Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Chairman's Report
Front matter
No text on this page.
रांम
राज
वखांणदाता
पडित प्रवर श्रद्धेय
श्री पुष्कर मुनिजी म०
संपादक
देवेन्दमनि शास्त्री, साहित
रूपान्तरकार
नृसिंह राजपुरोहित, एम. ए. (रिसर्च स्कॉलर)
प्रकाशक
सम्यग्ज्ञान प्रचारक मंडल, जोधपुर
द्रव्य सहायक
श्री वस्तीमलजी सेजाजी भंसाळी
अजीत (जिला बाडमेर) राजस्थान
पुस्तक प्राप्तिस्थल
१. भंडारी सरदारचंद जैन, बुकसेलर,
त्रिपोलिया बाजार, जोधपुर
२. सर्वोदय जनरल स्टोर्स, ५ पाला सदन,
दुकान नं० ३-४, आदर्श नगर,
हौसिंग कॉलोनी के सामने,
बंगाल केमिकल के पास, वरली,
बम्बई नं० १८
स्वाधीनता दिवस १९६५
प्रथम प्रवेश
एक रुपया
विषय - सूची
१
१३
रांम राज
धर्म री परख
चालता रहौ, प्रागै बधौ
जीण री कळा
जिंदगी रो प्राणद
३६
८१
No text on this page.
No text on this page.
[ ii ] के राम-जीवण री कथावा आथमणा मुल्कां रा लोक साहित में पण मोफली मिले । इण कारण इज तो हिन्दी रा प्रसिद्ध कवि श्री मैथिलीसरणजी गुप्त कह्यौ है - राम तुम्हारा चरित, स्वयं ही काव्य है कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है। रांम री पितर भगतो, रांम री मातर भगती, रोम रो बांधव प्रेम अर रोम रो राज ए सगली चीजां आदर्स रही है। श्री इस कारण है कै लाखा वरस बीत्यां पछैई राम-नाम मानखारी जबांन माथै चढयोडौ है। सगलारी एक इज चावना है कै रामराज पाछौ बणै। मानखा नै कृष्ण रै राज री के दूजा कोई भूपत रै राज री चावना नी है । चावना है तो फगत एक रामराज री । इण वास्तै देखणौ ओ है के रोम रोज में इसी कांई खूबिया रही है के मानखौ आज लग उण राज नै इतरौ चावै। इण पोथी में परम श्रद्धेय सद्गुरुवर्य श्रीपुष्करमुनिजी महाराज एक प्रवचन में राम राज री सगली खूवियां बताई है। अर राम चरित्र री विसेसतावां माथै जोर देवता आ प्रेरणा दीवी है के चरित्र इज कोई पण मुल्क रो मेरुदड है। मुल्क री आजादी चरित्र रा खूटा सू इज बाघोडी है । इण रै वास्तै मजबूत सूटा री जरूरत है। काचा पोचा खूटा सू कॉम नी चालै । कारण कै आजादी तो एक मतवाला गजराज रै उनमांन है। उण नै काबू राखणो घणौ अवखौ काम है। राम राज सातर जरूरी है के जीवण-कला रा मरम नै समझयौ जावै । जठा ताई जीवण-कला रो जाणकार नी वणे उठा ताई जीवण पांगर ना सके। अर जठा ताई धर्म री परख नी व्है, उठाताई घुमक्कड-जीवण रोपाणद नों उठायौ जा सके। इण भांत ए प्रवचन तर्क ज्यूं तीखा, श्रद्धा ज्यू गैरा अर दरपण री पाण निरमल है। इण में जमांना री समस्यावां रो समाधान है, उफेल है।
।
[ iii ]
आ पोथी पैला हिन्दी अर गुजराती में छप्या पछै अवै राजस्थांनी में
प्रकासित व्हैरी है। हिन्दी अर गुजराती में इणरो आछौ आव-आदर व्हियौ ।
इणरो राजस्थानी रूपांतर राजस्थानी गद्य रा जाणिया-पतवाणिया लेखक श्री
नृसिंह राजपुरोहित, एम० ए० (रिसर्च स्कॉलर) कियौ है । 'मिनखपणा रौ
मोल' पछै आ दूजी पोथी 'राम राज' पाठका ताई पुगावतां म्हनै घणौ
हरख है।
जैन स्थानक
खांडप (राज.)
स्वाधीनता-दिवस
१९६५
-देवेन्द्र मुनि
अनुवादक रा आखर सन् ५० में म्है राजस्थांनी गद्य लिखरणी सरू कियौ हो । उण वात नै आज पनर बरस व्हग्या । इण बरसा में राजस्थांनी नाम माथै हाको तो मोकळी व्हियो, पण काम इतरी नी व्हियौ । श्राज राजस्थांनी री संवैधानिक मान्यता वास्त लोक सभा में बिल पेस करण री वाता चाल री' है, राजस्थांनी वास्तै एक न्यारी अकादमी री थरपणा करण रो विचार परण जोर पकड़ती जावै है । पण मूळ सवाल ओ है के राज- स्थानी रे सिरजण री कांई हालत है । गद्य भासा री कसोटी मांनी जावै। इण वास्तै भासा रो दारमदार गद्य ऊपर है । आज राजस्थान में कितराक लेखक इसा है जो सतत- रूप सू गद्य लिख रहा है । (तुकबंदिया करने कवि सम्मेलना में सस्ती वाहवाही लूटणी दूजी बात है) आज सू पनरै बरसां पैली पूरा राज. स्थान में जिको लेखक (आंगळियां माथै गिण जितरा) राजस्थानी गद्य लिखता हा, म्हन तो प्राज पण वे इज सूरमा मैदान में दीस है। दूजी कांनी प्रकासण री आ हालत है के जो लिख्यो जावै, उणन कोई छापण वाळो कोयनी पर जिको छपवाय दियौ जावै उणनं कोई मोल लेवण वाळो कोयनी । इण सगळी वातां रो उकेल पापा ने सोचणी है। कोरी बातां सूतो काम पार पड़ण सूरह्यो । जैन धर्म पर बौद्ध धर्म प्राद-जुगाद सू पोता री बात जन-भासा में साहित सब सू पली अनुवादित होय नै आधुनिक राजस्थांनी गद्य म प्रकासित हुयी है। श्री सगळी साहित मानखा रा चरित्र नै ऊची उठा- वरण वाळी अर उगने मारग घालण वाळौ है । आपणा मुल्क न तो
[ i ]
आज इसा साहित री सख्त जरूरत है । इणमें सांप्रदायिकता के संकीर्णता
रो कठई नाम निसारण ई नी । 'वसुधैवकुटुम्बकम' इण साहित रो
मूळ मत्र है।
इण पोथी र पे'ली 'मिनखपणा रौ मोल' रै नाम सू आपरी एक
दूजी पोथी पण निकळ चुकी है । दोनू पोथ्या रो अनुवाद म्है गुजराती
सूकियो है । आगे पण अनुवाद रो काम चालू है । हरिजी री मरजी
हुई तो दो एक पोथ्यां फेर पण आपरै हाथां में वेगीज पूर्णला।
नृसिंह राजपुरोहित, एम. ए.
(रिसर्च स्कॉलर)
एक अोलखांण
इण पोथी खातर नारणा री मदद करण
वाला धर्मप्रेमी सज्जन श्री वस्तीमलजी
सेजाजी भंसाली गांम अजीत (जिला बाड़मेर
राजस्थान) रा वासी है । आप सर्वोदयो
जनरल स्टोर बम्बई रा मालिक अर श्री
महावीर मोटर ट्रेडिग कम्पनी रा भागीदार
है। या रो पूरी परिवार धर्म-अनुरागी अर
श्रद्धय गुरुदेव रा वखाणां तूं प्रभावित होय
नै इणां यां री माता सुश्री सोनी वाई से
याद मे इण पोथी 'राम राज' छपावरा
रो अरज कीवी । जिणरो फल भी है के
मा पोथी आपरै हाथा में है।
ने
-
गौतम पांचलिया
रांम राज
No text on this page.
रांम राज - उण दिन देस में सोना रो सूरज उगो हो, कारण के एक हजार वरसां री गुलामी भुगतनै देस सुतंतर सरवतंतर हो हो । इण सुतंतरता रै वास्ते भारत रा सपूतां सांमी छाती गोलियां झेळी। मातावां आपरा व्हाला डीकरां ने फांसी पर झूलता देख्या। जळियां वाळा बाग मे जो अत्याचार हुओ, उणनै देखनै मिनखपणी कुरळाय ऊठ्यौ । ओ दानवता रो नागी नाच हो । पण गांधीजी री विचार रूपी अांधी परदेसी राज ने खतम कर दियो अर इतिहास-प्रसिद्ध लाल किला पर यूनियन जेक री जगै समता पर साति रो प्रतीक तिरंगो असोक चक्र लहरायो । भारत वासियां रै हिवड़ा मे आणद री छोळां उछ- ळण लागी। मन रा मोर नाचण लाग्या, हिवड़ा रूपी कमळ खिलग्या। जीवण रा कण कण मे नवी-चेतणा आई पर जैजै- कार री आवाज सू अाभौ गूंजण लागौ। बाळक-बूढां सगळां रै चेरा पर खुसी नाचण लागी। कवि रै हिवड़ा रा तार झणझणाय ऊठ्या- विकास को श्रास भरा नवेन्दु सा, हरा - भरा कोमल पुष्प-माल सा। प्रमोद दाता विमल प्रभात सा, स्वतंत्रता का शुचि पर्व प्रा लसा । आज वो इज दिन, वो इज पनरै अगस्त पाछौ पायो है।
२ राम राज . पण जिको आणंद आजादी लेवतां वखत हो वो आज कठीन गायब व्हग्यो। आजादी लेवतां वखत जो उत्साह हो, वो आज कठीनै ठेका देयग्यो ? गुलामी में सू छूटती वखत जो आसावां या उम्मीदां ही वै पूरी हुई के नी ? जठा ताई म्हारी अक्कल कांम कर म्हूं तो जोर देयनै कैय सकू हूं के, जिको आणंद अर उत्साह उण दिन हो वो आज नी है । सुतंतरता मिळयां पै'ला आपां जिकण रंगीन कल्पनावां में उड्या करता, वै सगळी कल्पनावां साकार नी व्है सकी। भारत नै आजादी मिळयां पछ महात्माजी अर देस रा दूजा नेतावां इण बात पर बार बार जोर दियो है के स्वराज सुराज बणावणो चाहिजे, रामराज बणावणो चाहिजे । रांम भारत री संस्क्रति रो थांबो है, जिण पर पूरी आर्य संस्क्रति गरब कर सके। वो एक इसो जगमगाट करती दीवो है, जिणरा उजास में जैन, बौद्ध अर वैदिक संस्क्रति रो साहित जगमगाय रहयो है। जीवण रा पंथ मे भूल्या-भटक्या लोगां नै वो मारग बताय रहयो है । भारत रा करोडां नर- नारी भगती तूं रांम नाम सुमरण करै । ग्यारे लाख बरस बीतग्या है, पण आज तांई राम नाम री चमक कम नी हुई है। आप जांणो इज हां के उतरा लांवा जुग में कई कातिया हुई। कई सम्राट चमाचम करती तरवारां लेयर पाया अर प्रापरी वीरता सूं, सत्ता तूं, अन्याय सूं, अर अत्याचार सू मांनखा मन में भय वैठा दियो। वे जठी कांनी सू निकळता, उठी नै हाहाकार मच जावतो। वां रो फगत नाम सुण ने इज रांम राज ३ मोटा-मोटा वीरां रा काळजा कापण लागता पर हिवड़ा धड़करण लागता । जिणां संप्रदायवाद में रंगीज'र, अंध सिरधा मे आंधा होयर जो अत्याचार किया, खून री नदियां खळकाई, मंदिरां ने तोड्या, अबळावां रै सागै बळात्कार किया, उण राजावां मानखा रै तन पर भलैई राज कियो व्है, पण उणरै मन पर राज नीं कर सक्या । वारै वीरता री गाथावां पानड़ा पर भलैई लिख्योड़ी रैयगी व्हे, पण प्रजा रै हिवड़ा पर लिख्योड़ी नी है । वारा नाम इतिहास रा पानड़ा मे भलैई छप्योड़ा व्है, पण मानखा रे मन में तो कठैई निसांण तक नी है। राजा राम रै ज्यू वे प्रजा रा हिवड़ा में नी वस सक्या। इण कारण इज भारतवासी न तो वा नै याद करै अर न राम री ज्यू वारी पूजा अरचना करै। भारत रा लोक जीवण पर राम रै जीवण री गहरी छाप है । श्राप कस्मीर सू लगाय नै कन्याकुमारी तक अर अटक सूं लगाय नै कटक तक कठई चाल्या जावो, सगळी जगै आप रांम रै जीवण रो प्रभाव मिळं ला। राम रा जीवण पर जितरा कवियां री कलमां चाली है, उतरी स्यात् इज कोई दूजा महा- पुरुस रै जीवण पर चाली व्हैला। रघुवंस महाकाव्य, भट्टिकाव्य, महावीर चरित्र, उत्तर रामचरित्र, प्रतिमा नाटक, जानकीहरण, कुन्दमाला, अनर्घराघन, बालरामायण, हनुमन्नाटक, अध्यात्म- रामायण, अद्भुत रामायण, आनन्द रामायण, अर वाल्मीकि ऐ सगला ग्रंथ राम रा जीवण सूं सबंध राखै पर इणां ने संस्क्रत रा सिद्धहस्त कवियां लिख्या हैं। फगत संस्कृत मे इज नी पण भारत री कई प्रांतीय भासावां मे पण कविये राम- राम राज चरित्र रो गुणगांन कियो है । कंबन कृत-तमिल रामायण, तेलगू-द्विपायन रामायण, मलयालम-रामचरित, कन्नड़ी-तोरावे रामायण, बंगला-कृतिवासी रामायण, उड़िया-बलदास रामायण, मराठी-भावार्थ रामायण, हिन्दी-रामचरित मानस अर केस- राज कृत जैन रामायण - ऐ सगळा रांमकाव्य इण वात रो पुखतो सबूत देय सकै के राम रा उजळा चरित्र सूं सब जणा प्रभावित हुआ है। भारत में इज नी पण तिब्बत, लंका, खेतान, हिन्दी चीण, स्याम, ब्रह्मदेस अर हिंदएसिया सगळा देसा मे रांम री जस - गाथा एक सुर सूं गाई गई है । जैन संस्क्रति में राम आठमा बळदेव मांन्या जावै, तो बौद्ध साहित्य में बोधि सत्व रै रूप में प्रख्यात गिणी अर वैदिक धर्म में विस्णु रा अवतार रै रूप में पूज्या जावे। इण तरै भारत री इण तीन खास संस्क्रतियां में राम कथा रो विराट संजोग मिळे । राम रा चरित्र नै इतरो मान क्यूं मिळियो ? सगळी जगै राम रा गीत इज क्यूं गाया जावै ? राम इतरा पूजनीक क्यूं बणग्या? इणरो फगत एक इज कारण है-रांम रो परोप- कारी जीवण । राम रा जीवण ने सेलड़ी रे सांठा री प्रोपमा देवणी चाहिजै । सेलड़ी में मिठास इज मिठास व्है । जठे कापा उठैई रस रो झरणो वैवण लाग जावै । उणीज भांत राम रा जीवण में पण सगळी जगै मिठास रा इज दरसण व्है । निरदोस वाळपणा सूं लगाय'र सोने री संभया सूधी एक इज सरस मरियादा री सुर-लै'री झणझणाय रही है। राम रो जीवण सत, सदाचार अर कर्तव्य पाळण रो मुळगतौ दाखली है । वो आर्य पुत्रां रो परतख नमूनो है ।
राम राज ५ रांम नै अजोध्या में राजगादी मिळण वाळी ही। अजोध्या रो राज वैभव वारा चरण पखाळण ने तैयार ऊभी हो। मिनखां रै मन में पाणंद री छोळां उछळ री ही, मिनख राजी व्है रह्या हा के राम म्हारा राजा व्हैला । पण राम रा मन मे कोई हरख या खेद नी हो, उठे तो उल्टो तूफान मच्योड़ी है । वे एकांत मे बैठ'र विचार कर रह्या हा के दुनिया में राजगादी लेवा खातर भाई-भाई रो गळो कापै, अर हजारां मा-बाप विनां मौत मारया जाये। जिण सिघासण खातर लाखा मिनखां रो नास कियो जावै, वो इज सिंघासण आज म्हनै मिळ रह्यो है। पण इण सिंघासण रो असली मालिक हूँ नी हूँ, म्हारो छोटो भाई है। कल्पना करो के आप बजार सू मिठाई लावी, तो वा मिठाई पै'ला आप खावोला के टावरां नै दोला ? म्हारौ ख्याल है के पैला पाप टाबरां ने दोला। राजगादी रै वास्त रांम रा विचार पण ठीक इसा इज हा । वे सोचता हा के राज- गादी म्हारा छोटा भाइया नै मिळणी चाहिजे। राम रा मन में हकूमत री कोई इच्छा नी ही। वै आपरा अधिकार नैन्या भाइयां नै देवणा चावता हा। बडां रो वडापणी इण मे इज है के वै प्रापरा अधिकार छोटां ने देयदै अर छोटोड़ा रो फरज ओ है के वै बडां रा हुकम मे चालै । रामराज री मीठी कल्पना करवा वाळां आप राम रा अधिकार नै खुद लेवणो चावो या दूजां नै देवणो चावो ? जिण वखत चुणाव मे वोट लेवण रो सवाल आवै, उण वखत आज रो राम घर घर वोटा री भीख मांगतो फिरै । पण अधिकार री कुरसी माथै बैठतां इज वै ६ राम राज सगळी बातां भूल जावै । है कोई इसो माई रो लाल जिको कुरसी दबायां पछै ई घर-घर फिरतो व्है ? दुखियां रो दुख दूर करतो व्है, अर आप रै वचनां रो पाळण करतो व्है ? आज रा अधिकारी रांम नै आ बात सोचणी है , आप री आत्मा नै परखणी है। अब आप राम रा आगला जीवण पर विचार करो। संजोग बदळ अर राम ने राजगादी रं बदळे बनवास मिळ । बन बन भटकतां वखत ई वारे मन में कोई उदासी या दुख नीं। वे तो पे'ला रै ज्यूं इज पाणंद में झूम रह्या है । अजोध्या री प्रजा रै सनमुख अंधकार छायग्यो है, पण रांम रे सामने तो वो इज प्रकास चमक रह्यौ है। अजोध्या री प्रजा रो मुखड़ो मुरझायग्यौ है, पण राम रा मुखड़ा पर तो वो इज आणद झळके। आज पनरै अगस्त रा मंगळ प्रभात मे भारत रा रांमां नै विचार करणो है के आपां रामराज तो चावा, पण काई आपणा मे राम रै ज्यूं सुख-दुख रै वास्तै सम भाव है ? इले- क्सन में हार जावण सू आपणो मूडो मुरझाय तो नी जावै ? राम रै जीवण रो एक दूजो प्रसंग है- जुद्ध रा मैदान में रावण रै सक्ति बांण सूं लिछमण घायल होयनै अचेत व्हैग्यो है । राम री सेना में हाहाकार मच्योड़ी है । वाल्मिकी रामायण रै माफक हनुमान संजीवण बूटी लेवण नै गयो अथवा जैन रामायण रै माफक विसल्या लेवण नै गयौ । इण समै जिण भांत ग्रह रे च्यारूमेर उपग्रह फिरै, उणीज तरै लिछमण रे च्यारूंमेर सामंत छायोड़ा हा। राम, सुग्रीव, विभीसण मग- ळाई उपाय सोच रह्या हा के लिछमण री मुरछा किया
रांम राज
दूर को जा सके । उणीज वखत सामंतां देख्यो के उगमणी
दिसा में एक जोत उजास करती आय री है । उण नै
देख'र सगळा विचार मे पड़ग्या के प्रा रावण री माया है के
असल में परगा सुंदरी है ? राम कथा रा लेखक बतावै के
सोने री किरणा देखतां पांण रांम रो मूडो उतरग्यो । प्रा देख
ने सरदारा राम नै पूछयौ-"महाराज, आपनै माता कौसल्या
री चिता हैरी है, या पिता री मौत रो फिकर लागग्यो है या
व्हाला बांधव लिछमण री हालत देख'र चिंता व्हैरी है अथवा
सती सीता री याद मे आप दुखी व्है रह्या हो ? अर सवाल
रा पडुत्तर मे राम जो कुछ कह्यो है वो घणी कीमत राखै ।
उण मे भारत री सस्क्रति री साखियात आत्मा गूज री है ।
उणां कह्यो-"सरदारा, न तो म्हन मा री चिंता अर न पिता
रो फिकर है, न लिछमण री मौत रो दुख है पर न सीता री
याद आयरी है । पण एक बात है जो म्हारा कोमळ हिवडा नै
वीध री है जिणरै कारण म्हारी आख्यां मे आंसू आयग्या है, वा
वात पा है के जिण वखत विभीसण म्हारै कनै आयो, उण
वखत म्हे उणनै लकेस कैय नै बुलायो हो पण जे सूरज ऊगग्यो
तो लिछमण मर जावैला, कारण के सूरज ऊगतां इज, उणरै
रू रू मे जे'र फैल जावैला अर भाई लिछमण री मदद बिना
म्हूं लंका कीकर जीत सकूला ? इण चिंता रै कारण इज म्हूं
दुखी व्है रह्यो हूं।"
तारण भूमि में राम कहे
मुझ सोच विभीषण भूप कहे को !
रांम रै जीवण री आ छोटी-सीक घटना रामराज चावण
-
राम राज वाळा नै सोचण रै वास्तै मजबूर करै के राम पोता रै वचनां रो कितरो ध्यान राखता। राम रै ज्यूं पांई आपण वचना रो ध्यान राखां हां के नी ? वोट लेवती वखत अपां आपण साथियां रै सागै जो वायदा किया, जिको थथोबा दीना, वै वायदा अर थथोबा पूरा किया के नी ? आज पनरै अगस्त प्रांपांने इण सगळी बातों पर विचार करण रौ आदेस देय री है । आपण अठै पाद जुगाद तूं एक कैवत प्रसिद्ध है के जथा राजा तथा प्रजा। जिसौ राजा है, विसी इज प्रजा व्है । जे राजा धर्मनिस्ठ व्है तो प्रजा पण धर्मनिस्ठ व्है। राम राज प्रजा रो हाल बाल्मिकी अर तुळसीदास आछी तरै सूं कह्यौ है । उणें बतायो है के प्रजा में अहिंसा री निरमळ भावना फली- फूली ही, दुखी लोकां तरफ दया भाव हो, जीवण रा कण कण में सत रूपो परकास री किरणां फैल्योड़ी ही, लोक जीवण में सुख अर सांति री बंसरी बाजती ही, न तो राजा नै प्रजा सू सिका- यत ही अर न प्रजा नै राजा सूं कोई सिकायत ही । ओ है राम- राज री प्रजा रो साचो चितरांम । राम राज पर मुग्ध होय नै रास्ट्रपिता महात्मा गांधी एकर कह्यौ हो- स्वराज रो सब सू उत्तम रूप राम राज है। राम राज रो अर्थ है भगवान रो राज, सदगुणां रो राज, सद विरतियां रो राज । जद कोई आदमी वुरो काम करै तो आँपांणे मूंडा सू आपोआप निकळ जावे के इणमें सूं राम निकळग्यौ है । कोई जमांना में य केवा मे ग्रावतो के जे चरित्र रीमिक्षा लेवणी व्है तो भारतवासियां तूं लेवणी चाहिजै । अठा रो इंमांन
रांम राज
8
जठे कठई गयो उठे आपरा पवित्र चरित्र रो सौरभ फैलावती
रह्यो। भारत रा मिनखां दूजा देसां में जाय नै उठारा लोगों
नै आपरा चरित्र सूं घणा प्रभावित कियौ है । इण वास्ते
संस्क्रत रै एक कवि कह्यो है-
एतद्देश प्रसूतस्य, सकाशादग्नजन्मनः
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्, पृथिव्यां सर्व मानवाः ।
भारत रा कवियां इज नी पण दूजा मुल्कां रा विद्वानां
पण भारतवासियां री जस गाथा खुला दिल तूं गाई है।
विदेसी जात्री फाहयान, व्हेनसांग, इत्सिग, मेगस्थनीज पर
ऐलवेरोनी जिको भारत री जात्रा करण ने आया उणां जो
कुछ लिख्यौ उणनै पढ र भारत वासियां रै वास्तै चीन में जो
सद्भावना पैदा हुई, वा कवीन्द्र रवोन्द्र रै चीन पूगण पर
देखण में आई। चीन वासिया उण भारत रै देवता रो जो
स्वागत कियौ वो इतिहास मे अमर है पर अमर रैवैला ।
उणां कह्यो "प्रापरौ देस बड़ी भागसाळी है के जकै चोरयां नी
व्है, बदमासियां नी व्है, जठे मोटा २ नगरां मे सोना चांदी,
हीरा पन्ना अर माणक मोती रो दुकानां पर ताळा नी लगाया
जावै, धन धान रा भंडार खुला पड़या रैवे, आपरै उठारा
मिनख कितरा इमानदार है। चीन वाळां री बातां सुण ने
रवीन्द्र रै आख्यां में आंसू आयग्या, उणां कह्यो-भाइयो, एक
दिन म्हारो देस इसोइज हो, जिसो के फाहयान अर व्हेनसांग
बतायो है । पण आज उठे भरपूर बेईमानी है । जठै हीरा पन्ना
अर मारणक मोती री चोरी नी होवती, उठा रा मिनख आज
१०
राम राज
।
जूता चोरण मे ई संकोच नी राखै । म्हारा देस रो कितरो
पतन व्हैग्यो है।
अबार थोड़ा दिनां पैली अखबारां में कलकत्ता री एक
घटना छपी ही । उठे एक डाक्टर खनै एक नव जवान औरत
आई अर बोली "म्हारा पति बीमार है, कोई आप वारो
इलाज कर सकौ ?" डाक्टर पूछ्यौ "वैन, बारै काई बोमारी
है ?" लुगाई बोली “थोडा दिनां सूवे बिल पेमेंट करो,
बिल पेमेंट करो-इण तरै सू होका करता रैवै । डाक्टर बोल्यो
"बैन, इसो मालम व्है के वांनै कोई मानसिक रोग है । वे थोडा
दिन दवाई अर इंजेक्सन लेवण सू ठीक हैं जावैला" पांच सौ
रुपयां में इलाज तै हुौ । लुगाई आपरो बटुवो खोल्यो अर
एक सौ रुपयां रो नोट देवती बोली "प्रापरी कार पड़ी है,
आप कैवौ तो कार में बिठाय नै वांनै अठ लेय प्रावू ?"
