रमातामहकादय. ॥ एते भवन्तु मे प्रीताः प्रयच्छन्तु सुमङ्गलम् ।।२।। इति प्रार्थयेत् ॥ अस्य नांदी. श्राद्धस्यकांग देवताः प्रीयन्ताम् अस्मिन्नांदी श्राद्धेन्यूनातिरिक्ताया विधिः सोपविष्ट ब्राह्मणनां ववनानाम्दीमुखप्रसादात्सर्वः परिपूर्णोऽस्तु अस्तुप. रिपूर्ण ईति विप्राः ॥ समाप्ताः ।। अथ नित्यश्राद्ध प्रयोग। आचम्य प्राणानायम्य । ॐ पवित्रस्थो वै० ईतिमन्त्रेण दक्षिण पामइस्तयोरनामिकायां कुशपविर्ने धृत्वा ।। सङ्कल्पः ॥ अद्यत्यादि एवं विशेषण विशिष्टायां शुभपुण्य तियो ममाऽत्मन श्रुति स्मृति पुराणोक्त गुग्ण फन प्रात्यर्थ (अरमपितृपितामह प्रपिता महाना मास्नी कानां तथा प अमुक गोत्राणां अमुक शर्मणां अम्मन्मातामह प्रमातामहवृद्धप्रमाता- मदानां सस्नोकानां नित्यश्राद्ध मदं करिष्ये ।। तत. दतियां दत्वा । अप सामग्री रोती। मौली । मुपारी । ४.। अपन। रहवन गज मोडी । पुष । नेवेच । नागर पान । २१ लायची। 1 | मेवा। नालोर । नापूर । सिंदूर। मोनी। मुपेद मरमो। कुशा । दूर्वा । पता । दोना। ४. | मका वित। वैल । मुरादनग।.1 पिदुग्ध म मारता मेर। दाम । गोहा।२ पोती मोहा।। मर मदन । बनेर ११ गुण पिणा ! १ बजवधिया। १३॥ पारदिनादान पर मामणीति १. माला यथा, अमुकगोत्राणामस्मलित पितामह प्रपितामहानां भमुक शर्मणां सपत्नीकानां दक्षिणां दत्वा भवद्भिः प्रसादः कर्तव्यः सुकर्वन्यः । एवं मातामह प्रमातामह सुद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां गोत्रनामोच्चारपूर्वक दक्षिणां दद्यात् ।। ततः पित्रादयोमावामहाश्च इदं वः पाद्यमिति पाद- यन्दस्वाऽऽचम्य कुशासने उदड मुख उपविश्य पितृणं मातामहानां चेदमासनम् ॥ पित्र्येक्षणः क्रियाताम् । प्राप्नोतु भवान् प्राप्नुवानि । पितरो मातामहाश्च एव वो गन्धः सुगन्यः । इमानि पुष्पाणि सुपुष्पा- णि । अयं धूपः सुधूपः अर्य दीपः सुदीपः । आच्छादनं दत्वा पूर्णता वाचयित्वा द्विगुण मामान्नं पाने संस्थाप्य प्रोक्ष्य पानमालम्य तिलान्धि. कोर्य अामान्नेऽङ्गष्टं दत्वा । पितरः इदं वः आमान्नं सोपस्करं गयेयं भूः गदाधरो विप्रः ब्रह्मरूपमिदं पितृम्य अमुक गोम्यो- अमुक शर्मभ्यो वसुरुद्रादित्य स्वरूपेभ्यः स्वधा मातामा दम्य श्चेदमा- मन्नं स्वधा सम्पद्यतां नमः । दत्तमामान्न मतप्यमस्तु ! अस्तस्त्वक्षयम् । श्रीगयागदाधरः प्रीतो भवतु । मझार्पणमस्तु । ॐ मधुव्वाताऽ ऋवायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माधीन सन्त्वोषधीः ॥१॥ मघुनक्त मुदो पसो मधुमत्पार्थिव । रजः । मधुरयौ रस्तुनः पिता ॥२॥ मधुमानो ठवनम्पतिम घुमाँ २ ॥ऽअस्तुसूर्य : मादीर्गावो मवन्तु नः ॥३॥ (इति मन्त्रा ब्रह्मणेन पठनीयाः) | ॐ मघु मधु मघु ॥ सुप्रोनितमस्तु । अस्तु सुमोक्षितम् । शिवा आपः सन्तु । सन्तु शिवा आपः । सौमनस्य. मस्तु । अस्तु सोमनस्य । अक्षतं चारिष्टं चास्तु । अस्तु अक्षतं धारिष्ठ च । दीर्घमायुःश्रेयः पितरः ।। ॐ पितृम्यः स्वधायिभ्य: स्वधानमः। पितामहेभ्य: स्वयायिभ्य: स्वधानम् : प्रपिता महेम्यः : स्वधायि. निभ्यः + स्वधानमः। मपन्नपितरो ममिदन्त पितरो तीतपन्व पितरः पितर: गुन्धरम् ।।८।। इति मन्त्रेण स्वस्तीति यात् कुशपवित्र त्यागः) भएम-अनेन मयाकृतेन । नित्यमाद कर्मणा मम पित्रादि स्वरूपी. जनार्दन वासुदेव पीरताम ॐ सत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ।। इति नित्यमान प्रयोगः॥ अथ तीर्घनाद विधिः ॥ पत्र क्रमः । भासनम्पिएटदानं च पुनः प्रत्याने जनम् दक्षिणा. सहरा दिसामुदकादिक तमन्नगुटमप्यता स्तुितीपनदेयम् ॥४॥ पूषंयोगवत् ॥-प्रापिषत: गोरीचन्दन दिलायवरयेत मुगम्मि पुमागि संगनि पुमादि दलवीरत्र मारादीनिन्तिला देपानि ।।

प्रसवड [ ४२ ] चान्न सङ्कल्प्य स्तीर्थ श्राद्ध ध्वय विधि ॥ अर्घमावाहनचेयद्विजाल, गुनिवेशनम् । तृप्ति पश्च च विकिर तीर्थ श्राद्ध विवायेत् । नावा हन नदिगवन्ध्यो न दोपो दृष्टि सम्भव सकारुण्यश्च कर्त्तव्य तीर्थश्राद्ध विचक्षणे । तीर्थ श्राद्ध धूरि लोधन विश्वेदेवा पूर्वक अमुक्तीर्थ प्राप्ति निमित्तक श्राद्ध करिष्ये । इति सङ्कल्प इति तीर्थस्नान विधि श्रिय तीर्थोपनाससङ्कल्प । अद्य हेत्यादि अमुकशर्माह सक्लपापक्षयार्थ अमुक तीर्थ क्षेत्रोपवास व्रतमह करिष्ये । अद्यस्थित्वा निराधार सर्वभोग विवर्निव भो मोक्षे पुण्डरीकाक्ष शरण मे भवाच्युत इति पठेत् । अथ श्राद्ध । य ब्रह्म वेदान्तविदो वदन्ति परम प्रधान पुरुषस्तथान्ये विश्वो द्गते कारणमाश्वरम्या तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय || शुक्लावरघर विष्णु शशिवण चतुर्भुजम् प्रसन्न वदन ध्याये सर्वविघ्नोपशान्तये ।। इति नमस्कृत्य दक्षिण मागे भूमो चन्दनेन शखयने लिखित्वा तपासनार्थ कुशत्रय धृत्वा बत्रा सनाथं वत्र कर्मपाने संस्थाप्य पाने पवित्रम् । ॐ पवित्रस्यो वैष्णव्यौ सवितुर्व उत्सुनाम्म्य छि गुणपवित्रण सूय्यस्य रश्मिमि वस्यते पपिन पते पवि पूर्वस्ययकाम पुनेतच्छकेयम् ॥ इति मन्त्रेण कर्म पाने। पयिती निधाय, स्वदक्षिण हस्ता नामिकाया कुश पवित्रीमाधारयेत् ॥ शन्नोदेवीति जलम् । ॐ शन्नोदेवीर मोष्टयो आपो भवन्तु पीतये शैय्यो रमि असन्तुन ॥ इति जलम् । इति मन्त्रत त् । ठिलोपी सोम देवत्यो गोसगो देवनिर्मित प्रत्नमद्भि पृथक्क स्वघया पितृल्लोमान्त्रीणाहिन स्वाहा । इति तिलाक्षिप्त्वा । यावो सिति यवान् ।। ॐ योसि यवयास्मद्वेपो यवया रावीदिवत्वान्तरिक्षा यत्वा पृथिव्यत्वा शुन्धता ल्लोका पृत्रिपदना पिनिषदन मसि। इति यवान् क्षिपेत् ।। तत्र वरुणानाहन कुर्य्यात् ॥ ॐ आवाहयाम्यहं देवा गावा त्रैलोक्यमातरम् । यस्यारमरणमात्रेण सर्वपापप्रणासनम् ।। ॐ भू मुंव स्त्र वरुणोरेयता इहागच्छ इहाविष्ट सुप्रतिष्टितो वरदो भव । गन्धाक्षत श्वेतपुष्पाक्षतादि तूष्णी निक्षिप्य । कमपान मु सम्पन्नमस्तु । अन्तु मुसम्पनम् । तेन ननेनात्मान सर्वाश्राद्धसामनी सम्प्रोक्षयेत् । तद्यथा। अपपित्र०। प्राणानायम्य । ॐ पुण्डरीकाक्षाय नम अपमन्येन नौवीवन्धनम् । सोमस्य निविरसि विष्णो शाशि शर्म यनमानस्येन्द्रस्य योनिरसि शुषस्या कृषीप्कृधी इति ,निविवन्धनम् ।। वामयामारोपयेन् । तत सव्येन । ॐ देवताभ्यपितृम्य महायोगेभ्यएवष नम स्याहार्य स्वधाय नित्यमेव नमो नम । इति विपेत् । अपसत्येन । ॐ भादकाले गया :ध्यात्वा घ्यावा देवं गापरम् । मनमाप पिदन् [ ४३] ध्यात्वा तीर्थश्राद्ध समारभेतू ।। इति स्मृत्वा । सत्येन । प्रतिज्ञा संकल्पः ।। प्रोत्यादि देशकालो सक कीर्त्य अमुकगोत्राणां भस्मपितृपितामह प्रपितामहानां अमुकाऽमुक शर्माणां सपत्नीकानां वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां तथाअस्मन्मातामह प्रमाता मह वृद्ध प्रमाता: महानां अमुकाऽमुकशर्मणां सपत्नीकानां वसुन्द्रादित्यस्वरूपाणां अक्षय तृप्रत्यर्थ पावर्ण श्राद्ध विधानेन धरिलोचन संज्ञक विश्वेदेवा पूर्वकं अमुक तीर्थ प्राप्ति निमित्त सपिण्डकमामानतीर्थ श्राद्धं करिष्ये। कुरु चेति प्रत्युक्तिः । सव्यम् । ततः विश्वेदेवा आसनदानं । अद्येत्यादि अमुक गोत्रोरमपित्रादित्रय श्राद्ध सम्बधिनां क्या स्मन्मातादित्रय प्राद्ध- सम्बन्धिना धरिलोचन संज्ञकानां विश्वेषां देवानां इदमासनमस्तु । ॐ भूर्भुवः स्वः इदमामनमास्यतामास्ये । अपसव्यं कृत्वा । अमुक गोत्राणा- मस्मपितृपितामह प्रपितामहानाममुकामुकशाणां वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां इदमामनमस्तु भू भुवः स्वः इदमासनमास्यताप्रास्ये इति । आसनं दत्वा । अस्मन्मातृपितामही प्रपितामहीनां अमुकामुकी देवीनां. पसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां इदमासनमस्तु । भूर्भुवः स्वः इदमासनमास्य. तामास्ये । इति आसनं दत्वा । अमुक गोत्राणां अस्मन्मातामह.प्रमातामह वृद्धपमाता महानां अमुकामुकशर्मणां सपलिकानां वसुरुद्रादित्य-' म्वरूपाणां इदमासनमस्तु । ॐ भूर्भुवः स्वः इदमासनमस्तु । ॐ भुमु यः' स्वः इदमासनमास्यतामास्ये । इति पासनं दत्त्वा। ततः सव्यंकृत्वा । विश्वेदेवा पूजनम् ॐ नमोस्त्वनन्ताय सहस्रलये सहस्रपादाक्षि- शिरो रुवा हवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटि युगधारिणे नमः । इति मन्त्रेण पाय गन्धाक्षतैश्च सम्पूज्य, अपसव्येन । पितृवा- घणं सम्पूज्य ॐ पितृभ्य इत्यादीनां पितृणां ओं नवो यः इत्यादीनां मातामहानां प पूजनं फर्म्यात् । घेदी कृत्वा । अपसव्यं कृत्वा । ॐ अपहताऽसुरा रक्षा ।सि वेदिपद् इति रेग्गत्रयं कृत्वा। प्रथम रेगा- मने अपत्यादिअमुक गोरः अस्मित्पिता अमुक शर्मन वसु स्वरूपपिएडा- सनेऽपनेनित्व ॥ मयः अमुक गोत्रः अम्मपितामह अमुक शर्मन् रुद्र- स्वरूप पिएडासनेऽवने नित्य । यद्य, अमुक गोतः अस्मत्प्रपितामह अमुक शमन् श्रादित्यस्वरूप पिएडासनेऽयने निवः। द्वितीय रेसामने ॥ पर अमुक गोरः अस्मन्माना अमुमि देवि वमुस्वरूपे पिरडासनेऽयने निर अद्य अमुक गोगः अस्मतिसातामही अमुक देयि मद स्वरूप पिरहामनेऽयने निदर। भप अमुक गोत्रः अस्मरमपितामद अमुक शर्मन मादित्यस्वरूप पिरामनेऽपने निस्वः। द्वितीय रेयासने मय गोर अम्मन्माना अमुकिय वमुशापे पिएामनेऽपने नियां । [ ४४ ] अद्य अमुफ़ गोत्रः अस्मत्पिातामही अमुक देवि रुद्र स्वरूपे पिण्डासने- ऽवने निक्ष्व । अद्य अमुक गोत्रे अस्मत्प्रपितामहि अमुकि देवि आदित्य स्वरूपे पिएडासनेऽवने निक्ष्य । तृतीय रेखा सने। माता महादीनां अवनेजनानि दत्वा । सव्येन । भो ब्राह्मण युध्मदनुज्ञया पिण्डप्रदान मह करिष्ये । अपसव्यं कृत्वा । स मोटकं तिल गुड़ पिंड वायवान पिण्डं गृहीत्वा । अद्येत्यादि अमुक गोत्रः अस्मत्पिता अमुक शर्मन् वसुस्वरूप अस्मिन तीर्थ श्राद्ध एवं तिल गुड़ पिंडोऽमृतकल्पो महत्तस्तेस्वधा । ॐ अमुक गोत्राय अस्मत्पित्रे अमुक शर्मणे वसु स्वरूपाय । इति प्रथम रेखा मूलेऽवनेजनो परिपिंड दद्यात् । अमुक गोत्रः अस्मपितामह अमुक शर्मन् रुद्रस्वरूप अस्मिन्तीर्थ श्राद्ध एवं तिलगुड़ पिण्डोऽमृत कल्पो मद्दतस्ते स्वघा । अमुकगोत्रः अस्मत् प्रपितामह अमुक शर्मन आदित्य स्वरूपः अस्मिन्नीर्थश्राद्ध एवं तिल गुड़ पिंडोऽमृत कल्पो मद्यस्ते स्वधा । इयं भूमिर्गयातुल्या इदंमुदकं गाग-द्वितिय रेखामूले-अमुक गोत्रोऽस्मत् माता अमुकी देवी वसुस्वरूपस्मिन् तीर्थश्राद्ध एप तिल गुड़ पिंढोऽमृतकल्पो मद्दत्तस्ते स्वधा०-इयं भूमिरिति-अमुक गोत्रो अस्मत् पितामही अमुकी देवीरुद्रस्वरूपं स्मिन् तीर्थश्राद्ध एघ तिलगुड़ पिण्डोऽमृतकल्पो पद्धस्ते ते स्वधा । इयं भूमिरिति । अमुक गोत्रोऽस्मत् प्रपितामही अमुकी देवी आदित्य स्वरूपा अस्मिनार्थश्राद्ध एष तिल गुड़ पिंडोऽमृतकल्पो मद्धस्तेते स्वधा । इयं भूमि रिति०॥ वितयि ॥ रेखासने मुले-अमुक गोत्राय अस्मिन् मातामह अमुक शम्मन् सपत्निक वसु- स्वरूप अस्मिन् तीर्थ श्राद्ध एप तिल गुड़ पिन्डोऽमृतकल्पो महस्तस्ते स्वधा । इयं भूमिरिति अमुक गोत्राय भस्मत्मातामहाय अमुक शर्मणे रुद्रस्वरूपाय सपत्निकाय एप विलगुड़ पिंटोऽमृतकल्पो मद्धस्तेपे खधा । इयं भूमि रिति० ॥ अमुक गोत्र भस्मत् वृद्धप्रमातामह अमुफ शर्मन् आदित्य स्वरूप सपत्निकाय एप तिलगुढ़ पिंटोऽमृतकल्पो मद्धस्नेते स्वधा-इयं भूमिरिति ।।ओं लेपमागिन भय भागोस्तु इति लेपभागम्य प्रतिपक्तिलेप भागम्य चदयात् । सत्येनाचम्य पुण्डरीकाक्षं स्मरन् ततः अपसव्येन । प्रत्यवनेजनम् । अमुक गोत्रः अस्मत् पिताश्रमुक शर्मन् वसुस्वरूप अस्मिन् वीर्य पाढे पिंडे प्रत्यवने निक्ष्व ।। अमुक गोरः अस्मत् पितामह अमुकशर्मनरुद्र स्वरूप अस्मिन् दीर्थ श्राद्धे पिंडे प्रत्यवने निश्च । अमुकमोत्रः अस्मत् प्रपितामह अमुक शर्मन् आदित्य स्वरूप अस्मिन् तीर्यप्रापिएडे प्रत्यवने नि । अमुक गोत्रः अस्मत् माता भमुकी देवा यमुम्वरूपे पस्मिन् तीयंत्राद्धेपिडे प्रत्यवने निक्ष्य । अमुक गोरः अस्मन् प्रपिता मही अमुकी देवी स्वरूपा मस्मिनतीर्थ भादधे [ ४५ ] पिंडे प्रत्यवने निदन । अमुक गोत्रः अस्मत् मातामह अमुक शर्मन् सपत्निक वसु स्वरूप अस्मिन् तीर्थनाद्ध पिंडे प्रत्यवने, निदेव ।। अमुक गोत्रः अस्मन् प्रपितामहीअमुकी देवी आदित्य स्वरूपे अस्मिन्तीर्थ श्राद्ध पिंडे प्रत्यवने निक्ष्य । अमुक गोत्रः अस्मत् प्रमावा मह अमुक शर्मन रुद्रस्वरूप सपत्निक अस्मिन् तीर्थश्राद्ध पिंडे प्रत्यवने निक्ष । अमुक गोत्रः अस्मत् वृद्ध प्रमातामह अमुक शमन् सपत्निक आदित्यस्वरूपे अस्मिन् तीर्थश्राद्ध पिंडे प्रत्यवने निक्ष्व । गन्धाक्षत पुष्प धूप दीप वखा- दिभि पिण्डं सम्पूजयेत् । ॐ पितृपितामह प्रपितामहीम्यो नमः। ॐ मातृ पितामही प्रपिता महोम्यो नमः । ॐ मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमाता- महेभ्यः सपलिकेभ्यो नमः । निविंसृज्य । सव्यं कृत्वा दक्षिणां दानं देव द्रव्यं सम्पादाय सम्पूज्यः ॥ ॐ अद्येत्यादि अमुक गोत्रः पित्रादिप्रय तथा मातादित्रय तथा अमुक गोत्र मातामहादित्रय श्राद्ध सम्बन्धिनां धरि लोचन संज्ञकानां विश्वेषांदेवानां प्रीतये कृतेत देश देविकं पूर्वक तीर्थप्राप्तनिमित्तक श्राद्धकर्मणां सांगतासिद्धये इमां सुवर्ण निष्कयं ब्राह्मणं दास्ये । ॐ तत्सन्न मम तथा अमुक गोत्राणां पितृपितामह प्रपिता महानां अमुकामुक शाणां तथा मातृ पितामही प्रपितामहीनां तथा अमुक गोत्राणां अस्मत्माता मह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहाय अमुकाऽमुक शम्र्मणां सपत्निकानां वसु रुद्रादित्य स्वरूपाणां तीर्थश्राद्धनिमित्तकं इदं रजत निष्क्रयं ब्राह्मणान्दास्ये ।। तत्सन्न मम ॥ विश्वेदेवाने अन्नं संस्था- प्य । ॐ अद्येत्यादि अमुक गोत्रः पित्रा दिनय तथा मातामहादित्रय श्राद्धसम्बन्धिम्यो धुरिलोचन विश्वेभ्यो देवेभ्यो इदमान्नं सोदकं सोप- स्करं निषिद्ध वर्जअमृत स्वरूपं ब्राझणस्य तृप्तिपर्यन्त यथा विभाग वः स्वधा ॥ यथा सुसेन भुङ ध्वं भुङ्महि । अपसव्यम् । ॐ येचेह पितरो येच नेयांश्व विघ्नयां २ उचन प्रविद्मत्ववेत्त्य यतिते जात वेदः स्वधामियज्ञ सकृतजुषस्व इति पठित्वा । मधु ३ । अोह अमुक गोत्रेभ्यः अस्मपितृ पितामह प्रपितामहेभ्यः अमुकामुक शर्मेभ्यः स. पलिकेम्योः वसु रुद्रादित्य स्वरूपेभ्यः तीर्थनाद्धे इदमामानं सोदकं सो- परकर निपिद्ध वन्न अमृत स्वरूपंवाझणस्य तृप्ति पय्याप्तं यया विभाग वः स्वधा । तथा अमुक गोत्रोभ्यो मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहेभ्योः अमुकाऽमुक शर्मभ्यः सपत्निकम्यो वसुन्द्रादित्य स्वरुपेभ्यः इदं मामाम्न सोदकंसोपस्करं लिपिद्धव अमृत स्वरूपं प्राझणस्य तृप्ति पर्याप्त यथा विभागं वः स्वधा । सव्येन । पितृ गायत्री जपेत् - देव ताम्य-इति निधारं जपेत् । अपसव्य अक्षयोदक दानं ॥ अद्येह अमुक गोगाऽस्म- पित्रादित्राय श्रादसम्बन्धिनां तथा अमुक गोत्रा स्मामाता महादिनयं [ ४६ ॥ श्राद्ध सम्नन्धिना धूप्रिलोचनसन्न काना विश्वपा देनाना तीर्थप्राप्ति निमि- तक श्राद्ध इदमन्नोदकादियदत्त तदक्षय्यमस्तु ॥ अस्त्वतयम् । एवं पिता. मह प्रपितामहयो । अद्यामुक गोत्रस्यास्मन्मातामहस्य अमुक शर्मण सपत्निक्स्य वसुस्वरूपस्य अस्मिन् तीर्थश्राद्ध इदमन्नोदकादि यरच सद क्षय्यमस्तु । अस्वक्षयम् । एर प्रमातामहयोरपि । सव्येन । अघोरा पितर सन्तु सन्तु गोरन्नो वर्द्धन्ता २ सन्ततिवद्धता वेदा वर्द्धन्ता वर्द्धन्ता दातारो नोपि वर्द्धन्ता वर्द्धन्ता श्राद्धाचनो मास्यव्यगमत्- मागात् । अन्नचनो बहुभवेत् । भवतु अतिथीन्चलमेमही समाव या चितारब्धन सन्तु सन्तु, मास्मयाचिष्मकचन मायाचिथा इत्याशिप प्रतिगृह्य । स्वतिलक सत्यानुष्ठान सम्पन्ना सर्वदायज्ञबुद्धय पितृमात पराश्चेर सन्त्वस्मरकुलजगिरा इति पठित्वा । देवताभ्य इति निर्जपा ।। इद श्राद्ध विसर्जयेन् । अद्येह अमुक गोनाणा इति उच्चायं घूरि लोचन विश्वेदेवा पूर्वक इट श्राद्ध, तीर्थश्राद्ध विधिहीन श्रद्धानिया रहित तत्सु कृतमस्तु यन्न्यूनातिरिक्त सत्सवविष्णो प्रसादात् ब्राह्मणवचनात्सर्व परिपूर्णमस्तु अस्तुपरिपूर्णम् ।। उत्तिष्ठ ब्राह्मणस्पते इति पठित्वा विसज्य आमा वाजस्येति प्रदक्षिणीकृत्य नोविनिसृज्य । श्राचम्य यस्य स्मृत्येति पठेन् अच्युताय नम इति तीर्थधाद्ध विधि । तोर्यवासी ब्राह्मणो यजमान चन्दन पितृप्रसादाञ्च दद्यात् । पुन कर्ता अयोध्या मथुरामाया का.।। इति ।। अथ शय्यावानम् । दीप प्रज्वाल्याचम्य गणेशपूना कृत्वा-दक्षिणोत्तरा शय्या स स्थाप्य-तत्रादौ सारदारमयी दृढा दन्तपत्रे हेम-पट्टधेरलता हसतूली प्रतिच्यन्ना शुभ्रगण्डोपवानिका प्रच्छादनपटी युता गन्धधुपादि वासिता पुष्प ताम्बूल कु कुम पूरागरुचन्दनदीपकोपानच्छत्रचामरयजनासन मप्तधान्यपृवपूर्ण कुम्मादिसहिता शय्यामासाद्य, वा हैम काञ्चन- पुरुष स्थापयेत् । तद पूर्वाभिमुर उदह मुखो वा उपविश्य । श्राचम्य प्राणानायम्य । अद्येत्यादिनेशकालो सकाऽमुकोई यथोक्त फला याप्तये । इष्टदेववाया प्रीतये शय्यादानं करिष्ये । (इति सकल्प )। पुन शय्यादानप्रतिपदार्य प्राधणस्य पूननपूर्वक चरण करिष्ये इति सकरप्य भूमि देवास जन्मासिन् विप्र पुरपोचम प्रत्यद यमपुरुष अर्घाय प्रति गृपदाम् । गन्यादिमि सम्पृश्य । एमिर्गन्धादन् पुष्पपूगीफल व्यवासो करणामि करिष्यमा शप्यादान प्रतिपहायं यामह वृणे । तो [ १७ ] स्मीति प्रत्युक्ति ततो लक्ष्मीनारायणप्रतिमा पूजन कुर्यात् । अद्य श्र- मुको हकरिष्यमाण शय्यादानकर्मण पूर्वागत्वेन सुवर्णप्रतिमाया लक्ष्मीनारायणयो पूजनमह करिष्ये । प्रतिभा मग्न्युत्तारण पूवक--पञ्चा- मृत संस्नाप्य । एतन्त इति प्रतिष्टा । ध्यानम् । दक्षिणाघः परे पद्म- शस मूर्द्ध करे न्यसेत् । वामोद्धे च भवेचक्र लक्ष्मो पृष्टे कर पर। दक्षिणास्तु भुजे दिव्या पृष्टे देवस्य चक्रिण वामप्येक गवालक्ष्मी रत्न. पाचकराभवेत् । इति ध्यात्वा पोडशोपचारे सम्पूज्य ॥ स्तो लक्ष्मीनारायण प्रतिमा शय्यो परिस्थापयित्वा-शय्या सपूज्य कृताञ्जलि पुटो भूत्वा, शय्या प्रदक्षिणीकृत्य प्रमाण्यदेव्योनम । इति चतुर्दिशं प्रणम्य, सकल्प कुर्यात् । अयेहाऽमुकोहं ययोक्तफलवाप्ति कनकोल्वल नानारत्न सम- कीर्ण नानाद्रव्योपसंयुक्त नानादिव्यापसनमेव्य विमान रोहण पूषक पष्टि सहस्रवर्प पर्यन इन्द्रलोकवासत्प्राप्तिकाम, इष्ट देवताया प्रीतये, इमा शुम गएडोपधानिका प्रच्छादनपटयुवां गन्धपुष्पादिवासिता सुपूजित लक्ष्मीनारायण प्रतिमायुता । उच्छीर्षक स्थापित घृतकुम्भपूर्ण- ताम्रकलशोपिता, पार्श्वस्थापित ताम्बूल कुकुम मृगमद कपूगगरुचन्दन जातापत्र जाताफल लगपूगीफन नालिकर दापिकोपानह छत्रचामर दशादुरपस्करवती पाकादि पात्रान्नादुरपरस्रवती सालकारा चतुष्कोणेपु यथा क्रम सस्थापित घृतकुंकुम गोधूम जलपूर्ण पान युता, प्रजापति देवत्या, अमुक गोनाय । अमुक येदाध्यायिने अमुक शम्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमई सम्प्रददे । ॐ तत्सन्न मम दानवाक्य, यथान कृष्ण शयन शून्यं मागरजातया शय्या ममाप्य शून्यास्तु शय्या जन्मनि जन्मनि । ब्राझण शय्योपरि स्थित्वा, प्रतिगृहयात् । कृतस्य शय्या दानस्य मागता सिद्ध चर्य इद सुवर्ण अग्नि दैवत ब्राह्मणाय तुभ्यमह सप्रददे । तत्स नमम । ततो भूयसी सकल्प । ब्राह्मणान् । भोनयित्वा । प्रणिपत्य विस- जयेत् ॥ इति शय्यादानविधि ।। अथ भूमिदान विधिः॥ ताप्रपाले देयभूमि सम्बन्धि मृत्तिएड संस्थाप्य विधि ना अप सम्याप्य सकल । अयेत्यादि-अमुकोऽह यशोष फलावाप्तये भूमिदान करिष्ये । भूमिदानमण पूर्वागत्वेन भूमे ययामिलितोपचार पूजन महकरिष्ये । ध्यानम् ॥ शुक्लवर्ण महाशाया, दिव्याभरपभूपिता । चतु. मुंबासौम्यवपुरपन्द्रामुप्त दराप्रमा। रत्नपान रास्यान पानम्मोपपि. मंयुतम् । पद्मरत कत्तव्यं यो यापद पदन, दिग्नामाना चतुर्णा- | ४८ ] प्ताका- तृष्टगतामहो, इतिथ्यात्वा, भूम्यै नमः ॥ इति गन्धाक्षत पूष्पैः संपूज्य । दान संकल्प । अद्य हाऽमुकोहं सफलपाप क्षयपूर्वकं ययोक्त फनापाप्तये, इमां सुपजिताभूमि लयोत्पत्तियोग्या विष्णु देवत्या अमुक गोत्रायऽमुक शर्मणे ब्राह्मणाय दास्ये । तत्सन्न मम ॥ दान वाक्यम् । यथा भूमि प्रदानस्य, कलानाईन्ति पोहशी, दानान्यन्यानि मे शान्ति भूमिदानाद्भवत्विह । कृतस्य भूमिदानस्य साङ्गता सिद्धयर्थ इद सुवर्ण अग्निदेवतं दान प्रतिष्टास्त्रेन तुभ्यं संप्रदे । तथा इमां दक्षिणा भूमि दान कर्मण -साद गुण्यार्य । ब्राह्मणेम्यो त्रिविमज्य टास्ये, तथा माधव प्रीतये सिद्धानेन प्रामान्लेन वा यया सख्याकान् ब्राह्मणान्मोजयिष्ये इति सकल्प अमिपेकतिलक मन्त्र पाठादिकं कुर्यात् । इति भूमिदानम् ।। एकोदिष्ट श्राद्ध विधिः ।। अथै कोदिष्ट श्राद्धविधि । तर पास्कर सूनम् ।। अथैकोदिष्ट मेकोघं एक पवित्रमेक. पिण्डोना वाहन नाग्नौ करण नार विश्वेदेव । स्वदितमिति तृप्ति प्रश्न सुस्खदितमितिइतरे युगपतिष्टतामित्यक्षय स्थाने. ऽभिरम्यतामिति विसगोंमिरमतास्म इति तरे ।। तत्र मध्याहे स्नात्वा, धौववाससी परिधाय श्रद्धा व कृत्वा, श्राद्धदेमे गत्वा, दीप प्रज्वा- ल्याचम्य । पवित्रपाणिभूत्वा विष्णु सम्पूज्य, इस्ती सहतीकृत्वा । ॐ यम्ब्रह्मरेदान्तविटो वदन्ति पर प्रधान पुरुप क्वान्ये । विश्वोदते कारणमीरघरम्या तम्मै नमो विप्नविनाशनाय । अमीप्सितार्थसिद्धयर्थ पूयते । विदशैरपि । सर्व विप्नछिदेवस्मै गणाधिपतये नम । इति पुष्प'- ब्जलि दला, प्राधण तेलाम्यगं कारयित्वा सस्नाप्य । कुशोशि फुश- पुप्रोसि । प्राक्षणा निर्मितपुरा। त्वय्यर्चिते सोचितोस्तु यस्याई नाम कोय । एतन्त इति पठित्वा । ॐ एतन्ते देव सविवय्यज्ञम्प्राह वृहस्पतय ! प्रमाणे तेन यज्ञमवतेनयज्ञ पठिन्तेन मामव मनाति जुपता माग्यस्य, वृहस्पतियज्ञमिमं तन्नोत्ववरिष्ट यज्ञ । समिगन्दधातु विश्वेदेवास इहमादयन्तोमोम् प्रतिउ । ॐ भूमुंव स्त्र पितृमात, सम्बन्धि ब्रह्मन् सुप्रतिष्टितो मर । ततोऽपसव्यविधाय । तिलान् गृहीत्वा, अद्य इत्यादि ममुक गावस्या स्मपिनु अमुक शम्मणो वहस्यरूपस्य सावत्सरोकेको दिष्टयाइ भाडे अझन् मकान मयानिमन्त्रित । निमन्त्रितोरमीति न्युय । हम्ना सदनी न्या। अमोपने शौच परै सततं ब्रह्मचारिमित, मविनय मादिश्च मया प ादकारिणा । सायास सिनिमुछ बाममोर चिनिने भवितव्य। मब हर्नोधनने भाद्ध क्मणि सव्यन ।

पाएडव [ ४६ ] आगंतवः सुस्वागतम् । अपसव्येन, एतद्वः पाद्यमस्तु । यस्फलं कपि- लादाने कार्तिक्या ज्येष्ठ पुष्करे तत्फलं श्रेष्ठ विप्राणां- पाद शौचने । इति पठित्वा । पादपूजायां अत्र सुगधं अक्षताः पुष्पाणि तुलसीदलानि च समय। पादार्घदानम् सव्येन ॥ भूमौ शंखचक्रादिक लिखित्ला आसन आसने पात्रं, पाने पवित्र, पवित्र स्थौ वैष्णव्यो । शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पोतये । शय्योरभिरवंतुनः । इति जलम् । तिलोसि सोम देवत्यो गोसवो देव निर्मितः प्रत्नमद्भिः पृड क्तः स्वधया पितृल्लोकान् प्रोणाहिनः स्वाहा । इति तिलान् प्रक्षिप्य । गन्ध- पुष्पावतादि प्रणवेन तृणी वा यथाधिकार निक्षिप्य । भो ब्राह्मणाः पादाघपात्र सम्पत्तिरस्तु । अस्तु सम्पत्तिः। इति प्रत्युक्तिः । अपसव्येन । पित्राह्मण पादार्चनं विधाय त्रं नमः गन्धोस्तु स्वधा । अक्षताः पुष्पाणि तुल मोदलानि नमः। अद्य ह अमुका गोबास्मपितुः अमुक शर्मन वसुखरूप अद्यकर्तव्ये साम्वत्सरीककोद्दिष्टक्षयाह आहे, अझन्नेपते पादार्थोऽस्तु । पादार्घदानाचमनम् । सव्येन । स्वयमाचम्य अपसव्येन ! ब्राह्मणमाचामयेत् । सव्येन । श्राद्धदेशोपवेशनं इत्युदड मुखं उपवेशयेन् । खतः कर्मपात्र पूरणम् । ॐ भूरसि भूमिरस्य दितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य: पृथिवीं यच्छ पृथियों दह पृथिवी म्मादि। सोः । भूमी शंगचक्रादिकं लिसित्वा । आमनं श्रामने पात्रं पाने पवित्रम् । पवित्रस्थो वैष्णन्यौ, शन्नोदेवीरिति जलम । ययोमियव याम्म द्वेपो यययारातिदिवत्वान्त रिवायत्वा । पृथिळ्यत्वाशुन्धन्ताल्लोकाः पितृग्दनाः पितृपदनमसि । विलोसीति तिलान् । गन्ध पुप्पक्षतादितुषणों निक्षिप्य । कर्मपात्रं सुमंपन्नमस्तु, मनु सुसम्पन्नम् । तेन जलेनाल्मानं मंमोग प्राणायाम विधाय । पुण्डरीकाक्षाय नमः ॥ अपवित्रः पवित्रो या सीनस्थां गतो पिया । यः स्मरेत् पुण्डरीकार सवाह्याभ्यन्तरः शुचिः । हम्तो महतो कृत्या । देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिम्यग्य च। नमः स्वाहाये म्यगये नित्यमेव नमो नमः। इति त्रिः पटित्या ३ । स्नान सहल्यः। पयंकुराजलान्यादाय । ॐ विष्णु ३ अयोत्या. पुच्चार्यामुकगोनोऽनक गरिमा असायं विधाय । दिम मोट. कहिल्या मनुक गोप्रस्थापितुरमुरमए: यमुम्बम्स्यानुक गोषाया अम्म. माउ, अमुडी देम्पा: गामापापाः प्रदप वनिकामनाय माम्वन्मदिष्ट एसार मसाधिकार मिनपधं प्रात्मनः कायगुरथ गप्पा लानमा रिभ्य, दुराण मनुक गोगाचा प्ररमन्नादः भगो देवः गमवावा यः गौरवि पामिदिरपरि पाठोपाते। --- ५० ] सप्तव्याधादशाणेपु मृगा कालं जरे गिरी । चक्रवाका मरद्वीपे हसा सरसि मानमे । तेपिजाता कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगा । प्रस्थिता दीर्घ मध्यान यूय विमवसीन्थ । श्राद्धकाले गया ध्याचा ध्यात्वा देव गदाधर इति पठित्वा । अपसव्य विधाय मनसा च पितृन्मातृ ) ध्यात्वा । तत अमुकगोत्रस्य अस्मरिपतु अमुक शर्मणे वमुस्वरूपस्य सावत्सरिकोदिष्ट क्षयाहश्राद्ध समारमे इति पठेत् । मव्येन पचमोश गयाक्षेत्र कोशमेवं गयाशिर । यत्र यत्र स्मरिष्यामि पितृ णादत्तमक्षयम् । ततोऽपस येन । तिलमाटक गृहीत्या वामस्म्या। ॐ सोमस्य नीविरसि वियो शासि शर्मया नमानस्येन्द्रस्य योनिरसि समस्या पीव कृधी इति नीवी वध्या । ततोदिगवन्धनम् । मोटकान् गृहीत्वा । अग्निप्वात्ता पितृगणा प्राचीरक्षतु मेदिशम तथा रहिपद पान्तु यामी येपित्तरम्या। प्रतीची माज्यपा पातु उदीची मयि सोमपा । विदिशश्चगणा सर्ने रक्ष-तूध्व मलो पिया रनोभूत पिशाचेभ्यस्तयै वासुर दोपत । मर्वतश्चा विरस्तेपा यमोरक्षा करोतुमे । तिलारक्ष तु इति । जान्दर्भारक्षन्तु राक्षसान् पक्ति वैश्रोत्रियो रक्ष दतिथि सर्वरक्षा । श्रध अध्वं चकाणेषु हविष्मतश्च सर्वदा । तत सत्येन साग्रान् कुशान् गृहीत्वा । क्मं पात्रस्थ जलममि- लोडयेत् । ॐ यद्देवादेव हेडज टेवासश्च कृमाव्वयम् । अग्निात्तस्मा देन सो विश्यानमुचत्य हस यदि दिवा यदि नतमेना ७ सिचममाव्व यम् । वायुा तस्मादेनसो विश्वान मु चत्वछहस याद जान द्यदि- स्वप्न एनासिब्जयम् । सूर्योमातस्मा देनसो विश्वान मुंचत्वहस । गाय यात्रा । तनो ढर्भतिलयुत तनल गृहीत्या, पियानमुताय॑ । शूद्रादि- दृधि दूपित पाक पूनोऽस्तु । गाय यान्न सरोक्ष्य । प्रतिज्ञा । ॐ विष्णु ३ नम परामात्मने श्री पुराण पुरपोत्तमाय । अत्र । पृथिव्या जम्बूद्वीपे भरतमण्डे, नार्यावर्त पुष्पक्षेत्र । हिमवत्पते कशे । ब्रह्मणे द्वितीय पराद्धे । श्रीसेवाराहकरपे वैन समन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे कृतोता द्वापराते कलियुगस्य प्रथमचरणे पठ्यदाना मध्य, अमुमनाम मपत्मरे, अमुकायने, अगुकतों, अमुकमामे, अमुक पक्षे तिथो अमुक गोनोग्न, अमुक राशि, अमुक शाह , अपमध्य । अमुमगोत्रस्या ऽस्मतिपतु अमुर शमणो सुम्यरूपस्य अक्षय तृप्ति कामनया अपिण्ड सहित, एक दिक्षयाह श्राद्धविधिना पचान्नेन मारत्सरी कैकोद्दिष्ट क्षयाह श्राद्ध करिष्ये । ॐ कुरुप्प । इति प्रत्युक्ति । तत आसन । तिलमोरक गृहीता। श्रये अमुक गोगाम्याऽमत्पितु अमुक शर्मणो यमुम्यरूपस्य अस्मत मावत्सरीकोद्दिष्ट नयाह श्राद्धे इदमासनमस्तु । मयन । भूर्भुव म्ब ३- मासामान्यता मास्थे । ततो हरतार्थे संपारनम् । - ।

- भूमौ शंख चक्रादिकं लिखित्वा आसनं आसने, पात्र पात्रे, पवित्रम् पवित्रेस्थी वैष्णव्यो० शन्नो देवी रिति जलम् । तिलोसीति तिलान् गन्ध पुष्पाक्षनादि तूष्णी निक्षिपेन् । भो ब्रह्मन् पित्रर्घपाल्न सम्पन्नमस्तु अस्तु सपन्नम् । हस्ताघ । सष्येन ! पवित्रं गृहीत्वा । विप्रहस्ते समर्य, सपवित्रेषु हस्तेषु ॐ यादिव्या आपः पयसा संवभूवुर्था । अन्तरिक्षा 5 उतपार्थ- वोर्याः हिरण्यवर्णां यज्ञियास्तानऽ आप. शिवाः श, स्यो नाः सुहवा भवन्तु । अद्येह, अमुक गोत्रः अस्मपिता अमुक शर्मन् । वसुस्वरूप, अस्मिन् साम्वत्सरीकैकोद्दिष्ट क्षयाह श्राद्ध, एपतेहस्ता?ऽस्ति । पुनः प्रत्यर्घचं । अर्योदकं श्रियं दद्यात्पुत्र पौत्रादि वर्द्धनम् । यस्मातस्माच्छिवं- मेस्यादिह लोके परत्र च। इदि मूर्ध्नि अभिपिच्य । अपसव्येन, पितृ बामभागे। कुशानास्तीर्य । तदुपरि सपवित्रम् अर्धपात्रम् । पितृभ्यः स्थानममीनिन्युवजं कृत्वा तदुपरिस्वधा वाचनीयान् स पवित्रान् त्रीन्- कुशान दक्षिणायान संस्थाप्य । आचारात् शुन्धन्तां ल्लोकाः पितृपदना पितृपदन मसीति संप्रोक्ष्य । पितृभ्यः स्वधायिभ्य इति पूजनम् । ततोऽगुष्टं पवित्रे त्यक्तवा । पितृव्राह्मणार्चनंविघावत्रन्नमः ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः म्वधानमः, प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । अक्षन्न पितरो मीमा दन्त पितरो तीतृपन्त पितरः पितरः शुधध्वम् । गन्धोऽस्तु स्वधा । अक्षताः पुष्पाणि तुलसीदलानि । धूप दीप वस्त्र भूपण ताम्बूलादि दत्वा पुनः पवित्रे करे कृत्वा । अद्य ह अमुक गोत्रः । अस्मित्पितः । अमुक- शर्मन् । यमुस्वरूप अस्मिन्साम्वत्सरीकैकोद्दिष्ट क्षयाहं श्राद्ध विप्रार्चन विधाविमानि गन्धाक्षत, पुष्प, तुलसीदल दीप, वासो भूपण ताम्बूला- दीनि मद्दत्तानि ते स्वधा । विप्रार्चन विधेः सर्वपरिपूर्णमस्तु । अस्तु परि- पूर्णम् । गन्धादि दानाचमनम् । सव्येन । स्वयमाचम्य । अपसव्येन । ब्राहाणमाचामयेन् । सत्र्येन । अच्युत स्मरण । तो विएवं नैवेद्य परिवेश्य समर्पयेत् । नाभ्याऽ श्रासीदन्तरिक्ष शीणद्योः समवात पदभ्यां भू० ॥ इति नैवेद्य । अपसव्यं विधाय । यथाचक्रायुधो विष्णुस्त्रे- परिरक्षति । एवं मण्डलमस्माकं सर्वभूतानिरक्षतु । इति मस्मना चतुष्कोण मण्डलं विधाय । तदुपरि भोजनपात्र संस्थाप्य । सत्र्यंप्रणिधाय। अन्नं परिवेश्य । गायच्या अन्नं संप्रोक्ष । अपसव्येन । अन्वाचितवाम जान । अमुक गोत्रापाः अस्मत्मातुः अमुकी देव्याः यमुस्वरूपायाः x अमुक गोत्रायाः अस्मत्मातुः अमुकी देण्या: वसुस्वरूपाया: x अमुक गोत्रे अरम. स्मातः अमुखी देखि यमुस्वरूपे ।।

। ५२ ] स्वस्तिका कृतिना उद्व मुग्मेन । दक्षिणो परिस्थितेन । वाम हस्तेन । मधु मधु इतिपात्रमालभ्य जपति । पृथिवीत्ते पात्रं । धीरपिधानं ब्राह्मणस्य मुग्ने । अमृतेऽमृतं जुहोमि । विष्णो कव्य . रक्ष अप्रा दाक्षिण्येन तिलान्विकीयं । अपहता ऽमुरारक्षा सि व्येदिपदः । अंगुष्ठप्रहणम् । इदं विष्णुविधक्रमेत्रेधा निधे पदम समूदमस्य पा. सुरे। इदमन्नं इमाप्रापः इदमाज्यं इदं शारादिकं सर्व कत्र्यम् । अद्येह अमुक गोत्राय अस्मन्पित्रेऽमुक शर्मणे वसुस्वरूपाय साम्बत् मरीककोद्दिष्ट क्षयाह श्राद्ध । इदमन्नं इमा श्रापः। इदमाज्यं इदं शाकादिकं यत्सरिविष्टं । यत्परिवेष्यमाणंब्राह्मणास्यातृप्ति पर्यन्तं । ब्राह्मणेभ्य प्रातृप्तिदास्यमान मन्न च अमृत स्वरूपं महत् तेस्त्रया । ॐ येह पितरो येच नेह यॉध्व विद्मयाँ २5 उचनाप्र० इति पोशानदत्त्वा । भो ब्राह्मणा यथा सुसेन भुध्वम् । भुजग्ममहे। वतः. सत्येन प्रणव व्याहृति पूर्विका । गायत्री मध्विति मधुमती ऋक् नयञ्च पठेत् । ॐ मधु ३ मधुवाताऽ ऋतायते । मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वी०॥ ॐ मधु ३ यथा शत्त्या पित्त शुक्त, श्राशुः शिशान० इत्यादि पूरुप सूप्त सप्तदश»रुचिस्तयादीनश्नतम ब्राह्मणेषु पठेन् । ततस्तुलसी शर्करा गव्यदुग्धात्म मधुतिल गद्गाजल. युतमन्नंताम्रादि पात्रे कृत्वा । कर्मपात्रोदकं विष्णुनिये दितं भक्तमपि- दत्त्वा । अपसव्येन पिण्डनिर्माय । विकिरदानं । नैऋत्यां दिशि कुशत्रय भूमौ क्षिप्त्वा आसनं । असंस्कृत प्रमीतानां त्यागिनां कुलभागिनां । उच्छिष्टमागधेयानां दर्भपुविकिरासनम् । इत्यासनम् दत्वा । सजल तिलमोटक युतमन्नं विफिरेत् । अग्निदग्धाश्चर्यजीवा येप्य दग्धाःफुलेमम भूमौदत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यानु परांगतिम् । येषानं पचते माता येपनि पचते पिता । उच्छिष्ट ये च कक्षिन्ति । तेभ्योऽन्नं दत्तमक्षयम् । उच्छिष्ट मागद्ययेम्योनमः । इति गन्धाक्षत पुष्पैः पूजनं । अंगुष्ट पवित्रे त्यत्त्क्वा । इस्ती पादौ प्रक्षाल्य । सत्र्येनाचम्य । ततः श्राद्ध देशमागत्य । अन्येऽगुष्ट पवित्र करयोः कृत्वा चमेन् । अपसव्येन । ब्राह्मणहस्ते सकृदयों दत्त्वा । सत्येन । पूर्ववदगायत्रीमधुमती मध्विति च जपित्वा । भी ब्राहाणा अस्मिन् पाकमध्ये यन्किंचिद्रोचने तत्प्रतिगृह्यताम । सुन्वदितं। शेषान्नेन कि क्रियताम । इप्टैः सहमुग्यतां । अपमव्यन । पिण्डदानार्थ वेदिका लेपनं गोमयेन अपहताः अमुरारदा सिव्वेदिषदः । इति रेसा करणं युशेन । उलमुकधारणम् ,ॐ येरूपाणि प्रतिमुचमानाः। अमुग संत. म्वधया चरन्ति परापरो निपुरो ये भरंत्यग्निष्टां ल्लोकात्मणादात्यस्मात् । श्ररनेजनम् । सविनमोटक अलं गृहीत्वा । अघेह अमुक गोत्रः । अस्मतिगतः अमुक शर्मन । वमुम्वरूप । अस्मिन्साम्बत्मरीके कोदिष्ट .

[ ५३ ] तयाह श्राद्धे पिण्डासने अवनेनिश्च तत उपमूल लूनकुशास्तरणम् । सव्येन । पदस्मरणम् ईशान विष्णुकमलासन कातिकय वहिनयार्क रजनीश गणेश्वराणा, क्रौंचामरेज्य कलशौद्भवकाश्यपाना पादानमामि सतत पितृ मुक्तिहेतो । गङ्गागयाीन सस्मृत्य । गङ्गायै जम गयायै नम । गदाधराय नम । कुरुक्षेत्राय नम | श्रीतीर्थराजप्रयागाय नम | पितृस्वरूप ध्यात्वा । भो ब्राह्मण युस्मदनुज्ञया पिण्डप्रदानमह करिष्य । कुरुष्व तनोपसव्येन । तिलमोटक्युत । पिण्ड गृहीस्वा । वाम जान्वाच्य । अयेह अमुक गोत्र अस्मपित । अमुक शर्मन् वसुस्वरूप । अस्मन्साम्वत्सरीकोद्दिष्ट क्षयाह श्राद्धे । एपाऽन्न पिण्डोऽमृत स्वरूपो मद्दत्तस्ते स्तु। इय भूमिर्गयातुल्या । इदमुदक गाड्न गगोदकेऽसति गङ्गाजल तुल्य वा अमुक गोवाय 'गोत्राये' अस्मत्पिने। (अस्मिन्माने) अमुक शर्मणे ( अमुकीदेव्यै' बसुस्वरुपायवसुस्वरूपायै । श्रापारात् । लेप भागिनाभय भागोऽस्तु । इति लेप भाग पिण्डपार्चे दद्यात् । पिण्डास्तरण कुशेष । करोन्मार्जन कृत्वा । हस्त प्रच्छालनम् । सव्येन । उदड मुग्वेन च मरुन्नियमन । तत परावृत्य । अपसव्येन । अमीमदन्त पितरो यथा भाग मा वृषायिपत । तत प्रत्यवने जनम् । श्रोह - अमुक गोत्र अस्मपित । अमुक शर्मन् वसुस्वरूप पस्मिन् साम्वत्सरीकैकोद्दिष्ट तयाह श्राद्ध पिण्डे प्रत्यवने निक्ष्य । किंचिनी विविस सनम् । नमोव इति पडज लिकरणम् । ॐ नमो व पित्रोरमाय नमोव पितर पोपाय० ॥ निगुणित सूत्रदानम् । एतद्व पितरो वास प्राधस । उनकरणं कर्मपात्रोदकेन । ॐ ऊर्जव्यहन्तीरमृत घृत पय फीलाल परिश्रतम् स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन । सव्येन । देवताभ्य इति निर्जप भो ब्राह्मण युष्मदनुज्ञया पिण्डार्चनमह फरिप्ये । ॐ कुरध्वेति प्रत्युक्ति । तत अपसव्येन । पिएडा। पिएडार्चनविधावत्रन्नम । गन्धोस्तु स्वधा । अक्षता पुराणि तुलसी दलानि । पितृभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम पितामहेभ्य स्वधायिभ्य स्वधानम प्रपिता० ॥ वस्त्र । धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल भूपण च समाय । अद्य अमुक गोत्र अस्मपित अमुक शर्मन्- वमुम्वरूप अस्मिामाम्बमारी कोदिप क्षयाह श्राद्ध । पिण्डार्चन विध विमान गन्धातततुलसीदल वासो धूप, दीप, नैवेद्य, वाम्नूल भूषणानि अमुहगोत्र प्ररममा प्रमुई देवावमुस्वरूप -अमुकगाने प्रस्मन्मान अमुरादेवा मुखरूप। अनुगम अस्मामात अमुकदमा वनुम्वरूप -अमुकगोने अस्मामात प्रमुबारवीवमु म्वरूप। .

महत्तानि तेस्वधा । सत्र्येन । पिण्डार्चन विधेः सर्वपरिपूर्णमस्तु | अस्तु परिपूर्णम् । ततः पिण्डान भूमौ सुप्रोक्षितमस्तु । श्रस्तु सुप्रोतितम् । शिवा श्रापः सन्तु २ । विप्रकरे जलदान । अपांमध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रति- ष्ठितम् । ब्राह्मणस्य करे न्यस्ता शिवा पापो भवन्तु भे । सौमनस्यमस्तु । अस्तु सौमनस्यम । लक्ष्मीर्यसति पुप्पेषु । लक्ष्मीर्वसति पुष्करे । लक्ष्मीर्व- सति सदा गोप्टे सौमनस्यं सदास्तुमे । अक्षता चारिष्टं नंतु । अक्षतं चास्तु मे नित्यं शाति पुष्टिकरं परम् । यद्यच्छेयस्कर लोके । तत्तदस्तु सदा मम । ततः कुशः कर्मपात्रोदकेन । मूर्धन्याभिषेक बुर्यात् । मम कुले दीर्घमायुग्स्तु । अस्तु शान्ति रस्तु । अस्तु पुष्टिरस्तु अस्तु पृद्धिरस्तु । यच्छ यस्तदस्तु । यस्पापं रोगः शोको दुःखः दारिद्रय' तत्प्रतिहतमस्तु, अमृताभिपेकोऽस्तु । ततोऽक्षयोदक दानम् । अक्षय्यन्तु विप्रकरएक अप- सव्येन । अद्येह + अमुक गोत्रस्य अस्मत्पितुः अमुक शर्मणो वसुस्व. रूपस्य । अस्मिन्साम्वत्सरीकैकोदिष्ट क्षयाह श्राद्ध । इदमन्नोद कादिकं यदत्तं तदक्षयमस्तु । अस्तु । अक्षय्यम् । सव्येन प्रार्थनाशीग्रहणम् । अद्योराः पितरः सन्तु २ । गोत्रन्नो धद्धतां । दातारोनोभि वद्धन्ताम् । वेदाः वद्धन्ताम् वद्धन्ताम् । सन्तदि बद्धन्ताम् । श्रद्धा च नोमा व्यगमत् मागाः । वहुदेयं चनोऽस्तु । अस्तु अन्न घनो बहुभवेत् भवतु । अतिथि कचलभेमहि लमध्वम् । याचितारश्चनः सन्तु मास्मयाचिमकंचन माया- बेथाः एता एव पाशिपः सत्याः सन्तु २ । ततः स्वधावाचनम् । सव्येन । भो ब्राह्मणः युध्मदनुज्ञया स्वधां वाचयिष्ये वाच्यताम् । अपसव्येन । स्वधावाचनीयान् नीन् कुशान् पिण्डो परि संस्थाप्य । तिलमोटकंज. लञ्च गृहीत्वा । अद्येह + अमुक गोत्रेभ्यो ऽ स्मपितृभ्यो ऽ अमुक- शर्मभ्यो यसुस्वरूपेभ्योऽस्मिन् साम्वत्सरीकोद्दिष्ट क्षयाह श्राद्ध । ब्रह्मन् मधु स्वधोच्यताम् अस्तुस्वधा । स्वधावाचनीये ध्वपोनिपं चति । ॐ उर्जव्वहन्तिरमतं घृतं पयः कीलालं परिश्रत्तम् । स्वधास्य तर्पयत मे पितृन । दुग्धेनाप्पूर्जकरण माचारात् । केचिन्मते नीराजनम् । उत्तानं पात्रं कृत्वा ।। पितरः स्वर्गलोके प्रस्थिता भवन्तु । सत्येन दक्षिणाम- कल्पः । अद्येह अमुक गोत्रस्य । अस्मत्पितुः अमुक शमणे वसु स्वरू- पस्य 1 अक्षय तृप्ति प्राप्त्यर्थं कृतस्यास्य । साम्वत्सरीकैकोदिष्ट क्षया श्राद्धस्य । साङ्गता सिध्यर्थं न्यूनातिरिक्त परिमृर्त्यर्थं इदं रजतं वा अमुक गोत्रायाः 5 स्मन्कातुः अमकी देन्याः वसुस्वरूपायाः ॥ श्रमक गोत्रयाः अस्मन्मातु: अमुकी देव्याः वसु स्वरूपायाः ॥ गोत्राभ्यः मन्मातृभ्यः अमकीदेवीम्यः वसुस्वरूपाभ्यः । ।

स्वर्ग [ ५५ रजतनिपयिणी इमां दक्षिणा श्राद्धभोक्त, ब्राह्मणेभ्योऽन्येभ्योपि विभज्य दानुमुत्सृजे । ॐ तत्स-न मम । सत्यानुष्ठान सम्पन्ना. सदायज्ञ- बुद्धय पितृमातृपराश्चैव । सत्वस्मन् डजनानरा , अक्षता., पान्तु स्वास्तुि भवन्तो प्रवन्तु । स्वस्तीतिविप्रोक्ति । विशेष पूजाः । पिनिभ्य स्वधायिभ्य इति आयु प्रजाघनं विद्या । मोसुखानिच । प्रयच्छन्ति तथा राज्य न्नृणां प्रीता पितामहा । श्रायु. पुत्रान् यशः स्वर्ग । कीर्तिपुपुष्टिवलं श्रियम् । पशून् सुसं धनं घान्य प्राप्नुयां पितृपूजनात् । ततोपसन्येन । पिण्डमुत्थाप्य । सव्येनामाह्या अपसव्येन । पानान्तरेनिधाय । पिण्डस्थाने शंसचमादिक लिखित्वा । गन्धपुष्पपाततै पूजयेन् । पिण्डस्थाने अन्नम गन्ध अक्षता पुष्पाणि । सव्येन तत्र दीपं सस्थाप्य । पट तृन् पूजयेत् । ॐ वशन्ताय नम । ॐ ग्रीष्माय नमः। ॐ वर्षाम्यो नम | ॐ शरदे नमः । ॐ हेमन्ताय नमः। ॐ शिशिराय नमः। ततो हस्ती संहती कृत्वा । पातु पितृगणा. सर्वे यस्मात्स्यानादुपागता । सर्वे ते दृष्टमनस सर्वान् कामान्ददन्तुमे । ये लोका दानशीलाना । येलोका पुण्य कर्मणाम् । सम्पूर्णान्सनभोगैस्तु । तान् ब्रजध्वसुपुष्कलान् । इहास्माक शिशातिरायुरारोग्यसम्पदः । वृद्धि मन्तानवर्गस्य जायनामुत्तरोत्तरा । दीपस्थाने दीप । अपस येन । पिण्ड- त्याने पिएडा । अमचरम भुक्ष्य । य कश्चित्पितृरूपेण । तिहते परमेश्वर । सोऽयंत्राद्व प्रदानेन तृप्ति यायतु शाश्वतीम् । गयाया पितृ रूपेण स्वयमेको जनाईन । यं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्ष मुन्यते च 'गुण- प्रयान् । पञ्चमोश गया। कोशमेक गयाशिर । यत्रयस्मरिप्यामि पितृणा दत्तमक्षयम्, शमीपत्रमाणेन पिण्ड दद्यादयाशिरे, उद्धरेत्सप्त गोगाणा कुलमेकोत्तर शतम् । पितु शत गुणपुण्यं मा मातु रुच्यते । भगिन्या शतमादन, मोदय दचमक्षयम् । सन्येन । अद्यदिने अपरमपि श्रामं पाहिरण्यं उदयास्तमयनं, यदत्तं यद्दारये नन्वर्गद्वारे अमृती भूतते स्वधा । देवताम्य पितृभ्यश्च, महायोगीम्यवघ । नम स्वदायै । नित्य मेव नमो नम । नि पठित्वामा व्याघा दशाएँषु । मृगा कालजरेगिरी चक्रपाका मरदीपे, हसा मरमिमानमे । सेरि जाता युरुक्षेत्रे, माणा वेदपारगा 1 प्रन्थिवादीमध्यानं यू किंमवमीदय । श्राद्धमले गयां ध्यात्या प्यात्वादेयगदाधरम । मनमा चपिताध्यात्या । मानर या ततो. पमध्येन । ममुगोत्रस्य अस्मत्पिनु अमुकामगो । यमुस्यम्पस माम्यनमुरोकोदिष्टपाद भाई मिमृते । सत्यम् । इदमा मया विविहीन-गलहीन, वाक्यहीन, मताहीन, दसिगारीनं, मायनानं यस सामुग्नमस्तु । प्रमादानोमानयादयाननं तन विग प्रमा। ।

ब्राह्मण वचनात्सर्वं परिपूर्णमस्तु । अस्तु परिपूर्णम । अपमन्येन । कुशेन विप्रस्पशः । उत्तिष्ठेति ब्राह्मणमुत्थापयेत् । ॐ उत्तिष्ठ ब्राह्मणस्पते देवयं तत्वेमहे । रुपयन्तुमरुतः स्वधानवऽइन्द्रप्पयशर्म वाचा । इति ब्राह्मण- मुत्थाप्य । स्थानान्तरे निधाय । श्रभिरम्यताम् । इतिविसर्जयेत् । अभि- रतारम । इति प्रत्युक्तिः । सव्येन । कर्मपात्रं गृहीत्वा। आमावाजस्ये त्वनुबज्य । प्रदक्षिणी करणम् । ॐ आमाव्वाजस्यप्रसवो जगम्या । देमेद्यावा पृथिवीविश्वरूपे । आमागन्ताम्पितरा मातरा चामासोमोs- मृतत्वेनयस्यात् इत्यनुव्रज्यप्रदक्षिणीकृत्वा नमस्कुर्यात् । कर्मपात्र विप्रपा- दानिनीत्वा । अपसव्येन । कुशवाह्मणस्यशिरवा मोचनंकृत्वा । नीवीं विसृज्य पाणिना दीपं निवांप्य सव्येनाचम्य । यस्यमृत्वा च नामोक्तया। तपोयन क्रियादिपु न्युनं संम्पूर्णतां याति सद्योवन्दे तमच्युतम् । अच्युताय नमः ३ कायेनवासचा मनमेन्द्रियैर्वा बुद्धयात्मना वानु मृतिः स्वभावान् । करोमि यद्यत्सकलंपरस्मै नारायणयेति समर्पयेत् । चतुर्भिश्- चतुर्मिश्च द्वाा पञ्चभिरेवच हयनेच पुनद्वांग्या तस्मैयज्ञात्मनेनमः । अद्यमे सफसं जन्म-अधमे सफलं तपः। अद्यमे गोत्रजाः सर्वे यातावोऽ नुग्रहादिवम् । पत्रशाकादि दानेनक्लेशिता युयमी दृशः ४ तत् क्लेशमिह संजातं विम्मृत्यक्षन्तुमर्हथ । सूक्तस्त्रोत्र जपं त्यक्तवा । पिण्डावाणञ्चदक्षि- गाम । श्राह्वानस्वागचा विना च परिवेपणम् । विसर्जनं सौमनस्य । माशियं प्रार्थनं तथा । पित्रामन्यन् प्रकर्त्तव्यं प्राचीना बीतिनासदा।। इति एकोदिष्टश्राद्धविधिः। अथ पार्वणश्रादप्रयोगः। तत्रा पराह स्नात्वा । मध्याह्र सङ्कल्पः । यवकुश जलान्यादाथ। ॐ विधगु ३ । नमः परमात्मने श्रीब्रह्मपुराण पुरुपोत्तमाय तत्सदिद पृथिव्याँ जम्बूद्वीपे भरतपण्टे पावित्रे पुण्यक्षेत्रे हिमवत्पर्वतैकदेशे ब्रह्मणो द्वितीचपरार्द्ध श्रीश्वेत वाराहनाम्निकल्पे कृतनेताद्वापरान्ते अष्टा- विंशति मे कलियुगे कलियुगस्य प्रथमचरणे वैवस्वतमाम मन्यन्तरेप- प्रबहानाममध्येऽमुक नाममम्वत्सरे दक्षिणायने शरदत्तों ( भाद्रश्चेत् पपी पानी) पारिवनमामे कृष्णपक्षे यथानाम नक्षत्र योग करण मुहूर्त धारान्यिवायामुक धारविनायांममुय पुण्यतिथी । अमुकगोमोसन्नोऽमुक- गशिऽमुख्शा अपमत्र्यं पृत्या तिलमोटकमहितं जलं गृहीत्वा । अमुक गोताणामम्ममिपितामह प्रपितामहानाममुकामुक शर्मणां- मपन्नीयानां यमुरमादित्यस्वरूपाणामक्ष्यप्ति प्राप्तिकामनया पुरुरवा.

- [ ५७ ] देवसंज्ञकविश्वेदेवपूर्वकं सकलपापक्षयार्थ पार्वणश्राद्ध विधिना s मुकपार्वणश्राद्धाधिकार सिद्धयर्थमात्म शुद्धयर्थं ॥ मध्याह्नस्नानमहं करिष्ये ॥ ॐ कुरुष्वेतिप्रत्तयुक्तिः ।। इति सङ्कल्प्य ॥ धौतवाससी परि- धाय तर्पणं कृत्वा ।। श्राद्ध देशेगत्वा । दीप प्रज्वाल्याचम्य पवित्रपाणि- भुत्वा । शुक्लां वरधर विष्णुं शशिवर्णं चतुभुजम् । प्रसन्नवदन ध्याये त्सवविप्नोपशान्नये । इति विष्णु सम्पूज्य हस्तौ संहतोकृत्वा । ॐ यं ब्रह्म वेदान्तविदो वदन्ति पर प्रधानं पुरष स्तथान्ये । विश्वोद्गतेःकारण मोश्वरंवा तस्मै नमो विघ्नविनाशनाय । अभीप्सीतार्थसिद्धयर्थ पूज्यते + त्रिदशैरपि सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः । इति पुष्पाञ्जलि- दत्वा । ब्राह्मणान तैलाभ्यगपूर्वकमण्डलाद्वहिः संस्नाप्य प्रतिष्टा । एतन्ते देवसवितर्यज्ञम्पाहुवृहस्पतये ब्रह्मणेतेन यज्ञ मवसेनयज्ञरतिन्तेन मानव मनोजूतिज्जु पतामाज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञमिमंतनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु । विश्वेदेवासऽहमादयनतामो ३ प्रतिष्ट । ॐ भूर्भुवस्वः। वैश्वदैविक कुशवाह्मन सुप्रतिष्टितोभव । एवं पैतृक ब्राह्मणादीनामपि । ॐ एतन्त इति पठित्वा । ॐ भूभुवः । पित्रादिप्रय श्राद्धसम्बन्धि कुशब्रह्मन् सुप्रतिष्टतो कुशोसि कुशपुत्रोसि ब्रह्मणा निर्मितः पुरा । याचिंते सोचिंतोस्तु यन्याहं नामकीतये । एव मातामह ब्राह्मणस्यापि प्रतिष्ठा । मातामह सम्बन्धि कुशब्रह्मन् सुप्रतिष्ठितोभव । कुशोसिकुशपुत्रोसीति पठित्वा । यवान गृहीत्वा अद्येहेत्यादि । अमुकसम्वत्सरे । दक्षिणायने । शरहतौ अश्विन मासे । महालयापरपक्षेकन्यांगतेसवितरि । (भाद्र सिंह स्थिरी इतिपठेत् ) अमु- कतिथौ। अमुकगोत्राऽस्मत्पित्रादित्रय श्राद्धसम्बन्धिनां । अमुकगोत्रा- स्मन्मातामहादित्रय श्राद्धसम्वन्धिनां । पुरूरवो माईवसंज्ञकानां । विश्वपान्देवानां । अद्यकर्तव्ये । अमुक पार्वणश्राद्धे । धैश्वदेविक कृत्ये । कुशब्रह्मन् त्वं मया निमत्रितः निमत्रितोऽस्मीति प्रत्युक्ति । हस्ती- मंहतोकृत्या अक्रोधनैः शोचपरैः सततं ब्रह्मचारिभिः । भवितव्य भट. द्भिश्च मयाच श्राद्धकारिणा। सर्वायास विनिमुक्त: कामक्रोध विव- जितः । भवितव्यं भवद्भिोंद्यतने श्राद्धकर्मएि आगतंत्रः सुस्वागतम् । एतद्वः पाद्यमस्तु । यत्फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्टपुष्करे । तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणाम्पादपूजने । ततोपसव्येन । तिलान् गृहीत्वा । अधेह अमुक सम्वत्सरे दक्षिणायने शरदृतावाश्विने माभि । महाल- यापरपक्ष । कन्यांगते सवितरि । अमुकातिथौ । अमुक गोत्राणां । अाम. पितृ पिनामहप्रपितामहानां । अमुकामुक शर्मा । सपत्निकानां बसुरुद्रादित्य स्वरूपाणं । अद्य कर्तव्ये । अमुक पार्षणाद्धे, पित्रा. भव 1 । [ ५८ ] दिनय श्राद्धपत्ये कुशनह्मन् व मया निमन्त्रित निमत्रितोऽस्मि । इति प्रत्युलि । वहुत्वेतु भो नाझए भवतो मया निमन्त्रिता निमन्त्रिता स्म । अक्रोधन रिति पठित्वा । सव्येन । आगतव सुस्वागतम् । अपसव्येन । एतद्व पाद्यमस्तु । परफलमिति पठेत् । ततो मातामहाना ! अपसव्यम् । अद्येहेत्यादि अमुक गोनाण।। अस्म न्मातामह प्रमातामहवृद्धप्रमाता महाना। अमुसामुक शर्मणा सपत्निकाना। वसुन्द्रादिस्य स्वरूपाण । अद्यक्तव्ये। अमुक पार्वणश्राद्धे । मातामहादिवत्रय श्राद्धकृत्ये । कुश- ब्रह्मन् त्वमया निमन्त्रित ॥ निमनितोऽस्मि । इति प्रयुक्ति ॥ अको- धनैरिति पठित्वा । स येन । श्रागंतर सुस्वागतम् । अपसव्येन । एतद्व पाद्यमस्तु । यत्फलमिति पठेन् । सत्येन पाटाघ सपाद्यगन्धपुष्पाक्ष वाटि तूष्णोन्निक्षिप्य । पाटावपात्र गृहीत्वा । यद्येह अमुक सम्वत्सरे। अमुकायने । अमुकता । अमुक्मास । अमुकपक्षे । अमुक वियो । अमुक गोगाऽस्मत्पिता विनय श्रामन्वन्धिन 1 अमुकगोत्राऽस्मन्मतामहादिनय श्राद्धसम्बन्धिन । पुरुरवो माईव सज्ञक विश्वेदेवा + अद्यकर्तव्ये अमुक पार्वणश्राद्धे । वैश्वदैविक ब्रह्मन्लेषत पादार्थोऽस्तु । तत पैतृक- कर्म । अपसव्येन । पादार्घ सपाद्य । हस्ते गृहीत्वा । श्रोह अमुक सम्यत्मरे दक्षिणायने । शरहतीवाश्विने मासे । महालयापरवक्षे । मन्या- गते सवितरि | अमुक तियो । अमुक गोत्रा अस्मपितृ पितामहप्रपिता मह । अमुकामुक शर्माण सपलिका । वसुरुद्रादित्यस्वरुपा।अद्यकर्तव्ये । अमुक पार्वणश्राद्धे पित्रादित्रय आढसम्बन्धि कुशनझन्नेपते पादार्थोऽस्तु । अद्येह । अमुक मम्वत्सरे । दक्षिणायने । शरहती वाश्विने मासे । महालया पर कन्यागते । सवितरि । अमुरतिथी। अमुक गोत्रा अम्मन्मातामह प्रमातामह वृद्धनमातामहा । अमुकामुक शम्माणा मपनिमा । वमुन्द्रा दित्य स्वरूपा । अद्य कर्त्तव्य । अमुक पाणश्राद्ध। मातामहादिप्रय श्राद्धसम्बन्धि कुशवमन्नेपते पादार्थोऽस्तु । पादादाना चमनम ! मयेन । स्वयमाचभ्य। विश्वेदेवा नापामयेत् । अपसव्येन । पिनासण मातामह प्रक्षणानाचामयेत् । मन्येन । श्राद्ध देशोपरेशनम् । प्रझन्नुत्तिष्ट । अनोपविश्यतामिति । प्राड मुर्य । वैसदेविफ ब्राह्मणम् । अरमत्येन । उह मुर। पित्रादि नारणेनुपवेशयेत् सत्येन । तत यमपातपूरणम् । भूमि स्पृशेत् । भूरमि भूमिरस्यदितिरस्य विसपाया यियस्य भुवनस्य घनी प्रथिबी य्यच्छ प्रयिनीप्रथिवी म्माधि मी । भूमी गरमकादि लिपित्या। श्रामन आसने पानम् । पाने +चित् पादार गरनमि । [ ५६ ] पवित्रम् पवित्रेस्थोवैष्णव्यो० ॥ शन्नोदेवीरितिजलम् । शन्नोदेवीरभिष्टयs आपो । यवोसि यवयास्म द्वषोयवया राती हिवेत्वान्तरिक्षा यत्त्वापृथि- व्यैत्त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृपद्नाः पितपदनमसि । इति यवाक्षिपेत् । विलोसि सोम देवत्यो गोपवो देवनिर्मितः । प्रत्नमद्भिःपडतः स्वधया पितृल्लोकान्प्रीणाहिनः स्वाहा । गन्धपुष्पासतादि तृपणी निक्षिप्य । कर्मपात्रं सुसम्पन्नमस्तु । अस्तु सुसम्पन्नम् । तेन जलेनात्मान सम्प्रोक्ष्य । श्राद्ध- सामग्रीश्च सम्प्रोक्ष्य । प्राणायामं विघाय । पुण्डरीकाक्षाय नमः३। ॐ अपवित्रः पवि० । हस्तो संहतो कृत्वा । देवताभ्यः पितृम्यश्च । महायोचोगीभ्य एवच । नमः स्वहाय स्वधायै नित्यमेव नमोनमः । इति त्रिः पठित्त्वा: सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालं जरे गिरो चक्रवाकाः सरद्वीपेहंसाः सरसि मानसे तेपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रास्थिता दीर्घ मध्वानं यूयं किमवसीदथ । श्राद्धकाले गयांध्यात्वा ध्यात्वा- देवंगदाधरम् । मनसा च पितृन्थ्यात्वा । ततोपसव्येन । अोहत्याधुल्लिख्य । अमुक गोत्राणां । अस्मपितृपितामह प्रपितामहानां । अमुकामुक शर्माणां सपत्नीकानां वसुरुद्रा दित्यस्वरूपपाणां । तथाऽमुक गोत्राणां अस्मन्माता- मह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहानां । अमुकामुकशर्मणां सपत्निकानां वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां । अक्षयतृप्ति प्राप्त्यर्थं पुरूरवो माई व सज्ञक विश्वेदेव पूर्वकम् । अमुक पार्वणश्राद्धं समारभे। सत्येन । पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिरः । अनन्त गर्भिणं सायं कौशं द्विदल मैवच, प्रादेशमात्र विज्ञेयं पवित्रं यत्रत्रचित् । सप्तव्याधा दशार्णेविति पठ- नेष्यऽपसव्यमस्ति कुत्र चित् । यत्रया स्मरिष्यामि । पितृ णां दत्तमक्षयम् । ततोऽपसव्येन । तिलमोटकं गृहीत्वा । वाम कट्याम् । आरोपयेन् ॐ सोमस्य नीविरपिविष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्येन्द्रियस्य योनिरसि सुसस्याः कृपीस्कृधि । इति नीवों वध्वा ततो दिग्बंधनम् । मोटकान- गृहीता। अग्निध्याताः पितृगणाः प्राचीरतन्तु मे दिशम् । तथा वहिपदः पान्तु यामीये पितरस्तथा । प्रतीची माग्यपापान्तु। ऊदीचीमपि सोमपाः । विदिशश्च गणा. सर्वरक्षन्तूर्द्ध मधोपिया । रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैया सुरदोपतः, सर्वतश्चाधिपस्तेषां, यमोरक्षां करोतुमे । तिलारक्षन्तु दिति- जान्दीरक्षन्तु गक्षसान । पक्ति वैश्रोत्रियोरक्षेदीतीथः संरक्षकः । अत ऊर्द्धचं कोणेषु हविष्मं तश्च सर्वदा । ततः सख्येन । सामान्कुरान गृही- स्वा । कर्मपात्रस्यं जलमभि लोहयेत् । ॐ यद्देवाहदनं देवामश्चक्रमा- व्ययम् । अग्निम्मा तस्माइन सो विश्वान्मुञ्चत्व हमः । यरिदि- वायदि मैना सिचश्माब्वयम् । न्युर्मा तस्मादेनसो विस्वान्मु०चत्त्व हस । यदिजायदप्रदिश्व प्रऽएना , सिचरुमा त्रयम् । मूर्यो - [६] मातस्मा देनसो विश्वान्मुन्चत्वा । हसः । गायत्र्याच । ततो दर्भतिल युतम् । तज्जल दिग्बन्धे । सव्यमस्ति । एकेवाम्पुस्तके 1) गृहीत्वा । पाकविधानमुत्तार्यो । शूद्रादि घृष्टिदूपिन् पाकपूतोस्तु श्राद्धयोग्यो भवतु ! इति गायत्र्यान सम्प्रोक्ष्य । अथ प्रतिज्ञा । यवकुश जलान्यादाय । ॐ विष्णुः ३ नमः परमात्मने श्रीपुराण पुरुषोत्तमाय । अत्र प्रिथिव्यां जम्बूद्वीपे मरतखण्डे । आर्यावर्तेपष्ठ्याद्वानां मध्ये | अमुकनामसंम्वत्सरे । दक्षिणायने शरहतो (भ्राद्रक्षेन् वर्षा ऋतौ1) आश्विन मामे ! महालया परपले कन्यागते सवितरि । अमुकतिथौ । अमुक गोत्रोत्पन्नः। अमुक राशिः। अमुक शर्माहं । अपसव्यम् । विलमोटकब्वगृहीत्वा । अमुक- गोत्राणां । अस्मत्पितुपितामह प्रपितामहानां । अमुकामुक शम्मणां सपत्नीकानां वमुरुद्रादित्य स्वरूपारणा । तथामुकगोत्राणां । अस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमात महानां अमुकामुक शाणां सपत्निकानां । वसु- रुद्रादित्य स्वरूपाणां । अक्षय तृप्तिकामनया पुरुरयो मार्द्रव सन्त्रक विश्वेदेव पूर्वकं अर्घपिण्डसहित पक्वान्नेन पावणश्राद्ध विधिनामुक- पार्वणश्राद्धं करिष्ये । ॐ कुरुष्व इति प्रत्युक्तिः । ततः सव्येनासनम् । जु कुशद्वय यवानादाय । अद्येहेत्येयादि । अमुक नामसम्वत्सरे । दक्षिणायने शरदऋतौ आश्विन्य मासे महालयापरपक्षे । कन्यांगते मवितरि । अमुक तथौ । अमुक गोत्राऽस्मत्पित्रादित्रय श्राद्धसम्वन्धिना। तथामुक गोतास्मन्मातामहादिनय श्राद्धसम्बन्धिनां पुरुरवो मावसंज्ञ- काना । विश्वेषां देवानां इदमासनमस्तु । ॐ भूर्भुवः स्वः इदमासनभा- प्यताम् श्रासामहे । तयोपसव्येन तिलमो टकं गृहीत्वा । पैतृक कर्म । अद्यहेत्यादि । अमुक नाम सम्वत्सरे । दक्षिणायने । शरद ऋती पारियन मामे । महा लयापरपक्षे । कन्यांगते सवितरि अमुक विथी। श्रमुक गोत्राणां । अस्मपितृपितामह प्रपितामहानां । अमुकामुकशर्मरण । सपत्निकानां वसुन्द्रादित्यस्यरूपाणां । अमुकपार्यणादे पित्रादिप्रय श्राद्धमम्बन्यिकुशनझन् । इदमासनमस्तु । सव्येन । भूर्भुवस्वः इदमासन माम्यताम् । श्रामे। अपसव्यम् । पुनरितलमोटकम् गृहीत्वा । अद्यह। अनुक गोत्राणां अस्मन्मानामह प्रमातामह युद्धप्रमातामहानां । भमुकामुक शम्मागां । मवनिकाना 'मुन्द्रादित्यस्यम्पारणां । अमुक पार्षण- श्राद्धं । मातामहादिनय श्राद्धमम्यन्धि कुशग्रह्मन् । इदमासनमस्तु । मत्येन भभुयः भ्यः इदमामन माश्यताम् । आम ततः पावादनम् । सत्य विधाय । पशद्वयययान गृहीत्वा । मोह । अमुक गोत्रा मग्निमादित्रय श्रादसम्बन्धिनः तथामुक गोग्रास्मन्मातामहावित्रय भानुमभ्यनिधनः पुररको माईक महाकान्पिश्शन्देषानहमावाइयिये ।

। ॐ आवाहय इति प्रत्युक्तिः । ॐ विश्वदेवास 5 आगत ऋणुताम् । इम, हवम् । एदंबहिन्निपीदत । इत्यावाह्य प्रदक्षिणं यवान विकीर्य । ॐ विश्वेदेवाः शृणुतेम ५ हवम्मे येऽअन्तरिक्ष य s उपविष्ठ । येऽअग्निजिह्वाऽ उतवा यजत्राऽ श्रासद्यास्मिन्वहिंपि भादयध्वम् । आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवामहाबलाः। ये 'यत्र विहिता श्राद्ध सावधाना भवन्तुते 8 प्रागच्छत । ततोपसव्येन पित्तुनावाईयेन् । तिलमोटकं गृहीत्वा ! अद्येह । शरद् ऋतौ। अश्विनमासे महालयापरपक्षे कन्यां गते सवितरि । अमुक- तिथी । अमुक गोत्रान् । अस्मपितृ पितामह प्रपितामहानां अमुका अमुकशर्मणः सपत्निका नावसुरुद्रादित्य स्वरूपान् पित्तन् । आवाह- यिष्ये । ॐ आवाहय । ॐ उसन्तस्त्वा निधि मा शंतः समिधीमहि । उशन्नु शतऽयावह पितृनूहविपेऽअत्तवे । इत्यावाह्यात प्रदक्षिण तिलान् विकीर्य-आयन्तुनः पितरः सोम्या सोग्निष्यात्ताः पथिभिः- वयानः । अस्मिन्ययज्ञे स्वधया मदन्तोफित्रुन्तुतेव चन्त्वस्मान् । ये मया निमन्त्रिताः पूर्व पितरः पितृपक्षगाः। श्राश्रित्य पितृ कार्येषु साव- धाना भवन्तुते । आगच्छन्तु । इति जपेत् । मातामहानाबाहयेत् । अपसव्येन । तिलमाटकं गृहीत्वा । अयेह । शरदऋतौ । आश्विनमासे महालया परपक्षे । कन्यांगते सवितरि अमुकतिथौ । अमुकगोत्रान । अस्मन्मावामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहान् । अमुकामुक शर्मणः सपलिकान्वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणाम् मातामहानाबाहयिष्ये । ॐ आवा- हय । उसंतस्त्वेत्य नया वाह्याऽप्रदक्षिणं । विलान विकीर्य। प्रायन्तुनः इति जपेत् । आगच्छन्तु । ततः सव्येन । हस्ताईस्थापनम् । देवास द्वावेकवा । ततो भूमौ शंखचक्रादिकं लिखित्वा । आसनम् श्रासने पात्र । पात्र पवित्रम् । पवित्र स्यौ वैष्णव्यो सवितुर्वः प्रसव 5 उत्पुनाम्म्यच्छिद्देण पवित्रण सूर्यस्य रश्मिभिः। इति पवित्रम् निक्षिपेत् । शन्नोदेवीरभिष्ठयऽ आपोमवन्तु । (यम:) समूनस्तु भवेद्दमः पितृणा भादूधर्मणि । मूलेत लोकाज. यति शमस्यतु महात्मनः । (भ्यास:) तर्पयादीनि कार्याणि पितॄणा यानि कानिच तानिस्पदिगुण दर्मेस्सप्तपत्रविषेषतः । अप वज्याः कुराः श्राद्ध प्रदीपे । पिण्डार्या स्तरणेच तर्पयाविषो त्याजानियुक्ताः कुशाःराद्गाः अप्तिा- घताध्य पथिय मुक्तौं मलोत्तसर्जने । नो वो ब्रह्मगुणो मयास्थित परे दायास्तथा बन्दिना इति पाः । दर्मादीन्स्वयमा हरेनषलानौते स्तुकायां किया। कृपाभावकाराः । अन्योक्सिन्ति विस्तरमयान्न लिखितम् ।

। पीतये । शय्योरभिश्रवन्तुन. । इति जलम् । यत्रोसीति यवान् गन्धपुष्पा- क्षतादि प्रगवेन तृप्णी वा यथाधिकार निक्षिप्य । एवं रीत्या त्रीणि पित्रार्य पात्राणि । प्रासनं । श्रासने पात्रं पात्रं पवित्रम् । पवित्रे स्थाव्वेषगव्याविति । शन्नोदेवी रिति जलम् । तिलोसीति तिलान् । गन्ध पुष्पाक्षतादि प्राण्वन तृष्णा वा निक्षिप्य । ततः भो ब्राह्मण देवार्थ पात्रपरिपूर्णेस्ताम् । इति प्रत्युक्तिः । एकाध्य देवार्य पात्रं परिपूर्णमस्तु । अस्तु परिपूर्णम् । ॐ एवं रीत्या पित्रादीनामपि । पित्रय पात्राणि परिपूर्णानिसन्तु । सन्तु यथा माता महाऱ्या पात्राणि परिपूर्णानि सन्तु । २ सतः सव्यंविधाय । पवित्रं गृहीत्वा । विप्रहस्ते समाय । सपवित्रेषु हस्तेषु ॐ यादिव्याऽ श्राप:पयसा संवभूवुर्याऽ अन्तरिक्षाऽ उत पार्थि वीर्याः हिरण्य वणी यज्ञियास्तानऽ आपः शिवाः शछ स्योनाः मुहवा भवन्तु । अद्य अमुक सम्बस्सरे । दक्षिणायने । शरद ऋती आश्विनमासे महालया परपक्षे कन्यागते सवितरि । अमुक तिथी अमुक गोत्राऽस्मत्पित्रादित्रय श्राद्ध सम्वन्धिनः । तथामुक गोत्रास्मन्मातामहादिवय श्राद्धसम्बन्धिनःपुरूर वाव सद्कविश्वेदेवाः अमुक पार्वणश्राद्धे एपको हस्ताघोऽस्तु । पुनः प्रत्यच । पैतृक कर्म। सत्येन । सावित्रेषु हम्नेषु यादिव्या इति पठित्वा । अपसव्येन । अय- पात्रं गृहीत्या। अद्येद्द । अमुक गोत्र | अस्मत्पितः अमुक शर्मन् सपत्निक बमुस्वाप । अमुकपार्वणश्राद्धे एपते इस्लाघोंऽस्तु सध्येन । पुन: प्रत्पचंच । पुनः सपवित्रपु हस्तेषु या दिव्या इति पठित्वा । अपमन्यं विधाय, अळपात्रं गृहीत्वा । श्रोह । अमुक गोत्रः । अस्मपि. तामह । अमुक शर्मन् सपलिक रुद्र स्वरूप । अमुक पार्वण श्राद्ध। एफ्ते हस्वोर्षोऽस्तु । सन्येन पुनः प्रत्पच । पुनः सपवित्रेपु या दिव्या इति पठित्वा । अपमन्येन । श्रयंपात्र गृहीत्या। अोह । अमुक गोत्र । अम्मत्प्रपितामह । अमुक शर्मन् सपलिक । प्रादित्य स्वरूपं । अमुक पार्वणश्राद्ध । एपते हस्तो?ऽस्तु । सव्येन पुनः प्रत्यय । सपवित्रेषु हस्तेषु या दिव्या इति पठित्वा । अपसव्येन । हस्तापात्र गृहीत्वा । अथ विश्वेदेवाःवत्र शवदसतिः । इष्ट श्राद्धन् दक्षी मत्यांनादी स्वेयम् । नेनिक्ति केा एकानीका मेनधुग्लिाननी । पुरूरवी मायश्च पावणे ममुदाहता । यत्र यतेषा नाम न झायने । तर श्लोश उच्चारणीयः । श्रागच्चान्विति विश्वदेव विषय शंख वृहस्पति यननं पूर्वमा वत्र पुरूरवो भावाचेनि पाठे पुरसश्नावरचेति दिवगन् । ।

[ ६३ ] अद्येह अमुक गोत्र । अस्मन् मातामह । अमुक शमन् सपलिक वसुस्वरूप । अमुक पार्वणश्राद्ध एपते हस्ताद्योऽस्तु । सव्येन । पुनः प्रत्यर्घच । सपवित्रेषु हस्तेपु यादिव्या द्दति पठित्वा । अप- मव्येन । हस्तापात्रं गृहीत्वा अद्याह । अमुक गोत्रः अस्म- न्मातामह । अमुक शर्मन् सपलिक रुद्रस्वरूप । अमुक पार्वणश्राद्धे एपत हस्तार्थोऽस्तु । सत्येन । पुनः प्रत्यर्घच सपवित्र पु हस्तेषु यादिव्या इति पठित्वा । अपसव्येन । हस्ताघ पात्र गृहीत्वा । अद्य है । अमुक गोत्र । अस्मवृद्धप्रमातामह अमुक शर्मन् सपत्निक । आदित्यस्वरूप । अमुक पार्वण श्राद्ध एपते हस्ता?ऽस्तु । सव्येन । पुनःसत्यच । ततः सर्वान संश्नवान् प्रथमे पितृ ॐ पात्रे समवनीय । अर्धोदकं श्रिय दद्यात्पुत्रपौत्रादि वर्द्धनम् । यस्मोत्तस्माच्छिवं मेस्या दिह लोके पस्त्रच । इति मूर्धिनि अभिषिच्य । अपसव्येन । पितृवामभागे कुशानास्तीर्य । तदुपरि सपवित्रं पित्रर्घपात्रं मातामहापात्रंच पितृभ्यः स्थान मसीत न्युवजं कृत्वा । तदुपरि स्वधावाचनीयान् सपवित्राम त्रीन्कुशान्दतिणाग्रान् संस्थाप्य । आचारत् । ॐ शुन्धताल्लोकाः पितृपदनाः पितृपदन मसीति संप्रोक्ष्य । पितृभ्यः स्वधायिभ्य इतिपूजनम् । दतोङ गुष्ट पवित्रे त्यक्तवा सव्येन पूजनं । विश्वेषां देवानाम् अर्चनवि- धावत्रं नमः । इति विश्वेदेव ब्राह्मणहस्ते जलं दत्वा । नमोस्त्वनंताय सहस्रमूर्तये सहस्र पादाक्षिसिरोरुवाहवे । सहस्र नाम्ने पुरुपाय शाश्यते सहस्त्रकोटि युगधारिणे नमः । अनेन् गन्धादिभिःपूजनम् । गन्धोऽस्तु स्वाहा । यवाः पुष्पाणि । तुलसीदलानि अपसव्येन । पितृणाम् । संविन्धकुशविरस्य । अर्चन विधावनमः । ॐ पितृ म्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः पपितामहेभ्यः स्वधा- यिभ्यः स्वधानमः अक्षपितरो मीमदन्तपितरो तीतृपन्त पितरः पितरः शुधष्ठम् । अनेनपितृणाम पूजनम् । नमो वः पितरो रसायेवि मावाम- * अत्र श्राद माध्यम् । प्रथमे पाने संश्रवान् समवनीय । पात्रं न्युवजं कृत्य पितृभ्या: स्थानं मसीति पात्रेण तत प्रथमं पात्रं न्युयनं करोति भूमौ । तिल कुशान्दक्षिण मूलानिक्षिप्य तेषां मुपरिन्यवज मधोमुखं क्रोति गन्ध्या- दिमिः पूजये दित्युशनाः वैश्यदैविक पात्र संभवा अपि प्रथमे पात्रे निक्षिप्यन्वे. एवं मातामह प्रथम पात्रंऽपि संश्रवान् समवनीय न्युवनं कृत्वा वक्ष्यमाणं कुर्यात । अत्र प्रथम पात्रं देवगत्र माहुः । तदयुक्तम् । पितृानं तदुत्तानं कृत्वा । विभान्विसर्जयदिति । श्रावास तत्रतिष्ठति पितरः शौनकी नवीत ! सं श्रव शदेना पात्रलग्नापावयवाऽभिधीयन्त नहस्तदन्दच्युताः। ।

[ ६४ ] हानां श्राद्धसम्वन्धि कुशविप्रार्चनर्विधावत्र नमः शेपं पूर्ववत् । गन्धास्तु स्वधा । अक्षताः पुष्पाणि नुलसीदलानि । धूप दीपो पुनः पवित्रकरे कृत्वा ! सत्येन । यवकुशान जलञ्च गृहीत्वा । अद्य ह । अमुक गोत्रा- स्मत्पित्रादित्रय श्राद्ध सम्बधिनः तयाऽमुक गोतास्मन्मातामहादित्रय श्राद्ध मम्बन्धिनः । अमुक पार्वणश्राद्ध । पुरूरमादय संज्ञकाः विश्वेदेवाऽर्चन- विधाविमानि गन्धाक्षत् पुष्पतुलसीदल धूपदीपयामोभूपणादीनि महत्तानि यथा विभागं वः स्वाहा । विश्वेदेवसम्बन्धि कुशविप्रार्चन विधेः सर्व परिपूर्णमस्तु । अस्तु परिपूर्णम् । ततोपसव्येन । तिला- मोटक युतं जलं गृहोत्वा । अद्य ह । अमुक गोत्राः । अस्मत्पिनत पितामह प्रपिता महाः । अमुकामुक शर्मणः सपत्निका वसु. रुद्रादित्य स्वरूपा: । अमुकपार्वणश्राद्ध । कुशविप्रार्चन विधा. विमानि जलगन्धाक्षतपुष्पतुलसीदलधूपदीपवासोभूपणादीनि मद्दतानि यया विमागवः विप्रार्चन विधिरमर्व परिपूर्णमस्तु । अस्तु परि- पूर्णम् । गन्धान दिदानाचमनम् । सव्येन स्वयमाचम्य । विश्वेदेववाण- मायामयेत् । अपसव्येन-पित्रादिप्राह्मणा मायामयेत मातामहादि- बामणानप्याचामयेन् । सत्येन { अच्युतस्मरणम् । ततः यथा चकायुधो विष्णुस्त्रैलोक्यम्परिरक्षति । एवंमण्डलभस्मांक सर्वभूतानि रक्षतु । इति विश्वेदेवमादाएसमीपे। अपसव्येन । पितृमानामबागसमीपे मस्मना मण्डले कार्ये । मरमना चतुष्कोणमण्डलानि विधाय ॐ तेषामुपरि मोजनपात्राणि संस्थाप्य । पितृद्वितममीपे अलपात्रं संस्थाप्य । घृता- मन्नं पिहितमादाय नद्धत्य सम्प्रोक्ष्य पृच्छति । भो प्राङ्गणा युप्मनुक्षया जले, अग्नी करणमहं करिष्ये। ॐ कुरुष्व । विप्रपाणी जलेवाग्नीकरण- होमः । अपहोमः अपसव्येन । तिलमोटकयुवमन्न गृहीत्वा। ॐ यानमये क व्यवाहनाय म्याहा । इदमग्नये कव्य पाहनाय । ॐ सोमाय पितृमने म्याहा । १६ मोमाय पितृमते। किञ्चिद्धतशेपं पित्रादि- प्रामणे यो दत्त्या। शेष पिएटार्थे रयापयेत् । ततः मध्येन । परिवेपणाम । प्रग्नोरथदोमरर संग्य उपयीविना। अपसम्येन या कामों दनिवाभिमुनेन माइति छन्दोगररिशिष्टे । कतीपान त्याग्यमेवरिया. पिश नभु भरवेति माविदेसात् । मय्य न धन्दोगररम् । छन्दोगा गुहयः सम्पनारमध्येन याहुः । इति स्यात्योह। अगीपूर्म । पच्छाम मारमणमितिन् । मिनटलेन रहिवं तमप्यतायेत् । चरमोदि. मापस्य त्रिकोर हात्रिपस्या । मातातिरयस्य सहरपाम्य गम् । विमाः।

[ ६५ ] प्रथम विष्णवे नैवेद्यम् । ॐ नाभ्याऽभासीदन्तरित । शीर्णोद्यौः समवर्तत पद्भ्याम्भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां २ ॥ अकल्पयन । विष्णो साहसपरिवार सवाहन इदं अमृतस्वरूपन्नैवेद्यं गृहाण स्वाहा इति निवेद्य । ततो वैश्वदैविकपूर्वकं सुशीतजलसहितो- णान्न परिवेषणम् । रजतादि पात्रे कुर्यात् गायच्या अन्नसम्प्रोक्ष्य । अन्वाचितदत्तजानुः सक्तिकाकृतिनाऽधोमुखेन वामोपरि स्थितेन दक्षि- रणहस्तेन मधु३ इति पात्रमालभ्य जपति । पृथिवी तेपात्र चौर- पिधानं ब्राह्मणस्य मुसे अमितेऽ मृतं जुहोमि । विष्णो हत्यधरत । इति प्रादक्षिण्येन यवान विकार्य। अपहताऽअसुरा रक्षधसिश्वेदिषदः अड गुष्टाहणम् । ॐइदं विष्णुविचक्रमे त्रेधानिदघे पदम् । समूढमस्य- पाठसुरे । इदमन्नम् । इमा आपः इदमाज्यम् । इदं शाकादिक सर्व हविः । अद्यह: अमुकसम्वत्सरे । दक्षिणायने शरद ऋतौ अश्वि- नमासे महालयापरपते । कन्यागते सवितरि । अमुकर्तियौ। अमुक- गोत्रास्मत्पित्रादिवय श्राद्धसम्बन्धिम्यः तत अमुगोत्रा अम्मन्मातामहा- दिवयश्राद्धसम्बन्धिभ्यः पुरूरवावसंज्ञकम्यो विश्वेभ्यो देवेभ्योऽस्मिन् अमुकपार्वणश्राद्ध इदमन्न इमा आपः इदमाज्यं इदं शाकाः दिकं यत्परिविष्टं यत्परिवेष्यमाणं ब्राह्मणस्यातृप्तिपर्यन्तं अमृतस्वरूपं महत्तं यथाविभाग वः स्वाहा । इति भूमो जलं प्रदद्यात् । ब्राह्मणहस्तदाने प्रत्यवायः । ॐ ये देवासो दिव्यौकादसस्यपृथिव्या मद्धय कादशस्थ । अपसु क्षितौ महिनैकादशस्थ तेदेवासो यज्ञमिमं जुपध्वम् । इति पठित्वा । विप्रहस्ते जलमर्पयेत् नमो देवेभ्यः । तथा गायव्याऽन्न सम्प्रोक्ष्य । अपसव्यम् कृत्वा । अन्वाचितवामजानुः । स्वस्तिकाकृतिना उर्द्ध मुसेन दक्षिणोपरिस्थितेन वामहस्तेन मधु३ । इति पात्रमालम्य जपति पृथ्वीते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुसे अमृते। अमृतं जुहोमि । विष्णो कन्या रक्ष । अप्रादक्षिण्येन विलान्विकीर्य । अपहताऽअसुरा- रक्षासिल्वेदिपदः । अङ्गुष्टप्रहणम् इदं विष्णुरिति पठित्वा । इदमन्नम् । इमा आप: । इदमाज्य । इद शाकादिकं सर्व कव्यम् । अोह । अमुकगोत्रेभ्योऽग्मपितृपितामह प्रपितामहेम्बः । अमुकामुकशर्मभ्यः सपलिकेभ्यो वसुरुद्रादित्यस्वरूपेभ्यः । अमुकपार्वणश्राद्धे । इदमन्नं । इमा आपः । इदमाञ्यं । इदं शाकादिकं यत्परिविष्टं यत्परिवेष्यमाणं देवे नुत्तानइस्ताम्या.उचानाभ्यान्तु पैतृके। दवे सम्यमपः कृत्वा अपसम्यन्तु. पैतृति वचनात् ||- पृथ्विीपात्रमिति पात्रभिमन्त्रणम् । कृत्वेदं विष्णु रि- त्येन्ने द्विजाङ्गष्टं निवेशयेत् । (स्मृविसगरेस) २) १) या, [ ६६ ] ब्राह्मणस्यातृप्तिपर्यन्तं ब्राह्मणेम्य प्रातृप्तिदास्यमानमन्नंचअमृत स्वरूपं मदत्तं यथाविभागं वः स्वधा । ॐये चेह पितरो येचनेयांश्चन्विट् मया ३॥5 उचजनविदमत्वं व्वेत्य यतिते जातवेदस्वधामिन मुकृनं जुषस्व । इति पितृब्राह्मणहस्ते । आपोशानं, दत्वा पुनः माता- महपाने । उत्तानाम्यां पाणिभ्यां । मधु३ इति पात्रमालभ्य जपति । पृथिवी ते पात्रमिति | विष्णोकव्य रक्ष । इति । आपादक्षिण्येन तिलान्वि. कीर्य । अपहताऽअसुरा रक्षा ५ सि ब्वेदिपदः श्रङ गुप्टग्रहणं इदं विष्णु, रिति पठित्वा । इदमन्नं । इमा आपः । इदमाज्यं । इदं शाकादिकं सर्व कव्यं । पुनः । तिलमोटकं जलञ्च गृहीत्वा । अद्य ह । अमुकगोत्रेभ्यः । अम्मन्मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहे ग्यः । अमुकामुक शर्मभ्यः । सपत्निकेभ्यो वमुद्रादित्यस्वरूपेभ्यः । अमुकपार्वणश्राद्ध । इदमन्न। इमा पापः । इदमाज्यं । इबंशाकादिकं यत्परिविष्टं यत्परिवेष्यमाणं ब्राह्मणस्यातृप्तिपर्यन्तं ब्राह्मणेभ्य प्राप्तिदास्य मानमन्नं च । अमृत- स्वरूपं महत्तं यथाविभागं वः स्ववा । येचेह पितर इति पठित्वा इति मातामहनामहम्ने । श्रपोशानं दत्वा यथासुखेन भुङ ध्वम् । इत्याज्ञा दद्यात् मुज्महे । इनि विप्रोक्तिः ततः सव्येन । प्रणवन्याहृतिपूर्वक गायत्रीन्मघुमतीस्वयं च पठेन् । ॐमधु ३॥ मधुव्वाता- वायने मधुतरंति सिन्धवः माध्वीनः सत्त्वोषधीः । मधुनत. मुनोपमा मधुमत्यार्थिव । रजः मधुद्यौरस्तु नः पिता । मधुमानोवनस्प- निर्मधुमा IS अस्नु मूर्य । माध्वीवो भवन्तुनः मधु ३ यथाशक्तया पितृसूमागुः शिशान इत्यादि सपदराची रुधिरतबादीनश्मु विप्रेषु पटेन् तत स्तुलसीशर्करागव्यदुग्धाज्यमधुतिलगंगाजलयुतमन्नंतात्रपात्रे त्या । काम गरोदकं विष्णुनियेदितमातमग्नी करणान्नशेषमपि दत्त्वा । अपमन्येन । विण्डान्निर्माय । विकिरदानम् ॐ ने त्यान्दिशि पुश- प्रयं भूमी सिप्त्वा । श्रासनम् । असंस्कृतप्रमोतानां त्यागिनां कुलभागि- नाम् । इन्दिरामागधेयाना दर्भेषु विकिरासनम् । प्रत्यासनं दस्या। मारानं याममागे मुगपानसामवेत् । ददमागे तु यः कुर्यायो- मगनपलं लभेत् । + (प्रयेवाः) प्राशनम्मदीया मात्रिी प्रिपेदए । मधुगवा रवि सूचं मधिवत् त्रिकन्वषा I + प्रचेताः मुनमानेप तु लिमे वरम्मामसवयम् । पदाभिमुखा भूला सिपञ्चेव विशेषः । पात्र मनः । चामलमा रिपहान् पुषांन पारी । पियरोपपावे अमिमा म पपिए परिसी ने पुन: पिया प्रदादम्या ग्नेन पानवान। 1 [ ६७ ] सजल तिलमोटकयुतमन्नं विकिरेत् । अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम । भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम् । येषान्न पचते माता येपान्न पचते पिता । उच्छिष्टं ये च कांक्षन्ति तेभ्योऽन्नंदत्तमक्ष. यम् । उच्छिष्ट मागधेयेभ्य नमः । इति गन्धाक्षतपुष्पैः पूजम्न । अङ्गुष्ट- पवित्रे त्यक्वा हस्तौ पादौ प्रक्षल्य । सव्येनाचम्य । ततः श्राद्धदेशमा- गतय । अन्ये अङगुष्ट पवित्रे करे कृत्वाचमेत् । अपसव्येन | पितृपूर्व । सकृत्सकृदापो दत्त्वा । सव्येन । विश्वेदेवब्राह्मणहस्तोऽपि चुलुकदानम् । पूर्यमद्गायत्रीं । मधुमती मध्वितिं च जपित्वा भो ब्राह्मणा अस्मिन्पाक- मध्ये यत्किञ्चिद्रोचते तत्प्रतिगृह्यताम् । तृप्ताः स्थः । तृप्ताःस्मः । शेषान्नेन किं क्रियताम् इष्टैः सभुज्यताम् । अपसव्येन पिण्डदानार्थं वेदिकालेपनं गोमयेन । अपहता इति रेखाकरणं कुशेन + ॐअपहतोऽ- असुरा रक्षा ७ सिव्वेदिपदः । उल्मुकधारणम् । ॐ येरूपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽमुराःसन्तः स्वधया चरन्ति । परा पुरा निपुरो ये भरंत्यग्निस्टॉल्लोकात्प्रणुदात् त्यस्मात सतिलजलमोटकं गृहीत्वा । अद्येह । अमुकसम्वत्सरे। दक्षिणायने शरदऋतौ आश्विन मासे । महालया परपक्षे कन्यागते सवितरि । अमुकतिथौ। अमुकगोत्रः अस्मत्पिता । अमुकशर्मन् । सपत्निक वसुस्वरूप'। अमुकपार्वणश्राद्ध पिण्डासने अवनेनिन । अोह । अमुकगोत्रः । अस्मत्पितामहः । अमुक- शर्मन् सपत्निकरुद्रस्वरूपः अमुकपार्वणश्राद्ध । पिएडासने अवने निक्ष्व । अद्य ह । अमुकगोत्रः । अस्मत्प्रपितामह । अमुकशर्मन् सपन्निक श्रादित्यस्वरूप अमुकपार्वणश्राद्ध पिण्डा. सने । अवनेनिक्ष्य । ततः। उपमूललूनकुशास्तरणम् । सव्येन । पदस्मरणम् । ईशान विष्णुकमलाशनकार्तिकेयवहत्रपार्करजनीश- गणेश्वराणां क्रौंचामरेज्यकलशोद्भवकाश्यपानां पादन्नमामि सततं पितृ- * ( क ) ततस्सर्वाशनं पाने गृहीत्वा विविघं वुर्घः। तेषामुच्छेपण- स्थाने विकिरं निक्षिपेद्भुवि । ( कात्यायन: ) विकिरोतर गायऱ्यादि. जपं तृप्तिपश्नं चाह । (याश्वलायनः) स्य्येन ले वसुलिखेत् । अपहता सुरा रजासिम्वेदिषद इति । ब्राह्माण्डपुराणे विशेषः । निहन्मि सर्वयद मेध्य- मंत्रहताश्च सर्वे । सुरदानवा मया। रक्षासि यक्षाश्च पिशानसड घा वा मया यातुधानारच सवें । एतन्मन्त्रेण सुसंयतात्मा दर्मेण 'देवी विलिखे दिति । पिण्डपितृयज्ञ कात्यायनः ) दक्षिणेनोल्लिखलपहता । इत्यारे. य वा । अप्रपेक्षया दक्षिणात्वेन पुरस्ता करोति ये रूपायोति । श्राश्वला मनः) ४ सदाच्छिन्नैरवस्तोयति । .

[६] मुक्ति हेतो। गगा गया गदाधरादीन संस्मृत्य । गङ्गाय नमः । गदधराय नमः । कुरुक्षेत्राय नमः । ॐ श्री तीर्थराजाय प्रयागाय नमः । पितृस्वरूपं ध्यात्वा । भो ब्राह्मणा युष्मदनुज्ञया पिण्डप्रदानामह करिने। ॐ कुरुष्व । ततोऽपसव्येन । तिलमोटकयुतं सजलं पिंडं गृहीत्वा । वामजा- भ्वाच्य । अद्य ह । हतिगायने । शरदऋतौ आश्विनमासे । महालयापर- पक्षे । कन्या गते सवितरि। अमुकतिथी अमुकगोत्रः । अस्मपितः । अमुकशमन् सपन्निक वसुस्वरूप । अमुकपार्यणभाद्ध । एपोऽन्नपिण्डो- ऽअमृतस्वरूपो मद्दतस्तेऽस्तु । इयं भूमिर्गयातुल्या। इदमुदक गांगम् । गगोदके ऽसति गङ्गाजल तुल्यं वा। अमुक गोत्राय । अस्मत्पित्रे । अमुकशर्मणं सपनिकाय वसुस्वरूपाय । अद्य ह । अमुक गोत्र । अस्म- पितामह अमुक शर्मन् सपत्निक रुदस्वरूप । अमुकपाणश्राद्धे । एपो- उन्नपिण्डोऽमृतस्वरूपो मद्दतस्तेऽतु । इय भूमिर्गयातुल्या इदमुदक 'गार' (गङ्गाजलतुल्यं ) वा । अमुकगोगय । अस्मपितामहाय अमुकशर्मणे । सपत्निकाय । रुदस्वरूपाय। अद्य हे अमुकगोत्र । अस्मत्प्रपितामह । अमुकशर्मन् । सपत्निक । आदित्यस्वरूप । अमुकपार्वणश्राद्ध । एषो. ऽन्नपिएडोऽमृतस्वरूलो मद्दतस्तेऽस्तु | इयं भूमिर्गयातुल्या इमुदऽगान (गङ्गाजलतुल्यम् ) वा। अमुकगोत्राय । अस्मत्पपितामहाय। अमुक- शर्मणे । सपत्निकाय । श्रादित्यस्वरूपाय । अद्येह । अमुकगोन । अस्मन्ममा तामह । अमुकशर्मन् । सपत्निक वसुस्वरूप ! अमुकपार्वणश्राद्धे । एपोऽन्न पिण्डोऽमृत स्वरूपो मद्दतस्तेऽस्तु । इय भूमिर्गयातुल्या इदमुदक गाङ्ग, (गगाजल तुल्यम् ) वा । अमुकगोवाय अस्मन्मातामहाय। अमुकशर्मणे सपत्निकाय वसुम्वरूपाय अघेह । अमुकगोत्र अस्मत्प्रमातामह । अमुक- शर्मन् सपत्निक रुद्रवरूप । अमुक पार्वणश्राद्धे । एपोऽन्नपिएडोऽमृतस्प- रूपो मद्दतस्तेऽस्तु । इयं भूमिर्गयातुल्या इदमुदक गाग (गगाजलतुल्य) वा। अमुकगोगाय । अस्मत्प्रमातामहाय | अमुकशर्मणे सपत्निकाय मद्र स्वम्पाय । अद्य अमुकगोत्र । अस्मत् वृद्धप्रमातामहाय । अमुक- शर्मणे सपत्निकाय | आदित्यस्यम्पाय । लेपमागिनामय भागोऽस्तु । इति लेपमागं पिएडापावें दद्यान् । प्रतिपिण्ड प्रनिगं वा कुना- पारात । पिण्डास्तरणकुशेपु करोन्मार्जनं कृत्वा हस्तप्रक्षालनम् । सव्येन । x (दमास्तरपानन्तरमा सुममन्तुः ) अमविष निवेति पुरुष पुरुषचति । प्रिनिकेन रस्तेन विदधीतावने जनम् । कात्यायनेन वहिस्तरण स्वयंपरनेडन-मुकत्रम् । तत्र ययावष्यवस्था । - । 1 ६६] पिण्डदानाचमनम् + करे पुष्पाणि संगृह्य । उदङ मुखेन । अपसव्येनात्र पितर इति जपः। ॐ अत्र पितरो मादयध्वं यथाभाग मा वृपायध्यम् । उदङ मुखेनैव । सव्येन । मरुभियमनम् । ततः परावृत्य । अपसव्येन। अमीमदन्त पितरो यथा मागमावृषायीसत । पिण्डोपरि पुप्पं दत्वा । ततः प्रत्यक्नेजनम् । अयेह अमुकनाम सम्बत्सरे दक्षिणायने । शरद ऋतौ आश्विनमासे । कन्यागते सवितरि। महालयापरपक्षे । अमुकतियौ । अमुकगोत्र । अस्मत्पितः अमुकशर्मन् सपलिक वसुस्वरूप । अमुक- पार्वणश्राद्धे । पिण्डे प्रत्यवने नित्व । अद्येह अमुकगोत्र । अस्मपितामह । अमुकशर्मन सपत्निक । रुद्रस्वरूप अमुकपार्वणश्राद्धे । पिण्डे प्रत्यवने निदा । अयेह अमुकगोत्र । अस्मत्प्रपितामह । अमुकशर्मन् सपत्निक । आदित्यस्वरूप । अमुकपार्वणश्राद्धे पिण्डे प्रत्यवने निक्ष्य । अोह । अमुकगोत्र । अस्मन्मातामह । अमुकशर्मन् । सपलिक वसुस्वरूप । अमुकपार्वणश्राद्धे । पिण्डे प्रत्यवने निक्ष्व । अयह अमुकगोत्र । अस्मत्प्रमातामह । अमुकशमन सपत्निक रुद्रस्वरूप अमुकपार्वणश्राद्ध । पिण्डे प्रत्यवने निक्ष्व । श्रोह । अमुकगोत्र अस्मह वृद्धप्रमातामह । अमुक शर्मन् सपलिक। आदित्यस्वरूप अमुकपाणश्राद्धे । पिण्डे प्रत्यवने निक्ष्व । किंचिन्नीवीविप्रेसणम् । नमो वः इति पडब्जनीकरणम् । नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोपाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्य व नमो वः पितरः पितरो नो वो गृहान्न पितरो दत्त सतो वः पितरोः मेतद्वः पितरो व्यासः ।। सूत्रदानम् * एतद्वः पितरो वास इति । उर्जकरएफम- पात्रोदकेन । ॐ ऊज्ज व्धहन्तिरमृतं धृतं पयः कीलाल परिस्नु तम् । स्वधास्व तर्पयेत् मे पित,न् । सव्येन । देवताभ्य इति निर्जपेत् । भो माह्मण युष्मदनुक्षया पिएडाचनमहं करिष्ये । ॐ कुरुप्य । अपसव्पेन । पिएद्वारी पिएडार्चनं विधावत्रं नमः। गन्धास्तु स्वधा । अत्तताः । मनु-युप्पपिण्डा स्ततस्त्रां स्तुप्रपतो विधिपूर्वकम् ॥ तेषु दमें पते रस्तं विमृग्यालेपमागिना मनुः) प्राचम्योदक पगत्य निराचम्प राने गन् । पचन मुस्कुयात तिन् नेवचमन्नावत । भादचिन्तामयी नामे) एतदः यास इति नरान् पृथा पृषक । अनुभमुहगोत्रे वचम्म पासः पठाघः (वन मा) रोष चौमार्ग दुरलं मातं तया भादे पेवानि यो दयात् रामनारोद चोचमान् । (दाम) गन्ध पुमापिर पर। दोन्टर रिमिरेददेत (देश) दरिया सर भोगरर । ( मतिरिमारदार)। । - ।

। स्वधा- जलकच । ७० - पुष्पाणि तुलसीदलानि । ॐ पितृभ्यः । स्वधायिभ्यः । स्वधानमः । पिताहेभ्यः । स्वधायिभ्यः । स्वधानमः । प्रपितमहेन्यः । यिम्धः स्वधानमः। अवन्न् पितरो मीमदन्त पितरो तीतृपन्त पितरः । पितर. शुधधम । वस्खम् । धूपदीपो नैवद्यम् । ताम्मूलम् । भूषणञ्च समर्प्य-तिलमोटके गृहीत्वा । अद्य है। अमुकगोत्राः । प्रस्मस्पपितामहप्रपितामहाः । अमुकामुक- शर्मणः । सपत्निकाः वसुरुद्रादित्यस्वरूपाः । तथामुकगोत्राः । अस्मन्मा. तामहरमातामहयुद्धप्रमातामहाः। श्रमुकामुकशर्मा । पपलिकाः । वसु रुद्रादित्यस्वरूपाः । पिण्डार्चन विधाविमानि गन्धाक्षतपुष्पतुलसीदल- वासोयुगदीपनैवेद्यताम्बूलभूपणानि तुलसीपत्राणि च महत्तानि यथा- विभाग यः स्वधाः । पिएडार्चन विधेः सर्व परिपूर्णमस्तु अस्तु परिपूर्णम् । सव्येन । पिण्डापभूमी सुप्रोक्षितमस्तु । अस्तु सुप्रीक्षितम् । शिवा आपः सन्तु सन्तु। विप्रकरे। जलं अषां मध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम् । बामणस्य करे न्यस्ताः शिवा आपो भवन्तु मे । सौमनस्यमस्तु । अस्तु सौमनस्यम् । लक्ष्मीर्वसति पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति पुष्करे । लक्ष्मीर्वस्ते सदागोष्टे। सौमनत्य सदास्तु मे । अक्षताश्यारि. जन्तु । अक्षतञ्चास्तु मे नित्यं शान्तिपुष्टिकरं परम् । यद्यज यस्कर लोके तत्तदस्तुमदा मम । ततः कुशैः कर्मपात्रोदकेन मूर्द्धाभिषेकं कुर्यात् । ममकुले दीर्घमायुरस्तु । अस्तु शान्तिरस्तु । अस्तु पुष्टिरस्तु । अस्तु पृद्धिरस्तु । श्रस्तु यच्छु यस्तदस्तु । यत्पापं रोगः शोको दुःखं दारिद्रय। तत्प्रतिहतमस्तु । अमृताभिषेकोऽस्तु । सतोऽतथ्योदवानम् । अक्षय्यन्तु । विप्रकर एव अपसव्येन तिलमोटकसहितं जल गृहीत्या। अवहे । अमुकमम्वत्सरे । दक्षिणायने । शरद ऋती। आश्विनमासे । महालयापरपते। कन्यागते सवितरि। अमुकतिथी । अमुकगोत्रस्य । अस्परिपतुः । अमुकशर्मणः । सपलिस्य । वसुस्वरूपस्य । अमुकपार्वए- श्राद्ध । इदमन्नादकादिकं । यदत्त' तदक्षय्यमस्तु। अस्तु अक्षय्यम् + श्रोह । अमुकगोत्रस्य । अम्मपितामहस्य । अमुकशर्मा. सपत्नि- कस्य । सहस्वरूपस्य। अमुकपार्वणश्राद्धे । इदमन्नोदकादिकं । यहत्त। तदनथ्यमस्तु । अस्तु । अक्षय्यं । अग्रह। अमुकगीतस्य अस्मत्प्रपि. वामहस्य । अमुकशर्मण. । सपत्निकस्य । आदित्यस्वरूपस्य । अमुक- विंग्णश्राद्ध । इदमन्नादकादिक । यदतिदक्षयमस्तु । श्रस्तु अक्षय्यम् । (बुद्ध धातिम. ) स्तिया नामगोत्रेण को देयं विलारकम् । मप्येक शिवतीर्थन प्रनाम्यमिदमरतीति ।

। [ ७१ ] प्रोह । अमुकगोत्रस्य । अन्मन्मातामहस्य । अमुक शर्मणः सपत्निकस्य वसुस्वरूपस्य | अमुक पार्वणश्राद्ध । इदमन्नोदकादिकं । यद्दत् । तद- क्षय्यमस्तु । अस्तु । अक्षययम् । अद्येह । अमुकगोत्रस्य । अस्म प्रमातामहस्य । अमुकशर्मणः सपलिकस्य । रुद्रस्वरूपस्य । अमुकपार्वण- श्राद्ध । इदमन्नोदकादिकं । महत्त। तदक्षय्यमस्तु । अस्तु अक्षय्यम् । अद्यह। अमुकगोत्रस्य । अस्मवृद्धप्रमातामहस्य । अमुकामुकशर्मणः सपत्निकस्य । आदित्यस्वरूपस्य । अमुकपार्वणश्राद्ध । इदमन्नोदकादिकं । मद्दत्तं । तदक्षय्यमस्तु । अस्तु । अक्षय्यम् । सव्येन । यवकुश जलमादाय । अद्यहाऽमुकगोत्र । अस्मरिपत्रादिनयनाद्धसम्बन्धिनां । तथाऽमुकगोत्रास्मन्मातामहादिनयश्राद्धसम्बन्धिनां पुरुरवो मानवसंज्ञ कानां । विश्वषांदेवानां अस्मिन् पार्वणश्राद्धं वैश्वदेविककृत्ये । इदमन्नादकादिकम् । यद्दत्तं । तदनय्यमस्तु । अस्तु अक्षय्यम् । इति ततः प्रार्थना शाम्रहणम् । अघोरा पितरः सन्तु । सन्तु । गोत्रन्नो वद्ध ताम् । वद्धताम दातारो नोभिवर्धन्ताम् । वर्द्धन्ताम् । वेदाः वर्धन्ताम् । वर्द्धन्ताम् । सन्तति वद्धताम् । वर्द्ध ताम् श्रद्धाचनो माव्यगमत् । मागाः बहुदेयं च नोस्तु । अस्तु । अन्नञ्च नो वहु भवेत् । भवतु । अतिर्थीश्च लभेमहि । लभध्वम् । याचितारश्च नः। सन्तु । सन्तु । मास्मयाचिम कन्चन । मा याचेथाः। एता एव । आशिपः। सत्या.। सन्तु । सन्तु.। ततः स्वधा वाचनम् + भो ब्राह्मण युष्मदनुज्ञया स्वां वाचयिष्ये । वाच्यताम् । अपसव्येन । स्वधावाचनीयात् श्रीन् कुशान् । पिएडोपरि संस्थाप्य । सजलविलमोटकं गृहीत्वा । अद्य ह। अमुक्नामसम्यत्सरे । दक्षिणायने । शरदतौ। आश्विनमासे । महालयापरपक्ष । कन्यागते । सवितरि। अमुकतिथी। अमुरुगोत्रेभ्योऽस्मपितृभ्योऽमुकशर्मभ्यः । सपत्निकेभ्यो वसु स्वरूपेभ्यः । अमुक पार्वण श्राद्ध । मामण । मधु मधु स्वघोन्यताम् । अस्तु स्वधा' अद्य ह । अमुकगोत्रेभ्यः। अरमपिता. महेभ्यः। अमुशर्मभ्यः । सपलिकेभ्यः । रुद्रास्वरूपेभ्योः ऽमुकपार्वण- श्राद्धे । ब्राह्मणा मधु मधु स्वधोच्यतां । अस्तु स्वधा । अद्य ह । अमुक- गोत्रेभ्योऽस्मत्प्रपितामहेभ्योऽमुकशर्मम्यः । सपत्निकेभ्यः। श्रादित्यस्वरू- पेम्योऽमुफपार्वणश्राद्ध । ब्राह्मणा मधु मघु वयोच्यनां । अस्तु स्वधा। श्रोह। अमुकगोत्रेभ्योऽरमन्मातामहेभ्योऽमुशर्मभ्यः । सपलिकम्यो (गोभिनः ) अघोराः पितरः सवित्ययुक्त स्वघा धानयिष्ये इति पृच्छति । पितृभ्यः खपोच्यतामित्युक्तेऽस्तुत्वधेत्यु च्मानो धारा दद्यात् सर्ज म्वहारिम मिति।

सव्येन । [ ७२ ] रुद्रस्वरूपेभ्यो ऽमुकपार्वणश्राद्धे ब्राह्मणा मधु मधु वधोच्यतां अस्तु स्वधा । अद्यह। अमुकगोत्रेभ्योऽस्मत्प्रमातामहेभ्योऽमुकशर्मभ्यः । स- पत्निकेभ्यो रुद्रस्वरूपेभ्यो ऽमुकपार्वणश्राद्धे ब्राह्मणा मधु मधु स्वघोच्यतां । अस्तु स्वधा । अद्य ह । अमुकगोत्रेभ्योऽस्मद् वृद्धप्रमातामह भ्योऽमुकश. मम्यः । सपत्निकेभ्य आदित्यस्वरूभ्योऽमुकपार्वणश्राद्ध। ब्राह्मणा मधु मधु स्वधीच्यताम् । अस्तु स्वधा । स्वधावाचनीयेप्वपोनिषंचति । ॐ ऊर्ज ब्वहन्तीरमृतं घृतम्पयः कीलालम्परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत मे पितॄन् । दुग्धेनाप्यूर्जकरणमाचारत् । केचिन्मते नीराजनम् । उत्तानं पात्रं कृत्वा + पितरः स्वर्गलोके प्रस्थिता भवन्तु। दक्षिणा- सङ्कल्पः । देयद्रव्यं सम्प्रोक्ष्य पूजन कार्यम् । हिरण्यगर्भ- गर्भस्थ हेमबीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्ति प्रयच्छ मे। अद्य ह । अमुकसंम्वत्सरे। अमुकायने । अनुकौ । अमुकमासे । अमुक- पक्षे । अमुकतिथी । अमुकतिथी । अमुकगोत्रोत्पन्नः । अमुकराशि । अमुकशमहिं । अमुक गोत्राणाम् । अस्मपितृ पितामह प्रपिताम- हानां । अमुकामुकशमणाम् । सपत्निकानाम् । वसुरुद्रादित्यस्वरू पाणाम् । तथामुकगोत्रणाम् । अरमन्मातामहप्रमातामहवृद्धप्रमाताम- हानाम् । अमुकामुकशर्मणाम् । सपत्निकानां । वसुमद्रादि यस्वरू- पाणाम् । अक्षयतृप्तिप्राप्त्यर्थ । पुरूरवोमाद्रवसंज्ञक यिश्वेदेवापूर्वकं । कृतस्यास्य अमुकपार्वणश्राद्धकर्मणः । साधु गुण्यार्थम् । इदं रजतं । सोमदेवतं रजतनिष्क्रयिणी दक्षिणाम । या श्रद्धभोक्तृभ्याब्राह्मणऽन्ये. भ्योऽपि दातुमुत्सृजे। ॐतत्सन्नमम् । पुनः सुवर्ण संम्पोक्ष्य । हिरण्य- गर्भगर्भस्थं हेमबीज विमानसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्ति प्रयच्छ मे। इति संम्पूज्य । ययकुशानादाय । अद्य है । अमुकगोत्राऽ. स्मत्पित्रादित्रयश्राद्धसम्बन्धिनां । तथामुकगोत्रास्मन्मातामहादित्रयश्राद्ध- सम्बन्धिनां । पुरुरवोमाईवसंज्ञकानां । विश्वेषां देवानां प्रीतये। वैश्वदेविक कर्मणः । साधुगुण्यार्थम् । इद मुवर्णअग्निदेवतम् । मनसोपदिष्टां दक्षिणां वा प्रामणेग्यो दामुत्सृजे । ॐ तत्मन्न मम । स्वस्ति भवन्तो ध्रुवन्तु । स्वस्तीति विप्रोक्तिः । विश्वेदेवाः श्रीयन्ताम् । ति महीति । विश्वदेव प्राक्षणा ध्योषणा प्रीयंतां यो विसेदेवाः स्वविजक सत्यानुष्टानसम्पन्नाः । सर्वदा यायुद्धयः ।। पिन (नागलपडे ) उत्तान मध्यवाचस्तु कृत्वा दद्याच्च दक्षिणम् । हिर. पपन्द्रेवढानांचपिनया रमतन्तपा (कालिकापामानार्यः) दद्यायचोपवीत्यै यताम्बूलं ददिया तथा [ ५३ ] मातृपरश्चैव ॥ संत्वस्मत् कुलजा नराः ॥ अक्षताः पान्तु ॥ अशी- ग्रहणमितिब्राह्मणार्पणपुष्पाणि सङ गृह्य ॥ विशेषपूजनं ॥ सव्येनैव ॥ पितृभ्यः ॥ स्वाधायिभ्य इति ।। आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यन्न णां प्रीताः पितामहाः । आयुःपुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्तिम्पुष्टि बलं श्रियम् । पशून् सुखं धनं धान्यं प्राप्नुयां पितृपूजनात् । ततोऽपसव्येन । पितामहपिण्डमुत्थाप्य । सव्येनानाय । पात्रान्तरे निधाय । पिण्डस्थाने शङ्खचक्रादिकं. लिखित्वा । गन्धपुष्पाक्षतैः ॥ पड्ऋतन्पूजयेत् । पिण्डस्थाने अत्रनमः सुखन्ध । अक्षताः पुष्पाणि ) सव्येन । तत्र दीपं संस्थाप्य । ॐ बसन्तायनमः । ॐ ग्रीष्माय नमः । ॐ वर्षाभ्यो नमः । ॐ शरदे नमः । ॐ हेमन्ताय नमः । ॐ शिशिराय नमः । हस्तौसं हतौ कृत्वा । यान्तु पितृगणाः सर्वेयस्मात् स्थानादुय गताः। सर्वने हृष्टमनसः सर्वकाम- प्रपूरकाः । ये लोगा दानशीलनां ये लोकाः पुण्यकर्मणाम् । सम्पूर्णन सर्वभोगैस्तु तान्ब्रजध्वं सुप्पुकलान् । इहास्माकं शिवं शान्तिरायुरारोग्य. संपदः। वृद्धिः सन्तानवर्गस्य जायतामुत्तरोत्तरा । दीपस्थाने दीपः अपसव्येन । पिण्डस्थाने पिण्डः । असंचर मभ्युक्ष्य कुर्यात् । यः कश्चित् रितृरूपेण तिष्ठते परमेश्वरः। सोऽयं श्राद्धप्रदानेन तृप्ति लभतु शाश्वतीम् । गयायां पतृरूपेण स्वयमेको जनार्दनः । यं दृष्ट्वा पुण्डरी- काक्ष मुच्यते च ऋणत्रयात् । पञ्चक्रोशं गयाक्षेत्र कोशमेकं गया- शिरः। यत्र यत्र · स्मरिष्यामि पितृ णान्दत्तमक्षयम् । शमीपत्र- प्रमाणेन पिण्डन्दद्याद्गयाशिरे । उद्धरेत्सप्त गोत्राणां कुलमेकोत्तरं शतमम् । पितुः शतगुण पुण्यं सहस्रं मातुरुच्यते । भगिन्यां शतसादनं सोदय्ये दत्तमक्षयम् । सन्येन । अद्य दिने अपरमपित्रामं पचं हिरण्यं उदयास्तमयपर्षन्तं यद्दत्तं यद्दास्ये । तत् स्वर्गद्वारे । अमृतीभूयवः स्वधा । देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः३। सप्त व्याधा दशाणेपुमृगाः कालंजरे गिरौं । चक्रवाकाः सरद्वीपे हंसाः सरति मानसे । तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ । श्राद्ध- काले गयां ध्यात्वा ध्यात्वा देवं गदाधरम् । मनसा च पिन, ध्यात्वा । ततोऽपसव्येन । अद्य हेत्यायुच्चार्य अमुकगोत्राणाभस्मपितृपितामह प्रपितामहानाम् । अमुकानुकगोत्राणां सपलिकानां। वसुरुद्रादित्यस्त्र- रूपाणां । तथा अमुकगोत्राण । अस्मन्मातामह । प्रमातामह । वृद्ध- प्रमाततामहानां अमुकामुकशर्मणां सपत्निकानां । वसुभद्रादित्य- स्वरूपाणां । अक्षयतृप्त्यर्थं पुरूरवीमावसंज्ञक । विश्वेदेद्रवपूर्वकं । ।

[ ७४ ] अपिण्डसहित । अमुक्पार्वणश्राद्ध । विसृजे। सव्यम् । इदममुक पानणश्राद्ध । विधिनीन | कालहीन । वाक्यहीन । श्रद्धाहीन । दक्षिणा हीन । यत् कृत । वत् रुस्तमस्तु । प्रमादाल्लोभाद्भयाद्वा यन्नवृत्त । तत् श्रीभगवद्विष्णो ब्राह्मणवचनात् । स परिपूर्णमस्तु । अस्तु परिपूर्णम् । कुशेन विप्रस्पर्श । पितृव्राह्मए पूर्वरम् । ब्राह्मणानुस्थापयेत् । पितृमाता महब्राह्मणयोरपमन्यनोत्थापनम् । सव्येन । वैश्वदैविक्ब्राह्मणस्य । ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तरत्वेमहे । उपप्रयन्तु मरत सुदानवऽइन्द्रा शुभासचा । इति । ब्राह्मणानुत्थाप्य पात्रान्तरे निभाय । ॐ व्वाजेवा जेवतम्याजिनो नोनधनेषु विप्राऽमृताऽतज्ञा अस्यमध्व पियत मादय ध्यतृप्तायातपथिभिर्देवयान । इति विसृज्य 9 कर्मपान गृहीत्वा श्राभानाजस्येत्यनुमन्य । प्रदक्षिणीकरणम् । ॐ श्रामा वाजस्यसको जगम्यानमे द्यावापृथिवीविश्वरूपे । श्रमागताम्पितरामातराचामासो मोऽमृतत्वेनगम्यात् । इत्यनुव्रज्य । प्रदक्षियीकृत्य । नमस्कुर्यात् । कर्मपात्र विप्रपादामे निनीय । अपसव्येन । नौवीं विस्य । पाणिना दीप निर्वाप्य । गीन् समुद्रान् समसपन् स्वर्गान्पाम्पति पराइष्टकानाम् । पुरोपञ्चसान सुस्यलोके वर गच्च यत्र पूर्व परता सव्यं विधायाचम्य । हस्ने जल गृहीत्वा । यस्य स्मृत्या घ नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु न्यून सम्पूर्णता याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् । ॐ अच्युताय नम ३ । चतुभिश्च २ द्वाभ्या पचभिरेव च हयते च पुनद्वाभ्या तस्मै यज्ञात्मने नम ॥ प्रमादाकुर्वता र्म प्रच्यताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव ताद्विष्णो सम्पूर्ण प्यादिति श्रुति ॥ अद्य मे सफल जन्म अद्य मे सफलं सप । अद्य मे गात्रा सर्ने याता वैनुग्रहादियम् ।। पनशासादि दाने। फ्लेशिता यूयमीरश । तत्क्लेशमिह संपात विस्मृत्य तन्तुमर्दय । भूतोस्तोग्रजय त्यवत्वापिएडापाणं च दक्षिणाम् । श्राहार्म स्वागतं चाय विना च परियेपणम् ॥ विसर्जनसीमनस्य माशिषप्राधन तथा 1 पिन्यमन्याय प्राचीनावानिना सदा ॥ देवपूर्वमिद श्राद्ध पितपूरिसन्नम् । सर्वकर्मापसव्येन दक्षिणा नवतितम् ।। इति ।। गुप्तकाशी गुप्नदान प्रयोग गणारया पुरावृत्तं तीर्थस्थापचा गुमा। 'पश्यनायनिवामरूप (पारम्प) SITA अपनराप यिमनया (प्रा) मायापत्त त्या पियपिमर्जनम् । (आदत प्रामात गाय पटना घमरदिप -- [ ७५ ] लोकमङ्गलदायकम् ॥ १ ॥ कर्णयामि समासेन सावधानेन वै शृणु । यच्छ वा सर्वपापानि विलय यान्ति यात्रिणम् ॥ २॥ पुराणवचन चेत्य शिवाराधनमानस ॥ सिद्धस्त स्थापनं पूर्व कृत सिद्धाश्रम तत ॥३॥ केचिद्वदन्त्याधुनिमा विश्वनाथस्य सङ्गते । यदा यवनरानोऽसौ काशी गन्तु प्रचक्रमे ॥ ४॥ तदानान्तहितो देवो गुप्तकाशी तत स्मृता । न चेत्त द्विना शक्य स्थानारयान भवेदिदम् ॥ ५॥ कुन्तलश्यामलो मन्ये विनाख्यानेन वै कथम् । न वा पूर्वप्रणीतेषु ग्रन्थेवित्यपि दृश्यते ॥६॥ तस्मान्मन्ये शङ्करेण गगायमुनयोरिह । गुप्ति रूप सुविज्ञाय यदा कृत्वा च मन्दिरम् ॥ ७॥ प्रतिनष्ठाप्य व भूगाथ तदारयायि ततस्विदम् । अन्यथा पूर्वप्रन्थेषु कथ नाम न दृश्यते ॥८॥ स्थानमासाह्य लोकेन धामिकेण तथाविध । गुप्तदान च कर्त्तव्य यथाविभवनिस्तरै ॥४॥ स्वर्ण बासु निस्तैनारिकेलादिभि फलै । गुप्तदान प्रकर्तव्य यानासफल मानसै ॥ १० ॥ श्रादौ कायिकशुद्धयर्थ धेनुदानमपि फलम् । चोत्तम मुनिभि प्रोक्त सर्वदा शुभकर्मणि ॥ ११ ॥ एव कृत्वैर यात्रार्थी समा राध्य च विश्वपम् । ययादेवं ततो द्रः केदार बरौं तव ॥ १२॥ एव कृत्वैय यात्रार्थी केदारे लभते शिवम् । निर्धूय सर्वपापानि कृपया शङ्करस्य च ॥ १३ ॥ तवो गुप्तदानकर्ता यानार्थी (र्थिनी वा) सामग्री (१) सम्यक सम्पाद्य प्रत्यूपे च तत्र गङ्गायमुनयोर्धाराद्वयेन पूजनपूव क सकल्पस्नान कुर्यात् । शुद्धवस्त्र परिधाय श्रीविश्वनाथाय नम नम केदारेश्वराय नदरीश्वराय चेति नमस्कृत्य मन्दिरप्रागण एपोपविश्व तीय पुरोहिताहय्य विष्णु ३ निराचम्य सिद्धम् ३ ॐ अपवित्र पवित्रो वा सर्वावस्या गतोऽपि वा । य स्मरेत्पुएरीकाक्ष स गद्याभ्यन्तर शुचि ॥ इत्यनेन वामहस्तनलमभिमन्य शिरसि निक्षिपेत् । ॐ अपसर्पन्त ते भूता ये भूता भूमिसस्थिता । येभूता विघ्न रस्ते नश्यन्तु शिराज्ञया । इति भूत शुद्धिं सविधाय । अस्य श्री आसनमन्त्रस्य मेरा ऋषि मुतल ध. कूर्मो देवता प्रसने विनियोग । ॐ हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकश्यपुर्मही तत्या हिरण्या दापय सत्या अकर नम । इत्यक्तान ॐ भूर्भुव व पृथ्वि १ इहागच्छेह तिट पाद्यागीनि ममर्पयामि पृथिये नम सम्पूच । ॐ पृष्वि त्वया धृता लोका रवि व विगुना धृता व च धारय मा मद्रे पवित्र कुरु घासनम् ॥ इति साम्प्रयं जलपूनन पूर्वक सूर्य पूरयेत् यतो गणपतिं नमम्मय च शरीरशुद्धयर्थ गोदान [1] माममी मुवरा, रजत, वारदुन गाना, धनी, मामा, स्वएंगत्र सदभाव रजत, वदमारे स्पराष, अमार ताम्राष, ग पुष्ादि ।

[ ७६ ] कुर्यान् अथवा गोप्रत्याम्नायीभूरं द्रव्यं तीर्थपुरोहिताय दत्त्वा तत्कुर्यात् । ततो गुप्तदानसामग्री पाद्यगन्धाक्षतपुष्पधूपादिभिस्तत्तन्मन्त्रोच्चारणपूर्व के ममर्प सङ्कल्पं कुर्यात्-ॐ नम परमात्मने पुराणपुरुषोत्तमाय श्री- मद्भगवतो महापुम्पस्य विष्णोराजग प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहरार्धे श्रीरयेतवाराहस्ल्पे वैवस्वतमन्यन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्टे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गतगुप्तवागणस्या क्षेने हिमवत्पर्व तैरदेशे केदारसण्टान्तगतसुमेरुद्रदक्षिणपात्रे म दा. मिन्यास्तटे समीपे वा पष्टिसंवत्मराणा मध्येऽमुफनाम्नि संवत्सरे अमुका. यनेऽमुकतो अमुकमासे पक्षे तिथी वारे नक्षत्रे योगे च अमुराशि- स्थिते सूर्य चन्द्र भीमे बुधे गुरौ शुक्रे शनी रादौ केती एव गुण वशे- परणविशिष्टाना तिथी-अमुक्गोत्रोत्पन्न अमुकराशि अमुकये दाध्य यी अमुकवेदशास्त्राप्रवरसूतादिभियु त अमुकपुनो कपोतोऽमुरदेशग्राम- वास्तव्योऽहं अमुकशर्मा वर्मा वा गुप्तो वा श्रीकेदारबदरीश्वदादि देवदर्शनार्थी यात्री ममात्मन सम्लदुरितोपशमनार्थ तथेह जन्मनि जन्मान्तरे वा कृतकायिकमानसिमवाचिक्पापनिवारणाय विविधता- पोपशमनार्थ श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तसत्फलावाप्तये सूर्यादिनवग्रहजनितसर्ग- रिणनित्तये राजद्वारे समादिपु सर्वत्र विजयहदिमनोवाञ्छितप्राप्तये पुत्रपौत्रादिआयुरारोग्यनाभाय च धनधान्यादिममृद्धये श्रीकेदारपदरीवर- घ्योत्तरायण्डयातायामस्याम गुप्तवागणस्यान्चान यात्रा सफ्लीकरणाय गुप्तहानरूपेणेद हिरण्यमग्निदेवत्यं रजतं चन्द्रदेवतं ताम्रमदैवतं विष्णु देवनं वा कारयन्तीशदेवत्यं नारिकेलं वनस्पतिदेवयं वनादिक तत्त देवत्य अमुम्पुरोहिताय तुभ्य सम्प्रदः इति संकल्प्य तदानं वन्य नीर्थपुरोहिताय दत्वा तदाशीवचनं मोभिषे लन्या च विश्वनाथ पोशोपचारे पञ्चोपचारैयां मम्पूज्य भक्त्या प्रणम्य क्षमा याचयेन् त्रि परिक्रमेन्चेति शुमम । इति गुप्तदान । प्रयोगविधि अत्र शय्यादानकरणमपि मामलम् । अत शय्या- दानधरणार्षिभिर्यागभिस्त प्रयोगविग्रिस्यामेर पद्धनी अन्यारलोक नीय इति । अश शियाथर्वशीपम् । शिर पनि) ॐदया ये ग्यगलोषमार्यम्मे रमन्न ती मयानिनि । मोहमयीनामे प्रथममामामामि का [ ७ ] कश्चिन्मत्तो व्यतिरिक्त इति । सोऽन्तरादन्तर प्राविशत्सोऽह नित्यनित्यो व्यक्ताव्यक्तो ब्रह्माब्रह्माह प्राञ्च प्रत्यञ्चोऽह दक्षिणाञ्च उदचोऽहम धम्चोर्ध्वश्चाह दिशश्च प्रतिदिशश्चाह पुमानपुमान स्त्रियश्चाह साविन्यह गाय यह विष्णु यूजगत्यनुष्टुपचाह छन्दोऽह सत्योऽह गार्हपत्यो दक्षिणाग्निराहवनीयोऽह गारह गौर्यह मृगह यजुरह सामाहमथर्वागि रसोऽह ज्येष्टोऽह श्रेष्ठोऽह बारिष्टोऽहमापोऽह तेजोऽह गुह्योऽहमरण्योs हमक्षरमह क्षरमह पुष्करमह पवित्रमहमुमञ्च वलिश्न पुस्ताज्ज्योति रित्यहमेव सर्वेभ्यो मामेव स सर्व समो यो मा वेद स देवान वेद सीच वेदान् साझा नपि ब्रह्मनाह्मणैश्च गा गोभिर्बाह्यणान् ब्राह्मणेन हनिह विपा अत्युरायुषा सत्य सत्येन धर्मेण धर्म तर्पयामि न तेनसा। ततोह वे ते देवा रद्रमप्रच्छन् ते देवा रुद्रमपश्यन् ते देया रुद्रमध्ययान् ते देवा ऊध्यवाहवो रुद्र स्तुवन्ति ॥ १ ॥ ॐ यो 4 रुद्र स भगवान् यश्च ब्रह्मा तस्मै नमो नम ॥१॥ ॐ यो व भगवाद् यर विष्णी तस्मै वे नमो नम ॥२॥ ॐ यो वे रद स भगवान् यश्च स्कन्दस्तस्मै ये नमो नम ॥ ३ ॥ ॐ याचे न्द्र स भगवान यश्चेन्द्र स्तस्मैः ॥ ४॥ यो वै रुः स भगरान याग्निस्तस्मै० ॥ यो वै रुद्र स भगवान् यश्च वायुस्तस्मै० ॥ ६ ॥ यो वे न्द्र म भगवान यश्च सूर्यस्तरमैः ॥ ७ ॥ यो वे न्द्र स भगवान यश्च मोम स्तस्मै० ॥८॥ यो वै द स भगवान् येऽष्टी ग्रहास्तम्मैः ॥ ॥ यो वेन्द्र स भगवान् चाष्ट्री प्रतिग्राम्तस्मै- || 10॥ या 4 रद म भगवान यश्च भूस्तम्मैः ॥ ११ ॥ यो वै रुद्र म भगवान् यन्य भुवस्तस्मैः ॥ १२ ॥ यो चै स्द्र स भगवान् या स्वस्तम्म- ॥ १३ ॥ यो वै रुद्र स भगवान् यच्च महम्तस्मैः ॥ १४ ॥ यो द म भगवान् या च पृथिवी तस्मैः ॥१५॥ यो वै न्द्र म भगरान यच्चान्तरिक्ष ॥ या ये मंद्र म भगवान् या च चौस्तम्मै०॥।॥ योघे न्द्र म भगवान् याश्चापम्तस्मैः ॥ १८॥ यो न्द्र म भगवान यश तेनम्तम् ॥१॥ यो ये न्द्र म भरवान् यरन पालगम्मै. ॥२०॥ यो वे 12 म भगवान् यरर यमम्नम्मैः ॥ २१ ॥ या ये ग्र म भगवान यरच मृत्युस्तस्मै !॥ २२ ॥ यो ये रुद्र स भगवान् य रमने स्तम्भ ॥२३॥ यो ये मद्र स भगवान यन्गकाश मम्मः ॥५॥ यो रुद्र स भगवान् यन्ध रिच सौ ॥ ५॥ यो ये र म भगवान यस म्यूले सम्म० ॥ ६॥ यो ये राम भगगन यग्य मूम नम्।। ..॥ गायेर म मायान य-पराल सम्म ॥२॥ याद म भगवान यप मम्मे || यार म मगरान याम ।

