Adarsh Library, Jaipur
Naiyika
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नायिका
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स्टूडियो के भीतर उरा वक्त शूटिंग चल रही थी। मानवीय दुनिया के अन्दर वहा एक मोर दुनिया का निर्माण होता है। वहा भी एक पोर हंराना, रोना, गाना चलता रहता है तो दूसरी मोर ईप्या भोर झगड़े की लोना । सभी कुछ होता है वहा, पर ऐमा लगता है मानो राव कुछ दिसावा हो। बलाई सन्याल प्रोड्यूसर है । वे सड़े हैं, मोर सहे-सडे एकटक समी गुछ देख रहे हैं। उत्तेजनायरा उनका कलेगा धक् धक् कर रहा है । ब्लड- प्रेशर तो था ही, उस पर से डायम्दीज मलग । उन्होने पूछा, 'हरीपद, वहा गाडी भेजी गई कि नहीं?' हरीपद मागे बढ माया । पूछा, 'कहा, सर ?' 'तुम लोगो से और मापा-पच्ची नही कर सकता, वावा ! गाडी कहां भेजनी है, क्या तुमको मालूम नहीं है ?' हरीपद वोला, 'हा, वह तो मालूम है, सर ! 'तब फिर? भला वात समझते क्यो नहीं, बतायो ?' दरमसल सारा सिर-ददं बलाई सन्पाल को ही था। दिमाग रहने पर ही सिर-दर्द भी होता है । पर बताई सन्याल का सिर-ददं जन-साधारण से बहुत अधिक था। अधिक होना स्वाभाविक भी था, क्योकि केवल फिल्म बनाने का ही झमट तो नही पा; बल्कि मार्टिस्टो से कदमो में नाक भी रगड़नी पड़ती यो। विशेषकर वह मार्टिस्ट यदि टॉप-स्टार हो।
-- यद्यपि बलाई सन्याल ने आज पैसा कमा लिया है, पर जो कुछ भी माया है, वह सब उन्हीं टॉप-स्टारों की बदौलत ही तो! बलाई सन्याल की इस फिल्म की हीरोइन भी टॉप-स्टार मंजरी सेन प मंजरी सेन अगर आज वलाई सन्याल के मुंह पर थूक भी दे, तो वह भी बलाई सन्याल को चाटना पड़ेगा पार कहना पड़ेगा, 'पाहा! श्रापका थूक बहुत मीठा है, मैडम !' बहुत ही निकृष्ट धंधा है यह । हारकर यही बात बलाई सन्याल सभी से कहा करते । वे कहते, 'इस चंधे में अव कोई मज़ा नहीं रहा, भाई !' लोग कहते, 'जब मज़ा ही नहीं रहा, तो आप इस कारवार को वन्द भी तो कर सकते हैं !" 'ऐसा करना कहां संभव है, भई ? जगह-जगह कितने ही रुपये अटके पड़े हैं । छोड़ दूंगा, यह सोचने से ही क्या छोड़ा जा सकता है ? जिस समय धन्धे का जाल फैलाया था, तब कहां मालूम था कि इस जाल को वापस समेटना इतना मुश्किल होगा !' न जाने कहां शायद कहीं कोई जलपाईगुड़ी हाउस के पास ही दस हजार रुपये वाकी हैं । वे रुपये आज तक वसूल नहीं किए जा सके हैं । गौहाटी में एक पार्टी के पास चार लाख रुपये अटके पड़े हैं, जिसके लिए मामला भी चल रहा है। यह धंधा बन्द करने से अंत में ये रुपये भी अटके रह जाएंगे। बलाई सन्याल ने शौकिया ही हाई ब्लडप्रेशर नहीं बढ़ा रखा था। गोवर्धन, वलाई सन्याल के ऑफिस में प्रोडक्शन-मैनेजर थे। गोवर्धन ने कहा, 'आप इतनी फिकर क्यों करते हैं, सर? हम लोग तो हैं ही...' वलाई सन्याल भड़क उठे । बोले, 'क्या खाक हो तुम लोग? तुम लोगों के भरोसे पर सब कुछ छोड़ देने से ही तो मेरा यह हाल हुआ है। तुम लोग मैडम को सम्हाल सकोगे?' सचमुच, मैडम को सम्हालना बड़ा ही टेढ़ा काम था। मैडम का किस ४ ?
? वक्त कंसा मूड रहता है. यह शायद मंडम के मुष्टिकर्ता को भी नहीं मालूम या। रपयों की या किसी फैशनेबुल चीज़ की जरूरत हो, तब तो समझ में भी आए । लेकिन यह लड़की कब, किस चीज़ के लिए खोग उठेगी, यह समझना किसीके वश की बात नहीं थी। बलाई सन्याल ने भी कम कोशिश नहीं की थी। उधर अव तक लाइट वगैरह का सारा इंतजाम हो चुका था। मेकप- मन सब कुछ सजा-सवार कर तैयार था। माउंहन्ट्रैक भी रेडी था। 'पय- चारिणी' का हीरो भी मेकअप किए बैठा था और हाथ में एक नविल पक मिगरेट के कश सोच रहा था। हीरो, जिसका नाम अजय भादुडी है, अचानक पूछ लेता है, 'क्यों रे, कहा तक हुमा?' एक मसिस्टंट ने उठकर जवाब दिया, 'मजय दा, मंडम को लाने मादमी गया हुआ है।" 'क्या बात करते हो? ग्यारह बजने को पाए, और ममी लाने हो गया है ? तुम लोगों की यह मैडम अभी तक मो रही है क्या ?' अमिस्टेंट छोकरे ने जवाब दिया, 'अव यह कोन जाने, अजय दा!' 'अपने प्रोडक्शन मैनेजर को तो युला जरा।' पुकार सुनते ही गोवर्धन मा पहुचा। पूछा, 'क्या बात है, मजय दा? मापने मुझे बुलाया था?' अजय ने पूछा, 'क्यों रे, मैडम को भाने में इतनी देर क्यो हो रही है ?' 'पता नहीं, मजय दा! गाडी तो मुबह ही भेज दी गई थी, पर अभी तक नहीं लौटी है।' बात गरम होने से पहले ही बाहर न जाने कैसी गडबड गुरू हो गई थी। बलाई सन्याल चीख रहा था। गोवर्धन दौहते हुए बाहर निकल गया। ड्राइवर ने माकर बताया, 'मंहम घर में नहीं है।' बलाई सन्याल मपना धीरज सो बैठे, 'मैडम घर में नहीं है, तो तू इतनी देर वहा क्या कर रहा था? वहा बैठा-चंठा क्या पास काट रहा था? इससे पहले माफर सयर नहीं दे सकता था? अब क्या करू मैं? मेरी क्या 1 नायिका दशा होगी?' बलाई सन्याल अपने बाल नोचने लगा,'मेरा ब्लड-प्रेशर फिर बढ़ रहा है। मेरे सिर में मानो अग्नि ववक उठी है। अरे गोवर्धन,अव क्या करूं, भाई! वोल? अब मैं क्या करूं?' गोवर्धन पास खिसक पाया। बोला, 'आप यहां से जाइए, सर! मैं देखता हूं।' वलाई सन्याल ने कहा, 'तुम उससे पूछो तो सही, मैडम कहां गई है, वह जानता है क्या?' अभी तक ड्राइवर चुप्पी साधे था। अब वोला, 'सुना है, गौहाटी गई है 'अव क्या होगा, गोवर्धन ? मैं गौहाटी जाऊं? पर मुझे ब्लड प्रेशर जो है।' गोवर्धन ने दिलासा दी, 'याप फिक्र न करें, सर ! आप चुपचाप देखते रहिए । मैं जा रहा हूं गौहाटी। आप शान्त होइए।' उसके बाद, पता नहीं क्या हुआ। सभी कुछ मानो शांत हो गया और मिनट-भर में ही सारा स्टूडियो खाली हो गया। फिलहाल यह वात छोड़ें। इसके पहले एक दूसरी कहानी कहूं-वही कदमफूली की कहानी। कदमफूली के संस्कृति-संघ की कहानी। और ? और भी बहुतों की कहानी। अच्छा, तो कहानी शुरू होती है। २ धीरे-धीरे गांव-गांव में वह बात फैल गई थी। गांव-गांव कहने का तात्पर्य यह नहीं कि कदमफूली निपट देहात ही था। दरअसल किसी समय कदमफूली गांव उन्नति पर था। उस वक्त विष्णु बाबू के पूर्वज इस गांव के कर्ता-धर्ता थे। वे जिस दिन हाट-बाज़ार चले जाते, उस दिन हाट के सभी व्यापारी अपना सौदा उनके कदमों में रख देते और सिर झुकाकर प्रणाम करते । वे लोग भी ठीक वैसे ही थे। सवका कुशल-क्षेम पूछते, उनके अभावों-अभियोगों की बातें सुनते; जैसे, किसके पोखर पर जाकर जमींदार के प्यादे नै मस्ती पकड़ी। मालगुजारी न दे पाने के फलस्वरूप किसके नाम सदर कचहरी में मुकदमा दायर किया गया, मादि-प्रादि बहुत-मी बातें। हा, अब विष्णु वायू की हालत पहले-मी नही रह गई है। विष्णु बाबू का मतलब विष्णुचरण राय । उनके पूर्वज तो 'राय' पदवी के साय 'रापान' नगद भी लगाते थे यानी 'राय रायान' लिखा करते थे, लेकिन काग्रेगी शासन के समय से उन्होंने वह गन्द हटा दिया और सिर्फ 'राय' लिसने लगे। उस दिन मुबह-मुबह ही उनको सबर मिली। पारहयारीतल्ला के सामने पहुंचते ही देखा कि बाजार के ठीक बीचो-बीच बहुत बड़ा शामियाना बांधने का इन्तजाम हो रहा है। पूछा, 'क्या यात है, भई निरापद ?' निरापद मुहल्ले का नामी लड़का है। भाजकल के लडको से बराबरी के स्तर पर बात करनी पड़ती है। प्रय जमाना बदल गया है। पुराना जमाना होता तो विष्णु बाबू के सामने पडे होकर बात करने तक को हिम्मत नहीं होती किसोको। फिर मी निरापद बहुत थक्षा के साथ मागे यह पाया। बोला, 'क्या बात कर रहे हैं, ताऊ जी ? क्या प्राप सब कुछ भूल गए? भागामी बुधवार को हम लोगों का फंक्शन जो है ! मापके पास चन्दा लेने गए थे न ?' इतनी देर बाद विष्णु बाबू को याद माया। एक महीने पहले से ही मब लोग इन्तजाम मे लगे हुए थे। निरापद ही उम दल का अगुवा पा। विष्णु बाबू के पास से पचास रुपये चन्दा ले माए थे वे लोग, पर यह बात विल्कुल ही भूल गए ये विष्णु बाजू । यू तो विष्णु वायू तडके ही घूमने निकला करते थे, माज हो कुछ देर हो गई। घूमते-घूमते एकदम स्टेशन तक चले गए थे। तमाम चीजें कितनी यदलती जा रही थी ! जमाने के माथ-साय शायद सभी चीजें बदल जाती निरापद ने पूछा, 'फरसन को तारीस तो याद है न, नाऊ जी?' विष्णु वायू चलते-चलते टहर गए । बोले, 'कौन-सी तारीख को है ?' 'यही.."भागामी बुधवार को।'
'हां, हां, बुधवार को, अव याद आया। पर वहां ज्यादा देर तो नहीं - ठहरना पड़ेगान?' HA निरापद ने कहा, 'नहीं, ताऊ जी! आपको अधिक तकलीफ नहीं देंगे। पाप सिर्फ मीटिंग में शरीक होकर ही जा सकते हैं।' 'कुछ भाषण-वापण भी देना होगा क्या मुझे ?' 'थोड़ा-बहुत बोल दीजिएगा, क्योंकि सभी ने आपका भाषण सुनने का विशेष आग्रह किया है।' यह बात विष्णु वाबू के मन लायक हुई। तो क्या लोग अब भी उनका भाषण सुनने को उत्सुक रहते हैं ? .वारहयारीतल्ला से इधर पाने के बजाय विष्णु वाबू विपरीत दिशा की और चल पड़े-कदमफूली की तरफ। विष्णु बाबू के पूर्वजों की इज्जत थी। उनको वाद देकर कोई भी काम नहीं होता था। लेकिन आज भी ये लोग जो नाटक कर रहे है, उसमें विष्णु वाबू को रखना जरूरी है। विष्णु बाबू ने पचास रुपये चन्दा दिया है। पचास रुपये चन्दा देने में मन ही मन तक- लीफ तो जरूर हुई थी। कारण अव पहले वाला समय भी तो नहीं रहा । चीज-वस्तु के दाम भी तो आजकल बहुत बढ़ गए हैं। सारी चीजों के भाव प्राग की तरह बढ़ रहे हैं । लेकिन यह सब सोचने से क्या फायदा ? मुहल्ले के आवारा लड़के नाटक कर रहे हैं, उसमें भी चन्दा दो, और न दो तो तुम्हें खराब आदमी सिद्ध कर देंगे ! 'नमस्ते, बाबू साहब !' वगल से न जाने कौन जा रहा था। उसकी तरफ इतनी देर बाद नज़र पड़ी। 'क्यों रे भैरव ! इतने सवेरे-सवेरे कहां जा रहा है ?' भैरव सामन्त उत्तरपाड़ा का रहनेवाला है। आर्थिक स्थिति ठीक- ठीक ही है । खेती-बाड़ी करके गृहस्थी चलाता है। दरअसल यही लोग मजे में हैं । वह खाली पर चल रहा था; जूते का जोड़ा हाथ में लिए हुए था कि शहर के नजदीक पहुंचकर उन्हें पैरों में डाल लेगा, 'जी, नैनागंज जा रहा 'ननागंज? नेनागंज किसलिए? क्या तुमने नैनागंज में भी खेती- बाड़ी की है ?' १० नायिका भैरव मामत ने पहा, 'नहीं, पाबू माह्व! मैं मला इतना पंमा कहां मे लाऊगा? ननागंज में मेरी लड़की को गादी हुई है न? उसीको लाने जा रहा हूं।' 'क्यो ? म गर्मी में लहकी को लाने जा रहे हो? लडकी गर्भवती है पया?' 'प्रजी नहीं, हजूर ! लडकी ने ही लिया लाने की गयर भेजी है। नाटकः देखेंगी।' . 'नाटक. 'जी, मापने नही मुना बुधवार को बारहवारीतल्ला में नाटक हो रहा है न ? वनस्त्ता में नाटक कम्पनी प्रा रही है।' विष्णु वायू प्रवाया रह गए। नाटक कम्पनी प्रारही है ? कलकते में? पहा निरापद ने तो ऐमा कुछ बताया नही । उन्होंने तो यही मोचा था कि मुहल्ले के प्रावारा लडके मिलकर कोई नाटक करेंगे क्योंकि कभी- यभार ये लोग ही ऐमा किया करते थे। फिर एकाएक यह कलकते के दन को बुलाने की क्या जरूरत थी? 'क्या तुम्हें पक्का मालम है कि नाटक-, . कम्पनी कलकत्ते से पा रही है ?" 'जो हा, वायू साहब ! नहीं तो क्या नैनागज मे लडकी ने यो ही माने वी इच्छा व्यक्त की है ? कलकत्ते या नाट्यदल उमने कभी देखा नहीं है न!' विष्णु वायू मय यहा अधिक नही टहरे। अपने ग्यालो में सोए हुए वे मामने की तरफ चलने लगे। निरापद ने या उसके माथियों ने तो उनमे कुछ पहा नहीं था? या हो सकता है, उन्होंने कहा हो, उनको ही याद न रहा हो। फिर मान लो, नाटक करना ही था, तो नाटक कम्पनी कलकते में भला क्यों बुलाने लगे। दरममल नाटक, जलमा, मिनेमा मादि मभी चीजो के विरोधी है विष्णु वायू । पर दकियानूम रहकर सभी उनका मजाक उडाएगे, यही मोचकर वे अपनी जुबान से कुछ नहीं कहते। फिर ये मय वात कहने से फायदा भी बया? माजवल के लडके भला उनका कहना को मानने लगे। इम निरापद यो हो नो । मह पर तो फैसे हसकर बात कर रहा था उनमे, द्वारा । होता । विष्णु बाबू तमाखू लेकर बैठ जाते और पानेवालों से भेंट करते। पर नाटक को लेकर इस कदर पागल हो जाना क्या भले लड़कों के लक्षण हैं ? वैसा ही निरापद का बाप भी था। मुक्तिपद का लड़का है निरापद । गंज में मुक्तिपद की मनिहारी की दुकान थी। उस मनिहारी की दुकान रा ही उसके परिवार का किसी तरह भरण-पोपण होता था। युद्ध के समय कुछ रुपये वना लिए थे उसने । और कदमफूली में पक्का मकान उठ गया । इससे पहले टीन की छतवाला घर था। बाप के मरने के बाद दुकान तो रफा-दफा हो गई और अब लड़का नवाबी करने निकला है जाने दो, सवको भाड़ में ! दुनिया में कौन किसका है, बस, पूछो मत ! सभी तो यहां दो दिन रहने को पाए हैं। उसके बाद तो बस, 'फक्कम-फक्का। - और दिनों तो सुबह उठकर विष्णु वावू चहलकदमी करते हुए बाहर 'निकल जाते और घंटे-भर बाद ही लौट पाते। उसके बाद हर रोज़ का दैनिक कार्यक्रम शुरू हो जाता। पहले लेनदार और कर्जदारों का आगमन सव इसमें दोपहर के बारह-एक बज जाते। उसके बाद खाने-पीने और विश्राम का वक्त आ पहुंचता । ... लेकिन आज सव गड़बड़ हो गया। अाज तो स्टेशन तक जाना भी नहीं हुआ। उपरवाले नये हाई-वे पर शीतल, ताजी हवा चलती है । वह भी अाज नसीव नहीं हुई। वे बीच रास्ते से ही लौट आए थे। और अब वारहयारीतल्ला के रास्ते से वापस लौटना संभव नहीं है । शायद और लड़के जुट गए हों। संभव है, उन लोगों से फिर भेंट हो जाए । इसलिए सीधा रास्ता न पकड़कर, वे लम्बेवाले उल्टे रास्ते से घूमकर पाए। खोड़ा समय ही तो अधिक लगा, पर समय की उन्हें कोई चिन्ता नहीं । भैरव सामन्त के भण्डार-घर की खिड़कीवाले रास्ते से होकर मल्लिकों के पोखर की ओर एक आदमी के चलने लायक संकरी पगडंडी पर पैदल चलते हुए, वे अपने घर में घुसे। मल्लिक परिवार की बड़ी बहू इतने सबेरे गोबर थापने के लिए हाथ में बाल्टी लेकर, खिड़की की तरफ चली आई थी। बड़े बाबू को सामने १२ नायिका देसकर लम्बा-सा पूधट गीच लिया और माय हो दो कदम पीछे मरककर एकदम में घर के भीतर घुस गई। छोटी लड़की मालती ने पूछा, 'यया, मा, पया हमा? तुम लौट क्यो प्राई?' यही यहू ने कहा, 'मचानक देखा कि वरे बाबू पिड़की के रास्ते होगर लौट रहे हैं । मासिर यात क्या है।" मालती समझ नहीं पाई। मालती को मा भी नहीं समझ पाई कि विष्णु बाबू मदर रास्ता छोड कर सिडको के राम्ने छिपकर घर क्यों लौट रहे हैं, गर्म से या हर से ? अगर यह भी मान लें कि उन्होंने राम का ऐसा किया, तो मासिर ऐमी कौन-मी शर्म की बात थी? पोर मगर हर से किया तोर मासिर किसका था क्षण-भर बाद ही मालती ने भाककर देखा कि बडे बाबू मामन्त-घर के महार-घर के बगल से तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने घर की भोर चले जा 7 ३ कदमफूली का वर्तमान इतिहास मतीन के इतिहास में किसी प्रकार का सामंजस्य नही रसता, मयोंकि कदमफूली पद यह पुरानो कदमफूली नहीं रही। मब तो फाइव-ईयर प्लानिंग के फलस्वरूप वहा इलेक्ट्रिक-लाइट तक लग गई है । दाइग-नलीनिंग की दुकान भी खुल गई है। इस कदमफूली में मिनेमाहॉल भी बनने की बात पाकी हो ही रही थी कि वहे-बूढो के विरोध पर, बात यहीं पत्म हो गई । सिनेमा हाउम नहीं बना तो क्या हुमा मिनेमा की लहर तो यहां तक पहुंच ही गई यो । लडके एक मनोनी पट- वाले कोट-पेन्ट पहनने लगे मोर दिन भर विचित्र स्वर में गाना गाने रहते । कदमफूली के बड़े-बूढे कहने, 'जमाना बदल गया है, महाराय !' बड़ामराव जमानामा गया है-इस बारे में मभी को एक ही राय थी,पौर हर समय नये ज़माने की बात को लेकर मालोचना चसा करती। 7 ज़माना खराव तो था ही, पर कहां तक खराव था, इसी पर वाद-विवाद चलता रहता । साधारणतः विष्णु बाबू इन आलोचना-गोष्ठियों में शामिल नहीं होते । वे इन सबसे ऊपर थे। उनसे विचार विनिमय करने के लिए लोगों को उनके घर जाना पड़ता। गांव के प्रमुख व्यक्ति थे, अतः उनके लिए सब जगह, सभी गोष्ठियों में सम्मिलित होना कैसे संभव होता? पर जो नये ज़माने के लड़के थे, वे खुद अपने को ही बहुत होशियार मानकर चलते थे। बड़े-बूढ़ों की वे कुछ भी परवाह नहीं करते थे। निरापद ने कहा, 'हम क्या उनसे कुछ कम हैं, रे? हमारा भी तो कोई अपना विचार है !' सुखेन्दु बोला, 'फिर भी, विष्णु बाबू को प्रेज़िडेन्ट बनाना पड़ेगा।' निरापद ने पूछा, 'क्यों ? इसमें उनको बुलाने की ही क्या ज़रूरत है ? पाकर वकार ही हमलोगों के काम में अड़चन पैदा करेंगे। सिनेमा तक से उनको कितना विरोध है, यह तो उस बार तुम लोग देख ही चुके हो ?' यह बात सचमुच ही सवको याद थी। नैनागंज के ही एक घनी सेठ ने इस कदमफूली में सिनेमा हाउस बनाने की इच्छा व्यक्त की थी। इस इलाके के अगल-बगल उसका बड़ा भारी व्यापार फैला पड़ा था। उन्हीं रुपयों के प्रोफिट के बल पर नैनागंज में भी सिनेमा का व्यवसाय चल निक- , । बढ़ते हुए लता। अतः सेठजी ने सोचा, इस कदमफूली में भी एक सिनेमा हाउस बना दें। जगह-ज़मीन भी खरीद चुके थे। पर कदमफूली के वृद्ध-संप्रदाय के विरोध की बात मुख्य एस० डी० प्रो० तक पहुंच गई थी इसलिए सिनेमा- हाउस नहीं बन सका । उसी समय से निरापद का दल विष्णु वावू से नाराज रहता है। निरापद कहा करता, 'इसीलिए तो मैं कहा करता हूं कि इस कदमफूली में कभी कोई उन्नति नहीं होगी।' उस वक्त निरापद का दल बूढ़ों पर सच में ही बुरी तरह से क्षुब्ध हो उठा था। कदमफूली में एक सिनेमा हाउस नहीं, कोई सांस्कृतिक-संस्था ..नहीं, इसमें सबसे अधिक शर्म निरापद के दल को ही महसूस होती थी। और नैनागंज में सब कुछ है-बड़ी-बड़ी फैक्टरियां हैं, नाटक-क्लव भी हैं, - . १४ नायिका जहां वे लोग रवीन्द्र-जयती मनाने के लिए कलकत्ते से बड़े-बड़े नामी गाया. गायिकामों को बुलाते रहते। टिकट लगाकर जलसा भी हुमा करता। जिन के पास धन होता, वे मोटी रकम चन्द में दिया करते । नागज के सड़कों का चारो तरफ नाम फैल जाता मोर यहा इस कदमफूली में न तो एक भी बलय है पौरन पोर कुछ है। इसकी प्रतिक्रियास्वरूप ही निरापद और उसके साथियों ने यहा क्लब गुरु किया है । सरस्वती-पूजा के अवसर पर एक बार दल बनाकर हगामा भी कर लिया पा। वहीं के एक कुम्हार से एक मूर्ति बनवा ली यो, ठीक नागज की मरम्बतो-प्रतिमा जैसी ही मोर इसी हगामे में कई दिनो तक यावलो-में घूमने रहे थे। घर-घर घूमकर चन्दा इकट्ठा किया था। विष्णु यायू ने मोटा चन्दा दिया था। सिर्फ विष्णु बाबू ने ही नहीं, सभी ने मोटा चन्दा दिया था। दूसरे साल फिर सरस्वती पूजा हुई था। पर इस बार पूजा ही नहीं, माय में नाटक भी था। नाटक का नाम था 'चन्द्रगुप्त' । मुहल्ले के लड़कों ने ही लड़कियो का पार्ट किया था। दर्शको को प्रपार भीड सगी थी। फर- तल ध्वनि से हॉल गूज उठा था। किसी-किसी ने एकाध तमगा भी प्रदान किया था। लेकिन दूसरे साल निरापद मण्डली के लड़को ने लडकियो का पार्ट करना पसन्द नहीं किया। निरापद ने अपनी कुमारी बहन से हीरोइन का पार्ट करवाया। तब बुड्ढों को होश प्राया। सभी इकट्ठे होकर विष्णु वायू के यहा हाजिर हुए । बोले, 'कर्ता महाराय ! प्रापके होते यह कैसे सभव हुमा माखिरी समय में अब मपनी कदमफूली में क्या यह मनाचार भी देखना । । होगा?' विष्णु बाबू ने सब मुनने के बाद पूछा, 'यह सब उग मुक्तिपद के छोकरे का काम है न?' 'मजी हा, साहब ! उसो छोकरे का, जिसका नाम निगपद है । उसको कुमारी बहन ने ही यह बेशर्मा का काम किया है।' मन ही मन ममतोप प्रकट करने के अलावा और कोई नतीजा नही निकला। थियेटर का ताम-झाम अभी खत्म ही हुआ था कि 'रवीन्द्र-जयंती' की बारी आई। और इस बार भी लड़कों के बिल्कुल पास वैठकर लड़कियों ने गाना सुनाया था। कदमफूली का यश दूर-दूर तक फैल गया था । उसके बाद जब फिर सरस्वती-पूजा का अवसर प्राया तो निरापद- मंडली फिर विष्णु बाबू की बैठक में इकट्ठी हुई । विष्णु बाबू हुक्का पी रहे थे । निरापद को देखते ही बोले, 'क्या हुआ? अव क्या बात है?' निरापद ही दल का अगुआ बनकर गया था। सुपेन्दु भी साथ था। दल के और भी कई लोग साथ थे। कमरे में घुसते ही निरापद विष्ण बाबू की चरण-धूलि माथे ने लगा कर बोला, 'इस बार फिर हम लोग सरस्वती-पजा कर रहे हैं। आपका चन्दा, ताऊजी ?' विष्णु वावू को सरस्वती-पूजा को वात सचमुच ही याद नहीं थी। बोले, 'इस बार भी नाटक करने का विचार है क्या ?' निरापद ने कहा, 'जी हां, नाटक सभी पसन्द जो करते हैं।' 'श्रोह ! तो सभी पसन्द करते हैं बस इसीलिए तुम लोग नाटक करोगे? पर नाटक-वाटक करना क्या ठीक है, रे? मैंने या तुम्हारे पिता जी ने भी कभी नाटक किया है ? यह सब ग्रावारा छोकरों का काम है।' 'पर, ताऊ जी ! आपके जमाने में भी तो थियेटर होते थे ?' 'हा: 'उस समय होते थे, क्या इसीलिए अब भी होना जरूरी है ? उस जमाने में सभी शराब पीते थे, क्या इसलिए तुम भी शराब पियोगे ?' 'लेकिन, ताऊ जी! हमने सारी तैयारी जो कर ली है। हमने यह भी सोचा है कि इस बार के फंक्शन में आपको प्रेज़िडेण्ट बनाएंगे।' 'प्रेजिडेण्ट ?' हुक्के को एक बार गुड़गुड़ाकर विष्णु बाबू ने नली को मुंह से निकाल दिया। पूछा,'प्रेजिडेण्ट किस बात का ?' 'जी, हमने सोचा है कि इस वार फंक्शन कुछ बड़े रूप में करेंगे। मत- लव हरदम जैसा नहीं। सिर्फ गाना-बजाना और नाट्य-प्रदर्शन से सांस्कृतिक . कार्यक्रम पूरा नहीं होता । इसीलिए इस बार इन सबके साथ-साथ एकाध भाषण भी हो, तो अच्छा रहेगा।' . , १६ नायिका 'भाषण! तो मुझे मापन भी देना पड़ेगा क्या?' निरापद ने देखा कि मापण की बात सुनकर विष्णु बाबू का मन कुछ नरम हो पाया है। मतः उमने फिर कहा, 'देखिए, ताऊ जी! भाप बुजुर्ग लोग यदि हमें कुछ उपदेश वगैरह दें, तो देश का भी भला होगा मोर हम लोग भी बुध सीस मगे।' विष्णु बाबू ने जवाब दिया, पर मुझे तो मापप-वापण देना माता नहीं। निरापद वीला, "मापको भाषण देने को कौन कह रहा है ? माप सिर्फ कुछ उपदेश दे दीजिएगा। इस बार बाहर से पार्टी मा रही है न ।' 'याहर से पार्टी मा रही है ? मतलब?' निरापद ने कहा, 'हमेगा तो हमलोग खुद ही नाटक किया करते थे, पर इस बार सभी ने कहा कि अगर कलकतै से नाटक पार्टी बुलाई जाए, तो कार्यक्रम ज्यादा शानदार होगा।' 'लेकिन वे लोग तो बहुत लेंगे।' 'हा, लगे तो जरूर, ताऊजी ! लेकिन मधिक नहीं । पाच मो रुपये देने पर वे गुरुही पाकर प्ले कर जाएगे। हां गाड़ी-भाहा, यातायात एवं साने- पोने का सर्च मलग से देना होगा।' हूँ...!' गले से मजव-सी हुंकार निकालो विप्नु बाबू ने । पर वे मन में नाराज नहीं हुए थे और न ही इसे उनका समर्थन समझा जा सकता पा। उसके बाद जोर से चिल्लाकर मावाज दी, "गिरि गोविन्द !' गिरि गोविन्द विष्णु यावू का मुनीम था । उनके माते ही विष्णु बाबू ने कहा, 'पाच रुपये देना तो गिरि गोविन्द, इन लोगों को चन्दा देना है।' निरापद हो मुखियापा। इमलिए वही बोला, 'मजी नहीं, ताऊ जी! इस बार पाच रुपनो से काम नहीं चलेगा।' 'क्यों? 'ताऊ जी, बात यह है कि पांच सौ रपये तो नाटक-पार्टी को ही देने पड़ेंगे। कार में उनका माही-भाड़ा है । साने-पीने का स वगैरह भी सपा कम है ? इस बार सभी से हमने सादा चन्दा लिया है।'
'अच्छी बात है। गिरि गोविन्द ! दस रुपये दे दो भई, इनको।' 'जी नहीं, दस रुपयों से काम नहीं चलेगा। आपके नाम इस बार ५० - लिखे हैं।' 'क्या मुसीबत है ? पचास रुपये तो मुझे काट डालो, तव भी नहीं लेंगे । पाट की विक्री के दाम मुझे अभी तक नहीं मिले हैं। मैं क्या उप- स करूंगा?' यह निरापद की बहादुरी ही मानी जाएगी कि विष्णु वाबू के दो बार रोध करने के बावजूद, उनसे पचास रुपये उसने वसूल ही लिए। उसके दि निरापद ने कहा, 'हां, आपको हमारे फंक्शन में प्रेजिडेण्ट वनना है, ये मत भूल जाइएगा। और वह फंक्शन हो रहा है इसी आनेवाले बुधवार को । आज सोमवार है । कल मंगल के बाद, परसों बुधवार है । मतलव केवल कल का दिन बीच में है।' यह कहकर सभी प्रणाम करके चले गए। ४ कलकत्ते का ड्रामा-डाइरेक्टर सत्य मल्लिक पढ़ा-लिखा लड़का था। वाप के पास कोई खास पैसा नहीं था। इसीलिए लड़कियों की मांग के सिंदूर जितनी नाम मात्र की एक नौकरी ठीक कर ली थी उसने। सिंदूर सधवा होने की निशानी है। इससे लोग सतवंती समझते हैं । ठीक ऐसे ही नाम मात्र की नौकरी भी उसके काम-काजी होने का प्रमाण थी। लेकिन असली नशा तो नाटक का था । किसी जमाने में मुहल्ले-मुहल्ले में नाटक करता फिरता था। वह ब्रिटिश शासन का ज़माना था। उस ज़माने में यह पेशा हीन समझा जाता था। नाटक करने पर लोग कहते कि लड़का हाथ से निकल गया। लेकिन १६४७ के वाद से इस काम को नाटक कहकर किसी ने नहीं पुकारा, बल्कि इसे 'जातीय संस्कृति' के नाम से पुकारा जाने लगा। 'रूपक' नाम सत्य मल्लिक का ही दिया हुआ था। पहले 'रूपक' दः १८ नायिका । छोटा या तब इधर-उपर स्कूलो के हॉन मांग-जांचकर ये लोग पिटर किया करले। उम ममय नाटक कम हो थे। उसके बाद सत्य मल्लिक ने स्थय कलम पकड़ो। चुनिन्दा अग्रेजो नाटको से कहानी लेकर नाटक लिसे भोर कलकत्ता महानगर को भी चकित कर दिया। उमी समय से 'रूपक' का नाम फैलने लगा था भौर तभी से सत्य मल्लिक ने अपने दल का नाम रजिस्ट्री करवा लिया । रजिस्ट्री करवाने के बाद दिल्ली नाटक अकादमी को एक दरखास्त भेज दी। शुरू में सत्य मल्लिक साल में बारह नाटक तैयार कर लेता था, इसलिए उसे दिल्ली से पाच हजार रुपयो का ग्राट मिला । उन्हीं रुपयों से उसने दल के लोगों को कुछ-कुछ चैतन देना शुरू किया। उसके साथ हॉल का किराया एव टिकट विक्री वगैरह तो था ही। देखते-ही-देखते 'रूपक' का अपना पॉफिस भी हो गया । छपे हुए लेटर हैड तैयार हो गये। मॉफर भी माने शुरू हो गये। दल मे जो पहले से मौजूद थे, वे ममीर बन गये । सत्य मल्लिक हुए मालिक के बरावर, क्योकि वह दल सत्य मल्लिक का ही बनाया हुमा था। पर उसकी तकदीर अच्छी थी, यह मानना ही पडेगा। न जाने कहा से मजरी सेन नामक एक लड़की भी मिल गई उने। सत्य मल्लिक को वह उसी समय जंच गयी थी। उसने पूटा पा, 'तुमने इससे पहले भी कभी नाटक में काम किया है ?' मंजरी ने जवाब दिया, 'नहीं, कभी नहीं किया।' 'तो पचानक नाटक में पार्ट करने की इच्छा कैसे हुई ?' 'कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ेगा। अपना पेट तो भरना ही पड़ेगा।' सत्य मल्लिक को यह उत्तर बहुत पसन्द प्राया। इस घघे में स्पष्ट कह देना ही अच्छा है । यह यह भी तो वह सकती थी कि माटिस्ट बनकर नाम कमाना चाहती है, फिल्म स्टार बनना चाहती है। इस सब की जगह पेट भरने की बात कहकर मनरी ने ठीक ही किया था। इसीलिए जैसे-जैसे 'रूपक' का नाम फलना शुरू हुमा, उसके साथ हो मजगे का भी नाम बढ़ता गया। चारों तरफ से जब मजरी सेन की माग माने लगी, तब भी 'रूपक' दल को बात मजरी नहीं भूलो यो।
मंजरी ने कहा, 'नहीं, सत्य दा! मैं इतनी नमकहराम नहीं हो सकती। ऐसा करने पर भगवान मुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे।' अाज के जमाने में जव सभी रुपयों के पीछे पागल बने फिरते हैं, ऐसे समय में मंजरी का यह कृतज्ञता-प्रदर्शन सत्य मल्लिक को अच्छा ही लगा था। मंजरी ने कहा था, 'उन दिनों, जब कोई मुझे जानता-पहचानता नहीं था, तब आपने ही चान्स दिया था। यह बात भला मैं कभी भूल सकती हूं, सत्यदा?' तो यह था आज के युग की विख्यात अभिनेत्री मंजरी सेन का आदि इतिहास । फिल्मों में काम करने के ऐवज में डिस्ट्रीब्यूटर मंजरी सेन को मोटी रकम पेशगी देते । अब तो मंजरी सेन ने अपनी गाड़ी भी खरीद ली है। मकान भी खरीद लिया है । पर वह उस मकान में खुद नहीं रहती। उसे किराये पर उठा दिया है, क्योंकि हर महीने किराये की मोटी रकम आ जाती है । वह खुद किराये के मकान में रहती है। किसी से सहज ही मुलाकात नहीं करती। पहले से 'अप्वाइन्टमेंट' करने पर ही मंजरी देवी मिलने को राजी होती है, तभी कोई उनसे भेंट कर पाता है । पर सत्य मल्लिक की बात दूसरी थी। सत्य मल्लिक की गति-विधि अनन्त थी। उस घर के नौकर-नोक- रानियां, पाया-महाराज तक, सभी जानते थे कि सत्य मल्लिक का इस घर में एक अलग ही स्वागत-सम्मान था। उनको कोई कभी नहीं रोकता अगर कोई बाधा देता, तो वह अपराध माना जाता। सत्य मल्लिक की इच्छा हो तो उसे मंजरी के वेड-रूम तक में जाने की छूट थी । उसको कोई भी कुछ नहीं कह सकता। ऐसा था सत्य मल्लिक । 'रूपक' नाट्य-दल का डाइरेक्टर ! कमरे में घुसते ही सत्य मल्लिक कहता, 'क्यों जी, इतनी देर तक सो रही हो? उठो न, उठो!' यहां यह कह देना समुचित होगा कि सत्य मल्लिक और मंजरी सेन में बहुत ही घनिष्ठता हो गई थी, जिसके पीछे थी कुछ तो कृतज्ञता और कुछ श्रांखों की शर्म। नाशिक मंजरी जय पहले-पहल सत्य मल्लिक के पास माई थी, तब न तो रुपये थे उसके पास, मौरन गाड़ी-वाड़ी या जेवरात । निहायत ही योहीन चेहरा था उसका दूसरी साधारण लड़कियों की तरह ही। लेकिन तकदीर अच्छी थी, इसीलिये मयिक दिन रगहना नहीं पड़ा। पर तब भी मन नहीं भरता मजरी का। सत्य मल्लिक कहा करता, 'होगा, होगा, सब कुछ हो जाएगा। होने में भव रह ही क्या गया है ? मंजरी कहती, 'माप भी क्या बात करते हैं, सत्य दा? मभी मुझे मिला ही क्या है ? अभी तक एक 'प्राइज' भी तो नहीं मिल पाया।' 'प्राइश तो थोही-सी कोशिश करके ही पा सकती हो। उममें भला कौन-सी बहादुरी की बात है ?' 'तो तुम ही जरा-सा प्रयत्न कर दो न!' सत्य मल्लिक हसने लगता । कहता, 'मैं क्या तुम्हारी सिनेमा-लाइन का पादमी हू, जो मेरे कहने से काम हो जाएगा ?' मंजरी कहती, 'देसो न, उस बार मेरे बलिन जाने का सारा इंतजाम हो गया था, पर माखिर जाना रक हो गया।' इसी तरह सत्य मल्लिक का दल चल रहा था। सिनेमा की शूटिंग के दौरान बीच-बीच में जब कही बाहर जाने का मौका मिलता तो दल का नाम बढ़ाने के लिए मंजरी सेन स्टेज पर उतरती, जिमसे 'रूपक' दल के लिये रुपयों का भी जुगाड़ हो जाता मोर ख्याति भी बढ़ती । सत्य मन्लिक के हक में तो मोलह माने फायदा या। हां, तो इस प्रकार मंजरी बहुत जगह घूमी यो । विहार, जल- पाईगुडी, शिलाग, गोहाटो, विशेषतः दिल्ली प्रादि जाने कहा-यहा उमने ड्रामे में हीरोइन का रोल किया। दिल्ली के डामा-प्रकादेमी-गमारोह में मिनिस्टर लोग भी माए थे। बड़े-बड़े मंत्री तक माए थे। ऐसे तो किसी काम के लिए उनको फुर्सत नहीं मिलती, पर नाटक देखने के लिए अपने लड़के-लड़कियों एवं पत्नी समेत पाते। फोटो उतरवाते समय मुस्कान विखेरते हुए कैमरे के सामने खड़े हो जाते । . उस दिन सत्य मल्लिक अचानक आ पहुंचा । उस वक्त उसके याने की बात नहीं थी। मंजरी शूटिंग के लिए जा रही थी। सारी तैयारी भी हो चुकी थी। सुबह दस बजे स्टूडियो में हाज़िर होने की बात थी। मेक-अप करने में भी तो कुछ समय लगता । 'सत्य दा, तुम ? इस वक्त ? मैं तो अभी बाहर जा रही हूं।' सत्य मल्लिक को ज़रूरी काम था । कहा, 'यह मुझे मालूम था, फिर भी चला पाया। 'क्या बात है, कहो न?' सत्य मल्लिक बोला, 'एक वढ़िया ऑफर मिला है, काफी रुपयों का।" 'इस वक्त ऑफर ?' मंजरी मानो सोच में पड़ गई। इतनी फिल्में हाथ में हैं। कौन-सी फिल्म की शूटिंग में किस वक्त पहुंचे, इसी को लेकर प्रोड्यूसरों में खींचा- ..तानी चलती रहती थी। सत्य मल्लिक ने कहा, 'नहीं, इस समय नहीं । सरस्वती-पूजा के वक्त।' ? 'सरस्वती-पूजा के समय ? कव है पूजा? उसमें शायद अभी बहुत दिन हैं ?' 'हां, अभी तीन महीने बाकी हैं ! पर तुम अपनी डायरी में लिख लो। कहीं ऐसा न हो कि अंत में किसी पार्टी से तुम एडवांस ले लो और मैं मुसीबत में पड़ जाऊं।' मंजरी ने डायरी खोली। 'सत्य दा, तुम ऐसे समय प्राते हो कि क्या बताऊं! अव एक मिनट भी वक्त नहीं है । इसी बीच दो बार बलाई सन्याल ने टेलीफोन पर ताकीद कर दी है। हमेशा देर से उठती हूं, इसलिये टेलीफोन द्वारा उन्होंने मुझे जगा भी दिया था।' २२ नायिका 'यलाई सन्याल?' 'मरे, बलाई मन्याल को नहीं जानते ? 'पपचारिणी का डिस्ट्रीब्यूटर। हो, तो कितनी तारीख बतायी थी?' 'पच्चीम तारीमा जनवरी को पच्चीस तारीस । बुधवार।' मंजरी ने कलम सोल कर तारीय नोट कर ली । 'पच्चीम तारीख को मगर गौहाटी जाना पड़ा, तो जाने से पहले दो दिन हाय में रखना चाहता हूँ । बाद में भी दो दिन यूं ही निकल जाएंगे।' 'क्यों,दो दिन किसलिये? कैसे जामोगे ? प्लेन से ही तो जाना है न?' 'प्लेन से तो तुम जामोगी । दल के बाकी लोगों को तो ट्रेन से ही भेजूगा ।यू अभी से कुछ नहीं कह सकता। मेरे कहने का मतलब था कि तुम कोई सास काम अपने हाथ मत लेना । परदेश का मामला है । पया होगा, पया नहीं होगा, यह पहले से नहीं कहा जा सकता।' हां, तो तीन महीने पहले यही तय हुमा या। उसके बाद भी कई बार मंजरी के गाय मुलाकात हुई थी। दो हजार रुपयों का मामला पा । नाम, यस एवं घूमना-फिरना अलग से । मजरी गौहाटी इससे पहले भी गई थी। इस बार सत्य मल्लिक को पार्टी ने सत लिखा था कि अगर मजरी हिरो- पन का रोल करना स्वीकार करे, तोरपयों की यायत कुछ सोचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्लेन का एवं होटल का किराया, खाने का सर्च, मादि वाद देकर रूपक' दल को दो हजार रुपये नकद दिवं जायेंगे। उमी समय और भी कई जगह से पत्र माए थे कि उसके यहा पाकर मगर 'पर' दल नाटक करे, तो वे भी कुछ-कुछ रुपये देने को तैयार हैं। हा, गौहाटी जितने तो नही, पर एक-एक हजार भी मिले तो एक ही ट्रिप में बहुत रुपये पा जाएगे। सत्य मल्लिक ने मंजरी सेन से यह बात छिपा ली थी मोर बार-बार मिर्फ एक ही बात पूछता रहा,..."तो तुमने वह डेट मेरे लिए माती रक्षी है न, मंजरी?' मंजरी कहती, 'हा, वलाई सन्याल ने वही तारीस बहुत बार मागी, मैंने कह दिया कि नहीं, पहले सत्य दा का काम, उमके याद पापका।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'तो माज में चलूं?'