डाक्टर नै रुपया देख'र विस्वास व्हग्यो, उणें कह्यौ "आप कार
खुसी सू लेजाय सकौ ।" वा कार मे बैठ'र बजार में उण जगै
आई, जठे के झवेरी री मोटी दुकान ही । उणे झवेरी नै माल
बतावण रो कह्यौ। भवेरी कार पर उणरो चमकदार पेरवेस
देख नै उणनै कीमती सू कीमती माल बतायो । उणे पचास
हजार रो माल टाळयौ । वा बटुवा मे सू निकाळ'र दो हजार
रा नोट देवती बोली "जे पाप आपरा मुनीम नै म्हारै साग
भेज दो तो म्हूँ म्हारे पति सू इण विल रो पेमेंट कराय हूँ।
झवेरी मुनीम नै उणरै सागै भेज दियो। माल अर मुनीम
लेयर वा पाछी डाक्टर र उठे आई। वा सीधी डाक्टर खने
पूगी अर बोली "म्हारा पति पायग्या है, आप वान पाछी
रोम राज
तरै सू देख नै इलाज करावी ।" डाक्टर काम में लाग्योड़ी
हो, उण उणनै एक दूजा कमरा मे बिठाय दियौ अर पे'ली
आयोड़ा रोगियां नै रवांना करनै मुनीम खनै पूग्यो । डाक्टर
नै देखतां इज मुनीम बोल्यो "बिल पेमेट करौ।" डाक्टर मन
मे सोच्यो के लुगाई रो केवणी बिल्कुल सही है । उणे मजाक
में कह्यौ "हां हां अबार विल पेमेंट कर दूंला ।" आ कैय नै
ज्यूई डाक्टर उणरो सरीर तपासण लाग्यो, वो जोर सू
वोल्यो "आप ओ कांई कर रह्या हो ?" डाक्टर बोल्यो
"आपनै विल पेमेट री बीमारी है, उणरी जांच कर रह्यो हूँ।"
मुनीम घबरीज नै बोल्यौ "या आपनै कुण कही के म्हू
बीमार हूँ। आपरी लुगाई म्हारै दुकान सू पचास हजार रो
गेणो लेयने आई है अर आपने बतळाय नै आपरा मकान मे
गई है, सो फट बिल पेमेट करावी।" डाक्टर दो पांवडा लारै
खिसक'र अचूंना सू बोल्यौ “काई कह्यौ ? आपनै अबार जो
औरत साथै लेयनै आई है, वा तो म्हारी नी पण आपरी
लुगाई है । वा थारो इलाज करावण नै अठे लेय ने आई
है।
मुनीम पाछो बोल्यौ "कठैई आप भांग तो नी पो लीवी
जो पोतारी लुगाई नै म्हारी लुगाई बताय रह्या हो ? मजाक
मत करो पर बिल पेमेट कर दो।"
इण विचित्र सवाद र बाद उण लुगाई वास्ते पा सका
हुई । अठी उठी तपास करणे पर ई उण लुच्ची लुगाई रो
कठई पतो नी लाग्यो। अब सगळोई भेद खुलग्यो । इसा
अलेखां काळा कारनामा रोज अखबारां मे पढरण नै मिळे ।
-
१२
राम रान
अचंभो है के जिको देस नैतिकता में कोई दिन इतरो ऊंची
चढयोड़ो हो, उणरो आज कितरो पतन व्हग्यो है।
जे अाप राम राज चावी, देस नै आबाद अर सुखी देखणी
चावौ, तो आपने आपरा हिरदा में नैतिकता री जोत जगावणी
पड़ेला अर सुतंतरता री इण बरसगांठ पर आ परतिग्या करणी
पड़ेला के म्हे राम रै जिसा आदर्स थापण करांला । ऐ आदर्स
आपण देस रा गौरव नै बढावैला।
ब
धर्म री परख भारत जुग जुग सूं मानखा रै मोद रो कारण बण्योड़ी है । पण इण मोद रो कारण काई आभ तक पूगण बाळी हिमाळा री बरफ सूं ढक्योड़ी चोटियां है ? अथवा उछळ उछळ नै बाटळ जिसी गंभीर आवाज करतोड़ी मानखा रा हिरदा नै प्राणद देवण वाळी दरिया रो तूफान है ? के पर्छ हंसती मुळकती कुदरत रूपी नटडी रो फूटरापी है ? या थळ री चांदी जिसी चमकती रेत है ? या खळ-खळ छळ-छळ करती नदी री सरस धारावां है, या सोना चांदी हीरा जवाह- रात रो खांनां है ? अथवा पैट्रोल या तेल रा कुवा है। प्रो एक सुळगतौ सवाल है, जिण रो पडुत्तर आपनै देवणो है। जे आप इण बारला वैभव सूं इज भारत री कीमत आंकी तो म्हने कैवणो पडैला के आप भारत री आत्मा ने नी अोळखी, आप तो फगत सरीर अथवा भौतिक चीज नै इज देखी है पर उरणनै इज मांन दीनौ है । भारत जिण नै सगळा संसार रो आध्यात्मिक गुरु होवण रो पद मिळयो है अर सुरगां मे रेवण वाळा देवता पण इणरी मोटाई रो गीत गाव, जिण धरती पर जनम लेवण री इच्छा राखे, इणरो कारण,बारलो वैभव नी है। बारला वैभव री झळक तो आपनै एसिया खंड रा कई भागां मे पर अमेरिका
१४
रांम राज
?
यूरोप रा निराइ मुल्कां में देखण नै मिळ जावैला। दरअसल
मे भारत रो मान इण बारले वैभव रै कारण नी है।
भारत रो मान तो इण कारण है के भो एक धर्म-प्रधान
देस है । अठा री सभ्यता र संस्कृति रा रूं रूं मे धर्म समा-
योड़ो है। भारत नाम लेतां इज अपां नै धर्म याद आय जावै।
जे कोई प्राथमणा विचारक र सागै कोई योजना राखी जावे
तो वो केवैला के काई इण योजना सू म्हारी आवक वधैला ?
पण वा इज योजना जे कोई भारतवासी विचारक र आगे
राखी जावै तो वो पूछैला के कांई या योजना म्हारै धर्म र
माफक है ? अथवा या योजना धर्म सूं ताल्लुक राखै ? जिण
योजना में धर्म रो पुट नी व्है, उणनै भारतवासी एकदम
स्वीकार नी करै।
भारतवासियां री इण सुदर भावना रै कारण इज अठ
हजारां धर्म गुरु, तीर्थंकर अर पैगंबर पैदा हुआ। धर्म रो
संदेसो लेय नै हजारां विदेसी अठ पाया। उण सगळा संदेसा
नै, धर्म रा वचनां नै भारत री माटी पचाय लिया, वान फूलवा
फळवा रो मौको दीनी । प्रो इज कारण है के भारत मे हजारां
धर्म, संप्रदाय है अर घर घर में धर्म संप्रदायां री न्यारी न्यारी
खिचड़ी है। एक इज घर में बाप वैष्णव है तो वेटो सिव
भगत है । मा राम री पूजा करै तो वेटो कृष्ण री। बेटा री
बहू जैन धर्म नै माने तो पोतो वौद्ध धर्म नै, मतलब ओ है के
भारत रा हरेक घर में सगळा मिनख कोई न कोई धर्म या
संप्रदाय नै माने । विना धर्म या संप्रदाय रो घर आपने नी
मिळेला।
धर्म री परख १५ एक आथूणे पंडत भारत री जात्रा करयां पर्छ लिख्यो है भारत धरमां रो चिड़ियाघर है। ज्यूं चिड़ियाघर में कोई फ्रांस री चिड़ी व्है तो कोई जरमनी री, कोई रूस री व्है तो कोई अमेरिका री, कोई इंगलैंड री तो कोई अरब री, कोई अफगानिस्तान री तो कोइ पाकिस्तान री। जिण तरी सूं रंग रंग री पर भांत भांत री चिड़ियां चिड़ियाघर मे व्है उणीज तरै भारत मे भांत-भांत रा अर तरै-तरै रा न्यारा-न्यारा धर्मा रा लोग भारत मे है । कोई पूजा पाठ नै मांन देव तो कोई भजन पूजन नै, कोई टीला टबकां नै मान देवै तो कोई डाढी- चोटी नै, कोई काला धोळा कपड़ा नै मान देवै तो कोई भगवा कपड़ां नै। भारत धर्मा रो मेळो है । अठ इसलाम, ईसाई, सिक्ख, पारसी, जैन, वौद्ध अर वैष्णव कई धर्मा रा मानण वाळा है । पण सगळां रो लक्ष एक इज है पर वो है मोक्ष, धर्म उणरी साधन है। आ एक तैसुदा बात है के जिकी चीज जितरी सरल अर जितरी जांणीती व्हे, उरणरो अरथ उतरो इज अबखी व्है । मानखो रात'र दिन धर्म धर्म रा हाका किया करै, पण धर्म है कांई ? इण बात कम लोग जांण के धरम कांई है अर पाप काई है । इण ससार रा वाडिया मे कई विचारक, पंडत, पैगबर अर तीर्थंकर आया अर पोत पोता रै मत सू धर्म रो न्यारो न्यारो अर्थ कर नै गया। इण सूं ससार मे एकला धर्म सव्द रा कई अर्थ म्हैग्या । लॉरड मोरलेन एक ठौड़ कह्यो है के धर्म सब्द री कोई दस हजार व्याख्यावां हुई है, तांम पण वै
राम राज
ने
सगळा धर्मा रै वास्तै पूरी नी पड़े । जैन, बौद्ध अर भारत
रा कई धर्म उण व्याख्यावां सूं बारै रैय जावै । इण तरै धर्म
सब्द कई अर्था सूं प्रयोग में आयो है। उणरी भांत भात री
व्याख्यावां पण हुई है पण आज दिन तांई उणरी कोई इसी
व्याख्या नी निकळी के जिणनै दुनिया रा सगळा धर्म स्वीकार
करै।
कोई कैवै स्नान करणो धर्म है, कोई कैवे लांबी चोटी
राखणी धर्म है, कोई कैवै बिरामणां नै दान देवणो धर्म है तो
कोई कैवै टीला टबाका लगावणा धर्म है। कोई सिव पूजा
धर्म मानै तो कोई जिन पूजा नै, कोई गिरजाघर में प्रार्थना
करणी धर्म माने तो कोई मस्जिद मे नमाज पढण नै धर्म
समझे। कोई मंदिर मे जाय'र प्रारतो वोल तो कोई गीता रो
पाठ करै, कोई देवतावां आगै बकरा काटे तो कोई वां पर
दारू री धार इज चढावै, कोई सिराध कर तो कोई बिरामणां
नै लाडू जीमाई, कोई कैव के दूजा धर्म वाळां रो पल्लो भेटिया
सू इज धर्म रो नास है जावैला तो कोई कैवै के काफर
बात करण सूं इज धर्म मिट जावैला । साधारण मिनख तो
इण जंजाळ में इज पड़ जावै के छेवट धर्म है कांई ? साधारण
मिनख री तो बात ई कांई, मोटा मोटा ग्यांनी पण धर्म रो
मर्म नी जारण सक्या । उरणां कह्यौ है-
तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना:
नको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणन् ।
धर्मस्य तत्व, निहितं गुहायां
महाजनो येन गतः स पन्याः ।
धर्म री परख १७ तर्क सूं धर्म रो निरण करां तो उणसू पण वधारै जोर- दार तर्क पे'ला तर्क नै उडाय दे । तर्क तो हथियार है जिको आपस में इज लड़ता-भिडता रैवै। तर्क तो बिना तळिया रो लोटो है, जिको अठी नैई गुड़क जावे । उणसूं धर्म रो निरण नी व्है सके । सास्त्रां मे पण एक दूजा सू उल्टी बातां मिळ । एक सास्त्र जिको राग अलाप, दूजोड़ो उणसू उल्टो इज सुर काढे। इणीज भांत श्रुतियां, स्म्रतियां मे पण धर्म रो कोई एक निरण नी है। कारण के ऐ देस अर काळ रै माफक बण्योड़ी है। एक स्म्रति एक वात नै घड़े तो दूजो उणनै भांग नांखै । कोई एक मुनि रा वचन पुखता नी मांन्या जा सके । कारण के सगळां पोता पोता रै जमांना री बात कही है। आप आप रै जमांना में समाज री हालत देखनै उणां धर्म रा विध- विधांन बणाया है । इण वास्तै भुनियां री कथणी सूई धर्म रो सही फैसलो नी हो सके । इण वास्ते इज छेवट हार खाय नै व्यासजी ने कैवणो पड़यो-"भाई, धर्म रो तत्व तो बुद्धि री गुफा मे बैठ्यौ है । पर उठे अधारो होवण सू वो निजर नीं प्राय सकै इण वास्ते जिण मार्ग सूं महापुरुस गया है, वो मार्ग इज धर्म रो मार्ग समझणो चाहिजै । पण ओ ई कोई सही निरण नी है । महापुरुस जिण मार्ग गया व्है, वारै लारै बिना अक्कल सू गाडर रै ज्यू जावणो ओई एक मूरखपणो है । महावीर जिसा चितकां जंजाळ मे पड़या विना धर्म रो निरणे इण भांत दियो है- पन्नासमिक्खए धम्मत्तत्तं तत्तविणिच्छियं १८ राम राज असलियत री कसोटी पर कस्योड़ा धर्म तत्त्व री विवेक वाळी बुद्धि सूं इज धर्म री व्याख्या व्है सके । अठ ओ ई देख लेवणो जरूरी है के उगमणा अर प्राथमणा पंडतां, विद्वानां पर तीर्थंकरां धर्म री कांई व्याख्या करी है ? सब सू पैली व्युत्पत्ति वाळो अर्थ लेवां तो- “धारणाद् धर्मः" जिको धारण कियो जावै वो इज धर्म है । या- "दुर्गतौ प्रपतन्त मात्मानं धारयतीति धर्मः" अबखी वेळा में आत्मा नै धारण करनै राखं वो धर्म है । इण तर सूं धर्म रा दो अर्थ निकळ ला। इण दोनूं अर्था रो मतळव ओ हुयौ के इसा नियम, सद्गुण अर रीतभांत, इसी नीति अर इसो आचरण जिको दुर्गत में पड़ती आत्मा ने बचावै, ले जावै, वो इज धर्म है । इण वास्ते इज वैसैसिक दरसणकारां धर्म रो अर्थ दूजो कियो है- यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः "जिण बात तूं या जिण आचरण सूं या जिरण नीति नियम सू मिनख रो लोक अर परलोक दोनू सुधरै वो इज धर्म है ।" सुरगवासी किसोरीलाल मश्रूवाळा रे सब्दा में कवां तो- "जिणसूं समाज रो भरण, पोसण, रक्षण अर सत्व-संसोधन व्ह सकै, वो इज धर्म है' अर साफ साफ कैवां तो दुनिया में असली सुख जिणतूं वध सकै वो इज धर्म है।" जैन पंडत आचारज कुंद कुंद- "वत्थु सहावो धम्मो" सुखकांनी , ܚ
धर्म री परख
१६
चीज रा सुभाव नै इज धर्म कह्यौ है । हरेक चीज रो आपरो
न्यारो २ सुभाव व्है पर वो इज सुभाव उण चीज रो धर्म मान्यो
जावै । ज्यूं आग रो सुभाव गरमी है अर पांणी रो सुभाव
ठंडक है । सास्त्रां री निजर सू अठै चीज रा गुण नै या सुभाव
नै धर्म कह्यो गयो है। पण मानव समाज री निजर सू या
अध्यात्मिक निजर सू धर्म रो अरथ ओ व्हैला-"आत्मा रो
संसार में असली रूप मे रेवणो" इणरो अरथ ओ हुयौ के
मानव समाज मे व्यवस्था री थरपणा होवण सू अर उणरा
आचार-विचार अर विरतियां रो सुद्धपणो होवण सूं इज सुख
वधै, कल्याण व्है अर दूजी सिद्धियां मिळे ।
अंगरेजी भाषा मे धर्म नै 'रिलिजन' कैवै। रि लारे,
लीजन बांधणी। कैवतां आत्मा ने चोखा विचारां में
बांधणी । इणनै अनुबंध पण कय सकां हां। प्रात्मा जठ चोखा
विचारां सूं बंधीज जावै, उण समाज में कोई गड़बड़ नी व्है,
लड़ाई-झगड़ा नी व्है पर दुख मे वधारो नी व्है । कांट रा
सब्दां मे—"पोता रा सगळा कर्तव्यां नै ईस्वर रो हुकम मानणी
इणरो नाम इज धर्म है।" हेगल री मानता रै माफक मगज री
मरजादा मे रैवरण वाळा अमरियादी सुभाव रौ ग्यांन धर्म
है। मेयर्स धर्म री व्याख्या इण भांत करी है-"मांनखा री
आत्मा रो ब्रह्मांड बाबत चोखो पर साधारण पडुत्तर" मानव
सास्त्री आमेस धर्म रो अर्थ बतायो है-"ईस्वर सूप्रेम करणौ"
मक्टा गार्ट धर्म री व्याख्या करी है-"मन रो वो भाव जिण
सूत्रांपां सगळा संसार रै सागै मेळ अनुभव करां।" जेम्स
फेजर धर्म रो अनोखो अर्थ बतायौ है, उणरा सब्दां में "धर्म
२० राम राज मानखी री उण अंची मांनी जावण वाळी ताकतां री पूजा है, जिका नै मानव जीवण रो मारग बतावण वाळी अर उस पर अंकुस राखण वाळी मांनी जावै ।" इण सगळी बातां पर विचार करण सूओ नतीजो निक के धर्म मिनख र वास्ते इज नी है, पण हरेक प्रांणी वास्तै जरूरी है । ओ प्रांणियां री तरक्की वास्तै है, सुख वास्तै है अर पाळण--पोसण वास्तै है, प्रो एक व्यवस्था रो नाम है। धर्म मानखा नै सुखी अर सांत वणावण वास्तै एक वर- दांन लेयनै दुनिया में जनम्यौ है । हिरदा में घुस्योड़ी दानवी विरतियां नै हटाय ने मिनखपणा री थापना करै । दूजा सब्दां में कहूँ तो धर्म दानव नै मानव बणावै अर मानव नै देव बरणावै । धर्म आपणी समाज अर देस री उळझयोड़ी गूछळिया नै सुळझावण वाळौ है, वो आदमी, समाज अर संसार रो मानसिक बिमारियां अर आत्म-विकारां रो इलाज करण वाळी है । इण सू मिनख मिरत लोक में सुखां रो सुरग उतार सके। इणरै कारण मिनख संसार रा सगळा प्राणियां सागै प्रेम जोड़ सकै अर पोता रै कर्त्तव्य रो पालण कर सके । इण सू संसार री चोखी व्यवस्था है सके पर समाज में सुख सांति फैल सके। महात्मा चाणक्य रा सब्दां में --"सुखस्य मूल धर्मः" सगळा सुखां रो मूल धर्म है । वो मांनखा रा बिछुडता हिवड़ा नै मिळाय सक, विगड़योड़ा वेवार ठीक कर सके, टूटती व्यवस्था नै जोड़ सकै अर भूलती जीवण धारावां नै मारग धर्म री परख २१ - 1- . । बताय सके । धर्म ससार रै वास्तै इमरत है, आसीस है, सस्कृति नै बणावण वाळौ है अर जीवण रा निरमांण में मदद करवा वाळी है । धर्म री पूठ बिना मिनख आपरा जीवण मे कठैई सफल नी व्है सके । जचे जिको क्षेत्र व्ही-ज्यू के राजनैतिक, सामाजिक, सैक्षणिक, अर सांस्कृतिक, धर्म रे विना कठई काम सफळ नी व्है सके। जीवण रा हर क्षेत्र में धर्म मौजूद होवण सू संसार मे प्राणद रा फुपारा छूट सके, संसार सुरग रो संगीत सुण सके । पण दुख इण बात रो है के आज मानखौ धर्म रा असली भेद नै भूलग्यौ है अर भूलतो जाय रहयो है । जे कोई मिनख जीवणी तो चाय पण सास नी लेवै, तो कियां जी सकै ? ठीक इणीज भांत जिको आदमी, समाज या राष्ट्र जीवणो चावै, चोखी तरै सू रैवणो चावै, सुख सांति सूगुजारो करणो चावै तो धर्म रै बिना काम नी चाल सके । कारण के धर्म तो प्रांण रै समान है । इण वास्तै इज वैदिक धर्म रै मोटै रिसी संसार नै चेतावणी देवतां कहयौ है-"धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा" धर्म पूरा जगत रो आधार है । जे मानव जात रो धर्म है तो उणरो आधार पण है, पण जो धर्म नही तो प्राधार मे ई वेहम है । जे आपां धर्म नै कायम राखांला तो वो आपणी पूरी मानखा जात री रक्षा करेला अर जो धर्म नै गुमाय दांला, धर्म नै खतम कर दांला तो धर्म प्रांपाणो नास कर देला। महाभारत रा वन परब मे आईज बात वेदव्यासजी कही है-"धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः" इण वात नै मुहूं साफ खोल नै कय । मांन लो ।
२२
राम रान
कोई जगै इसी है के जठं मिनख धर्म रो नाम तक नी जांण, धर्म
री भावना ई वां में नी है, वांरै जीवण में धर्म रो आचरण
ई वी व्है, न वान धर्म रो सरूप समझावण वाली कोई
धार्मिक आदमी पण वारै बीच में है । धर्म रा अग्यांन रे
कारण इज वै पोता रै कर्तव्य रो पाळण नीं कर सकै, आप रा
नीति नियम नी बणाय सके, आपसी वेवार री मरयादा नी
बणाय सक, सगळाई आपस में लड़े, खावण पीवण री चोजां
आपस में खोस लेवै, मामूली सी बात पर एक दूजा नै मारण
वास्तै तैयार व्है जावै, एक दूजा री चीजां चुराय लेवै,
कोई मांदो व्है तो उणरी सेवा चाकरी नी करै, बेढगा
तरीका सू रैवै, एक दूजा री जरूरत पर ध्यान नी देवै, हरेक
चीज आपरै खनै घणी सूघणी भेळी करण री नीत राखे,
न कोई ने भगवान रो डर है, न कोई नै नरक भय है अर न
सुरग री परवा । उठे फगत झगड़ा टंटा रो इज राज है ।
विचार करी इसी जगै मानव समाज री काई हालत व्हैला !