[ stj रत्न तस्मै० ॥ ३० ॥ यो वै नद्र स भगवान् यच्च सत्य तस्मै० ॥ ३१ ॥ यो चै रद्र स भगवान यच्च सर्व तस्मैः ॥ ३२ ॥ २ ॥ भूस्ते प्रादि- मध्य भुरस्ने खस्ते शीर्ष विस्वरूपोऽसि नहाँ कस्त्व द्विधाविया वृद्धिस्त्य शान्तिस्त्व पुष्टित्व हुतमत्त दत्तमदत्त सर्वभसर्व विश्वमविर कृत- महत परमपर परायणाश्च त्वम् । अपामसोमममृता अभूमा गन्म ज्योति रविदाम देवान । किं नूनमस्मान् कृण्वदराति किमु धूतिरमृत मर्त्यस्य सोमसूर्य परस्तारसूक्ष्म पुरुष । सर्व जगद्विन या एतदक्षर प्राजापत्य सौर्य सूर्म पुरुष प्राहामायण मात्र भावेश सौम्य सौम्येन सूक्ष्म सूक्ष्मेण वायव्य वायव्येन असति तस्मै महापासाय वै नमो नम । द्वादिस्था देवता सर्ग हदि प्राणा प्रतिष्ठिता । हदि त्वमसि यो नित्य तिम्रो मात्रा परस्तु म । तत्योत्तरत शिरो दक्षिणत पादौ य उत्तरत म प्रोङ्कार य अोझार स प्रणय य प्रणय स सर्वव्यापी | मर्यव्यापी सोऽनन्त योऽनन्तस्तत्तारं यत्तार तच्छल यच्छला उत्सूदन यामूक्ष्म तद्वद्युत यद्युत तत्पर ब्रह्म यत् पर ब्रह्म स एक य एक स रुद्र यो रुद स ईशान य ईशान स भगवान् महेश्वर ।।३।। अथ करमादुच्यते ओकार । यस्मादुचायमाण पत्र प्राणानू_मुकामयति तस्मादुच्यते ओंकार । अथ करमादुच्यते प्रणन । यस्मादुचाय॑माण एव ऋग्यजु सामाथर्वाङ्गिरस ब्रहानामणेभ्य प्रणामयति मामयति च तस्मादुच्यते प्रणय । श्रथ कस्मादुच्यते सर्वव्यापी । यस्मादुच्चायंमाण एव यथा नेहन पललपिएडमिर शान्तरूपमोतप्रोतमनुप्राप्तो व्यतिसप्तश्च नरमा दुच्यते सर्वव्यापी। श्रथ कम्मादुच्यतेऽनन्त । यस्मादुजार्यमाण एव तीथंगूध मघस्लामवाम्यान्तो नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽनन्त । अध स्मा दुच्यते तार । यस्मादुच्चार्यमाण एव गर्भजन्मव्याधिजरामरणसंसार. महाभयात्तारयति त्रायते च तस्मादुच्यते तारम् । अथ परमादम्यते शुम्ल । यस्मादुच्चार्यमाण एवं क्लन्दते क्लाभयति ध ठस्मादुच्यते शुक्नम् । अथ परमादुच्यते सूक्ष्म । यस्या दुच्चार्यमाण एन मूल भूत्या शरीराण्यधितिष्ठति सर्याणि चाहान्याममृश्यति तस्मादुच्यते मूक्ष्मप् । अथ परमादुच्यते बचतम । यग्मा टुच्चार्यमाण पय व्या महति समसि द्योतयति तस्मा दुच्यते पंधुतम् । पम्मान्यते पर यस्मात् पच्य पृश्यनि नरमायने अथ कामाच्यते एक सथान प्राणन सम्मतगोनान मसृजति विरजति वीर्य के प्रति वीर्यमैके दतिया प्रन्याय गस्थ प्रायोऽभिनतमस्येके नया मामिद सतिसाई परमपर पराय त्या मम्भदय [ ] स एकोऽभूदन्तश्चरति प्रजानां तस्मादुच्यते एकः। अथ कस्मादुच्यते रुद्रः। अथ कस्मादुच्यते ईशानः यः सर्यान्देवा २ । नीशते ईशानी- भिर्जननीभिश्च शक्तिभिः । अभिवा शूर नो नुमो दुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वदशमीशानमिन्द्रतस्थुप इति तस्मादुच्यते ईशानः । अय कस्मादुक्यते भगवान् महेश्वरः । यस्माद्भक्तान ज्ञानेन• भजत्यनुगृह - रणानि च वाचं संसृजति विसृजति च सवान् भावान् परित्यज्यात्म ज्ञानेन योगैश्वर्येण महति महीयते तस्मादुच्यते भगवान् महेश्वरः । तदेतद्रचरितम् ॥४॥ एपोह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः पुर्वोह जातः स उ गर्भ अन्तः स एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ जना तिष्ठति सर्वतोमुरतः । एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै य इमल्लोकानीशत् ईशनीभिः । प्रत्यङ जना तिष्ठति चान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोत्ता ।। यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको येनेदं सर्व विचरति सर्वम । तमीशानं वरदं देवमीड्यंनिचाय्ये मां शाम्तिमत्यन्तमेति । क्षमा हित्या हेतुजालस्य मूलं बुद्धया सञ्चितं स्थापयित्वा तुरुद्रे । मद्रमेकत्वमाहुः शाश्वतं वै पुराणमिपमुर्जेण पशवोनुनायन्तं मृत्यु- पाशान् । तदेतेनात्मन्ने तेनार्घचतुर्थेन मात्रेण शान्ति संसृजति पशु- पाशविमोसणं या सा प्रथमा माम्ना ब्रह्मदेवत्या रक्तावर्णेन यम्तां ध्यायते नित्यम् स गच्छेद ब्रहापदम् । या सा द्वितीया । मात्रा विष्णुदेवत्त्या कृष्णवर्णेन यस्तां ध्यायते नित्यम् ल गच्छेघणवं पदम् । या मा तृतीया मात्रा ईशानदेवत्या कपिलावणेन यस्तां ध्यायते नित्यम् स गच्छेदेशानं पदम् । या सार्घचतुर्थी मात्रा सर्वदेवत्याऽव्यक्तीभूता सं विचरविशुद्धा स्फटिकसन्निभवणेन यस्तां, ध्यायते नित्यम् स गच्छेत्पदमनामयम् । तदे तंदुपासीव मुनयो वाग्वदन्ति न वस्य प्रहणमयं पन्था विहित उत्तरेग्ण येन देवा यान्ति येन पितरो येन पयः परमपरं परायण चेति । वालामहमानं हृदस्य मध्ये विश्वदेवं जातरूपं यरेण्यम् । वमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास्नेषां शान्तिभवति नेतरेपाम । यस्मिन् क्रोधं याच तृष्णां क्षमा चाक्षमां हित्वा हेतुनालस्य मूल । युद्धरा मनियत स्थाप- यित्वा तु र रुद्रमेस्त्वमाहुः रुद्रो हि शाश्यतेन वेर्ने पुराणे नेपमूर्जेण तपमा नियन्ताग्निरिति मम्म यायुरिति भाम जनमिति मम्म व्योमेति भन्म मयं या इदं भन्म मन एनानि पनुषि यन्नादानमिदं पाशुपतं यदम्म । नानानि महरोत् यस्माद ग्रह गाय ॥५॥ योऽग्नी मटोयोऽप्यन्वर्य योपपीपीगर आदि य इमा बिरवामुग्नानि पम्लपे तम्मै रुद्राय नमोऽन्यग्नये । योन्नोऽ. नोयो होऽप्यन्नों मह प्रोग्धीगिय चाविश। यो रुद्र दमा वनव्यागुपतं पशुपाशविमो- । [ ८० ] विश्वा भुवनानि चक्ल पे तम्मै रुद्राय वै नमो नमः ।। यी रुषोऽप्मु यो रुद्र श्रीपवीपु यो द्रो वनस्पतिपु । येन गद्रेण जगद्ध धारित पृथिवी द्विधा त्रिधा धा धारिता नागा येन्तरिक्षतस्मै रुद्राय यै नमो नमः । मूनिमस्य संसव्य प्यथर्वा हृदयश्च यत् । मस्तिप्कादूर्व प्रेरयत्यय मानोऽधिशीर्पतः । तद्वा मथव शिरो देवकोशः समुजित । तत् प्राणोऽभिरक्षति शिरोऽन्तमथो मनः । न च दिवो देवजनेत गुप्ता नचान्तरिनाणि न च भूम इमाः | यस्मिन्निदं सर्वमोतप्रोत तस्मादन्यन्न परं किञ्च नास्ति । न 'तम्मात्पूर्व न परं तदस्ति न भूतं नोत भव्यं यदासीत् । सहस्रपादे कमू| व्याप्तं स ए वेढमावरीवर्ति भूनम । अतरान् सज्ञायते कालः कालात् व्यापक उच्यते । ध्यापको हि भगवान् रुद्रो भोगायमानो यदा शेते मद्रग्नदा सहार्यते प्रजाः। जच्छ : वमिते नमो भवति तमस श्रापोऽश्वगु ल्या मथिते मथितं शिशिरे शिशिर मध्ययमानं फेनं भवति फेना दण्डं भवत्यएडाद्वह्मा भवति ब्रह्मणो वायुः वायोरोकारः श्रोङ्कारात्मावित्री माविच्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति । अर्चयन्ति तप. मन्यं मधु क्षरन्ति यधनु वम । एतद्धि परमं यपः । श्रापो ज्योति रमोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों नम इति ॥ ६॥ य इदमथव शिरो श्रामगोऽयीने । अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति । अनुपनीत उपनीतो भवति । मोऽग्निपुतो भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूनो भवति । म सोमपूतो भवति । स सत्यपूतो भवति । स सर्वेदातो मानि । म सचिंदेरनुध्यातो भवति । स सत्रेषु तथेषु स्नातो भवति । तेन मौः कनुमिरि भवति । गायच्या पष्टिमा नागि जातानि भवन्ति । प्राणानामयुत जप्तं भानि । स चतुपः पडिक पुनाति । श्रामप्तमात. पुरुपयुगान्पुनातील्या भगवानथर्वशीर. मानव शुचिः स पूनः पर्मण्या मावि द्विनीयं उपवा गणाधिपत्यमवाप्नोति । तृतीयं जप्वैव. मेगानु प्रविशत्यो शत्यो मत्यमा मध्यमों मत्यम ।। इति !! अथ शिवापर घनमापनस्तोत्रम् । प्रय कमंप्रमंगायलयति फनुपं मानी स्थित माविष्मूया. मेगमय परययनि नितरां जाठरो जान्यता 11 या ना दु:य व्यय- गति निरागस्थने देन 'संतों मेऽपराघ. शिष शिष शिय भी श्रीमादय नमो ॥१॥ यी मानियामममितय पुः स्तन्यपाने पिमा नोगरयरचभियग्यो मवगण जनिमा जनयी मां नुदति ॥ नाना- गंगास्दिानरपराः गं न मामि संध्या में [ ८१ ] शिव ३ भी श्रीमहादेव शंभो ॥२॥ प्रौढ़ोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसंघी दष्टो नष्टो विवेकः सुतधनयुवति स्वाधु सौख्ये निष- एणः ॥ शैवी चिंताविहीनं मम हृदयमहो मनग धिरूड क्षतव्यो मेऽप- राधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव शम्भो ॥३॥ वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विनतगतिमतिश्चाधिदेवाधितापैः पापै रोगैवियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौदि- होनं च दीनम् ।। मिथ्या मोहाभिलापैर्ऋमति मम मनो धूर्जटेनिशून्य तंतव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिन ||४|| नो शस्यं स्मार्तकर्मप्रतिपद गहन प्रत्यवायाकुलाख्यं श्रोते वार्ता कथमें द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गे सुगरे । ज्ञातो धर्मो विचारैः श्रवणमननयोः किं निधिध्यासितव्यं चन्त- व्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव० ||शा स्नात्वा प्रत्यूपकाले स्नपनविधि- कृते नाहतं गांगतोयं पूजार्थं वा कदाचिद्वहुतरगहनात्सण्डविल्बीदलानि ॥ नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पैस्त्वदर्थ इंतव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव० ॥६॥ दुग्धैर्मध्याज्ययुक्तर्द घिसितमहितः स्नापित नैव लिंग नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितं पूजितं न प्रसूनैः ॥ धूपः कपूर- दोपैविविधरमयुत व थक्ष्योपहारैः क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव० ॥७॥ ध्यात्वा चित्ते शिवारयप्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो हव्यं ते लक्षसंख्ये हुतवहवदने नापितं बीजमत्रैः ॥ नो तप्तं गांगतीरे प्रवजपनियमै रुद्र- जाप्यन वेदैः क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव० ॥ स्थित्या स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुण्डले सूक्ष्ममार्गे शान्ति स्वान्ते प्रलीने प्रकटित विभवे ज्योतिरूपे पराख्ये ! लिंगझे ब्रह्मवाक्ये सकल तनुगतं शकरं न श्मरामि क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव० ॥६॥ नग्नो निःसगशुद्धस्निगुण- विरहितो मस्तमोहांधकारो नासाने न्यस्तदृष्टिविदितमवगुणो नैव दृष्टः पदाचित् ॥ उन्मन्यावस्यया त्वां विगतकलिमलं शकरः न स्मरामि सन्तव्यो मेऽपराधः शिरः ॥१०॥ पन्द्रोद्भासिनसेसरे स्महरे गंगाधरे शङ्करे सर्पभूपिचकंठकर्णविवरे नेन्द्रोस्थ वै वानरे ॥ दंतित्यं तमुन्दगं. यरधरे ग्रेजोमयसारे हरे मोतार्य युर चित्तवृत्तिमन्विलामन्यन्नु क फर्मभिः ॥११॥ कि यानेन धनेन याजिरिभिः प्राप्नेन राज्येन किं किया पुत्र लामिप्रपाभिन गेन मि ॥ सात्वनमभंगर मपदिरे त्याज्यं मनो दूरनः स्वात्मार्थ गुरुयास्यतो मतपत भीपार्यतीवलमम्॥१॥ प्रायुनंश्यति पश्यतां प्रतिदिनं यानि तय योयना प्रत्यायान्ति गाः पुनर्न दिसाः माना जगतरुः ॥ लक्ष्मीस्तीयारंगभगवपला विधुच्चन जीवि सम्माच्चां शरणागर्न रापुरत्वं रस रसाधुनाः ॥१३॥ करपर- पतं धारकाय कर्म वा पर नयन वा मानम याऽपराधम । विहित- मविदितं या ममेरसमस्य जय जय रामनाये श्री माय नमो [ २ ] श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं' शिवापराधक्षमापनस्तोत्रं ॥४०॥ इति सम्पूर्णम् ।। अथ प्राणप्रतिष्ठा: . अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य । ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः'। ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि । जगत्सृष्टिः प्राणशक्तिर्देवता । श्रां बीजम् । ह्रीं शक्तिः । क्रों कीलकम् । प्राणप्रतिष्ठापने विनयोग-ॐ'ब्रह्मविष्णु- महेश्वरपिभ्यो नमः शिरसि । मृग्यजुःसामच्छन्दोग्यो नमः -मुखे। जगत्सृष्टय प्राणशक्त्यै नम.-- हृदये। आँ बीजाय नमः लिङ्ग । ह्रीं शक्तये नमः-पादयोः । क्रों कीलकाय नमः-सर्वाङ्गपु । एवं न्यास कृत्वा । ॐ श्र, के, सं, गं, घ, #, ऑ-पृथिव्यप्तेजोयाय्याकाशात्मने- अडगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ई, च, छ, ज, झ, ड, ई-शब्दस्पर्शरूपरस- गन्यात्मने वर्जनीभ्यां नमः । ॐ उ, ट, ठ, ड, ढ, णं, ॐ त्वचक्षुः- श्रोत्राजिहाघाणाऽत्मने मध्य माभ्यां नमः । ॐ ६, तं, थ, द, ध, नं, ऐं वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मने 'अनामिकाभ्यां नमः । ॐ श्री, प, फं, वं. भ, में, औं, वचनादानगमनानन्दविसर्गात्मने नमः । कनिष्ठिकाभ्यां- नमः । ॐ अं, य, र, ल, व, श, पं, सं, ह, क्ष, श्र:-मनोबुद्धयहवारचित्त- विज्ञानाऽत्मने करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादि । (नामेरारभ्य पादन्तिम् । श्राँ, इति, पोशयोजम् । हृदयाहारम्य नाभ्यन्तं की, इति, शक्तिबीजम् । ( मस्तकादारम्य हृदयान्तम् 'की' इति, अष्टंपुशंवीजमन्य- मेन् ॥ अथध्यानम्म्मोधिस्यपोतोलसदंरेणसरोजाधिरूढाकरा. ब्जे. पार्श कोदण्डरिसूइचमथ गुणमत्या युश पञ्च वाणान विध्राणा- पागले त्रिनयनलसिना पीनवक्षोरहान्यो देयों बालार्कयो मस्तु मुम्बकरो प्राणशक्षिः परा नः॥ (शिमि तथा हदि फर दत्त्या)-ॐ ऑ, ही, मो, य, र, ल, य, श, पं, सं, ६, सः सोऽपम् प्राणा प्राणाः । ॐ ओं, वी, को, ये, रे, ले, ये, शं, पे, स, सः-जीय 'रियमः | ॐ ओं, मं, मो, य, र, ल, थे, श, पं.स.१, स:- मन्द्रियाणि पार मनात्यक्चतु श्रीजिहाप्राणवाफपाणीपादपायपरथा-- नोहवागन्य मुग्य' घिर सिन्नु स्वाहा ॐ ॐaar, इति प्रणयम्य पच्नदशावृत्ती. (या) भनेन मम देस्य' ५० पदरा संस्काराः मम्पयन्ताम | युवस्या परपाम् (ॐ नमो भगवते पदीय) [ ३ ] इति, बीन्प्राणायामान्कृत्वा ॥ यथा पर्वतधातूनां दोपान्दहति पावकः । एवमन्तर्गतं पापं प्राणायामेन दह्यते ॥ इसि प्राणप्रतिष्ठा । अथ महामृत्युञ्जयमन्त्रजपविधिः । सङ्कल्प.-अद्येत्यादि पूर्वोच्चारित एवं गुणविशेषेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ मम आत्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्ताफलप्राप्त्यर्थं यजमानस्य शरीरेऽमुकपीड़ानिगश-द्वारा सद्यः आरोग्यप्राप्त्यर्थ श्रीमहामृत्युञ्जय- देवताप्रीत्यर्थं श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्रजपमहं करिष्ये-ॐ अस्य श्रीमहा- मृत्युञ्जयमन्त्रस्य । यसिष्ठ ऋषिः । श्रीमृत्युञ्जय रुद्रो देवता । अनुष्टुप छन्दः । हौं वीजम् । जू शक्तिः । सः कीलकम् । मृत्युञ्जयप्रीत्यर्थ जपे विनियोगः । न्यासाः-वसिष्ठऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे । श्रीमहामृत्युञ्जयरुद्रदेवतायै नमः हृदये हौं बीजाय नमः गुह्य । जू शक्तये, नमः पादयोः । सः कीलकाय नमः सर्वाङ्ग पु । ॐ उयम्बकं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ यजामहे तर्जनीभ्यां नमः । ॐ सुगन्धिं पुष्टिवर्धन मध्यमाभ्यां नमः । ॐ उर्वारुकमिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नमः । ॐ मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ मामृतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं. हृदयादि ॥ ध्यानम्-चन्द्रो- द्भासितमूर्धजं . सुरपति - पीयूपपात्रं महद्धस्ताम्जेन दधन्सुदिव्यममलं हास्यास्यपङ्क महम् । सूर्यन्दग्निविलोकनं करतलैः पाशातस्सूत्राड कु शां भोज, विभ्रतमक्षयं पशुपति, मृत्युजयं तं स्मरे ॥ १॥ मानसोपचारः सन्पूज्य || ॐलं पृथिव्यात्मक गन्धं समर्पयामि । ॐ हंआकाशात्मक पुष्पं समर्पयामि । ॐ यं वाबात्मकं धूपं समर्पयामि । ॐ र तेजप्रात्मक दीपं.दर्शयामि । ॐ वं अमृतात्मक नैवेद्यं समर्पयामि । ॐसं सर्वात्मकं मन्त्रपुष्पं समर्पयामि ॥ मन्त्रोद्धार-ॐ ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे ॥ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः जूॐ हौं ॐ । ऊत्तरन्यासं कृत्वा । गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणामत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रासादान्महेश्वर ।। मृत्युञ्जय महारुद्र ग्राहि मो शरणागतम् । जन्ममृत्युजरासँगैः पोडितं कर्मबन्धनः ।। अर्पणम्-अनेन महामृत्युजयपाज्येन कर्मणा श्रीमहामृत्युञ्जयः-प्रीयतां न मम ॥ अथ पटनणवयुक्त मृत्युञ्जय- महामन्त्रः-सङ्घल्पं पूर्ववत् । ॐ हौं जूसः ॐ भूभुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उारकमिव बन्धनात् ॐ सः जूहो ॐ स्वः भुन्भः ॥ अर्पणम्-पूर्ववन् ॥ इति पट्मणवयुक्त- 1 ।

नमः शिवाय, इति संयुतम् । अनूपवाक्षरं मन्न पञ्चाकरम फल प्रदम् । प्रवादियंदा- ॐ नमो भगवते रुद्रायेति प्राणानायम्य, कर्मपालजले, गङ्गायावाहन मृत्युजयमहामन्त्रः ॥ व जपानन्तरं देवपूजन कृत्वा ॥ प्रार्थना-- मृत्युञ्जय महादेव त्राहि मां शरणागतम् । जन्ममृत्युजरारोगैः पीड़ित कमबन्धनः ॥ ताकस्त्वद्गतप्राणारत्त्वचित्तोऽ ई सदा मृट । इति विज्ञाप्य देवेशं 'जफेन्मन्त्रं तु यन्त्रकम् ।। उपनिवेदनम्-जपसाङ्गता सिद्धयर्थ यथाकामनया द्रव्येण दशांशहोमतर्पणमार्जनमामणभोजनानि कुर्यात् ॥ इति घहामृत्युञ्जयमन्त्रजपविधिः ।। अथ शिवपूजापद्धतिः। अय यन्त्रोदारः ॥ अनुक्त कल्पेयंत्रंतु लिखेत्पादलाष्टकम् । पटकोण कर्णिक तत्र वेद द्वारोपशामितम् । अथ मन्त्रोद्धारः । नमस्कार समुद्धृत्य वामनेत्र समन्वितम् । यारुणं मुसवृद्य च यामु ललाट देवि तदा मंत्रः पतरः इति । अथ मन्त्र. ॥ ओरम् मूलमन्त्रः । अथ पूजाप्रयोगः । सामग्रीसपा नित्यकर्मविधाय, नव- वस्त्र परिधाय ओ३म् विष्णुर्विष्णहरिहरि निराधम्य ॐ सिवं ३ इर्यात् । गन्धपुष्पाइते रचसम्पूय तेन जलेनाऽऽत्मानं सम्प्रोक्ष्य ॥ ॐ अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थाः । ॐ पण्डरीकाक्षम्पुनातु ३ नमः कारः । दक्षिणे० ॐ सरस्वत्यै नयः । ॐ शखनिधये नमः । वामे लम्यै नमः । ॐ पद्मनिधये नमः । आसनशुद्धिः । ॐ पृथ्वीत्वयेति- मन्त्रम्य मेराष्ट्रष्ट ऋषिः, सुतलं छन्दः, फदिवता, आसनोपदेशने विनि योगः ॥ ॐ हिरण्यवर्णा सुभगा हिरण्यकशिपुमहि । तस्या हिरण्यदापये सत्या प्रारं नमः । इत्यत्तवान् क्षिपेत् । पुनः ॐ विश्वशक्तये नमः । महाशक्तये नमः । ॐ मामनाय नमः। ॐ योगासनाय नमः । ॐ अनन्तासनाय नमः विमला मनायनमः । मध्ये, ॐ परम सुम्बास- नाय नमः । ॐ भूर्भुवस्वः श्रात्मामनाय इति मन्येण पुष्पादिनाऽऽत्मन बामनदानम् ।। पाचादिमिभूमि, श्रामनं च सम्पूज्य प्रार्थयेन् ॥ ॐ पृयितया गनाः लोका देविय विष्णुना धृता । वंप धारय मां देवि पविध पुरवासनम् । ॐ नमः । मनः शिवस्नीयान ||* अशिविरूपाधिमाम शोणित भाजने । विदेवि शिवामध्ये, चा- मुण्डे पा पराजित । विष्पोनाम मन, शिखान्य करोम्यहम् ।। अयदिग्यन्धनम् ।। ॐ अपमनुने मूठा ये भूताः मुवि मास्थिताः। ये भूना निहारतेनाया शिपाता । इति भूनादानुस्मार्थ ॥ ॐ [ ६५ ] सवभूतानिवारकाय, शॉगीय सशराय मुदर्शनायास्त्रराबायहु फट् साहा ।। इति तालत्रयत्वा !! तत स्वदक्षिणभागे पुष्पाक्षते । ॐ गुरुभ्यो नम । ॐ परमारुभ्यो नम । ॐ परमेष्टिगुरुभ्यो नम । ॐ पूर्वासिद्धिभ्यो नम । ॐ प्राचार्येभ्योनम । तत स्ववामभागे । ॐ गणेशाय नम । ॐ दुर्गायै नम । ॐ क्षेत्रपालाय नमः । ॐ योगिनीभ्यो नम । ॐ क्षेत्र शाय नमः । पुनदिंगवन्धनम् ॥ ॐ अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचा सर्व तोदिशम् सर्वस्वह्यविरोधेन ब्रह्म कर्म समारभे ॥ वाम हस्तेन भूमि त्रिवार ताडयेत् । अय भूशुद्धि ॥ ॐ भूरसोत्यस्य प्रजापति ऋपि मातृका देवता, प्रस्तारपक्ति छन्द , भूशुद्धौ विनियोग । भूमौ हस्ती कृत्वा । ॐ भूरुमि भूमिरस्य दितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धनी । पृथिवीयच्छ प्रथिवीट ॐ पृथिवीं माहिठसि भैरव नमस्कार ।। ॐ भूतानामित्यस्य पौडिन्यऋपि , नाराय देवता, अनुष्टुप्छन्द, भैरव नमस्कारे विनियोग ।। पुष्पाजलिंवघ्या ।। ॐ यो भूतानामधिप तिर्यस्मिल्लोमा अधिश्रिता यऽईश महतो महारतेन गृह्णामि त्वामह मयि गृह गामित्वामहम् ।। ॐ तीक्षण दंष्ट महाकाय कल्पात दहनोपम ।। भैरवाय नमस्सुम्यमनुज्ञादातु मर्हसि ॥ इति भूतशुद्धि । ॐ नम शिवा येति प्राणायाम नय कृत्याऽऽचम्य । ॐ सुशान्तिवतु ।। ॐ स्वस्तिन.ऽ इन्द्रो वृद्ध श्रवा स्वस्तिन पूपा विश्व वेदा स्वस्तिनऽस्ताक्ष्यों अरि- घनेमि स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु । ॐ भद्र वर्ण भि सृणुयामदेवा भद्र पश्ये माक्ष भिर्यानना । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवाठ मस्तनूभियंस महि, देवहित यदायु ॥ त पत्नी भरनुगुच्छेमरवा पुति भिरुतवाहिरण्यै ॥ नाक गृभाना सुस्तस्य लोके तृतीये अष्टे अधिरोचने दिव || अथ ना- स्कारा । श्राविघ्ननाशिने मगल मूर्तये नम । श्रीश्चेष्टदेवताभ्यो नम || श्रीग्रामदेवताम्यो नम । श्री स्थानदवताभ्यो नम । श्री वास्तुदेवताभ्यो नम । श्री या हिरण्यगर्भाम्या नम । श्री लक्ष्मीनारायणाम्यानम । श्री उमामहेश्वराभ्या नम । श्री शचीपुरदराम्या नम श्री मातृपितृ चरण कमलोभ्या नम । ॐ सर्वेभ्योदेवेभ्यो नम | ओं सम्योपासणे भ्यो नम ॥ निविन्धमस्तु ।। ओं अभीप्सितार्थ मिद्धयर्थपू जतोय मुग मुरै । सर्वविघ्न हप्तस्मै श्री गणाधिपतयेनम । औं सर्व मगन मागल्ये शिरे मार्थसाधके । शरण्येव्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते ।। थों लाभग्तेपा यस्तेपा कुतस्तेषा परानय । येषामिन्दीवर श्यामा दृदयस्थो जनार्दन । ओं लम्पोदर नमस्तुभ्यं सतत मोदक प्रिय । अविघ्नं कुर मे देव सर्वकार्येषु मपरा ॥ घों सत्मत्तरमाणे नम ॥ सत कुयात् ।। यो विगुरिष्णुहरिहरि ॥ निराचम्म ! यो नम परमात्मन सकल्प . [६] पुराणपुरुषोत्तमाय श्रीमद्भगवतो. एवं.-गुण विसेषणविशिष्टायां शुभ- पुण्यतियो। अमुकगोत्रोऽमुकराशिरमुकशर्मा ममात्मनः वा, आमुष्क यजमानस्य श्रुति स्मृति पुराणेतिहासोक्त सत्फल प्राप्तये सकलैश्व- याभिः वृद्धयर्थ, अप्राप्त लक्ष्मी प्राप्त्यर्थ, प्राप्तलक्षम्याश्विरसं रक्षणार्थ, सकल मनेप्सित कामना संसिद्धर्थ, लोके वा सभायां, राज द्वारे वा । सर्वत्र यशोबिजय लाभादि प्राप्त्यर्थं इह जन्मनिजन्मान्तरेवा, सकल दुरितोपशमनार्थ, तथा मम सभार्यस्य, सपुत्रस्य, मबांधवस्या- खिलकुटुम्बसहितस्य, सपशोः समस्तभयव्याधिजरापीडाल्मृत्यु परिहार द्वारा, आयुरारोग्यश्चर्याभिवृद्धर्थ । तथा, ममाखिल कुटुम्बस्य जन्म- गशेः सकाशाद्य केचिद्विरुद्ध, चतुर्थाष्टम, द्वादशस्थान स्थितरमहास्तैः सूचितं, सूचयिष्यमाणं, यस्सर्वारिष्टं, तद्विनाशद्वारा, एकादशस्थानस्थित, वच्छुभफलप्राप्तये, पुत्रपौत्रादिसंततेरिवच्छिन्न युद्धधर्थ आदित्यादि- नवमहानुफूलतासिद्धयर्थ, तथा, इन्द्रादिदशदिकपालप्रसन्नतासिद्धयर्थ, आधिदेविकाविभौत्तिकाध्यात्मिक, विविधतापोपशमनार्थ, धर्मार्थकाम- मोक्षफलप्राप्त्यर्थच, ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसाम्बसदाशिव प्रीतये, पडङ्ग- न्यांसपूर्वकं यथा ज्ञानेन, यथा लब्धे नोपचारेण श्री साम्बसदाशिव- पूजनकर्माहं करिष्ये ॥ ततः ॐ अस्य श्री शिव पडाबर मन्त्रस्य वाम- देव ऋपिः, पंक्तिम्छंदो, श्रीसाम्बसदा शिवोदेवता, ॐ बीज, शंशक्तिः, शिवायेति कीलक, चतुर्वर्ग फलायाप्तये जपे विनियोगः । ॐ शिरसि वामदेव ऋषिः नमः । मुसे, ॐ पक्तिश्छन्दमे नमः ! हृदि ॐ साम्बसदा शिवाय नमः । गुह्ये, ॐ वीजाय नमः । पादयोः ॐ शंशतये नमः । सर्वाङ्ग, ॐ शिवायेति कीलकाय नमः ॥ ततः ॐ हृदयाय नमः । न शिरसे स्वाहा । म शिखायैवषट् । शि कवचायहुम् । वॉ नेत्रत्रयाय- घोपट । य अनायफट् । ततोध्यायेत् -ॐ पञ्चवका दशभुजो सर्व देवोत्तम प्रभुः । वेदोपगीनः सर्वशः सोम सूर्याग्नि लोचतः । गौरीभूपति पामाँगो कल्याण गुणसागरः । सर्वलोकपत्तिः श्रीमान सर्व देवाचितों विभुः ।। निष्फलोपिगुणोनित्यो निर्मलो निरुपादिकः । निरजनी निराकारो निरवन्धो निरामयः || ज्योतिः स्वरूपो विमलो चिद्धनः सकलात्मकः । एकः पूर्णः शिवः शान्तो मायातीतोऽक्षरो वः। इति इत्येन्ध्याता । ॐ नमः शिवायेति दशधाजप्त्वा ॥ अध्यं स्थापन पुर्यात् ।। भूमी रक्तचन्दनेन त्रिकोण वृत्त चतुरष मण्डल विलिख्य । d.ध्यापक मण्डलाय नमः । इति सम्पूज्य । ॐ में वहिमण्डलाय दश कलात्मने नमः । शियायपाराय नमः। इति आधारं सम्पूज्य ॐ पटइनिअर्घ्य पात्रपक्षालनम ॥ तनोय.पाप्रमायारोपरि सँस्थाप्य ।

। ॐ अँअर्कमण्डलायद्वादशकलात्मने शिवाय॑ 'पात्राय नमः । इत्या- धारो परि पात्रं सम्पुज्य ततः ॐ नमः शिवायेति मूल मन्त्रेणाऱ्या पात्रं वारिणा परिपूर्य्य ॐ गङ्गच यमुने चेति । ततः ॐ संसोममण्डलाल पोटशकलात्मने श्रीशिवार्ष्यामृताय नमः । इति सम्पूज्य नम इति । गन्धम् वपटू इति पुष्पम् । अक्षतांश्चक्षिपेत् ॥ अंकुश मुद्रया सूर्य मण्डलात्तीर्थानाबाह्य, मत्स्य मुद्रयाऽऽछायधेनुमुद्रया ५ मृतीकृत्य योनि- मुद्रयापरमीकृत्य सुगन्धादि द्रव्यं च निःक्षिपेत् । तेनार्योदकेन सर्वासामग्री सन्प्रोदय, आपोहिष्वति मन्त्रेण, आत्मानं चामिसि- चयेत् ॥ ततः घण्टा पूजयेत् ॥ ॐ आगमार्थ तु देवानां गमनार्थतु रक्षसाम् । सर्वभूतहितार्थाय घण्टानादकरोम्यहम् । इति वादयित्वा घण्टां प्रपूजयेत् ॥ ॐ सुपणों सि०॥ ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टास्थ गरुणायनमः- श्रावाहयामि सर्वोपचारार्थैः पाद्य गन्धाक्षत पुष्पाणि समर्पयामि, नमस्करोमि घन्टा मुद्रांच' प्रदर्य । ततो यामे धूपपात्रं ॥ दक्षिणे दीपपात्रं संस्थाप्य, पाद्यादीनि समर्प- यामि, गन्धर्वदेवाय धूपपात्राय नमः । वन्हि देवत्याय दीपपात्राय नमः । सम्पृज्य । श्रादौ गृह वास्तु पुरुषं पूजयेन् । गृहाभित्ती, वा, भूमौ, अक्षतैः । ॐ वास्तोस्पते प्रतिजानी ह्यस्मारवावेशो अनभीवो भवानः । पे यत्वेमहे प्रति तन्नो जुपस्वः शन्नो चवद्विपदेश चतु- प्पः ॥ ॐ भूर्भुवः स्त्र, गृह वास्तु पुरुपाय नमः । 'पाधादिभिः सम्पूज्य ' नमस्कारः । ॐ पूजियोऽसि मयावास्तो होमोथैरर्चनैः शुभैः। प्रसीद वहिदेवेश देदि मे गृह मुखम् । ॐ वास्तु पुरुषाय नमः ।। ततः पीठ पूजां कुर्यात्पूष्पाक्षतैः ॐ मण्डूकायनमः । ॐ कालाग्नि रुद्रायनमः। ॐ श्राधार' शक्तये नमः । ॐ आनन्दकन्दाय नमः । ॐ प्रपञ्चमाय नमः । ॐ कूर्माय नमः । ॐ शेपाय नमः । ॐ वाराहाय नमः । ॐ पृथिव्यै नमः । ॐ सुधार्णवाय नमः श्वेत द्वीपाय नमः। ॐ मणिमण्डपाय नमः । ॐ फल्एवृक्षाय नमः । ॐ स्वर्णसिंहासनाय नमः . ॐ सितक्षत्राय नमः । ॐ श्वेतचामर्याय नमः । ॐ धर्माय ज्ञानाय नमः । ॐ श्रेयाय नमः। ॐ नैरवाय नमः । ॐअनन्ताय नमः ॐ सविनलायनमः । ॐ प्रकृतिमयपन्न म्योनमः। ॐ विकारमयदेशरेभ्यो। ॐ पञ्चाशद्वर्ण वीजाक्ष्य कर्णिकायै नमः। ओं सं सत्वाय नमः।। ओंर जिसे नमः। ओं तं तमसे नमः ।।ओं मायायै नमः। ओं विद्यायै नमः। ओं सूर्येन्दु वहिमएडलेभ्यो नमः । ओं आत्मने नमः। ओं अन्तरात्मने नमः । श्रओं परमात्मने नमः। ओं झानात्मने नमः । ओं मायातत्वाय० ओं विद्यावत्वाय० । कलावत्वाय० । नमः [ ८८ ] ओं परतस्वाय नमः ॥ ततः पूर्वातिक्रमण ! ओं वामदेवाय नमः । ओं ज्येष्टायलाओं रुद्रायः। ओं कालाय० ।ओं कालविकरणाय। ओं क्लाय० । श्रओं वलविकरणाय । श्रों वजप्रमथिनेः । ओं सर्वभूतद- मनाय० ओं मनोन्मनाय । मध्ये, ओं नमो भगवते सकल गुणात्मने अनंत पीटात्मने नमः ॥ अथावाहनम् || ओं आगच्छ देवदेवेशलि. ऽस्मिन् सुस्थिरोभव । स्थिरोभूत्वा महादेव पूजां गृह ण नमोऽ: स्तुते ॥ श्रीसांवसदाशिवाय नमः ॥ ततः नूतन मूर्तीनां प्राणप्रतिष्ठा कुर्यात् ।। तद्यथा । ओं अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मविय्णु महेश्वरा ऋपयः ऋग्यजुः सामथर्याणि छन्दासिक्रियामय वपुः प्राणा. ख्या देवता श्री बीजं ही शक्ति क्रौं कीलकं आसां नूतनमूर्तीनां प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः ॥ अनामिकाग,टयोगेन । पञ्चगव्येन पनामृतेनवा। ॐओं ही क्रौं य र ल वं शं सं सोऽहं हंसः एपां शिवस्य नूतन लिङ्गानां प्राणा इहप्राणाः || पुनः अनेनैव मंत्रण एपा शिवस्य नूसनलिङ्गानां जीव इह स्थितः ।। पुनः एव । शिवस्य सन्द्रियाणि स्थितानि एपॉ शिवस्य नूतनलिङ्गानां सर्वेन्द्रियाणि । वाइ मनम्त्वक चक्षु: श्रोत्र जिह्वा घाण पाणि पाद पाय पस्थानि इहवागत्य सुचिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।। पुनर्वेदोक्त मन्ण । श्रओं एतन्तेदेव सवितुर्यज्ञं प्राहुहस्पतये ब्रह्मणे । तेन यक्षम पनेनयत्र पनितेन मामन । यो मनोजूतिः॥ पश्चात्संस्कारसिद्धये पञ्चदश प्रणवाहतीः कारयेत् ॥ यथा श्रों ओं ओं इति पञ्चदश वार १५ पठेत् । अनेन पायाँ नूतनमूर्तीनां जातकर्म गर्भाधानादि पञ्चदश- मंस्कारान्मपादयामि । इति वदेत् ॥ प्राथना । श्री स्वागतं देवदेवेश महाग्यारमिहागतः । सानिध्यंतु महादेव स्यार्चायां परिकल्पय । अनेन प्राण प्रतिष्ठादि कर्मयतेनीसाम्बसदाशिवोदेवता प्रीयतां नमम || वतः प्रतिको प्रत्येक पञ्चामृतेनाभिपेकं कुर्यात् ॥ तद्यथा || दुग्धेन ओं श्राध्याय स्वेति गोत्तम ऋपि पयोदेवता अध्ययः देशानाय क्षीरस्नाने विनियोग. ॥ श्रओं कामधेनु समुद्भतं मर्वेपा जीवनं परम । पारनं यज्ञ हेतुच पय. स्नानार्थमर्पितम् ॥ श्री पय पृथिव्यां० ॥ स्नानाथ दुग्धं समर्पयामि श्रीसांवमदाशिवाय नमः । एषः गन्धः ॥ एतानक्षतान् । इमानि पुष्पाणि ममर्प० । धूपमाधापयामि । दीपं दर्शयामि । नवेद्य- निवेदयामि श्रीमाँय० ॥ ततोऽननः ओं ईशानः सर्वविहानामीश्वरः मयंभूनाना प्राविजिमणेऽविपति शिवोमे अग्नु महाशियोम ।। ननाद्धोहम्म । श्रो श्राप प्रामान्निति प्रमागोनम अपित्रिष्टुप्छन्दः विश्वे देवादेयता प्रापः स्नाने विनियोगः । श्री श्रापो अस्मान्मावर: :

[ ८t] शुन्धयन्तु धृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु विश्व ४ हिरि नं प्रवहन्तिदेवी रुद्रदादिभ्यः शुचिरा पूतऐमि । दीक्षातंपसस्तिनरसि त्वां तां शिवा ओं शगमां परिदधेभद्रं वर्णपुष्यन् स्नानार्थे शुद्धोदकं समर्पयामि श्रीसाम्व- सदा०॥ एवं सर्वत्र ।। ततः दधिस्नानं ओं दधिक्राब्णेति वामदेव ऋपि रनुष्टुप्छन्दः दधिदेवता पूर्ववके वामदेवाय दधिस्नाने विनियोगः। ओं दधिक्राब्णे अकारिषं जिप्णोरश्वस्य वाजिनः सुरभिनोमुखा करत्मणऽआयु पितारिपत् ॥ ओं पयसस्तु समुद्भूतं० ।। स्नानार्थे दधिं सम० श्रीसाम्पस. एप गन्धः । एतानक्षतान् इमानि पुप्पाणि स० धूपमाघ्रा- पयामि । दोपं दर्शयामि, नेवेद्यं निवेदयामि, श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः । ततः शुद्धोदकं पूर्ववत् , वा, ॐ असोयस्ताम्रो० । दुधिस्नानान्तरं शुद्धो- दकं समर्पयामि ॥ ततो ऽक्षतः । ॐ वामदेवायनमोज्येष्ठाय नमः श्रेष्टा- यनमोझदाय नमः काल य नमः कलविकरणाय नमोवलविकरणायनमो ।। ततो घृतम् ॥ ओं घृतंमिमीक्षेतिगृत्समद ऋषित्रिष्टुप्छन्दः दक्षिण वक्रेअघोरायघृस्नाने विनियोगः । ओं घृतम्मिमीक्षे घृतमस्ययोनि घृते- श्रितो घृतंवस्यधाम । अनुष्ष्वधमावहमादयस्व स्वाहा घृतं वृपम व्यक्षि- हव्यम् । ओं अवनीत समुत्पन्नं० स्नानार्थे घृतं सम० श्रीसांव। एव गन्धः एतानक्षतान् । इमानि पुष्पाणि । धूपमाघ्रापयामि । दी दर्शयामि । नैवैद्यं निवेदयामि । श्रीसाम्वशिवाय नमः । अक्षतः ओं अघोरेभ्यो ऽथघोरेभ्यो घोरघोर । तरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तुरुद्र रूपेभ्यः ॥ शुद्धोदकम् । ओं असोपस्ताम्रोऽ । घृत स्नानानन्तरं शुद्धोदक सम० | श्रीसाम्ब० ॥ श्रय मधुस्नानम् । ओं मधुवातेति गोत्तमऋषि र्गायत्रीरन्दो मधुरेवता पश्चिमवक्रे तत्पुरुषाय मधुस्नाने विनियोगः। ओं मधुवाताऽऋतायते मधुतरन्तिसिंधयः माधीर्यः सन्त्वोषधीः मधुनक्तमुतोपसों मधुमत्पार्थिव ॐ रजः मधुद्यौरस्तुना पिता मधुमानो वनस्पतिर्मधुमा अस्तुसूर्य माध्वी. गावो भवन्तुनः । ओं तरुपुष्प समुद्भूतं० । स्नानाथ मदु स०। श्री- सॉव०॥ एप गन्धः । एतानक्षतान् । इमानि पुष्पाणि । धूपमा0 1 रोपं दर्श। नैवेद्यं निवेद०। श्री साम्बशिवाय०॥ अक्षतैः ।। ओं. तत्पुरुषायविद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नोरुद्रः प्रचोदयात् । शुद्धोदक। ओ अप्सीय० । मधुस्नानानन्तरं शुद्धोदकं सम० । श्री साम्ब० ॥ अथ- शर्करास्नानम् । ओं अपा” रसमित्यस्य इन्द्रवृहस्पति ऋषी अनुष्टुप्छन्दः उत्तरवके सो जावाय शकरास्नाने विनियोगः । ओं अपाठे रस मुद्वय ससूर्ये संत समाहितम् । अपा , रमस्य योरस स्तवोगृहाम्म्युद्यम- मुपयाम गृहीतो सौद्रायत्वा जुष्ट गृहाम्म्येषते योनिरिन्द्रायत्वा जुना ॥

। साम्च०॥ ० ] ओं इन सार समु० । स्नानार्थे शर्करां समा श्री साम्ब० । एप गन्धः। एतानक्षतान । इमानि पुष्पाणि । धूपमा। दीपं दर्श० । नैवेद्य नि । श्री साम्बसदाशिवाय अक्षतैः ।। ओं मद्योजातं प्रपद्यामि सद्यो जाताय चैनमः । भव भवे नाति भवे भवस्य माँ भवद्भवाय नमः । पुनः शुद्धो- दकं । यो असोयस्ताम्रोऽअ.। शर्करास्नानानन्तरं शुद्धोदकं म्म श्री साम्पसदाशिवाय० ॥ ततः पुनरावाहनादि पोडशोपचारैश्च पूजयेद्यथा।। (उत्तम शिवपूजनम्) अयपुष्पांजलिगृहीत्वाऽऽयाहन कुर्यात् । ओं श्रा- गच्छ भगवत्देव स्थानेचान स्थिरोभत्र । श्रों नमः शम्भवाय० । इत्यावाह्य! श्री भूर्भुवः स्वः मॉग सपरिवार सायुध सशक्तिक भोसाम्खुशिवे हाग च्छेह तिष्ठ इहसु प्रतितितो वरदोभय । अथासनम् । श्री रम्य सु शोभन दिव्यं सर्वसोत्यकरं शुभं । आंसनंच मयादत्त' गृहा। परमेश्वर । ओं यातेरुद्रशिवा० इत्यासनार्थे, पुष्पाणि समः श्री अथपाद्यम् । ओ३म् उष्णोदकं निर्मलंच सर्वसौगन्ध संयुतं । पाद. प्रक्षादयनार्थायदत्त ते प्रतिगृह्यताम् । ओं यामिपुंगिरि श• । इदं पार्य सम० श्रीसाम्य० । अथायम् । ओं अध्य' गृहाण देवेश गन्धपुष्पाक्षतः सह । करुणा करमेदेव गृहाणाय नमोऽस्तुते ॥ ॐ शिवेनवचसात्वा० अयोदकं ममः श्रीमाम्य ॥ अयाचमनीयम् । ॐ सर्वतीर्थममायुक्त मुरभिनिर्मल जलम् । श्राचम्यतां मयादत्तं गृहाण परमेश्वर ।। ओं अद्य वोचदधिः । इदमाचमनीय सम० श्री साम्ब० । अथस्नानम् । ओं गंगा सरस्वतीरेवा पयोगी नर्मदा जलैः स्नापितोसि मयादव तथा शाति पुमप्यमे । यो असोयस्ताम्रो । इदं जल समर्प० श्रीसाम्ब० । अथ गन्योदकम् । ॐ मलया पलसं भूतं चन्दनागर सम्भवम् । चन्दनं देव देश स्नानायं प्रतिगृह्यताम् ।। श्री गन्धद्वारा दुराया। गन्धाद समपं० श्रीसावसदा । पुनः शुद्धोदकं च मम ॥ श्रीमान्यः । अथ हरिद्रादि- चूर्णम् । ओं नाना मुगंधि द्रव्य च चन्दनं रजनीयुतम् । उद्वतन मयदत्तं नानाथं प्रतिगृह्यताम् ।। द्वसं नार्थमिदं हरि ओ३म अट शहः शुनाने अठ शुहः पृच्यतापमपापा । गन्धस्ते सोमवतु मेदायर मोऽरकन्युनः । पुनः शुद्धोदकं समः भीमाम्य० स्थ पञ्चामृतम । ओ३म् पयोदधिपतं घेर मधुच शर्करायुतम् । पञ्चामृत मयानीतं स्नानाथ प्रनिगृह ताम् ।। ओ३म् पञ्चनः मरम्पती । स्नानाथ पपा. मन म० श्री.माम्ब० । पुनरापनीयं । श्रोयम् पुनराननीय पदीयो नय मुष्टयगृहाण्यदेवश मनो भय यम्मी । श्री३म् प्रमोयोगमांतिः । पुनरामवतीयं गमः भीमाभ्यः । एतः पुरुप सूमोन, प्रोम्म मान गोनि महापिई यात्।। प्रोक्ष अमृताभिक ३ नि त्रियार - [१] वदेत् ॥ अथयज्ञोपवीतम् । ओ३म् नव भिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुणदेवतामयम् । उपोतं चोत्तरोयं गृहाण परमेश्वर । ओ३म् नमोस्तुनीलः । यज्ञोपवीतं सम० श्रीसाम्ब० ॥ अथवस्त्रम् ॥ ओ३म् सर्वभूताधिके सौम्ये लोक- लज्जानिवारणे । मय.पपादिने तुभ्यं वाससो प्रतिगृह्यताम् । ओ३म प्रमुंचधन्वन० । वस्त्रं समर्प० श्रीसाम्य ॥ अथगन्धम् । ओ३म श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रष्ट चन्दनं प्रतिगृह्यताम् । ओ३म् विज्यधनु-क० ॥ इदं गन्धं सम० श्रीसाम्व. सदा० ।। अथाक्षतान् ॥ ओ३म् अक्षतांश्च सुरश्रेष्ठकुंकुमाक्ताः सुशोभिताः । मयानिवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर । ओ३म् परिते- धन्वनोहेति० अक्षतान्निवेदयामि श्रीसाम्ब० ॥ अथपुष्पाणि ॥ ओ३म् माल्यादीनिसुगंधिनि मालत्यादीनिवप्रभो मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थ प्रतिगृह्यताम् श्रो३म् यातेहेतिन्मीदुष्पः ॥ पुष्पाणि सम० श्रीमाम्ब० ॥ अथविल्वपत्रम् । ओ३म् त्रिदलं त्रिगुणाकार त्रिनेत्रंच त्रियायुधम् । त्रिजन्म पाप सहारमेकबिल्वं शिवार्पणम् । ओ३म् शिवभव प्रजाभ्यो मानुषीभ्यस्त्वमगिरः । माद्यावा पृथिवीऽअभिशो. पीतिरिक्ष मावनस्पतीन् । विल्वदलानि सम० श्रीसाम्ब० ॥ अथपुष्प- याला । ओ३म् नाना सुगंधिभियुक्त ऋतुजैः कुसुमैः शुभैः। मया या प्रथिता मालां गृहाण त्व सुरेश्वर । ओ३म् यद्यशोप्सरसा ॥ इमॉ पुष्प- माला मम० श्रीसाम्ब० ॥ अथसौभाग्यद्रव्यम् ।। ओ३म् हरिद्रां कुकर्म चैव सिंदूर कजलान्वितम् सौभाग्यद्रव्यसंयुक्त गृहाणा- विक्रया सह । ओ३म् अहिरिवभोगै पर्येति । सौभाग्यद्रव्य सम० श्रीसाम्ब० ॥ अथर्वाकुराणि ॥ ओ३म् हरिताःश्वेत वर्णा वा पञ्चत्रिपत्र संयुताः । दूर्वांकुराः मयादत्ताः गृहाण भवनायक । ओ३म् वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः । श्राने यः सर्वदेवानां धूपोयं प्रतिगृह्यताम् । ओ३म् अवतत्त्व धनु० ॥ धूपमघापामि श्रीसाम्ब० ॥ अथदीपम् ।। ओ३म् आज्यं सद्वर्ति संयुक्त वह्निमायो जितमया दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापह । ओ३म नमस्तेायुधाया ॥ दीपं दर्शयामि' श्रीसाम्ब० ॥ अयनैवेद्यम् ॥ श्रोम् शर्करात संयुक्त मधुरं स्वादुचोत्तमम् । उपहार समायुक्त नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् । ओ३म् मानामहान्त मुत्त । ओ३म् प्राणाय स्वाहा०, ओ३म् अपानाय म्वाहा, ओं व्यानाय स्वाहा, उदानाय स्वाहा, ओं सामानाय स्वाहा, एभिर्पञ्चभिर्मन्त्रः प्राममुद्राः प्रदर्श्य । इद नैवेद्यं निवेदयामि श्रीसाम्ब० । मध्ये मनीयम् । ॐ एलोमीर लवंगादि कपूर परिवामितम् । प्राशनार्थ कृतं तोयं गृहाण परमेवरं ॥ ॐ कमएभ्यो०॥ पुनर्जलम् ॥ ओं- 1 [१२] साधारण जलं यूयंकरस्याति विशुद्धये । सततदेवदेवेश गृहाण मम भक्तिन. 1 ॐ शन्नादेवीर भी० । उत्तरोपामनार्य रमुख प्रक्षालनार्थ पुनजलसमः श्रीसाम्ब० । अर्थताम्बूलम् । ॐ पूंगीफल महादिव्य नागवल्जीदलैयुतम् । एनाचूर्णादिमयुक्त ताम्बूल प्रति गृह्यताम् ओं पत्पुर० । मुस शोभनार्थमिद ताम्बूलसम० श्रीसाम्ब० ॥ अथ फलानि ।। ओं नानाविधानिपक्यानि फलानि तु जानिच गृहाण देव देवेश प्रसन्नोभवविमो। ओं या फलानिडिफ० ॥ एतानिफलानि- सम॥ श्रीसाम्ब० ॥ अबदक्षिणाम् ॥ ओं हिरण्य गर्भगमस्थं हेम वीनं विभावसो । अनन्त पुण्यफलदमतः शान्ति प्रय न्धमे ॥ श्रओं हिरण्यगर्भ समः ॥ इमादक्षिणा समः ॥ अथकपूरा तिक्यम् । यो क्दलीगर्भसभूत कर्पूरं च प्रदीपितम । पाराति क्यमह पूर्वे पश्यमेवरदोभव ॥ ओं इदं हषि प्रजनः ॥ इदं कर्पू. रार्तिक्यं दर्शयामि श्रीसाम्ब० ॥ अयप्रदक्षिणा || ओं यानिकानिच पापानिजन्मान्तर कृतानि । तानिसर्वाणि मश्यन्तु प्रदतिय पढे पढे ।। ओं मानस्लोफेतनये । सर्व पापा पनुपये प्रदक्षिणा क्रोमि श्रीसाम्ब० ॥ अथ पुष्पाञ्जलिम् । ओं नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथासालोद्भवानि च । पुष्पाञ्जलिमयादत्ता गृहाण परमेश्वर || श्री नमस्तऽश्रायुधा० । इमापुर पाञ्जलिसम० श्रीमान्बः तत सफना यम् ॥ओं रक्ष रक्ष महादेव रक्ष लोम्यरक्षा । भक्तानाम मयंदा नातामर भवार्णवान् । वरदत्व वरदेहि वाग्वितं. वान्छितार्थद ।। इति मन्त्रणायस्थं पूगीफ्नं देवता सम्मु निवेद्य ।। ओं अनेन सफलायएफलदोग्नुमदामम । इत्योंदकेनदेवताम्नापयेत् ।। अथ प्राना ॥ ओं भूत्यालेपनभूपित प्रविलमन्नेवाग्निदीपापुर परटेपनगपुष्पदाम मुमगो गङ्गा उलै पूरित । ईपनाम जटाप्रपल्लव- युनोन्यन्तोनगन्मएडपे शम्भुमङ्गन कुम्भता मुरगतो भूयात्मवाश्रेयसे । श्रोमाय शिवाय । तो घामारर्तेन पुष्पासनेष्टमूर्तीन्यूजयेत् ॥ मर्शयतिति भूतयनम ॥ ॐ भगायलमूर्तयनम ॐद. याग्निमूर्तयेनम । ॐ उमापायुमूर्तये नम । ॐ भीमायामरामू: नये नम ॥ ॐ पशुपतयनमान मूर्तयः । ॐ महादेवाय मोम ममयः । ॐ ईशानाय मूर्य मुनयः ॥ नन पर ॐ यामदेवाय नम । दति। ॐ गोराय नम । परिममे नरपुमाय नम ॥ मर गानाय नम । मध्ये-ॐ मात्र महा शिपाय नम || पापाटिभिनयान मपन्य ॥ पुष ग्रहीया ॐ रेय देन महादेव मणानुप्रथम पर । अनुमाहिश परिवारानायमे ॥

[ ६३ ] इमामावरणां पूजां गृहाण सुमुखोभव ॥ श्रीसाम्ब० ॥ अथ मधुप- कण, वा शिवार्ष्यामृतेन पुष्पाक्षत युतः तर्पयेत् ॥ अष्टदलेप्रागादि- क्रमेण ॥ ॐ नन्दिने नमः ॥ इहागच्छेहतिष्ठ। नन्दीश्रीहादुकांपूजया- मितर्पयामि नमः । ओं महाकालाय नमः । इहागच्छेहतिष्ट। महाका- लंश्रीपादुकां पूजयामितर्पयामि नमः । ओं गणेश्वराय नमः । इहाग०। गणेश्वरं श्रीपादुकाओं वृषाभाय नमः । इहागच्छे० । वृषभश्री. पादुकां । ओं भूगिरिदिनेनमः । इहाग० भृगिरिटि श्रीपादु० । ओं स्कंदायनमः । इहाग० स्कन्दश्रीपा० । ओं वीरभद्रायनमः । इहाग० वीरभद्रंश्रीपा० । ओं चएढीश्वरायनमः । इहाग० । चण्डीश्वरं श्रीपादुः । ततोऽामृतम् ओं अभीष्टसिद्धिम्मेदेहि शरणागतवत्सल । भक्तयासमर्पयेत्तुभ्यमिदमाररणार्चनम् ॥ इदमाव रणार्चनं श्रीमाम्यस- दाशिवस्यदक्षिणहस्ते समर्पयामि । इति प्रत्यावरणार्चने । ततः पाद्य- दिभिनवेद्यान्तं सम्पूज्य । पुनस्तर्पयेत् ॥ मध्ये-ओं ईशानायनमः । इहागच्छेह, ईशानं श्रीपादुकांपूज० । ओं अधोरायनमः । इहाग० अघोरंश्रीपादु० । ओं सद्योजातायनमः । इहाग. सद्योजातंश्रीपा० । ओं अनन्तायनमः । इहाग० अनन्तंश्रीपादु० । ओं सूक्ष्मश्रीपा० । ओ शिवाय नमः । इहाग० शिवश्रीपा० । ओं एकपतयनमः । इहाग. एकपतिश्रीपा० । मद्रायनमः । उहाग० ॥ रुद्रश्रीपा०॥ ॐ त्रिमूर्चये. नमः। इहाग० त्रिमूर्तिश्रीपा० । ॐ श्रीकण्ठायनमः इहाग श्रीक- एठंश्रीपा० । ॐ सत्पतये नमः । इदाग० । सत्पति श्रीपादु। ॐ शान्त्यै नमः । इहाग० ॥ शान्ति श्रीपा० । ॐ विद्या- यैनमः इदागच्छे० विद्यांश्रीपा० ॐ निहत्ये. नमः । इहाग० निवृत्ति श्रीपा० । ॐ प्रतिष्ठायैनमः । इहाग० प्रतिष्ठांश्रीपा. ॐ वामदेवायनमः । इहाग० वामदेवं श्रीपा० । ॐ ज्येष्ठायनमः । इहाग० । ज्येष्ठं श्रीपा० | ॐ श्रेष्ठाय नमः। इहाग० । श्रेष्ठं श्रीपा०। ओं रुद्रायनमः । इहाग० रनश्रीपा०1ॐ कालायनमः । इहाग० कालंश्रीपादुकां० । ॐ कलविकरणायनमः । इहा० कनविकरण श्रीपा० । ओं बलायनमः इहाग० बलश्रीपादु०॥ ॐ बलनिकरणायनमः ॥ इहाग बलविकरणश्रीपा। ओं मलप्रमथिने-- नमः ।। इहाग० वलप्रमथिनंश्रीपा० । ओं सर्वभूतदमनायनमः । इहाग० । सर्वभूतदमनं श्रीपा० । ओं मनोन्मनायनमः । इझाग मनो न्मनंश्रीपा०॥ ततोऽयामृतम् ।। ओं अभीनामिद्धिम्मेदेहि शरणाग० ॥ ततः पाद्या. दिभिनवेद्यान्तं स पूजयेत् ॥ पुनस्तर्पयेत पूर्वे श्री हृदयायनमः । इहाग० हृदयश्रीपा० । अग्नये मंशिरसेस्वाहा । इहाग० शिरः श्रीपा० ।

1 ल. [ ६४ ] ईशाने मं. शिवायै वषट् । शिखाश्रीपा० । नैऋत्वां शिकवचाय- हुम । कवचंश्रीपा० वायव्ये यां नेत्रत्रयायवीपट । नेत्रत्रयं श्रीपा । मध्येय यत्रायफ्ट । अत्र श्रीपा० ॥ ततः परितं ॥ ओं अणि- मायनमः । हागः अणिमांश्रीपा० । ओं महिमाय नमः हाग० महिमांश्रीपा० | आँ लघिमायैनमः । दहाग चिमा श्रीपा० । थी गरिमायनम । इहाग गरिमांश्रीपा० । औं प्राप्यै नमः ॥ इहाग० प्राप्तिश्रीपादुओं प्राकाम्यै नमः। इहाण प्रामामी- श्रीपा० । ओं इपिताय नम । इहागः। इपितांश्रीपा० । ओं वसिताय - नमः । इहाग यसितांश्रीपाओं ब्राह्य य नमः । इहाग ब्राह्माश्रीपा० ओं माहेश्वराय नमः । दहाग० माहेश्वरी श्रीपा० । ओं कौमाप्य नमः । इहागन्छे कौमाराधीपाश्री वैष्णव्यै नमः । इहाग० वैष्णवी श्रीपा०] श्री धाराय नम । इहाग० वारहीश्रीपा० ॥ श्री रुद्राय नमः ।। इदागः भद्राणीश्रीपा० ॥ श्री चामुण्टाय नमः ॥ इहाग० चामुण्डांश्रीपा० ॥ श्री चण्डिकायं नम ।। इहाग। चण्डिकांधी। पुनः प्रागादिक्रमे ।। थों असितागमरवायनम ॥ इहाग अमितांगभर श्रीपा। ओंग भैरवायनमः ।। इहाग समभैरवंश्रीपा० ॥ श्री भएडभैन्यायनमः । इहागः भएडभैरवं श्रीपा० । श्री क्रोधभैरवायनमः ॥ इहाग० क्रोचभैरसश्रीपा। ओं उन्मत्तभैरवायरम ॥ इहाग० नन्मत्त भैरवंटीपा०॥ श्री कालभैरवाय. नमः ॥ इहाग० कालभैरर । श्रीपा०॥ श्री भीषणभैरवायनमः ॥ हाग॥ भीषणमय श्री ओं महारभैरवायनमः ॥ इहागः सहारभैरवं श्रीपा। तोऽध्यांमृतम् ।। ओं अभीष्टमिद्विम्मेदेहिशा ॥ पाचादिभि- यद्यान्तं पूज्येन ।। अथच । ओं मयायनमः । इदागः ॥ भश्रीपा०॥ ओं ईशानायनम इहाग० ईशानं श्रीपा० । पशुपतये नमः । इहागः । पशुपति श्रीपाल। श्री रद्रायनमः । इदाग० । रुदंश्रीपालाओं नमाय- यम । सागः । श्रीपा० ॥ओं भीमायनमः । इसाग०। मीम श्रीपा० । त्रों महादेवायनमः । हाग. ॥ महादेव श्रीपा० । भओं अनन्ताय नमः। माग अनन्तंभीपा० । ओं वामुश्नेिनमः । दाग बामुक्निश्रीपा० । नों पायनम | ग. सरायीपा श्री पनीरफायनमः। गादेशमीरपंथीपा । श्रों कोटकायनमः । इहाग पटकधीपा० । श्री शापामायनम | ग. शगलेश्रीपाओं पम्बनायनमः । • श्रीगा। श्री ननुपयनम । गः परंश्रीमानों बनमायनम ITनर्मश्रीग.! श्री मियतम गधिनी यापनमा हागीपादु । अर्जुनायनमः । साग. मममीरा-19 मामायन । आगमान श्रीमा ।

[ ६५ ] ओं भ.नमः । इहग० भरिश्रीपा० । ओं नलायनमः । इहाग० नलं- श्रीपा० । ओं रामायनमः । इहाग० रामश्रीपादु० । ओं हिमयतेनमः । इहाग० हिमवन्तंश्रीपा० । ओं निपदायनमः । इहाग. निघदनोपा- । ओं ध्यानायनमः । इहाग० । ध्यानंश्रीपा० । ओं माल्यकृतेनम । इहाग० । माल्यवन्तंश्रीपा० [ओं परिजातायनमः। इहाग. पारिजातंश्रीपा० । ओं हेमकूटायनमः । इहाग० हेमकूटश्रीपाढ० । ओं गन्धमादनाय नमः । इहाग० ।। गन्धमादनं श्रीपादुकां । ततोऽर्ध्यामृतम्। ओं अभीष्टसिद्धिमेदेहिश इदमावरणार्चनम् । श्रीसाम्ब- शिवस्य दक्षिणहस्ते निवेदयामि ।। ततः पाद्यादिभिः सम्पूज्य पुनरावरणम् ॥ ॐ इन्द्रायनमः ॥ झाग. इन्द्रश्रीपा० ॥ ओं अग्नये- नमः । इहाग० अग्निश्रीपा० । ओं यमायनम. इहाग० । यमंश्रीपा०। ओं तये नमः । इहागः। नितं श्रीपा० ॥ओं वरुणायनमः । इहाग० वरुणश्रीपा० । ओं वायवेनमः । इहागः । वायुश्रीपा० । ओं कुबेरायनमः । इवाग० कुवेरं श्रीपा० ॥ ओं ईशानायनमः । इहाग० ॥ ईशानां श्रीपा० । ओं ब्रह्मणेनमः । इहागः ब्रह्माणं श्रीपा० । ओं अनन्ताय नमः । इहाग० अनन्तश्रीपा० ॥ पुनः प्रागा- दिक्रमेण || ओं पंवत्राय नमः । इहाग० । वनश्रीपा० । ओं शंशक्त- येनमः ॥ इहाग. शक्तिंश्रीग० ॥ ओं दं दण्डायनमः ॥ इहाग० दण्डश्रीपा० ॐ खं खगायनमः ॥ इहाग० खड्ग श्रीपा० ॥ ॐ पं पाशायनमः ॥ इहाग० पाशंश्रीपा० ॥ ॐ अंकुशाय नमः । इहाग० अकुशश्रीपा० ओं ग गदायैनम ॥ इहाग० गदांश्रीपा० ॥ ओं शं शूलायनमः ॥ इहाग० ॥ शूलश्रीपा० । ओं पद्मायनमः इहाग० पद्म- श्रीपा० । ओं चक्कायनमः ॥ इहाग० चक्रं श्रीपादु० ॥ पुनस्त ।। क्रमेण || ओं ऐरावतायनमः ॥ इहाग० ऐरावतं श्रीपा० ॥ ओं मेपायनमः ॥ इहाग० । मेघश्रीपा० औं महिपायनमः इहाग० महि- पंश्रीपा० ।। ओं प्रेतायनमः ।। इहाग० श्रीपा० ॥ ओं मकराय. नमः ।। इहाग० मकरंश्रीपा० ॥ओं मृगायनम: ॥ इहाग० मृगश्रीपा०॥ ओश्म वृपभायनमः ॥ इहाग० वृपभश्रीपा० ॥ ॐ नरायनमः।। इहाग० नरंश्रीपा० ॥ ॐ गरुडायनमः इहागच्छ गरुडं श्रीपा० ॥ ॐ हंसायनमः ॥ इहाग० हंसंश्रीपा० ॥ पुनः पूर्वादिदिक्षु ॥ पूर्वे-विप्रवर्ण श्वेताभसहस्त्रफण युतशेषायनमः ॥ इहाग० शेषश्रीपा० । भग्नये वैश्यवर्ण नीलाभ पश्त्रशतं फणयुत तक्षयायनमः ॥ इहागर तक्षश्री- पादुका दक्षिणे विप्रवर्ण कुकुमाम सहस्रफणयुत अनन्तायनमः । इहाग अनन्तश्रीपा० ॥ नैऋत्यां क्षत्रिय रामसप्तशत पण- फरण्युतककोटकायनम । यनम [१६ ] युतवासुकिने नम ॥ इहाग० वासुकिन श्रीपा ॥ पश्चिमे विप्रवर्ण पोताभपञ्च शतफणयुतशखपालायनम ॥ इहाग० शङ्खपाल श्रीपादु वायव्ये-वश्यरण नीलाभ शवफणयुत पद्मायनम ॥ इहाग० पद्म श्रीपा० ॥ उत्तरशूद्रवर्ण श्वेतामत्रिशत इहाग० | कर्कोटक श्रीपा० || ततोऽामृतम् ॥ ॐ अभीष्टसिद्धिम्मे दहि शर० ॥ इदमावरणाचनम् । ओं तत्तत्सत्साम्बसदाशिस्य दक्षिण हस्ते समर्पयामि || पुन पूर्ववत्पाद्याटिभिनेवेद्यान्त पूजयेत् ।। तत गन्धपुष्पाक्षतयुत जलेनतर्पयत् ॥ ओं भव देव तर्पयामि ॐ शिरदेवतर्पयामि । ओं ईशानदेव तर्पयामि । ओं पशुपतिदेवतर्पयामि । ॐ रुद्रदेवंतर्पयामि श्रओं उपदेवतर्पयामि ओं भीमदेवंतर्पयामि । ॐ महान्तदेव तर्पयामि । ॐ देवदेव तर्पयामि ॥ तत ॥ॐ उपप्ठा इतिजलम । ओं श्रेष्ठायनम इतिमधुपर्णम् । ओं कालायनमइतिगन्धम् । ॐ फजविकरणायनम इति दीपम् । ॐ भवोद्भवायनम इति वेधम् ॥ ततोऽ टपुष्पाञ्जलिनि- वेदयेत् ॥ ध्यानपूर्वकम् ॥ ओं भवायदेवायनम सर्वायदेवायनम । ओं ईशानायदेवायनम । श्रओं पशुपतयेदेवायनम । ओं रुद्रायडेयायनम था मायदेवायनम । ओं भीमायदेवायनम । यो महतेनेवायनम ॥ तत ॥ओं भवस्यदेवस्यपल्यैनम । ओ सर्वस्य देवस्य पन्यैनम । ओं ईशानस्यदेवस्य पन्यैनम । ओं पशुपते देवस्य पन्यै नम । श्री रुस्यदेवस्य पल्यैनम । ओं उम्स्यदेवस्यपल्यनम । ओं भीमस्य यस्य पन्यैनम । श्रॉ महतोदेवस्यपरायैनम ॥ तत धूप दीपनी राजनचामरादिभि सम्पूयक प्रार्थयेत् ॥ श्रओं वन्दे महेश सुरसिद्ध सेरित भातद में नित पादपदम । विद्यापदभात नैफ वाध्यायेच्छिकामदुर्घ मरेशम । योयोग् माया प्रतितोहिपुमा ज्ञान वियत्ते खिलयस्तुनिष्टम । सविश्यना पलिपल्मपम्नध्यायपिए लियगत घरहम् ॥ श्रीमत्साम्या सदा । शिवार्पणमस्तु ॥ ततोऽष्टोत्तरश्त श्रां नम शिवायेति मदाम-- अनध्य । पुष्पान्जलि पुर्यात् ।। ओं नम श्री पारूपाय नमोऽहार पु धृते । नमोनादात्मने तुमनमो विन्दुकलात्मने । ॐ नमस्ते लिहुरूपाय नानापायतेनम । त्य मातामयंकाकाना स्यमय जगतास्ति । स्वधात्वा स्व समित्यप्रिय पितामह । नमस्ते भगयन र भारतर तिज । ॐ भीमाप व्योग स्पाय पशुम पायानमः 1 हादेवाय मोमाय अमनाय नमास्नु । ॐ माय मानाय नमः यसपणे विना नाम स प पावत् | प्रदाय ॥

[ १७ ] लिङ्गानांशिवरूपाणा यन्मया पूजनंकृतम् । तेन त्वं भगवान रुद्र वाल्छि. तार्थ प्रयच्छमे। ॐ तत्सत्साम्बसदाशिवार्पणमस्तु । ततः उत्थाय पुष्प. पूरितांजलिं कृत्वा ॥ ओ३म् यज्ञ नयज्ञ मयजन्त देवास्तानिधर्माणि प्रथमान्यासन् । तेहनाकं महिमान सचन्त यत्र पूर्वसाध्याः सन्तिदेवाः ॥ ॐ गजाधिराजाय प्रसह्य साहिने, नमो ययन्वै श्रवणाय कुर्म है। समेकामान् काम कामायमह्य कामेश्वरोवैश्रवणो ददातु । कुबेराययश्रय- गाय महाराजायनमः ॥ ओं स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं राज्य पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्य मयं समन्त पर्यायीस्यात् । सार्वभौम सार्वायुष श्रान्तादापरार्धात् । पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ता या एक राडिति । तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिविष्टारोमरुतस्यावसन् गृहे । श्राविक्षतस्य काम प्रेविश्वेदेवाः समासदः ॥ओं विश्वत शचतुरुतः विश्वतो मुखो विश्वो तो वाहुरुत विश्श्वतस्पात् । सम्याहुभ्यां धमति सम्पतः न्र्यावा- भूमी जनयन् देवऽएकः ।। ओं साम्बसदा शिवायनम इति पुष्पाञ्जलि समर्प्य ॥ प्रदक्षिणांकुर्यात् ।। बों सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्तसमिधः कृताः देवायद्धयज्ञ तन्वानाऽअवन्द्वन्पुरुषपशुम् । ओं यानिकानिच० ॥ अथ- क्षमापनम् ॥ ओं आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजांचैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर | अन्यथाशरणं नास्ति त्वमेव शरणंमम । तस्मात्कारुण्यं भावेनक्षमस्वजगदीश्वर गतं पापं गतं दुःखं गतंदारिद्यमेवच । आगता सुख सम्पत्तिः पुएरायाञ्च तबदर्शनात् ।। मन्त्रहीन क्रियाहीनं विधि- हीनं सुरेश्वर । यत्पूजितं मयादेव परिपूर्ण तदस्तुमे ॥ यदक्षर पभ्रष्टं मात्रा- हीन च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतादेव प्रसीद करुणानिधे ॥ ओं करचरण कृतंवा काय कर्मजंवा श्रवण नयनजंवा मानसं वापराधम् । विहित- मविहितं या सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाधे श्रीमहादेव शम्भो।। ओं त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव भ्राता च सखा त्वमेव । त्वमेव. विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्व ममदेवदेव ॥ ओं साम्बसदाशियाय- नमः ।। त्ततः जलसंप्रोक्षणम् ॥ ओं शतं भवति शतायुर्वैपुरुपः शतंद्रि- यरैवेन्द्रियं वीर्य्य मात्मंघत्ते ओं स्वस्ति मंत्रार्थाः सफलाः सन्तु । श्रा. राध्यदेवताः । सुप्रसन्नाः वरदाः भवन्तु । इच्छितमनकामना संसिद्धिरस्तु । प्राक्षणाबू युस्तथास्तु॥ -इविशियपूजनम् । नीराजनम् । ओं जय गङ्गाधर हर जय गिरिजाधीश, शिय. त्वन्मां पालय नित्य, कृपया सगतीश ॥ शिव नो हर हर हर महादेव शशा कैलाशे.

[८] गिरिसिखरे, कल्पद्रुम विपिने शिव० ।। गुजति मधुकर पुल्ले बुजयने गहने । शिव ओं हर हर हर महादेव ॥२॥ कोकिल कूजित मञ्चति हसायन ललिता शिक्षा विधति कला पलास्यं मोदान्मद सहिताः ।। शिव ओं हर हर हर महादेव ॥३॥ तस्मिल्ललित सुदेश, शालामणि रचिता, शिव० ।। तन्मद्धे हरनिकटेगौरी मुद् सहिता ।। शिव ओं हर हर हर महादेव ॥४॥ भूपण भूपितदेहा रमयति निज रमणम् ॥ शिव०॥ प्रोन्द्रिादि सुरेश राधित सचरणम् ।। शिव ओं हर हर हर महादेव ।।५।। विबुध वधूबहु नृत्यति, हृदया हलादयुतम् ।। शिव०॥ गायति किन्नर राजः सप्तस्वर रचितम् ॥ शिव ओं हर हर महादेव ॥६॥ धिनकत थै थै धिनकत मृदा मारभते, शिव० ॥ क्वणठण ललितं येणु मधुर नादयते ।। शिव ओं हर हर हर महादेव ॥१॥ रुणु रणु चरणे रचयति, नूपुरमुग्वालिवम् ॥ शिव० ॥ चक्रावत भ्रमयति फुरसे तांधिकताम् ॥ शिव ओं हर हर महादेव ॥ वा सो लुप चुप तालं पादयते ॥ शिव० ॥ अङ्गुष्ठाङ गुलिनादं लास्यं कृतं कुरते। शिव औं हर हर हर महादेव ।। कपूरद्युति गौर पन्चानन सहितम् । शिव० ।। प्रिनयन शशिधर मोलिं, विषधर कांठ युतम् ॥ शिव ओं हर हर हर महादेव ॥१०॥ सुन्दर जटा कलापं, पायक युत भालम् ।। शिव० ॥ डमरु त्रिशूल पिनाकर धृत नृक पालम् । शिव ओं हर हर हर महादेव ।।११!! शश निनादं कृत्या, मलरि मारभते ॥शिव०नीराजयते प्रहा वेदार्थ पिते ॥ शिव प्रों हर हर हर महादेव ॥१२॥इति मृदुधरण सरोजे, रकमले धृत्वा शिव०॥ अवलोक यवि मद्देश काभादि दिला ॥ शिष हर हर हर महादेव ॥ १३ ॥ मानवकपाल माल पन्नगयर फलितम् ।। पाम विभागे गिरिजा, रूपं यहुललितम् ॥ शिव दर महादेम ॥ १४ ॥ सुन्दर शरीरे शिरशिष, कृनभम्माऽऽभरणम् ॥ शिव ॥ इति पमघजा तापत्रय दरणम् ॥ शिव पोपहर महादेव ॥ १५ ॥ ध्यान सम्या ममये शुधि हृदये सा॥ शिय० स्थाणु गिरिजानायं गिरिशं प्रभि नया शिव ओं हर हर महादेव ॥ १६ ॥ प्रति दिन मेव पठ मनया यः पुरते शिवः ॥शिय मायुज्यं गनपनि भत्त या यः ऋणुने । शिव हर हर महादेय ॥ १७ ॥१५ यिः प्रजननम्मेऽस्तु दशमीर सर्थ्य. गरबग्नये ॥धाम मनि प्रजाति पशुमनि मोक मन्य मरसनि । अग्नि । प्रजापालाम्मे रो त्य पयोरेनोऽपामामुघरा ॥१॥ जो भूयः न्य: भीमाग्यमानियाय गम. पारानिक्य दर्शयामि । श्री मनारया मारियति: गन्न समिधः कृता देवायचा नस्यामाइ. शिव०॥ पोषम हर [] अवघ्नम्पुरुषम्पशुम १ पापानि सर्वाणि पदेपदे या हरत्यहो तत्क्षणमेवनृ- रणाम् । प्रदक्षिणां तांपरि भक्ति भावात् समाचरेदेव १ मयि प्रसीद ॐ भूर्भुवः स्व. श्रीसाम्बसदाशिवायनमः प्रदक्षिणां समाचरामि-इति ॥ श्रीमदुरुद्राभिषेकप्रयोगः। पाचभ्य प्राणनायम्य शान्तिसूक्तं पठित्या सुमुखश्चेत्यादि गण- पतिस्मरणं कृत्वा सङ्कल्प.-अद्येत्यादिः एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभपुण्यतियो ममाऽऽत्मनः यजमानस्य वा श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफल- प्राप्त्यर्य धर्मार्थकाममोक्षसिद्धिद्वारा झटिति सर्वव्याधिनिरासपूर्वकं सर्वाभीष्टसिद्धयर्थ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीभवानीशङ्करमहारुद्रदेवता प्रीत्यर्थ यथाज्ञानेन यथामलितोप चारद्रव्यैः पडङ्गन्यासपूर्वकं पुरुपसू. क्न ध्यानाऽवाहनादि पोडशोपचारैः अन्योपचारैश्च सद्दावर्त्त- नेनाभिषेक ( रुद्र महारुद्रमतिद्रं वा) पूर्वक पूजनमहं करिष्ये ।। पडङ्गन्यासाः-मनोजूतिरिति मन्त्रस्य बृहस्पति पिः धृहत्तीच्छन्दः बृहस्पतिर्देवता हृदयन्यासे जपे विनियोगः ॥ ॐ मनोजूनि पतामाज्ययस्यवृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टय्यक्ष । समिमन्दधातु ॥ विश्वेदेवासऽइहमादयन्तामो म्प्रम्प्रतिष्ठठ ॥ श्रओं हृदयाय नमः ॥ १ ॥ अबोद्धपग्निरिति मन्त्रस्य बुधगविष्ठिरा ऋषिः त्रिष्टुिप्छन्द. अग्निर्देवता शिरोन्यासे जपे विनियोगः ।।ओं अब्रोदय- गिन समिधाजनानाम्प्रतिधेनुमिवायतीमुपासम् ॥ युहाऽइवबष्णव- यामुज्जिहाना . प्रभानव: सिखते नाकमच्छ ॥ ओं शिरसे स्वाहा ॥ २ ॥ मूद्धानमिति मन्त्रस्य भरद्वाज ऋपिः त्रिष्टुप् छन्दः अग्निर्देवता शिखान्यासे जपे विनियोग. || ॐ मूर्द्धा नन्दिवोऽश्र- रसिम्पृथिव्यावैश्वानरमृतऽआजातमग्निम् ॥ कवि, सम्भ्राजम- तिथिजनानामासन्नापाञ्चजनयन्तदेवाः ॥ ओं शिसायै वषट ॥३॥ माणित इति मन्त्रस्य अप्रतिस्थ ऋषिः विराट्छन्दः मर्माणि देवता फवचन्यासे जपे विनियोगः । ॐ मर्माणितेन्वर्मणाच्छादयामिसोम- स्वाराजामृतेनानुयस्ताम् । भरोळरीयोव्वरुणस्ते कृणोतुजयन्वानु- देवा मदन्तु ॥ ओं कवचाय हुम् ॥ ४ ॥ विश्वतश्चक्षुरिति मन्त्रस्य रिश्वकर्मा देवता नेत्रन्यासे जपे विनियोगः ॥ घों ओं विश्वत- श्वन रुत विरश्वतो मुसो व्यिश्वतो वाहुरुत विश्वतस्प्पात् ॥ सम्बाहु. भ्यान्धमतिसस्पतन्त्रवाभू मीजनयन्देवऽएक ॥ यों नेत्रत्रयाप वौषट ||५|| मानतोके इति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषि , जगतीधन्दः एकन्द्रो

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[ १०० ]
देवता अनन्या में अपे विनियोगः! ओं मानस्तोके तनयेमानऽआयुपिमा
नोगोपमानोऽअश्वेपुरीरिप : || मानोचीरान्नद्रभामिनो ध्वधीविन्म-
न्त: सदमित्वा हवामहे ।। ओं अखाय फट ।।६।।
इति न्यासान् कृत्वा पोडशोपचारैः सान्धशिव' सम्पून्य पुस
जलि समय ( रुदमन्त्र) अविच्छिन्न जलधारया अभिपेकः कार्यः।।
क्षमापनम् --आवाहनं न जनामि न जनामि तवार्चनम् पूजां चैव न
जानामि क्षमस्य परमेश्वर ॥ अर्पणम्-अनेनावाहनादिषोडशोपचारः
अन्योपचारश्नयथाजानेन यथामिलितोपचारद्रव्यैः कृतेन पूजनाख्येन
कर्मण ओं भूर्भुवः स्वः श्रीभवानीश करदेवताः प्रीयन्तान मम ॥ श्रओं
वत्सब्रह्माणमस्तु ।
अभिषेकविचार:-
'वेदावेदाब्धिगमश्च रामद्विकम् । द्वौ द्वो पृथभिमन्त्रीस्तु नमः
काश्चमकाः स्मृताः ।। वाजश्व सत्यमुर्चा रमाचाग्निरंशुप तयाग्निकः ।
एका चैव चतम्रश्च त्र्यविर्वाज इति क्रमः ॥ एवं चमकानेकादशधा दि:
मध्य एककमार्ग नमकेषु संयोज्य पठेत्स रुद्रा तरकादशरुद्रः 'लघुरुद्र'
सरकादशगुणः 'महारुद्रः । तेरेकादशावृत्तः अतिरुद्रः । इति।।
मदीसंख्याफल देवि शृणुष्व वदतो मम ।
एकात्त्यादिपाठानां ययाश्कययामि ते॥१ ii
संकल्पपूर्व म पूज्य न्यासाङ्ग पु सत् सरन् ।
स्नात्वा पञ्चामृनेनैव ध्यानपूर्व शिव जपेत् ॥२॥
पालमहोपशान्त्ययमेकावृत्तिमुदीरयेत् ।
अपमगोपशान्त्यर्य विराति पठेन्नरः ।।३।।
प्रदोपशान्त्यै कर्तव्या पक्ष्यावृत्तिर्वरानने ?
महामये समुत्पन्ने
सनावृत्तिमुदीरयेत् ॥ ४॥
नयायस्या भवेच्छान्तियंसपेयफलं लभेत् ।
गजपश्ये विभून्यै च महावृत्तिमुदीरयन् ।। ५ ।।
निभिः वाममिद्वि रिहानिश्च जायने ।
तः पश्यभिः शाश्व सयानी यस्पनामियात् ॥ ६॥
गणभिः मादयं ग्यायिषमाप्नोति मानयः ।
नगद पुरनमान्यगुणान्यितः ॥ ७ ॥
मानिधिमागाय यस्यांनाप ।
पमाहामवार्ता मपनाय नमः परम् ॥८॥

VIDYA KBRAN [ १०१ ] अल्पमृत्युविनाशाय तयारोग्ययशःश्रिये। LN 31836 राजवृद्धपदेयाय महारुद्रेकसंख्यया ॥४॥ विभिश्चैव महान्द्ररसाध्यसाधनाय च । पञ्चभिश्वमहान्द्रः राज्यकामः प्रसाध्यते ।। १० सप्तभिश्चमहारुद्रः सप्तलोकः प्रसाध्यते । नवभिश्च महारुद्रः पुनर्जन्म न जायते ॥ ११ ॥ अतिरुद्रकसंख्येन देवलां पाप्मुयानरः । डाकिन्यादिभये प्राप्ते एकावृति जपेन्नरः ॥ १२ ॥ भूतप्रेत पिशाचानां भये च गुणवृत्तितः । प्रहदोषदशायान पञ्चायति न संशयः ।। १३ ॥ वरातिसारदोषादी वातपित्तकफादिपु । सर्गरोगापशान्त्यर्थं सप्तावृत्तिन्न सशयः ।। १४ ।। सर्शयसाधनायेव नवावृत्तिं पठेन्नरः । साध्य रोगनाशाय मनोऽभीप्सितकर्मणे ॥ १५ ॥ अल्पमृत्युविनाशाय तथारोग्याय ने पुनः । सर्वशान्तिीत्तन्त्र रद्रावृत्त्या न सशयः ॥ १६ ॥ शाता तपः-पड फा दशिनीरुद्री। रुद्रएकादशरुद्रतः एका दशमिरे वागि महासदरच कथ्यते । एकादश महारुद्रः रतिरुद्र इति स्मृतः ॥ १७ ॥ . श्रीगणेशायनमः || हरिओं ॥ गणानांन्वागणपति । हवा- महे प्रियाणान्वाप्रिय पति हवामहे निधीनान्त्वानिधिपति हवामहेन्वसोमम ॥ श्राहमहानिगर्भमा स्वमजालिग घम् ॥१॥ गायत्रीष्टुिः जर्ग.यनुष्टुप्पा क्यामइ ॥ इत्युष्णिहाक कुत्सूचीमि शम्म्यन्तुत्वा ॥ २ ॥ द्विपहा याश्चतुष्पदाग्निदायाश्चपद पंदा । बिच्छन्दायाबसच्चन्दा : सूचोभिः शम्बन्तुत्वा ॥ ३ ॥ मइ. स्तोमा': सुहच्छन्दसऽ वृत सहाप्रमाऽऋषय : मुप्प्तदेख्यो पूलपाम्पन्यामनुश्यघीराऽअन्यालेभित्थ्यो नरम्मीन ॥ ४ ॥ॐ यजामतोदूरमुर्देतिदैवन्तसुष्तस्य नवैति ॥ दूरजमण्योविन्ज्यिो. तिरेकन्नन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ ५ ॥ येनकमाण्यपसोमनी. षिणोयझेन कृण्वन्तिविदधेनुशरा ॥ यदपुर्यप्यज्ञमन्त : प्रजानान्त. न्मेमने : शिव संकलमास्नु ॥ ६ ॥ यज्ञानमुततोनिय [ १०२ ] • ज्योतिरन्तरमृतम्यूज सु ॥ यस्यान्नवेकिनन्कर्मविधवेतन्न्ो- मन; शिवसङ्कल्प्यम स्तु ॥ ७ ॥ येनेदम्भूतम्भुवनम्भविष्प्यत्परि- गृहीतममृतेन सर्वम् ।। येयास्तायतेसप्तहोतातन्न्नेमनः शिवसंक- रुपमस्तु ।। ८ ॥ यस्मिन्न्च : समय पियरिम्मन्न्प्रतिष्ठि वारधाभाविवाग : यस्मिश्चित्त सन्धमोतम्जानान्तन्मेमन शिवसंकल्ल्पमस्तु ।। ६ || सुपारविरवानिवयन्न्मनुष्प्यान्नेनीयतेमीशु- भिव्याजिनाइव ॥ हरप्रतिष्ठठयन्दजिरञ्जविष्ठन्तन्मे मनः शिवसङ्क- लप्पमस्तु ॥ १० ॥ इति नद्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ हरिः ॐ ॥ सहस्रशीर्षापुरुप : सहस्राक्ष सहस्रपात् ॥ सभूमि मतस्पृत्त्वात्यतिष्ठशाङ गुलम् ॥ १ ॥ पुरुष 5: एवेदध सर्व- य्यद, सँय्यभाळ्यम् ॥ उतामृतत्त्वस्येशानीयदन्ने नातिरोहति ॥२॥ एतावानस्यमहिमातोज्ज्यायाँश्च पूरुप : पादोस्यविश्वाभूतानि ठियपादम्यामृतन्दिवि ॥ ३ ॥ त्रिपादूर्ध्व ऽउ पुरंप : पादो- स्येहावापुन तो विरवड व्यफ्रामस्साशनानशनेऽ अभि चिराईजायतविराजोऽअधिपूरुप : मजातोऽअय॑रिकच्यतपुरयाद मिमोपुर 5.॥ ५॥ तस्माद्यमा सव्व- हुत : मम्भृतम्पदाघ्यम् ।। पशुं नारचक्रेब्वायुष्ठयानारएण्यामाग्या. चये ॥ ६ ॥ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत एच : सामानि जानरे ॥ छन्दा । सिमतिरेनस्णायजुम्तरम्मादजायत ॥ ॥ तस्मादश्श्योऽअजायन्तये- केचोभयादत : गावोइ जक्षिरेतसम्भात्तस्मारजाताऽभययः ॥८॥ तथ्यशम्यहि पिप्रौद्धन्पुरुपातमम्प्रत : ॥ तेन देवाऽभय जन्त साद्ध ध्याऽपयचये || ६ || यत्पुरूप व्याधु 5. फतिमान्यरूपयन ॥ गुमहिमस्यामीबिम्बा पिमूरूपादोऽयेते ॥ १० ॥ या पोस्य- मुग्मं मामीदयाहूराजन्य: इन : ॥ उस्तदंस्ययद्वैश्य पदपा । गुदतोऽभंगायत ॥ ११ ॥ पन्नमामनमो जातापवा : सूर्यो. गायन ॥ रमाशंदनायुश्यप्राणरय मुग्पादटिनरंचायत ॥ १२ ॥ नारम्पाड पामीदुन्तरित शीतो: ममं पशंमः ॥ पायाभूमि- रिश : भोप्रारमोवां २ करपयन् ॥ १३ ॥ परपुरषणविषा. देवायमान्यत ॥ समन्तोश्यामीराग भोम्म म गर. ॥ ॥ ततो ॥

[ १०३ ] द्धपि ॥ १४ ॥ सप्तास्यासन्न्परि धयस्त्रि : सप्तसमिधः कृताः ।। देवायद्यज्ञन्तन्न्यानाऽन् अनन्न्पुरुषम्पृशम् ।। १५ ॥ यज्ञ यज्ञमयज- न्तदेवास्तानिधर्माणिप्पथमान्न्यासन ॥ तेहनाकम्महिमान’ सचन्त यन्त्र पूर्वेमाद्धाया : सन्ति देवा : ॥ १६ ॥ अद्भय : सम्भृत . पृथिव्यैरसांच्चविश्वकर्मण ऽ: समवर्त्तताग्ने । तस्यत्त्वष्ट् वाग्विद- धंद्रूपमैतितन्न्मय॑स्यदेवत्वमाजानमन्प्रे ॥ १७ ॥ ब्वेदा इमेत पुरुषम्म- हान्तमादित्यवर्णन्तमस : पुरस्तात् । तमेवविदित्वाति मृत्युमतिना. न्य : पावितेयनार्य ॥ १८ ॥ प्रजापत्तिश्श्चरतिब्ब्भे अन्तर. जायमानो धहुधाब्विायते ॥ तस्ययोनिम्परि पश्यन्तिधीरास्तस्मिन्न्हत- स्त्युभुचना निविश्वा ॥ १६ ॥ यो देवेभ्य॑ऽ आतपतियो देवानाम्पुरोहितः ॥ पूथ्योयोदेवेवेटम्यो जातो नमोरुघायब्राझये ॥ २० ॥ चम्ब्राह्मजनयन्तो देवाऽअग्प्रेस्त दंभु वन् । यस्त्वैवम्ब्राह्मणोन्विद्या- त्तत्यदेवा ऽसन्न्वशे ॥ २१ ॥ श्रीश्चतेलक्ष्मीश्च्चपकाया वहो- राने पावे नक्षत्राणि रूपमश्श्विनौळयातम् । इण्णानिधाणामुम्म ऽइपाणसवलोकमइपाण ॥ २२ ॥ इति रुद्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ हरिः ॐ ॥ श्राशु : शिानोवृषभोनभीमोधनापुन क्षोभणरच्च. पंणीनाम् ।। सहकन्दनोनिमिप ऽ एक वीर : शुत सेना ऽ अज- यत्साकमिन्द्रः ॥ १ ॥ सड क्रन्दनेनानिमिपेाजिष्णुनायुत्कारेणदु- श्च्यवनैन धृष्णुना ॥ सदिन्द्रेणजयतृतत्त्संहदवय्युधानर 5 इपुंहस्ते- नवृष्ण ॥ २ ॥ सऽइपुंहस्तै ः सनिशङ्गिभिन्शीस स्रष्ट्रासयुधs इन्द्रोगणेन. ॥ सृष्टाजसो मपाबाशयुग्म धन्नाप्मति हिताभिरस्ता । ॥ वृहरप्पपरिदीयारधेन रक्षोहामिन्ना- २||ऽअवार्धमान : प्रभञ्जन्त्सेना : प्रमृणोयुधा- जयन्नम्माकमेगवितारयानाम् चुलविनायस्त्यावर s: प्रवीर 5 सहस्वान्ताजी सईमानऽ तृग्नः ॥ अभिवोरोऽभिसत्त्या सहोजामिन्द्ररथमाविष्ठठगोविन् ॥ ५॥ गोत्र मिदंगोविदव्यज्ज- बाहुजयन्तमन्माप्रमृणन्तमोजमा ।। इम ॥ संज्ञाताऽ अनुवीरयष्व- मिन्द्र सपायो ऽ अनुस। सरंभध्वम् ॥ ६ ॥ अभिगोनार, सहसा गाहमानोयोव्वीर : शतमन्युरिन्द्र * ॥ दुश्च्यवन : पृतनापाई युद्ध ३ ॥

[ १०४ ] पोस्मा सेनाऽश्रस्तुष्पयुत्सु ॥ ७ ॥ इन्द्रऽ आसान्नेताहरप्पति- दक्षिणायज्ञ पुज्नुसोम + देवसेनानामभिमब्ज़तीना-जयन्तीना- मरुतोयन्त्वप्रम ॥ ८॥ इन्द्रस्य वृष्णो व्वरणस्य राज ऽ आदित्या- नास्मरुता । शद्धम् ।। महामनसाम्भुवनश्चयवानाझोपी देवानाज. यन्तामुदस्यात् ॥६॥उद्धपंयमघवन्नायुधान्न्युत्सत्सत्त्वनाम्मामकानाम्मना सि ॥ उद्यतन वार्जिनों वाजिनान्यद्रयानाम्नयंतायन्तुषीपा 5 ॥ १० ॥ अस्माकृमिन्द्रऽ समृतेपुवजेप्प्यसमाऊँय्याऽइयवस्वाजयन्तु !! अम्माय्वीराऽउत्तरेमवन्तस्माँ us देवा अवतायेषु ॥ ११!! अमापाब्रािम्प्रतिजोभ यन्तीगुणानान्यस्येपरैहि ॥ अभिवहिनिई हत्सुशोकराधे नामिनास्तांसासमन्ताम् ॥ १२ ॥ अवसृष्टापरापवशरै उज्येप्रम स शिते । गच्छामियान्य पद्यस्यमामीपाकञ्चनोकिछप 5 ।। १३ ॥ प्रेताजयंवानर इन्दौर ऽ शर्म यन्तु उपाय + सन्तुवाह वीना धृप्प्यायथासंघ ॥ १४ ॥ असीयामेनामात 5 परे पामन्य तितs प्रोजसारपम्माना || ताई गृहततमसापनेनयामीऽ अन्न्योऽ अन्न्य- न्मजानन ॥१५॥ ययाप्याऽ सम्पन्तिकुमारायिंशिवा इव ॥ तन्नऽइन्द्रो यूहरप्पतिरदिति 15 शम्मयच्छतु यिश्वाहा शम्मयच्छतु ।।१६।। ममाणि- तेवर्मणाच्छादयामसोमस्यागजामतेना-वस्ताम। उरोयरीयो चरण- स्वेठणोतुमयन्तुत्या देवामदन्तु ॥१७॥ इति रुद्रे तृतीयोऽध्याय || हरि : ॐ ॥ विधायह स्विनुसोम्म्यस्मवायुयद्यज्ञपंता वविन्द्रुतम् ॥ याजूनोयोऽमिरततित्गनापुजा ऽ पुपोपपुरधाविर्स- जति ॥२॥ नदुत्य जावदमन्वव्याहन्ति तिव॥ दृशेन्विश्रयाय- सूर्यम् ॥ २ ॥ येना पाचक्षुमा भुरएएयन्नन्जनौ ॥ऽअर्नु ॥ म्ब. सुपश्यपि ॥३॥ यामध्ययूऽागत रणेनुसूयंत्वधा । गायश ५ समगा । तन्कनया ऽयव्यनश्श्यिनन्देवानाम् ॥४॥ तम्त्वना पुषभावित क्येमाम्यष्टनातिबहिषदं । म्यर्पिदम् ॥ प्रनीपी मृन. मन्दीरमामागुतान्तमनुयामुयद म ॥५॥ अयनरम्भादयनित मांगयोनिगियर जसोरिचमानै । इममपा - सामान्य शिशुन्न वित्रामविभीदिल्लिा पिबन्युयानामु गाइनीकन्या मित्रम्यग्यरेषण म्याग्नेऽ । मायामा एपीजयन्तरिय आत्यम्मागंजताना.

[५] पश्च ॥ ७॥ आनुऽइडोमिनिसुशस्तिविश्वानर : सवितादेवड अप्रियायुवानोमसथानो विश्वञ्जगदभिपित्त्वेम नीषा ॥ ८ ॥ यद्यवृत्रहन्नुदाऽअभिसूर्य ॥ सयन्त- दिन्द्रतेन्वशे ॥ ६ ॥ तरणिव्यिश्श्वदर्शतोज्ज्योतिष्ष्कृदंसिसूप्यं ॥ विश्व- मामासिरोचनम् ॥ १२ ॥ तत्सूर्य्यस्य देवत्वन्तन्महित्वम्मद्धथाका तौद्धित : सर्जभार || यदेदयुक्त हरित संघस्थाहावाञ्चीवा- संस्तनुतेसिमरम्मै ॥ ११ ॥ तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचरेससूर्योपा कणुतेद्योरुपस्त्यै ॥ अनन्तमन्द्रशदस्यपार्ज कृष्णमन्न्यद्धरितः सम्भान्ति ॥ १२ ॥ वराएमुहाँ .ऽ अंसिसूर्यघटादित्यमहाँ २७ अंसि ॥ महस्तेसतोमहिमापनस्यतेद्धादेवमहाँ २ऽसि ॥ १३ ॥ बद्- सूर्य्यश्भवसामहाँ २७ असिसम्बादेवमहारऽसि ॥ मन्न्हादेवानाम- सूर्य्य : ॥ पुरोहितोन्विभुज्ज्योतिराग्भ्यम् ॥ १४ ॥ श्राय- न्तऽइवसूयंटिवश्श्वेदिन्द्रस्यभदत ॥ व्वसूनिजानेजनमानऽओजसाप्पति- भागनदीधिम ॥ १५ ॥ शुद्दयादेवाऽउदितासूर्यस्यनिरईस: पिg. तानियात् ॥ तन्नोमिन्त्रोवरुणोमामहन्तामदिति : सिन्धुः पृथि- वीs उदयो : ॥ १६ ॥ आकृष्णेनरज॑साव्यत्तमानोनिवेशय॑नुमृत- म्मत्यंञ्च ॥ हिरण्ययेनसवितारधेनादेवोयातिभुवनानिपश्यन् ॥ १७ ॥ इति रुद्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ हरिः ॐ ॥ नमरोगमन्न्यवऽतोतऽइपवेनम: बाहुबयामु- ततेनम : ॥ १ ॥ यातें रुदशिवानुनूरघोरापापकाशिनी ॥ तयान- स्तन्न्या शन्तमयागिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ २ ॥ यामिपुगिरिशन्तु- हस्वैविभप्यस्तये ॥ शिवाहिरिस्ताङ्कमाईि सी : पुरंपलगत् ॥ ३ ॥ शिवेनुव्यवसात्वागिरिशाच्याबदामसि ॥ ययान सर्व्व मिज्जगदयूक्ष्म । सुमना ऽअसत् ॥ ४ ॥ अद्भुयवोचदधिवक्त- साथमो व्याभिषक् ॥ अहीरनॅसव्वानुम्भयन्सारजयातुधा- न्योधराची : परांसुव ॥ ५ ॥ अतौयस्ताम्म्रोऽ अंगणऽतवन्ध्रु 5: मुमुगल : ॥ येचैन । रुद्राऽ अभितोदिश्रिता : संहस्रशो वैषा । हेर्ट ऽईमहे ॥ ६ ॥ सौर्योनमर्पतिनीलग्पोवोल्वि. लोहित उनैनहोपा ऽअंदरवन्नदृन्नुहार्य : ॥

बोव्वप ॥ १२ ॥ [ १०६ 1 सदृष्टठोमडयातिन 5 ॥ ७ ॥ नमोस्तुनीलग्मीवायसहस्राक्षायमीदुपै ।। अथोये s. अस्यसत्त्वानो इन्तेभ्योकरन्नम ’ || || अमुञ्चधन्य नस्त्यमुभयोरापन्योाम् ॥ याश्चतेहस्त 5 इप : पगृताभंग- ६ ॥ विजयन्धनु: कपर्दिनो विशल्ल्योवाणवाँ २ ॥ जुत ॥ अनशनस्ययाऽइपवाआभुरस्यनिषट्नधि 5 ॥ १० ॥ याते- हेतिमौदुष्टमहस्तेयभूवतेधर्नु ॥ सयाम्मान्विश्वतस्त्वमचधम्म- यापरिभुज ॥ ११ ॥ परितधन्वनोहेतिरम्माणक्तुविश्वत ॥ अयोय ऽइषुधिस्तवारेऽ अम्मन्निहितम् ॥ अवतस्यधनु व ॥ सहस्राक्षशतेषुधे । निशीथ्र्यशल्ल्यानाम्मुखाशिवोन + सुम- नाभर ॥ १३ ॥ नमस्तुऽ आयुधायानांतताय धृष्ण ॥ उभा- न्यामुवनोबाहुटम्यान्तधन्वने ॥ १४ ॥ मानोमहान्तमुतमानौs- अव् कम्मानऽ उदन्तमुतमान उक्षितम् ॥ मानौ वधी 5. पितरः म्योतमातरम्मान में प्रियास्तन्योरुट्टीरिप 5. ॥ १५ ॥ मानस्तोके वनयमानुश्रायुषिमानोगोपुमानो . अश्श्वैपुरीरिप मानौव्वीरा- न्, द्रामिनोयो विचम्मन्त : सदाभित्याहवामहे ।। १६ ॥ नमोहि रंगण्याहवे । सेनान्न्ये दिशाश्पतये नमो नमो व्युतेभ्योहरिवेशेव्म्य । पशुनाम्पतये नमोनम : शुदिपजरात्विपीमने पीनाम्पतये नमो नमो हरि केशायोपवीतने पुष्टानाम्पतये नमोनमायभ्लुशायं ॥ १७ ॥ नमोवस्तुशाय । च्याधिनेऽन्नानाम्पतये नमो नमो भृवस्यहत्यैजगता- स्पतयेनमोनमा दायां तायिने क्षेत्राणाम्पतयेनमोनम : नम - सूतायाईन्त्येचनानाम्पतये नमोनमोरोहिताय ॥ १८ ॥ नमोरोहिताय. रस्थपतयव्यताणाम्पनयनमो नमो भुवन्तयारिम्नायौषधीनाम्पायन- मोनोमन्त्रिणेवापिशायराणाम्पतये नमो नमः ऽचर्योपायाकर. न्दर्यने पत्तीनाम्पतयनमोना - कृत्स्नायुतया ।। १ || नम:यस्नायतया ॥ धावतमत्वनाम्पायनमोनम : महमानायनि व्याधिन भाळ्याधि गौनापनयनमनोनमामिपनि फ्युभायगनानाम्पतयुनमोनमा- निलेपरिनरायाएगानाम्पतयन मोनगोय.00 नमो-वर्ग- सेपरिसन्नतेम्नायूनाम्पनयनमोमो निङ्गिणं धिमतेसाराणा- म्पनमोनमः गायिभ्याटिया । मन्नोमुनापतये नमो नमो [ १०७ ] सिमपोन तश्चरडयोव्वि कुन्तानाम्पतयेनम ॥२१ ।। नम : उष्णी- पिणें ॥ गिरिचरायंकुल यानाम्पतयनमो नम हुपु मद्भपौधायिभ्य- रश्चयोनमोनम श्रावन्न्वानेभ्य प्रतियानेन्श्चोनमोनम आयन्द्भयोस्यद्यश्चवोनमोनमाव्यिसृजद्भर्य : ॥ २२ ॥ नमोटिव- सुनद्धयोग्विद्धथंग्यश्चनमो नमः : सूपद्यो जाग्यश्चवोनमो- नम: शानेभ्यऽमामीनेत्र्भ्यश्चयोनगोनमस्तिष्ठ-योधावद्भपश्च- वोनमोनम : ममाम्य+ 1॥ २३ ॥ न : समान्य : सभापतित्म्य. श्श्चयोनमोनमोरश्वेऽम्योश्वपतिन्भ्यश्श्योनमोनमऽआभ्याधिनीम्यो- विविधयन्तीम्यश्चोनमोऽनमऽगणाभ्यस्तु , हुतीयश्चवो- नमोनमौगणेभ्य॥ २४ ॥ नमोगणेभ्यो । गणपतिव्यम्यश्श्चवोनमो- नमोनातेभ्योजातपतिभ्यश्चवोनमोनमो गृत्सम्यो गृत्संपतिदम्यश्श्च. चोनमोनमोव्विस्पेभ्योटिवश्वरूपेमश्चवोनमोनम : सेनाम्य s. ॥ २५ ॥ नम : सेनाम्य । सेनानिम्यरचोनमोनमौ रथिन्यो ऽअरयेभ्यश्चवोनमोनम : दम्य समहीतृभ्यरश्ययोनमोनमा मुहद्भयो अफेयश्चवोनम ॥ २६ ॥ नमस्तसंच्भ्यो । रथकारें- परश्यवोनमोनम : कुलालेष्म्य : रिम्यरश्चोनमोनमोनिषा- देय : पुल्जिप्टेम्यारचोनमोनम : वनि कम्योगंगयुग्भ्य रश्चदो नमोना : श्वनन्य॥२७॥ नमः श्वम्य 5. । श्वपवित्र्भ्यश्चवो. नमोनमोभवायवरुवायदनम : शायरपगुपतयेचनमोनोप्रोवाय- पशितिकण्ठाय नम : कारिदने ।। २८ ॥ नम:कदिने चन्युप्तके शायवनमं महमारायंचशतधन्वनेधुनो' गिरिशयायन शिपिविष्टायं चनमो मोदुष्टमायचेपुमतेपनमोहम्याय ॥२॥ गमोदम्पाय । पन्चामनाय नमो एते पुरवीर्यमै नमोव्युद्धाययम. पंच नमोपपायवाप्रमानमऽभासः ॥ ३०॥ नमऽश। घाजिरायंचमम शोग्य पोय नशीच्यायसनम् । यमनमोना यानीप्यार ॥ ३१ ॥ नमो गोठाय । पकनि. छायं च नर्म + पृथ्वं गायनापर-गपंचनामदयमानगपानमा गुनमोजन्यायमन्नायननम : सोमाय । पत्पनिमांगनमोयाग्म्यां य पुम्मायरनम : रलो- । . उम्मीपदावखन्या- सोम्याय ॥३॥ नमः [ १० ] क्यायचा वसान्न्याययनम् ऽव्यचखल्यायचनमोळ्यन्याय॥३३॥ नमोचन्याय चकक्ष्यायचनम: श्वार्यचप्पतिश्चवायचनमऽश्राशुपेणा- यचाशुरथायवन 5 शूरायचायभेदिनचनौविलिम्मने ॥ ३४ ॥ नमोविल्म्मिनै । पकवंचिने चुनमायमिनोनव्यायिनेचन : श्रुः सायंचश्श्रु तसेनाययूनगोदुन्दुन्न्यायचाहनन्यायचनमोषणवे ॥ १५ ॥ नमोधृष्य । वप्प्रमृशायचनमोनिपनिणेचेपुधिमठेननमस्तीपणे पथेचा- युधिनेचन : स्वायुधायचमुशन्वनेच ॥ ३६ ॥ नम सू त्याय । गुप प्यायचनम् 5 काट्यायव प्प्यायचनम् : ल्यायचसम्याय- चनमोनादेयाय चव्वेशन्तायनम s. यूप्योय ॥ ३७ ॥ नम : कृप्याय । चाषघ्यायचनमोवीधयायचातृप्प्यायचनमोमेग्घ्यायच- बिद्युत्यायमनमो व्वयायचचावायचनमोव्यात्याय ॥ ३८ ॥ नमोबात्याय । मंचरेपम्म्यांचनमोऽवास्तुच्यायधम्धारस्तुपायचनम 5. सोमाय पदार्य चनमस्ताम्नार्यवाणायधनम ; शगये ॥ ३८ ॥ नम + शुगरे । पशुपयेचनमऽरमार्थदशीमायचनमोम्यवधा- यचरेवधायमनमोहन्त्रेयसे च नमो क्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो नमहाराय ॥ ४० ॥ नम: शनवाये । चमयोभवायचगम : शहरायंचमयसरायग्नम ५ शिवायनाशिवतराय न नम् । पाय । वावायचगम के प्रतरणाययोतरणाय चनर्म- म्नीत्यायल्ल्य्याननम शष्याय चुफेन्न्यायनुनम सिवृत्त्याय ॥ ४२ ॥ नम : मिहत्याय । प्राय्याचनम: कि । शिनायचायणाय नम : अदिनिपुत्रस्येचन : इरि ण्यायनाप्रपु. यायचनमोव्याय ॥ १३ ॥ नमोन्याय चुगोठ्याम चनमानलप्यायसहायधनमोइनुयायचनिष्प्यायचनम • कापा. यषगह परेपठारापुनम 5 शुष्पयाय ॥ १४ ॥ नम: शुक्याय । परित्यायूचनर्म . पासळ्यायगरजग्यायचनमोकोरप्यायचोग- प्यायचनम कल्योगारथ्योपानम पृएगाय || ५ || नम + पर्याय । परशदायचनम । इदगुरमांणायनाभिन्नतेमुनर्मऽ पाभितन मिलेगुनम 5 अदम्योपाध्यायोनमो नमोष FAIR रिफा पाना, हरयानमोत्रिमियरोम्योनगारिधि ' { ११० ) न्तुतेयन्दिनम्मोयश्च नोद्वेष्टितमेपजिम्भेदभ्घम ॥ 5 ॥ १४ ॥ नमोस्तु- रुद्रेन्योययेन्तरितेयेयाव्यात इयत्र 5 तेयोदशप्राचीदंशदक्षिणा दर्शप्पतीचीईशोदीनीशोदा : ॥ तेयोनमोऽस्तुतेनोञ्चन्तुते नोम॒ष्टयन्तुनेयन्टिम्मोयभनोदष्ट्टिनमे[जम्मे- 5: ॥ ६५ ॥ नमोनु । मुद्देष्योयथिव्योम्येवागन्नमिषद 5:1 तेभ्योदशपती- चीदेशदक्षिणादर्शातीची दंगोदीनी शोदा : नेम्यानमो भन्नु तेनौवस्तुतेनीमृडयन्सनेन्द्रिटम्मोवश्य नो टेष्टितमेपजिम्मेदाम 5 ॥ ६ ॥ ति म्ढे पश्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ हरि + ॐ ॥ व्य मोमतेतवमनस्तनूपुबिधंन 5 !! प्रजावन्द 5: मचेमहि ॥ १ ॥ एप मद्रभाग 5 महस्वनाम्धि- कयान पथस्वाहपतेन्द्रभाग 5 श्राखुम्नेपरा : ॥ २ ॥ अर्ब रुद्रमंदीमहदेवाम्बकम् ॥ या नोव्यम्यसन्कर द्यवान 5 श्रेयसःकादुद्यर्थानोत्र्यवमायान् । ३ ॥ पजममि मेषजग- 'वेश्वायुपुरुषायभेषजम् । सुसम्भपायमेध्यै ॥ ४ ॥ त्र्यम्बकंप्यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिटवर्द्धनम् । नकिमि बन्धनान्मृत्योम्मदीयमामृतात् ।। अम्बकंप्यजामहेमुगन्धिम्मनिपटनम् ॥ उरिकमियन्धनाद्वितोमुंक्षी युमामुत ॥ ५॥ पुनत्त । नद्रावमने पर मजवरची'तही ॥ अवतत धन्यापिनाकवास 5: कृत्तिवासाऽयहि मन : शिवोतीहि ॥६॥ ध्यायुपजमदग्ने : कश्यपरय अायुषम् ॥ य वेधुत्र्यायुपन्तन्नोऽअनु. ध्यायुपम् ॥ ७ | शोनामामिवर्धितिस्तेपितानमन्तेऽत्र प्रस्तुमामाहि । मी : ॥ नित्तयाझ्या पेनार्याय जनगायायाप्पोपायमुपजाम्त्वा. यंमुवीर्याय ॥८॥ उनि ने पष्ठोध्यायः ॥ ६॥ हरि : ॐ ॥ उप्रश्च । भीमरश्नध्वान्तरघघुनिश्ममासहाँ रचामियुग्वारिधि : स्वादां ॥ १॥ अग्नि । ददयेनाशानि । दयाशंपगुपनि नयनमसंयुक्ना ॥ शम्मनाम्यामोशी- नम्मुग्न्युनो महादेव नन्न पत्रोनोग्नदेयटरनिटुनामि मनु: शिहीनिहोरयान्याम् ॥ २॥ उग्मोहितेनमिन मान्येन दुन्नोख्यायिनेन्टरप्रवीनमरतोपनमाययाप्रमुदा ॥ मध्य- पट्टायांव : पायामहादयस्यय र ध्यावनि, पशुप: पुरीतन् ॥ ३ लोमभ्य : स्वाहा लोमन्य : स्वाहात्वचे स्वाहात्वचेखाहालोहितायखाहालोहितायुवाहामेदौम्य स्वाहा मेदोभ्य स्वाहा । मा ५ सेन्भ्यः स्वाहामा । सेन्म्य : स्वाहास्त्रावमय : स्वाहास्नाभ्य: स्वाहा स्थन्म्य : स्वाहा स्त्यम्म्य स्वाहाम उजन्भ्य : स्वाहा मुज्जम्भ्य : स्वाहा रेतसे स्वादापायवेस्वाहा ॥ ४ ॥ आयासाय स्वाहा पायामाय॒स्वाहासंच्यासायुवाहां ब्वियासायस्वाहोगा- सायस्वाहा ।। शुचेस्वाहाशोचस्वाहाशोचमानायम्बाहाशोकायस्वाहा॥५॥ तपस्वाहा । तप्यते स्वाहावय॑मानायस्वाहा । तप्ताय स्वाहापाय स्वाहां। निष्टछत्त्य॒स्वाहाप्रायश्चित्यै स्वाहा भेपजायस्वाहा ॥ ६ ॥ यमाय- महान्तकायस्वाहामृत्यवे स्वाहा ॥ बाणेस्वाहावयहत्यायै स्वाहा विश्वेभ्योदेवेभ्य: स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या स्वाहा ।। ७ ।। इति रुद्रे सप्तमोऽध्यायः॥७॥ हरि ॐ । वारश्च । मेप्रसुवश्चमेप्रय॑तिश्च मेप्रसितिश्श्न- चमेधीतिचायनरच्चमेस्वरश्रूव मेश्लोकरश्चचमेश्वरश्नमेश्रुति- श्चमेग्योतिश्चमेस्त्ररश्चमेयझेनं कप्यताम् ॥ १॥ प्राणरचन मेपानश्चमेव्यानरमधमेमुश्श्चमेचित्तबम् । अाधोतंचमेववाश्चमे- मनश्चमेचतु शमेनोमेदश्वमेवलपचमेयो ने करपन्ताम् । भोजश्च । मेसईरस म 5 आत्मायमेनुनश्चमे शमनमेवर्मनमेगा- निचमेस्यौनिचमेपरू. पिरमेशवराणि चमऽआयुरश्नमेजरामेयझे नंकल्पन्ताम् ॥३॥ ज्यैपञ्चमाधिपत्त्यञ्चमेमन्युश्चमेमामश्श्य. मेमर चमेम्मश्श्चमे जेमान मेमहिमा मेनारिमार्चमेप्रथिमार्चमेव्वषिमा. मैदाधिमाननेवृद्धयमेव्युद्धिश्चमे यझेन करपन्नाम् (न०) ॥ मृत्यच मे युद्धाचमेजगंजमेपनयमबिश्वमेमईम्प मेकीहाच भोवमेवान चमेनानिष्प्यनाएञ्चमे मुमचमेतक- मेयने नकर पन्दाम् ॥ ५॥ अनम्य । मेमन गोयाममटमेनामभमे जीवा- तुश्श्यमे दीर्घायुक-चमेन मित्रा चमेमयन्त्रने मुमश्चमेशर्यनश्चमेस्म्या- ररूपमेमुनि चमेयोनकराताम् (1 ६ ॥ दन्तार्च । मेधर्नामे मरनेतिरस्थमे विकसमे महरवमे संक्षिपने सान मेमचमेमूर मेमाराम जयश्चने यौनकम्प्यन्ताम् ॥ ७॥ - [ ११२ ] शर्छ । मेमपश्यमे रियश्चमेकाम कामरयमेमोमनसमेमर्ग- रश्चमेद्रविणमेमद्रनमेयरधमेबसीयम्मेवश्चमे यशेनकलप- न्ताम् ।। ॥ (न. ) ! उनी । मे मुनृताच पर्यश्चमेरसंरचमेत मेमधुचमेसविरममे सपौविश्यमे पिपृष्टि चमेरठयमूऽबौद्रि- घनमेगनकल्पन्नाम् । ६ ॥ रयिश्च । मेरायश्चमेपुष्टएचमेपु- प्टिरपत्रिभुचीप्रभुचमेपूर्णश्चमे पूर्ण तरञ्चमेकुवमर्पितञ्चमेनचुम क्षुभ्यमेवजे पन्ताम् ॥ १० ॥ जितश्च । मेव्वेश्चमेभूत-मेभविष्य- नमे मुगचगेसुपर यश्चम ऽशुद्धश्चम ऋविरथमेकतृप्तवमेक्तृप्तिरकमेम- विममसुमतिश्चमेयुजेनक्लप्पन्ताम ॥ ११ ॥ श्रीहर्यश्च । मेयगोरखमेमा. पश्चिमेतिलाइच मुद्गारच गेम्वाल्वारश्चमे प्रियज वररचमेणवरचने श्या. माश्चिमेनीवारांश्चमेगोधमाश्चमेमसूरीश्चमेयन कल्प्पनन्ताम्॥१२॥ (न.) श्रमाच । में मृतिकाचमेगिरयरथमे पर्वतानसिकता राव- मेवनागतयशमे हिरणए पश्चमेयरम मेश्यामकामे लौइन्चमेसीसंभमेत्र- पुंचमेनकापन्ताम ॥ १३ ॥ अग्निश्च । ममाश्निमेवीमघरचम sोर्पायश्चमेटपच्या मे कृष्टपूच्चारमेाम्म्याचमेपर्वऽपा रएएवार मे िवृत्तश्यसेवितिरश्चमे भूतंचमभूतिश्य मेपशेर्नलल्प्पन्ताम् ॥ १४ ॥ अर्मुच । मेऽत्रुसतिरश्मयम्मे कलर्मचमेशतिश्चमेररम ऽएमचम यान गरिनमे युद्धेनं फलपताम् ॥ १५ ॥ (न०) । गिनरर्थ । म इन्द्रसमेमोमरसम इन्टेश्चमे सविताचम इ. रएच सरस्वती मन्दिरचीपूषाचमऽइन्द्ररश्यमेवहस्पतिशमऽइन्द्ररथ मे यो कापतान् ॥ १६ ॥ मित्रत । मन्तश्चमेबरण समटन्देश्यम धानामुऽन्द्ररत्वष्टांच महन्द्रश्यमेमन्तश्चमान्द्र रनविच देशाऽइन्द्रश्यमेयतेनका पन्चाम || १७ || पृथिवीर्य । मऽन्द्रवन्तरिक्षमस्ट्रशवमे चोयमन्त्ररथमेसमास्यम्। सन्दासमेन माणि अमऽइन्द्रश्यदिगमऽइन्द्रशमेयुसेनकल्प्य- ताम् । १८ ॥ [ न० 1 ॥ अतुर । मेम्मिश्यमेदाम्म्य रामधिपतिशयमा ५ शुरुवर्षमन्नमियम इन्द्रयापरब मेमेगावा पाश्चमऽ प्राशिवनग्य मे प्रतिमायारप मेगुमरामेमन्धी मयान पन्नाम् ॥ १६ ॥ प्रापयणगय | मधेशव परपरण वश्चमे वैश्या नरसश्चमद्रागिनरचमे महावैश्वदेवश्च मे 'मरुत्वतीयांश्चमेनिक्कैवल्लयश्श्यमे सावित्रंश्चमेसा रम्वतश्श्चमेपास्नोवतरच मेदारियोजनश्चमेयशेनंकल्प्पन्ताम् ॥ २० ॥ सुश्श्च मे चमसाश्चमे वायळ्यानिः चमेद्रोणकलशमे प्रावाण- रश्चमेधिपर्वणेचमेस्तभृच्चमाधवनोयश्चमेवदिश्चमे हिश्यमेवभृथ- श्चमे स्वगाकारश्च मेमशेर्नकल्पन्ताम् ॥ २१ ॥ [ न.] || अग्निश्च । मेघम्मश्चमेकर्कश्चमेसूरनमेमाणपत्र मेश्श्वमेघश्चमेथिवी चमे दितिश्च्चमे दितिश्चमेद्योश्च्चमेड गुलय : शम्चवरयोदिशश्नमे युझे न कल्प्पन्ताम् ॥ २२ ॥ तच । मऽऋत वश्च्मे तप॑श्चमे सव्वत्सर- रश्चमेहोरात्त्रेऽष्ठीवै वृद्रयन्तरे मेयने नकलप्पन्ताम् ॥ ३॥ [न.] | एकाच । मेनिस्रश्श्चमे निश्चमेपञ्चचमेपनचमेसुप्प्तमे सुप्तचमेनचमे नबचमएकादशमएकादशचमे त्रयोदशचमे त्रयों- दशचमे पश्चदशमे पञ्चदर्शनमेमप्नदर्शचमे सत्तदरांचमें नवंदश बमेनर्वदशवमारकवि / शनिश्चमकैरियं शतिश्चमेस्त्र. योविशतिश्श्च मेस्त्रयोवि शनिश्चमेपचविशतिश्च्चमेप व शतिरश्चमेसप्प्तर्वि शनिश्श्चमे साप्तर्वि । शतिश्श्नमे नववि । शतिश्चमेनववि | शतिश्श्चम एकत्रि शच्चमऽएकत्रि । शच्चमे. त्वयत्रि , शयमेयने नकापन्ताम् ॥ २४ ॥ [न० ॥ चत्र. रच्च । मेष्ठौचमेष्टीचमे द्वादशचमे द्वादश वमेषोडशचमेपोर्ट चमेवि शति श्चमेवि । शातिर्चमेचतुवि । शतिश्श्चमे चतुर्वि । शति- श्च्चमेष्टावि, शतिश्चमेष्टावि छ शतिश्चमेद्वास्त्रि , शञ्च द्वात्रि ॥ शच्चमेपटात्रि , शचनमेपरत्रि शरमेचत्वारि । মানবাহি এ ঘটমবি ৬ মাঘলুংহবাহি ৪ शश्चमेष्टाचत्वारि ॥ शञ्चमेयुझे नकलप्यन्ताम् ॥ २५ ॥ [ न० ॥ ध्यविश्च । मेव्यवीचमेदित्त्यवाट्चमेदित्योहोवमेपञ्चाविश् चमपञ्चावी- चमेत्रिवत्सरसमे त्रिवत्सार्चमेतुर्दावादमेतुय्याहीच मेयशेर्नकलपन्ताम् ॥ २६ ॥ पुष्टवाट्च । मेषष्ठीहीचमऽउक्षा मेव्यशाचमऽऋषभरचमेब्बे. हमनड्वॉश्चमेधेनुश्चमेयलेनकलपन्ताम् ॥ २७ ॥ [ न० ] व्याजाय स्वाहा असवाय स्वाहापिजायस्वाहाक तवेवाहाव्वमवेस्वाहातुर्पतयेस्वाहा ॥ १ [ ११४ ] हाम्न्हे मुग्धाय स्वाहामुग्धार्यव्यैन । शिनाय स्वाहाविन । शिनं 5- मान्त्यायनाय स्वाहान्त्यायभावनाय स्वाहा भुवनस्यपतयेखा हाधिपतये- खाहाप्रजापतयेस्वाहा ॥ इयन्तेरारिम्मताययेनतासियमनत्वाख- एयरवाजानान्त्याधिपत्याय ॥ २८ ॥ श्रायुयज्ञेन । कल्पनाम्पाणो. यज्ञेनकल्ल्पताकपर्यशेनकल्पता श्रोत्रयजेनकल्पतांग्यागयझेन कल्पताम्मनोयक्षेनंकल्प्पता मात्वमायझेन कल्पताम्नमायझेने कल्पता. उज्योतिर्व्यनेन कल्प्पता स्वीशे कल्पताम्पुष्टष्ठन्यज्ञेन कहप्पायुज्ञोले- नेकपनाम् ॥ स्तोमरचयर्जुश्च ऋक्यसामवृरथन्त रूच । खदेवयाऽयगन्नमामृतांऽअभूमप्रजापते 5 प्रजाऽशभूमवेट्स्वाहा ।। २६ ॥ इति रुद्रे श्रष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ ऋचंबाचुम्मपद्येमनोयजु : पद्य सामाणम्प्रपंचेचनु छ ओचम्प्रपद्ये ॥ व्यागोज सही जो मयिष्याणापानी ॥ यन्मद्विब्य पोदयस्य॒मनसो- वानिणादृहस्पतितधातु शोभवतुभुवनस्ययस्प- ति ॥ २ ॥ भूभुवः । तत्सवितुर्वरेण्यम्मी देवस्यधी महि ॥ धिोयोन + प्रिपोदयात् ॥ ३ ॥ कानरिश्च अऽआमुर्वदूती. मदाध : सस्त्रां ॥ कयाशविधयान्यता ॥ ४ ॥ कस्त्वा । सत्योमवा- नाम्म । हिमोमसमन्वंस 5 ॥ ढाचिदाजेबसु ॥ ५ ॥ अभीषण : सानामवितारिनु णाम् ॥ शतम्भवास्यू तिमि ॥ ६॥ कयात्त्व- ऽत्याभिप्रमन्दसेव्पन् ॥ फांस्वोतन्म्य प्राभर ॥ ७ ॥ इन्द्रोनि- यम्यरागनि ॥ शन्नोऽप्रस्तुविपदेशचतुष्पदे ॥ ८॥ शन्नोमिम: शंवरण 5: शन्नोभवत्वर्ण्यमा ॥ सन्ऽइन्द्रोहस्पिति : शमोयिष्णु- गर्नकम ॥ ८ ॥ राम्रोया। पवद्या शन्नस्तपतुसूयें। शन 5 कनिमहादेव 5. पर्जन्योऽभिवतु ॥ १० ॥ अनिशम्म वन्तुन श. रात्री : परिधीयताम् ॥ शन इन्द्रागनीभवताम: योग शन्नन्द्रायणास्तव्या || शऽन्द्रापूषणाव्वा माती. रामिन्द्रामामामुवितायराग्योः ॥ ११ ॥ शनीदेवीरभिष्टगामापोभवन्तु- पीतये ॥ रांगोभियन्गुन ॥ १० ॥ म्यानाधिषिनोमवान्नृपरा. नियनी ॥ ययान : सम्भारप्रया ॥ १३ ॥ भादि । घामयोभुवः ॥

[ ११५ ] स्तानऽजेंदधातन || मझेरपाययक्षसे ॥ १४ ॥ यो + शिवतमोरस- स्तस्यमाजयटेहन ॥ शतीरिवार * ॥ १५ ॥ तस्म्माऽधरणमाम- योयत्ययायजिन्य ! अपोजनयथावन : ॥ १६॥ दुधौ : शान्ति रन्तरित , शान्ति - पिवीशान्तिराप : शान्तिरोषधय : शान्ति ॥ वनस्पतयः शान्तिविश्वेदेवा : शान्तिदशान्ति : सर्व । शान्ति : शान्तिरेवशान्ति : सामाशान्तिरेधि ॥ १७ ॥ हद ईमा- मित्रस्यमाचनुपासर्वाणिभूतानिसमीदन्ताम् ॥ मित्रस्याइन्न पा सर्वाणि भूतानिसमाते । मित्ताम्यनाटुंपा समीक्षामहे ॥ १८ ॥ दृते । हमा । ज्योतमन्दर्शिनोळयासम्न्यो सन्दर्शितोळ्यासम् ॥ १६ ॥ नमसरोहरसेशोधिनमस्तेऽमस्वपि ॥ अन्याँरतेऽधरम्मत्तपतन्तुहेतयः पात्रकोऽ अस्मभ्यं शिवोभय 5॥२०॥ नमस्ते अस्तुब्बियुतेनमस्तेस्तन- यिलये ।। नमस्तेमगवन्नस्तुया : स्य समीदसे ।। २१॥ यतोयत: समीइसेततोनोऽभर्मयत रु ॥ शन : कुरुष्पजाम्भ्योभयन्न : पशुन्य ॥ २२ ।। सुमिन्त्रियानऽनापऽभोपंधय : सन्तुदुनिशियास्तरम्मै सन्तुयोरम्मान्द्वेष्टिटयन्वयििहटग्म: ॥ २३ ॥ तदुपहि- तम्पुरत्वाच्छुक्रगुपरत् ॥ परयेमश : शतडीनशरद शत। अणुयामशरदः शतम्घनत्रामशरद : रामदीना : स्यामशरद: श- तम्भूयारमशरदः शतात् ॥ २४ ॥ इति रुद्रे शाम्त्यध्यायः ॥ ६ ॥ अथ मद्रे स्वस्तिप्रार्थनामन्याऽध्याय, दरियों स्ववन्तिनइ द्रोप्युद्वश्र्धना : स्वस्तिन : पुपाधि- श्यवेदा ॥ स्वन्तिनगायोऽधारिष्टनेमि : स्वस्तिनो सुस्प्पतिर्दधातु ॥ ओं एवं पृथिव्याम्पय. भोपधीषुपयोदि व्यतिरिसेपोवा पर्यायवी स्मृदि. श सन्तुमभयम् ॥ २ ॥ भो विम्योरपाटममिन्यिप्णों म्नस्तस्यो विष्णो : स्यामि विस्यौदा योसि ।। ष्णुवर्म- सिविष्णवेत्त्वा ॥ ३ ॥ ओं मानवतावाठोरेयापर्यो देवता चन्द्रमदिवतावमपोदेवनारदादेवा दित्या देवामुमोदिपतान्यिारय- १ : 5:

S: [ १२६ } देवादेवताहरूपनियतेन्द्रौदेवतावरगोटेवा ॥ ४ ॥ ॐ सुघोगाव- प्रपद्यामिसुद्योजातायनमोनम: ॥ भवेमवेनाविभषेभवासम्ममृवोईवा. पूनम : ॥ ५ ॥ वामदेयायनमाध्यमायनम में श्रेष्ठायनमोरुद्रापन 5: सायनम : कन्तविररणायनमोवी विकारणायनमोगलायनमोवन- प्रमथनायनम संदभूतामनायनमोमोन्मनायनमं 5 ॥ ६ ॥ अधोरेग्योयूद्योरम्योघोरपोरतरभ्य ॥ सभ्य : मशम्योनम- स्तेऽस्तुमहरुपेम्य : ॥ ७ ॥ तत्पुरुषायविशमहादेवार्यधीमहि ।। तन्नोस्ः प्रचोदयात् ॥८॥ ईशान विद्यानामीश्वर : सहा- भूदानाम् ॥ प्राधिरनिर्माणाधिपतिर्मोशियोमै अस्तुसदाशिवोम् ॥ ६ ॥ ॐ शिदोनार्मामिम्बधितिम्तेपिता नमस्तेऽअम्नुमामाहि सो : निबत्तयाम्म्यायुपेन्नाधायप्रजननायरायस्पोपीयनुप्रजास्त्वार्य- सुवीर्य्याय ॥ १० ॥ * ब्धिशानिदेवसवितर्दुरितानि परसुव ॥ यद्वन्तनु भामुंव ॥ ११ ॥ ॐ दो शान्तिरन्तरिक्ष । शान्ति + पृथिवीशान्निराप ॐ शान्तिोषधय 5 शान्ति : ।। वन- पतय शान्तिविरवदेश : शान्तिब्रह्मशान्ति : मशान्ति s: शान्तिोवशाnि : मामाशान्तिरेधि ॥ १२ ॥ ॐ सूत्रेपोवा- येपवेदाना । रोमाममोपात्रमेनतद्वेदाना । रसेनाभिपियति ॥ १३ ॥ इति म्यस्तिप्रार्थनामन्याऽध्यायः॥ ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तिभवतु । सर्वारिष्टशान्तिर्भवतु ॥ पनेन तेन हद्वामिककमा श्रीमानीशद्वर- महामहः प्रीयता: मम । ॐ सदाशिवायमस्नु ॥ इति ।। अथ श्रीशिवसहस्रनाम दारभ्यते। . व्याम याच ॥ एकदा मुनयः मर्षे द्वारिक दामागताः ।। बामवंग मोठाः कृष्णदर्शनसानमाः ॥ १ ॥ मातु भगवान श्रीवः पूर्ण च परिक्षिा तेपामाशीदती गृण बहुमानपुरःसरम 1 पृष्टः व्ययामाम झुगारप्रभृत र यन् ।। चरित मूमिमारप्नं लोगनन्द परं पम् ।। । ॥ मारयमुन्गः म मायादिरकियोस्थिमाः ॥ सामानमयो म मा गामि Ire || सूर्मोपल्यानमन्या [ ११७ ] च स्मृतिधर्ममनुस्मरन । शिवपूजां ततः कृष्णो गन्धपुष्पाक्षतादिभि ।। ५॥चकार विधिवद्भक्त्या नमस्कारयुतां शुभाम् ॥ जय शङ्कर सोमेश रक्ष रक्षेति चाबवीत् ॥ ६ ॥ जजाप शिवसाहसं मुक्तिमुक्तिप्रदं विभो । अनन्यमानसः शान्तः पद्मासनपरः शुचिः ॥७॥ ततस्ते 'विस्मयापना दृष्ट्वा कृष्णविचेष्टितम् ॥ मार्कण्डेयोऽवदाकृष्णं यहुशो मुनिपुङ्गवः।।।। मार्कण्डेय उवाच ॥ त्वं विष्णुः कमलाकान्तः परमात्मा जगद्गुरुः ।। तव पूज्यः कथं शम्भुरेतत्सर्व वदस्व मे || ६ || व्यास उवाच ॥ अथ ते मुनयः सर्वे मार्कण्डेयं समर्पयन् ॥ वचोभिर्वासुदेवस्य टं साधु त्वयेति च ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ साधु साधु मुने पृष्टं हिताय सफलस्य च ॥ अज्ञातं तव नास्त्येव तथापि च वदाम्यहम् ॥ ११ ॥ दैवतं सर्वदेवानां सर्वकारणकारणम् ज्योतिर्यत्परमानन्दं सावधानमतिः शृणु ॥ १२ ॥ विश्वसाधनमीशानं गुणातीतमजं परम् ॥ जगतस्तस्थुपो ह्यामा मम मूलं महामुने ॥ १३ ।। यो देवः सर्वदेवानां ध्येयः पूज्यः सदाशिवः ।। स शिवः स महादेवः शङ्कररच निरन्जनः ॥ १४॥ तस्मा- धान्यपरो वेदलिपु लोकेषु विद्यते ॥ सर्वज्ञः सर्वगः शम्भुः सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ १५ ॥ पठ्यते सर्व वेदान्ते मिद्धान्ते यो मुनीवरी ॥ तस्मिन्भक्तिर्महादेवे मम धातुश्च निर्मला ॥ १६ ॥ महेशः परमं , ब्रह्म शान्तः सूक्ष्मः परात्परः ॥सर्वान्तरः सर्वसाक्षी चिन्मयस्तमसः परः ॥ १७ ।। निर्विकल्पो निराभासो निःसङ्गो निरुपद्रवः ।। निर्लेपः पुरुषाध्यक्षो महापुरुष ईश्वरः ॥ १८ ॥ तस्य चेच्छाभवत्पूर्व जगत्स्थित्यन्तकारिणी।। वामागादभवत्तस्य सोऽयं विष्णुरिति स्मृतः ॥ १६ ॥ जनयामास घातारं दक्षिणासासदाशिवः ॥ मयतो रुद्रमीशानं वालात्मा परमेश्वरः ।। २० ॥ तपरतपन्तु भो वत्सा अनत्रीदिति वा छवः ॥ ततस्ते शिवमात्मानं प्रोचुः संयतमानसाः ।। ३१ ॥ स्तुत्वा तु विविधैः । स्तोत्रैः प्रणम्य छ पुनः पुनः ॥ अझविष्णुमहेश्वरा ऊचुः । तपः केन प्रकारे कर्तव्यं परमेश्वर ॥ २२ ॥ हि सर्वमशेपेण स्वात्मानं येत्सि नापरः ।। शिव उवाच ।। फायेन मनसा वाचा भ्यान-पूजाजपादिमिः ॥२३॥ फामक्रोधादिरहितं तपः 'कुर्षन्तु भो सुराः ॥ देवा ऊचुः ॥ यया यत्कथितं शम्भो दुझें यमजितात्मभिः ॥ २४ ॥ सोम्योपावमतो प्रदान घद कारुण्ववारिधे ॥ शिव उवाच ममसुत्रताः ॥ २५ ॥ यया मंसारमग्नानां मुक्तिर्भवति शाखती गवन्तु सविधानं हि महापातकनाशनम् ॥ २६॥ पठतां भवता मयो मुशि म्यादनपायिनी ॥ ब्रह्मचारी कृमम्नानः शुक्लवासा जिसेन्द्रिय ॥२७भस्मवारी मुनिमांनी पदमामनममन्वितः यावा मा पला ॥ सहस्रनाममद्विद्यां जपन्तु

। ११८ ।
घोश निराकार मुनी वरम् | ८ || पावतीसहित श अटामुकुटमण्डि
दम् ।। वमान चम्म वैयात्र चन्द्रार्द्धतशेखरम् ॥ २६ ॥ यम्बक हि
वृषान्ट कृत्तिवाससमुज्मलम् ।। मुरचिवपदद्वन्द दिव्यमोग सुमुन्दरम्
॥ ३० ॥ विधा । मुप्रसन्न च ठार च वरामयम् ॥ दुद्धप कमलासीन
नागपनापतिनम् ।। - ॥ विश्वकाय चिदानन्द शुद्धमतरमव्ययम् ।
सदनागिरस शम्भुमनन्तकरसयुतम् !! -२ ॥ सहचरण दिव्य साम
सूयाग्निलोचनम् ।। न योनिमज ब्रह्म शिनामाद्य सनावनम् ॥ ३३ ॥
प्राकराज दुप्लेन मूयकाटिममप्रभम् ॥ निशाकरकलाशान्त भेपन
मरागिणाम् ॥ ३५ ॥ पिनाकिन विशालाच पशूना पतिमीश्वरम् ।।
कानात्मान कालकाल ग्वदेव महेश्वरम् ॥ ३५ ॥ ज्ञानवैराग्यसम्पन्न
योगानन्मयं परम् ।। शानश्वय्यसम्पन्न महायोगी वरेश्वरम ।। ३ ।।
समरसशठि सयुक्त पुण्याय दुरामदम् ।। तारक अझ सम्पूर्ण मणीयाप्त
महत्चमम् ॥ ३८ । यतीना परमं नझ यताना तपस फलम् ।। सयमिह
समामीन वपरितमनमम्पनम् ॥ ३८ ॥ विपीन्द्र विष्णगुनमित मुनिसिद्ध
निषेवितम् ।। महाय महात्मान वानामपि देवतम् ॥ ३ ॥ अथ शिव
कवचप्रारम्म ॥ शान्त पनित्रमोदार ज्योतिषा ज्योतिरुत्तमम् । शङ्करा
मे शिर पातु ललाट भालज्ञोचन ॥४०॥ विश्वचक्षु दृशौ पातु रही
मम ध्रुवावपि || Tरडी पातु महगान श्रुतौ रक्षतु पूवन ।। ४५ ॥ कपाली
मे महार पातु नामा मदाशिव ॥ मुम पातु हनिमोक्षा श्रोष्ठी पातु
महयर. ॥ ८ ॥ दन्तान् रननु वन्द्रस्तालु सोमकलायर ॥ रसना
परमानन्द पातु गन्ली शिवाप्रिय ॥ ४३ ।। चिनुक पातु मे शम्मु रम
धून शत्रुविनाश । पूर्व पातु मन कण्ठ नीलकण्ठोऽवतु ध्रुषम्
॥४|| सन्धी स्कन्धपविवाह वइस्तधर मदा ॥ नाबाहु महानाय्य
करो विवुधमराम ॥ ४५ ॥ श्रम गुला पातु पञ्चास्य पत्राणि च सदन
पात् ।। हृदय पातु सर्वात्मा स्वनी पातु पितामह ॥४॥ पदर हुमुक्पातु
मप्य मे मध्यमेश्वर ॥ कृतौ पातु भवानीशा पृष्ट पातु कुलेश्वर ॥४॥
प्राणान्मे प्रापद गनु नामि माम काट दिनु । सक्यिनी पातु मे मगा
जानुनी जनकाधिप । ज पुररिपु पातु चरणो मयनाशनः ।।
राग पातु मे शर्श बामनाभ्यन्तर शिव ॥४॥ इन्द्रियाणि हर
पातु सया पपवदन ॥ पूर्व पातु म पातु दहिणे यममदन ॥ ५० ॥
पामग्या मलिलाधीश -दीच्या में महायर ॥ शान्या पातु भूनेरा
ग्रामप्या रविन पन ।११ | मैत्या मूवम् पातु वायव्या वलयद्धन ॥
पातुमय पाय संसारनारान 1५॥ सर्वन मुसद पातु युक्षि
पानुमापन । एस म्यारदिशा मापाच्यम्मुस्पा ममम ॥ ५ ॥

[ ११६ ] नमो हिरण्यवाहव इति पठेन्मन्त्रं तु भक्तितः ॥ नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय हिरण्यपतयेऽम्बिकापतये पशुपतये नमो नमः॥ ५५ ॥ मद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय चै नमो नमः॥ भवे भवे नातिभये भवस्वमां भवोद्भवाय नमः ॥ ५५ ॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नम. क्लविकरणाय नमो बलविक- रणाय नमो पलाय नमो बलप्रमथनाय नमः मर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ५६ ॥ अघोरेशेऽय घोरेभ्यो घोरघोरतरेयः ।। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेम्य ॥ ५७ ।। तत्पुरुपाय विद्महे महादेवाय धीमहि ॥ तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ ५ ॥ ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिझा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् || ५ || सद्यो जातादिभिर्मन्नमस्फुर्यात्सदा- शिवम् ॥ ततः सहस्रगामेदं पठिनव्यं मुगुक्षुभिः ।' ६० ॥ सर्वकार्य- करं पुण्यं महापातकनाशनम् ।। सर्वगुह्यतमं दिव्यं सर्यलोकहितप्र. दम् ॥ ३१ ॥ मन्त्राणां परमं मन्त्रं भवदुःसपङ्कर्मिहत् ॥ भयान- न्यासः॥ ॐ नमः शिवायेति षडङ्गन्यासः । ॐनमः शम्भवाय च हृदयाय नमः ॥ ॐ नमो भवाय प शिरसे स्वाहा 11 ॐ नमः शङ्कराय च शिवाय यपट् ॥ ॐ नमो मयस्कराय च कवचाय हुम् ।। ॐ नमः शिवाय च नेत्रत्रयाय योपट् ॥ ॐ नमः शिवाय शिवस. राय प अनाय फट् ॥ नमोऽस्तु स्याग्गुरूपाय ज्योतिर्लिनामृतात्मने || चतुतिवपु स्थाय भूपितागाय शम्भो ॥ ॐ भस्य श्रीयेदसाराख्य. परमदिव्यशियसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य नागयण ऋपिरनुष्टुपन्दः ॥ सदाशिवो देवता ॥ ॐ नमः इति योजम् ॥ शिवायेति शतिः ॥ चैतन्यमिति कीलकम् ॥ सदाशिरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ अयच्या. नम् ।। ॐ कोटिसूर्यप्रतीकाश त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ शूलटगदाचम- पुनपाशधरं विभुम् ॥ ॐनमः पराय देयाय शङ्कराय महात्मने । कामिने नीलयएठाय निर्माय फ्पर्दिने ॥१ निर्विकल्पाय शान्ताय निरहवारिणे नमः ॥ अमर्याय विशालाय शूलहस्वाय ते नमः ।।२।। निरन्जनाय शर्शय निःशंकाय परात्मने ॥ नमः शिवाय मगाय गुणातीताय येधमे ॥ ३ ॥ महादेवाय पीवाय पार्थवीपतये ममः ।। कैवल्याय महेशाय विरक्षाय युधात्मने ॥ ४ ॥ य याय मुपेशाय निहाय स्वापिणे ॥ नमः सोमाय भूगार पानायामितेजसे मराय जगलिने जनगप पिनापिने निराधाराय सिंहाय माया. सीताय से नमः ॥ ६ ॥ घोडाय मयंभूताय पाना पमये नमः ॥ पुरमाय माय पुरुषाय महीगमे ॥ ७ ॥ महामन्तोषरूपाय मानिने ॥ नम ॥ [ १२० ] शुद्धयुद्धये ॥ बुद्धाय बहरूपाय ताराय परमात्मने ॥ ॥ पूर्वजाप मुरेशाय ब्रह्मणेऽनन्तमूर्तये ॥ निरक्षराय माय कैलासपतये ॥ ॥ निरामयाय कान्ताय निराकाराय ते नम मलिलात्मस्वरूपाय सोऽह तत्त्वाय ते नम ॥ १० नि- लम्पाय नित्याय नित्याया पतये थात्मागमाय कव्याय पूज्याय परमेष्ठिने ॥ ११ | विर्तनाय भीमाय शम्भवे विसरूपिणे ॥ हंसाय हसनाथाय प्रसिद्धाय नमो नम ॥ १२ ॥ परात्पराय मद्राय भवायालयशातये ॥ इन्द्रहन्त्रे निधीशाय कालहन्त्रे मनश्यिने ॥ १३ ॥ विश्वमाने जगद्धात्रे जग नेने नमो नम ॥जटिलाय विरोगाय पवित्राय मृडाय व ॥१४॥ निरयद्याय धीराय निरातङ्काय ते नम ॥ नादाय रविनेत्रायव्योमकेशाय ते नमः ।। चतुर्भागाय साराय योमिनेऽनन्तमायिमे ॥ १५ ॥ धर्मिष्ठाय वरिष्ठाय पुरनयविघातिने । गिरिष्ठाय गिरीशाय वरदाय नमो नम । १६ ।। व्याघ्रचर्माम्बरायाय दिशापखाय ते नम ॥ परमार्थाय मानाय प्रमथाय स्वचतुपे ॥ १७ ॥ आद्याय शूलहस्ताय शितिकण्ठाय तेजमे ॥ उपाय वामदेवाय श्रीफरठाय च ते नम ॥२॥ विश्वेश्वराय सूर्याय गौरीशाय यगय च ॥ मृत्युब्जयाय वीगय वीरभद्राय ते नम 11 १६ || विरूपाक्षाय पिथये पहिननेवाय ते नम ॥ जालन्धरशिरच्छवे हविपे हितकारिणे ॥ २० ॥ महोकालाय वैद्याय द्युसूणेशाय ते नम ॥ नम ॐ काररूपाय मोगनाथाय वे नम ॥ २१ ॥ रामेश्वराय शुचये भीमेशाय नमो नम ॥ ज्यम्बाय निहाय केदारायनमो नम ॥ २२ || गद्गाधराय ययये नागनाथाय ते नम ॥ भीमप्रियाय महसे रश्मीशाय नमो नम ॥२३॥ पूर्णम भूतपतये सर्वज्ञाय दद्यालवे || धर्माय धनदेशाय जगधर्माम्बराय प ॥ २४ ॥ भालनेग्राय यशाय श्रीशैनपतये नम ॥ फुशानुरेवसे नीलमादिताय नमो नम ॥ २५ ॥ अन्धकामुरहन्त्रे पायनाय पहाय प॥ घेतन्याय त्रिनेत्राय दशनाशराय ॥२६॥नम सहस्रशिरसे जयल्पाय से नम । सहसपरणासाथ योगिहरबजयासिने ॥१॥ मद्योजानाय गन्याय सर्ययमयाय च। पामोगय प्रगल्माय गायत्री पामाय ॥ २८॥ शोमाधाराय विधाय नमो विप्रमियाय च ॥ पपाराय मुशाय स्वरूपाय ते नम ॥२॥ विरामाय यमाय पिणामाग मदिने । अधर्मशनये सापहन्दुभीमबनाय ॥ २० ॥ घाराप्रये तुभ्यं प्राणाय नमः ।। नमो मल पम्प याय मशिने ॥ ३१ ॥शय विमये पाय पत्रिणे ॥ मम' पमानापाथ गोपनगगाए १ ॥ ३३ ॥ ममय जनबीजाय कासमूट.