'ठीक है।" 'तो फिर तुम्हारी बात पर यकीन करके मैं उन लोगों का चेक स्वीकार कर लेता?' 'वह चाहो तो ले लो, पर देखना, मेरी बात के खिलाफ कुछ न हो। कौन-सा नाटक खेलना है ?' सत्य मल्लिक ने बताया, 'उन्होंने 'रूप नहीं रूपो' खेलने के लिए कहा है -- 'रूप नहीं रूपो' नाटक सत्य मल्लिक का लिखा हुआ था। प्रोडक्शन की दृष्टि से भी खूब नाम कमा रहा था। पहले-पहल उसी नाटक द्वारा मंजरी का यश फैला था। उसमें मंजरी द्वारा अभिनीत एक 'मैड सीन' था। उसी सीन ने सबको पागल कर रखा था। तालियों की गड़गड़ाहट के साथ-साथ टिकट के दाम भी आग की तरह तेज हो गए थे। ६ हमेशा की तरह सत्य मल्लिक उस शाम भी 'रूपक' के ऑफिस में बैठा था। साथ में दो-चार लोग और थे। हर समय कुछ-न-कुछ लोग इसी तरह जुटे रहते थे। वे उसी दल के लोग होते थे। उनके बीच आपसी विचार-विमर्श चला करते एवं दूसरे दलों की निन्दा की जाती । हां, प्रशंसा भी होती, पर वह अपने ही जान-पहचान के दलों की। उस शाम दो व्यक्ति अचानक कमरे में घुस पाए । 'आप लोग कौन है ? कहां से आ रहे हैं ?' निरापद पहली बार ही रूपक' के ऑफिस में आया था। पत्र लिख- लिखकर जव थक गया और कोई जवाब नहीं मिला तो हारकर ट्रेन से कलकत्ता पाना पड़ा। 'आपका शुभ नाम ?' 'मेरा नाम निरापद हाजरा है। कदमफूली के संस्कृति-संघ का मैं सेक्रेटरी हूं।' २४ नायिका 'मेरा नाम सरय मल्लिक है । हमलोगों के यहां से भापके सन का जवाब नहीं जा सका, क्योकि हमलोग बुरी तरह युक्ड हैं। मापके पहा इस वार हम लोग प्ले नही कर सकेंगे। हम लोगों के पास समय नहीं है।' निरापद इस जवाब के लिए तैयार होकर ही पाया था। उसने कहा, 'लेकिन सिर्फ एक रात के लिए यदि पाप ममय निकाल सकते, तो हमलोग बहुत निहाल हो जाते । हमारे यहा सभी लोग मजरी मेन को देखना चाहते हैं।' 'अगभव !'पहकर मत्य मल्लिक ने मिगरेट का एक लम्या का पोचकर बहुत मारा प्रा छोडा और फिर कहा, "जिन्होंने पहले से बुक कर रखा है, उनको नो हम लोग निराश नहीं कर सकते। उन लोगों के चेक तक हमने कैश कर लिए हैं।' निरापद ने कहा, 'इसीलिए, सर! हमलोग नकद रपये लेकर पाए हैं कि माप चेक शायद न लें।' सत्य मल्लिक के लिए रुपयो का लालच सम्हालना बडा मुश्किल था। मिफं सत्य मल्लिक ही क्यों ? यहुतो के लिए मुश्किल है। सागकर पियेटर- दल में, जहां बहुत-से भमेले हैं, वहा मिट्टी के टुकड़ों की तरह रपये दिन- राने पड़ते हैं। निरापद या पुटा हुमा लडका। इन सबमे भली भाति परिचित । मारे रुपये दस-दस के नोटो में थे। नोटो को उसने टेबल पर फैलाकर ग दिया। सत्य मल्लिक 'हे-है' कर उठा। बोला, 'हैं, है, यह क्या वहा पर मन रखिये ! चाय बेदाग लग जायेंगे।' कुछ देर पहले ही चाय पी गई थी। पॉलिग मे चमनी टंबल पर कप के पेदे के दाग पड़ गए थे। मत्य मल्लिक ने झटपट वे मब रुपये उठा लिए मोर बोला, 'तुम लोग रपये दे रहे हो, भाई। पर जाने की नारीय अभी नहीं दे पाऊगा।' निरापद ने कहा, 'माप लोग तो उघर में ही लौटेगे। नैनागज स्टेशन पर पाप लोगों को ट्रेन ठहरेगी, नब एक रात के लिए यदि उतर जाने...।' 'स्टेज बैगा है ? हॉल तो दहिया है न " - निरापद ने कहा, 'नहीं, हॉल तो नहीं है। हमलोग खुद ही स्टेज तैयार कर देंगे।' 'वांस खड़ा करके, उसपर पाल टांककर?' 'यह तो आप खुद ही देख लीजिएगा।' निरापद ने जवाब दिया। 'तुम्हारे कदमफूली में कोई सिनेमा हाउस-टाउस नहीं है?' 'निपट देहात है, सर! कुछ भी नहीं है।' 'जव कुछ भी नहीं है, तो नाटक देखने का इतना शौक क्यों है, भाई ?' निरापद ने जवाब दिया, 'क्या कुबड़े व्यक्ति का कभी सीधे होकर सोने का मन नहीं करता, सर? बस ऐसी ही हमारी इच्छा समझिये । बहुत वैकवर्ड है हमारा गांव । यूं हम कोशिश कर रहे हैं कि सबको मिला- कर यदि एक सांस्कृतिक संघ का निर्माण हो जाए...।' सत्य मल्लिक ने रुपये जेव में ठूस लिए, 'ठीक है। रसीद वाद में कभी ले लेंगे, कि अभी ही दूं?' निरापद ने कहा, 'रसीद की हमें खास चिन्ता नहीं। हमारी तो बस यही इच्छा है कि ग्राप हमारे यहां अपना 'रूप नहीं रूपो' नाटक खेलते। उसकी बहुत चर्चा सुनी है। उसमें मंजरी सेन का पार्ट भी बहुत बढ़िया है ।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'मंजरी सेन जा सकेंगी कि नहीं इसका मैं कोई वर्ड नहीं दे सकता।' 'यह आप क्या कह रहे हैं ?" निरापद और उसके दल कालड़का दोनों एक साथ चौंक उठे और दोनों साथ ही बोल पड़े, 'यह आप क्या कह रहे हैं ? मंजरी सेन को देखने के लिए ही तो सब टिकट खरीदेंगे। उनके गए विना कैसे काम चलेगा?' सत्य मल्लिक ने कहा, "मैं जवान नहीं दे सकता। वह बहुत व्यस्त आर्टिस्ट हैं।' निरापद बोला, 'नहीं, सर! मंजरी सेन नहीं गयीं तो लोग बेंच-कुर्सी तक तोड़ डालेंगे । उनका जाना तो हर हालत में ज़रूरी है।' सत्य मल्लिक ने फिर कहा, 'देखो, भई ! इसकी गारंटी अभी से नहीं दे सकता। यह आपलोगों को मैंने पहले ही बता दिया है।' 'ठीक है। न हो तो हम कुछ और रुपये देने को तैयार हैं।' - २६ नायिका मत्य मल्लिक नाराज हो गया । बोला, 'तुम लोग मंजरी सेन को रुपयों का लालच देते हो? जानते हो, उसके पास कितना रुपया है ? मालूम है, वह कितने रुपये इन्कम-टैक्स देनी है ?' निरापद ने कुछ शमिन्दा होकर कहा, 'नहीं, नहीं, हम उन स्यान में नहीं बोल रहे, सर। हम तो यह कहना चाहते थे कि मंजरी सेन के ग जाने से हम लोगो को बहुत दुख होगा, क्योंकि उनको सभी देखना चाहते हैं।' 'तुम्हारे यहा रहने-वहने की जगह तो है न ?' 'मतलव !' निरापद को समझ में नहीं माई यह बात । मत यह फिर बोला, "इसका मतलव" 'इसका मतलब यह है कि हम जो इतने लोग वहा जायेंगे, ये पेड के नोचे तो नहीं रह सकते न । एक वटिया मकान का इन्तजाम हो जाएगा न? अटेच्छ-बाथरूम रहने से ठीक रहेगा। मजरी सेन मिर्फ इंटों के मन्दिर मे तो रह नही सकती? उनके लिए स्पेशल इन्तजाम कर सकोगे न?' निरापद ने बात सम्हाल ली । बोला, 'जरूर कर मरेंगे, पाप कैसी बात करते हैं ? पाप क्या यह समझते हैं कि हमारी कदमली में कोई भला आदमी ही नही रहता?' 'ठीक है, तो बाद में सवर लोभियेगा।' कहकर गन्य मल्लिक गम्भीर हो गया। निरापद ने पूछा, 'बाद का मतलब ? पाप ममी पकी बात नही पहेंगे? हम लोगों को भी तो प्राबिर मारा बन्दोवस्त करना पड़ेगा।' 'हा.. पर अभी तो वहुन दिन पडे है । तुम लोग वीन में सभी भाकर पको सबर ले जाना। प्रगर नही जा पाएगे, तो तुम लोगो का पिया रिफन्ड कर दिया जाएगा।' पहली बात तो यह है कि ऐमी प्रनिश्चिा दान भी मिलनी कठिन यो। सागकर मजरी सेन के मामले में, क्योकि मनरी मेन कोई फालतू स्टार तो थी नहीं। यह स्यय पहले से कुछ नहीं कह मरती कि अगले दिन पया होगा। संर, जो भी हो, निरापदन्दन पहली बार ना यही इलज्ञाम करके लौट गया था।
उनके जाते ही सत्य मल्लिक ने कहा, 'यह वात और किसी दूसरे के 1 में नहीं पड़नी चाहिए। याद रखना, मैडम के कानों तक भी यह बात रहुंचने पाये।' और सचमुच ही मंजरी सेन खुद भी नहीं जानती थी कि उसकी कदम- ली जाकर 'रूपक-दल' सहित स्टेज पर उतरना पड़ेगा । बलाई सन्याल (इयां डिस्ट्रीब्यूटर था। अगर कहीं भूले से भी उसको पता लग गया तो दवालाही निकाल देगा। बलाई सन्याल ने जव पहले-पहल सिनेमा का कारवार शुरू किया पा, उस समय मंजरी सेन भी पहली बार ही इस लाइन में आई थी। एक ही समय से दोनों की उन्नति शुरू हुई । इसीलिए वलाई सन्याल कहा करता था, 'पाप हो मेरी लक्ष्मी हैं, मैडम !' वलाई सन्याल को अगर एक बार भी खबर मिल गई कि सत्य मल्लिक मैडम को तीन-चार दिन नाटकों में व्यस्त रखेगा, तो वह शूटिंग की तारीख भी ठीक उसी समय निश्चित कर देगा, 'मेरी पिक्चर ज़रूरी है या नाटक ? आप ही कहिए, मैडम ! आपको फिल्म पैसा दे रही है या नाटक कम्पनी ? आपको इसी वक्त एक कार खरीद देता हूं। ड्राइवर तक का वेतन आपको नहीं देना पड़ेगा। गाड़ी दिन-रात आपके दरवाजे के सामने लगी रहेगी। आप जब चाहें घूमती फिरें और अगर गौहाटी जाने की इतनी ही इच्छा हो, तो चलिए न मेरे साथ । मसूरी, दार्जिलिंग, कुलू वली, मनाली, नेतारहाट, कहां जाने की इच्छा है ? सिर्फ जवान खोलकर एक वार कहिए तो सही, मैडम !' हां, तो इस बार सचमुच ही बलाई सन्याल को पता नहीं लग पाया। सत्य मल्लिक ने इस घटना को वहुत ही गुप्त रखा । सवेरा होते न होते मैडम को प्लेन से गौहाटी भेज दिया था और स्वयं भी दल-बल सहित उसी दिन रवाना हो गया । सरकिट हाउस में अपार भीड़ जमा हुई थी। टिकट के भी खासे दाम उठे थे। वहां से जलपाईगुड़ी, कूचविहार पारि घूमकर मंजरी सेन की उसी दिन लौटने की बात थी। सत्य मल्लिक उसको गाड़ी में लेकर रवाना ही हुआ था कि अचाना मंजरी ने पूछा 'ऐ, सत्य दा! अव कहां जा रहे हो? ! २८ नायिका सस्य मल्लिक ने कहा, 'चलो न, तुमको एक जगह ले चल रहा हूँ।' 'कहा? सत्य मल्लिक ने जवाब दिया, 'ये लोग बहुत ही परेशान कर रहे हैं। एक शो नहीं दे पाए, तो ये लोग पब्लिक के सामने बहुत वे इरजत हो जाएगे।' 'मुझे पहले क्यो नहीं बताया ?' 'पहले बताने से क्या बलाई सन्याल छोड़ता तुम्हें ? मरे, मई ! सिनेमा तो तुम्हारा है ही, पर नाटक का भी एक अलग चामं होता है, यह तो तुम मानती हो न? तुम्हारी नजरों के सामने ही प्रससकों की भीड़ लग जाएगी। परं-धर्र को मावाज करती हुई गाडी कचे-नीचे रास्ते पर लुढ़कती हुई चली जा रही थी । कूचबिहार में नाटकः रात साढ़े दस बजे टूटा । मोर सभी लोग तो उसी रात चले गए थे; एक जीप मिल गई थी भाडे पर । सत्य मल्लिक ने उसी में सब लड़कियो को भरकर भेज दिया था । वे गव उदीयमान मार्टिस्ट थी। अभी साइड-रोल करती थी। दल के मोर लोग ट्रेन से रवाना हो गए थे। सत्य मल्लिक ने एक सिगरेट गुलगा लिया। भोर से ही यात्रा पर निकल पड़े थे वे लोग । भोर का मतलब, रात सत्म होने पर । ऐमा नही करते तो सरकिट हाउस के सामने हजारों की संख्या में प्रशासक लोग घेर लेते मोर परेशान कर डालते । पुलिस माती, टीयर-गस छोडनी पडती, लाठी चार्ज होता। सत्य मल्लिक ने कहा, 'देश लिया न, अपने प्रगमको को? दाल-रोटी तक का ठिकाना नहीं भोर काड फैसे-वैसे हैं, देस लिया न? नॉर्मल हालत होती तो यह सब तुम्हे शायद विना चबाये ही निगल जाने ।' मंजरी ने कहा, 'सत्य दा, किमी दिन मैंने भी इसी की तमन्ना की थी। 'ऐसा ही होता है । अपने-माप कुछ मिल जाने के बाद मागो हुई चीज रोजी जर जाता है । इमीलिए तो कहता है कि विपेटर-नाटक एकदम मे मत घोड़ो। बीच-बीच में यह मय भी करती रही। यह वान मन है कि इस लाइन में साम रपये नहीं मिलने, पर मन को मनोप तो मिलता है।' पलती हुई गाड़ी के सामने मचानक एक गड्ढा देखकर मत्य मल्लिक चीख उठा, 'होशियारी से, जरा सम्हाल के !' ७ कदमफूली में उस समय खासा जश्न का समा बंधगया था। भैरव सामन्त अपनी बेटी को नैनागंज से लेकर लौट आया था। वारहयारीतल्ला में उसके पिता के मकान में ही कलकत्ता का 'रूपक दल' नाटक प्रस्तुत करेगा और वही न देख पाए, भला यह कैसे सम्भव था? मल्लिक के घर में भी पानेवाले लोगों की संख्या बढ़ गई थी। दो दिन पहले से ही सब घरों में गहमा-गहमी शुरू हो गई। सभी नाटक देखने के लिए बेताब नजर आते थे। बारहयारीतल्ला में लोगों का काफी जमाव हो गया था। नैनागंज से डेकोरेटर आए थे और जोर-शोर से लगकर अच्छा-खासा स्टेज तैयार कर लिया। सरस्वती की प्रतिमा का तो अव कहीं नामोनिशान भी नहीं था। विशाल वटवृक्ष के नीचे एक कोने में प्रतिमा स्थापित की गयी थी और यथारीति 'नमो नमः' के मंत्रोच्चार के साथ पूजा अर्पित करके उसका विसर्जन भी यथासमय हो गया था। संस्कृति-संघ के मेम्बरों को उस तरफ अव ध्यान देने की ज़रूरत नहीं थी। जितनी भीड़ थी, वह स्टेज की ओर उमड़ी पड़ रही थी। मुहल्ले के छोटे-छोटे बच्चे चारों ओर से घेरकर खड़े हैं। हर बांस के उठने के साथ- साथ उनका मन-मयूर नाच उठता । अहा ! परसों यहीं पर नाटक होगा। कलकत्ते से पार्टी पा रही है। लड़के भाग-भागकर ताज़ा खवर अपने-अपने घरों में पहुंचा रहे थे। कहते, 'मां, अव पाल टंग गया है।' मां पूछती, 'हां रे, बैठने की जगह कैसी है ?' 'मिट्टी पर पुपाल विछाकर, ऊपर से दरी विछा दी है निरापद : दाने।" 'लड़कियां सामने बैठेंगी क्या?' - ३० नायिका । एक लड़की बोली, 'नही, हम लोग निक की माट मे बैठेंगे। पिाको दोनों तरफ से घेर दिया गया है।' यह तो घेरना ही पड़ेगा। इस बार का नाटक पिछले मालों की तरह नहीं है। पिछले गाल तक तो सिर्फ गाय के लोग ही पाते थे। इस बार अगल-बगल के सभी गावो मे लडके, बूढे, बच्चे, लडकियां माएंगी। सभी ने पहले से ही टिकट कटा ली थी। जो जमी हैसियत का पादमी था, उसके लिए बैठने की वैसी ही व्यवस्था की गई थी। निरापद को तो सास लेने तक को फर्मत नहीं है । सोमवार को मुबह- सुबह ही घूमने जाते समय विष्णु चावू सब देव-गुन पाए । पचास रपये चन्दा दिया है । टिकट बेचने से भी यहत रपये माए थे। जितने रुपयों की उम्मीद थी, उससे भी मधिक रुपये उठे थे। अब तो बस, सारा काम रात्री- सुशी निपट जाए तो जान-मे-जान पाए। प्रय केवल पाटिस्टों के ठहरने की ही समस्या थी। विशेषकर मजरी सेन ये सम्बन्ध में । सत्य मल्लिक ने जैसा बताया था, मजरी मेन दन फे भौर लोगों की भीड़ में साधारण पार्टिस्ट की तरह नहीं रह सकती। उसके लिए विशेष इन्तजाम की जरूरत होगी। अगर हो मके तो सरकिट हाउग, और सरकिट हाउस न हो, तो किसी घटे मकान को जरूरत होगी। उमके खाने-पीने में किसी तरह की कमी नहीं रहनी चाहिए। यहुत ही महीन चावल, मुर्गी की तरी, ग्रेकफास्ट मे दो पडे और एक कप कॉफी। कॉफी की तो घटे-घंटे भर बाद ही जरूरत पडतो यो मजरी सेन को । पन इन्तजाम भी कुछ इसी तरह का किया गया था। निरापद सभी बातों के लिए राजी या। लेकिन उन सयका इन्तजाम करने में उसके प्राण निकले जा रहे थे। गदा नदी के किनारे को नील कोटी वहन दिनों मे यू ही साली पड़ी थी। कदमफूली के साहा बाबू किसी जमाने में धनी व्यक्ति थे। उग जमाने में नील के व्यापार में प्राशस्त लाहा ने करोडो रुपये इकट्ठे पर लिए थे। उनके पूर्वज यहुत दिनों से यहा निवास कर रहे थे । नील का व्यापार चल निकलने के बाद उन्होंने प्रौर दूसरे व्यवसायो मे भी दिमाग सपाना शुरू किया। पर उनको गिरती हुई हालत फिर कभी नहीं मुपरी। वशानुक्रम । से आर्थिक अवस्था अवनति की ओर ही अग्रसर हो रही थी। उनमें से बहुत से लोग कुछ दिनों तो वहीं रहे थे। फिर वे लोग भी मकान वगैरह सव छोड़-छाड़कर कलकत्ते चले गए और तब से उनका कोई पता-ठिकाना नहीं है। निरापद-मंडली ने मंजरी देवी के रहने का इन्तजाम उसी मकान में कर दिया था। राज-मिस्त्री एवं मजदूर लगाकर एक कमरा रहने लायक बनवा दिया एवं इसके-उसके घर से पलंग, शीशा, विस्तर, तकिया, चादर वगैरह ला-लाकर पूरा इन्तजाम कर दिया। सिर्फ एक रात को ही तो बात है। किसी तरह भी चला लिया जाएगा और सामने ही नदी भी है। लकड़ी की एक श्राराम कुर्सी, एवं दो मेज़-मांग-जांचकर सारी व्यवस्था हो ही गई। अब किसी भी चीज़ की कमी नहीं रही। अब तो बस, दल-बल सहित उनके पहुंचने का ही इन्तजार था। - गाड़ी ने जब मोड़ लिया, तभी मंजरी सेन को कुछ शुबहा हुआ था। पूछा, 'इधर कहां, सत्य दा?" सत्य मल्लिक ने कहा, 'तुमको पहले से नहीं बताया था। बताने से बलाई सन्याल तुम्हें किसी हालत में नहीं आने देता।' 'पर मैं इस विषय में नहीं पूछ रही हूं। मैं तो सिर्फ इतना ही पूछ रही हूं कि हम इधर कहां जा रहे हैं ?' आखिर सत्य मल्लिक को बताना ही पड़ा। बोला, 'कदमफूली नामक एक जगह है इधर।' ‘कदमफूली ?' सहसा मंजरी सेन चौंक उठी। 'तुम इतनी डरती क्यों हो ?' सत्य मल्लिक ने कहा, 'मैं जो कह रहा कि उसके सेक्रेटरी के साथ मेरा कन्ट्राक्ट हो चुका है । तुम क्या खाना पसन्द करती हो, कसे घर में रहने की व्यवस्था की जाए, वह सव बता दिया है मैंने । कह दिया है कि जहां तुम रहोगी, वहां अगल-बगल किसी का मकान नहीं होना चाहिए और पुलिस के पहरे का इन्तजाम भी होना चाहिए। रोशनी काफी रहनी चाहिए। तुम चिकन खाना पसन्द करती हो, यह भी मैंने उन्हें पहले से ही बता दिया है। एक-एक घंटे बाद ३२ नायिका ना-२ कॉफी...' मजरी सेन का चेहरा बहुत ही गम्भीर हो गया था। सत्य मल्लिक को लगा कि मंजरी उस पर नाराज हो गई है, परसत्य मल्लिक को नाराज करने की हिम्मत उसमें नहीं, इसीलिए कुछ बोल नहीं सकती। मंजरी के चेहरे की पोर देखकर सत्य मल्लिक ने फिर कहना शुरू किया, 'तुम मन पराब क्यो कर रही हो, मजरी? उन्होंने मुझे टेलिग्राम कर दिया है कि तुम्हारे लिए एक बढिया मकान का इन्तजाम कर लिया गया है । मकान पुराना जरूर है, लेकिन वहां तुम रहोगी, इसीलिये मिस्त्री लगाकर, काफी रुपये खर्च करके उसको नया रूप दे दिया गया है । मकान ठीक नदी के किनारे है । मगल-बगल किसी का भी घर नहीं है । विल्कुल दक्षिणमुखी मकान है । वहा तुम्हें किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी।' पर फिर भी मजरी सुश नहीं हुई है, सत्य मल्लिक ने उसका गम्भीर चेहरा देखकर ही इस सत्य का अनुमान लगा लिया । पर भव किया भी पया जा सकता है ? यह तो निश्चित था कि मंजरी सेन इसके लिए मत्य मलिक को कोई कड़ी बात नहीं सुना सकती। उसने सिर्फ इतना ही कहा, 'तुमने मुझे पहले क्यो नहीं बताया, मत्य दा?' 'पहले बताने से क्या तुम पाने के लिए राजी होती, मजरी' जबाव में मंजरी कुछ नहीं बोली, चुप रही। उस वक्त गाडी पा-पों करती हुई गाव के हाई-वे पर से होकर प्रागे बढ़ी जा रही थी। ८ निरापद-दल मुबह से ही पलकें बिछाए बैठा था। सबेरे के ममय ही मत्य मल्लिक के माने की बात यो, टेलिग्राम द्वारा ऐमी हो मूचना मिली थी। नागज से कदमफूली गाव पाच मील दूर था। मधेरे मे ही मादमी ननागंज जाकर इन्तजार कर रहे थे कि सत्य मल्लिक के पाते ही एक टैक्सी .
लेकर रास्ता दिखाते-दिखाते ले पायेंगे। बारहयारीतल्ला के पंडाल के बगल में जो हाई-वे पड़ता था, वह वाई ओर एक घुमाव देकर नदी के किनारे-किनारे विल्कुल दक्षिण की ओर चला गया था। उसी रास्ते पर एक पाइप के ऊपर निरापद-दल बैठा सिगरेट के कश खींच रहा था। इतने से इन्तजाम में ही वहुत-से रुपये खर्च हो गए। हजारों रुपये पानी की तरह वह गए । विष्णु बाबू जैसे लोगों से बहुत अनुनय-विनय करके चन्दे के रुपये कुछ बढ़वा लिए थे। विष्णु बाबू ने कहा था, 'तुम लोगों ने तो नाक में दम कर रखा है, बच्चो ! अब क्या वह जमाना रह गया है ? पहले जैसी नामदनी थी, वैसा खर्च भी कर सकते थे। पर अब...।' विष्णु वाबू जो सहसा कुछ उदार हो आये थे, उसका कारण उनकी पत्नी थी। पत्नी का भी इस तरफ इतना लगाव है, यह वात वे पहले नहीं जानते थे। रात को पत्नी ने कहा था, 'उनका नाटक हो रहा है, सुना है ?' विष्णु वावू ने कहा, 'हां, सुना है।' 'चन्दा दिया है न?' 'दिये वगैर छुटकारा भी तो नहीं मिला। अब तो इस मुहल्ले में जैसे सिर्फ आवारा लड़कों का ही अड्डा हो गया है।' कुछ देर चुप रहने के बाद पत्नी ने फिर कहा, 'तो फिर हम लोगों को कितनी टिकटें देंगे, कुछ कह गए हैं ?' विष्णु वाबू क्रोधित हो उठे, 'क्यों ? तुम्हारे सर पर भी यह सव सनक सवार है क्या?' पत्नी चुप रह गई । डर के मारे और कुछ नहीं बोली। पर विष्णु बाबू यों ही छोड़ देने वाले जीव नहीं थे। बोले, 'तुम लोगों के कारण ही तो चन्दा दे दिया था। अब तो मुहल्ले में सिर्फ आवारा लड़के हो रह गए हैं। वह मुक्तिपद हाजरा का लड़का है न, वही तो असली लीडर बना है। कितने दिनों से मेरी जान खा रहा था। आज सुबह जरा घूमने निकला तो देखता क्या हूं कि वारयारीतल्ला में और फ्यादा दिन नहीं टहला जा सकता। सभी लोग मिलकर रुपयों का श्राद्ध कर रहे . ३४ नायिका है। पंडाल यांधकर राय रास्ता-यास्ता एकदम से बन्द कर रमा है।' पली कुछ देर चुप रही। फिर बोली, 'माप भी तो उनका नाटक देखने जाएंगे?' । 'मैं जाता भला? पर मुझे क्या मालूम पारि यह सब भन्दर-नाप होगा। अगर पता होता तो क्या मैं राजी होता?" 'पर जब जुवान दे ही दी है, तब जाना तो चाहिए ही। ये इतने सम्मान के साय दुला भी तो रहे हैं मापको।' 'हां, देसो न, मुझे प्रेजिडेंट बना दिया है।' पत्नी ने कहा, 'ठीक ही तो है । पाप हो तो गाव के सिरमौर हैं। मापको याद देकर भला उनका कोई काम पूरा हो सकता है ?' विष्णु बाबू कुछ नरम पडे । शायद प्रात्मप्रासा ने उनके मन में गुद- गुदी पैदा कर दी थी। किसी जमाने में विष्णु यावू ने घन-ऐश्वयं की जग- मगाहट देखी यो। पर वह सब बचपन को बातें थी। माज भो मगर वही जमाना होता, तो यह हाजरा के घर का लडका भेंट तक करने की हिम्मत नहीं कर पाता। पर अब न तो वे मुनीम रह गए हैं, न गुमास्ते । पाली-साली-सो बैठरा सिर्फ गिरि गोविन्द के भरोसे ही पुराना ठाठ-याट बनाए हुए थे। गिरि गोविन्द सकुचाया हुमा-मा सामने मा सडा हुमा । विष्णु बाबू ने पूछा, 'कुछ कहना है ?' 'जी हा, छोटी दीदी बोल रही थी कि वे लोग भी बारहयारीतल्ला में नाटक देखने जाएगी। 'देखने जाएंगी, तो मुझमे पूटने की क्या जरूरत है ? टिकट विक रही है, गरीदने से ही मिल जाएगी।' 'हुजूर, टिकट तो सरोद ली है।' "टिकट गरोद ली है ? तब फिर मुझमे पूछने को पया मावस्यक्ता है ? अब उनकी समझ में पाया कि शायद इसीलिए पत्नी उन्हें इस तरह समना रही थी। विष्णु या मन-ही-मन मा हो गए। विष्णुपद गय । तो क्या सभी उनको इतना मानते हैं ? घर के नाती-गोते उनकी जितनी दरशत करते हैं, उतनी ही मुहल्ले के मुंहजोर लड़के भी करते हैं । फिर ये ही क्यों झूठ-मूठ मन-ही-मन इसके लिए इतना परेशान होते हैं ? यह खुशी विष्णु बाबू का मन हल्का कर गई। उन्होंने आवाज़ दी, 'गिरि गोविन्द ! 'जी, आया।' 'वो हाजरा का लड़का है न ? क्या तो नाम है उसका?' 'हुजूर, आप निरापद के बारे में कह रहे हैं ?' 'हां, अब याद आया, निरापद । वह फिर पाया था क्या?' गिरि गोविन्द ने कहा, 'जी, हुजूर ! पाया था।' 'क्या कहता था ?' 'कह रहा था कि आपके एक भाषण देने की बात है । वही बात याद दिलाने पाया था।' विष्णु वाबू ने कहा, 'अच्छा, अब तुम जानो।' गिरि गोविन्द जा ही रहा था कि उन्होंने पुकारा, 'गिरि गोविन्द, एक बात तो सुनो।' गिरि गोविन्द के वापस मुड़ते ही उन्होंने कहा, 'देखो, तुम दीदी लोगों से कह देना कि वे लोग नाटक देखना चाहती हों, तो चली जाएं। मुझे कोई आपत्ति नहीं। जैसा ज़माना हो वैसे ही चलना पड़ता है । मैं तो पुराने विचारों का आदमी हूं, पर उनकी खुशी में नाहक वाचा क्यों बनूं ? समझे न? वे लोग तो पुराने जमाने की नहीं हैं। वे लोग तो नये ज़माने में पैदा हुई हैं। क्यों, तुम्हारा क्या ख्याल है ?' गिरि गोविन्द ने कहा, 'हां जी, आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।' 'और हाजरा का लड़का.. क्या नाम है उसका ?' 'निरापद।' 'हां, निरापद आये तो उससे कह देना कि मैं भापण दूंगा। मेरा भाषण तैयार है। अब तुम जा सकते हो।' गिरि गोविन्द चला गया। विष्णु बाबू ने हुक्के की नली मुंह से हटाकर एक ओर रख दी और चाबी लगाकर वगल की अलमारी का दराज खोला। सामने ही भापण लिखे हुए कागज़ रखे थे। उन कागजों में सारी बातें उन्होंने खुद ही लिखी थीं। उन्होंने चश्मा पहन लिया और एकाध लाइनें पढ़नी शुरू की और . . ३६ नायिका फिर पूरा-का-पूरा भाषण पढ़ डाला। कल बहत रात तक जागकर ये लिसले रहे थे ताकि भाषण देते-देते कहीं बीच में ही न मटक जाए । पर सभी पूरा भाषण प: भी नहीं पाए थे कि किसी को पदचाप मुनाई दी। दराज बन्द करके उन्होंने फिर से हुक्का गुडगुडाना शुरू कर दिया। घुप्रा उडाती लड़के उपर हाई-वे के किनारे पाइप पर बैठे हुए सिगरेट के का लगा रहे थे मोर मुह वाये एकटक ननागंज के रास्ते पर नजर गडाये हुए थे। हीरोइन की गाडी उसी रास्ते से होकर पाएगी दूर से पाती हुई गाड़ी यही से दिस जाएगी। एकाएक मनसा बोल उठा, 'वह क्या है, रे? वह, जो हुई भा रही है ?' पष्टीपद ने भी ध्यान से देसा मोर कहा, 'चल हट, घुमा क्यों उड़ायेगी? यह तो पूल है धूल !' 'पर भई, लगती मोटरकार-सी है।' सचमुच वह मोटर ही थी। क्षण-भर मे ही सभी ने देसा, मनसा की बात ही सच निकली। गाड़ी घर-घरं करती हुई कदमफूली को मोर ही बढ़ी पा रही थी । सव-के-सव पाइप पर से उठ खड़े हुए। मा गये ! मा गए ! वे लोग मा गए हैं । बारहमारीतल्ला से भी सभी शोर मचाते हुए दौडे पाए, 'कहा हैं ? कहा है ? किधर हैं ?' सब ही, एक गाड़ी चली मा रही पो। दल के एकाप तहको ने फूलों की माला का भी इन्तजाम कर रहा था ताकि गाड़ी करीव माते ही हीरोइन को तुरन्त माला पहना सकें। इतनी देर में गाड़ी विल्कुल उनके मामने पहुंच चुकी थी। सब मिलकर बीच रास्ते पर पड़े हो गये। गाड़ी पूरी रफ्तार से चली आ रही यो। पर हठात् उनके सामने पहुंचते ही, घेक मारकर रुक गई। पाश्चर्यजनक करिश्मा है यह तो! गाडी में कोई नहीं है। सिर्फ ड्राइवर गाड़ी चला रहा था। उसके प्रतावा गाडी एकदम साली। संदा ने प्रागे याकर पूछा, 'किसकी गाड़ी है, रे?' "गुप्ता साहब की।'
'गुप्ता साहब की? तो फिर गुप्ता साहव कहां हैं ?' 'गुप्ता साहब तो कल ही पा गए थे।' 'मोह, यह वात है !' सभी अचरज में डूब गये। गुप्ता साहब अपने मकान में आ गए हैं और किसी को खबर भी नहीं हुई ! ड्राइवर ने फिर कहा, 'गुप्ता साहब अकेले नहीं आए हैं, सपरिवार पधारे हैं । साथ ही मेमसाहिवा भी हैं । वे लोग दो दिन की छुट्टी पर अचानक ही घूमने आ गए, फिर वापस चले जाएंगे।' ड्राइवर गाड़ी से सामान खरीदने वाजार गया था और वापस लौट रहा था । गुप्ता साहव खाने के शौकीन जो थे, अतः कोई वढ़िया चीज खरीदनी होती,तो नैनागंज ही गाड़ी भेजनी पड़ती । गुप्ता साहव आए हैं, यह बात अगर वे लोग पहले से जानते होते तो चन्दे की रसीद-वुक संग ले पाते । इससे उनका बड़ा काम निकलता। वे उदार-दिल के व्यक्ति हैं और पैसा भी खूब है उनके पास । 'अच्छा, ठीक है। तुम जानो।' गाड़ी फिर से हिच्च करके स्टार्ट हुई और धूल उड़ाती हुई अदृश्य हो गई। खैदा ने कहा, 'तो फिर गुप्ता साहब के पास चला जाए क्यों छोड़ें?' विभूति ने कहा, 'अरे, भई ! निरापद दा को आने दो । हम लोग अगर चन्दा मांगने गए,तो हो सकता है कि वे हमें दो रुपये देकर ही टरका दें। फिर तो मुश्किल में पड़ जायेंगे न !' 'हां, यही ठीक रहेगा । जव ऐसा चांस मिला ही है, तो छोड़ना ठीक नहीं । बैंदा ने फिर एक सिगरेट सुलगायी और लम्बा-सा कश खींचकर घुयां उगलने में व्यस्त हो गया। सबने फिर नैनागंज के हाई-वे की ओर मुंह-वाए देखना शुरू किया। 'रूपक' की हीरोइन कब आएगी, सबके मन में यही उत्सुकता थी। किसी समय जब गुप्ता-परिवार यहां रहता था, तव विष्णु वाबू बहुत ही शान के साथ अपनी जमींदारी चलाते थे । यद्यपि दोनों परिवारों ? चन्दा ३८ नायिका में मार्थिक असमानता थी, फिर दोनों वंशो में सद्भावना पो । एक दूसरे के घर पाने के कारण दोनों परिवारों के बीच एक स्यून मात्मीयता भी पनप उठी थी। जय विष्णु बाबू को प्राधिक स्थिति प्रगति पर थी, तमी मचानक न जाने कैसी घटना घटी कि गुप्त वंश के लोग हमेशा के लिए अपना गांव छोड़कर चले गए। हीरक गुप्त उसी गुप्त वंश के विकास गुप्त का लड़का था। हीरक गुप्त अपने जीवन में सफल व्यक्ति था, हालाकि विकास गुप्त की एकमात्र सतान होने की वजह से उन्हें हमेशा डर लगा रहता था। कहावत है न, कि एकलौता लडका हजार लडकों के बराबर होता है। हजार लडकों को लेकर जितना झमट होता है, उतना इम एक लड़के को लेकर उन्हें था। अगर विकास गुप्त माज इस दुनिया से कूच न कर गए होते तो देखते कि उनकी माशंका सर्वया निर्मूल थी । उनका सडका कमी इम गाव के लोगों का सिरमौर बन जाएगा, इसकी ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे। सिरमौर इसलिए की जीवन में इतनी सफलता शायद ही किसी को मिलती है । हीरक गुप्त का घर-परिवार तो कलकत्ते में है, पर काम के लिए उन्हें सारी इण्डिया का चक्कर लगाना पडता है मसल में काम या था, यह तो गांव में किसी को भी पता नहीं था; पर यह सबको मालूम था कि हीरक गुप्त की माय मोटी है। गाववाला घर छोडकर विदेश बसे हीरक गुप्त को माज पन्द्रह साल हो गए, पर लगता है, गाव का मोह एक- दम से छूटा नहीं है । अपने पिता विकास गुप्त के मकान का तो एकदम से रूप ही बदल दिया था उन्होंने । राप के ही जमाने का एक नोकर-टाइप का एक मादमी है, जो मकान की देख-भाल करता है तथा भामले-मुरदमे भी सम्हालता है। उनके पाने को सवर पाते हो सब मिल कर गुप्त के घर की मोर । लपके । उस वक्त हीरक गुप्त घर में ही था। खंदा सीधा गुप्त-परिवार के यूढ़े नौकर के पास गया और बोला, 'क्यो, वशी बदन ! तुम्हारे साहब नायिका ३६
कव पाए ?'
वंशी वदन ने जवाब दिया, 'कल । लेकिन इस वक्त तो साहव से
आपकी भेंट नहीं हो सकती।'
'भेंट नहीं हो सकती? हमलोगों के गुप्ता साहब, हमारी कदमफूली
के हो निवासी और हमसे ही भेंट नहीं हो सकती?'
वंशी बदन ने जवाब दिया, लेकिन मुझसे तो यही कहा है कि अाज
जरा आराम करेंगे । तबीयत ठीक नहीं है।'
बँदा ने कहा, 'तुम जाकर कह दो कि हम लोग 'कदमफूली संस्कृति
संघ' से आए हैं । चन्दा लेना है।'
वंशी वदन ने कहा, 'चन्दा लेना है, सो तो ठीक है; देंगे ही। लेकिन
इस वक्त मुलाकात नहीं हो सकती।'
वहुत जोरदार पादमी दिखते हो! अपने गांव के आदमी
होते हुए भी तुम गांव के लोगों से इस तरह पेश आते हो
'तुम तो
संदा ने कहा, 'कल। हम लोगों को तो पहले पता ही नहीं था कि गुप्ता साह्य पाये हैं । वह तो मापकी गाड़ी हाई-वे से माती दिखाई दी, तभी पता चला। हम सब हाई-वे के किनारे पाइप पर बैठे हुए थे। हमारा सेक्रेटरी नाटक की हीरोइन को लाने नैनागंज गया हुमा है। हम लोग उनका ही इन्तजार कर रहे थे। उनके माए विना कुछ होगा नहीं।' महिला ने कहा, 'मच्छा, ठीक है । मैं गुप्ता साह्य से सारी बात यह दूंगी।' 'हां, कह दीजिएगा। हम निरापद दा को लेकर शाम को फिर माएंगे।' पंदा के जाते ही वशी वदन ने कोठी का गेट फिर से बन्द कर दिया। गुप्ता साहब को पत्नी ने वंशो वदन से पूछा, 'तुम उन्हें पहचानते हो, वंशी बदन?' वंशी वदन ने कहा, 'हां, पहचानूगा क्यों नहीं ? वे सब इसो कदमफूली गांव के छोकरे हैं । ये लोग जब से पैदा हुए, तब से ही देखता माया हूँ । अब ये सयाने हो गए हैं, नाटक करने लगे हैं।' परनी के ऊरर पहुचते ही होरक ने पूछा, 'नीचे कौन लोग माये थे, माया?' माया ने कहा, 'यशी वदन उनको पहचानना है। वे सब तुम्हारी गाड़ी देसकर जान गए कि तुम पाये हो। दरअसल वे यहा चन्दा सेने माये थे।' 'किस बात का चन्दा?' 'नाटक के लिए। 'नाटक? मैं क्या सिनेमा-नाटक देखता हूं कभी ?' 'मगर न भी देखो, तो भी तुम्हारे गाव के लड़कों का नाटक है, इस- लिए चन्दा तो चाहेंगे ही।' हीरक ने कहा, 'तो तुमने कह दिया न कि मैं चन्दा-बन्दा नहीं दूगा गांव मे एक बार माता अवश्य हूँ, पर मुझे गाव से कोई मरोगार नहीं।' माया ने कहा, 'न, यावा! मैं यह सर यातें नहीं कह सकती थी। ! नायिका ४१ . कोई किसीके मुंह पर इस तरह भला कह सकता है ?' 'तुम नहीं कह सकती, पर मैं कह सकता हूं।' 'ठीक है, शाम को जब वे पाएंगे, तब तुम ही यह वात कह देना।' हीरक ने कहा, 'हां, ज़रूर कहूंगा।' 'यहां आकर जिनके बीच दो-एक दिन रहते हो, उन्हीं के मुंह पर ऐसी बात कहना क्या ठीक है ? फिर आते ही क्यों हो?' हीरक ने कहा, 'हुँ''यह मेरा अपना देश, मेरी अपनी जन्मभूमि है। यहां मेरा पैतृक मकान है । जव मेरी मर्जी होगी, तव आऊंगा । इससे किसीको क्या मतलव ? मुझे क्या किसी से डर लगता है ? वह जो विष्णु राय है, यहां का जनरल ? उसको भी मैंने एक दिन कड़ी-कड़ी बात सुना दी थी। इस बात का तो तुमको भी पता है ही ? माया बोली, 'पता नहीं, बावा ! मैं न तो तुम्हारे गांव की लड़की हूं और न ही किसीको पहचानती हूं। मुझे यह सव वताने की क्या ज़रूरत ?' हीरक ने कहा, 'नहीं, यह सब मैं तुमसे नहीं कह रहा हूं। मैं तो ये वातें उन्हीं को लक्ष्य करके कह रहा हूं।' कहकर हीरक एकाएक गम्भीर हो गया। फिर बोला, 'आज वे लोग चन्दा मांगने आये थे। इसका मतलब क्या है ? माया हीरक की बातें सुनकर अवाक् रह गई। बोली, 'तुम इतने नाराज़ क्यों हो जाते हो, बताओ तो? अचानक तुम्हें यह क्या हो गया है?' हीरक ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। चुप ही रहा । प्राज से बहुत दिन पहले की बात है, एक दिन असहाय हालत में हीरक को इन्हीं विष्णु चावू के पास जाकर भीख मांगनी पड़ी थी उस दिन विष्णु बाबू ने अपनी अमीरी के घमंड में आकर उसकी उपेक्षा की थी। वह बात हीरक क्या कभी भूल सकता है ? माया बहुत दिनों तक कहती रही, 'इससे तो अच्छा है कि दाजिलिंग चलें। हीरक कहता, 'दार्जिलिंग तो एक बार हो पाए हैं।' ४२ नायिका
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? - कोई किसीके मुंह पर इस तरह भला कह सकता है ?' 'तुम नहीं कह सकती, पर मैं कह सकता हूं।' 'ठीक है, शाम को जब वे पाएंगे, तव तुम ही यह बात कह देना।' हीरक ने कहा, 'हां, ज़रूर कहूंगा।' 'यहां आकर जिनके बीच दो-एक दिन रहते हो, उन्हीं के मुंह पर ऐसी बात कहना क्या ठीक है ? फिर आते ही क्यों हो?' हीरक ने कहा, 'हुँ..'यह मेरा अपना देश, मेरी अपनी जन्मभूमि है। यहां मेरा पैतृक मकान है। जब मेरी मर्जी होगी, तव पाऊंगा। इससे किसीको क्या मतलव ? मुझे क्या किसी से डर लगता है ? वह जो विष्णु राय है, यहां का जनरल ? उसको भी मैंने एक दिन कड़ी-कड़ी बात सुना दी थी। इस बात का तो तुमको भी पता है ही ?' माया बोली, 'पता नहीं, वावा ! मैं न तो तुम्हारे गांव की लड़की हूं और न ही किसीको पहचानती हूं। मुझे यह सब बताने की क्या ज़रूरत है ?' हीरक ने कहा, 'नहीं, यह सब मैं तुमसे नहीं कह रहा हूं। मैं तो ये वातें उन्हीं को लक्ष्य करके कह रहा हूं।' कहकर हीरक एकाएक गम्भीर हो गया। फिर बोला, 'आज वे लोग चन्दा मांगने आये थे। इसका मतलब क्या है ? माया हीरक की बातें सुनकर अवाक रह गई । बोली, 'तुम इतने नाराज़ क्यों हो जाते हो, बताओ तो? अचानक तुम्हें यह क्या हो गया है?' हीरक ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। चुप ही रहा । प्रार से बहुत दिन पहले की बात है, एक दिन असहाय हालत में हीरक के इन्हीं विष्णु बाबू के पास जाकर भीख मांगनी पड़ी थी। उस दिन विप वाबू ने अपनी अमीरी के घमंड में पाकर उसकी उपेक्षा की थी। वह या हीरक क्या कभी भूल सकता है ? माया बहुत दिनों तक कहती रही, 'इससे तो अच्छा है कि दाजिलि चलें।" हीरक कहता, 'दाजिलिंग तो एक बार हो पाए हैं।' ४२ नायिका 'दुवारा जाने में क्या कोई दोष है ? मन्टा, वहां न सही, गिमला ही चलो।' 'नहीं, चलो कदमफूली चलें।' माया जानती थी कि कदमफूली हीरक का गांव है । अपने जन्मस्थान के प्रति मनुष्य के मन में प्राकर्षण होना स्वाभाविक ही है । गाव में भाकर हीरक तालाब में नहाता, बाग-बगीचों में घूमता-फिरता, बन्दूक लेकर गिकार करने जाता । किसी समय उगकी सारी सम्पत्ति विष्णु पाय के पाम सिर्फ दो हजार रुपयों में बन्धक रमी हुई थी। ये तो मारी सम्पत्ति बेच ही देना पाहते थे, लेकिन इन बाग-बगीचो एवं मकान का गाय में उन्हें कोई ग्राहक ही नहीं मिला था। विष्णु बाबू ने उनसे पूछा था, "कितने रपये देने पर तुम यह गांव छोड़कर चले जानोगे ?' होरक ने जवाब दिया था, 'ताऊ जी, मेरे पारा कुछ भी नहीं है, अतः माप जो भी देंगे, वही मेरे लिए बहुत होगा।' 'फिर भी तुम कितना चाहते हो ?' पचरज है ! अब तक जिसके पर में उगे बेटे की तरह स्नेह मोर अपनत्व मिला था, माज उसी घर का मालिक उसे इस तरह बटोर भाषा में दुकार रहा था। यह गव याने सोचकर हीरत को माज अन्धा ही लगता है। उस वक्त यह पक्षी यदन ही उसका एकमात्र सहारा था। उस दिन इसी कमरे में, जिस कमरे में इस वक्त हीरक लेटा हुमा है, उसके पिता ने रोग-शय्या पर पड़े-पडे प्राण त्यागे थे। तब इमी वंशी यदन ने हीरक को अपने पर ले जाकर धीरज बचाया या पोर याहा था, "किसी के मा-बाप हमेशा जीचित रहे हैं, छोटे बाय ? कोई भी इस दुनिया में मदा जीवित रहने के लिए नहीं पाया है।' ताई ने भी उस दिन मपनी मीठी बातों से हीरक का गोक धो-पोछ दिया था। मोर रायसे मुख्य भाकपंप यो पन्न, जिसकी तरफ भापित होकर हीरक अपना सारा गोफ भूलने में सफल हो मपा था। अन्न का पूरा नाम मन्नपूर्णा था । मुहल्ले के लोग उमको 'मग्न' पहा नायिका . कर पुकारते । इस 'अन्न' के कारण हीरक को कितनी तकलीफें उठानी पड़ी थीं ! वह कहा करता, 'मुझे छूना मत, मैं जूठा हो जाऊंगा।' अन्न कहती, 'वाह रे, जैसे मुझे बड़ी गरज पड़ी है न तुम्हें छूने की ! मानो तुम्हें छूए बिना मेरे प्राण निकले जा रहे हैं।' लेकिन जव उसके ग्रह विपरीत हुए तो इस अन्न ने भी उसकी ओर से मुंह फेर लिया था। ताई ने भी कहा था, 'तुम यहां से चले ही जानो, वावा ! हमारी जात और धर्म जव सभी कुछ तुमने नष्ट कर दिया है, तो अब मैं तुमको इस घर में नहीं रहने दे सकती। मालिक ने मना कर दिया है।' ओह ! उस दिन कितनी भयानक पीड़ा हुई थी हीरक को, यह उसका दिल ही जानता है। उधर ताऊ जी भी बन्धक का दस्तावेज तैयार किए बैठे थे। उन्होंने कहा था, 'यहां दस्तखत कर दो।' हीरक वह कागज़ एक नज़र में पढ़ गया था। साफ-साफ अक्षरों में लिखा था, 'ईश्वर विकास गुप्त का पुत्र हीरक गुप्त दो हज़ार रुपयों के बदले उत्तराधिकार में प्राप्त अपनी चल-अचल सारी जायदाद, विष्णुपद राय के यहां वन्धक रख रहा है।' दस्तखत करने के बाद ताऊ जी ने दस-दस रुपये के नोटों के रूप में दो हजार रुपये उसे दिए थे। मुनीम गिरि गोविन्द ने कहा, 'जरा गिन लीजिएगा, छोटे वावू !" हीरक ने रुपये गिन लिए थे। दस-दस के दो सौ नोट थे। गिनती में कोई भूल नहीं थी। पर यही दो हजार रुपये दो साल में ही सूद-दर-सूद के हिसाब से बीस हज़ार में बदल जाएंगे, उस दिन हीरक इसकी कल्पना भी नहीं कर सका था, और उधर ताऊ जी भी यह कल्पना नहीं कर पाए थे कि एक दिन यही हीरक गुप्त वीस हज़ार का कर्ज चुकाकर अपना रेहननामा वापस ले जाएगा। ये सारी बातें हीरक ने माया को कहानी की भांति सुनाई थीं। सारी बात सुनकर माया ने कहा था, 'लेकिन इसके लिए हर साल - -- ४४ नायिका कदमफूली जाने की क्या जरूरत है? जो भी प्रतियोष लेना था, वह तो तुम ले ही चुके हो। तुमने तो मूस-गूद मिनाकर चीस हडार रुपये देकर सारी जायदाद लौटा ही ली है। फिर यहां क्या करने जामोगे?' होरख ने कहा, 'नही, माया ! ममी वहां बहुत कुछ देगना बाली 'प्रय और क्या देखना बाकी रह गया?' 'मरे, उम विष्णु वायू या पतन नहीं देगा?' 'वाह, उनका जितना पतन होना था,वह तो हो ही चुका है। जमी- दारी का वह मान-सम्मान भी भय नहीं रहा पोर बैंक में जमा-पूजी भी पत्म हो गई। 'लेकिन ...?' "मोह, तो तुम हर साल यही देसने वहां जाने हो ? तव तो तुम बड़े पराय भादमी हो!' हीरक ने कहा, 'मिफं देपने ही नहीं, दिपाने भी जाता हूं । अपना यह ऐश्वयं, यह गाही, ऐमी तुम-यह सब कुछ दिखाने जाता हूं।' माया ने हराकर कहा, 'हाय, दया! तो तुम मुझे भी दिखाने ले जाने हो यहाँ ?' 'मौर क्या, दिसाने नहीं से जाऊंगा? तुम जैसी खूबसूरत वह भला कितनों की है ?' 'मन्छा, तो मैं भी तुम्हारी सम्पत्ति मी गिनती में हूँ ?' । मी तरह होरक हर साल कदमफूली माता पौर माकर कोई-न-कोई नया काट करता । एक बड़ा-सा रेडियोग्राम ले मातापौर दिन भर उसको पजाता रहता। यस्लि कपर से एम्प्लीफापर लगाकर मुहल्ले के लोगों को मुनाता । कई बार नए-नए मॉडल की गाड़ी सेकर प्राता । गुप्त-परि- वार मार द्वारा गांव माता मोर साप में एक बहुत बढी वॉन भाती। गाव में दो-चार दिन के लिए काफी चहल-पहल मच गाती। हीरक गुप्त गाव में किसी के भी साथ मिलता-जुलता नहीं था। बहुत हमा तो नदी के किनारे बन्दूक से पक्षियों का शिकार करने निरन पड़ता। नायिका ४५ पर जिस तरह वह उमड़-घुमड़कर गांव पाता, उसी तरह घटायों को समेटकर चला भी जाता, और लोग देखते कि यह हीरक गुप्त कभी इसी गांव का लड़का था, जो आज इतना बड़ा आदमी बन गया है। आज उसने रुपये पैदा कर लिए हैं । वही धन दिखाने एवं उड़ाने वह यहां आता है। इसीलिए इस बार जब पता चला कि हीरक गुप्त गांव आया है तो गांव के लड़के विशेष खुश हुए, क्योंकि इस बार नाटक के कारण हजारों रुपयों के खर्च का मामला था और इसके लिए रुपयों की ज़रूरत थी। अभी और कितने रुपये खर्च होंगे, यह कुछ कहा नहीं जा सकता । बैंदा आदि हीरक गुप्त के घर से निकलकर फिर हाई-वे के पाइप पर या बैठे। सबने फिर से वीड़ी सुलगा ली खंदा ने कहा, 'अव शाम को अकेले नहीं जाएंगे । निरापद दा को साथ लेकर ही जाएंगे।' अन्य साथियों ने भी कहा, 'यही ठीक रहेगा । निरापद दा ही रुपये निकलवाने की कला जानता है।' अचानक नैनागंजवाले रास्ते के एकदम अन्तिम छोर पर धुआ-सा उठता दिखाई दिया। उसके बाद एक काला बिन्दु-सा दिखा, फिर दो बिन्दु दिखाई पड़े, और क्षण भर बाद ही दो गाड़ियां पाती हुई दिखाई दी। खैदा ने उत्तेजनावश अधजली वीड़ी नदी की धारा में फेंक दी, फिर उठ खड़ा हुया और बोला, 'इस वार तो निस्सन्देह हीरोइन की ही गाड़ी है। और फिर ज़ोर से चीख उठा, 'अरे, फूलमाला ले पा ! मालाs." माला।' सब-के-सव हो-हो करते हुए, पाइप पर आ खड़े हुए। इसी बीच गाड़ी एकदम सामने आकर खड़ी हो गई। विष्णुपद राय कदमफूली के खानदानी ज़मींदार वंश की अन्तिम पीढ़ी के व्यक्ति हैं। पीढ़ी के सिर्फ अन्तिम व्यक्ति ही नहीं, बल्कि वे अभागी और ४६ नायिका - निकृष्ट सन्तान भी सिद्ध हुए थे। उनका मासन गुरू होते ही देश की मायोहवा अचानक यदल गई। जब उन्होंने नये जमाने के माय ताल मिलाकर चलना चाहा, तो एकाएक उनको लगा मानो छन्द-भंग हो गया है। मानो रात-रात ही ये इस युगमे यहिष्कृत कर दिए गए हैं। उनको लगा कि लोग उनके पूर्वजों का जितना मम्मान करते थे, उतना उनका नहीं करते। उन्हें याद है कि ममी उस दिन तक तो गाव मे बच्चे से लेकर यूटे- बूढ़ी तक उन्हीं के इसारो पर उठते-चठते थे। पर अब वह बात नही रही । पब रास्ते मे किमीसे मामना-सामना हो जाता तो लोग सिर अवस्य झुकाते थे, पर सम्मान सहित नहीं। मय तो ऐसा लगता था कि लोगों का सिर न झुकाना ही उन्हें अधिक सा रस सकता है । विष्णु बाबू सब समझते थे। इसीलिए जहा लोगो की भीष्ट देवते, यहां से यथासंभव बचने की कोशिश करते थे। ये अपनी इजत अपने ही हायों बनाए रखना चाहते थे। लेकिन यह हीरक गुप्त? यह लड़का उन्हें प्रायः ही याद माता रहता। पाज भी उसीको याद मा रही पी। भाजकल तो जरा-सा एकान्त मिलते ही अनायास ही वही सब बातें याद मा जाती हैं । मन्नपूर्णा उनकी एकमात्र सन्नान थी । जो सर्वनास विकास गुप्त गुद न कर मका, वह उसका लडका होरफ गुप्त कर गया । सर्वनारा भी कही से एकाएक तो टपक नही पडता । उमके अकुर तो मधेरे की गहराइयों में बहुत पहले से ही पनपते रहते है। विष्णु बाबू एक दिन विकास गुप्त को सावधान भी कर चुके थे । उन्होंने कहा था, 'तुम्हारी पत्नी गई, तुम्हारी लट की गई, लड़का गया। सब कुछ सोकर भी तुम अपने मन को पवित्र नहीं कर सके, विकास ! भगवान नाम की कोई शक्ति हमारे सिर पर है-यह तो तुम मानते हो, या यह भी नहीं मानते।' विकास ने कहा था, 'तो मै यह कब कहना है कि माप व्याज की सनी रकम छोड दीजिए। मैं तो सिर्फ यह कहता हूँ कि थोड़ा कम कर दोगिर 'देस, गुप्ता! तू मेरा मूल-मूद दे या न दे, मुझे उससे गुराग पडता। भगवान ने मुझे बहुत दिया है । लेकिन सभी !
! फिरता है कि मैं तुझ पर अन्याय करता हूं, जुल्म करता हू...' उस दिन यह बात सुनकर विकास गुप्त स्तम्भित रह गया था। उसने कहा था, 'जिसने मापसे यह बात कही है, वह मेरा और आपका दोनों का ही नुकसान कर रहा है।' 'मेरा नुकसान ?' विष्णु बाबू उस दिन ठहाका मारकर हंस पड़े थे। फिर गिरि गोविंद को बुलाकर कहा था, 'अरे, गिरि गोविंद ! सुन, सुन तो ज़रा, गुप्ता क्या कहता है ? देख न, कहता है कि मेरा नुकसान होगा ! अरे, जव तक भगवान मेरा कुछ बुरा नहीं चाहेंगे, तब तक किसी माई के लाल में मेरा अहित करने की ताकत नहीं है । समझे, गुप्त ? मैं भाग्यवादी । मेरा अहित करने की ताकत मनुष्य मात्र में नहीं है।' विष्णु बाबू ने यह बात बड़े घमंड के साथ कही थी। उन्होंने यह बात केवल विकास गुप्त से कही हो, ऐसी बात नहीं । उस समय तो उनकी जुबान पर हर वक्त यही बात रहती थी। पर वे भी इस बात की कल्पना कैसे करते कि उनकी बेटी अन्नपूर्णा ही उनका सबसे अधिक सर्वनाश करेगी? अगर यह मान भी लें कि उन्होंने विकास गुप्त के साथ अन्याय किया था, तो उसके लड़के को अपने घर में आश्रय देकर उसका प्रायश्चित भी तो कर लिगा था उन्होंने । उनकी पत्नी भी उस दिन खुश ही हुई थी। विष्णु बाबू ने कहा था, 'हीरक को यहीं रहने दो। यों भी तो कितनी ही चीजें गृहस्थी में बरवाद हो जाती हैं, फिर इस अकेले के लिए ही भला कितना खाना वरवाद होगा ?' अतः पहले-पहल जब उन्होंने उसको अपने घर में लाकर रखा था, तब सोचा भी नहीं था कि गुप्त-वंश का यह वित्ते भर का लड़का किसी दिन सिर उठाकर बात करेगा। वह क्या खाता, कव खाता, कहां रहता, कहां सोता, इन सबकी जानकारी रखने की विष्णु बाबू को आवश्यकता भी नहीं थी। पर नज़र की ओट में विश्व-ब्रह्माण्ड के अनगिनत ग्रहों, नक्षत्रों, तारकों के प्रलय के दृश्य छुपे रहते हैं, इसकी तो शायद सपने में भी कल्पना नहीं की थी उन्होंने। वही 'अन्न' लोगों की नजरों से बचकर, एक दिन उस नाबालिग हीरक गुप्त के कमरे में मा उपस्थित हुई थी। कहा था, थी। कहा था, 'तो तुम छिप । ४८ नायिका छिपकर बीड़ी पीते हो?' उस जमाने की वह सड़की भग्न बहुत चानाक थी। हीरक ने पूछा, 'कौन कहता है ? विमने वहा सुमसे कि मैं वीड़ी पीता हूं?' "फिर भूठी बात ! मैंने स्वयं अपनी मांगों से तुम्हें बीड़ी पीते हुए देवा है और तुम अन्जान बनकर कहते हो, कि नहीं पीता!' हीरक ने राय परिवार के घर के एक कोने में माना सामाग्य स्पा. पित कर रखा था। वहा उसको माना मिलता है या नहीं, वह ठीक से सो पाता है या नहीं, अथवा पढाई लिखाई करता है या नहीं, प्राधियातें उन दिनों उससे पूछनेवाला कोई नहीं था। भन्न ने वही से चीनकर अपनी मां को पुकारा, 'मा, मां, मो मां...!' मचानक इस तरह चिल्लाकर युनाने की क्या जरूरत पा पड़ी, यह जानने के लिए ताई तुरन्त दौड़ी पाई। पूछा, 'क्यों, क्या हुमा री? इतनी चीस क्यों रही है?' 'यह देसो न, मा? गुप्त-परिवार का लड़का हिप-छिपकर बीड़ी पीना सीस रहा है।' ताई ने पल भर हीरक की मोर देगा। उसके बाद अपनी सड़की की मोर देखकर कहा, 'होरक बीड़ी पीता है या नहीं, इससे तुझे क्या मतलब तू क्यों फिरु के मारे मरी जा रही है ! तू इसके कमरे में पाई ही क्यों ?' हीरक बोला, 'नहीं, ताई! मैंने बीड़ी नहीं पी है। मच कह रहा हू, मैंने बीड़ी नहीं पी है।' ताई ने कहा, 'मगर तुम बीड़ी पीते भी हो बेटा, तो भी हमलोग तुम्हें मकान से तो निकाल नहीं रहे हैं। तुम जी भरकर वीड़ी पीपो, हमारा क्या ?' अन्नपूर्णा ने कहा, 'हां, मां ! मैंने स्पय देगा है, यह बीड़ी पीना है।' "मुझे तूने बीड़ी पीते देखा है ? कव देया है, बता? तुझे बताना ही होगा।' 'देखो न मां, स्वयं गलती करके मुझे भूठी सावित फरना चाहता है। मानो एक यही अच्छा है पोर सारा दोप मेरा ही फिरता है कि मैं तुझ पर अन्याय करता हूं, जुल्म करताहू उस दिन यह बात सुनकर विकास गुप्त स्तम्भित रह गया था। उसने कहा था, 'जिसने पापसे यह बात कही है, वह मेरा और आपका दोनों का ही नुकसान कर रहा है।' 'मेरा नुकसान ?' विष्णु बाबू उस दिन ठहाका मारकर हंस पड़े थे। फिर गिरि गोविंद को बुलाकर कहा था, 'अरे, गिरि गोविंद! सुन, सुन तो जरा, गुप्ता क्या कहता है ? देख न, कहता है कि मेरा नुकसान होगा ! अरे, जव तक भगवान मेरा कुछ बुरा नहीं चाहेंगे, तब तक किसी माई के लाल में मेरा अहित करने की ताकत नहीं है । समझे, गुप्त ? मैं भाग्यवादी हूं। मेरा अहित करने की ताकत मनुष्य मात्र में नहीं है।' विष्णु बाबू ने यह बात बड़े घमंड के साथ कही थी। उन्होंने यह बात केवल विकास गुप्त से कही हो, ऐसी बात नहीं । उस समय तो उनकी जुबान पर हर वक्त यही वात रहती थी। पर वे भी इस बात की कल्पना कैसे करते कि उनकी बेटी अन्नपूर्णा ही उनका सबसे अधिक सर्वनाश करेगी? अगर यह मान भी लें कि उन्होंने विकास गुप्त के साथ अन्याय किया था, तो उसके लड़के को अपने घर में आश्रय देकर उसका प्रायश्चित भी तो कर लिया था उन्होंने । उनकी पत्नी भी उस दिन खुश ही हुई थी। विष्णु वाबू ने कहा था, 'हीरक को यहीं रहने दो । यों भी तो कितनी ही चीजें गृहस्थी में वरवाद हो जाती हैं, फिर इस अकेले के लिए ही भला कितना खाना वरवाद होगा?' अतः पहले-पहल जब उन्होंने उसको अपने घर में लाकर रखा था, तब सोचा भी नहीं था कि गुप्त-वंश का यह वित्ते भर का लड़का किसी दिन सिर उठाकर बात करेगा। वह क्या खाता, कव खाता, कहां रहता, कहां सोता, इन सबकी जानकारी रखने की विष्णु वावू को आवश्यकता भी नहीं थी। पर नजर की प्रोट में विश्व-ब्रह्माण्ड के अनगिनत ग्रहों, नक्षत्रों, तारकों के प्रलय के दृश्य छुपे रहते हैं, इसकी तो शायद सपने में भी कल्पना नहीं की थी उन्होंने । वही 'अन्न' लोगों की नज़रों से बचकर, एक दिन उस नाबालिग हीरक गुप्त के कमरे में पा उपस्थित हुई थी। कहा था, 'तो 'तो तुम छिप- । - ४८ नायिका
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-- - हीरक ने जवाब दिया, 'झूठ बोलोगी तो क्यों नहीं कहूंगा ही नहीं, फिर भी तुम मुझ पर दोष लगा रही हो।' ताई ने कहा, 'वात यह है, वेटा ! मैं तुमसे बड़ी हूं । अतः एक वात हती हूं। मेरी लड़की भला झूठ वात क्यों कहने लगी, बतायो तो? उसे या फायदा है तुम्हारे नाम झूठा दोष लगाने से ?' अन्न बोल पड़ी, 'मैंने सोचा, भले घर का लड़का है। वीड़ी पीने से चरित्र नष्ट होता है, इसीलिए सावधान कर देने की गरज से कह दिया। पर, यह तो उलटे मुझे ही झूठी बना रहा है।' ताई ने कहा, 'हां, तुम्हारी गलती तो है ही । वह चाहे वीड़ी पीए या शराव, चाहे चरित्र-भ्रष्ट हो या जो हो, तुम्हें इसमें दिमाग खपाने की क्या ज़रूरत है ? तुम होती कौन हो उसकी? तुम उसके कमरे में आई ही क्यों ? आज नहीं तो कल तुम्हारी शादी होगी, फिर पराए घर जानोगी। इन सब पचड़ों में पड़ने की तुम्हें क्या ज़रूरत है ?' अन्न ने कहा, 'ठीक है, अव कभी नहीं कहूंगी । इस वार मुझसे गलती हो गई। घटना की शुरूपात तो इस प्रकार हुई थी, लेकिन उस दिन किसी ने भी हीरक को अपनी सफाई में बोलने का मौका नहीं दिया। साथ ही इस घटना को लेकर किसी से चर्चा भी नहीं हुई । जव सारी मिल्कियत ही छिन गई, तब आश्रय की उम्मीद उनसे ही तो की जाएगी, जिनके पा उसकी सम्पत्ति रेहन है । उसे आश्रय या रोटी अगर न भी दें, तो भी कू कहने लायक मुंह उसका नहीं है। दिन बाद ही फिर एक झंझट उठ खड़ा हुआ। वह अपने कमरे में घुस ही रहा था कि अन्न को उसने अपने कम वाहर निकलते देखा। हीरक ने पूछा, 'कुछ ढूंढ़ रही थी?' अन्न ने जवाब दिया, 'नहीं।' 'तो फिर इस कमरे में क्यों घुसी ?' 'हाय राम, तुम्हारे कमरे में जाने भर से ही तुम मुझे चोर : हो? क्या मैंने तुम्हारा कुछ त्रुराया है ?' उसके कुछ नायिका ५० हीरक ने कहा, 'मैंने तुम्हें चोर फर कहा ?' 'तुम्हारे कहने का मतलब तो यही था। और क्या कोई किसी को स्पष्ट रूप में चोर कहता है ?' होरस ने कहा, 'देखो, चिल्लाना मत । मगर ताई ने मुन लिया तो फिर हगामा सड़ा कर देंगी। मैं तुममे माफी चाहता हूं । यस माज से तुम्हे कुछ नहीं कहूंगा।' 'इसका मतलय? तुम मुझे चोर कहकर बदनाम करोगे और मैं चुप रह जाऊंगी ? मुझे ऐमो-बैमी लड़की मत समझना। सिर्फ मां ही क्यों, पिता जी भी मा जाएं, तो क्या है ? मुझे किमी का डर नही पहा है । मैं हर बात साफ-साफ कहनेवालियों में से हू ।' कहते-कहते उसकी मावाज जो राप्तम म्वर पर पहुंची तो ताईमा उपस्थित हुई। पाते ही बोली, 'क्या हुमा प्रम? यात क्या है ?' 'देश न मो, इसका कमरा बहुत गन्दा था। मैं जरा सफाई करने को घुगी थी कि यह मचानक मा गया और मुझ पर चोरी का इल्जाम लगाने लगा। कहता है कि मैं इसके कमरे में घुस कर जाने क्या धुरा रही धी?' ताई ने पूछा, 'यह क्या बात है, भई ? तुम ऐगी बात भी कह सकते हो? मेरी ही सड़की के नाम तुम ऐसा इल्जाम लगा रहे हो ?' हीरफ ने कहा, 'मैंने इसे चोर नहीं कहा था, ताई जी !' 'तो तुम यह कहना चाहते हो कि नुमने मन को कुछ नही कहा, यह मन ही तुमपर झूठ-मूठ दोप लगा रही है ? तुममे कुछ लेना-देना नहीं, कोई मतलब नहीं; फिर तुम उसे घोर क्यों कहते हो ? और फिर तुम्हारे कमरे में कौन सा सोना-चादी विसरा पड़ा है, जो वह पुरा कर ले जाएगी?' हीरक से भय मोर धुप नहीं रहा गया, मत: बोल पडा, 'ताई जी! सारा कसूर मेरा ही है। मैं पापमै माफी मागता हूं।' पर ताई यू सहन में ही छोड़ देनेवाली जीव नहीं पी। बोली, 'ऐसा कहकर तुम जीत जापोगे, यह नहीं हो सकता, बेटा । पमूर अगर मेरी सड़को का होता तो क्या तुम सोचने हो कि में उसे क्षमा कर देती ? में नापिया लिए तो अपना-पराया सब एक-बराबर है।' यह कहकर पिछली बार की तरह यह झगड़ा भी खत्म कर दिया गया। । पर अन्नपूर्णा शायद विचित्र धातु से बनी हुई थी। खुद को भी वह उसी तरह यंत्रणा देती रहती । नहीं तो गांव के और लड़के-लड़कियों के साथ मिलकर वह यमपोखर-पुण्यपोखर आदि घूमने में भी तो समय विता सकती थी। विष्णुपद राय गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। जिस तरह गांव के लोग उनका सम्मान करते और उनसे डरते थे, घर के लोगों में भी वही बात थी। वे अपनी पुरानी इज्जत, पावरू, सम्मान एवं जमींदारी के कानून-कायदों ' को कायम रखे सदर बैठक में बैठे रहते और उनके सामने मुनीम-गुमास्ते नाज़िर-कचहरी, तिजारत-महाजनी आदि-आदि बहुत-सी उलझनों का मुखोटा प्रोढ़े रहते । वहां पर प्रवेश करने का अधिकार हरेक को नहीं था, यहां तक कि परिवार के सदस्यों को भी नहीं । इसी तरह, उनके महल के अन्दर भी झांकने का अधिकार किसी को नहीं था। यहां तक कि उनकी गृहस्थी के भण्डार-घर, रसोईघर एवं गोशाला आदि में कहां क्या हो रहा है-यह खबर रखने की स्वयं वे भी ज़रूरत महसूस नहीं करते थे। उस दिन दो हजार रुपयों में विकास गुप्त की सारी ज़मीन-जायदाद खरीदकर, उन्होंने समझा था मानो कोई नियामत पा ली हो। पर उन्हें यह पता नहीं चल सका कि उनकी गृहस्थी के भंडार में सेंध लगाकर न जाने कौन व्यक्ति कौन-सी अमूल्य सम्पत्ति चोरी कर ले गया! अचानक एक दिन राय महोदय के घर में हलचल मच गई। कदमफूली जैसे साधारण एवं अज्ञात गांव में इस प्रकार की हलचल प्रायः नहीं दिखाई पड़ती। परन्तु राय साहव की पत्नी की हिम्मत का भी क्या कहना है ! इतनी बड़ी कलंकपूर्ण घटना को भी इस प्रकार दवा दिया कि किसी काग- चिड़ी तक के कानों में भी भनक नहीं पड़ी। इस घटना का अगर पता भी था तो सिर्फ हीरक एवं अन्नपूर्णा को ही। मां की आंखों में धूल झोंकना क्या इतना सहज था? एक दिन तो ताई ने रंगे हाथों ही पकड़ लिया था। बहुत रात गए अन्नपूर्णा हीरक के ५२ नायिका.
