Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Vastusar Prakaran
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जैन विविध ग्रंथमाला में छपी हुई पुस्तकें- १ मेपमहोदप-वर्षदोप–महामहोपापा भी मेवाविमच गयी विरारित) व सा रोगा, मुभा परेमा वा दुप्पट वर सौर कितनी परसेगी, मार गई, कपास सोय चोरी पारि बस्तुप मस्ती गौ वा माँगी इत्यादि मारी गुमायम प्रतिदिन बामने पापा अपूर्व प्रप। पापी शापि के पांग चा राम न्योतिपिलों ने भी इस प्रपा प्रमादिक मानम अपये पांगों में इस मंच पर से समाय शिवहै। सम्पूर्ण स्वप १५ रमाड ममारके साप माषान्तर मी विधा पालिसे समस्त बनता इसी से पाम दे सकती है। कीमत चार क्षा। २ बोरसीर-मूत्र प्रास्त गावा पाप हिन्दी माषान्तर पापा समस्त प्रमा से मार्च अपने सिये पपूर्व प्रवी। मूगप पांच भाना । पास्सुसार प्रकरण सचिन--(मा प्रेम विरचित) मूब और गुजराती भाषान्तर समेत कर सापासीम मास में बार परेगा। मित पांच रुपपा । शीघ्र ही प्रकाशित होने वाले प्रथ- १ स्पमाम सचित्र-मवार 'मय विति) मूग और भाषान्ता समेत । उपमें विरे ५. महारेर रमाक्तार, या गपपति, पस भैरव, मनमी दुर्गा पानी र समरत हिन्दुओं तमाम रेप रेशियों के मित्र र स्वम्मी मम चिनी के साथ प्रची तर दिया गया है। /२ २ प्रासाद मरन-(सूत्रधार 'मरमा विभिाषाम्ता समव । मदिर सम्बन्धी पर भरमसाब पापा। न दर्शन शिपावती-जमपुर मरि पिपि में मनोपर समाप मा मापारि पु तानी तवा पर दोनों का पाएर रेकी ति। गपितासार सम्प-( श्री महाराचई) गणित Avy | तोप प्राश-संध प्रतिमा भीमपनमूी विचित) जातक विश्व । पेग माता-(परोपम्पाय मिररित) बारित। २७ भुषन पीपक सटीक-पाय पणमसूरि और मागिरिमूरि। इसमें पर प्रमेय रेखाबाठा है। दो माहप एक पायम रमाई मारक बनने सो बम विधि बममरएक पुन्हापारिममिन। मानि स्थान- पं० भगवानदास जैन संपारक-जैन विविध प्रपमाणा मोतीसिंह मोमिपास स्वा, जपपुर सिटी (राजपूताना)
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बामननपारी
पात स्मरणोप-नगत्यूग्य-पिवद पारित्र घटामणि-तीर्योदारफ
तपागम्यामकार पूज्यपाद-विट्य-श्री-श्री-श्री
दीक्षा स १९४९ अपार शुक्ल "
गणिपद स १९६१ मागनीप शुक ५
-
सम्म स १९३० पाप मुक्क ११
पन्यासपद स १९६२ कारक पद ११
समास
श्रीमान आचार्यमहाराजश्री विजयनीतिसूरीश्वरजी ॥
मरिपद स १९७६ मार्गशीर्ष शुक्र ५
समर्पण श्रीमान् परमपूज्य प्रातःस्मरणीय भाषालब्रह्मचारी गिरिनार आदि तीर्थोद्धारक शासनप्रभाविक तपागच्छाधिपति जंगमयुगप्रधान जैनाचार्य श्रीश्रीश्री १००८ श्री विजयनीतिसूरीश्वरजी महाराज साहिक के कर कमलों में सादर समर्पण भवदीय कृपापात्र- भगवानदास जैन धन्यवाद भीमान् शासनप्रमाविक गिरिनार मादि वीर्योवारक संगमयुगप्रपाल मैनाचार्य भी विगपनीविदूरी परजी, महाराज, क्या श्रीमान शान्तमूर्ति विवर्ष मुनिराम भी नयंत- विजपमी महापन, एवम् बरवरगबीप प्रपस्निी सामी श्रीमती पुण्यमीची महाराज की बिदुपी शिप्पणा साची मीमती विनयभीजी माराम, ८ वीमों पम्पबरों के उपदेश पारा भनेक सम्बनों ने प्रथम से प्राहक होकर मुझे प्रसारित किया है, मिसे पर मंब प्रकाशित होने पर मेप मापने है। भीमान् शासनसम्राट् नंगमयुगमपान जैनाचार्य भी विनयनेमिसूरीपरजी महाराज के पहपर जैनागमन्याय-पर्सन म्योतिष-शिस्प-समविशारद जैनाचार्य श्री विजयोदयसूरीपरजी महाराम मे भय को छर करने पर कही कठिन पर्प समझाने की पूर्ण मदद की है, इसरिये में उनका हा भामार मानता है। श्रीमान मवर्चक भी प्रतिनिसयनी महाराज के विद्वान् प्रशिम्य मुनिएन भी असपिमष जी महाराज परा माचीन मंडारों से मने विपस की स्व-भिखित प्राचीन पुस्तमन्सरने ने प्राप्त हुई है एतदर्य मामार मानवा है। मिनी मामशंकर गौरीशंकर सोमपुरा पाम्मेवाना बात से मंदिर सम्मपी मन पवम् माहिती प्राप्त हुई है, तथा अपपुरमाड पं० जीवराम मोभर मास मूर्तिबास मर्ग एक मनो एवम् सप्रसिय मुसम्मर मद्रीनारायण जगमप चित्रकार मे सप देर रवियों भारिप्रेटो बना दिया है क्या सिमसामने प्रथम से प्राइक नरमपर, बन सब को पन्यवाद देता। मनुवादक प्रस्तावना. मकान, मंदिर और मूर्ति आदि कैसे सुंदर कला पूर्ण बनाये जावें कि जिसको देखकर मन प्रफुल्लित हो जाय और खर्चा भी कम लगे। तथा उनने रहनेवालों को क्या • सुख दुख का अनुभव करना पड़ेगा ? एवं किस प्रकार की मूर्ति से पुन्य पापो के पल की प्राप्ति हो सकती है ? इत्यादि जानने की अभिलाषा प्राय करके मनुष्यों को हुआ करती है । उन सब को जानने के लिये प्राचीन महर्षियों ने अनेक शिल्प ग्रंथो की रचना करके हमारे पर महान् उपकार किया है । लकिन उन ग्रंथों की सुलभता न होने से आजकल इसका अभ्यास बहुत कम हो गया है। जिससे हमारी शिल्पकला का हास हो रहा है। सैकड़ों वर्ष पहले शिल्पशास्त्र की दृष्टि से जो इमारते बनी हुई देखने में आती हैं, वे इतनी मजबूत हैं कि हजारों वर्ष हो जाने पर भी आज कल विद्यमान हैं और इतनी सुंदर कलापूर्ण हैं कि उनको देखने के लिये हजारों कोसों से लोग आते हैं और देखकर मुग्ध हो जाते हैं। शिल्पकला का हास होने का कारण मालूम होता है कि- मुसलमानों के राज्य में जबरदस्ती हिन्दू धर्म से भ्रष्ट करके मुसलमान बनाते थे और सुंदर कला पूर्ण मदिर व इमारतें जो लाखों रुपये खर्च करके बनायी जाती थी उनका विध्वंस कर डालते थे और ऐसी सुंदर कला युक्त इमारते बनाने भी न देते थे एवं तोड डालने के भय से बनाना भी कम हो गया। इन अत्याचागे से शिल्पशास्त्र के अभ्यास की अधिक आवश्यकता न रही होगी। जिससे कितनेक अथ दीमक के आहार बन गये और जो मुसलमानों के हाथ आये वे जला दिये गये। जो कुछ गुप्त रूप से रह गये तो उनका जानकार न होने से अभी तक यथार्थ रूप से प्रकट न हो सके । जो पांच सात ग्रंथ छपे हैं, उनसे साधारण जनता को कोई लाभ नहीं पहुँच सकता। क्योंकि वे मूलमात्र होने से जो विद्वान और शिल्पी होगा वही समझ सकता है । तथा हिन्दी भाषान्तर पूर्वक जो 'विश्वकर्मा प्रकाश' आदि छपे हुए हैं। वे केवल शब्दार्थ मात्र है, भाषान्तर करनेवाले महाशय को शिल्प शास्त्र का अनुभव पूर्वक अभ्याम न होने से उनकी परिभाषा को समझ नहीं सका, जिसे शब्दार्थ मात्र लिखा है एवं नकशे भी नहीं दिये गये, तो साधारण जनता कैसे समझ सकती है ? मैंने भी तीन वर्ष पहले इस प्रथ का भाषान्तर शब्दार्थ मात्र किया था, उसमें मेरे को कुछ भी अनुभव न होने से समझता नहीं था। बाद विचार हुआ कि इसको अच्छी तरह समझकर एव अनुभव करके लिखा जाय तो जनता को लाभ पहुँच सकेगा। ऐसा विचार कर तीन वर्ष तक इस विषय के कितनेक ग्रंथों का अध्ययन करके अनुभव भी किया। बाद इस अथ को सविस्तार खुलासावार लिखकर और नकशे आदि देकर आपके सामने रखने का साहस किया है । हिन्दी भाषा में इस विषय के पारिभाषिक शब्दों की सुलभता न होने से मैंने सस्कृत में ही रखे हैं, जिसे एक देशीय भाषा न होते सार्वत्रिक यही शब्दो का प्रयोग हुआ करे ।
[१] प्रस्तुत प्रेम के पर्चा करना (पदसी) • यनेबा मैनपावसम्मी भीपंपस में प्पम होनेवाले मासिक सेठ के सुपुत्र ठकुर पर' नामके सेठ के विद्यम सुपुत्र ठार 'फर' मे सबत् १३७२ में रचा है, ऐसा इस पंथ की समाप्ति में प्रशस्ति से मालूम होगहै। एवं ना प्रपनाया हुमा दूसरा रन परीक्षा' नामक प्रय 'मिसमें हीरा, पमा, माणक, मोदी, व्यसनीया, प्रबास, पुनराम मावि रमों की, सोना, चांदी, पीक्स, सांथ, नसत, या भोर मेहा भाषि मातुनों श्री वा पाप, सिंदुर, पक्षिपवास, रुद्रास, सारिपाम, कपूर, कस्तूरी, भम्बर, मगर, परन, इंकम इस्पाविकी परीक्षा का वर्णन है, इसकी प्रशस्ति में लिखा है कि सिरिपकष मासी कमाणपुरम्मि सिष्टिकालियो । तस्स पठपुर चंदो फेर तस्सेष भंगरुहो ॥ २५ ॥ तेण प रयणपरीफ्सा रहया ससेवि सिसिप कर मुणि'-गुण -ससि -परिसे अक्षावदीपस्स रखम्मि ।। २३ ॥ मीरिझीनगरे वरेण्यपिपण' फेस इति ष्पक्तपी मदन्पो पणिजां जिमेन्द्रवपमे पारिकमामणी । तेनेप विहिता हिताप जगतां प्रासादपिम्पक्रिया, रसानां विद्यापमस्कृतिकरीसारा परीघा स्फुटम् ॥ २७ ॥ इससे स्पष्ट मात्रम हवा है : फेल न हम्म में पर ममाहीन बारमाह के समप में सम्बत् १५७२ में बास्तुसार और रामपरीक्षा प्रब रहे। इस पातुसार प्रकरण प्रथम भारविपि और भाचार प्रदीप भावि प्रन्यों में प्रमाण मिस्वारे जिससे साव होता है कि प्राचीन भाचार्यों न मी इस मन्थ को प्रमाणिक माना है। प्रस्तुत पंप में तीन प्रकरण है। प्रथम प्राण प्रकरण है, उसमें भूमि परीपा, स्म- पोपन विषि, सास मारि के मार्च, माय म्पय मादि पान, १६ भौर १४ गावि के मकानों पसरूप, परप्रदेश, पेप जानन का प्रभार ६४, ८१, १०० मोर ४९ पर के पास्तु काम, गर सम्मपी प्रमााम फठ, मान पनाने लिय कैसी सभी वापरना चाहिय, इत्यादि विपयों का सविस्तर पणन है । दूसरा पिम्पपरीमा पप प्र प्रमाण है, उममें पत्थर की परीक्षा दया मूर्तियों मनिममा मान तमा उनले स्नान का प्रा पर उनके मास माफ है। जीरा पापार प्ररणसमें मंदिर के प्रत्येक मंग विभाग के मान और उनमे नान ब प्रभर रित गया है। इन दोनों प्रमाण ८० मूग गाया है। म्नमा सविस्तर माषान्तर पत्र सत्रनों समझ में मा जाप इस प्रा नमामारि बवमम स्पण्या किया गया है। सो परोपणविस र गुगरमागरमरियार रिमपिता है। - [११] विषय इसमें अपूर्ण था, वह मैंने दूसरे ग्रंथ जो इसके योग्य थे, उनमें से लेकर रख दिया है। तथा ग्रंथ की समाप्ति के बाद मैंने परिशिष्ट में वज्रलेप जो प्राचीन समय में दीवाल आदि के ऊपर लेप किया जाता था, जिससे उन मकानों की हजारों वर्ष की स्थिति रहती थी। उसके पीछे जैन धर्म के तीर्थकर देव और उनके शासन देव देवी तथा सोलह विद्यादेवी, नवग्रह, दश दिगपाल इत्यादि का सचित्र स्वरूप मूल ग्रंथ के साथ दिया गया है । तथा अंत में प्रतिष्ठा सम्बन्धी मुहूर्त भी लिख दिया है । इत्यादि विषय लिखकर सर्वाग उपयोगी बना दिया है। भाषान्तर में निम्न लिखित ग्रंथों से मदद ली है- १ अपराजीत, २ ज्ञानप्रकाश का आयतत्त्वाधिकार, ३ क्षीरार्णव १५ अध्ययन, ४ दीपार्णव का जिनप्रासाद अध्ययन, ५ प्रासादमंडन, ६ रूपमंडन, ७ प्रतिमा मान लक्षण, ८ परि- माण मंजरी, ९ मयमतम् १० शिल्परन्न, ११ राजवल्लभ, १२ शिल्पदीपफ, १३ समरांगण सूत्र- धार, १४ युक्ति कल्पतरु, १५ विश्वकर्म प्रकाश, १६ लघु शिल्प संग्रह, १७ विश्वकर्म विद्या प्रकाश, १८ जिन संहिता, १९ बृहत्संहिता अ० ५२ से ५९, २० सुलभ वास्तु शास्त्र, २१ बृहत् शिल्प शास्त्र, इन शिल्प ग्रन्थों के अतिरिक्त-२२ निर्वाण कलिका, २३ प्रवचन सारोद्धार, २४ आचार दिनकर, २५ विवेक विलास, २६ प्रतिष्ठा सार, २७ प्रतिष्ठा कल्प, २८ आरंभ सिद्धि, २९ दिन शुद्धि, ३० लम शुद्धि, ३१ मुहूर्त चिन्तामणि, ३२ ज्योतिष रत्नमाला, ३३ नारचंद्र, ३४ त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र, ३५ पद्मानंद महाकाव्य चतुर्विंशतिजिनचरित्र, ३६ जोइस होर, ३९ स्तुति चतुर्विंशतिका स्टीक ( बप्पभट्टो शोभनमुनि और मेरुविजय कृत)। प्रस्तुत ग्रंथ की हस्त लिखित प्रतिएँ निम्नलिखित ठिकाने से कोपी करने के लिये मिली थी २ शासनसम्राट जैनाचार्य श्री विजयनेमिसूरीश्वर ज्ञान भडार, अहमदाबाद । २ श्वेताम्बर जैन ज्ञान भडार, जयपुर । १ इतिहास प्रेमी मुनि श्री कल्याणविजयजी महाराज से प्राप्त । १ मुनि श्री भक्तिविजयजी ज्ञान भंडार, भावनगर से मुनि श्री जसविजयजीमहाराज द्वारा प्राप्त। १ जयपुर निवासी यतिवर्य पं. श्यामलालजी महाराज से प्राप्त । उपरोक्त सातों ही प्रति बहुत शुद्ध न थी जिससे भाषान्तर करने में बड़ी मुश्किल पड़ी, जिससे कहीं २ गाथा का अर्थ भी छोडा गया है विद्वान् सुधार कर पढें और मेरे को भूल की सूचना करेंगे तो आगे सुधार कर दिया जायगा । मेरी मातृभाषा गुजराती होने से भाषा दोष तो अवश्य ही रह गये होंगे, उनको सज्जन उपहास न करते हुए सुधार करके पढ़ें। किमधिक सुझेषु । स० १९९२ मार्गशीर्ष शुका २ गुरुवार अनुवादक- विषयानुक्रमणिका विषय प्रयंक विषय मैगमपरण * माम मौर मयि का प्रमाण रगापा गम (हाप)मस्वरूप भूमि परीक्षा २ सिसी के योग्य माठ प्रकार के सूत्र 10 वर्णानुम भूमि माय नमान विसापन बाठमाय के नाम चौरस भूमि सापन आय पर से द्वार की समस ३२ अष्टमांश भूमि सापन एक माय के ठिकाने दूसरा माम है भूमि पचण फळ सकते है। २ शल्प सोवन विधि कौन २ ठिकाने कौन २ माप देना बरसचम 8 पर के नपत्र प्रदान शेपनमाया ११ पर के राशि का शान २४ उपभमास्तुका १४ | व्यय नमान गृहारमे राशिफल १५ | भंश का मान गारमे मासफा १६ | पर के वारे नमान गृहारमे नपत्रफल ५८ | मायाविका अपवाद मानों की भपोमुत्रादि मंशा १८ | लेन देन का विचार शिकास्वापन क्रम २० । परिमापा १८ खावरम विचार X| परों के भेद २९ १२ भुवादि परों के नाम गृह प्रवेश विचार २२ | प्रस्वार रिषि मदों की संज्ञा २४ भुवावि १६ परों का प्रस्तार पमा मारिके पांच प्रचार के प भुवादि परों का फल कामान २५ शावनावि ३४ मिसाल परों के नाम ४२ पादों के समान २६, मिशाल पर छाण पर केय का प्रमाण उ. सान्वनादिर परों सपण ५ मुरूप पर मोर मभित्र पहिचान ३८ सूर्यादि भाष्ठ प का प्रमाण EAR२२२ FERRE१२२५२२५२१५ प्रापति के वर्णपति ८० ५६ 1५७ कैसे बनाना घर ५९ .५९ ६० वेध फल ८७ . ८८ [१३] विषय पृष्ठांक विषय पृष्ठांक घर में कहां २ किस २ का स्थान गौ, बैल और घोड़े बांधने का स्थान करना चाहिये दूसरा पिम्पपरीक्षा प्रकरण द्वार मूर्ति का स्वरूप ८१ शुभाशुभ गृह प्रवेश मूर्ति के पत्थर में दाग का फल ८१ और दुकान भूर्ति की ऊंचाई का फल ८२ द्वार का प्रमाण पाषाण और लकड़ी की परीक्षा ८२ घर की ऊंचाई का फल ८४ नवीन घर का आरम्भ कहां से करना ६० धातु, रत्न, काष्ठ आदि की मूर्ति सम चौरस पद्मासन मूर्ति का स्वरूप ८६ सात प्रकार के वेध ६१ मूर्ति की ऊंचाई ८६ वेध का परिहार ૧૬૨ खडी प्रतिमा के अंग विभाग और मान ८७ १६२ बैठी मूर्ति के अंग विभाग वास्तुपुरुष चक्र ६३ दिगम्बर जिनमूर्ति का स्वरूप वास्तुपद के ४५ देवों के नाम व स्थान ६५ मूर्ति के अंग विभाग का मान ८९ ६४ पद के वास्तु का स्वरूप ब्रह्मसूत्र का स्वरूप ९३ ८१ पद के चास्तु का स्वरूप ९३ १०० पद का वास्तुचक्र प्रतिमा के शुभाशुभ लक्षण ९४ पद का वास्तुचक्र फिर संस्कार के योग्य मूर्ति ९७ ८१ पद का वास्तुचक्र प्रकारान्तर से ७० घरमंदिर में पूजने लायक मूर्ति ९८ द्वार, कोने, स्तंभ, किस प्रकार रखना ७२ प्रतिमा के शुभाशुभ लक्षण १९९ ७३ देवों के शस्त्र रखने का प्रकार खूटी आला आदि का फल 1७३ घर के दोष 6४ तीसरा प्रासाद प्रकरण घर में कैसे चित्र बनाना चाहिये खात की गहराई १०२ घर के द्वार के सामने देवों के निवास कूर्मशिला का मान १०३ ७५ शिला स्थापन क्रम १०४ घर के सम्बन्धी गुण दोप ७६ | प्रासाद के पीठ का मान १०५ घा में कैसी लकडी वा परना ७६ | पीठ के थरों का मान १०५ दूसरे मकान के वास्तुद्रव्य का विचार ७८ पच्चीस प्रकार के प्रासाद के शयन किस प्रकार करना शिखर १०७ घर कहा नहीं बनाना ७९ चौबीस जिनप्रासादो का स्वरूप ६७ :: .. ६८ परिकर का स्वरूप ६९ ७० स्तंभ का नाप का फल नाम और . १७९ पृशक विषय प्रष्ठांक मासाद की संस्था ११० । मंदिर भने चावि स्वमत्र मातारास्वरूप ११० १३८ प्रासारभंग १३९ मंगेवर के १५पर ११२ | नानी समान नागर नातिके मरोवर का स्वरूप ११३ | परशान्य, पेहली पौर भगावटीम मेर मासिके मंगवर स्वरूप स्वरूप सामान्य मंगेवर का स्वरूप ११५ | चौबीस निनासय कम १४१ भन्य प्रकार से मंगओवर का स्वरूप ११४ चौबीस मिनाज्य में प्रविमा स्थापन मासापरमान प्रासार के व्यय प्रमाण पावन जिनालयम १४१ मिन २ गावि रेशियरों की कंपाई ११७ | पाचर गिनाम्प नाम १४२ सिमरों की रचना ११८ | शिखर पानी के मासाद नफा १४२ भामम्सारकामस्वरूप ११९ | ग्रामविर का वर्णन १४२ शुकनास का मान १२० प्रवर प्रशस्ति मंदिर में कैसी पनी वापरन्प परिशिष्ट कनपुरका मान १२१ पसेप १४५ पबारमा प्रमाण १२२ पगाामान १२४ परमान १२५ | चौबीस वीर्यकों के चिह सपिड बिम्बमान १२५/अपमदेव भौर हमके पास पपिप्पी प्रविमा की घष्ठि १२७ | अधिवनाथ १४८८ को मारठि शार १४८ रेघों का स्थापन कम १३० ममिनंदन भगवी घसरूस १३ मुमविनाम मामारमरपाम पप्रम मंदिर के समागम मस्य १३५ | मुपाचिन मंदिर के परम मसा १३६ | नामम १५२ मंडप मान १३. मुबिपिगिन १५२ स्तम मापनमाम १२५ | पिवयमित मटी, मस और स्वंम प्र विस्तार १३७ बांसचिन पप्रपत्र गुण " " १२९ | समबनाया " M " " " " M " " " " " 1१८० " " " ८१८२ " " " " " ११८६ १६२ वर्ग बल " विषय पृष्ठांक विषय पृष्ठांक वासुपूज्यजिन और उनके यक्ष यक्षिणी १५४ प्रहों का मित्रयल विमलजिन १५५ । प्रहों का दृष्टिबल .१८१ अनंतजिन १५५ प्रतिष्ठा, शिलान्यास और सूत्रपात के धर्मनाथ १५६ नतन्त्र ११८२ शांतिनाथ १५७ । प्रतिष्ठाकारक के अशुभ नक्षत्र कुंथुजिन १५७ । विम्बप्रवेश नक्षत्र १८२ अरनाथ १५८ । नक्षत्रों की योनि ११८३ मल्लिजिन १५९ / योनिवर और नक्षत्रो के गण ११८४ मुनिसुव्रत १५९ | राशिकूट और उसका परिहार १,१८५ नमिजिन १६० राशियों के स्वामी १८५ नेमिनाथ १६१ | नाडीकूट और उसका फल १८६ पार्श्वनाथ १६१ ताराबल महावीर (१८७ सोलह विद्यादेवियों का स्वरूप १६३ । लेन देन का विचार १८८ जयविजयादि चार महा प्रतिहारी देवियों राशि आदि जानने का शतपद चक्र १८९ तीर्थकरों के जन्मनक्षत्र और राशि .१९१ का स्वरूप १६८ दस दिक्पालों का स्वरूप १६९ | जिनेश्वर के नक्षत्र आदि जानने का नव ग्रहों का स्वरूप ... १७२ .१९२ क्षेत्रपाल का स्वरूप १७४ । रवि और सोमवार को शुभाशुभ योग १९४ माणिभद्र क्षेत्रपाल का स्वरूप १७५ मंगल और बुधवार को शुभाशुभ योग १९५ सरस्वती देवी का स्वरूप १७५ | गुरु और शुक्रवार को शुभाशुभ योग १९६ शनिवार को शुभाशुभ योग १९७ प्रतिष्ठादिक के मुहत शुभाशुभयोग चक्र संवत्सर, अयन और मास शुद्धि .१७६ / रवियोग और कुमारयोग १९९ तिथिशुद्धि १७७ / राजयोग, स्थिरयोग, वनपातयोग २०० सूर्य और चन्द्र दग्धा तिथि .१७८ | कालमुखी, यमल, त्रिपुष्कर, पंचक प्रतिष्ठा तिथि ११७८ और अबला योग २०१ वार शुद्धि १७९ मृत्युयोग २०२ प्रहों का उपपल १७९ अशुभ योगों का परिहार २०२ . चक
"
१२०६
[५]
पटाक विपद
एक
५२०३ मया, देवी, बेर, कार्तिकेय, यप, और
२०५
सूर्य और प्रविष्ठा मार्च
पहीन प्रहों का फल
१२१२
मासाद विनाश घरफ पोग
२०७
भाभ प्रहों प परिहार
૧૪૨
३०८
शुभमन की रष्टि सफर मह का
२१०
गुमपन
१० | सिधाया म
उप विधार
होरामाण और मवमांश
पांश पौर विश
पबर्ग स्वापना यंत्र
मा स्थापना
बिनदेव प्रविन मुर्त
महारेष प्रविधी मार्च
, * श्री वीतरागाय नम * परम जैन चन्द्राङ्गज ठक्कुर 'फेरु' विरचितम्-- सिरि-वत्थुसार-पयरणं នៅសាល សាល . मंगलाचरण- सयलसुरासुरविंदं दसण'वगणाणुगं पणमिऊणं । गेहाइ-वत्थुसारं संखेवेण भणिस्सामि ॥ १ ॥ सम्यक् दर्शन और सम्यक् ज्ञान वाले ऐसे समस्त सुर और असुर के समूह को नमस्कार करके मकान आदि बनाने की विधि को जानने के लिये वास्तुसार नामक ग्रंथ को संक्षेप से मैं ( ठक्कुर फेरु) कहता हूं ॥१॥ द्वार गाथा- इगवनसयं च गिहे बिंबपरिक्खस्स गाह तेवन्ना। तह सत्तरिपासाए दुगसय चउहुत्तरा सब्वे ॥२॥ इस वास्तुसार नाम के ग्रंथ में तीन प्रकरण हैं, इनमें प्रथम गृहवास्तु नाम के प्रकरण में एकसौ इक्कावन (१५१), दूसरा बिंब परीक्षा नाम के प्रकरण में तेवन (५३) ! 'वंगणनाणाग (१) ऐया पाठ युक्तिसंगत मालूम होता है। १ मसिहा । -- पास्तुसारे पौर वीसरा प्रासाद प्रकरण में सचर (७०) गाया है। मत दो सौ पौरपर (२०४) गाया है ॥२॥ भूमि परीघा-- -- चउवीसगुलभूमी खणेवि पूरिज पुण वि सा गचा। तेणेव मट्टियाए हीणाहियसमफला नेया ॥३॥ मकान आदि बनाने की भूमि में २४ अंगुस गारा सहा खोदकर निकन्ती हुई मिट्टी से फिर उसी को को पूरे। यदि मिट्टी कम हो माय, सहा पूरा मरे नहीं वो हीन फत्ता पर जाम वो उचम भौर बराबर हो माय तो समान फत्त मानना ॥२॥ भह सा भरिय जलेण य चरणसयं गच्छमाण जा मुसइ । ति-दु-इग थगुल भूमी थहम मज्मम उत्पमा जाण ॥ ४ ॥ भवमा उसी दी २५ चंगुल के खड़े में परामर पूर्व बल मरे, पीके एक सौ कदम दूर माकर और पापिस लौटकर उसी ही मनपूर्ण रहेको देखे। यदि सहे में तीन भंगुन पानी पख चाय तो ममम, दो मंगुन पख बाप वो ममम और एक अंगुस पानी सूख माप तो उधम भूमि सममना ॥४॥ पानुल मूमि- सियविप्पि थरुणखचिणि पीयवासी थ कसिणसुद्दी थ । मट्टियवराणपमाणा भूमी निय निय वरणासुम्खपरी ॥४॥ सफेद वर्ष की भूमि मामयों को, सात वर्ण की भूमि पनियों को, पील पर्स की भूमि परयों को और काले पर्ग की भूमि शद्रों को इस प्रकार अपने २ पर्षक सश वाली भूमि सुखकारक होती है ॥५॥ दिन् सार- समभूमि दुकरवित्यरि दुरेह चरकस्स मज्मि रविसंक। पढमतदायगन्भे जमुत्रा थदि-उदयत्यं ॥६॥ - गृह प्रकरणम् अया 11 प्रव A समतल भूमि पर दो हाथ के विस्तार वाला एक गोल चक्र करना और इस गोल के मध्य केन्द्र में बारह अंगुल का एक शंकु स्थापन करना। पीछे सूर्य के उदयार्द्ध में देखना, जहां शंकु की छाया का अंत्य भाग गोल की परिधि में लगे वहां एक चिह्न करना, इसको पश्चिम दिशा दिशा साधन यंत्र समझना। पीछे सूर्य के अस्त समय देखना, जहां शंकु की छाया का अंत्य भाग गोल की परिधि में लगे वहां दूसरा चिह्न करना, इसको पूर्व दिशा समझना। पीछे पूर्व और पश्चिम दिशा तक एक सरल रेखा खींचना। इस रेखा तुल्य व्यासार्द्ध मानकर एक पूर्व विंदु से और दूसरा पश्चिम विंदु से ऐसे दो गोल खींचने से पूर्व पश्चिम रेखा उत्तर पर एक मत्स्याकृति ( मछली की आकृति ) जैसा गोल बनेगा। इसके मध्य विंदु से एक सीधी रेखा खींची जाय जो गोल के संपात के मध्य भाग में लगे, जहां ऊपर के भाग में स्पर्श करे यह उत्तर दिशा और जहां नीचे भाग में स्पर्श करे यह दक्षिण दिशा समझना॥६॥ दक्षिण R पशिम आ me - - जैसे-'इ उ ए' गोल का मध्य विन्दु 'अ' है, इस पर बारह अंगुल का शंकु स्थापन करके सूर्योदय के समय देखा तो शंकु की छाया गोल में 'क' बिन्दु के पास प्रवेश करती हुई मालूम पड़ती है, तो यह 'क' बिन्दु पश्चिम दिशा समझना और यही छाया मध्याह्न के बाद 'च' विन्दु के पास गोल से बाहर निकलती मालूम होती है, तो यह 'च' बिन्दु पूर्व दिशा समझना। पीछे 'क' बिन्दु से 'च' बिन्दु तक एक सरल रेखा खींचना, यही पूर्वा पर रेखा होती है। यही पूर्वा पर रेखा के - 100 " मानुसार ॥ P4 1 P परावर मासाई मान कर एक 'क' मिन्दु से 'पवन' और दूसरा '' पिन्दु से खग' गोल किया जाय तो मम्य में मछली के माकार का गोल पम बावा। भष मध्य बिन्दु 'भ' से ऐसी एक सम्मी सरस रेखा खींची आय, जो मछली के प्राकार वाले गोल के मम्म में होकर दानों गोल के स्पर्श बिन्दु से बाहर निमसे, पही उधर दचिव रेखा सममना । मानसो कि शंड की छाया तिरपी'' पिन्दु के पास गोल में प्रमश करती है, तो पमिम पिन्दु और 'उ' पिन्दु क पास पार निकलती है, तो 'उ' पूर्व बिन्दु समझना। पीछे र बिन्दु स 'उ' बिन्दु पक सरम रखा खींची चार तो या पूर्वा पर रेखा होती है। पीछे पूर्वयम् 'म' मम्म बिन्दु से उचर पिय रखा सीधना । चौरस भूमि सापन-- समभूमीति वीए वट्टति थट्टकोण कक्कडए । . कूण दुदिमि'चरंगुल मज्मि तिरिय इत्युचउरसे ॥७॥ रिस भूमि सापक पर एफवाय प्रमाय समवस भूमि पर पाठ कोनों पाला त्रिज्या' एक ऐसा एक गोल मनाभो कि कोने के दानों तरफ सत्रा २ भंगुल के एमा पामा एक विरक्षा समपोरसही बाम ॥७॥ यदि एक पाप के विस्तार -बाले गास में मटमांश पनाया बापता प्रत्येक सबा का माप नब अंगुस होगा पौर पर्सम बनाया जाय वो प्रस्पेक सगा का माप सुबह गुप्त होगा। १सर वि पाक - h + IM म , गृह प्रकरणम् (५) अष्टमांश भूमि स्थापना-- चउरंसि कि कि दिसे बारस भागाउ भाग पण मज्झे । कुणेहिं सड्ढ तिय तिय इय जायइ सुद्ध अटुंसं ॥८॥ अष्टमांश भूमि साधन यंत्र ३॥ Lad ३॥ - सम चौरस भूमि की प्रत्येक दिशा में बारह २ भाग करना, इनमें से पांच भाग मध्य में और साढे तीन २ भाग कोने में रखने से शुद्ध अष्टमांश होता है ॥८॥ इस प्रकार का अष्टमांश मंदिरों के और राजमहलों के मंडपों में विशेष करके किया जाता है। अमांश स्थापना h ૫ 7- ॥ m NE है, - 3 भूमि लक्षण फल- दिणतिग बीयप्पसवा चउरंसाऽवम्मिणी' अफुट्टा य । अकल्लर . भू सुहया पुज्वेसाणुत्तरंबुवहा ॥ १ ॥ वम्मइणी वाहिकरी ऊसर भूमीइ हवइ. रोरकरी । अइफुट्टा मिच्चुकरी दुक्खकरी तह य ससल्ला ॥१०॥ जो भूमि बोये हुए बीजों को तीन दिन में उगाने वाली, सम चौरस, दीमक रहित, बिना फटी हुई, शल्य रहित और जिसमें पानी का प्रवाह पूर्व ईशान या उत्तर तरफ जाता हो अर्थात् पूर्व ईशान या उत्तर तरफ नीची हो ऐसी भूमि सुख देने वाली १ या । २ असला।
बारामारे
है
,
फटी
है॥६॥ दीमक वाली माधि कारक है, सारी भूमि निर्धन कारक
ई भूमि मृत्य करने वाली भौर शन्य वासी भूमि दान करने वाली है ॥१०॥
समरांगणस्त्रधार में प्रशस्त भूमि का समय इस प्रकार कहा है कि-
"धर्मागमे हिमस्सा या स्साहुणा हिमागमे ।
प्राप्युप्मा हिमस्पर्शा सा प्रशस्ता पमुन्धरा ।।"
प्रीम शतु में सी, मी तु में गरम और पौमासे में मरम और सी को
भूमि राती हो वा प्रशंसनीय है।
हस्संहिवा में कहा कि-
"शस्तीपपिदमनता मधुरा मुगपा,
खिग्धा समा न मुपिरा प मही नराणाम् ।
अपमान भमविनोदसपागवानो
पचे भिमे
कित शास्त्वमन्दिरेषु ॥
मो भूमि अनेक प्रकार के प्रशसनीय प्रौपपि पर भौर सतामों से सुशोभित
हो तया मधुर सार पाली, प्रकी मुगन्ध पासी, चिकनी, मिना कर पाती हो ऐसी
भूमि मार्म में परिभम को शांत करने पासे मनुप्पों को मानन्द देवी है ऐसी भूमि पर
भमा मकान बनवाकर स्पों नहे।
वास्तुशास्त्र में कहा कि-
"भमसमधुपोषेत्र सन्तोपो जायते भूपि ।
तस्मा कार्य ग सबैरिति गर्गादिसम्भवम् ॥"
मिस भूमि के पर मन और प्रांस सन्तोष हो अर्थात् मिस मूमि को देखने
से उत्साह पो उस भूमि पर पर करना ऐसा गर्ग प्रादि पियों का मत है।
रास्प सोपव विपि-
प्रकचतएहसपना इथ नव वराणा कमेण लिहियन्या ।
पुवाइदिसामु तहा भूमि काऊण नव माए ॥११॥
गृह प्रकरणम् (७) प क उत्तर स च ह ए त अहिमंतिऊण खडियं विहिपुव्वं कन्नाया करे दायो । श्राणाविजइ पराहं परहा इम अक्खरे सल्लं ॥१२॥ जिस भूमि पर मकान आदि बनवाना हो, उसी भूमि में समान नव भाग करें। इन नव मागों में पूर्वादि आठ दिशा और एक मध्य में 'ब क च त ए ह स प और ( जय ) ऐसे नव अक्षर क्रम से लिखें ॥ ११ ॥ शल्य शोधन यंत्र पीछे 'ॐहीं श्रींएँ नमो वाग्वादिनि मम प्रश्ने अवतर २' इसी मंत्र से खड़ी (सफेद मट्टी) मंत्र करके कन्या के | ईशान | पूर्व अग्नि हाथ में देकर कोई प्रश्नाक्षर लिखवाना या बोलवाना । जो ऊपर कहे हुए नव अक्षरों में से कोई एक अक्षर लिखे मध्य | दक्षिण या बोले तो उसी अक्षर वाले भाग में शल्य है ऐसा समझना। यदि उपरोक्त नव अक्षरों में से कोई अक्षर प्रश्न वायव्य पश्चिम | नैर्ऋत्य में न आवे तो शल्य रहित भूमि जानना ॥ १२ ॥ बप्पराहे नरसल्लं सड्ढकरे मिच्चुकारगं पुब्वे । कप्पराहे खरसलं अग्गीए दुकरि निवदंडं ॥१३॥ यदि प्रश्नाक्षर 'घ' आवे तो पूर्व दिशा में घर की भूमि में डेढ़ हाथ नीचे नर शल्य अर्थात् मनुष्य के हाड़ आदि है, यह घर धणी को मरण कारक है। प्रश्नाक्षर में 'क' आवे तो अग्नि कोण में भूमि के भीतर दो हाथ नीचे गधे की हड्डी आदि हैं, यह घर की भूमि में रह जाय तो राज दंड होता है अर्थात् राजां से भय रहे ॥ १३ ॥ जामे चप्पराहेणं नरसल्लं कडितलम्मि मिच्चुकरं । तप्पराहे निरईए सड्ढकरे साणुसल्लु सिसुहाणी ॥ १४ ॥ जो प्रश्नाक्षर में 'च' आवे तो दक्षिण दिशा में गृह भूमि में कटी परावर नीचे मनुष्य का शल्य है, यह गृहस्वामी को मृत्यु कारक है। प्रश्नाक्षर में 'त' भावे ।
पोस्तुसारे -- - " - 11 वो नर्मस्प कोष में भूमि में से हाथ नीषचे का शम्प है यह मालक को हानि कारा है भर्मात् गृहसामी को सन्तान का मुख न हे ॥ १४ ॥ । । पच्छिमदिसि एपराहे सिमुसलं फरदुगम्मि परएसं । वायवि इपगिद्द चउकरि अंगारा मित्तनासयरा ॥१५॥ प्रभापर में यदि 'ए' माये वो पत्रिम दिशा में भूमि में दो हाथ नीचे पासक का शम्प जानना, इसी से गृहस्वामी परदेश हेमर्थात् इसी पर में निवास नहीं कर समता । प्रभाघर में 'भावे तो पायम्भ कोष में भूमि में चार हाप नीचे मारे (कोपले ) है, मा मित्र (समन्धी ) मनुप्प को नारा कारक है ॥१५॥ उत्तरदिसि सप्पराहे दियवरसल्ल कहिम्मि रोरकर ।' पप्पगहे गोसल्लं सड्ढकरे घणविणासमीसाणे ॥ १६ ॥ प्रश्नापर में पदि 'स' माने तो उचर दिशा में भूमि के मीवर कमर परावर नीचे मामय का शम्म मानना, यास बार वो गास्वामी को दखि करता है। पदि प्रभापर में 'प' माने तो ईशान कोण में सहाय नीचे गौ का शरम नानना, यह गापति के पन का नाश कारक है।॥ १६ ॥ ': जप्परहे , मन्झगिहे ,अइच्छार-कवाल-फेस बहुसला। वच्छच्छलप्पमाया पाएण य हुँति मिच्युकरा ॥१७॥ ॥ 'प्रभावर में यदि 'म' भावे को भूमि के मध्य माम में भावी परावर नीचे भविषार, साग पारिपात शल्प मानना पे पर के मासिक को सपकारक है॥१७॥ FIN इन एवमाइ भनिवि जो पुब्बगयाई हुँति सल्लाई ।- से सम्बेवि य सोहिवि वन्छमले कीरए गेई ॥ १८ ॥ मा ITTER TIT TI 1 HT - - (१) गृह प्रकरणम् इस प्रकार जो पहले शल्य कहे हैं वे और दूसरे जो कोई शल्य देखने में आवे उन सबको निकाल कर भूमि को शुद्ध करे, पीछे वत्स वल देखकर मकान बनवावे ॥ १८॥ विश्वकर्म प्रकाश में कहा है कि- "जलान्तं प्रस्तरान्तं वा पुरुषान्तमथापि वा । क्षेत्रं संशोध्य चोद्धृत्य शल्यं सदनमारभेत् ॥” जल तक या पत्थर तक या एक पुरुष प्रमाण खोदकर, शल्य को निकाल कर भूमि को शुद्ध करे, पीछे उस भूमि पर घर बनाना आरम्भ करे। वत्स चक्र- तंजहा-कन्नाइतिगे पुव्वे वच्छो तहा दाहिणे धणाइतिगे। पश्चिमदिसि मीणतिगे मिहुणतिगे उत्तरे हवइ ॥११॥ जब सूर्य कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का तब वत्स का मुख पूर्व दिशा में; धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में मीन, मष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा में मिथुन, कर्फ और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा में रहता है ॥ १६ ॥ जिस दिशा में वत्म का मुख हो उस दिशा में खात प्रतिष्ठा द्वार प्रवेश आदि का कार्य करना शास्त्र में मना है, किन्तु वत्स प्रत्येक दिशा में तीन २ मास रहता तो तीन २ मास तक उक्त कार्य रोकना ठीक नहीं, इसलिये विशेष स्पष्ट रूप से कहते हैं- गिहभूमिसत्तभाए पण-दह-तिहि-तीस-तिहि-दहक्खकमा । इन दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमंकि वच्छठिई ॥२०॥ है २
पानुसारे
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घर की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात २ भाग समान कीजे, इनमें
मम स प्रथम माग पोष दिन, दूसरे में दश, तीसर में पंद्रह, चौथे में पीस, पांच में
पदा, ६E में दश और सातवें
माग में पांच दिन बरस रहा।
सम्मानिस
इसी प्रकार दिन संख्या चारों
पूर्व
ही दिशा में समझ लेना चाहिये
और मिस अंक पर पस्स का शिर
हो उसी के सामने का बराबर
पासाप्रामारी
अंक पर परस की पूछ रहती है इस
प्रकार भत्स की स्थिति ॥२०॥
पूर्व दिशा में सात मादि
म
का कार्य करना उसमें यदि धर्म
कन्या राशि का हो तो प्रथम पांच
दिन तक प्रयम माग में खास
मादि न करे फिन्तु और जगह
मन्या महर्स देखकर कर सकते हैं। उसके भागे दश दिन तक दूसरे भाग को
छोरकर अन्य अगा उक्त कार्य कर सकता है। उसके मागे का पद्रा दिन तीसरे भाग
को खारकर काम कर । यदि तुला राशि का र्य हो सो पूरे तीस दिन मम्म माग
में दार भादि का राम काम नहीं करे। पिक राशि के र्य का प्रथम पंद्रह दिन
पांचा भाग को) मागे का दस दिन पहा माग का भोर मन्तिम पांच दिन सासषी
माग को छोड़कर भन्य नगद काप कर सकता है। इसी प्रकार पारों दिशा क
भाग की दिन संम्पा समम सना पारिप।
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AMEErogr
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थग्गिमयो थाउहरो घणक्खये फुणइ पच्छिमो वच्छो ।
घामो य दाहिणो विय मुहावहो हवद नायब्वो ॥ २१ ॥
गृह प्रकरणमें ( ११ ) सम्मुख वत्स हो तो आयुष्य का नाशकारक है, पश्चिम ( पछिाड़ी) वत्स हो तो धन का क्षय करता है, पांयी ओर या दाहिनी ओर वत्स हो तो सुख- कारक जानना ॥ २१ ॥ प्रयम खात करने के समय शेषनाग चक्र ( राहुचक्र ) को देखते हैं, उसको भी प्रसंगोपात लिखता हूं। इसको विश्वकर्मा ने इस प्रकार बतलाया है- "ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टि गणयेद् विदिक्षु । शेषस्य वास्तोर्मुखमध्यपुच्छ, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ।। प्रथम ईशान कोण से शेषनाग ( राहु ) चलता है । *सृष्टि मार्ग को छोड़ कर विपरीत विदिशा में उसका मुख, मध्य ( नामि ) और पूंछ रहता है अर्थात् ईशान कोण में नाग का मुख, वायव्य कोण में मध्य भाग (पेट) और नैर्ऋत्य कोण में पूंछ रहता है । इन तीनों कोण को छोड़कर चौथा अग्नि कोण जो खाली है, इसमें प्रथम खात करना चाहिये । मुख नाभि और पूंछ के स्थान पर खात करे तो हानिकारक है, दैवज्ञवल्लभ ग्रन्थ में कहा है कि- "शिरः खनेद् मातृपितॄन् निहन्यात् , खनेच्च नामौ भयरोगपीड़ाः । पुच्छ खनेत् खनेत् स्त्रीशुभगोत्रहानिः स्त्रीपुत्ररत्नान्नवसनि शून्ये ॥" - - राजवल्लम में अन्य प्रकार से कहा है- "कन्यादा रवितस्त्रये फणिमुख पूर्वादिसृष्टिक्रमात् ।" अर्थात् सूर्य कन्या श्रादि तीन राशियों में हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा में रहता है । बाद सष्ट क्रम से धन प्रादि तीन राशियों में दक्षिण में, मीन श्रा.द तीन राशियों में पश्चिम में और मिथुन आदि तान राशिमों में उत्तर में नाग का मुख रहता है । "पुर्वास्येऽनिलखातन यममुखे खात शिवे कारयेत् । शीर्षे पश्चिमगे च पहिखननं सौम्ये खनेदु नम्रते ॥" अर्थात् नाग का मुख पूर्व दिशा में हो तब घायुकोण में खात फरना, दक्षिण में मुख हो तब ईशान कोण मे खात करना, पश्चिम में मुस्ख हो तव अग्नि कोण में खात करना और उत्तर में मुख हो तब नैर्ऋत्य कोण में खात करना।
वास्तुसारे यदि प्रयम खात मस्तक पर करे तो माता पिता का विनाश, मध्य माग नामि के सान पर बरे तो रावा मादि का मप और भनेक प्रकार के रोग मादि की पीड़ा हो। पूछ के स्थान पर खात करे तो स्त्री, सौभाग्य और वंश (पुत्रादि) की हानि हो और सासी स्थान पर करे तो स्त्री पुत्र रत्न मम मौर ट्रम्प की प्राप्ति हो। मा शेष नाग पक पनान की रीति इस प्रकार है-मकान मादि मनाने की भूमि के ऊपर परावर समपोरस माठ पाठ कोठे प्रस्पेक दिशा में बनाये अर्थात् पत्र घनावमा पर्य 7 TA E A 5 र सो न 7 य m 7 । 17 र म रक्षित ग ग र सो म उत्तर र तो म म र 3 य ग र A A 7 7 G परिश्रम फत ६४ काठे बनाये । पीछे प्रस्पेक कोठे में रविवार भारिपार सिखे। और प्रतिम काठे में भाप काठ का बार सिखे । पीछे इनमें इस प्रकार नाग की भाकृति पनाये कि शनिवार और मंगलबार के प्रत्येक प्रेठे में सर्य करती हुई मासूम पर, यहाँ २ गृहप्रकरणम् ( १३ ) घर के प्रारम्भ में नाग की आकृति मालूम पड़े अर्थात् जहां २ शनि मंगलवार के कोठे हों वहां खात आदि न करे। नाग के मुख को जानने के लिये मुहूर्त्तचिन्तामणि में इस प्रकार कहा है कि- "देवालये गेहविधौ जलाशये, राहोमुख शंभुदिशो विलोमतः । मीनार्कसिंहामृगार्कतस्त्रिमे, खाते मुखात् पृष्ठविदिक् शुभा भवेत् ॥" देवालय के प्रारम्भ में राहु ( नाग ) का मुख, मीन मेष और वृषभ राशि के सूर्य में ईशान कोण में, मिथुन कर्क और सिंह राशि के सूर्य में वायव्य कोण में, कन्या तुला और वृश्चिक राशि के सूर्य में नैर्ऋत्य कोण में, धन मकर और कुंभ राशि के सूर्य में आग्नेय दिशा में रहता है । राहु (नाग) का मुख, सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान कोण में, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य में वायव्य कोण में, कुंभ मीन और मेष के सूर्य में नैर्ऋत्य कोण में, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य में अग्नि कोण में रहता है। कुत्रां वावड़ी तलाब आदि जलाशय के आरम्भ में राहु का मुख, मकर कुम्भ और मीन के सूर्य में ईशान कोण में, मेष वृष और मिथुन के सूर्य में वायव्य कोण में, फर्क सिंह और कन्या के सूर्य में नैत्य कोण में, तुला वृश्चिक और धन के सूर्य में अग्नि कोण में रहता है। मुख के पिछले भाग में खात करना । मुख ईशान कोण में हो तव उसका पिछला कोण अग्नि कोण में प्रथम खात करना चाहिये । यदि मुख वायव्य कोण में हो तो खात ईशान कोण में, नैर्ऋत्य कोण में मुख हो तो खात वायव्य कोण में और मुख अग्नि कोण में हो तो खात नैर्ऋत्य कोण में करना चाहिये । हीरकलश मुनि ने कहा है कि- "वसहाइ गिणिय वेई चेइअमिणाई गेहसिं हाई । जलमयर दुग्गि कन्ना कम्मेण ईसानकुणलियं ।। विवाह आदि में जो वेदी बनाई जाती है उसके प्रारम्भ में वषम आदि,
पास्तुसारे
त्प (देवालय) के प्रारम्भ में मान मादि, गृहारम में सिंह आदि मलाशय में मकर
पादि भौर कित्ता (गर) के मारम्म में कन्या माहितीन २ संक्रांतिमों में राहु का
मुख ईशान प्रादि विदिशा में विसोम क्रम से रावा है।
पवाग () मुख बामने-
पान कोष
पायापकोय
मैस्म कीय
अग्निसोय
देवाजप
पन, मकर कम
मीन मेप पूष मिथुन कई कन्या हा
सूर्य में गई सिंह के सूर्य में | अधिक सूर्य सर्प में ण
मेरामुख
पर
सिंह कम्पा,
वृश्चित धन
मीन मेप
अप मितुम
रामुम
मुज
बकाशव
मेप पूप, मिथुन कर सिंह, कन्या तुमा परिषद
रामच
रामुप
पदी
मिन र सिर म्या शिष धम मोम मेप
के सूर्य में गाबा के सूर्य में | मकर सर्प में पूर्व में न
पामुख
पिता
पन महर हुम मीन मप धूप | मिथुन कर
रियर के
पूर्व में गद के पूर्व में पंद सिंक सूर्य में
तामुख
रामुख
पारंम में पम पास्तु -
'गापारमझमाइरसशी, रामैो वेदभिरमगादे ।
शूर्प रदै पठपादे सिरस्व, रामर ए भी पापी ॥१॥
गृह प्रकरणम्
। १५)
वृष पास्तु च-
स्थान
नक्षत्र
फल
३
लाभो गमैःपुच्छगैःस्वामिनाशो, वेदन:स्व्यं चामकृक्षौ मुग्वस्थैः ।
रामरीडा संततं चाकधिष्ण्या-दश्वैरुद्रदिग्भिरुक्तं ह्यसत्सत् ॥ २॥"
गृह और प्रासाद आदि के प्रारम्भ में वृषवास्तु चक्र देखना चाहिये । जिस
नक्षत्र पर सूर्य हो उस नक्षत्र से चन्द्रमा के नक्षत्र तक गिनती करना। प्रथम तीन
नक्षत्र वृषभ के शिर पर समझना, इन नक्षत्रों में गृहादिक का प्रारम्भ करे तो अग्नि
का उपद्रव हो। इनके आगे चार नक्षत्र वृषभ के अगले पाँव पर, इन में प्रारम्भ
करे तो मनुष्यों का वास न रहे, शून्य रहे ।
इनके आगे चार नक्षत्र पिछले पाँच पर, इनमें
आरंभ करे तो गृह स्वामी का स्थिर वास रहे ।
इनके आगे तीन नक्षत्र पीठ भाग पर, इनमें मस्तके
अग्निदाह
प्रारंभ करे तो लक्ष्मी की प्राप्ति हो। इनके
आगे चार नक्षत्र दक्षिण कोख (पेट) पर, इनमें
प्रारम्भ करे तो अनेक प्रकार का लाभ और | पृ पादे स्थिरता
शुभ हो । इनके आगे तीन नक्षत्र पूंछ पर,
पृष्ठे
लक्ष्मी प्राप्ति
इनमें प्रारम्म करे तो स्वामी का विनाश हो,
इनके आगे चार नक्षत्र बांयी कोख (पेट) पर,
इनमें आरम्भ करे तो गृह स्वामी को दरिद्र | पुच्छे
स्वामिनाश
बनावे | इनके आगे तीन नक्षत्र मुख पर, इनमें
वा कुक्षी निर्धनता
आरम्भ करे तो निरन्तर कष्ट रहे । सामान्य रूप
से कहा है कि सूर्य नक्षत्र से चन्द्रमा के नक्षत्र
मुखे
पीड़ा
तक गिनना, इनमें प्रथम सात नक्षत्र अशुभ हैं, इनके आगे ग्यारह अर्थात् आठ से
अठारह तक शुम हैं और इनके आगे दश अर्थात् उन्नीस से अट्ठाइस तक के नक्षत्र
अ पादे
४
शून्यता
४
३
द. कुक्षौ
ac
लाम
३
४
३
अशुम हैं।
गृहारमे राशिफल-
धनमीणमिहुणकराणा संकंतीए न कीरए गेहं ।
तुलविच्छियमेसविसे पुव्वावर सेस-सेस दिसे ॥२२॥
पास्तुसारे
घन मीन मिपुन और कम्पा इन गलियों पर संसद पर हा भारंम नहीं
करना पाहिए। तुता परिपक मेप और आप इन चार राशियों में से किसी भी राशि
का सूर्य से समर्म और पमिम दिशा के द्वारपासा पर न पनवाप, चिन्तु दक्षिण
या उपर दिशा के द्वारपाले पर का भाम्म करे । तथा बाकी की राशियों
(, सिंह, मकर और इम)के पर ये दो परपिण मौर रचर दिशा केदार पाना
पर न पनायें, किन्तु पूर्व और पमिम दिशा के मार वान पर का भारम्म रें ।।२२॥
नारद सनि ने बारा राशियों का फस इस प्रकार का है
--
"गृहसंस्थापन सूर्य मेएस्पे शुमर मवेत् ।
सुपस्पे पनादि स्पाइ मिपुने मरथ धाम् ॥
पटे गुमदं प्रोपर्व सिंो मृत्पषिपदनम् ।
कन्या राग सुला सौसम दृषिक पनवर्दनम् ।।
पातु महानि मारे स्पा धनागमः ।
कुंभ चरमस्वामः स्पाद मीने सममपापहम् ।
पर की स्यापमा परि मप गशि के पूर्व में कर वा शुमदायक रेप गणि
के पूर्व में पन पदि कार है मिथुन के पूर्व में निमम स मृत्यु कारकरे, करे
पूर्व में गुपदापक का है, सिंह सूर्य में सेवा नौरों की पदि कारक, काया के
पूर्व में रोगकारा, जुत्ता के रुप में मुसार पिक कर्प में पन विचार,
पन सर्प में महानिकारक मकर पूर्व में पन की प्राप्ति कारक इमक धर्म
में रम का लामा भोर मान के एप मपरायको।
पदारम्मे मास पस-
मोय-यगा मिन्चु-हाणि अत्यं सुन्ने च कलह-उन्नसिये ।
पूपा-संपय यग्गी मुह च चित्ताइमामफलं ॥२३॥
गृह प्रकरणम् (१७) अग्नि भय घर का प्रारम्भ चैत्र मास में करे तो शोक, वैशाख में धन प्राप्ति, ज्येष्ठ में मृत्यु, आषाढ़ में हानि, श्रावण में अर्थ प्राप्ति, भाद्रपद में गृह शून्य, आश्विन में कलह, कार्तिक में उजाड़, मागसिर में पूजा-सन्मान, पौष में सम्पदा प्राप्ति, माघ में और फाल्गुन में किया जाय तो सुखदायक है ॥२३॥ हीरकलश मुनि ने कहा है कि- "कत्तिय-माह-भद्दवे चित्त आसो य जिठ्ठ आसाढे । गिहारम्भ न कीरइ अवरे कल्लाणमंगलं ॥" कार्तिक, माघ, भाद्रपद, चैत्र, आसोज, जेठ और आपाड़ इन सात महिनों में नवीन घर का प्रारम्भ नर करे भौर बाकी के--मार्गशिर, पौष, फाल्गुण, वैशाख और श्रावण इन पांच महीनों में घर का प्रारम्भ करना मंगल-दायक है। - वइसाहे मग्गसिरे सावणि फग्गुणि मयंतरे पोसे । सियपक्खे सुहदिवसे कए गिहे हवइ सुहरिद्धी ॥२४॥ वैशाख, मार्गशिर, श्रावण, फाल्गुण और मतान्तर से पौष भी इन पांच महीनों में शुक्ल पक्ष और अच्छे दिनों में घर का प्रारम्भ करे तो सुख और ऋद्धि की प्राप्ति होती है ।। २४ ।। पीयूषधारा टीका में जगन्मोइन का कहना है कि- "पाषाणेष्टयादिगेहादि निंद्यमासे न कारयेत् । तृणदारुगृहारंभे मासदोषो न विद्यते ॥ पत्थर ईंट आदि के मकान आदि को निंदनीय मास में नहीं करना चाहिये। किन्तु घास लकड़ी आदि के मकान बनाने में मास आदि का दोष नहीं है। १ मुहूर्तचिन्तामणि में लिखा है कि-चैन में मेष, ज्येष्ठ मे वृषभ, भाषा में कर्फ, भादवे में सिंह, भाश्विन में तुला, कार्तिक में पृश्चिक, पौष में मकर भौर माघ में मकर या कुभ का सूर्य हो तब भर का मारम करना भण्या मामा है।
() पास्तुसारे भारम्भ पपत्र फल- सुइलग्गे पदबले खणिज्ज नीमीउ यहोमुहे रिक्खे । उढमुहे नक्खचे चिणिज्ज मुहलग्गि चदवले ॥२५॥ घम सम और चंद्रमा का बच दस र अपामु नपत्रों में लासमा करना तथा एम बम और पद्रमा बसपान देखकर कर्ण सापक नपत्रों में शिक्षा का रोपण करना चाहिये ॥२॥ पीपपारा टीका में मामम्प पि ने पाकि- "प्रभोमसमर्पिदधीत सावं, शिक्षास्सपा पोसवैर परम् । विपरमुखैरिकपाटयान, गृहप्रवेशो मृमिव ।।" मधोमुस नपत्रों में साव करना, कर्षमस मपों में शिक्षा पा पाटना का स्थापन करना, सिपख नपत्रों में द्वार, पाट, सपारी (पान ) पनपाना तपा मूसंपक ( मृगशिर रेवती, चित्रा और मनुराधा ) तथा ध्रुवसंबर (उत्तर- फाल्गुनी, उपरापाड़ा, उचरामाद्रपदा और रोरिसी) नषों में पर में प्रवेश करना । पपनों की भयोमुसायि संमा- सवण-इ-पुस्सुरोहिणि तिउत्तरा-सय-धणिट उद्द्वमुहा । भरणिऽसलेस तिपुब्वा मू-म वि कित्ची श्रहोवयणा ॥२६॥ भवण, भाद्री, पुप्प, रोहिणी, चिराफाम्गुनी, उपरापाड़ा, चराभाद्रपरा, शवमिपा और पनिष्ठा ये नपत्र जम्ममुस सहक है। भरसी, भासपा, पूर्वाफारगुनी पूर्णपारा, पूर्वाभाद्रपदा, मूल, मपा, पिशाला मोर कतिका ये मपत्र प्रपोमुस संहको॥ २६ ॥ भारमसिदि ग्रंप अनुसार नपत्रों की अपोमुखारि संभा--- 'मपोमुखानि पूर्ण स्पभूतारपामपास्तया । मरपीउधिकारापाः सिदय वासादिकर्मणाम् ॥
