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जैन शतक

दास, बहादुर · 2009/09

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श्रीपरमात्मने नमः।
स्वर्गीय कविवर भूधरदासजीविरचित
जैनशतक।
अर्थात्
हिन्दीके १०० पद्योंका मनोहर संग्रह
( तृतीय सशोधित सस्करण ।)
संशोधक-नाथूराम प्रेमी।
प्रकाशक-.
जैनग्रन्थरत्नाकरकार्यालय, बम्बई ।
श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस नं ४०२ ठाकुरद्वार बम्बईमें कृष्णराव
सखाराम पाटकरके प्रबन्धसे छपाकर प्रकाशित हुआ।
वीरनिर्वाण सवत् २४४१,
मार्च १९१५।
मूल्य ढाई आना।

Printed by Crisbnarao Sakharam Patkar at the
Shri Laxmi-Narayan Press, 402, Thakurdwar Bombay
and
Published by Nathuram Premi
Propriter-Jain Granth Rutnąkai Karyalaya
Hirabag, Bombay,

Seseseccas-31-3-JEPRESS निवेदन। (द्वितीय संस्करणका) विद्यार्थियोके सुभीतेके लिए अबके सस्करणमें टिप्पणी पह- लेसे लगभग दूनी कर दी गई है और प्रायः प्रत्येक कठिन शब्द- का वा वाक्यका अभिप्राय स्पष्ट कर दिया गया है। विचारपूर्वक पढनेसे अबकी बारकी टिप्पणी टीकाका काम दे सकती है। जिन पद्योके समान आशयवाले श्लोक हमको संस्कृत ग्रन्थों- में मिले है, अबकी बार उन्हे भी टिप्पणीमे दे दिया है । कुछ श्लोक पीछेसे मिले थे इस लिए वे परिशिष्टमे प्रकाशित किये जाते है । विद्वान् पाठक देखे कि अच्छे कवि दूसरोंका भाव लेकर की हुई कविताको भी अपनी प्रतिभासे कैसी अच्छी सजाते हैं। बम्बई-चन्दाबाडी। मार्गशीर्ष कृष्णा ३-२४३७ } नाथूराम प्रेमी. PCSPes. तीसरा संस्करण बिना किसी फेर-बदलके ज्योंका त्यो प्रकाशित किया जाता है। १-३-१९१५ ।

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3898म्म ॐ ॐनम सिद्धेभ्य । कविवर भूधरदासविरचित EntrERENCRETEACHEREPETECH जैनशतक । 1815 श्रीआदिनाथस्तुति। सवैया (मात्रा ३२)। ज्ञानजिहाज बैठि गनधरसे, गुनपयोधि जिस नाहि तरे हैं। अमरसमूह आनि अवनीसौं, घसि घसि सीस प्रनाम करे हैं ॥ किधौं भाल-कुकरमकी रेखा, दूर करनकी बुद्धि धरे हैं। ऐसे आदिनाथके अंह- निस, हाथ जोरि हम पॉय परे हैं ॥१॥ काउसंग्गमुद्रा धरि वनमैं, ठाड़े रिषभ रिद्धि तजि हीनी । निहचल अंग मेरु है मानौं, दोऊ भुजा छोर जिन दीनी ॥ फंसे अनंत जंतु जग-चैहले, दुखी देखि करुना चित लीनी । काढन काज तिन्हैं समरथ प्रभु, किधौं बॉह ये दीरघ कीनी ॥२॥ करनौं कछु न करनः कारज, तातै पानि प्रलंव १ अहर्निशि-रात्रिदिन । २ कायोत्सर्ग मुद्रा । ३ संसाररूपी कीच- इमें । ४ हाथ । nenerBACKBESEASERIES AXXXSXSXSXS36X9X9X33X6S** जैनशतक । करे हैं। रह्यौं न कछु पाँयनतें पैवौ, ताहीत पद नाहिं टरे हैं । निरख चुके नैनन सब यातें, नैन नासिका- अनी धरे हैं । कानन कहा सुनै यौं कॉनन, जोगलीन जिनराज खरे है ॥३॥ । छप्पय । जयौ नाभिभूपालबाल, सुकुमाल सुलच्छन । जयौ स्वर्गपातालपाल, गुनमाल प्रतच्छन । हग विशाल वर भाल, लाल नख चरन विरजहि । रूप रसाल मराल चाल, सुन्दर लखि लज्जहिं ।। रिपुजालकाल रिसहेश हम, फँसे जन्म-जंवाल-दह । या निकाल बेहाल अति, भो दयाल दुख टाल यह ॥ चन्द्रप्रभस्तुति । सवैया (मात्रा ३२)। चितवत वदन अमल चंद्रोपम, तजि चिंता चित होय अकामी । त्रिभुवनचंद पापंतपचंदन, नमत चरन चंद्रादिक नामी ॥ तिहुँ जग छई चंद्रिका-कीरति, EReRERGRERBACHEREnetrentRGRECERECERene १ चलना। २ नोक पर । ३ कानोंसे । ४ जंगलमें । ५ विराजते हैं, शोभा देते है । ६ कर्मरूपी शत्रूसमूहके लिये यमराजके समान । ७ हे ऋषभेश, हे आदिनाथ । ८ कीचड़का द्रह । ९ निर्मल चन्द्रमाके समान । १० इच्छारहित । ११ पापरूपी आतापके लिये चन्दनके समान । toenesc AeroAAAAccecatantneeseen SPORTSYSTBPSPSPS कविवर भूधरदासविरचित-- ३ GS चिहन चंद्र चिंतत शिवगामी । बन्दौं चतुरचकोर- चंद्रमा, चंद्रवरन चंद्रप्रभस्वामी ॥५॥ शान्तिनाथस्तुति । मत्तगयन्द ( सवैया)। शांति जिनेश जयौ जगतेश, हरै अघताप निशेश- की नाई । सेवत पाय सुरासुरराय, नमैं सिर नाय महीतलताई ॥ मौलि लगे मनिनील दिपैं, प्रभुके चरनौं झलकै वह झोई । सूंघन पार्य-सरोज-सुगंधि, किधौं चलि ये अलिकति आई ॥ ६ ॥ श्रीनेमिजिनस्तुनि । कवित मनहर ( ३१ वर्ण)। शोभित प्रियंग अग देखें दुख होय भग, लाजत अनंग जैसे दीप भानुभासतें । बालब्रह्मचारी उग्रसेनकी कुमारी जादौ, नाथ से निकारी जन्मकादौ-दुखरासते ।। भीम भवकाननमैं आन न सहाय स्वामी, अहो नेमि नामी तकि आयौ तुम तासतें । जैसे कृपाकंद वन- १ चन्द्रमाका है चिन्ह जिसके । २ वुद्धिमान पुरुपरूपी चकोरोंको चन्द्रमाके समान । ३ चन्द्रमाके समान । ४ मुकुटमें। ५छाया । ६ चरणकमलोंकी सुगंधि । ७ प्रियंगुके ( कगनीके ) फूलके समान श्याम- वर्ण है शरीर जिनका । ८ हे यादवनाय ! आपने राजीमतीको दुखमयी जन्ममरणरूप कीचड़से निकाल दिया । PERMISSFee . EMERGERRORCMACARPEnter BREAPSPBERROR PRE987299333838963GENOPS ४ जनशतक। ಆಟಿಕಳಂಕಕಾಖ* TISHTINATER जीवनकी बंद छोरी, त्यौं ही दासको खलास कीजे भवपासते॥७॥ श्रीपार्श्वनाथस्तुति । छप्पय (सिंहावलोकन)। जनम-जलधि-जलजान, जान जनहंस-मानसर । सरव इंद्र मिलि ऑन, ऑन जिस धरहिं सीसपर ।। परउपकारी वान, बाँन उत्थंपइ कुनय गन । जन- सरोजवन-भान, भौन मम मोह-तिमिर-धन ।। धनव- रन देह दुख-दाह-हर, हरखत हेरि मयूर मन । मनमथ- मतंग-हरि पौसजिन, जिन विसरहु छिन जगतजन॥८॥ श्रीवर्द्धमानजिनस्तुति । दोहा। दि-कर्माचल-दलन पवि, भवि-सरोज-रविराय । कंचनछवि कर जोर कवि, नमत वीरजिन-पाय ॥ ९ SPEPERSOOREneesSPEECH T9SUNSARSANE १ मुक्त-रहित । २ संसार समुद्र तरनेको जलयान अर्थात् जहाजके समान । ३ भव्यरूपी हंसोंको मानससरोवर । ४ आकरके । ५ आज्ञा । ६ स्वभाव । ७ वाणी। ८ उखाड़ती है। ९ खोटे नयोंको-नयाभासोंको। १० गण (मुनिमंडल ) रूपीकमलवनको प्रफुलित करने के लिये सूर्य । ११ नाश करनेवाले। १२ पाश्चंजिन । १३ मत भूलो। १४ कर्मरूपी मजबूत पर्वतको नष्ट करने के लिये वज्रके समान । १५ भव्यरुपी कमलोंको प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य । १६ वीर भगवानके चरण । SeasRESPARENERGREERREDEEPears SE BES THISESSIBEEssa कविवर भूधरदासविरचित- BARASSALABAS SALASPASOGEADPSPOREAEROPOR 31863339818636387BHOP8 सवैया (३१ मात्रा) रहौ दूर अंतरकी महिमा, वाहिज गुनवरनन वल कापै । एक हजार आठ लच्छन तन,-तेज कोटि- रवि-किरनि उथापै ॥ सुरपति सहते ऑखअंजुलिसौं, रूपामृत पीवत नहिं धापै । तुम विन कौन समर्थ वीरजिन, जगसौं काढि मोखमैं थापै ॥ १० ॥ श्रीसिद्धस्तुति । मत्तगयंद । ध्यानहुताशनमै अरि ईंधन, झोक दियौ रिपु-रोक निवारी । शोक हग्यौ भविलोकनको वर, केवलज्ञान- मयूख उधारी ॥ लोक अलोक पिलोक भये शिव, जन्मजरामृतपर्क पखारी। सिद्धन थोक वसैं शिव- लोक, तिन्हें पंगधोक त्रिकाल हमारी ॥ ११ ॥ तीरथनाथ मनाम करें, तिनके गुनवर्ननमैं बुधि हारी । मोम गयौ गलि {समझार, रह्यौ तहॅ व्योम तदा- कृतिधारी । लोक-गैहीर-नदीपति-नीर, गये तिर तीर १ वाहिरी गुण वर्णन करने की शक्ति भी किसमें है ? २ शरीरका तेज । ३ हज़ार नेत्ररूपी अंजुलियोंसे । ४ तृप्त होता है । ५ ध्यान- रूपी अग्निमें । ६ कर्म शत्रुओंकी रुकावटको निवारण किया। ७ किरण । ८ कीचड़ । ९ पावाढोक-प्रणाम । १० साचेमें । ११ आकाश । १२ संसाररूप गंभीर समुद्र के पानीको तिरके । PBOSBE ST9855 RPSPSeheneede.56SERSeasREneness 3835305853536363929 ६ जैनशतक । POREngmargetin पशु, पंछी १२० भये अविकारी । सिद्धनथोक वसैं शिवलोक, तिन्हैं पग- धोक त्रिकाल हमारी ।। १२ ।। साधुस्तुति । कवित्त मनहर। शीतरितु-जोरै अंग सब ही सकोरै तहां, तनको न मोरे नंदीधोरै धीर जे खरे । जेठकी झंको जहां अंडा चील छोरें छांह लोरै गिरिको तप वे धरे ॥ घोर घन घोरै घटा चहूंओर डोरै ज्यौं ज्यौं, चलत "हिलोरें त्यौं त्यौं "फोरें बल ये अरे। देहनेह तोरें परमारथसौं प्रीति जोरै, ऐसे गुरुओएँ हम हाथ-अंजुली करे ॥ १३ ॥ जिनवाणीस्तुति । मत्तगयद (सवैया)। वीरहिमाचलते निकसी, गुरु गौतमके मुखकुंड ढरी है। मोहमहाचल भेद चली, जगकी जड़तातप दूर करी है ॥ ज्ञानपयोनिधिमाहिं रली, बहु भंग-त- १ जोरसे । २ सुकडाते है । ३ नहीं मोडते । ५ नदीके किनारे । ५ एं-झकरे । ५ चीलपक्षी गर्मीके मारे अंडा छोड़ देते है। ६ चाहते है। ७ पर्वतके शिखरोंपर । ८ गरजते है । ९ डोलैं-डोलते हैं। १० झंझा पवनके झोके । ११ स्फुरायमान करके । १२ अड़े-डेटे । १३ मोह- रूपी महापर्वत-हिमालयको । १४ जड़ता या मूर्खतारुपी गर्मी । SETUPU631366 BASPERSORRERBETESTBRSECRE REREPREERSkseenemenEeeeeREALessenance 1303PBSESSIESBSESS BeeGB ७ कविवर भूधरदासविरचित-- रंगनिसौं उछरी है । ता शुचि शारदा गंगनदीपति, मैं अॅजुरी निज सीस धरी है ॥ १४ ॥ या जगमंदिरमैं अनिवार, अज्ञान अँधेर छयौ अति भारी । श्रीजिनकी धुनि दीपशिखा सम, जो नहि होती प्रकाशनहारी ॥ तो किहभॉति पदारथपॉति, कहां लहते रहते अविचारी । याविधि संत कहैं धन है, धन है जिनवैन बडे उपगारी ॥१५॥ इति मगलाचरण 1 AcoreSeeeeeeeeeeSIRECH 1998AEAIREATS.Gencontatoencode जिनवाणी और मिथ्यावाणी। कवित्त मनहर। कैसेकरि केतकी कनेर एक कहि जाय, ऑकदूध गायदूध अंतर घनेर है । पीरी होत रीरी पै न रीसें करै कचनकी, कहां कागवानी कहां कोयलकी टेर है ॥ कहां भान भारौ कहां औगिया विचारौ कहां, पूनौको उजारौ कहां माँवसअँधेर है । पच्छ छोरि पारखी निहारौ नेक नीके करि, जैनबैन औरवैन इत्तनों ही फेर है ॥ १६ ॥ १ जिसका निवारण न हो सके । २ पदार्योंकी-तत्वोंकी पंक्ति । "आक दूध सुरहीको" ऐसा भी पाठ है । ४ पीतल । ५हिर्स-वरा- वरी । ६ खद्योत, पटवीजना । ७ अमावास्याका अँधेरा1८" निहार देखो नौकेकर" ऐसा भी पाठ है । ९ दूसरे धर्मवालोंके वचनोंमें । gestes deessakakeSene 989s BESSP3636SHSAB6BJP3635353 ८ जैनशतक । वैराग्यकामना । कर गृहवाससौं उदास होय वन सेऊं, वेड निजरूप गति रोईं मैन करीकी । रहि हौं अडोल एक आसन अचल अंग, सहि हौं परीसा शीत-घाम-मेघ- झरीकी । सारंगसमाज खाज कबधौं खुजै है आनि, ध्यान-दल-जोर जीतूं सेना मोहअरीकी । एकलविहारी जथाजातलिंगधारी कव, होऊ इच्छाचारी वलिहारी हौ वा घरीकी ॥१७॥ राग और वैराग्यका अन्तर । रागउदै भोगभाव लागत सुहावनेसे, विनाराग ऐसे लागें जैसे नाग कारे है । रागहीसौं पाग रहे तनमै सदीय जीव, राग गये आवत गिलानि होत न्यारे हैं।। रागसौं जगतरीति झूठी सव सांची जानै, राग मिटैं सूझत असार खेल सारे हैं। रागी विनरांगीके विचा- रमैं बड़ी ई भेद, जैसे "भंटा पच काहू काहूको बयारे है " ॥ १८ ॥ भोगनिषेध । मत्तगयंद ( सवैया)। तू नित चाहत भोग नए नर, पूरवपुन्य विना १ जानूं-अनुभवू । २ मनरूपी हाथीकी । ३ मृगोंके समूह । ४ खु- जली कंडू । ५ नममुद्रा धारण करनेवाला । ६ 'वीतरागी' ऐसा भी एक पाठ है । ७ भटा अर्थात् बैंगन किसीको पथ्य होते है और किसीको वाही (वायुको बढ़ानेवाले ) होते हैं। 333333336 RSERSIRPERSPREASAS 3036SPS कविवर भूधरदासविरचित- ९ B39BHIBE किम पैहै । कर्मसेंजोग मिले कहिं जोग, गहै तव रोग न भोग सके है। जो दिन चारको व्योत वन्यौ कहुँ, तौ परि दुर्गतिमैं पछितैहै । यौहत यार सलाह यही कि, " गई कर जाहु" निवाह न है है ॥१९॥ देहस्वरूप। मातपिता-रज-वीरजसौं, उपजी सव सात कुधात भरी है । माखिनके पर माफिक वाहर, चामके वेठन वेढ धरी है। नाहिं तो आय लगै अव ही, बैंक वायस जीव वचै न घरी है। देहदशा यह दीखत भ्रात, घिनात नहीं किन बुद्धि हरी है ॥२०॥ संसारस्वरूप और समयकी बहुमूल्यता । कवित्त मनहर। काहूघर पुत्र जायौ काहूके वियोग आयौ, काहू रागरंग काहू रो रोई करी है। जहां भान जगत उछाह गीत गान देखे, सांझसमै ताही थान हाय हाय परी है। ऐसी जगरीतको न देखि भयभीत होय, हा हा नर मूढ तेरी मति कौनें हरी है । मानुषजनम पाय सोवत विहाय जाय, खोवत करोरनकी एक एक घरी है ॥ २१ ॥ १ मक्खियोंके पखों जैसे पतले चमडेके वेठनसे वेष्टनसे घिरी हुई । २ चगुला। ३ कौआ । enseseseeneteense OSHEEEEEEE EPSECBSESPEELSESesseel जैनशतक । १० सोरठा। कर कर जिनगुनपाठ, जात अकारथ रे जिया। आठ पहरमैं साठ, घरीं घनेरे मोलकीं ॥ २२ ॥ कानी कौड़ी काज, कोरिनको लिख देत खेत । ऐसे मूरखराज, जगवासी जिय देखिये ॥ २३ ॥ दोहा। कानी कौड़ी विषय सुख, भवदुख करज अपार । विना दिय नहिं छुटि है, लेशक दाम उधार ॥ २४ ॥ शिक्षा । छप्पय। देश दिन विषयविनोद, फेर वहु विपतिपरंपर । अशुचिगेह यह देह, नेह जानत न आप जरें। मित्र बंधु-सनमंध और, परिजन जे "अंगी। अरे अंध सव धंध, जान स्वारथके संगी ।। परहितअकाज अपनौ न कर, मूढराज अव समझ उर। तजि लोकलाज निज काज कर, आज दाव है कहत गुर । कवित्त मनहर। जौलौं देह तेरी काहू रोगसौं न घेरी जौलौं, जरा नाहिं नेरी जासौं पराधीन परि है। जौलौं, जमनामा वैरी देय ना दमामा जोलौं, मानै कान रामा वुद्धि फूटी कौड़ाके लिये जैसे कोई करोड़ों रुपयेका तमस्सुक (चिठ्ठी) लिख देवे । २ लेशमात्र भी। ३ दिन द्वय' ऐसा भी पाठ है। ४ जड़- अचेतन १५ पुत्र वा नातेदार । ६ मौका । ७ नगाडा। ८ आज्ञा ।९ स्त्री। AGRANEPeacepanMAREEReceneseeneKERSACAREERecener aakees GAAPAGReceneREPAREPAIRCRESAREERE 635369 16353PSPB33633 AAANI 83833633 म PAGALE कविवर भूधरदासावरचित- ११ जाइ ना विगरि है ॥ तौलौं मित्र मेरे निज कारज सॅवार ले रे, पौरुष थकेंगे फेर पीछे कहा करि है। अहो आग आयै जब झोंपरी जरन लागी, कुआके खुदाय तव कौन काज सरि है ।। २६ ॥ *सौ वरष आयु ताका लेखा करि देखा सब,आधी तो अकारथ ही सोवत विहाय रे । आधीमै अनेक रोग वालवृद्धदशाभोग, और हु संजोग केते ऐसे वीत जॉय रे ॥ वाकी अव कहा रही ताहि तू विचार सही, कारजकी वात यही नाकै मन लाय रे । खातिरमें आवै तौ खलासी कर इतनेमैं, भावै फैसि फंदवीच दीनौं समुझाय रे ॥ २७ ॥ बुढापा। वालप. बाल रह्यौ पीछै गृहमार वह्यौ, लोक- लाजकाज वांध्यौ पापनको ढेर है। अपनी अकाज कीनौ लोकनमैं जस लीनौं, परभौ विसार दीनों विषै- आयुर्वर्षशत नृणां परिमितं रात्री तदर्ध गत तस्यार्धस्य परस्य चार्धम पर वालत्ववृद्धत्वयो । शेष व्याधिवियोगदुःखसहित सेवादिभिर्नीयते जीवे वारितरङ्गवुवुदसमे सौख्य कुत प्राणिनाम् ॥ [भर्तृहरे ] १ "खातिरमै आवै तौखलासी कर हाल,नही काल घाल पर है अचा- नक ही आय रे। " ऐमा भी एक पुस्तकमें पाठ है। 6383636303530308898603 GURP36893583HG EeeeeeenerEntes nenienteaceremkeene 56363s 303 SEBSHSEBE १२ जैनशतक। Areness BREPEPARENES वश जेर () है। ऐसे ही गई विहाय अलपसी रही औय, नर-परजाय यह "आँधेकी बटेर" है। आये सेत भैया अब काल है अवैया अहो, जानी रे सयाने तेरे अंजौं हू अँधेर है ॥ २८ ॥ मत्तगयंद ( सवैया )। वालपनै न सँभार सक्यौ कछु, जानत नाहिं हिता- हितहीको । यौवन वैसे वसी वनिता उर, कै नित राग रह्यो लछमीको । यौं पेन दोइ विगोइ दये नर, डारत क्यौं नरकै निजजीको । आये हैं संत अजों शठ चेत, गई सुगई अव राख रहीको" ॥ २९ ॥ कवित्त मनहर । सार नर देह सव कारजकों जोग येह, यह तो विख्यात बात वेदनमैं बचे है । तामै तरुनाई धर्मसे- वनको समै भाई, सेये तव विषै जैसे माखी मधु रचै है ॥ मोहमदभोयें धनरामाहित रोज रोये, यौंही दिन खोये खाय कोदौं जिम मैच है। अरे सुन बौरे अब आये सीस धौरे" अजौं, सावधान हो रे नर नरकसौं बचे है ॥ ३० ॥ १ आयु-उम्र । २ सफेद वाल । ३ अवतक भी। ४ वयस-उम्र । ५ दो अवस्थाएं । ६ नरकमें । ७ सफेदवाल । ८ मोहरूपी मदमें भन्न हुए । ९ कोदों ( कोद्रव ) को खाकर जिस तरह मत्त हो जाते हैं। १० सफेद वाल। teenericgea Seasonasa 5895 megassos SSES ఈ ఆకును कविवर भूधरदासविरचित- १३ erreferentes Acersment - मत्तगयन्द ( सवैया ) वाय लगी कि बलाय लगी, मदमत्त भयौ नर भूलत त्यौं ही । वृद्ध भौं न भजै भगवान, विषै-विष खात अघात न क्यों ही ॥ सीस भयौ वगुलासम सेत, रह्यौ उरअंतर श्याम अजौं ही। मानुषभौ मुकता- फलहार, गवार नगोहित तोरत यों ही ।। ३१ ।। ससारीजीवका चितवन । चाहत हैं धन होय किसी विध, तौ सब काज सरें जियरा जी। गेह चिनाय करूं गहना कछु, व्याहि सुता सुत वॉटिये भाँजी ॥ चिन्तत यौं दिन जाहिं चले, जम आनि अचानक देत दगा जी। खेलत खेल खिलारि गये, " रहि जाइ रुपी शतरजकी वाजी" तेज तुरंग सुरंग भले रथ, मत्त मतंग उतग खरे ही । दास खवास अवास अटा, धन जोर करोरन कोर्श भरे ही। ऐसे वढे तो कहा भयौ हे नर, छोरि चले उठि अत छरे ही। धाम खरे रहे काम परे रहे, दाम हरे रहे ठाम धरे ही ।। ३३ ।। . ARBRBREASPARSHUGOPARGBPORAKAS ಇತಿಗಳೇಕಳಕಳಕಳಶಿತಳೆ १ प्रेतवाधा । २ सूतके धागेके लिये । ३ चिनाकर-बनाकर। ४ विवाह वगैरह उत्सवोंमें जो मिष्टान्न वाटा जाता है, उसे भाजी कहते हैं। ५ जमी हुई। ६ घोडा । ७ हाथी । ८ खुशामद करनेवाले । ९ खजाना । १० अकेले ही । ११ 'गड़े रहे' तया-'गरे रहे। ऐसा भी पाठ है। enseeneces20

388888888
जैनशतक।
अभिमाननिषेध ।
कवित्त मनहर।
SESSEREALGERLESSADASALAN
कंचनभंडार भरे मोतिनके पुंज परे, घने लोग
द्वार खरे मारग निहारते । जान चदि डोलत हैं झीने
सुर बोलत हैं, काहुकी हू ओर नेक नीके ना चितारते ।।
कौलौं धन खांगे कोऊ कहै यौं न, लांगे तेई,फिर पाँय
नांगे कांगे परपग झारते । एते पै अयाने गरवाने हैं
विभौ पाय, धिक है समझ ऐसी धर्म नासँभारते||३४॥
देखो भरजोवनमै पुत्रको वियोग आयौ, तैसे ही
निहारी निज नारी कालमगमैं । जे जे पुन्यवान जीव
दीसत हे यानहीपै, रंक भये फिरै तेऊ पनहीं न पगमें।।
एते पै अर्भाग धनजीतवसौं धरै राग, होय न विराग
जानै रहूंगौ अलग मैं । आंखिन विलोकि अंध
मूंसेकी अधेरी करै, ऐसे राजरोगको इलाज कहा
जगमै ।। ३५॥
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१ यान-सवारी २ "कवतक धन खायेंगे, वहुत धन है" कोई ऐसा
मत कहो, क्योंकि वे ही फिर लागे होकर अर्थात् भूखे होकर नंगे पैर
फिरेंगे और कंगळे वनकर पराये पैर झाड़कर उदरनिर्वाह करेंगे। अजान
मूर्ख । ४ सम्पत्ति धन । ५ दीखते थे। ६ अभागा। शशक (खर्गोश)
अपनी ऑखें वंद करके जानता है कि अब सब जगह अंधेरा हो
गया, मुझे कोई देखता ही नहीं है।