कोई उठ कोई जीवतो रैय सकै के आपरो भरण पोसण ठीक
तरै सू कर सकै ? कांई वै लोग दूजां रै वास्तै चोखी भावना
राख सकै ? इण सवालां रो उत्तर नकार में है। अब आपने
धर्म री कीमत, धर्म रो चमत्कार पर संसार में धर्म री जरूरत
समझ में आयगी व्हैला । जे उण जगै लोगां में धर्म होवतो तो
उणां रा नीति नियम होवता, आपसी वेवार री मरयादावां
होवती, कर्तव्यां रो पाळण होवतो, मन री विरतियां री सीमा
होवती अर इण तरै धर्म वारै जीवण में सुरग बणाय देवतौ ।
वै सगळा आपस में प्रेम सू, आणंद सूअर सहयोग सूरैवता।
३
धर्म री परख २३ - : : . .- सगळा आपस मे 'लेपौ जिसो देणौ' रा सिद्धान्त नै मानता, कोई दूजा री चीज नै हड़पण री कोसिस नी करतो, कोई चीज घणी भेळी नी करतो, इण तरै सू वांरो सामाजिक जीवण घणी सुखी होय जावतौ । “धर्मो रक्षति रक्षितः" रो भेद ओ इज है । इण वास्तै धर्म रा मर्म नै समझौ । उणरा उपयोग नै हिया में उतारौ अर उणरा वेवारीक बाजू नै मन मे राखौ । फगत धर्म धर्म री बूम मारया सू धर्म जीवण में नी आय सकै । धर्म तो आचरण री चीज है । वा विग्यापन री चीज नी है । वा आडबर अर थोथा देखवा री चीज पण नी है। प्राज- काल संसार मे धर्म रै खिलाफ एक नवो इज उस्टड सरू हुवी है। इसा लोग पैदा हुआ है के जिको धर्म अर धर्म रा नाम नै इज मिटा देवणो चावै । वे लोग कैवे के इण धर्म इज पूरा ससार नै बरबाद कर दियौ, धर्म इज मानखा नै आपस मे बुरी तरै सू लड़ायौ भिड़ायौ। इण वास्तै इण धर्म रो तो जड़ इज उखैल देवणी चाहिजै । दरअसल मे इण लोगां रै सब्दां मे पण थोड़ो घणो सार जरूर है । इण सू नटियौ नी जा सके। पण इसा लोग धर्म रा असली सरूप नै नी पंचांग । धर्म रा मर्म न नी समझ । वै पंथां, सप्रदायां पर धर्म रा नाम पर चलण वाला थोथा क्रिया काडां नै इज धर्म समझ बैठ्या है । वै वारै आपसी लड़ाई टटां अर कळ नै देखनै इज झट कैय देव के इसा धर्म नै गोळी मारी । 1. -- धर्म थोथी क्रियावां मे नी है, बिना सोच्यां समझयां ।
राम राज २४ भूखा नागा रैवण में नी है। धर्म कोई तरै रा पेरवेस में नी है। धर्म कोई खास तरै रा टीलां टबकां मे नी है, धर्म चूला चौका में नी है, धर्म लांबा चवड़ा उपदेसां में नी है, धर्म सुरग रा नाम पर हुंडी लिखवा मे या सुरग रा सपना दिखावण में नीं है । कोई रै लारै आंसू टपकावण मे या बळ नै भस्म होवण मे ई धर्म नी है। बिना सोच्यां समझयां सास्त्रां ने घोटवा में पण धर्म नी है। छळ पड़पंच अर बेईमानी सू पैसो कमाय नै दांन देवण में पण धर्म नी है। धर्म मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, थानक, उपासरा, मठ, गुरुद्वारा अर ठाकुरद्वारा में पण नों है धर्म तो हिया मे है, जीवरण मे है, सही सोचवा में अर सही काम करवा मे है। धर्म अहिंसा में है, सत आचरण में है। प्रेम में है, न्याय में है, सदाचार पर सद्विचार में है । धर्म पोता ने जाणवा मे, ओळखवा में अर समझवा में है। धर्म परमारथ में है । धर्म जिम्मेवारी अर कर्त्तव्य रा पालण मे है । धर्म अमीरी, गरीबी, जात-पांत, सांप्रदायकता अर प्रांतीयता रा भेदा नै मिटावण में है। धर्म दीन दुखियां नै गळे लगावा मे है। धर्म ईमानदारी सू वेवार करवा में है। धर्म कम सूकम चीजां सू आपरो काम चलावण में है । धर्म सत अर अहिसा पर अटळ रैवा में है, धर्म कैवणी अर करणी एक राखवा में है। धर्म रूढ़ियां, अंधविस्वासां, थोथी परंपरावा खोटी धारणावां पर खराब संस्कारां ने मिटावण में है। धर्म अबखी वेळा में ई नेकी पर रैवा में है। धर्म मन री निर- मळता, पवित्रता अर सुतंतरता में है । धर्म समाज सू थोड़ी लेवण में अर घणौ देवण में है। एक बात में इज कहूं तो
धर्म री परख
२५
"अहिंसा संजमोतवो" है। धर्म वो विचार, वचन या आचरण
है के जिणसू संसार रा सुख नै प्रांच नी आवै ।
इण सब्दां ने कोई मिनख, समाज या राष्ट्र खराब नी
कैय सके । कारण के ऐ जीवण री मूळ बातां है, यां रे बिना
जीवण एक पलक ई नी चाल सके । हां आ बात जरूर है के
आज काल नया ट्रेड मार्क लाग्योड़ा अनोखा अनोखा धर्म
है । यारी पुरांणी अर नवी करतूतां देख नै नफरत व्है ।
इणीज धर्मा र नाम पर, पंथां अर संप्रदायां रै नाम पर,
जीवता मिनखां ने आग मे होम दिया, इणीज धर्मा र नाम
पर छळ, पड़पंच, पाखंड, बेईमानी, अन्याय, अत्याचार पर
व्यभिचार चालता रहया । धर्म रे नाम पर लाखां मिनखां
नै सुरग रा सर्टिफिकेट देय नै ठग लिया । धर्म रा नाम पर
आपस मे खून री होळी खेलीजगी । धर्म रा नाम पर भोळी
ढाळी अबळावां रो जीवण नरक जिसो व्हैग्यो । इसा धर्म सू
साचांणी नफरत व्हैणीज चाहिजे । पण आपां ने एक बात तरै
सूसमझ लेणी चाहिजे के जैन, बौद्ध, वैदिक, हिन्दू, इस्लाम,
इसाई वगैरै विसेसण लाग्योड़ा धर्म अहिंसा पर सत्य रै ज्यू
धर्म नी है। ऐ तो एक तरै रा समाज है, संघ है, सप्रदाय या
तीरथ है, लेवल है, सांप्रदायिक ट्रेडमार्क है, अर धर्म री
पोसाक है । कारण के महावीर साफ सब्दां में अहिसा, संजम
पर तप नै इज धर्म कयौ है ।
इण वास्तै धर्म रो मतलब अहिंसा, सत वगैरै सद्गुण अर
सगळां रो कल्याण करण वाळौ है। जन्म सू आपनै कोई पण
।
२६
रांम राज
संप्रदाय, पंथ या अमुक विसेसण वाळो धर्म परंपरा में मिळियौ
है, पण सत्य अहिसा वगैरे बातां रो धर्म रै रूप मे पाळण
करवा में कोई नुकसांण नी है । साच तो साच इज रैवै । उरण
पर इसी कोई छाप नी लाग सकै के भो हिद्द रो साच के
ओ मुसलमान रो साच है अथवा ओ जैन रो साच है। कोई
आपरी सतांन रै वास्तै मुसलमान मा
वास्तै मुसलमान मा रै प्रेम में अर हिदू मा
रै प्रेम में कोई फरक रैवै ? या कोई छाप रैवै ? के ो प्रेम
तो चोखो है अर प्रो फोरो।
इण वास्तै आप इण नगद धर्म रा सद्गुणां रो, सुभावां
रो पर पोतारै कर्त्तव्यां रो पाळण करौ । वांनै छोडौ मत ।
घणखरा लोग आ सोच के धर्म तो परलोक री चीज है।
अठ धर्म करांला तो पागोतर में चोखो फळ मिळेला । कारण
के धर्म इण लोक री ज चीज तो है नीं। वो तो परलोक
सुधारण री चीज है, पण आ इज एक मोटी नासमझी है।
जिको धर्म इण भव में फायदो नीं सकै वो आगोतर कियां
सुधार सकै ? दरअसल में धर्म तो ओ भव अर पर भव दोन्या
सुधारवा वाळी चीज है। इण वास्तै जैन सास्त्रां में धर्म रो
फळ इण तर सूं बतायौ है-'इहलोय परलोय हियाए, सुहाए,
निसेसाए, खम्माए, अणुगामियत्ताए भवई।'
धर्म मानखा रा जीवण र इण भव सर परभव रे वास्तै
है । सुख रै वास्तै है, कल्याण रै वास्तै है अर ताकत रै वास्तै
है । इण भव में पाळियोड़ो धर्म परलोक मे पण टेको राखे ।
जिण तर सू कुदरत री दीनोड़ी चीजा-सूरज, चंद्रमा,
"
नै
धर्म री परख
२७
-
पाणी, धरती वगैरै रो सगळाई उपयोग कर सके, उणीज तरै
धर्म रो पण सगळा लोग उपभोग कर सके। वो कोई खास
मिनख, खास संप्रदाय, खास समाज, खास पंथ या खास रास्ट्र
रो ठेकेदारी में नी है । धर्म रो दरवाजो सबरै वास्तै खुलौ है।
मिनख चावै जिण जात-पात, देस-भेस या प्रात रो व्ही ।
जीवण में धर्म रो पाळण अर वेवार कठैई या करैई पण
कियो जाय सकै अर कियो जावणी चाहिजै ।
घणखरा लोगों
धर्म नै उपासरां, मदिरा, थानकां, गिरजाघरा, मस्जिदां, गुरु-
द्वारा अर राम द्वारा मे बंद कर राख्यौ है। वे लोग धर्म नै
वारली हवा नी लागवा देणी चावै । पण आ सब सू मोटी भूल
है के धर्म मंदिर मे इज जीवतो रैय सकै अर बारै निकळतां
पारण खतम व्है जावै । दुकान मे धर्म नी रैय सकै, ऑफिस में
धर्म छिप जावै, घर मे धर्म नै एक कांनी राख दियौ जावै अर
जीवण रा कोई पण वेवार मे धर्म कुम्हळीज जावै । राजनीति,
अर्थ नीति पर समाज नीति मे धर्म ठेका देय जावै । आ बात
नी व्हैणी चाहिजे । प्रा तो धर्म रे नाम पर एक मजाक है ।
धर्म तो हर टेम हर सांस र सागै रैवणो चाहिजै । उण रो
पलक पलक मे पाळण व्हैणौ चाहिजै । उण पर आचरण व्हैणी
चाहिर्ज। कोई पण मिनख प्रा बात तो नी कर सकै के जठै
कांटा भागता व्हे, उठे तो पगरखी उतार ले अर जठे कांटा
नी भागता व्है, उठ पगरखी पैर लै। इणीज भात जठ
जीवण रूपी मारग में वेईमानी, छळ, लोभ, हिसा रूपी काटा
लागण रो डर है उठे तो धर्म रूपी पगरखी उतार लेणी अर
मदिर, उपासरा वगैरै मे जठै इसा कांटा लागण रो डर नी
२८ राम राज व्है, उठ धर्म रूपी पगरखी पैर लेवणी, प्रा धर्म री मजाक नी तो और कोई है ? ओ तो बहुरुपियापणो है। धर्म रो तो हर वखत पाळण व्है, जरै इज वो जीवण ने हरचौ-भरयो बणाय सके। दांनवी विरतियां ने हटाय नै मानवी विरतियां बढाय सके। कई लोग आ सोच्या करै अर आपरा कुटुम कबीला में मोटयारां ने कह्या करै-छोकरां! हाल तो थारै खावण पीवण रा दिन है, सो खानी, पीनी पर मौज उडाी । वुढापो आवै जरै धर्म ध्यान करजौ। टाबरां ने कह्यौ जावै हाल थोरै भणीजवा गुणीजवा अर खेलवा रा दिन है, धर्म ध्यान तो फालतू टेम में कियौ जावै । इसा लोगां री मूरखता पर हंसी आवै। कांई मोटयारपणा मे, जीवण रा हर वेवार मे, दिनूगा सू लेयर संभया ताई हर एक बात में धर्म र आचरण रो ध्यान नी राखणी चाहिजे ? कांई टाबरां रै खेल कूद मे अर भणाई पढाई में धर्म नै जगैनी देवणी चाहिजे ? कांई अधकड़ा नै दुकानदारी में अर सामाजिक वेवार मे धर्म रो पाळण नी करणी चाहिजे ? भगवान महावीर तो हर वखत धर्म पाळण में साव- धांनी राखण रो उपदेस दियो है 'जरा जावं न पीड़ेइ, पाहो जावं न चड्ढः । जाधिदिया न हायति, ताव धम्म समायरे जठा तांई बुढापो घेरो नी घाललै, मांदीवाड़ नी दबायल, इंद्रियां कमजोर नीं पड़ जावै, उण रै पे'ला पे'ला धर्म रो पाळण करलौ। एक आदमी बजार कांनी दड़ीछंट दौड़यो जावतो हो । मारग में एक जणे उणनै पूछ्यौ-'भाई, थें कठे जाय रह्या -
धर्म री परख
२६
-
हो ?' उणे कह्यो-'मजूर लावण नै', 'क्यू किण वास्तै ?' वो
बोल्यो-'घर मे आग लागगी है, इण वास्तै कुप्रो खुदावणौ है
अर आग बुझावणी है।' पडुत्तर सुण नै आगलो आदमी हसण
लाग्यो अर उणें कह्यो-'आग लागी जरै थे कुप्रो खुदावण री
सोची। पे'ला थांरी अक्कल कठ गई ही ? 'ठीक इसीज बात
बुढ़ापा में धर्म ध्यान करण री है। धर्म रै वास्तै तो हर वखत
सोचतो रैवणी चाहिजै । नीतिकारां कह्यौ है-
'गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्'
समझलौ के काळ चोटी पकड़ राखी है इण वास्ते हरदम
धर्म पर आचरण करौ। तुंगिया नगरी में एक आचारज
चौमासौ करण नै आया। वे एक मसांण में होय नै आया।
मसांण मे ठोड़-ठौड़ सिलालेख लाग्योड़ा हा । वां पर लिख्योड़ी
हो-प्रो आदमी पांच वरस री अवस्था मे मरयौ, प्रो च्यार
वरस री उमर मे मरयौ अर प्रो तीन बरस री। प्राचारज
श्रावकां ने पूछ्यौ–'आ बात कीकर हुई ? कांई थारै अठे सब
लोग टावरपणा में इज मर जावै ? श्रावका बात नै साफ
करतां कह्यो-'महाराज, म्हारै अठै मसांण मे, मरण वाळां री
उमर नी लिखी जावै । अठै तो ओ लिख्यौ जावै के उणे कितरा
वरस धर्म ध्यांन कियौ । जिको आदमी जितरौ धर्म ध्यान करै
उणरो पूरो हिसाव धर्म खाता मे रैवै। म्हे कुल जोड़ लगाय
नै सिलालेख पर उणरी उमर लिख दिया करां ।' आचारज
घणा राजी हुआ पर कह्यौ–'वाह भाई वाह, आ तो बड़ी
चोखी बात है। इणसूं हरेक आदमी ने प्रेरणा लेवणी चाहिजे,
राम राज जिको आदमी जितरा बरस धर्म ध्यान करै, उणरी असली उमर उतरीज समझणी चाहिजे। बाकी टेम तो नकामो इज गयौ-ओ मानणी चाहिजै । इण धरती पर केईक धर्म इसा पण है के जिको लोभ अर डर रा पाया पर टिक्योड़ा है। ओ पण ठीक नी है। जिको धर्म सुरग रो लोभ पर नरक रो डर बताय नै मानखा नै प्रेरणा देवण बाळो है, उणां री नींव काची है। वै तर्क रूपी प्रांधी रा एक झपट्टा मे इज उड जावण वाळा है। इण धर्मा रो पायो अंध सिरधा री रेत पर चुण्योड़ी है । वां में कायम- पणो नी है। मानखा रे मन सूं सुरग रो लोभ अर नरक रो डर हटतां इज वे धर्म रै सांमां ई नी झाकैला। आजकाल रा घणखरा मोट्यारां री आ इज हालत व्है री है। धर्म पर वांरी सिरधा धीरे धीरै डिग री है । इण में वां रो एकलां री दोस नी है, उणां ने धरम रो सरूप ठीक ठीक नी समझायो गयो है। फगत अंध-सिरधा, लोभ अर डर रै बळ पर वां रै दिमागां मे धर्म नै ठूस्यो गयौ है । ओ धर्म कर्त्तव्य प्रेरित के विवेक प्रेरित नी होवण सूं वारै दिमाग सूं निकळ रह्यो है। इण वास्तै इण बुद्धिवादी जुग मे लोभ अर डर रा कादा सू निकाळ नै धर्म नै कर्तव्य, विवेक, समझदारी रा सरूप सूं समझावणी चाहिजै पर खास कर परतख आचरण कर बतावणी चाहिजै । जरै इज धर्म जीवण मे उतर सकैला । दूजी बात आज रा बुद्धिचादी जुग में विग्यांन संसार रै सनमुख नवा नवा आविस्कार राख'र दुनिया में अचूभा मे नांख दी है। सगळा संसार नै एक छोटीसीक जगै बणाय दी है। इसी टेम धर्म री परख ३१ १ मे धर्म जे विग्यांन नै साफ खराब बताय नै उणरो विरोध करती रैवै तो इस बात में कोई तत नी है। धर्म में तो वा ताकत है के वो हर जगै मारग बताय सकै, तो पछै विग्यांन रा क्षेत्र मे प्रेरणा देवण मे आघौ क्यूं रैवैला ? धर्म विग्यांन रै सागै मंगत नों बैठाई। विग्यांन नै धर्म प्रेरणा नी दीवी तो विग्यांन खोटे मारग लाग जावैला अर एक दिन उल्टो धर्म पर सवार है जावैला। धर्म नै जमीन-दोस्त कर नांखैला । इण वास्तै धर्म नै प्रेरणा देवणी चाहिजै के विग्यान संसार रै वास्तै सुखदाई कीकर बण सकै । विग्यांन आपो आप न तो मारण वाळी है अर न तारण वाळौ उणरी ताकत तो उरणरो उपयोग करण वाळां री बुद्धि पर है। जे धर्म, विग्यांन रो प्रयोग करण वाळां री बुद्धि धर्म कानी मोड़ दे तो संसार सुरग बण सके । महरिसि वेद व्यास कह्यौ है- 'धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानाम्' हमेसां तरक्की चावरण वाळां ! थारी बुद्धि धर्म पर लागी रैवै, धर्म रो जिको काम सास्त्र करता आया है, वो इज काम विग्यांन करैला । सास्त्र अर विग्यांन दोनां रो काम विस्लेसण करण रो है, संसार नै सनमुख सत नै राखण रो है, उण सू पापां ने क्यूं डरणी चाहिजे ? घणखरा विचारक कर्त्तव्य, फरज अर ड्यूटी नै धर्म कैवै। वे कैव के पोता पोता रै कर्तव्य रो पाळण करणो धर्म है । आपरो फरज अदा करणो धर्म है । आपरी ड्यू टी बजा- वणी धर्म है । ज्यू के राजपूत रो धर्म है रक्षा करणी, बिरांमणां राम राज रो धर्म है पढ़णो अर पढ़ावरणो । वैस्य रो धर्म है विज वैपार अर खेती करणी अर सूद्रां रो धर्म है सेवा करणी। वकीलां रो फरज वकालत करणी है, डाक्टरां रो फरज इलाज करणो है, न्यायाधीसां रो फरज न्याय करणो है अर मंत्रियां रो फरज राज चलावणो है । पण धर्म रो पो अर्थ घणो छोटो है। फरज सब्द सू धर्म सब्द घणो मोटो है। फरज सब्द में त्याग भेळी नी व्है तो उठे जितरी देवणो है, उतरौ इज लेवणौ। डाक्टर दवा या सलाह दीवी तो रोगी तूं फीस ले ली। अठाताई तो सोदो बराबर है । जो वो डाक्टर इमानदारी सूं उतरीज दवा अर सलाह रोगी नै दे, जितरा के उरण नै रोगी सूं पैसा मिळ रह्या है । प्रा तो एक नीति हुई। धर्म नी हुनौ। धर्म में तो कम सूं कम लेवणो अर बिना स्वारथ घणा सूं घणो देवणो है। फरज तो बदळ पण सकै । जिको आदमी आज वकील है, काल अध्यापक रो काम कर सके । पण धर्म री कीमत तो जगै एक सरीखी इज व्है । भारत में भारत रा रिसियां च्यार पुरसारथ बताया है-- धर्म, अर्थ, काम अर मोक्ष। इण च्यारां में मोक्ष तो छेलो फळ है । अर्थ अर काम नै धर्म रै सागै राखण री चेतावणी रिसियां आछी तरै सू दीनी है । उणां सदेस दियौ है के धर्म पर आचरण करण सूं इज अर्थ अर काम नै आछी तरै सूं भोग्यौ जाय । धर्म नै छोड नै अर्थ पर काम रो सेवन करणो जीवण रे वास्तै एक खतरो है । दुख सू छूटण रै वास्तै अर मोक्ष में जावणा रै वास्तै फगत एक इज मारग है अर वो है धर्म चरणां में जावणो । बिना धर्म र संसार नरक बण जावला धर्म री परख ३३ एक मेल में जैन सस्कृति रा मोटा महापुरुस बैठया हा। नीचे घर रा प्रांगणा में निन्या करोड़ सोना री मोरां रो ढिगलौ लाग्योड़ो हो । उणरै प्रागै आठ सुंदरियां हाथ जोड़ ने ऊभी ही । उठे पांच सौ चोर आया । वे धन लेवणी चावता हा । वारै खनै इसी विद्यावां ही के जिणसूं वे ताला तोड़ नांखता अर मिनखां ने नीद में सुवाय देवता । उठी नै उण सुंदरियां रो लक्ष काम हो । चावती ही के प्रो महात्मा म्हारै कावू मे प्राय जावै अर संसारिक सुखां रो भोग करै । एक कानी अर्थ रो जोर हो अर दूजी कांनी कामरो पण उरण महात्मा नै न तो लोभ रो मोह फंसाय सक्यौ अर न काम रो मोह उणनै घेर सक्यौ । छेवट तो जीत धर्म रीज व्है । वेद व्यासजी साची कही है-“यतो धर्म स्ततोजयः" सगळी संसार उरण महात्मा रा गुण गावै । जिको धर्म री सरण मे आवै, छेवट उणनै मोक्ष मिळे । आप दुख सू छूटणो चावी, दुनिया नै सुखी देखणी चावी तो धर्म नै रग रग में रमायली । 'अट्टि मिंज पेमाणु रागरत्ते' हाडकां अर नसां में धर्म रूपी प्रांण वायु भरौ । धर्म आपरा कोई काम नै नी रोकेला । वो आपरो खाणो पीणो वंद नीं करैला। वो तो आ इज कैला के जीवण री सगळी बातां में धर्म नै प्रागै राखौ, उण नै भूलो मत । 'सव्वाकला धम्मकला जिणाइ' सगळी कळावां में धर्म कळा उत्तम है । इण वास्ते अर्थ अर काम में धर्म नै भूलो मत । उण नै अांख्यां रा तारा ज्यूं सनमुख राखौ । पण अफसोस रे सागै कैवणो पड़े के आज धर्म बापड़ो
३४
राम राज
अर्थ अर काम रा बोझा सूदबग्यो है । उणरी आवाज धीमी
पड़गी है । उणरा कोई भाव ई नी पूछ । जठे देखो जठ ई अर्थ
अर काम नै मांन दियो जाय रहयौ है । सब जग धन माल
पर ऐस आराम री तूती बोल री है अर धर्म बापड़ो पूछ
दबायां बैठ्यौ है । महाभारत लिखण वाळां महाकवि वेदव्यास
वारा जमाना में अर्थ अर काम रो जोर देख्यौ तो जीवण सू
निरास होय नै कयौ है-
ऊद्ध बाहुविरोम्येष, नेव कश्चिच्छ णोति मे।
धर्मादर्थश्च कामश्च, सधर्मः किं न सेव्यताम् ।।
'म्हूं हाथ उठाय नै हाका करतो कैय रहयौ हू, पण म्हारी
बात कोई नी सुण रहया है । म्हारौ कैवणौ है के धर्म इज
खास चीज है । उणसू इज अर्थ अर काम मिळे । उण धर्म नै
क्यूं नी धारण कर रहया हो ?
आज मानव जीवण रा पाटिया पर अर्थ अर काम
सिघासण पर चढ़ियोड़ा है पर धर्म वां रो दास बण्योडौ है ।
जिको धर्म ससार नै मारग बतावण नै पायो हो, जगत रो
भरण पोसण करण ने प्रायो हो, उणरी आज कोई नी पूछ
है । सभा में, सोसाइटियां मे, उद्घाटना में, भासणां में, संस्थावां
में, उपासरां में, मंदिरां में अर थानकां में सगळी सगळी जग
आज पैसा वाळां री पूछ है । वांनै ऊंचो पासण दियौ जावै ।
ईमानदार अर धर्म पर चालण वाळा आदमी नै नीचौ बिठायौ
जावै । इण हालत पर प्रांपां नै गभीरता सूं विचार करणी
चाहिजै अर समाज में घुस्योड़ी बुराइयां नै धक्का देय'र वारै
धर्म री परख
-
निकाळणी चाहिजे । जरै इज धर्म री इज्जत कायम रैय
सकैला, त्याग पर सदाचार नै ऊची प्रासण मिळ सकैला।
आप लोग धर्म रा मर्म न समझौ, उण नै परखौ अर
जीवण मे उतारो, इसी म्हूं आपसूं उम्मीद राखू ।
-
-
चालता रहौ, आगै बधौ
--
-.
