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बैंश सेवकों के संगमरण
विष्णु प्रभाकर
शास्तक्षित ग्रंथालय
ozofa ofertUR
बारमार्थ,वाराणसी
KNC
50547
प्रकाशकीय । अपने समय के छोटे-बडे अनेक देश-सेवको और सेविकाओ के विषय मै गाधीजी ने बहुत ही भावपूर्ण सस्मरण लिखे है। थोडे-से-थोडे शब्दो में उन्होने ऐसे चित्र खीचे हैं कि पढकर हृदय गद्गद् हो जाता है। कहीं-कही तो ऐमा जान पडता है, मानो हम कोई कविता पढ रहे हो। जब शब्द हृदय की गहराई में से उठकर आते है तब प्राय ऐसा ही होता है। गाधीजी के लिखे इन सस्मरणो का एक विस्तृत संग्रह मेरे समकालीन' के नाम से 'मडल' से प्रकाशित हो चुका है । प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री उसी- में से ली गई है । बडे सग्रह मे कुछ ऐसे व्यक्तियो के भी सस्मरण आ गये है, जो सौभाग्य से आज हमारे बीच विद्यमान है। इस पुस्तक में केवल दिवगतो मे से ही कुछ चुने हुए मस्मरण लिये गये है। इन सस्मरणो को पढकर पाठको को बहुत से देश-सेवको का परिचय मिलेगा, वह भी ऐसे महापुरुष की कलम से, जिसके स्वय के जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा मे ही व्यतीत हुआ था। वेसे तो इस पुस्तक को जो भी पढेगा, उसीको लाभ होगा, लेकिन युवको के लिए तो यह बहुत ही उपयोगी है। हमे आशा है, प्रत्येक शिक्षा-सस्था के छात्र और छात्राजो के हाथ में यह पुस्तक पहुचेगी और वे इससे देश-सेवा की शिक्षा ग्रहण करेंगे। -संत्री Accession No. restore geadtronis Shantarakstita Library Tibetan matrice Serreth प्रामुख । प्रसिद्ध गायक श्री दलीपकुमार राय मे बातचीत हुए सन् १९३५ में बाधीजी ने कहा था--"जीवन समस्त कला से श्रेष्ठ है। मै तो समझता हकि जो अच्छी तरह पीना जानता है वही मन्त्र कलाकार है। उत्तन जीवन की भूमिका के बिना का किन प्रकार दिन की ज सकती है। कला के मूकका आधार है जीवन को उतनालाई- ही पता है । माहिय को इ- दन्टि से कला ने अलग नहीं किया अन । पावन से इतना अटन्नध हो जाने के बाद व्द नितानमन्ल और सुगम हो जाता है। स्वाचित ऐजाहिदृष्टिन तकर नाधीन इन्ही श्री रागस कहा था, ' कान्य और वही साहित्य चिरञ्जीवी रहेगा जिसे लोग सुग- मना से न सकेगे, जिने वे आसानी से पचा सकेंगे” एस साहित्य का सृजन वही कर सकता है, जिसने साहित्य के विण्य से साक्षात्कार कर लिया है, अर्थन् जो उसे जीना है । इनीको गाधीजी की भारी का नमन कि जो अच्छी तरह जीना जानता है, वह माहित्यिक ई। इस दृष्टि में वह एक ऊचे साहित्यिक निदेह ह एक के नाते आगे नहीं आये, करन उन्होंने कभी कवि, गर या आलचर 27दकिया: परतु फिर भी हाक जीवनी-माहित्य, आत्मकथा, सन्दचत्र बोर मम्मादिक बध है, उनकी पूजी महज दी रह प्रथम श्रेणी में लेखको मेला देठाती है। उनकी जन्मकथा (अथवा सत्य के प्रयोग एक अर्व अथ है । वह मी दृष्टियो ने इन क्षेत्र में स्थापित सभी परपराको को खड-इट करनवारा क्रातिकारी पुस्तक है। उनके फोर-से-योर विरोधी उसकी महानता के? मुक्त कठ से स्वीकार करते है ! - • हिंदी नवजीदा, १०-२-२४ .. वस्तुत' गाधोजी नै सच्चे अर्थो मे 'आत्मकथा' लिखी है। जीवन मे यदि कुछ गोपनीय रह जाता है तो आत्मकथा अधूरी है। सत्य और अहिसा का परीक्षण करनेवाला वैज्ञानिक अधूरी आत्मकथा नही लिख सकता। जिस प्रकार उन्होने अपना विश्लेषण करते समय सत्य को नही छोडा है, उसी तरह दूसरो के बारे मे लिखते समय उन्होने अहिसा को अपना आधार बनाया है। इसलिए उनके साहित्य मे जहा उनकी पारदर्शिनी दृष्टि का चमत्कार है, बहा वह मानव के सहज सौदर्य सहानुभूति से भी आ'लावित है। जब कभी उन्होने किसीके बारे मे लिखने के लिए कलम उठाई है, अपनी सरल, सुबोध और सुगठित भाषा मे उस वर्ण्य व्यक्ति का बडा ही सहानुभूतिपूर्ण चित्र उतारकर रख दिया है। • वह कभी लिखने के लिए ही किसीका जीवन-वृत्त या सस्मरण लिखने बैठे हो, यह तो उनके लिए सभव नही था, परतु अपने बहुधधी सार्वजनिक जीवन में उन्हें असख्य छोटे और बड़े व्यक्तियों के सपर्क मे आना पड़ा था। केवल भारत ही नहीं, दक्षिण अफ्रीका में भी अनेकानेक देशी और विदेशी व्यक्तियो से उनका सबध रहा था। बहुतो से वह सबध अति प्रगाढ और आत्मीयता से छलकता हुआ था। बहुतो के साथ उन्होने अपने संघर्षमय जीवन के अनेक वर्ष बिताये थे। कुछ के साथ वह कुछ ही दिन रहे थे। उनमे अनेक उनसे बड़े थे, जिनसे उन्होने बहुत-कुछ सीखा था। बहुत-से उनसे प्रेरणा लेते थे और उन्हे अपना आराध्यदेव मानते थे। बहुत-से उनके विरोधी भी थे, जिनसे उन्हे टक्कर लेनी पडती थी। ऐसे भी लोग थे, जिनसे उनका कोई विशेष संबध तो नही था, पर किन्ही विशेष कारणो से गाधीजी को उन व्यक्तियो में रुचि थी। इसब व्यक्तियो में जाति, लिग, वर्ण या वर्ग का कोई भेद नही था। उनमे राजनीति के धुरधर पडित और साधारण स्वयंसेवक, धर्माचार्य और श्रद्धालु भक्त, सम्राट और सेवक, पूजीपति और मजदूर, विद्रोही और प्रतिक्रियावादी सभी थे। सभीके बारे में उन्होने समान भाव और समान रूप से लिखा है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, लिखने के ये अवसर कभी पूर्व योजना के अनुसार नहीं आये। उस बहुधधी व्यस्त जीवन मे न जाने कब किसपर लिखना पड़ जाय, यह कोई नही जानता था। फिर भी ऐसे अवसर बहुत आते थे और साधारणतया उनका वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है- १ गाधीजी अपने सहयोगियो, समाज के मूक सेवको या किसी रूप मे प्रख्यात व्यक्तियो की मृत्यु पर समवेदना और श्रद्धाजलि के रूप में लिखा करते थे। २. जब उनके सहकर्मियो और सहयोगियो पर आक्षेप होते थे, तब उनका निराकरण और समाधान करने के लिए उन्हे लिखना पडता था । ३. राष्ट्रीय महासभा के सभापति पद के लिए चुने जानेवाले व्यक्ति के बारे में चुनाव के पूर्व या पश्चात् वह कभी-कभी लिखते थे। ४ अपने आदोलनो में भाग लेनेवालो और उनके विरोधियो के विषय मे उन भादोलनो के दौरान मे वह लिखते थे। ५ 'आत्मकथा' और 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास आदि पुस्तको में तत्सबधी व्यक्तियो का वर्णन आया है। ६ अनेक व्यक्तियो के जन्म-दिन या जयती आदि के अवसर पर पत्रो को सदेश और शुभ कामना के रूप मे उन्होने लिखा है ७. कभी-कभी विशुद्ध सपादकीय कर्तव्य को निबाहने के लिए लिखना पडता था। ८ निजी पत्रो मे व्यक्तियो की चर्चा आ जाती थी। यदि उनके साहित्य का काल-क्रम से अध्ययन किया जाय तो एक बात ज्ञात होगी कि शुरू में वह व्यक्तियो के बारे में अधिक लिखते थे, परतु जैसे- जैसे समय बीतता गया, यह लेखन कम होता गया। जब से उन्होने 'हरिजन' पत्रो का प्रकाशन किया, तब से तो हरिजन-सेवको को छोडकर और किसी- के बारे मे वह उन पत्रो मे नही लिखने थे। इन पत्रो को छोडकर पुस्तक आदि लिखने का समय अब उनके पास नहीं रहा था। फिर भी इम सबध में गाधीजी के एक गुण की बात विशेष उल्लेखनीय है । वह सपर्क में आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति से, चाहे वह छोटा हो या बडा, विरोधी हो या सहयोगी, अधिक से- अधिक आत्मीयता स्थापित करने की चेष्टा करते थे। वह उसकी मानव-सुलभ भावनाओ को छूकर उससे बातें करते थे। सबसे पहले वह मानव थे और दूसरो को भी मानव समझते थे और यह सब था अहिंसा के कारण । इस दृष्टि से उनके सस्मरण अध्ययन की वस्तु है। a - ।
- -- जैसे वह सरल और सशक्त भाषा लिखने मे लासानी थे, वैसे ही वह शब्द चित्र खीचने में भी बहुत कुशल थे। एक तो अपने जीवन के प्रति निर्दिष्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण (सत्य) के कारण, दूसरे विभिन्न विचार और व्यवहार, के इतने अधिक व्यक्तियो के सपर्क में आने के तथा भागवता (अहिसा) में अपनी आस्था के कारण उनकी परख सही और खरी हो गई थी, और जन दृष्टि पारदर्शी हो जाती है, तो वर्णन स्वत ही सजीव और मामिव हो जाता है । वस्तुत किसी भी व्यक्ति का ठीक-ठीक विश्लेषण करने में उन्हें अद्भुत कुशलता प्राप्त थी। कम-से-कम और नपे-तुले सार्थक शब्दो में वह वर्ण व्यक्ति के अदर और बाहर का चित्र कागज पर उतारकर रख देते ।। कुल चित्र देखिये-- "सर फिरोजशाह तो मुझे हिमालय जैसे मालम हुए, लोकमान्य समुन की तरह । गोखले गगा की तरह । उसमे मै नहा सकता था। हिमालय पर चढना मुश्किल है, समुद्र मे डूबने का भय रहता है, पर गगा की गोदी मे खेत सकते है, उसमे डोगी पर चढकर तैर सकते है।" "शिष्य होना परम पवित्र, पर व्यक्तिगत भाव है। मैने १८८८ मे दादा- भाई के चरणो मे अपनेको समर्पित किया पर मेरे आदर्श से वह बहुत दूर थे। में उनके पुत्र के स्थान पर हो सकता था, उनका शागिर्द नहीं हो सकता था। शिष्य का दर्जा पुत्र से ऊचा है। शिष्य पुत्र-रूप से दूसरा जन्म ग्रहण करता है । शिष्य होना अपनी स्वकीय प्रेरणा से समर्पित करना है. जस्टिस रानडे से मुझे भय लगता था। उनके सामने मुझे बयान करने का भी साहस नही होता था। बदरुद्दीन तैयबजी पिता की तरह प्रतीत हुए। उन्होने मुझे सलाह दी कि फिरोजशाह मेहता और रानडे के परामर्श से काम करो। सर फिरोजशाह तो हमारे सरक्षक बन गये। इसलिए उनकी आज्ञा मुझे शिरोधाय थी। नो कुछ वह कहते, मै चुपचाप स्वीकार करता। वबई के उस दोर ने मुहं जाना- पालन का मर्म सिखाया। उन्होने मुझे अपना शागिर्द नहीं बनाया। जाने आजमाइश भी नही की।" "जिस समय मै उनसे (लोकमान्य तिलक से) मिला, वह अपने साथियो से घिरे बैठे थे। उन्होने मेरी बाते सुनी और कहा-'आपका भाषण सार्व- जनिक सभा में होना जरूरी है, पर आप जानते है कि यहा दल दी है ।
इससे ऐसा सभापति चाहिए जो किसी दल-विशेष कान हो। यदि इसके लिए आप डाक्टर भाडारकर से मिले तो उत्तम हो।' मैने उनकी सलाह स्वीकार की और लौट आया। सिवा इसके कि स्नेहमय मिलाप के भाव प्रदर्शित करके उन्होने मेरी घबराहट दूर की, नहीं तो लोकमान्य का उस समय मुझपर कोई अच्छा प्रभाव नही पडा । 'डाक्टर भाडारकर ने मेरा उसी तरह स्वागत किया, जिस तरह गुरु शिष्य का करता है। उनके चेहरे से विद्वत्ता टपक रही थी। मेरे हृदय मे श्रद्धा का ज्वार उमड आया, पर गुरु-भक्ति का भाव फिर भी न भरा । वह हृदय-सिहासन उस समय भी खाली रह गया। मुझे अनेक धीर-बीर मिले, पर राजा की पदवी तक कोई न पहुच सका।" "पर जिस समय मै श्रीयुत गोखले से मिलने गया, बाते एकदम बदल गई।" यह मिलन ठीक उसी प्रकार हुआ था, जैसे दो चिर-विछोही मित्रो या माता और पुत्र का होता है। उनकी नम्र आकृति देखकर मेरा हृदय शात हुआ। दक्षिण अफ्रीका तथा मेरे सबध मे उन्होने जिस तरह पूछताछ की, उससे मेरा हृदय श्रद्धा से भर गया। उनसे विदा होते समय मैने अपने दिल में कहा, 'बस, मेरे मन का आदमी मिल गया।' १९०१ मे दूसरी बार दक्षिण अफ्रीका से लौटा। इस बार मेरी घनिष्ठता और भी प्रगाढ हो गई । उन्होने हाथ में मेरा हाथ लेकर पूछना शुरू किया-'किस तरह रहते हो ? क्या कपडे पहनते हो? भोजन कैसा होता है ?' मेरी माता भी इतनी तत्पर नहीं थी। मेरे और उनके बीच मे कोई अतर नहीं था । यह चक्षुराग था, अर्थात् प्रथम दर्शन से ही हृदय मे प्रगाढ प्रेम का अकुर जम गया था।" इस उद्धरण मे गाधीजी ने भारत के तत्कालीन नेताओ का जो तुलना- त्मक चित्रण उपस्थित किया है, वह उनकी पारदर्शिनी दृष्टि, उनकी विश्लेषण- शक्ति, उनकी तीव्र और प्रखर अनुभूति को स्पष्ट करता है । गोखले के चित्र में कितनी आत्मीयता है, वह उनके अपने मानवता से छलकते हुए हृदय की झाकी है। श्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने जीवन-चरित मेगाधीजी के विचारों की अच्छी-खासी आलोचना की है, पर सबकुछ कहकर उन्होने लिखा ह- 'लेकिन वह अपने भारत को अच्छी तरह जाना है।" अनुभूति की तीव्रता और वास्तविकता का और भी सुदर चित्रण उनके सस्मरणो मे हुआ है। घटनाओ और वार्तालाप के द्वारा उन्होने वयं ...
व्यक्ति की बाहरी और आतरिक सुदरता-कुरूपता को याओं को इस प्रकार उभार दिया है कि इसके पूर्ण परिपाक के साथ-साथ व्यक्ति का ? चित्र हृदय पर पत्थर की लीक बन जाता है । कस्तूरबा गाधी, देवदर स घोषालबाबू तथा वास्ती देवी आदि के सस्मरण, इस दृष्टि से बहुत ही सुदर बने है । बासंती देवी का देशबधु की मृत्यु के बाद, जो चित्र गाधीजी ने खीचा है, वह बहुरा ही मानवीय, बहुत ही करुण और बहुत ही यथार्थ है। भावना को अतिरजना ने उस करुण चित्र को बहुत ही सशक्त बना दिया है। ये चित्र किसो उद्घोषित साहित्यिक के द्वारा नहीं लिख गये, बल्कि एक ऐसे मानव द्वारा लिखे गये है, जिसका समस्त जीवन जीने की कला के, सत्य के प्रयोग करने में बीता था, जिसन जीना सीखते-सीखते जिलाने (अहिंसा) को सीख लिया था, जो सबसे पहले और मबरो पीछे मात्र मनुष्य था और ऐसा मनुष्य ही मनुष्य को नही पहचानेगा तो कौन पहचानेगा। इस पुस्तक के सकलन मे जिन मान्य व प्रिय बधुओ ने मुझे सहायता दी है, उनका मैं हृदय से आभारी हू। --विष्णु प्रभाकर .
विषय-सूची ११ १८ २० २८ ३४ ४७ ५४ ६५ १. हकीम अजमल खा २. डा० मुख्तार अहमद अंसारी ३. बी अम्मा ४. धर्मानद कौसंबी ५. कस्तूरबा गाधी ६. मगनलाल खुशालचंद गाधी ७ गोपालकृष्ण गोखले ८. घोषालबाबू ९. अमृतलाल वी ठक्कर १०. रवीद्रनाथ ठाकुर ११. लोकमान्य तिलक १२. अब्बास तैयबजी १३. देशबंधु चित्तरजनदास १४. महादेव देसाई १५. सरोजिनी नायडू १६. मोतीलाल नेहरू १७. वल्लभभाई पटेल १८. जमनालाल बजाज १९. सुभाषचद्र बोस २०. मदनमोहन मालवीय २१. श्रीमद् राजचंद्रभाई २२. आचार्य सुशील रुद्र २३. लाला लाजपतराय २४. वासती देवी २५. स्वामी श्रद्धानंद २६. श्रीनिवास शास्त्री २७. नारायण हेमचन्द्र ११७ १२७ १३२ १४२ १४७ देश-सेवकों के संस्मरण हकीम अजमल खां एक जमाना था, शायद सन् '१५ की साल में, जब मै दिल्ली आया था, हकीम अजमल खां साहब से मिला और डाक्टर अंसारी से । मुझसे कहा गया कि हमारे दिल्ली के बादशाह अंग्रेज नहीं है, बल्कि ये हकीम साहब है । डाक्टर असारी तो बडे बुजुर्ग थे, बहुत बडे सर्जन थे, वैद्य थे। वह भी हकीमसाहब को जानते थे, उनके लिए उनके दिल मे बहुत कद्र थी। हकीमसाहब भी मुमल- मान थे, लेकिन वह तो बहुत बडे विद्वान् थे, हकीम थे । यूनानी हकीम थे, लेकिन आयुर्वेद का उन्होने कुछ अभ्यास किया था। जाके वहा हजारो मुसलमान आते थे और हजारो गरीब हिन्दू भी आते थे । साहूकार, धनिक मुसलमान और हिन्दू भी आते थे। एक दिन का एक हजार रुपया उनको देते थे। जहातक मै हकीम साहब को पहचानता था, उन्हे रुपये की नही पड़ी थी, लेकिन सबकी खिदमत की खातिर उनका पेशा था। वह तो बादशाह- जैसे थे। आखिर मे उनके बाप-दादा तो चीन मे रहते थे, चीन के मुसलमान थे, लेकिन बडे शरीफ थे। जितने हिंदू लोग मेरे पास आये, उनसे पूछा कि आपके सरदार यहां कौन है ? श्रद्धानंदजी? श्रद्धानदजी यहां बडा काम करते थे। लेकिन नहीं, दिल्ली के सरदार तो हकीमसाहब थे। क्यो थे ? क्योकि उन्होंने हिंदू- मुसलमान सबकी सेवा ही की। यह सन् '१५ के साल की बात मैने कही। लेकिन बाद में मेरा बहुत बढ़ गया और मैने उनको और पहचाना। १ प्रार्थना-प्रवचन, १३-९-४७ ताल्लुक उनसे 9 २२ देश-सेवक सस्मरण • वह हिंदुस्तान के हिंदू, मुसलमान, सिख, क्रिस्टो, पारसी, यहूदी सबके प्रिय थे। वह पदके मुसलमान थे, मगर वह इस खूबसूरत देश के रहनेवाले सब लोगो की समान सेवा करते थे। "हकीमसाहब के स्वर्गवास से देश का एक सबसे सच्चा सेवक उठ गया। हकीमसाहब की विभूतिया अनेक थी। बे महज कामिल हकीम ही नही थे, जो गरीबो और धनियो, सबके रोगो की दवा करता है। वह थे एक दरबारी देश-भक्त, यानी अगर्चे कि उनका वक्त राजो-महाराजो के साथ मे बीतता था, मगर थे वह पक्के प्रजावादी। वह बहुत बडे मुसलमान थे और उतने ही बडे हिंदुस्तानी थे। हिन्दू और मुसलमान दोनो से ही वह एक-सा प्रेम करते थे। बदले मे हिदू और मुसलमान दोनो ही एक समान उनसे मुहब्बत रखते थे, उनकी इज्जत करते थे। हिंदू-मुसलमान एकता पर वह जान देते थे। हमारे झगडो के कारण उनके अंतिम दिन कुछ दु.खजनक हो गये थे, मगर अपने देश और देश-बधुओं मे उनका विश्वास कभी नष्ट नहीं हुआ। उनका विचार था कि आखिर दोनो सम्प्रदायो को मेल करना ही पडेगा । यह अटल विश्वास लेकर उन्होने एकता के लिए प्रयत्न करना कभी नही छोड़ा। हालाकि उन्हे सोचने में कुछ समय लगा, लेकिन अत में वह असहयोग-आदोलन मे कूद ही पडे, अपनी प्रियतम और सबसे बड़ी कृति तिब्बी कालेज को खतरे में डालते वह झिझके नही। इस कालेज से उनका इतना प्रबल अनुराग था, जिसका अदाजा सिर्फ वे ही लगा सकते है, जो हकीमजी को भलीभाति जानते थे। हकीमजी के स्वर्गवास से मैने न सिर्फ एक बुद्धिमान और दृढ साथी ही खोया है, बल्कि एक ऐसा मित्र खोया है, जिसपर मैं आड़े अवसरो पर भरोसा कर सकता था। हिदू-मुसलिम एकता के बारे मे वह हमेशा ही मेरे रहबर थे । उनकी निर्णय-शक्ति, गंभीरता और मनुष्य-प्रकृति का ज्ञान ऐसे थे कि वह बहुत करके १ प्रार्थना-प्रवचन, २९-१२-४७ डा० मुख्तार अहमद अंसारी १६ सही फैसला ही किया करते थे। ऐसा आदमी कभी मरता नही है। यद्यपि उनका शरीर अब नही रहा, मगर उनकी भावना तो हमारे साथ बराबर रहेगी और वह अब भी हमे अपना कर्तव्य पूरा करने को बुला रही है। जबतक हम सच्ची हिदू-मुसलिम एकता पैदा नही कर लेते, उनकी याद बनाये रखने के लिए हमारा बनाया कोई स्मारक पूरा हुआ नही कहा जा सकता। परमात्मा ऐसा करे कि जो काम हम उनके जीते-जी नही कर सके, वह उनकी मौत से करना सीखे। हकीमजी कोरे स्वप्नदृष्टा ही नही थे। उन्हें विश्वास थः कि मेरा स्वप्न एक दिन पूरा होगा ही। जिस तरह तिब्बी कालेज के द्वारा उनका देशी चिकित्सा का स्वप्न फला, उसी तरह अपना राजनैतिक स्वप्न भी उन्होने जामिया मिलिया के जरिए, पूर करने की कोशिश की।' । २ डा० मुख्तार अहमद अंसारी डा० असारी जितने अच्छे मुसलमान है, उतने ही अच्छे भारतीय भी है। उनमे धर्मोन्माद की तो किसीने शंका ही नही की है। वर्षो तक वह एक साथ महासभा के सहमत्री रहे है। एकता के लिए किये गये उनके प्रयत्नो को तो सब कोई जानते है और सच्ची बात तो यह है कि अगर बेलगाव मे, कानपुर मे श्रीमती सरोजिनी नायडू और गोहाटी मे श्रीयुत श्रीनिवास आयगार मार्ग मे न आते तो इनमे से किसी भी अधिवेशन के अध्यक्ष डा. असारी ही चुने जाते, क्योकि जब ये चुनाव हो रहे थे तब उनका नाम प्रत्येक आदमी की जबान पर था, परतु कुछ खास कारणो से डा० असारी का हक आगे बढ़ा दिया गया और अब ज्ञात होतः १ हिंदी नवजीवन, ५-१-२८ देश-सेवको के संस्मरण है कि विधि ने उनके चुनाव को इसीलिए आगे ढकेल दिया है कि वे ऐसे मौके पर आवें जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत हो। अगर हिंदू-मुस्लिम एकता की कोई योजना दोनो पक्षो को ग्रहण करने योग्य मालूम हो तो नि.सदेह डा० अंसारी ही उसे महासभा के द्वारा कर ले जा सकते है। ... अकेली यही बात (सर्व-सम्मति से और हृदय से एक मुसलमान को अपना अध्यक्ष चुनना) हिंदुओ की ओर से इस बात का साफ प्रमाण होगा कि हिंदू एकता को दिल से चाहते है, और राष्ट्रीय विचारोवाले मुसलमानों मे डा० अंसारी की अपेक्षा साधारणतया मुसलमान जनता मे अधिक आदत कोई नही है। इसलिए मेरे खयाल से तो यही अच्छा है कि अगले साल के लिए डा० असारी ही राष्ट्रीय महासभा के कर्णधार हो, क्योकि केवल किसी योजना को मजूर कर लेना ही हमारे लिए काफी नही है । दोनो पक्षो द्वारा उसे मजूर कराने की बनिस्बत उसे कार्य में परिणत करना शायद कहीं अधिक जरूरी है। और यदि हम मान ले कि दोनो पक्षो का समाधान करनेवाली एक योजना मजूर हो भी गई तो उसपर अमल करते समय बराबर सावधानी की आवश्यकता होगी। डा० असारी ही ऐसे काम के लिए सबसे अधिक योग्य पुरुष है । इसलिए मैं आशा करता हु कि सभी प्रात एकमत से डा० असारी के नाम को ही उस सर्वोच्च सम्मान के लिए सूचित करेगे, जो कि राष्ट्रीय महासभा के आधीन है।' 'हरिजन' मे उन सब महान् पुरुषों की मृत्यु पर, जो इस संसार से सिधार जाते है, साधारणतया मै लिखता नही हूँ। 'हरिजन' एक विशेष प्रवृत्ति से सबध रखनेवाला पत्र है। आम तौर पर उन्ही व्यक्तियो के स्वर्गवास के विषय में इसमे लिखा जाता है जिनका कि हरिजन-कार्य के साथ विशेष रूप से संबध होता है। श्री कमला नेहरू के स्वर्गवास पर मैने 'हरिजन' मे जो १ हिंदी नवजीवन, २१-७-२७ डा० मुख्तार अहमद अंसारी नहीं लिखा उसमे मुझे खास तौर पर अपने ऊपर पाबंदी लगानी पड़ी। ऐसा करके मैने करीब-करीब अपने साथ जुल्म किया। मगर डा० अंसारी के स्वर्गवास पर मुझे कोई ऐसा आत्म-निग्रह करने की जरूरत नही । कारण यह है कि वे निस्संदेह हकीम अजमल खां की तरह ही हिंदू-मुस्लिम ऐक्य के एक प्रतिरूप थे। कडी- से-कड़ी परीक्षा के समय भी वह अपने विश्वास से कभी डिगे नहीं। वह एक पक्के मुसलमान थे। हजरत मुहम्मदसाहब की जिन लोगों ने जरूरत के वक्त मदद की थी, वे उनके वशज थे और उन्हें इस. बात का गर्व था। इस्लाम के प्रति उनमे जो दृढता थी और उसका उन्हें जो प्रगाढ ज्ञान था उस दृढता और उस ज्ञान ने ही उन्हें हिन्दू- मुस्लिम-ऐक्य में विश्वास करनेवाला बना दिया था। अगर यह कहा जाय कि जितने उनके मुसलमान मित्र थे उतने ही हिंदू मित्र थे तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। सारे हिंदुस्तान के काबिल- से काबिल डाक्टरो में उनका नाम लिया जाता था। किसी भी कौम का गरीब आदमी उनसे सलाह लेने जाय, उसके लिए बेरोक- टोक उनका दरवाजा खुला रहता था। उन्होंने राजा-महाराजाओं और अमीर घरानो से जो कमाया वह अपने जरूरतमद दोस्तों मे दोनो हाथो से खर्च किया। कोई उनसे कुछ मांगने गया तो कभी ऐसा नही हुआ कि वह उनकी जेब खाली किये बगैर लौटा हो, और उन्होने जो दिया उसका कभी हिसाब नहीं रखा। सैकडों पुरुषों और स्त्रियो के लिए वह एक भारी सहारा थे । मुझे इसमें तनिक भी सदेह नहीं कि सचमुच वह अनेक लोगो को रोते-बिलखते छोड गये है। उनकी पत्नी बेगमसाहिबातोज्ञानपरायणा है, यद्यपि वह हमेशा बीमार-सी रहती है। वह इतनी बहादुर है और इस्लाम पर उनकी इतनी ऊची श्रद्धा है कि उन्होने अपने प्रिय पति की मृत्यु पर एक आसू भी नही गिराया। पर जिन अनेक व्यक्तियों की मै याद करता हू वे ज्ञानी या फिलासफर नहीं हैं। ईश्वर मे तो उनका विश्वास हवाई है, पर डा० अंसारी मे उनका विश्वास जीवित विश्वास था। इसमें उनका कोई कसूर नही । डाक्टर- देश-सेवकों के सस्मरण साहब की मित्रता के उनके पास ऐसे अनेक प्रमाण थे कि इंश्वर ने जब उन्हें छोड़ दिया तब डाक्टरसाहब भी उनकी मदद तभी तक कर सके, जबतक कि सिरजनहार ने उन्हे ऐसा करने दिया। जित काम को वह जीवित अवस्था मे पूरा नही कर सके, ईश्वर करे, वह उनकी मृत्यु के बाद पूरा हो जाय ।' , बी अम्मा यह मानना मश्किल है कि बी अम्मा का दहात हो गया है। बी अम्मा की उम राजसी मूर्ति को या सार्वजनिक सनाओं में उन- की बुलंद आवाज को कौन नहीं जानता। बुढापाहोते हुए भी उन- में एक नवयुवक को शक्ति थी। खिलाफत और स्वराज्य के लिए उन्होंने अथक यात्राएं की। इस्लाम की कट्टर अनुयायिनी होते हुए भी उन्होने देख लिया था कि इस्लाम का कार्य, जहातक मनुष्य के बस की बात है, भारत की आजादी पर आधारित है। इसी निश्चय के साथ उन्होने यह भी महसूस कर लिया था कि हिदुस्तान की आजादी हिंदू-मुस्लिम-ऐक्य और खादी के बिना अराभव है । इसलिए वह अविराम एकता का प्रचार करती थी। यह उनके लिए एक अटल सिद्धात हो गया था। उन्होंने अपने तमाम विदेशी और मिल के कपड़ों का परित्याग कर दिया था और खादी इस्तेमाल करती थी। मौलाना मुहम्मदअली मुझसे कहते है कि बी अम्मा ने उन्हे यह हुक्म दे रखा था कि मेरे जनाजे पर सिवा खादी के और कुछ न होना चाहिए जब-जब मुझे उनके बिछौने के नजदीक जाने का सौभाग्य प्राप्त होता तब-तब वह स्वराज्य और एकता की बातें पूछती। उनके बाद ही प्रायः वह खुदाताला से दुआ करती-"या खुदा, हिंदुओं और मुसलमानों १ हरिजन सेवक, १६-५-३६ बी अम्मा १७ को ऐसी अक्ल बख्शे कि जिससे ये एकता की जरूरत को समझें और रहम करके स्वराज्य देखने के लिए मुझे जिदा रहने दे।" इस बहादुर और भद्र आत्मा की यादगार को बनाये रखने की सबसे अच्छी रीति यही है कि हम सर्व-सामान्य कार्यों के प्रति उनके उत्साह और उमंग का अनुकरण करें । हिदूधर्म भी बिना स्वराज्य के उतना ही सकट में है जितना कि इस्लाम । परमात्मा करे कि हिदुओ और मुसलमानो को इस प्रारभिक बात की कदर करने की बी अम्मा-जैसी बुद्धि दे। परमात्मा उनकी आत्मा को शांति और अली भाइयो को उनके सौपे कार्य को जारी रखने की शक्ति दे। बी अम्मा की मृत्यु की रात के उस गभीर और प्रभावकारी दृश्य का वर्णन किये बिना मै नहीं रह सकता। उस समय मुझे उनके पास ही रहने का सद्भाग्य प्राप्त हुआ था। यह सुनते ही कि अब वह अपने जीवन की अतिम सासे ले रही है मै और सरोजिनीदेवी । उनके कुटुब के कितने ही लोग आस-पास जमा थे। उनके डाक्टर और हितचितक डा० असारी भी मौजूद थे। वहां रोने की आवाज नही सुनाई देती थी, अलबत्ते मौ० मुहम्मदअली के गालो पर से आसू जरूर टपक रहे थे। बड़े भाई ने बडी कठिनाई से अपने शोकावेग को रोक रखा था। हा, उनके चेहरे पर एक असाधारण गंभीरता अलबत्ते थी। सब लोग अल्ला का नामोच्चार कर रहे थे । एक सज्जन अंत समय की प्रार्थना गा रहे थे। 'कामरेड प्रेस' बी अम्मा के कमरे के इतना पास है कि आवाज सुनाई दे सकती है। परतु एक मिनिट के लिए वहा के काम मे गडबड नही हुई और न मौलाना ने ही अपने सपादकीय कर्तव्यों मे रुकावट आने दी। और सार्वजनिक काम तो कोई भी मुल्तवी नहीं किया गया । मौलाना शौकतअली ने तो सपने तक मे न सोचा था कि मै अपना रामजस कालेज जाना मुल्तवी करूगा। वह एक सच्चे सिपाही की तरह मुजफ्फरनगर के हिंदुओं को दिये गये निश्चित समय पर उनसे मिले, हालाकि वहा दौड़े गये - १८ देश-सेवकों के संस्मरण बी अम्मा की मृत्यु के बाद उन्हें तुरत ही वहा से चला जाना पड़ा था। यह सब जैसाकि होना चाहिए था, वैसा ही हुआ। जन्म और मरण ये दो भिन्न-भिन्न दशाए नहीं है, बल्कि एक ही दशा के दो भिन्न-भिन्न स्वरूप है। न मृत्यु से दुखी होने की जरूरत है, न जन्म से खुशी मनाने की। धर्मानंद कोसंबी शायद आपने उनका नाम नही सुना होगा। इसलिए शायद आप दु ख मानना नही चाहेगे । वैसे किसी मृत्यु पर हमे दुख मानना चाहिए भी नही, लेकिन इसान का स्वभाव है कि वह अपने स्नेही या पूज्य के मरने पर दुख मानता ही है। हम लोग ऐसे बने है कि जो अपने काम की डुग्गी पिटवाता फिरता है और राज्य- कारण मे उछाले भरता है, उसको तो हम आसमान पर चढा देते है, लेकिन मूक काम करनेवालो को नही पूछते । कौसबीजी ऐसे ही एक मूक कार्यकर्ता थे। उनका जन्म गोवा मे हुआ था। जन्म से वह हिदू थे, पर उनको ऐसा विश्वास बैठ गया था कि बौद्ध धर्म मे अहिसा, शील आदि जितने बढे-चढे है, उतने दूसरे धर्म मे, वेद-धर्म मे भी, नही है । इसलिए उन्होने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और बौद्ध शास्त्रो के अध्ययन मे लग गये और उसमे इतने बडे विद्वान हो गये कि शायद ही हिदुस्तान मे उनकी बराबरी का और कोई हो । उन्होन गुजरात विद्यापीठ व काशी विद्यापीठ मे पाली भाषा पढाई और अपनी अगाध विद्वत्ता का ज्ञान-दान किया था। उन्होने मेरे पास १०००) भेज दिये, जो किसीने उनको उन्होने मुझको लिखा था कि किसी- दिये थे । ' हिंदी नवजीवन, २३-११-२४ धर्मानंद कौसंबी १९ को पाली पढने के लिए लका भेज देना । लेकिन मैने उनसे पूछा कि क्या लका जाकर पढने से किसीको बौद्ध धर्म प्राप्त हो जायगा? मैने तो दुनिया मे बौद्धो से कहा है कि आपको अगर बौद्ध धर्म जानना है तो आप उसके जन्म-स्थान भारत मे ही उसे पायेगे। जहापर वेद-धर्म से वह निकला है, वही आपको उसे खोजना है और शकराचार्य-जैसे अद्वितीय विद्वान्, जो प्रच्छन्न बुद्ध कहलाये, उनके ग्रथो को भी आप समझेगे तब बौद्ध धर्म का गूढ रहस्य आप जान पायेगे। लेकिन कौसबीजी की विद्वत्ता से मै अपनी तुलना नही कर सकता । मै तो इग्लैंड मे भोज खाकर बना हुआ बैरिस्टर हू। मेरे पास सस्कृत का ज्ञान जरा-सा है। अगर आज मै महात्मा बना तो इसलिए नही कि अग्रेजी का बैरिस्टर हू, पर इसलिए कि मैने सेवा की है और वह सेवा, सत्य और अहिसा के द्वारा की है । इस सत्य और अहिसा की पूजा मे जो थोडी-सी सफलता मुझे मिलती चली गई उसीके कारण आज मेरी थोडी-बहुत पूछ है। कौसबीजी की मे यह समा गया कि अब यह शरीर अधिक काम करने के योग्य नही रहा है तो उन्होने अन- शन करके प्राण-त्याग करने की ठानी। टडनजी के कहने पर मैने उनका अनशन उनकी (कौसबीजी की) अनिच्छा से छुडवाया, पर उनका हाजमा बहुत खराब हो चुका था और कुछ भी खुराक ले ही नही सकते थे। तब दुबारा सेवाग्राम मे चालीस दिन तक केवल जल पर ही रहकर उन्होने शरीरात किया । बीमारी मे नाममात्र की सेवा और औषधि भी नही ली। जन्म- स्थान गोवा मे जाने का मोह भी उन्होने तजा और अपने पुत्र आदि को अपने पास न आने की आज्ञा दी । मृत्यु के बाद के लिए कह गये, मेरा कोई स्मारक न बनाया जाय । शरीर को जलाने या दफनाने मे जो सस्ता पडे वह किया जाय और इस तरह उन्होने बुद्ध का नाम रटते-रटते अतिम गहरी निद्रा ली, जो हरेक जन्मनेवाले को कभी-न-कभी लेनी ही है। मृत्यु हरेक का समझ २० देश-सेवकों के संस्मरण परम मित्र है, वह अपने कर्म के अनुसार आवेगा ही। भले ही कोई यह बता दे कि अमुक का जन्म अमुक समय होगा, पर मौत कब आवेगी, यह कोई भी आज तक नहीं बता पाया है। प्रोफेसर कौसबीजी जो बडे विद्वान थे और पाली भाषा मे अग्रगण्य माने जाते थे, वह सेवाग्राम-आश्रम मे चल बसे । उनके बारे मे वहा के सचालक बलवतसिह का पत्र है, जिसमे कहा गया है कि ऐसी मृत्यु आज तक मैने नही देखी । यह तो बिल्कुल ऐसी, हुई जैसी कबीरजी ने बताई है। दास कबीर जतन सों ओढ़ी। ज्यो-की-त्यों धर दीनी चदरिया । इस तरह हम सभी लोग मृत्यु की मैत्री साध ले तो हिन्दुस्तान का भला ही होने वाला है। कस्तूरबा गांधी । हम तेरह वर्ष की उम्र में मेरा विवाह हो गया। .. ..दो मासूम बच्चे अनजाने ससार-सागर मे कूद पडे दोनो एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा खयाल आता है। एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही। धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे। बोलने लगे। हम दोनों हम-उम्र थे, पर मैने पति का अधिकार जताना शुरू कर दिया।... कस्तूरबाई निरक्षर थी । स्वभाव उनका सरल और स्वतत्र था। वह परिश्रमी भी थी; पर मेरे साथ कम बोला करती। अपने अज्ञान पर उन्हे असतोष न था। अपने बचपन मे मैने कभी उनकी ऐसी इच्छा नहीं देखी कि 'वह पढते है तो मै भी पढ़ ।' उन्हे १ प्रार्थना-प्रवचन, ५-६-४७ । प्रार्थना-प्रवचन, ८-६-४७ कस्तूरबा गांधी २१ .. पढाने की मुझे बडी चाह थी। पढाने की जितनी कोशिशे की वे सब प्राय. बेकार गई । शिक्षक रखकर पढाने के मेरे यत्न भी विफल हुए। इसके फलस्वरूप कस्तूरबाई मामूली चिट्ठी-पत्री व गुजराती लिखने-पढने से अधिक साक्षर न हो पाई। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह की लडाई के काम से मुक्त होने के बाद मैने सोचा कि अब मेरा काम दक्षिण अफ्रीका मे नहीं, बल्कि देश मे है । दक्षिण अफ्रीका मे बैठे-बैठे मै कुछ-न-कुछ सेवा तो जरूर कर पाता था, परतु मैने देखा कि यहा कही मेरा मुख्य काम धन कमाना ही न हो जाय । देश से मित्र लोग भी देश लौट आने को आकर्षित कर रहे थे। मुझे भी जचा कि देश जाने से मेरा अधिक उपयोग हो सकेगा। मैने साथियो से छुट्टी देने का अनुरोध किया। बड़ी मुश्किल से उन्होने एक शर्त पर छुट्टी स्वीकार की। वह यह कि एक साल के अदर लोगो को मेरी जरूरत मालूम हो तो मै फिर दक्षिण अफ्रीका आ जाऊगा। मुझे यह शर्त कठिन मालूम हुई, परतु मै तो प्रेम-पाश में बधा हुआ था। मित्रो की बात को टाल नही सकता था। मैने वचन दिया। इजाजत मिली। इस समय मेरा निकट-सबध प्राय. नेटाल के ही साथ था। नेटाल के हिदुस्तानियो ने मुझे प्रेमामृत से नहला डाला । स्थान- स्थान पर अभिनदन-पत्र दिये गये और हरेक जगह से कीमती चीजे नजर की गई। १८९६ मे जब मै देश आया था तब भी भेटे मिली थी; पर इस बार की भेटो और सभाओ के दृश्यो से मै घबराया। भेट में सोने-चांदी की चीजे तो थी ही; पर हीरे की चीजे भी थी। इनसब चीजो को स्वीकार करने का मुझे क्या अधिकार हो सकता है ? यदि मै इन्हे मजूर कर लू तो फिर अपने मन को यह कहकर कैसे मना सकती हूं कि मै पैसा लेकर लोगो की सेवा नहीं करता था ? मेरे मवक्किलो की कुछ रकमो को लोटकर जाने २२ देश-सेवकों के सस्मरण सब चीजे मेरी लोक-सेवा के ही उपलक्ष मे दी गई थी। पर मेरे मन मे तो मवक्किल और दूसरे साथियो मे कुछ भेद न था। मुख्य- मुख्य मवक्किल सब सार्वजनिक काम मे भी सहायता देते थे। फिर उन भेटो मे एक पचास गिनी का हार कस्तूरबाई के लिए था। मगर उसे जो चीज मिली वह भी थी तो मेरी ही सेवा के उपलक्ष मे । अतएव उसे पृथक नही मान सकते थे। जिस शाम को इनमे से मुख्य-मुख्य भेटे मिली, वह रात मैने एक पागल की तरह जागकर काटी। कमरे मे यहा-से-वहा टहलता रहा, परतु गुत्थी किसी तरह सुलझती न थी।सैकडो रुपयो की भेटे न लेना भारी पड़ रहा था, पर ले लेना उससे भी भारी मालूम होता था। मै चाहे इन भेटो को पचा भी सकता, पर मेरे बालक और पत्नी ? उन्हे तालीम तो सेवा की मिल रही थी। सेवा का दाम नही लिया जा सकता था, यह हमेशा समझाया जाता था। घर मे कीमती जेवर आदि मै नही रखता था। सादगी बढती जाती थी। ऐसी अवस्था मे सोने की घडिया कौन रखेगा? सोने की कठी और हीरे की अगूठिया कौन पहनेगा? गहनो का मोह छोडने के लिए मै उस समय भी औरो से कहता रहता था। अब इन गहनो और जवाहरात को लेकर मै क्या करूगा? मै इस निर्णय पर पहुचा कि वे चीजे मै हरगिज नही रख सकता। पारसी रुस्तमजी इत्यादि को इन गहनो का ट्रस्टी बना- कर उनके नाम एक चिट्ठी तैयार की और सुबह स्त्री-पुत्रादि से सलाह करके अपना बोझ हलका करने का निश्चय किया। मै जानता था कि धर्मपत्नी को समझाना मुश्किल पडेगा। मुझे विश्वास था कि बालको को समझाने मे जरा भी दिक्कत पेश न आवेगी। अत उन्हे वकील बनाने का विचार किया। बच्चे तो तुरत समझ गये । वे बोले, "हमे इन गहनो से कुछ मतलब नही। ये सब चीजे हमे लौटा देनी चाहिए और यदि जरूरत होगी तो क्या हम खुद नही बना सकेगे?"