[ १२१ ] विपादिने । सिद्धेश्वराय सिद्धाय सहस्रवदनाय च ॥ ३३ ॥ नमः सहस्रहस्ताय सहस्रनयनाय च ॥ सहस्रमूर्तये तुभ्यं विष्णवे जितशत्रये ॥३१॥ काशीनाथाय गोत्रे ते नमस्ते विश्वासाक्षिणे हेत सर्व- चीजानां पालकाय नमो नमः ॥ ३५ ।। जगत्संहारकाराय विधावस्याय ते नमः ।। एकादशस्वरूपाय नमस्ते बहुमूर्तये ॥ ३६॥ नरसिंहमहादर्प घाविने शरमाय च ॥ भस्माम्यक्ताय तीर्थाय जाहनवीजन काय च ॥३७॥ देवदानवदैत्याना गुरवे ते नमो नमः ॥ दलिताब्जनभासाय नमो वायु- स्वरूपिणे ।। ३८ ॥ नमः स्वच्छस्वरूपाय प्रसिद्धाय नमो नमः ।। वृपध्व- जाय गोठयाय जगद्यन्त्रप्रवर्तिने । ३६ ॥ अनाथाय प्रनेशाय विष्णुशवं. हराय च ॥ हरिविधातृकलहनाशकाय नमो नमः ॥ ४० ॥ गदाहस्ताय वटवे गगनाय नमो नमः ।। कैवल्यफलदाने ते परमाय नमो नमः ॥४१|| ज्ञानगम्याय झानाय घण्टास्वप्रियाय च। पद्मासनाय पुपाय निर्वाणाय नमो नमः ॥ ४२ ॥ अयोनये सदेहाय ह्युत्तमाय नमो नमः ॥ अन्तका. लाधिपतये विशामातार ते नमः॥४३॥ कुरेरयन्वये तुम्यं सोमाय मुसिने नमः अमृतेशाय सौम्याय रोचराय च धन्विने ।। ४४ । प्रियं- पदाय दक्षाय यन्दिने विमवाय च ॥ गिरोशाय गिरित्राय गिरिशान्ताय से नमः॥ ५५ ॥ पारिजागय वृहते पञ्चयज्ञाय से नमः ।। तराय विशिष्टाय यालरूपधराय च ॥ ४६॥ जीवितेशाय पुष्टाय पुष्टानां पतये नमः ॥ भयहेत्यै हिरएयाय कनिष्ठाय नमो नमः ।।101 मध्यमाय विधाने च शूराय मुभगाय च ।। आदित्यठापनायाय पुण्यश्लोकाय ते नमः ॥४॥ महाददाय स्याय यामनाय नमो नमः ॥ नमस्तत्पुरुपायाय चतुईम्ताय मायिने । ४. | नमो धूर्जटये तुभ्यं जगदीशाय ते नमः ॥ जगन्नाधाय महमे लीलाविप्रधारिणे ॥५०॥ अभयाय नमस्तुभ्यममराय नमो नमः ।। प्रताप्राय नमस्तुम्पमभयाय नमो नमः ॥५१॥ लोपाभ्य नमानुम्यम- नादिनिधनाय च ॥ म्याहोपराय व्यवाय नमस्ने परमायालये स्यूलरूपाय नमः परशुधारिणे ॥ नमः गवाहस्ताय नागस्वाय गे नमः॥५३॥ परदामयास्ताय परटाइम्ताय ने नम ।। पामराय नमागुम्मम. शिवाय नमो नमः ॥४॥ महिमादिगुणेशाय पम्पप्रममा पुगताय गुलाप चबममनाप प॥५५॥ पुरपोरपाय पप्राप शिनुमाय नमो नमः ॥ माराम विपित्राय विपित्रगतये नमः ॥५६|| मिलाप गि निगुताय नमो नमः । परमेशप रोगय नमः परमा माला शोभापाय ॥ महापरमार नमना. KE पिता मारमाय ने मम। गाने m साप मार Rm मनपर पार पEATE ART - [ १२२ } परमज्योतिपे पनागर्भाय सलिलाय च ॥६०|| तत्वाधिकाय तत्वाय नमो दीर्घाय रगिणे । नमस्ते पाण्डु रङ्गाय गौराय ब्रह्मचारिणे ॥६५।। अणवे निष्कलायाथ सामगानप्रियाय च ॥ नमोऽक्षपाय क्षेत्राय नमस्ते पुण्य मूर्तये । ६॥ कलाधराय पूज्याय पञ्चाभूतात्मने नम ॥ निर्वाणाय च तथ्याय पापनाशकराय च ॥६३॥ विश्वतश्चक्षुपे कालयोगिनेऽनन्त रूपिणे ।। सिद्धसाधकरूपाय नमो मेदनिरूपिणे । ६४॥ अगण्याय प्रता पाय सुधाइस्ताय ते नम ॥ श्रीवल्लभाय निधये स्थाण मधुराय च ॥६५ ।। उपाधिरहितायाय नम सुस्तराशये ॥ नमो मुनीश्वरायाथ शिवानन्दाय ते नम ॥६६॥ रिपुष्नाय नमस्तेनोराशयेऽनुत्तमाय च ॥ चतुमूर्तिप • स्थाय नमो बुद्धीन्द्रियात्मने । ६७॥ उपद्रवहरायाथ प्रियसदर्शनाय च ॥ भूतनाथाय भूताय वीतरागाय ते नम ॥६८। नेप्काय निम्पाय पड चक्त्राय विशुद्धये ।। कुलशाय भूतभृते भुवनेशाय ते नम ॥६६॥ हिरण्य वाहवे जीवपरदाय नमोनम ।यादिदेवाय भय चन्द्रसजीवनाय च १७०।। हराय बहुरूपाय प्रसन्नाय नमो नम ॥ श्रानन्दभारतायाथ कूटत्याय नमो नम ॥७१|| नमो मोक्षफनायाथ शाश्वताय विरोगिणे ॥ यज्ञभोको सुपे णाय दत्तयज्ञविघातिने ॥ ७ ॥ नम सर्वात्मने तुभ्य विश्वपालाय ते नम । विश्वगर्भाय गर्भाय वेदगर्भाय ते नम ||७३॥ ससारार्णच मग्नाना दु राससारहेत ॥ मुनिप्रियाय जीवाय मूलप्रकृतये नम ॥ ५४ ॥ समस्त यधने तेजोमूर्तये ते नमा नम || श्राश्रमस्यापकायाथ वणिने सुन्दराय च ॥ ७ । मृगाणार्पणयाथ शारदायल्लभाय च ॥ पिचित्रमायिने तुभ्यमनकरिष्णवे नम १७६ ॥ वहिमुसमहादर्पमयनाय नमो नम || नमोऽधमूर्तये तुभ्य निप्पलकाय ते नम || ॥ नमो गाय भोज्याय यतनाथाय ते नम || नम || नमो मध्याय मुख्याय वसिष्ठाय नमो नम ॥ ७२ || अम्बिकापतये तुम्य महादन्ताय ते नम ॥ सत्यप्रियाय पत्याय प्रियनृत्याय ते नम || || नित्यतृप्नाय येदिने मृगहस्ताय ते नम ।। अस नारीश्वरायाय कुठारयुनपाणये ।। ८० ॥ वराभयप्रदान ते यहम्पाय न नम ॥ महार्याय मुमत्त्वाय फीस्तिग्माय ते नम ||२१॥ नम फूलगमायाथ यदान्तपटिनाय च ॥ अाताय श्रुतिमने पहुश्रुतितराय प प्राणाय नमस्नुम्य गन्यायग्राचारिगे। पाहीनाय घोडाय सांगतय नम ॥ ३ ॥ अनाप जननमाय नमस्तुभ्यं चिदामने ॥ रमझाय नमानुष्य रमनारहिनाय च ॥८४ ॥ अन्याय भूताय मदसापतये नम | प्रियाय पशप परण्योति म्यापिणे ॥ ॥ नमने মষ ন'দাবি শ্বাশয় । যিনিঘিনায়ানা ৪ চায় प॥८६॥ नमोऽन्तयामिा मयंदादिम्याव नमो नम ॥ परमणको [ १२३ ] पुराणाय नमो नमः ॥ ८७ ॥ वामदक्षिणपाश्र्वाय लोकेश हरिशालिने ॥ नमः सकलकल्याणदायिने प्रसवाय च ॥ ८८ ॥ स्वभावो मारधीराय सूत्रकाराय ते नमः ॥ विषयार्णवमग्नानां समुद्धरणसेतवे ।।८६ ॥ अस्ने- हस्नेहरूपाय वार्ताविक्रान्तवर्तिने ॥ यत्र सर्वयतः सर्व सर्व यत्र नमो नमः || ६ || नमो महावायाथ भास्कराय नमो नमः | भक्तिगम्याय भक्तानां सुलभाय नमो नमः ॥ ३१ ॥ दुष्प्रधर्षाय दुष्टानां विज्ञ याय विवेकिनाम् ॥ अलौकिकाय लोकाय ह्यलोकाय नमो नमः ।। १२ ॥ पूरयिने विशेषाय कुशलाय शुभाय च ।। नमः कपूरंगौराय सर्पहाराय ते नमः ॥ ३ ॥ नमः संसारपाराय कमनीयाय ते नमः ॥ वह्निदर्पविघाताय वायुदर्प विघातिने ।। ६४ ।। जरातिगाय वीर्याय वेद्याय व्यापिने नमः ।। सूर्यकोटिप्रकाशाय निष्क्रियाय नमो नमः ।। ६५ ।। चन्द्रकोटिसुशीवाय कपिलाय नमो नमः ॥ नमो गूढस्वरूपाय निश्चलाय पराय च ॥ ६ ॥ नमः सत्यप्रतिज्ञाय नमस्ते सुसमाधये ॥ एकरूपाय शून्याय विश्वनाभि- हृदाय च ॥ १७ || पर्वोत्तमाय लोकाय प्राणाय सुहदे नमः । नमः परायणायाथ चिन्मात्राय नमो नमः ॥६॥ भ्यानगम्याय ध्येयाय ध्यानरूपाय ते नमः || नमस्ते शारवतैश्वर्यविभवाय नमो नमः ॥ ६ ॥ नमः प्राणेश्वरायाय सर्वशक्तिपराय च ।। धर्माधाराय धन्याय पुष्कलाय नमो नमः । १००। प्रतिष्ठायै धर्मगोप्ये निधनाया जाय च ॥ योगेश्वराय योगाय योगगम्याय ते नमः ॥ १ ॥ महेन्द्रोपेन्द्रचन्द्रार्कनमिताय नमो नमः ।। महर्षिवन्दितायाथ प्रकाशाय सुधर्मिणे ॥२॥ नमो हिरण्य- गर्भाय नमो हिरएमयाय च ।। जगद्वीजाय हाराय सेव्याय क्रतवे नमः ॥३॥ आधिपत्याय कामाय स्वराय यशसे नमः ॥ नमः प्रचेतसे नाम- थाय सकलाय च ॥४॥ नमस्ते रुक्मवर्णाय नमस्ते ब्रह्मणेनये ।। योगा- त्मनेऽचिन्तिमाय दिव्यनृत्याय से नमः ॥५॥ जगतामेकनाथाय माया- 'वीजाय ते नमः॥ सर्ववत्मन्निविष्टाय प्रझनकभ्रमाय न॥६॥ प्रझा- नन्दाय भवते ब्रह्मण्याय नमो नमः ॥ भूमिभारातिसंह. भवसारयये नमः ॥७॥ हिरण्यगर्भपुत्राणां प्राणसंरक्षणाय च ॥ दुर्याससे पड्विकार- रहिताय नमो नमः ॥८॥ नमो देहाई कान्ताय पमिरहिताय गमकृत्ये भवनाशाय साम्राय परमेष्ठिने || अनन्तकोटिग्रझाएटनायकाय नमो नमः ॥ एकाकिने निर्मलाय द्रविणाय दमाय च ॥१॥ नमनितोचना- याय शिपिविष्टाय बन्धये ॥ त्रिविष्टपेश्वरायाय नमो व्यानेश्वराय प ॥११॥ विश्वेश्वराव दाने ते नमरचण्डेश्वराय प ।। व्यामेवराय पुधिने फडकेशाय से नमः ॥१२॥ योगेश्वराय प नमो दिवोदामेश्वराय च ।। नागेश्वराय न्यायाय न्यायनिवाहकाय प ॥ १३ ॥ शरण्याय मुगावाप [ १२४ ] फनिचक्रप्रवर्तिने । विचक्षणाय दंष्ट्राय श्वेताश्वाय नमो नमः ॥१४॥ नीलजीमूतदेहाय परात्मज्योतिषे नमः ।। शरणागतपालाय महावलपराय च॥१४॥ सर्वपापहरायाथ महानादाय ते नमः ॥ कृष्णस्य जयदात्र ते बिल्वकोशाय ते नमः || १६ | दिव्यभोगाय दण्डाय कोविदाय नमो नमः ।। कामपालाय चित्राय विचित्राय नमो नमः ॥ १७ ॥ नमो माता- महायाथ नमस्ते मातरिवश्ने । निःसनाय सुनेत्राय विनेशाय जयाय च ॥ १८ ॥ व्याजसंमदनायाथ मध्यस्थाय नमो नमः ॥ अगुष्ठशिरसा लंका- नाथदर्पहराय च ||१६न्यानपूरनिवासाय नमः सर्वेश्वराय च ॥ नमः परावरेशायजगत्स्थावरमूर्तये ॥२०॥ नमोऽप्यणुप्रमेयाय शाङ्गिणे विष्णु- मूर्तये ॥ नारायणाय वामाय सुदीप्ताय नमो नमः ॥२१॥ नमो ब्रह्माण्ड मालाय गोधराय वरूथिने ।। घण्टानहाय सूनाय नमः पावालवासिने ॥२२॥ नमस्ताराधिनाथाय वागीशाय नमो नमः ॥ सदाचाराय गौराय पुराणपुरुपाय च ॥२३॥ संसारमोचकायाथ वर्णिने लिंगरूपिणे । सञ्चि- दानन्दरूपाय पापराशिहराय च ॥२४॥ यतायाप्रमेयाय प्रमाणाय नमो नमः ॥ कलिपासाय भक्तानां मुक्तिमुक्ति प्रदायिने ॥२५॥ गारो विदेहाय बिलिङ्गरहिताय च ॥ नमो राजाधिराजाय चैतन्यविभवाय च ५.६॥ नमः शुद्धात्मन ब्रह्मज्यातिपदिाय च ॥ मयोमवे च दुर्भाय समर्याय च यजने । || चवराय नमो नतामालिने । अन. र्थनाशकायाय ममलेपकराय च ॥२॥ सदानन्दाय विटुप सगुणाय विरोधिने ॥ दुर्गमाय शुमानाय मृगव्यायाय ते नमः || प्रियाय धर्मधाम्ने ते प्रयागाय विमागिने ॥ आधायामृतपानाय मोमपाय तपस्विने ॥३०॥ नमो विचिन्नपाय पप्टिसंबद्ध नाय वा चिरन्तनाय धनुपे स्थविराय ध्रुवाय च ॥३१ ॥ नियमायाप्रगण्याय व्योमावाताय ते नमः ।। संवत्यराय लोप्याय स्थानदाय स्थविष्णवे ॥ ३२ ॥ व्यावमाय ला न्वाय महाक प्रियाय च ॥ गुणत्रयस्वरूपाय नमः सिद्धिविरूपणे ॥ ३३ ।। नमो नमःस्वम्पाय स्वच्दाय पुरुषाय च ॥ कालान्तराय वंदाय नमी प्रशाएहरूपिणे ॥ ३५ ॥ अनित्यनित्यरूपाय तदन्ततिने नमः ॥ ममम्ताय शुक्लाय पुप्याय पश्ये नमः। ३५ ॥ पञ्चतन्मात्र रुपाय पध्र्मेन्द्रियारमने || विशालाय पर्याय नमस्ते विपयामने ।। ३६ ।। भनयद्याय शनाय स्वतन्त्रायामनाय च ॥ नमः प्रौदाय प्रादाय योगादाय ते नमः ॥ ३७॥ मन्यसाय प्रमायाय प्रदीप विमलाय ॥ विश्वधामाय पाय पदनिःश्वमिताय १ ॥ ३८ ॥ याय मुधोराय मागाय नमः । च्यामाय याणहस्वाय परिणे नम ॥ ३६ | संग्रजाय रायाय स्वस्थान म सन्याय [ १२५ ] वरीयसे । गहनाय विरामाय सिद्धान्ताय नमो नमः ॥ १४ ॥ 'महीधराय होने ते वटवृक्षाय ते नमः ॥ ज्ञानदीपाय दुर्गाय सिद्धा- न्तनिश्चयाय च ॥ श्रीमते मुक्तिबीजाय कुशलाय विलासिने । ४१ ॥ प्रेरकाय विशोकाय हविद्धनाय ते नमः ॥ गम्भीराय सहायाय भोज- नाय सुभोगिने ॥ ४२ ॥ महायज्ञाय तीक्ष्णाय नमस्ते भूतचारिणे । नमः प्रतिष्ठितायाथ महोत्साहाय ते नमः ॥ ४३ ॥ परमार्थाय शिशवे प्रांशवे च कपालिने ॥ सहजाय गृहस्थाय सन्ध्यानाथाय जिष्णवे ॥ ४४ ॥ पडूभिः सुपजितायाथ त्रिदलासुरघातिने ॥ जनानन्दाय योग्याय कामेशाय फिरीटिने ॥ ४५ ॥ अमोघविक्रमायाथ · नग्नाय दलघातिने ॥ समामाय नरेशाय शुचिहास्याय ते नमः ॥ भूतिप्रियाय भूम्ने ते श्येनाय मधुराय च ॥ ४६ ॥ मनुष्यबाह्यगतये कृतज्ञाय शिवण्डिने ॥ निर्लेपाय जटाय महाकालाय भीरवे ॥ ४७ ॥. नमो विरूपरूपाय शक्तिगम्याय ते नमः ॥ नमः सर्वाय सदसत्पराय सुव्रताय च ॥ ४ ॥ नमो भक्ति प्रियायाथ श्वेतरहापराय च ।। सुकुमारमहापापहराय रथिने नमः || १६ || नमस्ते धर्मराजाय धना- ध्यक्षाय सिद्धये ॥ महाभूताय कलाय कल्पनारहिवाय च ॥ १५० ॥ ख्याताय जितविश्वाय गोर्णय सुचारवे ।। श्रोत्रियाय वदान्याय दुर्बलाय कुटुम्बिने । ५१ ॥ विरजाय सुगन्धाय नमोविश्वम्भराय च ॥ भवातीताय पष्ठाय नमस्ते सामगाय च ॥ ५२ ॥ अद्वैताय द्वितीयाय कल्पराजाय भोगिने ॥ चिन्मयाय नमः शुक्लज्योतिपे क्षेत्रगाय च ॥ ५३ ॥ सर्वभोगसमृद्धाय साम्बाय च नमो नमः ॥ नमस्ते स्वप्रकाशाय स्वच्छन्दाय सुतन्तवे ॥ ५४ ॥ सर्वज्ञमूर्तये तुम्यं हिरण्यरेतसे नमः ॥ शारदाय सुशीलाय कौशिकाय धनाय च ॥ ५५ ।। अभिरामाय तत्त्वाय व्यक्तकल्पाय ते नमः । अरिष्टमथनायाथ सुप्रतीकाय ते नमः॥ ५६ ॥ श्रारावे ब्रह्मगर्भाय वरुणायेन्दवे नमः ।। नमः कालाग्निरुद्राय श्यामाय सुजनाय च ॥ ५ ॥ अहिर्बुध्न्या- याजराय गुह्येशाय सशान्तये ॥ समयनाथाय सोमपाय गुहाय च ॥ ५८ ॥ निर्मलाय नमस्तुभ्यं छन्दसाराय देटिणे । ज्योतिर्लिंगाय पित्रे च जगरोहतकारिणे ॥ कारुण्यनिधये श्लोकाय जयशालिने । ज्ञानोदराय वीजाय जनविधा. महेतवे ॥३०॥ अपधूताय शिष्टाय छन्दसां प्रधवे नमः ॥ नमः फेण्याच गुह्याय सबबन्धविमोचिने ॥६॥ मदारकीर्तये शश्वत्प्रसन्नवदनाय च ।। वसवे घेदकाराय नमो भ्राजिष्णुविष्णरे ॥६॥ चरिणे देवदेवाय गदा- हस्तायमुत्रिणे । नमस्ते पारिजाताय गणाधिपतये नमः ॥६॥ सर्वशाग्या. नमः ५६ नमः . . [१२६ ] धिपतये प्रजनेशाय ते नमः || सूक्ष्मप्रमाणम्ताय सुरपार्श्वगताय च ॥ ६४॥ अशरीराय शुक्राय सर्वान्तर्यामिणे नमः ॥ सुकेशाय सुपुष्पाय श्रुतये पुष्पमालिने ॥६शा मुनिध्येयाय मुनये बीजस्थाय मरीचये । चामुण्ड जनकायाय नमस्से कृतिवासये ॥६६॥ व्योमकेशाय योग्याय धर्मपीठाय ते नमः॥ महावीर्याय दीप्ताय बुद्धाय शनये नमः ॥६॥ शिष्टेष्टाय मघ- वते केतवे करुणाय च ॥ कारणाय भगवते वाणदर्पहराय च ॥६८।। अनीन्द्रियाय रम्याय ज्ञानानन्दकराय च ॥ सदाशिवाय धीम्याय चि. न्त्याय चन्द्रमोलिने ॥६॥ नमस्ते जातु काय सूर्याध्यक्षाय ते नमः ।। ध्योतिपे कुण्डलीशाय घरदायाचलाय च ।।७।। वसन्ताय सुरमये जया. रिमथनाय च ॥ प्रेतपुरब्जयायाथ पृपदश्वाय ते नमः ॥७॥ रोचिष्णये सुरजिते श्वेतपीताय ते नमः नमस्ते चञ्चरीकाय तमिस्रमथनाय च ।। ७२।। प्रमाथिने निदाघाय चित्रगर्भाय ते नमः ॥ शिवालयाय स्तुत्याय सीथदेवाय ते नमः ॥ ७३ ॥ निरपद्याय दानाय विचित्रशक्तये नमः ॥ नमस्तुल्याय महमे वितानपतये नमः ॥ ७४ ॥ अहसारस्व- रूपाय मेधाधिपतये नमः ॥ विक्रमाय स्वतन्त्राय स्वतन्त्रगतये नमः ॥ ७५ ॥ अपाराय तत्वविद क्षयद्वीराय ते नमः ॥ पञ्चास्याय घदान्याय विश्वप्राणेश्वराय च ॥ ७६ ॥"अगोचराय सूक्ष्माय शे याय यहवाग्नये ॥ फेण्याय पद्महस्ताय नमस्ते जमदग्नये ॥ ७७ ।। अनावृताय मुक्ताय मातृकापतये नमः ॥ नमस्ते बीजकोशाय तीव्रा- मन्दाय मुक्तये । ७२ || नमस्ते विश्वदेवाय शान्तरागाय ते नमः ।। विलोचनाय तोयाय हेमगर्भाय ते नमः || ६ || अनाघन्ताय चण्डाय मनोनाथाय ते नमः ॥ ज्ञानस्कन्धाय तुष्टाय कपिलाय महर्षये ॥ १० ॥ नमविकाग्निकालाय देवसिंहाय ते नमः ।। नमस्ते मणिपूराय चतुर्वेदाय ते नमः || ८१ ॥ स्वभावाय सुवासाय यन्त द्गायव ते नमः ॥ नमस्ते शिवधर्माय महाधर्माय ते नमः ॥ २ ॥ प्रमन्नाय नमस्तुभ्यं सन्तिग्योतिषे नमः ॥ सवम्मुवे युलेशाय यक्ष. राममन्महे ॥ ३ ॥ श्रीमहादेव च ॥ अपन्तु सततं देवा नाम्नां दशरातीमिमाम् ॥ मम धातिप्रियकरी महामोक्षप्रदायिनीम ॥ ६ ॥ संमामे जयदात्री च सर्वामिद्धिमयों शुभाम ॥ यः पठेन्दृणु- पाद्वाति स पापः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ पुत्रकामो लभेत्पुत्रं राज्यकामस्तु गग्यताम् ॥ प्राप्नुगराया भात्या धनधान्यादिकं यह ॥८६॥ शिवालये नदीतीरेऽरयस्थमूले विशेषतः ।। प्रजपेरिसद्धियां देयाः शुचौ देश शमीतले ॥ ८ ॥ धनकामस्नु जुयादवाक्तैयित्वपत्रः ॥ मोशकामस्नु गठन पृढेन अहिनामः ॥ ८८ ॥ पुत्रकामसु जापान { १२६ ] विपतये प्रजनेशाय ते नमः ।। सूक्ष्मप्रमाणम्ताय सुरपार्श्वगताय च ॥ ६४॥ अशरीराय शुम्भव सर्वान्तामिणे नमः ॥ मुकेशाय सुपुष्पाय श्रुतये पुष्पमालिने ||६|| मुनिध्येयाय मुनये वीजस्थाय मरीचये ।। चामुण्ड जनकायाय नमस्ते कृतिवासये ॥६६॥ व्योमकेशाय योग्याय धर्मपीठाय ते नमः ।। महावीर्याय दीप्ताय बुद्धाय शनये नमः ॥६॥ शिष्टेष्ठाय मध. यते केतवे करवाय प|| कारणाव भगवते वाणदर्पहराय च ॥६८ अतीन्द्रियाय रम्याय ज्ञानानन्दकराय च || सदाशिवाय धीम्याय चि. न्याय चन्द्रमौलिने ।।६ ॥ नमस्ते जातु काय सूर्याध्यक्षाय ते नमः ।। ज्योतिष कुण्डलीशाय परदायाचलाय च ॥७॥ वसन्ताय सुरभये जया. रिमथनाय च ॥ प्रेतपुरब्जयायाथ पृपदश्वाय ते नमः ॥७१॥ रोविष्णवे मुरजिते श्वेतपीताय वे नमः || नमस्ते चञ्चरीकाय तमित्रमथनाय च ।। ७२|| प्रमाथिने निदाघाय चित्रगर्भाय ते नमः ॥ शिवालयाय स्तुत्याय वीयदेवाय ते नमः ॥ ७३ ॥ निरवद्याय दानाय विचित्रशक्तये नमः ।। नमस्तुल्याय महमे वितानपतये नमः ॥ ७४ ।। अहङ्कारस्व. रूपाय मेधाधिपतये नमः ।। विक्रमाय स्वतन्त्राय स्वतन्त्रगतये नमः ॥ ७५ || अपाराय तत्त्वविद क्षयद्वीराय ते नमः ॥ पश्चास्याय बदान्याय विश्वप्राणेश्वराय च ।। ७६ ॥ 'अगोचराय सूक्ष्माय शेयाय वडवाग्नये ॥ फेण्याय पद्महस्ताय नमस्ते जमदग्नये ॥ ७७ ।। अनावृताय मुक्काय मातृकापतये नमः ॥ नमस्ते दीजकोशाय सीमा- नन्दाय मुक्तये ।। I॥ नमस्ते विश्वदेवाय शान्तरागाय ते नमः ।। विलोचनाय वोगाय हेमगर्भाय ते नमः ।। E || अनाद्यन्वाय वरद्वाय मनोनाथाय ते नमः ॥ ज्ञानस्कन्धाय तुष्टाय कपिलाय महर्पये || १० || नमविकाग्निकालाय देवसिंहाय ते नमः ॥ नमस्ते मणिपूराय चतुर्वेदाय ते नमः ॥ ८१ || स्वभावाय सुवासाय ह्यन्त नायव ठे नमः ॥ नमस्ते शिवधर्माय महाधर्माय ते नमः || १२ ॥ प्रसन्नाथ नमस्तुभ्यं सर्वान्नज्योतिषे नमः ॥ सवम्मुवे कुलेशाय यक्ष- रासमन्महे ॥ २३ ॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ जपन्तु सततं देवा नाम्नां दशशतीमिमाम् ॥ मम चाविप्रियकरी महामोक्षप्रदायिनीम् ॥ ४ ॥ संमामे जयदावी च सांसिद्धिमयों शुभाम् ॥ यः पठेच्छृणु- याताsपि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥ पुत्रकामो लभेत्पुत्र राज्यकामस्तु राम्यवाम् ।। प्राप्नुयात्सरया भक्त्या धनधान्यादिक बहु ॥८६॥ शिवालय नदीतीरेऽवस्थमूले विशेषतः ।। प्रअपेरिसद्धियां देयाः शुचौ देश शमीदले ॥ २७ ॥ धनमस्तु जुहुगताक्तरित्वपत्रकः ॥ मोकामस्तु गयन पृतेन प्रविनामः । ८८ ॥ पुत्रकामस्तु বুখার [ १२६ ] श्रीगणेशायनमः ॥ चापेयगौराद्ध शरीरकाये कपूरंगोरार्धशरीर काय ॥ धमिल्लकायै च जटाधाराय नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥१॥ रएत्क्वर्णक कणन पुरायै मिलत्फणाभासुरनूपुराय ॥ हेमांगदाय भुज- गांगदाय नमः शिवायगारावास्तूरिकाकुङ्कुमचर्चितायै चिन्तारजपुरूविज चर्चिताय । सुकुण्डलायै फणिकुपडलाय नमः शिवाय० ॥३॥ मन्दारमाला. कुलिवालकायै कपालमालाकि तशेखराय ।। दिव्या म्बरायैच दिगम्बरांय नमः शिवायैः ॥ ४॥ प्रोत्फुलनीलोत्पललोचनाय विकासपङ्के रुहलोच- नाय | समेक्षणाय विपभेक्षणाय नमः शिवाय० ॥ ५ अम्भोरुहरयामन कुन्तलाय तडित्प्रभाभासजटाधराय ॥ जगज्जनन्यै जगदेकापत्रे नमः शिवाय चं नमः शिवाय ॥६॥ सदा शिवानां प्रियभूषणायै सदा शिवानां प्रिय भूषणाय ॥ शिवान्विताये च शिवान्विताय नमः शिवायै० ॥ ७ ॥ प्रपञ्चसप्टेंमुखवासदायै त्रैलोक्यसंहारकृतान्तकाय ।। कृवस्मरायै विकृत- स्मराय नमः शिवायैः ॥ ८ ॥ नमस्ते भगवद्रभास्करामिवतेजसे ।। नमो भवाय देवाय शिवाय परमात्मने ॥६॥ शन्याय तितिरूपाय सदा सुरमिदे नमः ॥ ईशानाय नमस्तुभ्यं स्पर्श मात्राय ते नमः ॥१०॥ महा- देवाय सोमाय अमृतेशायु ते नमः।। उपाय यजमानाय नमो मीढुष्टमाय ते नमः।।१॥ नमोऽस्तु ते शकर शान्तिमूर्ते नमोऽतु वे चन्द्रकलावतंस ।। नमोऽस्तु ते कारण कारणाय नमोऽस्तु ते कारणवर्जिवाय ॥१२॥ स एव. धन्यस्तव भकिमाजां तवाचको यः कुरुते सदेव ॥१३॥ मन्त्रहीन कि- याहीन भक्किहीनं सुरेश्वर ॥ यत्पूजिवं मयादेव परिपूर्ण वस्तु मे ॥१४॥ इविभीस्कन्धपुराण शिवस्तुतिः सम्पूर्ण । भीगशाय नमः शिवमहिम्नस्तोत्रम् । भीपुप्परम्वग्नाच। महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यपसासो स्तुतिर्मयादी नामपि तासन्नास्वयि गिरः ॥ अथावाच्यः सः स्वमविपरियामावधिगृपन ममाप्येप स्तोत्रे हर निरपवादः परि करः ॥१॥ अठीतः पन्थानं तव प महिमा वा मनसपारपावृत्या यं पक्तिममियो प्रविरपि ।।स कस्य स्तोतम्या विविधगुणः कस्य विषयः परे त्वांपीने पववि न मनः एम् ॥ मुरावा मामृर्षि विदर्धात भरद्धृ प्ररिणहिता न हि स्वात्मा- राम विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ।। ८॥ घुस कश्चित्सर सफलमपरस्त्व [ १३० ] स्य न रच ॥२॥ मधुस्मीता वाच परमममृतनि मितवतस्वव ब्रह्मन् कि धागपि सुरगुरोरिस्मयपदम् ।।मम वेता बाणी गुणकथनपुण्येन भवत पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनयुद्धिर्व्यवसिना ॥शा क्वैश्वर्य यत्तजगदुद. यरक्षाप्रलयकृत् प्रयोवस्तु व्यस्त तिस्पु गुणभिन्नासु सम्पु । अमन्याः नामस्मिन् वरद रमणीयामरणी विहन्तु व्याशी विदधत इहै के जड़- धिय ॥४४ किमीह किं काय स सलु किमुपायत्रिभुवन विमाधारो धाता मृनति कि पादार इति च।। प्रवक्यैश्वर्यं त्वय्यनवस्तादुस्यो हतधिय उत कोऽयं काश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥शा अजन्मानो लोका. किमयान्तोऽपि जगताभधिष्ठातार कि भाविधिरनास्त्य भवति । अनीशो ग कुर्याद्चनजनने क परिकरो यतो मन्दास्त्वा प्रत्यमरवर सशेख इमे ॥ ६ ॥ त्रयो सारस्य योग पशुपतिमत वैष्णमिति अभिन्ने प्रस्थाने परभिदभद पध्यमिति च ॥ रुचीना वैचित्र्या-जुकुटिलनाना पथजुपा नृणामेको गम्यस्तमसि पयसामर्णव इव ॥ ॥ महोत. खदान परशुरजिनं भस्म फणिनः कपाल चेचीयतव वरदठन्त्रोपकर- द्ध्यमिद परो प्रौव्याधी-ये जगवि गत व्यत्तविषये ॥ समस्तेऽप्ये, तस्मिन् पुरमपन वैषिमिव इव स्तेपन जिद मि ला ने खलु ननु धृष्ट मुम्बरता ॥ ॥ तवैधयं यत्नाबटुपरि विरियो हरिधः परिच्छेत्तु यातानिलमतलस्कन्धयपुप ॥ तो भक्ति द्वाभरगुरुगणदुम्या गिरिश यत् स्वयं तस्ये वाभ्यो उ भिनुत्तिर्न फलति ।। 10 अयत्नादा- पविभुवनमरव्यतिकर दशास्यो यदाहूनभृतरणकएपरवशान्॥ शिरपद्मश्रेगोरचिवचरणाम्भोदवले स्थिरावासद्वत त्रिपुरहर विस्त तिमिदम् ।। ११ ।। अगुप्य त्वमेगासमविगतसार भुजवल बनाकैला- समि त्वविवसती विस्मयन ॥ अनम्यापातानेऽप्यन चलिवाइ गुञ्ज शिसि प्रतिष्ठा वय्यासीद्ध वमुचितो मुपति मल ॥ १२ ॥ यधि सून गावादपरमोरपि मतीमय चके याय परिजन विधयत्रिभुवन ।। नतम मन् वरिवसिरि समरणयोनं कस्याप्युनत्य भवति शिt. भस्वयंचति ॥ १३ ॥ श्रारडशडयाम्गिामुरळाविधेयस्याः। ऽमीनियन पि Ban || RAमा. कण्ठे तब न पुरुने म भिना विरोऽपि नाभ्यो भुगनमय व्यसनिन ॥ १४ ॥ असि द्वारा नाचिपि सरासरनर नियन्त नित्यं जगनि अपिनी यस्य विशिवा । म पग्यग्रीव लामिवरमुरसाधारणमा मा रमतच्यामा नपि पशिपु सत्य. परिमर ॥३५॥ महीपादापागाजवि महसा । १३१ ] संशयपदं पदं विष्णोध्राम्यद्भुजपरिधरुग्णप्रहगणम् । मुहुद्यौदास्थ्य यात्यनि वजटाताडिततटा जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ १६ ॥ वियव्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः प्राहो पारां यः पृपतलघुदृष्टः शिरसि ते ।। जगद्द्वीपाकारं जलधिक्लयं तेन कृतमित्य- नैवोन्नेयं धृतमहिमादिव्यं. तब वपुः ॥ ७॥ रथः क्षोणी यन्ता शतधृति- रथेन्द्रो धनुरयो स्याङ्ग चन्द्राको स्थ. चरणपाणिः शर इति ।। दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतणमाडम्बरविधिविधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु:परतन्त्राः प्रभु- धियः ।। १८ । हरिस्ते साहस्र कमलवलिमाधाय पदयोर्यदेकोने त स्मा निजमुदहरन्त्रकमलम् । गतो भक्तयुद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ १६ ॥ तो सुप्ते जाग्रत् ज्यमांस फलयोगे ऋतुमतां क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते । अतस्त्वां संप्रेय ऋतुपु फनदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धां बद्धवा दृढपरिकरः कर्मसु.. जनः ॥२०॥ क्रिअदक्षो दक्षः ऋतुपतिरधीशस्तनुभृतामृषीणामाविन्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ॥ ऋतुम्रपस्त्वत्तः ऋतुफल विधानव्यसनिनो ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २१ ॥ प्रजानाथ नाथ प्रसभमभिक स्वां दुहितरं गतं रोहिद्भूतां रिरमयिपुमृष्यस्यपुषा । धनुष्पा- ऐर्यातं दिवमपि सपत्राकृतमभु सन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याध- रभसः ।। २२ ।। स्वलावण्याशंसा धृतथनुपमहाय तृणवत्पुर: प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथनपुष्पायुधमपि । यदि रणं देवी यमनिरतदेहार्धघटनादति वामद्धा बत वरद मुग्धा तुवतयः ॥ २३ ।। श्मशानेष्वाक्रीड़ा स्मरहर पिशाचाः सहचराश्चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटीपरिकरः ।।.अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं तथापि स्मर्तृणां वरदे परमं मङ्गलमसि ॥ २४ ।। मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः प्रध्यद्रोमाणः प्रम- दसलिलोसारितदशः॥ यदालोक्याल्हादं हद इव निमज्यामृतमये दधत्यन्त- स्तत्वं किमपि यमिनस्तकिल धवान् ॥ २५॥ त्वमस्त्व सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहस्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा समिति च । परि- च्छिन्नामेवं त्वयि परिणवा विभ्रति गिरं न विद्मस्तत् तत्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥ २६॥ त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रोनपि सुरान-. काराद्यैर्वणैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृति ।। तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरभिसन्धा- नमणुभिः समस्तव्यस्तं त्वां शरणद गृणास्योमिवि पदम् ॥ २७ ॥ शर्यो रुद्रः पशुपविरथोपः सह महॉस्तथा भीमेशानावि.. ति यदभिधानाष्टकिदम् । अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि प्रियायास्मै घाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥ २८ ॥ नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दवीष्ठाय च नमो नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महियाय च नमः ।। नमो भवः स्तोत्रमेतकार ·३७॥ सुरवरमुनिपूज्य स्वर्गमोक्षकहेत पठति यदि मनुष्यः प्राजलि. [ १३२ ] चर्पिठाय नितयन यविष्ठाय च नमो नमः सर्वस्मै ते तदि दमिति शर्वाय च नमः || २६ ॥ वहलरजसे विश्वोत्पनी मवाय नमो नमः । जनसुखकते सत्त्वोद्रितो मृडाय नमो नमः प्रमहसि परे नि गुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ ३० ।। कशपरिणतिचेतः क्लेशवाय क्वचेदं क्व च तव गुणसीमोल्ल- चिनी शश्वदृद्धिः ॥ इति पकितभमन्दीकृत्य मां भक्तिराधादरद घरण- योस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥ ३१ ॥ असितगिरिसम स्यात्काजलं सिन्धु- पात्रे सुरतस्वरशाखा लेखनों पत्रमुर्ती । लिखति यदि गृहोवा शारदा सवकालं तदपि तव गुणानामीश पारन याति ॥ ३२ ॥ असुम्सुरमुः नोन्द्ररर्चितयेन्दुमर्मालेग्रथितगुणमहिम्नो निगुणस्येश्वरस्य ॥ सालगुण- वरिणः पुष्पदन्ताभिधानो रुचिरमलधुवृत्तः ।। ३३ ।। अहरहरनबद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतन् पठति परमभक्त्या शुद्धचित्त: 'पुमान यः ॥ स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र प्रचुरवधनायुः पुत्रवान कीर्तिमाँश्च ॥ ३४ ॥ महेशान्नापरो देवो महिम्नो स्तुतिः ॥ अधोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् । ३५॥ दोसादान तपस्तीर्थ ज्ञान यागादिकाः कला नाईन्नि पोडशीम् मदशननामा सर्वगन्धर्वराजःशशिधरवरमौलेदेवदेवस्य दासः ।। स सतु 'निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोपास्तवनीमद मकापहव्यदिव्यं महिम्नः ।। नान्यचेताः ॥ ब्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः स्तवनमिदममोध पुष्पदन्तप्रणोतम् ॥३८॥ श्रीपुष्पदन्तमुखपंकजानिर्गतेन स्तोत्रेण किन्धि- पहरेण हरप्रियेण । कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणिती भवति भूतपतिर्महशः ॥३६॥ इत्येपा गामयी पूजा श्रीमच्छकरपादयोः । अर्पिता तेन मे देवः प्रीयतां प सदाशिवः । इति स्कन्दपुराणे पुरुष इन्वगन्धर्वराजविरचित श्रीसदाशिवमहिम्नाय स्तोत्र संपूर्णम् । श्रीसदा शिवार्पणमस्तु । श्रीरस्तु । नापरा . क्रियाः ॥महिम्नस्तष पाठस्य- देवीपूजनम् ॥ भय म्यानम् । नमो देन्ये महादये. शिवायै सततं नमः नमः प्रहत्य भताय नियता प्रणनाः स्पताम् ॥ ॐ मनसS काममाति- पापमय मशीय । मना रुपमय रमोयरा भी य: ताम्मयि महा भय भावादनम् ।। रियाणामी गुण . । १३३ ] रजतनजाम् । चन्द्रां हिरण्मयों लक्ष्मी जातवेदो ममावह ॥१॥ अथ श्रा- सनम् ॥ तामऽश्यावह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं बिन्देय गामश्व पुरुषानहम् ।।२।। अथ पाद्यम् ॥ अश्वपूर्णा रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । श्रिय देवोमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३॥ अथ अय॑म् ।। काँसोस्मितां हिरण्यप्राकारामाद्री वलन्ती तृप्तां तर्पयन्वीम् । पद्म स्थितां पद्मवर्णा तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥ अथ आचमनी- यम् ॥ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदागम् । तां पभिनोमी शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीनें नश्यतां त्वावृणोमि ॥५॥ अथ स्नानीयम् ।। आदित्य वर्णे तपसो धिजातो वनस्पतिस्तव वृत्तोऽथ बिल्वः। तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायांवरायाश्च. वाह्याऽअलक्ष्मीः ॥६॥ अथ पञ्चामृतस्नानम् ॥ तत्रादौ पयसा -ॐ पयपृथिव्यांम्पय श्रोषधी पयो दिव्यन्तरिक्ष पयोधाः ॥ परस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥ अथ शुद्धोदकरनानम् ॥ ॐ आपोषु : अरमान मातरः सुन्धयन्ते .. घृतेन नो घृत्प्वः पुनन्तु ॥ विवश्वध हिरिप्पम्प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरापूत एमि |-अथ दना ।। ॐ दधि काव्णोरश्वस्य वाजिनः सुरभिनो मुखाकरत्प्रणायूधपितारिपित् ।। अथ शुद्धोदक स्नानम् ॥ पापों अस्मान् ॥ अथ धृतेन ॥ ॐ घृतमिमते घृतमस्य योनि तेभियोघृतम्यस्यधाम ॥ अनुष्वधमावह मादयस्वस्वाहा कृतं वृषभवतिहव्यम् ॥ शुद्धोदकस्नानम् ॥ॐ आपो अस्मा०॥ अथ मधुस्नानम् ॥ ॐ मधुबाला ऋताय० ॥ शुद्धोदकस्नानम् ॥ ॐ आपो अस्मान्० ॥ अथ शर्करास्तानम ।। ॐ अपा। रसमुद्वयस । सूर्ये सन्त , समाहितम् । अपा , रसस्य यो रसस्तम्वो गृहणा म्युत्तम मुपयाम गृहोतो सीन्द्रायत्वा जुष्टं गृणाम्येपते योनिरिन्द्रायत्वा जुष्टतमन् । शुद्धोदफस्नानम् ।। ॐ आपो अस्मान् ॥ गन्धोदकालानम् ॥ ॐ गन्धद्वारा. दुराधर्षाः नित्यपुष्टां करीपिणीम् ॥ ईश्वरीं सर्वभूतां वामिहोपहये प्रियम् ।। उद्वर्तनस्तानम्-ॐ माशुनाते अशुः पच्य- वाम्परः ॥ गन्धस्ते सोममवतु मदायरसोऽअच्युतः ।। पुनः शुद्धोदकस्ता- नम् ॥ ॐ आपो भस्मान् ॥ ततः ॐ श्री जगदम्बायै नमः ।। इति नाममन्त्रेण रकगन्धाक्षतरकपुष्पधूपदीपनवेशानि समयॆ ॥ व सम. पयेत् ।। उपेतु मा देवसवः कीविश्व मणिना सह । प्रादुर्भूतो सुराष्ट्र. स्मिन् कोवि वि दातु मे ॥ ७॥ यज्ञोपवीतम् || पिपासामना, पेठामलरमी नारायाम्यहम् । भभूविमसद्धि च सर्वा निद मे गृहात गरम चन्दनम् ॥ गन्धद्वारा दुगधा नित्यष्ठां करोपिणीमईयरी सर्वभूताना तामिहोपडये मियम् ॥ ॥ मतम् ॥ॐ भन्न मोम. क [ १३४ ) दन्त ह्यवप्रिया अधूपत् ॥ अस्तोपतस्व भानवो-विप्रा नविष्ठया मवी- योजान्दिन्द्रले हरिम् ।। पुष्पाणि ॥ मनस. काममाफूतिं वाचः सत्यमशी- महि । पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १०॥ धूपम् ।। कई- मेन प्रजाभूतामयि सम्भ्रमकदम। श्रियं वासय मे कुले मातरं पल- मालिनीम । ११ दीपम् ॥ आपः स्रजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मेगृहे निचदेवी मातरं श्रियं वासय मे कुले । १२ । नेवेद्यम् ।। पार्दा पुष्क रिणी पुष्टि सुवणां हेममालिनीम् । सूर्या हिरएमयी लक्ष्मी जातवेदो ममा- वह ।। १३ । दक्षिणाम् ॥ आर्द्रा यः करिणीयष्टिं पिङ्गला पद्ममालि- नीम् । चन्द्रां हिरण्मयी लक्ष्मी जातवेदो म आवह ।। १४॥ प्रदक्षिणाम् ।। तामारह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूति गायो दास्योश्वान्विन्देय पुरुपानाम् ॥ १५ ॥ पुष्पाब्जलिमन्त्रम् ।। यः शुचि. प्रयतो भूला जुहूयादाज्यमन्त्रहम् । सूक्त' पप्रचदशर्चनच श्रीकामः सततं जपेत् ।। १६ ।।-सरसिज निलये सरोजहस्ते धवलतरांशुकगन्ध माल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनो त्रिगुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥१७॥ धनमग्निर्धनं वायूधनंसूर्यो धनं वसु । धनमिन्द्रो वृहस्पतिर्वरु- णं धनमश्विनी ॥ १८ ॥ पैनतेय सोम पिव सोमं पिबतु रहा । सोम धनस्य सोमनो मह्य · ददातु सोमिनः ॥ १६ ॥ न कोवो न च सात्सर्य न लोभो नाशुमा मतिः। भवन्ति कृतपुण्याना भक्ताना श्रीसूक्त अपेत् ।। २० ।। पद्मानने पद्मरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे । तन्मे भजसि पद्माक्षि यन सौख्यं लभाम्यहम् ॥ २१॥ विष्णुपत्नी क्षमा देवी माधवी माधवप्रियम्। विष्णु सप्रसी देवी नमाम्यच्युतवल्लभाम् ।। २२ । महालक्ष्मी च दिवोह विष्णुपत्नी च धीमही। तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥ २३ ॥ पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्धप्रिये पद्मदलायताक्षि । विश्वप्रिये विश्वमनानुकूले वादपद्म मयि सन्निधत्स्व ।। २४ ।। अानन्दकईभ. श्रीश्चिक्लीत् इति विश्रवाः । ऋपयः श्रियपुत्राश्च मयिश्रीदेवी देवता ॥ २५ ॥ ऋणरोगादिदारिद्य पापच अपमृत्यवः । भवशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥ २६ ॥ श्रीवर्चस्वमायुप्यमारोग्य- माविधाच्छाममान महीयते । धनधान्यं पशुं बहुपुत्रनाभं शतमरदीर्घ- मापु॥२७॥ देव्या याति:-वेदोक्त- प्रारातीरनिवासिनि निगमप्रतिसराये पारावारविहारिणी नारायणि [ १३५ 1 हृद्य । प्रपषचसारे जगदाधारे-श्रीविद्य प्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ।। जय देवि जय देवि जय देवि जय मोहनिरूपे। मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे ॥ १ ॥ दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोबलरदने पदनजनजिति मदने मधुकैटभकदने । विकसितपङ्कजनयने पन्नग पतिशयने खगपति- बहने गहने सङ्कटवनदहने । जय देवि०॥२॥ मञ्जीरातिचरणे मणि- मुक्ताभरणेकिंचिद्वस्त्रावरण वक्राम्बुजधरणे शक्रामयभयहरणे भूसुरसुग्य करण करणां कुरु मे शरण गजनक्रोद्धरणे।।जय देवि०॥३॥ छित्वा राहु- श्रीवां पासि त्वं विवुधान् ददासि मृत्युमनिष्ट पीयूषं विवुयान । विहरसि दानाऋद्धान्समरे संसिद्धान् मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान् ॥ जय देवि०॥४॥ अथ देव्या अथर्वशीर्षम् ।। . ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः, कासि.त्व महादेवी। सानदीदहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुस्पात्मकं जगत् । शून्यं चा शून्य श्रहमा:- नन्दानानन्दो अहं विज्ञानाविज्ञाने अहं ब्रह्माब्रह्मणी द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये । इति वाथर्वणी श्रुतिः । अहं पञ्च भूतानि अहं पञ्च तन्मात्राणि श्रमखिलं जगन् वेदोहमवेद्रोहम् विद्यामयिद्याहम् अजाहम् नजाहम् अधश्चोय च तिर्यक्वाहम् अहछ रुदेभिवसुभिश्यामि अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः अह मित्रावरुणावुभी विभर्मि अहमिन्दाग्नी अहमश्विना उभा अहछ सोम सष्टारं पूपर्ण भगं दधामि अहं विश्णुमुरुक्रमम् ब्रह्माणमुत्प्रजरपतिदधामि अह' दयामि द्रविण हविष्मते सुपाध्ये यजमानाय सुव्रते अह घराज्ञी सगमनी वसुनाम् पिकितुपी प्रथमायज्ञयानाम् अहंध सुवेपितर मस्य मूर्नमम योनिरपवांतः समुद्रेय एवं वेद सदैवी , सम्पद माप्नोति देवा अब्रुवन् । नमो देव्यै महाव्ये शिवायै सततं नमः। नम, प्रकृत्यै भद्रायै निम्ताः प्रणताः स्मनाम् ॥ तामग्नित्रणा तपसा अलन्ती वैरोचनी कम फलेषु जुष्ठाम् । दुर्गा देवी शरणं प्रपद्यामहेऽसु- रानाशयिन्यै ते नमः देवीं वाचमजनयन्तदेवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नोमन्द्रेप मूर्जदुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुटतेतु ॥ काल- रात्री ब्रह्मानुतां येजावी स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिदक्षदुहितर नमामः पावनां शिवाम् । महालक्ष्म्यै च विद्महे शर्वशत्ये च धीमहि बन्नो देवी प्रचोदयात् । अदितिांजनिष्ठ दक्षया दुहिना तव । तां देवा अन्धनायन्त भद्रा अमृत वन्धपः ॥ कामे योनिवर पाणिगुहा हंसा मावलिश्याभ्रमिन्द्रः पुनगुदा सम्ला मायया .

द्वादशादित्याः सैपा .' [ १३६ ] चापृथक् क्लेशा विश्वमातादि, विद्याः ॥ एषात्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कशधनुर्वाणधरा । एपा श्री महाविद्या । य एवं वेद स शोकं तरति । नमस्ते भगवति मातरम्माम्पाहि सर्वनः सैपा वैष्णवा यसवः सैवैकादशरुद्राः सैपा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च सैषा यातुधाना असुरा रासि पिशाचयक्षसिद्धा सैपा सत्वरजस्तमांसि सैपा, ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः सैपा ग्रहनक्षत्रज्योतिकला काष्टादि विश्व . रूपिणी तामई प्रणोमि नित्यम् । पाशपहारिणो देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी । अनन्तां विजर्या .शुद्धा शरएयां सर्वदा, शिवाम् ।। विपदाकारसेयुक्त बीतिहोत्र समन्वितम् । श्रद्धेन्दुलसित देड्या बीज सर्वार्थसाधकम् ॥ एवमेकाक्षर मन्त्र यतयः शुद्ध चेतसः । ध्यायन्ती परमानन्द मया ज्ञानाम्बुराशयः वाड्मया ब्रह्मभूस्तस्मात् पट- वक्रसमन्वितम् ॥ सूर्यो वाम श्रोत्रविन्दु संयुक्ताष्ट तृतीयकम् ॥ नारायणेन संमिश्रो वायुषाधरायुक्तयः ॥ बिच्चे नवार्ण कोणस्य महानानन्ददायकः ॥ हृत्पुण्डीकमध्यस्था प्रातः सूर्यसमप्रभाम् ! पाशाङ्क शधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् ॥ त्रिनेत्रां रक्तवसना भक्तकामवह भजे । मजामि त्वां महादेवि महाभयविनाशिनि ।। महादारिद्रयशमनी महाकारुण्यरूपिणी । यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति ॥ तस्मादुच्यते अज्ञेया । यस्था अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता । यस्ता लक्षं नोपलक्ष्यते तस्मादुच्यते अलदा । यस्या जननं नोपनदयते तस्मा दुच्यते अजा । ऐकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका । एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते ऽनेका अतएवोच्यठे ऽवे यानन्तालाजेकानेका । मन्त्राणां मातृकादेवी शब्दानां ज्ञानरूपिणि । ज्ञानानां चिन्मयावीवा शून्यानां शन्यसा, क्षिणी ॥ यस्याः परतरं नास्ति सैपा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गा दुर्गमा देवों दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽई संसारार्ण- वतारिणीम् ॥ इदमथर्वशीर्षम् योऽधीते । सपञ्चायशीफलमा नोति । इमथर्वशीर्पमझात्या योर्चाःस्थापयति । शवलहं प्रज्ञप्तापि नार्या शुदिप विन्दति । शवमष्टोचरं चास्य स्मृतः । दशवार पठेवस्तु सद्यः दुर्गाणि वति . महादेव्याः प्रसादतः ॥ पापः प्रमुच्यते । महा- सायमधीयानो दि- यमहतं पापं नाशयवि प्रातरधीयानो राधिकृत नाशयति । सायं प्रातः प्रयुधानो अपायो भवति निशीधे तुरीयसंध्यायां . पुरश्चर्याविधिः .. । पार्ष [ १३७ ] जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूयनायां प्रतिमाया जप्वा देवतासान्निध्य भवति । भौमाश्विन्यां महादेवीसन्निधौ जप्त्वा महामृत्युतरति स महा- मृत्युतरवि। य एवं वेद इत्युपनिषत् ।। हवनविधिः। । तत्र कर्ता शुभदिने ब्राह्म मुहूर्ते उत्थाय शौचादिविधिं कृत्वा स्नान 'सध्यावन्दनादिनित्य कर्म विधाय नवमहत वासः परिधाय सर्वां यत्रसामग्री सम्पाद्य प्राङ मुसः स्वासने उपविश्य ॐ विष्णुर्विष्णुहरिहरिः निराचम्य स्थानदेवतागणेशादि पञ्चाङ्गदेवता सर्वतोभद्रमण्डजदेवता पूजनं विधाय शान्तिस्तवं पठित्वा ।। ततः कर्मपानजले गंगाद्यावाहनं वा, अर्घपात्र स्थापनं कुर्यात् । यथा-भूमौ जलेन गन्धेन वा त्रिकोणषटकोणवृत्तचतुरस्त्र मण्डलं विलिख्य तदुपरि त्रिपादिकां तदुपरि ताम्रमयार्घ पात्र संस्थांप्प तत्र जलं दद्यात् । ॐ गङ्ग च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥ ॐ इमम्मे गग यमुने सरस्वति शद्रस्तोमं सवता परुष्ण्या। असिक्या मरुधे वितस्त-या कीये श्रृणु ह्यासुपोमया इति तीर्थान्यावाह्य ॥ यत्राक्षता- क्षिपेत् ॐ दशकलाप्मने धर्मप्रदा हिमण्डलाय नमः । ॐ द्वादशकलारमने ऽर्थप्रदसूर्यमंडलाय नमः । ॐ पोडशकलात्मने कामप्रदचन्द्रमण्डलाय मनः। स सत्वाय नमः। र रजशे नमः। अँ अन्तरात्मने नमः। म परमात्मने नमः । धेनुमुद्रयाऽमृतीकृत्य मत्स्यमुद्रयाच्छाद्य योनिमुद्रां प्रदर्य ॐ भू यः स्वः अर्धस्था गङ्गादिसप्तसरित इहागच्छत, इह तिष्ठत सर्वतीर्थात्मकायार्घपानाय नमः सन्पूज्य । ॐ नमो विस्वते ब्रह्मभास्वते विष्णु तेजसे । जगत्सवित्रे शुचये सदसफरकज़दायिने । इति वास्त्रय सूर्यायानल दत्वा-! अपशिष्टजलेन सर्वा यज्ञसामग्री सिक्त्या ॥ अग्निनामानि- लौकिकः पावको ह्यग्निः प्रथमः परिकल्पितः । अग्निस्तु मारुतौ नामा गर्भाधाने विवीयते ॥१॥ जगन्ते प्रत्यहं मन्त्री होमयेत्तदशाशतः । वर्षमाम्बाभिषेकञ्च विप्रभोय. नमाचरेत् ।। अथवा सर्वपूतों न होमादिकमयाऽऽचरेत् ॥ (होमामशती). पुसवने चान्द्रमस: अनाकर्मणि शोभनः । सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्मी जावकर्मणि ॥२॥ ययदहं भवेद्भग्नं वत्संख्यादिगुणो जपः । होमाभावे जर, कार्यो होमसरल्या

[ १३८ ]
प्राणायाम कुर्यात् । तबादी यरणविधिः ॥ पाद्यादीनि समर्पयामि
स्त्रणांगुलीयसहितवासोम्यो नमः । इति व्रणद्रव्यं सम्पूज्य || करणं
कुर्यात् ॥ आचार्यों वदेत् आस्ये ॥ ततो यजमानः ॐ नमोस्त्वनन्ता
येत्वादि मन्त्रः पादप्रक्षालनं विधाय-ॐ नमोस्त्वनन्ताय सहस्र-
मूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोमवावे ॥ सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः । ॐ आपपनध्वांतसहस्रभानवः समी.
हितार्पिणकामधेन्यः । अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां प्रामणवाद
रेणवः ॥ न यत्फलं कपिलादाने कार्तिक्या ज्येष्ठपुष्करे ॥ तत्फलं पाडव-
श्रेष्ठ विप्राणां पादधावने ।। ॐ भूमिदेवानेत्ययं दत्त्वा ॐ गन्धद्वारेति
गन्धविलेपनं कृत्वाक्षतपुष्पैः सम्पूज्य ॐ यदवायेति वरम्।
इति मुकुटकङ्कणकुंडलादिभिः सम्पूज्य ॥ वरणसामी करे गृहीता ॥
अयेइत्यादि करिष्यमाणामुकुहोकर्मणि एभिर्गन्धाक्षतपुष्पपूगीफलयज्ञोप:
वीतस्वांगुलीयवासोलकरणादिभिरग्निबृहस्पत्यादिदेवतैराचार्यकर्म कतु
आचार्यत्वेनामुकगोत्रममुकशर्माणममुकवेदाध्यायिन ब्राह्मण
त्वामहं
पुणे ॥ इनि वरणद्रव्यं प्राचार्यहस्ते दद्यात् । वृतोस्मीत्याचार्यो वदेत् ।
ॐ यतेन दीक्षामाप्नोतीत पटेत् ॥ अस्य यज्ञस्य होमर्मणि त्वं मे
श्राचार्यो भव ।। अहं भवानीति प्रत्युक्तिः ॥ आचार्य प्रार्थयेत्-
श्राचार्यस्तु यथा स्वर्ग शमादीनां गृहस्पतिः । तथा त्वं मम यज्ञ-
मित्राचार्यो भव मुत्रत ॥ ॐ संसारभय० इवि सम्पायं ॥ ततो यज-
मानो व्यान् । यथाविहितं कर्म कुरु । करवाणि इत्याचायौं वदेत् ॥
अथ ब्रह्मवरणम्-पूर्ववत्सम्पूज्य ।। अद्य हेत्यादि० अमुकोह ममामुकया
कर्मणि ममसरेक्षणाय तानावेक्षणाय ब्रह्मकर्मकर्तुमभिः स्त्रयाग
लीयवामाभिरग्निवृहस्पति देवतैरमुगोत्रममुकशर्माणम मुझवेदाध्यायन
: प्राह्मणं ब्रह्मत्येन त्वामहं वृणे । इति वरणद्रव्यं ब्रह्मणे दत्त्वा प्रार्थ-
येन्–यबा धतुमुसो ब्रह्मा वेदशास्त्रविशारदः । तथा त्वं मम यज्ञे
चापः। रिमाया चत्रियायान्नु रससंख्यागुणः स्मृतः ॥ वैश्याना बमुः
नानि ये पार्थिवो अग्निः प्राशने तु शुचिः स्मृतः ।
सभ्यनामाप चूड़े तु व्रतारम्भ
माल्याकमेपा स्रोपामयं विधिः || एका ब्राह्मणानिदामित्यर्थः ॥ वामपनुः
मारमेव बामणादिनीयामपि विपि रितिभावः । अप्राप्यतो तु 'होमकर्म-
गोदाने पूर्पनामा च केशान्वे अग्निकच्य।
बेरवानरो विसर्ग उदिवार पोनः स्मृत ॥ ४ ॥
पसका विमाया दिगुणों नरः । इतरेषानु यांना त्रिगुप्पादिः समीरितः ॥
समुद्भरः॥३॥

नाम- [ १३६ ] स्मिन्भव ब्रह्मा द्विजोत्तम । अस्य यज्ञस्य होमकमरिण त्वं मे ब्रह्मा भव ।। अह भवानि ॥ यथाविहितं कर्म कुरु ।। करवाणि ।। अथ ऋत्विग्वर- रणम्-ब्राह्मणान्पूजयेत् अद्यहेत्यादि० अमुकोह ममामुकनाम्नि महायज्ञ सर्वतः लेमाद्युपलव्धये ऋग्वेदपठनार्थ, उत्तरद्वारे, एभिर्वासोगुलीयास- नफलेवृहस्पतिवहिवनस्पतिदैवतैमुक्गोत्रानमुकशम्मणो ब्राह्मणान् होम- कत्तृत्वेन युष्मान् वृणे।। पुनश्च ।। तदङ्गतया यज्ञसम्बन्धि-शान्ति- पाठवाचकेभ्यो गणेशगायत्र्यादिजापकेभ्यो रुद्राध्यायविष्णुसहस्रनाम- चण्डीपाठकेभ्यो तथा प्रामदेवतास्थानदेवतादीनां पूजकेभ्यः साचार्यपुराणशास्त्रादिवाचकेभ्यः, अमुकनामगोत्रान् रणान् युष्मानह वृणे इति तेभ्यो वरणद्रव्याणि • दत्त्वा ।। वृत्ताः स्म इति प्रतिवपुः ॥ यथाविहितं कर्म कुरुत इति कर्ता वदेत् ॥ करवाम इति ब्राह्मणा वदेपुः प्रार्थना-अस्य यज्ञस्य होमकर्मणि यूयं मे विजो भवन्तु ॥ वय भवाम इति प्रत्युक्तिः ॥ अथ रक्षाबन्धनं कुर्यात- ॐ गणाधिप नमस्कृत्य नमस्कृत्य पितामहम् । विष्णु' रुद्र श्रियं देवीं वन्दे भक्त्या सरस्वतीम् ।। १ ।। स्थानं क्षेत्र नमस्कृत्य दिननाथं निशा- करम् । धरणोगर्भसन्भूतं शशिपुत्र' वृहस्पतिम् ॥ २॥ इत्यादि मंत्र: सर्पपाततः स्वरक्षां कृत्वा कङ्कणमभिमन्त्र्य दक्षिणकरे वध्नीयात् । बन्धन मंत्रः। येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिवघ्नामि रक्षे मा चल मा चल । इति वृत्वा । विधिना मधुपर्क कृत्वा वैश्वानर लक्षणं वाचयेत्-यज्ञपुरुपो वैश्वानरः कपिलो वर्षों ब्रह्मा ऋपिविष्णुच्छन्दों रुदो देवता चतुर्वेदा ऋषयोहोम विनियोगः।।१।। पूर्वाननस्थितश्चाग्नि ऋत्विजः पूर्वदिङ मुखाः। पूर्वे च देवताः सूर्याः कथन्तु प्राङ मुखो भवेत् ॥ २ ॥ पूज्यपूज्यकयोममध्ये प्राचीदिक् सा स्मृता बुधै। आवाह- येत्ततो ह्यग्नि मन्त्रपूतेन वारिणा ||३|| अनलः सजलं दृष्टवा भीत्वा 'प्रत्यङ मुसो भवेत् । अत एवाग्नौ विद्वद्भिजलस्पों न कारयितव्यः ॥ ४॥ नारद उवाच-पावास्यच किं रूपं लक्षण चैव कीदृशम् । शिस्त्रा ह्यदर- जिह्वाश्च चतुः श्रोत्रं मुखं कथम् ।। ५॥ ब्रह्मोवाच-पावकोद्विजरूपस्तु त्रिनेत्रः त्रिशिरास्तथा । पनवलक्षणसंयुक्ताः सप्तजिह्वाः प्रकीर्तिताः॥६॥ (अथ कुण्डलस्थरिदलबिचारः) वाष्टविधानि कुरानि-चतुरस योनिाद. चतुर्ध्या तु शिबी नाम धूविरग्निस्वयारे । श्रावसम्ये भवो शेमो वैश्वदेवे तु पावकः ॥५॥ ब्रह्मा वै गाहपत्याग्निरीश्वरो नक्षिपस्तथा। विष्णुराहवनीयश्च अग्निहेत्रे येऽग्नयः ॥ ६ ॥ .

नम [ १४० ] विभागे तन्मुसं ज्ञेय ह्यादावन्ते च मध्यके। उत्तरात्ये स्थितो विष्णुर्दति णास्ये प्रजापति ॥ ७॥ मध्यपक्रे शिषो ३यो हव ब्रह्मा जगाद है। मूर्ध्नि स्थितोऽह ब्रह्मा वै मुसे चैन तु शङ्कर ।।८॥ जिह्वाया च स्थितो विष्णु दंष्टाने तु प्रहा स्थिता। नाणे तु देवता सर्वाश्चक्षयो शशि- भास्करी ।। ६ ।। हृदये यस्य ऋग्वेदो माहुस्थाने यजुस्तथा। उदरे कट्या घ शिश्ने वा सामवेद प्रकीत्तित ।। १० ॥ अथर्व पादयोजघे। प्रोबाया प्रणवस्तथा । पृष्टभागे तु गायत्री एव रूप बुधै. स्ततम् ॥ १ ॥ नारद उवाच कस्य पुनो वैश्वानर कस्मिन्कुले चोत्पन्न का माता क पिता ॥ १२॥ ब्रह्मोवाच-शाण्डिल्यगोत्र शाण्डिलीनत्र शाण्डिल्या सितदेवलेति त्रिप्रवर श्रमणी माता वरुण पिता ॥ १३ ॥ अग्नि स्थापन सङ्कल्प कुर्यात् । ॐ परमात्मने पुराणपुरुपो त्तमाय श्रीमद्भगवतो महापुरुपस्य विष्णेराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्यत्र- ह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंश- तितमे कलियुगे तत्प्रथमचरणे नम्बुद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्याव- तिर्गतक्षेत्रे हिमवत्पर्वतैकदेशे केदारसण्डे बदरिकाश्रमे इह स्थाने श्रीविष्णुप्रभृति अमुकदवताया पुण्यतमक्षेत्रे बौद्धावतारे अस्मिन् वर्त माो अमुझनाम सम्वत्सरे मुकायने s मुकविमुकमामे ऽमुकपने ऽमुकरियावमुकवासरे ऽमुमननो ऽमुकयोगे ऽमुककरणे ऽमुकराशी स्थिने रपी, चन्द्रे, भोमे, बुधे, गुरो, शुक्र, शनी राही, केतो, सन्निर्दिष्टसमये- ऽमुकगारो० मुराशि सपत्नीक सपुत्रादिपरिवारो ऽमुकशमर्हि मम यनमानस्य झाताज्ञातमनोवाकायकमजनितनिसिलाघस्तोमनिरसनपूवका- धिभौतिकाधिदैविकाध्यामिकसमुत्पनवापरयापनोदायदु स्वप्नदु शानाः विविन्तितापित्र्याविप्रत्यूहव्यूहसपथितदुपहवाधोपलिप्तदारिद्रयदु सनिधि लवहोने वहन नामा कटिहोमे हुताशन ! चन्द्रं त्र्यम् मुवच लम् । पदस पजामारवटासतानि नामत ॥ सर्वसिदि. कर कुपट नतुरसमुदादतन् । पुरमद यामिरहमर्धन्दाम शुभप्रदम् । तु प्रायश्चित विधिश्चैव पास्यशेष साहस ॥ ७॥ दवाना हम्पारस्तु पितृष्णा काव्य.न. । पूमाहत्या मृदा नाम शान्तिक बरदस्तष ॥८॥ पोप्टिक बलदरनेर काराग्निनाभिचारिक। वश्याय कामदा नाम सनदा यधन ॥E || पार पम् नुमरा तिर्मणि । पदमारया कह परम पप्रसन्निभन् । पिद गमन रामप्यासनारिणम् । ( भदन पामर.)-विपासा - नमः । १४१ ] न ब्रह्माण्डवर्तिचराचर चतुरशीतिलक्षयोनिसमुद्भ तनानाविघातकसमुदायदू- रीकरणमुखदीर्घायुध्यनरुज्यबलपुष्टिप्राप्यनन्तरंसार्वजनीनहृदगतचर्मगतम स्तिष्कगतामयसंशोधनोत्तरकालिकवर्मार्थकाममोक्ष प्रतिबन्धकसमस्तान्त- ररायक्षपणसाधनकर्त्तव्यमीमांतरिक्षमहोत्पातेतिभयमूलसमुच्छेदनमूलकचतु- वर्गतिद्धिकोशोद्घाटकसर्व निगमागमोक्शुभफनप्राप्तयेऽमुकयज्ञपूर्वाङ्गतया यजु-शाखीयपद्धत्युक्तमकारेणाग्निस्थापन करिष्ये ॥ कुशैहस्तमात्रमिताभूमि परिसमूह्य तान्कुशानै शान्यां दिशि परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य सुवमू- लेन प्रजापतिभागगृहीतेन यथोरं तिखोरेखा विलिस्याल्लेखनक्रमेणानामि- कांगुष्ठाभ्यां मृद मुद्धृत्यपूर्वे क्षिप्त्वा जलेनाभ्युक्ष्य पीठं पूजयेत् कुशाक्षतैः । ॐ रत्नमन्दिराय नमः ॐ चतुरमंडलाय नमः, ॐ रत्नवेदिकायै नमः, ॐ श्वेतच्छत्राय नमः, ॐ रत्नसिंहासनाय. नमः, ॐ वैराग्याय नमः ॐ ऐश्वर्याय अधमाय नमः, ॐ अज्ञानाय नमः, ॐ अवैरा- ग्याय नमः, ॐ अनैश्वर्याय नमः । इति पञ्जभूसँस्कारान्कृत्वा ॥ ततः कास्यादिपात्र पैप्पलखादिरशम्यारणिज सूयकातज श्रीत्रियागारजं वाऽग्नि संस्थाप्य, अग्निसंस्कारं कुर्यात् । ॐ मीयगृहाम्यग्ने अग्नि रायस्पोपाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥ इति ग्रहणम गर्भो अस्योपीना गर्भो वनस्पतीना गर्मो विश्वस्य भूतस्यग्निगर्भो अपा- मसि ।। इति गर्भाधानम् ।। ॐ विवस्वानादित्यैप ते सोमपीय तस्मिन्मस्व- अदस्मै नरो वर्चसे दधातन । यदाशीदम्पतिवमिमत्रतः पुमान्पुत्रो कोठे तु जाठराग्निः स्यात्क्रयादोऽमृतमक्षणे । . समुदे वाडवो शेयः क्षये संवर्व को भवेत् ॥ १०॥ इति ।। ब्रामणताक्षणन्- कामपाश्च कुलीनाश्च वेदवेदागः । षटकर्मनिरताः शुदाः स्वाध्याये चैत तत्रयः ॥ १॥ चतुस स्वाद्राशा बलमिप्यते । वैश्यानामचन्द्राम शुद्धाया न्यसमोरितम् । चतुरन्तु सर्वे पाकेनिदिच्छान्त तात्रिकाः ।। (दुर्गाहोमे त्रिकोणकुमदं स्थान ) जितेन्द्रिया जितकोधा अग्निहोत्ररायशाः। पनदीना निर्विषया सत्यशोधरायया ॥२॥ उभयो. कुलयोः शुमा येशुदा वानकाः स्मृताः । कुटम्बिनो महाभागास्ते विप्राः फलदायकाः ३ नकारन पिरा व पखुलाः श्यामदन्ताः। माय स्वंम्म कुरामचन प्रिया । स्परिजलं वायं गि मानवाराम्भु'-रवि वरिभाने वीभागरचनात् सदाशिलादिम.न. ॥ ॐ * । १४२ ] जायते विंदते वस्वधा विश्वाहा २५ एधते गृहे ॥ इति पुंसवनम् ।। ॐ ऋस्त्वा सत्यो मदानामष्टिो मत्सदधसः ददाचिदारुजे वसुः ॥ इति । सोमन्तोन्नयनम् । ॐ अजीजनो हि पवमान सूर्य विधारे शक्मना • पयः ॥ गोजीररहमाणः परन्ध्रया ॥ इति जातकर्म । ॐ यदापि एप मातरं पुत्रः प्रमुदितो धयन् एतदग्ने अनृणो भवाम्यहं तौ पिवरी मया सम्प्रचरुस्था सन्मा भद्रेण पृको विचस्थविमपाप्मना गृह ॥ इति नामकर्म ॥ ॐ पूपा पञ्चाक्षरेण पर दिश बदायतो उज्येष सविता पडक्षरेण पत्नुदजयत्तानुज्जेपम्मरुतः सप्ताक्षरेण सप्त माम्यान्पशूनुदजय स्तानुन्जेष वृहस्पतिरष्टाक्षरेण गायत्रीमुदचयत्ता- मुच्छेपम् ॥ इति निष्कमणम् ॥ ॐ अन्नपतेन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः प्रपदातारै तारिप नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे । इत्यन्न- प्राशनम् ॥ ॐ अग्न आयाहि वीतये गृणानो हन्यदातये निहोचा ससि यदिपि ।। इति चूडाकर्म ।। ॐ भद्रं कर्णाभिः श्रृणुयाम देवा भर पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्ग सुष्ट वासस्तनूभिव्यशेमहि देवहित यदायुः ॥ इति कर्णवेधः ॥ ॐ अग्निरेकाक्षरेण प्राणमुदजयद्यमुजेप- मम्बिनीद्वयक्षरेण द्विपदो मनुष्यानुदायतान्तानुजय विष्णुस्त्यदरेण श्रीलोकानुदजयत्तानुज्जेप मोमश्चतुरदरेण चतुष्पदः पशूनुदयमानुज्ने. पम् ।। इत्युपनयनम् ॥ ॐ अश्वस्यान्नस्य सम्पत्तिः पुत्राणामभिसम्पदे !! आयुर्वलश्रियाददन्त्या सा न एहि रुन्धति ।। इति वेदारम्भः। ॐ प्रत कृणुताग्निब्रह्माग्निर्यझो वनस्पतिर्यज्ञियः ॥ देवी धियं मनामहे समृलोका. मभिष्टये वर्षो धायपाहस सुतीर्थानो असहशे ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्षतेवस्ते नोवन्तु नो यन्तु तेभ्यः इति समावर्तनम् ।। ॐगाय उपावतावतं यज्ञस्य रप्सुदा उभा कर्ण हिरएमया ॥ इति गोदानम् ।। ॐ भा पर भगवाँ अस्तु देवास्तेन वर्य भगवन्तः स्याम वत्या भग सर्व इज्जोडवीति म नो भग पुर एतामह ॥ इति विवाहः ॥ ॐ ऋतावान वैश्वानरमृतस्य । प्रवादी च परदेषा भ्रष्टाचारः राठस्तथा ॥ ४ ॥ नियमनकारी न गरीरं फरकमपि। पातपडनिरतो यश्व देवतामय निन्दकः ॥ ५ ॥ गोला कुरकारचेव निन्दा प्रेमानसाः। रामसेवा परा विधा यमपि वर्जिताः ॥ प्रन्येर न मरहस्येव प्राशस्त्यमुत्रम् ! समस्तकाविधानप्रतिदकनियन्ये. परा, सीमया देशाचारेण या परस्था। (उपपवरूपम्)- [ १४३ ] ज्योतिष्मती असृङवर्ममीमहे ।। इति चतुर्थी॥ अथावाहनम्-ॐ उपयाम गृहीतोस्यग्ने त्वा वर्चस एप ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे अग्ने वर्चस्विन् वर्चस्वास्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम् ।। इति पोडशसंस्कारा. न्मृत्वा ॥ अग्नि वैद्यां वा कुण्डे स्वाभिमुखं स्थापयेत् ।। ॐ वैश्वानरोन उतय आप्रयातु परावतः अग्निन्नः सुष्टुती रुप ॥ ॐ अग्नि दूतं०॥ इत्यग्नि संस्थाप्य ॥ तत्रं यक्षियकाष्ठानि ॐ त्वामद्य ऋषय आयेति मन्त्रेण संस्थापयेत् ॥ ॐ अग्निमूद्धेति मन्त्रेणाग्नि प्रज्वालयेत् ॥ अनामि- कांगुष्ठयोगेन प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात् ॐएतन्ते देव सवितर्यज्ञ प्राइस्पतये ब्राह्मणे नेन यज्ञरतिं तेन मामव । ॐ मनो जूतिर्जु पतामाज्यस्य वृहस्पतिज्ञमिमं नोत्वरिष्टं यज्ञ , समिम धातु विश्वेदेवास इह माद- यन्तामोम्प्रतिष्ठ॥ ॐ तदस्तु मित्रा०॥ ॐभूभुवः स्वः भो अग्ने उहागच्छं इह तिष्ठ ।। अथ ध्यानम्-अरष्टं शक्ति स्वस्तिकाभीतिमुच्चैदीर्घदौभि- रपामंजपाभम् । हेमाकल्पं पद्मसंस्थं त्रिनेत्रं ध्यायेद्वहिं बद्धमौलि जटाभिः ।। कुशकंडिकाक्रमः--यजमानोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्ध मासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागप्रान्कुशानास्तीर्य, अस्मिन्कर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव, भवानीति, यस्त- स्मिमन्नासने ऋताग्निपरिक्रमं ब्रह्माणमुद मुसे उपवेशयेत् । प्रणीतापान पुरतः कृ वा वारिणा परिपूर्य कुशराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्ने. रुत्तरवः कुशोपरि निदध्यात्, एकाशीतिदर्भानादाय विंशतिमाग्नेयादीशा- नान्तम्. विंशति नझणोग्निपर्यन्वं विंशवि नी त्याद्वायव्यान्तम्, विंशति- नै त्याद्वायव्यान्तम्, विंशतिमग्नितः प्रणीतापर्यन्तं परिस्तीर्य कुशम- वशिष्टमेकं स्वदक्षिणवः बुवस्थापनार्य स्थापयेत् । अग्नेरुतः पश्चिमशि पवित्र करणार्थ साप्रमनन्तगर्भ कुशवयं, पवित्रच्छेदनार्थ कुशवयम्, पासनानि व्यास:- कौरोष कम्बलं चैव अजिनं पहमेव च । दारुजं तालरनं वा मासनं परिकल्पयेत् । कम्मानिने शानसिदिनों बभीन्यांमचमीष। पंश जिने न्याधिनासम्मले दु:मोननम् ॥ प्राच्या शिरः समारल्यातं गह दहिया सौम्पयोः । उदर समिन्यु योनिः पादो न पमिने स पावापुरास विस्वारः सननं तवदीरितम् । इराना अभिनारे नदेलवावादिनपि। मान्तिकमाला मोशः सर्वेषां विषयमलन । पमानिमा प्रयोदरकुरा उपमनः । कुरान मभन पारमग्नेरास प्रतिवन ! 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[ १४४ ] प्रोनणीपात्र आम्रपाली, घमस्याली, सम्मानरूग. पञ्चकुशा, वेणीरूपीपयमनकुशा सप्त, पलाशसमियस्तिस्र , स्रुव, आयम्, पटु पञ्चाशदुत्तर मुष्टिशतद्वयावच्छिन्न तण्डुलपूर्णपात्र मदक्षिएम्, एतानि सर्वाणि पनि च्छेदनकुशाना पूर्वपूर्वदिशिक्रमेणासादनीयानि स्थापनी यानि ] च्छेदनार्थकफुरात्रयेण मारमनन्तर्गर्भकुशद्वय छिस्ता सपवित्रदक्षि- एकरण प्रणीतोदक वि प्रोक्षण पाने निवाय, व्यस्तम्, द्वाभ्यामनामिकागु- वाम्यामुत्तराप्र पवित्र धृत्वा तेन प्रोक्षणोजलस्य त्रिलवन कुर्यात् प्रोक्षणीपात्र वामहस्ते कृत्या, क्षिणानामिकागुष्ठाभ्या पवित्र गृहीता तेन प्रोक्षणीजल मिक्षिप्प, प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीप्रोक्षण विधाय, प्रोक्षणीनलेमासादितवस्तुमचनं कला, अग्निप्रणीतयोमध्ये प्रोक्षणीपात्र निदध्यात् ाज्यस्थाल्यामाज्य निरूप्य, अधिश्रित्य । तापयित्वा ] प्रदुमुकेन प्रदक्षिणक्रमेण इविष्ठयित्वा वली तत्प्रक्षिपेत्, सब मधोमुस प्रतप्य सम्मानकुशानाममरन्तरवो • लैवलित समृज्य, प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य, पुन प्रतप्य, स्वदक्षिणतो धृतशोपरि निदध्यान, अग्नि दक्षिणक्रमेणाध्यमग्नेश्ववार्यापतो निदध्यात् प्रोक्षणीवन् त्रिरत्यू यावेक्ष्य, सत्यपद्रव्ये तनिरस्य, पूर्वक्योहएयुत्पवन कुर्यात वेणीरू पोपयमनकुशान् ( उपग्रहार्थीयान्मुशान् ) वामहस्ते कृत्या उत्तिष्ठन् प्रजापति मनसा ध्यावा घृताका पालाशममि पस्तिन समिद्धतमे यस्मिन् सर्वाणि कायाणि साधनोयानि नित्यश ||१|| यादश रूप मेबळानाच तादशम् ॥ ( होमप्रमाणेन रहमानम् )-मुहिमा प्रमित कुरइ रावासुप्रवदते। शतहामग्तिस्तिमा स्तमान महम्के । यशानावय काताये- श्रावती तेजशी वा मन्मयी वा प्रकीविता। बादशाग्रुतविस्तीयां प्रादेशोच्या शुमा स्मृता ॥१॥ प्राज्यस्थानी समा नैव चारपानी प्रशस्यठे। प्रसीता वारणा प्राधा दादानुनसम्मिवा ॥२॥ दिहस्तमयुवे लद चनुास्तमुदीरितम् ॥ ( कुराहमानने मखलामानम् )- फरहाना ममजास्टिस मुरिमा नुवा. मात् । उनमेशामतो गंदा वाहन दग्वलदापापप्ररत्रवत् । पुगवायरस पापी मनुग्ला समानत ॥३॥ खातेन वक्षनव युवा पग परास्यते । नादिरा गामायग्नु उसासा सव ॥४॥ प्रालिमारामार वादा।

[ १४५ ] ऽग्नौ तूष्णीं जुहुयात् ॥ उपविस्य || सपवित्रप्रोक्षएयुदकेन प्रदक्षिक पक्रमेणाग्नि पर्युक्ष्य, प्रणीतापात्रे पवित्र' निधाय पातितद क्षिण जानुबामणान्यारब्धः ( ब्रह्मणो दक्षिणहस्तेन दक्षिणस्थ- कुशेन वा अनुस्पृष्टः ) समिद्धतमेऽम्नावाज्याहुतीः सुवेण दद्यात्, प्रजापत्यादिद्वादशाहुतिपर्यन्वं खुवावस्थिवडतशेपघृतस्प प्रोक्षणीपात्रे प्रोः कार्यः । अथाहुतयः ॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा, इंद प्रजापतये, इति पूर्वद्वारहोमः । ॐ इंद्राय स्वाहा, 'इमिन्द्राय, इत्यमिमध्ये उत्तरद्वारहोमः । ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये, इत्याधारौ दक्षिण- पूर्वार्द्ध ॐ सोमाय स्वाहा, इद, सोमाय इत्याज्यभागौ, उत्तर- पूवार्द्ध । इति चतुर्दारहोमः ॥ श्रय व्याहवयः ॥ ॐ भूः स्वाहा, इनमग्नये ॥ ॐ मुवः स्वाहा इदं वायवे ॥ ॐ स्वः स्वाहा, इद . सूर्याय ॥ ॐ भूर्नुकः स्वाः स्वाहा, इदं सवित्रेभ्यः ॥ एता महाव्याहवयः ॥ श्रय पन्चवारुणी ( प्रायश्चित्त ) होमः ॥ ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वानू देवस्य हेडो वयासिसीष्ठाः ॥ यजिष्टो यहितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषा .सि प्रमुमुग्भ्यस्मत्स्वाहा, इदमानीवरुणभ्याम् ॥१॥ ॐस बनो भग्नेवमो भयोतीनेदिष्ठो अस्या उपसो व्यष्टौ ॥ अवयव नो पण.. रराणो वीहि मुदीक सुहबो न एधि स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥ २ ॥ ॐ अपाश्चाग्नेस्यनभिशस्तपारच सत्वमित्व मया असि ॥ अयानो या वक्षा. स्ययानी धेहि भेपज स्वाहा ॥ इदमग्नये ॥३॥ॐ ये ते श वरुण ये सास्रं यज्ञियाः पाशा पिवता महान्वस्तमिनों भय सनिवोत विष्णुर्विश्वे मुन्ध मरुतः स्वर्काः स्वाहा ॥ इदं वरुणाय सवित्रे दयेकाचंगुलमम्मिताः । विस्मिा कुरडे वेदाग्निनयनागुलाः । इंगडे द्विरस्ते वा छेया रसवेदगुपाणुलाः। चनुहस्तेपु कुण्डे बमुतकयुगांगुनाः। अपंपरणाल्या व युक्तो नासाकविभवे ॥५॥ उमभन सुभ वासुसन पुकरमुक्तथैव न। अग्निहोत्रसवपी तथा कमत: सु वः ॥ ६ ॥ पविश्यमापन्। दयनुलं मूलातयं प्रन्यरेका निभवेत् । मेखतानां भवेदसः परितो नेभिरंगुला।। शतप पुस यसकमा. स्मुः। सितारोत्तो डेगा मेला तो उसने योनिरामान. ननुग्नुतमम सालविषय मायन् ।। पास विं पसमागमभू।

। १४६ ] विणवे विश्वेश्यो देवेभ्यो मरुद्धयः स्वभ्यः ॥ ४ ॥ ॐ उदुत्तम वरुणपाशमम्मदवाधम विमध्यम प्रथाय श्रथा वयमादित्यत्रते तवा नागसो अदितये स्याम स्वाहा ॥ इदं वरुणायादितये ॥ ५॥ अथाग्नि पूजनम्--ऋग्वेदं स्थापयेत्पूर्व यजुर्वेदन दक्षिणे । पश्चिमे सामवेदन्तु उत्तरे च ह्ययवर्णम् ।। इति चतुर्दिक्षु पाद्यादिभिर्वेदान्सम्पूज्य ततोग्निजिह्वा पूजनम्--ॐ काल्यै नमः, ॐ कराल्यै नमः, ॐ मनोजवायै नमः, सुलोहिनायै नमः, ॐ सुधूम्रवर्णायै नम , ॐ स्फुलिङ्गिन्यै नमः, अविश्व- मधये नमः, ॐ लोलायमानायै नमः सप्तजिलामुद्रां प्री ॐ भूर्भुवः स्वः सप्तजिह्वा इहागच्छत इह तिष्ठत पाद्यादीनि समर्पयामि सप्त जिह्वाभ्यो नमः सम्पूष्य ।। अथावादनम्-ॐ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वा- युस्तदु चन्द्रमाः ॥ तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ।।१।। सर्वे निमेपा जज्ञिरे वियुतः पुरुषादधि | मैनमूर्ध्व न तिर्यञ्चन मध्ये परिजप्रभत् ॥ २ ॥ न तस्य प्रतिमा-अस्ति यस्य नाम महद्यशः । हिरण्यगर्भ इत्येषः मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जात इत्येप ॥ ३ ॥ एपो ह देवः प्रदिशो नु सर्वापूर्वो ह जातः स उंगर्भ अन्तः स एवं जातः ।। स जनिष्यमाणः प्रत्यङजनॉस्तिष्ठति सर्व वोमुखः ॥ ४॥ चत्वारि श्रृङ्गास्त्रमयो अस्य पादा द्वे शो सप्तहस्तासो अस्य विधा वृद्धो वृपभो रोरवीति महो देवो माँ पानिवेश ॥५॥ रुद्रेकल्पे-रुद्रतेज समुद्रभूतं० ॥ इत्यावाहनम् ॥ॐ पुरुप एवेद । सर्व यद् भूतं यह भाव्यम् ॥ उतामृततत्त्वस्येशानो यदन्ननातिरोहति इत्यासनम् || आस: ना), पुष्पं समर्पयामि श्रीमदग्नये नमः | ॐ शन्नो देवीरभिष्टय * समन्वात्प्रवणं मूर्मि पंचपात्रमिति स्मृतम् ॥ २॥ पौष्टि के पंच दर्भाश्च चतुदर्भाश्च शान्ति के । पैत्रिके तु विदर्भाश्च दो दभी नित्यकर्मणि ॥ ३॥ पर्यश्वत्यपप्रात् पेहरवाना कुपटाना योनिगरिता । पटवत्र पंगु, मायाम वस्तारोन्नतिशा दिनी ॥ एकागु कन्तु योन्यमं कुर्यादाविदधोमुखम् । भारदेय.- महिंदभपिजले मस्य पवित्रम् ॥ परन्न्यूनमुरिष्टं रणे यथाक्रमम् ॥ ४ ॥ अधिः- अनामिकामूतदेशे पवित्र पारयंद द्विजः । एलो वोनि इसमन्येषु वयेत् । यययाफमेणे व योग्यममपि व. पेत् ।। पलादारम्य नास पायोन्य मर्ष सभाम् । नायिकाकोणे,

। १४७ ]
आपो भवन्तु पीतये शंयोरमिस्रवन्नु नः । इति पाद्यं समर्पयामि ॥
श्रीमदमये नमः ॥ ॐ त्रिपाल उदैत्पुरुषः पादोस्येहाभव-
सुनः ॥ ततो विषम म्यक्रामत्साशनानशने भभि ।। इत्य
समर्पयामि ॥ ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुपस्य स्कंभ-
सननीयो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य
ऋतसदनमासीद ॥ इत्याचमनीय सम०॥ ॐ तस्माधज्ञात्सर्वहुमः सन्भृतं
पृषदाज्यम् । परों स्तॉन्चक्र वायन्यानाराण्यानाम्याश्च ये इनि स्नायीय
सम०।। ॐ पन्ध नद्यः सरस्वतीमपियन्तिस स्रोतसा सरस्वती तु पनधासो
देशेभवत्सरित् ।। इति पञ्चामृत सम० ॥ ततः पञ्चामृतस्नानानानन्तरं
शुद्धोदकं सम० ।। ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उभेयान्भवति
जायमानः ॥ तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्त ॥ इति
वस्त्र सम० ॥ ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्र प्रजापतेर्यसहजं पुरस्तात ॥
आयुष्यमार्य प्रतिमुच शुभ्रंयज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजःइति यहोरवीतं सम०॥
ॐ अलङ्करणमसि भूयोऽलकरणं भूयाः ॥ इति भूषणाभावे रजतादि द्रव्यं
समर्प० ॥ ॐ अ-शुना ते अशुपच्यतां परुषा परुः ॥ गन्धस्ते
सोममवतु मदाय रसो च्युतः । इति चन्दनं सम० ॥ ॐ अक्षन्नमीमदन्त
ह्यवप्रिया ऽ धूषत ।। प्रस्तोपए स्त्रमानवो विप्रान्नविष्ठयामती योजान्विन्द्र
ते हरी ॥ इत्यक्षतान्सम० ॥ ॐ याहरद्यमदग्निश्रद्धाय कामायेन्द्रि
याय ता अहं प्रतिगृहणामि यशसा च भगेन च । इति पुष्पाणि सः ॥
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व संयोस्मान्धर्वति तं धूर्व यं वयं धूमिः। देवा
नामसि वह्नितम सस्तितमं पप्रितम जुष्टमं देवहूतमम् || इवि धूपमाघा.
पयामि ॥ ॐ चंद्रमा मनस इति दीपं दर्शयामि ॥ ॐ अन्नपतेन्नस्य नो
धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः ॥ प्रप्रदातारं वारप ऊर्ज नो थेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥
अग्निनियमस्तु संप्रहे-
उचमोऽरपिजन्योग्निस्तमः सूर्यकान्तिाः ।
उचमः श्रोत्रियागारान्मध्यमः स्वरहारपि ॥॥
प्रय समिधाहोममन्त्रा:-
समिधाग्नि दुवस्यत घुर्योधयतातिपिम् ।
योनि वा तन्त्रवितमः । कुपढाना कल्पयेदन्त भिमम्बुजसन्निभाम् । वत्त-
कुणानुरूपं का मानमस्य निगद्यते ॥ मुष्टयरल्येकालना नाभिमसेषता.
अस्मिन्हम्या जुहोवना स्वा"
ममिकाप शोपि पृठं दी जुहोवन ।
अग्नये जास्वेइसे साहा॥१॥

[ १४८ ] इति नैवेद्यं निवेदयामि श्री० ॥ तृपा दूरीकरणार्थमिदं जलं समर्प० । ततः करमुसप्रक्षालनार्थ च जलं समर्प० ॥ मुखवासार्थे पूगीफलताम्बूलं समर्मः ॥ ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातः पतिरेक प्रासीत् ।। स दाधार पृथिवीं चामुतेमा कस्मै देवाय इविपा विधेम ।। इति दक्षिा सम० । कारार्तिक्यं दर्शयामि ॥ ॐ प्रतिपदसि प्रेतिपदेत्वाऽनुपर्दस नूपरे वा सम्पदसि सम्पदे ला तेजोसि तेजसेवा ।। इति परिक्रमणम् ॥ ततो नमस्कारः । ॐ नमस्ते देव देवेश नमस्ते वरद प्रभो ॥ वैश्वानर नमस्तेस्तु सर्वदा मङ्गल कुरु ।। इति पोड शोपचारेण अग्निपूजनम् ।। अथ पञ्चगव्यहोमः -साप्रैः सप्तपत्रैर्हरितेः कुशैदशाहुवोजुहुयात् ॥ वत्र मन्त्रा:--ॐ इरावतीधेनुमतीहि भूत , सूयवासिनी मनवे दशस्या । व्यस्कम्रा रोदसी विषणने ते दावर्यः पृथ्वीमभितो मयूखैः स्वाहा । इदं पृथ्व्ये ॥ १॥ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् ।। समूह मस्य पासुरे स्वाहा ॥ इदं विष्णवे ॥२॥ ॐ मानस्तोके तनये भा न आयुपि मा नो गोपु मा नो अश्वेपु रीरिपः ॥ मा नो वीरान रुद्र भामिनो वधीहविष्मन्तः सदभि वा हवामहे स्वाहा, इदं रुद्राय ॥३॥ यज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमत: सुरुचो वेन आवः ॥ सुयुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः स्वाहा ॥ इदं ब्रह्मणे ॥४॥ ॐ अनये स्वाहा, इदमग्नये ॥५॥ॐ सोमाय स्वाहाः इदं सोमाय ॥ ६ ॥ ॐ तत्सवितुः इदं सूर्याय ॥७॥ ॐ प्रजापते न त्वदेवान्न्य न्यो विश्वा रूपाणि परिता बभूव ॥ यत्कामास्ते जुहुमरतन्नो अस्तु वयस्याम पत्यो रयीणां स्वाहा इह प्रजातये ।। ॐ स्वाहायै ॥६॥ ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये विष्टकृते ॥१०॥ पुनरी ॐ देवळंत ॥ इति पञ्चगव्यहोमः ॥ अथ यदिहोममन्पधृत- वा समिद्भिनिरो घुयेन बर्दयामसि । शरच्चोनाय विष्टय वा ॥३॥ रतः । विश्विदागुनोपेता 'कुरहे मन्येषु वर्धयेत् ॥ यवदसकमेणव नाभि पगुदायाः । योनिगडे योनिमाकुरडे नामि विर्जयेत् ।। विकृती उखानेहविष्मवानीपन हर्यत । जुषस्य समियो मम सग ॥ ॥ इति समिधाहोमः॥ 'गपाधिरतये देया प्रथमा तु वगहुतिः । अन्यषा सिक्ष कर्म देवहिनिरिचवम् से है माथे पक्षमापन- मामांग पवा दिमाग मान्यमेर ध।

यजमानस्य
[ १४६ .
प्रोक्षणम्-ॐ घृतं घृतपाबानः पिचत बसां वसापावानः पियवान्तरिक्षस्य
हविरसि स्वाहा दिशः प्रदिशः प्रादिशो विदिश उदिशो दिभ्यः
खाहा ॥ ॐ तेजोसि शुक्रस्यमृतमसि-वामनामसि प्रियं देवानामनाधृष्ट
देवय जनमसि ॥ इति है मद्रव्याजयेकीकृत्य पश्चात् ॐ प्रापोदिप्तादि
मन्त्रैः समोरयेदर्घजलेन ॥ हवनीयव्याय नमः सम्पूज्य, एवं गन्धः-
एतानक्षतान् इमानि पुष्पाणि धूपमात्रापयामि, दीपं दर्शयामि, नैवेद्य
निवदयामि, दक्षिणां समर्पयामि ॥ ग्रहसमिमः । अर्कः पलाशः खदिरो
झगमार्गोऽय पिपलः ।। औदुम्बरः शमो दूर्वा कुशश्च समिधः-
क्रमात् । समियाम्यो नमः पाद्यादानि समर्पयामि इति सम्पज्य ॥ ततः
तम्मित् यादिहोमद्रव्ये यजमानो ब्राह्मण एव का संकल्प : कुर्यात् ।।
यवकुशजल ते नान्यादाय || अद्येहेत्यादि० अमुकशाहं ममात्मनो वा
अमुख्य
श्रुयिस्मृतिपुराणेतिहासोक्तसत्फलप्राप्तयर्थ
[वा.
अमुमामासिना] सर्वैश्वाभिवृद्धयर्थं सकलमनई-
प्सितकामनासंसिद्धयर्थ लोके
वा सभायां राजद्वारे या सर्वत्र
यशोविजयलाभादि-प्राप्त्यर्थ, • इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदु-
रितोपशमनार्थ समस्तभयव्याधिजरापीडाल्पमृत्युपरिहारद्वार श्रायुगरोग्यैर-
वर्याभिवृद्धयर्थ सकलदुष्टप्रहजनितानिष्टफल निराकरणार्थं सर्वोपवादि.
नाशहेतवे; आदित्यादिनवमहानुकूलतासिद्धयर्थ आधिदैविकाधिमौतिका-
ध्यात्मिकत्रिविधतापोपशमनार्थ धर्मार्थकामादिचतुर्वर्गफलायाप्तये अमुक-
क्षेत्रेवा तोर्थे, करिष्यमाण अमुकनाम्नि महायज्ञे पूर्वाङ्गतयागणपत्या-
दिचतुर्देवानां प्रीतये ऋग्वेदादिचतुर्वेदानां संप्रीत्यर्थ, अधिप्रत्यधिदेव-
दोषः ) खातेऽधिके भवद्रोंगी होने धेनु धमवयः + वनकुरटे तु सत्तापो मरणं
भिन्नमेखले । मेखलारहिते शोकोऽप्यधिके वित्तसंचयः ) भार्यविनाशनं. प्रोक
कृष्पास्तिलानमागं च ोकमागं च तारहनयू।
शकरायाश्चाईकाग हवनस्स विधित्यम् ॥1॥
अभ्यच्च-
तिलं घृत समं कृत्वा यवान्नं दिगुणी कृतम् ।
तद वण्डुला देया होमसामान्यकर्मणि ॥२॥
कुण्डे योन्या विना गते । अग्य धंसनम्नो कुराई यत्कराठवर्जितम् ।
वदेवं कुण्डनिर्मायस्यातीर तुपकरतया प्यूनाधिताच दोषभवपाकुगर.
अपि च-
चतुर्माग विजान्नं च विभागं नाग्यमेव या
ययानन्तु त्रिभागं सामागमेन्तु तरडुलन् ॥३॥

। १५. j तासहितसूर्यादिनवग्रहदेववानां वैदिकमन्त्र वाभिधारितवत्समियामिः तथा पंचलोकपालगणपत्यादीनां, अष्टलोकपालानां च । इन्द्रादिदशदि- काल] आस्तिध्रुवगृथिवीवास्तुर्मक्षेत्रपालादिदेवानां प्रसन्नता तथा च विष्णुसर्पमाडौश्रियो मेघायाश्व रक्षोनीगायत्रीजातवेदेति मन्त्र श्रीलक्ष्मीनारायणयज्ञपुरुषप्रीत्ययं च सतिलयवांडलाज्येन गीमुद्रानिर्दि- टैर्यधाविधिाना होमं करिष्ये ॥ तथा व सम्बत्सरारम्य होम पूर्वोत्तरा- अपूर्णाहुतिपर्यन्तं चरुस्थालीपाकेन वा होनं करिष्ये ॥ वदावया .विश्वेदेवाचनपूर्वकनान्दीमुखश्राद्धं वा धृवच्छायञ्च करिष्ये । इति सङ्कलप होमद्रव्यादी त्यक्त्वा || अब पूर्वादिप्रविचरणे विश्वेदेवापू.. जनम् विष्णुविष्णुहरिई रिः बिराचम्य ॥ अञ्जलि ववा-ॐ आग: च्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महायलाः ॥ यज्ञकर्मणि ये देवा साव. धाना भवन्तु ते ॥ ॐ विश्वे देवान्भवत्सु श्रावाहयिष्ये ॐ आवाहय, इत्यावाहनमुद्रां प्रदर्य पुष्पाततैः-ॐ विश्वदेवास आगत शृणुता मइम . हयम् ॥ एवम्बहिनिपीदत ॥ ॐ भुवः स्वविश्वदेवा ३ागच्छन्तु इह तिष्ठन्नु इह सुप्रितिष्टिता वरदा भवन्तु || ब्रह्मावि पणुशिवात्मकम्यो विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः सम्पूज्य पायं समर्पयामि, एष गन्धः, एतानवतात्, इमानि पुष्पाणि, धूपमाघापयामि, दीपं दर्शयामि, नैवेद्य निवेदयामि, दक्षिणां समर्पयामि, विश्वम्यो देवेभ्यो नमः ( यव- कुपजलान्यादाय ॥ अमुकयक्षे त्राभ्युदयिकाद्ध सायबसुसंशकानां पिर वेषां देवानामेप हिंगुलापादा वो नमः स्वाहा ॥ १॥ गणपत्यादिदेवेभ्यो नवमहम्य इन्द्रादिदिकपालेभ्यः पश्चलोकपालेभ्योऽश्विन्यायाविश विन क्षत्रेभ्यो नान्दीमुरोम्य एप एप हिंगुनापादा? वो नमः स्वाहा ) अायुर्नागं घृताधिक्ये पुनारां विज्ञापिके। स्थाने स्थरिशसमेव कुर्यात् । तदुप्तम्-नित्यं नैमिविदाम्यं स्पषिदले या सक्षा चरेत् । स्तनाप वकर्यादानुवामिः मुशोमनम् । इयरवन्खता कता योनि भनयान्यसमादिः स्यायाधिस्ये न संशयः। ठरएनारिको हानिः शराधिको मम ॥ ४॥ प्रम्प-पायुचयोय ना." अप मद्रम्पमाणे नद्रासश्यम्- मयूरी कसरी मी पूरी मृगी वषा । करा : परम् । रोगपन नवे प्रोपंडिजनरनन् । निरागुम्भक पायावरप रमनं सपा ॥ (प्रग्नेः मदगिः )-बाली राही र मनोगत [ १५१ ] मेपादिद्वादशराशिभ्य उपमहेभ्योऽन्येभ्योऽपिमहमण्डलसंस्थेभ्यो देवेभ्यो नान्दीमुसेभ्य एष हिंगुलापादा? वो नमः स्वाहा ॥३॥ अगस्त्यादिभ्यो ध्वदिभ्यो नान्दीमुखेभ्यः एप हिंगुलापादा| वो नमः स्वाहा ।। ४ । कुल देवताभ्यो वास्तुपुरुषक्षेत्रपालादिभ्यो नान्दीमुखेभ्य एष हिंगुलापादा? वो नमः स्वाहा ॥ ५॥ सत्यवसुसुंज्ञकृभ्यो देवर्षिपितृमनुष्येभ्यो नांदी- मुसम्म एप हिंगुलापादा? वो नमः स्वाहा ॥ ६ ॥ इति , विश्वेदेवाने दद्यात् ॥ ॐ आब्रह्मन्निपि मंत्रेणार्घजलेन विश्वेदेवानामभिषिञ्चनं कुर्यात् ।। इति नान्दीमुखश्राद्धम् अथ घृतच्छायाविधानम् । तैजसे पात्र'. घृतं प्रक्षिपेत्-ध्रुवोसीति प्रजापति पिर्गायत्रीछन्दो ध्रुवो देवता घृतच्छा- यायां विनियोघः ॥ ॐ ध्रुवोसी ध्रुवोयं यज्ञमानोस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिभूयात् ॥ घृतेन द्याया पृथिवी पूर्यथामिन्द्रस्य च्छदिरसि विश्वजन- स्यच्चाया स्वाहा ।। इति वारत्रयं कृत्वा ॥ शेपं घृत-ॐ जयंती मगला काली भद्रकाली कपालिनी || दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते स्वाहा ॥ इति व्वही प्रक्षिपेत् ॥ ॐ यानि कानीति परिक्रमण कृता ब्रह्माचार्यत्विगादिभि मणेराशिपं गन्धाक्षताँरच गृहणीयात् ॥ समिद्धोमं विधाय ॥ अथ यवादिहोमद्रव्याहुतिः प्रारम्भः ॥ श्रादौ गणपत्यादि चतुहोम:- हरिः ॐ गणानान्त्वा गणपति । हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति । हवामहे निधीनात्वा निधिपति । हवामवे वसो मम || भाहमजानि गर्भधमात्मजासि गम्भधं स्वाहा ।। १।। ॐ ब्रह्मयज्ञान प्रथम पुरस्ता- द्विसीमतः सुरुयो वेन आवः ॥ सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतरच योनिमसतरच वियः साहा ॥ २ ॥ ॐ विष्णोरस्ट्मसि विष्णोः रनप्रस्थो लिष्णोः स्यूसि विष्णोधु वोसि । वैष्णवे त्वा स्वाहा ।। ३ ॥ ॐ नमः पञ्च मुद्रा विजानीयादोमद्रन्यग्रहे बुधः ॥1॥ म्युन्जेन पाणिना द्रब्य तजनारहितेन यत् । क्रियते हवनं विप्रेर्मयूरी वा विदुर्बुधाः ॥ २ ॥ अनुष्ठरहिताः सर्वाश्रमुल्योतानलचिताः । हवन क्रियते वाभिः कुक्कुरीसा प्रकीतिला ॥३॥ च सुलोहिता चैव मुधूम्रवर्गा। स्फुलिनिनो विश्वरूचिस्तथा च चलायमाना इति सप्तनिवाः ॥ ॥ एताश्चोक्ता विशेषपेण गावम्या ब्राह्मणेन तु ॥ (दोमे पूरी करसङ्कोची मृगी मुक्तकनिष्टिका । हंसी स्यातर्जनी मुक्ता विधा मुद्राः प्रकीर्तिताः ॥ ४ ॥ शान्ति के च मगी शेया हमी पौष्टिकर्मणि।.

इन्द्राय भार्ग प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा गारस्तेन ईशत माघशसो - [ १५२ ] शम्भवाय च मयो भवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च स्वाहा ॥ ४ ॥ ततः पञ्चगव्याभिषेकः प्रतिहोमान्ते कर्त- न्य ॥ यथा-ॐ यथावाणप्रहाराणां कवचं वारण भवेत् ॥ तद्वद्द वोपचा तानां शान्तिर्भवति वारणम् ॥१॥ यथा समुत्थित यंत्रु यन्त्रेण प्रतिहन्यते ।। तथा समुत्थितं घोरं शीघ्र शान्या प्रशाम्यति ॥ २ ॥ ग्रहा गावो नरेन्द्रारच ब्रह्मणाश्च विशेषतः ॥ पूजिताः प्रतिपूष ते निर्दहन्त्यप- मानिताः ॥ ३ ॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष, शान्तिः पृथ्वी शान्तिरापः .शान्तिरोषधयः शान्तिः ॥ वनस्पतयः शान्तिविश्वेदेवाः शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि ।।.४ ॥. विखानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ॥ यद्भद्रं तन्न श्रासुव ।। ५॥ ॐशान्तिः ३ ॥ अथ चतुर्वेदहोमः ॥ ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्तिम् ॥ होतारं रत्नयातमं स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ इपे खोजें त्वा वायव- स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण प्राप्यायश्वमान्या ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात वहोर्यजमानस पशन्पाहि स्वाहा ॥२॥ अग्न आयाहि वीतयेगृणानो हव्यदातये ॥ निहोता सत्ति चर्हि पि स्वाहा ॥ ३ ॥ ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पातये शंयोरभिनवन्तु नः स्वाहा ॥ ४॥ पूर्ववदभिपेकः ॥ ४ ॥ पूर्ववद- भिषेकः ॥ इति ऋग्वेद, यजर्वेद, सामवेद, अथर्वणहोमः अथादिप्रत्यधिदेवतासहिवनवग्रहाणां होमः । हरि ॐ अग्नि दूत पुरोदधे. हव्यवाहमुपनवे ॥ देवॉ भासादयादिह स्वाहा ॥ १ ॥ श्राश्प्णेनरजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मयं च हिरण्ययेन सविता अभिवारे सूकरी स्वादिपोच्चाटनादिप ॥ ५॥ मुद्राहीनं तु ये भो ॥ ६ ॥ जारमारणं कुक्कुटी ।। इति ।। मुद्राः)-मयूरी काकुटी हंसी यूकरी च मृगौ, तपापत्र मुद्रा विजानी पाटोमद्रव्यम हे बुधः ॥ न्युन्जेन पाणिना द्रन्यं वर्जनीरहितेन यन् ।-- क्रियते प्रयाग्निसावणानि शारदायम्- यत्र काठ वा भोप यत्र धूमस्त नासिका पाल्पखलन ने यतो मम तवः शिरः। यत्र प्रगलिटी वहिस्वन्मुखं नातवेदसम् ॥ १॥ सनं विप्रेयरी नियुधाः ।। अंगुठविता. सर्वा अंगुल्योधनkिait मनं शिष याभि: माटी मा कोविदा ॥ पिकनिदा तुरंसी स्पान्मकुणा .

यच्छानः शर्म रथेना देवो यातु भुवनानि पश्यन्वाहा ॥. २,॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् ॥ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृता- स्वाहा ।। इदं हविरादित्याय स्वाहा ॥ ॐ अस्वग्ने सघिष्ट वस्सी. पधीरनुरुद्धयसे गर्भे सजायसे पुनः स्वाहा ।। ४ ।। ॐ इमन्देवा असपत्न सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्येष्ठयाय जानराज्यायेन्द्रस्ये- न्द्रियाय ॥ इमममुष्य पुवममु पुत्रमस्यै विश एप वोमी राजा सोमोस्माकं ब्रह्मणाना में राजा स्वाहा ।। ५ ॥ ॐ जातवेदसे सुनवा- मसो ममरातीयतो निदहाति वेदः । स नः पर्षदतिदुर्गाणि विश्वा.. * नावेव सिन्धुन्दुरिता त्यग्निः स्वाहा ॥ ६ ॥ इद हविश्चन्द्रमते स्योनापृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी । स्वाहा ।। ७॥ ॐ अग्निम्मूञ दिवः ककुत्पतिः' पृधिव्या अयम् ॥ अपा, रेता सि जिन्वति स्वाहा ।। ८ ।। ॐ यदक्रन्दः प्रथम जायमान उद्यन्तसमुद्रादुत वा पुरीपात !! श्येनत्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्य महिजातन्ते अर्वन्स्वाहा । इदं हरिभौमाय स्वाहा ।' ६ ॥ ॐ इद विष्णुर्विचक्रमे वेवा निदधे पदम् ।। समूढमरय पाधसुरे स्वाहा ॥ ॐ उद्बुद्धयस्वाग्ने प्रतिजागृहित्वमिष्टापूर्ते सधसृजेथामयं च अस्मिन्सधस्थे अद्धथु त्तरस्मिन् विश्वेदेवा यजमा- नश्च सीदत स्वाहा ॥ ११ ॥ ॐ विष्णौरराटम० ॥ १२ ॥ इद इविद्यु- धाय स्वाहा ।। ॐ महा २ इन्द्रो वहस्तः। पोडशी शर्म यच्छतु हन्तु पाप्मान योस्मान्द्वेष्टि उपयाम गृहीतासि महेन्द्राय त्वैप ते योनिमहे- न्द्राय वा स्वाहा ॥ १३ ॥ ॐ बृहस्पते प्रतियदर्यो अर्हा द्युमद्विभाति सप्रथाः वैयन्यत्वं कांहोमे नेत्रेऽन्धत्वमवाप्नुयात् । नासिकाया,मनः पीटा शिरोहोमो हि शलदः । अधोमुख ऊध्वंपाद; प्रामुखो हन्यवाहनः । तिष्ठत्येव स्वमावेन पाहुतिः कुत्र दीयते । १ ॥ सूकरी मता । मध्यमानामिकागुष्ठमंगो चैवोग्लक्षिता ॥ फामूलयजो शेया मुद्रा श्रेष्ठा शिखण्डिनी। जारमारणकर्तव्ये कुक्कुटी तु प्रकीर्तिता ॥ वश्यो सावित्राम्बुहस्तेन वह नेः कुर्यात्यददिया। हन्यवाट् सनिलं दृप्तहे। विमेति सन्मुखो भवेत् ॥ २ ॥ इवि भुतेः ॥ अप सुधारयविधिः- अमेघृस्वार्थनाशाय मध्ये चैव मृदाजा | मूले न म्रियते होता सुवस्थान य भवेत् ॥ १॥ ..

[१५४ । ऋतुमजनेषु । यहीदयच्चयस ऋतप्रजात तदरमासु द्रविणन्धेहि चित्रं स्वाहा ।। १ ॥ॐ ब्रह्मयज्ञानं० ॥१५॥ इदं इविवहसवये स्वाहा ।। ॐ शुरुभ्योतिश्य सत्यज्योतिश्च ज्योतिश्माँरश्च || शुक्रश्च ऋतपार चात्यहाः स्वाहा ।। १६ ।। ॐ अन्नात्परिनु वो रसं ब्रह्मणा व्यपिवत्तत्रं पयः सोमं प्रजापतिः ॥ ऋनेन सत्यमिन्द्रियं विपान शुनमन्धस इन्द्रम्येन्द्रिय मिदं पयोमृतं मधु स्वाहा ॥ १७॥ ॐ त्रागारमिन्द्रहवे हवे मुहब शूरमिन्द्रं हयामि शक पुरहूतमिन्द्र खस्ति नो मघवा धामिन्द्रः स्वाहा ॥ १८ ॥ इदं दधिः शुक्राय स्वाहा ॥ ॐ प्रजापतेन स्वदेवान्यन्यो विश्वारूपाणि परिता बभूव यत्कामास्ते तु जुहूमस्वन्नो अस्तु पय: स्याम पत्यो रयीणां स्वाहा ॥ १९॥ ॐ शन्नो देवी० ।। २० । ॐ यमाय वा मयाय त्वा सूर्यस्य त्वा तपसे देवास्त्वा सविता मध्वा नक्कु पृथिव्याः संघस्प्रशस्पाहि ॥ अचिरसि शोचिरसि तपोसि स्वाहा ।। २१ ॥ इदं हवि शनैश्चराय स्वाहा ॥ ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु । ये अंतरिक्ष ये दिवि तेम्वः सर्पेभ्यो नमः स्वाहा ॥ २२ ॥ॐ कथा नरिचत्र आमुव दूती सदायुधः सखा ।। कया शविष्टया वृता साहा ।। २३ ॥ ॐ कापिरसि समुद्रस्य त्वाहित्या उन्नयामि । समापो अद्विरम्मत समोषधीभिरोषधीः स्वाहा ॥ २४॥ इद .इवि. राहवे स्वाहा ॥ ॐ भानमन्ब्राह्मणी ब्रह्मवर्चसी जाय নামায়ষ্ট যন্ত্র दपव्य तिव्याधो महारथो जायता दोग्धी धेनुर्वादानबानाशुः सप्तिः पुरन्धिोपा जिप्पू रयेष्ठाः समेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताग्निकामे निकामे नः पर्जन्यो अभिवपंतु फलवो न ओपयय. पच्यन्तां योपनमो नः कल्पवां स्वाहा ॥ २५॥ ॐ नारनपूर्वापा कर्मया स्करी मता शान्ति के पौस्टिके कार्य मृगी हंसो तयो- चना ।। (शाक्यममायम् --वितास्तु दिगुणाः मोक्ता यवेभ्यश्चचेव सर्वदा । अममध्यान यमद जमण्याच्न मध्यतः । सुवं पारयते विधान श वन्यं न सदा बुधैः ॥ २ ॥ वजनीन यहि त्वा कनिष्ठाव बहिस्तथा। मपदानामिफागुः स धारयते दिनः ॥ ३ ॥ नमत परित्यज्य पान लमपि । अयु.च्या पारिको यामाम धनत्रयः। सर्वकामसमस्यय टिलापियं सदन ॥ (शासनिर्माग विजादोना म.नन) वास्तुविठासंग्रहे यथा- और मजमानाय भारपेचदमन्द्रपा ॥ ४ ॥ मरर ग्रन हाचर प्रजापतिः ।

[ १५५ ] केतुङ्कण्वन्नकेतवे पेशोमर्या अपेशसे । समुपद्भिरझायथाः स्वाहा ॥ २६ ॥ ॐ इन्धानास्त्वा शत . समिधीमहि वनस्वन्नो वयस्कृत , सह स्वन्त- सहस्कृतं अग्ने सपलदपदं मनामदब्धासो अदाम्यं चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय स्वाहा ।। २७ ॥ इदं हविः केतवे स्वाहा ।। अभिषेकः ।। अथ पञ्चलोकपालहोमः ॥ हरिः ॐ गणानान्त्वा० इदं गणपतये स्वाहा ॥ १॥ ॐ जातवेद से० इदं दुर्गायै स्वाहा ॥२ । वाता वामनो वा गन्धर्वाः सप्तविशतिः ॥ ते अयेश्वमयु जस्ते अस्मिञ्जवमादधुः स्वाहा ।। इदं वायवे स्वाहा ।।३।। ॐ यावाकुशा मधुमत्यश्विना सूनृता- वती ॥ क्या यज्ञम्मिमिक्षवम ।। उपयामगृहातोस्यश्विभ्यान्त्वेष ते योनि- माध्वीभ्यान्वा स्वाहा ।। इदमाकाशाप स्वाहा ॥४॥ॐ अश्विनोéपज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाभिपिञ्चामि सरस्वत्यै भैषज्येन वीर्यायान्नाद्यायाभिषि- ब्चामीन्द्रस्येन्द्रिणवलाय श्रियै यशसेऽभिषिञ्चामि स्वाहा ॥ इदमश्विभ्यां स्वाहा ॥ ५॥ पूर्ववदभिपेकः ।। अथ गणपत्यादीनामष्टलोग्पालानाञ्च होमः । हरिः ॐ नमो गण- म्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो नातेभ्यो बावपत्तिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्तपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः स्वाहा ॥ ॐ गणपतये स्वाहा ।। ॐ मूपकाधिपतये स्वाहा । ॐ परशु- वाणय स्वाहा [ ॐ ईश्वराव स्वाहा ।। ॐ सर्वोत्पातप्रशमनाय स्वाहा ।। ॐ दियये स्वाहा ।। ॐ तिथिदेवतायै स्वाहा ।। ॐ धामच्छदाग्निरिन्द्रो ब्रह्मा देवो बृहस्पतिः ।। सचेतसो विश्वेदेवा यज्ञ प्रावन्तु नः शुभे स्वाहा ।। एवं सर्वत्र ] ॐ गणपतये मूषकाधिपतये परशुवाणाय इदमग्नये स्वाहा ।। षष्ठन्तु यलदैवत्य देवतास्तु सुवे सदा ॥५॥ त्यजेन्मूल घोडशाङ्गुलममतः । प्रजामागे सुवो धार्यः सर्वकर्मप्रसिद्धये ॥ ६ ॥ चतुर्भागास्तिला: कार्यास्त्रिभागन्ताज्यमेव च । श्वेता यवा विभागाः स्युस्तदर्षे वरडुलाः स्मृताः। तदर्घ शर्कराशे येत्यादि यथेष्टं शर्कराऽऽज्यञ्चत्यपि क्वचि- यमभाग फलम- - । सवामे वाते वहिर्विभागरचतुरगुतः । अग्निस्थानेऽग्निसन्तापः सोमे क्लेश उदाहतः । सू पशुविनाशः स्याद्रौटे रौद्रभयं भवेत् । प्रजापती प्रजाधिर्यमे मृत्युभयं भवेत् ॥ विसुवधारणा विधिः ।। दुपलभ्यते । एव शास्त्रसम्मतत्वेऽपि निधना यजमाना महर्षवादाज्यस्य माग. दर्य तत्राप्यशकाकभागमेवादिदीरत्न तु भागययमेव । देशकामाधानुरूप [ १५६ 1 ॐ इन्द्रायेन्दु छ सरस्वती नरा श सेन नग्नहुम् ॥ अयातामश्विना मधुभेषजं भिपजासु ते स्वाहा ।।ॐ इन्द्राय स्वाहा।।ॐ शचोपतये स्वाहा ॐ वनवाधाय स्वाहा ॥ ॐ ईश्वराय स्वाहेति पूर्ववत् ।। इन्द्राय शचीपतये वनवाणाय इदमग्नये स्वाहा ॥२॥ ॐ अग्नि दूत पुरो०॥ ॐ अग्नये स्वाहा ।। ॐ मेपाधिपतये स्वाहा ।। ओं चालवाणाय स्वाहा।। ओं ईश्यरायेवि पूर्ववत् ।। ओं खग्नये मेवाधिपतये ज्वालवाणाय इदमग्नये स्वाहा ।। ३ ।। श्री यमेन दचं त्रित एनगायुनगिन्द्रण प्रथमो अद्वय- तिष्ठत् ।। गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरादश्व वसवो निरतप्ट स्वाहा ।। ओं यमाय स्वाहा ।। ओं ताधिपतये स्वाहा ।। ओं दंडवाणाय स्वाहा ।। ओं ईश्वराय स्वाहेति पूर्ववत् ।। ओं यमाय प्रेताधिपतये दण्डवाणाय इदमग्नये सदा ।। 3 ।।ओं असुन्वन्तमयलमानमिच्चस्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य ।। अन्यमम्मदिच्छसाव इत्यानमोदे विनि ने तुभ्यमस्तु स्वाहा ॥ श्री वैश्रवणाय स्वाहा ॥ ओं यक्षाधिपतये स्वादा ।। ओं सगवाणाय स्वाहा ।। ओं ईश्वरायेति पूर्ववत् ।। ओं वैश्रवणाय यक्षाधिपतये खड्ग- वाग्राय इदमग्नये स्वाहा ॥५॥ प्रों वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्फसर्जनीस्थो वरुणरम ऋनुसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद स्वाक्षा । यो वरुणाय स्वाहा ।। श्री मकराधिपतये स्वाहा ।। ओं पाशवाणाय स्वाहा । श्री ईश्वरायेति पूर्ववत् ।। ओं वरुणाय माराधिपतये पाशवाणाय इदमग्नये स्वाहा ।। ६ ।। ओं बातो चामनो वा०॥ औं वायये स्वाहा श्री अन्तरिताधितये स्वाहा ।। ओं घजवाणाय स्वाहा ।। ओं ईश्चरायेति पूर्ववत् ॥ श्रओं वायवे अन्तरिक्षा- कर्मविशेपे नियमा:- पादेन पादमाकम्य जप नैव तु कारयेत् । शिरः प्राकृत्य वस्त्रेण ध्यान नैव प्रशस्यते ॥१॥ नामिपादकपलोन नेत्रचपलो द्विजः। नच गावालस्वैव जपन्सिदिमवाप्नुयात् ॥ २॥ धर्मभ्यवस्थितेः । समृदास्तु शास्त्र निर्देशानुस्यमेव समानुरेयुः। तिलानान्त सांपिायं सर्वेषामेव समृदानामावश्यकमेव, यायालयसहितायाम्- मन्यो होनः स्वम्टो वयंतो या मिथ्याकन समर्थमार। म यात्रा यमानं मिस्ति यंपदरानुः स्वस्तारात् ॥ अन्यथा प्रत्यवायभव [ १५७ ] धिपतये ध्वजवारणाय इदमग्नये स्वाहा ॥७॥ ओं सोमो धेनु सोमो अर्वन्तमाशु ७ सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति सादन्यं विदथ्य , सभेयं पितृश्रवणं यो ददारादस्मै स्वाहा 11 औं भोमाय स्वाहा ।। औं नक्षत्रा- धिपतये स्वाहा । ओं अमृतवाणाय स्वाहा ॥ ॐ ईश्वरायेति पूर्ववत् । ओं सोमाय नक्षत्राधिपतये अमृतवाणाय इदमग्नये स्वाहा ।।८।। ओं विष्णोराट. | ओं विष्णवे स्वाहा ॥ श्री लक्ष्मीपतये स्वाहा ।। ओं पक्राणाय स्वाहा ।। ॐ ईश्वराय स्वाहेति पूर्व यत् ।। ओं विष्णवे लक्ष्मीपतये चक्रवाणाय इदमग्नये स्वाहा॥६॥ ॐ ईशावास्यमिद सर्व यत्मिचिजगत्या गत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनं स्वाहा ॥ ॐ ईशानाय स्वाहा ॥ ओं उमापतये स्वाहा । ओं त्रिशूलवाणाय स्वाहा ।। ओं ईश्वरयोति पूर्ववत् ।। ओं ईशानाय, उमापतये त्रिशूलवाणाय इदमग्नये स्वाहा ॥ १० ॥ ओं ब्रह्मयज्ञानं०॥ ॥ओं ब्रह्मणे स्वाहा ॥ ओं ब्रह्माधिपतये खाहा ।। ओं कुशवाणाय स्वाहा ।। ओं ईश्वरायेति पूर्ववत् ।। ओं ब्रह्मणे ब्रह्माधिपतये कुश [ पाणये] वाणाय इदमग्नये स्वाहा ॥ ११ ॥ ऑ पातालाधिपतये स्वाहा ।। ओं विपवारणाय स्वाहा ।। ओं ईश्वराय स्वाहेति पूर्ववत् अओं साय पावालाधिपतये विपवाणाय इदमग्नये स्वाहा ।। १२ ।। अभिपेकः ।। इत्यप्टलोकपालहोमः ।। अथागस्त्यादि त्रपालहोमः । हरिः ओं अगस्त्यः खनमानः सनित्रैः प्राजापत्यवल मोक्ष्यमाणः ॥ उभावर्णावृषिम्म पुपोप सत्या देवेष्टाशिपो जगाम स्वाहा ॥१॥ औं धु वन्ते राजा वरुणो ध्रु वन्देवो वृहस्पतिः ॥ ध्रुवन्त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्र धारयतां ध्रुवं स्वाहा ॥ २ ॥ओं स्योना पृथिवी० ॥ ३॥ ऑ वास्तोष्पते प्रति जानाह्यस्मानस्ववेशो अनमोवो भवः न ॥ यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुपस्त्र शन्नो भव द्विपदे शब्चतुष्पदे णात् ॥ (द्रव्यभेदेनाऽऽहुतिप्रमाणाम् )-कर्षमात्रं घृतं होमे शुलिमात्र पयः स्मृतम् । गुडं पलामानं स्यारापि तथा मता ।। बोहयो मुष्टिमात्रा: सकारे सूतक नाम हकारे नृत्युस्तकम् । प्रवरदयसंयुक्ता प्राहुतिः यस्य दीयते ॥ १॥ सकारे शङ्करश्नचैव हकारे हरिषच्यते । अदरदयसंयुक्ता प्राहुतिस्तस्य दीयते ॥ १॥ कुण्डस्य पूर्व दिग्भागे काली जिहा प्रकीविता। स्युमुदगमापा यवा अपि । वरडुलः स्युत्तदाशश्नसमासामे च ॥ भावपयनादिवन्याणि सुवेण, सनिधो, मूलवो यंगुलं विहाय मध्यमाना.