गृह प्रकरणम् ( १९) तिर्यमुखानि चादित्य मैत्र ज्येष्ठा करत्रयम् । अश्विनी चान्द्रपौष्णानि कृषियात्रादिसिद्धये ॥ ऊर्धास्यास्त्र्युत्तराः पुष्यो रोहिणी श्रवणत्रयम् । आर्द्रा च स्युर्वजछत्राभिषेकतरुकर्मसु ।" पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपदा, मूल, आश्लेषा, मघा, भरणी, कृत्तिका और विशाखा ये नव अधोमुख संज्ञक नक्षत्र खात आदि कार्य की सिद्धि के लिये हैं। पुनर्वसु, अनुराधा, ज्येष्ठा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अश्विनी, मृगशिर और रेवती ये नव तिर्यक्मुख संज्ञक नक्षत्र खेती यात्रा आदि की सिद्धि के लिये हैं। उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपदा, पुष्य, रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और आर्द्रा ये नव ऊर्ध्वमुख संज्ञक नक्षत्र ध्वजा छत्र राज्याभिषेक और वृक्ष-रोपन आदि कार्य के लिये शुभ हैं । नक्षत्रों के शुभाशुभ योग मुहूर्त चिन्तामणि में कहा है कि- "पुष्यध्रुवेन्दुहरिसर्पजलैः सजीवै---स्तद्वासरेण च कृतं सुतराज्यदं स्यात् । द्वीशाश्वितक्षिवसुपाशिशिवैः सथुन-चार सितस्य च गृहं धनधान्यदं स्यात् ॥" पुष्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी, मृगशिरा, श्रवण, आश्लेषा और पूर्वाषाढा इन नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र पर गुरु हो तव, या ये नक्षत्र और गुरुवार के दिन घर का आरम्भ करे तो यह घर पुत्र और राज्य देने वाला होता है। विशाखा, अश्विनी, चित्रा, धनिष्ठा, शतभिषा और आर्द्रा इन नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र पर शुक्र हो तब, या ये नक्षत्र और शुक्रवार हो उस दिन घर का प्रारम्भ करे तो धन और धान्य की प्राप्ति हो । "सारैः करेज्यान्त्यमघाम्बुमूलैः, कौजेहि वेश्माग्नि सुतादितं स्यात् । सज्ञैः कदास्रार्यमतक्षहस्तै-झस्यैव वारे वारे सुखपुत्रदं स्यात् ॥" हस्त, पुष्य, रेवती, मघा, पूर्वापाढा और मूल इन नक्षत्रों पर मंगल हो तब, या ये नक्षत्र और मंगलवार के दिन घर का प्रारम्भ करे तो घर अग्नि से जल जाय और पुत्र को पीड़ा कारक होता है ।
। २०)
मानुसार
रोहिणी, भधिनी, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा और हस्त इन नक्षत्रों पर पुष हो
तम, या ये नपा और पुषवार के दिन पर का पारम्म कर तो सुख कारक भौर
पुषदायक होता है।
"ममैकपादाय शक्रमित्रानिधान्तकः ।
समन्दमन्दधारे स्मात् रपोभूतपुर्व गृहम् ॥"
पूर्वाभाद्रपदा, उचराभाद्रपदा, ज्येष्ठा, अनुराधा, स्वामी और भरसी इन
नपत्रों पर शनि हो बम, या ये नपत्र और शनिवार के दिन घर का भारम करे तो
पर पर राधस और भूव मादि के निवास पासा ।
'अमिनघणगे सर्ये चन्द्र पा संस्थिते यदि ।
निर्मित मंदिर नून ममिना दमतेऽपिरात् ॥"
कृषिका नक्षत्र के उपर सूप या चन्द्रमा को वापर का पारंम करे कोशीम
ही मह पर प्रमि से भस्म हो जाम ।
प्रथम शिक्षा की स्पापमा-
पुज्बुत्तर-नीमतले घिय प्रक्खय-स्यणपंचग ठविउँ ।
सिलानिवेर्स कीरइ सिप्पीण सम्मागणापुब्व ॥२७॥
पूर्व और उचर के मध्य स्थान प्रेस में नीम ( साप ) में प्रथम भी भरत
(पावस ) मोर पार जाति के रस रस करके ( वास्तु पूजन करके), या शिपियों
का सन्मान करके, शिक्षा की स्थापना करनी चाहिये ।।२७।।
भन्प शिम यों में प्रथम शिला की स्थापना प्रमिकोस में या ईशान होल में
करने को भी का।
सात लम विचार-
भिगु लग्गे युहू दममे दिण्यरु लाहे विहफई किंदे ।
जह गिहनीमारंभे ता वरिससयाउयं हवद ॥२८॥
गृह प्रकरणम्
(२१)
शुक्र लग्न में, बुध दशम स्थान में, सूर्य ग्यारहवें स्थान में और बृहस्पति केन्द्र
(१-४-७-१० स्थान ) में हो, ऐसे लग्न में यदि नवीन घर का खात करे तो सौ वर्ष
का आयु उस घर का होता है ॥२८॥
दसमचउत्थे गुरुससि सणिकुजलाहे अलच्छि वरिस असी।
इगति चउ छ मुणि कमसो गुरुसणिभिगुरविबुहम्मि सयं ॥२१॥
दसवें और चौथे स्थान में बृहस्पति और चन्द्रमा हो, तथा ग्यारहवें स्थान में
शनि और मंगल हो, ऐसे लग्न में गृह का आरंभ करे तो उस घर में लक्ष्मी अस्सी
(८०) वर्ष स्थिर रहे । वृहस्पति लग्न में (प्रथम स्थान में ), शनि तीसरे, शुक्र चौथे,
रवि छठे और बुध सातवें स्थान में हो, ऐसे लग्न में आरंभ किये हुए घर में सौ वर्ष
लक्ष्मी स्थिर रहे ॥ २६ ॥
सुक्कुदए रवितइए मंगलि छठे अ पंचमे जीवे ।
इश्र लग्गकए गेहे दो वरिससयाउयं रिद्धी ॥३०॥
शुक्र लग्न में, सूर्य तीसरे, मंगल छठे और गुरु पांचवें स्थान में हो, ऐसे
लग्न में घर का आरंभ किया जाय तो दो सौ वर्ष तक यह घर समृद्धियों
से पूर्ण रहे ॥ ३०॥
सगिहत्थो ससि लग्गे गुरुकिदे बलजुयो सुविद्धिकरो।
कूरठ्ठम-अहसुहा सोमा मज्झिम गिहारंभे ॥३१॥
स्वगृही चंद्रमा लग्न में हो अर्थात् कर्क राशि का चंद्रमा लग्नमें हो और
वृहस्पति केन्द्र ( १-४-७-१० स्थान ) में बलवान होकर रहा हो, ऐसे लग्न के समय
घरका आरंभ करे तो उस घर की प्रतिदिन वृद्धि हुआ करे । गृहारंभ के समय
लम से आठवें स्थान में क्रूर ग्रह हो तो वहुत अशुभ कारक है और सौम्यग्रह हो
तो मध्यम है।॥ ३१ ॥
पास्तुसारे इक्केवि गहे णिच्छह परगेहि परंसि सत्त-चारसमे । गिहसामिवराणनाहे थवले परहत्यि होइ गिह ॥३२॥ पदि कोई मी एक प्रा नीच स्थान का, शत्रु स्पान का या शके नाशक का होकर सात स्थान में या पारा स्थान में सोचा गृहपति के वर्षका सामी निर्मम हो, ऐसे समय में प्रारंम किया हुआ पर दूसरे शाके हाय में निमपसे चला जाता है॥३२॥ गरपति पर्णपति- भण मुक्कविहफह रविकुज-खत्तिय मयथवइसो थ। धुहु सुर मिच्छमणितमु गिहसामियवराणनाह इमे ॥३३॥ प्रापय पर्ष के स्वामी शुक्र मौर बास्ससि, अत्रिय वर्ष के स्वामी रवि और मंगल, वैश्य पर्यत सामी चन्द्रमा, शव पर्प का स्वामी बुष वा मोप पर्स के स्वामी शनि और राहु । गृहस्वामी के पर्व के स्वामी २ ॥३३॥ या प्रमेरा विचार- सयलसुहजोयलग्गे नीमारमे य गिहपवेसे अ । जह थट्ठमो थ फो थवस्स गिहसामि मारेइ ॥३४॥ सात के मार्रम के समप और नवीन गृह प्रवेश (पर में प्रवेश ) परते समप सम में समस्त एम योग शेने पर भी भाठवें स्थान में यदि कर प्रा हो सो पर सामी का मारप बिनारा होता है ॥२४॥ चित्त श्रणुराह तिउत्तर रेवह मिय-रोहिणी थ विदिकरो । मूल-दा यसलेसा जिट्ठा-पुच विणासह ॥३५॥ पित्रा, मणरापा, उचराफाम्गुनी, उत्तरापादा, उचगमाद्रपदा, पती, मृगशिर भौर रोहिणी इन नपत्रों में पर का मारम पा पर में प्रवेश करे पोरादि
गृह प्रकरणम्
( २३ )
कारक है । मूल, आर्द्रा, आश्लेषा ज्येष्ठा इन नक्षत्रों में गृहारंभ या गृह प्रवेश करे
तो पुत्र का विनाश करे ॥३५॥
पुवतिगं महभरणी गिहसामिवहं विसाहत्थीनास।
कित्तिय अग्गि समत्ते गिहप्पवेसे अ ठिइ समए ॥३६॥
यदि घरका प्रारंभ तथा घर में प्रवेश तीनो पूर्वा ( पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा,
पूर्वाभाद्रपदा ), मघा और भरणी इन नक्षत्रों में करे तो घर के स्वामी का विनाश
हो । विशाखा नक्षत्र में करे तो स्त्री का विनाश हो और कृत्तिका नक्षत्र में करे
वो अग्नि का भय हो ||३६।।
तिहिरित्त वारकुजरवि चरलग्ग विरुद्धजो दिणचंदं ।
वजिज गिहपवेसे सेसा तिहि-वार-लग्ग-सुहा ॥३७॥
रिक्ता तिथि, मंगल या रविवार, चर लग्न ( मेष कर्क तुला और मकर
लग्न), कंटकादि विरुद्ध योग, क्षिण चन्द्रमा या नीच का या क्ररग्रह युक्त चन्द्रमा
ये सब घर में प्रवेश करने में या प्रारंभ में छोड़ देना चाहिये । इनसे दूसरे बाकी
के तिथि वार लग्न शुभ हैं ॥३७||
किंदुदुडंतकूरा असुहा तिछगारहा सुहा भणिया ।
किंदुतिकोणतिलाहे सुहया सोमा समा सेसे ॥३८॥
यदि करग्रह केन्द्र (१-४-७-१० ) स्थान में, तथा दूसरे आठवें या बारहवें
स्थान में हो तो अशुभ फलदायक हैं। किन्तु तीसरे छठे या ग्यारहवें स्थान
में हो तो शुभ फल दायक हैं । शुभग्रह केन्द्र (१-४-७-१०) स्थान में,
त्रिकोण ( नवम-पंचम ) स्थान में, तीसरे या ग्यारहवें स्थान में हो तो शुभ कारक
हैं, किन्तु बाकि के ( २-६-८-१२) स्थान में हो तो समान फलदायक हैं ॥३८॥
(४) पास्तुसारे पामरेय पा प्रारंभ में उमाएममा - पार मम्यम १५७-101.0१२ सोम १७-१-४२११ ८-२-६ १२ मंगल १-४.०१.२-०-१५ २१-८-१२ २६८१२ समि १५-१-२-२-१२ . २०-२८ १२ ग्रहों की - सूरगिहत्यो गिहिणी चंदो घणं सुक्कु सुरगुरु सुक्खं । जो सपनु तस्स भावो सपलु भवे नत्यि संदेहो ॥३॥ पूर्व गृहस्थ, चन्द्रमा गहिणी (सी), शुक्र पन और पास्पति मुन है। इन में भो पसवान प्रह हो पर उनके मात्रों का अधिक फल देता है। इसमें सदेह नहीं गृह प्रकरणम् ( २५ ) है। अर्थात् सूर्य बलवान् हो तो घर के स्वामी को और चन्द्रमा बलवान् हो तो स्त्री को फलदायक है। शुक्र बलवान हो तो धन और गुरु बलवान् हो तो सुख देता है ॥३६॥ राजा श्रादि के पांच प्रकार के घरों का मान- राया सेणाहिवई अमच्च-जुवराय-अणुज-रराणीणं । नेमित्तिय-विज्जाण य पुरोहियाण इह पंचगिहा ॥४०॥ एगसयं अट्टहियं चउसट्ठि सठ्ठि असी अ चालीसं । तीसं चालीसतिगं कमेण करसंखवित्थारा ॥४१॥ थड छह चउ छह चउ छह चउ चउ चउ हीण्या कमेणेव । मूलगिहवित्थरायो सेसाण गिहाण वित्थारा ॥४२॥ चउ छच्च अट्ठ तिय तिय ग्रह छ छ छ भागजुत्त वित्थरयो। सेस गिहाण य कमसो माणं दीहत्तणे नेयं ॥४३॥ राजा, सेनापति, मंत्री (प्रधान ), युवराज, अनुज (छोटा भाई-सामंत ), राणी, नैमित्तिक (ज्योतिपी), वैद्य और पुरोहित, इन प्रत्येक के उत्तम, मध्यम, विमध्यम, जघन्य और अतिजघन्य आदि भेदों से पांच पांच प्रकार के गृह बनते हैं। उनके उत्तम गृहों का विस्तार क्रमश:-१०८, ६४, ६०,८०, ४०, ३०, ४०, ४०, और ४० हाथ प्रमाण है । और इन प्रत्येक में से ८, ६, ४, ६, ४, ६, ४, ४, और ४ हाथ क्रम से बार बार घटाया नाय तो मध्यम विमध्यम, कनिष्ठ और अति कनिष्ठ घर का विस्तार बन जाता है । यह विस्तार सब मुख्य गृह का समझना चाहिये } तथा विस्तार का चौथा, छट्ठा, अाठवां, तीसरा, तीसरा, आठवां, छट्ठा, छट्ठा और छट्ठा भाग क्रम से विस्तार में जोड़ देवें, तो सब गृहों की लंबाई का प्रमाण हो जाता है ॥४० से ४३॥
पास्तसारे या मादि पांच प्रभाबममाम 4- संख्या माप हाप राना सेना पति मंभी युवराज भनुन बी मिति वैयपुरोहित ८० ४. चमविस्तार १०८/१५ ४. १ सबार १४११०१११३५८१-१५MATH |४२ 2 मम्प- बिस्वा १००/५ २४ म चाई |१९५७-१५ विम | विस्तार २५२ |१८ IR पमा कमाई १५ १६-१२-१६२RI १५ IR ३२ ३२ निध विस्तार ५ १२ एस १२ २८ २० 2 dat |१.४१ ५५ २-14 202" |१३ १२/१२-१/११-१११२५ भजविस्तार... २४ २४ १ र १२/०१५ १२ ८ पापोंडे माग- वरणचउफगिहेसु बत्तीस कराइ-वित्थरो भणियो। चत्र पर हीणो कमसो जा सोलस घंतजाईणं ॥४॥ दसमंस थर्मस सडस-चउरंस वित्थरस्सहियं । दीद सज्वगिहाण य दिय-खचिप-बहस-मुदाण ॥४५॥ प्रयम ३२ हप के विस्तारपाते मामण क घर में से पार २ सोप्ता बाप दक पटामो वा क्रमशः पप्रिपरम, शद्र पार असम के पर का विस्तार होता है। पर्याद मामय क पर का विस्तार ३२ाय, पप्रिय माति के पर का गृह प्रकरणम् ( २७ ) - विस्तार २८ हाथ, वैश्य जाति के घर का विस्तार २४ हाथ, शूद्र जाति के घर का विस्तार २० हाथ और अंत्यज के घर का विस्तार १६ हाथ है । इन वर्गों के घरों के विस्तार का दशवां. आठवां, छछा और चौथा भाग क्रम से विस्तार में जोड देवें तो सब घरों की लंबाई हो जाती है । अर्थात् ब्राह्मण के घर के विस्तार का दशवां भाग ३ हाथ और ४॥ अंगुल जोड़ देवें तो ३५ हाथ और ४॥ अंगुल ब्राह्मण के घर की लंबाई हुई । इसी प्रकार सब समझ लेना चाहिये । विशेष यंत्र से जानना ॥४४-४५॥ चारों वर्ण के घरों का मान यंत्र- ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य शूद्र अंत्यज विस्तार ३२ २८ २४ २० लंबाई | ३५-४॥३१-१२ २८ २५ २० घर के उदय का प्रमाण समरांगण में कहा है कि- "विस्तारात् पोडशो भागश्चतुर्हस्तसमन्वितः । तलोच्छ्यः प्रशस्तोऽयं भवेद् विदितवेश्मनाम् ।। सप्तहस्तो भवेज्ज्येष्ठे मध्यमे षद् करोन्मितः । पञ्चहस्तः कनिष्ठे तु विधातव्यस्तथोदयः॥ घर के विस्तार के सोलहवें भाग में चार हाथ जोड़ देने से जो संख्या हो, उतनी प्रथम तल की ऊंचाई करना अच्छा है । अथवा घर का उदय सात हाथ हों तो ज्येष्ठ मान का, छह हाथ हो तो मध्यम मान का और पांच हाथ हों तो कनिष्ठ मान का उदय जानना।
वास्तुसार मुस्स पर और भलिब की पहिचाम- ज दीहवित्थराई भणिय त सयल मूलगिहमाणं । सेसमलिदं जाणइ जहत्थियं ज बहीकम्मं ॥४६॥ योवरयसालकक्खो चराईय मूलगिहमिणं सब्वं । श्रह मूलसालमज्मे ज वट्टह तं च मूलगिह ॥४७॥ मकान की बो संगाई और विस्तार कहा है, यह सप पुस्प पर का माप समझना चाहिये । बाकी मो द्वार के पार माग में दालान मादि हो यह सब मलिंद समझना पाहिये। दीवार के मीतर पहशाला (सरप शाना ) और रूपा शाला (मुरुप ग्राला के पगल की शाता ) मादि सन मूल पर बानना अर्यात् मूलशामा के मम्म में नो हों पे सप मूस पर ही मानना पारिये ॥४६-१७॥ . मलिंद का प्रमाण- श्रगुलसचहियसयं उदए गम्भे य हवद पणसीई । गणियाणुसारिदीहे इक्किकगईइ इथ परिमाण ॥४८॥ उदय ( ऊंचाई ) में एक सौ सास भगुल, गर्म में पिपासी गुप्त और क्षेत्र निवना ही लगाई में यह प्रत्येक प्रसिद्ध का माप समझना चाहिये ।।४।। शासा और भक्ति का प्रमाण राजपत्रम में कहा है कि--- "मासे मप्ततिरस्ववियुस्ते, शालामानमिदं मनुमक्ते । पत्रिंशवनरपि सस्मिन्, मानसशन्ति सपोरिति मृदा ।। पर का विस्तार निवने सप का हो, उसमें ७० हाय बोर कर पोदर स माग दा, बा सम्मि माये रखने हाय का शाला का विस्तार करना चाहिये । शाला का विस्तार मिटने हाय का हो, उसमें ३५ नोर कर पौदा से माग दो, नो सम्मि मापे रखने बाप का प्रतिद का विस्तार करना ।
गृह प्रकरणम् ( २६ ) - समरांगण सूत्रधार में कहा है कि- "शालाव्यासा तोऽलिन्दः सर्वेपामपि वेश्मनाम् ।" शाला के विस्तार से आधा अलिंद का विस्तार समस्त घरों में समझना चाहिये । गज ( हाथ ) का स्वरूप- पव्वंगुलि चउवीसहिं छत्तीसिं करंगुलेहिं कविया । अट्ठहिं जवमज्झेहिं पव्वंगुलु इक्कु जाणेह ॥४॥ चौवीस पर्व अंगुलियों से या छत्तीस कर अंगुलियों से एक कंबिया ( गज-२४ इंच ) होता है । पाठ यवोदर से एक पर्व अंगुल होता है ॥ ४६ ॥ पासाय-रायमंदिर-तडाग-पायार-वत्थभूमी य । इन कंबीहिं गणिज्जइ गिहसामिकरहिं गिहवत्थू ॥५०॥ देवमंदिर, राजमहल, तालाव, प्राकार (किला ) और वस्त्र इनकी भूमि आदि का मान कविया ( गज ) से करें । तथा सामान्य लोग अपने मकान का नाप अपने हाथ से करें ॥ ५० ॥ अन्य समरांगण सूत्रधार आदि ग्रन्थों में गज तीन प्रकार के माने हैं- आठ यवोदर का एक अंगुल, ऐसे चौवीस अंगुल का एक गज, यह ज्येष्ठ गज १ । सात यवोदर का एक अंगुल, ऐसे चौबीस अंगुल का एक गज, यह मध्यम गज २ । छह यवोदर का एक अंगुल, ऐसे चौवीस अंगुल का एक गज, यह कनिष्ठ गज ३ । इसमें तीन २ अंगुल पर एक २ पर्वरेखा करने से आठ पर्वरेखा होती हैं । चौथी पर्व- रेखा पर आधा गज होता है। प्रत्येक पर्वरेखा पर फूल का चिन्ह करना चाहिये । गज के मध्य भाग से आगे की पांचवीं अंगुल का दो भाग, आठवीं अंगुल का तीन भाग और बारहवीं अगुल्ल का चार भाग करना चाहिये । गज के नव देवता के नाम- "रुद्रो वायुर्विश्वकर्मा हुताशो, ब्रह्मा कालस्तोयपः सोमविष्णू । " गज के अग्र भाग का देवता रुद्र, प्रथम फूल का देव वायु, दूसरे फूल का देव विश्वकर्मा, तीसरे फूल का देव अग्नि, चौथे फूल का देव ब्रह्मा, पांचवें फल का पाससारे प्रकार देव यम, मंडे श्ल का देव बरूय, सातवें फल का देव सोम और भाठमें फल का देश विष्णुहै। इनको गा के प्रश्न माग से लेकर प्रस्मेक परेसा पर स्थापन करना। इनमें से कोई भी एक देष शिल्पी के हाथ से गब उठाते समय दर बार तो अनेक माम फस को देनेवाला होता है। इसलिये नवीन पर प्रादि का मारंभ करते समय सूत्रधार को गाके दो फलों के मम्म माग से ही उठाना चाहिये । गब सपवे समय यदि हाप से गिर माय सो कार्य में विप्न होता है। गव को प्रपम ममा मौर ममि देव के मम्म माग स उठाये वो पुत्र का साम मौर कार्य की सिद्धि हो । प्रमा और यम देवरे मम्म माग से उगवे तो शिम्पनर न विनाश हो । विपकर्मा और अग्नि देव के मम्म माग से पठापे तो कार्य प्रती तर पूर्वो। मम और परुम देव मम भाग से ठपये तो मध्यम फल दापक है। वायु और विपकी देर के मम्म माग से उसमे वो सब वह इप्सित फस दायक हो। पर और सोम देव के मध्य माग से धारण करे तो मम्पम फर दायको रुद्र और षायुदेव के मध्यम भाम से ग्ावे तो धन की प्राप्ति मौर कार्य की सिद्धि हो इसमे संदेह नहीं । विण और सोमदेष के मम माग से उठाये तो अनेक प्रकार की मुख समृद्धि प्राप्त हो। शिल्पी के योम्म माठ प्रकार के सूख- "वार प्टिनरस्तमौलं, फासिक स्मादयसम्पसमाम् । काठं पसरापास्ममतो बिखेरप-मिस्परसमाथि पदम्ति तजाः ॥" पत्र को खाननेवालों ने माठ प्रकार के स्त्र माने -अपम घटिया , गज (आप) २, तीसरा मुम की गेरी, चौपा सत कारा ४, पॉपर्वा भवसम हा गुनिमा ( काठकोना ) ६, सात सापणी (खेल)७ और पाठयों विक्षेप (प्रकार ) ये माठ प्रकार के सूत्र शिम्मी के।। भायमान- गिहसामिणो करेणं मिचिविणा मिणम वित्यरं दीई । गुणि थछेहि विहत्तं सेस धयाई भवे थाया ॥५१॥ बना ()ी। - रुद्र विवकर्मा असि सोम ia ब्रह्मा काल वरुण * १२ १३ १४ १५ १६ ७ १८ १९ २० S २१ २२ २३ २४ २.न. ८ प्रकार . पारली रसूतका रोरा MIRAINS VOOD Mal M नासत ७ साधणी पार प्रकार के दृष्टिसूत्र- ६ कारकोना-गोणीया TT ५अवलब सवत मुंज की डोरी
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गृह प्रकरणम् (३१) चारों तरफ खात ( नीम ) की भूमि को अर्थात् दीवार करने की भूमि को छोड़कर मध्य में जो लबी और चौड़ी भूमि हो, उसको अपने घर के स्वामी के हाथ से नाप कर जो लंबाई चौड़ाई आवे, उन दोनों का परस्पर गुणा करने से भूमि का क्षेत्रफल हो जाता है। पीछे इस क्षेत्रफल को आठ से भाग देना, जो शेष बचे वह ध्वज आदि प्राय जानना । राजवल्लभ में कहा है कि- "मध्ये पर्यकासने मंदिरे च, देवागारे मण्डपे भित्तिवाद्ये ॥" अर्थात् पलंग श्रासन और घर इनमें मध्य भूमि को नाप कर आय लाना । किन्तु देवमंदिर और मंडप में दीवार करने की भूमि सहित नाप कर आय लाना ॥ ५१ ॥ आठ भाय के नाम- धय-धूम-सीह-साणा विस-खर-गय-धंख अट्ट बाय इमे । पूज्वाइ-धयाइ-ठिई फलं च नामाणुसारेण ॥५२॥ ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, घृष, खर, गज और ध्वांक्ष ये आठ श्राय हैं । चे पूर्वादि दिशा में सृष्टि क्रम से अर्थात् पूर्व में ध्वज, अग्निकोण में धूम्र, दक्षिण में सिंह इत्यादि क्रम से रखें । वे उनके नाम के सदृश फलदायक हैं । अर्थात् विषम आय-ध्वज सिंह, वृष और गज ये श्रेष्ठ हैं और समाय-धूम्र, श्वान, खर और ध्वांक्ष ये अशुभ हैं ॥ ५२॥ प्राय चक्र- संख्या १ २ ३ ६ ८ आया ध्वज धूम्र सिंह | श्वान वृप खर गज चांक्ष दिशा पूर्व अग्नि | दक्षिण नैर्ऋत्य | पश्चिम वायव्य उत्तर ईशान
पाससारे
-
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भाप पर से द्वार की समझ पीयपधारा टोका में कहा है कि-
"सर्वधार हपयो पस्पादिम्दार पहिता हरिः ।
प्राग्वारोपमो गमो समसुरे-शाशाखा स्मासुमः
वन मास भावे सो पूर्वादि पारों दिशा में हार रख सकते हैं । सिंह भाप
भाषे वो पमिम दिशा को छोर कर पूर्व दपिण और उचर इन तीन दिशा में
मार रक्लें । पम भाप पाषे सा पूर्व दिशा में द्वार रक्खें और गम भाप मागे
तो पूर्ण और दक्षिण दिशा में हार रखें।
एक बाप के ठिकान दूसरा कोई पाप मा सकता है या नहीं। इसका
सुखासा भारंमसिदि में इस प्रकार किया है-
"मा पदे सिंहस्प वो गभस्म पृपस्प है।
एवं निवेशमईन्ति स्वतोऽपत्र पस्तु न ।
समस्त प्राय क स्थानों में मन प्राय दे सकते हैं। तया सिंह प्राय के
स्थान में घम भाप, गम भाप के स्थान में पन, और सिंह ये दानों में से कोई
भाप और पप भाप के स्थान में यम, सिंह और गज ये वीनों में सकाई माप
मा सकता है। पर्यात् सिंह भाप मिस स्पान में देने का उसी स्थान में सिं
भाप के ममाव में यन भाय मी दे सकते हैं, इसी प्रकार एक कममाव में
इसरे माय स्थापन कर सकस ! किन्तु प भाय भपने स्पान स सर माप के
स्थान में नहीं देना चाहिये । पर्याद प भाय प भाप के स्थान में ही देना चाहिये।
न २ टिमने कौन २ पाप ऐमा पह पलाते है-
विप्पे घयाउ दिज्जा खित्ते सीहाउ वदसि वसहाथो ।
सुद्दे श्र कुंजराथो घखाउ मुणीण नायव्वं ॥५३॥
मामण के पर में पम भाप, पप्रिय न घर में सिंह माय, पैश्य के पर
मैं पृपम भाय, शव के पर में गा माप और पनि ( सन्यासी ) के मामम में पांच
माय सेना चाहिये ॥५॥
गृहप्रकरणम् 1 २५) धय-गय-सीहं दिजा संते ठाणे धो असव्वत्थ । गय-पंचाणण-वसहा खेडय तह कव्वडाईसु ॥५४॥ ध्वज, गज और सिंह ये तीनों आय उत्सम स्थानों में, ध्वज श्राय सब जगह, गज सिंह और वृष ये तीनों प्राय गांव किला आदि स्थानों में देना चाहिये ॥५४॥ वावी-कूव-तडागे सयणे अ गयो अग्रासणे सीहो । वसहो भोत्रणपत्ते छत्तालंवे धो सिहो ॥५५॥ बावड़ी, कूत्रां, तालाव, और शयन ( शय्या ) इन स्थानों में गज प्राय श्रेष्ठ । सिंहासनादि आसन में सिंह श्राय श्रेष्ठ है। भोजन के पात्र में वृष आय और छत्र तोरण आदि में ध्वज आय श्रेष्ठ है । विस-कुंजर-सीहाया नयरे पासाय-सव्वगेहेसु । साणं मिच्छाईसुं धंखं कारु अगिहाईसु ॥५६॥ वृष गज और सिंह ये तीनों आय नगर, प्रासाद (देवमंदिर या राजमहल) और सब प्रकार के घर इन स्थानों में देना चाहिये । श्वान श्रआय म्लेच्छ श्रादि के घरों में और ध्वाक्ष आय अगृहादि ( तपस्वियों के स्थान उपाश्रय-मठ झोपड़ी श्रादि) में देना चाहिये ॥५६॥ धूमं रसोइठाणे तहेव गेहेसु वरािहजीवाणं । रासहु विसाणगिहे धय-गय-सीहाउ रायहरे ॥५७॥ भोजन पकाने के स्थान में तथा अग्नि से आजीविका करनेवाले के घरों में धूम्र श्राय देना चाहिये । वेश्या के घर में खर आय देना चाहिये । राजमहल में चज गज भौर सिंह श्राय देना अच्छा है ॥५७॥ पर के नक्षत्र का ज्ञान- दीहं वित्थरगुणियं जं जायइ मूलरासि तं नेयं । अट्ठगुणं उडुभत्तं गिहनक्खत्तं हवइ सेसं ॥५॥ ५ पातुसारे पर बनाने की भूमि की सगाई और पौराई का गुणाकार करे, मो गुबन फस मावे उसको घरका ममराशि (पेत्रफल ) मानना । पीबेइस पेत्रफल को पाठ से गुणा करके सचाइस धे माग , मो शेष बचे या पर कानपत्र होता है l पर के राशिकार- गिहरिक्खं वउगुणिर्थ नवमत्त लड मुत्तरासीयो। गिहरासि सामिरासी सह हदु दुवालसं थसुई ॥५६॥ परनपत्र को चार से गुणा कर नौ से माग दो, मा पम्पि भावे मा पर की सस्वराशि समझना चाहिये । यह पर की सुषवराशि मौर पर के स्वामी की राधि परस्पर क्ट्ठी और माठनी दो या सरी और पाररानी मा पो भयम है ॥५६।। पास्तुशाब में परिभाव इस प्रश्रर कहा- "अभिम्पादिवर्म मप सिंह प्रोक्तं मधात्रयम् । मुसावित्रिवर्ष पापे शेपमेषु इय मम् ।।" मपिनी मादि तीन नचा मारापिके, मषा मारिवीन नपत्र सिंहगशि क मौर मूल मारि तीन नक्षत्र धनराशि के हैं । अन्य नौ राशियों के दो दो नपर पावशास्त्र में नषत्र के चरण मेद से राशि नहीं मानी है। विशप नीच के गएराशि यंत्र में देखो। परराशि :- मेष १ प २ मिनसिं ५ पिन मपम एमान १ इमाम कप महिना रोदि मादा पुष्प | मपा विरापा शतभिचा मूल मवय, पा मा. मास मरपी मुमशिर पुर्य पूर्वाफामा रवा पनि पमा रेवती प्रचित . पतराफर . . . पाडा गृह प्रकरणम् ( ३५ ) व्यय का ज्ञान- वसुभत्तरिक्खसेसं वयं तिहा जक्ख-रक्खस-पिसाया । आउग्रंकाउ कमसो हीणाहियसमं मुणेयव्वं ॥६॥ घर के नक्षत्र की संख्या को आठ से भाग देना, जो शेप बचे यह व्यय जानना । यह व्यय यक्ष राक्षम और पिशाच ये तीन प्रकार के हैं। प्राय की संख्या व्यय की संख्या कम हो तो यक्ष व्यय, अधिक हो तो राक्षम व्यय और वरावर हो तो पिशाच व्यय समझना ॥६०॥ से ध्यय का फल- जक्खरयो विद्धिकरो धणनासं कुणइ रक्खमवयो य । मज्झिमवयो पिसायो तह य जमंसं च वज्जिज्जा ॥६॥ यदि घर का यक्ष व्यय हो तो धन धान्यादि की वृद्धि करनेवाला है । राक्षम व्यय हो तो धन धान्यादि का नाश करनेगला है और पिशाच व्यय हो तो मध्यम है । तथा नीचे बतलाये हुए त्रण अंशों में से यमअंश को छोड़ देना चाहिये ॥६१।। भश का ज्ञान- मूलरासिस्स अंकं गिहनामक्खरवयंकसंजुत्तं । तिविहुत्तु सेस अंसा 'इदंस-जमंस-रायंसा ॥६२॥ घर की मूलराशि (क्षेत्र फल) की संख्या, ध्रुवादि घर के नामाक्षर अंक और व्यय संख्या इन तीनों को मिला कर तीन से भाग देना, जो शेष रहे यह अंश जानना । यदि एक शेष रहे तो इन्द्रांश, दो शेष रहे तो यमांश मौर शून्य शेष रहे तो राजांश जानना चाहिये ॥२॥ घर के सारे का ज्ञान- गेहभसामिभपिंडं नवभत्तं सेस छ चउ नव सुहया । मझिम दुग इग अट्ठा ति पंच सत्तहमा तारा ॥६३॥ रंपमाप तपस्यों' इति पारे ।
(A) पास्तुसारे पर रेनषत्र से घर के स्वामी के नपत्र व गिने, गो सल्या मारे उसको नौ से भाग दे, मो शेप से यह वारा समझना । इन तारामों में क्ट्ठी, पौषी और नवीं वारा हम है। दूसरी, पाली और पाठवीं पारा मध्यम है। तीसरी पांचवीं और सावी नारा अपम है ॥६॥ मायादि वानने के लिए उदाहरण- मैसे पर पनाने की भूमि ७ हाप और अंगुन सपी तपा ५ हाय और ७ अगुल चौड़ी है। इन दोनों के भगत पनान के लिये हाप को २४ से गुगा कर भंगुप्त मिला दो वो ७४२५% १८+६=१७७ प्रगुत की सबाई और ५४२४-१२०१७-१२७ मंगुल की चौड़ाई हुई । इन दोनों अंगुतात्मक संवाई चौड़ाई को गुमा किया तो १७७४१२७-२२४७६ या पेत्रफडमा। इसको पाठ से माग दिया वो २२४७६-८ वो शेष सात रोगे । या सातवां गब भाग हुमा । अब घर का नपत्र पाने के लिये क्षेत्रफल को पाठ से गुणा किला वो २२४७६४८ - १७६८३२ गुबनफस हमा, इसको २७ से भाग दिया १७६८३२ + २७ तो शेप बारह बजे, यह अभिनी मादि से गिनने से पारयां उसराफाम्गुनी मपत्र एमा। भब पर की सक्त राशि जानने के लिये नवा उत्तराफाल्गुनी पारावारे सो १२ को ४ से गुमा किया तो ४८ हुए, इन 8 से भाग दिया वो सम्मि ५ भाई, या पानी सिंह राशि हुई। यह नियम सर्वप्र मागु नहीं होता, इसलिये गृहराशि का मेरे मनुसार राशि समझना चाहिये । प्पम बानने के लिये-पर का नपत्र उचराफाम्गुनी पारागा, इसलिये १२ से माठ से माम दिमा १२+ वो रोग परे। मा मात्र ७ से कम है, इसलिये पप म्पमतमा प्रया। मंश मानने के लिये-परका क्षेत्रफल २२४७ में बिस माति का पर हो उसके पर्व के भबर घोर दो, मान लो कि विबम माविका पर वो इसके पर्यापर के अंकपए, पा और ग्पम के अंक ४ मिला दिये शो २२५८६ हुए, इनको वीन से माग दिया वो ऐप १पसा है, इसलिये पर का भंग इन्द्राय मा ।
गृह प्रकरणम् १७) तारा जानने के लिये घर का नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी है और मालिक का नक्षत्र रेवती है। इसलिये उत्तराफाल्गुनी से रेवती तक गीनने से १६ संख्या होती है, इसको ह से भाग दिया तो शेष ७ बचे, इसलिये सातवीं तारा हुई । आयादिक का अपवाद विश्वकर्मप्रकाश में कहा है कि- "एकादशयवादूर्ध्व यावद् द्वात्रिंशहस्तकम् । तावदायादिकं चिन्त्यं तर्ख नैव चिन्तयत् ।। आयव्ययौ मासशुद्धिं न जीर्णे चिन्तयेद् गृहे ।" जिस घर की लंबाई ग्यारह यव से अधिक बत्तीस हाय तक हो तो उसमें माय व्यय आदि का विचार करना चाहिये । परन्तु बत्तीस हाथ से अधिक लंबाई वाला घर हो तो उसमें प्राय आदि का विचार नही करना चाहिये । तथा जीर्ण घर के उद्धार के समय भी आय व्यय और मास शुद्धि आदि का विचार नहीं करना चाहिये। मुहूर्तमार्तण्ड में भी कहा है कि- "द्वात्रिंशाधिकहस्तमब्धिवदनं तार्ण त्वलिन्दादिकं । नैवायादिकमीरितं तृणगृहं सर्वेषु मास्सूदितम् ॥" जो घर बत्तीस हाथ से अधिक बड़ा हो, चार द्वारवाला हो, घास का पर हो तथा अलिंद नियूंह (मादल ) इत्यादि ठिकाने प्राय आदि का विचार न करें । तृण का घर तो सब महीनों में बना सकते हैं। घर के साथ मालिक का शुभाशुभ लेन देन का विचार- जह कराणावरपीई गणिज्जए तह य सामियगिहाण । जोणि-गण-रासिपमुहा 'नाडीवेहो य गणियव्वो॥६॥ जैसे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या और वर के आपस में प्रेम भाव का मिलान किया जाता है। उसी प्रकार घर और घर के स्वामी के लेन देन आदि का विचार, योनि गण राशि और नाडी वेध द्वारा अवश्य करना चाहिये ॥६४॥ .'तजाणहजोइसामो भ' इति पाठान्तरे । १ योनि गण राशि नाडीवेध इत्यादि का खुलासा प्रतिष्ठा संबंधी मुहूर्त के परिशिप में देखो - वास्तुसारे पीमापा- थोवरय 'नाम साला जेणेग दुमाल भरणए गेह । गइनामं च थलिंदो हग दुतिलिंदोह पटसालो ॥६५॥ पटसालबार 'दुहु दिसि जालियभित्तीहिं महवो हवइ । पिट्टी दाहिणवामे थलिंदनामेहिं गुजारी ॥६॥ जालियनाम मुसा भयनामं च इवह खडदार । मारपट्टो य तिरिथो पीढ कही घरण एगहा ॥१७॥ श्रोवरय पट्टसाला पज्जतं मूलगेह नायव । एथस्स घेव गणिय रंघणगेहाह गिहमूसा ॥६॥ मोरडे (कमरे )का नाम शाता है। मिसमें एक दो शाला हो उसको पर परे। गा नाम प्रशिद ( धार के भाग का दासान ) का है।महो एक दो या तीन मतिर उसको पटशाखा काते हैं॥६५॥ पटगाना के डार के दोनों तरफ खिएकी ( मरोला) पुत्व दीवार और मंडप होता है। पिछले भाग में तथा दाहिनी और पानी परफ मो अजिन्द हो उस गुबारी करते हैं ॥१९॥ मासिप नाम मूषा (छोटा दसामा ) का है। मे का नाम पसार है। वम के उपर तीर्थ यो मोटा कार सवा है उसको मारवटकाते है। पीठ ली और परब मे वीमा एक भवानी माम ॥७॥ मार से पटणावा तक मुसम्म पर बामना चाहिये और बाकी मो रसोई पर मादि सप सम्स पर के माभूपय ॥१८॥ परे भेदोस मर- ओवरय थलिंद-गई गुजारि भित्तीण-पट्ट-पभाण । जालियमव्वाणय मेएण गिहा उवखंति ॥१६॥ ' पापिपामा।
गृह प्रकरणम् (1) शाला, अलिन्द (गति) गुजारी, दीवार, पट्टे, स्तंभ, झरोखे और मंडप आदि के भेदों से अनेक प्रकार के घर बनते हैं ॥६६॥ चउदस गुरुपत्थारे लहुगुरुभेएहिं सालमाईणि । जायंति सब्बगेहा सोलसहस्स-तिसय-चुलसीया ॥७॥ जिस प्रकार लघु गुरु के मेदों से चौदह गुरु अक्षरों का प्रस्तार बनता है, उसी प्रकार शाला भलिंद भादि के भेदों से सोलह हजार तीन सौ चोरासी (१६३८४) प्रकार के घर बनते हैं ॥ ७० ततो य जिकिवि संपइ वटुंति धुवाइ-संतगाईणि । ताणं चिय नामाइं लक्खणचिण्हाई वुच्छामि ॥७॥ इसलिये आधुनिक समय में जो कुछ भी ध्रुवादि और शांतनादि घर हैं, उनके नाम आदि को इकट्ठे करके उनके लक्षण और चिहों को मैं ( ठक्कर 'फेरू') कहता हूं ।। ७१ ॥ भुवादि घरों के नाम- धुव-धन्न-जया नंद-खर-कंत-मणोरमा सुमुह-दुमुहा । कूर-सुपेक्ख-धणद-खय-याक्कंद-विउल-विजया गिहा।।७२॥ ध्रुव, धान्य, जय, नंद, खर, कान्त, मनोरम, सुमुख, दुर्मुख, कूर, सुपक्षक, धनद, क्षय, आनंद, विपुल और विजय ये सोलह घरों के नाम हैं ।। ७२ ।। प्रस्तार विधि- चत्तारि गुरू ठविउ लहुयो गुरुहिठि सेस उवरिसमा । ऊणेहिं गुरू एवं पुणो पुणो जाव सव्व लहू ॥७३॥ चार गुरु अक्षरों का प्रस्तार वनावे । प्रथम पंक्ति में चारों अक्षर गुरु लिखे । * कोई प्रम्प में 'सि' नाम दिया है।
पास्तुखारे पीधे नीचे की दूसरी पंक्ति में प्रथम गुरु क स्थान के मीचे एक सघु अपर विसर बाकी ऊपर के बराबर लिखना चाहिये, पीछे नीच की तीसरी पंक्ति में उमर के सा अपर के नीचे गुरु और गुरु अपर के नीचे एक सप भवर सिखकर पाकी उमर के समान लिखना चाहिये । इसी प्रकार सम लघु प्रघर हो बाप पहावक क्रिमा करें। सपु गुरु बानने के लिये सघु मपर का (1) ऐमा और गुरु अपर न (5) ऐसा शिरें। विशेष दो नीचे की प्रस्तार स्थापना- SSSS है Sss SS1 1 SSS s Iss ।।ss 55 IS १२ sI5॥ । । । ss ।। IS IS १४ s।।3 s।।। ८ । सुमारि सोलह परों व प्रस्वार- तं व धन्नाईणं पुन्वाइ-लहुहिं सालनायब्वा । गुरुठाणि मुणह मित्ती नाम समं हवइ फलमेसि ॥७४॥ मैस पार गुरु पपरगाछे मंद के सोना भेद होते हैं, उसी प्रकार पर के प्रदषिण कम से सघुरूप शाखा द्वारा मुष पान्य प्रादि सोना प्रकार के पर बनते हैं। लघु के स्पान में शाला और गुरु रे स्थान में दीवार भानना चाहिम । स प्रथम चारों ही गुरु प्रपर तो इसी बरा पर २ पारों ही दिशा में दीवार हैमर्थात् पर की कोई दिशा में शाला नहीं है। प्रस्तार के दूसरे मेद में प्रपम मधु है, तो यहाँ दूसरा पान्य नाम के परपी पूर्व दिशा में शाला समाना पाहिसे । तीसरे मेद में इमरा सपुरे, तो तीसरे मम नाम के पर के दक्षिण में शाला भौर पौष मेर में मपम रोसा है वो पापा नंद नामक पर पूर्व और दपिण में एक २ शाखा है, गृह प्रकरणम् ( ४२ ) इसी प्रकार सब समझना चाहिये । इन ध्रुवादि गृहों का फल नाम सदृश जानना चाहिये । विशेष सोलह घरों का प्रस्तार देखो। ध्रुव धान्य२ जय३ नंद J SSSS 155$ SISS ISS 1 वर ५ कान्त मनोरम समुख 뉴 SSIS ISIS SIIS VIS 1 1 दुर्मुख कर १० सुपक्ष धनद१२ T T 5 SSS) ISSI SIST IISI क्षय १३ आक्रन्द१४ विजय१६ विपुल१५ T L.1 पा SSII ISII SIII III 네 भ्रवादिक घरों का फल समरांगण में कहा है कि- "ध्रवे जयमाप्नोति धन्ये धान्यागमो भवेत् । जये सपत्नाञ्जपति नन्दे सर्वाः समृद्धयः ॥ ar (४२) बालसारे सुरमायासद श्म कान्वे च समते श्रियम् । मायुरारोम्पमैश्चर्य व्या विचस्य सम्पदः ।। मनारमे मनमुष्टि-हमर्नु प्रकीचिंता । सुमुखे राबसम्मानं दुर्ससे कलाहः सदा ॥ सम्माधिमय रे मुपचं गात्रादित् । धनदे हेमरस्नादि भायैव समते पुमान् ॥ पर्य सवधय गेह-माक्रन्दं झातिमृत्युदम् । मारोग्यं विपुते म्पाति बिमय सपसम्पदः॥" ध्रुव नाम का प्रथम पर. सपकारक है । धन्य नाम का पर पान्मादिकारको षय नाम का घर रानु का बीतनपाना है। नंद नाम का घर सब प्रकार की समृद्धिायक है। खर नाम का पर फ्लेशकारकोपत नाम के घर में सपमी की प्राप्ति वया मायुप, मारोग्य, एमर्य और सम्पदा की विमोवी है। मनोरम नाम का पर पर के स्वामी के मन को संतुष्ट करता है । समुख नाम का पर गमसन्माम देने वाला है । दुर्सस नाम फा पर सदा क्लेशदायको कर नाम का पर भयंकर पापि मौर भय को करनाता है। सुपच नाम पर छडम्प की पदि करता है । धनद नाम के घर में सोना रस्न गौ इनकी प्राप्ति होती है। पप मामका पर सप पप करनेवासा है। भामद नाम का घर पातिमन की मृत्यु परमेपाता है। विपुल नाम का पर भारोग्य मौर कीतिदायक है। पिमय नाम का घर सब प्रकार की सम्पदादेनेवासा है। शान्तमावि चौसठ दिवस परों के नाम- संतण सतिद वड्ढमाण कुक्कुहा सत्थियं च इंसं च । वद्धण कन्चुर संता हरिसण विउला कराल च ॥७॥ वित चित्वं धनं कालदंड तहेव बंद । पुत्तद सव्वगा तह वीसइमं कालचक्क (च) ॥७॥ A'मंतर विधानम्।
गृह प्रकरणम् ( ४३ ) २२ ૨ ૩ २८ ३४ ३५ ३६ ४० YG ४८ ४९ ५५ ५५ तिपुरं सुंदर नीला कुडिलं सासय य सत्थदा सीलं । कुट्टर सोम सुभदा तह भद्दमाणं च कूरक्कं ॥७७॥ सीहिर य सव्वकामय पुहिद तह कित्तिनासणा नामा । सिणगार सिरीवासा सिरीसोभ तह कित्तिसोहणया ॥७॥ जुगसीहर बहुलाहा लच्छिनिवासं च कुविय उज्जोया । बहुतेयं च सुतेयं कलहावह तह विलासा य ॥७॥ बहूनिवासं पुहिद कोहसन्निहं महंत महिता य दुक्खं च कुलच्छेयं पयाववद्धण य दिव्वा य ॥८॥ बहुदुक्ख कंठच्छेयण जंगम तह सीहनाय हत्थीजं । कंटक इइ नामाइं लक्खण-भेयं अग्रो वुच्छं ॥८१॥ शान्त्वन (शांतन ) १, शान्तिद २, वर्द्धमान ३, कुक्कुट ४, स्वस्तिक ५, हंस ६, वर्द्धन ७, कवर ८, शान्त ६, हर्षण १०, विपुल ११, कराल १२, वित्त १३, चित्त ( चित्र ) १४, धन १५, कालदंड १६, बंधुद १७, पुत्रद १८, सर्वांग १६, कालचक्र २०, त्रिपुर २१, सुन्दर २२, नील २३, कुटिल २४, शाश्वत २५, शास्त्रद २६, शील २७, कोटर २८, सौम्य २६, सुभद्र ३०, भद्रमान ३१, क्रूर ३२, श्रीधर ३३, सर्वकामद ३४, पुष्टिद ३५, कीर्त्तिनाशक ३६, श्रृंगार ३७, श्रीवास ३८, श्रीशोम ३६, कीर्तिशोभन ४०, युग्मशिखर (युग्मश्रीधर ) ४१, बहुलाम ४२, लक्ष्मीनिवास ४३, कुपित ४४, उद्योत ४५, बहुतेज ४६, सुतेज ४७, कलहावह ४८, विलाश ४६, बहुनिवास ५०, पुष्टिद ५१, क्रोधसन्निभ ५२, महंत ५३, महित ५४, दुःख ५५, कुलच्छेद ५६, प्रतापवर्द्धन ५७, दिव्य ५८. बहुदुःख ५६, कंठछेदन ६०, B A ' जगज | B छद' ।
पास्तुसारे बंगम ६१, सिंहनाद ६२, स्विज ६५ भौर कंटक ६४ इत्यादि ६४ परों के नाम को। अब इनक सपण और मदों को काता है॥७५ से १ ॥ दिशाल पर के जपत रामपानम में इस प्रकार का है- "मप दिशातालपनपवानि, पदैनिमिः कोष्टकरंधसम्मा। तन्मभकोष्टं परिस्प युग्म, शातापवस्रो हि भवन्ति वितु ।" दो शाला पाने पर इस प्रकार पनाये जाते हैं कि-विशाल पर पाली भूमि की लम्बाई पोर धौलाई के वीन २ भाग करने से नौ भाग होवे हैं। इनमें से मम्न माग को छोर कर बाकी के भाठ मागों में से दो २ मागों में शाला बनानी चाहिये । और बाकी की भूमि खासी रखना चाहिये । इसी प्रकार चार दिशामों में चार प्रवर की शास्त्रा होती है। "पाम्पाग्निगा फरिणी पनदामिवाना, पूर्वानना व महिपी पिटवाल्यस्वा । गावी यमाभिवदनापि च रोगसोमे, छागी मोन्द्रवियोर्षश्वामिषात्रा ।" दषिय और अधिक दो भागों में दो शाता हो और इनके मुत उधर दिशा में हों वो उन शाखामों का नाम परिणी (हस्तिनी ) शामा है। नमस्प और पमिम दिशा के दो भागों में पूर्व मुखबाती दो शाखा हो पन 'मीपी' शाशा है। नासम्म और उपर दिशा दो भागों में दपिर मुखवाली दो शाखा हों उनका नाम गाली' शाहा है। पूर्व और ईशानकोण के दो भागों में परिम मुखवाली से शापा हो उनका नाय 'बागी' शाखाहै। करिणी (हस्तिनी) और महिपी ये दो शाखा इकट्ठी हो ऐसे पर का नाम 'सिबा है, पर नाम सप्य गुमफलदायक है । मावी और महिती ये दो शाता इदछी हों ऐसे पर का नाम 'यमर्प है, पर मुस्यु कारक है । बागी और गावी य दो शासा पट्ठी हो ऐसे पर का नाम 'दर' मा धन की हानि करनेवाला है। इस्तिनी मौर बागी ये दो शाखा इस्त्री हो ऐसे पर का नाम 'का', मा शनि कारक है। गापी और हस्तिनी ये दो शासा इष्ट्ठी हो ऐसे पर नाम 'मि है, या पर अच्छा नही है। इस प्रकार का नाम गृह प्रकरणम् ( ४५ ) अनेक तरह के घर बनते हैं, विशेष जानने के लिये समरांगण और राजवल्लभ श्रादि ग्रंथ देखना चाहिये । शान्तनादि घरों के लक्षण केवल ग्रोवरयदुगं संतणनामं मुणेह तं गेहं । तस्सेव मज्झि पढें मुहेगालिंदं च सत्थियगं ॥२॥ फक्त दो शालावाले घर को 'शान्तन' नाम का घर कहते हैं । अर्थात् जिस घर में उत्तर दिशा के मुखवाली दो शाला (हस्तिनी) हो वह 'शान्तन' नाम का घर जानना चाहिये । पूर्व दिशा के मुखवाली दो शाला (महिपी) हो वह 'शान्तिद' नाम का घर है । दक्षिण मुखवाली दो शाला ( गावी ) हो वह 'वर्द्धमान' घर है । पश्चिम मुखवाली दो शाला (छागी) हो यह 'कुक्कुट' घर है । इसी प्रकार शान्तनादि चार द्विशाल वाले घरों के मध्य में पीढ़ा ( पदारु दो पीदे और चार स्तंभ ) हो और द्वार के आगे एक २ अलिन्द हो तो स्वस्ति- कादि चार प्रकार के घर बनते हैं। जैसे-शान्तन नामके द्विशाल घर के मध्य में पटदारु और मुख के आगे एक अलिन्द हो तो यह 'स्वस्तिक' नाम का घर कहा जाता है । शान्तिद नाम के द्विशाल घर के मध्य में पटदारु और मुख के आगे एक अलिन्द हो तो यह 'हंस' नाम का घर कहा जाता है । वर्द्धमान नाम द्विशाल घर के मध्य में पटदारु और मुख के आगे एक अलिन्द हो तो यह 'वर्द्धन' नाम का घर कहा जाता है । कुक्कुट नाम के द्विशाल घर के मध्य में षटदारु और मुख के आगे एक अलिन्द हो तो यह 'कबूर' नाम का घर कहा जाता है ॥२॥ सत्थियगेहस्सग्गे अलिंदु बीयो श्र तं भवे संतं । संते गुजारिदाहिण थंभसहिय तं हवइ वित्तं ॥८३॥ स्वस्तिक घर के आगे दूसरा एक अलिन्द हो तो यह 'शान्त' नाम का घर कहा जाता है । हंस घर के आगे दूसरा अलिन्द हो तो यह 'हर्षण' घर कहा जाता है । वर्द्धन घर के आगे दूसरा अलिन्द हो तो यह 'विपुल घर कहा जाता है । क—र घर के आगे दूसरा अलिन्द हो तो यह 'कराल' घर कहा जाता है । शान्त घर के दक्षिण तरफ स्तंभवाला एक अलिन्द हो तो यह 'वित्त' वास्तुसार भर कहा चावा है । पर घर के दक्षिण तरफ स्तमपाता प्रबिन्द हो तो यह 'पिच' (चित्र) पर कहा जाता है । विपुल पर के रविण मोर स्तमवाला एक प्रदिन हो तो यह 'पन' पर कहा जाता है। करान घर के दषिय मोर स्तमबाबा मसिन्द हो दो या 'कास' पर कहा मावा है। पमान ३ शातिद उमर H (11 E] न मर 77 ] 1 पर्मण Ayia TIL. ]] נו ]]] -[[[ 121 . 1 Aur धन सरा 111 ]] ]]] [[[ 1111 S विचगिहे वामदिसे जब हवर गुजारि ताव बघद । गुजारि पिट्टि दाहिण पुरथोदु थलिंद त तिपुरं ॥८॥ H .
गृह प्रकरणम् (४७ ) वित्त घर के बांयी ओर यदि एक अलिन्द हो तो यह 'पंधुद' घर कहा जाता है । चित्त घर के बांयी ओर एक अलिन्द हो तो यह 'पुत्रद घर कहा जाता है । धन घर के बांयी ओर एक अलिन्द हो तो यह 'सर्वांग' घर कहा जाता है । कालदंड घर के बांयी ओर एक अलिंद हो तो यह 'कालचक्र' घर कहा जाता है । शान्तन घर के पिछले भाग में और दाहिनी तरफ एक २ अलिंद तथा आगे दो श्रलिन्द हो तो यह 'त्रिपुर' घर कहा जाता है । शान्तिद घर के पिछले भाग में और दाहिनी तरफ एक २ अलिन्द तथा आगे दो अलिन्द हो तो यह 'सुंदर घर कहा जाता है। वर्द्धमान घर के पीछे और दाहिनी तरफ एक २ अलिन्द तथा आगे दो अलिन्द हो तो यह 'नील' घर कहा जाता है । कुक्कुट घर के पीछे और दाहिनी तरफ एक २ अलिन्द तथा आगे दो अलिन्द हो तो यह 'कुटिल' घर कहा जाता है ।।८४॥ पिडी दाहिणवामे इगेग गुंजारि पुरउ दु अलिंदा । तं सासयं श्रावासं सव्वाण जणाण संतिकरं ॥५॥ शान्तन घर के पीछे दाहिनी और बांयी तरफ एक २ अलिन्द हो तथा आगे की तरफ दो अलिन्द हो तो यह 'शाश्वत' घर कहा जाता है, यह घर समस्त मनुष्यों को शान्तिकारक है । शान्तिद घर के पीछे दाहिनी और बांयी तरफ एक २ अलिन्द हो तथा आगे दो अलिन्द हो तो यह 'शास्त्रद' घर कहा जाता है। वर्द्धमान घर के पीछे दाहिनी और बांयी तरफ एक २ अलिन्द हो तथा भागे दो अलिन्द हो तो यह 'शील' नामक घर कहा जाता है । कुक्कुट घर के पीछे दाहिनी और वांयी तरफ एक २ अलिन्द हो तथा भागे की तरफ दो अलिन्द हो तो यह 'कोटर' घर कहा जाता है ॥८॥ दाहिणावाम इगेगं अलिंद जुअलस्स मंडवं पुरो *योवरयमज्झि थंभो तस्स य नामं हवइ सोमं ॥८६॥ शान्तन घर के दाहिनी और बांयी तरफ एक २ मलिन्द तथा भागे दो प्रलिन्द मंडप सहित हो, एवं शाला के मध्य में स्तंभ हो तो यह 'सौम्य घर * 'स्वरममके भय' इंति पाठान्तरे ।
पासासारे कहा पाता है। शान्तिद पर रे दाहिनी और पायी सरफ एक २ असिन्द और भागे दो मलिन्द माप सहिव हो या शाला के मम्पमें स्म हो तो मा 'मुमद्र' पर कहा जाता है। पईमान घर के दाहिनी और गांगरी वरफ एफ २ ममिन्द हो तथा मागे दो मसिन्द मरप सहित से और शाला के मम्म में स्वंम हो वो मा 'मद्रमान' पर कहा आता है । इट पर के दाहिनी पौर बसी तरफ एक २ भासिन्द हो सषा मागे दो मसिन्द मप सहित हो साथ ही शाला के मन में स्वम हो सो पह ' पर कहा मावा है ॥८६॥ मदर ㅋ ]]]-- [[[ il मुनव बायोग कालचक -- त्रिपुर। नील अटिन TIL E]] ]] [[[ 171 कायत पास्चर ]] [[ सौम्म। एम२ अद्रमान --- 1 E गृह प्रकरणम् ( ४ ) पुरो अलिंदतियगं तिदिसिं इकिक हवइ गुंजारी। थंभयपट्टसमेयं सीधरनामं च तं गेहं ॥८७ ॥ संतत घर के मुख श्रागे तीन अलिन्द और वाकी की तीनों दिशाओं में एक २ गुंजारी ( अलिन्द ) हो, तथा शाला में पदारु ( स्तंभ और पीढे ) भी हो तो यह 'श्रीधर' घर कहा जाता है । शांतिद घर के मुख आगे तीन अलिन्द और तीनों दिशाओं में एक २ गुंजारी, स्तंभ और पीढे सहित हो ऐसे घर का नाम 'सर्वकामद' कहा जाता है । वर्द्धमान घर के मुख आगे तीन अलिन्द और तीनों दिशाओं में एक २ अलिन्द, स्तंभ और पीढे सहित हो तो यह 'पुष्टिद' घर कहा जाता है। कुक्कुट घर के मुख आगे तीन अलि आगे तीन अलिन्द और तीनों दिशाओं में एक २ अलिन्द पदारु समेत हो तो यह 'कीर्तिविनाश' घर कहा जाता है ॥८७॥ गुंजारिजुअल तिहुं दिसि दुलिंद सुहे य थंभपरिकलियं । मंडवजालियसहिया सिरिसिंगारं तयं विति ॥ ८८ ॥ जिस द्विशाल घर की तीनों दिशाओं में दो २ गुंजारी और मुख के आगे दो अलिन्द, मध्य में पदारु और अलिन्द के आगे खिड़की युक्त मंडप हो ऐसे घर का मुख यदि उत्तर दिशा में हो तो यह 'श्रीशृंगार', पूर्व दिशा में मुख हो तो यह 'श्रीनिवास', दक्षिण दिशा में मुख हो तो यह 'श्रीशोभ' और पश्चिम दिशा में मुख हो तो यह कीर्तिशोभन' घर कहा जाता है ।।८८॥ तिन्नि अलिंदा पुरो तस्सग्गे भदु सेसपुव्वुव्व । तं नाम जुग्गसीधर बहुमंगलरिद्धि-आवास ॥८१ ॥ जिस द्विशाल घर के मुख आगे तीन अलिन्द हों और इनके आगे भद्र हो बाकी सब पूर्ववत् अर्थात् तीनों दिशा में दो २ गुंजारी, बीच में पदारु (स्तंभ पीढे) और अलिन्द के आगे खिड़की युक्त मंडप हो ऐसे घर का मुख यदि उत्तर दिशा में हो तो यह 'युग्मश्रीधर' घर कहा जाता है, यह घर बहुत मंगलदायक और ऋद्धियों का स्थान है। इसी घर का मुख यदि पूर्व दिशा में हो तो 'बहुलाभ, दक्षिण दिशा में हो तो 'लक्ष्मीनिवास और पश्चिम में मुख हो तो 'कुपित' घर कहा जाता है ॥८॥ दु अलिंद-मंडवं तह जालिय पिढेग दाहिणे दु गई। भितितरिथंभजुश्रा उज्जोयं नाम धणनिलयं ॥१०॥ .
४०)
पास्तुसार
विस दिशास पर के मुख मागे दो मलिन्द और खिड़की युक्त महप हो
या पीछे एक मसिन्द और दाहिनी तरफ दो अलिन्द हो, एर्ष स्तमयुक्त दीवार भी हो
ऐसे घर का पुस यदि उचर दिशा में हो तो या 'ठयोत' घर का बाता है। यह
पर धन का स्थान रूप है। इसी पर का मुख यदि पूर्व दिशा में हो तो 'बहुवेग',
दक्षिण दिशा में हो यो 'सवेच' और पत्रिम में मुख हो तो पलहावा' पर मा
भाता है |
-
प्रोभरी
पुरि
२
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]]]]
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ܝܒܒܐ
श्रीमगार
नीलिमाम
प्रीमिर
गुम्मसीधा
मामीनियम
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उपोता
ख्नेजर
मनम
कालापा
11..
211.
