Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Santa Antha Nirnaya
Front matter
No text on this page.
'व्याख्यान सार संग्रह पुस्तकमाला का वा पुष्प' 11 श्रीमजैनाचाय पूज्यश्री जवाहिरलालजी महाराज व्याख्यानों में से- - सनाथ-अनाथ-निर्णय। सम्पादक- पण्डित शंकरप्रसाद दीक्षित प्रकाशक- श्री साधुमार्गी जैन पूज्य श्री हुक्मीचन्दजी महाराज की संप्रदाय का हितेच्छु श्रावक-मएडल रतलाम प्रथम बार भद्ध मूल्य सम्वद १९९१ वि० २००० प्रति FAROOFyce प्रकाशक- श्रीसाधुमार्गी-जैन पूज्यश्री हुक्मीचन्दजी महाराज की सम्प्रदाय का हितेच्छु श्रावक-मण्डल रतलाम (मालवा) DOODD 30003) T . अखिल भारतीय श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कान्फ्रेन्स द्वारा श्री साहित्य-निरीक्षक-समिति से प्रमाणित t. - - मुद्रक- नथमल लूणिया आदर्श प्रेस, अजमेर (केसरगज डाकखाने के पास सन्चालक-जीतमल लूणिया - छपाई और कागज की लागत के हिसाब से इस पुस्तक का मूल्य । चार आने है, लेकिन- - श्रीमान् सेठ पूनमचन्दजी ताराचन्दजी गेलड़ा साहूकार पेठ, मद्रास ने सर्व साधारण इस पुस्तक से लाभ उठा सकें, इस दृष्टि से आधी लागत प्रदान करके यह पुस्तक मूल्य दो श्राने वितरण कराई है।
No text on this page.
भूमिका। सनाथ कौन है और श्रनाथ कौन है,। इस बात का ससार में, बडा विवाद रहा करता है। इस विषय में भिन्न-भिन्न लोग अपनी सम्मति अलग अलग बनाते हैं। कोई, धनवान को सनाथ बताता है, धनहीन को अनाथ कहता है, कोई पुत्र कलत्र वाले को सनाय मानता है जिसके ये नहीं हैं, उसे अनाथ सम- मना है और कोई शारीरिकवलसम्पन्न को सनाथ समझता है, रोगी, शक्तिहीन लोग उसकी दृष्टि में अनाथ हैं। इस प्रकार इस विपय में जितने मुँह उतनी बातें' कहावत चरितार्थ होती है। लेकिन वास्तव में सनाथ कौन है और कौन अनाथ है, इस बात के निर्णय के समीप पहुँचना, जनसाधारण के लिए [ २ ] बहुत कठिन है। इस बात का निर्णय तो कोई ऐसा महापुरुष ही कर सकता है, जो राग-द्वेष त्याग चुका हो, या उस मार्ग का उन पथिक हो। महामुनि सनाथी, ऐसे ही महा-पुरुप थे। इस विपय मे उन्होंने जो मन्तव्य प्रकट किया-सनाथ कौन है और अनाथ कौन है इसका जो निर्णय दिया, वह किसा भी दृष्टि से और किसी को भी अमान्य नहीं हो सकता। महामुनि सनाथी द्वारा दिया गया निर्णय, श्री उत्तराध्ययन सूत्र के २० वें अध्ययन में है। श्रीमज्जैनाचार्य पूज्य श्री १००८ श्री जवाहिरलालजी महाराज ने बीकानेर चातुर्मास में श्री उत्तराध्ययन सूत्र के २० वें अध्ययन में उल्लिसित महामुनि सनाथी द्वारा दिये गये सनाथ-अनाथ-निर्णय की विस्तृत व्याख्या की थी, जिसे इस मण्डल ने संग्रह कराया था और जो अब पुस्तक रूप में आपके कर-कमलों में है। हमें आशा है कि यह पुस्तक मसार में उपस्थित सनाथ-अनाथ विप- यक विवाद को मिटा कर, भव्यजनो को कल्याण-मार्ग की ओर अग्रसर करने में सहायक होगी। - यद्यपि यह पुस्तक अजमेर साधु-सम्मेलन से पूर्व ही तय्यार हो चुकी थी, लेकिन इसका छपना प्रारम्भ नहीं हुआ था। इसलिए साधु सम्मेलन द्वारा बनाये गये नियम के अनुसार यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि यह पुस्तक-साहित्य-निरीक्षक समिति से प्रमा- . -- [ ३ 1 णित हो जाने के पश्चात् ही प्रकाशित की जावे। तदनुसार मडल ने इस पुस्तक को श्री अखिल भारतीय श्वे० स्था० जैन कान्फ्रेन्स के कार्यालय में भेजा। कान्फ्रोन्स के कार्यालय ने साहित्य- निरीक्षक समिति से पुस्तक की जाँच करवा कर पुस्तक को प्रका- शित करने की स्वीकृति दी। इस कार्यवाही में कुछ समय लगा और इसी कारण यह पुस्तक श्रय प्रकाशित हो सकी। इस पुस्तक के प्रमाण-पत्र के साथ ही कान्फ्रेन्स के कार्यालय से हमे माहित्य' निरीक्षक-समिति की ओर से आया हुआ एक सूचनापत्र भी प्राप्त हुआ था। उस सूचनापत्र मे, विशेषत श्रीमान सेठ भैरोंदानजी साहब सेठिया बीकानेर की ही सूचनाएँ थी। सेठियाजी की उन सूचनाओं के अनुसार पुस्तक का सशोधन कर देने से पुस्तक मे बहुत विशेषता आ गई है। इसके लिए मण्डल, श्रीमान् सेठियाजी का आभार मानता है। पूज्यश्री के व्याख्यान में से निकले हुए साहित्य का अधिक प्रचार हो, और सर लोग ऐसे साहित्य से लाम उठा सकें, इस वात को दृष्टि में रखकर मद्रास निवासी श्रीमान सेठ पूनमचन्दजी ताराचन्दजी गेलडा ने इस पुस्तक की छपाई कागज आदि की लागत का आधा सर्च अपने पास से प्रदान करके यह पुस्तक श्राघे मूल्य में ही बॅटवाई है । मण्डल, गेलडाजी की इस उदारता का अभिनन्दन करता है, और पाशा करता है कि समाज के [ ४ ] अन्य सज्जन भी गेलडाजी की उदारता का अनुकरण करके जन- साधारण को ऐसे उत्तम साहित्य का लाभ पहुंचाने में सहायता करेंगे। इत्यलम् । । -- - रतलाम आपाड़ी पूर्णिमा स० १९९१ वि० ind । भवदीय: बालचन्द श्रीश्रीमाल वर्दभान पीतलिया सेक्टरी प्रेसीडेण्ट श्री साधुमार्गी-जैन पूज्यश्री हुक्मीचन्दजी महाराज की सम्प्रदाय का हितेच्छु श्रावक-मण्डल रतलाम - हीटिग बीमा । सनाथ-अनाथ निर्णय স্মঘা सनाथी श्रेणिक सम्वाद। संसार सार का कोई भी प्राणी, अनाथ रहने या अनाथ बनने की इक्छा नहीं रखता। सभी लोग सनाय रहना चाहते हैं। यदि किसी मनुष्य को, अनाथ कह दिया जावे, तो वह इसे घोर दुख एवम् अपमान की बात मानेगा। इससे प्रकट है, कि अनायता युरी है, जिसे कोई नहीं चाहता । इसके विपरीत सनायता को सब पसन्द करते हैं, सनायता से कोई भी पृणा नहीं करता। लेकिन देखना यह है कि सनाथता और अनाथता कहते किसे हैं । संसार के लोग, अपने पर किसी रक्षक, सहायक एवम् कृपा करने वाले का न होना अनायता में मानते हैं। कोई पुरुष- M सनाथ अनाथ निर्णय निर्णय विशेष, जिसका रक्षक नहीं है, कोई सगे सम्बन्धी एवम् मित्र परिजन जिसकी सहायता करनेवाले नहीं हैं, और जो किसी व्यक्ति या जन-समूह का कृपापात्र नहीं है, मासारिक लोग उस प्राणी को अनाथ कहते हैं । इसके विपरीत जिस प्राणी का कोई व्यक्ति विशेष रक्षक है, जिसको किसी की सहायता प्राप्त है, और जिस पर कृपा करनेवाले मौजूद हैं, वह प्राणी सनाथ माना जाता है। सनाथता और अनाथता का यह अर्थ, सासारिक लोगों की दृष्टि से है, अनाथता और सनाथता की यह परिभाषा, धर्म से दूर पडे हुए लोग करते हैं, लेकिन वास्तव मे अनाथता और सनायता की परिभापा, कुछ और ही है। अनायता किसे कहते हैं और सनाथता किसे कहते हैं, यह वात महानिप्रन्थ सनाथी ने महाराजा श्रेणिक को बताई थी। महामुनि सनाथी, केवल परिभाषा बताकर ही नहीं रह गये, किन्तु इसके साथ ही उन्होंने, अनाथता को नष्ट करने एवम सनाथ बनने का अनुभूत उपाय भी बताया था और यह भी बताया, था, कि गई हुई अनाथता फिर किस प्रकार एवम किन कारणो से आजाती है, और प्राप्त सनायता किस प्रकार तथा किन कारणों से चली जाती है। शास्त्रकारों की कृपा से, महामुनि सनाथी द्वारा किया गया उक्त प्रकार का वर्णन, उत्तराध्ययन सूत्र के २० चे अध्ययन में सुरक्षित है।
ut श्रीसेठिया सनाथ अनाथ निर्णय मझौला र । महामुनि सनाथी द्वारा किये गये वर्णन का प्रारम्भ, शास्त्र- कारों ने उत्तराध्ययन सूत्र में इस प्रकार किया है- सिद्धाण नमो किच्चा सजयाण च भावो । अत्यधम्मगति तच्च अणुसिदि सुणेह म ॥१॥ भावार्थ-सिन्द और सयति को भाव पूर्वक नमस्कार करके भर्थ और धर्म का सत्य सरूप बताने के लिये शास्त्र या शिक्षा को कहता हूँ, उसे सुनिये । इस कथा को कहनेवाले वक्ता, श्री सुधर्मा स्वामी-जो भग- वान महावोर के पञ्चमगणधर और पट्ट शिप्य थे हैं और श्रोता, श्री जम्वृ स्वामी हैं। इन दोनो महानुभाव का परस्पर गुरु-शिष्य का सम्बन्ध है। श्री सुधर्मा स्वामी ने श्री जम्मू स्वामी से कहा है, कि अर्थ और धर्म की ओर गति करानेवाली शिक्षा, मैं सिद्ध और सयति को नमस्कार करके कहता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। मिद्ध और सयति को नमस्कार करके, वक्ता महोदय ने, कथा का मगलाचरण किया है। प्रत्येक शुभकार्य मे मगला- चरण करना, एक आवश्यक कर्तव्य माना जाता है। मगलाचरण के पश्चात् वक्ता महोदय ने, श्रोता महोदय को, शिक्षा श्रवण करने के लिए सावधान रहने की सूचना दी है । श्री सुधर्मा स्वामी द्वारा किये गये मगलाचरण पर से यह सनाय आथ निर्णय ४ . प्रश्न होता है, फि सुधर्मा स्वामी ने, मंगलाचरण में सिद्ध और सयति को ही नमस्कार क्यों किया ? अरिहन्त श्राचार्य एवम् उपाध्याय को नमस्कार क्यों नहीं किया ? इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि सिद्ध और सयति को नम- स्कार करने से अरिहन्त श्राचार्य और उपाध्याय को भी नमस्कार हो जाता है। अरिहन्त की गणना सिद्ध में भी हो सकती है और साधुओं में भी। रहे श्राचार्य और उपाध्याय । आचार्य और उपाध्याय तो साधु ही हैं, इसलिए इनकी गणना साधुओं में होना स्वाभाविक है। मगलाचरण करके एवम् श्रोता महोदय को सावधानी से श्रवण करने के लिए सूचना देकर, श्री सुधर्मा स्वामी कहने लगे- पभूयरयणो राया सेणिो मगहाहियो । विहार जत निज्जाओ माडिकुच्छिसि चेहए ॥२॥ भावार्थबहुत रत्नों का धारण करनेगरा अथवा बहुत रत्नों का स्वामी, मगधाधिप राजा श्रेणिक, क्रीडा के लिए निकला और मण्डिकुक्ष नोम के बाग में आया। श्रीसुधर्मा स्वामी ने, धर्म की ओर गति करने का सच्चा उपाय, इस कथा द्वारा बतलाना प्रारम्भ किया । प्रत्येक कथा के प्रारम्भ मे, कथा के पात्र स्थान आदि का परिचय देना आव- श्यक है। इस कथा के दो पात्र हैं, एक महाराजा श्रेणिक . , ५ मनाथ अनाथ निर्णय और दूसरे महामुनि सनाथी । उक्त गाथा में, वक्ता महोदय ने कथा के एक पान महाराजा श्रेणिक का परिचय दिया, कि वह मगध देश का राजा और बहुत से रत्नों का स्वामी था, यानी सम्पत्तिशाली था। राजा श्रेणिक का परिचय देकर, वक्ता महोदय ने, कथा का प्रसग बतलाया है, कि यह कथा किन प्रसंगों के कारण बनी। इसके लिए कहा है, कि वह राजा श्रेणिक विहार-मनोविनोद-के लिए निकल कर मण्टिकुक्ष नाम के उद्यान (धाग) में पाया। अर्थात् इस वर्णन का स्थान, मण्डिकुन उग्रान था। वह उद्यान कैसा था, इसके लिए सुधर्मा स्वामी कहते हैं- नाणा दुम लया इराण नागा पक्खिनिसोविय । नाणा कुसुम सछन्न उजाग नदगावम ॥३॥ भावार्थ-अनेक प्रकार के वृक्ष और एताओं से भरा हुआ वह उद्यान- अनेक प्रकार के पुष्पों से नन्दनग्न के समान सुशोभित था । अनेक, प्रकार के पक्षी उम बाग में निवास करते थे। इस प्रकार वाग की सुन्दरता का वर्णन करके श्री सुधर्मा. स्वामी कहने लगे- तत्थ सो पासई साहु सजय सुसमाहिय । निसन्न रुक्समूलम्मि सुकुमाल सुहाइय ॥४॥ भावार्थ -रास श्रेणिक ने, उस याग में एक वृक्ष के नीचे, समाधि सनाध-अनाथ निणय प श्रेणिक को युक्त निश्चल बैठे हुए एक सातु को देसा, जिनका शरीर सुकुमार एवम् भोग भोगने योग्य था। तस्स रून तु पासित्ता राहणो तमि सजए । अच्चत परमो श्रासी अउलो रूवविम्हओ ॥५॥ भावार्थ-उन सातु के उत्कृष्ट और अनुपम रूप को देख कर राजा बहुत आश्चर्य हुआ किसी विशेप-जैसी कि देसी या सुनी न हो, ऐसी वस्तु या बात के देखने सुनने पर हो आश्चर्य होता है। सामान्य वस्तु या वात के देसने सुनने पर आश्चर्य नहीं होता'। यदि इन मुनि का रूप साधारण होता, तो राजा श्रेणिक को आश्चर्य न होता। क्योंकि वह स्वय भी बहुत सुन्दर था। उसके रूप को देख कर, कई साध्वियें, चेलना रानी के भाग्य की-ऐसा सुन्दर पति पाने के कारण-प्रशसा करती थी, तथा अपने तप सयम के फल स्वरूप, दूसरे भव मे ऐसा ही सुन्दर पति मिलने की इच्छा करती थी। जिस राजा श्रेणिक के रूप की कई साध्वियें भी सराहना करती थीं, वह राजा श्रेणिक मुनि के रूप को देख कर आश्चर्य करने लगा, इससे प्रकट है कि वे मुनि अनुपम राजा श्रेणिक ने, यदि किसी दूसरे को उन मुनि के समान सुन्दर देखा होता, तो उसे आश्चर्य न होता क्योंकि फिर उसके लिये मुनि का रूप अप्रतिम न रहता-सामान्य हो जाता। , सुन्दर थे।
सनाथ अनाथर्णिय . राजा श्रेणिक, साश्चर्य विचारले लगा, कि मैं इस बाग में प्राय आया ही करता हूँ, लेकिन आज मुनि के बैठने से यह वाग जैसा मनोहर हो गया है, वैमा मनोहर आज तक और कभी न था। जान पडता है, कि जिस प्रकार चन्द्रमा, तारों को पालो- 'कित करता है, और चन्द्रमा प्रदन लोक से तारेगण भी प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार ये मुनि भी बाग के वृक्षादि को सौन्दर्य प्रदान कर रहे हैं और मुनि प्रदत्त सौन्दर्य से बाग भी रम्य तथा मनोहर हो गया है। इन मुनि के रूप की समता करने में इन्द्रादि का रूप भी समर्थ नहीं हो सकता । मुनि के रूप से आश्चर्य चकित बना हुआ राजा श्रेणिक मनमें कहने लगा- अहो वरणो अहो रूव अज्जस्स सोमया । अहो खती अहो मुत्ती अहो भोगे असगया ॥६॥ भावार्थ-अहा। इन आर्य का वर्ण (रंग) कैसा है। इनका रूप कैसा है। कैसी सरलता पय शीतलता है। कैसी क्षमा है। कैसी दिली. भता है । और भोगों से कैसी सिम्पृहता है ! त्यागने लायक बुरे कामो को त्याग कर, उन कामों से पचे रहने वाले को, 'पार्य' कहते हैं। यह हुआ आर्य शब्द का समुच्चय अर्थ। फिर जो जिस विषय के त्यागने योग्य बुरे कार्यों को त्याग कर, उन बुरे कार्यों से बचा रहता है, उसे उसी विषय सनाथ नाथ निर्णय का आर्य कहते हैं। जैसे धर्म-आर्य, देश-आर्य, समाज-आर्य आदि। राजा श्रेणिक ने, उन मुनि को 'आर्य' माना, इससे यह तो प्रकट है, कि राजा श्रेणिक-दुर्विपय-भोग, लोभ, अक्षमा, वञ्चकता श्रादि त्यागने योग्य हैं, ऐसा जानवा था, और इनके त्यागनेवाले को प्रतिष्ठा की दृष्टि से देसता था । वर्ण का अर्थ है, रंग । रग मे भी आकर्षण होता है। अच्छा रंग, हृदय को अपनी ओर सींच ही लेता है। मनुष्य का अन्छा या बुरा रंग, शरीर के काले गोरे के भेद से नहीं होता, किन्तु सदाचार और दुराचार के भेद से होता है। सदा- चार पालन से, शरीर पर एक विशेप प्रकार का उत्कृष्ट रग निसरता है, जो दर्शक को आकर्पित किये बिना नहीं रहता। दुराचारी का वर्ण इसके विपरीत होता है। अनेक वस्त्राभूपण धारण करने, एव कृत्रिम उपायों से अच्छा रग बनाने की चेष्टा करने पर भी दुराचारी के शरीर का रंग, दर्शक को अपनी ओर प्राकर्पित करने रूप का अर्थ, आकृति को सुन्दरता है। दूसरे को आकर्पित करने वाला, दूमरे के हृदय पर अपना प्रभाव डालने वाला रूप हो, वास्तविक रूप है। सरलता, क्षमा और निर्लोभता भी चेहरे पर स्पष्ट दिसाई पड़ती है। विवेकवान की दृष्टि में, सरल और कपटी, क्षमाशील असमर्थ रहता है , " ९ सनाथ-अनाथ निर्णय , . और सोधी, निलामी और लोभी छिपे नहीं रहते। चतुर मनुष्य किसी को देसते हो जान लेता है, कि यह कैसा है। किसी रागी मनुष्य का, अपनी राग वाली वस्तु या जिस पर राग है, उस मनुष्य-को देस कर उसे अच्छा मानना स्वाभा- निक है, लेकिन ऐसे मनुष्य द्वारा अच्छा माने जाने के कारण, वह अच्छा माना गया व्यक्ति या पदार्थ वास्तव में अच्छा ही है, यह नहीं कहा जा सकता। क्योकि वह राग रसनेनाला, उस पदार्थ या व्यक्ति से राग होने के कारण ही उसे अच्छा मान रहा है, न कि उसकी वास्तविक अच्छाई के कारण। उदाहरण के लिए सूअर विष्ठा को अच्छा मानता है, लेकिन विष्टा अच्छी वस्तु है, यह बात कोई स्वीकार न करेगा। सूअर को विष्टा से राग है, इसी कारण वह विष्ठा को अच्छा मान रहा है। वास्तव में उसमें भक्षण करने योग्य श्रछाई नहीं है। राजा श्रेणिक को यदि मुनि से राग होता और इस कारण वह मुनि के वर्ण रूप को अच्छा मानता, तब तो बात ही दमरी थी, लेकिन राजा को इन मुनि से राग नहीं है। गजा श्रेणिक स्वय भी सुन्दर था, और वस्त्रालकार भी पहने हुए था, लेकिन उन मुनि के शरीर पर कोई वस्त्र भी रहा होगा, या न रहा होगा। ऐसा होते हुए भी राजा को वे मुनि आश्चर्यकारी सुन्दर प्रवीत हुए, इससे प्रकट है कि उन मुनि का स्वाभाविक रूप ही अनुपम था ।
सनाथ अनाथ निर्णय
-
रूप रंग में भी ऐसा आकर्पण होता है, कि श्राकर्पित व्यक्ति
अपने आप को ही भूल जाता है।
कहा जाता है, कि एक बार
गोकुल को गोपिया किसी स्थान विशेष पर दीपक जलाने गई
थी। इतने में उस ओर कृष्ण आगये। । कृष्ण को रूप छटा
को देखकर गोपियाँ अपने आप को इस प्रकार भूल गई, कि
उन्होने दीपक की बत्ती जलाने के बदले अपनी-अपनी उँगली ही
जला लो । उन्हे यह भी मालूम न रहा, कि हम अपनी उँगली
जला रही है, या दीपक। इसी प्रकार की बात मुसलमानों के
पैगम्बर यूसुफ के लिए भी कही जाती है। कहा जाता है, फि
यूसुफ बहुत सुन्दर था। एक बार कुछ स्त्रियो को-जो यूसुफ
के समीप सडी यूसुफ को देस रही थी-एक-एक नीबू काटने
के लिये दिया गया। वे स्त्रियाँ, यूसुफ के रूप से आकर्षित
होकर अपने आप को इस प्रकार भूली हुई थी, कि उन्होने नीबू
के बदले अपनी-अपनी उँगली ही काट ली और उन स्त्रियों को
इस बात का पता तक न लगा।
'गोपियों और इन स्त्रियो का, कृष्ण तथा यूसुफ के रूप पर
इस प्रकार प्राकर्पित होने मे तो मोह का कारण भी हो सकता ।
है, लेकिन राजा श्रेणिक का इन मुनि के रूप पर आकर्पित होने
में यह कारण भी नहीं था। बल्कि राजा श्रेणिक उस समय
तक बौद्ध मतावलम्बी था, इसलिए उसमें जैन साधुओं के प्रति
.