- [ १५८ ] खाहा ॥ ४ ॥ ओं यस्य कुर्मो गृहे इविस्तमग्ने वर्द्धया त्वम् ॥ तस्म' देना अधिननयञ्च ब्रह्मणहति स्वाहा ॥ ५॥ ओं क्षेत्रस्य पविना वय हि तेनैव जयामसि || गमश्व पोपयित्वा सन्नोमृलातीरशे खादा ॥ ६॥ पूर्वेदभिषेक इति क्षेत्रपालहोम || अथ विष्णुहाम हरि ओं त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाम्य || अतो धमाणि धारयन्स्वाहा ॥१॥ओं तद्विपासो विपन्यवा जापास समिन्धते विष्णायपरम पद स्वाहा ॥ २ ॥ ओं तो देवा अपन्तु नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥ पृथिव्या सत्व धामभि खादा ॥३॥ अभिषेक ॥ अथ सपहाम । हरि ओं नमोस्तु सर्पेभ्यो० ॥१॥ओं या इपवा यातुधानाना ये वा वनस्पतीधरनु ॥ ये वावदेषु शेरते तेभ्य सम्यो नम स्वाहा ।। २ ।। आ ये वामी राचने दिया ये वा सूयस्य रश्मिषु ॥ येहामप्सु सदकृत तेभ्य सर्पेभ्यो नम स्वाहा ॥३॥ अभि० ।। अथ फूडमाण्डाहोम हरि ओं यदेवा देवहेडन देवासरवमा यम् ॥ अग्निमा तम्मानसो विश्वा-मुम्चत्वाइस स्वाहा ॥ १ ॥ ओं यदि दिवा यदि नक्तमेना सि चकमा वयम् ॥ यायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुचन्त्वहम स्वाहा ॥ २ ॥ यदि नामद्यदि म्यान एनासि चकमा वयम् ॥ सूर्यो मा तस्म देनसो विश्वान्मुन्चत्व हस स्वाहा ॥ ३ अभिषेक ॥ श्रथ नियो गधायाश्य ढोप । हरि ओं सदसपतिमद्भूतम्प्रिय मिन्द्रस्य काम्यहम् ॥ सनि मेधामयामिपस्दा ॥ १ ॥ ॐ या- मेधा देवगणा पितरश्चीपासते || तया मामघ मेधयाग्ने मेधाविन थापनेमे तु करालाख्या दविय तु मनाजवा ।। मुजोरिता न नैये धूम्रवयं तु वारुण । स्कुलिनिनी नु वायम्ये साम्ये विश्वरूचिस्तथा ॥ १ ॥ आयुतमल्याहोममा गाय मागे शव हुलाऽटो रात ज्यम्बकेनन । मिडियात् । पर पासमम हापिनेव जयात् । प्राण वामित्यये । मार्य सोगेन तदमारे यशियामणेन हयात् । विभिाभिरकावि, वता मादिमन्यरच दादरारेशात ॥ चासातिमम्प्रण रखपयनयोग्नते। शवयव प्मारकादरायतन च ॥ -- [ १६ ] कुरु स्ववाहा ॥ २ ॥ ओं मेधाम्मे चरुणो ददातु मेधामभिः प्रजा, पतिः मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधान्धाता ददातु मे स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं इदम्भे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे नियमश्नुताम् ॥ मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमान्तस्यै ते स्वाहा ॥ ४ ॥ ओं श्रोश्च ते लक्ष्मीश्च पल्या- वहोरात्रे पार्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनी व्यात्तम् ॥ इष्णनिपाण मुम्म इपागा सर्वलोकम्म इपाण स्वाहा ॥ ५ ॥ अभि० अथ रक्षोन । हरिः ओं [ओं त्र्यम्बकं यजा० ॥ ओं काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती परुपः परुपपरि ॥ एवा नो दूर्व प्रतनु सहस्रण शतेन च स्वाहा ॥ ओं या शतेन प्रतनोपि सहस्रण विरोइसे तस्यास्ते देवीष्ठके विधेम हविपा वयं साहा । ओं यास्ते अग्ने सूर्य रुको विदमा वन्वन्ति रश्मिभिः ॥ ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि स्वाहा ] कृष्णुष्प पाजः प्रसितिन्न पृथ्वी पाहि गजे वा मवॉर इभेन तृष्वमनु प्रसितिन्द्रणानोस्तासि विद्वधरस- स्तपिष्टैः स्वाहा ॥ १ ॥ ओं तव भ्रमास आसुया पतन्त्यनुस्पृश धृपता शोशुचानः ॥ तपृधष्वग्ने जुहा पतका न सन्दितो विसृजविक- वगुल्ककाः स्वाहा ॥ २ ॥ ओं प्रतिस्पशो विसूज तूणितमो भवा पायुर्विशो अस्या अदब्धः ॥ यो नो रे अवशसो यो अन्त्यग्ने मा शिष्टे व्यथिरादयत्स्विाहा ॥ ३ ॥ भी उदग्ने तिष्टप्रत्यावनुष्वन्य- मित्रों ओपता तिग्महेते ।। यो नो प्रारति । समिना न चले नोचात यक्षतसन्न शुष्क खादा ॥ ४॥ ओं ऊर्यो भव प्रतिविद्धधादस्मदावि. प्रणुन देव्यान्याने ॥ अवस्थिरा तनुहि या तु जूनां जामि- मजामि थमृणीहि शत्रुन् अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि स्वाहा ॥४॥ मभिः भय दिशहोमः। हरिः ॐ प्राच्य दिने स्वाहाऽवांच्य दिशे स्याहा मीदुष्टनेति मन्त्रेण रोप्नः शवपरम् । रखोदाविश्वचर्षण जुहुयाप ना रानम् । सोए शिका (पूर्व द्रन्यारित्यागः )-पादौ न्यररित्यागः पश्नालोमो विधीयते । प्रत्यातिप्रमत्यागा मशागतादादो द्रम्पत्यागः । ( पहिर- सास जाति कायदाकारताच न । पटरावं अंश्च तेने निराव रामदेवतः ।। ए दामास हुत्या स्नान समानरेत्।। , इस्पयुवमलामन्या:॥ THE)मोलासम्मोपलवारा: । भरपादुम्मरी शिलान्दनः माला 1.TIAN देशपष प्रदिपति याठि; । (मभि: 40/- [ १६० ] दक्षिणाय दिशे स्वाहावांच्यै दिशे स्वाहा प्रतीच्यै दिशे स्वाहार्वाच्य दिशे स्वाहावांच्यै दिशे स्वाहोाय दिशे स्वाहार्वाच्य दिशे स्वाहा ॥ १ ॥ पूर्ववभिपेकः ॥ अथ गायत्रीहोमः । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्स्वाहा ॥ इति जपित्वाष्टोत्तरशतवारं जुहुयात् ॥ अभिः पेकः । तथैव-थों जातवेदसे० इत्यष्टाविंशत्यधिकशतयारं पटत्वा होम कुर्यात् ! अभिषेकः ॥ इति यवादिहोमद्रव्याहुतिं दत्त्वा । सुर्यमन्त्रैः पूजिताग्नी घृतधारां कुर्यात् ॥ उत्थाय तत्र मन्त्रा-आदित्यं गर्भ पयसा- मंग्धिसहस्रस्य प्रतिमा विश्वरूपम् ।। परिवृग्धि हर सामाभिर्म स्थाः शवायुपं कृष्णुहि चीयमानः स्वाहा ।। ओं विश्ववश्चक्ष रुत विश्वतो मुम्बः विश्वतो बाहुमत विरुत यिश्वतस्पात् ।। सम्बाहुभ्यान्धमति सम्पत हर्या- वाभूमी जनयन्देव एकः स्वाहा । अथ सम्बत्सरहोमः । श्रीगणेशाय नमः ॥ हरिः ओं मीढुष्टम शियतम शिवो नः सुमना भव ।। परमे वृक्ष आयुधग्निवाय कृत्तिं वसान आचर पिनाकं विभ्रदागहि स्वाहा । १॥ ओं अश्वावदी सोमावतीम् जयन्तीमुदोजसम् ।। आपत्सि सर्वा ओपधीरस्मा अरिष्टाततये स्वाहा ॥२॥ ओं सम्वत्सरोसि परिवत्सरोसीदायरसरोसीद्वत्सरोसि वत्सरोसि ।। उपसस्ते कल्पन्नामहोरावास्ते कल्लन्तामईमासाप्ते कल्पन्ताम्मासास्ते कल्पन्तामृत वस्ते कल्पन्वा सम्मसरात्तेः कल्पन्ताम् ।। प्रेत्या एत्यसब्चां च प्र. सास्य मुपचिदमि तया देववयाङ्गिरस्वद्ध वः सीद स्वाहा ॥ ३ ॥ अभिषेकः ।। अथ ऋतुहोमः । हरिः ओं वसवेन ऋतुना देवा वसवत्रिवृता सुवाः ।। जनसंख्याहोममन्त्रा:- गायच्या दशसहसं मानस्वीरेन पद्गुणम् । शिमहादिमन्वेश्च नत्वारि विष्णुदेवतेः ॥ १ ॥ नागुष्ठादधिका कार्या समित्स्यूलतरा चित् । न वियुका त्वचा चैव न सकोटा न पाटिवा । प्रादेशमात्रा संयोग्या समित्सर्वत्र नाधिका॥ ( समिदादीनामा• स्मारटे यास३०॥ इत्यादि मन्यः भवत्यारोममन्त्राः ।। पूर्व प्रतितो घहिन्दिन्यं मुमुध्यते । नृप्यो निमनिमाला महाग्निः परिशीतिः ॥1॥ नयनम् ) गमियादीनि प्रायः स्यामरेत् । रादानाव: कमकीत कर्म मापः ॥ समिदं एस रोवम्पन्-योनिविपि जुहोत्यग्नो पारिपि

[ १६१ ]
खिशमवान्तु ताः म सत्येन रेवतीः क्षत्र, हविरिन्द्रे क्यो दधुः
॥ ६ ॥ अभिषेफः ।।
अथ मासहोमः [ओं नक्षत्रेभ्यः स्वाहा नक्षत्रियेभ्यः स्वाहाहोरा-
बेभ्यः स्वाहार्द्धमाशेभ्यः स्वाहा मासेभ्य. स्वाहा ऋतुभ्यः स्वाहात-
वेभ्यः स्वाहा संवत्सराय स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या, स्वाहा चन्द्राय
स्वाहा सूर्याय स्वाहा रश्मिभ्यः स्वाहा वसुभ्यः स्वाहा रुद्रेभ्यः
स्वाहादित्येभ्य. स्वाहा मरुद्भयः स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा
मूलेभ्यः स्वाहा शाखाभ्यः स्वाहा वनस्पतिभ्भः स्वाहा पुष्पेभ्यः स्वाहा
फलेभ्यः स्लाहीपवीभ्यः स्वाहा ॥ ॐ एकस्मै स्वाहा द्वाभ्या स्वाहा
शताय स्वाहा व्युष्टय स्वाहा स्ववर्गाय स्वाहा ॥ ॐ हिरण्यगर्भः
समवर्त्ततामे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ॥ सदाधार पृथिवी
द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम स्वाहा ] अर्द्धमासाः परूपि
ते मासा आच्छ यन्तु शम्यन्तः । अहो रात्राणि मरुतो विलिष्ट सूदयन्तु
ते स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ मधवे स्वाहा माधवाय स्वाहा शुक्राय स्वाहा
शुचये स्वाहा नभसे स्वाहा नभस्याय स्वाहा ईपाय स्वाहो-
जर्जाय स्वाहा सहसे स्वाहा सहस्याय स्वाहा तपसे स्वाहा तपस्याय
स्वाहाहसस्पतये स्वाहा ।।
अथ पक्षहोमः । हरिः ॐ इमौ ते पक्षावजरौ पतत्रिणी याम्या
छ रक्षापयस्यग्ने ॥ ताभ्याम्पतेमसकृतामुलोकं यत्र ऋपयो जग्मुः
प्रथमजाः पुराणाः स्वाहा १ अभिषेकः ॥
अथ तिथिहोमः । हरिः ॐ अग्नः पक्षविर्वायोनिपततिरिन्द्रस्य
तृतीया सोमस्य चतुर्थ्यदिस्ये पञ्चमीन्द्राण्यै पष्ठी भरुवा सप्तमी
वृहस्पतेरष्टभ्यर्यम्णे नवमी धातुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी
सूतक विचार:-
व्रतषशविवाहेषषु भाडे होमेऽर्चने जपे ॥
प्रारब्धे सूतंक न स्यादनारन्धे तु सूनकम् ॥ १॥
मरम्मो वरयं यज्ञे सङ्कल्सो व्रतसत्रयोः ।
नान्दोधार्ट विवाददौ श्रद्धे पाकपरिक्रिया ॥२॥
च मानवः । मन्दाग्निरामयावी च दरिद्रश्चैव जायते ॥ भवेदन्धः सघूमे तु
जुहुयाद्यो हुताशने । तस्मात्समिद्धे होतव्यं नास मिद्धे कदाचन ॥ (अग्निष-
पैठीन सिस्मूते:-
विवाहदुर्गयोपु यात्रामा कार्यकर्मणि ।
नत्र सूतक तदत् कर्म यज्ञादि कारयेत् ॥ ३ ॥

प्रजापत्या: [ १६२ ) यमस्य त्रयोदशी स्वाहा १ ॐ नन्दायै स्वाहा, ॐ भद्रायै स्वाहा,' ओ जयायै स्वाहा, ओ. श्री रिक्तायै स्वाहा, श्रओं पूर्णय स्वाहा ॥ इति ॥ त्रिवारमुच्चार्य जुहुयात् ॥ अभिपेकः ॥ अथ सप्तवारदोमः । हरि ॐ आकृष्णेन रजसा० इति सूर्याय !! ऑ इमन्देवा अस० इति चन्द्रमसे एव सर्वेषां मन्त्रैजुहुयात् ॥ ओं कापिरसि समुद्रस्य वाक्षित्या० ॥ इति च क्वचित् ॥ अभिपेक. ॥ राशिहोमः । हरि ओं अश्वस्तूपरोगो मृगस्ते कएग्रीव आग्नेयोराटे पुरस्तात्मारस्ववीमेष्यध- स्वाद्धन्वोराश्विधोरामो वाह्वोः सोना पौष्णः श्यामो नाम्या सौर्य- यामी श्वेतश्च कृष्णश्च पार्खयोस्त्याप्ट्रो लोमशसक्स्थी सक्स्यो- यव्यः श्वेतपुच्छ इन्द्राय स्वपस्याय वेहद्वैष्णवो वामनः स्वाहा ॥ १॥ ओं प्रेतु वाजो कनिकदन्नानदद्रासमः पत्वा भरन्नग्नि-पुरीय्यमापाद्यायुपः पुरा ।। यूपाग्नि वृपणम्भरन्नपाङ्ग, समुद्रियं श्रग्न आयाहि वीतये स्वाहा ॥३॥ ओं अयं वेनरचोदयत्पृरिनगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपा सङ्गमे सूर्यस्य शिशुन्न विप्रा मतिभी रिहति उपयाम गृहीतो सिमर्काय त्या स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं कनिक्रदजनुपं प्रत्रवाण इति वाचरिते वना ययम् ॥ सुमङ्गलश्च शकुने भवासि मत्वा का दभिभा. विश्व्या विदित्वाहा ॥ ४ ॥ ओं याव्यानं विपू चिकोभी वृकं च रक्षति ॥ श्येनं पतत्रिण, सिह सम पात्व हसः स्वाहा ।.५॥ ओं कोदात्करमा प्रदात्कामोदारकामायादात् ।। कामो दाता कामः प्रति गृहीवा कामेवचे स्वाहा ॥६॥ओं वीभत्साय पोल्कसं वय हिरण्य- कारं तुलायै वाणिज पश्चादीपाय ग्लाविन विश्वभ्यो भूतेभ्यः सिमलं भूत्ये जागरणमभूत्यै स्वपनमात्यैजनवादिन वृद्धपा अप्रगल्भ संप शराय प्रच्छिदं स्वाहा ॥७॥ओं नमोस्तु सर्प० ।।८। ओं विज्य मनम् ) न वायुना कुत्रापिरस वादिभिः । न कुर्याद नमन कर चिद् म्यजनादिना । मुसेनेय धमेदग्नि धमन्या वेणुजावया ॥ मुस्खादेष म. अथ संख्याहोममन्या:- श्रो नमा व: किरिवेभ्यो देवाना हृदयेभ्यो नमो विचित्वरेभ्यो नमो विविपकेम्यो नम प्रानिईवेभ्यः सारा स्वोर विश्वचर्षणिभियोनि- मया ॥ द्रोणे मयस्थमासदत्वास यो पानी नियुद्भिः शतिनीमिर परराइसिपीमियम्याहि यशम् ।। वायो अरिंगसदने मादयस्य भूयं पात तस्विनिः मदाना स्वारा इति । जापत' वि चनुपगदरथाने पाठान्तरम् । (सगमोक्तमय यतव्यममार . स . यावानामिव गोधूमा ब्रोहियामिव शालयः ।। ध्यलामे पयः कार्य मध्यलामे [ १६३ ] धनुः कपर्दिनो विशल्यो वाणवाँ २ उत ॥ अनेशन्नस्यया इधव श्रामु- रस्यनिषं गथिः स्वाहा ॥ ६ ॥ त्वामवस्युराराचस स्वाहा ॥ १०॥ ओं वायव्यो वायव्यान्याप्नोति शतेन द्रोणकलशम् ॥ कुम्भीभ्यामम्भृणो सुते स्थालीभिः स्चालीराप्नोति स्वाहा ॥ ११॥ ओं पञ्चनद्यः सरस्वतीमपि- यन्तिस स्रोतसः सरस्वती तु पञ्चधासौ देशे भवत्सरित्स्वाहा ॥१२॥ अभिषेकः ॥ अथ नक्षत्रहोमः । हरिः ओं अश्विन तेजसा चक्षुः प्राणेन सरस्वती वीर्यम् । वाचेन्द्रो वलेनेन्द्राय धुरिन्द्रियं स्वाहा ॥१॥ओं यगाय त्वा मखा० ॥२॥ओं अग्नि मूर्द्धादि० ॥३। श्री प्रजापतेनत्वादत्ता ॥४॥ ओं सोमो धेनु सो० ॥५॥ ओं नमस्ते रुद्र मन्वयव उतोत इपवे नमः ॥ बाहुभ्यामुत ते नमः स्वाहा ॥ ६ ॥ ओं अदितिद्यौँ रदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता पिता स पुत्रः ॥ विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वं स्वाहा ॥ ओं वाचस्पतये पवस्व वृष्णो अशुभ्या गमस्तिपूतः ।। देवा देवेभ्यः पवस्त्र येषां भागोसि स्वाहा ॥८॥ओं नमोस्तु स१॥ ६ || ओं पितृभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधा- यिभ्यः स्वधा नमः।। अनन्षितरो मीमदन्त पितरोतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वं स्वाहा ।। १० ॥ श्रओं भग एव भगवॉ २ अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्त स्याम ॥ तन्त्वा भग सर्व इन्जोहवीति सानो भग पुर एता भवेह स्वाहा ।।११।। ओं अर्यमणं वृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय । वाचं विष्णु सरस्यती सवितारच वाजिन । स्वाहा ॥ १२ ॥ श्रओं सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्टा रूपैः पूष्णा पशुमिरिन्द्रेणास्मे वृहस्पतिना ब्रह्मणा सप्तजिह्वामुदा- मध्यमे संहते पायें मिलितागुपयोरधः । रोषा प्रमुखयो मुक्ता मुद्रेयं सप्वजिहिका ॥१॥ वा स्वगृयोक्तं यस्य कर्म प्रकीर्चितम् । तस्य वावति शास्त्राथे कृते सर्व कृत भवेत् ।। (द्रव्यप्रतिनिधयः )-ययोक्तवस्त्वसंपचौ माझ वदनुकारि यत् । स्कान्दे- अन्नहीनो दहेद्राष्ट्र मन्त्रहीनश्च शुविजः । यजमानमदादिगयो नास्ति यशसमो रिपुः । शुक्साममन्त्रा उच्चैर्याजषा मन्त्रा उपाशवः ॥ वया गुहः । घृतमतिनिधि कुर्यात्पयो वा दधि है। नूर || प्रायदोनेषु सर्वप । १६४ ] वरुणेनौजसाग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना देशन्या देवतया प्रसूतः प्रसामि स्वाहा ।। १३ ।। ओं लप्टावीरन्देवकानं जजान त्वष्टुर, जायत पाशुरश्वः । त्वष्टदं विश्वं भुवनं जलान वहोः अरिमिह यक्षि होतः स्वाहा ।। १४ || ओं वातो वामनो ॥१॥ ओं इन्द्राग्नी आगत है। सुतङ्गीर्भिन्नभो वरेण्यम् ।। अस्य पातं धियोपिता स्वाहा ॥ १६ ॥ ओं मित्रस्य चर्पणीधृतो वो देवस्य सानसि ॥ द्युम्नं चित्रः कवस्तम स्वाहा ।। १७ ॥ ओं त्रातारमिन्द्र० ॥ १८ ॥ओं असुन्वन्तः ॥ १६ ॥ श्रओं अप्स्वग्नेसधिः ॥ २०॥ श्री विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः विश्वे नो देवा अवमा गमन्तु विन्मस्तु द्रविण वाजो अस्मे स्वाहा ॥२१ ।। श्री ब्रह्मजज्ञानं० ॥ २२ ॥ श्री विष्णोर. राट० ॥ २३ ॥ ओं वसुभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा संज्ञानाथान्यावापृथिवी मित्रावरुणौ त्वा वृष्टयावताम् ।। न्यन्तु वयोक्त रिहाणा मरुताम्पृपती. गच्छ घसा पृष्णिभूत्वा दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह ॥ चक्षुष्या अग्नेसि चक्षुन्म पाहि ॥ २४ ॥ ॉ वरुणस्योत्तहूँ ॥ २५ ॥ ओं अवो- द्धयग्निः समिया जनानां प्रतिधेनु मिवायतीपासम् ॥ २६ ॥ ॐ उत यवानामिव गोधूमा ब्रीहिणार्थिव शालयः ॥ दथ्यलाभे पयः कार्य मध्यलाभे तथा गुडः । घृतपातिनिधि कुर्यात्पयो वा दघि का नृप || श्राज्यहमेषु मवेषु नोहिवुभ्य श्रणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः ॥ विश्वेदेवा ऋतावृधी हुवानास्तु मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु स्वाहा ॥२७॥ ओं पन्तव वयन्न रिप्येम कदाचन ॥ स्तोतारस्त इह रस्मसि स्वाहा ॥२८॥ अभि- येकः ।। इति नक्षत्रहोमः ।। श्रय विष्कुम्भादियोगहोमः ॥ हरिः ओं ॐ योजे योगे सास्तर याने बाजे हवामहे ॥ ससाय इन्द्र मूर्तये स्वाहा ॥१॥ ओं विष्कुम्माय स्थाहा एवं प्रत्येक अथ समुद्रहोमः ॥ हरि ओं [ओं सप्त पयः प्रविहिताः पठनीयाः स्वशाम्बीयी अन्यथाऽनर्थमाजनः ।। अप बामणभोजनम्- गांधानादिसर्वप ब्राह्मणाम्भोजयेद्रा । प्रातमध्ये मनुर्विशदयाघाने शतात्परम् ।। गम्यमेवं भवेत् । तदभावे मरिप्पास्तु श्राजमाविमेव च ॥ (न्यदेवव. पोरनुको पयपा)-ग्राम्य दम्पमनादेश मोतिषु विधीयते । मंत्रस्य देवता प्रामायणे म प्रायश्चि विवादश पञ्च का। मास बाबमोने प्रसपाना एवं पो। व्रते जुहुयात् ॥

या [ १६५ ] शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम् ॥ सप्तापः स्वपितो लोकमोयुस्तत्र जाग्रतो अस्वप्नजी सत्रसदौ च देवी स्वाहा ॥ ओं पितृभ्य स्वधाः ।। ओं पावका नः सरस्वती बाजोभिर्वाजिनीवती ॥ यज्ञ वष्टु धिया वसुः स्वाहा || ओं मातेव पत्रं पृथिवी पुरीष्यमग्नि स्वे योनाव- भारुषा ॥ ताम्वि श्वैर्दै वे ऋतुभिः सविदानः प्रजापतिविश्वकर्मा विमुञ्चतु स्वाहा समुद्रोसि नभस्वा नादानुः शम्भूर्मयो भूरभिमा- वाहि स्वाहा 11 मारुतोसिमरुनाङ्गणः शम्भूर्मयो भूरभिमावाहि स्वाहा । मारुतोऽसि मरुताङ्गणः शंभूर्मयोभूरमिमावाहि स्वाहा ॥ वस्यूरसि द्रुवस्वाञ्छम्भूर्मयोभूरभिमावाहि स्वाहा ॥ १ ॥ों श्रापो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन सो घृतप्वः पुनन्तु ॥ विश्व हि रिप्रम्पवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरातूत एभिर्दीक्षा तपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवाध शम्माम्परिदधे भद्र वर्णम्पुष्यन्राहा ॥ २ ॥ ओं समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनानायन्त्यनिविशमानाः पत्री वृपभो रराद ता पो देवोरिह मामवन्तु स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं या आपो दिव्या उत वा सवन्ति खनित्रिमा ऊत वा याः स्वयंजाः समुद्रार्थाः शुचयः पावकारता आपो देवीरिह मामवन्तु स्वाहा ॥४॥ ओं यासां राजा वरुणा याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यं जनानाम् । मधुश्रुतः शुचयो या पावकास्ता आपो देवी रिह मामवन्तु स्वाहा ।। ५ ।। ओं यासु राजा वरुणो यासु सोमा विश्वे देवा या सूर्य मदन्ति ॥ वैश्वानरो यास्वग्निः प्रविष्टस्ता आपो देवीरिह माम- वन्तु स्वाहा ॥ ६ ॥ ओं नदीभ्यः पौब्जिष्ठमृक्षीकाभ्यो नेपाद पुरुषच्याबाय दुर्मदं गधर्वाप्सरोभ्यो ब्रात्यं प्रयुभ्यः उन्मत्त सर्पदेवजनेभ्यो प्रतिपदमयेभ्यः उन्मत्त सर्पदेवजनेभ्यो प्रतिपदनयेभ्यः कितवमार्यता या अकिवम्पिशाचेभ्यो विदल कारों यातुधानेभ्यः चातुर्मास्येषु चत्वारि शतानि च सुरोमखे । श्रयुतं वाजपेये च अश्वमेधे चतुर्गणम् ।। चापि प्रजापतिरिति स्थितिः ॥ ( काम्यहोमादौ वहिनिवासादिविचारः)-सेका तिििरयुबा कृताप्ता शेषे गुणेऽभ्रे भुवि वहिवास: । सौख्याय होमे, शशियु-- ऋत्विग्नियम:- कन्दमूलफलाहारा दषिदीराशिनोऽपि वा। दिनार्द हवन कुयुः संवीवा पिरजोनराः ||१|| श्रय मगदपानार्यादीना दक्षिणानियमः-- ग्मशेषे प्राणार्थनाशो दिवि भूतले च ॥ शुक्लादिनो वर्षमानतिधिकाधिका । १६६ ] करटकोकारों स्वाहा || ७ ॥ श्री इमम्मे गड्स यमुने सरस्वति शतद् स्तोमं सचता परुष्यण्या ॥ अक्स्न्यिा मरुद् वृधे वितस्तया. जीकीये शृणुह्यासु मोपया स्वाहा ॥ ८ ॥ (केपुचित्पुस्तकेपु पर्वहोमः- ॐ पर्वतस्य वृपभस्म पृष्ठान्न वश्चरन्ति स्वसि च इयानाः | ता श्राव वृनन्नधरागुदवा अहिर्बुध्न्यमनुरीयमाणः ॥ विष्णोपक्रमणमसि विष्णोविक्रान्तमसि विष्णोः क्रान्तमसि स्वाहा) ओं यथावाणप्रहायण कवचं० इत्यादि मन्त्रः पूर्ववदभिषेकः ॥ इति यवादिहोमद्रव्याहुति दत्त्वा द्वितीयवारं सूर्यमन्त्रः पूर्ववत् धृतधारां कुर्यात् ॥ घओं शारदा मातरः प्रोक्का मद्यश्च मागरास्तथा । ततश्च देवताहोमं क्षेत्राद्याः कुलदेवताः । असख्याताः सहस्राणि स्वर्गमये च भूतले । रुद्रजाप्यंततः कृत्या स्वस्ति कुर्यात्ततः परम् ।। इति संवत्सरादिसमुद्रहोमः समाप्तः । ततश्चर्वादिद्रव्यैः स्थालीपाकहोमं कुर्यात् । संख्यामन्त्रीः संख्यायोक्त विधानेन जुयात् ॥ पश्चाद्देवं चरिरुद्र, वैष्णवी, आदित्य. विम्राड, पञ्चभद्र, आदिहोनं कृत्वा ।। अथोत्तगहोमः ॥ तत्रादी सङ्कल्पः ॥ ओं अवेहेत्यादि० अमुक- होमकर्मणि मया कारितस्य ब्राह्मणद्वारा नवप्रहादिमन्त्रांगहोमकर्मण उत्तरांगसिद्धये होमं करिष्ये ॥ व्याहतित्रयस्य प्रजापति पियत्र्युष्पि गनुष्टुप्छंदांसि अग्निवायुमूयां देवता उत्तरांगहोमे विनियोगः ॥ ओं भूः स्वाहा इदमग्नये । ओं भुवः साहा इदं वायथे । ओं स्वः स्वाहा इदं सूर्याय ॥ ततः औं प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये || ओं अग्नये स्त्रिष्ट्राटे स्वाहा इदमामनये स्विष्टकते ॥ इति स्विष्टकद्धोमः ॥ संभवं मद्धोमाः ॥ संभव प्राश्य पूर्णपात्र सइक्षिणं प्रमाणे दद्यात् ॥ पाद्यादिभिः पूर्णपात्र मंपूज्य ॥ श्रयेहेत्यादि० मया कारितस्य ब्राह्मण्यारा, अमुक कांगहोमकर्मणः सांगफरपालये साद्गुण्यार्थ घ इद बगदुलपूर्णपात्र मदविणं प्रजापतिदेवतमागोवाय, अमुकशमणे ग्रामणाय तुभ्यमई गमानगरेय पदिता चतुर्मिर्षिभातम्या, विरोपे शून्यरोपे १ भुवि वास: स शेयर वानं तवरमपि यदक्षिणा स्यात्मदेवायायांयामर्थ मार्ग तदनुमदकतावासानो तदर्दम् ॥१॥ प्रत्याभ्यो यहावं मुरुशिवानभूपणानि मदपारीनालायच 6. जूनिवषिमतास्तपिदपरेऽम्नः ॥ २॥ गुमा, कादिरो कमारिरि भूनने सामोऽगुम इत्यर्थः । एवंभात् प्रितिमे पन्ने गरि मन्दारमाणिपिनो मेरा बीमाति: मले । अर्थ: पदे रिसा भासमानुशिमिना मेरा रोमाति: पहे। मपं.- --

[ १६७ ]
सम्प्रददे ॥ ओं अक्रन्कर्मेति दत्त्वा ।। स्वतीत ब्राह्मणः प्रतिव्यात् ।।
अथ पूर्णाहुविहोमः 'अोहेत्यादि अमुककांगहोमकर्मणः साग-
फलप्राप्तये न्यूनातिरिक्तपरिपूर्त्यर्थं मृडनामाग्नौ पूर्णाहुतिहोम करिष्ये ।।
पाद्यादिभिमडाग्नि संपूज्य ओं सुवश्च मे चमसाञ्च में वायत्र्यानि च
मे द्रोणकलशश्च मे प्रावाणश्च मे ऽधिपवणे च मे पृतभृच्च माधव-
नीयश्च मे वेदिश्व मे बहिषश्च मे स्वगाकारश्च मे यज्ञन कल्पन्ताम् ।।
इति रक्तसूत्रेण सुवं वेष्टयित्वा सम्पूज्य ॥ सुवपात्र सयनद्रव्यं पीतव-
स्राच्छादितं घृताभिधारितं नारिकेमपूगीफलादिफलं संस्थाप्य तत्पात्र
वामहस्ते धृत्वा उत्थाय यजमानदक्षिणहस्तेन-पूर्णा दौति हिरण्यगर्भ-
ऋषिध्रिष्टुप्छन्दो महावैश्वानरो देवता मृडनामाम्नी पूर्णाहुतिहोमे विनि-
योगः ॥ ओं पूर्णादर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत ॥ वस्नेव विक्रीणा-
वहा इपपूर्ज शतक्रतो स्वाहा ॥ १॥ ओं सप्त ते अग्ने समिधः सप्त-
जिह्वाः सप्तर्षयः सप्त धाम प्रियाणि सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति सप्त
योगीरापृण स्वधृते स्वाहा ॥२॥ ओं पुनस्त्वादित्या रुद्राः वसवाः
समिन्धतां पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथयज्ञैः ।। घृतेन त्वन्तन्वन्वद्धयस्व सत्याः
सन्तु यजमानस्य कामाः स्वाहा ॥ ३॥ ओं मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या
वैश्वानरमृत जातमग्निम् ॥ कवि सम्राजमदिथिञ्जनानामासन्नापावं
जनयन्त देवा स्वाहा ॥ ४ ॥ ओं जयन्ती मङ्गला०॥५॥ इति घृतदिग्धं
पीतवस्त्राच्छन्न स्रुक्पुटितं नारिकेलादिफलं प्रज्वलितेऽग्नौ घृतावच्छि-
न्नधारया सह जुहुयात् ।। ततः ओं वाजश्च मे प्रसवश्च मे प्रयतिश्च मे
प्रसितिश्च मे धीतिश्च मे क्रतुश्च मे स्वरश्च मे लोकरच मे सुवश्च मे
श्रुतिश्च मे ज्योतिश्च मे स्वश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् [ वा० पुराणमन्त्रः]
इति पठन्तः सुवहस्तेनाज्यसहिता यजमानब्रह्माऽर्चायत्विजादिब्राह्मणाः
कात्यायन:-
ब्राह्मणे दक्षिणा देया या यत्र परिकोर्तिता ।। इति ।।
होमकर्माद्यशक्ताना विप्राणा द्विगुयो जपः ।
इतरेपान्तु वर्णाना त्रिचतुःपक्षसंख्यया ॥१॥
वित् बुधः, पंगुः शनिः, प्रार: भौमः, इज्या गुरुत, अगुः राहा, शिखी केतुः ।
कचिदग्निवासादिविचारामावो निर्णयसिंधौ -नित्ये नैमितिके दुर्गाहोमादौन
होमदिगुणजापेन सम्पूर्ण तर्पणं भवेत् ।
श्रकृवे मार्जने प्रोक्त तर्यमाद् दिगुणो जपः ॥२॥
प्रत्याम्नाये ब्रझमोज्यो न कुत्रापि मया भुतः । .
सर्वमा भोजयेदिप्रान् स्वातत्व सिद्धये ॥३॥

[ १६८ ] अग्नेर्देवतायाश्च प्रदक्षिणाचतुष्टयं कुयुः ॥ अथान्यालम्भनम्-ओं तन्या अग्नेसि तन्य मे पाहि ॐ आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि ओं वक़दा अग्नेसि वर्षों मे देहि ॥ ओं सुमिनिया न आप ओपधयः सन्तु इति सपवित्राभ्यां हस्ताभ्यां प्रणीताज लेन शिरः सम्मुज्य दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान्द्वेष्टि यं च । वयं द्विष्मः इतिप्रणीतापात्रमैशान्यां न्युजीकुर्यात् ।। ओं देवा गातु वित्वा मातुमितमनससत ।। इमं देवयज्ञ , स्वाहा वातेधाः ।। इति वहिहोमः ।। अथ व्यायुकरम्-ॐ मानस्तोके तनये मा न आयुपि मा नो गोपु मा नो अश्वेपु रीरिषः ।। मा नो वीरानुद्र भामिनो वधीईविष्मन्तः सदमित्वा हमावहे । ओं इम, स्तनमूर्जस्वन्तः ॥ इति नारिकेलफलस्य वा यज्ञद्रव्यस्य विभूति गृहीत्या व्यायुपमिति नारायण ऋषिरुष्णिक छन्दः शिवो देवता व्यायुपकरणे विनियोगाः।। ओं घृतम्मि- मिक्ष धृतमस्य योनि घृते श्रितो धृतं वस्य धाम अनुप्वधमावह मादयस्व स्वाहा कृतं धूपभ वक्षि हव्यम् ।। इति घृतालोडनम् ॥ तत्रादौ देवतायाख्या युपकरणं कृत्वा पश्चाद्यजमानं दद्यात् ।। ओं व्यायुपं जमदग्नेः इति ललाटे. ओं कश्यपस्य ध्यायुपं इति ग्रीवायाम ओं यदे वेपुं, इति हृदि ॥ ततः श्रद्धा मेवां यशः प्रज्ञां विद्या बुद्धि बलं श्रियम् ।। आयुष्यं तेज आरोग्यं देहि मे हत्र्यवाइन ॥ इति प्रणम्य ॥ यज्ञदशांशं तर्पणम्, सर्पणदशाश मार्जनम्, मार्जनदशाश ब्राह्मणभोजनम्, ततो यदक्षिणासकल्पः ।। अधेहेत्यादि० अमुकशर्मा मया ब्राह्मणद्वारा कारितस्य अमुक (संख्यक) होमनवप्रहशान्तिमखकर्मणः साङ्गफलायाप्ते इमां सुवर्ण रजतवानादिदक्षिणां, अग्न्यादिदेवत्या, अमुकामुकगोत्रेभ्यो ऋत्विम्म्यो तथा शन्तिपाठवाचकम्यो गणेशगायत्र्यादिजापरेभ्यो रुद्राध्यायविष्णु- सहस्रनामपाटकेम्यो ऋग्वेदादिचतुर्वेदोच्चारणकारकेभ्योतथा प्रामदेव वास्थानदेवतादीनां पूजकेभ्यः साचार्य पुराण-शास्त्रादिवाचकेभ्योऽमुका- विचारयेत् ॥ अन्यच्च-दुगाहोमविधी विवाहसममे सीमन्तपुत्रोत्सवे गर्भाधान विधो च वास्तुसमये विष्णोः प्रतिष्ठादिषु । मौसीवन्धनवैश्च देवकरणे संहका- यीयकाष्ठानि प्रदपुराण- पलाशाश्वत्यन्यग्रोधप्लववेकंकतोद्भवाः। रामी चोदुम्बरो बिल्वरचन्दनं मरनस्तथा!!! यासरन देवदारुश्च खदिरश्न प्रयोदश ॥१॥ उदमांवे पटकवन्य इति ॥ रनमिति होमे नित्यमये न दोषयनं चव बहेरपि ॥ अपराधंगहोमेऽपि न दिन गोप्यं वस्य सन्मकालवाभातदिति । (मे प्रथमाइतिर्गपपत्रे:- यान्तु सर्वे पूजामादाय [ १६६ ] मुकनामम्यो पूर्वपूजितकर्मकारकत्राह्मणेभ्यो वस्त्राभरणादिकं च विभज्य दातुमहमुत्सृजे ॥ ॐ तत्सन्न मम ॥ तथा भूयसी दक्षिणां, अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये ॥ इति ब्रह्माचार्यद्विजादिब्राह्मणान्सुवर्ण- वस्त्रादिदानेन संतोष्य ।। ततोऽग्नि विसर्जयेत्--ओं गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर । यत्र - ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन ॥ भो भो वह्न महाशक्त सर्वकर्मप्रसाधक । कुन्तिरेऽपि सम्प्राप्ते सान्निध्यं कुरु ' सादरम् ।। देवगणाः माकिकाम् । इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनरागमनाय च ॥ ओं यज्ञ यज्ञङ्गच्छ यज्ञपति गच्छ स्वां योनि गच्छ स्वाहा एप ते यशो यज्ञपते सह सूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा ॥ ओं धामच्छदग्निरिन्द्री ब्रह्मा देवो वृहस्पतिः । स चेतसो विश्वेदेवा यज्ञं प्रावन्तु नः शुभे ॥ अथाभिषेकं कुर्यात् ॥ ओं यत्त यमं वैवश्वतं मनो जगाम दूरकं ॥ वत्त आवर्तयामसि अक्षयाय जीवसे ॥ १ ॥ओं यत्ते भूमि चतुभृष्टिं मनो जगाम०।। ३ ॥ ओं देवस्य त्व सवितुः प्रसपेश्चिनो वाहुभ्ययां पूष्णो हस्ता- याम् । सरस्वत्यै वाचो यन्तुर्यत्रिये दधामि बृहस्पतये त्वा साम्राज्ये. नामिपिञ्चाम्यसौ ॥ ४ ॥ ओं अग्निदेवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवतादित्या देवता विश्वेदेवादेवता बृहस्पतिर्देवता इन्द्रो देवता वरुणो देवता ।। ५। ओद्यौः शान्ति- ॥ ६ ॥ মুখ যয়নুরুনঃ- सूर्य के उत्तरायण में तथा तीनहूँ उत्तरा, रोहिणी, विशाखा, कृचिका, रेवत', मृगशिर, ज्येष्ठा, पुष्य नक्षों में रिक्तातिधि छोड़ यज्ञारम्भ करना परन्तु श्राहुति में वहिवास लग्नदान शुद्धि भी देखनी चाहिये । गणाधिपतये देवा प्रथम तु चराहुतिः। अन्यया विफलं सर्व भवतीह न संशयः । हवच प्रयमाहुति पचवारुणी [ प्रायश्चित्तसंशक ] होमान- आहुति-सूर्य के नक्षत्र से ३ । ३ करके चन्द नक्षत्र पर्यन्त कम से सु०, बु०, शु०, श० ०, मं०, वृ० ग०, के०, के मुख को पाहुति होती है पापमह की शुभ नहीं है।। वहिवास-वर्तमान तिथि में ! जोड के वार जोडना ४ से शेप करना । ३ रहे तो पृथ्वी में अग्नि का वास है होम में सिदि होगी २१ शेष रहे तो अग्निवास पृथ्वी में नहीं होमादि कम में प्राणधनादि नाश हो ॥ न्तरक्रियमा यहोमस्याऽऽदिभूतेति 'ज्ञेयम् । पत्र वारुणीहोमस्तु तेरपि प्रागेव. भवतीति तात्पर्यम् ।। इति परिमाया सामान्यभागः । गगाप- [ १७० ] ओं अमृताभिपेकोऽस्तु. ३ इत्यभिषेकः । ततः कङ्कणं मोचयित्वा गोदानं विधाय गणपत्यादिदेवता विसृज्य । यजमानं तिलकदूर्वाभिराशिपंदद्यात् ।। ब्रह्माचार्यऋत्विब्राह्मणादीन्भोजयित्वा स्वयमपि भुञ्जीत || शुभम् ॥ अथ सूर्यापस्थान-प्रयोगः।। । श्राचम्य प्राणानायम्य ।। सङ्कल्पः-श्रथ पूर्वोच्चारित्त वर्तमान- एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथी ममाऽत्मनः श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं श्री सविता सूर्यनारायण प्रीत्यर्थ सूर्योपस्थान महं करिष्ये । कुश पवित्रधारणम्-~ओं पवित्र स्थो व्वैष्णव्यो सवि- तुळ : प्रसवऽ उत्त्पुनाम्याच्छद्रेण पवित्रण सूर्य्यस्य रश्मिभि: १ वस्य ते पवित्र पते पवित्र पूतस्य यक्काम : पुनेतच्छकेयम् ॥ १॥ इति मन्त्रणदक्षिण वाम हस्तयो रनामिकयोः कुश पवित्र धाय॥ सूर्यपूजनम् - ओं उदुत्यक्षात वेद सं० ॥२।। सूर्यमुदीक्षन्-ओं उदयन्तमस० ॥३॥ ओं उदूत्यजा० ॥ ४॥ श्री चित्रन्देवाना० |॥ ५॥ ओं तच्चक्षु ० ॥६॥ श्री तस्सवितु० ॥७॥ अनुवाक:--नों विम्बाइ० ॥ १७ ॥ पुरुपसूक्तम्-ओं सहन शी० ॥ १६ ।। शिव सङ्कल्पः--श्री यजामंतो० सुपारथि रवान्तम् ॥ ६॥ एते मन्त्रारुद्रध्यायेद्रष्टव्याः, मण्डल ब्राह्मणम्,-ओं यदेतन्मएडन्न तपति तन्मह दुक्थन्ताऽऋष: स ऋचा लोकोथप तद बिध्यते वन्महा व्रतं तानि सामानि स साम्नॉ ल्लोकोथ य एप ऽपत स्मिन्मएडले पुरुप : सोमिस्तानियजू । पि सयजुपां लोक 5 ॥ १ ॥ सैण त्रय्येव विद्या तपति तद्वैतदप्य विद्वा, स आहुस्त्रयी, वा ऽएपा विद्या तपतीति वाग्द्यैव तत्पश्यन्ती व्वदति ।। २ ।। स एप एव मृत्युर्य ऽ९ऽएकास्मि न्मएडले पुरुपो थे तद सुन यो तदचि दीप्यते तस्मान्मृत्युन म्रियतेमृतेन्तिस्तस्मादु न दृश्यते मृतेयन्त ॥ ३ तदेव श्लोको भवति-अन्दर मृत्योरमृत मित्त्य वर चन्मृत्यो रमृतम्मृत्या वमृत माहित मित्त्ये वस्मिन्छि- पुरुष ऽएनन्मएडलम्प्रतिष्टिवं तपवि मृत्युविवस्वन्तं वस्तऽइत्यसो • वा ऽा.. () रवि मन्त्रेण सूर्य गन्धादत पुणेः सम्यून्य (२) दक्षिण वाम पारपो दो दो साप्रद गन्धादव श्वेत पुष्प तुलशीदल सस्तिोपत्ता पश्चादेव मन्त्राः पठनीयाः ।। (इदं एसोपस्पान धारपयां वथा भाददिने कुर्वान्ति 0) .

Sएप [ १७१ ] दित्यो विवस्वा नेपयहोराने बिबस्ते त मेप बस्ते - मज़तोो नेन परिवृतोमृत्यो रात्मा विवस्वती त्ये सस्मिन्दि मण्डलऽएतस्य पुरुस्या स्मैत देप श्लोको भवति ॥ ४॥ तयोर्धा ऽएतयोरुभयोर रेतस्य चार्चिपऽएतस्य च पुरुषस्यैतन्मएडलं प्रतिष्प तस्मान्मह दुक्थ परस्मै न श छ सेन्ने देतांप्रतिष्ठां छिनदा ऽइत्येता: ओं ह स प्रतिष्ठा छिन्तेऽवो मह दुक्थ परस्मैरा.. सति तस्मा 'दुक्य श सम्भूयिष्टं परि चलतेप्रतिष्टा छिन्नोहि भवतीत्यधि देवतम् ॥ ५ ॥ अथाधि यज्ञमः यदेतन्मएडलं उपत्य य, स रुक्मोथपदेत दचिर्दीप्यत इदं तत्रपुष्करपर्ण प्रापोह्य ताऽआप ऽ.पुष्कर पर्ण :मथय ऽएप एविस्मिन्मएडले पुएपो यमेव स योयहिरएमय : पुरुषस्वदेतदेवतत्रय संस्कृत्ये हो पधत्तेतद्यज्ञ स्यै वानुस स्था मूर्द्ध मुस्कामति वदे तम प्येतिय ऽएप तपति तस्मादग्नि माद्रियेत परि हन्तुम मुत्र झेप तदा भवतीत्यु ऽएवाधियज्ञम् ॥ ६ ॥ अथा- प्यात्मम् यः तन्मण्डल तपति यश्चेप रुक्म इदं तछुक्त मक्षनथ यदेतदर्षिीप्यनेयञ्चेतत्पुष्कर पर्ण मिदं तत्कृषण मक्षनथ य ऽएनास्मिन्एडले पुरुपो यश्चैप हिरएमय : पुरुषो यमेव सयोयं दक्षिणे क्षन्पुरुप ॥ ७ ॥ स ऽएप एव लोकं पृता मेव सोग्नि रामि सम्यद्यते तस्यै तन्मिथुन यो य . सध्येक्षन् पुरुपोर्द्ध महै तदात्मनो यन्मिथुनं यदा- वे सह मिथुने नाथ सर्बोथ 5: कृत्स्म तायैतद्यत्रेद्वै भवतो द्वन्द्व . हि मिथुनम्प्रजननं तस्मा- द्वे लोकं वृणे ऽउपधीयेते तस्मा दुद्वाभ्यां द्वाभ्यांचितिम्प्रण यन्ति ॥ - ॥ स.एष ऽएवेन्द्र : यो यं दक्षिणेक्षन् पुरुपोथेयमिन्द्राणी तान्यां देवा ऽएतां, विधृतिमकुवं न सिकान्तस्मा बायाया अन्ते नाश्नीया द्वोर्य वान्हास्मा जायते वीर्य्य वन्त मुह साजनयति यस्या ऽअन्ते नाश्नाति ॥ ॥ तदेव देवत्रत राजन्य बन्धवो मनुष्याणा मनुतमांगोपायन्ति तस्मादुः तेषु व्वीर्य वा जायते मृत- वाका वयसा सा क्षिप्रश्येन जनयति ॥ १०.॥ तो हृदयस्या काशं प्रत्यवेत्य मिथुनी भवः तस्तो यदा मिथुनस्यान्तङ्गच्छतोथ है तत्पुरुष । स्वपिति तद्यथा है वेदम्मानुषस्य मिथुनस्यान्त- संविद ऽइव भवत्येव । है. वैतद संविद् इव भवति देव ॥॥ ह्येतन्मिथुनम्परमो टेप ऽआनन्द : ॥ १५ ॥ तस्मा देव वित्स्वप्यात् । योक्य है- तेऽएवतरवते मिथुनेन. प्रियेणयाम्नासमर्द्ध यति तस्मादुइ स्वपन्तधुरेव न बोधयेन देते देवते मिधुनी भवन्त्यो दिनसानीति तस्मादु हे तत्सुंखु 'पुप :: श्लेष्मण मित्र [ १७२ 1 मुखम्भवत्येते ऽ एव तदेवतेरेत 5 सिञ्चतस्तस्मा वसइद सर्व। सम्भवति वदिदं किञ्च ॥ १२ ॥ स 5 एप 5 एव मृत्यु ।। यऽ एए एतस्मिन्मएडले पुरुषो वश्चा यन्दक्षिणे क्षन्पुरुप स्तस्य है तस्य हृदये पादावनिहतीतीहै तदाच्छिद्योत्क्रामति स यदोकामत्यथ है तत्पुरुषो प्रियते तस्मा दुई नत्वमाहु राच्छेद्य स्येति ॥ १३ ॥ एप 5 उऽएव प्राण : । एव हीमा : सर्वा : प्रजा : प्रणयवि तस्यैते प्राणा: स्या s: स यदा स्वपित्य थैन मेवे प्राणा: स्वाऽअपियन्ति तस्मात्वाप्यय S: स्वाप्ययोहात , स्वप्नऽइत्या चक्षतेपरोक्षन्परोक्षकामाहि देवा: ॥ १४ ॥ स 5 एतै सुप्तो न कस्य च न व्बेदन मनसा सङ्कल्पयति न व्वाचान्नस्य रसव्विजानाति न प्राणेन गन्ध विज्ञा नाति न चनुपा. पश्यन्ति न श्रोत्रेण शृणोत्तत. ह्यते तदापीवाभवन्ति सऽ एपs एक सन्प्रजामु वहुधा व्याविष्ट स्तस्मा देका सती लोकम्पृणा सर्व: मग्निमनु विभवत्यथ यदेकऽ एव तस्मा देकः ॥ १५ ।। तदाहु ! ऽएको पृत्युर्वहवऽइत्येकरच बहवश्चेति हब याद्यदिहा सायमुत्र तेन कोय यदिह प्रजासु बहुधाव्याविष्ट स्तेनो वव : ॥ १६ ॥ तदाहु । ऽअन्तिके मृत्यु राऽइत्यन्तिके च दूरे चेतिह ब्रूयाद्य दहाय मिहाध्या- रमन्ते नान्तिकेय यदसा वमुत्र तेनो दूरे ॥ १७ ॥ तदेष श्लोको भवति । अन्ये भात्यपश्रितो रसाना सक्षरे मृतऽइदियदेवन्मएडल तपति वदन्न: मथ य एष 5 एतस्मिन्मएडले पुरुषः : सोतास 5 एतस्मिन्नन्ने पनितो भातीत्यवि देवतम् ॥ १८॥ अथाध्यात्मम्-इदमेव शरीर मन्नमुथयोयं दक्षिणे क्षन् पुरुप : सोत्ता स ऽएतास्मिन्नन्ने पभितो भाति ॥ १६ ॥ तमेत मग्निरित्यधर्पन्न उपासते ॥ यजुरित्येप हीद सव्व पुनक्ति सामेति छन्दोगाऽएतस्मिन्हीद ॥ सर्व समानमुक्तमिति- वह चाऽ एप होद . सर्व मुत्थाप यति यातुरिवि यातुविदऽएतेन होद ओं सवं यतं विपमिति सर्पा : सर्प ऽइवि सर्प विद् ऽगिति देवा रविरिति मनुष्या मायेत्य मुरा : स्वधेति पितरो देवजन इति देवजन विदो रूपमिविगन्धर्वा गन्ध सस्त यथा यो पासवे वदेव भवति तद्धनान् भूत्वा वति. वस्मा देन मेवं विस्म। रेवेत रुपासीठ सर्च, तद्भवति सर्व । हैनमेवदत्वा ऽयति ॥ २० ॥ स एप ग्रीष्ट कोग्नि पुगेका यजुरेका सामेकावयास पात्रोंप दधाति सक्म ऽपय तस्या ऽप्रायव नमथ यां यजुषा पुरुष ऽएवतस्या आवदनमथ औं साम्ना पुस्कर पर्णमय वस्याऽधायवन मेनिष्टक |॥ २१ ॥ ते वाऽएते ऽ ऽपप प रूम्म एनम पुष्कर पणं मेवमपुरुषमपविऽभेष ऽत्यप्सर ६ का [ १७३ । क्सामे यजुरपति एवम्वेकेष्टक : ॥ २२ ॥ स एप:एवमृत्यु : ऽएप एतस्मिन्मएडले पुरुपो यश्चार्य दक्षिणे क्षन्पुरुप : सऽएप ऽएवं विद् प्रात्मा भवति स यदेवं विदस्मॉ लोकाप्रेत्य थेत मेरा मान मभि सम्भवति सो मृतो भवति मृत्यु स्यात्मा भवति ॥ २३ ॥ तेन वाऽइदमने सदासी व सदासीत् ।। मण्डल ब्रह्मणम् ।। तदा':--किश्छन्द : कादेवताग्ने : शिरऽइति गायत्री छन्दोऽमि देवताशिर ॥ १ ॥ किञ्छन्द : का देवता प्रीवा ऽइत्युष्णिक छन्द : सविता देवताग्रीवा ॥ २१ ॥ किञ्छन्द : का देवता नूक मिति वृहती छन्दो वृहस्पति देवता नूकम ॥ ३॥ किन्छन्द : का देवता पक्षाविति वृहद्रथन्तरे बन्दो द्यावा पृथिवी देवते पक्षौ ॥ ४ ॥ किछन्द : का देवता मध्य मितित्रि- धूप बन्द इन्द्रोदेवता मध्यम् ॥ ५ ॥ किञ्छन्द : का देवता ओगीऽइति जगती बन्दाअादित्यो देवता श्रोणी ॥ किछन्द देवता यस्मादिदं प्राणा द्रेत सिच्यत इत्यत्तिच्छन्द श्छन्दऽप्रजापत्तिर्देवता ॥७॥ किन्छन्दऽका देवता योय मवाङ प्राणऽइति यज्ञायज्ञियं छन्दो वैश्वानरो देवता ॥1 किच्छन्दका देवतोरुदइत्त्य हुटम् छन्दो विश्वे देवादेवतोरू ॥६॥ किन्छन्दऽका देवताष्टी वन्ता वित्ति पंक्तिश्छन्दी मरुतो देवताष्टीवन्तौ ।। १० ।। किन्छन्दऽका देवता प्रतिष्टेऽइति द्विपदा छन्दो विष्णु देवता प्रतिष्टे । ११॥ किञ्छन्दऽका देवता प्राणऽइत्तिविश्छन्दछिन्दो ब्वायु देवता प्राणाऽ । १२ ॥ किन्छन्दः का देवतो नातिरिका नीति न्यूना. क्षरा छन्दआपो देवता नातिरिक्तानि सैषात्म विद्ये वैतन्मयो हैवैता ऽपतमात्मा नममि सम्भवत्ति न हातान्या लोक्यत्ता याऽआशीरास्ति ॥ १३ ॥ धोरोह शातपर्णेयः॥ ब्राह्मणम् ॥ ॐअयं वाऽइदन्नामरूपं कर्म तेपा नाम्नां वागित्येतदेवा मुक्य मत्तोहि सर्वाणि नामान्युतिष्ठन्त्ये तदेपाऽसामैतद्धि सर्वैर्नामभिऽसममेतदेर्षा ब्री तद्धि सर्वाणि नामानि विभचि ॥ १॥ अथ रूपणाम् - चक्षुरित्येत देवा . मुक्यमतो हि सर्वाणि रूपाएयु तिन्छन्त्येव देपावसामैतद्वि सवै रूपेऽसममेत देषां ब्रौ वद्धि सर्वाणि रूपाणि विभर्ति ॥२॥ अधकर्म- णाम् -श्रात्मेत्येतदेपा मुक्य मतो हि सर्वाणि कर्माण्यु त्रिष्ठन्त्येतदेपा सामैतद्धि सर्वेऽकर्मभिऽसममेवदेषां ब्रह्म वद्धि सर्वाणि कर्माणि (१) वादा रित्याद्यत्र लिखित नाहय दवं केचिपठन्ति केचिन्न !

1 १७४ 1 मिति तदेन यछपदेक मयमात्माइएकऽसग्नेतनयं तदेतदमृतह) सत्येन छन्न प्राणीवडअमृत नामरूपेसत्यन्ताम्या मयं प्राणाश्छन्नs बामणम् ।। ३ ।। दृप्तमालाविहीं नूवानो गायेऽास-भूमिरन्तु रिक्ष द्योरिति अष्टा वक्ष राण्याक्षराहनाऽएकम् । गायत्र्यै पदमेन दुहास्या- ऽरतत्स नारदपु लोकेषु ताप जयति योस्याऽएतदेव पद वेद ॥ १ ॥ मचोयत्यपिसामा नौत्यष्टा वक्षराण्यष्टा रहताsएक गायत्र्यै पदमेत दुहै वास्याऽरतत्सपायतीय वी विद्या तावद्ध जयति योस्याएत- देव पर्द वेद ॥२॥ प्राणोऽयानो व्यानऽइत्यष्टा वक्षराण्यष्टाक्षर छहग एक गायव्य पदमेतदुहे वास्याऽत्तस पावदिदप्राणि ताबद्ध नयति बोस्याऽएतदेव पवेद ॥ ३ ॥ अथास्याऽएतदेवतुरीयं दर्शते पर परजायऽएव तपतिपदै चतुर्थतन्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृशऽश्नह्येष पोरनाउइति सर्प मुझेप रजपर्युपरितपत्येव हेव श्रिया व शसा तपति यास्याऽरस देवं पद वेद ॥ ४ ॥ सैपा गायन्ये तामिस्तुरीये दर्शते पटे परो रममि प्रविष्ठाता त तरसत्येप्रतिष्ठवाचतुर्वै सत्य चतुर्हि वैसत्य तस्मादि दानीन्दी वियदमाना येयात्तामह मद्रा | मह मोपमितिय एवं याद हभद्राच मिति वस्माऽएर श्रदध्याम ॥ ५ ॥ तद्व तत्सय चले प्रतिष्ठतम् । प्रपोये चल उत्प्राण प्रतिष्टत तम्मादाहु- वलमत्याहो जायऽएत्ये बम्बेपा गायत्र्यधात्म प्रविष्टता ॥ ६ ॥ 'मा हेपा गयास्तप्राणा वैगर्यास्तरमाणात ताद्गयात तस्मा द्गायत्री नाम स पामेवा मूमन्याहेपेय सासयरमाऽअन्याह तस्य प्राणा स्त्रायते ॥ ॥ 'साह के सावित्री मनुष्टुभमन्याहुर्वाग नुप्दयंत दाम मनु मति न त्या फुर्वा द्गायत्री मेवानु नयाय दिह वाऽपि पसाय प्रति गृहाति न देव तदुगायध्यापकरच न पदं प्रदि। 3 ।। म घऽहमा बाल्लोकान्यूर्णन्प्रतिगृवीयात्सोस्याऽएत्त स्वयम पदमान या दययागातीयंथी विद्या यस्ता यत्प्रतिगृहायात्सोस्याऽपत द्वितीयम्पद मात्र यादयास्याऽक्तदेवत्त रोयदर्श पदपरोलायडरतपतिनवकेन बनाप्य लगना पनि गृहीयात् ॥ ॥स्या उपस्थापनम्- प्रत्याय)- गायव्यापी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पग पदसि नदि पदासे । नमस्ते तुरीयायदर्शवाय पनाय परोरनसे मा होमात्रा पविनियद्विघ्या सा याने कामो मा मम:वि गन हामेमामSAमृश्यते यमाएर. मुपनिष्टहयामिति ॥ एतदरे तम्मनको यही हिल माखनश्यि मुगप-यन्नु होनदायी रिद याउप्रय थीभूतो पदमी मुरमा मम्मा दिदा र फरेति होगा ॥ ११॥ सम्याड निय मुम्मम् । रिया अपि यक्षी माना गया यानि म भर [ १७५ ] रसदहत्येव । है वै व विदाद्यपि बहीव पापं करोति सर्व मेव तत्संसाय शुद्ध : पूतोजरोऽऽमृतः सम्भवति ॥ १२ ॥ माहाणम् ॥ श्वेतकेतुई वाऽ श्रामणेयऽ.प्रदक्षिणी कृत्य नमस्कृत्योपविशेत् ॥ १३ ॥ इति मण्डल जाह्मणम् ।। (साएयो हीत कुशानां कुशपवित्रयोश्च पूर्व स्यां दिशि त्यागः कर्तव्यः) । अर्पणम्-अनेन यथा शक्त्या कृतेन सूर्योपस्थान फर्मण श्रीभगवान सविता सूर्यनारायणः प्रीयतां नममा तत्सद्ब्रह्मार्पणसस्तु ।। इति सूर्योपस्थान प्रयोगः। अथ प्रायश्चित्तादि गोदान प्रयोगः। कुशतिल जलमादाय प्रोत्यादि श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्ति कामो गोदान कहिं करिष्ये । गोदान निमित्तक ब्राह्मण वरणार्थं चंदना- दिकमादाय ब्राह्मएमभ्यर्च्य अद्यकर्तव्यगोदाने एभिचंचंदनाक्षतपूगीफलता- यूलद्रव्यवस्त्राल कारैरभ्यर्च्य अमुक शर्माणं ब्राह्मणम् एभिद्र व्याक्षत पूगी- फले,गोदानरहितत्वेनचाहरणेस्वोस्मीतिप्रति वचनम्, व्रतेनदीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽऽप्नोति दक्षिणाम् दक्षिणा श्रद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्त्य माप्यते । ततोगोदान सामग्री सम्प्रोक्ष्य गां सवत्सां पूज्येत् || गवां मगेपुतिवन्ति मुवनानि चतुर्दश ।। यस्माचस्माच्छिवमेस्यादिह लोके परत्रच । गोभ्यः आसनम् । पाद्यम् अध्यम् श्राचमनं स्नानम् ॥ मन्त्रवित् ।। वस्त्रम्-- आच्छादनं मया सम्यक शुद्धं चैव सुनिर्मलम् । सुरभी वस्त्रदानेन प्रीयता परमेश्वरी । इति वस्त्रेण गामाच्छाद्य ।। गायोमे चामतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्टतः || गावो मे हृदये सन्तु गवांमध्ये वसाम्यहम् ।। इतिमन्त्रेण अक्षत पूजा प्रार्थना पंच गावःसमुत्पन्ना मथ्य माने महो दधौ। तासां मध्ये तथा श्रेष्टा तस्यैधेन्वै नमो नमः ।। इति मन्त्रेणगन्धाः दिभिःपूजयेत् ॥ पूजितासिवसिष्टेन विश्वामिणधीमता ।।. सुरभि हरमे पापं यन्मयादुप्तं कृतम् पुष्प माला ॥ नमो गोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभे योभ्य एव च ॥ नमोब्रह्म सुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो. नमः ।। सुरभि त्वं जगन्माता नित्यं विष्णु पदेस्थिता । मातगृहाणं मे दत्तं गोमातस्त्रातुमर्हसि ।। इति मन्त्रण गोभ्यो नैवेद्यम् ॥ धूपदीपादिक दत्त"फलानि विविधा निच ।। गृणाणावं मया दत्तं देहि मे वाछितं फलम् ।। रूपं देहि जयंदेहि भाग्यभवति देहि मे। पुत्रान् देहि धनदेहि सर्वान्कामांश्चदेहिम।। इति मन्त्रण अर्थ दत्वा ततोग पूजा। पृष्ठे नहरणे ब्रह्मणे नमः। गले विष्णवे नमः । मुखेरुद्राय नमः । रोमकूपेषु सर्वे. भ्यो महर्षिभ्यो नमो नमः पुच्छे सर्व नागेभ्यो नमः । स्तनेषु चतुस्समुद्रेभ्यो नागाः पुच्छे [ १७६ ] नमः । खुराप्रेऽष्टकुल पर्वतेभ्यो नमः। नेत्रयोः शशिमा कराभ्यां नमः । श गयोमध्येसर्वतीर्थेभ्यो नमः मूत्र गगादि सर्व नदीभ्यो नमः । गोमये लदमै नमः । कर्णयोरश्विनी कुमाराभ्यां नमः । जिह्वायां सरस्वत्यै- नमः नासा पुटयोः सुमुखायनमः उदरे पृथिव्यै नमः । दक्षिण पार्ये कुवेराय नमः । वामपाखें वरुणाय नमः । 'कारे सर्व वेदेभ्योनमः। इति श्रगपूजा !! यानि कानि च पापानि ब्रहाहत्या समानिच ! तानि वानि विनश्यन्तु प्रदक्षिणपदेपदे।। अथप्रार्थना।। पृष्टे ब्रह्मा गले विध्यारो रुद्रः प्रतिष्ठितः ।। मध्ये देवगणाः सर्वे रोमकूपे महर्षयः खुरायेषु वेचाप्टी कुल पर्वताः ।। मूत्र गगादयो तद्यो नेत्रयो शशि भारकरी एते यस्यास्तनी देवाः साधेनुवरदास्तुमे ।। या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या व देवेव्यवस्थिता ॥ धेनुरूपेण सा देवी मम पाप व्यपोहतु । विष्णो क्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा याच विभावसोः । चन्द्रा शक शक्तिर्या सा धेनुवर दास्तु मे ॥ चतुमुपस्यया लक्ष्मी लक्ष्मीर्या धन दस्य च ॥ या लक्ष्मी लोक पालानां सा धेनुवरदास्तु में ॥ या स्वधा पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञ भुज स्तथा ॥ सर्व, पाप हराधेनुः सामे शातिं प्रयच्छतु ।। मनोमे वर्पयेत् चतु, मैतर्पयेत् । श्रेय मे वर्पयेत्, प्रजान्मे तर्पयेत् गणान्मेतपयेत मिति गोपुन्छ व इति सांग तर्पयेत् ॥ ततः सङ्कल्प्यः पूर्व रस्तु देश सालो सदत्य- मम इह जन्मनि जन्मांतरे वा प्रज्ञान वशतः प्रकृति वियोगा । गुणत्रय कारण मनोवा काय कल्पिनिविध समस्त पाप संघटन, पर दाराभिमर्षण ब्राह्मण हनन मद्यपान गुरु तल्प गमनेध नार्थ दम पछेदन स्त्री हिसोपध जीयन सविधी विधवा दामी वेश्याभि, गमन रहस्य पातको पपातका गम्या गमनामा भतण लेहना लेखा प्या चोषणा भोगा भोजना र श्य स्पर्शनानियाभोजन of भेद वैदरिकय हय विमय शुद्र संसर्ग देवता हरण फसादि हरणाजनित सफल पावका पनौदन पूर्वक मायुरारोग्य धनधान्य मं प्राप्त्यर्थम् इमां गां रुद्र देवत्या यस्त्र द्वासनां स्वर्ण शगी रोप्य खुर्ग न पुच्ची ताम्र पृष्ठां चंदा घामा मयुतां कारण दोहनी श्री विष्णोः प्रीत्यर्थम् अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे मान- गाय मजिताय तुभ्यमई संपदो, नमम ति, प्राम-नि- गृक्षामि-शनि-कोदोन मिति गर्ष पर कपिने सयं देवाना पूजनीयाय रोहिणीमा ती देश मयायम्मा दश शामी प्रय०॥ दानविaimania भी परमेपर मारय य यापिन • सकल्प सिद्धि [ १७७ ] सालंकारादि गोदान प्रतिष्ठार्थ रौप्य चन्द्र दैवतं हिरण्यम् अग्नि दैवत अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्य महं संप्रददे, ओं तत्सत् न मम इति प्रदक्षिणां कृत्वा, गांनत्वा, ब्राह्मणां नत्वा, भूयसीं दत्वा स्तुवीत । गावः पश्याम्यहं नित्यं गावः परयन्तु मां सदा ॥ गावोस्माकं वयं शान्तिः यतो गावस्ततो वयम् ॥ गाव:पवित्राः परमं गावो मंगल मुत्तमम् ॥ गावः स्वर्गस्य सौंपानं गावोधन्याः सनातनाः ॥ धृत क्षीर प्रदा गावो घृत योन्यो धृतोद्भवाः । घून नद्यो घृतवसा स्तामे संतु सदागृहे ॥ अनेन गोदानेन श्री गोविन्दः प्रीयताम् द्यौः शान्तिमितिअभिशेष ।। सर्व प्रायश्चित गोदान सङ्कल्प प्रद्यह ऽमुक गोत्रः अमुक प्रवरः अमुक शर्मा मयाजन्म प्रभृति अद्य यावत् प्राचरितस्य समस्त पातकस्य अकृत प्रायश्चित्तस्य आमरणान्तं पापापनोद कामः इमां" वस्त्र द्वययुतां स्वर्ण शृगी रौप्य खुगं रल पुच्छी ताम्र पृष्ठ घंटा चामर संयुतां कांस्य दोहनी कपिला धेनु रुद्र · देवतां ( तत्प्रत्याम्नायीभूत अमुक द्रव्य खण्ड अमुक दैवतं , विष्णोः प्रीत्यर्थप्रायश्चित्त त्वेन अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे सुपूजिताय ब्राह्मणाय तुभ्य महं संप्रदे । न मम- इति । गो प्रार्थना । प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने निष्कृतिनष्कृता कचित् तस्य पापस्य शुद्धयर्थ धेनुमेवां ददामिते ।। ॥ गोदान प्रतिष्ठा- अद्य कृतवत् श्री-परमेश्वर प्रीतये कृतस्य यक्तिचिसालं कारादियुत प्रायश्चित्त गो ( प्रत्याम्नायीभूत अमुक इव्यदान कर्मणः) दान- -प्रतिष्ठा) अमुक द्रव्य खण्डं अमुक देवताकं अमुक गोत्राय इत्यादि ।। व्रत प्रतिष्ठा गोदान सं०॥ मम श्रुतु म त पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थ श्री परमेश्वर प्रीत्य. र्थम् एकादश्यादि तनदत कर्मणः प्रतिष्ठार्थम् ' इमां गां रुद्रदेवता (तत्प्रत्याम्नायीभूतं रजतं चन्द्र दैवतां ताम्र संएड श्री सूर्य दैवत) यथानाम गोत्राययथा नाम शर्मणे नाह्मणाय तुभ्य महं सं प्रददे ॥ एकादश्यादि तत्तत् व्रतकर्मणः प्रतिष्ठार्थ गोप्रत्याम्नायीभूतानि द्रव्याणि तत्तत् देवतानि नानानाम गोत्रेभ्यो नाना नाम शर्मभ्यो ब्राह्म- रणेभ्यः संप्रदे॥

[ १७८ ] पाप पनोद धेनुदानम् ॥ ॐ तत्सत् पूर्व संकल्प सिद्धि रस्तु अद्येह अमुक गोत्रस्य अमुक प्रवरस्य अमुक शर्मणो मम मनोवायताय कर्मभिराजन्मोपार्जित पापाप- नोदार्थम् इमां कृष्णां पापायनोद धेनुं रुद्रदेवत्यां (तत्प्रत्याम्नायीभूत रौप्य खण्डं चन्द्रदैवतं ) अमुक गोत्राव अमुक शमणे सुपूजिताय ब्राह्म- काय तुभ्य मह संप्रददे नमम इति । प्रार्थना मन्त्र । आजन्मो पाजितं मनोवाकाय कर्मभिः । तत्सर्व नाशमायातु पाप धेनु प्रदानतः ॥ दानप्रतिष्ठा-अद्यतैतत् पापापनोद धेनु । प्रत्याम्नायी भूत अमुक द्रव्यदान कर्मणः ] दानप्रतिष्ठार्थ अमुक द्रव्य खण्डं अमुक दैवतं अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय द्वान प्रतिष्ठा त्वेनतुभ्यमहं संप्रदे। ऋणापनोद धेनुदानम् ॥ तरसत् पूर्व संकल्प सिद्धिरस्तु अद्येह अमुक गोत्रस्य अमुक प्रव. रस्य अमुक शर्मणो मम आजन्मो पार्जितैहि कामुष्मिक समस्त ऋण जन्यपातक छेद काम इमां ऋणापनोद धेनुरुद्र दैवतां तत्प्रत्याम्नायी, भूव अमुक दन्य खण्डं अमुफ देवतं ] अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे सुपूजिताय ब्राह्मणाय तुभ्य मह संप्रददेन मम इति प्रार्थना-ऐहि कामुष्मिक यच, सप्त जन्मानितमृणम् । तत्सर्व नाशमायातु, गामे को ददतीमम ॥ दान प्रतिष्टा-अद्य कृतैतत् ऋणायनोद [प्रत्याम्नायीभूत अमुक द्रव्य दान कर्मणः ] दान प्रतिष्ठाथ अमुक द्रव्य अमुक देवतं ।। इस्यादि। प्रध-मोक्षधेनु दान मोक्षदो वामु देवस्तु । वेद शास्त्रैस्तु गीयते ॥ वी. वये द्विजाम्याय, मोक्ष घेनु ददाम्यहम् ।। ॐ सङ्कल्प सिद्धिरस्तु भयेह अमुक गोत्रस्य अमुक प्रवरस्य अमुफ शर्मणों मम ममस्त पापमय पूर्वक मंसार मोधा वाप्ति कामः पापा मद महा विष्णु प्रोति कामरथ मां-मोनधेनु नद्रदेवत्या [ तत्सत्याम्मायीभूत अमुक द्रव्य गएडा मनुक देय] अमुक अमुकगोप्राय शर्मणे सुपूजिताय नुभ्य मई मप्रसन मम इति। मोषधेनु प्रार्थना मन्त्रः।-मोजदेखि लीकेश। मोर देदि जनार्दन ॥ मोप धेनु प्रदानेन मममोशी- ऽनुगतः ॥ दान प्रविष्टा अ ०० मो० धे० प्रत्याम्नायीभूत अमुक म्य दान पर्मणः दान प्रतिष्ठा प्रमुफ द्रव्य ममुक देयतं इत्यादि । -- वरसत् पूर्व [ १७६ ] तिल दान विधिः ।। काँश पात्र कृष्ण तिल सुवर्ण सहित संकल्प्यं ॥ मम जन्म प्रभूति मरणान्तं कृत नाना विधपाप नाश नार्थं सहिरण्यं तिल पात्र' सोम दैवतम् अमुक गोत्राय अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय सूपूजि- साय तुभ्य मह अंप्रददे । विलाः पुण्याः पवित्राश्च तिलाः स्वर्गकाराः स्मृताः ॥ शुक्ला वायदिवा कृष्णा ऋपिगोत्र समुद्भवाः ॥ यानि कानि चपापानि ब्रह्म हत्या समानिध ॥ तिल पात्र प्रदानेन तानि नाश्यतु सर्वदा महर्षि गोत्र संभूताः कश्यपस्य तिलाः स्मृताः ॥ तस्मात्ते पां प्रदा- नेन मम पापं व्यपोहतु ॥ इति कुश जलान्दत्वा ।। दान प्रतिष्ठा-प्रद्य कृतैतत् सहिरण्य तिलक पात्र दानं प्रतिष्ठा सिद्धयर्थ दत्तिणां हिरण्यम् अग्निदेवतं । तन्मूल्योप कल्पितं द्रभ्यम् अमुक दैवतं ] यथा नाम गोत्राय इत्यादि। उत्क्रान्ति धेनु मम मुखेन प्रणोत्क्रमणार्थ श्री नारायण प्रीतये इमांउत् फ्रान्ति धेनु रुद्रदेवत्यां वित्प्रत्याम्नानी भूतंरजतं चंन्द्र देवत ताम्रखंड श्री सूर्य दैवत ] यथा नाम गोत्राय यथा नाम शर्मणे ब्राह्मणाय तुम्यमहसंप्रद प्रार्थनामृत्यूक्रान्तीप्रवृत्तत्य दुःखोत्क्रांतिनिवृत्तयोः तुभ्यं सप्रदेनाम्नां गांसमुत्क ति संज्ञिकाम् ॥ दान प्रतिष्ठा अद्यकृतेतत् उत्क्रान्तिधेनुप्रत्या- म्नायीभूत अमुक द्रव्य दान कमर्णः दानप्रतिष्ठार्थ अमुक द्रव्यं अमुक दैवतं इत्यादि। दशदान संकल्पः मम श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्यर्थ श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ गो- भू-तिल-हिरण्य-आज्य-वास-धान्य-गुडरौप्य लवण प्रत्यान्नायी . भूतानि इमानि रौप्य मण्डानि नाना नाम गोत्रोभ्यो नाना नाम शर्मभ्यो ब्रह्म- णेभ्यः संप्रदे दान प्रतिष्ठा अद्यकृतैतन् दश दान कृतप्रत्याम्नायी भूत कर्मणः प्रतिष्ठा सांगता सिद्धयर्थ यथोक्त प्रलप्राप्तये श्री नारायणप्रीतये इमानि रमत खण्डानि चन्द्र देवतानि गोभूइत्यादि दशदान प्रत्याम्ना यद्रव्य दान प्रतिष्ठात्वेन अहसंप्रदर्द ।। कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्य जानता, मृत्युकालवश प्राप्तं नरं पंचत्व मागवम् ॥ १ ॥ धर्माधर्म समायुक्त लोभमोह समावृत्तम् ॥ दईय सर्व गोत्राणि दिल्याँल्लोकात्सगच्छतु ।

[ १८ ] अध वृहद्गोदानविधिः सर्वाधनाशनं पुण्यं सर्वकामार्थसिद्धिदम् । स्वर्गापवर्गई चाय वक्ष्ये गोदानगहरम् ।। १ ॥ अयने विपुर्व याते वैधृती सूर्यसङ क्रमे । क्षीणेन्दो पौर्णमास्यां वा द्वादश्यां राहुपर्वणि ।। २ ।। मन्वादौ च युगादौ च जन्मर्ने पुत्रजन्मानि । यात्राकाले महोत्पाते दुःखप्नेऽद्भुतदर्शने ॥ ३ ॥ व्रते यागे प्रतिष्ठासु गावो या शिवाधिना । वीर्थे देवालये गोठे सङ्गमे यज्ञमण्डपे ॥ ४ ॥ शालमामशिलाये च शिवलिङ्गस्य सनिधी। इत्यादिशुभदेशेषु स्वगृदे वा पयविनोम् ॥ ५ ॥ दधादास्तिकयुद्धधा वां सहेमा द्विजपुनवे। कुलीनाय सुशीलाय वेदवेदाङ्गवादिने ॥ ६ ॥ सतायाप्रमत्ताय दान्ताय कुशवृत्तये । क्रोधहिंसाविहीनाप सदा सन्तोपजीविने ॥ ७ ॥ पितृमातगुरूणां व भताय प्रिययादिने । अनिंद्यदेशजाताय सांगाय व्रतचारिणे ॥ २ ॥ जपस्वाध्यायनिष्ठाय तथा सत्यपराय च। परवारनिवृत्ताय वहिसे वारताय च ॥६॥ सर्वदानानि देयानि विष्णुवत्त विचिन्तयेत् । अपराबाधमक्लेश स्वयलेनाजितं धनम् ॥ स्वल्पं वा विपुलं वापि देयमित्यमिधीयते ।। १०॥ तर दाता सुस्नात. गोदानसामापी स्वामतः संपाद्य सुलिप्ताया भूमी सपनीका स्वासने उपदिश्य यथोक्तलक्षणां सवत्सां गा प्राड मुवी. मवस्थाप्य अदक मुख ब्राह्मण संस्थाप्य गणेशं नत्वा स्वामतः गन्धा- दिना अर्घ सस्थाप्य कुशतिलजलयवान्यादाय सङ्कल्पं कुर्यात् ॥ विष्णुः ३ अधेद अमुकगोनोऽमुगशिरमुकशर्मा सपत्नीकोऽहम् श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफनावाप्तये सकलमनोरथसिद्धये च कृततद श्रीयज्ञ- पुरणप्रीतये गोदान करिष्ये तत्प्रतिप्रहार्थ प्राणस्य पूजनपूर्वक वर. शरिध्ये उपक गुर्व ग्राम अयादिभिः सम्पूज्य पावसामग्री को पता, पमिगन्याइतपुष्पमानायझोपवीतामाफलादिभिः गोदानप्रतिमहाय अमुक गोत्रममुकवाभ्यायियनममुकार्मार्थ ब्राह्मण त्वामहं यूणे । धृतोऽस्मीवि [ १८१ ] ब्राह्मणो वदेत् ।। ततः पुष्पमालादिभित्राह्मणं चालंकृत्य तत्र मंत्राः ॐ या आहरदिति भरद्वाज ऋषिरनुष्टुप्छन्दः सुमनसो देवता पुष्पमाला- ग्रहणे विनियोगाः ॥ ॐ या अहरज्जमदग्निः श्रद्धायै कामयेन्द्रियाय अहं प्रतिगृह्णामि यशसा च भगेन च ।। ॐ यद्यशोप्सरसमिाते भार- द्वाज ऋपिरनुष्टुप्छन्दः सुमनसो देवता पुष्पमालावन्धने विनियोगः । ॐ यद्यशोप्मरसामिन्द्रश्चकार विपुलं पृथु तेन संप्रथिताः सुमनसाः आवध्नामि यशो मयि । ततो ब्राह्मणं प्रार्थयेत् । यदर्चनं कृतं विप्र तव विष्णुस्वरूपिणः ।। तत्सर्वं मम दीनस्य विष्णवेऽस्तु समर्पणम् । ततः स्वपुरतः पाङ मुखों गां सवत्सामवस्थाप्य तदुत्तरतो न्यस्य पूजयेत् ॥ तत्र सकल्पः ॥ ॐ विष्णुः ३ अद्येहेत्यादि अमुक गोत्रोऽमु राशिरमुकशर्माहं गोदानपूर्वाङ्गत्वेन सवत्सायाः गोः यथामि. लितोप चारैः पूजनं करिष्ये । आवाहनम् । श्रावाहयाम्यहं देवो गां वां त्रैलोक्यमातरम् ॥ यस्याः स्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १ ॥ त्वं देवी वं जगन्माना त्वमेवासि वसुन्धरा । गायत्री त्व च सावित्री गगा त्वं च सरस्वती ॥ २ ॥ तृणानि भक्ष्यसे नित्यममृथं सबसे प्रभो ॥ भूतप्रेतपिशाचॉश्च पितृदेवतमानुपान् । सर्वांस्तारयसे देवि नरकात्पापसंकटान् । इत्यावाह्य पूजयेत् ॥ सर्व देव० इत्यादी सवत्साये गये नमः पार्थ स्नानं समर्पयामि । पुष्पं गृहीत्वा ।। नमो विश्वमूर्तिभ्यः विश्वमातृभ्य एव च । लोकाधिवासिनोभ्यश्च रोहिणीभ्यो नमो नमः || गोः अग्रपादाभ्यां नमः ॥ गोः पश्चात्पा- दाम्यां नमः ॥ देहस्था या च रुद्राणां शङ्करस्य सदा प्रिया । धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु, ।। गोरास्याय नमः॥ विष्णोक्षसि या देवी स्वाहा या च विभावसोः । चन्द्रार्कशक- शक्तिर्या सा धेनुर्वरदास्तुमे ॥ गोः शृङ्गाभ्यां नमः गोः कर्णाभ्यां नमः । चतुर्मुखस्य या लक्ष्मीर्यालक्ष्मीर्घनदस्यच लक्ष्मीर्या लोकापालानां: साधेनुर्वरदास्तु मे ॥ गोः पठाय नमः । स्वधात्व पितृमुख्यानां स्वाहा यज्ञभुजां तथा । सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्ति प्रयच्छ मे॥ गोः पुच्छाय नमः ।। वस्त्रम् ।। आच्छादनं मया दत्रं सम्यक् शुद्ध सुनिर्मल । सुरभिवंत्रदानेन प्रीयतां परमेश्वरि ॥ गन्धम् ॥ सर्वदेव- प्रियन्देवि चन्दनं कुङ्कुमान्वितम् ॥ कपूरादिसमायुक्त गोगन्धः प्रविगृह्यतामः ॥ अज्ञवाः ॥ अक्षता अतिशुभ्राश्च कुंकुमालाः मुशो. भनाः । मयानोता दियार्थ सन् गृहाण त्वं गवेश्वरि ॥ पुष्पाणि पुष्पमाला ॥ धूपम् ॥ आनन्दकृत् सर्वलोके देवानाञ्च सदा नित्ये . ( १२ प्रिये । गौस्त्वं पाहि जगन्माता धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ दीपम् ।। साज्यं सदसिंयुक्त यहिना ‘योजितं मया । दीपं गृहाण देवेशि सर्व तस्तिमिरापहम् ॥ गोग्रासः ॥ सुरमिस्त्वं जगन्माता, विष्णुपदे स्थिता ॥ गोमासं च मया दत्तं नैवेद्यं प्रतिगृहयताम् ॥ भूपणार्थे द्रव्यम् ॥ घण्टा चामरब्ध समर्ष ॥ (क) ततो गोदेह- तीर्थानू पूजयेत् ॥ अवविवारं प्र० गन्धाक्षतपुष्पैः-- शृङ्गमूले ब्रह्मविष्णुभ्यां नमः । शृंगाने सर्वती- थेभ्यो नमः । शिरोमध्ये महादेवाय नमः । लालटेगौर्यै नमः । नासरन्ध्र परमुखाय नमः । नासापुटयोः कम्बलाश्वतराभ्यां नमः । दन्तेषु वायवे नमः । जिहवायां वरुणाय नमः । हूँ कारे सरस्वत्यै नमः । गण्डयो: मासपक्षाभ्यां नमः । श्रोष्ठयोः सन्ध्याद्वयाभ्यां नमः । ग्रीवायां रक्षोभ्यो नमः । कुक्षी साध्येभ्यो नमः । जंघासु धर्माय नमः । खुरमध्ये गन्धर्वेभ्यो नमः । सुरापे कुलपर्वतेभ्यो नमः । खुरपश्चिमाप्रेषु अप्सरोगणेभ्यो नमः ! पृष्टै एकादश रुद्रेभ्यो नमः । सर्वसन्धिा वसुम्यो नमः श्रोण्योः पितृगणेभ्यो नमः । पुच्छे सोमाय नमः । पुच्छकेशेषु सूर्य्यरश्मिन्यो नमः । गोमूत्रे गद्गायै नमः गोमये यमुनायै नमः। धीरे सरस्वत्यै नमः। दग्नि नर्मदायै नम । घृते वहये नमः । रोमसु कोटिदेवेभ्यो नमः । उदरे पृथिव्यै नम । स्तनेषु चतु सागरेन्यो नमः। एते यस्याः स्तनो देवा सा धेनुर्वरदा मम । स्वर्गाश्रृंगी रौप्यखुयं साम्रष्टा मुक्ताफलसमर्पितलांगूलती कास्यगोदोहनिको विधाय प्रार्थयेत् ।। नमो गोम्यः श्रीमतीम्यः सौरभेवीभ्य एव च। नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नमः । ततः सकुशामतत्रय गोपुच्छ गृहीत्वा ॥ प्राड- मुस्त्री यजमानो देवतीर्थेन देवांस्तर्पयेत् । ॐ या नन्दिनी सुशीलाद्याः कामदाश्चैव धेन्वः । ताः सर्वाः पुच्छतो येन तपितास्तर्पयन्तु माम् ।। ब्रह्मा विष्णुर्महादेवः कार्तिकेयो गणाधिपः। पुष्पचापो महेन्द्रश्च भा. वानध्युतामजः ॥ देवाः समस्ताः सगणाः सवाइन परिच्छदाः। वस. वोऽटी द्वादशा द्रा एकादशैव तु ॥ विश्वेदेवाश्च साध्याश्चाप्टी मरुतो मातरस्तथा । गन्धर्वा गुह्यकाश्चैव सागराः मरितस्तथा ॥ यज्ञसा यस्यानाः पूतनाः पर्वता द्रुमाः। वार्थायन्यासरसश्चैव पशवः पन्नगा:' सः ऋचाणि राशयो योगा मासवर्षतुवासरा । अयने च युगाः कल्पाः तथा मन्वन्तराणि च ।। भुवनानि दिशौकारच तथा सर्वेन्द्रियाणि च । ॐ कारश्येय गायत्री छान्यंगानि चैव हि ॥ वदाश्च स्मृतयश्चैव पुरा [] अत्र दिनारं प्रदचिणीकार्या।

[ १८३ ] णानि तथैव च । आयुर्वेदो धनुर्वेदो गन्धर्वो मन्त्रगहरः ।। ओषभ्यो वनसं भूता ग्राम्याश्चर सुपिप्पलाः । सानुगा देवताश्चैव मुनयः सगणास्तया ।। ऋषयः ऋपिपल्यश्च सिद्धाश्च सगणास्तथा ।। प्रजा प्रजापतिश्चैव येऽन्ये विघ्नविनायकाः ॥ विद्याधरारच दैत्याश्च आचा- गुरवस्तथा । डाकिन्यः क्षेत्रपालास्च भैरवाश्चाष्टसंख्यकाः ॥ स्थावरा जंगमारचैव भूतमामश्चतुर्विधः । अक्षयेनामृतेनैव मंगलेन सुवारिणा ॥ गोपुच्छाम्र च्युतेनेह महत्तैन हितेऽखिलाः। शाश्वती तृप्तिमायान्तु दीर्थयुक्तवरप्रदाः सूर्य: सोमा कुलः सौम्यो गुरुः शुक्रः शनैश्चरः । प्रहारच तृप्तिमायान्तु राहुकेतुसमन्विताः ॥ इन्द्री वहिर्यमा रक्षः पाशी वायुर्धनाधिपः । ईशोs- नन्तस्तथा ब्रह्मा स ते तर्पिता मया ।। सावित्र्या सह लोकेशः सलक्ष्मी करचतुर्भुजः। महेशश्चोभया सार्द्ध तृप्तिमायान्तु शाश्वतीम् ॥ अविव. शिप्टो भृगुगौतमी च मरीचिदक्षो पुलहः पुलस्त्यः। प्राचेतसः काश्यपवि. श्वमित्री भरद्वाजसंज्ञो यदमग्निरेव ॥ अन्ये च सर्वे मुनिपुगवाश्च गृह्णन्तु दत्त जलमद्य तुष्टाः। जीवरिपतृकस्य तर्पणे निधोऽतस्तेन तन्न कार्यम् ॥ ततो यज्ञोपवीवं काठावरोहणं कृत्वा साक्षतकुरीः मनुष्य तीर्थेन मनुध्यास्तर्पयेत् ।। सनकः सनन्दनस्चैव सनातनस्तथैव च । कपिल- स्वासुरिश्चैव वोदुः परचशिखस्तथा । ते तृप्तिमखिलायान्तु गोपुच्छोदक तपणे ॥ ततोऽपसव्यं विधाय । द्विगुणि तकुशतिलजलैः पितृ तर्पयेत् कन्यवाडननः सोमो यमश्चैवार्यमा क्या। अग्निप्वात्ताः मोमपाश्च तथा वहिपदरचये .॥ तर्पितास्तृप्तिमायान्तु गोपुच्छोदकपणे । यमाय धर्मराजाय मृत्यये घान्तकाय च ॥ वैवस्वताय कालाय सर्पभूततयाय प। श्रीदुश्यराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने ॥ वृकोद- राय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः। पिता पितामहस्चैव तथैव प्रपितामहः॥ मातापितामही पैवतथैव प्रवितामही । मावामहःप्रमातामही दममाता मह- स्तथा। मातामही प्रमातामही युद्धप्रमातामहो क्या अश्यां तृप्तिमायान्तु गो. पुच्छोदस्तपणे। ये मना वै पिनव्यारच मातुलाः स्वशुरास्वथा । आचार्य- गुरुमिगाद्या गृपन्त्येतं जल मुदा । ये पसन्बन्धिनोऽमुना पहिदाह विव- जिताः । अपमृत्युमृता येचते गृह एन्तशुभ जनमत शेमठायेच मान यंशेष येमनाः । गुरुरवगुरवधूनां ये चान्ये बांधया स्मृताः ॥ येमे कुले लुप्तपिंदा मियालोपगवारचय । विरूपा भामगाश्चमाता माताः कुल मन ॥ ते म नप्तिमायान्तु गोपुच्छोद मतपणेः ॥ इत्यं वपणं विधाय सम्येनापम्य ॥ गम् मुम्यो गान उदामुसो विप्रः पुष्यदेशे स्वयं स्थित्या मान्य पा मलि कनम्न (मन) भन्धितं (युफ) प्रगृश गोपुर बता निधाय दानसंकल्प फुर्याम् ॥ॐ विष्णु: ३ पलादि उपाय [ १८४ ] अनुरनामसंवत्सरे अमुकारने अमुकत्ता अमुग्माने अमुक्पने अमुक वासरे अमुकवियो अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते बन्ने अमुकराशि- स्थिते सूर्ये अमुरास्थिते देवगुरी शपेषु प्रहपु यथायथ राशिस्थान स्थितेषु सत्सु एवंगुणविशेपेण विशिष्टाया शुभपुण्यतिथी ममात्मन बुनिस्मृति पुराणातफलप्राप्त्यर्थ मम ऐश्वर्यामिद्धयर्थम, सक्लमनईप्सित कामनाससिद्धयर्थम, लोके वा सभाया राजद्वारे वा सर्वत्र यशोविजय लाभादिप्राप्त्यर्पम, ह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकलदुरितोपशमनाथ, तथा मम सभार्यस्य सपुत्रस्य सवान्यवाय अग्मिलकुटुम्बसहितस्य सपशो समस्वभयञ्याधितरापीडा मृत्युपरिहार द्वारा आयुराग्यैश्वर्या भिवृद्धयर्थम तथा मम मराशेरखिल कुटुम्बस्य वा जन्मराशे सकाशाद्ये केचिद्विन्द्व चतुर्याप्तम द्वादशस्थान स्थित फरपहात सूचित सूचयिष्यमाणकन यसवारिष्ट नविनाशद्वारा एकादश स्थान स्थित बच्छुभफल प्राप्यर्थम, श्रादित्याग्निवग्रहानुभूलवासिद्धयर्थम् तथा इन्द्रादिदशदिक्तालप्रसन्नता सिद्धयर्थम, आधिदैविर-प्राधिभौतिक-आध्यात्मिकत्रिविधतापोपशम नार्थन, बर्मार्थकाममोक्ष फलावाप्त्यर्थमच यथोक्षफनावाप्तये अमुकोजाय अमुकदाध्यायिनेऽमुकशमणे ब्राह्मणाय तुभ्यमह सप्रददे । दानवाक्यम् । यज्ञसावनभूता या विश्वस्यापविनाशिनी। विश्लरूपधरो देव प्रीयता मनया गवा कपिले सव देवाना पूजनीया शिरोहिणी । वीर्य देव मयादत्ता वसम्माच्छान्ति प्रियच्छमे। इम्युच्चाप्यं सकुशगोपुच्छ विप्रहस्ते दद्यात विप्रोऽपि ।। ॐ द्योत्या ददातु पृथ्वी त्या प्रतिगृहणातु ।। ॐ देवस्य या सचिनु प्रसगरिवनोबाहुम्याम पूष्णो हस्ताभ्याम् । ॐ कोदात् कमाऽ श्रदान् कामोदात् कामा दावा काम प्रतिगृहीता कानव ॥ स्वतीति वंदन।। दामप्रतिष्ठा साल्प ।। ॐ विष्णु ३ अोहेत्यादि अमुकगोनोऽमुकरा शिमुझशामाऽद वैठद्गोदानाविष्टासियम् इद मुवर्णयमिदैवत यथा पििमनमाज्यासहित मालपायदाम्ये ॐ तत्सत् ॥इति दद्यात् । प्रान पुचादानाभिषेक पुण्यात् ॥ ॐ शान्ति ॐ यो शानिरस्तरिक्ष शान्ति प्रबिधीशान्तिाप शान्तिरोषधय शान्तिवनस्पतय शfast पदवा शानिमा शान्ति सर्व शान्ति शातिरेव शान्ति सामा शानिरपि ॥ ॐ पियानि दये सवितर्दुरितानि परामुष याद नन्नमामु॥ यस मापनामा पागोतक्रिपा'', पून आपला यावि मपा दे दनन्युम् ।। अध्यायनम ।

[ १८५ ] इत्यभिपेकं कृत्वा, मन्त्राशिपं च दद्यात् ।। ततो यजमानः प्राणेन समन्विना गां त्रिःप्रदक्षिणीकृत्य ॥ प्रदक्षिणामन्त्रो ॥ नमो.गोभ्यः श्रीम- वीभ्यः सौरभेयोन्य एव च । नमो ब्रह्मसुताभ्यरच पवित्राभ्यो नमो नमः ।। यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ! तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ।। ततो दक्षिण भूयसी च दद्यात् । ॐ विष्णुः ३ अोह अमुकगोत्रोऽमुकराशिरमुकशहि गोदानकम्मरणः सामफल- वाप्तये सादगुण्यार्थं च इमां दक्षिणां ब्राह्यणाय तुभ्यमह सम्प्रददे तथा भूयसी दक्षिणाम् अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये ॐ तत्सन । तथा ययोपपन्नेनान्नेन ब्राह्मणांश्च भोजयिष्ये ।। (क) ततो ब्राह्मण प्राशिफं दद्यात् मन्त्रपाठः ॥ ॐ गोमो धेनु सोमो ऽअर्वन्तमाशु सोमोवेरकर्मण्यन्ददाति ।। सादन्यं विदस्थ्य सभेयम्पितृश्श्रवणं यो ददाश दरने ॥ १ ॥ ब्राह्मण- युक्तमा निःप्रदक्षिणीकृत्य गोमतों पठित्वा ततो गोदान प्रतिष्ठाभूयसीस कल्पं कुर्यात् । गोमती अमे द्रष्टच्या । गोदाने विशेषः त्रिकं मातामहाद्यं च मातामयादि त्रयम् । ते घ तान्य दत्तं मे स्वीकुर्वन्तु जलं मुदा ॥ १ ॥ गोत्रे मदीये विमुता मृता ये गोत्रे च मातुर्मम ये विपन्नाः । गर्भच्युताः श्राद्धविवर्जितारच तेभ्यः स्वाधानेन जलेन इत्या ॥२॥ भृग्वग्निवनादिजलादिशस्त्रविपाणदन्ते खरे - जङ्गः । पञ्चत्वभाव विगताश्च ये च तेभ्यः प्रदत्तं शिवमरनु तोयम् ॥३॥ ये गैरवादी नरके निमग्नाः क्रियाविलुप्ताश्च कृतपकाराः । जन्मान्तरे ये मार दासभूनास्तेऽयक्षयां तृप्तिमिहामन] ॥ ४ ॥ये वधिमा अगाया येऽन्यजन्मनि चान्यगाः । ते राय धिमायान्नु गोस्टोरदृष्टवारिमिः ॥५॥ धेनुपुच्छे करं वा तपंणं प फराति यः । प्रात्नान तारये द्वषो दशप्पान देशापयन् ॥ ६ ॥ सन्तप्तिा मया ये गांपुन्छौदस्तपणे । प्रायुगतिपतुष्टि मेधां शाप सन्तः विम् ॥ ७॥ भरोग्य परमान पमन्तुष्टाममं ।। गोमती पटंग-गार. मुरमरी नित्यं गारो गुग्गुलन्धिा. गायः पनिटा भूतानां गायः सम्ययनं मान् ॥ १॥ पारनं मयंभूनानां () वसा पिसा दावाद मा प्रनतार नमः जिमि मरेत् ।

च [ १८६ । चरित रहन्ति हरिया मन्त्रपूतेन तर्पयन्त्यमरा-िदिति ॥ - ॥ सपोयामग्निहोत्रणा गावी होमे प्रशिक्षिता । पामेव भूताना गार शरणगुत्तम् ॥ ३ गार स्वर्गस्य सोपान गानो चन्या सवाहना । गार पवित्र परमगावो मगलमुत्तम् ॥४॥ नमो गोम्य श्रीमतीभ्य सौरमेयीभ्य एव च । नमो नझसुवा भ्यश्च पवित्राभ्यो नमो नम || ५ । ब्राह्मणाश्चैव गावरच कुलमेक द्विधा कृतम् । एकत्रमवास्तिष्ठन्ति ॥ ६ ॥ गानो मामुपतिष्टन्तु हेमश्रृङ्गय पयोमुच । सुरभ्य सौरभेग्यश्च सरित सागरास्तथा ॥ ७ ॥ गाव पश्याम्यह नित्य गार पश्य तु मा सदा । गावोऽस्माक वय तामा यवो गावस्ततो वयम् ॥घृतक्षीरश्रदा गागा घृतयोन्योधृतोद्वा । घृतन्यो धु तापास्ता में सन्नुमदा गहे।। गागरी ममामवसन्तु गापोमे सन्तुप्रति । गायोमामुपतिप्टन्तु गवा मध्ये वसाम्यहम् ।।१०।। एव रात्री दिवा राति समेषु विपमेषु च । भयेपुच नरो नित्य कीर्तयन्मुच्यते भवात् ।।१।।इत्या यम्च पन्भात सायं वा पुरुपन्तया । वाग्या कुरुते पाप वद्राय प्रतिम क्ष्यते । यदहा कुरुते पात तदहा प्रतिमुन्यते ।। १२ ।। अथ ग्रह्मयज्ञ प्रयोग। (सूर्यापस्थाना नन्तर प्राज्ञिणी कृत्य नमस्कृत्योपविशत् । दर्भयू पविश्य दर्भपाणिभूला स्वाध्याय च यथा शक्तया दावारभ्यबदम् ) नाचम्य प्रागानायम्य ॥ कुशपवित्र धारणम् ~ॐ पवित्यो वैष्णथ्यो सरितु' प्रासा उत्युनाम्मलिद्रेण पवित्रण सूपस्य राश्मिभि । तस्य ने पवित्रपते पवित्र पूतस्य काम पुन तोयम् ।।१।। सकृल्प-प्रद्य पूर्वाधारित ए गुण विशेपण विशिष्टाया शुभ पुण्य तिथी ममात्मन श्रुति स्मृति पुराणो फल प्राप्य ॐ तत्सत् परमेश्वर प्रीत्यर्थ यथाशक्ति प्रक्षयज्ञ नाह यक्ष्ये । श्रयान1 ब्रह्मयज्ञ चारया स्याम ~द्विनीय सङ्कल्प - इपेवादिप मन्त्रषु स ममातेपु दश प्रणव सहितपुमा क्रिया च्यिा स्तन निशा तृपि प्रजापति दाता। साथि सि सणि सामानि प्रतिलिकाता। प्रक्ष यज्ञ चिनियाग । अझ पारम्भ ययारिधिस्नाा छन्द पुरुषऽशरीर त्यसन् । तिर्यवि. सय यमदुध छन्द पुरषस्य च ।। न्यासा:-ॐ गौतम भरता भाम्या नम नेत्रया । ॐ विश्वामित्र अमदग्निभ्या नम नामिप्यो । प्राये म पारि। ॐगायचाग्निभ्या नम शिरसि ( ॐ इदियरस [ १८७ ) वितृभ्यांनमः ग्रीवायाम् ॐ बृहती वृहतिभ्यां नमः-अनुके। (हनौ)॥ ॐ बृहद्रधन्तरद्यारा पृथिवीभ्यां नमः-बाह्वोः। ॐ त्रिष्टुंविन्द्राभ्यां नमः- नाभी । ॐ जगत्पादित्याभ्यां नमः-श्रोएयोः। ॐ अतिच्छन्दा प्रजा- पतिभ्यांनन:-'लङ्ग।ॐ यज्ञा याज्ञे वैश्वानाभ्यां नमः-- -गुदे । ॐ अनुष्ठ विश्वेभ्यो देवेभ्यो नन.-ऊवोंः। ॐ पङ्किवरुद्योतमः जान्योः। ॐद्विपदा- विष्णुभ्यां नमः पादयोः। ॐ विछन्दा वायुभ्यां नमः । नासापुटस्थ प्रणेषु । ॐ न्यूनाक्षरा छन्दोभ्यो नमः-सर्वाङ्गपु ॥ एव मेवाचानि- योजयिस्वा वेदमयः सम्पद्यते । [न कुत्ताश्चिद्भयं विन्दते । शापा नुग्रह सामयं ब्राह्म तेजश्च वर्द्धते । स्वर्ग लोकं पर साधनम् । धर्मार्थ काम मोक्षस्य च । तस्य दारिद्र दुःख शोक रोगभयं नभवति । ऋपि देवता छन्दा ५ सिघिदित्वाः ऋग्मयो यजुर्मयः साममयोऽथर्यमयोऽमृतमयो विश्णु रिदं कात्यायनस्य च ॥ ॐ भून्भुवस्व तत्स वितु० ॥२॥ ॐ इपेत्त्यो वायवस्व देवो वः सविता प्राप्यतु श्रेष्ठ तमाय कर्मणाप्यायद्धमन्याइन्द्राय भागम्प्रजा वतीर नमीवाऽअयक्षमा मा वस्तेनऽईशत् माद्यशं । सो धुवा ऽआरम्मिन्नोपवौ स्यात बहोर्यज्ञ- मानस्य पशूनपाहि ।। ३ ॥ वसोऽपवित्रम् ।। हिरण्मयेन पात्रेण सत्त्यस्या- ऽपिहिनम्मुखम् । पोसावादित्त्ये पुरुषऽसो सावहम् ॥ ॐ ३म् । खम्ब्रह्म । तमुपै ख्यमन्तरेणा हवनीयच गाई पत्यज प्राष्टिनप- उप स्पृशति तयदर उपत्यशत्य मध्यो वै पुरुषो यद् ऋतम्बदति तेन पूवि रन्तरतो मध्यावाऽआपो मेध्यों भूत्वा व्रत मुपायानीति पवित्रम् चाऽप्रापऽपवित्र पूतो प्रत मुपायनोति तस्माताऽप्रपउअस्पृशति ।।१।। सोग्नि मेवा भीतमाणो प्रत मुपैति ।[ॐ पूर्ण मदऽपूर्णमिदं पूर्णा- त्पूर्ण मुदुच्यते । पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्ण, मेवा वशिष्यते । ॐ खं. ब्रह्मा । ॐ खं पुराणम् ॐ वायुरेव स मिति स्माह कौर न्यायणी पुत्रो वेदय पाह्मण विदुर्वेदेन न यदितव्यम् ] | ॐ प्राश्नी पुत्रादा. सुरि बासिनःऽप्राश्नी पुत्रऽासुरायण दासुरायणऽआसुररोसुरि वशिव- ल्याद्याज्ञवल्क्य उहालकाऽदुद्दालकोऽमणादरुपऽडावेशे शिः कुत्रे कुभिनाज श्रासो वाजभवानिहारतो वाभ्योगाग्जिावान् वायोगोऽसि. गहापंगणासितो वार्प गयो हरि गत् कश्यपावरिवःऽशिलगत्यप [1] एते मन्त्राः स्वर पूर्वकं पटनीया इति केशाबिन् मत्ते। परं च हलायुधः एवंमति प्रारमुखः प्रागप्रेर कुरो परिश्य पाम (स्त जले कुश पत्रिदोदो ] कृत्वा वसरिदविण दस्त यो नुवं हत्या ॐ पूर्विका गायत्री तथा चतुरो वेदादीन् पठेत् ॥ [२] सउदोसिएन् । - { १८८1 च्छिप करया कश्यपान ध्रुवे ऽकश्यपोने युरियायो नागम्भिण्डया ऽअम्भिण्डगा दित्या दादित्या नामानि शुक्लीनि यनू । पि वानसने यम याज्ञवल्क्य ना रसायन्ते ॥ ॥ ( इत्युक्त हरण्यो पनि पदि] ॥ॐ अग्नि माले पुराति यत्रस्य दावनम् । होतार एन धात मम् ॥ ॐ अग्नऽआयाहि वातये गृणानो हव्य दातये। निहोता सस पहिय ॥ २ ॥ ॐ शन्नो दोर भिष्टयऽ आपोभवन्तु पातयं ।। पारभिन्तुन 5॥६॥ रतुदानम्तर अङ्गानि पठेन अथानुवाकान्व पयामि । मरइन दक्षिण महि हृदयम् । अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामि, भातो ऽधिकार फन गुनानि कमणि । अथातो गृथालीपाकाना कमद्धिरा देच। समाम्नाय सनाम्नात मय रसतभननग संमिनम् । फच सम्बन् सर. मये युगायनम् । गोगमा अपाती धर्म विज्ञासा. श्रमाती नहा विज्ञामा बागीवर यावरस्य । नारायण नमस्कृत्यइति । विद्यातपो यानि यानिविगुराडित । साम्यवं नास्तिो देर श्रीयता मे जनाइन । (वन रक्षयाय पारयोगद्दीत उशाना कुश पवित्रस्य न उत्तरस्या पाग कुर्यात) अगम्-~-प्रनेननमा यज्ञाख्येत कर्मणा श्री भगवान परमे सर प्रायता न मम ॥ ॐ समापण मस्तु ॥ यस्यस्मृत्याः इति नम यक्ष प्ररोग ।। शुभम् भगत ।। यथावणी प्रयोगः ॥ श्रय पावणी प्रयोग [तन धारणस्य पूणिमादिकाले प्राव स्नान सन्ध्यादि नित्यकर्म विवाय गुरु शिवगणे सह प्रामादि प्राच्यामुदीच्या वानद्योदि रम्य जलाशय गत्यात्तीरे शुभ्रा यया देश सम्भवा या मृहमा गोमय भस्म कुशान् तिलाचतान मुर- भाषि पुष्पाणि सागपामाग यसोपवीतादि सा नावणी सामना मम्पाटा पिस्थापनापीठ (श्वेत वस्वरम्भापत्र या) पूतनागम्म पुरादि सम्मार च मा मुल्लेपन के प्रक्षालित हस्त पाद प्रान मुग्ध उदा गुग्गा पा सपवित्र करो गुरु नपच्ची पारियु गिय महानन्य प्राणा नायम्य देशकालीसहोल मौं मह सहल यान् ॥ यथा - सहर ~अधीनानामध्यप्यमाणाना शाशय ना पापनबिन्द कोश धापान्तरि ति दुस सो मारिन पणा नामाना गती पतयिापितोशारित बयाना () अपमाला (२) वामवदान. (1) प्रथा यसरपन् ।

। १६ . श्लिष्या सष्ट वर्णविघट्टनादिभिः पठितानां श्रुतीनां यद्यातयामत्वं तत्परि हागर्थ अप्टत्रिशदनध्याया ध्ययनेरथ्यारञ्चरतः शूद्रस्य शृ. चतोऽध्ययनेम्लेच्छान्य जादेः शृण्वतोऽध्ययने अशुचिद्देशेऽध्ययने प्रात्मनोऽशुचित्त्वेऽध्ययने अक्षरस्वरांनुस्वार पदच्छेद करिडका व्यक जनहस्य दीयंप्लुन कण्ठ तालु मूर्धन्यो ठय दन्त्य नासिका नुनासिक रेफ जिह्वामूलीयो पद्मा नीयो दातानुदात्त स्वरितादीनां ये नोचरे माधुर्याक्षर व्यक्ति हीनत्वाधनेक प्रत्य वाय परि हार * सर्वस्य वेदस्य स वीर्यत्वसम्पादन द्वारा यथावत्फलप्रा- प्त्यर्थं श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं सशिष्योऽहं शुक्लयजुर्वेदोत्सर्गोपा करणं करिष्ये इति सङ्कल्प्य, गुरुः शिष्यैः सह उभाकवीत्युः पठेत् ।। तथा-ॐ उभाक वीयुवा नो धर्मः पारतत् । परिसन्यानि धमिलो विसरठयानिविसृजामहे ॥ इतिमन्त्रं पठित्वा यथा क्रमेण सर्वे गुरो रभिवादनं कुयु: । ( पुनश्चदेशकाली स्मृत्वा सङ्कल्ययेद्यथा ) सङ्कारः-अध्यायोमर्ग कर्म निमिचं गए लानं महं करिष्ये। पुनश्न इत्यादि ॐ खंब्रह्मान्तेयु याः क्रिया स्वविवस्वान पिः सर्वाणिवुजु विसर्वाणि छन्दा, सि प्रजापतिलिङ्गोक्ता देवता स्नानादि सर्व कर्मसु विनि योगः इत्युक्त्या' स्नाना नुनां प्रार्थयेन् । यथा-नमोऽस्तु. देव देवाय शिति कण्ठाय वेधसे । रुद्राय चाप हस्ताय दण्डिने पक्रिणे नमः। सरस्वती च गायत्री वेदमावा गरी यसी। सन्निधात्री भव त्यं च सर्वपा प्रणाशिनी ॥ यद्वा सागर निघोंप दण्ड हस्ता सुरान्तक । जगत्लष्टर्जगन्मित्र नमामि त्वांमु रान्तक । तीक्ष्ण दंष्ट्र महाकाय कल्पान्त दहनीपम | भैरवाय नमस्तुभ्यं मनुज्ञां दात्मासि ॥ नमामि गङ्ग वर पादप मुरा सुरवन्दितदिव्यरूपम् ॥ भुक्तिं च मुक्ति च ददासि नित्यंभाया नुसारेण सदा नराणाम् ॥ ( इम मन्त्रं समुचार्य तीर्थ स्नान समाचरेत् । अन्यथा तत्फल स्यार्य तीर्थज्ञोहरति ध्रुषम, उत्तिष्टन्तु महाभूता ये भूनानुमि वासिनः ॥ भूता नाम विरोधन स्नान कर्म समारभे ।। अपसपन्तु भूता ये भूता स्तीथंदूपाः । येभूता निम्न कार स्ते नरयन्तु शिवाज्ञया । पुष्का यानि वीर्थानि गगाया सरिवस्तथा; 'प्रागच्छन्नु परियाणि स्लान काले सदामम || अरामार्ग मिभिवे सिभि स्विभिः कुणैः पृथा पृथा गायत्री पठित्ता ब्रस प्रयि युक्ताः सप्तर्षयाः। ते मोठे नवं दरां पीतवासमा र वा प्रसार तास्मिन्प्रागगा उदगमा वास्थार नौपाः ।। अपा उड सो वो पविश्य [ १६० ] माधि पवि स्त्र च वीर्येषु वसतिस्ता । वरुणाय नमस्तुभ्य स्ला- नानुनाप्रपच्दमे ॥ अधिष्टाभ्यश्च वीर्णना तीर्थयुविचरन्ति वा । देतारता प्रयच्छन्तु स्नानाज्ञानम सदा ।। गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि मरस्वति । नरदेसिन्धु कावरि जलेस्मिन् सनिधिं कुरु ॥ सत' ॐ उरु हि राजा वाणा-बार० इतिमन्त्रणा तोयमभिम चयेत् ॥ शेष स्नाननिवि. प्रयाग वस्तब्य 11 तत धीत का ससी परिवाय दर्मा सनादौ प्राङ मुस भस्म गोपी चन्दनादि धृत्वा पवित्र पाणि राम्य माध्याह्न सन्ध्या कुर्यात् । तत सूर्गे पत्थान मण्डल नाह्मण च सम्पाद्य । तत वह्य यज्ञ देवपि मनुष्य पितृ तर्पण च कुर्यात् । अब ऋपि पूतनम् -तत्रादी मृग पाच मिति सूक्त सई पठनीयम । ( सूक रुद्र शान्त्याध्याय दुष्टव्यम् ) । पिप्रतिष्ठा'-अमना तिनुपता भाज्यस्य गृहस्पतिवामिमन्तनो त्वरिष्ठ प्यन्न . मभिमन्द रानु । विश्ने देवास मा दयन्ता मो३.प्रतिष्टा । एप नै प्रतिष्ठा नामयज्ञो यो नयझेन यजन्ते सर मेव प्रतिष्ठिा मस्तु ॥ इति मन्त्रेण सप्युपरि अवतान् निक्षिपन् || वि आवाहनम-भू कश्यप पानाहयामि भोस्श्यप इहा गच्छ दह निट पूपा गृहाणमम स मुस सुप्रशन्नोपरदो भव ॥ १ ॥ ॐ भूर्भुग म्य भरद्वानाय नम भरद्वाज श्रावर हयामि भी भर. द्वाज इहागच इहतिष्ट पूजा गहाण ममसमुत्र सूपमन्नो वरदोनव 1॥२॥ ॐ भूत्र स गीतमा य नम गोनम भावाहयामि । भागीतम इहागाछ इह तिष्ट पूजा गृहाण ममसमुस सुप्रसन्नो घर दामन ॥ ३ ॥ ॐ श्रये नम अहिं श्रापाहयामि मा अत्रे इहागच्छ हातिप्ठपूजागृहाण ममसमुत्र सुप्रसो वरदो भव ॥ ८॥ ॐ भूर्नु स्व जमदग्मय नम याग्नि आवाहयामि भी नमदमे इहागच्च इह विध पूरागृहाए ममसगुम सुप्रसना परदोभर ॥ ५॥ ॐ भूर्भुवस्व पसिष्ट्र उहागच्छ इतिहपूनागृहाण मम संमुख सुशती परदीभव । • ॥ ॐ रम्य विश्वामित्र नम श्रारा हयामि । मा विश्वा मिरा दहागराइह विष्ठ पूना गृहाण मम समुन्द्र सुमसनो परदा भर ॥३॥ भूमुंज अमन्यन्यै नम अन्यत्यै नम अमन्यत्ती मावा हयामि भी अमन्यति । इहागच्छ हनिय पूना गृहरणा मम समुन्या मुग्मना वरदामर || ॐ भू याजपल्स्याय नम यास मत्स्य मात्रा हयामि । मायाक्षरत्स्य इहागाध इतिष्ठ पूनागृहाण मम मुर मुममतापरवा भर || ६ मा गोनम नपाजा वयमेव. कश्यपाय नम 11 [ १६१ . गौतमोऽयंभारद्वाजऽइमावेच विश्वामित्र जमदग्नीऽअयमेव विश्वामित्रो- ऽयं जमदग्निरिमा वेव वसिष्ठ कश्यपा वयमेष वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेयात्रि चिम्न मद्यतेतिहवै नामैतद्यतिरिति सवस्याचा भवत्ति सर्वस्यान्नन्भवति य एवं वेद ॥४॥ सङ्कल्पः अद्य त्यादि शुभपुण्य तिथौ ममात्मनः अति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तयर्थं श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं उत्सर्जनाङ्गत्वेन अन्धन्ती सहित कश्यपादि सप्तपिस्व ऋपि . पूजन महं करिष्ये । तत्रादौ निविघ्नता सिद्धयथं महागणपति पूजनं स्मरणं वा करहिये। [ एव गणपतिपूजा स्मरण वा कृत्या ऋषीन्ध्या- येत् ] ॥ ध्यानम् ~ॐ सप्तऽऋपय.ऽप्रनिहिताःऽशरीरं सप्त रक्षन्ति सद् मप्रमादम् । सप्तापःऽस्थपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतोऽअस्वप्नजोसश्च सदी चदेवी ॥ ३॥ इदं विष्णुर्विचक्रमे वेधा निदधे पदम् । समूद मस्यपा, सुरेस्वाहा ॥४॥ सहस्रशी०॥ ५ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्- धन्ती सहित कश्यपादि स्व ऋषिभ्यो नमः भ्यान पूर्वक मा वाहने समर्पयामि ॥ श्रासनम्-सुवर्ण घट्टित दिव्यं नाना रत्न समन्धितम् । आसनं रुचिरं यच गृह्यतांभो मुनीश्वराः ॐ पुरुष ए० ॥ ६ ॥ ॐ भू- भुवः स्वः अरुन्धती सहित काश्यपादिक्ष ऋपिभ्यो नमः आसनं समर्प- यामि ।। पाद्यम्-गङ्गाजलं समानीतं गन्ध टूव्येण संयुतम् । पाद्यार्थ प्रति गृहन्तु कश्यपाया महर्षयः [१]-ॐ एतावानस्यः । ७॥ ॐ भूभुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादि स्व ऋपिभ्यो नमः पाद्यं सम- र्पयामि ॥ अय॑म् -- सुवर्ण पात्र संयुक्त गन्ध पुष्पाततैर्युतम् । सातपयः प्रगृह्यन्तु इद मयं मयार्पितम् ।। ॐ त्रिपादू० ।। ॐ भू भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यादि स्व ऋपिभ्यो नमः अयं समर्पयामि ।। प्राच- मनम्-कपर वासितं तोयं सुवर्ण कलशेस्थिनम् । दत्तमाचमनीयं च ऋषिणां प्रीतये सदा । -ॐततो लि० ॥६॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरु. न्धती सहित करशादि एव ऋषिभ्यो नमः ।। आचमनीयं समर्पयामि ॥ स्नानम्-सुगन्ध द्रव्य संयुक्त पवित्रा मङ्गलं जलम् । स्नानार्थ वः समानीतं मुनयः प्रतिगृयाचाम् ।।-ॐ तम्मा धज्ञात्सर्व०। १०॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यागदि स ऋपिभ्यो नमः स्नानं समर्पयामि ।। अय क्षेप पञ्चामृनम्नानम्-पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम् । पञ्चामृत मयानीव स्नानार्थ प्रति गृह्यताम्:-ॐ पचनद्यस० ॥ ११ 11 ॐ भूर्भुवः स्यः अरुन्धती सहित करयपादि स पिम्यो नमः पञ्चामृत स्नाननं समर्पयामि ॥ गन्धोदास्नानम्-ॐ गन्ध द्वारा दु०॥ १२ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादित पियो नमः गन्ध स्नानं समर्पयामिः-पूर्वपूजा समाप्य । पुरुष सूक [ १६२ ] नाभिषेक कुर्यात् ।। ॐ सहनशी० ॥ ॐ भू मुं३ व अन्धनी सहित कास्यपादिस पिम्यो नम महाभि । कान समर्पयामि ॥ इति क्षेप कम । सत्रम् ~ माण्य वौष शुभ्राणि यत्राणि रिपिया निय! सगा प्रति गृहस्तु उप शीत निवारण । ] ॐ वस्मायया ॥ (३॥ भु मुंच स अरु- यता सहित कत्यादिस्ट पियो नम वस्त्र समर्प यामि ॥ यतोपपीतम् यशोपपीतम्-नानामन् समद त प्रिवृत्त ब्रह्मसूत्रकम् । प्रत्येक दीयते स्वच पर प्रति गृह्यताम ॥ॐ तम्मा दरखा। ४ ।। ॐ भूर्भुव व अन्धनी सहित मत्यपादिसऋषिभ्यो नम यहोप बीतइतिसमर्पयामि ॥ गन्धम् अात्मसन्तापहार च सुगन्ध दूर संयुतम् । चन्दनवप्रच्छामि पीणामीतिहत ।। ॐ तम्या - ॥ ५॥ ॐ भूध व अरुन्धती सहित कस्यपादिस्य शूपिम्यो नम गन्य समर्पयामि ॥ अयक्षेपम्-अक्षता शुभ्र (न्दुल जा शुलार शशुध्रा मनोरमा । अक्षतान्सप्रयच्यामिगृहन्तुमुनि पुगवा । ॐ प्रह नमी. ॐ मूल्य स अरुन्धती सहित कश्यपादिस्व ऋषिभ्यो नम अक्षतान समर्पयामि हरिद्रा हरिद्रादाकिम चैच कजलभूपणा निच ।। कण कण्ठ सूप च गृहाण पमेश्वरि ॥ ॐ अहिरिवन {{ १०॥ ॐ भूर्भुर ५ अझन्धतीसहित पश्यादिस्व अपिभ्यो नम हरिद्रा कुमादि द्रव्याणि समर्पयामि ॥ इति क्षेपकम् ।। पुष्पाणि ( तुलसी-न-निस्पकमलानि च ऋषिभ्यो विशेषत ) मा न्यादीनि मुगन्धीनि मालत्यादीनि सत्तमा । मयापितानि पुष्पाणि गृदन्तु मुनिपुङ्गवा ॥-ॐ यत्पुरता ॥ १८ ॥ ॐ भूर्नु व अामी सहेत कश्य गादि सुपिम्यो नम तुकालोडरपुष्पाणि समपयाणि । भूगम्दानुरासमुद्र, नो भूपेऽय प शागर । सुगन्ध करयपादिम्य स्पोम्यो दीयवेऽधुना ॥ ॐ प्रा० ॥ गुर व अमन्यती सहित सत्यपादिस्य सपिभ्यो नम धूप दर्शयामि ॥ दीपम्--पश्च चर्ति समायुक्त सौ मङ्गल शोभन । गयानिदिको माया दीपोऽयंप्रतिभृग्वाम् ॥ॐ चन्द्रमाम- २० ॥ अमन्यता सहित सध्या दिख ऋषिम्या नम दीप दर्शयामि ॥ नैवेद्यम्-फरमूल समायुफ नाना शारु समन्धि । नम् । शगत सयुक्त नश्य प्रतिगृयताम् ||-अनाम्याऽप्रार ॥ ०१ मध ययानिय पियो म मेवा समर्पयामि ॥ 17 मथे पानीय ममर्पयामि। उत्तरापोशा इन प्रकार मुरा मशालने कोदवना पन्दर्भ में समर्पयामि ॥ ॐ भूप म . • [ १६३ j. (अथ क्षेपकम् – फलम् नारिकेलं कूष्माण्डंच कदली कर्कटी फलम् । ऋतुकालोद्भवं चान्यदीयतेऽद्य मुनीश्वराः ।। ॐ याः फलि ॥ २२ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धतीसहित कश्यपादि स्व ऋपिभ्यो नमः फलानि समर्पयामि ॥ इति क्षेपकम् ॥ ताम्बूलम्-- पूगी फलं म कपूर नाग वल्ली दलैयुतम् ॥ एला लवङ्ग संयुक्त ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ ॐ- यत्पुरुपे० ।। २३ ।। ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादिस्व ऋपिम्यो नमः ताम्बूलंसमर्प. यामि ॥ अथ क्षेपकम्-दक्षिणा' हिरण्य गर्भ गर्भस्थं हेम वीज विभावसौः । अनन्त पुण्य फलद मतः शान्तिप्रयच्छमे ॥ ॐहिरण्य गवः ॥ २४ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः- अरुन्धती सहित कस्यपादि- स्व ऋषिभ्यो नमः दक्षिणां समर्पयामि ॥ कर्पू रात्तिक्यम्'--ब्रमिष्टा ब्रह्मरूपाश्च कश्यपाद्या महर्पयः । ब्रह्म यज्ञादि दातारः सन्तु मे कीर्ति कर्मणि ॥ ॐ इदछह ॥ २५ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादिस्व ऋपिभ्यो नमः कर्पूगर्तिक्यं दर्शयामि ॥ इति क्षेपकम् ।। प्रदाक्षिणा यानि कानि च पायानि जन्मान्तर कृतानि च १ तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणा पदे पदे ॥ ॐ सप्तायस्या०॥ २६ ॥ ओं भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादिस्व ऋपिम्यो नमः -प्रदक्षिण समर्पयामि मन्त्रपुष्पयुक्तो नमस्कारः-शरणागत दीनार्थ परि त्राण परायणाः । रक्षन्तु मुनय सर्वे मामद्य शरणा- गतम् । सप्तर्पयः शुभाः श्रेप्टा सर्वेषां च शुभ प्रदाः । पुष्पाञ्जलि मया- दतं गृहन्तु मुनिसत्तमाः ॥-ॐ यज्ञेन यज्ञ०॥ २७ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धमी सहित कश्यपादित ऋपिम्यो नमः मन्त्र पुष्प युक्त नमस्कारं समर्पयामि ॥ प्रार्थना'-मन्त्र हीनं क्रिया हीनं भक्ति हीन मुनीश्चराः। यत्पूजितं मया सर्व परि पूर्ण तदस्तुमे ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धती सहित कश्यपादि स्वपिभ्यो नमः प्रार्थना समर्पयामि ॥ अर्पणम्-अनेनमया वेदोत्सर्जनाङ्गत्वेन कृतेन ध्याना वाहनादिपोडशोपचारादि पूजनेन अरुन्धती सहित कश्यपादि सप्तपिस्व ऋषयः प्रीयन्तां न मम ॥ ॐ तत्सहार्पणमस्तु ॥ इति ऋपि स्व'पितृभ्यो यज्ञोपवीत दानम्-अमुक गोत्रेभ्यः अस्भपितृ पितामह प्रपितामहेभ्यः । तथा द्वितीयं अमुक गोत्रेभ्यः यस्मन्माताह प्रमातामह वृद्ध प्रमावामहेभ्यः। तृतीयं-कन्यवाड नलादि (1) प्राचीनावीवि दक्षिणाभिमुचः सर्वे कुशोदकं गृहीत्वापुरतीयजी- पवीतानि निधाय ॥ ॥ पूजनम् ॥ ततः सम्पद्यन्ताम् इति [ १६४ ] दिव्यपितृभ्य इमानि जोपनीवानिवधा मृध्यपरि समर्पयेत् ॥ [ जीवित्सित के रपि पितु पिनादि मातामहादिभ्यश्च यज्ञोपवीतानि देयानि 1.1 तत सन्य कृत्या सर्वान्तामणान् । गन्धादिना सम्पूज्य तेभ्यो यज्ञोपवी वानि दत्त्या पश्चात् सर्वे सय मपिवार्याणि ।। जो पपीत धारण प्रयोग-प्राचम्ये प्राणानायम्य ॥ सङ्कल्प, श्रोत्याद्रि मम श्रौत स्मार्व कर्मानुष्ठान सिद्धयर्थ नयाच अमुक कर्मानधन यज्ञो पपीतधारण मह करिष्ये । सूत्र त्रिगुणी करणम्-इद विष्णुरिति मेवातिथि पि । विष्णुर्देवता ! गायत्री छन्द सूर विगुणी करणे विनियोग -3 इद विष्णुविचक्रमे घा निदधे पदम् । समूढ मस्य पा सुरे स्वाहा ||१|| प्रक्षालनम्--आपोहिष्ठतितिसणासिन्धु द्वीप ऋपि । श्रापादेयता । गायत्री छन्द । यज्ञोपवीत प्रक्षालने विनियोग ~ॐ आपोष्ठिा मयो भुव स्तानऽऊनें ददातन महेष्णाय चक्षसे ॥२॥ यो व -शिव तमो रस स्तस्यमानयतेह न -उशतीरिवमातर ॥ । तस्माऽअरङ्गमाम यो यस्य यस्य क्षयाय निन्न्यय । पापो पत्नयया चनS || ततो यज्ञोपवीतानि प्रक्षाल्या नन्तरं दशगायत्री मन्नेरभि मन्य ॥ तन्तु देववानामा बाई नम् --प्रणवस्य । ब्रह्मा मृपि परमात्मा देवता। गायत्री छद प्रथम त-तो ॐ कारा वाहने विनियोग । ॐ प्रथम ततो ॐ कार मावाहयामि । अग्नितमिति मेवा तिथि सपि । अग्नि देवता। गायत्री छन्द । द्वितीय तन्ती न्याराहने विनियोग --ॐ अनि सम्पुरोदये हध्यवाह मुपये। देवा र पासा दयादिह ॥ ५॥ द्वितीय वन्तो अग्निमावाह यामि । नमोस्तु सर्पभ्य इत्यस्य प्रजापति ऋपि सर्या देवता । अनु प्टुप छन्द । तृवीय वन्नी सा वाहने विनियोग ~ॐ नमोस्तु । सर्प भ्या वैकच प्रथिवीमनु । येऽपरिक्ष येदिवि वेभ्य-सर्पेभ्यो नम -1 ६॥ तृतीय तुन्तौ साना बाहयामि । वय सामेत्यस्यमन्धुमवि सोमो दसवा । गापता छन् । चतुब चन्वी सोमा पाहो विनियोग - वय सामनते ना मनस्त नूपुषि व प्रशान्त ममहि॥११ पनुव दन्ती मोममायाहयामि ॥ दीवामित्यस्य शषि । पितरो Wala शिष्टय एन्द पञ्चम तन्वी पित्रा सहमे विनियम- भारतामर समन्मदगमा 5 पितर-सम्म्यास-1 अगुग्यड पुर राशन सास्त नो पनु पितरा इगु !! पनम तन्वी पिमा नागमामि पितरित्यस्य दिरपयगम ऋषि। प्रजापतिश्यता। (1) मा प्रयोग याबोध्यम् ।

[ १६५ ] निष्टप् छन्दः । पष्ट तम्तो प्रजापत्या वाहने विनियोग.-ॐ प्रजाप तेन । यदेता न्यन्यो विश्वारूपापि परिवा बभूव । यस्कामास्ते जुद्ध- मस्तन्नोऽअस्तु व्यय स्याम एखयोरयीणाम् ॥ ॥ पटतन्वी रजापतये. नम. प्रजापतिमा 'वाहयामि आनो नियुद्धिरित्यस्य । वसिष्टऋषि । अनिजो देवता त्रिष्टपू छन्दः । सप्तम तन्वी अनिला वाहने विनियोगः । ॐ आनो नियुद्भिःशतीनीभिरदर ५ सहस्रिणीभिरूपयाहि यज्ञम् ।। व्वायोऽअस्म्मिन्सक्ने मादयस्व यूयम्पात स्वस्तिभिऽ सदान : ।। १० ।। सप्तम तन्वी अनिलाय नमः अनिल मावाहयामि ।। सुगाव इत्यस्यापि पि. । गृह पतयो. देवता- । आर्पा निटप् छन्दः ॥ प्रटम तन्तीयमा वाहने विनियोगः- ॐ सुगावो देवाऽ. सदनात अम्मयऽआजग्मेदधसवनज्जुपारणा | भग्भाणा वहमाना हवी धप्प्य- सम्मेधत्र यसवो वसूनि स्वाहा ॥ १॥ अष्टम तन्तौरमाय नम. यममाना हयामि ॥ विश्वेदेवासऽआगव इत्यस्थामधु छन्दा अपि.। विश्वेदेवा देवता.। त्रिष्टुपूछन्दः। नवम वन्तौ विश्वपा देवानामा वाहने मिनि- योगः-ॐ विश्वेदेवासऽआगव श्रृणुताम्ऽइम इवम् । एदयहिन्ति। पीदव ॥ १२ ॥ उघम वन्तो विश्वेदेवेभ्यो नम. पिसानदया ना वाइयामि ।। यज्ञो पवीत प्रन्थि देवताऽवाहनम्-ब्रह्मजज्ञान मित्यस्य । प्रजापतिरपि । नझा देवता गायत्री छन्दः । प्रन्थि मध्ये नहा याहने विनियोग ॥ ॐ ब्रह्मयज्ञानम्प्रथम स्पुरस्ता दिसीमत: सुरुचीयनs- सवुद्धधन्याऽ उपमाऽ अस्यन्विष्टाऽ सतरच योनिमसतरच बिरः । १३ || इद विष्णुरित्यस्यमेधा तिथि पि । विष्णुर्देवता । गायत्री छन्द । प्रन्धि मध्ये विष्ण्वा वाइने विनियोगः-ॐ इदम्विगु० ।। १४ ।। अम्बक मित्यस्य । पसिष्ट पि. रुद्रो देवता। विराट प्राझीनिष्टुप् छन्दः। प्रन्थि मध्येरुटा वाहने विनियोग.- ॐ - क. ॥१२॥ ग्रनोयोत प्रन्यि देववाभ्यो नमः -प्रन्धि देवता श्रावा हयामि ॥ प्रणाया वाहित देवताभ्यो नमः यथास्थानम न्यसामि ॥ मानसो पचार. सम्पूज्य । भध प्यानम्-प्रजापतेयसहज परित कापीस सूत्रोद्भव प्रम सूरम् । प्रात्य सिल प यशःप्राश पस्य सिदि गुरु प्रस सूत्रम् ।। युवा सुरासा परिवोतमागास उषा. न्मपति जायमानः । उम्पीरास. कपर उनयन्ति स्वाभ्या मनमा च. पन्त । यसोपसेव धारणम्, यसोपवीत मिति मन्वा परमटी पि. जिन देवता । ग्रिष्टुम् छन्दः । यज्ञोपी भार पनि योग-ॐ झोपवीवमानम्पविरजापतेयं सहसम्पुरलान् । प्रायुब मायाप्रति मुर शुभ्र यशोवीवम्बर मम्नु ते. समोपी मसि यस्य रायो आध [ १६६ ] पवीते नोपन हामि ।। अजेन मन्त्रेण यज्ञोपवीतानां पृथक्-पृथक् धारण कुर्यात् । प्रति यज्ञोपयोत धारण स्याचन्तयोराचमम् धारणान्ते जीर्णसूत्र त्याग मन्त्र'-एतादिन पर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया । जीर्णत्वात्वपरि- त्यागो गच्छ मूत्र यथा सुखम् ॥ इति मन्त्रेण जाण यज्ञोपवीत शिरो मार्गेण नि.सार्य शुद्ध भूमी त्याच ॥ पश्चा यथा शक्ति गायत्री मन्त्र अपं कुयात् ।। अयम्-अनेन नव यज्ञोपवीत धारणार्थे कृतेन यथा शक्ति गायत्री जप कर्मणा श्री सविग देवता प्रीयतां न मम ।। ॐ तत्स ब्रह्मार्पणमस्तु ॥ यस्य० ॥ इति यलोपवीत धारए प्रयोग " अधोत्सर्ग तर्पणम् श्राचन्य प्राणानायम्य देशकाली सदीय छन्दसा क्वचिदन ध्यायादि काले पठनादनधिकरिभिः श्रावणञ्च प्राप्त मानिन्यस्य निरासा मुसा Fख्य तर्पगमई करिष्ये इति सवलाय । देववर्पणम्'--ॐ विश्वेदेवास प्रागत श्रुणुताम इम हवम् । एदम्यहि लिपीदतः ॥ २६ ॥ विश्वे देवा शृणु म । हाम्यवेऽन्तरिक्ष पऽउपदय विष्ठु । ये अग्नि जिताउतवा यजन्याऽासदधारिम्बहिपि मादयद्धम् ॥ ३० ॥ इति मन्त्राभ्यां देवाना वाहा । * देवास्तृप्यन्तु । बन्दा । सि तृप्यन्तु । ॐ घेदास्तृप्पन्तु ॥ ॐ ऋपय स्प्यन्तु । पुराणा चार्ग हप्यताम् । ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् । ' इत्तय चास्तृिप्यताम् । [अथ रूपकम् केविसंवत्सरावयवात् पृथक्वेन तर्पयन्ति तथा]- ॐ अहोगा स्तुत्यन्ताम । अर्थमासा. स्तृप्यन्ताम् । ॐ मासास्तृप्यन्ताम । ॐ ऋतव स्तृप्यन्ताम् । ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम् ॥ इनि क्षेपकम् ॥ ॐ पितर स्तृप्यन्ताम् ॥ श्राचार्या स्तृप्यन्ताम् तव सभ्य जान्याच्य दक्षिणासि मुसो ऽपसव्येन विलमिल श्रित जलमजलीगृहीत्वाअमुक गोत्राःअस्मपितरः अमुकशर्माणो वसुरूपा स्त्यविधानमः । अमुकगोत्राः अस्मपितामहाः अमुक शर्माखो रुद्ररूपी स्तृप्यध्य स्वधानमः ॥ अन्येतु अभि रद्भिः ददता मित्यादि नोमा त विधिना शिष्यअदरसः क्रियामागेन सर्वान पितृन् समयन्तिजीवस्थित पुरैशिष्यैश्वाचार्ग पितृनपरणकार्यमाश-अमुजगोगः अस्मदा चार्यस्य पिनरः अनु शर्माण स्मृप्यध्वस्वधा । एव माचर्यस्य पितामह प्रपिता बहाना यम ।। (२) दचिण जान्याच्येानामि मुखाः मन्येन प्रागौदभेदैबतीयन देवाना नअखि प्रर्य दयात् ।।

[ १६७ ] वतः आचमनम्,-तूप्पीम् पश्चात् ।। वंशानां ब्रवणम् अथ यशः समान मासाञ्जीवी पुत्रात्साञ्जीवी पुत्रो माण्डूकायने माण्डूकानिमाण्डव्या माण्डव्यः कौत्सात्कोत्सो माहित्ये माहित्यि- बामकतायणाम कक्षायणो वात्स्याद्वात्स्याऽशाण्डिल्या च्याण्डिल्य- अकुप्रेकुथियज्ञ वचसोराजस्तम्बायनाद्यज्ञ वचा राजस्तम्वायनस्तु रात्का- वपेयात्तुरः कावरे यऽ:प्रजापते प्रजापविब्रह्मणोब्रह्मस्वयम्भुब्रह्मणे नम: 1१॥ यशोक्ता ऋपय सृप्यन्ताम् । (एवं ऋष्युपरि उदकं क्षिपेत् ) अथ व शस्तदिदं वय शौपणय्याच्छीपणाप्यौ गौतमाद्गौत्तमो वात्स्यां द्वात्स्यो वात्स्याच्च पारा शाच्च पाराशर्य: साङ कृत्याच भारद्वाज्ञा- भारद्वाज ऽऔदवा हेश्च शाण्डिल्याच शाडिल्यो वैजवाब गौतसाच गौतमो वैजवापायनाच वैष्ठ पुरे याच्च वैष्ट पुरेयः शाण्डिल्याच रोहि णायनाच रौहिणा यनःशौनका चात्रेयाच रैभ्या च रेभ्य: पौतिमाख्या- यणाचकोण्डिन्यायनाच कौण्डिन्यायनऽ: कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः कौरिड- न्यात्कौण्डिन्यः कौण्डिन्याचाग्नि वेश्याच ॥२॥ आग्नि वैश्यः सैतवात्- सैतवः पाराशया॑त्पाराशर्योजातुकराज्जातू कयोभारद्वाजा भारद्वाजो. भारद्वाजःचा सुरायणाच गौतमाचगौतमोभारद्वाजा द्भारद्वाजोवैजवा पायना- द्वेजवा पायन: कौशिकायनेः कौशिकायनि घृतकौशिकाद्धृत कौशिकः पाराशायणगराश-यणs: पाराशा पाराशय्यों नातुका जातु कएयों भारद्वाजा द्वारद्वाजो भारद्वाजाचा सुरायणञ्च यास्काचा सुरायणले. वणेस्त्र वणि रोपजन्धने रौप जन्ध निरासुरेरासुरि र्भारद्वाजा भारद्वाजा आत्रेयात् ।।३।। आत्रेयोमाण्टे एिटर्गोतमाद् गौतमो-गौतमा गौतमो व्वात्स्याद्वात्स्यः शाडिल्याच्छाण्डिल्य कैशोकिाप्याकैशोर्यकाप्य. ऽकुमारहारितात्कुमारहारितोगालवादालवोविदर्भी कौण्डिन्या द्विदर्भीकौएि- डन्योत्सन पातोबाभ्रवाद्वत्सन पाद्वाभ्रवः पथs:सौभरात्पन्या:सौभ- रोऽयास्वादाङ्गिरसादयात्या आङ्गिरसऽआभूतेस्त्राष्टां दा भूचिस्त्वाष्ट्रो- विश्वरूपा त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनोदधौचा थवणाध्य- ङाथर्वणो देवाद् थवा देवोमृत्योऽप्राध्य । सनान्मृत्युः प्राध्वछ सनात्प्राध, सनाएकरैकपि प्रिजितेविजिति व्यस्दै ज्यष्टिः सनारो सनारु : सनातनात्सनातनः सनगात्सनगs: परमेष्टिनः परमेष्टी ब्रह्मणो ब्रह्मस्वयम्भु ब्रह्मण नम :॥ ४॥ वंशोतमऋपयस्तृप्यन्ताम् अथव। रास्त दिदं क्यशौपर्णाय्याच्छौर्पणा- [ १६ त्यो गीतमानतमोवारस्यावा त्योभास्या पाराशयाच पाराशयं साइक 'त्याच भारद्वाजावभारद्वाजोदपाहेश्चशाण्डिल्याच शाण्डिल्योवैजवायाच गौतमाच गौतमो वैजवा पायनाच चैष्ठ पुरेयाच वैष्ठया शारिडल्याचरोहिणायनाच रोहिणायन शौनकाबलेवन्तायनाच रैन्याचरेभ्यऽपीतिमाल्यायणञ्च कौण्डिन्यायनाचा कौण्डिन्यायन कौण्डियाभ्या कौण्डिन्या श्रीवाभ्या औणवामाs कौण्डिन्या रकोरिडन्या कोण्डिएया कौण्डिन्या कौण्डिन्यानानि धैत्याच ॥ ५ ॥ याग्निवेश्या सेठया सैतवऽ पारा शा पाराशय्यों आतू काजातू फरायो भारद्वाजाद्धार द्वाजोभारद्वाजाचारायणाच गीतमाच गोतमोभार हाजाद्वारद्वाजो वताका कोशिका द्वालाका कौशिकऽ कापायपाकायए सोकरायाणासोकरायास्त्र पस्त वणिरोपजन्धेनरोप जन्धनिऽ सायकाय नात्सायकायन कौशिकायनेऽ कौशिकायनित कौशिकाद्धत कौशिक पारसायण। पाराशायण पाराशय्यापाराशयां जानाएयामात् करायांभारद्वानो भारद्वाज भारद्वाजाशासुरायणाचयारकाचासुरायएस्त्रकरणे परिणरीर जन्धन रोप जन्धनिरासुरेरासुरिभारद्वानाभारद्वाज आयात ॥६॥आत्रेयादानेयो माण्टेरिट गावमा द्रौवमागीतमा द्रौतमोचालयादा स्यशाण्डिल्याच्छाण्डिल्यऽ कैशोकिाप्या शोग्यऽ काप्या कुमार हारिताकुमार हारितोगालवा दालचिदर्भो कौण्डिन्यो यत्सनपातो यात्रवासन पाहाव पथसौभरात्पन्याऽ सोभेरायास्यादाहिरसा दयास्यऽआहिरसऽ आभूतेस्वाष्टादा भूतिस्त्वाप्ट्रोन्विश्वरूपा बादाद विश्वस्त्याष्ट्रो श्विभ्यामरिनो दधोवऽ अथणामध्यड डायण देवाद बब्बावामृत्या प्राध्य , सनान्मृत्यु प्राय घ सनात् प्राध्य. सन एक रेप विप्रजिते विप्रजिनिव्यष्टे यदि सनारो सनारऽ सनातना सनातन सनगासनग परमेष्टिना परमेष्टी प्राणो ब्रह्म स्वयम्भु नमोनम वशाका पयस्तृप्यन्ताम्।।जाश्रयवध शस्त दिद क्या भारत द्वाजापुत्रा भारद्वानापुत्रो व्यात्सीमाण्डवी पुना द्वात्सीमाएइवी पुत्रऽपारा शरी पुना पाराशरी पुनो गार्गी पुरागार्गी पुनs पाराशरी कौण्डिनी पुत्रा पाप शराफौण्डिनी पुनोगार्गी पुत्रादगार्गी पुनो वाढयी पुत्राद्वाडेयी पुना मौपिकी पुरान्मोपिकिपुत्रो हारिफर्णा पुनावारि की पुत्रीभारद्वाजी आहारद्वाजी पुनऽ पती पुनात्यही पुरऽ शौनकी पुनाच्छीनकी पुनार कास्यपी याला क्या माटरी पुना काश्यपी चालास्यामाठरी पुरा पोत्सा पुत्रा स्कोरमी पुत्रो वीवा पुजा बोधीपुत्रऽ शाल द्वायनी पुनाच्छा- बायना पुत्रा वार्षगणो पुत्रा व्याप गणा पुयो गौतमो पुनागौवमीपुर श्रीरया पुत्रा वाया पुत्री गौतमा पुत्रादगीवमी पुत्र ब्यासी पुत्रा द्वारसी - गणो [ १६६ ] पुत्रो भारद्वाजी पुत्राद्वारद्वाजी पुत्र: पाराशरी पुत्रा पाराशरी पुत्रोव्वार्का- रुणीपुत्राव्याकारुणी पुत्रऽत्रातभागी पुत्रादातभागीपुत्रऽःशौङ्गीपुत्राच्छौड़ी पुत्रः साइ कृती पुत्रात्साड कृतीपुत्रs:t !! पालम्बी पुत्रादालम्बी- पुत्रऽआलम्बायनी पुत्रादालम्बायनी पुत्रो जायन्ती पुत्राजायन्ती पुत्रो. माण्डूकायनी पुत्रान्माण्डूकायनी पुत्रो माण्डकीपुत्रान्माण्डकी पुत्र: शाण्डिलीपुत्राच्छाएिंडलीपुत्रो राधीतरी पुत्राद्राथी तरीपुत्रऽक्रोनिचकी पुत्राभ्यां क्रोञ्चिकी पुत्रोवैदभृती पुत्रा वैदभृतीपुत्रो भालुकी पुत्राद्भालुकी पुत्र : प्राचीन योगी पुत्रा प्राचीन योगीपुत्रः सान्जीवी पुत्रासाब्जीवी पुन: काशकेयी पुत्रात्कार्थकेयी पुत्र ॥ १० ॥ प्राश्री पुत्रा दासुरि वासिनः । प्राश्रीपुत्रऽआसुरायणा दासुरायणऽ आसुरेरासुरिया॑ज्ञ वल्क्यान्द्याज्ञ वल्क्यऽउद्दालकादुद्दालको रुणादरणऽउपवेशेरुप्रवेशिs: कुवे: कुभिवाजश्रवसोव्याजभवसाध्वाज- अवाजिता वतोव्याध्योगाज्जिव्हावा न्याध्योगोसिताद्वार्पगणाद् सितोव्वा हारितात्कश्यपाद्धरित्त: वश्यIS: शिल्पा कश्यपा च्छिल्प: कश्यपs कश्यपानेधु कश्यपोनैध्रुविव्वांचो वागम्भि- एयाऽ अम्भिण्यादित्यादा दित्यानीमानि शुक्लानियजु , पिन्वाज वल्केयना ख्यायन्ते ॥ ११ ॥ वंशोकाऽऋषयस्तृप्यन्ताम् ।। ॐ तत्सवितु- रिति चतुर्वारं गायत्री पटेत् ॥ हति प्रति वंश वंशोक्ता नामृपीणां तर्पणम् । ततः तत्सं वितुर्व० सावित्र्याश्चतु. कृत्वाऽनुब्रुवणम् । सर्वेषांतदन्ते ॐ विरताः स्म इतिसकृदुञ्चैवूयात् ॥ अध्यायाः-इपेत्वां ॥ १ । कृष्णोसि ॥ २ ॥ समिधाग्निम् ॥ ३॥ एवंम् ॥ ४ ॥ अग्न. स्तनू ः॥ ५ ॥ देवस्यत्वा ॥ ६ ॥ ब्वाचस्पतये ॥ ७ ॥ गृहीवोसि ॥ ८ ॥ देवसवितः ॥ ६ || अपो देवा ः ॥ १० ॥ युञ्जान : प्रथमम् ॥ ११ ॥ दृशानो रुक्म : ॥ १२ ।। मयि गृह्णामि ॥ १३ ॥ध्रुवक्षितिध्रु वयोनि : ॥ १४ ॥ अग्ने जातान् ॥ १५ ॥ नमस्ते ।। १६ । अश्मन्नूजम् ॥ १७ ॥ व्याजश्व ॥ १८ ॥ स्वादीन्त्वां ॥ १६ ॥ त्रस्ययोनि: ॥ २० ॥ इमम्में ॥ २१ ॥ तेजोसि ॥ २२ ॥ हिरण्य गर्भ : सम् ॥ २३ ॥ अश्वस्तूपर 5 ॥ २४ ॥ शादन्दद्धि 5 ॥ २५ ॥ अग्निश्च ॥ २६ ॥ समारत्वा ॥ २७ ॥ हाता यक्षत् ।। २ । समिद्धोऽ अञ्जन् ॥ २६ ॥ देवसवितः || ३० ॥ सहस्र शीर्पा पुरुप : ॥ ३१ ॥ तदेव ॥ ३२ ॥ अस्या जरासः ॥ ३३ ॥ यज्जाग्रतः 5:॥ ३४ ॥ अपेत 5: ।। १५ ।। ऋच वाचम् ॥ ३६ ॥ देव- स्ववा ।। ३७ ॥ देवस्य ॥ ३८॥ स्वाहा प्रणेभ्य: ॥ ३ ॥ उपयाम [ २००३ ईशाव्यस्यम् ॥ ४० ॥ ॐ हिरण्ययेन पावेण सत्यस्यापिहितम्मुरयम् योसा वादित्ये पुरुष सोसायहम् ॥ ॐ ३ ॥ खन्त्रह। अध्यायोका ऋपयस्तृप्यन्ताम् । अथकारिडका'-व्रतमुपैरयन }} १ ॥ सबै कपालान्ये वायत्तर पदयाति ॥ २ ॥ स स्च s: समाप्टिं ! ३ ॥ हिङ कृत्या नवाह ॥ ४॥ सवैवराया श्रापयति ॥ ५ ॥ मृतगोहर देवेपुयज्ञभागमीपिरे ॥ ६ ॥ सपोशाखया वसानपा करोति ॥ ७ ॥ मनो हवै प्रात 5. ॥ ८ ॥ सयवाह ॥ ॥ स सयद्वा इत श्चेवश्च सम्मति ॥ १० ॥ उद्धृत्या हवनीयम्पूर्णाहुति जुहोति ॥ ११ ॥ सूर्योहवाड अग्नि होत्रम् ॥ १२ ॥ अथ हुतेग्नि होगमुपतिष्ठते ॥ १३ ॥ प्रजापतिहवा इद मनाएकऽरनास १४ ॥ पितामहा विषा हवे देवा नननु : ॥ १५ ॥ देवयजन योषयन्ते ॥ १६ ॥ दक्षि. णेना हवनीयं प्राचीन ग्रीवे कृष्णाजिनेऽउपस्तृयाति ।। १७ ।। सप्तपदान्यनुनिः कामति ॥ १८ ॥ शिरो चै यज्ञस्यातिथ्य वाहू प्रायणियोदयनीयो ॥ १६ ॥ तद्य sए पूर्णािवपिठस्थूणराजो भवति ॥ २० ॥ उदरभे वास्यसदः।। २१ ॥ अनिमादचे ॥ २२॥ तद्यतत्प्रवृतो होता होतृपदन पविशति ।। २३ । प्रजा पति- प्रजा. ममुजानो रिरिचानऽपामन्यत ॥ २४ ॥ प्राणो हवाई श्रस्योपा शु. ॥ २५ ॥ पक्षपोहवाऽअस्य शुक्रा मन्थिनी ।। २६ ।। भवयिता समुप हवा 5. स्मात्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥ २॥ मनोहवाऽअस्यसविता ॥ २॥ आदित्त्येन चरुणोदय नीयन प्रचाति ॥ २६ || प्रजापतियोऽएप यद शु: ॥ ३० ॥ देवाश्च नाऽअसुराच || ३१ ॥ अयस बञ्चाज्यविलापिनी चादाय ॥ ३२ ॥ अरएयोरमी समारोहा ॥ ३३ ।। केशरस्य पुरुषस्य ॥ ३४ ॥ भाग्ने योटा कपाल : पुरोडाशो भवनि ॥ ३५ ॥ असताऽहमपासोन् ॥ ३६॥ प्रजापति परनिरूपाएयम्यध्यान ।। ३७ ॥ तदै देवा अ पन् ॥ ३८ ॥ अवैनमत ऽ ग्यन त्येा ॥ ३८ ॥ पर्याय निप्पा ताऽश्रापो भवन्ति ।। ४० ॥ न्या. सिहती पिमयन्ति ।। ११ । कामप्रति मुख्यfrन ॥४॥ स्वनी पाये वाग्नि विदित्या 5 ॥ ४ ॥ गाई पत्य व्यापलाश शापया न्युरहति ॥ ४ ॥ अथातो मनाईरनि रिनोगाउँपयोभाति । ४६ ६ मामणि गृहीते यन् ॥ ४ ॥ म्ममुपयाति ४॥ प्राणभूत अयावि 11 4 | द्वितीयविधिनुभवानि ॥ १० ॥ नृवीयागिदि मुपदयावि [ २०१ ] । ५१ ॥ चतुर्थोचितिमुपद्धाति ॥ ५२ ॥ पचनी चिविमुपद- पाति ॥ ५३॥ नाकसद उपद्धाति ।। ५४ ।। ऋतव्याऽउपदधाति ।।५।। अथातऽ शतरुद्रियं जुहोति ॥५६|| उपवसथीये हन प्रात रुदितऽआदित्ये । ५७ ॥ अथातो बैश्वानरं जुहोति ।। ५८ ॥ अथातो राष्ट्र भृवो जुहोति ॥५६ ॥ अथातs: पयोवृत तायै ॥ ६॥ अग्निरेप पुरस्ता चीयते 1६१ ।। प्रजापति स्वर्ग लोक मजिगा । सत् ॥ ६२ ।। प्राणो गायत्री ॥ ६३ ।। प्रजापति विस्रस्तम् ॥ ६४॥ तस्य वागतस्थाऽम्ने: ।। ६५ ।। हैतेषणे ।। ६६ । सम्वत्मरो यज्ञ: प्रजापतिः ॥ ६७ ॥ त्रिव पुरुपो जायते ॥ ६ ॥ वाग्यवाऽएतस्याग्नि होत्रस्याग्नि होत्री ॥ ६ उद्दालको हारुणित ॥ ७० ॥ उर्वशी हाCAIS: || ७१ भृगुई वरुणि: 11 पशु वन्धेन यजसे ।। ५३॥ वद्यया हवं ॥५४॥ अयंचे यज्ञोयोयं पवते ।। ७५ ॥ समुद्र वाएते प्रचरन्ति ।। ७६ ॥ यद्वा- लोके ।। ७७॥ दीर्घसत्र हवाऽएतऽउपयन्ति ॥ ७९ ॥ तदाहुर्य देवदीर्घ सत्री ।। || सोमो व गजायज्ञ: प्रजापतिः ॥८० । विश्व रूपं वे त्याष्ट्रमिन्द्रोऽहन् ॥ ८ ॥ इन्द्रस्य वै या ।। २२ । एतस्मा यज्ञात्पु. रूपो जायते ॥ २३ ॥ ब्रह्मो दनं पचति ॥ २४॥ प्रजापतिदेवेम्योयज्ञान्व्या- दिशत् ॥ २५॥ प्रजापते रक्ष्यस्व यत् ।।६। प्रजापति रकामत् ।।७।। अथ प्रावर्गातमस्य ॥ ८ ॥ पुरुषोद नारायणोऽकामयतः ॥८॥ ब्रह्म वैस्यम्मु तपोऽतप्यत ॥१०॥ अथास्मै श्मशानं कुन विद्यौः शान्तिः ॥४१॥ देवा व सत्रंनृपेटुः ॥२॥अथातो रोहिणी जुहोति ॥ ३ ॥ सबै तृतीये इन् ।। ६४ ॥ द्वया ह प्राजा पत्याः ॥६५॥ हात वाला कि हानू पानोगायऽआस ।। ६६ ॥ जनकोव देहः ॥ १७ ॥ जनक इह- बौदह याज्ञवल्क्यो जगाम ।। 65 || पूर्णमदऽ.पूर्णमिदम् । ६ ॥ श्वेत रेतुईयाऽआरुणोयः ॥ १० ॥ प्रारनीपुत्रा दामुरि वासिनः । चतुर्दश- एडेवध्यायोक्ता अपयस्तृप्यन्ताम् ॥ अथ शतस्थानानि-ॐ इपेवां ॥१॥ परिते ॥२॥ अग्नेनयं ॥ ३॥ उपयाम गृहीतोसि मुशम्मासि ॥ ४॥ [प्रयमा] सोमस्यविएि. || परस्याऽअधि ॥ ६ ॥ अन्याव: U || रायमि 11 11 नमोहिरण्य वाहवे न्द्र मम ॥१०॥ मोठे ॥ ११॥ अन्नांपरितः॥१०॥ अश्विना तेजसा ॥ १३ ।. पृथिव्यै स्वाहा । ११ प्रजापतये च ॥ १५॥ तेऽप्रस्र ॥ १६ ॥ तनून पात्रयः ॥ १७ ॥ अयमिह ॥८॥भनुन: ॥ १६॥ इयत्यमे ॥२॥ ((शेष. चसप्ततिः॥ दिएमवेन पान्येण सम्ना शतोता पयनुप्यन्ताम् ।। प्रमुचन ॥ ९ ॥ तदेयं निष्टि॥३॥ प्रा. भयलिप्ताम्यां पवित्राभ्याम् ।। ३ यूहन्होपायविष्टोपि ५ वमूनां । २०३ ] तानि यदा ग्रहाति ।। ७३ | चांगनौतिष्ठन् ।। ७८ ॥ कतमऽात्मेति '७५ । अथ हैन मनुष्याऽचु-७६||अब यामिच्छेगभन्दधीतेति। सप्त सहर पर शत शेष चर्पि शति ॥ ७ ॥ प्राश्नीपुत्रा दासुरि पासिन । ७॥ चतुर्दश काण्ड शतोक्ता ऋग्यस्तृप्यन्ताम् ॥ अथ प्रपाठका'-प्रत मुपैख्यन् ॥ १ ॥ चतुर्धाविहितो हवाऽअपेनिरास ॥ २॥ वाऽआऽ ऽ ॥ ३॥ स चोर। माघारयिष्यन् ।। ४ ।। चन पैटेवाऽ । यज्ञेन वैदेवा दियम पोदकामन् ॥ ६ । स वैस्नु चोव्यूहति ॥ ७ ॥ स यद्वाऽइत् श्वेतरचसम्भरति ॥८॥ वरुणो हैनद्राज्य कामऽआदधे ।। ६ ।। यत्र वै प्रजापति 5 प्रज्ञा ससृजे ॥ ०॥ प्रना- पति वाऽएते नाग्ने वनेने जे ॥ १५ ॥ महा हरिपा हरे देवा वृन जनुs ॥ १२ ॥ देवयजन योष तन्ते ॥ १३ ॥ वाचयच्छति ॥१४॥ नाडे कृष्णा जिन मास्तुणाति १५॥ नद्याएपपूर्वार्यो वपिष्ठ स्थुणा रानो भवित ॥ १६ ॥ विजामानो हैवास्यधिष्ण्या ॥ १७ ॥ पाश कृत्वाप्रतिमुञ्चति ॥ १८॥ सोत्यप य जति ॥ १६ ॥ प्राणोप्रसे हवा अस्योशु पा २०॥ आत्मा हवाऽरायण ॥ २१ टनन्ति वारुण तद्यज्ञम् ।। २२ ॥ सवाऽअवभृथुमभ्य बैंति ॥ २३ ॥ तथा तद्वादशाहन न्यूढ श्च्छन्द सायजते ॥ ४ ॥देवारचवाऽ असुराश्च । २५॥ व ई पत्यन चरुणा प्रचरति ।। २६ ।। सवाऽअपs सम्भरति ॥ २७ ॥ मैत्रावरुण्या पयस्य या प्रचाति ॥ २८॥ असद्वाऽइदमप्रऽआमीत ॥ २६ ॥ प्राना- पत्त्यश्च रक्षाऽालम्भन्ते ॥ ३० ॥ प्रदीप्ता:एतेग्नयो भवन्ति ॥ ६॥ नस्याऽएतस्याऽआपाढा पूर्ण करोति ॥ ३२ ॥ रुक्म प्रति मुन्यविमति ॥ ३३ ॥ गार्हपत्यवेप्यन् पलाश शासाग व्युद् हनि ॥ ३४ ॥ श्रम दर्भस्तम्भ मुपदधाति ॥ ३ ॥ प्रात्मन्नग्निंन गृहीतचेप्यन् ।। ३६ ॥ र्म मुर दधाति ॥ ३७ प्राणभुतऽउपदयाति ॥ ३८ ॥ विश्व ज्योतिपमुस दगति ।३६ ।। अथा तोन्वा वृत्तम् ।। ४० ॥ गाई पत्यनुप याति ॥ ४ ॥ अथात शवदिय जुहोति ।। ४२ ॥ प्रत्ये त्यग्नि प्रद रिष्यन् ॥ १॥ प्रथ कान्यक्ष मुनु जुहोति ॥४४॥ अथ प्रात: प्राव रनुमान मुपा करिष्यन् ।। ४५॥ अग्निरेप पुरस्ता भोयते ॥४६॥ या तरच यन स्वैर ॥४७॥ सम्बसचे अनापत्तिानि ॥ ४॥ नेगदममे सदासोनेव सदासीन् । ४६ ।। संवत्तरोरें यक्ष प्रजापतिः ॥ ५॥ अपिवारवाद দুৱাৰি प्रना.मृतमानोऽप्यन ॥ २२॥ अथा तन्याध्याय प्रशमा ।। ३ ।। अत्र वयसो गोपिनो ॥ ४॥ पुगए छह नागरण पजागनिमगार ॥ सोमो ने रामा CRS प्रजापति ॥५६॥ प्रायिंग नमन || 2011 [ २०५ ] बाद पचति ।। ५८ ॥ नियुक्त पशुषु। ५६ || प्रमुन्याश्य दक्षिणेनच्चे दिम् ॥ ६॥ पुरुषोह नारायणोऽकामयत ।। ६१ ॥ देवाह 2 सन्ति- पेदुः ।। ६२ ।। सयौताछ होतान्याह ।। ६३ वयाह प्राजाप्रश: ६४।। हुप्त बालाकिहान-बानोगार्यास || ६५ ॥ अथहैन भुज्युलाह्यायनित: पप्रच्छ ।। ६६ ॥ जनक हश्वेदेई याज्ञवल्क्यो जगाम ।। ६७ ॥ भूमि रन्त सिंह चौरति 1 ६० ॥ प्राश्नो पुत्राद सुरि वासिनः । ६६॥ इनिचतुदश काण्डे प्रपाठीका श्यय सृप्यन्ताम । इति प्रपाठकाः ॥ अथ त विम जेन् म यस्मिन्हात्र मुल्लोक मेत्यम नियाम्यायोमहाभ्यान्नि गृहतेऽय गृहपतिः सुब्रह्मण्या मात्र अनिता वातास्तानि दश भवन्ति ताइएताऽअनुलयोमध्यमैप तृतीयांचितिमहोबानाथब्ध शस्तरमा उह नयाचम वायग्राम यासीवामणीमर्यादाया एवलोष्ट माहत्य प्रारनी पुत्रा दासुरिशसिन ० ॥ १॥ अन्त्यकाण्डकोक्ता ऋपयत्तृप्य- न्ताम् । एवं व्रत विसृजेत परमाङ्गतिद्वच्छतीति तस्माद्धातुचमसात तस्मिन् समुपहमिष्टया समिधाsध्यादधति द्वादशवा त्रयोदश या दतिया भवन्ति यावा नग्निर्या वत्यस्यममाया तावत्तद् भवति तस्मा समान सम्पन्धनास्तस्मादिमे प्राणऽउपरिष्टाद् सम्बन्ना मवाद नैसर्सि जो लोहा इति ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयभ्यु ब्रह्मणे नमः शिनीमा प्राप्ये दहिं मना जायन्ते तस्मादिमावात्मानमथिता वाहू तस्मादु है नाजीनाच पिशाचन सश्यन्तेमाजसनेश्मयाज्ञवल्क्येनाम्यायन्तै ॥२२॥ चनुदंशकाण्ड अन्त्य फाक्वी कोक्ता ऋयय स्तृप्यन्ताम् ॥ नमस्त- तवः तदेवस्यायुक्त न मृपा प्रान्तयन्ति देवा दति नहे विटुप कितनपा प्रान्तं भाति तयो हास्ये उत्सर्षे देवाश्रयन्ति ।। ११॥ इनि नमस्कारः । विसंजनम्-ॐउत्तिष्ठ पते देययन्तरत्वेमहं । उपप्पयन्तु मगनः मुहानसाद पाशर्व वासवा १५६३४ख स्वप्रयरान्धि सगन् । जले प्रास्यन्- समुदाय स्वाहांन्तरिक्षय स्वाहा देव मुविना रहन्छ साहा मित्रा यमणी गछ वाहनो राग स्वाहा छन्दसिंग साहायायाधियी गन्दु स्वाहायड्छ स्वाहामोमय माहादियनभोग स्वाहाग्निश्याना या मनोमहाहियदि यन्ने घमांगा सज्योति-विम्भरम्मनापण स्वाहा ॥ na) शिपमन युः । प्राचार्यादि का पूजन RTI (म्बो दाना शशि गृहीयान् । नयारमार्गापार्म कर्मणः নানাবিধ সন্তান বা কি মানামা যিয় ধৰি सषप्य 1 ) यांगम-प्रनेनाभ्यायोमर्ग कमांडवयेन छनेन शपि पूजन नचादि रमणा श्रीमगया परमेयरः प्रीयता न मम। रस- त्रमाण मात्र ॥ इति श्रायोपयोगः ॥