मांनखा रो बोत्योड़ो जुग उणरै सनमुख इज है, जिणमे
समाज रै जीवण री रेखावां चमक री' है। हजार हजार पर
लाख लाख बरस बीतम्या तांम पण उण जीवण री रेखावां
झांखी नी पड़ी। आज पण वै रेखावां उणीज भांत चमक
री' हैं ।
रे
मांनखा रा आद अनाद जुग जिण ने जैन मत में जोगलिक
जुग कैवै, अर वैदिक मत में त्रेता जुग कैवै, उण जमांना
देखा तो मालूम व्है के उण वखत रो मानव फिरोकड़ हो,
खानाबदोस हो, बिना घर बार रो हो, वो डांग माथै डेरा
बसाय नै
हर वखत अठी उठी फिरतो रैवती। वो आजकाल
रा मानव रै ज्यूं एक जगै घर बसाय नै नी रेवती । वो तो
फिर फिर नै कुदरत रा फूटरापा नै देखतो रैवतौ । कुदरत
दीनोड़ी बखसीसां-पवन, पाणी, फल-फूल अर कंद मूळ रो
उपयोग करनै आपरो जीवण आणंद सूं बितावतो । उणरी
सगळी जरूरतां दरखता सूं इज पूरी व्है जावती । कारण के
उण जमाना में मिनख री जरूरतां पण मामूली इज ही। उणे
कुदरत रा खोळा में आपरै जीवण री अमोलक घड़ियां विता-
वतां अलेखां बरस बिताय दिया । पण दिन लाग्यां समै पल्टो
खायो अर दरखत मांनखा री जरूरतां ने पूरी करता थाक
चालता रहौ, प्रागै वो ग्या । उरण वखत एक मोटौ विचारक पर जीवण रो कळाकार जनम्यौ । उणें वन वन भटकता मिनख नै उणरी जरूरतां पूरी करण वास्तै खेती करणी सिखाई, हाथ रा हुनर सिखाया, उण सूं उण जमांना रो मिनख आर्य बाजण लागौ । उणे कर्म जोग री दीक्षा दीवी । अबै मानखो घर बणाय नै रैवण लाग्यौ, गांवड़ा पर नगर बसाय नै सभ्यता र संस्क्रति रो प्रचार करण लाग्यौ अर समाज बणाय नै पोता रो जीवण आणद सू बितावण लाग्यो। इणरै पछै समाज में सगळा काम ठीक ढंग सू चालता रवै इण वास्तै च्यार वर्ण वताया गया-बिरांमण, क्षत्री, वैस्य अर सूद्र । इण च्यारूं वर्णा रो मूळ धन एक इज हो के समाज रो जीवण सुख सूं वीत सके । जिण वखत ऐ वर्ण बणाया गया उण वखत ऊंच नीच री कोई भावना नी ही । फिरोकड़ सुभाव में कायमी आयां पछै इण च्यारूं वर्णा री विरती दूजा रूप सूं पांगरण लागी । विरांमण वर्ण रो मूळ काम हो, समाज रा विकास खातर मनन-चिंतन करणी, विद्या पर कळा रो प्रचार कर नै समाज नै संस्कारी बणावणी । समाज रा कर्तव्यां री मरयादा बांधणी अर इण भांत समाज री नैतिक चौकीदारी कर नै उणनै तरक्की कांनी लिजावणी । श्रा मोटी जवाबदारी निभावण वास्तै विरांमण पोते विद्या पढ़ण अर पढ़ावण खातर आप रो घर- बार छोडनै देस परदेस फिरता रैवता । दूर-दूर प्रांतां अर मुल्कों में जाय नै समाज रा विकास नै आछी तरै सूं देखता ।
रांम राज
बांरी आ जात्रा 'विद्या-जात्रा' बाजती। विद्या जात्रा पूरी व्हतां
इज वे जग्य सत्रां में जावता । चौमासा रा च्यार महीना एक
ठौड़ बैठयां पछै वे 'चरैवेति-चरैवेति' रा सिद्धांत माफक
फिरता इज रेवता । जीवण री छेली घड़ियां में पण वे कीड़ी-
मकौड़ी रै ज्यूं मरया करता, फिरता-फिरतां मरणौ वधारै
पसंद करता।
क्षत्री रो काम हो अन्याय पर अत्याचार सू समाज री
रक्षा करणो । उण वखत रो क्षत्री फगत राजगादी पर बैठ ने
मोटा-मोटा मे'लां में मौज-सौक इज नी करतो, पण जिण घड़ी
उणरै कान में कोई गरीब या अभ्यागत री पुकार आवती, वो
दौड़नै उणरी रक्षा करण नै जावतो। जीव नै हथाळी में राख
नै वो पोता री इण जवाबदारी नै निभावतौ । वारै कांनां मे
वृद्ध स्रवा इंद्र री प्रो मंत्र गूंजतौ रैवतो- 'चराति चरती भगः'
जिको चालतो रैसी उणरो तकदीर पण प्रागै वधतौ रैसी परण
जिको बैठौ रैसी, उणरो तकदीर पण बैठ जासी इण वास्ते
क्षत्री पोता रा देस, समाज अर जात री रक्षा खातर आपरा
फौज-फंटा साग फिरता रैवता। आ वांरी विजय-जोत्रा'
बाजती।
वैस्य रो काम हो समाज में जिण चीज री जठ जरूरत है,
उठे वा चीज पुगती करणी, पैदाइस अर वंटवाड़ रो हिसाब
राखणी। उण रोप्रो काम विणज वेपार वाजती । समाज र
सेवा री आ जवाबदारी पूरी करवा वास्तै वैस्य हिमाळं सूं
कन्या कुमारी तांई अर अटक सू कटक तांई इज नी पण दरियां
चालता रहो, प्रागै बधौ ने लांघ नै परदेसां मे पूगतो। उठा तूं जरूरत री चीजां लेय नै आवतौ अर वारै चाहिजे जिकी चीजां देय नै आवती । इण तरै वो करेई करेई तो एक मोटा काफला सागै लाखां रुपियां रो माल लेय नै एक जगै सूं दूजी जगै जात्रा करतौ। माल रो निकास पर आवक करण रै कारण वो सार्थवाह रै नाम सू ओळखीजती । इण तरै वो नीति स वैपार कर नै पोता री पर समाज री जीवण जात्रा नै सुखी बणावती। सूद्र रो काम हो भांत-भांत री कळावां, कांमां अर उपज सूं समाज नै च्यारूमेर सूं वेफिकर बणावणौ। सूद्र री जवाब- दारी दूजां करतां घणी वधारै ही। कला अर कारीगरी सीखण वास्तै उण नै जग जगै जावणौ पड़तौ । उण री आ मुसाफरी 'सेवा-जात्रा' बाजती। इण तर सूं च्यारी वर्ण जात्रा नै मान देवता । संत महात्मा जात-पांत रा बंधण सूं बारै हुया करै, वां नै वर्णा री भीतां रोक नी सके। ऐ लोग च्यारी वर्णा तूं निरलेप रैवता थका समाज नै नैतिक अर धार्मिक मारग बतावता, समाज रा नैतिक अर धार्मिक पोरादार होवता । वां रै कोई घर बार के आश्रय नी हुया करती। वै तौ सगळी दुनियां ने पोता रो कुटुंम मान नै चालता । सगळा संसार नै आध्यात्मवाद कांनी लिजावण वास्तै, समाज मे धर्म री जोत जागती राखण वास्तै, वै एक जगै सू दूजी जगै फिरता रैवता । नदी रा वेग रे पांण विघनां री चट्टानां नै तोड़ता थका आगै वधणी अर गांव-गांव मे धर्म री अलख जगावणी ओ इज वार जीवण रो लक्ष हो ।
४० रांम राज जैन साधु पर एक जगै पर वै घणा दिनां तांई थिर नी रैवता। जे कदाच वां नै कोई कारण सूं रुकणो पड़ती तो वै तन सू भलाई रुको, मन सूं नीं रुकता। इण वास्तै भारत रा संत महात्मा फिरता इज रह्या है। एक जगै रा मोह में फंस नै वै कदैई रुकिया नी । चौमासा नै छोड नै लारला आठ महीना फिरती रैवणौ प्रो इज वो रो खास काम हो । प्रो इज कारण है के आगमा में जठे साधक संजम रो मारग पकड़ नै भेख धारण करे, उठ भेख (दीक्षा) रै अर्थ में 'पवज्जा' अर 'प्रव्रज्या' सब्द आवै । रै वास्तै जगै-जगै सास्त्रां में प्रव्रजित सब्द काम में पावै । इण सब्द री व्युत्पत्ति इण भांत है-प्र उपसर्ग व्रज धातु चालवा रा अर्थ में है। दोन्यां नै भेळा करण सूं अर प्रत्यय लगावण सू प्रव्रज्या सब्द बणै । उण रो अर्थ है बराबर फिरतो रैवणी। इणीज वास्तै वैदिक साहित मे 'परिव्राजक' सब्द आयो है, इण रो अर्थ है घर-बार रा मोह नै छोड नै हर वखत फिरती रैवणी। आज सूं ढाई हजार बरस पे'लो भारत में एक संस्क्रति रो विकास हुयौ हो, जिणरौ नाम है स्रमण-संस्क्रति । जैन अर बौद्ध इण संस्क्रति री दो धारावां है। सरूपांत में तो आजी- वक अर आकारवादी वगैरै अनेक धारावां ही। पण मौजूदा टेम में जैन अर बौद्ध ऐ फगत दो धारावां इज बची है । दोन्यू धारावां रा संत ठेट सूं फिरोकड़ रहा है। महात्मा बुद्ध रो मत हो के जिण भांत गेंडो एकलो वन में निरभै होय नै फिरती रैवै, उणीज भांत साधुवा नै निडर होय
चालता रहो, पागे बो
४१
नै फिरणौ चाहिजै । एकर उणां आपरा साठ चेलां ने बुलाय
नै संदेस दियौ हो-
'चरथ भिक्खवे बहुजनहिताय बहुजनसुखाय ,
चरथ भिक्खवे, चारिकां, चरथ भिक्खवेचारिकां ।'
हे भिक्खुनां, दुनियां रै परमारथ खातर अर अलेखां मिनखां रे
सुख खातर फिरता इज रहौ । भिक्खु, थांरी जीवणचर्या
वास्तै हमेसा चालता रहौ । सम्राट असोक ई बौद्ध धर्म अंगो-
कार कियां पछै दिगविजय छोड नै वरसौ वरस धर्म-जात्रा
करती रैवती।
बौद्ध धर्म दूर-दूर तांई लंका, जावा, सुमात्रा, बरमा, स्यांम,
चीन, जापान, तिब्बत एक एसिया रा कई मुल्कां मे फैलग्यौ,
उण रो एक इज कारण हौ अर वो औ के बौद्ध भिक्खुमा रो
पैदल विहार करणौ। बौद्ध भिक्खुनां दूर-दूर तांई फिर-फिर
नै पोता रा आचरण सू , उपदेसां सू अर वुद्ध सिक्षा सू तमाम
मुल्कां मे धर्म, नीति, सभ्यता र सस्क्रति रो प्रचार कियो।
भारत रै महापंडत स्त्री राहुल सांकृत्यायन घुमक्कड़ सास्त्र
नाम री एक पोथी लिखी है। उण मे उणां पुरांणा जमांना सूं
फिरोकड़ां (घुमक्कड़ां, रो हाल लिख्यो है अर घूमण-फिरण सू
फायदा वताया है । भगवान महावीर नै ई उणां घुमक्कड़राज
री पदवी दी है अर वां रै फिरण रै प्रभाव रो रोचक ढग सू
हाल लिख्यौ है।
भगवान महावीर पण साधु-साध्वियां नै उपदेस देवतां
कह्यौ है-
४२
राम राज
'भारंड पक्खीव चरे ऽपमत्ते'
हे लमणां ! भारंड पक्षी रै ज्यूं मस्त होय नै विहार करो,
भ्रमण करौ, विचार तारौ। जैन अर बौद्ध साधुवां रै विहार
रै कारण इज उरण प्रांत रो नाम बिहार पड़ग्यौ ।
जूना जमांना री बात नै छोडने मौजूदा समै पर निजर
नांखां तो आज ई सैकड़ा जैन साधु भारत रा इण खूणा ताई
पैदल घूम घूम नै मानखा रै मन में अहिंसा पर सत री जोत
जगाय रह्या है। वां रै खनै न घोड़ा है, न ऊट है, न मोटर
है, न विमांन है, न साईकल है अर न बग्घी है। तांमपण जैन
संस्कृति रा सत एक गांव सूं दूजा गांव तांई, एक नगर सू
दूजा नगर तांई अर एक प्रांत सू दूजा प्रांत तांई संजम भरी
जिंदगी री मस्ती मे झूमता थकां हजारां कोसां री पैदल जात्रा
करै अर मानखा नै आध्यात्मिक और धार्मिक विचारां रो
प्रकास देवता रैवै। वान उघाड़े माथै, उभाण पगां, आपरा
पोथी पत्रा पर कपड़ा सागै लेय नै चालणौ पड़े । वांनै न कोई
साथ री जरूरत है और न सवारी री । वे तो गांवां पर नगरा
में पोता री मरियादा सू रैवता थका, मानखा री मुसीबतां नै
धार्मिक निजर सूमिटावण री कोसिस करै । इण वास्ते इज
कह्यौ है-
'विहारचर्या मुणोणं पसत्या"
पैदल चालणौ मुनियां वास्तै घणौ आछौ है । अवै संत
विनोबा कांनी देखौ । भारत र इण मोटे विचारक पैदल फिर
फिर नै देस में एक नवी अहिंसक विचार क्रांति नै जन्म दियो
-
चालता रहो, श्रागै वधी है। भूदान सू लगाय ने ग्राम दांन तक रै आंदोलन सूकिण तर दुनिया रा दिल दिमाग नै हिलाय दियो वो सूरज री रोसणी रै ज्यूं साफ है । भारत र इण रास्ट्रीय संत पग जात्रा सूकमाल कर दियौ है। इण सूविदेसी लोग पण अचंभा में पड़ग्या है । वे ई पोता रा हक हकूक छोडण री बात घर घर अर झुपड़ा झूपड़ा तांई पूगावण वास्तै पैदल जात्रा करण लागग्या है । भारत रा इण अनोखा संत खनै एक इज मंत्र है-चालौ, आगै वधौ, पग रस्तै चालबी इज करौ । नोवाखाळी मे जिण वखत हिंदू मुसलमानां रो दंगौ हुआ, उण वखत महात्मा गांधी पैदल जात्रा क्यूं पसंद करी ! इणरौ कारण प्रो इज हो के गांव गांव मे छोटा सू छोटा पर दुःखी सू दुःखी मिनख री पुकार सुणी जा सके । परण अर वाहणां पर बैठने सपाटा सू जात्रा करण वाळां रो मेळ जनता सागै नी रैय सकै । ओ इज कारण है के भारत रो रास्ट्रीय महासभा कांग्रेस नै मजबूत बणावण रै वास्तै अर कांग्रेस रा सिद्धांतों में जीवण लावण वास्तै कांग्रेस रा मोटा नेतावां पदजात्रा सूं जनता साग सेद-मेंद राखण रो मारग तै कीनी है। उणां कांग्रेसी किमतरियां नै पण पदजात्रा रो दियौ है । साच्यांणी जे काग्रेस वाळां जे पूरा भारत में पद- जात्रा सरू करदी तो गांमड़ां री परजा सागै वांरी सेंद-मेंद वधैला अर लोगां रै साचा दुखां री जांण व्हैला । पैदल जात्रा मे भारत रो नसीब पळटण री ताकत है । सही वात पूछो तो मुसाफरी रो साची आणंद पैदल हुकम ।
४४
राम राज
चालवा में इज है । परण ऊपर के वाहण में बैठनै कोई इलाको
सपाटा सूं पार तो कियौ जाय सकै पण उठा री परजा सू एक
रत्ती भर ईओळखांण नी व्है सके। उठा रा मिनखां री असली
हालत काई है, उणरो बिल्कुल पतो नी लाग सके। इण
कारण इज साधु मानखा रै जीवण री उळभयोड़ी गूछळियां
सुळझावण नै, लोकजीवण में घुसयोड़ी बुराइयां रो इळाज
करण नै अर पोतारै साधपणा री साधना निभावण नै पैदल
विहार करै । एक प्राथमणै विचारक कह्यौ है-
He travels best, who travels on foot.
जिको पैदल जात्रा करै, उणरी जात्रा इज सब सूं पाछी
है । पैदल जात्रा जीवण में चेतणता रो लक्षण है। जिणनै
एकाध वेळा ई पैदल जात्रा करवा रो मौको मिळयौ व्है, वो इज
चेतणता रो अनुभव कर सके। कुदरत रा नवा नवा नजारा
देखणा है तो पैदल जात्रा करणी चाहीजै। सरीर सूअर मन
सू निरोग व्हैणो व्है तो पैदल जात्रा घणी फायदामंद है ।
ग्यांन अर अनुभव रो परकास लेवणौ व्है तो पैदल जात्रा घणी
कल्याणकारी है । समाज री सही हालत देखणी व्है तो पैदल
जात्रा घणी जरूरी है । मांनखा रो सुख दुख देखनै सहानुभूति
दिखावणी व्है तो पैदल जात्रा सब सू उत्तम है ।
फगत भारत रा धर्म पर सास्त्र इज पैदल जात्रा नै मान
देवता रह्या व्है, आ बात नी है । जापान मे सिंटो धर्म पर
ब्रूसिडो धर्म ई जात्रा रा फाइदा नै स्वीकार कीनी है। हज
करवा रो हुकम देवण वाळा इस्लाम धर्म पण पैदल जात्रा
ने
चालता रहो, प्रागै बधी मांन दीनी है। तापड़िया रा कपड़ा पैर नै जेरूसेलम री पवित्र धरती ताई जात्रा करण वाळा ईसाई भगतां पण पैदल जात्रा घणी पसंद कीवी है । भारत रा वैदिक धर्म में पर उणरी साखावां_वैस्णव धर्म, सैव धर्म अर हिंदू धर्म में हरेक भगत नै तीरथ जात्रा करण रो हुकम दियो है। पुरांणा जमाना में जिण वखत आवण जावण रा कोई साधन नी हा, उण वखत लोग पैदल तीरथ जात्रा करवा निकळता अर खूब ग्यांन-अनुभव लेयनै पाछा पावता । मानव जीवण री ऊंडाई, जीवण रो सही अनुभव, सांस्- कृतिक ग्यांन अर रीत भात रो अनुभव जिको पैदल घूमण फिरण सू है सके, वो वाहण पर बैठ नै जात्रा करण सूनी व्ह सके। भूगोल रा जितरा विद्वान हुआ है अर वां पोथ्यां लिखी है, उणां कोरा कल्पना रा घोड़ा इज नी दौड़ाया है, पण उण जगावां ने देख-परख नै पछ पोथ्यां लिखी है । आप देखोला के जितरा ई मोटा मोटा कवि हुआ है, वे सगळा ई घुमक्कड़ हा। कवि कुळगुरु काळिदास रो नाम आप सुण्यौ व्हला, जिणरी रचनावां ने देखनै विदेसी लोग पण चकित हुवा है । वां री कविता में जो चमत्कार है वो घमण रै कारण इज आयो है। उणां उजळा, धवळा, बरफ सू ढक्यौड़ा हिमाळे पर सदा हरियाळा रैवता देवदारां रै कुदरती फूट- रापा रा जो वखांण किया है, वै निजरां देखने किया है, कानां सुणनै नी किया है- राम राज अमुपुरः पश्यसि देवदार, पुत्रीकृतोऽसौ वृषभध्वजेन राजा रघु री संसार विजैजात्रा में, उणां जिण जिण मुल्कां रो हाल लिख्यौ है, उणमें सू घणखरां वारै निजरां दीठौड़ा हा अर जिको नी दीठौड़ा हा, वारी पूरी जांण लेयने पछै लिख्यौ है । आप कादंबरी महाकाव्य रो नाम सुण्यौ व्हैला, जिणरी बराबरी संस्कृत गद्य साहित में आज दिन तांई कोई ग्रंथ कर सक्यौ है । इसी अनोखी दूजौ ग्रंथ देववाणी में ढूंढचोडौ ई नी मिळ सके । इणनै लिखण वाळा हा महाकवि बाणभट्ट । वारै बार मे संस्कृत में एक कैवत है के- 'बाणोच्छिष्टं जगत् सर्व' वै पक्का फिरोकड़ हा । वै कई दिनां तांई तीन दरजन सूं वधार कवि अर कलाकारां नै साथै लेयनै इणां मुसाफरी करी ही । दस कुमारचरित रा लिखणवाळा महाकवि दंडी पण पक्का फिरोकड़ हा । कांची रा पल्लव राज री सभा रा रत्न रैवतां थकां ई इणां खूब देसाटण कियो । कळिकाळ सरवग्य आचारज हेमचंद्र सूरि, वादिमानमर्दन सिद्धसेन दिवाकर, हरिभद्र सूरि, पर अभयदेव सूरि वगैरे जित- राई संस्क्रत अर प्राक्रत रा विद्वान हुआ है सगळा ई पक्का फिरोकड़ हा । जैन साधु होवण रै कारण वांनै फिरणी तो पड़ती इज हो पण भांत-भांत री विचारधारावां, संस्क्रतियां, परं- परावां, अर जण-रुचियां रो ग्यांन लेवण नै वै खूब आणंद सूं धूमता । बृहत कल्प-भास्य अर व्यवहार-भास्य में साधुवां ने -
चालता रहो, प्राग बधी
४७
उग्रविहारी अर अप्रतिबद्ध विहारी होवणौ जरूरी बतायौ है ।
इणरै साग देस-देस री भासावां, मंस्क्रतियां पर रैण-सैण री
जांणकारी रै वास्तै ई 'उग्र विहार' करणौ चाहिजै जिणसूं परजा
री रीत-भांत देखी जाय सके ।
हिंदी-साहित रा महाकवि देव पण पक्का फिरोकड़ हा ।
इणां फिर-फिर नै देस-देस री लुगायां रा चितरांम बणाया ।
कविता रा विकास में पण फिरणी कम कीमत नी राखै ।
आ बात सही है के पैदल-जात्रा में पग-पग माथै मुसीबत
आवै । पैदल जात्री नै उण तकलीफां सू टक्कर लेय नै आगै
वधणी पडै । पैदल फिरणौ कोई फूलां री सुखसेज नी है, दुखां
अर तकलीफां रो मारग है। कस्ट सैवण वाळो इज पैदलजात्री
वण सकै । उणरै सनमुख करई-करैई तो दुख रा डूंगर आय
जावै । कठई सत्कार मिळं तो कठैई दुत्कार, कठई प्रेम रो
इमरत मिळे तो कठैई द्वेस रो हलाहल जे'र । कठई ठैरवा
वास्तै मोटा-मोटा राजमै'ल मिळे तो कठैई भागी टूटी झूपड़ी,
कोई वखत मेवो लापसी मिळे तो कोई वखत मुट्ठी चिणा ।
इण वास्तै इज एक कवि कह्यौ है-
'परदेस कलेश नरेस हुं को'
परदेस में राजा ने ई तकलीफ मिळे ती पछै साधारण मिनख
री तो वात ई कांई ? सांचौ साधक सांचौ पद-जात्री आप री
जात्रा में जिकी तकलीफां आवै, बाधावां आवै, विधन आवै,
वां सू घवरीज नी, झिझक नी अर रुकै नी। मुसीबत रै टेम वो
इण सेर सू सबक लेवै-
४८
राम राज
काट लेना हर कठिन मंजिल का कुछ मुश्किल नहीं ।
इक जरा इन्सान में चलने की आदत चाहिए।
पैदल चालण वाळा साचा साधक में सगळी चेतणा सक्ति
जाग जावै। वो नवा-नवा मिनख, नवा-नवा गांम, नवा-नवा
मकान, नवा-नवा खान-पान देखे। उण वखत उणरी विराट
चेतणा हंसती थकी अड़चणां रो स्वागत करण नै तैयार रखें।
उपर
मन में कवि री आ वांणी गूजण लाग जावै-
करे खाना बदोशी की खुदा खुदकार सामानी ।
नयी मंजिल, नया बिस्तर, नया दाना, नया पानी ॥
इण भांत नित नवा विचार हिया में भरनै पद जात्री
सिघ रै ज्यूं आपरा धे' कांनी प्रागै वधै। चावै जितरा
विधन आवै, आंधी आवै, पण उणरा पग धूज नी, हिमाळ री
चट्टान र ज्यूं अडग रैवै।
भारत री संस्क्रति रा फिरोकड़ संत वैदिक रिसियां रै
सब्दां मे-'चरन्वै मधु विन्दत्ति !' चालण वाळां नै मधुरता
मिळे । जीवण रो साचो मिठास तो वान इज मिळे । वे-
'स्वांतः सुखाय' 'रै वास्तै नीं पण 'सर्वजन सुखाय, सर्वजन
हिताय' रे वास्तै फिरचा करै । वे जठे कठै ई जावै जिण किरण
नै ई मिळं अर मिळण वाळा में जे ग्यांनरूपी रोसणी है तो
उणने जगाय देवै।
जिण मिनख रो कीकीयां मे जोत व्है अर उण पर कोई
कारण सूं मोतियो अायग्यौ है तो डॉकटर आपरेसन करने
उण मोतिया नै हटाय देव ! जिणसू उण मिनख नै पैला
चालता रहो, प्रागं वो ४६ जिसौ दीखण लाग जावै । पण जिण मिनखरी अांख में रोसणी नी व्है, उण पर सूं मोतियो हटारग पर ई निजर नी आय सके। कारण के मूळ में रोसणी नी है। डॉकटर जचै जितरोई हुसियार व्ही, वो रोसणी नी देख सके। ठीक या इज बात साधक रै बावत है। साधक जठे विहार करने जावै, उठा रा मिनखां में जो सिरघा व्है, ग्यांन लेवण री जोगता है, साधना कांनी आगै वधवा री इच्छा व्है, तो साधक वां रै आत्म रूपी आस्यां पर प्रायोड़ा मोह अर वासणा रूपी मोतिया नै हटाय नै ग्यान री रोसणी देय सके। पण वा मे ग्यांन लेवण री ताकत इज नी व्है, इच्छा इज नी व्है तो साधक जचै जितरी उपदेस- रूपी दवाइयां दो, पण वां रै मोह रो पड़दो नी हट सके । जो खुद जाग्योड़ी है, उण नै जगावण रै वास्तै दुनिया मे कारणां रो टोटो नी है । बीज जो जागती व्है, उण में प्रांण म्है, आत्मा व्है, चेतणता व्है तो धरती उण नै कैवै-'अन्नराज जागौ, आप ससार रा सिरमौड़ हो । हूँ आप नै फूलण-फलण नै जगै देवू ।' पांणी कवै-'अन्न देव ! ओ मीठौ पांणी आपरै वास्तै तैयार है, इण नै पीअौ अर फूलो-फळी ।' पवन कैवै- 'हे संसार रा प्रांण, थनै गरमी लागती व्है तो म्हूँ थनै हवा करूं । यूं विकास कर ।' सूरज रो तावड़ी कैवै–'हे बीज, यूं तेजस्वी वण, प्रागै वध, म्हू थनै परकास दू।' पण जे बीज मुडदी व्है, सड़योड़ी व्है तो धरती कैवला—'अरे अन्न रा दांणा, थू म्हारा सरीर मे नकामां क्यू पड़यौ है ? थारा सरूप नै बदळ लै अर सड़ गळनै नस्ट व्हेजा।' पाणी उण नै सड़ावण में
५०
राम राज
मदद करै । जिको पोसण करतो व्है वो इज सोसण करण
लाग जावै । पवन उण नै जळाय नांखै, माटी उण नै
माटी बणाय नांखै । इणीज भांत जिण मिनख में जाण व्है,
सुद्धताई व्है, संजीवणी सक्ति व्है तो उण नै साधक पण मिळ
जावै । आप जाणौ के धर्मास्तिकाय रो गुण चालणी है परण
आपां चालांला जद इज वो मदद करैला । जे आपां थिर हां
तो वो आपां नै मदद नीं कर सके। माछळी चालै जदै इज
पाणी उण नै मदद करै। इणीज भांत आप जीवण रा कोई
क्षेत्र में धरम रो निजर स प्रागै वधणी चावोला तो जरूर उण
मे श्रावकारौ मिळेला।
खरी बात आ है के आगे वधणी इज जीवण है। जिण
जीवण मे चाल नी, चळवळ नी, वो जीवण मुडदा जिसौ है ।
कवि जयसंकर प्रसाद कयौ है-
इस जीवन का उद्देश्य नहीं है, शांति भवन में टिक रहना ।
किन्तु पहुंचना उस सीमा तक, जिसके आगे राह नहीं ।
जीवण रो विकास करणौ व्है तो आगै वधौ । चर धातु
सू इज आचार-विचार, संचार-प्रचार, उच्चार-उपचार वगैरे
सब्द बणै । इण सगळां रै मूळ मे चालणी है । चर क्रिया है।
आप ई आप रा जीवण में चर ने जगै दो। घबरावी मत ।
इण सू आप रो विकास व्हैला, आप री बुद्धि चमकैला, आप
रा दिल पर दिमाग नै इण कानी मोड़ दो, स्रवण संस्कृति रो
ध्यांन इण कांनी इज रहयौ है-चरैवेति चरैवेति-चाल्या
करौ, प्रागै वधौ।
ܟܛܦ