सनाथ अनाय निर्णय विशेप भक्ति भी न थी। कई बार वह जैन साधुओं को अप- मानित करने की असफल चेष्टा भी कर चुका था । जैन साधुओ के प्रति भकि न होने पर और उन्हें अपमानित करने की भावना होने पर भी राजा श्रेणिक, उन मुनि के रूप से इस प्रकार 'आकर्पित एवं प्रभावित हुआ, कि उसे यह याद ही न रहा, कि ये मुनि रानी चेलना के उन्हीं गुरुओं में से हैं, जिन्हें अपमानित करने की मैं कई बार चेष्टा कर चुका हूँ। राजा श्रेणिक इस चाग में पाया तो था केरल मनो विनोद के लिए, लेकिन पूर्व- सचित पुण्य के प्रताप से यहाँ उसे सन्चे धर्म की प्राप्ति होनी थी, इसलिए वह अपने हदय के दुर्भागो को भूल गया और- तस्स पाए उ पदित्ता काऊण य पयाहिण । नादरमणास पजली पडिपुच्छई ॥७॥ भावार्य-राजा अणिक ने उन मुनि के चरणों को चन्दन करके, उनकी प्रदक्षिणा की और न बहुत समीप न बहुत दूर बेठ कर हाथ जोड यह उन मुनि से पुउने लगा। उस क्षत्रिय राजा ने अपना वह सिर जो प्राण जाते भी दूसरे किसी के ओर विशेषत जिससे प्रेम नहीं है, उसके आगे नहीं मुका सकता था, मुनि के पैरों पर डाल दिया। फिर मुनि की प्रदक्षिणा करके वह सभ्यतानुसार इस प्रकार धैठा कि न बहुत सनाथ अनाथ निर्णय कि समीप और न बहुत दूर। यह करके, राजा श्रेणिक हाथ जोड-, कर मुनि से पूछने लगा- तरुणो सि अज्जो पव्वइनो भोगकालमि सजया । उनहियो सि सामरणे एयमह सुणामिता ॥८॥ भावार्थ-हे आर्य। में यह सुनने का इच्छुक हैं, कि आप भोग के योग्य इस तरगावस्था में, सयम में क्यों तत्पर हुए राजा श्रेणिक, अव तक यह समझता है, मनुष्य शरीर और विशेषत युवावस्था केवल भोग के ही लिए है, इसकी प्राप्ति का दूसरा कोई कारण नहीं है। इस समझ पर से ही उसे, इन तरुण मुनि को देख कर यह जानने की इच्छा हुई, कि इनने भोगों को छोड कर दीक्षा क्यो लेली ? अर्थात इन्हे किसी प्रकार का कष्ट था, भोग भोगने या भोग प्राप्त होने की सुविधा न थी इसलिए दीक्षा ली है, या हठवश -केवल इस मनुष्य शरीर तथा इस युवावस्था एव सुन्दरता का अपमान करने के लिए-सयम लिया है ? राजा श्रेणिक के उक्त प्रश्न पर से तो यही मतलव निकलता है, कि वह तरुणावस्था को भोग के योग्य समझता था संयम के योग्य नहीं समझता था और भोग को ही उत्तम मानता था, संयम को उत्तम नहीं मानता था। लेकिन पहले उसने मुनि के रंग रूप के साथ मुनि की क्षमा, सरलता आदि की जो प्रशंसा , सनाथ अनाय निर्णय , की है, उस पर विचार करने मे मालूम होता है कि वह संयम को ही उत्तम समझता था, भोग को उत्तम नहीं समझता था। इस प्रकार ये दोनों बातें परम्पर विरोधिनी ठहरती हैं। इसलिए हो सकता है कि राजा श्रेणिक सयम को ही उत्तम मानता रहा हो और मुनि से संयम लेने का कारण जानने के लिए उसने सयम के विरोधी पक्ष को ग्रहण किया हो, तथा इसी वास्ते युवा- वस्था को केवल भोग के योग्य बताई हो । राजा श्रेणिक के प्रश्न के उत्तर में, वे मुनि कहने लगे- अणाहो मि महाराय गाहो मज्म न विजई । अणुकपग सुहिं वापि काचे नाभिसमेमह ॥ ६ ॥ महाराजा, में अनाथ था, मेरे पा कोई ऐसा नाथ विद्य- मान न था, जो मुझ पर कृपा रसता, अप्रास वस्तु प्राक्ष कगता तथा माह वस्तु को रक्षा करता। न कोई ऐसा सुहद ही था जो मुझ पर दया करके मुझे थोडा भी सुख देता। मुनि के उत्तर का अभिप्राय यह है कि मुझ पर कोई नाथ न था--कोई कृपा करके सुस देने वाला नहीं था. था, इसलिए मैंने सयम ले लिया। सनाथी मुनि के इस उत्तर मे, साधारण बुद्धि वाले का यह समझना स्वाभाविक है, कि ये गरीब होंगे, इसलिए साधु बन गये, लेकिन सनाथी मुनि के उत्तर बहुत गूद तत्त्व भरा हुआ है, जो पारो प्रकट होगा। भावार्थ-हे अनाथ में सनाय अनाथ निर्णय १६ प भावार्थ-हे भयनाता सयति। मैं आपका नाय होता हूँ, या मनुष्यभव अति दुर्लभ है अत मित्र ज्ञाति के साथ मिल कर भोग भोगिये राजा श्रेणिक फहता है, कि हे संयति । पहले तो यह संभव नहीं, कि आप जैसे ऋद्धि सम्पन्न का कोई नाथ न हो। कदाचित आपका कथन यथार्थ हो और आप ने अनाथ होने के कारण ही सयम लिया हो, तो लीजिये, मैं आपका नाथ बनता हूँ। अब तो आप अनाथ नहीं रहते हैं, इसलिए उठिये, और मेरे साथ चलिये। यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म इस प्रकार सयम में बिताने के लिए नहीं है, किन्तु पुण्य से प्राप्त भोगो का उप- भोग करने के लिये है। इस लिए ससार के भोग भोगिये । मेरे नाथ वन जाने पर, आपके लिए किसी भी प्रकार के भोगों की कमी न रहेगी। मैं आप को पराधीन बनाने के लिए आप का नाथ नहीं बन रहा हूँ, किन्तु आपकी सुविधा के लिए, आपका कष्ट मिटाने के लिए और श्राप को भोगों से भेंट कराने के लिए ही आपका नाथ बन रहा हूँ। इस लिए आप अवि- लम्ब मेरे साथ चलिये। मुझे भी आप का नाथ बनने में बडी प्रसन्नता है। दुख तो यह है, कि आप मुझे पहले नहीं मिले। यदि पहले ही मिल गये होते तो आपको सयम लेना ही न पडता। राजा के इस कथन में कई रहस्य हैं। मुनि की इस बात पर, कि 'मेरा कोई नाथ नहीं था, इस लिए मैं सयम में प्रव्रजित
१७
सनाथ अनाय निर्णय
हो गया' राजा को विश्वास नहीं हुआ। उसने मुनि के कथन
की यथार्थता जानने के लिए, किसी और उपाय के बदले मुनि
का नाथ बनने के उपाय का अवलम्बन लेना उचित समझा।
उसने विचारा, कि यदि मुनि का कथन सत्य हो, तब तो मैं नाथ
बनता ही हूँ। मेरे नाथ बनने पर यदि ये सयम त्याग कर
मेरे साथ आ गये, तो मुझे एक अद्वितीय ऋद्धि-सम्पन्न व्यक्ति
की प्राति होगी। और यदि इन मुनि ने केवल बहाना बनाने
के लिए अपने को अनाथ बतलाया है, तो मेरे उक कथन से
मेरी उदारता का दिग्दर्शन होने के साथ ही, मुनि की बात का
असली रहस्य भी खुल जावेगा। इसके सिवा, मैं राजा हूँ।
कोई अपना दस मेरे सामने प्रकट करे, तो उस दु स को मिटाना
मेरा कर्तव्य है। इन मुनि ने अनाथता के दुस से दु सित
होकर दीक्षा लेने की बात कही है, इस पर भी यदि मैं इनका
नाथ न चलूँ, इनकी अनाथता न मिटाऊँ, तो फिर मैं राजा ही
कैसा। जो वृक्ष, ताप से दुखित को छाया देकर शान्ति नहीं
पहुँचा सकता, वह वृक्ष हो कैसा। इसलिए मेरा यह कहना कि
मैं
श्रापका नाथ वनता हूँ, मेरा कर्तव्य भी है।
इस प्रकार कई
कारणों को दृष्टि में रसकर हो राजा श्रेणिक ने मुनि से यह
कहा, कि मैं आपका नाथ बनता हूँ।
राजा श्रेणिक ने, भोगो के त्यागी मुनि को भोग भोगने के
सनाथ अनाथ निर्णय लिए आमन्त्रित करके एक प्रकार से मुनि की अवज्ञा की, फिर भी वे मुनि, राजा पर रुष्ट नहीं हुए, न उन्होने राजा की बात से कुत्र दु स ही माना। वे जानते थे, कि मैने जिस अभिप्राय से अपने आप को अनाथ बताया, राजा मेरे उस अभिप्राय को नहीं जानता। इसी वास्ते यह मेरा नाय बनने को तयार हुआ है ओर मुझे भोगो का प्रलोभन दे रहा है। राजा की बात के उत्तर मे उन्होने राजा से कहा- अप्पणा विश्रणाहो सि सेणिया मगहाहिवा । अप्पणा घणाहो सन्तो कस्स नाहो भविस्सास ॥१२॥ भागाथ-हे मगधाधिप श्रेणिक | तू स्वय भी तो अनाथ है । जब तू स्वय ही अनाथ है, ता मेरा नाथ किस प्रकार हो सकता है? मुनि की यह बात सुनकर- एव वुत्तो नरिंदो सो सुसभती सुविम्हिो । वयण अस्सुयपुब्ब ' साहुणा विम्हयनियो ॥१३॥ भावार्थ-पूर्व में जो कभी किसी से नहीं सुनी गई थी, ऐसी बात उन मुनि के भुप से सुनकर, राजा श्रेणिक को इतना आश्चर्य उसका चित्त घरा सा गया । राजा श्रेणिक को, एक तो मुनि के रूप रगादि से ही आश्चर्य था, दूमरे यह आश्चर्य हो रहा था, कि ऐसे ऋद्धिमान अनाथ इतने में ही मुनि के इस कथन ने और भी आश्चर्य "
सनाय भनाथ निर्णय
-
साहस होता
कह दिया, फि मुनि को भूल तो न योलना चाहिए । वीरों के
सिवा और कोई, इस प्रकार स्पष्ट यात कहने का साहस नहीं
कर सकता। वीरो के हृदय, स्वच्छ रहते हैं, उनमें
है, इसलिए वे किसी भी कारण या भय से अपने पदय के भावों
को छिपाते नहीं, किन्तु स्पष्ट प्रकट कर देते हैं। इसके सिवा,
जिससे हम अपना भ्रम मिटाना चाहते हैं, उसके सामने मनोगत
मानों को छिपाना भी अनुचित है। ऐसा करने से, भ्रम का
मिटाना कठिन हो जाता
.
-
"
.