[ २०५ ] अथ ऋषिश्राहम् । । कृत प्राणायामोदेशकालो सड कृत्य-उत्सर्गानभूत मूपि श्राद्ध मह करिष्ये ।। ॐ इदं विष्णुर्वि०॥ १ ॥ इति मन्त्रणदिग्बन्धः ।। ऋषिश्राद्ध. स्योपहाराः शुचयोभवन्तु ।। इत्यु पहार प्रोक्षणम् । देशकाल पानसम्पदस्तु । अरुन्धती सहित कश्यपारिस ऋपरः यथादत्त विभागं वः स्वाहा अरु- न्वतीसहित कश्यपादि स्व ऋषयः,यया दत्तं गन्धा द्यर्चनं यथायथा विभागं यः स्वाहा । इति गन्धादि दानम् । ऋषिश्राद्ध साङ्गता सिद्धयर्थ सप्त मङ्कग कार ब्राह्मणान् यथाकालं यथा सम्पन्नान्नेन तर्पयिष्ये । तेन अरुन्धतो सहित कश्यपादि स्व ऋषयः श्रीयन्ताम् । ऋपिश्राद्ध साङ्गता सिद्धयर्थं हिरण्यनिष्क्रयभूतां दक्षिणा आचार्यायं तुभ्य मह सन्प्रददे आचार्यः । ॐकोऽक्षा स्माऽअदाकामोऽदात्कामायादान् । कामो दाता काम: प्रतिग्रहीता कामैतत्ते ॥ २४६॥ इति मन्त्रं पठेत् । उपविष्टेषु ब्राह्मणेषूद कादि दानम् ।। तद्यथा-ॐ शिवा आपः सन्तु । सौमनस्यमस्तु । अक्षतं चारिष्टं चास्तु । अघोरा ऋषयः सन्तु । सर्वत्र सन्विति विप्राः प्रति वचनं दधः । उत्सर्ग कर्मणो न्यूनानिरिक्त दोष परिहारार्थ नाना नाम गोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो भूयमी दक्षिणां सम्प्रददे प्रार्थना-उत्सङ्गिभूतं ऋषिश्राद्धं परिपूर्ण मिति प्राचार्यादयः प्रति वचनंदद्युः । ततः सहनोस्तु सहनो वतु सहनऽइदं वीर्य यदस्तु ब्रह्मऽइन्द्रस्तद्वेदयेनयथा नविद्विषामह इति ॥ पश्चात्-उभाक वी० इति मन्त्र पठेत् ॥ इति ऋषि द्धाद्धम् ।। इस ऋपि श्राद्धं कृता कृतं अस्ति ॥ इति श्रावणी पद्धति अध्यायोपाकर्मः पारस्करगृह्यसूत्रे-अथातो ऽअध्यायोपाकमोषधीनां प्रादु- र्भावे अणेन प्रापण्यां पौर्ण मास्याडः श्रावणस्यपञ्चम्य: हस्तेनवाज्यभागाविष्टा ज्याहुती जुहोति । प्रथिव्याऽइत्युग्वेदे ऽन्तरिक्षायवायय इसियदिवेसूर्या येति मामजुर्वेदेदे दिग्भ्य श्चन्द्रमस इत्य थर्ववेदे ब्रह्मणे छन्दोम्यश्चे तिसर्वत्र प्रजापतयेदेवेभ्यो ऋपिभ्यः श्रद्धायै मेवायै सदरस्पतयेऽनुमतये ऽइति चैत देवत्रतोदेशेन विसर्गेपु सदसस्पति मित्यात धानास्ति' सर्वे नुपठेयु हुवा हुस्खोदुम्पर्यस्तिस्वस्त्रिस्नः समिध ऽपादध्युराः सपलाशा प्रञ्च गव्यम्---शरीर शुद्धयर्थ पश्चगव्यप्राशन कार्यम् ॥ पच गन्यं पवित्र तु पाइरे ताम्न भाजमे (१) गायध्या चैव गोमत्र (२) गन्ध दारेति गोमयम् ( ३) प्राप्याय स्वेति चक्षीरं (४) इविकाध्यति वैदलि (५) पिनेसोसि शुक्र मियामं (3) देवस्य का कुशोदाम ।।

[ २०६ ] धुनाता. साच्यिा ब्रह्म चारिणश्य पूर्व कल्पेन शन्नो भवत्वि त्यक्षतवानाऽअसादन्तः प्राश्नीयुईधि काव्ण इति दथि भक्षेयुः स यावन्तगण मिच्छेत्तावन्तस्तिलाना कर्पफल केन जुहुयात्सावित्र्या शुक्र ज्योतिरित्य नु वाकेन याप्राशनान्ते प्रत्यक्त मुसेभ्यऽउपविष्टंभ्य में कारमुक्यात्रिश्च सावित्रीमध्याया दीन्प्रत्यापि मुसानि वह चाना पर्वामिण छन्दो गाना , सूक्तान्या यव्यंगाना , सर्व जपन्ति महनास्तु महनोवतुसह न द वार्य वदस्तु ब्रह्म ऽइन्द्रस्तद्वेद येन यथा न पिद्विपा महऽइति त्रिरात्र नाधीयोर लोम नया नामनिट न्तनमे के प्रागुत्सर्गात् ॥ अथोपाकर्मप्रयोगा'- - 11 तत तत्र पूर्वेण नह्मणो. [गुरु. हम्ती पादौ प्रनाल्य द्विराचम्याव सय्याने लोकिकामेवा पश्चाच्छिाध्य सहप्राग्मुस अरिश्च प्राणा याम त्रयं कृत्वा देशका लोमीर्य श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ अध्यायोपाकमग्गि पत्र भूमसार पूर्वक मनिस्थापनमह करिष्य इनि मङ्कल्प्य' पञ्चभूसस्कारान्युर्यान् । तेच!-दर्भ. परि समुन्ध २-गोमयोदकेनो पलिप्य । ३-- मुस्रेणी लिख्य। ४--अनामिका प्ठाम्यामुद्धृत्य। ५- उदकेनाम्युक्ष्य अग्निं प्रतिष्ठाप्य पात्र स्थापनादि कुर्यात् । गमनम् । अनेकत्तरत पात्रासादनम् । द्वे पवित्र ताम्रमयी प्राज्य स्पाली । पाजाश्य समिव । प्राचा वाद्योरो । समिठतमे प्राज्य भागा । निल होम मात्रिी मन्त्रेग । पूर्णपात्र दक्षिणा । विरान लीमना नामनि मन्तनम् ॥) ॥] पिच्छन्ददेवतास्मरणम्'---इपेत्ये स्यादिकस्य सम्बमान्यस्य माध्यन्दिनीयस्य वाज मनेय तस्य यजुवेंदा म्नायस्य किया ऋपि । वायुदेवता। गायत्र्यादीनिसारिण बन्दासि ! अभ्यायोगमणिरिनियोग ||- सवाभिध्यानम्' -17-प्रतापटिम । इन्द्रम् । अनिम् । मोमम् । पृथिवीम । अनिमा प्रमाणाम् । एन्दा गि । अन्तरिक्षम् । थायुम् । प्रमाणम् । छन्दाऽसि । दिसम् । मूगंम् । ब्रह्माणम् । दन्दा छसि । दिश. । परम- मम् । प्रमाणम् । छन्दा । मि। प्रजापतिम । देवान् । प्रपीन् । अमाम् । मेराम् । सदसपनिम् । अनुमनिम् ॥ एता. प्रधानदेयता यागेन । मदमपनिम् । पनामि. | मरिणानिये । अनिधिष्ट हपानारोग ! अमिम । वायुम् । मूल्यम् । प्रग्ना यदी।

। [ २०७ ] अग्नीवरुणौ। अग्निम् । वरुणम् । सवितारम् । विष्णुम् । विश्वा- न्देवान् । मरुतः । स्वर्कान् । वरुणम् । प्रजापतिम् । एता अङ्ग प्रधानार्थादेवता अस्मिन्कर्मण्यहं यदये ।। [ ब्रह्मवरणम् ( दक्षिण तो ब्रह्मासनमास्तीर्य । अमुक शर्मनू अस्मिकर्मणि ब्रह्मा' भव। भवामीति प्रति वचनम् । ब्रह्मातूष्णी आसनावलोकन-आसनात्तनिरसनब्च कृत्वा उपविशेत् ॥ अग्नेस- त्तरतः मणीवार्थमासनद्वयनिधाय । प्रणीता चमसं वाम हस्ते कृत्वा आत्माभिमुख जलेनापूर्य प्रथमा सनेनिधाय चमस दण्डमालभ्यत्रयां- अवलोक्य तेन सङ्कतादिना ऽनुज्ञातः प्रणीयोत्तरासनेनिध्यात् । तत उद्गप्रैः प्रागप्रैः कुशेरग्निं परिस्तीर्य । अर्थवदासाद्य । अग्ने उत्तरतः प्राक्संस्थ मुदकुसंस्थं वा पात्रासादनम् । पवित्रच्छेदनार्थं दर्भास्त्रयः । पवित्रद्वे । प्रोक्षणी पात्रम् । आज्य स्थाली । सम्मार्जन कुशास्त्रि प्रभृतयः । उपयमनकुशाः सप्तप्रभृतयः। समिस्त्रि प्रभृतयः। सुवः। आध्यम् । धानाः पूर्ण पात्र च ।। अथोप कल्पनीयानि-प्रति शिष्यं नव नव समिध घानः मपत्रा औदुम्बरस्य । दधिभक्षणार्थ । लौकिका धाना वाहु मात्र मौदुम्बर काष्टं तिल स्थापनस्थाने सर्पफणकार मार्कफलकम् । तिलाश्चेति । पवित्र करणाम् । द्वयोपरि त्रीणि निधाय द्विमूलेन द्वौ कुशौ प्रदाक्षणी कृत्य सर्वान्युगपत्ता नामिका इष्ठाभ्यां-तित्वा तानुत्तरतः प्रक्षिपेत् । प्रोक्षणीपात्र प्रणीतो तरतो निधाय प्रोक्षणीपात्रे पानान्तरेण प्रणीताद्धि स्तासांपोषणम् । स पवित्र हस्ते नोत्तानेन, पानप्रोक्षणम् । आज्य स्थाल्याः प्रोक्षणम् । सं मार्ग कुशानां प्रोक्षणम् || उपयमन कुशानां प्रोक्षणम् । समिधांप्रोक्षणम् ॥ सुवस्यप्रोक्षणम् ॥ श्राजस्य मोक्षणम् । धानानां प्रोक्षणम् ।। पूर्ण पात्रस्य प्रोक्षणम् ॥ प्रणीतामन्योमध्ये सञ्चरे प्रोक्षणीनिधाय । कुशोप ग्रहेण आज्यस्वाल्यामाज्य निर्वापः । आध्यापि अयणम् । ततोवल दुल्मुकेन पर्यग्निकरणम् । इतरथारतिः 1 अधिने सुवंशप्रताय । संमार्ग कुरौः संमृज्य। अप्रैमूलादारभ्याय पर्यन्तं मूलन दारभ्यमूलपर्यत प्रणीतोदशनाम्युक्ष्य ।पुनःप्रतप्य । दक्षिणतो निद ॥ (१) प्रौन्दुमरस्य या शाता फलक दय संयुता । आप पल नामायशः परि कलितम् ||२|| एता: सप्तर्विशर टुतयः प्राज्येन वत. प्रेक्षितघानामि धारणम् ।। स्तुवेण धाना अवदाय । मदमसति मतमित्य योन मरेप जुहयाच॥

[२०८ ] ग्यात याव्य मुद्रास्य । उत्तरतो निधाय तितोऽग्नः पश्चिम तो निदयात् । पवित्राभ्यामाग्यमुत्यूय । प्रोक्षणीश्चपूर्व बदुःपूर्व आध्यमवेक्ष्य । अप द्रव्य- निरसनम् । उपपमन कुशानादाय ! तिष्टन समिधोऽम्यादाय प्रोझरयुक शेपेण सपवित्र ए हस्ते नेशानमारभ्ये शान पर्यन्तं प्रदक्षिणमग्नि पर्युक्ष्य । इतरथावृत्तिः। पवित्रयोः प्रणीतासु निधानम् । सोपह सत्य हात मुनाने हदिनिधाय दक्षिण जानु निपातः ब्रह्मणोवारम्भः । दक्षिण हस्तेननुवण होमः । मनसा-ॐ प्रजापतये स्वाहा इद प्रजापतये नमम || त्यागान्तेद्रव्य प्रक्षेपः। प्रोक्षणाणीपात्र संघवधारणम्)। इन्द्राय स्वाहा । इदं इन्द्रायय नमम ॥ ॐ अग्नये स्वाहा इदमग्नये नमम ॥ ॐ सोमाय स्वाहा इदे सोमाय नमम ॥१॥ ऋग्वेदे -सप्त विशत्याहुतयः । ॐ पृथिव्यै स्वाहा इद पृथिव्यै न ममः । ॐ अग्नये स्वाहा इदमग्नये नमम । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रह्मणे नमम । बन्दोन्यः स्थाहा । इदं छन्दोभ्यो नमम् ॥ यजुर्वेदे-ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा इस मन्नरिक्षाय नमम ॥ ॐ वायपे स्वाहा इदं वायवे नमम । ॐ माणे साहा इद प्रमाणे नमम । ॐ छन्दोम्या स्वाहा इदं छन्दोभ्यो नमम |साम- वेद---ॐ दिो स्वाहा इदं दिवे नमम ॐ सूर्याय स्वाहा । इदं सूर्याय नमम । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रह्मणे नमम । ॐछन्दोभ्य स्वाहाइदं छन्दो. भ्योनमम ॥ ४ ॥ अथर्वण वेदे:-ॐदिग्भ्यः स्वाहा इदं दिग्भयो नमम । ॐ मन्द्रमसे स्वाहा चन्द्रमसे नमम । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्राह्मणे नमन । ॐ इन्दोभ्यः स्वाहा इदं छन्दोभ्यो नमम । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदंप्रतापतये नमम । ॐ देवेन्य. स्वाहा इई देयम्यो नमम । ॐ ऋपि यः साहा इदं ऋषिभ्यो नमनः ॐ श्रद्धाय स्वाहा इदं खाय नमः । ॐ मवाय माहा हुदै धाय नमम ॐ सदसपतये स्वाश इद् सदस्पतये नमम । ॐ अनुमतये स्वाहा इद अनुमतये नम: ॐ सदसस्पति- मद्दतम् प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिध्मधामयासिप स्वाहा ॥१॥ इदं सदमदपतये नमम । (म मन्त्र गुरुणायपच्यमान शिष्या आप सहानुपठेयुः । तत उदुम्पर समितिवय मनिवार्य हाते गृहीत्वा उत्याय प्रमुग्यस्तिदन्तः सवितुपरेएय० ॥ २ ॥ स्वाहा क्षमग्नये नमम । (इत्युच्चार्य एका समिधमाध्युः । एष मन्त्र द्वितीया या तृतीयाम् | a स उपपिरोयुः। प्राचार्यः पुनः । श्रुणाधाना अया m! मीयांधानावि पूर्ववत् ॐ शमवितु ॥ sh (२)ना: मप्तविंशात्या दुतयः यापन तवाधित पानामधारपार॥ सुषपाना अदा | मसाविभनिनBIRu [ २०६ ] इदमग्नये नमम ।। ततस्तिस्रोऽपराःसमिधो घृत्तेनाभ्यम्य । उत्थाय प्राङ मुखास्तिष्ठन्तः-ॐ तत्त्सनवितुष्ट ॥ ३ ॥ स्वाहा इदमग्नये नमम । ( इत्युचार्य एकां समिधमादध्युः।) पुनः ॐ तत्सवितु०॥४॥ स्वाहा इदमग्नये नमम । एवं द्वितीया। पुन. ॐ तत्सवितुः॥४॥ स्वाहा इद मग्नेय नमम ।। एवं तृतीयां हुत्वा चार्योधाना हुर्तिजुहुयात् । ॐ सद- सप - स्वाहा इदं सद सस्पतये नमः ॥ मन्त्रानुपठनं (शिष्याणा. मपि-समिन्त्रयं पूर्व वज्जुहुयात् ) ॐ तत्सवितु०॥ स्वाहा इदमग्नये नमम । एवं द्वियीयां। ब्रह्म चारीतु । शिष्योऽहर हरग्नि कार्य क्रमेण समिदाधान कुर्यान न सावित्र्या । अन्यत्सर्व समानम् । ) चाना भक्षणम् (ततोया उपकल्पिताधानास्तिस्र स्तिस्रोगृहीत्वा)-ॐ शन्नोभवन्तुव्वा- जिनो वेषुदेव तातामितद्वः स्वाः । जम्भयन्तोहिंन्कड़: रक्षा .सि सनेम्म्यस्म्म्यहयुयवन्नमीवाऽः ||६॥ इति मन्त्रणदन्तै रस्वा दन्तः प्राश्नीयुः ।। ततो-द्विराचनम् ) दधिभक्षणम्'-दधिक्राव व्णोऽ अकारिपजिष्णोऽरश्श्वश्यवाजिनः। सुरभि नो मुसा करत्तःप्रण आयुध पितारिपत् ॥ १० ॥ इति मन्त्रेण दधि भवेयु.)। द्विरचमनम् । (तत आचार्यो यावन्तशिष्यगणं आत्मन इच्छेत्तावतरितलान्गणयित्वा आकर्षफलकेना वदाय )-ॐ शुका ज्योतिरश्त्र । चित्त्यन्योतिम्श्च सत्त्यज्योतिश्च ज्योतिष्मांश्चशुक्राश्चऽऋतपावात्यहा||११॥ इत्या धनु वाकेन सावित्र्या वा जुहूयात् । ॐ तत्सवितु० ॥ १२ ॥ स्वाहा इदं सवित्रे न मम ।। (सं सवप्रक्षेपः । ततो धानाभ्यः स्विष्टक )- ॐ अभ्नयेस्विष्ट कृते स्वाहा इदमग्मयेविष्टकृतेन मम ॥ भूराद्या नवा दुतयः'-(प्राज्येन जुयात् । सर्वत्र त्यागान्ते द्रव्य प्रक्षेः । वद्यथा- ॥१॥ ॐ भूः स्वाहा इदमग्नयेन मम ॥२॥ॐ भुवः स्वाहा इदं वायरे न मम ॥ ३॥ ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न मम ॥ ४॥ ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडोऽ अवयासि सीष्ठाः। यजिष्ठो अहितमः शोशुचानो विश्वा द्वेपा सिप्पमुमुगध्य स्म्मत्वाहा ।। १३ ॥ इदमग्नी रुणभ्यां न मम ॥२५॥ सत्त्वन्नोऽ. अग्ने वमो भवोती नेदिष्ठोऽअस्याऽउपसोव्युष्टी। अब यत्व नोवरुण रराणोधीहि मृडोक सुहवो नऽएधिस्वाहा ॥ १४ ॥ इदमग्नीवरुणा भ्यान मन ॥६॥ अया श्चाग्नेस्यनभिशखिपाश्च सत्यमित्वमयाs असि । अया नोयज्ञ वहास्यानोधेहि भेषज । स्वाहा । (सौरमन्त्रः)। इदमयाय न मम । [ इद मग्नये अयसे न मम इवि ] केचित् ।। येते शतं घरुण ये सहस्रं यज्ञयाः पाशा वितला महान्तः। तेभिनोंड. अद्य सवितोव विष्णु विश्वे पुरस्चन्तु ममतः स्वः स्वाहा ।

ॐ [ २१. ] [ सौत्रमन्तः । इदं वाय सवित्रे विष्णने विश्वेभ्यो देवेभ्यो मह. द्यः स्वभ्यश्च न मम ॥ ॥ उदुत्तमं व्यरुणपाश मल्मवाधर्म- विमध्यम ७ श्रथाय । श्रया अयमादित्य व्रते तवा नागसोऽअदिव ये स्याम स्वाहा ।। १५॥ इदमादित्यायादिवये न मम ॥ ६ ॥ उपांशु । ॐ प्रजापतये स्वाहा इद प्रजापतये न मम । [ संखव प्राशनम् ] भाव मनम् । पवित्राभ्यां मार्जनम् । पानी पवित्र प्रविपत्तिः ॥ ब्रमणे पूर्ण पानदागम्,-यथा,मन् अस्योपाकर्मयोग तयाविहित पूर्ण पात्र प्रति गृयताम् । ॐ द्यौस्वाददातु पृथिवीत्या प्रतिगृहातु इति मन्त्रस्य ब्रह्मा अपं कुर्यात् । (प्रणीता विमोकः । ततोऽग्निमुत्तरेण कुशेषु प्रत्यद, मुम्यो पविष्टे-य. शिष्येभ्यः प्राइ मुस आचार्य: अकारमुक्त्वा विश्व सावित्री मनु ज्यान )-यथा-ॐ तत्सवि० दयान ।। ( इति निः) इवेत्यादि ईशावास्यान्तम् । नव मुपैयन्नित्यादि सरमन्त्र ब्राह्मण योध्यादि प्रत्यात् । वह चापिमुसानि । पर्वाणि छन्दोगानाम् । सूक्ता न्यपणा नाम् । (एवं स पठित्वागुरुः शिष्याश्च जपन्ति ) । सहनोस्तु, सहनोतु महनऽहद वीर्य वदस्तु ब्रह्म इन्द्रस्तद्वदे येन यथा न विद्विषामहे ।। इतिमात्र जपित्वा वि राममध्ययनं लोम नसा नमान कृन्तनमयपनं च करिष्या महे ॥ इति सवे पा सकरपा १ ) प्रागुत्सर्ग द्वा नियमो लोमनख निकृत्तनम् । उत्सां वधि लोमनखा नाम ऋन्तन मह करिष्ये इति । छन्द सामुत्सर्गाप्राइ मन्त्र प्रामण योरध्ययनम् ॥ इत्पु पाकर्म प्रयोगः॥ अथ तीर्थ श्राद्ध विधिः वाचष्यवीः-श्राद्धया दीयते यस्मात् श्राद्धं येन निगद्यते । नित्य नैमित्तिक काम्य वृद्धि श्राद्धतथैवच ह पाण चेति मनुना श्राद्ध पञ्च विध स्मृतम् ।। अहन्नेकादशप्राप्ये पाणन्तु विधीयते । तीपुत्रामणा नैव परीक्षेत कदाचन ।) अन्नाथिन मनु प्राप्त भोज्य सतमि पिएटदानं च संयाये पायस न वा ! कर्त्तव्य मृपिभि दिप्ट पिण्या फेन गुडे न वा ॥ देय तिलपिण्या शक्ति मन्दिर नरेः सदा ॥ पाढेतु तर कर्तव्य मर्यायाइन वर्जितम् ।। अथ पार्वण तीर्थ श्राद्धम् अथ तोच कन्यता पूर्व तीर्थ प्राप्ति काल एवं वीर्थ साष्टांग प्रणम्य नारिकेज फन पुमा सवादिक श्रादाय अमुक तीर्वाय नमः इति निवेश ॐ सरेण नी पृष्टया ॐ नमोस्तु देव देवाय शिति एटाय पिडने रुद्राक्ष पाप हस्ताय पनिऐवेधसे नमः । सरखनी च मनुर प्रर्वात् ।

[ २११ ] सावित्री वेद माता गरीयी। सन्नि धात्री भवत् वत्रः तीर्थे पाप प्राणा- शिनी ॥ तीक्ष्ण द्रष्ट महाकाय कल्यान्त दहनो पम ।। भैरवाय 'नमस्तुभ्य मनुज्ञा दात्तु मर्हसि ॥ इति मन्त्रेण क्षेत्रपाल गणेशं च नमस्कृत्य सचैलें लायात् ।। तत. विधिना पूर्ववत् तीर्थस्नानं देश काल कीर्त नान्ते यथो. कलायात् ॥ इति स्नायायात् ।। इति स्नात्वा ।। प्रायश्चित्तार्थे गो भू हिरण्या दिकं दद्यात् ।। क्षौर कुर्यात्-तत्र मन्त्रः-यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्या समानिच । केशानां नित्यतिष्ठन्ति तस्मात्कैशान्वपाम्यहम् ॥ ततः प्रथम दक्षिण कर्ण मास्म्य वामकर्ण पर्य्यन्तं उदकं सस्थम् केशववप- नम् । तत.श्मश्रु लोम नखा ग्राणा क्रमेण वपनम् । उतानां केशादीनां जले गर्तेवा प्रक्षेप. ततः मृत्तिका स्लायात् तत्रमन्त्र...ओं अन्व क्रान्ते- रय कान्ने विष्णु क्रान्ते वसुन्धरे मृत्तिके हरमे पाप यन्मया दुष्कृत कृतम् ।। मृत्तिके ब्राह्मणा दत्ता कास्यपेयामि मन्त्रिता | मृत्तिकेदेहिमे पुष्टिं. श्री हंसकुण्ड ब्रह्मतीर्थ वइसर्व प्रतिष्टितम् ।। ओं इदं विष्णुर्वि० इतिमन्त्रोण । तत्र निभज्योन्म- ज्य जलादुत्तीर्य धोते वाससी परिघाय भस्मादीना त्रिपुण्डो पुरड्रादिक वृत्वा संध्या मुपास्य ।। तपणे कुर्यात् तत सम्पादिते रूपकरणैस्तीर्थ श्राद्ध मारभेत् तत्राय विधिः॥ श्राद्धस्थानम्.-मनु-गुचि देशं विविक्त'तु, गोमये नोप लेपयेत् । दक्षिणा प्रवण रचैव प्रयन नोप पादयेत् ।। प्राद्धस्यले देवस्य सं निधापनम्-पादमे-शिवस्य नामद लिङ्ग भामिलामशिला चयः। पोठे मस्थापयित्वा तु पादच कुरेते नरः। पितर स्वस्य तिष्ठन्ति कल्प कोटि शतदिति ।।

परिमेष्ठि नसर्गज नाशये दथ. ॥ [ २१२ ] कुशग्रहण मंत्र विरिचिनासहोत्पन्न बुद सर्वाणि पापानि दर्भ ? स्वास्ति करो भवः ।। हविर्विपये-आगो मच यच्छाधं माप मुद्ग विवर्जितम् । तैल पक्वैन रहित कृतमप्य कृत भवेत् ॥ सूतके-विष्णु स्मृती-त्रत यज्ञविवाहेषु श्राद्धे होमेऽर्चने जपे। प्रारब्धे सूतकं नस्यात् अनारब्धे तु सूतकम् ॥ विधवा कर्तृक श्राद्धम् ।। -स्वमत प्रमिति रिभ्ये स्वपितृभ्य स्वथैवच । विधवा कारये च्छाद्ध यथा काल मतिद्रिता ॥ आमान्ने नतु शूद्रस्य तृष्णातुद्विज पूजनम् । कृत्वा श्रादन्तु निर्वाप्य सजति आचम्य हरिस्मृत्वा ॥ शुक्ल वापीत वस्त्र परिधाय आशनो परि उपविश्य दीपं धृत्या तिल तैलवा प्रज्माल्यरक्षोध्नदीपाय नमः इतिसम्पूज्य [ दीपं दक्षिणाभिमुसं सस्थाप्यश्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुसं उपविश्य ] पुप्याक्षत सहित नमस्कृतम्-यन्त्रह्म वेदाम्तविदो वदन्ति परं प्रधान पुरुपस्तथान्ये विश्वोद्गते कारणमीश्वरम्भा तम्मै नमोविघ्नविनाशनाय || शुक्ला- वर धरं विष्णु शशिवर्णं चतुर्भुजम् ॥ प्रशन्नवदनध्यायेत् सर्व विनो पशान्वये इति नमस्कृतम् ॥ स्ववामभागे गन्धादिना भूमौ चतुष्कोण मएडलं विधाय तत्र शङ्ख चक्र च १४ । विलिख्य तत्र कुशानास्स्तीर्य वा यमुष्टितण्डलधृत्वा तदुपरि कर्मपात्र सस्थाप्य | ताम्रीय सद्ग] पाने पविनम्-दक्षपाणिने-ॐ पवित्र स्थीवैष्णव्यो सवितुर्व:सव उत्तपुनाम्न्यछिद्रेणपवित्रण सूर्य्यस्य रस्म्मिभि. तस्यते पतिपते पवित्र पूतस्य यत्तकामपुने तक्षकेयम् ॥ इति मन्त्रेण पवित्र क्षिपेत् स्त्र दणि हरता नामिकाया पवित्र स्थ इति मन्त्रेण उश पवित्री मय धारयेत् ।। पाने च शन्नोदेवीति जलम्-ॐ शन्नौदेवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतय शय्यौरभिश्रयन्तुन. इति मन्त्रण पानेतु जलक्षिपेत् ॥ इति मन्त्रातात् यमोसीति ययान्--ॐ यगोसियवयास्मद् द्वेपो यवयारातिदिव त्त्वान्तरिक्षायत्त्वायिये त्वा शुन्धवानो पितृपदना पितृपदन मसि ।। इति यवाक्षिपेत् ।। विलासीति ठिन्लान् विलोपी सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मित प्रत्नमद्धि पृङस्वययापितन्नोकामीणाहिन स्वाहा इनितिलानन्दिपत् । तत्र वरुणा गहन उर्यान-श्रावाहयाम्यह देवी मात्या लोक्यमातरम ॥ यस्या स्मरणमायण मर्वपाप प्रणामनम ।। मुंय व चमणी देवना दहाच्च दाविष्टम् प्रविष्टितोपरदोभर ॥ गन्धाधत (मगरात्र) चतपुप्पादिभि. णिनिक्षिप्य । गन्धद्वारेति ग-मम । श्री मनिष ॐ म पात्र मु मम्पन्न मन्तु । प्रतिपक्षणा [ २१३ j पृच्छेत् । अस्तुसु सम्पन्म मिति यजमानोत्रूयात् ] प्रतिववचनम् ॥ ततः तज्जलेन ॐ अपवित्रः पवित्रो या सर्वा० इति मन्त्रण श्राद्धीयवस्तना- स्मानां च सिंचेत् पुण्डरीकाक्षस्मृत्वा इतित्त् श्राद्धदेशे सामाग्री प्रात्मानं च सम्प्रोक्ष इति ॥ ततःकुशादिक श्रादाय ॐ अद्येत्यादि प्रधान सङ्कल्य सिद्धिरस्तुदेश काल कीर्ति नान्ते अमुक गोत्राणा मस्मपितृ पितामह प्ररिता महानांममुकामुक शर्माण या (ब्रह्माणां या गुप्तानां ) यथायोग्य सपत्नीकानां वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां अक्षय तृप्त्यर्थं पार्वण श्राद्ध विधानेन धूरि लोपन सज्ञक विश्वेदेव पूर्वकं अमुक तीर्थ प्राप्त निमित्त सपिण्डक मामानं तीर्थ श्राद्धं करिष्ये ।। ॐ कुरु चेति प्रत्युक्तिः ॥ ॐ देवताभ्य पितृभ्यश्च महायोगीभ्य एव च ॥ नमः स्वधायै स्वाहायै नित्य मेव नमो नमः इतित्रि । सप्न व्याधादशाणे पुमृगाः कालजरे गिरौः चक्रवाकाशर- द्वीपे हसा सरसिमानसे। तेपि जाता कुरुक्षेत्र ब्राह्मणा वेदपागाः ॥ प्रस्थित दीर्घ मध्यातंयू यं किमवतीदथः ॥ श्राद्धारम्भे गयांध्यात्वाध्यात्या देव गदाधरम् । उभाभ्यांचनमस्कृय ततः श्राद्ध समाचरेत् ॥ गया गया गयादित्यो गायत्री च गदावरः गया गयासुरश्चैव पड़गया मुक्तिदायकाः ईशान विष्णु कमला सन कार्तिकेय वह्नित्रयार्क रजनी शगणेश्वराणाम् ॥ क्रौंचामरेन्द्र कलशोद्भव कस्यपानां पादान्नमामि सततं पितृ मुक्तिहेतोः ।। ॐ गयायै नमः ॐ गदाधरायैनमः। ततः कृष्णकन्यमिदं रक्षमदीय मिति अपसव्येन दिगबन्धनं कुर्यात्-तिल सहित मोटकं आदाय तिलान् पूर्वादिकमेण विकिरेत् ओं अग्निध्यात्ताः पितृगणाः प्राचीरक्षन्तु में दिशम् ।। अपहता असुग रक्षा धसि वेदि पर! तथा वर्हि पद यान्तुयाम्याये पितरः स्थिता ॥ अपहता असुरा रक्षा सिव्वेदिपदः ।। ओं उदीची मपि सोमपः पितरः यान्तु ।। अपहता असुरा रक्षा | सिम्वे. विपदः ओं अध्वं तस्त्वर्यमा रक्षेत्कव्यवाडनलोप्यधः ओं रक्षोभूत पिशा. चेम्य स्तथैवाऽसुर दोषतः।। सर्वतः श्चधिपस्तेपां ।। यमो रक्षा करोतुमे ।। इति मन्त्र स्विलाविकीर्यदिगबन्धन मोटक मनेन वक्ष्यमाण मन्त्रण वाम कट्यांधारेयत् ओं निहन्मि सर्व पदमेध्यवद् भद्धतारचसर्वेऽसुरदानवामया ।। रक्षांसि यज्ञाः स पिशाच गुह्यकाहता श्रादे वैश्व देव --पाजुषा:सामगाः पूर्व प्रादमध्ये पर्वणःपहिचाः भादशेषेण कुर्युर्ववैश्वदेवकम् ॥ वैश्वदेवम् ॥ श्देव अङ्गली प्रमाणे माघ अनि:--निर्यग्यवोदरान्वष्टा वावद्विवस्त्रयः । अङ्गुलीः सेव विशेयः श्रोते स्नाते च कर्मणिः ॥ इति वचनात् ॥ भार्यारजस्वला सत्वे-दिन चतुष्टयं प्रति पालयेत् । रजस्वला वोर्थे देवमन्दिरादोस्वमदिनेन गन्तव्यम् ।।

मरम { २१४ ] मया यातुधानाश्च सौ इति । ततस्तिल सहित कुशवयं गृहीत्वा-श्यान्तु दूरतः सर्वेद तेयादानवास्तया ॥ सर्व विनो पशान्त्यर्थं क्षपामिया कुशा लिलान इति मन्त्रण दक्षिणस्या क्षिपेत् ।। ततः सम्य-कृष्ण हव्य मिदं रक्षमदीय इवि सव्यं कृत्या हरि मरेत् श्री नमो नमस्ते गोविन्द पुराण पुरुषोत्तम । इदं आई हपी केश! रक्षतां सवतो दिश. । अथा सनम् --ततः सव्येन कुशादिक मादाय ओं अोहामुक गोत्राणा रिपतृ पितामह प्रपितामहानाममुकामुक মামা। [प्रहार गुप्तानां ] यथायोग्यसपत्नी कानां वसुरुद्रादित्य वाणां वया द्वितीय गोत्राणामस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महाना अमुकामुक शर्माणा यथायोग्य सपनो कानां वसुरुद्रादित्य स. पाणां श्राद्ध शम्यन्धिनाधूरि लोचन शज्ञकानां विश्वेषां देवानामिद मासन मस्तु । इदं कुशरूप श्रासन भास्थता आस्ये इत्यासनंदया। ताः अचनम् ~कुशोसि कुशपुत्रोसि बाहरणानिमितः पुरा । त्वयाचितः सोचितोस्तु यस्याई नाम कीर्तये ॥ पूर्वयन् अस्सयन मोटा मादाय-ॐ अयेहामुक गोत्राणामस्मपित पितामह प्रपिता महाना- ममुका मुकामुक शर्माणा [ ब्रह्मणा-गुप्तानां ] यया योग्य सलो का न घसुरुद्रा दित्यवरूपाणं तथा द्विताय गोत्राणा मस्मन्माता- 4 সনাপন্থর মাঝামাল মুন্ডামুয়ালাবা ননী চান। वगण प्रजापत्यग्नी स्वरूपाणा अद्य कर्तव्यामुक तीर्थ आद्धे इदं मोटक रूप मासन पीढ़ा विभज्य युष्मन्य स्वधा, इदं मोटक रूप ग्रामन श्रास्यता प्रास्ये इत्यासन दया । ततः सव्यन ॐ कुशोसि कुश पुरोसि ब्राह्मणा निर्मितः पुस । त्वर्चितः सोपितोस्तु यस्याह नाम कामयेति श्रयिभ्य इति पृष्ठवा ॐ अर्चयति प्रत्युक्त ॐ नमोस्व नन्ताय सहस्रमूर्तयति मन्त्रेणगन्ध पुष्पाक्षत धूप दीप नैवेद्यादिभिः सम्पूज्य । मुशादिक मादाय ॐ मस्मगित पितामह पपितामहानामगुफा मुकामुक शर्मा ( अक्षणा गुप्ताना ) यथा योग्य मग्नीका नावसु रुद्रादित्य स्वरूप मां भास मम्बन्धिनोविश्वदवा भूमि मोचन नामानः पान्धर्चना ग्याध पुष्पा तत्तयरा रूप दीप यज्ञो पपीत पासासि को नमः ॐ अर्चन. यी मा परिपूर्ण मस्तु इति जलं दधात् अस्तु प्रति घनम । In अरमध्येन ॐ अविष्ये इति पित् प्राणां पृथ्स - प्रयति प्रत्युतः नन्यादिमि सम्पूरा धूप में कार येन् । पित आम सम्स्य || मैं पिट पितामह प्रपितामहान यथा योग्य सपनो फेभ्यो नमः । माँ नमार: मामामह प्रमातामह व प्रमाना• अधामुक गोनाया 1 | सत्यन [ २१५ मदाना यथा योग्य सपनी का ना तथा च प्राप्त समस्ताना पूजन कुर्यात् ॥ कुश मोटकादिक मादाय ओं अद्यामुक गोत्रा अस्मपित पितामह प्रपितामहा अमुकामुकामुक शर्माण (ब्रह्मा गुप्तो) यथा यथा योग्य सपत्नीका वसु रुद्रादित्य स्वरूपा तथा अमुक गोत्रा अस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महा अमुकामुकामुक शर्माण यथायोग्य सपत्नी का वरुण प्रजापति अग्नि स्वरूया अद्य कर्त्तव्या मुक तीर्थ श्राद्धे एतान्यर्चनान्यत्र गन्ध पुष्पाक्षत ताम्बूलपूगीफरा यज्ञोपवीत धूप दीप नैवेद्यादीनि पोढा विभज्य युध्मभ्य स्वधा इत्यु स्नेत् । ओं अर्चन विधे सर्वपरि पूर्ण मस्तु इति जल दद्यात् ओं असु परिपूर्ण इति प्रति वचनम् । अब अन्नसकल्प सोपस्कर मन्न सम्प्रोक्ष्य सोपस्कर यब जल धृत मधुयुत मन्म उपनीय मधुनामिधार्य ऋजुहस्ताभ्या अन्न पात्र आलभ्य पृथिवीते पात्र चोरपिधान आहरणस्य मुझे अमृते अमृत जुहोमि स्वाहा । इट विष्णुविचक्रमे धानिदधे पदम्, समूढ मस्य पा. सुरेखाहा । ओं कृष्ण हव्यमिद रक्ष मदीयमिति पठित्वा । ओं इद अन्न इति अन्ने इमा आप इति जल इद माज्यइति घृते ॥ इद हविरिति पुनरन्ने एतानि उपकारणानि इति क्रमेण अन्न जल घृतेषु विन घरे दक्षिणा ङ्गठनिध्य ॥ ओं यवोसियवयास्म द्वेषो यक्वारितिमन्त्रण यवानोपरि विकीर्य कुश यव जलान्यादाय-वाम हस्ताङगुल्यङगुप्टें क्रमेयानमापश्चपृष्टवा ओं अद्यामुक गोत्राणामस्मत् पितृ पितामह प्रपितामहानाममुकामुकामुक शर्माण। (ब्रह्मा गुप्तो) यथायोग्य सपत्नी का ना वसुरुद्रादित्य स्वरूपारणा तथा द्वितीय गोत्राणा अरमन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महानाममुकामुकामुक शर्माण यथा योग्य सपत्नी का ना वरुण प्रजापति अग्नि स्वरूपाणा श्राद्ध सम्बन्धिभ्य धूरि लोचन सझक विश्वभ्य देवेभ्य इद मन अमृत स्वरूपए सपद्यता न मम स्वाहा ॥ इति कुशादिक उत्तसनत् ॥ अपसव्यन ।। सोरस्कर विल घृत मधुजल युत मन्न उपनीय मधुना विधार्य अधो मुसाभ्या व्यस्ताभ्या पाणिभ्या अन्न पान श्रालभ्य पृथिवीते पात्र द्या रविधान नामस्य मुसे अमृते अमृत जुहोमि इ. विष्णु- विचामेत्र धा निदधे पदम् सम्द मस्य पा. सुरेम्वाहा औं छप्पण कच्यमिद रक्षमदीय इवि पठित्वा ओं इद अन्न ओं इमा आप ओं इद आज्य श्रों इन इविरिति पुमरने । ओं-वा न्युपकारणानि क्रमेण अन्न जल पृतेषु विप्र दक्षिणा नष्ट निप्य । श्रओं प हना असुरा रक्षा में सिल्वेदिपद इति नाझरणा नाम प्रतो भूभाये।

{ २१६ ] तिलान् विकीर्य मोटका दीन्यादाय वाम हस्ताङ्ग गुलिभिः क्रमे मान्नं अपश्च स्पृष्टवा ओं अद्य हामुक गोत्र भ्यः अस्मास्पिन पितामह प्रपितामहेभ्यः अमुकामुकामुक शर्मभ्यः [ ब्रह्मा-गुप्तेभ्यः ] यथा योग्य सपत्नी केभ्यः वसु रुद्रादित्य स्वस्येभ्यः तथा द्वितीय गोत्रेभ्यः मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमावामहेभ्यः यथा योग्य सफ्नी के भ्यः वरुण प्रजापति अग्नि स्वरूपेभ्यः इद मामानं सजलं सोपस्कर परि विष्ठं परि वेक्ष्यमाण मश्य तृप्ति हेतोस्तेयथा यथा भाग विभन्यभुज्यतो स्वधा ।। इति पितृ ब्राह्मण समीपै मोटकादिकमुस्ट, जेत् । सकृत् अपोदत्त्वाः ततः सव्ये न देव ब्राह्मण करयोः श्री भवन्तौ प्राशयन्तो मित्य पोशान वैश्वदेव प्रामण जलं दद्यात् ।। अपसव्येन भवन्तः प्राशयन्तु इति पित प्रामणाय जलं दद्यात् ।। अन्नहीन क्रिया होनं विधि हीन च यद्भवेत् तत्सर्व मछिन मन्तु इति जपेत् ॥ सव्येन गायत्री जपित्वा ओं मधुव्याता ऋत्तायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीनः सन्स्योपयो । श्रओं मधुनरक मुतोपसो मधुमन् पार्थिव रजः!! मधुयोर- स्नुनः पिताः ।। ओं मधुमान्नोठवनस्पतिर्मधु मॉः अस्तु सूरयः । मादी वो भवन्तुनः ॥ श्रओं मधु मधु मधु होते पत्तिा। यों अन्नहीन क्रिया होनं विधिहीन चयद्भवेत् । तत्सर्व मछिद्र मस्तुश्रीभास्करस्य प्रसादतः ।ओं नमस्तुभ्यं विरुपात नमस्तेऽनेक चक्षसेः । नम पिनाक हस्ताय वहस्ताय वै नमः इति पठेत् ॥ यथा सुखं जुपध्वम् इति वचना नन्तरं ते वाहाणा मोनिनो भूत्वामुजीर संशया च भक्ष्यं प्रार्थयेयुः ।। ततोदर्भेष्वासीनः गायत्री मधुव्याता इत्यादि ऋवम् ओं मधु मधु मध्वीति च जपेत् । तनः अगुवपाजः मिति रक्षोग्नी ऋचं पठेन [ अप्रेद्रष्टव्यः ] ततः स्तिजा नभूमोनिया श्री उदीरता मित्यादिपित मन्त्रान् भो सहस्र शी स्यादि पुरुष मूकम् ओं आशुः शिशानू इत्यादि कम प्रति रथं मधुचाता इत्यादि पितृसूक्तये नमस्येऽह इत्यादि विय.पविनाणि अप्रेट्रष्टव्यः) यथा शक्तिजन् । नमस्तुम्धविरूपाद नमस्ते कचनमः पिनास हस्ताय का इम्ताय नमः ॥ इविपटेन अन्यहायिदिन गोवादि पारायणं पटेन ॥ अपसव्येन पिएउहानार्थ येदिका निर्माण ओं ये पाणि प्रतिमुश्यमाना अमुराः मन्नुः स्वधयारवरन्ति । परापुर्ण मिगुरो रे भन्यग्निॉल्लोकान प्रागुदात्यम्मान इति मन्त्रण चलनुशार भ्रामयि-या । तद्गार दक्षिण विपन् । ततः पिण्डिकायां रेरा करणा-यामेन पाणिनो दर्भ पिन्जली गोडा मध्येन अागृहोत्या- अपना असुर रमासिका दिपा। इति दधिणामां रेखां हवावां मुनर नादिया, लता जलेन भी शन्नो देशोरिनि पिरि आसिन्य, नदंनुदिनाल मशानाम्नीय, [ २१७ ] सव्येन ओ देवताभ्य इतित्रि. पठित्वा अपसव्येनयवपिष्ट मयान् पिण्डान्निर्माय-मोटकादिक मादाय ओं अद्यामुक गोत्रअस्मत् पित अमुक शर्मन् [ब्रह्मा-गुप्त ] वसुस्वरूप अमुक तीर्थ श्राद्धे पिण्डस्थाने अत्रावने निवतेस्वधा । एव पितामह. प्रपितामहा (अम्बात्रिय) मातृ पितामह प्रपितामध(सपलजननी )मातामहप्रमातामहा वृद्वप्रमातामहा एतेसस्त्रिय ली-पुर-पुत्री-पितृव्य सत्री मालसपत्नीक. स्वभ्रातासपत्नीक पितृ स्वपा- सापि अपत्यधवयुक् सापत्या सधवा, मातृप्वसा-आत्मध्बसा-श्वसुर. गुरु-शिष्या आप्तमित्राणि-मस्त (अब शस्त्र-वाहनादि ) पितृभ्यो वसुस्वरूपेभ्य आद्यकर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्धे पिण्डस्थानेऽअत्रावने निवते स्वचा इति अवने जन छिन्न मूल कूशोपरिदद्यात् ॥ तत सव्येन भो ब्राह्मण युष्मदनुजया एिण्ड प्रदान महौं करिष्ये इति परने औं कुरुत्वेत्यनुज्ञात ॥ आसव्येन यव पेन्टमयान निर्माय पिएड मोटकादि सहितप्रथम पिएड आदाय-ओंअोहेत्यादि पूर्व सकल्पमुधार्य अमुक गोत्र अस्मपित अमुक शर्मन् (ब्रह्मन् वागुप्तो) वसु स्वरूपाय कत्तव्य अमुक तोथश्राद्वे एप पिण्डोरअमृत तरूपोऽक्षय्य तृप्तिहोतोस्ते स्वधा। इदमुद्रक गागम्-ओं गङ्ग चेत्यादि गगा जलम् । ओं अद्य हे त्यादि पूर्व सकल्प मुच्चार्य अमुक गोत्र, अस्मपितामह अमुक शर्मन् रुद्रस्व- रूपाय कर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्ध एप पिण्डो अमृतस्त रूपोऽ अक्षय तृप्ति देतो स्ववा। इद मुदक गागम् ॥२॥ ओं अद्य देत्मादि पूर्व सङ्कल्पमुच्चार्य अमुक गोत्र अस्मत्प्रपितामह अमुक शर्मन् आदित्य स्वरूपाद्य कर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्धे एपपिएडो अमृतस्तरूपोऽअक्षय तृप्तिहेतोस्ते स्वधा । इद उदक गागम् गमेश्य यमुनेत्यादि ॥३॥ ओं अोहे त्यादि पूर्व संकल्प सिद्धि रस्तुअमुक गौत्राये अस्मन्मात्र. अमकी देवी गायत्री स्वरूपे (सापत्ये ) अद्य कर्तव्य अमुक तीर्थ भाद्धे एप पिण्डौ अमृतस्त रूपेऽक्षय तृप्तिहेतोस्ते स्वधा। इद मुदकं गागम् ।। ओं प्रद्यहे त्यादि पूर्व सकल्प सिद्धिरस्तु अमुक गोत्राचे अस्मन्पितानही अमुकी देवी (सापत्याची).सावित्रीस्वरूपेऽय कर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्ध एप पिरडोअमृत स्वरूपे अक्षय तृप्ति हेतोस्ते स्वया, इदनुदक गागम् ॥ ओं अथेहेत्यादि पूर्ण सकल्प सिद्धिरस्तु अमुक गात्रायें अस्मस्त्रपितामहो अमुको देवी ( सघवादेव्यै ) सरस्वती सरूपे अद्य कर्तव्य वीर्य श्राद्ध एप पिएडो अमृतस्व रूपे अक्षम तृप्ति हेनोस्त स्वधा ॥ एव सपत्न जननी !! इद मुदफगागम् गगे चेत्यादि । द्वितीयम् प्रों अहे त्यादि पूर्व साल्प मुशाय अमुक गोना अस्म-माता मह अमुक रामन यया योग्य सपनोकर वसु स्वरूपाय [ २१० ] कर्तव्यं अमुक तीर्थ श्राद्ध एप पिण्डो अमृतस्तरूपो अक्षय तृप्ति है चोस्ते खया इद मुदक गागम् ॥ ओं अद्य हे त्यादि पूर्व साल्प मुसार्य अमुकगोमाः अस्मन्प्रमाता मह अमुक शमन यथा योग्य सपत्नीक वमु स्वरूपाध कर्तव्य अमुक तीर्य श्राद्ध एवं पिण्डो अमृत स्वरूपों अक्षय तृप्ति हेतोस्ते लगाओं अहे त्यादि पूर्व सपमुच्चार्य अमुक गोगाः अस्मन्वृद्ध प्रमागमइ अमुक शर्मन् यथायोग्य सपत्नीक वसु स्वरूपाय कर्त्तव्य अमुक तीथं श्राद्ध पप पिण्डो अमृत स्वरूपो अक्षय तृप्ति हेतोस्तेन्वया । इद मुदक गागम् गगे चेत्यादि तीर्थ मन्त्री एः ॥ एरवी वनयादि पुत्र पुथ्योऽपि पितृन्य ज्येष्ठ कनिष्ट यथायोग्य सपनोकः, मातुन. मोऽपि सन्नी, १वसा-मातृप्सा बारमहरसा (यथायोग्या. ) जायापिताः गुरू शिष्या. भातमित्र समस्त पितृम्य वाइन अख शबादि, आद्यकर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्ध एपपिण्डो अमृत- स्वल्पोऽअक्षय्य तृप्तिवोस्तेन्यया । इय भूमिरिति । इद मुनक गागम् गगेचेत्यादि तीर्थ मनोष पुन एक पिण्डमादाय--श्री मात्रमणो ये पितृ वश आता मानुस्तद्या वश भवामदीयाः । कुल द्वये ये ममदासभूता भृत्यास्तवाश्रित सेवाश्च मित्राणि सख्य, पशवश्च वृक्षा पृष्टारच दष्टाश्च तो पकारा. जन्मानरे ये मम सगताच तेम्य स्वधा पिण्ड मिर्म ददामि तिला । पुनरपर पिण्डमादाय रे पिता पितामहरव तथैव प्रपितामह । माता पितामही पैर तयैव प्रपितामही । मातामहा वारिप- वाचप्रमाता महवा दय । तेभ्यो पिएडो मयादत्त म्यवय्य युपतिष्ट्वाम इवि दत्ता ॥ दत. पालतकुश मूखन ओं लेन मागिना भय भागास्तु इति लेप भागिन्य. प्रवि पशि लेप भागं च, दद्यात इति कर प्रोक्ष्य मयं कृत्वा द्विराचम्य हरिस्मरेत् वन अपमन्याने प्रत्यपने जनम् । मोटरमादाय ओं अधामुक गोत्र अस्मलित. अमुक शर्मन रसु स्वरूप अद्य कर्तव्य अमुक तीर्थ पाढे पिण्डे प्रत्यवने अनन्ते स्वधा, एवं इति दवाऽन्येभ्योपिपिरद प्रत्याने अन इत्या दन्येन श्रावस्य प्पाक्षत गृहोस्या उत्थाय ओंध पितरी माद यचं यथा भागमा अपायध्वम् पनि उत्तपनि मुग पटिया स्माम नियम्य भाकार मूर्तीन पियाध्यापन -ॐ अमामवन पिनो यथा भागमा पायिपन इति पठि स पुष्पादिकानि पिण्डोरिनिपिन् । नीरा सिस्य । मध्यन मावस्य हरि स्मरे मामयन मुआण्यादापयामेन पानिान सूप दुनियन चादाय नमोर. वित रसाय नमोर ति: शीपाय नाः पितरा बीमार नमोर पितर. स्त्रयायै नमोः पितरो पोराय नमोर. पिवरी मन्यो नमोर पिता पितरो नमो योगहान्ना पितरोत दाम पि पियाम इति मन्येण प्रत्यक पिन्नी परिसूर्य [ २१६ ॥ दद्यात् । वतः क्रमेण प्रत्येक पिण्डान् गन्धादिभिः सम्पूज्य धूपदीप नैवे. धादि निवेद्य ॐ पितृ पितामह प्रपितामहेभ्यो नमः ॐ मातृ पितामह प्रपितामहिन्योनमः ॐ मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महेभ्यः अमुका मुकामुक शर्मेभ्यः सपत्नी केम्यः वसु रुद्रादित्य स्वरुपेभ्यः तथाः अन्यन्यः आसमस्तेभ्यः दत्त पिण्डेभ्यः प्राधकर्तव्य अमुक तीर्थ श्राद्धभ्यः एतानि पिण्डार्चनानि अन वल सूत्र गन्ध पुष्पाक्षत धूप दीप उपायन द्रव्य नैवेद्य साम्बूल यज्ञोपवीत वासासि अनेकधाभागं विभज्य युष्मभ्यः स्वधा ॥ इति पिण्डे उत्सृजेत् । ततः आशिपः प्रार्थयेत् सव्येन ॐ गोत्रन्नोवर्धताम् ॐ वर्धत्ताम् इति प्रति ववनम्। ओं दातारोनोभिवर्धताम् ॐ वर्धन्ताम् । ओं वेदावर्धन्ताम् । ॐ सन्तति वर्धन्ताम् ।-ऑवर्धन्ताम् । श्रद्धा चनो माव्य गमत् ॐ मागात् ॐ वहुदेयं चनोस्तु ॐ अस्तु । ॐ अन्नं चनो वहुभवेत् ॐ अतिर्थी श्चलभे महि । ओं लभभ्यम् । ॐ याचिचारश्चनः सन्तु ओसन्तु । स्व विलकं सत्वा नुष्टान सन्पन्नाः सर्वदा यज्ञ चुद्धय. पितृमात पपश्चैव सन्त्वस्मत् कुलजा नरा । ॐ यं कामंकाम- यते सोस्मै काम समृध्यतां मिति ब्राह्मण हस्तेनस्व तिलकं [ देव ब्राह्मण (वेश्वदेव ) स्पर्शन पूर्वकं ] कारयेत् । ततः अपसव्येन ॐ स्वधावाच यिष्ये ॐ वाच्यताम् । रिकाजलिना ॐ अद्यामुक गोत्रेभ्योऽऽस्मपित पितामह प्रपिता महेभ्योऽअमुका मुकामुक शर्मभ्यः यथायोग्य साली केभ्यः वसु रुद्रादित्य स्वरूपेभ्यः । तथा अमुक गोत्रेभ्य. अस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमाता महेभ्योऽमुमुकामुक शर्मभ्व यथायोग्यस सपत्नी केभ्यरसुरुद्रादित्य स्वरूपेभ्य तथा अन्ये म्यश्च समस्तेभ्योदत्त पिएडेभ्योः । अमुफ तीर्थ श्राद्धेभ्यस्वधोच्यताम् ॐ अस्तु स्वधा । ॐ ततः सपयस्क पुटक वाम हस्ते कृत्वा ॐ ऊर्जवहन्ती रमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयन् मे पितृ न् । इति दक्षिणप्रां पयोधारां दवा पृच्छत् । ओं रिएडाः सम्पन्नाः ओं सुसम्पन्ना ओं पिण्डान्नुस्थाय यामि, ॐ उत्थापयस्व । उतः नम्री भूय पिएडान सव्येना ग्राह्य । अपसन्ये- नोत्थापयेत् । पिण्डाधार कुशानुल्मुक च वीक्षिपेत् । पिण्डिकायां शङ्खचक्रं च ७४ विलिख्य ॐशखायनमः । ॐ वाय नमः । ॐ शंख चक्राम्यां नमः इवियवैः अपसन्येन पिण्डान् पिपिएको परि निधाय गयायां पितृ रूपेण स्वयमेव जनार्दनः त दृष्टवा पुण्डरी कादं मुच्यते च ऋणत्रयात् इतिः सव्येन पूजयेत् ॐ वसन्ताय नमस्तुभ्यं प्रीष्मायच नमो नमः ॥ वर्षापरच शरत्संज्ञ ऋतवेच नमोनमः। हेमन्ताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शिशिरायच । मास सम्वत्सरेभ्याचदिवसेभ्यो नमो. नमः || इति वसन्तादियड् 'तुम्यो नमः एवं दक्षिणाद्रव्याणि प्रादाय पूलवेत्-हिरण्य गर्भ गर्भस्य हेमषी दहिडेय दम्यावननः । ततः कुशादि ततः सव्यन N [20] सहित दक्षिणाद्रध्यं श्रादाय ॐ अद्यामुक गोगाणा मस्मपितृपितामह प्रपि तामहानाममुकामुकामुक शर्माणा यया योग्य सपत्नीकाना वसु रुद्रा दित्य स्वरूपाणा तथ अमुक गोत्राणामस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महानाममुकामुकामुक शर्माणा (वा) यथा योग्य सपत्नीकाना वरुण प्रजापति अग्नि स्वरूपाणा कृतैतत् श्रमुक तीर्थ पिण्डदान प्रतिष्ठाथ दक्षिणा द्रव्यं यथा नाम दैवत यथा नाम गोत्रायत्यादि नाविश्वेदेव ब्राह्मणाय दद्यात् । पुन कुशादि सहित दक्षिणा द्रव्य श्रादाय ॐ अद्या मुक गोत्राणा मरमपितृ पितामह प्रपितामहानाममुका मुका मुक शर्माणा (वा) यथायोग्य सनी काना वसु रुद्रादित्य स्वरूपाणा तया द्वितीय गोत्राणा मस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महानाम मुका मुका मुक शर्माणा (वा] यथा योग्य सपत्नी काना वरुण प्रनापति अग्नि स्वरू पाणा तथा अन्येपासमस्त पित णा कृतैतत् अमुक तीर्थ श्राद्धे पिण्ड दान प्रतिष्टार्थमिदं सुपूजित हिरण्य यपानाम दैवत यथा नाम गोत्रेभ्य यथा यथा नाम शर्माभ्य पितृ ब्राह्मणेभ्य यथा यथा भाग विभज्य दातु मह मुत्सृजे ॥ पुन भूयसी दक्षिणामादाय ॐ अद्यामुक गोत्राणामस्म पितृपितामह प्रपितामहानाम मुका मुका मुक शर्माणा (वा) यथायोग्य सपत्नीका ना वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणा द्वितीय गोनाणा अस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमाता महानाम मुका मुका मुक शर्माणा (वा) यथा योग्य सपत्नीकाना वरुण प्रजापति अग्नि स्वरूपाणा अद्य कृतैतद् मुक- तीर्थ श्राद्ध सागता सिद्धये न्यूनाति रिक्तपूर्तये च अमुक द्रव्य ममुक दैवत ममुकामुकामुक गोने म्योऽअमुका मुकामुकताम शर्मभ्यो ब्राह्मणेभ्यो यथा भाग विभज्य यया काले दातुमह मुत्सृने इति ब्राह्मणेभ्यो दद्यात् । तत पूरि लोचन विश्वे देववा प्रीयन्ता मिति प्रणमेत् । अपसव्येन वाजे २ वत गानिनो धनेपुविप्राऽमृता मृतज्ञा अस्यमध्वा पियमादचं तृप्ताय्यात पथिभिहव यानै । इति मन्त्रणपित विसृजेत् ॥ सव्येन ॐ पितृष्यभ्यश्च महायोगी यये वच नम स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम । इति त्रिपठेत् अपसव्येन दीप आदाद्य । सव्यन हस्ती पादौ प्रक्षाल्या पम्य इति पठेत् । ॐ यत्कृतम् तत्सुकृत मस्तु यन्न त तद्विष्णौ प्रसादा। ब्राह्मणवपनान परिपूर्णम् स्तु अन्तुमरि पूर्णम् इति ब्राह्मणा ।ॐ प्रमादा (कुर्वना कम प्रच्य बताध्वरपु चम्मरणा वताद्विष्णा सम्पूर्ण स्यादिति श्रुति ॥ आयु पूजा धन विद्या स्वग मोक्ष सुग्गा निच प्रयग्यन्त तथा राज्य पिवर -पाव पिता ॥-11वो वक्ष्यमान् श्रायमस्वम्य पर्यन्त दयपि पिण मानवा दीनविलोदकाम्नलिभिातर्पयेत्-ॐ याप्रशस्तम्ब पयन्न शपिपिनुमानया । तृप्यन्तु पिवर मा माता महादय ॥१। पिन दूपताभ्य । २२१ । वशे मृतायेव मास व शे तयैवच ! गुरुश्वसुर वन्धूना ये चान्ये वान्धवा स्मृता सा ते तृप्ति मखिलायान्तु ये चास्मत्तीय काज्ञक्षिण ये ..धवा बान्धवायेऽन्यजन्मनि वान्धवा ।३।। तेसर्वेतृप्तिमायान्तुमद्दत्वेनाम्वुनाऽखि- ना || देवासुरास्तथा यक्षानागाग-धर्वराक्षसा |पिशाचागुह्यका सिद्धा कूष्माण्डास्तर व खगा ।। जलेचराभूमि चरा वाय्वाहाराश्च जन्तव ||२ ने तृप्तिमखिलायान्तुमइत्तेनाम्बुनाऽखिला नरकेपुसमस्तेपुयातनासुच्येस्थि वा ॥ ६ ॥ तेषा माप्या यनायेतदीयते सलिल मया ॥ अतीत कुलकोटीना सप्तद्वीपनिवासि नाम् ॥ आवस्य भुवना, लोकानिदमस्तु तलो रकम् ।। यत्र क्वचनसस्थानानु तृष्णोपहत्तात्मनाम् ॥ इद मक्षय मेवास्तु मया दत्त तिलो दकम् ॥ इतिमन्त्रणतिल मिश्रित वारि धारा या दद्यात । मथ बस्त्र निष्पीडन विधाय-एके चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रियो स्मिता । ते पिर्धन्तु मया दत्त वस्त्र निष्पीडनो दक मिति मन्त्रए वजल भूमौ निक्षिपेत् ॥ सत सव्यं कृत्वा पूर्वाभि मुखो भुत्वा आचम्य जले ब्रह्मादि देवान पूजयेत्।।-ॐ ब्रह्म यज्ञानम्प्रथम पुरस्ताद् द्विषी मत सु रुचोमेन Sआव ॥ सवुघ्न्या उपमा अस्य विष्टा शतश्च योनिम शतश्चम्विव ओं ब्रह्मणे नम इद विणुविचक्रमे त्रेधानिदधे पदम् ।। समूढमस्य पा ५ सुरे खाहा ॥ ओं विष्णवे नम ॥ ॐ नमस्ते रुद्र मन्य यऽउसोतऽइपये नम ॥ वाहुभ्या मुतते नम || ओं रुद्राय नम || ओं भूभुव व तत्सवितुर्वरेण्यम्भगो देवस्य धीमहि ॥ धियो योन प्रचोद यात् ।। ओं मिनाय नम ॥ ओं बरण स्योत्तम्भनाप्ति अरुणस्य ऽऋतसदन मासीद ॥ ओं वरणाय नम ॥ अयोत्थाय सूर्य्या याध्यं दद्यात् ॥ अर्घपत्रे जलगन्धपुष्पादीनिनिक्षप्य ॥ ओं एहि सूय महस्त्राशोतेजो राशे जगत्पते ।। अनुकम्पयमा भक्तयागृहाणाध्य दिवाकर इति मन्त्रेण अयं दद्यात् ॥ तत्त उत्थायेव सूर्यो पस्था नम् । औं अहरा मस्य केतवोव्विरस्मयोजना अनु ॥ भ्राजन्तोऽ अनगो यथा ।। उपमाय गृह तोसि सूर्यायत्वाभ्राजायपते योनि मूर्यायवा म्राजाय ॥ सूर्यधाजिष्ट भ्राजिष्ट व.देवेचिसिधा निगेहम्मनुष्येषुभूयासम् ॥ शुचिपहसुरन्तरिक्ष सद्धोता चेदि पतिथि टुगेणसत् ॥ नृपवर सहव सद् व्योम सदान गोजा जा 5 अदिनाऽऋतबृहन् इति मन्त्राभ्या सूर्य मुपस्थायें प्रदक्षिणी कृत्यदिग्भ्यो दिग्देवेभ्यश्च पणमेत् । पारस्वयं दिशनम | ओं इन्द्रायना ।ओं आग्नेयै दशे नम । मोअग्नये नम । ओदक्षिणस्पैनिशे SHRो यमाय । ओं ने चयदिश नम यो नियतचे नम | भों । २२० । प्रतीच्यदिशे नम वरुणाय नम ॥ओं वायव्य दिशे नम श्री पायल्ये नम ॥ श्री उदोच्य दिशे नम ओं कुरेराय नम | ओं ईशान्य दिशे नम थों ईशानाय नम || ओं उार्यदिशेनम-ओ ब्रह्मणे नम ॥ ॐ अयोदिशे नम अानन्ताय नम ॥ तत उपविश्य प्रणमेत् ॥ श्रओं ब्रह्मणे नम । ओं अग्नये नम ओं पृथिव्यै नम । प्राविया नम । अपचे नम । श्रावाचस्पत य नम । श्रा वि नम । श्री महद्भ्यो नम । श्री अयो नम । ओं अपाम्पतते नम । श्रावरुणा। य नम | ओं सम्वञ्चसाप यसा सन्तनु मिरग-महि मनसा स शिनष्टा सुनो विदधातु गयो नुमाष्टुं वन्यो यद्विलिष्टम् ॥ इति मन्त्रेण सनल कर द्वयेन मुप विमृश्य । तञ्चक्षुरीति मन्त्रेण चक्ष स्पर्श कुर्यात् ।। ओं तपतु देवहितम्पुरस्ता च्युम मुञ्चरत् । पश्येम शरद शवजीवन দাও যাব ৪ গন্তু অন হয় যার স্বপ্ন যান না হaীনা श्याम शरद शतम्भूयश्व शरद शवात् ।। इति मन्त्रेण नामिका गुप्टाम्या चल स्पृष्टा, चनु पर्श विदधीत । तत ॐ देवागातु विदो गातु विवागातुमित ! मनस्पतऽमन्वयज्ञ स्वाहाव्यातेवा इति मन्त्रैण पितृन विसृज्य कायन वाचेति मन्त्रणेवराण कुर्यात्- कायेन वाचा मनसन्द्रियैवावुध्यात्मनामा प्रकृति स्वभावात् ।। कोमि यद्यत् सकल परस्मै नारायणा यति समपयेति ११ कमपात्रस्थ कुशा कि भूभाचुत् मृतन् । यस्यस्मृत्या चना मोतया तपोयज्ञ क्रिया दिषु । न्यून सम्पूर्ण ना यावि सोवन्दे तमच्युतम् ॥ चतुभिश्न चतुभिश्च द्वान्या पञ्चमिरे बच हुक्त व पुनर्वाम्बा समेविष्णु प्रमीतु इति पठेन ca गन्धाक्षत पुप्पाण्यादाय वक्ष्य माणमन्त्रा पठित्या गन्धादिभि यजमानस्यतिलक कुयु । वैदिक मन्त्रा भी शमिन्नु शादोऽअन्तिोषा या न रखका जरस-वन नाम ॥ पुत्रा मोपर पितरो भवन्ति मानोमभ्यारी रिपतायुर्मान्तो ॥ १ ॥ अदिति या विति रन रित मदितिम्माता पिता सपुत्रा विश्वाऽ अदिति पञ्च पना अदिति जान अदिविग्जनिसवमूम् ॥ स्वाद प.मद पितरोषयोधा छ थित शक्षा सन्तोगभीरा । चित्र मनावता अमृदा मतो योरा उरयो पात माहा || ३ माणा म पितर सान्या स: शिरनोपा का अथिया अनेहसा ।। पून पानुरिता पा पा रक्षा माफिनोऽप्रशस ॥४॥ पितम्य যা সিল কাম বিনামল থিল বনম। বিয়া मान्य मायिभ्य प्रधानम | मन पिan मामल पितोवी [ २२३ ] तृपन्त पित्तरः पितरः शुन्धध्वम् ॥ ५ ॥ पुनन्नुमा पितरः सोम्यासः पुनन्तुमा पितामहा पुनन्तु प्रपिता महा पवित्रेण शता युपा । पुनन्तुमा पिता महाः पुनन्तु प्रपिता महाः । पवित्र ग शतायुपाविश्च म् श्रायुध्य प्रश्नवै ॥ ६ ॥ ततो यजमानो गृहीत तिलको ब्राह्मण पादान प्रक्षाल्य पादोदकं गृहीत्वा || तान्त्राह्मणान् पायसादिभि भॊजयित्वा तेभ्यो लब्ध्याभ्यनुनः सपरिवार स्वयं मपि भुञ्जीतः ।। तत् ॥ श्राद्धीयद्रव्या- णि ब्राह्मणाय प्रतिपादयेत् तद् भावे जलेवानिक्षिपेतः इति सहितम् ।। प्रा० धेनु' अ० द्रव्या अथ पितृसूक्तम् ॥ । ॐमधुमधु मधु ॐमधुन्धाताऋताय ते मधु क्षरन्ति सिन्धयः माध्वीन: सन्तोषधीः ।। १ ।। मधुनक्त मुत्तोपसो मधु मत्पार्थिव रज मधुद्यो रस्तुनः पिता ॥२॥ माधुमान्नोवनस्पतिमधुमा ॥ २ ॥ ऽस्तु सूर्यः माध्वोर्गावो भवन्तुनः ॥३॥ ॐ अग्नये कन्यवादनाय स्वाहा. सोमाय पितृ मते स्वाहा अपहता असुरक्षा ३ सि वेदि पदः ॥ ४ ॥ ये रूपाणि प्रति मुनचमाना । असुराः सन्तस्वधया चरन्ति परा पुरोये भरन्त्यग्निष्टों स्लोकात्प्रणुदात्यस्मात् ॥५॥ अत्र पितरो मादयध्वम् । यथाभागमा वृपायन्त्रम् । अमीमदन्त पिवरो यथा भागमा धूपायिपत् ॥ ६ ।। ॐ नमोकः पितरोरसाय नमोव.पिवर शोपाय नमोवः पितरोजीवाय- नमोवः पितरः स्वधायै नमोवः पितरो धोराय नमोवः पितरो मन्यवे, पितर पितरो, ननोयो गृहान्नः पितरो दत्त सतोकः पितरो देद्रमै तद्वः पितरोव्वास प्राधत्त ।। ७ ॥ आधच पितरो गर्भ कुमारं पुष्कर स्रजम् । यह पुरुषोऽपत् ॥ ८॥ उज्ज वहन्ती मृवं धृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् स्वयास्थतर्पयतमे पितृनः॥ ॐ पितृन्न्यः स्वधायिम्य. स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्य. स्वधानमः प्रक्षन पितरोऽमीमदन्त पितरोऽती तृपन्न पितरः पितरःशुन्धद्ध्वम् ॥१०॥ पुनन्तु मा पित्तरः सोन्यासः पुनन्तु मॉ पिता महाः पुनन्नु प्रपितामहाः पवित्रेण शवायुपाः पुनन्तु मा पिता- महाः पुनन्तु प्रपितामहा प.चित्रेण शतायुपाविश्व श्रायुयं नये ॥११॥ अग्न आयूपि पवसःऽ-आसु वोर्ज धिय धनः आरे वाधस्व दुरा- नाम् ।। १२॥ पुनम्तु माँ देव जनाः पुनन्तु मनसा धियः पुनन्नु विश्वा भूतानि जाव वेदः पुनीहिमा ।। १३ ।। पविण पुनी हिमा शुक्रेण देव दोद्यत् अग्ने कस्वा कतू १ दरलु यत्ते परिध मविध्यन्ने वितत मन्तरा नझतेन पुनातु मा ।। १५ ।। पवमानः सो अद्य नः पवित्रण विचपाणि.

। 1 २२५ ] यः पोता मयुनातुमा ॥ १६ ॥ उभान्यदेव सवितः पवित्रौण न च मी पुनीहिविश्वतः ॥ १७ ॥ वेश्य देवी पुनती देव्यागा धस्यामिमा बयः स्तन्योतपूष्टाः । तया- मदन्त सधमा देपुषय स्याम पतयोरयीणाम् ॥१८॥ ये समानाःसमनसः पितरो यमराज्ये तेषां लोकः वयानमो यज्ञो देवेषु कल्पताम् ॥ १६ ॥ ये समाना समनसो जीवा जीवेषु मामकाः तेपा श्रीमयि कल्पता मस्मिल्लो शत समाः ॥ २० ॥ द्वेसृती अस्पृणवं पितृणामह देवाना मुतमत्त्यानाम् तान्यामिदं विश्व मेजसमेतिय पितरं मातरंञ्च ॥ २१ ॥ इद ३ हविः प्रजननं मे अस्तु दश वीर । सर्व गण के स्वस्तये आत्म सनि । प्रजासनि पशु सनि लोक मन्य भयसनि । अन्तिः प्रजा बाहुला मे करोवन्न पयोरेतो अस्मा सुधरा ॥ २२ ॥ उदीरता मवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः असुय ईथुर का शक्षास्तेनोऽवन्तु पितरो हवेषु १ २३ । अङ्गिरसोनः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः तेषांवय । सुमतौ यशियाना मपि मरे सौमनमे स्याम ॥ २४ ॥ ये नः पूर्वे पितरः सोन्यासोऽन हिरे सोमपी में वसिष्याः तेभिर्यमः सऽरमणो हवी ।प्यु शन्नु शनिः प्रति काममतु ॥ २५ ॥ व सोम प्रचिकितो मनोपा व रजिष्ठ मनुनेपि पन्थाम तय प्रणीती पितरो न इन्दोः देवेषु रत्न मभ जन्त धीरा ॥ २६ ॥ त्वयहि नः पितरः सोम पूर्व कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः । वन्वन्न वातः गरिधीऽरपोणु वीरेमि रस्वै मधवा भवानः ।। २७.त्व सोम पितृभिः संविहानोऽनुद्यावा पृथिवीः श्रावतन्य || तस्मैत इन्द्रो इविषां विधेम वय ५ स्याम पवयो रयीणाम् ।। २८ ॥ वहिपदः पितर अत्यागिमायोइव्या च कमा सुपध्वम् ।। 1 श्रागता वसा सन्त मेना थानः शंयोरयोदधात ॥२६ || माह पितृ-सुविया ॥ २॥ श्रबिसेन पात च विक्रमण विष्यो वहिंपदोये स्वयया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इदा गमिष्ठा ॥ ३०॥ उपहताः पितरः सोमासो बहिन्येषु निधिपु प्रियेषु ।। त आगमन्तु त ३६ अन्धपि प्रयन्तु वेऽनन्त स्मात् ॥ ३१ ॥ पायान्तुनः पितरः सौम्यासो ऽग्निपाताः पथिमिदेवयानः । अस्मिन् यज्ञे वया मन्दन्तोऽपि वन्तुतेऽवन्यस्मान् ॥३॥ अग्निध्याता पितर एह गछत सदा सदा मदतमु प्रणातयः श्रत्ताहवा सिप्रयतानिवहिंप्यवारयिसा वीरं दधावना ॥ ३१ ॥ ये अग्निधाता में अनग्निमाता मध्ये दिवा स्वपयामादयन्ते तेभ्यः यात सुनीति में वारया एवकल्पयाति ॥१४॥ अग्निवातानुय नोमवामहे नाशि में मोमपीच य श्राशुः । तेनो विप्रासः सुहवा पन्तु वध स्पाम पयो स्वीणाम् ॥ ३५ ॥ श्राच्या जानु थियो [ २२५ । निषधर्म यज्ञ मभिः गृणीत विश्वे माहिसिष्ठ पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम ॥ ३६॥ आसीनासो अरुणोना मुपस्थे रयीं धत्त दाशुपे माय पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य-वस्वः ।। प्रयच्छतत इहोदधात ॥३७|| यमग्ने कन्य वाहनस्वचिन्मन्यसे , रयिम् तन्नोगीर्भिः अवाप्यं देवत्रा पनयायुजम् ॥ ३८ ॥ यो अग्निः कन्य वाहनः पितृ:न्यवहता वृधः प्रेदुइ- च्यानि वो चति देवेभ्यश्चपितृभ्य आ ॥ ३९ ॥ त्वमग्न ईडितः कव्य वाहना वाडव्यानि सुरभीणि कृत्वाप्रादाः पितृभ्यः स्वधयाते अक्षन्न. द्वित्वं देव प्रयवा हवीऽपि ॥४०॥ ये चेह पितरो ये च नेह याश्च विद्वायाँ ।। २॥ उचन प्रविन त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिरंज्ञ सुकृतंजुपष्व ॥ ४१ । इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासोय उपरास ईयुः ये पार्थिवे रजस्या निपत्ता ये वानून सु वृजि ना मु विनु ।। ४२ ॥ अधा यथा नः परासः प्रलासो अग्न ऋत माशुपाणाः शुचीदयन्दी धिति मुक्थ शासु क्षामाभिदन्तो अरुणीरपनन् ॥ १३ ॥ उशन्तस्त्वा. निधीमह्या शन्तः समिधी महि । उशन्नुशत भावह पितॄन् हविपे अत्तव ॥४४॥ त्रीन्समुद्रा समप खर्गा नपां पति वृषभ इष्टका नाम् ।। पुरीषवसानः सुक तस्य लोके तत्र गच्छत यत्र पूर्वेपरेताः ॥४|| माप्या यखसेम तुते विश्वतः सोमविधायम् भवा वाजस्य सङ्गथे ॥४६॥ सन्ते पया ॐ सि समुयन्तु वाजाः सं वृष्ण्या न्यभि मातिपाहः आप्याय मानो अमृताय सोम दिविश्रवा स्युत्तमानिधिष्वः ॥ ४५ ॥ अग्नि प्रियेपुधाम सु कामोभूतस्यभव्यस्यं सम्राईको विराजति ॥ ४॥ ओं तत्सत् । इतियजुर्वेदे पित सूक्तम् ॥ अथ हेमाद्रो मार्कण्डेय पुराणो रुचिस्तवः ॥ रुचिरु वाच-नमस्येऽहं तीर्घ रच्छ्राद्धे येव सन्त्यधि देवताः । देव रपिहि तप्यन्ते येच श्राद्ध स्वधोचरः ॥१॥ नमस्येऽहं पितॄन्स्वर्गे ये वन्ति महर्षिभिः। श्राद्धर्मनोभर्यभक्त्याभुक्ति :मुक्ति मभीप्सुभिः ॥२॥ नमस्येऽहं पितृन्स्वर्गे सिद्धाः संतर्पयन्ति यान् । आवेषु दिव्यैः सकले रूप हारे नुत्तमैः ॥ ३॥ नमस्येऽई पितृ भक्त्यायेऽय॑न्ते मुह्यकैरपि । तन्मयत्वेन वामद्भिद्धि मात्यन्ति की पराम् । नमावेऽह पितृ न्मत्यैः रच्यन्ते भुविये सदा, श्राद्ध श्रद्धयाभिर लोक प्राप्ति पदायिनः ॥५॥ नमस्येऽई पितृन्विप्रेरय॑न्तेभुषिये सदा वाञ्छिवाभीष्ट लाभाय प्राजा [ २९६ ] प्रत्यमदायिनः ॥ ६ ॥ नमस्येऽह पितॄन्ये थे वय॑न्तेऽरण्य यासिमिः । वन्यैः प्रार्थता हारैस्तपो निधूत किल्विपः ॥ ७॥ नमस्येऽह पितन्वित्र नैष्टिकं ब्रह्म चारिभिः ये सं संयताम्मिनित्यम् सं तप्यन्ते समाधिभिः ।। नमस्येऽई पितृच्छा राजन्या स्तर्पयन्ति यान कन्यैर शेपैविधिव श्लोक .. बय फल प्रदान ।। || नमस्येऽह पितृन्वेश्य स्यन्ते भुविये सदा सकर्माभिरते नित्यं पूष्प धूपान्न वारिभिः ॥ १, ॥ नमस्येऽह पितृम्यादै ये शुदै रवि भकितः सन्तप्यन्ते जगत्या नाम्ना ज्ञाताः सु कालिनः ।।१।। नमस्येऽई पितृच्चाद्धः पाताले ये महा मुरैः सन्तयन्ते स्वधा हारास्त्यात दम्भ पदेः सदा ॥ १२॥ नमस्येऽह पितृष्छादै स्यन्तेये रसापले । भौगैर शेषेविधि वन्नागैः कामा नभीप्सुभिः । १३ । न मस्येऽह पित आद्धः सौः सन्त पितान्सदा । तत्रय विधि वन्मत्र भोग संपत् सम- न्वितैः ।। १४ ॥ पितृन्नमस्येनियसन्ति सामान्ये वेद लोके च तवान्त रिते ॥ महीतले ये ध सुरादि पूज्याः तेमेश्यच्छन्तु मयोपनीयम् ॥ १५ ॥ पिनन्नमस्ये परमात्म भूता ये वे विमाने निवसन्ति मूर्ताः । यजन्ति यानस्तमलमनोभियोगिश्वराः क्लेश विमुक्ति हेतूम् ॥ १६ ॥ पितॄन्नमस्से दिपि ये म पूर्वाः ॥ स्वधा भुजः काम्य फलाभि सन्धौ ॥ प्रदान शक्काः बालेप्सितानां वि मुक्ति दायेऽनभि सहितेषु ।। १० ।। तृप्यन्तुतेऽस्मिन्पिः तर समस्ता इच्यावतां ये प्रदिशान्ति कामाम् || मुरत्वमिन्द्रत्वमतोऽधिक वा, सुणन्पशु स्यानिवल गृहाणि ॥ १८॥ सोमत्यये रश्मिपुयेऽ विम्बे, शुम्ले विपार्नेव सदा वसन्ति ॥ तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरोऽन्न तोयगन्धा दिनापुष्टि मिवोरजन्तु ॥ १६ ॥ येषां हुतेऽग्नौहविपा च तृप्तिः ये भुजते वित्र शरीरभाजः ये पिण्ड दानेन मुर्द प्रयान्ति तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितरो न्नवायः ॥ १० ॥ ये सडिगमांसनसुरैरभीष्टः कृष्णस्तिलईन्यमनो हरैश्च । कालेन शान महपिय संत्रीणि तारतमद मन्त्रायान्तु ॥ २१॥ कव्यान्य शेपाणि वयान्यमीष्ठा न्यतोर पा ममराचिंतानाम् । पान्तु सानिध्य मिहास्तुपुष्प,गन्धा युभोज्येषुमयापिते ।।२२॥दिने दिनेयमतिगृह्यतेऽर्धाम् । मासान्त पन्या नुपयेऽपकास, येत्सरान्तेऽभ्युदये ५ पूज्या प्रयान्तु ते मेरो तृप्तिम् ॥ २३ ॥ पूग्या द्विजाना कुमुदेन्दुभासों ये चनिया. गणार नपाई घाण: । या दिशांये कनरावदाता नीलीनिमा शूर अस्य येष ॥ २४ ॥ तेऽस्मिन्समस्ता मम पुटर गन्ध, धूपान वायावि मिा बनेन, याग्नि होमनचयान नृदि सदा पिनन्यः प्रणतोऽस्मि गम्य ॥ २४॥ ये व पूारयति मृप्ति हेवोरनन्ति फल्यानि गुभा हतारि, नवा ध्यो भूति गयो भयनित तृप्यन्तु मेऽस्मिन्प्रताडनु नागः ॥ २६ ॥ सामि भूतान्य मुसस्नोपान् निशांश यन्तस्य fot [ २२७ ] प्रजानाम् आद्याःसुराणममरेशपूज्यास्तृप्यन्तु।ऽस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्या॥२७॥ अग्निष्वात्ता वहि पदः आज्यपाः सोमपास्तथा। ब्रजन्तु तृप्ति श्राद्ध ऽस्मिन् पितर स्तर्पिता मया ॥२८॥ अग्निध्वाताः पितृ गणाः प्राची रतन्तु मे दिशम् । तथा वर्हि पदः पान्तु याम्या ये पितरस्तथा ॥ २६ ॥ प्रतीची माज्यपा स्तव दुदोची मपि सोमपाः अव्वत स्त्वर्यमा रक्षेत्कव्य बाडनलोऽयधः।॥३०॥विश्वे देवाअधः पान्तुअर्ध्वपाःन्तुमरुद्गणाः रक्षो भूत पिशाचेभ्यस्तथैवा सुर दोपतः । सर्वतश्चाधिप स्तेषां यमो रहां करोतु मे। ३१ ॥ विश्वा विश्व भुगाराध्यो धर्मो धन्यः शुभा ननः । भूतिदो भूति कृढ़ोतः पितृणां वे गणा नका।। ३२ ।। कल्याणः कल्पदः कर्ता कल्पः कल्पतरा श्रयः कल्पना हेतु रनघाः पडिमे ते गणा स्मृताः ॥ ३३ ॥ वरो वरेण्यो वरदः पुष्ठिद स्तुष्टिद स्तथा । विश्व पाता तथा धाता सप्तै वैते तथा गणाः ॥ ३४ ॥ महान्महात्मा महितोमहिमा वान् महाबलः। गणाः पञ्च तथै वैते पितृणां पाप नाशनाः ॥३५ ।। सुखदो धनदश्चान्यो धर्म दोऽन्यश्चभूतिदः । पितृणां कथ्यते चैत तथा गण चतुष्टयम् ॥ ३६ ।। एक त्रिंशत्पितृगणा याप्त मखिलं जगत् । वेमेऽनु तृप्तापितरस्तुष्यन्त च सदा हितम् ॥३७॥ स्रोत्रेणाने नच नरो योन्मों स्तोष्यति भक्तितः तस्य तुष्टा क्य भोगान्दास्यामो ज्ञानमुत्तमम् ॥३८ ।। तस्मा देत त्वया श्राद्धे विप्राणा भुञ्जतां पुरः श्रावणीय महा- भाग अस्मा तृप्ति कारकम् ॥ ३६॥ इतिरुचिस्तवः ।। अथ रक्षोनी चंपटेत् ॥ ॐ कृणुष्व पाजः प्रासितिं न पृथ्वी याही रोजेपामवां इभेन ।। त्रिषथ्वी मनु प्रसिति हुणानोस्तासि विध्यरक्षसस्त पिष्टै ॥ १॥ तव भ्रमास आशु या पतन्त्य नुस्पृशधृषता शोशु चानः । वपू-प्यग्ने जुला पतङ्गान सन्दितो चिज विध्व गुल्काः ॥ २ ॥ प्रतिस्पशो बिसज तूर्णि तपो भवा पायुविशो अस्या अदब्धः। योनो दूरेऽअधश १० सोयो- ऽअन्त्यग्ने माकिष्टेब्वयधिराधर्षीत् ।। ३ ।। उदग्ने तिष्ट प्रत्याते नुध्वन्य मित्रा" ओपत्तात्तिम हसे ॥ यो नो अराति १० समिधान चकेन नीचा संधयश सन शुष्कम् ॥ ४ ॥ वो भव प्रनिविद्या द्वयस्मदा विक- अवस्थिरा तनु हियांतु जूनां जामिमना मिप्रमृणो हि शत्रुन् । अग्नेष्ट्वा तेजसो सादयामि ॥ इति रक्षोभी ऋचम् । गुष्व देव्यान्यग्ने॥

[ २२८ ] गर्ग:-कृपणे भाद्रपदे मासि श्राद्धं प्रति दिन भवेत् । पितृणां प्रत्यई कार्यनिपिद्धा हेऽपि तर्पणम् ।। । अथ तर्पण प्रयोगः॥ . आचम्य प्राणा नायम्य कुश पवित्र धारणाम्-(दक्षिणहस्तस्या नामिक यां-ॐ पवित्र स्थो वैष्णव्य योसवितुल्य असवऽउत्तपुनाम्य छिद्रेण पवित्रण सूर्यस्य रश्मिभिः तस्य ते पवित्रपतेपवित्रपूतस्य यकाम: पुने तबकेयम् ॥ १॥ मन्ोण धारयेत्, सल्पः ॐ विष्णवे नमः-अद्यपूर्वोच्चारित एवं गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथी ममात्मनः श्रुभिस्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थ देव ऋपि मनुष्य पितृ तर्पणा मह करिष्ये ।। आम्र पात्रे रौप्य पात्रो वा तर्पणर्थे उदक पूरणम्- (एतत्पागे प्रथम श्वेतगन्ध यवान्ऽतद्भावतण्डुलान् ) सुगन्ध पुष्पाणि तुलसी दल सहित्तानिनिदध्यात् तदन्तर तत्पात्रो परि हस्त प्रमाणान प्रादेश प्रमाणात वात्रीन कुशान् प्राग्नान् स्थापयित्वा पश्चान्मन्त्रोण तत्पात्रं जलेन पूरयेत् ॥)-ॐ विश्वान्देवान् भवत्सु (केपाश्चिन्म: भाद्ध कर्माणि कुर्यात् नतु तर्पणे।) आवाहयिष्ये ॐ आवाहय ।। ॐ विश्वेदेवासऽआगत श णुतामऽइम हवम् । एदम्यहिंनिपीदत ॥२॥ विश्वेदेवाऽ । शृणतेम में हवम्मे येऽअन्तिरिक्ष यऽउपदयविष्ठ । येऽअग्नि जिह्वाऽउत वा यजत्राऽसहयास्म्मिन्नवहिर्पि मादयत्रम् ॥ ३॥ ततो देवानामा वाहनम्-(पूर्व पात्रो परिस्थापित त्रीन्कुशान् तुलशीदल संयुक्कानदक्षिण र सम्पुटे धृत्वा सदनन्तरं तस्योपरि वाम हस्त मयो मुसं कृत्वा पश्चा देवाना वाहयेत् ॥) भागछन्तु महाभागा विश्वेदेवा महायलाः ये तर्पणेऽत्र विहिताः सावधाना भवन्तुते ॥ ३ ॥ ॐ भवामः ॥ देव वर्पणम्-ॐ ब्रह्मास्तृप्यताम् । ओं विष्णुस्तृप्यताम् । ओं मद्रसृप्यन्ताम् । ओं प्रजापतिस्तृप्यताम् । ओं देवास्तृप्यन्ताम् । श्री चन्दा सि स्तृप्यन्ताम् । ओं वेदास्तृप्यन्ताम् । श्री ऋषयः स्तृप्यन्ताम् । ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् । ॐ उतरा पायर्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ सम्बत् सावयवस्तृप्यन्ताम्, ॐ देव्य स्तृप्यन्ताम् ॐ श्रप्सासस्तृप्यन्ताम् । ॐ देवानुगास्मृप्यन्ताम् । ॐ नागा स्तृप्यन्ताम् । ओं सागरास्तृप्यन्ताम् । ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् । ॐ सरित- स्तृप्यन्ताम् ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ यतास्तृप्यन्ताम् । ॐ रक्षा सिस्तृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् । ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् । ॐ - . [ २२६ 1 भूतानिस्तृप्यन्ताम् । ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् । ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् । ओं ओषधयस्तृप्यन्ताम् । ओं ओषधयस्छुप्यन्ताम् । ओं भूतमामश्चतु विधस्तृप्यन्ताम् । (तैः कुशैः) प्रांगणैः पूर्वाभिमुखो दक्षिण इस्तस्य सर्वाङ्ग ल्यप्रै देवतीर्थनान्य पात्रे एकैकाञ्जलिं क्षिपेत् ।।) ओं तीर्थानि तृप्यन्ताम् । ॐ तीध देवास्तृप्यन्ताम् । ॐ विश्वेदेवास्तृप्यन्ताम् । ॐ मोदाप्यन्ताम् । प्रमोदास्तृप्यन्ताम् ॐ सुमुखा स्तृप्यन्ताम् । ॐ दुर्मुसाम्तृप्यन्ताम् । ॐ अविघ्नास्तृप्यन्ताम् । ॐ विग्न रस्तृप्यन्ताम् ।। मालाकारे यज्ञोपवीत विधाय - मनुष्यदेव तर्पणम् ( ततो निवोतं कृत्वा पूर्वोक्त वुशानुदगमाम्दक्षिणा हस्तस्य कनि टका मूल प्रदेशेधृत्वा ६श्चादुत्तराभिमुसं मनुष्य देवेभ्यो द्वौ द्वाव जली कायतीर्थेन देयौ ॥ ) यथा--सनकस्कृत्यतु । ॐ सन० ।। ॐ सनन्दनस्तृप्यतु । ॐ सन न० ॥ ॐ सनातनस्तृप्यतु । ॐ सना० ॥ ॐ कपिलस्तृप्यतु। ॐ कहि०) ॐ आसुरिस्तृप्यतु । आसुः॥ ॐ बोइस्तृप्यतु । ॐ वोदु० ॥ ॐ पश्चशिखस्तृप्यतु । ओं पच० ॥ पितृ तर्पणम्-: पूर्वोक्त कुशान्द्विभुग्नान्दक्षिणान मूलान् द्विगुणी अत्या. अष्ट तर्जनी मध्य प्रदेशे (दक्षिण हस्तस्य) धृत्वा दक्षिणाभिमुसं पूर्वमन्त्रित् पान जले अपसव्येन कृष्एतिल मिश्रणं तेन जलेनाया सध्यन पितृतीर्धन पितृ स्त्रों स्त्रीनञ्जलीन् दद्यात् ।) यथा-ॐ कन्यवाड नलस्तृप्यताम् । ॐ कच्यवा०ॐ क०ॐ सोस्तृप्यातम् ॥३॥ ॐ यमत्त प्यताम् ॥ ३॥ ॐ अर्यमारदृप्यताम् । ३ ॥ ओं अग्निध्वात्ताः पितर स्तृप्यताम् । ३॥ ओं वहिंपदःपिवरस्तृप्यताम् । ३।। यमतर्पणम् ॥- (यमांश्चकेत्री स्त्रीमन्जुलीन्दद्यादित्याहुः। ) यथा-ओं यमायनमः । ओं यमाय० ऑयमाथाओं धर्मगसायममः ॥३१ ऑमृत्यवेनमः ॥२॥ अन्तकाय नमः। ३॥ श्री वैवस्वनाय नमः। ३ ।।ओं कालायनमः।३॥ ओं सर्वभूत क्षयायनमः । ३ । ओं औन्दुम्बरायनमः । ३॥ओं दृघ्नाय नमः।३॥ ॐ नीलायनमः। ३ | ओं परिमेष्ठिते नमः।३॥-नी कोदरायनः । ३।। ओ चिनाय नमः । ओं चिनागुप्तात ननः । ३॥ मनुष्य पितृतपणम्- (स्वस्व पितृणां गोन नामो शारं छत्या पिन तीन प्रत्येकंत्रों बोनम्जलीन्दद्यात् ।।) उशन्सस्येत्या चाइनम्-त्रों उशन्तस्वा । निधी मयुशन्तऽ समिपी महि । शन्नु रामद पिढन्हविषेऽअत्तरे ॥ ४ ॥ नमस्तापितना वाहयिष्ये-मो आवाइय-(तपं. णेतु प्रथमा विभक्त्यन्त पद योजयेत् ।।) यया श्री बीरमा म उत्सरात उन्मरपमा सिर: सोभ्यास. । प्रमुख्यऽयस za भास्ते at यन्तु पितरोहरेषु ॥२॥ओं अपेक्षा सरगोरोमलिना [ २३० । मुशमा (का) वसु वरूप स्तृष्यता मिद तिलोदक वस्सैस्वधा ।। प्रथमा नलिम् । अङ्गिरसोन । पितरो नवगवाऽअथर्वाणोवृगवड सोन्यास । नेपालय . सुमती यज्ञियानामपिमरे सौमनस स्याम ॥ ६॥ भो अग्रेहामुक गोनोऽम्मपिताऽमुक शर्मा वसु स्वरूप स्तुभ्यतामिद तिलोदक तस्मैस्वधा । इविद्वितीयाननलीम् ॥ श्रओं आयन्तु । नऽ पितर-सोम्म्यासोग्निध्याता परिभिर्देवयानेऽ । अस्मिन्य स्त्र घयामदन्तीचित्र बन्नुपन्ला मानापाथद्य हामुळगोत्राऽस्मपितामुख शर्मासु स्वरूपस्तृप्यता मिद विलोदक तलवधा ॥ इति त्रितियानलि पित्रे दद्यात् ॥ श्रओं उन वहन्ती रमृतम् धुवम्मय- कीलालम्परिचुतम् । अधास्त्य दर्पयत मेपितम् ॥ ८॥ ओं अयेहामुक गोगोऽस्मपितामहोऽ मुक शर्मा (वा) रुद्र रूप स्तृप्यता मिद विनोदक तस्मैस्वधा ।। इति प्रथम । पितृम्ब्य-वधायिय । स्वधा नम+ पितामहेभ्य स्वधर यिम्व्य स्वधा नम+पितामहेभ्यालयापिन्यस्वधानमन पितरो' मोमदन्त पितरोता तृपन्तपितरऽ पितरऽ शुन्धरम्॥६॥ों अद्येहाऽमुक गोगोऽस्मत्पिता महोऽसुरु शर्मारुद्र स्वरूपस्तु० ॥ इति द्वितीया जलीम् ।। ओं ये चेह पितरो येच नेह यॉश्चविज्नया ॥ उच न पविदम् । लस्य यतित जाननेरऽ स्ववाभिव्यंज्ञयमुनपस्न । ओं श्रोहाऽमुक गोत्रोऽस्मपितामहोऽमुक शर्मालद्र स्वरूपस्तु । इविनि नीयपितामहाय दद्यात् ओं मधुधाताऽऋतायते मभुतरान्ति सिम्बल्य ! मातीन्न सन्यापधाऽ । श्री अग्रेहामुक गोगोऽस्मपितामहोऽमुरुशमा (या श्रादित्य स्वरूपस्तृप्य मिद तिलोदक उस्मैवधा। इति प्रबमान लिम् ) ॐ मधुनम्न मुनो पसी मधु मत्पाविव रज- मधु रथी रस्तु न पिता ११ १२ ॥ ॐ श्रोहा मुक गोत्रो 5 स्मप्रपिता महोऽनुरु शमा आदित्य स्वरूपस्तु० ॥ इति--द्वितीराञ्जलिम् ।। ॐ मधु मानो यनरम्पनिर्मधुमा २ ॥ अस्तु सूप्यं - 1 मादी गांपामवन्तु न ६ ॥ १३ ॥ अयेहा मुझ गोगा जमप्रपितामह। मुक शर्मा आदित्य समस्तु० ॥ इति प्रपिता महा मृदीयाजति दद्यान् ॥ ॐ आमामानस्य प्रसको राम्या मे यामा पृथिवी विraru | आमा ताम्पितरा मावरा घामा मामा अमृत स्न गम्यान् ॥ *भयेहा मुरु गोऽस्मन्माना अमुफदा (सापत्यसयका ) गायका म्बल्या तप्यता मिद तिलोरा ये बधा। इति प्रथमा बलिया ॥ पर + पाक्यन माये द्वितीया मितीया मी पान् ॥ ॐ मामा ज्वारस्यपसरी राम्या दमे दारा यिनी विवो ॥ मामा गन्नाम्पिन मावरा चामा साम! अमरन [ २३१ ] गम्यात् ।। ॐ अधेदामुक गोत्रा ऽस्मऽपितामही अमुक दा ( वा- यथा योग्या) सवित्री स्वरूपा स्तृप्यता मिदं तिलोदकं तस्यै खधा ॥ इतिपितामा प्रथमा जलि दत्वा ॥ अने नैव वाक्येन द्वितीय त्रितीया, जली दद्यान् ॥ तप्तः-आमा ज्वाजस्यप्प्रसवो जगम्या देमे द्यावा पृथिवी विश्वरूपे ॥ आमागन्ता पितरा मातरा चामा सोमो अमृत त्वेन गम्यात् ॥ ॐ श्रोहामुक गोत्राः अस्मत्सपि- 'तामही अमुकदा ( यया योग्या ) सरस्वती स्वरूपा तृप्यवामिदं तिलोदकं तस्यैस्वधा ।। इति प्रपिता मह्ये प्रथमा जलि दद्यात् ।। अने नैव वाक्येन प्रपितामद्ये द्वितीय तृतीयाञ्जली दद्यात् ।। ॐ मधु । मधु । मधु । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । तृप्यध्वम् । ॐ नमो व पितरो रसाय नमोव पिसर : शोषाय नमोव 5: 5: पितरो जीवाय नमोव . पितर : स्वधायै नमोव : पितरो पाराय नमो व : पितरो मन्म्यवे नमो वः पितर : पितरो नमो वो गृहान्न : पितरी दत्त सतोव : पितरो देऽम्मै ततः पितरो ध्वास (आधत्त ) ॥ १४ ॥ ॐ अद्येहामुक गोनः ऽस्मन्माता महोऽमुक शर्मणाः ( वा ) यथायोग्य सपत्नीकः वरुण स्वरूपः स्तृप्यता मिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा ।। इति माता..महाय सपत्नी काय प्रथमाञ्जलिं दद्यात् । एवं एव नमोवः इति मन्त्रेण माता महाय ( यथायोग्य सपत्रीकाय ) द्वितीय तृतीयां जली अपि देये ।। ॐ नमो वः इति मन्त्रं सममं पठित्वा ॐ अद्येह अमुक गोत्रोऽ. स्मतामाता महो ऽमुक शर्मा (वा) यथायोग्य सपनीका प्रजापति स्वरूपः स्तृप्यतामिदं विलोदकं तस्मैखवा ॥ इति प्रमाता महाय प्रथमाञ्चलिं दद्यात् ॥ एतदेव वाक्य मुच्चार्य द्वितीय तृतीयाञ्जलि अपि तस्मै देये ॥ ॐ नमो वः इति मन्त्रं समनं पठित्वा ॐ अधेहामुक गोत्रो ऽस्मद् वृद्ध प्रमाता महो ऽमुक शर्मा (वा) यथा. योग्य सपत्नीकः अप्ति स्वरूपः स्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा ।। इति वृद्ध प्रमाता महाय सपनी काय प्रथमालि दद्यात-द्वितीय तृतीयाञ्जलि अपि एतदेव वाक्य मुच्चार्य देये ॥ [ तो वक्ष्य माण- श्लोका नुसारेण्य वावाम्बा इति जेट कनिष्टादोन्सपनी कांच चर्पयेत् ॥ श्रयेह ऽमुक गोत्रा. श्रामद् सपन जननी (उपमाता) अमुकदा वसुरूपा तृप्यता मिदं तिलोदकं तस्ये स्वधा । इदं विलो. दक वस्ये स्वधा । इदंतिलोदक वस्ये स्वधा । श्रोहामुक गोगा ऽस्मद् पनी अमुक दा वसुरूपा तृप्यता मिद तिलोदकं तस्ये स्वधा। इदं दिलोदकं वस्ये स्वया ॥ इदं तिलोदकं तस्ये स्वधा । अहा- मुक गोत्रेः अस्मत्सुतः अमुक शर्मा (वा) वमुरूप 'स्तृप्यता मिदं विलो दर्क तस्मै खधा । इदतिः ॥ अमुक गोत्रा श्रमकन्या अमुकदा ( यथायोग्या ) वरूपा तृप्यतामिद तिलोदकं तस्यै स्वधा । ३० ॥१०॥ अमुक गोत्रः अस्मपितृभ्यः अमुकशर्मा यथा योग्य सपत्नीक ( ज्येष्ट कनिष्ट ) वसु स्वरूप स्तृप्यता मिदं मिदं तिलो दकं तस्मै स्वधा नमः ।। ३० । ३० । अमुक गोत्रः अस्मन्मातुलः अमुक शर्मा यथा योग्य सपत्नीक वसुस्वरूप स्मृप्यता मिदं ! इ० । इ० ॥ अमक गोत्रः अस्मदाता अमुक शर्मा (वा) यथायोग्य सपनीक वसुरूप स्तृप्यता मि० १ ३० । इ० ॥ अमुक गोत्रः अस्मत्सापन्नभ्राता अमुक शर्मा (वा) यथा योग्य सपत्नीक वसुरूप स्तृप्य तामि० । ३० । इ० । अमुक गोत्रा अस्मदात्म भगिनी अमुकदा ( यथायोग्या वसु रूपा तृप्यता मि० । इ० । इ० ॥ अमुक गोत्रा अस्मन्मात् भगिनी अमुकदा ( यथायोग्या) व रूपा • तृप्यतामि० । इ० । इ० ॥ अमुक गोवा अस्मदात्म भगिनी अमुकदा . (यथायोग्या ) वसु रूपा तृप्यता मि० । इ० १ . ॥ अमुक गोत्रा अस्म सापल भगिनी अमुकदा (सापत्या ) वसुरूपा तत्वता मि० । इ० । इ०॥ अमुक गोषः अमच्छरः अाक शर्मा वसुरूस्तृप्यता मि० । इ० {son. अमुक गोत्राः अस्मद्गुरुः अमुक शर्मा वमुरूपाटप्यतामि० । इ० । । अमुक गोत्रः अस्मच्छिष्यः अमक शर्मा वसुरूपस्तृप्यता मि०।३। इ० । अमुक गोत्रः अस्मन्मित्रः अनुक शर्मा वसुरूपस्तत्यता मिः।३। इ० ॥ अमुक गोत्रः अस्मदाप्तः। अमुक शर्मा वसु रूपस्तृप्यता मिः।३०।३।। ततो यक्ष्यमाणान् प्रामास्तम्ब पर्यन्त देवर्षि पित मानवा दोन तिलो दका बालिभि स्वर्पयेत् ।। यथा-श्री भावशास्तम्यपर्यन्व देवर्षि पित • मानवाः । तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृ माता महादय, पितृ वंशे मृता येच मात वरी वय वच । गुरुरवशुर वन्धना ये चान्ये वान्धवा स्मृताः ।। तृप्ति माबिला यान्तु ये चारमत्तोयका तिणः । ये वान्धवा वान्धवा वा येऽन्य जन्ममियान्यया ॥ ३ ॥ ते सर्व तृप्ति मायान्तु मरत नान्युनाs पिना || देवाः सया या नागा गन्धर्व राखHE || पिशाचा गुराकाः सिद्धा मापातर कामगाः । जले। भूमि पा यावा हारप जन्म सृष्टि मशिला यानु वह नाम्युनाऽतिला ! नरकेषु समस्तेषु यातना मुपस्थिताः नेपामाप्या यनायेतदीय सजिल मया | मनीत कुल कोटरीनां सप्तीए नियासिन || भागमभुरना मोकानिए मानु तिलोदकम् ॥ ययः पचपन संस्थानांतष्यो महतात्मनाम् ।।६। मध्य मेवास्नु मवादस तिलोदकम् ॥ भययात्र --- { २३३ ] . निष्पीडनम् ॥- ये के चास्म-कुले आता अपुत्रा गोत्रिणो स्मृताः । ते गृहन्तु मयाद वस्त्र निष्पीडनोदकम् ।। इति मन्त्रेण तजलं भूमोक्षिपेत् वस्न चतुर्धा कृत्वां । भूमो वामभागे निष्पीडयेत् । तपित जले पवित्र विसृजेत् ॥ ततः -सव्य कृत्वा पूर्वाभि मुखो भूत्वा शुद्धोदकेनाचम्य प्राणा यामं कुर्यात् । अयं जले अझादि धेवान्पूजयेत् । ओं ब्रह्मयज्ञा नम्प्रथमम्पुरस्तादिवसीमत 5: सुरुचोव्वेनऽआवs । सवुद्यन्या उपमा अस्यष्टिाः सतश्च्चयोनिम सतश्चन्विव: ।।१६।। ओं ब्रह्मणे नमः ॥ इति मन्त्रण पाने शुद्धोदकं पूरयिस्वातन्मध्येऽनामिकयापडदलम् श्वेत गन्धाक्षतपुष्पाणि तुलसीदलानि च प्रक्षिप्य पश्चादेवेभ्योऽर्थ ओं इदं विष्णुर्विचक्रमेधा निदधे पदम् । भमूढ मस्यपाॐ सुरे स्वाहा १५|| ओं विष्णवेनमः ।। ओं नमस्तेमद्रमन्नय वस्तोतऽइपवे नमः ॥१८॥ भों रुद्रायनमः || ओं तत्सवितु ॥ १६|| ओं सवित्रे नमः ।। ओं मित्रस्य चर्पणीधृतो वो देवस्य सानसिद्दयुम्नचित्र स्व. . स्तमम् ।। २० ।। ओं मित्राय नमः । ओं इमम्मे वरुण श्रुधी हवामस्या च मृत्य । त्वाम वस्यु राचके ॥ २१ ॥ओं वरुणायनमः !!.सूर्योपस्थानम् औं अदृश्श्रमस्य केतवोविरश्मयो जना ॥ अनु। भ्याजन्तो भग्नयो यथा । उपयाम गृहीतोसि सूर्याय त्स्वानाजायैप ते योनि: सूर्याय वानाजाय सूर्य नाजिष्ठम्ब्राजिष्ट स्वन्देवेष्वसित्राजिष्टोद मनुष्येपुभूयासम् ॥ २२ ॥ इ.स:शुचिप द्वसुरन्तरिक्ष सद्धोवाव्येदिषद विधिदरोणसत् । नृपवरसव सद्वयोम सदज्ञागोजाऽवजाऽअहिजाजा ऽत्रनम्वृहत् ॥ २३ ॥ दिग्देवतानां नमस्कारा:- -प्राच्य-ओं इन्द्रायनमः॥ आग्नेय्यै-ओं अग्नयेनमः ॥ दक्षिणायै-नों यमाय नमः ॥ नै तय ओं नितये नमः || पश्चिमाय-ओं वरुणायनमः ।। वायव्ये-ओं वायवे नमः।। नदीच्यै-ओं सोमाय नमः ॥ ईशान्यै-ओं ईशानायनमः अध्यायै-ओं ब्राह्मणे नमः। अधस्तात्-ओं विष्णवे नमः ।। अवाच्य-ओं अनन्ताय नमः ॥ (जनमध्ये ) ओं ब्रह्मणे नमः ।। ओं अग्नये नमः ।।ओं पृथि- वै नमः ॥ ऑ ओपधिभ्यो नमः ॥ ओं याचे नमः ॥ श्रों पाचस्पतये थों विष्णवे नमः । ओं अन्यो नमः।। ओं अपाम्पतये नमः । श्रों वदाय नमः ।। मुरु नमः ॥ वमा पनम् मायने मफलं जन्म प्रयो सपलं चपः। अद्य गोप्रवास यावा वानुमदासिन् । पत्र शाखादि दानेन तेशिवायूयमी संवत् क्लेरा तिर सातः तत्सव इन्तु मनुः।

[ २३४ । जिमार्जनम् (शुद्धोदकेन ) ओं संन्वर्थसा पयसा सन्तनू भिरगाह मनसा संघ शिवेन ॥ त्वष्टा सुब्रोक्विधातुरायोनुर्माष्टु तभयो यहि लिष्टम् ॥ २४ ॥ विसरम-ओं देवा गातु विदोगातु वित्त्वागातुमिन । मनसम्मपतऽमन्देव यज्ञ स्वाहाव्यातेधा अर्पणम्-अनेन यथा शक्ति देव ऋपि मनुष्य पितु तर्यगारव्येन कर्मणा भगवान मम समरत पितृस्वरूपे जनार्दन वासु देवः प्रीयतां नमम । ॐ तत्सद्मार्पण मस्तु । श्री गदावरस्तृप्यतु । श्री विष्णवे नमः इतित्रिः इति तर्पण प्रयोग श्री चक्र पूजनम् ॥ . श्री गणेशाय नमः । अथ देव्यार्चनम्-श्राचम्य प्राण नायम्य शुशान्ति मवतु || || मङ्गलोचारणम् ॐ स्वस्तिनऽऽइन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व वेदाःस्वस्तिन स्तार्योऽअरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु ॥१॥ भद्रकर्णेभिःऽशृणुयाम देवा भद्रम्पश्ये मा शभिर्थजगाऽस्थिरै रस्तुष्ठ वा सस्तनूभिर्व्यशे महि देव हित व्यदायु : ॥ २ ॥ वम्प्रल्कोभिरनुगच्छेभदेवा : पुत्र हि भिरुत वा हिरण्यै ना कङ्ग बन्यनाः सुकृतस्य लोके तृतीये ऐऽअधिरोचने. दिवः 5॥३॥ नमस्काराः। श्रीमन्महा गणाधिपतये नमः । देवता- भ्यो नमः । कुल देवताभ्यो नमः । ग्राम देवताभ्यो नमः । स्थान देवताभ्यो नमः । वास्तु देव भ्यो नमः । वाणी हिरण्य माम्यां नमः । श्री लक्ष्मी- नारायण भ्यां नमः । श्री उमामहेश्वरा भ्यां नमः । शचीपुरन्दराया नमः । मातृ पितृ चरण कमलाभ्यां नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । निर्विप्न मस्तु । सुमुस श्चैक दन्तश्च कपिलो गज कर्णकः । लम्बो. दरश्च विकटो विन्न नाशो गणाधिपः । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षोभाल चन्द्रो गजाननः । द्वादरी सानि नामानियः पठेच्छणया दपि ॥ विद्यारम्भे. विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । साप्रामे सटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते । शुक्ला म्वर धरं देवं शशि वर्ण चतुर्भुजम् प्रशन्नः वदन ध्यायेत सर्व विनो पशान्तये ॥ अभिप्सितार्थ सिद्धयर्थ पूजितोय. मुरा- सुरे. सर्व पिन्न हरस्तस्मैगणाधिपतये नमः । सर्वमहल माङ्गल्ये शिवे सार्थ साधिके शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते । सर्वदा सर्व कार्येषु नास्तिस्तेषां ममङ्गलम् । येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलाय तनम् हरिः तदैव लग्न सुदिन वदेव तारावलं चन्द्र वलं तदेव । विद्या वलं देव वलं तदेव लक्ष्मी पते तेऽनि युगं स्मरामिः ॥ लाभस्तेषां जयस्तेपा कुतस्तेषां पराजयः । येयां मिन्दी वर स्गमो हृदय स्थो जना-, ईनः ॥ यत्र योगीश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुधरः तत्र श्रीवित्रयो भूति ध्रुवा नीति मतिर्मम !! सर्वेष्वा ख्य कार्येषु त्रयलो भुवनेश्वराः । देवादि सन्तुनः शिद्धि ब्रह्मेशान जनार्दना ॥ विनायकं गुरु भानु अझ विष्णु महेश्वरान् । मरम्बो प्ररगुन्यादौ सर्वचार्याय विधिये ॥ सदापः।- [ २३६ १ ओं विस्णु २: श्री मद्भगवतो महा पुरुषस्य विष्णुराशाया प्रयत्तमानस्य अध ब्रमणे द्वित्तीये पराद्ध श्रीरयेव वराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरेणा- विराति तमे युगे कलि प्रथम चरणे भारतसरडे भारतवर्ष जम्बूद्वीपे आर्या वन्तिरगन् हिमवत् प्रवर्तक देशे केदार स्वएडे वाद्रिका प्रमे शुभेद दक्षिण पावें सरस्वती मन्दा किन्यामध्ये श्री शालिवाहन शासे बौद्धा बतारे अस्मिन्वत माने पछी सम्वत्सराणं मध्ये अमुक नाम मम्वत्सरे अमुकाऽयने अमुक्ती अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक नासरे अमुक तियो अमुक नक्षत्रे अमुक राशि स्थिते चन्द्रे अमुक राशि स्थिठे श्री सूर्ये अमुक राशि स्थिते देव गुरी शेषेषु प्रहेषु यया ययं राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं गुण विशेषण विशि- छायो शुभ पुण्य तिथी ममारमन' 'अति स्मृति पुरापोत फल प्राप्ययं मम ऐश्चयांभिः वृध्यर्थ अप्राप्त लक्ष्मी प्राय प्राप्त लदम्याश्चिर काल संरक्षणार्थम् एकल मन इप्सित कामना में सिद्धपर्यम् लोके वा सभायां राज द्वारे या वा सर्वत्र यशो विजय लामादि प्राप्त्यर्य इह जन्मनि जन्मान्तरे बाल्य योवन वार्धक्या बस्थासु वाक्माणि पाद पायू पस्थ माया रसना शुन श्रोत्र सन मनोभिः चरिच काता मात कामा काम महापातको पातकादि सचितानां पापा नां अन्यतत् सं सगं रूप महापात फा ना स्टा स्पृष्ट साली करण अपात्री करण जाति भ्ररा फरण रस रिव्य गा बिश्य खरोष्ट्र विश्य महिपि विक्रय अनादि पशु विक्रय प्रामण दुर्भापणे निरर्थक दुम च्छेदन कमानया कम् अनव दुरण जाति भ्रंश करण रवि देवराज साप हरण निन्दा पद निन्दा देव निन्दा शिवनिन्दा अमक्ष्य भक्षण भाम्य भोज्य अयोध्याऽऽचोपणम अपेया पानम प्रस्य स्पसनम प्रधान्यम्य प्रवण अमेया माणं माहित्याहिं मनम् अयम्याऽऽयन्धनम् अचिन्त्या चिन्तनम् अयाच्याऽऽवाच- मम अपुभ्यो पूज नम व्यनिक मान पिन तिरस्करणमन्त्री पुर प्रति भेनम मिल्या पग पर द्रोह पर हानि पीयहरणम्तम मासण म्लेच्च मा सनम प्रागणम सामि भेदनम् मित्र पचन भायां निम्मरम परान भोजनम् ॥ गणिकान्न भोजनम् मनु पran भोजनम नामटान्न भोजजनम कि मंदादि करप हया परि रोम भोजनम मन्यायोपिकापान मकर पुरिलो पराम नार्थ क्या गोवो भरण स पित पितामह प्रपिता महाना भाका मा रामाया यभागेग्य ( मासस्य मरा ) मपमो प्राण - पुष्पाणि [ २३८ ] वोऽयु मश समानऽआयुऽ:प्रमोपोऽ: । आस्मिन्कलशे वरुणं साङ्गस परिवार सायुधं सशक्तिमा वा हयामि ततः-कलश प्रार्थनादेव दानव सम्बादे मध्यमाने महोदधौ । तत्पन्नोऽसि सदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयंम् वत्तोये सर्व तीर्थानि देवाः सत्वयिस्थिताः ॥ त्वायिविष्ठन्ति भूतानित्वयि प्राण प्रतिष्ठिताः । 'शव स्वयंत्वये वाऽपि विष्णुस्त्व व प्रजापतिः श्रादित्या वसवोन्द्रा विश्वे देवाः स पैत्रिकाः त्वयि तिष्टन्ति सर्वेपि यतः कामः फल प्रदाः । त्वत्प्रसादा दिमां पूजा, कर्तु मोहे जलो इवः सानिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भवसवंदा । प्रमत्रो भव ॥ वरदो भव ॥ ॐ भू भुवः स्वः कलशस्थ वरुणाय नमः । आवा हयामि यथा मिलितो पचरार्थे गन्धा तत समर्पयामि । नमस्करोमि । अनन्तरम् । कलशोदकेन पूजा द्रव्या तथा ऽअात्मानं च अपवित्र पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपिचाः यः स्मरेत्पुण्डरी का सवाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ॐ आपोहिष्टा मयो भुव स्वान 5 उर्जेदधातन । महे. रणाय चक्षसे ।। योवः शिव तमो रसस्तस्य भाजयते इन। उशतीरि व मातर तस्मारङ्ग मा मवो यस्य जयाय जिन्तथ । आपो जन यथा चन : || इति सम्प्रोक्ष्य ॥ पश्चात् कलश मुद्रां प्रदश्य । श पूजनम्-शादी चन्द्र देवत्यं कुक्षो वरुण देवता पृष्ठे प्रजापति श्चैव अग्रे गदा मरस्वती । त्रैलोक्ये यानि वीर्थानी वासुदेवस्य चात्रया । शइखे तिष्टन्ति विप्रेन्द्र सम्माच्छङ्गवः प्रचोदयात् । ॐ अग्निपि : जन्य : पुगे हितः तमी महे महा गयम अभूर्भुवः स्वशसस्य देवतायै नमः पावा हयामि सर्वोप- चारार्थ गन्ध पुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि । शा मुद्रांप्र- : घण्टा पूजनम्--आगमार्थ तु देवानां गमनार्थ तु रक्षसाम् । घण्टा नादप्रकुर्वीत पश्चाद् घरदा प्रपूजयेत् । ॐ सुपर्णासि गरुत्त मास्त्रि वृत्ते शिरो गायत्र व्चनु हड्यन्तरे पक्षी । स्तोम प्रात्कमा छन्दा- स्यनानि यजु पि नाम ॥ सामते तनू वामदेव्य व्यज्ञा य. लिय म्युचुन्धिष्ण्या शफा : सुपर्णोसि गरुत्त्वमान्दिवन च्छ स्व: पत ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टास्थाय गमवाय नमः आवाहयामि । सो पयारा गन्ध पुष्पाणि समर्पयामि नमकरोमि । घण्टा मुद्रां परटरप गा मुद्रा-रामसोनु करो कृत्वा मंय विधा कनिष्ट के पुनश्वा. पो मोफला दर्जन्यो योमयेधयोः । मध्यमा नामिक देव पचाविपरिता तयेत् ।। मदेशा पहिरानस माविमनिगरिबीय !! . पब मान : पाल्च [ २३६ ] प्रदय , दीप पूजनम्-त्रिनेत्रमा रक्त तनु, सु शुक्ल: वस्त्र सुवर्ण मज मामे मीढ़े ॥ वराभय स्वक्ति क शक्ति हस्तं पद्म स्थ मा कल्प समूह युक्तम् ॥ ॐ आग्नि जोति यॊति जोति रग्नि 5 स्वाहा सूर्यो ज्ज्योति ज्योति : सूर्य 5: स्वाहा । अग्नि! ज्योति व्वा : स्वाहा, सूर्यो व्वों ज्योति बर्च : स्वाहा । ज्योति : सूर्य : सूर्यो जयोति : स्वाहा ॥ ॐ भूभुवः स्वः दीप स्थ देवतायै नमः आवाहयामि सर्वो पचारार्थे गन्धा क्षत पुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि ।। गुगुरुभ्यो नमः ॥ यम्बक ध्यानम्-इस्ताम्भोज युगस्थकुम्भ युगला- दुद्धृत्यतोयं शिरः सिंचिन्तं करयो युगेन दधतं स्यांकेश कुम्भौ करो। अतस्त्रग मृगहस्त मम्बुज गतंमूर्द्धस्थ चन्द्र सर्व पीयूषो नत्तनुभजे समि- रिज मृत्युंजजयं त्र्यम्बकम् ॥ इति त्र्यम्बकं नत्वा ।। तारादि नमोन्वं मूल मन्त्रम्-माला मन्त्रम्-श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ओह्रीं श्रीं क ए इलाही ह स कहल ही सकल हों सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्री स्वाहा ॥ जपित्वा वा स्व १ माला मत्रम् जपेत् ॥ अस्य श्रीत्रिपुर मुन्दरी मत्रस्य दक्षिणा मूति ऋषि पंक्तिः छन्दः श्री मत्रिपुर सुन्दरी देवताएँ वीजं सौः शक्तिः क्ली कोलकं ममामिष्टसिद्धयर्थे जपेविनियोगः आन्यान्यान्यासानाह-दक्षिणा मूर्तये नमो मूर्ध्नि । पक्तयै नमोमुखे । त्रिपुर सुन्दर्यै नमो हृदि । ऐं वीजाय नमो गुह्ये सौः शक्तये नमः पादयोः। क्लीं कीलकाय नमो नाभौः। इति मुन्यादि न्यासः ॥ कर शुद्धि न्यास माह-ही श्री अंमध्यमाभ्या नमः । ह्रीं श्रीं मां अनामिकाभ्यांनमः।.ह्रीं श्रीं सोः कनिष्ठिकाभ्यां नमः । श्री श्री अं अङ्ग प्टाभ्यो नमः । ह्रीं श्री आंसर्जनीभ्यां नमः । हो श्री सोः करतल कर पृष्टाभ्यां नमः अयं कर शुद्धि न्यासः ।। श्रासन न्यासः ।। आसन न्यासमाह देवीति-ह्रीं श्री ह्रीं क्लीं सौः देव्यासनाय नमः पादयोः ह्रीं श्रीं है. इस क्ली हसौः चक्रासनाय नमः जंघयोः।ही श्री दसैं हसक्ली हसौः सर्व मन्त्रासनाय नमः जानुनोः। ही श्रीं ह्रीं क्लील्वे साध्य सिद्धा सनाय नमोलिंगे: इत्यासन न्यासः । स तारादि नमोन्त मूलम् (माला पइंग-हृद्य गुलिभयं न्यस्येवर्जन्यादि यंतुके। शिवाप्रदेशे थाङ्गष्ठ दशान ल्पस्तु ब्रह्माणि || हृद्य नेत्र पूर्व मन सक्ति रङ्गस्य मुद्रिका प्रसा- रिकाम्या इस्ताम्या कृन्वा ताल त्रयं मुधा ।। वर्जन्य गुष्ट यो रपे स्कालयं च ध्या इशः] पर सौभाग्य दण्डनी मुद्रा लक्षणम् - वामे मुष्टिं दृढं वध्वा तर्जनी प्रविसारयेत् । भ्रामये दाम कान्वं मुद्रा सौभाग्य दण्डनीति । इयं चयोमणि मुद्रामिति ॥ .