कस्तूरबा गांधी २३ ? मै प्रसन्न हुआ। “तो तुम बा को समझाओगे न?" मैने पूछा। "जरूर-जरूर। वह कहा इन गहनो को पहनने चली है । वह रखना चाहेगी भी तो हमारे ही लिए न? पर जब हमे ही इनकी जरूरत नही है तब फिर वह क्यो जिद करने लगी?" परतु काम अदाज से ज्यादा मुश्किल साबित हुआ । "तुम्हे चाहे जरूरत न हो और लडको को भी न हो। बच्चो का क्या? जैसा समझा दे, समझ जाते है। मुझे न पहनने दो, पर मेरी बहुओ को तो जरूरत होगी। और कौन कह सकता है कि कल क्या होगा? जो चीजे लोगो ने इतने प्रेम से दी है उन्हे वापस लौटाना ठीक नही।" इस प्रकार वाग्धारा शुरू हुई और उसके साथ अश्रु- • धारा आ मिली। लडके दृढ रहे और मै भला क्यो डिगने लगा मैने धीरे से-कहा, "पहले लडको की शादी तो हो लेने दो। हम बचपन मे तो इनके विवाह करना चाहते ही नही है । बडे होने पर जो इनका जी चाहे सो करे । फिर हमे क्या गहनो-कपडो की शौकीन बहुए खोजनी है ? फिर भी अगर कुछ बनवाना ही होगा तो मै कहा चला गया हू "हा, जानती हू तुमको । वही न हो, जिन्होने मेरे भी गहने उतरवा लिये है | जब मुझे ही नही पहनने देते हो तो मेरी बहुओ को जरूर ला दोगे | लड़को को तो अभी से वैरागी बना रहे हो इन गहनो को मै वापस नही देने दूगी और फिर मेरे हार पर तुम्हारा क्या हक है ?" "पर यह हार तुम्हारी सेवा की खातिर मिला है या मेरी ?" ?" मैने पूछा। . "जैसा भी हो, तुम्हारी सेवा मे क्या मेरी सेवा नही है ? मुझ- से जो रात-दिन मजूरी कराते हो, क्या वह सेवा नही है ? मुझे रुला-रुलाकर जो ऐरे-गैरो को घर मे रखा और मुझसे सेवा- टहल कराई, वह कुछ भी नही ?" ये सब बाण तीखे थे। कितने ही तो मुझे चुभ रहे थे। पर गहने देश-सेवकों के संस्मरण -- वापस लौटाने का मै निश्चय कर चुका था। अंत मे बहुतेरी बातों मे मै जैसे-तैसे सम्मति प्राप्त कर सका। . . . जिस समय डरबन मे मै वकालत करता था, उस समय बहुत बार मेरे कारकुन मेरे साथ ही रहते थे। वे हिदू और ईसाई होते थे, अथवा प्रातो के हिसाब से कहे तो गुजराती और मद्रासी । मुझे याद नही आता कि कभी उनके विषय मे मेरे मन मे भेद-भाव पैदा हुआ हो। मै उन्हे बिल्कुल घर के ही जैसा समझता और उसमे मेरी धर्मपत्नी की ओर से यदि कोई विघ्न उपस्थित होता तो मै उससे लडता था। मेरा एक कारकुन ईसाई था। उसके मा-बाप पचम जाति के थे। हमारे घर की बनावट पश्चिमी ढग की थी। इस कारण कमरे मे मोरी नही होती थी और न होनी चाहिए थी, ऐसा. मेरा मत है। इस कारण कमरोमे मोरियो की जगह पेशाब के लिए एक अलग बर्तन होता था। उसे उठाकर रखने का काम हम दोनो- दपती का था, नौकरो का नही। हा, जो कारकुन लोग अपने को हमारा कुटबी-सा मानने लगते थे वे तो खुद ही उसे साफ कर डालते थे, लेकिन पचम जाति मे जन्मा यह कारकुन नया था। उसका बर्तन हमे ही उठाकर साफ करना चाहिए था। दूसरे बर्तन तो कस्तूरबाई उठाकर साफ कर देती, लेकिन इन भाई का बर्तन उठाना उसे असह्य मालूम हुआ। इससे हम दोनो मे झगडा मचा। यदि मै उठाता है तो उसे अच्छा नही मालूम होता था और खुद उसके लिए उठाना कठिन था। फिर भी आखो से मोती की बूदे टपक रही है, एक हाथ मे बर्तन लिये अपनी लाल-लाल आंखो से उलहना देती हुई कस्तूरबाई सीढियो से उतर रही है, वह चित्र में आज भी ज्यो-का-त्यो खीच सकता हूं। परतु मै जैसा सहृदय और प्रेमी पति था वैसा ही निष्ठुर और कठोर भी था। मै अपनेको उसका शिक्षक मानता था। इस- अपने अंधप्रेम के अधीन हो मै उसे खूब सताता था। इस कारण महज उसके बर्तन उठा ले जाने-भर से मुझे सतोष न हुआ। मैने यह भी चाहा कि वह हँसते और हरखते हुए उसे ले जाय । इसलिए कस्तूरबा गांधी २५ मैने उसे डांटा-डपटा भी। मैने उत्तेजित होकर कहा--"देखो, यह बखेडा मेरे घर मे नही चल सकेगा।" मेरा यह बोल कस्तूरबाई को तीर की तरह लगा। उसने धधकते दिल से कहा, "तो लो, रखो यह अपना घर ! मै चली।" ? उस समय मै ईश्वर को भूल गया था। दया का लेशमात्र मेरे हृदय मे न रह गया था।मैने उसका हाथ पकडा। सीढी के सामने ही बाहर जाने का दरवाजा था। मै उस दीन अबला का हाथ पकड़ कर दरवाजे तक खीचकर ले गया। दरवाजा आधा खोला होगा कि आखो मे गगा-जमुना बहाती हुई कस्तूरबाई बोली, "तुम्हे तो कुछ शरम है नही, पर मुझे है। जरा तो लजाओ।मै बाहर निकल- कर आखिर जाऊ कहा मा-बाप भी यहा नही कि उनके पास चली जाऊ । मै ठहरी स्त्री-जाति ! इसलिए मुझे तुम्हारी धौस सहनी ही पडेगी। अब जरा शरम करो और दरवाजा बद कर लो। कोई देख लेगा तो दोनो की फजीहत होगी।" मैने अपना चेहरा तो सुर्ख बनाये रखा, पर मन मे शरमा जरूर गया। दरवाजा बद कर दिया। जबकि पत्नी मुझे छोड़ नही सकती थी तब मै भी उसे छोड़कर कहा जा सकता था? इस तरह हमारे आपस में लड़ाई-झगड़े कई बार हुए है, परतु उनका परि- णाम सदा अच्छा ही निकला है। उनमें पत्नी ने अपनी अद्भुत सहनशीलता के द्वारा मुझपर विजय प्राप्त की। यह घटना १८९८ की है । उस समय मुझे ब्रह्मचर्य-पालन के विषय मे कुछ ज्ञान न था। वह समय ऐसा था जबकि मुझे इस बात का स्पष्ट ज्ञान न था कि पत्नी तो केवल सहधर्मिणी, सहचारिणी और सुख-दुख की साथिन है । मै यह समझकर बर्ताव करता था कि पत्नी विषय-भोग की भाजन है, उसका जन्म पति की हर तरह की आज्ञाओ का पालन करने के लिए हुआ है। कितु १९०० ई० से मेरे इन विचारो मे गहरा परिवर्तन .
२ देश-सेवकों के संस्मरण हुआ। १९०६ मे उसका परिणाम प्रकट हुआ, परतु इसका वर्णन आगे प्रसग आने पर होगा। यहा तो सिर्फ इतना बताना काफी है कि ज्यो-ज्यो मै निर्विकार होता गया त्यो-त्यो मेरा घर-ससार शात, निर्मल और सुखी होता गया। बा का जबरदस्त गुण महज अपनी इच्छा से मुझमे समा जाने का था। यह कुछ मेरे आग्रह से नहीं हुआ था। लेकिन समय पाकर बा के अदर ही इस गुण का विकास हो गया था। मैं नहीं जानता था कि बा मे यह गुण छिपा हुआ था। मेरे शुरू-शुरू के अनुभव के अनु- सार बा बहुत हठीली थी। मेरे दबाव डालने पर भी वह अपना चाहा ही करती। इसके कारण हमारे बी व थोडे समय की या लबी कड वाहट भी रहती, लेकिन जैसे-जैसे मेरा सार्वजनिक जीवन उज्ज्वल बनता गया, वैसे-वैसे बा खिलती गई और पुख्ता विचारो के साथ मुझमे यानी मेरे काम मे समाती गई । जैसे दिन बीतते गये, मुझमे और मेरे काम मे-सेवा मे-भेद न रह गया। बा धीमे-धीमे उसमे तदाकार होने लगी। शायद हिदुस्तान की भूमि को यह गुण अधिक-से-अधिक प्रिय है । कुछ भी हो, मुझे तो बा की उक्त भावना का यह मुख्य कारण मालूम होता है। बामे यह गुण पराकाष्ठा को पहुचा, इसका कारण हमारा ब्रह्मचर्य था। मेरी अपेक्षा बा के लिए वह बहुत ज्यादा स्वाभाविक सिद्ध हुआ। शुरू मे बा को इसका कोई ज्ञान भी न था। मैने विचार किया और बा ने उसको उठाकर अपना बना लिया। परिणाम- स्वरूप हमारा सबध सच्चे मित्र का बना। मेरे साथ रहने मे बाके लिए सन् १९०६ से, असल मे सन् १९०१ से, मेरे काम मे शरीक हो जाने के सिवा या उससे भिन्न और कुछ रह ही नहीं गया था। वह अलग रह नहीं सकती थीं । अलग रहने मे उन्हें कोई दिक्कत न होती, लेकिन उन्होने मित्र बनने पर भी स्त्री के नाते और पत्नी के नाते मेरे काम मे समा जाने मे ही अपना धर्म माना। इसमे बाने आत्मकया,१९२७ १ कस्तूरबा गांधी २७ मेरी निजी सेवा को अनिवार्य स्थान दिया। इसलिए मरते दम तक उन्होने मेरी सुविधा की देखरेख का काम छोडा ही नही । अगर में अपनी पत्नी के बारे मे अपने प्रेम और अपनी भावना का वर्णन कर सकू तो हिदूधर्म के बारे मे अपने प्रेम और अपनी भावनाओ को मै प्रकट कर सकता हूँ । दुनिया की दूसरी किसी भी स्त्री के मुकाबिले मे मेरी पत्नी मुझपर ज्यादा असर डालती है। यद्यपि अपनी मृत्यु के कारण वह सतत वेदना से छूट गई है, इसलिए उनकी दृष्टि से मैने उनकी मौत का स्वागत किया है, तो भी इस क्षति से मुझको जितना दुख होने की कल्पना मैने की थी उससे अधिक दुख हुआ है। हम असाधारण दपती थे। १९०६ मे एक दूसरे की स्वीकृति से और अनजानी आजमाइश के बाद हमने आत्म-सयम के नियम को निश्चित रूप से स्वीकार किया था। इसके परिणामस्वरूप हमारी गाठ पहले से कही ज्यादा मजबूत बनी और मुझे उससे बहुत आनद हुआ। हम दो भिन्न व्यक्ति नहीं रह गये। मेरी वैसी कोई अच्छा नही थी, तो भी उन्होने मुझमे लीन होना पसद किया । फलत वह सचमुच ही मेरी अर्धागिनी बनी। वह हमेशा से बहुत दृढ इच्छा-शक्तिवाली स्त्री थी, जिनको अपनी नवविवाहित दशा मे मै भूल से हठीली माना करता था, लेकिन अपनी दृढ इच्छा-शक्ति के कारण वह अनजाने ही अहिसक अस- योग की कला के आचरण मे मेरी गुरु बन गई। आचरण का आरभ मेरे अपने परिवार से ही किया। १९०६ मे जब मैने उसे राजनीति के क्षेत्र मे दाखिल किया तब उसका अधिक विशाल और विशेष रूप से योजित 'सत्याग्रह नाम पडा । दक्षिण अफ्रीका मे जब हिदु- स्तानियो की जेल-यात्रा शुरू हुई तब बा भी सत्याग्रहियो मे एक थी। मेरे मुकाबिले शारीरिक पीडा उनको ज्यादा हुई। वह कई बार जेल जा चुकी थी, फिर भी इस बार के इस कैद- खाने मे, जिसमे सभी तरह की सहूलियते मौजूद थी, उनको अच्छा नही लगा। दूसरे बहुतो के साथ मेरी और फिर तुरत ही उनकी जो गिरफ्तारी हुई, उससे उन्हे जोर का आघात पहुचा और उनका २८ देश-सेवकों के संस्मरण मन खट्टा हो गया। वह मेरी गिरफ्तारी के लिए बिल्कुल तैयार नही थी। मैने उन्हे विश्वास दिलाया था कि सरकार को मेरी अहिसा पर भरोसा है और जबतक मै खुद गिरफ्तार होना न चाहूं वह मुझे पकडेगी नही । सचमुच उनके ज्ञानततुओ को इतने जोर का धक्का बैठा कि उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हे दस्त की सख्त शिकायत हो गई। अगर उस समय डा० सुशीला नैयर ने, जो उनके साथ ही पकड़ी गई थी, उनका इलाज न किया होता तो मुझसे इस जेल मे आकर मिलने से पहले ही उनकी देह छूट चुकी होती। मेरी हाजिरी से उन्हे आश्वासन मिला और बिना किसी खास इलाज के दस्त की शिकायत दूर हो गई। लेकिन मन जो खट्टा हुआ था, सो खट्टा ही बना रहा। इसकी वजह से उनके स्वभाव. मे चिड़चिड़ापन आ गया और इसीका नतीजा था कि आखिर कष्ट सहते-सहत क्रम-क्रम से उनका देहपात हुआ। उनमे एक गुण बहुत बड़ा था ।हर एक हिदू-पत्नी मे वह कमोबेश होता ही है। इच्छा से या अनिच्छा से अथवा जाने-अन- जाने भी वह मेरे पदचिह्नो पर चलने मे धन्यता अनुभव करती थी।... अगरचे मै चाहता था कि उस तीव्र वेदना से उन्हे छुटकारा मिले और जल्दी ही उनकी देह का अत हो जाय तो भी आज उनकी कमी को जितना मैने माना था, उससे कही अधिक मै महसूस कर रहा हूं। हम असाधारण दंपती थे-अनोखे । हमारा जीवन सतोषी, सुखी और सदा ऊर्ध्वगामी था ।' मगनलाल खुशालचंद गांधी मेरे चाचा के पोते मगनलाल खुशालचद गांधी मेरे कामों १ 'हमारी बा', पृ० २२ २ 'हमारी बा', १८-२-४५ . मगनलाल खुशालचंद गांधी २९ मे मेरे साथ सन् १९०४ से ही थे। मगनलाल के पिता ने अपने सभी पुत्रो को देश के काम मे दे दिया है। वह इस महीने के शुरू में सेठ जमनालालजी तथा दूसरे मित्रो के साथ बगाल गये थे, वहा से बिहार आये। वही पर अपने कर्तव्य के पालन मेही उन्हे कठिन ज्वर हो आया। नौ दिन की बीमारी के बाद प्रेम और डाक्टरी ज्ञान से जितनी सेवा सभव है, सभी कुछ होने पर भी वह बृज- किशोर प्रसादजी की गोद मे से चले गये। कुछ धन कमा सकने की आशा से मगनलाल गाधी मेरे साथ सन् १९०३ मे दक्षिण अफ्रीका गये थे। मगर उन्हें दूकान करते पूरा साल भर भी न हुआ होगा कि स्वेच्छापूर्वक गरीबी की मेरी अचानक पुकार को सुनकर वह फिनिक्स-आश्रम मे आशामिल हुए और तब से एक बार भी वह डिगे नही, मेरी आशाए पूरी करने मे असमर्थ न हुए। यदि उन्होने स्वदेश-सेवा मे अपनेको होम दिया तो अपनी योग्यताओं और अपने अध्यवसाय के बल पर, जिनके बारे में कोई सदेह हो ही नही सकता, वे आज व्यापारियों के सिरताज होते । छापाखाने मे डाल दिये जाने पर उन्होने तुरत ही मुद्रण-कला के सभी भेदो को जान लिया। यद्यपि पहले उन्होने कभी कोई यत्र हाथ मे नही लिया था तो भी इजिन-घर मे, कलो के बीच तथा कंपोजीटरों के टेबल पर सभी जगह अत्यत कुशलता दिखाई । 'इंडियन ओपीनियन' के गुजराती अश का संपादन करना भी उनके लिए वैसा ही सहज काम था। फिनिक्स- आश्रम में खेती का काम भी शामिल था और इसलिए वह कुशल किसान भी बन गये.। मेरा खयाल है कि आश्रम मे वे सर्वो- त्तम बागबान थे। यह भी उल्लेखनीय है कि अहमदाबाद से 'यग इंडिया' का जो पहला अंक निकला उसमे भी उस सकट-काल मे उनके हाथ की कारीगरी थी। पहले उनका शरीर भीम जैसा था, किंतु जिस काम मे उन्होने अपने को उत्सर्ग किया, इसकी उन्नति मे उस शरीर को गला दिया था। उन्होने बड़ी सावधानी से मेरे आध्यात्मिक जीवन का अध्ययन ।
३० देश-सेवकों के संस्मरण . किया था। जबकि मैने विवाहित स्त्री-पुरुषो के लिए भी 'ब्रह्मचर्य ही जीवन का नियम है' का सिद्धात अपने सहकारियो के सामने पेश किया था तब उन्होने पहले-पहल उसका सौदर्य तथा उसके पालन की आवश्यकता समझी और यद्यपि उसके लिए, जैसाकि मै जानता हू, उन्हे बडा कठोर प्रयत्न करना पड़ा था तो भी उन्होने इसे सफल कर दिखलाया । इसमे वह अपने साथ अपनी धर्मपत्नी को भी धीरतापूर्वक समझा-बुझाकर ले गये, उसपर अपने विचार जबरन डालकर नही। जब सत्याग्रह का जन्म हुआ तब वह सबसे आगे थे। दक्षिण अफ्रीका के युद्ध का पूरा-पूरा मतलब समझानेवाला एक शब्द मै ढूढ रहा था। दूसरा कोई अच्छा शब्द न मिल सकने से मैने लाचार उसे निष्क्रिय प्रतिरोध का नाम दिया था, गोकि यह शब्द बहुत ही नाकाफी और भ्रमोत्पादक भी है। क्या ही अच्छा होता अगर आज मेरे पास उनका वह अत्यत सुदर पत्र होता जिसमे उन्होने बत- लाया था कि इस युद्ध को 'सदाग्रह' क्यो कहना चाहिए। इसी सदा- ग्रह को बदलकर मैने 'सत्याग्रह' शब्द बनाया। उनका पत्र पढने पर इस यद्ध के सभी सिद्धातो पर एक-एक करके विचार करते हुए अत मे पाठक को इसी नाम पर आना ही पड़ता था। मुझे याद है कि वह पत्र अत्यत ही छोटा और केवल आवश्यक विषय पर ही था, जैसे कि उनके सभी पत्र होते थे। युद्ध के समय वह काम से कभी थके नही, किसी काम से देह नही चुराई और अपनी वीरता से वह अपने आसपास मे सभी किसीके दिल उत्साह और आशा से भर देते थे। जबकि सब कोई जेल गये, जब फिनिक्स मे जेल जाना ही मानो इनाम जीतना था तब भी, मेरी आज्ञा से, जेल से भारी काम उठाने के लिए वह पीछे ठहर गये । उन्होने स्त्रियो के दल मे अपनी पत्नी को भेजा। हिदुस्तान लौटने पर भी उन्हीकी बदौलत आश्रम, जिस सयम-नियम की बुनियाद पर बना है, खुल सका था। यहां उन्हे नया और अधिक मुश्किल काम करना पडा। मगर उन्होने अपने- मगनलाल खुशालचंद गांधी ३१ सीखी। वह को उसके लायक साबित किया। उनके लिए अस्पृश्यता बहुत कठिन परीक्षा थी। सिर्फ एक क्षण के लिए ऐसा जान पडा, मानो उनका दिल डोल गया हो। मगर यह तो एक सैकड की बात थी। उन्होने देख लिया कि प्रेम की सीमा नही बाधी जा सकती, और कुछ नही तो महज इसीलिए कि अछूतो के लिए ऊची जाति- वाले जिम्मेदार है, हमे उन्हीके जैसे रहना चाहिए। आश्रम का औद्योगिक विभाग फिनिक्स के ही कारखाने के ढग का नही था । यहा हमे बुनना, कातना, धुनना और ओटना सीखना था। फिर मगनलाल की ओर झुका । गोकि कल्पना मेरी थी, कितु उसे काम मे लानेवाले हाथ तो उनके थे। उन्होने बुनना और कपास के खादी बनने तक की और दूसरी सभी क्रियाए तो जन्म से ही विश्वकर्मा, कुशल कारीगर थे। जब आश्रम मे गोशाला का काम शुरू हुआ तब वह इस काम मे उत्साह से लग गये, गोशाला-सबधी साहित्य पढा और आश्रम की सभी गायो का नामकरण किया और सभी गोरुओ से मित्रता पैदा कर ली। जब चमालय खुला तब भी वह वैसे ही दृढ थे। जरा दम लेने की फुर्सत मिलते ही वह चमडे के सिद्धान्त भी सीखनेवाले थे । राजकोट के हाई स्कूल की शिक्षा के अलावा और जो कुछ वह इतनी अच्छी तरह जानते थे, उन्होने वह सब स्वानुभव की कठिन पाठ- शाला मे सीखा था। उन्होने देहाती बढई, देहाती बुनकर, किसान, चरवाहो और ऐसे ही मामूली लोगो से सीखा था। वह चर्खा-संघ के शिक्षण-विभाग के व्यवस्थापक थे। श्री वल्लभ भाई ने बाढ़ के जमाने मे उन्हे विट्ठलपुर का नया गाव बनाने का भार दिया था। वह आदर्श पिता थे। उन्होने अपने बच्चो को, दो लडकियो और एक लडके को, ऐसी शिक्षा दी थी कि जिसमे वे देश के लिए उपहार बनने के लिए योग्य हो । उनका पुत्र केशव यत्र- विद्या मे बडी कुशलता दिखला रहा है। उसने भी अपने पिता देश-सेवकों के संस्मरण के ही समान यह सब मामूली लुहार-बढइयो को काम करते देखकर सीखा है। उनकी सबसे बड़ी लडकी राधा ने अपने मत्थे बिहार में स्त्रियो की स्वाधीनता के सबध में एक मुश्किल और नाजुक काम उठाया था। सच ही तो, वह यह पूरा-पूरा जानते थे कि राष्ट्रीय शिक्षा कैसी होनी चाहिए और वह शिक्षको को प्रायः इस विषय पर गभीर और विचारपूर्वक चर्चा में लगाया करते थे। पाठक यह न समझे कि उन्हे राजनीति का कुछ ज्ञान ही नही था। उन्हे ज्ञान जरूर था; कितु उन्होने आत्मत्याग का रचनात्मक और शात पथ चुना था। वह मेरे हाथ थे, मेरे पैर थे और थे मेरी आंखे। दुनिया को क्या पता कि मै जो इतना बडा आदमी कहा जाता हूं, वह बडप्पन मेरे शांत, श्रद्धालु, योग्य और पवित्र स्त्री तथा पुरुष कार्यकर्ताओं के अविरल परिश्रम और सेवा पर कितना निर्भर है, और उन सबमे मेरे लिए मगनलाल सबसे बड़े, सबसे अच्छे और सबसे अधिक पवित्र थे । यह लेख लिखते हुए भी अपने प्यारे पति के लिए विलाप करती हुई उनकी विधवा की सिसक मै सुन रहा हूं। मगर वह क्या समझेगी कि उससे अधिक विधवा, अनाथ मै ही हो गया है। अगर ईश्वर में मेरा जीवत विश्वास न होता तो उसकी मृत्युपर,जोकि मुझे अपने सगे पुत्रो से भी अधिक प्रिय था, जिसने मुझे कभी धोखा न दिया, मेरी आशाए न तोडी, जो अध्यवसाय की मुत्ति था, जो आश्रम के भौतिक, नैतिक और आध्यात्मिक सभी अगो का सच्चा चौकीदार था, मै विक्षिप्त हो जाता । उनका जीवन मेरे लिए उत्साहदायक है, नैतिक नियम की अमोघता और उच्चता का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है । उन्होने अपने ही जीवन मे मुझे एक-दो दिनों में नही, कुछ महीनो में नही, बल्कि पूरे चौबीस वर्षों तक की बड़ी अवधि मे-हाय, जोअब घडी भर का समय जान पडता है-यह साबित कर दिखलाया कि देश-सेवा और मनुष्य-सेवा, आत्म- ज्ञान या ब्रह्मज्ञान आदि सभी शब्द एक ही अर्थ के द्योतक है। + मगनलाल खुशालचंद गांधी मगनलाल न रहे, मगर अपने सभी कामों में वह जीवित है, जिनकी छाप, आश्रम की धूल मे से दौडकर निकल जानेवाले भी, देख सकते है । ... उनके जैसा सरदार अगर मुझे मिला होता तो उन्होने जितनी मेरी सेवा की थी, उतनी मै अपने सरदार की नही कर सकता। उनका जीवन सपूर्ण था। आश्रम के वह प्राण थे। मै तो केवल घूमता फिरा और आश्रम के प्रति बेवफा रहा। उन्होने आश्रम की सेवा मे अपना शरीर गला दिया था। मै मीराबाई के समान जहर का प्याला पी सकता हू, मेरे गले मे कोई सांपों की माला डाल दे तो उसे सहन कर सकता है, किंतु यह वियोग उन दोनो से भी अधिक कठिन है। तो भी छाती कठिन करके, उनका गुण- कीर्तन करते हुए मैने अपने हृदय मे उनकी मूर्ति स्थापित की है।' . रूखी बहन' बिल्कुल बच्ची थी, तब से सतोक के जीते- जी भी मगनलाल के हाथों पली थी। इसके जीने की शायद ही आशा थी। मश्किल से सास ले सकती थी। इस लड़की को मगन- लाल नहलाते, बाल सवारते और पास बैठाकर खिलाते थे और अपने दूसरे बच्चो की भी देखभाल करते थे। फिर भी नौकरी में सबसे ज्यादा काम करते थे । सुदर-से-सुदर बाडी उन्होने बनाई थी। फिनिक्स मे पहला गुलाब का फूल उन्हीने उगाया था। फिनिक्स की कितनी ही सख्त जमीन मे जब उनकी कुदाली की चोट पडती थी तब धरती कापती मालम होती थी। मगनलाल में आत्म-विश्वास था। अपने काम के बारे में श्रद्धा थी। और भगवान् ने उन्हे बलवान शरीर दिया था। यह । , हिंदी नव जीवन, २६-४-२८ २ हिंदी नव जीवन ३-५-२८ मगनलाल गांधी की पुत्रियां ४
३४
देश-सेवकों के संस्मरण
शरीर अत मे आश्रम के बोझ से और उनकी तपश्चर्या से कमजोर
हो गया था।'
उन्होने आश्रम के लिए जन्म लिया था। सोना जैसे अग्नि में
तपता है वैसे मगनलाल सेवाग्नि में तपे और कसौटी पर सो फी-
सदी खरे उतरकर दुनिया से कुच कर गये । आश्रम मे जो कोई
भी है वह मगनलाल की सेवा की गवाही देता है ।
गोपालकृष्ण गोखले
के विषय मे शिष्य क्या लिखे। उसका लिखना एक
प्रकार की धृष्टता मात्र है । सच्चा शिष्य वही है जो गुरु मे अपने-
को लीन कर दे, अर्थात् वह टीकाकार हो ही नहीं सकता। जो
भक्ति दोष देखती हो वह सच्ची भक्ति नही और दोष गुण के
पृथक्करण में असमर्थ लेखक द्वारा की गई गुरु-स्तुति को यदि
सर्वसाधारण अगीकार न करे तो इसपर उसे नाराज होने का
अधिकार नही हो सकता। शिष्य के आचरणो ही से गुरु की टीका
होती है । गोखले राजनैतिक विषयो मे मेरे गुरु थे, इस बात को
मै अनेक बार कह चुका है। इस कारण उनके विषय मे
कुछ
लिखने मे मै अपनेको असमर्थ समझता हूँ। मै चाहे जितना लिख
जाऊ, मुझे थोडा ही मालूम होगा। मेरे विचार से गुरु-शिष्य का
सबध शुद्ध आध्यात्मिक संबध है। वह अकशास्त्र के नियमानुसार
नही होता। कभी-कभी वह हमारे बिना जाने भी हो जाता है।
उसके होने मे एक क्षण से अधिक नहीं लगता, पर एक बार
होकर वह फिर टूटना जानता ही नही।
।
, महादेव भाई को डायरी, भाग १,८-७-३२
२ 'यरवडा-मंदिर से ३०-५-३२
गोपालकृष्ण गोखले । १८९६ ई० मे पहले-पहल हम दोनों व्यक्तियो मे यह सबध हुआ। उस समय न मुझे उनका खयाल था और न उन्हे मेरा। उसी समय मुझे गुरुजी के भी गुरु लोकमान्य तिलक, सर फिरोज- शाह मेहता, जस्टिस बदरुद्दीन तैयबजी, डा० भाडारकर तथा बगाल और मद्रास प्रात के और भी अनेक नेताओ के दर्शनो का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मै उस समय बिल्कुल नवयुवक था, मुझ- पर सबने प्रेम-वृष्टि की। सबके एकत्र दर्शन का वह प्रसग मुझे कभी न भूलेगा, परतु गोखले से मिलकर मेरा हृदय जितना शीतल हुआ उतना औरो से मिलने से नही हुआ। मुझे याद नही आता कि गोखले ने मुझपर औरो की अपेक्षा अधिक प्रेम-वृष्टि की थी। तुलना करने से मैं कह सकता हूँ कि डा० भाडारकर ने मुझपर जितना अनुराग प्रकट किया उतना और किसीने नही किया। उन्होने कहा--"यद्यपि मै आजकल सार्वजनिक कार्यों से अलग रहता हूँ, फिर भी केवल तुम्हारी खातिर मै उस सभा का अध्यक्ष बनना स्वीकार करता हू, जो तुम्हारे प्रश्न पर विचार करने के लिए होनेवाली है।" यह सब होते हुए भी केवल गोखले ही ने मुझे अपने प्रेम-पाश में आबद्ध किया। उस समय मुझे इस बात का बिल्कुल ज्ञान नहीं हुआ। पर सन् १९०२ वाली कलकत्ते की काग्रेस में मुझे अपने शिष्य-भाव का पूरा-पूरा अनुभव हुआ। उपर्युक्त नेताओ मे से अनेक के दर्शनो का उस समय मुझे फिर सौभाग्य प्राप्त हुआ। किंतु मैने देखा कि गोखले को मैरी याद बनी हुई थी। देखते ही उन्होने मेरा हाथ पकड लिया। वह मुझे अपने घर खीच ले गये। मुझे भय था कि विषय-निर्वाचिनी- समिति मे मेरी बात न सुनी जायगी। प्रस्तावो की चर्चा शुरू हुई और खतम भी हो गई, पर मुझे अत तक यह कहने का साहस न हुआ कि मेरे मन मे भी दक्षिण अफ्रीका-सबधी एक प्रश्न है। मेरे लिए रात को कौन बैठा रहता | नेतागण काम को जल्दी निपटाने के लिए आतुर हो गये। उनके उठ जाने के डर से मै कापने लगा। मुझे गोखले को याद दिलाने का भी साहस न हुआ।
देश-सेवको के सस्मरण इतने में वह स्वय ही बोले-मि० गाधी भी दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियो की दशा के सबध में एक प्रस्ताव करना चाहते है। उसपर अवश्य विचार किया जाय। मेरे आनंद की सीमा न रही। राष्ट्रसभा के सबध मे मेरा यह पहला ही अनुभव था। इसलिए उससे स्वीकृत होनेवाले प्रस्तावो का मै बड़ा महत्त्व समझता था। इसके बाद भी उनके दर्शन के कितने ही अवसर उपस्थित हुए और वे सभी पवित्र है । पर इस समय जिस बात को मै उनका महामत्र मानता हू, उसका उल्लेख कर, इसे पूर्ण करना उत्तम होगा। इस कठिन कलिकाल में किसी विरले ही मनुष्य मे शुद्ध धर्मभाव देख पडता है। ऋषि, मुनि, साधु आदि नाम धारण कर. भटकते फिरनेवालो को इस भाव की प्राप्ति शायद ही कभी होती है। आजकल उनका धर्म-रक्षक पद से च्युत हो जाना सभी लोग देख रहे है। यदि एक ही सुदर वाक्य मे धर्म की पूरी व्याख्या कही है तो वह भक्त-शिरोमणि गुजराती कवि नरसिह मेहता के इस वाक्य मे है "ज्यां लगी आतमा तत्व चीन्यो नहीं, त्यां लागी साधना सर्व जूठी।" अर्थात्-"जबतक आत्मतत्व की पहचान न हो तबतक सभी साधनाए निरर्थक है।" यह वचन उसके अनुभव-सागर के मथन से निकला हुआ रत्न है। इससे ज्ञात होता है कि महा- तपस्वी तथा योगीजनो मे भी (सच्चा) धर्मभाव होना अनि- वार्य नही है। गोखले को आत्मतत्व का उत्तम ज्ञान था, इसमें मुझे तनिक भी सदेह नहीं। यद्यपि वह सदा ही धार्मिक आडंबरसे दूर रहे, फिर भी उनका सपूर्ण जीवन धर्ममय था । भिन्न-भिन्न युगों में मोक्ष-मार्ग पर लगानेवाली प्रवृत्तिया देखी गई है। जब- जब धर्मबधन ढीला पडता है तब-तब कोई एक विशेष प्रवृत्ति धर्म-जागृति मे विशेष उपयोगी होती है। यह विशेष प्रवृत्ति उस समय की परिस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की होती गोपालकृष्ण गोखले ३ . है। आजकल हम अपनेको राजनैतिक विषयो मे अवनत देखते । एकागी दृष्टि से विचार करने से जान पडेगा कि राजनैतिक सुधार से ही अन्य बातो मे हम उन्नति कर सकेगे। यह बात एक प्रकार से सच भी है। राजनैतिक अवस्था के सुधार के बिना उन्नति होना सभव नही । पर राजनैतिक स्थिति में परिवर्तन होने ही से उन्नति न होगी। परिवर्तन के साधन यदि दूषित तथा घृणित हुए तो उन्नति के बदले और अवनति ही होने की अधिकतर संभावना है। जो परिवर्तन शुद्ध और पवित्र साधनो से किया जाता है वही हमे उच्च मार्ग पर ले जा सकता है। सार्वजनिक कामो मे पडते ही गोखले को इस तत्व का ज्ञान हो गया था और इसको उन्होने कार्य मे भी परिणत किया। यह बात सभी लोग जानते थे कि यह भव्य विचार उन्होने अपनी भारत-सेवक-समिति तथा सपूर्ण जन-समुदाय के सम्मुख रखा कि यदि राजनीति को धार्मिक स्वरूप दिया जायगा तो यही मोक्ष-मार्ग पर ले जानेवाली हो जायगी। उन्होने साफ कह दिया कि जबतक हमारे राजनैतिक कार्यों को धर्मभाव की सहायता न मिलेगी तबतक वे सूखे, रस- हीन, ही बने रहेगे। उनकी मृत्यु पर 'टाइम्स ऑव इडिया' में जो लेख प्रकाशित हुआ था उसके लेखक ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था और राजनैतिक सन्यासी उत्पन्न करने के उनके प्रयत्न की सफलता पर अविश्वास प्रकट करते हुए, उनकी यादगार 'भारत-सेवक-समिति' का ध्यान इसकी ओर आकर्षित किया था। वर्तमान काल मे राजनैतिक सन्यासी ही सन्यासाश्रम की गौरववृद्धि कर सकते है। अन्य गेरुवा वस्त्रधारी सन्यासी उनकी अपकीति के ही कारण है। शुद्ध धर्म-मार्ग मे चलनेवाले किसी भारतवासी का राजनैतिक कामो से परे रहना कठिन है। उसी बात को मै दूसरी तरह अगीकार किये बिना रह ही नहीं सकता। और आजकल की राज्य-व्यवस्था के जाल मे हम इस तरह फस गये है कि राजनीति से अलग रहते हुए, लोक-सेवा करना सर्वथा असभव ही है। पूर्व समय मे जो किसान इस बात को जाने बिना ३८ ३ देश-सेवको के संस्मरण भी कि जिस देश मे हम बसते है, उसका अधिकारी कौन है, अपनी जीवन-यात्रा भलीभाति निर्वाह कर लेता था, वह आज ऐसा नहीं कर सकता। ऐसी दशा मे उसका धर्माचरण राजनैतिक परिस्थिति के अनुसार ही होना चाहिए । यदि हमारे साधु, ऋषि, मुनि, मौलवी और पादरी इस उच्च तत्व को स्वीकार कर ले तो जहा देखिये वही भारत-सेवक-समितिया ही दिखाई देने लगे और भारत मे धर्मभाव इतना व्यापक हो जाय कि जो राजनैतिक चर्चा आज लोगो को अरुचिकर होती है वही उन्हे पवित्र और प्रिय मालम होने लगे, फिर पहले ही की तरह भारत- वासी धार्मिक साम्राज्य का उपभोग करने लगे। भारत का बधन एक क्षण मे दूर हो जाय और वह स्थिति प्रत्यक्ष आखो के सामने, आ जाय, जिसका दर्शन एक प्राचीन कवि ने अपनी अमरवाणी में इस प्रकार किया है--फौलाद से तलवार बनाने का नही, बल्कि (हल की) फाल बनाने का काम लिया जायगा और सिह और बकरे साथ-साथ विचरण करेगे। ऐसी स्थिति उत्पन्न करनेवाली प्रवृत्ति ही गुरुवर गोखले का जीवन-मत्र थी। यही उनका सदेश है और मुझे विश्वास है कि गद्ध और सरल मन से विचार करने पर उनके भाषणो' के प्रत्येक शब्द मे यह मत्र लक्षित होगा। .. यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्यसि कौन्तेय ! तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ श्री कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था, वही उपदेश भारत-माता ने महात्मा गोखले को दिया था और उनके आचरणो से सूचित होता है कि उन्होने उसका पालन भी किया है। यह सर्वमान्य बात है कि उन्होने जो-जो किया, जिस-जिस का उपभोग - १ स्वर्गीय गोखले की पुण्य-तिथि के उपलक्ष में उनके भाषणो तथा लेखों के गुजराती संग्रह की भूमिका।
गोपालकृष्ण गोखले किया, जो स्वार्थ त्याग किया, जिस तप का आचरण किया, वह सभी कुछ उन्होने भारत-माता के चरणो मे अर्पण कर दिया। केवल देश ही के लिए जन्म लेनेवाले इस महात्मा का अपने देश-बधुओ के प्रति क्या सदेश है ? 'भारत-सेवक-समिति' के जो सेवक महात्मा गोखले के अतिम समय मे उनके पास उपस्थित थे, उन्हें उन्होने निम्नलिखित वाक्य कहे थे . (तुम लोग) मेरा जीवन-चरित लिखने न बैठना, मेरी मूर्ति बनवाने मे भी अपना समय मत लगाना । तुम लोग भारत के सच्चे सेवक होगे तो अपने सिद्धात के अनुसार आचरण करने अर्थात् भारत की ही सेवा करने मे अपनी आयु व्यतीत करोगे।" सेवा के सबध मे उनके आतरिक विचार हमे मालूम है। राष्ट्रीय सभा का कार्य-सचालन, भाषण तथा लेख द्वारा जनता को देश की सच्ची स्थिति का ज्ञान कराना, प्रत्येक भारतवासी को साक्षर बनाने का प्रयत्न कराना, ये सब काम सेवा ही है। पर किस उद्देश्य और किस प्रणाली से यह सेवा की जाय? इस प्रश्न का वह जो उत्तर देते वह उनके इस वाक्य से प्रकट होता है। अपनी सस्था ('भारत-सेवक-समिति') की नियमावली बनाते हुए उन्होने लिखा है, “सेवको का कर्तव्य भारत के राजनैतिक जीवन को धार्मिक बनाना है।" इसी एक वाक्य मे सब-कुछ भरा हुआ है। उनका जीवन धार्मिक था । मेरा विवेक इस बात का साक्षी है कि उन्होने जो-जो काम किये, सब धर्मभाव ही की प्रेरणा से किये । बीस साल पहले उनका कोई-कोई उद्गार या कथन नास्तिको का-सा होता था। एक बार उन्होने कहा था-- "क्या ही अच्छा होता यदि मुझमे भी वही श्रद्धा होती, जो रानडे मे थी।" पर उस समय भी उनके कार्यों के मूल में उनकी धर्म- बुद्धि अवश्य रहती थी। जिस पुरुष का आचरण साधुओ के सदृश्य है, जिसकी वृत्ति निर्मल है, जो सत्य की मूर्ति है, जो नम्र है जिसने सर्वथा अहकार का परित्याग कर दिया है, वह निस्सदेह . ।
देश-सेवको के संस्मरण धर्मात्मा है । गोखले इसी कोटि के महात्मा थे। यह बात मैं उनके लगभग २० वर्षों की सगति के अनुभव से कह सकता हूँ। १८९६ मे मैने नेटाल की शर्तबदी की मजदूरी पर भारत में वाद-विवाद आरभ किया । उस समय कलकत्ता, बबई, पूना, मद्रास आदि स्थानो के नेताओं से मेरा पहले-पहल सबध हुआ। उस समय सब लोग जानते थे कि महात्मा गोखले रानडे के शिष्य है। फर्ग्युसन कालेज को वह अपना जीवन भी अर्पण कर चुके थे, और मै उस समय एक निरा अनुभवहीन युवक था । मै पहले- पहल पूना मे उनसे मिला। इस पहली ही भेट मे हम लोगो में जितना घनिष्ठ सबध हो गया उतना और किसी नेता से नही हुआ। महात्मा गोखले के विषय मे जो बाते मैने सुनी थी वे सब. प्रत्यक्ष देखने में आईं। उनकी वह प्रेम-युक्त और हास्यमय मूर्ति मुझे कभी न भूलेगी। मुझे उस समय मालूम हुआ कि मानो वह साक्षात् धर्म की ही मूर्ति है। उस समय मुझे रानडे के भी दर्शन हुए थे। पर उनके हृदय मे मै स्थान न पा सका। मै उनके विषय में केवल इतना ही जान सका कि वह गोखले के गुरु है । अवस्था और अनुभव में वह मुझसे बहुत अधिक बडे थे, इस कारण अथवा और किसी कारण से मै रानडे को उतना न जान सका, जितना कि गोखले को मैने जाना। १८९६ ई० के अवसर से ही गोखले का राजनैतिक जीवन मेरे लिए आदर्श-स्वरूप हुआ। उसी समय से उन्होने राजनैतिक गुरु के नाते मेरे हृदय में निवास किया। उन्होने सार्वजनिक सभा (पूना) की त्रैमासिक पुस्तक का सपादन किया। उन्होने फर्ग्युसन-कालेज में अध्यापन-कार्य करके उसे उन्नत दशा को पहुचाया। उन्होने ब्रेल्वी-कमीशन के सामने गवाही देकर अपनी वास्तविक योग्यता का प्रमाण दिया, उनकी बुद्धिमत्ता की छाप लार्ड कर्जन पर-उन लार्ड कर्जन पर जो अपने सामने किसीको कुछ न गिनते थे-बैठी और वह उनसे शकित रहने लगे। उन्होने बडे-बडे काम करके मातृभूमि की कीर्ति को उज्ज्वल गोपालकृष्ण गोखले ४१ किया। पब्लिक-सर्विस-कमीशन का काम करते समय उन्होने अपने जीने-मरने तक की परवा न की। उनके इन तथा अन्य कार्यों का दूसरे व्यक्तियो ने उत्तम रीति से वर्णन किया है। ... . जनरल बोथा तथा स्मट्स से जब उन्होने दक्षिण अफ्रीका की राजधानी प्रिटोरिया मे मुलाकात की थी उस समय इस मुलाकात के लिए तैयार होने मे उन्होने जितना परिश्रम किया था वह मुझे इस जन्म मे नही भूल सकता। मुलाकात के पहले दिन उन्होने मेरी और मि० कैलेनबेक की परीक्षा ली। वह स्वय रात के तीन ही बजे जाग पड़े और हम लोगो को भी उन्होने जगाया। उन्हे जो पुस्तकें .दी गई थी उनको उन्होने अच्छी तरह पढ लिया था। अब हम लोगों से जिरह करके वह इस बात का निश्चय करना चाहते थे कि उनकी तैयारी पूरी हुई या अभी उसमे कसर है। मैने उनसे विनयपूर्वक कहा कि इतना परिश्रम अनावश्यक है। हम लोगो को तो कुछ मिले या न मिले, लडना ही होगा, पर अपने आराम के लिए मै आपका बलिदान नही करना चाहता । पर जिस पुरुष ने सर्वदा काम मे लगे रहने की आदत ही बना रखी थी, वह मेरी बातो पर कब ध्यान देता | उनकी जिरहो का मै क्या वर्णन करू । उनकी चिताशीलता की कितनी प्रशसा करू । इतने परिश्रम का एक ही परिणाम होना चाहिए था। मत्रि-मडल ने वचन दिया कि आगामी बैठक मे सत्याग्रहियो की आकाक्षाओ को स्वीकार करने वाला कानून पास किया जायगा और मजदूरो को ४५ रुपयो का जो कर देना पडता है वह माफ कर दिया जायगा। पर इस वचन का पालन नही किया गया। तो क्या गोखले निश्चेष्ट हो बैठ रहे ? एक क्षण के लिए भी नही । मेरा विश्वास है कि १९१३ ई० मे उक्त वचन को पूरा कराने के लिए उन्होंने जो अविराम श्रम किया, उससे उनके जीवन के दस वर्ष अवश्य छीजे होगे। उनके डाक्टर की भी यही राय है। उस वर्ष भारत में जागृति उत्पन्न करने और द्रव्य एकत्र करने के लिए उन्होने जितने ४२ देश-सेवकों के सस्मरण कष्ट सहे, उनका अनुमान कठिन है। यह महात्मा गोखले का ही प्रताप था कि दक्षिण अफ्रीका के प्रश्न पर भारतवर्ष हिल उठा। लार्ड हार्डिज ने मद्रास मे इतिहास मे यादगार होने योग्य जो भाषण दिया वह भी उन्हीका प्रताप था। उनसे घनिष्ठ परिचय रखनेवालो का कहना है कि दक्षिण अफ्रीका के मामले की चिता ने उन्हे चारपाई पर डाल दिया, फिर भी अत तक उन्होने विश्राम करना स्वीकार न किया। दक्षिण अफ्रीका से आधी रात को आने वाले पत्र-सरीखे लबे-चौडे तारो को उसी क्षण पढना, जवाब तैयार करना, लार्ड हार्डिंज के नाम पर तार भेजना, समाचार- पत्रो मे प्रकाशित कराये जानेवाले लेख का मसविदा तैयार करना और इन कामो की भीड मे खाने और सोने तक की याद न. रहना, रात-दिन एक कर डालना, ऐसी अनन्य निस्स्वार्थ भक्ति वही करेगा जो धर्मात्मा हो। हिंदू और मुसलमान के प्रश्न को भी वह धार्मिक दृष्टि से ही देखते थे । एक बार अपनेको हिदू कहनेवाला एक साधु उनके पास आया और कहने लगा कि मुसलमान नीच है और हिद् उच्च । महात्मा गोखले को अपने जाल में फसते न देख उसने उन्हे दोष देते हुए कहा कि तुम मे हिदुत्व का तनिक भी अभिमान नही । महात्मा गोखले ने भवे चढाकर हृदय-भेदी स्वर मे उत्तर दिया--"यदि तुम जैसा कहते हो वैसा करने ही मे हिंदुत्व है तो मै हिदू नही। तुम अपना रास्ता पकडो।" महात्मा गोखले मे निर्भयता का गुण बहुत अधिक था । धर्मनिष्ठा मे इस गुण का स्थान प्राय सर्वोच्च है । लेफ्टिनेट रैड की हत्या के पश्चात् पूना मे हलचल मच गई थी। गोखले उस समय इग्लैंड में थे। पूनावालो की तरफ से वहा उन्होने जो व्याख्यान दिये वे सारे जगत मे प्रसिद्ध है। उनमे वह कुछ ऐसी बाते कह गये थे, जिनका पीछे वह सबूत न दे सकते थे। थोडे ही दिनो बाद वह भारत लौटे। अपने भाषणो मे उन्होने अप्रेज सिपाहियो पर जो इलजाम लगाया था उसके लिए उन्होने माफी माग ली। इस गोपालकृष्ण गोखले ४३ माफी मागने के कारण यहा के बहुत-से लोग उनसे नाराज भी हो गये। महात्मा को कितने ही लोगो ने सार्वजनिक कामो से अलग हो जाने की सलाह दी। कितने ही नासमझो ने उनपर भीरुता का आरोप करने में भी आगापीछा न किया। इन सबका उन्होने अत्यत गभीर और मधुर भाषा मे यही उत्तर दिया--"देश- मेवा का कार्य मैंने किसीकी आज्ञा से अगीकार नही किया है और किसीकी आज्ञा से उसे मैं छोड भी नहीं सकता । अपना कर्तव्य करते हुए यदि मै लोकपक्ष के साथ रहने के योग्य समझा जाऊ तो अच्छा ही है, पर यदि मेरे भाग्य वैसे न हो तो भी मै उसे अच्छा ही समझूगा।" काम करना उन्होने अपना धर्म माना था । जहातक मेरा अनुभव है, उन्होने कभी स्वार्थ-दृष्टि से इस बात का विचार नही किया कि मेरे कार्यो का जनता पर क्या प्रभाव पडेगा। मेरा विश्वास है कि उनमे वह शक्ति थी जिससे यदि देश के लिए उन्हें फासी पर चढना होता तो भी वह अविचलित चित्त से हसते हुए फासी पर चढ जाते । मै जानता हूँ कि अनेक बार उन्हे जिन अवस्थाओ मे रहना पड़ा है उनमे रहने की अपेक्षा फासी पर चढना कही सहज था। ऐसी विकट परिस्थितियो का उन्हे अनेक बार सामना करना पड़ा, पर उन्होने कभी पाव पीछे न हटाया। इनसब बातो से तात्पर्य यह निकलता है कि यदि इस महान् देशभक्त के चरित्र का कोई अश हमारे ग्रहण करने योग्य है तो वह उनका धर्म-भाव ही है। उसीका अनुकरण करना हमे उचित है। हम सब लोग बडी व्यवस्थापिका सभा के सदस्य नही हो सकते। हम यह भी नही देखते कि उसके सदस्य होने से देश-सेवा हो ही जाती है । हम सब लोग पब्लिक सर्विस-कमीशन मे नही बैठ सकते। यह बात भी नही है कि उसमे के सब बैठनेवाले देशभक्त ही होते है। हम सब लोग उनकी बराबरी के विद्वान् नही हो सकते और विद्वानमात्र के देश-सेवक होने का भी हमे अनुभव नही है। परतु निर्भयता, सत्य, धैर्य, नम्रता, न्यायशीलता, सरलता और । - - देश-सेवको के सस्मरण अध्यवसाय आदि गुणो का विकास कर उन्हे देश के लिए अर्पण करना सबके लिए साध्य है, यही धर्मभाव है । राजनैतिक जीवन को धर्ममय करने का यही अर्थ है। उक्त वचन के अनुसार आचरण करनेवाले को अपना पथ सदा ही सूझता रहेगा। महात्मा गोखले की सपत्ति का भी वही उत्तराधिकारी होगा। इस प्रकार की निष्ठा से काम करनेवाले को और भी जिन-जिन विभूतियो की आवश्यकता होगी वे सब प्राप्त होगी। यह ईश्वर का वचन है और महात्मा गोखले इसका ज्वलत प्रमाण है।' विश्व-बधुत्व की भावना उन्होने स्वय अपने जीवन मे चरि- तार्थ करके दिखा दी, इस बात को उनके साथी खूब अच्छी तरह से जानते है । पारिया (अत्यज) कहे जानेवाले भाइयो से वह खूब दिल खोलकर मिलते थे। यह बात उनमे नही थी कि वह किसी पर कृपा या अहसान कर रहे है । उनके हृदय मे तो केवल सेवा का ही आदर्श था। उनका विश्वास था कि सार्वजनिक आदमी जनता के नेता नहीं, बल्कि सेवक है। उनकी दृष्टि में सबसे बडा सेवक ही सबसे बडा नेता था । वह हर तरह एक सच्चे जन्मना ब्राह्मण थे। वह जन्मजात अध्यापक भी थे। उनसे जब कोई 'प्रोफेसर' कहता तो बडे प्रसन्न होते थे। विनम्रता की तो वह मूर्ति थे। राष्ट्र को उन्होने अपना सर्वस्व दे दिया था। चाहते तो वह मालामाल हो जाते, लेकिन उन्होने तो स्वेच्छा से गरीबी का ही बाना पसंद किया। गोखले ने एक महान अवसर पर लिखा था, “जो सेवा किसी व्यक्ति के कहने से हाथ मे नही ली जाती, वह किसी दूसरे की आज्ञा से त्यागी भी नही जा सकती। इसलिए सबसे निरापद नियम तो यह है कि मनुष्य को हम उसके वर्तमान रूप मे ही ग्रहण करे, फिर चाहे जिस कुल मे वह पैदा हुआ हो और उसकी जाति या उसका रग चाहे जो हो।" २ ' 'महात्मा गांधी रामचंद्र वर्मा लिखित . हरिजन-सेवक ९-३-३४
घोषालबाबू
घोषालबाबू
काग्रेस के अधिवेशन को एक-दो दिन की देर थी। मैने निश्चय
किया था कि काग्रेस के दफ्तर मे यदि मेरी सेवा स्वीकार हो तो
कुछ सेवा करके अनुभव प्राप्त करू ।
जिस दिन हम आये उसी दिन नहा-धोकर मै काग्रेस के दफ्तर
में गया। श्री भूपेद्रनाथ बसु और श्रीघोषाल मत्री थे। भूपेनबाबू
के पास पहुचकर कोई काम मागा। उन्होने मेरी ओर देखकर
कहा, "मेरे पास तो कोई काम नही है, पर शायद मि० घोषाल
नुमको कुछ बतावेगे। उनसे मिलो।'
मै घोषालबाबू के पास गया। उन्होने मुझे नीचे से ऊपर तक
देखा। कुछ मुस्कराये और बोले, "मेरे पास कारकुन का काम
है। करोगे?"