राजा को बात सुनकर और विशेषत राजा ने मुनि पर
मृपावाद का दोप लगाया इस पर से, उन मुनि को राजा के प्रति
किंचित् भी क्रोध, क्षोभ या घृणा नहीं हुई। वे मुनि जानते थे,
कि राजा में, मिथ्यात्व (अज्ञान ) है, इमी से यह धन सम्पत्ति
आदि न होने में हो अनाथता मान रहा है, और इसी कारण यह
मेरे कयन को, कि 'तू स्वय भी अनाथ है
मूठ जान रहा है।
जब यह अनाथता के रूप को समझ लेगा, तर स्वय ही अपने-
श्राप को अनाथ मान लेगा। अभी तो यह अपने पक्ष को लेकर
कह रहा है, और मैं अपने पक्ष को लेकर कह रहा हूँ। मुझे
अपना पक्ष इसे समझाना चाहिए । इस प्रकार विचार कर,
से कहने लगे-
सनाय भनाय निर्णय २८ जाती है। इस प्रकार सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली सम्पत्ति क स्वामी होते हुए भी में अनाथ कैसे है । भगवन् आप शहता न बोरिए। . राजा श्रेणिक, अपनी सम्पदा के कारण अपने आप को सनाय मान रहा है। वह सोचता है, कि मेरे पास ऐसी तो सम्पदा है, और यह सम्पदा भी मेरे पास उसी प्रकार आई है, जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है यानी इस सम्पदा के लिए, न तो मैंने किसी के आगे दीनता ही दिसाई है, न मेरे पास आने के लिए इस सम्पदा से ही प्रार्थना की है। ऐसा होते हुए भी मैं अनाथ कैसे। राजा श्रेणिक की दृष्टि मे, अनाथ वही है, जिसके पास ऐसी सम्पदा का थोडा भी भाग न हो। आज भी, सासारिक लोग उसे ही अनाथ मानतेहैं, जो द्रव्यहीन, कुटुम्हीन एवं मित्रहीन हो, लेकिन ऐसा समझना कैमी भूल है, यह बात अनाथी मुनि ने वतलाई है। राजा णिक, वीर था। वीर लोग, हृदय के भावों को दयाकर नहीं रखते, किन्तु स्पष्ट रूप से प्रकट कर देते हैं। राजा श्रेणिक, अनाथ उसे ही मानता था, जो द्रव्य, कुटुम्ब, एक मित्र- होन हो, इसलिए मुनि को बात उसे झूठ मालूम हुई। मुनि की बात के विषय में उसे जो भ्रम हुआ, उस भ्रम को उसने छिपा कर नहीं रक्सा, किन्तु वह वीर था, इसलिए उसने स्पष्ट साथ अनाथ निर्णय मुनि ने, राजा श्रेणिक को सावधान करने के लिए कहा है, कि तू अविच्छिन्न यानी एकाग्र-मन से मेरी यात सुन । वास्तव में कोई बात उस समय तक समझ में नहीं आती, जब तक कि चित्त स्थिर न हो। स्थिर चित्त से सुनी हुई बात को, बुद्धि उसी प्रकार शीन ग्रहण करती है, जिम प्रकार स्थिर जल प्रतिषिम्न मिलने में देर नहीं करता। गौलते हुए जल में, अनेक उपाय करने पर भी प्रतिविन्ध डिवाई नहीं देता। ठीक इसी प्रकार चाहे कैसी भी अच्छी बात हो, चाहे कैसा भी उत्तम विपय हो, जब तक चित्त स्थिर न होगा, बुद्धि उस बात या उस विषय को ग्रहण करने में असमर्थ ही रहेगी। राजा श्रेणिक को, अनायता सनाथता का भेद सुनने के लिए "तत्पर देख मुनि कहने लगे---- कोसम्बी नाम नयरी पुराण पुर भेयणी । तत्थ पासी पिया मज्म पमयधणसचओ ॥१॥ भावार्थ-कौशम्बी नाम की नगरी-जो प्राचीन से भी प्राचीन थी प्राचीन कहलाने वाले नगरों की प्राचीनता का भी उसरधन करनेवाली थी, में मेरे पिता रहते थे, जिनके पास प्रचुर धन सचित था ( या उनका नाम प्रचुरधनसची था।) कौशम्बी नगरी की प्राचीनता बताने में, मुनि का अभिप्राय उस नगरी की विशेषता बताना है। प्राचीन नगरों में जो विशे- -- सनाथ भनाथ निर्णय २२ न तुम जाणे अणाहस्स अस्य पुत्थ च पस्थिग। जहा अणाहो भवई सणाहो वा नराहिना ॥१६॥ सुमेह मे महाराय शव्यक्खि तेण चेयसा जहा अणाहो भवई जहा मेय पवत्तिय ॥१७॥ भावार्य हे पृथ्वीपति, हे नराधिप, तुम नाथ शब्द का अर्थ और उसकी व्यु पत्ति नहीं जानते हो, न यह जानते हो, कि अनाथ या सनाथ किस प्रकार होता है। इसरि हे महाराजा, अनाथ किये करते है, और मैंने आपको किस आशय से अनाथ कहा है, यह एकाग्र चित्त से सुनो। मुनि ने, राजा श्रेणिक को, पृथ्वीपति, नराविप और महा- राजा कह कर सम्बोधन किया है। इस प्रकार के सम्बोधनो द्वारा, उन मुनि ने राजा श्रेणिक पर यह प्रकट किया कि तू राजा है, पृथ्वी एव मनुष्यो का स्वामी है और इस कारण तेरे पास धन-वैभन भी बहुत है, यह मैं जानता हूँ। यह जानते हुए भी, मैंने तुमे अनाथ क्यो कहा, इस बात को मेरे ही द्वारा सुन । अभी तो तेरे को मेरी बात अमत्य जान पड़ी है, लेकिन 'नाथ' शब्द का अर्थ और अनाथता-सनाथता का भेद जान लेने पर तेरे को मेरी वात सत्य जान पडेगी। अनाथता-सनाथता का भेद मैं फेवल विद्वता की सहायता से ही नहीं बताऊँगा, किन्तु अनुभूत चताऊँगा। अनायता किसे कहते हैं और वह कैसी होती है, मैं अपने पर से ही बताता हूँ। यह २५ सनाय भनाथ निर्णय जन्म-स्थान एव पिता का परिचय देकर वे मुनि अब यह बताते हैं, कि मैं किस प्रकार अनाथ था। सब से पहले, वे, राजा को अपनी शरीर मम्बन्धी अनाथता सुनाकर यह बताते हैं, कि जिस शरीर को तू बहुत अच्छा बताता है, जिस युवावस्था को, तू भोग के योग्य मानता है, उस शरीर एव युवावस्था की ओर से में किस प्रकार अनाथ था, इमे देस और अपने आप के लिए भी विचार कि मेरी ही तरह तू भी अनाथ है या नहीं । वे मुनि कहने लगे- पडमे वए महाराय अतुला मे अच्छिवेयणा अहोत्था विउलो दाहो सगेसु पस्थिवा ॥१॥ भारार्थ हे महाराजा, हे पृथ्वीपति, युवारस्था के प्रारम्भ में, मेरी इन आँखों में अनुपम वेदना उत्पन्न हो गई और इसी प्रकार सारे शरीर में प्रचण्ड दाह उत्पन्न होगया। मुनि ने, शरीर मे भी पहले, युनावस्था की ओर मे अना- थता बताई है। क्योकि राजा श्रेणिक ने, भोग के लिए शरीर की अपेक्षा युवावस्था को अधिक उपयोगी मान रखा था । युनावस्था में होनेवाली पीडा का वर्णन करके, वे मुनि, राजा श्रेणिक को यह बता रहे हैं, कि राजा, जिस युगम्था को तू भोग के योग्य मानता है उस युवावस्था में भी क्सि प्रकार की अनाथता घुसी हुई है, यह देस। आगे अर्थापति अलंकार द्वारा सनाथ अनाथ निर्णय २६ मुनि ने यह भी बता दिया है, कि मेरे स्त्री भी थी और वह सुन्दरी तथा पतिभक्ता थी । अर्थात् युवावस्था के माय ही भोग के साधन भी प्रस्तुत थे, फिर भी मैं युवावस्था की ओर से किस प्रकार अनाथ था । युवानस्था के प्रारम्भ में उत्पन्न आँपो की वेदना कैसी थी, यह बताने के लिये मुनि कहते हैं- सत्थ जहा परमतिक्ख सरीर पिवर तरे । आलिज अरी कुद्धोएव मे अच्छिवेयणा ॥२०॥ भावार्थ-चोपा हुआ नु, शरीर के छिद्रों में तीक्ष्ण शस्त्र घुसेडे और उस समय में जैसी वेदना हो, वैसी ही वेदना मेरो आँखों में हो रही थी। मुनि कहते हैं-राजा, तेरे कथनानुमार युवावस्था में से स्त्री-सौन्दय देखने के लिए थी, लेकिन आँसो में ऐसी वेदना हो रही थी, कि स्त्री-सौन्दर्य देखने के स्थान पर मै यह कहता था, 'कि ये ऑसे हैं ही क्यो ? इमी प्रकार युवावस्था के लिए भी, में यही कहता था, कि निगोडी युवावस्था न मालूम कैमी आई, जिसके आते ही मेरी प्रासों में इस प्रकार की वेदना होने लगी। अन रजा, तू ही बता, कि मै युवावस्था और ऑसो की ओर से सनाथ रहा या अनाय ? यदि मैं इनकी ओर से सनाथ होता, तो इनके द्वारा मुझे कष्ट ही क्या होता में युवावस्था और आँस की ओर से सनाथ नहीं था, किन्तु अनाथ था। इसी प्रकार मनाथ अनाथ निर्णय मेरी ओर से भी युवावस्था और आँखें अनाथा थीं। मैं तो यह चाहता नहीं था, कि इस युवावस्था मे आँसो को इस प्रकार को पीडा हो । मै तो यही चाहता था, कि इस युवावस्था और आँखों द्वारा मुसहो, टमी प्रकार युवावस्था और प्रॉसें भी सुस ही चाहती थी, लेकिन न तो मेरा चाहा ही हुआ, न युवावस्था और ऑगो का चाहा ही हुआ। सी दशा में मैं इनकी ओर मे कैसे सनाथ रहा और युवावस्था एव ऑसे भी मेरी ओर से कैसे मनाया रही। हे राजा, ऑगो मे इस प्रकार की पीडा थी, शरीर दाह से दग्य हो रहा था, उस पर भी- तिय मे अन्तरिच्छ च उत्तम च पडिई । इन्दासणि समा धारा वेयरणा परमदारुणा ॥२१॥ भावार्थ - हृदय क्मर तथा मस्तक मे ऐसी असा एव दारण वेदना हो रही थी, जये इन्द्र के वनाघात से घोर वेदना होती हो। मुनि कह रहे हैं, कि मेरी इन प्रॉसों में जैसे शत्रु तीक्ष्ण शस्त्र घुसेडता हो, शरीर में जैसे ज्याला लगी हो, और हृदय कमर तथा मस्तक में जैसे इन्द्र वज्र मारता हो, ऐसी दारुण पीडा हो रही थी। मुनि के इस कथन का अभिप्राय राजा को यह बताना है कि तू बाह्य शत्रुओ को जीतने के लिये सेना का बल रसता है, लेकिन जो शत्रु शरीर के भीतर रह कर ही इस प्रकार की पीडा .
सनाथ आय निर्णय २८ . . उपजावे, उसे जीतने क तेरे पास क्या उपाय है ? जो शत्रु चर्म- चक्षु से दिसता है, उसे तो तू कभी नष्ट भी कर सकता है लेकिन जो शत्रु अपने ही शरीर के भीतर रहता हुश्रा भी नजर नहीं आता उसे तू कैसे नष्ट कर सकता है ? इमके सिवा वेदना के समय शरीर प्रॉसे आदि शत्रु का काम कर रही थी, या मित्र का ? यदि मित्र का काम करती, तब तो वेदना हो क्यों होती, और शत्रु का काम करती थीं, तव तो मैं उनकी ओर से सनाथ कैसे रहा ? राजा तू मेरा नाथ बनने को तयार हुआ है, लेकिन मेरे कथन पर से तू अपने आप के लिये भी विचार ले, कि तू अपने शरीर की ओर से सनाथ है या अनाथ १ ससार मे, प्रात्मा का निकट मे निकट सम्बन्धी शरीर है। इस निकट सम्बन्धी शरीर की ओर से भी मैं किस प्रकार अनाथ था और तू भी किस प्रकार अनाय है, इसे देय। क्या यह मनुष्य शरीर रोग रहित है ? यदि नही, तो जो स्वय अनाथ है-जो अपने पाप की ही रक्षा करने में असमर्थ है-वह मेरा नाथ कैसे हो सकता है ? इसी प्रकार शरीर भी मेरी ओर से सनाथ कैसे रहा ? यदि मैं शरीर का नाथ होता, तो शरीर में वेदना ही क्यो होने देता? । राजा कदाचित तू यह कहे, कि रोगों को तो औपधादि से निर्मूल भी किया जा सकता है, तो सुन- सनाथ अनाथ निर्णय ज्वट्ठिता मे पायरिया विज्जामंत तिगिच्छया। अधी या सत्य कसला मन्त मूल विसारया ॥२२॥ भारार्थ -मन्त्र और जहां घूटी से रोग मिटाने में विशारद, चिकित्सा के उपयोगी शास्त्र एवं शर के कुशल विद्वान आचार्य चिकित्सक मेरी चिविरसा करने के लिए आए । मुनि ने शरीर में रोगों की उत्पत्ति बता कर, शरीर की ओर से अनाथता बताई थी, लेकिन इसके विपय में श्रेणिक राजा यह कह सकता था, कि रोग तो कुशल वैद्यों द्वारा मिटाये जा सकते हैं। राजा श्रेणिक द्वारा कही जा सकने वाली बात का मुनि पहले से ही निराकरण कर देते हैं। कहते हैं-राजा, तू यह मत समझ, कि मै वैशादि उपचार के प्रभाव से वेदना पा रहा था। यह मै पहले ही कह चुका हूँ, कि कौशम्झी नगरी प्राचीन से भी प्राचीन थी। उसकी प्राचीनता के कारण उसमें वैद्यो के भी प्राचार्य रहते थे। वे वैद्याचार्य, मन्त्र-विदा मे भी निपुण थे, और जडी बूटी द्वारा औषध करने में भी कुशल थे। उनका अनुभव ऐसा बडा हुआ था, कि वे रोगी को देखते ही रोग का निदान कर लेते थे, और एक ही बार के मन्त्र पढने या ग्वा देने से, वे रोग को मिटा देते थे। ते मे तिगिच्छ कुव्यन्ति चाउपाय जहाहित । न य दुक्खा विमोयन्ति एसा मज्म अणाया ॥२३॥ - , . A
सनाथ अनाथ निर्णय
भावार्थ-2 वैद्याचार्य मुझे निरोग करने के लिए, रोग का निदान
करना, ओपधि देना, पथ्य सेवन कराना और परिचर्या करामा, अथवा
वमन, विरेचन, मन और म्बेश्न, अथवा अजन, वचन, लेपन और मर्दन
इन चारों प्रकार से मेरी चिकि सा करने लगे, मगर मुझे दुग मुक्त न
इस प्रकार का मेरो अनायता यी ।
कर सके।
.
.
मुनि कह रहे हैं--राजा, इस प्रकार मेरे लिए बडे-बडे
श्राचार्यों द्वारा आपापचार हुआ, लेकिन मेरा रोग नहीं गया ।
अब बतला, कि मै वैद्य औपच आदि की ओर से भी अनाथ
था या नहो और इस ओर से तू भी अनाथ है या नहीं ?
मुनि की बात सुन कर, राजा प्रेणिक विचारता है,
कि
वास्तव में यदि शरीर मे रोग हो ज वे, तो अधिक से अधिक उन्हे
मिटाने के लिए प्रोपोपचार आदि ही किया जा सकता है,
और क्या किया जा सकता है। लेकिन यदि औषधोपचार से
भी रोग न जाये, तो मै राजा होकर भी क्या कर मकता हूँ?
श्रीपधादि से मबका रोग जाता भी तो नहीं है। इसी
प्रफार यदि कोई बाहर मे शस्न मारता हो, तो उसे रोका
जा सकता है, लेकिन अपने शरीर के भीतर से शस्त्र मारने वाले
को कैसे रोका जा सकता है। इस ओर से तो सचमुच मै भी
अनाथ हो ।
मुनि कहते हैं-राजा, वैद्य श्रादि की ओर से तो मै अनाथ
साथ अन्य निर्णय था ही, लेकिन औषध मन्त्र श्रादि का श्राश्रय ग्रहण करने वाले उनके बल पर अपने को सनाथ मानने वालेचे वैय स्वय भी अनाथ थे। यदि व अनाय न होते, तो औपध मन्त्र आदि का आश्रय ही क्यों लेते। उनने जिन ओपध मन्त्र का आश्रय लिया है, वनोपय मन्त्र उनको स्वय को भी तो कट-मुक्त नहीं कर सकते। इस प्रकार जर वैग म्यय ही अनाय थे, तब मुझे कष्ट- मुक्त करके सनाथ कम बना सकते थे। यहाँ ये प्रश्न होते हैं कि मुनि के शरीर में रोग हुए इस पर से उन्होने शरीर की ओर से अनाथत. मिद्व की, लेकिन सभी लोगो के शरीर में तो गेम रोग होते नहीं हैं, बहुत लोग निलकुल स्वस्थ भी होते है। प्रेमी दशा में, शरीर की ओर से सन अनाथ ही है, यह केमे कहा जा सकता है ? इसी प्रकार वैद्य औपचादि मे, मुनि का रोग नहीं गया तो क्या हुआ, लेकिन और लोगो का रोग जाते भी तो दखा जाता है । फिर वद्य या औपधादि की ओर से भी अनायता कैमे सिद्ध हो सकती है ? कदाचित ये मुनि तो इम ओर से अनाथ करे भी जा सकते है- क्योकि इन्हें रोग हुए और वे रोग वैयादि से नहीं मिटे लेकिन जो लोग निरोगी है, या रोग होने पर भी जिन्हे वैर ओपधादि से लाभ पहुँचाता है, वे तो सनाथ है न ? हाँ, मनुष्य-शरीर सर्वथा रोगरहित नहीं है, लेकिन जब तक रोग रहित है, तब तक - सनाथ अनाथ निर्णय तो शरीर की ओर से अनाथता नही है न ? इन प्रश्नों का समाधान, सतिप्त मे नीचे किया जाता है। मुनि ने राजा श्रेणिक से कहा है, कि 'मैं अनाथ था।' उन के द्वारा कहा गया 'मैं' सर्वनाम आमा का है, न कि शरीर का। यानी यह आत्मा अनाथ था। यदि उन्होंने शरीर के लिए मैं सर्वनाम का प्रयोग किया होता, तो उन्हें शरीर की ओर से अनाथता सिद्ध करने की आवश्यकता न रहती उन्होने आमा को अनाय बता कर, सबसे पहले निकट-सम्बन्धी शरीर की ओर से आत्मा की अनाथता सिद्ध की है। शरीर रोग शोका दि दु खो से रहित है, यह कोई नहीं कह सकता, और जब शरीर स्वय भी दुस सहित है, तो वह दूसरे को-यानी आत्मा को-सनाय केसे कर सकता है ? इसके सिवा, शरीर जड है। जड शरीर, चैतन्य आमा का नाथ भी कैसे हो सकता इसी प्रकार यदि आत्म. भी शरीर का नाथ होता, तो प्रात्मा शरीर मे रोग पाने ही क्यो देता ? आमा कब चाहता है कि शरीर में रोग हो ? आत्मा के विना चाहे ही शरीर को रोग आ घेरते हैं, इस से मिद्ध है कि आत्मा की ओर से शरीर भी अ- नाथ है। इस प्रकार मुनि का शरीर की ओर से प्रात्मा को और आत्मा की ओर से शरीर को अनाथ वताना, विलकुल ठीक हो है। जो शरीर इस समय रोगी नहीं है, वह भी अनाथ ही , सनाथ अनाथ निर्णय है। क्योंकि अभी रोग उदय मे न आये हो तो क्या, लेकिन शरीर में रोग हैं अवश्य। और जब शरीर में रोग हैं, तो वे अवश्य ही उदय में आवेंगे। अभी रोग उदय में नहीं आयें हैं, इस कारण शरीर को रोग-रहित उसी प्रकार नहीं माना जा सकता, जिस प्रकार हमला न करनेवाले-चुपचाप बैठे रहनेवाले, मल्कि अधीनता स्वीकार करनेवाले शत्रुओं के भी रहवे कोई आदमी शत्रु-रहित नहीं कहा जा सकता। शत्रु-रहिव तो वही कहा जायेगा, जिसका गुप्त या प्रकट, प्रत्यक्ष या परोक्ष, बलवान या निर्बल कैसा भी-शत्रु नहीं है। इसी प्रकार जववक शरीर में रोग गुप्त भी हैं, तबतक शरीर, रोगरहित नहीं है और जो शरीर स्वय ही रोग-प्रस्त है, स्वय ही अनाथ है, वह आत्मा की अनाथता कैसे मिटा सकता है ? - और आत्मा मी जब रोगों से शरीर की रक्षा नहीं कर सकता, तब वह भी शरीर का नाय कैसे हो सकता है? मुनि की दृष्टि में, औषध मन्त्र आदि जानने और उनके द्वारा दूसरे का रोग मिटाने की चेष्टा करनेवाले या रोग मिटाने- वाले मैच भी अनाय हैं। क्योकि ऐसे लोगों को स्वय को भी रोगों का मय है। उनके शरीर में भी रोग होते है, तथा जिन अचारों धरा वे लोग दूसरे को रोग मुक्का करना चाहते हैं, धन वपचारों द्वारा वे स्वयं का रोग मिटाने में प्राय असमर्थ रहते हैं। r १ सनाय-अनाथ निर्णय - इस पर इस प्रकार से वैद्य, स्वय भी अनाय हैं और जिन श्रीपध मन्त्र आदि का उन्होंने आश्रय ले रखा है, वे औपध मन्त्र भी अनाथ हैं। यदि औषर मन्त्रादि अनाथ न होते, किन्तु सनाथ होते, तो जिन लोगों ने उनका आश्रयाले रखा है, वे लोग अनाथ कैसे रहते ? आमा, स्वयं अनाथ है, इससे अपने निकट-सम्बन्धी शरीर को भी रोगादि से बचाकर सनाय नहीं बना सकता । भी, अपनी अनायता का ध्यान न करके, यह सनाथ होने के लिए वैद्यादि की शरण जाता है, लेकिन वैद्यादि स्वयम भी अनाथ है, इससे वे औषधादि फी शरण जाते हैं। इस प्रकार परम्परा पर ये सन अनाय ही ठहरते हैं, और जो स्वय की ही , अनाथता नहीं मिटों मका है, वह दूसरे को सनाथ कैसे बना सकता है ? १४ आत्मा का, शरीर में रहना श्रात्मा की पहली कमजोरी है। शरीर में रहना, आत्मा की अनाथता का ही कारण है। फिर अपने आप को शरीर का नाथ मान कर भी, शरीर में रोग होने देनाः प्रात्मा।