[ २४० ] मन्त्रम् ) मध्यमा नामिमाभ्या शिरसि न्यसेत् ॥ पग माह-श्रीं ह्रीं की सो हृदये। ओं ह्री श्री शिर -आद्य कूटेन शिवा। मध्य कूटेन करच । वित्तिय कूटेन नेत्रम्। सौ ऐं श्रीं ह्रीं श्रीं अस्त्रम् ।। इति पडगम् ।। पुन सारादि नमोन्त मूल मध्या नामिकाभ्या (सुधासवन्ती दीपामारा बृह्म रमाथा सौभाग्य दा देशैमाध्याय ) शिरसिन्यसेत् ॥ पुनर्वाम वर्णे पर शौभाग्य दडनी मुद्रा कुत्वा राम पायें मूर्धादिपादान्तम् तारादि नमोन्त मूल न्यसेत् ॥ पर रौभाग्य दण्डनी मुद्रा एवं क्षोभणी मुद्रा ।। स तारादि नमोन्त मूल न्यसेत् ॥ दर्शयेत् ॥ रिपु जिहा मुद्रा एच दाविणि (ताराति नमोन्त मूल सहित न्यसेत् ) दर्शयेत् । निखण्डा मुद्रा एव कपिएी मुद्रा प्रत्येक तारादि नमोन्त मूल न्यसेत् ॥ मुसे स वेष्टय स्तारानि नमोन्त मूल दक्ष कर्ण तो वामान्त कएठान्मुसा तमत्र मेव न्यसेत् ॥ पुन प्रणव पुटा विद्या सर्वात न्यसेत् ॥ (विद्या श्र आ. इत्यादि ) मुसे योनि मुद्रा वध्वा तथैव देवींन्यसेत् ॥ अयं जग- दशीकरणान्यास | देवी कात्या विश्व रक्त ध्यायन अगुष्ठा नामिका भ्या ब्रह्मरन्ध्र मणि बन्धे ललाटे विद्या न्यसे दितिसमोहनो न्यास ॥ भनम पादयो । प्रा नम जद्ययो। इ नम जानुनो। ई नम कटि भागयो । उ नम लिंगे । औं नम पृष्टे । क नम नाभिदेशे । नम पायो । लु नम स्तनयो । लू नम अंशयोए नम कर्णयो । ऐ नम ब्रहार-धे ।ओं नम बन्ने औं कर्ण नेष्टेमि अनम नेत्रयो । 'अनम कर्णशष्कुली ॥ अय सहार न्यास ॥ वाग्देवता न्यास माहपोडश स्वर पूर्व कतद्वीज पूरी वशिनी शिरसि न्यसेत् - यथा अ आ इई अ . ल ल ए ऐ ओं ओ अ अ ब्लू वशिनी वाग्दे वताय नम शिरसि ॥ कवर्गस्य कामेश्वरी वीजाद्य भाले न्यसेत् के संग घर मो हो कामेश्वरी. वाग्देवतायै नमो ललाटे॥ धवर्गेण मोहनी वीजन भ्रू मध्ये न्यसेत् ॥-यथा च छ ज झ नन्वनी मोहनी वाग्देवतायै नमो भ्रमभ्यस्वर्गेण स्तद्वीजस्य विमलां कंटेन्यसेत् ॥ ट ठ ड ढ एक टल् विमला वाग्देवतायै नम फठे ॥ क्वर्ग बीजाम्या अरुणा हदि रिपु जिदा मुद्रा-था- गुर गर्मित महिनीवया दन्नपापिना । रिपु बिदामा एम्य मुद्रोका तु नशि नीति मुद्रा वामपाद वे वेति इस दारिणी मुद्रा विसपडा ( अने) मिसरा मुदा सवयम्-रिवार को सप्टा पगुष्ठी कारयेत्समो।। प्रनामान्यगते कला वर्मन्यो हटिला दी । अनिष्टो निपु नीत निबापाने मारी || त्रिपडेय एमाल्यावा त्रिपुरा मान कर्माणिः । [ २४१ ] न्यसेत् ।। यथा-तं , दंछ नी अक्षणा वाग्देवतायै नमोहदि । पवर्ग वीजाभ्यां जयंती नाभौ न्यसेत् ।। यथा-- पंव में मं हसल्व्यू जयन्ती बाग्देवतायें न्यसेत् ।। पचों वीजाद्य सर्वेश्वरी मूलाधारे न्य सेत् ||-यथा-यं र ल व इम्यू सर्वेश्वरीवाग्देवतावैनमो मूलाधारे ॥ शादयो बीजाभ्यां कोलिनी उर्वादि पादान्तन्यसेत् स च यथा-शं पसंह ल संक्षत्रों कोलिनी वाग्देवतायै नमः ऊवांदि पादान्तम् । वाग्देवतायै नमः इति पदम् ।। सृष्ठि न्यास माह ब्रह्म न्ध्र इति ब्रह्म रन्ध्र इति ||ल लाटे । इ नेत्रयो।ई कर्णयो। उनसौ। ॐ गंडयो। ऋदन्ते पु। ऋोष्टयौ । लजिह्वायां । ल मुख मध्ये। एटष्टे। ऐं सोंग ओं इदि । औं स्तनयो । अं कुतौ । अः लिंगे । स्थितिन्यास माहकरति-च अगुष्टाभ्यां नमः । श्रां तर्जिनीभ्यां नमः । मध्यमाभ्यां नमः । ई अनामिकाभ्यां नमः । कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ब्रह्मरन्ध्र । ऋ'मुखे। इदि। ल'नाम्यादि पादान्तम् । ल कंठादिनाभ्यन्तम् । ए ब्रह्म रन्ध्रात्कंटात् । एपंच पादा गुलिपु ॥ (ऐ ओं-औं।अ) पर चायनि- न्यासमाह । - आं मून्धि कळे । इंई नेत्रयो, श्रुत्यो, ऋऋनसोडे, टु' लूगंडयो । एऍोष्टयो । ओं औंमुखमध्ये । दन्त पंक्त। प्रवदने विन्यसेत् ॥ द्वितीय माह-- शिखा। श्रा शिर ई भाले । ई भ्रूः। नासाः । ॐ मुखे। ऋकर-लए ऐं ओं औं अं अः दक्षकर सन्ध्यप्रेषु पंच एवं वामे पंच ॥ तृतीय माह-~ अंशिरः । ललाटे। इइ नेत्रयो उमुखे। जिह्वायां । ' ल ल ए ऐ ओ औ अं अः दक्षपाद अंगुलिपु संध्यमं पंच एवं वाम- पादे पंच ॥ चतुर्थ माह- ललाटे । प्रांगले । ई हृदि । इनामी । मूलाधारे। ॐ ब्रह्मरंधे। मुखे। ऋगुदे । लु आधारे । ल हृदये । एं ब्रह्मरन्ध। ऐ ओं करयो। ओं- पाइयो। 'प्रः ६दिः ॥ पंचम थाह-प्रणव पुटितां विद्यां सर्वांगे न्यसेत् नमोता हदिर-श्रीभ ललाटे ही आंगले। क्ली-ई दृदि। एंईनामी। सौ मूला. धारे। ओं ब्रह्मरंध्र । ही ऋमुसे। श्री ऋ. गुदे। श्राद्ययूटेन लू आधारे। मध्यरटेन लू, हृदि । तृतिय कूटेन ए ब्रह्म रंधे । सौः एएँ इदि कर्षणीति त्रिखण्डया मुद्रयातु भाले मूलं न्योत ॥ त्रैलोक्यस्या खिले स्पाई कति स्वं विचिव येत् ॥ योनि मुद्रा यमे द्रष्टव्य- मुखे योनि मु०-मिय: कनिष्ठि के वध्या तर्जनीभ्या अनामिको अनामि कोय सरिलष्ट दोष मध्य मयोरधः अङ्गष्टाम दयं न्यस्ये योनि मुद्रे यमीरि ति॥ अयं जगदशी करण न्यासः ॥ , तथा रक्क [ २४२ ] ओं करयो। क्लीं ह्री-ओं अंपादयो । श्री श्र हृदि ॥ पोढान्यासादयो विस्तरभया-नोक्तास्ते उच्यन्ते ॥ यथा--गणेशप्रह नक्षत्र योगिनी राशि पीठ लक्षण पोढा न्यासा ||-गणेश मातृ का मंत्र स्य दक्षिणा मूर्ति सुपि गायत्री छन्द श्री मातृ का सुन्दरी देवता ममो पास्य श्री विद्या गत्वेन पोढा न्यासे विनियोग ॥श्रक स ग घ ङा ऐं हृत् । इच०५ कनी शिर । उ ८०५ सो शिसा । ए १.५ ए सो कवचम् ।। ॐ प० । ओं की नेत्रम् ॥ यं यं. १० अ ऐ अध्न ।। ध्यानम् - उहात्सूर्य सहनामा पीनोन्नत पयोधरा ॥ रक्त माता वरा लेप रक्त भूपण भूपिता ।। पाशा कुरा धनुर्वाण भास्वत्पाणि चतुष्टया रक्त नेत्र या स्वर्ण मुकुटोद्भासि चन्द्रिकाम् ।। एव' ध्यात्वान्यसेद्वीज पूर्व ग अ विघ्नेश ह्रीन्या नम । ग श्रा विघ्न राज श्रीभ्या नम । इत्यादि मातृ का स्थले न्यसेत् । अथग्रह मातृ का मनस्य दक्षिणा मूवि पि गायत्री छन्द श्री मातृका सुन्दरी देवता मपो पास्य श्री विद्या गत्वेन पोढान्यासे विनियोग । ध्यानम् --रक श्व साम पीत चपाडुरम् धूम्र कृष्णं च धूम्र यूम धूम्र विचिन्त येत् ॥ रवि मुख्याकाम स्पान्सर्वा भरण भूपि तान् । वामो रुन्यस्त हस्ताश्च दक्षिणे नपर प्रदान् ॥ १६ मूर्याय रेणुका वायै नम हृदि । य ४ चन्द्राया मृता वाय नम भ्रमध्ये | क ५ मगलाय धामा वायै नमो नेत्रयो || च । वुधाय ज्ञान रूपा वाये नमो हृदि । व५ वृहस्पतये यशस्धिन्य वाचै नमो हृदयोपरिभागे। त ५ शुभाय शाकयं वाय क्दे ।। ५४ शनैश्चराय शकय वाये नमो नाभी। शं प स ह राहवे कृष्णा गायै नमो मुसे । लं केवरेधूम्रा वायै नमो गुद्दे ॥ शुध नक्षत्र मान का मंत्रस्य दक्षिणा मूति ऋषि गायत्री छन्दो नक्षत्र पिणी सुन्दरी देवता विद्या गवेन न्यास विनियोग ध्यानम् - उपल (काजानि सकाशा मर्ग भरण भूपिता । नति पारयोऽश्विनी मुम्या परदा भय पाण्य || अ आ आश्चिन्यनमा ललादाइ १ तस्यां गणेश श्रावासपूजये दामना दिभि । अपचयं अनुमैराश कुर्या दा वरणाचनम् ॥ प्राग्नेया दिपु कोयेषु हृदय न शिर रिसा । वमाम्पचाप नेपादिदप स्थापूनये मुथ) ॥ द्विवीयावरसे या प्रागाराष्ट्र व गाय । रियादिमा विपानी न मांगदा विध वादिनी॥ निषि प्रदीश पापाधी पुरपा पागधरियमा । दनाप कर एक दंपो मादा !! गमास्य सम्बादरको विश विनमा प्रायस्व दोपु समाधाप्रायुधैयुवा । नम - [ २४३ ] भारायैनमोदक्षनेत्रेउई"ॐकृत्तिकायैनमोवामनेत्रे । ऋतूत रोहिरायै नमोदक्षनेत्रे एंमृगशिरसेनमोवामकर्णे। एंप्रादायैनमोदक्ष नसि। ॐ औं पुनर्वसवेनमोवामनासि ॥ कंपुष्पायनमाकंठे खं गं आश्लेयायै नमो दक्ष स्कन्धे । उमद्यायैनमोवामस्कन्धे। चंपूर्वा फाल्गुन्यैनमो दक्ष कूपरे । छ जं उत्तरा फाल्गुन्यै नमो वाम कूपरे । म हस्ताय नमो दक्षिण मणि बन्धे । टंट चित्रायै नमो वाम मणि बन्थे। डं स्वात्यै नमो दक्ष हस्ते । ढं णं विशाखायै नमो वाम हस्ते ! त थे दं अनुराधायै नमो नाभी । , ज्येष्टायै नमो दक्ष कटौ। नं पं फं मूलाय नमो वाम कटौ । वं पूर्वापाडायै नमो दौरौ । भं उत्तरपाड़ायै नमो वामी रौ । मं श्रवणाय नमो दक्ष । जानुनि । यं रंधनिप्टाय नमो वाम जानुनि । लं शतभिषायै नमो दक्ष जंद्यायाम् । वं शं पूर्वाभाद्रपदायै नमो वाम जंद्यायाम् । पं सं हं उत्तरा भादपदायै नमो दक्ष पादे । क्षं अं अः रेवत्यै नमो वाम पादै । इति नक्षत्रमातृकाः सर्वेषु न्यासे ब्वादौ माया श्री वीजे योज्ये ।। न्यासा न्सर्वा भकूवीत् माया श्री वीज पूर्व कानित्युक्त त्वात् ॥ योगिनी न्यास माह- योगिनी न्यासस्य मुनि छन्दसी पूर्वोक्त । योगिनी रूपा सुन्दी देवता श्री विद्यां गत्वेन न्यासे विनियोगः । ध्यानम्-सिता सिता रुणा वधू चित्रा पीतारच चितयेत् ॥ चतुर्भुजाः समैर्वक्रे सर्वाभरण भूपिना: एवं ध्यात्वान्यसेत् ॥ ह्री श्री डॉ डी दंमल वर यूपू डाकिन्यै नमः । १६ मम त्वचं रक्ष २ त्वगात्मने नमः कंठ देशे विशुदौ ॥ १॥ ह्रीं ओं रॉसरं मल बर यूपू राकिन्यै नमः । के १२ मम रक्त रक्ष २ असगात्मने नमः हृद्यनाथा हते ॥ २ ॥ ली ली ले मलवर यूप्लाकि न्यै नमः । १० मम मांसं रक्ष २ मांसत्मने नमः नाभौ मणिपुरे ॥३॥ का की कं मल वर यूपू काकिन्यै नमः । ६ मम मेदो रक्ष २ मेद आत्मने नमः लिग मूले स्वाधिष्ठान्ने ॥ ४ ॥ शांशी शं मन वर यूपू शाकिन्यै नमः व ४ ममास्थि रस २ अध्यात्मने नमः गुदे मूलाधारे ॥५॥ हां हां ह मलबर यूपू हाकिन्यै नमः हसं मम मनां रत २ मञ्जात्मने नमो भ्रमध्ये प्राज्ञा चके ॥६॥ यां यो यं मल वरयू याकिन्यै नमः । श्रमम शुक्र रक्ष र शुक्रात्मने नमः ब्रह्मरन् ।।२।। इति योगिनो मानकाः ॥ राशि मातृका न्यास भाह-राशि मातृका मन्त्राय मुनि छन्दसी पूर्वोर । राशि रूपा सुन्दरी देवा श्री विद्या गत्वेन न्यासे विनियोगः ॥ ध्यानंरक श्वेत हरि द्वर्ण पांडु चित्रासिता- मरेत् ।। पिशंग पिंगली वध्र कर्बु शिक्षधूप्रान् ।। एवंध्यात्यान्यसेत् ।

। [२४४ ] अं ईई मेपाय नमः दह पाद गुल्फे ॥ १॥ उॐ वृषायनमः दस जानुनि ॥२॥ ललू मिथुनाय नमः दक्ष बृपणे ॥३॥ एं ऐं ककीय नमः दक्षकुक्षौ । भाँ औं सिंहाय नमः दक्ष स्कन्धे। अं अः शप संई कन्याये नमः दशिरो भागे ॥ कं खं गं घंङ तुलाये नमो । वाम शिरो भागे ॥छ मंबं घृश्चिकाय नमः वामस्कन्धे । टं ठंड ढ णं धन्विने नमः वामकुक्षौ । तथं दंधं नं मकराय नमः वाम वृपणे ।पं कं वंभ में कुंभाय नमः वाम जानुनि । य र ल व वं मीनाय नमो वाम गुल्फे। इति राशि मातृकाः ॥पीठ मातृकाः॥ माह-पीठ मातृका मन्त्रस्य मुनि छन्दो गानि श्री मातृका पीठ रुपिणी सुन्दरी देवता श्री विद्यां गत्वेन न्यासे विनियोगः ॥ ध्यान-सिता सिता रुणा श्यामा हरित्पीतान्यनुक्रमात्। पुनरेवत्क्रमा देवी पंचाशत् स्थान शंचये ।।ही श्री अंकामरूप पीठाय नमः ॥१॥ ही श्री श्रां वाराणसी पी० ॥ २॥ ह्रीं श्रीं इ नेपालपी० ॥३॥ ही श्री ईपौढ वर्धनपी० ॥४॥ हो भी काश्मीर पो० ॥५॥ ह्रीं श्रीं ॐ कान्य कुब्ज पी० ॥ ६॥ ह्रीं श्री ऋ पूर्णागिरी पो० ॥७॥ ह्रीं श्रीं ऋ अर्बुदाचल पी० ॥ ८॥ ह्रीं श्री लू, आंम्रात केश्वर पो० ॥ ६॥ ह्रीं श्रीं लू, एकाम्र पी० ॥ १० ॥ ही श्री तिस्रोत पी० । ही श्री ऐं काम कोठ- पी० ॥ १२ ॥ ह्रीं श्रीं ॐ कैलाश पी० । ह्रीं श्रीं औं भृगु पी० ॥ १४ ।। होत्री केदार पीठा० ॥ १५ ॥ ही श्री श्री चंद्रपुर पी० ॥ १६॥ ही श्री के श्री पी० ॥ १७ ॥ ह्रीं श्री खं मारपी० ॥ १८ ॥ ह्रीं श्रीं गं जालं. घा पी० ॥ १६ ॥ ह्रीं श्री घं मालव पी० । ह्रीं श्री कुलान्तपी० ह्रीं श्रीं चं देवी कोहक पो०॥२२॥ द्वीश्री छ गोकर्ण पी० ॥ २३ ॥ हाँ श्रीजं मारुतेश्वर पी० ॥ २४॥ हाँ श्री झ अट्टहास पी० । ह्रीं श्री अविरल पी० ॥ २३ ॥ ह्रीं श्री टं राजगृह पी० ॥ २७ ॥ ह्रीं श्री ठमहापथ पी० ॥२८॥ ही श्री कोल्लगिरि पी० ॥ २१॥ ही श्री ढं एलापुर पो० ॥ ३० ॥ ही श्री पं कालेश्वर पो० ॥ ३१॥ ही श्री जयंती पी० ॥ ३२॥ दी श्री थे उज्जयिनी पी० ॥ ३३ ॥ ही श्री ई चरित्र पी०॥ ३४ ॥ ही श्री धं शारि का पी० ॥ ३५ ॥ ह्रीं श्रीन हस्तिनापुर पी. प्राय संयमन् ॥ पूर्व ब-याशियं यन्यस्ये त्यादि ॥ मुद्रा ववसमा मुच्यते-यरस-उन्मार- मार-मायोनि || यस्पर-पुटाकागे करो कला राम्या कुणादी । परिवृत्ये प्रमेणे व मध्यमे दो गवो मेयर अमिता नामिकादयः ॥मयोन्यं निविदाः पयां अंगुरा' यप्रदेश: मुद्दे पर पानी सरसर मटेविमा ( भ्रमे) २४५ ] ॥३६॥ ही श्री पनडीश पी० ॥ ३७ ॥ ही श्री फ प्रयाग पी० ॥ ३८।। ह्रीं श्री वं पष्टीश पी० ॥ ३६॥ ह्रीं श्रीं सं मायापुर पी० ॥४॥हीं श्री में मलय पी० ॥ ४१ ॥ हो श्री यं श्री- शैल पी० ॥ ४२ ॥ ह्रीं श्री र मेरू पी०॥४३॥ ही श्री लं गिरि पी०रही श्री वं माहेन्द्र पो० ॥ ४५ ॥ ह्रीं श्रीं शं वामन पी० ॥ ४६॥ ही श्री चं हिरण्यपुर पी० ॥४७॥ ह्रीं श्री सं महा लक्ष्मी पी० ॥ ४० ॥ हों याण पो० ॥ ४६॥ ह्रौं भी लं छाया पी०॥ ५० ॥ हौं श्री ई छत्रपुर पीठाय नमः । ५१ ॥ इति पीठ मातृकाः आदि शब्दात्काम मातृकादयो ज्ञेया॥ (अग्रे स्पष्टा) एवं न्यासान् कृत्वामुद्राः प्रदर्शः। पडडम् ॥ ध्यानमाइ-बालायुल तेजसां विनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनी नाना लंकृति राजमान वधुपं वालोडराट शेखराम्। हस्तैरिक्षु धनुःसृणि शमशरं पाशं मुदा विनती श्री चकस्थित सुन्दरी त्रिजगवामाधार भूतास्मरेत् ॥ मानस्थापन माह- ॐ वनोद के हूँ फडिसिजल ग्रहणम् ॥ ॐ ह्रीं स्वाहेति पाद प्रक्षा- सनम् । ॐ ही सु विशुद्ध धर्म सर्व पाप निशाम्या शेष विकल्पानय नय स्वाहेत्या च मनम् ओं मणि धरि वनिणि शिरसरिणि सर्व वशं करिएि हु फट् स्वाहेति शिखाबन्धनम् । ओं रक्ष२ हु फट् स्वाहेति विघ्न वारणम् ।। ओं पवित्र वा भूमे हु स्वाहेति भूमि निमत्रणम् ॥ ओं पासु रेखे वन रेसे हु स्वाहेतिमंडलम् || ओं यथा गताभिषेक समाग्नि मेहु फडिति पुष्पशोधनम् ।। ओं आं ही स्वाहेति चित्त शोधन मंत्रः । कलश स्थापनम्-- ओं रक्ष २ फट् स्वाहा भूमि सं शोगा। ब-श्रो श्रासु रेखे या रेखे हुस्खाही मण्डल मंत्रेणं-वृत्त त्रिकोणचतुष्कोणात्मक मण्डलं कुर्यात् । तवाधार शक्ति-यथा--विश्व शक्त्यै नमः ।। ॐ महाशक्तये (माया) नमः ॥ कूमा सनाय नमः ॥ ॐ योगास. नाय नमः || ओं अनन्ता सनाय नमः । ॐ विमला सेनाय नमः। मध्ये ॐ परम, सुखाय नमः । ॐ भूभुक कामासनाय उन्माद मुद्रा तक्षयम् समुवीकरौ कृती. मध्यमा मध्यमानुजे ॥ अना- मिकेतु सरले वदधस्वनीद्वयम् ॥ दंडा काशै दौगुप्टो मध्यमा नस देशगो। मुद्रशान्मादनी नामक्लेदिनी सर्व योपिता 11 महां कुरा मुद्रा सदए यथा--- माया नामिका युग्मं अधः कस्ता कुशा कृति ॥ तम्या वपिते व रमेय विनियो अयेत् ॥ माछा मुनास कामा साधिनोति ।।

।सव [ २४६ ] नम । इति आधार शक्ति कूर्म शेषान् सम्पूज्य ॥ एक त्रिंदश क्षर मन्त्रेण धार पूजयेत् ।-तमाह- ॐ रा र मल वर यूर अग्नि मण्डलाय धर्म प्रद दश कलात्मने ऐं कलशा धाराय नम । तदुपरि पात्राधारो परि श्राप्नयो दश कला अर्च ये चा एवाह- हव्य कन्यादिका वहा ॥ य धूम्राचि कला श्री पादुका पूजयामि । र उष्मा कला श्री पा० || ल ज्वलनी कला श्री पा० ॥ व ध्वालिनी कला श्री पा० ॥म विस्फु लिंगिनी कना श्री पा० ॥ र सुत्रे कला श्री पा० ॥ रू सुरूपाये कला श्री पा० री कपि लाये कला श्री पा० ।। रा हव्याये कला श्री पा० ॥ ॐ कव्याये कला श्री पा० || स्वर्णादिनिमित् कलशम्-ॐ हा ही हू हमल न्यू ह सूर्य मण्डलाय द्वादश कलात्मने की कलशाय नम । तत्रार्क कला स्तपिन्याद्या सम्पूज्य । क भ इत्यादि विलोमे मूल मातृके जपन् जलै स्त सम्पूर्य । क भ वपिन्पै नम तापिन्यै नम ।र्ग फ धूम्राय नम ।ध प मरीच्यै नम | ऊन-वालि न्यै नम । च ध रुच्यै नम । छदं सुपुम्नये नम । जख भोग दायै नम । # त विश्वायै नम || बणं वोधिन्यै नम || ढंधारिण्यै नम। द उ-क्षमायै नम ॥ इत्यर्क मण्डलं सम्पूज्य । मूल मन पठन सुधा बुध्या तो य सम्पूर्य वगन्ध पुष्पाक्षतान में तपनी बला श्री पादु का पूजयामि नम । य वापिनी कला श्री पा०॥ सू धूमाक्षी क्ला श्रीपा० ।। ६ मरिचि कला श्री पा० ।न्य ज्ञालिनी कलाश्री पा) न रुन्चे कला श्री पा० । म सपुम्नाय कला भी पा० ॥ ह भोगदायै कला श्री पा०॥ हू विश्व कला श्री पा० ॥ ही वोधिन्य कला श्री पा० । हा धारिराय कला श्री पा० ॥ ॐ क्षमाय कला श्री पा० ॥ मिति प्रयोगे प्रिसएटा मुद्रा वध्योका ॥ मूलविद्या च मन वित ॐ सोम मण्डलाय येनि कलशा मृताय नम खत ॐ सा सी सू ममल न्यूस सोम मण्डलाय कामप्रद पोडश कलात्मने सो कलशा मदा योनि मुद्रा लवण-मध्यमे कुटिले कृत्वा वजन्यु परि सस्यिते ॥ अनामिका मध्य गोतये यहि कनिष्ठिकै ॥ सर्वा एकत्र सान्या अनुः पोमिदा ॥ पातु प्रयामा मुद्रा महायो य मिया मते ।। विखएटा मुद्रा। Hो मए ॥ गगे च स्यादि सूपया अ कुरा मद्रया---अन्नी मध्य मि फरखा सर्जनी मम्य थि । मयोग्या व चिमुद्रपा कुश ufsa || मत्स्य मदाल-वामो परिक्षा सस्याप्य दच इव प्रसारमेत भारो युवको गारर माय मटे यनी रिवेति । मुराज मुभा (ममे) दाम- परि मृताय नमः मनोयं जलाने । पोडशस्वराद्या, श्चान्द्रीः कलास्तनले चयेत्त्ता आह अमृतेति ।। अं अमृतायै कला श्री पादुकां पूजयामि । श्री मानदायै कला श्री पा० ॥ई पूपायै कला श्री पा०॥ई तुष्टै कला श्री पा०। पुष्टै कला श्री पा०॥ ॐ रत्ये कला श्री पा०। ऋधृत्यै कला श्री पा० ॥ ऋशशिन्यै कला श्री पा० ॥ तूं चन्द्रिकायै कना श्रीपाच कात्यै कला श्री पा०॥ एंजोत्स्न्याय कला ॥ , शिश्नये कला श्रीपा ओं प्रीत्य कला श्री पा० । औं अंगदायै कला श्री पा० ॥ अंपूर्वायैकला श्री पा० ॥ अः पूर्णामृतायै कला श्री पा० इत्यध्यसम्पूज्य ॥ तत्र तनपट स्थापने हरिण मुद्रया गंगे चेत्यादि तीर्थ मन्ने कुशमु द्रया अर्थ मण्डला तीर्थमावाह्य स्वदो देव मा वाहयेत् ॥ एका दशान मन्त्रण शारं जलं मंत्रयेत् सा यथा-एँ ही श्री हो ओं हो त्री हूं फट इसौः हू' मिति मन्त्रणाम्ठबार जलं मन्त्रयेत् ॥ तवो-ही वीजेत (सुधां) प्रक्षिप्य ( इति तोये अमुको प्रतिष्य)। कुम्भ योनिमुद्रा प्रदर्शयेत् । तन्त्र सम्पूज्याघ जले हसतमलेवि स्वरूपं पानीयवः । मेख मन्त्र आह-यया- हुसक्ष मलव्य आनन्द भैस्वायवौषट् । (दाणेन इति स्वरूपम् ) हसयो वैपरित्य-सहा मल ब्यू'सुधा देव्य वौषट ।। इति सम्वाण पूजयेत् ॥ मुद्रा- प्रदर्श येत् ॥-मत्स्य-अस्त्र-कवच-धेनु-संरोधिन्या-सन्निरुभ्य-मुशल- चर्क महामुद्रा-योनि मुद्रा-कुम्भ-पुनः अमृति मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ अर्घ्य इति--आदयः षोडशवराः । कादयोणान्ता (कं० तपयन्त ) थादयो शान्ताः (५० यः पर्यन्त ) से ये त्रिकोणं संचिन्त्य ॥ की रश। हक्षाभ्यां मध्ये शोभितं तत्र ऐं क्लीं सौः रिति वाला संपूजयेत् । ओं ह्रीं हंसः सोहं स्वाहा ।। इति मन्त्रेण देवी ज्योखिमयों यजेत् । मूलं त्रिपूजने कूर्याकुर्यात्मुद्रा समीरिताः ॥ समीरिता मुद्राः मत्स्य-अस्त्र-कवचं-धेनु-अम. विसंरोधिनीरसंन्तिमभ्य-संस-मुशल-चक्र-इति नव मुद्राः कुर्यात् अर्योद- केन--पूजा वस्तूनि प्रामानं वं सम्प्रोस्य मूल मंत्र स्मरन् । राक्ष पद मुसल मृद्रा-मुष्टि कृत्वा तु इस्त्राभ्या वामसो परि दक्षिणाम् । कुर्यान् मुशल मद्रेय सर्व विघ्न निारिणति ॥ चक मुद्रा-हस्तोतु समुखो कृत्वा सं लामो मु प्रसारिती । कनिष्टा गुष्टको लमो मुद्रेपाचक मशि तेति ॥ अस्त्र मुद्रा- ददस वजनी मध्ये सव्ये कर तले विपेत् अभियान शन्द स्या दस्त्र मुद्रा समी रिताच मुद्रा-हनेत्र त्रिभिरा ख्यातं दाम्या अस्वं शिरोमतम् । अनुष्टं न शिखाशेया दिभिः कवच मोरितिम् ॥ वि पंदगानि म्यास मुदाम् ।। भमती मुद्रा-परिवृत्य करी पश्चाननी मध्यमे युते कानयनामिका परतर युवं कुरु: मु मुद्रे पमा स्यावा अमृदी करणं भवेत् । अयं द्रम्य स्त- [ २४८ ] अध्य पद च प्रयोज्य ।। मधुपर्कम्-पात्र तुमधुपर्कस्य दध्याज्य मधुचदि- पेन् । मूल शोर सुगाम व्यावं वदने प्रभोः ।। सुधा मय- सहसमल- व्यू:सुधादेव्य वौषट् । मुन्यक्षरः सप्वाणम् पूजयेत् । मधु पर्क मिदं देव कल्पयामि प्रमोदमै । पुनराधमनं दद्यात्नल श्लोशन्तर पठनू । शुद्धि माप्नोति तस्मैठेपुनरा च मनीयकम् । स्नान वस्त्रो पवीतान्ते नेवेद्यान्ते पितरस्मृतम् ।। पुनरा चमनं--उच्छिष्टीय शचि वापियस्यस्मरणमा- प्रताः॥ शुद्धि माप्नोति तस्मैते पुनरा च मनीय कम् ॥ पीट पूजा माह- - द्वार निर्णयः-मात्स्ये--पहची पूर्वतः स्थाप्यो दक्षिणेतु यजुर्विदी। सामागो पश्चिमे तद्वदुत्तरेर त्वयवों । इति वचनात् । ( सुधाण- वासन परवा यजेत्प्रेताप्रेन्युजासनम् ) दिव्या सन चक्रासनं सर्व मन्त्रा सनं ततः साध्य सिद्धा सनं प्रान्च्यं चक्र राजप्रपूजयेति ।। इति मंत्र महोदधिम् ॥ वार मात्रा नयाधम् - बम सूर्य सोमाग्नि मण्डलं गुणान् सत्त्व रज तमसि स्व. वण धान् । सं सत्वाय नमः २ रजासाय नमः त तमसाय नमः । नम्....पाय द्रयाण्याह-दूवाहरति । प्राचमनीय द्रव्यापया लपंगेति । कोल मुगन्ध मनोरमम् त ग्राम पात्रोलिपलवाविनदर्भान तर्पपान् । ययाणा, दान गप वेनाध्यमूनिमा चरेत् ।। धेनु महावामागुलिवा मध्येषु दक्षिण गुती स्थाना सं योज्य तर्जन दिन दबा मध्य मया बाया वा दव मा मया यामां तनी चनिये जयेत् । नया नामया बामा कनिष्टा पिनियो बयेत् । सिरितायो पुखोपाधेनु मुद्रा पीdिaaअमृत पीजत. वमिति जेनराधिन्या मुद्रया मा पपा-अगुष्ठ गपिपी मेव सन्नि रोरे समीरसेति ॥ अगुपएं गर्भ मष्टि दय: 1 महा- मायण-गरमी हाय रखा रंगलो मप्रथ को वियोज्येदिवियोनि मद्रा- न यामागुरदिप रवये नच शय काया मध्य सत्या मुष्टि कुमांत मद्रपो॥

नमः 1 [ २४६ ] श्रामानिमत्यादीन् । मात्रारयादीन-अं आत्मने नमः । ॐ अन्तरात्मने नमः। म परमात्मने नमः । ज्ञानात्मानं ही ज्ञानात्मने नमः । मायातत्त्वा. दीनि स्ववर्या द्यानि । मां मायावत्वाय नमः । कला तत्त्वाय नमः विद्यावत्त्वाय नमः । प्रपूजयेत् । ब्रह्मप्रेवाय नमः विष्णु प्रेताय नमः रुद्रेश्वर प्रेतायनमः ॥ पीठ शक्ती राह-कामिन्यै नमः | कामदायिन्यै नमः । रत्यै नमः । रतिप्रयायै नमः । नन्दायै नमः । मनोन्मनागे नमः धराय नमः । वराभय करायै नमः। इति पूर्वोक पीठ मातृके आदि शब्दा- स्कामानुकादयो (क्षेयाप्रयोगेषु) तवः आसन मंत्रेण पूजये बक नाय. कम्-पीठ मन्त्र मुद्धरविस्वरूपमन्यत् यया ऐं परोये अपरागै परा परायै हसी सदाशिव महा वपद्मा-सनायनमः इति ॥ एवंपीठंसमभ्यर्चदद्यापुष्पा मलिततः।।पुष्पाञ्जलि मंत्र माह । -ही श्री प्रफ्ट गुप्तत्तर सम्प्रदाय कुलनिगर्भ रहस्यात्ति रहस्य परा पर रहस्य संज्ञक श्री चक्र गत योगिनी पादुकाभ्यो पुरपाञ्जलिम् ।। इति ॥ प्रावरणा-उपचार पूजनम् ॥ पूजनप्रयोगः त्रिखएडा मुद्रोक्ता ॥ आवाहन मंत्र माह- ध्यानपूर्वकंपुष्पं गृहित्वा - खड्ग चक्र गदेषु चाप परिघा शूलभुशुण्डी शिरः शंख संन्दधतीं करैखि नयनां सर्वाङ्ग भूपा घृताम् ।।नीला. श्मा ति मास्यपाद दशकां सेवे महाकालिकां यामस्ती स्वपिते हरोकमल को हन्तु मधु कैटभम् ॥ ॥ १ ॥ ॐ हिरएट वर्ण हरिणी सुवर्ण रजत श्रजम् । चन्द्रां हिरण्य मयों लक्ष्मी जातवेदोय मा वह ॥ १ ॥ देवेशि भक्ति सुलभेसर्वा वरण सं युते । यावत्वां पून यिष्यामि तावत्त्वं सुस्थिराभव ॥ इदमा वाहनं प्रोक' ततः स्थापनमा परेत् ॥ भैरवी मंत्र मुच्चार्य श्री मन्त्रिपुर सुन्दरि ॐभूर्भुवस्व. मधु पर्व मन्त्र:-श्रो दधिक्कारयोऽधकारियजिम्योऽरभवस्य म्याजिना सुरमिना मुखाकरप्रणऽप्रा. विवारिषत् ॥ पातु दधिं विपेत् ॥ श्रा घृतमिमिद घृतमस्य योनिधृते ! रिश्तो वृत्तम्म्बस्यधाम । अनुष्प्वधमा वर' मादयं न स्वाहा र एस नदि इल्यम् ॥रतिद्वंदित् ।। श्री. मधु बावाऽवाय ते मधुचरन्ति सिन्धवः । मावीनः सत्त्वोपंधीः ।। मधुनक्तमुतोष सो मधुमचापिवघरजः। मधुद्दयो रस्तुनः पिता 11 मधु मानोधनपतिमधुमाँ॥२॥अस्तुसूर्य याद वीगांवोभवन्तुनः मधु दिपेत् ।। त्रित यित्वा-शुक्ल पक्षेतु-प्राएँ की सौः ॐनमः कामेश्वरि हा काम फल प्रदे सर्व सत्व वशं करि सर्व भगदोभय करि हुई दादी की श्रिय न्वी मुप हये श्रीर्मा देवीं जुपताम् ॥ गङ्गादि सब तीर्थेभ्यो । २५० ] श्री महा त्रिपुर सुन्दर्य नम ध्यानावाहनसमर्पयामि नम ॥ इति प्रयोगे ।। अथ श्रासनम्-ॐ अजस्रक परशु गदेषु कुलिपं पद्म धनु कुण्डिका दएई शक्ति मसिं च चर्म जल ज घण्टा सुराभाजनम् ।। शूल पाश शुदशने च दधतों ने प्रसन्ना नना से वे सै रिम मर्दिनीमिह महा लक्ष्मी सरोगस्थिताम || HIs आवाह जात वेदो लक्ष्मी मनप गामिनीम् । यस्या हिल्य विन्देय गामस पुरुषा नहम् ।। अनेक रन सयुक्त नाना मणि गणान्विसम् । फातम्बर मय दिव्य आसन प्रति गृह्ययाम् ।। ॐ भू भुर्व स्व श्री महा निपुर सुन्दर्यनम ध्यान पुष्प सहित आसन सगपयामि नम ॥ इति पुष्प स० ॥ तत श्रासन मुद्रा स्थापत्यादि दशयेत् । पके स्मिन्कुरु सानिम्यै नमोन्त स्थापने मनु दर्शयेन्स्यापनि मुना सन्निधि सनिरोधनम्-सुमुखी मुद्रा मत्रविद् दशयेत् ।। पराकम् न्यसेत्सकली करण विदम् अव गुएठा मृवीकार परमी कृत्यभहा मुद्रा प्रदर्शयेत् ॥ मुद्रा पूर्व प्रयोगे द्रष्टन्य पात्र स्थापनादि प्रयोगम् ॥ पाद्यम्-उद्यत्मानु सहस कान्ति मण क्षोमा शिरो मालिका रक्का लिप्त पयोधरा नप यी विद्या मभीति राम् ॥ हस्ताजै दध तीत्रिनेत्र विलसद्वकार विंद श्रिय देवीं वद्ध हिमाशु रत्न मुकुटा बन्ने सुम द स्मिताम् । ॐ अश्व पूर्ण रय मध्या हस्ति नाद प्रमोदिनीम् । मयामार्थ नया ढवम् तोयमे तत्मुख सशंपाद्यार्थ प्रतिगृह्य ताम् ॥ ओं भू व स्व श्री महा त्रिपुर सुन्दर्यै नम पाद्य, समर्पयामि नम । अभ्यम् कालानामा कटारित भयदा मौलि बद्धन्दु रेखा शर चक्र पाणा विशिल मपि करे रुद्ध हन्ता नियाम् ॥ सिंह कयाधि रुदा त्रिभुवन मखिला तेनसा पूरयन्ती ध्यायेद दुर्गा जया या निदश नूस सौ की ऐ४६ कामेश्वरि निया श्री दुर्गा पूजयामि तर्प यामि ना एल प्रयोग ॥ कृष्ण पतेत विचिमादा कामेश्वभ्यां सान इति. माना । विसपा मुद्र। उता ।। उपा(पूना निसपटा मुद्रा-मुद्रा निसा पाप पुमासादाय नाजलो || ध्यात्वा पूचा दिता देवी मूल विद्या समुभ साचे कमल नासिरम निगवम् ।।दरभस मागया योजित मुमो सो महापदन का स्पारणा नद पि ॥ सर्व भूत र मात रमरि परमेश्वरि ॥ ॥ म पूजाभ वन्य मयुक उममा जलिम् ॥म भRTHANI पउत् । ॥

[ २५१ ] परिवृतां सोवितासिद्धि कामैः कॉसौस्मिताहिरण्यप्रकारामानांज्यलन्तीतृप्तां तर्पयन्तीम् ॥ पद्म स्थितां पद्म वर्णा तामिहो पह्वये श्रियम् ॥ निधीनां सर्व रलानां त्वय नभ्यगुणा ह्यसि ॥ सिंहो परि स्थिते देवि । गृदाणाध्य नमोस्तुते ॥ ४ ॥ओं भूर्भुवः स्वः श्री महात्रिपुर सुन्दर्यै नमः श्रयं समर्प यामिनमः ॥ आचमनीयम् -घटा शूल हलानि शंख मुशले चक्रं धनु सापक हस्तान्जैर्दधता घनान्त बिल मच्छीतांशुतुल्य प्रभाम् ॥ गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभुतामहापूर्वा मन्त्र सरस्वती मनुभजे शुभादि दैत्यादिनीम् । चन्द्रां प्रभासां यशमा ज्वलन्तीं श्रिय लोके देव जुष्ठा मुदाराम्। तां पद्मनेमी शरण महं प्रपद्ये अलक्ष्मीन्में नन्यता त्वा वृणोमि (स्यपूरे ण सुगन्धेन मुगन्धि स्वादु शीतलम् । तोयमा चमनी या) देवि । त्वं प्रति मृह्यताम् । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महात्रिपुर सुन्दर्यै नमः आचमनीयं समर्पयामि नमः ॥ ५॥ मलाय कर्षण स्नानम्-नागधीश्वर विष्टरो पणि फणोत्तं सौरुश्नावली भास्वदेह लतां दिवाकर निभा नेत्र त्रयोझासिताम् । माला कुम्भ कपालनी रज कर्रा चन्द्रार्द्ध चूड़ा परां सर्वज्ञ श्वर भैरवाङ्क निलयां पद्मावती चिन्तये ॥ आदित्य वर्णे तपसोधि जातो बनस्पतिस्तव विक्षोऽथ विल्यः तस्यफलानि तपसानु दन्तुमायांन्तरायाश्चवाचाऽअल- दमीः॥ मन्दाकिन्याः समानीतेहेमां वोरुह भासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि सनिलेश्च सुगन्धिभिः ।। ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महा त्रिपुर सुंदर्यै नमः स्नानं समर्पयामि नमः ॥ ६॥ मधुपर्कम्-पात्र तु मधु पर्फस्य दद्याज्य मधु चक्षिपेत् । मूल श्लोक सुधा मंत्रै दद्यात्तं वदने प्रभोः ॐ मधुव्वाता रितायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माउथ्वीन सन्त्वोषधीः ॥ दधि घृतमधु समायुक्त पात्र युग्म समन्वितम् मधु पर्क गृहाणत्वं शुभदाभव शोभने । ॐ भूर्भुवः स्व श्री महात्रिपुर सुन्दय नमः ॥ ७ ॥ शुद्धोदक स्लानम्- ओं आपो अस्मान्मावरः सुन्य यन्तु घृतेय नो घृतस्वः पुनन्तु ॥ विश्व पिरथिम्प्रवदन्सि देवी रुदिदाभ्यः शुचिरा पूतएभि । दीसांतं पसस्तिनू रसियां तो शिवा ॐ शगमा परिदधे भद्रं वर्ष पुरन् ।। परमानन्द वोधाब्धि निमग्न निजमूर्तये । सांगोपांग मिदं स्नान कल्पम्यहमीशिते । ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीमहात्रिपुर सुन्दर्यै नमः मधुपर्क स्नानान्ते शुद्धोदक स्नान स०॥ पुनराच मनीयम्-उच्छिष्टोभ्य शुचि पीप यत्यास्मरण माप्रतः शुद्धिमाप्नोति वस्मैते पुनरा चमनीयकम् ॥ सर्व लोकस्य या शक्ति बदा यिष्णु महेश्वराः । दाम्या च मनं वस्यै देव्यांनुभ्य मनोहरम् ।। ॐ भू भुवः स्वःभी मई त्रिपुर सुन्दय नमः आचमनीय समस्यामि नमः । सुगन्धित स्लानम्त्रों माराकाडापरो हन्ती परुपः परुपस्परि ।। एशनो दुर्वे प्रवनु सदय शते नचः। भो स्नेहागृहाण स्नेहन लोकेरपरि तुर्थ्य प्रदा स्थामि स्नानार्थ प्रति गृह्य वाम् ॥ पुनः पूर्वोक । २५२ ) महा नग, सर्व लोकेषु शुद्धात्मन् वधामि श्नेह मुत्तम् ॥ औं भूर्भुवः कः श्री महात्रिपुर सुन्दय नमः सुगंन्धित दर्य समर्पयामि नमः ॥ ॥ दुग्ध म्नानम्-ओं मयः पृथिव्याम्यय औषधी धीषु पयो दिव्यन्तरिक्ष पयोः भाः ॥ पयः स्थवीः प्रविशः मन्तुमह्यम् ॥ कामधेनु समुद्भतं सर्वेषा. जीवन परम् । पावन यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थ मर्पितम् ॥ १० ॥ ओं भू भुवः स्वः श्री महा त्रिपुर सुन्दयै नमः पय स्लानं समर्पयामि नमः ।। पय स्ननान्ते शुद्धोदकस्नान-ओं आपो अस्मान्मातरः सुन्ध यन्तु घृतेन नो घृतस्वः पुनन्तु ॥ विश्व हिरिखिम्प्रवहंति देवी रुदिदाभ्यः शुचिरापूत एमि। दिक्षांत पसस्ति नू रसि स्वां तां शिवा ओं शगमा परिदधे भद्रवर्ण पुष्पन स्नानार्थ शुद्धोदक समर्पयामि नमः । स्नानाले उच्छिष्टोप्य सिति पुन चिमनीयं समर्पयामि नमः ।। दधिस्नानम्-ॐ दधि काणे अमाप जिष्णोत्वस्य वाजिनः सुरभिनो मुखा करत्मण आयु, विवारिपत् ॥ ॐ पय सस्तु समुद्रः तं मधुराम्ल शशि प्रभम् । दध्यानीवं मया देवी । स्नानार्थ प्रतिगृह्य- ताम् ॥ पुन शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदक स्नानान्ते । मन्त्रो धाणे पूर्व प्राचमनीययं समर्पयामि नमः । इति दधिम् ।। घृतस्नानम्-ॐवृतं घृत पावनः पित व्यसां वसा पावनः पिवता- न्तरिक्ष स्य इवि रसि स्वाहा । दिशः प्रदिश आदिशोविदिशऽउहिरो दिग्भ्यः स्वाहा ।। नव नीत समुत्पन्नं सर्व सन्तोप कार कम् । घृत मन्त्रोचार्ण विधेशुद्ध स्नानम्, शुद्ध स्नानान्ते चमनीयम् ॥ इति पृतम् ।। मधुरनानम्-मधु नक्क मुठो पसो मधु मत् पार्थिव : मधु गोरस्तु नः पिताः | तरु पुष्पं समुदतं सु स्वाद मधुरं मधुरं मधु । तेजः पुष्टि कर दिव्यं नानार्थ प्रति गृह्यताम् ॥ मन्त्रोचारण पूर्वक पुनः शुद्धादक स्नानम्-स्नानान्ते प्राधमनीयम् ॥ इति मधुः । शगस्नानम् ॐ आमा समुदयस ममाहित ॥ प्रापा ४ सय यो रमन म्यो गृहाण म्युत्तम् मुष- याम गृहीतो मोन्द्रायत्या जुष्ट गृहाभेपते योनि रिन्द्रायत्या जुष्ट समम् ॥ हनुमार समुदता शर्मंग पुष्टि कारिका । मला पहारका दिन्या नानाचे प्रति गृध ताम् ॥ पापी प्रामामिनि गुटोरक Faमिति भानमनीय समर्प यामि नमः। भुका सा भी महा yि गुनय नमः ११ मन्त्रणा मुका गुक वृध्य सहित एक पत्रामृत स्नान समयामि नमः || इति । पमा मुखर 5. मूर्ये सन्त । २५३ ) ॐ पञ्च नः सरस्ती मपयन्ति स स्रोतसः । सरस्वतीतु पञ्च- धासो देशे भवत्सरित् ॥ पयो दधि घृतं चैव मधुच शर्करान्वितम् । पञ्चामृतं मया नीतं स्नानार्थ प्रति गृह्यताम् । पुनः आपो अस्मान् मिति शुद्धोदक लानं ॥ उच्छिष्ठ मिति आचमनीय ॥ ॐ भूर्भुवः खः श्री महा त्रिपुर सुन्दर्य नमः पश्चामृत स्नानं समर्पयामि नमः ॥ गन्ध स्नानम् -- ॐ गन्ध द्वारा दुराधर्षा नित्य पुष्ठां कीपिणीम् ईश्वरी सर्व भूतानां तामिहो पह्वये श्रियम् ॥ मलया चल सम्भूतं चन्दना गर सम्भवम् ॥ चन्दनं देवि देविशः । स्नानार्थ प्रति गृह्य- ताम् ॥ पुनः आपो अस्मान् मिति शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । स्नानान्ते उच्छिम मिति आचमनीयम् ॥ उद्वर्तनम्-ॐ सुनाते अ शुः पृच्यतां परुपा पर गन्धस्ते सोमम् भवतु मदाय रसोऽ अध्युवम् ।। नाना सुगन्धि द्रव्याणि चन्दन रजनी युतम् । उद्वर्तन मया दत्त स्नानाथं प्रति गृह्य वाम् पुनः शुद्धोदक स्नानम्-पापो अस्मान्मातरः सुन्ध यन्तु मिति शुद्धोदक स्लान ।। उचिष्ठ मिति आच- मनीयम् ।। ॐ भूः भुवः स्वः श्री महा त्रिपुर सुन्दर्यै नमः उद्व- तने समर्पयामि नमः इति । तदुपरि ॐ सहर्ष शीर्षे त्यादि पुरुष शुक्दन श्री महा त्रिपुर सुन्दर्यै नमः ( मूर्ती ) शस्त्रविशेषा ध्यं समर्पयामि नमः। द्वय वस्त्रम्-ध्यायेय रत्नपीठे शुक कलफठितं शृण्वती श्याम लांगी, न्यस्तो कोचिं सरोजे शशि शकल पपं बल्लकी बाद यंतीम् ।। कल्हारा वरमालानियमितविलसन डिकारक्त वस्त्रांमातंगी शवपात्रां मधुर मधु मदां चित्रको दासिभालाम् ॥ उपैतु मां देव सत्रः फीति स्व मणिना सह । मादु भूतो सुराष्ट्रस्मिन् कीर्ति यदि दवानु मे ।। यदकून युगे देवि । कंचुकेल समान्वितम् । परिधेहि फूपां कृत्वां देवी । दुर्गति नाशिनि ॥ ॐ भूर्भुवः सः श्रीमहात्रिपुर सुन्दर्य नमः वः यं समर्पयामि नमः ॥ इच्छिामिति पाचमनीयं सम- पयामि नमः ॥ अथयज्ञोपवीतमश्राणां फरुपा तानि साक्षी घृत पाशांकुश मुख्य पाप हस्ताम्। अणिमा दिभिरावृताम यूखे रह मित्ये यधि भावये भवानीम् ॥ शुत पिपासा मला ज्येष्टाम लक्ष्मी नारायाम्यहम् । अभूति मसद्धिं च सर्वा निमुद मे गृहात् ! नवमिस्वन्तुभिर्युक्त विगुण त्रिपुरेमयिम् । उपयोतं भोत्तरीयं गृहाण परमेश्वरि ।। ततः स्वयं गरम- नीयम् । प्रओं भूभुयारा श्री महा त्रिपुर मुन्दय नमः यज्ञोपवीत (शून) समर्पय मि नमः । तदोवपुष्यम् ॥ गन्धम् बन्धक- काचन निमवि [ २५४ ] पत्मालापाशा कुशौ च वरदं निज वाहु दण्डै । विभ्राण मिन्दु शकला भागवि नेन मन्याविके शम निश वपुरा श्रयामि ।। गन्धद्वारादुराधर्षा नित्य पुष्टा करीपिणीम् । ईश्वरी सर्व भूताना तामिहो पह्वये श्रियम् ।। परमानन्द सौभाग्य परिपूर्ण दिग-वरे। गृहाण परम गन्ध कृपया परम श्वरि ।। ओं भू भुव व श्री महा त्रिपुर सुन्दथै नम गन्ध समपयामिनम शौभाग्य सूत्रम्-श्रो सोभाग्य सूत्र परदे । सुवर्णमणि संयुतम् । बध्नामि देवेशि ? सौभाग्य देहि मे सदा ।। श्री भूर्भुव स्व सूत्र श्री महात्रिपुर सुन्दर्ये नम कराठ सूत्र समर्पयामि नम | असम्म अक्षन्न मोमदन्त हयवप्रियाऽ अधूषत । अस्वोरत स्वभानयोबिप्पा नविघ्या मत्ता यो नानिबन्द्रतेहरी ॥ अक्षता निमला शुद्धा मुक्तामणि समन्धितान ग्रहाणे मान्महादेवी ? देहिमे निर्मला पियम् ॥ इति क्षेपकम् ॥ ओं मू मुंव व श्री महा त्रिपुर सुन्दयें नम अवता-समर्पयारम नम ॥ हरिद्राचूर्णम् ।। हरिदा रकिन देवी। सुख शौभाग्य दायिनि ॥ तस्मा स्वा पूजयाम्यत्रदु सशान्ति प्रयच्छमेत् ।। श्री भूर्भुघ स श्री महा त्रिपुर सुन्दर्य नम परिमल द्रव्य समर्पयामि नम कुलम् कुङ्क मम् कान्न्दि दिव्य कामिनी कामशम्भयम् । कुकुमे नाचिते देवि । प्रशिद्ध परमेश्वरी। ॐ भूर्भुव ख श्री महा त्रिपुरसुदर्य नम कुकुमम् समपयामि नम सिन्दूर-सिन्दुर मगणा भास जया कुशुम सन्निभ। पूजितामियो देवि ? प्रसोद परमेश्वरि ।। ओं भू भुव व श्री महात्रिपुर सुन्दर्य नम सिन्दूर समर्पयामि नम । सजना-नतुभ्यां काजलं रम्य सुभगे। शान्ति कारक । कपूर ज्योति रुत्पन्न गृहाण परमेश्वरि । ओं भू मुव स्व श्री महागिर सुन्दर्य नम कानला समर्पयामि नम || दुङ्गुिरम् --उत्सप्प हम रुचिरा रघि चन्द्र वहि नेता धनुशा युता कुश पाश शूनम् ॥ रम्येभु औरच दधता शिव शक्विरूपा कामेवा हृदिभनामि तन्दु लसाम् ॥ ॐ श्राद्रां पुष्करणी पुष्टि मुरया देम मालिनीम् । स्याहिरामया लक्ष्मी नात पदा ममा 46 ॐ कापडा फारडा सरा हन्तो परप पपपरि एवानो दुय अतनु महनेश श न । दुई दल श्यामजस्य मही रूपे हरि प्रिय || अतो टुयामिभवी पयामि सदा शिव ॥ ॐ भूभुर म्य भा महा त्रिपुर मुन्दर नम । दुर्गा कर समपयामि ॥ घिर पत्रम्--पारा य करिगा यष्टि पिला पत्रमाशिनाम् । चन्द्रा दिएम ममा नाम भारत ॥ ॐनमा विनिमन यिधन नमा अम्मिए पपया प नम -भुयाय प रश्रुत मनापनमा इन्दुगप पाइननया यप नमो गया। यात्रा का [२५५ ] महा देवि । प्रियः सदा ॥ विल्व पत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरे स्वरित ॥ ॐ भू भुवः स्वः श्री महा त्रिपुर सुन्दर्य नमः विल्व पत्रं समर्पयामि नमः ।। पल्लव अर्पणमू-ताम्ऽावहं जात देवो नाभी मनप गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं . प्रभूति गालो दाग्यो स्वान्विन्देयं पुरुपा नहम् ॥ ॐ अश्वत्थेपो निषदनं पर्णेवो व्यसरि स्कृना ॥ गोमाज गोमाज इकिलासययास नवथपुरुषम् ॥ गृह द्वारे चोम - पि दुष्टासुर निवहिणि ॥ पूजां करोमि चार्यगि पल्लवान दनोद्भवैः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीमहा त्रिपुर सुन्दर्यै नमः पल्लवान- समर्पयामि नमः । फलमाला- ॐ महादेवी चविद्महे विष्णु पत्नी व धीमही ॥ तन्नो देवीप्र०॥ ॐ याः फलाफलनीर्याऽ अफला यारच पुदि- पणी ॥ पृहस्पति प्रसूता स्तानो मुञ्चन्त्य हसः । शरत्काले समुद्भता निशुम्भे मर्दिते त्वया ।। फल मालां वरां देवि | गृहाण सुर पूजिते । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महा त्रिपुर सुदर्यै नमः फलमालां स० ॥ रत्नमाला-ॐ परि वाज पतिः कवि रनि हव्या न्वक्रमीत् । तचंद्रलानिदा शुपे ॥ ॐ कईमेन प्रजाभूता मयि सभ्रम कर्दम । श्री य वा सयमे गृहे मातरं पद्म मालिनीम् ॥ मुक्काफल युतां माला रत्न वैडूर्य सु प्रभाम् ॥ माणिक्यं स्वर्ण प्रथिवां गृह्यतां वरदे । नमः। ॐ भूर्भुवः स्वः भी महा विपुर सुन्दर्यै नमः रन माला स० ॥ पृष्प माला--आपः वजन्तु स्निग्धानि चिल्लीत वसमे गृहे । निय देवी मातरं श्रियं वा सयमे कुले ॥ॐ श्री श्चते लक्ष्मी रथ पर- झया वहो रात्रे पार्वे न.१ पदम् शंखजपुष्पादि शत पत्रै पिचित्र ताम् ॥ पूष माला प्रयेच्छामि गृहाण त्वं सुरे श्चरि ॥ भुवः स्वः श्री महत्रिपुर सुन्दर्यै नमः पुष्प मालां स०॥ अथ पुष- वालर विद्युति मिन्दु किरीटा तुङ्ग कुचां नयन वयं युक्ताम् । स्मेर मुखी वरदा कुशपाशा भीति करी प्रभजे भुवनेशीम् ॥ मनसः काम मा कूति वाचः सत्य मशीमहि । पशूनां रूप मन्नयस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ पुष्प नाना विधेर्दिव्य : कुमुदै रथ चम्पकः ॥ पूजार्थ नीयतै तुम्ब पुष्पाणि प्रतिगृह्य ताम् । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री म० पुष्पं स० ॥ अलंकारम-विधु दाम सम प्रभा मृग पतिं स्कन्ध स्थितां भीषण कन्याभिः कर चाल सेट-शिलस द्धास्वा भिरा सेवितां ।। हस्ते श्चम गदासि खेट विशिखां श्वाप गुणं तर्जनी विम्राणामन लामिका शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥ हार करण, केयूर मेखला कुण्डला- दिभिः । रत्नाढय कुण्डलो पेतं भूपण प्रतिगृह्यताम् !! ॐ भूभुवः स्वः श्री म० अलकार स०॥ सुगन्ध द्रव्यम् वालाई मण्डला भाषां [ २५६ ] चतु वहिं विलो पनाम ॥ पाशा कुशवरामीती द्वार यन्नी शि भने ॥ ॐ अहि खि भोगैः पति वाई. जाया इति परि माय मानः ॥ इन्वघ्नो विश्वान् युनानि विद्वान्यु मान्युमा । सम्परि पान विश्वतः ॥ चन्दना गा कपूर कुंकुम रोचन वया । कस्तूर्यादि सुग न्धाश्च सर्वाङ्गेषु विशेपनम् ॥ ॐ भूर्भुवः सा श्री म० सुगन्य दुल्य (इतर ) स०॥ अथ धूम-यः शुचिः प्रयतोभूत्वा जुड्या दास मन्वहम् । शुक्त पञ्च दश च श्री कामः सततं जपेत् ।। ॐ रमी धूतं वतन्यूबव योल्मा पूर्व तीत धूर्वयं यय पूर्वामः । देवाना मसि यहि मध सस्नि तमं प्रपित मजुष्ट तमन्देवहूतमम् दशा गुग्गुलं धूपं चन्दना गरु संयुतम् समर्पितं मया भक्तया महादेव प्र गुट्याताम् । ॐ भू नुवः स्वः श्री महानि० धूपं स० ॥ अथ दीपम्- ॐ अग्निज्योति ज्योति रग्नि साहाः सूर्यो उज्योति ऽ सूप्यं । स्वादाः अग्नि व उज्योति बच : स्वाहाः सूर्यो व्वों ज्योति अचं स्वाहा । ज्योति । सूर्य : सूर्यो ज्योति : स्वाहा ।। सर सिज निलये सरोज इस्ते धवल तगंशुक गन्ध. मात्य शोभे । भगवति हरि लल्लभे मनोज्ञ त्रिभुवन भूति करि प्रशद मह्यम् ।। पृा वर्वि समा युक्त महा तेजो महो ज्वला । दीपं दाम्यामि देवेसि सुशतामा सर्वदा ॥ ॐ भूभुवः स्वः श्री महा त्री० दीपं समर्प- यामि नमः । अथ नैवेद्य-नैवेश निवेदयामि नमः । जलेना पक्ष । गन्ध पुष्पा भ्या माछाध ॥ धेनु मुद्या अमृती इत्य || योनि मुद्रा प्रदश्य ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ बदानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा, ॐ श्रादी पुष्करिण पुष्ठि सुवर्णां हेम मालिनीम् । सूर्या हिरएमयां लक्ष्मी जाव वेदो म मा बह ।। अन्नं चतविध सादु रसः पभिः समन्वितम् । नैवेद्य गृह्यता देवि । भक्ति मे बचनां कुरु । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महा बिपुर सुन्दव नमः नैवेद्यं स० ॥ मध्ये पानीयम्-ॐ यत्पुरपेण हविधा देवा यज्ञ म० ॥ आदी यः करिणीं यदि पिगला पद्म मालि नीम् । पन्द्रां हिरएमयों लदी जाव वेदोम आवह ॥ आचम्यता त्वयादेविभक्ति में चलां कुरु । इप्सितं मे । वरं देहि पत्रच भू भुवः स्वः श्री महा बिपुर पा नीयम करो द्वनम्-करोद्वर्तन के देवि सुगधै परि वामितः इप्सितं मे वरं देहि र ष परां गतिम् । ॐ पगलम् । ॐ 11 मुद्रा धेनु-अमृती मोनि-पूर्व प्रपोगे दया।

[ २५७ ] भू भुवः स्वः श्री महात्रि !! इतिच गन्धसमर्पयामिः । हस्त मुख प्रक्षालनार्थे जलं-गन्धतोय समानी सुवर्ण कलशोस्थितम् । हस्त प्रक्षा: लनार्थाय पानीयंते निवेदयेत् ॥ पुनः शन्नो देवोति मंत्रस्य उत्तरा पोसनार्थ-करमुसमक्षा लतार्थ जलं समर्पयामि नमः ।। ऋतुफलम् - याः फलिनीयोऽअफलाऽअयुष्पायाश्च पुष्पिणीः । वृहस्पति प्रसूतास्तानों मुम्चत्वं । हसः ॥ दातासर कदलीपन सात्रक प्रपि थकम् । नारिके लेजु जंवादी फलानि प्रतिगृह्यवाम् ।। ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महात्रि० ऋतु फलं स० ॥ ताम्बूल पूगीफलम्-ॐ सप्तास्यासन परिधयः । ॐ वामs श्रावह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्याहिरर्य प्रभूतिं गावो दास्यो श्वानविन्देयं पुरुपानहम् ॥ एला लवंग कस्तुरों कापूरैः पुष्पवामित्तांवीटि का मुख वासार्थ मर्पयामि सुरेश्वरि ।। ॐ भू भुवः स्वः श्री महात्रि० ताम्बूल पूगीफलं सम०॥ दक्षिणाद्रव्यं-हिरण्य गर्भ गर्भस्थं हेमवीज विभावसौः । अनन्त पुण्य फलद मतः शान्ति प्रयच्छमे ॥ हिरण्य गर्व समवत्तं ताने भूतस्य जातः पतिरेकडासीत् । सदाधार पृथिवीन्यमुते माम्मैदेवाय हविषाविधेम ॥ भूजाफल समृध्यर्थ तवाने स्वर्णमोश्वरी स्थापितं तेनमे प्रोता पुन्कुरु मनो स्थान् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री महात्रि पूजन पूर्वकं दक्षिणा द्रव्यं समर्पयामिनमः ।। कपुरी रात्र्तिक्यम. ॐ इद हविप्रजननम्मेऽअस्तुदशवीर सर्वगण स्वस्तये। प्रात्कम मनिष्प्रजासनि पशुशनि लोक सन्न्यभय सनि । आग्नि:पहुनाम्धलाम्मे करो स्वन्नम् पयोरेतोऽअम्मासुधत्त ।। नीराजनं सुमांगल्यं करेण सम- बिलम्। चन्द्रार्क वहि सदृशं महादेवि ! नमाऽस्तुते ॥ओं भू भुवः स्वः श्री महा० कपूरात्तिक्यं समर्पयामिः ॥ प्रदक्षिणम्-ॐ मानस्तोके तनये। ॐ याति कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि । तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे। सर्व पापा पनुत्तये प्रदक्षिणां करोमि ॥ ॐ स्वः श्री महा त्रि० प्रदक्षिणां स०॥ पुष्पांजलिम्-ॐ विश्ववश्चतुरु विश्वतो मुखो विश्वतो वाहुरुत विश्व सत्पात् । संवाहुम्यांधमति सरत वा भूमि जनयन देवएकः ॥ नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भया निच ! पुष्पान्जलिं मया दत्तां गृहाण परमेश्वरि ।। ओं भू मुवः स्वः श्री महात्रि० पुष्पाञ्जलि समर्पयामि नमः । ततः सफलाय--पुष्पंगृहिल्या ध्यानम् काला नामां कटाः ररि कुलभयदां मौलिवद्धेन्दु रेखांशलं चक्र कृपाण विशिख मपि करै रुखहन्तांत्रिोत्रम् । सिंहस्कन्धाधि रूढां निभु वन मखिलं तेजता पूरयन्तीष्वायेदुर्गा जयाख्यां निद्रा परि वृत्तामविता सिद्धि कामः ।।-पिरुषार ||१|शादयः सुर गगा निहतेऽति वीर्य तस्मि दुरामनि सुरारि वले. देव्या ॥ तां तुष्टुवुः सतिनम्र शिरोधरांसा भूभुवः [ २ ] वारिमा प्रहर्ष पुलकोद्रम वाम देहाः ॥ २॥ देल्या यय तत मिदं जगदात्म शक्त्या निशेष देवाण शक्ति समूह मूर्या, उमस्विका मखिल देव मनि पूज्यां भक्त्या नता.स्म विदधातु णुभा निशानः ॥३॥ यस्याः प्रभाव मतुल भगपानतन्तो ब्रह्मा हरश्च नहिं वस्तु मलं बलन्च || साचण्टिका खिल जगत्परि पाल नाय नाशाय चा शुभ भयरवमति करोतु ॥४॥ या श्रीः स्वयं सुति नां भुवने व लक्ष्मीः । पापात्मनां सिधियां हृदये सु बुद्धिः श्रद्धा सतां कुल जन प्रभाध्य लगा, तां त्वां नवाः स्म परि पाशय देविविरवम् ॥ ५॥ किं , याम धब रूप भचिन्त्य मेतति धाति वीर्य मसुर हय कारि भूरि ॥ किं बाहवे चरितानि तवाति यानि सर्वेषु देव्य सुर देव गणादिकेषु ॥ हेतु समस्त जातां निगुणाऽपिदोपै नज्ञायसे हरि हरादिभि रप्य पारा ।। श्रवा श्रया ऽखिल मिदं जगदं शभून मच्या कृताहि परमाप्रति स्त्वमाद्या ॥ १॥ या समस्त सुरता समुदो रणेन तृप्ति प्रयाति सकले मसेषु देवि ॥ स्वाहा ऽसि वै मित गणस्य च तरिक्ष हेतु रुचार्य में बमत एव जनैः स्वधाच ॥ या मुक्ति हेतु रवि चिन्त्य महा व्रतात्वसम्यम से सुनियतेन्द्रिय तत्त्व सारैः ! मोनाधि- भिमुनिभिरस्त समस्त दोपैविद्या ऽसि साभगवती परमादि देवि ॥ ६ ॥ शन्दारिमका सु विमलयंजुपां निवान मुग्दी थरम्यपह पाठ यतां चसामनाम् ॥ देवी यी भगवती भव भावनाय वाता च सर्व जगतां परमार्ति हलीः ॥ १० ॥ मेधाऽसि देवि विदिता सिन शास्त्र सारा दुर्गासिंदुर्ग भव मार नीरसंगा ।। श्रीः केट- भारि हृदये ककवाधि वासा गोरी त्वमेव शशि मालित प्रतिष्ठा ॥ ११ ॥ परसहा सममलं की पूर्ण चन्द्र विम्यान कारि कनको बम कान्ति कान्दम् ॥ अत्यद्भुतं पहनमा चरुषा क्या Sपि पर्ण यिनोस्य महमा महिया मुरेण ॥ १२ ॥ हायातु देवि कृषितं भृकुटी कराज मुघच्छशा सहश छपि सयः ।। प्राणान्मुमोष महिपस्ववीच चित्रं कर्जीव्यतिहि कुपिता तक दर्शनेन ॥१३॥ व प्रसीद परमा भवती भवाय सधो विनाश सि कोपवती फुमानि ॥ विज्ञावमे नद धुनेय यदस्त मेत नीत पलं सुविलं महिए। मुस्य ॥ १४ ॥ ते स मा जन पदेषु धनानि तेषां तेषां यस न प मी दाति धर्म व धन्यास्त पर निवास त्य दारा येषां सदा ऽभ्युद् यदा भवतो प्रशना ॥ १५ ॥ पम्पाधि देखि मरनानि सदैव कर्मापयत्या हसः प्रतिदिन मुन्टा प्रोसिस प्रयाति पदती भयदी यसादा माय फसा ननु कि वेन यन्न है -- घीय च हन्त . [ २५१ ] ॥ १६ ॥ दुर्गे (मृता हरसि भीति मशेष जन्तोः स्वस्थैः स्मृत। मति वतीय शुभांददासि दारिद्रय दुः खमय हारिणि का त्वदन्या सर्वो प्रकार करणाय सदा चित्ता ॥ १७ ॥ एभिहतर्जगदु पैति सुर्ख तथै ने, कुर्वन्तु नाम नरकाय चिरायपापम् ॥ संग्राम मृत्यु मधि गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नून महिसा न्विनि हैसि दधि ॥ १८ ॥ दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वा मुरा नः रिषु यत्प्रहिणोषि शस्तम् ॥ लोका प्रयान्तु रिपवो ऽपिहि शस्त्र पूता इत्थं मति भवति तेष्व हितेषु साध्वी ॥ १६ । वन प्रभानिकर विस्फुरणी स्तथोग्रेः शूलाग्र कान्ति निवहेन दृशो ऽसुराणाम् ।। यत्रा गता विल यमं शुमदिन्दु खएड योग्या ननं तव विलोक यतां तदेतत् ॥२०॥ दुर्वृत्त वृत्त समनं तव देषि शीलं रूपं तथै तद विचिन्त्य मतुल्य मन्यः ॥ देव परा क्रमाणां वैरि वापि प्रकटितव दया त्वये त्यम् ॥ २१ ॥ केनो पमा भवतु ते ऽस्य परा क्रमस्यरूपं चशत्रु- भय' कार्यति हारि कुत्र ।। चित्ते कृपा समर निष्टु रता चदृष्टा- स्वय्येव देवि वरदे भुवन त्रयेऽपि ॥ त्रैलोक्य मे तद खिलं रिपु नाशनेन, ब्रांतं त्वया समर मूर्द्ध नि तेऽपिहत्त्वा । नीता दिव रिपु- गणा भय मप्य पास्त मरमा कमुन्मद सुरारिमव नमस्ते ॥ २३ ॥ शूलिन पाहिनो देवि पाहि पनेन चाम्बिके । घण्टा स्वनेन स्नः पाहि ना पज्यानिः स्वनेन च प्राच्या रक्ष प्रती च्यां च चण्डिके रख दक्षिणे, भ्रामणे नाम शूलस्य उत्तरस्यां तथे श्वरि ॥ २५ ॥ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्यविचरन्ति ते, यानि वां स्यर्थ घोणणे ते रक्षा मा तथा भुवम् । खग शूल गदा दोनि यानि चामणि तेम्बिके, कर पल्लव संगीनि तरस्मा नक्ष सवंत ॥२०॥ भूमाप्रादेशंकृत्वाप्रणमेत।। इति मत्रेणार्य स्थं पूगीफलंश्वेष्टा सम्मुखे निवेद्यः ॐअनेन सफलाध्येय दास्तु सदा ममः । इत्य शंख विशपायर्योदकन देवतांनापयेत् ।।ॐभूर्भुवः स्वःश्रामहात्रिपुर सुंदर्य नमः अध्यं समर्पयामि नमः ॥ ततःमूलमत्रेण ग. न्धातल पुष्पधूप दीपंत्रि.पूजयेत् पुनः संतर्पयेत्-मूल मत्रेण पुष्पान्तान्- शुक्ल पक्षेत्-यथा आं क्ली सौः ॐनमः कमिश्चरि इच्छा काम फलप्रदे सर्वप्तत्ववश करि सर्व जगत्वोभएकरिहुहुहुंद्रा द्रक्ली ब्लूस सौ ली ऐं ४६ कामेश्वरिनित्वा श्रीपादुका पूजयामिति दंश हस्तेन । माला मन्त्र सतर्फ येत् । ( वामै शं भूपि निक्षिपेत् ) इतित्रिः मंः पर्यन्तं भू. वः स्वः श्री महात्रिः। पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि नमः ॥ इति पुष्याम्जलिम् । कृष्ण पहेतुपूर्ववत् माला मन्त्र पूजयामि नमः कामेश्वरि तर्प० पुस० प्रार्थनाम्-ॐ विद्यु राम समप्रभा भूग पति स्कन्धरियां भीषणाम् [ २६० ] कन्याभिः करवाल सेट विलसद्धस्ताभिरा सेविताम् ।। हस्तरचक्र गदाति सेट विशिखाया गुर्ण वर्जनीम् विप्राण। मनलामिका शशि घरो दुई विमत्रां भजे ।। सर्व स्वरूपे ! सर्वेशे सर्व शक्ति स्वरूपिणि । पूजां गृहाणू-कौमारि ! अगन्मावर्नमोऽस्तुते ॥ श्री भूर्भुवः स्वः श्रीमहात्रिपुर मुन्दय नमः प्रार्थनां स० ।। नया च । वैदिक वातांत्रिक सूक्त प्रार्थमेव समर्पयामिः ॥ नमोवेव्यै महादेव्यैः वा श्री शक्तप्राय आवर्णाचनादि परिवार पूजनम्-शुक्ल पतेयजेन्नित्या कामेश्ययादि योदश ॥ कृष्णपने विचित्रायाः कामेश्वर्यवसानकाः । इनि वचनान् । प्रयोगो यथा- भगमालिनी माह-आं ऐं भग भुगेभगिनि मगो दरिभगमाजे मगाव भग गुये भाग योने भगनिपातिनि सर्व भगवशंकरि मगरूपे नित्यक्तिन्ने भग स्वरूपे सर्व भगानि मेह्यानय वरदे रेते सुरेतेभगक्लिन्ने क्लिन्न वे क्लेदय द्रावय अमोघे भगविच्चे तुभदो भय सर सत्वान् भगेररि ए ग्लज ब्लू' में ब्लू भौं ब्लू हे विजन्ने सर्वाणि भगानि में वशमानय सी हरेल्वे ही भगमालिनी नित्या या पादुका पूजयामि नमः । नित्यजीत्रा मन्त्र माह-शिवाचा एका दशार्णः । ईहीं हित्य विज्ञन्ने मवद्रये स्वाहा नित्यक्लिन्ना नित्या श्री पादुकां पू०." भेगडामंत्रमाह-ई श्रओं को धो क्रॉ चौ छौं श्रौं ज्ञयों स्वाहा मेर- डानित्या श्री पा० । वद्धि वासिनीमंत्रमाह-मायेति-ॐ ही वद्धि वासिन्यैनमः वहि वासिनि नित्या श्री पादुकां पूजयामि नमः । महाविद्य श्वरी मंत्र माह--ॐ ही में सः नित्य मिलने मद्रवे म्वाहा ।। महाविद्यश्वरीनित्या की पा० ॥ शिव दूती मन्त्र मार- ॐ ही शिव दूत्यै नमः ॥ शिव दूनीनित्या श्री पा० सरिता मंत्र माह-ही हुँचे च के क्षः सी हूँ क्षे ही फट नित्या श्री पा कुल सुन्दरी मंत्र माह-लु ऐ रनों सी. कुन सुन्दरी नित्या श्री पा० ॥ नित्य नत्रमाह- ऐ दली सी. झो० सही इस्लों मी. की दी की ब्लू सः नित्या श्री पा! गौन पनाकिनी मप्रसाद प्रों हा ही की नित्य मदद को नील निनित्या श्री पा० ॥ विजया मर माह-पंह सके जियाये नमः जिगनिया भी पा || म मनाला मत्र माह--त्रों यो मामला नमः सा मला धीपा मालामालिन मंत्रमाह- श्री नमागी ज्याला मालिनि देवि भयं भून संहारकारिक जान बम मान्न प्रजननि मल मन प्रगल हुन पद माला मालिनी निरस भी पा- || वित्रि मात्रा क्या श्री पा० ॥ एग ५५ रा निस्या ॥ एम स्त्रिकाये पर राम परिता [ २६१ । विन्दौ मूलेन षोडशी यजेत् ॥ | मूल महा त्रिपुर सुन्दरी नित्या श्री पादुको पूजयामि तर्पयामि नमः । विन्दुत्रिकोण यो मध्ये त्रिभंगीभिः पंक्ति येणगुरू न्यजेत् ॥ ते प्रिविधा इत्याह || यथा-पर प्रकाशा नन्दनाथ, श्री पादुकां पूजयामिः ॥ पर शक्तयं वा श्री. पा० भोगदा नन्दनाथ भी० पा०॥ गगनदा नन्द नाथ श्री पा० ॥ भोग शक्तयम्वा श्री पा०॥ विन्दो प्रागादि दिनु पूर्वा माय देवता की पा०॥ दक्षिणा नाय देवता श्री पा० । पश्चिमा नाय देवतां श्री पा० ॥ उरां नाय देवता श्री पा० ॥ ततः पंच पंचिकाः पूजयेत् ।।-तत्राद्य पंचके । मूलेन श्री विद्या मध्ये पूज्या ॥ दिनु लम्या द्याः लक्ष्मी मंत्र माह-श्री लक्ष्मी श्री पा० । इति पूर्वे । महा लक्ष्मी मंत्र माइ- ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमलेकमला लये प्रसीदर श्री ह्रीं श्रीं ॐ महा लद. म्यै नमः महा लक्ष्मी श्री पा० ॥ दक्षिणे ॥ त्रिशक्ति मंत्र माह- श्री ही की विशक्ति श्री पार परिचमे । सर्व साम्राज्या मंत्रमाह- श्री सहकल ही श्री सर्व साम्नाग्या श्री पा० ॥ उत्तरे ॥ द्वितीय पंचके~पर ज्योति-मंत्र माह--ॐहीं हंसः सोहं स्वाहा परं ज्योतिः श्री पा० ॥ पूर्व ॥ पर निष्कल शाम्भवी मंत्र माह-ॐ परनिकल शाम्भवी श्री पा० दक्षिणे ॥ अजपामाह-हमः अजपा श्री पा०॥ पश्चिमे ॥ श्रादिक्षांत वर्णास्तु म.काः ॥ अं आ. इं मातृका श्री पा० उत्तरे ।। तृतीय कल्प सता पंचके त्वरिता मंत्र माह- ॐ ही हु बेचछेक्षः स्मी हुने ह्रीं फट् त्वरिता श्री पा० ॥ पूर्वे ॥ परि जातेश्चरी मंत्र - माह ।। ॐ ही इसकल है ही ॐ सरस्वत्यै नमः पारि जातेश्वरी श्री पा०1 दक्षिणे ॥ त्रिपुटा मंत्र माह-श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिपुटा श्री पा०। पश्चिमे। द्रां द्री ली ब्लू सः पंच वारणेशी श्री पाल उत्तरे । कामधेनु पंच के II अमृत पीठेशी मंत्र माह-क्लीं सौं: अमृत पोठेशी श्री पा० ॥ पूर्व ॥ सुधा श्री मंत्र माह--हखौं रहीं श्रीं क्ली सुधा श्री पाए । दक्षिणे ॥ अमृते श्वरी माह-सौः क्ली है अमृते श्वरी श्री पा॥ पश्चिमे । अन्नपूर्ण खरी मंत्रमाइ-ॐ ह्रीं श्री को नमो भगवनिमाहेश्वरि अन्न पणे स्वाहा अन्नपूर्णा भी पा० ॥ उत्तरे ॥ रत्न पश्चके सिद्ध लक्ष्मी मन्त्र माह-पंक्तिन्ने क्ली मद. ये कुले हसीः सिद्ध लक्ष्मी श्री पा० । पूर्व । दक्षिणे माती- क्ली सौः ऐही श्री ओं नमो भगवती मातंगीश्वरि सर्व जन मनोहरि सर्वराज शं करि, सर्व दुध मा वशंकर सब लोक व शकर हौं श्री वीरे मागों भी पादुका प्र० । दक्षिणे भुवनेश्वरी माह ही मुयमेश्वरी श्री पा० ॥ पश्चिमे || वाराही मंत्र माह- एंग्लों में नमो भगवि बालि - थ भूविध [ २६२ ] धाराहिवाराहमुखि एंग्लो ऐ अंधेचिनिनमः रिंधधिनिनमः जिभेजभिनि नमः मोहे मोहिनि नमः स्तंभे स्वभिनि नमः एंग्लों ऐं सर्वदुष्ठ प्रदुष्टानां सपा सर्व याक वित्त चतुर्मुख गति जिला स्तम्भं कुरु २ शीघ्र वशं कुरु २ ऐंग्लों ऐंठः ठः ठः ठः हुँ फट् स्वाहा वाराही श्री पा० उत्तरे ॥ एवं पंच पंचिकाः सम्पूज्य दर्शनानि यजेत् ।। शिव दर्शन श्री पा! शक्ति दर्शन श्री पा० ॥ ब्राह्म दर्शन श्री पा०॥ सौर सोगतम् ।। मूलेनविस्ततयेत् ।। अङ्ग,ष्ट तर्जनी योगे ज्ञान मुद्रा प्रदर्शयेत् । माख्य विन्दु पर्यन्तं ।। प्रतिलोमे नवा वरण पूजा आवरण देवता नामादी माया श्री चोजे अंनेतु श्री पादुकां पूजयामि नमः ॥ अग्नीशा शुरवायव्यं पुरोदिदवग पूजनम् ॥ आग्नेये हत् ॥ ईशः शिरः । नैरित्ये शिखावायव्ये कवचं । पुरो नेत्रे । दिवख ॥ प्रयोगो यथा-श्री ही क्ली में सौः हृदयं वाग्देवता श्री पा। आग्नये ॥ ॐ ही श्री शिरः वाग्देवा श्री पा०॥ ईशः ॥ कयेइल ही शिखा वाग्देवता श्री पा० । नैरित्ये । इस कहन ह्रीं कवचं वाग्देवता श्री पा० ।। सकलाही नेत्रमाग्देवता श्री पा०॥ पुरौ ॥ मोः पं क्लीं ह्रीं श्री दिक्षत्र श्री पादकां पूजयामि वाग्देवायै नमः ॥ अत्रम् ॥ निरेखं भू गृह मस्ति । वस्याधर रेखायां अष्ट दिनु ऊव' भधश्चाणिमाद्या दश सिद्धीर्यजेत् ॥ ही श्री अणिमायशिद्धि अणिमा श्री पादुकां पू० ॥ ही श्री महिमायै शद्धिमहिमा श्री पादुकां ॥ ह्रीं श्री लघि माय शिद्धिलंधिमा भी पा० ही श्री गिरिमाय सिद्धिगिरिमा श्री पा० ॥ ही श्री प्राप्तयसिद्धि प्राप्वये श्री पा०॥ ही श्री प्राकाम्यै शिवि प्राकाम्यां श्री पा०॥ ह्रीं श्रीं इपिताय शिद्धि ईपिता श्री पा०॥ ह्रीं श्री वसिवाय शिद्धि वसिवा श्री पादुकां पूजयामि नमः ॥ ध्यानम् - वन हम समानाभाः पाशांकुशधरा शुभाः। सावकेन्यः प्रवच्छन्ति रलोध वां विचितयन् ।। पाद्य गन्धाक्षत पुष्पांदिभि वद्यान्तं सम्पूज्ययेत् ।। भूगृह द्वितीय रेबायां पश्चिमादि प्राधाद्या अष्ट मातृर्यवत् ॥ ही श्री प्राझी माता श्री पादुकां पूजगमि नमः । हीं श्री माहेश्वरी मान का श्री पा० ।। बा श्री कौमारी मातृका श्रीपा० । ही श्री वैप्पापी मान का भी पा० ॥ दी श्री बाराही मातु का श्री पा० भी इन्द्राणीमान मा श्री पा० ॥ द्वी श्री पामुण्डा मानका श्री पाल! दी भी महा लक्ष्मी माता श्री पा० ॥ ध्यानम्-विद्यां शूलं शक्ति पके गदा वहिडकम् ॥ पद्म नमेरा दयवीः मया मिष्ट प्रभागिताः । पागधा शत गुप्पा दिभिः शान्त सम्पूण येन् । वस्यनाराण मीय रेशर सि सामान दश महामाया परा ।२६३ ] मुद्रा यजेत् ॥ ह्रीं श्री सोभए मुद्रा श्री पा० ॥ ही श्रीद्रावण मुद्रा श्री पा० ॥ही श्री कशण मुद्रा श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं वश्य- मुद्रा श्री पा॥ ह्रौं श्री उन्माद सुद्रा श्री पा० ॥ ह्रीं श्री महा कुशाः मुद्राः श्री पाली श्री सेवरीमुद्रा श्री पा० ॥ ह्रीं श्री वीन मुद्रा श्रीपादुकां पू० ह्रीं श्री योनि मुद्रा श्री पा० ॥ ही श्री त्रिखण्डामुद्रा श्री पादु०॥ एवं ।। क्षोभ मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ प्रार्थना-- ॐ अभिष्ट सिद्धि में देहि शरणां गत वत्सला । भक्तधा समर्पये धुभ्यं मिदना, वरणा चनम् । इदमा वरणा चंगम् ॥ उतः पाछा- दिमि नैवेद्यान्न सम्पूज्यः अं० मुलेन पुष्पा अलिंदद्यात् ॥ ततः पोडशारे चिलो मेन पश्चिमादि पोडश कामा कपणा धाः शक्कीः पूजयेत् ।। तपयेत् ।। यथा-दीधी सामा कपणी शक्ति श्री १० ॥ ह्री श्री. बुद्धया कपणी शक्ति श्री पा० ॥ ही श्री अहं कारा फर्पणी- शक्ति श्री पार हो श्री शब्दाकर्षिणी शक्ति श्री पा०॥ ह्रीं श्री सर्शा कर्पणी शक्तिश्री पा०॥ ह्रीं श्री स्पर्शाकर्षणी शशि श्री पा॥हाँ श्री रूपा कर्पिणी शक्ति श्री पा०11 ह्रीं श्री गन्धा कर्पिणी शक्ति श्री पा० ॥ ही श्री चिचा कर्षणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री धैर्या कर्णणी शक्ति श्री पा-॥ ह्रीं श्री नामा कर्णरणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री वीजा कर्षणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री अमृता कर्षणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री स्मृत्या कपणी शक्ति श्री पा ही श्री शरीरा कणी शक्ति श्री पा० ॥ ही श्री पात्मा कर्मयी शक्ति श्री पारार्थना-अभिष्ट सिद्धिम्मे देहि शरणा- गत वप्सलः । भक्त्या समर्पये तुम्य द्वितिया वरणाचने । इति संप्राध्य ।। एताः योदश गुप्त योगिन्यः पूजितास्तर्षिताः संस्वित्युक्त्या ॥ द्रावणो मुद्रा दर्शवेत् ।। अष्टवर्गा वितेः टोर पूर्वाधनु लोमेना नंग कुरामा धाः पूज- येत् ।। यथा ही श्री अनंग कुगुमा श्री पा०॥ ह्रीं श्री अनंग मेखला श्री पा० ॥ ही श्री अनंग माना श्री पा० ॥ ही श्री अनंग मदना तुरा श्री पा० हो श्री अनंग रेखा श्री पा०॥ ही श्री अनंग येगा श्री १०॥ ही श्री-अनंग कुशाः श्री पा० ॥ ही श्री अनंग मामिनि श्री पा० ॥ एवं तृतीया वरणैः सम्पूज्य संघ झोरणे के एना अपो गुप्त तर योगिन्यः पूजिवाः सन्तु ।। प्रार्थना- वोरणी मा~-वामे मुस्टिवल्या दर्जनी प्रतिकार या भामदाम मुमा सौभाग्य दरानीतियोमणी मावि प्रामियो नामगुप गर्मित मधि बनोस र पारिनार विनिक पारण्य मुद्राला राग नायिनीति मुदा वाम पाद वने रात !!

मूने पुनाजलिं दत्त्वा । वश्यमुद्रा प्रदश येत || पूजितास्वपिता ह्रीं श्री सर सिद्धि प्रदा द्यादेपो श्री पा० ॥हीं श्रीं सर्व सम्प पंप मुद्रा--गरि पत्यं करोसष्टा बंगुष्टी कारये ममो ॥ नामान्त- [ २५४ ] अभिष्ट शिदि म्मे देहि शरणागन् वत्सजः । भक्कया समर्पये तुम्य तुतिया वरणाचने ॥ इति से प्राय ॥ पाद्यगन्धाक्षत पुष्पादिभिः नेवेद्यान्त सम्पूज्य. इत्युक्त्वा कर्यण मुद्रां दर्शयेत् ।। पुनः तपयेत् ॥ तवरचतुर्या वरणे चतुर दशारे कादि चतुर्दशाणं युते । इन गोपेत्याधुक्त रूपा दर्पण पाशर वाम कराः। पान पात्रो कुरावा दतकराः सर्व सं शोभण्यां द्या रचतुर्दश शायः ॥ शक्ति पदाटिका परिचमादि विलोमतः पूयाः ॥ यया-ही श्री सं क्षोभरणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री द्राविणो शक्ति श्री पा० ॥ ही श्री कृपणी शक्तिः श्री पा०॥ हो श्री हाद करी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री सं मोहिना- शक्ति श्री पाधा स्वपन कारिणी शक्ति श्री पाः ॥ ही श्रा जम्मनि का शक्ति श्री पा० ही श्री वशं करी शक्ति श्री पा०॥ ह्रीं श्री. संजनि का शक्ति श्री पा० । ह्रीं श्रीं शर्यो न्मादिनि का शक्ति श्री पा० ॥ हो श्री साथि साधिनी शक्ति श्री पा० ॥ ही श्री स मम्पति रूपिणी शक्ति श्री पा०॥ ही श्री सर्व मत्रमयी शक्ति प्रो पा- ह्रीं श्री सर्वदच्य करी शक्ति श्री पा: पत्र चरण माराय मयं सौभाग्य दे चक्रे इमा चतुर्दशमम्प्रदाय योगिन्य पूजिता. सवि त्युक्त्वा पश्य मुद्रा दर्शयेत् ॥ प्रार्थना-अभिष्टशि- द्विम्मेरहि । मरणा गत वत्सजे मक्या ममर्पये तुभ्य चतुर्था वरण चंने ॥ इदमा वरणा चनम् ॥ पाद्यगन्धाक्षत पुष्पादिभिः मम्मूज्य । इमा ॥ णादि दश वर्ण युते दशारे पश्चिमादि व्युत्क्रमेण सर्प सिद्धिप्रदाया था देवी प्रदादा दश पूजयेत् ॥ यथा-- पदा देवी श्री पाक सर्व करी देवी श्री १०॥ ह्रीं श्रीं सव' मंगत कारिणा देवी श्री पा०॥ हीं भी सर काम प्रदा देवी श्रीपा० ॥ ह्रीं श्री सर दुःख निमो। चतुर्थ प्रिंस गते सत्वा तन्पो झटिला ती ॥ कनिष्टके नियुत निज स्थानमहे. सर॥ त्रिखरो ममारमाता त्रिपुरा हान कपिः इति पंथी। सरपमुद्रा-पुटा रो रो पत्ता बन्या पंग वी || परि वसं या मध वगग मेष देखि ननिय नामिमा दयः ।। SAR निाि. मां अगुएरा बम देवः मद्रेय परमे शानी हवं वाय प्य मनि ॥ विवरण मुद्रा मारा पा. हीं श्रीं [ २६५ ] . चिनी देवी श्रीपादुका० ॥ ह्रीं श्री सर्व मृत्यु प्रशमनी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं सर्वविघ्न निवारिणी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं सर्वात सुन्दरी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीसर्व शौभाग्य दायिनी देवी श्री पा० ॥ एवं पंचमा वरण सम्पूज्य सर्वार्थ वाध के चके इमा दश कुलयोगीन्यः पूजिताः सन्ति त्युक्त्वा ॥ प्रार्थना-अभिष्ट शिद्धि म्मे देहि शरणां गत वत्सलेः भक्तथा समर्पतेत्तु भ्यं पंचमा वरणा चनम् ॥ पाद्य गन्धादत पुष्पादिभिः नैवेद्यान्तं सम्पूज्य || उन्माद मुद्रां दर्शयेत् ॥ ततो परे दशारे माद्यर्णयुत्ते ज्ञान मुद्रा पर दक्ष कराः टंक पाश वाम करा उद्यदविनिभाः सर्वज्ञा द्या देव्याश दश- पूजयेत् ॥ यथा T-ह्रीं श्रीं सर्वज्ञा देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्री सर्व शक्ती देवी श्री पा० ॥ ही श्रीं सर्व ऐश्वर्य फल प्रदा देवी श्री ज्ञान मयी देवी श्री पा० ।। ह्रीं श्रीं सर्व व्याधि विनाशिनी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं सर्वा धार स्वरूपा देवी श्री पा० ॥ह्रीं श्रीं सर्व पापहरा देवी श्री पा० ॥ ही श्री सर्वा नन्द मयी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्री सर्वरक्षा स्वरूपिणी देवी श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं सर्वे सितार्थ फलदादेवी श्री पा० ॥ इति पश्चिमादि विलो. : मगाः ॥ एवं पष्ट मा वरण मभ्यर्च्य सर्व रक्षा करे चक्रे इमा दश निगर्भ योगिन्यः पूजिता सन्त्वि त्युक्त्वां कुश मुद्रां दर्शयेत् ।। प्रार्थना-अभिष्टसिद्धिम्मेदेहि-शरणां गत वत्सलेः भक्तथा समर्पये तुभ्यं पध्दमा वरणा र्चनम् इति सं प्रार्थ्यः पाद्यगन्धाक्षत पुष्प धूपदीप नैवेद्यान्त सम्पूज्यां कुश मुद्रयाम्प्रदर्शयेत् ॥ तवोष्दारे रक्क यन्त्र बाणधर दक्ष करा धनु विद्या वाम करा न्यासोका अष्ट पसिन्या द्या उक्त वीज पूर्विका यजेत् ।। ह्रीं श्रीं अं आं० अः झलू वशिनी वाग्देवतायै श्री पा० ।। ह्रीं श्री-अं श्रां० श्रः क्ली हो कौमारी वाग्देवतायै श्री पा०॥ ही श्री अं- आं० अः न्नी मादिनी वाग्देवता श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं अं श्रां० उन्माद मुद्रा-संमुखौनु कगै कृत्वा मध्यमा मध्यमे नुजे ॥ अनामिके तु सरले वध स्वर्जनी द्वयम् ॥ दंडा कारी ततो गुष्टो मध्यमा नस्व देशगी । मुद्रेशा न्मादनी नाम क्लेदिनी सर्व योपिता ॥ अंकुश मुद्रा-अज्जी मध्यमिकाकृत्वा वर्जनी मध्य पर्वणि । संयोज्या कुन्तये किचिन्मुद्रपांकुशशिकम् ।। खेचरी मुद्गा-सम्यदक्षिण हस्तेतु सभ्य इस्तेतु ददियम् । वाहू कृता- [ २६६ ) ग्लू विमला वाग्देवतायै श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं श्र आ० मा म्री अरुणा वाग्देवतायै श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं अ श्रा० अहव्यू जयनीवावाग्देवतायै श्रीपादुका०॥ ह्रीं श्रीं श्र आ० अ इज्म् यू शर्वेशी वाग्देवतायै श्री पा० ॥ ह्रीं श्रीं अ आ अनीकौलिनीवस्वतायैश्री पा० एव सप्तमा वरण भिष्टवा सर्व हरे चक्रे इमा अप्टारहस्य योगिन्य पूजिता सत्वि त्युक्त्वा ।। प्राथना अमिष्ट सिद्धिम्मे देहि सरणा गत वत्सल भक्त्या समर्पयेत्तुभ्य सप्तमा धरणार्चनम् ॥ इति प्रार्थयेत् ।। पाद्य गन्धाक्षत पुष्पादिमि नैवेद्यान्त सन्पूज्य । सेचरी मुद्रा दर्शयन् ।। सतोऽकयादि वरणरचितेत्रिकोणेपश्चिमाद्यनु लोमेन चतुदिक्षस्व स्व वीजपूर्वकान् जभ मोह यसस्तभ विशेषण विशिष्टान कामेश्वर कामेश्वर्यो र्वाण धनु पाशाकुशान्पूजयेत् ।। यथा-ला वा सा द्रा द्रीं क्लीं ब्लू स कामेश्वर कामेश्वरी जमा वाणश्री पा० ॥ पश्चिमे ॥ ध थ कामेश्वर कामेश्वरी मोहन धनु श्री पा० ॥ उत्तरे । बाह्री कामेश्वर कामेश्वरीवशीकरणपाश श्रीपा० ॥पूर्वे । क्रौं कामेश्वर कामेश्वरी सम्वनाकुश श्री पा० ॥ दक्षिणे अग्नि दक्षिण वामकोणेपुकूटत्रय कव्ह.स.)पूर्वे रुद्रविष्णु ब्रह्मणाशक्त्याश्वतिस्र कामे श्वरीवन श्वरी भगमालिनीसना पूज्या ॥ प्रयागोयथाफ एईलह कामरूप पीठे क मेश्वरी रुद्र शक्ति श्री पा० ॥ ह सकल ही पूर्णगिरी पीटे वने श्वरी विष्णु शक्ति श्री पा० ॥ सक्ल ह्रींजालन्धरी पोटे भग मालिनी ब्रह्म शक्ति श्री पा० ॥ एव मष्टमा वरण भिष्टवा सर्व सिद्धिप्रदे के इमा अति रहस्य योगिन्य पूजित सान्त्वि त्युक्त्वा मलेन पुराञ्जलि दत्वा वीज मुद्रा प्रदर्शयेत् ॥ यथा प्रायना - अभिष्ट सिद्धिमेदेहि शरणा- ङ्गत् वत्सले भक्त्या समपयेत्तुभ्यं अष्टमा परणार्चनम् ।। इदमा वरणा चनम् ।। पाद्य गन्धाक्षत पुष्प धूपधीप नैवेद्यादिमि सम्पूजयेत् । मूले पुष्पान्नलिंदत्वा मुद्रा प्रदर्शयेत् । वता- आ० इत्यादिमूल विद्या पढित्या ध्यात्या विदौ श्री मत्रि. महा-वि हस्तौ स परि वर्थच ॥ इनिष्ट नामिा देशि झाजे न क्रमेश बजीम्यापमानान्तमा मपिमध्यमे । अंगुष्ठी तुमहादे विसरता काश्यत्सम । चीन मुद्रा -अगुष्ट गभिंगी सेव मनिराध समीरितति अगुष्ट गर्भ नदिय यम बनि मुप नमंध कनिधि के वावा वर्जनीभ्यां मनामि के॥ अना मियोप्य सलिट दार्थ मध्य मया रथ । अगुधाय न्य योनि मदेरम रितेति ॥ ३. वशीकरण-पास ॥

[ २६७ ] पर सुन्दरी पादुका पूजशमि इतियजेत् ॥ एवं नवमावाण माराध्य सर्व काम प्रदे पर सर्वामीष्ट दायिनी परा पर रहस्य योगिनी श्री मनिपुर सुन्दरी पूजितास्त्वित्त्युक्त्वा योनि मुद्रां प्रदर्श्य निरर्पयित्वा धूपदीपा दीनि दत्वा अग्नोवाबाह्य हुत्वोदासयेत् ॥ अग्नि स्थापनम् । (प्र० ३०) प्रार्थना-अभिष्ट सिद्धि मे देहि शरण गत वत्सले: भक्त्या समर्पये तुभ्यं नवमा वरणार्चनम् ।। इति सं प्रात्य॑ ।। पाद्यगन्धाक्षत धूप दीप नैवेद्य पुष्यै नानाविधैर्दिशेत् । वह्निसम्पूज्य पूर्वोक्त श्रीमद् त्रिपुर सुय्य नगः ॥ योनि मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ अथ शत चगदी श्री सत् चण्डिविधानम् । विधान प्रयोगो यथा-शास्रोत विधिना शङ्करालये भवान्या लयेगा । मंडपं वेदि मध्ये निर्माय ।। प्रतीच्या. कुण्ड मध्येवा कृता-साल्पं विधाय ॥ कृत नित्य क्रियो मुक कामः शत चण्डी विधान मई करिष्य इति ॥ मातृ स्थापन नांदी श्राद्धं विधाय स्वस्ति वाचनं कृत्वा ॥ उक्त लक्षणान् दश विप्रान् मधु पर्क बत्र हम दाना- दिना वृणुयात् ॥ तेच यजमान दत्ता सपु दत्तमालाभिः समाहि- ताः सुमन सोभगवतीं स्मरं तः सप्त सतीमूल मन्त्रेण वेद्यां कुंभ- सस्थापयित्वां तत्र दुर्गा मा पाह्य पोडशो पचारैः संम्पूज्य तदने प्रत्येक दश कृत्वः सप्तसती म युतं च नवार्ण जपेयूः ॥ हविष्य भोजन ब्रह्म चर्यभू शयना स्पृश्यास्पर्शादि नियमां रच चरेयुः ॥ यज मान श्व द्विं वर्षा द्या उक्तलक्षणा अधि कांगी त्यादि दुर्लक्षण रहिताः कुमारी त्रिमूर्तिकल्याणादिनाम्नी दश कन्या भोजन वस्त्र हेम दांना दिनामंत्रा पर मयो मित्यादि मंत्रेणा वाह्यजगत्पूज्ये त्यादि स्व० स्व. मंत्रः पूजयेत् ॥ नवाणं चण्डिका मंत्रं जपेयु वा युतं पृथक् ।। यजमानः पूजयेच कन्यानां दशकं शुभम् ॥ द्वि वर्षा द्या दशा दांता कुमारीः परि पूजयेत् ॥ नाधिका गीन हीनांगी कुप्टिनी च व्रणों किताम् ॥ श्रधां काणां केकरां च कुरूपां रोम युक्त नुम् ॥ दासी जावां रोगयुक्तां दुष्टां कन्यां न पूजयेत् पित्रांसष्ट से सिद्ध यशसे शानियो द्भवाम् ॥ वैश्यानांधन लाभायपुत्राप्त शुद्भजायजेत् ॥ द्विवर्वा सा . कुमा युवा त्रिमूर्वि यिन त्रिका ।। चतुरन्दा तु कल्याणी पंचवर्षा तुरोहिणी । पडव्दा कालिका प्रोक्का चरिडका सप्त हायनी । अष्ट वर्षा शाम्भवी स्या हर्णा च मय हायनी ॥ सुभद्रा दश वर्षोकर [ २६८ ] स्वा मंत्रैः परि पूजयेत् ॥ एकान्दा याः प्रोत्य भावो रुद्रान्दास्तुवि. वजिताः ।। वासा मा वाहने मंत्राः प्रोग्यन्ते शङ्करो दिताः । मंत्रा. तामयीं लक्ष्मी मात्रणांरूपधारिणीम् ॥ नव दुर्गास्मिकां साता कन्या मा वाहयाम्यहम् ॥ कुमारि कादि ऋन्यानां पूजा मंत्रा न्युवेऽधुना !! जगत्पूज्ये लगढ'ये सर्व देव स्वरूपिणि ॥ पूजागृहाण कौमारि जग- म्मार नमी स्तुते ॥ त्रिपुरांत्रिपुरा धारां त्रिवर्ग ज्ञान रूपिणीम् । त्रैलोक्य वन्दितां देवीं त्रिमूर्ति पूजया म्यहम् || कलामिकां फला टी- तां कामएर हृदयां शिवाम् ॥ कल्याण जननी देवी कल्याणी पूजयाम्यहम् ॥ अणिमादि गुणाचारा मकारा द्यक्षरा त्मिकाम् ।। अन- तां शक्ति कां लक्ष्मी रोहिणी पूजयाम्यहम् .॥ कामचारां शुभां कान्तां काल चक्र स्वरूपिणीम् ॥ कामदां कमरणो दारां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥ चण्डवीरां चंड मायां चंढ मुंड प्रभजनीम् पूजयामि महा देवी चण्डिकां चएट विक्रमाम् ॥ सदा नन्द करी शांता सर्व देव नमस्कृताम् ॥ सर्व भूतात्मिकां देवों शामवीं पूजया म्यहम् ।, दुर्गमे दुस्तरे कार्य भवाएंव विनाशिनि ॥ पूजयामि सदा भक्कया दुर्गा दुर्गाति नाशिनीम् ॥ सुदरी स्वर्ण वर्णा भां सुख सौभाग्य दायिनीम् ।। सुभद्र जननी देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ॥ एत मैत्रेः पुराणोक: स्लावां कन्यां प्रपू जयेत् ॥ गंधे पुप्पैर्भक्ष भोज्यै त्रिमूर्तिपूजनम् ॥ वस्त्ररा भरणे रपि ॥ वेद्या विरचिते रम्ये सब तो भद्र मण्डले ॥ घटं संस्थाप्य विधि वत्तत्रा वाह्य भये च्छिवाम् ॥ तद कन्यका रचापि पूजये दाह्मणा नपि || उपचारे स्तु विविधः पुतिन वरणा न्यपि ॥ एवं तु माझपाः पूज्याः अन्यथा होम मा चरेत् ।। पाय मान स्त्रि मध्वक्त द्राक्षरमा फले रपि ॥ मातु लिंगे रितु खंडे मारि केलेः पुरै स्ठिलेः ॥ जावी फले राम्र पल रन्ये मधुर वस्तुभिः सप्त रात्या दशा वृत्या प्रति श्लोकं हुतं परेत् ॥ अयुर्व च स्वाईन स्थापिनो विधानतः ल क्यम् ॥ व आवरण देयता नाम मंत्रे स्वारादि स्याहां वे रेकेका माहुति हुत्वा ॥ सप्ट मिदिरः कामयीयविद्याः हवनीय द्रव्य प्रयोगे द्रष्टव्यः प- उम्मनीयम् ॥ उन्मनीयं-माला फल ही एक साल मन इन ही भी की [२] कृष्णाय गोविन्दाय गोपी जन वल्लभाय स्वाहा ५ मिनि पुर्ण हुर्ति कृत्या देवी कुंभ स्यांसम्पत्य । आवाझ जुहुया म्यं पंचविंशति संह- यया ॥ ईशानाय नैऋत्य वायु-कोणेषु चक्र मात् ।। श्री चक्रस्य पनि दद्यात् हुत शेपेण संयुतः (ईशानादि कोणेषु वटुक योगिनी क्षेत्र पाल गणेशेभ्यो नमः)। बटुक बलि मंत्रमाइ-ऐद्यहि देवी पुत्र वटुक नाथ कपिल जटा भार भासुर त्रिनेत्र ज्याला मुख सब विघ्ना भाशाय २ सणे पवार सहित वलिं गृह २ स्वाहेति ।। श्री बटुकादि पूजनम् ॥ योगिनी पति मंत्र माह-उद ब्रह्माड तो वा दिविगगन व. लेभूतले निष्कले वा पाताले वा नलेवा सलिल पवन यो र्यत्र कुत्रस्थितावा ॥ क्षेत्रे पीटो व पीठा विवुध कृत पदा धूप दीपादि केन प्रीता देव्येः सदानः शुभ वलि विधिना पातु वीरेन्द्र बंद्याः ।। यां योगिनीभ्यः स्वादान्ती भूमि नंदातरो मनुः । योगिनी नां पति दद्यात् अतेन विधि पूर्वकम् ॥ क्षेत्र पाल बलि मंत्र माह-क्षा क्षी तं झोक्ष हुस्थाने क्षेत्र पालेश सर्व कामं पूरय स्वाहेति ॥ गणेश वलि मंत्र माह-ॐ गांगी गू गं गणपतये:- वर बरद सर्व जनं मे वशमानाय सर्वो पचार सहित वलिं गृह २ स्वाहेति ॥ किंचिद्वकी कृता मध्या गणनाथ वलौस्मृता ।। अनामा मध्यमा गुटा योगिनांतु वलौ पुनः ।। एव सम्पूज्य संस्तुत्य ।। नत्वात्मन्युप सं हरेत् ॥ सिद्ध मंत्रः प्रकुति प्रयोगान् शिवभाषितान् इत्यादि भी चक्रस्य वलिं दद्यात हुत शेपेण संयुतः ॥ आवर्णादि परिवार पूजनं समर्पयामिः नमः || नतोनमस्कारान् ॥ ऋत्वाभ्यः प्रत्येकं निष्कमको सुवर्णपित सुवर्ण सवत्सगो दानादिकं दद्यात् ॥ ततो विप्राः कलशो दकेन यजमानं निगम पुराणोक्त मंत्र रमिपिचेपुराशिपरच दद्युः ततः शतं विमानाना विधानभाजयेत् । तेभ्योपि यथा शक्ति दक्षिण दद्यात् ।। गृहया दाशिपस्ततः ।। शुभम् ।। चंडीविधेः प्रकार माह-- सस्वा विधान दशगुणं सहस्र चंडीवत्र शत विप्रप्रवरणम् ।। ते शव.

[ २७० विप्राःप्रत्येकदशदश.सप्तशती पाठान्कुर्युः । अयुतमयुतंनवार्ण अपंचवुयुः । शत कन्या श्चमोज्याः पूज्याः ॥ एवंदश दिनेषु संपाद्य एकादशेहि सप्त- शती शता वृत्या प्रति श्लोकं तल्लक्षण सख्यं नवाणेन च होमः ।। ऋत्विग्भ्योपि दश २ निष्क मितं सुवर्ण प्रत्येकं दद्यात् ।। शेष पूर्वोक्तवत् । इति सहस्र चडी विधिः ॥ एतत्फलं-एवं' सहस्र संख्याकं मिति । एतद्युतचंडी विधान लक्ष चण्डी विधानयो रूप लक्षणं सहस्र चंडीदश गुणोऽयुतचंडी विधिः सदशगुणो लक्षचंडी विधिः । जपे होमे दक्षिणा यां कन्यासु विप्रभोजने च दशगुणत्वम् ॥ इति चंढीपाठ विधिः । वर्णनम् ॥ श्री देव्या आतिः ॥ थारती पत्तिका।। टका-जे अम्बे गौरी मय्या जय अम्बे गौरी। तुमको निशदिन ध्यावे हरी ब्रह्मा शिवजी ॥ माग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्वल से दोऊ नयना चन्द्र वदन नीको ।। टेक कामक समान फलेवर रवांवर राजे । रक्त पुष्प गल माला कपठन पर सागे ।। टेक केहरि वाहन राजे सड़ग सप्पर धारी। सुर नर मुनि जन शेवत तिनके दुःस हारी ।। टेक फानन कुण्डल शोभन नासाने मोवी। कोठिक चन्द्र दिवाकर गजत सम ज्योति ॥ टेक रांभु निशुंभ विढारे महिषासुर पाती। धूम्र विलो पन नयनां निशिदिन मदमाति ।। टेक पौसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरों। वाजत ताल मृदंगा और पाजत डमरू ॥ टेक भुजा गार अति शोभत समग सप्पर धारी, मन यान्दित फल पार्य संयत नर नारी ॥ टेक।। कन्चन बाज विराजत भम कपूर पाती। भीमा गुमे राजव कोटिल ज्योति ।। टेफ ।। यह मम्मे की मातीशी फोई नर गारे। भनत शिरानन्द यामी मुममम्पति पाये। भन्ये गौरी मध्या य सम्मेगा. रिनाथ शर्मा

॥
[ २७१ ]
श्री अग्नि स्थापनम्
अग्नि स्थापन विधिमाह-आसनम् वागीशी वागीश्वर्यो योग
पीठात्मने नमः । मायादिकः पीठ मनस्तयोस्ते नाशनं दिशेत् ॥ यजेतौ
तारमायाभ्यां गंधाधै रुपचारकैः ।।। लक्ष्मी नारायणौ वर्षे वैष्णवे होम.
कर्माणि ॥ सूर्य कान्ता दरणितः श्रोत्रिया गारवो पिया ॥ पात्रेण पिहिते
पाने वह्नि मानाय ये चतः॥ अरणदाय तत्पात्र वर्मणो द्धादये
तुतम्
अस्त्र मोण नैऋत्ये क्रव्यादां शतत स्त्यजेत् ।। मूलने पुरतो घृत्वा संस्का-
राश्च ततश्चरेत् ।। वीक्षणाद्यान्पुराप्रोक्ता नल्पं प्रोक्षण मा चरन् । पर-
मात्मा नलेनाथ जाठरेणापि वह्निना || म्भरनै म्यवह्नि वीमा चैतन्य
योजयेत्ततः ॥ तारेण चामि मच्याग्नि सुधया धेनु मुद्रया ।।
अमृतीत्य संरक्षेदख मंत्रण मंत्र वित् ॥ मुद्रयात्वा गुठिन
कवचेना व गुंठयेत् ॥ कुण्डो परितको वह्नि भ्रामयेञ्चिाध्र व
(ॐ) पठन् ॥ नवाणं मुद्धरति ॥ शय्यागता मृनुस्नातां नीलेदोवर
धारिणीम् ॥ देवेन भुज्य मानांता स्मृत्वा तद्योनि मण्डले ॥ इशरे चोधिया
व ह्रस्थापये दात्म सं मुपम् ।। मूलं नवार्णं चपठ खानु स्पृष्टधरातल.
तरैफाशिन्दु संयुक्त गगनं वद्धि ततः ॥ तन्याय हृदया तोय नवार्णाग्नि
निधापनेः विश्राण्या च मनं देवी देवयोज्वांलये द्वसुम ।। चतुविशतिवर्णेन
मन्द्रोण श्रपणा दिभिः । चिपिंगल हना द्वद्वदह युम पचद्वयम् ।।
सता ज्ञापय स्वाहा मंत्रो वेद भुजावरः प्रदेश्य ज्वालिनी मुद्रामुत्थाय
बिहिना जलिः ।। श्लोक रूपेण मन्त्रोण युपतिष्टे द्रुताशनम् ॥
कन्या दाशं मासाशि नो वन्हेयस्तत्र भागस्त मत्रपत्यजेत् ॥ कान्ह
वीजात्रमिति वीजात् ।। सुषया व वीजेन धेनु मुद्राः अपि गुठिन्या अपि
वक्ष्यते ॥ कवचेन हुवीजन ॥ विधुवं प्रयवम् ।। (ओं)
१ हो वागीशी वागीश्वर यो योग पीठात्मने नमः।
२ ओह्री लक्ष्मीनारायण म्या नमः ॥
ह वहि चैतन्याय नम इत्यग्नि स्थापने नवादो मंत्रः॥
चनुर्विशवि वर्ण मुदरति-चिसिंगलहन २ दह २ पच २ खर्घशा शायप
स्वाहा । वेद ४ भुजा रक्षा चतुर्विशति वर्णाः"
ज्यालिनी मुघा लवणम्--मणि बन्ध युती देखा प्रस्ता गुलिको करी।।
कनिष्ठर गुष्ट युगुले मिलिबातः प्रसारित ।। शालिनी नाम मुद्रेयं वैश्वानर
प्रिय करीति
१६, वहि चैतन्याय नम २ अग्निम् ३ भापहादिभिः ॥ ३॥

। [ २७२ ] लाफ रूप अग्नि मंत्र माह-अग्नि प्रज्वलित वन्दे मात वेदं हुवा शनम् ॥ सुवर्ण वर्ण ममल समिद्धं विश्व श्चतो मुखम् ॥ अथानि मंत्रं विन्यस्येत्तद्विधान मुर्दीयते ॥ वैश्वानरांते जातेति वेदांते स्यादिहा वह ॥ लोहि ताक्ष पदासर्व कर्माण्य तेतु साधय ॥ वह्नि प्रियांवो मंत्रोय पडिक्शत्य क्षणन्वितः । ऋपि शछन्दो देवतास्य भृगुर्गायत्र पावकाः । र वीजंठ द्वयं शक्ति हवने विनि योजनम् ।। लिंगे पायो मूर्ध्निवक्रे नसि ने सिलांग के ॥ वह जिह्वाः स्ववीजा दयान्यमेन्ता नमो न्विताः ॥' हिरण्या गगना रका कृष्णा सुप्र भयान्विता । बहु रूपाति रक्तति जिला दमुन सोमताः दीपि का नल वायु स्थाः साद्या नरण मिलोमतः । सेन्दवः सप्त लिहानां सप्तानां योजना गताः ॥ १ गीर्वाण पितृ गन्धर्व यक्ष नाग पिशाचकाः । गक्षसा श्चेतिजि द्वानां देवतास्तस्यले न्यसेत् ॥ व्यासे' चने व्युत्क्रमः स्या द्वहु रूपाति रिक्तयोः । नेति रिक्वान्य स्वच्या सर्वांगे बहु रूपिका ॥ महनाचिपे हृदयं स्वस्ति पूर्णाय मस्तकम् । उत्तिष्ट पुरुपा येति शिखामंत्रोयमीरितः ॥ धूमान्ते च्यापिने वर्म सप्त जिह्वाय नेत्रकम् । अस्त्रं यनुर्धरा येति पडंगानि समाचरेत् ॥ मूर्ध्नि वाम सकं पार्वे कटी लिंग कटी पुनः । दक्षे पार्थे सके न्यसे नमूर्ती रष्टी विभा अग्निमंत्र याह-वैश्वा नर जात वेद इहा व लोहिताद सर्व कर्माणि साधय स्वाहेति । ठ दयं स्वाहा । डेन्ता चतुर्ग्यताः जिह्वा वीजा न्युपरति । दीपिकेति । एतेष स्थिताः सकारावा. विलोम वर्णाः स व श वलरयेवि सेन्दयो नुस्वाराद्या इमे सप्त हिररयादि जिहाना वीजानी त्यर्थः । ततश्च ॥ स्य हिरण्याये नमः । प्य गगनायै नमः ॥ प्य रक्ताय नमः ! मकृष्णाये नयः । ल्यू. मुप्रेमायै नमः । पूँ बहुरूगयै नमः । प्रमे । सप्त जिदी नामानि ।। म गल्लूप्रमअम - श्राने रिलायनम् बिहा वोबानि । गीर्वाण दयो जिलाधि देवा जिल्हा स्थानेषु पस्यान्यस्टा । मुरेभ्यो नमः सिंगे इत्यादि जिदाप देवाता नामानि । 'प्रयोगोस्तु । स. प. म. हिरण्याय नमो जिंगे । प्रश्न प्रम गगनाये नमः पागे । रमप ममम रलाये नमः मूनि । म म म कृष्णाय नमः ॥ यक तमु प्रमारे नमः । नसिमबह पाये नमः नेयो प्रतिकिाये नमः प्रचिलागे । मस्तके गिग मंत्रः। सरप्रापि । २५३ ) यसोः ॥ तारापये पदा धास्ता रचतुर्थी ममसान्विताः ॥ जातवेदाः सप्त जिलो हव्य वाहन इत्यपि ] अश्वो दूरज संशोन्य स्वथा वैश्वानरा इयः । कौमार तेजाः स्या द्विश्व मुसो देव मुस स्तथा ।। ततो न्यसे निजे देहे पीठं हाट करे तमः । वह्नि मण्डल पर्यन्त मरत कादि ययो दितम् ॥ पीता श्वेता रुणा कृष्णा धूम्रा तीत्रा स्यु लिंगिनी। रुचिरा ज्वालिनी चेति कृशानोः पीठ शक्तयः ॥ वीज वन्हया सनायेते इदं तः पीठमन्त्रकः । एवं विन्यस्य पीठान्तं पावर्क चिंतयेचनी ।। ध्यानम्-त्रिनेत्रमारल तनु सु शुक्र वस्त्र सुवर्ण सज मग्नि मीदे। वराभय स्वस्तिक शक्ति हस्तं पद्मस्थ मा कल्प समूह युक्तम् ॥ एवं घ्यावा धनं कुर्यान्मानसं रिधि वसोः ॥ परिपि चे तत स्तोयः कुण्ड स्थडिल मेक्वा ॥ दौः परि स्तरे दग्निं भाग्ने रद गमः। प्रत्याक्षिण सौम्यास न्यसे भी परिधी क्रमात ॥ पालाशान्वि- वां स्तेपु मा विष्णु शिवान्यजेत् । यही तत्पीठ मभ्यर्धा वाहये स्वदो नलम् ॥ गन्धादिभिः समभ्यय॑ पूजये त्यावर्क प्रती । पट सु कोणेषु मध्ये च जिला स्त देवता यजेत् ॥ ईशा- नादिपु वावंत कोणेषुपट समर्चयेत् ॥ हिरण्याच तिकोना मध्येतु बहु रूपिणीम् ॥ केसरे प्वंग पूजा स्याहले प्वष्ट स्वमूर्तयः । माचरोधी दलों नेषु भैया:- स्यु स्वदप्रतः । धरा पुरेतु शकाचा वाद्या युधसंयुताः । एवमा चरणे युक्त सप्त पोवाया पीठ शक्तयः। वीज मिति २ वहपासनाय नमः । इति- पीठ मंत्रः॥ ध्यानं त्रिनेत्र मिति ॥ वर सस्ति को ददयो । प्रभीति राती यामयोः ॥ प्राकला प्राभरणानि वसप युतम् ।। हृदयम् । स्वस्ति: मनम्। उचिट पुरुषाय शिवा, धूम मानिने कर सप्त निहार नेत्रम् । धनुर्धयय प्रथम् नो श्रमये जात वेदमे नमो मुनीं। शो म. सा. योन। यो प्रहरपला. ग्रंसके । प्रधोदन राय पावें । वैश्वानराम कटो।मार वे. निगे। विश्व मुटो। देव मु.नपा ।। ततो पो मिहे ।। १3 रा रेतसः ।। तीर्थ मन्त्रणा ॥ गगेच यमुने चैर गावावर भरस्वति नदे सिम्युगयेरि रजोरिम समिनि कुवस्य नेन ॥ ययकामरा मुद्रया ।। शमा मध मितानी मम्पावपि योग्या ये चिन् भोपा इस सविस्परम् ॥

[ २७४ । मिः पावकं यजेत् असि नांगो रुरु श्चंटः क्रोध उन्मत्त संज्ञको कपाली भीवण श्चापि संहार चाष्टभैरवाः ॥ वामे कुशा नथा स्तीर्य वत्र वस्तूनि निक्षिपेत् । प्रणीता प्रोक्षणीपात्रे आज्य स्थालों सुवं सचम् ॥ अधो मुखानि चैतानि होम द्रव्यं घृतं कुशान् ।। समिधः पंच पालाशी रन्य दप्युप योगियत् ॥ कृत्वा पवित्रे मूलेन प्रोक्षतानि शुभांभसा | उत्तानानि विधां याथ प्रणीतां पूरये जलैः ॥ तीर्थमश्रेण तीर्थी नि सृण्या तत्रा हुयेत्सुधीः ।। पवित्र अक्षतां स्वत्रनिक्षिप्योत्पवन चरेत् ॥ अथो दीच्या निधायै तां प्रोक्षण्यां तज्जलं क्षिपेत् ॥ हनीय द्रव्य जात मुक्षे त्तोयैः पवित्रगैः ॥ मूलेन मूल गायत्र्या यद्वा हृदयमंत्रवः । दक्षिणे पीठ मासाद्य तत्र ब्रह्माण माह्वयेत् ।। अणि माद्याः सिद्धयोष्टीब्रह्मणः पीठदेवताः ।तारहत्पूर्वको तो ब्रह्मो- मंत्रोस्य पूजने ॥ हस्ताम्यां स कसु वो धृत्वाचापयन्निरधो मुखो। वाम हस्तेन वोधृत्वा दर्भदंण मार्जयेत् । संप्रोक्ष्यं प्रोक्षणी तीयें: प्रतप्य पूर्व वत्पुनः । न्यस्याप्नौ मार्जनान्दा स्तयोः शक्ति त्रयंन्यसेत् ॥ इच्छा ज्ञान क्रिया संक्षा चतुर्थी नम सान्विता ॥ दीर्घत्रयन्दु युग्थ्योम पूर्वकं स्थान कत्रये ॥ हृदायुम्न चिन्यसे२ च्छक्तिं स ये शंभु तत स्तुती। भूत्र त्रयेण सं येष्ठय संपूज्य कुसुमा दिभिः ॥ कुशोपरिन्यसे दक्षे तयोः संस्कार ईश्वः । अस्रोक्षिवायामाज्यस्य स्थाल्या माज्यं विनि क्षिपेत् ॥ विक्षिणादिक संस्कार संस्कृतं मूल मंत्रवः । गोमुद्रया मृन कृत्य पट- संस्कारां स्ततश्चरेत् ॥ कुण्डोद्धृते वायु कोयो स्थितगारे विनिक्षिपेत् ॥ हृदेतित्तापन प्रोत दर्भ युग्मं प्रदीपितम् ॥ श्राज्ये क्षिप्त्वाह दा वह्रो पवित्री करणं क्षिपेत् ।। आ नीरा जये दीप्त दर्भ युग्मेन पर्यणा ॥ अभिष्टो वन मुक्त वदीप्तं दर्भ अयं घृते | दर्शये दस्त्रेणो द्योते गृहीत्वा घृत पात्रिकाम् । अणिमाया अष्ठमं वक्ष्यन ॥ ब्रह्म मंत्र मुदति ॥ तारेसि । प्रो नमो ब्रह्मणे इति ॥ सूक सुर संस्कार मा | स्नाभ्यामिति ॥ राति पय मार ।। इच्छिवि दीयंत्रयन् श्राई कम्योमदः । तत्पूर्व काहाच्या शत नमो मूले ।। की गनरके नमः मध्ये ॥ ई क्रिया गरी नमः भवे । गोमुद्रा:-धनु मुद्रा॥ १-यो नमो ब्रह्मयोः २ नमः शके नमः शमवे || नाही प्रय मिति ।।दा सिंगला मुपुम्णा स्या।। तृतीया मध्ये दिया। दा॥ नम रवि मन्त्रय ॥ अग्नये साति दयने । सोमाय स्यारेडि वाम ॥ वदावि मनुष्टय नागने नेत्र सुख प्रा भरतीत्यर्थः ।। । ।

[ २७५ ] संयोज्याम्नौ तदंगारान्सलिल संस्पृशेत्सुधीः ॥ अंगुठा नामिकाभ्यान्तु दर्भावा दायिनि क्षिपेत् । निरग्नि संमुसे त्याज्य मस्त्रेणोत्पवनविदम् ।। हृदात्म संमुखं तद्वदाज्य दोषस्तु संस्जवः ॥ नीराजनादि संस्कारे स्वग्नौ दर्भान्विनिक्षिपेत् ॥ दर्भ द्वयं ग्रंथि युतं घृतमध्ये विनिक्षिपेत् ।। वाम दक्षिण योः पौस्मृत्वा नाड़ी वयं स्मरेत् । दक्षिणा द्वामतोमध्या दादाय धृतं सुधीः ॥ अग्नयेग्नि प्रिया सोमायस्त्रात्यग्नि नेत्रयोः ॥ जुहुया दग्नी पोमाम्यां स्वाहेत्यक्षिय तृतीयके। पातये वाहुतेः शेपमाहुति ग्रहण स्थले । भूयो हुदा दक्ष भागा दादा याज्यं मुसे यजेत् ॥ अग्नये स्विष्ट कृते तन्ने त्रास्यो द्धाटनं मतम् ॥ नरसिंह विनाविष्णु मने नेत्र द्वयं यजेत् ॥ 'नरसिंहा न्य देयेषु वह नेत्र अर्थ स्मृतम् ॥ महा व्यातिभि व्यस्त समस्- तामि चतुष्टयम् ॥ आहुती ना अयं वह्नि' मंत्रेणै वत तश्चरेत् ॥ घृता हुति मिरामि रेकैकां सस्कृति चरेत् ॥ श्रोमस्याने रमु संस्कार करो म्यग्नि वल्लभा ॥ इत्ये मर्नु जपनगर्भा धानं पुंस वनं ततः । सीमंतोनयन जात कर्म कृत्वा ततश्चरेत् ॥ वह्रो पच समि- धीमा नाला पनयनं सोः ॥ कुर्या देवाभिधानेन पूर्ववन्नाम शुष्मरणः ।। नामानन्तर मे तस्य पितरौ स्वर्पये दृदि ॥ अन्न प्राशं तवा चोलो- पनयो दारयो जनम् ॥ संस्काराः स्युविवाहान्ता मृत्य॑ताः क्रूर कर्मणि ॥ एक का माहुतिं कुर्या दह जिहागमूर्तिभिः ॥ इन्द्रादिभिश्च वा. ये विठाते जुहुया चतः ।। सुवेणा ज्यं चनुवार निधाय सुनितां सुधीः ॥ अपि धाय सुवे ऐवो गृही याकर युग्मतः ॥ टि. न्मूलं वयो नाभी रुत्वामे कुगुमक्षिपेत् ॥ वामस्त ना वं तन्मूल ओं प्रस्थान गर्माधान सरकार: करामि स्वाहे त्यादि। पंन समिधा सेमा सो रमः नालारनपना ख्य. सताराः ॥ देवाभिधानेन देव नाम्ना शुध्मणाम नाम पूर्ववत् ॥ घृता हुत्यय केन कुर्यात् । रामामिः कृम्पामि रित्यादि || पतस्याम: पितरी वागीशी वागीशी कुण्डात् त इदि न्यसेत् ॥ उपनयन मुमवीतम् । दार याजना विवादः। १ नरसिंबरच अन्ये देवा भवेषु । २ ५ स्वास भुरः स्वाहा स्वः स्वारा मुवः स्वः सा | बेभानर जात वेद समालोद वाच सर्व माथि सापय स्वाहा ।। अनुन पुमान् ॥ दराधा म्मस्लेन भिलेन ॥ वमेव विभाग मा। पूर्वेति ॥ दोन पर ॥ नामा मापा' पंदै । नगर. १ ॥ .. ..

[ २५६ । कृत्याग्नि मनुना सुवीः ॥ जुहुया द्वौ पडतेन संपत्यर्थ मतं द्वितः ! महागणेश मंत्रेण व्यस्तेन दशवा ततः ॥ जुहुयाचसमस्तेन चतुर्वार घृना हुतीः। पूर्व पूर्व युतं वीज पट्कं वाणाश्च सायकाः ॥,मुनयो मार्गणा श्चेति विभाग स्तन्मनोः स्मृतः ॥ वारो लक्ष्मी गिरि सुता कामोभूर्गण नायकः ॥ चतुर्थं तो गणपति वरांते वरदे तिच ॥ सर्वांते जन मित्युक्त्या मेव शान्ते तु मानय ॥ स्वाहां तो वसु युग्माणे महा गणपतेनुः । एवं कृत्वाग्नि सस्कारं पीठं देवस्य पूजयेत् ।। श्री अग्नि पूजनम् तोष्ट देव मा वाह्य मुद्रा आवाहनादिकाः ।। प्रदर्य वह्नि रूपस्य देवस्य वदने पुनः ॥ मूलेन जुहुयात्पच नेत्र संख्या घृता हुतीः ।। वक्रेकी कर त्वग्नि देवयोस्ते नजायते ॥ नाड़ी संधान सिदद्यर्थ वहि देवतयो स्नतः ।। जुहुयान्मूल मोण रुद्र संख्या घृता हुतीः ।। इष्ट देवस्या घृती नामे कैका माहुति चरेत् । तवस्तु मूल मंगेण दशधा जुहुयाद् घृतम् ।। ततः फलपोत द्रव्येण दशांशं जुहुया खपात् ।। होम समाप्य कुर्वीत पूर्णा मार्गणाः पंच ॥ गणेश मंत्रमाह ॥ तार इति ॥ , जिहवि स्वदेवता नामप्युप लक्षणं २॥ श्री हों तो लोग गणपतये वर वाद सर्व बनं मे वश मानय स्वाहा ॥ प्रयोग स्तु श्री स्वाहा || श्री श्री स्वाहा ।। श्री श्री ही स्वाहे त्यादि ।। श्रावाहनादिका अग्ने वतन्याः । पञ्चनेत्र संख्या पंचविंशतिः ।। पवित्रादि प्रति पऊिमाह ।। वझा विति ।। विपि ब्रह्माणां विक्षग्य-दक्षिणा दत्वेवि शेषः ।। स कुशान् परिस्तरय सहितान् वसा वग्नौ।। तर्पण मंत्र माह-मूल मंत्रान्ते कृष्णं तर्पयामि नमः ।। कृष्य अभिषिचामीत्य भिगे ।। जना दशांश दोमः-तदां शेनामिका व शेन विध भोजन मिति ।। पचागं पुरश्चरण मिवि कनीयान् पक्षः॥ अभिषेक व मध्यमः || वर्षमा मिक व मंगउचगः परः होम दशा दिन भोजन मिचि ।। किं बहुना ।। वर प्रामण भोजने देववा प्रमादो भवति ॥ शासन एवं प्रापना नम्वर गुगन्धि दम्यं देय अभिष्टमिति ॥ ग्रा चंद्रम् ।।-वरातीर निवासिनि मिति दरम्यः ।। मधः सर्गना मरि भुनो। मयामिति ॥ विस्यमा लालमो. सोयो पापा नुः मधपा मसा• मिसिएननान् । शुभम्भुपा।

। २७७ ] हुवि मनन्यधीः ॥ होमा पशिष्टे नाज्येन पूरयित्वा सुचं सुधीः । पुष्प फत निधा यामे सु वेणा आता पुन. ॥ उत्यितोवीयर्ड तेन मूलेनजुहुया द्वशी। तद् द्रव्येणा वृत्ती नांच जुहुया दाहुतिं पृथक् ॥ देवं विसृज्य खद्दादि यह निहांग मूर्तिभिः । जुस्यान्यहती हुवा प्रोत्वं मोक्षणी जलै. ॥ संप्रार्थ्या नेनानुना नत्वात विसृजे दृदि ।। भो भो वहे महा शक्त सर्व कर्म प्रसाधक कर्मातरेपि संप्राप्ठे सानिध्यं कुरु सादरम् ।। वही पविको निक्षिप्य प्रणीतां वुमुवि तिपेत् ।। विधि विसृज्य सकुशान्यरिधीविन्यसे इसौ। एवं होमं समाप्याथ तर्पये रेवता जले | आवाय तदशांशेन तथा दक्षिणे चनम् ॥ वर्ष- यामि नम स्चेति द्वितीयां तेष्ट पूर्वकम् ॥ मूलां वेतु पदं देयं सिंचामोत्य- भिपे चने । ततो नाना विष स्नैस्तपयेविन सत्तमान । इष्ट रूपान्समा- राध्य तेभ्योदयाच दक्षिणम् । न्यून सम्पूर्ण वा मेति बामणाराधनान्नृणाम् देवताश्च प्रसीदति सं पद्यते मनोरथाः॥

श्री शरत्कालीय नवरात्र पूजामाह ।। वत्रादौ प्रति पदि कृत्यम् ॥ तत्र निर्णयः ॥ अमायुक्ता न कर्तव्या- प्रतिपत् पूजनेमम । मुहूर्त मात्रं कर्तव्याद्वितीयादि गुणान्वितेति )] पुनः । देशभङ्गो भवे तत्र ,दुर्भिक्ष्यं चोपजायते ॥ नन्दायां दर्श युक्तायां यत्र यात्मम पूजन मिति घचनात् ।। भार्गवार्चन चन्द्रिकायाम् । वाष्ट वैधृतियुक्ता चेत् प्रतिपत् चण्डिकाचने । तयो रन्ते विधातव्यं कलशो- रोपण गृह । इति वाक्यात् ।। चित्र नक्षत्र वैधृति योग समायुक्त प्रति- पत्तिथि घ वर्जयित्वा शुद्ध प्रतिपत्तिथौ अथवा द्वितीया तिथौ घट स्थापनं कुर्यात् ।। वदितु प्रतिपब्लुप्ता तदाऽमाया मपिकार्य्यम् ॥ रात्री स्थापन कुर्यान्न च कुम्भाभिवेचन मिति मत्स्यपुराण वाफ्यात् । रात्री घटस्थापनं विसर्जन च नैव कुर्यात् ।। अथ प्रयोगः-प्रातः समयेस्नान सध्यादि । नित्य कर्म फुत्वाकदल्या दिस्तम्भवितान तोरण वन वैष्टितमण्डिते दुर्गागृहे चतुरस्र चतुई। स्ते वेदिको परिसब तो भद्रादि मण्डिते शुद्धगूढ़ भूमि चन्दना क्षतः प्पधूपदीप नैवेद्य कुशतिल जल सम्पूर्ण मामग्री सम्पाद्य कारम्भेदीप पूजन मित्याचारः ।। अचम्य कम पात्रं कृत्वा कुशादी म्यादाय || अथ दुर्गा सप्तशती प्रयोगः ॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ।। अथ प्रयोगविधिः । श्रीगणेशायनमः ॥ अथ प्रयोगान्तराणि कात्यायनी तन्त्रोक्तानि ।। प्रति श्नो मातियोः प्रणव जन्म सिद्धिः ॥१॥ अमे सर्वत्र श्लोक पर मंत्रीय लक्षणम् ॥ सप्रणवमनु लोम व्याहति प्रयमादी अन्तेतुवि- सोमवरिये । प्रति श्लोक छत्या शवावृत्त पाठेऽति शीघ्रसिद्धिः ॥२॥ प्रतिरलोक मादोजाव येदमाश पटेत् सपकाम सिद्धिः ॥३|| अपमृत्यु वारणाय चक मन्यं पठेन् । मादाय वे प शतमित्य यः । प्रतियोर्क पन्मन्त्र अपात्यन्यत्र ॥४प्रति ग्लोई शूलेन पाहिनी यीतिपाटावय मृत्यु नाराः ॥ अस्य फल स्यापि लोक स लागयुवं सहन

[ २ ]
तत्मत् ३ ओं विष्णु ३ नम इत्यादि देशकालो संकृत्य अथेहे त्यादि
अमुझगोत्रस्य सदारापत्यस्यामुक शमणे मम अद्य प्रभृति नवमीपर्यन्त
मुपवामादि नियमैरिष्ट देवता प्रीति द्वारा त्रिवर्ग सम्पत्ति सिद्धये नव.
रात्र व्रत महं करिष्ये । वङ्गतया करिष्यमाण नव दिन पर्यन्त महर्निश
दीप प्रज्वालनादि नवरात्रतकर्माणि निर्विघ्नता सिद्धयर्थम्श्रीगोश्वरस्य-
ययामिलितोपचारैःपूजनमहं करिष्ये,इविसंकल्प्यः ।। एकदन्तंशूर्पकर्ण मित्या
दीनाध्यात्वा आवाहनासन पाद्यार्ध्या चमन वन यज्ञोपवीत भूपण गन्ध
पुष्पादत धूप दीप नैवेद्यान्ते गणा नन्ने तिमनोण गणेशं सन्पूज्य
खशकतया मातृकां चसम्पूज्य पुण्याहा वाचनं कुर्यात् । सम्भवे ग्रह च
सस्थाप्य तत् ॐ योपि यवयास्म द्वेप यवया रावी दिवेत्वान्त रिक्षा
या पृथित्या गुन्धतावाँल लोकाः पितृपदनापितृ पदन मसि मन्त्रण यवं
प्रक्षाल्य, शुद्ध मृत्तिकायाः मण्डपं कृत्वा संकल्पं कुर्यात् । अयेह देच्या-
स्तुष्टयर्थ यवा रोपण मइ करिष्ये ।। तत्र मंत्रः ।। ॐ यवत्वां यव रूपोसि
यत्रार्थे निमितोऽसिदि ॥ देवीनां तृप्ति कारी च तस्मात्त्वं वरदो भव
शतंबाजपे प्रामृत्युवारणम्॥५॥प्रतिश्लोकेशरणागतदीनार्वेतिरलोकपठे
त्सर्ग काय सिद्धिाप्रतिश्लोर्फ करीतुसानःशुभेत्यर्द्ध पठेत्सव कार्यसिद्धिः
॥ ७॥ स्वाभिष्ट वर प्राप्तये एवं देव्या वर लव्ध्ये ति श्लोकं पठेन् ।।
सर्वा पत्तिवारणाय प्रति रनोळं दुर्गेस्मतेति पठेत् ॥ अस्य केवल स्यापि
श्लोकस्य कार्यानुसारेण लक्ष्य युतं सहस्रं शतं वाजपः ॥ ॥ सर्वा
वाधेत्यस्य लक्षापे प्रति श्लोक पाठेवा श्लोकोत' फलम् ॥ १० ॥ इत्थं
यदा यदा यायेति शोक जपे महामारी शान्तिः ॥ १०॥ ततो वने नृपो
राज्य मिति मत्रस्य जपे पुनः स्वराज्य लाभः ।। १२ ।। हिनास्ति दैत्य
इत्यनेव सदीप वलि दाने घंटां बंधने च वाल ग्रह शान्ति॥ १३ ॥ तेजांसि
आद्यावृत्रि मनो लोमेन पढित्या ततो विपर्णा क्रमेण द्विचीया मनु
लोमेन तृतीया मित्येव मा यूर त्रयेण शीघ्र कार्य सिद्धिः १४ ॥ सर्वा
वृत्ति वारणाय दुर्गेस्मृतेत्यधं ततो यहे चियम दूरके रत्तदेते दारि-
यदुःसत्यर्च मेव कार्यानुसारेण लवमयुतं सहनं सत्तं वाजपः ॥ कामो.
स्मीत्त्यवं प्रति जोकं पठेतमी प्राप्तीः ॥ १६॥ प्रति श्लोक मनता
अस्मिाभिराचं पठेदण परिहारः ॥ १७ ॥ मारणार्थ मेवमुक्या समुत्यनि
रत्तोकं पठेन मारपोकातिभिः फलसिद्धः॥ १८ तानिनामपि पैतामि
इति श्लोक जप माणसन्वो मोदन मित्य नुमत्र सिद्धम । प्रति म्लोक
कच्च लोक पाठेत्त्व वश्यम् ॥ १६॥ गान शेण निति रोग
प्रति रलोक पाठे सकल रोग नाश: ॥ नामात्र उपेपिसः ॥२४॥

[ २८० जयंनी मंगला काली भद्रकाली कपालिनी । दुगः क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुको ।। इति मन्त्रण यव माध्य ।। शुद्धोदकेन यत्रो परि सेचनम् ॥ अथ घट स्थापनम् ॥-तत्र-संकल्पः- प्रवेइ ममेह जन्मनि दुर्गा प्रीति द्वारा सर्वापच्छान्ति पूर्वक दीर्घायु विपुनधन पुत्र पौत्रस्य नव हिन्न सन्तन्ति वृद्धिस्थिर अक्ष्मी कीर्ति लाभ शत्रु परा जय मदमोष्ट सिद्धयर्थ शारद नवरात्र प्रतिपदितिः हित कलश स्थापन पूर्वकं दुर्गा कुमारी पूजन मह करिष्ये । कलश स्थापन विधिना घट संस्थाप्य । प्रयोग पु यथा वह ती या नाड़ी दक्षा वामा वावद्धरतेन स्यामे त्रिकोणादियंत्र । यंत्र' मालिख्य || बास्त्र ज्ञालितं पात्रा धारं स्थापयेत् ॥ एक विदंम ज्ञर मंत्रेणाधारं पूजयेत् । माह-ॐ रां री रमल यर यूरं अग्नि मण्डलाय धर्म प्रदश कलात्मने ऐं कलशा धाराय नमः । तदु परि मात्रा धारो परि श्राग्ने यी दश कला अर्चये ना पवाह ॥ धूम्राचिरिति ॥ हन्य कव्यादिका वहा । ये धुम्राविः कसा श्री पादुका पूजयामि ॥ र ऊमा कला श्री पालं ज्वालिनी कला कला श्री पा० ॥ 4 ज्वालिनी कला श्री पा० ॥ मविसु लिगिनो कला श्री पा० ॥ २ सुत्रे कला श्री पा० ॥ र म रूपाय कर श्री पा० ॥ री कपिलाये कला श्री पा०॥ गं हव्याय कला इत्युक्त सा बदा देवी गंभीरेति रलोकस्य प्रति २ लोकं पाठे पथर- जये वा विद्या प्राप्तियां, वे कृत नाशरच ॥ २१ ॥ भगरत्या ऋd सर्व मित्यादि द्वादशो सर शतारामन्त्रः सर्व कामदः सर्वापति चारपाच ॥ २२ ॥ देवो प्रपन्नाति हरे इति श्लोक यया कार्य जवायुत साल शतान्य तम संख्या जपे प्रति लोप पाठे वा सर्या पनिधिः सर्व प्रामाप्तिव || एषु प्रयोगेषु प्रति जो पाने केयलमे वनमस्करणेऽदि शीघे मितिः ॥ प्रति श्लोक काम वीन सं पुटि वस्य एक स्वारिंशदिन त्रिा वृत्ती सर्व काम सिदित ॥ २३ ॥ २० विशति दिन पर्यन्त मुक रीत्या प्रत्यह द्वादशा यूटी पशी करणम् ॥ २५ ॥ माया वोन से पुटि वय फट् पना सहिनस्य मम दिन पर्यन्त यो दशा पत्ता साटन सिद्धिः ॥ २५ ॥ वाया मेदिन पतुष्ट्रय मैफा शा पूची मर्योपद्रय नाराः ॥ २६ ॥ एसो न पाहिल पर प्रति साफ भी गीत्र में पुद्धि तय पंच दराची लरनी प्राप्तिः ॥ २१ ॥ पनि २ भोई यापी पुटिपा गुस्या विण शकि [ २०१1 पा० ॥ ॐ व्यायै कला भी पा ॥ पूजयेत् ॥ स्वादि- निर्मित कलशम् ॥ अस्त्रायफडिवि प्रक्षाल्य तमा घोरन्यसेत् तमुद्ध- रति ॥ ॐ हां ही हु हमल यू ई सूर्यमण्डलाय वसु प्रद द्वादश मलाममे ही कलशाय नमः इति । सूर्य कला प्राह ॥ के में तपिन्यै नमः ख तापिगै नमः । गं फं धूम्रायै नमः । धं पं मरीचये नमः । जालिन्यै नमः पंधरुच्य नमः । छ बंसु पुन्नाय नमः । जसं भोगदायै नमः । ॐ विरवायै नमः न चोधि न्यै नमः। धारिण्यै नमः । दं ई क्षमायै नमः। इत्यर्क मण्डल सम्पूज्यः । युनः पूर्ववत् मं तपनी क्ला श्री पा०। तापनी कला श्री पा० धूम्रा कला श्री पा० ॥ हमरिचि कला श्री पा० ॥ यूं वाहिनी कला श्री पा० ॥ वं रुच्य कला श्री पा० ॥ में सु पुम्नाय कला श्री पा० ॥ ' भोग दाये कला श्री पा०॥ हूँ विच कला श्री पा० ॥ ही दोधिन्यै कला श्री पा०॥ हो धारिएवं कता श्री पा० ॥ ॐ क्षमाय कला श्री पा० ॥ मिति ।। मूल मत्रं पठन सुधा वुभ्या दोयं सम्पूर्य तर गन्ध पुष्या तान्- में सपनि कला श्री पादुकां पूजयामि त्यादि प्रयोगे क्षिपेत् ॥ मूल- विद्यां च मंत्र वित् कलशा मृताय तम । ॐ सोम गएडलायेति पूर्वत्रिपएडा मुद्रां वधा सतः ॐ सांसी सूं समल बयू सं सोम ॥ २६॥ अथसत चडी विधिः युर्वोक्त अनि स्थापनादि प्रयोग द्रष्टव्यः॥ श्री रस्तु॥ अथ देव्याः कवचं प्रारम्यते। श्री गणेशाय नमः । भवेत्यादि० श्री महा काली गहालक्ष्मी महासरस्वती देवता प्रीत्यर्थ नही सप्त सती पाठास्यकर्म करिष्ये ॥ वदगवे नादौ कवचार्गला कोलक पठन माय तयो रष्टोत्तर शतसंख्य नवार्ण जप पूर्वकं कमेण रानि सूत्र देवी सूक्त पठनमचे रहस्य त्रयपठनं च करिष्ये । इति सकलप । प्रथम नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ॥ नमः प्रत्यै भद्राय निखा. प्रणावा. समताम् ॥ इति मंत्रेण पञ्चो पचार पुस्तक पूजा कुर्यात् ॥ श्री रस्तु श्रीगणेशाय नमः ॥ भो नमश्चरिडकायै ।। मारझेर उपाच | ओं यद् गुह्य परमं लोके- सर्व रता करं नृणाय ॥ यनकस्य चिदा ख्यातं तन्मेत्र हि पितामह ॥ १॥ ब्रोवाच । अस्ति गुह्य वम विप्र सर्व भूतो पकारकम् ॥ देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्चतुष्वमहा मुने ॥ २॥ प्रथमं शैल पुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी । तृतीयं चन्द्र घण्टेति ष्मारदेति चतुर्यक्रम [ २८२ ] मण्डलाय कामप्रद पोडश कलात्मने सौः कलशा मृताय नमः । मोयं जलार्चने ॥ अमृतेति ।। अं अमृवाय कला श्री पा० ॥ श्री मानदाय का श्री पा० ॥ई पूपायै कला श्री पा०।ई तुष्टै कला श्री पा०॥ पुष्टै कला श्री पा०॥ रत्ये कला श्री पा०॥ धृत्ये कला श्री पा० ॥ शशिन्यै कला श्री पा०॥ चन्द्रिः फायै कला श्री पा० ॥ लु कात्ये कला श्री पा० ॥ एं ज्योत्स्न्याय कला श्री पा०॥ ऐत्रियकला श्री पा० ॥ ओं प्रीत्येकला श्री पा०॥ श्री अंगदायै कला श्री पा० ॥ अं पूर्वाय कला श्री पा० ॥ श्र: पूर्ण मृताये कला श्री पा० ॥ इत्यध्य सम्पूज्य कुम्भ योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥ वत्र घटो परिप्रतिमा सस्थाप्य अथवा तद् भावे दम्य सवा संस्थाप्य श्री दुर्गामावादयेत् ॥ अथध्यानम्-जटा जूट समा युक्तां मूर्द्वन्दु कृत शेखराम् लोचन अय सम्पन्नां पमेन्दु सदृशा नमाम् ॥ अतसो पुष्प वर्णा भां सु प्रविष्टा सु लोचनाम् ॥ नव यौवन सम्पन्नां महिषासुर मर्दिनीम् ॥ त्रिशूलं दत्तिणे दद्यात् सर्ग चक्रं च वामतः । वीक्षणं वाएं क्या शकि वामतो सन्नि वेशयेत् ।। खेदकं पूर्ण चापं च पाशमङ कुश मूजिम् ॥ घण्टां च पाशु पापि वामतः सनि वेशयेत । अयस्ता माहिप त द्विशिरस्क प्रदर्श येत् । शिर च्छेदो अवयव दानव खड्ग पाणिनाम् ॥ हदि शूलेन निभिन्न तिर्यम्गन्ध विभू पितम् ॥ रक्त की कतारुच रक्त विसस्फारिते क्षणम् वेष्टितं नाग पाशेन भृकुटो भीपणा ननम् धमन् रुविश्वस्त्र ॥३॥ पञ्चमं स्कंदमातेति पष्टं कात्यायनीतिच ॥ सप्तमं काल- रात्रीवि महागौरीति चाष्टमम् ॥ ४ ॥ नवमं सिद्धि दात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः ।। उतान्येतानि नामानि ब्राण वमहात्मना ॥ ५॥ अग्निनादन मानस्तु शत्रमध्ये गतोरणे विपमे दुर्गमे चैवमयार्गः शरणं गताः ॥ ६ ॥ पां आयवेकिंचि दशुभरसकटे ॥ नापदं तस्य पश्यामि शोक दुःख भयं नहि ॥७॥ यैस्तुभचया सता नून सेषां वृद्धिः प्रजायते || येत्यां स्मरान्ति देवेशि रक्षसे वानं संशयः। प्रेवसंस्थातु चामुण्डा वागदी महिषा सना, ऐन्द्री गन समा रूढ़ा वैष्णवी गावा सना ||॥ माहेश्वरी पारदा कौमारी शिखि पाहना लक्ष्मीः पद्मा सना देवी पद्म इस्ता हरि प्रिया ॥१०॥सेत रूपधरा देवी घरी वृप वाहना। ग्राझी इस समा ल्ला सर्व भरण भूपिवा ।। १२ । इत्येतामावरः सर्वाः सर्व योग समन्विताः || नाना भरणशोभाया नाना रत्नोप शोभिवाः । दरसन्वे रथमा रूदा [३] च देव्या सिंह प्रदर्श येत् ।। देव्यास्तु दक्षिणं पादं । सम सिहो परि स्थितम् ॥ किब्धि दूधं तथा वाम मङ्ग, महिषो परि ।। स्तूप आनं च सद्रूपममरैः सन्नि वेशयेत् ॥ श्रथा वाहनम् । एहि दुर्गे महा मागे ? रक्षार्थ मम सर्वदा ।। आवा हयाम्यहं देवि ? सर्वे. कामार्थ सिद्धये ॥ अस्यां मूर्तीसमा गच्छ ३६ तिष्ट इह सन्निहिता मव इह स्थिरा भव सुप्रसन्ना भव इत्या वाझ एतन्त इति प्रति छाप्य । ॐ दुर्गे दुर्गरक्षणि ? स्वाहा । जयन्ती मङ्गला कालो इति मन्त्रेण च दुर्गे देव्यै पाध्याया॑ च मनोय पञ्चामृत स्नान शुद्धो दक स्नान वस्ल यज्ञोपवीत भूपण चन्दन सिन्दूराजना दर्शादि शौभाग्य द्रव्या क्षत पुष्प माल्य बिल्व पर धूप दीप- नैवेद्य ताम्बूल दक्षिणादि षोडशो पवारैः पञ्चो पचारैः यथा- देव्यः क्रोध ममाकुलाः || १२ ।। शंख चक्र गदा शक्ति हलं च मुमला- युधम् ।। सेट तोमरं चैव परशु पाशमेवच ॥ १३ ॥ कुन्ता युर्घत्रिशू- लं च शामा युद्ध मुत्तमम् ।। खङ्ग चर्मत्रिशूलं च पटिश मुद्गरं तथा ।। १४ । दैत्यानां देहनाशाय भवाना मभयाय च ॥धार यन्त्या युधा नीस्थंदेवाना च हिता यये ॥ १५ ॥ नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोर परक्रमे ।। महा वले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ १६॥ त्राहिमां देवि दुष्पेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि ।। पाच्या रक्षतु मा मैंद्री पामेश्यामग्नि- देवता।' १७ ॥ दक्षिणेऽवतु वाराही नेत्यां खड्न धारिणी । प्रतीच्या वारुणो रक्षे द्वायत्र्यां मृग वाहिनो ॥१८ 11 उदीच्या पातु कौमारी ईशान्यां शूलधारिणी ऊध्र्व ब्रह्माणी मे रहे दधस्ता द्वष्णवी तथा ॥१॥ एवं दशदिशो रक्षे चामुण्डा शव बाहना ॥ जया मे चाप्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥ २०॥ अजिता वाम पार्वे तु दक्षिणे चा पराजिता ॥ शिखामेहयोतिनी रक्षे दुमा मूलि व्यवास्थिता ।। २१ ।। माला धरी ललाटे च भ्रवौ रक्षे द्यशस्विनी ॥ त्रिनेत्रा पभ्रवोर्मध्ये यम घन्टा च नासिके ॥ २२ ॥ शंखिनी चक्षुषोमध्ये प्रोत्रयोर यासिनी ॥ कपोलो कालिका रनेकर्ष मूलेतु शाकरी ॥ २३ ॥ नासिकायां सुगन्धा च उत्चरोष्टे च चचिका ॥ अथरे चा मृत कला जिला यां व सरस्वती ।। २४ ॥ दन्तानरन्तु कौमारी काठ देशेनु चण्डिका ॥ घरिटकाचित्र घंटा च महामाया प वालुके ॥ २५ ॥ कामाक्षी चिबुकं रक्षे द्वायं मे सर्व मंगला ॥ प्राशयां भद्रकाली च पृष्ट 'वशे धनुर्धरी ॥ २६ ॥ नील प्रीवा पहिः कण्ठे 'नालिका नल बरी ॥ स्कन्धयोः मशिनी रखेवार में [ २८४: ] समवैर्या दुर्गा दुर्गा सम्पूज्य प्रणम्य प्रार्थयेन् । प्रागच्छ देवदेवेशि ! दैत्य दर्प निपू दनि ! ॥ पूजां गृहाण सुमुखि १ नमते शङ्कर प्रिये ? ॥ सर्व तीर्थ मयं वारि सर्व देव समन्वितम् ॥ इम घट समागच्छु तिष्ट देव गणैः सह ॥ दुर्गे देवि ? समागच्छ सान्नि- ध्यं कुरुवै धुवम् ॥ वलि पूजां गृहाण त्वं मप्टाभिः शक्तिभिः सह ॥ महिपनि महा माये चामुण्डे मुण्ड मालिनि ? ॥ द्रव्य मारोग्य विजयं देहि देवि ? नमः सदा ॥ सर्व मङ्गल मांगल्ये- शिवे सार्थ साधिके || शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायारिण नमोस्तुते ॥ रूप देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहिमे ।। पुत्रदेहि धनं देहि सर्वा स्यामा प्रदेहिमे ॥ एव प्रार्थना नन्तरं सुगन्धि द्रव्यं देयम् ॥ अथ कन्या पूजा ||--गणेशं वटुकं दुर्गा प्रणम्य, संकल्पः अधेह मम देवीथमादाद् विविध मनोऽभीष्ट फामना वासि राज्य करणोत्तर कालिक देवी लोक गमन कामनया कुमारी वटुकं घ पूजन पूर्वक भोज इध्यामि ॥ मन्त्राक्षर मर्यालक्ष्मी मातृणां रूपधार• वत्र धारिणी ॥ २७ ॥ हस्तयो दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च ॥ नखा ब्लेश्वरी रक्षेत्कुतौरले कुलेश्वरी ॥ २८ । सनी रतेन्महादेवी मनः शोक विनाशिनी ।। हृदये जलिता देवी उदरे शूल धारिणी ॥ २६ ॥ नाभी प कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्ये श्वरी तथा ॥ पूतना कामिका मेहू गुदे महिप वाहिनी ॥ ३० ॥ कट्यां भगवती रखे जानुनीविन्थ्य वासिनी ॥ बंधे महावला रहे सर्व कामप्रदायिनी ॥ ३१ ॥ गुल्फयो नारसिंही च पाद पृष्टे तु तैजसी ॥ पादांगुलीपु श्री रहे पादाध स्थल वामिनी ॥ ३२ ॥ दंष्टा करालिनी रक्षेत केशां श्चैवोय केशिनी ॥ रोम कूपेषु कौमारी वंच वागीश्वरी तथा ॥ ३३ ॥ राक मजा वसा मांसा न्यस्थि मेदांसि पावती ॥ अन्नाशि काल राजीव पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥ ३४ ॥ पद्मावती पन कोशे कफे यूग माणिवधा | माला गुग्गी नरा बाला मभेद्या सर्व संधिषु ॥ ३५ ॥ शुक्र प्रमाणो मे रखे ज्यायां छत्रेश्वरी तथा ॥ श्रा फार मनो बुद्धि रचन्मे धर्मवारिणी ।। ३६ ॥ प्राता गनी तथा व्यान मुदा नपसमा कम् ॥ यत्र दस्ता च मेरदेसाण' कल्याण शोभना ॥ ३७॥ रसरूपे घ गोन सदस्पर्ग प योगिनी ॥ गरमराम श्चैव र नारायणी सदा ।। ३ ॥यायुर वाराही में इन चीयरा कोचिनी - । २२५ ] यीम् । नव दुर्गात्मिका साक्षात्कन्यामा वा हवाम्यहम् ॥ इत्या बाह्य तक पूजा मंत्रश्च ।। जगत्पूज्ये जगद्धात्रि सर्व शक्ति स्वरूपिणी पूजा गृहाण कौमारि ! जगन्मात नमोस्तुते ॥ इति मन्त्रेण पाद प्रक्षालनादिभिः पूजयेयेत् भोजयेञ्च नाना वस्त्र पक्वान्ना लकारैः ख शक्त्या देवी पूजा नन्तरं नवमी पर्यन्त प्रत्यहं वा कुर्यात् ॥ एके कां पूज्येत्कन्यां मेक वृद्धया तथै क्च ।। द्विगुणा बापि प्रत्येकं नवकं च विशेषतः ॥ द्विवर्ष कन्या मारभ्य दश वर्षा वधि क्रमात् ।। पूजयेत्सर्व कार्येषु यथा विध्युक्त मार्गतः ॥ अत उजन्तु या कन्या सर्व कार्येषु वर्जिता ॥ आयुष्य घल वृद्धयर्थ कुमारी पूजयेन्नरः आयुः काम त्रिमूर्ति विपर्ग स्यफल प्रदाम् ।। अला मृत्यु व्याधि पीड़ा दुःख दारिद्र नाशिनीम् ॥ आरोग्य सुख कामी च जय कामी तथैव च ॥ यशः कामी नरोनित्यं रोहिणी प्रति पूजयेत् ॥ विद्यार्थी चा भयार्थी च राज्यार्थी व विशेषतः । शत्रणां च विना शार्थी कालिकां पूजयेन्नरः ॥ ऐश्वर्य सुख कामी च पुत्रा कामी चयो नरः ।। सा मामे जय कामी च चरिडकां प्रतिपूजयेत् ।। दुःख दारिद्र नाशाय नृपं समोहना यच ।। महा पाप विना शार्थ शाम्भवी च प्रपूजयेत् ॥ सर्व च धनं विद्या च चरिणी ॥ ३६॥ गोत्र मिन्द्राणी में रोत्सशून्मे रच चण्डिके।। पुत्रानोन्महालक्ष्मी भी रक्षनुभैरवी ।। ५० ॥ पत्थान सुपथा रटेन्मार्ग क्षेम करी तथा ।। राज द्वारे महालक्ष्मी विजया सर्वतः स्थिता ॥ ४२ ॥ रक्षा होनं तु यत्स्थानं वाजितं कवचेनतु ॥ वत्सा क्षमे देवी जयन्ती पापनाशिनी ॥ ४२ ॥ पद मेक नगच्छेतु यदीच्छेच्छुभ मात्मनः॥ करचे नावृतो नित्यं यत्र यच गच्छति ॥४३॥ तत्र तत्रार्थ लाभश्च विजयः सर्व कामिकः ॥ चिन्तयते काम तंतं प्राप्नोति निश्चितम् ॥ ४२ ॥ परमैवर्य मतुलं प्राप्यते भूवले पुमान् ॥ निर्भयो जायते मर्त्यः संपामेव पराजित. ॥ ४५लोक्ये तु भवेत् पूज्यः कवचे नावृचः पुमान ॥ इदंतु देव्याः कवचं देवांना मपि दुर्लभम् 11 ४३ ॥ यः पठेन् प्रयतो नित्य त्रिसंध्यं श्रद्धयान्वितः ॥ देवी कला भये तस्य श्रेजोक्ये चापराजितः ॥ १७ ॥ जीवेद्वर्ष शतं साम मप मृत्युविय- जिवः नश्यन्ति व्याधयः सर्ने लता विस्फोटका दयः ॥ ४॥ स्थावर बगम व कृत्रिम पापियद्विपम् ।। अमिवाराणि सर्वाणि मन्त्रयंत्राणि भूतले ।। भूचराः मेघराश्चैव कुलजा स्नोपदेशिकाः ॥४६॥ सहजा कुजना डाकिनी शाकिनी तथा अन्तरिक्ष घरा पोप हाकिन्यस्य मदायमाः । ५. " प्रा भूत पिशा पर गन्धर्व रासाः ||प्रय गचम बंगालाः ॥

[ २८६ ] लोकस्यशत्रूणांउपसाधनकर्मणि ॥ दुर्गातु दुःखनाशायपूजयेद्यनत्तोवुधः ।। शौभाग्य धनधान्या दिवाच्छितार्थ फलाप्तये ।। शुभद्रां पूजयेन्मयो दासी दासादियुद्धये |अत्रिमूर्तिपूजा।त्रिपुरात्रिपुराधारांत्रि वर्ग ज्ञानरूपिणीम् ।। कामदां करुणो दारां काली र पूजयान्हम् ।। कल्याणी पूजा मंत्रः -- कालात्मिका कला तीतां कारुण्य हृदयां शिवां ॥ कल्याण जननी नित्य कल्याणों पूजयाम्यहम् ॥ रोहिणी पूजा मन्त्रः ।।-अणिमा दिगुणा धारा मकारा यक्षरा मिकाम् ॥ अनन्त शक्ति का लक्ष्मी रोहिणों पूजयाम्यहम् । कालिका पूजा मंत्रः।-कामं वारिशुभा कान्तां का नवा- स्वरूपिणीम् ।। कामदा करुणो दारां काली व पूजयाम्यहम् ।। चण्डिका पूजा मंत्रः।-चएडवीरां चण्ड मायां चण्डः मुण्डप्रभञ्जनीम् ॥ पूजयामि सदा देवी चण्डिकां चण्ड विक्रमम् ।। शाम्भवी पूजा मन्त्रः। सदानन्द करी शान्तां सर्व देव नमस्कृतम् ।। सर्व भूतात्मिकां लक्ष्मी शाम्भवी पूजयाम्यहम् ।। दुर्गा पूजा मन्त्रः ||-दुर्गमे दुस्तरे कार्य भव. दुःख विनाशिनीम् ॥ पूजयामि सदाभक्तया दुर्गा दुर्गाति नाशिनीम कुष्माण्डा भैरवा दयः ॥ ५१ ॥ नश्यन्ति दर्शना त्तस्य कवचे इदि- संस्थिते ॥ मानो नतिभवेद्राज्य तेजो वृद्धि कर परम् ।। ५२ ॥ चशसा वर्धतेसोऽपि कृर्ति मण्डलभूतले ॥ तस्माअपेत्सदा माया कवचं कामद मुने ॥ ५३ ॥ जपेत्सप्त शर्ती चण्डौं कृत्वातु कवचं पुग ॥ यावद् भू मण्डल पत्ते सशैल वनका ननम् ॥ ५४ । वावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्र पौत्रकी ॥ देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरै रपि दलभम् ।। ५५ ॥ प्राप्नोति पुरुषो नित्य महामाया प्रसादतः ॥ लभते परम नपं शिवेन सह मोदते ॥ १६ ॥ इति वाराह पुराणे हरिहर प्रक्ष विर चितं देव्याः कवर्च समाप्तम् ॥ ॐ नमरचण्डिकाये जयन्ती मङ्गणा काली भद्रकाली कपा. लिनी || दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते ॥१॥ जयत्व देवि चा भएडे जय भूनाति हारिणी ॥ जय सर्ग गते देवि काल राग्नि नमोऽनुते ॥२॥ मधुफैट भवि द्रायिधात वरदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विपो जहि ॥ ३॥ महिपा सुर निर्णाशि भक्ताना सुखदे नमः । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४॥ बीज बंधे देविचएउमुराद पिनाशिनी ।। रूपं देहि जय देहि यशो देहि द्विषो जाह ॥१॥ शुभत्यै पनि शुम्भस्य भूना शस्य पदिनी । रूपं देहि जयहि यशो देहि दिसो पनि अचिन्त्यरूप परिते सर्व शत्रु विनाशिनी ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो नदि हिरो जहि ॥८॥ननेगा महा माया' .