मैने उत्तर दिया, "जरूर करूगा। अपने बस भर सबकुछ
करने के लिए मै आपके पास आया हू।
"नवयुवक, सच्चा सेवा-भाव इसीको कहते है।"
कुछ स्वय-सेवक उनके पास खडे थे। उनकी ओर मुखातिब
होकर कहा, "देखते हो, इस नवयुवक ने क्या कहा ?"
फिर मेरी ओर देखकर कहा, "तो लो, यह चिट्ठियों का
ढेर, और यह मेरे सामने पडी है कुरसी। उसे ले लो। देखते हो न,
सैकड़ो आदमी मुझसे मिलने आया करते है। अब मै उनसे मिलू
या जो लोग फालतू चिट्ठियां लिखा करते है उन्हे उत्तर दू
मेरे पास ऐसे कारकुन नहीं कि जिनसे में यह काम करा सक् । इन
चिदियो मे बहुतेरी तो फिजूल होगी, पर तुम सबको पढ जाना।
जिनकी पहुच लिखना जरूरी हो उनकी पहुच लिख देना और
जिनके उत्तर के लिए मुझसे पूछना हो पूछ लेना।"
उनके इस विश्वास से मुझे बड़ी खुशी हुई।
श्री घोषाल मुझे पहचानते न थे। नाम-ठाम तो मेरा उन्होंने
४६ देश-सेवकों के सस्मरण 1 बाद को जाना। चिट्ठियो के जवाब आदि का काम आसान था। सारे ढेर को मैने तुरत निपटा दिया । घोषालबाबू खुश हुए। उन्हे बात करने की आदत बहुत थी । मै देखता था कि वह बातो में बहुत समय लगाया करते थे। मेरा इतिहास जानने के बाद तो कारकुन का काम देने मे उन्हे जरा शर्म मालूम हुई, पर मैने उन्हे निश्चित कर दिया। "कहां मै और कहा आप | आप काग्रेस के पुराने सेवक, मेरे नजदीक तो आप मेरे बुजुर्ग है। मै ठहरा अनुभवहीन नवयुवक यह काम सौपकर मुझपर तो आपने अहसान ही किया है; क्योकि मुझे आगे चलकर काग्रेस में काम करना है। उसके काम-काज को समझने का अलभ्य अवसर आपने मुझे दिया है।" "सच पूछो तो यही सच्ची मनोवृत्ति है। परतु आजकल के नवयुवक ऐसा नही मानते । पर मै तो काग्रेस को उसके जन्म से जानता है। उसकी स्थापना करने मे मि०ह्य म के साथ मेरा भी हाथ था।" घोषालबाबू बोले। हम दोनो मे खासा संबध हो गया। दोपहर के खाने के समय वह मुझे साथ रखते। घोषालबाबू के बटन भी 'बेरा' लगाता। यह देखकर 'बेरा' का काम खुद मैने लिया। मुझे वह अच्छा लगता। बडे-बूढों की ओर मेरा बडा आदर रहता था। जब वह मेरे मनो- भावो से परिचित हो गये तब अपना निजी सेवा का सारा काम मुझे करने देते थे। बटन लगवाते हुए मुह पिचकारकर मुझसे कहते, "देखो न, काग्रेस के सेवक को बटन लगाने तक की फुरसत नहीं मिलती, क्योकि उस समय भी वे काम में लगे रहते है।" इस भोलेपन पर मुझे मन मे हँसी तो आई, परंतु ऐसी सेवा के लिए मन मे अरुचि बिल्कुल न हुई । उससे जो लाभ हुआ उसकी कीमत नही आकी जा सकती।' १ आत्मकथा, १६२७ अमृतलाल वि० ठक्कर ४७ वि० ठक्कर अमृतलाल ठक्करबापा आगामी २७ नवबर को ७० वर्ष के हो जायगे। बापा हरिजनो के पिता है और आदि-वासियो और उन सबके भी, जो लगभग हरिजनो की ही कोटि के है और जिनकी गणना अर्द्ध- सभ्य जातियो मे की जाती है। दिल्ली के हरिजन-निवास-वासियो की तजवीज इस प्रकार उनकी ७०वी जयती मनाने की है, जिस से ठक्करबापा के दिवस पर, हरिजन-कार्य के निमित्त, उन्हे ७०००) की एक विनम्र थैली भेट करना चाहते है । इसके लिए उन्होने मेरा आशीर्वाद मागा है। यह भी चाहते है कि उनके इस शुभ प्रयत्न को मै प्रकाश मे ला दू। पर मैने तो उन्हें झिडका है कि उनमे आत्म-श्रद्धा की कमी है। ठक्करबापा एक विरल लोकसेवक है। वह विनम्र स्वभाव के है। वह प्रशसा के भूखे नही। उनका जीवन कार्य ही उनका एकमात्र सतोष और विश्राम है । वृद्धावस्था उनके उत्साह को मद नही कर सकी है। वह स्वय एक सस्था है। एक बार जब मैने उनसे कहा कि वह थोडा आराम ले ले तो तुरत उनका जवाब आया, "जब इतना तमाम काम करने को पडा है, तब मैं आराम कैसे ले सकता हू ? मेरा काम ही मेरा आराम है।" अपने जीवन-कार्य मे वह जिस प्रकार अपनी शक्ति लगा रहे है, उसे देख कर तो उनके आस-पास रहनेवाले नवयुवक भी लज्जित हो जाते है। इतने महान् कार्य के लिए और उस जनसेवक के लिए, जो अपने विशाल वृद्ध कधो पर इतना भारी भार वहन कर रहा है, ७०००) की थैली एक प्रकार का अपमान है। कार्यकर्ताओ का तो यह लक्ष्य होना चाहिए कि सारे हिदुस्तान से वे ७०,०००) से कम तो किसी हालत मे इकट्ठे नही करेगे। महान् सेवा-प्रवृत्ति और उसके सेवा-रत पिता को देखते हुए, यह ७०,०००) की रकम भी कोई चीज नही है। लेकिन एक महीने के अंदर यह ?
४८ देश-सेवकों के सस्मरण रकम इकट्ठी करनी है, इस दृष्टि से यह ठीक ही है।' भारत-सेवक-समिति को अपने प्राणो की तरह प्रिय समझने- वाले एक मित्र श्री ठक्करबापा-कोष के लिए दस रुपये का चदा भेजते हुए लिखते है- "श्री ठक्करबापा की प्रशंसा में लिखे गये आपके एक-एक शब्द का मै समर्थन करता है। इस सबध में मेरी एक ही सूचना है और वह यह कि बापा के पुण्य कार्यों का सारा श्रेय भारत-सेवक- समिति को महज इसलिए नहीं मिलना चाहिए कि बापा उसके एक सदस्य है । समिति ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनको अपना सदस्य माना है और बापा के द्वारा मानव-जाति की जो. महान सेवा हुई है, उसपर हमेशा ही गर्व किया है।" यह शिकायत बिल्कुल ठीक है । दरअसल, बात तो यह है कि बापा की कई विशेषताओ का उल्लेख करते हुए मै उनकी एक खास विशेषता का उल्लेख करना भूल गया है, इसका मुझे खयाल ही न रहा। बात यह कि भारत-सेवक-समिति की सदस्यता स्वीकार करने से पहले बापा म्युनिसिपल कारपोरेशन, बबई के रोड इजीनियर का काम करते थे। हरिजन-सेवक-सघ को उनकी सेवाएं भारत-समिति की ओर से ही बतौर कर्ज के मिली है। बापा की इकहत्तरवी जयती मनाने मे मुझे हाजिर होना चाहिए। लेकिन मै इस लायक नही रहा हूँ। मेरी तो हार्दिक आशा है कि बापा सौ वर्ष पूरे करे। बापा का जन्म ही दलितो की सेवा लिए है, वह भले ही अस्पृश्य हो या भिल्ल या सताल या खासी इत्यादि । उनकी कदर करने में भी हम दलितो की कुछ-न-कुछ सेवा करते है । बापा की सेवा ने हिदुस्तान को बढाया है।' । ' हरिजन सेवक, २१-१०-३९ २ हरिजन सेवक, ४-११-३९ ३ हरिजन सेवक, ९-१२-३९
रवींद्रनाथ ठाकुर
४९
: १० :
रवींद्रनाथ ठाकुर
लार्ड हार्डिज ने डाक्टर रवीद्रनाथ ठाकुर को एशिया के
महा-कवि की पदवी दी थी, पर अब रवीद्रबाबू न सिर्फ एशिया के
बल्कि ससार भर के महाकवि गिने जा रहे है। उनके
हाथ से भारतवर्ष की सबसे बडी सेवा यह हुई है कि उन्होने अपनी
कविता द्वारा भारतवर्ष का सदेश ससार को सुनाया है। इसीसे
रवीद्रबाबू को सच्चे हृदय से इस बात की चिता है कि भारतवासी
भारत-माता के नाम से कोई झूठा या सारहीन सदेशा ससार को
न सुनावे। हमारे देश का नाम न डूबने पावे, इस बात की चिता
करना रवीद्रबाबू के लिए स्वाभाविक ही है।'
...
शांतिनिकेतन मे आगमन मेरे लिए एक तीर्थ यात्रा के
समान था। बहुत दिनो से मेरी इच्छा वहा जाने की थी, लेकिन
यह अवसर मलिकदा जाते समय ही मुझे मिल सका। मेरे लिए
शातिनिकेतन नया नही है। १९१५ मे जब इसकी रूपरेखा बन
रही थी तब मै वही था। इसका मतलब यह नही कि अब इसका
निर्माण-क्रम रुक गया है। गुरुदेव खुद विकसित हो रहे है । वृद्धा-
वस्था के कारण उनके मन के लचीलेपन मे कोई अतर नही पड़ा
है। इसलिए जबतक गुरुदेव की भावना की छाया उसके ऊपर है
तबतक शातिनिकेतन की वृद्धि रुक नही सकती। वहा प्रत्येक
मनुष्य की उनके प्रति जो श्रद्धा है वह ऊपर उठानेवाली है, क्योकि
वह सहज है। मुझे तो इसने अवश्य ही ऊचा उठाया। कृतज्ञ
छात्रो और अध्यापको ने उनको 'गुरुदेव' की जो उपाधि
दे रखी है उससे शातिनिकेतन मे उनकी स्थिति ठीक-ठीक
व्यक्त होती है। यह स्थिति उनकी इसलिए है कि वह उस
१ यंग इंडिया, १-६-२१
५० देश-सेवको के सस्मरण स्थान और वहा के समूह मे निमग्न हो गये है, अपनेको भूल गये है। मैने देखा कि वह अपनी प्रियतम कृति 'विश्व भारती' के लिए जी रहे है । वह चाहते है कि यह फूले-फले और अपने भविष्य के विषय मे निश्चित हो जाय । इस- के बारे मे उन्होने मुझसे देर तक बातचीत की। लेकिन इतना भी उनके लिए काफी नही था, इसलिए जब हम विदा हो रहे थे तब उन्होने मुझे नीचे लिखा बहुमूल्य पत्र दिया प्रिय महात्माजी, आपने आज सुबह ही हमारे कार्य के 'विश्व-भारती'-केद्र का विहगावलोकन किया है। मै नही जानता कि आपने इसकी मर्यादा का क्या अदाज लगाया है। आप जानते है कि यद्यपि अपने वर्त- मान रूप मे यह सस्था राष्ट्रीय है, तथापि अत भावना की दृष्टिं से यह एक सार्वदेशिक-अतर्राष्ट्रीय-सस्था है और अपने साधनो के अनुसार भरसक शेष जगत को भारत की सस्कृति का आतिथ्य प्रदान करती है। एक बडे गाढे अवसर पर आपने बिल्कुल टूटने से इसे बचाया और अपने पाव पर खडे होने में इसकी सहायता की। आपके इस मित्रतापूर्ण कार्य के लिए हम आपके निकट सदा आभारी है। और अब शातिनिकेतन से आपके विदा होने के पहले मैं आपसे जोरदार अपील करता है कि यदि आप इसे एक राष्ट्रीय संपत्ति समझते है तो इस सस्था को अपने सरक्षण मे लेकर इसे स्थायित्व प्रदान करे। 'विश्व-भारती' उस नौका के समान है, जो मेरे जीवन के सर्वोत्तम रत्नो से भरी हुई है और मुझे आशा है कि अपनी रक्षा के लिए अपने देशवासियों से यह विशेष देख-रेख पाने का दावा कर सकती है। प्रेमपूर्वक- रवीद्रनाथ ठाकुर . ? इस सस्था को अपने सरक्षण मे लेनेवाला मै कौन होता हू चूकि यह एक ईमानदार आत्मा की कृनि है, इसलिए ईश्वर का सरक्षण इसके साथ है । वह कोई दिखावे की चीज नहीं है। गुरुदेव रवीद्रनाथ ठाकुर स्वय सार्वदेशिक-अतर्राष्ट्रीय है, क्योकि वह सच्चे रूप मे राष्ट्रीय है। इसलिए उनकी सपूर्ण कृतिया सार्वदेशिक है और 'विश्व-भारती' उन सबमे श्रेष्ठ है। मुझे इसमे किसी तरह का सदेह नही कि जहातक आर्थिक बोझ का सबध है इसके भविष्य के बारे में गुरुदेव को सपूर्ण चिता से मुक्त कर देना चाहिए। उनकी हृदयग्राही अपील के जवाब मे जो कुछ सहायता करने लायक मै हू, करने का मैने उनको वचन दिया है।' .. ... मै हू यहा आप लोगो के लिए कोई अतिथि या महमान बन- कर नही आया हू । शातिनिकेतन तो मेरे लिए घर से भी अधिक है। जब १९१४ मे मै इग्लैण्ड से लौटनेवाला था तब यही तो मेरे दक्षिण अफ्रीकावाले कुटुब का प्रेमपूर्वक आतिथ्य हुआ था और यहा मुझे भी करीब एक महीने तक आश्रय मिला था। जब मै आप सब लोगो को अपने सामने एकत्र देखता तो उन दिनो की याद मेरे हृदय पर छा जाती है । मै कितना चाहता हू कि यहा ज्यादा दिन ठहरू, पर अफसोस कि यह सभव नही । यहा कर्तव्य का प्रश्न ह । उस दिन एक मित्र को एक पत्र मे मैने लिखा था कि शातिनिकेतन और मलिकंदा की यह यात्रा मेरे लिए तीर्थ यात्रा है। सचमुच इस बार शातिनिकेतन मेरे लिए 'शाति का निकेतन' सिद्ध हुआ। मै यहा राजनीति की सब चिता और झझट छोडकर मात्र गुरुदेव के दर्शन और आशीर्वाद लेने आया है। मैने अक्सर एक कुशल भिक्षुक होने का दावा किया है। लेकिन आज गुरुदेव का मुझे जो आशीर्वाद मिला है उससे बढकर दान मेरी झोली मे कभी किसीने नही डाला है। । मै जानता हूं कि उनका आशीर्वाद तो मुझे हमेशा ही है। मगर आज मेरा खास सौभाग्य है कि उन्हीके हाथो रूबरू मुझे आशीर्वाद मिला और इस कारण मेरे हर्ष का पार नही। १ हरिजन सेवक, २-३-४० हरिजन सेवक, ३०-३-४० देश-सेवको के संस्मरण - डा० रवीद्रनाथ टैगोर के निधन मे हमने न केवल अपने युग के सबसे बडे कवि को ही, बल्कि एक उत्कट राष्ट्रवादी को, जो कि मानवता का पुजारी भी था, खो दिया है। शायद ही कोई ऐसी सार्वजनिक प्रवृत्ति होगी, जिसपर उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व की छाप न पडी हो। शातिनिकेतन और श्रीनिकेतन के रूप मे उन्होने समस्त राष्ट्र के लिए ही नहीं, अपितु समस्त ससार के लिए विरासत छोडी है। ... ? । टैगोर की क्या बात | उन्होने क्या नही साधा साहित्य का एक भी क्षेत्र उन्होने छोडा है ? और सबमे कमाल ऐसी अलौकिक शक्तिवाला आदमी हमारे यहा तो है ही नही, लेकिन दुनिया मे भी होगा या नही, इसमे मुझे शक है। गुरुदेव की देह खाक मे मिल चुकी है, लेकिन उनके अदर जो जोत थी, जो उजेला था, वह तो सूरज की तरह था, जो तबतक बना रहेगा जबतक धरती पर जानदार रहेगे। गुरुदेव ने जो रोशनी फैलाई वह आत्मा के लिए थी। सूरज की रोशनी जैसे हमारे शरीर को फायदा पहुचाती है, वैसे गुरुदेव की फैलाई रोशनी ने हमारी आत्मा को ऊपर उठाया है। वह एक कवि थे और प्रथम श्रेणी के साहित्यिक थे। उन्होने अपनी मातृभाषा मे लिखा और सारा बगाल उनकी कविता के झरने से काव्य-रस का गहरा पान कर सका। उनकी रचनाओ के अनुवाद बहुत-सी भाषाओं मे हो चुके है। वह अग्रेजी के भी बहुत बडे लेखक थे और शायद बिना अग्रेजी जाने ही वह उस जबान के इतने बड़े लेखक बन गये थे। मदरसे की पढाई तो उन्होने की थी, लेकिन यूनिवर्सिटी की कोई १ १ हरिजन सेवक, ७-८-४१ २ 'महादेवभाई की डायरी रवींद्रनाथ ठाकुर डिग्री उन्होने नही ली थी। वह तो बस गुरुदेव ही थे। हमारे एक वाइसराय ने उनको ‘एशिया का कवि' कहा था। उससे पहले किसी को ऐसी पदवी नही मिली थी। वह समूची दुनिया के भी कवि थे। यही क्यो, वह तो ऋषि थे। हमारे लिए वह अपनी 'गीताजलि' छोड गये है, जिसने उनको सारी दुनिया में मशहूर कर दिया। तुलसी- दासजी हमारे लिए अपनी अमर रामायण छोड गये है। वेदव्यास- जी ने महाभारत के रूप मे हमारे लिए मानव-जाति का इतिहास छोडा है। ये सब निरे कवि नही थे। ये तो गुरु थे। गुरुदेव ने भी सिर्फ कवि के नाते ही नही, ऋषि की हैसियत से भी लिखा है। लेकिन सिर्फ लिखना ही उनकी अकेली खासियत नही थी । वह एक कलाकार थे, नृत्यकार थे और गायक थे। बढिया-से-बढिया कला मे जो मिठास और पवित्रता होनी चाहिए, वह सब उनमे और उनकी चीजो मे थी। नई-नई चीजे पैदा करने की उनकी ताकत ने हमको शातिनिकेतन, श्रीनिकेतन और विश्व-भारती जैसी सस्थाए दी है। अपनी इन सस्थाओ मे वह भावरूप से विराज- मान है, और ये अकेले बगाल को ही नहीं, बल्कि समूचे हिदुस्तान को उनकी विरासत के रूप में मिली है। शातिनिकेतन तो हम सबके लिए असल मे यात्रा का एक धाम ही बन गया है। गुरुदेव अपने जीतेजी इन सस्थाओ को वह रूप नही दे पाये,जो वह देना चाहते थे, जिसका वह सपना देखते थे। कौन है, जो ऐसा कर पाया हो? आदमी के मनोरथ को पूरा करना तो भगवान के हाथ मे है। फिर भी ये सस्थाए हमे उनकी कोशिशो की याद दिलावेगी और हमेशा हमको यह बताती रहेंगी कि गुरुदेव के मन मे अपने देश के लिए कितनी गहरी प्रीति थी और उन्होने उसकी कितनी- कितनी सेवाए की है। । १ . ' हरिजन सेवक, १९-५-४६ ५४ देश-सेवको के संस्मरण लोकमान्य तिलक लोकमान्य बाल गगाधर तिलक अब ससार मे नही है। यह विश्वास करना कठिन मालूम होता है कि वह ससार से उठ गये। हम लोगो के समय मे ऐसा दूसरा कोई नही, जिसका जनता पर लोकमान्य के जैसा प्रभाव हो । हजारो देशवासियो की उनपर जो भक्ति और श्रद्धा थी वह अपूर्व थी। यह अक्षरश सत्य है कि वह जनता के आराध्यदेव थे, प्रतिमा थे। उनके वचन हजारो आदमियो के लिए नियम और कानून-से थे। पुरुषो मे पुरुष-सिह ससार से उठ गया | केशरी की घोर गर्जना विलीन हो गई। देशवासियो पर उनका इतना प्रभाव होने का क्या कारण था? मै समझता हू, इस प्रश्न का उत्तर बडा ही सहज है। उनकी स्वदेश-भक्ति ही उनकी इद्रियवृत्ति थी। वह स्वदेश-प्रेम के सिवा दूसरा धर्म नही जानते थे। जन्म से ही वह प्रजासत्तावादी थे। बहुमत की आज्ञा पर इतना अधिक विश्वास करते थे कि मुझे उससे भयभीत होना पड़ता था। पर यही वह बात है जिससे जनता पर उनका इतना अधिक प्रभाव था। स्वदेश के लिए वह जिस इच्छा-शक्ति से काम लेते थे वह बडी ही प्रबल थी। उनका जीवन वह ग्रथ है जिसे खोलने की भी जरूरत नही, वह खुला हुआ ग्रथ है। उनका खाना-पीना और पहनावा बिल्कुल साधारण था। उनका व्यक्तिगत जीवन बडा ही निर्मल और बेदाग था। उन्होनें अपनी आश्चर्य-जनक बुद्धि- शक्ति को स्वदेश को अर्पण कर दिया था। जितनी स्थिरता और दृढता के साथ लोकमान्य ने स्वराज्य की शुभ वार्ता का उपदेश किया उतना और किसीने नही किया। इसी कारण स्वदेशवासी उनपर अटूट विश्वास रखते थे। साहस ने कभी उनका साथ नही छोडा। उनकी आशावादिता अदम्य थी। उनको आशा थी कि जीवनकाल मे ही मै सपूर्ण रूप से स्वराज्य स्थापित हुआ देख लोकमान्य तिलक सकूगा। यदि वह इसे नही देख सके तो उनका दोष नहीं है। उन्होने निस्सदेह स्वराज्य-प्राप्ति की अवधि बहुत कम कर दी है। मै अग्रेजो को ऐसी धारणा बनाने से मना करता हूँ कि लोकमान्य अग्रेजो के शत्रु थे, या अधिकारी वर्ग या अग्रेजी राज्य - से घृणा करते थे। कलकत्ता-काग्रेस के समय हिदी के राष्ट्र-भाषा होने के सबंध मे उन्होने जो कहा था, उसे सुनने का अवसर मुझे भी प्राप्त हुआ था। वह काग्रेस-पडाल से तुरत ही लौटे थे। हिदी के सबध में उन्होंने अपने शात भाषण मे जो कहा उससे बडी तृप्ति हुई। भाषण में उन्होने देशी भाषाओ पर खयाल रखने के कारण अग्रेजो की बड़ी प्रशसा की थी। विलायत जाने पर, यद्यपि उन्हे अग्रेज जूररो के विषय मे बुरा ही अनुभव हुआ तथापि उनका ब्रिटिश प्रजा-सत्ता मे बडा ही दृढ विश्वास हो गया। उन्होने यहातक कहा था कि पजाब के अत्याचारो का चित्र 'सिनेमेटोग्राफ' यत्र द्वारा ब्रिटिश प्रजासत्तावादियो को दिखाना चाहिए। मैने यहा इस बात का उल्लेख इसलिए नही किया कि मै भी ब्रिटिश प्रजासत्ता पर विश्वास रखता हूं (जो कि मै नही रखता), पर यह दिखाने के लिए कि वह अग्रेज-जाति के प्रति घृणा का भाव नही रखते थे। पर वह भारत और साम्राज्य की अवस्था को इस पिछडी अवस्था में न तो रखना ही चाहते थे और न रख सकते थे। वह चाहते थे कि शीघ्र ही भारत से समानता का भाव रखा जाय और इसे वह देश का जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे। भारत की स्वतत्रता के लिए उन्होने जो लडाई की उसमे सरकार को छोड़ नही दिया । स्वतत्रता के इस युद्ध मे उन्होने न तो किसीकी मुरव्वत की और न किसीकी प्रतीक्षा ही की । मुझे आशा है, अग्रेज लोग उस महापुरुष को पहचानेगे, जिनकी भारत पूजा करता था। भारत की भावी संतति के हृदय मे भी यही भाव बना रहेगा कि लोकमान्य नवीन भारत के बनानेवाले थे। वे तिलक महा- - देश-सेवकों के संस्मरण राज का स्मरण यह कह कर करेगे कि एक पुरुष था, जो हमारे लिए ही जन्मा और हमारे लिए ही मरा। ऐसे महापुरुष को मरना कहना ईश्वर की निदा करना है। उनका स्थायी तत्व सदा के लिए हम लोगो मे व्याप्त हो गया। आओ, हम भारत के एकमात्र लोकमान्य का अविनाशी स्मारक अपने जीवन मे उनके साहस, उनकी सरलता, उनके आश्चर्यजनक उद्योग और उनकी स्वदेश-भक्ति को सीखकर बनावे। ईश्वर उनकी आत्मा को शाति प्रदान करे। .. २ लोकमान्य तो एक ही थे। लोगो ने तिलक महाराज को जो पदवी, जो उच्चस्थान, दिया था वह राजाओ के दिये खिताबो से लाख-गुना कीमती था। देश ने आज यह बात सिद्ध कर दिखाई है। यह कहे तो अत्युक्ति नही होगी कि सारी बबई लोकमान्य को पहुचाने के लिए उलट पडी थी। उनके आखिरी दिनो मे जो दृश्य मैने अपनी आखो से देखा वह कभी भुलाया नहीं जा सकता। लोगो के उस अगाध प्रेम का वर्णन करना असभव है। फ्रास मे कहावत है कि 'राजा मर गये, राजा चिरजीव रहे।' यह विचार इगलैड आदि सारे देशो मे प्रचलित है और जब राजा की मृत्यु होती है तब यह कहावत कही जाती है। उसका भावार्थ यह है कि राजा तो मरता ही नही । राजतत्र एक मिनिट भी बद नही रहता। उसी प्रकार तिलक महाराज भी मर नही सकते, न मरे ही। बबई की जनता ने यह दिखला दिया कि वह जीते है और बहुत समय तक जीयेगे। उनके सगे-सबधियो को भले ही दुख हुआ हो, उन्होंने भले ही आखो से मोती टपकाये हो, परतु दूसरे लोग तो उत्सव मनाने के लिए आये थे। बाजे और भजन लोगो को चेतावनी दे १ यंग इंडिया ४-८-२० २ यहां सकेत मृत्यु के समय से है। .