की दूसरी कमजोरी है। । पूर्ण बलवान-सनाथ- आत्मा, शरीर में रहता ही नहीं है, वह तो शारीरिक-बन्धन से मुक्त हो जाता है। ऐसे पूर्ण बलवान की अपेक्षा मध्यम दर्जे का बलवान आत्मा, शरीर में तो रहता है, लेकिन शरीर में, रोग नहीं आने देता। "रोग, निर्वल आत्मा के शरीर में ही होते हैं, . - । सनाथ अनाथ निर्णय और वह भी उसकी ( आत्मा की) निर्बलता के कारण। आत्मा के लिए उचित तो यह है कि जिस निर्बलता के कारण रोग आये हैं, उस निर्वनता को ही मिटा दे. लेकिन यह न करके वैद्यादि की शरण जाना, आमा की तीसरी कमजोरी है। रोग होने पर, आत्मा, वैद्यादि की शरण मे गया और औपचादि उपचार से रोग मिट भी गये, तन भी प्रात्मा की कमजोरी में वृद्धि हो जाती है और श्रामा अधिक अनाथता में पड़ जाता है। क्योंकि फिर आत्मा यह समझने लगता है, कि मेरा अस्तित्व वैद्य औप- धादि की कृपा से ही है। इस प्रकार आत्मा, स्वय का बल स्त्रोता जाता है और वैद्य औपधादि के आश्रित होता जाता है। सारांश यह, कि वैद्य और औषधादि से चाहे रोग मिट भी जाते हो, लेकिन इससे श्रात्मा सनाथ नहीं होता, किन्तु श्रात्मा की अनाथता बढती है। आत्मा की अनाथता मिट कर प्रामा सनाथ कैसे हो सकता है, यह बात इन्ही मुनि ने आगे चतलाई है। मुनि ने, अवस्था, शरीर वैद्य और औषध आदि की तरफ से तो आत्मा की अनाथता सिद्ध कर दी। श्रर वे कहते हैं- राजा, यदि नू यह मोचता हो,,कि वैद्यादि ने धन न मिलने के कारण अच्छी तरह उपचार न किया होगा, या, धन व्यय न कर मकने के कारण, अन्छी-अच्छी औषधियाँ तथा पथ्य की वस्तुएँ . - - सनाथ अनाथ निर्णय । . । प्राप्त न हो सकी होंगी, या आपके माता-पिता श्रादि की ओर से आपकी सुश्रूपा न हुई होगी, तो इसके लिए भी सुन पिया मे सन्य सारं पि दिज्जा हि मम कारणा। न य दुक्खाउ विमोयन्ति एसा मज्म अणाहया॥२४॥ भावार्थ-मेरे पिता, मेरे लिए मेरे को कष्ट-मुक्त कराने के लिए- पर का सर्वस्व देने को तयार थे, फिर भी ये मेरे को दुख मुक्त न करा सके। इस प्रकार मेरी भनाथता थी। राजा, मैं यह पहले ही कहा चुका हूँ, कि मेरे पिता बहुत यडी सम्पत्ति के स्वामी थे। बहुत-से पिता ऐसे भी होते हैं, कि जो सन्तान की अपेक्षा द्रव्य को अधिक समझते हैं, सन्तान को दुसी एव नष्ट होते देख सकते हैं, किन्तुं धन व्यय होता नहीं देस सकते, लेकिन मेरे पिता ऐसे न थे। वे, सन्तानकी अपेक्षा धन को तुच्छ समझते थे। मेरी रुग्णावस्था के समय वे अधिक से अधिक यही कर सकते थे, कि अच्छे-अच्छे वैद्यो को बुलाकर उनसे मेरा उपचार करावे, मेरे उपचार मे द्रव्य व्यय करें और मेरी परिचर्या का प्रबन्ध करें। मेरे पिता ने यह सब किया । उन्होने बडे-बडे वैद्याचार्यों को बुलवाकर मेरा उपचार कराया, बहुमूल्य औषधियाँ दिलवाई, मुझे अच्छा कर देने के बदले अपने घर का सर्वख देने को सयार थे, मैरी परिचर्या में भी किसी प्रकार की कमी नहीं रहने दी, फिर भी वे मेरा दुख न मिटा सके।
सनाथ-अनाथ निर्णय कसे रहा। राजा, ऐसी दशा में, मैं पिता और धन की ओर से भी सनाथ इसी प्रकार मेरी ओर से पिता भी कैसे सनाथ रहे ? मेरी ओर से पिता तभी सनाथ हो सकते थे, जन मेरे द्वारा उन्हें सुख प्राप्त होता और पुत्र के कर्तव्यानुसार मैं उनका दुख मिटाता। लेकिन दुस मिटाकर, सुग्य देने के स्थान पर मैं, पिता को अधिक दुसी बना रहा था, उनको चिन्ता बढा रहा था, उनका धन व्यय करा रहा था और उनपर कार्य का वोक डाल रहा था। लब जन्मदाता पिता मी मुझे सनाय न कर सके, न में ही उन्हें सनाथ बना सका, तत्र तू मेरा नाथ बनकर मुझे सनाथ कैसे कर मकेगा, इसे विचार मुनि की बात सुनकर, राजा श्रेणिक विचारता है, कि वास्तव में यह बात तो ठीक ही है। मैं, अपने पुत्रों पर अभिमान करता हूँ, परन्तु ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर, मैं पुत्रों की तथा पुत्र मेरी रक्षा करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं। कदाचित् पाह्य शत्रुओं का आक्रमण होने पर वो मैं उनकी और वे मेरी रता करने की चेष्टा कर मी मफते हैं, लेकिन मुनि के शरीर में जिस प्रकार रोग-शत्रु ,आक्रमण करते थे, उसी प्रकार मेरे या पुत्रों के शरीर में आघात करें, तो मैं या पुत्र दोनों क्या कर सकते हैं? , अधिक से अधिक, वैद्यादि द्वारा उपचार करा सकते हैं, लेकिन उपचारों से लाम न होने पर क्या कियो.जा सनाय-अनाथ निर्णय 1 सकता है। और जब मै पुत्रो का, तथा पुत्र मेरा दुख दूर नहीं कर सकते-सुसी नही बना सकते तव पुत्रो की तरफ से मैं और मेरी तरफ से पुत्र, सनाथ कैसे रहे। इसी प्रकार मैं अपने द्रव्य पर अभिमान करता हूँ, द्रव्य के कारण अपने आपको सनाथ मानता हूँ, लेकिन ऐसे समय में, द्रव्य भी तो रक्षा नहीं कर सकता । यदि द्रव्य ऐसे समय में रक्षा कर सकता होता, तो इन मुनि के लिये इतना द्रव्य व्यय किया गया, कर भी ये सुसी क्यो न हुए । मुनि का मुझे अनाथ कहना, ठीक ही है। सचमुच मैं अनाथ हूँ, वथा जब मैं स्वयं भी सनाथ नही हूँ, तब इन मुनि का नाथ कैसे हो सकता हूँ । - 1 - "मुनि ने, अवस्था, शरीर, वैद्य, औपधादि, पिता और द्रव्य की ओर से अनाथता सिद्ध करके राजा को यह बतला दिया, कि इनकी ओर से तू भी अनाथ है । अब वे कहते हैं-राजा, तू कभी यह कहे, कि पिता की अपेक्षा माता का पुत्र पर अधिक स्नेह होता है, वह पुत्र की अधिक परिचर्या कर सकती है, आपके माता न होगी, इसलिए आप रोग-मुक्त न हुए होगे। लेकिन राजा, मेरे माता भी थी। कई पुत्रो की माताएँ, पुत्र को यातक छोड कर ही मर जाती हैं, लेकिन मेरी माता जीवित थीं और- . - ३९ सनाथ-अनाथ निर्णय - - माया मे महाराय पुत्त सोग दुहहिया । न य दुक्खाउ विमोयन्ति एसा माझ प्रणाहया ॥२५॥" भावार्थ-हे महाराजा, मेरी माता, मेरे दुख से दुखी रहा करती पा, फिर भी वह मुझे दुख से न छुड़ा सकी। ऐसी मेरो अनायता थी । मुनि कहते है-राजा, कई लोगो की माताएँ, अपने पुत्र से प्रेम नहीं करती हैं, कई को माताएँ ऐसी निठुर भी होती हैं, कि अपने पुत्र को मार तक डालती हैं, लेकिन मेरी माता ऐसी न थी। मेरी माता, मुझ पर बहुत कृपा रचती थी, मुझ पर सदा दया किया करती थी, और मुझे दुस में देख कर दुसी रहती थी। वह, दिन-रात मेरी चिन्ता करती, मेरी परिचर्या करती, मेरा दुस मिटाने के लिए.-मुझे सुखो बनाने के लिए प्रत्येक सम्भव उपाय काम में लाती, लेकिन फिर भी वह मेरा दुःख न मिटा सकी। माता की दया, माता की कृपा, माता की परिचर्या और माता का मेरे लिए दुस करना, मेरे किसी काम न आया। बल्कि, माता को दुसी देख कर मैं और दुसी होता था। मैं सोचना थी, कि माता को दुसी बनाने का कारण मैं ही हूँ। इस प्रकार माता का दुस करना, मेरे लिए दु खवर्द्धक तो.. हुआ, लेकिन मुझे दुःखं-मुक्त न कर सका। मेरे शरीर मेजो वेदना हो रही थी, उसे माता किसी भी प्रकार न मिटा सकी। यदि कोई बाह्य शत्रु मेरे शरीर पर आघात करता होता, तो मेरी माता, मीटिज अवार - सनाय-अनाथ निर्णय । अपने प्राण, देकर भी उस शत्रु से मेरी रक्षा करती, शत्रु श्राघातों को अपने ऊपर सहती, लेकिन मेरे शरीर ही में छिपे हुए शत्रु के श्राघातों से वह मेरी रक्षा न कर सकी । इस प्रकार मैं, माता की ओर से अनाय था। राजा, माता की ओर से में ही अनाथ न था, किन्तु मेरी ओर से माता भी अनाया ही थी। पुत्र का कर्तव्य है, कि वह माता को सुखी बनावे तथा उसके दुख दूर करे। मेरी माता, सब प्रकार से सुखी थी। उसके पुत्र थे, पुत्रवधू थी, सद, उसकी आज्ञा मानते थे और पिता भी उस पर प्रसन्न रहते थे। घर में मी, किसी प्रकार की कमी न थी। फिर भी मेरी वेदना के कारण, माता दुखी हो रही थी। मैं, उसके सुख-चन्द्र को प्रसने वाला राह बना हुआ था। उसे सुख पहुँचाना तो दूर रहा, किन्तु अपनी वेदना से मैं उसे और दुसी बना रहा था। मेरे कारण, उसका सारा सुखमय संसार, दुखमय बन गया था। वह मृत्यु फे- दुख से भी अधिक दुखें अनुभव कर रही थी। अम मुनि, राजा श्रेगिक को यह बता रहे हैं, कि मेरे पुण्य से, मुझे भाई भी मिले थे । मसार में, और सब का मिलना इसना कठिन नहीं है, जितना कठिन भाई का मिलना है। हाँ, जो लोग घन-वैभव. को ही अधिक समझते हैं, उनकी दृष्टि में तो माई, असमान धैरी है। वे समझते हैं, कि भाई ने माता के पेट - -- - ४१ सनाय अनाथ निर्णय में आफर, मुझे माता के दूध से वचित कर दिया, जन्म लेकर माता पिता के स्नेह में हिस्सा करा लिया और बड़ा होकर धन चॅटवा लिया । इस प्रकार के लोग, माई को वैरी मानते हैं, परन्तु ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो भाई को सर्वोत्कृष्ट मानते हों, स्था यह समझते हों कि ससार में और सब का मिलना तो सरल है, लेकिन भाई का मिलना बहुत कठिन है। तुलसीदासजी ने, रामायण में, लक्ष्मण के मूर्छित होने पर, राम से विलाप कराते हुए कहलवाया है- मात पिता जग होतई जाता मिलड़ न जगत सहोदर माता॥ लझाकांड अर्थात-ससार में माता-पिता तो पुन पुन होते ही है, लेकिन सहोदर (सगा)माई नहीं मिलता। मुनि कहते हैं- भायरी में महाराय सगा जिकणिहगा । नय दुक्खा विमोयन्ति एसा मज्झ अगाहया ॥२६॥ भावार्थ-हे महाराज, मेरे सहोदर छोटे और बड़े माई भी मुझे दुख से न शुग सके। ऐसी मेरो क्षनायता थी।.... - हे राजा, ससार मे भाई के समान कोई सहायक नहीं माना जाता, इसलिए तू यह कह सकता है कि आपके भाई न होंगे, - 1 1 २ सनाथ अनाय निर्णय ४४ । ना 1 भावार्य-उस नवयौवना मे, मुझे कष्ट में देखकर, अन्न खाना, पानी पीना, केसर चन्दनादि सुगन्धित दम्य का लेपन, गारादि भारण करना त्याग दिया। यह यात नहीं थी, कि फुस्टाओं की तरह पति मति दिखाने के लिए यह इन वस्तुओं का उपभोग मेरी जान में न करती हा और पीछे से करती हो, किन्तु न यह प्रकट में ही इनका उपभोग करती थी, न परोक्ष में ही। खण वि मे महाराय पासाओ मे न फिट्टई। न य दुक्खा विमोयन्ति एसा मज्म अणाहया॥३०॥ भावार्थ-वह मेरी पत्नी, एक क्षण के लिए भी मेरे पास से दूर जाती, फिर भी यह मुझे दुख मुक्त न कर सकी, ऐसी मेरी अनाथता थी। ।" इस कथन द्वारा मुनि, राजा श्रेणिक को यह बता रहे हैं, कि राजा, तू अपनी रानियों के भरोमे अपने आप को सनाथ समम रहा है, लेकिन मेरी स्त्री ने मेरे लिए जो कुछ किया, उससे अधिक तेरी रानियाँ और क्या करेंगी? ऐसी स्त्री के होते हुए भी जब में अनाथ था, तो रानियों के होने से तू सनाथ केसे हो सकता है ? ।। राजा, मेरी पत्नी की ओर से में तो अनाथ था ही, लेकिन मेरी पली भी मेरी ओर से अनाथा ही थी। ससार-व्यवहार के नाते, मेरी स्त्री के प्रति मेरा यह फर्त्तव्य था कि मैं उसे सुख देता, दुःखों से उसकी रक्षा करता, 'लेकिन मैं, इस कर्तव्य का , 7 ४५ सनाथ अनाथ निर्णय 4 न ॥ पालन करने में असमर्थ रहने के साथ ही, अपने दुःख से अपनी ' स्त्री को भी दुखी बना रहा था। इस प्रकार वह भी मेरी ओर मे अनाथा ही थी। मुनि की इस बात पर कि 'राना, तू स्वय भी प्रनाथ है!' गजा श्रेणिक को आश्चर्य हुआ था और उसने मुनि के कथन को मूल बताते हुए, कहा था कि मेरे हाथी, घोडे, नौकर-चाकर, नगर-प्रोम एव रानियाँ आदि हैं, फिर मैं अनाथ कैसे हूँ? उसके इस कथन पर से ही, मुनि ने अपनी अनाथता के वर्णन द्वारा राजा श्रेणिक को यह बताया कि इसी प्रकार तू भी अनाथ है अपनी अनाथता के कारण बता कर, मुनि ने, राजा श्रेणिक को ही अनाथ सिद्ध नहीं किया, किन्तु उसे यह भी बता दिया, किं जिनके भरोसे तू अपने आपको सनाथ मान रहा है, वे स्वयं भी अनाथ हैं ! अर्थात् न तो तू ही सनाथ है, न जिनका तू नाथ बना हुआ है, वे हो । जो तेरे भरोसे अपने आपको सनाथ मान रहे हैं, वे भी उसी प्रकार अनाथ हैं, जिस प्रकार मेरे भरोसे अपने पापको सनाय माननेवाले मेरे माता-पिता, बहिन, स्त्री और भाई अनाथ थे। मुनि कहते हैं, 'राजा, जिस प्रकार हूं, मनुष्य-जन्म और युवावस्था की विशेषतः भोग के लिए मानता है, उसी प्रकार मैं भी मानता था। जिस प्रकार हाथी, घोडे, धन आदि के होने से ।
सनाय अनाथ निर्णय
४६
1
.
नू अपने आपको मनाथ मानता है, उसी प्रकार में भी अपने
श्रापको सनाथ मानता था। लेकिन जब मेरे शरीर में वेदना हुई.
तब इन सब की कसौटी हुई, और ये सब सनाथ करने वाले नहीं
फिन्तु अनायता बढाने वाले ही ठहरे।।
राजा, मेरी पीडा किसी भी तरह न मिटी, तर मैं विचारने
लगा, कि जिनके कारण, मैं अपने आपको सनाथ समझ रहा है।
वे मुझे दुस मुक्त क्यों नहीं कर पाते, विचारते-विचारते मुझे
मालूम हुआ, कि ये माता-पिता, भाई-बहिन, स्त्री और वैद्य श्रादि
स्वय ही अनाथ हैं, फिर ये मुझे सनाथ कैसे बना सकते हैं।
मैंने, अपने दु ख को इन सब पर घटा कर देखा अपना-सा
सम्बन्ध इन सब का भी देसा, तो मुझे मालूम हो गया, कि मेरी
ही तरह ये लोग भी अनायता बढानेवाली वस्तु के अधीन
पड़े हुए हैं।
।., माता-पिता आदि सम्बन्धी के वर्णन द्वारा, मुनि ने, अपने
नीति पूर्ण सामाजिक जीवन का मी परिचय दिया है। उन्होंने
यह भी बतलाया है, कि मेरा सामाजिक जीवन किस प्रकार
नीति-पूर्ण था। नीति के अनुसार, माता-पिता का पुत्र के प्रति,
भाई का भाई के प्रति, बहन का माई के प्रति और स्त्री का पति
के प्रति क्या कर्तव्या होता है, मुनि ने इसका भी -दिग्दर्शन
कराया है।
--
।
४७ सनाथ अनाथ निर्णय . आध्यात्मिक जीवन का मूल, नीति-पूर्ण मामाजिक जीवन है । यद्यपि आत्मा सुनी तो अान्यात्मिक जीवन से ही हो सकता है, लेकिन नीति-पूर्ण सामाजिक जीवन के प्रभाव में आध्यात्मिक जीवन के लिए क्षेत्र तयार नहीं होता। यह बात दूसरी है, कि नौति पूर्ण सामाजिक जीवन थोडी ही देर का हो, लेकिन प्राध्या- त्मिक जीवन की उत्पत्ति के लिए उसका होना आवश्यक है। मुनि का मामाजिक-जीवन, नीति-पूर्ण या, इमीमे उनमे श्राध्यात्मिक जीवन उत्पन्न होने में देर न लगी। मुनि का कयन सुन कर राजा श्रेणिक उनमे कहने लगा है आर्य, हे संयति, आपके वचनों ने मेरे हृदय का यह गर्व मिटा दिया, कि मैं सनाथ हूँ। थर मैं इम यात को भली भाँति समझ गया, कि मैं जिस सम्पदा पर से अपने आपको सनाथ मान रहा हूँ, वह सम्पदा सनाव बनाने वाली नहीं, किन्तु अनायता बढाने चाली है ।' कृपा करके यह बतलाइये, कि श्रापको जो वेदना इतने उपाय करने पर भी नहीं गई थी, वह वेदना गई कैसे और वास्तव में सनाथ होने का उपाय क्या है। -मुनि बोले-हे राजा, जब सारे उपाय हो जाने पर भी मेरे शरीर की,वेदना न मिटी, तव में, उसी वेदना में पड़ा पडा अपने आप ही विचारने लगा, कि इतना उपचार होने पर भी मेरी पीडा क्यों नहीं मिटी । यदि यह पीडा भौतिक कारणों से है तो भौतिक .