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1335363693333333333333363633 कविवर भूधरदासविरचित- १५ दोहा। 933036363636398903 है जैनवचन अंजनवटी, आजै सुगुरु प्रवीन । रागतिमिर तऊ ना मिटै, बडो रोग लख लीन॥३६ मनहर। जोई दिन कटै सोई आवमैं अवश्य घटै, बूंद बूंद वीतै जैसैं अंजुलीको जल है । देह नित झीन होत नैन तेजहीन होत, जोबन मलीन होत छीन होत वल है।। आवै जरा नेरी तक अंतक-अहेरी आवै, परभी नजीक जात नरभौ निफल है । मिलकै मिलापी जन पूछत कुशल मेरी, ऐसी दशामाही मित्र ! काहेकी कुशल १ || ३७ ॥ बुढापा । मत्तगयद ( सवैया )। दृष्टि घटी पलटी तनकी छवि, वर्क भई गतिलक नई है। रूस रही परनी घरनी अति, रक भयौ परिर्यक लई है। कॉपत नार वहै मुख लार, महामति संगति छोरि गई है । अंग उपंग पुराने परे, तिशना उर और नवीन भई है ॥ ३८ ॥ १ आयुमें-उम्र में । २ नजदीक-निकट । ३ जमराजरूपी शिकारी। ४ वाकी--अटपट, कहीं पैर रखते हैं कहीं पड़ता है । ५ कमर । ६ नई अर्थात् झुक गई, टेढी हो गई। ७ विवाही हुई। ८ पलग-चारपाई। ९ गर्दन । १० बुद्धि छोडके चली गई-सठया गई। ११ गात्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते । 9430189GLALACREAGE Anamensenseminaeeees SSRes PSEESEPSPSPSPBSRISH जैनशतक। १६ कवित मनहर। रूपको न खोज रह्यौ तरु ज्यौं तुषार दह्यौ, भयौ पतझार किधौं रही डार सूनीसी। कूवरी भई है कटि दूवरी भई है देह, ऊँवरी इतेक आयु सेरमाहि पूनीसी । जोबननैं विदा लीनी जरा. जुहार कीनी, हानी भई सुधि बुधि सबै बात उनीसी । तेज घट्यौ ताव घट्यौ जीतवको चाव घट्यौ, और सव घट्यो एक तिस्ना दिन दूनीसी ॥ ३९ ॥ अहो इन आपने अभाग उदै नाहिं जानी, वीतराग-वानी सार दयारस-भीनी है । जोवनके जोर थिर जंगम अनेक जीव,जानि जे सताये कछु करुना न कीनी है। तेई अब जीवरास आये परलोकपास, लैंगे बैर देंगे दुख भई ना नवीनी है। उनहीके भयको भरोसौ जान कांपत है, याही डर "डोकरानैं लाठी हाथ लीनी है" ॥४०॥ जाकौं चाह अहमिंद्रसे उमाह जासौं, जीव मुक्तमा जाय भौ-मल बहावै है । ऐसौं नरजन्म पाय विषै-विष खाय खोयौ, जैसे काच सीटें मूढ मानक गमावै है ॥ मायानदी बूइँ भीजा १ वाकी । २ सेरभर रूईमें एक पौनीके वरावर वाकी रही । ३ उन्नीसी-कमती । ४ स्थावर जीव, एकेन्द्रिय। ५ बूढ़ेने । ६ वदलेमें। ७ इवकरके।

36Ssses BES SOGSPERBE कविवर भूधरदासविरचित-- १७ कायावल तेज छीजा, आया पर्ने तीजा अव कहा वनि आवै है । तातै निज सीस ढोलै नीचे नैन किये डोले, कहा वढि वोलै वृद्ध वदन दुरावै है ॥ ४१॥ मत्तगयन्द ( सवैया )। देखहु जोर जरा भटकौ, जमराज महीपतिको अग- वानी । उज्जल केस निसान धरै, बहु रोगनकी सँग फौज पलानी ॥ कायपुरी तजि भाजि चल्यो जिहि, आवत जोवन-भूप गुमानी । लूट लई नगरी सेंगरी, दिन दोयमैं खोय है नाम निसानी ॥४२॥ दोहा । सुमतिहिं तजि जोवन समय, सेवहु विषय विकार खलेसा नहिं खोइये, जनम-जवाहिर सार । ४३ ॥ कर्तव्याशक्षा। BREADESeenecenseserenceseementSesesees मनहर। CEREBRAEBACHERERECEMCAST देवगुरु सांचे मान सांचौ धर्म हिये आन, सांचौ ही वखान सुनि सांचे पंथ आव रे। जीवनकी दया पाल झूठ तजि चोरी टाल, देख ना विरानी-चाल तिसना घटाव रे ।। अपनी वड़ाई परनिंदा मत करै भाई, यही चतुराई मद मांसकौं वचाव रे । साध खटकर्म साध- १ तीसरापन बुढ़ापा । २ सिर हिलाता है। ३ मुंह छुपाता है। ४ सारी । ५ खलीके बदले । ६ व्याख्यान-शाख । ७ दूसरेकी स्त्री। साधुओंकी सज्जनोंकी। EeePEREGARREARRERERARAPESREPense 3868633 १८ जनशतक । संगतिमैं वैठ वीर, जो है धर्मसाधनको तेरे चित चाव रे ॥४४॥ सांचौ देव सोई जामैं दोषको न लेश कोई, चहै गुरु जा उर काहुकी न चाह है। सही धर्म वही जहां करुना प्रधान कही, ग्रंथ जहां आदि अंत एकसौ निवाह है ॥ ये ही जग रत्न चार इनकौं परख यार, सांचे लेहु झूठे डार नरभौको लोह है । मानुष विवेक विना पशुकी समान गिना, तातें याहि वात ठीक पारनी सलाह है ॥ ४५ ॥ साचे देवका लक्षण । छप्पय। जो जगवस्त समस्त, हस्ततल जेम निहारै । जगजनको संसार, सिंधुके पार उतारै ॥ आदि-अंत-अविरोधि, वचन सवको सुखदानी । गुन अनंत जिहँमाहिं, रोगकी नाहिं निशानी ।। माधव महेश ब्रह्मा किधौं, वर्धमान कै वुद्ध यह । BOERERARDOTEBOL EN399 DAEREREGBETEGBG9AS BORATORSearntainerBREADESH १ इच्छा-उत्कठा । २ लाभ । ३ यो विश्वं वेद वेद्यं जनन-जलनिधेसङ्गिनः पारदृश्वा पौर्वापर्याविरुद्धं वचनमनुपमं निष्कलङ्क यदीयम् । तं चन्टे साधुवंद्यं निखिलगुणनिधिं ध्वस्तदोषद्विषन्तं बुद्धं वा वर्द्धमानं शतदलनिलयं केशवं वा शिवं वा ॥ [अकलबकाष्टक ] ESERESPERSASAREASRe FASESAME63PSARORAPAAAAAPAAAAAAAAAAAAAACHARACACAAAAAAXI कविवर भूधरदासविरचित- १९ ये चिहन जान जाके चरन, नमो नमो मुझ देव वह ॥ यज्ञमे हिंसानिपेध । कवित्त मनहर। *कहै पशु दीन सुन जग्यके करैया मोहि, होमत हुताश- नमैं कौनसी वड़ाई है । स्वर्गसुख मैं न चहाँ "देहु मुझे" यौं न कहौं, घास खाय रहौं मेरे यही मनभाई है।जो तू यह जानत है वेद यौँ वखानत है, जग्य जलौ जीव पावै स्वर्गसुखदाई है । डार क्यों न वीर यामैं अपने कुटुवहीकौं, मोहि जिन जारै " जगदीसकी दुहाई है" ॥४७॥ सातो वारगर्भित षट्कर्मोपदेश । छप्पय । अघ-अधर-आदित्य, नित्य स्वाध्याय करिज्जै । सोमोपम संसार-तापहर, तप करलिज्जै ।। *नाहं स्वर्गफलोपभोगतृषितो नाभ्यर्थितस्त्वं मया । सन्तुष्टस्तृणभक्षणेन सतत हन्तुं न युक्तं तव ।। स्वर्ग यान्ति यदि त्वया विनिहता यज्ञे ध्रुवं प्राणिनी । यज्ञ किं न करोपि मातृपितृभि पुत्रैस्तथा वान्धवैः ॥ [ यशस्तिलके] १ इस छप्पयमें सातों दिनके नाम आये है। २ पाररुपी अधेरेको मिटानेके लिये स्वाध्याय आदित्य अर्थात् सूर्यके समान है। ३ संसार- रूपी तापको हरनेके लिये तय सोम अर्थात् चन्द्रमाके समान है। NARENSheeshener CASACABZADACACOLA LAEGERA.CAtestatacat CAOLO RALALAEGSCASEGARESE SRERSEASREOnePARDASRESS 3539 9896333535363 २० जैनशतक । . जिनवरपूजा नियम करहु, नित मंगलदायनि । बुध संजम आदरहु, धरहु चित श्रीगुरुपायनि ।। निजवितसमान अभिमान विन, सुकर सुपत्तहिं दान कर यौं सनि सुधर्म षटकर्म भनि, नरभौ-लाही लेहु नर ।। दोहा। ये ही छह विधि कर्म भज, सात विसन तज वीर। इस ही पैड़े पहुचि है, क्रम क्रम भवजलतीर ॥ १९ ॥ सप्तव्यसन। आखेलन मांस मद, वेश्याविसन शिकार । चोरी पर-रमनी-रमन, सातौं पाप निवार ॥ ५० ॥ जुआनिषेध। छप्पय । सकल-पापसंकेत, आपदाहेत कुलच्छन । कलहखेत दारिद्र देत, दीसत निज अच्छैन । गुनसमेत जस सेत, केंत रवि रोकत जैसे। औरॉन-निकर-निकेत, लेत लखि बुधजन ऐसें ।। जूआ समान इह लोकमैं, आन अनीति न पेखिये। इस विसनरायके खेलको, कौतुक हू नहिं देखिये ।। ५१ १ भगवानकी पूजा मंगल करनेवाली है । २ शुक्रवार वा अच्छे हाथसे । ३ सुपात्रको । ४ शनिवार वा मुधर्म सनि अर्थात् सुधर्ममे मन होकर । ५ मार्गसे । ६ 'अलच्छन' भी पाठ है। ७ नेत्रोंसे। ८ जैसे सूर्यको केतु ग्रहका विमान रोक देता है । ९ अवगुण समूहका घर । tesecsecsececececececececesaRenascerne SSESPOPU938YB6353 RSSSSBPSPBUPSPSPSSSES कविवर भूधरदासविरचित- २१ PORAN मासनिषेध । जंगम जियको नास, होय तब मांस कहावै । सपरस आकृति नाम, गन्ध उर घिन उपजावै ॥ नरकजोग निरई, खाहि नर नीच अधरमी । नाम लेत तज देत, असन उत्तमकुलकरमी । यह निपटनिंद्य अपवित्र अति, कृमिकुल-रास-निवास नित । आमिष अभच्छ याके सदा, वरजौ दोष दया- लचित ।। ५२ ॥ मदिरानिषेध । दुर्मिल (सवैया)। कृमिरास कुवास सरौय दहैं, शुचिता सब छीवत जात सही। जिहिं पान कियँ सुधि जात हिय, जन- नी जन जानत नार यही। मदिरा सम आन नि- षिद्ध कहा, यह जान भले कुलमैं न गही । धिक है उनकौं वह जीभ जलौ, जिन मूढनके मत लीन कही ।। ५३ ॥ वेश्यानिषेध । धनकारन पापनि प्रीति करै, नहिं तोरत नेह जथा तिनको । लव चाखत नीचनके मुंहकी, शुचिता सव १ एकेन्द्रका छोड़कर बाकी सब जीवोंको जगम जीव कहते है । २ भोजन । ३ सड़ाकरके । ४ यदि वन नहीं होता है, तो नेहको तिनकेके समान तोड़ देती है । ५ लार-लाला ! merensanRanESENERAR PHPUS3530PSSS363388663536TS २२ जैनशतक। Gafas Sofaer Breennese जाय छिौं जिनकौं । मद मांस वजारनि खाय सदा, अँधले विसनी न करै घिनकौं । गनिका सँग जे सठ लीन भये, धिक है धिक है धिक है तिनकौं* ॥ ५ ॥ आखेटनिषेध कवित्त मनहर । काननमैं बसै ऐसौ आन न गरीव जीव, भाननसौ प्यारौ प्रान पूंजी जिस यहै है । कायर सुभाव धरै काहूँसौं न द्रोह करै, सवहीसौं डरै दांत लिय तृन रहै है ॥ काहूसौं न रोप पुनि कापै न पोष चहै, काहूके परोष परदोष नाहिं कहै है । नेकु स्वाद सारिवेकौं ऐसे मृग मारिवेकौं, हाहा रे कठोर तेरी कैसे कर बहै है ॥५५॥ या खादन्ति पलं पिवन्ति च सुरां जल्पन्ति मिथ्यावच' सिह्यन्ति द्रविणार्थमेव विद्धयर्थप्रतिष्ठाक्षतिम् । नीचानामपि दूरवक्रमनसः पापात्मिका कुर्वते लालापानमहर्निशं न नरकं वेश्यां विहायाऽपरम् ॥२४ ॥ [पद्मनन्दिपंचविंशतिका] या दुर्दैहे कवित्ता वनमधिवसति प्रतृसम्बन्धहीना भीतिर्यस्यां खभावाद्वदनधृततृणा नापराधं करोति । बध्यालं सापि यस्मिन्ननु मृगवनिता मांसपिण्डप्रलोभादा- दाखेटेस्मिन् रतानामिह किमु न किमन्यत्र नो यद्विरुद्धम् ॥ [ पद्म० पंच १जंगल में । २ परोक्षमें । ३ हाथ चलता है, उठता है। PSEBPSPBEBetes ले REnterEREREST Eeeeeenemies UPS38 डा BOSSIBIBIEBERRER कविवर भूधरदासविरचित-- २३ SEARCORE चोरीनिषेध । छप्पय 1 369600BPSPBABASAR चिंता तजैन चोर, रहत चौंकायत सारै! पीटै धनी विलोक, लोक निर्दइ मिलि मारै प्रजापाल करि कोप, तोपसौ रोप उडावै । मरै महा दुख पेखि, अंत नीची गति पावै ॥ अति विपतिमूल चोरीविसन, प्रगट प्राप्त आवै नजर। परवित अदत्त अंगार गिन, नीतिनिपुन परसैं न कर॥ परस्त्रीसेवननिषेध । कुगतिवहन गुनगहन, दहन दावानलसी है। सैंजस- चंद्रघनघटा, देहकृशकरन खई है ॥ धन-सर-सोखन धूप, धरम-दिन-सांझसमानी। विपतिभुजंगनिवास, बांबई वेद वखानी ॥ इहिविधि अनेक औगुनभरी, प्रानहरन-फॉसी प्रवल । मत करहु मित्र यह जान जिय, परवनितासौं प्रीति पल ॥ ५७ ॥ परस्त्रीत्यागप्रसंसा। दुर्मिल सवैया। दिवि दीपर्क-लोय वनी वनिता, जड़जीव पतंग जहां परते। दुख पावत प्रान गवॉवत हैं, वरजे न , sacacanceGOALAESAGPACATALOS0GSASAACSARIGE Ecocachentar BAERBAERBee: १ चौकन्ने। २ दूसरेका धन । ३ विना दिया हुआ । ४ सुयशरूपी चन्द्रमाको ढकनेके लिये बादलोंकी घटा । 'घटा'के स्थानमें 'छाहिं' भी पाठ है। ५ क्षयरोग । ६ धर्मरुपी दिनका अन्त करनेवाली सध्या । ७ सापके रहनेकी बल्मीकि या वावी।दिव्य-प्रकाशमान ।९दीपककी शिखा enemenement Remes enemesnes Remester 535355536SPSSSSVISISABPS २४ जैनशतक । रहैं हठसौं जरते ।। इहि भाँति विचच्छन अच्छनके वश, होय अनीति नहीं करते ! परती लखि जे धरती निरच, धनि हैं धनि हैं धनि हैं नर ते ॥ ५८ ॥ दिवशील शिरोमनिकारजमैं, जगमैं जस आरज तेइ लहैं । तिनके जुग लोचन वारजें हैं, इहिभांति अचा- रज आप कहैं ॥ परकामिनिको मुखचंद चितै, मुंद जाहिं सदा यह टेव गहैं। धनि जीवन है तिन जी नको, धनि मायँ उनैं उरमाँय बहैं ॥ ५९ ॥ कुशीलनिन्दा। मत्तगयंद ( सवैया)। जे परनारि निहारि निलज्ज, हँसै विगैसैं वुधिहीन बड़ेरे । जूठनकी जिमि पातर पेखि, खुशी उर कूकर होत घनेरै ॥ है जिनकी यह टेव है, तिनकौं इस भौ अपकीरति है रे। है परलोकविर्षे दंड, करै शतखंड सुखाचलकेरे ॥ ६० ॥ एक एक व्यसनका सेवन करनेवाले । प्रथम पांडवा भूप, खेलि जूा सव खोयौ । मांस खाय वक-राय, पाय विपदा वहु रोयौ । १ इन्द्रियोंके वश । २ पराई स्त्रीको । ३ आर्य, श्रेष्ठ पुरुष । ४ कमल । ५ जीवितव्य ।। ६ जीवोंका । ८ हृदयमें धारण करती हैं। ९ विकसित होवे, खिल उठे । १० पत्तल। ११ आदत । १२ वह आदत इस भवमें बदनामीरुप और परलोकमें वज्रके समान होकर सुखरूपी पर्वतके सैकड़ों टुकड़े कर देती है ।१३"है परलोकवि विजुरी सु-" ऐसा भी पाठ है। १४ वज्रदंड । १५ वक HEREnCREnemenSASREASREERSeemERSPEAERS BAERBERence छप्पय। ७ माता। नामक राजा। ineeSPARAGRAEBARESH SSSSSSSSSSSSSS कविवर भूधरदासविरचित- २५ विन जानें मदपानजोग, जादौंगन दज्झे । चारुदत्त दुख सह्यो, वेसवा-विसन अरुज्झे ॥ नृप ब्रह्मदत्त आखेटसौं, द्विज शिवभूति अदत्तरति। पर-रमनि राचि रावन गयौ, सातौं सेवत कौन गति *॥ दोहा। PER863683963636 पाप नाम नरपति करें, नरक नगरमैं राज । तिन पठये पायक विसन, निजपुर वसती काज॥६२ जिनकै जिनके वचनकी, वसी हिये परतीत विसनप्रीति ते नर तजौ, नरकवासभयभीत ॥१३॥ कुकविनिन्दा। मत्तगयन्द (वैया)। राग उदै जग अंघ भयौ, सहजै सब लोगन लाज गवॉई । सीख विना नर सीख रहे, विसनादिक सेव- नकी सुघराई | तोपर और रचे रसकाव्य, कहा कहिये १ जले । २ वेश्याव्यसन । ३ शिकारसे । *धूताधर्मसुत. पलादिह वको मद्याद्यदोनन्दना- श्चारु कामुकया मृगान्तकतया स ब्रह्मदत्तो नृप । चौर्यत्वाच्छिवभूतिरन्यवनितादोषाहशास्यो हठा- देकैकव्यसनाद्धता इति जना सवैन को नश्यति ॥ ३१॥ [ पद्मनन्दिपर्चाविंशतिका ] ४ सिपाही । ५ अपना नगर वसानेके लिये । ६जिनदेवके। "विषयानके सेवनको" "विषयादिक सेवनकी" तथा " वनिता सुखसेवनकी" ये भी पाठ हैं। ८ "तापर रीझि रचैरस काव्य, बड़े निरदै कुमती कवि भाई" ऐसा भी पाठ है। ಆಗಅನಿಆಕಳಿಕಕಳಕಳಕಳಬೇಕು nee PERSPEARE REne 36585319 36HSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSVEESCE २६ जैनशतक | तिनकी निठुराई । अंध असूझनकी अखियानमै, झोंकत हैं रज रामदुहाई ।। ६४ ॥ कंचन कुंभनकी उपमा, कह देत उरोजनको कवि बोरे। ऊपर श्याम चिलोकत के, मनिनीलमकी ढकनी हँकि छारे ॥ यो सतबैन कहें न कुपंडित, ये जुग आमिषैपिंड उघारे । साधन झार दई मुँह छार, भये इहि हेत किधौं कुच कारे ॥६५॥ ए विधि भूल भई तुमतें, समुझे न कहां कसतूरि बनाई । दीन (रंगनके तनमै, तृन दंत धरै करुना किन आई ॥ क्यों न करी तिन जीभन जे, रसकाव्य करें परकौं दुखदाई । साधु-अनुग्रह दुर्जन-दंड, दोऊ सधते विसरी चतुराई ॥६६॥ मनरूप हाथी। छप्पय। BASEENERDPRESIBGASCENERARSH ज्ञान महावत डारि, सुमति संकल गहि खंडै । गुरु अंकुश नहिं गिनै, ब्रह्मवत-विरख विहंडे। करि सिधंत सर न्हौन, केलि अघ-रजसौं ठाने । करनचपलता धरै, कुमति करनी रति मानै ।। १ "मेलत हैं" ऐसा भी पाठ है। २ वालक-मूर्ख | ३ मासके लौंदे। ४ हरिणोंके शरीरमें कस्तूरी बनाई सो वडी भूल की। ५ रसकी कविता करनेवाले कवियोंकी जीभोंमें कस्तूरी बनाते, तो अच्छा होता । अभिप्राय यह कि उसके लिये उनकी जीभ नहीं काटी जाती। ब्रह्मचर्यरूपी वृक्ष। ७ कानोंकी चपलता, अथवा इन्द्रियोंके विषयोंकी चपलता। ८ हथिनी । PSIRSSI80363e3SSESSESSE Asces86SSESSESSFE638536363638 . SPEERSPEECrea , CASHERE कविवर भूधरदासविरचित-- २७ डोलत सु छन्द मदमत्त अति, गुण-पथिक न आवत उरै। वैराग्य खंभतें बॉध नर, मन-मतग विचरत बुरै ॥६॥ गुरुउपकार। कवित्त मनहर। ढईसी सराय काय पंथी जीव वस्यौ आय, रत्नत्रय निधि जापै मोख जाकौ घर है। मिथ्या निशि कारी जहां मोहअंधकार भारी, कामादिक तस्कर समूहनको थर है ॥ सोवै जो अचेत सोई खोवै निज संपदाकौं, तहां गुरु पाहरू पुकारे दया कर है। गाफिल न हूजै भ्रात ऐसी है अँधेरी रात, " जाग रे बटोही यहां चोरनको डर है" ॥६८ ॥ कषाय जीतनेका उपाय। मत्तगयन्द सवैया। छमनिवास छिमा-धुवनी विन, क्रोध पिशाच उरै न टरैगौ। कोमलभाव उपाव विना, यह मान महामद कौन हरैगौ ॥ आर्जव-सार-कुठार विना, छलवेल निकंदन कौन करेगौ । तोप॑शिरोमनि मंत्र पढे विन, लोभ फणीविष क्यौं उतरैगौ॥ ६९ ॥ १ गुणरूपी मुसाफ़िर पास भी नहीं आते हैं। २ चोर । ३ स्थल- थल । ४ पहरेदार । ५ मुसाफिर । ६ क्षमारुपी धूनी। ७ आर्जव (सरलता) रुपी फौलादकी कुल्हाडी। ८ सतोषरूपी उत्कृष्ट मंत्र ९ सर्पका जहर ! PSESSESEGIRUPERSPERIESERUSSSSS Catat96696CAEAEAEAEAEAEAEACHERER 18635 BASE जैनशतक । २८ 26.CAEAEGEACA DAS CEREREALALAEAEAEAEDA मिष्टवचन। काहेको बोलत वोल बुरे नर, नाहक क्यों जस धर्म गमावै । कोमल वैन चवै किन ऐन, लग कछु न सवै मन भावै ।। तालु छिदै रसना न भिदै, न घटै कछु अंक दरिद्र न आवै । जी कहैं जिय हानि नहीं, तुझ जी सव जीवनको सुख पावै ॥७०॥ धैर्यधारणोपदेश । कवित्त मनहर। आयौ है अचानक भयानक असाता कर्म, ताके दूर करिवेको वली कौन अह रे । जे जे मन भाये ते कमाये पूर्व पाप आप, तेई अव आये निज उदैकाल लह रे ॥ एरे मेरे वीर काहे होत है अधीर यामैं, कोऊको न सीर तू अकेलो आप सह रे । भय दिलगीर कछू पीर न विनसि जाय, ताहीते सयाने तू तमासगीर रह रे ॥७१ होनहार दुर्निवार । कैसे कैसे बली भूप भूपर विख्यात भये, वैरीकुल कापै नेकु भौंहोंके विकारौं। लंघे गिरि सायर दिवा- यरसे दिपैं जिनौं, कायर किये हैं भट कोटिन हुँकारसौं॥ ऐसे महामानी मौत आये हू न हार मानी, क्यों ही १ वोले। २ क्यों नहीं । ३ अच्छे । ४ हे जिय ! जीमसे कहनेसे तेरी कुछ हानि नहीं, और सब जीवोंका जी सुख पाता है। ६ चिंतित-दुखी । ७ सागर-समुद्र। ८ दिवाकर-सूर्य । PBIRENE PERHPERGRERENCIENCE 13 ५ साझा। Aasareesaas 36598390636366Bes entenceTEGORSE कविवर भूधरदासविरचित- २९ उतरे न कभी मानके पहारसौं । देवसौं न हारे पुनि दानेसौं न हारे और, काहूसौं न हारे एक हारे होन- हारसौं ॥ ७२ ॥ कालसामर्थ्य | लोहमई कोट केई कोटनकी ओट करौ, काँगुरेन तोप रोपि राखौ पेट भेरिकैं। इन्द्र चन्द्र चौंकायत चौकस है चौकी देहु, चतुरग च, चहूंओर रहो घेरिकै ॥ तहाँ एक भौंहिरा बनाय बीच बैठौ पुनि, बोलौ मति कोऊ जो बुलावै नाम टेरिक । ऐसें पर- पंच-पॉति रचौ क्यौं न भॉति भॉति, कैसे हून छोरै जम देख्यौ हम हरिकै ॥ ७३ ।। मत्तगयन्द सवैया। अन्तकसौं न छुटै निहचै पर, मूरख जीव निरन्तर बूंजै । चाहत है चितमैं नित ही सुख, होय न लाभ मनोरथ पूजै ।। तौ पन मूढ़ बँध्यौ भय आस, वृथा बहु दुःखदवानल भूजै । छोड़ विचच्छन ये जड लच्छन धीरज धारि सुखी किन हुजै ॥ ७४ ॥ धैर्यशिक्षा । जो धनलाभ लिलार लिख्यौ, लघु दीरघ सुक्र- १ दानव-दैत्य । २ किवाड़ लगाके । ३ चौकाने । ४ सेना । ५ जमराजसे । ६ कायै डरै। PSPBE 980 PHPBS563GE BARSaes ETERBest seseaRE 3685 जैनशतक । तके अनुसारै । लो लहि है कछु फेर नहीं, मरुदेशके ढेर सुमेर सिधारै ॥ घाट न बाढ़ कहीं वह होय, कहा कर आवत सोच विचारै । कूप किधौं भर सागरमैं नर. गागर मान मिलै जल सारै ।। ७५ ।। आशारूपी नदी। मनहर कवित्त। मोहसे महान ऊंचे पर्वतसौं ढर आई, तिहूँ जग भूतलमैं याहि विसतरी है । विविध मनोरथमै भूरि जल भरी वहै, तिसना तरंगनिसौं आकुलता धरी है। परै भ्रम भौंर जहां रागसौ मगर तहां, चिंता तट तुंग धर्मवृच्छ ढीय ढरी है। ऐसी यह आशा नाम नदी है अगाध ताकौं, धन्य साधु धीरजजहाज चढ़ि तरी है ॥ ७६ ॥ महामूढ वर्णन । जीवन कितेक तामें कहा वीत बाकी रह्यौ, ताप CREREMERGREE BG009eeeeeeeeeeeeeeeeeBRAGER ... १ मारवाड़के ढरमें अर्थात् टीवोमें । २ मुमेरुपर जो कि सोने का है । ३ कम और ज्यादा । ४ चाहे कुआमेसे भर ले चाहे सागरमेंसे भर ले, तेरे घड़े भर ही जल मिलेगा । ५ सर्वत्र । ६ उक्त च;- आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्गातरंगाकुला रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्गुमध्वसिनी । मोहावर्त्ततुदुस्तरातिगहना प्रोतुंगचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वरा.॥ [ भर्तृहरे] ७ मनोरथमय । ८ ढाके-गिरा करके । ९ "धीरजतरंड" भी पाठ है। . EenEREDERERRORESREGRERRESTERBAREIRE SSFE ఆలో ASSISTS SSSSSSSS133573500 कविवर भूधरदासविरचित-- अध कौन कौन करै हेर फेर ही। आपको चतुर जान औरनको मूढ़ माने, सांझ होन आई है विचारत सवेर ही। चामहीके चखनः चितवै सकल चाल, उरसौं न चौंधै कर राख्यौ है अधेर ही। वाहै वान तानकै अचानक ही ऐसौ जम, दीस है मसान थान हाडनको ढेर ही ।। ७७ ॥ केती बार स्वान सिंघ सांबरे सियाल सांप, सिन्धुर सारंग सू सूरी उदरै परयौ । केती वार चील चम- गीदर चकोर चिरी, चक्रवाक चातक चंडूल तन भी धरयो। केती वार कच्छ मच्छ मेडक गिंडोला मीन, शंख सीप कौड़ी है जलूको जलमैं तिरचौ। कोऊ कहै जाय रे जनावर!" तो बुरो माने, यौँ न मूढ़ जानै मैं अनेकवार है मरयो ।। ७८ ॥ दुष्टकथन । छप्पय। करि गुणअम्रतपान, दोपविप विषम समस्पै । बंकचाल नहिं तजै, जुगल जिला मुख थप्पे ।। १ देखै । २ चलाचै । ३ वाण-शर। ४ खींचकरके। ५ वारहसिंगा । ६हाथी, "सिंधुर सारग"के स्थानमें "वानर विलाव"भी पाठ है। ७ मृगा ८ खरगोश । ९ सुअरी-सूकरी ! १० चिडिया । ११ जोंक । १२ उग. लता है। १३ सापके दो जीभे होती है, दुष्ट द्विजित अर्थात् चुगल होता है। ISPENSPERCASRemeASTERS- SERS ३२ जैनशतक। तकै निरन्तर छिद्र, उदै परदीप न रुच्चै । बिन कारण दुख करै, वैर-विष कबहुँ न हुँच्चै ॥ वर मौनमंत्रसौं होय वश, संगत कीयें हान है। बहु मिलत बान यातै सही, दुर्जन सांप समान है॥७९॥ विधातासे तर्क। मनहर कवित्त । सज्जन जो रचे तौ सुधारससौं कौन काज, दुष्ट जीव किये कालकूटसौ कहा रही । दाता निरमापे फिर थापे क्यौं कलपवृच्छ, जाचक बिचारे लघु तृण- हते हैं सही । इष्टके संयोगते न सीरौ घनसार कछु, जगतको ख्याल इंद्रजाल सम है वही । ऐसी दोय दोय बात दीखै विधि एकहीसी, काहेको वनाई मेरे धोखौ मन है यही ॥ ८०॥ GBREAEAEAEABACA चौवीस तीर्थंकरोंके चिन्ह । छप्पय । PREGenermanennesses गऊपुत्र गजराज, बाज वानर मनमोहै। कोक कमल साँथिया, सोम सफरीपति सोहै ॥ सुरतरु गैंडा महिष, कोलं पुनि सेही जानौं । वज्र हिरन अज मीन, कलश कच्छप उर आनौं । १ दीपका उदय वा पराई बढ़ती। २ अच्छा लगे। ३ छोड़ता है ४ शीतल । ५ वैल । ६ चन्द्रमा । ७ मगर । ८ कल्पवृक्ष । ९ शूकर । SERECResRGREERSHERERESTER888 ****BES कविवर भूधरदासविरचित- ३३ शतपत्र शंख अहिराज हैरि, रिषभदेव जिन आदि ले। श्रीवर्द्धमानलौं जानिये, चिहनें चारु चौवीस ये ॥१८॥ श्रीऋषभदेवके पूर्वभव । DGDEBRERARBSnegos कवित्त मनहर । आदि जयवर्मा दूजे महावलभूप तीजे, सुरग-ईशान ललितांग देव थयौ है । चौथे वज्रजघ एह पांचवै जुगल देह, सम्यक ले दूजे देवलोक फिर गयौ है ।। सातर्फे सुबुद्धिराय आठवें अच्युतइंद्र, नववे नरेंद्र वज्र- नाम नाम भयौ है । दशैं अहमिन्द्र जान ग्यारवै रिषभ-भान, नाभिवंश- धरके सीस जन्म लयौ है ॥ ८२॥ श्रीचन्द्रप्रभके पूर्वभव । B2BQCAERASAL EMIGASES गीता। श्रीवर्म भूपति पालि पुहमी, स्वर्ग पहले सुर भयो । पुनि अजितसेन छखंडनायक, इंद्र अच्युतमैं थयौ । वर परम नाभिनरेश निर्जर, वैजयंति विमानमै । चंद्राभ स्वामी सातवें भव, भये पुरुषपुरानमैं ॥ ८३ ॥ 86363GRESS- १ रक्तकमल । २ सर्पराज । ३ सिंह । ४ चिन्ह-निशान । ५ ऋष- भदेवरूपी सूर्यने नाभिराजाके वशरूपी उदयाचल पर्वतके शिखरपर जन्म लिया । ६ 'भूधर' कविका भी नाम है । ७ पृथ्वी । 2050 ARSHES FORSEEBSFLESSERESERESssor ३४ जैनशतक । श्रीशान्तिनाथके पूर्वभव । कवित्त ( ३१ मात्रा) सिरीसेन आरज पुनि स्वर्गी, अमिततेज खेचरपद पाय । सुर रविचूल स्वर्ग आनतमैं, अपराजित बलभद्र कहाय ॥ अच्युतेंद्र वज्रायुध चक्री, फिर अहमिंद्र मेघरथराय । सरवारथासद्धेश शांतजिन, ये प्रभुकी द्वादश परजाय ।। ८४ ॥ नेमिनाथके पूर्वभव । छप्पय । PERBABASAHEBRBRBREASTHBERSPERS RESPE8.1 पहले भव वन भील, दुतिय अभिकेतु सेठघर । तीजे सुर सौधर्म, चौम चिन्तागति नभचर ।। पंचम चौथे स्वर्ग, छठें अपराजित राजा । अच्युतेंद्र सातय, अमरकुलतिलक विराजा ।। सुप्रतिष्ठराय आठम न, जन्म जयन्तविमान धर । फिर भये नेमि हरिवंशशशि, ये दशभव सुधि करहु नर॥ श्रीपार्श्वनाथके भवान्तर । कवित्त ( ३१ मात्रा)। विप्रपूत मरुभूत विचच्छन, वज्रघोष गज गैहन- मैंझार । सुर पुनि सहसरश्मि विद्याधर, अच्युतस्वर्ग अभैरि-भरतार | मैनुजइंद्र मध्यम ग्रैवेयिक, राजपुत्र १ चौथभवमे । २ वनमें ! ३ देवागनाओंका पति, इन्द्र । ४ राजा। SREE999606APERCOSARORESABPDPERMEROFREASHAGARARB0BREPAREneRent --- PSIBUPSIBILIBHIBBBBBBBER - कविवर भूधरदासविरचित- ३५ आनदकुमार । आनतेंद्र दश भव जिनवर, भये पास- प्रभुके अवतार ।। ८६ ॥ EDEREGenence GEGHEREGReenes राजा यशोधरके भवान्तर । मत्तगयंद सवैया। राय यशोधर चन्द्रमती, पहले भव मंडल मोर कहाये । जाहक सर्प नदीमध मच्छ, अजा अज भैंस अजा फिर जाये ।। फेरि भये कुकड़ा कुकड़ी, इन सात भातरमैं दुख पाये । चूनमई चरणायुध मारि, कथा सुन संत हिर्यै नरमाये ॥८७ ॥ , BeennenesecABARRERes सुबुद्धिसखीके प्रति वचन । मनहर कवित्त । कहै एक सखी स्यानी सुन री सुबुद्धि रानी, तेरौ पति दुखी देख लागै उर आर है। महा अपराधी एक पुग्गल है छहौं माहि, सोई दुख देत दीसै नाना परकार है ॥ कहत सुवुद्धि आली कहा दोष पुग्गल- को, अपनी ही भूल लाल होत आप ख्वार है । " खोटौ दाम आपनो सराफै कहा लगै वीर, " काहूको न दोष मेरौ भौंदू भरतार है ॥ ८८ ॥ BOSSIBPSSURBISPERHPENSFERS3888SPEN १ कुत्ता । २ मुर्गी । ३ मुर्गाको मारके-वलि चढाके । ४ शूल । BACA Sacramenaxhonerozeznatne जैनशतक । www ~~ eneREOSearcREPER गुजराती भाषामे शिक्षा। करिखा। ज्ञानमय रूप रूड़ो सदा सासतौ, ओळखै क्यों न सुखपिंड भोला । बेगळी देहथी नेह तूं शं करै, एहनी टेव जो मेह ओला ॥ 'मेरने मान भवदुक्ख पाम्याँ पंछी, चैन लोध्यो नैथी एक तोला । बळी दुख वृच्छनो वीज बाँव अने, आपथी आपनै आप बोला ||८९ ॥ द्रव्यलिंगी मुनि । मत्तगयंद सवैया। शीत सहैं तन धूप दहैं, तरुहेट रहैं करना उर आने । झूठ कहैं न अदत्त गहैं, वनिता न चहैं लैंप लोभ न जानें ॥ मौन वहैं पढि भेद लहैं, नहिं नेम जहैं व्रत रीति पिछाने । यौं निवहैं पर मोख नहीं, विन ज्ञान यहै जिन वीर वखानें ॥ ९० ॥ अनुभवप्रशसा । कवित्त मनहर। जीवन अलप आयु बुद्धि बल हीन तामैं, आगम BEST GBEREA 385एमरस १ सुन्दर । २ पहिचाने । ३ पृथक्-जुदी । ४ देहसे। ५ क्या । ६ मेरुके प्रमाण । ७ पाये । ८ पछि । ९ मिला । १० नहीं। ११ फिर। १२ वृक्षका । १३ वोता है । १४ और । १५ आपसे । १६ आपको । १७ वृक्षके नीचे । १८ जरा भी । १९ छोड़ते।