कमरे में माई थी। वह समय राय-परिवार के गहरी नौद में डूबे रहने का होता था। पर ताई जी गायद किसी विशेष कार्यवाही बरामदे को मोर पाई थीं। कोई एक चौका देने वाली मावाज सुनते ही वोसी, कौन है ?" पर कोई मावाज नहीं माई। मकान के पिछवाड़े बांस के झरमुट पर एक उल्लू चीस पड़ा। ताई जी ने फिर मावाज दी, 'कौन है वहां ?' उस वक्त हीरक मपने कमरे में यहा पर-थर कांप रहा था । कभी- न-कभी ऐसा होना ही पा, यह माशंका हीरक को बहुत पहले से थी । बहुत बार उसने कहा भी पा, 'मगर ताई जी ने देस लिया तो माफत प्रा जाएगी।' मन्न कहती, पयादा होशियार बनने की कोशिश न किया करो।' 'पर फिर भी तुम यहां पाती ही क्यों हो? यार-बार मुझे किसी मुसीबत में हाले बिना क्या तुम्हे चन नहीं मिलता?' मन्न ने कहा था, 'मैं क्या झूठ-मूठ हो तुम्हें मुसीबत में डालती हूँ? क्या तुम बीड़ी नही पीते ?' हीरक ने जवाब दिया, 'अगर मैं बीडी पीतातो मेरे मुह से गंध माती, जानती हो न? क्या मेरे मुंह से गघ पाती है ?' 'दिसामो, दे कि तुम्हारे मुह से गंध माती है या नहीं ?' हीरक ने मुंह पूरा सोल दिया, और मन्न अपनी नाक उसके मुह के नजदीक करके बोड़ी की गंध सूधने लगी। बोली, 'दे तो जरा ! मुह से सांस फैको। फैको न सांस!' पर यह सब कुछ नहीं करना पडा हीरक को। उसके पहले ही जो होना पा, वह हो चुका। हीरक को लगा मानो उसके दिमाग पर रिसीने वयापात रिया हो। कुछ देर तो उसके मुंह से कोई मावाज ही नहीं निकली। माखिर यह गोला, 'तुम इम कमरे से पती जामो।' 'क्यों ? क्यों पली जाऊ? मैंने क्या किया है ?' हीरक ने कहा, 'माखिर दोपो में ही ठहराया जाऊगा, जबकि....... 'जयकि, पया?' !
? - 'जबकि मैंने तो कुछ किया ही नहीं है । पर झूठमूठ की डांट सुनने के लिए मुझे ही पकड़ा जाएगा। ताई जी मुझे ही डांटेंगी। तुम्हारा पलड़ा भारी है, और मैं हूं अकेला।' वस ऐसे ही रोज होता था। अन्न को अच्छा तो बहुत लगता, पर डर भी कम नहीं लगता था। उस घर में हीरक की हैसियत एक दास से अधिक नहीं थी । दूसरों की दया पर ही आश्रित था वह । दुनिया में इसी आश्रय और दो जून दो मुट्ठी अनाज के लिए ही मनुष्यों में इतना विरोध, इतना विश्वासघात एवं झगड़ा रहता है । और अन्त में उस दिन ताईजी ने उन्हें पकड़ ही लिया। बोलीं, 'अरी, अन्न ? तू यहां कैसे? इतनी रात गए क्या कर रही थी यहां?' उस दिन जब अन्न को और कोई उपाय न सूझ पड़ा तो वह बोल पड़ी थी, 'हील दा ने बुलाया था। 'हीरू ने बुलाया था। किसलिए बुलाया था? कहां है हीरक ?' कहते-कहते ताई हीरक के घुप्प अंधेरे कमरे में घुस पड़ी थी, और पुकारने लगी थीं, 'हीरू ! हीरू!! कहां है हीरू ?' और हीरक कमरे के एक कोने में छिपा हुआ खड़ा था। 'कहां हो, हीरू ? जवाव क्यों नहीं देते ?' ताई जी का स्वर तव तक सप्तम स्वर तक पहुंच चुका था। हीरक को डर लगने लगा । अगर ताई जी उसे पकड़ लेंगी, तो? अगर सभी जाग जाएंगे, तब ? 'अरे, जवाव क्यों नहीं दे रहे ? कहां हो तुम ?' लेकिन तब भी हीरक कोई जवाब नहीं दे सका। पर ताई जी छोड़ देने वाले लोगों में नहीं थीं। उसी घोर अंधेरे में ताईजी कमरे के कोने की और बढ़ी, और हीरक के वालों को मुट्ठी में कसकर उसे बाहर घसीट लाई। वोलीं, 'क्यों? जवाब कैसे नहीं दे रहे हो? बोलो, अन्न को क्यों बुलाया था यहां?' हीरक चुप रहा। प्रतिवाद करने की भापा भी मानो खो गई थी उसकी। - ५४ नायिका , ताई उसी तरह उसके बालों को मुट्ठी में भीचे पूछ रही पी, 'दूध- केला सिला-खिलाकर क्या तुम्हे ऐसा सर्वनाश करने के लिए ही पाला था। निकलो, इसी वक्त निकल जामो यहां से।' उस वक्त कदमफूली में गहरी प्रधेरी रात थी। हीरक ने अपनी सफाई में कुछ कहने की कोशिश भी की, पर ताई उसे कुछ कहने का मौका देतीतवन! हीरक ने सिर्फ इतना ही कहा,'ताई जी, में चला जाता है। भाप मेरे बाल छोड़ दीजिए। मैं मभी चला जाऊंगा।' सेकिन जाने भी नहीं देंगी, मोर निकल जाने के लिए डांटेंगी भी ! हीरक की हालत बहुत ही दयनीय पी। उगी दिन माघी रात को हीरक कदमफूली गांव छोडकर चला गया। पारीर पर पहने हुए कपड़ो के मलावा पौर कोई दूसरा कपडा, कम्बल, तक्रिया, गंजी, कमीज, जूते, कुछ भी नही था उसके पास ) सिर्फ पहने हुए कपड़ों में ही राम-परिवार का पर छोड़कर हीरक चला गया। प्रसहाय एवं साधनहीन दशा में, सूने पय को संगी बनाकर हीरफ बारहारीवाले रास्ते से निरुद्देश्य चलता हुमा कलकत्ते पहुंच गया पा। भोर कितने ही सालो बाद लौटकर मापापा यह। तब उस हीरफ को पहचानना ही मुश्किल था। तबतक कदमफूली में भी मनेक परिवर्तन हो चुके थे। कदमफूली से लेकर नैनागंज तक हाई- ये बन गया था। नई परीदी कार द्वारा नये बने हाई-ये पर चलकर हीरक सीधा राम के मकान तक मा पढवा पा। उस दिन तो उमे विष्णु पादू भी नही पहचान सके थे। घरमा उतारकर पूछा, 'कौन ? कौन हो सुम?' होरफ ने जवाब दिया था, माप मुझे नहीं पहपान सकेंगे। मेरा नाम 'हीरका ?' 'जी हो । मेरे पिताजी का नाम सर विकास गुप्त था। मैं उन्हींका सड़सा होरक गुप्त हूं।' इस बीच विष्णु या एकदम स्तम्भित हो चुके थे। या करें, क्या न नापिका । करें, उनकी कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। खुश हों या गुस्सा दिखाएं या चौंक उठे, कुछ भी नहीं सोच पाए। आखिर कोई उपाय न देख पूछ बैठे, 'हां, तो अव तुम कैसे हो ?' 'ठीक हूं।" उसके बाद शायद वाहर खड़ी नई कार पर उनकी नजर पड़ी, तो पूछा, 'वह कार किसकी है ? तुम्हारी है ? क्या तुम उसी गाड़ी द्वारा पाए हो?' 'जी. "हां, वह गाड़ी मेरी ही है। सत्रह हज़ार रुपये देकर खरीदी है, और उसी गाड़ी पर चढ़कर आपसे मुलाकात करने आया हूं।' 'ठहरे कहां हो?' 'कहीं नहीं ठहरा हूं मैं । और कहीं ठहरने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। गाड़ी में मेरा ड्राइवर है। उसके पास फ्लास्क में काफी है, कुछ फुट्स हैं। अब मैं ठहरूंगा तो अपने ही मकान में ।' 'अपने मकान में ? मतलब, अपने पैतृक मकान में ?' 'जी हां, आपके पास मेरी पैतृक-जायदाद की जो मार्टगेज ड्यू है, उसे क्लीयर कर देना चाहता हूं।' 'क्लीयर करना चाहते हो?' 'जी, देना तो बहुत दिनों से वाकी है ही। और फिर जितने दिन बीतते हैं, उतना ही सूद भी तो बढ़ता जाता है न, इसीलिए सब कुछ क्ली- यर कर देने को पायाहूं।' तव तो मानो विष्णु बाबू के पाश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। हीरक को उन्होंने पापाद-मस्तक देखना शुरू किया। कीमती शर्ट, पैन्ट, टाई-सव चीज़ों को वे अपनी नज़रों से परखने लगे। सचमुच, क्या यह वही हीरक है ? क्या यही विकास गुप्त का लड़का है ? उन्हें मानो अपनी आंखों पर विश्वास करने की इच्छा नहीं हुई। इतने दिन तो इसे खाने- पहनने को भी नहीं मिलता था। उन्हें अच्छी तरह याद है कि वाप के मर जाने के बाद उन्होंने ही दया करके इसे प्राश्रय दिया था। उनके घर में वैसे भी तो कितनी ही गायें, बकरियां, दाइयां, नौकर आदि पल रहे थे-उनकी ही तरह यह भी पलता रहेगा; यही सोचकर - ५६ नायिका उन्होंने इसे घर में मात्रय दिया था। और उसके बाद? उसके बाद एक दिन पत्नी से पूछा था, 'वह छोकरा कैसा है ? या करता रहता है माजकल? पर दिखाई नहीं दिया ?' 'किसकी बात कह रहे हैं ?' 'अरे वही, विकास गुप्त का लड़का ?' 'उसको मैंने विदा कर दिया है।' 'क्यों? विदा क्यों कर दिया? कव विदा कर दिया? मुझे तो मालूम ही नहीं है ? तुमने मुझे बताया भी नहीं ?' 'वस, मेरी सुशी! मैंने विदा कर दिया। मव कभी तुम इस तरह किसी को घर मत लाना।' 'क्यों, क्या किया था उसने ?' 'पहले यह पूछो कि क्या नहीं किया उसने ? दूय मोर केला सिला- खिलाकर तुमने घर में सार को पाल रखा था।' 'क्या कहती हो तुम? किसके हुक्म से तुमने उसे निकाला? मुझसे एक बार पूछा तक नहीं ? क्या मैं इस घर में कुछ भी नहीं हूँ ? उसको पर में में लाया था। मोर राना उचित है या मनुषित, यह मैं ही समझ सकता था। उसको निकालनेवाली तुम कौन होती हो ?' पत्नी के साय उनका उस दिन सासा झगड़ा हुमा था। पत्नी ने कहा पा, 'तुम अपनी बाहरी बैठक में बाहर के लोगो में ही मस्त रहते हो। पर में क्या हो रहा है, यह किसी दिन भी जानने की कोशिश की है तुमने ? फिर माज हो जानने को मया जरूरत मापही है ? मैंने जो ठीक किया है। तुम्हारी तकदीर मच्छी है कि मैंने प्रात्महत्या नहीं की।' कहकर पत्नी वहां मौर सडी नहीं रही। एकदम भीतरी कमरे में मदृश्य हो गई। पर उस दिन भी वे नहीं जान पाए कि मौर कितना बडा सर्वनाश उनी प्रतीक्षा कर रहा है। वे तो हरदम काये, तिजारत, महाजनी, सोग- याग, पान-चावल, धन-सम्पत्ति वगैरह में ही रमे रहते थे। घर के बारे में उन्हें कुछ भी सोचने का समय नहीं मिलता था। उनके लिए सिर्फ पली कुछ भी किया, नापिका करें, उनकी कुछ समझ में ही नहीं पा रहा था। खुश हों या गुस्सा दिखाएं या चौंक उठे, कुछ भी नहीं सोच पाए। आखिर कोई उपाय न देख पूछ वैठे, 'हां, तो अब तुम कैसे हो ?' 'ठीक हैं।' उसके बाद शायद वाहर खड़ी नई कार पर उनकी नजर पड़ी, तो पूछा, 'वह कार किसकी है? तुम्हारी है ? क्या तुम उसी गाड़ी द्वारा पाए हो?' 'जी''हां, वह गाड़ी मेरी ही है। सत्रह हजार रुपये देकर खरीदी है, और उसी गाड़ी पर चढ़कर आपसे मुलाकात करने आया हूं।' 'ठहरे कहां हो?' 'कहीं नहीं ठहरा हूं मैं । और कहीं ठहरने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। गाड़ी में मेरा ड्राइवर है। उसके पास फ्लास्क में काफी है, कुछ फुट्स हैं । अव मैं ठहरूंगा तो अपने ही मकान में।' 'अपने मकान में ? मतलब, अपने पैतृक मकान में ?' 'जी हां, आपके पास मेरी पैतृक-जायदाद की जो मार्टगेज ड्यू है, उसे क्लीयर कर देना चाहता हूं।' 'क्लीयर करना चाहते हो?' 'जी, देना तो बहुत दिनों से बाकी है ही। और फिर जितने दिन बीतते हैं, उतना ही सूद भी तो बढ़ता जाता है न, इसीलिए सब कुछ क्ली- यर कर देने को प्रायाहूं।' तव तो मानो विष्णु वाबू के पाश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा । होरक को उन्होंने पापाद-मस्तक देखना शुरू किया। कीमती शर्ट, पैन्ट, टाई- सब चीज़ों को वे अपनी नज़रों से परखने लगे। सचमुच, क्या यह वही हीरक है ? क्या यही विकास गुप्त का लड़का है ? उन्हें मानो अपनी सांखों पर विश्वास करने की इच्छा नहीं हुई। इतने दिन तो इसे खाने- पहनने को भी नहीं मिलता था। उन्हें अच्छी तरह याद है कि बाप के मर जाने के बाद उन्होंने ही दया करके इसे प्राश्रय दिया था। उनके घर में वैसे भी तो कितनी ही गायें, बकरियां, दाइयां, नोकर आदि पल रहे थे--उनकी ही तरह यह भी पलता रहेगा; यही सोचकर ५६ नायिका ? उन्होंने इसे पर में माश्रय दिया था। और उसके बाद? उसके बाद एक दिन पत्नी से पूछा या, 'वह छोकरा कैसा है ? पपा करता रहता है भाजकल? घर दिखाई नहीं दिया?' "किसकी बात कह रहे हैं ?' 'मरे यही, विकास गुप्त का लड़का ?' 'उसको मैंने विदा कर दिया है।' 'क्यों ? विदा क्यों कर दिया? कय विदा कर दिया? मुझे तो मालूम ही नहीं है ? तुमने मुझे बताया भी नहीं ?' 'वस, मेरी पुशी ! मैंने विदा कर दिया। भव कभी तुम इस तरह किसी को घर मत लाना।' 'क्यों, पया किया था उसने ?' 'पहले यह पूछो कि क्या नहीं किया उसने ? दूध और केला सिला- खिलाकर तुमने पर मे सांप को पाल रखा था।' 'क्या कहती हो तुम ? किसके हुक्म से तुमने उसे निकाला? मुझसे एक बार पूछा तक नहीं ? क्या मैं इस घर में कुछ भी नहीं हूं? उसको घर में में लाया था । मोर रसना उचित है या मनुचित, यह में ही समझ सकता पा। उसको निकालनेवाली तुम कौन होनी हो?' पत्नी के साथ उनका उस दिन खासा झगड़ा हुमाया। पत्नी ने कहा था, 'तुम मपनी बाहरी बैठक में बाहर के लोगो मे ही मस्त रहते हो । घर में क्या हो रहा है, यह किसी दिन भी जानने की कोशिश की है तुमने ? फिर माज ही जानने की क्या जरूरत मापही है ? मैंने जो कुछ भी किया, ठीक किया है । तुम्हारी तकदीर मच्छी है कि मैंने भात्महत्या नहीं की।' कहकर पत्नी वहां मोर सड़ी नहीं रही । एकदम से भीतरी कमरे में प्रदृश्य हो गई। पर उस दिन भी वे नहीं जान पाए कि मोर हितना बड़ा सर्वनाम उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। वे तो हरदम रुपये, तिजारत, महाजनी, लोग- घान-चावल, धन-सम्पत्ति वगैरह में ही रमे रहते थे। घर के बारे में उन्हें कुछ भी सोचने का समय नहीं मिलता था। उनके लिए सिर्फ पत्नी बाग, नायिका ५७ । - ही नहीं, शायद अन्नपूर्णा भी घर की अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुनों में से एक थी। बस, इससे अधिक कुछ नहीं। पर ये सब पुरानी बातें हैं । इतने दिनों में वे सारी पीड़ा एवं जुदाई वगैरह भूल चुके थे। उसके बाद से उनका शरीर टूटता चला गया था। वायु, सर्दी, जुकाम, कफ, ब्लड प्रेशर, डायन्टीज आदि में वे इस कदर उलझे रहे कि अतीत की सारी बातें प्रायः भूल ही गए थे। डॉक्टरों ने सुबह टहलने को कहा था। अतः वे इसी में मग्न थे। सुबह टहलने जाते समय जिस-जिस से मुलाकात होती, वे सभी उनके सम्मान में सिर झुकाकर प्रणाम करते। इतने से ही उनको परम सन्तोप मिल जाता था कि सचमुच लोग अब भी उनका सम्मान करते हैं । मन-ही- मन वे बहुत खुश होते । वह जमाना गया, उस ज़माने की आवोहवा, सुख- शान्ति, धन-दौलत सब कुछ गए-पर इज्जत यावरू अब भी है, यह जानकर सचमुच उन्हें खुशी ही होती थी। ठीक उसी वक्त हीरक पहुंचा। उन्होंने कहा, 'अब तुम्हारे पास काफी रुपये हो गए हैं, यह मुझे पता है; और यह बहुत खुशी की बात है। पर वाप का कर्ज चुकाना सुपुत्र का काम है। हीरक ने जवाब दिया, 'जी हां, मैंने भी यही तय किया है कि आपके सारे रुपये मैं चुका ही दूं।' अव विष्णु वाबू क्या कहें, क्या करें-यह उस क्षण सोच ही नहीं पाए। फिर क्षण भर रुककर गिरि गोविन्द को अावाज दी। वोले, 'देख तो, गुप्ता जी का दस्तावेज़ कहां है ?' 'जी, वह तो लोहे के सन्दूक में रखा है।' 'उसको निकाल लायो।' 'चावी दीजिए। विष्णु वावू की सभी चाबियां कमर की डोरी में लटकी रहती थीं। वहां से चावी निकालकर देते हुए वे बोले, 'तुम जरूर लायक बेटे हो, इसी- लिए तुम्हारे बाप का कर्ज इस तरह अदा हुआ । लेकिन व्याज तो बहुत ज्यादा हो गया है, बेटा ! एकसाथ इतने रुपये क्या तुम दे सकोगे?' ५८ नायिका उसके बाद गिरि गोविन्द को मोर पलटकर बोले,'ग्याज रितनाहुपा है, गिरिगोविन्द ? जरा हिसाब लगाकर यताना तो।' फिर हीरक से बोले, 'बेटा, तुम्हें जरा इन्तजार करना पड़ेगा, कारण हिसाव किताय बहुत कड़ी चीज है न !' उसे अच्छी तरह याद है कि उस दिन विष्णु बाबू ने कुछ मिठागपूर्ण व्यवहार करने की कोशिश की थी। उसकी कार, रुपये एवं स्वास्थ्य देव- कर फिर से घनिष्टता स्थापित करना चाहते थे। पर हीरक के चेहरे का भाव देसकर मधिक बढ़ने की हिम्मत नहीं कर सके। होरक ने जवाब दिया, 'मेरे पास अधिक टाईम नही है। जो कुछ लेना-देना है, सब पूरा करने की गरज से ही मैं माज यहां मापा हूं।' पन्त में वे दो हजार रुपये मूद-दर-सूद वदते-बढ़ते मूल एवं ग्याज सहित चीस हजार पर पाकर टहरे । विष्णु वाबू में कहा था, 'जव तुम्हें मुविधा हो, रुपये दे जाना मोर साय-ही-साय दस्तावेज ले जाना।' हीरक ने कहा, 'नहीं, मुझे इसी वक्त सुविधा है। इसी वक्त सारे रुपये दे सकता हूं । रुपये मैं अपने साथ ही लाया हूं।' यह सारा मामला उस दिन माघे घण्टे में ही निपट गया था। समूचे नकद रुपये चुकाकर हीरक ने पपने पैतृक मकान का दस्तावेज़ पॉकेट में लूंसा पौर चला माया था। ६ यह मगमग पन्द्रह-सोलह साल पहले की कहानी है। उसके बाद से हीरक की किस्मत का पामा पलट गया। जीविका की सोज में उमने कलकत्ता छोडकर मद्रास में पड़ाव डाला था। सचमुच ही जिसको मार कहते हैं, वही ज्वार पैदा हुआ था हीरक के मन में। धन का ज्वार, रजत का ज्वार, मधिकार का ज्वार । लेकिन इसके बावजूर, उमे जब भी जरा-सा मौका मिलता यह कदमफूनी भवस्य पाता। मोर नायिरा ५६ यहां आकर भरपूर धन खर्च करके अपने ऐश्वर्य का नगाड़ा पीटकर प्रचार करता। अपनी कार नेनागंज भेज कर विलासिता की सामग्री मंगाता। अपने पैतृक-मकान की सारी खिड़कियां खोलकर रेडियो एवं रेडियोग्राम वजाता। उस घोर अन्धकार के बीच अपने मकान को अलादीन के चिराग की भांति जगमगा देता। और अन्त में किसी एक दिन परिवार-सहित गायव हो जाता, पर कहां चला जाता यह किसी को पता नहीं रहता। वंशीवदन हीरक गुप्त के पिता के ज़माने का आदमी था। रास्ते में मुलाकात होने पर कभी-कभी राय महाशय पूछ लेते, 'कैसे हो भाई वंशीवदन?' वंशीवदन प्रणाम करके कहता, 'जी, आपके प्राशीर्वाद से सब कुशल है।' 'वेतन-टेतन तो ठीक समय पर मिल जाता है न ?' वंशीवदन कहता, 'जी, छोटे वावू ने मेरा वेतन बढ़ा दिया है। यह देखिए न, जूतों का यह जोड़ा खरीदने के लिए अलग से रुपये दिए थे । यह कमीज़ भी छोटे बाबू की ही दी हुई है। छोटे वाबू की दया से ही इस वक्त पेट भरकर खा रहा हूं।' 'ठीक है, ठीक है ! हां, तो कितना मिलता है इस वक्त तुमको ?' 'जी, पहले दस रुपये मिलते थे, पर अब तो बढ़ाकर तीस रुपये कर दिए हैं । दयालु दिल के हैं हमारे छोटे बाबू । किसी का दुःख-दर्द नहीं देख सकते।' 'अच्छा !' कहकर विष्णु बाबू चले जाते। उसके बाद वे खड़े नहीं रहते। ये सब बातें उनको सुनने में अच्छी नहीं लगती थीं। हीरक ने पूछा था, 'वंशी, मुझपर राय महाशय इतने नाराज़ क्यों रहते हैं, बतायो तो? मैंने उनका क्या बिगाड़ा है ? मैंने तो अपनी जान- कारी में उनका कुछ नहीं विगाड़ा है। उनका सारा रुपया सूद-दर-सूद वेवाक अदा कर दिया है। वंशीवदन कहता, 'जी, अव उनका पहले-सा शरीर भी तो नहीं रहा। भीतर-ही-भीतर टूट गए हैं वे, शायद इसीलिए ऐसा हो।' 'पर मैं तो उनके टूटने का जिम्मेदार नहीं हूं न ?' - ६० नायिका बंगोवदन ने कहा था, 'हा, यह तो सही है छोटे बाबू "इसके मलाया तकदीर का भी तो किमी को पता नहीं रहता।' पौर धीरे-धीरे राजमिस्त्री लगाकर हीरक गुप्त ने अपने मकान को फिर से प्रासाद बना दिया। विष्णु बाब सुबह टहलने जाते समय मागर उन मोर एकटक निहारते जाते, पोर उसके बाद मचानक जय वंशीवदन से मुलाकात हो जाती तो फिर मे पूछने, 'क्यों जी वशीक्दन, तुम्हारे छोटे बाबू मच्छी तरह तो हैं ?' वंदीबदन ठीक पहले की तरह हो भक्ति-भाव से प्रणाम करके कहता, 'जी हा मालिक, अच्छी तरह हैं।' 'हां तो, महीना-यहीना तो तुम टाईम पर पाने हो न ?' विष्णु बाबू भूल जाते कि यह प्रश्न उन्होंने पिछले दिन ही निया पर वशीवदन इस बात का उल्लेख न करके कहता, 'जी हा, यह तो मिलता है।' 'ठीक है, ठीक है, मच्छा है।' कहकर वे लोट पडते । फिर वापस पलटकर पूछते, "शरा वतामो तो, मकान ठीक करवाने में कितने रुपये लगेंगे तुम्हारे छोटे वायू के ?' वंशीवदन कहता, 'जो, वह तो मुझे टोक नहीं मालूम ।' 'फिर भी, मन्दाज से। 'दस-बीस हजार तो अवश्य ही लगेंगे। माजकल सभी चीजों की कीमत बढ़ गई है न! सारा सामान माया भी तो कलरत्त से है !' 'टीक है, ठीक है । पर तुम्हारे छोटे वार जव इतना सर्च कर रहे हैं, तय फिर मकान खाली गयो रस छोड़ा है । यहा तुम्हारे छोटे यावू रहेंगे पया?' वंशीवदन करता, 'नही हुजूर, छोटे बाब म निरे देहात में भला गयो रहने पाए गे?' 'क्यों ? क्या कदमफूलो सराव जगह है। क्या हमलोग यहा नहीं रहते ? तुम नही रहते हम मय पया इन्मान नहीं है।' वशीवदन जवाव देता, 'नही मालिर, यह बात नहीं है। पर छोटे नायित बाबू अगर यहां रहे तो उनका काम-काज कोन सम्भालेगा? आप ही बता- इए?' 'जी,छोटे बाबू 'ऐसा कौन-सा राज-कार्य करते हैं तुम्हारे छोटे बाबू, जो यहां रहने से उनका सर्वनाश हो जाएगा ?' बावृ तो यही कहते हैं कि यहां रहने से उनका कारोबार विगड़ जाएगा। 'अच्छा, किस चीज़ का कारोबार है तुम्हारे छोटे वावू का?' 'मैं तो यह सब जानता नहीं मालिक ; पर सुना है कि लोहे-लक्कड़ का काम है।' 'लोहे-लक्कड़ का मतलब ? तुम्हारे छोटे बाबू लोहे-लक्कड़ के मिस्त्री हैं क्या?' 'जी, मुझे ठीक-ठीक यह भी पता नहीं, पर सुना है कि छोटे वावू के कारखाने में हजारों आदमी काम करते हैं।' 'कोई लड़का-बच्चा भी हुआ है तुम्हारे छोटे बाबू को ?' 'एक लड़का हुआ है, पर वह भी तो यहां नहीं रहता।' 'यहां नहीं रहता? तो कहां रहता है ?' 'जी, सुना है, विलायत गया है।' 'विलायत ?' मानो विष्णु बाबू ने सुनने में भूल की हो । दुवारा पूछते, विलायत गया है ? पर क्यों?' वंशीवदन कहता, 'हुजूर, मैं नौकर हूं। भला, मुझे क्या पता ?' उसके बाद विष्णु बाबू वहां खड़े नहीं रहते। उन्हें लगता, दो हजार रुपयों की मोर्टगेज ड्यू को बीस हजार रुपयों में वेचकर भी मानो वे हार गए हों । वे दनदनाते हुए अपने घर की ओर बढ़ जाते । ये सारी बातें हीरक ने वंशीवदन से कभी सुनी थीं; और पाज कदम- फूली पाने के बाद लड़कों के चन्दा मांगने पर वे सारी बातें उन्हें फिर से याद हो पाई। अचानक वंशीवदन ने खबर दी, 'छोटे बाबू, गांव के लड़के लाए हैं।' हीरक ने कहा, 'उनको ऊपर ले प्रायो।' ६२ नायिका । १० सत्य मलिक यारहयारीतल्ला में गुस्से से लाल हो बल पा रहा था। गड़ाई नदी ऐसी कोई सास बड़ी नहीं थी, पर बरसात के दिनों में जब वह तेज हो जाती थी तो कदमफूली को ढालू जमीन डूब जाती भोर जाडे के दिनों में फिर मूग जाती। फरवरी के गुरूपात तक तो पंदल ही नदी पार कर उस पार जाया जा सकता है। गिफं टखने तक पर भीगते पोर कपडे मामूली से ऊचे करने से ही काम चल जाता। लाहा वायू का मकान बहुत दिनों से साली पडा पा। धूल-गई जम गई थी। पर निरापद मौर उसके साथियों ने मिलकर मकान की पूरी सफाई कर दी थी। राज-मिस्त्री लगाकर मरम्मत करवाने में ही कई सौ राये लग गए । टेवल चेयर जितनी पी, सव टूटी-फूटी! यह भी इधर- उपर के परों से लाकर इकट्ठी की गई थी। निपट देहात में भला किमके घर मे बढ़िया फर्नीचर रहता है ! पर फिर भी निरापद-दल ने दौड़-धूप करके मंजरी सेन के रहने लायक सुप्रबन्ध कर दिया था। लेकिन सब देस-सुनकर सत्य मल्लिक ने कहा, 'यह पया? यहा क्या मनुप्य रह सकता है ?' निरापद हो ननागंज से उन्हें रास्ता दिखाते-दिमाते यहां तक ले माया था।वह यहीं खड़ा था। उसने कहा, 'माप तो जानते ही हैं कि यह निरी देहाती जगह है। मापकी चरण-रज यहा पडी है, इमीगे कदमफूली धन्य हो उठी है।' 'तुम लोगों के पन्य होने से तो हमारा काम नहीं चलेगा। माटिंग्ट को मगर माराम नहीं मिलेगा तो वह 'प्ले' किस तरह करेगा? उसको तो हर प्रकार से 'कम्फर्ट' देना होगा, माराम देना होगा। प्रगर हीरोइन का मिजाज ही विगह गया तो मैं 'डायरेक्शन' मिस तरह मा? पिनके द्वारा 'प्ले' कराऊंगा? बोलिए। निरापद नप सडा रहा। उसके पीपे दल के पन्य सडक पडे थे। उनके मुह से भी कोई बात नहीं निकली। सब सोच रहे कि गत्य मल्लिक के नाराज होने से तो काम नहीं चलेगा। नादिरा ६३ 'स्टेज कैसा हुआ है ?' 'जैसा आपने बताया था, वैसा ही हुआ है। आप एक बार स्वयं चलकर देखिए ना' 'वह तो देखूगा ही । ग्रीनरूम का अरेंजमेन्ट तो ठीक हुया है न ? और हां, हमारी हीरोइन के लिए एक सैपरेट मेकअप-रूम भी चाहिए।' सुनकर सभी चुप रहे। निरापद को यह आशंका पहले से ही थी। कलकत्ते के आर्टिस्टों के साथ इसी तरह झंझट उठानी पड़ती है । मुहल्ले के लड़कों द्वारा 'प्ले' कराते, तो किसी प्रकार का झंझट नहीं होता। सब लड़के अपने-अपने घरों से ही आवश्यकतानुसार 'मेकअप' का सरंजाम ले पाते। फिर भी सत्य मल्लिक ने जो कुछ फरमाया, निरापद वह सब कुछ करने को तैयार हो गया। वह बोला, 'सर, हम देहाती लड़के हैं । इतना सब भला हम कैसे जानते ? अव आप जैसा-जैसा कहेंगे, वैसा ही हम करते जाएंगे।' 'अब कब करेंगे? कल शाम को 'प्ले' है। इस बीच सब कुछ कर लोगे। निरापद ने कहा, 'आपके कहने भर की देर थी। हीरोइन के लिए हम लोग इसी वक्त एक अलग मेकअप-रूम तैयार कर देते हैं।' 'एक फुल-साइज़ का बड़ा आइना भी होना चाहिए उस कमरे में।' 'फुल-साइज़ का पाइना? यह तो सचमुच चिन्ता की बात है। इन कुछ घन्टों में ही इतना बड़ा आइना कहां से मिलेगा!' 'मुंह देखने वाले छोटे पाइने से काम नहीं चलेगा?' सत्य मल्लिक ने कहा, 'वह आइना देखते ही मंजरी सेन फेंककर फोड़ देंगी । तुम लोग उसके स्वभाव से परिचित नहीं हो। मैंने तो पहले ही तुम लोगों से बता दिया था कि हमें मन-पसन्द असबाव चाहिए।' सिर्फ आइना ही नहीं, बहुत कुछ नये सिरे से बदलना पड़ेगा। सत्य मल्लिक अपने दल के अन्य लोगों के मेकअप का पूरा सरंजाम अपने साथ लाया था। ड्रेस एवं ड्रेसिंग का सभी सामान रूपक पार्टी का था। ६४ नायिका सत्य मल्लिक ने ऑडिटोरियम भी देखा । दो हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था थी उसमे । सामने की तरफ चटाई बिछा दी गई थी । वहां छोटे लड़के-लड़कियां बैठेंगे। उसके बाद लम्बी-लम्बी दरिया विछी थी, जहा पुरुषों के बैठने का इलज़ाम था। साल के लम्बे-लम्बे यास लाल पट्टियों से लपेटे गए थे। उन वांसों पर बहुत बड़ी छावनी बनाई गई थी। यह सब इन्तजाम नेनागंज के डेकोरेटर से कराया गया था। जी-तोड़ मेहनत करके उन्होंने यह पंडाल सजाया था। वहीं अगल-बगल चिके डालकर पर्दा भी बना दिया गया था, ताकि पार्टीशन के उस मोर भले परकी पोरत बंटकर नाटक देख सकें। सत्य मल्लिक ने धूम-फिरकर सारा इन्तजाम देखा। ऐसा लग रहा पा मानो इन्तजाम देखकर उन्हें सास भी नहीं हुई। पर विल्कुल ना- पसन्द करने जैसा भी कहीं कुछ नहीं था। बोले, 'जैसा तुम्हारा देश है, उमी अनुसार हमे मैनेज करना पड़ेगा। पर हमारे माटिस्टो को प्ले करके सुशी नहीं होगी। निरापद ने 'हमारे यहा की 'पॉझियन्म' बहुत अच्छी है, सत्य दा। सभी चुपचाप ध्यान से देखेंगे-सुनेंगे, पोरगुल बिल्कुल नहीं करेंगे।' 'सो तो ठीक है, पर अधिक तालिया न बजें इसका ध्यान रखना। नहीं तो डायलॉग कोई नहीं सुन सकेगा। मुफस्सल को मॉडियन्म में यही सबसे बड़ा दोष पाया जाता है।' निरापद ने अभयदान दिया। बोला, 'ठीक है, उसके लिए हम पहले से ही सबको मावधान कर देंगे। हम बड़े-बड़े साइनबोर्ड भी टाग देंगे कि, 'कोई भी तालीन बजाए ।' सत्य मल्लिक ने निश्चिन्त होकर एक सिगरेट सुनगाई। फिर बोला, 'ठीक है, हम इतने में ही मैनेज कर लेंगे। पर हीरोइन के लिए एक संपरेट भेकमप-स्म झटपट तैयार कर डालो। मोर हो, एक मादमकद लम्बे माइने के लिए भी तो मैंने कहा था। याद है न?' इतना कहकर सत्य मल्लिक समा स्थगित करके चला गया। नापिका ६५ शाम के समय निरापद अपने दल के लड़कों के साथ हीरक गुप्त के घर जा पहुंचा। बहुत दिनों बाद वे इस घर में आए थे। पहले कभी पाए भी थे तो बाहर से ही चन्दा लेकर चले जाना पड़ा था। निरापद-दल जानता था कि हीरक दा के पास से खाली हाथ कभी नहीं लौटना पड़ता। फिर भी गुप्त साहब बहुत दिनों के बाद यहां आए थे। इसके अलावा, इस बार निरापद-दल का पहले से खर्च भी बहुत बढ़ गया था, अतः कलकत्ते की 'पक' पार्टी के नाम पर कुछ अधिक ही मांगना पड़ेगा। जब वंशीवदन उनको बैठक में बैठाकर गया तो सभी अचरज में ड्य गए। ऐसी वढ़िया सजावट वाला घर इस इलाके में तो क्या पूरे नैनागंज में भी नहीं होगा। बहुत दिन पहले यह हीरक गुप्त इमी कदमफूली में रहता था। यह सब सुनी हुई वाते हैं। लेकिन गांव के जो बड़े-बूढ़े हैं, उनको सब कुछ याद है। विकास गुप्त को उन्होंने दरिद्रावस्था में मरते देखा था। घर में पत्नी तो थी नहीं । शायद कोई विधवा मौसी या बुमा थी भी, तो वह विकास गुप्त की मृत्यु के बाद न जाने कहां गायब हो गई थी। अन्त में सिर्फ यह लड़का ही अकेला पड़ा रह गया था। सभी उसको सीधे-सादे और लजीले लड़के के रूप में जानते थे। वह किसी से भी अधिक मिलता-जुलता नहीं था। यों दूसरे लोग भी उससे खास घुलना पसन्द नहीं करते थे। अकेला ही किताव-कापियां लिए वह नैनागंज पढ़ने जाता। कदमफूली के और लड़के जिस वक्त हुल्लड़वाजी एवं खेल-कूद में मस्त रहते, उस वक्त विकास गुप्त का लड़का अकेला ही विष्णु वावू के घर में लिखने-पढ़ने में मस्त रहता। और फिर एक दिन वह लड़का भी पता नहीं कहां चला गया। विष्णु बाबू का मुनीम गिरि गोविन्द कहा करता था, 'लड़का कहीं भाग गया है।' 'भाग गया है ? भाग जाने का मतलब ?' गिरि गोविन्द कहता, 'कौन जाने वावा; मैंने तो एक दिन सुबह उठवार देखा कि कमरा खाली पड़ा है। कहीं कोई नहीं है । मालिक से ? - ६६ नायिका जाकर यहा। मालिश बोले, 'भाग गया तो पच्छा ही हुमा।' पर सर यही रहो कि कोई माल-प्रमयाव लेकर नहीं मागा। पूव ही बचे !' यह राय करो और क्यों हमा, यह कोई नहीं जानता। फिर एक दिन अचानक यही होरक. गुप्त यहां कार में थेटकर पा उपस्थित हुप्रा। उग बरा वह बहुत रुपयो का मालिक था। मनगिनत रुपये देकर उमने गिरवी रसा हुषा प्रपना पंतक मरान छुड़ा लिया। फिर मकान ठीक-ठाक करवाया। इनने रुपये मागिर पाए वाहा से, यह कोई नही जान मका। मगर इस बारे में वनीवदन से भी पुछ पूछा जाए तो यह भी कुछ नहीं बता गकेगा। हा. सोटे वाय पाहं जहां भी रहे, वंशीवदन के महीने या रपया ठीक गमय पर मनीमार द्वारा पा जाता था। पंजीवदन का भी यह स्वभाव था कि वह बहुत ही सावधानीपूर्वक मकान को देग-भाल करता, यगीचे को यत्नपूर्वक मंभालता रहता। मचानक यभी छोटे कदमफूली में हाजिर होने तो मकान विल्लुम जगमगा उटना पा। पर मकान का भीतरी भाग इस कदर पूवमूरत होगा, यह निरापद पौर उमरे साथियों ने कभी नहीं सोना था। सोचने का मौका ही नहीं मिला पा। यंगोवदन किसी को घर में घुमने देने को पान तो दूर रहो, याग के फूल-फलों ता पर किसी का हाय सगने नहीं देता था। मवसे पहले संदा की ही नजर पड़ी थी। चोला, 'यह रहा सम्या पादना!' ? निरापद ने भी उस तरफ देशा। इसके अलावा हरीपद, गोकन, हायला मादि की भी नजर एकमाप उपर पड़ी। सभी माप-गाप बोल पड़े, 'मरे ! सपमुग। गंदा ने कहा, 'यही माग लेते तो पंगा रहता इस यीच होरफ भी कमरे में प्रा पहुंचा था। उनके माते ही निरापर यगरह मय उठ पड़े हए । हीरक ने एक सिंग-गाउन पहन रखा था। माते ही यह बोला, 'शायद तुम्ही सोग मुबह भी माए थे?' निरापद ने राव मी मोर से प्रगुणा बनकर रहना शुरू किया, 'सर, पहले हम लोगों को पता नहीं था कि माप यहा पाए हैं। इसीलिए पहसे नायिका ६० । . । । यहां नहीं पा सके थे। हम सब कदमफूली के ही लड़के हैं । आपने हमारे गांव का नाम रोशन किया है, इसीलिए आपको अपनी फंक्शन में पधारने के लिए आमंत्रित करने आए हैं।' हीरक ने पूछा, 'किस बात का फंक्शन हो रहा है तुम लोगों का? ' 'जी, हमारे 'संस्कृति-संघ' की ओर से सरस्वती-पूजा के उपलक्ष में नाटक होगा। वहुत रुपये खर्च करके कलकत्ते से 'रूपक दल' को वुलाया है हम लोगों ने । आपने 'रूपक' का नाम तो जरूर सुना होगा ?' 'ल्पक? रूपक क्या?' 'जी, कलकत्ते की नामी नाटक कम्पनी है 'रूपक' । वे लोग सहज ऐसी-वैसी जगह जाने को तैयार नहीं होते। हम लोग बहुत कह-सुनकर काफी खुशामद करके उनको यहां लाए हैं। कुल मिलाकर तीन हजार रुपये तो सिर्फ इस नाटक के लिए खर्च हो जाएंगे।' 'इतने रुपये किसने दिए ?' 'हम लोग सभी से चन्दा ले रहे हैं। टिकट भी विक्री कर रहे हैं।' हीरक ने एक सिगरेट सुलगाई और घुयां उड़ाते हुए बोला, 'तुम्हारे ज़मींदार महाशय ने कितना चन्दा दिया है ?' 'उन्होंने पचास रुपये दिए हैं।' 'और मुझे कितने देने पड़ेंगे?' 'पाप अपनी सामर्थ्य के अनुसार दया करके जो कुछ भी दे देंगे, वह हम सिर-माथे पर चढ़ाकर ले लेंगे।' 'मैं अगर पांच सौ रुपये दूं, तब तो तुम लोग खुश होगे न ?' निरापद की आंखों में कृतज्ञतावश प्रांसू भर पाए। उसने शीन नीचे झुककर हीरक गुप्त के पैर छू लिए। 'अरे ! अरे! यह क्या कर रहे हो ?' कहकर हीरक ने अपने पैर खींच लिए और वंशीवदन को पुकार कर भीतर से रुपये लाने को कहा। फिर निरापद की ओर देखकर वोला, 'देखो, मैं लोहे-लक्कड़ का कारोवार करता हूं। नीरस-शुष्क वस्तु में से रस निकालना ही मेरा पेशा है । मैं नाटक-वाटक कुछ समझता नहीं हूं। साल के पूरे दिन मद्रास, दिल्ली और बम्बई आदि के चक्कर लगाने में ही बीत जाते हैं। कभी-कभार मौका ६८ नायिका । पाकर कलकत्ते पाता हूं तो समय निकालकर घर चला पाता हूं; मौर यहा मैं विश्राम पाने के लिए पाता हू, प्रतः नाटक-याटक देखने में नहीं मा सकूगा । रुपये तुम लोगों की सहायता करने के सयाल से दे रहा हूँ, नाटक देसने की इच्छा से नहीं।' निरापद चुप! उनको वयान पर मानो कोई यात पाकर पटक गई हो। इतनी प्रात्मीयता को उन लोगों ने मपैसा नहीं की थी। वशीयदन ने रुपये लाकर दे दिए । रुपये लेकर निरापद ने अपनी बैग में रग लिए। फिर वोला, 'हम पापकी इम दया का पहमान कभी नहीं भूलेंगे, सर!' हीरक ने कहा, 'मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों का यह नाटक सक्सेसफुल 'लेकिन पांच मिनट के लिए भी मगर माप माते तो हम सब पन्य हो जाते!" 'मेरे पास समय नहीं है. माई। इसके अलावा जैसा कि मैंने पहले पाहा, मैं यहा सिर्फ माराम करने के लिए ही माता हूं। फिर भी, जब तुम लोग इतना फहने हो तो देगूंगा; अगर समय निकास पाया तो अवश्य पाऊंगा।' इसके याद निरापद उठ पडा हुमा पौर बोला, 'यदि माप मानें तो मापसे एक पनुरोप मोर फरुगा, सर!' 'बोलो क्या बात है?' 'यह मादमाद माइना पगर एकवार माप हमे देते, तो बहुत पहसान होता।' 'क्यों? इसका क्या करोगे तुम 'सोग?' 'हमारा काम गरम होते ही हम गुदमाकर पापको यह माइना पापा जाएगे; यह हम वादा करते हैं। बात यह है कि हमारी हीरोइन का 'मेक- अप रूम' तैयार हो रहा है। यहाँ एक ऐसे ही पाइने की जरूरत है।' 'क्यो? क्या ऐमा पाना हुए बिना उमका मेकअप नही होगा ?' 'जी, यह बहुत बड़ी मोर नामी हीरोइन है न! पहा तोदया करके 'प्ले' फरने मा गई है । उसोको देखने के लिए तो मान हमारे यहा टिकट - नाधिका ६६ - की भीड़ लगी हुई है। उसका कहना है कि एक हुए विना वह 'प्ले' नहीं करेगी।' 'यहां ऐसा पाइना और किसी के पास नहीं है ?' 'नहीं। अगर होता तो आपसे हम ऐसा अनुरोध नहीं करते।' 'पर तोड़ तो नहीं दोगे?' 'नहीं, नहीं! इस बात की हम अापको गारंटी देते हैं। जैसे ही हमारा नाटक खत्म होगा, हम खुद आकर आपके घर पर इसे रख जाएंगे।' 'ठीक है। ले जायो।' निरापद और उसके साथी नमस्ते करके चले पाए । बाहर आकर खंदा बोला, 'मां कसम, आदमी बहुत ही अच्छा है। हमने तो सोचा था कि बहुत ही घमण्डी होगा।' खोकन ने कहा, 'सारी वात नसीव की है, मेरे भाई । क्या था और क्या हो गया?' हावला ने कहा, 'फिर भी आदमी बड़ा हो या कुछ भी हो; दिल का भला है।' निरापद ने कहा, 'यह सब बातें छोड़ो। चलो, अब यह देखा जाए वि 'ग्रीन-रूम' कैसा वना है ? अगर सत्य दा ने पसन्द नहीं किया तो वेड गर्क समझो।' वगीचा पार करते ही सड़क पा जाती थी। उनके सड़क पर पहुं ही माया ने कमरे में प्रवेश किया । बोली, 'क्या हृया? एकदम से पांच रुपये दे दिए उनको?' हीरक ने जवाब दिया, 'हां दे दिए।' 'बड़प्पन दिखाने के लिए ही दे दिए न ?' हीरक बोला, 'ऐसी बात नहीं है । मुना है, विष्णु बाबू ने सिप रुपये का चन्दा दिया है। इसीलिए मैंने पांच मी रुपये दे डाले। दिन के लिए अपना यह ग्राइना भी उनके 'ग्रीन-रूम' के लिए दे 'क्यों?' 'क्योंकि यह बात भी अाखिर जमींदार साहब के कानों में भले वे खुद अपनी प्रांखों से न देखें, पर वे सुनेंग जरूर दि नायिका ७० कीमती पाहना उनको काम में लाने के लिए दे दिया। माया ने कहा, 'यही तोड़ तो नहीं हाल गये लोग?' 'तोगे क्यो मला? उनसी कोई हीरोदन माद है. जो वडे मारने के बिना 'मेकअप' नहीं कर सपती।' 'तो क्या तुम उनका नाटक देसने जानोगे?' 'पागल दुई हो ! मुझे पाने-पीने की तो पुरमत ही नहीं प्रौर में उनका नाटक देखने जागा ? निग पर विष्णु बाबू जहा प्रेनिटेष्ट हो ? तौया!' यवीयदन कमरे में पाया तो हीरक ने उममे कहा, 'ये मव लटके घुछ देर के बाद प्राफर यह मादना ले जाएगे । उनको ले जाने देना। मम ? उनका काम हो जाने के बाद वे लोग ग्वय लाकर इने यही रय जाएगे।' हीरक इतनी यार कदमफली पाया था, पर इग तरह मे कभी किमी ने उरारी पुछ नहीं चाहा या । उनने मोचा, चनो, यह भी अच्छा ही हमा। ममी को पना तो चल जाएगा फि हीरक गुप्त के घर में कितने कोमनी- फीमती पर्नीचर हैं ! पच्छा हुमा। हा, यहुत ही मच्छा हुया ! १२ गटाई नदी के उग पार ही लाहा यार का मकान है। मकान या दिनों में वोही पड़ा था। सभी ने मिलकर उसको टीप-टाय रिया पोर गंवारफर उसमे गाय मल्लिक एर मजरी मेग के रहने वालजाम पर दिया। यहा पर लोगों की मावाजें, रापने गाने घोगध याममोर गोर-गया मामिज मन के वानी नया नही पहप मगा। पर पहले ही दिन मारी गा नीद नही पाई मजगन मी। मत्य मस्तिक में ही कह रहा था, 'तुम्हे यान नर लीप मी, मगरी ! मेरे लिए यहुत कष्ट मरने पडे तुमगा।' मंगरी मन को अपने जीवन में ऐगे या दगी का मामना करना पड़ा था। मभिनेत्री जीवन को सम्मान में बहुतों की गुलाम भी परनी पडीपी।पर माज यलाई सन्याल तक उगको रानी की तरह पाराम देने नायिका ७१
की भीड़ लगी हुई है। उसका कहना है कि एक बड़ा आदमकद
हुए विना वह 'प्ले' नहीं करेगी।'
यहां ऐसा आइना और किसी के पास नहीं है ?'