सनाय अनाथ निर्णय ४८ उपाय से इसका शमन भी होना चाहिए ! भौतिक उपायों में किसी प्रकार की कमी न रहने पर भी मेरे शरीर के रोग नहीं मिटे और मैं सुसी नहीं हुआ, इससे प्रकट है, कि यह वेदना भौतिक कारणों से नहीं, किन्तु आध्यात्मिक कारणों से है। इन रोगों के होने में मेरे पूर्व-सस्कारो का अवश्य ही सम्बन्ध है । मेरे साथ, पूर्व के कोई ऐसे सस्कार हैं, जिनके कारण मुझे ये रोग घेर रहे हैं। मैंने अपने मन मे यह निर्णय किया, कि ये रोग आध्यात्मिक कारणो से ही हुए हैं, बाह्य कारणो से नहीं हुए हैं। इस निर्णय पर पहुँचने के साथ ही, हृदय में ये प्रश्न होने लगे, कि यदि पूर्व-सस्कार के कारण ये रोग हुए हैं, तब क्या मैं पहले भी था। यदि मैं पहले न होता, तो ये :पूर्व-संस्कार होते ही कैसे ? इसलिए निश्चय ही मैं पहले भी था। लेकिन यदि मैं पहले भी था, तो मुझे ऐसे ही न मालूम किंतने दुःख सहने पडे होंगे। इस प्रकार मेरे मन में अनेक प्रश्न होने लगे और मैं, अपने आप ही उनका समाधान करने लगा । अन्त में, तो ह एवमीहसु, दुक्खमा हु पुणो पुणोः । वेयणा अणुभविउ जे, ससारामि अणन्तए॥३१॥ भावार्थ-रोग न मिटने से, विचार करने पर मुझे विश्वास हुआ, कि ईस अनन्त-संसार मे भ्रमण करते हुए, मैंने इस प्रकार की वेदना बार-बार अनुभव की है। 1 1 . P ४९ सनाथ अनाथ निर्णय , राजा, इस प्रकार विश्वास होने पर, मैं यह सोचने लगा, कि संसार में भ्रमण करने और बार-बार ऐसे कष्ट अनुभव करने का कारण क्या है ? इस प्रश्न पर विचार करते हुए मैं इस सिद्धात पर पहुंचा, कि मोह के वश होकर, आत्मा, सासारिक पदार्थों द्वारा अपने श्रापको सनाथ बनाना चाहता है, लेकिन इन सांसा- रिक पदार्थों से, जैसे जैसे सम्बन्ध बढता जाता है, यह आत्मा, वैसे-ही-वैसे अनाथ होता जाता है और वह अनाथता ही ससार में भ्रमण कराने एव ऐसे या इससे भी अधिक-दु ग्य अनुभव करने का कारण है। राजा, आत्मा की यह बहुन बड़ी गल्ती है, कि यात्मा, माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र, धन-वैभव और वैद्य-दवा आदि पर विश्वास करके, उनके आश्रित रहने में स्वय को सनाथ मानता है। इसी मूल के कारण, श्रात्मा, अनाथ है और ससार में परिभ्रमण एव फिर फिर दुःख अनुभव कर रहा है। वास्तव में, ये सब, श्रात्मा को सनाथ बनानेवाले नहीं है, किन्तु अनाथ बनानेवाले हैं। चाहे आत्मा इनके अधीन रहे, इनको अपना नाथ माने, या इन्हें अपने अधीन रसे, आप इनका नाथ रहे, दोनों ही प्रकार की बातें बनायता देनेवाली हैं। जिम मकार एक थम्चे को पकड़ने वाला नादमी, चाहे यह माने, कि थम्बे ने मुम्हें पकड़ रखा है, या यह माने, कि मैंने थम्बे को पकड रसा . . ५ सनाथ अनाथ निणय , है, लेकिन, जब तक वह थम्बे को न छोड़ दे, तब तक पराधीन ही है। इसी प्रकार चाहे सासारिक पदार्थों का आप होकर रहे, या सांसारिक पढाथों को अपना करके रखे, है दोनों ही तरह अनाथता राजा, इस निश्चय पर पहुँचने के पश्चात्, मैंने रोग-निवारण के लिए, भौतिक उपायों का करना त्याग दिया और यह सोचने लगा, कि आत्मा इस अनाथता से निकल कर सनाथ बने, इसका उपाय क्या है ? क्योकि अब मुझे विश्वास हो गया था, कि ये रोग, अनाथता से ही हैं। विचारते-विचारते, मै इस निर्णय पर पहुँचा, कि इस सकुचित सम्बन्ध को त्याग कर, विशाल सम्बन्ध स्थापित कर लिया जावे । माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री आदि के ही अपना न मान कर, ससार के प्राणिमात्र को अपना माना जावे इसी प्रकार, केवल माता-पिता श्रादि व्यक्ति या समूह विशेष, वे बनकर रहने के बदले, ससार के प्राणिमात्र का बनकर रहा जावे केवल. इन्हीं से अपने आपको सनाथ न मानकर, ससार के प्राणिमात्र से अपचे श्रापको सनाथ माना जावे, और केवल इन्ह के नाथ न रह कर, ससार के प्राणिमात्र का नाथ रहा जावे. भौतिक पदार्थों पर विश्वास न करके, अपने आप (प्रात्मा) पर ही विश्वास किया जावे, भौतिक पदार्थों से ममत्व तोड दिया जावे, तो यह अनाथता मिट सकती है। प्राणिमात्र को अपना नाथ यनाने, एव प्राणिमात्र का नाय वन्ने के लिए, नोध, लोभ, .
सनाथ-अनाथ निर्णय इन्द्रिय-लोलुपता और प्रारम्भ-समारम्भ को त्यागने एवं क्षमा, इन्द्रिय निग्रह, निरारम्भता और निर्लोभता आदि को अपनाने की आवश्यकता है। जब तक ऐसा न किया जावे, वब तक अनाथवा नहीं मिट सकती। इस निर्णय पर पहुंचते ही, मैंने अपने मन में सकल्प किया कि- सई च जड़ मुजा वेयणा विउला इतो । खन्तो दन्तो निरारम्भो पब्बड़ए अपगारिय ॥३२॥ भावार्थ-यदि मैं एक बार इस महान् वेदना से मुक्त हो जाऊँ, तो क्षमावान् , इन्द्रियों का दमन करनेवाला, एव निरारम्भी वनकर अणगार धर्म स्वीकार करूंगा। एवं च चिन्तहत्ताण पसुत्तो मि नराहिग । परियत्तन्तीय राइए वेयणा मे खय गया ॥३३॥ भागर्थ है नराधिप, इस प्रकार चिन्तवन करते-करते, मुझे नोंद मा गई, मै सोगया । रात्रि के बीतने पर सवेरे मैंने देखा, कि मेरी शारीरिक वेदना क्षय हो गई है और मेरा शरीर, वेदना रहित हो गया है। मुनि कह रहे हैं-राजा, अब तक मैं, मोह की नींद में पदा सो रहा था, इसलिए इन रोगो ने, मेरे यहाँ चोर की, मोति प्रवेश कर लिया था। रोग रूपी चोरों को, न मै ही भगा सका था, न,माता-पिता, वैद्य आदि ही। रोगों को, मैं या वे भगा भी कैसे सकते थे ? क्योंकि, में और मेरे साथ ही वे सब भी, मोद .
.
-
4.
सनाथ अनाथ निर्गय
क्री नींद में पड़े हुए थे। चोर, घर में तभीतक रह सकते हैं,
जवतक घर का स्वामी सोया हुआ हो। म्वामी के जागने पर
चोरों का साहस, ठहरने का नहीं हो सकता। मैं, जन मोह की
नींद से जागा, तभी उन रोग रूपी चोरों को भगाने में समर्थ हो
सका। मैंने, मोह-निद्रा भंग करके, जैसे ही रोग रूपी चोरों से
यह कहा, कि तुम लोग मेरे यहा से भाग जाओ, वैसे ही रोग
रूपी चोर, भाग गये। उनने समझ लिया, कि अन गृह
स्वामी जाग गया है, इससे यहां रहने मे कुशल नहीं। राजा,
मोह-निद्रा दूर कर देने पर, रोगों के भगाने में मुझे, माता-पिता
आदि किसी की भी सहायता न लेनी पड़ी। महायता लेता भी
तो किसमे ? माता-पिता आदि स्वय ही मोह को नींद में जकडे
हुए थे । यद्यपि उन रोग रूपी चोरों को, मैं, अपने यहाँ पहले भी
नहीं रहने देना चाहता था, लेकिन पहले मै, मोह की नीद से
घेसुध था और साथ ही अनाथ भी था। सोये हुए अशक्त का
है। इसलिए मेरी इच्छा न होने पर भी, वे रोग
रूपी चोर, मेरे शरीर रूपी घर में घुसे रहे। मैं, मोह-निद्रा से
जागकर भी यदि अशक्त ही बना रहता, अपने आपको सशक्त न
बनाता, सो वे रोग रूपी चोर न भागते । क्योंकि, जागते हुए
अशक्त की बात कौन मानता है । लेकिन मैने जागने के साथ ही,
अपने आपको सशक्त बना लिया और अपनी शक्ति का प्रदर्शन
भय
कौन करता
मनाथ मनाय निर्णय करते हुए यानी यह कहते हुए, कि मैं क्षमागान, इन्द्रियों का दमन करनेवाला एव निरारम्मी बनकर अनगार (सयति) होऊँगा मैंने, रोग रूपी चोरों को डाटा। मेरे बाटते हो वे भाग गये। राजा, वेदना के मारे, मुझे बहुत दिनों से नींद नहीं पाई थी, लेकिन मैंने जैसे ही यह सङ्कल्प किया, कि वेदना मिट जाने पर, मैं अनगार होऊँगा' वैसे ही मुझे नींद आगई। मुझे नीद पाई जानकर, मेरे माता पिता आदि को घहुत प्रसन्नता हुई। जिस रोगी को नींद नहीं आती उसका रोग, असान्य माना जाता है। मुझे नींद नहीं आती थी इसलिए मेरे घरवाल, मेरा रोग असाध्य मानकर दुखी हो रहे थे, लेकिन मुझे नीट पा जाने मे, मेरे घरवाले बहुत प्रसन्न हुए। वे, यह समझने लगे, कि अब हमारा पुत्र, भाई या पति स्वस्थ हो जायेगा। उस समय मेरे घर के लोगो को कैसा ही हुआ होगा, यह मै नहीं बता सकता। मेरे घर के लोग मुझे नींद में सोया हुआ जान रहे थे, लेकिन राजा, मेरी यह नील, दूमरी ही तरह की थी। वे सब लोग, मुझे सोया हुआ और अपने आपको जागता हुआ समझ रहे थे, लेकिन मेरी समझ मे, में,जाग रहा था, और चे सन लोग सो रहे थे। अपने सोने और घर के लोगों के जागने मे, मुनि जो अन्तर बता रहे हैं, वह, गीता के निन्न कथन के अनुसार 1 - - ,
सनाय अनाथ निर्णय
A.
।
या निशा सर्व
भूताना तस्सा जागति संयमी।
यस्या' जामति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ।
-
मध्योप २
,
अर्थात्-सब लोग जिमे रात सममते हैं, उसमें संयमी
पुरुष जागता रहता है और जिसमें मारा संसार जागता हैउसे
तत्त्वज्ञानी मुनि, रात समझते हैं। 'मतलब यह, कि संसार में
लिपटे हुए लोग, जिसे सचा सममते हैं, ज्ञानी लोग, उसे भूग
सममते हैं और जो तत्त्व की बात, ससार में लिपटे हुए लोगों
से छिपी हुई है, उसे ज्ञानी लोग साफ देखते हैं।
मुनि भी यही बात कह रहे हैं। वे कहते हैं, कि राजा,
घर के लोग मुझे सोता और अपने आप को जागता समझ रहे
थे, लेकिन वास्तव में, मैं जाग रहा था और वे लोग, सो रहे थे,
अर्थात, जिसे वे सनाथता समझते थे, उसे मैं, अनाथता
मानने लगा था, और जिसे मैं सनाथता मानने लगा था, उसे वे
लोग, तेरी ही तरह अनायता मान रहे थे । तू भी तो अपने
श्राप को सनाथ मान कर, मेरा नाथ बनने को तयार हुआ है,
लेकिन वास्तव में, तू भी अनाय ही है, सनाथ नहीं है। तेरी
दृष्टि में, हम ( साधु ) सोये हुए हैं और तू जाग रहा है, लेकिन
वास्तव में, हम जाग रहे हैं और तू सोया हुआ है।
राजा, रात्रि व्यतीत होने पर, यानी सूर्योदय होने पर, मैंने
-
-
सनाय नाय निर्णय देवा, कि मेरा शरीर तो वही है, लेकिन उसमें फिचित भी वेदना नहीं है।।। यह देसफर, मुझे इस बात पर विश्वास हो गया, कि रोगों को, मैंने ही ठहरा रक्सा था, इसीसे ठहरे थे । मुझे, मिता, माता, बहन, भाई, स्त्री, धन, वैद्यादि और श्रीप- धादि से सनाथ बनने की अपनी भूल भी समझ में : आगई। मुझे, इस बात पर पूर्णत विश्वास हो गया, कि सर्वारम्भ को त्यागने, इन्द्रियों का दमन करने और क्षमा को अपना कर अनगारे धर्म में प्रवजित होने पर ही, सनाथ हो सकता है, तथा प्रत्येक दु-स, अनाथ को ही सताते हैं, सनाथ को नहीं सताते। शक्ति सम्पन्न मे, रोगादि प्रत्येक दुख, भय खाते रहते हैं । यहा प्रश्न होता है, कि जब सनाथी मुनि का रोग, मयम का चिन्तवन करने मात्र से ही चला गया, तर फिर संयमी लोगो को कष्ट क्यों भोगने पडे । उदाहरण के लिए, मुनि श्री गजसु- कुमारजी का, भाग से जलना । इस प्रश्न का उत्तर यही है, कि जिसे ससार के लोग रात समझते हैं, वह ज्ञानियों के लिए दिन है और जिसे संसार के लोग दिन समझते हैं, ज्ञानियों के लिए वह रात है। इसके अनुमार, मसार के लोग, मुनि श्री गजसुकुमारजी का आग से जलना मानते हैं, उनके लिए कष्ट समझते हैं, लेकिन गजसुकुमार मुनि, इसे कष्ट नहीं सममते थे, किन्तु सुख सममते थे और सनाथ अनाग निर्णय - - सिर पर भाग रसनेवाले को, लक्ष्य पर पहुँचानेवाला सहायक ३ मा नतेथे। उन्हें तो, शरीर को शीत से शीघ्र त्यागना ही अभीष्ट था। यदि उनकी यह इन्छा न होती, तो वे श्मशान में ही क्यो जाते और अपने सिर पर अग्नि रसने ही क्यों देते। अग्नि रखी जा चुकने पर भी, यदि वे उस अग्नि से फष्ट अनुभव करते होते, तो, इच्छा करने मात्र से ही अग्नि को, शीतल कर सकते थे। उनमें ऐसी शक्ति थी, कि चाहने पर अग्नि शीतल हो ही जावे। इस शक्ति के होते हुए भी, उन्होंने अग्नि को शीतल करने की इच्छा नहीं की, इसका कारण यही है, कि वे उस अमि से, दु ख अनुभव नहीं करते थे, किन्तु यह विचार कर सुस मान रहे थे, कि मैं अपने ध्येय के समीप शीघ्र पहुँच रहा हूँ। इस प्रकार, जव अमि से जलनेवाले मुनि ही जलने मे दुस नहीं मानते थे, तब फिर यह कैसे कहा जा सकता है, कि संयमी गजसुकुमार मुनि को कष्ट हुए। सयमी को, किसी प्रकार का कष्ट तो होता ही नहीं। सयम स्वीकार करनेवाला, कष्टो को जीत लेता है। वह अपने लिए कष्टो का अस्तित्व पहले ही मिटा देता है, तब सयम लेता है। सनाथी मुनि का रोग, सयम की उच्च भावना से मिटा, मन्त्र औपध प्रादि से नहीं मिटा, न माता पिता श्रादि को सेवा सुभूपा से ही कोई लाभ हुआ, यह बात ठीक है, लेकिन इसका यह सनाथ अनाथ निर्णय अर्थ नहीं है, कि औषध आदि से रोग मिटते ही नहीं, या वैध, रोगी को मिटा ही नहीं सकता, इस कारण माता-पिता वैद्यादि को नग्ण की परिचर्या करने की ही आवश्यकता नहीं है। यदि औषधादि से रोग मिटते ही न होते, वैद्य रोगी को स्वस्थ कर ही न मकता होता, या माता, पिता, भाई, बहन, स्त्री आदि की परिचर्या से लाम ही नहीं होता, तो न तो कोई किसी का उपचार ही करता, न किसी की परिचर्या हो । लाभ इनसे भी होता है, इनसे भी रोग मिटते हैं, लेकिन इन उपायो से रोग मिट ही जाते हैं, यह निश्चित पात नहीं है। इनमें किसी को लाभ होता भी है. और किसी को लाभ नहीं भी होता। इसके सिवा, इस प्रकार से मिटे हुए रोग, सदा के लिए मिट गये, यह भी नहीं कहा जा सकता, न शारीरिक रोग मिट जाने के कारण, श्रात्मा सनाथ ही बन जाता है। सयम की च भावना से जानेवाले रोग, निश्चित रूप से चले जाते है और आत्मा भी अथिता से निकलकर सनाथ बन जाता है। तात्पर्य यह, कि औपध परि- चर्या श्रादि से लाभ न होने के कारण, किसी की औषध परिचर्या करनी ही न चाहिए, यह समझना गलती है। चाहे रोग जावे या न जाने, कष्ट में पडे हुए को लाभ हो या न हो, लेकिन जो श्रादमी, रोगी या कष्ट मे पढे हुए की, औपध एव मेवा सहायता करता है, उसे तो अनुकम्पा का लाभ होता ही है।
सनाथ-अशा निर्णय - - औपधादि द्वारा, तथा|संयम की उचाभावना द्वारा, रोग जाने में जो प्रधान अन्तर है, वह श्रात्मा को अनाथता एव सनायता का है। यानी, एफ से श्रात्मा अधिक अनाथ होता है, और दूसरे से सनाथा होता है। परिक मन्त्र के द्वारा निरोग बने हुए का आत्मा, औषध द्वारा निरोग बने हुए के प्रात्मा की अपेक्षा अधिक पराधीन हो जाता है। क्योंकि औपध पर चाई विश्वास किया जावे । या न किया जावे, प्रयोग में आई हुई औपध कभी कभी अपना अच्छा या बुरा प्रभाव दिखाती ही हे लेकिन यन्त्र-मन्त्र का प्रभाव तो तभी हो सकेगा, जब उन पर पूर्णत विश्वास किया जावे । । उदाहरण के लिए----मेस्मरेजिन का प्रभाव, उस भोलेभाले श्रादमी पर ही अधिक पडता है जिसमें अन्य विश्वास की मात्रा अधिक है। जिसे मेस्मरेजिर पर विश्वास नहीं है, जो यन्त्र-मन्त्र को नहीं मानता, उस प मेस्मरेजिम का वैसा प्रभाव नहीं पड़ता, जैसा प्रभाव, 'विश्वास करनेवाले पर पड़ता है। इस प्रकार, औपध की अपेक्ष यन्त्र-मत्र से निरोग होनेवाले को, श्रात्म-विश्वास विलकुल ही -खो देना पड़ता मयम की ज्य भागना से रोग जाने मे, यह बात नहीं है। उममे आत्मा, पराधीन नहीं होता, किन्तु स्वाधीन होता है। इस प्रकार से रोग जाने में, आत्म विश्वास बढ़ता है, घटता नहीं है। , उच्च भावना से गया हुआ रोग, कदा. - . - सना अनाथ निर्णय - - चित फिर कभी आ भी गया, तो आत्म विश्वास के कारण, श्रात्मा की भावना और उच्च होगी, और इस प्रकार श्राम-विश्वास अहोगा।' सनाथी मुनि कहते हैं: राजा, वैद्य, एवं औपधादि से मेरा रोग नहीं गया, यह अच्छा हो हुआ। यदि इनके द्वारा मेरा रोग चला जाता, तो मैं अनार्थता में अधिक फंस जाता अनाथता से निकल न पाता। 'मेरे में, आम विश्वास उत्पन्न न होता, किन्तु वैद्य औषध श्रादि पर ही विश्वास करने लगता और इस प्रकार अपनी परतन्त्रता को और बढा लेता। यद्यपि मेरा उप- चार व मेरी परिचर्या करनेवालों-मेरे दुस से दुखी रहने- पालों की भावना उपकार को ही थी, वे तो अपनी ओर से, मुम पर दया हो करते थे, और ज्ञान होने तक उनकी वह दया मुझे सुखप्रद भी मालूम होती थी, लेकिन अर ज्ञान होने पर, में ससार को बधनकारक समभने लगा है, और मुझे उनकी दया, मेरी परतन्त्रता बढानेवाली दिसती है। राजा, मेरे शरीर में रोग आये, यह भी अच्छा ही हुआ। यदि मेरा शरीर, रोगी न हुआ होता किन्तु स्वस्थ होता, तो मैं अनाथ ही बना रहता, सनाथ न हो पाता। रन रोगों ने, मुम में सनाय बनने की भावना उत्पन्न कर दी, इसलिए मैं, उन रोगों को मित्र मानता हूँ।' अब भी यदि मुझे कोई रोग हो, तो उस . -
सनाथ अनाथ निर्णय
रोग को मैं दुख दात नहीं मानेंगा, किन्तु सुखदाता मानूँगा और
समगा, कि मेरे में किसी प्रकार की कमी आई है, मेरी उन
भावना में कोई न्यूनता हो गई है, इसीलिए यह मेरा पूर्व-परिचित
मित्र मुझे सावधान करने के लिए आया है।
राजा, सबेरे मुझे वेदना रहित देखकर मेरे भाई, दहन, माता
पिता, स्त्री आदि को बहुत प्रसन्नता हुई। मुझे जागा. हुआ
जानकर, सन लोग मेरे पास आये । उस समय वे सब बहुत
ही हर्षित थे।
सब कहते थे कि हमारे पुण्य अच्छे हैं, जिससे
हमारा पुत्र, भाई, या पति अच्छा हो गया। • सब लोग अपने
अपने भाग्य की बडाई करने लगे और मुझसे पूछने लगे,
कि
तुम्हारे शरीर की वेदना, एक दम से कैसे चली गई ?