लोकमान्य तिलक ५७ बात को रहे थे कि लोकमान्य मरे नही है । 'लोकमान्य तिलक महाराज की जय' ध्वनि से आकाश गूज उठता थी। उस समय लोग इस भूल गये थे कि हम तो तिलक महाराज के देह के दाह-कर्म के लिए आये है। शनिवार की रात को जब मैने उनके स्वर्गवास की खबर सुनी तब मेरा चित्त व्याकुल हो रहा था, पर जयघोष सुनकर मेरी बेचैनी जाती रही। मेरी भी यही धारणा हुई कि तिलक महाराज जीवित है। उनका क्षण-भगुर देह छूट गया है, पर उनकी अमर आत्मा तो लाखो लोगो के हृदय में विराजमान है। इस जमाने मे किसी भी लोकनायक को ऐसी मृत्यु का सौ- • भाग्य प्राप्त नहीं हुआ था । दादाभाई गये, फिरोजशाह गये, गोखले भी चले गये। सबके साथ हजारो लोग श्मशान तक गये थे, पर तिलक महाराज ने तो हद कर दी। उनके पीछे तो सारी दुनिया गई। रविवार को बबई बावली हो गई थी। यह कैसा चमत्कार ! ससार मे चमत्कार नाम की कोई वस्तु ही नहीं। अथवा यो कहे कि जगत स्वय ही एक चमत्कृति है। बिना कारण के कोई काम नहीं होता। इस सिद्धात मे कोई अपवाद नही हो सकता। लोकमान्य का हिदुस्तान पर असीम प्रेम था। इसी कारण लोक-प्रेम की भी मर्यादा नही रह गई थी। स्वराज्य के मत्र का जितना जप उन्होने किया है उतना दूसरा किसीने नही किया। जिस समय दूसरे लोग यह मानते थे कि हा, अब भारत स्वराज्य के योग्य होगा, उस समय लोकमान्य सच्चे दिल से मानते थे कि भारत आज ही तैयार है। लोकमान्य की इस धारणा ने लोगो के मन को हर लिया था। ऐसा मानकर वह बैठे नही रहे, बल्कि जिदगी भर उसके अनुसार काम किया। उससे जनता मे नवीन चैतन्य, नया जोश पैदा हुआ । उन्होने स्वराज्य प्राप्त करने की अपनी अधीरता का स्वाद लोगो को चखाया और ज्यो-ज्यो जनता को उसका स्वाद मालूम होने लगा त्यो-त्यो वह उनकी तरफ खिचती गई।
५८ देश-सेवको के संस्मरण . उनपर अनेक तरह की आफते आई, तरह-तरह के कष्ट उन्हे सहने पडे, तो भी उन्होने उस मत्र का अनुष्ठान नही छोडा । इस तरह वह कठिन परीक्षाओ मे भी पास हुए। इससे जनता ने उन्हे अपने हृदय का सम्राट् बनाया और उनका वचन उसके लिए कानून की तरह मान्य हो गया। देह के नष्ट हो जाने से ऐसा महान् जीवन नष्ट नहीं होता, बल्कि देह-पात के बाद से तो वह शुरू होता है। जिसे हम पूजनीय मानते है उसकी सच्ची पूजा तो उसके सद्गुणो का अनुकरण करना ही है । लोकमान्य अत्यत सादगी के साथ रहते थे। उनके स्मरण के लिए हमे भी अपना जीवन सादा बनाना चाहिए। हमे उस सीमा तक वस्तुओ का त्याग करना चाहिए, जिस तक के लिए हमारा मन गवाही देता हो । अपने निश्चित कार्य को करने से कभी पीछे नही हटना चाहिए। वह विचारशील थे। हमे भी विचार करके ही बोलना और काम करना चाहिए। वह विद्वान् थे, अपनी मातृभाषा और सस्कृति पर उनका खूब प्रभुत्व था । हमे भी उनकी तरह विद्वान् होने का निश्चय करना चाहिए । व्यवहार मे विदेशी भाषा का त्याग करके मातृ- भाषा का काफी ज्ञान प्राप्त करना और उसीके द्वारा अपने विचारो को प्रकट करने का अभ्यास करना चाहिए। हमे सस्कृत भाषा का अध्ययन करके अपने धर्म-शास्त्रो मे छिपे धर्म-रहस्यो को प्रकट करना चाहिए। वह स्वदेशी के प्रेमी थे। हमे भी स्वदेशी का अर्थ समझकर उसका व्यवहार करना चाहिए। उनके हृदय मे अपने देश के प्रति अथाह प्रेम था। हम भी अपने हृदय मे ऐसा प्रेम उदय करे और दिन-प्रतिदिन देश-सेवा मे अधिकाधिक तत्पर हो। इसी रीति से उनकी पूजा हो सकती है। जिनसे इतना न हो सके वे उनकी यादगार के लिए जितना हो सके धन दे और वह स्वराज्य के कार्य मे खर्च किया जाय । लोकमान्य वर्तमान राज्य-मडल के कट्टर शत्रु थे । पर इससे यह न समझना चाहिए कि वह अग्रेजो से द्वेष करते थे। जो प लोकमान्य तिलक लोग ऐसा समझते है वे भूल करते है। उन्ही के श्रीमुख से मैने कई बार अग्रेजो की प्रशसा सुनी है। वह अग्रेजी राज्य के सबध को भी अनिष्ट नही मानते थे। वह तो सिर्फ अपनेको अग्रेजो के बराबर मनवाना चाहते थे। किसीका भी गुलाम बनकर रहना उन्हे पसदन था। ने . "शठ प्रति शाठ्यम्" तिलक महाराज का जीवन-मत्र नही था । अगर ऐसा होता तो वह इतनी लोकप्रियता प्राप्त न कर सकते । मेरी जान मे ससार-भर मे ऐसा भी एक उदाहरण नही है, जिससे किसी मनुष्य इस सिद्धात पर अपना जीवन-निर्माण किया हो और फिर भी वह लोकमान्य बन सका हो । यह सच है कि इस बारे में जितना गहरा मै पैठता हू, वह नही पैठते थे। हम शठ के प्रति शाठ्य का कदापि उपयोग कर ही नही सकते। 'गीता- रहस्य' मे एक-दो स्थानो मे, सिर्फ एक-ही दो स्थानो मे, इस बात का थोडा समर्थन जरूर मिलता है। लोकमान्य मानते थे कि राष्ट्र- हित के लिए अगर कभी शाठ्य से, दूसरे शब्दो मे 'जैसे को तैसा' सिद्धात से, काम लेना पडे तो ले सकते है। साथ ही वह यह भी मानते तो थे ही कि शठ के सामने भी सत्य का प्रयोग करना अच्छा है, यही सत्य सिद्धात है। मगर इस सबध मे वह कहा करते थे कि साधु लोग ही इस सिद्धात पर अमल कर सकते है। तिलक महा- राज की व्याख्या के मुताबिक साधु लोगो से अर्थ वैरागियो का नही, बल्कि उन लोगो से होता है जो दुनिया से अलिप्त रहते है, दुनियादारी के कामो में भाग नही लेते । इससे यह अर्थ नही निकलता कि अगर कोई दुनिया मे रहकर इस सिद्धात का पालन करे तो अनुचित होगा--हा, वह न कर सके यह दूसरी बात है। वह मानते थे कि शाठ्य का उपयोग करने का उसे अधिकार है। लेकिन ऐसे महान् पुरुष के जीवन का मूल्य ठहराने का हमे कोई अधिकार हो तो हम विवादास्पद बातो से उसका मूल्य न १ हिंदी नवजीवन, ६-८-२२ देश-सेवको के सस्मरण करे। ठहरावे । लोकमान्य का जीवन भारत के लिए, समस्त विश्व के लिए, एक बहुमूल्य विरासत है। उसकी पूरी कीमत तो भविष्य मे निश्चित होगी। इतिहास ही उसकी कीमत का अनुमान लगावेगा, वही लगा सकता है। जीवित मनुष्य का ठीक-ठीक मूल्य, उसका सच्चा महत्व, उसके समकालीन कभी ठहरा ही नही सकते । उनसे कुछ-न-कुछ पक्षपात तो हो ही जाता है, क्योकि रागद्वेष-पूर्ण लोग ही इस काम के कर्ता भी होते है। सच पूछा जाय तो इतिहासकार भी राग-द्वेष-रहित नही पाये जाते। समकालीन व्यक्ति मे विशेष पक्षपात होने की सभावना रहती है । लोकमान्य के महान् जीवन का उपयोग तो यह है कि हम उनके जीवन के शाश्वत सिद्धातो का सदा स्मरण और अनुकरण तिलक महाराज का देश-प्रेम अटल था । साथ ही उनमे तीक्ष्ण न्याय-वृत्ति भी थी। इस गुण का परिचय मुझे अनायास मिला था। १९१७ की कलकत्ता-महासभा के दिनो मे, हिदी साहित्य सम्मेलन की सभा मे भी वह आये थे। महासभा के काम से उन्हे फुर्सत तो कैसे हो सकती थी? फिर भी वह आये और भाषण करके चले गये। मैने वही देखा कि राष्ट्र-भाषा हिदी के प्रति उनमे कितना प्रेम था। मगर इससे भी बढ़कर जो बात मैने उनमे देखी, वह थी अग्रेजो के प्रति की उनकी न्याय-वृत्ति । उन्होन अपना भाषण ही यो शुरू किया था--"मै अग्रेजी शासन की खूब निदा करता हूं, फिर भी अग्रेज विद्वानो ने हमारी भाषा की जो सेवा की है, उसे हम भुला नही सकते।" उनका आधा भाषण इन्ही बातो से भरा था। आखिर उन्होने कहा था कि अगर हमे राष्ट्र- भाषा के क्षेत्र को जीतना और उसकी वृद्धि करना हो तो हमे भी अग्रेज विद्वानो की भाति ही परिश्रम और अभ्यास करना चाहिए। अपनी लिपि की रक्षा और व्याकरण की व्यवस्था के लिए हम एक बडी हद तक अग्रेज विद्वानो के आभारी है । जो पादरी आरभ मे आये थे, उनमे पर-भाषा के लिए प्रेम था। गुजराती मे टेलर- कृत व्याकरण कोई साधारण वस्तु नही है। लोकमान्य ने इस बात लोकमान्य तिलक ६१ ? क्या हम का विचार भी नही किया कि अग्रेजो की स्तुति करने से मेरी लोक- प्रियता घटेगी। लोगो का तो यही विश्वास था कि वह अग्रेजो की निदा ही कर सकते है। तिलक महाराज मे जो त्याग-वृत्ति थी, उसका सौवा या हजारवा भाग की हम अपने मे नही बता सकते। और उनकी सादगी? उनके कमरे मे न तो किसी तरह का फर्नीचर होता था, न कोई खास सजावट । अपरिचित आदमी तो खयाल भी नही कर सकता था कि वह किसी महान् पुरुष का निवास स्थान है। रग-रग मे भिदी हुई उनकी इस सादगी का हम अनुकरण करे तो कैसा हो ? उनका धैर्य तो अद्भुत था ही। अपने कर्तव्य मे वह सदा अटल रहते और उसे कभी भूलते ही न थे। धर्मपत्नी की मृत्यु का सवाद पाने पर भी उनकी कलम चलती ही रही । तिलक महाराज के जीवन का एक भी ऐसा क्षण बतला सकते है, जो भोग-विलास मे बीता हो? उनमे जबर्दस्त सहिष्णुता थी। यानी वह चाहे जैसे उद्दड-से-उद्दड आदमी से भी काम करवा लेते थे। लोकनायक मे यह शक्ति होनी चाहिए। इससे कोई हानि नही होती। अगर हम सकुचित हृदय बन जाय और सोच ले कि फला आदमी से काम लेगे ही नही, तो या तो हमे जगल मे जाकर बस जाना चाहिए, या घर बैठे-बैठे गृहस्थ का जीवन बिताना चाहिए । इसमे शर्त यही है कि स्वय अलिप्त रह सके । मुह से तिलक महाराज का बखान करके ही हम चुप न हो बठे। काम, काम और काम ही हमारा जीवन-सूत्र होना चाहिए। जब कि हम स्वराज्य-यज्ञ को चालू रखना चाहते है, हमे चाहिए कि हम निकम्मे साहित्य का पढना बद कर दे, निरर्थक बातें करना छोड दे और अपने जीवन का एक-एक क्षण स्वराज्य के काम मे बिताने लगे। आप पूछेगे कि क्या पढाई छोडकर यह काम करे ? १९२१ मे भी विद्यार्थियो के साथ मेरा यही झगडा था कि तिलक महाराज ने क्या किया था ? उन्होने जो बड़े-बडे ग्रथ लिखे, वे बाहर रहकर नही, जेल में रहकर लिखे थे। 'गीता-रहस्य' और ६२ देश-सेवको के संस्मरण - - 'आक्टिक होम' वह जेल मे ही लिख सके थे। बडे-बडे मौलिक ग्रथ लिखने की शक्ति होते हुए भी उन्होने देश के लिए उसका बलि- दान किया था। उन्होने सोचा, “घर के चारो ओर आग भभक उठी है। इसे जितनी बुझा सकू, उतनी तो बुझाऊ।" उन्होने अगर हजार घडे पानी से वह बुझाई हो तो हम एक ही घडा डाले, मगर डाले तो सही। पढाई आदि आवश्यक होते हुए भी गौण बाते है। अगर स्वराज्य के लिए इनका उपयोग होता हो तो करना चाहिए, अन्यथा इन्हें तिलाजलि देनी चाहिए। इससे न हमारा नुकसान है और न ससार का। तिलक महाराज अपने जीवन द्वारा इसका प्रत्यक्ष उदा- हरण छोड गये है। जिनके जीवन मे से इतनी सारी बाते ग्रहण करने योग्य हो, जिनकी विरासत इतनी जबर्दस्त हो, उनके सबध मे उक्त प्रश्न के लिए गुजाइश ही नही रहती है। हमारा धर्म तो गुणग्राही बनने का है। आज हमे जो काम करना है, वह मुर्दार आदमियो के करने से तो हो नहीं सकता। स्वराज्य का काम कठिन है। भारत मे आज एक लहर बह रही है। उसमे खिचकर हम भाषण करते है, धीगाधीगी मचाते है, तूफान खडे करते है, मनमाने तौर पर सस्थाओ मे घुस जाते है और फिर उन्हे नष्ट करते एव धारा- सभाओ मे जाकर भाषण करते है। तिलक महाराज के जीवन मे ये बाते हमारे देखने में भी नही आती। उनके जीवन के जो गुण अनुकरणीय है, सो तो मै ऊपर कह ही चुका हू।' १ लोकमान्य की पुण्यतिथि पर गुजरात विद्यापीठ में दिया गया भाषण।
अब्बास तैयबजी ६३ : १२: अब्बास तैयबजी सबसे पहले सन् १९१५ मे मै अब्बास तैयबजी से मिला था। जहा कही मै गया, तैयबजी-परिवार का कोई-न-कोई स्त्री-पुरुष मुझसे आकर जरूर मिला । ऐसा मालूम पड़ता है, मानो इस महान् और चारो तरफ फैले हुए परिवार ने यह नियम ही बना लिया था। हमारे बीच इस अटूट सबध का खास कारण क्या था? सिवा इसके मुझे और कुछ मालूम नही कि जिस सुप्रतिष्ठित न्यायाधीश के कारण यह वश प्रसिद्ध है उससे सन् १८९० मे मेरी मित्रता हो गई थी, जबकि मै दक्षिण अफ्रीका से हिदुस्तान वापस आया था और बिल्कुल अनजान व्यक्ति था। कुछ लोगो के विचार मे तो मै सभवत एक दुःसाहसी आदमी था, लेकिन बदरुद्दीन तैयबजी और कुछ अन्य व्यक्ति ऐसे भी थे, जिनका यह खयाल नही था। मगर मुझे तो बडौदा के अब्बास मिया के विषय पर ही आना चाहिए। जब हम एक-दूसरे से मिलते और मै उनके मुह की ओर देखता तो मुझे स्व० जस्टिस बदरुद्दीन तैयबजी का स्मरण हो आता था। हमारी उस मुलाकात से हमारे बीच जन्म-भर के लिए मित्रता की गाठ बध गई। मैने उन्हेहरिजनो का मित्र ही नहीं, बल्कि उन्हीमे का एक पाया। बहुत दिन पहले गोधरा मे, शाम को हरिजनो की बस्ती मे होनेवाले एक अस्पृश्यता-विरोधी-सम्मेलन मे जब मैने उन्हे बुलाया तो दर्शको को बड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन अब्बास मिया ने हरिजनो के काम मे उसी उत्साह से भाग लिया, जैसे कोई कट्टर हिदू ले सकता है। इतने पर भी वह कोई साधारण मुसलमान नहीं थे। इस्लाम के लिए उन्होने मुक्तहस्त तहस्त से दान दिया और कई मुस्लिम सस्थाओ को वह सहायता देते रहते थे। मगर हरिजनो को मुसलमान बनाने जैसा कोई विचार उनके मन मे नही था। उनके इस्लाम मे भूमडल के तमाम महान् धर्मो के ६४ देश-सेवको के सस्मरण . लिए गुजाइश थी । इसीलिए अस्पृश्यता-विरोधी-आंदोलन में वह हिंदुओ की ही तरह उत्साहपूर्वक भाग लेते थे, और मै जानता कि जबतक वह जिदा रहे तबतक उनका यह उत्साह बराबर वैसा ही बना रहा। असल बात यह है कि उन्होने आधे मन से कभी कोई काम नही किया। अब्बास तैयबजी अपने मन में कोई बात छिपा कर नहीं रखते थे। पजाब की पुकार का उन्होने तत्क्षण जवाब दिया। उनकी आयु के और ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसने जीवन में कभी कोई मुसीबत नही झेली, जेलो की सख्तिया बर्दाश्त करना कोई मजाक नहीं था। लेकिन उनकी श्रद्धा ने हरेक कठिनाई को विजय कर लिया। हँसते-हँसाते खेडा के किसानो की तरह ही सादा जीवन व्यतीत करते, उन्हीका-सा खाना खाते और सब मौसमो मे उन्हीकी रद्दी-सही गाडियो में सफर करने की क्षमता से अनेक नौजवानो को उनके सामने शर्मिंदा होना पड़ा। ऐसी असुविधाओ के बारे मे, जिन्हे कि बचाया जा सकता हो, मैने उनको कभी शिकायत करते हुए नहीं सुना। "क्यो?" का प्रश्न करना उनका काम नही था, वह तो काम करने और अपनेको झोक देने की बात जानते थे। हालाकि एक समय चीफ जज की हैसियत से उन्हे किसीको मृत्युदण्ड देने और अपनी आज्ञा-पालन कराने की सत्ता प्राप्त थी, फिर भी बिना किसी उन के अनुशासन पालन करने की आश्चर्यजनक क्षमता उन्होने प्रदर्शित की। वह मनुष्य-जाति के विरले सेवको मे से थे। भारत-सेवक भी वह इसीलिए थे कि वह मनुष्य-जाति के सेवक थे। ईश्वर को वह दरिद्र-नारायण के रूप में मानते थे। उनका विश्वास था कि परमेश्वर दीन-दुखियो के बीच ही रहता है । अब्बास मिया का शरीर यद्यपि इस समय कब्र मे विश्राम कर रहा है, पर वह मरे नहीं है। उनका जीवन हम सबके लिए एक स्फूर्ति है, एक प्रेरणा है। - १ हरिजन सेवक, २०-८-३६ १ देशबंधु चित्तरंजन दास ६५ देशबंधु चित्तरंजन दास देशबधु दास एक महान् पुरुष थे। मैं गत छ वर्षों से उन्हें जानता हू। कुछ ही दिन पहले जब मै दार्जिलिग से उनसे विदा हुआ था तब मैने एक मित्र से कहा था कि जितनी ही घनिष्ठता उनसे बढ़ती है उतना ही उनके प्रति मेरा प्रेम बढता जाता है। मैने दार्जिलिग मे देखा कि उनके मन मे भारत की भलाई के सिवा और कोई विचार न था। वह भारत की स्वाधीनता का ही सपना देखते थे, उसीका विचार करते थे और उसीकी बातचीत करते 'थे, और कुछ नही । दार्जिलिग से विदा होते समय भी उन्होने मुझसे कहा था कि आप बिछुडे हुए दलो को एक करने के लिए बगाल मे अधिक समय तक ठहरिये, ताकि सब लोगो की शक्ति एक कार्य के लिए युक्त हो जाय । मेरी बगाल-यात्रा मे उनसे मत- भेद रखनेवालो ने भी बिना हिचकिचाहट के इस बात को स्वीकार किया है कि बगाल मे ऐसा कोई मनुष्य नही है, जो उनका स्थान ले सके। वह निर्भीक थे, वीर थे। बगाल मे नवयुवको के प्रति उन- का निस्सीम स्नेह था। किसी नवयुवक ने मुझसे ऐसा नही कहा कि देशबधु से सहायता मागने पर कभी किसीकी प्रार्थना खाली गई। उन्होने लाखो रुपया पैदा किया और लाखो रुपया बगाल के नव- युवको मे बाट दिया। उनका त्याग अनुपम था, और उनकी महान् बुद्धिमत्ता और राजनीतिज्ञता की बात मै क्या कह सकता | दार्जिलिंग मे उन्होने मुझसे अनेक बार कहा कि भारत की स्वाधीनता अहिसा और सत्य पर निर्भर है। देशबधु ने पटना और दार्जिलिग मे चरखा कातने की कोशिश की थी। मैने उनको चरखा का पाठ पढाया था और उन्होने मुझ- से वादा किया था कि मैं कातना सीखने की कोशिश करूगा और जबतक शरीर रहेगा तबतक कातूगा। उन्होने अपने दार्जिलिग . हू देश-सेवको के संस्मरण के निवास स्थान को 'चरखा-क्लब' बना दिया था। उनकी नेक पत्नी ने वादा किया कि बीमारी की हालत छोडकर मै रोज आध घटे तक स्वय चरखा चलाऊगी और उनकी लडकी, बहन और बहन की लडको तो बराबर ही चरखा कातती थी। देशबधु मुझसे अक्सर कहा करते-"मै समझता हू कि धारा सभा में जाना जरूरी है मगर चरखा कातना भी उतना ही जरूरी है। न सिर्फ जरूरी है, बल्कि बिना चरखे के धारा सभा के काम को कारगर बनाना असभव है।" उन्होने जबसे खादी की पोशाक पहनना शुरू किया तब से मरने के दिन तक पहनते आये। मेरे लिए यह कहने की बात नही है कि उन्होने हिदू-मुसल- मानो मे मेल करने के लिए कितना बड़ा काम किया था। अछूतो से वह कितना प्रेम रखते थे, इसके विषय मे सिर्फ वही एक बात कहूगा जो मैने बारीसाल मे कल रात को एक नाम-शूद्र नेता से सुनी थी। उस नेता ने कहा--" -"मुझे पहली आर्थिक सहायता देशबधु ने दी और पीछे डाक्टर राय ने।" देशबधु देश-सेवको मे एक रन थे। उनकी सेवा और त्याग बेजोड था। ईश्वर करे, उनकी याद हमे सदा बनी रहे और उनका आदर्श हमारे सदुद्योग मे सार्थक हो। हमारा मार्ग लबा और दुर्गम है। हमको उसमे आत्म- निर्भरता के सिवा और कोई सहारा नही देगा। स्वावलबन ही देशबधु का मुख्य सूत्र था। वह हमे सदा अनुप्राणित करता रहेगा। १९१९ मे, मनुष्यो मे से एक दिग्गज पुरुष उठ गया। पजाब महासभा जाच-समिति के सिलसिले में उनसे पहले-पहल मेरा प्रत्यक्ष परिचय हुआ। मै उनके प्रति सशय और भय के भाव लेकर उनसे मिलने गया था। दूर से ही मैने उनकी धुआधार वकालत और उससे भी अधिक धुआधार वक्तृत्व का हाल सुना था। वह अपनी मोटरकार लेकर सपत्नीक, सपरिवार आये थे और १ हिंदी नवजीवन, २५-६-२५ १ देशबंधु चित्तरजन दास ६७ एक राजा की शान-बान के साथ रहते थे। मेरा पहला अनुभव तो कुछ अच्छा न रहा । हम हटर-कमिटी की तहकीकात मे गवा- हिया दिलाने के प्रश्न पर विचार करने के लिए बैठे थे। मैने उनके अदर तमाम कानूनी बारीकियो को तथा गवाह को जिरह मे तोड- कर फौजी कानून के राज्य की, बहुतेरी शरारतो की कलई खोलने की, वकीलोचित तीव्र इच्छा देखी । मेरा प्रयोजन कुछ भिन्न था। मैने अपना कथन उन्हे सुनाया। दूसरी मुलाकात मे मेरे दिल को तसल्ली हुई और मेरा तमाम डर दूर हो गया। उनसे मैने जो कुछ कहा उसको उन्होने उत्सुकता के साथ सुना । भारतवर्ष मे पहली ही बार बहुतेरे देशसेवको के घनिष्ठ समागम मे आने का अवसर मुझे मिला था । तबतक मैने महासभा के किसी काम मे वैसे कोई हिस्सा न लिया था। वह मुझे जानते थे- एक दक्षिण अफ्रीका का योद्धा है। पर मेरे तमाम साथियो ने मुझे अपने घर का-सा बना लिया, और देश के इस विख्यात सेवक का नबर इसमे सबसे आगे था। मै उस समिति का अध्यक्ष माना जाता था। "जिन बातो मे हमारा मतभेद होगा उनमे मै अपना कथन आपके सामने उपस्थित कर दूगा। फिर जो फैसला आप करेगे उसे मै मान लूगा। इसका यकीन मै आपको दिलाता हू।" उनके इस स्वयस्फूर्त आश्वासन के पहले ही हममे इतनी घनिष्ठता हो गई थी कि मुझे अपने मन का सशय उनपर प्रकट करने का साहस हो गया। फिर जब उनकी ओर से यह आश्वासन मिल गया तब मुझे ऐसे मित्र- निष्ठ साथी पर अभिमान तो हुआ, कितु साथ ही कुछ सकोच भी मालूम हुआ, क्योकि मै जानता था कि मै तो भारत की राज- नीति मे एक नौसिखिया था और शायद ही ऐसे पूर्ण विश्वास का अधिकारी था। परतु तत्र-निष्ठा छोटे-बडे के भेद को नही जानती। वह राजा जो कि तत्र-निष्ठा के मूल्य को जानता है अपने सेवक की भी बात, उस मामले मे मानता है, जिसका पूरा भार उसपर छोड़ देता है। इस जगह मेरा स्थान एक सेवक के जैसा था। और में इस बात का उल्लेख कृतज्ञता और अभिमान के साथ करता ६८ देश-सेवकों के संस्मरण हू कि मुझे जितने मित्र-निष्ठ साथी वहा मिले थे, उनमे कोई इतना मित्र-निष्ठ न था जितना चित्तरजन दास थे। अमृतसर-धारा-सभा मे तत्र-निष्ठ का अधिकार मुझे नही मिल सकता था। वहा हम परस्पर योद्धा थे, हर शख्स को अपनी अपनी योग्यता के अनुसार राष्ट्र-हित-सबधी अपने ट्रस्ट की रक्षा करनी थी, जहा तर्क अथवा अपने पक्ष की आवश्यकता के अलावा किसीकी बात मान लेने का सवाल न था। महासभा के मच पर पहली लडाई लडना मेरे लिए एक पूरे आनद और तृप्ति का विषय था। बडे सभ्य, उसी तरह न झुकनेवाले महान् मालवीयजी बला- बल को सामने रखने की कोशिश कर रहे थे। कभी एक के पास जाते थे,कभी दूसरे के पास । महासभा के अध्यक्ष पडित मोतीलाल- जी ने सोचा कि खेल खतम हो गया। मेरी तो लोकमान्य और देशबधु से खासी जम रही थी। सुधार-सबधी प्रस्ताव का एक ही सूत्र उन दोनो ने बना रखा था। हम एक-दूसरे को समझा देना चाहते थे, पर कोई किसीका कायल न होता था । बहुतो ने तो सोचा था कि अब कोई चारा नही था और इसका अत बुरा रहेगा। अलीभाई, जिन्हे मै जानता था और चाहता था, पर आज की तरह जिनसे मेरा परिचय न था, देशबधु के प्रस्ताव के पक्ष मे मुझे समझाने लगे। मुहम्मद अली ने अपनी लुभावनी नम्रता से कहा, "जाच-समिति में आपने जो महान कार्य किया है, उसे नष्ट न कीजिये।" पर वह मुझे न पटा सके। तब जयरामदास वह ठडे दिमागवाला सिंधी आया, और उसने एक चिट मे समझौते की सूचना और उसकी हिमायत लिखकर मेरे पास पहुचाई। मै शायद ही उन्हे जानता था । पर उनकी आंखो और चेहरे में कोई ऐसी बात थी जिसने मुझे लुभा लिया। मैने उस सूचना को पढा । वह अच्छी थी। मैने उसे देशबधु को दिया। उन्होने जवाब दिया, "ठीक है, बशर्तेकि हमारे पक्ष के लोग उसे मान ले।" यहां ध्यान दीजिये उनकी घनिष्ठता पर । अपने पक्ष के लोगो का समाधान किये बिना वह नही रहना चाहते थे। यही एक रहस्य है लोगों के देशबधु चित्तरजन दास - हृदय पर उनके आश्चर्यजनक अधिकार का । वह सब लोगो को पसंद हुई। लोकमान्य अपनी गरुड के सदृश तीखी आखो से वहा जो कुछ हो रहा था सब देख रहे थे। व्याख्यान-मच से पडित मालवीयजी की गगा के सदृश वाग्धारा बह रही थी। उनकी एक आख सभामच की ओर देख रही थी जहाकि हम साधारण लोग बैठकर राष्ट्र के भाग्य का निर्णय कर रहे थे। लोकमान्य ने कहा- "मेरे देखने की जरूरत नही । यदि दास ने उसे पसद कर लिया है तो मेरे लिए वह काफी है।" मालवीयजी ने उसे वहा से सुना, कागज मेरे हाथ से छीन लिया और घोर करतल ध्वनि से घोषित कर दिया कि समझौता हो गया। मैने इस घटना का सविस्तर वर्णन इसलिए किया है कि उसमे देशबधु की महत्ता और नि- विवाद नेतृत्व, कार्य-विषयक दृढता, निर्णय-सबधी समझदारी और पक्ष-निष्ठा के कारणो का संग्रह आ जाता ह। अब और आगे बढिये । हम जुहू, अहमदाबाद, दिल्ली और दार्जिलिग पहुचते है । जुहू मे वे और पडित मोतीलालजी मुझे अपने पक्ष मे मिलाने के लिए आये। वह दोनो जोडवा भाई हो गये थे। हमारे दृष्टि-बिदु अलग-अलग थे, पर उन्हे यह गवारा न होता था कि मेरे साथ मतभेद रहे। यदि उनके बस का होता तो वे ५० मील चले जाते जहा मै सिर्फ २५ मील चाहता, परतु वे अपने एक अत्यत प्रिय मित्र के सामने भी एक इच न झुकना चाहते थे, जहां कि देशहित सकट मे था। हमने एक प्रकार का समझौता कर लिया । हमारा मन तो न भरा, पर हम निराश न हुए। हम एक-दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए तुले हुए थे। फिर हम अहमदाबाद मे मिले। देशबधु अपने पूरे रग मे थे और एक चतुर खिलाडी की तरह सब रग-ढग देखते थे। उन्होने मुझे एक शान की शिकस्त दी। उनके जैसे मित्र के हाथो ऐसी कितनी शिकस्त मैं न खाऊगा । पर अफसोस | वह शरीर अब दुनिया मे नही रहा वह अक्सर आध्यात्मिकता की बाते करते थे और कहते ।
देश-सेवको के सस्मरण थे कि धर्म के विषय मे आपका मेरा कोई मतभेद नही है। पर यद्यपि उन्होने कहा नहीं तथापि हो सकता है कि उनका भाव यह रहा हो कि मै इतना काव्यहीन हू कि मुझे हमारे विश्वासो की एकात्मता नही दिखाई देती। मैं मानता हू कि उनका खयाल ठीक था। उन बहुमूल्य पाच दिनो मे मैने उनका हर कार्य धर्म- मय देखा और न केवल वह महान् थे, बल्कि नेक भी थे, उनकी नेकी बढती जा रही थी। जबकि क्रूर दैव ने लोकमान्य को हमसे छीन लिया तब मैं अकेला असहाय रह गया । अभी तक मेरी वह चोट गई नही है, क्योकि अबतक मुझे उनके प्रिय शिष्यो की आराधना करनी पडती है। पर देशबधु के वियोग ने तो मुझे और भी बुरी हालत मे छोड़ दिया है।' उनका त्याग महान् था। उनकी उदारता की सीमा न थी। उनकी मुट्ठी सदा सबके लिए खुली रहती थी। दान देने मे वह कभी आगा-पीछा न सोचते थे। उस दिन मैने बड़े मीठे भाव से कहा, "अच्छा होता, आप दान देने में अधिक विचार से काम लेते।" उन्होने तुरत उत्तर दिया, “पर मै नही समझता कि अपने अविचार के कारण मेरी कुछ हानि हुई है ।" अमीर और गरीब सबके लिए उनका रसोई-घर खुला था। उनका हृदय हरेक की मुसीबत के समय उसके पास दौड जाता था। सारे बगाल मे ऐसा कौन नवयुवक ह, जो किसी-न-किसी रूप मे देशबधु का कृतज्ञ नही है ? उनकी बेजोड कानूनी प्रतिभा भी सदा गरीबो की सेवा के लिए हाजिर रहती थी। मुझे मालूम हुआ है कि उन्होने यदि सबकी नही तो, बहुतेरे राजनैतिक कैदियों की पैरवी बिना एक कौडी लिये की है। पजाब की जाच के समय जब वह पजाब गये तो अपना सारा खर्च अपनी जेब से किया था। उन दिनो अपने १ हिंदी नवजीवन २५-६-२५ देशबघु चित्तरजन दास साथ वह एक राजा की तरह लवाजमा ले गये थे। उन्होने मुझसे कहा था कि पजाब की उस यात्रा मे उनके पचास हजार रुपये खर्च हुए थे। जो उनके द्वार पर आता था उसीके लिए उनकी उदारता का हाथ आगे बढ जाता था। उनके इसी गुण ने उन्हे हजारो नवयुवको के दिल का राजा बना दिया था। जैसे ही वह उदार थे वैसे ही निर्भीक भी थे अमृतसर मे उनकी धुआधार वक्तृताओ ने मेरा दम खुश्क कर दिया था। वह अपने देश की मुक्ति तुरत चाहते थे। वह एक विशेषण को हटाने या बदलने के लिए तैयार न थे इसलिए नहीं कि वह जिद्दी थे, बल्कि इसलिए कि वह अपने देश को बहुत चाहते थे। उन्होने विशाल शक्तियो को अपने कब्जे मे रखा । अपने अदम्य उत्साह और अध्यवसाय के द्वारा उन्होने अपने दल को प्रबल बनाया । परतु यह भीषण शक्ति प्रवाह उनकी जान ले बैठा। उनका यह बलि- दान स्वेच्छापूर्वक था। वह उच्च था, उदात्त था ।' कलकत्ता १८ ता० को पागल हो गया था । अक-शास्त्री कहते है कि २ लाख से कम आदमी इकट्ठे न हुए थे। रास्तो पर खड़े, तार के खभो पर चढे, ट्राम की छत पर खडे, झरोखो मे राह देखते हुए बैठे स्त्री-पुरुष इससे जुदा है । साथ भजन-कीर्तन तो था ही। पुष्पो की वृष्टि हो रही थी। शव खुला हुआ था, परतु उसपर फूलो के हार का पहाड बिछ गया था। अर्थी के जुलूस के आगे स्वयसेवक फुलवाडी लेकर चल रहे थे। उसमे फूलो से सुसज्जित चरखा था। जुलूस स्टेशन से ७-३० पर चलकर श्मशान मे बजे पहुचा। ३-३० बजे अग्नि-सस्कार शुरू हुआ। श्मशान घाट पर भीड उमडी थी। पीछे से जो भीड उमडती थी उसे रोकना अति कठिन था और मैं समझता हूं कि यदि मुझे - ३ १ हिंदी नवजीवन २५-६-२५ ७२ देश-सेवकों के सस्मरण हट्टे-कट्टे लोगो ने अपने कधे पर बिठाकर इस उमडती हुइ भीड़ के सामने न उठा रखा होता तो भयकर दुर्घटना हो जाती। दो सशक्त आदमियो ने मुझे अपने कधे पर बिठा रखा और उस हालत मे मै लोगों को रोक रहा था और उनसे बैठ जाने की प्रार्थना कर रहा था। लोग जबतक मुझे देसते थे तबतक तो मानते थे, पर मै जहा अशाति की आशका होती उस ओर गया कि मेरी पीठ फिरते ही लोग तुरत उठ खड़े हो जाते थे। सब लोग दीवाने हो गये थे। हजारो आखे रथी की ओर लगी हुई थी। जब दाहकर्म शुरू हुआ तब लोग धीरज खो बैठे। सब बरबस खडे हो गये और चिता की ओर खिच पडे । यदि एक भी क्षण का विलंब होता तो सबके चिता पर गिर पडने का अदेशा था। अब क्या . करे ? मैने लोगो से कहा, "अब काम पूरा हुआ। सब अपने-अपने घर जावे।" और मुझे उठानेवाले भाइयो से कहा, "अब मुझे इस भीड़ से हटा ले चलो।" लोगो को मै पुकार-पुकारकर और इशारे से कहता चला कि मेरे पीछे आओ। इसका असर बहुत अच्छा हुआ, वह हजारो की भीड वापस लौटी और दुर्घटना होते-होते बची। चिता चदन की लकडी की बनाई गई थी। लोग ऐसे मालूम होते थे मानो वन-भोज को आये हो । गभीरता तो सबके चेहरे पर थी, पर ऐसा नही मालूम होता था कि वे शोक-भार से दब गये है । कुटुम्बियो का और मेरा शोक स्वार्थ-पूर्ण मालूम होता था । हमारे तत्व-ज्ञान का अत आ गया, लोगों का कायम रहा, क्योकि वे तटस्थ थे। उनके अंदर सम्मान का भाव तो पूरा-पूराथा। उनकी पूजा नि स्वार्थ थी। वे तो भारत- पुत्र को, अपने बधु को, प्रमाणपत्र देने के लिए आये थे। वे अपनी आंखों से और चेष्टा से ऐसा कहते हुए दिखाई देते थे, “तुमने बडा काम किया, तुम्हारे जैसे हजारो हो देशबधु जैसे भव्य थे वैसे ही भले थे । दार्जिलिग मे इसका बडा अनुभव मुझे हुआ। उन्होने धर्म-संबधी बाते की। जिनकी छाप उनके दिल पर गहरी बैठी, उनकी बाते की। वह धर्म का अनु- देशबधु चित्तरंजन दास ७३ , ? भव-ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक थे। “दूसरे देश मे जो कुछ हो, पर इस देश का उद्धार तो शातिमार्ग से ही हो सकता है। मैं यहा के नवयुवको को दिखला दूगा कि हम शाति के रास्ते स्वराज्य प्राप्त कर सकते है। यदि हम भले हो जायगे तो अग्रेजो को भला बना लेगे।" "इस अधकार और दभ मे मुझे सत्य के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। दूसरे की हमे आवश्यकता भी नही।" "मै तमाम दलो मे मेल कराना चाहता हू । बाधा सिर्फ इतनी ही है कि हमारे लोग भीरु है। उनको एकत्र करने के प्रयत्न मे होता क्या है कि हमे भीरु बनना पडता है। तुम जरूर सबको मिलाने की कोशिश करना और मिलना, पत्र-सपादकों को .समझाना कि मेरी और स्वराज्य-दल की ख्वामख्वा निदा करने से क्या लाभ ? मैने यदि भूल की हो तो मुझे बतावे । मै यदि उन्हे सतुष्ट न करू तो फिर शौक से पेट भर के मेरी निदा करे।" "तुम्हारे चरखे का रहस्य मै दिन-दिन अधिक समझता जाता है। मेरा कधा यदि दर्द न करता हो और इसमे मेरी गति कुठित न हो तो मै तुरत सीख लू । एक बार सीखने पर नियमपूर्वक कातने मे मेरा जी न ऊगा। पर सीखते हुए जी उकता उठता है । देखो न, तार टूटते ही जाते है।" "पर आप ऐसा किस तरह कह सकते है ? स्वराज्य के लिए आप क्या नही कर सकते।" "हा-हा, यह तो ठीक ही है। मै कहा सीखने से नाही करता हू ?मै तो अपनी कठि- नाई बताता हू। पूछो तो वासतीदेवी से कि ऐसे काम मे मै कितना मदबुद्धि हू वासतीदेवी ने उनकी मदद की, "ये सच कहते है। अपना कलमदान खोलना हो तो ताला लगाने मुझे आना पडता है।" मैने कहा, “यह तो आपकी चालाकी है। इस तरह आपने देशबधु को अपग बना रखा है, जिससे उन्हे सदा आपकी खुशामद करनी पड़े और आप पर सहारा रखना पडे।" हँसी से कमरा गूज उठा । देशबधु मध्यस्थ हुए। “एक महीने बाद मेरी परीक्षा लेना। उस समय मै रस्सिया निकालता न मिलूगा।" मैने कहा, "ठीक है। आपके लिए सतीशबाबू शिक्षक भी भेजे देगे। आप जब पास ।
७४ देश-सेवको के संस्मरण । हो जायगे तो समझियेगा कि स्वराज्य नजदीक आ गया।" ऐसे सब विनोदो का वर्णन करने लगू तो खात्मा नही हो सकता। कितने ही सस्मरण तो ऐसे है, जिनका वर्णन मै कर ही नही सकता। मै जिस प्रेम का अनुभव वहा कर रहा था उसकी कुछ झलक यदि यहा न दिखाऊ तो मै कृतघ्न माना जाऊगा। वह छोटी-छोटी- सी बात की सभाल रखते थे। मेवे खुद कलकत्ते से मगवाते । दार्जिलिग में बकरी या बकरी का दूध मिलना मुश्किल पडता है। इसलिए ठेठ तलहटी से पाच बकरिया मगवा कर रखी। मेरी जरूरत की एक-एक चीज का इतजाम किये बगैर न रहते थे। हमारे कमरे के दरम्यान सिर्फ एक दीवार थी। सुबह होते ही, . काम-काज से निबटकर, मेरी राह देखते बैठते । चारपाई पर बैठते थे, चारपाई अभी नही छूटी थी। पल्थी मारकर बैठने की मेरी आदत से परिचित थे । सो कुरसी पर नही बेठने देते थे। खटिया पर ही अपने सामने मुझे बैठाते । गद्दे पर भी कुछ खास तौर पर बिछवाते और तकिया भी लगवाते। मुझसे दिल्लगी किये बिना न रहा गया, “यह दृश्य तो मुझे चालीस बरस पहले की याद दिलाता है। जब मेरी शादी हुई थी तब हम दुलहे-दुलहिन इस तरह बैठे थे। अब यहा पाणि-ग्रहण की ही कसर है।" मेरे कहने की देर थी कि देशबधु के कहकहे से सारा घर गूज उठा। देशबधु जब हँसते तो उनकी आवाज दूर तक पहुचे बिना न रहती। देशबधु का हृदय दिन-पर-दिन कोमल होता जाता था। रूढि के अनुसार मांस-मछली खाने में उन्हें कोई विधि-निषेध न था। फिर भी जब असहयोग शुरू हुआ तब मासाहार, मद्यपान और चुरट तीनो चीजे उन्होने छोड दी थी। पीछे जाकर फिर उन्होने अपना जोर जमाया था, परतु उनका झुकाव इनको छोड़ने की ओर ही रहता था। अभी कुछ दिनो से राधास्वामी सप्रदाय के एक साधु से उनका समागम हुआ। तब से निरामिष भोजन की उत्सुकता बढ गई थी। सो जबसे वह दार्जिलिग गये, निरामिष भोजन शुरू महादेव देसाई ७५ किया था। और मेरे रहने तक घर मे मास-मछली न आने दिया। मुझसे अनेक बार कहा, “यदि मुझसे हो सका तो अब से मै मास- मछली को छुऊगा तक नही। मुझे वह पसद थी नही और मै ममझता हूं कि इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति मे बाधा पहुचती है। मेरे गुरु ने मुझे खास तौर पर कहा कि साधना के खातिर तुम्हे मासाहार अवश्य छोड देना चाहिए।" । यदि हमे देशबधु की आत्मा को शाति दिलाना हो तो हमारे पास एक ही इलाज है। उनके तमाम सद्गुणो को हम अपने अदर पैदा करे। कितने ही सद्गुण तो अवश्य पैदा कर सकते है। उनके सदृश अग्रेजी चाहे हमे न आसके, उनकी तरह वकील हम सब न हो सके, धारासभा मे जाने की शक्ति उनके सदृश हमारे पास न हो, पर हमारे अदर उनके जैसा देशप्रेम तो हो सकता है। उनके बराबर उदारता हम सीख सकते है। उनके बराबर धन हम चाहे न दे सके, परतु जो यथाशक्ति देते है, उन्होने बहुत-कुछ दे दिया है। विधवा के एक ताबे के छल्ले की कीमत महाराज के करोडो मे से दिये हजार की कीमत से ज्यादा है। देशबधु ने खादी पहनने के बाद फिर घर मे या बाहर उसका त्याग नहीं किया। क्या हम खादी पहनेगे ? देशबधु ने महीन खादी कभी न चाही उन्होन तो मोटी खादी को ही पसद किया था। देशबधु ने कातने का प्रयत्न किया। जिन्होने शुरू नहीं किया, क्या वे अब करेगे ? २ : १४ : महादेव देसाई महादेव की अकस्मात् मृत्यु हो गई । पहले जरा भी पता १ हिदी नवजीवन. २-७-२५ हिंदी नवजीवन, ९-७-२५ २ देश-सेवकों के संस्मरण नहीं चला। रात अच्छी तरह सोये। नाश्ता किया। मेरे साथ टहले। सुशीला और जेल के डाक्टरो ने,जो कुछ कर सकते थे,किया लेकिन ईश्वर की मर्जी कुछ और थी। सुशीला और मैने शव को स्नान कराया। शरीर शाति से पडा है, फूलो से ढका है, धूप जल रही है। सुशीला और मै गीता-पाठ कर रहे है। महादेव की योगी और देशभक्त की भाति मृत्यु हुई है। दुर्गा, बाबला और सुशीला से कहो, शोक करने की मनाई है। ऐसी महान् मृत्यु पर हर्ष ही होना चाहिए। अत्येष्ठि मेरे सामने हो रही है। भस्म रख लूगा।' भावना तो महादेव की खुराक थी। उसका बलिदान कोई छोटी चीज नहीं है। अकेला भी वह बहुत काम करेगा। मै इसे शुभ शकुन मानता हू। शुद्धतम बलिदान हुआ है, इसका परिणाम अशुभ नही हो सकता। महादेव मेरा अतिरिक्त शरीर था। कितनी दफा मैने उसे मैक्सवेल के पास भेजा है, दूसरो के पास भेजा है। मान लेता था कि महादेव को काम सौपा है तो वह कर लेगा। .. उसे मेरा वारिस होना था, पर मुझे उसका वारिस होना पड़ा है। महादेव की समाधि पर जाना मेरे लिए बिल्कुल सहज बन गया है। मै न जाऊ तो बेचैन हो जाऊ। वहा जाकर मैं कुछ करना नही चाहता, समय भी नहीं देना चाहता, मगर हो आता हु, इतना ही मेरे लिए बस है। अगर मै जिदा रहा तो यह जमीन आगाखा से माग लूगा । वह न दे, यह सभव हो सकता है। मगर किसी रोज तो हिदुस्तान आजाद होगा। तब यह यात्रा का स्थान बनेगा। मै वहा जाता हू तो महादेव के गुणो का स्मरण करने के लिए, उन्हे ग्रहण करने के लिए। मै उसकी स्मृति को १ डा० सुशीला नैयर २ आगाखां महल से २५-८-४२ को दिया तार ३ महादेवभाई को मृत्यु आगाखां महल में हुई थी।