'नहीं। अगर होता तो आपसे हम ऐसा अनुरोध नहीं करते।'
'पर तोड़ तो नहीं दोगे?'
'नहीं, नहीं! इस बात की हम आपको गारंटी देते हैं। जैसे ही
रा नाटक खत्म होगा, हम खुद आकर आपके घर पर इसे रख जाएंगे।'
'ठीक है। ले जायो।'
निरापद और उसके साथी नमस्ते करके चले आए। बाहर आकर
दा बोला, 'मां कसम, आदमी बहुत ही अच्छा है। हमने तो सोचा था
क बहुत ही घमण्डी होगा।
खोकन ने कहा, 'सारी वात नसीव की है, मेरे भाई । क्या था और
क्या हो गया?'
हावला ने कहा, 'फिर भी आदमी बड़ा हो या कुछ भी हो; दिल का
भला है।'
निरापद ने कहा, 'यह सब बातें छोड़ो। चलो, अब यह देखा जाए कि
'ग्रीन-रूम' कैसा बना है ? अगर सत्य दा ने नहीं किया तो वेड़ा
गर्क समझो।'
कीमती माहना उनको काम में लाने के लिए दे दिया।' माया ने कहा, 'कही तोट तो नही हालग वे लोग?' 'तोगे क्यो भला? उनकी कोई हीरोइन पाई है, जो बटे पादने के बिना मेकअप' नहीं पर माती।' 'तो क्या तुम उनका नाटक देखने जाप्रोगे?' 'पागल हुई हो! मुझे माने-पीने की तो फुग्मन ही नहीं और मैं उनका नाटक देखने जाऊगा? निग पर विण बाबू जहा प्रेजिडेट हो ? तौवा !' वशीयदन कमरे में पाया तो हीरक ने उसमे कहा, 'ये सव लहरी युध देर के याद ग्राफर यह प्रादना ले जाएगे । उनको ले जाने देना । मम। उनका काम हो जाने के बाद वे लोग म्बय लावर इम यही ग जाएगे।' हीरक इतनी वार मदमफाली प्राया था, पर ग तरह में कभी किसी ने उगमै युछ नहीं चाहा था। उसने सोचा, चलो, यह भी अच्छा ही हुमा। गभी को पना तो पल जाएगा कि हीरक गुप्त के घर में कितने कीमती. फोमती पर्नीचर हैं ! मच्छा हुमा। हा, बहुत ही अच्छा हुमा ! १२ गाई नदी के उस पार ही लारा बाय का मकान है। मसान यहा दिनो मे घोही पहा या। सभी ने मिलकर उसकी टोर-टाफ रिया मोर मंवार कर उसमे गन्य मल्टिक एक मर्ग मेन पं. रहने पाइलजाम पर दिया। यहा पर लोगों की प्राचार्ड, गपने-पाने की गध या कापौर गोर-गया मादिमनरी मेन मेवानी नानी पहर गोगा । पर पहले ही दिन मारी गानोरनही पाई मजग मेन की। सत्य मल्लिक में ही रह रहा था, 'तुम्हे यहुत नरमीफ दी, मंगरी! मेरे लिए बाल कट गहने पहें नमको।' मगरी शेन को अपने जीवन में ऐगे बदन दगी वा मामना करना पड़ा था। पभिनेत्री जीवन री गुम्मान में बहनों की शाम भी करनी पड़ी थी। पर माज बनाई सन्याल तक उसी रानी की तरह माराम देने नायिका १
fiv
जोडहब उसको
अण्डल्य है। करना होउने वर्दी लग जाती
है, यह बात बनाईजो जानते हैं। किसी के
वगैर बहारही केले जल-दिन के उपहार पहुंच जाते
है। दहनन नही जान को इसकी जन्म-तिथि कैसे मालूम हो
गई? और निर के दिन ल्पयों के लिए एक दिन मंजरी
सेन ने हनीपोनादिका पाउन सके वे रुपये उसने लोटा दिए
है। अब अगर दे रूप देने का भी हैं तो वह नहीं लेती। कहती हैं,
'नहीं, मैं नहीं लेती। जबकि मंजरी सेन को वे लोग रुपये देकर
धन्य हो जाते।
पृथ्वी पर मनुष्य के भाग से विचित्र और क्या वस्तु हो सकती है ?
रातों को अकेली सोई हुई मंजरी सेन वहुत वार अपने पूरे जीवन की
परिक्रमा करती है। सुबह उठते ही उसे फिर स्टुडियो जान':
सारी रात जागने के बाद भी जब वह स्टुडियो जाकर
खड़ी होती है, तो उसका चेदरा देखकर कोई यह नः
जरी सेन सारी रात सोई
उसे हंसता परत
बसाई सन्याल हंसने लगते। हंसते समय वे बढ़त ही गद्गद दिलाई पडते । कहते, 'माप सिर्फ मेरी ग्रामदनी के रुपयों पर ही नउर रसती हैं मंहम, पर कितनी ही फिल्मों में मुझे पाटा भी तो सहना पड़ा है, यह नहीं देसती पाप?' 'मापको पौर घाटा? पापको तो बलाई बाबू, सोलहों प्राने साम ही लाम होता है।' बलाई मन्याल कहते, 'माप भी क्या बात कहती हैं मैडम? जिस फिल्म में माप रहती हैं, साली उमी में लाभ हो जाता है। पर जिस फिल्म में माप नहीं रहती, वे सब फिल्में...? तब तो मेहम, बैठे-बैठे मासी मारली पडती है!' मजरी कहती,'ठीक है, पापको मेरे कारण यदि लाभ होता है, तो मुझे पाप...?' 'पापको क्या चाहिए, मुह से कहिए तो सही, मैडम ?' मंजरी पूछती,'मैं जो मागूगी,माप वही दे देंगे तो?' पहले तो बलाई सन्याल हर जाते । फिर वगरें झांकते-रो याहते,'माप तो मेरे घघे की लक्ष्मी है। मगर पार कुछ मागे, तो भला मैं 'ना' कर सकता हूं?" 'तो फिर मुझे एक होरे का नेकलेस सरोद दीजिए । देगू, माप लिने दिलेर हैं !' भौर सपमुच ही यलाई सन्याल ने एक फिल्म रिलीज होने पर मारी सेन को हीरे का नेकलेस खरीद दिया था। हीरे का नेकलेस यलाई सन्यान के लिए एक साधारण वस्तु से अधिक कुछ नहीं पा । कारण, केवल उग एक फिल्म में ही पलाई सन्याल को पाच साम रुपयों का नाम हुपा पा। मगरी सेन जानती थी कि उसके दम पर ही कितने प्रोड्यूम, डायरेक्टर्ज, हिस्ट्री. म्यूट मागों रुपये कमाते हैं पोर स्टूडियो के हजारो लोगो की जीगिरा घसती है। यह सोचने में मंजरी सेन को गुशी होती पो, हालाकिमको इस यात का पूर्ण पहसास था कि इनमे से कोई भी यह नहीं जानता है कि गुर उसको रात-रात भर नोद नहीं भाती पोर कितनी ही रातोपी निदाहीन निस्मगता उसके कितने ही उजालो को गहन प्रकार में चोदशी है । उसे । नायिका लगता कि ये रुपये, यह ख्याति, यह रूप, सव भूठे हैं। सब दिखावटी हैं। पर दूसरे दिन जब सूर्य निकलता तो बात ही कुछ और हो जाती थी। दिन के उजाले में उसकी यात्रा रोजमर्रा की तरह फिर प्रारम्भ हो जाती। उसको फिर से साज सजाना पड़ता । फिर बाल संवारने पड़ते । उसके बाद लोगों के एकदम अामने सामने जाकर खड़े भी होना पड़ता। फिर सौदे- वाजी करके अपना मूल्य भी बढ़ाना पड़ता। पर यह सत्य दा? इस सत्य दा के पास जाकर मंजरी सेन अपने को फिर बचपन के रूप में पा जाती थी। सत्य दा के सामने कोई वहाना या हीला-हवाला न चलता था उसका । सत्य दा कुछ भी कह दे, उन्हें 'ना' नहीं कहा जा सकता था। वलाई सन्याल कहते, 'मैडम, मैं आपको इतने रुपये देता हूं, फिर भी अापका मन नहीं जीत सका। जवकि सत्य मल्लिक जो कुछ भी कहता है, आप सिर झुकाकर ग्रहण कर लेती हैं !' 'मोह ! तो अाप अपनी तुलना सत्त्य दा से करते हैं ?' बलाई सन्याल कहते, 'मैं भी तो आपको कम रुपये नहीं देता, मैडम ।' मंजरी जवाब देती, 'आपके पास सिर्फ रुपये हैं, इसलिए ग्राप रुपयों से ही सारी बातों को तोलते हैं। लेकिन जब मैं एक-एक रुपये के लिए इधर-उधर प्ले' करती भटकती थी, तब आप कहां थे? अगर सत्य दा ने मेरा इतना नाम न कर दिया होता, तो क्या अाज अाप मेरी इतनी खातिर और खुशामद करते ?' इसके बाद बलाई सन्याल ने इस विषय को कभी नहीं उठाया। वलाई सन्याल ने अच्छी तरह समझ लिया था कि मैडम को रुपयों द्वारा वश में नहीं किया जा सकता। अगर उसे वश में करना ही है तो सिर्फ खुग करके हो किया जा सकता है। पर मंजरी सेन का खुग होना भी क्या इतना सहज था? सारी पृथ्वी तो उसके विरुद्ध पड्यंत्र रचकर उसे नीचे गिराना चाहती है। सभी चाहते हैं कि उनकी दौलत खत्म हो जाए। उसकी ख्याति नष्ट हो जाए । उसका रूप-रंग विकृत हो जाए। इसी में तो सबको खुशी मिलती। उन सबके विरुद्ध संघर्ष करते-करते, जूमते-जूमते उसने मन की शान्ति, रातों की - ७४ नायिका . नींद और दिनाचन मय मो दिया। इनना मय होने के कामना यह मनोभी नो पिक तरह? मजरी मेन बदमनी में पाई है तो यह सत्य मानवाही मान या कि यह उमे पहा ना मना है। अगर बलाई सन्मान होता तो शायर ना माता पाने? मजरी सेन पिडलो मे बाहर देश रही यो। गडाई नदी के दोनो नौं पर गीवान जम गई थी। कभी यहा परका पाट बना हुमाया। पार मोग दमी घाट पर नहाया करते थे। दमो नदी में चार लोगो को नौगामा में माल ग्राना-सा था । लेरिन पय परा पाट टूट-पटारमा हो गया है। मनगे मेन ने मय दा मे कहा भी था, 'मात्य दा, और दानी जगः हो। हुए भी तुम मुझे यहा पर हो गया ले গ্লাহ্ गन्य मल्लिक ने कहा, 'क्यो ? क्या तुम्हें फोनकलीप. हो रही है यहा? मैंने इन रोकगे से कह दिया है कि हमारी हीरोइन गोविगोतरह पी भी तकलीफ हुई तो वह 'प्ले' नही कर मवेगी । गह गुनार उन लोगों ने क्या कहा, जानती हो?' मनगे ने इग गत का वोगमारनहीं दिया। प्रश्न रिया, 'स्था जन लोगों ने यहा गाम मुझे नी माना चाहा था" तो यहा होमानजनरयाने करतीती? ग'गाजो युछनाम-यम है, वह सब तुम्हारे ही कारण नो है। तुम्हारे बिना नो 'मा' गुछ भीगी।' मगरीने यता, 'म यह नही कर रही है। मेरा मानय पर रिया उन्होंने मुझे देगो के लिए ही गादन को यह बताया है ?" 'पौर नही नो परा? दरअमल मुग्लीनो या की 'मेन पटे हो। यहां के बडे, यम्ने, जान गभी तुम देगन मे fam in । मीनिए गो गारे टिकट बिक गए। जग-गापर दोनो नो तुम्हें पता भी चले । पाते ममर मने गा मा दा कि पर पहरा देने के लिए मोट पर पतिम पटानीग: । ना ! सभी सर. गाय के गभी लोग नुम्हारे हम मान पर मरन' 'वाह,तुम 'मैं यहां आ गई हूं, इसका तो सभी को पता चल गया होगा?' 'पता चल गया होगा का मतलव ? मैं तुम्हारी कम्पनी का डायरेक्टर हूं न, इसलिए मेरे पीछे लोग हाथ धोकर पड़े हुए हैं और तुमको सिर्फ एक नज़र भर देखने की रिक्वेस्ट कर रहे हैं।' 'पर पाश्चर्य होता है कि इस गंवार देहात में भी मेरा इतना नाम है ? सत्य मल्लिक ने कहा, 'अरे वाह ! इसमें कौन-सी नई बात है ? पांच मील दूर ही तो नैनागंज है। वहां सिनेमा हाउस है ही। वहां तुम्हारी फिल्में पाती ही रहती हैं। क्या वे फिल्में किसी ने नहीं देखी होंगी?' - मंजरी पता नहीं क्या सोचने लगी। फिर बोली, 'पता नहीं, मुझे क्यों डर लग रहा है, सत्य दा?' 'डर? डर किस बात का ? पुलिस के पहरे का इतना जबरदस्त इन्तज़ाम हुमा है कि कोई तुम्हारे पास फटक भी नहीं सकेगा। मैंने उन सबसे कह दिया है कि गांव का कोई भी आदमी हीरोइन के घर की ओर न आने पाए। नहीं तो हमारी हीरोइन 'प्ले' नहीं करेगी।' 'नहीं, बात यह नहीं है। इसके लिए तो खैर पुलिस है हो।' 'तब फिर? फिर किस बात का डर है ?" मंजरी ने कहा, 'यह निरा देहाती गांव है न, यहां...।' 'क्या बात करती हो तुम? तुम समझती हो, इन लोगों में रस-बोध नहीं है ? नहीं भई, इस विषय में तुम्हें डरने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। मैं खुद जाकर स्टेज देख पाया हूं। तुम्हारे लिए एक संपरेट मेकअप-रूम तैयार करने को भी कह दिया है। यह भी कह दिया कि तुम्हारे मेकअप-रूम में एक बड़ा आइना भी होना चाहिए। पहले तो वे लोग कह रहे थे कि इतना बड़ा पाइना उन्हें नहीं मिल पाएगा। पर मैंने ज्योंही कहा कि पाइने बिना हमारी हीरोइन 'प्ले' नहीं कर पाएगी, त्योंही उन लोगों ने बड़े पाइने का इन्तजाम भी कर दिया।' 'कहां से लाए इतना बड़ा ग्राइना ये लोग? यहां किसके पास इतना बड़ा आइना है?' 'है भई, इस कदमफूली में भी बड़े लोग रहते हैं। मैं तो ग्राइना ७६ नाविका देपकर अचरज में पट गया। रितना बड़ा है ! मिरगर तर देशा जा सकता है। मैंने पूछा भी यह विमय पर से से मा? उन्होंने बताया तो पता चला कि उसका नाम हीरक गुप्त है।' 'हीरक गुप्त?' १३ न जाने बाहर कंमा शोर-सा उठा कि सत्य मल्लिक उठार सहा हो गया। बोला, 'मैंने बार-बार उन लोगो को मना कर दिया पाकि यहां किमी प्रकार का शोर नहीं होना चाहिए। परन्तु फिर भी...?' पुलिस से बचकर पता नहीं किस तरह कुछ छोकर मकान के ठीक सामने तक मा धमके थे। पुलिस ने उन्हें परडा, तो उन्होंने पुलिस के साथ झगड़ा मुरू कर दिया था। सत्य मल्लिक मागे वह माया। बोला, 'यह क्या हो रहा है? विम यात का शोरगुल हो रहा है ?' देहाती गाय की पुलिस जो टहरी! सो लाठी लेकर भीड़ को मागे बढ़ने से रोक रही थी। 'क्या हमा है तुम लोगों को? इस तरह चिल्ला क्यो रहे हो ?' 'सर, हम लोग एक वार मजरी देवी को देगे।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'जब वह थियेटर करेंगी, तब देगना। ममी क्या है यहां? इस वरत ये विश्राम कर रही है। तुम लोगों के कारण पया विधाम भी नहीं कर पाएगी?' मभी एकमाय बोल पड़े, 'नही सर, हम उन्हें परेशान नहीं करेंगे, हम मिर्फ एक बार उनको देगेंगे। हम लोग उनको सम्पयंना करेंगे।' किमी एक ने पहा, 'हम उनसे मिर्फ एक बार 'शेर-है।' करेंगे।' सत्य मल्लिम एमी पटनामों से परिचित पाइनका मुरायला रिग सरह करना चाहिए, यह भी उसे पता था ।योला, 'कल गारी रात उनको नींद नही माई थी, इसलिए इस समय ये जरा सो रही है। बा तुमसर- পাধি।
को जरा-सी देर सोने भी नहीं दोगे ?' 'सर, हम लोगों के लिए उन्हें सिर्फ एक मिनिट उठने के लिए कहिए । स वरामदे के सामने पाकर वे खड़ी हो जाएंगी। बस, हमलोग ज़रा जी सरकर उनको देख लें, फिर चले जाएंगे।' सत्य मल्लिक ने पूछा, 'तुमलोग यहां मंजरी देवी को देखने आए हो, उसके लिए क्या तुम लोगों ने 'संस्कृति-संघ' के सेक्रेटरी से परमिशन लिया है?' 'सर, हम लोग 'संस्कृति-संघ' से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। हम तो मंजरी देवी के फैन हैं। हम उन्हें देखे विना यहां से हिलेंगे नहीं।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'अच्छा तो तुम लोग मेरी बात नहीं सुनोगे, यही कहना चाहते हो न?' 'नहीं, नहीं सुनेंगे । अाप कौन होते हैं, जो हम आपकी बात सुनें ?' अचानक गड़बड़ी और अधिक बढ़ गई। पीछे की तरफ के लड़के भी आगे बढ़ पाए और उछलकर चिल्लाने लगे। घटना यहां तक पहुंच जाएगी, इसकी सत्य मल्लिक ने कल्पना भी नहीं की थी। खासकर ऐसे वज्र देहात में ! शहर में तो सिनेमा के दीवानों का होना अस्वाभाविक नहीं। पर यहां? की 'हम लोग मंजरी देवी को देखना चाहते हैं।' अव सत्य मल्लिक का चुप रहना असम्भव था। पुलिस के सिर्फ द सिपाही यहां तैनात किए गए हैं। दो सिपाही किस तरह इतनी बड़ी भी- को सम्हालेगे? अगर सब-के-सब मिलकर अचानक उनको दबोच लें तो सकता है, घर के भीतर भी घुस पाएं । क्या करें,क्या न करें ; सत्य मल्लिा कुछ भी समझ में यहीं पाया । इतने बड़े घर में लोग हैं भी कितने सिर्फ दो यादमी उस तरफ बरामदे में खाना बना रहे थे। वे भी इतनी में देखकर अचकचा गए थे। दोनों सिपाहियों के चेहरे भी निरीह हो रहे 'मंजरी देवी, वाहर निकल आइए, निकल पाइए !' चीख-पुकार क्रमशः बढ़ती जा रही थी। धीरे-धीरे लड़कों की स भी बढ़ने लगी थी। क्रम इसी तरह चलता रहा तो इतनी भीड़ हो ज कि हो सकता है, सत्य मल्लिक को भी ठेलकर वे लोग घड़-धड़ाते हुए नायिका ७८ ही घुम पढ़ें। 'निकाल पाइए, निकल पाइए !' रात्य मल्लिक ने एक सिपाही को बुलाकर पूछा, 'थाना यहां से कितनी दूर है ?' उसने जवाब दिया, 'याना तो हमारे नैनागंज में है. हुजूर ।' 'यहा सबर भेज सकोगे?' सिपाही ने कहा, 'तो इधर कौन सम्हालेगा? मेरा सायो अकेला तो यहा सकेगा नही । उधर देखिए, लोगों के झुड-के झुंड नदी पार करके घर चल मा रहे हैं।' मत्य मल्लिक ने भी देखा कि नदी के उस पार से पंदल चलकर बहुत से छोकरे पर पा रहे हैं। कुछ देर बाद और लडके मा जाएगे तो और भी भीड़ हो जाएगी। मन मर में मत्य महिला को टर लगना शुरू हुमा । 'रूपक' इतनी जगह गया था. पर ऐमा काटकही नही हुप्रा पा । बडे-बड़े शहरों में भी पुलिस के पहरे का इन्तजाम करके स्थिति को सम्हाल लिया गया था। पर उसने यह नहीं सोचा था कि इस छोटे-से देहात में ऐमा होगा? भव पया करे, फुछ भी नहीं सोच सका सत्य मल्लिक । युनिट के सभी मदस्य बारहयारीतल्ला मे पण्डाल के पास ठहरे हुए थे। वहीं पर उनके रहने, साने, पाराम करने का इन्तजाम कर दिया गया था। उनको तो मायद यहा की हालत की जानकारी भी नहीं होगी। सरस मल्लिक ने पुलिस के एक सिपाही को युलाया मोर कहा, 'सुनो, तुम लोग तब तक इधर सम्हालो; मैं भीतर से अभी माया ।' कहकर यह भीतर चला गया। लेकिन इसके बाद तो ची पोर भी मधिक बढ़ गई। भीड़ भी अधिक होती जा रही थी। वे लोग चिल्ला रहे थे, 'मंजरी देवी, मापको एक बार देखेगे हम लोग! भाप दया करके निकल माए ! सिर्फ एक मिनिट के लिए, काइण्डली, बाहर मा जाइए !' सरय मल्लिक ने भीतर जाकर देखा कि मंजरी नहा चुकी है और बालों को हितराफर एक 'इजी चेपर' पर किताव हाय में लिए बैठी है। सरय मल्लिक ने पूछा, 'मंजरी, कॉफी पी लो तुमने ? तुमको कॉफी नायिका ७६ मिल गई न?' मंजरी ने मानो कुछ सुना ही नहीं। चेहरा उठाकर पूछा, 'तुम मुझे यहां लाए ही क्यों, सत्य दा?' सत्य मल्लिक ने कहा, 'अरे भई, इस वज्र देहात में ऐसा होगा, मुझे क्या यह मालूम था? करीव पांच सो लोग झुण्ड बनाकर अब तक इकट्ठे हो चुके हैं। इसके अलावा और भी बहुत से लोग नदीपार करके इस ओर चले पा रहे हैं।' 'मैं उस बारे में नहीं कह रही हूं। वे लोग तो ऐसा करेंगे ही। मुझे यह सब सहने की आदत हो गई है । पर यहां आकर सत्य दा, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।' सत्य मल्लिक यह सुनकर चिन्तित हो उठा। वोला, 'क्यों, क्यों भला? कुछ वतानो भी । तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न ? कॉफी पी ली है न! मैंने तो उन लोगों से कह रखा है कि घन्टे-घन्टे बाद तुम्हें कॉफी दे दिया करें।' मंजरी ने कहा, 'हां, कॉफी तो मैंने पी ली है।' 'तो फिर ? बुखार-वुखार तो नहीं हो गया ?' मंजरी ने कहा, 'नहीं, वुखार क्यों होगा अचानक ? बस, यों ही मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।" सत्य मल्लिक ने कहा, 'सिर्फ एक ही दिन की तो बात है। उसके बाद तुम्हें और तकलीफ नहीं दूंगा।' मंजरी ने कोई जवाब नहीं दिया। पर सत्य मल्लिक का यह काम उसको ठीक नहीं लग रहा था। अगर वह एक बार भी टेढ़ी हो जाए तो बस, सब ठप्प हो जाएगा। सिर्फ अाज यहीं पर नहीं, बल्कि 'रूपक' पार्टी ही हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। 'रूप नहीं, रूपा' की आज जो इतनी मांग है, इतना नाम है, वह सव इस मंजरी के कारण ही तो है। कुछ देर ठहरकर सत्य मल्लिक ने फिर कहा, 'एक वार डॉक्टर को बुलाने को कहूं ?' मंजरी ने कहा, 'नहीं, तुम अपना काम करो, मैं एकदम ठीक हूं।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'एकाएक इस तरह से बात क्यों करने लग . . . नायिका जाती हो, मंजरी? तुम्हें पगर किमी प्रकार की भमुविधा हो, तो मुझे कह तो सकती हो ? मैं हूँ मिगलिए ? उन लोगों से मेरी यही मंगन थी कि तुम्हें जो भी ममुविधा होगी, उसे वे सोग दूर करेंगे। तुम्हारे कारण उनके कितनै टिकट बिक चुके हैं, जानती हो ?' मंजरी ने कहा, 'यह सब बातें सुनकर मुझे खुशी नहीं होती है सत्य दा, मैं बहुत ही टायर्ड हूं।' 'क्यों नहीं, टायर होने की तो बात है हो। मेरे पास यांडो है। पोड़ी-मो?' तभी अचानक ऐसा लगा, मानो बाहर एक भयानक धमाका हमा हो ! किमी ने टीन की छत पर पत्थर फेंका था। प्रभी तक लोगों का पीसना जारी था, 'निकल पाइए, मंजरी देवी! सिर्फ एक बार दया करके बाहर मा जाइए । यस, एक बार देखना चाहते हैं हम मापको।' उसके बाद एक पत्पर फिर एत पर माकर पड़ा। फिर एक भारी भावान हुई। सत्य मल्लिक पर चुप नहीं रह सका। बोला, 'मंजरी, मैं अभी भाया। बस, तुरंत भाया ।' मोर दौड़कर बाहर निगल गया। १४ बारहवारीतल्ला तक सबर पहुंच गई थी। निरापद सब काम सत्म करके पर पहुंचा पाकि पाना साएगा। कई दिन ये लोग इसी झनट में फसे पे। सिर्फ एक रात के नाटक के लिए ही इतना सब कमेना करना पड़ रहा था। उपतम तोपूना का ही पा; पर उसे तो एक पुरोहित भी सम्पन्न कर सरता था! नंद, भारती भादि की जो कुछ संपारी करनी थी, उसके लिए सड़कों को रिमी प्रसारा मिर-ददं नहीं उठाना पड़ा था। प्रसनी सिर-दर्द नाटक के कारण ही पा। टिकटें प्रायः रामूची विक पुगी पी। पंडाल के सामने टिकट पर में नारिका १ हुआ निरापद-दल का एक लड़का अन्तिम बची हुई टिकटें बेच रहा या। अचानक खबर प्राई कि लाहा बाबू के मकान पर दुःखद घटना घट गई है । शाहगंज के लड़कों ने लाहा बाबू के मकान पर हमला कर दिया है। वे लोग नदी पार करके आए थे और हीरोइन को देखना चाहते थे। उनके द्वारा लाहा वाबू के मकान की छत पर पत्थर फेंके जा रहे हैं। 'तुमको किसने खबर दी?' केतु ने कहा, 'वहां से पुलिस का एक आदमी पाकर यह खबर दे गया है।' 'उसके बाद ? अब क्या हो रहा है ! सत्य दा कहां हैं ?' 'सत्य दा तो वहां नहीं थे। 'उनके दल के और लोग क्या कर रहे हैं ?' केतु ने कहा, 'यह तो पता नहीं उन लोगों को तो शायद अभी तक कुछ पता ही नहीं है । मैं साधन को टिकट-घर में बैठाकर सीधा तुम्हारे पास दौड़ा चला पा रहा हूं।' निरापद को खाने की सुध न रही । शाहगंज गड़ाई नदी के उस पार है । शाहगंज के लड़के-लड़कियों ने बहुत टिकट खरीदे थे। वे लोग भी शाम को नाटक देखने आएंगे। पर मामला यह रुख ले लेगा, इसकी तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। किसे पता था कि आखिर में शाहगंज के गुण्डों का दल नदी पार करके कदमफूली में आ जाएगा और यह कांड कर बैठेगा। पर होता वही है जो तकदीर में लिखा है। निरापद कोई भी उपाय नहीं सोच सका। उसने सिर्फ इतना ही कहा, 'चल, देखू, क्या कर सकता हूं मैं ?' वह कमीज़ पहनते-पहनते वाहर निकल आया और बोला, 'हावला कहां है?' केतु ने कहा, 'उसको अभी तक खबर नहीं मिली है। वे सब वारह्यारीतल्ला में पण्डाल सजा रहे हैं।' निरापद ने कहा, 'तू जाकर उनको बुला ला। अच्छा, कितने लोग ८२ नायिका इकट्ठे हुए हैं वहां, कुछ सुना है ?" केतु ने कहा, 'पुलिस के प्रादमी ने मुझे रावर दो मोर फिर सीधा मैनागंज के पाने घसा गया। महता पा, प्रायः पाच-छ: सौ नाके होंगे।' निरापद ने कहा, 'मन्छा, ठीक है । मैं एक बार अपने प्रेरिण्ट के पारा जाऊ पोर उनसे सारी बात कहकर देखू ।' प्रेजिडेण्ट का मतलय पा विष्णुपद राय । कदमफूली के जमींदार ही गाव के कता-धर्ता थे। यदि इस प्रकार की कोई गावह हो जाए तो उनको परिचित करा देना उरूरी होता है। मगर पाने पुलिस का मामला होता है तो यही उसे सम्हालते हैं। सीधी सड़क छोड़कर निरापद पंदल ही पगडंडी के रास्ते से जमीदार महाशय के परकी मोर दौड पड़ा। मचानक उसने देखा कि सामने से एक गाड़ी पूर्व की मोर जा रही है। निरापद ने पहचान लिया। गुप्ता साहब ! वहीं से उसने चिल्लाकर पुकारा, 'सर, सर!' पौर सुद भी कार के पीछे-पीछे दौड़ने सगा। पीछे से पुकार गुनकर हीरक गुप्त ने गाड़ी रोक दी। निरापद के पास पहुंचने पर उन्होंने गाड़ी में बैठे-बैठे ही पूछा, 'क्या बात है ? इस तरह हाफ क्यों रहे हो? "जी, हम लोग यहत भारी मुसीबत में फम गए हैं।' 'कसी मुसीयत ? क्या रपये मोर चाहिए?' हीरक गुप्त स्वयं कार डाइव कर रहा पा। पोधे बन्दूक रखी थी। सायद झील की तरफ शिकार करने जा रहा था। निरापद ने कहा, 'नही सर, रुपये नहीं पाहिए। माप तो जानते ही हैं कि यहां नाटक करने के लिए एक हीरोइन माई है।' 'हां, हो, वह तो पता है । साहा बाबू के मकान में ठहरी है। उसके 'मेकअप-कम के लिए मैंने तुम लोगों को अपना माइना भी तो दिया है।' 'नहीं, वह बात नहीं है। मापने हमारी हीरोइन मारी देवी फा नाम तो जरूर सुना होगा? 'नहीं, भई । म सोहे-नराशाम करनेयाला मादमी है और । नादिरा . हरदम मद्रास-दिल्ली आने-जाने में ही टाईम खत्म हो जाता है; हीरोइन-विरोइन की खवर रखने का मौका मुझे नहीं मिलता है। खैर क्या हुआ उसको ?' 'उसे नदी किनारे लाहा वावू के मकान में ठहराया गया है। वहां पर शाहगंज के लड़कों ने पाकर हमला कर दिया है। मुझे अभी-अभी खबर मिली है।' 'शाहगंज के लड़कों ने ? क्यों ? हमला किसलिए कर दिया ?' निरापद ने जवाब दिया, 'हीरोइन को देखने के लिए। 'उसको तो नाटक में देखना ही है। तब फिर इस वक्त उसे देखने की ऐसी क्या श्रावश्यकता पड़ गई ?' निरापद ने कहा, 'अव कौन समझाए उन्हें ? हम लोग तो इधर स्टेज सजाने में व्यस्त थे, और उधर वहां के गुण्डों ने प्रायः पांच सौ लड़कों के साथ मकान को घेर लिया है।' 'तो फिर पुलिस में खवर दो।' निरापद ने कहा, 'पुलिस में खबर देने तो प्रादमी गया है । पर यहां से नैनागंज का रास्ता छ: मील है। पुलिस के पाने में तो बहुत समय लग जाएगा। अगर इससे पहले ही उन्होंने हीरोइन की 'इन्सल्ट' कर दी तो ? अगर आप एक बार वहां चलते...?' 'मैं ? मैं तो शिकार करने जा रहा हूं।' निरापद ने कहा, 'आपके पास बन्दूक है। बन्दुक देखकर वे लोग जरूर डर जाएंगे। दया करके अगर एक बार श्राप चलते...' 'मुझे वहां जाकर क्या करना होगा?' निरापद ने कहा, 'करना कुछ भी नहीं होगा। बस, आपकी बन्दूक देखते ही सब डरकर भाग जाएंगे। सर, सिर्फ एक बार मेहरवानी करके चलिए। आपके गए बिना वहां अनर्थ हो जाएगा।' हीरक गुप्त ने कहा, 'पर वे लोग भला मेरी बात क्यों सुनने लगे ? मैं कौन होता हूं उनसे कुछ कहनेवाला?' निरापद ने कहा, 'क्या कहते हैं प्राप! पाप इतने बड़े आदमी हैं । प्रापकी बात नहीं सुनेंगे तो क्या मेरा सुनेगे? इसके अलावा, आपके पास ५४ नायिका सुद की गाड़ी है, पन्दूक भी है। फिर भी माप ऐमो यात रहते है ? नहीं, भाप एक बार जरूर पलिए, मर।' होरफ गुप्त कदमफूली में दो-एक दिन माराम करने के समान से भाता था, उसके दिमाग में हर वक्त परमिट, इनाम-गम एवं इम्पोर्ट-एस- पोर्ट लाइसेन्म मादिको यात हो धूमती रहती थी। इन सब मनाया રો कुछ सोचने का समय ही नहीं रहता था उसके पास । महके को भी अमेरिका भेज दिया था; मतः उसको मोर रो भी यह निश्चिन्त पा साप में बस फे.यल पली रहती थी। पर पत्नी का साप उसके लिए कोई समस्या नहीं थी । जहा रही भी हीरक पूमता, वह उसके साथ-साप जाती थी। माया कहा करती, 'भय मुम व्यवसाय के लिए इतनी चिन्ता मत रिया करो।' हीरक जवाब देता, 'अगर व्यवसाय के मारे में नहीं मोचूं तो पौर किस बारे में सोचूं ? पासिर किसी-न-किसी पीज में तो ध्यान सगाना ही पड़ेगा। हा, यह पात राच भी थी। मगर मोबने के लिए कुछ भी न रहे तो फिर होरक गुप्त को सब कुछ छोड-शाहकर घर में बैठ जाना पोगा। होरप बहता, 'तुम राममही हो, मैं सिर्फ रपयों के लिए ही प्यापार करता ?' सिर्फ एपयों के लिए हीरक व्यापार नहीं करता है, यह बात माया पसी तरह जानती थी। पर दुनिया में मोर फालतू यातों को चिन्ता करने को बनाए रुपयों की चिन्ता करने में समा युराई है ? इतने दिनो से दोनों पति-पली में इसी तरह बन रहा था। भाज महास, पल दिल्ली, परगों बम्बई मोर उसके बाद कलकत्ता । इन सामे प्यस्तता तो पी ही, इसके अलावा कार बातों को चिन्ता करने का समय भी उन्हें नहीं मिल पाता था। हीरक ने गाड़ी पलाते चलाते हो पूग, मटा, यह बतानो, शाहगन के लडके पचानर ऐमा पोंकर बैठे ?' निरापद ने कहा, "सिनेमा-स्टार को देखना पाहते हैं। मोरक्यों ?' 'उसमें देसने सापक एसोपा बात है?' नादिरा ८ फल्म में देखकर उनका मन नहीं भरता, अतः साक्षात स्टारों को देखना चाहते हैं।' 'पागल ! विलकुल पागल !' इतना कहकर हीरक मन-ही-मन सोचने थाः तो क्या लोहे-लक्कड़ के व्यवसायी को कोई नहीं देखना चाहता? कुछ बहादुरी है, वह सिर्फ सिनेमा में ही है ? लोहे के व्यवसाय में ? बंचपन से आज तक विना खाए, बिना सोए और कितने अथक रिश्रम द्वारा प्राज उन्नति के इस शिखर पर वह पहुंचा है, फिर भी उसको देखने के लिए तो इस तरह मार-पीट नहीं होती? उसे देखने के लिए तो कोई इस कदर धक्कम-घुक्का नहीं मचाता? जब कि ऐसी-ऐसी कितनी ही फिल्म-स्टारों को हीरक खरीद सकता है। 'बिलकुल ठीक कहा आपने सर, शहर के लड़के-लड़कियां सिनेमा- नाटकों के पीछे एकदम पागल-से रहते हैं।' 'क्यों ? ऐसा क्या है सिनेमा में ? वल्कि इससे अधिक मजा तो लोहे- लक्कड़ में है। जानते हो, हम जो लोहा तैयार करते हैं उसीसे पटड़ियां वनती हैं, और उन पटड़ियों के ऊपर ही ट्रेन चल सकती है।' हां, सच ही तो है। हीरक ने इतने दिनों तक तो इस तरह से कभी सोचा ही नहीं था। जिन्दगी भर लोहे-लक्कड़ का ही हिसाब-किताव करता रहा । उसने यही समझा था कि लोहा ही ज़िन्दगी का एकमात्र ध्रुव सत्य एवं स्थायी वस्तु है । यह पृथ्वी लोहे के कारण ही चल रही है और चल रहेगी। सोने के विना फिर भी काम चल सकता है, लेकिन लोहा कदम-कदम पर चाहिए। पर प्राज कदमफूली के रास्ते में गाड़ी चलाते-चलाते एकाएक ही गुप्त को लगा कि लोहे से भी अधिक कीमती शायद सिनेमा है निरापद जैसे लड़के ने कितने रुपये चन्दे में प्राप्त किए हैं तथा कितने करेगा; और उस पर भी ये लोग कितनी कठिन मेहनत कर रहे हैं। एक नाटक के लिए ही तो! जवकि हीरक नाटक नाम की इस सम्बन्ध में विलकुल अनजान है। 'अव बाई पोर चलिए, सर।' हीरक हंसा। वोला, 'मैं जानता हूं। कदमफूली के सभी र नायिका परिचित हूं। निरापद ने प्रश्न विया, 'मैंने सुना है, भाप भी इस कदमफूली के ही 'हां, मैं यहीं का जन्मा हुमा हूं। यह मेरी जन्म-मृमि है, तभी तो इस तरह तिचा-सिंचा बार-बार यहां पला माता हूं।' कार को बाईपोर मोहकर हीरक ने हठात् प्रान किया, पन्छा मेरा माइना उनको पसन्द माया ?' 'हो सर, पसन्द सयों नहीं पाता? सत्य मल्लिक रूपक' के गयरेक्टर हैं। पापका माइना देखकर वे बहुत खुश हुए। पूछ रहे थे कि मैंने इतने यदिया पाइने का कहाँ से इन्तजाम किया? मैंने मापका नाम बताया और रहा, गुप्ता साहब हमारे गांव के ही निवासी हैं। बहुत मे यासे हैं । मुनकर ये पचरज में पड़ गए थे।' 'क्यों, इसमें पचरज करने की क्या बात है ?' निरापद ने रहा, 'वे लोग नाटक कम्पनी के मादमी है न; मोना होगा, यहां कोई समीर नहीं रहता। इसीलिए सो साम तौर से मैंने यह बात उन्हें सुनाई पी।' हीरक ने प्रश्न किया, 'नाटक-सिनेमा वासों के पाम तो शायद बहन पसा होता है?' निरापद ने जवाब दिया, 'नाटकवालों के पास तो सास पंसा नहीं होता, पर सिनेमावानों को पैसों कीया कमी है ?' 'वह कैसे?' 'सर, यह जो हमारी हीरोइन मजरी देवी है न, उसके पास भी बहुत पैसा है । वह बहुत धनी है । प्रम देखिए न, उसके साने के लिए हम लोगो को मुर्गे का इन्तजाम करना पड़ रहा है । गरम पानी का बन्दोबस्त करना पा रहा है । मार, बेदाना एवं मपित का इन्तगाम करना पड़ रहा है। पानी को जगह ये मिर्फ गम पोती है। गवार-देहात का पानी पीने से तबीयत सराव हो जाएगी, इसीलिए हमे डाम का इन्तजाम करने को कहा गया है।' 'महीने में कितनी माय है उसकी" निरापद ने कहा, 'यह भला ठीक-ठीक कोई बता सकता है ? वैसे सुना है, लाख-लाख रुपये लिए विता वह किसी फिल्म में काम करने को तैयार नहीं होती। 'लाख-लाख रुपये?' 'जी हां, सर ! प्रापको नहीं मालूम ? वे तो लाख से नीचे वात ही नहीं करती। बहुत कीमती आर्टिस्ट हैं न ! सच है कि झूठ, यह तो भगवान जाने; पर सुना यही है कि पहले ये बहुत गरीब थीं । इसी 'रूपक' कम्पनी के एक नाटक में ये पहली बार उतरी थीं और तभी से इनका नाम होना शुरू हो गया।' 'रूपक?' निरापद ने कहा, 'जी हां, इस नाटक-कम्पनी का काफी नाम है। मंजरी देवी के लिए ही तो हम लोगों ने 'रूपक' को इतनी खुशामद करके बुलाया है।' तब तक कार लाहा बाबू के घर के ठीक सामने सड़क पर पहुंच गई। निरापद ने दूर से ही दिखाते हुए कहा, 'वो देखिए सर, किस कदर भीड़ जमी हुई है ! ज़रा तेज चलाकर पहुंचिए न वहां !' हीरक गुप्त स्पीड और तेज़ करके गाड़ी को भीड़ की ओर ले गया। दूर से देखकर उसने अनुमान लगा लिया था कि लाहा बाबू के घर के सामने लोग मरने-मारने को तैयार हो रहे हैं। १५ जमींदार महाशय खाना खाने के बाद साधारणतः थोड़ी देर पाराम करते थे। उनकी उम्र भी तो काफी हो चुकी थी। उस वक्त गिरि गोविन्द घर के भीतर रसोईघर के एक कोने में बैठकर खाना खा लेता और फिर बाहरवाले कमरे में चला पाता। वहां चौकी पर उसका एक बिस्तर सिमटा हुप्रा पड़ा रहता । उसको खोलकर वह लेट जाता। यह उसकी खाना , खाने के बाद की खुमारी-भरी नींद होती थी। इसी ऊंघ भरी नींद में नायिका गिरि गोविन्द के दिमाग में पुरानी बातें नकर लगाती रहती। बहुत दिन पहले वह इस राय-परिवार में माता-वही लिगने के काम पर रगा गया था पोर तब से उसका मारा जीवन इसी पर मे घोता है। कभी-कभी नींद में गिरि गोविन्द को ऐसा लगता, मानो जमीदार महोदय ने उमे पुकारा है। 'जी, प्राता हूं,मालिक।' मोर वह हइयहाकर जब बैठक में पहुंचता तो देखता कि कमरा माली है । यहा कोई नहीं है। हाका भी पानी पहा है। सब उसे लगता कि उसे सुनने में भूल हुई है। गिरि गोविन्द में कभी कोई पूछना भी तो यह जवाब देता, 'जमीदार साहब के हुक्म का गुलाम हू मैं तो सिफ।' कहा किगको कितना चन्दा देना है, किसरे सेन में कितना पान मा है, पाट के कारोबार में किगके पाग कितना बाकी है मादिविविध विषयों का हिमाय मिगना ही गिरि गोबिन्द का काम था। इसरो पपिक उगकी कोई जिम्मेदारी नही थी मोर न इससे मधिक जिम्मेदारी उमीदार महा. पाय उसे कभी देने ही थे। पर जिम्मेदारी या अधिकार पधिक न होते हुए भी पर को मारी घटनाए गिरि गोविन्द के सामने ही घटी थी। उग वान यही जमीन्दार महाराय कितने घमंडी ये! गार के लोग हर रोग इनको बैठक में इकट्ठे होते ये । कदमफूली मे जितने भी काम-काज पोर कार्यक्रम होते थे, उन मर में इनका परामगं-मनुमोदन प्राप्त करना मय के लिए प्रावश्यक पा । বিকা गुप्त की गम्पूर्ण जायसद धीरे-धीरे इन्होंने हस्तगत कर नी पी पौर इमी गिरि गोविन्द ने सारे कागजों पर हस्ताक्षर वगैरह किए थे। बाद में उसके लड़के को लाकर जमीदार महोदय ने अपने परम रगा, पौर फिर एक दिन उसी लड़के को भगा भी दिया । उगके भगा दिए जाने भी यात मुनकर गिरि गोविन्द मन ही मन पचरज मरके रह गया था, योनि मालिक ने पुछ पूछने मी उमकी हिम्मत नहीं थी। मिर्फ एक बार गिरि गोविन्द ने पूछा या, 'जो मालिक, कई दिन से होरर बाबू को नहीं देगा? मागिर वह गया कहा मालिक नाराज हो गए। बोले थे, 'नुम गय बातो में टांग पो ।
अड़ाते हो, बतानो तो? तुम नौकर हो, नौकरों की तरह रहो। सारी वातों के बीच में टांग अड़ाना अच्छा नहीं । समझे ?' उसके बाद गिरि गोविन्द ने उस सम्बन्ध में उनसे कभी एक शब्द भी नहीं कहा। गांव के लोग अगर उससे कुछ पूछते भी तो वह सिर्फ इतना ही कहता, 'मेरी क्या विसात हुजूर, मैं तो मालिक के हुक्म का गुलाम हूं।' और यह सब वात राय साहब से पूछने की हिम्मत किसी में नहीं थी। बस सबको यही बात वार-बार याद आती रहती कि बैठक के पिछवाड़े वाले कमरे में अकेला वैठा हीरक पढ़ने-लिखने में मगन रहता था और पैदल चलकर नैनागंज के स्कूल में पढ़ने जाया करता था। इस जीवन की लीला भी कितनी विचित्र है ! यद्यपि गिरि गोविन्द दार्शनिक नहीं था, फिर भी उस गन्दे तख्त पर लेटे-लेटे वह अपने समस्त जीवन पर कभी-कभी विचार कर लिया करता था। जिस आदमी का न कभी कोई उत्थान हुआ हो न पतन, ऐसा कोई पात्र ढूंढने का जब वह प्रयत्न करता तो खुद को छोड़कर दूसरा कोई उसे नहीं मिलता था। पर कदमफूली भी अब पहले वाली कदमफूली नहीं रही थी। सभी में कुछ न कुछ परिवर्तन हो रहा है । यहां तक कि विकास गुप्त का वह लड़का भी एक दिन अचानक फिर आकर उपस्थित हुना और रेहन धरे सारे कागज़ वगैरह लौटा ले गया। उसने दो हजार रुपयों के दस्तावेज़ के व्याज मिलाकर वीस हजार रुपये अदा करके अपने पिता की ज़मीन- जायदाद को वापस हस्तगत कर लिया तथा इसके साथ ही साथ अपने मकान का नक्शा भी पलट दिया। गिरि गोविन्द ने यह सब अपने जीवन- काल में स्वयं अपनी प्रांखों के सामने घटते देखा है। बीस हजार रुपयों के नए कड़कदार नोट वह राय साहब के सामने फेंक गया था और गिरि गोविन्द ने ही एक-एक नोट गिनकर सारे रुपये राय साहब के हाथ में रखे थे। उसे अच्छी तरह याद है कि उस दिन उसने सिर्फ एक बार प्राश्चर्य- चकित होकर हीरक के चेहरे की ओर देखा था। शायद वह उस पहले- वाले चेहरे से अव के हीरक गुप्त का सामंजस्य करने की कोशिश कर रहा था। पर सामंजस्य बैठा नहीं। उस दिन के बाद से हीरक बार-बार यहाँ पाने लगा। यहां प्राकर . मूल एवं । ' १० नायिका यह सब पुरानी बातें याद दिला देता । रयान-पतन तो दुनिया में होता हो रहना है । पर इस कदर उत्थान क्या पहले भी कमी रिसीमामा प्रचानक लगा कि वाहर कोई बना रहा है। गिरि गोविन्द विस्तर छोड़कर वठ पडाहमा । बोपा, 'कौन है?' पाहर से जवाब माया, 'मैं हूं,हायला।' गिरि गोविन्द जल्दी-जल्दी बाहर पाकर बोला, 'क्या बात है ? क्या पाहते हो तुम लोग?' गि हाबला ही नहीं, छोकरी का पूरा दस पर के मामने दरला हो गया था। सब मोहल्ले के ही सड़के थे। सभी के चेहरों पर उत्तेजना की छाप धी। उन्होंने एक साप पूछा, 'क्या निरापद मइया पाए थे यहाँ ?' 'कौन निरापद मइया? वह जो सामंत वायू पा महका है, यो ? नहीं भाई. यहां तो नहीं पाया।' हायला ने कहा, 'नहीं पाया? यह क्या बात है ! निरापद माया ने तो हम सबको यहां पहुचने के लिए पहा पा मोर यह भी कहा था कि उमीदार महासय से मिलकर विचार-विमर्श करेंगे।' "किस बात का विचार-विम?' 'माहगल के लड़कों ने साहा बार के मकान पर हमला कर दिया है। गहाई नदी में तो अभी पानी नहीं है न, इमोलिए सरने म पार माकर लाहा बाय के मकान पर पढ़ाई कर दी। 'पयो ? पढ़ाई क्यों कर दी? वहां ऐसा क्या है ?' 'हमारी हीरोइन उसी मकान में रही हैं। पुनिमा बन्धन भी दे लोग नहीं मान रहे हैं। 'तो इसमे राय साह्य का करेंगे? मुम लोगों के नाटक को मारी यो यदि वे लोग पर-परत कर रहे हैं, तो ऐमो हालत में वे मोग राय माहय को यात मसा पयों सुनेंगे?' 'मुनेंगे, जार मुनगे । राप गाहब की बात नहीं मुनेंगे तो और रिमयी मुनेंगे? ये हमारे संशति-मप के प्रेजिष्ट जो हैं।' ?