गृहप्रकरणम् ( १ ) उज्जोअगेहपच्छइ दाहिणए दु गइ भित्तिअंतरए। जह हुंति दो भमंती विलासनामं हवइ गेहं ॥ ११ ॥ उद्योत घर के पीछे और दाहिनी तरफ दो २ अलिन्द दीवार के भीतर हो जैसे घर के चारों ओर घूम सके ऐसे दो प्रदक्षिणा मार्ग हो ऐसे घर का मुख यदि उत्तर में हो तो वह 'विलाश' नाम का घर कहा जाता है । इसी घर का मुख यदि पूर्व दिशा में हो तो 'बहुनिवास' दक्षिण दिशा में हो तो 'पुष्टिद' और पश्चिम में मुख हो तो 'क्रोधसनिम' घर कहा जाता है ॥११॥ तिं अलिंद मुहस्सग्गे मंडवयं सेसं विलासुब्व । तं गेहं च महंतं कुणइ महड्ढि वसंताणं ॥ १२ ॥ विलास घर के मुख प्रागे तीन अलिन्द और मंडप हो तो यह 'महान्त' घर कहा जाता है । इसमें रहनेवाले को यह घर महा ऋद्धि करनेवाला है । इसी घर का मुख यदि पूर्व दिशा में हो तो 'महित', दक्षिण दिशा में हो तो 'दुःख और पश्चिम दिशा में हो तो 'कुलच्छेद' घर कहा जाता है ।।१२॥ मुहि ति अलिंद समंडव जालिय तिदिसेहि दुदु य गुजारी। मज्झि वलयगयभित्ती जालिय य पयाववद्धण्यं ॥१३॥ जिस द्विशाल घर के मुख आगे तीन अलिन्द, मंडप और खिड़की हों तथा तीनों दिशाओं में दो २ गुंजारी (अलिन्द ) हों तथा मध्य घलय के दीवार खिड़की हो, ऐसे घर का मुख यदि उत्तर दिशा में हो तो 'प्रतापवर्द्धन', पूर्व दिशा में हो तो 'दिव्य', दक्षिण दिशा में हो तो 'बहुदुःख और पश्चिम दिशा में मुख हो तो 'कंठछेदन' घर कहा जाता है ॥१३॥ पयाववद्धणे जइ थंभय ता हवइ जंगमं' सुजसं । इय सोलसगेहाई सव्वाई उत्तरमुहाई ॥१४॥ , 'जंगज' । इति पाठान्तरे ।
वास्तुसारे प्रतापवईन घर में यदि पदारु (स्वम-पीडा ) हो तो मह 'अंगम' नाम का पर कहा जाता है, या भच्या यश फैलानेवाला है। इसी पर का मुख पदि पूर्व दिशा में हो तो 'सिंहनाद', दक्षिण दिशा में से तो 'हस्तिज' और पमिम दिशा में हो दो कंटई पर कहा जाता है। इसी सरह शतनादि पे सोलर पर सब उचर मुखवाले हैं ॥४॥ विसात. निवास पुदिन TIL Fil ܫܩܒܪ मडनर मरित उस LIL .רובר प्रतापपईन। दिय२ हस३ ATHI हमार A3 गृह प्रकरणम् ( ५३ ) एयाई चिय पुव्वा दाहिणपच्छिममुहेण बारेण । नामंतरेण अन्नाई तिन्नि मिलियाणि चउसठ्ठी ॥ १५ ॥ ऊपर जो शांतनादि क्रमसे सोलह घर कहे हैं, उन प्रत्येक के पूर्व दक्षिण और पश्चिम मुख के द्वार भेदों को दूसरे तीन २ घरों के नाम क्रमशः इनमें मिलाने से प्रत्येक के चार २ रूप होते हैं। इस तरह इन सब को जोड़ लेने से कुल चौसठ नाम घर के होते हैं ॥१५॥ दिशामों के भेदों से द्वार को स्पष्ट वतलाते हैं- तथाहि-संतणमुत्तरबारं तं चिय पुव्वुमुहु संतदं भणियं । जम्ममुहवड्ढमाणं अवरमुहं कुक्कुडं तहन्नेसु ॥ १६ ॥ जैसे-शांतन नाम के घर का मुख उत्तर दिशा में, शान्तिद घर का मुख पूर्व दिशा में, बर्द्धमान घर का मुख दक्षिण दिशा में और कुक्कुट घर का मुख पश्चिम दिशा में है । इसी तरह दूसरे भी चार २ घरों के मुख समझ लेना चाहिये । ये मैंने पहिले से ही खुलासा पूर्वक लिख दिये है ॥१६॥ अव सूर्य आदि आठ घरों का स्वरूप- यथा-अग्गे* अलिंदतियगं इक्किकं वामदाहिणोवरयं । थंभजुग्रं च दुसालं तस्स य नाम हवइ सूरं ॥ १७ ॥ जिस द्विशाल घर के आगे तीन अलिन्द हो, तथा बांयी और दाहिनी तरफ एक २ शाला स्तभयुक्त हो तो यह 'सूर्य' नाम का घर कहा जाता है ॥१७॥ वयणे य चउ अलिंदा उभयदिसे इक्कु इक्कु प्रोवरयो । नामेण वासवं तं जुगतं जाव वमइ धुवं ॥ १८ ॥ जिस द्विशाल घर के आगे चार अलिन्द हो, तथा वांयी और दाहिनी तरफ एक २ शाला हो तो यह 'वासव' नाम का घर कहा जाता है। इस में रहने पाले युगान्त तक स्थिर रहते है ॥१८॥ * 'माए' इति पाठान्तरे ।
पास्तसारे
मुहि ति थलिंद दुपच्छह दाहिणवामे थ हवइ इक्किक्कं ।
त गिहनामै वीर्य हियच्छियं घउसु वन्नाणं ॥११॥
विस रियाल पर के भागे तीन प्रजिन्द, पीछे की तरफ दो प्रतिन
वथा वाहिनी भौर पामी तरफ एक २ मलिन्द हो तो उस पर का नाम भीमा
बावा है। यह पारों वर्षों का हितचिन्तक है |
दो पच्छह दो पुरश्रो थलिंद तह दाहिणे हवह इक्को ।
कालखं तं गेहं अकालिदंड फुणइ नणं ॥ १००
जिस विशाल पर के भागे और पीछे पो २ मतिन्द तपा दाहिनी मोर
एक मलिन्द हो तो यह काम नाम का पर कहा जाता है। मा नियम से भारत
दर (दुर्मिपता) करता है ॥१०॥
थलिंद तिन्नि वयणे जुथल जुथलं च वामदाहिणाए ।
एगं पिट्टि दिसाए चुदी सद्विवढणयं ॥ १०१॥
निस दिशाम पर के भागे तीन मशिन वा पोपी और दधिषे तरफ दो।
पक्षिर और पीछे की तरफ एक अमिन्द हो ऐसे पर को 'दि नाम पर
करा पाता है। यह सपदि को परानेवासा ॥१.१॥
दु थलिंद चउदिसेहिं सुब्वयनाम च सव्वसिद्धिकर ।
पुरथो तिन्नि थलिंदा तिदिसि दुग त च पासायं ॥ १०२ ॥
विस द्विशास पर के पारों मोर दो दो प्राचिन्न हो तो यह 'सबव' नाम
का पर कहा जाता है, या सर सरह से सिद्धिकारक है। मिस विशाल पर के
मागे तीन प्रतिन्द और तीनों दिशामों में दो २ मछिन्द हो या 'पासाद' नाम
उपर का नाता है॥१०२।।
चरि अलिंदा पुरयो पिडि तिर्गत गिह दुवेइक्खं ।
इह सूराई गेहा यह वि नियनामसरिसफला ॥ १० ॥
गृद प्रकरणम्
(४५)
जिस द्विशाल घर के आगे चार अलिन्द और पीछे की तरफ तीन अलिन्द
हो उसको द्विवेध' नाम का घर कहा जाता है। ये सूर्य श्रादि पाठ घर कहे हैं वे
उनके नाम सदृश फलदायक है ।।१०३।।
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वास्तुसारे an विमलाइ सुंदराई इसाइ थलं कियाइ पभवाई । पम्मोय सिरिमवाई चूडामणि कलसमाई य ॥ १०४ ॥ एमाइथासु सव्वे सोलस सोलस हवति गिहतत्वो। इक्किक्कायो चउ चउ दिसिमेथ-यलिंदमेएहिं ॥ १० ॥ तिथलोयसुंदराई चउसटि गिहाइ हुँति रायाणो। पुण थवट्ट सपइ मिच्छा ण च रब्बभावेण ॥ १०६ ॥ विमसादि, संदरादि, इसादि, प्रमकवादि, प्रमवादि, प्रमोदादि, सिरिमपादि नामरि और कश मादि ये सब र्यादि घर के एक से पार चार दिशामों के भौर मलिन्द के मेदों से सोला २ मेद होते हैं । योस्पसुम्दर मादि चौसठ पर राधामों के लिए है। इस समय गोल पर बनाने का रिणाम नहीं है किन्त राम्यमाव से मना नहीं है अर्थात् रामा खोग गोल मकान मी पना सकते॥१०४ से १०१॥ पर में कहा २ किस २ प्रस्मान करना पाहिये यह पवना है- पुब्वे सीहदुवारं अग्गीह रसोइ दाहिणे सयणं । नेरह नीहारठिई मोयणाठिइ पच्छिमे भणिय ॥ १०७॥ वायव्वे सव्वाउह कोमुत्तर पम्मठाणु ईसाणे । पुवाइ विणिदेसो मूलग्गिादारविक्खाए ॥ १०८॥ मकान की पूर्व दिशा में सिंह द्वार बनाना चाहिये, प्रमिकोय में रसोई मनाने का स्थान, दपिर में शपन (निद्रा) करने का स्थान, नेचस्प कोर में निहार (पाखाने) का स्थान, पपिम में मोसम करने का स्थान, पापम्य कोण में सब प्रकार के मायुष का स्थान, पचर में धन का स्पान और ईशान में धर्म का स्थान बनाना चाहिये । इन सब का घर के भूतदार की अपेक्षा से पूर्वादिक दिशा का दिमाग करना पाहिये मर्यात् मिस दिशा में पर का सम्म द्वार दो मसीही दिशा को पूर्व दिशा मान कर उपरोक्त विमाग करना चाहिये ।।१०७ से १०८॥
गृह प्रकरणम् (५७) द्वार विषय- पुब्बाइ विजयवारं जमबारं दाहिणाइ नायव्वं । अवरेण मयरबारं कुबेरबारं उईचीए ॥१०॥ नामसमं फलमेसिं बारं न कयावि दाहिणे कुज्जा । जइ होइ कारणेणं ताउ चउदिसि अट्ठभागकायव्वा ॥११०॥ सुहबारु अंसमज्झे चउसुं पि दिसासु अट्ठभागासु । चउ तिय दुन्निछ पण तिय पण तिय पुवाइ सुकम्मेण॥१११॥ पूर्व दिशा के द्वार को विजय द्वार, दक्षिण द्वार को यमद्वार, पश्चिम द्वार को मगर द्वार और उत्तर के द्वार को कुबेर द्वार कहते हैं। ये सब द्वार अपने नाम के अनुसार फल देनेवाले हैं। इसलिये दक्षिण दिशा में कभी भी द्वार नहीं बनाना चाहिये । कारणवश दक्षिण में द्वार बनाना ही पड़े तो मध्य भाग में नहीं बना कर नीचे बतलाये हुये भाग के अनुसार बनाना सुखदायक होता है। जैसे मकान बनाये जानेवाली भूमि की चारों दिशाओं में आठ २ भाग बनाना चाहिये । पीछे पूर्व दिशा के आठों भागों में से चौथे या तीसरे भाग में, दक्षिण दिशा के आठों भागों में से दूसरे या छठे भाग में, पश्चिम दिशा के आठों भागों में से तीसरें या पांचवें भाग में तथा उत्तर दिशा के आठों भागों में से तीसरे या पांचवें भाग में द्वार बनाना अच्छा होता है ।।१०१ से १११ ॥ बाराउ गिहपवेसं सोवाण करिज्ज सिडिमग्गेणं । * पयठाणं सुरमुहं जलकुंभ रसोइ अासन्नं ॥११२॥ द्वार से घर में जाने के लिये सृष्टिमार्ग से अर्थात् दाहिनी ओर से प्रवेश हो, उसी प्रकार सीढ़ियें बनवाना चाहिये..." ॥११२॥ समरांगण में शुभाशुभ गृहप्रवेश इस प्रकार कहा है कि- "उत्सङ्गो हीनबाहुश्च पूर्णबाहुस्तयापरः । प्रत्यक्षायश्चतुर्थश्च निवेश परिकीर्तितः ॥" * उत्तरार्द्ध गाथा विद्वानों को विचारणीय है ।
पास्मुसारे गधार में प्रवेश करने के लिये प्रथम 'उस्संग प्रमेशदूसरा दीनबाई मर्थात् 'सव्य' प्रमेण, तीसरा 'पूर्णमा' अर्थात् 'भपसष्य प्रदेश और पापा 'प्रस्य अर्थात् 'पठमग प्रवेश मे पार प्रकार के प्रवेश माने हैं। इनका शुभाम फरत क्रमशः प्रम कातरें। "उत्संग एकदिकाम्पा माराम्या पास्सुमेश्मनोः । स सौमाम्पप्रमादि-धनधान्पअयप्रदः ।।" पास्तार पर्याद सस्प पर का द्वार और प्रपेश द्वार एक ही दिशा में हा मर्थात् पर के सम्मुख प्रवेश हो, उसको 'उत्सग प्रवेश करते हैं। ऐसा प्रवेश द्वार सौमाम्य कारक, संवान पनि फारक, धनधान्य देनेपास्ता और विजम करनेवाला है। "पत्र प्रवेशतो पास्तु-गृए मपति पामतः । सदीनपाक वास्तु निन्दित वास्तुपिन्तकः ।। तस्मिन् वसमम्पपिता स्वम्पमित्रोअपपाषषः । जीनियम मवेमिपं विविधम्पापिपीरिसः॥" पवि मुरूप पर का सार प्रवेश करते समय पांमी भोर हो अर्थात् प्रपम प्रमेश करने के बाद मांगी मोर वाकर मुस्प पर में प्रवेश रो, उसको जीनबाई' भवेश करते हैं। ऐसे प्रवेश को पास्तुशास्त्र माननेवास विद्वानों ने निन्दित माना है। ऐसे प्रषेश गासे पर में रहने वाला मनुष्प माप पनवासा पा पार मित्र पाव वाला और मीभिव होता है या अनेक प्रकार की प्याधियों से पीड़ित होगा। 'वास्तुप्रवेशवो यत्तु ग रपियवो भवेत् । प्रदक्षिणप्रवेशत्वात् ददू विधात् पूर्मपाकम् ॥ तत्र पुर्वाप पारिप पनपान्पमुखानि प । माप्तुमन्ति नय निस्सं षसन्तो वास्तुनि धनम् ॥" यदि मुम्प पर का भार प्रवेश करते समय रानी भोर हो,मोद प्रपम प्रवेश करने के पार दादिनी मोर वाकर साप पर में प्रवेश वो उसको पूर्णबाई प्रदेश करते हैं। ऐसे प्रमेश पाले पर में गनेवासा मनुप्प पुत्र, पौत्र, पना पान और मुह को निरवर मात करता है।
गृह प्रकरणम् (५६) घर "गृहपृष्ठं समाश्रित्य वास्तुद्वारं यदा भवेत् । प्रत्यक्षायस्त्वसौ निन्द्यो वामावर्त्तप्रवेशवत् ॥" यदि मुख्य घर की दीवार घूमकर मुख्य घर के द्वार में प्रवेश होता हो तो 'प्रत्यक्ष' अर्थात् 'पृष्ठ मंग' प्रवेश कहा जाता है । ऐसे प्रवेशवाला घर हीनवाहु प्रवेश की तरह निंदनीय है। और दुकान कैसे बनाना चाहिये- सगडमुहा वरगेहा कायव्वा तह य हट्ट वग्धमुहा । बाराउ गिहकमुच्चा हट्टच्चा पुरउ मज्झ समा ॥११३॥ गाड़ी के अग्र भाग के समान घर हो तो अच्छा है, जैसे गाड़ी के आगे का हिस्सा सकड़ा और पीछे चौड़ा होता है, उसी प्रकार घर द्वार के आगे का भाग सकड़ा और पीछे चौड़ा बनाना चाहिये । तथा दुकान के आगे का भाग सिंह के मुख जैसे चौड़ा बनाना अच्छा है । घर के द्वार भाग से पीछे का भाग ऊंचा होना अच्छा है। तथा दुकान के आगे का भाग ऊंचा और मध्य में समान होना अच्छा है ॥११३॥ द्वार के उदय (ऊंचाई) और विस्तार (चौड़ाई) का मान राजवल्लभ में इस प्रकार कहा है- पष्ट्या वाथ शतार्द्धसप्ततियुतै-यासस्य हस्ताङ्गलै- रिस्योदयको भवेच्च भवने मध्यः कनिष्ठोत्तमौ । दैार्द्धन च विस्तरः शशिकला-भागोधिका शस्यते, दैर्ध्यात् व्यंशविहीनमर्द्धरहितं मध्यं कनिष्ठं क्रमात् ॥" घर की चौड़ाई जितने हाथ की हो, उतने ही अंगुल मानकर उसमें साठ अंगुल और मिला देना चाहिये । ये कुल मिलकर जितने अंगुल हो उतनी ही द्वार की ऊंचाई बनाना चाहिये, यह ऊंचाई मध्यम नाप की है । यदि उसी संख्या में पचास अंगुल मिला दिये जाय और उतने द्वार की ऊंचाई हो तो वह कनिष्ठ मान की ऊंचाई जानना चाहिये । यदि उसी संख्या में सत्तर ७० अंगुल मिला देने से जो संख्या होती है उतनी दरवाजे की ऊंचाई हो तो वह ज्येष्ठ मान का उदय जानना चाहिये । - (..) वास्तुसारे दरखावे की ऊचाई जितने अंगुल की हो उसके माधे माग में ऊंचाई सोसावे माग की संस्था को मिसा देने से मो छल नाप होती है, उतनी ही दरवाजे की चौड़ाई की बाप वो पा भेष्ठ है। दरगामे की न छपाई के सीन माग परावर करके उसमें से एक माग अनग कर देना पाहिये । पाकी के दो माग निवनी दरखाने की पौड़ाई की बाय तो मा मध्यम द्वार कहा जाता है । यदि दरवामे की भाई के मापे भाग बिवनी चौड़ाई की बाम सो पा कनिष्ठ मानवाना द्वार मानना पाहिये। पार के उदय का दूसरा प्रचार- "गहोस्सेपेन या प्रशनेन स्मात् समुच्छ्रितिः । वदन सु विस्तारो द्वारस्पेस्पपरो विधिः ॥" पर की ऊंचाई के तीन माग करना, उसमें से एक माग प्रतम करके पाकी वो माग जिवनी शर की ऊंचाई करना चाहिये। और ऊंचाई से माघे शर का विस्तार करना पारिये । यह मार के उदय भौर विस्तार का दूसरा प्रकार है। पर की ऊंचाई फस- पुब्बुचं अत्यहरं दाहिण उच्चपरं घणसमिदं । अवरचं विद्धिकरं उब्वसियं उत्तराउच्चं ॥११॥ अपूर्व दिशा में पर ऊंचा हो वो सचमी का नाश, दपिर दिशा में पर चा हो तो धन समृदियों से पूर्ण, परिचम दिशा में पर ऊंचाहो तो धन पाम्पादि की पति करने वाला और उचर परफ पर अंपा हो तो उमार (पस्ती रहित) होता है ॥१९॥ पर भारम्म मपम कहाँ से करना चाहिमे यह पवताते है- मूलायो थारंभो कीरह पच्छा कमे कमे कुज्जा । सव्वं गणिय-विसुद्ध वेहो सबत्य वज्जिज्जा॥११५॥ सब प्रकार के भूमि मादि के दोपों को करके मो पुस्प शाहा (पर) है, वहीं से प्रथम काम का भारम्म करना चाहिये । परमात् क्रम से दूसरी इसरी पारिरिजा परशारम भरेरा से सममप चाहिये बात बारको पूर्व रिज मापर करिय प्रहमा ची।
गृह प्रकरणम् ( ६१ ) जगह कार्य शुरू करना चाहिये । किसी जगह आय व्यय आदि के क्षेत्रफल में दोप नहीं आना चाहिये, एवं वेध तो सर्वथा छोडना ही चाहिये ॥११॥ सात प्रकार के वेध- तलवेह-कोणवेह तालुयवेहं कवालवेहं च । तह थंभ-तुलावेहं दुवारवेहं च सत्तमयं ॥११६॥ तलवेध, कोणवेध, तालुवेध, कपालवेध, स्तंभवेध, तुलावेध और द्वारवेध, ये सात प्रकार के वेध है ॥११६॥ समविसमभूमि कुंभि य जलपुरं परगिहस्स तलवेहो । कूणसमं जइ कूणं न हवइ ता कूणवेहो श्र ॥११७॥ घर की भूमि कहीं सम कहीं विपम हो, द्वार के सामने कुंभी (तेल निकालने की घानी, पानी का अरहट या ईख पीसने का कोल्हू) हो, कूए या दूसरे के घर का रास्ता हो तो 'तलवेध' जानना चाहिये। तथा घर के कोने बराबर न हों तो 'कोण- वेध' समझना । ११७॥ इक्कखणे नीचुचं पीढं तं मुणह तालुयावेहं । बारस्सुवरिमपट्टे गम्भे पीढं च सिरवेहं ॥११॥ एक ही खंड में पीढे नीचे ऊंचे हों तो उसको 'तालुवेध' समझना चाहिए। द्वार के ऊपर की पटरी पर गर्भ (मध्य ) भाग में पीढा आवे तो 'शिरवेध' जानना चाहिये ॥११८॥ गेहस्स मन्झि भाए थंभेगं तं मुणेह उरसल्लं । अह अनलो विनलाई हविज जा थंभवेहो सो ॥११॥ घर के मध्य भाग में एक खंभा हो अथवा अग्नि या जल का स्थान हो तो यह हृदय शल्य अर्थात् स्तंभवेध जानना चाहिये ॥११६ ।
वास्तुसारे हिटिम उवरि खणाण हीणाहियपीढतं तुलावेहं । पीढा समसंखाश्रो हवतिजह तत्य नहुदोसो ॥१२०॥ घर के नीचे या ऊपर के स्वर में पीछे न्यूनाधिक हों तो 'तुनावेघ' होता है। परन्तु पीछे की संख्या समान हो वो दोप नहीं है ।।१२०॥ दुम-व-थभ-कोणय-किलाविद्धे दुवारवेहो य । गेहुचविउणभूमी तं न विरुद्ध बुहा विति ॥१२१॥ बिस पर के द्वार के सामने या पीच में प्रप, कमा, खंमाकोना या कीमा ( खूट) हो तो 'भारवेष होता है। किन्तु पर की ऊंचाई से निगुनी (दूनी ) भूमि धारने के बाद उपरोक्त कोई वेघ हो तो विरुद्ध नहीं पात् मेमों का दोष नहीं है, ऐसा परित लोग करते हैं ।।१२।। पंप का परिहार पाचारदिमकर में पाकि- "उपापभूमि हिगुणां स्पषमा चैत्ये पसूर्गुणाम् । पादिदोपो नै स्पाद एवं त्वष्ट्रमतं मया ॥" पर की ऊंचाई से पुगुनी भौर मन्दिर की ऊंचाई से पार गुणी भूमि को बोर कर कोई पेप प्रादि का दोप हो वो पर दोप नहीं माना जाता है, ऐसा रिपकर्मा का मत है। तलवेहि कुट्ठरोथा हवति उच्घेय कोणवेइम्मि । तालुथवेहेण भयं कुलस्वयं यंभवेहेग्य ॥१२२॥ कावाल तुलावेहे घणनासो हवह रोरभावो थ । इन चेहफल नाउँ सुदं गेह रेयव ॥१२३॥ वलवध से कुष्ठरोग, कोनवेघ से उपाटन, वालुरोध से भय, स्तंभनेप से कुल का पय, पास (शिर) येप और नुताप स धन का विनाश पौर स्लेश होता है। इस प्रकार पप के फस को जानकर घर पर पनाना चाहिये ।।१२२।१२।। • ' पारस सर्म रोमा' इति सम्परे ।
गृह प्रकरणम् (६३) वाराही संहिता में द्वारवेध बतलाते है- "रथ्याविद्धं द्वारं नाशाय कुमारदोपदं तरुणा। पंकद्वारे शोको न्ययोऽम्बुनिःस्राविणि प्रोक्तः ।। कूपेनापस्मारो भवति विनाशश्च देवताविद्धे । स्तंभेन स्त्रीदोपाः कुलनाशो ब्रह्मणाभिमुखे ॥" दूसरे के घर का रास्ता अपने द्वार से जाता हो ऐसे रास्ते का वेध विनाश कारक होता है। वृक्ष का वेध हो तो चालकों के लिये दोपकारक है। कादे वा कीचड़ का हमेशा वेध रहता हो तो शोककारक है। पानी निकलने के नाले का वेध हो तो धन का विनाश होता है । कूए का वेध हो तो अपस्मार का रोग ( वायु विकार) होता है । महादेव सूर्य आदि देवों का वेध हो तो गृहस्वामी का विनाश करने वाला है। स्तंभ का वेध हो तो स्त्री को दोप रूप है और ब्रह्मा के सामने द्वार हो तो कुल का नाश करनेवाला है। इगवेहेण य कलहो कमेण हाणिं च जत्थ दो हुंति । तिहु भूयाणनिवासो चउहि खयो पंचहिं मारी॥१२४॥ एक वेध से कलह, दो वेध से क्रमशः हानि, तीन बंध हो तो घर भूतों का वास, चार वेध हो तो घर का क्षय और पांच वेध हो तो महामारी का रोग होता है ।। १२४॥ वास्तुपुरुष चक्र- अछुत्तरसउ भाया पडिमारूवुव्व करिवि भूमितयो । सिरि हियइ नाहि सिहिणो थंभं वजेह जत्तेणं ॥१२५॥ घर बनाने की भूमि के तलमाग का एक सौ आठ* भाग कर के इसमें एक मूर्ति के आकार जैसा वास्तुपुरुष का आकार बनाना, जहां जहां इस वास्तुपुरुष के मस्तक, हृदय, नामि और शिखा का भाग आवे, उसी स्थान पर स्तंभ नहीं रखना चाहिये ॥१२॥ में * एक्सौ आठ भाग की कल्पना की गई है, इसमें से सौ भाग पास्तुमडल के और पाठ भाग वास्तुमंडल के बाहर कोने में चरकी आदि पाठ राक्षसणी के समझना चाहिये ऐसा प्रासाद मंडन में कहा है।
पास्तुसारे वास्तु पर भंग विमाण इस प्रकार है- "ईशो मूर्मि समाभिवः ममयो पर्वन्यनामादिति- रापस्तस्स गरे पदंशपुगते प्रोको चपरवादितिः। चकापर्ममपरौ स्तनपुगे स्पादापबरसो पदि, पम्पेन्द्रादिमुरारप रषिसरखे पामे , नापादयः ।। सावित्रः पविता च पिरकरे पामे दुर्म छतो, मृत्युमैचगवस्तषोडविपये स्मामामिपठे मेरे शम्ममौ प भानुपगले पो पहिरोगी स्मृती, पूपानंरिगणारच सप्तवियुपा नम्यो पदो। पैदवार" ईशानकोने में पास्तुपरूप का सिर है, इसके ऊपर ईशदेव को स्थापित करना वास्त पुरुषचक्र- चाहिये । दोनों पत कान के ऊपर पर्जम्प और दिति देम को, गरेक कार प्रापदेव को, दोनों पे पर बस और मदिति देव को दोनों सनों पर फ्रम से अपमा और पूणीपर k ना का स मा एच सपा स । मन + को, दर म ऊपर भापवस्स को दाहिनी सखा के पर ग्रादि पांच (छ, धर्म, सत्प, भूरा और भागय) देपों को, पापी मना के ऊपर नागादि पाप ( माग, गृह प्रकरणम - मुख्य, भल्लाट, कुबेर और शैल) देवों को, दाहिने हाथ पर सावित्र और सविता को, गांये हाथ पर रुद्र और रुद्रदास को, जंघा के ऊपर मृत्यु और मैत्र देव को, नाभि के पृष्ठ भाग पर ब्रह्मा को गुह्येन्द्रिय स्थान पर इंद्र और जय को, दोनों घुटनों पर क्रम से अग्नि और रोग देव को, दाहिने पग की नली पर पूपादि सात (पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गंधर्व, मूंग और मृग) देवों को, वांये पग की नली पर नंदी श्रादि सात ( नंदी, सुग्रीव, पुष्पदंत, वरुण असुर, शेप और पापयक्ष्मा) देवों को और पांव पर पितृदेव को स्थापित करना चाहिये । इस वास्तु पुरुष के मुख, हृदय, नाभि, मस्तक, स्तन इत्यादि मर्मस्थान के ऊपर दीवार स्तंभ या द्वार आदि नहीं बनाना चाहिये । यदि बनाया जाय तो घर के स्वामी की हानि करनेवाला होता है। वास्तुपद के ४५ देवों के नाम और उनके स्थान- "ईशस्तु पर्जन्यजयेन्द्रसूर्याः, सत्यो भृशाकाशक एव पूर्वे । वहिश्च पूपा वितथाभिधानो, गृहक्षतः प्रेतपतिः क्रमेण ॥ गन्धर्वभृगौ मृगपितृसंज्ञौ, द्वारस्थसुग्रीवकपुष्पदन्ताः । जलाधिनायोप्यसुरश्च शेषः सपापयक्ष्मापि च रोगनागौ ।। मुख्यश्च मल्लाटकुवेरशैला-स्तथैव चाह्ये ह्यदितिर्दितिश्च । द्वात्रिंशदेवं क्रमतोचनीया-त्रयोदशैव त्रिदशाश्च मध्ये ॥" ईशान कोने में ईश देव को, पूर्व दिशा के कोठे में क्रमशः पर्जन्य, जय, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश और आकाश इन सात देवों को; अग्निकोण में अग्निदेव को, दक्षिण दिशा के कोठे में क्रमशः पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गंधर्व, शृंगराज और मृग इन सात देवों को; नैऋत्य कोण में पितृदेव को पश्चिम दिशा के कोठे में क्रमशः नंदी, सुग्रीव, पुष्पदंत, वरुण, असुर, शेष और पापयक्ष्मा इन सात देवों को वायु- कोण में रोगदेव को उत्तर दिशा के कोठे में अनुक्रम से नाग, मुख्य, भन्नाट, कुबेर, शैल, अदिति और दिति इन सात देवों को स्थापन करना चाहिये । इस * नामि के पृष्ठ भाग पर, इसका मतलब यह है कि वास्तुपुरुष की भाकृति, मोंधे सोये हुए पुरुष की भाकृति के समान है।
थास्तुसारे प्रकार पचीस देव ऊपर के कोठे में पूलना चाहिये । और मम्म के कोठे में वेरा देश पूलना चाहिये। "मागर्ममा दक्षिणको विवस्वान्, मैत्रोऽपरे सौम्पदियो विमागे । पृथ्वीपरोऽपस्स्पय मम्मवोऽपि, प्रपार्षनीयः सकले' मूनम् ॥" सर के कोठे के नीचे पूर्व दिशा के कोठे में मर्ममा, दक्षिण दिशा के कोठे में विवस्वान्, पश्चिम दिशा के कोठे में मैत्र मौर पर दिशा के कोठे में पृथ्वीपर देव को स्थापित कर पूलन करना चाहिये और सम कोठे के मध्य में प्रमाको सापित कर पूमन करना चाहिये। "मापापपत्सो शिवकोणमध्ये, सावित्रकोऽसौ सविता तथैव । कोखे महेन्द्रोऽप बयस्तृतीये, स्त्रोऽनितेऽयोऽप्पय छद्रदासा।" ऊपर के कोने के कोठे के नीचे ईशान कोण में माप और भापवस्स को, ममि कोण में सामित्र और सविधा को, नैनत्य कोस में इन्द्र और बप को, पायु कोष में रुद्र मौर रुवदास को स्पापन करके पूजन करना चाहिये । "यानवाये परकी द्वितीये, विदारिका पूतनिका दीये । पापामिपा मारतकोयके सु, पून्या पुरा उक्तापिधानकैस्तु ॥" पास्तुमउन के पाहर ईशान कोण में परकी, प्रमिकोप में विदारिका, नैऋत्य कोण में पूसना और घायुकोण में पापा इन पार रापसनियों की पूजन करना पाहिये। प्रासाद महन में वास्तुमंउस पार कोणे में माठ प्रकार के रेप बताये "ऐशान्ये परकी पापे पीलीपीठा प पूर्ववत् । सिदारिकामी कोणे प बंमा याम्पदिशामिवा ।। नैर्मस्पे पूतना सकन्दा परिषमे पापुकोणके । पापा रापसिका सौम्पर्ममैव सर्वतोऽर्षपेत् ॥" ईशान कोने के पार उघर में घरकी और पूर्व में पीसी पीछा, ममि बोय के पार पूर्व में पिदारिका और दपिस में मा, नेश्नत्य कोय के पार दक्षिण में पूचना मौर परिपम में संदा, मायु कोण के पार पश्चिम में पापा मोर उघर में मर्यमा की पूजन करना पारिसे । " गृह प्रकरणम् (६७) कौनसे वास्तु की किस जगह पूजन करना चाहिये यह बतलाते हैं- "ग्रामे भूपतिमंदिरे च नगरे पूज्यश्चतुःपष्टिकै- रेकाशीतिपदैः समस्तभवने जीर्णे नवाब्ध्यंशकैः । प्रासादे तु शतांशकैस्तु सकले पूज्यस्तथा मण्डपे, कूपे पएणवचन्द्रभागसहिते-प्यां तडागे वने ॥" गॉव, राजमहल और नगर में चौसठ पद का वास्तु, सब प्रकार के घरों में इक्यासी पद का वास्तु, जीर्णोद्धार में उनपचास पद का वास्तु, समस्त देवप्रासाद में और मंडप में सौ पद का वास्तु, कूए वावड़ी, तालाव और वन में एकसौ छियानवे पद के वास्तु की पूजन करना चाहिए । चौसठ पद के वास्तु का स्वरूप- चतुःषष्टिपदैर्वास्तु-मध्ये ब्रह्मा चतुष्पदः । अर्यमाद्याश्चतुर्भागा द्विद्वयंशा मध्यकोणगाः॥ वहिष्कोणेष्वर्द्धभागाः शेषा एकपदाः सुराः।" ६४ चौसठपदका वास्तुचक्र- चौसठ पद के वास्तु में ज |ई सूस सूस | चार पद का ब्रह्मा, अर्य- अ मादि चार देव भी चार २ अर्यमा पद के, मध्य कोने के आप वि आपवत्स आदि आठ देव कु ए पृथ्वीवर नाहा विवस्वान दोदो पद के, उपर के कोने के आठ देव आघे २ पद के मु मैत्रमा और वाकी के देव एक २ , कप सुनं पि - স্বয়। प आ विदारिका आप पू शै आपवत्स सावित्र सविता य सद्रदास नये पद के हैं। शेअ पा प्रता पातुसारे पासी पर वास्तु का स्वरूप- "एकाशीतिपदे प्रमा नवार्यमापास्तु पद्पदाः ।। विपदा मम्मकोमेडटी पामे वारिंशदेकरा" ई प MERROR वास्तुपक- जाईम्स||आज पू आमा वि अ श ए कप्तीभर विमानाय इसमासी पद के पास्तु में नव पद का प्रमा,मईमादि चार देव बाबा परके मप्य कोने माप भाप पस्स प्रादि पाठ देव दो दो पद और उसर के पचीस देव एक २ पद के हैं। भ H रेस म रोपा शेअसुन 4 सोपद के वास्तु सरूप- "श प्रमाप्टिसंम्पांनो बामकोणेप सार्वगाः ।। पर्यमापास्तु परसंशाः शेपास्तु पूर्वपास्तुपद ।"
गृह प्रकरणम् १०. सौपदका वास्तुचक বাকী विदारिका पज इसूस दि अ आप अपवत अर्यमा अ सविता पू वि # कु सौ पद के वास्तु में ब्रह्मा सोलह पद का, ऊपर के कोने के आठ देव डेढ़ २ पद के, अर्यमादि चार देव आठ आठ पद के और मध्य कोने के आप आपवत्स आदि आठ देव दो २ पद के, तथा बाकी के देव एक२ पद के हैं। गु वैवस्वत gelten भ य मु ग ना स 41 2 सं यो सुद्रदास पा शेवपुरा न पि पापा एतना उनपचास पद के वास्तु का स्वरूप- "वेदांशो विधिरर्यमप्रभृतयस्त्र्यंशा नव त्वष्टकं, कोणतोऽष्टपदार्द्धकाः परसुराः षड्भागहीने वास्तोर्नन्दयुगांश एवमधुनाष्टांशैश्चतुःषष्टिके, सन्धेः सूत्रमितान् सुधीः परिहरेद् भित्तिं तुला स्तंभकान् ॥" पदे।
पास्तुसारे - प स भी H अ .. . मा प्रगम HA ना म H म में R सपनामपरकर - उनपचास पद के पास में चार पद का प्रमा, प्रर्षमादि पार देप तीन २ मर्ममा पद, माप मादि भाठ देश नम पर के, कोने में पाठ रेष मागे २ पर और पाकी के चौबीस देव पीस पद में सापन करना पाहिये। पीस पद में प्रत्येक केब. २ माग किये वो १२. पर हुए, इसको २४ से भाग दिया. वो प्रत्येक देव के परि २ माग माते हैं । चौसठ पद में पास्तान की कल्पना करना चाहिये। पीछे वास्तुपुला के संमि भाग में दिवास तसा या प्रेम को डिमान् नहीं रहें। पसुनंदिरुव प्रतिष्ठासार में इस्पासी पद का पासपूजन इस प्रकार पत्ताया कि- "विपाय मसणं पेत्रं पाहपूमा विपापपेत् ॥ रेखामिस्तिर्पगर्णामि-नाग्रामि समपालम् । पूर्षेन पंपबर्सेन सैकशीतिपदं सिखेत् ।। तेवएदसपपानि चिसिवा मध्यकोएके। मनादिसिमधेप पूजपेत् परमेष्ठिनः ॥ वदूपरिसाएकोरेप मपापा देवया प.त् । पोग्रापत्रेप विपादेपरिप संपमेत् ॥ पतुर्विशतिकोप्टेषु यभेप्यासनदेवताः। माविशतोष्टपरमेषु दवेन्द्रान् क्रमशो पमेत् ॥
गृह प्रकरणम् ( ७१ ) r ३३ १५ 16 २९ २२ २१ सीन मरिहाल चिन माघर २.त५२ ६ २१ M १५ 4 जया अमितिमा पुण्येवानजतात जलपन * VEER स्वमंत्रोच्चारणं कृत्वा गन्धपुष्पाक्षतं वरं । दीपधूपफलार्याणि दत्वा सम्यक् समर्चयेत् ॥ लोकपालांश्च यक्षांश्च समभ्यर्च्य यथाविधि । जिनविम्बाभिषेकं च तथाष्टविधमर्चनम् ॥" प्रथम भूमि को * -* * पवित्र करके पीछे से चमरेन्द्र वलीन धरणेन्द्रभूतान एदेवर नेणारा हरिका हरिमहरू अतिकायामाकार जीतरति गीतया मशिनि मतमानधातेन्द्र धातेन्द वास्तुपूजा करना चाहिये। अग्र भाग पापा मानमरगोमुख महायस् त्रिमुरवः यसवर में वज्राकृतिवाली समाती मिमिका चकेवरी अनिता दुरितारी काली, महामा रोहिणी प्रज्ञप्ति वजय तिरछी और खड़ी नसी१६ १ २ खला३ दश २ रेखाएँ खींचना चाहिये। साताअरिहतभाचार्य के चूर्ण से इक्यासी में पद वाला अच्छा मंडल बनाना Lapituterut चाहिये । मध्य के Pressel»kaxut ( RiebedԵՒՏՔեթլի-le नव कोठे में आठ Lurbat HELPIRLeEabus पांखड़ीवाला कमल VEEREYyluebluebeens finger PHERDEREELE KREETREPRENEPe बनाना चाहिये। म क कमल के मध्य में परमेष्ठी अरिहंतदेव को नमस्कार मंत्र पूर्वक स्थापित करके पूजन करना चाहिये । कमल की पांखड़ियों में जया आदि देवियों की पूजा करना अर्थात् कमल के कोनेवाली चार पांखड़ियों में जया, विजया, जयंता और अपराजिता इन चार देवियों को स्थापित करके चार दिशावाली पांखड़ियों में सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु को स्थापन कर पूजन करना चाहिये । कमल के ऊपर के सोलह कोठे में सोलह विद्या देवियों को, इनके ऊपर चौवीस कोठे में शासन उसके ऊपर पंचवर्ण EEEEE सुमक्ष 11 महाकाली या शाता ज्वालामताराका बस कुसुममा विजय अजिन ब्रह्मा १० her अपराजि (उपाध्या 216 * th 9 पातुपारे - देवता को और इनके सर पचीस कोठे में 'इन्द्रों को प्रमशः सापित करना पाहिये । तदनन्तर भपने २ देवों के मंत्रापर पूर्वक गंध, पुष्प, अपक, दीप, धूप, फल और नेमप मादि पा कर पूजन करना चाहिये । दश दिगपास और पोलीस यों की मी पयामिपि पूजा करना चाहिये । बिनषि के सर मभिषेक पौर प्रष्टप्रकारी पूना करना चाहिये । हार कोने स्वम पारि किस मन्नर रखना चाहिये यह पवसाये है- पारं पारस्स समं थह बार बारमज्मि कायन्वं । यह वज्जिऊण वारं कीरइ पार तहालं च ॥१२६॥ मुरूप धारक परावर दूसरे सब ार पनाना चाहिय अर्थात् इरएफ हार के उपरंग समपत्र में रखना या मुख्य द्वार के मध्य में प्राचार ऐसा माना एखाबा पनाना चाहिये । यदि पुस्प धार को घोर कर एक तरफ खिसकी बनाई माप तो वह अपनी इमानुसार पना सकता है ॥१२६॥ कूर्ण कूणस्त सम थालय थालं च कीलए कीलं। थमे थभं कुजा यह वेहं वजि फायब्वा ॥१२७।। कोने के परामर कोना, मासे के परामर माता स्टे के बराबर झूय और खम के परापर खमा ये सर पेष को घोर कर रखना चाहिये ॥१२॥ थालयसिरम्मि कीला थभो वावरि वार यमुवरे । वारद्विवार समस्खण विसमा थमा महाथसुहा ॥१२८॥ भाले के ऊपर कीसा ( बँटा ), मार के उपर सम, संम के सर हार, द्वार के सर दो दार, समान संर और विषम स्तम ये सब बड़े माम है ॥१२॥ यंभहीणं न कायव्य पासाय मठमदिरं । कूणरक्खतरेऽवस्सं देयं यमं पयत्चयो ॥१२॥ परिमाथामा विष्य में सोमायोपरका विमा। . गामसम्परे।
गृह प्रकरणम् ( ७३) प्रासाद ( राजमहल या इवेली ) मठ और मंदिर ये विना स्तंभ के नहीं करने चाहिये । कोने के बगल में अवश्य करके स्तंम रखना चाहिये ॥१२६।। स्तंभ का नाप परिमाण मंजरी में कहा है कि- "उच्छ्ये नवधा भक्ते कुंभिका भागतो भवेत् । स्तम्भः पड्भाग उच्छाये भागार्द्ध भरणं स्मृतम् ॥ शारं भागार्द्धतः प्रोक्तं पट्टोच्चभागसम्मितम्" । घर की ऊंचाई का नौ भाग करना. उसमें से एक भाग के प्रमाण की 'कुंभी' बनाना, छः भाग जितनी स्तंभ की ऊंचाई करना, आधे भाग जितना उदयवाला 'मरणा' करना, आधे भाग जितना उदयवाला 'शरु' करना और एक भाग प्रमाण जितना उदय में 'पीढ़ा बनाना चाहिये । कुंभी सिरम्मि सिहरं वट्टा अह्रस-भद्दगायारा । रूवगपलवसहिया गेहे थंभा न कायव्वा ॥ १३०॥ कुंभी के सिर पर शिखरवाला, गोल, आठ कोनेवाला, भद्रकाकार ( चढ़ते उतरते खांचेवाला ), रूपकवाला ( मूर्तियोंवाला) और पल्लववाला (पत्तियों वाला ) ऐसा स्तंम सामान्य घर में नहीं करना चाहिये । किन्तु प्रासाद-देवमंदिर वा राजमहल में बनाया जाय तो अच्छा है ॥ १३० ।। खणमझे न कायव् कीलालयगोखमुक्खसममुहं । अंतरछत्तामंचं करिज तह य पीढसमं ।। १३१ ॥ खूटी, आला और खिड़की इनमें से कोई खंड के मध्य भाग में आजाय इस प्रकार नहीं बनाना चाहिये । किन्तु खंड में अंतरपट और मंची बनाना और पीदे सम संख्या में बनाना चाहिये ॥ १३१ ।। गिहमज्झि अंगणे वा तिकोणयं पंचकोणयं जत्थ । तत्थ वसंतस्स पुणो न हवइ सुहरिद्धि कईयावि ॥ १३२ ॥ जिस घर के मध्य में या आंगन में त्रिकोण या पंचकोण भूमि हो उस घर में रहनेवाले को कभी भी सुख समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती है ॥ १३२ ॥ करिज खण - (७४) पास्तधारे मूलगिहे पच्छिममुहि जो बारह दुनि बारा योवरए । सो तं गिह न मुंजह यह मुंजइ दुक्विथो हवह ॥ १३३ ॥ पश्चिम दिशा के द्वारपाले मुम्प पर में दो हार और शाला हो ऐसे पर को नहीं मोगना पाहिये मर्याद निवास नहीं करना चाहिये, क्योंकि उसमें राने से ख होता है ।। १३३ ॥ कमलेगि ज दुवारो थहवा कमलेहिं ववियो हवह । हिटाउ उवरि पिहुलो न ठाइ थिरु लच्छितम्मि गिहे ॥ १३४ ॥ बिस घर के द्वार एक कमलवासे हों या बिसकुस कमन से रहित हों, दवा मीरे की अपेषा उपर पौड़ हों, ऐसे धारवाने पर में सपमी निवास नहीं करती है ॥ १२ ॥ वलयाकार कूणेहिं संकुलं अहव एग दु ति कूर्ण । दाहिणवामइ दीह न वासियवेरिस गेहं ॥ १३५ ॥ गोस कोनेवाला या एक, दो, चीन कोनेपाखा तथा पिय भौर का भोर संपा, ऐसे पर में कमी नहीं रहना चाहिये ॥ १३५ ।। सयमेव जे किवाडा पिहियति य उग्घर्डति ते थमुहा । चिचकलमाइसोहा सविसेसा मूलदारि सुहा ॥ १३६ ॥ बिस पर के फिवार स्वयमेव पंप हो पाप या सुप्त बाम तो भएम समझना चाहिये । पर का सम्म द्वार कलश भारि चित्रों से मुशोभित हो वो बहुत शुभकारक ॥ १३६ ॥ छविंतरि मिचितरि मग्गंतरि दोस जे न ते दोसा । साल थोवरय कुक्खी पिट्टि दुवारेहिं बहुदोसा ॥ १३७ ॥ ऊपर मोपेर मादि दाप पवसाये, उनमें यदि बत का, दीवार का मा मार्ग का अन्तर होवो वे दोप नहीं माने जाते हैं। शासा और भारत की एपी (पग माग ) यदि भार पिचशे भाग में हो तो बहुत दोपकारक है ॥ १३७ ।।
गृह प्रकरणम् । ७५ ) घर में किस प्रकार के चित्र बनाना चाहिये - जोइणिनट्टारंभ भारह-गमायणं च निवजुद्धं । रिसिचरियदेवचरियं इय चित्तं गेहि नहु जुत्तं ॥ १३८ ॥ योगिनियों का नाटारंभ, महाभारत रामायण और राजाओं का युद्ध, ऋषयों का चरित्र और देवों का चरित्र ऐसे चित्र घर में नहीं बनाना चाहिये ॥ १३८ ।। फलियतरु कुसुमवल्ली सरस्सई नवनिहाणजुअलच्छी। कलसं वद्धारणयं सुमिणावलियाइ-सुहचित्तं ॥१३१ ॥ फलवाले वृक्ष, पुष्पों की लता, सरस्वतीदेवी, नवनिधानयुक्त लक्ष्मीदेवी, कलश, स्वस्तिकादि मांगलिक चिन्ह और अच्छे अच्छे स्वप्नों की पंक्ति ऐसे चित्र बनाना बहुत अच्छा है ॥ १३६ ॥ पुरिसुव्व गिहस्संगं हीणं अहियं न पावए सोहं । तम्हा सुद्धं कीरइ जेण गिहं हवइ रिद्धिकरं ॥ १४० ॥ पुरुष के अंग की तरह घर के अंग न्यून या अधिक हो तो वह घर शोभा के लायक नहीं है। इसलिये शिल्पशास्त्र में कहे अनुसार शुद्ध घर बनाना चाहिये जिससे घर ऋद्धिकारक हो ॥१४० ॥ घर के द्वार के सामने देवों के निवास सषधि शुभाशुभ फल-- वजिज्जइ जिणपिट्टी रविईसरदिहि 'विराहुवामभुथा। सब्वत्थ असुह चंडी बंभाणं चउदिसिं चयह ॥ १४१॥ घर के सामने जिनेश्वर की पीठ, सूर्य और महादेव की दृष्टि, विष्णु की बायीं भुजा, सब जगह चंडीदेवी और ब्रह्मा की चारों दिशा, ये सब अशुभकारक हैं, इस लिये इनको अवश्य छोड़ना चाहिये ॥ १४१ ॥ 'अरिहंतदिट्ठिदाहिण हरपुट्ठी वामएसु कल्लाणं । विचरीए बहुदुक्खं परं न मग्गंतरे दोसो ॥ १४२ ॥ , "विण्हुवामो प्र' इति पाठान्सरे । २ 'भरहंत' इति पाठान्तरे । -
वास्तुपारे
-
पर के सामने परिरस (जिनेश्वर) की रष्टि मा दपिय भाग होक्या
महादवची की पीठ या पापी राजा हो सो बहुत कन्यायकारक है। परन्तु इससे चिप
रीव हो तो पहुत दुखकारक है। यदि पीप में मार रास्ते का अंतर हो वो दोप
नहीं माना जाता है॥१४२ ॥
एह सम्मन्मी गुण दोष-
पढमत-जाम-चजिय धयाइ-दु ति-पहरसभवा छाया ।
दुइहेऊ नायव्वा तयो पयत्तेण वजिज्जा ॥ १४३ ॥
पाते और अंतिम चौथे पार को छोड़कर दूसर और तीसरे प्रहर में मदिर के पाजा
मादि की माया पर के ऊपर गिरवी पो सो दुःखकारक मानना । इसलिये इस वाया
को प्रपश्य छोड़ना चाहिये। अर्थात् दूसरे और तीसरे प्रार में मंदिर के पधादि
की छाया मिस अगह गिरे ऐसे स्थान पर पर नहीं बनाना पादिये ।। १४३ ॥
समकट्ठा विसमखणा सव्वपयारेसु इगविही कुज्जा ।
पुवुत्तरेण पल्लव जमावरा मूलकायया ॥ १४४ ॥
सम काठ और विषम संर ये सब प्रकार से एक विधि से करना चाहिये ।
पूर्व उपर विशा में (ईशान कोण में ) पनप और एपिस परिचम दिशा में (नैवत्स
कोष में) मृत नमाना चाहिये ॥ १४ ॥
सब्वेवि भारवट्टा मूलगिहे एगि सुत्ति कीरति ।
पीढ पुण एगसुचे उवरय-गुजारि अलिंदेसु ॥ १४५ ॥
मुरूप घर में सब मारवटे (बो स्तम के उपर संगा काष्ठ रसा चातावा)
बराबर समर्थन में रखने पाहिये । ना शाशा गुंजारी और भर्शिद में पीरे मी
समस्त्र में रखने पाहिये ॥ १५ ॥
पर में केसी सरी घप में महीनाग चाहिये यह पता है-
इल घाणय-सगडमई घरहट्ट-जंताणि कंटई तह य ।
पचुंवरि खीरतरू एयाणम कटठ पज्जिज्जा ॥ १४६ ॥
। ७७ ) गृह प्रकरणम् . हल, धानी ( कोल्हू ), गाड़ी, अरहट ( रेहट-कूए से पानी निकालने का घरखा ), कांटेवाले वृक्ष, पांच प्रकार के उदुंधर ( गूलर, बड़. पीपल, पलाश और कलुबर ) और क्षीरतरु अर्थात् जिस वृक्ष को काटने से दूध निकले ऐसे वृक्ष इत्यादि की लकड़ी मकान बनवाने में नहीं लाना चाहिये ॥ १४६ ॥ बिज्जउरि केलिदाडिम जंभीरी दोहलिद ग्रंबलिया । 'बब्बूल-बोरमाई कणयमया तह वि नो कुज्जा ॥ १४७ ॥ बीजपूर ( बीजोरा ), केला, अनार, निंबू, आक, इमली, बबूल, बेर और कनकमय (पीले फूलवाले वृक्ष ) इन वृक्षों की लकड़ी घर बनाने में नहीं लाना चाहिये तथा इनको घर में बोना भी नहीं चाहिये ॥ १४७ ॥ एयाणं जइ वि जडा पाडिवसा उपविस्सइ अहवा । छाया वा जम्मि गिहे कुलनासो हवइ तत्थेव ॥ १४८ ॥ यदि ऊपरोक्त वृक्षों की जड़ घर के समीप हो या घर में प्रवेश करती हो तथा जिस घर के ऊपर उनकी छाया गिरती हो तो उस घर के कुल का नाश होजाता है ॥१४८॥ सुसुक भग्गदड्ढा मसाण खगनिलय खीर चिरदीहा । निंब-बहेडय-रुक्खा न हु कट्टिजंति गिहहेऊ ॥ १४१ ॥ जो वृक्ष अपने आप सूखा हुआ, टूटा हुश्रा, जला हुआ, श्मशान के समीप का, पक्षियों के घोंसलेवाला, दूधवाला, बहुत लम्बा (खजूर आदि), नीम और बेहड़ा इत्यादि वृक्षों की लकड़ी घर बनाने के लिये नहीं काटना चाहिये ॥ १४६ ॥ वाराही संहिता में कहा है कि- "सन्नाः कण्टकिनो रिपुभयदाः क्षीरिणोऽर्थनाशाय । फलिनः प्रजाक्षयकरा दारूण्यपि वर्जयेदेपाम् ॥ छिन्द्याद् यदि न तरूंस्तान् तदन्तरे पूजितान् वपेदन्यान् । पुन्नागाशोकारिष्टबकुलपनसान शमीशालौ ।।" घर के समीप यदि कांटेवाले वृक्ष हों तो शत्रु का भय करनेवाले हैं, दूध वाले वृक्ष हो तो लक्ष्मी के नाशकारक हैं और फलवाले वृक्ष हों तो संतान के नाश कारक १ 'बलि' इति पाठान्तरे । २ पावसा' 'पाडोसा' इति पाठान्तरे पास्तुपारे . हैं। इसलिये इन पषों की साड़ी मी पर बनाने के लिये नहीं जाना चाहिये। मेष पर में या घर के समीप हो सो काट देना चाहिये यदि उनसों नहीं काटें तो उनके पास पुमाग (नागकेसर), अशोक, भरीठा, पान (केसर), पनस, शमी और शासी इस्पादि मुर्गपित पून्य प्रपों को मोने से सो ठक्त दोपित ापों का दोष नहीं गया है। पाहाणमय में पीढ पीढ पट्टे च वारउत्ताण । एए गेहि विरुद्धा सुहावहा घम्मठाणेसु ॥ १५० ॥ यदि पत्थर के म्तम, पीठे, छत पर के सस्ते और वारशाख ये सामान्य गृहस्थ के घर में हो सो मिरुद (प्रथम) हैं। परन्तु धर्मस्पान, देवमंदिर भारि में हो तो रामकारक ॥१५॥ पाहाणामये कट्टे कट्ठमए पाहणस्स थमाइ । पासाए य गिहे वा वज्जेश्रवा पयत्तेणं ॥ १५१ ॥ मो मासाद या पर पत्थर के हों, वहां सदी के और काष्ठ के हों वहा पत्थर के स्तम पीरे भादि नहीं बनाने पाहिय । मर्यात पर मादि पत्थर के हों वो स्वम भादि मी परपर के और लकड़ी के हो वा स्वंम मादि भी लकड़ी के पनाने चाहिये ॥१५॥ दूसरे पर सकरी भारि पास्तुद्रम्प पीना चाहिये यह पवसावे है- पासाय-कूव-चावी-मसाण मठरायमंदिराणं च । पाहाण-इट्ट-कट्ठा सरिसवमचा वि वज्जिज्जा ॥ १५२ ॥ देवमंदिर, ए, पापी, स्मशान, मठ और पबमास इनके पस्थर है या सफली भादि एक दिन मात्र मी अपने पर के काम में नहीं लाना पाहिये ॥ १५२॥ पुपः समरापय सूत्रपार में मी पहादि- "अन्पवास्तव्युत द्रम्प-मन्पवास्तौ न गोषपेत् । प्रासादे न भवेत् पूमा गरे प न बसेर् रही ॥" दूसरे मास्तु (मकान मादि) की गिरी दुई सकसी पापाय ईट ना मावि द्रम (पीने) सरे पातु (मान ) में काम नहीं लाना चाहिये। यदि दूसरे का पास्तु द्रष्य मंदिर में समाया बाय सो पूमा प्रतिष्ठा नहीं होती है, और घर में लगाया बाय दो उस पर में स्वामी राने नहीं पाया है।
गृह प्रकरणम्
( ७६ )
सुगिहजालो उवरिमयो खिविज्ज नियमज्झिननगेहस्स ।
पच्छा कहवि न खिप्पइ जह भणियं पुव्वसत्थम्मि ॥ १५३ ॥
अपने मकान के ऊपर की मंजिल में सुन्दर खिड़की रखना अच्छा है, परन्तु
दूसरे के मकान की जो खिड़की हो उसके नीचे के भाग में आजाय ऐसी नहीं रखना
चाहिये। इसी प्रकार पिछली दिवाल में कभी भी गवाक्ष (खिड़की) आदि नहीं रखना
चाहिये, ऐसा प्राचीन शास्त्रों में कहा है ॥ १५३ ।।
शिल्पदीपक में कहा है कि-
"सूचीमुखं भवेच्छिद्रं पृष्ठे यदा करोति च ।
प्रासादे न भवेत् पूजा गृहे क्रीडन्ति राक्षसाः ॥"
घर के पीछे की दिवाल में सूई के मुख जितना भी छिद्र नहीं रक्खे। यदि
रक्खे तो प्रासाद (मंदिर) में देव की पूजा नहीं होती है और घर में राक्षस क्रीड़ा
करते हैं अर्थात् मंदिर या घर के पीछे की दिवाल में नीचे के भाग में प्रकाश के
लिये गवाक्ष खिड़की आदि हो तो अच्छा नहीं है ।
ईसाणाई कोणे नयरे गामे न कीरए गेहं ।
संतलोयाणमसुह अंतिमजाईण विद्धिकरं ॥ १५४॥
नगर या गाँव के ईशान आदि कोने में घर नहीं बनाना चाहिये । यह उत्तम
जनों के लिये अशुभ है, परंतु अंत्यज जातिवाले को वृद्धिकारक है ॥ १५४ ।।
शयन किस तरह करना चाहिये ?--
देवगुरु-वगिह-गोधण-संमुह चरणो न कीरए सयणं ।
उत्तरसिरं न कुज्जा न नगदेहा न अलपया ॥ १५५ ॥
देव, गुरु अग्नि, गौ और धन इनके सामने पैर रख कर, उत्तर में मस्तक
रख कर, नंगे होकर और गीले पैर कमी शयन नहीं करना चाहिये ।। १५५ ।
धुत्तामच्चासन्ने परवत्थुदले चउप्पहे न गिहं ।
गिहदेवलपुग्विलं मूलदुवारं न चालिज्जा ॥ १५६ ॥
पाससारे - हैं। इसलिये इन पनों की साड़ी मी पर बनाने के लिये नहीं लाना चाहिये। मेष पर में या पर के समीप हों तो काट देना चाहिये यदि उनामोंगो नहीं काटें वो उनके पास पुमाग (नागकेसर), अशोक, मरीठा, बकुल (केसर), पनस, शमी और ग्रामी इस्पादि सुगंधिस पून्य पषों को पोने सो उक्त दोपितरों का दोप नहीं रावा है। पाहाणमय धभ पीढ पीढ पट्टे व बारउत्ताण । एए गेहि विरुद्धा सुहावहा सुहावहा धम्मठाणेस ॥ १५० ॥ यदि परपर के सम, पीरे, प्रत पर के सम्से और द्वारपास ये सामान्म गृहस्थ के घर में हो सो विरुद (अशुभ ) । परन्तु पर्मस्पान, देवमंदिर मादि में हो यो रामकारक हैं ॥ १५॥ पाहाणमये कळं कट्ठमए पाहणस्स धमार । पासाए य गिहे वा वज्जेथव्वा पयत्तेणं ॥ १५१ ॥ मो मासाद या पर पत्थर के हों, पहां लकड़ी के मौर काष्ठ के हो यहाँ परपर के स्तम पीछे भादि नहीं पनाने पाहिय । पर्याद घर मादि पत्थर के हों वो स्तम मादि मी परपर के और सकरीको सा स्ठम मादि भी सकरी के बनाने पाहिये ॥१५॥ खरे मन की सारी भारि वास्तुबम्प पही ोमा चाहिये या वक्ता है पासाय-कूब-चावी-मसाण मठरायमंदिराणं च । पाहाण-इट्ट-कठा सरिसवमत्ता वि वज्जिबा ॥ १५२ ॥ देवमंदिर, ए, पापरी, रमशान, मठ पार राबमास इनके परपर ईट या सकती मादि एक दिन मात्र मी अपने घर के काम में नहीं खाना चाहिये ।। १५२॥ पुनः समरांगण सूधपार में मीकि "मन्पपातुप्यतं द्रम्प-मन्यवास्ता न योजयत् । प्रासादे न मोत् पूजा गरेपन से ही " दूसरे पास्तु (मकान मादि) की गिरी दुई सकरी पापाय रघूना भादि द्रण (पी) दूसरे यास्तु (मकान ) में काम नहीं लाना चाहिये। पदि सरेका पास्त प्रम्प मंदिर में लगाया बाय तो मा प्रतिष्ठा नहीं रोती है, और घर में सगापा गाप तो उस पर में खामी राने नहीं पाया है। . - विम्वपरीक्षा प्रकरणः द्वितीयम् । हारगाथा- में वस्तु स्थिति- इअगिहलक्खणभावं भणिय भणामित्थ बिंबपरिमाणं । गुणदोसलक्खणाई सुहासुहं जेण जाणिज्जा' ॥ १॥ प्रथम गृहलक्षण भाव को मैंने कहा । अब बिम्ब ( प्रतिमा ) के परिमाण को तथा इसके गुणदोष आदि लक्षणों को मैं ( फेरु ) कहता हूं कि जिससे शुमाशुम जाना जाय ॥१॥ मूर्ति के स्वरूप छत्तत्तयउत्तारं भालकवोलायो सवणनासायो। सुहयं जिणचरणग्गे नवग्गहा जक्खजक्खिणिया ॥ २ ॥ जिनमूर्ति के मस्तक, कपाल, कान और नाक के उपर बाहर निकले हुए तीन छत्र का विस्तार होता है, तथा चरण के आगे नवग्रह और यक्ष यक्षिणी होना सुखदायक है ॥२॥ मूर्ति के पत्थर में दाग और ऊंचाई का फल- बिंबपरिवारमज्भे सेलस्स य वराणसंकरं न सुह । समअंगुलप्पमाणं न सुंदरं हवइ कइयावि ॥३॥ प्रतिमा का या इसके परिकर का पाषाण वर्णसंकर अर्थात् दागवाला हो तो अच्छा नहीं । इसलिये पाषाण की परीक्षा करके बिना दाग का पत्थर मूर्ति बनाने के लिये लाना चाहिये। . 'गजेइ । २ 'क्यावि' इति पाठान्तरे ।
वास्तुसारे
पूर्व और मंत्री के समीप, दूसरे की पास्तु की हुई भूमि में और चौक में पर
नहीं पनाना चाहिये। विधेकविश्वास में कहा है कि-
"दुख देवकक्षासमे गृहे शनिश्पनुप्पपे ।
पूधामास्पगृशाम्पाशे स्पासा मुतपनवयौ ।"
पर देवमंदिर के पास हो सो दुाख, चौक में हो वो हानि, पूर्व और मंत्री
पर के पास दो सौ पुत्र और धन का विनाश होता है।
पर मा देवमंदिर का मायादार कराने की बावश्यकता हो कर इनके सस
भार को चलायमान नहीं कराना चाहिये । अर्यात् प्रथम का गुस्प द्वार विस पिसा में
जिस स्थान पर बिस माप का हो, उसी प्रकार उसी दिशा में उस स्थान पर
माप का रखना चाहिये ॥ १५६ ॥
गोसार पोरे पापो स्थाप-
गो-चसह-सगडठाण दाहिणए वामए तुरंगार्य ।
गिहबाहिरभूमीए संलग्गा सालए ठाया ॥ १५७ ॥
गौ त भौर गादी इनको रखने का मान दक्षिण भोर, उमा परेका
स्पान पायीं मोर पर क बार भूमि में बनवापी हुई शाला में रहना पारित ॥१॥
गेहाउ वामदाहिण अग्गिम भूमी गहिज्ज जइ पन्ज ।
पच्छा कहवि नलिज्जइ इथ भणियं पुब्बनाणीहि ॥ १५८ ॥
इति श्रीपरमजेनचन्द्राङ्गज-ठक्कर 'फेर' विरचिते गृहवास्तुसारे
गइलक्षणनाम प्रथमप्रकरणम् ।
यदि का काय विशेष से मषित भूमि लेना पड़े तो पर के पानी का इपिए
तरफ की या भाग की भूमि सना चाहिये । फिन्त पोपी को मि कमी भी
नी सेना पाहिय, एसा पूर्व यानी प्राचीन मापार्यों में कहा ॥ १५ ॥
यिम्चपरीक्षा प्रकरणम्
(८३)
"मधुभस्मगुडव्योम-कपोतसदृशप्रभैः ।
माञ्जिष्ठैररुणैः पीतैः कपिलैः श्यामलैरपि ॥
चित्रश्च मएडलैरेभि-रन्तज्ञेया यथाक्रमम् ।
खद्योतो वालुका रक्त-भेकोऽम्युगृहगोधिका ॥
दर्दुरः कुकलासश्च गोधाखुसर्पवृश्चिकाः ।
सन्तानविभवप्राण-राज्योच्छेदश्च तत्फलम् ॥"
जिम पत्थर या काष्ठ की प्रतिमा बनाना हो, उसी पत्थर या काष्ठ के ऊपर
पूर्वोक्त लेप करने से या स्वाभाविक यदि मध के जैसा मंडल देखने में आये तो भीतर
खद्योत जानना । भस्म के जैसा मंडल देखने में आवे तो रेत, गुड़ के जैसा मंडल
देखने में श्रावे तो भीतर लाल मेंउक, आकाशवर्ण का मंडल देखने में आवे तो पानी,
कपोत ( कबूतर ) वर्ण का मंडल देखने में आवे तो छिपकली, मँजीठ जैसा देखने में
आवे तो मेंडक, रक्त वर्ण का देखने में आवे तो शरट (गिरगिट ), पीले वर्ण का
देखने में आवे तो गोह, कपिलवर्ण का मंडल देखने में आवे तो उंदर, काले वर्ण का
देखने में आवे तो सर्प और चित्रवर्ण का मंडल देखने में आवे तो भीतर विच्छू है,
ऐसा समझना । इस प्रकार के दागवाले पत्थर वा लकड़ी हो तो संतान, लक्ष्मी,
प्राण और राज्य का विनाश कारफ है ।
"कीलिकाछिद्रसुषिर-त्रसजालकसन्धयः ।
मण्डलानि च गारश्च महादूषणहेतवे ॥"
पापाण या लकड़ी में कीला, छिद्र, पोलापन, जीवों के जाले, सांध, मंडलाकार
रेखा या कीचड़ हो तो बड़ा दोष माना है ।
"प्रतिमायां दवरका भवेयुश्च कथञ्चन ।
सदृग्वर्णा न दुष्यन्ति वर्णान्यत्वेऽतिदूषिता ।"
प्रतिमा के काष्ठ में या पाषाण में किसी भी प्रकार की रेखा ( दाग) देखने
में आवे, वह यदि अपने मूल वस्तु के रंग के जैसी हो तो दोष नहीं है, किन्तु मूल
वस्तु के रंग से अन्य वर्ण की हो तो बहुत दोषवाली समझना ।
पाससारे - प्रतिमा परि सम प्रगुत-यो चार छ। पाठ दस पारा इत्यादि की अगुस बाली पनपावें तो कभी मी मन्त्री नहीं होती, इसलिये प्रतिमा विपम भंगुत-एकवीन पांच सास नब ग्यारा इस्पादि एकी अगुतवाली पनाना चाहिये ॥३॥ भापारदिनहर में एहरिंग मपण में कहा कि- "प्रभातः सम्प्रवामि गृहमिम्मस्प सपणम् । एकासे मवेच्छष्ठ घमनाशनम् ॥ १ ॥ पडले बापते सिद्धि' पी। स्पाचतुरनुले । पञ्चासे तु वृद्धिा स्यात् उमेगस्त परशुसे ॥ २ ॥ सप्ताहुले गर्दा वृद्धि निरष्टाले मसा । मषानुले पुत्रवृद्धि बननाशो दशाङ्गुले ॥ ३ ॥ एकादशाहत मिर्म सर्वकामासापनम् । एतस्प्रमाबमाम्पाव मत मर्च न कारयेत् ॥ ४॥" अप घर में पूछने योग्य प्रतिमा का सपण कहता है । एक अंगुल की प्रतिमा श्रेष्ठ, दो अंगुष की पन का नाश करनेवाली, तीन भंगुत की सिदि करनेपाली, धार भगुल की दुख दनेपासी, पौष प्रगुल की पन धान्य और परा की वृद्धि करनेगी, छ! अंगुल की उडेग करनेवासी, सात प्रगुप्त की गौ मादि पराभों की पृद्धि करनेवाली, पाठ प्रगुल की पनि कारक, नब अंगुल की पुष भादि की वृदि करनेपाली, पश भंगुस की पन का नाश करनेपाती और म्पार मंगुस की प्रतिमा सर इच्छित कार्य की सिदि करनेवासी है। वो या प्रमार का ससे अधिक भंगुलवाली प्रतिमा पर में पूजने के लिये नहीं रखना पारिसे । पापाय और मार्ग की परीक्षा पिपिसास में इस प्रभर है- "निर्मसनारनासन पिटया भीफलसपा । पिलिप्तश्मनि काठे या प्रकट भएरर्स मबत् ॥" निर्मल कांनी फे साप पशप के फत्त की बात पीसकर पत्थर पर पानी पर सेप करने समरस (राग) मझट से मादा है।
यिम्वपरीक्षा प्रकरणम्
(८३.)
"मधुभस्मगुडव्योम-कपोतसदृशप्रभैः ।
माञ्जिष्ररुणः पीतैः कपिलैः श्यामलैरपि ।
चित्रश्च मण्डलैरेभि-रन्तज्ञेया यथाक्रमम् ।
खद्योतो वालुका रक्त-भेकोऽम्युगृहगोधिका ।
दर्दुरः कृकलासश्च गोधाखुसर्पवृश्चिकाः ।
सन्तानविभवप्राण-राज्योच्छेदश्च तत्फलम् ॥"
जिम पत्थर या काष्ठ की प्रतिमा बनाना हो, उसी पत्थर या काष्ठ के ऊपर
पूर्वोक्त लेप करने से या स्वाभाविक यदि मध के जैसा मंडल देखने में आये तो भीतर
खद्योत जानना । भस्म के जैसा मंडल देखने में आवे तो रेत, गुड़ के जैसा मंडल
देखने में आवे तो भीतर लाल मेंडक, आकाशवर्ष का मंडल देखने में आवे तो पानी,
कपोत ( कबूतर ) वर्ण का मंडल देखने में आवे तो छिपकली, मँजीठ जैसा देखने में
भावे तो मेंडक, रक्त वर्ण का देखने में आवे तो शरट (गिरगिट ), पीले वर्ण का
देखने में आवे तो गोह, कपिलवर्ण का मंडल देखने में आवे तो उंदर, काले वर्ण का
देखने में आवे तो सर्प और चित्रवर्ण का मंडल देखने में आवे तो भीतर बिच्छू है,
ऐसा समझना। इस प्रकार के दागवाले पत्थर वा लकड़ी हो तो संतान, लक्ष्मी,
प्राण और राज्य का विनाश कारक है ।
"कीलिकाछिद्रसुषिर-त्रसजालकसन्धयः ।
मण्डलानि च गारश्च महादूषणहेतवे ॥"
पाषाण या लकड़ी में कीला, छिद्र, पोलापन, जीवों के जाले, सांध, मंडलाकार
रेखा या कीचड़ हो तो बड़ा दोष माना है ।
"प्रतिमायां दवरका भवेयुश्च कथञ्चन ।
सदृग्वर्णा न दुष्यन्ति वर्णान्यत्वेऽतिदूषिता ।।"
प्रतिमा के काष्ठ में या पाषाण में किसी भी प्रकार की रेखा ( दाग) देखने
में आवे, वह यदि अपने मूल वस्तु के रंग के जैसी हो तो दोष नहीं है, किन्तु मूल
वस्तु के रंग से अन्य वर्ण की हो तो
बहुत
दोषवाली समझना।
बानुसार
कुमारमुमिहत शिल्परल में नीचे लिखे अनुसार रसाएँ राम मानी है।
"नम्पापर्चपमुम्पराघराय भीषस्सोपमा ,
शास्वस्तिकास्तिगोपनिमा शम्बुसूपिमाः ।
नसग्मजलिंगतोरणमृग-प्रासादपयोपमा,
पामा गस्टोपमाम शुमरा रेसा कपर्दोपमा ॥"
पस्थर या लकड़ी में नंपावर्च, शेषनाग, घोड़ा, भीषस्स, कहमा, राख
स्वस्तिक हाथी, गौ, पम, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, छत्र, माला, पा, पिपलिंग, मोरण,
हरिस, प्रासाद ( मन्दिर ), कमल, मन गलश शिम की पटा क साश रेखा
हो वो रामदायक हैं।
मार्च क किस २ स्थान पर रेसा (दाग)म होने चाहिये, जो पसुमदिरुव मविप्रसार
में कहा कि-
"दये मस्तके माले प्रशयोः कर्पयोर्मुखे ।
उदरे पठसल में इस्तयोः पादयोरपि ॥
एवेप्पोप सर्वेषु रेखा साम्बननीसिका।
विम्मान पत्र एपन्ते स्पबेचानि विषयमः॥
भन्पस्पानेषु मप्पस्या ग्रासफाटपियर्मिता ।
निर्मतस्निग्पशान्ता च पर्यसारूप्पशासिनी॥"
एदय, मस्तक, कपास, दोनों कंप, दोनों कान, मुख, पेट, पृष्ठ माग, दोनों
हाप मोर दोनों पग इस्पादिक प्रतिमा के किसी भंग पर या सम भंगों में नीसे पारि
रगषाप्ती रेखा हो तो उस प्रविमा को परित लोग अवश्य मोड़ दें। उक्त भंगों के
सिगासरे अंगों पर हो सो मपम है। परन्तु सराब, पीरा भादि उपयों से रहित)
सम्ब, पिकनी मौर दी ऐसी अपने पर्म सश रेखा दो दो दोपमासी नहीं है।
पातु ल मा मादि मूर्वि के सिर में मापारशिपहर में पारि-
"निर्म मणिम पन्द्र-सूर्यकान्तमयीमपम् ।
सर्व समगुर्ग क्षेत्र समी रस्नमाविमिः ॥"
पिम्यपरीक्षा प्रकरणम्
(५),
चंद्रकान्तमणि, सूर्यकान्तमणि आदि सब रत्नमणि के जाति की प्रतिमा
समस्त गुणवाली है।
"स्वर्णरूप्यताम्रमयं वाच्यं धातुमयं परम् ।
कांस्यसीसवङ्गमयं कदाचिन्नैव कारयेत् ।।
तत्र धातुमये रीति-मयमाद्रियते क्वचित् ।
निषिद्धो मिश्रधातुः स्याद् रीतिः कैश्चिच्च गृह्यते ॥"
सुवर्ण, चांदी और तावा इन धातुओं की प्रतिमा श्रेष्ठ है । किन्तु काँसी, सीसा
और कलई इन धातुओं की प्रतिमा कभी भी नहीं बनवानी चाहिये । धातुओं में
पीतल की भी प्रतिमा बनाने को कहा है, किन्तु मिश्रधातु ( कांसी आदि ) की बनाने
का निषेध किया है । किसी प्राचार्य ने पीतल की प्रतिमा बनवाने का कहा है।
"कार्य दारुमयं चैत्ये श्रीपा चन्दनेन वा ।
बिल्वेन वा कदम्बेन रक्तचन्दनदारुणा ॥
पियालोदुम्बराभ्यां वा क्वचिच्छिशिमयापि वा ।
अन्यदारूणि सर्वाणि विम्बकार्ये विवर्जयेत् ।।
तन्मध्ये च शलाकायां बिम्बयोग्यं च यद्भवेत् ।
तदेव दारु पूर्वोक्तं निवेश्यं पूतभूमिजम् ॥"
चैत्यालय में काष्ठ की प्रतिमा बनवाना हो तो श्रीपर्णी, चंदन, बेल, कदंच,
रक्तचंदन, पियाल, उदुम्बर ( गूलर ) और क्वचित् शीशम इन वृक्षों की लकड़ी
प्रतिमा बनवाने के लिए उत्तम मानी है । बाकी दूसरे वृक्षों की लकड़ी वर्जनीय है ।
ऊपर कहे हुए वृक्षों में जो प्रतिमा बनने योग्य शाखा हो, वह दोषों से रहित और
वृत्त पवित्र भूमि में ऊगा हुआ होना चाहिये ।
"अशुमस्थाननिष्पन्नं सत्रासं मशकान्वितम् ।
सशिरं चैव पाषाणं विम्वार्थ न समानयेत् ॥
नीरोगं सुदृढं शुभ्रं हारिद्रं रक्तमेव वा ।
कृष्णं हरिं च पाषाणं बिम्धकार्ये नियोजयेत् ॥"
वास्तुमारे भपवित्र स्थान में उत्पम होनेपाने, धीरा, मसा या नस पारि दोपबाहे, ऐसे पस्थर प्रतिमा के लिये नहीं जाने चाहिये। किन्तु दोपों से रहित मन्स सफेर, पीता, लाल, कम या हरे पर्यपासे पस्पर प्रतिमा के लिये साने चाहिये । खमपपुरस पयसन मुफ मूर्वित्र सरूप- थन्नुन्नजाणुकघे तिरिए केसंत थंचलते यं । सुत्तेग चउरंस पज्जकासणसह बिंबं ॥४॥ दाहिने घुटने से पेपि कंधे वक एक एस, पपि पुरने से दाहिने पे का सरा एत्र, एक पुटने से दूसरे घुटने का विरवादीसरा स्त्र, और नीचे पस्त्र की किनार से कपाल के केस सक पौया स्त्र । इस प्रकार इन चारों एषों का प्रमाण पराबर हो सो मह प्रतिमा समचतुरस संस्थानगाली कही बाती है। ऐसी पर्वकासन (पमासन ) बानी प्रतिमा शुम कारक है ॥ ४ ॥ पर्यनसन का स्वरूप विवापिसात में इस प्रकार है- "नामो दधिमनस्पोर्यो पर्यघिः करोऽपि प । दपियो पाममस्पो-स्तस्पर्पडासन मतम् ॥" बैठी हुई प्रविमा के दाहिनी नपा और पियडी के मर पाया हाथ मौर पाया परण रखना चाहिए । सथा पापी बंपा और पिपी के उपर दाहिना परम भौर राहिना हाप रखना चाहिये। ऐसे मासन को पर्यकासन काते हैं। माविमा की कमाई का प्रमाण- नवताल हवह रूव रूवस्स य बारसंगुलो तालो । थंगुल अहहियसयं उड्ढे यामीण छप्पन ॥५॥ प्रतिमा की ऊंचाई नव वान की है। प्रतिमा के ही पार भंगुप्त को पकवात कहते हैं। प्रतिमा क मास के प्रमाण से कायोरसर्गप्पान में सही प्रविमा ना वास अर्थात् एक सौ माठ मगुप्त मानी है और पपासन से बैठी प्रतिमा पप्पन भएर मानी ॥१॥ ।
विम्वपरीक्षा प्रकरणम् (८७) खड़ी प्रतिमा के अंग विभाग- भालं नासा वयणं गीव हियय नाहि गुज्झ जंघाइं। जाणु अपिडि श्र चरणा 'इक्कारस ठाण नायव्वा ॥ ६ ॥ ललाट, नासिका, मुख, गर्दन, हृदय, नाभि, गुह्य, जंघा, घुटना, पिण्डी और चरण ये ग्यारह स्थान अंगविभाग के हैं ॥६॥ भंग विभाग का मान- चउ पंच वेय रामा रवि दिणयर सूर तह य जिण वेया । जिण वेय 'भायसंखा कमेण इथ उड्ढरूवेण ॥७॥ ऊपर जो ग्यारह अंग विभाग बतलाये हैं, इनके क्रमशः चार, पांच, चार, तीन, बारह, बारह, बारह, चौवीस, चार, चौवीस और चार अंगुल का मान खड़ी प्रतिमा के है । अर्थात् ललाट चार अंगुल नासिका पांच अंगुल, मुख चार अंगुल, गरदन तीन अगुल, गले से हृदय तक बारह अंगुल, हृदय से नाभि तक चारह अंगुल, नाभि से गुह्य भाग तक बारह अंगुल, गुह्य भाग से जानु ( घुटना ) तक चौवीस अंगुल, घुटना चार अंगुल, घुटने से पैर की गांठ तक चौवीस अंगुल, इससे पैर के तल तक चार अंगुल, एवं कुल एक सौ आठ अंगुल प्रमाण खड़ी प्रतिमा का मान है ।। ७ ॥ पद्मासन से बैठी मूर्ति के अंग विभाग- भालं नासा वयणं गीव हियय नाहि गुज्झ जाणू श्र। श्रासीण-बिंबमानं पुव्वविही अंकसंखाई ॥८॥ कपाल, नासिका, मुख, गर्दन, हृदय, नाभि, गुह्य और जानु ये आठ अंग बैठी प्रतिमा के हैं, इनका मान पहले कहा है उसी तरह समझना । अर्थात् कपाल , " १ पाठान्तरे-भाख नासा वयण थणसुत्त नाहि गुज्य उरू अ । जाणु श्र जंघा चरणा श्रदह ठाणागि जाणिज्जा ॥ २ पाठान्तरेचर पच वेम तेरस चउदस दिएनाह तह प जिण वेया । जिण घेया मापसखा कमेण इम उड्डस्वेण ॥
(८) पालसारे - पार, नासिका पांच, मुख पार, गक्षा सीन, गमे से एप तक बारह हदय से नामि सरपारह नामि से गुम (इन्द्रिय ) सरुबारह और मानु (घुटना) माग पार अंगुल, इसी प्रकार कुत्त छप्पन बगुल बैठी प्रतिमा का मान है॥८॥ निगमराचार्य भी वसुपदि पूविष्ठासार में दिगम्बर निगमूर्वि सरूप इस प्रकार है- "सालमात्र मुख वा ग्रीवाघमतरशम् । फएम्तो पय याय भन्तर द्वादशाकुलम् ।। तासमा सतो नामि-नामिर्मेद्वान्तरं मुखम् । मेवान्ततर तन्दै-ईस्तमात्र प्रकीचितम् ।। वेदाङ्गुलं मवेन्वानु- नुगुम्फान्तर करः । वेदाङ्गुल समारम्पा गुम्फपादसलान्तरम् ॥" मुख की ऊचाई पारा अंगुस, गक्षा की उंचाई पार भंगुत, गले से हदय तक का अन्तर पारा भंगुल, दय से, नामी तक का अन्तर पारह भगुप्त, नामि से सिंग तफ मन्तर पार प्रगुप्त, लिंग से भानु पक मन्सर पोपीस अंगुस, मानु (पटना) की सपा पार भंगुत्ता खानु से गुम्फ (र की गोठ ) व भतर चौमीस भंगुस और गुरफ से पैरवस का भवर धार भंगुस, इस प्रकार कापोत्सर्ग सड़ी प्रतिमा की ऊंचाई इस एक सौ माठ' (१०८) भंगुस। "बादशात्तविस्तीर्ण-मापत मादागुलम् । साद स्वोगान्वं त्रिपासप पपाझमम् ।। रागुम्माय वर्गद् ससाट नासिका " 1 मोकी जमवा धाम मैगपुराने पनागर शिसपाप माप मा गिर प्रतिमा जलमा स्थिर गिरप्रमालिनी | रेने बरपतिको कमीबामा। . नि मेरिना और मन में मितिमा समान पान को बौन (1) गुवानीमापारे।
का मान
समचतुरस्र पद्मासनस्थ श्वेताम्बर जिनमूर्ति
-
लि
समचतुरस पासनस्थ दिगंबर मिनमूर्षि प्रमान.