महादेव देसाई ७७ खोना नही चाहता । और जिस तरह से वह यहा मरा, उससे उसकी स्त्री और उसके लडके के प्रति मेरी वफादारी भी मुझे बताती है कि मुझे वहा नियमित रूप से जाना चाहिए। हो सकता है कि मेरी जिंदगी मे यह जगह मुझे न मिल सके और इस जगह को यात्रा-स्थल बनते मै न देख सकू, मगर किसी-न-किसी दिन वह जरूर बनेगा, इतना मै जानता हूं। आज तो मै सब काम उसका काम समझकर करता हूँ। बाहर जाऊगा तब भी उसीका काम करूगा। ... ... - लगता ही नहीं कि महादेव सदा के लिए गया । कल रात को स्वप्न मे वह लडकी कहती है, “महादेवभाई कहां है ?" मै उत्तर देता हू, “बहन, मै तो उसे श्मशान मे छोड आया हूं।" पीछे वह पागल-सी हो जाती है, कहती है, "लाओ महादेव- भाई को | उसे वहा क्यो छोड आये?" . . . महादेव की मै भाट की तरह स्तुति करता हू, मगर मेरा मन उसकी शिकायत भी करता है। उसकी मिसाल सपूर्ण या आदर्श नही मानना चाहिए। वह इस विचार का जप करते-करते चला गया कि मै बापू क्या कर सकता हू ? बापू से पहले चला जाऊ तो अच्छा है। मगर उसे तो कहना चाहिए था कि "नही, मुझे तो जिदा रहना है और बापू का काम करना है।" यह दृढ़ सकल्प उसे मरने से रोक भी लेता। के बाद मेरे विचार से महादेव के चरित्र की सबसे बड़ी खूबी थी मौका पडने पर अपनेको भूलकर शून्यवत् बन जाने की उनकी शक्ति। २ जमनालाल, मगनलाल और महादेव-इनमें से हरेक कारावास-कहानी . हरिजन सेवक १२-८-४६ देश-सेवको के संस्मरण अपने-अपने क्षेत्र मे अनूठे थे । मेरा खयाल है कि उनकी जगह दूसरे नही ले सकते । मगर मै कहूगा कि इन तीनो मे से महादेव मुझमे पूरी तरह खो गया था। मैं यह कह सकता हूं कि मुझसे अलग उसकी कोई हस्ती ही नही रह गई थी। महादेव की एक बड़ी खूबी यह थी कि जो काम उन्हे सौपा जाता था, उसे करने के लिए वह सदा तैयार रहते और बडे उत्साह से करते थे। इसी तरह वह एक अच्छे लेखक, अच्छे रसोइया और अच्छे कुली बन सके थे। अक्सर जो लोग मेरे साथ काम करने के लिए आते है, वे ऐसे ही बन जाते है।' महादेव गुलाब का फूल है । २ वह मेरे बॉसवेल (जीवनी लिखनेवाले) बनना चाहते थे, फिर भी मुझसे पहले मरना चाहते थे। इससे बेहतर वह क्या कर सकते थे' सो वह तो चले गये और मुझे उनकी जीवनी लिखने लिए छोड़ गये। बच्चे अपने मा-बाप के पहले मरना चाहे तो इससे बढकर बेरहमी और क्या हो सकती है ? यह उन- का निरा स्वार्थ है। भले ही मै दूसरो को इस बात का यकीन न दिला सकू, लेकिन यह मै जरूर महसूस करता हू कि मौत कभी वक्त से पहले नही आती। दुनिया में अपना काम खत्म करने से पहले कोई मर्द या औरत कभी नही मरता। महादेव ने पचास साल मे सौ बरस का काम पूरा कर डाला था। सो वह आराम करने चले गये, जिसपर उनका पूरा हक था।' महादेव के मित्र और प्रशसक उनके प्रिय काम करके ही उनकी बरसी मना सकते है। वह बडे शक्तिशाली पुरुष थे। वह सुदर १ हरिजन सेवक १८-८-४६ २ हरिजन सेवक, १८-८-४६ • हरिजन सेवक १८-८-४६ सरोजिनी नायडू और सुडौल अक्षर लिखते थे। वह कई चीजो से प्यार करते थे। लेकिन उन सबमे चर्खे की जगह पहली थी। एक कलाकार होने के नाते वह नियम से बहुत बढिया कताई करते थे। कामकाज के भारी बोझ से थककर चूर हो जाने पर भी वह हमेशा कातने का वक्त निकाल लेते थे। चर्खा उन्हे फिर तरोताजा बना देता था। उनकी कई खूबियो मे उनके बेजोड अक्षर भी कोई कम महत्व नही रखते थे। उसमे कोई उनका सानी न था। रामदास स्वामी ने अपने एक दोहे मे खूबसूरत अक्षरो की चमकीले मोतियो से तुलना की है । महादेव की कलम से निकले हुए अक्षर खरे मोती जैसे होते थे। उनकी तीसरी खूबी थी, हिदुस्तान की भाषाओ से उनका प्रेम । वह भाषा-शास्त्री थे। बगाली, मराठी और हिदी पर उनका पूरा अधिकार था और वह उर्दू भी सीख चुके थे।' सरोजिनी नायडू सरोजिनी देवी आगामी वर्ष के लिए महासभा की सभा- नेत्री निर्वाचित हो गई। यह सम्मान उनको पिछले वर्ष ही दिया जानेवाला था। बडी योग्यता द्वारा उन्होने यह सम्मान प्राप्त किया है। उनकी असीम शक्ति के लिए और पूर्व और दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में की गई महान सेवा के लिए वह इस सम्मान की पात्र है और आजकल के दिनो मे जबकि स्त्री-जाति के अदर भारी जागृति हो रही है, स्वागत-कारिणी- समिति का भारतवर्ष की एक सर्वोत्तम प्रतिभाशालिनी पुत्री को सभापति चुनना भारतवर्ष की स्त्री-जाति का समुचित सम्मान करना है। उनके सभापति चुने जाने से हमारे प्रवासी देश-भाइयो १ हरिजन सेवक, ८-९-४६ - २ काग्रेस ८० देश-सेवको के सस्मरण को पूर्ण संतोष होगा और इससे उनके अदर वह साहस पैदा होगा, जिससे वे अपने सामने उपस्थित लडाई को लड सकेगे। राष्ट्र द्वारा दिये जाने वाले सबसे ऊचे पद पर उनका होना स्वतत्रता को हमारे अधिक समीप लावे ।' A अमेरिका के लिए श्री सरोजिनीदेवी ने गत १२ ता० को हिदुस्तान का किनारा छोडा । यूरोप, अमेरिका, इत्यादि मुल्को मे अपनी स्थायी सभाए स्थापित करके या समय-समय पर अपने प्रतिनिधि भेजकर हमारे बारे मे जो झठी मान्यताए प्रचलित हो गई है, उन्हे दूर करने की आशा अनेक आदमी रखते है । मुझे यह आशा हमेशा ही गलत जान पडी है । ऐसा करने से हम सार्व- जनिक धन का और जिनका और अच्छा उपयोग हो सकता है, उन लोगो के समय का दुरुपयोग करेगे । कितु पश्चिम मे अगर किसीका जाना फल सकता है तो सरोजिनीदेवी का या कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जाना अवश्य फल सकता है। सरोजिनीदेवी का नाम उनके काव्यो से पश्चिम मे प्रसिद्ध है। उनमे चतुराई भी वैसी ही है। उन्हे यह भली-भाति मालूम है कि कहां, क्या और कितना कहना चाहिए। किसीको दुख पहुचाये बिना खरी-खरी सुना देने की कला उन्होने साधी है। जहा कही वह जाती है, उनकी बात सुने बिना लोगों का काम चलता ही नही है। दक्षिण अफ्रीका मे अपनी शक्ति का सपूर्ण उपयोग करके उन्होने वहा के अंग्रेजो का मन हरण किया था और सुदर विजय प्राप्त करके सर हबीबुल्ला-प्रतिनिधि-मडल का रास्ता साफ किया था। वहां का काम कठिन था, कितु वहापर उन्होने अपनी मर्यादा निश्चित करके कानून के जाल-पेचो मे न पडते हुए, मुख्य बात मे लगे रह- कर अपना काम भली-भाति किया था और हिदुस्तान का नाम चमकाया था। ऐसा ही काम वे अमेरिका आदि देशो मे भी करेगी। ' हिंदी नवजीवन, ८-१०-२५ सरोजिनी नायडू ८१ अमेरिका मे उनकी हाजिरी ही मिस मेयो के असत्य का जवाब हो जायगी। उनका साहस भी उनकी दूसरी शक्तियो के ही समान है। परदेश जाने मे न तो उन्हें किसी सहायक की आवश्यकता रहती है और न किसी मत्री की ही। जहा कही जाना हो वह अकेले निर्भयता से विचर सकती है। उनकी ऐसी निर्भयता स्त्रियों के लिए तो अनुकरणीय है ही, पुरुषो को भी लजानेवाली है। हम अवश्य यह आशा रख सकते है कि उनकी पश्चिम की यात्रा में से अच्छा फल निकलेगा। अमेरिका से कई-एक मित्रों के पत्र बराबर मेरे पास आते रहते है, जिनमे सरोजिनीदेवी के काम की प्रशसा रहती है । मित्र लिखते है कि सरोजिनीदेवी अमेरिका मे बडे महत्व का काम कर रही है और अपनी सारी ईश्वरदत्त प्रतिभा का इस देश के लिए पूरा-पूरा उपयोग कर रही है। इसमे शका नहीं कि उन्होने अमेरिकावासियो का मन मोह लिया है। कनाडा की एक बहन ने एक लबे पत्र मे अपने कुछ अनुभव लिखकर भेजे है, उसमे थोड़ी सी बाते नीचे देता हू "सरोजिनी देवी थोडे समय के लिए मेरी मेहमान बनी थी। आपके उन मित्र और दूत से मिलकर मैने अपने-आपको बडभागी पाया है। मै खुद एक स्त्री हू, वह भी स्त्री ही है। साथ ही वह तो कवि और सुधारक है, इसीलिए उन्होने मेरा हृदय और भी चुरा लिया है। उनकी आत्मा का मुझपर बहुत ज्यादा असर हुआ है और इतने दिन के बाद भी उन- के मिलाप की बात हमारे हृदय मे जैसी-की-तैसी बनी हुई है। जिस गिरजाघर मे सरोजिनीदेवी ने व्याख्यान दिया था वह तो श्रोताओ से खचाखच भर गया था। उनके ज्ञान की, उनके अनु- भवों की, उनकी काव्य-शक्ति की, उनके मधुर कोकिल कंठ की, उनके विनोद की और अग्रेजी भाषा पर उनके प्रभुत्व की मै . हिंदी नवजीवन, २०-९-२८ देश-सेवको के सस्मरण आपसे क्या बात कहू ? जैसे-जैसे उनकी वाणी का प्रवाह बढता गया, वैसे-वैसे लोग मारे आश्चर्य के चकित होते गये और आखिर- कार उनके गुणो पर पूरे-पूरे मुग्ध हो गये। उन्होने हमारे सामने जितनी भी समस्याए रखी, हममे से कोई भी उनका उत्तर न दे सका। मेरे पास एक व्यवहार-कुशल व्यापारी बैठे हुए थे, उन्होने समाधिवत् होकर उनका सारा व्याख्यान सुना । जो प्रश्न पूछे गये सरोजिनीदेवी ने उनके ठीक-ठीक उत्तर दिये और बीच-बीच में जिस ढग से उन्होने विनोद का सहारा लिया उसे देखकर तो पूर्वोक्त व्यापारी महाशय से बोले बिना न रहा गया । उन्होने कहा, 'ऐसी शक्ति तो मैने किसी भी दूसरी स्त्री मे नही देखी। अगर सच कहू, मेरी राय मे कोई भी पुरुष इनके मुकाबले मे खडा. नही रह सकता।' वर्तमान भारत के विषय मे उन्होने जो कुछ कहा, वह बहुत ज्यादा असर करनेवाला था। उन्होने हमारी न्याय-प्रियता को जागृत किया, हमारे हृदयो को पानी-पानी कर दिया और हमे उसी समय यह अनुभव होने लगा कि आपके वहा भी उसी तरह का राज्यतत्र होना चाहिए, जैसा हमारे यहा है । सरोजिनीदेवी की रचना मे, मालूम होता है, ईश्वर ने कई रग पूरे है। उनसे भोजन के समय मिलिये या सम्मेलनो मे मिलिये, सा- मान्य वार्तालाप के लिए मिलिये अथवा और किसी काम के लिए, हर हालत में उनकी प्रतिभा बिखरी पडती थी। उनके उत्साह का तो पार ही नही है। कई निमत्रणो को स्वीकार कर चुकी है, एक ही दिन में कई जगह जाती है, लेकिन मालूम नहीं होता कि थकी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके पास शक्ति का कोई अटूट भडार है | लोकप्रियता से वह फूल नही उठती । यहा की सब अच्छी चीजे उन्हे पसद है। वह बच्चो को प्यार करती है, सुंदर फूल उनका मन चुरा लेते है, हमारे वृक्ष, हमारे सरोवर और हमारी नदिया उन्हे आनद प्रदान करती है, फिर भी वह भविष्य को नही भूलती। यानी, स्त्री-जाति मे जो कमजोरिया रहती है और प्रशसा के कारण जिस तरह बहुधा स्त्रिया अपना आपा भूल
मोतीलाल नेहरू
८३
जाती है, उस तरह का भय मुझे सरोजिनीदेवी के बारे में नहीं
।"
मै नही समझता कि इन बहन ने जिन शब्दो मे सरोजिनीदेवी
की शक्ति का वर्णन किया है उनमे कोई बात बढाकर लिखी गई
है। सरोजिनीदेवी मे वस्तुस्थिति को पल भर मे समझ लेने की
अपूर्व शक्ति है। वह अपनी मर्यादा को समझती है । अर्थशास्त्रियो
और राजनैतिक नेताओ की बारीकी में वह कभी नही उतरती।
इस तरह के ज्ञान का न तो वह कभी दावा करती है और न आडबर
ही। साधारण आदमी के पास जितना ज्ञान होता है, उतने ही ज्ञान
की पूजी से वह अपना काम इतनी चतुराई से कर लेती है कि
सामनेवाला आदमी उन्हे कभी उलझन मे डाल ही नही सकता ।
उलटे जो कुछ उनसे ग्रहण करता है उसीमे इतना सतोष अनुभव
करता है, मानो उसे सबकुछ मिल गया हो।'
मोतीलाल नेहरू
महासभा का सभापतित्व अब फूलो का कोमल ताज नही रह
गया है। फूल के दल तो दिनो-दिन गिरते जाते है और काटे उघडते
जाते है। अब इस काटो के ताज को कौन धारण करेगा? बाप या
बेटा ? सैकडो लडाइयो के लडाका पडित मोतीलाल नेहरू इस
काटो के ताज को पहनेगे या सयम-नियम के पक्के जवान
सिपाही पडित जवाहरलाल नेहरू, जिन्होने अपनी योग्यता और
महत्ता से देश के युवको के हृदयो पर अधिकार कर लिया है ?
श्रीयुत वल्लभभाई पटेल का नाम स्वभावत ही सबकी जबान
पर है । पडितजी एक व्यक्तिगत पत्र मे लिखते है कि इस समय
तो वल्लभभाई पटेल को ही, उनकी वीरता के लिए, सभापति
चुनना चाहिए और सरकार को यह दिखला देना चाहिए कि उन
१ हिंदी नवजीवन, २१-२-२९
?
८४ देश-सेवकों के संस्मरण पर सारे राष्ट्र का विश्वास है। खैर, मगर अभी तो श्री वल्लभभाई का कोई प्रश्न ही नही हो सकता। इस समय उनके पास काम भी इतना पड़ा हुआ है कि वह बारडोली छोडकर दूसरी ओर ध्यान ही नही दे सकते। और फिर दिसबर आने से पहले ही सभव है कि वह सरकार के अनेक बदीगृहो मे से किसी एक में उसके अतिथि बनकर पहुच जाय । मेरा अपना विचार तो यह है कि यह काटो का ताज पडित जवाहरलाल नेहरू को ही मिलना चाहिए। भविष्य तो देश के युवको के ही हाथ मे होना चाहिए। मगर बगाल तो अगले साल, जबकि बहुत-से तूफानो का भय है, पडित मोतीलाल के ही हाथो महासभा की पतवार देना चाहता है। हम लोगो मे आपस में फूट है और चारो ओर से हमे एक ऐसा शत्रु घेरे हुए है जो जितना शक्तिशाली है, उतना ही नीति-अनीति से लापरवाह भी । बगाल को इस समय किसी बडे-बूढे की विशेष आवश्यकता है और वह भी ऐसे आदमी की, जिसने उसके गाढे अवसर पर, उसे संभाला हो । अगर सारे हिंदुस्तान के लिए आगे सुख का समय नही आने वाला है तो बगाल के लिए तो और भी नही । इसके तो हजारो कारण है कि पडित मोतीलालजी को ही क्यो यह कांटो का ताज धारण करना चाहिए। वह वीर है, उदार है, उनपर सभी दलो का विश्वास है, मुसलमान उन्हें अपना मित्र मानते है, उनके विरोधी भी उनका आदर करते है और अपनी जोरदार दलीलो से वह उन्हे प्राय ही अपनी राय से सहमत कर लेते है और फिर इसके अलावा उनके स्वभाव मे सधि और समझौते की भावना की ऐसी पुट भरी हुई है, जिससे वह किसी ऐसे राष्ट्र के अत्यत योग्य दूत होने लायक है, जिसे सम्मानित समझौते की आवश्यकता है और जो उसे करने के लिए तैयार है। इन्ही बातो पर विचार करके, अत्यत साहसी बगाली देशभक्त पडित मोतीलाल नेहरू को ही अगले वर्ष के लिए राष्ट्र का कर्णधार बनाना चाहते है।' हिंदी नवजीवन, २६-७-२८ मोतीलाल नेहरू मै श्री मोतीलाल नेहरू इत्यादि की याद आपको दिला दूगा, जिन्होने अपनी कानूनी लियाकत बिल्कुल मुफ्त बाटी और अपने देश की बडी अच्छी तथा विश्वस्त सेवा की। आप मुझे शायद ताना देगे कि वे लोग इस कारण ऐसा कर सके थे कि वे अपने व्यवसाय मे बड़ी लंबी फीस लेते थे। मै इस तर्क को इस कारण नही मान सकता कि मनमोहन घोष के सिवा मेरा और सबसे परिचय रहा है। अधिक रुपया होने की वजह से इन लोगो ने भारत को आव- श्यकता पड़ने पर अपनी योग्यता उदारतापूर्वक दी हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उसका उनकी आराम तथा विलास से रहने की योग्यता से कोई सबध नही है । मैने उनको बडे सतोष से दीनता- पूर्वक जीवन-निर्वाह करते देखा है।' हू स्वर्गीय मोतीलालजी के चित्र के उद्घाटन का जो सम्मान तुम लोगो ने मुझे दिया है, उसके लिए मै तुम्हारा आभारी तुम्हारे पास उनकी छवि रहे और उनके पवित्र भावो को तुम सदा अपने हृदय मे अकित रखो, यह उचित ही है । यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही है कि जैसा सबध दो सगे-सहोदर भाइयो के बीच होता है, वैसा ही प्रगाढ प्रेम-सबध मोतीलालजी के और मेरे बीच था । मोतीलालजी की देश-सेवा, मोतीलालजी का त्याग, मोतीलालजी का अपने पुत्र-पुत्रियो के प्रति अनुपम प्रेम, इन सब बातो का परिचय जैसा मुझे था, लगभग वैसा ही तुम्हे भी होना चाहिए। जब से मुझे मोतीलालजी का प्रथम परिचय प्राप्त हुआ, तब से उनके जीवन के अंतिम समय तक उनके निकट ससर्ग में रहने का सद्भाग्य ईश्वर ने मुझे दिया था। मैने देखा कि वह प्रति- क्षण स्वदेशहित का ही चिंतन करते थे । उनके लिए स्वराज्य स्वप्न नही, बल्कि प्राण था। स्वराज्य की उन्हे सदा तृष्णा-पिपासा ' हिंदी नवजीवन, १२-११-३१ देश-सेवकों के सस्मरण रही और वह दिन-दिन बढती ही गई। ऐसे आदर्श देशभक्त का चित्र अपने सम्मुख रखना उचित ही है। पडित मोतीलालजी के सद्गुणो मे एक गुण यह भी था कि वह अस्पृश्यता नही मानते थे। वह मानो एक राजपुरुष थे। उन्होने तो बेहद रुपया कमाया, उसे सत्कार्यो मे, स्वराज्य के कार्यो मे लुटाया। मुझे उनके ऐसे दृष्टात मालूम है कि उनके हृदय मे ऊच-नीच का भाव था ही नही।' - उस जमाने मे हमने विदेशी कपडे के पहाड चिन-चिनकर जला दिये थे और कोई यह नहीं कहता था कि इससे राष्ट्र की निधि बरबाद हो रही है। श्रीमती नायडू ने अपनी पेरिस की साडी जला दी थी और स्व० मोतीलालजी ने भी अपने विलायती कपडो मे दियासलाई लगा दी थी। उनके पास तो आलमारी-की-आल- मारिया विदेशी कपडे थे। इसके बाद जब वह जेल गये तब उन्होने मेरे पास एक खत भेजा था--आज वह खत मै खोज नही सकता- पर उसमे था कि मै सच्चा जीवन अब ही जी रहा हूँ, आनद भवन में मेरे पास जो समृद्धि थी उससे मुझे यह सुख नही मिलता था। वहा उन्हे सिगार, शराब, गोश्त कुछ नही मिलता था। पूरा भोजन भी नहीं मिलता था, फिर भी उसमे उन्हे सुख मालूम हुआ । यह सही है कि उनकी यह चीज हमेशा नही चली। मेरी हालत विधवा-स्त्री से भी बुरी है । एक विधवा अपने पति की मृत्यु के बाद वफादारी से जीवन बिताकर अपने पति के अच्छे कामो का फल पा सकती है। मै कुछ भी नही पा सकता। मोतीलालजी की मृत्यु से मैने जो खोया है, वह मेरा सदा के लिए नुकसान है। ' हिंदी नवजीवन, २९-१२-३३ १ प्रार्थना-प्रवचन, २०-६-४७ 3 'कोई शिकायत नहीं, पृष्ठ ७३ वल्लभभाई पटेल मोतीलालजी की मृत्यु हरेक देश-भक्त के लिए ईर्ष्या- स्पद होनी चाहिए, क्योकि अपना सबकुछ न्यौछावर करके वह मरे है और अत समय तक देश का ही ध्यान करते रहे है। इस वीर की मृत्यु से हमारे अदर भी बलिदान की भावना आनी चाहिए। २ वल्लभभाई पटेल सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ रहना मेरा बडा सौभाग्य था। उनकी अनुपम वीरता से मै अच्छी तरह परिचित था, परतु पिछले १६ महीने मे जिस प्रकार रहा, वैसा सौभाग्य मुझे कभी नही मिला था। जिस प्रकार उन्होने मुझे स्नेह से ढक लिया, वह मुझे मेरी मा की याद दिलाता है। मैं यह कभी नही जानता था कि उनमे मा के गुण भी है।.. बारदोली और खेडा के किसानों के लिए उनकी चिता मै कभी नही भूल सकता। सरदार वल्लभभाई हँसी मे कहा करते थे कि उनके हाथ की रेखाओ मे जेल की रेखा नही है। उन लोगो के लिए जेल है ही नही, जिनके मन मे जेल महल के समान है और जो जेल और महल मे कोई भेद नही समझते । जहा आज सरदार विराजे है, वहा हम सबको जाना है, पर बिना योग्यता प्राप्त किये जेल नहीं मिलती। सरदार वल्लभभाई की अमूल्य सेवाओ के हम पात्र थे या नहीं, इसे प्रमाणित करने का अवसर अब आ गया है। उन्हे गुजरात से आशा क्यो न हो ? उन्होने मजदूरो की सेवा मे कौन कमी रखी है ? १ ७ फरवरी को दिया गया सदेश २ 'महादेवभाई की डायरी' ८८ देश-सेवकों के संस्मरण था डाकवालों और रेलवे के नौकरो ने उनके पास बैठकर स्वराज्य का पाठ कौन कम पढा है ? अहमदाबाद का ऐसा कौन नागरिक है जो नही जानता कि उन्होने अपना सर्वस्व होम कर शहर की सेवा की है ? शहर मे जब भीषण महामारी फैली थी, उन दिनो गरीबों की सेवा का इतजाम करनेवाला कौन था? वल्लभभाई। अकाल पड़ने पर अकाल-पीडितो की मदद के लिए दौड पडनेवाला कौन था? वल्लभभाई। गुजरात मे ऐतिहासिक बाढ़ आई, लाखों लोग घरबार-विहीन बन गये, खेतो की फसल बह गई। उस समय सारे गुजरात का सकट टालने के लिए सैकडो स्वयसेवको को तैयार करनेवाला, लोगो के लिए एक करोड रुपये सरकार के खजाने से निकलवानेवाला कौन ? वल्लभभाई ही। और वह भी. वल्लभभाई ही थे, जिन्हें बारदोली की जीत के लिए ऋणी जनता ने सरदार कहकर पुकारा और जो संपूर्ण स्वराज्य की आखिरी लड़ाई के लिए जनता को तैयार कर रहे थे। वल्लभभाई तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए गये । अब हमें क्या करना चाहिए? इस सवाल का एक जवाब तो साफ ही है। हम हिम्मत न हारे, उलटे हममे से हरएक दुगुनी दृढता और दुगुनी हिम्मत के साथ सविनय-भग के लिए तैयार हो जाय और जेल की, या मौत मिले तो मौत की, राह पकड ले । सरदार के जाने के बाद अब रहनुमा कौन होगा? इस तरह का नामर्दी से भरा हुआ सवाल कोई अपने मन मे न उठने दे। जिसे सविनय-भग करना है, उसके पास आज बहुतेरे साधन पड़े हुए है और सरकार नये-नये साधन पैदा कर रही है । जैसे हमारे लिए यह जीवन-मरण का खेल है, वैसे ही सरकार के लिए भी है । मालूम होता है कि उसकी हस्ती का आधार ही स्वतत्र स्वभाव के मनुष्यो को दबाने पर है, नही तो वह वल्लभभाई के समान शाति, रक्षा के लिए प्रसिद्ध आदमी को क्यो पकडती? ' जेल पहुच . . १ हिंदी नवजीवन, १३-३-३०
वल्लभभाई पटेल
८९
सरदार के लिए सब समान है, एक नन्हा बालक भी इसे
जानता है। उन्हे तो गरीब-मात्र की सेवा करनी है। फिर भले ही
वह भगी हो या ब्राह्मण, गुजराती हो या मद्रासी, राष्ट्र ने उनकी इस
विशेषता को पहचाना और पहचानकर राष्ट्रपति बनाया ।'
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सरदार मेरे सगे भाई के समान है, तथापि इतना प्रमाण
पत्र देते हुए मुझे जरा भी सकोच नही होता।
...
वल्लभभाई अरबी घोडे की तेजी से दौड रहे है । सस्कृत की
किताब हाथ से छूटती ही नही । इसकी मुझे आशा नही थी
लिफाफो मे तो कोई उनकी बराबरी नही कर सकता। लिफाफे
वह नापे बिना बनाते है और अदाज से काटते है, मगर बराबर के
निकलते है और फिर भी ऐसा नहीं लगता कि इसमे बहुत समय
लगता है। उनकी व्यवस्था आश्चर्यजनक है । जो कुछ करना हो
उसे याद रखने के लिए छोडते ही नही । जैसे आया वैसे ही कर
डाला । कातना जब से शुरू किया है, तब से बराबर समय पर
कातते है। इस तरह सूत में और गति मे रोज सुधार होता जा रहा
है। हाथ मे लिया हुआ भूल जाने की बात तो शायद ही होती है।
और जहा इतनी व्यवस्था हो, वहा धाधली तो हो ही कैसे ?
कई मुसलमान दोस्तो ने शिकायत की थी कि सरदार का
रुख मुसलमानो के खिलाफ है। मैने कुछ दुख से उनकी बात सुनी,
मगर कोई सफाई पेश न की। उपवास शुरू होने के बाद मैने अपने
ऊपर जो रोक-थाम लगाई हुई थी वह चली गई। इसलिए मैने
टीकाकारों को कहा कि सरदार को मुझसे और पडित नेहरू से
...
. हिंदी नवजीवन, १४-५-३१
२ "विजयी बारदोली'
महादेवभाई की डायरी, २८-८-३२
९० देश-सेवकों के सस्मरण । अलग करके और मुझे और पडित नेहरू को खामख्वाह आसमान पर चढाकर वे गलती करते है। इससे उनको फायदा नही पहुच सकता । सरदार के बात करने के ढग में एक तरह का अक्खडपन है, जिससे कभी-कभी लोगो का दिल दुख जाता है, अगरचे सरदार का इरादा किसीको दुखी बनाने का नही होता । उनका दिल बहुत बड़ा है । उसमं सबके लिए जगह है । सो मैने जो कहा, उसका मतलब यह था कि अपने जीवन भर के वफादार साथी को एक बेजा इलजाम से बरी कर दू । मुझे यह भी डर था कि सुननेवाले कही यह न समझ बैठे कि मै सरदार को अपना 'जी हुजूर' मानता हूँ । सरदार को प्रेम से मेरा 'जी हुजूर' कहा जाता था। इसलिए मैने सरदार की तारीफ . करते समय कह दिया कि वह इतने शक्तिशाली और मन के मजबूत है कि वह किसीके 'जी हुजूर' हो ही नही सकते। जब वह मेरे 'जी हुजूर' कहलाते थे तब वह ऐसा कहने देते थे, क्योकि जो कुछ मैं कहता था वह अपने-आप उनके गले उतर जाता था। वे अपने क्षेत्र मे बहुत बड़े थे। अहमदाबाद म्युनिसिपैलिटी मे उन्होने शासन चलाने मे बहुत काबलियत बताई थी। मगर वह इतने नम्र थे कि उन्होने अपनी राजनैतिक तालीम मेरे नीचे शुरू की। उन्होने उसका कारण मुझे बताया था कि जब मै हिदुस्तान मे आया था उन दिनो जिस तरह का राज-काज हिदुस्तान मे चलता था, उसमें हिस्सा लेने का उन्हे मन नही होता था। मगर अब जब सत्ता उनके गले आ पडी तब उन्होने देखा कि जिस अहिसा को वह आजतक सफलतापूर्वक चला सके अब वह नही चला सकते । मैने कहा है कि मै समझ गया है कि जिस चीज को मै और मेरे साथी अहिसा कहा करते थे वह सच्ची अहिंसा न थी। वह तो नकली चीज थी और उसका नाम है निष्क्रिय प्रतिरोध । हा, किनके हाथो मे निष्क्रिय प्रतिरोध किसी काम की चीज है ? जरा सोचिये तो सही कि एक कमजोर आदमी जनता का प्रतिनिधि बने तो वह अपने मालिको की हँसी और बेइज्जती ही करवा सकता है। मै जानता जमनालाल बजाज हू कि सरदार कभी उन्हे सौपी हुई जिम्मेदारी को दगा नही दे सकते । वे उसका पतन बर्दाश्त नहीं कर सकते।' । : १८ : जमनालाल बजाज सेठ जमनालाल बजाज को छीनकर काल ने हमारे बीच से एक शक्तिशाली व्यक्ति को छीन लिया है। जब-जब मैने धनवानो के लिए यह लिखा कि वे लोककल्याण की दृष्टि से अपने धन के ट्रस्टी बन जाय तब-तब मेरे सामने सदा ही इस वणिक् शिरोमणि 'का उदाहरण मुख्य रहा । अगर वह अपनी सपत्ति के आदर्श ट्रस्टी नही बन पाये तो इसमे दोष उनका नही था । मैने जानबूझकर उनको रोका । मै नही चाहता था कि वे उत्साह मे आकर ऐसा कोई काम कर ले, जिसके लिए बाद में शात मन से सोचने पर उन्हें पछताना पडे। उनकी सादगी तो उनकी अपनी ही चीज थी। अपने लिए उन्होने जितने भी घर बनाये, वे उनके घर नही रहे, धर्म- शाला बन गये । सत्याग्रही के नाते उनका दान सर्वोत्तम रहा। राजनैतिक प्रश्नो की चर्चा मे वह अपनी राय दृढतापूर्वक व्यक्त करते थे। उनके निर्णय पक्के हुआ करते थे । त्याग की दृष्टि से उनका अतिम कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा। वह किसी ऐसे रचनात्मक काम मे लग जाना चाहते थे, जिसमे वह अपनी पूरी योग्यता के साथ अपने जीवन का शेष भाग तन्मय होकर बिता सके । देश के पशु- धन की रक्षा का काम उन्होने अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था। इस काम मे वह इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोई मिसाल नही। उनकी उदारता मे जाति, धर्म या वर्ण की सकुचितता को कोई स्थान न था। वह एक ऐसी साधना मे लगे हुए थे, जो कामकाजी आदमी के ९ प्रार्थना-प्रवचन, १५-१-४८ ९२ देश-सेवको के संस्मरण लिए विरल है । विचार-सयम उनकी एक बडी साधना थी। वह सदा ही अपनेको तस्कर विचारो से बचाने की कोशिश मे रहते थे। उनके अवसान से वसुधरा का एक रत्न कम हो गया है। उन- को खोकर देश ने अपना एक वीर-से-वीर सेवक खोया है। जिस कार्य के लिए उन्होने अपना शेष जीवन समर्पित कर दिया था, उसे अब उनकी विधवा जानकीदेवी ने स्वय करने का निश्चय किया है। उन्होने अपनी समस्त निजी सपत्ति को, जो करीब ढाई लाख के आस-पास है, कृष्णार्पण कर दिया है । ईश्वर उन्हें अपने इस अगीकृत कार्य में सफल होने की शक्ति दे।' था। मेरे साथ जमनालालजी का सबध करीब-करीब तभी से. शुरू हुआ जब से मैने हिदुस्तान के सार्वजनिक जीवन मे प्रवेश किया। उन्होने मेरे सभी कामो को पूरी तरह अपना लिया था, यहातक कि मुझे कुछ करना ही नही पडता था। ज्योही मै किसी नये काम को शुरू करता वह उसका बोझखुद उठा लेते थे। इस तरह मुझे निश्चित कर देना मानो उनका जीवन-कार्य ही बन गया ११ फरवरी को जब मै जमनालालजी के द्वार पर पहुचा तो उनका देहात हो चुका था। मेरे पास वर्धा से सदेश तो सिर्फ यही आया था कि खून का दौरा कम करने की दवा भेजे । मै दवा भेज- कर अपने दिल की तसल्ली कर सकता था। लेकिन उस दिन मैने महसूस किया कि नही, मुझे खुद ही जाना चाहिए। जब वहा पहुचा तो मामला कुछ और ही पाया। जमनालालजी तो बडभागी थे। उनकी तरह हम भी अपने को बडभागी साबित कर सकते है, बशर्ते कि जो चीज उनके रहते हमे साफ नही दिखाई दी वह उनके बाद हमे साफ दिखाई देने लगे, जो जाग्रति हममे उनके जीवित रहते नही आई वह अब , हरिजन सेवक, १५-२-४२ जमनालाल बजाज सब में आ जाय। उनका सबसे बड़ा काम गोसेवा का था। वैसे तो यह काम पहले भी चलता था, लेकिन धीमी चाल से । इसमे उन्हे सतोष न था। उन्होने इसे तीव्र गति से चलाना चाहा और इतनी तीव्रता से चलाया कि खुद ही चल बसे। । खादी के काम मे उनकी दिलचस्पी मुझसे कम न थी। खादी के लिए जितना समय मैने दिया उतना ही उन्होने भी दिया। उन्होने इस काम के पीछे मुझसे कम बुद्धि खर्च नहीं की थी। इस- लिए कार्यकर्ता भी वह ही ढूढ-ढूढकर मेरे पास लाया करते थे। थोड़े मे यह कह लीजिय कि अगर मैने खादी का मत्र दिया तो जमनालालजी ने उसको मूर्त रूप दिया। खादी का काम कुछ होने के बाद मै तो जेल मे जा बैठा, मगर वह जानते थे कि मेरे नजदीक खादी ही मे स्वराज्य है । अगर उन्होने तुरत ही उसमे रत होकर उसे सगठित रूप न दिया होता तो मेरी गैरहाजिरी मे सारा काम तीन-तेरह हो जाता। यही बात ग्रामोद्योग की थी। उन्होने इसके लिए मगनवाड़ी दी ही थी, साथ ही उसके सामने की कुछ जमीन भी वह मगनवाडी के लिए खरीदने का सकल्प कर चुके थे। अब चि० कमलनयन' ने वह जमीन भी मगनवाडी को दे दी है। ग्रामोद्योग का काम इतना व्यापक है कि इसमे अटूट रुपया खर्च किया जा सकता है। एक बात और जमनालालजी कई बार कहा करते थे कि लोग और सब जगह तो खादी पहनकर चले जाते है, लेकिन बैक मे नही जाते। अगर बैक में वह अपनी मारवाड़ी पगडी पहनकर न जाय तो उनके खयाल में इसमे उनकी प्रतिष्ठा की हानि होती है। मगर खुद जमनालालजी ने कभी इसकी कोई चर्चा नहीं की। १ जमनालालजी के ज्येष्ठ पुत्र देश-सेवको के सस्मरण हू फिर उसका नतीजा कुछ भी क्यों न हुआ हो । अत मै यह चाहता कि हममे इतनी स्वतत्रता और इतना आत्म-गौरव पैदा हो जाना चाहिए कि हम अपनी खादी की पोशाक मे हर जगह बिना झिझक के जा सके। अबतक इस देश की आजादी को खोने मे व्यापारी-समाज की खास जिम्मेदारी रही है। जमनालालजी को यह चीज बराबर खटका करती थी। जमनालालजी के दूसरे काम आखो के सामने ही है। महिला- आश्रम को ही लीजिये । यह उनकी अपनी एक विशेष कृति है। उन्हीकी कल्पना के अनुसार यह अबतक काम करता रहा है। जमनालालजी के सामने सवाल यह था कि जो लोग देश के काम- मे जुटकर भिखारी बन जाते है, उनके बाल-बच्चो की शिक्षा का क्या प्रबध हो ? उन्होने कहा कि कम-से-कम उनकी लडकियो को सरकारी मदरसो के मुकाबले मे अच्छी ही तालीम मिल सकेगी। बस, इसी खयाल से महिला-आश्रम की स्थापना हुई। आज इस आश्रम के लिए एक त्यागी और सुशिक्षित महिला की आवश्यकता है। आप इस आवश्यकता की पूर्ति मे सहायक हो सकते है। बुनियादी तालीम और हरिजन-सेवक-सघ के काम का भी यही हाल है । आप इनमे शरीक हो सकते है । हिदू-मुस्लिम- एकता के लिए उनके दिल मे खास लगन थी। उनके अदर सांप्र- दायिक द्वेष की बू तक न थी। आप उनके जीवन से इस गुण को ग्रहण कर सकते है। जमनालालजी का स्मृति-स्तभ खडा करके हम उनकी याद को चिरस्थायी नही बना सकते । स्तभ पर खुदे हुए शिला-लेख को तो लोग पढकर थोडे ही समय मे भुल जायगे, परतु जिस आदमी ने दुनिया के लिए इतना कुछ किया है उसके काम को चिर- स्थायी रखने का सकल्प कोई कर ले तो वह उनका सच्चा स्मारक हो रहेगा । कितु इसके लिए मै जबरदस्ती नही करना चाहता। जिसे जो कुछ भी करना हो आत्मोन्नति के लिए करे। अगर सुभाषचन्द्र बोस दिखावे के लिए कुछ भी होगा तो उससे मुझे और जमनालालजी की आत्मा को उल्टा कष्ट ही होगा। जमनालाल का शरीर मर गया, पर असल जमनालाल तो जिदा ही है और आगे के लिए उसे जिदा रखना हमारा काम है। सुभाषचंद्र बोस नेताजी के जीवन से जो सबसे बड़ी शिक्षा ली जा सकती है वह है उनकी अपने अनुयायियो मे ऐक्यभावना की प्रेरणाविधि, जिससे कि वे सब साप्रदायिक तथा प्रातीय बधनो से मुक्त रह सके और एक समान उद्देश्य के लिए अपना रक्त बहा सके । उनकी अनुपम सफलता उन्हें निस्सदेह इतिहास के पन्नो मे अमर रखेगी। नेताजी के प्रत्येक अनुगामी ने, जो भारत लौटने पर मुझसे मिले, निर्विवाद रूप से यह कहा कि नेताजी का प्रभाव उनपर जादू-सा हुआ करता था और वे उनके अधीन एकमात्र भारत की आजादी प्राप्त करने के उद्देश्य से काम करते थे। उनके दिलो मे साप्रदायिक और प्रातीय या और कोई भी भेदभाव कभी भी अकुरित नही हुआ था। नेताजी एक महान् गुणवान पुरुष थे। वह व्युत्पन्नमति और प्रतिभा-सपन्नथे। उन्होने आई०सी०एस० की परीक्षा उत्तीर्ण की, कितु नौकरी नही की। भारत लौटने पर वह देशबधुदास से प्रभावित हुए और कलकत्ता कारपोरेशन के मुख्य एक्जीक्यूटिव आफिसर नियुक्त हुए। बाद मे वह राष्ट्रीय महासभा के भी दो बार राष्ट्रपति बने, परतु उनकी उल्लेखनीय सफलताओ मे, भारत १ सेवाग्राम, २८-२-४२ जमनालालजी, पृष्ठ १० २ देश-सेवकों के संस्मरण से बाहर के, उस समय के कार्य है, जब वह देश से भागे और काबुल, इटली, जर्मनी और अन्य देशो से होकर अत मे जापान पहुचे । विदेशी चाहे कुछ भी कहे, पर मै विश्वास के साथ यह अवश्य कहूगा कि आज भारत में एक भी ऐसा आदमी नही है जो उनके इस प्रकार भागने को अपराध मानता है। 'समरथ को नही दोष गुसाई'--सत तुलसीदास के इस कथन के अनुसार नेताजी पर भागने का दोष नही लगाया जा सकता। जब सर्वप्रथम उन्होने सेना तैयार की तो उसकी तुच्छ सख्या की उन्होने कोई चिंता नही की। उनका निश्चय था कि सख्या चाहे कितनी ही कम क्यो न हो, पर भारत को आजाद कराने के लिए उन्हे सामर्थ्य भर यत्न करना ही चाहिए। नेताजी का सबसे महान् और स्थिर रहनेवाला कार्य था सब प्रकार के जातीय और वर्ग-भेद का उन्मूलन । वह केवल बंगाली ही नही थे। उन्होने अपने आपको कभी सवर्ण हिंदू नही समझा। वह आमूलचूल भारतीय थे। इससे अधिक क्या कि उन्होने अपने अनुगामियो में भी यही आग प्रज्वलित की, जिससे प्रेरित होकर वे उनकी उपस्थिति में सभी भेदभाव भूल गये थे और एक- सूत्र होकर काम करते थे। ... एक बात और । वह यह कि जो आजाद हिंद फौज सुभाष- बाबू ने बनाई थी और उसके लिए हम सब सुभाषबाबू की होशि- यारी, बहादुरी की तारीफ करते है और तारीफ करने की बात है; क्योकि जब वह हिंदुस्तान से बाहर था तब उसने सोचा कि चलो, थोडा फौजी काम भी कर लू । वह कोई लडवया तो था नही। एक मामूली हिंदुस्तानी था । जैसे दूसरे वकील, बैरिस्टर रहते हैं वैसे सुभाषबाबू भी थे। फौज की कोई तालीम तो पाई नही थी। हां, सिविल सर्विस में जैसा आमतौर पर होता है, थोड़ी घुड़सवारी - ' 'नेताजी, हिज लाइफ एण्ड वर्क' सुभाषचंद्र बोस । - सीख ली होगी । लेकिन पीछे उन्होंने फौजी-शास्त्र थोडा पढ लिया होगा। इस प्रकार उनके मातहत जो सेना बनी थी, मै सुनता हू कि उसके दो बडे अफसर, जिनसे मै जेल मे तथा उसके बाहर भी मिला था, काश्मीर पर हमला करनेवालो से मिले हुए है। यह मुझको बहुत चुभता है । ये सुभाषबाबू के मातहत खास काम करनेवाले थे और हमेशा उनके साथ रहा करते थे। सुभाषबाबू लश्कर से कोई बात छिपाकर रख तो सकते नही थे, क्योकि उन्हे उनके मारफत काम लेना पडता था। वे आज लुटेरो के सरदार होकर आते है तो मुझको चुभता है। अगर उनको अखबार मिलते है या जो मै कहता हू उसको वे सुन ले ले तो मै अपनी यह नाकिस आवाज उनको पहुचाता है कि आप इसमे क्योपडते है और सुभाष- बाबू के नाम को क्यो डुबाते है ? आप ऐसा क्यो करते है कि हिद का पक्ष ले या मुसलमान का पक्ष ले ? आपको तो जाति-भेद करना नही चाहिए। सुभाषबाबू तो ऐसे थे नही । उनके साथ हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई, हरिजन आदि सब रहते थे। वहा न हरिजन का भेद था, न इतरजन का । वहा तो हिदु- स्तानियो मे जात-पात का कोई भेदभाव था ही नही । यो तो सब अपने धर्म पर कायम थे, कोई धर्म तो छोड बैठे थे नही । लेकिन सुभाषबाबू ने कब्जा कर लिया था, उनके चित्त का हरण कर लिया था, शरीर का हरण नही किया था। ऐसा तो चलता नही था कि अगर आजाद हिंद फौज मे शामिल नही होता है तो काटो । लोगो को इस तरह काटकर वह हिदुस्तान को रिहाई दिलाने वाले नहीं थे। इस तरह से बडे और बडप्पन पाया। तब आप इतने छोटे क्यो बनते है और इस छोटे काम मे क्यो पडते है ? अगर कुछ करना ही है तो सारे हिंदुस्तान के लिए करो। वहा जो मुसलमान है, अफरीदी है, उनको कहे कि यह जाहिलपन क्यों करना? लोगो को लूटना और देहातो को जलाना क्या चलो, महाराजा से मिले, शेख अब्दुल्ला से मिले, उनको चिट्ठी लिखें कि हम आपसे मिलना चाहते है, हम यहा कोई लूट करने -- हुए ?