शरीर में वेदना नहीं है ? आदि। मैंने उनसे कहा, कि अन में
अन्छा हो गया। अन मेरे शरीर में, तनिक भी वेदना नहीं है।
वे सत्र कहने लगे, कि तुम्हारे अच्छे हो जाने से, हमें जो प्रसन्नता
है, वह प्रमन्नता, त्रैलोक की सम्पत्ति मिलने पर भी नहीं हो
अन यह बताओ, कि जो वेदना इतने इतने उपाय
करने पर भी नहीं गई थी, वह वेदना पाज आप ही आप मिट
गई या किसी कारण विशेष से चली गई ? मैं उनमे कहने लगा,
किं इतने उपचार करने पर भी जो वेदना नहीं गई थी, जिप्स
वेदना के न मिटने के कारण, मैं श्रापको और आप-मुझे सुसी
अब तो
सकी।
,
सनाथ-अनाथ निपाय
न कर सके थे, उस वेदना को मिटाने के लिए, मैंने
एक शक्ति
का स्मरण किया।
उस शक्ति का स्मरण, करते ही, मुझे
बहुत दिनो मे उठी हुई नीद आ गई और मैं सो गया। इस
समय जाग कर, मैं, शरीर को रोग-रहित स्वस्थ-देसता है।
यह सर, उस शक्ति के स्मरण एव उसकी कृपा का प्रताप है।
मेरी बात सुन कर, मेरे घर के सर लोग, हर्प सहित, उम
शक्ति को बडाई करने लगे और कहने लगे, कि वह शक्ति कहाँ
रहती है और कौन है ? जिसने ऐसे समय में, तुम्हरी और हम
सब की इस प्रकार सहायता की हम उस शक्ति को कोटि-कोटि
नमस्कार करते हैं और उसे धन्यवाद देते हैं
राजा, उन सब के प्रश्न के उत्तर में, मैंने कहा कि वह शक्ति
और कहीं नही रहती है, किन्तु हृदय में ही रहती है। मैं, उस
शक्ति को भूला हुआ था, इसीमे इतने कष्ट उठा रहा था। कष्टों
से मुक्त होने के समस्त उपाय असफल होने पर, मैंने उस शक्ति
का स्मरण करके उससे कहा, कि यदि एक बार मैं फट-मुक्त हो
जाऊँ, तो तेरी शरण श्राऊँगा। ऐसा कहो हो, मुझे नींद श्रागई,
मेरी वेदना कम हो गई और इस समय मैं, अपने आपको
रोग रहित स्वस्य देख रहा हूँ।
मेरी इस बात को सुन कर उन लोगों का फौतूहन पढ गया
अब थे, उस शक्ति का नाम नानने के लिए, अधिक उसुक थे।
.
सनाथ-अनाथ निर्णय
,
.
-
उनकी उसुकता देखकर, मैंने कहा, कि भेदों से तो उस शक्ति
के, क्षमा, सत्य, अहिंसा, धादि कई नाम हैं, लेकिन समुच्चय में
वह सयम की शक्ति है। मयम की शक्ति से हो, मैं रोग-मुक्त
हुआ हूँ। अब मैं, उस मयम की शक्ति से की हुई अपनी प्रतिज्ञा
के अनुसार, उसकी शरण जाना चाहता हूँ, इसलिए आप सब
लोग, स्वीकृति दीजिये।
'यमो परम्' धातु से, 'सयम' शब्द की उत्पत्ति है। इसका
अर्थ है, समस्त विकारों से दूर रहना ।
मेरे इस कथन को सुनकर, मेरे घरवालों को मेरे वियोग का
स्वाभाविक दुख हुअा। सब लोग, आपस में एक दूसरे की
ओर देखने और अपनी अपनी आँखो से, ऑसू टपकाने लगे।
मैं, उन्हें बहुत प्रिय था, इसीलिए उन्हें मेरी यह बात सुनकर
दुख हुआ। उत लोगों को दुसी देखकर, मैंने उनसे कहा,
कि आप लोग दु सी क्यों होते हैं ? मैं, जो वेदना अनुभव कर
रहा था, उसी वेदना में यदि मेरी मृत्यु हो गई होती, तर
आप लोगों को धैर्य रसना पड़ता या नहीं? फिर जिस सय
की शक्ति की कृपा से मैं अच्छा हुआ हूँ, उसकी शरण जाने में
समय, आप लोग धैर्य रसकर मुझे स्वीकृति क्यों नहीं देते,
यदि उस शक्ति की कृपा न होती, तो मैं वेदनासे मुक्त हो पाता
इतं पातों पर विचार करके, आप लोग प्रसन्नता-पूर्वक मुन
-
र
सनाय अनाय निर्णय सयम फी शरण जाने के लिए स्वीकृति दे दीजिए। इस प्रकार, मेरे बहुत समझाने बुझाने पर, मेरे घर के लोगो ने, मुझे सयम लेने के लिए स्वीकृति दी। तो कल्ले पभायम्मि प्रापुच्छिताण पन्धये ।। खन्तो दन्तो निरारम्भो पध्वो अपगारिय ॥३४॥ भावार्थ-सवेरे वेदना मिटने पर, मैने अपने वाधवों से स्वीकृति ली, और क्षमावान्, इन्द्रिय निरोधी, एघ निरारम्मी बनकर, अनगार धर्म स्वीकार कर लिया। तोह गाहो जामो थप्पणो य परस्स य । सव्वेसिं चेव भूयाण तसोण थावराण य ॥ ३५ ॥ भावार्थ-सयम रेकर, मै, अपना स्वय का, तथा दूसरे सब अस एव स्थावर जीवों का नाथ बन गया। सनाथी मुनि कहते है-राजा, अब मुझे किसी भी प्रकार के रोग शोक का भय नहीं है। अब मैं सनाथ हूँ, इसलिए किसी प्रकार का दुख मेरे समीप भी, महीं आ सकता। यदि कभी कोई गेगन्दु स आया भी, तो उसे, मैं अपने श्राप हो मिटाने में समर्थ हूँ। उनमे, घबरा, कर, किसी दूसरे की, शरण जाने की, आव- श्यकता नपड़ेगी। मेरी जीवन-गाथा सुनकर, तू समझ गया होगा, कि मैं कैसा अनाथ,था,और अब किस प्रकार सनाथ हूँ। मेरे, कथन पर.से, तू अपने आप के लिए भी विचार ले, कि तू .
सनाथ अनाय निर्णय सनाथ है या अनाथ, और मेरा नाथ बनने को ममर्थ है, या नहीं। राजा, तेरे को यह तो मालूम हो ही गया होगा, कि जब तक कोई किसी दूसरे जीव या पदार्थ पर अपना आधिपत्य रसता है, आप शासक और उन्हें शासित मानता है, तब तक वह, अपना खय का भी नाथ नहीं है, और दूसर का भी नाथ नहीं है। जो, दूसरे को अपने अधीन रहना चाहता है, वह स्वयं भी दूसरे के अधीन हो जाता है, यह अटल सिद्धात है। इसी प्रकार, जो दूसरे शासक के अधीन है, वह तो अनाथ है ही। सनाथ तभी हो सकता है, जब आप स्वय भी दूसरे के अधीन न रहे, और न किसी दूसरे को ही अपने अधीन रखे। इस प्रकार सनाथ बननेवाला, अपने आपका हो नाथ नही रहता है, किन्तु प्राणिमात्र का नाथ बन जाता है । तू, यह मत समझ, कि फिर तो प्राणिमात्र पर अपना आधिपत्य हुआ। इस प्रकार से प्राणि मात्र का नाथ बनने में, आधिपत्य या अधीनता को तो स्थान ही नहीं है। इसमें तो केवल मित्रता को हो स्थान है। सयम का अर्थ ही, विकारों से दूर रहना है। जब सयम स्वीकार लिया, तन, छोटे-बडे, शासक-शासित या अधिपति श्रधीन आदि विचार रहा ही कहाँ ? फिर तो, मैत्री-भावना ही विकसित होती है। वय अपना नाथ बना हुआ व्यक्ति, प्राणिमात्र का नाथ, मित्रता के बलपर बनता है, साम, दाम, दण्ड और भेद आदि सासारिक .
सनाय-अनाथ निर्णय
सीति के बल पर नहीं। यदि तू मेरा नाथ बनने का इच्छुक
है, तो अपने अधीनस्थ लोगों पर से अपना श्राधिपत्य उछाले,
भौतिक पदार्थों पर विश्वास करना छोड़ और अपने आप पर
विश्वास कर । बस, फिर तू केवल मेरा ही नहीं, किन्तु प्राणिमात्र
का नाथ बन जावेगा।
राजा, नू अपने आपको, हाथी घोडे श्रादि के होने से
सनाध मानता है, लेकिन तूने, हाथी घोडे क्यो रख छोडे है ?
तु , इस विषय में भली प्रकार और एक एक पर अलग अलग
विचार कर। यदि तू पैदल चल सकता होता, तो घोडे क्यो
रसता पैदल नहीं चल सकता, इसी कारण घोडे रसे हैं न १
तेरे से जो काम नहीं हो सका, जिसके करने की तेरे में शक्ति
नहीं थी, वह काम करने के लिए ही तूने घोडे रखे हैं न १ फिर
इसमें विशेषता की बात कौन सी रही ? यह तो और कमजोरी
हुई । यदि घोडे, तेरे को उठा कर चलने से इनकार करदें, तो तू
कैसे चलेगा? घोड़ा ने, तुझ कमजोर पर कृपा की है, तेरी सहा-
यता की है, जो तेरा वजन उठाकर चल रहे हैं । ऐसी दशा में तू
उन घोडो का नाथ कैसे रहा १ हाँ, लोकोक्ति से, वे घोडे, तेरे
नाथ तो हो भी सकते हैं। क्योकि, तुम अशक्त को सहायता
देते हैं।
गजा, घोड़ों की ही तरह हाथी के लिए समझ ।
५
सनाय-अनाथ निर्णय २१ तेरा काम घोड़ो से- नहीं चला, तब तू हाथी की शरण गया, यानी हाथी रखने लगा। जो काम हाथी करता है, वह काम करने की शक्ति, यदि तेरे में ही होती, तो तू उसकी सहायता क्यों लेता? यही वात, पैदल, दास दासी श्रादि के लिए भी समझ ले। अब यदि मेरी ही तरह तुझे सनाथ बनना है, तो संसार की समस्त वस्तुओं पर से अपना अधिकार उठाकर, इस सयम रूपी शक्ति की शरण आ जा, फिर - तू अपना भी नाथ बन जावेगा और मेरा तथा, प्राणिमात्र का नाथ बन जावेगा। यदि, त एक दम से, ऐसा नहीं कर सकता, तो धीरे धीरे कर । अनाथता देनेवाली वस्तुओं को, धीरे धीरे त्यागने पर भी, जितने अश में उन वस्तुओ को त्यागेगा,, उतने ही अश मे सनाथ बनता जावेगा और जब अनाथता देनेवाली वस्तुओं कोसर्वथा त्याग देगा, सब सर्वाश में सनाथ बन जावेगा। राजा, उतने कष्ट भोग कर अनाथता त्यागने एव नाथ बनने के पश्चात्, मैं इस सिद्धान्त पर पहुँचा हूँ- अप्पा नई वेयरणी अप्पा मे कूडसामली। अप्पा काम दुहा घेणू अमा मे नन्दण वण ॥३६॥ भावार्थ-मेरा आत्मा ही पैतरणी नदी है। मेरा' मारमा ही शाल्मली वृक्ष है, मेरा आरमा ही इच्छित वस्तु देने वाली कामधेनु है, और मेरा भारमा हो नन्दनवन है। , - - 1 . - सनाथ-अनाया निर्णय , शास्त्रकारों ने, पुण्य और पाप के फल के लिए, सुख और दुख ये दो पक्ष दिखाये हैं। यानी यह बताया है, कि पुण्य से सुख प्राप्त होता है और पाप से दुस। इस सुख दुस से, धर्म का फल भिन्न है , क्योंकि, धर्म का फल मोक्ष है। मोक्ष होने पर, न तो कर्मजनित सुग्व ही है, न दुख ही। यदि मोक्ष में कर्मजनित सुस माना जावेगा, तो फिर वहाँ दुस का भी अस्तित्व मानना पड़ेगा। क्योंकि, जहाँ एक पक्ष होगा, वहाँ दूसरा पन भी होगा ही। लेकिन मोक्ष में, कर्मजनित दुसं का नाम भी नहीं है, इसलिए कर्मजनित मुख भी नहीं है। दुस और सुख तो तभी तक हैं, जबतक मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए धर्म का फल-मोक्ष-सुस-दुस रहित है। शास्त्रकारों ने, पाप का फल दु ख बताया है। दुस में भी वैतरणी नदी एवं कूटशाल्मली के वृक्ष के दुख विशेष हैं। शास्त्रकारों का कथन है, कि नैरयिक को, वैतरणी नदी द्वारा बड़े बड़े कष्ट भोगने पड़ते हैं। वह, उसमें डूबता तथा उतराता है, उसके अन्दर रहनेवाले अनेक जीव उसे काटते साते हैं। इस प्रकार वैतरणी नदी द्वारा, नैरयिक को बहुत फष्ट भोगने पड़ते हैं। नैरयिकों को नरक में कूटशाल्मली वृक्ष से भी बहुत दुख होता है। कूटशाल्मली वृक्ष के पत्ते, पैने होते हैं। वे पत्ते, नैरयिकों के शरीर पर गिरकर, उनके शरीर को क्षत-विक्षत करते - - सनाय अनाथ निर्णय से मारनेवाले को तो नहीं पकडता, और लकड़ी को पकड़ता है। वह समझता है, कि मारनेवाली यह लकड़ी ही है। यद्यपि वह लकही तो निमित्त मात्र है, मारनेवाला तो दूसरा ही है, लेकिन कुत्ता, अज्ञान के वश यह नहीं समझता। इसी प्रकार, सुख- दुख का दाता दूसरे को माननेवाले लोग भी, भूल करते हैं । दूसरा तो निमित्त मात्र है, सुख-दु स का देनेवाला, दूसरा कदापि नहीं हो सकता। सुख या दुः ख का दाता कौन है, इस बात को सिंह की तरह देसने की आवश्यकता है। सिंह पर जब कोई आदमी, गोली या तीर चलाता है, तब सिह, उस गोली या तीर को नहीं पकड़ता, किन्तु, गोली या तीर चलानेवाले पर झपटता है। वह समझता है, कि यह गोली या तीर, अपने आप नहीं आया है, किन्तु दूसरे के चलाने से आया है। इसी प्रकार दुख-सुख देनेवाले-वैतरणी नदी, कूटशाल्मली. वृक्ष, कामधेनु' और नन्दनवन श्रादि-किसी और को मत मानो, किन्तु यह देसो, कि दुख सुस बनाया किसने है ? इन्हे प्राप्त करनेवाला कौन है ? ये 'सुख दुख पाते कहाँ से हैं और किसके भेजे हुए पाते हैं ? इस बात का, शेर की तरह अनुसन्धान करने पर, अन्त में यही ठहरता है कि हमारा आत्मा ही वैतरणी नदी, कूटशाल्मली वृक्ष, कामधेनु, और नन्दनवन है। इसी प्रकार शत्रु मित्र, अनुकूल, प्रतिकूल, स्वपक्षी, विपक्षी, श्रादि भी हमारे श्रात्मा से ही बनते हैं। + सनाथ अनय निणा - - सनाथी मुनि जो बात कह रहे हैं, वही वात गीता में भी, इस प्रकार से कही है- उद्धरेदात्मनाऽऽत्मान नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।। अध्याय ठा अर्थात्-अपने भारमा से ही अपने पारमा का उद्धार करो, गिरने मत दो। आत्मा का शत्रु या मित्र, स्वय आमा ही है। दूसरा कोई उत्थान पा पतित करनेवाला नहीं है। सनाथी मुनि कहते हैं- अप्पा कता विकत्ता य दुहाण य सुहाण य । अप्पा मित्तममित्त य दुपष्ट्रिय सुपहिनी ॥३७॥ भावार्थ--सुख और दु ख का उत्पादक एव विनाशक (कर्ता हत्ता) भारमा ही है ।, आत्मा ही मित्र, शह, दुष्प्रतिष्ठ (दुस पात्र), एव सुप्रतिष्ठ ( सुख पात्र ) है। सनाथी मुनि कहते हैं, कि छोटे से लेकर वैतरणी नदी और और कूटशाल्मली वृक्ष तक के महान् दुस, आत्मा के ही पैदा किये हुए हैं, और आत्मा ही इन्हें नष्ट भी कर सकता है। इसी प्रकार छोटे से लेकर कामधेनु एव नन्दनवन तक के महान् सुख भी आत्मा के ही पैदा किये हुए हैं, और श्रामा इन - - , - + .