प्रयोस्सगस्प० मिनमर्मिक मान
प्रपोत्सर्गस्थ वि०मिममूर्तिमान
बिम्बपरीक्षा प्रकरणम् (९) चारह अंगुल विस्तार में और बारह अंगुल लंबाई में केशांत भाग तक मुख करना चाहिये । उसमें चार अंगुल लंवा ललाट, चार अंगुल लंबी नासिका और चार अंगुल मुख दाढी तक बनाना । "फेशस्थानं जिनेन्द्रस्य प्रोक्तं पञ्चाङ्गलायतम् । उष्णीषं च ततो ज्ञेय-मङ्गलद्वयमुन्नतम् ॥" जिनेश्वर का केश स्थान पांच अंगुल लंवा करना । उसमें उष्णीष (शिखा) दो अंगुल ऊंची और तीन अंगुल केश स्थान उन्नत बनाना चाहिये । पद्मासन से बैठी प्रतिमा का स्वरूप 'ऊर्ध्वस्थितस्य मानार्द्ध-मुत्सेधं परिकल्पयेत् । पर्यकमपि तायत्तु तिर्यगायामसंस्थितम् ।।" कायोत्सर्ग खड़ी प्रतिमा के मान से पद्मासन से बैठी प्रतिमा का मान आधा अर्थात् चौवन ( ५४ ) अंगुल जानना । पद्मासन से वैठी प्रतिमा के दोनों घुटने तक सूत्र का मान, दाहिने घुटने से वॉये कंधे तक और पाये घुटने से दाहिने कंधे तक इन दोनों तिरछे सूत्रों का मान, तथा गद्दी के ऊपर से केशांत भाग तक लंबे सूत्र का मान, इन चारों सूत्रों का मान बरावर २ होना चाहिये। मूर्ति के प्रत्येक अंग विभाग का मान- मुहकमलु चउदसंगुलु कन्नतरि वित्थरे दहग्गीवा । छत्तीस-उरपएसो सोलहकडि सोलहकडि सोलतणुपिंडं ॥ १ ॥ दोनों कानों के अंतराल में मुख कमल का विस्तार चौदह अंगुल है। गले का विस्तार दस अंगुल, छाती प्रदेश छत्तीस अंगुल, कमर का विस्तार सोलह अंगुल और तनुपिंड (शरीर की मोटाई ) सोलह अंगुल है ॥ ६ ॥ कन्नु दह तिन्नि वित्थरि घड्ढाई हिहि इक्कु श्राधारे। केसंतवड्दु समुसिरु समुसिरु सोयं पुण नयणरेहसमं ॥ १०॥ कान का उदय दश भाग और विस्तार तीन भाग, कान की लोलक भढाई भाग नीची और एक भाग कान का आधार है । केशान्त भाग तक मस्तक के बरा- घर अर्थात् नयन की रेखा के समानान्तर तक ऊंचा कान बनाना चाहिये ॥ १० ॥ - पास्तुसारे नकसिहाग भायो एगंतरि चक्खु चउरदीहत्ते । दिवड्डुदइ इक्कु डोलह दुभाइ भउ हळु छद्दीहे ॥ ११ ॥ नासिका की विसा के मम्म गर्मसूत्र से एक २ माग र मास रखना चाहिये । भाव पार माग पी और ए भाग पौड़ी, पाँख की काली कीकी एक भाग, दो भाग की सृष्टी भोर मास के नीचे का (कपोह ) भाग ब भगुत संवा रखना चाहिये ॥११॥ नक्कृतिवित्थरि दुदए पिंडे नासग्गि इक्क यधु सिहा । पण भाय श्वहर दीहे वित्थरि एगंगुलं जाण ॥ १२ ॥ नासिका विस्तार में तीन भाग, दो माग पदय में, नासिका मन माग एक भाग मोटा और भई भाग की माफ की शिखा रखना चाहिये । रोटरी बाई पांच माग और विस्तार पर भगुम का मानना ॥ १२॥ पण उदइ चउ वित्थरि सिरिवच्छं बमसुत्मज्मम्मि । दिवढंगुलु थणवट्ट वित्यरं उडचि नाहेगं ॥ १३ ॥ मप्रसूत्र ए मप्प माग में छावी में पांच माम के सरसमाना और चार माग के विस्तारवासा भीपस्स करना । र भगुस के विस्वार पाशा गोन स्तन बनाना और एक २ माग विस्तार में गहरी नामि करना चाहिये ।। १३ ।। सिरिवच्छ सिदिणकपर्खतरम्मितह मुसल छपण थट्ट कमे । मुणि-वउ रवि-वसु-चेया कुहिणी मणियंघु जघ जाणु पयं॥१४॥ भीररस और स्तन मंसर या माग, स्तन भौर काँसका भंवर पाप माग, समत (रूप) माठ माग हानी साव भंगुप्त, मणिप पार भंगुता चंपा पार माग मानु माठ भाग और पैर की पड़ी पार माग इस प्रकार सब का विस्तार मामना ॥१०॥ यणमुत्तग्रहोभाए भुपवारसग्रंस उवरि छहि क्धं । नाहीउ किरइ बट्टे पाथो केसमंताथो ॥ १५ ॥ - विम्वपरीक्षा प्रकरणम् (११) स्तनसूत्र से नीचे के भाग में भुना का प्रमाण चारह भाग और स्तनसूत्र से ऊपर स्कंध छ: भाग समझना । नाभि स्कंध और केशांत माग गोल बनाना चाहिये ।। १५ ॥ कर-उयर-यंतरेगं चउ-वित्थरि नंददीहि उच्छंगं । जलवहु दुदय तिवित्थरि कुहुणी कुच्छितरे तिनि ॥ १६ ॥ हाथ और पेट का अंतर एक अंगुल, चार अंगुल के विस्तारवाला और नव अंगुल लंबा ऐसा उत्संग ( गोद ) बनाना । पलाठी से जल निकलने के मार्ग का उदय दो अंगुल और विस्तार तीन अंगुल करना चाहिये । कुहनी और कुक्षी का अंतर तीन अंगुल रखना चाहिये ।। १६ ।। बंभसुत्ताउ पिंडिय छ-गीव दह-कन्नु दु-सिहण दु-भालं । दुचिबुक सत्त भुजोवरि भुयसंधी ग्रहपयसारा ॥ १७ ॥ ब्रह्मसूत्र ( मध्यगर्भसूत्र ) से पिंडी तक अवयवों के अर्द्ध भाग-छः भाग गला, दश भाग कान, दो भाग शिखा, दो भाग कपाल, दो भाग दाढ़ी, सात भाग भुजा ऊपर की भुनसंधि और आठ भाग पैर जानना ।। १७ ॥ जाणु यमुहसुत्तायो चउदस सोलस अढारपइसारं । समसुत्त-जाव-नाही पयकंकण-जाव छन्भायं ॥ १८ ॥ दोनों घुटनों के बीच में एक तिरछा सूत्र रखना और नाभि से पैर के कंकण के छ: भाग तक एक सीधा समसूत्र तिरछे सूत्र तक रखना । इस समसूत्र का प्रमाण पैरों के कंकण तक चौदह, पिंडी तक सोलह और जानु तक अठारह भाग होता है । अर्थात् दोनों परस्पर घुटने तक एक तिरछा सूत्र रखा जाय तो यह नाभि से सीधे अठारह भाग दूर रहता है ।। १८ ॥ पइसारगभरेहा पनरसभाएहि चरणअंगुह्र । दीहंगुलीय सोलस चउदसि भाए कणिडिया ॥ ११ ॥ के
पातुसारे
चरण के मध्य भाग की रेखा पर भाग अर्थात् एड़ी से मध्य भंगुली तक
पंद्रा भगुल लश, भगठे तक सोलह भंगुल और कनिष्ठ (छोटी) अंगुली तक
चौदह मंगुर इस प्रकार वरण बनाना चाहिये ॥ १६ ।।
करयलगमाउ कमे दीहंगुलि नदे थट्ट पक्खिमिया ।
छच्च कणिहिय भणिया गीवुदए तिन्नि नायब्वा ॥ २०॥
करवत (स्पेसी) के मम माग से मध्य की संबी अंगुली तक नष भंगुल,
मम्प भगुसी के दोनों तरफ की वर्धनी मोर भनामिका भंगुसी सक भाठ २ भगुस
और कनिष्ठ भंगुती का भंगुन, या येती का प्रमाण जानना । गले का पदप
तीन भाग जानना ॥ २० ॥
मज्मि महत्वगुलिया पणदीहे पक्खिमी थ चउ चउरो।
लहु अंगुलि भायतिय नह-इकिकं ति श्रगुट्ठ ॥ २१ ॥
मध्य की पड़ी भगुती पाच माग सपी, गम की दोनों (वर्मनी और
मनामिका ) भंगुती पार २ भाग लपी, बोटी अंगुली तीन माग सगी और मगूठा
तीन माग संपा करना चाहिये । सप गुलियों के नख एक एक भाग करना
पाहिये ॥ २१॥
यंगुट्टसहियक्रपलवट्ट सत्तंगुलस्स वित्यारो।
परणं सोलसदीहे तयद्धि वित्यिन्न चउरदए ॥ २२ ॥
अंगूठे के साथ करनसपर का विस्तार सात भगुल करना । परम पोला
भंगुस सा, माठ अंगुल पाया और पार भगुस कंघा (एपी से पैर की गोठ तक)
करना॥ २२॥
गीव तह कन्न थतरि खणेय वित्वारि दिवड्दु उदइ तिग।
थंचलिय घट्ट वित्परि गहिय मुह जाव दीहेण ॥ २३ ॥
पिम्वपरीक्षा प्रकरणम् (१३) गला तथा कान के अंतराल भाग का विस्तार डेढ़ अंगुल और उदय तीन अंगुल करना । अंचलिका ( लंगोड ) आठ भाग विस्तार में और लबाई में गादी के मुख तक लंबा करना ॥ २३ ॥ केसंतसिहा गद्दिय पंचट्ठ कमेण अंगुलं जाण । पउमुड्ढरेहचक्कं करचरण-विहूसियं निच्चं ॥ २४ ॥ केशांत भाग से शिखा के उदय तक पांच भाग और गादी का उदय आठ भाग जानना । पद्म ( कमल ) ऊर्ध्व रेखा और चक्र इत्यादि शुभ चिन्हों से हाथ और पैर दोनों सुशोभित बनाना चाहिये ॥ २४ ॥ ब्रह्मसूत्र का स्वरूप-- नक सिरिवच्छ नाही समगम्भे वंभसुत्तु जाणेह । तत्तो अ सयलमाणं परिगरविवस्स नायव्वं ॥ २५ ॥ जो सूत्र प्रतिमा के मध्य-गर्भ भाग से लिया जाय, यह शिखा, नाक, श्रीवत्स और नाभि के बराबर मध्य में प्राता है, इसको ब्रह्मसूत्र कहते हैं। अब इसके वाद परिकरवाले विव का समस्त प्रमाण जानना ।। २५ ।। परिकर का स्वरूप- सिंहासणु बिबायो दिवढयो दीहि वित्थरे श्रद्धो। पिंडेण पाउ घडियो रूवग नव ग्रहव सत्त जुयो ॥ २६ ॥ सिंहासन लंबाई में मूर्ति से डेढ़ा, विस्तार में श्राधा और मोटाई में पाव भाग होना चाहिये। तथा गज सिंह आदि रूपक नव या सात युक्त बनाना चाहिये ॥ २६ ॥ उभयदिसि जक्खजक्खिणि केसरि गय चमर मज्झि-चक्कधरी । चउदस बारस दस तिय छ भाय कमि इन भवे दीहं ॥ २७॥ सिंहासन में दो तरफ यक्ष और यक्षिणी अर्थात् प्रतिमा के दाहिनी भोर यक्ष और बाँयी ओर यक्षिणी, दो सिंह, दो हाथी, दो चामर धारण करनेवाले और पानुसार मम में चक्र को पारम करनेवाली परपरी देषी पनाना। इनमें प्रस्पेसमाप इस प्रकार है-चौदा २ भाग के प्रत्येक पच मौर यपिणी, पारा २ माग के दो सिंह, दश २ माग के दो साथी, वीन २ भाग के दो वर करनेवाले, और का माग की मम्प में परवरी देवी, एवं कुल ८४ भाग जम्मा सिंहासन हमा ॥ २७ ॥ चक्कघरी गरुडका तस्साहे धम्मवक्क उभयदिसं । हरिणजुधे रमणीय गदियमज्झम्मि जिणचिरहं ।। २८ ।। सिंहासन के मध्य में मो चरपरी देवी है पा गरी समारी परनेवाती है, उनकी चार सभामों में उपर की दोनों समामों में पक, तया नीचे की दाहिनी समा में परदान और पौंपी समा में पिबोरा रखना चाहिये । इस पळेश्वरी देवी के मीपे एक धर्मपक बनाना, इस धर्मचक्र के दोनों तरफ मुन्दर एक २ परिय पमाना भौर गादी के मम भाग में मिनेश्वर भगवान् का पिन करना चाहिये ॥ २८ ।। घउ कणाइ दुन्नि छज्जह पारस हत्यिहिं दुन्नि थह फयाए। थड थक्वरवट्टीए एवं सीहासणस्सुदय ॥ २१ ॥ पार माग दागपीठ (कमी), दो भाग का बना, बारा माग का नापी मादि रूप, दो माग की कमी और माठ भाग प्रपर पड़ी, एवं इ०२८ भाग सिंगा सन का उदयमानना ॥ २६ ॥ परिकर के पतपारे (गत के माग) स्वरूप- गहियमम-चसु माया तत्तो गतीस-चमरघारी य । तोरणसिर दुवालस इथ उदयं परखवायाण ॥३०॥ प्रतिमा दी गदीरापर भाठ भाग परपारी पा कारसग्गीये की गारी करना, इसके ऊपर एकवीस माग रे पामर धारण करनासे देव या कारस्सग ज्यान में ही प्रतिमा करना और इसके ऊपर तोरण क शिर कापार माग रसना, एपंत कापन माग पसारा उदयमान समझमा ॥ ३०॥ .
विम्वपरीक्षा प्रकरणम्
( १५ )
सोलसभाए रूवं धुंभुलिय-समय छहि वरालीय ।
इअ वित्थरि बावीसं सोलसपिंडेण पखवायं ॥ ३१ ॥
सोलह भाग थंभली समेत रूप का अर्थात् दो २ भाग की दो थंभली और
बारह भाग का रूप, तथा छह भाग का वरालिका ( वरालक के मुख आदि की
प्राकृति ), एवं कुल पखवाड़े का विस्तार बाईस भाग और मोटाई सोलह भाग है। यह
पखवाड़े का मान हुआ ॥३१॥
परिकर के ऊपर के डउला (छत्रवटा) का स्वरूप-
छत्तद्धं दसभायं पंकयनालेग तेरमालधरा ।
दो भाए थंभुलिए तह वंसधर-वीगाधरा ॥ ३२ ॥
तिलयमज्झम्मि घंटा दुभाय थंभुलिय छच्चि मगरमुहा ।
इथ उभय दिसे चुलसी-दीहं डउलस्स जाणेह ॥ ३३ ॥
आधे छत्र का भाग दश, कमलनाल एक माग, माला धारण करनेवाले
भाग तेरह, थंभली दो भाग, बंसी और वीणा को धारण करनेवाले या बैठी प्रतिमा का
भाग आठ, तिलक के मध्य में घंटा (घूमटी ), दो भाग थंमली और छ: भाग मगरमुख
एवं एक तरफ के ४२ भाग और दूसरी तरफ के ४२ भाग, ये दोनों मिलकर कुल
चौरासी भाग डउला का विस्तार जानना ॥ ३२॥३३॥
चउवीसि भाइ छत्तो बारस तस्सुदइ अट्ठि संखधरो।
छहि वेणुपत्तवल्ली एवं डउलुदये पन्नासं ॥ ३४ ॥
चौवीस भाग का छत्र, इसके ऊपर छत्रत्रय का उदय बारह भाग, इसके ऊपर पाठ
भाग का शंख धारण करनेवाला और इसके ऊपर छ: भाग के वंशपत्र और लता, एवं
कुल पचास भाग डउला का उदय जानना ।। ३४ ।।
छत्तत्तयवित्थारं वीसंगुल निग्गमेण दह-भायं ।
भामंडलवित्थारं बावीसं अट्ठ पइसारं ॥ ३५॥
पास्तुसारे प्रविमा रे मस्तक पर के छत्रत्रय का विस्तार बीस भगुल मौर निर्गम इस माग करना। मामरस का विस्तार बाईस भाग पौर मोर्गा पाठ माग करना ॥ ३५ ॥ मालघर सोलसंसे गहंद पहारसम्मि ताणुवरे । इरिणिंदा उभयदिस तथो थ दुदुहिथ सखीय ॥ ३६॥ दोनों तरफ माता पारय करनमाल इंद्र सोला २ माम और उनके ऊपर दोनों तरफ पठाग २ माग के एक २ हाथी, उन हापियों के ऊपर पैठे इए परिप गोपीदव पनाना, उनके सामने दुदमी पानेाजे और मप्प में पत्र के ऊपर अंत बमानेमासा बनाना चाहिये ।। ३६ ।। विवद्धि डउलपिंड छत्तसमेयं हवइ नायव्वं । थणसुतसमादिट्ठी चामरघारीण कायब्वा ॥ ३७॥ छत्रय समेस उरला की मोटाई प्रविमा स पापी मानना | पसपा में पामर धारण करनेवाले की मा काउस्मग पानस्म प्रतिमा की रष्टि मूसनायक प्रविमा के परापर स्वनपत्र में करना ॥ ३७॥ जइ इति पंच तित्था इमेहिं भाएहि तेवि पुण फुब्बा । उस्सग्गियस्स जुधले विवजुग मूलविवेग ॥ ३८ ॥ पसपारे में मारे दो पामर धारद करनेवाले हैं, उस ही स्थान पर दो कारस्सग ध्यानस्प प्रतिमा तथा उसा में वहां पंश भौर बीणा पारण करनेवाले है, परी पर पपासनस्प बैठी हुई दो प्रतिमा पर एक मूलनापक, इसी प्रकार पंचवीपी परि परिकर में करना हो सो पूर्वात मो माग पामर वंश मौर वीषा पारय करने पास कर, उसी माग प्रमाण से पंचवीथी करना पारिसे ।। ३८॥ प्रविमा रेशुमाराम सपण-- परिममयायो उड्ढे ज वित्र उत्तमेहिं सठविय । विमलंगु वि पूइबइ त बिवं निष्फलं न जओ ॥ ३१ ॥ ,
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परिकर का स्वरूप
पास्नुसारे
प्रतिमा के मस्तक पर के चाय का विस्तार बीस भगुल मौर निर्गम इस
माग परना। मामरस का विस्तार पास भाग मोर मोटाई भाठ भाग करना ॥ ३५ ॥
मालघर सोलसंसे गहंद पहारसम्मि ताणुवरे ।
हरिणिंदा उभयदिस तथो य दुदुहिय संस्त्रीय ॥ ३६॥
रोनो परफ माला धारण करनेवाले इद्र सोला २ माग के और उनके ऊपर
दोनों तरफ भाग २ भाग के एक २ हाथी, ग्न पापियों के ऊपर बैठे हुए हरिय
गमेपीदेव बनाना, उनके सामन इंदुमी मनानेवाले और मम्प में पत्र के सर शख
पमानवाता बनाना पाहिले ।। ३६ ।।
विवद्धि डउलपिंड छत्तसमेयं हवइ नायव्व ।
थणसुतसमादिही चामरघारीण कायब्वा ॥ ३७॥
छात्रय समेत गला की मोटाई प्रविमा स भाषी मानना | पखवारे में पापर
धारण करनेवाले की या काउस्मग मानस्प प्रविमा की प्टि मूखनापक प्रविमा रे
परापर स्वनपत्र में करना ।। ३७ ॥
जर इति पंच तित्या इमेहिं भाएईि तेवि पुण कुना।
उस्सग्गियस्स जुथल विवजुग मूलविवेगं ॥ ३८॥
पसबारे में मां दो पामर धारण करनेवाले हैं, उसी स्थान पर दो
पारस्सग मानस्य प्रतिमा पाउला में यहां पंश और पीणा पारय करनेवाले,
पी पर पपासनस्य बैठी हुई दो प्रतिमा और एक मूलनायक, इसी प्रकार पचवीपी
परि परिकर में करना हो तो पूर्वाज बो माग चामर पंग और मीया पारय करने
पालेकर, उसी माग प्रमाण से पंचवीभी मी करना पारिसे ।। २८ ॥
प्रविमा शुमाराम सपण-
वरिससयायो उड्ढे जे बिंब उत्तमेहिं संठविय ।
विमलंगु वि पूडब्बइ तं पियं निष्फल न जओ ॥ ३१ ॥
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अर्द्ध पद्मासन वाली प्राचीन पार्श्वजिन मूर्ति
पार्श्वनाथ भगवान की खडी मूर्ति प्राबू
परिरमौर तारय पुत पी पारसनापति समवसरण र मर्माना मार बिम्बपरीक्षा प्रकरणम् (१७) - - - जो प्रतिमा एक सौ वर्ष के पहले उत्तम पुरुषों ने स्थापित की हुई हो, वह यदि विकलांग (बेड़ोल ) हो या खंडित हो तो भी उस प्रतिमा को पूजना चाहिये । पूजन का फल निष्फल नहीं जाता ॥ ३९ ॥ मुह-नक-नयण-नाही-कडिभंगे मूलनायगं चयह । आहरण-वत्थ-परिगर-चिराहायुहभंगि पूइज्जा ॥ ४० ॥ मुख, नाक, नयन, नाभि और कमर इन अंगों में से कोई अंग खंडित हो जाय तो मूलनायक रूप में स्थापित की हुई प्रतिमा का त्याग करना चाहिये । किन्तु आभरण, वस्त्र, परिकर, चिन्ह, और आयुध इनमें से किसी का भंग हो जाय तो पूजन कर सकते हैं ॥४०॥ धाउलेवाइबिंब विअलंग पुण वि कीरए सज्जं । कहरयणसेलमयं न पुणो सज्जं च कईयावि ॥४१॥ धातु ( सोना, चांदी, पित्तल आदि ) और लेप ( चूना, ईंट, माटी आदि) की प्रतिमा यदि अंग हीन हो जाय तो उसी को दूसरी बार बना सकते हैं । किन्तु काष्ठ, रत्न और पत्थर की प्रतिमा यदि खडित हो जाय तो उसी ही को कभी भी दूसरी बार नहीं बनानी चाहिये ॥४१॥ आचारदिनकर में कहा है कि- "धातुलेप्यमयं सर्व व्यङ्गं संस्कारमईति । काष्ठपाषाणानिष्पन्न संस्काराई पुनर्नहि ।। प्रतिष्ठिते पुनर्बिम्बे संस्कारः स्यान्न कहिचित् । संस्कारे च कृते कार्या प्रतिष्ठा तादृशी पुनः ।। संस्कृते तुलिते चैव दुष्टस्पृष्टे परीक्षिते । हृते विम्बे च लिङ्गे च प्रतिष्ठा पुनरेव हि ।।" धातु की प्रतिमा और ईंट, चूना, मट्टी आदि की लेपमय प्रतिमा यदि विकलांग हो जाय भर्थात् खंडित हो जाय तो वह फिर संस्कार के योग्य है । अर्थात् उस ही को , ।
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मंगा पुगतवार बमुख जिन मति
निवार परतु पाठ मुक मासूम
बोले
(बबन म्युबिचम)
भररस्य
विभागार मिन मुनि
विम्वपरीक्षा प्रकरणम् (७) . जाय - जो प्रतिमा एक सौ वर्ष के पहले उत्तम पुरुषों ने स्थापित की हुई हो, वह यदि विकलांग ( बेड़ोल ) हो या खंडित हो तो भी उस प्रतिमा को पूजना चाहिये । पूजन का फल निष्फल नहीं जाता ॥ ३९ ॥ मुह-नक-नयण-नाही-कडिभंगे मूलनायगं चयह । आहरण-वत्थ-परिगर-चिराहायुहभंगि पूइज्जा ॥४०॥ मुख, नाक, नयन, नाभि और कमर इन अंगों में से कोई अंग खंडित हो जाय तो मूलनायक रूप में स्थापित की हुई प्रतिमा का त्याग करना चाहिये । किन्तु आभरण, वस्त्र, परिकर, चिन्ह, और आयुध इनमें से किसी का भंग हो, तो पूजन कर सकते हैं।॥ ४०॥ धाउलेवाइविंबं विअलंगं पुण वि कीरए सज्ज । । कट्टरयणसेलमयं न पुणो सज्जं च कईयावि ॥४१॥ धातु ( सोना, चांदी, पित्तल आदि ) और लेप ( चूना, ईंट, माटी आदि) की प्रतिमा यदि अंग हीन हो जाय तो उसी को दूसरी बार बना सकते हैं । किन्तु काष्ठ, रत्न और पत्थर की प्रतिमा यदि खडित हो जाय तो उसी ही को कभी भी दूसरी बार नहीं बनानी चाहिये ।। ४१ ॥ श्राचारदिनकर में कहा है कि- "धातुलेप्यमयं सर्व व्यङ्गं संस्कारमर्हति । काष्ठपाषाणनिष्पन्न संस्काराई पुनर्नहि ।। प्रतिष्ठिते पुनर्विम् संस्कारः स्यान्न कहिचित् । संस्कारे च कृते कार्या प्रतिष्ठा तादृशी पुनः ।। संस्कृते तुलिते चैव दुष्टस्पृष्टे परीक्षिते । हृते बिम्त्रे च लिङ्गे च प्रतिष्ठा पुनरेव हि ।।" धातु की प्रतिमा और ईंट, चूना, मट्टी आदि की लेपमय प्रतिमा यदि विकलांग हो जाय अर्थात् खंडित हो जाय तो वह फिर संस्कार के योग्य है । अर्थात् उस ही को - - (१५) पास्तुसारे फिर पनवा सकते है। परन्तु हाती या पस्पर की प्रतिमा संविदो बार वो हिर संरचर के योग्य नहीं है । एष प्रतिष्ठा होने पाद कोई भी प्रविमा कामी HEAR नहीवा , पदि कारणवश पर सस्कार करना पड़ा वो फिर पूर्ववत् ही प्रविप्न करानी पारि । मानि-प्रविष्ठा होने बाद मिस मर्षि का संस्कार करमा परे, बोधना परे, इष्ट ममुप्प का सर्यो नाप, परीषा करनी पड़े या पोर चोरी करने नाम वो फिर पसी मूर्ति की पूर्ववत् ही प्रविष्ठा करानी पारिरे । परमंदिर में पूर्वये लायक मूर्ति पसलप- पाहाणलेबकट्ठा दतमया चिचलिहिय जा पडिमा । अप्परिगरमाणाहिय न सुदरा पूयमाणगिहे ॥ ४२ ॥ पापार, सेप, अप्ठ दांव और चित्राम की नो प्रविमा है, पर परि परिकर से पहिवो और ग्पारा भगुन के मान से भपिको वो पूषन करनेवाजेपर में प्रया नहीं।।४२॥ परिभरवासी प्रतिमा परिव की और पिना परिकर की प्रविमा सिर की है। सिकी प्रतिमा परमदिर में पास के सिवाय पस्पर, सेप, सालीपाव वा पिनाम की पनीरो को नहीं रखना चाहिये । परिव की मूर्वि रेसिपे भी भीसकसचन्द्रो पामायत प्रतिष्ठाकम्प में कार- "मस्ती नेमी वीरो गिहमवणे सापए प पारमा । इगपीस विरपपरा सविग प्रयापदे ।।" मन्जीमाय, नेमनाप भौर महावीर सामी पे तीन तीरों की प्रतिमा भाषण को परमदिर में न पूमना पाहिये । बिन्तु इसकीस सीकरी की प्रतिमा परमदिर में बावितरक पूजनीय मौर परनीय है। निमिनापो पीरमण्डी मापौ बारहा। प्रयो मे मबने स्याप्पा न गरे रामापका ॥"
चिम्यपरीक्षा प्रकरणम्
(8)
नेमनाय स्वामी, महावीर स्वामी और मल्लीनाथ स्वामी ये तीनों तीर्थकर
वैराग्यकारक हैं, इसलिये इन तीनों को प्रासाद (मंदिर) में स्थापित करना शुमकारक
है, किन्तु घरमंदिर में स्थापित करना शुभकारक नहीं हैं।
इक्कंगुलाइ पडिमा इक्कारस जाव गेहि पूइज्जा।
उड्ढं पासाइ पुणो इअ भणियं पुव्वसूरीहिं ॥ ४३ ॥
घरमंदिर में एक अंगुल से ग्यारह अंगुल तक की प्रतिमा पूजना चाहिये,
इससे अर्थात् ग्यारह भंगुल से अधिक बड़ी प्रतिमा प्रासाद में ( मंदिर में ) पूजना
चाहिये ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है ॥ ४३ ॥
नह-अंगुलीअ-बाहा-नासा-पय-भंगिणु कमेण फलं ।
सत्तुभयं देसभंगं बंधण-कुलनास-दव्वक्खयं ॥४४॥
प्रतिमा के नख, अंगुली, बाहु, नासिका और चरण इनमें से कोई अंग खंडित
हो जाय तो शत्रु का भय, देश का विनाश, बंधनकारक, कुल का नाश और द्रव्य
का क्षय, ये क्रमशः फल होते हैं ॥४४॥
पयपीढचिराहपरिगर-भंगे जनजाणभिच्चहाणिकमे ।
छत्तसिरिवच्छसवणे लच्छी-सुह-बंधवाण खयं ॥ ४५ ॥
पादपीठ चिन्ह और परिकर इनमें से किसी का भंग हो जाय तो क्रमशः स्वजन, वाहन
और सेवक की हानि हो । छत्र, श्रीवत्स और कान इनमें से किसी का खंडन हो जाय
तो लक्ष्मी, सुख और बंधन का क्षय हो ॥ ४५ ॥
बहुदुक्ख वकनासा हस्संगा खयंकरी य नायव्वा ।
नयणनासा कुनयणा अप्पमुहा भोगहाणिकरा ॥४६॥
यदि प्रतिमा वक्र (टेढी) नाफवाली हो तो बहुत दुखकारक है। इस्व
(छोटे) अवयववाली हो तो क्षय करनेवाली जानना । खराब नेत्रवाली हो तो
नेत्र का विनाशकारक जानना और छोटे मुखवाली हो तो भोग की हानिकारक
मानना ॥४६॥
(10) बास्तुपारे - - प कडिहीणायरियहया सुयबंधवं इण हीणजघा यं । होणासण रिविहया धणक्खया हीणकरचरणा ॥४७॥ प्रतिमा परि कटि हीन हो तो प्राचार्य का नाशकारक है। हीन मंपावासी हो वो पुत्र और मित्र का पप करे। हीन भासनपानी होवो रिदि का विनाशकारको। बाप और धरण से दीन हो तो धन का पय करनेवाप्ती मानना ॥४७॥ उत्ताणा अत्थहरा वकमणीवा सदेसमंगरा । अहोमुहा य सचिंता विदेसगा हवइ नीचुच्चा ॥४८॥ प्रतिमा यदि कर्व मुखवाली हो वो धन का नाशकारक है, टेरी गरदनवासी हो तो सदेश का विनाश करनेवाली है। भपोमुखषाशी हो तो पिता उस्सम करनेवाली और कंप नीच मुखबाली हो तो विदेशगमन करानेवासी बानना ॥ ८ ॥ विसमासण-वाहिका रोरकरगणायदव्वनिप्पन्ना। हीणाहियंगपडिमा सपक्खपरपक्खकटकरा ॥ ४६॥ प्रविमा यदि बिपम भासनवासी हो तो माघि करनेवाली है। से पैदा किये हुए पन से बनवाई गई हो वो पा प्रतिमा दुम्काल करनेवाली मानना । न्यूनाधिक भगवाली हो सो सपथ को मौर परपच को कष्ट देनेवाली है ॥ १६ ॥ पडिमा रउद्द जा सा करावय इति सिप्पि अहियंगा। दुबलदव्वविणासा किसोअरा कुणइ दुभिक्खं ॥ ५० ॥ प्रविमा यदि राद्र (मपानक) हो करानेपासे का भार भपिक मग पासी हो सो शिम्पी का विनाश करे । दुर्वल भगवासी हो तो द्रम्प का मिनाए करे मोर पसी कमरवाती हो तो दुर्भिप करे ॥ ५० ॥ उड्ढमुही घणनासा थप्पूया तिरिदिष्टि विन्नेया। यघट्टदिदि थमुहा हवड़ अहोदिहि विग्धकरा ॥५१॥ । प्रन्याय - यिस्वपरीक्षा प्रकरणम् ( १०१ ) , प्रतिमा यदि ऊर्ध्व मुखवाली हो तो धन का नाश करनेवाली है। तिरछी दृष्टिवाली हो तो अपूजनीय रहे। अति गाढ दृप्टिवाली हो तो अशुभ करने वाली है और अघोष्टि हो तो विघ्नकारक जानना ॥ ५१ ॥ चउभवसुराण आयुह हवंति केसंत उप्परे जइ ता। करणकरावणथप्पणहाराण पाणदेसहया ॥ ५२॥ चार निकाय के ( भुवनपति, व्यंतर, ज्योतिपी और चैमानिक ये चार योनि में उत्पन्न होने वाले ) देवों की मूर्ति के शस्त्र यदि केश के ऊपर तक चले गये हों तो ऐसी मूर्ति करने वाले, कराने वाले और स्थापन करने वाले के प्राण का और देश का विनाशकारक होती है ॥ ५२ ॥ यह सामान्यरूप से देवों के शस्त्रों के विषय में कहा है, किन्तु यह नियम सब देवों के लिये हो ऐसा मालूम नहीं पड़ता, कारण कि भैरव, भवानी, दुर्गा, काली आदि देवों के शस्त्र माथे के ऊपर तक चले गये हैं, ऐसा प्राचीन मूर्तियों में देखने में आता है, इसीसे मालूम होता है कि ऊपर का नियम शांत वदनवाले देवों के विपय में होगा। रौद्र प्रकृतिवाले देवों के हाथों में लोहू का खप्पर या मस्तक प्राय: करके रहते हैं, ये असुरों का संहार करते हुए देख पड़ते हैं, इसलिये शस्त्र उठायें रहने से माथे के ऊपर जा सकते हैं तो यह दोप नहीं माना होगा, परन्तु ये देव भी शाान्तचित्त होकर ठें हों ऐसी स्थिति की मूर्ति बनवाई जाय तो इनके शस्त्र उठायें न रहने से माथे ऊपर नहीं जा सकते, इसलिये उपरोक्त दोष बतलाया मालूम होता है । चउवीसजिण नवग्गह जोइणि-चउसट्टि वीर-बावन्ना । चउवीसजक्खजक्खिणि दह-दिहवइ सोलस-विज्जुसुरी॥५३॥ नवनाह सिद्ध-चुलसी हरिहर बंभिंद दाणवाईणं । वण्णंकनामश्रायुह विस्थरगथाउ जाणिज्जा ॥ ५४ ॥ इति परमजैनश्रीचन्द्राङ्गज ठक्कुर 'फेरु' विरचिते वास्तुसारे वास्तुपारे पका - पौनीस मिन, नवना, पौसठ योगिनी, पावन पीर, चौबीस चौबीस पपिवी, दश दिक्षाल, सोना विधादेवी, नव नाप, चौरासी सिम मिपा, महादेव, प्रमा, इन्द्र और दानव इत्यादिक देवों के पर्य, विक्ष, नाम और मायुध मादित विस्तार पूर्वक पर्सन मन्य प्रयों से बानना चाहिये ॥ ५३ ॥ ५४॥ प्रय प्रासाद-भकरणं हत्तीयम् । भणियं गिहलक्खणाइ विवपरिक्खाइ-सयल्गुणदोस । सपड़ पासायविही संखेवणं णिसामेह ॥१॥ समस्त गुण मौर दोप पुन पर के अपम और प्रतिमा के सपर मैंने पासे का है। मप प्रासाद (मंदिर) बनाने की विधि को संप से प्रता, इसको मुनो ॥१॥ पढम गाविवर' जलतं यह फफरतं कुणह । कुम्मनिवेसं यह खुरस्सिला तयण सुत्तविही ॥२॥ प्रासाद करने की भूमि में इतना गहरा साव खोदना कि बस भागाप या करवासी कठिन भूमि मा माय । पीछे उस गहरे सोदे हुए साव में प्रथम मन्म में धर्मशिसा स्पापित करना, पीछे माठौं दिशा में माठ घरणिता स्थापित करना । इसके बाद स्वनिपि करना चाहिये ॥ २ ॥ रेसम मेगिम मारिणी और रिवारमा ससस इमी प्रबोपीमिरे रिचार्मरेमसमरामारि'मा मगर पर ममेरे। 'णारा 'मारि मार दिया।
प्रासाद प्रकरणम् (१०१) कुशिला का प्रमाण प्रासादमण्डन में कहा है कि- "अर्धाङ्गुलो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये । अागलात् ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधिः ॥ एकत्रिंशत्करान्तं च तदा वृद्धिरिष्यते । ततोऽर्दापि शतार्द्धान्तं कुर्यादगुलमानतः ॥ चतुर्थांशाधिका ज्येष्ठा कनिष्ठा हीनयोगतः । सौवर्णरौप्यजा वापि स्थाप्या पञ्चामृतेन सा ॥" एक हाथ के विस्तारवाले प्रासाद में आधा अंगुल की कूर्मशिला स्थापित करना । क्रमश: पंद्रह हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधे २ अंगुल की पद्धि करना। अर्थात् दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ अंगुल, इसी प्रकार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल वढाते हुए पंद्रह हाय के प्रासाद में साढे सात अंगुल की कूर्म-शिला स्थापित करें। आगे सोलह हाथ से इकतीस हाथ तक पाव २ भंगुल बढाना, अर्थात् सोलह हाथ के प्रासाद में पाणे भाठ अंगुल, सत्रह हाथ के प्रासाद में आठ अंगुल, अठारह हाथ के प्रासाद में सवा आठ अंगुल, इसी प्रकार प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल गढ़ावें तो इकतीस हाथ के प्रासाद में साढे ग्यारह अंगुल की कूर्मशिला स्थापित करें। भागे बत्तीस हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ माघ २ पाव भंगुल अर्थात् एक २ जव की कूर्मशिला बढाना । अर्थात् बत्तीस हाथ के प्रासाद में साढे ग्यारह अगुल और एक जव, तेत्तीस हाथ के प्रासाद में पौंणे पारह भंगुल, इसी प्रकार पचास हाथ के विस्तारवाले प्रासाद में पौणे चौदह अंगुल और एक जव की बड़ी कूर्मशिला स्थापित करें। जिस मान की कूर्मशिला आवे उसमें भपना चौथा भाग जितना अधिक बढावे तो ज्येष्ठमान की और अपना चौथा भाग जितना घटादे तो कनिष्ठ मान की कूर्मशिला होती है। यह कूर्मशिला सुवर्ण या चांदी की बनाकर पंचामृत से स्नान करवाकर स्थापित करना चाहिये ।
।..) पास्तुसारे - पौवीस जिन, मषना, चौसठ योगिनी, पावन पीर, पौवीस पक, चौबीस यदिबी दश दिसाल, सोखह विपादेवी, नव नाय, चौरासी सिद्ध विमा महादेव, प्रमा, इन्द्र और दानव इत्यादिक देशों के पर्य, घिह, नाम और माइप माविप विस्तार पूर्पक वर्णन अन्य प्रपों से मानना चाहिये ।। ५३ ॥ ५४॥ अथ मासाद-प्रकरणं हत्तीयम् । भणिय गिहलक्खणाइ विवपरिक्खाइ-सयलगुणदोसं । सपइ पासायविही सखेवणं णिसामेह ॥१॥ समस्त गुण और दोप युक्त पर के सषण और प्रतिमा के समय मैंने पासे का है। भव मासाद (मंदिर) बनाने की विधि को संप से करता है, इसको सुनो ॥१॥ पढम गाविवर' जलंतं यह फकरतं कुणह' । फुम्मनिवेसं यहूं खुरस्सिला तयणु सुचविही ॥ २ ॥ प्रासाद करने की भूमि में इतना गहरा साप खोदना कि अस भामाप या कंकरपासी कठिन भूमि मा चाप । पीके उम्र गहरे सोये हुए सात में प्रथम मम में धर्मशिसा स्थापित करना, पीछे भाडे दिशा में माठ सुरशिता स्थापित करना। इसके बाद पिपि करना चाहिये ॥२॥ • मेशिन मास ४ । विपासीरिया समी बीणि रिपाकम समयनुपारित ' मायो पाओवासरे। 'पापा । 'मापिम भाव' इति एमपो ।
(१०५) प्रासाद प्रकरणम् । प्रासाद के पीठ का मान-- पासायायो श्रद्धं तिहाय पायं च पीढ-उदओ अ। तस्सद्धि निगमो होइ उववीढ जहिच्छमाणं तु ॥ ३॥ प्रासाद से आधा, तीसरा या चौथा भाग पीठ का उदय होता है। उदय से आधा पीठ का निर्गम होता है। उपपीठ का प्रमाण अपनी इच्छानुसार करना चाहिये ।। ३ ।। पीठ के थरों का स्वरूप- अड्डथरं' फुल्लिअओ जाडमुहो कणउ तह य कयवाली। गय-अस्स-सीह नर-हंस-पंचथरइं भवे पीठं ॥४॥ इति पीठः ॥ अड्डथर, पुष्पकंठ, जाड्यमुख ( जाड्यंबो), कणी और केवाल ये पांच थर सामान्य पीठ में अवश्य होते हैं। इनके ऊपर गजथर, अश्वथर सिंहथर, नरथर, और हंसयर इन पांच थरों में से सब या न्यूनाधिक यथाशक्ति वनाना चाहिये । सामान्य पीठ का स्वरूप- HOMERIENDRAासपट्टी केपाल मन्तरपन की जाइभ । Hzi भीर जीर ! 'महुथर' इति पाठान्तरे।
पास्तुसारे -- का da . मपिता मोर वारिधिमा सम्प- - सस धर्मशिक्षा का स्वरूप विकर्मा रुव पीरार्यष ग्रन्त्र में परसाया है कि धर्मशिसारे ना माग करके प्रत्येक माग के पर पूर्वादि दिशा के पष्टिक्रम से सार) मप्फ मेरर, मगर, प्रास, पूर्वकम, सर्प और शंख ये पाठ विशामों के भागों में और मम्प भाग में कनुमा बनाना चाहिये । कर्मणिसा को स्थापित करके पीचे उसके कार एक नाली देवके सिंहासन तक रखी माती उसको प्रासाद की नामि काते हैं। मपम धर्मशिला को मम्म में स्थापित करके पीछे मोसार में नंदा, मना बया, रिया, मनिवा, मपराधिका, या, सौमागिनी और घरबी से ना सुरशिला धर्मशिला को प्रदपिया करती हई पूर्णादि सष्टिकम से स्थापित करना पाहिये । नपणी 'घरबी शिक्षा को मम्प में धर्मशिता के नीचे स्थापित करना चाहिये । इन 'नदा मादि शिसामों पर मनुफम से पम, पित, दर, तलवार, नामपास) पबा, गदा और प्रियत इस प्रचार दिगपालों का शव बनाना पाहिले भौर परवी शिक्षा पर विमा का पापनाना चाहिये। शिक्षा समापन पराक्रम- "ईशानादग्निकोपाचा शिसा स्पाप्पा प्रदपिसा । मम्मे धर्मशिला पपा गीतबावित्रमशः ॥" अपम मम में सोना या चांदी की धर्मशिक्षा स्मापिस करके पीछे नो पाठ सुर शिता, ये ईशान पूर्व पग्नि मादि प्रदषिणक्रम से गीत पात्र की मांगासिक पनि पूर्वक स्थापित करें। १तिकमाइनिक मिनी बोपमा सिमेस्मविषामते है। -- 1 .
(१०५) प्रासाद प्रकरणम् प्रासाद के पीठ का मान- पासायायो श्रद्धं तिहाय पायं च पीढ-उदओ अ । तस्सद्धि निगमो होइ उवधीद्ध जहिच्छमाणं तु ॥३॥ प्रासाद से प्राधा, तीसरा या चौथा भाग पीठ का उदय होता है। उदय से श्राधा पीठ का निर्गम होता है। उपपीठ का प्रमाण अपनी इच्छानुसार करना चाहिये ॥ ३ ॥ पीठ के थरों का स्वरूप अड्डथरं' फुल्लिअओ जाडमुहो कणउ तह य कयवाली। . गय-अस्स-सीह-नर-हंस-पंचथरइं भवे पीठं ॥४॥ इति पीठः ।। अड्डथर, पुष्पकंठ, जाड्यमुख ( जाज्यवो), कणी और केवाल ये पांच थर सामान्य पीठ में अवश्य होते है। इनके ऊपर गजथर, अश्वथर सिंहथर, नरथर, और हंसथर इन पांच थरों में से सब या न्यूनाधिक यथाशक्ति बनाना चाहिये । सामान्य पीठ का स्वरूप-- COPE हासमा केपाल जाउमा भी भी ! 'महुथर' इति पाठान्सरे।
पास्तुमारे
पाप पर युक महापीठ बसरूप-
पर
REMIRAHANE
--
जब
सिरीविजयो महापउमो नंदावतो अलच्छितिलमो अ।
नरवेअ कमलईसो कुंजरपासाय सत्त जिणे ॥५॥
भीषिमय, महापप, नंपार, सरमीसितक, नरपेदकमसईस और बरसे
सात प्रासाद मिन मगान के लिये उचम है ॥५॥
बहुमेया पामाया थस्सखा विस्सकम्मणा भणिया ।
तचो थ केसराई पणवीस भणामि मुलिला ॥५॥
प्रोसाद प्रकरणम् (१०७) विश्वकर्मा ने अनेक प्रकार के प्रासाद के असंख्य भेद बतलाये हैं, किन्तु इनमें अति उचम केशरी आदि पचीस प्रकार के प्रासादों को मैं (फेरु) कहता हूँ ॥ ६॥ 'पच्चीस प्रकार के प्रासादों के नाम- केसरि अ सव्वभद्दो सुनंदणो नंदिसालु नंदीसो । तह मंदिरु सिरिवच्छो अमिअब्भवु हेमवंतो अ॥७॥ हिमकूडु कईलासो पुहविजओ इंदनीलु महनीलो । भूधरु अ रयणकूडो वइड्डुज्जो पउमरागो अ॥ ८॥ वज्जगो मुउडुज्जलु अइरावउ रायहंसु गरुडो अ। वसहो अतह य मेरु एए पणवीस पासाया ॥९॥ केशरी, सर्वतोभद्र, सुनदन, नंदिशाल, नंदीश, मन्दिर, श्रीवत्स, अमृतोद्भव, हेमवंत, हिमकूट, कैलाश, पृथ्वीजय, इंद्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूड, वैडूर्य, पद्मराग, चोक, मुकुटोज्वल, ऐरावत, राजहंस, गरुड, वृषम और मेरु ये पच्चीस प्रासाद के क्रमशः नाम है ॥ ७-८॥ - पच्चीस प्रासादों के शिखरों की संख्या-- पण अंडयाइ-सिहरे कमेण चउ वुड्ढि जा हवइ मेरु । मेरुपासायअंडय-संखा इगहियसय जाण ॥ १०॥ पहला केशरी प्रासाद के शिखर ऊपर पांच अडक (शिखर के आसपास जो छोटे छोटे शिखर के आकार के रखे जाते हैं उनको अंडक कहते हैं, ऐसे प्रथम केशरी प्रासाद में एक शिखर और चार कोणे पर चार अंडक हैं । ) पीछे क्रमशः चार २ अंडक मेरुप्रासाद तक बढ़ाते जावे तो पच्चीसवाँ मेरु प्रासाद के शिखर पर कुल एक सौ एक अंडक होते हैं ।। १०॥ 1 इम पच्चीस प्रासादों का सचित्र सविस्वरवर्णन मेरा अनुवादित 'प्रासादमरन' अन्य जो अब अपने- वाला है उसमें देखो। .
. - (१०) पास्पसारे बैसे केगरी प्रासाद में शिखर समेत पांच अंडर, सर्वतोभद्र में नर, सुनंदन प्रासाद में रह, नंदिशाल में समा, नंदीश में इफीस, मन्दिरप्रासाद में पचीस, श्रीवत्स में उनपीस, अमृतोमर में देतीस, हेमंत में सतीस, मस्ट में इकतालीस, कैलाश में पैदाशीस, पृथ्वीजप में सन-पघाम, इन्द्रनीत में अपन, महानील में सचा पन, भूघर में इसठ, रत्नर में पैसठ, वैदर्द में उनसचर (६६), पचराग में विचर) पाक में सवार, मुकुटोन्यन में इस्मासी, ऐराम में पचासी, रामहंस में नेपासी,गम में सिराणये, अपम में सचान और मेल्यासाद के ऊपर परसो एक गिलर होते हैं। पीपार्यपादि शिल्प प्रयों में पतुर्वरावि विष मादि के मासार न सलप बाम भारि के भेदों से वो पतलाया है, उसका सारांश इस प्रकार है- 'कमसम्पपप्रासाद (अपमाधिनप्रासाद)-सस माग ३२ । कोण माग ३, कोसी माग १, प्रविर्य भाग ३, कोणी माग १, उपरप भाग २, नंदी माग १, भनाई भाग ४=१६+१६-३२ । २ कामदायक (ममितपनम) प्रासाद-वतमाग १२ । कोप २, प्रतिकर्म २, मद्राई २-६+६=१२॥ ३ शम्मषबानमप्रासाद-वस माग है । कोख १. कोणी , प्रतिकर्जा १, नंदी है। भद्राई १३-४+। ४ ममतोमर (ममिनंदन) प्रासाद-तत माग । कोख मादि का दिमाग कपर मजब। ५ पितिपय (समविवनभ) प्रासाद-मन भाग १६ । कोप २, प्रतिकर्ष २, उपरथ २, मद्राई २८+:-१६ । ६ पपराग (पचप्रम) प्रासाद-मत्त भाग १६ । होय पारिता विमाग रूपर मुघर। ७ पुपारनभप्रासाद-उल माग १० । काय २, प्रतिकण । भद्राई १६५+५=१०॥ - चंद्रप्रमप्रामाद- भाग ३२ कोस ५, कोसी १, प्रतिकर्य, नदी, भद्राई ४-१६+ १५०३२॥
प्रासाद प्रकरणम्
( १०६)
६ पुष्पदंत प्रासाद-तल भाग १६ । कोण २, प्रतिकर्ण २, उपरथ २,
भद्रार्द्ध २८+८=१६
१० शीतलजिन प्रासाद- तल भाग २४ । कोण ४, प्रतिकर्ण ३, भद्रार्द्ध
५%१२-+-१२=२४ ।
११ श्रेयांसजिन प्रासाद-तल भाग २४ । कोण आदि का विभाग
ऊपर मुजब ।
१२ वासुपूज्य प्रासाद-तल भाग २२। कोण ४, कोणी १, प्रतिकर्ण ३,
नंदी १, मद्रार्द्ध २=११+११=२२ ।
१३ विमलवल्लभ (विष्णुवल्लभ) प्रासाद-तल भाग २४ । कोण ३, कोणी १,
प्रतिकर्ण ३, नंदी १, भद्रार्द्ध ४=१२+१२=२४ ।
१४ अनंतजिन प्रासाद-तल माग २०। कोण ३, प्रतिकणं ३, नंदी १,
भद्रार्द्ध ३=१० + १०=२० ।
१५ धर्मविवर्द्धन प्रासाद-तल भाग २८ । कोण ४, कोणी १, प्रतिकर्ण ४
नंदी १, भद्रार्द्ध ४=१४+१४=२८ ।
१६ शांतिजिन प्रासाद-तल भाग १२ । कोण २, कोणी ३, प्रतिकणं १३,
नंदी ३, भद्रार्द्ध १६-६+६=१२ ।
१७ कुंथुवल्लभ प्रासाद- तल भाग ८ | कोण १, प्रतिकर्ण १, नंदि
भद्राई १६-४+४==
१८ अरिनाशन प्रासाद-तल भाग ८ । कोण भाग २, भद्रार्द्ध २=४+४==
१६ मन्लीवल्लभ प्रासाद- तल भाग १२ । कोण २, कोणी , प्रतिकर्ण १३,
नंदी , भद्राई १६-६+६=१२।
२० मनसंतुष्ट ( मुनिसुव्रत ) प्रासाद-तल भाग १४ । कोण २, प्रतिकर्ण २,
मद्रार्द्ध माग ३=७+७=१४ ।
(११.)
वास्तुमारे
२१ ममिवन्सम प्रासाद- भाग १६ । कोख ३, प्रसिकल २, भद्राई
भाग ३-८+८-१६ ।
२२ नेमिकल्सम प्रासाद-वन भाग २२ । कोख २, कोमी १, प्रतिकर्ण २,
कोपी १, उपरप २, नंदिन १, मद्राई २=११+ ११-२२ ।
२२ पापम्लम प्रासाद-पस माग २८ । ब, कोपी २, प्रतिकर्ष ३,
नंदिवर, मद्राई ४-१४+१४ =२८ ।
२५ पीरविक्रम (पीरमिनपन्सम) प्रासाद-पत भाग २४ । कोर ३,
कोबी १, प्रविकर्म ३, नंदी १, भद्राई ४% १२+१२= २४ ।
मासार संख्या-
एएहि उवज्जती पासाया विविइसिहरमाणाओ।
नव सहस्स छ सय सत्तर वित्थारगथाउ ते नेया ॥११॥
मनेक प्रकार के शिखरों के मान से नव हमार का सो सचर (६६७०)
प्रासार उत्तम होते हैं। उनका सविस्तर वर्णन अन्य प्रम्पों से मानना ॥ ११ ॥
मासादयसमाम स्पा-
पउरसमि उ खित्ते अट्ठाइ दु वुड्ढि जाव बावीसा ।
मायविराई एवं सब्वेसु वि देवभवणेसु ॥ १२ ॥
समस्त देवमन्दिर में समचौरस मूतगम्मारे के तलमाम का पाठ, दया
पारा, चौवा, मोजा, मठारा, बीस या पाईस माग करना चाहिये ॥ १२॥
भासार का स्वरूप
उपर चउमदा सब्बे पासाय हुति नियमेण ।
कूणस्सुमय दिसेहिं दलाइ पढिहोंति भदाई ॥ १३ ॥
पडिरह वोलिंजरया नदीसुकमेण ति पण सच दला।
पल्लविय करणिक अवस्स भइस्स दुण्हदिसे ॥ १४ ॥
प्रासाद प्रकरणम् ( १११ ) चार कोना और चार भद्र ये समस्त प्रासादों में नियम से होते हैं। कोने के दोनों तरफ प्रतिभद्र होते हैं ॥१३॥ भद्र-रविन न? उपर पर डा प्रकिन प्रतिकम फर्ण-सका ओसार- रेलाकणे Inteps Licen समहल भद-78 ओसार भोसार प्रासादतल भट्र-रमा उपर AAA प्रतिकर्ण पनिक LIFE कर्ण-पा यह प्रासाद का नकशा प्रासाद मंडन और अपराजित आदि ग्रंथों के आधार से सम्पूर्ण अवयवों के के साथ दिया गया है, उसमें से इच्छानुसार बना सकते हैं। प्रतिरथ, वोलिंजर और नंदि इनका मान क्रम से तीन, पांच और साढ़े तीन भाग समझना । मद्र की दोनों तरफ पल्लविका और कर्णिका अवश्य करके होते हैं ॥ १४ ॥ दो भाय 'हवइ कूणो कमेण पाऊण जा भवे गंदी। पायं एग दुसड्ढं पल्लवियं करणिकं भदं ॥१५॥ दो भाग का कोना, पीछे क्रम से पाव २ भाग न्यून नंदी तक करना । पाव भाग, एक भाग और पढ़ाई भाग ये क्रम से पल्लव, कर्णिका और भद्र का मान समझना ॥१५॥ भद्दद्धं दसभायं तस्साओ मूलनासियं एगं । पउणाति ति य सवाति य कमेण एयंपि पडिरहाईसु ॥१६॥ भद्रार्द्ध का दश भाग करना, उनमें से एक भाग प्रमाण की शुकनासिका करना। पौने तीन, तीन और सवा तीन ये क्रम से प्रतिस्थ आदि का मान समझना ॥ १६ ॥ , 'कूणमो हुई' इति पाठान्तरे २ 'ऽहलेह सुकमेण नायब्व' । ।
पाससारे मासारभंग- कूण पडिरह य रह मई मुहभह मूलभगाइ । नंदीकरणिक पल्लव तिलय तवंगाइ भूसण्यं ॥१७॥इति विस्तर.। कोना, प्रतिरप, रथ, मद्र और मुखभद्र ये प्रासाद के भंग हैं। सपा नंदी, कविका, परजव, विशक बोर वग मादि प्रासाद के भूपस में ॥ १७ ॥ मएटोपर के रह पर- सुर कुंभ कलस कइवलि मची जंघा य छज्जि उरजंघा । मरणि सिरवट्टि छज्ज य वइराहु पहारु तेर थरा ॥१८॥ गतिय दिवड्दु तिसुकमिपणमड्ढा इग दुदिवढ दिवढो अ। दो दिवड्डु दिवट्ठ भाया पणवीस तेर घरमाण ॥१॥ सुर, म, कलश, केवास मची, नंगा, बमि उरचपा, भरपी, शिरापटी, बमा, राहु और पहारू मे मन्टोवर क सदय के रह पर हैं ॥१८॥ पपरोक वेरा घरों का प्रमास क्रममा एक, तीन, रेड सेन, रेहसारे पापा एक, योग र, दोगौर है। प्रर्यात् पीठ के ऊपर सुरा से सेपर काम के भव तक मंडरोवर के सदय का परबीस माग करना उनमें नीचे से प्रथम एक माम का सुरा, तीन माग न कुम, प भाग का कसण, ग माम का केवास, ग भाम की मैची, सारे पाप माग की संपा, एक माग की बानसी, दो माम की परनंपा माम की भरपी, ग माम की शिगवटी, दो माग का पना, भाप का बेराड और रे माग का पहारु इस प्रकार पर का मान है ।। १ ।। - " - प्रासाद प्रकरणम् ( १९३) प्रासादमण्डन में नागरादि चार प्रकार के मंडोवर का स्वरूप इस प्रकार कहा १-नागर जाति के मंडोवर का स्वरूप- "वेदवेदेन्दुभक्ते तु छाद्यान्तो पीठमस्तकात् । खुरकः पञ्चभागः स्याद् विंशतिः कुम्भकस्तथा ॥१॥ कलशोऽष्टौ द्विसाई तु कर्त्तव्यमन्तरालकम् । कपोतिकाष्टौ मञ्ची च कर्तव्या नवमागिका ॥ २॥ त्रिंशत्पश्चयुता जड्या तिथ्यंशा उद्गमो भवेत् । वसुभिर्भरणी कार्या दिग्भागैश्च शिरावटी ॥ ३ ॥ अष्टांशो; कपोताली द्विसार्द्धमन्तरालकम् । छाद्यं त्रयोदशांशैश्च दशमागैर्विनिर्गमम् ॥ ४॥" प्रासाद की पीठ के ऊपर से छज्जा के अन्त्य भाग तक मंडोवर के उदय का १४४ माग करना । उनमें प्रथम नीचे से खुर पांच भाग का, कुंम बीस भाग का, कलश आठ भाग का, अंतराल (अंतरपत्र या पुष्पकंठ ) ढाई भाग का, कपोतिका ( केवाल ) आठ भाग की, मञ्ची नव भाग की, जंघा पैंतीस भाग की, उद्गम (उरुजंघा) पंद्रह भाग का, भरणी भाठ माग की, शिरावटी दश माग की, कपोतालि ( केवाल ) आठ भाग की, अंतराल (पुष्पकंठ ) ढाई भाग का और छज्जा तेरह भाग का करना । छज्जा का निर्गम (निकासू ) दश भाग का करना । २-मेरु जाति के मंडोवर का स्वरूप- "मेरुमण्डोवरे मञ्ची भरण्यूर्वेऽष्टभागिका । पञ्चविंशतिका जंघा उद्गमश्च त्रयोदशः ॥५॥ अष्टांशा मरणी शेषं पूर्ववत् कल्पयेत् सुधीः ।" मेरु जाति के प्रासाद के मंडोवर में मञ्ची और भरणी के ऊपर शिरावटी ये दोनों आठ २ माग की करना । जंघा पच्चीस भाग की, उद्गम ( उरुघा ) तेरह भाग की और भरणी आठ भाग की करना । बाकी के थरों का भाग नागर जाति के मंडोवर की तरह समझना । कुल १२६ भाग मंडोवर का जानना ।
(१५) पास्तुसारे ३-सामान्य मरोवर का स्वरूप- "सप्तमागा भवेन्माची फूट छापस्स मस्सके ॥६॥ पोरणांशाः पुनर्भया मरणी सप्तमागिका । शिरावटी चतुर्मागा पदः स्यात् पम्पमागिका ॥ सूरि फुटबार्य च सर्वकामफलप्रदम् । कुंमफस्य युगाशेन स्वावराणो प्रमेशकम् ।।८।। 'सामान्य मंगेवर में मम्धी सात माग की करना । नाके पर टपकाय करना । सपा सोसा भाग की, मरगी सात माग की, शिरावटी चार माग की, केवाह पांच भाग की पौर छन्मा पारह माम का करना । बाकी के परों का मान मेरु बाति के मपरोवर के समाफिक समझना । यह मएडोबर सब कार्य में फसदायक ५-अन्य प्रकार से मंगेपर का स्वरूप- पीठतरचापपर्यम्त सप्तविंशविमाजिवम् । द्वारयाना खुरादीनां भागसंम्पा क्रमेव च ॥ स्मादेकवेदसाई-साईसाएमिलिमिः । साईसाईमार्गमा दिसामग्रनिर्गमम् ॥" पीठ ने सर से छन्ना के अन्य भाग तक मोर क उदय का सचाईस माग करना । उनमें सुर मादि पारा यरों की माम संस्था क्रमशः इस प्रकार है- सुर एक माम, म पार माग, कसरा रेर माग, पुप्पकाठ भाषा माग, वानरेर माग, मची माग, अंपा माठ माग, सपा तीन माग, मरपी रेर माग, देवास रे माग, पुष्पकंठ भापा भाग और घना राई भाग इस प्रकार स माग के मरोवर का सस्प है। या निर्गम एक माग करना । है। १ महमपावार नियमी मिशी पाय धराम चोमपुरा मेहार जिस पात्र मामक पुस्तक मह मन और विविधर कविसीम बम भाग में सामान्य ममेयर र प्रभाव में माग महल मुमकिमही है। वैसे-'विरानुमाया बस मिनी "शिरापटी मा माय मा वि। माता मंग्रेस ममा चा पापमपम झाप 'चार गमनमा ममें से पापापभन्न विते है एवं भाषान्तर में भापविमो में माग बम बमा सारी वर्ग बापूरमको समाधानविपरागवायो गेमर पर ही लिया।
प्रासाद प्रकरणम्
( १९४)
नारमार-२०
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वास्तुसारे
मासार (पालय) मान-
पासायस्स पमाणं गणिज्ज सहमिचिकुंभगथरायो ।
तस्स य दस मागायोदो दो मित्ती हि रसगम्मे ॥२०॥
पाहर के माग से $मा के पर से दीवार के सारित प्रासाद का प्रमाव गिनना
पाहिये । वो मान मारे इसका दश माग करमा, इनमें दो २ माग की दीवार और
का माग का पर्मगह (गमारा ) फरना चाहिये ॥ २० ॥
मासार इस प्रमाण-
छग दु ति चउ पण हत्ये पासाइ खुराउ जा पहारूयरो।
नव सत्त पण ति एर्ग थंगुलजुत्त कमेणुदय ॥२१॥
एक बाप के विस्तारपाले प्रासाद की ऊंचाई एक हाप और नव अंगुस,
दो बाप रेपिरवारवाले प्रासाद की ऊंचाई दो हाथ और सात मगुस, तीन हाप
के विस्तारपा प्रासाद की ऊंचाई वीनाथ और पांच प्रगुल, पार पाप
पिस्वार पासे प्रासार की ऊंचाई पार हाथ और तीन अंगुल, पाप सापक विस्तार
पाते प्रासाद की ऊंचाई पाप हाय और एक अंगुस है। या बुरा से सेकर पारू
पर तक के मैडोवर का उदयमान सममाना ॥२१॥
प्रासादमसम में मी कहा कि-
रस्तादिपम्पपर्यन्तं विस्तारेवोदयः समः ।
स फ्रमा नपसप्तेपु-रामचन्द्राजुयापित्रम् ॥"
एक से पांच बाप क के विस्तारवाचे प्रासाद की ऊंचाई विस्तार के
बरार करना प्रति प्रमशः एक, दो, चीन, चार और पांच हाप करना, परन्तु इनमें
क्रम मम, सातपाप, दीन और एक अंगुल निवना अधिक समझना।
इच्चाइ खयाणंते पहिहत्थे चउदसगुलविहीणा ।
इथ उदयमाण भणिय थयो य उड्ढ भवे सिहर ॥२२॥
प्रासाद प्रकरणम् (११७ ) पांच हाथ से अधिक पचास हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ चौदह २ अंगुल हीन करना चाहिये अर्थात् पांच हाथ से अधिक विस्तारवाले प्रासाद की ऊंचाई करना हो तो प्रत्येक हाथ दश २ अंगुल की वृद्धि करना चाहिये । जैसे-छः हाथ के विस्तारवाले प्रासाद की ऊचाई ५ हाथ और ११ अंगुल, सात हाथ के प्रासाद की ऊंचाई ५ हाथ और २१ अंगुल, आठ हाथ के प्रासाद की ऊंचाई ६ हाथ और ७ अंगुल, इत्यादि क्रम से पचास हाथ के विस्तारवाले प्रासाद की ऊंचाई २३ हाथ और १६ अंगुल होती है । यह प्रासाद का अर्थात् मंडोवर का उदयमान कहा । इसके ऊपर शिखर होता है ॥ २२ ॥ " प्रासादमण्डन में अन्य प्रकार से कहा है- "पश्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशद्यावच्छतार्द्धकम् । हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धि-मनुसूर्या नवाङ्गुला ॥" पांच से दश हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाय चौदह २ अंगुल की, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल की और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ नव २ अगुल की वृद्धि करना चाहिये। शिखरों की ऊंचाई- दूणु पाऊणु भूमजु नागरु सतिहाउ दिवड्ड सप्पाउ । दाविडसिहरो दिवड्ढो सिरिवच्छो पऊण दूणो अ॥२३॥ भ्रमज जाति के शिखर का उदय पौने दुगुणा (१३), नागर जाति के शिखर का उदय अपना तीसरा भाग युक्त ( १६), डेढा (१६), या सवाया (११) । द्राविड़ जाति के शिखर का उदय डेढा ( १ ) और श्रीवत्स शिखर का उदय पौने दुगुना (१३) है ॥ २३ ॥ प्रासाद के मान से
1
पातुसारे
प्रासार मिसप) मान-
पासायस्स पमाणं गणिज्न सहमित्तिकुंभगथरायो ।
तस्स य दस भागाथोदो दो मिती हि रसगम्मे ॥२०॥
पार के माग से इंमा के घर से दीवार के साति प्रासाद का प्रमाण गिनना
पाहिये । मो मान भावे इसका दश माग करना, इनमें दो २ भाग की दीवार और
बा भाग का गर्मगृह (गमारा ) करना चाहिये ॥ २० ॥
मासार के पत्र ममाण-
छग दु ति चउ पण इत्वे पासाह खुराउ जा पहारूयरो।
नव सत्त पण ति एगे भंगुलजुत्तं कमेणुदय ॥२१॥
एक हाय के विस्तारपाले प्रासाद की ऊंचाई एक हाय और नग अंगुस,
रोहाप विस्तारपाले प्रासाद की ऊंचाई दो शाम और सात भगुल, तीन हाप
के विस्तारमा प्रासाद की ऊंचाई वीन हाप और पांच प्रगुत, चार हाय रे
विस्वार वाले प्रासार की ऊंचाई चार हाप और तीन अंगुस, पांच बारे विस्तार
मासे प्रासाद की ऊंचाई पाच हाय और एक भंगुछ है। या खुरा से लेकर पहारू
पर तक के मंडोवर का उपमान समम्ना ॥ २१ ॥
प्रासादमएडन में मी कहा है कि-
"स्वादिपम्पपर्यन्तं विस्तारसोदयः समः।
स क्रमाद् मबसप्तेपु-रामचन्नाचाधिकम् ।।"