देश-सेवकों के संस्मरण वे तो आये नहीं है। आप इस्लाम को दबाते है, इसलिए आपको बताने आये है। यह तो मै समझ सकता हूं। तब तो आप सुभाष- बाबू का नाम उज्ज्वल करेगे और उन अफरीदी लोगो के सच्चे शिक्षक बनेगे। अफरीदी लोग कैसे रहते है, उनमे भी लुटेरे है या नही है, यह मै नही जानता हू। लेकिन मेरी निगाह मे वे भी इन्सान है। उनके दिल मे भी वही ईश्वर या खुदा है, इसलिए वे सब मेरे भाई है। अगर मै उनमे रहू तो उनसे कहूगा कि लूट क्या करना, एक-दूसरे पर गुस्सा क्या करना | मै यह तो कहता नही कि तुम्हारे पास जो बदूके या तलवारे है, उन्हे छोड़ दो। उनको रखो, लेकिन जो दूसरे लोग डरे हुए है, मुफलिस है, औरते है, बच्चे है, उनको बचाने के लिए। उसमे क्या है, चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान । तो मै कहूगा कि ये जो दो अफसर है, जिनका नाम मैने सुन लिया है, सुभाषबाबू का नाम याद करे। वे तो मर गये, लेकिन उनका नाम नही मरा, काम तो नही मरा।' आज सुभाषबाबू की जन्म-तिथि है। मैने कह दिया है कि मै तो किसीकी जन्म-तिथि या मृत्यु-तिथि याद नही रखता। वह आदत मेरी नहीं है। सुभाषबाबू की तिथि की मुझे याद दिलाई गई। उससे मै राजी हुआ। उसका भी एक खास कारण है । वह हिंसा के पुजारी थे। मै अहिसा का पुजारी है। पर इसमे क्या ? मेरे पास गुण की ही कीमत है । तुलसीदासजी ने कहा है न, "जड़-चेतन गुण-६ -दोषमय विश्व कीन्ह करतार । संत-हंस गुण गहहिं पय परिहरि बारि विकार ॥" हस जैसे पानी को छोडकर दूध ले लेता है, वैसे ही हमें भी करना चाहिए । मनुष्य-मात्र मे गुण और दोष दोनो भरे पड़े हैं। हमे गुणो को ग्रहण करना चाहिए । दोषो को भूल जाना चाहिए। सुभाषबाबू बडे देश-प्रेमी थे। उन्होने देश के लिए अपनी जान १ प्रार्थना-प्रवचन, २-११-४७
मदनमोहन मालवीय
की बाजी लगा दी थी और वह करके भी बता दिया। वह सेना-
पति बने । उनकी फौज मे हिदू, मुसलमान, पारसी, सिख सब थे।
सब बंगाली ही थे, ऐसा भी नही था। उनमे न प्रातीयता थी, न
रग-भेद, न जाति-भेद । वह सेनापति थे, इसलिए उन्हें ज्यादा
सहूलियत लेनी या देनी चाहिए, ऐसा भी नही था।'
: २० :
मदनमोहन मालवीय
जब से १९१५ मे हिदुस्तान आया तब से मेरा
मालवीयजी के साथ बहुत समागम है और मैं उन्हें अच्छी
तरह जानता हू । मेरा उनके साथ गहरा परिचय रहता है।
उन्हे मै हिंदू-ससार के श्रेष्ठ व्यक्तियो मे मानता हूं।
कट्टर और पुराने खयालात के होते हुए भी बड़े उदार विचार
रखते है। उनका किसीसे ईर्ष्या रखना असभव है। उनकी उदारता
ऐसी है कि उसमे उनके दुश्मनो के लिए भी जगह है । कभी उन्हे
शासन की चाह न रही और जो शासन आज उनके पास है वह
उनकी मातृभूमि की आज तक की लंबी और अखड सेवा का फल
है। ऐसी सेवा का दावा हममे से बहुत कम लोग कर सकते है।
उनकी और मेरी विशेषता अलग-अलग है, लेकिन हम दोनो एक
दूसरे को सगे भाई-सा प्यार करते है। मेरे और उनके बीच कभी
जरा भी बिगाड़ नही हुआ। हमारे रास्ते जुदे-जुदे है। इसलिए
हमारे बीच स्पर्धा और डाह का सवाल पैदा ही नही हो
सकता।
...
.
आशावाद और भोलेपन में मैं भेद करता हूं। पडितजी
प्रार्थना-प्रवचन २३-१-४८,
२ हिंदी नवजीवन १-६-२४,
.
देश-सेवको के सस्मरण ... ... मे दोनो है । दृष्टिमर्यादा पर निरागा के चिन्ह होते हुए भी और जानते हुए भी जो आशा रखता है वह आशावादी है । यह गुण पडितजी मे काफी मात्रा में है। आशा की बाते कोई कह दे और उसपर विश्वास लाना वह भोलापन है। यह भी पडितजी मे है। उसे मै त्याज्य समझता हू। पडितजी महान व्यक्ति है, इसलिए उनको ऐसे भोलेपन से हानि नही हुई है। हमे ऐसे भोलेपन का अनु- करण कभी नही करना चाहिए। आशावाद अतर्नाद पर निर्भर है, भोलापन बाह्य बातो पर ।' देश के सार्वजनिक जीवन को उनकी बहुत बडी देन है। उनका सबसे बडा कार्य हिदू विश्वविद्यालय, बनारस है। इस विद्यालय के प्रेम से हमे हार्दिक प्रेम है। महामना मालवीयजी ने उसके लिए जब कभी मेरी सेवाए चाही है, मैने दी है। मालवीयजी महाराज के साथ मेरा कितना गाढ सबध है। अगर उनका कोई काम मुझसे हो सकता है तो मुझे उसका अभिमान रहता है और अगर मैं उसे कर सकू तो अपनेको कृतार्थ समझता हूँ । यहा आना मेरे लिए तो एक तीर्थ मे आने के समान है। यह विश्वविद्यालय मालवीयजी महाराज का सबसे बडा और प्राण-प्रिय कार्य है। उन्होने हिदुस्तान की बहुत-बहुत सेवाए की है, इससे आज कोई इकार नही कर सकता। लेकिन मेरा अपना खयाल यह है कि उनके महान् कार्यो मे इस कार्य का महत्व सबसे ज्यादा रहेगा। २५ साल पहले, जब इस विश्वविद्यालय की नीव डाली गई थी, तब भी मालवीयजी महाराज के आग्रह और खिचाव से मै यहा आ पहुचा था। उस समय तो मै यह सोच भी न सकता था कि जहा बडे-बडे राजा-महाराजा और खुद वाइसराय आने- वाले है, वहा मुझ-जैसे फकीर की क्या जरूरत हो सकती है। तब तो मै 'महात्मा भी नही बना था। महादेवभाई की डायरी, २७-५-३२ - मदनमोहन मालवीय १०१ उस समय भी मालवीयजी महाराज की कृपा-दृष्टि मुझपर थी। कही भी कोई सेवक हो, वह उसे ढ्ढ निकालते है और किसी- न-किसी तरह अपने पास खीच ही लाते है। यह उनका मदा का धधा है। लोग मालवीयजी महाराज की बडी प्रशसा करते है। वह सब तरह उसके लायक है। मै जानता हूँ कि हिंदू विश्वविद्यालय का कितना बडा विस्तार है। ससार मे मालवीय- जी से बढकर कोई भिक्षुक नही। जो काम उनके सामने आ जाता है, उसके लिए--अपने लिए नही-उनकी भिक्षा की झोली का मुह हमेशा खुला रहता है। वह हमेशा मागा ही करते है, और परमात्मा की भी उनपर बडी दया है कि जहा जाते है, उन्हे पैसे मिल ही जाते है, तिसपर भी उनकी भूख कभी नही बुझती । उनका भिक्षापात्र सदा खाली रहता है। उन्होने विश्वविद्यालय के लिए एक करोड इकट्ठा करने की प्रतिज्ञा की थी। एक करोड की जगह डेढ करोड दस लाख रुपया इकट्ठा हो गया, मगर उनका पेट नही भरा। अभी-अभी उन्होने मुझसे कान मे कहा है कि आज के हमारे सभापति महाराज साहब दरभगा ने उनको एक खासी बडी रकम दान में और दी है। मै जानता हूं कि मालवीयजी महाराज स्वय किस तरह रहते है। यह मेरा सौभाग्य है कि उनके जीवन का कोई पहलू मुझसे छिपा नही । उनकी सादगी, उनकी सरलता, उनकी पवित्रता और उनके प्रेम से मै भली-भाति परिचित उनके इन गुणो मे से आप जितना कुछ ले सके, जरूर ले। विद्यार्थियो के लिए तो उनके जीवन की बहुतेरी बाते सीखने लायक है । मगर मुझे डर है कि उन्होने, जितना सीखना चाहिए, सीखा नही है। यह आपका और हमारा दुर्भाग्य है । इसमे उनका कोई कसूर नही। धूप में रहकर भी कोई सूरज का तेज न पा सके तो उसमे सूरज बैचारे का क्या दोष ? वह तो अपनी तरफ से सबको गर्मी पहुचाता रहता है, पर अगर कोई उसे लेना ही न चाहे और ठड मे रहकर हूँ १०२ देश-सेवकों के संस्मरण ठिठुरता फिरे तो सूरज भी उसके लिए क्या करे ? मालवीयजी महाराज के इतने निकट रहकर भी अगर आप उनके जीवन से सादगी, त्याग, देशभक्ति, उदारता और विश्वव्यापी प्रेम आदि सद्गुणो का अपने जीवन मे अनुकरण न कर सके तो कहिये, आप से बढकर अभागा और कौन होगा ? - ... .. के लिए और हिदुस्तान के लिए अग्रेजी मे एक कहावत है-'राजा गया, राजा हमेशा जियो ।' ठीक यही भारत-भूषण मालवीयजी महाराज कहा जा सकता है-"मालवीयजी गये, मालवीयजी अमर हो ।” मालवीयजी हिंदुस्तान के लिए पैदा हुए किये गये अपने कामो मे जीते है। उनके काम बहुत है। बहुत बडे है। उनमे सबसे बडा हिदू-विश्वविद्यालय है । गलती से उसे हम बनारस हिंदू युनिवर्सिटी के नाम से पहचानते है। उस नाम के लिए दोष मालवीयजी महाराज का नही, उनके पैरोकारो का रहा है। मालवीयजी महाराज दासानुदास थे। दास लोग जैसा करते थे, वैसा वह करने देते थे । मुझे पता है कि यह अनुकुलता उनके स्वभाव मे भरी थी, यहातक कि बाज दफा वह दोष का रूप लेलेती थी, लेकिन 'समरथ को नहि दोष गुसाई' वाली बात मालवीयजी महाराज के बारे मे भी कही जा सकती है । उनका प्रिय नाम तो हिद्द विश्व-विद्यालय ही था और यह सुधार तो अब भी करने योग्य है। इस विश्वविद्यालय का हरेक पत्थर शुद्ध हिदू-धर्म का प्रतिबिब होना चाहिए । एक भी मकान पश्चिम के जडवाद की निशानी न हो, बल्कि अध्यात्म की निशानी हो। और जैसे मकान हो, वैसे ही शिक्षक और विद्यार्थी भी हो। आज है ? प्रत्येक विद्यार्थी शुद्ध धर्म की जीवित प्रतिमा है ? नही है तो, क्यो नही है? इस विश्वविद्यालय की परीक्षा विद्यार्थियो की सख्या से नहीं, बल्कि उनके हिदू-धर्म की प्रतिमा होने से ही हो सकती है, फिर भले वे थोडे ही क्यो न हो। १ हरिजन सेवक, २१-१-४२, ?
श्रीमद् राजचंद्रभाई १०३ मै जानता हूं कि यह काम कठिन है, लेकिन यही इस विद्यालय की जड है । अगर यह ऐसा नहीं है, तो कुछ नही है। इसलिए स्वर्गीय मालवीयजी के पुत्रो का और उनके अनुयायियो का धर्म स्पष्ट है। जगत मे हिदू-धर्म का क्या स्थान है ? उसमे आज क्या दोष है ? वे कैसे दूर किये जा सकते है ? मालवीयजी महा- राज के भक्तो का कर्त्तव्य है कि वे इन प्रश्नो को हल करे। मालवीय- जी अपनी स्मृति छोड गये है । उसको स्थायी रूप देना, उसका विकास करना, उनका श्रेष्ठ स्मृति-स्तभ होगा। विश्वविद्यालय के लिए स्व. मालवीयजी ने काफी द्रव्य इकट्ठा किया था, लेकिन बाकी भी काफी रहा है। इस काम मे तो हरेक आदमी हाथ बटा सकता है। यह तो हुई उनकी बाह्य प्रवृत्ति । उनका आतरिक जीवन विशुद्ध था। वह दया के भडार थे। उनका शास्त्रीय ज्ञान बडा था। भागवत उनकी प्रिय पुस्तक थी । वह सजग कथाकार थे। उनकी स्मरण-शक्ति तेजस्विनी थी। जीवन शुद्ध था, सादा था । उनकी राजनीति को और दूसरी अनेक प्रवृत्तियो को छोड देता हूं। जिन्होने अपना सारा जीवन सेवा के लिए अर्पित किया था और जो अनेक विभूतिया रखते थे, उनकी प्रवृत्ति की मर्यादा हो नही सकती। मैने तो उनमे से चिरस्थायी चीजे ही देने का सकल्प किया था। जो लोग विश्वविद्यालय को शुद्ध बनाने मे मदद देना चाहते है, वे मालवीयजी महाराज के अतर्जीवन के मनन और अनुसरण करने की कोशिश करे।' : २१ : श्रीमद् राजचंद्रभाई मै जिनके पवित्र सस्मरण लिखना आरभ करता हूं, हरिजन सेवक, ८-१२-४६ १०४ देश-सेवको के सस्मरण । उन स्वर्गीय राजचद्र की आज जन्मतिथि है। कार्तिक पूर्णिमा संवत् १९७९ को उनका जन्म हुआ था। मेरे जीवन पर श्रीमद्राजचद्र भाई का ऐसा स्थायी प्रभाव पडा है कि मै उसका वर्णन नही कर सकता। उनके विषय मे मेरे गहरे विचार है। मै कितने ही वर्षों से भारत मे धार्मिक पुरुषो की शोध मे हू, परतु मैने ऐसा धार्मिक पुरुष भारत मे अबतक नहीं देखा, जो श्रीमद् राजचद्रभाई के साथ प्रतिस्पर्धा कर सके। उनमे ज्ञान, वैराग्य और भक्ति थी, ढोग, पक्षपात या राग-द्वेष न थे। उनमे एक ऐसी महान् शक्ति थी, जिसके द्वारा वह प्राप्त हुए प्रसग का पूर्ण लाभ उठा सकते थे। उनके लेख अग्रेज तत्व-ज्ञानियो की अपेक्षा भी विलक्षण, भावनामय और आत्मदर्शी है। यूरोप के. तत्व-ज्ञानियो मे मै टाल्स्टाय को पहली श्रेणी का और रस्किन को दूसरी श्रेणी का विद्वान् समझता हू, परतु श्रीमद् राजचद्रभाई का अनुभव इन दोनो से भी बढा-चढा था। इन महापुरुषो के जीवन के लेखो को अवकाश के समय पढेगे तो आप पर उनका बहुत अच्छा प्रभाव पडेगा। वह प्राय कहा करते थे कि मै किसी बाडे का नही हू और न किसी बाडे मे रहना ही चाहता हू। यह सब तो उपधर्म -मर्यादित है और धर्म तो असीम है कि जिसकी व्याख्या हो ही नही सकती। वह अपने जवाहरात के धधे से विरक्त होते कि तुरत पुस्तक हाथ में लेते । यदि उनकी इच्छा होती तो उनमे ऐसी शक्ति थी कि वही एक अच्छे प्रतिभाशाली बैरिस्टर, जज या वाइसराय हो सकते थे। यह अतिशयोक्ति नही, कितु मेरे मन पर उनकी छाप है। इनकी विचक्षणता दूसरे पर अपनी छाप लगा देती थी। जिनका पुण्य-स्मरण करने के लिए हम लोग आये हुए है, उनके हम लोग पुजारी है। मै भी उनका पुजारी है। वह दयाधर्म की मूर्ति थे। उन्होने दयाधर्म समझा था और उसे अपने जीवन में उतारा था। मैने यह बहुत बार कहा और लिखा है कि मैने अपने जीवन मे बहुतो से बहुत-कुछ ग्रहण किया है । पर श्रीमद् राजचंद्रभाई सबसे अधिक यदि मैने किसीके जीवन मे से ग्रहण किया हो तो वह कविश्री (श्रीमद्राजचद्र) के जीवन मे से ग्रहण किया है। दया-धर्म भी मैने उन्हीके जीवन मे से सीखा है। बहुत-से प्रसगो मे तो हमे जड होकर वैसी ही प्रवृत्ति करनी चाहिए। शुद्ध जडा और चैतन्य मे भेद नहीं के बराबर है। सारा जगत जड रूप ही दीख पडता है । आत्मा तो कभी क्वचित् ही प्रकाशित होता है। ऐसा व्यवहार अलौकिक पुरुषो का होता है और यह मैने देखा है कि ऐसा व्यवहार श्रीमद्राजचद्रभाई का था। वह बहुत बार कहा करते थे कि मेरे शरीर मे चारो ओर से कोई बरछी भोक दे तो मै उसे सह सकता हू, पर जगत मे जो झूठ, पाखड, अत्याचार चल रहा है, धर्म के नाम से जो अधर्म हो रहा है उसकी बरछी मुझसे सही नही जाती। अत्याचारो से उन्हे अकुलाते मैने बहुत बार देखा है। वह सारे जगत को अपने कुटुब के जैसा समझते थे। अपने भाई या बहन की मौत से जितना दुःख हमे होता है उतना ही दुख उन्हे ससार मे दुख और मृत्यु देखकर होता था। राजचद्रभाई का शरीर जो इतनी छोटी उम्र मे छूट गया, इसका कारण भी मुझे यही जान पडता है । यह ठीक है कि उनके शरीर मे दर्द घर किये हुए था, पर जगत के ताप का जो दर्द उन्हे था, वह उनके लिए असह्य था। उनके देह मे केवल शारीरिक दर्द ही होता तो उसे उन्होने अवश्य जीत लिया होता, पर उन्हे तो जान पडा कि ऐसे विषम काल मे आत्म-दर्शन कैसे हो सकता है। यह दया-धर्म की निशानी है । ' श्रीमद्राजचद्र को मै 'रायचद्रभाई' अथवा 'कवि' कहकर प्रेम और मानपूर्वक सबोधन करता था। उनके सस्मरण लिखकर उनका रहस्य मुमुक्षुओ के समक्ष रखना मुझे अच्छा लगता है। १ राजचद्र-जयती, अहमदाबाद में सभापति-पद से दिया गया भाषण J १०६ देश-सेवको के सस्मरण . मुमुक्षु शब्द का मैने यहा जान-बूझकर प्रयोग किया है। सब प्रकार के पाठकों के लिए यह प्रयास नही । मेरे ऊपर तीन पुरुषो ने गहरी छाप डाली है टाल्स्टाय, रस्किन और रायचद्रभाई। टाल्स्टाय ने अपनी पुस्तको द्वारा और उनके साथ थोडे पत्र-व्यवहार से, रस्किन ने अपनी एक ही पुस्तक 'अनदु दिस लास्ट' से, जिसका गुजराती नाम मैने 'सर्वोदय' रखा है और रायचद्रभाई ने अपने साथ गाढ परिचय से। जब मुझे हिदू-धर्म मे शंका पैदा हुई उस समय उसके निवारण करने में मदद करनेवाले रायचद्रभाई थे। सन् १८९३ मे दक्षिण अफ्रीका मे मै क्रिश्चियन सज्जनो के विशेष सपर्क मे आया। उनका जीवन स्वच्छ था। वे चुस्त धर्मात्मा थे। अन्य धर्मियो को क्रिश्चियन होने के लिए समझाना उनका मुख्य व्यवसाय था। यद्यपि मेरा और उनका सबध व्यावहारिक कार्य को लेकर ही हुआ था तो भी उन्होने मेरी आत्मा के कल्याण के लिए चिता करना शुरू कर दिया। उस समय मै अपना एक ही कर्तव्य समझ सका कि जबतक मै हिदू-धर्म के रहस्य को पूरी तौर से न जान लू और उससे मेरी आत्मा को सतोष न हो जाय तबतक मुझे अपना कुलधर्म कभी न छोडना चाहिए । इसलिए मैने हिदू-धर्म और अन्य धर्मों की पुस्तके पढना शुरू कर दी। क्रिश्चियन और मुसल- मानी पुस्तके पढी। विलायत के अग्रेज मित्रो के साथ पत्र-व्यवहार किया। उनके समक्ष अपनी शकाए रखी तथा हिदुस्तान मे जिन के ऊपर मुझे कुछ भी श्रद्धा थी पत्र-व्यवहार किया। उनमे रायचद्र भाई मुख्य थे। उनके साथ तो मेरा अच्छा सबध हो चुका था। उनके प्रति मान भी था। इसलिए जो मिल सके उनसे लेने का मैने विचार किया। उसका फल यह हुआ कि मुझे शांति मिली। हिदू- धर्म मे मुझे जो चाहिए वह मिल सकता है, ऐसा मन को विश्वास हुआ। मेरी इस स्थिति के जवाबदार रायचद्रभाई हुए। इससे मेरा उनके प्रति कितना अधिक मान होना चाहिए, इसका पाठक कुछ अनुमान कर सकते है ।
श्रीमद् राजचद्रभाई इतना होने पर भी मैने उन्हे धर्मगुरु नही माना । धर्मगुरु की तो मै खोज किया ही करता है। और अबतक मुझे सबके विषय मे यही जवाब मिला है कि ये नही । ऐसा सपूर्ण गुरु प्राप्त करने के लिए तो अधिकार चाहिए । वह मै कहा से लाऊ ? १ रायचद्रभाई के साथ मेरी भेट जुलाई सन् १८९१ मे उस दिन हुई जब मै विलायत से बबई वापस आया। इन दिनो समुद्र मे तूफान आया करता है, इस कारण जहाज रात को देरी से पहुचा। मै डाक्टर-बैरिस्टर-और अब रगून के प्रख्यात झवेरी प्राण- जीवनदास मेहता के घर उतरा था। रायचद्रभाई उनके बड़े भाई के जमाई होते थे। डाक्टरसाहब ने ही परिचय कराया। उनके दूसरे बडे भाई झवेरी रेवाशकर जगजीवनदास की पहचान भी उसी दिन हुई। डाक्टरसाहब ने रायचद्रभाई का 'कवि' कहकर परिचय कराया और कहा, "कवि होते हुए भी आप हमारे साथ व्यापार मे है । आप ज्ञानी और शतावधानी है।" किसीने सूचना की कि मै उन्हे कुछ शब्द सुनाऊ और वे शब्द चाहे किसी भी भाषा के हो, जिस क्रम से मै बोलूगा उसी क्रम से वे दुहरा जावेगे। मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ। मै तो उस समय विलायत से लौटा था। मुझे भाषा-ज्ञान का भी अभिमान था। मुझे विलायत की हवा भी कुछ कम न लगी थी। उन दिनो विलायत से आया मानो आ- काश से उतरा। मैने अपना समस्त ज्ञान उलट दिया। और अलग- अलग भाषाओ के शब्द पहले तो मैने लिख लिये, क्योकि मुझे वह क्रम कहा याद रहनेवाला था और बाद मे उन शब्दो को मै बाच गया। उसी क्रम से रायचद्रभाई ने धीरे-से एक के बाद एक सब शब्द कह सुनाये । मै सतुष्ट हुआ, चकित हुआ और कवि की स्मरण- शक्ति के विषय मे मेरा उच्च विचार हुआ। विलायत की हवा कम पड़ने के लिए कहा जा सकता है कि यह सुदर अनुभव हुआ। कवि को अग्रेजी का ज्ञान बिल्कुल न था। उस समय उनकी उमर पच्चीस से अधिक न थी। गुजराती पाठशाला मे भी उन्होने - १०८ देश-सेवको के संस्मरण थोडाही अभ्यास किया था। फिर भी इतनी शक्ति, इतना ज्ञान और आस-पास से इतना उनका मान इससे मै मोहित हुआ। स्मरण- शक्ति पाठशाला मे नही बिकती और ज्ञान भी पाठशाला के बाहर, यदि इच्छा हो--जिज्ञासा हो--तो मिलता तथा मान पाने के लिए विलायत अथवा कही भी नही जाना पडता, परतु गुण को मान चाहिए तो मिलता है--यह पदार्थ पाठ मुझे बबई उतरते ही मिला। कवि के साथ यह परिचय बहुत आगे बढा। स्मरण-शक्ति बहुत लोगो की तीन होती है, इसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं। शास्त्र-ज्ञान भी बहुतो मे पाया जाता है, परतु यदि वे लोग सस्कारी न हो तो उनके पास फूटी कौडी भी नहीं मिलती। जहा सस्कार अच्छे होते है वही स्मरण-शक्ति और शास्त्र-ज्ञान सबध शोभित होता है और जगत को शोभित करता है। कवि सस्कारी ज्ञानी थे। अपूर्व अवसर एवो क्या रे आवशे, क्या रे थईशुं बाह्यातर निम्रय जो । सर्व सबंधनु बधन तीक्ष्ण छेदीने, विचरशु कब महत्पूरषने पथ जो॥ सर्व भाव थी ओदासीन्य वत्ति करी, मात्र देश ते सयमहेतु होय जो॥ अन्य कारणे अन्य कशु कल्पे नहि, देहे पण किचित् मूर्छा नव जोय जो. ॥अपूर्व।। रायचद्रभाई की १८ वर्ष की उमर के निकले हुए अपूर्व उद्गारो की ये पहली दो कडिया है । जो वैराग्य इन कडियो मे छलक रहा है, वह मेने उनके दो वर्ष के गाढ परिचय से प्रत्येक क्षण मे देखा है। उनके लेखो की एक असाधारणता यह है कि उन्होने स्वय जो अनुभव किया वही लिखा है। उसमे कही भी कृत्रिमता नही। दूसरे के ऊपर छाप श्रीमद् राजचद्रभाई । - . डालने के लिए उन्होने एक लाइन भी लिखी हो, यह मैने नही देखा। उनके पास हमेशा कोई-न-कोई धर्म-पुस्तक और एक कोरी कापी पडी ही रहती थी। इस कापी मे वह अपने मन मे जो विचार आते उन्हें लिख लेते थे। ये विचार कभी गद्य मे और कभी पद्य मे होते थे। इसी तरह 'अपूर्व अवसर' आदि पद भी लिखा हुआ होना चाहिए। खाते, बैठते, सोते और प्रत्येक क्रिया करते हुए उनमे वैराग्य तो होता ही था। किसी समय उन्हे इस जगत् के किसी भी वैभव पर मोह हुआ हो, यह मैने नही देखा। उनका रहन-सहन मै आदरपूर्वक परतु सूक्ष्मता से देखता था। भोजन मे जो मिले वह उसीसे सतुष्ट रहते थे। उनकी पोशाक मादी थी। कुर्ता, अगरखा, खेस, सिल्क का दुपट्टा और धोती, यही उनकी पोशाक थी तथा ये भी कुछ-बहुत साफ या इस्तरी किये हुए रहते हो, यह मुझे याद नही। जमीन पर बैठना और कुरसी पर बैठना, उन्हे दोनो ही समान थे। सामान्य रीति से दुकान मे वह गद्दी पर बैठते थे। उनकी चाल धीमी थी और देखनेवाला समझ सकता था कि चलते हुए भी वह अपने विचार मे मग्न है । आखो मे उनके चमत्कार था। वह अत्यत तेजस्वी थे। विह्वलता जरा भी न थी। आखो मे एकाग्रता चित्रित थी। चेहरा गोलाकार, होठ पतले, नाक न नोक- दार न चपटी, शरीर दुर्बल, कद मध्यम, वर्ण श्याम और देखने में वे शातिमूर्ति थे। उनके कठ मे इतना अधिक माधुर्य था कि उन्हें सुननेवाले थकते न थे। उनका चेहरा हँसमुख और प्रफुल्लित था। उसके ऊपर अतरानद की छाया थी। भाषा उनकी इतनी परिपूर्ण थी कि उन्हे अपने विचार प्रकट करते समय कभी कोई शब्द ढूढना पडा हो, यह मुझे याद नही । पत्र लिखने बैठते तो शायद ही शब्द बदलते हुए मैने उन्हें देखा होगा। फिर भी पढनेवाले को यह न मालूम होता था कि कही विचार अपूर्ण है अथवा वाक्य-रचना त्रुटि-पूर्ण है, अथवा शब्दो के चुनाव में कमी है।
११० देश-सेवकों के संस्मरण यह वर्णन सयमी के विषय मे सभव है। बाह्याडबर से मनुष्य वीतरागी नही हो सकता। वीतरागता आत्मा की प्रसादी है। यह अनेक जन्मो के प्रयत्नो से मिल सकती है, ऐसा हर मनुष्य अनुभव कर सकता है। रागो को निकालने का प्रयत्न करनेवाला जानता है कि राग-रहित होना कितना कठिन है । यह राग-रहित दशा कवि की स्वाभाविक थी, ऐसी मेरे ऊपर छाप पड़ी थी। मोक्ष की प्रथम सीढी वीतरागता है। जबतक जगत की एक भी वस्तु मे मन रमा है तबतक मोक्ष की बात कैसे अच्छी लग सकती है, अथवा अच्छी लगती भी हो तो केवल कानो को ही, ठीक वैसे ही जैसे कि हमे अर्थ के समझे बिना किसी सगीत का केवल स्वर ही अच्छा लगता है। ऐसी केवल कर्णप्रिय क्रीडा मे से मोक्ष का अनुसरण करनेवाले आचरण के आने में बहुत समय बीत जाता है। आंतर वैराग्य के बिना मोक्ष की लगन नही होती। ऐसे वैराग्य की लगन कवि मे थी। ... .. वणिक तेहनुं नाम जेह जूढू नव बोले, वणिक तेहY नाम, तोल ओर्छ नव तोले, वणिक तेहनु नाम बापे बोल्युं तेपाले, वणिक तेहनु नाम व्याजसहित धन वाले, विवेक तोल ए वणिकनुं सुलतान तोल ए शाव छ, बेपार चूके जो वाणीओ दुःख दावानल थाय छ । सामल भट्ट सामान्य मान्यता ऐसी है कि व्यवहार अथवा व्यापार और परमार्थ अथवा धर्म ये दोनो अलग-अलग विरोधी वस्तुएं है। व्यापार मे धर्म को घुसेडना पागलपन है। ऐसा करने से दोनो बिगड जाते है। यह मान्यता यदि मिथ्या न हो तो अपने भाग्य में केवल निराशा ही लिखी है, क्योकि ऐसी एक भी वस्तु नहीं, ऐसा एक भी व्यवहार नही जिससे हम धर्म को अलग रख सके। धार्मिक मनुष्य का धर्म उसके प्रत्येक कार्य में झलकना ही श्रीमद् राजचंद्रभाई चाहिए, यह रायचद्रभाई ने अपने जीवन मे बताया था । धर्म कुछ एकादशी के दिन ही, पर्युषण मे ही, ईद के दिन ही, या रविवार के दिन ही पालना चाहिए, अथवा उसका पालन मदिरो मे, देरा- सरो मे और मस्जिदो मे ही होता है और दूकान या दरबार मे नही होता, ऐसा कोई नियम नहीं। इतना ही नही, परंतु यह कहना धर्म को न समझने के बराबर है, यह रायचद्रभाई कहते, मानते और अपने आचार मे बताते थे। उनका व्यापार हीरे-जवाहरात का था । वह श्री रेवाशंकर जगजीवन झवेरी के साझी थे। साथ मे वे कपडे की दूकान भी चलाते थे। अपने व्यवहार मे संपूर्ण प्रकार से वह प्रामाणिकता बताते थे, ऐसी उन्होने मेरे ऊपर छाप डाली थी। वे जब सौदा करते तो मै कभी अनायास ही उपस्थित रहता। उनकी बात स्पष्ट और एक ही होती थी। चालाकी सरीखी कोई वस्तु उनमे नही देखता था। दूसरे की चालाकी वह तुरत ताड़ जाते थे। वह उन्हे असह्य मालूम होती थी। ऐसे समय उनकी भृकुटि भी चढ़ जाती और आखो मे लाली आ जाती, यह मै देखता था। धर्म-कुशल लोग व्यवहारकुशल नही होते, इस वहम को राय- चंदभाई ने मिथ्या सिद्ध करके बताया था। अपने व्यापार मे वह पूरी सावधानी और होशियारी बताते थे । हीरे-जवाहरात की परीक्षा वह बहुत बारीकी से कर सकते थे। यद्यपि अग्रेजी का ज्ञान उन्हे न था, फिर भी पेरिस वगैरह के अपने आढ़तियो की चिट्ठियो और तारो के मर्म को वह फौरन समझ जाते थे और उनकी कला समझने मे उन्हे देर न लगती। उनके जो तर्क होते थे, वे अधिकाश सच्चे ही निकलते थे । इतनी सावधानी और होशियारी होने पर भी वह व्यापार की उद्विग्नता अथवा चितान रखते थे । दुकान में बैठे हुए भी जब अपना काम समाप्त हो जाता तो उनके पास पड़ी हुई धार्मिक पुस्तक अथवा कापी,जिसमे वह अपने उद्गार लिखते थे,खुल जाती थी। मेरे जैसे जिज्ञासु तो उनके पास रोज आते ही रहते थे और ११२ देश-सेवको के सस्मरण उनके साथ धर्म-चर्चा करने में हिचकते न थे। 'व्यापार के समय मे व्यापार और धर्म के समय मे धर्म' अर्थात् एक समय में एक ही काम होना चाहिए, इस सामान्य लोगो के सुदर नियम का कवि पालन न करते थे। वह शतावधानी होकर इसका पालन न करे तो यह हो सकता है, परतु यदि और लोग उसका उल्लघन करने भी लगे तो जैसे दो घोडो पर सवारी करनेवाला गिरता है, वैसे ही वे अवश्य गिरते । सपूर्ण धार्मिक और वीतरागी पुरुष भी जिस क्रिया को जिस समय करता हो, उसमे ही लीन हो जाय, यह योग्य है। इतना ही नहीं, बल्कि उसे यही शोभा देता है। यह उसके योग की निशानी है। इसमे धर्म है। व्यापार अथवा इसी तरह की जो कोई अन्य क्रिया करना हो तो उसमे भी पूर्ण एकाग्रता होनी ही चाहिए। अतरग मे आत्मचितन तो मुमुक्षु मे उसके श्वास की तरह सतत चलना ही चाहिए। उससे वह एक क्षण भी वचित नही रहता । परतु इस तरह आत्मचितन करते हुए भी जो कुछ वह बाह्य कार्य करता हो वह उसमे ही तन्मय रहता है। यह नहीं कहना चाहता कि कवि ऐसा न करते थे। ऊपर कह चुका है कि अपने व्यापार मे वह पूरी सावधानी रखते थे। ऐसा होने पर भी मेरे ऊपर ऐसी छाप जरूर पडी है कि कवि ने अपने शरीर से आवश्यकता से अधिक काम लिया है। यह योग की अपूर्णता तो नही हो सकती है यद्यपि कर्तव्य करते हुए शरीर तक भी समर्पण कर देना यह नीति है, परतु शक्ति से अधिक बोझ उठा कर उसे कर्तव्य समझना यह राग है । ऐसा अत्यत सूक्ष्म राग कवि मे था, यह मुझे अनुभव हुआ है। बहुत बार परमार्थ दृष्टि से मनुष्य शक्ति से अधिक काम लेता है और बाद मे उसे पूरा करने में उसे कष्ट सहना पडता है। इसे हम गुण समझते है और इसकी प्रशसा करते है। परतु परमार्थ अर्थात् धर्म-दृष्टि से देखने से इस तरह किये हुए काम मे सूक्ष्म मूर्छा का होना बहुत सभव है। यदि हम इस जगत् मे केवल निमित्तमात्र ही है, यदि यह भा 석 .