सनाय अनाय निर्णय
.
सुखों को भी नष्ट कर सकता है । समस्त दुख-सुख का कर्ता
श्रात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं है।
भ्रमवश श्रात्मा, अपने लिए दुस सुख का देने और करने
वाला किसी दूसरे को हो मानता है । इस बात को तो भूल हो
जाता है कि सुख टु य मेरे ही किये हुए हैं, इसी से मैं इन्हें भोग
भी रहा हूँ, और यदि मैं चाहूँ तो इनसे निकल भी सकता हूँ।
इस बात को, आत्मा किस प्रकार भूला हुआ है, यह बात एक
दृष्टान्त द्वारा समझाई जाती है।
एक महल में, एक कुत्ता घुस गया।
उस महल मे, चारो
ओर प्रतिविम्ब-दर्शक काँच लगे हुए थे। कुत्ते को उन चारों
तरफ लगे हुए काँच में अपना प्रतिविम्ब दिखाई देने लगा । अपने
प्रतिविम्व को देख कर, कुत्ता समझने लगा, कि ये दूसरे कुत्ते
हैं। वह जिधर भी देखता है, उधर उसे अपने ही समान कुत्ते.
दिखाई पड़ते है। यद्यपि काँच में दिखाई देने वाले कुत्ते,
नहीं हैं, उसी कुत्ते का प्रतिविम्ब है, और कॉच मे के
इसी कुत्ते ने बनाया है, लेकिन कुत्ता इस बात को नही
और फाँच में दूसरे बहुत मे कुत्ते समझ कर भोकता
कुत्ता आप, स्वय जिस प्रकार मुह बना कर भौंकना
प्रकार काँच स्थित कुत्ते भी मुँह बनाकर भौंक रहे
कर, तथा अपनी ही प्रतिध्वनि सुन कर, कुत्ता,
चाला दूसरा समार-मार न और समझता है, कि इन सय युत्तों ने, मुझे चारो ओर से मेर लिया है, तथा मुझ पर हमला करने के लिए भौंक रहे हैं। इस प्रकार, वह अपने भ्रम से ही पाप दुसी हो रहा है दुख देने कोई नहीं है। ठीक इसी तरह, श्रात्मा, अपने प्रापफे पैदा किये हुए दुस भोगता है, कोई दूसरा दु ख नहीं दे रहा है। फिर भी, पालमा यही समझता है, कि मुझे दूसरो ने दुख दे रखा है। यदि यह कुत्ता चाहे, तो उस काँच जटित महल थाहर निफल फर, अपने आप को सुखी बना सकता है, जो सर्वथा उसी के अधीन है, इसी तरह यदि आत्मा भी चाहे तो अपने आप को दुख-मुरा और सुसी बना मकता है। चाहे स्वर्ग का सुग्म हो, या नरफ का दुस, उस सुख-दुख फा कर्ता श्रात्मा ही है। श्रात्मा ने ही, म्बर्ग या नरफ में जाने योग्य कार्य किये हैं। किसी दूसरे के किये हुए कार्यों के कारण, अपना आत्मा, स्वर्ग या नरफ को नहीं जा सकता। आत्मा को अपने कर्तन्त्र से ही म्बर्ग नरक प्राप्त होता है । मुख दुर फा देनेवाना दूसरे को माननेवाले लोग, टपादान और निमित्त को नहीं समन्ते, इमामे उन्हें यह भ्रम रहता है, फि मुग्य-दुग का देने वाला दूसग है। आए विना कार्य नहीं होता। बाई स्वर्ग के मुम्ब दी, सनाय अनाथ निर्णय , या नरक के दुख, प्राप्त होते हैं कारण से हो। उन कारणों का उत्पादक, स्वय आत्मा ही है। आत्मा ही, स्वर्ग या नरक प्राप्त होने के कार्य करता है। विना कर्म किये, स्वर्ग या नरक नहीं जाता, न सुस-दु स ही पाता है। नरक या स्वर्ग का आयुष्य बाँधने में, फर्म-यन्ध की प्रधानता है। फर्म-धन्ध, अध्यवसाय से होता है और अध्यवसाय, श्रात्मा के अधीन हैं। इसलिए आत्मा ही सुस दुख का कर्त्ता, भोक्ता, एवं हर्ता है। कुछ लोग काल को नरक-स्वर्ग या सुख-दु स का देने वाला कहते हैं। कुछ का कहना है, कि स्वभाव से ही नरक या स्वर्ग प्राप्त होता है ।। कोई, सुख-दु.स का देने वाला होनहार को मानते हैं, और कुछ लोग कहते हैं, कि सब कुछ ईश्वर के अधीन हैं, वह जैसा चाहता है, वैसा हो जाता है। ।' कालवादी कहते हैं, कि हिर्ता काल ही है। वे लोग, अपने कथन की पुष्टि मे कहते हैं, कि, 'काल होने पर ही, जवानी आती है, और काल होने पर ही, बुढौंपा 'पाता है। फाल होने पर ही, स्त्रियाँ, बालक प्रेसव करती हैं और वृक्ष फूलते फनते हैं। काल होने पर ही गर्मी सर्दी और वर्षा भी होती है। इस प्रकार प्रत्येक कार्य, काल से ही होता है, निना ।, कुछ नहीं होता। इसी के अनुसार, काल होने पर, आत्मा जाना पड़ता है और काल होनेपर नरक जाना पड़ता है। - . .
७५ . . सनाथ अनाय निर्णय काल होने पर, सुख मिलता है, और काल होने पर दुख मिलता है । 'तात्पर्य यह, कि सब कुछ काल ही करता है और काल ही से सब कुछ होता भी है।' स्वभाववादी कहता है, कि 'काल फर्ता नहीं है, किन्तु स्वभाव का है। जो कुछ होता है, स्वभाव से ही होता है, काल श्रादि किसी के किये कुछ भी नहीं होता। यदि काल ही कर्ता है, काल से ही सब कुछ होता है, तो काल तो सब पर वर्तता है । फिर एक का काम होता है, और दूसरे का काम क्यों नहीं होता ? काल होने पर भी एक स्त्री के तो बालक होता है और दूसरी स्त्री के क्यों नहीं होता ? एक ही बाग के कुछ' वृक्ष तो फलते हैं और कुछ वृक्ष काल होने पर भी क्यों नहीं फलते ? एक वृत्त में आम लगते हैं, दूसरे में नीबू क्यों लगते हैं ? सव में आम क्यो नही लगते ? फान तो सय पर समानता से धर्तता है, फिर इस प्रकार की विषमता क्यों ? इन बातों पर दृष्टि देने फर्ता नहीं ठहरता, किन्तु स्वभाव को ठहरता है । जो कुछ होता है, स्वभाव से ही होता है । स्वभान होने पर ही, स्त्री के बालक होते हैं और वृक्ष में फल लगते हैं। इसी प्रकार, जिस वृक्ष में, आम का फल लगने का स्वभाव होता है, उसमें, श्राम का फल लगता है और जिसमें नीयू का फल लगने का स्वभाव होता है उसमें, नीयू का फल लगता है। जिसमें नरक से काल, 1 सनाथ अनाथ निर्णय सुस का स्वभाव है। . 4 - का स्वभाव होता है, वह नरक नाता है और जिसमें स्वर्ग का स्वभाव होता है, वह स्वर्ग जाता जिममें होता है, वह सुख पाता है, और जिसमें दुम का स्वभाव होता है, वह दुस पाता इस प्रकार, सम कुछ स्वभाव से ही होता है। म्वभाव ही, प्रत्येक बात का कर्ता है, काल आदि कोई भी कर्ता नहीं है। होनहारवादी, काल तथा स्वभाव आदि को न कुछ बताकर कहता है, कि 'जो कुछ होता है, होनहार से ही होता है। होनहार हो कर्चा है, दूसरा कोई भी कर्ता नही है। स्वभाववादी ने, कालवादी को झूठा ठहरा कर, स्वभाव को कर्ता बताया है, लेकिन स्वभाव भी कर्चा नहीं है, कर्चा तो होनहार ही है। यदि स्वभाव ही कर्ता हो, तो दो स्त्रियों में से, एक के तो पहले बालक हुआ और दूसरी के बहुत, समय पश्चात् बालक क्यों हुआ ? बालक उत्पन्न करने का स्वभाव तो इस दूसरी मे भी था, फिर इतने विलम्ब का क्या कारण ? स्वभाव होने पर भी पहले बालक नहीं हुआ और फिर बालक हुआ, इससे सिद्ध है, कि जो कुछ होता है, होनहार से ही होता है।' ईश्वर को फर्चा माननेवाले लोग कहते हैं, कि 'जो कुछ होता है, वह सब ईश्वर के करने से ही होता है। काल, स्वभाव या होनहार कर्त्ता नहीं है, किन्तु ईश्वर हो कर्ता है। ' प्रत्येक बात, , , .
No text on this page.
सनाय अनाथ निर्गय . काल को ही नही समझता है, तब वह, चैतन्य आमा के विषय में कुछ करने के लिए समर्थ कैसे हो सकता है ? चैतन्य आत्मा को, जड-काल के अधीन समझना, चैतन्य आत्मा के लिए, जड़ काल को कर्त्ता मानना, कौनसी बुद्धिमानी है ? जडा काल के अधीन चैतन्य आत्मा को मानना, चैतन्य को जड़ बनाना है। , इस कारण, पाल, कदापि कर्त्ता नहीं माना जा सकता। ही तरह, स्वाभाव के लिए भी यही प्रश्न होता है, कि 'स्वभाव' जड है, या चैतन्य.? यदि कहो कि जड़ है, है, तो फिर काल की ही तरह स्वभाव भी, चैतन्य श्रात्मा का कर्ता कैसे हो सकता है और चैतन्य आत्मा को, जड स्वभाव के अधीन फैसे माना जा सकता है ? यदि कहो, कि स्वभाव चैतन्य है, तो आत्मा से भिन्न है, या अभिन्न ? यदि अभिन्न है, तब तो फिर आत्मा ही, कर्ता ठहरता है, स्वभाव, कर्ता कहाँ रहा स्वभाव, आमा के अधीन है। आत्मा, अपने स्वभाव को अपनी इच्छानुसार बना सकता है। क्षमावान से क्रोधी, क्रोधी से क्षमावान, चोर से साहकार और साहूकार से चोर होते देखे जाते हैं। इस प्रकार, स्वभाव में परिवर्तन होता है, जो सर्वथा आत्मा के अधीन है। 'इसलिए, स्वभाव का नहीं हो सकता। यह बात दूसरी है, कि श्रात्मा के अधीन रहकर, स्वभाव, कर्तृत्व में भी भाग लेता हो, लेकिन इस कारण, स्वभाव का नहीं कहा . ? - सनाथ अनाथ निर्णय , है। स्वय कुछ करने की शक्ति नहीं रखता है । फिर भी यदि ईश्वर उसे नरक भेजता है, तब तो ईश्वर अन्यायी ठहरा । उसने वय ही, आत्मा से बुरा काम कराया और फिर भी उसे नरक में भेज दिया, इससे अधिक अन्याय और क्या होगा? ऐसा अन्याय तो मनुष्य भी नहीं करता। मनुष्य भी, अपने सेवक द्वारा फराये हुए अच्छे बुरे कार्य के परिणाम को, स्वय भोगता है, नौकर पर नहीं डालता । एक व्यापारी का मुनीम, यदि नुकसान का सौदा कर गैठता है, तो उस नुकसान को भी व्यापारी ही उठाता है, मुनीम को नहीं उठाना पडता। फिर जो ईश्वर स्वय ही आत्मा से पाप करावे, वहीं उस आत्मा को नरक भेज दे, यह न्यायोचित कैसे है ? उचित तो यह है, कि ईश्वर, प्रत्येक प्रात्मा को कुछ न कुछ इनाम ही दे, फिर चाहे आत्मा द्वारा बुरा ही काम सम्पादन क्यों न हुआ हो । क्योंकि बुरा काम करके भी, आत्मा ने, ईश्वर की आज्ञा का पालन ही किया है, और श्राक्षा का पालन करने के कारण, श्रात्मा तो पुरस्कार का ही अधिकारी है। श्रात्मा से, ईश्वर ही सब कुछ कराता हो, आत्मा, कुछ भी अधिकार न रखता हो, तब तो फिर, ससार में, किसी प्रकार का सदुपदेश देने, या धर्म का प्रचार करने आदि की भी आवश्यकता नहीं रहती। क्योंकि श्रात्मा तो दूसरे के अधीन है, इसलिए , - " " सनाय अनाय निर्णय . नही होता, तो इसका अर्थ तो यह हुआ, कि आत्मा एक मशीन है और ईश्वर उसका सचालक है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आत्मा एक मिट्टी का ढेला है और ईश्वर, उस मिट्टी के ढेले के बर्तन बनानेवाला कुम्हार है। या यो कहा जा सकता है, कि आत्मा बन्दर है, और ईश्वर मदारी। ईश्वर-रूपी मदारी, श्रात्मा-रूपी बन्दर को जैसा सिसलाता और नचाता है, उसे उसी प्रकार नाचना होता है । ईश्वर को, इस प्रकार का कर्ता मानने पर तो बड़ी गड़बड होती है। ससार अना- वस्था दोष से परिपूर्ण हो जाता है। फिर तो धर्म करने की भी श्रावश्यकता नहीं रहती। क्योकि, चाहे धर्म करो या पाप, होगा वही, जो ईश्वर चाहेगा। धर्म करने से, कोई लाभ न होगा। इसी प्रकार, यह भी मानना होगा, कि आत्मा यदि धर्म करता है, तो ईश्वर की प्रेरणा से और पाप करता है, तो ईश्वर की प्रेरणा से। अच्छा बुरा, ईश्वर की प्रेरणा से ही करता है। सब ईश्वर ही करता कराता है। लेकिन यदि ऐसा है, तो यह प्रश्न होता है, कि फिर आत्मा को, नरकादि के कष्ट क्यो भोगने पड़ते हैं ? आत्मा ने, स्वय तो कुछ किया नहीं, जो कुछ किया, वह ईश्वर के कराने से किया, फिर विना किये का फल, आत्मा को क्यों भोगना पडे १ ईश्वर के सम्मुस, आत्मा तो एक मिट्टी के देले के समान, या एक मदारी के बन्दर के समान निरधिकारी . , सनाथ अनाभर्णिय 1 . सभी तो पापियो फो दण्ड और पुण्यात्माओं को सुख मिलता है। यदि ईश्वर फर्ता न हो, सो यह व्यवस्था न रहे ।' इस प्रकार, राजा का उदाहरण देकर, ईश्वर-फर्तृत्व सिद्ध फरते हैं, लेकिन इस दलील पर भी फई प्रश्न होते हैं। सर से पहला प्रश्न तो यही होता है कि जब ईश्वर ही प्रात्मा से पुण्य- पाप फराता है, तब उसका फल प्रात्मा क्यों भोगे ? दूमरा प्रश्न यह होता है कि यहुत स्थानों पर, राजा नहीं होता है, विना राजा फे हो काम पतता है, तो क्या इसी प्रकार, कहीं-कही विना ईश्वर के भी फाम चलता है ? तीसरा प्रश्न यह है कि कहीं-कहीं राजा का अस्तित्व ही उठ गया है और सम्भव है कि सभी जगह मे उठ जाये, तो क्या ऐसा ईश्वर के लिए भी हो सकता है ? चौथा प्रश्न यह है कि राजा का परिवर्तन भी होता रहता है और उसके नियम भी यदलते रहते हैं, तो क्या ऐसे ही ईश्वर और उसके नियम भी परिवर्तनशील हैं १ सबसे बडा प्रश्न यह होता है कि एक आदमी, चोरी कर रहा है। यह चोरी का पाप, वह 'आदमी, पूर्व-पाप के दण्ड स्वरूप कर रहा है, या नया पाप कर रहा है ? यदि यह कहो, कि पूर्व पाप के दण्ड स्वरूप फर रहा है, तर तो यह अर्थ हुआ कि ईश्वर पाप का दण्ड देने के लिए, पाप कराता है। फिर तो किसी का 'चोरी मत करो।" उपदेश, ईश्वरीय- व्यवस्था में हस्तक्षेप करना-अपराध होगा । यदि यह कहा जा
सनाथ-अनाय निर्णय
.