एक से पांच शाप तक के विस्वारबासे प्रामाद की ऊंचाई विस्तार के
बराबर करना मा क्रमशः एक, दो, तीन, पार और पांच हायपरमा, परन्तु इनमें
कम से नम, सावपांचवीन और एक अंगुल बिना मपित समझना ।
इच्चाइ खाणते पडिहत्ये चउदसंगुलविहीणा ।
इथ उदयमाण भणिय यथो य उड्ढं भवे सिहरं ॥२२॥
प्रासाद प्रकरणम् ( १९७) - , पांच हाथ से अधिक पचास हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ चौदह २ अंगुल हीन करना चाहिये अर्थात् पांच हाथ से अधिक विस्तारवाले प्रासाद की ऊंचाई करना हो तो प्रत्येक हाथ दश २ अंगुल की वृद्धि करना चाहिये । जैसे-छः हाथ के विस्तारवाले प्रासाद की ऊचाई ५ हाथ और ११ अंगुल, सात हाथ के प्रासाद की ऊंचाई ५ हाथ और २१ अंगुल, आठ हाथ के प्रासाद की ऊंचाई ६ हाथ और ७ अंगुल, इत्यादि क्रम से पचास हाथ के विस्तारवाले प्रासाद की ऊंचाई २३ हाथ और १६ अंगुल होती है । यह प्रासाद का अर्थात् मंडोवर का उदयमान कहा । इसके ऊपर शिखर होता है ॥ २२ ॥ प्रासादमण्डन में अन्य प्रकार से कहा है- "पश्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशद्यावच्छतार्द्धकम् । हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धि-मनुसूर्या नवाजुला ॥" पांच से दश हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाय चौदह २ अंगुल की, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल की और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तारवाले प्रासाद का उदय करना हो तो प्रत्येक हाथ नव २ अगुल की वृद्धि करना चाहिये। शिखरों की ऊंचाई- - प्रासाद दूणु पाऊणु भूमजु नागरु सतिहाउ दिवड्ड सप्पाउ । दाविडसिहरो दिवड्ढो सिरिवच्छो पऊण दूणो अ॥२३॥ के मान से जाति के शिखर का उदय पौने दुगुणा (१३), नागर जाति के शिखर का उदय अपना तीसरा भाग युक्त ( १६), डेढा ( १६ ), या सवाया (११) । द्राविड़ जाति के शिखर का उदय डेढा ( १६ ) और श्रीवत्स शिखर का उदय पौने दुगुना (१६) है ॥ २३ ॥ अमज ।
(११) वास्तुसारे रेलमंदिर के शिखर का सा- पिचर की गोसाईबारे पर रेषा ta-मी मनस्विर सेवा गुणा व्यापार मायामि रोपाप से विरकी पोल मासी पीपी। शिसरों की रा-- छन्नउह उवरि तिहु दिसि रहियाजुर्विव-वरि-उरसिहरा । फोहिं चारि फूहा दाहिण वामग्गि दो तिलया ॥२४॥ बारे सर पीनों दिशा में रयिका युद्ध पिम रखना और इसके उपर उस शिखर (मंग) करना । चारों कोन क पर पार हट ( विखरा-अंक) और इसक राहिनी आमा पाई सरफ दो सिसक पनाना पारिप ॥ २५॥ उरसिहरफूडमज्मे सुमूलरेहा य उवरि चारिल्या । छतरफोहिं रिसी थावलसारो थ तस्सुवरे ॥२५॥ वि तमन्तरे।
प्रासाद प्रकरणम् (-११६ ) उरुशिखर और कूट के मध्य में प्रासाद की मूलरेखा के ऊपर चार लताएँ करना । लता के ऊपर चारों कोने में चार ऋषि रखना और इन ऋषियों के ऊपर श्रामलसार कलश रखना ।। २५ ।। भामलसार कलश का स्वरूप- आमान मालसारिका चदिका 'पडिरह-बिकन्नमज्झे अामलसारस्स वित्थरद्धदये । गीवंडयचंडिकामलसारिय पऊण सवाउ इकिके ॥२६॥ आमलसार कलश का स्वरूप, दोनों कर्ण के मध्य भाग में प्रतिस्थ जितने आमलसार कलश का विस्तार करना और विस्तार से आधा उदय करना । जितना उदय हो उसका चार भाग करना, उनमें पौने भाग का गला, सवा भाग का अंडक (मामलसार का गोला), एक भाग की चंद्रिका और एक भाग की आमलसारिका करना ॥ २६ ॥ प्रासादमण्डन में कहा है कि- "इथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छृयो विस्तरार्दैन चतुर्भागैर्विभाजितः ।। ग्रीवा चामलसारस्तु पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥" दोनों रथिका के मध्य भाग जितनी आमलसार कलश की गोलाई करना, मामलसार के विस्तार से आधी ऊँचाई करना, ऊँचाई का चार भाग करके पौने भाग का गला, सवा भाग का भामलसार, एक भाग की चंद्रिका और एक भाग की आमल- सारिका करना। "पटिरह बिकन्नमज्मे भामसारस्स वित्थरो होइ । तस्सदेण य उदनो तं मग्मे ठाण चत्तारि ।। गीषव्यचटिका आमनसारिय कमेण तव्भागा । पाऊण सवाईट इगेगा मामलसारस्त एस विहि ॥” इति पाठान्तरे ।
(१०) पास्तुसारे थामलसारयमज्मे चंदणखट्टासु सेयपट्टचुपा । तस्सुवरि काणयपुरिसं घयपूरतथो य वरकलसो ॥२७॥ मामलसार फलश के मम्म भाग में सफेद रेशम के पस से रका मा परन का पलंग रखना । इस पलंग के ऊपर 'कनकपुरम ( सोने का प्रासाद पुरुस) रसना और इसके पास पी से मरा हुभा परि का कलश रखना, या प्रिया एम दिन में करना पापिये ॥ २७॥ पाहणकट्टिमथो जारिसु पासाउ तारिसो कलसो । जहसत्ति पट्ट पच्छा कायमथो रयणजडियो थ ॥२८॥ परपर, लकड़ी या ईट उनमें से जिसका प्रासाद पना हो, पसी सीपतरा भी पनाना चाहिये । अर्थात् पस्पर का प्रासाद पना हो तो कसश भी पस्वर का, साड़ी का प्रासाद हो तो कत्लश मी लकड़ी का और ईट का मासाद पना हो वा कलश मीट का फरमा पाहिये । परन्तु प्रतिष्ठा होने के बाद अपनी राधि मनुसार सोने का पा रस्त भरित का भी करपा सहवे ।। २८॥ शुकमास का मान- छज्जाउ जाव कंघ इगवीस विभाग करिवि तचो अ । नवथाइ जावतेरस दीहुदपे हवह सउणासो ॥२॥ बम से संपवक के ऊंचाई कीस भाग करना, उनमें से नया , म्यारा, पारस बर माग परामर तथा उदय में शुमास करना ॥ २६ ॥ उदयदि विहिथ पिंडो पासायनिलाढतिक च तिलउच्च । तस्सुवरि हवइ सीहो महपकलसोदयस्स समा ॥३०॥ उदय से भाषा शुन्नास पारि (माटाई) करना। या प्रासारसाट विकका विसा माना जाता है। उसके ऊपर सिंह मरप कलय का उदय परामर रखना । भोट मापदी ऊपाई नाम कासिंह से मधिकमही हानी पारिये ॥३०॥ रगान मालगेश पाया।
प्रासाद प्रकरणम् (१२१) समरांगणसूत्रधार में कहा है कि- "शुकनासोच्छूितेरूज़ न कार्या मण्डपोच्छृितिः।" शुकनास की ऊंचाई से मंडप की ऊंचाई अधिक नहीं करना चाहिये, किन्तु बराबर या नीची करना चाहिये । प्रासादमण्डन में भी कहा है कि- "शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका।" शुकनास के बराबर मडंप का कलश करना, या नीचा करना अच्छा है, परन्तु ऊंचा रखना अच्छा नहीं । Sho २ मंदिर में लकड़ी कैसी वापरना- सुहयं इग दारुमयं पासायं कलस-दंड-मकडियं । सुहकट्ठ सुदिट्ठ कीरं सीसिमखयरंजणं महुवं ॥३१॥ प्रासाद ( मन्दिर ), कलश, ध्वजादंड और घजादंड की पाटली ये सब एक ही जात की लकड़ी के बनायें जाय तो सुखकारक होते हैं। साग, केगर, शीसम खेर, अंजन और महुआ इन वृक्षों की लकड़ी प्रासादिक बनाने के लिये शुम मानी है ॥ ३१ ॥ नीरतलदलविभत्ती भद्दविणा चउरसं च पासायं । फंसायारं सिहरं करंति जे ते न नंदंति ॥३२॥ पानी के तल तक जिम प्रासाद का खात खोदा हो, ऐसा समचौरस प्रासाद यदि भद्र रहित हो, तथा फांसी के आकार के शिखरवाला हो, ऐमा मन्दिर जो मतुष्य करावे वह मनुष्य सुखपूर्वक आनन्द में नहीं रहता ॥ ३२ ॥ . कनकपुरुष का मान- अद्धंगुलाइ कमसो पायंगुलवुढिकणयपुरिसो श्र। कीरइ धुव पासाए इगहत्थाई खवाणंते ॥ ३३ ॥ १६ का, मकड़ी का प्रासाद हो वो कलश मी लकड़ी का और एका प्रासार पर हो वो सण मीट का करना चाहिये। परन्तु मविद्या होने के बार मानी गी विकका सिमाना आवा| उसके ऊपर सिमेंटप तथा सरसा रसना। भवोत् माप की ऊंचाई रामनाम सिंह से अधिक नहीं होनी चाहिये ll (१२०) पास्तुसारे आमलसारयमज्मे चदणखट्टासु सेयपट्टचुथा । तस्सुवरि कण्यपुरिसं धयपूरतयो य वरकलसो ॥२७॥ मामलसार कलश के मम्प भाग में सफेद रेशम के पत्र से मामा पर का पग रखना । इस पलंग के ऊपर कनाल (साने का प्रासाद एस) रखना मोर इसके पास घी से मरा भाव का कला रखना, पाकिया का दिन में करना चाहिये ॥ २७ ॥ पाहणकट्टिमयो जारिसु पासाठ तारिसो कलसो । जइसत्ति पइ पच्छा कगायमश्रो स्यजहियो घ॥२८॥ परयर, लकड़ी पा ईट उनमें से विसका प्रासाद पना हो, पसी भी बनाना चाहिये । वर्षात् पस्पर का प्रासाद ना हो तो कसा भी पस्कर मनुसार सोने का पास मरित का भी करवा सकते हैं ॥२०॥ सुकनास मान-- छज्जाउ जाव कषं इगवीस विभाग करिवि तत्वो अ । नवथाइ जावतेरस दीहृदये हवइ सणासो ॥२५॥ बला से मंगवा के ऊंचाई का कीस भाग परना, उनमें से नया एका पार, पारस पर भाग परावर सपा उपस में शनास करना ॥ २६ ॥ उदयदि विहिन पिंडो पासायनिजाइतिक च तिलसन्च । तस्वरि इवह सीहो मंडपकलमोदयस्स समा ॥३०॥ उन से भाषा पन्नास का सिंग (मोटा) करना ! या प्रसार सहर मसामान भी पास मगा।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२३) बजादंड की ऊंचाई इस प्रकार है- "दण्डः कार्यस्तृतीयांश: शिलात: कलशावधिम् । मध्योऽष्टांशेन हीनांशो ज्येष्ठात् पादोन कन्यसः ॥" खुरशिला से कलश तक ऊंचाई के तीन भाग करना, उनमें से एक तीसरा माग जितना लंबा ध्वजादंड करना, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। यदि ज्येष्ठ मान का श्राठवां भाग ज्येष्ठ मान में से कम करें तो मध्यम मान का और चौथा भाग कम करें तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। प्रकारान्तर से बजादण्ड का मान- "प्रासादन्यासमानेन दण्डो ज्येष्ठः प्रकीर्तितः । मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥" प्रासाद के विस्तार जितना लंबा ध्वजादंड करें तो यह ज्येष्ठमान का होता है। यही ज्येष्ठमान के दंड का दशवां भाग ज्येष्ठमान में से घटा दें तो मध्यम मान का भौर पांचवां भाग घटा दें तो कनिष्ठमान का ध्वजादंड होता है। ध्वजादण्ड का पर्व (खंड) और चूड़ी का प्रमाण- "पर्वभिर्विषमैः कार्यः समग्रन्थी सुखावहः ।" दंड में पर्व (खंड) विषम रखें और गांठ (चूडी) सम रखें तो यह सुखकारक है। ध्वजादंड के ऊपर की पाटली का मान- "दण्डदैर्घ्यषांशेन मर्कटयन विस्तृता । अर्द्धचन्द्राकृतिः पार्श्वे घण्टोऽर्द्ध कलशस्तथा ।।" दंड की लंबाई का छट्ठा' भाग जितनी लंबी मर्कटी ( पाटली ) करना और लंबाई से आधा विस्तार करना । पाटली के मुख भाग में दो अर्ध चन्द्र का श्राकार करना । दो तरफ घंटी लगाना और ऊपर मध्य में कलश रखना। भर्द्ध चन्द्र के आकारवाला भाग पाटली का मुख माना है । यह पाटली का मुख और प्रासाद का मुख एक दिशा में रखना और मुख के पिछाड़ी में ध्वजा लगानी चाहिये । इसी प्रकरण की ५५ वीं गाया में मर्कटी (पाटली) का मान प्रासाद का माठवा भाग माना है।
(२२) पास्तुप्सारे एक बाप के विस्तारपाले प्रासाद में कनकपुरूप मापा भगुन का करना पाहिये। पीये प्रत्येक नाव परि २ मंगुल सा बनाना चाहिए । अर्याद दो साप प्रासाद में पीना भगुल, तीन हाप के प्रासार में एक भंगुत, चार आपके प्रासाद में समा अंगुप्त इस्पादिक कम से पचास हापरे पिस्वारपाचे प्रासार में पौने रह भंगुस का कमकपुरूष पनाना चाहिये ।। ३३ ।। अनादराप्रमाण- हग हत्थे पासाए दंह पउणंगुल भवे रिह। श्रद्धंगुलबुढिकमे जाकरपन्नास-कन्नुदए ॥ ३४ ॥ एकाप के विस्वारपाल प्रासाद में मापार पौने भगुल का मोटा बनाना चाहिये । पीधे प्रत्येकाप माघे २ मंगुस क्रम से पाना चाहिये । मर्याद दो हाप मासाद में सबा अगुल का, दीन हावरे प्रासाद में पौने दो अंगुस का, चार हाप प्रासाद में सपा दो अगुवा पांच हायक प्रासाद में पौने तीन प्रगुत का, इसी क्रम से पपास बाप रे विस्वारपाले प्रासाद में समा पपीस भंगुस न मोटा पमादर करना चाहिये। तथा कर्मरे उपप गितना सपा मबार करना पाहिये ॥२५॥ जमा प्रासादमपान में काहि "एकास्वे तु पासादे पर पादोनमसम् । यौदर्याचा प्रदि-निद पम्बाशयम्बकम् " एकाप के विस्तारवाते प्रासाद में पौन प्रगुल का मोटा पमादर करना, पीच पचास पदक प्रस्पेकाप मापे २ अंगुन मोटाई में पड़ाना चाहिये ।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२३) बजादंड की ऊंचाई इस प्रकार है- "दण्डः कार्य स्तृतीयांश: शिलात: कलशावधिम् । मध्योऽष्टांशेन हीनांशो ज्येष्ठात् पादोन: कन्यसः ॥" खुरशिला से कलश तक ऊंचाई के तीन भाग करना, उनमें से एक तीसरा माग जितना लंबा ध्वजादंड करना, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। यदि ज्येष्ठ मान का आठवां भाग ज्येष्ठ मान में से कम करें तो मध्यम मान का और चौथा भाग कम करें तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। प्रकारान्तर से ध्वजादण्ड का मान- "प्रासादव्यासमानेन दण्डो ज्येष्ठः प्रकीर्तितः। मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥" प्रासाद के विस्तार जितना लंबा ध्वजादंड करें तो यह ज्येष्ठमान का होता है। यही ज्येष्ठमान के दंड का दशवां भाग ज्येष्ठमान में से घटा दें तो मध्यम मान का भौर पांचवां भाग घटा दें तो कनिष्ठमान का ध्वजादंड होता है। ध्वजादण्ड का पर्व (खंड) और चूड़ी का प्रमाण- "पर्वमिर्विषमैः कार्यः समग्रन्थी सुखावहः।" दंड में पर्व (खंड) विषम रखें और गांठ (चूड़ी) सम रखें तो या सुखकारक है। ध्वजादंड के ऊपर की पाटली का मान- "दण्टदैर्घ्यपडाशेन मर्कटयर्द्धन विस्तृता । अर्द्धचन्द्राकृतिः पार्श्वे घण्टोऽर्द्ध कलशस्तथा ।।" दंड की लंबाई का छठा' भाग जितनी लंबी मर्कटी ( पाटली) करना और लंबाई से आधा विस्तार करना । पाटली के मुख भाग में दो अर्ध चन्द्र का आकार करना। दो तरफ घंटी लगाना और ऊपर मध्य में कलश रखना। भर्द्ध चन्द्र के श्राकारवाला भाग पाटली का मुख माना है । यह पाटली का मुख और प्रासाद का मुख एक दिशा में रखना और मुख के पिछाड़ी में ध्वजा लगानी चाहिये । इसी प्रकरण की ५३ वी गाथा में मर्कटी (पाटली) का मान प्रासाद का भाठवा भाग माना है।
(१२५) पारसुसारे मनापामाम- णिप्पने वरसिहरे घयहीणसुरालयम्मि यसुरठिई। तेण धयं धुव कीरइ दडसमा मुक्खसुक्खकरा ॥३५॥ सम्पूर्ण बने हुए दषमन्दिर के अच्छे शिखर पर पा न हो तो उस देव मन्दिर में भसुरों का निवास होता है। इसलिये माघ के सुख को करनेषासी र परापर सम्मी पमा अवश्य करना चाहिये ॥३५॥ प्रासादमपन में कहा कि- घबा दयाप्रमादेन दायांशेन मिरवरा । नानावी पिचित्राचा विपन्चामा शिस्रोचमा ॥" ध्वमा के पन र दी लम्बाई बिसना लम्बा और दर का माठगा भाग जितना चौदा अनेक प्रकार के पों से मुशोमिव करना, तथा वजा के मंतिम भाग में तीन ना पांच शिखा करना, यह उधम पना मानी गई है। - झर माव- पासायस्स दुवारं हत्यपइ सोलसंगुलं उदए। जा इत्य चउका हुँति तिगदुग वुढि कमाडपन्नासं ॥३६॥ प्रासाद के द्वारा उदय प्रत्येक बाप सोसह अंगुत्त का करना, या पदि पार राय व विस्तारपासे प्रासाद सक सममना मर्यात् चार हाय के विस्तार पासे प्रासाद कार का उदय चौसठ मंगुस समाना। पीछे क्रमशः तीन २ मौर दो २ अंगुल की पदि पचास हाय तक करना चाहिये ॥३१॥ मासादमग्न में मागरादि प्रासाद हार का माम इसी प्रकार का है- "एकास्वे तु प्रासादे द्वार स्मात् पोरगुतम् । पोरगांगुरिका सहि-विइस्चतुष्टपम् ॥ 'पासायचो । 'लप्पर। पंचम बिबारेमा विमासा । इति पासवरे ।
प्रासाद प्रकरणम् (१२५) के में अष्टहस्तान्तकं यावद् दीर्घ वृद्धिगुणाङ्गुला । द्वयगुला प्रतिहस्तं च यावद्धस्तशतार्द्धकम् ॥ यानवाहनपर्यवं द्वारं प्रासादसमनाम् । देर्द्धिन पृथुत्वे स्याच्छोभनं तत्कलाधिकम् ॥" एक हाथ के विस्तारवाले प्रासाद में सोलह अंगुल द्वार का उदय करना । पीछे चार हाथ तक मोलह २ अंगुल की वृद्धि, पांच से आठ हाथ तक तीन २ भंगुल की वृद्धि और पाठ से पचास हाथ तक दो २ अंगुल की वृद्धि द्वार उदय करना चाहिये । पालकी, रथ, गाड़ी, पलंग (मांचा), मंदिर का द्वार भौर घर का द्वार ये सब लंबाई से प्राधा चौड़ा करना, यदि चौड़ाई में पढ़ाना हो तो लंबाई का सोलहवां भाग बढाना। उदयद्धिवित्थरे बारे आयदोसविसुद्धए । अंगुलं सड्ढमद्धं वा 'हाणि बुड्ढी न दूसए ॥ ३७॥ उदय से आधा द्वार का विस्तार करना। द्वार में ध्वजादिक आय की शुद्धि के लिये द्वार के उदय में आधा या डेढ अंगुल न्यूनाधिक किया जाय तो दोप नहीं है ॥ ३७॥ निल्लाडि बारउत्ते बिंब साहेहि हिडि पडिहारा। कूणेहिं अदिसिवइ जंधापडिरहइ पिक्खणयं ॥ ३८ ॥ दरवाजे के ललाट भाग की ऊंचाई में बिंव ( मूर्ति ) को, द्वारशाख में नीचे प्रतिहारी, कोने में आठ दिग्पाल और मंडोवर के जंघा के थर में तथा प्रतिरथ में नाटक करती हुई पुतलिऍ रखना चाहिये ॥ ३८ ॥ विम्वमान- पासायतुरियभागप्पमाणविंबं स उत्तमं भणियं । रावट्टरयणविद्दुम-धाउमय जहिच्छमाणवरं ॥ ३१ ॥ १ 'कुझा हिण तहाहिय' । इति पाठान्तरे ।
है
(१२६)
पास्तुपारे
प्रासाद के विस्तार का पौषा माग प्रमाण यो प्रतिमा मह उत्तम प्रतिमा
कहा | किन्तु राजपत्र ( स्फटिक ), रस्न, प्रवास मा सुपदिक पातु की प्रतिमा
का मान अपनी इच्छानुसार कर सकते हैं ।। ३६ ।।
विवेत्रविकास में मारे कि-
"पासादतुर्यभागस्त समाना प्रतिमा मता ।
उत्चमायकते सा तु कार्यकोनामिकाला ।।
प्रथया स्वदशाशेन हीनस्पाप्याधिकस्प वा ।
कार्या प्रासादपादस्प शिम्पिमिः प्रसिमा समा ॥"
मासाद पौये माग के प्रमाण की प्रतिमा करना, याम नाम की प्राप्ति के
लिये है, परन्तु पौधे भाग में एक भंगुन न्यून या अधिक रखना चाहिये । या
प्रासाद के पौधे माग का दश माग करना, सनमें से एक माग चौपे माग में हीन
करके या बड़ा करके उतन प्रमाण की प्रतिमा शिम्पकारों को बनानी चाहिय ।
वसुनंदिरुत प्रविष्ठासार में सारे रि-
"हारस्पाटशिहीना पास् सपीठः प्रविमोप्ट्रयः ।
तत् विभागो मवेत् पीठ दो मागौ प्रतिमोप्ट्रयः ।"
द्वार का पाठ भाग करना, उनमें से ऊपर के माठ मागको बोरकर पाकी
सास माग प्रमाग पीठिका सहित प्रतिमा की चाई होनी चाहिये । सास भाम का
सीन भाग करना, इनमें से एक भागकी पीठिका (पमासन ) मौरो माग की प्रतिमा
की ऊंचाई करना चाहिये।
प्रासादमयरन में कहा है कि
"वतीयांशन गर्भस्त्र प्राप्सादे प्रविमानमा ।
मम्पमा स्वदायोना पायोना कनीपसी ॥"
प्रासाद के गर्भगा का तीसरा भाग प्रमाण प्रतिमा बनाना सचम है। प्रतिमा
का दरावा माग प्रतिमा में पटाकर उनने प्रमाण की प्रतिमा करें तो मम्मममान की,
और पापnt माग न्यून प्रतिमा में वो कनिष्ठमान की प्रतिमा सममना ।
पंजीनिमिति तोकाप का बासमबार एक पा की
मा चाहिये।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२७ ) प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण- दसभाय कयदुवारं' उदुंबर-उत्तरंग-मज्झेण । पढमंसि सिवदिट्टी बीए सि सत्ति जाणेह ॥ ४०॥ मन्दिर के मुख्य द्वार के देहली और उत्तरंग के मध्य भाग का दश भाग करना । उनमें नीचे के प्रथम भाग में महादेव की दृष्टि, दूसरे भाग में शिवशक्ति (पार्वती) की दृष्टि रखना चाहिये ॥ ४० ॥ सयणासणसुर-तईए लच्छीनारायणं चउत्थे अ । वाराहं पंचमए छठंसे लेवचित्तस्स ॥ ४१ ॥ तृतीय भाग में शेषशायी (विष्णु ) की दृष्टि, चौथे भाग में लक्ष्मीनारायण की दृष्टि, पंचम भाग में वाराहावतार की दृष्टि, छठे भाग में लेप और चित्रमय प्रतिमा की दृष्टि रखना चाहिये ।। ४१ ॥ सासणसुरसत्तमए सत्तमसत्तंसि वीयरागस्स । चंडिय-भइरव-अडंसे नवमिंदा छत्तचमरधरा ॥ ४२ ॥ सातवें भाग में शासनदेव (जिन भगवान के यक्ष और यक्षिणी) की दृष्टि, यहीं सातवें भाग के दश भाग करके उनका जो सातवा भाग वहीं पर वीतरागदेव की दृष्टि, आठवें भाग में चंडीदेवी और भैरव की दृष्टि और नववे भाग में छत्र चामर करने वाले इंद्र की दृष्टि रखना चाहिये ॥ ४२ ॥ दसमे भाए सुन्नं जक्खागधव्वरक्खसा जेण । हिडाउ कमि ठविजइ सयल सुराणं च दिट्ठी अ॥४३॥ ऊपर के दशवें भाग में किसी की दृष्टि नहीं रखना चाहिये, क्योंकि वहां यक्ष, गांधर्व और राक्षसों का निवास माना है । समस्त देवों की दृष्टि द्वार के नीचे के क्रम से रखना चाहिये ।। ४३ ॥ । 'कडचार' इति पाठान्तरे ।
(१२) वास्तुसारे प्रासाद के विस्तार का चौथा माग प्रमाण मो प्रतिमा हो यह उचम प्रतिमा का है। किन्तु रामपा ( स्फटिक), रस्न, प्रवाल या सुबर्यादिक घातु की प्रतिमा का मान भपनी इच्छानुसार कर सकते है॥ ३६॥ विवेकवितास में कहा कि- "पासावतुर्यभागस्त समाना प्रतिमा मवा । सच्चमापकते सा तु कायकोनाधिकारला ॥ अपवा स्वदशांशेन हीनस्याप्पपिरस्प पा । कार्या प्रासादपादस्य शिम्पिमि प्रविमा समा ॥" प्रासाद रे चोये माग के प्रमाण की प्रतिमा करना, यह उत्तम साभ की प्राप्ति के लिये है, परन्तु चौधे भाग में एक भगुत न्यून मा अधिक रसना चाहिये । पा प्रासाद के चौथे माग का दश माग करना, उनमें से एक माग पौधे माग में हीन करके या पड़ा करके उतने प्रमाण की प्रतिमा शिम्पकारों को पनानी पाहिय । पसनविकत प्रतिष्ठासार में मारे कि- "द्वारस्पाटशिरीना स्पा सपीठा प्रविमोप्पः । व विभागो मवेद पीठ दशै मागौ प्रतिमोप्पः ॥" द्वार का पाठ भाग करना, ग्नमें से उपर के माठ भाग को बोड़कर पाकी सात माग प्रमाद पीठिका सरित प्रतिमा की ऊंचाई होनी चाहिये । सात भाग का तीन भाग करना, ग्नमें से एक भागकी पीठिका (पवासन ) पौर दो माग की प्रतिमा की कमाई करना चाहिये। प्रासादमपन में कहा है कि- "तृतीयांशन गर्भस्त्र प्रासादे प्रतिमाघमा । मम्पमा स्वदशांना पांग्रोना कनीयसी ॥" प्रासाद के गर्मग्र का तीसरा माग प्रमाण प्रतिमा बनाना ग्यम है। प्रतिमा का दरमा माग प्रतिमा में पटाकर उनन प्रमाण की प्रविमा करें वो मप्पममाम की, और पापी माग न्यून प्रतिमा रें तो कनिष्ठमान की प्रतिमा समझना । रणनीति पर पति दोगेश माप का स्थान बोरस गपकी र समान -- ।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२७) प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण- दसभाय यदुवारं' उदुंबर-उत्तरंग-मज्झण । पढमंसि सिवदिही वीए सि सत्ति जाणेह ॥ ४०॥ मन्दिर के मुख्य द्वार के देहली और उत्तरंग के मध्य भाग का दश भाग करना | उनमें नीचे के प्रथम भाग में महादेव की दृष्टि, दूसरे भाग में शिवशक्ति (पार्वती) की दृष्टि रखना चाहिये ।। ४० ।। सयणासणसुर-तईए लच्छीनारायणं चउत्थे । वाराहं पंचमए छठंमे लेवचित्तस्स ॥ ४१ ॥ तृतीय भाग में शेषशायी ( विष्णु ) की दृष्टि, चौथे माग में लक्ष्मीनारायण की दृष्टि, पंचम भाग में वाराहावतार की दृष्टि, छडे भाग में लेप और चित्रमय प्रतिमा की दृष्टि रखना चाहिये ।। ४१ ॥ सासणसुरसत्तमए सत्तमसत्तंसि वीयरागस्त । चंडिय-भइरव-अडसे नवमिंदा छत्तचमरधरा ॥ ४२ ॥ सातवें भाग में शासनदेव (जिन भगवान के यन और यक्षिणी) की दृष्टि, यहीं सातवें भाग के दश भाग करके उनका जो सातवॉ भाग वहीं पर वीतरागदेव की दृष्टि, आठवें भाग में चंडीदेवी और भैरव की दृष्टि और नववें भाग में छत्र चामर करने वाले इंद्र की दृष्टि रखना चाहिये ॥ ४२ ।। दसमे भाए सुन्नं जक्खागंधव्वरक्खसा जेण । हिहाउ कमि ठविज्जइ सयल सुराणं च दिट्ठी अ॥४३॥ ऊपर के दशवे भाग में किसी की दृष्टि नहीं रखना चाहिये, क्योंकि वहां यक्ष, गांधर्व और राक्षसों का निवास माना है । समस्त देवों की दृष्टि द्वार के नीचे के क्रम से रखना चाहिये ।। ४३ ॥ । 'कछुवार' इति पागन्तरे ।
वास्तुसारे प्रचारान्वर से इष्टि प्रमाण- मागह भणंतेगे सचमससि दिहि 'अरिहंता । गिहदेवाल पुणेवं कीरह जह होइ बुढिकरं ॥ १४ ॥ रिसनेक भाचार्यों 1 मीकि मंदिर के मुरूम द्वार के देहसी और व रंग के मन माग का भाठ माग करना । उनमें भी उपर मो सातवाँ माम, उसका फिर माठ माग करके, इसी के सातवें माम ( गमांग ) पर परिसंत की ष्टि रखना पाहिये । मर्वाद द्वार के २४ भाग पर, ५५ में भाग पर वीतरागदेन की घष्टि रखना चाहिये । इसी प्रकार गृहमंदिर में मी परना चाहिये कि बिससे बल्मी माविकी पनि रो॥१५॥ मासादमयान में मी हा कि- "भायमाने भमे हार-मष्टमम्र्पतस्पनेन् । सप्तमसप्तमे रएि सिंह पमे एमा ।" हर की ऊंचाई का पाठ भाग करके सर का पाठो माग बोर देना, पीये मात माम का फिर माठ माग रक, इसीका मो सादा माग गममाय, उसमें रटि रखना पाहिये । या साग माग के यो माठ माग पिये है, उनमें से अप, सिंहपा मम भाप में भर्याद पापा, तीसरा रा पाता माग में भी घष्टि रख सकते हैं। दि. पसुनंदिरुत प्रतिष्ठासार में कहा कि- "विभग्य नपा द्वार व परागानपस्त्यमेत् । कद्वी सप्तम तर् पिमग्य स्वापपेर् पशाम् ॥" घर का मब भाग करके नीचे के का भाग मौर ऊपर के दो माम कोशेष दोपारी मो सावा मग रहा, रसा मी न माग करके इसी के सात माग पर प्रतिमा की रष्टि रसना चाहिये । 'भारता' इति पामावरे ।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२६ ) देवों का दृष्टिद्वार- KUMUONYMI उत्तरंग गांधर्व रामासयतकाष्टि इंद्रकाशि -मिन अरिहंत हर्षि चंडी भैरवका दृष्टि जनयक्षयक्षिणीष्टि- वीतरााकी लेप और विनायी प्रतिमाह १-प्रथम प्रकार से देवों का दृष्टि स्थान । वाराहावतारकीहाह यह प्रकार प्राय. सब भाचार्यों को अधिक माननीय है। २-अन्य प्रकार से देवों का दृष्टि स्थान । लक्ष्मीनारायणकी शेषशायीपी दृष्टि पार्वती की दृष्टि शिवदृष्टि देहली पास्सुसारे मारान्तर से रिश्रममाण- भागट्ठ भणतेगे सत्तमसत्तसि दिहि 'अरिहता। गिहदेवानु पुणेवं कीरइ जह होइ बुढिकरं ॥ ४४ ॥ रिखनेक भाचार्यों का मत है कि मंदिर से सम्म द्वार के ली और ग्ध रंग मम्म माग का पाठ माम करना । उनमें मी उसर का मो सासवा माग, उसन्न फिर माठ माग करके, इसी के सात माग ( गोग) पर परिव की घटि रसना चाहिये । प्रर्पात् हार ६४ माग करके, ५५ वे माग पर पीवरामदेव की रष्टि रखना पारिसे । इसी प्रचार सामंदिर में मीना चाहिये किनिससे सामी भादि की दि॥४४॥ प्रासादमपान में मी काति- "भाय मागे भने दार-मष्टममर्पतस्त्पबेत् । सप्तमसप्तमे रष्टिपे सिंहे प्पो एमा ।।" हार की ऊंचाई का माठ भाग कर सर माठौं माग छोड़ देना, पीधे मान भाग का फिर माठ माग करका बसीका मो सावळ माग गनभाय, उसमें पष्टि रखना चाहिये । या साग माग के मो माठ माग सिनमें से अप, सिंह या मन भाय में अर्थात् पारा, सीसरा मा पासा भाग में भी रष्टि रख सकते हैं। दि० पसुनंदिरुत प्रतिष्ठासार में कहा कि- विभग्म नवपा हार वत् पामामयस्त्पमेत् । कर्मदी सप्तम तद् विमग्प स्पापये प्याम् ॥" मार का ना भाग करके नीचे केक भाग और रो माग पोर दो, पासी मो सावा मग रहा, उसका मी नव माग करके इसी के सावरे माग पर प्रतिमा की रष्टि रमना चाहिये। 'भारता' इति पामन्तरे।
प्रासाद प्रकरणम् ( १२६ ) देवों का दृष्टिद्वार- उत्तरंग गांधर्व राक्षसयक्षकी ष्टि इंद्रकीधि मिन अरिहंत चंडी भैरवका दृष्टि जनयक्षयक्षिणी दृष्टि वीतरागकी हि- लेप और चित्रमयी प्रतिमा १-प्रथम प्रकार से देवों का दृष्टि स्थान । वाराहावतारकीहा यह प्रकार प्राय. सव आचार्यों को अधिक माननीय है । २-अन्य प्रकार से देवों का दृष्टि स्थान । लक्ष्मीनारायणकाहर शोषशायीनी दृष्टि . पार्वती की दृष्टि शिवदृष्टि देहली . वास्तुसारे गर्मगृह में देवों की स्थापना- गन्मगिइड्ढ-पणंसा जक्खा पढमंसि देवया पीए । जिणकिराहरवी तइए यमु चउत्थे सिर्व पणगे ॥ ४५ ॥ प्रासाद के गर्भगृह रे मापे का पांच भाग करना, इनमें प्रथम माग में सपा पूसरे भाग में देिवी, वीसरे भाग में जिन कण और पर्प, चौपे भाग में प्रमा और पचिर्ने माग में शिव की मूर्ति स्थापित करना चाहिये ।। ४५ ।। नहु गन्मे ठाविज्जइ लिंग गन्मे चहज्ज नो कहवि । तिलयद तिलमित्त ईसाणे किंपि आसरिओ॥४६॥ महादेव का विंग प्रासाद के गर्म (मध्य) में स्थापित नहीं करना चाहिये। यदि गर्म माग को छोड़ना न पा तो गर्म से विन भाषा दिलमात्र मी ईशानकोष में हटाकर रखना चाहिये ॥ ४६ ॥ मिचिसंलग्गबिंब उत्तमपुरिसं च सम्बहा असहं । चित्तमयं नागाय छवंति एए 'सहावेण ॥ १७ ॥ दीवार के साथ लगा हुमा ऐसा देवविध और सचम पुरुष की मूर्षि सर्वमा प्रयम मानी है। किन्तु चित्रमय नाग मादि देव पो सामाविक लगे हुए रहते हैं ससका दोप नहीं ।। ४७॥ जगवी ससप- जगई पासायंतरि रसगुणा पच्छा नवगुणा पुरो। दाहिण चामे तिउणा इअ भणियं खित्तमज्भायं ॥४८॥ नगी (मंदिर की मर्यादित भूमि) और मध्य प्रासाद का भवर पिवते भाग में प्रासाद के विस्तार से बा गुमा, भागे नन गुमा, दारिनी भौर भारी मोर वीन २ गुमा होना चाहिये । या पेत्र की मर्यादा है ॥ ४ ॥ मामेर' इति पान्तरे। - प्रासाद प्रकरणम् (१३१) प्रासादमण्डन में जगती का स्वरूप विशेषरूप से कहा है कि- "प्रासादानामधिष्ठानं जगती सा निगद्यते । यथा सिंहासनं राज्ञां प्रासादानां तथैव च ॥ १॥" प्रासाद जिस भूमि में किया जाय उस समस्त भूमि को जगती कहते हैं। अर्थात् मंदिर के निमित्त जो भूमि है उस समस्त भूमि भाग को जगती कहते हैं । जैसे राना का सिंहासन रखने के लिये अमुक भूमि भाग अलग रखा जाता है, वैसे प्रासाद की भूमि समझना ॥ १ ॥ "चतुरस्रायतेऽष्टास्रा वृत्ता वृत्तायता तथा | जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥२॥" समचौरस, लंवचौरस, आठ कोनेवाली, गोल और लंबगोल, ये पांच प्रकार की जगसी प्रासाद के रूप सदृश होती है। जैसे-समचौरस प्रासाद को समचौरस जगती, लंबचौरस प्रासाद को लंबचौरस जगती इसी प्रकार समझना ॥ २॥ "प्रासादपृथुमानाच्च त्रिगुणा च चतुर्गुणा । क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठका || ३॥" प्रासाद के विस्तार से जगती तीन गुणी, चार गुणी या पांच गुणी करना । त्रिगुणी कनिष्ठमान, चतुर्गुणी मध्यममान और पांच गुणी जेष्ठमान की जगती है ॥ ३ ॥ "कनिष्ठे कनिष्ठा ज्येष्ठे ज्येष्ठा मध्यमे मध्यमा । प्रासादे जगती कार्या स्वरूपा लक्षणान्विता॥४॥" कनिष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठमान जगती, ज्येष्ठमान के प्रासाद में ज्येष्ठ- मान जगती और मध्यमान प्रासाद में मध्यममान जगती। प्रासाद के स्वरूप जैसी जगती करना चाहिये ॥४॥ "रससप्तगुणाख्याता जिने पर्यायसंस्थिते । द्वारिकायां च कर्त्तव्या तथैव पुरुषत्रये ॥ ५ ॥" च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवल और मोक्ष के स्वरूपवाले देवकुलिका युक्त जिन- प्रासाद में छ: या सात गुणी जगती करना चाहिये । उसी प्रकार द्वारिका प्रासाद और त्रिपुरुष प्रासाद में भी जानना ।। ५ ।।
पास्तुसारे गर्मगृह में देशों की स्पापपा- गम्भगिहड्ढ-पणसा जक्खा पढमंसि देवया बीए । जिकिराहरवी तइए बमु चउत्थे सिर्व पणगे ॥ ४५ ॥ प्रासाद के गर्भगारेमाघेका पाप भाग करना, उनमें प्रथम माग में पप, दूसरे भाग में देवी, तीसरे भाग में जिन, कृष्ण और एप, पीपे माग में प्रमा और पाच भाग में शिव की मूर्षि स्पापित करना चाहिये ।। ४५ ।। नहु गन्मे ठाविज्जद लिंगं गन्मे चइज्ज नो कहवि । तिलघद्धं तिलमित्त ईसाणे किंपि आसरिओ॥ ४६॥ महादेव का सिंग प्रासाद गर्म (मप्प) में स्थापित नहीं रमा पाहिये। पदि गर्म माग को बोरना न पा वो गर्म से बिन बापा तिलमात्र मी ईशानकोष में इटार रखना चाहिये ॥ ४६ ॥ मिचिसंलग्गबिंब उत्तमपुरिसं च सव्वहा असई ।' चित्तमयं नागायं हवंति एए 'सहावेण ॥ १७ ॥ दीवार के साथ लगा हुमा ऐसा देवर्षिय और उपम पम की भूचि सर्पमा मम मानी है। किन्तु चित्रमय माग 'मारि देव वो सामाविक लगे हुए रहते हैं, उसका दोष नहीं ॥ ४७॥ पगपी सतप- जगई पासायंतरि रसगुणा पच्छा नवगुणा पुरओ। दाहिण-वामे तिउणा इस मणियं खित्तमज्माय ॥४८॥ मगती (मंदिर की मर्यादित भूमि) और मध्य प्रासाद का भवर पिक्से भाग में प्रासाद के विस्तार से गुणा, भागे नर गुणा, दाहिनी और मामी भोर सीन २'गुसा दोना चाहिये । यह पेत्रही मर्यादा है। ८ || । 'ममामेर' इति पागम्तरे।
प्रासाद प्रकरणम् ( १३१) प्रासादमण्डन में जगती का स्वरूप विशेषरूप से कहा है कि- "प्रासादानामधिष्ठानं जगती सा निगद्यते । यथा सिंहासनं राज्ञा प्रासादानां तथैव च ॥ १॥" प्रासाद जिस भूमि में किया जाय उस समस्त भूमि को जगती कहते हैं। अर्थात् मंदिर के निमित्त जो भूमि है उस समस्त भूमि भाग को जगती कहते हैं । जैसे राजा का सिंहासन रखने के लिये अमुक भूमि माग अलग रखा जाता है, वैसे प्रासाद, की भूमि समझना ।। १॥ "चतुरस्रायतेऽष्टात्रा वृत्ता वृत्तायता तथा । जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥ २॥" समचौरस, लंक्चौरस, आठ कोनेवाली, गोल और लंबगोल, ये पांच प्रकार की जगती प्रासाद के रूप सदृश होती है। जैसे-समचौरस प्रासाद को समचौरस जगती, लंबचौरस प्रासाद को लंबचौरस जगती इसी प्रकार समझना ॥२॥ "प्रासादपृथुमानाच्च त्रिगुणा च चतुर्गुणा । क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठका ।। ३॥" प्रासाद के विस्तार से जगती तीन गुणी, चार गुणी या पांच गुणी करना । त्रिगुणी कनिष्ठमान, चतुर्गुणी मध्यममान और पांच गुणी जेष्ठमान की जगती है ।। ३ ।। "कनिष्ठे फनिष्ठा ज्येष्ठे ज्येष्ठा मध्यमे मध्यमा । प्रासादे जगती कार्या स्वरूपा लक्षणान्विता ॥४॥" कनिष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठमान जगती, ज्येष्ठमान के प्रासाद में ज्येष्ठ- मान जगती और मध्यमान प्रासाद में मध्यममान जगती। प्रासाद के स्वरूप जैसी जगती करना चाहिये ॥४॥ "रससप्तगुणाख्याता जिने पर्यायसंस्थिते । द्वारिकायां च कर्त्तव्या तथैव पुरुषत्रये ।। ५॥" च्यवन, जन्म, दीक्षा, केवल और मोक्ष के स्वरूपवाले देवकुलिका युक्त जिन- प्रासाद में छः या सात गुणी जगती करना चाहिये । उसी प्रकार द्वारिका प्रासाद और त्रिपुरुष प्रासाद में भी जानना ।। ५ ।। म
पातुसार
"मम्रपानुकमेणैव सपादशिन साईन।।
दिगुणा पापवा कार्या सास्वायतनविषिः॥६॥"
मएरप के क्रम से सपाई दी पा गुनी विस्तारपाती अगवी करना पाहिये।
"शिश्नमसपुस्ता न्येष्ठा मम्मा पनिष्टका ।
सन्छायस्प प्रिमागेन भ्रमणीनो समयपः ॥७॥"
तीन प्रमणीबासी न्पेष्ठा, दो प्रमसीपाली मप्पमा और एक प्रमणीवासी
आमिष्ठा नगवी मानना | बगती की ऊपाईका तीन माग करके प्रत्येक माग प्रमनी
की ऊंचाई चानना ॥ ७॥
"चतुफोस्वया सूर्य-कोचैरिंशतिकोय।।
भष्ठापिंगति-पत्रिंशत्-कोमा सस्य प्रमायसः ॥ ८ ॥
मगती पार कोनावाली, बारह कोनापासी, पीस कोनापाली, महास कोना-
पाप्ती और बपौस कोनावाली करना मया ॥८॥
"प्रासादावा हस्तान्ते मेरो धार्षिशविकरात् ।
माविंशपता भूवाशाच प्रवाई के ॥ ४॥"
पारराम के विस्तारमा मासाद को प्रासाद के वीसरे माग भर्पा प्रत्येक
हाप भंगुप्त, ईस से पचीस हाय के विस्तारमाले प्रासार को पौधे माम धर्माद
प्रस्पेकापना गुरु और शीप से पचास हाय के विस्तारपार प्रासाद को पांच
माग नगती 5पी बनाना चाहिए ।। ६ ॥
"एक हस्ते रेणैप साईदर्षणामतुष्करे ।
पकैनरातानि मार दित्रियुगांगकः ॥ १०॥"
एक हावरे विस्तारवासे प्रासाद को एक बाप रूपी भगवी, दो से चार बार
तक के विस्तारपाते प्रासाद को हाईवें भाग, पांच से पायाप व प्रासारको
सरे माग, देर से पोपीस हाव के प्रासाद को तीसरे भाग और पचीस से पचास
के विस्तारपा प्रासाद को पौधे माग बमती पी करना पाहिले ॥१०॥
"तदुन्द्राय समेत् प्राज्ञः स्वष्टाविंशविमिा परे।
विपरो मामामस्म विपरिक वा ॥ ११॥
पपत्रममायुक्ता विपदा सरपत्रिम ।
विपद सर इसात् सप्तमार्ग मकम् ॥ १२ ॥
जगती में देवकुलिका न करना हो तो किला (ग..1) अवश्य बनाना चाहिये । जगती के उदय का स्वरूप- और प्रासाद प्रकरणम -- WERY ... . मा Jan MCNTD (११) मरान मRARAरान जम्परा
"
पालसारे
"मम्पानुक्रमेयैव सपादशिन सार्थतः।
द्विगुवा पापना कार्या सास्वायनमिपि ॥६॥"
मएप्प के कम से सपाईटरी या दुगुनी विस्तारपासी भगवी करना चाहिये।
पत्रिकामसयुक्ता पेठा मप्या कनिष्ठन।
सप्यापस्य विमागेन प्रमसीमा समुन्द्रमा॥७॥"
तीन प्रमतीपाती मेष्ठा, दो प्रमणीपासी मम्पमा और एक प्रमपीवासी
पनिष्ठा जगवी बानमा । मगवी की ऊपाईका तीन भाग करके प्रस्पेक माग अपनी
की अचाई चानना ॥ ७॥
"चतुफोस्वथा एर्प-कोशितिकोषक।
शवि-पशि को सस्म प्रमायः ॥
बगती पार नामाली, पारह कोनापासी, पीस कोनापाली, भाइस कोना
पाशी और पीस कोनापासी करना मध्या॥८॥
"प्रासादादास्वान्वे पो शापिंशसिकरात् ।
शशिपापाचे भूवाशाय शवाई॥६॥"
पारा शप के विस्तारवाले प्रासाद को प्रासाद के तीसरे माग पनि प्रत्येक
साप - भंगुर, बाईस से पचीस हाप के विस्तारवा प्रासाद को पौधे माग अर्याद
प्रस्पेकाप बागुल और तीस से पचास हाप के विस्तारपाले प्रासार को पांचवें
माग बगवी ऊंची बनाना चाहिए ॥ 8 ॥
"एक दस्ते परेनेब साईवणामतकरे ।
पर्सनैनरातान्ति क्रमार् वित्रियुगांग ॥१०॥"
एक बाब पिस्वारपासे प्रासाद साप इंची बगती दो से चार हाय
तक के विस्तारवाने प्रासाद को ग भाग, पांच से बारह हाथ व प्रसार को
इसरे भाग, वेरा से पौवीस बाप के प्रासाद को सीसरे भाग और पचीस से पचास
बाप के विस्तारपा प्रासाद को चौपे माग पगवी संधी करना चाहिये ॥१०॥
"वदुरदाय मये प्रायः स्वाविशतिमिः परे।
विपरो नामहमस्प दिपई सिधा ।।११।।
पपपत्रममायुक्ता विपदा सरपत्रित ।
हिपद सरई समात् सप्तमागे व ऊमस् ॥ १२ ॥
जगती में देवकुलिका न करना हो तो किला (ग) अवश्य बनाना चाहिये । जगती के उदय का स्वरूप- प्रासाद प्रकरणम् FASTHAmrava -- KALAWAR (१६) रामायनर - १४) -पासारे- "कहशक्षिपदो प्रोक्सो भागेनान्तरपप्रभम् । कपोवाली विभागा ष पुप्पाएठो सुगौशकम् ॥ १३॥" जगती की ऊंचाई का पढाईस माग करना । उनमें तीन माग का माम्मश्म, दो भाग ही कपी, पपपत्र सहित तीन मागकी प्रास पही, दो माम का सुरा, साद माम का ईमा, तीन माग का कलश, एक भाम का मतरपत्र वीन भाग फेवास और पार माग का पुष्पकंठ करना ॥ ११ १२-१३ ।। "पुष्पकान्मारपकमस्य निर्गमस्याप्टमिः पदैः। कर्येषु पदिशिपाता। प्रान्पादिः प्रदक्षिये ॥ १०॥" पुष्पकंठ से बापम निर्गम माठ माग करना । पूर्वादि रिग्रामों में प्रदपिस फ्रम से दिसासों को र्य में स्थापित करना ॥ १४ ॥ "प्राकारैर्मपिस्ता कार्या चतुर्मिरमपरपै।। मकरसनिष्कास: सोपान-तोरवादिमिः ॥ १५ ॥ बमती रिसा (गड) से मुशोमिस करना, पारों दिशा में एकद्वार पता यक (मम्प) समेत करना पस निकलने के लिये मगर के मुखबारे परनासें करना, द्वार मागे धोरण और सीदिएँ करना ।। १५ ॥ मासार के मंरपर कम- पासायक्मलथग्गे गूढक्खयमंडवं तश्रो छकं । पुण रगर्मडवं तह तोरणसवलाणमंडवय ॥४६॥ प्रासादरमस (गमारा) के मागे गूडमंडप, गूगमंडप के भागे मापौकी, बाचौकीमाग रंगमरप रंगमरप के मागे धोरण पुस्त पसासक (रसाये पर का मंरप) इस प्रकार मरप का प्रम है।। ४६।। प्रासादमग्न में मी पाहि- "गतिकस्तपा नृस्प कमेय मरपात्रयम् । मिनस्याग्रे प्रकम्पासा हु महानकम् ।" बिन मगवान के प्रासाद क मागे गूढमरप, उसके मामे त्रिक तीन (नव पौकी) और उसके माग नृत्यमाप (रंगमरप),प वीन माप करना चाहिये, समा उन सबसे मागे पसानक (परमाने पर का मरप) सब मंदिरों में करना पारिये ॥ , प्रासाद प्रकरणम् ( १३५ Air . 0 DOLA नयोत संगारीमा मंदिर के तल भाग का स्वरूप- मागार साम समस्व सामोपाम युक्रेत मन्दिर गप प्रससप- पास्तुसारे ..
प्रासाद प्रकरणम् (१३७) दाहिणवामदिसेहिं सोहामंडपगउक्खजुअसाला । गीयं नट्टविणोयं गंधव्वा जत्थ पकुणंति ॥ ५० ॥ प्रासाद के दाहिनी और वाँयीं तरफ शोमामंडप और गवाक्ष (झरोखा) युक्त शाला बनाना चाहिये कि जिसमें गांधर्वदेव गीत, नृत्य व विनोद करते हुए हो ॥५०॥ मंडप का मान- पासायसमं बिउणं दिउड्ढयं पऊणदूण वित्थारो। 'सोवाण ति पण उदए चउदए चउकीओ मंडवा हुंति ॥५१॥ प्रासाद के बराबर, दुगुणा, डेढा या पौने दुगुना विस्तारवाला मंडप करना चाहिये । मंडप में सीढी तीन या पांच करना और मंडप में चौकीऍ पनाना ॥५१॥ स्तम्भ का उदयमान- कुंभी-थंभ-भरण-सिर-पट्ट इग-पंच-पऊण-सप्पायं । इग इअ नव भाय कमे मंडववट्टाउ अद्धदए ॥५२॥ मंडप की गोलाई से आधा स्तभ का उदय करना, उसी उदय का नव भाग करना, उनमें एक माग की कुंभी, पांच भाग का स्तंभ, पौने भाग का भरणा, सवा भाग का शिरावटी (शरु) और एक भाग का पाट करना चाहिये ॥५२॥ मर्कटी कलश और स्तंभ का विस्तार- पासाय-यट्टमंसे पिंडं मकडिअ-कलस-थंभस्स । दसमंसि बारसाहा सपडिग्धउ कलसु पउणदृणुदये ॥ ५३॥ प्रासाद के भाठवें भाग के प्रमाणवाले मर्कटी ( ध्वजादंड की पाटली), कलश और स्तंभ का विस्तार करना, प्रासाद के दशवें भाग की द्वारशाखा करनी। कलश के विस्तार से कलश की ऊंचाई पौने दुगुनी करना ।। ५३ ॥ १ 'सोवाणतिन्नि उदए" २ 'दिवढ्दये' इति पाठान्तरे । 15 -
बास्ससारे
मंदिर में से २ सपपासे पा सारे स्वम रते माते है, उनमें से कितने स्वमो मसरूप.
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(१३६ ) पोलाद प्रकरणम् कलश के उदय का प्रमाण प्रासादमंडन में कहा है कि- "ग्रीवापीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिका भागतुल्येन त्रिमागं बीजपूरकम् ।।" कलश का स्वरूप- - S .३भाग जिला कलश के अंड गला art - -- कलश का गला और पीठ का उदय एक २ भाग, अंडक अर्थात् मध्य भाग का उदय तीन भाग, कर्णिका का उदय एक भाग और बीजोरा का उदय तीन भाग । एवं कुल नव भाग कलश के उदय के हैं। प्रक्षालन आदि के जल निकलने की नाली का मान- जलनालियाउ फरिसं करंतरे चउ जवा कमेणुच्चं । जगई अ भित्तिउदए छज्जइ समचउदिसेहिं पि ॥५४॥ एक हाथ के विस्तारवाले प्रासाद में जल निकलने की नाली का उदय चार जव करना। पीछे प्रत्येक हाथ चार २ जव उदय में बढाना । जगती के उदय में और दीवार (मंडोवर) के छज्जे के ऊपर चारों दिशा में जलनालिका करना चाहिये ।। ५४ ॥ प्रासादमंडन में कहा है कि- "मंडपे ये स्थिता देवा-स्तेषां वामे च दक्षिण । प्रणालं कारयेद् धीमान् जगत्यां चतुरो दिशः ॥" मंडप में जो देव प्रतिष्ठित हों उनके प्रक्षालन का पानी जाने की नाली बाँयीं और दक्षिण ये दो दिशा में बनावें, तथा जगती की चारों दिशा में नाली करें। कौन २ वस्तु समसूत्र में रखना- अाइपट्टस्स हिडें छज्जइ हिटुं च सव्वसुत्तेगं । उदुंबर सम कुंभि अ थंभ समा थंभ जाणेह ॥ ५५ ॥ पाट के नीचे और छज्जा के नीचे सव समसूत्र में रखना चाहिये । देहली के परावर सब कुंमी और स्तंभ के बराबर सब स्तंभ करना चाहिये ।। ५५ ।।
(१४.) बास्तुसारे मंदिर की हारशासा, हसी और संसापरी सतप- FHP- HARR تی لسانیاتی Aमसा मममा इमका सपिस्तर पर्सन प्रासादमग्न गो मम भनुमाद पूर्वक अपनेपाना है उसमें देसा । अहमदाबाद माल मिली जगमाप अंपाराम सामपुरा का सिसा हुमा महा मार पर शिम्पशास्त्र में दाली पौर शंखापटी क नको का माग प्रशुद सिसा है। मिलीमी सुद भाषा में तीन माग तिखत, मौर नफरों में पार भाग नवसाते हैं। मालूम होता जिमिस्रीजी मे इस नशा करके पुस्तक सिखी होगी । - प्रसाद प्रकरणम् (१४१) चोवीस जिनालय का क्रम--- अग्गे दाहिण-वामे अट्टजिणिंदगेह चउवासं । मूलसिलागाउ इमं पकीरए जगइ मज्झम्मि ॥ ५६ ॥ चौवीस जिनालयवाला मन्दिर करना हो तो वीच के मुख्य मन्दिर के सामने, दाहिनी और वॉयीं तरफ इन तीनों दिशाओं में आठ आठ देवकुलिका ( देहरी) जगती के मीतर करना चाहिये ।। ५६ ॥ चौवीस जिनालय में प्रतिमा का स्थापन क्रम- रिसहाई-जिणपंती सीहद्वारस्स दाहिणदिसाओ। ठाविज्ज सिटिमग्गे सव्वेहिं जिणालए एवं ॥ ५७ ॥ देवकुलिका में सिंहद्वार के दक्षिण दिशा से ( अपनी बॉयीं ओर से) क्रमशः ऋषभदेव आदि जिनेश्वर की पंक्ति सृष्टिमार्ग से ( पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इस क्रम से ) स्थापन करना । इस प्रकार समस्त जिनालय में समझना ।। ५७ ।। चउवीसतित्थमज्झे जं एगं मूलनायगं हवइ । पंतीइ तस्स ठाणे सरस्सई ठवसु निमंतं ॥ ५८ ॥ चौवीस तीर्थंकरों में से जो कोई एक मूलनायक हो, उप्त तीर्थंकर की पंक्ति के स्यान में सरस्वती देवी को स्थापित करना चाहिये ।। ५८ ।। बापन जिनालय का क्रम- चउतीस वाम-दाहिण नव पुठ्ठि अट्ठ पुरओ अ देहरयं । मूलपासाय एगं बवाण्णजिनालये एवं ॥ ५९॥ चौंतीस देहरी बीच प्रासाद के वॉयीं और दक्षिण तरफ अर्थात् दोनों बगल में (सत्रह सत्रह देहरी, नव देहरी पिछले भाग में, आठ देहरी आगे तथा एक मध्य का मुख्य प्रासाद, इस प्रकार कुल बावन जिनालय समझना चाहिये ।। ५६ ।।
( २५२) पास्तुपारे पाचर बिमासयम कम- पणवीसं पणवीसं दाहिण-चामेसु पिट्ठि इकार । दह अग्गे नायव्वं इअ बाहतरि जिणिदाल ॥६॥ मम मुरुप प्रासाद के पाहिनी मौर बायीं वरफ पपीस पच्चीस, पिछाडी म्पार, भागे रस और एक पीप में मुस्प प्रासाद, एवं इस पाचर मिनालय मानना ॥३०॥ शिसरपद मामी के मासाद फस- अंग विभूसण सहिथं पासायं सिहरबद कठमयं । नहु गेहे पूइज्जह न परिज्जह किंतु जन्तु घरं ॥ ११ ॥ कोना, प्रतिरष और मद्र भादि भंगवाला, तपा तिखक सबंगादि विमान पाता शिखरपद साड़ी का प्रासाद पर में नहीं पूषना चाहिये और रखना भी नहीं चाहिये । किन्तु सीप यात्रा में साय हो सो दोष नहीं ॥ १ ॥ जत्त कए पुणु पन्छा ठविज्ज रहसाल अहव सुरभवणे। जेण पुणो तस्मरिमो करेद जिणजत्वरसंघो ॥ १२ ॥ सीर्य मात्रा से पापिस भाकर शिखरपद साड़ी के प्रासाद का रमशाखा मा देवमन्दिर में रस देना चाहिये कि फिर कभी उसके पैसा बिन पात्रा संप निकालने में काम मावे ।। ६२॥ णमाम्बर न पर्यन- गिहदेवालं कीरइ दारुमयविमाणपुप्फये नाम । उवधीढ पीठ फरिसं जहुच चउरंस तस्सुवरि ॥१३॥ पुष्पक विमान के भाकार सारा मकड़ी का पर मंदिर करना चाहिये। सपपील, पीठ और उसके सर समपौरस परश भादि मैसा पासे कहा है वैसा करना शा चउ यंभ चउ दुवारे च3 तोरण घउ दिसेहिं छज्जउखें । पंच कणवीरसिहरं एग दु ति यारेगसिहरं वा ॥६॥ +t - .
प्रासाद प्रकरणम्
(१५६)
चारों कोने पर चार स्तंभ, चारों दिशा में चार द्वार और-चार तोरण, चारों
ओर छज्जा और कनेर के पुष्प जैसा पांच शिखर (एक मध्य में गुम्मन, उसके चार
कोणे पर एक एक गुमटी ) करना चाहिये। एक द्वार या दो द्वार या तीन द्वार वाला
और एक शिखर ( गुम्मज) वाला भी बना सकते हैं ॥ ६४ ॥
अह भित्ति छज्ज उवमा सुरालयं आउ सुद्ध कायव्वं ।
समचउरंसं गम्भे तत्तो असवायउ उदएसु ॥६५॥
दीवार और छज्जा युक्त गृहमंदिर बरावर शुभ आय मिला कर करना चाहिये।
गर्भ भाग समचौरस और गर्भ भाग से सवाया उदय में करना चाहिये ।। ६५ ।।
गम्भाओ हवइ छज्जु सवाउ सतिहाउ दिवड्दु वित्थारे ।
वित्थाराओ सवाओ उदयेण य निग्गमे श्रद्धो ॥ ६६ ॥
गर्भ भाग से छज्जा का विस्तार सवाया, अपना तीसरा भाग करके सहित
१६ या डेढा होना चाहिये । गर्म के विस्तार से उदय में सवाया और निर्गम प्राधा
होना चाहिये ।। ६६ ॥
छज्जउड थंभ तोरण जुअ उवरे मंडओवमं सिहरं ।
आलयमज्झे पडिमा छज्जय मज्झम्मि जलवढें ॥ ६७॥
छज्जा, स्तंभ और तोरण युक्त घर मंदिर के ऊपर मण्डप के शिखर के सदृश
शिखर अर्थात् गुम्मज करना। गृहमंदिर के मध्य भाग में प्रतिमा रखें और छज्जा में
जलवट बनावें ॥ ६७॥
गिहदेवालयसिहरे धयदंडं नो करिज्जइ कयावि ।
आमलसारं कलसं कीरह इश्व भणिय सत्येहिं ॥६८॥
घरमंदिर के शिखर पर ध्वजादंड कभी भी नहीं रखना चाहिये । किन्तु श्रामल-
सार कलश ही करना चाहिये ऐसा शास्त्रों में कहा है ॥ ६॥
- म पास्तुसारे पाचर निवासमा कम- पणवीसं पणवीसं दाहिण-चामेस पिट्ठि इकार । दह अग्गे नायब्वं इअ बाहचरि जिणिदाल ॥ ६० ॥ मप्प सम्म प्रासाद दाहिनी और पॉपी तरफ पन्चीस पम्पीस, विधाडी मारा, मागे बस मोर एक पीप में मुस्प प्रासाद, एवं इस पाचर विनातन बानना ॥१०॥ रिसरगर सही प्रासाद का फस- अंग विमूसण सहिथ पासायं सिहरबद्ध कट्ठमयं । नहु गेहे पूइज्जइ न घरिज्जह किंतु जत्तु वर ॥ ६१ ॥ कोना, प्रसिरप और भद्र भादि मंगवाला, तवा तिसक तबगादि विमान पामा शिखरब जन्नी का प्रासाद पर में नहीं पूछना पाहिसे और रखना भी मही पाहिये । किन्तु वीर्ष पात्रा में साथ दो तो दोष नहीं ॥ ११ ॥ जत्त कए पुणु पच्छा ठविज्ज रहसाल अहव सुरभवणे । ” जेण पुणो तस्सरिसो कोद जिणजत्तवरसंघो ॥१२॥ तीर्थ यात्रा से वापिस भाकर शिवरगद लकड़ी के प्रासाद को स्पधाला पा देवमन्दिर में रख देना चाहिये कि फिर कमी रसके जैसा मिन भाषा संप निकासने में काम भावे ।। ६२॥ पापन्दिर धपष- गिहदेवाल कीरह दारुमयविमाणपुष्फर्य नाम । उववीढ पीठ फरिसं जहुत्त चउरम तस्सुवरि ॥३॥ पुपक रिमान के भाकार सस्य लकड़ी का पर मदिर करना चाहिये। सपपीठ, पीठ और उसके ऊपर समचौरस फरणमादि जसा पासे कहासा करमा ॥६॥ चउ यम चउ दुवार चउ तोरण चउ दिसेहिं छज्जउडे । पंच कणवीरसिहर एग दु ति पारेगसिहरं वा ॥१४॥ .