श्रीमद् राजचंद्रभाई शरीर हमे भाडे मिला है, और उस मार्ग से हमे तुरत मोक्ष साधन करना चाहिए, यही परम कर्तव्य है, तो इस मार्ग मे जो विघ्न आते हो उनका त्याग अवश्य ही करना चाहिए। यही पारमार्थिक दृष्टि है, दूसरी नही। जो दलीले मैने ऊपर दी है, उन्हे ही किसी दूसरे प्रकार से रायचदभाई अपनी चमत्कारिक भाषा में मुझे सुना गये थे। ऐसा होने पर भी उन्होने ऐसी-वैसी उपाधिया उठाई कि जिसके फल- स्वरूप उन्हे सख्त बीमारी भोगनी पड़ी। रायचदभाई को परोपकार के कारण मोह ने क्षण भर के लिए घेर लिया था, यदि मेरी यह मान्यता ठीक हो तो 'प्रकृति याति •भूतानि निग्रह. कि करिष्यति' यह श्लोकार्थ यहा ठीक बैठता है और इसका अर्थ भी इतना ही है। कोई इच्छापूर्वक बर्ताव करने के लिए उपर्युक्त कृष्ण-वचन का उपयोग करते है, परतु वह तो सर्वथा दुरुपयोग है। रायचदभाई की प्रकृति उन्हे बलात्कार गहरे पानी मे ले गई। ऐसे कार्य को दोषरूप से भी लगभग सपूर्ण आत्माओ मे ही माना जा सकता है। हम सामान्य मनुष्य तो परो- पकारी कार्य के पीछे अवश्य पागल बन जाते है, तभी उसे कदाचित् पूरा कर पाते है। यह भी मान्यता देखी जाती है कि धार्मिक मनुष्य इतने भोले होते है कि उन्हे सबकोई ठग सकता है। उन्हे दुनिया की बातो की कुछ भी खबर नही पड़ती। यदि यह बात ठीक है तो कृष्णचद्र और रामचद्र दोनों अवतारो को केवल ससारी मनुष्यो मे ही गिनना चाहिए। कवि कहते थे कि जिसे शुद्ध ज्ञान है उसका ठगा जाना असभव होना चाहिए। मनुष्य धार्मिक अर्थात् नीतिमान् होने पर भी कदाचित् ज्ञानी न हो, परंतु मोक्ष के लिए नीति और अनुभव ज्ञान का सुसगम होना चाहिए। जिसे अनुभव-ज्ञान हो गया है, उसके पास पाखड निभ ही नही सकता। सत्य के पास असत्य नही निभ सकता । अहिंसा के सान्निध्य मे हिंसा बद हो जाती है। जहा सरलता प्रकाशित होती है वहा छल-रूपी अधकार नष्ट हो जाता देश-सेवकों के संस्मरण है। ज्ञानवान और धर्मवान यदि कपटी को देखे तो उसे फौरन पहचान लेता है और उसका हृदय दया से आर्द्र हो जाता है। जिसने आत्मा को प्रत्यक्ष देख लिया है वह दूसरे को पहचाने बिना कैसे रह सकता है। कोई-कोई धर्म के नाम पर उन्हे ठग भी लेते थे। ऐसे उदाहरण नियम की अपूर्णता सिद्ध नही करते, परतु य शुद्ध ज्ञान की ही दुर्लभता सिद्ध करते है। इस तरह के अपवाद होते हुए भी व्यवहार-कुशलता और धर्मपरायणता का सुदर मेल जितना मैने कवि मे देखा है उतना किसी दूसरे मे देखने मे नही आया । रायचदभाई के धर्म का विचार करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि धर्म का उन्होने क्या स्वरूप समझाया था। धर्म का अर्थ मतमतातर नही। धर्म का अर्थ शास्त्रो के नाम से कही जानेवाली पुस्तको को पढ जाना, कठस्थ कर लेना अथवा उनमे जो कुछ कहा है, उसे मानना भी नही है। धर्म आत्मा का गुण है और वह मनुष्य-जाति मे दृश्य अथवा अदृश्य रूप से मौजूद है। धर्म से हम मनुष्य-जीवन का कर्तव्य समझ सकते है। धर्म द्वारा हम दूसरे जीवों के साथ अपना सच्चा सबध पहचान सकते है। यह स्पष्ट है कि जबतक हम अपनेको न पहचान ले तबतक यह सब कभी भी नही हो सकता। इसलिए धर्म वह साधन है, जिसके द्वारा हम अपने-आपको स्वयं पहचान सकते है। यह साधन हमे जहां-कही मिले, वही से प्राप्त करना चाहिए। फिर भले ही वह भारतवर्ष मे मिले, चाहे यूरोप से आये या अरब- स्तान से आये। इन साधनो का सामान्य स्वरूप समस्त धर्म-शास्त्रों मे एक ही सा है। इस बात को वह कह सकता है जिसने भिन्न- भिन्न शास्त्रो का अभ्यास किया है। ऐसा कोई भी शास्त्र नही कहता कि असत्य बोलना चाहिए, अथवा असत्य आचरण करना चाहिए। हिसा करना किसी भी शास्त्र मे नही बताया। समस्त शास्त्रो का दोहन करते हुए शकराचार्य ने कहा है, "ब्रह्म श्रीमद् राजचंद्रभाई ११५ सत्य जगन्मिथ्या।" उसी बात को कुरानशरीफ में दूसरी तरह कहा है कि ईश्वर एक ही है और वही है, उसके बिना और दूसरा कुछ नही । बाइबिल मे कहा है कि मैं और मेरा पिता एक ही हैं। ये सब एक ही वस्तु के रूपातर है। परतु इस एक ही सत्य के स्पष्ट करने मे अपूर्ण मनुष्यो ने अपने भिन्न-भिन्न दृष्टि-बिदुओ को काम मे लाकर हमारे लिए मोह-जाल रच दिया है। उसमे से हमें बाहर निकलना है। हम अपूर्ण है और अपने से कम अपूर्ण की मदद लेकर आगे बढते है और अत मे न जाने अमुक हृदय तक जाकर ऐसा मान लेते है कि आगे रास्ता ही नही है, परतु वास्तव में ऐसी बात नही है । अमुक हद के बाद शास्त्र मदद नहीं करते, परंतु मनु- भव मदद करता है । इसलिए रायचदभाई ने कहा है : "ए पद श्रीसर्वज्ञे दीर्छ ध्यानमां, कहीं शक्या नहीं ते पव श्रीभगवंत मो एह परमपद प्राप्तिनं कर्यु ध्यानमें, गजाक्यर पण हाल मनोरय रूप जो... इसलिए अत मे तो आत्मा को मोक्ष देनेवाली आत्मा ही है। इस शुद्ध सत्य का निरूपण रायचदभाई ने अनेक प्रकारों से अपने लेखो में किया है। रायचदभाई ने बहुत-सी धर्म-पुस्तकों का अच्छा अभ्यास किया था। उन्हे सस्कृत और मागधी भाषा को समझने में जरा भी मुश्किल न पडती थी। उन्होने वेदांत का अभ्यास किया था। इसी प्रकार भागवत और गीताजी का भी उन्होने अभ्यास किया था। जैन-पुस्तके तो जितनी भी उनके हाथ मे आती, वह बाच जाते थे। उनके बाचने और ग्रहण करने की शक्ति अगाध थी। पुस्तक का एक बार का बांचन उन पुस्तकों के रहस्य जानने के लिए उन्हें काफी था। कुरान, जदेअवस्ता आदि वह अनुवाद के जरिए पढ गये थे। वह मुझसे कहते थे कि उनका पक्षपात जैन-धर्म की ओर था। उनकी मान्यता थी कि जिनागम मे आत्मज्ञान की पराकाष्ठा है, मुझे उनका यह विचार बता देना आवश्यक है। परतु रायचदभाई का दूसरे धर्मो के प्रति अनादर न था,बल्कि पुस्तके भी ११६ देश-सेवकों के संस्मरण वेदांत के प्रति पक्षपात भी था । वेदाती को तो कवि वेदाती ही मालूम पडते थे। मेरे साथ चर्चा करते समय मुझे उन्होने कभी भी यह नही कहा कि मुझे मोक्ष-प्राप्ति के लिए किसी खास धर्म का अवलंबन लेना चाहिए। मुझे अपना ही आचार-विचार पालने के लिए उन्होने कहा। मुझे कौन-सी पुस्तके बाचनी चाहिए, यह प्रश्न उठने पर, उन्होने मेरी वृत्ति और मेरे बचपन के सस्कार देखकर मुझे गीताजी बांचने के लिए उत्तेजित किया और दूसरी पुस्तको में पचीकरण, मणिरत्नमाला, योगवासिष्ठ का वैराग्य प्रकरण, काव्य-दोहन पहला भाग, और अपनी मोक्षमाला बाचने के लिए कहा। रायचदभाई बहुत बार कहा करते थे कि भिन्न-भिन्न धर्म तो एक तरह के बाडे है और उनमे मनुष्य घिर जाता है। जिसने मोक्ष-प्राप्ति ही पुरुषार्थ मान लिया है, उसे अपने माथे पर किसी भी धर्म का तिलक लगाने की आवश्यकता नही । सूरत आवे त्यम तुं रहे, ज्यम त्यम करिने हरीने लहे अर्थात्-'जैसे सूत निकलता है वैसे ही तू रह ! जैसे बने तैसे हरि को प्राप्त कर। जैसे अखा का यह सूत्र था वैसे ही रायचंदभाई का भी था। धार्मिक झगडोसे वे हमेशा ऊबे रहते थे। उनमे वह शायद ही कभी पड़ते थे। वह समस्त धर्मों की खूबिया पूरी तरह से देखते और उन्हे उन धर्मावलबियो के सामने रखते थे। दक्षिण अफ्रीका के पत्र- व्यवहार मे भी मैने यही वस्तु उनसे प्राप्त की। मै स्वयं तो यह माननेवाला हूं कि धर्म उस धर्म के भक्तों की दृष्टि से संपूर्ण है, और दूसरो की दृष्टि से अपूर्ण है। स्वतत्र रूप से विचार करने से सब धर्म पूर्णापूर्ण है । अमुक हद के बाद सब शास्त्र बधन रूप मालूम पडते है। परतु यह तो गुणातीत की अवस्था हुई। रायचंदभाई की दृष्टि से विचार करते है तो किसीको अपना धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं । सब अपने-अपने १ आचार्य सुशील रुद्र ११७ धर्म मे रहकर अपनी स्वतत्रता मोक्ष प्राप्त कर सकते है, क्योकि मोक्ष प्राप्त करने का अर्थ सर्वांश से राग-द्वेष रहित होना ही है। : २२: आचार्य सुशील रुद्र आचार्य सुशील रुद्र का देहात ३० जून, १९२५ को होगया। वह मेरे एक आदरणीय मित्र और खामोश समाज-सेवी थे। उनकी मृत्यु से मुझे जो दुख हुआ है उसमे पाठक मेरा साथ दे । भारत की मुख्य बीमारी है राजनैतिक गुलामी। इसलिए वह उन्हीको मानता है, जो उसे दूर करने के लिए खुले आम सरकार से लडाई लडते है, और जिसने कि अपनी जल और थल-सेवा तथा धन-बल और कूट-नीति के द्वारा अपनी मजबूत मोर्चाबदी कर ली है। इससे स्वभावत उसे उन कार्यकर्ताओ का पता नही रहता जो • नि स्वार्थ होते है, और जो जीवन के दूसरे विभागो मे, जो कि राजनीति से कम उपयोगी नही होते है, अपनेको खपा देते है। सेट-स्टीफस कालेज, दिल्ली, के प्रिसिपल सुशीलकुमार रुद्र ऐसे ही विनीत कार्यकर्ता थे। वह पहले दरजे के शिक्षा-शास्त्री थे। प्रिसिपल के नाते वह चारो ओर लोकप्रिय हो गये थे। उनके और उनके विद्यार्थियो के बीच एक प्रकार का आध्यात्मिक सबध था। यद्यपि वह ईसाई थे, तथापि वह अपने हृदय मे हिदू-धर्म और इस्लाम के लिए भी जगह रखते थे। इन्हे वह बडे आदर की दृष्टि से देखते थे। उनका ईसाई धर्म औरोसे फटक कर अलग रहनेवाला न था, जो अकेले ईसामसीह को दुनिया का तारनहार न मानता हो उसके सर्वनाश की दुहाई देनेवाला न था। अपने धर्म पर दृढ रहते हुए भी वह औरो को सहन करते थे। वह राजनीति के बडे तेज और चिता- शील स्वाध्यायी थे। अग्रगामी कहे जानेवाले लोगो के प्रति अपनी ' 'श्रीमद्राजचंद्र' से ११८ देश-सेवकों के संस्मरण कुछ मत तो मेरे सहानुभूति की कवायद जहा वह न दिखाते थे, वहा वह छिपाते न थे। जब से, १९१५ से, मै अफ्रीका से लौटा मै जब-कभी दिल्ली जाता, उन्हीका अतिथि होता। रौलट कानून के सिलसिले मे जबतक मैने सत्याग्रह नही छेडा तबतक यह कार्य निर्विघ्न जारी रहा । ऊचे हल्को में उनके कितने ही अग्रेज मित्र थे । एक पूरे अंग्रेजी मिशन से उनका सबध था। अपने कालेज के वह पहले ही हिंदुस्तानी प्रिसिपल थे। इसलिए मेरे दिल ने कहा कि मेरा उनके साथ समागम रहने और उनके घर म ठहरने से शायद लोगो को यह गलत खयाल हो कि मेरा उनका मतैक्य है और उनके साथियो को अनावश्यक सकट का सामना करना पड़े। इसलिए मैने दूसरी जगह ठहरना चाहा। उनका जवाब अपने ढग का था--"मेरा धर्म लोगो के अनुमान से अधिक गहरा है। मेरे जीवन के घनिष्ठ अग है । वे गहरे और दीर्घकाल के मनन और * प्रार्थना के बाद निश्चित हुए है। मेरे अग्रेज मित्र उन्हे जानते है। यदि अपने सम्माननीय मित्र और अतिथि के रूप मे मै आपको अपने घर मे रखू तो वे इसका गलत अर्थ नही कर सकते । और यदि कभी मुझे इन दो बातो मे से कि अग्रेज के अदर जो कुछ मेरा प्रभाव है वह चला जाय या आप किसी एक को चुनना पड़े तो मैं जानता हूं कि मै किस चीज को पसंद करूगा । आप मेरे घर को नहीं छोड सकते।" तब मैने कहा-"लेकिन मुझसे तो हर किस्म के लोग मिलने के लिए आते है। आप अपने मकान को सराय तो बना नही सकते।" उन्होने उत्तर दिया--"सच पूछो तो मुझे यह सब अच्छा मालूम होता है। आपके मित्रो का आना-जाना मुझे पसद है । यह देखकर मुझे आनद होता है कि आपको अपने मकान मे ठहराकर मेरे हाथो कुछ देश-सेवा हो रही है।" पाठको को शायद मालूम न हो कि खिलाफत के दावे को प्रत्यक्ष रूप देने के लिए जो पत्र मैने वायसराय को लिखा था उसका विचार और मसविदा प्रिसिपल रुद्र के मकान मे तैयार हुआ था। वह तथा चार्ली एंड ज उसमे सुधार सुझानेवाले थे। उन्हीके घर की छाह में साला लाजपतराय बैठकर असहयोग की कल्पना उत्पन्न और प्रवर्तित हुई । मौलानाओ, दूसरे मुसलमानों तथा अन्य मित्रो और मेरे बीच जो निजी मत्रणा हुई उसकी कार्रवाही को वह बडी दिलचस्पी के साथ चुपचाप देखते थे। उनके तमाम कार्य धर्म-भाव से प्रेरित होते थे ऐसी हालत मे दुनियावी सत्ता छिन जाने का कोई डर न था- तथापि वही धर्म-भाव उन्हे सासारिक सत्ता के अस्तित्व और उप- योग तथा मित्रता के मूल्य को समझने में सहायक होता था। जिस धार्मिक भाव से मनुष्य को विचार और आचार के सुदर मेल का यथार्थ ज्ञान होता है, उसकी सत्यता को उन्होने अपने जीवन मे चरितार्थ कर दिखाया था। आचार्य रुद्र ने अपनी ओर इतने उच्च .चरित्र लोगो को आकर्षित किया था, जिनके सहवास की इच्छा किसीको हो सकती है। बहुत लोग नही जानते है कि श्री सी० एफ० एड यज हमे प्रिसिपल रुद्र के ही कारण प्राप्त हुए है। वे जुड़े भाई जैसे थे। उनका स्नेह आदर्श मित्रता के अध्ययन का विषय था । प्रिसिपल रुद्र अपने पीछे दो लड़के और एक लडकी को छोड़ गये है।" : २३ : लाला लाजपतराय लाला लाजपतराय को गिरफ्तार क्या किया, सरकार ने हमारे एक बडे-से-बडे मुखिया को पकड़ लिया है। उसका नाम भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर है। अपने स्वार्थ-त्याग के कारण वह अपने देश-भाइयो के हृदय मे उच्च स्थान प्राप्त कर चुके है। अहिंसा के प्रचार के लिए और उसके साथ ही लोकमत को संगठित और प्रकट करने के लिए उन्होने जितना परिश्रम किया ' हिंदी नवजीवन, ९-७-२५ १२० देश-सेवकों के संस्मरण है उतना बहुत ही थोडे लोगों ने किया है। उनकी गिरफ्तारी से सरकार की नीति या वृत्ति का जितना सच्चा पता चलता है उतना दूसरी किसी बात से नही । पजाबी भाई लालाजी को बडे-से-बड़ा गौरव जो दे सकते है वह यह है कि वे यही समझकर कि लालाजी हमारे साथ ही है, उनका काम बराबर आगे बढाते रहे। आखिरकार लाजपतराय, पडित सतानम, मलिक लालखान और डाक्टर गोपीचद के मुकदमे का फैसला हो गया । लालाजी तथा पडित सतानम को अठारह महीने की कैद की सजा दी गई। अभियुक्तो के बहुतेरा विरोध करने पर भी सरकार ने जबरदस्ती. उनके बचाव के लिए एक वकील नियुक्त किया था। इस तमाशे के होते हुए भी उनको सजा दी जाना तो निश्चित ही था। सजा का हुक्म सुनाये जाने के जरा पहले ही लालाजी ने मुझे एक पत्र लिखा। उसमे उनके चित्त की प्रसन्नता टपकी पडती है। वह इस प्रकार है । "आपने जो स्नेहपूर्ण टिप्पणी लिखी है तथा रामप्रसादजी और पुरुषोत्तमलाल के द्वारा जो सदेश भेजा, उनके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद । मैं बहुत मजे मे हू । मैने अन्न-त्याग नही , किया था। मैं अपने आराम के लिए शोरोगुल मचाने के खिलाफ हू। हम यहा इसलिए नही आये है कि किसी तरह की सुविधाएं या रियायते चाहे । सच्चा हाल अखबारो मे जाहिर हुआ है और आशा है कि वह अब आप तक पहुच गया होगा। हम सब लोगों का चित्त बहुत प्रसन्न है और मै राष्ट्रीय पाठशालाओ तथा धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन मे अपने समय का खूब सदुपयोग कर रहा हूँ। अहमदाबाद मे जो कुछ हुआ है उसके तथा सर्वपक्षीय परिषद् (राउड टेबल काफ़ेस) के हालात मुझे मालूम हो गये है। हमारी हिंदी नवजीवन, ११-१२-२१ लाला लाजपतराय १२१ तकलीफो की वजह से हमारे सिद्धातो के निर्णय मे बाधा न होने दीजिएगा । आप यकीन मानिये, हम अपने मनोरथ को पूरा करने के लिए जबतक चाहिए तबतक और जितनी चाहिए, उतनी तकलीफे बरदाश्त करने को हर तरह से तैयार है । और अब जब कि उसीके लिए हम यहा आये हुए है तो हमे उसे अत तक निबाहना चाहिए।" हमे आशा करनी चाहिए कि लालाजी और पडित सतानम को उनका अध्ययन जारी रखने दिया जायगा। मै उन्हे तथा उनके साथियो को यह भी सूचित करने का साहस करूंगा कि वे मौलाना शौकतअली और श्री राजगोपालाचारी तथा उनके साथियो का •अनुकरण करे, अर्थात् वे साहित्य-सबधी उद्योगो के साथ-ही-साथ चरखा कातने पर भी ध्यान देगे। मै अभिवचन देता ह कि बीच- बीच मे चरखा कातते रहने से लालाजी के इतिहास-लेखन तथा पडित सतानम के सस्कृत-अध्ययन मे हानि न होगी। ... मैने तो लालाजी को एक बच्चे के समान खुले दिलवाला पाया है। उनके त्याग की जोड लगभग हुई नही। मेरी उनसे हिन्दू- मुसलमानों के बारे मे एक बार नही, अनेक बार बाते हुई है । वह मुसलमानो के साथ तनिक भी दुश्मनी नही रखते, लेकिन उन्हे जल्दी एकता हो जाने मे शक है । वह ईश्वर से प्रकाश पाने के लिए प्रार्थना कर रहे है । खुद शकित रहते हुए भी वह हिदू-मुसलमानो की एकता के कायल है, क्योकि जैसाकि उन्होने मुझसे कहा है वह स्वराज्य के कायल हैं। वह मानते है कि ऐसी एकता के बिना स्वराज्य स्थापित नही हो सकता । तो भी वह यह नही जानते कि यह एकता किस तरह और कब होगी। मेरा उपाय उन्हे पसद है, परतु इस बात मे शक है कि हिदू लोग उसका मर्म समझ पावेगे १ हिंदी नवजीवन, २५-१-२२ १२२ देश-सेवकों के संस्मरण या नही और अगर समझ पावेगे तो उसकी शराफत की कदर करेगे या नही। ... कहा जाता है कि किसीने यह सवाद भेजा है कि अमृतसर की खिलाफत-परिषद मे मैने लाला लाजपतराय को भीरु कहा है। लालाजी जो कुछ भी हो, वह भीरु नही है। मेरे व्याख्यान का पूर्वापर सबध देखने से प्रतीत होगा कि मै उनका इस आक्षेप से कि वह मुसलमानो के विरोधी है बचाव कर रहा था। उस समय मैने जो कुछ कहा था वह यह है लालाजी सदा शात चित्त रहते है और उन्हे मुसलमानो के उद्देश्य के बारे मे बड़ी शका रहती है। लेकिन वह मुसलमानो की दोस्ती सच्चे दिल से चाहते है। लालाजी के प्रति मेरा बडा आदर-भाव है। मै उन्हे बहादुर, आत्म-त्यागी, उदार, सत्यनिष्ठ और ईश्वर से डरनेवाला मानता हू । उनका स्वदेश-प्रेम बडा ही शुद्ध है। देश की जितनी और जैसी सेवा उन्होने की है उसमे उनकी बराबरी करनेवाले बहुत कम है। और यदि ऐसे शख्सों पर सदेह किया जा सके कि उनके उद्देश्यहीन है तो हमे हिदू-मुस्लिम-ऐक्य से उसी प्रकार निराश होना पडेगा जिस प्रकार हमे अली भाइयो पर हीन उद्देश्य रखने का सदेह करने पर निराश होना पड़े। हम सब अपूर्ण है, हमारा मत एक-दूसरे के खिलाफ दूषित हो गया है। हम, हिन्दू और मुसलमान, जैसे है वैसे ही समझे जाने चाहिए । जो हिदू-मुस्लिम-ऐक्य को अपना धर्म मानते है उन्हे तो जो साधन हमारे पास है उसीके द्वारा उसे संपादन करने का प्रयत्न करना चाहिए। २ ... १ हिंदी नवजीवन १-६-२४ १ हिंदी नवजीवन, १४-१२-२४ लाला लाजपतराय १२३ . "आपके तार के लिए आभार मानता हू। लोगो की ओर से पुलिस को हमला करने के लिए कोई कारण नही मिला है। यह मामला इरादापूर्वक किया गया था। दो सख्त चोटे लगी है, मगर गभीर नही है। एक बाईं छाती पर और एक कधे पर लगी है। दूसरी चोटे सत्यपाल, गोपीचद, हसराज, मुहम्मद आलम आदि मित्रो ने सभाल ली। दूसरो पर भी मार पडी है और चोटे लगी है, कितु चिता का कोई कारण नही है।" -लाजपतराय मैने लाला लाजपतराय को तार से धन्यवाद दिया था और हालत पूछी थी। उसके जवाब मे तुरत ही लालाजी ने ऊपर का तार भेजा। आज के लोगो मे से, जबकि अधिकाश की अभी रेखे भी नहीं भीगी थी, लालाजी ने 'पजाब केसरी' का नाम पाया था। अबतक उनका यह अल्काव जैसा-का-तैसा कायम है, क्योकि चाहे उनके पक्ष और विपक्ष मे कुछ भी क्यो न कहा जाय, वह अब भी पजाब के सबसे बडे निर्विवाद नेता है और सारे भारतवर्ष मे सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित नेताओ मे से है। वह महासभा के सभापति हो चुके है, यूरोप मे उनका नाम है और वह उन गिने- चुने नेताओ से है, जो दिल की बात तुरत ही कह देते है, गो कोई भले ही गलतफहमी करे या उससे भी अधिक उन्हे अक्सर पह- चाननेवाला मूर्ख समझे। मगर लालाजी अपनी आदत से लाचार है; क्योकि वह अपने दिल मे कोई बात छिपाकर रख ही नहीं सकते। जो बात सोची, वह वह कहेगे ही। । इसलिए जब मैने यह शीर्षक पढा "लालाजी पर मार" और मार के व्यौरे पढे तभी मेरे मुह से निकल गया-"शाबाश !" अब हमे स्वराज्य पाने में बहुत देर नही लगेगी, क्योकि चाहे हमारी क्राति हिसक हो या अहिसक, साइमन कमीशन के लाहौर आने पर उसके विरोध में निकाले गये जलूस का लालाजी के नेतृत्व किया था। पुलिस ने उस जलूस पर लाठियां चलाई थी।
१२४ देश-सेवको के संस्मरण स्वतत्र होने के पहले हमे देश के नाम पर मरने की कला सीखनी होगी। इसके अलावा जबतक महान प्रयत्न न किया जावे, अहिसक दबाव से भी शासक झुकेगे नही । आदर्श और सपूर्ण अहिसा के सामने, मै यह कल्पना कर सकता हू कि शासको की वृत्ति बिल्कुल ही बदल जानी सभव है। मगर गोकि आदर्श और सपूर्ण कार्यक्रम बनाना सभव है, तथापि उसका सपूर्ण और आदर्श अमल कभी सभव नही है, इसलिए सबसे सस्ती बात यही है कि नेताओं पर मार पडे या गोली चले। अबतक अनजान आदमियो परमार पडी है या वे मारे गये है। थोडे-से आदमियो को गोली मारने से भी देश का ध्यान जितना आकर्षित नहीं होता उससे कही अधिक लालाजी पर हमला करने से हुआ है। लालाजी तथा दूसरे नेताओं पर हमले से हिंदुस्तान के राजनीतिज्ञ विचार मे पड गये है और सरकार की शाति तो जरूर ही भग हो गई होगी।' ॥ लाला लाजपतराय का देहात हो गया। लालाजी चिर- जीवी होवे । जबतक हिदुस्तान के आकाश मे सूर्य चमकता है तब- तक लालाजी मर नहीं सकते। लालाजी तो एक सस्था थे। अपनी जवानी के ही समय से उन्होने देशभक्ति को अपना धर्म बना लिया था और उनके देशप्रेम मे सकीर्णता न थी। वह अपने देश से इसलिए प्रेम करते थे कि वह संसार से प्रेम करते थे। उनकी राष्ट्रीयता अंतर्राष्ट्रीयता से भरपूर थी। इसलिए यूरोपियन लोगो पर भी उनका इतना अधिक प्रभाव था। यूरोप और अमेरिका मे उनके अनेक मित्र थे। वे मित्र लालाजी को जानले थे और इसलिए उनसे प्रेम करते थे। उनकी सेवाए विविध थी। वह बडे ही उत्साही समाज और धर्म-सुधारक थे। हममे से बहुत-से लोगो के समान वह भी इसीलिए राजनीतिज्ञ बने थे कि समाज और धर्म-सुधार की उनकी लगन ५ हिंदी नवजीवन, ८-११-२८ लाला लाजपतराय १२५ ऐसे एक राजनीति मे शामिल हुए बिना पूरी होती ही नही थी। सार्वजनिक जीवन शुरू करने के कुछ ही समय बाद उन्होने देख लिया था कि विदेशी गुलामी से देश के स्वतंत्र हुए बिना हमारे इच्छित सुधारो में से बहुत-से नही हो सकेगे। जैसाकि हममे से बहुतो को जान पड़ता है, उन्हे भी जान पडा था कि विदेशी परतत्रता का जहर देश की नस-नस मे घुस गया है। भी सार्वजनिक आंदोलन का नाम लेना असंभव है, जिसमे लालाजी शामिल न थे । सेवा करने की उनकी भूख सदा अतृप्त ही रहती थी। उन्होने शिक्षण-सस्थाएं खोली, वह दलितो के मित्र बने, जहा कही दुख-दारिद्रय हो, वही वह दौडते थे। नवयुवकों को वह असाधारण प्रेम से अपने पास जमा करते थे। सहायता के लिए किसी नौजवान की प्रार्थना उनके पास बेकार न गई। राजनैतिक क्षेत्र मे वह ऐसे थे कि उनके बिना चल ही नही सकता था। अपने विचार प्रकट करने मे वह कभी भयभीत न हुए। उस समय भी जबकि कष्ट सहना रोजमर्रा की बात नही हो गई थी, अपने विचार निर्भीकता से प्रकाशित करने के लिए उन्होने कष्ट सहा था। उनके जीवन मे कोई छिपा हुआ रहस्य नहीं था। उनकी अत्यंत अधिक स्पष्टवादिता से मित्रो को प्रायः घबराहट मे पड़ना होता था, उनके आलोचक भी चक्कर में पड़ जाते थे, मगर उनकी यह आदत छूटनेवाली नही थी। मुसलमान मित्रो का लिहाज रखता हुआ भी मै दावे के साथ यह कहता हूं कि लालाजी इस्लाम के दुश्मन नही थे। हिदू-धर्म को सबल बनाने तथा शुद्ध करने की उनकी प्रबल इच्छा को भूल से मुसलमानों या इस्लाम के प्रति घृणा नही समझनी चाहिए। हिंदू-मुसलमानो मे एकता स्थापित करने की उनकी हार्दिक इच्छा थी। वह हिंदूराज की चाहना नही करते थे, वह हिदुस्तानी राज की इच्छा करते थे। अपने-आपको हिदुस्तानी कहनेवाले सभी लोगों मे वह सपूर्ण समानता स्थापित करना चाहते थे। लालाजी की मृत्यु से भी हम परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करना १२६ देश-सेवकों के संस्मरण सीखे और अगर हम निर्भय बन जाय तो यह तुरत ही संभव है। उनके लिए एक राष्ट्रीय स्मारक की माग अवश्य ही होनी चाहिए और वह होगी भी। मेरी विनम्र सम्मति मे कोई स्मारक तबतक सपूर्ण नहीं हो सकता जबतक कि स्वतत्रता जरूर प्राप्त करनी है, यह दृढ विश्वास न हो, और स्वतत्रता प्राप्त करने के लिए वह जीते थे, इसीके लिए उनकी ऐसी गौरवमयी मृत्यु भीहुई। जरा हम याद करे कि उनकी अतिम इच्छा क्या थी। उन्होने नई पीढी को हिदुस्तान की स्वतत्रता प्राप्त करने तथा उसके गौरव की रक्षा करने का भार सौंपा है। नई पीढी मे उन्होने जो विश्वास दिखलाया, वह क्या उसके योग्य आपको साबित करेगी? और हम बूढो मे से, जो भारतवर्ष को स्वतत्र देखने के . लालाजी तथा दूसरे अनेक स्वर्गीय देशभक्तो के स्वप्न को सही बनाने के लिए अभी तक बचे हुए है, एक बार सभी मिलकर महान प्रयत्न कर अपनेको लालाजी के जैसे देशबंधु पाने का अधिकारी सिद्ध करेंगे। ... . जब राजनीति को लोग भूल जायगे, जब जनता का ध्यान खीच लेनेवाली अनेक क्षणभगुर वस्तुए भी विस्मृत हो जायंगी, तब भी लालाजी के गभीर और विशाल हरिजन-प्रेम को और उनकी तज्जनिक महान् सेवाओ को करोडो हिंदू ही नही, बल्कि कोटिशः सवर्ण हिदू भी और हिदू ही क्यों, समस्त भारत- वर्ष बडी श्रद्धा-भक्ति से याद किया करेगा। लालाजी एक महान् मानव-प्रेमी थे और उनका वह मानव-प्रेम विश्वव्यापी था। उनकी प्रत्येक वर्षी के अवसर पर हमे अपने जीवन मे लालाजी को उनकी प्रत्येक विगत वर्षी की अपेक्षा, अधिकाधिक सजीव करते जाना चाहिए । लालाजी-जैसे समाज-सुधारकों का जब निधन होता है तब केवल उनकी देह का ही नाश होता है । उनका कार्य और १ हिंदी नवजीवन, २२-११-२८ वासंती देवी १२७ । उनके विचारो का देह के साथ अत नही होता। उनकी शक्ति तो उत्तरोत्तर बढती जाती है। हमे इसका अनुभव तब और अधिक होता है जब हम देखते है कि ज्योज्यो समय बीतता है त्यो त्यो इस जीर्ण चोले के बाहर इसका प्रभाव स्वत. प्रकट होता जाता है। मनुष्य के अदर जो क्षणजीवी अश है वह देह के साथ नाश को प्राप्त हो जाता है, कितु मनुष्य का जो शाश्वत अविनाशी अश है वह तो देह के भस्मीभूत होने पर भी जीवित रहता है और देह का बधन दूर हो जाने से वह और भी अधिक प्रकाशमान हो जाता है। इस विचार को सामने रखकर हमे लालाजी की स्मृति को चिरजीवी रखना चाहिए। हरिजन हिदू तथा सवर्ण हिदू, दोनो ही स्व० लालाजी का पुण्यस्मरण करके हिदू-समाज मे से यह अस्पृ- श्यता का पाप-कलंक धो डालने का नये सिरे से सकल्प करे। हरि- जन तो उन त्रुटियों को दूर करे जो अत्याचार बर्दाश्त करते-करते लोगो मे पैदा हो जाती है और सवर्ण अपने उस पाप को पखारकर शुद्ध हो जाय, जो उन्होने हरिजनो को जन्मना अस्पृश्य और अपने को जन्मना उच्च मान कर किया है।' : २४ : वासंती देवी कुछ वर्ष पूर्व मैने स्वर्गीय रमाबाई रानडे के दर्शन का वर्णन किया था। मैने आदर्श विधवा के रूप मे उनका परिचय दिया था। इस समय मेरे भाग्य मे एक महान वीर की विधवा के वैधव्य के आरभ का चित्र उपस्थित करना बदा है। वासती देवी के साथ मेरा परिचय १९१९ मे हुआ है। गाढ़ परिचय १९२१ मे हुआ । उनकी सरलता, चातुरी और उनके अतिथि-सत्कार की बहुतेरी बाते मैने सुनी थी। उनका अनुभव 'हरिजन सेवक, २३-११-३४ १२८ देश-सेवकों के संस्मरण भी ठीक-ठीक हुआ था। जिस प्रकार दार्जिलिग मे देशबंधु के साथ मेरा सबध घनिष्ठ हुआ उसी तरह वासती देवी के साथ भी हुआ। उनके वैधव्य मे तो परिचय बहुत ही बढ़ गया है। जब से वह दार्जिलिग से शव को लेकर कलकत्ते आई है तब से मै कह सकता हूं कि उनके साथ ही रहा हू । वैधव्य के बाद पहली मुलाकात उनके दामाद के घर हुई। उनके आस-पास बहुतेरी बहने बैठी थी। पूर्वाश्रम मे तो जब मै उनके कमरे मे जाता तो खुद वही सामने आती और मुझे बुलाती । वैधव्य में मुझे क्या बुलाती? पुतली की तरह स्तम्भित बैठी अनेक बहनो मे से मुझे उन्हें पहचानना था। एक मिनट तक तो मै खोजता ही रहा। मांग मे सिदूर, ललाट पर कुकुम, मुह मे पान, हाथ मे चूडिया और साडी पर लेस, हँस- मुख चेहरा-इनमें मे से एक भी चिन्ह मै न देखू तो वासती देवी को किस तरह पहचान ?जहा मैने अनुमान किया था कि वह होगी वहा जाकर बैठ गया और गौर से मुख-मुद्रा देखी । देखना असह्य हो गया। चेहरा तो पहचान मे आया। रुदन रोकना असभव हो गया। छाती को पत्थर बनाकर आश्वासन देना तो दूर ही रहा। उनके मुख पर सदा-शोभित हास्य आज कहां था? मैने उन्हें संत्वना देने, रिझाने और बातचीत कराने की अनेक कोशिशे की। बहुत समय के बाद मुझे कुछ सफलता मिली। देवी जरा हँसी। मुझे हिम्मत हुई और मै बोला,"आप रो नहीं सकती। आप रोवेंगी तो सब लोग रोवेगे। मोना (बडी लड़की) को बड़ी मुश्किल से चुपकी रखा है । बेबी (छोटी लड़की) की हालत तो आप जानती ही है । सुजाता (पुत्रवधू) फूट-फूटकर रोती थी, सो बड़े प्रयास से शात हुई है । आप दया रखिएगा। आपसे अब बहुत काम लेना है।" वीरांगना ने दृढता-पूर्वक जवाब दिया, "मै नही रोऊंगी।
वासंती देवी १२९ मुझे रोना आता ही नही।" मै इसका मर्भ समझा, मुझे सतोष हुआ । रोने से दुःख का भार हल्का हो जाता है । इस विधवा बहन को तो भार हलका नही करना था, उठाना था। फिर रोती कैसे? अब मै कैसे कह सकता था-"लो, चलो, हम भाई-बहन पेट भर रो ले और दुःख कम कर ले ?" हिदू विधवा दुख की प्रतिमा है । उसने ससार के दुख का भार अपने सिर ले लिया है। उसने दु ख को सुख बना डाला है। दुख को धर्म बना डाला है। वासंती देवी सब तरह के भोजन करती थी। १९२० तक के समय मे उनके यहा छप्पन भोग होते थे और सैकडो लोग भोजन करते थे। पान के बिना वह एक मिनिट नही रह सकती थी।पान की डिबिया पास ही पड़ी रहती थी। अब शृंगार-भाव का त्याग, पान का त्याग, मिष्ठानो का त्याग, मांस-मत्स्य का त्याग, केवल पति का ध्यान, परमात्मा का ध्यान । इस दुख को सहन करना धर्म है या अधर्म ? और धर्मो में तो ऐसा नही देखा जाता । हिदू-धर्मशास्त्रियो ने भूल तो न की हो? वासती देवी को देखकर मुझे इसमे भूल नहीं दिखाई देती, बल्कि धर्म की शुद्ध भावना दिखाई देती है। वैधव्य हिदू-धर्म का शृगार है। धर्म का भूषण वराग्य है, वैभव नहीं । दुनिया भले ही और कुछ कहे तो कहती रहे । परतु हिदू-शास्त्र किस वैधव्य की स्तुति और स्वागत करता है ? १५ वर्ष की मुग्धा के वैधव्य का नही जो कि विवाह का अर्थ भी नही जानती। बाल-विधवाओ के लिए वैधव्य धर्म नही, अधर्म है। वासती देवी को मदन खुद आकर ललचावे तो वह भस्म हो जाय । वासती देवी के शिव की तरह तीसरी आंख है। परंतु पद्रह वर्ष की बालिका वैधव्य की शोभा को क्या समझ सकती है? उसके लिए तो वह अत्याचार ही है । बाल-विधवाओ की वृद्धि मे मुझे देश-सेवको के संस्मरण 'हिदू-धर्म की अवनति दिखाई देती है। वासती देवी-जैसी के वैधव्य मे मै शुद्ध धर्म का पोषण देखता हू । वैधव्य सब तरह, सब जगह, सब समय, अनिवार्य सिद्धात नहीं है। वह उस स्त्री के लिए धर्म है जो उसकी रक्षा करती है। रिवाज के कुए मे तैरना अच्छा है । उसमे डूबना आत्म- हत्या है। जो बात स्त्री के सबध मे वही बात पुरुष के सबंध मे होनी चाहिए। राम ने यह कर दिखाया। सती सीता का त्याग भी वह सह सके । अपने ही किये त्याग से खुद ही जले। जब से सीता गई तब से रामचद्र का तेज घट गया। सीता के देह का तो त्याग उन्होने किया, पर उसे अपने हृदय की स्वामिनी बना लिया। उस दिन से उन्हे न तो शृगार भाया, न दूसरा वैभव । कर्तव्य समझ- कर तटस्थता के साथ राज्य-कार्य करते हुए शात रहे। जिस बात को आज वासती देवी सह रही है, जिसमे से वह अपने विलास को हटा सकती है, वे बाते जबतक पुरुष न करेगे तबतक हिदू-धर्म अधूरा है। एक को गुड और दूसरे कोथूहर' यह उल्टा न्याय ईश्वर के दरबार मे नही हो सकता। परंतु आज हिदू- पुरुषो ने इस ईश्वरीय कानून को उलट दिया है । स्त्री के लिए वैधव्य कायम रखा है और अपने लिए श्मशान-भूमि मे ही दूसरे विवाह की योजना करने का अधिकार | वासती देवी ने अबतक किसीके देखते, आसू की एक बूद तक नही गिराई है। फिर भी उनके चेहरे पर तेज तो आ ही नही रहा है। उनकी मुखाकृति ऐसी हो गई है कि मानो भारी बीमारी से उठी हो। यह हालत देखकर मैने उनसे निवेदन किया कि थोडा समय निकलकर बाहर हवा खाने चलिये। मेरे साथ मोटर मे तो बैठी, पर बोलने क्यो लगी? मैने कितनी ही बाते चलाईं- वह सुनती रही। पर खुद उसमे बराय नाम शरीक हुईं। हवाखोरी की तो, पर पछताई। सारी रात नीद न आई। "जो बात मेरे पति को अतिशय प्रिय थी वह आज इस अभागिनी ने की। यह क्या
वासंती देवी
।
शोक है ?" ऐसे विचारो मे रात गई । भोबल (उनका लडका)
मुझे यह खबर दे गया ! आज मेरा मौनवार है। मैने कागज पर
लिखा है-"यह पागलपन हमे माताजी के सिर से निकालना
होगा। हमारे प्रियतम को प्रिय लगनेवाली बहुतेरी बाते हमे उसके
वियोग के बाद करनी पडती है। माताजी विलास के लिए मोटर
मे नही बैठी थी, केवल आरोग्य के लिए बैठी थी। उन्हे स्वच्छ
हवा की बहुत जरूरत थी। हमे उनका बल बढाकर उनके शरीर
की रक्षा करनी होगी। पिताजी के काम को चमकाने और बढाने
के लिए हमे उनके शरीर की आवश्यकता है। यह माताजी से
कहना।"
"माताजी ने तो मुझसे कहा था कि यह बात ही आपसे न
कही जाय। पर मुझसे न रहा गया। अभीतो यही उचित मालूम
होता है कि आप उन्हे मोटर मे बैठने के लिए न कहे।"-
भोबल ने कहा।
बेचारा भोबल! किसीका लौटाये न लौटने वाला लड़का
आज बकरी जैसा बनकर बैठा है। उसका कल्याण हो
पर इस साध्वी विधवा का क्या ? वैधव्य प्यारा लगता है,
फिर भी असह्य मालूम होता है। सुधन्वा खौलते हुए तेल के कड़ाह
मे भटकता था और मुझ-जैसे दूर रहकर देखनेवाले उसके दुख
की कल्पना करके कापते थे। सती स्त्रियो, अपने दुख को तुम
संभाल कर रखना | वह दुख नही, सुख है। तुम्हारा नाम लेकर
बहुतेरे पार उतर गये है और उतरेगे।
वासती देवी की जय हो!'