अब कोई चारा न देख गिरि गोविन्द ने कहा, 'इस वक्त वे सो रहे हैं, अतः अभी तो नहीं जा सकेंगे । मैं उनको जगा नहीं सकता।' 'एक बार जगा सकते तो बहुत अच्छा होता। कल हम लोगों का नाटक है, और अाज अगर कोई ऐसी-वैसी बात हो गई तो तुम्हीं बतानी गिरि गोविन्द, क्या होगा?' गिरि गोविन्द ने कहा, 'वह सब मुझे क्या मालूम, भइया ? मैं तो सिर्फ उनका चाकर हूं। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।' 'पर एक बार प्रेजिडेण्ट साहब को खवर तो दे दो।' 'तो फिर उनके नींद से उठने के बाद ही खबर दे सकूँगा। उससे पहले नहीं । मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है, भाई।' हावला वगैरह की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वे लोग क्या करें! निरापद भइया ने तो उन सबको यहीं आने को कहा था। 'कोन है ? गिरि गोविन्द, यह शोर कौन मचा रहा है ?' कहते-कहते राय साहब अचानक सामने आ हाज़िर हुए। चीख-पुकार से उनकी भी नींद टूट गई थी। 'क्या बात है ? तुम सब इस तरह शोर क्यों कर रहे हो ?' हावला ने सामने पाकर सारी बात समझाकर कह दी। राय साहब ने पूरी बात मन लगाकर सुनी। फिर वोले, "तो, मैं भला इसमें क्या कर सकता हूं? शाहगंज के गुण्डे भला मेरी बात मानेंगे ?' 'अगर न भी मानें, तो यह निश्चित है कि आपके वहां जाकर खड़े होते ही वे डरकर भाग जाएंगे।' 'तुम लोग जाकर पुलिस में खबर दो न ?' हावला ने कहा, 'पुलिस को खबर देने तो नैनागंज आदमी जा चुका है। पर जो कुछ होना है, वह तो इससे पहले ही हो जाएगा।' 'पाखिर वे लोग चाहते क्या हैं ?' हावला ने कहा, 'वै लोग और क्या चाहेंगे, ताऊ जी ? शायद हमारी हीरोइन का ही अपमान-वपमान कुछ करेंगे । और वह अगर नाराज हो गई तो फिर शायद 'प्ले' करना मंजूर न करे । तव तो हम लोग ही ग्राफत में फंसेंगे। इधर हजारों रुपयों को टिकटें बिक चुकी हैं।' ? । ९२ नायिका । पुछ देर पता नहीं उन्होंने क्या सोचा। फिर योने, 'मन्ठा, तो फिर गिरि गोविन्द, तुम हो एक बार नापी । मेरा नाम लेकर उनसे बहना कि वे सोग गात नहीं हए, नो में पुलिस बुलाकर मयको ठीक कर दूंगा।' "जी, ये लोग गेरी यान मानगे मला? ये शाहगंज के पायारा महो 'कैसे नहीं मानेंगे? तुमको तो मेरा नाम संकर बना है। मगर न मानें तो मुझे पाकर यताना । मैं तुरत जाऊगा । फदमपी के सहक नोक से नाटक कर रहे हैं, इगमे ननको मयो मिर-ददं हो रहा है ? मगर उनको भी नाटक देखना है, तो टिकट कटाए पोर पपचाप नाटक देग जाएं । जापा, मोर उनमे जाकर मेरा नाम लेकर नहीं।' प्रय गिरि गोविन्द ने प्रतिवाद नहीं किया। इतना ही पड़ा, जी, जमी पापसी मर्जी।' 'हो, भय तुम जापो । मगर उन लोगों ने तुम्हारी बान न गुनी, तो मैं भी जल्दी ही धना जाऊगा।' भटपट गिरि गोविन्द ने अपना कुर्ता पहना मोर एडी हाय में लेकर सड़कों से कहा, 'पलो।' हाबला उसके साथ-साप चलने सगा। राम्न में हायला ने कहा, 'जरा जल्दी और उटाकर पलो, गिरि गोविन्द नही तो वे सोग सर्वनाश कर सलगे। चलो।' गिरि गोविन्द तेज कदमो से चलने लगा। मंजरी अकेली साहा बाय के मकान में उमी तरह बैठी पी, मानो मन- ही-मन बीते दिनों में सेन-देन का हिमाय कर रही हो। बाहर में पान के पद हिला देनेवालो सोगों की पोरा-चिल्लाहट को पावाज पा रही थी। ऐसा पहने भी यहत बारहमा है । जब से उसकी प्रमिटि होनी पुरू हुई है, सब मे ऐसा ही होता पा रहा है। मजरी ने रिसी जमाने में जो पाहा पा, वही अव पा रही है । पर पाने न पाने के बीच इतनी दरार पड़ चुकी थी कि उसके बारे में सोचकर सिर-दर्द करने की उसको ज़रूरत नहीं पड़ती आजकल । अव लगता है कि शायद यही उसका प्राप्य है । यह धन, सम्मान और ग्लैमर ! वह सोच रही थी कि अगर प्राज ये इतने सारे लोग उसे देखने के लिए इकट्ठे नहीं होते, तो क्या उसे अच्छा लगता? गाड़ी में सवार होकर वह बाहर निकले और कोई उसे पहचान न पाए, तो क्या उसे अच्छा लगेगा? कलकत्ता होता तो वह उसी वक्त पुलिस कमिश्नर को टेलीफोन कर देती। कलकत्ते के कितने ही जाने-माने प्रतिष्ठित लोग उसे बचाने के लिए सोना तानकर इकट्ठे हो जाते थे। उनके सामने मंजरी अपनी असहाय अवस्था जाहिर करके और सिर नीचा करके भी गौरव महसूस करती तथा सिर ऊंचा रखने में भी सफल होती। और भी तो वहुत-सी लड़कियां शहरों, गांवों या शहरों के पास-पास वसती हैं। उनमें से भला कितनी को देखने के लिए लोग पागलों की भांति छटपटाते हैं ? भला किस-किसके लिए पुलिस के पहरे की आवश्यकता पड़ती है ? , 'ठहरो! अचानक वाहर यह किसको आवाज सुनाई पड़ी? 'ठहरो' सुनते ही मानो क्षण-भर के लिए बाहर के सब लोग सहम गए हों। 'क्या चाहते हो तुम लोग? यहां किसलिए आए हो?' किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। पता नहीं कौन है यह, जो सबको घमका रहा है ? मंजरी ने कान खड़े कर लिए। आखिर यह व्यक्ति है कौन? 'अगर तुम लोग नाटक देखना चाहते हो, तो कल शाम को बारहयारी- तल्ला में पायो । यहां पर तुम लोगों को इस तरह मैं शोर नहीं करने दूंगा।' शायद भीड़ में से किसी ने कहा, 'सर, हम सिर्फ एक बार मंजरी देवी को देखना चाहते हैं।' 'ठीक है, कल देखना।' 'नहीं सर, हम उसका मेकअप किया चेहरा नहीं देखना चाहते । हम ६४ नायिका तो उसको मानी वेश-भूपा में देखना चाहने हैं। हम उनका अभिवादन करना चाहते हैं। "इमसे तुम्हें क्या साम होगा ?' 'उनको देगकर हम अपना महोभाग्य समझेगे। हमारा जीवन सायंक हो जाएगा। 'तुम्हारा जीवन सायंक होने से उसको कोई फायदा नहीं । या तो तुम लोग चले जामो, भन्यया यों ही छुटकारा नहीं दूंगा मैं । इगीलिए मैं साप में यन्दूक भी सेता माया हूं।' भीड़ में एक तरह की गुनगुनाहट-गो गुरु हो गई। मंगरी को सगा, मायद बन्दूक देषकर सभी भयभीत हो गए हैं, और मया करें, यह उनकी ममझ में नहीं पा रहा है। 'यहां से भाग जामो !' भीड़ में से शोर उठा, 'हम लोग नहीं जाएगे। मारिए गोली । हम लोगों का सीना छलनी कर दीजिए गोली पलाकर। हम सौना साने गरे पर के सामने प्रायः एक बार लोगों को भी सगीपी । एक तरफ तो एक हजार सोग , मोर दूसरी तरफ सिर्फ परेसा वह! पर यह पादमी 'हम लोग नहीं जाएगे। पाप जो कर सकते हैं, ररिए।' 'तुमलोग भी सक सड़े ही हो? मैं कहता हू यहाँ से पसे जापो !' 'मोह, तो पाप अपनी प्रमोरी दिखाने यहां पाए हैं ? पाप हैं कौन ? पापकी बात हम नहीं मानेंगे। मजरी देवी, माप पद सामने प्राकर हम लोगों को भगा दीजिए। हम बरा प्रापकी ही बात मानेंगे।' इतनी देर तक सरय मल्लिक एप पे। मब उनकी भावाड मुनाई पडो, देसो भाई, में ही 'रूप एय रूपा' का परिचालक हूं और मैं ही मसरी देवी को यहां साया है। उनको यहाँ साने की जिम्मेदारी मेरी है। मगर उनको पुछ भी नुरसान हपा तो यह गलतो मेरी ही मानी जाएगी। मैंने तुम मोगो को पहले ही बता दिया है कि मंजरी देवी को सबीयत सराय है पोर मगर ऐगी हालत में ये बाहर माकर राही होंगी, तो उनकी तबीयन और भी - खराव हो जाएगी। सभी एक साय चीख रहे थे । अतः सब की साफ आवाज़ मंजरी को कमरे में बैठे स्पष्ट समझ में नहीं पा रही थी। सबकी आवाज को दबाकर पता नहीं कौन एक व्यक्ति चीख पड़ा, 'ऐसी कौन-सी और कहां की शाह- जादी है वह, जो एक बार वाहर आकर हमसे मुलाकात करने भर से उन- की तबीयत खराब हो जाएगी? क्या मोम की गुड़िया है वह ?' सभी 'हो-हो' करके हंस पड़े। व्यंग्यमिश्रित हंसी थी वह । अव की बार इधर से कोई आवाज नहीं आई। तो क्या सत्य दा भी डर गए हैं ? 'तो फिर तुम लोग नहीं जानोगे न ?' फिर उसी व्यक्ति की आवाज़ सुनाई दी। सत्य मल्लिक ने कहा, 'देखते हो न, इनके हाथ में बन्दूक है । तुमलोग नहीं जानोगे तो आखिर ये गोली चला ही देंगे।' चारों तरफ शोर-गुल बढ़ गया । एक पत्थर खिड़की पर पाकर गिरा। मंजरी का मन बोरियत से भर उठा। अगर अभी कोई दुर्घटना हो जाए तो? अचानक सत्य दा कमरे में पाया। वोला, 'मंजरी,जो सोचा था, वही हुआ । वाहर बहुत जोरों से हंगामा मच गया है। वे लोग तुम्हें देखना चाहते हैं । इधर पुलिस का सिपाही भी सिर्फ एक ही है । 'संस्कृति-संघ' का सेरोटरी छोकरा भी डर गया है। मुझे अब पुलिस बुलाने के लिए जाना ही पड़ेगा । तुम बिल्कुल मत डरना। इस दरवाजे की सिटकिनी बन्द रखना। किसी को भीतर मत पाने देना । मैं चला।' इतना कहकर वह कमरे से निकल गया। मंजरी क्षण-भर उसी तरह चुपचाप बैठी रही। क्या करे, वह समझ नहीं पाई। और उसके कुछ देर बाद ही गोली छूटने की आवाज़ पाई। मंजरी कमरे में अकेली बैठी छटपटाहट महसूस कर रही थी। थोड़ी देर के बाद एक और गोली छूटने की आवाज़ पाई। मंजरी ने साड़ी का पल्ला अच्छी तरह कमर में लपेटा और कमरे से निकलकर सीधी १६ नायिका बरामदे में मा सही हुई। हीरक गुप्त को बन्दूक को मायाज मुनार सहनों का दन दौड़कर नदी पार करने की कोशिश कर रहा था। जिस व्यक्ति ने उनके लिए बन्दूक चलाई थी, वह भव पुप सदा गाहगत यो पोर ताक रहा था। उसके पास ही एक मादमी मोर सहा पा, जो मंजरीबो देखकर पर- यर कापने लगा था। वह कुछ सम्मलकर बोला, 'वह देगिए, ये पा रही हैं मंजरी देवी!' यह मुनकर हीरक गुप्त ने पीछे मुड़कर देगा और पितुन मंजरी ये सामने जा सड़ा हुमा मनागंज गे कदमफूली की दूरी कम नहीं थी। सत्य मलिक निरापद के साथ उघर ही दौड़ता हुमा जा रहा था। नैनार मे बदली तक 'हाइ-वे' बन गया था, पर अभी तक यम चपनी गुरू नहीं हुई थी। और फिर बस चले भी तो कैसे ? बस के लिए मदारिदा ही रहा पी दहा ? कदमफूली है भी तो इस भूखण्ड के नितात पन्दनी दिन में कहा एक नन्हा-सा गाव ही न ! और उसके बाद है गहाई नदी में दो नहीं है उस पर, जिससे होकर कोई नदी के उस पारपंदर हो । चलते-चलते ही सत्य मल्लिक ने कहा, 'इमोनियम पहनको चार नहीं था।' 'देसिए न सत्य दा, मुझे मनुमान तक नोपारिधिति यहा तक पापहवेगी।' 'तुम लोगों के कारण ही यह पारद। सो हो, पगरी देश के प्रोड्यूसर को पता चल गया दो सा होनी चार करो मिमंजरी देवी के लिए ही पटोपड़ी है। उनको बनाए निरी ने बहाने माया हूं। वह भी सिकं तुम्हारी वाउ पर विश्वास करो।' निराद ने कहा, 'शाहगंज के उन लड़कों ने ही सारी गरी है, सर। यह तो आपने देखा ही है कि कदमफूली के लड़के कितने सभ्य हैं ! इस गड़बड़ी में कदमफूलो का एक भी लड़का शामिल नहीं है, सर!' 'माना कि वे नहीं हैं, फिर भी कदमफूली की भी तो कोई जिम्मेदारी है। अव अगर मंजरी देवी को कुछ हो गया, तो उसका जिम्मेवार कौन होगा?' । ? निरापद ने कहा, 'यहां से नैनागंज पहुंचने में भी तो काफी समय लग जाएगा । अब कैसे जाएं वहां ? क्या इसी तरह पैदल चलकर?' सत्य मल्लिक ने पूछा, 'यहां आसपास में किसी के पास कार-बार भी नहीं है क्या? निरापद ने जवाब दिया, 'वैलगाड़ी है।' 'वैलगाड़ी से आते-जाते तो सुबह हो जाएगी।' उत्तेजना के मारे सत्य मल्लिक ने एक और सिगरेट जला ली। फिर कहा, 'तुम सब-के-सव गंवार-देहाती भूत हो। और ऊपर से यहां नाटक कराने लाए हो 'रूपक' कम्पनी को! पहले पता होता तो मैं आता? नहीं, नहीं, हम यहां प्ले नहीं करेंगे। समझ लो, प्ले खत्म !" निरापद डर से कांप उठा। बोला, 'नहीं, सत्य दा। हम लोगों की इज्ज़त बचा लीजिए। हम आपके पैर पड़ते हैं । जैसे भी हो, सब शान्त कर देंगे हम लोग। देखिएगा, कल किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होगी। प्राज पुलिस के आते ही सब ठीक हो जाएगा।' 'पर पुलिस की प्रतीक्षा में और कितना समय वरवाद किया जाएगा उधर मंजरी देवी को भी अकेली छोड़ पाया हूं। इस बीच उधर क्या हो गया होगा, कौन जाने ?' 'उधर की कोई चिन्ता मत कीजिए, सत्य दा। उधर गुप्ता साहव हैं, और उनके पास बन्दूक भी है। वे सब सम्भाल लेंगे।' सत्य मल्लिक ने पूछा, 'वे हैं कौन ?' निरापद ने जवाब दिया, 'वही तो गुप्ता साहब हैं। यहां नहीं रहते। कल एकाएक ही अपने गांव लौटे हैं । वहुत अमीर व्यक्ति हैं। शिकार करने जा रहे थे। मैंने उन्हें रास्ते में देखा तो मदद के लिए बुला लाया। फिर कहा, 'हां, घोड़े का इन्तजाम कर सकता हूं घोड़े पर आप बैठ ? १८ नायिका सक्ने हैन? 'तुम चुप रहो। म से ही नहीं करूंगा। अव भविष्य में नहीं प्ले करने जाऊंगा, तो पहले से सारी बात सोच-समझकर ही कद्रास्ट करूगा।' निरापद ने गिड़गिडाकर कहा, 'पाप नाराज न होइए, सत्य दाागर माप ही नाराज हो जाएंगे, तो हम लोग फिर कहा रहेंगे; बताइए न? इसने लोगों ने टिकट परीदे हैं, वे हमें गाली नहीं देंगे सपा ?' सस्य मल्लिक ने कहा, 'तुम्हें उनसरी पड़ी है। पर कहीं मंजरी देवी नाराज हो गई, तो मैं क्या करूगा; यह बतामो पहले ? तुम्हारा गांव इतना गंवार है, यह यात तुमने पहले क्यों नही बताई? मगर बता देते तो मैं पाता ही नहीं।" इतनी देर में चारहयारीतल्ला पहप गए थे लोग । युनिट के सोग सत्य मल्लिक को देसते ही उमके पास दो पाए। बोले, 'परा हुमा सरप दा? क्या हमा?' सभी के चेहरे पर उत्तेजना की गहरी छाप पो। एक ने कहा, 'हीरोइन का मेकमप रूम तैयार हो गया है. मत्यदा।' सत्य मलिक ने कहा, 'उम बात को छोड़ो। पब तो यह देखो कि 'प्ले होगा कि नहीं।' 'क्यो ? प्ले क्यों नहीं होगा?' कम्पनी के सभी व्यक्ति प्रचकचा गए मचानक ऐसा क्या हो गया, जो प्ले ही बन्द हो जाएगा? मब सत्य मल्लिक के पेहरे की मोर देखकर मन्दाजा लगाने सगे किया बात हो सकती है। 'क्या बात हुई, सत्यदा? मासिर हुमा क्या क्या कोई गडबडी हो कम्पनी के लोगों को यहां पाने के याद बहुत पाराम मिला था। निरापद-दल ने उनके याने-पीने का बहुत अच्छा इनजाम कर दिया था। रोटी-सब्जी के साप माम भी था। माम के लिए दो बकरे काटे गए थे। यस्तुत: उन सबरी कश्मनी में रहने में काफी मागम मिल रहा था। इसमें पहने इतनी सानिरधारी मोर भाराम उन मोगा को कहीं नहीं मिना पा। प्ले सन्द हो जाने को यात मुनकर वे हतप्रभ से हो गए। - 'क्या बात हुई, सत्य दा? प्ले क्यों नहीं होगा?' 'प्ले इसलिए नहीं होगा कि यह भले लोगों के रहने के लायक जगह नहीं है। यहां पुलिस का एक सिपाही तक तो नहीं है। न कोई थाना है। यहां तक कि टैक्सी, टेलीफोन या इलेक्ट्रिक लाइट भी नहीं है। यहां क्या भले लोग प्ले कर सकते हैं ? चलो, सारा सामान समेटो । कल सुबह ही हम यहां से चले जाएंगे।' फिर कुछ ठहरकर वह निरापद से बोला, "कल जिस जीप द्वारा हम यहां पाए थे, उसे क्यों छोड़ दिया; वतानो तो? वह होती, तब भी कुछ वात वनती।' निरापद ने कहा, 'अाज तो हम लोगों को उसकी जरूरत थी नहीं, इसीलिए छोड़ दी। वह भाड़े की थी। कल शाम को फिर पाएगी और मैं आप लोगों को उसी के द्वारा वापस ले जाऊंगा।' 'अगर तुम लोगों के पास इतने रुपयों का इन्तजाम नहीं था तो हम लोगों को यहां बुलाने की ज़रूरत क्या थी ?' निरापद ने कहा, 'आप तो जानते ही हैं कि यह वज्र देहात है। यहां रुपये लुटाने पर भी कोई चीज़ नहीं मिलती।' अव तो सत्य मल्लिक का स्वर सप्तम पर पहुंच गया। बोला, 'जानते हो न, 'रूपक' किसी की खुशामद करके बड़ा नहीं हुआ है। रूपक का जितना नाम और प्रतिष्ठा है, सब खुद की मेरिट पर है। कलकत्ते में तो कदम-कदम पर नाटक-कम्पनियां भरी पड़ी हैं, पर उन्हें तो जगह-जगह से बुलावा नहीं पाता। फिर रूपक की ही क्यों इतनी धूम मची रहती है ?' फिर अधजली सिगरेट का टुकड़ा फेंकते हुए बोला, 'मैं कहे देता हूं, हम लोग प्ले नहीं करेंगे। कल सुबह की ट्रेन से हम लोग निश्चित ही चले जाएंगे।' निरापद बड़ी मुसीबत में पड़ गया। संस्कृति-संघ के कई मेम्बर भी वहां खड़े हुए सब कुछ सुन रहे थे। उनमें से एक को निरापद ने अावाज दी, 'ए केतु, सुन !' कोतु के पास आते ही निरापद ने पूछा, 'हावला कहां है ?' केतु ने जवाब दिया, 'वे लोग तो तुम्हारी ही खोज में गए हैं। हाबला, १०० नायिका - बलाई मय-से-राय जमींदार महागय के पास गए हैं । तुम्ही ने तो उनसे वहा जाने को कहा था। 'मोह, यह पात है !' पर मैं तो उनके पर जा नहीं पाया। राने में हो गुप्ता साहब गे भेंट हो गई। उनको माय संकर मैं माहा बापू के पर चला गया था। फिर ये लोग यहां क्यों गए? जब मैं यहा नहीं मिला, तो उन्हें यारहयारीतल्ला नौट पाना चाहिए या या वहां जाना चाहिए पा? पे लोग लाहा वायू के मकान पर भी नहीं दिगे। मागिर गए महां ये ?' मया करे, क्या न करे; निरापरको कुछ समझ में नहीं पाया। टीक उगी वक्त उसने देगा कि दूर 'हाई-ये' पर ननागर की तरफ से पुलिस का एक पत्या पा रहा है । निरापद मुशी से उछल पड़ा, 'वाह, पुलिम मा गई ! वह देगिए!" सत्य मल्लिक ने उपर देसा। येनु, गंदा मादि सभी ने उस तरफ देगा। गुनिट के पोर सोगों ने भी देगा कि सचमुच ही दग-बारह पुलिस मे सिपाही कदमफूली को घोर चल पा रहे हैं । उनके साप में अपने दान का कोई भी व्यक्ति नहीं पा निरापद ने कहा, 'वह जो ड्यूटी पर सिपाही पान, शायर यही इनको युला साया है।' पाम माने पर पता चला कि उनमें ननागज पाने के दारोगा भी है। निरापद को लगा मानो उस के हाप में स्वर्ग पा गया हो। यह दौड़. कर दारोगा के पाग जा पहुंचा। पोधे पीछे उसके दस में सड़क भी पहुंचे। १८ हाबना पपने दल-बल सहित गिरि गोविन्द को साप मेकर माहा चार मकान पर पहुच गया था। जिन लोगों ने इतनी देर से हगामा मपा रहा था, उनमें में घिरतर सव सक जा पके थे। पर अभी भी कुछ सहपों में नदी के उस पार भुप बना रणापा। गिरि गोविन्द ने पूछा, 'कहाँ है रे? यहा तो कोई भी नहीं है।' नामिरा हावला ने कहा, 'हां, मैं भी यही सोच रहा हूं। तो क्या सब चले गए?' लाहा वावू का मकान काफी वड़ा था। सामने की ओर इस समय कोई नहीं था। हावला वगैरह सीधे भीतर घुस गए। सबसे पहले छत- वाला वरामदा था और उसके बाद बहुत बड़ा हॉल । उसी हॉल के अगल- बगल कई कमरे थे। पहले तो भीतर घुसने में हाबला को डर लगा रहा था। वह इसी सोच में डूवा था कि आखिर सारे-के-सारे लोग गए कहां? लेकिन फिर हिम्मत करके सब के सब घर के भीतर घुसे । गिरि गोविन्द ने पूछा, 'क्या बात है रे, तुम्हारी नाटक-कम्पनी के सारे लोग कहां गायब हो गए ?' सचमुच सब कहां चल दिए ? जिस कमरे में हीरोइन के रहने का इन्तजाम था, वहां सिर्फ दो-एक साड़ियां पड़ी थीं। एक ओर क्रीम, स्नो और पाउडर के कुछ डिब्बे भी पड़े थे। हीरोइन का सूट-केस, होल्डाल आदि भी सब खाली पड़े थे। बिस्तर भी खाली था। हाबला एक अनात आशङ्का से सिहर उठा। निरापद दा भी पता नहीं कहां चले गए ? हावला के साथ जितने लोग थे, वे भी चारों ओर हीरोइन को ढूंढ़ने लगे । गिरि गोविन्द ने पूछा, 'क्या सभी यहीं थे ?' वाहर प्रांगन में दो व्यक्ति खाना पका रहे थे । खाना बनाने के लिए ये लोग नैनागंज से बुलाए गए थे, क्योंकि कदमफूली के लोग मुरगी छूने को तैयार नहीं थे। कॉफी बनाना भी नहीं जानते थे। ये दोनों रसोइये भी मुंह बाए बैठे थे। हावला ने पास जाकर उनसे पूछा, 'अरे, तुम लोगों को कुछ पता है, ये ?' एक रसोइये ने कहा, 'वन्दूक की आवाज सुनकर शाहगंज के सब लड़के तो उस पार भाग गए। 'निरापद वाव को तुमने देखा था? क्या वे यहां पाए थे ?' 'हां, सिक्रेटरी बाबू पहले तो यहां थे, पर वाद में कहीं चले गए।' हावला ने फिर पूछा, 'और कमरे में जो महिला थीं, वे कहां गई ?' - लोग कहां गए १०२ नायिका 'मह तो हमें पता नहीं, या । हम कॉपी लेकर जव मोवर गए तो देगा कि यहां कोई नहीं है। हमने गोवा, पापापहीं गई होंगी।' हायला पाश्चयंचरिन रह गया। माप मे सब लोग एक-दूसरे का मह ताकने लगे। पासिर सब गए यहाँ ? बहुत ही ताग्नुब पी या गिरि गोविन्द बोर हो उठा। दोपहर के समय पोहा पाराम भी करने को नहीं मिला । मालिक ने तो यहा पाने का हुक्म दिया, जर सिपही गिगी हंगामे या गड़बड़ी का चिह्न ही नहीं है। हायला ने रमोइये मे फिर पूछा, 'शाहगंज के पडो क्या यहत पीय- चिल्ला रहे थे। उसने जवाब दिया, 'हो या करीव एक हजार लोग नदी पार कर पा गए ये पौरन पर परयर फेंक रहे थे। गिरकी-दरवारों पर भी परपर फेंके गए थे। हम लोग तो यह देगर के मारे बाहर भाग गए थे। फिर जब यही सब शान्त हो गया तो हम लौटकर भीतर माए । पर पाकर देते है फियहाँ कोई है ही नहीं।' हावला को गमझ में नहीं पा रहा था कि पय यह पपा करे ? गिरि गोविन्द ने भी यहा, 'तो मैं भय यहाँ टहरसर क्या करूंगा? में जाता हूं,मालिक से सारी बात बता दूगा। गिरि गोविन्द जाने मगा। पर दरममन यहो उसके करने को रह भी पपा गया पा? उमने जो कुछ यहा देमा, यम वही मारी बान चाफर राय साह्य को बता देगा। उगक बार राय साहब जंगा ठीर: समगे, धमाकरेंगे। प्रापिर ये प्रति भी तो पर जाने-जाने उमने देखा कि मोगों का एक भष्ट उपर मे-इपर ही घना पा रहा है । जरा ध्यान से देगते ही हायना ने समझ लिया कि पुमिग पा रही है। और गिर पुलिस ही नहीं, उनके साथ में 'पर' गटाय. रेवदर गप मल्लिक भी था। उसका मध्या पर पोर जवान चेहरा मबसे पलग ही दिगाई दे रहा था। मणके बिलाल पाग-पागे निरापद नामा भी पन मा रहे थे। निरापद काफी सेरी से पदम बढ़ाता हुमा पना पा रहा था। नादिरा १६ किसी-किसी का जीवन खुद में ही एक नाटक-सा होता है । इसका जीता-जागता प्रमाण है हीरक गुप्त । यद्यपि उसको नाटक-सिनेमा का शोक नहीं है, पर फिर भी शुरू से लेकर आखिर तक उसका जीवन किसी नाटक से कम नहीं। अगर यह सच न होता तो हीरक के बचपन में ही उसके पिता इस तरह क्यों मर जाते ? और पिता के मरने के बाद हीरक विल्कुल अनाथ क्यों हो जाता? और अगर अनाथ नहीं होता तो राय-परिवार में उसे आश्रय भी नहीं मिलता। पर पाश्रय पाने के उसी दुर्भाग्य ने आज उसको इस कदर सौभाग्य के उन्नत शिखर पर पहुंचा दिया था; अन्यथा उसको भी कदमफूली में 'संस्कृति-संघ' के इन लड़कों जैसा ही जीवन व्यतीत करना पड़ता । या सम्भव है कि वारहयारीतल्ला में मोदी-खाने की कोई छोटी-मोटी दूकान खोल लेता। या गड़ाई नदी पर मछली पकड़ने के लिए धरना देता और सारा दिन उसी में बिता देता। हीरक को वह दिन अच्छी तरह याद है, जब साधी रात के समय इस कदमफूली को त्यागकर वह अकेला ही नैनागंज के स्टेशन पर पहुंचा था और शेप रात वहां के वेटिंग-रूम में विताई थी। उस दिन इतनी बड़ी दुनिया में उसे एक भी नाम ऐसा याद नहीं पाया था, जिसके पास जाकर वह खड़ा हो सके या पाश्रय मांग सके। आज के इस वर्तमान जीवन और उस दिन के जीवन में जमीन-आसमान का फर्क है। लेकिन आज मंजरी देवी के नजदीक पहुंचकर अचानक उसे लगा मानो इससे अच्छी तो पहले- वाली ज़िन्दगी ही थी। उस अनाथावस्था में बिना खाये-पीए मारे-मारे फिरना, और साथ ही बड़े होने का उत्साह, उस दुनिया से शिकायत एवं खुद से प्यार! ओह, क्या दिन थे वे भी ! अव न तो जीवन में किसी तरह का संघर्ष है, न कोई शिकवा है, न शिकायत; और न ही किसी तरह का विरोधाभास । इन सबके न होने ने ही जैसे उसके जीवन को जड़ बना डाला है । वह कभी-कभी सोचता है, अब मैं किससे शिकवा-शिकायत करूं और किससे क्या उम्मीद करूं? अव चाहने को वाकी ही क्या रह गया है ? - १०४ नायिका यति मयतो उसीसे सबको शिकायत है तथा सनदेन-याने उसे घेरे रही हैं। पान हसारो परिवार उगो की दया पर निर्भर है। साहा यायू घर में मंजरी को निकालकर हीरा अपनी गाड़ी में में पाया। 'मैं तुम्हें विग नाम से पुका, समझ में नहीं माना?' ममरी ने कहा, 'यो ? मेरा नाम क्या तुम्हें नहीं मालूम?' होरफ ने कहा, 'मानम तो है, पर ये लोग तो तुम्हें उग नाम में पुका. ते नहीं। इन मोगी ने जब मजरी देवी नाम यताया मोर कहा कि यह फिल्म की प्रसिद्ध पमिनेत्री है.तय भी मैं नहीं समझ पाया था कि यह तुम्हीं मेरी मग्न हो! मेरो वही अन्नपूर्णा!' मजरी ने यहा, 'वह नाम बहुत पुराना था, इसीलिए बदल लिया। इसके मनाया, जैसे तुमने अपने जीवन मा नया परिचंदर गुरुपर निया है, वैमे ही मेरा भी यह नया जीवन समभो । भवतुम्हारी पहनवाली पात्र- पूर्णा मर चुकी है। क्षण भर धुप रहार यह फिर बोली, 'हो तो, भय यहां से जा रहे हो मुझे?' 'जहाँ तुम बहोगी, वही से नानूगा। समूमे भारतवर्ष में रहने की जगह है मेरे पास । याव, दिल्ली, महाम, हर मही।' मंजरी बोली, पर मैं तो इच्छानुसार हर कहीं नहीं ना गानी न !' मंगरीमो बात सुनकर हीरक चकित रह गया । बोला, 'क्यों ? बपा तुम्हें ही नौकरी करनी पाती है ? मैंने तो सुना है कि तुम फिल्म में हीरो. इन हो!' मंजरी ने कहा, 'हा.हीरोइन ह, तभी तो ऐगोबात है। मार नौग्री करती होती, तो जहा तशी होती-यहा जानी, भोर पानी मत्रों के गार मब दुर करती। मिर्फ एक पॉफिग पो छोडकर मैं और ग्मिीको भी परवाह नहीं करती। पर ग यरत तो मैं ग्यानि, प्रतिष्ठा ज्यान यो गुलाम है। मैं जो कुछ मात्र करती है. दूसरे दिन के परावारीको गमे ताजा गयरबही होती है। होरक गुप्त ने पार पलात-मनातही मुरकर एक बार मररी रेगहरे माभिरा ? र देखा। उसके बाद बोला, 'ये सारी बातें शायद नॉग हैं ? क्या उन्हें ही दोहरा रही हो तुम ?' 'तुमने कैसे जाना यह ? तुम तो कहते हो कि तुम नाटक-सिनेमा देखते नहीं ?' । हीरक हंसा। बोला, 'यह सच है कि मैं फिल्म वगैरह नहीं देखता। ही नहीं, बल्कि इनके विषय में जानकारी रखने का भी मुझे अवकाश नहीं मिलता। फिर भो नाटक में क्या रहता है, यह तो मैं जानता ही हूं।' 'अखवार भी नहीं पढ़ते ? अखवार में भी तो मेरे चित्र छपते हैं।' हीरक ने कहा, 'ज़रूर छपते होंगे, पर मुझे अखबार की वे खवरें पढ़ने की फुरसत नहीं मिलती। शेयर मार्केट की खबर देखने में ही मेरा रोज़ दो घन्टे का समय लग जाता है।' 'क्या सचमुच तुम मेरा नाम नहीं जानते ? मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है।' हीरक ने कहा, 'इतने दिन तक तो सचमुच ही नहीं जानता था; हां ; . श्राज यहां आकर लड़कों के मुंह से पहली बार तुम्हारा नाम सुना; लेकिन तव भी यह नहीं समझ पाया था कि वह तुम्हीं हो।' मंजरी ने कहा, 'योह, तो इसका मतलब है, इतने दिन तक सचमुच मेरी धारणा गलत थी!' 'कसी गलत धारणा?' 'मैं सोचती थी कि बंगाल के जितने भी लोग हैं, सब मेरा नाम हैं; मेरी सूरत से परिचित हैं। यहां के जितने भी लड़के, लड़कियां और जवान हैं, मेरा नाम सुनते ही सब मुझे पहचान सकते हैं।' हीरक ने कहा, 'खैर, तुम इस बात को इतना तूल मत दो । दर मुझे सिनेमा देखने का टाईम ही नहीं मिलता।' 'पर बंगाल की सड़कों पर तो तुम भी घूमते-फिरते हो; पोस्टर भी तुम्हारी नज़र में नहीं पड़ा ?' हीरक ने कहा, 'मोह, मैं देख रहा हूं, तुम अभी भी वैसे वैसी ही घमण्डी!' १०६ नायिका
'मेरा घमण्ड प्रभी तुमने देश ही रितना है ? यह तो बलाई गम्पाल
जानता है अच्छी तरह।
'यह यलाई मन्याल कौन है ?"
'वह मेरा प्रोड्युमर है। फाइनैम्मियर पोर स्ट्रिीम्यूटर भी है । पानी
कि वह मय कुछ है । मेरे जरा-मा मुसरा भर देने में वह निहाल हो जाता
"मोर यह गाजन जो तुम्हारे गाय पाए हैं, वे कोन है ? यही नो
तुम्हारे डायरेक्टर बदलाने हैं ?'
'उनका नाम मत्य मल्लिक है। ये कोई गाग नहीं है। उनमेपनी
के गाय तो मैं यो हो दया करके हीरोइन का रोल निभाने भली पाई
'पों, दया करके कमे ? पा सम उनके पाप नही लोगी?'
मंजरी मसाई पोर बोली, 'यो माघारणन. मैं दया नहीं करती। यह
मैं प्रच्छी तरह जानती हूं कि मेरे दया करने में मेरे प्रोपगर को लागों
श्यों का मुनाफा होता है। माज अगर एकमन्दाक्ट पर हतार करती
हूं तोवर पगबार का प्रमुग पारण वही गवर होती है।'
होरर ने पार चलाने ए पूछा, 'पय यह बताया कि तुम
जानोगो
महो?'
मंजरी ने जगरिया,'जाम से जानोगे।'
'मान नो, म तुम्हे अपने पर ही से जाऊ, सय?"
'मुझे इसमें कोई पारत्ति नहीं है । गुना है. नुमने मेरे मेरुप-म के
लिए माफी या माना दिया है"
'म यही पौर युछ नही मुना?'
'पौरममा मुनतो?'
'तुमने यह नहीं मुना कि पब मेरे पाम भी बहन से है? यह नही
गुना कि मैं मोहे का कारोबार करता हूँ ? क्या या नहीं गुना कि मेरी
सम्पनी की फरारी में हजारो गोमाग में मोगबामगरले."
मंजगी महगाए हीरक की पोर एपटक देंगे जा रही थी। हमने
फिरगहना पिया, 'उग दिन मगर ताई घर में न भगा देती तो पाया
পাধি ?
व कुछ नहीं होता । तव संभव था कि कदमफूली के अन्य मैं भी ग्राज पंडाल बनाकर मेहनत करके नाटक करता फिरता। या र बारहयारीतल्ला में मनिहारी की कोई छोटी-मोटी दुकान कर लेता यवा नदी किनारे बंसी लेकर मछली पकड़ता।' मंजरी ने कहा, 'तुम्हारे चले जाने के बाद मैं भी गांव से भाग गई पी। क्या तुम्हें पता है ? 'नहीं तो! भागी क्यों?' 'तुम्हारी खोज में ही भागी थी।' 'यह क्या कह रही हो?' मंजरी ने कहा, 'हां, यह सच है। पता नहीं उस वक्त क्या मन में पाया कि जो काम प्राज तक नहीं किया था, वही कर बैठी। हमारे वंश में आज तक किसी ने ऐसा नहीं किया।' 'ओह, यह वात है ? फिर उसके बाद ?' 'उसके बाद पता नहीं कैसे और क्या-क्या हुप्रा? मैं कदमफूली से पैदल चलकर सीधी नैनागज स्टेशन पहुंची और ट्रेन में बैठ गयी। उस समय ग्राधी रात थी। मुझे बहुत डर लग रहा था। मैंने सोचा, यह क्या कर रही हूं ? अगर अभी मुझे कोई पकड़ ले, या मेरी इज्जत लूट तो? पर मां और पिता जी पर मुझे बेहद गुस्सा आ रहा था, क्योंकि लोगों ने तुम्हें निकाल दिया था, इसलिए वापस घर लौटना भी चाहती थी।' 'उसके वाद ?' 'उसके बाद ट्रेन चल पड़ो। मेरे पास न टिकट था, न कुछ स आदि। उसी ट्रेन से रिफ्यूजी लड़के-लड़कियों का एक दल पाकिस्त पा रहा था। उसमें मैं भी शामिल हो गई। उनमें से किसी के टिकट नहीं था । अतः मुझे भी लोगों ने उसी दल में से एक समझा पाकिस्तान से निकाले लोगों के साय एक हो गई। रास्ते में कोई चैलेंज नहीं कर सका। मैं उनके साथ-साथ कलकत्ता चली गई के साथ एक रिफ्यूजी कॉलोनी में ठहर गई। सभी ने यह समझ मां-बाप या अपना कोई भी साथ नहीं रहा । उन लोगों ने सोच नायिका दो के समय उन ममी का रान कर दिया गया है 'उराके याद?' गाड़ी डाइव करते-करते हो हीरक मारी या पान ग मुन रहा था । बोला, 'उसके बाद क्या हमा?' "उगा याद तुम्हारी यही मन्नपूर्णा एक दिन मंजरी मन बन गई। मेरा नाम हमा, रुपये हुए; मेरी कोई भी च्या या मालसा बाकी नहीं रही। मौर पर तुम मुझे यहा देख ही रहे हो।' 'इम पहले तुम कदमलो पानी नहीं पाई ?' मंजरी ने कहा, 'कभी नहीं । यही पहली बार माईहूँ।' 'मग ताऊ जी-ताई जी ने तुम्हारी कोई सीजनगयर नहीं नी ? पर उन्होंने थाने में सबर तक नहीं दी।' मंजरी ने कहा, 'हो सकता है, उन्होंने मेरी गोजमो हो। गंगर है. उन्होंने पुलिस में भी गारदी हो । या फिर ऐमा भी हो सरना है कि सोप-तान के डर में रिमी को कुछ यताया ही न हो।पा मुगिन है. कोई भूटी पफराह उड़ा दी हो। वायद यह पहरिया हो कि मैं मामा की पर जाने के बाद पचानक मर गई। मय दुल मुमरिन है। पर इन यार में मुझे टीप-टीक मुछ भी पता नहीं है।' 'उम याद मा हुमा?' मंजरी ने जवाब दिया, 'उसके बार मोरक्या होता? उसके बाद तो भर में यहां तुम्हारे सामने हं हो।' 'मा ताज जी-ताई जोसिी पो भी नहीं पता कि तुम यही नाटक करने पाई हो?' मंजरी ने कहा, 'मुझे हो क्या पता पाकिम यहो पा रही है. गाम मोपदमनी में? और न यह पाया कि यहां मार तुमसे फिर मना. कान हो जाएगी। मेरे शायरेक्टर मत्स दा ने पहने से कुछ भी नही उनाया पा मुझे। फिर रास्ते में जब मैंने करमतोमानाम मुना तो मात्री चाहा किमही नही मा पर गत्य मलिक को भी नो पा नहीं पा शिपही मम्मपनी मेरो जन्मभूमि है।' 'तो तुम्हारे बारे में पता किमी पोष्ट पता नही" 'नही, पभो तातो रिमोमोधरा नहीं है। मैंने पिमी गोभी मादित नहीं बताया । जब कार इधर प्राने लगी थी तब मुझे शक हुआ था कि यह मुझे किधर ले जा रहे हैं। बस, तब से वही पुरानी बातें सोच रही हूँ। सोच रही हूं कि आज तकदीर मुझे कहां ले आई है । बाहर जव सब लोग चीख चिल्ला रहे थे, गाली-गलौज कर रहे थे, खिड़कियों पर पत्थर फेंक रहे थे; तव मेरा उधर बिल्कुल भी ध्यान नहीं था। मैं तो वस वैठी-वैठी अपनी ही बातें सोचे जा रही थी ! मैं हंसू या रोऊं; कुछ भी समझ में नहीं 1 पा रहा था।' हीरक ने कहा, 'अरे, बातों-ही-बातों में हम बहुत दूर निकल पाए विल्कुल नैनागंज की तरफ ! चलो, अव घर की ओर लौट चलें।' 'घर?' मंजरी अवाक रह गई 1 वोली, 'तुम्हारे घर?' हीरक ने कहा, 'हां, मेरे घर जाने में तुम्हें कोई एतराज़ है ?' 'नहीं एतराज़ भला क्यों होगा! पर तुम्हारे घर में कौन-कौन हैं ? 'मेरी पत्नी है । बस, और कोई नहीं।' 'और लड़के बच्चे ? क्या वेटा-बेटी कोई नहीं है तुम्हारे ?' 'हां, है, एक लड़का । उसको अमेरिका भेज दिया है। वहीं पढ़ता है वह।' 'तो सचमुच ही तुम मुझे अपनी पत्नी के पास ले चल रहे हो ?' 'क्यों, ले जाने में क्या बुराई है ?' 'नहीं, बुराई तो कुछ नहीं है । पर वहां ले जाकर तुम मेरा परिचय क्या दोगे ? क्या यह कहोगे कि मैं सिनेमा-स्टार'मंजरी सेन हूं।' हीरक ने कहा, 'जो परिचय तुम कहोगी, वही दे दूंगा।' 'अगर तुम मेरा असली परिचय दोगे तो क्या तुम्हारा कुछ नुकसान नहीं होगा?' 'नुकसान?' कहकर न जाने मन ही मन हीरक क्या सोचने लगा। मंजरी ने कहा, 'क्या तुम अपनी पत्नी से कह सकते हो कि शादी से पहले तुम मुझसे प्रेम करते थे? क्या उसे बता सकोगे कि मेरे ही कारण मां ने तुम्हें घर से निकाल दिया था? बता सकोगे कि मेरे पिता के पास ही तुम्हारा पैतृक मकान दो हजार रुपयों में गिरवी पड़ा था? सव कुछ खोल- कर उसे बता सकोगे न? अच्छी तरह सोचकर देख लो।'
होरक चुपचाप कार चलाता रहा। मजरी ने फिर कहना गुरुकिमा, 'सय भन्छा तो यही रहेगा कि मुझे महाँ से लाए हो, यही यापम परपा प्रायो।' हीरक ने रासे केएम. मोर कार रोकती। फिर पॉकेट से सिगरेट. पेस निकालकर एक सिगरेट गुनगाई। सामने पश्चिम को मोर पेड़ों के ऊपरी छोर पर नाम का मूरज पटका हुमाया। हीरक ने एक बार उस सरफ देवा। फिर एक सम्बा-मा बा लेकर घुमा उगल दिया। पिछली मीट पर मन्दूक पाडी रसी हुई थी। हीरक ने कानर होकर उसकी तरफ देया। कहा तो जा रहा पा मजे से मौत की भोर शिकार करने पौर पहा क्या-मे-या हो गया ! वैसे तो यह बन्दूक होरर के जीवन में हर- दम माय रही है । इमो बस से उसने कितनी हो बार चिडिया, माप पौर हिरण वगैरह का शिकार किया है। पर मान तक उसे मनुष्य का शिकार नहीं करना पड़ा था। मात्र यह पहला अवसर है। मान यह पहला भवगर है, जब उसे मनुष्य का शिकार कर पाना पड़ा है। उस दिन को अन्नपूर्णा पाज एकदम से मंजरी सेन बनकर उसकी जिन्दगी में मा गई है। मिर्फ मंजरी सेन ही नहीं, बलि मय उसके साप रपये, रयाति, परखन मोर प्रतिष्ठा समो कुछ मोजूद है। हठात् हीरक ने कहा, 'इससे तो पन्छा है पन्न पलो, हम कहीं भाग चलें। 'क्यों? मुझे अपने घर ले जाते डर लगता है।' हीरक ने कहा, 'हा। 'किस यात कार?' हीरक ने कहा, 'तुमने जो-जो गाते भी नहीं है, वे में मपनी पत्नी से नही रह सकगा । माया तो मुझमे पूगी हो कि तुम मेरा परिषय किरा तरह हमा? तुमसे मेरा श्या मम्याप है।' 'फिर ऐमा करो, तुम भूठ बोल देना। तुम परते थे ममें जानते हो, यह बात हो या देना पहना जिगाट में मुझे एटारा दिलाने की गरर से ही तुम मुझे पपने पर से पाए हो।यो, ऐमा नहीं बह गहोगे।" पता नही होस या सोचने सगा। कुछ देर बाद बोना, 'नहीं, . नासिा ।
, कह सकूँगा।' फिर ? शायद पत्नी से तुम बहुत डरते हो?' रक ने जवाब दिया, 'हां, डरता हूं।' तो फिर अब तुम्हारा क्या इरादा है ?" होरक बहुत देर तक सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाता रहा। फिर i, 'सुनो अन्न, मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने आज तक जो कुछ भी है, वह गलत था।' 'ऐसा क्यों कहते हो?' 'अन्न, तुम्हें मालूम ही है कि मेरी जगह कोई दूसरा व्यक्ति होता तो झ जैसी स्थिति में अपने को परम सुखी मानता । गत वर्ष हमारी कम्पनी न सत्रह लाख रुपये इन्कम टैक्स में दिए हैं। इसके अलावा खुद मैंने भी पर्सनल-टैक्स के रूप में तीन लाख रुपये दिए हैं। अव इससे अधिक मेरे जैसा प्रादमी भला क्या कर सकता था, बोलो तो? किसी दिन इसी हीरक ने स्यालदह स्टेगन पर चाय की दुकान के सामने डेली पैसेंजरों से एक-एक पैसे की भीख मांगी थी। सिर्फ इतना ही नहीं,पैदल चल-चलकर अखवारों की फेरी तक की है मैंने । लोगों के घरों में नौकर का काम किया है। कारखानों में इन्हीं हाथों से हथौड़ी भी चलाई है मैंने। और उसके बाद, अचानक ही युद्ध छिड़ गया।' इतना कहकर हीरक ने मंजरी की ओर मुंह घुमाकर देखा। पूछा, 'क्या बात है, कुछ बोल नहीं रही हो तुम?' मंजरी ने जवाब दिया, 'मैं सब सुन रही हूं, तुम कहे जायो । हां फिर उसके बाद?' हीरक ने फिर कहना शुरू किया, 'उसके बाद से अब तक मैं रुप कमाने में ही लगा रहा हूं। रुपये कमाता हूं और खर्च करता हूं। पर अ बारे में सोचने का मौका मुझे प्राण तक नहीं मिला। मैंने सोचा था सिर्फ रुपयों के बल पर ही मैं सारी दुनिया को खरीद सकूगा । पर तुमने मुझे उलझन में डाल दिया है।' "मैंने?" हां, तुमने । कदमफूली में मैं इससे पहले भी बहुत बार या ११२ नायिका पपने रिता के पुराने मकान को मैंने पैलेस में पदम दिया है। इस पदम- फूमी ने मुझे रिलनी यातनाएं दी हैं, उन सबका मैंने पूरा-पूरा प्रतिगोप लेना चाहा है। मुझे ऐमा महसूस होता रहा है कि मारी दुनिया हो मेरे विरुद्ध कोई पदयंत्र रच रही है । इसीलिए मैंने प्रतिमा सीपी किपद के पैरो पर गडे होते ही हम समूची दुनिया से में अपना प्रतिगीय नगा। पर माज तुमसे मुलाकात होने के याद गे मुझे ऐगा मग रहा है पन्न, मानो में हार गया हूं। सचमुच हो मेरो पराजय हुई है।' मजरी हमने लगी। बोली, 'ऐसा क्यों कहते हो? परा मैंने एपमुष हो तुम्हारी यहत क्षति को है?' हीरक ने कहा, 'नही में तो यह देख रहा हूँ कि दुनिया में कुछ भी नहीं कर पाया । सिर्फ अपने स्टाफ के मामने ही मैं फरिश्ता माना जाता हूं, पर मपनी फैक्टरी के बाहर मेरा कोई मस्तिस्य नहीं । जति.." 'जबकि क्या?' 'जवकि तुमको सिर्फ एक नजर देसने भर के लिए हजारों की संस्था में लोग बाग तनी हुई भन्दूक के सामने भी निर्भय होकर सीना ताने गड़े रहते हैं। सिर्फ एक बार तुमको देखने के लिए दूर से ही सही, पर लोग तुम्हें एक धार देखना चाहते हैं । शहर होता तो पता नहीं तुम्हारा गया हाल होता? जहा सिनेमा-नाटको की भीड़ लगी रहती है, वहा तो मोग तुम्हें चौर-फाडकर चट कर जाते।' मंजरी ने कहा, 'इस वक्त इन बातों को जाने दो।' होरफ ने पूछा, 'हा, तो वतामो, बहा पले ?' मजरी ने कहा, 'यहां से बहुत दूर, कहीं भी ऐमो जगह घमो, वहाँ फोई मुझे पहचान न सके। 'पर ऐमी जगह मिलेगी कहा?' मंजरी ने कहा, 'चलो, दूढ़कर देखें कि एमी जगह नहीं मिलती है या नहीं। होरक ने कार स्टार्ट को। गाड़ी पर पहो। सामने दोनों पोर मना मैदान फैना पड़ा था मौर हाई-वे वाली घोड़ी माक मोपो नै नामंत्री भोरचली गई पो। कार तो यों भी यहा तिर एका पोरना . ।कार लेकर इस अंचल में प्रधिक आना-जाना कोई नहा त में काम करते हुए किसान-मजदूर हाथ का सब काम छोड़कर ए एकटक इनकी ओर देखने लगे। 'हीरक, देखो वे लोग कितने सुखी हैं ! हैं न ?' 'कोन लोग?' हीरक ने एक नज़र उधर देखा। नंगे बदन पर सिर्फ कमर में एक ड़ा लपेटे हुए तथा सिर पर एक साफा बांधे हुए थे वे सब किसान । कसी-किसी किसान की पत्नी भी खेत पर आई हुई थी। वे दोनों गांव के इन किसानों को जानते थे । मंजरी और हीरक इसी कदमफूली एवं नैना- गंज में पैदा हुए थे, यहीं बड़े हुए थे। फिर भी इतने दिनों बाद प्राज उनकी नज़रों में यह सब नया-नया-सा लग रहा था। हीरक ने कहा, 'लेकिन अन्न, वे लोग हमें सुखी मानते हैं।' 'ऊंह, उनके मानने से क्या होता है ! वे लोग रात को निश्चित होकर सो तो सकते हैं न ! मेरी तरह इतनी परेशानियां या चिन्ताएं तो नहीं सताती उनको।' होरक ने आश्चर्य से पूछा, 'कैसी बातें करती हो तुम? क्या रात को तुम्हें नींद नहीं आती ?' मंजरी ने जवाब दिया, 'नहीं।' 'क्यों?' जवाब मिला, 'पता नहीं। मुझे खुद भी नहीं मालूम । इसके अला वाहर के भी किसी व्यक्ति को इस बात का पता नहीं। नदी पार क लाहा बाबू के मकान के सामने जिन लोगों ने मुझे सिर्फ एक बार दे के लिए इतना बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया था, काश, वे लोग जान कि मुझसे वे लोग कितने अधिक सुखी हैं !' 'तुम दवा क्यों नहीं लेती? डाक्टर को क्यों नहीं दिखाती ?' मंजरी ने कहा, 'दिखाया था।' 'क्या कहा उसने ?' मंजरी बोली, 'पहले तो उसने मुझे एक गुलाबी रंग की थी। पर वह मैं बहुत अधिक लेने लगी; इसलिए उसे बदलकर नायिका एशमरी सफेद रंग को टेबलेट दे रहा है। उसराना है, पहलीवाली गोली से शायद 'हार्ट' कमडोर हो जाता है।' 'ये गोलियां तुम रोज लेती हो?' मंजरी ने जवाब दिया, बिना लिए रह भी तो नहीं जाती।' 'क्यों, सम्हे मला ऐमो कौन-सी तकलीफ है?' मंजरी पहले सगो, 'मैंने यही बात ऑस्टार से भी पूछोपीकि मुझे गौन- सी तकलीफ है ? मेरे पास तो रूपये भी बहुत हैं, मेरा स्वास्थ्य भी मला-धंगा है। मुझे किसी की नौकरी भी नहीं करनी पड़ती। नपर-गृहस्थी का हो मुझ पर कोई योझमा झमट है। मुझे रुपये देने के लिए मभी दिन-राल मेरी शुशामद करते रहते हैं। जिस दिन रिमी सिनेमा-हाठग में मेरी कोई नई फिल्म रिलीज होती है, उस दिन हॉल के सामने की भीड़ को कन्ट्रोल करने के लिए पुलिस बैठानी पड़ती है। फिर मुझे क्या तकलीफ है?' "तोमाटर ने क्या कहा ?" 'हॉस्टर ने जो कुछ कहा, मैं उमा मुछ भी मतलब नहीं समझ पाई। रोटर का कहना है कि मुझे जितना मिलना उपयुस था, उससे बहुत ममिक मिल गया है। इसीलिए मुझे इतनी तकलीफ होती है।" "इगरा मतलब?' 'मतलब पता नहीं क्या है। शायद मेरा इतना नाम नहीं होता, इतने रपये मेरे पास न होते, तमी पन्छा रहता। तभी वापर मैं उन सोगों की तरह सुख से सो सकती। 'कहीं बाहर पुमने क्यों नहीं जाती; जिस तरह मैं पमता-फिरता हूँ?' 'कोई जगह भी तो ऐसी नहीं छोड़ी, वहाँ मैं न गई हो। इगिया में, दलिया के बाहर, गमुद्र के उग पार, पहाड़ों के गियर पर; सर जगह तो मुझे से जा चुका है यताई सन्याल ।' 'वही तुम्हारा प्रोड्यूसर बलाई मन्याल ?' 'हो, यही। इसमें उसी का सो फापता है। मेरे स्वास्थ्य के बारे में मुमो पिक उसी को तो सिर रहता है।' हीरक ने कहा, 'मोह ! मामामी सो पाया ही मिना है तुम्हें !' 'पया वह फिर्फ मेरे ममे-युरेरो प्यान में रखकर ही यह मर करता मादिरा ॥
रे स्वस्थ रहने का अर्थ है, उसकी अधिक कमाई होना । पर इस वा
यद बलाई सन्याल भी हार मान गया होगा।'
'वो कैसे?'
'इतनी मुश्किल से वह मुझे सम्भाल-सम्भालकर रखता है। फिर भी मैं
की प्रांखों में धूल झोंककर इस सत्य मल्लिक के साथ नाटक करने
कल पड़ती हूं। उसकी समझ में नहीं आता कि मैं क्यों नगर के बाहर
से गांवों में नाटक करने आती हूं। जबकि शहर की व्यस्तता से ही थककर
में हांफ जाती हूं, मेरा दम घुटने लगता है।'
'पर प्राज रात को यदि तुम्हें नींद न आई तो क्या करोगी? गोलियां
कहां से मिलेंगी तुम्हें ?"
मंजरी ने कहा, 'मेरे पास हरदम गोलियां रहती हैं। इस समय भी
मेरे सूटकेस में रखी हैं । मैं उन्हें साथ ही ले आई हूं।'
'पर तुम्हारा सूटकेस तो लाहा बाबू के घर में है।'
'योह, हां!' इतनी देर बाद मानो मंजरी को सब कुछ याद आया।
उसे याद आया कि वह कदमफूली में पाई है, और 'रूप और रूपा' की
हीरोइन है। उसे यह भी याद आया कि उसको लाहा बाबू के मकान में न
पाकर सभी हताश हो जाएंगे। जिन्होंने नाटक देखने के लिए टिक
खरीदा है, वे सभी उसे न पाकर चीख-पुकार मचाएंगे । अव सब याद मा
लगा उसे । पर फिर भी उसे लगा, यही ठीक है, यह भाग पाना ही उस
हित में अच्छा रहा है।
मंजरी ने कहा, 'उधर भी तो एक रास्ता है न, हीरक ?'
हीरक ने कहा, 'उधर तो फूलवाड़ी है।'
'तो ठीक है, फूलवाड़ी की ओर ही चलो न!'
हीरक ने पूछा, 'फूलवाड़ी में जाकर क्या करोगी?'