जीरौरी कला । भारत दरसण सास्त्रां पर फिलासाफी रो देस है। अठ हरेक चीज सास्त्र, धर्म अर ग्यांन री कसौटी पर कसी जावै, फिलासाफी अर विचारां री पांण पर चढ़ाई जावै । जिको चीज कसौटी पर पांण पर पूरी उतर वा इज खरी मानी जावे अर वा इज गिरण करण जोग समझी जावै । भारत रा विद्वानां जीवण रा कोई खूणा नै खाली नी छोड्यौ है । उणा जीवण रा हर पासा पर पूरो सोच-विचार कियौ है । प्रो इज कारण है के बाद जुगाद सूं लगाय नै आज दिन ताई कई महापुरसां जीवण रै वारा मे भांत-भांत सू सोच्यौ है । परंपरा रूप मे जिकण दिन सू मिनख रा जोवण में सभ्यता पर सस्क्रति रो पग-मंडण हुयौ, कळा रै बाबत सोच्यौ जावण लागौ, उण दिन सू कळा मांनखा रै हिवडा री हार वणगी। विनां कळा रो कोई पण काम मॉनखा जूण मे चोखो नी समभयौ जावै । जिण घड़ी तूं मानखा जूण नै सरस अर सुंदर वणावण री कोसिस सरु हुई उण वखत सू इज अण- जापणे कळा पण मानव जीवण मे आयगी। सरुपांत में मांनखो जीवण रा तरीका सू साफ अजाण हो, सभ्यता अर संस्क्रति रो नाम ई नी जाणतौ हो, उण ५२ राम राज वखत जीवण रा मोटा कळाकार भगवान रिखबदेव मानखा ने भांत भांत री कळावां सिखाई। उणां आदमियां रै वास्तै ७२ अर लुगायां रै वास्तै ६४ कळावां रो सिरजण कियो। अठे सवाल ऊठ सके के जिकण जीव रो जितरौ आउखौ है उतरो तो उण नै जीवणी इज पड़े। कळा बिना ई वो जीवतो तो रै'इज सकै पछै कळा री कांई जरूरत पड़ी। इण सवाल री पडुत्तर दियां पे'ली प्रांपांनै मानव-जीवण अर कळा दोनां पर पूरो विचार करणी चाहिजै । कोई मिनख चालै-फिरै, स्वासा लै, कुटम-कबीला री पेट भराई करै अर माथौ घालण नै एकाद टापरी ऊभी करदै तो कांई उणरौ मिनख जमारौ सफळ व्हैग्यो ? कांई मांनखा री जिदगी रो माप-तोल प्रो इज है ? इन्सांन रै जोवण रो दारो- मदार ईण बातां माथै इज है ? ना, मांनखा री ज़िदगी रो ओ सही माप तोल नी है, प्रो असली दारोमदार नी है। दूजी जीवाण रै गळाई उमर रा दिन अोछा करणा अर अध- बळिया छोणा री पाण विकार अर वासनावां रो धूम्रो छोडतां थकां सौ बरस जीवती रैवणी ई धूड़ समान है । उण जीवणा री कोई कीमत नी है । एक नीतिकार कह्यौ है : 'काकोऽपि जीवति चिरं च वलि च भुड क्ते' कागलौ लांबी, उमर भोगवै अर बळिरी चीजां खाय ने पापरी पेट भरै। —ण तो कागलां, कुत्ता, गिरजड़ा अर मिनकियां नै ई मिळी है। वांनै ई पोता रो जीव उतरो इज व्हाली है जितरो जीण री कळा के मिनख नै आपरो जीव व्हाली है। मिनख री गळाई वांनै ई आपरै पेट रो खाडो भरण खातर सगळा पड़पंच करणा पड़े। कुत्ता कागला आपरी भख सोजण नै अठी-उठी फिरता रैवै अर देखता रैवै के कठैई ऐठौ चूठी पड़यौ है के नी? चील गिरजड़ा पाभ मे भमता थका देखता रवे के कठई मरयोड़ा ढोर डांगर पड्या है के नी ? दैत-रागस दूजां री ज़िदगी वरवाद करने, पार को लोही चूसने जूण पूरो करै । इसा जोवरण री कांई कीमत है ? मानखा री जिदगी अर इण जिनावरां री जिंदगी मे पाकास-पताळ रो फरक है । मानव जीवण काई है ? इण सवाल नै भारत रा विद्वानां पूरी तरै सू ऐरण पर चढ़ाय ने परख्यौ है। मानव- जीवण री व्याख्या करतां एक प्राचारज कह्यौ है :- 'कि जीवनं ? दोष विजित यत्' साचो मानखा जीवण काई है ? इणरै पडुत्तर मे उणां खाणी-पीणो, चलणी-फिरणी, स्वासा-लेवणी के जीवती रैवणी इज नी है पण जीवण ने दोखां पर विकारा स प्राघौ राखणौ इज असली जीवण है । उण मिनख रो जीवण इज साची जीवण है जो नाहर री दांई निडरता सू गूजतौ थको अन्याय, अत्याचार अर भ्रस्टाचार सू टक्कर लेवती थको हाथी री दाई मस्ती में झूमती थको चालै अर दुःख, गरीबी, कळे स, पाप नै हराय नै नेचा सूं जीवै। इण भांत जीवण रो अर्थ हुो विकारां अर वासनावा सूं जूझणौ। एक पलक तांई जीवणी पण जळजळाहट करतोड़ा
५४
राम राज
नखतर री दांई जीवणौ रोसणी अर सत्कर्म करतां थकां जीवो
इज वाजब है । भारत रा विद्वांनां कह्यौ है :-
'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः'
हे इमरत पूतां, थारो जीवण फगत जीवाजूणां में भटकण खातर
के पेट भराई खातर नी हुवौ है। थे सत्कर्म करता थका सौ
बरस तांई जीवण री मंसा राखौ। खोटी बातां खातर एक
पलक ई जीवता मत रही।
जीवण कांई है ? इण बाबत एक जिग्यासु नै पडुत्तर
देवतां महात्मा टॉलस्टाय एक कथा सुणाई-'एकर एक आदमी
वन मे हो'यर कठैई जावै हो के अचारणचक एक जंगळी हाथी
उण पर हमलौ कियो। बचाव रो कोई उपाय नी देख'र वो
मारग रा एक कुत्रा में पड़ग्यौ । कुआ रे बीच में वड़ रो एक
मोटो दरखत हो। उण आदमी उण वड़ री एक पतळी-सीक
डाली पकड़ ली। थोड़ी जेज में उण री निजर कुआ कांनी
कोई बचाव देखण खातर नीचे कांनी पूगी तो देख्यौ के पाणी
में एक मगरमच्छ मूंडो फाड़यां बैठयों है । वो सांपरतीक
काळ उणनै उड़ीकै हो। उणे घबराय ने ऊपर कानी देख्यो
तो माखियां रो मद निजर आयौ, जिकरण मे सू टपो-टपो करने
मद नीचे पड़े । मद रा मीठा स्वाद प्रागै वो सगळा डर भूलग्यो
पर वै मद रा टीपा चाटण लाग्यौ । पण मो कांई ? उणै अचूभा
सू देख्यौ के जिण डाळी नै पकड़'र वो लटक्योड़ी हो उण नै
एक सफेद पर एक काळी ऊंदरौ काट हो। उण जात्री रो
भय खूब बढ़ग्यो ।'
जीण री कळा जिग्यासु रो मूंडौ देख' र टॉलस्टॉय--'नी समभयौ यूं ?' वो हाथी काळ हो, मगरमच्छ काळ रो भाई जम हो, मद जीवण रो रस हो अर काळा-धोळा ऊंदरा दिन अर रात हा। इण सगळा पड़पंचां मे रैवतां थकां, सगळी अड़चणां सूं जूझतां थकां जीवण बितावणी प्रो इज मानव जीवण है । जैन साहित मे पण इणीज भांत की एक रूपात्मक कहाणी 'मधु विदु' रै नाम सूं प्रसिद्ध है पर बौद्ध साहित में 'अवदान' रै नाम सूं। जचे सोई ह्रौ पण जीवण रै खातर सावधान होय नै चालणौ जरूरी है । मांनखै ठीक ढंग सूं जोवण वास्तै कळा रौ पल्लौ पक- यो। कळा विनां जीवण, जीवण नी है । कळा मानखा नै आगै वढ़ावण वाळी है, मानखा रै विकास री एक अटकळ है, जिंदगी रो एक खास तरीको है, दूजा सब्दां मे मांनखा रा जीवण में सुद्धता बढ़ावण रो एक सुदर मारग है । कळा री एक सही परिभासा आज दिन ताई नी व्है सकी है, तांमपण कळा जीवण मे जरूरी है, इण वात माथै सगळा एक सुर सूं मजूर करै है । यू तो कळा रो खेतर अथाग है, उण नै कोई साधारण अरथ मे बांध्यौ नी जा सकै । कळा सब्द रो इण दिनां इसो प्रचार हुवी है के हरेक चीज कळा वणगी है। भोजन पकावणी, मकांनां रा नकसा बणावणा, जूता, पर कसीदो काढणी, वूट पालिस करणौ, पीतळ रा बरतनां पर नक्कासी रो काम करणी, अखबार मे व्यंग चित्र बणावणा, लेख लिखणा या नाम लिखणा सव कळावां मांनी जावै ।
राम राज
नै
कैवण रो मतळब ओ के जो कोई चीजजिण नै दाय आय जावै
अर उणसूं आप रो मतळब निकळे उणने कळा रो नाम दे
दियौ जावै । अठाताई के चोरी करणी अर खीसा कापणा ई
कळा मांनी जावै । काळी बजार करणी, मिनखां नै ठगण रा
नवा नवा ढंग काढणा, कोई चीज री थोथी तारीफां करणी
ई कळा गिणीजै । ठेट सूं गावणी तो कळा हो इज पण अबै तो
हसणी अर रोवणौ ई कळा मांनो जावै । मतळब ओ के भासा
में जितरा क्रिया पद व्है वां सगळां रै लारी कळा रो पूछड़ी
लगावण री फैसन बणगी है । इणसूं साधारण मिनख तो
घपला में पड़ जावे के दरअसल में कळा कांई है । आथमणा
कळा रा पारखियां यूनांनी सभ्यता री सरूआत सूं लगाय
आज दिन तांई 'कळा री परख' पर घणौ ई लिख्यौ है । यूनांनी
आचारज अफलातून अर वांरा चेला अरस्तू सूं लगाय नै अाज
रा जुग मे केट, शेलिग, हेगेल, सोपेनहार, बालटेयर, हर्बर्ट,
स्पेसर पर जारस्किन कळा रा निराई पारखी वेग्या है।
ज्यां क्रिस्टोफीन नाम रा प्रसिद्ध उपन्यास री भूमिका लिखतां
रोम्यारोलां जिदगी बाबत आपरा विचार लिख्या है। वा
कह्यौ है-संजम वाळी, मरियादा वाळी अर नियंत्रण वाळो
जीवण कळा है। पाणिनी री व्याकरण रै माफक क्लुप्त धातु
सूं कळा सब्द बण्यौ है, जिणरौ प्रमाण है कल्पना करणी, रचना
करणी । क्षेमराज इण सिव सूत्र विमरसिणी में कळा
अरथ लिख्यौ है:-"कलयति स्वरूप प्रावेशयति, वस्तूनि वा तत्र तत्र
प्रमातरि सा कला" कैवतां कळा आपरा नवा नवा रूप परगट
किया करें।
जीण री कळा
५७
संसार में कोई पण चीज न फूटरी है अर न कडोपी।
दोनूं वातां अथवा भाव देखण वाळा रै रस अनुभव माथै
कायम होवै । हरेक चोज नै न्यारी न्यारी निजरां सू देखण सू
न्यारा न्यारा ढंग री दीसै । कोई रूपाळी लुगाई री लोथ पड़ी
व्हे तो उण नै कामी आदमी खोटी निजर सूं देखैला, उणरौ
भाई अथवा वेटौ, वैन अर मा रै रूप में देखैला, कोई साधु
महात्मा उणनै जांमण रै रूप मे देखैला। अर गरजडा, कागला,
कुतरा उणनै खावण री निजर सूं देखैला, इण भांत निजर
भेद रै कारण एक इज चीज एक रै वास्तै फूटरी है तो दूजा
रै वास्तै कडोपी है। इण वास्ते जीवण रो कळाकार हरेक
चोज में सत अर फूटरापौ देखणी चावै । दरअसल मे कळा
आत्मा अर हिरदा सू संबंध राखण वाळी चीज है । एक चितारौ
रंग अर कूची री मदद सूं कागद अथवा भीत पर इसो रूपाळी
चितरांम बणावै वो चितरांम बोलण सो लाग जावै, तो उणमे
वा वोलण वाळी चीज चितारै रा आत्मिक भाव है। एक मूरत
वणावण वाळी प्रापरी तीखी छोणी अर हथौड़ा री पांण एक
अणगड़ पर वेडोळ भाठा नै घड़ एक इसी अोपनी मूरत
वणाय दे के उण मे कळाकार रा भाव जीवता परतख दीखण
लाग जावै । एक गवैयौ ताल, लै अर कठ सूं वीणा पर इसो गावै
के उण रो अंदरूणो रस सांपरतीक हाजर व्है जावै । एक कुम्हार
एक माटी रा लूंदा सू फूटरा सूं फूटरो प्यालौ, कुंजौ. घड़ी
के मटको जचे जिकी चीज बणाय सके । कळा एक कानो जठे
फूटरी चीज
फूटरा ढग सू हाजर करै, उणीज भात एक
नै
राम राज कडोपी चीज नै पण इसा चोखा ढंग सू हाजर करै के वा कडोपी नी रैय सके। इण सगळी बातों पर विचार करणे सूं नतीजी ओ निकले के जीवण रै अंदरूणी फूटरापा, आत्मिक फूटरापा, समाज रा सत अर सिव नै भली भांत बतावण वाळी चीज रो नाम इज कळा है। कळा रो काम मानखा रा जीवण नै खराब करणी के अणगढ राखणौ नी है पण उण नै ढंगसर राखणौ है । भोग- विळास री चीजां रै वास्तै कळा सब्द रो उपयोग करणौ कळा री मजाक उडावणी है। ओ कळा रो बिगड़योड़ो रूप है, कळा री नक्कल है, असली कळा नी है। आजकाल सिनेमा रै छापा रा चितारा, विळास भावनां खातर नागी मूरता बणावण वाळा सिलावट, लिछमी-पतियां नै रीझावण वाळी पातरियां, रेडियो पर सिनेमा स्टुडियो मे पैसा पैसा खातर गावण वाळा सगीतकार अर सूगली राजनीति रांणी रा दलाल कवि, ऐ सगळा कळा रा दुसमण है। इसा नांजोगा हाथा मे पड़'र कळा री घणी बदनामी हुई है। कळा चांदी रा टुकड़ा साटै मोल नी मिळ । असली कळा रो पारखी कळाकार पोता री कळा सूं समाज नै सत रो, सिद्धांत रो, कल्याण रो अनुभव करावै । वो पोता रा फरज सू टळ नै थोथी कीरत नी चावै। भारत री सस्कृति रा आगीवांणां कळा रो धे' सुद्ध अर सूक्ष्म सत नै परगट करणी बतायौ है। दरअसल में कळा सूं X
जीण रो फळा
५६
मांनखा जूण मे आणंद रो अनुभव है । कोई पण चीज में
आणंद उण वखत इज आवै जद के उण चोज सूं कोई ग्यान
मिळे । कोई न कोई सत परगट व्है, उण चीज सू निस्ठा
पैदा व्हे पर ऐ बातां कळा सू इज है सके । इण कारण
भारत रा रिसी मुनियां कह्यौ है-
विधान्तिर्यस्य संयोगे सा फलान कला मता ।
लीयते परमानन्दे च्यात्मा सा परा फला ।।
जिकण रा संजोग सू मानखा जीवण में थाकैलो के आळस
आवै, जीवण थिर व्है जावै अर विचारां री धारा रुक जावै,
वा कला नी है, कळा री थोथी नक्कल है। जिकण बात सू
आत्मा परम पाणंद मे लीन व्है जावै, वा इज दरअसल में
कळा है।
आथमणा विद्वानां आज कळा रै वारा मे एक नवी आवाज
उठावणी सरु करी है, "कळा कळा रे वास्तै" (Art for arts
sake) स्यात कळा रो दुरपयोग होवती देखनै इज उणा यू
कैवणी सरु किया है। पण भारत रा विद्वानां तो सरूपांत सू
इज सत नै बतावण वाळी चीज नै इज कळा मांनी है। जठै
कळा रो उपयोग स्वारथ-साधना, विलासिता अर धन रै खातर
कियो जावै, उठ सत खतम व्है
जावै। उठ कोई पण सत रो
जनम नी व्है सके । इण वास्तै अत मे नतीजी ओ इज निकळ
के कळा रो जनम जद अदरूणी रूप मे प्रात्मा सू व्है तो
उणरौ उपयोग सत रै वास्तै, सिद्धांत रौ वास्तै या कल्याण रै
वास्ते होवणी चाहिजे । काळ मे बारलो फूटरापी खास चीज
६० राम राज नीं है । जठे सत पर सिव मौजूद व्है उठ फूटरापो तो कुदरती रूप सूपाय जावै । एक लुगाई सिणगार वास्तै कळा रो उपयोग करे, वा बारा सूतो घणी ई फूटरी लागै पण जे उणमे अंदरूणी फूट- रापौ नी है तो उठ कळा रो नाम-निसांण ई नी है । वा लुगाई जो परायां सागै चोखो बेवार नी राखै, टाबरां पर घर वाळां सागै करड़-झरड़ कर, थोथो घमंड राखै तो पर्छ उठ कळा कठे ? उणरी कळा न सत वास्तै है पर न सिव वास्तै । आ असली कळा है इज नी । भारत री संस्कृति रा आधार-थंभ भरथरी कह्यौ है-- साहित्य - सगीत - कला विहीनः । साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ।। जिकण जीवण में साहित री साधना, लोक-हितकारी सत- प्रधान नी है, संगीत री पूजा कैवतां सिवपणा मे भरोसो नी है अर कळा री जठे साधना नी है वो जीवण जिनावरां रो जीवण है, मिनख रो जीवण नी है, भलाई चेहरा मोहरा सू वो मिनख जिसौ दीसतौ व्हौ पण असल में वो बिना सीग- पूछ रो जिनावर इज है । हां, तो मांनखा जूण मे सत, सिव पर सुंदर इण तीन चीजां रो मेळ कळा बाजै। इसी कळा मानखा नै जिनावर- पणा सू उठाय नै मिनखपणा कांनी ले जावै। कळा रो काम मिनख नै जिनावरपणा सू उठाय नै धीरे धीरै मानव तत्त्व, देव तत्त्व अर छेवट भगवत्तत्व कांनी ले जावणी है । दाखला
जीणेरी फळा
रूप में माटी में कोई खास फूटरापौ नी व्है, पण उणमाटी नै
इज लेयनै कुम्हार दुनियां री भलाई वास्तै अापरा खांमची
हाथां सू घड़ा रो रूप देयदे तो वा माटो पण अणूती काम री
बण जावै ।
इणोज भांत आटो अर पांणी एक चतर लुगाई रै हाथ मे
पडै तो वा आपरा कडूंवा वास्तै फूटरा फलका पोवै अर वो इज
आटौ पांणी कोई फूड़भधरा रै हाथ मे पड़े तो वा धान रो धूड
कर नांखै । चतर आपरी कळा सू धान नै सुधार लेवै अर फूड़-
भघरा गीली-काठी कर नै अथवा फीकौ-खारी कर नै भोजन
नै विगाड़ नांख, बळियो-जळियौ कै काचौ-पाको कर नै धूड कर
नाखै । उण हालत में उण में कळा रो लवलेस ई नी है।
कारण के न तो उण मे सत व्है, न सिव व्है अर सुंदरता
काम इज कांई । कोई चीज रो फगत फूटरापो देख नै उठे कळा
रो अनुमान कर लियो जावै तो ौ धोखौ है । कुदरत किपाक
नाम रौ फळ वरणायौ है, उण मे फूटरापो खूब है, अर सुगंध
पण है, छतां पण उण में सत रो अंस नी है, कारण के उण नै
खावण तूं मिनख मर जावै । इणीज भांत जीवण री हरेक
क्रिया रै वारा मे समझणी चाहिजे । सत पर सिव री कसौटी
माथै परख नै इज कळा रो अनुमान लगावणी चाहिजे । एक
लेखक घणी प्रोपती कहांणी लिखी है । उण कथा रो कथानक
घणी चोखौ है, वा मनोरंजक पण है,
छतांपण जे वा कथा
मांनखा नै विळास कांनी ले जावै, उण नै पढ'र मानखौ नीची
गिरै तो केवणो चाहिजे के उण कथा मे सत अर सिव नी है,
सुदर भलै ई व्हौ। पण जिकण काव्य, नाटक, उपन्यास,
।
६२
रांम राज
सिनेमा, चित्र, संगीत, बाजा-गाजा के मूरत निरमाण सत अर
सिव री निजर सू व्है अर उण में सुंदरता री कमी व्है ताम पण
उणनै कळा कैय सकां हां । पण जठै फगत फूटरापा नै निजरा
में राख नै इज कोई चीज बणाई गई है उण सू दुनियां री कोई
भलाई नी व्हती व्है अर उल्टो मानखा नै खोटो रस्तो मिळतो
व्है, वो मिनख सू जिनावर अर जिनावर सूं रागस बणतो व्हे
तो वा असली कळा नी है । पेट रा पड़पंच में पड़नै कोई पण
मिनख कळा नै तोड़-मरोड़ नै मूंडा तरीका सूं दुनियां रै सामै
राख सकै, इणसूं वो असली कलाकार रो पद नी पाय सके।
ओ इज कारण है के आदि तीरथंकर भगवान रिखबदेव
पण उरण जमांना रा मानखा नै ई कळा सिखाई अर वा उणने
जिनावरपणा सूमिनखपणा कांनी लिजावण वाळी ही। उणा
उण कळावां रो उपयोग सत रै वास्तै, सिव रै वास्तै अर
मांनखा जूण री भलाई रै वास्तै बतायौ हो । जम्बू द्वीप प्रज्ञप्ति
सूत्र इण बात रो साक्षी है :-
'पयाहियाए उदिसई'
भगवान रिखबदेव प्रजा री भलाई रै वास्तै, सत और
सिव रै वास्तै कळावां रो उपदेस दीनौ हो। उणां जिको ई
कळावां सिखाई, वारै लारै मिनखपणी लावण रो सदेसो छिप्यो-
डी हो इण वास्तै इज उण जुग रा मिनखां नै वे कळावां
सिखाय ने वांरो उद्देस्य पण सागै सागै वताय दियो। सार श्रो
निकळ्यौ कै कळा रो जिको रूप सत रै वास्तै, सेवा र वास्तै,
कोई सिद्धांत अथवा धे' गै वास्तै ग्रांपणे
सनमुख
मंगलकारी
जीण री कळा बण नै आवै, वा इज कळा जीवण रै वास्तै आणंदकारी है, असली फूटरापा नै देवण वाळी है। उण कळोवां मे जीवण रो मोटौ सत छिप्योड़ो हो। कळा रो जिको रूप मानखा री रागसी विरतियां ने नी दवाय सके, मानखा रा थोथा अहंभाव नै नी मिटाय सक, संसार री समरसता नै परखरण री दिव्य- द्रिस्टो नी देय सक, जीवण में कुरूपता पैदा करै, वा कळा नी, कळा री प्रेत छाया है सके है। इण वास्तै कळा री परीक्षा रो सब सू फूटरो मापक यंत्र सूं पैदा होवण वाळी सत प्रभाव री परपरा अर जीवण रो हित परगट होवणी है । इण भांत या वात साफ व्हेगी के जीवण काई है अर कळा काई है ? साग-सागै दोन्यां रो आपसी सबंध काई है ? असली कळा कांई है अर नकली कळा कांई है ? कळा रो धे' काई व्हैणौ चाहिजे ? म्हूं समझू के इतरौ समझ्यां पछै मानव- जीवण री कला नै आप सरलता सू समझ सको हो । हरेक आदमी जीवती रैवणी चाव, पण जीवती रैवणी ई तो एक कळा है । जीवतो रैवण रौ मतळ व किणी भांत गळत- सळत ढग सू पोता नै कायम राखणी इज जीवणौ नी है। यू तो कुत्ता-मिन्नी, कीड़ी-मकोड़ी, बाघ-चीतरा अर दूजा जोव- जिनावर सगळाई जीवता रैवे पण जे आप मिनख बणनै जी चावी तो आपने जीणे री कळा जाणणी ला । यू जी तो सगळी दुनियां जीव पण जीवण मिनख इज जाण । जिरणनै ढग पायग्यो तो आणंद सू जीवै इज, पण । कोई क रोस
६४
रांम राज
मारग दिखाय दै, दूजां रै वास्तै जीवण रो एक नमूनौ छोड
जावै। जे कोई रै पग में कांटी भाग जावै, अांख में धूड़ रो
कण पड़ जावै, पैरण रा कपड़ों में या डाढ़-दांत में कांई फस
जावै तो वो सहन नी व्है सके, इणीज भांत हरेक मिनख नै
बिना कळा रो जीवण सहन नी व्हैणौ चाहिजे। जिको मिनख
जीवण री कळा जांण लेवै, वो आपरी जिंदगी मे छोटी सूं
छोटी बात में पूरी सावधानी बरतै, वो आपरो हरेक काम सत
रै वास्तै, सेवा रै वास्तै करै । वो दूजां रै जीवण रो ध्यान
राखतौ थकी, दूजां नै जीवाड़तो थको जीवै। वो कोई इसो
काम नी करै जिणसूं दूजां नै नुकसान पूगै अथवा दूजा
दुख व्है।
यूं तो चालणौ सब जांण, टाबरपणा सूई चालणौ आय
जावै, इण वास्तै कोई ट्रेनिग नी लेवणी पड़े। इणीज भात
खावणौ-पीवणौ, ऊठणौ-बैठणी, सोवणी-जागणी, बोलणी-
चालणौ हरेक मिनख कर सकै अर करै इज हैं । खावण-पोवण
रो काम तो जीव-जिनावर ई करै । पण जिको मिनख जीवणी
जाणे अर जिको जीवणौ नी जांण, वारै कांमां मे घणी फरक
रैवै।
एक आदमी जीवण रै वास्तै खावै अर दूजौ खावण रे
वास्तै जीवती रैवै । एक सरदी-गरमी रै बचाव सारूं अर लाज
ढाकण नै कपड़ा पै'रै अर दूजी मौज सोक अर फैसन रै वास्त
कपड़ा पैरै। एक आदमी पैसा कमावण ने अर पोता री
प्रतिस्ठा बढावण ने स्वारथ खातर आछी बोल पर पाछी
जीषण री कळा ६५ लिखे, पण दूजो निस्वारथ भाव सू सत बोलै, सत लिखै । एक आदमी दूजां नै सतावण सारूं, मारण-पीटण सारूं, लूटण- खसोटण सारू, अन्याय अनीति करण सारू, जोर जमावण सारूं चालै तो दूजो न्याय सू कमायोड़ी जीविका सारूं, संसार री भलाई सारूं, सेवा सारू, आत्म-साधना सारू चालै । एक आदमी इण वास्त जागती रैवै के दूजां नै तंग करै, पापाचार करै, संसार मे मारकाट मचावे, पण दूजो इण वास्तै जागतौ रवै के आपरै करतव्य रो पालण कर, जगत रो कल्याण करै। इणीज भांत एक आदमी रो सोवणी-जागणौ, ऊठणी-बैठणी तो खराव धे' खातर व्है अर दूजो आदमी ऐ सगळी बातां पाछा कांमां वास्तै करै । कांई इण दोन तरै रा आदमियां रै कांमां में कोई फरक नी है ? जद फरक है तो प्रो कैवणी पडेला के जिको आदमी जीवण री कळा जांण है उणरो हरेक काम ढंग- सर अर संसार री भलाई वास्तै व्हेला पण जिको जीवण री कळा नी जांण है, उणरो हरेक काम गळत व्हैला । एक साधक जीवण रा मोटा कळाकार म० महावीर नै पूछयौ- 'कहं चरे, कहं चिट्ठ, कहमासे, कहं सए ? कहं भुजंतो भासंतो, पाचकम्म न बंधई ?' हे भगवन् ! कळामय जीवण वितावण बाळा नै किण भांत जीवणो चाहिजे, कीकर चालणी, बैठणी, 'ऊठणी, खावणी, पीवणौ अर बोलणी चालणौ चाहिजै, जिणसू उणरी जीवण री कळा में बाधक पाप करम नी बंध सकै ? म० महावीर मरम रा नप्या-तुल्या सब्दां में पडुत्तर दियो- - - ६६ रांम रान जयं चरे, जयं चिट्ठ, जयमासे, जयं सए । जयं भुजंतो भासतो, पावकम्मं न बधई। हे जीवण कळा रा साधक ! थनै विवेक सू चालणी चाहिजे, जतन सूऊभौ होवणी, बैठणी, सोवणी, खावणी, पीवणी अर बोलणी चाहिजै जिणसूजीवण री कळा में बाधक पाप करम नी होय सके । प्रो है जीवण री कळा रो दरसण। जे मिनख पोता रा जीवण में इण भांत विवेक सू सोच, पोता री सत्यं, सिव, सुदरं री चोखी भावना राखै तो जीवण कळा पूरण होवतां जेज नी लागे । अरजुण जिस्यै जिग्यासू पण करमजोगी क्रिसण नै जीवण कळा रै भरम नै जांणण वाळा स्थितप्रज्ञ रै बारा में पूछयो है-- स्थितप्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थस्य केशव स्थितधोः किं प्रभाषेत, किमासीत व्रजेत किम् ? हे जीवण कळा रा कोविद स्त्री किरण ! जीवण कला रा मरम नै जांणणिया स्थितप्रज्ञ री कांई प'चांण है ? वो थिर- बुद्धि कियां बोले ? कियां बैठे अर कियां चाल ? इण वात रो पडुत्तर स्त्री क्रिस्ण आपरी अमोलक वांणी में विस्तार सूं अठारै स्लोकां में दियौ है । साचांणी जीवण कळा रो मरम जांणणियौ वणण रै वास्तै उण सगळा स्लोकां रो मनन कर नै उणां में बताया मारग माथै चालणं पर जीणं री कळा मिळ जावे। जीवण री कळा ने जांणणियो जद जीवण
जीण री कळा
६७
री कोई पण क्रिया नै करैला तो वो पोता रे पाड़ली-पाड़ली
दुनिया ने पण देखैला। वो सोचैला के म्हारी इण क्रियावां
अथवा हरकतां तूं कोई प्रांणी ने दुख तो नी व्हैला। कोई री
जिंदगी में अड़चन तो नी आवला ?