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हिंदी नवजीवन २-७-२५
देश-सेवको के सस्मरण ? : २५ : स्वामी श्रद्धानंद जिसकी उम्मीद थी वह ही गुजरा । कोई छ महीने हुए स्वामी श्रद्धानदजी सत्याग्रहाश्रम में आकर दो-एक दिन ठहरे थे। बातचीत में उन्होने मुझसे कहा था कि उनके पास जब-तब ऐसे पत्र आया करते थे जिनमे उन्हें मार डालने की धमकी दी जाती थी। किस सुधारक के सिर पर बोली नही बोली गई है ? इसलिए उनके ऐसे पत्र पाने मे अचभे की कोई बात नही थी। उनका मारा जाना कुछ अनोखी बात नही है । स्वामीजी सुधारक थे। वह कर्मवीर थे,वचनवीर नही । जिसमे उनका विश्वास था, उसका वह पालन करते थे। उन विश्वासो के लिए उन्हे कष्ट झेलने पडे । वह वीरता के अवतार थे। भय के सामने उन्होने कभी सिर नही झुकाया । वह योद्धा थे और योद्धा रोग-शैय्या पर मरना नही चाहता । वह तो युद्ध-भूमि का मरण चाहता है। कोई एक महीना हुआ कि स्वामी श्रद्धानदजी बहुत बीमार पडे । डाक्टर असारी उनकी चिकित्सा करते थे। जितने अनुराग से उनसे सभव था, डाक्टर असारी उनकी सेवा करते थे। इस महीने के शुरू मे मेरे पूछने पर उनके पुत्र प्रो० इद्र ने तार दिया था कि स्वामीजी अब अच्छे है और मेरा प्रेम और दुआ मागते है। मैं उनके बिना मागे ही उनपर प्रेम और उनके लिए भगवान से प्रार्थना करता ही रहता था। भगवान को उन्हे शहीद की मौत देनी थी। इसलिए जब वह बीमार ही थे तभी उस हत्यारे के हाथ मारे गये, जो इस्लाम पर धार्मिक चर्चा के नाम पर उनसे मिलना चाहता था, जो स्वामीजी की प्रेरणा से आने दिया गया, जिसने प्यास मिटाने को पानी मागने के बहाने स्वामीजी के ईमानदार नौकर धर्मसिह को पानी लेने स्वामी श्रद्धानद को बाहर हटा दिया और जिसने नौकर की गैरहाजिरी मे बिस्तर पर पडे हुए रोगी की छाती मे दो प्राण-घातक चोटे की। स्वामीजी के अतिम शब्दो की हमे खबर नही । लेकिन अगर मै उन्हे कुछ भी पहचानता था तो मुझे बिल्कुल सदेह नही है कि उन्होने अपने परमात्मा से उसके लिए क्षमा याचना की होगी, जो यह नही जानता था कि वह पाप कर रहा है। इसलिए गीता की भाषा मे वह योद्धा धन्य है जिसे ऐसी मृत्यु प्राप्त होती है। मृत्यु तो हमेशा ही धन्य होती है, मगर उस योद्धा के लिए तो और भी अधिक जो अपने धर्म के लिए यानी सत्य के लिए मरता है। मृत्यु कोई शैतान नहीं है। वह तो सबसे बडी मित्र है। वह हमे 'कष्टो से मुक्ति देती है। हमारी इच्छा के विरुद्ध भी हमे छुटकारा देती है । हमे बराबर ही नई आशाए, नये रूप देती है। वह नीद के समान मीठी है, कितु तो भी किसी मित्र के मरने पर शोक करने का चलन है । अगर कोई शहीद मरता है तो यह रिवाज नहीं रहता। अतएव इस मृत्यु पर मै शोक नही कर सकता। स्वामीजी और उनके सबधी ईर्ष्या के पात्र है, क्योकि श्रद्धानदजी मर जाने. पर भी अभी जीते है। उससे भी अधिक सच्चे रूप मे वह जीते है, जब वह हमारे बीच अपने विशाल शरीर को लेकर घूमा करते थे। ऐसी महिमामय मृत्यु पर जिस कुल मे उनका जन्म हुआ था, जिस जाति के वह थे, सभी धन्यता के पात्र है । वह वीर पुरुष थे। उन्होने वीर-गति पाई। स्वामी श्रद्धानद की दृष्टि से इस प्रसग को धर्म-प्रसग कहेगे। वह बीमार थे । मुझे तो कुछ खबर न थी, कितु एक मित्र ने खबर दी कि स्वामीजी भाग्य से ही बच जाय तो बच जाय । पीछे से मेरे तार के उत्तर में उनके लडके का तार मिला कि उन्हे धीरे-धीरे आराम हो रहा है। यह भी मालूम हुआ कि डाक्टर असारी बहुत १ हिदी नवजीवन, २३-१२-२६ १३४ देश-सेवको के सस्मरण । । अच्छी तरह सेवा-शुश्रूषा कर रहे है। इस प्रकार की गभीर बीमारी मे वह बिछौने पर पडे थे और उसपर ही उनके प्राण लिये गये। मरना तो सबको है, कितु यो मरना किस काम का | सारे हिदु- स्तान मे और पृथ्वी पर जहां-जहा हिंदुस्तानी लोग होगे, वहा-वहा स्वामीजी के, स्वाभाविक बीमारी से, मरने से जो असर होता उसकी अपेक्षा इस अपूर्व मरण से अजीब ही असर होगा। मैने भाई इद्र को समवेदना का एक भी तार या पत्र नही लिखा है। उन्हे और कुछ दूसरा कह ही नही सकता। इतना ही कह सकता हूं कि तुम्हारे पिता को जो मृत्यु मिली है, वह धन्य मृत्यु है। कितु यह सब बात तो मैने स्वामीजी की दृष्टि से, मेरी अपनी दृष्टि से की है । मै अनेक बार कह चुका हूं कि मेरे लेखे हिन्दू और' मुसलमान दोनो ही एक है । मै जन्म से हिंदू हू और हिदू-धर्म मे मुझे शाति मिलती है । जब-जब मुझे अशाति हुई, हिदू-धर्म मे से ही मुझे शाति मिली है। मैने दूसरे धर्मो का भी निरीक्षण किया है और इसमे चाहे जितनी कमिया और त्रुटिया होवे तो भी मेरे लिए यही धर्म उत्तम है । मुझे ऐसा लगता है और इसीसे मै अपनेको सनातनी हिदू मानता हू। कितनेही सनातनियो को मेरे इस दावे से दुख होता है कि विलायत से आकर यह सुधरा हुआ आदमी हिदू कैसा | कितु मेरा हिदू होने का दावा इससे कुछ कम नहीं होता और यह धर्म मुझे कहता है कि मैं सबके साथ मित्रता से रहू इसीसे मुझे मुसलमानो की दृष्टि भी देखनी है। मुसलमान की दृष्टि से जब इस बात का विचार करता तो मुझे दूसरी ही बात मालूम पड़ती है । यह काड मुसलमान के हाथ बन पडा, धर्म-चर्चा के बहाने घर मे प्रवेश करके उसने यह कृत्य किया। नौकर ने तो कहा, “स्वामीजी बीमार है। आज नही मिल सकते।" दरवाजे पर हुज्जत हुई। स्वामीजी ने सुनकर कहा, "अच्छा है, आ जाने दो।"और स्वामीजी मे उससे बात करने की शक्ति न रहने पर भी उन्होने बाते की। बात करने की तो उनमे ताकत ही नहीं थी। स्वामीजी को तो उसे समझाकर विदा स्वामी श्रद्धानद कर देने को था, इसलिए बुलाकर कहा, "भाई, अच्छे हो जाने । पर तुम्हे जितनी बहस करनी हो कर लेना, कितु आज तो बिछौने पर पड़ा है।" इसपर उसने पानी मागा। धर्मसिह को स्वामीजी ने आज्ञा दी, "इनको पानी पिला दो।" आज्ञाकारी नौकर पानी लेने जाता है, तबतक तो यहा उसने रिवाल्वर निकाल ली। एक से सतोष न हुआ तो दो गोली मारी। स्वामीजी ने उसी समय प्राण खोये । धर्मसिंह आवाज सुनकर अपने मालिक को बचाने दौडा, कितु बचावे कौन ? ईश्वर को स्वामीजी के शरीर की रक्षा नही करनी थी। हमारे लिए यह एक अच्छा शिक्षा-पाठ बनना चाहिए कि 'स्वामीजी का खून अब्दुलरशीद के हाथो हो। इससे हम एक-दूसरे को समझ ले। श्रद्धानदजी और मेरे बीच कैसा सबध था, वह तो आज मैं यहा नही कहूगा। मेरे सामने वह अपने दिल की बाते कहा करते थे। कोई छ महीने हुए जब वह आश्रम मे आये थे तब कहते थे, “मेरे पास धमकी के कितने पत्र आते है। लोग धमकी देते है कि तुम्हारी जान ले ली जायगी, पर मुझे उनकी कुछ परवा नहीं।" वह तो बहादुर आदमी थे । उनसे बढकर बहादुर आदमी मैने ससार मे नही देखा । मरने का उन्हें डर नही था, क्योकि वह सच्चे आस्तिक, ईश्वरवादी आदमी थे। इसीसे उन्होने कहा-मेरी जान अगरले ही ली जाय तो उसमे होना ही क्या है ? ' स्वामीजी से मेरा पहला परिचय तब हुआ जब वह महात्मा मुशीराम के नाम से प्रसिद्ध थे। वह परिचय भी पत्रो से हुआ। उस समय वह कांगडी गुरुकुल के प्रधान थे, जोकि उनका सबसे पहला और बडा शिक्षा-क्षेत्र का काम है। वह सिर्फ पश्चिमी शिक्षा- पद्धति से ही सतुष्ट न थे। लडको मे वे वेद-शिक्षा का प्रचार करना १ हिंदी नवजीवन, ६-१-२७ देश-सेवकों के संस्मरण चाहते थे और वह पढाते थे हिंदी के जरिए, अग्रेजी के नही । शिक्षा- काल मे वह उन्हें ब्रह्मचारी रखना चाहते थे। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रहियो के लिए उस समय जो धन इकट्ठा किया जा रहा था, उसमे चदा देने के लिए लडको को उन्होने उत्साहित किया था।वह चाहते थे कि लडके खुद कुली बनकर, मजदूरी करके चंदा दे, क्योकि वह युद्ध क्या कुलियो का नही था? लडको ने यह सब पूरा कर दिखाया और पूरी मजदूरी कमाकर मेरे पास भेजी। इस विषय मे स्वामीजी ने मुझे जो पत्र भेजा था, वह हिदी मे था। उन्होने मुझे 'मेरे प्रिय भाई' कहकर लिखा था। इसने मुझे महात्मा मुशीराम का प्रिय बना दिया। इससे पहले हम दोनो कभी मिले नही थे। हम लोगों के बीच के सूत्र ऐड्यूज थे। उनकी इच्छा थी कि जब कभी मै देश लौटू, उनके तीनो मित्रो, कवि ठाकुर, प्रिंसिपल रुद्र और महात्मा मुशीराम से परिचय प्राप्त करू । वह पत्र पाने के बाद से हम दोनो एक ही सेना के सैनिक बन गये। उनके प्रिय गुरुकुल मे हम १९१५ मे मिले और उसके बाद से हरेक मुलाकात मे हम दोनो परस्पर निकट आते गये और एक दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह समझने लगे । प्राचीन भारत, सस्कृत और हिदी के प्रति उनका प्रेम असीम था। बेशक, अस- हयोग के पैदा होने के बहुत पहले से ही वह असहयोगी थे। स्वराज के लिए वह अधीर थे। अस्पृश्यता से वह नफरत करते थे और अस्पृश्यो की स्थिति ऊची करना चाहते थे। उनकी स्वाधीनता पर कोई बंधन लगाना वह नही सह सकते थे। जब 'रौलट ऐक्ट' का आंदोलन शुरू हुआ तो उसे सबसे पहले शुरू करनेवालो मे से वह थे। उन्होने मुझे बहुत ही प्रेम से भरा हुआ एक पत्र भेजा । कितु वीरमगाम और अमृतसर-कांड के बाद सत्याग्रह को स्थगित किया जाना वह नही समझ सके । उस समय से हमारे बीच मतभेद शुरू हुए, कितु उससे हम लोगो के भाई-भाई के सबध मे कभी कोई अतर नहीं पड़ा। उस मतभेद स्वामी श्रद्धानद १३७ से मुझपर उनका बाल-सुलभ स्वभाव प्रकट हुआ। परिणाम का विचार किये बिना ही, उन्हे जैसा मालूम था मुझसे सच्ची बात कह दी। वह अतिसाहसिक थे। समय बीतनेके साथ-साथ हम दोनों मे जो स्वभाव का अतर था, उसे मै देखता गया, कितु उससे तो उनकी आत्मा की शुद्धता ही सिद्ध हुई। सबको सुनाकर विचार करना कुछ पाप नहीं है। यह तो एक गुण है। यह सत्य-प्रियता का सर्वप्रधान लक्षण है । स्वामीजी ने अपने विचार गुप्त रखे ही नही। बारडोली के निश्चय से उनका दिल टूट गया । मुझसे वह निराश हो गये। उनका प्रकट विरोध बहुत जबर्दस्त था। मेरे 'नाम उनके निजी पत्रो मे और भी विरोध होता था, कितु हमारे मतभेद पर जितना वह जोर देते थे, प्रेम पर भी उतना ही। प्रेम का विश्वास केवल पत्रो मे ही दिला देने से वह सतुष्ट न थे । मौका मिलने पर उन्होने मुझे ढूढ निकाला और मुझे अपनी स्थिति समझाई और मेरी समझने की कोशिश थी। मगर मुझे मालूम होता है कि मुझे ढूढने का असल कारण यह था कि अगर जरूरत हो तो मुझे वह विश्वास दिला सके कि एक छोटे भाई के समान मुझपर उनकी प्रीति जैसी-की-तैसी बनी हुई है। आर्यसमाज और उसके सस्थापक पर मेरे मतोसे और उनके नाम का उल्लेख करने से उन्हें बहुत कष्ट हुआ, परतु इस धक्के को सह लेने की शक्ति हमारी मित्रता मेथी। वह यह नही समझ सकते थे कि महर्षि के विषय मे मेरे मतो और अपने व्यक्तिगत शत्रुओ के प्रति ऋषि की असीम क्षमा का एक साथ कैसे मेल बैठ सकता है। महर्षि मे उनकी इतनी अधिक श्रद्धा थी कि उनपर या उनकी शिक्षाओ पर कोई भी टीका वह सह नही सकते थे। शुद्धि-आदोलन के लिए मुसलमान पत्रो मे उनकी बडी कडी आलोचनाए और निदा की गई है। मै स्वय उनके दृष्टि-बिदु को स्वीकार नही कर सका था। अब भी मै उसे नही मानता। कितु मेरी नजर में, अपने दृष्टि-बिदु से वह, अपनी स्थिति का पूरा बचाव 1 . १३८ देश-सेवकों के सस्मरण - . सकता था। १ करते थे, जबतक शुद्धि और तबलीग मर्यादा के भीतर रहे, तब तक दोनों ही बराबर छूट के अधिकारी है। अगर हम हिन्दू और मुसलमान दोनो शुद्धि का आतरिक अर्थ समझ सकते तो स्वामीजी की मृत्यु से भी लाभ उठाया जा एक महान सुधारक के जीवन के स्मरणो को मै सत्याग्रहाश्रम मे, उनके कुछ महीनो पहले के आखिरी आगमन की बात के बिना खत्म नही कर सकता। वह मुसलमानो के दुश्मन नही थे। कुछ मुसलमानो का विश्वास वह बेशक नही करते थे, कितु उन लोगो से उनका कुछ द्वेष नही था। उनका खयाल था कि हिद दबा दिये गये है और उन्हे बहादुर बनकर अपनी और अपनी इज्जत की रक्षा करने योग्य बनना चाहिए। इस बारे मे उन्होने मुझसे कहा था कि “मेरे विषय मे बडी गलतफहमी फैली हुई है। मेरे विरुद्ध कही जानेवाली कई बातो मे मै बिल्कुल निर्दोष हू । मेरे पास धमकी के कितने एक पत्र आया करते है।" मित्रगण उन्हे अकेले चलने से मना करते थे। मगर यह परम आस्तिक पुरुष उनका जवाब दिया करता था, "ईश्वर की रक्षा के सिवाय और किस रक्षा का मै भरोसा करू ? उसकी आज्ञा के बिना एक तिनका भी नही हिलता । मै जानता हूं कि जबतक वह मुझसे इस देह के द्वारा सेवा लेना चाहता है, मेरा बाल बाका नही हो सकता।' आश्रम में रहते समय उन्होने आश्रम-पाठशाला के लडके- लडकियो से बाते की । उनका कहना था कि हिदू-धर्म की सबसे बडी रक्षा आत्म-शुद्धि से ही होगी, भीतर से ही होगी। चारित्र्य और शरीर के गठन के लिए ब्रह्मचर्य पर वह बहुत जोर देते थे।' वीर पुरुष को जब ऐसी मृत्यु मिलती है तो वह उसे ... . १ हिंदी नवजीवन, ६-१-२७ स्वामी श्रद्धानंद १३९ . मित्र के समान गले लगाता है। कितु इससे कोई यह नहीं चाहता कि उसका कोई खुन करे। कोई भी अपने साथ अन्याय करे, गुनह- गार बने, कोई भी मनुष्य दुष्कृत्य करे, ऐसी इच्छा ही करना अनुचित है। स्वामीजी वीरो के अग्रणी थे। अपनी वीरता से उन्होने भारत को आश्चर्यचकित कर दिखाया। इसका साक्षी मै ह कि देश के लिए अपना शरीर कुर्बान करने की उन्होने प्रतिज्ञा ली थी। वह अनाथ-बधु थे । अछूतो के लिए उन्होने जितना किया उससे अधिक हिदुस्तान मे दूसरे किसीने नहीं किया। उनकी दूसरी सेवाओ का वर्णन मै यहा करना नहीं चाहता। स्वामीजी के जैसे वीर, देशभक्त, ईश्वर के अनन्यभक्त और सेवक का खून देश के लिए जैसा लाभदायक है, वैसा ही, उसे दुख होना भी स्वाभाविक है, क्योकि हम लोग अपूर्ण मनुष्य है। स्वामीजी आत्म-बलिदान से दूसरा ही धर्म बतला गये है। उन्होने एक बार मुझसे पूछा था कि आर्यसमाज उदार कैसे नही? आप क्या जानते है कि महर्षि दयानद ने अपनेको जहर देनेवाले के साथ क्या किया था। मैने जवाब दिया कि मै महर्षि की क्षमाशीलता को जानता हू । मगर स्वामीजी तो महर्षि के भक्त थे । उन्होने सारी कथा कह सुनाई । महर्षि क्षमाशील थे, क्योकि उनके आगे युधिष्ठिर का उज्ज्वल उदाहरण था। वह उपनिषदो के भक्त थे। श्रद्धानदजी भी वैसे ही क्षमाशील थे। शुद्धि पर बाते करते समय उन्होने एक बार कहा था कि "मै मुसलमानो को हिदुओ का दुश्मन नहीं मानता।" 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के सिद्धात का उपदेश करने वाले और गीता के भक्त श्रद्धानदजी किसीको दुश्मन क्योकर मान सकते थे ? उन्होने कहा, "मै मुसलमानो को भाई मानता हूं, मित्र मानता हू, कितु हिदू को भी भाई मानता हू और उसकी सेवा करना चाहता हूँ। आज श्रद्धानदजी के लिए आसू बहाने का समय नही है। ।
१४० देश-सेवको के सस्मरण आज तो क्षत्रियता बताने का अवसर है । क्षत्रियता क्षत्रिय का खास गुण भले ही हो मगर ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र सभी उसे दिखा सकते है । खासकर आज का 'स्वराज युग' हम सबके लिए क्षत्रियता का युग है। इसलिए रोने की बात छोड दे और श्रद्धानदजी के बलिदान से, रशीद के किये खून से जो पाठ मिले उसे हृदय मे धरे।' ... ... स्वामीजी का देहात हुआही नही है। देहात तो तब होगा जब हम उनकी सच्ची देह को मिटाने की कोशिश करेगे। अगर्चे कि सच्ची बात तो यह है कि हमारी कोशिश से भी उनकी देह का नाश होने को नही है । जबतक यह गुरुकुल कायम है, जबतक एक भी स्नातक गुरुकुल की सेवा करता है, तबतक स्वामीजी जीते ही है। स्वामीजी का शरीर तो किसी दिन गिरने को था ही। पर स्वामीजी का सबसे बड़ा काम गुरुकुल है, उन्होने अपनी सारी शक्ति इसमे लगा दी थी। इसे पैदा करने में उन्होने अधिक-से- अधिक तपश्चर्या की थी। तुमने सत्य की प्रतिज्ञा ली है। अगर तुम अपने वचन का पालन करोगे तो किसीकी शक्ति वह गुरुकुल को मिटा दे। पर गुरुकुल को चिरस्थायी रखने के लिए उस वीरता, ब्रह्म- चर्य और क्षमा की जरूरत है, जो हमने उनके जीवन मे देखी। वीरता का लक्षण क्षमा, और ब्रह्मचर्य और वीर्य का सयम है। वीरता और वीर्य की रक्षा से तुम देश और धर्म की पूरी-पूरी रक्षा कर सकोगे । मै जानता हूं कि यह काम मुश्किल है। तुम्हारे यहा के बहुत-से विद्यार्थियो के पत्र मेरे पास पड़े हुए है | कोई मेरी स्तुति करता है तो कोई गाली देते है। स्तुति तो नाकाम चीज है। उसका असर मेरे पर नही होता। परतु जब विद्यार्थी चिढकर गाली देते है तो मुझे चिता होती है क्योकि क्रोध से वीर्य का नाश नही कि 'हिंदी नवजीवन, १३-१-२७ स्वामी श्रद्धानंद १४१ होता है। स्वामीजी के सामने मैने ब्रह्मचर्य की अपनी व्याख्या रखी थी और वह मेरे साथ सम्मत थे। किसी स्त्री का मलिन स्पर्श न करने मे ही ब्रह्मचर्य नहीं होता। हा, ब्रह्मचर्य वहा से शुरू जरूर होता है। पर क्षमा की पराकाष्ठा ब्रह्मचर्य का लक्षण । पिछले साल स्वामीजी जब टकारिया से लौटते समय मुझसे मिलने गये थे तो उन्होने मुझसे कहा कि 'हिंदूधर्म की रक्षा-नीति से ही सभव है।' अगर तुम वैदिक आचार और विचार की रक्षा करना चाहते हो तो तुम यह वस्तु याद रखो कि तुम्हे पग-पग पर रुपये मिल जायगे, मगर ब्रह्मचर्य का, नीति का पाया यहापर न होगा तो तुम्हारा गुरुकुल मिट्टी में मिल जायगा इस भूमि के तो आत्मा नहीं है। इसकी आत्मा तुम्ही हो। अगर तुम आत्म-बल खो दोगे और 'उदरनिमित्त बहुकृतवेष ' जैसे बन जाओगे तो तुम्हारी सारी शिक्षा बेकार जायगी। मै आज तुम्हारे आगे चर्खा और खादी की बात करने नही आया हू । तुम्हारा पहला काम ब्रह्मचर्य और वीरता का-क्षमा का है। उसे भूल जाओगे तो स्वामी जी का नाम कायम नहीं रहेगा। रशीद की गोली से स्वामीजी का क्या हुआ? वह तो उस गोली से ही अमर हुए। स्वामीजी का दूसरा काम अछूतोद्धार था। जिन शब्दो में मालवीयजी ने खादी की वकालत की, मै नही कर सकता। पर इतना जरूर कहूगा कि अगर हम हमेशा गरीबो और अछूतो की फिक्र रखेगे तो खादी से अलग नहीं रह सकते। ईश्वर तुम सबके ब्रह्मचर्य, सत्य और तुम्हारी प्रतिज्ञाओ की रक्षा करे, गुरुकुल का कल्याण करे और स्वामीजी का हरेक काम परमात्मा चालू रखे ! १ , १ हिंदी नवजीवन, ३१-३-२७ १४२ देश-सेवको के संस्मरण : २६ : श्रीनिवास शास्त्री दक्षिण अफ्रीका-निवासी भारतीयो को यह सुनकर बडी तसल्ली होगी कि माननीय शास्त्री ने पहला भारतीय राजदूत बनकर अफ्रीका मे रहना स्वीकार कर लिया है, बशर्ते कि सरकार वह स्थान ग्रहण करने के प्रस्ताव को आखिरी बार उनके सामने रखे। भारत-सेवक-समिति और शास्त्रीजी ने यह बडा ही त्याग किया है, जो वह इस निर्णय पर पहुचे है । यह तो एक प्रकट रहस्य है कि यदि यह प्रस्ताव नही किया जाता तो वह भारत मे अपना काम छोडकर इस जिम्मेदारी को अपने सिर पर लेने के जरा भी इच्छुक नही थे। परतु जब उनसे साग्रह यह अनुरोध किया गया कि वह ही एक ऐसे आदमी है, जो उस समझौते के अनुसार कार्य शुरू कर सकते है, जिसके स्वीकृति कराने मे उनका बहुत भारी हाथ रहा है, तो उन्हें इस प्रार्थना और आग्रह को मजूर करना ही पडा। दक्षिण अफ्रीका से समय-समय पर जो तार भेजे गये थे उनसे हमे पता चलता है कि वहा के अनेज भी इस बात के लिए कितने उत्सुक थे कि शास्त्रीजी ही इस सम्माननीय पद को ग्रहण करे । शास्त्रीजी की वक्तृत्व-शक्ति, निस्पृहता, मधुर विवेक- शीलता और असीम सचाई ने यूनियन सरकार और वहा के यूरो- पीय लोगो के हृदय मे उनके लिए चाह और आदर उत्पन्न कर दिया, जब वह हबीवुल्ला-शिष्टमडल के साथ कुछ दिन के लिए दक्षिण अफ्रीका गये थे। मै खुद जानताहू कि हमारे दक्षिण अफ्रीका- निवासी भाई इस बात के लिए कितने असीम चिंतातुर थे कि किस प्रकार शास्त्रीजी ही, वहा भारत के पहले राजदूत बनकर जाय। और श्रीयुत श्रीनिवास शास्त्रीजी के लिए भी तो, जिन्हे परमात्मा ने ऐसे उदार हृदय से भूषित किया है, ऐसे सर्वसम्मत अनुरोध को अस्वीकार करना असंभव था। अब यह प्राय निश्चित है कि शीघ्र श्रीनिवास शास्त्री - १४३ ही उनकी बाकायदा नियुक्ति होकर, उसकी खबर प्रकाशित कर दी जायगी। इन पहले राजदूत का काम भी उनके लिए निश्चित कर दिया जायगा । निस्सदेह, यूनियन सरकार और हमारे दक्षिण अफ्रीका के भारतीय भाई भी भारत के इस पहले राजदूत से बडी-बडी आशाए तो करते ही होगे। चूकि शास्त्रीजी स्वय भारतीय और एक विख्यात पुरुष है, निस्सदेह यूनियन सरकार जरूर यह सोचती होगी कि जहातक भारतीयो से सबध है, उन्हे समझा-बुझाकर शास्त्रीजी सरकार के प्रस्तावो आदि का काम सरल कर देगे। दूसरे शब्दो मे यो कहिये कि यूनियन सरकार उनसे आशा करती •है कि शास्त्रीजी उसकी बातो को भारतीय समाज तथा भारत- सरकार के सामने सहानुभूति-पूर्वक रखेगे। इधर भारतीय समाज भी आशा करता है कि शास्त्रीजी इस बात का जरूर आग्रह करेगे कि समझौते का सम्मानयुक्त, बल्कि उदारता-पूर्वक पालन हो । दो प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों को सतुष्ट करना यो कठिन तो है ही, पर दक्षिण अफ्रीका मे, जहा कि जातियो और दलों के स्वार्थो में आश्चर्यजनक पारस्परिक विरोध है, यह काम कही अधिक मुश्किल । कितु मैं जानता हू कि अगर इस सूक्ष्म तराजू को अपने हाथ में कोई उठा सकता है और दक्षिण अफ्रीका से सबंध रखनेवाले सभी दलो को सतुष्ट कर सकता है तो अकेले शास्त्रीजी ही एक ऐसे आदमी है । मेरा खयाल है कि यूनियन सरकार के मत्री यह तो अपेक्षा नहीं रखते होगे कि भारतीय समाज को उसके न्याय्य स्वत्वोको दिलाने में शास्त्रीजी इच भर भीपीछे हट जाय ।हा, अधिक-से-अधिक शास्त्रीजी यह कर सकते है कि वह भारतीयों को १९१४ के समझौते का उल्लघन करके आगे बढ़ने से रोके, कम- से-कम तबतक तो जरूर रोके, जबतक कि वहा के भारतीय अनु- करणीय आत्मसयम और अपने अन्य व्यवहार द्वारा १९१४ मे प्राप्त किये समझौते से आगे बढ़ने की अपनी पात्रता को सिद्ध नही कर देते । अतः यदि इस दक्षिण अफ्रीका के हमारे भारतीय भाई १४४ देश-सेवको के संस्मरण भारत के प्रतिनिधि के काम को सरल और अपनी परिस्थिति को सुरक्षित कर लेना चाहे तो वे उनसे बड़े-बडे चमत्कारो की आशाए करना छोड दे । उनका यह अनुमान गलत होगा कि “चूकि हम अभी एक सम्माननीय समझौता करा चुके है और उसपर अमल कराने के लिए भारत का एक महान पुरुष हमारे यहा आ रहा है, इसलिए अब तो हमारी परिस्थिति में एकदम कायापलट हो जायगा।" उन्हे याद रखना चाहिए कि माननीय शास्त्रीजी वहा उनके वकील बनकर, उनके प्रत्येक व्यक्तिगत शिकायत के लिए लडने को नही जा रहे है । उनको मामूली व्यक्तिगत शिकायते सुना-सुनाकर परेशान करना उस सोने के अडे देनेवाले पक्षी की हत्या करने के समान है। वह तो वहा भारतीय सम्मान के रक्षक बन- कर जा रहे है। सर्वसाधारण भारतीय समाज के स्वत्व और स्वाधीनता की रक्षा के लिए वह वहा जा रहे है । शास्त्रीजी वहा यह देखने के लिए जा रहे है कि यूनियन सरकार कही कोई नवीन रुकावटी कानून न बनाने पाये। अलावा इसके वह देखेंगे कि वर्त- मान कानूनो का पालन उदारता-पूर्वक तो हो रहा है। उनके पालन मे भारतीयो के स्वत्वो को कोई हानि तो नही हो रही है, आदि। अत यदि उनसे कोई व्यक्तिगत शिकायत की भी जाय तो वह किसी व्यापक सर्वसाधारण नियम का उदाहरण-स्वरूप हो। इस लिए यदि व्यक्तिगत मामलो मे शास्त्रीजी की सहायता मागने में दक्षिण अफ्रीका का भारतीय समाज दूरदर्शी सयम से काम न लेगा तो वह उनकी परिस्थिति को असह्य और उस महान् उद्देश्य के लिए उन्हें असमर्थ बना देगा जिसके लिए वह वहा विशेष रूप से भेजे गये है। और सचमुच एक राजदूत की उपयोगिता केवल यही समाप्त नही हो जाती कि वह केवल सरकारी पद से सबध रखने- वाले अपने कर्तव्य का पालनभर कर ले, बल्कि उसकी वह अप्र- त्यक्ष सेवा कही अधिक उपयोगी है जो सरकारी तथा गैरसरकारी कामों को लेकर उससे मिलने-जुलनेवाले लोगो पर उसके मिलन- सार स्वभाव और सच्चरित्र के प्रभाव द्वारा होती है। अत. यदि श्रीनिवास शास्त्री हमारे देशभाई शास्त्रीजी के दिमागी और हृदय के महान गुणों नागडे करना चाहें तो वे मेरी बताई उपर्युक्त मर्यादाओ का जरूर खयाल रखे। .''इस सप्ताह मे मिले पत्र में एक सज्जन ने क्लर्कस्डोप की प्रसिद्ध घटना का, जिसके बारे में दक्षिण अफ्रीका के अखबारो के पन्ने-के-पन्ने भरे रहते है, आखो देखा सच्चा वर्णन किया है। यूनि- यन सरकार के नि संकोच पूरी और स्पष्ट माफी माग लेने से यद्यपि इस घटना पर राजनैतिक दृष्टि से अब कुछ भी कहना बाकी नही रह जाता है और न कुछ कहने की जरूरत ही है तो भी इस षडयत्र के सामने जिसका कि परिणाम श्री शास्त्रीजी के लिए प्राणात भी हो सकता था, उन्होने जो उदारता और हिम्मत का व्यवहार किया है उसकी प्रशसा कितनी ही क्यो न की जाय वह कम ही होगी। मेरे सामने जो पत्र है उससे मालूम होता है कि जिस सभा में वह व्याख्यान दे रहे थे, उसको तोड देने के लिए डेप्टीमेयर के नेतृत्व मे जो दल आया था उसने बत्तिया बुझा दी, फिर भी वह भारत माता का सच्चा सपूत और प्रतिनिधि अपने स्थान पर यत्किचित् भी घबडाये बिना डटा रहा, जरा भी न हटा और जब भडाका होने के कारण सभा के हाल मे श्रोताओ को सास लेना भी मुश्किल हो गया तब वह बाहर गये और वहा, जैसे कोई बात ही नही हुई हो, इस घटना के प्रति इशारा तक न करते हुए उन्होने अपना व्याख्यान पूरा किया। योतो इस घटना के पहले ही दक्षिण अफ्रीका के यूरोपियनो मे वह प्रिय हो गये थे; परतु शास्त्रीजी के इस धीर हिम्मतभरे और उदार आचरण ने वहा के युरोपियनों के विचार में उन्हे और भी अधिक गौरवान्वित कर दिया है और क्योकि उन्हें अपने लिए यश नही चाहिए था (शास्त्रीजी से अधिक कीति से लजानेवाले मनुष्य कदाचित् ही मिल सकेगे) उन्होने, १ हिंदी नवजीवन, २८-४-२७ १४६ देश-सेवकों के संस्मरण - जिस काम के वह प्रतिनिधि थे, उसके लाभ मे अपनी लोकप्रियताका बडी योग्यता और सफलता पूर्वक उपयोग किया। दक्षिण अफ्रीका मे उनके बहुत ही थीडे समय के निवास मे उन्होने अपने देशवासियो का गौरव बहुत बढा दिया है। हम यह आशा करे कि वहा के भार- तीय अपने आदर्श व्यवहार से अपनेको उस गौरव के योग्य प्रमा- णित करेंगे। परतु दक्षिण अफ्रीका के मुश्किल और नाजुक प्रश्न को हल करने में उनके कार्य का महत्व केवल इसीपर, जो एक घटना-मात्र है, निर्भर नही है। हम उनके दफ्तर की भीतरी कार्यवाही के विषय मे, सिवा उनके परिणामो के कुछ नही जानते । पर इसमे उन्हें उस सारी राजनीति-कला का उपयोग करना पड़ता था जो अपर्ने पक्ष के सत्य होने के विश्वास से प्राप्त होती है तथा जो झूठ, कपट तथा नीचता को कभी बरदाश्त नही कर सकती। परतु हम यह जरूर जानते है कि सस्कृत और अंग्रेजी की अपार विद्वता और जुदा-जुदा विषयो का ज्ञान, वाक्यपटुता इत्यादि कुदरत से प्रचुरता में मिली हुई बख्शीशो को अपने कार्य के लिए उपयोग करने में उन्होने कोई कसर नही की है । चुनंदा यूरोपियनो के बड़े श्रोतृ- समूह के आगे वह भारतीय तत्वज्ञान और सस्कृति पर व्याख्यान देते थे, जिससे उनके दिलो पर बडा असर होता था और उस पक्ष- पात के परदे को,जिसके कारण यूरोपियनो का बडा समूह अबतक भारतीयो मे कोई गुण ही नहीं देख सकता था, उन्होने पतला कर दिया है। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयो के प्रश्न मे, ये व्याख्यान ही शायद उनका सबसे बडा और अधिक स्थायी हिस्सा है। ... ... मौत ने न सिर्फ हमारे बीच से, बल्कि समूची दुनिया के १ १ हिंदी नवजीवन, १८-१०-२८
नारायण हेमचंद्र
१४७
।
८
बीच से भारत-माता के
एक बड़े-से-बड़े
सपूत को उठा लिया है।
उनके परिचय मे आनेवाला हरकोई देख सकता था कि वह हिदु-
स्तान को बहुत ही प्यार करते थे। पिछले दिनो जब मै उनसे मद्रास
मे मिला था, उन्होने सिवा हिदुस्तान और उसकी संस्कृति के,
जिनके लिए वह जीये और मरे, दूसरी किसी बात की चर्चा ही नही
की। जब वह मृत्यु-शय्या पर पडे दीखते थे, तब भी मुझे विश्वास है
कि उनको अपनी कोई चिंता नही थी। उनका सस्कृत-ज्ञान अग्रेजी
के उनके अगाध ज्ञान से ज्यादा नही तो कम भी न था। मुझे एक
ही बात और कहनी है और वह यह कि अगरचे राजनीति में हमारे
खयाल एक-दूसरे से मिलते नहीं थे, तो भी हमारे दिल एक ही थे
और मै यह कभी सोच नहीं सकता कि उनकी देशभक्ति हमारे
किसी बड़े-से-बडे देशभक्त से कम थी। शास्त्रीजी जिदा है, यद्यपि
उनका नामधारी शरीर भस्म हो चुका है।
: २७ :
नारायण हेमचंद्र
स्वर्गीय नारायण हेमचन्द्र विलायत आये थे। मै सुन चुका
था कि वह एक अच्छे लेखक है। नेशनल इडियन एसो-
सिएशनवाली मिस मैनिग के यहा उनसे मिला। मिस
मैनिग जानती थी कि सबसे हिल-मिल जाना मै नही जानता।
जब कभी मै उनके यहा जाता तब चुपचाप बैठा रहता। तभी
बोलता, जब कोई बातचीत छेड़ता।
उन्होने नारायण हेमचद्र से मेरा परिचय कराया।
नारायण हेमचद्र अग्रेजी नही जानते थे। उनका पहनावा
' हरिजन सेवक, २२-४-४६
१४८ देश-सेवको के सस्मरण विचित्र था। बेढगी पतलून पहने थे। उसपर था एक बादामी रग का मैला कुचैला-सा पारसी काट का बेडौल कोट । न नेकटाई,न कालर । सिर पर ऊन की गुथी हुई टोपी और नीचे लंबी दाढी। बदन इकहरा, कद नाटा कह सकते है। चेहरा गोल था, उसपर चेचक के दाग थे। नाक न नोकदार थी, न चपटी। हाथ दाढी पर फिरा करता था। वहा के लाल-गुलाल फैशनेबल लोगो मे नारायण हेमचद्र विचित्र मालूम होते थे। वह औरो से अलग छटक पडते थे। "आपका नाम तो मैने बहुत सुना है। आपके कुछ लेख भी 'पढे है । आप मेरे घर चलिये न नारायण हेमचद्र की आवाज जरा भर्राई हुई थी। उन्होने हंसते हुए जवाब दिया- "आप कहा रहते है ?" "स्टोर स्ट्रीट मे।" "तब तो हम पडोसी है। मुझे अग्रेजी सीखना है। आप सिखा ?" देगे?" . समय हुआ। मैने जवाब दिया--"यदि मैं किसी प्रकार भी आपकी सहा- यता कर सक्तो मुझे बडी खुशी होगी। मै अपनी शक्ति भर कोशिश करूंगा। यदि आप चाहे तो मैं आपके यहा भी आ सकता हू ।" "जी नही, मै खुद ही आपके पास आऊगा । मेरे पास पाठ- माला भी है। उसे लेता आऊगा।" निश्चित आगे चलकर हम दोनो मे बडा स्नेह हो गया। नारायण हेमचद्र व्याकरण जरा भी नहीं जानते थे। 'घोडा' क्रिया और 'दौडा' सज्ञा बन जाती है। ऐसे मजेदार उदाहरण तो मुझे कई याद है। परतु नारायण हेमचद्र ऐसे थे, जो मुझे भी हजम कर जाय । वह मेरे अल्प व्याकरण-ज्ञान से अपनेको भुला देनेवाले जीव न थे । व्याकरण न. किसी प्रकार लज्जित न होते थे। । जानने पर वह नारायण हेमचन्द्र "मै आपकी तरह किसी पाठशाला मे नही पढा हू । मुझे अपने विचार प्रकट करने में कही व्याकरण की सहायता की जरूरत नही दिखाई दी। अच्छा, आप बगला जानते है ? मे तो बगला भी जानता हू । मै बगाल मे भी घूमा हू । महर्षि देवेद्रनाथ टैगोर की पुस्तको का अनुवाद तो गुजराती जनता को मैने ही दिया है। अभी कई भाषाओ के सुदर ग्रथो के अनुवाद करने है । अनुवाद करने मे भी शब्दार्थ पर नही चिपटा रहता । भावमात्र दे देने से मुझे सतोष हो जाता है। मेरे बाद दूसरे लोग चाहे भले ही सुदर वस्तु दिया करे । मै तो बिना व्याकरण पढे मराठी भी जानता हू, हिदी भी जानता हू और अब अग्रेजी भी जानने लग गया हू । मुझे तो सिर्फ शब्द-भडार की जरूरत है । आप यह न समझ ले कि अकेली अग्रेजी जान लेने भर से मुझे सतोप हो जायगा। मुझे तो फ्राम जाकर फ्रेंच भी सीख लेनी है। मैं जानता हूं कि फ्रेच साहित्य बहुत विशाल है। यदि हो सका तो जर्मन जाकर जर्मन भाषा भी सीख लूगा। इस तरह नारायण हेमचद्र की वाग्धारा बे-रोक बहती रही। देश-देशातरो मे जाने व भिन्न-भिन्न भाषा सीखने का उन्हे अमीम - शौक था। "तब तो आप अमेरिका भी जरूर ही जावेगे।" "भला इसमे भी कोई सदेह हो सकता है। इस नवीन दुनिया को देखे बिना कही वापस लौट सकता हू "पर आपके पास इतना धन कहा है ?" "मुझे धन की क्या जरूरत पडी है ? मुझे आपकी तरह तडक- भडक तो रखना है ही नहीं। मेरा खाना कितना और पहनना क्या मेरी पुस्तको से कुछ मिल जाता है और थोडा-बहुत मित्र लोग दे दिया करते है, वह काफी है। मैं तो सर्वत्र तीसरे दर्जे मे ही सफर करता हूँ । अमेरिका तो डेक मे जाऊगा।" नारायण हेमचंद्र की सादगी बस उनकी अपनी थी। हृदय भी उनका वैसा ही निर्मल था । अभिमान छू तक नही गया था। ?
१५० देश-सेवकों के संस्मरण लेखक के नाते अपनी क्षमता पर उन्हे आवश्यकता से भी अधिक विश्वास था। हम रोज मिलते । हमारे बीच विचार तथा आचार-साम्य भी काफी था। दोनों अन्नाहारी थे। दोपहर को कई बार साथ ही भोजन करते। यह मेरा वह समय था, जब मै प्रति सप्ताह सत्रह शिलिंग मे ही अपना गुजरा करता और खाना खुद पकाया करता था। कभी मैं उनके मकान पर जाता तो कभी वह मेरे मकान पर आते । मै अंग्रेजी ढंग का खाना पकाता था, उन्हें देशी ढंग के बिना संतोष नही होता था। उन्हें दाल जरूरी थी। मै गाजर इत्यादि का रसा बनाता। इसपर उन्हें मुझपर बड़ी दया आती। कही से वह मूग ढूढ लाये थे। एक दिन मेरे लिए मूग पकाकर लाये, जो मैने, बडी रुचि-पूर्वक खाये। फिर तो हमारा इस तरह का देने-लेने का व्यवहार बहुत बढ गया। मै अपनी चीजो का नमूना उन्हे चखाता और वह मुझे चखाते। इस समय कार्डिनल मैनिंग का नाम सबकी जबान पर था। डाक के मजदूरों ने हड़ताल कर दी थी। जानबंर्स और कार्डिनल मैनिंग के प्रयत्नों से हड़ताल जल्दी बंद हो गई। कार्डिनल मैनिग की सादगी के विषय मे जो डिसरलो ने लिखा था,वह मैने नारायण हेमचंद्र को सुनाया "तब तो मुझे उस साधु पुरुष से जरूर मिलना चाहिए।" "वह तो बहुत बडे आदमी है। आपसे क्यो कर मिलेगे?" "इसका रास्ता मै बता देता हूं। आप उन्हे मेरे नाम एक पत्र लिखिये कि मै एक लेखक हूं। आपके परोपकारी कार्यों पर आपको धन्यवाद देने के लिए प्रत्यक्ष मिलना चाहता हूं। उसमे यह भी लिख दीजिएगा कि मै अग्रेजी नही जानता । इसलिए- अपना नाम लिखिए-बतौर दुभाषिए के मेरे साथ रहेगे।" मैने इस मजमून का पत्र लिख दिया। दो-तीन दिन मे कार्डि- नल मैनिंग का कार्ड आया। उन्होने मिलने का समय दे दिया था। से नारायण हेमचंद्र १५१ ने । हम दोनो गये। मैने तो, जैसाकि रिवाज था, मुलाकाती कपड़े पहन लिये । नारायण हेमचंद्र तो ज्यो-के-त्यो, सनातन | वही कोट और वही पतलून । मैने जरा मजाक किया , पर उन्होने उसे साफ हंसी में उड़ा दिया और बोले- "तुम सब सुधारप्रिय लोग डरपोक हो। महापुरुष किसीकी पोशाक की तरफ नही देखते । वे तो उसके हृदय को देखते है। कार्डिनल के महल मे हमने प्रवेश किया । मकान महल ही था । हम बैठे ही थे कि एक दुबले से ऊचे कदवाले वृद्ध पुरुष प्रवेश किया। हम दोनो से हाथ मिलाया । उन्होने नारायण हेम- चंद्र का स्वागत किया। "मै आपका अधिक समय लेना नही चाहता। मैंने आपकी कीर्ति सुन रखी थी। आपने हडताल मे जो शुभ काम किया है, उसके लिए आपका उपकार मानना था । ससार के साधु पुरुषो के दर्शन करने का मेरा अपना रिवाज है। इसलिए आपको आज यह कष्ट दिया है।" इन वाक्यो का तरजुमा करके उन्हे सुनाने के लिए हेमचद्र ने मुझसे कहा। "आपके आगमन से मै बडा प्रसन्न हुआ हूं। मैं आशा करता कि आपको यहां का निवास अनुकूल होगा और यहां के लोगो आप अधिक परिचय करेगे। परमात्मा आपका भला करे ।" यो कहकर कार्डिनल उठ खड़े हुए। एक दिन नारायण हेमचद्र मेरे यहां धोती और कुरता पहन- कर आये। भली मकान-मालिकिन ने दरवाजा खोला और देखा तो डर गई। दौड़कर मेरे पास आई और बोली-“एक पागल-सा आदमी आपसे मिलना चाहता है।" मै दरवाजे पर गया और नारायण हेमचंद्र को देखकर दंग रह गया। उनके चेहरे पर वही नित्य का हास्य चमक रहा था। "पर आपको लडको ने नही सताया hcar ?"
१५२
देश-सेवको के संस्मरण
"हा, मेरे पीछे पडे जरूर थे, लेकिन मैने कोई ध्यान न
दिया तो वापस लौट गये।"
नारायण हेमचंद्र कुछ महीने इगलैंड में रहकर पेरिस चले
गये। यहा फ्रेच का अध्ययन किया और फ्रेच पुस्तको का अनुवाद
करना शुरू कर दिया। मै इतनी फ्रेच जान गया था कि उनके अनु.
वादो को जाच लू । मैने देखा कि वह तर्जुमा नही, भावार्थ था।
अत मे उन्होने अमेरिका जाने का अपना निश्चय भी निबाहा।
बड़ी मुश्किल से डेक या तीसरे दर्जे का टिकट प्राप्त कर सके थे।
अमेरिका मे जब वह धोती और कुरता पहनकर निकले तो असभ्य
पोशाक पहनने का जुर्म लगाकर वह गिरफ्तार कर लिये गये थे
पर जहातक मुझे याद है, बाद में वह छूट गये ।'
050547
Shartar... - rary
Tiberar is ruSarathi
INPUTED
SLIM
. आत्म-कथा, १९२७