( १५३) प्रासाद प्रकरणम् चारों कोने पर चार स्तम, चारों दिशा में चार द्वार और चार तोरण, चारों ओर छज्जा और कनेर के पुष्प जैसा पांच शिखर (एक मध्य में गुम्मन, उसके चार कोणे पर एक एक गुमटी ) करना चाहिये। एक द्वार या दो द्वार या तीन द्वार वाला और एक शिखर ( गुम्मज) वाला भी बना सकते हैं ॥ ६४ ॥ अह भित्ति छज्ज उवमा सुरालयं आउ सुद्ध कायव्वं । समचउरंसं गब्भे ततो असवायउ उदएसु ॥ ६५॥ दीवार और छज्जा युक्त गृहमंदिर बराबर शुभ आय मिला कर करना चाहिये। गर्भ भाग समचौरस और गर्भ भाग से सवाया उदय में करना चाहिये ।। ६५ ।। गब्भाओ हवइ छज्जु सवाउ सतिहाउ दिवड्डु वित्थारे । वित्थाराओ सवाओ उदयेण य निग्गमे अद्धो ॥ ६६ ॥ गर्भ भाग से छज्जा का विस्तार सवाया, अपना तीसरा भाग करके सहित १६ या डेढा होना चाहिये । गर्म के विस्तार से उदय में सवाया और निर्गम आधा होना चाहिये ।। ६६॥ छज्जउड थंभ तोरण जुअ उवरे मंडओवमं सिहरं । आलयमझे पडिमा छज्जय मज्झम्मि जलवढें ॥ ६७ ॥ छज्जा, स्तंभ और तोरण युक्त घर मंदिर के ऊपर मण्डप के शिखर के सदृश शिखर अर्थात् गुम्मज करना | गृहमंदिर के मध्य भाग में प्रतिमा रखें और छज्जा में जलवट बनावें ॥ ६७॥ गिहदेवालयसिहरे धयदंडं नो करिज्जइ कयावि । आमलसारं कलसं कीरइ इथ भणिय सत्थेहिं ॥ ६८॥ घरमंदिर के शिखर पर ध्वजादंड कभी भी नहीं रखना चाहिये । किन्तु श्रामल- सार कलश ही करना चाहिये ऐसा शास्त्रों में कहा है ।। ६६ ।। ।
-- पास्तुसारे प्रेषकार प्रशस्ति- सिरि-धंधकलम-कुल-संभवेग चदासुएण फेरेण । कन्नाणपुर ठिएण य निरिक्खिउ पुग्वसत्याइ ॥ ६१ ॥ सपरोवगारहेऊ नयण मुणि राम'चढ़ बरिसम्मि । विजयदशमीइ रह गिहपडिमालक्खणाईण ॥ ७० ॥ इति परमजैनश्रीचन्द्राङ्गजठक्कर फेरुविरचिते वास्तुसारे प्रासादविधिप्रकरण तृतीयम् । भी पधम्लश नामके पचम कुरु में उत्पम हुए मेठ चंद्र मास पर ने कल्याणपुर (करनाल) में रहकर भौर प्राचीन शाखों को देखकर सपर के उपकार २लिये निझम संवत् १३७२ पर्प में विजयदशमी के दिन पर पर, प्रतिमा मौर प्रासाद रुपण युक्त पास्तुसार नामका शिम्पग्रंथ रचा ।। ६8 । ७० ॥ नम्दाष्टनिधिचन्द्रे प प विक्रमरामतः । अन्योऽम पास्तुसारस्प हिन्दीमापानुवारिसः ।। इति सौराप्दूराष्ट्रान्सर्गत पातिप्तपूरनिवामिना पपिबतमगवानदासाला मैनेनानुमारित गृह-पिम्प प्रासादप्रफरणत्रपयुक्त वास्तुसारनामक प्रकर समाप्तम् । -
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लावसारी जैन मन्दिर का भोतरी दृश्य प्राबू ।
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जेसलमेर के जैन मन्दिर के सांभरण का सुन्दर दृश्य
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समानापामावरीपर मार
परिशिष्ट वज्रलेप- मंदिर आदि की अधिक मजबूती के लिये प्राचीन जमाने में जो दीवाल आदि के ऊपर लेप किया जाता था, वह बृहत्संहिता में वज्रलेप के नाम से इस प्रकार प्रसिद्ध है- भामं तिन्दुकमाम कपिस्थकं पुष्पमपि च शाल्मल्याः । बीजानि शल्लकीनां धन्वनवल्को वचा चेति ॥१॥ एतः सलिलद्रोणः सलिलद्रोणः काथयितव्योऽष्टभागशेषश्च । प्रयतार्योऽस्य च कल्को द्रव्यरेतः समनुयोज्यः ॥२॥ श्रीवासकरसगुग्गुलुभल्लातककुन्दुरूकसर्जरसैः । मतसीपिल्वैश्च युतः कल्कोऽयं वज्रलेपाख्यः ॥ ३ ॥ दी-तिन्दुकं तिन्दुकफलं, आममपक्वम् । कपित्यकं कपित्यकफलमामेव । शाल्मन्या: शाल्मलिवृक्षस्य च पुष्पम् । शल्लकीनां शल्लकीवृक्षाणां बीजानि । धन्वनवल्को धन्वनवृक्षस्य वन्कस्त्वक् । वचा च । इत्येवं प्रकारः । एतैर्द्रव्यः सह सलिलद्रोणः क्वाथयितव्यः । द्रोणः पलशतद्वयं षट्पञ्चाशदधिकम् । यावदष्टमागा- वशेषो भवति, द्वात्रिंशत्पलानि अवशिष्यन्त इत्यर्थः । ततोऽष्टभागावशेषोऽवता- र्योऽवतारणीयो ग्राह्य इत्यर्थः । अस्य चाष्टभागशेषस्यतद्र्व्यवक्ष्यमाणः कन्फश्चूर्णः समनुयोज्यो विधातव्यः । तच्चूर्णसंयुक्त कार्य इत्यर्थः । कैः इत्याह-श्रीवासकेति श्रीवासका प्रसिद्धवृक्षनिर्यासः। रसो बोलः, गुग्गुलुः प्रसिद्धः, भल्लातकः प्रसिद्ध एव । इन्दुरुको देवदारुवृक्षनिर्यासः । सर्जरसः सर्जरसवृक्षनिर्यासः । एतैः तथा अतसी प्रसिद्धा । बिल्वं श्रीफलं एतैश्च युतः समवेतः । अयं कल्को वज्रलेपाख्यः, वज्रलेपेत्या- ख्या नाम यस्य ।।१।२।३।। १९
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जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूपं (१४७) - जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप- जिनेश्वर देव और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप निर्वाणकलिका, प्रवचनसारोद्धार, आचार- दिनकर, त्रिषष्टीशलाकापुरुषचरित्र आदि ग्रंथों में निम्न प्रकार है। उनमे प्रथम आदिनाथ और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तंत्राचं कनकावदातवृषलाञ्छनमुत्तराषाढाजातं धनराशिं चेति । तथा तत्तीर्थोस्पन्नगोमुखयक्ष हेमवर्ष गजवाहनं चतुर्भुज वरदाचसूत्रयुत- दक्षिणपाणिं मातुलिङ्गपाशान्वितवामपाणिं चेति। तथा तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नामप्रतिचक्राभिधानां यक्षिणी हेमवर्णा, गरूडवाहनामष्टभुजां वरद- पाणचक्रपाशयुक्तदक्षिणकरां धनुर्वज्रचक्राङ्कुशवामहस्तां चेति ॥ १ ॥ प्रथम 'आदिनाथ' (ऋषभदेव ) नामके तीर्थंकर सुवर्ण के वर्ण जैसी कान्तिवाले हैं, उनको वृषभ (बैल) का चिन्ह है तथा जन्म नक्षत्र उत्तराषाढा और धनराशि है। उनके तीर्थ में 'गोमुख' नामका यक्ष सुवर्ण के वर्णवाला, 'हाथी की सवारी करनेवाला, चार भुजावाला, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और माला, बाँयीं हाथों में बीजोरा और पाश ( फांसी) को धारण करनेवाला है । उन्हीं आदिनाथ के तीर्थ में अप्रतिचक्रा (चक्रेश्वरी) नामकी देवी सुवर्ण के वर्णवाली, 'गरुड़ की सवारी करनेवाली, 'आठ भुजावाली, दाहिनी चार भुजाओं में वरदान, बाण, फांसी और चक्र वाँयी चार भुजाओं में धनुष्य, वज्र, चक्र और अंकुश को धारण करनेवाली है । १ प्राचारदिनकर में हाथी और बैल ये दो सवारी माना है। २ सिद्धाचन आदि कईएक जगह सिंह की सवारी और चार भुजावाली भी देखने में पाती। एवं श्रीपाल रास में सिंहारूदा मानी है। ३ रूपमंटन और घसुनदिकृत प्रतिष्टासार में बारह और चार भुजावाली भी मानी है-भाठ भुना दो भुजा में वज्र, एक भुजा में बीजोरा और एक में वरदान । चार भुजावाली में ऊपर के दोनों हाथों में 5 और नये दो हाथ घरदान मौर बीजोरा युक्त माना है। में (१५) वास्तुचारे दूसरे मनिवनाथ और उन पर यषिणी का स्वरूप- वितीयमजितस्वामिनं हेमा गजवायन रोहिणीजात पाति चेति। तपा ततीर्थोत्पन्नं महापहाभिधानं यश्वरं चतुर्मुस रपामय मातामाइममष्ठपाणिं परवमुदगराचस्प्रपायान्वितषियपापि पीजपुरमा भयाययक्तियुकबामपापिपल्स चेति । तपा तस्मिन्नेव ती समुत नामजिताभिधानां पषिषी गौरवर्षा बोहासमामित्यां चतुर्भजा परवा शापिशितादिपकर वीजपूरकाययुक्तपामकरां चेति ॥ २॥ इसरे 'ममितनाय' नामके तापकर है, उनके शरीर का वर्ष मुबई वर्ष का पापी के साबनगासे हैं, गरिबी नपत्र में जन्म है और राशि है। पनके वीर्य में महाप' नामका पप चार मसगधा, रुप पर्वमा ओपी के उपर सवारी करनवामा माठ मुजावाला, दाहिनी पार जामों में परदान सदर, मासा और फांसी को पार करने वाला, पापी पार गजामों में पाचोरा, भ्रममा मंडय और शक्ति को धारण करनेवासा है। उनी भनिवनापदेन के वीर्य में भनिता' (अभिवाता) मामी परिधी गैरवर्णवाली 'सोहासन पर बैठनेपाली, पार जावाली, सहिनी हो मजामों में परदाम मौर पारा (कासी) को धारण करनेपासी, बोपी दो मामों में बायोग और भकुश को धारण करनेवासी है ॥२॥ तीसरे संभवमाम पर उनके पक्ष परिणी न स्वरूप- तपा वतीयं सम्मवनार्य हेमार्म भरवशासन मगधिरजातं मिपुन राशि घेति । तस्मिरती समुत्पन्न घिमुम्पपझरवरं त्रिमुख विने श्याम पर्ण मयूरमाहर्न पनि मागदामपयुक्तदक्षिण पार्पि मातुणिनागाच सूधान्वितवामान पति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुस्पन्नो दुरितारिदेवी गौर भासाला मी पणी मात्र २ मण को मुर्विशनिवारी सतिपिपान शिरमान होगा।
. जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप ( १४६ ) वर्णा मेषवाहनां चतुर्भुजां वरदाक्षसूत्रयुक्त दक्षिणकरां फलाभयान्वित- वामकरी चेति ॥ ३ ॥ तीसरे 'सम्भवनाथ' नामके तीर्थकर हैं, उनका वर्ण सुवर्ण वर्ण का है, घोड़े के लांछन वाले हैं, जन्म नक्षत्र मृगशिर और मिथुन राशि है । उनके तीर्थ में 'त्रिमुख' नामका यक्ष, तीन मुख, तीन तीन नेत्रवाला, कृष्ण वर्ण का, मोर की सवारी करनेवाला, छः भुजावाला, दाहिनी तीन भुजाओं में नौला, गदा और अभय को धारण करनेवाला, बाँयी तीन भुजाओं में वीजोरा, 'सांप और माला को धारण करनेवाला है। उन्हीं के तीर्थ में 'दुरितारि' नामकी देवी गौर वर्णवाली, मीढा की सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और माला, बॉयीं दो भुजाओं में फल और अभय को धारण करनेवाली है ॥ ३ ॥ चौथे अभिनंदनजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा चतुर्थमभिनन्दनजिनं कनकद्युतिं कपिलाञ्छनं श्रवणोत्पन्नं मकर- राशिं चेति। तसर्थोत्पन्नमीश्वरयक्षश्यामवर्ण गजवाहनं चतुर्भुज मातुलिङ्गा- चसूत्रयुतक्षिणपाणिं नकुलाङ्कुशान्वितवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थ समुत्पन्नां कालिकादेवीं श्यामवर्णा पद्मासनां चतुर्भुजां वरदपाशाधिष्ठित- दक्षिणभुजां नागानुशान्वितवामकरां चेति ॥ ४ ॥ अभिनंदन नामके चौथे तीर्थकर है, उनके शरीर का वर्ण सुवर्ण वर्ण का है, चंदर का लाञ्छन है, जन्म नक्षत्र श्रवण और मकर राशि है । उनके तीर्थ में 'ईश्वर' नामके यक्ष कृष्णवर्ण फा, हाथी की सवारी करने वाला, चार भुजावाला, दाहिनी दो भुजाओं में बीजोरा और माला, बॉयों दो भुजाओं में न्यौला और अंकुश को धारण करनेवाला है। १ विषष्टीशलाका पुरुष चरित्र में रस्सी' धारण करनेवाला माना है। २ चतुर्विशतिजिनेन्दचरित्र में 'फणिमृद्' सर्प लिखा है। 'चतुर्विंशतिजिनस्तुति' जो दे० ला. में सचित्र छपी है उसमें 'फल' के ठिकाने फलक ( ढाल ) दिया है, वह अशुद्ध है क्योंकि ऐसा सर्वत्र देखने में आता है कि एक हाथ में खड्ग हो तो दूसरे हाथ में ढाल होती है । परन्तु खड्ग न हो तो ढाल भी नहीं होनी चाहिये । हाल का सम्बन्ध खग के साथ है । ऐसी कई जगह भूल की है।
. -- FT - वास्तुसारे पनके वीर्ष में मालिका' नामकी यषियी कम्पपर्स की, पर (मह) पर बैठी हुई पार मबागाली दाहिनी दो मजामों में परदान और फांसी, गॉगी दो समानों में नाग मोर अंकुश को घारव करनेवाली है ॥ ४ ॥ पांचवें मुमविनामभिन और उनके पप यक्षिणी का स्वरूप-- तथा पञ्चम सुमतिजिनं दमवणे कौत्रवामन मधोत्पन्न सिंहराति बेति । ततीर्थोत्पन्नं तुम्पस्यक्ष रमेतवर्ण गमवाइन पतु जबरदयक्तिमुत- दक्षिणपाणि नागपाययुकवामहस्त चेति । तस्मिने ती समुत्पन्ना महाकाली देवी सुवषेषयों पनवाइमा चतुर्सजा परदपावामिष्ठितषिय- करा माविमाययुक्तबामममा घेति ॥ ५ ॥ मुमविनायजिन नामके पौषवें तीर्थकर है, उनके शरीर का बर्य सुबर्सव का है, कौंच पदी का साम्बन है, बाम नपा मपा और सिंह राशि। उनके तीपं में 'तुंबर' नामका यप सफेद वर्मा, गका पर सपारी करने पासा, पार समाचाता, दाहिनी दो मुभाभी में परदान और शपिया कॉपीरो समामों में नाग और पाश को पारण करनेवासारे। उन वीर्य में 'महाकानी' नामकी देवी सुवर्ष पर्यशाची, कमल का पान पाती, पार मुजाराली, दाहिनी दो भुजाओं में पादान और पाय, बॉपी दो भुमामों में पीनोरा और प्रकृय को पारण करनेवाली है।॥५॥ बढे पामममिन और उन पर पक्षिणी कप स्वरूप- तपा पठं पनमम रक्तवर्ण कमलसम्बनं पिवानवजात कन्या राशि पेति। तसीस्प: कसम यक्ष मीनबर्ण करमान बसंत फवामपयुक्तदक्षिणपार्षिमझवापरप्रयुक्तमामपापि पेति । तस्मिन्पत्ती समुत्पन्नामध्युता देवी श्पामवर्णा मरवाहमा पतुर्मुजा परदनावान्वितदपिण करा कामुकामपयुतवामहस्तां पेति ॥ ६॥ पपप्रम नाम के बारे मीकर , उनके शरीर का पर्ण साता का है, बमला साम्छन । कम मपत्र चित्रा और न्या राशिहै। मरमाबार पारिनम और शिरिष में कार में समा र 1 मागण्य माना।
जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप ( १५१ ) उनके तीर्थ में 'कुसुम' नामका यक्ष नीलवर्ण का, हरिण की सवारी करने वाला, चार भुजावाला, दाहिनी दो भुजाओं में फल और अभय बाँयी दो भुजाओं में न्यौला और माला को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'अच्युता' (श्यामा) नामकी देवी कृष्ण वर्णवाली, पुरुष की सवारी करनेवाली, 'चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और वाण, पायीं दो भुजाओं में धनुष और अभय को धारण करनेवाली है ॥ ६ ॥ सातवें सुपार्धजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा सप्तमं सुपावं हेमवर्ण स्वस्तिकलाञ्छनं विशाखोत्पन्नं तुला- राशिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं मातङ्गयक्षं नीलवर्ण गजवाहनं चतुर्भुज विल्व- पाश्थयुक्तदक्षिणपाणिं नकुलकाङशान्वितवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्न शान्तादेवीं सुवर्णवर्णा गजवाहनां चतुर्भुजां वरदाक्षसूत्रयुक्त- दक्षिणकरां शूलाभययुतवामहस्तां चेति ॥७॥ सुपायजिन नाम के सातवें तीर्थकर हैं, उनके शरीर का वर्ष सुवर्ण वर्ण का है, स्वस्तिक लांछन है, जन्म नक्षत्र विशाखा और तुला राशि है। उनके तीर्थ में 'मातंग' नामका यक्ष नीलवर्ण का, हाथी की सवारी करने वाला, चार भुजावाला, दाहिनी दो भुजाओं में विलु फल और पाश ( फांसी), बायी दो मुजामों में 'न्यौला और अंकुश को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'शान्ता' नामकी देवी सुवर्ण वर्णवाली, हाथी के ऊपर सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और माला, बायीं दो भुजाओं में शूली और अभय को धारण करनेवाली है ॥ ७ ॥ . १ दे० ला० सूरत में छपी हुई च० वि० जि० स्तुति में फल के ठिकाने ढाल बनाया है वह अशुद्ध है। २ प्राचारदिनकर में दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और पाश, चौयों दो भुजाओं में बीजोरा और अंकुश धारण करना माना है। ३ भाचारदिनकर में 'वन' लिखा है (१२) वास्तुसारे माओं पप्रममिन भौर उनके पद पपिणी स्वरूप- तपाष्टम चन्द्रप्रमजिनं पवनवणे चन्द्रवाम्बने भनुरापोत्पन्न प्रति रासिं थेसि । ततीर्थोत्पन्न विजयपक्ष हरितवर्षे त्रिनेत्रं हसवान निमुन दक्षिणहस्ते यमं पामे मुद्गरमिति । तस्मिन्नेव ती समुत्पन्ना भाटिदेवी पीतवर्ण पराइ ( पिल ) पाहनां चतुजां सड़गपुदुगरान्वितदधिषमुजा फषकपररायुतषामहस्तां चेति ॥८॥ पंद्रप्रमजिन नाम माठ तीर्थकर है उनके शरीर का पर्व सफेर है, पंद्रमा का सायन रे, मन्म नपा मनुराधा और प्रमिक सारी। उनके तीर्थ में 'विजय' नागज पप रापर्स वासा, तीन नेप्रमाला, सही समारी करनासा, दा मुनापासा, दाहिनी भुमा में पक और पा हाल में समर से धारण करनेपाला है। उनके वीर्य में 'मृटि' (मामा ) नामकी देवी पीसे पर की, "परा या विसाप () की सपारी करनेवाली, पार सुमागाती, दाहिनी दो मामो में सदम भौर सगर, मोषी दो समामों में राम और फरसा को धारण करनेपाली ॥ नव, सुरिधिभिन मीर उनके पर परिणी का स्वस्म- । तपा नवम सुपिपिजिन पपक्षपर्ण मकरसाबम भूबनवजातं का रासिं चेति । तत्तीस्पामजितपक्ष श्वेतवर्ण फर्मवाहन चतुर्भुजमातुविधा चरमपुफ्तदक्षिणपाणिं नकुलकुन्ता बतबामपाणिं पेति। तस्मिन्नेव ती समुरुपक्षा सुतारादेपों गौरपर्णा पूपयाहना पतुभुजा परदापसूत्रयुमतदधिष भगा कलगागान्वितयामपाणि पेति ॥६॥ चालिगरामापरिजन it गाभाNिERI बारीमा FEARNayaR TRA । RMS मत (a) कमी माप।
१ आदिनाथ (ऋषभदेव) के शासनदेव और देवी-
१- गोमुख यक्ष
१ - चक्रेश्वरी देवी
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२ अजितनाथ के शासनदेव भोर देवी-
२ महायस
२ - अजितबला देवी
Arjuniliune
३ सभवनाथ के शासनदेव और देवी-
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1-विमुख या
२ उरितारिया
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४ अभिनवनजिन के शासनदेव और देवी-
7- ईभर यक्ष
ससारेबी
५ सुमतिनाथ के शासनदेव और नेवी-
५. तबस यह
५- गलाकाली देसी
tha
६ पद्मप्रभजिन के शासनदेव और देवी-
६- यम यम
६ अच्युता-श्यामा
देवी
पाणुसारे म्याप यांसमिन और उनके पप पषिणी न स्वरुप- तयका मेपास इमपर्ण गएकवायन भषपोल्पी मकरराशि चेति। तत्तीस्पाक्षमीश्वरयझ पपलपर्ण मिनेन तृपभवादन पतुभुज मातुविवान्वितदक्षिणपार्थि मकुक्षाचम्युरुवामपार्षि तस्मिन्नेव ती समुस्पतां मानधी देषी गौरवर्णी सिंहयाइनां चतुर्सजा परद मुदगरान्वितद्धिपपाणिं कायाकुणयुक्तवामकरी घेति ॥ ११ ॥ श्रेयांसमिन नाम के ग्यारहवें वीर्यकर में उनके शरीर का बस सुवर्ण वर्षका १ सद्गी का साम्छन है, मम्म नपत्र भवण और मकर राशि है। उनके दीर्थ में शिर' नाम पर सफर पर्सवाना, तीम नवाला, बैन की समारी करनेवाला, चार मुवाशाला, दाहिनी दो भुनामों में पीनारा मोर गा; पापी दो भुमामों में न्यौसा और गाजा को पारण करनवाला है। उनके तीर्थ में 'मानपी' (भीवत्सा ) नामकी देवी गौरवसेवामी, सिर की सवारी करनेपाली, पार सुमापाती, दाहिनी दो मजाभों में बरदान भौर पर, पापी दो समानों में करता और भकुश को धारण करनेमाती ॥११॥ पाय मासपूम्पमिम मौर उनके पर पक्षिणी मवरूप~ तपा मावर्य षासुपूज्यं रक्तवर्या महिषपापमं शतभिपजि जातं कुम्मरामिं चेति । सत्तीस्पिन कुमारया श्वेतवर्ण समापन पतुसंज मातुझियापान्वितदधिणपाणिं मकरकपनुर्युक्तवामपाणिं चेति । तस्मि मेष तीचे समुत्पना प्रभादेवी स्पामबी भरवास चतुर्मजा बरव शक्तियुक्तपविणकर पुष्पगदायुक्तबामपाधि चेति ॥ १९॥ पासपूरपबिन नामले पारहर्षे तीर्थंकर हैं, उनके शरीर काय सास है, मैंसा के सम्बनमासे , भन्मनचत्र शतभिषा और कुमराशि है। उनके तीर्य में 'कुमार' नाम का यच सफर पर्सवासा, इस की सवारी करने पासा, चार मुमावासा वाहिनी दो मुमामों में भीमारा और बाद मामे दो गायों में म्यौता भौर पनुप को धारण करनेवासा है। साबा गण ( मी) विधा है। विधी मंच मति (मन) नि।
जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप ( १५५) उनके तीर्थ में 'प्रचण्डा' (प्रवरा) नाम की देवी कृष्ण वर्णवाली, घोड़े पर सवारी करने वाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और शक्ति चाँयीं दो भुजानों में पुष्प भौर गदा को धारण करनेवाली है ॥ १२ ।। तेरहवें विमलजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा त्रयोदर्श विमलनाथ कनकवर्ण वराहलाञ्छनं उत्तरभाद्रपदा- जातं मीनराथि चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं षण्मुखं यक्ष श्वेतवर्ण शिखिचाहनं द्वादशभुज फलचक्रवाणखड्गपाशाक्षसूत्रयक्तक्षिणपाणि, नकुलचक्र- घनुःफलकाङ्कुशाभययुक्तवामपाणि चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्ना विदितां देवी हरितालवर्णा पद्मारूढां चतुर्भुजां बाणपाशयुक्तक्षिणपाणि धनुर्नागयुक्तवामपाणिं चेति ॥ १३ ॥ विमलजिन नाम के तेरहवें तीर्थंकर सुवर्ण वर्णवाले हैं, सूअर के लांछनवाले हैं, जन्म नक्षत्र उत्तराभाद्रपदा और मीन राशि है। उनके सीर्थ में 'पण्मुख' नाम का यक्ष सफेद वर्ण का, मयूर की सवारी करने- वाला, बारह भुजावाला, दाहिनी छ: भुजाओं में 'फल, चक्र, बाण, खड्ग, पाश और माला बायीं छ: भुजाओं में न्यौला, चक्र, धनुष, ढाल, अंकुश और अभय को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'विदिता' ( विजया ) नाम की देवी हरताल के वर्णवाली, कमल के प्रामनवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वाण और पाश तथा चायीं दो भुजाओं में धनुष और सांप को धारण करनेवाली है ॥ १३ ॥ चौदहवें अनन्तजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- सथा चतुर्दशं अनन्तं जिनं हेमवर्ण श्येनलाञ्छनं स्वातिनक्षत्रोत्पन्नं तुलाराशिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं पातालयक्षं त्रिमुखं रक्तवर्ण मकरवाहनं षभुज पद्मखड्गपाशयुक्तदक्षिणपाणिं नकुलफलकामसूत्रयुक्तवामपार्णि १२. ला० सूरत में च० वि० जि० स्तुति में यहां भी फल के ठिकाने दाब दिया है, उसकी - -
७ सुपार्श्वजिन के शासनदेव और देवी-
७
माता यस
७ शानादेवी
८ चन्नपभुजिन के शासनदेव और देवी-
विजय मम
ज्मा नारीकी
जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप (१५३ ) सुविधिजिन नामके नववे तीर्थकर हैं, उनके शरीर का वर्ण सफेद है, मगर का लांछन, जन्म नक्षत्र मूल और धन राशि है। उनके तीर्थ में 'अजित' नामका यक्ष सफेद वर्ण का, कछुए की सवारी करने वाला, चार भुजावाला दाहिनी दो भुज ओं में बीजोरा और माला, बायीं दो भुजाओं में न्यौला और भाला को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'सुवारा' नामकी देवी गौरवर्ण की, वृषभ ( बैल ) की सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और माला; बॉयीं दो भुजाओं में कलश और अंकुश को धारण करनेवाली है ॥ ६ ॥ दशवें शीतलजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा दशमं शीतलनाथं हेमाभं श्रीवत्सलाञ्छनं पूर्वाषाढोत्पन्नं धनराशि चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नं ब्रह्मयक्षं चतुर्मुखं त्रिनेत्रं धवलवर्ण पना- सनमष्टभुजं मातुलिङ्गमुद्गरपाशाभययुक्तक्षिणपाणिं नकुलकगदाडशाक्ष- सूत्रान्वितवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां अशोकां देवीं मुद्ग- वर्णा पनवाहनां चतुर्भुजां वरदपाशयुक्तदक्षिणकरां फलाङ्कुशयुक्त- वामकरां चेति ॥ १०॥ शीतलजिन नाम के दसवें तीर्थंकर हैं, उनका वर्ण सुवर्ण वर्ण का है, श्रीवत्स का लाञ्छन, जन्म नक्षत्र पूर्वाषाढा और धनु राशि है । उनके तीर्थ में 'ब्रह्मयक्ष' नाम का यक्ष चार मुखवाला, प्रत्येक मुख तीन २ नेत्रवाला, सफेद वर्ण का, कमल के आसनवाला, पाठ भुजा वाला, दाहिने चार हाथों में बीजोग, मुद्गर, पाश, और अभय बाँयें चार हाथों में न्यौला, गदा अंकुश मौर माला को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'अशोका' नाम की देवी. मूंग के वर्णवालो, कमल वाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और पाश; बॉयों दो भुजाओं में 'फल और अंकुश को धारण करनेवाली है ॥ १० ॥ و श्रासन । दे० ला० सूरत में छपी हुई च० वि० जि० स्तु० में दाल दना दिया है, यह अशुद्ध है। २० पास्तुसारे ग्याप यांसजिन मोर उनके पर पपिणी स्वरूप- तथैकादर्श अपार्स इमपर्ण गएकसान भवयोपन मकररादि चेति । तत्तीर्थोत्पन्नमीश्वरपक्षं पबलवर्ण त्रिनेत्र पृपभवाहनं चतुर्भुज मातुविशागदापितदक्षिणपाणि नकुलाधमत्रयुक्तवामपाणिं तस्मिन्नेव तीर्थे समुस्पला मामधीं देषी गौरपी सिंहषाहनां पतुजा परद मुद्गरान्पितदक्षिणपाणिं कलशाययुकथामकरां थेति ॥ ११ ॥ भांसजिन नाम के ग्यारा वीर्यकर में उनके शरीर का पर्स सुपर्ण पर्षका है, खद्गी का साम्छन है, भग्म नपत्र भरख और मकर राशि है। उनके तीर्थ में पर' नाम का यष सफर पर्णवाला तीन नमाला, बैज की सवारी करनेवासा, पार भुजापाला, दाहिनी दो मुमामों में बीमारा और गरा, गामी दो मुनामों में न्यौसा और माता को धारण करनेवाला है। मनवीर्य में 'मानपी' (भीवरसा ) नामकी देवी गौरवणवाणी, सिर की समारी करनेपाली, धार सभापाली, दाहिनी दो मजामों में बरदान पौर पदर, पापी दो एमाभों में पसरा और अकुरा को घारण परनेवानी ॥ ११ ॥ पाय पापम्पमिन मोर उनके पर पक्षिणी म स्वरूप- तपा मादयं पासपूज्यं रफ्तषों महिपमापन शतभिषजि जातं हुम्मरासिं चेति। तचीर्थोत्पन्नं मारयां श्वेतपर्ण इसबाहन चतुर्मुज मातुणियापान्वितदधिषपार्षि मकुखकममुर्युक्तवामपाणि चेति। तस्मि मेष तो समुत्पमा प्रचयगदेवी रपाममा परवानां चतुर्भजा परम शक्तियुक्तचिषकर पुष्पगदायुक्तधामपाणि पेति ॥ १२ ॥ पासुपूज्यचिन नामक पारा पीकर , उनके शरीर कापस साल है, मैंसा के मामबनवाते हैं, अन्मनपत्र शतमिपा और कुंभराशि है। एनके तीर्प में 'कुमार' नाम का यच सफर पर्यवासा, ईस की सवारी करने पासा, चार पुमापासा, दाहिनी दो मुमामों में बीमारा और पार को पापें दो पायो में म्यौसा और पनुष को पारस परनेवाला है। समारोबार में पाया (मा) विनियममय ( ब ) विका।
( १५५ ) जिनेश्वर देव और उनके शासन देवा का स्वरूप उनके तीर्थ में 'प्रचण्डा' (प्रवरा) नाम की देवी कृष्ण वर्णवाली, घोड़े पर सवारी करने वाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और शक्ति वाँयीं दो भुजानों में पुष्प मोर गदा को धारण करनेवाली है ॥ १२ ॥ तेरहवें विमलजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा त्रयोदशं विमलनाथ कनकवर्ण वराहलाञ्छनं उत्तरभाद्रपदा- जातं मीनराशिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं षण्मुखं यक्षं श्वेतवर्ण शिखिवाहनं द्वादशभुजं फलचक्रयाणखद्गपाशाक्षसूत्रयुक्तदक्षिणपाणिं, नकुलचक्र- धनुःफलकाङ्कुशाभययुक्तवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थ समुत्पन्नां विदितां देवी हरितालवर्णा पद्मारूढां चतुर्भुजा घाणपाशयुक्तदक्षिणपाणि धनुर्नागयुक्तवामपाणिं चेति ॥ १३ ॥ विमलजिन नाम के तेरहवें तीर्थंकर सुवर्ण वर्णवाले हैं, सूअर के लांछनवाले हैं, जन्म नक्षत्र उत्तराभाद्रपदा और मीन राशि है। उनके तीर्थ में 'पण्मुख' नाम का यक्ष सफेद वर्ण का, मयूर की सवारी करने- चाला, वारह भुजावाला, दाहिनी छ: भुजाओं में 'फल, चक्र, बाण, खड्ग, पाश और माला वॉयीं छ: भुजाओं में न्यौला, चक्र, धनुप, ढाल, अंकुश और अभय को धारण करनेवाला है। उनके तीर्थ में 'विदिता' (विजया ) नाम की देवी हरताल के वर्णवाली, कमल के आसनवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वाण और पाश तथा बांयीं दो भुजाओं में धनुष और सांप को धारण करनेवाली है ॥ १३ ॥ चौदहवें अनन्तजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा चतुर्दशं अनन्तं जिनं हेमवर्ण श्येनलाञ्छनं स्वातिनक्षत्रोत्पन्न तुलाराशिं चेति । ततीर्थोत्पन्नं पातालयक्षं त्रिमुखं रक्तवर्ण मकरवाहनं षभुज पद्मखड्ग पाशयुक्तदक्षिणपाणिं नकुलफलकाक्षसूत्रयुक्तवामपाणि १२० ला. सूरत में च० वि० जि० स्तुति में यहां भी फल के ठिकाने दान दिया है, उसकी भूब है।
- पास्तुमारे ति । तस्मिन्नेव ती समुत्पन्नां पण देगी गोरगी पद्मवाहनां पतु संजा सागपाययुक्तदक्षिणकरां धर्मफसकाययुतवामहस्ता पेति ॥ १४ ॥ बनन्समिन नाम के चौदा वीर्षकर है, उनके शरीर का पर्ण पर्व रंग 1, स्पेन (पास) पपी के नाम्नाले, मन्म नपत्र स्वाति और तुला राशि मासे है। उनके वीर्य में 'पावान' नाम का पद, वीन लगाना, सात वर्षमासा, मगर के पाहनषासा, ६ ममापासा, दाहिनी तीन ममामों में कमस, सर्ग भौर पाशा गामी तीन सामों में मौला, राम और मामा को धारण करनपाला है। पनी के वीर्ष में 'मंशा' नाम की देवी गौर वर्णमाही, कमठ के वाहन पासी, पार समामासी, दादिनी दो मुमामों में सरग और पारा यमि दो मुनाओं में राम और प्रकाश को धारण करनेवासी है।॥ १४ ॥ पना पर्मनायधिन और उनके घर परिणी का स्वरूप- तपा पचदर्य पमंजिन कनकपर्ण बजवायन पुप्पोस्पर्म राधि घेति । तत्सीस्पिन किन्नरयक्ष भिमुख रक्तवर्ण कर्मवाहर्म पग्मज बीज परकगवाभपयुक्तपिपाणिं मलपनाचमाखायुक्तबामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुस्पनो फन्दपी देवी गौरव मस्स्पवाहमा चतुर्मा उत्पलाययुक्तदधिषकर पनामपयुक्तवामहस्तां चेति ।। १५ ॥ पर्मनापविन नाम के पन्द्रह वीर्षकर में, य सुवर्य वसपारे, पन लाम्बम बारे जन्म नपा पुम्म और कर्क राशिवाले हैं। उनके तीर्थ में हिमर नाम का पद, तीन मसपाला, सात वर्षगामा, कए कापानमास', मुजावाखा, दाहिनी मुमामों में बीगोरा, गदा और अभय, भोपा हापों में न्यौता, कमल और माता को पारमरनेवाला। उनी के सीप में कारपो' (पम्गा ) नाम की देसी, मोर पर्यवासी, मक्सी कबारनवासी, चार मुभावाती, दाहिनी समानों में कमस भौर अशा बागी मुमामों में पप भौर प्रमय को पार करनेवाती है ॥ १५ ॥ कि बिधिमा बाम पर और भावना पोहापायी मामा।
६ सुविधिग्नि के शासनदेव और दवी-
९ - अजित यस
९ - रातारा देवी
"
--
१० शतिलजिन के शासन देव और देवी-
१०- ब्रह्मयक्ष
१०- अशोका देवी
११ श्रेयासजिन के शासनदेव और देवी-
11 पर मा
१. माननीमाबला) देवी
१२ वामुपज्यजिन के शासनदेव पौर देवी-
12
कुमार मन
१२
प्रबहादेश
I
PrE
१३ विमलनाथ के शासनदेव और देवी-
१३ - षण्मुरव यक्ष
१३ विदिता (विजया) देवी
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१४ अनन्तनाथ के शासनदेव और देवी-
१४- पाताल यक्ष
१४ - अकुशा देवी
+
१५ धर्मनाथ के शासनदेव और देवी-
१५ किसर मक्ष
१५ करो (m)ी
१६ शातिनाथ के शासनदव और देवी-
1" गरर यस
" नितीगी देवी
जिनेश्वर देव और उनके शासन देवों का स्वरूप ( १५७) सोलहवें शान्तिजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा षोडशं शान्तिनाथं हेमवर्ण मृगलान्छनं भरण्यां जातं मेषराथिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं गरुडयक्षं वराहवाहनं क्रोडवदनं श्यामवर्णं चतुर्भुजं बीजपूरकपद्मयुक्तक्षिणपाणिं नकुलाक्षसूत्रवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां निर्वाणी देवी गौरवर्णा पद्मासनां चतुर्भुजां पुस्तकोस्पल- युक्तक्षिणकरां कमण्डलुकमलयुतवामहस्तां चेति ॥ १६ ॥ शान्तिजिन नाम के सोलहवें तीर्थकर हैं, ये सुवर्ण वर्ण वाले, हरिण के लाञ्छनवाले, जन्मनक्षत्र भरणी और मेप राशिवाले हैं। उनके तीर्थ में 'गरुड' नाम का यक्ष 'सूअर के वाहनवाला, सूअर के मुख- वाला, कृष्णवर्णवाला, चार भुजावाला, दाहिनी दो भुजाओं में चीजोरा और कमल, वायें दो हाथों में न्यौला और माला को धारण करनेवाला है । उन्हीं के तीर्थ में निर्वाणी' नाम की देवी गौरवर्णवाली, कमल के वाहनवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुनाओं में पुस्तक और कमल; बाँयीं भुजाओं में कमंडलु और कमल को धारणकरनेवाली है ॥ १६ ॥ सत्रहवें कुंथुजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा सप्तदशं कुन्थुनाथं कनकवर्ण छागलाञ्छनं कृत्तिकाजातं वृषभ- राशिं चेति । तत्तीर्थोस्पन्नं गन्धर्वयक्षं श्यामवर्ण हंसवाहनं चतुर्भुजं वरद- पाशान्वितक्षिणभुजं मातुलिङ्गानुशाधिष्ठितवामभुजं चेति। तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां बलां देवीं गौरवर्णा मयूरवाहनां चतुर्भुजां वीजपूरकशूलान्वित- दक्षिणभुजां मुघुण्ढिपमान्वितवामभुजां चेति ॥ १७ ॥ कुन्युजिन नाम के सत्रहवें तीर्थकर हैं, ये सुवर्ण वर्णवाले, बकरे के लाञ्छन- वाले, जन्मनक्षत्र कृत्तिका और वृष राशिवाले हैं। १ त्रिपष्टीयताका पुरुष चरित्र में 'हाथी' की सवारी लिखा है २ भाचारदिनकर में सुवर्ण वर्णवाली लिखा है।
(१५८) पास्तसारे उनके वीर्ष में गर्व' नाम का पप छप्स पर्मपासा, ईस के वानवाला, पार अभावाला, दाहिनी मुनामों में वरदान और पाश, पायी सुमामों में बीमोरा और मकुर को धारण करनेवाला है। उनी के तीर्थ में 'पला' (मध्यता) नाम की देवी गौरवर्णवानी, मोर के पाहनवासी, चार मुमाबाप्ती राहिने हाथों में बीमोरा और शूली को पानी राषों में लोरे की की नगी हुई गास लाड़ी मोर कमल को धारण करनेवाली है ॥ १७ ॥ मठ मरमाव और उनके यह परिणी म स्वस्म- तपा प्रध्यदशम भरनापं हेमाम नन्यापर्समापन रेमतीनवजातं मीनरासिं चेति । ततीर्पोत्पन्न यखेन्द्रयक्ष षण्मुस त्रिनेत्रं पामवणे या पाइन हादरामु मातुविंगवाणनगमूवगरपाशाभयपुफ्तदचिणपाणि नकुल एनुअर्मफलकावास्यायनयुक्तवामपाणि चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे सन स्पन्मां पारिणी देवी कृष्णषों चतुर्भमां पद्मासना मातुणिोपवान्वित दक्षिणमुजा पायाचवज्ञान्वितमामहरी चेति ॥ १८ ॥ पठारावें 'भरनाय' नाम के तीर्थकर है, वे सुपी वर्णमाले, नन्दापर्य के साम्यनपाले बन्मनपत्र पती पौर मीन राशिमा। उनके तीर्थ में 'पपेन्द्र' नाम का पप का सषासा, प्ररपेक मुख तीन २ नेत्रवाना, रुप्प वर्णमाप्ता, रोख का वाहनमाला बारा मुजागाजा, दाहिने हार्यों में पीमोरा, बाण सा महर पाश भौर प्रमय पाय सापों में पोशा भनुप, रासा शूत, मंकुश और माता को पार करनेवाला है। उनी कार्य में पारिता' नाम की देवी पासी, चार मुनापासी, कमर के पासनवासी, दाहिनी भुमामों में पानोरा भार कमस, पोपी मुजाभों में पाश और माता को धारण करनेवासी है॥१८॥ १ मि और पा में अपनी माना। . ' सावा पासपो माdivat' इति सोये। समारोबा निवाल्पपरिव और बाचादिषभ में 'पम हिस।
जिनेश्वरदेव और उनके शासनदेवों को स्वरूप (१५६) , उन्नीसवें मल्लिजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप-- तथैकोनविंशतितममल्लिनाथं प्रियङ्गुवर्ण कलशलाञ्छनं अश्विनीनक्षत्र- जातं मेषराशि चेति । तत्तीर्थो स्पन्नं कुबेरयक्षं चतुर्मुखमिन्द्रायुधवणे गरुड वनं गजवाहनं अष्टभुजं वरदपरशुशूलाभययुक्तदक्षिणपाणिं चीजपूरकश- क्तिमुद्गराक्षसूत्रयुक्तवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां वैरोट्यां देवीं कृष्णवर्णी पद्मासनां चतुर्भुजां वरदाक्षसूत्रयुक्तदक्षिणकरां मातुलिंग- शक्तियुतवामहस्तां चेति ॥ १६ ॥ मल्लिनाथ नामके उन्नीसवें तीर्थकर हैं, ये प्रियंगु (हरे ) वर्णवाले, कलश के लाञ्छनवाले, जन्मनक्षत्र, अश्विनी और मेप राशिवाले हैं। उनके तीर्थ में 'कुवेर' नामका यक्ष चार मुखवाला, इंद्र के आयुध के वर्ण- वाला ( पंचरंगी ), गरुड के जैसा मुखवाला, हाथी की सवारी करनेवाला, माठ भुजा वाला, दाहिनी भुजाओं में वरदान, फरसा, शूल और अमय को; बॉयीं भुजाओं में बीजोरा, शक्ति, मुद्गर और माला को धारण करनेवाला है । उन्हीं के तीर्थ में 'वैरोट्या' नामकी देवी कृष्ण वर्णवाली, कमल के वाहन वाली, चार भुजा वाली, दाहिने भुजाओं वरदान और माला; वॉयीं भुजाओं में बीजोरा और शक्ति को धारण करनेवाली है ॥ १६ ॥ बीसवें मुनिसुव्रतजिन और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा विंशतितमं मुनिसुव्रतं कृष्णवर्ण कूर्मलाञ्छनं श्रवणजातं मकर- राशिं चेति । तत्तीर्थोस्पन्नं वरुणयक्षं चतुर्मुखं त्रिनेत्रं धवलवर्ण वृषभवाहनं जटामुकुटमण्डितं अष्टभुजं मातुलिंगगदाधाणशक्तियुतक्षिणपाणिं नकुल- कपद्मधनुःपरशुयुतवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां नरदत्तां देवी गौरवर्णी भद्रासनारूढां चतुभुजां वरदाक्षसूत्रयुतक्षिणकरां बीजपूरक- शूलयुतवामहस्तां चेति ॥ २० ॥ मुनिसुव्रतजिन नामके बीसवें तीर्थंकर हैं, ये कृष्ण वर्णवाले, कछुए के लांछनवाले, जन्म नक्षत्र श्रवण और मकर राशिवाले हैं। - (१९०) पातुसारे मक तीर्थ में 'वरूप मामका थप चार मुसमासा, प्रत्येक मुख तीन २ । पाला, सफद' पर्यषाना, बैज्ञरे गानवाला, शिरपर बटा मट से मुशोभित, भाठ अमावाला, राहिनी मुनामों में पीबोरा, गदा, पाय और शक्ति का पानी मुनामों में पौला कमल', धनुप और फरसा को पार करनेवाला है। उनी के तीर्य में 'नरहया' नामकी देवी गौर वर्मपानी', मनासन पर बैठी हुई, पार मुभावाली, दाहिनी मुमामों में बगदान और माला, पोमी मुमामों में बीमोय भौर शस को पार करनेमाली है ॥ २० ॥ इकीसमें ममिमिन और नके पर परिणी प्र स्वरूप- तपैकर्षियतितमं ममिजिन कनकवण भीवोत्पनवाबनं प्रथिनीजातं मेपरासिं थेति । ततीर्थोस्पन्न सुटियक्ष चतुर्मुस पिने दमवणे पमवा एन अष्ठमुर्ज मातुखियक्तिमुद्गरामपपुफ्तक्षिपपापि महणपररावणाक्ष षषामपापि घेति । ममेर्गान्धारीदमी रमेता इंसवाहमा चतुजा परवाना पुस्तदक्षिणमुजमा पीजपूरम(न्त ! )पतवामपाणिग्या येति ॥२१॥ नमिधिन नामके इन्हीसमें वीर्षकर , ये सुपर्स पर्साल, नील कमरे साधनगले, बन्म नषत्र भपिनी भौर मप राषिपाते हैं। उनक तीर्य में 'मृकुटि' नामक पद पार सुखपाला, प्रत्यक मुख दीन २ नेवाला, सुरण पर्यवाला, बस का गहमपाता, माठ मुबागला, दाहिने राषों में पीमोरा, शश्कि, मदर और ममप गोपी हायों में न्यौता, फरसा, पम और मासा को धारण करनेगसा है। उनी के तीर्थ में 'गांधारी' नामकी देणं सफेद पर्साली, इस के पाइनणसी, पार मुगापासी, दाहिनी मुजामों में बरदान और ससगार, पौंपी मुमायों में पीमोरा मार इमान्लग ( माला) पारस करमेवाती ॥ २१ ॥ INममारोह में पप सिम। १.NP मा वि। ३ मामधारोहार भाचाररिनार में सुगमन मिल
१७ कुंथुनाथ के शासनदेव और देवी-
19. ध यक्ष
१७
चलादेवी
१८ अरनाथ के शासनदेव और देवी-
१८- यक्षेन्द्र यक्ष
१८
धारिणी देवी
Love
farh 19/7145 120
वास्तुसार धमक तीय में परुष' नामका यध पार मुखपाता, प्रत्येक बस तीन २ नेत्र पाला, सफद' धर्मगला, पेल रे पानगाला, शिरपर पटारे मकट से सुशोमिता माठ मुमागला. दाहिनी मुनामों में पीबोरा, गदा, पाय भौर फिका पापी भुनामों में न्यौक्षा कमल', धनुप भौर फरसा को धारण करनेवाला है। ही के तीर्य में 'मरदा' नामकी देवी गौर वर्षवाली', मद्रासन पर बैठी हुई, पार मुपागली, दाहिनी मुमामों में घरदान और मासा, पापी मुनामों में सीमोरा भौर शन को पारण करनेवाली है ॥२०॥ इबीसवें ममिजिन भौर उनके पर परिणी का स्वरूप- तकर्षियतितम ममिजिन कनकवण नीयोल्पाबाबन भन्थिनीजातं मेपरासिं थेति । तत्तीर्पोत्पन्न भटिपक्षं चतुर्मु त्रिनेत्रं दमवणे पृपमया हनं अष्टभुज मातुविशक्तिमूदगरामयपुफ्तदक्षिणपाणिं मकुवपररावजाक्ष सूत्रमामपाणि घेति । नमेर्गापारीदेषी श्वेता हंसवाहनां तुम जो बरदता पुपत्तदक्षिणभुजयां पीजपूरकुंभ(कुन्त ? )युतवामपाणियां चेति ॥२१॥ ममिमिन नामके इकीस तीर्थकर है, ये सुपर्ण बजगल, नील कमल के साख्नवाले, सन्म नक्षत्र मधिनी भौर मप राशिमाल । उनक वीर्य में 'मृकुटि' नामका यप पार मुसाला, प्रत्यक मत दीन २ नेप्रपाला, सुमय वर्णपासा, पंस का मानवाला, माठ मुसापाला, दाहिने पों में पीमोरा शक्ति, मुद्गर और भमरा पोपी हापों में न्योता, फरसा, पम और माला का धारण करनपाला। उनी रे वार्ड में 'गाधारी' मामकी देग सफेद पर्णगली, इसकेगानगसी पार सुमाराली, दाहिनी भुजामों में परदान और तलपार, पापी मुनामों में पीमोरा भार फुमालश (मासा)को पारण करनेवाली ॥२१॥ परमनाहार पनि। ...में माहादिया। प्राममा पारित गुरवंत मिनी
२१ नमिनाथजिन के शासनदेव और देवी-
२१ - फरि यक्ष
२१
गाधारी देवी
Shantramu
।
२२ नेमिनाथजिन के शासनदेव और देवी-
२२ - गोमेधयक्ष
२२- अम्बिका देवी
ह
१६ मल्लिनाथ के शामन देव और देवी-
१९ ऊमेर मम
13 - शेरमानी
२० मुनिसुव्रतजिन के शासनदेव और देवी-
त
16णम
२
नवना देवी
२१ नमिनाथजिन के शासनदेव और देवी-
२१ - रि यक्ष
27 - गाधारी देवी
२२ नेमिनाथ जिन के शासनदेव और देवी-
२२ - गोमेधयक्ष
२२- अम्बिका देवी
२३ पाश्चनाधजिनके शासनदेव और देवी-
२२० मार्चमम
२३ पद्मावती
aar
२४ महावीरजिनके शासनदव और देवी-
२४ माnai
२४-सिपाधिकारी
जिनेश्वरदेव और उनके शासनदेवों का स्वरूप । १६१) बाईसवें नेमिनाथ और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा द्वाविंशतितमं नेमिनाथं कृष्णवर्ण शङ्खलाञ्छनं चित्राजातं कन्या- राशिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं गोमेधयक्ष त्रिमुखं श्यामवर्ण पुरुषवाहनं षड्भुज मातुलिङ्गपरशुचक्रान्वितदक्षिणपाणिं नकुलकशूलशक्तियुतवामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां कूष्माण्डी देवी कनकवर्णा सिंहवाहनां चतुर्भुजा मातुलिङ्गपाशयुक्तदक्षिणकरां पुत्रांकुशान्वितवामकरां चेति ॥ २२॥ नेमनाथ जिन बाईसवें तीर्थकर हैं, ये कृष्ण वर्णवाले, शंख का लांछनवाले, जन्म नक्षत्र चित्रा और कन्या राशिवाले हैं। उनके तीर्थ में गोमेध' नामका यक्ष, तीन मुखवाला, कृष्ण वर्णवाला, , पुरुष की सवारी करनेवाला, छ: भुजावाला, दाहिनी भुजाओं में बीनोरा, फरसा और चक्र बाँयें हाथों में न्यौला, शूल और शक्ति को धारण करनेवाला है । उन्हीं के तीर्थ में 'कुष्माण्डी' अपर 'अम्बिका' नामकी देवी, सुवर्ण वर्ण- वाली, सिंह की सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिने हाथों में 'बीजोरा और पाश; बाँयें हाथों में पुत्र और अंकुश को धारण करनेवाली है ॥ २२ ॥ - तेईसवें पार्श्वनाथ और उनके यक्ष यक्षिणी का स्वरूप- तथा त्रयोविंशतितमं पार्श्वनाथं प्रियंगुवर्ण फणिलान्छनं विशाखाजातं तुलाराशिं चेति । तत्तीर्थोत्पन्नं पार्श्वयक्षं गजमुखमुरगफणामण्डितशिरसं श्यामवर्ण कूर्मवाहनं चतुर्भुजं बीजपूरकोरगयुतक्षिणपाणिं नकुलकाहियुत घामपाणिं चेति । तस्मिन्नेव तीर्थे समुत्पन्नां पद्मावती देवी कनकवी कुर्कु- स्वाहनां चतुर्भुजां पद्मपाशान्वितदक्षिणकरां फलांकुश्शाधिष्ठितवामकरां चेति ॥२३॥ पार्श्वनाथ जिन नामके तेईसवें तीर्थंकर हैं, ये प्रियंगु ( हरे) वर्णवाले, सांप के लांछनवाले, जन्म नक्षत्र विशाखा और तुला राशि वाले हैं। १ प्रवचनसारोदार निपटीशक्षाकापुरपचरित्र और प्राचारदिनकर में 'श्रानलुवी' लिखा है।
२३ पाश्वनाथाजिनके शासनदेव और देवी-
21-
मार्चमक्ष
२३ पमावतीन
-
aa
२४ महावीरजिनके शासनदव और देवी-
४ मातंगमन
२४-सिपालिका
सोलह विद्यादेवी का स्वरूप । प्रथम रोहिणीदेवी का स्वरूप- प्रायां रोहिणीं धवलवर्णा सुरभिवाहनां चतुर्भुजामक्षसूत्रवाणान्वित- दक्षिणपाणिं शङ्खधनुर्युक्तवामपाणिं चेति ॥१॥ प्रथम 'रोहिणी' नामक विद्यादेवी सफेद वर्णवाली. कामधेनु गौ पर सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में माला और वाण तथा बाँयीं भुजाओं में शंख और धनुप को धारण करनेवाली है ॥ १ ॥ दूसरी प्रज्ञप्तिदेवी का स्वरूप- प्रज्ञप्ति श्वेतवर्णा मयूरवाहनां चतुर्भुजां वरदशक्तियुक्तदक्षिणकर मातुलिंगशक्तियुक्तवामहस्तां चेति ॥ २ ॥ 'प्रज्ञप्ति' नामकी विद्यादेवी सफेद वर्णवाली, मोर पर सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और शक्ति तथा बाँयीं भुजाओं में बीजोरा और शक्ति को धारण करनेवाली है ॥ २॥ आचारदिनकर में दो हाथवाली माना है, एक हाथ में शक्ति और दूसरे हाथ में कमल धारण करनेवाली माना है। तीसरी वज्रशृङ्खलादेवी का स्वरूप- बज्रशृंखला शंखावदातां पद्मवाहनां चतुर्भुजा वरदशृंखलान्वित दक्षिणकरां पद्मशृंखलाधिष्ठितवामकरां चेति ॥ ३ ॥ 'वज्रशृंखला' नामकी विद्यादेवी शंख के जैसी सफेद वर्णवाली, कमल के आसनवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और साँकल तथा वाँयीं भुजाओं में कमल और सॉकल को धारण करनेवाली है ॥ ३ ॥ आचारदिनकर में सुवर्ण वर्णवाली और दो भुनावाली, एक हाथ में साँकल और दूसरे हाय में गदा धारण करनेवाली माना है ।
उनके वीर्य में पार्थ नामका पर हाथी के मुखवाला, शिर पर सांप की फपीपाला, फण पर्सवासा, कहए की सवारी करनपासा, चार भुजावाला, दाहिनी सुजामों में पीजोरा भौर 'सौप पोपी मुमामों में न्यौशा और साँप को पारवरने पासाहै। . " उनी के सीप में 'पपावती' नामकी देवी सुरण वर्णमासी, पुर्गे दी समारी करनेवासी, धार मुमावानी, दाहिनी मुजामों में कमठ मोर पाण) पापी मुनामों में फल और महश को धारण करनेवाली है ॥ २३ ॥ पौषीस महावीरजिन भौर पनके पस पक्षिणी का स्वरूम- तपा चतुर्षि शतितम पवर्षमानस्वामिनं कनकम मिहलायन उत्त राफागुन्या जात कपाराशिं घेति । ततीपोत्पमं मातङ्गपक्ष श्यामवणे गज वाहनं मिस इक्षिपणे नकल पामे पीअपूरकमिति । तत्तीर्नोस्पल सिमा पिका हरितवर्षी सिंहबाहना पतुओ पुस्तकाभपयफ्तदक्षिणकरा मातु विवीणान्वितयामहस्ता चेति ॥ २४ ॥ पर्दमान स्वामी ( महावीर स्वामी) नामके चौबीसमें मीर्थकर, ये सुनर्ग वर्णमासे, सिंह के साधनना, नाम नपत्र उचराफान्गुनी मौर कन्या राशिवाले हैं। उनके सीर्य में 'मावग' नामका यच रुप पर्यवाता, हापी की सारी करने दो मुजारासा, दाहिने हाथ में पौसा और पायी हाय में बीमोरा को पारण करनेवासा। उनी के वीर्ष में 'सिझायिका' नामकी देषीरे पषासी, सिंहसी समारी परनेपानी, पार समावासी, दाहिनी भजामों में पुस्तक मौर मभय, रोपों पुनामों में पीयोरा भीर बाणा का धारण करनेपासी ॥ २४ ॥ पासा, बापरिमार 'गारितार। रममा सिराहायपुर और माविमन-बराना : असि मामferti -RE परिणीबिना। आमसरी पार और पाबमा दिन।
- सोलह विद्यादेवी का स्वरूप । प्रथम रोहिणीदेवी का स्वरूप- श्राद्यां रोहिणीं धवलवर्णा सुरभिवाहनां चतुर्भुजामक्षसूत्रवाणान्वित- दक्षिणपाणिं शङ्खधनुर्युक्तवामपाणिं चेति ॥१॥ प्रथम 'रोहिणी' नामक विद्यादेवी सफेद वर्णवाली. कामधेनु गौ पर सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में माला और बाण तथा वायीं भुजाओं में शंख और धनुप को धारण करनेवाली है ॥ १॥ दूसरी प्रज्ञप्तिदेवी का स्वरूप--- प्रज्ञप्तिं श्वेतवर्णी मयूरवाहनां चतुर्भुजां वरदशक्तियुक्तक्षिणकर। मातुलिंगशक्तियुक्तवामहस्तां चेति ॥ २ ॥ 'प्रज्ञप्ति' नामकी विद्यादेवी सफेद वर्णवाली, मोर पर सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और शक्ति तथा बाँयीं भुजाओं में बीजोरा और शक्ति को धारण करनेवाली है ॥ २ ॥ आचारदिनकर में दो हाथवाली माना है, एक हाथ में शक्ति और दूसरे हाथ में कमल धारण करनेवाली माना है। तीसरी वज्रशृङ्खलादेवी का स्वरूप- वज्रशृंखला शंखावदातां पद्मवाहनां चतुभुजां वरदशृंखलान्वित दक्षिणकरां पद्मशृंखलाधिष्ठितवामकरां चेति ॥ ३ ॥ 'वज्रशृंखला' नामकी विद्यादेवी शख के जैसी सफेद वर्णवाली, कमल के आसनवाली, चार भुजावाली, दाहिनी दो भुजाओं में वरदान और साँकल तथा बाँयीं भुजाओं में कमल और सॉकल को धारण करनेवाली है ॥ ३ ॥ आचारदिनकर में सुवर्ण वर्णवाली और दो भुनावाली, एक हाथ में साँकल और दूसरे हाथ में गदा धारण करनेवाली माना है।
पातुसारे पौषी बांटी देवी का स्वरूप- पाहुयां कनवर्षा गजवाहनां चतुजा बरबजयुतदविषारी मातुविमाययुक्तवामहस्तां चेति ॥ ४ ॥ 'वाडा' नामकी बियादेवी सवर्ष पैसी कान्तिपासी, हामी की सवारी करनवाली, चार सभापासी, दाहिनी दो साभों में परदान और बन तथा बाँगी समामों में बीघोरा और मफुश को धारण करनेवासी ॥४॥ माचारदिनकर में चार हाप क्रमशः वसवार, बल, दाल और माता युक्त माना है। पांची माविचाकरवी म स्वरूप- प्रतिचक्रो तरिनुपर्णा गवाहनां चतुजा चावतुष्टपषित करी पेति ॥५॥ 'अप्रतिषका' नामकी विपादेगी बीमती रे बैसी चमकती हुई कान्तिवासी, महकी समारी करनेवाली और चारों ही समाभों में चको पारपरमेवासी।।।। भट्ठी पुरुषपचदेवी का स्वरूप- पुरुपदत्ता कमकावदाता महिपीवाहनाचतुर्सजा परदासिपुताधिप करां मातुविशाररुपतवामहसतां चेति ॥ ६ ॥ 'पुष्परचा' नामकी विपादेवी सुपर्ण नैसी कान्तिवासी, मैंस की सारी करनेवाली, पार सवाबासी, वाहिनी समामों में परवान और वसवार तथा नापी सजामों में पीमोरा और रात को पारण करनेवाली है ।। ६ ॥ मापारदिनकर में वसपार और दान युक्त दा आयबासी माना है। सावी कामदेवी का स्वरम- कानी देवी कृष्णवर्ण पपासना पतुसंजो मधसूत्रगदालतदक्षिण कर। वामपपतवामहस्ता घेति ॥७॥ , विद्यादेवियों का स्वरूप- ܫܝ 1 रोहिनी देवी १ २ प्रतप्ति देवी One ३ वज्जवला देवी ४ वजांकुशा देवी w पास्तुसारे पीपी माइती देवी प्रस्वरूप- पाहुयां कनकवर्णा गजषाहनां चतुर्सां परदवजपुतददिपकर मातुतिहणयुक्तवामहस्तां चेति ॥४॥ 'पोशा' नामकी रियादेवी वर्ष के सी चन्तिवाती, हामी की सवारी करनेपानी, चार ममावाती, दाहिनी दो सखामों में वरदान और बज पा कॉपी समानों में बीमोरा और भकुश को धारण करनेवाली रे॥ ४ ॥ भाषारदिनकर में पार हाप क्रमशः सलवार, पत्र, दास और माता युद्ध माना है। पांची भाविकाररेपी का सम- मप्रतिको तरितवर्षी गमावानां चतुर्मजा कष्टपषित करी पेति ॥२॥ 'अप्रतिषका' नामकी पिपादेवी बीबसी के सी धमकती हुई कान्तिवादी, गम की सवारी करनेवाली और चारों ही समामों में पोपारपरनेपाली ।।५।। बढी पुरपायरेषी बस्वरूप- पुरुषवत्ता कनकावदाता महिपीवाहाचतुर्सजा परदासिपुक्तचिप- करा मातुलिखेटकपुलवामहस्तां चेति ॥५॥ 'पुल्सरचा' नामकी विपादेषी सुपरसी कान्तिपाती, मैंस दी समारी करनेवाली पार समावजी, दाहिनी समानों में परान और तबगार पा पापी अनामों में बीचोरा और सो धारण करनेवाली है ।। ५॥ माधारदिनार में वसवार और राख या दारापाती माना है। सावी कापीरेवी का स्वरम- काली देवी रुप्पपणी पद्मासना चतुजा भवस्त्रगवाहलवषिष कर। बजोमयमुतवामहसता चेति ॥७॥ .
विद्यादेवियों का स्वरूप- 1 रोहितनी देवी १ २ प्रतत्ति देवी ३ वनखला देवी वनांकुशा देवी बिद्यादेवियों का स्वरूप- ५ अपतियानी ६yमहनादेवी ७ काली देनी मराकाली विद्यादेवियों का स्वरूप- ९ गौरी देवी १० गांधारी देवी ४ yhini .. - ११ सास्त्रादेवी (मज्वाला) १२ मानवी देवी M-T विद्यादेवियों का स्वरूप- १३ रोजाना 17 अच्छुप्ता देनी ममाता रेवी 14 मानसीसी
सोलह विद्यादेवी का स्वरूप
( १६५)
'काली' नामकी विद्यादेवी कृष्ण वर्णवाली, कमल के आसनवाली, चार
मुजावाली, दाहिनी भुजाओं में अक्षमाला और गदा तथा बॉयीं भुजाओं में वज्र
और अभय को धारण करनेवाली है ।। ७ ॥
आचारदिनकर में गदा और वज्रयुक्त दो हाथवाली माना है ।
.
आठवीं महाकालीदेवी का स्वरूप-
महाकाली देवीं तमालवर्णा पुरुषवाहनां चतुर्भुजां अक्षसूत्रवज्रान्वि-
तदक्षिणकरामभयघण्टालंकृतवामहस्तां चेति ॥ ८ ॥
'महाकाली' नामकी विद्यादेवी तमाखू के जैसी वर्णवाली, पुरुष की सवारी
करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी भुजाओं में अक्षमाला और वज्र तथा बॉयीं
भुजाओं में अभय और घंटा को धारण करनेवाली है ॥ ८ ॥
आचारदिनकर में सफेद वर्णवाली, दाहिनी भुजाओं में माला और फल तथा
बायीं भुजाओं में वज्र और घंटा को धारण करनेवाली माना है। किन्तु शोभन-
मुनिकृत जिनचतुर्विंशति का में 'धृतपविफलाक्षालीघण्टैः करैः' अर्थात् वज्र, फल, माला
और घंटा को धारण करनेवाली माना है।
-
नववीं गौरीदेवी का स्वरूप-
गौरी देवी कनकगौरी गोधावाहनां चतुर्भुजा वरदमुसलयुतदक्षिण-
करामक्षमालाकुवलयालंकृतवामहस्तां चेति ॥ ८ ॥
'गौरी' नामकी विद्यादेवी सुवर्ण वर्णवाली, गोह ( विषखपरा ) की सवारी
फरनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी भुजाओं में वरदान और मुसल तथा बॉयीं
मुजाओं में माला और कमल को धारण करनेवाली है ॥8॥
आचारदिनकर में सफेद वर्णवाली और कमल को धारण करनेवाली माना है ।
दसवीं गांधारीदेवी का स्वरूप-
गांधारीदेवी नीलवर्णी कमलासनां चतुर्भुजां वरदमुसलयुतदक्षिण-
कर्रा अभयकुलिशयुतवामहस्तां चेति ॥१०॥
(६१)
पास्तुसारे
'गांधारी नामकी दरावी विणदेवी नील (बाकाश ) पर्णवासी,
कमन
भासनवाली, चार समापाली, दानिी मजामों में वरदान और मुसल पा पोगी
मुनामों में ममप मौर वन को धारण करनेपाली ॥१०॥
माचारदिनकर में रुप्प पर्ववाती सया मुसत और पज को धारण करनेवाली
माना है।
मामा
म्यापी महामायदेवी का स्वरूप-
सर्यास्त्रमहाज्या घपवषयों पराहवाइनो प्रसंस्यमहरणयुतहस्ता
थेति ॥ ११॥
सर्वानादेवी नामान्तरे 'महाजाला नामकी म्पारती विद्यादेवी सफेद गर्न
पाखी, सुमर की सवारी करनेवासी मौर मसंस्प शस्त्र यह हापवासी है ॥ ११ ॥
भाचारदिनकर में विनाप की सवारी करनेवासी भौर नातायुकदोहामवाली
है। बोमनमुनिकत बिनचतुर्षिगतिका में परातक पान माना है।
पापी मानवीपी का स्वरूप-
मानवी श्यामवर्णा कमवासना चतुर्सजा परदपायासंकृतक्षिणकरी
अपसूत्रपिटपालंकृतवामहस्ता घेति ॥ १२॥
'मानवी' नामकी पारापी विधादेवी वर्मबाप्ती, कमल के मासनवासी,
पार मुनापाती, दाहिनी मुमा वरदान और पाय सबा पाषी भुमा मासा और सपा
मुशोमित है ॥ १२॥
मापारदिनकर में नीस पर्यबाली, नीतामस के पासनवासी और पपुल
पवाती माना।
देवी रोल्पादेवी का स्वरूप-
रोव्यां श्यामवर्ण मजगरवाहना बमजा लद्वोरगाहलदक्षिण
कर लेटकाहियुतबामकरी घेति ॥ १३ ॥
सोलह विद्यादेवी का स्वरूप (१६७) " 'वैरोख्या' नामकी तेरहवीं विद्यादेवी कृष्ण वर्णवाली, अजगर की सवारी करनेवाली, चार भुजावाली, दाहिनी भुजाओं में तलवार और सॉप तथा बॉयीं भुजाओं में ढाल और सॉप को धारण करनेवाली माना है ॥ १३ ॥ आचारदिनकर में गौरवणं वाली, सिंह की सवारी करनेवाली, दाहिना एक हाथ तलवारयुक्त और दूसरा हाथ ऊंचा, बाँयां एक हाथ साँपयुक्त और दूसरा वरदानयुक्त माना है। चौदहवीं अच्छुप्तादेवी का स्वरूप- अच्छुप्ता तडिद्वर्णा तुरगवाहनां चतुर्भुजां खड्गवाणयतदक्षिणकरां खेटकाहि युतवामकरां चेति ॥ १४ ॥ 'अच्छुप्ता' नामकी चौदहवीं विद्यादेवी बीजली के जैसी कान्तिवाली, घोड़े की सवारी करनेवाली, चार भुजावानी, दाहिनी भुजाओं में तलवार और बाण तथा बाँयीं भुजाओं में ढाल और सॉप को धारण करनेवाली है ॥ १४ ॥ आचारदिनकर और शोभनमुनिकृत चतुर्विंशति जिनस्तुति में साँप के स्थान पर धनुष धारण करने का माना है । पंद्रहवीं मानसीदेवी का स्वरूप- मानसी धवलवी हंसवाहनां चतुर्भुजां चरवज्रालंकृतदक्षिणकरां अक्षवलयाशनियुक्तवामकरां चेति ॥ १५ ॥ 'मानसी' नामकी पंद्रहवीं विद्यादेवी सफेद वर्णवाली, हंस की सवारी करने- वाली, चार भुजावाली, दाहिनी भुजा वरदान और वज्र तथा बॉयीं भुजा माला और वज्र से अलंकृत है ॥ १५ ॥ आचारदिनकर में सुवर्ण वर्णवाली तथा वज्र और वरदानयुक्त हाथवाली माना है। १ यह पाठ अशुद्ध मालूम होता है यहां धनुप का पाठ होना चाहिये, क्योंकि वाण के साथ धनुप का सयध रहता है।
(१५) पास्तुसारे सोपी महामानसीदेवी स्वरुप- महामानसी देवी पषवषर्ण सिंहवाहनां चतुर्सजा परदासियुक्त पविणकरां कपिसकाफलकयुतवामहस्ता पेति ॥ १६ ॥ 'महामानसी' नामकी सोसावी विद्यादेवी सफेद पर्सवासी, सिंह की सारी करनेवासी, पार सजावाली, दाहिनी मुखामों में वरदान मौर वनपार पा गॉपी मुजामों में कुरिका और दाल को धारण करनेवासी माना है ॥ १५ ॥ माघारदिनकर में सलवार और घरदानयुक्त दो हाप सपा ममर की समारी . माना। जय विजयादि चार महा प्रतिहारी देवी का स्वरूप । "मारेषु पूर्वविपिनैव सुवर्णवमे, पाकियाऽभपदमुद्गरपाणपोऽमू' । देम्यो अपापि विजयाप्यजिताऽपराजि ताक्पे प पारखिलं प्रतिहारकर्म ॥१॥" पमानामहामने सरे । सममसरय के मुपर्णगारे पूरिदारों में पाश, अंकुश, मभप भौर मुद्गर को स करनपाती मया, रिमया मजिवा भौर मपरामिसा नामकी पार पी द्वारपाल का कार्य करती।
दिगम्बर जैनशास्त्रानुसार तीर्थंकरो के शासनदेव यक्षों और यक्षिणियों का स्वरूप, - १-गौमुख यक्ष का स्वरूप- सवोत्तरार्ध्वकरदीप्रपरश्वधाक्ष-सूत्रं तथाऽधरकराफलेष्टदानम् । प्राग्गामुखं वृषमुखं वृषगं वृषाङ्क-भक्तं यजे कनकभं वृषचक्रशीर्षम् ॥१॥ वृषम के चिह्नवाले श्री आदिनाथ जिन के अधिष्ठायिक देव 'गोमुख' नामका यक्ष वह सुवर्ण के जैसी कांतिवाला, गौके मुख सदृश मुखवाला, वैलकी सवारी करने वाला, मस्तक पर धर्मचक्र को धारण करनेवाला और चार भुजावाला है । ऊपर के दाहिने हाथ में माला और बाँये हाथ में फरसा तथा नीचेके वॉये हाथ में बीजोरे का फल और दाहिने हाथमें वरदान धारण करनेवाला है ॥१॥ १-चक्रेश्वरी (अप्रतिहतचक्रा) देवी का स्वरूप- भर्माभाद्यकरद्वयालकुलिशा चक्राङ्कहस्ताष्टका, सव्यासव्यशयोल्लसत्फलवरा यन्मूर्तिरास्तेऽम्बुजे । ताक्ष्य वा सह चक्रयुग्मरुचकत्यागैश्चतुर्भिः करैः, पञ्चेष्वास शतोन्नतप्रभुनतां चक्रेश्वरी तां यजे ॥१॥ १. गोमुखयक्ष १चक्रेश्वरी देवी Haha trict ११८-२ पास्तुसारे पांचसौ घनुप के शरीर पाले भीआदिनाथ जिनपर की शासन देवी ' बकेवरी' नामकी दी है। वह सुवर्ष क जैसी वर्ण पाली, कमल के ऊपर मैठी हुई, गल की सवारी करने वाली और पारस समावाली है । दा सरफ के दा हायमें वन, दो तरफ के पार २ हापों में आठ पर, नीचे के पपि हायमें फल और दाहिने हाथमें घरदान मा धारण करने वाली है। प्रकारान्तर से चार भुमा पाली मी मानी है, ऊपर के दोनो हाथों में चम, नीचे के पोये हाप में पीजोरा और दाहिने हाप में वरदान को धारण करनेवाली है ॥१॥ - २-माापसका स्वरूप- T चत्रिशलकमलाशवामहस्तो निमिंशवणपरशयवराण्यपाणिः । धामीकरपुतिरिभाइनतो महादि-पक्षोऽयंतो (R) अगतमतुराननोऽसौ ॥ २॥ हाथी के पिहवाले श्रीममिवनाप जिनेवर का शासनदेव 'महायप' नाम-का या है। पर मुवर्ण के जैसी फान्ति वाला, हाथी की सवारी करने वाला, चार मुख पाला और जाठ मुखा पाला है। माँये पार हार्यों में पा, त्रिशूल, फमल और अक्षय को, वमा दाहिने पार हापों में तलपार, दमा, फरसा और बरदान को धारण करनेवाला है ॥२॥ २- महायक्ष-यक्ष २-अनिता(रोहिनी देवी YA • पसनदी-मविणासारमें गामोर कमरामासन माना है।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप १६८-३- - २-अजिता (रोहिणी) देवी का स्वरूप- स्वर्णद्युतिशखरथाङ्गशस्त्रा लोहासनस्थाभयदानहस्ता। देवं धनुः सार्द्धचतुश्शतोच्चं वन्दारुवीष्टामिह रोहिणीष्टेः ॥२॥ साढ़े चार सौ धनुप के शरीरवाले श्री अजितनाथ जिनेश्वर की शासन देवी 'रोहिणी, नाम की देवी है । वह सुवर्ण के जैसी कान्तिवाली, लोहासन पर बैठनेवाली और चार भुजा वाली है । तथा उसके हाथ शंख, चक्र, अभय और वरदान युक्त हैं ॥ २ ॥ ३-त्रिमुख यक्ष का स्वरूप- चक्रासिमृण्युपगसव्यसयोऽन्यहस्तै-दण्डत्रिशूलमुपयन् शितकर्तिकां च, वाजिध्वजप्रभुनतः शिखिगोऽञ्जनाभ-स्त्यक्षःप्रतीक्षतु बलिं त्रिमुखाख्ययक्षः ॥३॥ घोड़े के चिह्नवाले श्रीसंभवनाथ के शासन देव 'त्रिमुख' नामका यक्ष है, वह कृष्ण वर्णवाला, मोर की सवारी करनेवाला, तीन २ नेत्र युक्त तीन मुखवाला और छह भुजावाला है। बॉये हाथों में चक्र, तलवार और अंकुश को तथा दाहिने हाथों में दंड, त्रिशूल और तीक्ष्ण कतरनी को धारण करने वाला है । ३-प्रज्ञप्ति ( नम्रा) देवी का स्वरूप- पक्षिस्थाद्धेन्दुपरशु-फलासीढीवरैः सिता । चतुश्चापशतोचाहद्-भक्ता प्रज्ञप्तिरिज्यते ॥३॥ २ । ३-त्रिमुखयक्ष ३-प्रज्ञप्ति(नना)देवी Animes ALLL वास्तुसारे - पार सौ धनुपके शरीर पासे भीसमवनाप की शासनदेवी 'प्रमाप्ति' नामकी देवी है। पर सफेद वर्गमाली, पक्षी की समारी करनेवाली और छह हायवाली है। हाथों में बईचंद्रमा, फरसा, फल, वसपार, इष्टी. (तुम्बी १) और परदान को धारण करनेपाली है।॥ ३॥ ५-पसेपर पस का स्परूप- मोदनुःखेटकवामपाणिं, सकरपत्रास्यपसम्पइस्तम् । श्याम करिस्थ कपिकेतुमक्त, यक्षेश्वर यक्षमिहार्पयामि ॥४॥ पानरके पिपासे भीजमिनन्दन घिन के शासनदेव ' यक्षेपर' नामका या है। रुप्णवर्णवासा, हापी की सवारी करनेवाला, और चार सभावाला है। पपि हाथों में धनुष और रासको तथा दाहिने हाथों में पाप और तलवार को पारण करनेवाला है ॥ ४ ॥ --बरंचसा (दूरितारी) देवी का सम्प- सनागपाशोरूफलाक्षसूत्रा इसाधिस्था परवानुमुक्ता। हेमप्रभार्दनिधनुःशतोष-तीपेंशनम्ना पपिमालाओं ॥४॥ सारे वीन सौ धनुष के शरीर पाले भीममिनदन जिन की शासनदेवी 'परसता' नाम की देवी है, सुवर्ण के बेसी कान्तिवाली, इसकी सवारी करनेवाली भौर चार राजाबासी है। हाथों में नागपाल, पीबोराफल, माला और बरदान को धारण करनेवाली है ॥४॥ r-यक्षेश्वर यक्ष वजयखलारितारी देनी प्रतिहाविपकमें पिरी सिवाद।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप
१६८-५
में
५-तुम्बरु यक्ष का स्वरूप-
सोपवीतं द्विकपन्नगोर्ध्व-करं स्फुरद्दानफलान्यहस्तम् ।
कोकाड्कननं गरुडाधिरूढं श्रीतुम्बरं श्यामरुचिं यजामि ॥ ५॥
चकवे के चिह्नवाले श्रीसुमतिनाथ के शासन देव 'तुंबरु' नामका यक्ष है । वह कृष्ण
वर्णवाला, गरुड की सवारी करनेवाला, सर्पका यज्ञोपवीत (जनेऊ) को धारण करनेवाला, और
चार भुजावाला है । इसके ऊपर के दोनों हाथों में सर्प को, नीचे के दाहिने हाथ
वरदान
और वॉये हाथ में फल को धारण करनेवाला है ॥ ५ ॥
५-पुरुषदत्ता (खद्गवरा) देवी का स्वरूप-
गजेन्द्रगा वज्रफलोद्यचक्र-वराङ्गहस्ता कनकोज्ज्वलाङ्गी ।
गृहानुदण्डत्रिशतोन्नताहन नतार्चनां खड्गवराय॑ने त्वम् ॥५॥
तीन सौ धनुष शरीर के प्रमाणवाले श्री सुमतिनाथ की शासन देवी 'खड्गवरा' (पुरुष-
दत्ता) नामकी देवी है । वह सुवर्ण के वर्णवाली, हाथी की सवारी करनेवाली और चार भुजावाली
है। हाथों में वज्र, फल, चक्र और वरदान को धारण करनेवाली है।
"
। तुम्बर यक्ष
4-खावरा(पुरषदत्ता) देवी
.