cseSUHUBSUP8888898 कविवर भूधरदासविरचित- ३७ है Be3e30Beee30seeee अगाधसिंधु कैसैं ताहि डॉक है । द्वादशांग मूल एक अनुभौ अपूर्व कला, भैवदाघहारी घनसौरकी सौक है। यह एक सीख लीजै याहीको अभ्यास कीजै, याको रस पीजै ऐसो वीरजिन-वॉक है । इतनो ही सार येही आतमको हितकार, यहीं लौं मदार और आगे इकढाक ।। ९१ ॥ भगवत्प्रार्थना। आगम अभ्यास होहु सेवा सरवग्य तेरी, संगति सदीय मिलौ साधरमी जनकी । सन्तनके गुनको बखान यह वान परौ, मैटौ टेव देव परऔगुनकथ- नकी ॥ सबहीसौं ऐन सुखदैन मुख वैन भाखों, भावना त्रिकाल राखौ आतमीक धनकी । जौलौं कर्म काट खोलौं मोक्षके कपाट तौलौ, ये ही बात हूजौ प्रभु पूजौ आस मनकी ॥ ९२ ।। LRA02ArtAS-ORCARBASORCAS LABRADOR 089r9z8sr889301ASTERS C0300c3SEEczcBeBREG36- १ पार पावेगा। २ संसाररूपी उष्णताको हरन करनेवाला। ३ चन्द नकी । ४ शलाका-सलाई । ५ वाक्य है-वचन है । ६ यथा- शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिर्सगति सर्वदायें: सवृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम् । सर्वस्यापि प्रियहितवचं भावना चात्मतत्त्वे सम्पद्यन्तां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्ग ॥ [नित्यपूजा] PREPARENERSEPEHEREBERREne UPERea8e3BABIREN जैनशतक । ३८ जिनधर्मप्रशंसा। दोहा। छये अनादि अज्ञानसौं, जगजीवनके नैन । सब मत मूठी धूलकी, अंजन है मत जैन ॥ ९३ ॥ मूल नदीके तिरनको, और जतन कछु है न । सब मत घाट कुघाट हैं, राजघाट है जैन ।। ९४ ॥ तीनभवनमैं भर रहे, थावर जंगम जीव । सब मत भच्छक देखिये, रच्छक जैन सीव ।।९५॥ इस अपार जगजलधिमैं, नहिं नहिं और इलाज । पाहनबाहन धर्म सब, जिनवरधर्म जिहाज ।। ९६ ॥ मिथ्यामतके मद छके, सव मतवाले लोय । सब मतवाले जानिये, जिनमत मत्त न होय ॥९७॥ मत-गुमानगिरि पर चढ़े, बड़े भये मनमाहिं । लघु देखें सब लोककौं, क्यों हूं उतरत नाहिं ।। ९८॥ चामचखनसौं सव मती, चितवत करत निबेर । ज्ञाननैनसौं जैन ही, जोर्वत इतनो फेर ॥ ९९ ॥ ज्यौं बजाज ढिग राखिकैं, पट परखै परवीन । त्यौं मतसौं मतकी परख, पाव पुरुष अमीन ॥१००॥ SPOPerenneCAPSereneRemenBPOROPeenepenarensesnnapcneREn १ पत्थरकी नावें। २ सब धर्मोवाले। ३ मदोन्मत्त-पागल। ४ धर्मक अभिमानरूपी पहाड़ पर। ५ चमड़ेके नेत्रोंसे-बाहिरी नजरसे। ६ देखते है । ७ पास पास रखके कपड़ोंकी जांच करता है।

JESUSERst कविवर भूधरदासविरचित- ३९ SEEG दोय पक्ष जिनमतविर्षे, नय निश्चय व्यवहार । तिन विन लहै न हर्स यह, शिवसरवरकी पार ।। सीझे सीझैं सीझ हैं, तीन लोक तिहुँकाल जिनमतको उपकार सब, जिन भ्रम करहु दयाल । महिमा जिनवर वचनकी, नहीं वचनबल होय । भुजवलसौं सागर अगम, तिरै न तीरहिं कोय१०३ अपने अपने पंथको, पोखै सकल जहान । तैसैं यह मतपोखना, मति समझौ मतिवान।।१०४॥ इस असार संसारमैं, और न सरन उपाय । जन्म जन्म हुजौ हमैं, जिनवरधर्म सहाय ॥ १०५ ।। कविका परिचय । कवित्त मनहर। आगरेमैं वालबुद्धि भूधर खंडेलवाल, वालकके ख्यालसौं कवित्त कर जाने है। ऐसे ही करत भयौ जैसिंघसवाई सूबा, हाकिम गुलाबचंद आये तिहि थाने है । हरीसिंघ साहके सुवंश धर्मरागी नर, तिनके कहेसौं जोरि कीनी एक ठान है । फिरि फिरि प्रेरे मेरे आलसको अंत भयौ, उनकी सहाय यह मेरो मन मान है।॥ १०६ ॥ MALALAEGZALAGA LEGALOZGLGLASAREA ARALASSEGEREA GREAGEER PRESPEmerenERBREASURE १ आत्मा । ९ मत करो। ३ ऐसी कविता करते करते आगरेमें सवाई जयसिंहका सूवा हुआ। Renama 9B STORE BEGORSEEBRITISE0* 383 जैनशतक । दोहा। सतरहसै इक्यासिया, पोहे पाख तमलीन । तिथि तेरस रविवारको, सतक समापत कीन।।१०७ समाप्तोऽय ग्रन्थः । ForoCAESBOSALASPBROA0673ansferenceCASA Ensacabroneeseen परिशिष्ट । १. तीसरे पद्यके समान आशयवाला संस्कृत श्लो..-- नो किश्चित्करकार्यमस्ति गमनप्राप्यं न किञ्चिदशो दृश्यं यस्य न कर्णयो किमपि हि श्रोतव्यमप्यस्ति न । तेनालम्वितपाणिरुज्झितगति लाग्रदृष्टी रह. संप्राप्नोति निराकुलो विजयते ध्यानकतानो जिनः॥२॥ २ छ। पद्यके समान आशयवालाः जयति जगदधीशः शान्तिनाथो जिनेन्द्रः स्मृतमपि हि जनानां पापतापोपशान्त्यै। विबुधकुलकिरीटप्रस्फुरनीलरत्न- द्युतिचलमधुपालीचुम्बितपादपद्मम् ॥ (दोनों पद्मनन्दिपंचविंशतिकासे) - SiemensRERESPERemsBRARBASIRSABPSABRER १ पूषके अंधेरे पाखमें। BREAK

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और हिन्दीके शुद्ध जैनग्रन्थोंक
मिलनेका ठिकाना:-
मैनजर-श्रीजैनग्रन्धरत्नाकरकार्यालय,
हीराबाग पो० गिरगांव (बम्बई.)

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जैन शतक

Author
दास, बहादुर
Title
??? ???
File name
जैन शतक
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2009/09
Publisher
जैन ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, बॉम्बे
Language
Sanskrit
Pages
48
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
DLI number
322496
Barcode
99999990253047.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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eAn83CdIZ6p
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