एक मोटर रो ड्राइवर है, वो होस राख नै मोटर चलावे,
वो डावी जीमणौ देखनै पूरा ध्यान सू मोटर चलावै । वो
पूरी निगै राखै के कोई किचरीज नी जाय, कठई टक्कर नीं
लाग जाय, इण वास्तै जठे कठई खतरी देख, बेक लगाय दे,
हारन वजाय नै दूजां नै सावधांन करदै जिणसू कोई भपट
मे नी ओय जावै । इण भांत मोटर चलावण वाळी सही सलामत
ठिकाणे पूग जाया करै । इणसूं उणन ई पाणंद मिळे पर
मोटर रा मालिक ने पण ।
-
प्रो एक दाखलो है । इणीज भांत जिंदगी पण एक गाडी
है, जो फगत गैरेज मे राखण वास्तै इज नी है, उणन हिलावणी
डुलावणी पड़े, इण विना काम नी सरै। जीवण रूपी गाडी
रा ड्राइवर आपां खुद हां । जे आपां आपणी जीवण रूपी
गाडी नै होस राख नै खड़ा, डावा जीमणा देखता थका, जे
कोई जिंदगियां बीच मे प्राव तो वान कुचळां नी, वचावण री
कोसिस करां, वाणी पर लेखन रूपी हॉरन बजाय ने वांन
सावधांन करां। करैई तेज चलावां तो करई वरेक लगावां
अर इण भांत जे कोई चालक सावचेती सू चाले तो वरोवर
आराम सू ठिकाण पूगे। अर सागै सागै पोता रा परिवार,
समाज अर जाति वाळां ने ई पूगाय देव ।
1
६९
राम राज
पण कोई ड्राइवर इसो व्है के जिणै नसो कर लिया है
पर धत होय नै मोटर चलावै। वो न डावी कांनी देख भर
न जीमणी कांनी ! अंधाधुंध चालतो वो आ नीं देख के कोई
मर जावैला अथवा कोई दुरघटना व्है जावैला। उणे दूजां री
जिंदगी री कोई परवा नी है, वो तो एक्सीडेंट करतो थको
ठिकाण पूगण री फुरती राखै । पण इसा नकांमा ड्राइवर नै
बीच में इज पकड़ लियो जावै, उणरौ लाइसेंस जपत व्है जावै
पर जरीबांनो होवै सो न्यारौ । वो पाछौ जिदगी भर मोटर
चलावण रो परवांणो नी पाय सकै ।
इणीज भांत जद जीवण कळा सूं अजाण अडाणी नै जीवण
रूपी गाडी मिळ जावै, तो वो दूजां री जिंदगियां नै वाढतो
थको, पोते दुख देखतौ थको अर गाडी रो हजीरी करती थकी
ठिकाणे पूगण री कोसिस करै । मोहमाया रूपी दारू रा नसा
में धत वो दूजां री जिदगी नै फोतका बरोबर ई नी लेखवे ।
इसा आदमी नै पाप करम रूपी सिपाही पकड़ लेवे । उणरी
मानव जीवण रूपी गाडी चलावण रो अधिकार खोस लियौ
जावे यांनी उणनै कई भवां ताई पाछौ मिनख जमारो नी
मिळे । सजा उणनै मिळ जावै अर वो ठिकाणेसर पूग पण
नीं सके।
जीवण री कळा रा जाणकार पर अजांण, इण दोनां
जीवण में कितरौ फरक है, वो इण दाखला सूं साफ व्हग्यो ।
जीवण री कळा मे वारला फूट रापा री कोई कीमत नी है,
उठे तो अंदरूणी फूटरापा नै मान है। सत भर सिव ऐ उणां रा
जीण री कळा
६६
दोन्यू फेफड़ा है, जिण सू वो सांस लेवै । जठै जीवण में सत
अर सिव नी, उठ कोरी कळा प्रांणहीणा पीजरा रै समान है ।
एक राजा रै धन-माल री चरचा देस परदेस में मांनखा
रै जवांन पर ही । एकर एक मोटा महात्मा भीख मांगता २
राजमहल मे पधारया। राजा वान भगती-भाव सू आहार
दीनौ । महात्मा राजकुळ रा लोगां ने उपदेस देय नै जावण
लाग्या तो राजा अरज करी के वै पधार नै खजानौ देखलै,
कारण के साधु महात्मावां रै आसीस सूं इज इसो खजानौ बण
सक्यो हैं । महात्मा राजा रो खजांनी देखनै राजी ई हुया पर
चिंता मे पण पड़या। महात्मा राजा नै पूछचौ-"राजन, सबसूं
ज्यादा कीमती भाठो इणा मे कुणसौ है, बतावौ देखू ?" राजा
एक मुट्ठी भरीजै जितरो चमचमाट करतोड़ो हीरौ बतायो ।
महात्मा थोड़ा मुळक्या और बोल्या-"महाराज, म्हें इणसूं
ई मोटा मोटा भाठा आपरै राज में देख्या है, आपने वां रो
ठा ई नी है ।" राजा लालच मे आय नै वांनै देखण नै चाल
पड़यो। महात्मा वान ले जाय नै एक गरीब डोकरी रौ
झंपडा मे ऊभा राख्या अर डोकरी री घरटी रा पुड़िया
बतावतां कहयो-"थारै राज में ऐ सबसूं कोमती भाठा है, प्रजा
ने कही सो रोज इणां रा दरसण करबो करै।" राजा चुपचाप
ऊभौ, कांई समझ पर कोई जवाब दे । इतरै तो महात्मा
मीठी बांणी सूं बोल्या-"राजा, इण डोकरी रै जीवण रो
साधन ऐ घरटी रा दोनूं पुड़िया है, इणसू वा दूजां रो अनाज
पीसै अर पोता रै प्रांणां री रक्षा करै। आपरा हीरा पन्ना
जीण री कळा
७१
कळा रो मापदंड आपरै अठै फगत बारला फूटरापा सूं
अांक्यौ जावै।"
साचांणी अस्टावक्र मुनि री वाणी में भारत री सस्कृति
री प्रात्मा परतख बोल री' है। वै जीवण री कळा रा असली
पारखी हा । जीवण रै अंदरूणी फूटरापा रो उपयोग वै जोग मे
करणिया
हा,
भोग में नी।
जीवण री कळा सू अजांण मिनख रै जीवण में भोग व्है,
जोग नी; स्वारथ है, संजम नी। उणरो जीवण नीरस व्है,
सरस नीं; उणरा जीवण में मौज सौक री विरती व्है, साची
आणंद नी । एक दाखला सूं आ बात साफ व्है जावैला ।
मिस्टर पीटरसन नाम रो विद्वांन लिख के म्हनै थोड़ा
दिनां पैली एक इसो आदमी मिळयौ जिकी उमर में तो
चाळीस बरस रो हो पण चेहरा सू साठ बरस रो लागतो।
कारण के उणे दुनियां री खूब मौज सौक लूटी ही । उण
आपरी जिंदगी में सगळी चीजां रो रस चूस्यौ हो पण बदळा
में काई दियो नी हो। संजम तो उण मे नाम रो ई नी हो ।
वो विद्वान हो, मोटौ वेपारी हो, घणा देस-परदेस फिरयो हो
अर कई घाटां रो पांणी पी चुक्यौ हो। चाळीस बरस री
उमर में इज उणरी आ हालत व्हेगी ही के अब उणरै जीवण
मे कोई रस नी रेग्यौ हो । उणरी जिंदगी कड़वी, रूखी अर
जहरीली बणगी ही। चाळीस बरस री उमर मे इज उणरा
वाळ चांदी व्है जिसा सफेद व्हैग्या हा, हालां कि कुदरत सूं
उणने आछौ सरीर मिळयौ हो पण बिना सार-संभाळ आ हालत
जीण री कळा
कांई ऐ सीधा-सादा कपड़ा अर पीतळ रा कड़ा इण नारी
रतन रै वास्तै अपमान जोगा नी है ? पण बातचीत करण सूं
उणरी धारणा साफ थोथी निकळी । मा अर बेटा में बडो प्रेम
हो। तांमपण उण आदमी आपरै मन रो वेहम काढण नै
पूछयौ-"माताजी, आपरै सरीर पर साधारण कपडा अर हाथां
मे पीतळ रा कड़ा देखने म्हनै बडो अचूंभी व्है, कांई आ आपरै
वास्तै, बंगाळ रै वास्तै अर सतीस बाबू रै वास्तै सरम री बात
नी है ?" डोकरी बोली-"बेटा, थारी समझ मे भूल है, म्हूँ
हीरा-पन्ना पर जड़ाव रो सिणगार करने साधारण मांनखा रै
वास्तै ईसका रो कारण वणूं तो आ सतीस अर बंगाळ सै वास्तै
कोई गौरव री बात नी है । मानखा रो फूटरापो कोई गेणा-
कपड़ों में नी है पण त्यांग मे है, दया में है, सात्विकपण में है।
कळापूरण जीवण बितावण मे है। थनै आ जांण नै खुसी
होवणी चाहिजे के अबार थोड़ा दिनां पैली बंगाल में भयकर
काळ पड़यौ हो । मानखो अन्न रा दाणा दांणा वास्तै तरसण
लाग्यौ हो । उण वखत सतीस दयाळ बण्यौ अर म्है म्हारा
हाथ सूं गरीबां री सहायता कोनी । ओ इज असली गौरव है
अर म्हूँ समझू के सतीस अर वंगाळ रो गौरव पण इणमें इज
है । कपड़ा-लत्तां अर गेणां-गांठा सू लद नै धन री थोथी मे'मा
करणी फिजूल है । सादगी पर संजम सू जीवण बितावणौ ऐ इज
साचा विद्वान अर कळाकार रा लक्षण है ।
यो है जीवण री कळा रो भेद । जठे जीवण री कळा व्है,
उठे भोग माथै वंदो लाग जावै, संजम और विवेक रूपी पवित्र
।
।
जीण री कळा
७५
एक बूढ़े आदमी एक मोटयार नै कह्यौ-"थनै कांई ठा, काम
कियां होवै ? मुहूं दस बरसां सू सभा रो प्रधान हूं, मोह,
कितरो ऊंडो अनुभव है म्हारौ। थारै अनगढ़ हाथां मे जो
सभा रो काम सूप दूं तो चार दिनां में सगळो रापटरोळ व्है
जावै।"
पाकोड़े पीळ पान ऊगती कूपळ नै कह्यौ-"म्हू दुनियां
रो रास-रंग देख चुक्यौ हूं, अवै y अठे अारांम सूं रै', खूब
खिलौ अर खेलौ । म्हूं अवै नीचली हरी घास पर विसरांम
करूंला।"
उठीने वो मोटयार लिलाट मे सळ घाल्यां डोकरा नै
देख रह्यो है अर अठीनै कंवळी कूपळ मीठी निजर सूं नैणां रा
प्यालां मे इमरत रस भर नै पोळा पत्ता कांनी नीचे देख री'
ही। बूढ़ा रा सफेद बाळां मे स्वासां री संख्या लिख्योड़ी है ।
इण दोनां में सूं जीवण नै ठीक तरी तूं पत्तै समझ्यौ है अर
वो आपरी जीवण कळा में सफळ हुवौ है ।
अओ इज हाल आज रा समाज में जवांनां पर बूढां रो हैं ।
वै जोवण नै ठीक तरै तूं नी समझण रै कारण अंधारी गळियां
में भटका मार रहा है । दोन्यू पोता रो अधिकार पावण री
धुन मे रैवै । पोता रो फरज बजावण री गुंजाइस दोन्यां मे
नो व्है । इण कारण जीवण री कळा सूं वै आधा रैय जावै ।
हरेक वात मे वै झोड़ करैला, आपस मे थूका-फजीती अर
कुस्ती करण ने तैयार व्है जावैला, पण सजम अर मरजादा
रा पवित्र सूत्रां नै भूल जावैला। इण कारण इज जिंदगी रो
।
जीण री कळा
७७
इंगलैंड रा हाउस ऑफ कामंस मे घणी बार बडी गरमा-
गरम चरचा चाल जावै अर सदस्यां रै आपस मे खासी थूका-
फजीती व्है जावै। एकर एक लिछमीपती पोता रा विरोधी
नै ललकारतां कह्यौ-"काई वै दिन यूं भूलग्यो जद यूं म्हारै
पिताजी रै बूटां पर पालिस किया करतो ? आज यूं म्हांसू
अड़ रह्यो है ?" विरोधी सदस्य एक गरीब कुटुंब रो होवतां
थकां ई ठेट तूं मैंणती, पोता रा फरज नै बजावण वाली पर
पगां पर ऊभो होवणियौ जीवण कळा रो जांणकार हो। उण
मुळकतां थकां सगळां रे सामने कह्यो-"प्रापरो कैवणौ
विल्कुल सही है, पण कांई म्हूं पोलिस ठीक ढंग सूं नी करतो
हो ?" कोई पण काम जिणरै लारै सत व्है, सेवा-भावना व्है,
भलो भूडो नी है के छोटो मोटो नी है। कोई पण छोटा
मोटा काम नै करण में सरम विल्कुल नी आवणी चाहिजै ।
उणनै ईमानदारी अर ढंग सू पूरो करणी चाहिजै । जे उण
कांम सूं दुनिया री भलाई व्हैती व्है तो उणमें पूरी दिलचस्पी
लेवणी चाहिजे, प्रो इज मोटो नाम है ।
जिण अादमी नै पोता रो फरज वजावणौ आय जावै वो
जीवण री कळा मे तुरंत हुसियार व्है जावै । पण जठे जीवण
री कळा में बाधक तत्वां रो विवेक नी व्है, भला भूडा रो
ग्यांन नी व्है, जीवण री अवखी घड़ियां में मिनख भाग छूट
तो उठे समझणो के जीवण कळा नी है। पर जिणनै जिंदगी
में श्रावण वाळी अड़चनां रो ग्यांन नी व्है, वो कई चोखा काम
करतो थको ई एकाध दोस रै कारण पोता रा जीवण नै दुखी
वणाय नांखै ।
७६
रांम राज
मजो जावतो रैवै । वै जीवै पण लाचारी सूं । समै काटणो है
इण वास्तै जीवता रैवै । वां रा जीवणा मे कोई रस नी है,
कोई फूट रापौ नी है, कोई सत नी है ।
जैन धरम रा आगीवांणां हरेक बात नै साधना रो रूप
दीनौ है। उणां कोई पण चीज री संख्या पर जोर नी देयर
गुणां पर जोर दीनौ है । वां री निजर में quantity (संख्या)
इत्तरी कीमत नी राखै जितरी के quality (गुण) । उणां आपरा
साधकां ने प्रा इज बात बताई है। उणां बतायो के चावै छोटी
सूं छोटी बात अथवा साधना पकड़ी पण उणनै नियम भर
विवेक सूं पार घालौ । भलैई वो काम थोड़ी जेज रै वास्त
इज व्है पण उणनै ठीक ढंग सू करणी । जैन धर्म री पौसध
अर सामायिक साधनावां नै ठीक ढंग सूं पालणा नी करण पर
उणमें दोस बतायी गयी है-
पोसहस्स सम्म अणणूपालणयाए
सामाइयस्स सम्म अणणूपालगयाए
सामाइयस्स प्रणवडियस्स करणाए
इणीज भांत इण साधना में प्रमारजन पर प्रतिलेखन रो
विधान पण हैं । उणरै वास्तै बतायो है के जे ऐ क्रियावां
सम्यक् ढंग सूं नी करै तो पण दोस लागे ।
जिदगी नै सम्यक ढंग सू बितावण वास्तै कोई पण काम
खराब नी है । सरत आ है के लार कोई हित है अर विवेक
पण व्है ।
जीण री कळा
७७
इंगलैड रा हाउस ऑफ कामंस मे घणी बार बडी गरमा-
गरम चरचा चाल जावै अर सदस्यां रै आपस में खासी थूका-
फजीती व्है जावै। एकर एक लिछमीपती पोता रा विरोधी
नै ललकारतां कह्यौ-"काई वै दिन थू भूलग्यो जद यूं म्हारै
पिताजी रै बूटां पर पालिस किया करतौ ? आज यूं म्हांसू
अड़ रह्यो है ?" विरोधी सदस्य एक गरीब कुटुंब रो होवतां
थकां ई ठेट तूं मैंणती, पोता रा फरज नै बजावण वाली अर
पगां पर ऊभो होवणियौ जीवण कळा रो जांणकार हो। उणे
मुळकतां थकां सगळां रै सांमनै कह्यो-"प्रापरो कैवणौ
बिल्कुल सही है, पण कांई म्हूं पोलिस ठीक ढंग सूं नी करतो
हो ?" कोई पण काम जिणरै लारै सत व्है, सेवा-भावना है,
भलो डो नी है के छोटो मोटो नी है। कोई पण छोटा
मोटा काम नै करण मे सरम बिल्कुल नी प्रावणी चाहिजै ।
उणनै ईमानदारी अर ढंग सूं पूरो करणौ चाहिजै । जे उण
काम सू दुनिया री भलाई व्हैती व्है तो उणमें पूरी दिलचस्पी
लेवणी चाहिजे, प्रो इज मोटो नाम है ।
जिण आदमी नै पोता रो फरज बजावणौ प्राय जावै वो
जीवण री कळा मे तुरंत हुसियार व्है जावै । पण जठे जीवण
री कळा में बाधक तत्वां रो विवेक नी व्है, भला मूंडा रो
ग्यांन नी व्है, जीवण री अबखी घड़ियां में मिनख भाग छूट
तो उठ समझणो के जीवण कळा नी है। पर जिणनै जिंदगी
में श्रावण वाळी अड़चनां रो ग्यांन नी व्है, वो कई चोखा काम
करतो थको ई एकाध दोस रै कारण पोता रा जीवण नै दुखी
वणाय नांखै ।
७८
राम राज
-
एक बैंन बडी मैंणती ही । पण उणमें दो ओगण घणा
मोटा हा । एक तो प्रो के वा कोई रो थोड़ो-सीक काम करने
वार वार कैवती फिरती के म्है उणरो अमुक काम कीनौ अर
दूजो ओ के वा कोई नै सोरो देखती तो उणरो पेट दुखणो
प्राय जावती । अठा तक जे कोई धणी लुगाई में गैरो हेत
होवती पर बिमारी सिमारी में लुगाई धणी री खूब सेवा करती
तोई उणनै घणो खराब लागतौ अर वा निंदा करबो करती।
इण वास्तै तन तोड़ मैंणत करण पर ई उणनै गाळां अर
ओळबा खामणा पड़ता । हालत अठा तक बिगड़योड़ी ही के
उणरी इण खराब आदत रै कारण उणरै माता पिता रैई
नाक में दम हो । खूब मैणती होवतां थकाई वा आपरै लखणां
सूं कोई रै वास्तै भली नी बण सकी। जे उणनै जीणे री
कळा रो ग्यांन व्है तो वा पोता रा जीवण आणंद-पूरण वणाय
सकती ही अर आदर मांन पाय सकती ही ।
जिण तरै सू चंदरमा में ठंडक, फूटरापो पर चांदणो व्है
पण इतरा गुण होवतां थकां ई उणरै मायलो धब्बो उणरो
सगळो फूटरापो मिटाय नांखै, इणीज भांत मानखा रा जीवण
में सगळी बातां होवतां थकां ई केई इसा फालतू कारण, बेढंगी
बातां पर फिजूल रा पड़पंच है के जिण { उण रो जिंदगी
बेकार व्है जावै । म० महावीर इण फालतू बातां सूं बचण
वास्तै गृहस्थां खातर एक एक व्रत बतायौ है, जिणरो नाम है
अनर्थ दंड विरमण व्रत । उणमे अपध्यांन, आळस, हिंसाकारक
कांम, पाप री प्रेरणा वगैरै जीवण कळा रे मारग में प्राडा
जीण री कळा ७६ आवण वाळा बताया है । आज रा जुग में इण व्रत रो खेतर खूब लांबो-चोड़ो व्है सके । उणरो अरथ पण खूब विस्तार सूं सोच्यो जा सके है। कोई पण काम नै उत्साह सूनी करणी, ईमानदारी सूनी करणी, फालतू बातां मे टेम बरबाद करणी, लोगां रै साबासी री बाट जोवणी, पूरो रस लेय नै काम नी करणी, मिनखां रै कैवण सू काम बदळतो रैवणौ। पोता री ताकत नै खराब कांमां में खरच करणौ, कूड़ बोलणी, मारपीट करणी, जरूरत सूज्यादा संग्नै करणौ, ऐ विरमण व्रत रा दोस जिंदगी मे बाधक समझणा चाहिजै । एक पातर खनै रूप, जवांनी अर धन हो । वा बीसू जवांनां नै नचाय चुकी ही पण उणरै मन मे न तो सांति ही अर न आणंद, वा दुनिया रो सिकार करती पण दुनियां उणरो खुद रो सिकार करती । उणै जोवण रो कळा नै समझो अर पोता री ताकत अर साधनां रो चोखो उपयोग करण रो बिचार किया। पोता रो खराब धधी तो छोड दियौ अर आपरा धन सूं जात्रु वास्तै धरमसाळावां बणावणी, कुवा खुदावणा अर सादगी सू जीवण रो विचार कियौ । केई मध्यम वरग रा परिवार, जिकां रा हाथ तग होवतां थकाई कोई खनै मांग नी सकै हा, वांनै चुपचाप मदद करणी सरू करी। घर घर मे उण पातर रो नाम फैलग्यौ । उणरी बद- नांमी विल्कुल मिटगी अर ठौड़ ठौड़ उणरा बखांण (तारीफ) होवण लाग्या । इतिहास मे अबपाळी नाम री पातर रो नाम प्रसिद्ध है जिणे महात्मा बुद्ध रै चरणा मे सब कुछ अरपण करन पोता रा जीवण नै सफळ बणायौ ।
६०
राम राज
आप आ चिता मत करौ के आपरो लारलो जीवण कितरो
खराब रह्यौ है । आप आगै रै वास्तै सोचो अर मौजूदा समय
नै सुंदर बणावण कांनी ध्यान दो। जे श्राप गृहस्थ हो तो
आपरै गृहस्थी रा जिका फरज है उणनै आछी तरै सूपूरा
करौ। पोता रा परिवार, समाज, देस अर मांनखा जात
वास्तै पण जिका आपरा फरज है वांनै ढंग सूनिभावी ।
जीवण रा हरेक काम नै जीवण कळा री निजर सू तोलो,
परखौ अर जे वै सही पर हितकारी है तो बिना कोई विचार
रै अथवा बिना कोई साबासी रै किया जावी। आपरै
जीवण री सफळता ते है । आपरो भविस्य उजळौ है । आपरो
जीवण तुरत जीवण काला री पगडांडियां नै पकड़ लैला, जठा
सूपड़ण री कोई संभावना नी है, जठा सूफिसळण रो कोई
अनुमान नी है।
जिंदगी रो आशंद - संसार रा सगळा धर्मा, सास्त्रां, विचार-धारावां, वादां अर ग्यांन विग्यांनां रो खास 'धे' है-मांनखा जूण नै सबसूं ऊंची उठावणी, मिनख में सूं मिनखपणी जगाय नै उण नै देवपणा अर धीरै २ भगवतपणा कांनी लिजावणौ। पण आ बात जद इज पूरी व्है मकै के मिनख पोता री जिदगी नै संभाळ, पोता रै जीवण रो उजळापी अर कीमत समझे, मानखा जूण री असली कीमत न समझे। जठा तांई कोई मिनख पोतारी जिंदगी नै सही रूप सूं नी समझै, जिदगी री महानता नै नी ओळखै, उठा तांई उण जीवण पर कोई पण नवी रंग नी चढ़ सके, कोई रोगन पॉलिस नी व्है सके, उण जिंदगी नै चमकीली नी बणाईज । एक रंगरेजो कोई जूना कपड़ा नै रंगणी चावै तो पैला उणरो जूनो रंग धोय नै साफ करै, जरै इज उण पर नवो रंग चढ़ सके । इणीज भांत जे कोई मिनख आपरा जीवण पर नवो रंग चढ़ावणी चावै तो उण पर जो जूनो रंग चढ़योड़ी है उणने साफ करणी पडेला। कारण के जीवण पर लाखां बरसा र संस्कारां रो रंग चढ़योड़ी है सो साफ कियां बिना नवो पर चमकदार रंग चढ़ नी सके । अर जे चढ़ग्यौ तो बदरंग व्है जावैला । इणीज भांत एक हुसियार चितारी भांत-
८२
राम राज
भांत रा रंग अर कूची लियां भींत पर चितरांम वणावण नै
तैयार बैठची है, पण जे भीतां सरीखी नी व्है, गड़गुंबड़ वाळी
व्है तो उण पर चावतां थकाई चोखो चितरांम किया वण
सकै । चितारौ भलैई माथो फोडले पण चितरांम नी वण
सकला। इणीज भांत आपरी जिंदगी रूपी भीत सरीखी नी है,
गड़गुंबड़ वाळी है अर इसी भीत पर जे फूटरो चितरांम बणा-
वणो चावी तो सरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि अर वाणी ए सगळी
सामग्री होवतां थकां पण रूपाळी चितरांम नी वण सकैला।
आपने पैली आपरी जिदगी रूपी भीत नै समतळ करणी
पड़ेला, खाडा खोचरा मेंटणा पड़ेला, ऊपरली कचरौ साफ
करणी पडैला, जद ई ज सांगोपांग रूपाळी चितरांम बण सके ।
जे आपरी जीवण रूपी चादर काळी है, मसोदा जिसी मैली
घांण है तो उण पर नवौ रंग नीं चढ़ सके । कवि री
भाखा में-
"सूरदास की काळी कामरी, चढे न दूजो रंग।"
जिंदगी री काळी अथवा मैली चादर पर पण रंग चढा-
वण रो ओ इज हाल है। भगवान महावीर पण आ इज वात
जिग्यासु नै कही ही-
"धम्मो
सुद्धस्स चिट्ठई"
उण जीवण पर इज धर्म रो रंग चढ़ सकै अथवा टिक
सकै के जो साफ है अर सुद्ध है।
आपरी जिंदगी आपरो सबसू कीमती धन है । भारत रा