[ २८७ ] ।। शुभद्रा पूजन मन्त्रः।।-सुन्दर्य स्वर्ण वर्णाभां सुख शौभाग्य दायि- नीम् । शुभद्र जननों देवों सुभद्रां पूजयाम्यहम् ॥ भक्तिः कुमारीणां याला पूजा कार्या || काचुकै श्चैव वस्त्रैश्च गन्ध पुष्पा चतादिभिः ।। नाना विधैर्भय भोज्यै भोजयेत् पायासादिभिः ।। इति कुमारी पूजा ॥ अथ सप्त सती पाठ विधिः ।। सकल पूजा नन्तरं सप्तसत्यादि गठ जपादिकं कुर्यात् ॥ ब्राह्मण द्वारा कुर्यात् ।। श्रूयाद्वा ॥ अथ. सप्त सती पाठ वेद पाठानेक पुराणान्तर गत स्त्रोत्र पाठ गायत्री जप नवार्णव मन्त्र ज्ञाप स्वेष्ट देवता मन्त्र जपादीन यथा शक्ति कुर्यात् ॥ अथसंकल्पः ॥ अयेह ममभूत भविष्य वर्तमान जन्म जन्मान्तराणां दुष्कृत नृवृत्ति दुष्कृतोत्थ समस्त पाप क्षय शत्रु दस्यु राज शस्त्रा न शता यौघहेतुक भया भाव महा मारी समुद्भवा शेपो प सर्गापगम विविधो सातो पशम सवा पच्छान्ति पूर्वक रक्षो भूत पिशाच ग्रह पर कृत्या वालप्रहादि सकल वाधा शम- यिनी श्री दुर्गा सानिध्य द्वारा सर्व गुणो त्पत्ति दीर्घायु विपुल धन धान्य पुत्र पौवाद्य नव च्छिन्न सन्तति वृद्धर्थ सकल कुलानन्द स्थिर लक्ष्मी कीति लाम सुख प्राप्ति सदभिष्ट सिद्धि मूलक महा काली महा लक्ष्मी महासरस्वती प्रीतये मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत सावर्णि:- चण्डिके दुरितापदे ॥ रूप देहि जय देहि यशो देहि दिपो जहि ॥ ६॥ स्तुवद्भयो भक्ति पूर्व त्वा पण्डिके व्याधि नाशिनि || रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि ॥ १० ॥ चरिडके सततं ये स्वा मर्च यन्तीह भक्तिः ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विपो जहि ॥ ११ ॥ देहि सौभाग्य मारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विपो जहि ॥ १२ ॥ विधेहि द्विपतां नाशं विधेहि बल मुच्चकैः ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १३ ॥ विधेहि देवि कल्याणं विधेहिपरमां श्रियम् ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १४ ॥ सुरासुर शिरोरत्ननिघृष्ट चाणे ऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १५ ॥ विगवन्तं यशवन्तं लक्ष्मी वन्तं जनं कुरु ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६ ।। प्रचण्ड दैत्य दर्पघ्ने चएिटके प्रणवा यमे ॥ रूपं देहि जय देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १७ ॥ चतुर्भुजे चतुर्वक संस्तुते परमेश्वरि ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विपो [ २ ] सूर्य तनय इत्या राभ्य सावर्णि भविता मनुः सथा च रहस्यादिः पर्यन्तंपाठं कर्तु मध्या रम्य नवमी पर्यन्त ब्रह्मणानां पूजनं वरणं च करिष्ये ॥ पाठान्ते यथा शक्ति वलिदान छाग कुष्माण्ड फलेवा वक्ष्य माण विधिना कार्यम् ॥ अथ द्वितियादि दिन कृत्यम् ॥ द्वितीयायां श्री परमेश्वर्यै पट्ट केशरज्जु कङ्कति कां दद्यात् ॥ तृतीयां दर्पणं सिन्दूर कजलम् ॥ चतुर्ध्या मधु शर्करा दधि काश्य पात्रान्नं काश्य थालि कास्ष्य मधु पकम् ॥ कालम् ॥ पञ्चम्यामुद्वर्तन सौवर्ण शैर्यश भूपणमयया वत्पुष्पं दध्यात् ॥ . प्रति संध्यं प्रति पदादि तिथिपु पूजनं यथा शक्कया ॥ द्वितीयायां मध्याह्राउ ऊर्व संध्या काला दर वाल चन्द्र दर्शनं कुयात् । शंखार्घ श्वेत चन्दन दुध्यक्षत तोये निधान जानुना वनि स्पृष्ट्वा दक्षिण हस्तेन चन्द्रार्घ्यदानम्।। तत्र मंत्रः ।। श्रवि नेत्र समुद्गत क्षीरी दाणव सम्भव || गृहाणार्य शशां केश रोहिण्या सहित प्रभो ॥ प्रणाम मंत्रः॥ नमः सुधां शवे तुभ्य लक्ष्मी जहि ॥ १८ ॥ कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भकया सदाम्बिके । रूपं- देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ १६ ॥ हिमाचल सुता नाथ मंस्तुते परमेश्वरि ॥ रूप देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषो जहि ॥ २० ॥ इन्द्राणीपति सद्भाव पूजिते परमेश्वरि ॥ रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २१ ॥ देवि प्रचण्ड दोर्दण्ड दैत्य दर्पविना शिनी ।। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ २२ ॥ देवि भक जनी दाम दत्ता नन्दो दये ऽम्बिके । रूपं देहि जयं देहि यशोदेहि द्विषो जहि ॥ २३ ॥ पत्नी मनो रमां देहि मनो वृता नुसारिणीम् । तारिणी दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्वाम ॥२४॥ इदं स्वोत्र पदित्यानु महास्वोर पठेन्नरः ॥ सतुसप्त शता संग्याय रमानेति सम्पदाम् ॥ २५ ॥ इति मार्कण्डे पुराणे अर्गना स्तोत्र समाप्तम् । निमारपिटकाये--मारडेययाध-विशुद्ध मानदेहाय त्रिवेदी दिव्यचतुपे ॥ श्रेयः प्राप्ति निमित्तायनमः सीमाधारिणा समेतदि. जानीया माणामपिटोलपम्||मोऽपियम ममाप्नोति सन्जाप्य वापस । २ ॥ सिद्धपन्यु चारनादीनि यानि सम्ला न्यपि ॥ एतेन गुरता देवी स्तोम माणप्तिस्यति ॥ ३ ॥ न मन्त्र नौषधं नानकि नपि nिd ॥ बिना आध्येन सिद्धदेत मर' गुपाटना दिकम् 1 ४ ॥ रामप्रारयपि सिस्यन्ति मोर रास मिमां हर ॥ एत्या निगन्यया माम सब मे मिदं शुभम् ॥ ५॥ स्वात्र परिहा [ २८६.. भ्रातर्नमोनमः ॥ निष्कलदिन् कला धारिन् गङ्गाधर शिरो मणे । शंभोर्जटा जूट वासिन् वाल चन्द्र नमो स्तुते ।। इति दद्यात् ॥ श्रय पष्टयां बिल्वनिमत्रणविधिः ॥ शुक्ल पष्टयां जेष्टा युनाया सूर्यास्तः वेलायां वित्त म सन्निधौगत्वा उपवासादि मृत नित्य नियापूर्व मुखं उत्तर मुख वा उपविश्याऽऽचम्य सन्ध्या काल समये दी प्रमाल्य संकल्पं कुर्यात् ।। अयहे. श्री दुर्गा प्रीति कामः श्री वृक्ष पूजन पूर्वक बिल्ल निमन्त्रणमदकरिष्ये ॥ ॐ भगरति दुर्गे इहा गन्छ- इतिष्टे त्या वाह्य । पाद्यादि नैवेद्यान्तो पचारः सम्पूजयेत् ॥ तत्र मंत्रः । रावणस्य वधार्थाय समस्या नुप्रदायन । अकाले लवणा. म्बोधी त्वया देव्या वितः पुराण अह मप्यानितः पप्टयां साया- म्हे बोक्या म्याः ॥ पूजयामीह, दुर्गे त्या सर्व शत्रु विनाशिनीम् ।। देव देवांश संभूतः ? श्री वृत्तः पाण्डिका प्रियः ॥ श्रामन्त्रयामि पूजार्थ शासा मेक यच्छमे ॥ इत्यामंध्य । यथोक्त विधिना विल्व यास्तु वच्च गुप्तं चकार सः ।। समाप्नोतिः सु पुण्येन तां यथा वछि यन्त्रणाम् ॥ ६ ॥ सोऽपिटेममाप्नोति सर्व मवे नशशयः । कृष् यां वा चतुर्दश्या मष्टम्यां वासमाहितः ॥ ७ ।। ददातिप्रति गृह्णाति नान्य थेषां प्रसिद्धयति ॥ इत्यं रूपेण कीलेन महादेवन कीलितम् ॥ ८॥ योनिष्कीलांविधायनां नित्यं जपति सस्पुटम् ।। ससिद्धःसगणः सोऽपि गोंजायतेनरः ॥ ६॥ नचना पटत स्वस्य भयं कापि हि जायवे ।। नाप मृत्यु वशयावि मृतो मोक्ष ममानु यात् ॥ १० ॥ ज्ञात्वा प्रारम्य. कुर्मान न कुर्वाणो विनश्यति ॥ ततोसत्वैव संपन्न मिदं प्रारभ्यते बुधेः ॥ ११ ॥ सौभाग्यादि प यत्किंचिद् दस्यते ललना जने ॥ तत्सर्व वनसाइन तेन जाप्य मिदंशुभम् ॥ १२ ॥ शनैस्तु जप्यमानेऽस्मि-स्तोघे सम्पतिरुचः ॥ भर त्येव समप्रापि ततः प्रारम्य मेवतन् ॥ १३ ॥ ऐपयं यत्प्रसादेन सौभाग्या रोग्य संपदः ॥ शहानिः पर) मोतः सूयने सान किं जनः ॥ १४ ॥ इविभगाया: कोलक स्वोत्र समाचार ॥३॥ शुभंभूयात् ॥ श्री गणपति जयति ॥ ॐ अस्य श्री नवार्ण मन्त्रस्य प्रमा शिगुनमा शयः ॥ गायत्र्युपियग नष्टभ रचन्दामि । श्रीमहा काजो महा लक्ष्मी मा सास्वत्यो देवताः ॥ ए बीजम् ।। शक्निों फोजकम् । भो महाकाशी महा नरमी महा मरस्वती प्रीत्यर्य रे पिनियोगः ॥ प्राविगु र शमिश सिरति ॥ गायमुगि नुष्टुपन्दोम्यो नमागु ॥

[ २० । वृचाधि वास फुत्वा नत्य गीत वाद्योत्सव रात्री जागरण कृत्वा यतः पुनः । ॐ विल्व इहागच्छ इहा तिप्टे त्या बाह्य विल्वा य नमः । इति मन्नण पाद्यादि सिन्दूर गन्ध पुष्पाक्षत धूप दीप ताम्बूल नैवेद्यान्त दधात् , विल्व वृक्षरद्वा मन्त्र पठेत् । श्री- रोल शिखरे जातः ? श्री फलः ? श्री निकेतन | नेतव्योसिसमागच्च पूग्यो दुर्गास्वरूपतः ।। इनि पठेन् ।। अथ सप्तमी दिन कृत्यम् ।। सप्तम्या प्रातरा रम्य पत्रिका पूजनान्तर पर्यन्त पुस्तकादी सरस्वती पूजयेत् ॥ मन्त्र मप्रे वक्ष्यते रुद्र यामले:-मूल ऋते सुराधीश पूजनीया सरस्वती ।। इति ।। सप्तम्या मूल युक्तायां वा केवलायां पत्रिका प्रवेशः । तहिने प्रातः समये नित्य कर्म कथा पुन विस्व समीपं गत्वा प्रणम्य प्रार्थयेत् । विश्व वृत महाभाग सदानं शकर प्रिय | गृहीत्वा तव शाखां च पूज्या दुर्गेति चस्मृतिः ।। उत्तिष्ट पत्रिके देवि सर्व कल्याण हेतये ॥ पूजां गृहाण सम्ला मस्माकं वरदा भव || मेरु मन्दर कैलाश हिम. पच्छिखरे गिरो ॥ जाता श्री फल वृक्षोत्व माम्बिका पा सदा प्रिये इति प्रात्यं ॥ विश्व वृक्षस्य दक्षिणस्यां दिशि श्री फन युग सहितां शाखा गृहीत्वा गन्धादिभिः सम्पूज्य ।। ॐ हिन्दि फट अस्त्राय नमः । ॐ फट् स्वाहा इति मन्त्रेण सच्छिन्द्य तच्छा खात्रोटनं कृत्वा वृक्षा महा काली महा लक्ष्मी महा सरस्वती देवताभ्यो नमः इहि ॥ ऐं वोजाय नमो गुद्य ॥ हां शक्तये नमः पादयोः ।। क्ली कील काय नमोनाभी । इति मूलेन करौ संशध्य ।। ॐ ऐं अगुष्टा भ्यानमः ।। ही तर्जनीभ्यां नमः । ॐ क्ली मध्ययाम्यां नमः | ॐ चामुण्डाय अना: मिकाम्यां नमः । ॐ विच्छ कनिष्ठिाकाम्यां नमः ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विषे करतल कर पृष्ठाभ्यां नमः ।। एवं हृदयादि । ततोऽक्षर न्यासः ॥ ॐ नमः शिसायांम् ॥ ॐ हौ नमो दक्षिण ने ॥ॐ पली नमो वाम नेत्रे ।। ॐ चा नमो दक्षिण कर्णे॥ ॐ मुं नमो वाम- करो ॥ ॐ टां नमो दक्षिण नासायाम् ॥ ॐ नमोगाम नासायाम् ।। ॐनिमोमुसे ॐ नमो गुने । विन्यस्याष्ट धार मनेन व्या. पर ज्यांत ।। ॐ ऐं भाग्नेटो नमः । ॐ ही दक्षिणाय नमः । ॐ ही नये नमः ।। ॐ क्ली प्रताय नमः || ॐ क्लीं वायन्यै नमः * पामुब्दापे उदीच्य नमः । ॐ पामुरादाय ईशान्यै नमः । ॐ ऐं दो की चामुण्डायै विको उचाय नमः । ॐ ह्रीं क्ली पामुण्डायै विधे भूम्ये नमः । अथ ध्यानम् ॥ गन पक गवेषु पाप परिपाशूल भुगु शिः गरा मेदयती कर बि नयनां मार भूपा पचाम् ।। ननारम पनि देवतीर्थ । कदनी स्तम्भ दाडिम धान्य वृक्ष हरिद्र पुन मानक कचूर विस्व पत्रा शोक जयन्ती द्रोण पुष्पान्य पुष्प फलं चयल्लयं सम्पूर्ण मा हृत्य प्राययेत् ॥ शाखान्छेदेन यद् दुःखं यकृतं हिमया प्रभो ।। क्षम्यतां मम वृशेश विन्ध वृक्ष नमोस्तुते ॥ वृल्व वृक्ष महाभाग सर्वदा शकर प्रिय ॥ गृहीत्वा तव शासां च देवी पूजां करोम्यहम् ।। इति प्रार्थ ॥ ॐ ह्रीं हुँ को चामुण्डे चल चल शीत्र त्वम्बिके प्रविश ।। पारितत्त्वं दुर्ग रूपासि सुर तेजा महाबले । प्रविश्य तिष्ठ यज्ञोस्मिन् यावत् पूजां करोम्यहम् ॥ इति प्रविश्यस्थापयेत् ॥ ॐ स्थां स्थी इति स्थिरोभर । आरोपितासि दुर्गेवं मृगमर्य श्री फलतुवा ।। स्थिरी भूता च त्वं देवि गृहाण कामदा भव ॥ इति स्थिरी कृत्य पत्रिम मुत्थाप्य दोलायामारोप्य दोलां स्कन्धे निधाय नौनी सन् गृह समीपे आन यानाना वादिवादि मद्गल पुरस्सर पत्रिकायां यथामिलितो पचारैः सम्भूज्य ततो देवी गृहान्भ्यन्तरे सायं काले पत्रिका प्रवेशयेत् ॥ श्रथ सप्तम्यां सन्योत्तर कृत्यम् ।। सतो भूतादीनां कृशरान यलिंदद्यात् ।। ॐ भूत इहागच्छेहतिष्टे त्या वाह्यसंस्थाप्य भूतादिभ्यो नमः ॥ इति मास्य पाद दशमां संवे महा कालिका यामस्तोत्स्वपिवे हरी कमल जोहन्तुं मधु कैटभम् ॥ १ ॥ अक्षम्रपाशु गहेषु कुनिशं पा धनुः कुएिडकां दण्डं शक्ति मसिंच चर्म जल घरटा-सुरा माज- नम् ।। शल पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्ना ननां संवेसे रिभ मर्दिनी मिह महा लक्ष्मी सराजस्थिताम् ॥ २ ॥ पण्टा शूल इलानि शय मुसले चक्रं धनुः सायकं हस्तान्र्दधतीं धनान्त वितसच्छीतांशु तुल्य प्रभाम् ॥ गोरी दे सगुद्भवां त्रिनयना माघार भूवामहा पूर्वा मंत्र सरस्वती मनुभजेच्छुभादि दैत्यादिनीम् ।। ३ ।। अष्टो तर शत सख्यामाज... हो की चामुण्डायैविच्चे ॥ भोज अयायश्हेि वलयानायधीमतन्नरातिप्रयो दवात् ।। १०८ ॥ जपेत् ।। इति नवा विधिः॥ . भय रात्रि सूकम् । विश्वरधरी जगदाची स्थिति संहार कारिणोम् । निद्रा भगवा रियोस्तुलां वेजस-अनुः ॥ १॥ ममोरान ॥वं स्वाहात्वं स्वधा त्वं हि षट् कार स्वरालिका ।। तुदाल महरे नित्वे विश मात्रारिम कास्थिता ॥२॥ अचं मात्रा स्थिता नित्या पानुपाणं विशेषतः ।। स्वमेव संभ्या मारियो त्वविजननी परा! ३ वरनहार्यते विं सपेचातयते जगत्व वयान्यने देवि वनस्पन्न बना।

[ २२ ] पाद्यादि नैवेद्यान्तेः सम्पूज्य प्रार्थयत् ॥ भूवा प्रेता. पिशाश्च येत्र सन्त्यवमतले । गृहन्तु मयाद वत्तिमे तत्प्रसादितम् ।। पूजिता पनि पुष्पाद्यैस्तपिता वलिभिस्तथा देशा दस्माद्वितिः सृत्य पूजां गृहन्तु यत्वाम् ।। एप माप वलिः भूतादिभ्यो नमः सर्पपंच विकीर्य वल्यु परिदीप प्रज्वाल्य गृहाहि थापयेत् ॥ नवः सप्तम्या पुस्तका दो प्रभात वा पत्रिका पूजनानंतर वा सरस्वती स्थापयेत् यथा । वेद शास्त्र पुरापनि स्मृति व्याकरणानिय ।। ज्योति मन्त्र विद्यां च सर्व विद्या मनेक था। विततां पुस्तके मातनिश्चयं कुल्मेगृहे ॥ संजीवन कुलेजातं पुस्तकाय नमो नमः । इति मन्त्रादिना पूजयेत् ।। अहे त्यादि सर्वापच्चान्ति सा विध सोख्य प्राप्ति पूर्वक शरत्कालीय नव दुर्गा शाकम्बारी स्थापन मह करिष्ये ॥ भूएमयीं दुर्गा प्रतिमा सफला विल्व शाखां, कदल्यादि नत्र पत्रिकां च सस्थाप्य पञ्चामृतेन संस्थाप्य एतन्त इति प्रति. प्टाप्य पूजयेत् ॥ पत्रिका नामानि । कदली दाडिमं धान्यं हरिद्रा मानकं कचम् ।। विल्वा शोकी जयन्ती च विज्ञेया नव- त्रिका | प्रत्ये नत्र पत्रिका पूजनं यथा शक्ति कृत्वा स्लानीयं . दद्यात् ।। तद्यथा || आये यी नर्वदा गङ्ग यमुना च रखती ॥ शरयू गण्डकी पुण्या येत गङ्गा च कौशिकी ॥ ची च पावाले स्वर्ग मन्दाकिनी तथा ॥ सत्रीः सुमन सोभूत्वा शृंगार स्लपयन्तुते ॥ विसृष्टो मुष्टि रूपात स्थिति रूपा च पालने ॥ या संहति रूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मय ॥ ॥ महा विद्या महा माया महा मेधा महालतिः । महामोहा चभवती महा देवी महासुरी ॥६॥ प्रकृतिस्त्व नसर्गस्य गुप जय भाविभाविनी । कालरात्रिमहाराविमोहरात्रिश्च दायरः ॥ ७ ॥वं श्री स्वनीश्वरील होस्व बुद्धिवाध तरणा ॥ तन्ना पुष्टि स्तयातुष्टि व शान्तिः शान्दिरेवष || || सङ्गिनी शूलिनी पोरा गदिनी चक्रिणी या राजिनी चापिनी-वाण भुशुपही परिघा बुधा ।। ६ ।। मीभ्या सौम्य वय रोप सौम्ये गस्त्यति मुन्दरी ।। परा पराणां परमात्वमेय परमेश्वरी ॥ १०॥ यसकिचित्स्यचिदानुसद सदाखिलात्म ॥ वस्य सभ्य या शफिक सात कि सूयसे वदा ॥ ११ ॥ यया त्वां जगत्सा जगसात्यधि या जगन् । माऽपिनिदायरा नीतः कस्यांतानुसे मिहेश्वरः ।। विमाः शरीर प्राण मद मीणन एवं प॥ कारि गस्ते यो सस्त्वा यः स्तोतुं शक्ति मान्भवत् ॥ १३ ॥ सा मिलय प्रमाः स्वरदार पनि भन्नुका ॥ मोह येनी दुराधरी व मोटी 1 १४ ॥ यो ५ अगस्यामा नौपचामप्युवो बा ॥ बाप । २१ । कदल्यै, नमः । कदल्या ब्रह्माणी हागच्छे इतिष्टे त्या वाह्य ब्रह्माण्यै नमः इति पाद्यादि नैवेद्यान्त दद्यात् ॥ दाडिम्या रक्त चण्डिकाम् । सर्वेषा मधिपो देव ईशानो नाम नामतः ॥ शूलपाणि महादेवो शृङ्गारै स्नफ्यन्तुते ॥ पूर्व बद् इहागच्छे त्यादिना सम्पूज्येत् ।। धान्ये लक्ष्मीम् । पुण्यात्वं पुण्य शाखाना मङ्गलानां च मङ्गलम् । विष्णुना विधृतो नित्य मा शान्ति प्रयच्छमे ॥ मन्दाकिन्या स्तुते वारि सर्व पाप हर शुभम् । स्वर्गस्रोतस्तु वैष्णव्य शृङ्गा- रैलपयन्तुते ।। पूर्व वसंपूजपेत् ॥ मानके चामुण्डम् । गन्धाढ्यं चन्दनं दिव्यं तच्छीतल सुरप्रियम् ॥ सर्व पाप हरं चैव शृंगार स्नपयन्तुते ॥ पूर्ववत्सपूजयेत् ॥ कचे कालिकाम्-सागरा. सरितः सर्वा सरः घोतोदमस्तथा । सर्वोषधीभिः पापना शतशः स्नप: गन्तुते ॥ सर्वाः सुमनसो भूत्वा शृगारैस्न पयन्नुते : ॥ पूर्व वत्स पूजयेत् ॥ विल्वेशिवाम् ॥ हिमवद्धेम कूटाद्या श्चाधिविश्चन्तु पर्वताः निझरोदक, पूर्णेन पष्टेन कलशे नतु । सर्वा सुमन सोभूत्वा शृंगार स्नपयन्तुते ॥ पूर्ववत्सम्पूजयेत् ॥ अशोके शोक हारिणीम् श्चक्रियता मस्य इन्तु मेतो महा सुरौ । १५ ॥ इति श्री गणेशाय नमः ॥ अथ सप्त शती न्यासः ॥ श्रथ प्रथम मध्यमो त्तम चरि त्राणां ब्रह्य विष्णु रुद्रा ऋषयः । श्री महा काली महा लक्ष्मी महा सरस्वत्यो देवता ॥ गायभुष्णिग नष्ट भरछ- मासि ॥ नन्दा शाकम्भरी भीमा. शक्तयः ।। रत दन्तिका दुर्गा भ्रामों वीजानि ॥ अनिर्वायुः सूयस्तत्त्वानि || ऋग्यजुः साम वेदाभ्यानानि ॥ सकल कामना सिद्धयें श्री महा काली महालक्ष्मी महा-सरस्वती देवत प्रीत्यर्थं जपे विनियोगः । तत्रादौ न्यासा ॥ सङ्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥ शचिनी चापिनी वाण भुशुण्डी परिधायुधा | अंगुष्टाभ्या नमः ॥ शूलेन पाहिनो देविपाहि खङ्गन चाम्बिके। घण्टा स्वनेन नः पाहि चापज्यानिः वनेनच ॥ तर्जनी म्या नमः ॥ प्राच्या रक्ष प्रतीच्या च चण्डिके रख दक्षिणे ॥ भ्रामणे नाम शूलस्य उचरस्या तथेश्वरि । मध्यमाम्या नमः । सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्तिते ॥ यानि चात्यर्थ घोराणि वे रक्षा, स्मां स्तथा मृशम् ।। अनामिकाम्यां नमः ॥ खड्ग शूलगदा दोति यानि पायाणि ते ऽम्बिके ॥ कर पल्लव सङ्गीनि रस्मा बत सतः ॥ कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ सर्व वरूपे सर्वेशे:स. वंशति समन्विते ॥ भयेभ्य स्वाहि ना देवि दुर्गे दवि नमो { २१४ ॥ ॥ लवणेतु सुरा सर्पि दधि तीर जलै स्तथा ॥ सर्वा सुमनसो भूत्वा अंगार स्लपयन्तुते ॥ पूर्व वत्सम्पूजयेत् ।। जयन्त्यां कार्तिकाम्॥- दुर्गा चण्डी खरी चएडी वाराही कार्तिको तथा । हरसिति तथा काली रुद्राणी वैष्णवी तथा ॥ भद्रकालो विशालाक्षी भैरवी सर्व रूपणी । सर्वा सुमनसो भूत्वा गृङ्गारे लापयन्तुते ॥ पूर्ववत्सम्पुज्य ॥ तत्रैव तक्षका दोश्चमापयेत् पूजयश्च ।। तक्षकाद्या श्चये चान्ये 'पाताल तल बासिनः ।। सर्वा सुमनसो भूत्वा गृङ्गारैः स्नापयन्तुते ॥ अनेन प्रकारेण प्रत्येक पत्रि. फान स्नापयित्वा पूजयेत् ॥ ततो विश्व फल शाखायां श्री परमेश्वरी मा वाहयेत् । अथा वाहनम् । आवाहयाम्महः देवी श्री फले मृण्मये तथा । श्रायुरारोग्य मैश्वर्यं देहि देवि नमः सदा । कैलाश शिखरे देवी हिमाद्रे हिमपर्वतात । अागन्तु विल्व शाखायां चण्डिके कुरु सन्निघम् ।। स्था- पितासि महादुर्गे । पूजयेत्वा प्रसीदमे । दुर्गे देवि ! इहा गच्छ सानिध्य मम काय ॥ यज्ञ भागानगृहाण योगिनी कोटिभिः सह ।। इत्यावाब सत्र यनं बिकीयं ॥ प्रौदुर्गे-दुर्गे रस स्वाहा दुर्गायै नमः ॥ जयन्ती मङ्गला काली चेति पाद्याभ्यां चमनीय मधुपर्क पश्चामृत शुद्धस्तान वना ऽस्तुते ॥ कर वन कर पृष्टाभ्यां नमः .)। एवं हृदयादिपु खानी शूलिनी योग० हृदयाय नमः ॥ शूलेन पाहिनो देवी० शिरसे स्वाहा ॥ प्राच्यां रस प्रतीपांच० शिखायै वषट् ॥ सौम्यानि यानि रूपाणि कवचाय हुम् ।। खज शल ने प्रयाय वौ पट् ॥ सर्व स्वरूपे सर्वेशे० अस्त्राय फट् ।" अथ ध्यानम् विद्युहराम सम प्रभा मृग पनि स्कन्धस्थितां भीपणां कन्याभिः परपाल खेट विल साताभिरासेविवाम् ॥ हस्तैरथम गदामि सेट ' विशिक्षा सायं गुणं वर्जनी विभाणा मेनलात्मिक शशिधयं दुगां विनेत्र भने ॥ १॥ इति ध्यानम् ।। प्रथम चरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः महाकाली देवया गायत्री छन्दः, नन्दा शकि, रफ दन्तिका पीयम् । अग्निस्तत्वमा गद स्वरूपम्, श्री महाकाली प्रीत्यर्थ प्रथम परित्र जपे योगः पिनि ।। अथ पानमसा धक गहेषु पाप परिपागलं भुगएडी शिर. शेवं सवाची करे बिनयनां सां भूपा भूताम् ॥ नीलाम पुदि मास्य पार राधं संधे मशहानिकांपामस्तोलादे हरी कमानोन्नु म. मम् ॥ ॥ माराच ॥ १॥ सायणिः सूर्य सनयो योमनुः काम... निरामय तदु प ितिराहणतो मम ॥२॥ मामाया गदादीनिक I- [ २६५ । भूपए गन्धाक्षत पुष्प सिन्दूर कन्जलादि द्रव्ह धूप दीप नैवेद्य ताम्बू लादि समस्त पत्रिका स्वरूपायै भगवत्यै दुर्गा देव्यै नमः । इत्यादीनां दत्वा नमस्कारः ॥ उग्र घरहे। रुद्र चण्डे चण्डोने पर नाशिनी ।। चण्डिके चण्ड वस्याम्ब चण्डि ! तुभ्यं नमोनमः ॥ महिपग्नि महामाये चामुण्डे मुण्ड मालिनि ॥ क्षेम मारोग्य मैश्वयं देहि देवि ! नमोस्तुते ।। इतिप्रणम्य प्रार्थयेत् ।। विल्व पत्र मादाय ॥ सुधोद्भव च भी वृक्षं शङ्करस्य सदा प्रियम् । पवित्रते प्रयच्छामि चिल्व। पत्रं सुरेश्वरि द्रोण पुष्पमादाय । ब्रह्म विष्णु शिवा दीनां द्रोण पुष्प सदा प्रियम् ।। उत्ते दुर्गे। प्रयच्छामि सर्व कामायं सिद्धये ॥ कुङ्कमेन समालिप्ते चन्द- नेन विले पिते । विल्व पर कृताऽऽपीडे दुर्गे है शरणं गतः ।। रूपं देहि यशो देहि, भगभगवति तथा पुत्रान्देहि धनन्देहि सर्वान्कामान्प्रदेहिमे ।। अथ प्रत्येक नव पत्रिका पूजा ॥ अद्येहेत्यादि नव पत्रिकायां नव दे. वीनां पूजन महं करिष्ये इति संकल्प्य अावाहनादि ताम्बूलान्तः सम्पूज्य प्रत्येकं प्रार्थयेत् ।। कल्पयां ब्राह्मणी पूजा ॥ दुर्गे देवि ! समागच्छ सानि- ध्यमिह कल्पय | रम्भा रूपेणमेनियां शान्ति कुरुं सदा शुभे। ब्रह्माए नमः ॥ दाडिम्यां रक्क पण्डिकां पूजयेत् ।। दाडिमि त्वं पुरा युद्ध रक्त बीज- नुभावने यथा मन्वन्तराधिपः । संवभूर्य महामागः सायणिस्तनयो खेः॥३॥ स्वारो विपेऽन्वरे पूर्व चैत्र गंश समुद्भवः ॥ सुरथो नाम नाम राजाभून्समस्ते तित्ति मण्डले ॥ ४॥ तस्य पालयतः सम्यकप्रजाः पुत्रा निवौ रसान ॥ बभूवः शत्रको भूपाः कोला विश्वासिभिर्जितः ॥६॥ ततः स्वपुर माया यो निज देशा धिपो भवत् ।। आफ्रान्तः समहा- भागस्तैस्ददा प्रबलारिभिः ॥ ७ ॥ अमात्यैर्नलिभिर्दुष्टै दुर्वलस्यदुगमभिः।। कोशो वलं चाप हतं तत्रापि स्वपुरे मा ८॥ ततो मृगया यानेन हा स्वाभ्यः सभूपतिः । एकाको हयमा रुख जगाम गहन वनम् ॥ ६॥ स वा श्रम मद्रातोद्वितवर्यस्य मेधनः । प्रशान्तश्या पदा कीर्ण मुनि शिष्यो पशो भिवम् ।।१०॥ तस्यो कंचित्त कालच मुनिना न सक्छव. ॥ इव रचेतश्च विचस्तस्मिन्मुनि वग श्रमे ॥ १ ॥ सोऽचित्र यतदा र ममत्वा कष्ट चेतना नत्पूर्व: शलिवं पूर्व मयाहीनं पुरंदि तत् । १२ । मग त्यै स्वैरसद्वर्धनतः पाल्यते नया ॥ न जाने स प्रधानोमैसूर हस्ती सदामदः ॥ १३ ॥ ममं नरिवयातः कान्भोगा नुपलश्यते ।। ये ममानुगता' नित्यं प्रसाद धनभोजने ॥ १४॥ अनुपूर्ति भूनतेऽय वन्यन्यमही भृताम् ॥ असम्पायय शोलेले उर्वद्धि सब वन्ययम् ।। १५ । माचिवः सोऽति दुखेन यशोगमिष्यति ॥ पत- ..

[२६] न्य सम्मुखे ॥ उमा कार्यरतं यस्मा दुर्गे देवि नमो नमः ॥ २॥ भान्ये लक्ष्मी पूजयेत् ॥ जगवः प्राण रक्षार्थब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ उमा प्रीति करवान्यं तस्मादचतु सर्वदा ।। ३। हरिद्वायां दुर्गा पूजयेत् ॥ हरिदय वरदे देवि उमा रूपासि सुप्रभे ? ॥ मम विघ्न विनाशाय पूजां चैव गृहाण भो ॥ ४ ॥ मानके चामुण्डा पूजयेत् ॥ अस्मिन्टेवि समाविष्ट मान वृते राचीरिये मम चानुग्रहार्थाय पूजाश्वीकरणायच ॥ ५॥ करचूर कालिकापूजयेत् ॥ महिषासुर युद्वेषु कानि भूतासि सुत्र ! । मम चानु प्राय आगतासि हर प्रिये ॥६॥ विल्वे शिवां पूजयेत् ॥ महादेव प्रिय करो वासुदेव प्रियः सदा ॥ उमा प्रीति करोय.स्याद्विल्व वृक्ष ॥ नमो. स्तुते ॥७॥ अशोके शोक हारिणीम्-हरप्रिय करो वृक्ष ! सदात्वं शोक नाशनः ।। दुर्गा प्रीति करोयस्मात् तस्मातम् रक्षमा सदामिति पूजयेत् ॥ जयन्त्यां फार्चिी पूजयेच् ।। निशुम्भ शुभ मथने सेन्द्रदेव मणैः सह ॥ जयन्ति ! पूजयामिवा यस्माई वरदाभव ॥ ॥ इति नय पत्रिका सम्पूज्य प्रार्थयेन । खड़ग छुरिकाधनुध्वज पता का शक्ति मीसि दुन्दुभि शह. हारक छत्र चामरे शस्त्रास्त्राणि श्रीदुर्गा समीपे सस्थापयेत् इति-, सप्तम्या पत्रिका प्रवेशः पूजन विधिश्च || अथ महाष्टम्यां काल चान्य प सतत चिन्तया मास पापियः । १६ ॥ व वित्रा श्रमाभ्याशे बन्यमेकं दार्श सः ॥ सप्टरलेन कस्त्वम्मो हेतुश्चा गमनेऽत्रकः॥ १७ मशोक इन कामाता दुर्मना इवलक्ष्यसे । इत्या कण्यवचस्तस्य भूपतेः प्रणयो दितम् ॥१८॥ प्रत्युवाचसवं नैश्यः प्रश्रया धनतो नृपम् ॥ १६॥ औरय उवाच ।। २० ।। समाधिर्नाम गैरयोऽह मुत्पन्नोधनिना फूले ॥२१॥ पुर दारे निरवश्चनिनोभादिसाधुभिः विहीनश्चर्नेदार पुत्र राहाय मेधनम् ॥ २२ ॥ वनमध्यागतो दु सो निरस्त रयाप्तवन्धुभिः ॥ सोऽईन बेमि पुत्राणा कुशज्ञा कुशलास्मिाम् ॥ २३॥ प्रवृत्ति स्वानां नां चंदाराणां चारनास्थितः । किनु तेषां गृहे म मतेम किनुसा प्रति ॥ २४ ॥ कय ते किंतु सद् पृचादुचाः किंतु मे मुताः ॥ २५॥ राजो वाच ॥ २६॥ योनिरस्वोभाल्लुधैः पुहाग दिर्मियोः ॥ २७ ॥ किं भवतः स्नेह मनुयध्नातिमानसम् ॥२८॥ मेश्य याच ॥२६॥ एव मेवद्यया प्राह भवानरमद्वच ॥ ३० ॥ किं करोमि नवागवितम निष्टु रामनः।। ये. सत्यम्य पितु स्नेह धन तुनर्निरातः ।। ३१॥ पति सजन हाई हादिप्येवमे मनः किम वना भिजानामि जानमपि महायते ॥ ३२॥ योम या विगुणेष्वापि यत् ॥ मेपां ने मेनि श्वासो.

[ २६७ ] रात्री भद्रिका पूजा निर्णयः ॥ नाष्टमी सप्तमी युक्ता सप्तमी नाष्टमी युता ॥ नवम्या सह कार्यास्या दष्टमी सर्वदा बुधैः । अष्टमी सप्तमी युग्मे महोत्साहे महोत्सवः ॥ इति वाक्यात् । नवमी युक्तायाः प्राशस्त्याभि धानात् सति संभवे सप्तमी विद्धा सर्वथा वर्जनीया || यदि स सूर्यो दये न स्या नवमी वापरे ऽहनि ॥ तदाष्टमी प्रकु- ति सप्तम्यासहिता नृपः इति ॥ अहं भद्रा चभद्रा च आवयो रन्तर नहि ॥ सर्व सिद्धि प्रदास्यामि भद्राया मचिंता प्यहमिति वचनं भद्र काल्य चन परेण महाष्टम्यां निशीथ काले पुजा कर्तव्या । दक्ष यह रिनाशिन्या अर्द्ध राने प्रादुर्भावात् ।। तत्राष्टम्यां महा काली दक्ष यज्ञ विनाशिनी ॥ प्रादुर्भूता महाघोरा ह्यार्द्धस्ते चन्द्र मण्डले ॥ इति ब्रह्य वचनात् ॥ सप्तमी विद्धां न कुर्वीत मुख्य शुद्धा- म्यां काल रात्रि कुर्यात् अष्टम्यां सायं सन्ध्योत्तरं देवी पूजा कार्या । अद्येह दुर्भिक्षादिदुः खादि निवृत्ति दीर्घा युध्य परमानन्द परम पद गमन दशाव मेध फल पज माला कुल विमान वरा रोहण शाश्वत दोर्मनस्य च जायते ॥ ३३ ॥ करोमि किं यन्न मनस्ते प्वप्रीतिपु निष्ठुरम् ॥ ३४ ॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ ततस्तो सस्तिो विप्र तं मुनि समुपस्थिौ ।। ३६ ।। समाधिर्नाम वैश्यो ऽसौ सच पार्थिवसत्तमः ।। कृत्वानु तौ यथा न्याय यथां तेन सविदम् ॥ ३७॥ उपविष्टो यथाः काश्चि च्चक्रतु वैश्य पार्थिवौ ॥ ३८ ॥ राजी वाच ॥ ३६॥ भगवस्या मह प्रष्टु मिच्चाम्येकं वदस्व तत् ॥ ४ ॥ दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्ता यत्ततांविना ॥ ममत्व गतराजस्य राज्याङ्ग स्वग्विले ध्वपि ॥ ४१ ॥ जानतो ऽपि यथाज्ञस्य क्मेि तन्मुनि सत्तम । अयं निकृवः पुत्रै दर भृत्त्यै स्तथो मिनः ॥ ४२ ।। स्वजनेन च स त्यक्त स्तेपु हार्दी तथा प्यति ॥ एव मेष तथा हेच द्वावाय त्यन्त दुः पितौ ॥ ४३ ॥ दृष्ट दोपे ऽपि विपये मनत्वा कृष्ट मानसौ ॥ तरिक्रमे तन्महा भाग यन्मोहो शानिनो रपि । ४४ ॥ ममास्य च भव त्येषा विवेकान्ध स्यमूढना ॥ ४५ ॥ परु वाच ॥ ४६ ॥ ज्ञान मस्ति समस्तस्य जन्तो विषय गोचरे ॥४७ ॥ विपयाश्च महा भाग यानि चैव पृथक्पृथक् ।। दिवान्धाः प्राणिनः केचि दाता वधा स्तया परे । केचिदिया था रात्रौ । माणिन स्तुन्य दृष्टयः ॥ ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं नुते नहि केवलम् ॥ यतोहि ज्ञानिनः स पशु पक्षि मृगादयः ।। झार्न च तन्मनुष्याणां यत्तेपां मृग पक्षिणाम् ॥ ५० ॥ मनुष्याणां च । [ २६८ ] फाला छिन्न हर्प विजय कामः श्री दुर्गा देव्याः पूजन ध्यान घाई करिष्ये ॥ इति संकलय ॥ ततः गणेश दोप पूजनार्य स्थापन कृत्वा ॥ वटा जूट समायुक्त स्यादि पूर्वोक्त ध्यानं कुर्यात् ।। अथावाहनम ॥ एहि दुर्गे महाभागे ? रक्षार्थ मम सर्वदा ॥ श्रामा हवा म्यहदेवि ? सर्व कामार्थ सिद्धये ॥ अस्या मूर्ती ममागच्छ स्थिति मकृपया कुरु ॥ रद कुरु सदा मदे विश्वेश्वरि ? नमो स्तुते ॥ ॐ एतन्तेवि भगवति दुर्गे ? इहागच्छ इइ लिष्टेह सन्निहिता भव इह स्थिर। भव सुप्रशन्ना भव इत्या वाम ॥ ॐ जयन्ती मङ्गला कालीति दुर्गे दुर्गे रक्षणि ! स्वाहा ॐ दुर्गाये नमः।। इति मन्त्रए आमन पाचार्य पञ्चामृत स्नांना चमन शुद्धोदक स्नान क वन भूपण सिन्दूर चन्दना क्षत पुष्प काजल धूपदीप नैवेश वाम्बूल दक्षिणान्तं कृत्रा आवरणं पूजये ॥ देव्या दक्षिण भागे एका दश गौरीः पूजयेन् ॥ ॐ ही जयन्तै नमः इति । प्रणयादि नमोन्तं सर नेयम् ।। ॐ ही मसलाय नमः । ॐही काल्यै नमः। ॐ हो ही भद्र काल्यै नमः ॥ ॐ ही कपालिन्ये नमः । श्रओं ह्रीं दुर्गायै नमः । श्री ह्रीं क्षमायै नमः। यों ही शिवायै नमः । श्रओं ही धान्ये नमः । ह्रीं यत्तेषां तुल्य मन्य सथो भयोः ।। ज्ञाने ऽपि सति पश्यैता म्यतहां बार चंचुपे ॥ ५१ ।। फणमोग हवामो हा पीडय माना नपि सुधा ॥ मानुपा मनुज व्याघ्र सामिलापाः सुवान्प्रति ॥ ५२ ॥ लोभापत्यु पकाराय नन्वे वाकि न पश्यसि ॥ तथापि ममता वर्ने मोह गनिपातिताः ।। ३ ।। महा माया प्रभावेण संसार स्थिति कारिणा ॥ तन्नात्र विरमा कार्यों योगनिन्द्रा जगत्पतेः ॥ ५४ ॥ महामाया हरे स्पा या सं मोडते जगत् ॥ शानिनामपि वेतांसि देवी भगवती हिसा॥ ५५ ।। पलादा प्य मोहाय महामाया एय. इति । तया विसभ्यतेविश्य जादै वाम || || सैपा प्रमना वरदा नृणा भरति मुक्तये ॥ सा विद्या परमा मुक्के हेतुभूता सनातनी ।। ५७ ॥ संसार बन्देश्य सेन सरपरेरपरी ५ || राजी वाच ॥ ४॥ भगवान्काहिसा देवी महामायेतियां भवान् ॥ ६० ॥ प्रवीति भयमुत्पन्नास रमाप्यार द्विज ॥ यलमाया च सा देवीयत्व रायया ॥ ६१ ॥ वत्स धातुमिच्दा मलतो मझविदांर ।। ६२ ।। प्रापिरुवाच ।। ६३ ॥ नित्येसा जगन्मूतिस्वया सर्वमिदं ततम् ॥ १४ ॥ ग्यापि तत्समुत्पति यदुवा प्रगनामम् ॥देशनां कार्यसिद्धगर्यमाविभाति शायदा ।। ६५ 11 अपन्नाति वदालोमे मनित्याप्यमधीयते ॥ योग नि नमः। [ २६ स्वाहानमः । श्री ही सधा नमः ।। अादि नैवेद्यान्तः पूजयेत् । देव्यापृष्ट भागे द्वादश देवी पूजनम् कुर्यात् ॥ ही मादि नमोन्ताः प्रयोगो यथा- हो सचएबायै नमः। ह्रीं प्रचडाय नमः । हीं चण्डोप्रायै नमः । हीं चएडनायिका नमः ॥ ही पण्डाय नमः । ह्रीं चएडवत्यै नमः। ही चरडरूपायै नमः। ह्रीं चण्डिकायै नमः । प्रत्येकं सम्पूज्य, दे या वाम भागे नव देवीःपूजयेत् ॥ ह्रीं उप्र दंष्ट्रायै नमः । ही शुभ द्रष्टायै नमः ॥ ह्रीं करालिन्यै नमः॥ ह्रीं भीम नेत्राय नमः ॥ ही विशालाक्ष्यैः नमः।। ह्रीं मगजायै नमः॥ ही जयायैनम || ही विजाय नमः इति सम्पूज्य ॥ देव्यप्रभागे पोडश देवी। पूजयेत् ॥ ह्रीं मङ्गलायै नमः। ह्रीं नदिन्यै नमः । ह्रीं रुद्रायै नमः। हो लदो नमः ॥ ह्रीं कीत्यै नमः। यशश्विन्य ह्रीं पुष्टथै नमः । ह्रीं शिवायें नमः द्वौं साध्य नमः ह्रीं यशोवत्यै नमः । हीं शोभायै नमः यदा विष्णुजगत्ये कार्णवोकृते ।। ६६ ॥ आस्तीर्यो शेपममजकल्पान्ते भगवान्प्रभुः ।। ताद्वाव सुरौ घोरौ विख्यातो मधुकैटभो ॥ ६७ ॥ विष्णु कर्ण मलोद्भूती हन्तुं ब्राह्मणमुद्यती ॥ सनाभि कमले विष्णो:स्थिवो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥६॥ दृष्ठवाताव सुरी चोरी प्रसुप्तंच जनादम् ॥' तुष्टाव योग निद्रां तामेकाप हृदयः स्थितः ॥ ६ ॥ विवोधनार्थाय हरे हरिनेत्र कृतालयाम् ॥ ७० ॥ विश्वेश्वरी जधी स्थिति संहार करिणीम् ।। निद्राभगवती विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥७१ । ब्रह्मो वाच ॥ ७२ ॥ त्व स्वाहा व स्वधा त्वं हि वपद्कारः स्वरास्मिका। सुधा स्वमक्षरे नित्ये विधा मात्रात्मिका स्थता ॥ अधं मात्रा स्थिवा नित्या यानुचार्या विशेषतः । खमेव संध्या सावित्री त्वं देविजननी परा ॥ ४॥ स्वये तर्दायतेविं त्वगै तत्सृज्यते जगत् ॥५॥ त्वयेवत् पाल्यते देवित्त मस्यन्ते च सर्वदा ॥ विसृष्टौ सृष्टिरूपात स्थिति रूपाच पालने ।।७६ ॥ तथा संहति रूपान्ते जगतोस्य जगन्मये ।। महा विद्या महा माया महामेधा महास्मृतिः ।। ७७ ।। महा मोहा च भवती महा देवी महासुरी ।। प्रकृ. विस्वं च सर्वस्य गुण वय विभाविनी ॥ us!! कालरात्रिमहारात्रि मोह- राविश्वदारुणा ॥ श्रीस्त्वमीरपरी त्वं ही स्ल बुद्धिोध लतणा॥ ६ लज्जा पुष्टि वथा तुष्टिनं शान्तिः शान्तिरेवच ! खङ्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥२०॥ शङ्गिनी चापिनी वाणभुर एडी परिघायुधा ॥ सौम्या सौम्य तराशेप सौम्येभ्यस्त्यति सुन्दरो॥ २१ ॥ पण एरा परमात्वमेव परमेवरी। यचकिचित्स्यचिद्वस्तुसद्वासद्वाखित्वकस्मिफे नाव सर्वस्यया शक्तिः सानं किं स्तूयस तदा ॥ यया सयाजगासप्टा जगपा.

[ ३...
जब नमः। ह्रीं धृत्यै नमः । ह्रीं श्रानन्दायै नमः ह्रीमेधाय नम हो
नन्दाय नमः । इति पूर्ववतमम्पूजयेत् देव्यास भागे चतुः पष्टिदेवों ही वी जाये
नमः पूजयामि । हो मालायै नमः पूजयामि ॥ ही भद्रायै नमपूजयामि ॥
सौ धृत्यैनमः पू०। ही शान्त्यै नमः पू० । ही शिवायै नमः पूछ । ही क्षमाय
नमः पू० । ही सिद्ध नमः पू० । ह्रीं तुष्ट्यै नमः पू० । ह्रीं पुष्ट्यै नमः
पू० । ही उमाय नमः पू० । ह्रीं श्रियै नमः पू० । ह्री ऋद्ध नमः ५०
हो रत्यै नमः पू०। ही दीप्तायै नमः ।। पू०॥ ही कात्यै नमः पू०,
हों लक्ष्मै नमः पू० ॥ ही ईश्वर्या नमः पू०। ही वृद्धध
नमः पू० ही शक्तये नमः पू० । ह्रीं जया वत्यै नमः पू० । ही
ब्राझै नमः पू० । हां जयन्यै नमः पू। हो अपराजितायै नमः पू० । ह्री
स्पत्तियो जगन् ॥ ३ ॥ सोऽपि निशा वशं नीतः कस्तवां स्तोतु मिद.
श्वरः ॥ विष्णुः शरीर ग्रहण मह मीशान एवच ॥ ४ ॥ कारि तारते
यतोःऽतस्त्वां का स्तोतु शक्तिमान्भवेत्॥ सात्व मित्वं प्रभावैः स्वै मदारै
देवि संतुता ॥८५ ॥ मोदयैवी दुराधर्षा वसुरी मधुकैटभौ ॥ प्रयोधं च
जगत्स्वामी नीयता मच्युतो लघु ॥८६॥ वोधश्च क्रियता मस्यु हन्तु
मेतो महासुरी ।। ८७ ॥ ऋषिरुवाच ॥ ८ ॥ एवं स्तुता तदा देवी तामसी
तत्र वेधसा ॥ ८ ॥ विष्णोः प्रबोध नार्थायनिहन्तु मधुकैटभी ।।
नत्रास्य नामिका वाहु हृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ १० ॥ निर्गम्य दर्शने तस्यों
ब्रह्मणोऽव्यात जन्मनः । उत्तस्थौच जगन्नाथ स्तया मुक्तोजनार्दनः ।।
॥१॥ एकार्ण वेऽहि शयना चतः सदहशे च वी ॥ मधुकैटभी दुरात्माना
वनि वीर्य पराक्रमी ॥ १२ ॥ मोधरक्त क्षणावतु प्रमाण जनितो यमौ ।।
समुत्थाय वतस्ताभ्यां युयुधे भगवान्दरिः ॥ ३ ॥ पञ्च वर्ष सहस्राणि बाहु
प्रहरणो विभुः ॥ तायप्यति बलोन्मत्ती महामाया विमोहितौ ॥ ६४॥
उक्त यन्ती वरोस्मत्तों प्रियता मितिकेशवम् ॥ १५ ॥ भगवानुवाच ॥ ६॥
भवेता मद्यमे तुष्टो मम वध्या वुमा बपि ॥ ३७॥ किमन्येन वरे यात्र
एतापद्धि वृत्तं मया ॥ || ऋषिरुवाच || || यान्छिनाम्यो मिति
वदासी पापो मयं जगन् । विलोक्य ताम्यां गदितो भगवान्कमले क्षण,
मायां जहिन यत्रो सलिलेन परिप्नुप्ता ॥ १॥पिरवार ॥२॥
सधेत्युम्वा भगाता गंय चमः गदाभृता ॥ कृत्या केण दिन्ने अपने
शिरसी तयोः ॥३॥श्व मेपा समुन् पन्ना ब्रह्मणा सस्ता स्वयम् ।।
प्रभाय मया देव्याच भूयः शृगु वदामिते ॥ ४ । इनि माफएटेय पुराणे
सागि मन्यन्तरे देवी माहात्मे मधुपैटभ वधो नाम प्रथमाध्यायः ॥ १॥
उपार ॥ १४ ॥ अर्थ ॥ २४ ॥ तो०६६ ॥ एवम् ॥ १४॥

[ ३०१ ॥ अजितायै नमः पू० नहीं मानाय नम पूछ । ह्रीं दित्यै नमः पू०। हो मायाये, नमः पू० । ही महा मयायै नमः पू० ही मोहिन्यै नमः पू० । ही रति लालसायै नमः पू० । ही तारायै नमः पू० ह्री विमलायै नमः पू०॥ तदा ही गोय नमः पूजामि । हा शरण्यायै नमः पू० । ह्रीं कौशिक्यै नमः पूजयामि । ही मत्यै नमः ५० । ह्रीं दुर्गायै नमः पू० ॥ ही क्रियायै नमः। पूछ। हीं अमन्यत्यै नमः पू० । ही घण्टायै नमः पू० । हो का नमः पू० ॥ ही कपालिन्यै नमः पू० ।। ह्रीं रौद्रे नमः पू० ही काल्यै नमः पू० । हो मायूर्य नमः पूछ । ह्रीं त्रिनेत्राय नमः पू । ह्री स्वरूपिण्यै नमः पू० । हा वटु रूपायै नमः पू० ॥ हो रिपु हन्त्र्यै नमः पूछ। ही अम्बिकायै नमः पू० ॥ ही चर्षिायै नमः पू० । ह्रौं मुर पूजि- तायै नमः पू० । ही वखत्यो नमः पू० । हो कौमाय नमः पू० ही माहेश्वर्य नमः पू० । ही वैष्णव्यै नमः पू० । हो महा- लक्ष्म्यै नमः पू० । ही शिवदूत्ये नमः पू० । ही कार्तिक्यै नमः पू० । ही कुशिकायै नमः पू० । हा चामुण्डायै नमः पू० । इति संपुज्या मध्यम चरितस्य ) विष्णु ऋपिः ॥ महा लक्ष्मी उष्णिक छन्दः ॥ शाकंभरो शक्तिः ॥ दुर्गापीजम् ।। वायुतत्तम् ॥ यजुवेंदः स्वरूपम् ॥ महालक्ष्मी प्रीत्यर्थ मध्यम चरित जपे विनि- योगः ॥ अयध्यानम् । ॐ अक्षत्रकपरशुं गदेषु कुतिशं पद्म धनु- दिगिको दण्डं शक्क मसिं च च जलर्ज घण्टा सुरा भाजनम् ॥ शूलं पाश मुदर्शने च दधतों इस्तैः प्रसन्ना ननां से शरम- मदिनी मिह महालक्ष्मी सरोज स्थिताम् ॥ १॥ ऋपिस्त्राच देवा सुर यम् शुद्धं पूर्ण मन्द शवं पुरा ॥ महिपे सुराणाम विपे देवानां च पुरं दरे ॥ २ ॥ नत्रा सुरै महा वीर्य देव सैन्यं पराजितम् ॥ जिवा चसकला न्देवानिन्द्रो ऽभून महिपा सुरः ॥ ३ ॥ ततः परा जिता देवाः पद्म योनि प्रजापतिम् ॥ पुरस्कृत्य गंतास्तत्र यवेश गावजी॥ यथा वृचं त्यो स्तद्वन्महिपा सुर चेष्टितम् ॥ ५ ॥ विशाः कथया मासुदेवाभि भवविस्तरम् ॥ ५॥ सूर्य न्द्राग्न्य निलेन्दूनां यमस्य वरुण स्यच ।। अन्येषा चाधि का रान्स स्वयमेवाभितिष्ठति ॥ ६ ॥ स्वर्गा निराहता: सर्वे वेन देव गणा मुवि । विचरन्ति या मया महिपेण दुरात्मना || ॥ एतदः कधितं सर्व ममरारि विचेष्टितम् ॥ शरण वः प्रपन्नाः स्म वध स्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ ॥ इत्यं निशम्य देवानां वनां. सिमधु सूचनः ॥ कार को शंभुख भ्रकुटी कुटिज्ञा ननी. देवता॥

श्रेष्ट मातृकाणं अष्टदिन पूजनं कुर्यात् ॥ ग्रामण्यै नमः । माई- श्वर्यै नमः । कौमार्यनमः । वैष्णन्यै नमः । पाराय नमः । इन्द्राण्यै नमः । चामुण्डाय नमः । महालक्ष्म्यै नमः ! मध्ये परित काय नम- । देव्या अग्रभागे और वाय नमः । इति पूजयेत् ॥ वत्र मन्त्रः ॥ भैर व परमं देवं सर्व काम प्रसाधनम् । पूजा ईो देव्याः सर्वाधिक फल प्रदम् ॥ ततः श्री परमेश्यये जल दुग्ध कुश दधि वरद तण्डुश यव सर्पपादि दश सहस्र वर्षा व छिन दुर्गा लोक मही पनिय काम एयो पालो धो भगवत्यै दुर्गा देव्यै मया दत्तः । दुर्गे ! दुर्गे ? रतिणि स्वाहा दुर्गा देव्ये नमः । इत्यर्थ दत्वा चन्दा दद्यात् ॥ अनि स्टोम यज्ञ फल फल प्राप्ति कामनगा चन्दनेन भगवत्यै दुर्गा देव्यै अनुलेपनं दचं दुर्गा देव्यै नमः ॥ विल्वपत्र माला मादाय ! चन्दनेन समाजिप्ते कुड मेन विलेपिते । विल्व पत्र कुना माली गृहाणसुर बन्दिने ? ॥ दुर्गा देव्यै नमः । अथ सिंह पूजा ॥ॐ हौं हः हः महा शादूल वितानाय पिङ्गल लोचनाय नमः ।। ॥ ॥ वो ऽवि कोप पूर्णस्य चक्रिणो वदना वः ॥ निश्च काम मह जो ब्रह्मणः शंकर स्वच ॥ १०॥ अन्येषां चैव देवानां शमादीनां शरीर । निगतं सुमहत्तेजत्तश्चक्य ममगच्छत ॥ ११ ॥ अतीव तेजसः फूट अलन्तमिव पर्वतम् ॥ दद शुस्वे मुग स्वत्र ज्याला व्याप्त दिगन्तरम् ॥ १२ ॥ अनुल वत्र सचेतः सर्व देव शरीरजम् ॥ एकत्यं तर भूनारी व्याप्त लोक अस्थिपा ॥ १३ ॥ यदभू छाम्भवं तेज स्तेना जागठ वन्मुखम् ।। याम्ये न पाभवन्केशा बायो विष्णु तेषमा ॥ १४ ॥ सौम्येन स्वनयो युग्मं मम्मे चैन्द्रेण चाभवत् ॥ वारणे नव जंघोरू नितम्ब स्वेजसा भुवः ॥ १५ ॥ प्राण तेजसा पादोद गुग्यो जसा ॥ वसूनां च करा गुल्या कोवरेण च नासिका ॥ १६ ॥ तस्यास्तु दन्ताः संभूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रित जमे वया पाक तेजसा ॥ १७ ॥ ध्रयो र सम्पयो स्टेज अवमा वनिक्षस्य || अन्येषां पेय देवानां संभव स्तेजसो शिवा ॥ १८ ॥ सवः समस्त देवानां तेत्रो राशिस मुख्याम् ।। वो पिलोक्यमुदाउ मरा महिपादितः ॥ १६ ॥ शूल जानिमिष्ठम्य दीनाय पिनाक पर ।। प.प दच A RE !! २० ॥ शो म ः शनि सम्बे यानमा [ ३०३ ] अथ देव्याः पढङ्ग, पूजा । ॐ कालीवत्री श्वी लोह ईष्ट्राम स्वाहा हृदयाय नमः । ॐ काली बजे श्वरी लोह दंष्ट्राय स्वाहा शिरसे नमः । ॐ काली वनेश्वरी लो० शिखायै वषट् ॥ ॐ काली वनेश्वरी लो० कवचाय हुम् ॥ स्वाहा काली वनेश्वरी लोह द्रष्टाय स्वाहा ॥ नेत्राभ्यां वौषट् ॥ ओं कालो वो खरी लोह दंष्ट्राय स्वाहा अस्त्राय फट् ॥ प्रयास्त्र पूजा- त्रिशूनायनमः । खड्गाय नमः । चक्रायनमः । तौदण वाणायनमः । शक्कैनमः । इति दक्षिण । खड्गायनमः पूर्ण चापायनमः । अड कुशाय- नमः । घण्टामै नमः इतिवामे । अथ सिंहासन पूजा । वन नख दंष्ट्रायु धाय महासिंहाय हु फट् नमः ॥ विजयो जयदो जेता विप्रभेत्ता भयङ्करः ।। दुःखहा धर्मदः शान्तः सर्वारिष्ट विनाशिकः ॥ इत्यष्टौ तव नामानि तस्मासिंहपराक्रमः । तेन सिंहासनो नित्यं नाम्ना देवेपुगीयते ॥ त्वयि स्थितः शिवः सात्वापि शक्रः सुरेश्वरि ! ॥ त्वयि स्थिवो हुरो देवस्व दर्थ तप्यते तपः ॥ नमस्ते सर्वतो भद्र भद्रतो नव भूपते ॥ त्रैलोक्य जय सर्वस्व सिंहासन ! नमोऽस्तुते ॥ अथ खड्ग पूजा ।। असि विसजनम् ।। पग वाचणधारो दुरासदः ॥ श्री गौं विजयश्चैव धर्म राजस्तथैवच ।। इत्यष्टी तब नामानि स्वयमुक्तानि वेधमा । नक्षत्रं कृतिकातेतु गुरुदेवो शनः ।। मारुतोदच वांरचापि वाण पूर्ण तथेपुधी ॥ २१ ॥ व मिन्द्रः समुत्पाद्यकुलिशा दमराधिपः॥ ददौ तस्ये सहस्राक्षो घण्टा मेरायता द्जात् ।। २२ ॥ कालदण्डाद्यमोदण्डं पागं चायु पतिर्ददौ ॥ प्रजापतिश्चा. उमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ २३ ॥ समस्त रोम कूपेषु निजरश्मीन्दिवा- करः ।। कालरचदत्त वान्खडा तस्यान्धर्मच निर्मलम् ॥ २४ ॥ क्षीरोदश्चा मलं हार मजरे च वयान्वरे ।। चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले मटका निच ॥ २५ ॥ अर्ध चन्द्र क्या शुभ्र केयूरान्सन पाहुपु ॥ नूपुरी विमनी तद्वयनेय कगनुत्तमम् ।। २६ ॥ अगुलीयक रत्नानि समस्ता स्यगुलीपुच ।। विश्वकर्मा ददो तस्यो परशुंचादि निर्मलम् ॥ २७ ॥ अनाण्य नेक रूपाणि तथा मेध दर्शनम् ॥ अम्मान पत्र मानां शिरस्यु रसि चापगम ॥ भवलधिस्तरमै पंकज पाति शोभनम् ॥ हिमवान्वाइन सिहं रत्नानि विविधाः निच !! दार शून्यं सुरया पान पात्र धनाधिपः ॥ शेषश्च सर्व नागेशो महामणि विभूपितम् ॥ ३० ॥ नागदार ददौ तस्वैधया पृविती मिमाम अन्य रपि सुरै देवी भूषणे रायुधै स्तथा ॥ ३ ॥ समानिता ननादोः साह हा मुहुर्मुः । तस्यानादेनचोरेण रत्नमा पूरिवं नमः ॥ ३२॥ प्रमायताति महटाप्रति कन्दो महानभूत ॥ चुभुः चुरस्के रक्षमा [३०४ ] महेश्वरः ॥ रोहिणीश्च शरीरं तेधारा देवो जनाईनः ॥ पिता पिता महो देवस्तमा पालयसर्बदा ॥ नीलजी भूत शब्दाशस्तीक्ष्ण द्रष्ट कृशोदाः ॥ विशुद्ध धर्मा सतत तीक्ष्णधारस्तथैवच ॥ इयां येन हता क्षीणी हतरच महिपा सुरः तीक्ष्णधार य शुद्धाय तस्मै खड्गाय ते नमः ॥ अथ चुरिया पूजा ॥ ॥ सर्वायुधानां प्रथमं निर्मितोसिपिनाकिना ॥ शूला पुधों द्विनि कृष्य कृत्वा मुष्टि ग्रह शुभम् ॥ चण्डिका प्रचासि सर्ग दुष्ट विनाशिनी ॥ तथा विस्तारिता चासि देवानां प्रति पादिता !! सर्व सङ्गि भूतानि सर्व दुष्ट निवारिणी ॥ नित्यं शान्ति यन्छ नमोस्तुते ॥ अथ कट्टार पू० ॥ कट्टारक । जगद्रक्ष ! रक्ष वाजिबना निच ॥ ममदेहं सदा रक्ष कट्टारक ! नमोस्तुते । अयधनु० ॥ सर्वायुध महाशस्त्र सर्व देवा रसूदन । चाप | मां समरेरक्ष सायकैः सुरसेवितः ॥ धृतं कृष्णेन रक्षार्थ संहाराय हरे एक ॥ त्रयीमूर्ति श्च त्वं देव ! धनुरा नमाम्यहम् ॥ अथ चम०॥ चर्म प्रदस्त्वं समरे सर्व सैन्यस्य रक्षकः ॥ रक्षमा रक्षणीयो हं त्वयाः नद्य ! नमोस्तुते ॥ अथ सफला लोकाः समुद्राश्च चकं पिरे ।। ३३ ॥ चधान वसुधा घेलुः सकलाश्च महीवराः ॥ जयेति देवाश्च मुदाता मूचुः सिंह वाहिनीम् ॥४॥ तुष्टुवुमुनय स्जैनां भक्ति नम्राममूर्तयः ॥ दृष्टया समस्तं स सुब्ध त्रैलोक्य मपरारयः ॥ ३८ ॥ सन्नदाखिलसैन्यास्तैसमुत्तस्पुरुदा युधाः ॥ श्राः कि मेतदिति क्रोधादामाप्य महिषासुरः ।। ३६ ॥ अभ्यधावतत शब्द मशेपरसुरवृतः ॥ सददर्श ततो देवी व्याप्त लोक यात्विषा ।। ३७ ! वादा क्रान्त्या नतभुनं किंगटोल्लिविताम्वराम् ॥ शोभित शेप पाताना धनुानिः स्वनेनताम् ॥ ३८ ॥ दिशो भुजसहस्रणसमन्ता हपाप्य सांस्थि ताम तत.प्रानेयुद्ध तया देव्यासुरद्विपाम । ३८॥ शनारवया मुक्त रादी पितदिगन्तरम् ॥ महिषा सुर सेन्ननीश्चितुराख्यो मुः ॥ ४० ॥ ययुधे यामरश्चान्येरपतुरग वलान्वितः ॥ रथाना मयुत पभिरुद प्राण्यो महामुगः ॥ ४१॥ अयुभ्य ता युनानां घसनेण महाहनु पञ्चाशदिस्य ग्युिते रसि लोमा महासुरः ॥ ४२ ॥ म्युनाना शतः पभि पारलोयुयुरेरणे । गज गाजि सहस्रौधेरनेः परिवा रितः ॥ ४३ ।। युनो ग्थानां कोटगाव युद्धे तरिमन्नयुध्यन ॥ विडाला. गोऽयुनानांच पचारात रमायुते ॥ ४५ ॥ युयुधे सयुगे सम पानी गतियारिमः ॥ अन्ये घनत्रायुनोग्य माग होता. ।। ४।। युयुषः मयुगे देख्या मह तत्र मता मुगः॥ फोटि कोटि सहनु रवाना दन्निना नया ॥ सनां पनो युद्धे नत्रा महिला मु। सौमेर महा- " [ ३०५ ] वारण । खड्गायुधानां त्रातात्वंवारणः सवारपागावीराणां देहिधारीत्वं चारयं सिद्धि नायक ! ॥ अथ मदन० नर्तकी नर्तकश्चैव बलम! त्वं नृपस्य च । मृदु महलमा रक्ष गम्भीर ध्वनि मल ॥ श्रथ दुन्दुभिः ॥ दुन्दुभैश्च सपत्नानां पोपो हृदय कम्पनः । त्वत्पूजकानां सौम्यानां तथा विजय वर्द्धनः ॥ यया जीमूत घोपेण हान्त वर वारणाः । तथास्तु क्य शब्देन घोपोऽस्माकंभयावहः ॥ अथ वाण॥ कामदेवस्य देवानां सफलाश्चार्जुनस्य च || रामस्य र यथा वाणास्तथास्माकं भवन्विह ।। अथ त्रोण । रक वृत्त स्थितं त्वं च पूर्ण मायुध सायकैः ।। सङ मामे विजयं नित्यं त्रोण काय नमोस्तुते ॥ अथ कुन्तः ॥ पाश पातय शत्रु त्वं बनया लोक मायया || गृहाण जीवितं तेषां मम सैन्यं च रेतताम् ।। अथ पताका० ॥ नागकिन्नर गन्धर्व यक्षभूव महोरगाः प्रमथाश्च- महादेवो भूतेशोभातृभिः सह ॥ शक सेनापति स्कन्दो वरुणश्गभित- स्त्वयि ! ॥ प्रद हन्तु रिपून सर्यान् विजयं चस गच्छतु ।। यानि मुक्कानि- रिपुमि भूपणानि समन्ततः ॥ निहि वानि सदातानि त्वया दुप्रियतेजसा मिन्दि पालेश्च शक्ति भिमुसलैस्तथा ॥ ४७ ॥ युयुधुः संयुगे देव्या खड्गः परशु पट्टिीः ।। केचिञ्च चितिपुः शकीः केचित्पासांस्तथा परे ।। देवी खड़ा प्रहारस्तु ते तां हन्तु अचम्मुः।। सापि देवी तनस्तानि शवाण्यत्राणि चरिडका । लीलयवः प्रपिछेद निजशस्त्रान वपिणी ।। अनायस्ता नना देवीस्तूय माना सुरयिंमः ॥ ५० ॥ मुमोचा सुर देहेषु शसारयवापि पेश्वरा ॥ सोऽपि युद्धोधुत सटो देन्या वाहन केसरी ॥ १ ॥ पचारा सुर सैन्येषु वनोष्विव हुतापनः निःश्वासान्मुमुचे यांचयुध्य मानारोऽम्यिका त एक्सपः संभूवागणाः शव सहस्रशः॥ युयुधुस्ते परगुमि फिन्दि पालासि पटिरीः ॥ ५३ ॥ नाशयन्वोऽसुरगणान्देवी शक्त्यु पर हिता ॥ अवाश्यन्व पटहान्गणाः शंखांस्तथा परे ।। ५४ ।। दङ्गारप नवान्ये तस्मिन्युद्ध महोत्सवे ॥ ततो देवी त्रिशूलेन गदयाराधि पृष्टिभिः ।। सहगादिभिश्च शतशो निजधान महा मुरान् ॥ पावयामास पैवान्यान्पण्टास्वन विनोदितान् । असुरान्मुरि पारोन यात्रा पान्या न फर्पयन् ॥ फेचिद्धिमाका मोहरीः सङ्गपतिस्तयापरे । ५. ॥ वियो. विवामिपावन गदा नपिरोग्ने । येमुरप फेधिधिर मुसवेनभृगहता ५८ केपिन्निाविवाभूमामिन्ना-सूनेनयवसि निरन्तरा शरीपोगनाः पित पातिरे ।। सेनानुफारिणाःप्राणान्मुमुचुधिदशाना।शपिटायमिन्ना सिन्नमायालया पो।। शिमिपेनुगममायेषितारिताः ॥ पिचिन अंपा स्त्यपरे पंगु दर्गा महामुग ॥ ३१ ॥ एक [ ३०६ ] काल नेभिवधे युद्धे तथा त्रिपुर घातते ॥ हिरएयकश्योयुद्ध यथा देवासुरे तया ॥ शोभिवासि सुरै वन्द्या शोभसे संयुगे ततः ॥ नीलारवेळा मिमां दृष्टवा विनश्यन्तु ममारयः ॥ अथध्वजापूजा । शक केतु महावीर मुवर्णम्वव्युपासितः ॥ दया प्रधान योगानां कुरु रक्षा रिपोर्गयात् ॥ अथं वीणा० शारदा वल्लभे ! त्वं हि अगना शत भूपिते ॥ वीयो। त्वं रक्षमां नित्यं विदग्ध नृप वल्लभे ॥ अथ जिरह शर्म दस्त्वं हि समरे धर्म सैन्य यंसोधने ॥ रक्षमा रक्षणीयोऽहं ववा नद्य । नमोस्तुते ।। अथ कुण्डल० ।। प्राण इन्त्री रिपुस्त्वं चा मलयालोकमालया | गृहाय जीवितन्तेषां सैन्यं च मम रक्षताम् ॥ अथ चामरम् ॥ शशाङ्क का शङ्काशो हिमडिएिड महासुर- प्रोत्सारयाशु दुरित चामरा मर पूजित ।। अथ छत्रम् ।। यथाम्बुध छादयति शिशयेमां वसुन्धराम् ॥ तया छादयमा छत्र विजया रोग्यवर्द्धये ॥ अथ शङ्ख || पुण्यदः शङ्खः ! पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम् ।। विष्णुना त्वं धृतो नित्य मतः शान्ति वाहविचरणाः केचिदेव्या द्विधा कृताः ॥ छिन्नेऽपि चान्येः शिरसि पतिता पुनरुस्थिताः कवन्धा युयुधुर्देव्या गृहीत परमा युधाः ॥ ननृतुश्चापरे तपयुद्धे तूर्यलयाश्रिताः ।। ६३ ॥ कवन्याश्छिन्न शिरसः सद्गशवृष्टि पाणयः ॥ तिष्ट तिटेति मापन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥ ६४ ॥ पातितरथ नागारचेर सुरेश्च यमुन्धग अगम्या साऽ भवच त्यत्रा भून्ममहारण: ६५।। शोणितीघा महानद्यः सद्यस्तत्र विसुन्नः॥ मध्ये चा सुर सैन्यस्य वारणा सुरवाजिनाम् ॥ ६६ । ज्ञणेन तन्महा सैन्यममुराणं याम्बिका ॥ निन्येतयं यया वद्विस्तुग दारु महाचयम् ॥ ६॥ स चसिद्धी महानाद मुत्सअन्धुतसरः॥ शरीरेभ्योऽमरारीणा मनियविचित्वति ॥ ६ । देव्यागणेश्च स्तस्तव ऋतं युद्ध तवामुरैः। यथेषां तुष्टुवुर्देवाःपुष्पवृष्टि मुनो दिवि ॥ ६॥ ॥ इविमाण्डेय पुराणे सावणिं के मम्बंन्त देवी माहात्म्ये महिपासुर सैन्य वधो नाम द्वितीयोऽध्यायः २ ॥ उवाच ।। श्लोक ॥ ६॥ एवम् । ६६॥ एव मादितः।। १७३॥ अधध्यानम्-अधद्भानु सहस कान्दि मरुण धौमां शिरोमालिका रमाजिप्तप योधरां उपवटी विद्याम भौतिवरम ।। हवा.दंपतीप्रिनेत्र पिलसरकारविन्दश्रियं देवी पहियां शुरनमुन्टा बन्देसुमन्दारिमताम । अपिण्याप ॥ १ ॥ निन्य मानतसैन्य मालोक्य महासुरः ।। सेनानी श्चिनुर फौपाययोयोन मगान्धिकाम ॥ सदेवी शर यण वर्ष समरे "मुरः ॥ ययामे गिरेगतोय यणायदः ॥३॥ तस्यनित्या तो देवी सोलगेच शरोतरान ।। जपान तुरगान्यागीयंन्चार पेववाजिनाम् ४॥

। ३०७ ] प्रयच्छमे ॥ इति शखाख पूजा ।। श्री परमेश्वर्यै नाना पुष्पमाल्य दीप माला दाना पक्वान्न कदली फलामेनु नारङ्गवीज पूर मूलक कुष्माण्ड वाभ्यूम पूगी फले त्यादिमिष्टमिष्ट द्रव्यं यथा शक्ति दत्वा ॥ रत पुष्पाञ्जलिमादाय स्तुति पठेत् ॥ ॐ दुर्गा शिवं शान्ति करीं ब्राह्मणों ब्रह्मणः प्रियाम् ।। सर्व लोक प्रणेत्रों च प्रपमामि सदा प्रियाम् ।। मङ्गलां शोभनांशुद्धांनिएफलां परमां कलाम् ॥ विश्वेश्वरी विश्वमावां प्रणमामि सदा उमाम् ।। सर्व देवमयों देवी सर्व रोगभया पहाम् 11 वझेश विष्णु नमिता पण्डिकां प्रणमाम्यहम् ॥ विभ्यस्थां विन्ध्य निलया दिव्य स्थान निवासिनीम् ॥ योगिनी योग जननी चण्डिकां प्रपमा म्यहम् ॥ ईशान मातरं देवी मोश्वरी मोवर प्रियाम् ॥ प्रातात्मिसदादुर्गासंसारार्णव वारि- रणीम् ॥यइदं पठतिस्तोत्र सृणुया द्वापियो नरः।। समुतःसर्गपापस्तुमोदत्ते दुर्गयासह ।। इतिस्तुत्वा प्रणमेत् ॥ यत्रनस्याद्विलिदानंतत्रगोदानमीरितम प्रथाग्निस्थापन विधिनाअग्निस्थापनंकृत्वा होमं कुर्यात् श्रथ वलिदान विधिः ॥ प्रथम बाग सेचनं । स्वयंभूर्वासुदेवश्च शङ्कश्चमहोदयः सदा- रारररचस पुत्राश्च सगणारचस शक्तयः ॥ प्रोतन्तु त्वां पशु श्रेष्ट मेवे विश्व क हेयः ॥ छागाय नमः इति अर्ध चन्दन पुष्प धूप दीप नैवेद्यान्वैः पूजां विधाय खड्गाय नमः इति खड्ग संपूजयेत् ।। अत्र प्रसङ्गतश्यागमहिपावि रुधि रेण तृप्तिमाह । मेपरुधिरेण एकवर्ष चिच्छेदचधनु सद्यो ध्वजं चाति समुन्छ्तिम ॥ विव्याध चैवगा। पुच्छिन्न धन्वा नमाशुगैः ॥ ५॥ सच्छिन्नधन्वा विश्थोहताश्वोहतसारथिः ।। अभ्यधा वदतां देवी खड्ग मंधरोऽसुरः ॥ ६॥ सिंह माहत्य सङ्गेन वीक्षण धारेण मूर्धनि ॥ श्राजघान भुजे सव्ये देवी मप्यति वेगवान् ॥ ७ ॥ तस्याः म्बनो भुजं प्राप्यपफाल नृप नन्दन ।। वो जग्राह शूलं सकोपा दरुप लोचनः ॥5॥ चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकान्यां महासुरः॥ आम्बल्य मान तेजोभी रवि विम्व मिवाम्बरात् ॥ इप्टावदा पतच्छुलं देवीशून्लममुन्धुत ॥ तच्लंशवधान नौवं सत्र महासुरः ॥१८॥ हते बस्मिन्महावीर्ये महिषस्य पम् पती ॥ श्राज गाम गजारूढश्चामर त्रिदशार्दनः ११॥ सोऽपि शति मुमो चाय देव्यास्वामम्बिकादतम् ।। हु कारामि हतां भूमो पातया मासनिष्प्रभाम् ॥१२॥ भग्नां शशि निपतितां दृष्टया क्रोध समन्वितः ॥ पिप पामरः शूलं वापस्तदपिसाच्छिनन १३ वतः सिंहः ममुतात्यगन कुम्भान्तरेस्थितः ॥ वाहु युद्धेन युयुधे नेनुश्चखि दशारिया ॥ १५ ॥ युबमानी ववस्तोतुतस्मानागान्मही गती युयुधानेऽति संस्था प्रहार रवि दामणोः ॥ १५ ॥ सतो वेगासमुत्पत्य [ ३० j तृप्तिः।।ागरुधिरेणदशवर्षप्तिः।महिपरुधिरेणशतवपतृप्तिः।स्वदेहरुधि- रेणसहस्रवतृप्तिः प्रथयागोत्सर्गसंकल्पः ॥श्रीमदुर्गादर्शनामिवन्दन स्पर्शन तर्पण जनन पूर्वकं सदारापत्यस्य ममाखिला' पच्छान्ति नानाविध कल्याणोत्पत्ति दीर्घायुष्य वन पुष्टिवृद्धि दुर्गाप्रीतिकाम.श्रीदुर्गादेव्यैअमुक छाग वलिं वह्नि दैवतं नमः ॥ पशुं गायत्री श्रावयेत् ॥ ॐ पशु पाशाय विद्महेशिस्च्छेदायधीमहि तन्नो पशुः प्रचोदयात् || अञ्जलिवध्या पशु प्रार्थयेत् । यज्ञार्थे पशवः सृष्टा यज्ञार्थे पशु घातनम् ॥ यतस्त्वां पाठ यिष्यामि तस्माद्यज्ञे वयोऽवधः ॥ शिवा द रिमः पिण्डै रतस्त्व शिवती गतः ॥ अपत्यं च पशोदित्य चाशिव च शिवो मिहि ॥ पशुस्व वाण रूपेण मम भाग्यादुपस्थितः॥ चण्डिकाप्रीति दानेन मम चापा पाद्विनाशनम्। पशुरूप परित्यज्यगन्धर्वस्व स्वरूपधृक गोरी लोकं समा साद्य मम कल्याण दो भव । पशु पाशविमोशाय हेम कूटस्थिता यच । पशवे व नमः स्तुभ्य नमस्ते वलि रूपिणे ॥ छेदो सि वलि रूपत्व माझया निपत्य च मृगारिणा || कर प्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥ १६ ॥ उप्रश्चरणे देव्या शिला वृक्षादिर्भिहतः ॥ दन्त मुष्टि वलेश्चैव करा: लश्व निपातितः ॥ १७ ॥ देवी क्रुद्धागदापावचूर्णया वाकलंभिन्दि पालेन वास्ताम्र तथान्धकम् । उग्राम्स्यमुप्रवीयं चत) व चमदा हनुम् ॥ त्रिनेत्रा चत्रिशूलेन-जधान परमेश्वरी ॥१६॥ विटालस्या सिना कायापातया मास वैशि | दुधदुर्मुसं चोभी शो निन्ये यमक्षयम् २०॥ एवं संघीय माणेतु स्वसैन्ये महिपा सुरः।। माहि. पेण स्वरूपेण बासयामासतान्गणान् ||२२|| काश्चित्तुण्ड प्रहारेण सुरक्ष स्तथा परान् ॥ लांगूल तडितांश्चान्याञ्चगाम्यां च विदारितान् ।। २२ ॥ वेगेन काश्चिद परान्नादेन भ्रमणे नच : निः श्वासपवने नान्या पाठया मासभूवले ॥ २३ ॥ निपात्य प्रमथा नीक मभ्यधावतसाऽसुरः ।। मिह इन्नु महादेव्याः कोपंपळेवतोऽम्बिका ॥२७॥सोऽपि कोपान्महा बार्य सुर एणमहीतल || जाम्यां पर्वतानुभांशिया पच ननादध ॥२॥ रंग भ्रमण विनुरणा मही तस्य पशोर्यन ।। लांगने नाह तरचारिका प्लाययामास मयतः ॥२६|| धुतविभिन्नाश्च सराई सगळययुर्वनाः ।। श्यामानलास्ताः शनशानिपेतु नमसोः पलाः ॥ इति मोध समाध्यान मारती महा मुरम ॥ष्टया मा परिदका को सपाय तदाऽकरोत् ।। माहिला या पाशं वपन्ध महामुरम ।। सत्यात माहि रूपं मोऽपि यो महान TRAILE: सिंहऽमयरसचायतस्याम्पिका शि: ॥ दिन. शिवायरमप. या पाऔर दृश्य ॥ ३० ॥ व पाय पुर्ष देशी माम चोदतम् ॥

it j परया गुरोः ॥ वेदभेदोद्भवं दुःसं चमस पशुरूप- धृक् ॥ पशु योनि प्रशूनोसि पूजा होमादि कर्मणि ॥ तुष्टा भवति सादेवी सरत: पिशिते तवः ॥ इति स्तुत्वा ॥ ॐ काली काली वनश्वरी लोह दण्डायै नमः ।। पूर्वोकरसि चित्तजनादिमन्त्रः सहगंप्रणम्य श्री परमेश्वरीध्यापैक प्रहारेणच्छिन्द्यात् ॥ कपूरमिश्रितं रुविरं समर्पयेत् ।। अथ पुनगोतमोक्क धागोत्सगं विधिः । कुशाग्रए छागं प्रोक्ष्य। ॐ अग्निः पशु रासी चेना यजन्तस पल्लोकमजयस्मिन्नग्निः सचे लोको भविष्यति तन्वेस्यसि पियवा अपः ॥ ॐ वायुः पशुरासी तेना यजन्त सरतल्लोफ मजयस्मिन्न द्यग्निः सते लोको अविध्याति तन्तेष्यसि पिवैवा अप. ॥ ॐ सूर्य पश- रासी ना यजन्तस एतल्लोक सजयस्मिन्नद्यग्निः सते लोको भविष्यादि वन्तेष्यसि पिता अपः (भाँचण्डः पशुरासी दित्यादि ॥ ॐ गन्धः पशुरासी दित्यादिना ।) चागं हस्तनस्पृशेत् ॥ ॐ वाचं ते शुन्धामि ।। ॐ शिरस्ते शुन्धामि ॥ शृङ्गतेशुन्धामि तुस्ते शुन्यामि ॥ ॐ कर्णोति शुन्धामि ॥ ॐ वकं ते शु० ॥ ॐ कण्ठते शु० ॥ ॐ मेहू ते शु०॥ ॐ सर्व गात्राणि ते शुन्याभिइति अक्षतान् पशु गाो निक्षिप्य ॥ ॐ वार । पाप्याचिच्छेदसायदिखा चर्मणासाघवतःसोऽभून्महागज/३१ ॥ करेण च महासिंह तं चकर्ष जगजेच ॥ कर्पतस्तु का देवी वगन निर अन्तत ।। ३२ || सतो महासुरोमूयो माहिप वपुगस्थितः । तथैव शोभया मास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ३३ ॥ ततः द्धा जगन्माता पएिडक पानमुत्तमम् ।। पपी पुनः पुनश्चैव जहासारण लोचना ।। ३ । ननर्द पासुरः सोऽपि वन वीर्य मदोद्धतः ।। विपाणाभ्यां च चिक्षेप परिदकां प्रेति भूधरान् । साचता अहिता स्तेन चूर्ण यन्ती शरोत्करैः उवाच मदोर धूत मुरा रागा कुजा क्षम् ॥३६॥ देव्युवाच ॥३७॥ गगर्ज वर्ष मूढ मधु यारसियाम्यहम् ॥ मयावयित्वेऽऔर गाजिय त्याग देशवाः ॥ ३८ ॥ ऋषिरुवाच ॥ २४ ॥ एय मुक्का समुत्पत्य साऽऽन्दा तं महा मुरम् । पादेना कम करठे च शूले नैन महादयन् ॥ ४० ॥ तवा सोऽपि पहा कान्तरसया निज मुसा उचः । अब निपात पयामी रूया बोयण सातः ॥ ४२ ॥ प्रारमिफान्त स्वामी युध्यमानो महामुरा ।। तया महासिना देव्या शियित्वा निपानित ॥ तनो हाहाल सर्व देव सन्ननारा । प्रहर्ष च पर जग्मुः साना देवता गणाः ॥ १३ ॥ तुष्टु युस्तां मुरादेशी सह दिव्य महरिभिः ॥ गुर्गन्धर्व पदो नन्त साप्स TE ॥४४॥ इसि मारय पुरारे मावशिक मन्वन्तरे देवी माहाम्ये महिपा.

मिनसि काली लीयता [ ३१. j यताम् ॥ ॐ शिरस्ते श्राप्यावाम् ॥ ॐ शृङ्गे व पाप्यावाम् ॥ चतुम्त श्रा० ॥ ॐ कोत भा० ॐ वक्त्रता !! करठंत आ०॥ मेढू व पा० ॥ ॐ सर्वा गात्राणिव आप्यायताम् ॥ पशोरुपरि पुष्पाणि निक्षिप्य प्रार्थयेत् ॥ शिरः करठे लगाटे च पादयोर्जयोस्तथा ॥ नेत्रयो। मर्जगागेषु मुश्चन्तुमगु देवताः । अनेन छागं प्रोक्ष्य पशु गायत्री श्रान- येत् ।। ॐ 'पशु पाशाय विद्महे शिरददाय धीमहि ॥ तन्नोछागः प्रचो- दयान् ॥ पुष्पाततैः पूजयेत् ।। सॉक्लो फेंचारि सरस्वति लीयवां नमः ॥ यौषट् ।। इत्यादि क्रमेण सा पाइयोः पृथिवी नीयताम् ।। माँ पायो मित्रो लीयताम्। साँ चनुपोस्तेजो लीवाम् सॉ उपस्थे जलं लीयताम् । साँ कर्णयोः नभो। लीयताम् । सॉ सर्वात पुदियो लीयताम् ।। फट् वीपटू ।। इति तत्तत्स्याने लोनं कृत्वा तत्वशाल स्पृशेत् । ॐ चामुण्डायै नमः कपाले ॥ ॐ यमायनमः शृङ्गयोः ॥ ॐशशिभास्कराभ्यां नेत्रयोः ।। मुर वधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ उवाच ॥ ३॥ लोकाः ॥ ४ ॥ एवम् ॥ ४३॥ एवमादितः ॥ २१७ ॥ अथ ध्यानम् ॥ काला भ्रामा कटाक्ष ररि कुल भयदां मौलि वढेन्द्र रेयां शंख चक्रं पाणं विशिसमपि कर रुद्ध इन्ती त्रिनेवाम् ।। सिह स्कन्धाथि रुट त्रिभुवन मसिलं तेजमा पूरयन्ती ध्यायेद दुर्गा जवाख्या विदश परि मृतां सेवितां मिद्धि कामैः ॥ ४॥ ऋषिरुवाच ॥ १ ॥ शकादयः सुर गणा निहितेऽवि वीर्य । तस्मिन्दु. रात्मनि मुरारि वले च देव्या । तो तुष्टुवुः प्रणाति नम्र शिरोपरांसा। याग्भिः प्रहर्ष पुलकोद्म भार देहाः ॥ २॥ देल्या यया तत मिदं जगदात्म शतया । निःशेष देव गण शक्ति समूह मूयो । ताम्बिया मखिल देव महपि पूज्यों । भक्षया नवा स्मविदधातु शुभानिसान. ॥ ३॥ यस्याः प्रभाव मतुलं भगवान ननन्तो। महा हररच नहिं धन्तु मलं वलंच।। सा चण्डिकाऽसिल जगतारि पाल नाय नाशाय चा शुभ भयग्यमीति करोतु ॥४॥ या श्रीः स्वयं मुति नां भव; मेन ली। पापात्मना एवधियां हृदयेपुवुद्धिः। श्रद्धा मतां कुल जन प्रभवस्य नाजावां त्वां नवाः स्म परि पालय देविविग्यम् || nfo घरांयाम व कामपिन्त्यमेठन । किं चावि वीर्य ममुर शय कारिभूरि।। किं पाइयेषु घरि मानि नजाति यानि, सर्यपु देम्य मुर देवगणा दिए॥६॥ हेतुः समस्त नादिगुणाऽपि दीपे। नसायमे हरि हरादिभिरण्यपारा ।। भयांभयामित मिां जगदशन्न । मन्याता हि परमा प्रतिमाशाwl पस्था: मम मुखा मगुदीन ।नधि प्रयानि माला मागणुति।।

[ ३११ ] बृहस्पतये कर्णयोः ॥ॐचन्द्रायपोलयोः ॥ॐमधिरवदनार्यमुसे॥ॐ रक्त दन्ति का नमःदन्ते॥ॐपृथिव्यम्नासिकयोअमहादेवाय करठ।ॐ थिव्यै० उदरे ॥ॐप्रजापतयेल्मेदसि ॥ॐकूर्माय पृष्टे!!ॐसागोराङ्गाय नमःपुच्छे।। ततः पूर्वोक्त यज्ञार्थे पशवः सृष्टा इति मन्त्रेण पशु प्रार्थयित्वा खड्गं पाद्या दिना संपूज्य ॥ ॐ मध्ये ब्रह्मणे नमः ॐ अप्रे महादेवाय नमः । ॐ पृष्टे यमाय नमः । ॐ प्राधारेकालाय नमः ॥ पूर्वोक्त असिविमर्डनं पठित्वा ।। छागकन्धे पर्पयेत् यावद् गात्र शिरो बलि न चान यति वाय- द्वनीकाल्यै नम इति मन्त्रेण जलपक्षिपेत् । अथ मविर सेक संकल्पः ।। ॐअोह दश वर्पा वछिन्न दुर्गा प्रीति कामनया इदं छाग रुधिरं भग वत्यैमयादवम् ।।अजमेपमहिपादिवलिदानेतुगामाप्टम्यामद्धरामम- सर्वापच्छान्ति पूर्वक सर्व कल्याणात्पचिदारुणगृहपोडोपशमनशत्रु मारण पूर्वक दिग्विजय राष्ट्र प्राप्ति कामनया इम महिषं यम देवतमजं वद्धि दवतं मेषं वरुण देवतं दक्षयज्ञ विनाशिन्ये महाघोराय कोटि योगनी परि वृताये भद्र काल्यै ही दुर्गे! रक्षणि स्वाहा श्री दुर्गादेवी प्रतिये घातयिष्ये ।। तत्तो नाम भन्नंग फूष्माण्टं सम्पूज्य ॥ अयह सौल वनका ननदान जन्य स्वादाऽसि वै पितृगणस्य च तृप्ति हेतु। रुच्चार्य से स्वमत एवं जनेः स्वधा च ॥ ॥ यामुक्ति हेतु रवि चिन्य मदातास। मभ्यस्यस सुनि. यवेन्द्रिय तत्त्व सारैः ।। मोतार्थमिमुनिभिरस्तसमस्तदोपै । विद्याऽसिसा भगवती परमादि देवि ॥ ॥ शब्दारिमकासु विमलयजुषां निधान । मुरदीयरम्य पदपाठ क्वांवसाम्नाम् देवीग्योमगरवीभषभारनाम्याता प सर्व जगतां परमार्ति हन्धी ॥१०॥ मेधाःऽसि देशि विदिवा मिल शाख सारा दुर्गासि दुगं भव सागर नीर संगा॥ भोः कैट भारि हदय करताधि वासा गौरी त्वमेव शशिमौलि कत प्रतिष्टा ॥ ११ । ईपरसहा सममलं परि पूर्ण चन्द्र विम्बानु कारि फनकोनम कान्ति कान्वम् ।। अत्यतं प्रदत मातरूपा तथाऽपिवपिनोम्य सहसा महिषासुरेण ॥ १२॥ ध्यानु देवि कुपिवं कुटी काल मुद्यच्दशासराच्छति यन्न सधः।। प्राणान्मुमोच महिपस्तद वीवचित्र' कै म्यतेहि कुपितान व दर्श नेन ॥ १३ ॥ देषि प्रसोद १मा भरती भवार सो विनारायसि कोप पती पुलानि ! विशातमे वदधुनैव पदस्व मतन्नीनं बलमु विपुल महिषा सुरस्य ॥ १४ ॥ ते संमता उन पदपुवनानि वेषां तेषां यशसि न पसी दति धर्म वः॥धन्यास्त व निमुना सजभूत्र द्वारा देश सदाऽन्युदर दारसी प्रमना ।। १५॥ धम्याधि दवि सानानि स कर्मारपल्या प्रतिदिन मुली करोति ॥ स्वयं प्रसाद वो भवो सारा .

[ ३१२ । फल प्राप्ति कामेः कुष्माएड फलं वनस्पति दैवतं भगवत्यै दुर्गा देव्यै मया दत्तम् इति संकल्प्य । कूष्माण्ड फलं देवी प्रीतये दद्यात् ।। ततो महिप रुधिर दान संकल्प: १. अद्यशत वर्षा वछिन दुर्गा प्रीति काम नया इद महिप रुधिरं भगवत्यै दुर्गा देव्यै मया दत्तं नमः ।। पशु कपालं देव्या पुरतो याम भागे संस्थाप्य पुष्पाक्ष-युक्त दीपं तकपालो परि दद्यात् ततोवशिष्ट रक्तं धृत्वा कुशाविभिरष्ट्या विभज्य तेन पूर्वे चा मुएउ तर्पयामि ॥ तदक्षिणे योगिनीं तर्पयामि ॥ प. श्चिमे डाकिनी तर्पयामि || उत्तरे भैरवीं तर्पयामि ॥ श्रामे ये विदारिकातर्पयामि ॥ नैऋत्ये पाप राक्षसी तर्पयामि ॥ वायव्ये पूतनां सर्प यामि ॥ ईशाने कालिकां वर्ष यामि ॥ इति सन्त- यं ॥ खङगाय खलनाशाय भक्त कार्याय तत्परः ॥ पशु च्छेद स्त्रिया कार्यों खड्ग रूपिन्न मोस्तुते ॥ इवि खड्ग प्रणमेत् ॥ वहुशोज महिपा घात अद्यसंख्या वर्षा व छिन्न दुगो प्रीति काम- श्लोक त्रयेपि फलदा ननु देवि तेन ॥ १६ ॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीति मशेप जन्तोः स्वस्थैःस्मृता मति मतीव शुमांददासि ।। दारिद्रयदुःख भय हारिणि का त्वदन्या । सर्वो पकार करणाय सदाचित्ता ॥ १७ ॥ एभिह तैर्जगदु पैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नर काय चिराय पापम् ॥ संग्राम मृत्यु मधिगम्य दिव प्रयान्तु मत्वेति नूनमहिता विनि हसि देवि ॥ १८ ॥ हप्वकिं न भवती प्रकरोति भस्म । सर्वा मुरा नरिपु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् ॥ लोकान्प्रयान्तु रिपवो ऽपिहि शस्त्रपूता ॥ इत्थं मति भवति तेव हितेषु स्वाधी ॥ १६ ॥ खड्ग प्रभानिकर विस्फुरणेस्वथोप्रेः शूलाम कान्ति निवहेन हशो ऽसुराणाम् ॥ यत्नागता पिल यमं .शुभदिन्दु खण्ड । योग्या ननं तय विलोक यता वदे तत् ॥ २० ॥ दुईच वृत्त शमनं तबदेवि शीलं । रूपं तथै तदविचिन्त्य मतुल्य मन्यैः ॥ वार्य च इम्त हत देव परा ममाणां परि ष्वपि प्रकटि तैय दयावयेत्यम् ॥ २१ ॥ केनो पमामयतु ते ऽस्य परा क्रमस्य । रूपं प शत्रुभय कार्यति हारि कुत्र ॥ चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता प हा त्वय्येव देवि वरदे मुक्न प्रयेऽपि ॥ २२ ॥ Jलोक्य मेवद खिन रिपु नाशनेन । घावं त्वया समर मूनि ते ऽपिदत्वा । नीता दिवं रिपु गणाभयाप्य पात मरमा कमुन्मद मुसारि भवे नमस्ते ॥ २३ ॥ शूलेन पाहिनो देवि पाहि पोन चाम्विके । पण्टा स्सनेन स्नः पदि पापाग्यानिः सने गर । प्राच्या रख प्र.

[ ३१३ ] नया एतान्बागान् वहिदैवतान् एवान्मेषान् वरुण दैवतान् एतान् महिपान् यम दैववान् श्री दुर्गा देव्यै प्रीतये अहं घावयिष्ये ॥ महिप त्वेन कुमाएडं वीजपूरं नर स्ततः ॥ छागा भावे कर्फटी स्यान्मत्स्या भावे तु मूलकं ॥ मधु त्रयं घृत मधु शर्करा परि कीर्ति- वम् ।। नारि केलोदकं पुण्यं रहस्यहि शिवोदकंम् ॥ इति विशेष वान्येन नर महिप छाग मत्स्या भावे वीज पूरकं कूष्माण्ड कर्कटी फजम् मूलकं घृत मधु शर्करा नारि केलादिकं भगवत्यै दुर्गा देव्यै क्रमेण निवेदयेत् ॥ कदली वृन्ताकं जम्वीरं नारङ्ग कोशातक प दद्यात् ॥ अथ स्तुतिः ॥ जयदेवि जगन्माव जय पापौष हारिणी ॥ जय जन्म जरा व्याधि तृष्णा दावा नला कृते ? ॥ जय सर्व विपत्तिनि जयत्रिदश वन्दिते ॥जय नित्या नन्द रूपे जय कल्याण दायिनि ? ॥ जय शत्रु आय करि जय रोग प्रणां शिनी ॥ ती च्यां च चण्डिके रस दक्षिणे । भ्रामणे नात्म शूलस्य उसर- स्यां तथे श्वरि ॥ २५ ॥ सौम्यानि यानिरूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थ घौराणि तैरता स्मां स्तथा भुवम् ॥ खड्ग शूल गदा दोनि यानि चास्त्राणि ते ऽम्बिके । कर पल्लव संगीनि ते रस्मान रक्षसर्गतः ॥ २७ । ऋपिरु वाच । २८ ॥ एवं स्तुता सुरै दिव्यैः कुसुमै नन्दनोद्भवः ॥ अर्चिता जगनां धात्री तथा गन्धानु लेपनैः ॥ २६ ॥ भकया समस्तैस्त्रि दशै दिव्य धूपैः सुधूपिता ॥ प्राह प्रसाद सुमुखी समस्तान्प्रणतान्सुरान् ॥ ३० ॥ देव्यु वाच ॥ ३१ ॥ त्रियतां त्रिदशा. सर्वे यदस्म तो ऽभिषा छितम् ॥ ददा म्यह मति प्रीत्या स्तवै रेभिः सुपूजिता ॥ २३ ॥ देवा ऊचु ॥ ३३ ॥ भग वत्या कृवं सर्व न किंचिदवशिष्यते ! यदयं निहतः शत्रु रस्माक महिपा सुरः॥ ३४ ॥ यदि चापि वरो देयस्वया stमाक महे सरि ॥ संस्मृवासस्मृता त्वनो हिसथाः परमा- पदः ॥ ३५ ॥ यश्च मर्त्यः स्ववै रेभिस्वा स्वोध्यत्य मला नने ।। वस्य विचद्धि विभ-धनदारादिसंपदाम् ।। ३६ ।। वृद्धये ऽस्मत्प्रसन्ना संभवेयाः सर्वदाम्बिके ॥ ३७ ॥ ऋषीरु वार ॥ ३ ॥ इति प्रसादिता दे बंगतो ऽर्थे तथात्मनः ॥ तये त्युक्त्वाभद्रकाली बभूवा न्तहिंता नृप ॥ ३८ ॥ इत्येतत्कवि भूपसभूता सा यथा पुरा ॥ देवी देर शरोरेभ्या जगत्रय हितैपिणी ॥ ४०॥ पुनश्चगौरी देहात्सा समुद्भूता यथाऽभवत् ।। वधाय दुष्ट दैत्यानां वया शुम्न निशुम्भयोः ४१ । रक्षाणय चलोकानां देवानामुपकारिणी ॥ वच्छृणुष्व मयाऽऽस्यावं यया वत्कथया . [ ३१४ जय भीमे जया घोरे जय सङ्कट तारिणि ।, ॥ जयामृत रसा स्वाद 'तुन्दिला नन्दविपई ! ॥ त्रिनेत्रे विकरालास्ये मुण्डमाला विभूपिते. ससुर क्षय करि खड्गपद्यांगधारिणि ! | महाघोरे महारावे दैत्य दर्प निपूदिनि ! ॥ इमं पशु बलि ! देवि गृहीत्वा काल रात्रि के !॥ प्रीताभव महा चण्डि रक्षमा शरणागतम् ॥ आयुर्देहि धन देहि भाग्य कीर्ति च देहिमे । स्त्रियं देहि सुतान् देहि सर्वाका. मांश्चदेहि मे !! उग्र चण्डेन चण्डासि प्रचण्डकर वालिनी ।। महा चण्डोग्रदोईण्डे विश्वेश्वरी नमोस्तुते ॥ रक्षमा शरणानं त्वतादर्श त मानसम् ॥ हर पापहर क्लेशंहर शोक हा सुखम् ॥ हर गं हर क्षोभ हर दैन्यं हर प्रिये ॥ स्तुति मेवां पठित्वैव दण्डवत् प्रणमेद मुवि । गुहा कालि जगद्धात्र सर्वान्तर्यामिनीवरि ! | गृहि त्वेनं पशु बनि यथोक फलदा भव ॥ कायेन मनमा वाचा त्वचो नान्या गनिमम ॥ अन्त मिते ॥ ४२ ॥ इति मार्कण्डेय पुराणेसावर्णि के मन्वन्तरे देवी माहात्म्ये शक्रादिस्तुति नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ उवाच ॥ ५॥ अर्घ ॥ २॥ लोक ॥३५॥ एवम् ॥ एव मादितः । २५६ ।। उत्तम चरितस्य ॥ रुद्र ऋपिः ॥ महा सरस्वती देवता ॥ अनुष्टु पछन्दः ॥ भीमाशक्तिः ॥ भ्रामरी वीजम् । सूर्यस्तत्वम् ।। सामवेदः स्वरूपम् । महा सरस्वती प्रीत्यर्थ उत्तम चरित जपे विनियोगः ॥ अथ ध्यानम्-थएटा शून हलानि शब मुशले चक्र धनु सायक इस्तादधर्ती घनान्त विलसन्धीतांशु तुल्य प्रभाम् ॥ गौरीदेह समुद्भवां त्रिगगता माधार भूतां महा पूर्व मंत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि देत्यादिनीम् ॥५॥ पि रुवाच ॥१॥ पुराशुम्भनि शुम्भाभ्यांममुराम्यांशचीपते त्रैलोक्य- यवभागाश्चहतामद वना यात्॥वावेर सूर्यतां ववि कार तथैन्दवम् ।। कोवेर मय यायं च चक्राते वरुणस्यय वावपव नाधि च चक्रतु- वहि कर्मच॥ ततो देवा विनिगा श्रृंष्ट राज्याः पराजिताः ॥ ४॥ हवा- चिकारा खि दशा स्ताच्या सर्वे निराकृताः ॥ महासुराभ्यां वा देवी संस्मर त्य पाजिताम् ॥ ५॥ सयाऽस्माकं वरी दचो यथापत्मुस्मवाऽखिलाः ।। भया नाश यिध्यामि तत्क्षयारपरमापदः ॥ ६॥ इति वृत्या मति देया हिम यन्त नगेश्वरम् ।। जम्मुत्तत्र तनो देवी विष्णु मायां प्रतुष्टुवुः ॥७॥ देवा यः ॥ ८॥ नमो देव्ये महा देव्ये शिवाय सततं नमः ॥ नमः प्रत्य भद्राय नियताः प्रणात स्मनाम् ॥ ६ ॥ रौद्राय नमो नित्यायै गाय भाध्य नमो नमः ॥ न्योतनाये पेन्दुरूपिश्ये सुसाये सनत नमः ।। १०॥ कल्याचे प्राता गै मिरगे कर्मो नमो नमः ॥ त्ये भूभूवा . [ ३१५ j श्चरसि भूतानां दृष्टिस्त्वं परमेश्वरि ! ॥इतिस्तुत्वागीतवाद्यादिकं च कृत्यां पुनर्देव्यै स्तोत्रपाठादिनापुष्पाञ्जलिंदद्यात् ॥पद्धयांकराभ्यांजानुभ्यां मनसा वचमा हशा || उरसा शिरसा चेति प्रणामोऽष्टांग ईरितः ।। इति प्रणम्य ।। श्रीपरमेश्वरी प्रीतये नवार्ण वमन्त्रणाऽथवा जयन्तीमंगलेतिमन्त्रणलक्षं सह स्रम् अष्टोत्तर शतं वायथा शक्तिहोमं कृत्वा इष्ट देवताभ्यां कुलदेवताभ्यांच संपूज्याऽहुतिं दत्वा वह्माण्याद्यष्ट दलेपु वलिदानं कुर्यात् यथा-ब्रह्माणी 'माहेश्वरी कौमारी वैष्णवी वाराही नार सिंहि ऐन्द्री शिव दूती मध्ये च चण्डिका । वलिदान मन्त्रः ॥ ॐ भगति ब्रह्माणि एपबहु घृत दीप मास. समन्वित भावभक्त वलिंतुभ्यं नमः क्रमेण सर्वेभ्यो मातृभ्योवलिंदद्यात् ॥ अथ सामान्य वलिदानम् ॥ ॐ नमः कपाली ग्रह नक्षत्र सुरासुर गन्धर्व यश विद्याधर गरुड़ महोरग किन्नर गजेन्द्र देवता राक्षस भूत क्रव्याद पिशाच मनुष्य मातृगण योगिनी शाकिनी डाकिनी गणा इमां वलिं गृहणान्त स्वाहा ॥ पूर्ववत् दद्यात् ।। ॐ शिवाः कङ्काल लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥११॥ दुर्गाये दुर्गपारायसारायैसर्व कारिण्यै ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ।। १२ । अति सौम्याति रोद्गायै नतान्स्तस्यै नमो नमः नमोजगातिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमोनमः ॥३॥ या देवी सर्व भूतेपुरिष्णुमायेतिशब्दिता ॥नमस्तस्यै॥१शानमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः॥१६॥यादेवोस भूतेपुचेतनेत्यनिधीयतेनिमस्तस्यै ॥१७॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः १६ या देवी सर्वभूतेपुवुद्धिरूपेणसस्थिता नमस्तस्यौ ॥ २०॥ नमस्तस्यै ॥ २१॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२ ॥ या देवीसवभूतेषु निद्रारूपेण सस्थिता नमस्तस्य।२४॥नमस्तस्यै नमस्तस्यै ।। नमो नमः ॥ २५॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा रूपेण सस्थिता । नमस्तस्यै ॥ २६ ॥ नमस्तस्ये ॥२७ । नमस्तस्यै नमोनमः ॥ २८ ॥ या देवी सर्व भूतेषु छाया रूपेण सस्थिता । नमस्तस्यो ।॥ २६ नमस्तस्यै ॥ ३०॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ३१॥ या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिा ॥ नमस्तस्यै ।। ३२ ।। नमस्तस्यै ॥ ३३ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ३४॥ या देवी सर्व भूतेषु तृष्णा रूपेण सस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥३५॥ नमस्तस्यै ॥ ३६॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ३७॥ या देवी सर्व भूतेषु शान्ति रूपेण सस्थिता । नमस्तस्यै ॥ ३८॥ नमस्तस्यै ।। ३६ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ४० ॥ या देवी सर्वभूतेपुजावि रूपेण संस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥४१॥ नमस्तस्यै ।। ४१ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ४३ ।। या देवी सर्व भूतेषु लज्जा रूपेण सस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥४४॥ नमस्तस्यै । ४५ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ४६ ॥ या देवी सर्व भूतेषु शान्ति रूपेण । ३१६ } वेतालाः पूवना जम्मका दरः ॥ ते मर्वे तृप्ति मायान्तु वलिदानेन नर्पिताः ॥ इति बलिं दगात् ॥ क्षेत्रपाजाय कृच्शरान्नं वाध्य क्षत वलिं दत्त्वा होम समाप्य होमन्वे श्री परमेश्वर्या विशेषतः ललां कुर्यात् ॥ • इति महाष्टम्यां काल रात्रि विधिः ।। अथ महा नवमी पूजा विधिः ॥ सातु पूर्व युता ग्राह्य तद्यथा हेमाद्री स्वान्दे ।। पूर्व विद्धा प्रकर्तव्या नवमी वलि कर्मणि ॥ न कुर्यात्नवमी तात दशमी संयुत्तां सदेत्यादि वचनात् ।। पूर्व विदा शुभेति प्रति भाति ।। अष्टमी दशमी सन्यौ तृतीयं खलु कथ्यते ॥ तस्मिन्कृते वलिदाने पुत्र- नाशो भवेद्धवाः इति ॥ नवम्या मपरा हेतु वलि दान प्रशस्यते ।। इति धौम्य वचनात् ।। शुद्धा नवमी महा नवमौ न विद्धा |॥ शुद्धाया अभावे अपराह्न या नवमी तनै वेत्ति ॥ नवम्या मपरा हेतु यतिदानं प्रशस्यते ॥ दशमी वर्जये त्तत्र नात्र कार्या विचारणेति मदन लोधत्वात ब्रह्म वैवर्तेऽपि । नन्दायां ज्वलते वह्निः पूर्णायां पशुधावनम् ॥ भद्रायो गोकुल क्रीड़ा तत्र राज्य विनश्यति ।। यदातु नवमी त्रुटित्ता तदाष्टम्या सस्थिता । नमस्तस्यै ॥ ४७ ॥ नमस्तस्यौ ।। ४८ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ४६॥ या देवी सर्व भूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यो । ॥ ५० ॥ नमस्तस्यै ॥ ५१ ॥ नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ५२ ।, या देवी सर्व भूतेषु कान्ति रूपेण सस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥ ५३ ।। नमस्तये ॥५५॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ५५ ॥ या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण सस्थिा ॥ नमस्तस्यै ॥ ५६ ।। नमस्तये ॥ ५७ ॥ नमस्तस्ये नमोनमः ॥ ५८ ।. या देवी सर्व भूतेषु वृत्ति रूपेण सस्थिता ।। नमस्तस्यै ।। ५६ ॥ नमस्तप्ये ॥ ६०॥ नमस्तस्यै नमो नमः ।। ६१ ॥ या देवी सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण सस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥ १२ ॥ नमस्तस्मै ॥ ३ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ६४॥ या देवी सर्वभूतेषु दया रूपेण सस्थिता । नमस्तस्यै ॥६५॥ नमस्तस्यै ॥६६॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ६५ ।। या देवी सर्व भूतेषु नुष्टि रूपेण सस्थिता ॥ नमस्तस्यै ॥६॥ नमस्तस्यै ॥ ६॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ७० ॥ या देवी सर्गः भूनेषु मान रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै ॥ १॥ नमस्तस्यै ।। ७२ ॥ नमस्तस्यै नमोनमः ।। ५३ ॥ या देवी सर्व भूनेषु प्रांति रूपेण सस्थिता । नम्नम्मे ||४|| नमस्तस्यै ॥ ७॥ नमस्तस्यै नमोनमः ॥ ६॥ इन्द्रियाण मारापी भताना पा मिलेगु या ॥ भूतेषु माता तस्यै व्याप्य दस नमोनमः । पिति स्पेण या मल मेत पाय स्थिवा न । नमनाये । ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमी.

काम 1 ३१७ 1 नवमी पूजा कार्या ॥ वत्र पूजन विधिः ॥ अद्य हाश्यिन्ये शुक्ल महा नवम्बां सकल पाप क्षय पूर्वक धर्म यशो दीर्घायुष्य ब्रह्म लोक गमन ब्रह्मेन्द्र रुद्र विष्णादि प्राप्य परम प्राप्ति त्रि शूलिनी दुर्गा चरिउका पूजन महं करिष्ये ।। ॐ त्रिशूलिनी हा गच्छेद विष्टेत्या वाह्य त्रिशूलिन्य नमः ।। इति मन्त्रेण पाचादि नेवेद्यान्तैः सम्पूज्य तत्र दुर्गा शिवां शङ्करी चण्डिकां च सम्पूज्य अष्टम्यामिवोक्क प्रकारेण वलिदानं कुमारी पूजन शस्त्रास्त्र पूजनं कुर्यात् ।। इतिमहा नवमी विधिः।। अथ दशम्यामपराजिता पूजा । श्रवणार्वेण संयुक्ता दशमी शुक्त पक्षगा इषे मासि स्थिता ज्ञेया विजया दशमी तिथिः सा नवमी विद्धा कर्दव्या नत्वेकादशी युक्ता ।। मध्याह्न विजय मुहूर्त इति केषां चिन्मतम् ।। सन्ध्यासमये केषां चिन्मतम् ।। विजया रयोऽष्टमस्मृत इति वशन्तराजः ।। किंचित्सन्ध्या मतिक्रम्य किश्चिदुत्पन्न वारकः ॥ विजयो नाम योगोयं सर्व कर्मसु सिद्धदः ॥ इति गर्ग संहिताया मुक्तम् । प्रवण युका शुद्धा नमः ॥ ५० ॥ स्तुता सुरैः पूर्व मभीष्टसंश्रया (त्तथासुरदेणदिनेषु सेदिता ।। करोतु सानः शुभ हेतुरोश्वरी। शुभानि भद्राएय मिहन्तु चापदः ॥ ८१ ।। या सारतं चोद्धत देत्यतापितरस्माभिरीसा च सुरैर्नमस्यते ।। या चस्मृता तरक्षणमेव इन्तिनः सर्वा पदोभक्ति विनम्र विभिः ॥ ८२ ॥ ऋपिकाच UE. I एवं तदादि युक्तानां देवानां तत्र पार्वती । स्नानु मन्या ययौतोये जाह्नव्या नृप नन्दन ॥२४॥ साऽब्रवोत्तान्सुरासुन्धर्भवद्भिः स्तूयतेत्रका शरीर कोश वश्चास्याः समुद्ता ब्रवीच्छिवा ॥ ३५॥ स्तोत्र ममेकि- यते शुम्भ दैत्य निरा कवैः ।। देवःसमेतैः समरे निशम्भेन पराजितः । शरीर कोशायत्तस्याः पावस्या निः मुताम्बिका। कौशिकीवि समस्त्रेषु यतो लोकेषु गीयते ॥ ७ ॥ तस्यां विनिर्गतायांतु कृष्णा भूत्सापि पार्वती ॥ कालिकेवि समाख्याता हिमाचल कताप्रया । तोम्बिकां पर रूपं विभ्राणां सुमनो हरम् ॥ ददर्श पण्डो मुएहश्च भृत्यौशुभ निशुभयोः ।। ६२॥ ताभ्यां शुभाय चाख्याना अतीव सुमनोहरा काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयंती हिमा पलम् ।। नैववारा क्वचिंद्र पं केन विदुत्तमम् ॥ जायतां कात्यसो देवी गृह्यता चा सुरेश्वर IT स्रोरत्नमति पाद्गो द्योतयती दिशस्विषा । सातुतिति देत्येन्द्र वा भवा- धु मर्हति ॥ १२॥ यानिरत्नानि मथयो गजाश्वा दोनि वै प्रभो । त्रैलोक्येतु समस्ता निसां प्रतं भ्रांति ते गृहे ॥ ३॥ परावधः समानी वोरल पुराना पारिजात तकरचायं तथैवोप: स्व पाय || चारुपा मुख पद्मन विचित्र । १८ j देशमी ॥ अथवा नवमी युता वा विजया दशमी अद्याश्विन शुक्ल दशम्याम पराजिताया विजय सिद्धयर्थ नवदुर्गा पूजाया न्यूनाति रिक्त परि पुरणार्थ मपराजिता देवी पूजन पूर्वक विसर्जन महं करिष्ये चन्दने नाष्ट दलं लिखित्वा तन्मध्ये मृरामय पात्र वयं सस्थाप्यावाहयेत् ।। अथवा पूगीफल पुष्पाज्ञतेष्वादयेत् । मध्ये ॐ अपराजितायै नमः । दक्षिणे क्रियासिद्धय जयायै नमः ।। वामे ॐ उमायै विजयायै नमः ।। नाम मन्त्र प्रतिष्टाप्या बाह्य । चतुभुजा पीत वस्त्रां सर्श भरण भूपि ताम् । इत्यादिना खड्गचर्म घर नरामय हस्तां त्रिनेत्रा भीषत्प्रहसित वदनां सर्वाङ्ग सुन्दरी मपराजिता श्री भगवतींध्यात्वा ॐ अपराजितायै नमः । ॐ जयायै म । ॐ विजयाय नमः इति नाम मन्त्रा पाद्या चमन वस्त्रा भूपण वन्दनाक्षत पुष्प धूप दीप नैवेद्य ताम्यू लादि दक्षिणान्तं दत्वा, पार्थयेत् ।। कनको ज्यता !! जया देवी शिवे भाता भन्किामान्ददातु मे ॥ काय नेन विचित्रेण केयूरेण च भूपित्ता ।। जय प्रदा महा माया शिव- विमान संयुक्त मेत विष्टति तेंगणे ॥ रत्न भूत मिदा नीत यदासीद्वेधसो. इतम् ॥ १५ ॥ निधि रेप महापद्मः समानीतो धनेश्वगत् ॥ किं जस्किनी ददी चार्वाधिर्माला मम्लान पंकजाम । खते वारण गेहे कांचन सावतिष्यति ॥ तथायें स्वेदन परो यः पुरासीत्प्रजायतेः ।। ६७ ॥ मृत्योरुकान्ति दा नाम शक्तिीश त्वया हवा ।। राजस्य भ्रातस्तव परिगृहे ॥ ॥ निशुभस्याब्धि जाताश्च समस्ता रत्न जातयः ॥ वद्धि रपि ददौ तुभ्य मग्नि शौचे च यासमी ॥ ६ ॥ एवं देत्येन्द्र रलानि समस्तान्या दूतानित ॥ स्त्री रलमेपा कल्याणी त्वया करमान्न गृह्यते ।। .०० ॥ अपि स्याम ॥१॥ निशम्यति यचः शुभःसतदा चंड मुण्टयोः ॥ प्रेपयामास सुप्रीय दूतं देव्या महामुरम् ॥२॥ इति चति पवाकच्यासागत्या वचनान्मम ॥ यथा चान्यति में प्रोत्या तथा कार्य या लघु ॥ ३॥ मन सत्ता या शैक्षो देशेऽति शामने । सादेवी तां ततः डाइरलक्षणं मधुर या गिरा।। २ ॥ दूत याच ॥ ५॥ देवि देत्येश्वरः शुभ स्वास्य परमे स्वरः ॥ दूनी पि तस्तेन पसारा मिहा गतः ॥६॥ अध्या इताना सांमुयः सदा देव पानिपु प निर्जिवा स्त्रिल देवारिसम यदा हारगुप्या सत् ॥६॥ मम लीग मरिने मम देवा यशानुगाः ॥ या भागा नई समान पाश्नानि पृधा प्रयद । प्रलोक्ये वरनानि मम परवान्य शेषका र गलपन चन्द्र वाहनम् रोड पाशः समिक्ष { ३१६ ] भापित चेदसा 4 विजयात्र महाभागा ददातु विजयं मम ॥ हारेण शुचि चित्रण भावकनक मेसला ॥ अपोय कदरता करोतु विजय मन ॥ इति मन्नौः संप्राध्य हरिता सपंप दूर्वा युक्त पीव वान पोटलिकां पति सूत्रण ॐ कार मुजान बद्धाबा एतन्तेति प्रतिष्टायाभि मन्वयेत् ।। सदा पराजिते यस्मात् लला मुत्तमा स्मृता । सर्गकामार्थ सिद्धयर्थ तस्मात् स्वां पूजया म्यहम् ।। भवा पसजिते देवि । मम सर्व समृद्धये ॥ पूजितायां त्वयि श्रेयो ममास्तु दुरितं हत मिति मन्त्रेणापराजिनं देवों समोपे अभिमन्व्य ॥ अथ धारण मन्त्रः ॥ जयदे वरदे देवि ! दशम्याम पराजिते ? ॥ धारयामि भुजे दक्षे जय लाभाभि वृद्धये ॥ वलमा येहि वलय मायशत्रों पराजयम् ॥ उद्धारणाभवे युर्मे धनधान्य समृद्धयः ] • इति मन्लोण दक्षिण बाहौ धारयेत् ॥ ततो मूल देवी सम्पूज्य प्रार्थयेत् ।। रूपं देहि यशो देहि भगं भवति देहिमे ॥ पुत्रान्देहितथा मावः सर्वान्कामा श्चदेहिमे ॥ महिपनि महामाये चामुण्डे मुण्ड मालिनि ? ॥ आयुरा मथनोद्भूत मश्वरल ममामरैः ॥ उचः श्रव साक्षं तत्प्राणिपत्य समपितम् ॥ १० ॥रानि चान्गनि देशेषु गंवः पुरगेपुष । रन्न भूतानि- भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ ११॥ वो रन भूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् ॥ साव मस्मा नुपा गच्छ यता रन भुजो वयम् ॥ १२ ॥ मावाममानुजं वापिनि शुम्भ मुरु विक्रमम् ।। भजलं चला पॉगि रत्न भूता सिषेयतः ॥ १३ ॥ परमैश्वर्य मतुल प्रात्स्य सेमत्परि- प्रहात् ॥ एतद बुद्धया समा लोक्य मत्सरि महतां ब्रज ॥ १४ ॥ ऋषि- रुवाच ॥ १५ ॥ इत्युक्ता सा तदा देवो गंभोरां : स्मिता जगौ ॥ दुर्गा भगवती भद्राययेद धार्यते जगत् ॥ १६ ॥ देव्युवाच ॥ १७ ॥ सत्य मुक्त त्वया नात्र मिथ्या किं चित्तयो दितम् ॥ त्रैलोक्याधि पति शुभो निशुंभ श्चापि वादृशः ॥ किंवत्र यत्प्रति ज्ञाव मिथ्या नस्क्रियते कथम् । भ्रूयता मल्प युद्धित्वात्प्रतिक्षा चा स्त्ता पुरा ॥ १६ ॥ योमा जयति संग्रामे योमे दर्प व्यपो हति ।। योमे प्रति पलो लोके समे भर्वा भविष्यति ॥ २०॥ तदा गच्छतु शुम्मोत्र निशुमो वा महासुरः॥ मां शिवा किंचिरे मात्र पाणिं गृहातु मे लघु ॥ २१ ॥ दूत उवाच ॥२२॥ अव लिप्तासिमै वल देवि ब्रूहिम माप्रतः ।। लोक्ये कपुमा स्तिष्टे दो शुभ निशुभयो । २३ । अन्येश मपि दैत्यानां सर्ने देवान युधि विष्टन्त्रि संमुझे देवि किं पुन. नीलमेकिका ॥ २४ ॥ इन्द्राद्याः सकला देवा स्तस्युर्येषां न सयुगे । शुम्भादीनां कय तेषां त्रो प्रयास्यमि संमुखम् ।। १२५ ॥ सार्ज गच्च मययोता पाच शृंम निशुंभयोः ।।

तप विसृज्य देवी मुत्यापये । ३२० ] रोग्य मेश्वयं देहि देवि ! नमोस्तुते ॥ ततः प्रणमेत् । इयं पूजा मया देवि ; यथा शक्त्या निवेदिता ॥ रक्षार्थ स्वत्प्रसादाय यनन स्वस्थान मुत्तमम् ॥ इति प्रणाम्य ॐ कारेण विसर्जयेत् ॥ ॐ दुर्ग देवि जगन्मातः स्वस्थानं गच्छ पूजिते ! ॥ सम्वत्सरे व्यतीते तु पुनरा गमनं ॥ इति उत्तिष्ट देवि चण्डेशि ? शुभां पूजा प्रगृह्य च ॥ कुरुष्व नाम कल्याणमष्टाभिः शक्तिभिः सह ॥ गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थान नं देवि चण्डिके ? ॥ अजस्रोतो जले वृद्धये स्पीयतां च जले त्वया ॥ ततो जपपाठ नव रात्र व्रत देवी पूजनादि. कृवस्य 'सम्पूर्ण कर्मणो दक्षिा संकल्यं कुर्यात् ।। पूर्व स्थापित पत्रिय मृएमय प्रतिमाञ्चोत्थाप्य शिविकादि शुभयानो परि सनिवेश्य गीत यादिन निः स्वनेल समीपे गत्वा पूर्वोक्क दुर्गे देवि जगन्मात रिति श्लोकेन इमां पूना मत्रा देवि ? इति लोकेन च जने केशा फणा निधूत गौरवामा गमिष्यसि ॥ २६ ॥ देव्युवाच ॥ १२॥ एवमेत द्वली शुभी निशुभ श्चाति बोर्य वान् || किं करोमि प्रति ज्ञाम वदना लोचिता पुरा ॥ १२८ ॥ सत्संगच्च मयो ते यदेतत्सर्व मारत. ॥ वदा पवा सुरेद्राय सच युक्त करोतु यत् ।। १२६ ॥ इति श्री मार्कण्डेय पुराणे सावणिके मन्वन्तरे देवी माहात्म्ये देण्यादूत संवाहो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ उवाच ॥ ॥ गएडानि ।। ६६ ।। श्लोका ॥ १४ ॥ एवं ॥ १२६ ॥ एव मादितः अथ ध्यानम् नागाधीश्वर विष्टरां पणि फणोत्तसोक रवा वली मावदेह लवादिवाकर निर्भा नेत्र प्रयो झासिताम् ॥ माला उम्भ कपालनी रजकरा बद्राद्ध हां पर समंझे स्वरभैरवा निलयों पद्मा यां चिन्तये ॥ १ ॥ पक वाच ॥ १ ॥ इत्या फपर्ये वयो देन्याः सतो मर्परिवः।। समा पप समागम्य दैत्यरासाय विस्तरात् ॥ २ ॥ तस्य तस्य साम्य मारयां मुरगाट तसः । स झोपः प्रदत्या नामधिप धूम्रलोचनम् ॥ ३ ॥ हे भून लोयनाशु त्वं च सैन्य परि पारितः । वामा नय बनाद दुष्टां कशा कपण विजाम् ॥४॥ अयोधाणः सविनयादियोतिष्ठते ऽपरः ! इन्थ्यो म मावि यो गप सपा ॥ || पिक याच ॥ ॥ सप्त मनः सोम देत्यो भून लोना । नः पटनाममाया गमुरादुर ययो ॥ nu (प्टा वा पो नुदिना पस

[ ३२१ ]
प्रवाहयेत् ॥ ततो अपराजिता पत्र व्रयं तंडुल त्रयं च ॐ सः ।
सहक वरा हॉ.सः हुमितिमंत्रेण प्राशयेत् ॥ ततः शमी वृक्षान्ते
गवा पूजा कार्या ॥ मंत्रः ॥ शमी शम यते पापं शमीलोहित
कन्टका ॥ धारिएय जनु वायनां रामस्य प्रिय वादिनी ॥ करिष्यमाण
यात्रायां यथा कालं सुखं मया ॥ तत्रनिर्विघ्न की वंभव श्री
गम पूजिता ॥ इति मन्त्रेण शमी पूजयित्वा ) पुष्पाणि सावता
मादा शमी मूल गतां मृदम् ॥ शमी शाखां च गृहित्वा शिवि-
कादि यानो परि सन्नि वेश्य गीतषादिवनिर्धेः स्वगृहं प्रत्या
नयेत् ॥ ततः स्वजनैः सह वेदोक्त पुराण मन्त्र रभिपेकं कृत्वा
यख भूपण तिलका दिकं धारयेत् ।। ततो जल समीपे ॥ गोप्टे
नद्यां वा खल्जन विज्ञोक येत् ॥ प्रणाममन्त्रः । नीलग्रीव शुभ
ग्रीव सर्व काम फज अंद॥ पृथिव्या मव तीणोसि खजरीट ?
नमोस्तु ते ॥ इति प्रणम्य ब्राह्मणेभ्यो ?? दक्षिणां दत्वा पाशी-
दिं गृहीत्वा यथा सुसं विहरेत् । इति शरत्कालिक दुर्गोत्सव
सस्थिताम् । जगादो प्रया हीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ८॥ न
चेत्प्रीत्याय भरती मद्भार मुपैष्यति । ततो वला नवाम्येप केशाकर्षण
विनाम् ॥ ६ ॥ देव्यु वाच ॥ १०॥ दैत्येश्वरेण प्रहितो वल पान् यल
संवृतः । बलानयसि मामेव' तक करो म्यहम् ॥ ११ ॥ ऋपिरु याच
॥ १२॥इत्युक्त सोन्याधा वत्ता मसुरो धुम्र लोचनः॥ हुकारे ऐवतं भस्म
साच कारां विका ततः ॥ १३ ॥ अध क्रुद्ध महासन्य मसुराणां
तथाम्बिका ॥ ववर्य सायकै स्वीपणे स्वथा शक्ति पर स्वधैः
॥ १४ ॥ ततोधुत सटः कोपात्कृत्वा नाद सुभैरवम् ॥ पपाव सुर
सेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः । १५ ।। कारिखकर प्रहारेण
दैत्यां नास्येन पा परान् ॥ प्रात्या चाधरेणान्या न्समधानमहा-
सुरान ॥ १६ ॥ केषां चित्पाटया मास नरौः कोप्टानि केसरी।
क्या वल प्रहारेण शिगंसि कृतवानायक ॥ १७ ॥ विच्छिन्न याह
शिरसः वास्तेन स्या परे । पपीपरुधिर को दन्येषाधुन
केसः ॥१॥ घरोन उद्वन पर्व प नीर्व महामना न
के सरिणा देन्यावाहने नाति कोपिना ॥ ११ ॥ श्रुत्वा तम सुरे
देम्बा निहतं धूम्र लोपनम् ॥ पलं प शयित घरस्न देयो केसरि
पावतः ॥ २० ॥ धुकोप देत्याधिपतिः शुभः प्रफुरिताधरः ।
भारापयास पो पर नुरहो महा मुणे ॥ २ ॥

না। [ ३२२ ] विधिः ॥ ॥ शुभम् भूयात् ॥ ले०सेवकविश्वनाथ शम्मा । स्त्री कर्तु-दीप दान प्रयोगः। ! स्रष्ट देववा समीपे निवेद्यः ।। अथ लक्ष वर्तिका दीपदान विधिः का शुचिरा चान्तः दीप प्रज्वाल्य नमोस्त्व नन्तायेति दीपं सम्पूज्य ।। अर्ध स्थापनं कुर्यात् ।। अयं स्थापन माह ॥ स्ववामा त्रिकोणपटकोण वृत्त चतुरस्त्राणि कृत्या शंस मुद्रयास्तभयेत् ॥ ततः पुष्पाक्षरग्न्यादिषु पड़ेगानि सम्पूज्यास्त्र ज्ञालित माधारं भवहि मंडलाय दश कलात्मनेदे. चाप्यं पात्रा सनाय नम इत्याधार त्रिकोणे स्थापयेत् ।। नत्राग्ने कला धूप्रापि राधाः पूजयेत् शख मवक्षालितं शंखम् ॥ अंसूर्य मंडलाय द्वादश हे मुण्ड क्लै हुमि. परि वारि ती ॥ तत्र गच्छत गत्वा च सासमा नीयतां लघु ॥ २२ ॥ केशेष्या कृष्य वर्धवावा यदि वः स शयोयुधि ॥ तदा शेपा युप्रै स्सर सुरै विनि हन्य वाम् ॥ २३ ॥ तस्यां इवायां दुष्टायां सिंहे च. विनि पातिते ॥ शीघ्र मा गम्यतां वद्ध्वा गृहीत्वाता मांत्रिकाम् ॥ २४ ॥ इति मार्कण्डेय पुराणे सावर्णि के मन्वन्तरे देवी माहात्मये धूम लोचन वधो नाम पष्टोऽध्यायः ॥ ६॥उवाच ॥४॥ अर्घ ॥ ॥ श्लोकर एवम् २४ ।। एवमादितः ॥ ४१२ ॥ प्रयध्यानम्-ध्यायेयं न पीटे शुक कर पठिन शृण्वती श्याम नांगी न्यस्तै कात्रिं सरोजे शशि शक्ल धरा वल्लकी वाद यन्तीम् । कहारा वरमाला नियमित विलसन्चूडिका रक्त वस्त्रां मातंगी शंख पात्रा मधुर मधु मदां चित्रकोद्रासि भालाम् ॥ ॥ ऋषि रुवाच ॥ १ ॥ प्राप्चान्ते खतो देत्या श्चएडमुएउ पुरोगमाः ॥ चतुरंगा वलोपेवाययुरम्यू- धवा युधाः ॥२|| दहशुस्ते ततो देवी मीपद्धासा व्यवस्थिताम् ॥ सिंहस्यो परिशेलेन्द्र महति वाचने ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा समादातुमुद्यर्मच कुनयताः ।। श्राष्ट चापा सिधास्तवान्ये तत्समीपगाः ॥१॥ ततः कोप च करो. रविका वानरीन्प्रति । कोपे न चास्या पदनमपीवर्णमभूसदार बाटी कुटिलात्ताया लन्नाट फलकाद् द्रुतम् ॥ काली कराल बदना विनिता सिपाशिनी।६। विचित्र सांग घरानर मालाविभूपया, दीपि चपरोधाना शुष्क मासाविभैरवा ॥७॥ अति विस्तार वदना जिला जजन भीपणा ॥ निमग्नारला नयना नादा पूरिखदा मुसा ॥८॥ मियेगेनाभिपतिवाधार तो महामुरान् ॥ सैन्ये व मुरारीणाममर । ३२३ । कलात्मदेवार्ष्या पात्राय नमः इति वमाधारे स्थापयेत् ॥ व्यतिवर्ण वा स्त्रयोविंशति वर्णः अमुक पदस्थाने इष्ट देवता नामोचार्य रामाध्ये त्यादि रोख मत्र माह ॥ ॐ क्लीं महाजन चराय फट् स्वाहा पापजन्याय नम इति ॥ कामः क्लीमिति व्यत्तिवर्ण:न्त्राई कलास्तपिन्य द्याः सम्पज्य विलोमे मूल मातृके कं भं वपिन्यादिकान्जपनजलैस्तं सम्पूर्य ॥ ॐ सोम मण्डलाय पोडशकलात्मनेदेवाच्या मृतायनमइत्ययसंपूज्य तत्र वन्मत्रंमृणि मुद्रया गंगे चेत्यादितीर्थ मणकुशमुद्रयाऽ के मंडलात्तीर्थमा वायस्वद- दोदेवमावाहयेत्ाश्रकुशमुद्रा|लक्षणंमुक्तम्। मत्स्यमुद्रोका ॥ अंगुष्ठतर्जनी स्फोटंछोप्किामुद्रावाम मुष्टिनिगर्ववर्जनीकंकृत्वाशंसोपरिभ्रमणमवगुटन पनमुद्राबामणाहुवीजेनगोमुद्रांधेनुमुद्राम् ।साउचाअमृतचीजत.वमिति बोजेनसरोधिन्यामुद्रायmववार्यमुद्रा-शंसाधाशस्खमुशलचक्र मुद्रा प्रताः । महामुद्रांकुर्वन् ॥ परमीकृत्यारयोरगुलीसमध्यकरोवियोजयेदितिमहामुद्रका फरांगुल्य माणि वक्री कृत्य संमुखं योजि नानि गालिनी मुद्रा गरुड़मुद्रा उकाः ॥ तेन प्रोक्षणी जलेन निजांग मुक्षेत् सिंचेत् ॥ ततलम् ।। ६॥।॥ पाणिग्राहां कुशप्राहि योध घंटा समन्दितान् । ममादायक हस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥ १० ॥ सथैवयोवं तुरगै रथ सारथि ना सह ।। निक्षिप्य वक्के दशनैश्चर्वयंराति भैरवम् ॥ ११ ॥ एक जमाह के शेष प्रीवाया मय वापरम् ।। पादेनाक्रम्य चैवान्य मुर सान्य मपोथयन् ॥ १२ ॥ ते मुकानि च शस्त्राणि महास्वाणि तथासुरैः । मुम्मे न जमा हरूपा दश मधिवा न्यपि ॥ १३॥ वलिनां सरलं सर्व मसुराणां दुरात्मनाम् मममतयधान्या नन्यारचा पायचदा ॥१४॥ असिना निहताः फेचित्तचित्वष्ट नांग नाहिताः ॥ जग्मुक्निाराममुरादेवाप्राभि हिता स्तथा । १५॥ क्षणेन ताल सर्व मसुराणा निगतितम् ॥ दृष्टया चंडो भिदुद्रायतां काला मतिभीपणाम् ॥ १६ ॥ शवमहामीमी मातीता महासुरः।। छादयामासपरच मुंडसिप्तः सहन शः । १॥ तानि चमायनेकानि विशमानानि सन्मुसम् ॥ वनुर्यवार विवानि सुरई निधनो दरम् ॥ १८॥ उदो उहामा निषा भीमं भैरव नादिनी || काली कराल यांत दुर्दशं दरानोग्यता ॥ १६ ॥ उत्पाश्च महा सिंह देवी चंद मधावत || गृहीला पास्य रोपु शिरस्ते नामिनास्मिनन् । २० । भय मुदाम्ययावचा रष्ट्या पं निवासिनम ।। समप्प पायद भूमी सा यह गाभित्रका | इस रो मन्च या निपातितम् ॥ मुंर पमु महावीर्य दिशो मेनगा राम ॥२॥शिरपंजरस सीप रीत्या मुसह प्रता { ३२४ । अब संकल्पः ॥ अद्येत्यादि मम समस्त जन्म वाल्य योवन वार्धक्या चन्यो पार्मित कायिक वाधिक मानसिक सांसर्गिक सकल पाप क्षय पूर्णकहिकानेक विधि निरवधिक भोगानु भवानन्तरे श्री परमेश्वर प्रीति द्वारानझा शिव विष्णु सायुज्य पद प्राप्ति कामोलक्षवचिकाप्रज्वालननदङ्ग भूत दीप कलश गणेश पूजन पूर्वाक ब्रह्म विष्णु महेश्वरं पूजनं प्रधान देवता पूजनं पाह करिष्ये ॥ दीपं सम्पूज्य कलश गणेश पूजनं १ फूर्णत् । अन्य कल रा मध्ये इदं विष्णु रिति मन्त्रेण हैम सिंहासन स्थित लिया सहित विपणु पूजयेत् ॥ वदक्षिणे ब्रह्म यज्ञान नमिति सावित्री सहित ब्रह्माणं पूजयेत् ॥ वह चरे नमः शम्भवायेति मन्त्रेण उमा सहिवं शिवं पूजयेत ॥ प्रधान देवतां गङ्गा धपोडशो पचारः सम्पून्य ।। तवः मनो जूति रिति मन्त्रेण प्राण प्रतिष्टाप्य ॥ ॐ सहस शीति दृहासमि श्रमभ्येत्य वहिकाम् ॥ २३ ॥ मया तवात्रोपहती चण्ड मुडौ- महापशु ॥ युद्ध यज्ञे स्वयं शुमं निशुभ वहनिष्यसि ॥ २५ ॥ अपि- रुवाच ।। २५ ।। तावानीती ततो दृष्ट्वा चण्ड मुण्डी महामुरी ॥ उवाच कालों कल्याणी ललितं घडिकावरः ॥२५॥ यस्मा ,ई च मुंडं घ गृहीत्या त्वमुपागा । चामुडेविततो लोकेस्यातादेवि भविष्यसि ।। २७ ।। इति मार्कण्डेय पुराणे सावपिके मन्वन्तरे देवी माहात्म्ये चण्ड मुण्ट वधो नाम सातमाऽधायः॥ ७॥ उवाच ॥२॥ श्लोक ॥ २५॥ एवम् २७ ।। एवमादितः॥ ४३६ ॥ अथ अष्टमः।। अथ ध्यानम्-अरुणा करुणा वरनिवासी धृत पाशा कुश मुख्य चाप हस्ताम् ।। अपिमा दिभिरा वृतां मयूखैरह मित्ये पविभावये भवा- नीम् ।। ८ ।। ऋपिरवाच ॥ १ ॥ चरडे व निहते देत्ये मुएंद व विनि पादिते । बहुलेषु च सैन्येषु क्षयिते वसुरे स्वरः ॥२॥ ततः कोर पराधीन चेताः शुभमः प्रतापवान् ॥ उद्योग सर्व सन्यानां देत्या नामादि. दशह ॥३॥ भय सगं यले दैत्यापिटशीविरुदायुधाः कम्यूनां धनुरा शीति नियन्नुि वाले दाः ॥ ३ ॥ फोटि वीर्याणि पवाराद मुराणां मुलानियशवं कुलानि धौम्रा निगंच्यन्तु ममाया !॥५॥ काला दादा मोयोः कानयास्तया मुगः युदाय सजा निर्यान्तु आया सरिता मम ॥ इत्याशाप्या मुरपतिः गुम्मी औरय शासनः : निन- गाम महासन्य सहयचंभिक मायान्तु परितका ध्या तरीन्य मविनोषणाप । ग्यास्मनः पूरयामास धरणी गगनाचरम् ।।८।। Aafnaनार मीय स्वयान्न ॥ परटान माद मम्बिका घर पन्ना सिह परटाना नारापरित दिमुथा।