६-पुष्प यक्ष का स्वरूप-
मृगारुहं कुन्तवरापसव्य-करं सखेटाऽभयसव्यहस्तम् ।
श्यामाङ्गमज्जध्वजदेवसेव्यं पुष्पाख्ययक्षं परितर्पयामि ॥ ६ ॥
- . - पास्तुसारे पार सौ धनुप के शरीर पाल भीसमवनाप की शासनदेवी 'प्रनप्ति' नामकी देवी है। पर सफेद धर्मवाली, पधी की सवारी करनेवाली और छह हाथवाली है। हालां में अर्दषद्रमा, फरठा, फल, उलवार, इष्टी (सुम्पी) और परदान को धारण करनेवाली है।। ४-यसेवर पक्ष का स्वरूप- प्रेहदनुस्टकवामपाणिं, सकपमास्यपसम्याहस्तम् । श्याम करिस्थ कपिकेतुमक्त, यक्षेश्वरं यक्षमिहायामि ॥४॥ पानरके पिएमाठे श्रीजमिनन्दन मिन के शासनदेष ' यक्षेपर' नामका यक्ष, मा फप्नवर्णवाला, हाची की सवारी करनेवाला, और चार सनावाला है । पाँपे हाथों में पनुप और गलको समा दाहिने हाथों में पान और प्रसवार को धारम करनेवाला ॥४॥ v-परेलला (दूरिवारी) देवी का स्वरूप- सनागपाशोसफराक्षसूत्रा इमाधिरूता परवानुमुक्ता । देमप्रभार्दनिधनुःशप्तोच-तीपशनम्रा पविचारार्चा ॥ ४ ॥ सारे चीन सौ धनुप के शरीर पासे भीममिनंदन दिन की शासनदेषी बसससा' नाम की देवी है, सुवर्ग के नैसी फान्तिवाली, इसकी सवारी करनेवासी और चार राजावासी है।हापों में नागपाश, बीमोराफल, माला और परवान फो धारण करनेवाली ॥४॥ r-यक्षेश्वर यक्ष वनरखलारितारी) देवी1 -प्रठिठातिकमें पिरी दिया है।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियो का स्वरूप
५-तुम्बरु यक्ष का स्वरूप-
सोपवीतं द्विकपन्नगोर्ध्व-करं स्फुरद्दानफलान्यहस्तम् ।
कोकाड्कननं गरुडाधिरूढं श्रीतुम्बरं श्यामरुचिं यजामि ॥ ५ ॥
चकवे के चिह्नवाले श्रीसुमतिनाथ के शासन देव 'तुंवरु' नामका यक्ष है । वह कृष्ण
वर्णवाला, गरुड की सवारी करनेवाला, सर्पका यज्ञोपवीत (जनेऊ) को धारण करनेवाला, और
चार भुजावाला है । इसके ऊपर के दोनों हाथों में सर्प को, नीचे के दाहिने हाथ में वरदान
और बॉये हाथ में फल को धारण करनेवाला है ॥ ५ ॥
५-पुरुषदत्ता (खद्गवरा) देवी का स्वरूप-
गजेन्द्रगा वज्रफलोद्यचक्र-वराङ्गहस्ता कनकोज्ज्वलाङ्गी ।
गृह्णानुदण्डत्रिशतोन्नताहन नतार्चनां खड्गवराय॑ने त्वम् ॥५॥
तीन सौ धनुष शरीर के प्रमाणवाले श्री सुमतिनाथ की शासन देवी 'खगवरा' (पुरुष-
दत्ता) नामकी देवी है । वह सुवर्ण के वर्णवाली, हाथी की सवारी करनेवाली और चार भुजावाली
है। हाथों में वज्र, फल, चक्र और वरदान को धारण करनेवाली है।
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। तुम्बर यक्ष
4- खजवरा (पुरुषदत्ता) देवी
(
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६-पुष्प यक्ष का स्वरूप-
मृगारुहं कुन्तवरापसव्य-करं सखेटाऽभयसव्यहस्तम् ।
श्यामाङ्गमञ्जध्वजदेवसेव्यं पुष्पाख्ययक्षं परितर्पयामि ॥ ६ ॥
पास्तुसारे फमल के चिलवाले भीपपप्रमजिन के शासन देव 'पुष्प' नामका यक्ष है। पर रुप्प वर्णवाला, हरिण की सपारी फरनेवाला और चार • मुजावाला है। दाहिने हाथों में मासा और परदान को, सपा योये हाथों में गल और अमय को पारण करनेवाला है ॥ ६ ॥ -मनोवेगा (मोहनी) देवी का स्वरूप- तुरन्याहना क्षेपी मनोवेगा चतुर्सजा । घरदा पाबनाया सोल्लामिफलकायुषा ॥ ६ ॥ पपप्रम जिनकी शासनदेषी 'मनोवेगा' (मोहिनी) नामकी देवी है । पा सुवर्ण वर्णवाली, पोरे की सारी फरनेवाली और चार मुजापाला है। हायों में वरदान, तलवार, राल और फल को पारण करनेवाली है॥६॥ - ६ पुष्पयक्ष -मनोवेगा(मोहिनी देवी ७-मादंग पसका साप- सिंहापिरोस्प सवाल-सव्यान्यपाणे: कुटिलाममस्य । कृष्णस्विपः स्वास्तिककेतुमके-आतापक्षस्प करोमि पूजाम् ॥७॥ सस्तिक के पिहपाल पीसुपार्थनाप फ शासनदेच 'मावंग' नामका पप पर कृष्ण पर्भवाला, सिंह की सपारी करनेवाला, इटिस (टेग) मुखवासा, दाहिने हाथ में विश्वत मोर पोय हाय में दंर को पारम करनेवाला है। सुनंरि प्रतिष्ठा करप में दो मुमाबाना माना है।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप
१६८-७
७-काली (मानवी) देवी का स्वरूप--
सितां गोवृषगां घण्टां फलफूलवरावृताम् ।
यजे काली द्विको दण्ड-शतोच्छ्रायजिनाश्रयाम् ॥ ७ ॥
दो सौ धनुष के शरीरवाले श्रीसुपार्श्वनाथ की शासनदेवी 'काली' (मानवी) नामकी
देवी है । वह सफेद वर्णवाली, बैलकी सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है । हाथों में
घंटा, फल, त्रिशूल और वरदान को धारण करनेवाली है ॥ ७ ॥
७- मातंगयक्ष
७-काली (मानवी) देवी
AACHAN
Hyapain
८--श्याम यक्ष का स्वरूप---
-
sho
यजे स्वधित्युद्यफलाक्षमाला-वराङ्कवामान्यकरं त्रिनेत्रम् ।
कपोतपत्रं प्रभयाख्यया च, श्यामं कृतेन्दुध्वजदेवसेवम् ॥ ८॥
चंद्रमा के चिह्नवाले श्रीचंद्रप्रभाजन के शासनदेव 'श्याम' नामका यक्ष वह
कृष्ण वर्णवाला, कपोत (कबूतर) की सवारी करनेवाला, तीन नेत्रवाला और चार भुजावाला
है । वॉये हाथों में फरसा और फल को तथा दाहिने हाथों में माला और वरदान को धारण
करनेवाला है ।॥ ८॥
८--ज्वालिनी (ज्वालामालिनी) देवी का स्वरूप--
चन्द्रोज्ज्वलां चक्रशरासपाश-चर्मत्रिशलेपुझषासिहस्ताम् ।
श्रीज्वालिनी साईधनुःशतोच-जिनानतां कोणगतां यजामि ॥ ८॥
पास्तुसारे और सौ धनुप क शरीरमाले भीचंद्रप्रमजिन की शासनदेवी 'वाठिनी' (ज्यालामा सिनी ) नामकी देवी है। वह सफेद वर्णवाली, मरिप (मेसा ) की सवारी करनेवाली और आठ मुमापाती है हाथों में • पक्र, अनुप, नागपान, गल, विशूल, पाम, मम्सी और तलवार को धारण करनेपाली है ॥ ८॥ A ५ श्यामयक्ष -ज्वालामालिनीदेवी ९-मजिद पम का स्वरूप- सहाक्षमालापरवानशक्ति-फलापसम्पापरपाणियुग्मः । स्वास्रो मकराइमको पहातु पूजामजिता सितामा ॥९॥ मगर कविहगाते भीमुविधिनाय के शासनदव 'अपित' नामका यव है। पर देव पणवाला, कछमा की सवारी करनेवाला मार पार हाय पासा है। दाहिने दापों में अक्षमाला और परवान को नया पोय हापों में एक्ति और फस को पार करनेवासा ।।९।। .-महाकाली (भती) रेषी का स्वाप- कृष्णा कुमासना बम्ब-शतोमतजिनानता। महाकालीरपते पन-फसमुनरवानयुक् ।।१।। -हापापं पिरषित मामामाथिनी करप में माठापास-निघूस पाश मण्डी पमुप बाप फल परान मौरपा इस प्रकार बदमा।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप १६८-९ - . एक सौ धनुष के शरीरवाले श्रीसुविधिनाथ जिन की शासनदेवी 'महाकाली' (भृकुटी) नामकी देवी है । वह कृष्ण वर्णवाली, कछुआ की सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है इस के हाथ वज्र, फल, मुद्गर और वरदान युक्त हैं ।। ९॥ ९-अनितयक्ष २-महाकाली(कुरी)देवी X 7 १०--ब्रह्म यक्ष का स्वरूप-- श्रीवृक्षकेतननतो धनुदण्डखेट-वनाट्यमव्यपय इन्दुसितोऽम्बुजस्थः । ब्रह्मा शरस्वधितिखड्गवरप्रदान-व्यग्रान्यपाणिरुपयातु चतुर्मुखोऽर्चाम् ॥ १० ॥ श्रीवृक्षके चिह्नवाले श्रीशीतलनाथ के शासनदेव 'ब्रह्मा' नामका यक्ष है । वह श्वेतवर्ण वाला, कमल के आसन पर बैठनेवाला, चार मुखवाला और आठ हाथवाला है । बॉयें हाथों में धनुष, दंड, ढाल और वज्र को तथा दाहिने हाथों में वाण, फरसा, तलवार और वरदान को धारण करनेवाला है ॥१०॥ १०--मानवी (चामुडा) देवी का स्वरूप- झषदामरूचकदानोचितहस्तां कृष्णकालगां हरिताम् । नवतिधनुजिनप्रणतामिह मानवीं प्रयजे ॥१०॥ नवे धनुष के शरीरवाले श्रीशीतलनाथ की शासनदेवी 'मानवी' (चामुंडा) नामकी पास्तुपारे " सौ धनुप के शरीरबाले भीचद्रप्रमजिन की शासनदेवी 'वालिनी' (न्नालामा लिनी ) नामकी देवी है । पर अफेद वर्णवाली, महिप ( भंसा) की समारी करनेवाली और भाठ भुमावाली है हपों में • पक्र, धनुष, नागपाल, गल, त्रिशूस, पाप, मच्छसी और तलवार को धारण करनेवाली है॥८॥ ८ श्यामयक्ष -ज्वालामालिनी देवी .-भजित पसका स्वाप- सदाभमासापरवामशक्ति-फलापसम्यापरपाणियुग्मः । स्वारूरकर्मों मकराइमको गहातु पूजामजिता सितामा ॥९॥ मगर के पिमलामे भीमविभिनाय के शासनदव 'अजिस' नामका यक्ष है । वह व मनवाला, कटुआ की सवारी करनवाला बार चार साप पाता है। दाहिने हारों में मधमासा मौर वरदान फो सदा पोये हाथों में प्रति और फल को पार करनेवाला ॥९॥ ९-महाकामी (मी) देवी का स्वरूप- कृष्णा कमासना बन्द-शतोमतजिनामता। महाकालीग्पते पन-फसमुन्नरवानयुक ॥०॥ -रेमाचार्य पिरपित नापामामिनी काप में माठ दापों के एल-मिएम, पाप, ममी भनुप, पाग ,फस परपान मौरस मबार पता है।
१६.--११ दि० शा जिनेश्वर देवों के शासनदव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप 22-गोरीगोमेधक) ११- ईश्वरयक्ष. - - -- . १२-कुमार यक्ष का स्वरूप- शुभ्रो धनुर्वभ्रफलाट्यसव्य--हस्तोऽन्यहस्तेषुगदेष्टदानः । लुलायलक्ष्मप्रणतन्त्रवक्त्रः प्रमोदतां हंसचरः कुमारः ।। १२ ।। अमे के चिह्नवाले श्रीवासुपूज्यजिन के शासनदेव 'कुमार' नामका यक्ष है । वा श्वेतवर्णवाला, हंसकी सवारीकरनेवाला, तीन मुखवाला, और छह भुजावाला है । बॉये हाथो में धनुप, नकुल (न्यौला ) और फल को, तथा दाहिने हाथों में वाण, गदा और वरदान के धारण करनेवाला है ॥ १२ ॥ १२-गाधारी (विद्युन्मालिनी) देवी का स्वरूप- सपद्ममुसलाम्भोजदाना मकरगा हरित् । गांधारी सप्ततीष्वास तुङ्गप्रभुनतार्यते ॥ १२ ॥ सत्तर धनुष प्रमाण के शरीरवाले श्रीवासुपूज्यस्वामी की शामन देवी 'गांधारी (विद्युन्मालिनी) नामकी देवी है । वह हरे वर्णवाली, मगर की सवारी करनेवाली , और च भुजावाली हैं - उसके ऊपर के दोनो हाथ कमल युक्त हैं तथा नीचे का दाहिना हाथ वरदा और वायां हाथ मुमल युक्त है ।। १२ ।।
थास्तुमारे देवी है। वह हरे पर्णपाली, फाले सुअर की सवारी करनवाली और पार संघावाली है। यह हापों में मछली, माला, पीजारा फ्ल और घरदान को धारण करनेयाली है ॥१०॥ " १० ब्रझयक्ष १. मानवी लागुडा) देवी - ११-वर पक्ष का मरूप- त्रिशूल पराप्तियामहसता करेऽक्षसूत्रं स्वपर फस । पिघ्रत सितो गण्डकभरता हास्यीश्वरोऽर्या कृपानिने ग्रः॥ ११ ॥ गैडा के चियाले श्रीभयांमनाय + शासनदेन पर' नामका पक्ष । परमाद मर्णवाला, बैल की सवारी करनेवाला, सीन नन्नवाला और घार मनानाला है । बायें हापों में त्रिशूल भौर दण्ट को, तपा दाहिन दायों में माला मोर फस को धारण करनेवाला है ॥११॥ ११-गौरी (गीमपही)धीपा स्वरूप- मसतराम्सकाश परदा कनाप्रमाम् । गौरी यसमाप्तिधनुः प्राणु वर्षी मृगापगाम् ॥ ११॥ अस्मी भनुप क शरीरपास धीभेयांमनाप की शासनदी 'गौरी' (गोमेषकी) नाम की देवी है। यह गुवर्ण पणवारी, रिण की मयारी फरनयाली भार चार सनापाती है। हापों में मुगर, पमह। फसम मार परदान का पारण परनपासी ॥१५॥ - ~ १६८--१६ दि० शा जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणिया का स्वरूप ११- ईन्दरयक्ष. 129-मोरीगोमेधा) 4 . १२-कुमार यक्ष का स्वरूप- शुभ्रो धनुर्बभ्रुफलायसव्य--हस्तोऽन्यहस्तेषुगदेष्टदानः । लुलायलक्ष्मप्रणतस्त्रिवक्त्रः प्रमोदतां हंसचरः कुमारः ॥ १२ ॥ भैंसे के चिह्नवाले श्रीवासुपूज्यजिन के शासनदेव 'कुमार' नामका यक्ष है । वह श्वेतवर्णवाला, हंसकी सवारीकरनेवाला, तीन मुखवाला, और छह भुजावाला है । वॉये हाथों में धनुप, नकुल (न्यौला ) और फल को, तथा दाहिने हाथो में वाण, गदा और वरदान को धारण करनेवाला है ॥ १२ ॥ १२-गाधारी (विद्युन्मालिनी) देवी का स्वरूप- सपद्ममुसलाम्भोजदाना मकरगा हरित् । गांधारी सप्ततीष्वास तुङ्गप्रभुनतार्च्यते ।। १२ ॥ सत्तर धनुष प्रमाण के शरीरवाले श्रीवासुपूज्यस्वामी की शासन देवी 'गांधारी' (विद्युन्मालिनी) नामकी देवी है । वह वर्णवाली, मगर की सवारी करनेवाली , और भुजावाली है। उसके ऊपर के दोनो हाथ कमल युक्त हैं तथा नीचे का दाहिना हाथ वरदान और वायां हाथ मुसल युक्त है ॥ १२ ॥ - , चार २ १६८--१२ पाम्मुसारे | १२:कुमारयक्ष १२-गाधारी (विद्युमालिनी देवी . .. १३-तुब पस का साप- यक्ष हरित् सपरशूपरिमारपाणिा, कौक्षेपकाक्षमणिम्टकवण्डमुवाः । विघ्रपतुर्भिरपरैः शिस्विग किरा-नम्रः प्रवृप्यतु यथार्थचतुमुनालयः ॥१५॥ सुअर के पिहवाले भीमिमसनाप के घासनदेव 'वसुख' नामका यक्ष है। बहरे पर्णवाला, मोरकी सवारी करनवाला, * चार मुखयाला और पारह मुमापाता है। उपर के भाठ हायों में फरसा को तया पाकी के पार हापों में सलमार, मासा, 18 और परदान को धारण करनेवाला है ॥ १३ ॥ ५-रोपी का स्वरूप- पप्टिवणहोवतीन-मता गोनसचाइना । ससर्पचापसपु-वैरोटी हरितार्यते ॥ १३ ॥ साठ धनुप प्रमाण के शरीरपाले भीविमलनाप की शासनदेवी रोटी' नामकी देवी है। पर हरे वर्णवासी, सौंपकी सवारी करमाली, मोर पार मुमाबाली है। उपर के पानी कायों सर्पका, नीचे के दाहिने आप में पाप और बॉये हाप में पनुप को परम फरनेपाली ॥१२॥ * प्रतिष्ठातिमक में मुखपामा मागा है। पस्तप में पप परक्योकि वारा भुग तो मुपदोन पाहिये।
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप १६८---१३ , १३ चतुर्मखयक्ष १३ - बैरोटी देव . B 2:5 . १४--पाताल यक्ष का स्वरूप- पातालकः समृणिशूलकजापसव्य-हस्तः कषाहलफलाङ्कितसव्यपाणिः । सेधाध्वजैकशरणो मकराधिरूढो, रक्तोऽर्च्यतां त्रिफणनागशिरास्त्रिवक्त्रः ॥ १४ ॥ , सेहीके चिह्नवाले श्रीअनन्तनाथ के शासन देव 'पाताल' नामका यक्ष है । वह लाल वर्णवाला, मगर की सवारी करनेवाला, तीन मुखवाला, मस्तक पर सांपकी तीनफण को धारण करनेवाला और छह भुजावाला है । दाहिने हाथों में अंकुश, त्रिशूल और कमल को तथा बॉयें हाथोंमें चावुक, हल और फलको धारण करनेवाला है ॥१४॥ १४-अनन्तमती (विजूंभिणी ) देवी का स्वरूप-- हेमाभा हंसगा चाप-फलवाणवरोद्यता। पञ्चाशचापतुङ्गार्हद्-भक्ताऽनन्तमतीज्यते ॥ १४ ॥ पचास धनुष के शरीरवाले श्रीअनन्तनाथ की शासन देवी 'अनन्तमती' (विजुभिणी) नामकी देवी है । वह सुवर्ण वर्णवाली, हसकी सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है । यह हाथों में धनुप, विजोराफल, बाण और वरदान को धारण करनेवाली है ॥१०॥ -
१६८-१४
षास्तुसारे
१४ पातालयक्ष
१४ अनन्तभतीनिणी)
देवी
,
.
१ --किपर पस का सम्प-
मकवनाशवामपाणि , समुद्राक्षासिवरान्पाइस्ता ।
मपासवर्णसिमुस्मो झपस्थो वनाइमक्ताऽशतु किमरोऽपाम् ॥ १५ ॥
पत्र के चिनषाले भीधर्मनाप क षासन देव 'किमर' नामफा पक्षहै। पर प्रपाल
(मुंगे) के वर्णवाला, मछली की सपारी करनेवाला, तीन मुखवाला और छा समावाला है
मायें हार्योंमें पफ, पर मौर अंकुष्ठ का तथा दाहिने हाथों में मुद्गर, माला और बरदान का
घारम करनेवासा ॥१५॥
१५-मानसी (परसूता देवी का सम्प-
साम्पजपनुठानाडुवाशरोस्पसा प्याघ्रगा प्रयासनिमा ।
नवपञ्चकषापोधितजिननमा मानसीह मान्पेत् ॥ १० ॥
पंचालीस भनुप के परीर वाले भीधर्मनाथ शासन दी 'मानसी' (परमृता) नामकी
देवी है। यह मुंगेके चैमी साल कादिवाली, म्याघ्र (नाहर) की सपारी करनगाली और छह समा
माली है। हाथों में कमल पनप, वादाज, मश, माप और कमल का पारण नेपाली है. ॥१५॥
दि० शा० जिनेश्वर देवा के शासनदेव यक्ष और यक्षिणिया का स्वरूप
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१५-किन्नरयक्ष
१५-मानसीत्परता देवी
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१६--गरुड यक्ष का स्वरूप--
वक्राननोऽधस्तनहस्तपद्म-फलोऽन्यहस्तार्पितवज्रचक्रः।
मृगध्वजाहत्प्रणतः सपर्या, श्यामः किटिस्थो गरुडोऽभ्युपैतु ॥ १६ ॥
हरिण के चिन्हवाले श्रीशान्तिनाथ के शासन देव 'गरुड' नाम का यक्ष है । वह टेढा
मुखवाला (सूअर के मुखवाला) कृष्ण वर्णवाला, सूअर की सवारी करनेवाला और चार भुजा
वाला है । नीचेके दोनो हाथों में कमल और फलको, तथा ऊपर के दोनों हाथों में बज्र और
चक्रको धारण करनेवाला है ॥१६॥
.
१६--महामानसी (कन्दर्पा) देवी का स्वरूप-
चक्रफलेडिवराङ्कितकरां महामानसी सुवर्णाभाम् ।
शिखिगां चत्वारिंशद्धनुरुन्नतजिनमतां प्रयजे ॥१६॥
चालीस धनुप प्रमाण के ऊंचे शरीरवाले श्रीशांतिनाथ की शासनदेवी 'महामानसी'
नामकी देवी है । वह सुवर्णवर्णवाली, मयूर की सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है ! हाथों,
में चक्र, फल, ईढी ( १ ) और वरदान को धारण करनेवाली है ॥ १६ ॥
पास्तुपारे
-
१६-गगराध्यक्ष
मामा
१७-गपर्व पक्ष का स्वरूप-
मनागपाशोर्यकरयोऽघ -करवपत्तषुपनुः सुनीलः ।
गपर्ययक्षा स्तमकेतुभक्ता पूजामुपेतु मितपक्षिपाम ॥१७॥
पकरे धिनचाले भीईपुनाथ के शासनदेव 'गर्ष ' नामका यक्ष है । वह फणवर्ग
बाला,
पधीकी सवारी करनवासा और चार मुबाबाला है। ऊपर के दोनों हाथों में नागपाश को,
सथा नाप के दो हाथों में क्रमश पनुप और पाप को पारण फरनेवाता है॥१७॥
१७--सपा (गोपारी) देवी का स्परप-
सपशासिपरी रुपमा कृष्णकालगाम् ।
पमात्रिंशदनुगजिननम्रो यो जपाम् ॥१७॥
पंतीम घनुप क घरीरमाले श्रीकंपनाप की शासनदेवी 'मया' (गांधारी ) नाम भी
देवी है । यह सरपके पर्णपाठी, काल भर की सवारी करनेवाली और पार भुमावाली है। हापों
में पक, शंख, वलवार और वरदान को धारण करनवाली है ॥१७॥
१६८-१७ दि० शा. जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष आर यक्षिणियों का स्वरूप १७ गंधर्वयक्ष ११-जया (गांधारी देवी १८--खेन्द्रयक्ष का स्वरूप- आरभ्योपरिमात्करेषु कलयन् वामेषु चापं पविं, पाशं मुद्गरमकुशं च वरदं पठेन युञ्जन् परैः ॥ चाणाम्भोजफलस्रगच्छपटली-लीलाविलासांस्त्रि, पड्वक्त्रष्टगरावभक्तिरसितः खेन्द्रोऽर्च्यते शहगः ॥ १८ ॥ मछली के चिह्नवाले श्री अरनाथ के गासन देव 'खेन्द्र' नामका यक्ष है । वह कृष्ण वर्णवाला, शंख की सवारी करने वाला, तीन २ नेत्रवाला, ऐसे छह मुखवाला और बारह भुजा वाला है । वाये हाथों में क्रमशः धनुप, वन, पाश, मुद्गर, अंकुश और वरदान को तथा दाहिने हाथों में वाण, कमल, वीजोराफल, माला, बडी अक्षमाला और अभय को धारण करनेवाला है ॥१८॥ १८-तारावती (काली) देवी का स्वरूप- स्वर्णाभां हंसगां सर्प-मृगवज्रवरोधुराम् । चाये तारावती त्रिंशच्चापोचप्रभुभाक्तिकाम् ॥१८॥ त्रीश धनुप के शरीरवाले श्री अरनाथ की शासनदेवी ' तारावती ( काली ) नामकी देवी है । वह सुवर्ण वर्णवाली, हंसकी सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है। हाथों सांप, हरिण, वन और वरदान को धारण करनेवाली है ॥ १८ ॥ . .
पास्सुमारे
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१६-गराउयक्ष
लामा---
१५-पर्व पसका सम्प-
सनागपाशोकरद्वयोऽध:-करदूपत्तपुषनुः सुनीला ।
गपर्षपक्ष स्तमोतुमक्ता पूजामुपेतु मितपभियाम ॥१७॥
पकरेके पिनमाते भीडानाप के शासनदेव 'ग' नामका पर है। पर छप्पन
वासा, पक्षीकी सबारी फरनवाला और चार भुनापाला है। ऊपर के दोनों हाथों में नागपाश को,
सपा नाय के दो हाथों में क्रमश धनुष और पाप को धारण करनेवाला है।॥१७॥
१५--पा (गांधारी) देवी का स्वरूप-
सपशवासिषरी रुपमामा कृष्णकासगाम् ।
पत्रिंशयनुनाजिनमा फजे जयाम् ॥ १७ ॥
वीस पनुष के सरीरपाले भीनाप की शासनदेवी 'जया' (गांधारी) नाम की
देवी है। वह सुबर्ण पर्णवाली, फाल एमर की सवारी करनेवाली और पार मुवाबासी है। गायों
में पफ, पंख, सलमार और परवान को धारण करनेवाली है ॥१७॥
१६८--१९ दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वरूप १९- कुबेरयक्ष १९ अपराजितादेवी , २०- वरुण यक्ष का स्वरूप- जटाकिरीटोऽष्टमुखस्त्रिनेत्रो वामान्यखेटासिफलष्टदानः । कूर्माङ्कनम्रो वरुणो वृषस्थः श्वेतो महाकाय उपैतु तृप्तिम् ॥ २० ॥ कछुआ के चिह्नवाले श्री मुनिसुव्रतनाथ के शासन देव ' वरुण नामका यक्ष है। वह सफेद वर्णवाला, वैल की सवारी करनेवाला, जटा के मुकुटवाला, आठ मुखवाला, प्रत्येक मुख तीन २ नेत्रवाला और चार भुजावाला है । वांये हाथो में ढाल और फल को तथा दाहिने हाथों में तलवार और वरदान को धारण करनेवाला है ॥ २० ॥ २०--बहुरूपिणी देवी का स्वरूप पीतां विंशतिचापोच्च-स्वामिका बहुरूपिणीम् । यजे कृष्णाहिगां खेटफलखगवरोत्तराम् ॥ २० ॥ वीस धनुप के गरीरवाले श्री मुनिसुव्रतजिन की शासन देवी 'बहुरूपिणी' (सुगधिनी) नामकी देवी है । वह पीले वर्णवाली, काले सांप की सवारी करनेवाली और चार भुजावाली है । हाथों में ढाल. फल, तलवार और बरदान को धारणकरनेवाली है ॥ २०॥ M पास्सुसारे १८. वेन्ट्रयक्ष १r तारावती(काली)देवी "--कुर यस का स्वरूप- मफलकनुर्वण्रपाम्पगमठरसुपाशपरमवाप्टपाणिम् । गजगममचतुर्मुम्पन्द्रयापपुतिकलशाइनत पम कुपरम् ॥ १० ॥ फरम चिलवाल भी महिनाय फ शामन दर कमर' नामका यम । पाक अनुप के जैसे वर्णनाला, हायी की मपारी करनेवाला, पार मुलपाला और माठ हापकाला। दायों में गस, स्नुस, दर, कमस, बलशर, बाण, नागपास और घरवान का धारण करनेवाला ॥१०॥ "--मपगमिना दबी का म्यरूप- पक्षयिशतिपापोपदेवमेवापरामिता। शरभभाचते ग्येर फगामियरयु हरित् ॥ १० ॥ पचीम पनुस क गैरपास भी मादिनाप की मामन दबी 'अपरामिता' मामकी सपी है। पार पणपासी, मरापर की मवारी परनवाली और पार भुमायासी । हापों में पाल, फल, वतमार और परहाम का धारण करनयानी।
१६८--१९
दि० शा० जिनेश्वर देवो के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियो का स्वरूप
१९ - कुबेरयक्ष
१९ अपराजितादेवी
२०--वरण यक्ष का स्वरूप-
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जटाकिरीटोऽष्टमुखत्रिनेत्रो वामान्यखेटासिफलेष्टदानः ।
कूमाङ्कनम्रो वरुणो वृषस्थः श्वेतो महाकाय उपैतु तृप्तिम् ॥२०॥
कछुआ के चिह्नवाले श्री मुनिसुव्रतनाथ के शासन देव 'वरुण नामका यक्ष है।
वह सफेद वर्णवाला, बैल की सवारी करनेवाला, जटा के मुकुटवाला, आठ मुखवाला, प्रत्येक
मुख तीन २ नेत्रवाला और चार भुजावाला है | वांये हाथो में ढाल और फल को तथा दाहिने
हाथों में तलवार और वरदान को धारण करनेवाला है ॥ २० ॥
२०--बहुरूपिणी देवी का स्वरूप
पीतां विंशतिचापोच्च-स्वामिकां बहुरूपिणीम् ।
यजे कृष्णाहिगां खेटफलखगवरोत्तराम् ॥ २० ॥
बीम धनुष के शरीरवाले श्री मुनिसुव्रतजिन की शासन देवी 'बहुरूपिणी' (सुगंधिनी)
नामकी देवी है । वह पीले वर्णवाली, काले सांप की मत्रारी करनेवाली और चार भुजावाली
हैं । हाथों में ढाल, फल, तलवार और वरदान को धारणकरनेवाली है ॥ २० ॥
१६८-२० पास्तुमारे २० वराणयक्ष २० - बहुरूपिणीदेवी . २१-भूटी पक्ष का स्वरूप- खेटामिकोवाशराडशाम्ज-पक्रेटवानोलमिताप्टइस्तम् । चतुमुस्व नन्दिगमुस्पलाइ-म जपाम भृकर्टि पजामि ।। २१ ।। साल फमल के पिहलाले भी नमिनाथ के शासन दब 'भृकुटि' नामफा पर। बा लाल पर्णवाला, नन्दी (ल) की सवारी करनवाला, पार मस्सवाला और आठ गावाता है। रापों में गल, वसपार, पनुप, पाण, अंडन, फमल, पफ और बरदान को धारण करने पाताई ॥२१॥ २१-पामुंग (सममामिनी) देवी का सम्प- चामुण्डा यष्टिमेटाभ-सूत्रम्बोस्कटा हरित् । मकरस्थापते पा-वशठणोन्नतशमा ॥२१॥ पर पनुप र प्रमाम ऊच शरीरबासे भी नमिनाप की शासन देगी 'पामुदा' नामकी दीवारे वर्णवासी, मगर की सुपारी करनेपाती और पार भुजाबासी है।पों में दर, राठ, माठा और तलवार को पारप करनवाली है ।। २१ ॥ .
दि० शा० जिनेश्वर देवों के शासनदेव यक्ष और यक्षिणियों का स्वन्प २१ - भृकुटियक्ष २१ चामुंडा कसममालिनी) देवा २२-गोमद यक्ष का स्वरूप- श्यामस्रिवक्त्रो द्रुघणं कुठारं दण्डं फलं वज्रवरौ च विभ्रत् । गोमेदयक्षः क्षितशंखलक्ष्मा पूजां नृवाहोऽहंतु पुष्पयानः ॥ २२ ॥ शंख के चिह्ववाले श्रीनेमनाथ के शासनदेव 'गोमेद ' नामका यक्ष है । वह कृष्ण वर्ण- वाला, तीन मुखवाला, पुष्प के आसनवाला, मनुष्य की सवारी करनेवाला और छह हाथवाला है। हाथों में मुद्गर, फरसा, दंड, फल, वज्र, और वरदान को धारण करनेवाला है ॥ २२ ॥ २२-आम्रा (कुप्माण्डिनी) देवी का स्वरूप- सव्येकापगप्रियङ्करसुतकपीत्यै करे विभ्रती, दिव्याघ्रस्तवकं शुभंकरकर-श्लिष्टान्यहस्ताङ्गुलिम् । सिंहे भर्तृचरे स्थितां हरितभा-माम्रद्रुमच्छायगां, वन्दारं दशकार्मुकोच्छ्रयजिनं देवीमिहाम्रां यजे ॥ २२ ॥ दश धनुष के शरीरवाल श्री नेमनाथ की शासन देवी ' आम्रा ' ( कुष्माण्डिनी) नाम की देवी है । वह हरे वर्णवाली, सिंह की सवारी करनेवाली, आम की छाया में रहनेवाली, २४-२२ यास्तुसारे और दा मुजावाली है । पाये हाथ में प्रियपर पुत्र की प्रीति क लिप आम फी एम का, उपा दाहिने हाथ में शुभंकर पुत्र का धारण निवासी है। २२ गोमेदयक्ष २२ आम्नादेरी ऊरमागिनी अमादेवी २३ -भरण यसका स्पाप- उनिहस्तधृतषासुकिम्माटाघ -सम्या पपाणिफणिपाशवरप्रणन्ता । भीनागराजकाठ धरणोऽधनीस:, फमभितो मजतु षासुकिमौलिरिज्याम् ॥ २३ ।। नागराध के चिहवाल भीपार्थनाथ मगपान के शासन दव 'घरण ' नामका यष । दहा के बैस नीले धर्मवाला, फगुआ की सवारी करने वाला, मकर में सांप का बिह पासा और चार भुनाबाला है। ऊपर क दोनों हाथों में पासुकि ( सर्प) को, नीचे के पाप हाप में नागपाश को और दाहिने हाथ में वरदान को धारम फरनवाला है ।। २३ ।। २३-पमापती रवी का मरूप- दवी पद्मावती मोम्ना रक्तवर्णा चतुमुना । पपासनाऽपुर्श पस्त स्वक्षसूत्रं प पाजम् ।। अपमा पद्ममावली पतुर्विंशतिः ममुजाः। पाशामिफन्तबालेन्दु -गठामुमरसयुतम् ।।
दि० शा० जिनेश्वर दया के शासनदेव यक्ष और यक्षिणिया का स्वरूप भुजापट्क समाख्यातं चतुर्विंशतिरुच्यते । गड्लासिचवालेन्दु--पद्मोत्पलशरासनम् ।। शक्ति णशाशं घण्टा वाणं मुमलखेटकम् । त्रिशल परशुं कुन्तं वज्रं मालां फलं गढाम् ।। पत्रं च पल्लवं धत्ते वरदा धर्मवत्मला । श्रीपार्श्वनाथ की शामन देवी 'पद्मावती' नामकी देवी है । वह लालवर्णवाली, कमल * के आमनवाली और चार भुजाओं में अंकुम, माला, कमल और वरदान को धारण करनेवाली है । प्रकारातर से छह और चौवीम् भुजावाली भी माना है। छह हाथों में पाश, तेलवार, भाला, बालचन्द्रमा, गदा और मुगल को धारण करती है। चौबीस हाथों में क्रमश:-शंख, तलवार, चक्र, बालचन्द्रमा, सफेद कमल, लाल कमल, धनुप, शक्ति, पाश, अंकुश, घंटा, चाण, मूसल, ढाल, त्रिशूल, फरमा, भाला, वन, माला, फल, गदा, पान, नवीन पत्तों का गुच्छा को धारण करती है ॥ २३ ॥ 3 और वरदान २३-धरणेन्द्र यक्ष २३- पझावतीदेवी * आशाधर प्रतिष्ठाकल्प में कुक्कुट सर्प की सवारी करनेवाली और कमल के आसनवाली माना है । मस्तक पर साप की तीन फणा के चिह्नवाली माना है। मल्लिपणाचार्यकृत पद्मावतीकल्प में चार हाथों में पाश, फल, वरदान और अकुश को धारण करनेवाली माना है।
१५८-२५ बाम्नुसारे २५-मातंग पस स्वाप- मुद्रमभो मर्दनि धर्मपत्र, पिनसफल पामकरऽथ यान । पर करिस्थो हरिकेतुभक्तो, माता पक्षाऽनु तुष्टिमिष्टया ॥ २४ ॥ सिंहक चिहपाल श्रीमहावीरबिन के मासनदव 'मातंग' नामका यम । पर मूंग के से हरे पर्णपासा, हाथी की सवारी करनपाला, मस्तक पर धर्मपक का पारण करनेवाला और दो सजावाला है। पापे हाथ में पीमाराफल, और दाहिन हाप में परवान को धारण कर नेवाला है ॥२४॥ २५-सियापिका देवी का प्यरूप सिदापिका सप्तकरोतिा-जिनायो पुस्तकदानहसताम् । मिता सुमद्रासनमत्र यज्ञे, हेमति मिहगति पजेहम् ॥ २४ ॥ सात हाथ के ऊचे परीरवाले भीमहावीरजिन की वासनदेवी सिद्धायिका' नामकी देवी है। यह सुवर्णवर्णमाली, मद्रामन पर पैटी हुइ, सिंह की सवारी करनेपाली और दा रमा माली है। माया हाथ पुस्तक युक्त और दाहिना राप मरदान युक्त है ॥ २४ ॥ , २४-मातगयक्ष २४-सिहायिका देवी Ointension- दश दिक्पालों का स्वरूप। १ इंद्र का स्वरूप- ॐ नमः इन्द्राय तप्तकाञ्चनवर्णाय पीताम्बराय ऐरावणवाहनाय वज्र- हस्ताय पूर्वदिगधीशाय च । तपे हुए सुवर्ण के वर्ण जैसे. पीले वस्त्रवाले, ऐरावण हाथी की सवारी करने- वाले और हाथ में वज्र को धारण करनेवाले और पूर्व दिशा के स्वामी ऐसे इंद्र को नमस्कार। - २ अमिदेव का स्वरूप- ॐ नमः अग्नये प्राग्नेय दिगधीश्वराय कपिलवर्णाय छागवाहनाय नीलाम्बराय धनुर्वाणहस्ताय च । अग्नि दिशा के स्वामी, कपिला के वर्ण जैसे ( अग्नि वर्णवाले ), बकरे की सवारी करने वाले, नील वर्ण के वस्त्रवाले, 'हाथ में धनुष और घाण को धारण करने- वाले एमे अग्निदेव को नमस्कार । ३ यमदेव का स्वरूप- ॐ नमो यमाय दक्षिणदिगधीशाय कृष्णवर्णाय चर्मावरणाय महिष- वाहनाय दण्डहस्ताय च । दक्षिण दिशा के स्वामी, कृष्ण वर्णवाले, चर्म के वस्त्रवाले, मैंसे की सवारी करनेवाले और हाथ में दड को धारण करनेवाले यमराज को नमस्कार । ४ निर्ऋतिदेव का स्वरूप- ॐ नमो नितये नैऋत्यदिगधीशाय धूम्रवर्णाय व्याघ्रचर्मवृताय मुद्गरहस्ताय प्रेतवाहनाय च । निर्वाणकालिका में-१ शक्ति को धारण करना माना है। ३२ वास्तुसारे मै बस्यकोस के स्वामी, 'घून के पणाझे व्याघ्रधर्म को पहिरनपासे, में 'सद्गर को धारण करमेषाल और प्रत (शप) की सपारी करनवाल ऐस निति देव को नमस्कार । ५ बरुणदेव स्वरूप- ॐ ममो वरुणाप पमिमदिगपीश्वराय मेपवर्णाय पीताम्बराय पाय हस्ताय मस्स्पषाइनाया पभिम दिशा के स्वामी, मेप के पैसे पर्यवाले, पाले यसमा हाम में पाश (फासी) को धारण करनेवास और मपसी की सपारी करनपाले एसे वरूपादेव का नमस्कार। ६ वायुदेव स्वरूप ॐ ममो वापसे वायम्पदिगमीयाप धूसराङ्गाप रकाम्बराय हरिण चाहनाय ध्वजमहरणापा पायुकाय के स्वामी, धूसर (उसका पीला रंग) पसवास झाल यसपास, हरिण की सवारी करममास और साथ में वसा को धारण करनाल एसे पापरेषको ममस्कार। ७ भमेरपेन स्वरूप-- ॐ ममो अमदाय उत्तरदिगपीवाय यककोयाम्पचाय कमानाप श्वेतपत्राप मरवाहनाय रमाइस्ताप च । पचर विणारे स्वामी पहर समानची, सुपर्ण वर्गवास, सफद यसपास, मनुप्प पारी परनेवासे और हाय में रस को धारण करनेवात ऐसे पनर (उमेर) देवको नमस्कार । निरम में इस पर मतान्तर है- हरिद (ग) और पवारबामेयो माना है। पसरे सर और मगर सरीमपणे माना। .मबुरेष मी परपसमाषाहै। मेरदेव ममिति परर भनेक परंपाये को सेवा पाप में विशाल (प में रोमेण्या और गदा से पार भनेपाले माया।
दश दिक्पालों का स्वरूप ( १७१ ) ८ 'ईशानदेव का स्वरूप- ॐ नमः ईशानाय ईशान दिगधीशाय श्वेतवर्णाय गजाजिनवृताय वृषभवाहनाय पिनाकशूलधराय च । ईशान दिशा के स्वामी, सफेद वर्णवाले, गजचर्म को धारण करनेवाले, बैल की सवारीवाले, हाथ में शिवधनु और त्रिशूल को धारण करनेवाले ऐसे ईशानदेव को नमस्कार । ९ नागदेव का स्वरूप- ॐ नमो नागाय पातालाधोश्वराय कृष्णवर्णाय पद्मवाहनाय उरग- हस्ताय च। पाताललोक के स्वामी, कृष्ण वर्णवाले, कमल के वाहनवाले और हाथ में सर्प को धारण करनेवाले ऐसे नागदेव को नमस्कार । - १० ब्रह्मदेव का स्वरूप- ॐ नमो ब्रह्मणे ऊर्चलोकाधीश्वराय काञ्चनवर्णाय चतुर्मुखाय श्वेत- वस्त्राय हंसवाहनाय कमलसंस्थाय पुस्तककमल हस्ताय च । ऊर्ध्वलोक के स्वामी, सुवर्ण वर्णवाले, चार मुखवाले, सफेद वस्त्रवाले, हंस की सवारी करनेवाजे, कमल पर रहनेवाले, हाथ में पुस्तक और कमल को धारण करने- वाले ऐसे ब्रह्मदेव को नमस्कार । निर्माण कलिका के मत से इस प्रकार मतान्तर है- १ ईशानदेव को तीन नेत्रवाला माना है। २ ब्रह्मदेव सफेद वर्णवाले और हाथ में कमढलु धारण करनेवाले माना है।
- बास्तुसारे नै स्यकोस के स्वामी, 'पून के गले मानधर्म को पहिरनेपासे, दाग में 'इगर को पारस फरनवाले और प्रस (आप) की सवारी करनपाल ऐस नियति देव को नमस्कार । ५'परमदेव र स्वरूप- ॐ नमो वरुणाय पश्चिमदिगपीश्वराय मेघवर्याय पीताम्बराप पाय इस्ताप मस्स्पवाहनाय च । पथिम दिशा के स्वामी, मेघ के जैसे पर्थवाने, पीले पखपाले हाय में पाश (फांसी) को धारण करनेवाल और मयसी की सवारी करनपाले एसे वरुणदेव प नमस्कार। ६ वायुरेन का स्वरूप- ॐ नमो पापधे पापप्पदिगपीशाय धूसराङ्गाय रकाम्बराप हरिण- पाइनाय पजमहरणाप। पापुपाय के स्वामी, धूसर (आला पीला रंग) वसवास सार पसाले, हरिण की सपारी करनवाल और जाप में प्वमा को पारम रनपास एसे वायुदल को नमस्कार। . मेरोगका स्वरूप ॐ नमो धनदाप सत्तरदिगधीशाय ग्रककोयाध्यघाय कनानाप श्वेतवमाय मरवाहनाय रलहसताय च । पचर दिशा के स्वामी र सशनपी, सुपर्ण पर्मबास, सफद समास, मनुष्य की मारी रनेवामे भोर तप में रस का पारण करनमान एस घनद (हार) रेप को नमस्कार। dिesमम मर माता- तर (m)पण और राधाष भामरे माना है। परवर मरीर मगर गरी मापेमामा है। पर भी मारपर्वमाना। गोपनिधि पारा मे पास एप में निपुस (महमेशा in गावाममोसमामा है।
दश दिक्पालों का स्वरूप ( १७१) ८ 'ईशानदेव का स्वरूप- ॐ नमः ईशानाय ईशान दिगधीशाय श्वेतवर्णाय गजाजिनवृताय वृषभवाहनाय पिनाकशूलधराय च । ईशान दिशा के स्वामी, सफेद वर्णवाले, गजचर्म को धारण करनेवाले, बैल की सवारीवाले, हाथ में शिवधनु और त्रिशूल को धारण करनेवाले ऐसे ईशानदेव को नमस्कार । ९ नागदेव का स्वरूप- ॐ नमो नागाय पातालाधोश्वराय कृष्णवर्णाय पद्मवाहनाय उरग- हस्ताय च। पाताललोक के स्वामी, कृष्ण वर्णवाले, कमल के वाहनवाले और हाथ में सर्प को धारण करनेवाले ऐसे नागदेव को नमस्कार । १० 'ब्रह्मदेव का स्वरूप-- ॐ नमो ब्रह्मणे ऊर्वलोकाधीश्वराय काञ्चनवर्णाय चतुर्मुखाय श्वेत- वस्त्राय हंसवाहनाय कमलसंस्थाय पुस्तककमल हस्ताय च । ऊर्ध्वलोक के स्वापी, सुवर्ण वर्णवाले, चार मुखबाले, सफेद वस्त्रवाले, हंस की सवारी करनेवाले, कमल पर रहनेवाले, हाथ में पुस्तक और कमल को धारण करने- वाले ऐसे ब्रह्मदेव को नमस्कार । निर्वाण कलिका के मत से इस प्रकार मतान्तर है- १ ईशानदेव को तीन नेत्रवाला माना है। २ ब्रह्मदेव सफेद धर्णवाले और हाथ में कमल धारण करनेवाले माना है।
नव ग्रहों का स्वरूप । १सूर्यम स्वरूप- नम' सूर्याप सहसकिरणाय पूर्वदिगपीयाप एकपसाय बमब हस्ताय ससारवरमवाहनाय । हजार किरणोधारे पूर्व दिशा के स्वामी मानसपाले बाप में कमसको पारस फरनेवाले और सात पारे के रथ की सवारी करनमा पूर्य को नमस्कार । मात्र स्वरूप- मममन्द्राप तारागपापीयाप पापम्पदिगपीयाप रपेतराप रखे तदयवाजिवाइमाय सुमाकम्भहस्ताय च। वारामों के स्वामी, वापम्प दिशा के स्वामी, मफेद बनना, सफर इस पर के रथ की भारी करनेवाले और पाप में अमृत केईम को पार करनेवान चंद्रमा को नमस्कार ३ मंगत प्रस्वरूप- ॐ नमो मनलाय दधिणदिगपीशाप पिलुमवर्णाप रक्ताम्बराप भूमिस्थिताप कालहस्ताप । दक्षिण दिशा के स्वामी मृगा के बर्मबाश, सार पसातमूमि पर पेठे हुए और पाप में सास को पास करनेवास मंगल को नमस्कार । . ४ पुष का स्वरूप- ॐ नमो धुपाप उत्तरदिगपीयाप हरितवमाय कचहंसवाहनाप पुस्तकहस्ताप च। hिमाग प्रभा मतान्तर सूर्यमापपरा मना है। समाबेदाप में प्रसस्त्र (मा) Immuबारम्बा मारा है। 1 मेमर पासून (मा) और रक्ष में पावर माना है। पुरनगर दवा में ग्रहमा चौर रिम माना है।
नव ग्रहों का स्वरूप ( १७३ ) उत्तर दिशा के स्वामी, हरे वर्णवाले, राजहंस की सवारी करनेवाले और पुस्तक हाथ में रखनेवाले बुध को नमस्कार । ५गुरु का स्वरूप- ॐ नमो बृहस्पतये ईशान दिगधीशाप सर्वदेवाचार्याय कांचनवाय पीतवस्त्राय पुस्तकहस्ताय हंसवाहनाय च । ईशान दिशा के स्वामी, सब देवों का प्राचार्य, सुवर्ण वर्णवाले, पीले वस्त्र- वाले, हाथ में पुस्तक धारण करनेवाले और हंस की सवारी करनेवाले गुरु को नमस्कार। , ॐ ६ शुक्र का स्वरूप नमः शुक्राय दैत्याचार्याय माग्नेदिगधीशाय स्फटिकोज्ज्वलाय श्वेतवस्त्राय कुम्भहस्ताय तुरगवाहनाय च । दैत्य के प्राचार्य, आग्नेयकोण का स्वामी, स्फटिक जैसे सफेद वर्णवाले, सफेद वनवाले, हाथ में घड़े को धारण करनेवाले और घोड़े की सवारी करनेवाले शुक्र को नमस्कार । - ७ शनि का स्वरूप- ॐ नमः शनैश्चराय पश्चिमदिगधोशाय नीलदेहाय नीलाम्बराय परशु- हस्ताय कमठवाहनाय च । पश्चिम दिशा के स्वामी नील वर्णवाले, नीले वनवाले, हाथ में फरसा को धारण करनेवाले और कछुए की सवारी करनेवाले शनैश्वर को नमस्कार । निर्वाणकलिका के मत से इस प्रकार मतान्तर है- ५ गुरु के हाथ में अक्षसूत्र और कुण्डिका माना है। ६ शुक्र के हाथ में श्रससून और कमरहलु माना है। ७ शनैश्वर थोदे कृष्ण वर्णवाले, लम्के पीले याल वाले, हाथ में अक्षत्र और कमण्डलु को धारण करनेवाले माना है।
(१७) पास्तुसारे ८गा स्वरूप--- ॐ नमो राहये नैर्षतदिगधीयाप सवारपामबाप रपामवसाय पर यहस्ताप सिंहपाहमाय प । मैत्य दिशा के स्वामी, काजल से रपाम संग, माम पक्षमासे, हाय में फरसा को धारण करनेवाल मौर सिंह की सवारी नेपाले राह को ममस्कार । ९सुत्र स्वरूप- ममतये राहुप्रतिचन्दाय रयामानाप श्यामवसाय पसगवाह माय पसगहस्ताय । राहु का प्रतिरूप श्याम पर्दवास, श्याम वसमासे, साँप की सवारीमाने और बाप को पार करनेवासे रेतु को नमस्कार । थाचारदिनकर के मत से क्षेत्रपाल का स्वरूप । ॐ मम क्षेत्रपाखाप कृष्णगौरकाबनपूसरकपिखवाय नियति भूजदयगय पर्मरकेशाय जटाजूटमगिडताप पामुको कृतजिनोपवीताय तबक लमेखवाय पकृतहाराय मानायुपहस्ताप सिंहधर्मावरणाय मेतासनाप ऊपरपाइनाप विशोषमाप । रुप्य, गौर, सुवर्म, पोटु भौर पगासे, बीस मुआमासे, पर शवाचे, पड़ी मटापाले, पामकी माग की मनेकाले, पपन्नाग की मेलवाने, शेषनाग पारवाले, भनेक प्रकार के शखको दाब में धारण रनेवासे, सिंह के पोपाय करनेवाले, मेव के भासनबाछे, हवे की सबारीलाते चौरवीन नेमाने ऐसे पेयपात को नमस्कार । पनिमा मेसमा मवान्ता है- णमा प्रेमिका कहनाभापा है। वापसी मीनपारराने मामा है।
क्षत्रपाल का स्वरूप ( १७५) निर्वाणकलिका के मत से क्षेत्रपाल का स्वरूप- क्षेत्रपालं क्षेत्रानुरूपनामानं श्यामवर्ण वर्वरकेशमावृत्तपिङ्गनयनं विकृ- तदंष्ट्र' पादुकाधिरूढं नग्नं कामचारिणं षड्भुजं मुद्गरपाशडमरुकान्वित- दक्षिणपाणि श्वानाङ्कुशगेडिकायुतवामपाणिं श्रीमद्भगवतो दक्षिणपार्चे ईशानाश्रितं दक्षिणाशामुखमेव प्रतिष्ठाप्यम् । अपने २ क्षेत्र के नामवाले, श्याम वर्णवाले. बर्वर केशवाले, गोल पीले नेत्र- वाले. विरूप बड़े २ दांत वाले, पादुका पर बैठे हुए, नग्न, छ: भुजावाले, मुद्गर, फाँसी और डमरू को दाहिने हाथ में और कुत्ता अंकुश और गेडिका ( लाठी ) को बाँयें हाथ में रखनेवाले, भगवान् की दाहिनी और ईशान तरफ दक्षिणाभिमुख स्थापन करना चाहिये। माणिभद्र क्षेत्रपाल का स्वरूप- ढक्काशूलसुदामपाशाङ्कुशखरेः । स्वस्करषदकं युक्तं भास्यायुधवगैः॥ माणिभद्रदेव कृष्ण वर्णवाले, ऐरावण हाथी की सवारी करनेवाले, वराह मुखवाले, दांत पर जिन मंदिर धारण करनेवाले, छः भुजावाले, दाहिनी भुजाओं में ढाल, त्रिशूल और माला; बॉयीं भुजाओं में नागपाश, अंकुश और तलवार को धारण करनेवाले हैं । ऐसा तपागच्छीय श्री अमृतरत्नसूरि कृत माणिभद्र की भारती में कहा है। सरस्वती देवी का स्वरूप- श्रतदेवतां शुक्लवर्णी हंसवाहनां चतुर्भुजां वरदकमलान्वितदक्षिण करा पुस्तकाक्षमालान्वितवामकरां चेति । सरस्वती देवी सफेद वर्णवाली, ईसकी सवारी करनेवाली, चार 'भुजावाली, दाहिने हाथों में वरदान और कमल, बाँयें हाथों में पुस्तक और माला को धारण करनेवाली है। १ प्राचारदिनकर और सरस्वती के स्तोत्रों में दाहिने हाथों में माना और कमल, बायें हाथों में वीणा और पुस्तक को धारण करनेवाली माना है।
सिंहस्प गुरु प्रतिष्ठादिक के मुहूर्च। पारमसिदि दिनदि, समाधि मार्त चिन्तामणि मार्च माचरण, रानमाला भार पाठिपस इत्यादि प्रों क मापार से नीच क सब मार सिसे गये हैं। संवत्सरिक की शद्धि- संवत्सरस्य मासस्य दिमस्पर्क्षस्य सर्वपा । जबारोस्मिता गदि प्रतियां पिबाइकत्॥१॥ के पर्प का छारकर पर्प, मास, दिन, नवम और मगनवार को खोड़कर दूसर भार, इन सब की रादि वैसे विवाह में देखते है, ससी प्रकार प्रतिमा कार्य में भी दसना पाहिये ॥१॥ भपन शुद्धि- ग्रहमषेत्रिय प्रतिष्ठा-पिपाइगायतम पपूर्वम् । सौम्यायने कर्म धर्म विधेयं यदुगर्हितं तस्लम दधिणे च ॥ २॥ गृह प्रवेश, दम की प्रगिठा, विवाह, मन संकार और पझोपषितादि प्रत इत्यादि शुभकार्य 'उचरायण में धर्म हो सब करना गुभ माना है और दपिक में । म य राम कार्य करना अशुभ माना है ॥२॥ मास रि- मिग्गसिराइ मासह पिसपोसाहिप वि स सहा । जान गुरु सफो पा पाखो पड़ो म भस्पमिमो ॥ ३ । पंग पॉप और अधिक मास को पाकर मार्गशिर मादि भाठ मास ( मार्ग- शिर, माघ फागुन पेशाल, पष्ठ मोर मापाट ) शुम।। परन्तु गुड मा एक बात, पर भोर मस्त नहीं हान पाहिम ॥३॥ 1 मार मापार मायरान जारि राशि मूर्य रविवारन न - प्रतिष्ठादिक के मुहर्त। ( १७७) गेहाकारे चेइन वजिजा माहमास अगणिभयं । सिहरजु जिणभुवणे बिंबपवेसो सया भणिश्रो ॥४॥ आसाढे वि पट्टा कायव्वा केइ सूरिणो भणइ । पासायगभगेहे बिंबपवेलो कायव्यो ॥५॥ घरमदिर का प्रारम्भ माघ मास में परें तो अनि का भय रहे, इसलिये माघ मास में घरमंदिर बनाने का प्रारम्भ करना अच्छा नहीं । परन्तु शिखरबद्ध मंदिर का आरम्भ और बिम्ब ( प्रतिमा ) का प्रवेश कराना अच्छा है । आषाढ मास में प्रतिष्ठा फरना, ऐसा कोई प्राचार्य कहते हैं, किन्तु प्रासाद के गर्भगृह (मूलगम्भाग) में बिम्ब प्रवेश नहीं कराना चाहिये ॥४॥ ५ ॥ तिथि शुद्धि- चट्ठी रित्तहमी बारसी अ अमावसा गयतिहीअो । वुड्डतिहि फूरदद्धा वजिज्न सुहेसु कम्मेलु ॥ ६ ॥ छह, रिक्ता (४-६-१४ ), श्राठम, बारस, अमावस, क्षयतिथि, वृद्धितिथि, रतिथि और दग्धातिथि ये तिथि शुभ कार्य में छोड़ना चाहिये ॥ ६ ॥ क्रूर तिथि- त्रिशश्चतुर्णामपि मेषसिंह-धन्वादिकानां क्रमतश्चतनः । पूर्णाश्चतुष्कत्रितयस्य तित्र-स्त्याज्या तिथिः क्रूरयुतस्य राशेः ॥७॥ मेष, सिंह और धन से चार २ राशियों के तीन चतुष्फ करना, उनमें प्रथम चतुष्क में प्रतिपदादि चार तिथि और पंचमी, दूसरे चतुष्क में षष्ठी श्रादि चार तिथि और दशमी, तीसरे चतुष्क में एकादशी श्रादि चार तिथि और पूर्णिमा इन क्रूर तिथियों में शुभ कार्य वर्जनीय है । उक्त राशि पर सूर्य, मंगल, शनि या राहु आदि कोई पाप ग्रह हो तव कर तिथि माना है अन्यथा नहीं ।। ७ ॥ क्रूर तिथि यंत्र- मेष सिंह ११-१५ १२-१५ मिथुन कुंभ १३-१५ कर्क वृश्चिक मीन १४-१५ -- . धन . वृष कन्या मकर १-५ २-५ ३-५ ४-५ ६-१० ... ७-१० ८-१० ९-१० तुला २३
२
८
"
(१७)
पास्तधार
सूर्पदम्बा विषि-
पग पर महमि बही दसमट्ठमि पार दसमि पीना ट।
पारसि पास्थि बीमा मेसाइस
घरदहविषा ॥८॥
मेष मादि मारा राशिों में गर्म हो तब म स बल, पौष, भाठम, मठ,
सम, भाठम, पारस, वसम, दूज, पारस, चौथ और इस य पदमा सिपि की
बावी हैं॥८॥
सूर्यदग्मा सिपि पंत्र-
पद-मीन सम्भवि में
मिथुन-कन्या सार्वति में
प-म
सिह-अधिक
मेप-कर
म- मकर
पनरग्बा विमि-
कुंभपये प्रजमिहुपे तुलसीदे मपरमीण विसको ।
विधियकमास कमा पीमाई समतिही स ससिवड़ा ॥६॥
इंम और धन का पद्रमा हो तब एख, मेष और मिथुन का चंद्र हो तप चौष,
ससा और सिंह का चंद्र हो तब वह मार और मीन का बद्रमा हो तप पाठम, प
मौर क का पद हो सब दसम, प्रमिक और कन्या का पंद्रहो तब वारस, इत्या
रिक क्रम से दितीयादि सम विपि पददम्पा विपि कही मावी है ॥ ॥
पदग्पा विपि पर-
-पम में
मकर-पीन में
१२
"
२
मेप-मिथुन "
८
१.
४
"
पुग--सिंद ।
मिड-पन्या
"
प्रविष्ठा-सिपी-
सिपपपम्पे परिचय मीम पंचमी दसमि तेरमी पुरपा ।
कसि परिषय बीमा ५५मि सहपा पाहाए ॥१०॥
प्रतिष्ठादिक के मुहर्त ।
(१७)
शुक्लपक्ष की एकम, दूज, पांचम, दसम तेरस और पूनम तथा कृष्णपक्ष की
एकम, दून और पंचमी ये तिथि प्रतिष्ठा कार्य में शुभदायक मानी हैं ॥१०॥
चार शुद्धि-
आइच बुह बिहप्फइ सणिवारा सुंदरा वयग्गहणे ।
विवपइट्ठाइ पुणो विहफा सोम बुह सुक्का ॥ ११ ॥
रवि, बुध, वृहस्पति, और शनिवार ये व्रत ग्रहण करने में शुम माने हैं तथा
विम्ब प्रतिष्ठा में वृहस्पति, सोम, वुध और शुक्र वार शुभ माने हैं ॥ ११ ॥
रत्नमाला में कहा है कि-
तेजस्विनी क्षेमकृदग्निदाह-विधायिनी स्यादरदा दृढा च ।
मानंदकृस्कल्पनिवासिनी च, सूर्यादिवारेषु भवेत् प्रतिष्ठा ॥ १२॥
रविवार को प्रतिष्ठा करने से प्रतिमा तेजस्वी अर्थात् प्रभावशाली होती है । सोम-
वार को प्रतिष्ठा करने से कुशल-मंगल करनेवाली, मंगलवार को अग्निदाह, बुधवार को
मन वाञ्छित देनेवाली, गुरुवार को दृढ (स्थिर), शुक्रवार को आनंद करनेवाली
और शनिवार को की हुई प्रतिष्ठा कन्प पर्यन्त अर्थात् चंद्र सूर्य रहे वहां तक स्थिर
रहने वाली होती है ।। १२ ।।
प्रहों का उचवल-
अजवृषमृगाङ्गनाकुलीरा झषवणिजौ च दिवाकरादितुङ्गाः ।
दशशिखिमनुयुक् तिथीन्द्रियांश-निनवकविंशतिभिश्च तेऽस्तनिवाः ॥१३॥
मेषराशि के प्रथम दश अंश रवि का परम उच्च स्थान, वृषराशि के प्रथम तीन
अश चन्द्रमा का परम उच्च स्थान, मकर के प्रथम अट्ठाईस अंश मंगल का, कन्या के
पंद्रह अंश बुध का, कर्क के पांच अंश गुरु का, मीन के सत्ताईस अंश शुक्र का और तुला
के प्रथम बीस अंश शनि का परम उच्च स्थान है । उक्न राशियों में कहे हुए ग्रह उच्च
हैं और उक्त अंशों में परम उच्च हैं। ये ग्रह अपनी उच्च राशि से सातवीं राशि पर हो तो
नीच राशि के माने जाते हैं । अर्थात् सूर्य मेषराशि का उच्च है इससे सातवीं राशि
तुला का सूर्य हो तो नीच का माना जाता है । इसमें भी दस अंश तक परम नीच
है। इसी प्रकार सब ग्रहों को समझिये ॥ १३ ॥
. (१६) यास्तुसार ग्रहों का स्वाभाविक मित्रपट- शत्रू मन्दसितो ममम शशिजो मित्राणि पा रथे- स्तोपांगहिमररिमजम सादो रोपा' समा' शीतगो' । जीवेन्तुष्पकरा' फजस्य सुखदो झोरि सिता समो, मिधे सूर्यसितो धुपस्य हिमगुः शत्रु समाचापरे ॥१४॥ सूरे सौम्पसितावरी रविमुतो मायोऽपरे स्वन्यपा) सौम्यार्की सुन्दो ममौ अजगुरु शुक्रस्प शेषावरी । शुकशी सुहदी सम सुरगुरु: सौरस्य चान्येऽरयो, पे प्रोक्ता' स्वत्रिकोणमादिषु पुनस्तेऽमी मया कीर्तिता ॥१॥ पर्ष के शनि मौर शुक्र शन, पुप ममान और चन्द्रमा, मंगल व पास्पति मित्री । चन्द्रमा के पर्य और पुष मित्र में सपा मंगन, पास्पति, एक मोर शनि य समान , शनु ग्रह कोई नहीं है। मंगल कर्प, पन्द्र और पाम्पति ये मित्र है पुध शत्रु है और शुक्र व शनि समान हैं। पुषर्य और शुक्र मिश्र र चन्द्रमा शत्रु और मगल, स्पति व शनि ये समान स्वभाष पाले हैं। गुरु के पुप और शुक्र शमुहै, शनि मपम है और सूर्य, चंद्रमा प मंगस मित्र हैं। शुक्र के पुष मौर शनि मित्र , मंगल और गुरु समान और सूर्य ष चंद्रमा शत्रु । शनि के धम भौर पुष मित्र हैं, परस्पति समान और सूर्य, चंद्रमा । मंगस शत्रु हैं। इस्पादिक जो अपने विशोष मरनादि स्थान में को, मैंने यहाँ उदारम रूप में बवसाय ॥१४॥१५॥ प्रा मैत्रीचा- । महा पर मंग पुप गुम शनि - मित्र म पर सूर्य दुर मूर्य उछ म् ० म प शनि पुपएफ पुर सम शनि ममानि मंगल पर हस्पति शुभा शमि रामशनि खुप पत्र चुपएक स्पत..