रिसी-मुनियां मानखा री वारली संपदा-रंग-रूप, बुद्धि, इंद्रियां,
M
जिदगी रोप्राणंद
८३
मन, सरीर, धन-धान करतां मानखा रा जीवण नै घणी कीमती
मांन्यौ है।
इण संसार रा 'वाड़िया नै जे आप विवेक री निजरां
सूं देखी तो आपने केई अनोखा २ जीव निजर आवैला।
भांत भांत रा रंग, भांत भांत री डिजाइनां अर' भांत
भांत रा चेहरा । संसार रा जीवां में मिनख पण एक
अनोखो जीव है । दूजा जिनावरां रै ज्यूं उणरो माथो अर
मूंडो नीचे कांनी नम्योड़ी नी है। उणरो ऊचो देख' र सीधो
चालणी प्रा बतावै के वो दूजा जीवां तूं न्यारौ है, ऊंची है ।
उणरो रंगरूप अर डील पण दूजा जीवां सू न्यारी है। पूरी
जीवाजूण में मानखा सू बढ़नै दूजो कोई जीव आगै नीं है,
कारण के मानखा जूण मुगती रो दरवाजौ है। मांनखा नै जो
खास तरै री जिदगी मिली है उण सू वो देवता बणं सके पर
ठेट परमात्मा ताई पण पूग सके। संसार में जितरा ई उगमणा
अर प्राथमणा विद्वान हुआ है, तीरथंकर, पैगंबर, संत, साधु
अर रिसि मुनि हुवा है, सब जणां एक सुर तूं मानखा जूण नै
सब सूं ऊंची बताई है। जैन आगमां में मांनखा जूंण रै वास्तै
'देवानु प्रिय' सब्द आवै । भौतिक जीवण नै चावण बाळा
देवतावां रो जूंण सूं पण आ जूण बत्ती है, इण कारण देवता
पण इणनै चावै । देवता इण हाड मांस री बणियोड़ी मांनखा
देह नै इज नी चावै पण वे तो मानखा री आत्मा, मन, बुद्धि,
वाणी अर इंद्रियां री सांमी मानखा नै चावै ।
आपनै मानव जीवण मिळयौ है, पण जे आप उणरी
रांस राज
i
कीमत नी जांणी, उणनै धूड़ रै मोल वेचण नै तैयार है जावी,
उणरो विकास करणौ के उणनै उजळो वणावणी समझो इज नी
तो आपरी जिंदगी मुळकणी तो आधी रही कुमळीज जावेला ।
जिकी जिंदगी फळ नी, फूल नी, मुळकै नी वा जिंदगी धरती
पर भार रूप है। इसो मिनख ठीक है के आपरै उमर रा
दिन अोछा करै। कारण के वासना रा कादा मे पड़यो वो
आपरी जिदगी बितावै । उणरी सगळी उमर धन-दौलत जोड़वा
में, मै'ल-माळिया ऊभा करवा में अर सरीर सिणगारवा में इज
बीत जावै। इसी थोथी अर नकामी जिंदगी रो मोल कांई
है ? न वा कोई रै काम प्राय सबै अर न दूजां नै कोई
फायदो पूगाय सके ।
समझ लो एक आदमी पोता रा कोई साथी नै कागद
लिखणौ चावै, लिफाफो बडो मजबूत अर फूटरौ है, बेल-बूटा
पण उण पर पाछा मंडचोड़ा है, कागद पण घणी चीकणो है,
लिफाफा पर ठिकाणी पण लिख दियौ है, पण मायने समाचार
कांई नी है। उणरो साथी लिफाफो खोलै पण मांयनै समाचार
बिल्कुल नी मिळं तो वो कोरो लिफाफी उणरै कांई काम
आयौ । वै बेल वूटा अर वो चीकणो कागद कांई काम
प्राया।
ठीक आ इज हालत मानखा जीवण रूपी कागद री है ।
कोई आदमी पोता रा सरीर रूपी लिफाफा नै ढंग सूं सजाय
लै, पाउडर अर क्रीम चेहरा पर पोत लै, फूटरा रेसमी कपड़ा
पैर लै, माणक मोतियां रा गेणा सरीर पर लाद ले, पण जे
जिदगी रोप्राणंद
८५
जिंदगी में असली तत्व संयम, नियम, मरजादा वगैरै है वारी
कठे ई ठा' ठिकाणी ई नी है तो पछै वै गेंणा, कपड़ा पर मोती
मूंगा किण काम रा? उणरी हालत तो उण खाली लिफाफा
जिसी है जिणसूं कोई मतळब नीं निकळ अर मानखो पोता
रा जीवण तूं इज थाक जावै । एक बगीचा में भांत भांत रा
अर रंग रंग रा फूल खिल्योड़ा व्है, पण वां मे सुगंध बिल्कुल
नी है, तो स्यात् आप वार खनै ई जावणौ नी चावोला ।
इणी ज भांत कोई आदमी फूटरो-फररो, लांबो-चवड़ी, अर
दीसतो-वास्तौ है पण उणमे विनय, विवेक, मिनखपणौ, संजम,
सत अर अहिंसा जिसा गुण नी व्है तो वो मिनख विद्वानां नै
फूटरो होवतां थकां ई चोखो नी लागे । कवियां री कलमां,
चितारां री कुंचियां अर लेखकां री लेखणियां इस मिनख रो
चितरांम उतारण नै तैयार नी व्हैला अर जे व्हैला तो ई वांरै
मन मे नफरत व्हैला। जिकण जिदगी मे सत, सिव पर सुंदर
नी व्है वा जिंदगी इज कुमळीजियोड़ी गिणीजै अर कोई उणरै
खने ई नी जावणी चावै । इसा मिनख पर जिनावर में कोई
फरक नी है।
संसार रा इतिहास में इसा अलेखू दाखला मिळं , जिणमें
ठा' पड़े के जिदगी कुमळीजगी है, उणनै ईखै, मोह अर माया
रूपी नागां खायली है। जो जीवता तो हा पण मुड़दा सा
बण नै । वां री जिदगी नै प्रांपां असफळ जिदगी कैवाला,
भलैई वां रै खनै धन रा ढिगला व्है, संपदा रा भाखर व्है पर
साधनां री वागरां व्है ।
।
राम रान
तंस पर रायण री इसीज कहाणियां है जिका में. जोवण
री मुळक नी हो । ए दोनूं मोटा राजा हुवा है। वारे जीवण में
पाई वाता ही; काया लांबी-चबड़ी, राजपाट रो ठाट, मानखो
गार नाम सूं धूजतो पण जिंदगी में जो खास कमी ही वा' आ
ही के जिदंगी में मुंळक को ही नौं । वै उमर भर दूजो पर
अत्याचार करता रहया, दूजां नै तावता रहया, इण कारण
इज दुनियां बांसूं नाराज रही। इतिहासकारों अर'कहांणी
लेराका वां पर कलम चलाई तो जरूर पण नफरत सूं चलाई।
कोई पण वारी जीवणी पढे तो उण पर थू थू करण लाग ।
गौसालक अर गोड़से री कहाणी पण इसीज है-मांनखा नै
वासू नफरत है। हर हिटलर जो जरमनी रो करणे-करावण
हो, सगळा संसार में प्रसिद्ध व्हग्यो, उणरी जिंदगी पणे
संसार नै वरवाद करण में इज बीती । उणरी जिदंगी में
मुळक रो कठई ठा' ठिकाणो ई नी हो । जिकण रै जीवण में
हिंसा पर मार-काट व्है उणनै मानखो तो कीकर पंसद कर
सके पण उणनै पोता नै ई कदैई सांति नी मिळे ।
जापान रो हिरोसिमा नगर भस्म होवती हो। अणुबम
सूं वळझळ नै उणरी राख व्हे रो ही, उण वखत उण वळबळती
भोभर पर दौड़तो एक आदमी उठ काई सोजती हो । वो करैई
अठीने दौड़ती तो करैई उठीनै अर जोर जोर सूं बोलण
लागतो-
He shall go to hell, who has destroyed this beloved
town of Japan (जिणे इण जापान रा फूटरा नगर रो नास
कीनी है, वो जरूर नरक में जावैला।)
-
-
जिदगी रोप्राणंद
८७
करैई वो थांभा ऊपर चढनै च्यारू मेर देखती अर कई
अठी उठी फिरण लागतो पण उणनै चाहिजती चीज नी लाद
री ही । रूंखडा, बांटका, पानड़ा सगळाई बळ नै भसम व्हैग्या
हा अर वो पोतं पण गरम राखोड़ा पर चालण सूं बळ नै काळी
पड़ग्यौ हो!
इतरा में घायलां री सेवा करण वाळी एक मोटर उठे
आई । उणां उणनै कोई पागल भारतवासी समझ नै सहायता
केम्प मे लेग्या अर उठे उणरी सेवा चाकरी होवण लागी।
उठीनै अमेरिका में अणुबम बणावण वाळी डॉक्टर चास
निकोलस कठैई भागग्यौ हो । उणरी लुगाई मेरी अर उणरो
साथी राबर्ट सिडनी उणनै खोज हा । वे मन में सोचता
जावता हा के म्हे निकोलस ने कितरो समझायौ हो के )
अणुबम मत बणा, इणसू ससार रो नास व्है जावैला। पण वो
मान्यो कोनी अर इण कारण इज उणरो साथ पण छोडणी
पड़यो। इसो मालम है के उणे आपरी चाळीस बरसां री सोध
खोज सरकार नै सूप दी है जिणसूं जापांन रो नास व्है रहयौ
है । पण प्रेम रै नातै उणनै सोधणी तो पड़ेला इज । यू विचार
कर नै वे उणरी प्रयोगसाळा में पूग्या । पण उठे भीत पर
लिख्योड़ी हो-He shall go to hell (वो नरक में जावैला)
ओ निकोलस रै हाथ सूं लिख्योड़ी हो । उणी वखत निकोलस
रो जूनी नौकर टांमी मिळयो। उणे बतायौ के जिण वखत
रेडियो सूं हिरोसिमा रै नस्ट होवण री खबर आई, निकोलस
एकदम ऊठयौ-हाका करण लाग्यौ अर आंख्यां बद करने
अठा तूं दौडग्यो । उठा पछ उणरो कोई पतो नी है।
-
राम राज
समाचार पत्रों में निकोलस रै गुम हो जावण री खवर देय
नै सिरानी पर मेरी जद जापांन पूग्या तो सांति संघ रा सदस्यां
वारो उठे खूब श्रादर सत्कार कियो अर वान सहायता केन्द्र
दिशावण ने लेग्या। उठा रै एक मोटे डाक्टर विलियम एक
अस्पताळ में फिरतां पूछ्यौ के कांई आप वताय सकौ के इसा
भयानक बम रो वणावण बाळी कुण हो, तो सिडनी निकोलस
रो नाम बतायो । नाम बतावतां पांण एक पागल री जोर सूं
अावाज पाई-Allas, he shall go to hell (अफसोस वो जरूर
नरक में जावला)।
वे भो सुण ने एकदम चौंक्या, वांने विस्वास व्हग्यो के वो
पागल इज निकोलस है, कारण के प्रयोगसाळा री भीत पर
ए इज आखर लिख्योड़ा हा पर टांमी पण आ इज बात
कही ही।
वे सीधा उणरै खने आया अर आंसूड़ा टळकावता
वोल्या-"अरे निकोलस, थारी आ हालत !" निकोलस पण
आपरा साथी अर पोता री लुगाई नै पै'चांण ली। वो बोल्यो-
"मेरी, थारी बात साची निकळी, म्हूं जरूर नरक में जाऊंला ।
जो दूजां री मुळक नै मिटाय नै पोता री मुळक कायम
राखणी चावै, वो थोथा विचारां में गोता खावै। में म्हारी
सोध संसार नै बरवाद करण सारूं काम मे ली, इण कारण
इज म्हारी खुसी गायब व्हेगी।
ओ है जिंदगी रो देवाळो । जठे मानखो खोटा काम करे,
उठे उगने कितरा दुख उठावणा पड़े। निकोलस रा दाखला
जिदगो रो प्राणंद ८६ सूं आपां आछी तरै समझ सकां के उणरै चाळीस बरसां री मैणत अकारथ गई पर उणरो पोता रो जमारी ई बिगड़ग्यो। जे वो पोता री अक्कल, हिरदा अर इंद्रियां नै चोखै मारग घालतो तो दुनियां मे पूजोज जावतो। चंदरमा कितरो फूटरो व्है । अर फेर पूनम रो पूरो चांदो जद आपरी सोळू कळावां सागै ऊगै तो कितरो रूपाळी, कितरो ठंडी, कितरो चोखो पर कितरो आणंद देवण वाळो लागे । इसा रूपाळा चांद नै हरेक जीव देखणी चावै, इणरो कारण ओ इज है के वो चंदरमा सगळी कळावां सागै पूरण व्है । इगीज भांत जिण मानखा री जिंदगी सगळी कळावां सूं पूरण है, उणनै संसार रा सगळा जीव चावै, उरणरै कुसळ- खेम री कामना करै। सगळां रै वास्तै वा जिंदगी आणंद देवण वाळी व्है । मरजादापुरसोत्तम रांम, करमजोगी क्रिसरण, भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, ईसामसीह, म० गांधी इण सगळा महापुरखां रो जीवण चदरमा री पांण इमरत सूं भरयोड़ी हो । वारै जीवण मे सांति, प्रेम, न्याय, सत अर क्षमा भरयोड़ी ही। ओ इज कारण है के आज कई बरस बीतग्या पण हालतांई मानखो वांनै याद कर, देव करनै पूज। ज्यार जीवण में सहज आणंद हो, निकोलस रै गळाई उणा अणु-बम री सोध नी करनै प्रमाणु बम री खोज कीवी ही अर प्रेम री पूरणता इज वारै जिंदगी रूपो प्याला नै छळोछळ भर सकी ही । जीण री कळा वारै बरोबर हाथ आयगी ही। इण कारण इज अबखी सू अवखी घड़ियां में पण हँसता रह्या, वारै जीवण
राम राज
में कई उदासी धाकावट नी पाई। वे पोता रै जिंदगी री
मनट तक कायम राख सक्या। जोगेसर पाणंदघनजी
मांगा र जीवण री मुळक खातर पूरो जीवण बितायग्या। वार
शोषण में मरती ही, फक्कड़ता ही, सरलता ही अर ए चीजां
गया जिदगो रो पाणंद हो ।
जोगेसर पाणंदघनजी बडा पांचवांन पुरस हा । एकर वे
मा गांव में ठरघोड़ा हा, जठ पो कायदो वण्योड़ी है के
जहातां गांव रो नगर सेठ सभा मे नी प्राय जावै उठातांई
कोई पण साधु महात्मा पोता रो वखांण सरू नी कर सके ।
जोगेमर ने तो कोई परवा ही कोयनी । सो उणां तो पोता रो
बमाण सरु कर दोनो पर नगर सेठ थोड़ा जेज तूं उठ पाया।
रोठा नै था वात खारी लागी सो बखांण खतम हुयां पछै वे
महात्माजी खनै पूग्या पर कवण लाग्या-"महाराज! आपने
प्रो ठानी हो के इस गांव री एक मरजादा बणियोड़ी है पर
वा पा के जठा ताई इण गांव रो नगर सेठ बखांण मे नी प्राय
पाव, उठा तांई सरू नो व्हैणी चाहिजै । आप नै सोच विचार
ने यो काम करणी चाहिजतो हो।" आनंदघनजी तो फक्कड़
साधु हा, वे किणरी परवाह करता ? वै बोल्या-"म्हूं इण
लिछमीपतियां री थोथी वाता नै नी मानूं ।" सेठ नाराज
होय ने बोल्यो-"महाराज, हाल आपनै रैवणी तो इण गांव
पर इण समाज में इज है, पछै आप इयां अकड़ ने किया रेय
सकोला?" संत देख्यो सेठ रो पारो गरम व्हैग्यौ है तो वे सांत
भाव सूं बोल्या-"सेठजी, जे आपनै इसो इज गुमांन व्है तो म्हूं
जिदगी रो प्राणद
९१
तो अबार ओ गांव छोड नै चाल्यौ जावू । इण समाज रै सागै
मुहूं म्हारी आत्मा नै नी बांध सकू । अर जे थारी आ धारणा
व्है के म्हे आनंदघन नै पाळां पोसां हां तो थांरी प्रा धारणा
थोथी है; न म्हनै इणां मोटा-मोटा उपासरां री जरूरत है पर
न थां जिसा सेठ-साहूकारां री गुलामी री जरूरत है।"
इतरो कैय नै वे तो प्रापरी साधना वास्तै वन कांनी रवाने
व्हग्या अर आनंद सूं आपरी साधना में लीन व्हंग्या । ओ है
जिंदगी रै आणंद रो एक नमूनी। जठै इसो आणंद व्है, उठे
कोई पण चोखो काम, चोखी साधना रुक नी सके । साग-सागै
कोई पेण"बिखो के दुख टिक नी सकै । जोगेसर आणंदघनजी
तीरथंकर चौवीसी मे तीजा तीरथंकर संभवनाथजी नै अरज
करतां जिदगी रै असली आणंद रो भेद इण भांत खोल्यौ है-
सेवन कारण पहली भूमिका रे ।
अभय, अहष, अखेद ।।
भय चंचलता नै परिणामनी रे ।
द्वष अरोचक भाव ।
खेद प्रवृत्ति करतां थाकिया रे ।
दोष प्रबोष लखाव ॥
सभव देव ते धुर सेवो सेव रे ।
लही प्रभु सेवन भेद ॥
कवि आणंदघनजी जिंदगी रो आणद परगट करण खातर
कितरा ऊंडा पूगग्या है। वे कैवै के प्रभु री सेवा करण खातर
अर जीवण नै ऊंचो उठावण खातर प्रभुत्व सेवन रा भेद नै
समझो अर पछै उणरो भोग करौ । प्रभुत्व-सेवन रो अरथ है
रामराज जिगी रो ग्राणंद मेळवणी। इण वास्ते पैला भोमका तैयार को। घर भोमका तैयार करण वास्त पैला तीन चीजां री जाता है-अभय, अद्वेस अर अखेद । अभय रो अरथ निडर- गो, पण पण निडरपणा रो अरथ थोथी अकड़ नी है । परमाणु बम बणावणा के एवरेस्ट री चोटी माथै चढणी पण बिहारणी नी है। लड़ाई रा मैदान में जे कोई आदमी लाखां गोरा रं सामने मौत तूं जूझती थको निकळ जावै के कोई मानस परम सस्य वणाय दे, पण इसा मिनख र पण हिवड़ा रो पड़कणां सुणी व्है तो ठा' पड़े के उठे पण जीवण री मोह विरती है। बार तो उठे वीरता रो सांग दीखैला पण मांयला मांगी मौत रो भय धड़कती निजर अावला। इण वास्तै निड- रता रो घरय अठं अंदरूणी विरतियां रो चचळ नी होवणौ है। उट वारली निडरता के बारलो आणंद मिनख नै मोटो नी वणाय सके। जिंदगी रे पाणंद रो दूजो तत्व उणां अद्वैस बतायौ है । अद्वेग रो मतळव फगत इतरो इज नी है के दूजां तूं वैर-विरोध नी करणौ। प्राप जांणो के मामूली भाठौ के एक इन्द्रिय जीव कोई सू वैर नी राख । फगत इण कारण सूं इज वांनै अद्वेसी नी कय सका । जठे उदासीनता, नफरत के बेपरवाही री विरती व्ह, उठ द्वेस मायनै इज मांयनै घोड़ा री पांण दौड़ती निजर नावै । जिंदगी सूं हार नै बैठ जावणी, किणे ई प्रापरी बात नी मांनी तो उणसू कांनी ले लेवणौ पण अद्वेस नी है । उपर मन में वळण नी व्हेणी चाहिजै । जठे मन रा पड़दा मे
जिदगी रोप्राणंद
६३
वैर विरोध री होळी सुळगती व्है, उठ उदासीनता के कांना
लेवण री राख ऊपर नांखण सू वैर विरोध री आग बुझै नी
पण कोई निमित्त रूपी पवन लागण सूं पाछी आग सुळग
जावै । इण वास्तै आनंदघनजी री निजर में द्वस रो मतळब
अरोचकभाव है। कोई मिनख सूनफरत करणो, उणसूकांनां
ले लेवणो के उणसू उदासीनता देखावणी पण द्वेस इज
गिणीजै । जठे द्वेस व्है उठे मोह, आसक्ति अर मूर्छा वगैरै
मांयनै छिप्योड़ा रैवै । इण वास्तै आपरो मतळब पूरो नी
होवण सू, मोह री भूख नी बुझण सू, मूर्छा नै दांणी-पाणी
नी मिळण सू कोई मिनख सूनी बोलणी, उणरै सागै संपर्क
नी राखणी, उणसू कांनां करणी अद्वेस नी है। अद्वेस रो
असली रूप उठे है के जठै विरोधी सूविरोधी मिनख र वास्तै
पण मन मे सद्भावना व्है, मिळणे पर प्रेम भाव व्है, वांणी में
नेह टपक, हिवड़ा में प्रेम-भरी जग्या व्है अर आत्मा में करुणा
व्है । उणरै विरोध रै कारण प्रापरी कोई सुभ के सुध विरती
नै रोकणी, भय रै कारण सत करम सूडिग जावणी, एक तर
सूअद्वेस इज है। जठे आ विरती व्है उठे जिंदगी रो असली
आणंद के जिंदगी री मस्ती नी आय सके ।
जिंदगी रे आणंद रो तीजो तत्व अखेद है । अखेद रो
मतळब फगत दुखी नी होवणौ इज' नी है। एक मजूर प्रापरो
काम करतौ करतौ कायो नी व्है के एक वैग्यांनिक बम बणा-
वतौ बणावती थाकौ नी व्है तो इतरा रो इज मतळव अखेद
नी है। कारण के उठै बुरा काम री बुराई रो कांटो हर वखत
राम राम । मन में सुरथोड़ी रैवे, इण वास्तै वो पीड़ा देवती रैवै । मिनख ने प'ला सूइज सोच विचार रै ढंग सू इसो काम करणी चाहिजे के पर्छ उणनं पछतापो नी करणो पड़े। कारण के जिको तीर एकर हाथ सूछूट जावै वो पाछो हाथ नी आवै । इण वास्तै कोई पण काम कियां पै'ला मिनख नै हजार वार सोच लेवणी चाहिजै जिणसू के पर्छ पछतापी नी करणी पडै । इण वास्तै पाणंदघनजी रे कथण माफक अखेद रो प्ररथ श्रो हुवी के कोई पण काम सोच-समझ नै ढंग सू करणी जिणसू पछ उमर भर चिंता में नी वळणी पड़े। इण तरै पोता रो निजर सू सत जच्योड़ी, हितकर लागोड़ी बात सरू करने रुकणो नीं, के मन में कोई भांत रो दुख कळेस नी लावणी अखेद रो भेद है । हां, तो जो मिनख पोता री जिंदगी में पारणंद रा इण तीनू तत्वां नै अपणाय ले तो उणरो जीवण पूरण व्है जावै, कळा-पूरण चांद री पांण मुळकण लाग जावै। पण आ बात ध्यान में राखणी चाहिजे के ए तीनू तत्व भेळा होवण सू इज जिंदगी रो पाणंद प्राय सके। जिंदगी रे पाणंद रोअसली नुस्खो प्रो इज है । जिंदगी री असली पर पूरी मुळक (आणंद) रो मतळव भो है के जो एक'र सरू करनै प्रागै सू आगै पूर- णता कांनी वधती जावै, रुकै नी तो आणंद अंत ताई कायम रैय सके। जिण भांत दूज रो चंदरमा दूज सू लगाय नै पूनम तांई वधती इज जावै, उणीज भांत मानखा रा जीवण में पण पाणंद धीरे धीरै वधतौ इज रैवणी चाहिजे । अर जे मारग
जिदगी रोप्राणंद
१५
में इज पोता रा फरज नै छोड दियौ, मारग भूलग्या अथवा
रुकग्या तो समझणौ के आणंद तांई पूगणी कठण है ।
एक जूनी कथा है । वा इण भांत है के एक राजा हो,
उणरै एक बेटो हुयो । कोई जोतखी राजा नै कैय दियौ के प्रो
कुँवर तो मोट्यार गाळा मे इज मर जावैला, उणरा गिरै
इसा इज पड़या है। अबै राजा कुँवर होवण री खुसी तो भूलग्यौ
अर उणरी मौत री चिंता मे पड़ग्यौ। रांणी पण घणी दुखी
हुई। राज परवार रा सगळा मिनखां पण बडो सोच कियौ
अर इण भांत सब जणा हर वखत गमगीन रैवण लाग्या । राजा
रै दिमाग मे आळं पो'र अर चौसठ घड़ी जोतखी री वाणी
गूजण लागी अर वो पोता रा फरज नै ई भूलग्यो । यू फरज
रे तौर कुँवर रो पालण पोसण हुयौ, सिक्षा-दीक्षा पण हुई, अर
कुंवर मोटयार ई व्हैग्यौ पण मा बापां रै मन में संतांन रै
वास्तै जिकी असली हूंस व्है, जिकी जिंदगी रो असली पाणंद
व्है, वो नी आय सक्यो। एक मामूली सी बात जिंदगी रो
सगळी रस, सगळी आणंद इज खतम कर दियौ । ओ सगळी
परिस्रम अर पाळण पोसण ऊपरला मन तूं होवतो हो। राणी
कुंवर नै खोळा में लेयनै खवाड़ती, पिवाड़ती अर उणरौ लाड
ई करतो पण उणरै दिमाग में तो हर वखत आ बात चक्कर
काटबो करती के कुँवर जवानी में जावती रैवैला। पोता री
संतांन नै पाळतां मा रै मन मे जिको असली पारणद व्है वो
सूखती जाय रह्यौ हो।
इण भांत जिदगी मे कई मौका आवै के जद जीवण भय
राम राज
?