। ३२५ ] श्रासनम् ॥ पुरुष एवंति उपवेशन ॥ ॐ एतावानस्येति पाद्यम् ॥ त्रिपादूर्वेतिपयम् ॥ॐ वदो विराडितिप्राचमनीयम् ॥ तस्माद्यज्ञादिति स्नानम्।।त माद्यज्ञासमितिबाच्छादनान्तरमादरवेतियज्ञोपवीतम्। यसमितिगन्यमायापुरुमिनिपुटम् वृहस्पते इतिवत्रम्! यबोसीविय. वान् ॥ बाह्मणोस्येतिघूपम् ॥ चन्द्रमामनसोइतिदीपम्, ॐनाभ्याासी दितिनैवेद्यम् ॥ ॐ यत्पुरुषेण इति अञ्जलिकरणम् ॥ॐसप्तास्यासबिति- प्रदक्षिणा ॥ इति सम्पूज्य ॥ गरुडं हसं वृप च सम्पूज्य । ततोऽङ्ग पूजा ॥ कालाय नमः शिरः पूजयामि ॥ ॐ विष्णवे नमः ललाटं पूज- वामि ॥ ॐ वहये नमः नेत्र पूजयामि ॥ ॐ रवये नमः कौँ पूजयामि ॥ ॐ दीप्ताय नमः नासिकां पूजयामि ॥ ॐ निशा कराय नमः मुखं पूजयामि ॥ ॐ रुद्राय नमः कण्ठ पूजयामि ॥ ॐ शेषाय नमः स्कंध पूजयामि ॥ ॐ जगद्वापिने निनादे पपीः काली जिग्ये विस्तारिता नना ॥ १०॥ निनाद मुप श्रुत्य दैत्य शैन्यैश्चनु दिशम् ॥ देवी सिंहस्तथा काली सरोः परिवा- रिता ॥ ११ ॥ एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुर द्विपाम ॥ भवायामर सिंहाना मति वीर्य वलान्विताः ॥ १२ ॥ ब्रह्मेश गुहविष्णु नां तथेन्द्रस्यप शातयः || शरीरेन्यो विनिष्कम्य तद्र पेश्चण्डिकां ययुः ॥ १३ ॥ यस्य देवस्य यदप यथा भूपए वाहनम् || तद्वदेवहितच्चक्कि सुरान्योद धुमायौ ॥ १४॥ सयुक्त विमानाने साक्षसूत्र कमण्डलुः । प्रायाता प्रमणः शक्ति ब्रह्माणी सभिधीयते ॥ १५ ॥ माहेरपरी वृपा रुदात्रिशूल वाचा. रिणी । महाहिवलयाप्राप्ता चन्द्र रेखा विभूपणा ॥ १६ ॥ कौमारी शकि हस्ता च मयूर वर वाहना। योद्धमन्यापयो दैत्या नायिका गुहरूपिणी ॥ १७ ॥ ठयव वायो शक्फि गरुडो परि सास्थिar राप गदा शाह सहा हवायुपा ययौ ॥ १८ ॥ यस बाराहमतुलं रूपं या विभ्रतो हरेः ॥ शक्षिः साप्या पयो वन पाराही विधवांतनुम् ॥ १६ ॥ नार सिंहो नृसिंहस्य विधदी मारी यपुः । प्राता वत्र सदाडेपषिप्त नयर सहविः ॥ २० ॥ पत्र इस्ता तपेन्द्री राशी परि स्थिता । प्राप्ता सहर नयना यथा शक स्वयैव सा ॥ २१ ।। दवः परिवृतस्त भिरी शानो देखें राविनिः ॥ हन्यन्तामसुणः शीम मम प्रोत्याह परिरमम् ॥२२॥ तो देवो शरीरात विनिमान्दापि भीपणा ॥ परिवध रित्युमा शिया शवनिनादिनी ॥ २३ ॥ सा पाह एन जटिल मागार [ ३२६ । नमः वाहू पूजयामि ॥ ॐ तेजो रूपाय नमः स्तन्नी पूजयामि ।। ॐ महेश्वराय नमः नाभिं पूजयामि ॥ ॐ विश्वरूपाय नमः कटी पूजयामि || ॐ जगत्प्रभवे नमः गुदं पूजयामि ॥ ॐ स्वप्रका- शाय नमः उरू पूजयामि । ॐ स्वय ज्यातिये नमः जानुनी पूजयामि ।। ॐ चतुभ्यूदाय नमः गुलकौ पूजयामि ।। ॐ जनाधिपाय नमः पादौ पूजयामि ।। ॐ पर ब्रह्मणे नमः सर्वात पूजयामि ।। ॐधानमः पादी पूजयामि ।। विधाने नमः जो पूजयामि ।। स्रष्टे नम उरू पूजयामि !! ॐ प्रजापतये नमः मेदू' पूजयामि || ॐ परमेष्टिने नमः कटी पूजयामि || ॐ अग्नि रूपाय नमः नाभिं पूजयामि ॥ ॐ पद्म नाभाय नमः हृदयं पूजयामि ॥ वेद्यसे नमः वाहूपूजयामि ॥ दामोदराय नमः कण्ठं पूजयामि ॥ ॐ हिरण्य गर्भाय नमः मुखंपूजयामि ॥ ग्रह्मणे नमः शिर पूजयामि ॥ विष्णवे नमः सर्वा गम् पूजयामि ॥ विशेपो पहारादि समर्पयेत् । अथ दीप मपराजिता ॥ दूत वगच्छ ,भगवान्पावं शुम्भ निशुम्भयोः ॥ २४ ॥ ब्रूहि शुम्भ निशुम्भं च दीनया वति गर्विती । ये चान्ये दानवा स्तन युदाय समुपस्थिनाः । २६॥ ल्योक्य मिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः ॥ यूय प्रयात पाताले यदि जोवितु मिच्छय ॥ २६ ॥ वनावले पाथ चेद्भवन्तो युद्ध काइ क्षिणः ।। ददागच्छत् तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितने वाः ॥ २७ ॥ यतो नियुक्तो दौत्येन व्या रेल्या शिवः स्वयम ॥ शिव दूतीति लोके । ऽस्मिं स्ततः साख्याति मागता |॥ २० ॥ ते ऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शख्यिात महा- मुराः॥ अमापूरिता जग्मुर्यतः फात्यायनी स्थिता ॥ २६ ॥ ततः प्रथममेवाने शर शक्त्यष्टि युष्टि मिः ॥ ववर्यु रुवामा स्तान्देवी भमरायः ॥ ३० ॥ सा प तान्प्रहितान् वाणा श्लूल शक्ति पर स्रधान ।। चिच्छेद तीनयामाव धनुर्मुळे महभि. ॥ ३१ ॥ वस्थापवस्वथा काली शूल पान विदारि तान् । बट्वाङ्ग पोधिता श्वारोन् कुर्वको म्यचर चदा ॥ ३२ ॥ कमएदनु जला हेप हत थीयांन्दती जसः || प्रमाणो पारो च्दा न्येन येनरम धापति ॥ ३३ ॥ माहेसरी त्रिशूलेन क्या पण वैयरी ।। देयाजधान कौमारी सया शत्त्यादि कोपना ॥ ३४ ॥ ऐन्द्री फलिश पानेन शवशो देत्य दानराः ॥ पेतु विदारितः त्रयां अधिपायपिणः- ॥ ३५ ॥ नुरव पहार विभाना दष्ट्राम इन म.॥ वाराह मूत्या. न्यपवं पण प विदारिता. । ३६ । नर्स पिरित लान्या- [ ३२७ । दान सङ्कल्पः ॥ अद्येहेत्यादि पूर्व सङ्कल्प सिद्धि रतु अमुक गोत्रायाः अमुक नाम्नी देव्या ममसमस्त जन्म वाल्य यौवन । वार्धक्या वस्यो पार्जित कायिक बाधिक मानसिक सांसर्गिक सकल पापक्षय पूर्वकैहि कानेक विष निर वधिक भोगा नुभावा नन्तरं श्री परमेश्वर प्रीतये तिल तैला कान् घृताक्तान संख्य कान प्रज्वालितान् दीपान अमुक देववा राधन पक्षे ब्रह्मणे विष्णरे, ईश्वराय, देव्यगद्गायै, तुलस्य, सूर्याय, गणपतये समर्पया मोति शर्मपयेत् ॥ श्रय काश्य पान रोप्य पात्रस्य हेम वत्तिका दान मंत्रः॥ रौप्य पात्र स्थित दीप हम यत्ति समन्वितम् ॥ कांस्य पात्रेण सहितं ददामि प्रत पूर्तये ॥ ततो भूयमी दक्षिणा दानम् ॥ इदं ब्रा मवादेव कृतं प्रित्यै तब प्रभो! न्यून सम्पूर्ण सांयातु प्रसादा तव केशव ! | गृहीत्वाऽपि व्रतंदेव या पूर्ण करोम्यहम् ॥ न्मतयन्ती महा सुरान् । नार सिंही वचाराजी नादा पूर्ण विगम्वरा ॥ ३७ ॥ पण्डा टुहा सैरसुराः शिव दूत्यभि दू. पिताः ॥ पेतुः पृथिव्यां पतिताँस्वाँश्चखादाच साचदा ॥ १८॥ इति मान गणं कुद्धं मदयन्त महा सुरान् ॥ रष्टवाभ्यु पाविविध शुर्देवारि सैनिकाः ।। ३६ ॥ पलायन परान दृष्ट्वा दैत्यान्मार गणार्दिवान् ।। योद्ध मन्या ययो कद्धो रक्त वीजो महासुरः ॥ ४० ॥ रविन्दुर्घदा भूमोपतत्यस्य सरीरतः । समुत्पततिमेदिन्यां वरमायस्वदासुरः ॥४१॥ युयुधे सगदा पाणि रिन्द्र शत्या महामुरः ॥ ववश्वेन्द्रीस्व वनेण रक वीजमवाडयत् ३२ कुलिरोनाहवस्यारा बहु सुस्राव शोणीतम् ॥ समुत्तस्थुस्तको योधाम्नद्र पास्तस्पराक्रमाः ॥ ४३ ॥ यावन्तः पतितास्तस्य शरीरांद्रक विन्दवः ।। वावन्तः पुरुग जातास्तद्वीयं वल विक्रमाः ।।४४॥ ते चापि युयुधुस्तम पुरुपा रक सम्भः ॥समें मातृभिरन्त्यम रारातादि भीपणम ॥१५॥ पुनष वा पानज्ञवमस्य शिरोपदा । वह राम पुरपातो जाताः सहनशः ॥ ४६॥ वैष्णवी समरे चैनं चरणामिजपानह । गया वारस मासरेनी तममुरेश्वरम् ॥ ४॥ ॥ वैष्णवी च भित्रस्य धिर साव सम्भः। सहन शो जनश्याप्तं तत्ममाय महामुरेः ॥ ४६ शक्त्या पपान कौमारो पाराको प वासिना ॥ माथी मिलेन रफ वीजनहामुरम् ॥ ४ ॥ न पापि गड्या दैत्यः स एस इनवयक । मातः कोश समाविष्टोरत योजो महामुरः ॥ १० ॥ वा तस्य पधा शक्ति शुलादिनि नपि । पान यो घरकोयनासोर गगः ॥ १ ॥ रामुरामसम्भूतरतुर, सर्व अगन् । म्यान

भद्र मण्डलैक
[ ३ ]
तन्मेभवतुसम्पूर्ण वप्रसादारजनार्दनः यस्यस्मृत्येतिकायेनवाचेत्यादि नाप-
रमेश्वरसमlततोविसर्जनकुर्यात् ॥इतिलक्षवतिकादीपदानविधि समाप्ता।
पूर्वोक्तविधिमत्याचित्रानामन्यादेव्यासकल्पोकदेवानां चार्पणं कृतम् ।
अथ महाष्टमी व्रतप्रतिदा ॥ सर्वतो
देशे कलशं सम्पूज्य ॥ तदुपरि सुवर्ण प्रविमा तत्पूजाविधिना
सम्पूज्य रात्री जागरणं प्रातर्देच्या उत्तर पूजां विधाय ॥ ॐअथ महाशमी
अम्बे अम्बिकेति १०८ होम समाप्य प्रार्थयेत् ॥ महिपनि ! महा माये
चामुण्डे मुण्ड मालिनि ! ॥ द्रव्यमारोग्य विजयं देहि देवि! नमोस्तुते ।
भूतप्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरी! देवेभ्यो मानुपेभ्यश्च भयेभ्योर
क्षमा सदा ।। सव' मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्ध साधिके ।। उमे ब्रह्माणि
कौमारी विश्वरूपे ! प्र प्रसीद मे ॥ इतिसंप्राटर्य || नव ब्राह्मणेभ्यो यथा
शक्ति रक्त व प्रदक्षिणादि दान कुर्यात् ।।
मासीत्ततो देवाभयमाजग्मुरुत्तमम् । ५२ातान्विषण्णान्सुरान् दृष्ट्वापरि-
डका प्राइसत्वरा उवाच कालींचामुण्डेविस्तरवदनं कुरू: ॥५३॥ मच्छस्त्र.
पात सम्भू वान रक्तविन्दून्महासुरान ॥ रक्तविन्दोः प्रतीच्छत्यवक्त्रेणनेन-
वैगिता शामिनयन्ती चररणे दुत्पन्नान्महा सुरान् ॥ एवमेप क्षय दैत्य.
क्षीणरको गमिष्यति । ५५|| भक्ष्यमाणा स्वया चोमा न चोत्पत्स्यन्ति
चापरे । इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूले नाभि जपानतम् ॥५६||मुसेन काली
जगृहेरकवीजस्यशोणितम प्रदोऽसावाजघानाथगदणवत्रचण्डिकामा ५७/
न चास्या वेदनां पके गदा पातोऽलिप कामपि ॥ तस्या हवस्य
देहात्तु यहु सुस्राव शोणितम् ॥ ५८ ॥ यतस्तवस्तद्वक्त्रेण पामुण्डा
सम्प्रवीच्यति । मुसे समुद्रतायेऽस्या रक्त पातान्महासुराः ॥ ५६ || वाश्च
खादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणिनम् ॥ देवो शूलेन वप्रेण वाणी
रसिभि टिभिः ॥ ६० ।। जद्यात रक वीज चामुण्डा पीत शोणि-
तम् ॥ स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घ सभाहतः ।। ६१ ॥ नीरकन्च मही.
पाल रक्त योजो महासुरः ।। वतस्ते हप' मतुलमवापु खि दशा नृप ॥ ६२॥
वेपांमातृगणो जातो ननर्वासन मदोद्धतः ॥६३॥ इति मार्कण्डेय पुराणे
मायर्यायो मन्यन्तरे देवी माहात्म्ये रजवीज क्यो नामाष्टमोऽध्यायः ।
आय ॥ १ ॥
अश्लोक ६१ ॥ म०६३ ॥ एवमादितः ॥५०२॥
अथ ध्यानम्-मयूफ फायन निमांगचिराप मायांपाशापशीष
वादा निज वाहु दरई विधाण मिन्दु शकल भरणां विनेनामम्माम्बिके
शमनि यपुरा प्रयामि ॥ ॥ राजोपाप ॥ १॥ विपित्र मिदमात्यात
भाभयतामम देख्यारचरित माहात्म्यं रफीज पधाधितम् ॥२॥

[ ३२६.] अथ कुमारी पूजनम् . सुतिप्त भूमौ स्थापिता सनेषु प्राङ मुखीः कुमारीः संस्थाप्य संकल्प कुर्यात् ॥ अयेत्यादि मम कृतस्या मुकाष्ठमी अतरयो द्यापन कर्मणः प्रतिष्टा साङ्गता सिद्धये देवी प्रीत्यर्थ एसावसंख्याक कुमारीणां यथा सादत साममिणां पूजन पूर्व के भोजनं चाहं करिष्ये ॥ तासां पाद प्रक्षालनम् ॥ जगत्पूज्ये ! जगद्वन्दे सशत्रुविनाशिनि ! ॥ पूजां गृहाण कौमारि ! जगन्मात नमोस्तुते ॥ इति मन्त्रण पाद्यादि नैवेद्यान्वं समर्च्य विभवानुसारेण सौभाग्य द्रव्य वख भूपणा दोनि दद्यात् ।। खएड मोदक घृत दुग्ध दधि मधुनि यथा सुखं शनैः शनैः - जयेत् ।। तासां दत्ता च मनीया नां करेण तव पुष्पादिकं दत्वाप्रतिगृह्यविस येत भूयरवेच्छाम्यह श्रोतुं रक वीजे निपातिते ॥ चकार शुभो यत्कर्म निशुम श्चाति कोपनः॥ । पिरु वाच ॥४॥ चकार कोपमतुलं रत वीजे निपातिते ॥ शुंभा शुरो निशुभश्च हश्वन्येषु चाहवे ॥ ५ ॥ इन्य मानं महा सैन्यं विलोक्या मर्पमुहम् ॥ अभ्यधा पनि शुभोथ मुरन्यया सुरसेनंया ॥ ६ ॥ तस्यामत स्तथापृष्टे पाच योश्य महासुराः संदष्टोष्ट पुदाः क्रुद्धाहंतु देवी मुपा ययुः ॥ ४ ॥ आज गाममहावीर्यः शुभोपि स्वयले वृतः ॥ निहतुं चरिदका कोपात्कृत्वा युद्धंतु मामिः ।। ॥ ततो युद्ध मवी वासी देव्याः शुंभ निशुंभयोः ॥ शर वर्यमवी वोमं मेघयो रिय वर्षतो ॥६॥ विच्छता स्वाञ्छरां स्ताभ्यां चरिनुका स्वशरोकरः ॥ साया मास पांगेपु शस्त्रोघे रसुरेश्वरी ॥ १० ॥ निशुभो निशिवं खग धर्म पादाय सुपभम् ।। अतार यन्मनि सिंह" देल्या वाहन मुत्तमम ॥ ११ ॥ वाढिते वाहने देवी नुरप्रेणासिमुत्तमम् ॥ निशुभस्मा यपि च्छेद धर्म चा पृष्ठ पन्त्रकम् ॥ १२ ॥ चिन्ने धर्मणि खगेच शकि चिक्षेपमोमुरः ॥ तामप्यस्सद्विधा पके पप्रेणाभि सुखा गवाम् ॥ कोपाप्मातो निशुम्भोय शलं जमाह दानवः प्राय मुष्टिपानेन देवो वयाप्य चयन् ॥ १४ ॥ श्राद्धियाय गहां सोपि चिप पण्डिमां प्रवि, सापि देव्या प्रियजेन भिन्नामाम ॥ १५॥ ततः पर हस्तू द मापान्तं दैत्य पुरु गरम् । माइत्व देवी वापोये साव यत भूतले ।। १६ ॥ तस्मिन्नि पतिते भूमो निशुम्भे भीम विस्ने। भावयवीर संकट प्रपती इन्तुन विकम् ॥ १७ ॥ सरयरय स्तथा युगडीत परमायुः ।। सपनागता [ ३३०. ] अथ श्री विष्णु पूजन प्रयोग श्राचाम्य प्राणा नायाम्य भूतादि शुद्धिं संविधायशु शान्ति भवतु । मङ्गलोचारणम् --ॐ स्वस्तिनऽऽइन्द्रोवृद्धश्रवाः | स्वास्तिन: पूषा विश्व वेदा: स्वास्तिन स्वाक्ष्योऽअरिष्टनेमिऽ स्वस्तिनो वृहस्हति ईवातु ॥१॥ भद्दकर्णेभिऽ शृणुयाम देवा भद्रम्पश्येमा क्षमिवं जत्रा : स्थिरै रस्तुष्टुवा , सस्तनूभियंश महि देव हितं ययदायुः ॥ २ ॥ तम्पन्कोभि सुगच्छेम देवाःऽपुतिभि- मत वाहिरण्यैः । नाक गृभ्णानाःS सुझतस्य लोके तृतीये पृष्ठेऽअधि भुजै रष्टाभि रतुले व्याप्यां शेपं वभौ नमः ॥ १८ ॥ तमायान्तं समालोक्य देवी शद्ध मवा दयत् ।। ज्या शब्दं चापि धनुषश्चकरा वोवदुःसहम् १६ ॥ पूरयामास ककुभोनिज घण्टास्वने नच ॥ समस्त दैत्य सैन्यानां तेजी वध विधायिना ॥ २० ॥ ततः सिंहो महा नाटैस्त्याजितेभ महामदैः ।। प्रयामास गगनं गां तथैव दिशोदश ॥ २१ ॥ ततः काली समुत्पत्य गगनं दमामताडयत् ॥ कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनारतेविरोहिताः ॥ २२ ॥ अट्टाहा सम शिवशिव दूती च कारह ॥ तैः शरसुरारपुः शुम्भः को परंययी ॥ २३॥ दुरात्मविष्टतिष्टेतिव्याजदागम्बिका यदा ।। वदा-जयेत्यभिहितं देवैरा काशसंस्थितैः ॥ २४ ॥ शुभेनागत्यया शक्ति मुक्कावालातिभीपणा || पायांती वहिकूटा भासानिरस्ता महोल्कया ।। सिंहनादेन शुभस्य व्याप्तं लोक यान्तरम् । निर्वावनिः स्वनो घोरो जितया नवनी पते ॥ २६ ॥ शुभमुक्ताच्छरान्देवी शुभस्तत्प्रहिताच्छरान् ।। चिच्छेदस्वशरै रुः शत शोध सहस्रशः ॥ २७ ॥ ततः सा चरिता मुद्धा मूले नाभिजधानतम् ॥ सवदा निहतो भूमो मूर्छितो निप- पातह ।। २८ ॥ ततो निशुभः संप्राप्य चेतनामाचकार्मुकः ॥ भाजधान शरदेवों काली के शरिण तया ॥ २६ ॥ पुनश्च कृत्वावा वाहूना मयुवं दनुजेश्यरः ॥ चक्रायुधेन दिविजयादया मास चटिकाम् ॥ ३० ॥ ततो भगवती द्धा दुगो दावि नाशिनी।। चिच्छेद नानि प्रमाणि स्वशरैः सायमस्वतार ।। ततो नियुंमोयेगेन गदा मादाय चंडिकाम् ।। अध्यधा यतय हुनु दैत्य मेना ममा धृतः ॥ ३१ ॥ तस्या पवन एवाशु गर्दा निच्दिर परिसासनेन शिन धारेण सच मूल समादरे ॥ ३३ ॥ सूल हस्तसमायां निशुभ ममराईनम् हदि विवाधशूलेन येविढेनचरित का ॥३४॥ भिन्नस्य वस्य गुनेन दयानिः मतापः ॥ महावनी महागाम्बिय पुरुषोवदन ॥ ३४ ॥ वस्य नियमवो देवीपहायस्थन - । ३३१ ] रोपनेदिवऽ ॥ ३ ॥ नमस्कारा:-श्री मन्महा गणापि पतये नमः । इष्ट देववा भ्यो नमः । कुल देवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । वास्तु देवताभ्यो नमः । वाणी हिरण्य गर्भाभ्यां नमः । श्री उमामहेश्वराभ्यां नमः । श्री लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः । शची पुरन्दराभ्यां नमः । मातृ पितृ परणकमलेभ्यो नमः । सर्वे. म्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । निविघ्न-मस्तु ।। सुमुख श्चैक वन्तश्च कपिलो गज कर्णकः । लम्बोदरश्चविकटो विघ्न नाशो गणाधिपः ॥ धूम्र केतुर्गणाध्यक्षो भान चन्द्रो गजानन० ॥ इत्यादिभि मन्त्रैर्गणेशं सम्पूज्य वत्र-सङ्कल्पः-ॐ विष्णु ३- वत्ततः ॥ शिरश्चिच्छेदखगन ततो सार पतचि ।। ३६ ।। तत.सिंह श्चखादोनदंष्ट्राचएएशिरोवरान् ॥ असुयंस्तांस्तथा काली शिवदूती तथा परान् ॥ ३ ॥ कौमारी शक्ति निभिन्नाः केचिन्नेशुमंहासुराः ।। प्रमाण मंत्र पूतेननोये नान्येनिराकृताः ॥३॥ माहेश्वरीनिशूलेन भिन्नाः पेत्तुस्तथा परे । वाराही तु द्यावेन केचिच्चूर्ण कृता भुषि ।। ३६ ॥ खंडखंड च चक्रेण वैष्णन्या दानवाः कृताः॥ बग्रेण चेद्रो इस्वाम विमुक्केन वधा परे ॥४०॥ केचिद्विने शुर सुराः केचिन्नप्टा महाहवात् ॥ भविताश्चापरे काली शिव दूतीमृगाषिः ॥४१॥ इति मार्कण्डेय पुगणे सारणिके मन्वन्तरे देवी माहाल्ये निशुम्भ वो नाम नवमोऽध्यायः ME॥ वाच ॥ २ ॥ श्लोक ॥३: ।। परं ॥ २१ ॥ परमा- दितः ॥ ५५३॥ अथध्यानम्-उत्तप्त हेम रुचिरा रवि पन्द्र यहि नेत्रां धनुरशरयुता कुश पाश शूलम् ।। रम्यभुजैरव दधतीं शिव शक्ति रूपां कामेश्वरी दि भजामि धृतेन्दु लेखाम् ॥ १०॥ पिरुवाच ॥१॥ निम निहत रख्या प्राचरं प्राण समिवम् ॥ हन्यमानं पल र मुरोग्यधी दरः ॥२॥ वला व पाद् दुष्टे वं मादुर्गे गर्नमा वह ।। अन्यासां चल मा श्रित्य युद्ध सेयाति मानिनी ॥३॥ देन्युवाच ॥ ४॥ एकराई प्रगत्यर द्वितीया काममापरा।। भता दुष्ट मोर सियो मतिभूतयः ॥ शुपितराय ॥५Bo: समस्या स्वारेन्यो प्रमाणि प्रमुसायम् ॥६॥ an देण्यास्वनी जग्मुरे वासीसमाविका ॥७॥ देश्या 15॥ई विभूत्या बहुभि रिये यंदास्थिता । परस न मो याविष्टा म्यानी थिमा ॥ ॥ अपिलराम ॥ १० ॥ ताः प्रा। युरयाः शुभस्य गोनयोः ॥ परतां सरानान मुरारामा पापम् ॥ ११॥शरवः .

[ ३३२ ] श्री मद्भगवनो महा पुरसस्य विगु राक्षया प्रवर्त्त · मानस्य श्रा अक्षणः द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे श्रष्टा विशति तमे युगे कलि प्रथम चरणे जम्बू द्वीपे भारतखण्डे बद्रिका अमे भारत वर्षे श्रार्या वर्ता न्तर्गतहिमपर्वतक देशे केदार खण्डान्तर्गत पुण्य क्षेत्रे अलक नन्दामन्दाकिन्यो मध्ये बौद्धा वतारे अस्मिन्व तैमाने अमुक नाम संम्वत्सरे अमुका ऽयचे अमुक्ती अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक वासरे अमुक तिथी अमुक नचत्रे अमुक राशि स्थिते चन्द्रे अमुक राशि स्थिते श्री सूर्ये अमुक राशि स्थिते देवगुरी शेषेप, ग्रहेषु यथा वयं राशि स्थानस्थित तेषु सत्सु एवं गुणविशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्यतिथी मम ऽत्मनः शितैः शस्त्रस्तथास्त्रं चैव दारयोः तयोयुद्ध मभून या सर्व लोक भयं करम् ॥ १२ ॥ दिव्यान्यस्त्राणीस शो मुमुचे यान्यथाम्बिका व भंजतानि देत्येन्द्रस्तत्प्रवीघात कमि ॥ १३ ॥ मुक्कानि तेन पास्त्राणि दिल्यानि परमेश्वरी ॥ व भंजलीलये वोग हुंकारोधारणा दिभिः ।। १४ ॥ ततश्शर शर्देवी माच्छादयत सो सुरः ॥ सापि कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेपुभिः ॥ १५ ॥ छिन्ने धनुपि देत्येन्दुस्तथा शक्ति मया द॥ चिच्छेद । देवी चक्रेण ताम प्यस्य करेस्थिताम् ॥ १६ ॥ ततः सन मुपादाय शव चन्द्र च भानुमत् ॥अभ्ययावत्तदादेवीदे त्याना- माधिपेश्वरः १७ ॥तस्यापततएयाशुखनविच्छेद चाडिका ।। धनुर्मुक्तः शिव- वारीचामंचाकरामनम् ॥ १८ ॥ हवाय सवदा दैत्य रिछनधनाविशा रथिः ।। जपाइ मुदरं घोरमविका निधनोद्यवः || १ || छिदापततस्तस्य मदर निशितैः शरैः ॥ क्यापिसोम्यधा वत्ता मुष्टि मुद्यम्य वेग थान् ॥ २० ॥ समुष्टिं पातयामास हृदयदैत्य पुनयः ॥ दन्यास्त पापि सा देवी उलेनी रस्य वाडयत् ॥ २१ ॥ वन प्रारामिहतो निप पातमही तले ॥ स देत्य राजः सहसा पुन रेख तोत्थितः च प्रगृह्योपयों गगन मास्थितः ॥ वत्रापि मानिराधारा युयुधे तेन पंरिका ॥ २३ ॥ नियुद्धसे तदा दैत्यर. विकाच परस्परम् ॥ चतुः प्रथम सि मुनिविस्मय कारकम् ।। नठोनियुद्ध सुचि त्या तेनाविका सह ॥ २५ ॥ इत्पादन भ्रामया मास पितेप धरणी वले ॥ २५ ॥ तिमी धरणी प्य मुष्टि मुचन येगितः ॥ मम्यचायत दुप्टात्मा गहिका निपने परा ॥ २६ ॥ ममा यावं नवोदशी मयं देत्य जन श्वरम् । जगत्यां पादया मास नित्या ग्रसेन बसि । २७ ॥ सगा मुः पपा .. ॥ २२ ॥ उत्पत्य [ ३३३ } श्रुति स्मृतिपुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं(मम ऐश्वर्याभि वृद्धयर्थम् ।अप्राप्तलक्ष्मी- प्राप्यम् । सकलमनईप्सितकामनाससिद्धयर्थम् । लोकेवासभायांराजद्वारेवा सर्वत्रयशोविययलाभादिप्राप्त्यर्थम्इहजन्मान्तरेवासकलदुरिवोमशमनार्य तथा ममसभार्यस्य सुपुत्रस्य सुवाधवस्यअखिलकुटुम्ब सहितस्य स पशोः समस्त भय व्याधि जरापीडामृत्यु परि हार द्वारा आयुरारोग्यैश्वर्यामि युद्धयर्थम् । तथा मम जन्मराशेर खिल कुटुम्बस्य वाजन्मराशेः सकाशाद्ये कैचिद्वरुद्ध चतुर्थाष्टमद्वादशस्थान स्थित क्रूर प्रहास्तै सूचितं सूचियिष्य मारणं च यत्सर्वारिष्ठंतद्विनाशदारा एकादश स्थान स्थिर वच्छुभ फल तोा देवी शूलाग्र विक्षित ॥ चाल यन्स कलां पृथ्वी साप्ति द्वीपांसपर्वताम्।।२।। ततःप्रशन्नमखिलंहतेतारिभन्दुरात्मनि जगत्स्वास्थ्य वीवापनिर्मलं चाभवनमः उत्पातमेधारसोल्काये प्रागाहस्ते शमं ययुः ।। सरितो मार्ग वा हिन्यस्तथा सस्तत्र पातिते ॥ ३०॥ ततो देवा गणाः सर्ने हर्ष निर्भरमानसाः । वभू दुनिहते तस्मिन्गधर्वा ललितं जगुः ॥ ३१ ॥ अवादयंस्तेथे वान्ये नघृतु श्वाप्सरोगणाः । वयुः पुण्यास्तथा स्वस्ववासुप्रभोभूदिवा करः ।। जन्मलुश्चाग्नरपंतांगपशांता-शांव दिग्जनिः ॥३२॥इविमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वन्तरेदेवीमाहात्म्येशुंभ षधो नामाद- शमोऽध्यायः||१०उवाचाशाप्रधशाश्लो॥२७॥ एवमादितः ।। ५७६ ॥ अथध्यानम्-वालर विद्युति मिन्दु किरीटां तुन कुचां नयन श्रय युक्ताम् ॥ स्मेरमुखी वरदा कुरा पाशा भीति करी प्रभजे भुवनेशोम् श्वपित्वाच ॥ १ ॥ देव्या हते तत्र महासुरेदेसेंद्राः सुरा वहि पुरोग मास्वाम् कात्यानी तुष्टुव रिष्ट लाभाद्धिकासिवकतान्जाविकासि ताशाः ॥२॥ देवि प्रपन्नातिहरे प्रसीद, प्रसीद मावर जगतो पिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं । त्वमीश्वरी दोविचरा घरस्य ॥ ३ ॥ आधार भूता जगस्त्वमेका । मही स्वरूपेणयतः स्थिवासि अपां स्वरूप स्थितया त्वयेत दाप्यायते कृत्स्नमलध्यवीर्ये ॥ ४॥ त्वं प्एवी शक्ति रनंत योयो विश्वस्य वीजे परमासि माया ।। सं मोहितं देवि समस्त मेत व प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥२॥ विद्याः समस्ता सव देवि भेदाः बियः समस्ताः सकला जगत्सु ॥ लयकया पूरितम वयैवत् । कावेस्तुतिः स्तव्य परापरोक्तिः ॥ ६॥ सा भूतायदा देवो स्वर्ग मुक्ति प्रदायिनी॥ सुवास्नुवये झावा भवति परमोतयः । ७समगां बुद्धि रूपेय जनस्य हदि संस्थिते । स्वर्गा परर्गदे देवि नारायणि नमोस्तुते ॥ ८॥ कला काप्टादि पेण परिणाम प्रदायिनि । विश्वस्यो परतोश नारायणि नमोस्तुते ॥ ३ ॥ सर्व मंगलमा मंगल्ये शिरे सायं साधिके । शरण्ये - । ३३४ j प्राप्त्यर्थम् । पुत्र पौत्रादि सन्तते रविच्छिन्न वृद्धयर्थम् । श्रादित्यादि नवमहानु फूललवा सिद्धयर्थम् । तथा इन्द्रादि दशदिक्पाल प्रसन्नता सिद्धययम् । अधिदेविकाऽधिभौतिकाऽध्यात्मिकत्रिविध तपो पशम नार्थम् । धार्थ काम मोक्ष फलावाप्त्यर्थच : भू भुवःस्वः श्री लक्ष्मी नारायण अनन्तो प्रीत्यर्थ यथा ज्ञानेन यथामिलिटोपचार द्रव्यैः पुरुष सूतनध्याना वाहनादि पोडशोपचार सहितस्य अनन्तो पचारैः पूजन महं करिष्ये। तबादीपडङ्ग न्यास पूर्व के पुरुष सूक्त पोडशाङ्ग न्यात पूर्वकं वा। कशशादि पूजन करिष्ये ॥ ॐ भूर्भुवः कलशस्य करणाय नमः आवाहयामि सर्वो पचरार्थे गन्धाक्षत पुष्पाणि समर्पयामि । त्र्यंबके गौरि दारायणी नमोस्तुते ॥१०॥ सृष्टि स्थिति विना शानां शक्ति भूसना दनि । गुराश्रयेगुणमये नारायणि नमोस्तुते ॥११॥ शरणागत दोनातं परित्राण परायणे । सर्वस्यानि हरदेवि नारायणि नमोस्तुते १२॥ हंसयुक्त विमान स्थे ब्रह्माणी रूपधारिणि || कोराभिः तीरके देवि नारायणि नमोस्तुते ॥ १३ ॥ त्रिशूल चन्द्राहि धरे महावृषभ वाहिति माहेश्वरी स्वरूपेण नारायणि नमोस्तुते ॥ १४ ॥ मयूर बुक्कुट घृते महाशक्ति धरे नये ।। कौमारी रूप संस्थाने नारायणि नमोस्तुते ॥ १५॥ शंस चक्र गदा शहं गृहीत परमा युधे प्रसीद वैष्णवी रूपे नारायणि नमोस्तुते ।। १६ ।। गृहीतोग्रमहाचक्रे राष्ट्रोद्धृत वसुंधरे ॥ वाराह रूपिणि शिव नारायणि नमास्तुते ॥ १४ ॥ नृसिंहरू पेणोणो इन्तु दैत्याक तोद्यमे त्रैलोक्य वाणसहिते नारायणि नमोस्तुते ॥ १८ ॥ किरीटिनि महा को सहन नयनोज्यले ॥ वृत्र प्राणहरे पेंद्रिनारायणि नमोस्तुते ॥ २० ॥ दंष्ट्रा करान वदने शिरोमाला विभूपणे ॥ चांमुडे मुंड मथने नारायणि नमोस्तुते ।। १|| लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे धुवे ।। महारात्रि महाविद्ये नारायणि नमोस्तुते ॥ २२ ॥ मेधे सरस्वति वरे भूतियानविद्यामसि ।। नियते त्वं प्रसीदेशेनारायणि नमोस्तुते । २३॥ सा स्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते ॥ भयेभ्यत्राहिनोदेवि दुर्गा देवि नमोस्तुमा २४ ।। एतचे पद साम्यं लोचनं प्रय भूषितम् ।। पादुना सर्वभीविम्युः कात्यायनि नमानुस्ते ॥ बाला काल मत्युम मरोपामुर सूदनम् ॥ त्रिशूल पानुनोमोनिभद्र कानि नमोस्तुते ।। दिनलि दल तेजांसि स्वना पूर्वया जगन् ।। सार्घटी नुनो देवि पापेभ्योनः मुनानिय ॥ २५ ॥ असुरा स्मृण्यसा पंक पतिस्ते करोचला। गुभाय मनोमय पदिके व नवाश्यम् ॥२८॥रोगा नशेपा नपि हंसि नुप्टा गप्पा तु कामान्मकला नभीष्टान् । सामाभितानां न विप.

। [ ३३५ ] नमस्करामि। अनन्तरं कललशोदकेन पूजा द्रव्याणि सथाऽत्मानं च- अावित्रः श्रापोहिष्टा । इत्यादि मन्त्रण पासम्प्रोक्ष्य यथा-अपवित्रः॥ पवित्रो वासा वस्थां गतोऽश्विा । यास्मरेत्पुण्डरी का स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ॐ आपोहिष्टा मयो। भुवस्तानऽउर्जेदधावन । महेरणाय चतुशे ॥५॥ यो व शिर उमो रसस्तस्य भाजयतेहन : उशतीरि वमातरः ॥ ६ ॥ तम्माऽअरङ्गमामवीयस्यतयायजिन्वय । आपो जनयथा चनः ॥ ७॥ पश्चात्कलकलशशमुद्रा प्रदर्य || शहपूजनम्- शादी चन्द्र देवत्यं कुक्षौ वरुण देवता। पृष्टे प्रजापतिश्चैव अप्रेगङ्गा सरस्वती। रैलोक्ये यानितीर्थानि वासुदेवस्य चाज्ञया ।श विष्टन्ति विप्रेन्द्रतस्माच्या प्रपूजयेत् । त्वम्पुरासागरोत्सन्नीविष्णुनाविधृतःकरे । नि- मितःसर्वदेश्चगवन्यायनमोस्तुतेपाञ्चजन्यानविद्महेपाक्मानायधीमहि। न्नराणां त्वामा धिताह्याश्रयतां प्रयांति ।। २६ ॥ एतत्तयकदनं त्वयाऽय धर्म द्विषां देवि महासुराणाम् ।। रूपैरनेवहुधात्ममूर्ति । कृत्वाऽम्बिके वत्प्रकरोविकाऽन्या ॥३० ॥ विद्यासु शास्त्रे पुविवेक दीपे । प्वायेषु वाक्येपुचका त्वदन्या ॥ ममत्वगति महांधकारे। विभ्रामयत्ये तदतीव विश्वम् ॥ ३० ॥ रक्षांसि यत्रोमविपारच नागा यत्रारयो दस्यु वलानि यत्र ।। दावा नलोयर क्याधि मध्ये तस्थिवावं परि पासि विश्वम् ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरित्वं परि पासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् ।। विश्वेश वन्द्या भरती भवंति ॥ विश्वा प्रयायेत्वयिमति नाम्नः ॥ ३३ ॥ देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते नित्यं यथा मुरवधा दधुनैर सधः। पापानि सर्व जगवां प्रशमं नयाशु । उत्सात्ताक अनिवारच महोपसगान् ॥ ३४ ॥ प्रणवानां प्रसीदत्वं देवि विवाति दारिणी ।। लोक्य वासिना मीत्ये लोकानां वरदा भर ।। ३६ ॥ देव्युवाच ।। ॥३७॥ या दाई मुरगणा वरं यमनसेच्चय ।। युगुम प्रयच्यामि जगतामुपकारकम् ॥ ३७॥ देवापुः ॥ ३८॥ सर्वा वाधा प्रेशमन प्रैलोक्याया सिनेश्वरि ॥ एष मेस्त्वया कार्य मस्मरि रिनाशनम् ॥ ६ ॥ देव्युवाच ॥४०॥ वैवखते रे प्राप्ते श्रष्टा शितिमेयुगे । भुमो निशुभ रगन्या युतस्पते महानुणे ॥ ४६॥ नह गोर गृह जाता यशोदा गर्भ संभरा । ततस्ता नारा यियानि विद्या पज़ निवा सिनी ॥५२॥ पुनरप्पति रौद्रेश ए पृथिवी वजे ॥ मावा हनिम्नानि वै पितांस्तु दान गान् ॥४३॥ भवत्याचवामान्यैः पित्तानासुरान रहा इन्वा भविष्यन्ति दादिनी ममोपमाः ॥४४॥ को मां देवताः स्वगं नवं लोकेर नानाः । सुनसरी ज्या रिम्वनि पुष्पाणि समर्पयामि [ ३३६ ] तन्न शङ्ख प्रचोदयात् ।।) ॐ अग्नि ऋ पिऽ परमान 5 पाञ्चजन्य पुरोहित 5 तमीमह महागयम् ॥ ८॥ ॐ भू मुंव व शद्धस्थ देवतायै नम आवा हयामि सों पच्चारार्थे गन्ध नमस्करोमि । शङ्कमुनामदर्य ।। (घरटा पूजनम् ) आगमार्थ तु देवाना गमनाथै तु रक्षसाम् । घण्टा नादं प्रकुर्वीत पश्चाद् घण्टा प्रपूनयेत) ॐ सुपर्णोसि ॥ गहरूमास्त्रि वृत्त शिरो गायव्यञ्चतु-गृहद्रथन्तरे पदी । स्तोमऽआरूमा छन्दा । स्यङ्गानि यजू । पिनाम । सामते तनु म देव्यप्येज्ञायज्ञियामुन्धिष्ण्या s श फा5 ॥ सुपोसि गरत्वमान्दि वगच्छस्व-पत || ६ ||--ॐ भू भुव स्व घण्टास्थाय गरुड़ाय नम आवाहयामि। सवों पचारार्थ गन्ध पुष्पाणि समपयामि नमस्करोमि । घण्टामुद्रा प्रदर्य ॥ अथ क्षेपकम्-ततो दीप पूजन भक्तयादीप प्रयच्छामि देवाय परमात्मने । ताहि मानिरयाद् घोरा हीप ज्योति नमोऽस्तुते ॥ ॐ अग्नि नयाँति ज्योति गग्नि स्वाहा सूर्यो जयोति जयोति । सूर्य स्वाहा अग्नि चर्चा जयोति व्य' स्याहा सूर्या ठपर्श ज्योविव्यर्च 5 स्गहा ॥ ज्योतिऽ सूर्यऽ सूर्या ज्योतिऽ स्वाहा ॥ १० ॥ सतत रक दतिकाम् । ४५ ॥ भूयश्च शतवार्पिक्या मनावृष्टया मनभसि ।। मुनिभि सस्मृता भूमी सभविस्याम्य योनिना व शतेन नेत्राणा निरीविष्यामि यन्मुनोत् ॥ कीर्तयिष्यन्ति मनुना शताक्षी मितिमावद ॥४.॥ ततोऽइम सिल लोकमात्म देः समरे । भरिप्यामि सुग शाकै रप्टे प्राण धारक ॥४॥शा भरीति विक्ष्यातिदायास्या भ्यद भुवि ।। उषय पधिप्यामि दुगमारल्यमहामुरम् ।।४०॥ दुर्गादेवीति विदयारावरमेनाम भविष्यति । पुनरचाह पदाभीम रूपं छत्वा हिमामले ५० रशासिभा यिष्यामि मुनीना बाण कारणात् ॥ तदामाँ मुनय सर्वेस्तो प्यत्या ननमूलय ॥ ५३ ।। भीमा देवोति विक्ष्यात वन्मे नामभविष्यति ।। सारुणाग्न्यत्र लाक्ये महापापा फरिष्यति ॥ ५२ ।। ददाई भ्रामर रूप रग माययार पदम् ॥ नाक्यस्य हितार्थाय पषिप्यामि महा मुरम् ॥ ५३ ।। धामी घमा सोकावदाम्चोयनुसरत ॥ इत्य यदा या यावा या भविष्यति ॥ ५४ || पदावा पीयांह फरिश्य म्परिसम||4|| पनि मार गुपये सापशि क म यन्तरेर सो माहारये यो मा नागपणा विनाम एकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥ उपाप ॥४॥ अर्थ।। लोग। २० पाम् 1 44 1 सामानि ॥ ६३. । भूभुन र गन्धा- रोमि ॥ [ ३३७ ॥ दीपस्थ देवतायै नमः अावा हयामि सर्वो पचारार्थे क्षत पुष्पाणि समर्पयामि नमस्क ध्यानम्- शान्ताकारं भुजग शयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगन सहशं मेघवर्ण शुभाम् । लक्ष्मी कान्व कमल नयनं योगि. भिभ्यान गम्यं वन्दे विष्णु भवभय हरं सर्व लोकैकनाथम् । अथ-ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नास्थो विष्णोस्यूरसिव्विष्णो दुयोसि ॥ वैष्णव मसिविष्णवेत्वा ॥ १३ ॥ अथ विष्णोरावा हनम् ।- पावादयेत्तं गरुड़ो परिस्थितं रमा देहं सुरराज वन्दितम् । कन्सान्तकं चक्र गदाज हवं भजामि देवं वसुदेव सूनुम् । ॐ विष्णुविचक्रमेधा निदधे पदम् । समूढ मस्य पा ॐ सुरे स्वाहा । आवाहनम्-पागच्च भगवन् देव स्थाने चात्र स्थिरो भव । याव (पूजां करिष्यामि ताक्व सन्निधौ भव ॥ ॐ सहस्रशीर्पायुरुप : सहस्राक्षः सहस्रपात् ।। अथ ध्यानम-विद्युद्दाम समप्रभा मृगपति स्कन्धस्थितां भीपणां कन्याभिः कर बालरोट विलसद्धस्ताभिगसेविताम् ।। हस्ते चक्र गदासि सेट व्यिशिखा श्चापगुण तर्जनी विभ्राणामनलामिका शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रभिजे १२ ॥ देव्युवाच ॥ १॥ एभिःस्ववैश्चमां नित्यं स्वोप्यतेयः समाहितः । तस्याई सानां वाधा नाश यिष्याम्य संशयम् ॥२॥ मधु फैटभ नाश चमहिषासुरघातनम् ।। कोर्तियिष्यंतियेतद्रधं शुंभनिशुभयोः ।। ३॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चर्क चेतसः ॥ श्रोष्यति मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥ नवेषां दुष्कत किंचिदुष्वोस्थान चापदः । भविष्यति नदारिद्रय न घेष्टयियो जनम ॥५॥ शत्रुटोन भयं तस्य दस्युतोवानराजतः ।। न शस्त्रा नलतो योपाकदाचिसं भविष्यति । ६॥ तस्मान्ममैवन्माहात्म्य पठि वन्यं समाहितः। श्रोतव्यं न सदाभस्या पर स्वस्त्ययनहितत् ॥ ७॥ उस न शेषस्तु महामारी समुद्भवान् ॥ तया विविध मुत्पात माहात्म्य समयेन्मनाने वत्तव्य सभ्यम् नित्यमाय वनमम सदान दिनो. क्ष्यामिसानिध्यं तत्र मेस्थिनम् ॥ ६ ॥ यलिप्रदाने पूजाया मग्निकार्य महोत्स। सममैव चरितमुधार्य माध्यमेव ॥१०॥ जानवा जानवा वापि बलिपूजा तथा वाम् ।। प्रतोधिप्याम्पई प्रीत्यावह होम तथा पवम् ॥११॥ शालाले महाजामियतेयार वापिंडीवस्या मने वन्माह भुत्वा मकि समन्वितः ॥ १२ ॥ मां पाधाविनिमुको धनधान्य मुंवान्वित मनुष्योमरसादन भविष्यवि नसरायः ॥ १३ ॥ भुता मभेदन नाहान वयागोपचय. गुः ॥ ५॥ मम प युद्धेषु प्राव चैवये भक्त्या अनन्त [ ३८ ] म भूमि सव्य तरपृत्वात्यतिष्ठदशाङ्ग लम् ॥ ॐ ॥ भूभुत्र स्व. श्री विष्गुनारायण ( देववाभ्यानमः आवाहन पूर्वकं ध्यानं समर्पयामि ॥ श्रासनम् ॥ रम्यं सोभनं दिव्यं सर्व सौख्य करं शुभम् । श्रासनं च भयादत्तं गृहाण परमेश्वर ॥ ॐ पुरुषऽऐवद छ मध्यय्यद्भतंय्यच भाभ्यम् । उवामृतत्वस्येशा यदन्ने गतिरो हवि !! ॐ भूर्भुवः स्वः श्री विष्णु लक्ष्मीनारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः आसन समर्पयामि ! पाद्यम्- उष्णोदक निर्मलं च सर्व सौगन्ध्य संयुतम् । पाद प्रक्षालनार्याय दत्तं ते प्रति गृह्यताम् ॥- ॐ एता वानस्यं । महि मातो ज्यायां वरुप : । पादो स्याव्यश्वा भूतानि त्रिपादन्या मृतदिति । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्यो नमः पाद्यं समर्पयामि ॥ अर्थम्--अध्यं मृहाण देवेश गन्ध पुष्पक्षतैः सह । करुणा कर मेदेव गृहाणाय- नामो ऽस्तुते ॥ ॐ विपा दूर्द्ध ऽउदै सुरुष 5 पादो स्यहा भवच. पुन : ततो धिप्पडङ- व्यका मत्सा शना नशने आभि । ॐ भूर्भुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवता- निर्मयः पुमान् ॥ १४ ॥ रिपवः समय याति कल्याणं चोपपद्यते ।। नंनते च कुलं पुसा माहात्म्यं मम एवताम् ।। १५ ।। शांतिकमणि सर्वत्र तथा दुः स्वप्न दर्शने ॥ प्रह पीड़ा शुनी प्रासु माहात्म्य सृणुयान्मम ॥ १६ ॥ उपसर्गाः शमं यांति प्रह पीडाश्च दारुषाः॥ दुः स्वप्न च नृभिईष्ट सुस्वप्नमुप जायते ॥ १७ ॥ वाल प्रहाभि भूतानां यालानां शान्ति कारकम् ॥ सघातभेदे १ नृणां मैत्री करणमुत्तमम् ॥ १८ ॥ दुचा नाम शेषाणां वलदानि करं परम् ।। रक्षा भूत पिशाचानां पठना देर नाशनम् ॥ १६ ॥ सर्व ममेला माहात्म्य मम सन्निधि कारकम् ॥ पशुपुष्पा पे रखगध दी स्तथी तमः ॥ २० ॥ वित्राणां भोजने हामः प्रोतहोयरेहनिशम् ।। भन्ये श्वविविध भोगेः प्रदाने दात्सरेणया ।। ‘कयते सास्मि सदु धरिते श्रुते ॥ भूत हरवि पानानि तथा रोग्य प्रयच्छति ॥ २२ ॥ रमों का भूतम्यो जन्मनो कीर्तनमम ।। युद्धषु पनं यन्मे दुष्ट पत्य निईणम् ॥ २३ ॥ वारिम भुते र नं भर्य पुंसां न ज्ञायते ॥ युप्माभिः स्तुतयो गारच याच प्रमानिभिः पुगः ॥ २४ ॥ प्रदाणाच वास्तासु प्रयच्छन्ति सभामविम् ॥ भरण्यं प्रान्तरे वापि दायामि परिवारितः ॥ २५ ॥ • | प्रीतिम . 1 ३३६ ] भ्यो नमः अर्थ समर्पयामि ॥ आचमनम् -सब तीध समायुक्त सुगन्धि निर्मल जलम् । आचम्यतां मया दत्तं गृहीत्वा. परमे- श्वर ॥ ---ॐ ततो विराड जायत विराजो अधि पुरुप । स जानाऽ अत्यरिचयत परवाढूमि मधो पुर : ॐ भूर्भुवः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्यो नमः पाश्मनीयं समपयामि । स्नानम्- गङ्गा-सरस्वती या पयोष्णी नर्वदा जले. । नापितो ऽसि मया देव तथा शान्ति कुरुष्वमे ॥ ॐ वस्नायता सद्यतः : सम्भृत- पदा जयम् । पy स्वॉ श्चके वायळ्या नारत्याग्ना म्म्या रवये । ॐ भूसुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः स्नान स. मर्पयामि ॥ [अथ क्षेपकम्-पञ्चामृतस्नानम्-पयो दषि धृत चमधु च शर्करायुतम् । पञ्चामृतं मयानीतस्नानार्थ प्रति गृयताम् ।-ॐ पञ्चनद्यः सरस्वती मपि यन्ति सस्रोतसः । रखतीतु रचना मोशे भरसरित ॥ दस्युभिः वांवृतः शून्ये गृहोतो वारि शत्रुभिः ॥ सिंह न्याना नुया तोरा वनेवा वन हस्तिभिः ।। २६ ॥ राना क्रुद्ध नचा शप्तो यो धरातापिया। प्राणिवोवा पातेन यतः पोत महार्ण ॥ २७॥ पवत्सु चापि शस्त्रेषु संग्राम भृश दारणे ॥ सर्व चाधा सुघोरासु वेदनाभ्यर्दितो पिया ॥ २८ ॥ स्मरन्ममतमरिनं नरो मुन्येत संघटात् ।। मम प्रभारिसडाद्या दस्यको वैरिस स्तयाः दूरा देय पजागन्ते स्मरत श्चरित मम ॥ ३० ॥ ऋपर वाच ॥ ३१ ॥ इत्युक्ता मामवरती चडिका चंडविक्रमा ॥ ३२ ॥ परयता मेव देवानां वयां तरधीयतः ५ तेपि देवा निय तकाः स्याधि कारा न्यथा पुरा ॥ ३३ ॥ यक्ष भाग भुज. सर्वे चषिनि हतारय. ५ देत्याय देव्या निइने शुभे देव रिगेयुधि ॥ ३४ ॥ जगद्वस के वस्मि न्महामे तुर विस्ने । निशुभेच महा यो रोपाः पानाज मा ययुः ॥ ३५ ॥ एवं भगरती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः ॥ संभू। कुरुत भूप जगत. परिपालनम् ॥ १६॥३वन्मोपतेविश्व मैमिनसूयते । सायापिना विज्ञानं तुधा ऋद्धि प्रयच्छति ॥ ३७ ॥ सप्तं वयेतत्स. कलं मगाउ मनु र ॥ महा काला महा छाल महामारी स्वरा ॥ ३॥ सैर काले महामारो मंच नृष्टि मत्यना। स्थिति करोति भूनानां सैर काले मनाउनी ५.३६ ॥ भर काले नग्णां शेष लदी कि प्रदा गृहे । मेगा भार वथा लक्नीविना सायो पशुपते ॥ ४० : स्ना संपूजिता पुमे धूपं गन्मादिभि सया निवितं पुपारप मधि गनि गुभाम् श्री मार । ३४० ) शुद्धि माप्तोनि ॐ भूर्भुवः स्व. श्री लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः एक मन्त्रण पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि ॥ शुद्धोदक स्नानम्-ॐ आपो अस्मान्मातरः सुन्ध यन्तु घृतेन नो धृतस्वः पुनन्तु ॥ विश्व हरि पिम्प्रवहन्ति देवीं रुदि दाम्यः शुचिरा पूत एमि । दीक्षान्तं पसस्ति नूराशिस्त्रां तां शिवा ॥ ॐ शगमा परि ये भद्रं वर्ण पुष्पन् । परमा- नन्द वोधाब्धि निमग्नं निजमूर्तये । सांगोपांग मिदं स्नानं कल्पयाम्यह मोशिते ॥ ॐ भू भुवः स्व. श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्यो नमः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ॥ श्रापमनीयम्- अद्धिप्टोप्य शुचि वापि यस्यस्मरण । मात्रता तस्मैते पुनराच मनीयकम ॥ ॐ भुवः स्वः श्री लक्ष्मीनारा- यण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः प्राचमनीयं समर्पयामि ॥ अथवा पृथग्मन्त्रोण पश्चामृत स्नानम्-तत्र-पयः स्नानम् कामधेनु समुत्पन्न सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थ मर्पितम् ।- पुराणे सावणि के मन्वन्तरे देव्याश्चरित माहात्म्य नाम-द्वादशोध्याय. ॥ १२ ॥ उवाच २ अर्घ २ शोक ३७ एवम् ४१ एवमादितः ६७१ ।। अथध्यानम्-यालार्क मण्डला मामा चतुर्बाहु त्रिलोचनाम् ॥ पाशा कुश वरा भीती द्धर यन्ती शिवांभजे ।। १३ ।। ऋपिल्याव ।१।। एतचे कथितं भूप देवी माहात्यमुत्तमम् । एवं प्रभावा सादेवी ययेदै चार्यते जगत् ॥ २॥ विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णु मायया । तया त्वमेव अश्यश्व वय वान्य विवेकिनः ॥ ३॥ मोह्य ते मोहिताश्चैव मोह मेष्यति पापरे ।। सामु हि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ।। ४ । आप धिवा संघ नृणां भोगस्वा पवर्ग दा॥ ५॥ मार्कण्डेय उवाच ॥६॥ इति तस्यवचः श्रुत्वा सुरथः सनराधिपः ॥ ७॥ प्राणिपत्यमहाभाग तमपिं सांशित प्रवम् ।। निर्विएगोति ममत्येन राज्यापहरणे नए ॥८॥ जगाम सपस्तपसे सच येश्यो महामुने ।। संदर्श नार्थ में वाया नदी पुलिनमास्थितः । || सब बेश्यलपरतेपे देवी सूत परं जपन् । सस्मिन्युलिने देव्याः छत्वा मूर्तिमही मयीम् । अणा पतुरतस्याः पुरा भूग्नि वपणेः ॥ निरा दारी यता हारी दम्मकी समाहिती ॥ ११॥ तुस्ती पलिपेर मित्र मात्रा मृगु शिवम् ॥ एवं समास भयतो प्रिमिययतात्मनोः ॥१॥ परितुष्टा अगलागी प्रत्याई माह परिका, १३ ॥ युगाप १४॥ यथार्थ्यत त्यमा भूपत्ययाच रस नन ॥ १५ ॥ मत प्राप्पनां म परिपटादा मन् ॥१६॥ मायबाप ॥ १७॥ मात्रा नांगम्य मग्रिपन्य उन्मान ॐ पय: पृथिव्याम्पय औषधोपु पयोदिव्यन्तरिते पयोधा ऽ । पय- खती : अदिश:सन्तु मह्यम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः पयः स्नानं समर्पयामि ॥ पयः सानावे शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि ॥ शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं समर्प- यामि ॥ दधिग्नानम्-पयसस्तु समुद्भूतं मधुराग्लं शशिप्रभम् ॥ दध्यानीदं मयादेव स्नानार्थ प्रति गृह्यताम् ॥-ॐ दधिक्काव्णोऽका रिष हिमणोऽश्वस्यवाजिन + । सुरभिनो मुसा करणाऽायू पितारिपत् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्योनमः दधि स्नानं समर्पयामि ॥ दधि स्नानान्ते शुद्धोदक लानं समर्पयामि ॥ शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ॥ मधुलानम्--- नवनीव समुत्पन्न सर्वसन्तोप कारकम् । घृतं तुभ्य प्रदास्यामि स्नानार्थ प्रति गृह्यताम् ।।-ॐधृतम्मिमित घृतमस्य योनिघृतारतो घृताम्म्वस्य ॥ १८ ॥ मी यच निसं राज्यं हत शत्रु वलं वलात् ॥ सापि गैश्यस्तती ज्ञानं क्वेनिविणामा नसः ॥ १६॥ ममेत्यह मितिप्राज्ञः संग विच्युति कारकम् ॥२०॥ देव्युवाच ॥ २१ ॥ स्वल्पै रहोमि नपचे स्वराज्य प्रास्यते भवान् ॥ इत्यारिपून स्पतितं तब सत्र भविष्यति ॥ २२ ॥ मृतरच भूयः सं प्राप्य जन्म देशद्विवस्वकः ॥ २३ ॥ सायणिको नाम मनुर भवान्भुवि भविष्यति ॥ वैश्य वयत्वयायर वरीमत्तोभिवादितः ॥ २४ ॥ तंप्रयच्छामि से सिद्धये तब मान भविष्यति ॥२५॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ २६॥ इति दत्ता क्यो देवी यथाभिलपित वाम् ॥ २७ ॥ वभूवांवदिता सद्यो भक्त्या साम्यामभिष्टुता ॥ एवं देव्या वर लगवा सुरथः क्षत्रियर्पमः ॥ २८ ॥ सूर्याजम समासारा सार्वाणर् भवितामनुः ॥ २६ ॥ सावणि भवितामनु रिति द्विचारणीयः ।। इति माण्डेय पुराणे सारणिके मन्वन्तरे देवी माहात्म्य सुरय गैश्य यो र प्रदानं नाम त्रयो दशोऽध्यायः ॥ उचाच ॥ ६ अपाणि ॥ ११ ॥ श्लोका ॥ १२ ॥ एवम् २६ एवमादितः ॥ ७०० ।---अयोचर- न्यासा --माहिगिनी शुलिनी--पोग० हृदयायनमः । शलेनपाहिनो देवो० शिरसे स्वाहा ॥ प्राशरद वोध्या २० शिवायर पट् ।। .सौम्यानि यानि रूपाणि कवचाय हूं सद्ग राल का दीनि नेवप्रयापयोपट्सन स्वरूप मरी प्रयतन्त्रोकदेवीनसम्- अप भ्यानम्-धिगुराम समभाग पविस्फन्धारियांभीष कन्यायः कमालपेटविलसम्माभिरासेविदाम् ॥ इश्पकगदासि पेट विशिना अस्थाय 1 1 ३४२ धाम । अनुष्वधमावह मादयस्य स्वाहा कृतं वृपमध्यत्तिभ्यम् ।। भूभुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्यो नमः घृत स्नान समपर्यामि || शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ॥ मधु स्नानम्-- तक पुष्प समुद्भूतं सुरशटु मधुर मधु । तेजः पुष्टि कर दिव्यं स्नानार्थ प्रतिगृयवाम् ||-ॐ मधुः याताऽतायतेमधुक्षरन्ति सिन्धव । माद्धी : सन्तोषयी 5 ॥ मधुनत मुतोपसोमधुमत्पार्थिवधाज+ मधुचौरस्तुनःपिता ॥ मधुमान्नाव्यनस्यतिम्मधुमा ॥ २ ॥ ऽयस्तु मूय्य माद्वीर्गावो भवन्तुनः ॥ ॐ भू भुवः स्वः श्री लक्ष्मीनारायण (अनन्तं( देवताभ्यो नमः मधु स्नानं समर्पयामि स मधु स्नानान्ते शुद्धो. दक स्नान समर्पयामि । शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनीयं समर्पयामि ॥ शशस्नानम्-इनुसार समुदता शर्करा पुष्टि कारिका । मलापहारिका दिव्यास्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ॐ अपा रसमुद्धयस मूम्ये सन्त। ममादितम् । अपा ३० रसस्य यो रसस्तंबो गृहाम्म्युत्त ममुपयाम श्चापं गुरु तर्जनी वित्राणामन लात्मिकांशशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रांमने । नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सत नमः । नमः प्रकृत्यै भद्राय नियताः प्रणताः स्मताम् ।।शेद्राये नमो नित्याय गौर्य धात्र्यै नमो नमः ज्योत्स्ताय चेन्दुरू. पिएर्य सुयाय सातं नमीः ॥२॥ कल्याणचप्रणतांवृद्ध्यैसिद्धबैकुर्मो नमो नमः मंत्ये भूभृतां लक्षौराहण्ये ते नमो नमः|| ३ | दुर्गायदुर्ग पारायै नमः । साराय सब का िण्यै । ख्यात्य तथैव कृष्णाय धूम्राये सततं नमः ।४ अति सौम्याति रौद्राय नतास्तस्यै नमो नमः । नमो जगत्प्रतिष्ठाय देव्यै कृत्यै नमो नमः ।। ५ ॥ या देवी सर्व भूतेपु विष्णु मायति शब्दिता नमः स्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमो नमायादेवोसर्वभूतेपुचेतनेत्य भिधीयते । नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्नमस्तस्यैनमोनमाया देवी सर्वभूतेषुबुद्धिरूपेण मंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्मस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।। ६॥ या देवी सर्व भूपु निद्रा रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । या देवी सर्वभूतेषु नुधा रूपण सस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्य नमो नमः । १०॥ या देश मा भनेषु दाया रूपए सविता नमस्तस्यै 'नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २१॥ या देवी सर्व भूनेषु शक्ति रूपेण मंस्थिता नमस्य नास्तस्यै नमस्तस्यै नमो मनः ॥ १२॥ या देयी सर भूने per मंस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम १३ या देशोनवं भूतंयु जान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्ये नमो नम ॥१॥ या देवी भूपु जाति पय मंस्थिता । नमावस्ये नमनाये नये नमानय नमो नमः ॥१८या देशी गई भूने [ ३४३ ] गृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्ट तमम् ॥ ॐ भूवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः शर्करा स्नानं समर्पयामि ॥ शर्करानानान्ते । आचमनीयं समर्पयामि ॥ पष्टं गन्धोदक स्नानम् मलया चल सम्भूतं चन्दना गरु सम्भवम् चन्दनं देवदेवेश स्नानार्थ प्रति गृयताम् ।।-ॐ गन्ध द्वारा दुराधर्षां नित्य पुष्य करीषिणीम्। ईश्वरी सर्व भूतानानां तामिहो पहयेश्रियम् ।। ॐ भूभुवः स्वः श्री लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवता न्या नमः षष्टं गन्धोदक स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदक दक स्नानम् । स्नानान्ते पाचमनीयं ममर्पयामि ॥ उर्वन स्नानम्-जाना सुगन्धि द्रव्यं च चन्दनं रजनी युतम् । नद्वर्तनंमया दत्तं स्नानार्थ प्रति गृह्य वाम् ||-ॐ अ६ शुना ते अशु : पृच्यता म्परूपा परु गन्धस्ते सोम मवतु मदाय रमो ऽअञ्चयुत : ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री विष्णु लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः उद्वर्तनस्नानं प्रमपयामि ॥ उद्वर्तन स्नानान्ते शुद्धोदक स्नानसमर्पयामि ॥ शुद्धोदक स्नानान्ते आचमनं समर्पयामि ॥ विशेषम् ॐ भूनुवः स्वः श्री विष्णु लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धादकं शुद्धोदक स्नानान्ते पाचमनीयं समर्पयामि लज्जा रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६॥ या देवो सर्वभूतेषु शान्ति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै ननत्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १७ ॥ या देवी सर्व भूपु श्रद्धा रूपेण संस्थिता । नमस्तस्य नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १८॥ वा देवी सर्व भूतेषु कान्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १॥ या देवी सर्व भूतेपु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता । नमस्वयै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२०॥ या देवो मर्व भूतेषु पृत्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नम- स्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २१ ॥ यादेवी सर्वभूतेषु स्मृति रूपेण सस्थिता नमस्तस्यै नमस्त स्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२२॥ या देवी सर्वभूतेषु दया रूपेण सस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २३ ॥ या देवी सर्व भूनेषु तुष्टि रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्ये. नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २४ ॥ या देवो म भूतेषु मान रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । या देवा सर्व भूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता । नममस्ये नमः स्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ॥ इन्द्रियाणा मधिष्टानी भूतानां नाखिलेषुया । भूतेषु सवा तस्यै व्याप्य देश्यै नमो नमः || विवि स्पेष या सरन मेव स्वायम्य स्थिवा जगन् । नमस्तस्यै नमस्त.

[ ३४४ 1 ततः-पञ्चामृतादि स्नानाङ्ग पूजा ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भावान विष्णु लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः वस्त्रोप वस्त्रार्थ अनतान् ममर्पयामि । यज्ञो पवीवार्थे उत्तवान् समर्पयामि । गन्ध समर्पयामि | भाना परि मल सौभाग्य द्रव्याणि. समर्पयामि । यया ऋतुकालो इन पुष्पाणि समर्पयामि । धूपं दर्शयामि । दीपं दर्शयामि। शकरी पहार नैवेद्यम्-ॐ प्राणा- यस्वाहा । ॐ अपानायस्वाहा । ॐ व्याना य स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा। उदानाय वाहा । नैवेद्यं समर्पयामि । नैवेद्या- न्ले हस्त प्रक्षालनं मुख. प्रज्ञाननं च समर्पयामि । करो- द्वर्तनायें चन्दनं समर्पयामि । मुख वासाचे पूगीफल ताम्बूलं समर्पयामि । हिरण्य मुद्रा दक्षिणां समर्पयामि । कपूर श्रागतिक्यं दर्शयामि । प्रदक्षिणाः समर्पयामि । मन्त्र पुष्प युक्त नमस्कार समर्पयामि । विशेपायः ~ रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक । मकाना नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८ ॥ स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्ट से अया च्या सुरे देणादिनेषु मेविता । करोतु सा नः शुभहेतुरी श्वरो शुभानि भद्रायभिहन्तु चापदः || २ || या साम्प्रतं चोदत देत्य तापितरमाभिरीशा च मुरैर्न मस्यते । याचरमृता तत्क्षण मेव हन्निनः सा पदी भक्ति विनम्न मूर्तिभिः ॥ १० ॥ इति तन्त्रोक्त देवी सूकसमाप्तम् । अथ प्राधानिक रहस्यम् । राजी वाच-भगवन्नववारा मे परिक्षका या स्त्ययो दिताः। एतेका प्रकिति प्रसन्प्रधान वक्तु महंसि ॥ १ ॥ भाराध्य यन्मया देव्या स्वी येन द्विव । विधिना हि सकलं ययायप्रण तस्वमे ॥ १ ॥ पिरवाप-इन रहस्य परम मनास्येयं प्रपनवे । भको इसीवि नमे वित्तपाण्यं नराधिप ॥ ३ ॥ स स्यायामहाजरमी दिगुणा परमेश्वरी । लश लक्ष्य साया सान्याप्य रहने व्यवः रिय॥१॥ मातु लिङ्ग गा र्ट पान पाप विधी। नाग जिप योनि पविभवो नृप पनि ॥ ५ ॥ सप्त फाइन पामा जापन भूपधा । शून्य वदयिन स्पेन पूरपा मास प्रेममा ॥ ॥ गुप-- र मिन ही विनीमय परमेश्यी। पसार पर पंतममा बजे नदि ॥ ७ ॥ मा भिमान ani दाकि गनना पिशात मोपना नारी पन्यानु मप्यमा ICIRE पाशि: मेटल कापायला शिमा प्राणादि .

! • ३५५ } ममयं कर्ता वाताभवभवार्ण वात् । वरद ६ वरं देहि वाटतं वाञ्छितार्थद । अनेन सफला रण फलदो ऽस्तु सदा मम । प्रार्थना समर्पयामि ॥ अर्पणम्-अनेन पश्चामृतादि स्नानाङ्ग भूत पूजन कृतेन भूर्भुवः वः स्वः श्री भगवान् विष्णु लक्ष्मी नारायण ( अनन्त) देवताः प्रीयंन्ता न मम ॥ निर्माल्य विसृज्य । पुनश्च- ततः अभिपेकः कार्यः । स्नापन धारा पात्राय गन्धाक्षत पुंड ( तुलशीदलं ) समय । तदनना मभिषेकार्थे देवानां गन्धाक्षत पुष्पाणि समर्पयेत् ॥ शालिग्रामोपरि अासनार्थे पूजार्थे चतुलसी- दलं तद्वत्समयं ।। स च-यथा-हरिः-ॐ सहस्र शीर्मा० ।। पुरुष ए० ॥ एतावान० ॥ त्रिपादूद्धर्द्ध so || ततोव्विराड । तस्माद्यज्ञात्स० ॥ तस्मादयज्ञा सहुत ऋच : सामानि जज्ञिरे। . सि जज्ञिरे तरम्मा इयजु स्तस्स्मा दजायत । तस्म्मा- दरवा 5 अजा यन्त येके चोभया दत्त । गावो ह जझिरे तस्म्मान्तस्म्मा जाता अजावयः तं स्पज्ञ म्वहिपिषी क्षनपुरुप जात मग्नत: । लेनदेवाऽअजयन्त साद्धयाऽऋषय श्चये ॥ यत्पुरुप व्यदधु :ऽ कतिधाव्यकल्प्पयन् । मुसलिमस्यासीरिकम्वाहू किमूल पादाऽ 'उञ्चयेते । ब्राह्मणोस्य मुग्व मासोद यादराजन्नय:कन 57 ॐ स्तदस्य यद्वैश्य: पदभ्या , शहोऽअजायत ॥ चन्द्रमा मनसो जातश्चयो :s सूर्योऽअजायत । श्नोत्रा द्वायुश्च प्राणश्च मुखाग्नि रजायंन । शिरा स्त्रजम् ।। ६ ।। सांपो वाचमहा लक्ष्मी तामसोप्रमदोत्तमा । मामकर्म चमे मात दैहि तुभ्यं नमोनमः ॥ १० ॥ तो प्रोवाच महालक्ष्मी स्तामसी प्रमदो तमाम् । ददामि तव नामनि यानिकर्माणि वानिते ॥११॥ महामाया महाकाली महामारी तुधा तृपा । निद्रा तृष्णा चैक वीरा काल रात्रि दुरत्यया ॥ १२॥ इमानि व नामानि प्रति पाद्यानि कर्मभिः । एभिः फर्माणि तेज्ञात्वा योऽधीते सोरनुते सुखम् । १३ ॥ तामित्युक्त्वा महालक्ष्मी: स्वरूपमपरं नृपम् । सत्त्वाख्येनाति शुद्धेन गुणेनेन्दु प्रभंधौ ॥ अक्षमालाङ्कशधय वीया पुस्तक धारणी। सा वभूव वरा नारी नामान्यस्यैवसा ददौ । १५ ॥ महा विद्या महावाणी भारतो वाक्ससरस्वती । पायर्या ब्राझी कामधेनु :ज. गर्मा च धीश्वरी ॥ १६ ॥ अवो वाच महालक्ष्मी महाकाली सरस्वतीम् ।। युवां जनयनां देव्यो मिधुने स्वानु रूपतः ॥ १७॥ इत्युक्तात महालक्ष्मीः समर्ड मिथुन स्वयम् हिरण्य गौं कपिरी स्रो पुसौ कमलासनी ॥ १॥ महान्विधे विरोति धाव रित्याह तं नरम् । श्रीः पोकमले लक्ष्मी त्या .

नादम्याऽासी दन्तरिक्ष में शीर्णोदयौ : समवर्तत । पद्भाम्भूमिहिंशः श्रोत्रातथा लोकाँ २ ॥ अकल्पयन् । यत्पुरुपेण हविषा देवा यत्र मतन्नयत् । वसन्तोस्यासी दाज्य ग्रीसम्मऽइम : शरवि 5 ॥ साप्तास्या सन्नपरिध यास्त्रि : सप्त समिधः कृता: देवा यध्यजन्त नवानाऽभवदन्पुरुपम्पशुम् ॥ यक्षेन यज्ञमय जन्त देवास्तानि धर्माणि पथमान्या सन् । तेह नाकम्महिमान सचन्त यत्र पूळ साडया सन्ति देवा: । अत्रा वसरे श पूरितोदककन-ॐ इदं विष्णु बिचकक्रमे बेधा निधे पदम् । समदमस्य पा , सुरे स्वाहा ।। इति मन्त्रेण शालिग्रामस्नापयेत् । पश्चात् स्नोपनधारापात्रो दकेन श्री भगवान विष्णु नारायण (अनन्त ) देवतानां शान्त्याभिषेक कुर्यात् सच यथा--- ॐ द्यौः शान्ति रन्तरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रोप धय 5 शान्ति: । व्यनस्पतय :ऽ शान्तिविश्वे देवा : शान्तिबंध शान्ति : सव्व' । शान्ति 5 शान्ति रेख शान्ति :5 सामा मावा चतां स्त्रियम् ।। १६ || महाकाली भारती च मिथुने सृजतः सह । एतयोरपि रूपाणि नामानि च बदामिते २० || नील कण्ठं रक्त वाई श्वेवाग चन्द्र शेखरम् । जनया मास पुरुप महाकाली सितास्त्रियम् ॥ २१ ॥ सरुद्रः शङ्करः स्थाणु कपर्दी च त्रिलोचनः । त्रयी विद्या कामः धेनुः सास्त्री भाषातरास्वग। २२ । सरस्वती स्त्रियं गौरी कृष्ण च पुरुष नृप । जनया मासनामानितयो रपि वदामिते २३ । विष्णुकृष्णोपीके शो वासुदेवो जनार्दनः । उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा ॥२४॥ एवं युवतयः सद्यः पुरुपत्वं प्रपेदिरे । चक्षुष्मन्तोऽनुपश्यन्ति नेतरे तद्विदो जनाः ॥ २५ ॥ ब्रह्मणो प्रददौ पत्नी महा लक्ष्मी नृप वयोम् । रुद्राय गौरी वरदां वासुदेवाय च श्रियम् ॥ २६ ॥ स्वरया सह संभूय विरच्योएड मजो जनत् । विभेद भगवान् रद्रग्वद गीयर्या सद वीर्यवान ।। २७ ॥ अएउमथे प्रधानादि कार्य जात मभून्नृप । महा जगत्स्थायर जन्मम ।। ८ । मास लस्जदम्या मह केशवः संजहार जगत्मर्व सहगीर्य महेश्वरः ॥२६॥ बालदमीमहाराज सर्व सस्य मयीश्वरी। निराकार व साकारा मेर नाना भिधानभूत ||१०|| नामान्तर निरूप्यपानाम्नानान्यनत्रचिन् ॥३९॥ इति ध्धानिक रहस्यं समाप्तम् । अधवैकृतिक रहस्यम्- ऋषिमार-विगुणा वामसीदेवी सावित्रीयात्रियोदिता । मामय) भूतात्मकं सर्व पुपोप गलया

। ३४७ !
यसो यत: समी हसे ततो नोऽअमरक्षम । शन्न कुरुष्पजाम्भ्योऽभयन्न:
पशुम्म्य+ॐ सर्वेषां वा एप वेदाना , रसोयत्साम सर्वेषामेवे नमे
तद् वेदना । रसेनामिपिञ्चति ।। (ब्राह्मण मन्त्रः)॥ ॐ शान्तिः
शान्तिः सुशान्ति भवतु । सर्वारिष्ट शान्ति भवतु ॥ ॐ अमृताभिषेकोऽस्तु ।।
ॐ भुवःस्य श्री विष्णु नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः अभिषेक
समर्पयामि ॥ इतितेपकम् ॥ पश्चात 'देवतीय धृत्वा । ततो देवाया-
चमनम्-ॐ केशवाय नमः स्वाहा ॐ नारायणाय नमः स्वाहा । ॐ
मारवाय नमः स्वाहा । इत्वा चमनं समर्पयेत् ॥ हल प्रक्षालनम्--ॐ
गोविन्दाय नमः ॥ यत्रम्-
-सर्व भूपाधिके सौम्ये लोक लजा निवारणे ।
मयोप दिवतुभ्यं वासतीप्रति गृह्यताम् ॥ ॐ तम्मा यज्ञात्मवंत
ऋचऽ' माना ॐ भूर्भुवः स्वः श्री विष्णु नारायण (अनन्त) देवताभ्यो
नमःया वस्त्राऽमारे तिलाऽततानसमर्पयाम यज्ञोपवीतम् -नयभिस्तन्तु-
भिपुक्त त्रिगुण देवता मयम् ॥ उपवीतं चोत्तरीय गृहाण परमेश्वर ॥ ॐ
तस्मादरा 5 . ॐ भूर्भुवः स्वः श्री विष्णु नारायण ( अनन्त)
देवताभ्यो नमः यज्ञोपवीतं (यज्ञो पवीताऽभावेऽक्षतान् ) समर्पयामि ।।
चण्डिकादुर्गाभद्रा भगवतीर्यते ॥ १॥ योग निन्द्रा हरे रुक्ता महाकाला
तमोगुणा। मधुकैटभ नाशार्थ यां तुष्टा वान्बुजासनः ॥ २॥ दश वक्त्रा
दशभुजा दशपादाजनप्रभा । विशालया राज माना त्रिशल्लोचन
मालया ॥ ३ ॥ स्फुरदशन दंष्ट्रासा भीम रूपापि भूमिप। रूप सौभाग्य
कान्तीनां सा प्रतिष्ठा महाश्रियः ॥४॥ सङ्ग वाणगदा शूल शङ्ख चक्र
भुशुण्डिभृत् । परिघं कामुकं शीर्ष निश्चयो उद्बुधिरं दधौ ॥ ५॥
एषासा वैष्णवो माया महा काली दुरत्यया पाराधिता वशी कुर्यास्पूजा
रुश्चरा चरम् ॥ ६ ॥ सर्व देव शरीरेन्योवाऽविभूताऽमित प्रभा ।
त्रिगुणामा महालक्ष्मोः साना-महिषमर्दिनी ॥ श्वेतानना नील भुजा.
मुश्वतस्तन मण्डला रक्त मध्या रक्क पाटा नौल जज घोररन्मदा ॥८॥
सुचित्र जघना चित्र माल्वाम्बर विभूपणा चित्रानुलेपना कान्ति रूप
सौभाग्य शानिनी । अष्टादश भुजा पूग्या सा सहस्रभुना सती !
श्रायुधान्या वक्ष्यन्ते दक्षिणाधः कर क्रमात् ।। १०॥ अक्षमाला चकमलं
वाणोऽसि; कुलिश गदा। चक्रं त्रिशूल परशु' शी घण्टा च पाशका
॥ १६ ॥ शक्तिर्दण्डश्चर्म चापं पान पात्रं कमण्डलु । अजङ्कत भुजामे
मिरायुद्धः कमलासना ॥ १२ ॥ सर्व देव मयी मीशां महालक्ष्मी मिमां
नृप । पूजयेत्सर्व लोकानां सदेवानां प्रभुभवेत् ।।१३। गौरीदेहात्समुद्भूता
या सत्त्रक गुणाश्रया । साहासरस्वतीमोका शुम्भासुर निवहिणी ॥१४॥

. । ३४८, गंन्धम्-श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गन्वाध्य सुमनोहरम् । विलेपन सुर श्रेष्ट चन्दनं प्रति गृह्यताम् ।। ओं तय्यनम्बर ओं भूभुवस्वः श्री विष्णु नारायण (अनन्त ) देवेन्यः गन्धं अक्षता सहितं सौभाग्य यादीनि अनामिका अप्ठेनसमर्पयामि ।। अथ क्षेपकम्--अक्षताः ( यव, अक्षतार सुर श्रेष्ठ कुस,माताः सुशोभिताः । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥ तिलान् ओं अक्षन्नमीम दन्तह्यह्यवरिप्रयाऽअधूपत । अस्वोक्त स्त्रभानवोचिषा नविष्ठयामती यो जानिन्वन्द्रने हरी ॥ ौं भूभुवः स्वः श्री विष्णु नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः अक्षतान्समर्पयामि ॥ इति क्षेश्कम पुष्पाणि-माल्यादोनि सुगन्धीनि मालत्या दीनि वै प्रभो। मयानोतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर। ओं पत्पुरुषः ॥ओं भूभुः स्वः श्रीविष्णु नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः पुष्पाणि (सौभाग्यद्रव्य सहितं च ) समर्पयामि । ( शालि ग्रामस्यासनार्थं तुलसी दले ॥ समय । ) एवं यवतिला तितानसमर्पयामि ) तुलशीदलापणम्- तुलशीहेमरूपां चरल रूपां चमञ्जीम् । भव मोक्ष प्रशं तुभ्यम यामि हरि प्रियाम् ॥ ॐ विष्णोः कर्माणि । पश्यत यतो न तानि पस्य्यशे । इन्द्रस्य युनय :5 सरवा ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भगवान् विष्णु लक्ष्मीनारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः तुलशीदलं समर्प यामि ॥ पृथक मन्त्रेण सोभाग्य द्रव्यम्-हरिदां कुङ्कम चैवसिन्हुई काला वितम् । सौभाग्य द्रव्य संयुक्त गृहाण परमेश्वरी ॥ अहिसि भाग 5. पर्णेति याहू नयाया हेतिम्परि चाधमानः । हस्तमनोविश्वा व्ययुनानि विद्वान्पुमान्सुमा । सम्परि पात विर. दधौ चाष्ट भुजा वाण मुसजे शून चा भृत । श घण्टा लागलं 'च कामुक वसुधाविप ॥ १५ ॥ एषा सपूजिता भातया समत्व प्रय च्छति । निशुम्भ मयिनी देवी शुम्भा सुर निवहिणी ॥ १६ ॥ इत्युतानि स्वरूगणिमूर्तीनां तप पार्विष । उपासनां जगन्मात: पृथगामा निशा मय ॥ १७ !! महा लक्ष्मी यंदापूज्या महाकाली सरबती । दविणोत्तरयोः पूजये पृष्टनो मिथुन प्रयम् ॥ 1 ॥ शिब्धि. या मध्ये मद्रो गोर्या प दक्षिणे । बाम लदम्या भी करा पुरती देवा अयम् ॥ १६ ॥ अष्टादशभुजा मध्ये यामे गाण्या दशानना ! दणि भुजा सयामह नोठि समय ॥ २० ॥ पूर्णविरलता पूया अति मानादि भैरवाः । अष्टादश भुजा पा पदा या नराधिप ॥२१॥ दशानना पाट भुजा दहिणो परयो ना| दशा नना या पक्षिणी भयो तया ॥२॥ कान । ३४६ वर्त: ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भगवान् विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः सौभाग्य न्याणि समर्पयामि ॥ इति क्षेपकम् ॥ धूपम्-वनसपति रसोद भूगो गन्धाढयो गन्ध उत्तमः । श्राय, सर्व देवानांचूपो ऽयंप्रतिगृह्यताम् ||-ॐ ब्राह्मणोस्य मुखमासीद वाहू राजन्नयः कृतः । उरू तदस्य यद्वेश्य : पया , शूद्रो अनायत ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भगवान् विष्णु लक्ष्मी नारा- यण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः धूपं दर्शयामि ॥ घृत पूरित नीरा. जनदीपम् ाज्यंच वर्ति संयुक्त पहिना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेश लोक्य तिमिरा पह ॥ ॐ चन्द्रमा मनसो जात शचक्षो. सूरो अजायन । श्रोत्राद् द्वायुरश्चप्राणश्च मुबा दग्निरजायत ।। ॐ भूर्भुवः स्वः श्री विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः घृत पूरित नीरा जन दीपं दर्शयामि ॥ नैवेद्यम्-शर्करा घृत संयुक्त मधुरं स्वादु चोत्तमम् । उपहार समायुक्त नेवेद्य प्रति गृह्य ताम् ॥ ॐ नाभ्या ऽासी दन्तरीक्ष शीणों द्यो : समवर्तत । पदयाम्भूमिर्दिश : श्रोत्रा वया लोकाँ ॥ २ ॥--ऽअकल्ययन् ।। ॐ प्राणायस्वाहा । ॐ अपानायस्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । उदानायस्वाहा । ॐ समानायस्वाहा ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भग- मृत्यु च संपूज्यो सर्वा रिष्ट प्रशान्तये ॥ यदा चाष्ट भुना पूज्या शुम्भा सुरनिवहिणी नवास्याः शक्तयः पूज्या स्तदारुद्रविनाय कौ।। नमो देव्या इति स्तोत्रमहा लक्ष्मी समर्चयेत् ॥ २४ ॥ अवतार याचायाँ स्तोत्र मन्त्रा स्तदा श्रयाः ॥ अष्टादश भुजा चैपा पूज्यामहिप मदिनी ॥ २५ ॥ महालक्ष्मी महकाली सैव पोका सरस्वती ॥ इश्वरी पुण्य पापानां सर्व लोक महेश्वरी ॥ २६ ॥ महिपान्त करी येन पूजितास जगत्प्रभूः ।। पूजये जगतां धात्री चण्डि. का भक्त वत्सलाम् ॥ २७ ॥ अध्यो दिभि रल कौर र्गन्ध पुष्प स्तयोत्तमः ॥ धूप दीपैश्व नैवेद्यै नर्नाना भक्ष्य समन्वितः ॥ ८ ॥ रुधिराक्तन वलिना मसेन सुरया मृप ।। बलिमासादे पूजेयं विष वा मयेरिला ॥ २६ ॥ ते किल सुरा मांस नॊक्ता पूजा नृप क्वचित ॥ प्रणामा धमनी यैश्च चन्दनेन सुगन्धिना ॥३०॥ सकरिश्च वाम्यूलभक्ति भाव समन्वितः ॥ वाम भागे प्रवो देव्याश्छिन्न- शीमिहासुर ॥ ३ ॥ जयेन्माहियं येन प्राप्त सायुज्य मीशया । दक्षिणे पुरत सिंह मममंधर्म मीश्चरम ॥ २२ ॥ वाहन पूजये दोन . [ ३५० j वान विष्णु, लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताभ्यो नमः, नैवेद्यं समर्पयामि । नैवेद्य मध्ये पानीयम्--एलो शीर लवन्नादि कपूर परि वासितम् । प्राशनार्थ कृतं तोयं गृहाण परमे. खर ॥ उत्तरा पोशानं हस्त प्रक्षालनं मुस्ख प्रक्षालनं आचम रेधि ॥ नीयम्चसम पयामि । करोर्त नार्थ चन्दनं समर्पयामि ॥ मुख वासार्थे ताम्बूलम् पूगीफलं महादिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् एला चूर्णादि संयुक्त ताम्बूलं प्रति गृह्यताम् । ॐ यत्त पुरुपेण। हविषा देवायज्ञ मान्यत, ब्वमन्तो स्यासी दाजयन एडमऽऽइध्मः शरविश । ॐ भूर्भुवः श्री भगवान् विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः ताम्बूलं समपर्यामि ।। फजम्--इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरसस्ता । तेनमे मफला यानि वजन्मनि जन्मनि ॥ ॐ या फलिनीयो श्रमजाऽ अपुयाययाश्य पुष्पिणी: । दृहस्पतिप्रसूतस्तानो मुच नव हसः ॥ ॐ भूभुवः स्वः श्री भगवान लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः फलं समर्पयामि ॥ दक्षिणा-हिरण्य गंभं गर्भस्थ हेमधीज विभावसोः । अनन्त पुण्य फलद मनः शान्ति प्रयच्छमे ॥ ॐ हिरएक गर्भ 5: समयत ताग्ने भूनस्य जात . पतिरेकऽप्रासीत सदाधार पृथिवीन्द्यामुने म.कस्म्मदेवाय हविपाविधेम । भूर्भुवःस्वाभगवान श्रीम०विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त ) देवताभ्यो धृतं येन परा परम ॥ ततः कृताञ्जलि वा स्तुबीत चरितरिमः ।। ३३ ॥ पनवा मभ्यमेन ने केने तरयोरिद ॥ चरितानु न अपेज्जपंरिद्र मा प्नुयात् ।। स्तोत्र मन्त्रीः स्तुपो तेमां यदिवा जगदम्बिकाम् ।। प्रदक्षिणा नमस्कारान् कृत्या भूनि कृताञ्जलिः ॥ क्षमापयेज्जगद्धात्री मुहुर्मुख दितः ।। प्रतिश्लोक च जुहुयात्यायमं निल सर्पिप। ॥ जुहयात्रोत्र मन्त्रा पण्डिकायै शुभं हविः ॥ भूगा नाम पटें देवीं पूजयेत्तु ममाहिवः ॥ ३५ ॥ प्रयनः प्रान्जलिः प्राहः प्राणा नारोप्य धात्मनि ।। सुनिरं भावयोवा परिटका सन्मयो भवेत् ॥ ३८ ॥ एवं यः पूजयेद्भत्क्या प्रत्यह परमेश्वरीम् भुक्ता भोगन्यथा काम देवी सायुज्यमाप्नुयात् ।। ३६ || यो न पूजयते नित्यं परिखमा भाऊ यसलाम || भस्मीत्यास्य पुण्यानिनिहित्परमे। सरो॥ तामापुजय भूपाल मर्ग लोक महेश्वरीम् ।। यधोकन विधानेन परित मुबमास्यसि ॥४॥ दवि झि रहस्य ममानम् ॥ भय मूनि कायम विपदा गती नामया मान्यति नन्दानुनापूनिवास [ ३५१ ] नमः दक्षिणां समर्पयामि ॥ कपू रातिक्यम-कदली गर्भ सम्भूतं कपूरं च प्रदीपितम् ।प्रागतिक्यमहं कुर्वपश्यमेवरदोभव--ओददछ हविषजन- नम्मेऽअस्तुदर्शवीर सवंगण स्वस्तयोमालमसनिप्पजासनिपशुसनिलोक सन्नय भयसनि | अग्निऽ.प्रजान्बहुलाम्मे करोत्वन्नम्पयोरेतोऽअस्मासु पत्त !! श्री भूर्भुवः स्वःश्रीभगवान विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त) देवताभ्यो नमः करारार्चिक्ये दर्शयामि । मन्त्र पुष्प युक्त प्रदक्षिणा- यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि । तानि सर्वाणि नस्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ।। ओं सप्तास्या सन्परि-धयत्रिः सप्त समिधः कृताऽः देवांययज्ञन्तन्वानाऽ अवद्धनन्न्पुरुपप्पशुम् ॥ ओ भू भुवः स्वः श्री भगवान् विष्णु "लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताम्यो नमः प्रारतिस्य सहिता मन्त्र पुष युक्त प्रदक्षिणां समर्पयामि ॥ मन्त्र पुष्प युक्त नमस्कारः --नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि- भक्त्यया वशीकुर्याज्जगलयम् ॥१॥ कन सोत्तम कान्तिःसासुकान्तिकनका. म्बरा । देवी कनक वर्णाभा कनकोत्तम भूपणा ॥ २॥ कमला कुश पाशाब्रलंत चतुर्भुजा ।। इन्दिरा कमला लक्ष्मी. साश्रीरुक्मान्वुजा सना ॥ या रक्त दन्तिका नाम देवी प्रोकामयाऽनघ ।। तस्याः स्वरूप वक्ष्यामि शृणु सर्व भया पहम् ॥४॥ यच्छृत्वा सर्व पापेभ्यो मुच्यते नान संशयः ॥ रक्ताम्बरा रक्तवर्णा रक्त सर्वाङ्ग भूषणा ।। ५॥ रतायुधा रक्त नेवारत केशातिभीपणा ॥ रक्त तीक्ष्ण नखा रक्त रसना रक्त दन्ति का ॥ ६ ॥ पति नारी वानुरक्ता देवी भक्तं भजेजनम् ।। वसुधेव विशा. लासा सुमेरु युगलस्तनी ॥ [ दीर्घोलम्बावति स्थूलोतायतीवमनो हरौ ॥ कर्कशायति कान्तो सौ सर्वा नन्द पयोनिधी ॥ ॥ मतान्स पाययेदेवी सर्व कामदुधास्तनौ ॥ सङ्ग पात्र शिरः सेटैरलं कृन चतुर्भुजा श्रारख्याता रक्त चा मुण्डा देवी योगेश्यरोति च || अनयाव्याप्त मखिलं जगस्थावर जङ्गमम् ॥ १० ॥ इमायः पूजयेद्भक्त्यास व्याप्नोति चरा चरम् ॥ मुक्त्वा भोगा न्यथा काम देवी सायुज्य माप्नुयात् ॥ अधीतेय इमं नित्यं रक्त दंत्या वपुः सयम् ।। तं सा परि चेरहवीपति प्रियमि- चांगना ।, .२ । शाकंभरी नीलवर्णा नीलोत्पल विलोचना । गभीर नामि त्रिपनी विभूपित उनूदरा ! १३ ॥ सुकर्कशतमोत्तुग व्रत्त पीन पनस्तनी । मुष्टी शिली मुम्बा पूर्ण कमलं कमला लया ॥१४॥ पुष्प पल्लव मूनादिफलाढ्य शाक सचयम् ॥ काम्या नस्तर सैयुतं जुसएमृत्यु जरा पहम् ।। १५ । कार्मुकै चस्फुत्किाति विभ्रति परमेश्वरी । शाकंभरी शवाक्षी सा सैव दुर्गा प्रफीतिवा ॥ १६ ॥ नमागौरी सी चण्डी पातुवश्च २। पुप्पामलि मयादत्तं गृहाण परमेश्वर ॥ ॐ यज्ञेन यन मय अन्त देवा तानि धम्माणि प्रथमान्या सन् । तेह नाकम्महिमान: सचन्त यत्त्रपूर्वे साद्धया : सन्ति देवा :5 ॥ ॐ भू भुवः खः श्री विष्णु लक्ष्मी नारायण (अनन्त') देवताभ्यो नमः मन्त्र पुष्पाञ्जलि युक्त नमस्कारं समर्पयामि ।। विशेषायः रक्ष रक्ष सुरः श्रेष्टः रक्ष त्रैलोक्य रक्षक। भक्ताना ममयं कर्ता बावा भव भवार्ण वान् ॥ वरद त्वा वरं देहि वाच्छित वाजिनार्थद ( एतेन मन्त्रेण पृङ्गींफल हिरण्य गन्धाक्षत पुप्पैः संयुक्त जलेन अयं मेकं दद्यात् । ) अनेन सफलाण फलदोस्तु सदा नम ॥ ॐ भू भुवः स्वः श्री विष्णु लक्ष्मीनारायण ( अनन्त) देवताभ्यो नमः विशेषाध्य समर्पयामि ॥ प्रार्थना- कर कुच चुछ कामे पाणिगु व्या तेषु प्रथम जनवि पुत्री सलमेऽनग्न धाम्नि, प्रथि दनि विडनीवी वन्धनी मोक्षणार्थ चतुरधिक कराशा, ऋपाणिः ।। यद्विम्ब मम्बर मणि यदपांप्रशति नछ निपिश्चति यदग्नि कालिका साच पार्वती ॥ शाकमरी स्तुवनध्यायज पन्स पूजयत्रमन् ॥ १५ ॥ अक्षय्य मरनुते शीघ्र मन्न पाना मृतं जलम् ।। भीमाऽपि नीन वों सा दंष्टा दशन भासुरा ॥ १८ ॥ विशान लोचना नारी वृत्तपीन पयोवरा । चन्द्र हासंच डमरं शिरः पाच विभ्रती ॥ १६॥ एक वीरा काल रानिः सैमोक्ता कामदा स्तुता ।। तेजी मण्डल दुधुपा श्रामरी चित्र कान्ति भूत् ॥ २०॥ चित्र भ्रमर संकाशामहामारीतिगीयते ।। इत्येता पूर्तयो देव्या व्याख्याता वसुधाधिप ॥ जगन्मानु श्चडिकाया. कीर्तिताः कामधेनवः । इदं रहस्य परम न वाच्य कस्य चिराया ॥२१॥ व्याख्यानं दिव्य मूर्तीना मधोमर यहितः स्वयम् ॥ एतस्यास्वं प्रसादेन सामान्यो भविष्यसि ॥ २३ ॥ सर्व रूप मयी देवी सर्व देवी मये जगत् ॥ अतोई विश्य रूपां व नमामि परमे श्वरीम् ॥ २४ ॥ इdि मूनि रहस्य समाप्तम् ॥ श्री जगदम्वार्पणमस्तु ।। श्री पार्वती पूजनम् साब उमंग यस्य य. मास्तरका व्यापिनी तिथिरिति पप्पु ધમાં मंग व्यापिनीमा । पूर्वाभिमुखोत्या पम्य दीपाय मंरर फुयात् ।। ॐ पोहामुरगोमुर नाम्नी मम rifur परिमामिलातर-दूरी करण राव पीर मि मपनि भनि नराम मार भूपाल शामिन्यादि भोजन। --- [ ३५३ ] जोत्स्नानिशासु हिम धानि चयन्मयूसः पूषापुराण पुरुषः स नमो ऽस्तु तस्यै ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्री भगवान विष्णु लक्ष्मी 'चारायण (अनन्त ) देवताभ्यो नमः प्रार्थना समर्पयामि !! ( इयं प्रार्थ- कृतास्ति) ॥ शङ्ख भ्रामणम्-शङ्ख मध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशको परि। अङ्ग लम मनुष्याणां ब्रह्म हत्यां व्यपोइति ॥ एवं शङ्को दकेन-स्वशरीरं मार्जयेत् ॥ अथ ग्रन्यि पूजनमू-ॐ श्रियै नमः । मोहिन्यै नमः पमिन्यै नमः ॥ महावलायै नमः। अजायै नमः । मङ्गायै नमः । वरदायै नमः । शुभायै नमः ॥ जयायै नमः । विजयायै नमः । जयन्त्यै नमः । पापनाशिन्यै नमः । विश्वरूपायै नमः। सर्वमङ्गलायै नमः । इति प्रथिं सम्पूज्यः ॥ प्रथाङ्ग पूजा ॥-मत्स्यायनमः पादौ पूजयामि ॥ कूर्माय नमः गुल्मी पूजयामि नमः । वराहाय नमः जानुनी पूजयामि नमः । नार सिंहाय नमः । ऊरू पूजयामि नमः वामनाय नमः कर्टि पू० ॥ रामाय नमः उदरंपूज० ॥ श्री रामाय नमः हृदयं पू०॥ कृष्णाय नमः मुर्स पू० । सहस्र सिरसे नमः शिरः पू० । श्रीमद्नन्ताय. मृत्यु सन्निपाव-राज यम-विषय जरा-वराति सारादि-दुर्ग्रह-दुर्योगिनी- दुः स्वप्नादि-पीडानिवृत्ति पुत्र मित्र भृत्यगजास्व-क्षेत्र धन-धान्य रत्नादि-सम्पद् भोगान्तर- गन्धर्वाप्सरोगण-संगीतादि-जात-मजरी मानादि-शोमितृ-विमाना रोहण-पूर्वकं भगवतः श्री मद् ज्योतिलिङ्ग स्वरूपिणः सदाशिवस्य परम सायुज्य-मुक्ति कामा श्री पार्वती देवता प्रीतयेयेभि र्यया मिलितोप चारै स्वद् बताङ्ग भूत देवता याश्च पूजन मई करिष्ये । [श्रा सूर्याय अध स्वस्थानी ब्रतं कतु तदङ्गत्वेन जगत्साक्षिणे श्रीसूर्यायएपोधः समर्पयामि . ] वामे अर्ध्यस्थापनम् ॥ दक्षिणे शकस्थापन. च ॥ नमोस्त्र नन्तायेति दीपं सम्पूज्य गणानां वेति गणपति सम्पूजयेत् ॥ अथ कलश पूजा ।। भूरीति भुमिशोधनम् ।। धान्न्यन नसीतिधान्यम् ॥ आजिति अत्रणं कलर्श संस्थाप्य वरुणस्यो. तम्भनमिति निर्मल तीर्थादि जल प्रतिप्य 41 ओपपीरिति सर्वोपधीः । हिरण्यार्भेति पञ्चरत्नानि । या फलिनीरिति फजम् पोषधीयः समितिय. वान् । गन्ध द्वारा मिति चन्दनम् ॥ कारडाकाण्डादिविदूर्वा ॥ स्योना पृथिवीति मृदः । अश्त्येवेविपन्चपल्लवैस्तन्मुखं मान्छायवृहस्पत इति वस्त्र युग्मेन कळरा वेष्टयित्वा तत्वायामीति वरुण मा वाघ पूजयेत् ॥ ततः कनशेगङ्गादोंश्च ॥ सर्वे समुद्राः सातवीर्थानि जलदा नदा आयान्तुयजमानस्य दुरिसक्षय कारकाः । इति ॥ मन्येषावाहयेत् ।। ततः कलशाभिमन्त्रणम् ॥ कलशस्स मुविष्णुः फरठेकः समान। - { १५४ } मः सह पृ० इत्यङ्गम् सम्पूज्य. || अथा वरणपूजा-अनन्तस्य दक्षिण पार्थे रमायै नमः ॥ वामपाचे भूम्यै नमः । इति प्रथमा वरणम् ॥ आवरण देवता मा वाय हन्तं प्रक्षाल्य ॥ गन्ध पुष्प तर्जनी मध्यमा अटै धूम मध्ये शंसोदकं गृहीत्वामन्त्रान्ते शंखोहक भ मौ निनिष्प पुप्पे देवो परिनिक्षिपेत् ॥ दयाब्धे ? बाहि संसार लक्ष्मेशौ शरणागतम् ॥ मक्तया समर्पये तुम्यं प्रथना करणार्यनम् ।। इति मन्त्र मुधार्य जलं त्यक्त्या पुष्पं देवो परि न्यपेन् । एवमने र |॥ १ ॥ पूर्वादि क्रमेण तृद्धोलकाय नम । महालकाय नमः। शवोरकाय नमः । सहस्रोल्काय नमः ॥ दयाब्धे ? बाहि संसार रूदमेशो सरणागतम् भळ्या समा येनुभ्यं द्वितीया वरणाचनम् इनि वधैवका सुदेवाय नमः । सङ्घर्षणाय नमः । प्रद्युम्नाय नमः । अनिरुद्धार- नमः ॥ दयावाहि संसार लक्ष्मेशो शरणागतम् भम्त्या समपये तुभ्यः त्रिविकार- णाचनम् ॥३॥ प्राच्याम्-केशाय नमः । नाराय जयनमः माधवाय नम.. गोविन्दाय नमः । गधु सुदनार नरः त्रिविक्रमाय नमः । यामनाय नमः। श्री धरायनमः हृपी केशाय नमः पद्म नाभाय नमः । दामोदराय नमः। दयावेत्राहि ससार लक्ष्मेशो सरणागतम । भक्त्या समर्पय तुम् मूने वस्त्र स्थितो ब्रह्मामध्येमातृगणाः स्मृताः- कुक्षोनु सागराः सर्ने सव- द्वापा वसुन्धरा ॥ मृग्वेदोऽययजुरेदी सामरेंदोग्यथर्वण. ॥ श्रॉच नहिताःसो कलशन्तु समाश्रिवाः । कमशेदेवद्वार पूजा । ॐ गणपतये नमः । ॐ गुरुभ्यो नम ॥ क्षेत्रपालाय नमः । ॐ नन्दिने नमः ।। ॐ महाकालायनमः ॥ ॐ नमः ॥ ॐ विनायकाय नमः ।। लम्दाय नमः ॥ ॐ चण्डाय नमः ॥ *दिन्यै नमः। इति मन्ः पायादीनि समर्पयेत् ।। वत. उन्दशाभि कलशमुस मादागपूजयेन् । नि शिष्टा. ॥ ॐ प्रमणे नमः । ॐ विष्णचनमः ॥ ॐ मदेश्वरा यनमः ॥ ॐ गदायै नमः। ॐ यमुनायै नमः ॥ ॐ सरस्वत्यै नमः । गएश्यये नमः ॥ ॐ जान्दव्यै नमः ॥ ॐनदाय नमः । सप्त सागरभ्यो नमः ॥ ॐ माग यदि मातविभ्यो नमः ॥ श्रादि चादि नवमदभ्यो नमः ॐ अश्वस्याम दारितोनिमो नमः॥ अश्यियादि नक्षत्रेभ्यो नमः ॥ विम्मादि सप्तशियिं गेभ्यो नमः ॥ मेपारिवारा राशिभ्यो नमः । मृत्युन्जयाय नश्वरीतहिवायनम. 1 सम्पूर्ण कलशाय नमः ॥ इति मन्त्र पारादीनिन त पुष्प ममपर्यत ।। सती गरा पूना | ॐ गएपवयनमः ॥ शिवराय नमः। एक स्वाय नमः । मूषक वाहनाय नमः म जम्योदराय नमः । गजल गाय नमः ॐ [ ३५५ ] चतुर्था वरणार्चनम् ॥ ४ ॥ पूर्वादि क्रमेण । मरस्थाय नमः। फर्माय नमः। राहाय नमः । नारसिंहाय नमः । वामनाय नमः । परस् रामायनमः । श्री रामाय नमः । कृष्णायनमः। बौद्धायनमः । कलये नमः अनन्ताय नमः । विश्वरूपिणे नम. दयाव्ये नाहि संमार लक्ष्मेशो सरणागतम् । भक्यत्या समपंचायं पञ्चमापरणाचनम् ।। पूर्यादिक्रमेण- अनन्वायनमः । दक्षिणस्या ब्रह्मणेननः। पश्चिमायां वायवे नमः । उत्तरस्यां मौशानाय नमः । 'आग्नेयां वारुण्ये नमः । नैऋत्यां गायत्र्यै नमः || वायव्याभारत्यै नमः । ऐशान्यां गिरिजायै नमः। अमेगडाय नमः। वामे सुपुरयाय नमः। दयाये ! गहि संसार लदनेशो सरणागतम् । भत्या समाये तुभ्यं पष्टमा यातनम् ॥ ६ ॥ पूर्वादि क्रमेण--इन्द्राय नमः । अग्नये नमः । यमाय नमः नि तये नमः । वरुणाय नमः । सोमाय नमः। ईशानाय नमः । दगान्थे । बाहि संसार लक्ष्मेशो सरणागतम् ॥ भक्तया संमपये तुभ्यं सप्तमा वरणा- चनम् ॥ ७॥ अग्नेयां शेषाय नमः । ननृत्याविष्णवे नमः । वाय-यां विषये नमः । ऐशान्याप्रजापतये नमः। याब्धे! त्राहिसंमार लदाशी सरणागतम् ।। भकया समर्पये तुम्यं अष्टमा वरणाचनम् ॥ ६॥ अग्नेय्या प्रथदस्ताय नमः । सिद्धि विनायकाय नमः । पार्वती नन्दाय नमः । मनोरथ दायिने नमः ॥ इति मन्त्रैः रक्त सूत्र कपुप्पं च समर्पयेत् । सतो गोपाम पूजा ॐ नन्दाय नमः। मुभद्रायै नमः। सुमनसेनमः । मुशोलाय नमः । सुभगाय नमः । पञ्चगोमाभ्यो नमः ॥ इति मन्त्र पिन सूत्र कपिल पुणं च समर्पयेत् ॥ ततः कौमारीपूजा ॥ ॐ मझएये नमः ।। माहेश्वरै नमः ॥ कौमाय नमः ॥ वैष्णव्ये नमः ॥ वागही नमः।। इन्द्राय नमः !| चामुण्डायै नमः ॥ महालक्ष्म नमः । शमि हस्ताये नमः। मयूरा सनाय नमः ॥ रक्त लोचनायै नमः ।। पराशक्तये नमः ॥ हमारी मयै नमः । इति मन्त्रीः पद्यादीनि रह सून रक गुप मायन् ॥ ततोमोहिनी ना सजनमोदिन्यै नमः ॥जगन्मोहि न्यैनम मो मोहिन्यै नमः। इति मन्त्रैः पायादोनिपीत सूधपोत पुष्पन्न ममर्पये ॥ तोऽष्टचिरजीवि ॥ * भत्तत्वाम्ने नम ॥ यनयं नमः ॥ व्यासाय नमः हनुमनो नगः) मिमीपर मनः॥ मा. पायर्याय नमः । परशुराणाय नमः ॥ मारदेयापनमः ॥ उमापतये नमः ! उनि मन्त्री; पायादीनि चैत सूत्र व पुष्पब्ध सनग्येत् । ततः पत्र बलि पूजा ॥ अज्ञा-पिपिटामन पम यति निर्णय । सिन्दूर मस्तम हवा जरिवि शिष्टा. ॐ गाय नमः ॥ पार नमः .

गणपतये नमः । नेऋत्यां सप्तमातृभ्यो नमः । वायग दुई नमः। ऐशान्यां क्षेत्राधि पतये नमः । दयाब्धे ! वाहिसंसारलक्ष्मेशोसम्यागतम् । भक्कया समर्पये तुभ्यं नवमा वरणाचनम् ॥ ६॥ मध्ये ब्रह्मणे ॥- भास्कराय नमः । शेगय नमः | सर्वव्यापिने नमः। ईश्वराय नमः । विश्वरूपाय नमः । महाकायाय नमः । सृष्टि को नमः । कृष्णाय नमः। हरये नमः । शिवाय नमः । स्थिति कारकाय नमः। अन्तकाय नमः ॥ दयान्धे ! बाहि संसारलक्ष्मेशो मरणागतम् । मकया समर्पये तुम्यं दशमा वरणार्चनम् ॥ १० ॥ शौरयै नमः । वैकुण्ठाय नमः । महास्नाय नमः । पुरुपोचमाय नमः । अजाय नम । पद्मनाभाय नमः। मंगलाय नमः । हृषीकेशाय नमः | वरदाय नमः । मधुसूदनाय नमः । प्रच्युताय नमः । अनन्ताय नमः । गोविन्दाय नमः । विजयाय नमः। अपजिवाय नमः । कृष्णाय नमः । दयाध्धे ! त्राहि संसारात् लक्ष्मेशो सरणागतम् भक्त्या समाये 'तुभ्यं एकाइशा वरणाचतम् ॥ ११ ॥ अनन्नाय नमः। कपिजाय नमः । शेषाय नमः । मर्पयाय नमः ।। इलायुबाय नम | तारणाय नमः । शीर पाणये नमः। घलभदाय नमः। दयाव्ये ! पाहि ससारान् । लोशो सरणागतम् । भक्कया समर्पये योगिनीभ्यो नम नेत्रपालाय नमः ॥ एतत्स्थानाधिपतये नमः असि. साहायष्ट भैरवेभ्यो नमः ॥ वृकोदर क्षेत्रपालाय नमः ।। रक्तकेश क्षेत्र पालाय नमः । लम्बोदर क्षेत्रपालाय नमः ॥ सर्व क्षेत्र पालेभ्यो नमः ॥ सर्व पिशाचेभ्यो नमः ॥ सा भूतेभ्यो नमः ॥ इति मन्त्रैः प्रागादीनि कृष्ण सूत्र कृष्ण पुष्प मर्मपयेत् ।। ततः सूर्यादि पूजा | ॐ सूर्याय नमः ॥ सदा शिवाय नमः । गृहलक्ष्मै नमः ॥ इष्ट देववाय नमः। नागेभ्यो नमः ॥ इति मन्ो. पायादीनि पञ्चवर्ण सूत्र पञ्च वर्ष पुष्पप समर्पयेत् ॥ ततो देवाने सनकादि पूजा ॥ॐ सनकादि पि-पो नमः ॥ ऋषि पुत्रेभ्यो नमः ॥ दिव्याश्रनेभ्यो नमः ॥ इति मन्नः पाधादीनि खेत सूत्र वपुष्पजन समस्येत् ॥ ततो देवाने गोमयोद्भव पाहायो वृद्ध ब्राह्मण पूजा II. ॐ दिव्यम्पाय नमः ।। दिव्या वराय नमः ॥ देवभकिन्यै नमः ॥ मुभूपायै नमः ।। जदिलामै नमः । वधिराणे नमः । अति वृद्धायै नमः ॥ कुम्जाये नमः॥ अति. दीपाये नमः ॥ इति मी पायादीनि श्रोत साप समर्प- पेन् । पुनस्वग्रेव नवराज पूजा-पाय नम ॥ मातृवत्सलाय नमः सुजन दियाय नमः । मु चरित्राय नमः । मुमतये नमः ॥ प्रियं माय नमः ॥ इति मन्त्री पागदोनिश्वेत पुपप समर्पयेत् ॥ ततः [ ३५७ j तुम्य द्वादशा वरणाचनम् ॥ १२ ॥ क्षीन्धि शायिने नमः । प्रन्युताये नमः । भूम्याधाराय यनः । लोकनाथाय नमः | फरणमणि विभूषणाय. नमः । सहस्रमूर्ने नमः । सहस्राचिपे नमः || दयाव्ये ! त्रापि संसारात् । लक्ष्मेशो सरणा गतम् । भलत्या समपये त्तम्यं त्रयोदशा वरणार्चनम् ॥ ३ ॥ केशवादि चतुर्वि ति नामभः । केरावाय नन केशिहायनमः । हरये नमः। कामदेवाय नमः । कामपालाय नमः। काम्या नमः। कान्ताय नमः । स्तागमायनमः । अनिर्देश्याय नमः । वपुपे नमः । विष्णु वीगय नमः। अनन्ताय नमः । धनञ्चयाय नमः । ब्रह्म याय नमः । ब्रा झद् ब्रह्माये नमः । ब्रह्म २ विवर्धनाये नम । ब्रह्म विद् ब्राह्मणाये नमः । ब्रह्मी ब्रह्मज्ञाय नमः। ब्राह्मण प्रियाये नमः । महा-क्रमोमहा कमाये नमः 1 महा तेजाये नमः। महोग्हाये नमः । मा कनु महायभाये नमः। महा यत्रो महा हविये नमः ॥ २४॥ दयाव्ये ! बादि समाए सन्मांसाणा गतम् । भक्तया समर्पये तु चतुर्दशा वरणार्थनम् ॥ इति मन्त्र मुबार्य अलं त्यक्त्वा पुष्पं देवी परि ॥ श्रयपत्र पूजा-कृष्णाय नमः। पनास पत्र समर्पयामि ॥ विष्णवे नमः श्रीन्दुम्बर पत्रं समर्पयामि ॥ हरये नमः प्रास्वस्थपत्रं समर्पयामि ॥ शम्भवे नमः भृगराव पत्र समर्पयामि ॥ अक्षणे । पापिनी पूजा फूत दाना रोहणां पापिनी कुरडे निमग्नां पूजयामिति शिवाचार | नवराजपन्यै नमः ॥ पापमूत्यै नमः ॥ कुशोलाय नमः । कुमा पिण्यै नमः 11 धर्मपिण्यै नमः । इतिमन्त्रः पाणादीनि फुप्प मुखं कृष्ण पुषच समर्पयत ॥ तो देवाग्मे भत्सरः पूजा ।। ॐ अस्यै नमः । मेनपये नमः रम्भाय नमः ॥ चन्द्र रेसाय नमः ॥ तिलोत्तमाय नमः ॥ ययुष्मत्यै नमः । श्रान्ति मत्यै नमः। लीलारत्यै नमः | समय नमः ॥ धुताच्य नमः ॥ पन्द्रमानाचे नमः ॥ धर्मात्यै नमः ॥ पोराय नमः ॥ इति मन्त्रीः पापविनि पीन पीत पा समयन नोभार पERT -धर्म सोता नमः। धर्म ये नमः ॥ धर्म पतये नमः । धर्म रवार- नमः ॥ इति त मय श्येत पुप्पा समरिन् । चतः नाग नवी- पूना सब समुदेयो नमः ॥ अट नाग जेम्पो नमः ।। नदी- मो नमः ॥ इति मन्त्रः हरित मूर परिलमा ममपंत ॥ घर: सिजिदि || -सरसने न पनपनमः । यामाय नरः ॥ नुमने नम. u firs न. पाय नमः। न्यमेत् ॥

भास्करयतमः अशोकपत्र नमः। जटा धार पत्र' समपयामि ॥ समर्पयामि ॥ शेषाय नमः कपित्थपत्र समर्पयामि ॥ सर्वव्यापिने' नमः वट पत्रं समर्पयामि ॥ ईश्वराय नमः प्रापन समर्पयामि ॥ विश्वरूपिणे नमः कदली पत्रं समर्पयामि ॥ महाकालाय नम अपामार्ग पत्रं समर्पयामि ।। सृष्टि कर्वे नमः कपीर पत्र समर्पयामि । स्थिति करे नमः पुन्नागपत्र समर्पयामि । अन्तमाय नमः नागवली पत्रं समर्पयामि ॥ अथपुष्प पूजा-अनन्ताय नमः पद्म पुष्मं समर्पयामि । विष्णवे नमः जाति पुष्पं समर्पयामि ॥ अध्ययाय नमः कहार पुष्प समर्पयामि । सहस्त्रजिते नमः केतकी पुत्रं समर्पयामि ॥ अनन्त रूपिणेनमाबवुलपुष्पंसमर्पयामि इप्टायनमःशवपुष्पंसमर्पयामि विशिष्ट्राय नमःपुनागपुष्पंसमर्पयामि । शिष्टायनमःकरबोरपूप समर्पयामि । शिख रिडने नमः धत्तूरपुष्य समर्पयामि ।। विश्ववाहवेनमः मल्लिका पुष्पं समप. यामि । महीं धराय नमः मालती पुर्ण समर्पयामि । उच्युताय परशुरामाय नमः ॥ मार्कण्डेयाय नमः । प्रजापतये नमः ॥ इनि मन्त्रः श्वेन सूत्र श्वेत पुष्पश्च समर्पयेत् ।। ॐ अश्ययाम दयश्चिरंजीविनः सु प्रतिष्ठिताः सन्तो वरदाः भरन्तु इति मन्त्रण लावाः क्षिपेत् ।। रातः सिन्दूर भारठे पूजा-पार्वत्यैनमः । मौर्य नमः नमः ! इात रक्त सूत्र रफ पुष्पच समर्पयेत् ॥ शिवपूजा" महेश्वराय नमः ॥ ईश्वराय नमः || सदा शिवाय नमः ॥ इति खेत सून श्वेत पुष्पं च समपयेत् ॥ श्रय मूल देवता पूजा ।। ध्यानम् ।-मन्दार माला फलिता लकायै कपाल माला र शेसराय।। दिव्याम्बराये पदिगम्बराय नमः शिवाय च नमः शिवाय ।। सहस शोपरया वाहनम् ।। पुरुप एवेत्या सनम् ॥ ॐ आधार शक्ये अनन्ताय नमः || स्कन्दाय नमः || नारायणाय नमः ॥ पवाय नमः ॥ पेभ्यो नमः || कर्णिकाये नमः ॥ शरभ्यो नमः ।। गुराय नमः । सिंहाय नमः । शनि मन्त्री पचादीनि मायन ।। एनागानस्यति पायम् ॥ त्रिपादूपत्यध्यम् ॥ तनो विरादित्या चमनम् ॥ पयः पृपियां दक्षिमा पृमि मिने मधुव्याता अशा रस- मित्यादिभिः पञ्चामृतम् ॥ श्रापो सामानिवि शुक स्नान ।। प्रसि. पुस ARTI] शठि शिराभ्यामिदं मप ममर्पयामिति ममुपम् ॥ गृहरन पनि पम् । नम्मानमा मृतः मन गिनिर 3 ॥ तमा नया winni पोयम् ॥ी रे नि मिसी मराय नमः । शिपाप सौभाग्य पृद्धि कन्य समर्पयामि ॥ अनन्ताय नमः । श्रच्युताय नमः। अद्भुत क्मणे नमः । अति विक्रमाय नमः । अपरा जिताय नमः । श्रसएडाय नमः। [ ३५६ ] नमः कार्ण कार पुष्पं समर्पयामि । श्रन्तकाय नमः क्दली पुष्प श्रथा अष्टोत्तर सत नामभिः पूजयेत् । अग्नि ननाय नमः अग्नि वपुषे नमः। अश्याय नम ! अनि पुत्राय नमः । अनन्तकुनाय नमः । अनाशिने नमः। अब्दनीलाय नमः। अहरहाय नमः । श्रेष्टमूर्तये नमः ! अनिरुद्धाय नमः । अनिविष्टाय नमः । अचवलाय नमः | शब्दातिगाय नमः । अचल रूपाय नमः । अखिल धराय नमः अन्यक्ताय नमः । अनुरूपाय नमः । अभये कराय नमः । अहताय नम.] अवपुपे नमः । अयोनिजाय नमः । अरविन्दाय नमः । श्रान वजिताय नमः । अधोक्षजाय नम । अदिति पुत्राय नमः अम्बिकापति पूर्व जाय नमः) अपस्मार नाशिनेन : अव्ययाय नमः । अनादयेन. 1 अप्रमेयाय नमः । अघशत्रवे नमः । अमरा रिघ्नाय नमः । अनाश्चराय नमः' अजाय नमः। अघोराय नमः। अनादि निधनाय नमः । श्रमर प्रभवे नमः। आमाह्याय नमः । अकराय नमः । अनुत्तमाय नमः अरूपाय नमः।- अन्न नमः । अमोधाधि पतय नमः। अजाय नमः । अक्षयाय नमः। अमृताय नम । अघोर वीर्याय नमः । श्रव्यङ्गाय नमः । अविनाय नमः । अत्तिन्द्रिययाय नमः। अमित इति मन्त्राभ्यामदर्श चामर व्यञ्जनानि ॥ त मिति चन्दनम् । अतन्न मीत्य क्षता ॥ वत्सुरुपमिति . पुष्पाणि ॥ तत. पु म् ॥ मालोचित यथा पुष्पं पश्व वणे: मुगन्धिभिः ॥ विचित्र मथिता माला- गृह्यता परमेश्वरी || तो विल्व पत्रम् ॥ पानांतु सदस्य सम्पादत्तस्य यत्फलम् ।। तत्फल लभते पत्र देत्वा विल्पस्य शोभनम् ॥ यत्रम् ।। एक धत्तर पुष्पेणाय. पूजयवि शङ्करम् ।। सर्वपाप विनिमुक शिवनोके महीयते ।। दूर्वा ॥-दूर्वाङ्क र यन्तु शम्मी पूजा काले. प्रयच्छति ॥ नात शतगुण सदा प्राप्नोति मानव. ॥ कमलम नमः शमवाय इति मन्त्रण नील - कमलम् ।। देवों द्वारेति मन्नण जाति पुभम् ॥ ननः शभवावेति मन्त्रेण च दमन पुष्पम् ।। कन्दर्प भस्मस जाय पवित्र दान शुभम् गृहीत श्री महेशानो भक्त्या दच मया शिवौ । सहस्त्रसूत्रम् ॥ काम निर्मित सूत्र पत्रिसु मनोहरम् ॥ सर्वपाप विनाशाय शिशाभ्या नमो नमः नमस्ते देव देवेश मुरामुर नमस्कृत ! ॥ नमस्ते जगतामात. पार्वति। वरदायिनि !॥ इति मन्त्रणाप्ट वार सदर किरकुन्द पुरुष पार्वती साहताय शङ्कराय नमः ॥ राम गिरिजा यज्ञ [ ३६० ] तेजसे नमः | अमितये नमः । अष्टमूर्तये नमः । अनिलायनमः । भवशाय नमः । अणोरणीयसेनमः । भशोकायनमः।अरविन्दाक्षायनमः ।नधिष्टाय नमः अमितनयनाय नमः परस्यवासिने नमः । अप्रपत्तायनम ! अनन्त रूपायनमः अनलायनमः अनिमिपायनमःखरूपायनमःअगस्यायनमः । अमितायनमाभनन्त कायनमः चिन्त्यायनम.अपानिधयेनमः अविसुन्द- रायनमः श्रमरप्रियायनमः। श्रष्टसिदिदायनमः अरविन्दप्रियामनमामानि- न्दोद्भवाय नमः। अनयायनमः । अर्थायनमः । अक्षोम्यायनमः । चि- मवे नमः । अनेक मूर्तये नमः । अनेक ब्रह्माण्डपतये नमः । अनन्त शयनाय नमः । अमराधिपतये नमः । श्रनाधाराय नमः। अनन्त नास्ने नमः ! अनन्तश्रिये नमः । अक्षराय नमः । श्रमायाय नमः । पाश्रम स्थानायनमः । श्राश्रमा तीतायनमः। अन्नदायनमः । आत्मयोनये नमः। अवनी पतये नमः श्रवनीधराय नमः । अनादये नमः । श्रादित्याय नमः। अमृताय नमः। अष्टवा प्रदाय नमः । अव्यकाय नमः। अनन्ताय नमः । इत्यष्टोधर शतनाम पूजा !॥ श्रथ धूपम्-दशाङ्ग गुग्गुलोद्भतं धन्दमाग संयुतम् ॥ सर्वशा उतम चूप गृहाण सुर पूलि. तम् । यत्सुरूप मिति धूम् ॥ दीपम्-सायं चर्चि सयुक्त बहिना योनितं मया। दीप । गृहाण देवेश : त्रैलोक्यविमिरापहम् ॥ ब्राह्मणोस्य मुस भासीत् इति दीपम् ॥ नैवेद्य-मन्न चतुर्विध स्वादुपयो दधि धृतेर्युवम् ॥ नाना व्यञ्जन शोमाच्यं नैवेद्य' प्रतिगृह्यताम् ॥ चन्द्रमा ममस इति नैवेद्यम ॥ नैवेद्य मध्ये पानीयम् । उत्तरापोपणार्थ ते, दाम वो सुवासितम् । गृहाण मुमुसो भूला अनन्ताय नमो नमः । उत्त. सहिवाय नमः । महेश्वराय उमासहिताय नमः । ॐ महादेवाय गौरी सहिताय नमः। ॐ स्थाएर विशालाक्षी सहिताय नमः ॥ ॐ शिवाय श्री मुस्खी सहिताय नमः । पशुपपतये नारायी सहिवाय नमः उपाय माधवी सहिवाय नमः ॐ शुभ सत्वाय श्री हिताय नमः। ईरवपय मद्गल सहिताय नमः ॥ रुद्रायास्त्रिका सहिताय नमः ॥ यूपध्वजाय महको सदिनाय नमः ॥ॐ पार्वत्यै नमः । सर्वाय नमः। ओम अन्याय नमः । मयंभ्वदमन्यै नमः । स्वस्थानीपरमेश्वर्यै नमः।। इति मन्त्र पाचादीनि समर्पयेत् ।। माधणी येवि पम् ।। पममा मनस इति दीपम् । नाग्या असोदिवि नैवेधम् ॥ पुनराचमनं अम्यूनादि द्रव्यं निवेदयेत् ।। हिरण्य गर्भविद्रव्यम् ।। यानि कानि च पाणनि जन्मान्तर छुवानिय ।। वानि २ प्रयन्ति प्रदक्षिा पद पदे ।। ति प्रतियां न निदेवेति नोयननम् ॥ थव कम ॥ मर्यन्दु तारका वहि वेजापुजविराजिवम् ।।

[ ३६१ ] रापोपणम् ।। मुख प्रक्षालनम्-इस्त प्रक्षालनम् । करोद्वर्तन कदेवमया दत्तहि भक्तिः ।चारु चन,प्रम दिव्यं गृहाण जगदीश्वर !॥ इति करोद्ववनम् ॥ फलम् इदं फन मया देव ! स्थापित पुरसस्वर ॥ तेनमेस कला वानिर्मवेज्जन्मनिज्जन्मनि ॥ ताम्भूलम् - पूगी फल महादिव्यं नागवल्या दलैयुतम् !!~कपूरैला समायुक्त वाम्यूलम्पति गृह्यताम् ॥ ॐ हिरण्य गर्भति इक्षिणाम् ॥ यानि कानि चपापानि जन्मान्तर कृतानि चतानि नानि विनस्पन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥ नाभ्या प्रासोदिति प्रदक्षिणाम् ॥ नमस्कारम् --नमस्ते भगान्भूयो नमस्ते धरणीधर !! नमस्ते सर्व देवेश ! नमस्ते मधुसूदन ! ॥ सप्तास्यासन्- इति नमस्कार रान् । मन्त्र पुष्पम् - नमस्ते देव देवेश ! नमस्ते गरुड़वा ! ॥ नमस्ते कमला कान्त ! अनन्ताय नमो नमः ॥ यनेन यज्ञमय सं० इति मन्त्र- पुष्पम् । प्रार्थना-अनन्ताय नमस्तुभ्यं सहल शिरसे नमः नमोस्तुपा- नाभाय नागानां पतये नमः ।। अनन्त कामदः कामा नगन्तो में प्रयच्छतु ॥ अनन्तो दोर रूपेण पुन पौत्राप्रवर्षतु ॥ इति सप्रार्थ्य दोरकं गृहीत्वा-प्रय दोरक बन्धन मन्त्रः ॥ अनन्त संसार महासमुद्र मग्न समन्यू बरवासुदेव ! ॥ अनन्त रूपे विनि योजयत्र हनन्त सूत्राय नमो नमस्ते ।। वस्नीयात् || जीर्णदोर ममु देवं विजेई स्वदालया ॥ इति -- विसृजेत् ॥ अथ वायनमन्त्रः 1-~-गृहाणेदं द्विज श्रेष्ठ? वायनं दक्षिण युतम् ॥ त्वत्प्रसादादह देव ? मुच्देयं कर्म बन्धनात् ॥ प्रति गृह दीपं देवेश ! गृहाण परमेश्वरः ! ।। अथ पुष्पाञ्जलिः ॥ नमोस्तुते उमादेवि त्वस्यानि परमेश्वरि ॥ त्रैलोक्य जननि ! नित्ये सत्वानां पाप हारिणि ॥ त्रिपुरघ्न महादेव ! भकवास ! विश्व- कृत् ! १ नमस्करोमि देवेश ब्रह्ममाघध बन्दित ! ॥ इति नमस्कार ।। अन्यया शरणं नास्ति युवा वैशरणं मम || तस्मारकारुण्य भावेनरतवां परमेश्वरो ॥ विसर्जनम् ।। प्राबादन न जानानिति ॥ पुनः सूर्याघम् ।। स्वस्थानी ब्रतस्य सम्पूर्ण फनावाप्तये जगत्सातिणे श्री सूर्याय इदम, समर्पयामि नमः !! श्रय दक्षिणा संकल्पः ||-अद्येह अनेक अन्मकृत पाए इयार्थ साम्वत्सरिक श्री पार्यतो (स्वादानी) मार प्रत पूजा सागपा सिद्धर मिमां दक्षिण नम्र सएट श्री सूर्य दैवतं रजतं या सौम्य या नाम गोत्रायत्यादि। इति पद्म पुराणोह माय शुला पौर्णमास्यां स्वस्थानी व्रत पूजा विधिः- समाल: । ले० इमारी गायत्री देवीनां चारा मतम् ॥

फल संयुक्त द्विज श्रेष्ट । अनन्तफन दायक ॥ पक्वान्न दक्षिण घृत मं युतम् । वायनं द्विज बर्याय दाश्यामि व्रत पूर्तये । अथ जीर्ण दोरक दोन मन्त्रः-अनन्तः प्रति गृहाति अनन्तो ३ ददाति घः अनन्तस्तारको भान्या मनन्तायनमो नमः । इति दद्यात् । ततो यथा शक्ति ब्राह्मणान् भोजयेत् । अनेन ऋतपूजनेन श्री-भगवान् विष्णु लक्ष्मी नारायण ( अनन्त ) देवताप्रिंथताम् न मम ॥ मन्त्र पुष्प, नाना सुगन्ध पुष्पाणि यया कालोद्भवानिय । पुत्पाञ्जलिः शुमा देया देवता प्रीतये सदा ।। इति । भार्ति-करुयापारा वारं कलि मलपरि हारम्, कद्र सुत शयितार करधृत कहारम् । धनपट लाभ शरीर कमलोद्भवपितरम् । कलये-मुष्णु मुदार कमलाभरिम् । विश्वनिहारं नाय ? निहारम् भवपारम ॥ देवी प्र. होम द्रव्यम् ॥ . नवा वृत्ति युतो सर्मान कामा निश्रा नवान यान् ॥ थथ प्रयोगा वक्ष्यते साधकाभीष्टसिद्धिदाः ।। नव लक्ष जपेनात्य रुद्ररूपी न भवेत् । मल्लिका मालती पुष्पै होमा द्वागीश तामियात् ।। करवीरे अंपा पुष्पै होमा मोहयते जगत् । चन्द्र (क्यूर) कुकुम कस्तूरी होमात कामाधि कोभवेत् ॥ चंपकैः पाटलैविश्व वशमानयते ऽचिरात् । लाजा होमोराज्य दायी मधुनोपद्रव क्षयः ॥ निशि म्याग पले होमो रिपु सैन्य विनाश कत् । दध्याज्य दुग्धमधुमि. क्रमाद्धो माद मानु पात् ॥ प्रारोग्य संपदं प्रामं धनंशकी यासु. गम ॥ कमलर्धन संपत्ति दादिमै राजवश्य ताम् ॥ क्षत्रियामातु लिगैतु वेश्या नारंगजेः फलैः । शूद्राः सुष्मांद संभूतै यस्याः स्यु निश द्वतः ।। पनसानां लक्ष होमा दुस्यास्यु पथक वतिनः । द्राक्षा फसे रिष्ट सिद्धि रभाभि मैत्रिणो, शाः ॥ नारि के लेस्तु संपत्ति सलैः संष्ट सिद्धयः । गुग्गुलेदः स नाशः स्यात् सो शर्कगगुः ॥ पायसे धन धान्यास्ति वधुः प्राणिनो यशा। पोरनफने होमा अदमात्रा रा रा नवराजका यु far. पर पिनाशनः 1 कपूर होमा लमते वा पति नरो विरान !! करंज फल होमेन भूतप्रेतादयो वशाः । वियः स्या तुना लक्ष्मी रिनुतः मुम्राप्तयः ॥ न होमादीपिरताकि शान्तिः स्यानिल उरलैः । कि यह नाश सबष्ट साधिता भृणाम् ॥ ५२ ।। मी यूट पिके भेदा यान्तर नियो जनान् । पयो न गदिता । ३६३ ] रतो दक पान विधि। . तू तू तूं रुरु ॐइतिमन्त्रः ॥ दिशा न्यास माह ॥-दिशा न्यासमहा देवि कथया मितया नद्ये । ॐकारविन्यसेद्भदे अवतःपापनाश- नम् ॥ १॥कार पूर्व दिग्भगे बह्रौ । कारमेवचः। रूँ कारं धर्मराजे च: । कारं नेने नथाः ॥ पश्चिमे चैव रु कारं नकार वायु के तथा ॥ है कार उत्तरे चैव हें कार सीशं दैवते ॥ ३ ॥ ॐ कारं तु अघ श्चैव दिन न्यासं सत्र कारयेत् । दिड न से च कृते देवि कुएड न्यास विचक्षणः ॥ ४ ॥ अङ्ग न्यासं ययो कुर्य्या त्या च शृणु पार्वति-ॐ कार विन्यसे मूदिन्न' रूँ कार नेत्रयो स्तथा ॥ ५॥ कारं वक्त्र मध्येतु रूँ कार कंठ देशवः। तूं कार स्कन्धयोदशे रु. कारं हृदये तथा ॥ ६ ॥ तू कार गुह्य देशेतु रु कारं जंधयो स्वया । सै कारं सर्व संधौच ॐ कार पादयोस्तथा ॥ ७ ॥ अथ कर न्यासः । देह न्यासे कृते देविकर न्यासं तु कारयेत् । कामा न्यसेद भद्रे ॐ कारन्तु वि दैवतम् ॥ ८ ॥ रूँ कारं वह्नि वीजं च तजन्यां तु न्यसे त्तया। मध्यमायान्तु न कारं पवित्रा यां न्यसे । म ६ ॥ कनिष्टा यां च हू कार दष्टां गुठे त्रि देवतम् । 'तर्जन्या देवि 6 कारं तू कार मध्यत-- स्वथा ॥ १०॥ कारं च पवित्रा यां कनिष्टायां तमे वहि ॥ इत्यं न्यासे कृते देवि सर्वसिद्धि भवेत्ततः ॥ इति न्यासविधि. ॥ अथ प्राशन विधि. ||-वत्तिवेद्भक्ति संयुको मय्यैव हित चेवसा । दक्षिणे नैव हस्तेन ग्रीन वारांरप सुरे श्वरी। ईशानाभि मुखो भूत्वा पिने वामेन पापिना दक्षिणे न ततः पीत्वा पिवेन्त वृपभो यथा ॥ भुमिमागल्य जानुभ्यां हस्त युग्म प्रसार्य । ईपन्मानं च वारास्त्री स्त्रिवास्फोट तु कारयेन् । अहं ब्रह्मा स्यह विष्णु रह रहो महेषः का स्फोटं ततः कृत्वा वहेद वै सायको तमः ॥ इति रेतीदक प्राशनविधिः । गुगुरुभ्यो नमः पूजयेत् ॥ ॐ सम्पक मिति प्रार्थ यत् ॥ पथ गौरव भीतितः ॥ ५३ ॥ भेदा नाह-सर्वेष्ट सिद्धेश्च मुल्यै पैक काम राज विया ॥ यथा-इसकल एईल दी इसकल एईल की सहक एईन ही इसकह एईल हा सहकह एईल हा का 1 पदक द्वो || पतस्वीरो इर्य कूट काम राजीयम् ॥ ।

-- अथाऽभिषेक विधिः। V अश्वत्थपल्लवैः या अाम्रपल्लवैः ब्राहाण, वरुण जल यजमान शरीरे! अभिपिश्चन कुर्यात् ।। सुरास्त्वामभिषिचन्तु ब्रह्मविष्णु महैश्वगः । वासुदेवो जगन्नाथस्तथा संकर्षणो विभुः। प्रद्युम्नश्चानि रुद्धश्च भवन्तु विजयाय त । श्राखण्डलोऽनिर्भगवान् यमोवै निति स्तथा । करुणः पवनश्चेव धनाध्यक्षस्तथा शिवः । ब्रह्मणा सहित. शेपो दिक् पाला पातु ते सरा । कीर्तिलक्ष्मीधृतिर्मेधा पुष्टि बद्धा क्रियानति । 'बुद्धिर्लज्जा वप. शान्तिर्माया निद्रा च भावनाः। एतास्त्वामभिषिञ्चन्तु देवपल्यत्त्वमागताः । श्रादित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधजीवसितार्कजाः । महा- स्वामभिषिञ्चन्तु राहु केतुश्चतर्पिताः देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपनगाः । ऋपयो मुनयो गावो देवमाता एव च देवपन्यो द्रमा नागादेत्याश्याप्सर- सोगणाः । अनाणि सर्वशास्त्राणि राजानो वाहनानि च । औपधानि च "रत्नानि कालस्य वयवाश्चय । सरित सागरा. शैलास्तीर्थानिजल दानदाः एतास्वामभिपि-वंतु सर्वकामार्थसिद्धये । यथाविधि कला यास विधानमय कथ्यते । निवृतिम् जानुपय्यन्तं न्यसेत्पादतलाकलाम । जान्वादि नाभिपय॑न्तं प्रतिष्ठा विन्यसे ततः । नाभ्यादि कण्ठपर्यन्त ततो विद्या प्रपिन्यमेत् । कण्ठाल्ललाटपर्यन्तं तत. शान्तिकलां न्यसेत् । ललाटात् ब्रह्मरधाते शांत्या तीता तो न्यसेत् ।। इति अभिषेकम् ॥ अथ माशीर्वादमन्त्राः । हरिः ॐ पृथिच्याऽअहमुदन्तरिक्षमामहमन्तरिक्षाहिवमारुतम । दिवो माकस्य पृष्टारस्वायोरिगा महम् ॥ १ ॥ स्वयंन्तोनापेतन्यादा रोहन्ति रोदसी। यज्ञ य्येश्यिश्वतोधार सोम्विनिरे ॥३॥ अग्ने प्रेहि हि प्रथमो देवयताम्चनुवा नामुत मानाम् । इयक्षमाण म्यूगुभिऽ मजोपाई स्वय॑न्तु यममान सरित ॥३॥ योधा मे। ऽमस्यव्यपसोपविष्वरमहिन्यस्यायमुतस्यस्वधावऽपीयतित्वोऽअनुत्त्यो गृणाति बदाम वाव अन्देऽअप्रे ।। ४ । सपोधि। रिम्मधवान सुपते भ्यायन । पुगोवधाम्म पासिधिरश्नकर्मणो स्वाहा ।। पनास्त्वा । रित्यापायसव समिन्धनाम्पुनम्नमाणो व्यानीय पई. सन सतयार यजमानस्य मस्या 5 सप्त.

[ ३६५ कामा ॥६। यथेमावाच करल्याणी मा यदानि जनेभ्यऽ। ब्रह्मरा- जन्या म्व्या ॐ शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च । पियो देवा- नान्दक्षिणायै दातरिह भूयासमय-म्मेकाम समृदयता मुप मादो नमतु ॥ ७ ॥ स्वस्ति नऽऽ इन्द्रो वृद्धाश्रयाऽसति न पूषा विश्व- वेधाई। स्वस्ति न स्ताक्ष्योंऽअरिष्टनेमिः स्वस्ति नो वृहस्पर्दिधातु ॥5॥ शतं भवति शत्तायुर्वं पुरुषः शतेन्द्रिय आयुरेवेन्द्रिय वीर्यमात्म- न्धत्ते ॥ इत्याशीर्वादमन्त्राः॥ ग्रंथकतु वंशाष्टकम् प्रामे च शोणितपुर नाम पेये, बभूव करिधनिज बंश दोपः । श्री देवि दीन स्तनय स्तदीपो, भवानि दीनो यजु वाजपेयः १ ॥ तस्य पुत्रा त्रयो भूवन्दातारामोगुणान्वितः । राम चन्द्रामिध रचैकस्तृतीयोवियांप्रियः ॥२॥ नारायणदत्त शास्त्री विद्यालय प्रर्वतकः । श्रीदाताराम ननयो समाषा देवि दीपकः ॥ ३॥ पुरोहिसोस्ति श्री केदारे नेपाल देश बासिनाम् ॥ लालमोहरिया प्रसिद्धपा विदितो दिवि देवना ॥ ४ ॥ विचक्षणो नीति गुणे विश्वनाथ इवापर. ।। कर्मकाण्डरतो धीमान्छामान् विनय वारिधिः ॥ ५॥ तेनेयं रचिता तीर्थविधान चन्द्रिका नृणम् ॥ श्री देव्यांचन विधौ नवरात्र विधानकम् ।। ६ ।। झात्यायां कृत हत्या वाजायन्ते भुवि मानवाः ।। गत्वा तीर्थे पिण्ड दान विधि यचपर्यादिकम् ॥ ॥ गृह मेत्य प्रकारांच्या देवी पूजा व मुक्तिदा ॥ पितॄणा मात्मनोर्थे वा सर्गेपामुप कारिका ॥ ८॥ (इति नागपुर थाना प्रामस्थो भोजाप निदफः) [ ३६६ ] ग्रन्थ समाप्ता मन्त्रा गां पठने विधान मखिलं जानन्ति यस्माद् बुधाः। तत्सर्व सुविचार्य शास्त्र निचर्य श्री कर्म ठानां मुदे ।। कृत्वा हृद्य तमं सुशास्त्र विहित लोको प्रकार क्षमम् । अन्योऽयं प्रकटी कृतो निजधिया श्री विश्वनाथैर्महान् ॥ १ ॥ द्वय सहस्र नवाधिक वत्सरे स्वसित के मधु मासि अमाथिती। कृति रियञ्च ममापि सुपूचिया,पशुपतेश्च विशेपत्त आशिषा ११२।। इति अखिल महर्षि मणीवा नेक अन्य सम्मता सर्व साधारण जना हादिनी तीर्थ विधान पद्धतिः समाप्ता (लौकिके पाप नाशाय चैदिके स्वर्ग मास्नु यात् ।।) इति ॥ सम ॥ महत्ता प्रयत्लेन इमा विरच्या विदुपा मप्रे. प्रकाशते त्रुटिस्तु तत्व दर्शिभि विज्ञः शोधनीयेति कामयेत ग्रन्थकारः॥ श्रीकेदारनाथो जयति ॥ 131१३६ शुभमस्तु ।। VIDYA DHAR OTAVDO LIERY BART. प्रकाशक- अन्य स० विश्वनाथ शर्मा लालमोहरिया - पता- पं. विश्वनाथ नेत्रप्रसाद शर्मालालमोहरिया सांगितपुर पी. गुप्त काशी गनुसाम राम

Tirth Vidhan Paddhatti

Author
Sharma,vishvanath
Title
Tirth Vidhan Paddhatti
File name
Tirth Vidhan Paddhatti
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2012/08
Publisher
U.p. Vishva Nath Sharma
Language
Sanskrit
Pages
375
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311599
Barcode
99999990320470.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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