मंजरी ने कहा, 'करना कुछ नहीं है, बस, वहां जाना चाहती
'पर वहां तो कहीं रहने की जगह है नहीं। वह तो एकदम
जगह है।'
मंजरी ने कहा, 'रहने की जगह न हो तो न सही, पेड़ की
होगी न वहां।'
का
पेड़ के तले रहोगी?' 'क्यों, पेड़ की धार मा सराव जगह है ?' 'यरियहाँ गरमी पधिक हुई तो?" 'तुम्हारी गाडी तो है ही। तुम्हारी गाड़ी में ही गो गाऊंगी।' 'मोर परिभ्रस लगेगी, तब ?' मंजरी ने कहा, 'भूग मगेगी तो सार मे पलार नागंज से सा पाएंगे। वहां की मूडी पोर गुलाबजामुन बहुत बढ़िया होी हैं।' 'तुम मूडी सामोगी?' "क्यों ? मया मूडीपराव चीज है ? जानी हो, कितने ही दिनों से नमक-पानीवाला बागी मान पाने को मेरी इच्छा हो रही है, पर मैं गा नहीं सकती। तेल में तनी चीजें गाने को इन्सकरती है,परम में भी गा नहीं सकती। तुम्हें मालूम है, कई बार तो मुझे भर पेट भात पाने को भी नही दिया राता?' हीरक विस्मित-सा हो गया यह सब मुनकर । बोला, 'पपों ? भर पेट साने को क्यों नहीं दिया जाता? यतामोसो कोन नहीं गाने देता तुमको? 'मोर कोन ? यदी यलाई मन्याल । हमारा प्रोड्यूसर उसे है कितनी तली वीज साने से मेरा परीर विगद पाएगा। मात सारुर मगर मैं मोटी हो गई तो नुरुमान बताई मन्याल का ही होगा म । मेरे कारणही ती बलाई सन्यान की कमाई होती है। मगर मागों कमाती हूं तो यलाई सम्मान मुझे गटाकर करोड़ों रपये कमाता है।' 'यह यात है ? तुम्हारा बनाई सन्यास करोडरोपों का मानिस है?" "गि परेला बनाई गवाल ही नहीं, पति हमारी मिनेमा-माईन मे यलाई सन्यास जैसे पौर भी तो यहा से लोग हैं, जो करोड़ों पपी में मालिक है। होरस ने पहा, 'चतो तब पवाटीकी तरफ हो पा!' पर 'दाई का रास्ता छोरकर उनकीर यमलयाने छोटे राम्ने पर पम पहो। कम्पा मिट्टीवाला रासा। नगर हो जाने मारन कोपर गूगकर पूल में परिवर्तित हो गया था। पहिलो के बारसे धन उहाकर मारी के भारा-मह पर जमने लगी नादि हीरक ने मंजरी की ओर देखकर कहा, 'देखो, तुम्हारा मेकअप खराब हो जाएगा।' मंजरी ने कहा, 'होने दो । तुम चलो।' । २० वंशीवदन अपने कमरे में था। अचानक पुकार सुनकर वह भीतरी बरामदे में गया तो माया ने पूछा, 'वंशी, साहब कहां गए हैं ।' वंशीवदन ने कहा, 'जी, वे तो दोपहर के ही गए हुए हैं।' 'यह तो मुझे भी पता है । पर वे कहां गए हैं और अभी तक लोटे क्यों नहीं?' वंशीवदन ने पूछा, 'एक वार ढूंढने जाऊ ?' साधारणतः यहां आने के बाद गुप्ता साहब दो-एक दिन घर में ही विताते और यहां के किसी भी व्यक्ति से नहीं मिलते । जव वे घर में सोकर या उठ-बैठकर सब तरह से ऊब जाते तो उनका मन छटपटाने लगता। गुप्ता साहब काम-काजो जीव हैं, यह वंशीवदन अच्छी तरह जानता है। कभी-कभी तो वे कुदाल लेकर स्वयं ही वाग की मिट्टी खोदने लग जाते या फिर चहारदीवारी के किनारे-किनारे पोधे रोपने लगते । ऐसा था गुप्ता साहब का स्वभाव । कभी तो वे खानसामा-बावर्ची साय लाते, और कभी वंशीवदन के हाथ का ही बनाया खाना उन्हें स्वादिष्ट लगता । वंशीवदन उनको मनमौजी स्वभाव का व्यक्ति मानता था। उसके बाद शिकार की बारी आती थी। बहुत पहले एक वार गुप्ता साहब का खास नौकर मोहन उनके साथ पाया था । साह्य के साथ मोहन सारी दुनिया में घूम चुका था। मोहन के मुंह से ही वंशीवदन ने गुप्ता साहब के मनमौजी स्वभाव की कहानी सुनी थी। उनके मिजाज के बारे में उसने मोहन से काफी सुन रखा था। साहब को कैसा और क्या-क्या खाना पसन्द है, यह भी जान लिया था उसने । मोहन जव उनके साथ नहीं पाता तो वंशीवदन का डर के मारे ११८ नायिका बुरा हाल हो जाता था। यह इस भय से कांपता रहता कि पता नहीं साहन उगके हाय कासाना पसन्द करेंगे या नहीं। 'मोहन कहा करता था, जानते हो यंशी, साहब के पास बहुत रुपये हैं ?' वसीयदन जयाय देवा, 'उहर होगे। मन्यमा इम वय देहात में कोई मोटर मे बैटकर माता है? 'नहीं भई, मेरे कहने का यह माला नहीं है। मैं तो यह बह रहा हूँ कि उनके पाग पयिक रुपये हैं, इसीलिए झंझट भी यहत है। इन्हीं झमट ममेलों से कवकर हमारे सार यहाँ भाग पाते हैं। यशीषदन के दिमाग में ये सब बातें नहीं थी । वह महता, 'व गाये हों तो फिर कट-मगीयत किग यात की, मोहन ? देगो न, हम- सौगों के पास स्पर्म नहीं है. इसीलिए इतनी मुसीयत है। पर साहयको किस बात की तकलीफ है ?' मोहन को गुप्ता साहय को सर झमटी ममीयतों का ज्ञान पा । साहन पर कितने मामला-मुकदमों का रोम रहता है, उनका कितना बड़ा मोफिग है, जिसमें नित्य कितने-कितने लोग नौकरी के लिए परना दिए बैठे रहते हैं। मादि-मादि बहत-सी बातें हैं, जिनका मोहन को जान था। पर इतना राव कशी को नहीं मालूम था। उगने तो इन्हीं साहब को, जब ये बहुत छोटे थे, तब मे देगा है। उन दिनो उसके लिए यही साहय मुन्ना थे। उसके बाद मुन्ना से मुन्ना यार हुए। और फिर बाद में मोहन के मह से ही मुन-गुनकर यशोवदन उन्हें मुन्ना याब मे साहब करने सगा। साहय पूछने, 'यो, क्या तुम मछली का बढ़त हो सादिष्ट बोरया यना सकते हो?' पहने-पहल सो यशी को गर्म पानी पी।पर यार मे माहर ए मान. ग्निरो मरने गाने को प्रा सा मुनमुनकर उसमा गाहम वा गया। पा गिने दिन माहब यहां रहने, वो गांव की साग-पाम पोजे उनके लिए पकातापा। गाय कहो, 'बाह वंशी, तुम तो गाना पराने में बहन माहिर हो!' वंशी रहना, 'मोहन-सा साना तो मुझे बनाना नहीं माता, नापिरा - . - होरक कहता, 'अब मैं मोहन को छोड़ दूंगा और तुम्हें ही साथ ले जाया करूंगा।' माया कहती, 'तव तो बस, हो गए निहाल !' हीरक पूछता, 'क्यों ? क्या वंशी नहीं सकेगा?' माया कहती, 'सकेगा क्यों नहीं; पर उसे तुम्हारे मिजाज़ का अन्दाज़ है नहीं। जिस दिन तुम्हारे तेवर से उसका पाला पड़ेगा, वह नौकरी छोड़कर भाग जाएगा।' यह सच भी था । वात अस्वीकार करने लायक नहीं थी। हीरक गुप्त के मिजाज़ की जानकारी कदमफूली के लोगों को नहीं थी। वह तो उसकी फैक्टरी का स्टाफ ही जानता था। गुप्ता साहब को देखते ही उनके मेरु- दण्ड तक में आतंक से कंपकंपी छूटने लगती थी। इंजीनियर और फोर- मैनों का दल कांप उठता था। वे मन-ही-मन भगवान को याद करते रहते। फैक्टरी में वरावर ही युनियनें बनाने की मुसीबतें उठती रहती हैं, वहुत वार स्ट्राइक हो जाता है, कितनी बार पुलिस को बुलाना पड़ता है और कितनी ही वार खून-खरावा तक हो जाता है। इन्हीं सव झंझटों में कारण कितनी ही वार फैक्टरी से सीधे घर पाकर गुप्ता साहब ने घर भयानक महाभारत छेड़ा है। घर में घुसते ही जो उनके सामने आया उसे उन्होंने नौकरी से निकाल दिया है। आखिर में जीवन की पीड़ा सारी कड़वाहट माया पर पाकर गिरती । वे माया को सामने पाकर का सारा जहर उस पर उड़ेल देते और साधारण-सी बात को लेकर नक-से-भयानक काण्ड कर बैठते । एक दिन डाक्टर ने उनको एक की टेवलेट दी और कहा, 'रात को सोने के पहले रोज़ एक खा ली' मिस्टर गुप्ता!' पहले-पहल तो उन्होंने अपने को संयत करने की कोशिश की में उन्हें गोलियां खानी ही पड़ीं। और इन गोलियों का बहुत ५ हुआ । मिजाज़ ठण्डा भी रहने लगा तो उन्होंने गोलियां लेनी व पर एक बार फिर कारखाने में 'लेवर-ट्रबल' हुया तो उन्हें १२० नायिका गोलियो पानी पड़ी। तभी उन्हें कुछ शान्ति मिली। इसके बाद फिर डॉक्टर को बुसाने की जरूरण न पड़ी। वे स्वयं ही दुकान से गोलियां सरीदकर साने लगे। माया ने एक बार उन्हें मना भी किया, पर हीरक नहीं माना। मासिरकार एक बार ये सस्त बीमार पड़े । होपटर ने सारी यात मुनकर कहा, 'मापने यह क्या किया? क्या इस तरह की गोलियां नही दतनी पमादा पाई जाती है ? इममे हाट कमशेर भी तो होता है।' हीरक ने कहा, 'पर डॉक्टर साहय, रात को मुझे नीदमों नहीं माती?' डॉटर ने कहा, 'टेन्शन मे । टेन्सन कम होते ही पापो नीद पा जाएगी। यात मुनकर गुप्ता साहय स्वयं ही युदबुदाने लगे, 'टेन्शन ! टेन्सन !' पर टेन्मान है किस यात का? न तो उन्हें कोई प्रभाव है, न दु: है पौर न ही किसी प्रकार की पीडा है। ये तो सीढ़ी-दर-मोदी उन्नति के नियर को पोर ही बढ़े जा रहे हैं। पभो उन्हें मोर भी कचा उटना है पौर ऐसी जगह पर पना है, जहा पहपकर पतन को यात शौचना भी पग- गत है । फिर टेन्सन क्या होने लगा? डॉक्टर ने समझाकर महा था, 'माप जिस तरह गोगो, परमगत बात यह नहीं है । मापको गरम होने से ही टेक्सान होता है। मोर मिस्टर गुप्त, यही मापका पसली रोग है।' माया ने पूछा पा, 'तो फिर ये ठीक कैसे होंगे, परमात्य" डॉक्टर ने जवाब दिया था, 'परिपाद म्य इन्हें रिलेकर फर गरें, सनीय ठीक हो गाने है। पगर कभी-कभी पाप एमी जगर नागर, जा टेलीफोन न हो, भरमार न हो; पानी मिटी रो यत दूर रिमी ममः गिनारे या फिर रिसोनिपट देहात में जहां मार लोगो मोमोई नहीं जानता हो, सो यहा उन्हें दिमागोमानि मिलेगो।' मतः उसी समय हीरक पहली बार पदमपानी में पाया था। यहा पापर माम-धं दीवात उगे याद नहीं पाती। दया का ध्यान भी नहीं माता कभी। यहाँ न तो अगवार के लिए पनायास उरोजना ही नापिका न ही ट्रंक-कॉल का अाधुनिक अत्याचार था। बहुत ही निरि पा यहां पर उसका। द में जब भी फैक्टरी से उसका मन ऊवकर छटपटाने लगता या झमेले ते, तो वह सीधा यहीं चला आता था । कई दिनों तक यहां रहकर राम से अपना समय विताता, पक्षियों का शिकार करता, भर-पेट । और सो जाता। और इन सबके बाद भी जब समय बचता तो रे-आकाश के नीचे माया के साथ बैठकर घरेलू बातचीत करता। वास्तव में देखा जाए तो हीरक के कदमफूती पाने का यही संक्षिप्त तिहास है। पर यह पहला मौका है, जब व्यतिक्रम घट रहा है। अचानक ही मिसेज़ गुप्त को लगा कि ऐसा तो कभी नहीं हुआ। शिकार को तो हीरक हमेशा ही जाता है, पर थोड़ी देर तक ही यह झील के किनारे रहता है। कभी शिकार करने में वह सफल हो जाता है तो कभी असफल; पर इतनी देर तो उसे कभी नहीं लगती। वंगीबदन को बाहर भेजकर माया खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई। गांव में साधारणतः पक्के मकान नहीं होते । टिन के छप्परों की संख्या ही अधिक होती है । माया ने देखा, दूर पर कदमफूली के ज़मींदार विष्णु राय की हवेली टूटी-फूटी हालत में खड़ी है। उसके एक तरफ पता नहीं किसका घर है, जिसका फूस का छप्पर दिखाई पड़ रहा है । छप्पर पर कोहड़े की वेल फैली पड़ी है; और उसके उस पार नेशनल हाई-वे व लम्बा रास्ता नैनागंज के बाजार की प्रोर चला गया है । कितनी ही गा भैसें और बकरियां मैदान में घास चरती हुई घूम रही हैं। उस तरफ देखते रहना माया को बहुत अच्छा लगा। समूची पृथ्वी ढूंढ़े भी शायद ऐसी एकान्त-शान्त जगह नहीं मिलेगी। पर यहां भी के लड़कों ने नाटक करना शुरू कर दिया है ! लगता है, धरती पर [ शान्ति बची है, वह भी निश्चिह्न हो जाएगी। एकाएक उसने देखा कि वंशीवदन अकेला ही पैदल घर की आ रहा है। मिसेज़ गुप्त को मानो इतना-सा विलम्ब भी सहन नहीं हो
जल्दी से यह पिड़ को छोड़ कर दो तल्ले के बरामदे में मासी ई पोर
नीचे की ओर देखते हुए वंशो का इन्तजार करने लगी। वमोवदन धारा
यूढा पादमी टहरा। इतनो-मी दूर पहुंचने में ही उगे काफी गमर लग
गया । पौर जव वह पहुंचा, तब तक मानो मिसेज गुप्त को सहनशक्ति
गीमा पार कर गई पी।
'क्या हुपा, वंगी ? साहब पहाँ है ?'
वंगी ने कार की पोर देगते हुए जवाब दिया, 'साहय तो ननागंजको
मोर पले गाए, मालकिन!'
'ननागंज? बयों, ननागंज क्यों चले गए ?'
यंत्री ने कहा, 'यह तो पता नहीं । मैं पहले मोल की तरफ हो गए
था। पर यहाँ मुझे गाड़ी नहीं दिखाई पड़ो। धौर जब माहीमही मिमी
तो मैं मोट फर वापस पाने सगा। तभी अचानक देगा कि मादव की पार
पहाई नदी की पोर से पाकर नैनागज की तरफ मुट गई।'
'मुह गई? इसका मतलब?'
"जी, शाहब की फारसीधे राने से नहीं पाई पी। पानमुहलने के
बिगुल बोपराने से होकर उनकी गाडो पा रही थी।'
'उसके बाद ? पा तुमगे मुलाकात हुई ?'
'नहीं मालकिन, मुनाकात से होती? मैंने सोचा, नायर गाडी
सदर रास्ते पर पाएगी, पर माईनही । गोपी उत्तर दिशा मी मोर पनी
गई।
'मों ? उत्तर की मोर क्या है?'
'जी, उत्तर की भोर से भी तो मैनागजजाया जामाता है। मी.
लिए मैंने सोचा किये नागज के सिवाय मोर वहां जाएगे?"
'तो तुमने मामार को नहीं दी?'
'पाबाज कैसे देता? ये तो मर्राटे मेगानिसनार मेगा।'
माया ने महा, "नेनागर में माहब को ऐगा रश नाम पर गया?
पदि पुछ गरीदारीमो मायस्पर पो तो रामपनो को भेज दो। राम.
पनी कार डाय करके से जाता।'
मंत्री ने कहा, 'सोवो टीम है, पर मैंने देगा कि साहबमार पना रहे
ना
गल में पता नहीं कौन बैठा था।' ल में ? बगल में भला कौन होता? क्या रामधनी साहव के साथ ही मालकिन, वह तो सो रहा है। एक लड़की को मैंने उनकी वगल देखा था।' लड़की? क्या कहा, लड़की को देखा था? क्या कह रहे हो तुम? तुम्हारी आंखें तो खराव नहीं हो गई ?' 'नहीं मालकिन, अांखें भला क्यों खराब हो जाएंगी? मैंने स्वयं नी आंखों से स्पष्ट देखा है।' 'लड़की कौन थी? क्या तुम उसे पहचानते हो? क्या तुम्हारी कोई जानी-पहचानी थी वह ?' वंशी ने कहा, 'नहीं मालकिन, मेरी पहचान की नहीं थी वह लड़की । एक नया ही चेहरा था। गांव की कोई लड़की नहीं थी।' 'पर वह है कौन; यह जानने का प्रयत्न एक बार भी क्यों नहीं किया तुमने ? देखने में कैसी है ? उम्र कितनी है ?' वंशी ने कहा, 'जी, देखने में वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। 'वहुत खूबसूरत है ? उम्र कितनी होगी ?' 'जी, ठीक-ठीक तो अन्दाज़ा नहीं लगा पाया, फिर भी मुझे वह जवान सी ही लगी। दोनों ही जनें खूब बतियाते हुए जा रहे थे । मैंने बहुत ज़ोर से गला फाड़कर साहव को पुकारा भी था, पर फिर भी उन्होंने नहीं सुना वंशी की बातें सुनकर मिसेज़ गुप्त अवाक् रह गई। हीरक के सा गृहस्थी बसाए इतने दिन हो गए, जिसमें कितने ही प्रांधी-तूफान पाए, दु: सुख-सौभाग्य प्रादि के अवसर भी पाए; तब भी एक साथ ही रहे दे आज तक कभी ऐसी विपदा का सामना नहीं करना पड़ा था माया को उसने वंशी से जो कुछ सुना, वह उसे बहुत ही अविश्वसनीय ल इसी लिए मिसेज़ गुप्त ने फिर पूछा, 'तुमने अच्छी तरह देखा था न, व कहीं गलतफहमी तो नहीं हुई ?' वंशी ने कहा, 'जो, मैं भला गलत क्यों देखने लगा! कार और कौन घूमता है ? साहब के सिवाय और किसी के पास का १२४ नायिका
'यह भी तो हो सकता है कि तुमने किसी पुष्प को ही उनकी बगल
मे बैठे देगा हो?'
'जी! यह कैसे हो सकता है ? रात तो थी नहीं, फिर गया में ऐगी
गलती कर सकता हूं?'
प्रय मिसेज गुप्त यया यरे; यह उसकी समझ में नहीं पाया। गोली,
"फिर भी एक यार तुम रामधनी से भी पूछकर देगो। शायद उसे कुछ
मालूम हो।'
रामधनी 'पाऊट-हाऊग' में सो रहा था। वो उसको मालदिन के
गामने चुना सापा।
उसने भी यही कहा, 'मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं, मेममाहय।
'क्यो रे, तुमने कभी मिमी पोरत को माहब के माप देखा है ?'
'नही, मेममा'य।
'पछा, यहा नही तो विगी पोर जगह उनके साथ किसी गड़की को
देखा है भी ?
'नहीं, मेमसाय।
'मच्या तुम जामो।'
रामयनी साहर का बहुत पुराना सावर पार गरमहा जाए तो
हर यात साहय के साथ ही रहता था। जब भी हीरक पर मे याहर निस.
लता, वह स्वयं गारमाय नहीं करता था; किमपिस्तर रामपनी ही
फार पलाता पार माया ने सोचा, जर साहब के बारे में रामपनीको भी
मालूम नहीं, तो फिर किसे मालूम होगा?
रामपनी वापर जा हो रहा या दिमाया ने देखा. उपर गीरी
पोर से पता नहीं कौन-कौन से सोग धर्म पा रहे हैं। मिगत
पहपान नहीं सकी। यशी से पूछा, 'यमो, ये लोग कौन है?'
यंत्री उन लोगों की मोर देते ही उन्हें पहचान गया। बोमा, मो
यही गांव के पास हैं, जो यहाँ नाटक करवा रहे हैं।
निरापद एवं उनके साथी सर तक बगीचे में प्रवेश कर चुके थे।
गुप्त उनको
। २१ उस दिन सत्य मल्लिक को ही सबसे अधिक चिन्ता हुई थी। 'रुपक' पार्टी का नाम-यश जो कुछ भी या, वह सब एकमाय मंजरी सेन की वजह से ही था। मंजरी सेन की दया से ही रूपक' इतने दिनों से कमा-खा रहा था। दुनिया में बहुत-से लोग ऐसे होते हैं जो अपना समय व्यर्थ गंवाने से डरते हैं । सत्य मल्लिक भी उन्हीं लोगों में से एक है। समय का क्या मूल्य है, यह वचपन में ही वह अपनी पाठ्य-पुस्तक में पढ़ चुका था। अपने वास्तविक जीवन में वह और कुछ माने या न माने, पर उसने एक चीज अवश्य ध्यान में रखी कि समय रहते ही दोनों हायों से जो कुछ हो सके उतना कर लो। रुपये, यश और इज़्ज़त दोनों हाथों से जितने इकट्ठे कर सको कर लो; उसके बाद चाहे नशे में चूर सुध-बुध खोकर ही क्यों न पड़े रहो । फिर तो जिस चीज़ को भी तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी वह सब तुम्हें मिलेगा। लेकिन इस समय के मामले में ज़रा-सी भी ढिलाई वरती कि तुम पिछड़ जाओगे । तव तुम्हारी भोर कोई प्रांख उठाकर भी नहीं देखेगा। सत्य मल्लिक की रूपक-पार्टी की उन्नति का भी यही इतिहास है । जिस दिन उसने मजरी सेन को पाया है, उसी दिन से वह उसका उपयोग कर रहा है। इससे मंजरी देवी का जो नफा-नुकसान होना था, सो तो हुआ ही; पर सत्य मल्लिक को कुछ कम लाभ नहीं हुआ । सत्य मल्लिक के पास तो यश और पैसा हुआ ही; साथ-ही-साथ 'रूपक' पार्टी के अन्य लोगों के पास भी धन की कमी नहीं रही। उनके पास भी सब कुछ हो गया । सत्य मल्लिक ने एक कार खरीद ली । चाहे वह टूटी-फूटी ही क्यों न हो, पर यह तो कहा ही जा सकता है कि उसके पास अपनी कार है। उसके बाद दुनिया में, समाज में, गणमान्य के रूप में वह प्रसिद्ध भी हुआ। यह सब कुछ मंजरी सेन की बदौलत ही हुआ था। पर दुनिया में एक दूसरे किस्म के लोगों का भी दल है, जो समय वरवाद करने में ही अपने को बड़ा समझते हैं। सुबह से शाम तक काम से जी चुराकर ही मानो वे जीवित रहना चाहते हैं । लगता है, जैसे काम का नाम सुनते ही ज़िन्दगी के पिछले दरवाजे से भागकर उनके प्राण १२६ नायिका बपते हो। पर कभी-कभी यह भी देराने में माता है कि ऐसे लोग भी कई चार जीवन में उन्नति पर जाते हैं। उनको भी दरवन मिलती है। पवा नहीं, कहाँ से या पा सेहरा भी उनके मिर पर बंध जाता है। मगरी एन भी ऐसे ही लोगों में से एक थी। मंजरी मेनने कभी सस्य मलिक से काम की मांग कीपी। काम इसलिए पाहा पायोकि वह ओयित रहना चाहती थी। अन्नपूर्णा नाम को मिटाकर मंजरी नाम से एक नया जीवन नये मध्याप से मुकरना पाहा था उसने । रुपया, पंसा, दरउन, प्रतिष्ठा, मुछ भी तो नहीं पा उसने पास। पर इन सबको चिन्ता तो उसे याद में तय हुई थी, जय एक-एर कदम यह उन्नति के शिखर पर पहुंचती जा रही थी। हगीसिए मगर रारय मल्लिक मंजरीको गोबठा, तो जितना नुमान मंजरी का नहीं होगा, उससे अधिक उमका होगा। इसलिए साहा यापू के मकान में जम मजरी नहीं मिली तब वह गुस्से को जगह हमारा ही मधिक हमा। उसने कहा, 'मय क्या होगा? कहीं शाहगंज के गुण तो नहीं उटा से गए मजरी देवी को ?' पुलिस का दारोगाएर प्रौढ़यगाली पा। वह बोला, 'यह हमारा एरिया तो है नहीं, मःमगर ऐसी बात है तो वहां के पुलिस स्टेशन रोगर भेजनी पडेगी। पर महतो वाद की बात है, इस परत तो इतना गमय है नहीं। मूटपेरा, स्नो, त्रीम, पाउडर, सारी पोरमाउज मादिसरयों मेन्यों मरे में पारामा भपं है. यहकही भागी नहीं है. यस्किरी निपिग पह सकते हैं। तो फिर मजरी देयो नई कहाँ ? भना पदाचा गाती है यह ? निरापद ने रहा'सर, मैं तो उन्हें मिस्टर गुप्त के महारं यहा छोर कर गया था। लेगिन ये भी पता नहीं हो पम दिए है ?' सत्य मलिक ने पूछा, 'यही मिाटर गुप्त पे, जिनके पर तुम भादमरूद माइना से पाए पे?" 'उन पर हो" 'हमारीकदमफनो में ही है। वह को वारपारीतन्ना है न, उससे दीक है उनका घर।" त्य मल्लिक ने कहा, 'तो फिर उन्हीं के घर पर चला जाए है, मंजरी देवी वहीं गई हों!' पुलिस इंस्पेक्टर की भी यही राय थी । सभी उस तरफ चल दिए। पद, बंदा, हाबला प्रादि सभी बड़ी मुसीबत में फंस गए थे। इतनी मेह- और इतना बड़ा प्रायोजन, उन्हे सव व्यर्थ होते दीख रहे थे। अगर हीरो- न न मिली, तो यह सब व्यर्थ हो जाएगा। अब क्या होगा? जिन लोगों टिकट खरीदा है, उनके द्वारा तो समूचा पंडाल ही जला दिया जाएगा। सबसे अधिक परेशानी निरापद को हो रही थी। वही तो इन सब का सरदार है न । सारी जिम्मेदारी, परेशानी उसी की है। ख्याति एवं वदनामी सब के लिए लोग उसी को जिम्मेवार ठहराएंगे मौका पाकर निरापद ने पूछा, 'अव क्या होगा, सत्य दा?' सत्य मल्लिक को गुस्सा पा गया। वह बोला, 'तुम्हीं लोगों के कारण यह सारा काण्ड हुअा है। अव नाटक होगा कि नहीं; यही देखो।' किसी का भी दिमाग उस समय ठीक नहीं था। पुलिस को देखकर गांव के कुछ और लोग भी साथ हो लिए। उनके गांव में इससे पहले भी नाटक हुए थे, पर कलकत्ता की पार्टी का कोई नाटक आज तक नहीं हुआ था। और आज जब होने की बात भी हुई तो क्या उनकी समूच पाशाओं पर पानी फिर जाएगा? वे सब के सब हतप्रभ-से खड़े सा वार्तालाप सुन रहे थे। सत्य मल्लिक की युनिट के लोग भी सूखा-सूखा सा चेहरा साथ चल रहे थे। यह सच है कि सत्य मल्लिक ने रुपये अग्रिम ही ले थे, पर सिर्फ रुपयों का नुकसान ही तो बड़ा नुकसान नहीं होता बड़ा नुकसान तो मंजरी देवी का गायव होना था। अगर मंजरी कहीं कुछ हो गया तो वह हानि सिर्फ रूपक की ही नहीं होगी, बल्कि के सभी लोगों की हानि मानी जाएगी। पूरे बंगाल में यह खबर तरह फैल जाएगी। उसे जिस रूप में वह यहां लाया था उसी चंगी कलकत्ते पहुंचा दे, तो जान-में-जान आए। इतनी देर में वे लोग दल-बल सहित हीरक गुप्त के मकान - . १२८ नायिका पहुंच गए थे। गोर-गुल गुनकर यंशीवदन बाहर मापा पोर बोला, 'क्या चाहते है वायू, माप लोग?' पुलिस मो साप देसकर यह पौर भी पकड़ा गया था। दरवाजा पूरा सोल कर बोला, 'माइए, भीतर मादएमाप लोग।' मिसेज गुप्त पर के भीतर मे सब देस रही पो। उमने गोवदन यो भीतर युलवाया और पूछा, 'ये लोग रिमलिए पाए हैं, वंशी ?' वंशी ने जवाब दिया, 'जी, वे सोग साहब की पोज में पाए हैं।' 'क्यों ? गाहब से ऐगी पया मावश्याना मा पड़ी है उन्हें ?' 'साहय लाहा यार के मकान पर गए थे, या नाटक-कम्पनी को एक सड़की पी। यह पब नहीं मिल रही है।' मिसेज ने कहा, 'तो ये लोग यहा गुप्ता साहब को दंडने माए या उस लडकीको?' वंशीषदन ने कहा, 'ये लोग एक बार मापसे मिलना चाहते हैं। 'पर मुभगे मिलने से क्या होगा? जामो. तुम्ही उन सबमे यह दोन कि गुप्ता साहब घर में नहीं है।' 'मैंने कह दिया था मालकिन पर मेरी यात कोई नहीं मान रहा है। नागंज के दारोगा साहब भी उनके साथ पाए हैं।' माया पुर रही। यंगो सबको भीतर बुला माया। भीतर पाते ही सबसे पहले राम मल्लिर ने पात गुरूमी । योला, 'देगिए, हम लोगों के 'स्पर' कोदोरोइन मंगरी देयी यहा नाटा करने माई पी। पर मय यह मिल नहीं रही है। इसलिए हम लोग प्रापके पास माए हैं।' मिसेज गुप्त ने रहा, 'यह तो मैं मुन पुकी है. पर इस मामले में मना मैं ममा कर सकती हूं?' सत्य मल्लिा नै परा, 'पारो मुछ करने के लिए नहीं कह रहे हैं हम सोग। इन गाहना है कि गुप्ता साहब साहा पाए के मकान पर गए पे, जहाँ मंजरी देवो ठहरी हुई थी। हम सोग उस समय पुलिस बुलाने गए हुए थे।मोटकर पाए तो देखते हैं, बदा कोई नहीं है। गुप्ता साहब भी नहीं है और मंगरी देवो भी नहीं है । मत. हमने सोचा कि शायर मिस्टर को लेकर अपने घर आए हों।' ज गुप्त ने गंभीरतापूर्वक उत्तर दिया, 'मिस्टर गुप्त का ऐसा नहीं है । यह बात यहां के सभी लोग जानते हैं।' त्य मल्लिक ने फिर कहा, 'मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं था। मैं हा था कि मिस मंजरी सेन मिल नहीं रही हैं, उसको हम सब जगह के हैं। इसलिए हम लोग यह जानने आए हैं कि शायद वे मिस्टर गुप्त थ यहां आई हों।' मिसेज गुप्त बोली, 'मिस्टर गुप्त शिकार करने गए हैं। मुझे पूरा श्वास है कि वे लाहा बाबू के मकान की ओर नहीं जा सकते।' इतनी देर बाद अब निरापद ने मुंह खोला। बोला, 'पर उनको मैं खुद ही लाहा बाबू के घर पर बुलाकर ले गया था। उनके पास बन्दूक थी%3B इसलिए मैंने सोचा था कि वन्दुक देखकर गुण्डे भाग जाएंगे।' 'गुण्डे ? गुण्डे कहां से आ गए ?' 'शाहगंज की ओर से। फिल्म-एक्ट्रेस को देखने के लिए हमला कर दिया उन लोगों ने।' मानो इतनी देर बाद मिसेज गुप्त की समझ में सारी बात आई। पर फिर भी उन्होंने अपने चेहरे के भाव से यह दर्शाया नहीं। निरापद ने फिर कहा, 'देखिए, आप इसे अन्यथा न लीजिएगा हम लोगों की बहुत रुपयों की टिकटें बिक चुकी हैं। लगभग तीन हज ' रुपये लगाकर यह सारा इन्तजाम किया गया है । गुप्ता साहब ने भी करके पांच सौ रुपये चन्दा दिया है। अब अगर हीरोइन न मिली, तो लोग बहुत बड़ी आफत में फंस जाएंगे। इसीलिए आपके पास पाए है ने कहा, 'लेकिन अब तो प्राप सबने देख लिया प्रापकी हीरोइन यहां नहीं है। अब आप जो ठीक समझे, करें।' इसके बाद किसीके पास कुछ कहने को नहीं रहा । सब जाने को मुड़ ही रहे थे कि तभी घर के सामने एक जीप भाकर र में एक ड्राइवर था और उसके वगलवाली सीट पर एक व्यक्ति भीड़ देखकर वह व्यक्ति कुछ आश्चर्यचकित-सा हुया। जीप से उतरकर व्यक्ति पास पाया और पूछने लगा, मिसेज़ गुप्त गुप्ता का पर यही है ? वशीबदन मागे पर पापा, "जी, माप यहां से पाए हैं ?' 'हम लोग कलकत्ते से पाए हैं।' कालरत को वात सुनकर गरय मल्लिक को पोग पाप हुपा। पूछा, 'मला से मा यहा फिलिए पाए हैं ? में भी तो कलम से ही भाषा हूं।' 'प्रापका गम नाम ?' सत्य महिला ने बताया, 'मेरा नाम सत्य मलिर है।' 'सत्य मल्लिक! हार ! पमी महासय, पापको ही तो हम सोग दूदने फिर रहे हैं।' 'मुझे लूट रहे है ! मुझमें क्या साम है मापसो?' उस व्यक्ति ने कहा, 'मैं यी० एम० प्रोडमान का शर्मचारी हूं। मेरा नाम भूपेन राहा है। सत्य मल्लिा वी० एम०प्रोहमान का नाम सुनते ही समझ गया कि मामला क्या है । पग पूछा, 'क्या बात है, कहिए ?' भून राहा ने कहा, 'मापके पारण हमारे ग्टुटियो में हम मन गई है। गंजरी देयी को पाप ही यहा से पाए है न !' गत्य मस्तिाने पूछा, 'तो उससे बवाहमा ?' 'क्या नही हमा, यह पूटिण? मंजरी देवी के लिए हमें सारी मूटिंग पंसिल करनी पडी है। सारे पाटिम्टो को अतिरिक्त पये देने परे है. जर कि शूटिंग हुई नही । यताई यायू मारबमा होकर मुझे शूट करने को दो फिर रहे है । मोर पार पूर्ण किया इमा" माय महिला ने कहा, 'पर मैं मजगैदेशीको उम्ती तो परुर नहीं गया। यह गाहो मेरे माप प्राद। 'किन भाको मालूम होना पाहिल तिपाप मारण हो हमारा पार नारामा प्रशासन पटक गया है। हिस्ट्रीपूटगं मंद-मानामपाम ठोस रहे हैं। 'तो क्या उसरा जिम्मेवार महं" भूपेन राहा पहा, 'जिम्मेवार कौन है, यह यात नो यार में होगी ; अभी प्राप चुपचाप मंजरी देवी को हमारे हवाले कर दीजिए। न्हें अभी साथ ले जाएंगे। यहां से गौहाटी जाते-जाते ही तो पूरा एक लग जाएगा । उसके बाद वहां से प्लेन द्वारा कलकत्ता...' सत्य मल्लिक ने कहा, 'पर भाई, हम भी तो मंजरी देवी को ही ढूंढ़ने लिए यहां पाए हैं। 'मंजरी देवी को ढूंढ़ने के लिए? इसका मतलव ?' 'मतलब यह कि मंजरी देवी सुबह से मिल नहीं रही है।' भूपेन राहा मानो आकाश से गिरा हो । बोला, "मिल क्यों नहीं रही है, मिस्टर? हम लोग मंजरी देवी के लिए कहां-कहां मारे-मारे फिरते रहे हैं, यह मालूम है आपको? कलकत्ता छोड़े चार दिन हो गए; इन चार दिनों में हम न पेट भर खा पाए हैं और न नींद भर सो पाए हैं। जहां किसी ने मंजरी देवी की मौजूदगी के बारे में बताया, हम पागलों की तरह वहीं दौड़ते फिरे हैं।' अब सत्य मल्लिक को भी कुछ डर लगा। उसने पुछा, 'मिस्टर बलाई सन्याल कहां हैं ?' भूपेन राहा ने कहा, 'उनको रात में नींद ही कहां पाती है, मिस्टर ? इन कुछ दिनों में ही उनका ब्लड-प्रेशर बढ़ गया है। हम लोग जितना ही उन्हें समझाते हैं कि आप चिन्ता मत करिए. वे उतने ही नर्वस हुए . रहे हैं । हमारा समूचा प्रोडक्शन डिपॉर्टमेन्ट ही नर्वस हो गया है।' निरापद ने पूछा, 'लेकिन ग्राप लोगों को यहां का ठिकाना कहां मिला?' भूपेन राहा ने कहा, 'योह, यह क्या सहज ही हमें मिला है ? तो हमलोग ढूंढते-ढूंढ़ते रूपक के प्रॉफिस गए, पर वहां देखा कि कोई है । तब फिर मुहल्ले के लोगों से मुलाकात की। उनसे पता चला कि दल गौहाटी गया है तो वहां से हम गौहाटी गए । वहां सुना कि या कूचबिहार गए हैं । फिर कूचविहार से जलपाईगुड़ी। अन्त में वहां प्रापलोग इस कदमफूली में पाए हैं। वाप रे, आपको ढूंढते-ढूंढ़ते जान ही निकल गई, मिस्टर !' 'आप लोगों के साथ और भी कोई है क्या?'
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; अभी आप चुपचाप मंजरी देवी को हमारे हवाले कर दीजिए। न्हें अभी साथ ले जाएंगे। यहां से गौहाटी जाते-जाते ही तो पूरा एक लग जाएगा। उसके बाद वहां से प्लेन द्वारा कलकत्ता...' सत्य मल्लिक ने कहा, 'पर भाई, हम भी तो मंजरी देवी को ही ढूंढने लिए यहां पाए हैं। 'मंजरी देवी को ढूंढने के लिए? इसका मतलव ?' 'मतलब यह कि मंजरी देवी सुवह से मिल नहीं रही है।' भूपेन राहा मानो आकाश से गिरा हो । बोला, "मिल क्यों नहीं रही है, मिस्टर : हम लोग मंजरी देवी के लिए कहां-कहां मारे-मारे फिरते रहे हैं, यह मालूम है आपको? कलकत्ता छोड़े चार दिन हो गए; इन चार दिनों में हम न पेट भर खा पाए हैं और न नींद भर सो पाए हैं। जहां किसी ने मंजरी देवी की मौजूदगी के बारे में बताया, हम पागलों की तरह वहीं दौड़ते फिरे हैं।' अब सत्य मल्लिक को भी कुछ डर लगा। उसने पूछा, 'मिस्टर बलाई सन्याल कहां हैं ?' भूपेन राहा ने कहा, 'उनको रात में नींद ही कहां पाती है, मिस्टर ? इन कुछ दिनों में ही उनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है । हम लोग जितना ही उन्हें समझाते हैं कि आप चिन्ता मत करिए. वे उतने ही नर्वस हुए रहे हैं। हमारा समूचा प्रोडक्शन डिपॉर्टमेन्ट ही नर्वस हो गया है।' निरापद ने पूछा, 'लेकिन आप लोगों को यहां का ठिकाना कहां मिला?' भूपेन राहा ने कहा, 'मोह, यह क्या सहज ही हमें मिला है ? तो हमलोग ढूंढते-ढूंढ़ते रूपक के प्रॉफिस गए, पर वहां देखा कि को है । तब फिर मुहल्ले के लोगों से मुलाकात की। उनसे पता चला कि दल गौहाटी गया है तो वहां से हम गौहाटी गए। वहां सुना कि ग्रा कूचबिहार गए हैं । फिर कूचविहार से जलपाईगुड़ी। अन्त में वहां आपलोग इस कदमफूली में पाए हैं । वाप रे, पापको ढूंढते-ढूंढ़ते जान ही निकल गई, मिस्टर!' 'आप लोगों के साथ और भी कोई है क्या?'
'है क्यो नही, महाशय जी! इस कदमफूली को ढूढ लेना भला किसी अकेले पादमी के वश की बात है ? भोर तो मौर, रेलवे टाईम-टेवुल में भी इसका नामो-निशान नहीं है। भला ऐसी जगह को ढूंढ लेना पासान था? वलाई वा तो सुद हमारे साप माना चाहते थे। पर हम काफी कह सुनकर उनको जलपाईगुड़ी में ही छोड़ पाए हैं। हमने उनसे कहा, प्रय आपको तकलीफ करने की जरूरत नहीं है । ज्यों-ही हमें मंजरी देवी का पता लगेगा, त्यों-ही पापको ट्रंक कॉल या टेलीग्राम कर देंगे। और भव यहां पहुंचे हैं, तो यह सवर मिली कि मंजरी देवी लापता हैं ! मैं मभी तुरन्त नैनागंज के पोस्ट प्रॉफिस जाऊंगा- बलाई वायू को ट्रक-कॉल करने के लिए। पुलिस-इस्पेक्टर ने कहा, मंजरी देवी यहा थी, यह सच है। पर मव वे यहां नहीं मिल रही हैं । उन्ही को खोजने के लिए मैं दल-बल सहित यहां घूम रहा हूं।' 'दूढने पर भी नहीं मिल रही हैं ! पापका मतलब क्या है ? किसी जीते-जागते प्राणी का उड़कर हवा में मिल जाना तो संभव नहीं है न!' 'नही भई, वे उडी नहीं है । हमने उनको एक हवेली में एकान्त में ठह- राया था। प्राज शाम तक वे वहीं पर थी । फिर नदी पार के कुछ लोगों ने हवेली पर हमला कर दिया। हम लोग पुलिस बुलाने गए थे, पोर जब लौटकर पाए तो देखते हैं कि उनका सारा असवाब तो ज्यो का त्यों पड़ा है, सिर्फ वही गायब हैं।' भूपेन राहा बोल पड़ा, 'यह खबर अगर मैं सन्याल साहब को दे दूं तो सुनते ही उनको अम्वोसिस हो जाएगा। मब तक उनको दो यार स्ट्रोक हो चुका है। वंशीवदन ने कहा, 'देखिए, जव माप लोग इतने परेशान हो रहे हैं, तो मैं एक यात मापसे पूछता हूं। जरा यह तो बताइए कि वो देखने में कैसी 'कौन?' 'मौर कौन ? जिसके बारे में इतनी देर से बहस हो रही है, वही। क्या यह देखने में बहुत सुन्दर है ? क्या उसका रंग गोरा है ?' ? नायिका य मल्लिक ने पूछा, 'क्या तुमने मंजरी देवी को कहीं देखा है शी ने कहा, 'मेरी प्रांखें तो अव वैसी तेज़ रही नहीं, पर फिर भी है कि उस तरह के चेहरेवाली एक लड़की को मैंने देखा है।' कहां? कहां देखा है तुमने ?' 'जी, मैं अपने साहव को ढूंढने जा रहा था। पर जब वे कहीं नहीं मिले, में ब्राह्मण-मुहल्ले से होकर वापस घर लौट रहा था। तभी अचानक मैंने ना कि हमारे साहव तो कार चला रहे हैं, और उनकी बगल में एक जली गोरी-सी लड़की बैठी है।' 'लड़की? कैसी थी देखने में ?' 'जी, बहुत सुन्दर थी।' 'वे लोग किस तरफ गए हैं ? हां, हां, जल्दी बतायो, किस तरफ गए हैं वे ?' सव एकसाथ बोल पड़े। वंशी ने बताया, 'वे लोग हाई-वे की पोर ही गए हैं।' अव और कुछ पूछने का समय नहीं था। सव के सव यह खबर सुनते ही उछल पड़े। 'इतनी देर तक क्यों नहीं बताया तुमने ? हम सब इतनी दूर से पाए हैं और तुम चुप रहकर मजा ले रहे थे ?' सत्य मल्लिक ने इन्स्पेक्टर की ओर देखते हुए कहा, 'तव फिर चलिए, उधर ही चला जाए। इतनी देर बाद कुछ तो सुराग मिला।' भूपेन ने कहा, 'पर वे आखिर जा कहां सकते हैं ?' वे कहां जा सकते हैं, यह कोई नहीं बता सका; पर जिस तरह भी उनको ढूंढ़ निकालना सभी के लिए अत्यन्त आवश्यक था। अगर वे ल नहीं ढूंढ़ पाए, तो जितनी हानि निरापद की थी, उतनी ही सत्य मलि की भी थी। पर सबसे ज्यादा हानि बलाई सन्याल की थी। उसकी लाख की फिल्म के बारह बज जाएंगे। युनिट के सारे लोगों को उ करना पड़ेगा, एवं सन्याल साहव को फिर स्ट्रोक होगा। भूपेन राहा की जीप खड़ी थी। वह बोला, 'पाइए, सब लोग तरह इसी में लूंसकर बैठ जाएं।' सत्य मल्लिक ने पूछा, 'अापके साथ प्रापकी पार्टी का और नायिका माया है ?' 'पाया कैसे नही ?' हमारे प्रोडक्शन के छ: व्यक्ति यहापाए हैं। तीन तो मेरे साय पाए हैं और तीन जलपाईगुड़ी मे सन्याल साहब के पास हैं । यहां की स्थिति को खवर मुझे इसी वक्त जलपाईगुड़ी पहुंचानी होगी। अपनी पार्टी के तीन व्यक्तियों को मैं नैनागंज में ही छोड़ पाया हूं। उनके साय मिस्टर सन्याल के ट्रंक-कॉल का मादान-प्रदान अनवरत चल रहा 'तो फिर चलिए, देखें, कहां मिलते हैं वे लोग?' सब लोग जीप में बैठकर हाई-वे की भोर चल दिए। २२ वंशीवदन के भीतर कमरे में पहुंचते ही मिसेज गुप्त ने पूछा, 'वे लोग चले गए, वंशी?' 'जी मालकिन, उनको ढूढने नैनागज को पोर गए हैं।' मिसेज़ गुप्त ने खिड़की की राह से बाहर देखा। बगीचे के पेड़ों के उस पार हाई-वे दिखाई पड़ रहा या, जहा काफी लोगों से भरी हुई एक जीप 'पों-पो' करती दोड़ी जा रही थी। जिन्दगी में पहली बार माज मिसेज गुप्त का मन भारी हो पाया। उसने सोचा, ऐसे तो नहीं ये वे कभी! पहले तो ऐसा कभी नही हुआ ! 'अच्छा वंशी, तुमने ठीक से देखा था न ?' वंशी ने कहा, 'जी मालकिन, मैंने बहुत अच्छी तरह देखा था। भूल कैसे होती भला?' 'लेकिन पहले तो ऐसा कभी नहीं हुमा वंशी! माज तक तो ऐमी बात न कभी देखी थी, न सुनी थी।' वंशोवदन ने कोई जवाब नहीं दिया। मिसेज़ गुप्त पति के साथ लन्दन, पेरिस, अमेरिका, बम्बई, मद्रास, दिल्ली कितनी ही जगह गई यो। कितने हो नाइटक्लवों और कितनी ही पार्टियों में पति का साथ दिया या उन्होंने । . नायिका १३५ तरह की घटना तो कभी नहीं घटी। फिर इस वज्र देहात ही ऐसा कांड क्यों कर बैठे वे ? वह लड़की कौन हो सकती है? 1, वह कोई सिनेमा-स्टार ही है, तो अचानक उसपर इतना पाक- से हो गया उनका? क्या उसकी उम्र अब काफी हो गई है ? गुप्त ने सोचा, शायद उसकी उम्र सचमुच बढ़ गई है, इसीलिए रे-धीरे उससे दूर खिसकते जा रहे हैं । यह सब सोचते-सोचते उसकी दोनों आंखें क्रमश:धुंधली होने लगीं; व जीप उन्हें दिखाई नहीं दे रही थी। सामने हाई-वे की तरफ जाते- ते मानो वह क्षितिज के उस पार छिप गई हो। । २३ किसी ज़माने में कदमफूनी के निकट बसी हुई फूलवाड़ी उन्नत अवस्था में थी। हीरक जब छोटा था तो बहुत बार स्कूल से लौटते समय फूलबाड़ी से होता हुआ घर पाता था। गड़ाई नदी वहां बहुत-सी जगह घेरकर काफी गहरी और चौड़ी हो गई थी। उसीके एक वगल घाट बना हुआ था। घाट तो था ही, साथ ही नहानेवालों के लिए पक्की इंटों से बना हुआ एक स्नान-गृह भी था, जहां स्कूली लड़के बड़ की जटाओं से लटककर झूला झूलते थे। पर फूलबाड़ी इधर ध्वंस हो चुकी थी। काफी साल पहले ही चेच के प्रकोप से गांव-का-गांव खत्म हो गया था। नैनागंज जैसे-जैसे सम होता गया, वैसे-वैसे फूलवाड़ी के लोग वहां जाकर वसने लगे। फूलव' का वह हाट-बाजार, वे जमींदार, ताल्लुकेदार एवं रैय्यत प्रादि सब से चले गए। फूलवाड़ी का सम्पूर्ण ऐश्वर्य लेकर नैनागंज काफी बढ़ ग फिर नैनागंज में रेलवे स्टेशन हो जाने के बाद तो जैसे फूलवाड़े समूची उपजत ही चली गई। हीरक जब छोटा-सा था, तब फूलवाड़ी मृत्यु-शैया पर थी। जामुन, कटहल मादि के जंगल में अगर कोई हिम्मत करके घुस में नायिका ता उसे बहुत ही डर लगता; एक गाय तक उपर चरने के लिए नहीं जाती थी। मगर कोई मनुष्य उस तरफ चला भी जातातो शाम होने से पहले ही नैनागज लोट पाता। हीरक ने कहा, 'इतनी ही देर में शायद कदमफूली में तुम्हारी काफी छानवीन हो चुकी होगी।' 'हुह ! होने दो।' 'पर अन्न, यह तो सोचो अगर तुम उन्हें न मिली तो उन लोगों का सारा प्ले ही नष्ट हो जाएगा। बहुत रपयों को टिकटें विकी हैं। मैंने स्वयं भी तो पाच सौ रुपये चन्दे में दिए हैं।' 'तुमने बेकार ही इतना चन्दा क्यों दे दिया? क्या तुम सचमुच नाटक देखना चाहते थे?' हीरक ने कहा, 'नहीं। बल्कि मेरे पास इतने रुपये है, यह दिखाने के लिए मैंने चन्दा दिया था। 'सच, पाश्चर्य की बात है यह ! पर प्राखिर तुमने इतने रुपये इकट्टे कैसे कर लिए?' हीरक ने कहा, 'तुम विश्वास करो, मैंन स्पय इकट्ठे नहीं किए; बल्कि रुपयों के ढेर-के-ढेर मेरे पास खुद चलकर पा जाते हैं।' 'जरा सुनू तो, वो कैसे हीरक ने कहा, 'यह ठीक-ठीक याद नहीं मुझं। मरे पास रुपये इस तरह पाते जा रहे हैं, यह भी पहले मुझे मालूम नहीं था। अचानक एक दिन मैंने अपनी वैक की चेक-बुक देखो तो चौक उठा । मुझे विश्वास नहीं हुमा । मैंने सोचा, इतने रुपये मेरे पास कैसे और कहा से आ गए?' घाट की सीढियो पर ढलने मूरज का प्रकाश पड़ रहा था। महा पर फैला कर कुछ तिरछी हो, एक सीडी का सहारा लेकर, मन्ना गई। हीरक ने कहा, 'ठहरो, मैं गाड़ी में से कुशन ले माऊरि बैठना।' हीरक गाडी मे से एक डनगेपिलो का कुगन ते मार पीठ के पास रख दिया। फिर कहा, "रा स दूं। फिर देखना, कैसा आराम मिलता है !' ह उठ गई और वोली, 'और तुम ? तुम नहीं बैठोगे आराम से ?' रक भी पास ही वैठ गया। बोला, 'मेरी किस्मत में पाराम लिखा ही है, अन्न !' 'क्या मतलब ? क्या तुम कभी आराम नहीं करते? तुम तो इतनी ह घूम चुके हो, देश-विदेश जा चुके हो, बड़े-बड़े होटलों में रह चुके फिर भी तुम यह कहना चाहते हो कि तुम्हें ज़िन्दगी में कभी आराम हीं मिला?' हीरक ने कोई जवाब नहीं दिया। 'भला बतायो तो, तुम्हें ज़िन्दगी में पाराम क्यों नहीं मिला?' 'यह तो पता नहीं। पर जहां-जहां में जाता हूं, रुपये वहीं मेरा पीछा करते हैं। या तो मेरे पीछे-पीछे रुपये आ जाते हैं, नहीं तो ट्रंक कॉल प्रा जाता है । इतने से भी बात नहीं बनतो तो मेरा एटर्नी पा जाता है। इससे भी वढ़कर कोई हुई तो मेरा एकाउण्टेण्ट मेरे पीछे चला पाता है। इसी- लिए मुझे जैसे ही मौका मिलता है, मैं कदमफूली चला पाता हूं। अगर मैं चाहूं तो चाहे जितने रुपये खर्च करके यहां भी अपने मकान में टेलीफोन लगवा सकता हूं, पर ऐसा मैंने किया नहीं। मैंने अपनी फैक्टरी में कह दिया है कि अगर कोई मर भी जाए, तव भी मुझे कदमफूली में किसी प्रकार की मूचना भेजने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि मैं यहां सिर्फ पाराय करने के लिए पाता हूं।' अन्न का चेहरा करुण हो पाया। वह सिर्फ इतना ही कह सब 'पाराम ? यहां पाने से क्या तुम्हें आराम मिल जाता है ?' 'नहीं । यहां भी आराम नहीं मिलता। क्योंकि यहां मेरे साथ में रहती है।' 'माया! माया कौन ?' 'मेरी पत्नी। तुमने मेरी पत्नी को कभी देखा नहीं है न ? सच अच्छी पत्नी सभी को नहीं मिलती। लेकिन सभी की पत्नियां इतन भी नहीं होती।' 'यह क्या कहते हो ? एक ओर तुम पत्नी की बड़ाई करते . नायिका दूमरी पोर बुराई भी करते हो ! मासिर वात क्या है ?' हीरक ने जवाब दिया, 'कभी-कभी इच्छा होती है कि मैं पत्नी से भी कही दूर चला जाऊ।' 'भला ऐसी इच्छा क्यों होती है ? क्या तुम्हारी पत्नी देसने में कुरूप है ?' 'नहीं । बल्कि बहुत ही खूबसूरत है। मैंने बहुत सारे रुपये कमाने के बाद शादी की है। प्रत. उसके कुरूप होने का कोई मवाल ही नहीं उठता। बहुत देख-मुनकर अपनी मर्जी से ही शादी की थी मैंने । फिर भी पत्नी से कभी-कभी दूर रहने को जी चाहता है । इसलिए कि पत्नी के साथ रहने में जिम्मेदारियों की बात मन में बनी रहती है । उसके साथ रहने से ही बैक में जमा रुपयो की, इन्कमटक्स प्रादि की याद मन से नहीं जाती। उसके कारण ही एटर्नी, एकाउण्टेण्ट, कोर्ट, लेबर, ट्रीब्यूनल प्रादि की समूची बातें दिमाग में ही चक्कर काटती रहती है।' 'अच्छा, कदमफली पाकर तुम क्या करते हो? किस तरह अपना समय गुजारते हो?' 'शिकार कर लेता हू । नीद पाती है तो सो लेता है । और अगर इतने में भी मन को शान्ति नहीं मिलती, तो दवा की गोलिया माता हूँ।' 'क्या कहा, तुम भी गोलिया खाने हो ?' 'हा, देखो !' कहकर हीरक ने पॉकेट से एक पैकेट निकाला, और पहा, 'यह देखो!' इसके बाद अन्न की ओर देखकर फिर कहा, 'माया को पता चल जाता है तो वह विरोध करती है । पर सक्सेस का मतलब क्या है, यह तो माया जानती नहीं । मुझे लगता है कि इस ज़िन्दगी मे तो अब ये गोलिया मुझमे छूटने में रही। इतना कहकर यह पैकेट में मे एक गोली निकाल पाने ही वाला था किमन्न ने उसका हाथ पकड लिया और बोली, 'नहीं, मत यायो।' 'यह तुम कह रही हो?' पन्न ने कहा, 'हा, मैं खुद भुक्तभोगी हूँ, इमीलिए तुममे कहती है कि यह मत पामो । जितनी देर नक विना याए रह सकने हो उतना ही । . नायिका खाए जाते हैं।' ,अच्छा तो है । लेकिन तुम्हें नहीं मालूम कि जव चारों तरफ से एकाउण्टेण्ट आदि मुझे घेर लेते हैं, तो मेरी क्या हालत होती है ?' न्न ने कहा, 'क्या मुझे ही नहीं मालूम ? मुझे तो खुद वकील, हैं 'तो क्या तुम भी ब्लैक का रुपया लेती हो ?' 'मैं तो नहीं लेना चाहती, पर वलाई सन्याल जिद करके मुझे लेने पर बूर कर देता है।' 'ऐसा क्यों ? तुम अगर ब्लैक का रुपया लेती हो तो इससे उसको या फायदा है ! 'ज़रूर कोई फायदा है। मैं तो इतने दांव-पेंच समझती नहीं। शुरू से ही वह मुझे जबर्दस्ती रुपये लेने पर मजबूर करता रहा है ।' हीरक ने कहा, 'अच्छा, अब इन सब बातों को जाने दो। इतने दिनों बाद मिले हैं ; प्रायो, कोई दूसरी बात करें।' अन्न ने कहा, 'सच, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि यहां मेरी तुमसे दुवारा मुलाकात हो जाएगी। मैंने तो सोचा था कि तुम ज़िन्दगी भर के लिए यह गांव छोड़कर चले गए हो।' हीरक ने कहा, 'हां, चला ही गया था। मैंने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि दुवारा लौटकर यहां पाऊंगा। पर डॉक्टरों ने शहर एवं सभ्यता से दूर रहने को कह दिया, तो कदमफूली पाना ही पड़ा।' 'यहां पाकर तुम ने क्या देखा?' 'सबसे पहले तो यह खबर मिली कि तुम यहां नहीं हो । मैंने समभ शायद ताई से नाराज होकर तुमने भी घर छोड़ दिया है। पर असलिः क्या है यह किसी से पूछ भी तो नहीं सकता था। अतः मन ही मन तुम बारे में सोचता रहता था।' 'तुमने एक बार भी मेरी खोज-खवर नहीं ली कि मैं कहां गई हूं?' 'कहां और किससे पूछता? और दूसरी बात यह कि अव हालत रहती है, वह तो तुम्हारे सामने है । अगर अभी कलकत्ते में है । नायिका
अव तक एटी, यगोग, दंपरेशीमोगस भिमाग का।
किसी से बात तफ गरी का मौका नहीं गित । किन urd, it
भी तो मुझे ढूंद रामती मी?'