पर लोग री धारा कांनी मुड़ जावै पर जिंदगी रो असली
पाणंद खतम व्है जावै।
प्राजकाल रा जुग में जिका धर्म रा ठेकेदार वण्योड़ा है,
वार जोवण में पण जिंदगी रो असली आणंद क्यूं नी है ? रात
र दिन धर्म री क्रियावां में ड्रव्योड़ा रैण पर ई वार जीवण
मे आणंद क्यूं नी है। इणरो असली कारण जे ढूंढयौ जावै
तो ठा' पड़ेला के वारी सगळी क्रियावां लोभ पर भय माथै
टिक्योड़ी है । का तो वान सुरग रो लोभ है अर का नरक रो
भय है। अथवा इण संसार मे स्वारथ सिद्ध होवण रो,
नांमवारी रो के धन कमावण रो लोभ है, के सरकारी सजा रो,
वेइज्जती रो, स्वारथ भंग होवण रो भय है। फरज री असली
धार पर वांरी जीवण रूपी नदी नी वैवै । इण कारण इज
वांने धर्म क्रियावां में रस नी आवै, आणंद नी मिळे ।
धर्म री सगळी क्रियावां ए दोन्यू वातां ध्यान में राख नै
की जावे।
भगवद्-भगत थेरिसा रो नाम आप सुण्यो व्हैला। वा
एक महान पंडिता ही। वा प्रापरै जीमणा हाथ में चराक
(मशाल) पर डावा हाथ में पांणी री बाल्टी राखती । लोग
उणने इण भांत हाट बजार में फिरती गिरती देखता तो वाने
बडो अचूंभो होवती । कोई उणनै पूछतौ तो वा पडुत्तर देवती
कै चराक तूं म्हूं सुरग रा सुख वाळ देवणा चावू अर वाल्टी
रा पाणी सूं नरक री आग बुझा देवणी चावू । इणसूं मानखो
सुरग री थोथी कल्पनावां में झब्योड़ी नीं रैवै अर न नरक
जिदगी रो प्राणंद
सूं डरपै, वां धरम रा कामां में लाग्यौ रैवै अर पोता रै फरज
रो पूरो ध्यान राखै । लोगां पूछयौ-"थांन ा कल्पना कियां
सूझी ?" डोकरी थेरिसा बोली-"इण संसार रा वाडिया मे
जितरा पण साधक है, कोई रै मन में नरक रो भय समायोडौ
है तो कोई सुरग रा सुखां में लीन व्है रहयौ है, पण कोई
बिना स्वारथ आपरो फरज पूरी करनै जिदगी नै आणद सू
पूरण नी बणावै । घणखरा मिनख दुनियां मे चोखा काम करै
जरूर पण वारै लारै ई कोई न कोई भेद है । कोई पोता रा
पापां नै छिपावण नै सत्करम करे तो कोई आपरी नांमवारी
अर धन कमावण रै वास्तै या दुनियां नै उल्लू बणावण रै
वास्तै सत्करम करै । इण भांत हजारां साधकां रै मन में
घुस्योड़ी सुरग री उण थोथी कल्पनावां नै मसाल सू बाळणी
चावू अर नरक रा डर नै बाल्टी रा पांणी सू बुझावणी चावू ।
मतलव प्रो के म्हूं भय अर लोभ दोनू मिटा देवणी चावू । म्हूं
समाज से मन मे आ बात आछी तरै बिठा देवणी चावू के
जिंदगी रो असली आणंद पोता रो फरज निभाण पर इज
मिळ सके । घरम, धरम रै वास्तै होवणी चाहिजै अर सत्करम
सत रा पालण वास्तै होवणी चाहिजै । आ इज म्हारी
भावना है।
डोकरी री बात रो सार ओ है के मांनखा नै पोतारी
जिंदगी में तकलीफां, मुसीवतां पर अड़चनां सूं नी डरणौ
चाहिजै। ओ व्हैला जद इज जीवण मे असली आणंद
आवैला।
९८
राम राज
-
जिंदगी रो आणंद प्रात्मा सहित पूरा सरीर रो आणंद
है । जठे फगत सरीर रो आणंद इज व्है, उणनै पूरो आणंद
नी कह्यौ जा सके । कारण के आत्मा तो पूरा सरीर, इन्द्रियां,
मन अर बुद्धि रो पावर हाउस है। जे आत्मा में आणंद नी
है तो मन रो, बुद्धि रो, हिरदा रो के सरीर रो आणंद जिंदगी
ने इतरी मजबूत नी बणा सके। तांम पण ए सगळा प्राणद
जिंदगी रा आणंद नै पूरण जरूर बणाय सके। बसंत रित
प्राव जद फगत रूखड़ा रै नवा पानड़ा इज नी आवै, पण
फूल, मांजर, फळ, कूपळां पर नैनी नैनी डांमकियां सगळी
घणी फूटरी आवै । वसंत रो वो आणंद पूरण आणद बणै ।
सगळी कुदरत इसी दीसै जांण नवो वागो परयौ है। अठीने
कोयल टहूका देवणा सरू करै अर उठीने भांत भात रा फूलां
पर भमरा फूदियां गूजण लाग जावै। एक कांनी जूंना अर
पीळा पांनड़ा झड़ण लागै तो दूजी कांनी नवा अर सोवणा
पांनड़ा श्रावणा माडै । चिड़कलियां अर सूवटा किलोळ करण
लागै अर रूंखां पर माळा घालण लागै । इण भांत वसंत रित
रा सगळा अंग कुदरत रा प्राणद नै घणौ बढ़ा देवै। ठीक
इणीज तरै जिदगी रा आणद में आत्मा तो खास चीज है इज,
पण मन, बुद्धि, हिरदो, इन्द्रियां अर सरीर पण पूरा
सहायक है।
दाखला रे रूप में संबं सूं पैली मन रा आणंद नै लेलौ।
जिण वखत जिदगी मे अबखी घड़ी आवै, च्यारूमेर खतरो
निजर आवै, उण वखत काचो अथवा डरपोक मन मारग चूक
जिदगी रो प्राणंद
88
जावै । पण मन री मजबूती अथवा साचो आणंद उठ इज
है के जठे अबखी तूं अबखी वेळा में पण मन भाखर री पांण
अचळ रैवै, हिलै नी के डिगै नीं। जिकण मन में इसा आणंद
रो वासो नी व्है वो मन एक झाड़ रै उनमांन समझणौ चाहिजै
के जिको मुसीबतां रै जकेरां सू करैई अठीनै लुळ जावै तो
करैई उठीनै । वो पोता राधे' माथै अटळ नी रैय सके ।
इसो मन मनसूबां री दुनियां में डूब्योड़ी रैवै, चिंता री चिता
में धधकतो रैवै के पछै आभै री सोनै री कल्पनावां मे रमतो
रैवै । पण ठोस धरतो पर ठे'र नै सन्मुख प्रावण वाळी बातां
रो उकेल नी सोचै । कइयां रो मन तो इणसू पण कमजोर
न्है, वांनै तो मुसीबत रो मामूली जकैरो कठैई रो कठैई जाय
नै फैक सके । इसा मन वाळां रै खनै भलाई लाख रुपियां री
पूंजी व्ही, कुटुम कबीला सूं घर भरयोड़ो व्हौ, श्रवण नै मोटा
मोटा मैल माळिया व्ही, पण वारै कमजोर मन मे आणंद
थोडी ताळ पण नी टिक सके। मामूली सी आफत आई के वे
हाय हाय करण लाग जावै, पोता रा फरज नै छिटकाय देव
अर हरदम कोई न कोई चिता में लीन रैवै । सुख री बातां
सुणतां पांण वां रो अचपळी मन चलायमान व्है जावै। पण
जिकण मिनखरै मन मे आणंद री छोळां प्राय रो' म्है, उठ
मन री कोई पण तूणी इसो नी मिळं ला के जठे भय अथवा
लोभ रो असर व्है सके। इसो मन तो फरज रूपी तीखी धार
पर चालतो रैवैला। बीच मे जे भाठो आवैला तो उणसू
टकरा सी पर सूगलो पांणी प्रासी तो उणसू पण जूझसी ।
घणो जूनी बात है के स्यालकोट (सिंगालकोट) मे बौद्ध
-
१००
राम राज
-
धर्म रो सम्मेलन हुयो । उण वखत एक सवाल ऊठयो के इण
सहर में एक विद्वान ब्राह्मण रैवे, वो बौद्ध भिक्खुवां सूं नफरत
करै, अवै कुण इसो भिक्खु है जो उण ब्राह्मण रा अोछापण नै
दूर कर सकै अर प्रेम सू उणनै सही मारग पर लाय सके ।
एक साधु इण काम नै पार लगावण रो बीड़ो उठायो-
वो बोल्यो के म्हूं पडत रामन नै जीतवा री कोसिस करूला ।
भिक्खु हाथ में भीख रो बरतन लेय नै उण पंडत रै घरां
पुग्यो । पण उठे तो पैली सूइज इण बात री सख्त मनाई ही
के भिक्खु सूं कोई भासण ई नी करै । सो स्रमण नै भिक्षा नी
मिळी अर वो पाछो आयग्यो। दूजै दिन वो पाछो गयौ तो
उठे तो वारी वा बात । इण भांत वो नित रोज जावतो अर
हंसतो हंसतो पाछो प्राय जावतौ । यूं करतां उणनै पूरा दस
म ह । बीतग्या पण उणरै मूडा पर कदैई रीस री रेखा ई नी
आई । वो तो हर वखत हंसतो रैवतो । उणरै मन रो धीरप
पर सांति देखनै मिनख अचूभी करण लागता ।
एक दिन पंडतांणी घर मे एकलीज ही सो उणे भिक्खु नै
कह्यौ---"आप दर हमेस भीख लेवण नै पधारौ पण घर-धणी
रो इण बाबत हुकम नी है, इण वास्तै म्हूं आपने भीख देय
नी सकू।"
स्त्रमण बोल्यौ-"बैन संत रै वास्तै भीख री कोई कमी
नी है। भीख देवण वाळा कई माई रा लाल बैठ्या है । म्हनै
भीख देवण सूं जे थारै घर मे झगड़ो टंटो होवतौ व्है तो म्हार .
भोख नी चाहिजे। स्रमण पाछो विहार कांनी वहीर हुवी के
जिदगी रो प्राणंद
१०१
मारग में उणन वो इज पंडत मिळग्यो, जिकण नै के वो सुधा-
रणी चाव हो ।
भिक्खु नै खाली हाथां आवतो देखनै पंडत उण सूं मजाक
करतो बोल्यो-"y कठ गयो हो ? कांई भीख वीख मिळी ?"
स्रमण पोता री मिसरी जिसी मीठी वाणी में बोल्यौ-
"महाराज, म्हूं नमायत रै घरी भीख लेवण नै गयौ हो, आज
दस महीनां री तपसा फळी है अर पंडतांणी जी म्हने कांई
दीनी है।" "पंडतांणी कांई दीनो है" प्रा बात सुणनै
पंडतजी एकदम लाल कंकोळ व्हग्या। वे स्रमण नै उठे इज
ठेराय नै सीधा घरै पूग्या अर पंडतांणी ने पूछण लाग्या-"बता,
आज थे उण साधू नै कांई दियो है ?" वा बोली-“पतिदेव,
म्हूं आपरै हुकम बिना कियां देय सकू ? अर आपरै हुकम री
उदूली कियां कर सकू ?"
पंडत पाछा घर बार पाया अर लोगां नै सुणावण नै
जोर जोर सू कैवण लाग्या-"भाइयां, घोर कळजुग
पायग्यौ है,
किसीक गजब री बात है के ए लोग साधू रो भेख बणाय नै
दुनियां नै ठगणी चावै । देखो तो खरी, ए कितरो कूड़ बोले,
अबार प्रो कैवतो हो के पंडतांणी म्हन काई दियौ है, अबै म्हूं
उणनै पूछू के पंडतांणी उणनं कांई दियौ है ?
स्रमण हंसतो थको बोल्यौ-महाराज ! पंडतांणी म्हने
"ना" दियो है । आ तो आप नै ठा' इज है के म्हूं घणा दिनां
सूं आपरै उठे भीख मांगण नै प्रावू हूं। आज म्हनै "ना"
मिळची है तो स्यात कोई दिन "हां" पण मिळ जावला।
रांम राज
भिक्खु रो इसो अनोखो पडुत्तर सुण नै पंडत जी री रीस
सांत व्हेगी। उणां पूछयौ-थारी प्रा कोसिस कितरा दिन
तांईं चालती रैवैली ? भिक्खु सांति सूं पाछौ बोल्यो-जठा
ताई पा जिंदगी है। पंडत आ बात सुणनै घणी प्रभावित
हुवो-धन है आपरो जीवण, प्रापतो मिनख नी पण देवता हो ।
दस महीनां मे कोई पण दिन आपने आदर भाव नी मिळयौ,
अनाज रो एक दांणो पण नी मिळयौ, तांमपण प्रापरा चेहरा
माथ म्हें कदैई रीस नी देखी । धन है आपरी सांति पर सेहन
सगती नै । इणमें कितरी कोमळता अर सांति है । पंडत स्रमण
र पगां पड़ग्यौ अर माफी मांगण लाग्यो । बोल्यो-"हूं आपने
समझ नी सक्यौ। आप तो म्हारा जीवण नै सुधारण नै पाया
हो । म्हारा मोटा भाग है के म्हनै आप जिसा महात्मा रा
दरसण हुवा है।" पंडत उणनै घरां लेग्यौ, भीख दीवी
अर पोता रो जीवण सरल अर सात्विक ढंग सू बितावण
लाग्यौ ।
ओ है मन रे आणंद रो साचो नमूनो । अक्कल रो प्राणद
उठे मिळे, जठे मिनख हरेक मौका माथै आपरी वेवारीक
बुद्धि सू सही गळत रो ठीक ठीक निरण करलै । जठे अक्कल
राजसी व्है, उठ चंचळता रै कारण गळत निरण करलै, मारग
भुलाय दै अर मौको पड़यां नास पण करदै। इसी बुद्धि घणी
खराब व्है, वा रक्षा करवा वाळी के हित करवा वाळी नी
व्है । दाखला रै रूप मे निकोलस री बुद्धि घणी तेज ही, पण
वा रजोगुणी होवण सूं नास-कारक बणी। इणीज भांत
जिदगी रोप्राणंद तमोगुण वाळी पण मूरखता री मूरत व्है । वो सही के गळत कांई नी सोचे। तमोगुणी करतां तो रजोगुणी चोखो । तमोगुणी मिनख तो अंधविस्वासी, अंधसिरधाळ , रूढ़ीवादी पर बिना विवेक रो म्है, इण वास्तै राजसो अर तामसी विरती वाळां रै जीवण मे साचो आणंद नी व्है । जठै बुद्धि दूजां री भलाई में लागती व्है, उठे इज बुद्धि रो आणंद निजर आवै । विद्वांनां धन री दळिदरता करतां बुद्धि री दळिदरता नै घणी खराब बताई है। विद्वांनां मोटयारां नै उपदेस पण इण भांत दियौ है- "धर्मे ते धीयतां बुद्धिर्मनस्ते महदस्तुय" हे मोटयार, थारी बुद्धि धन में नी धर्म में रमै, थारौ मन प्रोछौ नी पण मोटो बणै । हिरदा रो आणंद वो गिणोजै के जठे हिरदो घणो मोटी है, जिकण में मन में सगळा संसार रै वास्तै प्रेम, नेह अर इमरतरों झरणी बैवै । जठ मन नैनो व्है, उठे थारा-म्हारी री भावना, स्वारथरी निजर, जात-पांत रो भेद, रंगभेद, रास्ट्र भेद, प्रांत भेद अर संप्रदाय री भावना घणी ऊंडी है अर वै भावनावां उणरा हरेक वेवार में साफ दीस। उणरो मन दूजां नै देख नै पिघळ नी। दूजा धर्मा रा के देसां रा विद्वांनां रै वास्तै पण उण मन मे कोई प्राव-आदर नी है। इसो मन मिनखपणा रा टुकड़ा २ कर नांखै, मिनखपणा नै विखोर मांखै । इसा थोथा मन सूं न दांन दियौ जा सकै अर न परोप- कार कियौ जा सके। संसार री भलाई रा कांमां मे पेलपांत १०४ राम-राज तो इसो मिनख पड़े इज नी अर जे पड़े तो उण में उणरी कोई न कोई स्वारथ जरूर व्हे । वो उणमें भय के लोभ रै कारण पड़े। इण कारण इज हिरदा रो आणंद उठे नी लाध । हिरदा रो पारणंद तो उठ इज व्है के जठे मिनखपणो अखंड व्है । वो पोता रा हिरदा में सगळी दुनियां नै समेट लेवै । कंडोई पापी, हरांमी नै दुरगुणी व्हो, पण उण वास्तै ई उणरै मन में तो प्रेम इज व्है । वो उणनै प्रेम सूं सुधारवा री कोसिस करै । आजकाल रा नेता रै ज्यूं वो उणनै टाळ नै एक कांनी नी करदे पण उणमें प्रेम सूं समझाय नै सुधारवा रो मौको दे । वचन रो आणंद उठे मान्यौ जावै के जठे वाणी सागै फूल झड़ता है। इमरत जिसो मीठी, चोखी अर तुलियोड़ी सत वाणी बोली उठ इज वचन रो आणंद है । मानखा र जीवण में बुद्धि, हिरदो के मन रो आणंद वांणी सूं दीसै । वांणी दूजा आणंदां रो दरपण मान्यौ जावै। इण वास्तै इज सोच-विचार नै मीठो बोलण वाळी मिनख हर वखत मुळकती रैवै । पण जिकण रे मूंडा सूं कड़वी, खोटी के नकामी वांणी निकळ" जिकण सूं वैर, विरोध अर दुस्मणी वधै तो इसा जीवण में असली आणंद कठे। विद्वानां कह्यौ है-वचने का दरिद्रता- मीठा वचन बोलण में कंजूसी क्यूं करणी चाहिजे । इण वास्ते वांणी आणंद पण घणो जरूरी है। काया रो आणंद उठे मांन्यो जावै के जठे काया सूं कोई पण सोच-विचार नै समझ- दारी सूं कियौ जावै । वेवार मांनखा रै जीवण रो दरपण मांन्यौ जावै, उणने देखनै इज मानखा री अंदरूणी हालत रो अंदाज लगायौ जावै। इण वास्तै जठे जीवण रा वेवार में - -
जिदगी रोप्राणद
१०५
।
अोछा विचार व्है, नफरत व्है, वैर विरोध व्है, स्वारथ के लोभ
व्है, काया सूं मानखा रो भूडो व्है तो व्है, उठ जीवण रो
आणंद नी मिळ सके । काया रो आणंद हिरदा में छोळां देवता
रगत री पांण है। रगत एक ठयै नी रवै, वो सगळा सरीर
मे दौड़ती रैवै अर उण हालत में इज सरीर निरोग रवै। जे
रगत एक ठायै रुक जावै तो काळी पड़ जावै, सरीर नै विगाड़
नांख पर काम पड़यां जीव नै पण खोळियौ छुडाय नांखै ।
जिको रगत दौड़ी करती रैवै उणरो रंग रातो रैवै । जिको
लोहू पडयौ रैवै उणरै काट लाग जावै अर जिकण नै रात दिन
काम में लियौ जावै वो चमकती रैवै । इणीज भांत जिको
सरीर हरदम दूजां री भलाई करण नै तैयार रैवै, पराई पीड़
काटण वाळो व्है, रगत री पांण समाज री सेवा करण ने
तैयार रवै, वो सरीर आणंदपूरण पर ललाई वाळी व्है ।
वो हरदम निरोग रैवै। निरोग सरीर काया रे आणंद री
निसांणी है।
इन्द्रियां रो आणंद उठे मान्यी जावै के जठै हरेक इन्द्रियां
नै चोखै रास्तै लगाई जावे । वान विसय-वासनावां में के
खराब बातां में नी भटकवा देवै। मिनख पोता री जितरी
ज्यादा जरूरतां वधावैला उतरो ई ज्यादा इन्द्रियां रो गुलाम
बङ्गला, उण हालत में मिनख री आजादी खतम है जावला
अर जिदगी रो पाणंद जावती रैवेला। कारण के गुलांम नै
तो हर वखत मालिक री सेवा मे रैवणी पड़े, उणरै सुख दुख
री चिंता कुण करै ? इण वास्तै इन्द्रियां रो आणंद पण जिंदगी
१०६
राम रान
में जरूरी चीज है । पांचूं इन्द्रियां रो सही उपयोग पण वो इज
मिनख कर सकै के जिकण री इन्द्रियां निरोग पर संयम वाळी
व्है । इन्द्रियां अर सरीर निरोग होवण सूं इज धर्म री पालणा
ठीक तर सूं व्है सके। अर धर्म पालण सूं इज आत्मिक
पाणंद पैदा है सके।
नैतिक रूप सूं पाणंद उठे है के जठे मिन ख पोता रा
जीवण मे इमानदारी, सच्चाई, सभ्यता, नियम पर मरजादावां
री पूरी पूरी पालणा करै। जिको मिनख नीति छोड़ दे तो
पछ घरम कियां रैय सके। धरम री जड़ इज नीति है। इण
वास्तै नैतिक रूप सू आणंद मेळवणी व्है तो कोई पण इसो
कांम नी करणी चाहिजै जिको के अनीति सूं पूरी व्है तो व्है,
जिकण सूं समाज अथवा देस नै नुकसांण पूगती व्है । जूनो
खेलण सूं, मांसाहार करण सूं, दारू पीवण सूं, रुळियारगिरी
करण सू, सिकार खेलण सू मानखा रो जीवण भ्रस्ट व्है जावै,
नैतिक आणंद फीको पड़ जावै, इण सब सू बच नै रैवणी
चाहिजै ।
आत्मिक आणंद उण वखत मिळे जद के मिनख सत,
अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अस्तेय, अनासक्ति, क्षमा, दया
पर संजम रो पालण करै । जठे ए गुण नी व्है, अर फगत
ऊपरली टांम-टीम दीसै उठे आत्मा रो आणंद नडी ई नी रैवै ।
दरअसल मे प्रात्मा तो इण सगळा आणंदां री मा है। जे
आत्मा रा सद्गुण जीवरण में नीं आया तो जिंदगी रो पाणंद
कोई पण हालत में पूरो नी व्है सके ।
जिदगी रोप्राणद
१०७
इण भांत ए सगळा पारणंद जिंदगी में आवण सू इज
जीवण रो पूरो आणंद मिळ सके । इण मारग में मानखा नै
कुदरत री केई चीजां सू प्रेरणा मिळ सकै है । सूरज री
उगाळी रे पैलरी सोने री परगा, आसमान मे उछळतो
पवन, बाळा सूरज री मन-मोवणी किरणां एक सू एक
वध नै इसी चीजां है के जिकी जिंदगी रा आणंद वास्तै अनोखी
प्रेरणा देवे । कवि रा सब्दां मे-
उठो नई किरण लिए जगा रही उषा
उठो उठो नये संदेस दे रही दिशा-दिशा ।
खिले कमल अरुण तरुण प्रभात मुस्करा रहा ,
गगन विकास का नवीन साज है सजा रहा ।
उठो चलो बढ़ो समीर शख है बजा रहा ,
भविष्य सामने खड़ा प्रशस्त पथ बना रहा ।
सो आप पोता नै पाणंद रै गुणां सू भरी, आपरी
जिंदगी हंसण लाग जायैला। आप ऊठोला तो आपरो भाग
पण मुळकण लाग जावैला , पर आप बैठग्या तो आपरो भाग
पण कुमळीज जावैला आपनै आपरी जिदगी में साचो
आणंद लावणी है, वो प्राणद आपनै नरक री गंदगी सू
बचाय नै सुरग री पगडांडी माथै अमरता कांनी लेजावैला ।
No text on this page.
'मिनखपणा रौ मोल' विद्वांनां री नजर में हमारे धर्म-निरपेक्ष राज्य में जहां धर्म शिक्षा नही दी जाती, वहां नैतिक शिक्षा के लिए यह पुस्तक उपयोगी हो सकती है, जिसकी प्राज के शिक्षा शास्त्री आवश्यकता अनुभव करते हैं। भाषा शुद्ध राजस्थानी है, जिसमें प्रवाह तथा स्वाभाविकता दोनो ही है। मरुभारती, जनवरी '६५ उपदेश-प्रधान पुस्तक की ओर मेरी रुचि प्रायः नही होती, पर इस पुस्तक से मैं प्रभावित हुए विना नही रह सका । मुनिजी महाराज गंभीर चिंतक ही नहीं, किन्तु गभीर विचारो को सुवोध एव रोचक शली में प्रस्तुत करने में भी दक्ष है। जिससे सामान्य पाठक भी रुचि लेकर लाभ उठा सकता है । विचार और अभिव्यक्ति, भाव और भाषा, अंतरग और बहिरग सभी दृष्टि से पुस्तक सुन्दर हुई है। राजस्थानी भाषा में होने के कारण 'मिनखपणा रो मोल' के प्रति मेरा विशेष पक्षपात है। इससे राजस्थान की साधारण जनता विशेष लाभान्वित होगी, स्त्री समाज विशेष रूप से। नरोत्तमदास स्वामी वनस्थली विद्यापीठ इण पोथी में प्रापन प्रवचनकार श्रद्धेय मन्त्री पुष्कर मुनिजी म० री विद्वत्ता अर अमरवाणी रा परतख दरसरण होसी । इणरै सागै भासा री सजीवता, भाव री गभीरता, सैली री विसेसता आपरौ मन मोय लेसी। आपरै हिवड़ा रा तार मतैई झणझणाय ऊठसी । इण प्रवचना में भार- तीय सस्कृति री आत्मा परतख वोल री' है। इन्द्रनाथ मोदी न्यायमूत्ति, राजस्थान हाई कोर्ट । भी हर [ii ] पुस्तक मेंहूँएक सुलझा हुआ दृष्टिकोण है । धर्ममय श्रद्धा का जीवंत रूप है । विवेक का प्रकाश है । विद्वान प्रवचनकार के समन्वित अनुभवों का सुफल है। हिन्दुस्तान साप्ताहिक, दिल्ली पुस्तक सीधी-सादी भाषा में है । धार्मिक होते हुए व्यक्ति के लिए ग्राह्य है। इससे प्रात्म-शुद्धि की प्रेरणा ले सकते है । ....."ये प्रवचन नई दिशा, नई स्फूर्ति व नई प्रेरणा प्रदान करने वाले हैं। नवभारत टाइम्स, दिल्ली जिस किसी भी विषय को लेकर पाठक इस पुस्तक को पढ़ना प्रारभ करेंगे उसमें उन्हें जीवन के तलस्पर्शी प्रश्नो का उत्तर, मनन की सामग्री और अपने बारे में कुछ सोचने का अवसर प्राप्त होगा। जैन प्रकाश, दिल्ली 'मिनखपणा रो मोल' राजस्थानी गद्य साहित्य का एक अनमोल रत्न है । आध्यात्मिक विषयो को जन-जीवन की भाषा मे प्रसोरित करने के लिए लेखक का प्रयत्न सराहनीय है । प्रस्तुत सग्रह राजस्थानी गद्य के माधुर्य का छलकता हुआ स्रोत है । जन-साधारण कठिनतम विषयो को भी सरलता से हृदयगम कर सकता है । भावो की गहनता तथा भाषा के लालित्य की दृष्टि से लेखक की यह कृति महत्त्वपूर्ण है। विजयमुनि शास्त्री, साहित्यरत्न पुस्तक 'मिनखपणा रौ मोल' एक उत्तम कृति है। भाषा प्रवाह- पूर्ण तथा शैली प्रभावोत्पादक है । उपाध्याय समर मुनि 'मिनखपरणा रौ मोल' पुस्तक मैं एक ही बैठक मे पढ गई। कृति वास्तव में टकसाली भाषा का टकसाली नमूना है। राजस्थानी में इतनी सुन्दर कृति को देख कर मेरा मन-मयूर नाच उठा। रानी लक्ष्मी कुमारी चुंडावत एम. एल. ए. (राजस्थान)
No text on this page.