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त । (१८१ ) ? ग्रहों का दृष्टिवल- पश्यन्ति पादतो वृद्धया भ्रातृव्योम्नी त्रित्रिकोपके । चतुरस्र स्त्रियं स्त्रीवन्मतेनायादिमावपि ।। १६ ।। सब ग्रह अपने २ स्थान से तीसरे और दसवें स्थान को एक पाद दृष्टि से, नव और पांचवें स्थान को दो पाद दृष्टि से, चौथे और आठवें स्थान को तीन पाद दृष्टि से और मातवें स्थान को चार पाद की पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। कोई आचार्य का ऐसा मत है कि-पहले और ग्यारहवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। बाकी के दूसरे, छठे और बारहवें स्थान को कोई ग्रह नहीं देखते ।। १६ ।। क्या फक्त सातवें स्थान को ही पूर्ण दृष्टि से देखते हैं या कोई अन्य स्थान को भी पूर्ण दृष्टि से देखते हैं ? इस विपय में विशेष रूप से कहते हैं- पश्येत् पूर्ण शनिर्भातृब्योनी धर्मधियोर्मुकः । चतुरस्र कुजोऽन्दु-घुधशुक्रास्तु सप्तमम् ॥ १७ ॥ शनि तीसरे और दसवें स्थान को, गुरु नववे और पांचवें स्थान को, मंगल चौथे और आठवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है । रवि, सोम, बुध और शुक्र ये मातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखते है ॥ १७ ॥ अर्थात् तीसरे और दसवें स्थान पर दूसरे ग्रहों की एक पाद दृष्टि है, किन्तु शनि की तो पूर्ण दृष्टि है। नववे और पांचवें, चौथे और आठवें और सातवें स्थान पर जैसे अन्य ग्रहों की दो पाद, तीन पाद और पूर्ण दृष्टि है, इसी प्रकार शनि की भी है, इसलिये शनि की एक पाद दृष्टि कोई भी स्थान पर नहीं है । नववें और पांचवें स्थान पर अन्य ग्रहों की दो पाद दृष्टि है, किन्तु गुरु की तो पूर्ण दृष्टि है। जैसे दूसरे ग्रहों की तीसरे और दसर्वे, चौथे और आठवें और सातवें स्थान पर क्रमशः एक पाद, तीन पाद और पूर्ण दृष्टि है, वैसे गुरु की भी है, इसलिये गुरु की दो पाद दृष्टि कोई स्थान पर नहीं है । चौथे और आठवें स्थान पर अन्य ग्रहों की तीन पाद दृष्टि है, किन्तु मंगल की तो पूर्ण दृष्टि है । जैसे दूसरे ग्रहों की तीसरे और दसवें, नववें और पांचवें और सातवें स्थान पर क्रमशः एक पाद, दो पाद और पूर्ण दृष्टि है, वैसे मंगल की भी है, इसलिये मंगल की तीन पाद दृष्टि कोई भी स्थान पर नहीं है, ऐसा
(१)
बारनुसारे
सिर होता है। रवि, सोम, पुष और शुक ये पार प्रहों की सो सात स्थान पर ही
पूर्वपटि होने से इसरे मी स्थान में पूर्ण रष्टि से नहीं देखत है।
प्रविय के नपत्र-
मह मिसिर इस्युत्तर प्रशुराहा रेवई सपण मूर्व ।
पुस्स पुणप्पस रोहिणि साइ पणिहा पाहाए ॥१८॥
मपा, मृगशीर, दस्त, उपराफाल्गुनी, उपरापारा, उत्तराभाद्रपरा अनुरापा,
रेपती, भार, मूल, पुष्प, पुनर्वसु, रोहिणी सावि मौर पनिष्ठा से नपा प्रविष्ठा
कार्य में थम रे॥१८॥
सिमपास मौर सूत्रपात के मपत्र-
ममुर्म घुपमित कर पुस्स पणिष्ट्र सपभिसा साई।
पुस्स तिसत्तर रे रो कर मिग सबथे सिखनिषेसो॥ १६ ।।
ध्रुवसहरू (पचराफाल्गुनी, उचरापाटा, उचराभाद्रपदा और रोहिणी),
मुसंशा (मृगशीर, रेवती, चित्रा और अनुरापा), हस्त, पुष, घनिष्ठा, शवमिपा
मौर स्वाति इन नपत्रों में पैस्म (मन्दिर) का प्रपात करना अच्छा है। सपा पुप्म,
तीनों उचरानपत्र, रेवी, रोहिणी इस्त, मगधीर और भय इन नपत्रों में शिक्षा
का स्थापन करना मझ॥ १६ ॥
प्रविणकारको मधुम ममत्र-
कारावयस्स जन्मरिमर्स दस सोतसं तरारं ।
तेवीस पंचवीस बिपाठार पमिमा ॥ २० ॥
रिम्स प्रतिष्ठा करनेमासे को अपना सम्मानपत्र, दमा, सोसाखों, मगरावी,
तेजीमा और पचीस से नपा निम्न प्रतिमा में घोड़ना चाहिये ॥ २० ॥
विम्ब प्रदेश मपत्र--
सयमिसपुस्स पणिहा मिगसिर घुमिर भएहि सहवारे ।
ससि एसिए पर गिहे परेसिन परिमामो ॥२१॥
प्रतिष्टादिक के मुहूर्त। (१८३) शवभिपा, पुष्य, धनिष्ठा, मृगशीर, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तरामाद्रपदा, रोहिणी, चित्रा, अनुराधा और रेवती इन नक्षत्रों में, शुभवारों में, चन्द्रमा, गुरु और शुक्र के उदय में प्रतिमा का प्रवेश कराना अच्छा है ।। २१ जिनविम्व करानेवाले धनिक के अनुकूल प्रतिमा स्थापन करते समय नक्षत्र, योनि श्रादि देखे जाते हैं। कहा है कि- योनिगणराशिभेदा लभ्यं वर्गश्च नाडीवेधश्च । नूतनर्षियविधाने षड्विधमेतद् विलोक्यं ज्ञैः ॥ २२ ॥ योनि, गण, राशिमेद, लेनदेन, वर्ग और नाडिवेध ये छ: प्रकार के बल पंडितों को नवीन जिनविम्ब करवाते समय देखने चाहिये ॥ २२ ॥ नक्षत्रों की योनि- उडूनां योन्योऽश्व-दिप-पशु-भुजङ्गा-हि-शुनको- स्व-जा-मार्जारा खुद्वय-धृष-मह-व्याघ-महिषाः । तथा व्याघ्र-णे-ण-श्व-कपि-नकुल बन्छ-कपयो, हरिाजी दन्तावलरिपु-रजः कुञ्जर इति ॥ २३ ॥ अश्विनी नक्षत्र की योनि अश्व, भरणी की हाथी, कृत्तिका की पशु (बकरा) रोहिणी की सर्प, मृगशीर्ष की सर्प, आ की श्वान, पुनर्वसु की बिलाच, पुष्य की बकरा, आश्लेषा की बिलाव, मघा की उंदुर, पुर्वाफाल्गुनी की उंदुर, उत्तराफाल्गुनी की गौ, हस्त की महिष, चित्रा की बाघ, स्वाति की महिष, विशाखा की बाघ, अनुराधा की मृग, ज्येष्ठा की मृग, भूल की श्वान, पूर्वाषाढा की वानर, उत्तरापाढा की नकुल, अमिजिद की नकुल, श्रवण की वानर, धनिष्ठा की सिंह, शतमिषा की अश्व, पूर्वा- भाद्रपदा की सिंह, उत्तराभाद्रपदा की 'बकरा और रेवती नक्षत्र की योनि हाथी है ॥ २३॥ १ अन्य प्रयों में गौ योनि लिखा है
(१४)
? वास्तुमारे
पोनि पैर--
वर्ष हरीभमहिपतृ पाप्नवर्ग, गोव्याघ्रमश्वमहमोतुकषिर्क।
लोकातपाऽन्यदपि दम्पत्तिमतभृस्प-योगेषु पैरमिह वर्णमुदाहरन्ति ।।२४ ।
धान भौर मृग को, सिंह और पापी को, सर्प और नकुल को, बकरा और
पानर को गौ और पाप को घोड़ा और मैंसा को, विलाय और संदुर को परस्पर
और है। इस प्रकार लोक में प्रचलित दूसरे पैर भी देखे जाते हैं। मा पैर पति पत्नी,
सामी सेवक और मुरु शिष्म आदि के समय में छोरना चाहिये ।। २४ ॥
मपत्रों के गण-
दिम्यो गण' किन पुमर्षसूपुप्यास्त
स्वास्पश्विनीमषप्यपीष्णमृगानुरापा ।
स्पान्मानुषस्तु भरपी फमखासनक्ष
पूर्वोत्तराभितयशंकरदेवतानि । २५ ।।
रचोगप पिदभराचसषासवेन्द्र
चित्रानिदेषकरुणामिभुजङ्गमामि ।
मीति स्पयोरति नरामरयोस्तु मध्या,
धेरै पक्षादसरपोर्मतिर स्पयोस्तु ।। २६ ॥
पुनर्वसु, पुप्प, इस्म स्वाति अधिनी अपय, रेयसी, मृगशीर्प और मनु
राधा पे नप नपत्र दरगयपाले हैं। भाया राहिणी पूर्वाफमम्गुनी पापाटा, पूर्ता-
माद्रपदा उत्तगफाम्गुनी, उसरापारा, उपराभाद्रपदा भार पार्दा य नव नवा मनुप्प
एप वासर मघा, मूल, पनिश ज्येष्ठा, सिद्रा, विशाखा, शुवमिपा, कविका
और मासपा प न मघष रापण पाते है उनमें एक ही पर्ग में अत्यन्त प्रीति
से एक का मनुप्प गर हा पर इसरे देवगण हा वा मप्पम प्रीसि रहे, एक
का दपगण हा भार इसरे का गमग हाता परस्पर पैर रह सपा एक का मनु
प्पगण ऐमौर दूसरे का रापसाय वा मृत्यु कारक॥ २५ ॥ २६ ॥
प्रतिष्ठादिक के मुहर्त। (१०५) राशिफ्ट- विसमा भट्टमे पीई समाउ भट्टमे रिज। सत्तु छहहम नामरासिहि परिवजए। बीययारसम्मि यज्जे नवपंचमगं तहा। सेसेंस पीई निदिहा जेइ दुचागहमुत्तमा ।। २७ ।। विषम राशि (१-३-५-७-8-११) से आठवीं राशि के साथ मित्रता है, और समराशि (२-४-६-८-१०-१२) से आठवीं राशि के साथ शत्रुता है । एवं विषम राशि से छट्ठी राशि के साथ शत्रुता है और समराशि से छही राशि मित्र है । इस प्रकार दूजी और बारहवीं तथा नववीं और पांचवीं राशियों के स्वामी के साथ आपस में मित्रता न हो तो उनको भी अवश्य छोड़ना चाहिये । पाकी सप्तम से सप्तम राशि, तीसरी से ग्यारहवीं राशि और दशम चतुर्थ राशि शुभ है ॥ २७ ॥ कितनेक प्राचार्य गशिकूट का परिहोर इस प्रकार बतलाते हैं- नाही योनिर्गणास्तारा चतुष्कं शुभदं यदि । तदीदास्येऽपि नाथानां भकूट शुभदं मतम् ॥ २८ ॥ यदि नाडी, योनि, गण और तारा ये चारों ही शुभ न तो राशियों के स्वामी का मध्यस्थपन होने पर मी राशिकूट शुभदायक माना है ॥ २८ ॥ राशियों के स्वामी- मेषादीशाः कुजः शुक्रो बुधश्चन्द्रो रविवुधः । शुक्रः कुजो गुरुमन्दो मन्दो जीव इति क्रमात् ॥ २६ ॥ मेषराशि का स्वामी मंगल, वृष का शुक्र, मिथुन का बुध, कर्क का चंद्रमा, सिंह का रवि, कन्या का बुध, तुला का शुक्र, वृश्चिक का मंगल, धन का गुरु, मकर का शनि, कुंम का शनि और मिथुन का स्वामी गुरु है । इस प्रकार क्रम से बारह राशियों के स्वामी हैं ॥ २६ ॥ २४ पारसुसारे मारी -- ज्येष्ठार्यम्पेगनीरापिपमयुगयुगं दास्रम चेकनारी, पुष्येन्दुस्वाष्ट्रमित्रान्तकमसुजखम योनिषुध्ये च मध्या। पाप्यनिष्यासपिभोड्युगयुगमपो पौष्पमं पापरा स्याइ चम्पस्योरेकनामा परिणपनमसन्मभ्यनामां हिमस्युः ॥३०॥ न्येठा, मृत, उच्चराफाम्गुनी, हस्त, भाा, पुनर्वसु, शततारका, पूर्वाभाद्रपद पौर अधिनी ये मय नपत्रों की भाप नारी है1 पुष्प, मृगशिर, चित्रा, अनुरापा, मरणी, घनिष्ठा, पूर्वापाठा, पूर्वाकान्गुनी मौर उत्सरामाद्रपद य नप नपों की मध्य नाती है। स्वाति, विशासा, कृत्तिका, रोहिणी, भासपा, मघा, पचरापाहा, भवष और रेवती ये नब नपत्रों की मन्स्य नारी है। पर ष का एक माही में विवा होना पशुम मौर मध्य की एक नारी में विवाह हो तो मृरपुकारक है ॥ ३० ॥ माडी फा- सुमसुहिसेषपसिस्सा परपुरदेस सह एगमारीमा । कला पुण परिणीमा इणइ पई ससरं सासु च ॥३१॥ एकनारीस्थिप्ता यत्र गुरुर्मन्त्रम देवता । सन रूज मृत्यु क्रमेण फसमाविरोत् । ३२ ॥ पुत्र, मित्र, सेवक, शिप्प, पर, पुर और दश प एक नारी में हो तो शुम परन्तु कन्या का एक नारा में विवार किया जाय वो पति, असुर और सासु ा नाशकार। गुरु, मत्र और देवता ये एक नारी में वो शत्रुता, राग और मृत्य कारक ॥३१ । ३२॥ पापपर- मनिभानपकेषु निपु जानिकर्मापानसज्ञिता प्रथमाः । नापत्रिपासप्तमाताराः स्युनं हि गुभा' फ्यान ॥ ३१ ॥ जन्म नपा पा माम नपत्र सपारम्म फरक मा २ की शान साइन करनी। इन तीनों में प्रपम २ ताराभों के नाम कम से ममतारा, कमतारा और भापानवारा प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त । (१९७) जानना । इन तीनों नवकों में तीसरी, पांचवीं और सातवीं तारा कभी भी शुभ नहीं है ॥ ३३ ॥ तारा यंत्र- - जन्म सपत् २ विपत् ३ क्षेम ४ मैत्री १ यम | साधन ६निधन ७ मैत्री परम कर्म १० " १६ "१४ " भाधान १६ २० १ २३ " २४ २५ २६ २७ " " " है। इन ताराओं में प्रथम, दूसरी और आठवीं तारा मध्यम फलदायक तीसरी, पांचवीं और सातवीं तारा अधम हैं तथा चौथी, छट्ठी और नववीं तारा श्रेष्ठ हैं। कहा है कि- ऋक्षं न्यूनं तिथिन्यूना क्षपानाथोऽपि चाष्टमः । तत्सर्व शमयेत्तारा षट्चतुर्थनवस्थिताः ॥ ३४ ॥ नक्षत्र अशुभ हो, तिथि अशुम हो और चंद्रमा भी आठवॉ अशुभ हों तो भी इन सब को छट्ठी, चौथी और नववीं तारा हो तो दवा देती है ॥ ३४ ॥ यात्रायुद्धविवाहेषु जन्मतारा न शोभना । शुभाऽन्यशुभकार्येषु प्रवेशे च विशेषतः ॥ ३५ ॥ यात्रा, युद्ध और विवाह में जन्म की तारा अच्छी नहीं है, किंतु दूसरे शुभ कार्य में जन्म की तारा शुभ है और प्रवेश कार्य में तो विशेप करके शुभ है ॥३॥ वर्ग बल- अकचटतपयशवर्गाः खगेशमार्जारसिंहशुनाम् । साखुमृगावीनां निजपञ्चमवैरिणामष्टौ ।। ३६ ।। अवर्ग, कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग और शवर्ग ये आठ वर्ग हैं, उनके स्वामी-अवर्ग का गरुड़, कवर्ग का बिलाव, चवर्ग का सिंह, टवर्ग का पास्तुसार पान, वसग का सर्प, पपर्ग का तंदुर, पमर्ग का धारेव भौर शर्मर्ग का मीरा (पारा) है। इन वर्गों में भम्पोऽन्य पांचों वर्ग शत्रु होता है ॥ ३६ ॥ मेन रन का विचार- मामादिवर्गाहमपैकवर्गे, षोडमेव मतोलमात्र । स्पस्पोमयोरटातापशिष्ठे-ऽर्दिते वियोपा प्रपमेन देया' ।। ३७ ॥ दोनों के नाम के माय पपरमाने वर्गों के भकों को कम से समीप रसर पीछे इसको माठ से भाग देना, मोशेष रहे उसा मामा करना, योपचे उतने दिया प्रथम पाक पर्गनाला दूसरे वर्ग पास का करजदार है, ऐसा समझना । इस प्रकार युग के प्रकों को सक्रम से भर्यात् दूसरे वर्ग के अंको पाला सिकार पूर्णपद क्रिया करना, दोनों में से बिनके विमा प्राधिक हो वह करबदार सममना ॥१७॥ सदाहरस-महावीर लामी मौर मिनरास इन दोनों के नाम के भाप मवर के वर्गों को फम से तिला वो ६५ हुए इनको माठ से माग दिया तो शेष ७, इनके भाषे हिरे ता सारे वीन विमा रपे इससिपे महावीरदेव बिनास का सारे तीन विमा करदार है। अब उत्क्रम स पर्गों को सिसा ता हुए, इनको पाठ से माग दिया दो शेप पार पत्र, इनके प्राधे लिये तो दो मिया ने इसलिये मिनदास मापीर देव का दो पिया करबदार है। पहुए दोनों विधा में से अपना लेन देन निकाल लिया तो ये विमा महावीरदेव का अधिक रहा, इसलिये महावीर देव स विधा मिनदास के करबदार हुए । इसी प्रकार मर्षत्र लेन देन सममाना । योनि, गण, राशि, वारा यदि और नागरे में पाप वो बम्म नपा से देखना चाहिए । पदि मम नपत्र मालूम ना तो नाम मात्र से देखना पारिस । रिन्तु वर्ग मैत्री भोर मेन देन वो अमिर नाम के नपत्र से ही देखना पाहिय, ऐसा भारम्मसिदि पंप में मारे।
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त।। | REE ) राशि, योनि, नाडी, गण आदि जानने का शतपदचक्र- शाशि वर्ण वश्य योनि राशीश गण |सख्या नाटी चू चे १ अश्विनी मेष पनिय चतुष्पद अन्ध मंगन देव भाव चो ला. २ भरणी मेष पत्रिय चतुष्पद गज मंगल मनुष्य मध्य , मेर मगन ३) कृतिका वत्रिय वैश्य चतुष्पद अंत्य ३ वृष ३ ३ शुक्र श्रो. वा ४ रोहिणी वृष वैश्य चतुष्पद सर्प मनुष्य वीवु २ वैश्य २ चतुष्पद वे वो का की ५) मृगशिर २ शुक्र २ वृष २ मिथुन सर्प देव मध्य २ शुद्ध २ मनुष्य २ बुध ६ भादों मिथुन शुद्ध मनुष्य धान बुध मनुष्य भाप छ के को. ३ मनुष्य ३ बुध 0 पुनर्वसु ३ मिथुन | ३ शूद १कर्क ब्राह्मण माजार देव प्राप जलचर १चद ॥ पुष्य ब्राह्मण वकरा चदमा हो. टा मध्य देव है भालेषा SEN कर्क ब्राह्मण जलचर माजार वद्रमा राक्षस प्रत्य मघा मा मी मु मे सिंह सत्रिय वनचर सूर्य राक्षस मो रा । पूर्वा फा० सिंह पत्रिय वनचर सूर्य टी टु. चूहा मनुष्य मध्य क्षत्रिय, वनपर १२/उत्तरा फा० १ सिह ३ कन्या गौ १ सूर्य ३ बुध पा पी ३ वैश्य ३ मनुष्य मनुष्य भाष पु पा णठ वैश्य मनुष्य मैंस देव माप वास्तुसारे चित्रा पे पो १Lरी मपुम पाय स | मन १५ स्पति मयुष्य मैस मम्म 14 विद्यावा पी.. तो पण प कीय मंग मानी मिक हरत मगर म 15 पर अधिक मंग रासस सूब माल पाव मा भी. पाग मयुध पर मेमो उचरापास पर मम पनि जपा मकर पापी मम रासस मम्म माण प्रतमित पो सा मो.म मनुम में हो २६ पूरी माय सिद मयुप्म मीन एम सामान गो मयुम रपती ग्रामप प्रतिष्ठादिक के मुतर्स। ( १९१ ) प्रतिष्ठा करानेवाले के साथ तीर्थंकरों के राशि, गण, नाडी भादि का मिलान किया जाता है, इसलिये तीर्थंकरों के राशि आदि का स्वरूप नीचे लिखा जाता है । तीर्थकरों के जन्म नक्षत्र- वैश्वी-ब्राह्म-मृगाः पुनर्वसु-मघा-चित्रा-विशाखास्तथा, राधा-मूल-जलक्ष-विष्णु-वरुणा, भाद्रपादोत्तराः । पौष्णं पुष्य-यमः-दाहनयुताः पौष्णाश्विनी वैष्णवा, दास्री स्वाष्ट्र-विशाखिकार्यमयुता जन्मक्षमालाहताम ॥३८॥ उत्तराषाढा १, रोहिणी २, मृगशिर ३, पुनर्वसु ४, मघा ५, चित्रा ६, विशाखा ७, अनुराधा ८, मूल ६, पूर्वापाढा १०, श्रवण ११, शतभिषा १२, उत्तरा- भाद्रपद १३, रेवती १४, पुष्य १५, 'भरणी १६, कृत्तिका १७, रेवती १८, अश्विनी १६, श्रवण २०, अश्विनी २१, चित्रा २२, विशाखा २३ और उत्तराफाल्गुनी २४ ये तीर्थंकरों के क्रमशः जन्म नक्षत्र हैं ॥ ३८ ॥ तीर्थकरों की जन्म राशि- चापो गौर्मिथुनद्वयं मृगपतिः कन्या तुला वृश्चिक- श्वापश्चापमृगास्यकुम्भशफरा मस्स्यः कुलीरो हुडुः । गौर्मीनो हुड्डुरेणवक्त्रहुडकाः कन्या तुला कन्यका, विज्ञेयाः क्रमतोऽहतां मुनिजनः सूत्रोदिता राशयः ॥३६ । धन १, वृषम २, मिथुन ३, मिथुन ४, सिंह ५, कन्या ६, तुला ७, वृश्चिक ८, धन ६, धन १०, मकर ११, कुंभ १२, मीन १३, मीन १४, कर्क १५, मेष १६, वृषभ १७, मीन १८, मेष १६, मकर २०, मेष २१, कन्या २२, तुला २३ और कन्या २४ ये तीर्थंकरों की क्रमशः जन्म राशि हैं ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार तीर्थंकरों के नक्षत्र, राशि, योनि, गण, नाड़ी और वर्ग आदि को नीचे लिखे हुए जिनेश्वर के नक्षत्र आदि के चक्र से खुलासावार समझ लेना । १ 'छपे हुए बृहद्धारणायन में तथा दिनशुदि दीपिका में श्री शान्तिनाथजी का 'अश्विनी नक्षत्र लिखा है यह भूल है, सर्वत्र त्रिपाटी अादि प्रथों में भरणी नक्षत्र-ही लिखा हुआ है।
मानुसार मिमेपर के पत्रकारिवाने प्रका- चिनमाम पानि गल B राशि नम्तीपर माडी वर्ग पर अपमदेव मयुब पम परियो स श्रा मम ३ वमबनाव पुगतिर २ मिम M माप मेष मप्रमिनमन पुष - मिनुष समति मना सित मेष . पणप्रय मित्रा पास पर सुपा 5 मेर परिब देष मंप मम्म साधी पूर्व रासि पर मेष है मेष : मेवात पर मत्र धामण सवामित्र E प्रतिष्ठादिक के मुहत ( १९३) विमल उत्तरामादपद गौ मनुष्य मीन गुरु मध्य ७ हरिण घनत रेवती दस्ति देव है मीन गुरु प्रत्य १ गरुड १५/ धर्मनाथ श्रज पुण्य कर्क देव चा १ सर्प मध्य १६ शान्तिनाथ भरणी हस्ति मनुष्य मेप मगन मध्य ८ मेप 1 कुथुनाथ कृत्तिका रानस ३ वृपभ शुक्र श्रत्य २ विहान प्ररनाथ रेवती हस्ति देव 8 मीन गुरु गरुड 18) मल्लिनाथ अश्विनी थश्व देव मेप मगन प्राप ६ उदर २० मुनिसुव्रत श्रवण वानर देव ४ मकर शनि यत्य ६ उदर १ नमिनाथ प्रश्विनी अश्व देव १ मेप मान प्राम ५ सर्प २२ नेमिनाथ चित्रा व्याघ्र राक्षस कन्या मध्य ५ सर्प २३/ पार्श्वनाथ विशाखा स्यान राक्षस तुला शुक्र यस्य महावीर उत्तरा फाल्गुनी गो मनुष्य ३ कन्या प्राय ६ उदर । ९९ वास्तुसारे विपि, पार और नपत्र के पोग से एमाधम पोग होते हैं। उनमें प्रथम रविवार से एम पोग बसमावे- मानौ मूत्य करादिप पोष्णप्रामगोत्सरा' । पुष्पम्बाचियासष्प-काष्टमघमी तिथिः ॥ ४० ॥ रविवार को हस्त, पुनर्वसु, रेवती, मृगशीर, उचराफाल्गुनी, वघरापारा उचरा- माद्रपदा, पुष्प, मूल, भचिनी पौर पनिष्ठा इन नपत्रों में से कोई नपत्र तथा प्रतिपदा, मष्टमी और नवमी इन विधियों में से कोई विधि हो तो शुम योग होता है। उनमें विपि और पार मा नपा और पार ऐसे दो का याग से धो दिक शुम योग, एव विपि पार भौर नपत्र इन तीनों का पाग हो वो त्रिक शुम माग सममना । इसी प्रकार पशुम योगों में भी समझना ॥ ४० ॥ रविवार को भाम पोग- मपा वारणं याम्यं विशाखात्रितयं मपा । तिपिः पटसप्तध्यार्क-मनुसंम्पा तयेप्यते ॥ ४१ ॥ रविवार को शतमिपा, भरणी, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा गौर भषा इन नपत्रों में से काई मपत्र तथा घा मातम, ग्यारस, पारस मोर चौदस इन तिथियों में से कोई तिथि हो यो माम योग होता है॥४१॥ सोमबार रेसम योग-- सोमे सिद्ध मृगवाम-मैत्राएपार्यमणं कर' अति शतभिषक् पुप्य-रितपिस्तु मिनपामिश ॥ ४२ ॥ सोमवार को मृगशीर, रोहिणी, अनुरापा, उपराफाल्गुनी, हस्त, भवस, रातमिपा भौर पुष्प इन नपत्रों में से कोई नपच सया व या नवमी तिमि हो तो एम पोग होता है ।। ४२॥ सोमवार को बाम पोग- म चन्द्र पासवापारा-पानोचिदिमेषतम् । सिवन्पै चिना ससम्मेधदरपादिनपं तथा ॥ ४२ ॥ " प्रतिष्ठादिक के मुहर्त्त ( १९५) सोमवार को धनिष्ठा, पूर्वाषाढा, उत्तरापाढा, अभिजित् , आर्द्रा, अश्विनी, विशाखा और चित्रा इन नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र तथा सातम, ग्यारस, वारस और तेरस इन तिथियों में से कोई तिथि हो तो अशुभ योग होता है ॥ ४३ ।। मंगळवार को शुभ योग- भौमेऽश्विपोष्णाहिर्बुध्न्य-मूलराधार्यमाग्निभम् । मृगः पुष्यस्तधाश्लेषा जया षष्ठी च सिद्धये ॥ ४४ ॥ मंगलवार को अश्विनी, रेवती, उत्तराभाद्रपदा, मूल, विशाखा, उत्तरा- फाल्गुनी, कृत्तिका, मृगशीर, पुष्य और आश्लेषा इन नक्षत्रों में से कोई नक्षत्र तथा त्रीज, आठम, तेरस और छह इन निथियों में से कोई तिथि हो तो शुभ योग होता है ॥४४॥ मंगलवार को अशुभ योग- न भोमे चोत्तराषाढा मघावासवत्रयम् । प्रतिपद्दशमी रुद्-प्रमिता च मता तिथिः ॥ ४५ ॥ मंगलवार को उत्तरापाढा, मघा, श्रा, धनिष्ठा, शतभिषा और पूर्वाभाद्र- पदा इनमें से कोई नक्षत्र तथा पडवा, दसम और ग्यारस इनमें से कोई तिथि हो तो अशुभ योग होता है ॥ ४५ ॥ बुधवार को बुधे मैत्रं श्रुति ज्येष्ठा-पुष्यहस्ताग्निभत्रयम् । पूर्वाषाढार्यमः च तिथिर्भद्रा च भूतये ।। ४६ ॥ बुधवार को अनुराधा, श्रवण, ज्येष्ठा, पुष्य, हस्त, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशीर, पूर्वापाढा और उत्तराफाल्गुनी इनमें से कोई नक्षत्र तथा दूज, सातम और वारस इनमें से कोई तिथि हो तो शुभ योग होता है ॥ ४६ ॥ शुभ योग- वास्तुसारे पुपबार को मनुम योग- न पुषे यासयारखेपा-रेवतीप्रपवारुणम् । चित्रामूलं तिपिभेष्टा जपैकेन्द्रनवाहिता ॥१७॥ पुषवार को धनिष्ठा, भासेपा, रेपती, मधिनी, भरग्री, यवमिपा, चित्रा मौर भूत इनमें से कोई नपत्र सपा सीज, पाठम, सेरस, परषा, पौदस मौर नममी इनमें से कोई तिथि होवो भशुम योग होता है॥४७॥ गुरुवार को शुम पोग- गुरौ पुष्पाविनादिस्प-पूर्यारोपाय वासबम । पौणं स्वोतिपय सिधै पूर्णामेकादयी तथा ॥ ४ ॥ गुरुवार का पुष्प, अधिनी, पुनर्पस, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापारा पूर्वाभाद्रपदा, पासपा, घनिष्ठा, रेपसी, सावि विशाखा और भनुरामा इनमें से कोई नपत्र तमा पांचम, दसम, पूर्णिमा या एकादशी विपि हो वो शुम योग होता ॥४८॥ गुरुवार को माम पोग- म पुरी पारुणाग्नेय चतुप्कार्यमपश्यम् । स्पेष्ठा भूत्यै तथा भद्रा तुर्या पठ्यष्ठमी तिपि ॥ १६ ॥ गुरुवार को एसभिपा, चित्र, रोरिसी, ममशीर, मार्दा, उचराफागुनी, रस्त और न्नेष्ठ। इनमें से कोई नपत्र वा दून सातम, बारस, पौष, षा और माठम इनमें से कोई विपि हो तो अशुम योग होता है ॥ ४ ॥ मुबारको धमयोग- एके पोप्माधिनापारा मैत्र मार्ग सुतिश्पम् । यौनादिस्पे फरो मम्दानपोदरपी सिल्पे ॥५०॥ एकवार को पती, मधिनी, पूर्मापारा, अक्षरापारा, अनुरापा, मृगशीर, पनिष्ठा, पूर्णफाम्गुनी, पुनर्पस मोर रस्त इन नपत्रों में से कोई नपत्र पा एकम, घर, ग्यारस और वेरस इनमें से कोई तिथि हो तो राम योग होता है ॥१॥ .
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त (१७) शुक्रवार को अशुभ योग- न शुक्रे भूतये ब्राम पुष्यं सार्प मघाभिजित् । ज्येष्ठा च वित्रिसप्तम्यो रिक्ताख्यास्तिथयस्तथा ।। ५१ ॥ शुक्रवार को रोहिणी, पुष्य, आश्लेपा, मघा, अभिजित् और ज्येष्ठा इनमें से कोई नचत्र तथा दून, त्रीज, सातम, चौथ, नवमी और चौदस इनमें से कोई तिथि हो तो अशुभ योग होता है ॥ ५१ ।। शनिवार को शुभ योग- शनी ब्राह्मश्रुतिद्वन्दा-विमरुद्गुरुमित्रभम् । मघा शतभिषक् सिद्धय रिक्ताष्टम्यौ तिथी तथा ॥ ५२ ।। शनिवार को रोहिणी, श्रवण, धनिष्ठा, अश्विनी, स्वाति, पुष्य, अनुगधा मघा और शतभिषा इनमें से कोई नक्षत्र तथा चौथ, नवमी, चौदस और अष्टमी इनमें से कोई तिथि हो तो शुभ योग होता है ॥ ५२ ॥ शनिवार को अशुभ योग- न शनौ रेवती सिद्धथै वैश्वमार्यमणत्रयम् । पूर्वामृगश्च पूर्णाख्या तिथिः षष्ठी च सप्तमी ॥ ५३ ।। शनिवार को रेवती, उत्तराषाढा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपदा और मृगशीर इनमें से कोई नक्षत्र तथा पांचम, दसम, पूनम, छट्ट और सातम इनमें से कोई तिथि हो तो अशुभ योग होता है ॥ ५३ ॥ उक्त सात वारों के शुभाशुभ योगों में सिद्धि, अमृतसिद्धि प्रादि शुभ योगों का तथा उत्पात, मृत्यु आदि अशुभ योगों का समावेश हो गया है, उनको पृथक् २ संज्ञा पूर्वक जानने के लिये नीचे लिखे हुए यंत्र में देखो ।
(११) वास्तुसारे धुमासम पोगा- पोग एपि सोम मंगर पुर यदि बोग . मार्ग पिठामा रोदिया रातमिपा ममा "ति ति ति वि.लि १२ति "ल| ति त ति | R इवायपोग पति पति 1110 बमबरयोग मा विद्यावा माई रिम रोहिरी बोग पनि रेन रेक्ती रियायपछि पुण अपुरापावचनापाटा तमिया मालिनी स्मधारया व NH जापा ममा मूब चित्र | पुषर्षभ सानिमू पश्चिमी | रो बारे मारेप अजराम.मड-मा बोय भा मपहिरा प्य पुरपुस अपवाद व पाविर रेण्टी प्रचियी मधुराधा रोपीसी रेती मापोग पियाम स्वमिष प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त (१५) -- रवियोग- योगो रवेर्भात् कृत४ तर्फ नन्द :- दिग्१० विश्व१३ विंशोडषु सर्वसिद्धथै । आये१न्द्रिया५ श्व७ द्विपद रुद्र११ सारी १५- राजो१६ इषु प्राणहरस्तु हेय || ५४ ।। सूर्य जिस नक्षत्र पर हो, उस नक्षत्र से दिन का नक्षत्र चौथा, छट्ठा, नववाँ, दसवॉ, तेरहवा या बीसवाँ हो तो रवियोग होता है, यह सब प्रकार से सिद्धिकारक हैं । परन्तु सूर्य नक्षत्र से दिन का नक्षत्र पहला, पांचवाँ, सातवॉ, आठवाँ, ग्यारहवाँ पंद्रहवॉ या सोलहवाँ हो तो यह योग प्राण का नाशकारक है ।। ५४ ॥ कुमारयोग- योगः कुमारनामा शुभः कुजज्ञेन्दुशुक्रवारेषु । अश्वायैदधन्तरित-नन्दादशपञ्चमीतिथिषु ।। ५५ ।। मंगल, बुध, सोम और शुक्र इनमें से कोई एक वार को अश्विनी आदि दो २ अंतरवाले नक्षत्र हो अर्थात् अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, मघा, हस्त, विशाखा, मूल, श्रवण और पूर्वाभाद्रपद इनमें से कोई एक नक्षत्र हो; तथा एकम, छट्ट, ग्यारस, दसम और पांचम इनमें से कोई एक तिथि हो तो कुमार नाम का शुभ योग होता है । यह योग मित्रता, दीक्षा, व्रत, विद्या, गृह प्रवेशादिक कार्यों में शुभ है । परन्तु मंगलवार को दसम या पूर्वाभाद्र नक्षत्र, सोमवार को ग्यारम या विशाखा नक्षत्र, बुधवार को पडवा या मूल या अश्विनी नक्षत्र, शुक्रवार को दमम या रोहिणी नक्षत्र हो तो उस दिन कुमार योग होने पर मी शुभ कारक नहीं है। क्योंकि इन दिनों में कर्क, संवर्तक, काण, यमघंट आदि अशुभ योग की उत्पचि है, इसलिये इन विरुद्ध योगों को छोड़कर कुमार योग में कार्य करना चाहिये ऐसा श्रीहरिभद्रसरि कन लग्न- शुद्धि प्रकरण में कहा है ॥ ५५ ॥ , पास्तुसारे एमपोग- राजपोगो भरणपाचै मन्तरःगुमाषहः । भद्रावतीयाराकाK ऊजहभृगुमामुषु ॥ ५६ ॥ मंगल, पुष, शम और रनि इनमें से कोई एक वारं को मरती मादि दा २ भवरमाले नपत्र मर्यास् भरणी, मृगशिरा, पुप्प, पूर्वाफाम्गुनी, चित्रा, अनुरापा, पूर्वा पारा, पनिष्ठा और वचरामाद्रपदा इनमें से कोई नषम हो पा दूध, सावम, पारस तीच भौर पूनम इनमें से कोई वियि हो यो राजयोग नाम का राम कारक योग होता है। इस योम को पूर्वमद्राचार्य ने तरुण पोग कहा है ॥ ५६ ॥ स्पिर योग- स्पिरपोगा एभो रोगो दावी गनिजीवपोः । प्रयोदरपष्ठरिक्तासु मचन्तकृत्तिकादिभिः॥ १७ ॥ गुरुवार मा शनिवार को वेरस, अष्टमी, पौय, नवमी और बौदस इनमें से कोई सिपि हो वा कृषिका मादि दा २ भंवरपासे मचा रो पर्थात् कपिका, मार्दा, भासेपा, उपराफाम्गुनी समावि, ज्येष्ठा, उचरापारा, शतमिपा और रेवती इनमें से गोई मपत्र हो तो रोग प्रादि के विच्चेद में शुभकारक ऐसा स्पिरयोग होता है। इस योग में स्थिर कार्य करना अच्छा है ॥ ५ ॥ पापाव पोग- बमपातं स्पजेद् मित्रिपनपद्ससमे लिपी। मैत्रेऽप व्युत्तरे पैश्ये प्रामे भूलकर कमात् ॥ ५ ॥ नको अनुरापा, वीज को तीनों ग्चरा (उत्तगफाम्गुनी, उचरापारा या उपग भाद्रपदा), पंचमी को मपा, ६ को रोहिदी और सातम को मूल पारस्व नपा से तो पमपाव नाम का योग होता है। यह योग यमकार्य में बर्मनीय है। मारपर टिप्पन में रस पित्रा या साति, सातम को भरमी, नवमी को पुप्प भौरसमी को मासे नपत्र हो तो यमपात योग माना है। इस बमपात योग में राम गर्म करें वो कामास में कार्य करनेपास की मृत्य सेवी है, ऐसा प्रश्नश में कहा है॥ ५८ ॥ - प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त ( २०१) - कालमुखी योग- चउरुत्तर पंचमघा कत्तिम नवमीइ तइन अणुराहा । अट्ठमि रोहिणि सहिआ कालमुही जोगि मास छगि मञ्च ॥ ५६ ।। चौथ को तीनों उत्तरा, पंचमी को भवा, नवमी को कृत्तिका, तीज को अनुराधा और अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र हो तो कालमुखी नाम का योग होता है। इस योग में कार्य करनेवाले की छः मास में मृत्यु होती है ॥ ५६ ॥ यमल और त्रिपुष्कर योग- मंगल गुरु सणि भद्दा मिगचित्त धणिट्टिा जमलजोगो। कित्ति पुण उ-फ विसाहा पू-भ उ-खाहिं तिपुक्करो ॥६०॥ मंगल, गुरु या शनिवार को भद्रा (२-७-१२) तिथि हो या मृगशिर, चित्रा या धनिष्ठा नक्षत्र हो तो यमल योग होता है । तथा उस वार को और उसी तिथि को कृत्तिका, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराषाढा नक्षत्र हो तो त्रिपुष्कर योग होता है । ६० ।। पंचक योग- पंचग धणि? अद्धा मयकियवजिज जामदिसिगमणं । एसु तिसु सुहं असुहं विहिअंदु ति पण गुणं होई ॥ ६१ ।। धनिष्ठा नक्षत्र के उत्तरार्द्ध से रेवती नक्षत्र तक (ध-श-पू-उ-रे) पांच नक्षत्र की पंचक संज्ञा है । इस योग में मृतक कार्य और दक्षिण दिशा में गमन नहीं करना चाहिये । उक्त तीनों योगों में जो शुभ या अशुभ कार्य किया जाय तो क्रम दूना, तीगुना और पंचगुना होता है ॥ ६१ ॥ से अबला योग- कृत्तिपभिई चउरो सणि बुहि ससि सूर वार जुत्त कमा । पंचमि विह एगारसि बारसि अबला सुहे कजे ॥ ६२ ।। कृत्तिका, रोहिणी, मृगाशर और आर्द्रा नक्षत्र क दिन क्रमशः शनि, बुध, सोम और रविवार हो तथा पचमी, दूज, ग्यारस और वारस तिथि हो तो अवला नाम २६
(२०२)
पास्तुसारे
का योग होता है। पर्यात् कृतिका नक्षत्र, शनिवार और पचमी तिपि, गरिसी नपत्र,
सुभषार मौर दूज तिथि: मृगशिर नपत्र, सोमवार और एकादशी सिपि मार्दा नपत्र
रविवार मौर पारस विपि हो सो आपला योग होता है। यह एम कार्य में
पर्बनीय ॥ २ ॥
विपि मौर नपत्र से मत्यु पोग-
मूखसाइपित्ता भसेस सपभिसपत्तिरेषामा ।
नंदाए भदाप महषया फग्गुणी दो दो ॥ १३ ॥
विजपाए मिगसपणा पुस्सऽस्सिपिमरणिनि रिसाए ।
भासारदुग पिसाहा भणुराह पुणपसु महा य ॥ १४ ॥
पुलाइ कर पपिटा रोहिणि इनमयगऽपत्पमसत्ता ।
नदिपाठापमुरेसरको पनाए मार्म । ६५ ॥
नेदा सिपि (१-६ ११)को मूत्र, भाद्र, स्मासि चित्रा, मालेपा, शतभिषा,
कृषिका या रेवती नक्षत्र हो, भद्रा विधि (१७-१२)ो पूर्वाभाद्रपद, उपरामाद्र
पद, पूर्वाफाम्गुनी या उत्तराफागुनी नपत्र हो, नपा विपि ( ३८१३) को मृग-
शिर, भवन, पुप्प, मधिनी, भरणी मा ग्येष्ठा नपत्र हो रिक्वा सिपि (४६१५)
को पूर्वापारा, ग्चरापाटा, विशाखा, मणुरापा, पुनवसु या मघा नपत्र हो, पूर्ण सिपि
(५१०१५) को दस्त, पनिष्ठा या रोहिनी मचत्र हो वो प सप नपत्र मृतक
अवस्थामा को भाये है। इसलिये इनमें नंदी, प्रतिष्ठा भादि यम काम करना मति
मान् बोर॥६१ से ६५ ॥
माम पोरमें का पदिार-
योगास्तिपिपारोस्था-स्तिपिमोस्था मबारजाः ।
पपगारोप्येव पासितयजास्तथा ॥ १६ ॥
तिमि और पार के योग से, सिषि और मपत्र क माग से, नपत्र और पार
के योग से तया तिथि नपत्र और पार इन सीनों के योग से बो माम योम होवे रे
वे सब हम (पीसा ), बा ( बगान ) और सरा ( नैपास) देश में पनीय।
मम्प देशों में वर्षनीय नही है ॥६६॥
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त
( २०३ )
रविजोग राजजोगे कुमारजोगे असुद्ध दिअहे वि ।
जं सुहकजं कीरइ तं सव्वं बहुफलं होइ ।। ६७ ॥
अशुभ योग के दिन यदि रवियोग, राजयोग या कुमारयोग हो तो उस दिन
जो शुभ कार्य किये जाय वे सब बहुत फलदायक होते हैं ॥ ६७ ।।
अयोगे सुयोगोऽपि चेत् स्यात् तदानी-
मयोगं निहत्यैष सिद्धिं तनोति ।
परे लग्नशुद्धया कुयोगादिनाशं,
दिनार्दोत्तरं विष्टिपूर्व च शस्तम् ॥ ६८ ॥
अशुभ योग के दिन यदि शुभ योग हो तो वह अशुभ योग को नाश करके
सिद्धि कारक होता है । कितनेक प्राचार्य कहते हैं कि लगशुद्धि से कुयोगों का नाश
होता है। भद्रातिथि दिनार्द्ध के बाद शुभ होती है ।। ६८ ।।
कुतिहि-कुवार-कुजोगा विट्ठी बि अ जम्मरिक्ख दट्टतिही।
मज्झरहदिणाअो परं सव्वंपि सुभं भवेवस्सं ॥६॥
दुष्टतिथि, दुष्टवार, दुष्टयोग, विष्टि (भद्रा), जन्मनक्षत्र और दग्धतिथि ये
सब मध्याह्न के बाद अवश्य करके शुभ होते हैं ।। ६६ ॥
अयोगास्तिथिवारक्ष -जाता येऽमी प्रकीर्तिताः ।
लग्ने ग्रहबलोपेते प्रभवन्ति न ते क्वचित् ॥ ७० ॥
यत्र लग्नं विना कर्म क्रियते शुभसञ्ज्ञकम् ।
ततेषां हि योगानां प्रमावाज्जायते फलम् ।। ७१ ॥
तिथि वार और नक्षत्रों से उत्पन्न होने वाले जो कुयोग कहे हुए हैं, वे सब
बलवान ग्रह युक्त लग्न में कभी भी समर्थ नहीं होते हैं अर्थात् लग्नबल अच्छा हो तो
कुयोगों का दोष नहीं होता। जहां लन बिना ही शुभ कार्य करने में आवे वहां ही
उन योगों के प्रभाव से फल होता है ।। ७०-७१ ।।
लम विचार-
लग्नं श्रेष्ठं प्रतिष्ठायां क्रमान्मध्यमथावरम् ।
व्यङ्गं स्थिरं च भूयोभि-गुणैराव्यं चरं तथा ॥७२॥
पास्तुसारे मिनदव की प्रतिष्ठा में दिखमार सम भेष्ठ है, स्थिर हम मध्यम और घर लम फनिष्ठ है। यदि घर लम भस्पस बलरान गुममों से युक्त हो वा प्राव कर सकसे॥७२॥ विस्वभाव मिथुन ३ कन्या ६ पन ९ मीन १२ चम । स्विर प२ सिंह ५ अधिक ८ईम ११ मम्पम पर मेप तुम.मकर १० मयम सिंहोदये दिनकरो घटमे बिपाता, भारायणस्तु युपती मियुने महेन' । देख्यो मिमूर्तिमवनेपु निवेशनीया , सुदामरे स्पिरगद निसिवाम रेवा ॥७३॥ सिंह सम में सूर्य की, इभ सम में प्रमाफी, कन्पा सप में मारायण (विष्णु) की, मिपुन लप में महादेव की, दिखमाषपाले सम में रेवियों की, पर सम में द्र (दर भाद) देवों की मौर स्थिर सम में समस्त देशों की प्रविष्ठा करनी चाहो ॥७३॥ भीष्माचार्य ने तो इस प्रकार मा है- सौम्पैर्देवा' स्थाप्या करैर्गन्पषपचरचासि । गणपतिगाम नियतं कुर्यात् सापरणे बग्मे ॥ ७ ॥ सौम्प ग्रहों के लम में देश की स्थापना करनी और कर मरों के प्रम में गवर्ष, पप और राचस इनकी स्वारना करनी तथा गबपति और गणों की स्थापना सापा रमसा में करनी चाहिये ॥ ७ ॥ सम में ग्रहों का होरा नवमांशादिक बल देखा माता है, इसलिये प्रसगोपात पाहा सिसवा है। पारम्भसिदिवार्तिक में कहा कि-विषि मादिपा से चंद्रमा
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त
( २०५ )
का बल सौ गुणा है, चंद्रमा से लग्न का बल हजार गुणा है और लग्न से होरा आदि
षवर्ग का बल उत्तरोत्तर पांच २ गुणा अधिक बलवान् है ।
होरा और द्रेष्काण का स्वरूप-
होरा राश्य मोजः-ऽर्केन्द्रोरिन्दर्कयोः समे ।
द्रेष्काणा भे त्रयस्तु स्व-पञ्चम-त्रित्रिकोणपाः ॥ ७५ ॥
राशि के अर्द्ध भाग को होरा कहते हैं, इसलिये प्रत्येक राशि में दो, दो हारा
हैं। मेष आदि विषम राशि में प्रथम होरा रवि की और दूसरी चंद्रमा की है। वृष
आदि सम राशि में प्रथम होरा चंद्रमा की और दूसरी होरा सूर्य की है ।
प्रत्येक राशि में तीन२ द्रेष्काण हैं, उनमें जो अपनी राशि का स्वामी है वह
प्रथम द्रेष्काण का स्वामी है । अपनी राशि से पांचवीं राशि का जो स्वामी है वह दूसरे
द्रेष्काण का स्वामी है और अपनी राशि से नववीं राशि का जो स्वामी है वह तीसरे
द्रेष्काण का स्वामी है ॥ ७५ ॥
-
नवमांश का स्वरूप-
नाशाः स्युरजादीना-मजणतुलकर्कतः ।
बर्गोत्तमाश्चरादौ ते प्रथमः पञ्चमोऽन्तिमः ॥ ७६ ॥
प्रत्येक राशि में नव२ नवमांश हैं। मेष राशि में प्रथम नवमांश मेष का, दूसरा
वृष का, तीसरा मिथुन का, चौथा कर्क का, पांचवां सिंह का, छट्ठा कन्या का,
सातवां तुला का, आठवां वृश्चिक का और नववां धन का है। इसी प्रकार वृष राशि में
प्रथम नवमांश मकर से, मिथुन राशि में प्रथम नवमांश तुला से, कर्कराशि में प्रथम
नवमांश कर्फ से गिनना । इसी प्रकार सिंह और धनराशि के नवमांश मेष की तरह,
कन्या और मकर का नवमांश वृष की तरह, तुला और कुंभ का नवमांश मिथुन की
तरह, वृश्चिक और मीन का नवमांश कर्क की तरह जानना ।
चर राशियों में प्रथम नवमांश वर्गोत्तम, स्थिर राशियों में पांचवाँ नवमांश
और द्विस्वभाव राशियों में नववा नवमांश वर्गोत्तम है। अर्थात् सब राशियों में
अपना२ नवमांश वर्गोत्तम है ॥ ७६ ॥
।
और सम्न र
पसारे
प्रविश विवाद मादि में मलमास की प्रामान्यता है। मादी-
बग्ने शुभेऽपि पचंग कर स्पाटसिदिद।
पग्मे फरेपिसौम्पाय: शुभदोऽसो पखी पतः ॥७७ ।।
बग्न एभ होने पर मी यदि नवमांश कर हो मा इष्टसिदि नहीं करता है।
होने पर मी नवमांश मुभ हो वो धमकारक है, परब कि मशही
मसमान है। फर अंश में या हमा एम प्रा मी का होता है और शुभ अंध में रहा
हुमा कर ग्रह शुभ होता है। इसत्तिपे नबर्माण की यदि अपरम देखना
पाहिये ।। ७७ ॥
प्रषिद्ध में प्रमाधम नसमांस-
वास्तु मिघुम' कन्पी पन्यापाप गोमनाः ।
प्रतियां वृषः सिंहो पपिग मीन मध्यमा ॥ ७ ॥
प्रविष्ठा में मिपुन, कन्या और धन का पूर्वाई इवनें अंश सचम हैं। सपा
सिंह, तुता और मीन इसने अंग मप्पम रे ॥ ७ ॥
द्वारा भौर सिंह मखरूप-
स्युर्यादागा स्वग्रहावषेया सिंगाशकेष्बोजयुजोस्तु रारयो ।
प्रमोस्कमाव-रा-शिले-त्रियेषु भौमागुिमशुका ।। ७ ।।
प्रत्येक राशि में पारा २ शादीश हैं। विस नाम की राशि हो उसी
राशि प्रथम प्रादशांश और पानी के ग्यारह शपणे सके पीछे की क्रमश:
ग्यारह राशियों के नाम का बानना । इनहादाशी सामी राशियों के मो स्वामी
-
प्रत्येक राशि में तीस त्रिंगांश । इनमें मेप, मिथुन भादि सिम राशि के
पांच, पाप, भात, साव भोर पाप अंशों के स्वामी कम से मंगल, शनि, गुरु पुष
और तक है। मादि सम राशि के निशांश और उनके सामी भी उसकम से
मानना, भर्पाद पार, सात, पाठ, पाप मोर पाप विशाशों के सामी कम से एक,
पुर, गुरु शनि और मैगस हैं ॥ ७ ॥
षड्वर्ग की स्थापना का यंत्र- द्वादशांशेश निशांशेश पनि होरा नवांशेश राशि राशि स्वामी द्रेष्कामेश रवि चंद्र मगल रवि गुरु | म शु बु च र बु शु म गु म शु बु च र शु म गु श श गु ५म ५श ८गु ७वु ५शु मेष मगल चद्र रवि | शुक्र सुध शनि श श गु म शु बु च र यु | शु बु च र यु शु म गु श श गु म ५शु ७७ वृष शुक्र शुक्र शनि | शु म गु श श गु म शु बुबु च र बु शु म गु श श गु म शु ५ म ५श ८गु ७७ ५२ मिथुन, बुध रवि चद्र | बुध च र यु शु म गु श श गुचर मु शु म गु श श गु म शु यु ५शु ७७ ८गु ५श कर्क चद्र चद्र रवि | चद्र मगल गुरु रवि चद्र | रवि गुरु मगल म शु यु न र यु शु म गुर शु म गु श श गु म शु बु च ५ म ५श ८गु ७७ ७वु ५शु प्रतिष्ठाविक के सारी सिंह रवि चद्र रवि | युध शनि शुक्र, श श गु म शु बु च र बुबु शु म गु श श गु म शु मुच ५शु ७मु गु ५श कन्या बुध शुक्र शनि बुध |शु म गु श श गु म शु यु | शु म गु श श गु म शु वु च र उ ५म ५श ८गु ७ ७ ५शु तुला शुक्र रवि चद्र चन्द्र च र बु शु म गु श श गु| म गु श श गु म शु यु च र वु शु| ५शु ७नु ८गु ५श ५म पृश्चिक मगल चद्र रवि मगल गुरु मगल रवि | म शु बु व र वु शु म गु गु श श गुमशु यु च र वु शु म ५म ५श ८गु ७ ५शु घन रवि चन्द्र गुरु चद्र रवि |शनि शुक्र सुघ | श श गु म शु मु च र वु श श गु म शुबु च र मु शु म गु| ५शु ७२ ८गु ५श ५म मकर शनि शनि रवि चद्र | शनि दुध शुकशु म गु श श गु म शु श गु म पु च र दुशुम शु श कुम ५म ५श ८गु ७६ ५ मीन चद्री गुरु चद्र मगन च र दु शु म गु श श गु गु म शु दुच र बु शु म गु श शशु ७ ८गु ५श गुरु (१०.)
(१००) बास्तुपारे भन्न मामी में बामा प्रपा अवश्य देखना चाहिये। मा- बग्नं देहः पद्कपर्गोऽमकानि, प्राणमन्द्रो पातवः लेबरेन्द्रा । प्राणे मष्टे देहमास्वानायो, पस्नेनातमन्द्रवीय प्रकपप्पम् ॥ ८॥ लग्न शरीर, पर्वर्ग में भंग है, पन्द्रमा प्राव है और अन्य प्रा सप्त भात है। प्राण का विनाश माने से शरीर, अगोपांग और पातु का मी विनाश हो जाता है। इसलिपे प्रायरूप पन्द्रमा आपस प्रपश्य जेना चाहिये ।। ८० ॥ में समम मावि स्थान की एद्धि- रवि जोऽर्कलो राहु शुक्रो वा सप्तमस्पित' । इति स्थापककर्सरी स्पाप्पमप्पविलम्बितम् ।। ८१ ॥ रवि, मंगल, शनि राहु मा यक यदि सप्तम स्पान में रहा हावा स्थापन करानेराले गुरु का और करनेपाल गास्म का तपा प्रतिमा का मी शीघ्र ही बिनाश कारक है ॥१॥ स्पाग्या बग्नेम्पयो मन्दात् पष्ठे शुक्रेनुलग्नपा' । र पादप पा सऽस्तेऽस्मगुरू समी । ८२ ॥ छग्न में शनि, रवि सोम मा मगल को स्पान में शुम, पद्रमा पा मग्न का स्वामी, माठमें स्पान में चंद्र, मंगल, पुष, गुरु या शक पर्जनीय है या सप्तम स्थान में कोई भी ग्रह हो वो मच्दा न हैं। किन्तु कितने मागायों का मत है कि पन्द्रमा या गुरु सावरे स्थान में रोता मप्पम फलदायक है ।। ८२ ॥ प्रविष्ठा श्मनी में प्रस्थपना- प्रतिष्ठा मेटो रविरूपच शीतकिरण', स्वपर्मात्ये तत्र चितिमरविमी पापरिपुगौ। दुपस्थायी प्पपनिपनपजी भृगुमुता , सुत पावग्नानवमदयमापेप्यपि तपा ॥ ३ ॥ प्रविष्ठा के समय सम्म पानी में पूर्व परि उपपप (३-६ १० ११) स्यान में हो तो मह है। पन्द्रमा पन और पर्म स्पान सहित पूोह स्थानों में - प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त (२०१) (२-३-६-६-१०-११) रहा हा तो श्रेष्ठ है। मंगल और शनि तीसरे, ग्यारहवें और हे स्थान में रहे हों तो श्रेष्ठ हैं। बुध और गुरु बारहवें और पाठवें इन दोनों स्थानों को छोड़कर बाकी कोई भी स्थान में रहे हों ता अच्छे हैं, शुक्र लग्न से पांचवें स्थान तक (१-२-३-४-५) तथा नवम, दसम और ग्यारहवॉ इन स्थानों में रहा हो तो श्रेष्ठ है ।। ८३ ॥ लग्नमृत्युसुप्तास्तेषु पापा रन्ध्र शुभाः स्थिताः । स्याज्या देवप्रतिष्ठायां लग्नषष्ठाष्टगः शशी ।। ८४ ।। पापग्रह (रवि, मंगल, शनि, राहु और केतु) यदि पहले, आठवें, पांचवें और सातवें स्थान में रह हो, शुभग्रह अाठवें स्थान में रहे हों और चन्द्रमा पहले, छढे या आठवें स्थान में रहा हो, इस प्रकार कुण्डली में ग्रह स्थापना हो तो वह लग्न देव की प्रतिष्ठा में त्याग करने योग्य है ।। ८४॥ में नारचंद्र में कहा है कि- त्रिरिपा१ चासुतखे२ स्वत्रिकोणकेन्द्र३ विरैस्मरेऽत्रापयर्थे ५ । लाभेद क्रूर सुधार चिंत३भृग४ शशि५ सर्वे६ क्रमेण शुभाः॥८५। क्रू'ग्रह तीसरे और छठे स्थान में शुभ हैं, वुध पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवे या दसवें स्थान में रहा हो तो शुभ है। गुरु दूसरे, पांचवें, नववे और केन्द्र (१.२-३-४) स्थान में शुभ है । शुक्र (६-५-१-४-१०) इन पांच स्थानों में शुभ है । चन्द्रमा दूसरे और तीमरे स्थान शुभ है। और समस्त ग्रह ग्यारहवें स्थान में शुभ हैं ।। ८५ ॥ खेऽर्कः केन्द्रारिधर्मेषु शशी झोऽरिनवास्तगः । षष्ठेज्य स्वत्रिगः शुक्रो मध्यमाः स्थापनाक्षणे ॥ ८६ ।। भारेन्द्रकोः सुतेऽस्तारिरिष्फे शुक्रस्त्रिगो गुरुः । विमध्यमाः शनि/खे सर्वे शेषेषु निन्दिताः ॥ ८७ । दसवें स्थान में रहा हुआ सूर्य, केन्द्र (१-४-७-१०), अरि (६ ) और धर्म ६) स्थान में रहा हुआ चंद्र, छठे, सातवें और नववें स्थान में रहा हुआ बुध, छठे स्थान में गुरु, दूसरे व तीसरे स्थान में शुक्र हो सो प्रतिष्ठा के समय में मध्यम फलदायक है। २७ (१०८) पास्तुसार मन शाम में पामा भबट माप देखना चाहिये। याद कि- बग्न देहर षद्कवर्गोजकानि, प्राणमन्द्रो पातपः लेवरेना। प्रापे मष्ठे देशपास्वङ्गमायो, पस्नेनातमन्द्रवीय प्रकरप्यम् ॥ ८ ॥ नग्न शरीर है, पर्वर्ग ये भंग , चन्द्रमा प्राव है और अन्य प्रा सप्त धातु हैं। प्राण का विनाश हा मामे से शरीर, मंगोपांग और धातु का मी विनाश हो भाता है। इसलिये प्राबरूप चन्द्रमा रा स मवरय लेना चाहिये ॥८॥ पम्न में सम्म भादि स्यान की शुद्धि- रवि जोऽईमो राहु शुक्रो पा ससमस्थिता । इन्ति स्थापककर्तारौ स्थाप्पमप्पविखम्बितम् ॥ ८१॥ रवि, मंगल, शनि राहु या एक यदि सप्तम स्थान में रहा सेता स्थापन करानेवाले गुरु का भौर करनेवाले गास्य का व्या प्रतिमा का भी शीघ्र ही बिनाश कारक है ॥१॥ स्यान्पा बग्नेभयो मन्दात् पठे गुरेन्दुबग्नपा' । रन्धे चन्द्रावय पत्र सर्वेऽस्तेऽस्मगुरू समो । २ ।। मग्न में शनि, रफि, सोम या मंगत, बहे स्थान में एक, चन्द्रमा या लग्न का सामी, माठमें स्थान में पंद्र, मंगल, पुप, गुरु या शुक्र पर्मनीप रे वश सप्तम स्थान में कोई भी प्रहा हो तो मया नही हैं। फिम्तु कितने भागों का मत है हिन्द्रमा या गुरु सावत्र स्थान में हो तो मम्पम फलदायक है ।। ८२ ।। प्रविधा इममी में स्पापना- मतिछायो भेष्ठो रविसपथपे शीतकिरण', स्पपाध्ये तत्र चितिमरविमौ श्यापरिपुगी। पुषस्वर्याचा ध्पयनिपनपर्जी मृगुसुता , सुतं पावनग्मामवमदरामायेप्यपि तपा ।। ८३ ॥ प्रविष्ठा के समय सग्न अपडसी में पर्प यदि उपपप (३-६१०-११) स्पान में दो वो भेष्ठ है। चन्द्रमा पन मोर पर्म स्पान सहित पूर्वोह स्थानों में ( २११) प्रतिपादिक के मुहूर्त गुरु बलहीन हो, मंगल बलवान् हो या नवम पंचम स्थान में रहा हो, शुक्र ग्यारहवें स्थान में रहा हो ऐसे लग्न में महादेव की प्रतिष्ठा करना चाहिये ॥ ८ ॥ के ब्रह्मा प्रतिष्ठा मुहूर्त्त- बलहीने स्वसुरगरौ बलवति चन्द्रात्मजे विलग्ने वा । त्रिदशगुरावायस्थे स्थाप्या ब्राह्मी तथा प्रतिमा ॥ ६ ॥ शुक्र बलहीन हो, बुध बलवान् हो या लग्न में रहा हो, गुरु ग्यारहवें स्थान में रहा हो ऐसे लग्न में ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापन करना चाहिये ॥१०॥ देवी प्रतिष्ठा मुहूर्त-- शुक्रोदये नवम्यां बलवति चन्द्र कुजे गगनसंस्थे । त्रिदशगुरो बलयुक्त देवीनां स्थापयेदाम् ।। ६१ ॥ शुक्र उदय में, नवमी के दिन, चन्द्रमा बलवान् हो, मंगल दसवें स्थान में रहा हो और गुरु बलवान् हो ऐसे लग्न में देवी की प्रतिमा स्थापन करना चाहिये ॥११॥ इंद्र, कार्तिक स्वामी, यक्ष, चंद्र और सूर्य प्रतिष्ठा मुहूर्त- बुधलग्ने जीवे वा चतुष्टयस्थे भृगी हिबुक संस्थे । वासनकुमारयक्षेन्दु-भास्कराणां प्रतिष्ठा स्यात् ।। ६२ ।। बुध लग्न में रहा हो, गुरु चतुष्टय (१-४-७-१०) स्थान में रहा हो और शुक्र चतुर्थ स्थान में रहा हो ऐसे लग्न में इन्द्र, कार्तिकेय, यक्ष, चंद्र और सूर्य की प्रतिष्ठा करना चाहिये ॥ १२ ॥ प्रह प्रतिष्ठा मुहूर्त यस्य ग्रहस्य यो वर्गस्तेन युक्ते निशाकरे । प्रतिष्ठा तस्य कर्तव्या स्वस्ववर्गोदयेऽपि वा ।। ६३ ।। जिस ग्रह का जो वर्ग (राशि) हो, उस वर्ग से युक्त चंद्रमा हो तब या अपने २ वर्ग का उदय हो तब ग्रहों की प्रतिष्ठा करना चाहिये ।। ६३ ॥
(Rt.) पातुसारे मंगत, चद्र और सूर्य पांचवें स्थान में शुक्र बढे सातव या पारा स्थाने में, गुरु वीसा स्थान में, शनि पांचों या दसवें स्थान में हो तो विमध्यम फलदायक है। इनके सिवाय दूसरे स्थानों में सम मा अघम है ॥ ८६-८७ ।। भविष्ठा में पर स्थापना मंत्र- ता सम मध्यम विमन्चम . सोम ५ ग पुस 4 ८ सनि बिनदेष प्रविछ सह- पत्रपति सूर्यस्य मते पक्षाहीमेऽङ्गारके बुधे पैन । मेपवृषस्पे सूर्य पपाकरे चाईती स्थाप्या शनि पसवान् हो, मगर और पुष बलहीन हो क्या मेप मौर पराशि में पर्स और चन्द्रमा से हो सब मराित (मिनदेव) की प्रतिमा स्थापन पारिये ॥८॥ महादेव प्रविक्ष मा.- बलहीने विदागुरी पखवति भौमे त्रिकोणसंस्मे पा । मसुरगुरौ पापस्थे महेश्वरार्चा प्रतिप्पा ॥ ८ ॥ करना
.
(२)
प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त
गुरु बलहीन हो, मंगल बलवान् हो या नवम पंचम स्थान में रहा हो, शुक्र
ग्यारहवें स्थान में रहा हो ऐमे लग्न में महादेव की प्रतिष्ठा करना चाहिये ।। ८६ ।।
ब्रह्मा प्रतिष्ठा मुहूर्त-
बलहीने स्वलुरगुरौ पलवति चन्द्रात्मजे विलग्ने वा ।
त्रिदशगुरावायस्थे स्थाप्या ब्राह्मी तथा प्रतिमा ॥ ६० ।।
शुक्र बलहीन हो, वुध बलवान् हो या लग्न में रहा हो, गुरु ग्यारहवें स्थान
में रहा हो ऐसे लग्न में ब्रह्मा की प्रतिमा स्थापन करना चाहिये ॥१०॥
देवी प्रतिष्ठा मुहूर्त-
शुक्रोदये नवम्यां चलवति चन्द्रे कुजे गगनसंस्थे ।
त्रिदशगरी बलयुक्त देवीनां स्थापयेदर्चाम् ।। ११ ।।
शुक्र के उदय में, नवमी के दिन, चन्द्रमा बलवान् हो, मंगल दसवें स्थान
में रहा हो और गुरु बलवान् हो ऐसे लग्न में देवी की प्रतिमा स्थापन करना
चाहिये ।। ६१॥
इंद्र, कार्तिक स्वामी, यक्ष, चंद्र और सूर्य प्रतिष्ठा मुहूर्त-
बुधलग्ने जीवे वा चतुष्टयस्थे भृगौ हिवुक संस्थे ।
वासनकुमारयक्षेन्दु-भास्कराणां प्रतिष्ठा स्यात् ।। ६२ ।।
बुध लग्न में रहा हो, गुरु चतुष्टय (१-४-७-१०) स्थान में रहा हो और
शुक्र चतुर्थ स्थान में रहा हो ऐसे लग्न में इन्द्र, कार्तिकेय, यक्ष, चंद्र और सूर्य की
प्रतिष्ठा करना चाहिये ।। 8२।।
प्रह प्रतिष्ठा मुहूर्त-
यस्य ग्रहस्य यो वर्गस्तेन युक्ते निशाकरे ।
प्रतिष्ठा तस्य कर्त्तव्या स्वस्ववर्गोयेऽपि वा ।। ६३ ॥
जिस ग्रह का जो वर्ग (राशि) हो, उस वर्ग से युक्त चंद्रमा हो तब या अपने २
वर्ग का उदय हो तब ग्रहों की प्रतिष्ठा करना चाहिये ॥ १३ ॥
(१२) पास्तुसारे पम्दीन मोमफा- बलहीना' प्रतिष्ठाप रवोन्दुगाभार्गवा' । प्रदेश-गृहिणी-सौम्प-स्यानि इन्युर्यपाक्रमम् ।। ६४ ।। पूर्व पसीना ता घर के स्वामी का, चंद्रमा पमहीन होनाक्षी का गुरु पहीन होता मुख का दौर शुफ पतहीन हो वो धन का विनाश होता है ।।६।। प्रासार विनासकारण योग- तन-मधु-मुक्त-धूम धर्मेपु तिमिरान्तक । सर्मस कुजार्की र सहरन्ति सुराख्यम् ।। ६५ ।। पाला, पौधा, पाच, सावर्षों या नषों इन पापों में से किसी स्पान में सूर्य रहा तो क्या कपांच स्थानों में पा दसवें स्पान में मंगल पा पनि हा हो तो देवालय का विनाश कारक है ॥ १५ ॥ माम प्रमों का परिहार- सौम्पवाक्पतियाणां य पकोऽपि खोस्कट' । करैरयुक केन्द्रस्य मोऽरिष्ठ पिनधि स । ६६ ।। दुप, गुरु और शुक्र इनमें से कोई एक भी बसवान् हो, एवं इनके साथ कोई कुर प्रान रहा हो और केन्द्र में रोरों वो पे शीघ्र ही भरिष्ट बोगों नारा करते हैं॥६६॥ बरिष्ठ स्वोषगो दोषानग्रीति वीतरश्मिना । बाक्पतिस्तु यत इन्ति सासंवा मराति ॥६७ ॥ पतवान् होकर अपना उप स्थान में राहुमा कुप प्रस्सी दोपों का गुरु सौगों का भार शुमार दोनों का नाश करता है ।। ६७ ॥ पुषो विनाप चतुष्पेषु स्पित व हन्ति पिचरमरोषान् । राक सरम विमनोभवेपु, सर्वत्र गीर्गपगुम्स्तु अयम् ॥६॥ पूर्व के साथ नतिर हुमा पुष पार रेन्द्र में से कई कन्द्र में रहा हो वो २ एक सौ दोन म विनाश करता है। सूर्य के सार मही या मादक नग्न प्रतिष्ठादिक के मुहूर्त (२११) सातवें स्थान के सिवाय कोई भी केन्द्र में रहा हो तो लग्न के हजार दोषों का नाश करता है और सूर्य रहित गुरु चार में से कोई केन्द्र में रहा हो तो लग्न के लाख दोषों का विनाश करता है ॥ १८ ॥ तिथिवासरनक्षत्रयोगलग्नक्षणादिजान् । सपलान् हरतो दोषान् गरुशुक्रौ विलग्नगी ।। १ ।। तिथि, वार, नक्षत्र, योग, लग्न और मुहर्च से उत्पन्न होने वाले प्रबल दोषों को लम मैं रहे हुए गुरु और शुक्र नाश करते हैं ॥ १८ ॥ लग्नजातान्नवांशोस्थान् क्रूरदृष्टिकृतानपि । हन्याजीवस्तनौ दोषान् व्याधीन् धन्वन्तरियथा ॥ १० ॥ लग्न से, नवांशक से और क्रूरदृष्टि से उत्पन्न होने वाले दोषों को लग्न में रहा हुमा गुरु नाश करता है, जैसे शरीर में रहे हुए रोगों को धन्वंतरी नाश करता है ।। १००॥ शुभप्रह की दृष्टि से कराह का शुभपन- लग्नात् करो न दोषाय निन्द्यस्थानस्थितोऽपि सन् । दृष्टः केन्द्रत्रिकोणस्थः सौम्यजीवसितैर्यदि ॥ १०१ ।। फूरग्रह लग्न से निंदनीय स्थान में रहे हों, परन्तु केन्द्र या त्रिकोण स्थान में रहे हुए बुध, गुरु या शुक्र से देखे जाते हों अर्थात् शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती हो तो दोष नहीं है॥१०१ ॥ कूरा हवंति सोमा सोमा दुगुणं फलं पयच्छति । जइ पासइ किंठिो तिकोणपरिसंहिओ वि गुरू ॥ १०२ ॥ केन्द्र में या त्रिकोणा में रहा हुआ गुरु यदि क्रूरग्रह को देखता हो तो वे फूरग्रह शुभ हो जाते हैं और शुभ ग्रहों को देखता हो तो वे शुभग्रह दुगुना शुभ फल देनेवाले होते हैं ॥ १०२॥ सिद्धछाया लम-- सिद्धच्याया फ्रमादर्का-दिषु सिद्धिप्रदा पदैः । रुद्र-सा ष्ट-नन्दाष्ट-सप्तभिश्चन्द्रवद् द्वयोः ॥ १०३ ।।
बास्तुसार
नप अपने शरीर की बाया रविवार को पारस, सोमवार को सार पाठे,
मंगलवार को नक, पुषवार को पाठ, गुरुवार को सात शुक्रवार को सारे पाठ और
पनिवार को भी सारे पाठ पर हो तब उसको सिदकामा करते हैं, पर सरकार्य
की सिदिदायक है ॥१३॥
प्रश्ान्तर से सिमायामा-
पीसं सोखस पनरस पदस तेरस य पार पारे ।
रबिमाइस पारंगुखसंकषायंगला सिदा ।। १०४ ॥
मर पारा भंगुनशंक की बाबा रविवार में पीस, सोमवार को सोसह,
भगवार को पंद्रा पुषवार को चौदह, गुरुवार को बेरह, एबमार को पारह और
शनिवार को मी बारा प्रगुप्त हो र उसको भी सिरपाया काय ॥ १.४॥
एम सात प्रमाप में उपरोज सिदलाया लग्न से समस्त राम प्र परना
पारिये । नरपतिजयपर्या में कहा है कि-
मचापि तिपिवारा-स्ताराचन्द्रपई प्रहा।
पुयन्पपि युभ भावं भजन्ते सियापपा ॥ १० ॥
नपत्र, विपि, मार तारावस, पन्द्रास मोर प्रा ये कमी दोपपासे वो
भी उपत सिदकापा से राम माप को देनवाने त है॥१.५॥
। २१५) प्रथम से नग or " " " १ " २ " २ or " ग्राहक बनने वाले मुनिवरों के नाम । नाम नाम १० श्रीमान् पंन्यास श्री धर्मविजयजी गणी तपस्वी श्री गुणविजयजी महाराज महाराज १ श्रीमान् न्याय विशारद न्यायतीर्थ मुनि- मुनिराज श्री धीरविजयजी महाराज राज श्री न्यायविजयजी महाराज गणाधीश श्री हरिसागरजी मुनिराज श्री रविविमलजी पंन्यास श्री हिमतविजयजी १ मुनिराज श्री शीलविजयजी ५ मुनिराज श्री कर्पूरविजयजी मुनिराज श्री महेन्द्रविमलजी (वीर पुत्र) , मुनिराज श्री वीरविजयजी २ प्रवर्तक श्री कान्तिविजयजी मुनिराज श्री जसविजयजी २ पंन्यास श्री हिमतविमलजीगणी न्याय शास्त्र विशारद मुनि मुनिराज श्री कल्याणविजयजी श्रीचिन्तामणसागरजी (इतिहास रसिक) मुनि श्री रत्नविजयजी मुनिराज श्री उत्तमविजयजी यतिवर्य पं० लब्धिसागरजी पंन्यास श्रीरंगविजयजी पं० देवेन्द्रसागरजी मुनिराज श्री अमरविजयजी पं० अनूपचन्दजी पार्श्वचंद्रगच्छीय जैनाचार्य ५० प्रेमसुंदरजी श्री देवचंद्रसूरीजी पं० लक्ष्मीचंदजी मुनिराज श्री मानसागरजी (राजवैद्य) पंन्यास श्री उमंगविजयजी पं० रामचंद्रजी १ पंन्यास श्री मानविजयजी वाचक पं० जीवनमळजी मुनिराज श्री विवेकविजयजी प्रथम से ग्राहक बननेवाले 'सद्गृहस्थों के नाम । नाम नग १२५ सेण्ड हर्ट रोड का जैन उपाश्रय इस्ते १५ सेठ किसनलालजी संपतलालजी लूना- शा• मंगलदास चीमनलाल बम्बई वत फलोदी १००सरी सेठ रणछोड़भाई रायचंद १५ सेठ मेघराज भीखमचंद मुणोत फलोदी मोतीचंद बम्बई ५ मिस्त्री भायशंकर गौरीशंकर सोमपुरा २० सेठ रायचंद गुलावचंद अच्छारी वाळे पालीताना बम्बई ३ सेठ आशाभाई चतुरभाई मांग्ल २ " " २ २ १ " " " १ १ " or " गणी महाराज नाम मा नाम १ शाह नयमत्री हेमानी सिमान "कपूरचरणी सेठमम्मी मीसमबनी बनाजी मोपोडी " १ " " - " " ना २ चैमागम माणगार २न येताम्बर सोसाफ्टी इस्वे पावू पाद मछमी चोपड़ा मधुवन १ शाह भीवरामनी भीमानी, सीवाणपी " फूलचंदजी पुनीसामी सहसम्मजी सेनामी "म्मेवमम्मी मोटाजी " पुजीगरनी कस्तूरचंदमी " फोनमम्मी बनेपनी " पदमी रोपामो कायरी " समीपरजी अँगामी , मनुक्मणी मनानी हेमामी मागी वारानगी ममूवमम्मी मी० मार०सार मेठमलजी ममममी एच०० राठौर फोस्हापुर १ मिडापत्रएजी प्रतापपदमी सिरोही सालममी चीमनामी बाबाज १ भगवानमी ९पाजी सियाण्य तारापनी पीठासी "वारावगी मरसिंहसी १ " मेराभी विषदनी सातेर मगर जुवारमात्री गुमनामी शिवर्गम , प्राचंद ओमपर पर १ बानू पौषमम्मी परामिया पालीवाल १ माद परमाई पूंनाभाई १ मिमी बन जराममाई सोमपुरा, मटबरमा मोहनमा सोमपुरा सिरपुर " बहु मानव सोमपुरापीसनार १ मोगफ हामीएम प्रशीराम पाडगांव १सार न्यावर्षद मोतीचन्द मटा पीर बगमसास प्रांगणावाम १ पोटागल समरसी फोटामुण १ सेठ सस्पनाप्रपणनी देवी १ पार जान बगना की १ वारजी पोपरा बगीमगंज १ सेठ मोवीमा स्नीयामा वापर - १ १ " . . "
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