मान ने कहा, 'पुरु-तुम तो मरणni. fruiri
होकर पान कत्तं गई और यह तुम्हे fastim unfut
लटकी हूं न; जहां भी जासी, मांगों को ixiti til
रहता। और उगक बाद जय
सियारामा
मेरी हालत भी टीका तम्हार int
हीरक कुछ देर पप ग्य, falnutrita
कहा, 'अव थोडी-मी देर बादशाहासन'
अन्न बोली, 'प्रोट, गमन ई गुमinimali Int
पत्नी की याद ग्रामीहै?'
हीरक ने जयाय दिया, 'नी, in Rai
बहुत अच्छा लग रहा है। मैं मानो HHHHRI
कहा था।'
'पर, मुझे भी नो पाबा Aarat
नमम भेट हुई है। मीना HEREx, Ka
लौटू ही नहीं और यहां सीधी।
हीरा ने पूछा, 'गमका"
प्रन ने जबाव दिया, विवाहिद
नहीं मिला मर्नमाम TREAM
पनि गीपादारनियम
कांनी मारी, प्रयाinary?
काहनी।'
हीराग,nmararrian
तमाम
कन तुम्हारे नाम, यश एवं रुपयों का क्या होगा? उन सबका ह पायोगी?' न ने कहा, 'तुम मुझे नहीं जानते, इसीलिए ऐसा कह रहे हो। भी तो ऐसी इच्छा होती है कि सब-कुछ छोड़कर कहीं भाग जाऊं। तो किसी समुद्र के किनारे मछुओं की वस्ती में जाकर उन्हीं के र की एक सदस्या बनकर रहूं। या फिर...?' हीरक ने बीच में ही टोककर कहा, 'अच्छा, तुम अच्छी तरह व लो। अगर मैं इसका इन्तजाम कर दूं, तो?' अन्न चौंककर उठी और हीरक की अोर देखने लगी। बोली, 'क्या तलव?' 'मतलव यह कि तुम और मैं दोनों कहीं ऐसी एकान्त जगह जाकर रहें, तो क्या तुम रह सकोगी?' अन्न की दोनों आंखें आश्चर्य से फैल गई। बोली, 'मजाक तो नहीं कर रहे हो ?' 'मजाक क्यों करूंगा, अन्न ! मैं भी तो तुम्हारी ही तरह ज़िन्दगी से भागता फिरता हूं। जिस तरह तुम नाटक के वहाने शहर से दूर देहातों में घूमती हो, मैं भी तो उसी तरह अपना सारा कारोवार छोड़कर यहां कदमफूली में प्राकर छिपा रहता हूं।' 'लेकिन तुम मुझे लेकर कहीं चले गए, तो तुम्हारी फैक्टरी को कौन सम्भालेगा?' 'कोई नही सम्भालेगा। वह जाए जहन्नुम में !' 'जरा सोचो तो, तुम्हारे दिना तुम्हारे वकील, एटर्नी, एकाउण्टेण तुम्हारी फैक्टरी के इंजीनियर, प्रोवरसियर, फोरमैन आदि का व होगा?' 'वे सव भी जहन्नुम में जाएं ! जिस प्रकार तुम्हारे बिना तुम फिल्म इण्डस्ट्री की हानि होगी, बस उसी तरह मेरे कारोवार के होने दो।' अन्न ने कहा, 'हां, यह तो तुमने सच कहा। पर बलाई सन्या धुनेंगे, उनका ब्लड प्रेशर बढ़ेगा।'
'तो फिर?' अन्न ने कहा, 'तो फिर क्या, मैं तो बन जाऊंगी ग| का गुजारा शायद रुपयों के बिना नहीं होगा। पर मुझे रुपयो की जा नहीं है। मैं अब बिना सोए नही रह सकती। मय में नगीदमी गोलियों से छुटकारा चाहती हूँ, सच कहती हूं, तुम मुझे यचा सो!" हीरक ने कहा, 'तो फिर चलो, उठो।' 'लेकिन तुम तो मेरे जैसे मकेसे हो नहीं। पुम्हारी पानीमा। उनका क्या होगा?' हीरक ने कहा, 'मैंने उनको व्यवस्था पहले से ही फरशीमगर मैं कही चला भी जाऊ, तो रुपयों के कारण उनको कभी राकी होगी।' 'उनको छोड़कर जाने में सचमुच क्या तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।' . . . हीरक ने पूछा, 'तो क्या इतनी देर से मैं जो कुछ पल रहा है. वो तुग झूठ समझती रही हो?' अन्न बोली, 'अच्छा, तव चलो; अब चल ही दें।' हीरक ने भी कहा, 'ठीक है, चलो, उठो।' अन्न ने कहा, 'बहुत दिनो पहों पर छोड़कर मैंने जीवन का समय अध्याय शुरू किया था। अब फिर से कोई नया अध्यायो। फिर भी वैसे ही पूछती हूं कि मुझे कहाँ से चल रही गुम ?' 'चली, पहले यहा से तो निकल चरें। किरजहाजी पाडेगा, पण चलेंगे। मेरे पॉकेट में चेक-बुक है ही, साथ में कार भी है।' दोनों जाकर कार में बैठ गए। अन्न ने पूछा, 'दाद में प्रयोग की नहीं करोगे?' 'इतने दिनो तक जरूर अफसोस किया है, लेकिन प्राजकनी अफसोस नहीं करता। 'मैं क्या सोचती हू,जानते हो? एर छोटा-हा, प्यारा-गावर बदा नदी के किनारे। ...और उसकी टिनवाली इन होगी, जिस पर हम ET . नालिसा र छप्पर इतनी नीची होगी कि सिर नीचा करके हमें घर में है। र हां, हम एक गाय भी पालेंगे।' रक ने पूछा, 'लेकिन अन्त में तुम्हें तो कभी अफसोस नहीं होगा न, ?' - अन्न ने कहा, 'तुम मेरी चिन्ता मत करो। मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया में उस पर अडिग रहूंगी।' 'और तुम्हारी यह ख्याति ? क्या तुम अपनी ख्याति का मोह छोड़ कोगी?' 'मेरी ख्याति ही तो मेरा सिर-दर्द है।' 'और, तुम्हारा पैसा?' 'अब तो मुझे ऐसा लगता है कि वह पहलेवाली ज़िन्दगी ही अच्छी थी, जव न इतना नाम था और न पैसे थे। वस, सिर्फ मुहल्ले की क्लबों में शौकिया नाटक करती फिरती थी। लेकिन हां, तुम खूब अच्छी तरह सोच लो; कहीं ऐसा न हो कि बाद में तुम्हीं टूट जायो।' हीरक ने कहा, 'अगर ऐसी वात होती तो मैं न कदमफूली में आता और न अाज इस फूलवाड़ी में आता। यह मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यहां पाकर मैं इतना समय नष्ट न करके अगर एक फैक्टरी को सम्भालता तो मेरी बहुत-सी प्रोब्लम्स तो मिटती ही, साथ ही रुपये भी बहुत पाते। लेकिन उस स्थिति में होता यह कि मैं खुद को नहीं बचा पाता। - कार फूलवाड़ी को पार कर प्रव हाई-वे की ओर चल दी। हीरक ने सुझाव दिया, 'अव चलो, कलकत्ते का रास्ता पकड़ें।' 'कलकत्ता? अव कलकत्ता किसलिए जानोगे?' हीरक ने कहा, 'नहीं भई, कलकत्ता नहीं ; ग्रैंड-ट्रक रोड से होते सोधे किसी ऐसी देहाती जगह चलेंगे जहां कोई आदमजाद नहीं हो।' हीरक ने कार के ऐक्सीलरेटर पर दवाव डाला। गाड़ी हवा करने लगी।
२४ यलाई सन्याल की प्राधी पार्टी उस समय ननागंज में एटपटा रही थी। भूपेन राहा तो कदमफूली चला गया मौर बाकी लोग कमी तो जसपाई- गुड़ी में बैठे वलाई सन्याल के साप पोस्टप्रॉफिम के टेलीफोन द्वारा बातें करते मोर कमी सड़क पर माकर चाय की दुकान पर चाय पीते । बलाई सन्याल ने सबसे कह दिया था, 'अब तुम लोगों को टेलीफोन करने की जरूरत नहीं । मैं सुद ही वहां पा रहा हूं।' प्रत: पब उनके करने लायक यहा कुछ नहीं रह गया था । बस, इकडे बैठकर चाय पीने एवं गप्प हाकने के सिवाय मोर कोई काम नहीं था उनको। भचानक उनको लगा कि जीप गाड़ी इधर ही मा रही है। सबको लगा कि भवस्य भूपेन भैया ही लौटकर पा रहे हैं और उनके लौट पाने के बाद ही मागे की कोई व्यवस्था की जाएगी। पर नहीं, जीप मे भूपेन दा नहीं थे। जव जीप बिल्कुल पास मा गई तब पता चला कि जीप में खुद वलाई सन्माल बैठे हैं । यूनिट के तीन व्यक्ति जलपाईगुड़ी में बताई बाबू के साथ रह गए थे। वे लोग भी उनके साप माए थे। इनमे से कुछ लोग ट्रेन से, कुछ एरोप्लेन से तया कुछ जीप गाड़ो से सफर करके यहा तक पाए हैं । बलाई बाबू समूचे बगाल, बिहार एव प्रासाम मे प्रसिद्ध है । जहा-जहा सिनेमा हाउस हैं, वहां-वहा बलाई बाबू की खातिर होती है । वे लोग वलाई वाबू को मप्रसन्न नहीं रख सकते । जव नेनागज में मैडम की कोई सबर नहीं मिली, तो जल- पाईगुड़ी में और अधिक रहने का धैर्य वे नहीं रख पाए। बोले, 'एक बार मैं सुद ही नैनागज जाता हूं।' जलपाईगुड़ी के एक्जीन्यूटर ने काफी मना किया था। उसने कहा था, 'पाप यह हाई ब्लड प्रेशर लेकर वहां विल्कुल मत जाइए।' पर बलाई सन्याल बोले, 'माप यह क्या कहने लगे मिस्टर, मेरा तो जी-जान हो वहा लगा हुआ है ! मेरी डेढ़ लाख रुपयो की प्रार्टिस्ट वहां रहे, तो फिर मैं मला यहा कैसे माराम कर सकता हूं?' नायिका १४५ ।
, - वाद अव और कहने-सुनने को कुछ वाकी नहीं रहा। उसी वक्त र सवार होकर निकल पड़े। वे मन ही मन झंझला रहे थे। जकल फिल्म बनाना तो आग से खेलने जैसा हो गया है। पहले त नहीं थी। अब तो आर्टिस्टों की खुशामद करते-करते ही प्रोड्यू- रान हो जाते हैं । खैर, जो भी हो; जो कुछ किस्मत में लिखा है वह कर रहेगा। यही सोचते-सोचते बलाई सन्याल पांच सौ मील पार के नैनागंज आ पहुंचे थे। ननी उनके सामने आ खड़ा हुआ। ननी उनकी प्रोडक्शन-कम्पनी का सिस्टेण्ट है। उसको देखते ही वलाई सन्याल ने एक डांट पिलाई । बोले, 'तुम लोग क्या करते रहे यहाँ बैठे-बैठे ? भूपेन कहां गया ?' 'जी, हम लोगों को यहां बैठाकर भूपेन भैया कदमफूली गए हैं।' 'यह तो मैंने कल टेलीफोन पर ही सुन लिया था। लेकिन भूपेन ने वहीं रहने का मौरूसी पट्टा लिखा लिया है क्या? कदमफूली के समाचार जानने में कितने दिन लगेंगे ? अच्छा, नैनागंज के सिनेमा-हाउस में पता लगाया तुम लोगों ने ?' ननी ने कहा, 'हां, लगाया था, सर । इन्हीं लोगों ने तो बताया था कि यहां भी मंजरी देवी के नाम पर नाटक के टिकट काफी विक रहे हैं।' वलाई सन्याल ने पूछा, 'वह सब तो मुझे मालूम है । लेकिन भूपेन के क्या कहा यह बतायो मुझे ? कोई खबर भेजी उसने ?' 'नहीं सर, कोई खवर नहीं भेजी। हम लोगों को यहां बैठाकर खुद कुछ लोगों को साथ लेकर कल कदमफूली चला गया। बस, उ बाद से उसने हमें कोई समाचार नहीं भेजा। हमने आपको सुवह फोर यह वता भी दिया था।' वलाई सन्याल ने कहा, 'तुम सब के सब मूर्ख हो! एक साधा काम नहीं कर सके तुम लोग। अव तुम लोगों से कुछ भी होने की नहीं है। चलो, मेरे साथ सिनेमा हाउस चलो।' नैनागंज के एकमात्र सिनेमा हाउस के मालिक बंगाली नहीं एक पंजाबी सज्जन थे। नैनागंज में सिनेमा हाउस बनाकर उन ही लाभदायक काम किया था। हिन्दी पौर बंगला फिल्मों से मोटी रकम कमाकर ये महाराय चन्द दिनों में ही पैसेवाले हो गए थे। बलाई सन्याल के आगमन की खबर मुनते ही उन्होंने उनको बड़े प्यार से अपने प्रॉफिस में बैठाया और पूछा, 'क्या हुमा, सन्याल साहब ? मापकी अगली फिल्म कहां तक पहुंची?' बलाई सन्याल ने कहा, 'माप फिल्म का हाल तो अपनी प्रांतों में सामने देख ही रहे हैं ! पुराने जमाने में फिल्म बनाई, मार्टिस्ट को रुपये दिए मोर बस, सारे झमट सत्म हो जाते थे, पर माज का जमाना तो देखिए ! इस दुढ़ापे में भी आर्टिस्ट के पीछे-पीछे दौडना पड़ रहा है मुझे।' एक्जीन्यूटर ने कहा, 'पर मापकी मंजरी देवी क्या भभी तक यहीं बैठी हैं ? कल पहली बार मैंने लोगों के मुह से सुना कि मंजरी देवी यहां मा रही हैं और यही मैंने पापके पादमियो को बता भी दिया था।' 'मरे भाई, इधर मेरे पादमी कदमफूली में प्रासन जमाकर बैठ गए हैं और उघर जलपाईगुड़ी में बैठे-बैठे मेरा लह-प्रेशर बढ़ने लगा था। क्या बताएं भाई, उघर मेरे रुपयो का धार हो रहा है और इधर माटिस्ट गायब है ! क्या करू, क्या न करूं, मेरी तो कुछ समझ में नहीं पाया। इमलिए घबराकर यहा चला पाया हूं।' एग्जीव्यूटर ने कहा, 'तब फिर मापके प्रोडक्शन मैनेजर को माने दीजिए; देखें, वह क्या सबर लाता है।' बलाई सन्याल ने भी कहा, 'हा, इसीलिए तो यहां बैठा हूं।' उसके बाद बलाई बाबू ने हांक लगाई, 'ननी, मब और कितनी देर इन्तजार करेंगे यहा? इससे तो अच्छा है कि हम सब भी कदमफूली हो चलें।' ननी बेचारा क्या कहता; सिर्फ इतना ही कह सका, 'भूपेन दा प्रगर पीछे से मा गए, तो? 'मा जाएगा, तो माने दो। हम कहीं भागकर तो जा नहीं रहे। एक चक्कर लगा लेने में हजं क्या है ? जल्दी चलो, तुम लोगों के सभी कामों में दिलाई ही दिलाई है। चलो!' नायिका १७ । सच में, सबने चलने की तैयारी कर ली। बलाई सन्याल ब्लड- मरीज थे। उन्होंने छाती पर हाथ रखकर कहा, 'मैडम अगर ली में आई है, तो चाहे जिस तरह भी हो, मैं उसे वहां से लेकर ही । यह सब भूपेन के वश की बात नहीं है।' जीप का तो इन्तजाम था ही। मिस्टर बलाई सन्याल ड्राइवर के वाली सीट पर विराजमान हो गए, और उससे पूछा, 'कदमफूली यहां कतने मील दूर है ?' ड्राइवर ने बताया, 'यही कोई पांचेक मील होगा।' जीप हाई-वे से होकर चल पड़ी । हाई-वे के दोनों ओर दूर-दूर तक बड़ के पेड़ दिखाई पड़ रहे थे । ये पेड़ अधिक बड़े नहीं हुए थे, प्रतः चारों ओर ईंट की जाली से घिरे हुए थे। उन्हीं जालियों में से हर एक पर 'रूपक' का 'रूप और रूपा' का एक-एक पोस्टर चिपका हुआ था। पोस्टरों में खास आकर्पण के तौर पर मंजरी सेन का ही नाम मोटे मोटे हरफों में छापा गया था। बलाई सन्याल यह देखकर भड़क उठे और अपने-आप ही बड़वड़ाने लगे, 'देखो, देखो न उसकी हिम्मत ! सब उसी छोकरे की करतूत है यह उसी सत्य मल्लिक नामक शख्स की। अपना सर्वनाश तो कर ही रहा है। साथ-साथ मैडम का भी सर्वनाश कर डालेगा। और मेरी तकदीर में तो खैर पूरा घाटा लिखा ही है।' एकाएक वलाई सन्याल को दूर से एक गाड़ी आती दिखाई पड़ी। फूलबाड़ी का रास्ता हाई-वे से होकर भीतर की ओर चला गया था आने वाली गाड़ी ने फूलवाड़ी की तरफ से हाई-वे की ओर ही मोड़ लि था। २५ हीरक उस वक्त अपने में ही मगन स्वयं से बातें किए जा अन्न भी सब ओर से निश्चिन्त होकर आत्म-विश्लेपण में वि । इतने दिनों की समूची थकावट और बोरियत मानो इस फूलवाडी में पाते ही मिट गई थी। अभी भी दोनों के सामने लम्बी जिन्दगी पड़ी है। अगर तुमसे कोई गलती हो ही गई है, तो फिर उस गलती को समाधि यही पर क्यों न बने ! और क्यों न नये रास्ते पर नये तरीके से कदम बढाया जाए। जहन्नुम में जाए तम्हारा नाटक और तुम्हारी पत्नी ! तुम खुद अपनी मर्जी के मालिक हो, इसलिए तुम्हें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने की पूरी भाजादी है। ऐसा होने पर भी अगर तुम अपनी मर्जी का जीवन नहीं जियोगे, तो तुम्हारी सामाजिकता अनवरत तुम्हारा शोषण करती रहेगी। तुम्हारी जिम्मेदारी तुम्हारी रातों की नींद चुरा लेगी। भौर तुम्हारी जिन्दगी ? वह सिर्फ तुम्हारे यश के पीछे मृगतृष्णा सदृश्य दौड़ती रहेगी। यह मृगतृष्णा न तुम्हें पाराम करने देगी और न ही चैन से सोने देगी। तुम्हारा कम तुम्हें एक हाथ से अपार धन-राशि देता है तो दूसरे हाथ से तुम्हारी रातो को नींद भी छीन लेता है। पौर मगर या देता है तो मारमीय- स्वजनों से तुम्हें दूर भी ले जा पटकता है । ऐसी स्थिति में तुम किस तरफ जायोगे? बहुत मच्छी तरह सोचकर देख लो कि इतने दिनों तक तुमने क्या पाया है ? तुम्हारे चारों तरफ जो लोग तुम्हारी प्रशसा की स्तुति गाते रहते हैं, क्या वे वास्तव मे तुम्हारे मित्र हैं ? क्या वे लोग तुम्हारे सुभा. कांक्षी हैं ? यह जो तुम्हारा स्टाफ है, जो तुम्हें देखते ही सलाम करता है, वह क्या सचमुच ही तुम्हारी भलाई चाहता है ? तुम्हारे वकील, एटी, बैरिस्टर आदि क्या तुम्हारे निःस्वार्थ सेवक हैं ? तुम्हारे ही रुपयों से जो शराब पीते हैं, और तुम्हारी ही कृपा पर अपनी जीविका चलाते हैं, क्या उनमे से किसी ने भी कभी यह जानने की कोशिश की है कि तुम्हें रात में नीद क्यों नहीं माती? पौर हीरक, तुम्हारी पत्नी? उसको तुम कहां तक समझ पाए हो? तुम्हारी धन-दौलत के वैभव एवं प्रतिष्ठा मादि को बाद देकर सिर्फ तुम्हारे स्वयं के नगण्य अस्तित्व को लेकर क्या वह सतुष्ट रह पाएगी? तुमने कब मौर किस प्रकार परसा है उसे ? संर, इन मबसे परे तुम्हारे पास मन नाम को भी तो कोई पीज है ! क्या उसने इन सब चीजो को पाकर कभी तृप्ति नायिका १४६ की है ? फिर इतना अगाध ऐश्वर्य पाकर भी तुम्हें फायदा क्या ? र तुम? तुम, मंजरी सेन ! तुम्हें सिर्फ देखने के लिए हज़ारों-लाखों या में जो लोग सिनेमा-हाउस के सामने क्यू लगाकर टिकट कटाते या वे सब तुम्हारे शुभाकांक्षी हैं ? तुमसे पहले और भी तो -सी फिल्म-स्टार हुई थीं। उन सवको उन्होंने क्यों भुला दिया? जब लोगों ने उन्हें भुला दिया है, तो तुमको नहीं भूल जाएंगे, इसका क्या माण है ? और सच ही तो, इतने दिनों तक तुमने क्या और कितना कुछ या है ? यदि कहो कि रुपये, तो सुन लो; क्या बलाई सन्याल ने जितने रुपये अजित किए हैं, उसने जितना रुपया पाया है; क्या उतना ही रुपया तुमने भी पाया है ? रुपयों के कारण ही किसी दिन तुमने दूसरों के सामने हाथ फैलाया था और अब उन्हीं रुपयों की बहुतायत से तुम्हारा मन छटपटा रहा है। शायद यह रुपये ही तुम्हारे जीवन का काल बन गए हैं। बहुत देर तक वे दोनों उस एकांत वातावरण में मानो अपने-अपने अतीत की परिक्रमा करने निकल पड़े थे। दोनों ही अपने-अपने जीवन की कहानी की शुरूआत तक जा पहुंचे थे। दोनों ही सोच रहे थे कि उनकी शुरूवाली जिन्दगी ही अच्छी थी, जब वे उद्वेगहीन शान्ति में अपना जीवन व्यतीत करते थे। तब न इन्कम-टैक्स था और न किसी प्रकार की प्रतियोगिता थी बस, सिर्फ जीवित रहने की कामना भर थी। और आज फूलवाड़ी में है कर उन दोनों ने फिर से उसी प्रकार का जीवन जीने की मनोकां की थी। घाट की सीढ़ियों पर पड़ते हुए सूर्य के प्रकाश में मंजरी ने अनज' ही मानो मुक्ति का प्रास्वाद पा लिया हो। उसे ऐसा महसूस हुआ, शहर से गांव ही अच्छा है। और गांव की अपेक्षा यह निर्जन जंग भी अच्छा है। 'अन्न, तुम रो रही हो?' अन्न की तरफ देखकर हीरक हतप्रभ रह गया। अन्न ने कहा, 'तुम सोचते होगे कि मुझे अभिनय करने की और मुमकिन है इसे भी तुम मेरा अभिनय ही समझो। लेकिन यकीन मानो हीरक,माज से पहले कभी इस तरह मैंने अपने को अपने ही मागे दया का पात्र नहीं समझा था।' हीरक ने कहा, 'लेकिन तुम जी छोटा न करो, भन्न ! मैंने तुमसे कहा म कि मैंने भी दृढ निश्चय कर लिया है।' और उसके बाद उसी मनोदशा मे हीरक ने कार ड्राइव करते हुए कहा, 'एक बात कहू मंजरी, हम चाहे कहीं भी क्यों न भाग जाएं; पर कोई न कोई तो हमारा पीछा अवश्य करेगा।' 'तय फिर कहां चलोगे; बतायो ?' हीरक ने कहा, 'समझ में नहीं मा रहा है कि कहा जाएं ? तुम्हे तो सभी पहचानते हैं और मुझे भी फैक्टरी के लोग दूढ ही निकालेंगे। ऐमा लगता है कि इण्डिया छोडकर गए बिना हमें कोई रिहाई नहीं देगा।' 'इण्डिया से बाहर कैसे जामोगे?' हीरक ने कहा, 'मेरे पास उसका इन्तजाम है। मेरी पॉकेट में एक्स- पोर्ट-लाइसेन्स मौजूद है।' 'पौर क्या मेरे 'वोसे का इन्तजाम भी कर सोगे?' "हां, कुछ ममय तो लगेगा, लेकिन इन्तजाम कर प्रवदय लूंगा।" अन्न ने कहा, 'सच, ऐसा सोचने में ही कितना अच्छा लगना है। कितना सुख मिलता है ! मय रातो को जागना नहीं पड़ेगा। अब मुझे मेकअप नही करना पडेगा; न ही फ्लैश-वल्व की रोशनी में कमरे के मामले सहा होना पडेगा। हीरक ने कहा, 'लेकिन सोचता है कि तुम्हें बाहर ले जाकर कही मुझे वेवकूफ तो नहीं बनना पडेगा" 'क्यों ? तुमने ऐसी बात क्यों कही हीरक ने कहा, 'क्योकि मैंने सुना है कि जो अभिनय करते हैं, उनके लिए वही एकमात्र सत्य है और बाकी सारी दुनिया भूठी है। लेकिन मेरे सम्बन्ध मे ऐसी बात नहीं, क्योंकि मैं रान-दिन लोहे-लक्कड में ही अपना समय गुजारता रहा हूँ।" अन्न ने उसे रोकते हुए कहा, 'वम करो, अव पिछली बातोंरेस अनुभव को है ? फिर इतना अगाध ऐश्वर्य पाकर भी तुम्हें फायदा क्या और तुम ? तुम, मंजरी सेन ! तुम्हें सिर्फ देखने के लिए हज़ारों-लाखों की संख्या में जो लोग सिनेमा-हाउस के सामने क्यू लगाकर टिकट कटाते हैं, क्या वे सब तुम्हारे शुभाकांक्षी हैं ? तुमसे पहले और भी तो . . बहुत-सी फिल्म-स्टार हुई थीं। उन सवको उन्होंने क्यों भुला दिया ? जब उन लोगों ने उन्हें भुला दिया है, तो तुमको. नहीं भूल जाएंगे, इसका क्या प्रमाण है ? और सच ही तो, इतने दिनों तक तुमने क्या और कितना कुछ पाया है ? यदि कहो कि रुपये, तो सुन लो; क्या बलाई सन्याल ने जितने रुपये अजित किए हैं, उसने जितना रुपया पाया है; क्या उतना ही रुपया तुमने भी पाया है ? रुपयों के कारण ही किसी दिन तुमने दूसरों के सामने हाथ फैलाया था और अब उन्हीं रुपयों की बहुतायत से तुम्हारा मन छटपटा रहा है। शायद यह रुपये ही तुम्हारे जीवन का काल बन गए बहुत देर तक वे दोनों उस एकांत वातावरण में मानो अपने-अपने अतीत की परिक्रमा करने निकल पड़े थे। दोनों ही अपने-अपने जीवन की कहानी की शुरूपात तक जा पहुंचे थे। दोनों ही सोच रहे थे कि उनकी शुरूवाली ज़िन्दगी ही अच्छी थी, जब वे उद्वेगहीन शान्ति में अपना जीवन व्यतीत करते थे। तब न इन्कम-टैक्स था और न किसी प्रकार की प्रतियोगिता थी। बस, सिर्फ जीवित रहने की कामना भर थी। और आज फूलबाड़ी में बैठ कर उन दोनों ने फिर से उसी प्रकार का जीवन जीने की मनोकांक्षा की थी। घाट की सीढ़ियों पर पड़ते हुए सूर्य के प्रकाश में मंजरी ने अनजाने में ही मानो मुक्ति का आस्वाद पा लिया हो। उसे ऐसा महसूस हुआ, मानो शहर से गांव ही अच्छा है। और गांव की अपेक्षा यह निर्जन जंगल और भी अच्छा है। 'अन्नं, तुम रो रही हो ?' अन्न की तरफ देखकर हीरक हतप्रभ रह गया। अन्न ने कहा, 'तुम सोचते होगे कि मुझे अभिनय करने की आदत है, और मुमकिन है इसे भी तुम मेरा अभिनय ही समझो। लेकिन यकीन मानो होरक, माज से पहले कभी इस तरह मैंने अपने को अपने ही आगे दया का पात्र नहीं समझा था।' होरक ने कहा, 'लेकिन तुम जी छोटा न करो, अन्न ! मैंने तुमसे कहा न कि मैंने भी दृढ निश्चय कर लिया है।' और उसके बाद उसी मनोदशा में हीरक ने कार ड्राइव करते हुए कहा, 'एक बात कहूं मंजरी, हम चाहे कहीं भी क्यों न भाग जाएं; पर कोई न कोई तो हमारा पीछा अवश्य करेगा।' 'तव फिर कहा चलोगे; वतामो?' हीरक ने कहा, 'समझ में नहीं पा रहा है कि कहां जाएं ? तुम्हे तो सभी पहचानते हैं और मुझे भी फैक्टरी के लोग ढूंढ ही निकालेंगे। ऐसा लगता है कि इण्डिया छोडकर गए बिना हमें कोई रिहाई नहीं देगा।' 'इण्डिया से बाहर कैसे जानोगे?' हीरक ने कहा, 'मेरे पास उसका इन्तजाम है। मेरी पॉकेट मे एक्स- पोर्ट-लाइसेन्स मौजूद है। 'और क्या मेरे 'वोसे' का इन्तजाम भी कर लोगे?' 'हां, कुछ ममय तो लगेगा, लेकिन इन्तजाम कर अवश्य लूंगा।" अन्ल ने कहा, 'सच, ऐसा सोचने में ही कितना अच्छा लगता है ! कितना सुख मिलता है ! अब रातों को जागना नही पड़ेगा ! अव मुझे मेकनप नहीं करना पड़ेगा; न ही पतस-बल्व की रोशनी में कमरे के सामने खडा होना पड़ेगा।' हीरक ने कहा, 'लेकिन सोचता हूं कि तुम्हें बाहर ले जाकर कही मुझे बेवकूफ तो नहीं बनना पड़ेगा?' 'क्यों ? तुमने ऐसी बात क्यों कही?' हीरक ने कहा, 'क्योंकि मैंने सुना है कि जो अभिनय करते हैं, उनके लिए वही एकमात्र सत्य है और बाकी सारी दुनिया भूटी है। लेकिन मेरे सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं; क्योंकि मैं रात-दिन लोहे नक्कड़ में ही अपना समय गुजारता रहा हूं।" अल ने उसे रोकते हुए कहा, 'दस करो, अब पिछली बातों को मत . नायिका १५१ दोहरायो ! हीरक ने कहा, 'फिर भी, तुम ज़रा सोचो तो सही ! तुम्हारे नाटक के इतने टिकट बिक चुके हैं, अव अगर तुमने नाटक नहीं किया तो उनका कितना नुकसान होगा! सर्वनाश ही समझो !' अन्न ने कहा, 'मेरे कारण इस प्रकार के सर्वनाश पहले भी बहुत बार हो चुके हैं।' 'लेकिन बाद में किसी प्रकार का पश्चात्ताप तो नहीं करोगी न इसके लिए ?" अन्न ने घूमकर हीरक के चेहरे की ओर देखा। बोली, 'क्यों? क्या तुम्हें बाद में पश्चात्ताप होगा?' हीरक से जवाब दिया, 'नहीं। अगर तुमने मेरा साथ दिया, तो मैं अपने दिल में शक्ति महसूस करूंगा।' 'मैं तुम्हारे साथ हूं, हीरक ! और हरदम तुम्हारे साथ रहूंगी।' दोनों को ऐसा लग रहा था, मानो इतने दिनों तक वे गलत राह पर चल रहे थे और अब जाकर अपनी असली मंजिल पर पहुंच पाए हैं । जिन्दगी में और भला उन्हें क्या चाहिए? ज़रूरत से ज्यादा पा जाने की पीड़ा का मूल्य तो वे इतने दिनों से चुकाते आ ही रहे हैं। कभी एकाउण्ट्स के गोरख- धन्धे में और कभी सक्सेसनेस की चक्की में ज़िन्दगी को पीसकर, उसका सारा रस निचोड़ कर, अपने बेजान शरीर को वे घसीट-घसीटकर विस्तर पर पटकते रहे हैं। पर अब हीरक को कोई भी बांधकर नहीं रख सकता। एक छोटा-सा नीड़ ! एक छोटा-सा आसमान ! और पांव के नीचे कदम भर धरती! बस, इतने से ही वह अपना संसार खुद तैयार करेगा। वे अपने लिए अब परम संतोष का संसार, अनाकांक्षी संसार, ख्यातिहीन संसार बनाएंगे। और उस संसार में रहेंगे सिर्फ वे दो प्राणी! एक वह स्वयं और दूसरी उसकी अन्न ! उसी संसार में वे अपने अस्तित्व का उजाला ढूंढ़ निकालेंगे। उसी उजाले को वे अपना मूलधन मानकर हंसने-रोने के बीच अपनी दुनिया की सृष्टि करेंगे। यह सब सोचने में हीरक को बहुत अच्छा लग रहा था। हीरक ने देखा, अन्न कार की सीट का सहारा लिए आंखें मूंदे बैठी थी। १५२ नायिका .
स्या वह सो गई है ? सोने दो बेचारी को ! उसको नीद आ गई, यह बहुत ही अच्छा हुआ । हीरक को इस तरह सहज ही नीद नहीं पाती। पॉकेट मे स्लीपिंग-पिल्ज़ का पैकेट पड़ा है। ज्यों ही उसे जरूरत पडेगी, वह एक गोली मुंह में डाल लेगा। उसके बाद दो घण्टे के लिए निश्चिन्त ! तब न तो कोई समस्या रहेगी न कोई अशान्ति महसूस होगी। उसने हौले से पुकारा, 'अन्न !' वह सचमुच ही सो रही थी। उसको सोने दो! हीरक ने और भी जोर से गाड़ी चलाई । एक्सीलरेटर पर और अधिक दवाव दिया। गाड़ी ने पोर ज़ोर से गति पकडी । यद्यपि प्राज इस तेज़ गति की ज़रूरत नहीं थी। बॉयलर और कोक-प्रविन प्राज खाली पड़े थे। आज प्रोडक्शन बन्द पड़ा था। सिर्फ प्राज की ही बात नही, अब हमेशा के लिए उनका प्रोडक्शन बन्द हो जायेगा! कल से दिल्ली से उसके पास पत्र प्राने शुरू होगे। फाइनेन्स- मिनिस्टर का पत्र पाएगा, एक्सपोर्ट लाइसेन्स की मिनिस्ट्री से पत्र प्राएगा। सब जगहों से पत्र प्राने लगेंगे। क्या हुमा? तुम्हारा टारगेट कैसे फुलफिल नहीं हुमा? सारा फाइव-ईयर प्लान गडवड़ हुप्रा जा रहा है ! कहाँ गए मिस्टर गुप्त ? वो तुम्हारे मैनेजिंग डायरेक्टर कहा गए कहा गए तुम्हारे डायरेक्टर्ज-बोर्ड के चेयरमैन ? उसको कम्पनी के डायरेक्टर्ज उसे चारों तरफ टेलीग्राम और ट्रंक कॉल करेंगे। चेयरमैन कहा गए ? हेयर इज़ हो ? योर मिस्टर गुप्त? 'ही इस प्रॉन लीव, सर ! वे छुट्टी पर गए हैं।' 'कहां पर, किस जगह गए हैं ?' 'उन्होंने किसी से भी बताने को मना किया है।' 'मना करने का क्या मतलब? इधर मिलियन डॉलर के फॉरेन- एक्सचेंज का प्रश्न है और उन्होंने पता बताने को मना किया है ? वाह, यह खूब रही! 'हां, वे रिलक्स करने गए हैं। कह गए हैं कि कोई उन्हें डिग्टवं न ? करे।" 'बट यू मस्ट इनफॉर्म हिम ! उनको खबर देना जरूरी है।' 'हम किस तरह सवर दे सकते हैं, सर? वहा तो पोस्ट प्रॉफिग तक नापिका १५३ नहीं है । टेलीफोन नहीं है । खबर भेजने का कुछ भी साधन नहीं है।' 'तो फिर मैनेजर को वहां भेजिए।' 'लेकिन सर, ऐसा करने से वे बहुत नाराज़ होंगे। वे नहीं चाहते कि उनके विश्राम के समय कोई उन्हें डिस्टर्व करे।' 'डैम इट! जहां मिलियन डालर का सवाल है, वहां क्या उनका पाराम इतना महत्त्वपूर्ण है ? बल्कि सच तो यह है कि अगर उनको यह खबर नहीं दी गई, तो वे आप लोगों पर ही नाराज़ होंगे । जाइए, इसी वक्त किसी को भेजिए । मैसेंजर भेजिए।' 'लेकिन सर, वे तो यहां से दूर हैं। बहुत दूर एक निपट विलेज में। वहां मैसेंजर के पहुंचने में भी तो काफी समय लगेगा।' 'लगेगा तो लगने दो। कोई इण्डिया के वाहर तो नहीं हैं न ?' 'नहीं, सर ! हैं तो बंगाल में ही। बंगाल के एक विलेज में उनकी जन्म-भूमि है; वहीं वे फैमिली के साथ गए हैं।' 'डेम केयर ! अगर उनके पाने में देर हुई तो संभव है, करोड़ों-करोड़ रुपयों का प्रोडक्शन ही वन्द हो जाए ! इण्डिया-गवर्नमेंट का हैवी नुकसान हो जाएगा। ऑल स्टील वर्क्स स्ट्राइक कर देंगे। क्विक ! क्विक !!' - हीरक ने गाड़ी और तेज़ चलानी शुरू कर दी। उसने स्पीड काफी वढ़ा दी। "और दूर भाग चलो, हीरक ! यहां से बहुत दूर । सब मिलकर तुम्हें पीछे की ओर घसीटने का प्रयत्न कर रहे हैं । एक तो वह माया ही है, जो बराबर वंशीवदन द्वारा मेरी खोज-खवर ले रही होगी। माया को शुरू-शुरू में, हो सकता है, कुछ तकलीफ हो। वह मुझे खूब ढूंढ़ेगी, पुलिस में खवर कर देगी । कदमफूली छोड़कर वापस कलकत्ता चली जाएगी। फिर कलकत्ते के ऑफिस में जाकर मद्रास ट्रंक-कॉल करेगी। मद्रास से जवाव आएगा, 'नहीं तो, मिस्टर गुप्त यहां तो नहीं आए । लेकिन उनको ढूंढ़ने के लिए आदमी भेजा है हमने।' 'कहां भेजा है ?' 'दिल्ली।' 'दिल्ली क्यों ?' १५४ नायिका "सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि बम्बई, कलकत्ता, मय जगह उन्हें ट्रंक- कॉल किया जा रहा है। पर अचानक पुलिस द्वारा सयर मिलती है कि, 'सिर्फ मिस्टर गुप्न ही नही, बल्कि उनके साथ फेमस सिनेमा स्टार मिस मंजरी सेन भी गायव 'यह सब क्या बकवास है ? प्रॉल नॉनसेन्स ! ऑल सिली टॉक!' हीरक ने एक्सीलरेटर पर और डोर से दबाव डाला । माही और तेज गति से आगे बढ़ने लगी। अब कोई डर नहीं है । एक बार सिर्फ कल- कत्ता के रिजर्व बैंक तक पहुंचने भर की देर है, फिर सारी समस्याए हल हो जाएगी । .. उसके बाद हीरक, तुम कहा जानोगे ? कहा जाना चाहोगे? फिलीपाइन्स ? टोकियो ? हॉलैण्ड ? रशिया? या अमेरिका ? नही, नहीं ! अब किसी भी बडे शहर में नहीं। अब तो किसी ऐसी जगह चल, जहां सिर्फ घना जगल हो । जहा सिर्फ नदी या समुद्र हो, यहा- - किसी कवि ने लिखा है, 'वह जगल मुझे वापस लौटा दो।' यह पक्ति उमकी बचपन मे पढी हुई थी। पर उस समय उसे यह बात मच्छी नहीं लगी थी। उस समय तो वन में रहते हुए भी उसकी प्रांखें कलकत्ते को पोर लगी हुई थी । गाव को तो उस दिन भूल जाना चाहा था उसने । अब वापस उमी वन मे लोट जाने की इच्छा हो रही थी। कभी-कभी प्रादमी को सब चुछ छोडकर ही राव कुछ मिलता है।''चलो फिलीपाइन्स, या फिर चलो हवाई-द्वीप, या फिर और कहीं भी ऐसी जगह चलो, जहा रुपये, टेक्स, प्रॉडिटर, इन्कम कुछ भी न हो। जहां स्ट्राइक या प्रोडक्शन या किसी प्रकार की भी समस्या न हो, वही चलो। मिस्टर गुप्त की नजरों के सामने जैसे समूचा विश्व-ब्रह्माण्ड ही उलट. पलट होने लगा। क्या भूचाल पानेवाला है ? नही! नही ! नही ! अचानक मिस्टर गुप्त चीख पडा, 'नही, मैं हीरक नहीं हूं! एकाउण्ट्स की गड़बड़ी की बात मुझसे कहने मत प्रायो। मैं इस कम्पनी का कोई नहीं है । इस कम्पनी को मैंने ही स्टार्ट किया था, यह सही है; पर प्रद मैंने नायिका १५५ अपनी समूची सम्पत्ति का अपनी मर्जी से ही त्याग कर दिया है । अव मैं सैलरी भी नहीं चाहता। एलाउन्स भी नहीं चाहिए मुझे । प्रॉफिट भी नहीं चाहिए । यहां तक कि इन्टरेस्ट या डिविडेण्ड भी नहीं चाहिए। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए । यह सही है कि किसी दिन मैंने इन्हीं सबकी आकांक्षा की थी; पर अब इन सबको छोड़कर मैं चला!' , जैसे वंशीवदन की आवाज़ उसके कान में पड़ी, 'नहीं मालकिन, मैं तो सब जगह उन्हें ढूंढ़ आया; पर साहब कहीं नहीं मिले।' 'और उन लोगों के नाटक की वह लड़की, जो यहां आई हुई थी, वह मिली कि नहीं ?' 'नहीं, वह भी नहीं मिल रही है । सब उसे भी ढूंढ़ रहे हैं।' माया ने कहा, 'तब तुम कुछ इन्तज़ाम करो । मैं यहां से जाना चाहती 'आप कहां जाएंगी, मालकिन ?' 'जहां मेरी मर्जी । इसकी तुम्हें चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है । तुम मेरे.जाने का इन्तज़ाम कर दो।' हीरक ने कार के एक्सीलरेटर पर और दबाव डाला। कार सर्राटे के साथ हाई-वे के समतल चिकने पथ पर दौड़ चली। एकाएक अन्न जाग पड़ी। जागकर वह चारों ओर नज़र दौड़ाकर देखने लगी । बोली, 'हीरक, हम कहां हैं ?' हीरक ने बताया, 'नैनागंज के नजदीक ।' अन्न बोली, 'अगर यहां एक कप कॉफी मिल पाती तो अच्छा रहता।' हीरक ने कहा, 'कॉफी नहीं भी मिली, तो चलो देखें, शायद चाय- वाय यहां मिल जाए।' :१५६ नायिका निरापद-दल की जीप नेनागंज की ओर बढी जा रही थी। मय मल्लिक, पुलिस इन्स्पेक्टर प्रादि गव उम जीप में बैठे-बैठे मामने वी और नजरें दौड़ा रहे थे। सबसे अधिक चिन्ता भूपेन राहा को थी। दरअसल, वह प्रोडकमन का चीफ भी तो था। उमसे नीचे हैं ननी और गोवयंन । बहुत से लोगो की जीविका, जीवन-यात्रा इम मैडम पर ही निर्भर है। इसीलिए तो भूपेन राहा को इस निरं देहात मे दौडे पाना पड़ा था। चलते-चलने में प्रचा- नक दूर एक गाडी दिखाई पड़ी। वह बोला, 'मामने वह किमकी गाड़ी मा रही है ?' निरापद ने कहा, 'बह गाडी गुप्ता साहय वो नहीं है। गुप्ता माहव की तो बन्द गाडी है।' निरापद का कहना ठीक ही था, क्योकि गाडी के नजदीक पहचने ही भूपेन राहा ने चिल्लाकर कहा, 'अरे, यह नो यलाई वाब ग्राह!' 'कौन ? बलाई सन्याल ?' मत्य मल्लिक जिम बात से हर रहा था, प्रापिर वही हार रही। मिस्टर वलाई सन्याल साक्षात् सामने हाजिर हो ही गा । वे और अधिक सब नहीं कर पाए थे। यलाई सन्यात भूपेन गहा को देखते ही गाड़ी में उनर पई। उनका शरीर मोटा और यल-युल पा। एक ता कड़ाके की धूप, तिस पर हाई- ब्लड-प्रेर। इस कारण उनका बदन कुछ-कुछ लाल-सा लग रहा था। मजरी सेन के गायब हो जाने के कारण यूटिग बन्द करके पूरा का पूरा दल जो कलकत्ते से बाहर निकला, नो अब तक उनमे से कोई भी वापस कल- कते नहीं लौटा था। वलाई मन्याल तो न ड-प्रेशर के कारण जलपाईगुडी में ही टहर गए थे और अपने दल के अन्य लोगो को उन्होंने ननागंज दिया था। परन्तु अाखिर तायो रपयो का मामला था । बलाई बाई धे कि प्रोडक्शन-असिस्टेण्ट पर ही भरोसा करके हाथ पर हार से उनका काम नहीं चलेगा। यही सोचकर वे खुद यहां त । भूपेन को सामने देखते ही उन्होंने पूछा, 'क्यों ? क्या हुग्रा? मैडम - मिली?' भूपेन बगलें झांकते हुए बोला, 'आप इन्हीं लोगों से पूछ लीजिए न, सर! ये सब भी मैडम को ही ढूंढ़ने निकले हैं । यह देखिए, ये हैं थाने के दारोगा साहब, और ये हैं 'रूपक' के डायरेक्टर श्री सत्य मल्लिक ।' 'ग्रोह, तो आप ही हैं सत्य मल्लिक ? वाह मिस्टर, पाखिर अापने मेरा सत्यानाश करके ही दम लिया न? मेरी डेढ़ लाख रुपये की हीरोइन को इस मूढ़ देहात में लाकर आपने मेरा कितना बड़ा नुकसान किया है, यह जानते हैं आप? उफ्, आप तो मिस्टर, पादमी का खून तक कर सकते हैं; पर अव मैं क्या करूं, यह बताइए? मैं हाई-ब्लड-प्रेशर का मरीज़ हूं। मुझे दौरे पड़ते रहें, क्या आप यही चाहते हैं ?' इतनी देर बाद पुलिस के दारोगा ने मुंह खोला । बोला, 'देखिए, इस वक्त आप उन सब बातों को जाने दीजिए । जो होना था, वह तो हो चुका है । उसके लिए अब चिन्ता करने से क्या फायदा? हमें खबर मिली है कि मिस्टर गुप्त नामक कोई सज्जन उन्हें लेकर कहीं चले गए हैं। हम सब उन्हीं की खोज में जा रहे हैं।' 'यह आप क्या कह रहे हैं ? ये मिस्टर गुप्त कौन हैं ? उसको कहां ले गए वो? दोनों कहीं भाग गये हैं क्या? अोह, क्या मुसीवत है ! मेरा तो सर्वनाश हो गया! हाय, मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है !' 'अरे नहीं, आप बिल्कुल फिक्र न करें। कदमफूली में मिस्टर गुप्त 'की पत्नी है; उसे छोड़कर वे आखिर कहां जा सकते हैं ?' 'पर मंजरी से उनकी मुलाकात हुई कैसे ? आउट-डोर शूटिंग के समय मैं मैडम को कितनी हिफाजत से रखता हूं । पुलिस के पहरे का सख्त इन्त- जाम रखता हूं। और आप हैं कि आपने मेरी डेढ़ लाख रुपये की आर्टिस्ट को जिस तिस के साथ मिलने दिया? आपने अपना सर्वनाश तो किया ही, साथ ही मेरा और मैडम का भी सर्वनाश किया है। लेकिन मिस्टर, इन सबमें सबसे अधिक सर्वनाश मेरा ही किया है आपने । आपके कारण ही मेरी चार लाख रुपयों की फिल्म यों बीच में अटकी रह गई। अव मैं क्या करूं?' १५८ नायिका इन्स्पेक्टर ने कहा, 'पर अब यहा खड़े रहने से तो कुछ फायदा नहीं । चलिए, नागंज ओर चला जाए। मिस्टर गुप्त ननागन को मोर ही तो जाते हुए देखे गए हैं।' बलाई सन्याल ने कहा, 'तो क्या दे अभी तक वहां बैठे होगे? मेरी ऐसी किस्मत ही कहां, मिस्टर? हाय ! हाय ! इतनी देर में तो ये अवश्य ही नैनागज से भी प्रागे चल दिए होगे।' 'फिर भी चलिए, देखने में क्या हज है ?' निरापद ने कहा, 'लेकिन बलाई बाबू, माप एक वार हमारी विपत्ति पर भी तो गौर कीजिए। हमारी तीन हजार रुपयों को टिकट बिक चुकी हैं। थव मगर नाटक न हुमा, तो पाप ही बताइए, क्या होगा? हम लोगों के पडाल को लोग जलाकर खाक कर देंगे। प्रापको नहीं मालूम, पाहगंज के लोग एक नम्बर के गुण्डे है !' 'इतनी देर तक बलाई सन्याल ने निरापद को नहीं देखा था। उसकी बातें सुनकर अब उनको नजर उस पर पड़ी । पूछा, 'तुम कौन हो?" निरापद ने बताया, 'मैं कदमफूली 'संस्कृति-संघ' का सेक्रेटरी निरापद हाजरा हूं।' मलाई सन्याल बिगड़ उठे। बोले, 'बस, अपने पास रखो मपने तीन हजार रुपयों का मामला । कहा मेरे चार लाख रुपयो पर बन पाई है, मेरा ब्लड प्रेशर दो सौ से ऊपर पहुंच रहा है, मोर तुम हो कि मुझसे अपनी तुलना कर रहे हो? मेरी जितनी भी बरवादी हुई है, उसकी जड़ तुम्ही तो पुलिस इन्स्पेक्टर ने कहा, 'देखिए, माप लोग झगड़ा बाद में कर लीजिएगा। इस वक्त तो सबसे पहले मपराधी को निकालने की माव- श्यकता है।' इस बार सब लोग वापस गाड़ी मे बैठ गए। दोनों हो गाडियां उत्तर की मोर विद्युत् गति से दौड़ पड़ी। जिस व्यक्ति को ढूंढने के लिए इतनी दौड-धूप, इतना आय व्यय किया जा रहा था, मौर इतनी परेशानिया उठानी पड़ रही थी, वह उस वक्त कहा मोर किस हालत में था, यह किसी को भी मालूम नही या। बनाई ? सन्याल पाश्चर्य में डूबे हुए बहुत देर तक यही सोचते रहे कि यह आखिर : हुमा कैसे ? अगर मेहनत करने से अधिक पैसे पाते हों, तो फिर मैडम और अधिक मेहनत क्यों नहीं करती? इवर सत्य मल्लिक सोच रहा था कि मंजरी यहां नाटक करने पाकर किसके हत्थे चढ़ गई! हीरक गुप्त पता नहीं वह कहां का कौन-सा साहबजादा था, जो प्रार्ट के बारे में तिल भर भी ज्ञान नहीं रखता; फिर भला उससे मंजरी का क्या सम्वन्ध था ? उसके साथ आखिर वह गई कहां? मिस्टर बलाई सन्याल नैनागंज में जिस जगह से रवाना हुए थे, वापस वहीं पहुंच गए। गाड़ी के वहां रुकते ही उन्होंने देखा कि सिनेमा-हाउस का पंजावी मालिक उनकी तरफ चला आ रहा है। 'यह लीजिए सन्याल बाबू, मिल गई आपकी आर्टिस्ट !' बलाई सन्याल उछल पड़े यह खबर सुनकर। पूछा, 'कहां मिली? कहां है ? कहां है ?' 'मेरी चाय की दुकान में।' 'आपकी चाय की दुकान में ? मतलव ?' 'हां, वे मेरे सिनेमा-हाउस के ही स्टाल में चाय पी रही हैं। यद्यपि मैंने उनसे कुछ बात नहीं की है, पर मैंने उनको पहचान लिया है। अपने स्टाल-होल्डर को उन पर नजर रखने को कह पाया हूं।' वलाई सन्याल ने पूछा, 'मैडम के साथ और कौन है ?' उनको मैं नहीं पहचानता। हां, उनके पास एक कार है । ऐसा लगता है कि वे गांव में काफी भीतर दूर तक गए थे और दोनों ने एक साथ वहां वहुत समय व्यतीत किया है, और अब टायर्ड होकर मेरी दुकान में चाय पीते ही वे फिर कार में बैठकर चल देंगे।' सत्य मल्लिक, निरापद, पुलिस-इन्स्पेक्टर प्रादि सभी पाश्चर्यचकित होकर उनकी सारी बातें सुन रहे थे। इतनी देर वाद निरापद के मन में प्राशा की किरण कौंधी। उम्मीद वंधी। चोला, तो फिर मिल गई न? आपने ठीक से देखा तो है न? या यों ही अफवाह उड़ा रहे हैं ?' सिनेमा-हाउस का मालिक पंजावी सज्जन था, पर बहुत दिनों से १६० नायिका बंगाल में रहते-रहते बंगला भाषा, बंगाली चाल-चलन मादि सीस गया था। वह बोला, 'मैं उनको कमरे मे चाय पीने के लिए बैठा माया हूं। उन्हें चाय देकर में प्रापको ही ढूंढने जा रहा था। वह देखिए, उनकी कार सामने खडी है।' सबने उपर देखा। सचमुच, गुप्त साहब को कार बीच सड़क में सड़ी थी। घलाई सन्याल सबसे भागे चढ़ गए। उनके बाद सत्य मल्लिक, भौर फिर निरापद, भूपेन राहा, इन्स्पेक्टर भी धीरे-धीरे आगे बढ़े। उन सबके पीछे-पीछे ननी, गोवर्धन प्रादि चल रहे थे। २७ विष्णुपद राय को सारे काण्ड को सबर पहले ही मिल चुकी थी। नाटक के पीछे मुहल्ले के पागल सड़को का किया काण्ड ! इतने इतने रुपये देकर यहा के छोकरों ने एक नाटक-कम्पनी बुलाई थी, धौर उनकी आर्टिस्ट लड़की भाग गई ! और भागी भी विकास गुप्त के लड़के हीरक गुप्त के साथ। वे शाम से ही छटपटा रहे थे। कल नाटक है। उनको भाषण देना पड़ेगा और इधर इन छोकरो का कुछ पता-पता ही नहीं है। एक बार तो सोचा कि सुद बारहयारीतल्ला जाकर पता लगा पाएं, पर फिर सोचा कि ऐसा करने पर लोग क्या कहेगे ! विष्णु बाबू यही सब सोचते हुए अपने कमरे मै बठे-बैठे छटपटा रहे थे। कभी-कभी उटकर बाहर की ओर भाक लेते । अचानक पीछे से उनकी पत्नी ने कमरे में प्रवेश किया। बोली, "क्या हुमा,जी?' विष्णु बाबू ने पीछे की भोर मुड़कर कहा, 'भव मौर क्या होगा?' 'क्यो, क्या तुमने कुछ नही सुना?' नायिका १६१ विष्णु बाबू ने कहा, 'मुहल्ले के लड़कों का काण्ड तो देखो! इतने रुपयों की टिकटें बेच डालीं और अब कहते हैं कि उनके नाटक की लड़की भाग गई है !" बड़ी बहू ने कहा, 'मैंने भी यही सुना है।' विष्णु बाबू ने कहा, 'पर किसके साथ भागी, क्या यह भी सुना तुमने ? अरे, अपने उसी हीरक के साथ ! 'हीरक के साथ ? क्या कहते हो ?' 'हां, मैंने तो उसी समय कह दिया था कि इस छोकरे के चाल-चलन ठीक नहीं हैं । रुपये हो गए तो क्या हुआ, चरित्र तो अच्छा नहीं है न ।' पत्नी ने कहा, 'हां जी, पर उसकी तो शादी हो चुकी है। सुना है, हवेली में उसके साथ उसकी बहू भी रहती है।' विष्णु बाबू ने कहा, 'जैसी उसकी इच्छा, वैसा उसे करने दो। मेरा क्या है ? मरने दो, मैं कुछ कहने थोड़े ही जा रहा हूं। उसके वाप का दस्तावेज़ मैंने उसे लौटा दिया, यही पाप किया। उन दिनों उसे घर में लाकर खिला-पिलाकर आदमी बनाया, बस इसी से आज इतना सिर-दर्द - उसके बाद अचानक अपने आप ही बुदबुदाने लगे, 'मरने दो, मेरा क्या है ! मैं तो किसी वात के वीच में नहीं पड़गा, बावा। किसकी लड़की को कौन चोरी करके ले गया, उससे तुम्हें क्या मतलब है, और मुझे भी क्या मतलब है ? जाए जहन्नुम में मेरी बला से ! पत्नी ने कहा, 'मल्लिक-परिवार की लड़कियां नाटक देखने के लिए पिता के घर आई हैं । उनको तो बहुत अफसोस हो रहा है।' 'क्यों ? अफसोस किसलिए कर रही हैं ? नाटक की लड़की के भाग जाने की वजह से? पत्नी ने कहा, 'नहीं। बेचारी लड़कियां इतने शौक से नाटक देखने के लिए ही तो यहां आई हैं, वही न देखने को मिले तो उन्हें दुःख होगा ही।' विष्णु बावू बिफर उठे। बोले, 'उनसे कहो, वे अपने रुपये वसूल कर लें। विकास गुप्त के बेटे ने मुझे नीचा दिखाने की गरज से पांच सौ रुपये । १६२ नायिका का चन्दा दिया है, यह भी पता है तुम्हें ?' 'पाप सो रुपये। 'हां, नहीं तो क्या मैं भूठ बोल रहा हूं?' विष्णु बाबू को घरवाली बहुत दिनों से इस गृहस्थी के पन्दम्नी हाल सपने में समाए हुए थी । जव वह इस घर में वह बनकर पाई थी. उस वक्त इसका चेहरा कुछ और ही था। पारिवारिक सदस्यों, ऐश्वयं, वैभव तथा धन-दौलत मादि से यह गृहस्यो उन दिनों परिपूर्ण थी। उसके बाद एक-एक कर सब कुछ उसको पासो के सामने ही ध्वंस होता गया। एक-एक कर सब-कुछ नि.शेप हो गया। दुनिया ही लुट गई इस गृहस्थी को। “मोर उस दिन को घटना का तो पति को भी कुछ पता नहीं चला था। यहां तक कि घर के किसी और सदस्य को भी उस बात का पता नहीं चल सका था। उम दिन विष्णु बाबू को भरयाली ने मरेले में ही मांसू बहा-वहाकर सारी रात बिताई थी। घर के मालिक तो सिर्फ बैठक में बैठे हुए ज्याज के कारोबार, महा- जनी एव रुपये माना-पाई के हिसाब-किताव में ही व्यस्त रहते थे; मौर जब उनका सारा काम-काज पौर हिसाब-किताब चुकता हो जाता, तब जाकर वे बहुन रात गए सोने के लिए मन्दर माते । बहुत रात बीते कभी-कभी भगर विष्णु याव की नीद टूट जाती, तो ये देखते कि उनकी पत्नी बार-बार पहलू पाल रही है। तब वे पूछ लेते, 'क्यो? क्या नीद नहीं पा रही है ?" पत्नी जवाब देतो, 'नहीं।' 'मच्छर काट रहे हैं क्या?' 'तब फिर ? शायद दोपहर में खूब माराम से जी भरकर सो चुकी हो?' उस दिन भी उनकी पली उनको यह नहीं कह सको कि, 'नहीं, वह दोपहर में नहीं सोई। वह यह भी नहीं कह पाई कि, 'किमी भी रात उसे नींद नही माती' या 'वह हर रात मासों में ही विता देती है।' सिर्फ एक दिन विष्ण याबू ने इतना कहा था, 'क्या भन्न के बारे में नापिया १६३ - विष्णु बाबू ने कहा, 'मुहल्ले के लड़कों का काण्ड तो देखो! इतने रुपयों की टिकटें बेच डालीं और अव कहते हैं कि उनके नाटक की लड़की भाग गई है !" बड़ी बहू ने कहा, 'मैंने भी यही सुना है।' विष्णु वावू ने कहा, 'पर किसके साथ भागी, क्या यह भी सुना तुमने? अरे, अपने उसी हीरक के साथ !' 'हीरक के साथ ? क्या कहते हो ? 'हां, मैंने तो उसी समय कह दिया था कि इस छोकरे के चाल-चलन ठीक नहीं हैं । रुपये हो गए तो क्या हुआ, चरित्र तो अच्छा नहीं है न ।' पत्नी ने कहा, 'हां जी, पर उसकी तो शादी हो चुकी है। सुना है, हवेली में उसके साथ उसकी बहू भी रहती है।' विष्णु वाबू ने कहा, 'जैसी उसकी इच्छा, वैसा उसे करने दो। मेरा क्या है ? मरने दो, मैं कुछ कहने थोड़े ही जा रहा हूं। उसके बाप का दस्तावेज़ मैंने उसे लौटा दिया, यही पाप किया। उन दिनों उसे घर में लाकर खिला-पिलाकर पादमी बनाया, बस इसी से आज इतना सिर-दर्द है।' उसके बाद अचानक अपने आप ही बुदबुदाने लगे, 'मरने दो, मेरा क्या है ! मैं तो किसी बात के बीच में नहीं पड़गा, बावा। किसकी लड़की को कौन चोरी करके ले गया, उससे तुम्हें क्या मतलब है, और मुझे भी क्या मतलब है ? जाए जहन्नुम में मेरी बला से !' पत्नी ने कहा, 'मल्लिक-परिवार की लड़कियां नाटक देखने के लिए -पिता के घर पाई हैं । उनको तो बहुत अफसोस हो रहा है।' 'क्यों ? अफसोस किसलिए कर रही हैं ? नाटक की लड़की के भाग जाने की वजह से ?' पत्नी ने कहा, 'नहीं। बेचारी लड़कियां इतने शौक से नाटक देखने के लिए ही तो यहां पाई हैं, वही न देखने को मिले तो उन्हें दुःख होगा ही।' विष्णु वाबू विफर उठे । बोले, 'उनसे कहो, वे अपने रुपये वसूल कर लें। विकास गुप्त के वेटे ने मुझे नीचा दिखाने की गरज से पांच सौ रुप १६२ नायिका का चन्दा दिया है, यह भी पता है तुम्हें ?' 'पांच सौ रुपये !' 'हां, नहीं तो क्या मैं झूठ बोल रहाहूं?' विष्णु वाबू को घरवाली बहुत दिनों से इस गृहस्थी के अन्दरूनी हाल अपने में समाए हुए थी। जब वह इस घर में बहू बनकर आई थी, उस वक्त इसका चेहरा कुछ और ही था। पारिवारिक सदस्यो, ऐश्वयं, वैभव तथा धन-दौलत प्रादि से यह गृहस्थी उन दिनो परिपूर्ण थी। उसके बाद एक-एक कर सब कुछ उसको पाखों के सामने ही ध्वंस होता गया। एक-एक कर सब-कुछ नि.शेप हो गया। दुनिया ही लुट गई इस गृहस्थी की। और उस दिन को घटना का तो पति को भी कुछ पता नहीं चला था। यहां तक कि घर के किसी और सदस्य को भी इस बात का पता नहीं चल सका था। उस दिन विष्णु बाबू की घरवाली ने अकेले में ही मांसू बहा बहाकर सारी रात विताई थी। घर के मालिक तो सिर्फ बैठक में बैठे हुए ब्याज के कारोबार, महा- जनी एवं रुपये-प्राना-पाई के हिसाब-किताव में ही व्यस्त रहते थे; और जव उनका सारा काम-काज और हिसाव किताव चुकता हो जाता, तब जाकर वे बहुत रात गए सोने के लिए मन्दर पाते । बहुत रात बीते कभी-कभी प्रगर विष्णु बाबू की नीद टूट जाती, तो वे देखते कि उनकी पत्नी बार-बार पहलू बदल रही है। तब वे पूछ लेते, 'क्यों ? क्या नीद नहीं पा रही है ?' पत्नी जवाब देती, 'नहीं।' 'मच्छर काट रहे हैं क्या ?' 'नहीं।' 'तब फिर ? शायद दोपहर में खूब माराम से जी भरकर सो चुकी हो?' उस दिन भी उनकी पत्नी उनको यह नहीं कह सकी कि, 'नहीं, वह दोपहर में नहीं सोई। वह यह भी नहीं कह पाई कि, "किसी भी रात उसे नीद नहीं पाती' या 'वह हर रात मांसों में ही विता देती है।' सिर्फ एक दिन विष्णु वाबू ने इतना कहा था, 'क्या भन्न के बारे में नायिका १६३ सोच रही हो?' .:. उनकी पत्नी ने मुंह छिपाकर उस प्रश्न का जवाव टाल देने की कोशिश की थी। इसी बीच राय साहब फिर कहने लगे थे, 'नहीं, नहीं ! तुम उस मुंह- जली के बारे में इतना मत सोचा करो। खबरदार, जो कभी उसका नाम भी जुबान पर लाई। अगर मैंने भूल से भी तुम्हारे मुंह से उसका नाम सुन लिया, तो तुम्हें भी घर से निकाल बाहर करूंगा। ठीक उसी तरह जैसे मैंने हीरक को निकाला था।' एक बार बिगड़ जाने पर राय साहव को फिर अपने ऊपर अख्तियार नहीं रहता। इसी गुस्से ने रायवंश के सर्वनाश को न्योता देकर बुलाया था। यही गुस्सा उनकी सारी बरबादी की जड़ बन गया। जो कुछ था, उस सवका विध्वंस कर चुकने के बाद, उसी ध्वंस-स्तूप पर खड़े होकर अब जैसे उनका सारा आक्रोश स्वयं पर ही फटा जा रहा है। वे हमेशा वातों- ही-बातों में कहते, 'मैं क्या किसी का गुलाम हूं, जो किसी के आदेशानुसार चलूं ?' पर उनकी पत्नी ने किसी दिन भी इस बात का कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया। बस, उनकी सभी ज्यादतियां चुप्पी साधे सहन करती गई। इतने दिनों बाद आज भी अगर वह चाहती तो बीते दिनों का इतिहास सुनाकर राय साहब को पीड़ा पहुंचा सकती थी। पर उसको उन पर दया आ जाती थी। उसको लगता कि क्या फायदा होगा उनके मन को ठेस पहुंचाकर ? अकारण ही प्राघात करके आखिर उसे क्या मिलेगा? इसके अलावा उनको जैसे आघात पहुंचाने की ज़रूरत थी, वह तो उनको अपने आप ही मिल रहा था। अचानक मंजरी के भाग जाने की खबर कानों में पड़ते ही वह अपने पति के कमरे में जा पहुंची। पर वहां जाकर पता लगा कि उनको इसकी सूचना पहले से ही मिल चुकी है, और यह समाचार सुनकर वे प्रसन्न ही हुए हैं। उन्होंने कहा था, "अच्छा हुआ बड़ी बहू, बहुत ही अच्छा हुमा । उस वक्त तो किसी ने मेरी बात मानी नहीं। मैंने तो उसी वक्त कह दिया था १६४ नायिका कि सीमा से बाहर जाना अच्छा महो। तुम पागौर मार दिया, बस यही समझ लिया कि मुझ पर तुराकाका भय दिया है। क्यों, ठीक है न?' अचानक गिरि गोविन्द ने भीतर प्रवेश किया। दमारामारी तरह हाफ रहा था। 'क्या खबर लाए, गिरि गोविन्द ?' 'जी, वो विकास गुप्त का लडका नाटकवाली मटकी को लेकर भाग गया है। इसीलिए लाहा बाबू के मकान पर पुलिम माई है।' 'यह तो मैं भी सुन चुका हू । पर तुम इतनी देर कहा थे ?' 'जो मालिक, उन लोगों ने मुझे ये सब चीजें महिला दी और कहा कि यह सब आपके पास ले जाकर रख दू । उनका कहना था कि अगर यह सामान वही रहा तो मुमकिन है, कोई हथिया ले।' 'क्या है यह सब ?' राय माहब ने देखा कि गिरि गोविन्द के हाय में एक छोटा-मामूट. कम और एक हैड-बैग है। 'टम बैंग का मैं क्या करूं? क्या है इसके अन्दर ?' 'जी, यह तो मुझे मालूम नही । वनव के उसी ठोकरें ने, पानी मुक्ति- पद हाजरा के लड़के निरापद ने ही मेरे हाथ मे यह मारा सामान दिया था और बहाया कि यह उनके नाटकवाली लड़की का बैग है,निमम माप-पत्र- गहने प्रादि कुछ भी हो सकते हैं मैं इसे अापके पास जमा करवाई, गोंकि पापही उनके प्रेजिडेण्ट हैं।' उनकी स्त्री चुपचाप यह मय मुन रही थी, अतः गिरि गोविन्द ने बैंग और गूटम दन्हीं की और बढ़ा दिया। बोला, 'आप ही ठीक में मनान- कर रख दीजिए, मालकिन । लड़कियों की चीजें हैं। मैं भला कहाँ त गम्माल महंगा!" गृहिणी ने पूछा, 'गिरि गोविन्द, इसमें ताला तो वन्द है न ?' कहकर उसने बैग का मुंह बोला, पोर बोल पड़ी, 'हाय राम, देखो, बैग तो खुला हुमा ! कहीं वै नाग गहनों को लेकर बाद में इजा तो नहीं लगाएगे हम पर?' या मासिक राय साहब भड़क उठे। बोले, 'नहीं, नहीं, इन सब छिनाल छोकरियों की चीजों को मत छूना । इनको छूना भी पाप है।' पत्नी ने जवाब दिया, पर क्या मैं छू रही हूं ?' 'फिर भी तुम इन सबको चीर-फाड़कर फेंक दो । मेरे घर में यह सब अनाचार नहीं चलेगा।' इतना कहकर उन्होंने पत्नी के हाथ से बैग छीनकर कमरे से बाहर फेंक दिया। पर वह दरवाजे से टकराकर अटक गया और उसके भीतर के रुपये, पैसे, गहने आदि सब फर्श पर चारों और विखर गए। उनकी पत्नी सामान को बटोरने ही जा रही थी कि राय साहब सप्तम स्वर में चीख पड़े, 'फिर छू रही हो उन्हें ? मैं कहता हूं, फेंक दो, फेंक दो !' हठात् उनकी पत्नी वे सब चीजें उठाते-उठाते इस तरह दो कदम पीछे खिसक गई, मानो सांप देख लिया हो। 'अरे, यह क्या है ? जरा देखिए तो, यह क्या है ?' बैग के भीतर से एक छोटा बैग निकलकर गिरा था, जिसमें से एक चीज़ बाहर निकल आई थी। घरवाली जल्दी से उस पर झुकी। 'तुम फिर छू रही हो? मैं तुम्हें मना कर रहा हूं, फिर भी बात नहीं मानती हो? मैं कहता हूं, मत छुप्रो उन्हें !' पत्नी ने कहा, अजी, इसे देखिए तो सही! यह अपनी फोटो है न !' 'क्या कहा ? अपनी फोटो? तुम्हारा दिमाग तो खराव नहीं हो गया ? जो मुंह में आता है, बक रही हो! इसको फाड़कर फेंक दो।' उसके बाद गिरि गोविन्द की ओर देखकर उन्होंने जोर से डांट लगाई 'यह सब घर में क्यों उठा लाए तुम, बतानो तो? यह सब बिगडैल लड़कियों की अपवित्र चीजें हैं और तुम इन्हें घर में उठा लाए ! जाओ, सब बटोरकर सड़क पर फेंक प्राओ। जाओ!' 'आप देखिए तो सही!' कहते-कहते पत्नी ने फोटो को हाथ में उठा लिया और थर-थर कांपने लगी। . तुम मेरी ૬૬ नायिका २८ नैनागंज पहुंचकर हीरक ने अपनी गाड़ी वीच रास्ते में ही खडी कर दी थी। धूल और कीचड़ लगकर कार एकदम बदसूरत हो गई थी। यद्यपि कभी यह हाल था कि अगर अपनी कार को वह ऐसी हालत मे देस लेता तो फिर कार-क्लीनर की नौकरी जानी निश्चित यो। बहुत बार ऐसा हो भी चुका या । रामघनो कार ठीक तरह से नहीं चला पाता, इस- लिए कितनी ही वार वह साहव से फटकार सा चुका है। कितनी वार उसे 'फाइन' भी भरनी पडी है। और कभी-कभी ऐसी घटना भी घट जाती कि साहब का दिल खुश करके वह यशोस में मोटी रकम प्राप्त कर लेता । हीरक के मनमौजी-स्वभाव से सम्बन्धित कितनी ही कहानिया फैक्टरी के स्टाफ के लोगो मे प्रचलित हैं, इसका कुछ-कुछ भान स्वयं हीरक को भी था। फिर भी वह अपने उस भतीत का, जिसने इतने दिनों से उसे अपने शिकंजे मे जकह रखा है, धो-पोंछकर नामोनिशान तक मिटा देना चाहता है। इतने दिनों से संचम करते-करते जो प्रतीत माज मूल-धन बनकर बैंक के फिक्स्ड डिपोजिट खाते में जमा हो रहा है, उस प्रतीत को वह भूल जाना चाहता है। मन्न भी अपने ही बारे में सोच रही थी। फूलवाडी के उस नालाव के पक्के घाट की सीढियो पर हीरक के परो के पास लेटकर मिली ऊष्मा को वह अभी तक अपने में महसूस कर रही थी। एकाएक मन्न ने पूछा, 'इस वक्त तुम्हारे पाम कैमरा नही है न?' हीरक ने जवाब दिया, 'नहीं। क्यो ?' पन्न ने कहा, 'कैमरा होता तो फोटो सोचकर अपने पास रखते।' किसकी फोटो?' 'फूलबाडी के उस घाट की, जहा हम लोग लेटे थे । उमको एक फोटो सोचकर अपने पास रखने से कितना अच्छा लगता | क्या ही हमीन वस्न गुजाग है वहा हमने ? क्यों, सच कहती है न?' हीरक ने कहा, 'सच, मगर पहले मुझे ऐमा पता होता तो अपने साय कमरा अवश्य ले माता।' नायिका १६७ र तुम्हारा वह कैमरा कहां गया, जिससे तुमने हम लोगों की थी? याद है न ?' कौन-सी फोटो?' 'याद नहीं है ? मां, पिताजी और मैं; हम तीनों बैठे थे और तुमने खींची थी। यह उस समय की बात है, जब तुम छोटे थे।' हीरक ने कहा, 'हां, अव याद आया। लेकिन वह मेरा कैमरा नहीं था। कूल के एक साथी का कैमरा लेकर उस समय मैंने चित्र खींचना सीखना शुरू किया था। अब तो मैंने बहुत बढ़िया कैमरा खरीद लिया है।' अन्न ने कहा, 'तुम्हें मालूम है, वह तस्वीर मेरे पास अभी तक है । उसको मैं हर वक्त अपने साथ रखती हूं।' 'कहां है, दिखाओ।' 'यहां नहीं है, मेरे बैग में है। बैग भी तो नदी के किनारे वाले मकान में पड़ा रह गया।' उसके बाद एकाएक उसे होश आया। बोली, 'चलो, अधिक देर करना उचित नहीं है । हो सकता है, कोई हमें पहचान ले। चाय के पैसे तुम दे ही चुके हो न?' 'हां।' 'तब फिर और देर क्यों कर रहे हो ? उठो कलकत्ते पहुंचने में भी है काफी समय लगेगा । बीच में कई नदियां भी पार करनी पड़ेंगी।' लेकिन उसकी वात खत्म होने से पहले ही कई व्यक्तियों के बात करने की आवाज़ सुनाई दी। चाय-दूकान के मालिक ने उनकी हि खातिर की थी और एक एकान्त कमरे में उनके बैठने का इन्तज़ाम दिया था। अन्न को कोई भी नहीं पहचान पाया था, क्योंकि उसने निकाल लिया था। पर कमरे में बैठने के बाद उसने चूंघट सरक था । अब बाहर निकलने के समय उसे कोई पहचान न ले, इसलि फिर चूंघट निकाल लिया। वाहर से न जाने किसकी आवाज़ सुनाई दी, 'ज़रा भीतर ?' गुप्ता साहव ने गंभीर स्वर में पूछा, 'कौन हैं ? क्या चाह *hco दा 'मैं हूं, सिनेमा हाउस का एक्त्रीब्यूटर, सर। एक व्यक्ति माने मिलना चाहता है।' होरक ने पूछा, 'कौन मिलना चाहता है ? कौन है वह? हाही? व्हाट डज ही दान्ट्स ?' इतना कहकर उसने पर्दा नरकशापा और बाहर का बड़ा दृप्रा। पर्दे के जरा-सा सरकत ही अन्न को बनाई मन्माल का चेहरा दिडाई पड़ा। उसे देखते ही वह चौक की। बलाई समान पहा की पत्रमा उनको किसने सबर दी? 'क्या यहां मंजरी देवी है ? मैं उनमे जरा दान करना चाहता हूं।' 'पाप कौन है ? कहां से आए हैं ?' वलाई सन्याल आगे बढ़ पाए और दोने, 'मैं करने दे पाता हूं।' 'ठीक है । लेकिन मंजरी देवी नानक कोई गड़की यहां नहीं है।' बलाई सन्याल ने कहा, 'लकिन नर, में प्राली मादों में उन्हें यहां देख चुका हूं।' बलाई सन्याल के पीदे मुड़े मना लागल्नुहोकर उनका दाटकर मुन रहे थे । भूपेन राहा, निरापद, मत्य मल्लिक प्रादि की दहा नोंद । पता नहीं अब क्या होगा, यही नोव-मांचकर उन दर दिन दहा रहे थे। एकाएक हीरक गुप्त ने चिल्लाकर कहा, 'मटा!" चाय की दुकान पर जो वहा या, वह वहीं नीक करा फिर हीरक ने अपेक्षाकृत धीमी पादाज में दूछा, 'माई करने का मतलब क्या है ? यही न, कि मैंने ग्रारकी प्राटिन्ट की यहां कि ग्दा है ? लेकिन मेरे साय जो यहा है, वह मेरी ग्रानीया है, और उसका दान मंजरी सेन नहीं है।' 'मजरी सेन नहीं, तो और क्या नाम है टमका?' 'उसका नाम है अन्नपूर्णा राय।' 'मन्नपूर्णा ?' निरापद आश्चर्य में डूब गया। अन्नपूर्णा! मा अगा, मानी l सुना है उसने यह नाम । नायिका हूं, आप लोग चले जाइए यहां से । अदरवाइज़, मैं पुलिस म सन्याल रोने-रोने को हो पाए । बोले, 'लेकिन सर, पुलिस तो के साथ ही है। तो अच्छा ही है। आखिर आप लोग चाहते क्या हैं ? मिस मंजरी त करना ही तो चाहते हैं न? पर वे आपसे बात करना नहीं चाहें, - लाई सन्याल ने कहा, 'मैं उनसे सिर्फ दो-एक बातें निवेदन करूंगा। दो बातें।' अचानक भीतर से पर्दा हटाकर मंजरी बाहर निकल आई। बोली, स्टर सन्याल, आप यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे ?' बलाई सन्याल ने कहा, 'देखिए मैडम, मैं बहुत ही मुसीबत में फंस गया है। मेरा सर्वनाश हो गया है, मैडम !' सत्य मल्लिक ने आगे बढ़कर कहा, 'मंजरी, मंजरी...! मैं, मैं...!' बलाई सन्याल ने सत्य मल्लिक को बीच में ही टोकते हुए कहा, 'पाप चुप रहिए, मिस्टर ! श्राप देख रहे हैं कि हम लोगों की बात हो रही है, फिर आप क्यों 'डिस्टर्ब करते हैं ?' फिर अन्न की ओर पलटकर वे बोले, 'मैडम, मैडम, मैंने आपकी ऐसी क्या क्षति की है, जो आप मेरा इस तरह सर्वनाश करने पर तुली हैं ? सिर्फ आपके कारण मेरी यूनिट के सभी लोगों को उपवास करना पड़ रहा है।' मंजरी सेन ने उसी तरह चूंघट में से जवाब दिया, 'इसमें मेरा क्य दोष है, मिस्टर सन्याल? आपकी यूनिट उपवास कर रही है तो मैं क करूं?' 'मैडम, आप सब कुछ कर सकती हैं। एकमात्र आप ही तो हैं मुझे इस विपत्ति से उवार सकती हैं।' मंजरी ने कहा, "मिस्टर सन्याल, अब आप जा सकते हैं वक्त दूसरी जगह जा रही हूं। मुझे अभी प्रापसे बात करने की नहीं है।'
7 । फिर हीरक की ओर देखकर कहा, 'चलो, हम लोग चलें।' इतना कहकर वह सबके बीच में से रास्ता बनाकर पागे-मागे चलने. लगी । हीरक उसके पीछे चल पड़ा। सामने ही कार खड़ी थी। मजरी उसी तरफ चल पड़ी। बलाई सन्याल ने पोछे से बड़े हो निरीह भाव से पुकारा, 'मैडम !' सत्य मल्लिक भी पीछे-पीछे पा रहा था। उसने सबके सामने ही उसका हाथ पकड लिया, 'मजरी!' मजरी ने कहा, 'सत्य दा, पाप मुझे परेशान न करें। मुझे जाने दीजिए। आप लोगों ने मुझे बहुत दिन तक ठगा है. और मैंने भी प्राप लोगों को बहुत ठगा है ।' 'तुमने ठगा है ? कसी बात करती हो तुम 'हां, मैंने भी ठगा हो है। मैंने सबको ठगा है। मैंने स्वयं हंसकर तुम लोगों को रुलाया है और स्वय रोकर तुम्हे हंसाया है । दरअसल, सत्य दा, मैंने खुद को भी ठगा है।' सत्य मल्लिक ने कहा, 'तुम क्या कहती हो, मंजरी? मेरी तो कुछ समझ में नहीं पा रहा है। मंजरी ने कहा, 'तुम्हे समझने की जरूरत भी नहीं है, सत्य दा । मैं तुम्ह मममने के लिए बोल भी नहीं रही। असल बात यह है कि माप लोग मुझे मत रोकिए । मैंने अपना भविष्य निश्चित कर लिया है।' वलाई सन्याल ने कराहते हुए कहा, 'तो फिर प्राप शूटिंग नही करेंगी, मैडम? तो क्या मेरी फिल्म के सात रील वेकार हो जाएगे? तो क्या मुझे चार लाख रुपयो का नुकसान उठाना पडेगा? प्रापका क्या इरादा है, मैडम ? मेरा ब्लड-प्रेगर दो सौ से ऊपर हो चुका है । देखिए, अव मुझे स्ट्रोक हो जाएगा।' मंजरी ने उनकी किसी बात का जवाब न देकर हीरक को मोर देखा। बोली, "मुंह क्या देख रहे हो! गाडी में बैठो न, ये लोग तो ऐसे ही करते रहेगे। हीरक ने कहा, 'माप लोग जरा हटकर खडे हो। मैं कार स्टार्ट करगा।' नायिका १७१ निरापद ने कहा, 'लेकिन सर, अब हम लोगों का क्या होगा? हमारी कदमफूली के सव लोग मिलकर हमें मारेंगे, पंडाल जला डालेंगे। हम उन्हें किस तरह समझाएंगे, सर?' हीरक ने कहा, 'उनके रुपये लौटा दो। और अगर वे लोग इतने पर भी न मानें, तो मैं तुम लोगों के रुपयों की सम्पूर्ण क्षतिपूर्ति कर दूंगा।' निरापद ने कहा, 'सर, आप हमारी हालत का ठीक अन्दाज़ा नहीं लगा पा रहे हैं।' तब तक सत्य मल्लिक मंजरी सेन के विल्कुल नजदीक पहुंच चुका था। बोला, 'पर मंजरी, कुछ तो सोचो,क्या मेरे प्रति तुम्हारा प्रतिदान है ? क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया? मेरे प्रति क्या तुम ज़रा भी अहसानमंद नहीं हो? तुम मुझे इस तरह विपदानों में फंसाकर चली जायोगी ? मेरी हालत पर क्या एक बार भी विचार नहीं 'करोगी? अगर तुम चली गई, तो 'रूपक' का क्या होगा? तुम्हारे विना मैं इस यूनिट को रखकर करूंगा ही क्या ?' वलाई सन्याल ने कहा, 'और मैडम, आप मुझे भी बता जाइए कि मैं क्या करूं? मेरे चार लाख रुपयों का इन्वेस्टमेंट नष्ट हो जाएगा!" हीरक ने कहा, 'देखिए, मैं अब और सहन नहीं करूंगा। आई मस्ट बी रूड। आप सब हट जाइए सामने से; अब मैं कार स्टार्ट करूंगा। वी मस्ट लीव दि प्लेस नाऊ । क्विक, क्विक !' - । सचमुच उस दिन इतने लोगों की जो भीड़ नेनागंज बाजार के मोड़ पर इकट्ठी हुई थी, वह वहां के लिए बिल्कुल नयी बात थी। नैनागंज में ऐसी भीड़ किसी ने आज तक नहीं देखी थी। यहां-वहां से इकट्ठे होकर लोग उस भीड़ को देखने के लिए खड़े हो गए थे उस दिन । मंजरी को ले कर उस दिन कितनी ही कपोल-कल्पित कहानियां गढ़ी गई थीं। कोई कहता कि मंजरी सेन किसी के साथ भाग रही थी, सो पकड़ी गई । कोई कहता, मंजरी सेन शराब के नशे में बहक रही थी, अतः पुलिस ने उसे 'अरेस्ट' कर लिया। पर जो सही बात थी, उसका पता कई दिनों के बाद चला । अतः अव वही सुनिए। १७२ नायिका २६ मानव जीवन मे सुख और दुःख, पीड़ा और प्रानन्द, पासा और निराशा बहुत ही प्रास-पाम रहते हैं। इसलिए युग-युगान्तरो से अनगिनत काव्य-कहानियो की रचना होती पा रही है। प्राप, मैं और दूसरे सभी किमी अदृश्य नाटक कार के इशारे पर यहा अभिनय करने पाए हैं, और एक दिन जव सवका अभिनय पूरा हो जाएगा, तो वापम पर्दे के पीछे चले जाएगे। यही नियम इतने दिनों से चला आ रहा था; यह पहला मौका था, जब उम नियम में परिवर्तन हुआ। दृश्य बदल गया, लेकिन नायक-नायिका नहीं बदले । इस दुनिया में आकर दो व्यक्ति अपने जीवन में चरम ख्याति, चरम धन-दौलत एव चरम यश-इपजत पाकर भी उस दिन इन्ही सवसे मुक्ति पाना चाहते थे । रोजमरे को अनिद्रा की पीडा, हर समय अनिश्चितता की प्राशका, यह सब व्याधिया उन्ही लोगो को सताती हैं, जिनके पास सबकुछ जरूरत से ज्यादा होता है। और उन सब के अधिक होने के कारण ही उनके खोने का भी डर लगा रहता है । इसीलिए गरीवी का मज़ा लूटने के लिए वेचैन होकर उस दिन उन दोनों ने धन-दौलत की इस दुनिया से भागना चाहा था । पर अभी-अभी मैंने कहा न कि दृश्य परिवर्तन हो गया, लेकिन नायक-नायिका नही बदले । उम दिन मंजरी को लेकर जब ननागंज में इतनी चिल्ल-पों मची हुई थी, तभी अचानक गिरि गोविन्द वहा प्रा उपस्थित हुप्रा । हा, गिरि- गोविन्द ! उस दिन वह मजरी के सामने एकवारगी ही फफक-फफककर रो पड़ा था। वोला, 'दीदी! दीदी !!" अन्न ने गिरि गोविन्द को पहचान लिया। बोली, "गिरि गोविन्द ! तुम?" गिरि गोविन्द ने रोते-रोते कहा था, 'दीदी, बाबू बहुत बीमार पड़े हैं, पोर तुम यहा बैठी हो? जब से तुम कदमफूली छोडकर गई हो, तव से क्या तुम्हें एक बार भी अपने मां-बाप की याद नहीं आई ? क्या तुम इतनी नायिका १७३ पत्थर-दिल हो? क्या तुम्हारे दिल में मोह-ममता नाम की कोई चीज नहीं है ?' मंजरी ने कहा, 'तो तुमने मुझे पहचान ही लिया, गिरि गोविन्द ?' 'पहचानूंगा कैसे नहीं ? मैंने बचपन में तुम्हें कितना लाड़-प्यार किया है. ! अब बूढ़ा हो गया हं न। इसलिए मेरा दिमाग या अांखें भले ही कम- ज़ोर हो गई हों, पर तुम्हारी आवाज थोड़े ही भूल सकताहूं!' 'लेकिन गिरि गोविन्द, सच-सच बताना कि तुमने मुझे पहचाना कैसे? कलकत्ता जाने के बाद मेरा नाम तक बदल चुका है। यहां के और लोग तो मुझे नहीं पहचान पाए ?' 'दीदी, तुम्हारे बैग में जो फोटो थी न, मालकिन ने वह देख ली है। वह फोटो देखने के बाद से ही मां रो रही हैं।' 'और पिता जी?' "उनके लिए डॉक्टर बुलाने हो तो मैं नैनागंज आया था, दीदी । और यहां आकर सुना कि तुम यहीं हो। क्या एक बार घर नहीं चलोगी? मालिक अब बचेंगे नहीं। दीदी, एक बार तुम वहां चलो, सिर्फ एक बार !' बलाई सन्याल इस नई घटना से मानो विमूढ़-से हो गए। निरापद भी विस्मित-सा रह गया। हीरक गुप्त भी स्तम्भित रह गया । और इसके बाद ही दृश्य-परिवर्तन होता है । मानो पृथ्वी पर सब कुछ उलट-पलट हो गया। सबसे पहले बलाई सन्याल के मुंह से ही आवाज़ निकली। बोले, 'मैडम, तो फिर मेरी फिल्म का क्या होगा?' 'आप चुप भी रहिए।' मंजरी ने डांटकर उनको चुप करा दिया। निरापद ने कहा, 'पर मेरा नाटक, सत्य दा? हमारे नाटक का क्या होगा?' सत्य मल्लिक की पार्टी के सभी लोग इतनी देर से चुपचाप सब कुछ देख-सुन रहे थे। मानो उनकी सारी की सारी बातें खत्म हो गई हों। सत्य मल्लिक ने आगे बढ़कर कहना शुरू किया, 'तो क्या मंजरी, तुम नाटक नहीं करोगी?' १७४ नायिका अवको वार मंजरी उबल पड़ी, 'तुम चुप रहो, सत्य दा! पहले 'म: अपने जीवन को महत्त्व दूं, या तुम्हारे नाटक को? क्या तुम लोग मुझे जीने नहीं दोगे? क्या मेरे पास जो, जान या मन नाम की कोई चीज नही है ? क्या सिर्फ रुपये इकट्ठे करने से ही मुझे संतोप मिल जाएगा? क्या जिन्दगी भर मैं चेहरे पर रंग पोतकर लोगों का मनोरजन ही करती रहूंगी? मानो मुझे खुद के दर्द का इलाज करने की ज़रूरत नहीं है। मानो. मुझे स्वाभाविक जीवन जीने की इच्छा ही नहीं होती। क्या तुम लोग यही चाहते हो कि जिन्दगी भर मैं ग्लैमर मे ही मग्न रहू ? जैसे मुझे गृहस्थी वसाने की प्राकांक्षा ही नहीं होती। जैसे इस दुनिया में मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है । माप लोग आखिर सोचते क्या हैं, बताइए तो सही ? क्या समझते हो तुम लोग ? तुम लोगों का नाटक में किसी हालत में नहीं करूंगी। अब मैं फिल्म जगत मे भी कदम नही रखूगी। कहते-कहते सबके सामने ही मजरी रो पड़ी । बहुत ही निरीह भाव से उसने अांचल से मुंह ढंक लिया और व्याकुल होकर रोने लगी। पता नहीं किस सुदूर से एक फैक्टरी का मालिक गाव के एकान्त मे कुछ समय विश्राम करने को जाता था। उसके प्रॉफिस एक्जीक्यूटिव को कह दिया जाता कि विश्राम के दिनों में मिस्टर गुप्त को किसी हालत में भी विरक्त नहीं किया जाना चाहिए। मिस्टर गुप्त हर साल इसी तरह माराम करने को जाते । वे अपनी पत्नी को साथ लेकर और सारी जिम्मे- दारियों को पीछे छोड़कर चले जाते । लाखों रुपयों के डेबिट और क्रेडिट का पाकर्षण भी मिस्टर एवं मिसेज़ गुप्त को नहीं डिगा सकता था। वे हर साल निश्चित रूप से विश्राम करने चले जाते थे। पर इस वार कुछ और ही हो गया। मिस्टर गुप्त के प्राने के बाद से हो उनकी फैक्टरी मे लेवरस्टवल शुरू हो गया था। पर यह सवर गुप्त साहब तक पहुंचाने की हिम्मत किसी में न थी। प्रासिर एक दिन मचा- ना , नक ही कस्टम्स-डिपार्टमेण्ट से सरप्राइज़ चेकिंग करने को ऑफिसर्स श्रा धमके और साथ-ही-साथ इन्कम-टैक्स का एक आदमी भी प्रा पहुंचा। उस घटना के बाद एक्जीक्यूटिव-सेक्रेटरी अधिक धैर्य नहीं रख सके। मिस्टर गुप्त के पी० ए० को सीधे प्लेन से कलकत्ते भेज दिया। वहां से कार ड्राइव करके वह नैनागंज पहुंचा। 'क्या बात है, रंगनाथन् ?' रंगनाथन को देखकर मिस्टर गुप्त चकित रह गए। रंगनाथन मिस्टर गुप्त का पी० ए० था। उसने कहा, 'सर,आपसे एक काम था, इसीलिए चला आया।' 'क्यों, क्या हुआ? ' रंगनाथन ने एक के बाद एक सारी खबर सुना दी कि किस तरह इण्डिया गवर्नमेन्ट के दिल्ली ऑफिस से सी० बी० आई० के ऑफिसर फैक्टरी में 'सरप्राइज़ चेकिंग के लिए आ पहुंचे हैं । सब कुछ सुनकर हीरक को लगा, मानो अचानक ही समूची धरती कांप उठी हो । हीरक गुप्त ने कहा, 'क्या बात करते हो तुम? हमारा चीफ-एका- ण्टेण्ट कहां गया?' 'वे अपनी लड़की की शादी पर छुट्टी लेकर बैंगलोर गए थे। उनको बुलाने के लिए हमने तुरन्त पाहूजा को भेजा था और वे अपनी लड़की की शादी छोड़ कर उसी वक्त पा भी गए। आते ही उन्होंने आपको खबर भेजने की सलाह दी।' 'एक्सपोर्ट-डिपार्टमेन्ट की फाइल और पेपर्स तो सब ठीक हैं न ?' पता नहीं क्षण भर को हीरक किस सोच में डूब गया। उसके बाद बोला, 'ठीक है, एक बार मुझे जाना ही पड़ेगा; अन्यथा वहां सब कुछ उलट-पलट हो जाएगा। फिर अन्न के पास जाकर कहा, 'अन्न, तुमसे मुझे एक बात कहनी है। ज़रा इधर तो प्रायो। अन्न को एक ओर ले जाकर हीरक ने कहा, 'अचानक ही मेरा पी० ए. यहां आ पहुंचा है। मेरी फैक्टरी में सरप्राइज चेकिंग हो रही है। मेरा एक बार वहां जाना ही ठीक रहेगा।' १७६ नायिका ना-११ अन्न ने कहा, 'होरक, मैं मी तुमसे एक बात कहने की सोच रही थी। अभी-अभी तुमने सुना ही है कि पिता जी मस्त बीमार हैं, और यह भी देख ही रहे हो कि बताई सन्याल किस कदर रो-गा रहे हैं । वह ब्लड प्रेशर का मरीज है, अतः मैंने कलकत्ते जाकर शूटिंग शुरू न की, तो सच मे उसका सर्वनाश हो जाएगा, हीरक ।' हीरफ ने कहा, 'मैं भी उपर ग्राफत मे फंस गया हूं, अन्न । इनसे मिलो, ये है मेरे पी० ए०, मि० रगनायन् । ये डेढ हजार मील से सिर्फ मेरे लिए दौड़े चले आए हैं । कारण, अचानक ही कल सुबह से माफिम मे सर- प्राइज-चेकिंग शुरू हो गई है । मचमुच ही मेरे मिर पर जैसे प्रासमान टूट पडा है । क्या करूं, क्या न करू...' अन्न ने पूछा, 'क्या बात है ? कुछ गडबड़ी हो गई है क्या ?" 'गड़बड़ी हुई है कि नहीं, यह सब तो वहा जाकर पता लगेगा; मभी तो प्रधेरे-कूप मे पड़े रहने-सी गति हो रही है मेरी। मैं सोचता हू कि ऐसी हालत में इमी क्षण मेरा वहा जाना जरूरी है।' 'मॉल राइट।" हीरक ने कहा, 'तो अब फिर कय मुलाकात होगी?' मंजरी ने कहा, 'इस बारे मे मैं तुम्हे याद मे खबर दे दूगी। तुम चिन्ता मत करना। अभी तो पहले मैं यह देखू कि पिता जी की हालत कैसी है ?' पर बाद में सवर देना क्या मभव था ? सचमुच, ख्याति एक ऐसा ही माकर्षण है ! धन-दौलत का एक अपना ही मोह है ! वहां हजारों कष्ट हैं, लेकिन उन कप्टों से भी हमारा अटूट सम्बन्ध-सा हो जाता है । यह जानते हुए भी कि उसके चलते हमे भनिद्रा का शिकार होना पड़ेगा, उसके कारण प्रति दिन, प्रति पल हमे अभिशाप का बोझ वह्न करना पड़ेगा, लेकिन फिर भी हमारे लिए किसी एकान्त मे या जगल में चले जाना कमी सभव नहीं होगा। 'वही एकान्त फिर से लौटा दो' यह कहकर हम उच्च स्वरो में प्रार्थना भले ही कर लें, और माडम्बर-सहित वन महोत्सव भले ही मना लें, पर दरमसल हमारा उघर लौट जाना समव नहीं। किसी हालत में भी नही। नायिका १७७ ३१ भी जब टालीगंज में शूटिंग होती है, तो बलाई सन्याल वहां दम मौजूद रहते हैं। मैडम पर हर समय उन्हें पहरा देना पड़ता नवीय दुनिया के अन्दर वहां एक और ही दुनिया का निर्माण होता हां भी हंसना-रोना और नाचना गाना होता है। वहां भी ईर्ष्या, वं संघर्प की लीला चलती रहती है । वहां भी वास्तविक जीवन जैसा व कुछ रहता है, लेकिन फिर भी वहां का सब कृत्रिम, रटा-रटाया र बाहर से बनाया-सजाया हुप्रा-सा लगता है। वलाई सन्याल के मन में हमेशा डर बना रहता। वे प्रोड्यूसर हैं, कर भी शूटिंग के दौरान स्वयं वहां खड़े रहते हैं और एकाग्र मन से सारा काम देखते हैं । उत्तेजना-वश उनका दिल धक-धक धड़कता रहता है । ब्लड प्रेशर तो था ही; अब एक नई बीमारी ने उन्हें और पा घेरा है और वह है डायबटीज़। सुबह के वक्त स्टुडियो आते ही वे कहते, 'गाड़ी भेजी गई कि नहीं, हरीपद ?' हरीपद, गोवर्धन, भूपेन राहा, सभी संत्रस्त हो उनकी सेवा में हाज़िर हो जाते। हरीपद पूछता, 'कहां, सर ?' उसकी बात सुनकर बलाई सन्याल भड़क उठते । कहते, 'वाप रे, तुम लोगों से मैं अब अधिक माथापच्ची नहीं कर सकूँगा। गाड़ी कहां भेजी जाती है, यह तुमको मालूम नहीं ?' हरीपद कहता, 'हां, वह तो मालूम है, सर।' 'तव फिर ? तुम लोग बात समझते क्यों नहीं ?' सारा सिर-दर्द मानो वलाई सन्याल को ही था। उनके दिमाग इसीलिए उन्हें सिर-दर्द भी रहता। एक ज़माने से वे फिल्म बनाते हैं। सिर्फ फिल्म बनाना ही तो सब कुछ नहीं है, बल्कि आर्टिस्ट के में नाक भी रगड़नी पड़ती है । विशेषतः वह आर्टिस्ट यदि मंजरी से टॉप-स्टार हो। १७८ नायिका उस दिन भो फिर से शूटिंग शुरू हुई। फिर से मंजरी सेन इन रिल की हीरोइन बनी। इतने दिनों को झम्टों, परेशानियों के बार भी मंगरी। सेन को छोड़ नहीं सके वलाई सम्मान । माज मगर मंगरी सेग रजाई सन्याल के मुह पर थूकना भी चाहे, तो उसे भी निस्किार मन से बनाई सन्याल को निगलना ही पड़ेगा, मोर रहना पड़ेगा, 'मापका रिसना मीठा है, मंडम !' गोवर्धन बहता, 'सर, माप इतनी चिन्ता क्यो करते हैं, पासिर हम लोग किसलिए हैं ?' यह सुनते ही बलाई सन्याल का पारा गर्म हो जाता। ये पहले, 'गार हो तुम लोग ! सब कुछ तुम लोगों पर यकीन करके छोड़ दिया, तभी तो माज मेरी यह हालत है । क्या उस समय तुम लोग मैडम को गम्भाल समे थे? तब तो मुझे ही कदमफूली जाकर मैडम को दूढ-ढोरकर यापरा साना पड़ा था। याद है न?' और यह सच भी या। वह बात सभी को मान तक याद है। कौन तो थे एक मिस्टर गुप्त, जिनके साथ एक तरह से मैहम भाग ही गई थी। पर एकाएक ही मंडम के पिता बीमार हो गए, और यह पवर गुनो ही गारा मामला शात हो गया था। उस एक दिन में बलाई सन्याल की पटरी लगभग बीस हजार रुपये यों चुटकी बजाते हवा हो गए थे। मैडम का बाप बूढा था । उसका दाह-गस्कार भी तो फारसा पहा था। एक तो वह खर्च हुमा, उस पर से श्राद्ध अलग से करना पड़ा। इन्हीं गाय- धन, ननी, भूपेन राहा मादि ने कथा देकर यूढे को मगान तक पहभाया था। कदमफूली रास्कृति-मघ के लड़के भी क्या कम संतान थे? उन गय ने वलाई सन्याल को पकड़ लिया और बोले, 'हमारी तीन हजार रुपयायी टिकटें बिक चुकी है, वह रुपया निकालिए ।' सत्य मल्लिक तो मौका पाकर वहा से सिमक गया, पर यमाई गम्पाल भला कैसे खिसक जाते ! उनके तो मिर पर राह पढ़ा हुपा था! उसपी चार लाख रुपयो के लागत की फिल्म का मामला था। मनः महनही तों' दे मडम की उपेक्षा नहीं कर सकते थे । इगके पलावा, विष्णु वायू भी तो कोई ऐरे-गैरे ."हीं । !
। के ज़मींदार थे वे । इसलिए उनके मृत्यु-भोड दकर खिलाना पड़ा था । और वह सब वलाई सन्याल न करता त न करता? और था ही कौन ? बल्कि इतनी गरज थी भी किसे ? तो एक भी पैसा अपनी गांठ से निकालनेवाली थी नहीं। ऐसी शिक्षा मिली ही नहीं थी । वह ऐसी लड़की थी भी नहीं। इतना सव करने के बाद मैडम को वापस कलकत्ता लौटा लाना संभव ना था। वह भी बलाई सन्याल के बल पर ही। अगर वलाई सन्याल की गह और कोई होता, तो इस फिल्म की सब रील डब्बे में बन्द कर दी जाती। और हीरक गुप्त ? वह उस समय पत्नी सहित हाई-वे पर कलकत्ते की अोर कार में उड़ा जा रहा था। माया ने सिर्फ एक बार पूछा था, 'वह लड़की कौन थी, जी ?' हीरक ने सिगरेट का कश लगाते हुए कहा, 'यह भला मैं क्या जानूं ? मैं क्या बंगला फिल्में देखता हूं कभी? पर सुना है कि बहुत ही फेमस फिल्म- स्टार है । बहुत रुपये कमाती है।' माया ने कहा, 'हां, हां, मंजरी सेन नाम तो मुझे भी सुना-सुना-सा लग रहा है। हीरक ने कहा, 'वेचारी को शाहगंज के गुण्डों ने बहुत परेशान कि था। मैं नहीं होता तो आज उसका बहुत बुरा हाल होता।' वस, उनमें इतनी ही बात हुई थी। हीरक गुप्त के दिमाग में उस फिर से इन्कम-टैक्स, वेल्य-टैक्स, एक्सपोर्ट-लाइसेन्स प्रादि घूम रहे र से उसकी तबीयत खराब होने लगी थी,और फिर से उसने स्ली पल्ज़ खरीद ली थीं। फिर से डेविट और क्रेडिट तथा बैलेंस-शीट के वंधे में उलझकर उसका दिमाग फेल होता जा रहा था। और तब जाकर मानो वलाई सन्याल को ऐसा महसूस हुआ वची तो लाखों पाए । वेकार लोगों के चक्कर में पड़कर मैडम ने दिमाग खराव कर ही डाला था। अंत में सन्याल साहव ने ही स लिया। - नायिका मैडम ने कदमफूलो से अपना सारा संबंध तोड़ दिया और प्रव अपनों विधवा मा के साथ कलकत्ते के फ्लैट में प्राकर बस गई है । प्रत्येक दिन सुबह बलाई सन्याल को कार मैडम के फ्लेट के सामने प्राकर खड़ी हो? जाती है। मां बेटी को जगाती है और कहती है, 'अरी प्रो अन्न, उठ, उठ तो, देस तेरी सिनेमा की कार मा गई है !' तब भी बेटी नहीं उठती। मा फिर जगाती है । कहती है, 'उठ न बेटी ! परी अन्न, तेरी सिनेमा वाली गाडी देस कितनी देर से खडी है !' अन्न नाराज हो जाती है और कहती है, 'खड़ी रहने दो। उससे मेरा क्या बनता-बिगड़ता है ?' स्लीपिंग-पिल्ज़ की कीमती नींद सहज ही उसकी नैन-पंखुड़ियों को छोड़कर जाने को तैयार नहीं होती। पाखिर हारकर जब वह उठती है,.. तब तक स्टुडियो में हो-हल्ला मच चुका होता है। बलाई सन्याल का ब्लड. प्रेशर जल्दी-जल्दी बढ़ना शुरू हो जाता है । डायरेक्टर तैयार, लाइट तैयार, साउण्ड तयार, कैमरा तैयार, यहा तक कि हीरो अजय भादुडी भी मेक- अप करके तैयार हो जाता है; सिर्फ हीरोइन ही उस वक्त नजर नहीं माती। और जव मंडम स्टुडियो में कदम रखती है, तब तक लच का टाइम हो जाता है । मैडम चुपचाप मेकअप-रूम मे घुस जाती है। वलाई सन्याल पाकर पूछते हैं, 'याज कैसी तबीयत है, मैडम ?' प्रोडक्शन-मैनेजर भूपेन राहा पाकर नमस्ते करता है। प्रोडक्शन- असिस्टेंट गोवर्धन एक प्लेट में मॉपल काटकर लाता है, अगूर, अनार, दही, माइसक्रीम और सदेश लाता है । मेकअप करते-करने में हम फल का एकाध टुकडा मुंह में डालती जाती है और भूपेन राहा डायलॉग पढ़कर सुनाता जाता है । जो डायलॉग मैडम को पसन्द नहीं पाते, उनको यह बदलने के लिए कहती है । तब दुवारा मैडम को पसन्द के अनुसार नये डायलॉग लिसाए जाते हैं । तब जाकर भीतर से मैडम को बुलाहट होती है । और मैडम जैसे दया करके धरती पर अपने चरण-कमल रसते हुए नायिका १८१ जब फ्लोर पर पहुंचती है, तब सब के सब सतर्क हो जाते हैं । बलाई सन्याल का कलेजा धक-धक करना शुरू कर देता है। ब्लड प्रेशर क्रमशः ऊंचा बढ़ना शुरू हो जाता है। डायरेक्टर कहता है, 'रेडी, मैडम रेडी!' और इसके बाद मैडम को कुछ भी याद नहीं रहता। उस समय न तो कदमफूली की बात याद रहती है, न ही हीरक गुप्त की बात याद रहती । फूलबाड़ी की बात भी याद नहीं आती। उसी फूलवाड़ी की, जिसके पोखर के किनारे बड़ के पेड़ का सहारा लेकर उस दिन उसने कैसी-कैसी बातें कही थीं। वह सब कुछ भी याद नहीं रहता मंजरी को। डायरेक्टर चिल्ला पड़ता है, 'मॉनिटर !' और तब समूचे फ्लोर पर सांय-सांय करती स्तब्धता छा जाती है। 'लाइट्स ग्रॉन !' , 'साउण्ड स्टार्ट ! 'कैमरा !' 'क्लैप-स्टिक! और पलक झपकते ही मैडम मंजरी हो उठती है, और मानवीय-जगत में एक और ही जगत की सृष्टि होती है। बीसवीं शताब्दी की यांत्रिक- सभ्यता का मानव, मशीन की ही तरह फिर से कठपुतली का नाच शुरू कर देता है । परमार्थ की बात भूलकर वह फिर से अर्थ-उपार्जन की वेदी पर अपनी आत्म-बलि देता है। । 1230
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