उस पर उपदेश का कोई असर नहीं हो सकता और ईश्वर को
उपदेश की आवश्यकता ही क्या है ? यदि यह कहा जावे, कि
ईश्वर की प्रेरणा से ही, एक आत्मा, दूसरे आत्मा को उपदेश
देता है, तो यह बात ठीक नहीं जंचती। क्योंकि वही ईश्वर,
घोरी त्यागने का उपदेश दिलावे और वही ईश्वर चोरी करने की
प्रेरणा करे, यह कैसे सम्भव है।
ईश्वर को कर्त्ता मानने पर, इसी प्रकार के बहुत से ऐसे प्रश्न
उत्पन्न होते हैं, जिनका समाधान होना कठिन है।
1
।
। ईश्वर को कर्ता माननेवाले लोग ईश्वर-कर्तृत्व के विषय में,
एक यह दलील देते हैं, कि 'ईश्वर को कर्ता न मानने से, ससार
में अन्याय फैल जावेगा । लोगों को, पुण्य-पाप का फल देनेवाला
कोई न रहेगा। कोई भी अपराधी, स्वय दण्ड नहीं भुगतना
चाहता। स्वय जेल जाना, किसी को भी पसन्द नहीं है।
खेच्छापूर्वक, कोई भी दुख नहीं सहना चाहता, सब सुख ही
चाहते हैं। इसलिए, जिस प्रकार राजा के न होने पर अन्याय
अपराध बढ जावेंगे, अपराधियो को दण्ड और अच्छे काम
करनेवालो को पुरस्कार देनेवाला कोई न रहेगा, जिससे व्यवस्था
मे गडबड होगी और अशान्ति घढ जावेगी, इसी प्रकार, यदि
ईश्वर न हो, तो पाप-पुण्य का फल कौन दे १ ईश्वर कर्ता है,
८३ सनाथ अनाथ निर्णय तभी तो पापियों को दण्ड और पुण्यात्मानो को सुख मिलता है। यदि ईश्वर कर्ता न हो, तो यह व्यवस्था न रहे ।' । इस प्रकार, राजा का उदाहरण देकर, ईश्वर-कर्तृत्व सिद्ध करते हैं, लेकिन इस दलील पर भी कई प्रश्न होते हैं। सब से पहला प्रश्न तो यही होता है कि जब ईश्वर ही श्रात्मा से पुण्य- पाप करता है, तब उसका फल आत्मा क्यों भोगे ? दूसरा प्रश्न यह होता है कि बहुत स्थानों पर, राजा नहीं होता है, विना राजा के ही काम चलता है, तो क्या इसी प्रकार, कहीं-कही बिना ईश्वर के भी काम चलता है ? तीसरा प्रश्न यह है कि कहीं-कहीं 'राजा का अस्तित्व ही उठ गया है और सम्भव है कि समी जगह से उठ जावे, तो क्या ऐसा ईश्वर के लिए भी हो सकता है ? चौथा प्रश्न यह है कि राजा का परिवर्तन भी होता रहता है और उसके। नियम भी बदलते रहते हैं, तो क्या ऐसे ही ईश्वर और उमफे नियम भी परिवर्तनशील हैं सबसे बडा प्रश्न यह होता है कि एक आदमी, चोरी कर रहा है। यह चोरी का पाप, यह आदमी, पूर्व-पाप के दण्ड स्वरूप कर रहा है, या नया पाप कर रहा है ? यदि यह कहो, कि पूर्व पाप के दण्ड स्वरूप फर रहा है, तब तो यह अर्थ हुआ कि ईश्वर पाप का दण्ड देने के लिए, पाप कराता है। फिर तो किसी का 'चोरी मत करो।' उपदेश, ईश्वरीय- च्यवस्था में हस्तक्षेप करना-अपराध-होगा । यदि यह कहा जावे, - सनाय-अनाथ निर्णय ८४ कि वह चोरी करनेवाला, नया पाप कर रहा है, तो ईश्वर को प्रेरणा से कर रहा है, या स्वेच्छा से १, यदि ईश्वर की प्रेरणा से कर रहा है, तर तो यह हुआ कि ईश्वर पाप कराता है और स्वय पाप करा कर भी, पाप का दण्ड देता है। यदि यह कहा जावे, कि पाप करने के लिए, आत्मा स्वतत्र है, इसलिए वह स्वेच्छा से पाप कर रहा है, तब भी यह प्रश्न होता है, कि पाप हो जाने पर उसका दण्ड देने के बदले, ईश्वर, पाप करनेवाले को, पाप करने के समय ही क्यों नहीं रोक देता? पाप करने दे कर फिर दण्ड देने से, ईश्वर को क्या लाभ ? वह दयालु कहाता है, फिर किसी को दु ख मे पडने या किसी के पास दु ख रहने ही क्यों देता है? ईश्वर को कत्ती सिद्ध करने के लिए दी जाने वाली समस्त दलीलें, इसी प्रकार लघर ठहरती हैं। हाँ, ईश्वर को निमित्त रूप की तो जैन-शास्त्र भी मानते हैं, लेकिन ईश्वर को उपादान कर्ता मानने, एव आत्मा को-जो प्रत्यक्ष ही कर्ता भोक्ता है-अकर्ता मानने का कोई कारण नहीं है। यदि आत्मा को ही शुद्ध-प्ररुपणा के अनुसार ईश्वर माना जावे, तर तो ईश्वर को कती मानने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ईश्वर को व्यक्ति विशेप और आत्मा से भिन्न मान फर का मानना, ठीक नहीं है। गीता में भी T कहा है- เป็น सनाथ अनाथ निर्णय न कर्तृत्व न कमाणि लोकस्य सृजति प्रभु.॥ अध्याय ५धा '' अर्थात्ईश्वर न तो ससार के कर्तृत्व में है, न कर्मों की सूष्टि करने - + इस प्रकार गीता के अनुसार भी, ईश्वर का नहीं है। कर्म करने में श्रात्मा स्वतंत्र है, लेकिन कर्मवन्ध हो जाने पर आत्मा, कर्म के प्राधीन हो जाता है। फिर श्रात्मा को, को का अच्छा बुरा फल-विपाक या प्रदेश से-भोगना ही पड़ता है। कर्म का फल भुगताने वाला कोई दूसरा नहीं है, किन्तु कर्म स्वयं ही अपना फल उसी प्रकार भुगताते हैं, जिस प्रकार मिश्री और मिर्ची, अपना मीठापन और कडापन देती हैं। मिश्री को मुँह में रसने पर मीठापन और मिर्च को मुंह में रखने पर कडुश्रा- पन, श्राप हो मालूम होता है। इस मीठेपन था कडएपन के देने में, किसी और की सहायता-प्रेरणा या शक्ति नहीं होती। यदि किसी दूसरे की प्रेरणा या शक्ति से मिर्च और मिश्री, कडु- आपन या मीठापन दें, तो इसका अर्थ यह होगा कि मिर्च और मिश्री मे, स्वभावत कडुआपन या मीठापन नहीं है। लेकिन वास्तव में, मिर्च और मिश्री, किसी की प्रेरणा से कडुआपन या मीठापन नहीं देती है, किन्तु उनमें, मुँह में रखने पर फडुबा- पन और मीठापन देने का स्वभाव, ही है। ठीक इसी प्रकार, सनाथ अनाय निर्णय , फर्म में फल भुगताने की शक्ति स्वभावत है। शुभ कर्म का शुभ फल और अशुभ कर्म का अशुभ फल, कर्म अपने स्वभाव से ही भुगताते हैं। इसमें किसी तीसरे फी आवश्यकता नहीं है । यदि कर्म का फल कोई तीसरा भुगताता हो, तो इसका अर्थ यह होगा कि कर्म अपना फल भुगताने की शक्ति नहीं रखते। लेकिन यह बात नहीं है। मिर्च और मिश्री फी तरह, कर्म में भी अच्छा-बुरा फल भुगताने की शक्ति है, इसलिए फर्म-फल भुगताने के लिए, ईश्वर की आवश्यकता नहीं होती। रही यह वात, कि फिर आत्मा, स्वर्ग या या मोक्ष क्यों नहीं चला जाता ? इसका उत्तर यह है, कि जैन-शास्त्रो के समीप, स्वर्ग कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। जैन-शास्त्र, स्वर्ग को भी कर्म-फल भोगने का वैसा ही एक स्थान मानते हैं, जैसा कि नरक को । हाँ, यह अन्तर अवश्य मानते हैं, कि स्वर्ग में शुभ फल भुगता जाता है और नरक में अशुभ फर्मों का फल भुगता जाता है । शुभ कर्म भोगने के लिए, प्रात्मा को स्वर्ग जाना पड़ता है, इसलिए यदि आत्मा स्वर्ग चला भी गया, तब भी कोई विशे- पता की बात नहीं हुई । अब केवल मोक्ष जाने की बात रही, लेकिन जब तक आत्मा के साथ कर्म हैं, आत्मा, मोत जा ही कैसे सकता है और कर्म-रहित होने पर आत्मा को मोक्ष से रोक ही कौन सकता है। कर्म-रहित आत्मा का नाम ही 'मुक्तात्मा' है। आत्मा कों का - सनाय-अनाथ निर्णय के साय कर्म न होने को ही मोत कहते हैं। यदि आत्मा अपने कों को नष्ट कर दे, तो यह मुक्त ही है। साराश यह, कि फाल, स्वभाव, होनहार, या ईश्वर को की मानना, भयफर भूल है। इस भूल मे, आत्मा, अनाथता पड़ता है । कर्ता, कोई दूसरा नहीं है, किन्तु आत्मा ही है। इसी- प्रकार, फल देने वाला भी कोई दूसरा नहीं है, किन्तु कर्म, अपना फल आप ही भुगता देते हैं। इसलिए श्रात्मा ही फती, हत्ती और भोक्ता है। फुछ लोग कहते हैं, कि जो कुछ होता है, फर्म से होता है। इस प्रकार, वे सब भलाई धुराई कर्म पर ही डाल देते हैं, लेकिन यह नहीं विचारते कि ये कर्म, किये हुए किसके हैं ? कर्म का करने वाला फी कौन है ? कर्म आत्मा के किये विना श्राप ही आप नहीं पाये हैं। प्रात्मा के करने से ही पाये हैं । जब आत्मा के फरने मे ही फर्म आये हैं और अपना अच्छा बुरा फल देते हैं, तब कर्म के कर्ता-आत्मा को छोड़ कर, कर्म को दोप देने से क्या लाभ ? यह तो वही कुत्ते को सी बात हुई, जो लकडी मारने वाले को न पकड़ कर, लकडी को पकडता है । फर्म तो आत्मा के किये हुए हैं और श्रात्मा उन्हे नष्ट करने की शक्ति भी रसता है। उन बेचारों को क्या शक्ति है, जो आत्मा के किये निना ही, आत्मा को अच्छा चुरा फल भुगतावें। कोई आदमी अपने .
सनाय-अनाथ निर्णय ८८ . मुँह में मिर्च रस ले, और जब मुँह जलने लगे, तब मिर्च को दोष दे, तो ऐसे आदमी का मिर्च को दोष देना, मूर्खता के सिवा और क्या कहा जावेगा ? मिर्च की ही तरह कमों का तो शुभाशुभ फल देना, स्वभाव ही है। यदि आत्मा, कर्म में लिप्त न हो, तो वे कर्म, शुभाशुभ फल दे ही कैसे सकते है। इस प्रकार बेचारे फर्म, निर्दोप हैं। तात्पर्य यह कि चैतरणी नदी एव कूटशाल्मली वृक्ष ऐसा दुस देने वाला, तथा कामधेनु और नन्दनवन ऐसा सुख देने वाला आत्मा ही है। यही वात अनाथता और सनाथता के लिए भी है। आत्मा, अनाथ भी अपने आप ही होता है और सनाथ भी अपने आप ही होता है । कोई दूसरा न तो रुष्ट होकर अनाथ बना सकता है न तुष्ट होकर सनाथ बना सकता है। अव प्रश्न यह होता है, कि आत्मा, वैतरणी नदी, कूट- शाल्मली वृक्ष, कामधेनु या नन्दनवन बनता कैसे है ? अर्थात् कैसे कार्यों के करने से वैतरणी नदी, कूटशाल्मली वृक्ष बनता है और कैसे कार्यों से कामधेनु, एव नन्दन वन बनता है ? सनाथी मुनि के शब्दों में, इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि सासा- रिक गड़बड में फंस कर पाप एव निषिद्ध कार्य करना, यह तो अपने आत्मा को वैतरणी नदी और फूटशाल्मली वृक्ष बनाना है, तथा सासारिक मझटों से निकल फर, आत्मा को मोक्ष की . - सनाथ अनाथ निणय ओर बढाना, संयम धारण फरना, यह अपने आत्मा को काम- 'धेनु एव नन्दनवन बनाना है । सनाथी 'मुनि कहते हैं, कि पहले मेरा आत्मा ही चैतरणी नदी और कूटशाल्मली वृक्ष घना हुआ था, इसीसे स्वय भी कष्ट भोग रहा था और दूसरो को भी कष्ट पहुँचा रहा था, लेकिन अब वही मेरा श्रात्मा, कामधेनु और नन्दनग्न बन गया है, इससे आप भी श्रानन्द में है, तथा दूसरो को भी आनन्द पहुंचाता है। राजा, जब मैं रोग-प्रस्त था, तब कहता था, कि मेरी आँखें, मेरा सिर और मेरा शरीर दुख दे रहा है । यदि ये दुख न दें, तो मुझे शाति हो जावे। उधर वैद्य कहते थे, कि वात पित्त आदि में विषमता आगई है, इससे दुख हो रहा है। यदि वात पित्त आदि मम हो जावें, तो दुस मिट जावे । उनकी समझ से, दवा, वात पित्त कोसम कर सकती थी, इसलिए, दवा ही 'शाति देने वाली थी । इस प्रकार में कुछ समझरहा था और वैद्य कुछ फहरहे थे। अपनी समझ के अनुसार उन्होंने मेरा उपचार भी किया, लेकिन मुझे, शान्ति न हुई । वैदा लोग, पीडा का वास्तविक निदान करते थे, वास्तविक निदान नहीं करते थे। यानी यह नहीं बतलाते थे, कि वास्तव में यह पीड़ा पाई कहाँ से । उनकी दृष्टि, अपने व्यवसाय तक ही सीमित थी, इसलिए वे, इन रोगों के होने का यह कारण न बता सके, कि ये रोग प्रात्मा की अनाथता से ही सनाय-अनाथ निर्णय उपन्न हुए है। अन्त में, उपचार की ओर से उत्पन्न निराशा एवं अविश्वास ने, मेरे ही हृदय में यह विचार पैदा किया, कि ये सब रोग, मेरे श्रात्मा मे से ही निकले हैं और उसकी अना थता से उत्पन्न हुए हैं। सनाथी मुनि ने, राजा श्रेणिक से यह कहा है, कि हमारा श्रात्मा ही वैतरणी नदी, कूटशाल्मली वृक्ष, कामधेनु और नन्दन वन है। इस कथन पर से किसी के हृदय में यह प्रश्न हो सकता है, कि वैतरणी नदी, कूटशाल्मली वृक्ष, नन्दनवन और कामधेनु का अस्तित्व है भी, या केवल कल्पना ही कल्पना है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि शास्त्रकारों को, किसी प्रकार का भय दिखाना या प्रलोभन देना अभीष्ट नहीं था, जो वे झूठी कल्पना करते । झूठी कल्पना तो तब की जाती है, जब कोई स्वार्य हो । शास्त्रकारों ने, वैतरणी नदी एव नन्दनवन आदि बता कर यह नहीं कहा है, कि हमें कुछ दोगे, तो नन्दनवन तथा कामधेनु प्राप्त होगी और नहीं दोगे, तो वैतरणी नदी एवं कूटशाल्मली वृक्ष प्राप्त होगा। यदि उन्होंने, ऐसी कोई योजना रखी होती, तब तो उक्त सन्देह होना स्वाभाविक था, लेकिन उन्होंने ऐसी कोई योजना नहीं रसी है-ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया है-इसलिए यह सन्देह नहीं किया जा सकता, कि शास्त्र कारों ने, वैतरणी नदी आदि की झूठी कल्पना की होगी । - सनाथ अनाथ निर्णय %3 " . " . - - है ? शास्त्रकारों ने, वैतरणी नदी आदि बताने के साथ ही यह भी कहा है, कि तुम्हारा श्रात्मा ही वैतरणी नदी, कूटशाल्मली वृक्ष, नन्दनवन और कामधेनु है । - तुम्हारा आत्मा ही, दुस एवं सुस को कर्ता है। इस प्रकार वैतरणी नदी, तथा नन्दनवन आदि का अस्तित्व आत्मा में ही सिद्ध किया है और कहा है, तुम अपने आत्मा को, इनमें से चाहे जैसा बना सकते हो। अब प्रश्न यह होता है कि वैतरणी नदी, कटशाल्मली वृक्ष, कामधेनु और नन्दनवन, हमारे आत्मा से दूर हैं और हमारा श्रात्मा इन से दूर है। ऐसी दशा में, आत्मा से इन सब का सम्बन्ध कैसे हो सकता इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि स्वर्ग-नरक, सुस-दुख, चैतरणी नदी, फूटशाल्मली वृक्ष, कामधेनु और नन्दनवन आदि सबका विधायक आत्मा ही है । श्रात्मा ही विधायक है, इस लिए वैतरणी नदी तथा नन्दनवन आदि दूर होने पर भी, समीप किस प्रकार पाजाते हैं और प्रात्मा उनके समीप किस प्रकार पहुँच जाता है, यह वात निम्न दृष्टान्त पर से समझ में पाजावेगी। एक आदमी बीमार है। निरोगता उससे दूर है। इसी प्रकार एक आदमी स्वस्थ है और रोग उससे दूर हैं। लेकिन रोगी आदमी ने पथ्य और स्वस्थ आदमी ने कुपथ्य का सेवन , - सनाथ-अनाथ निर्णय ९२ किया, इससे रोगी आदमी स्वस्थ बन गया और स्वस्थ आदमी रोगी बन गया। यानी, बीमार आदमी से निरोगता दूर थी, फिर भी उसके पास आगई और वह वीमार, निरोगता के पास तथा स्वस्थ श्रादमी से रोग दूर थे, फिर भी रोग समीप श्रागये और वह रोगों के समीप हो गया। होगया । - - . न - ठीक इसी प्रकार, वैतरणी नदी, कुटशाल्मली वृक्ष, काम- धेनु एव नन्दनवन से आत्मा और श्रात्मा से ये सब दूर हैं, फिर भी अच्छे या बुरे, पाप या पुण्य कार्य से, ये सब आत्मा और आत्मा इनके समीप हो जाता है। सनाथी मुनि ने, राजा श्रेणिक से कहा, कि आत्मा ही सुख दुस का निर्माता एव भोक्ता है और आत्मा ही अच्छा करने वाला मित्र, तथा बुरा करने वाला शत्रु है। सनाथी मुनि के इस कथन के प्रथमाश का विवेचन तो हो चुका, अब यह देखना है, कि आत्मा, अच्छा करने वाला मित्र एव चुरा करने -वाला शन्नु कैसे बनता है। सबसे पहले यह देसने की आवश्यकता है, कि, मित्र तथा शत्रु कहते किसे हैं ? वैसे तो ससार में साने पीने वाले बहुत से "मित्र बन जाते हैं, लेकिन वे वास्तव में मित्र हैं या शत्रु, यह परीक्षा समय विशेष पर ही होती है। तुलसीदासजी ने कहा है- .
सनाथ अनाथ निर्णय न + १ धीरज धर्म मित्र अरु नारी। भापति काल परखिये चारी॥ अर्थात्-धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री की परीक्षा, आपत्ति- काल में करो। मित्र की परीक्षा, आपत्ति के समय में ही होती है। दुःख मे जो सहायता करे, वही मित्र है । सकट के समय सहायता न करे, वह मित्र नहीं है किन्तु मित्र' के रूप में छिपा हुआ, शत्रु है। श्री जम्बू महाराज ने अपनी रानियो से कहा था, कि प्रिये, तुम प्रेम दिखाती हो, मित्रता बताती हो, लेकिन मित्र वही है, जो सकट के समय काम आवे । केवल सुस के समय, मित्रता का प्रदर्शन करने वाला ही, मित्र नहीं है। इसके लिए मैं एक दृष्टान्त देता हूँ। । एक राजा का प्रधान था। प्रधान ने विचारा कि अपने समय असमय के लिए किसी को मित्र भी बना रखें । यह विचार कर उसने अपना एक नित्य-मित्र बनाया। प्रधान, नित्य- मित्र की बहुत सातिर करता । उसे, अपनी तरह खिलाता पिलाता और पहनाता ओढाता । नित्य मित्र से वह किसी भी प्रकार का भेद दुराव न रखता । नित्य-मित्र, प्रधान के और प्रधान, नित्य- मित्र के साथ ही रहता । प्रधान ने, एफ दूसरा पर्व-मित्र भी बनाया। वह, पर्व-मित्र को पाठवें पन्द्रहवें दिन अपने यहाँ चुला - सनाथ अनाथ निर्णय ९४ कर, उसकी खातिर करता, खिलाता-पिलाता और पहनाता श्रोहाता । इन दोनों मित्रो का प्रधान को बहुत भरोसा था। प्रधान समझता था कि ये मित्र कष्ट के समय में मेरी सब प्रकार की सहायता करेंगे। दोनो मित्रों के प्रकट व्यवहार से भी ऐसा ही प्रतीत होता था। इन दो-मित्रों के सिवा, प्रधान ने, एक सेठ, को भी मित्र बना रखा था। प्रधान का, सेठ से कोई विशेष व्यवहार न था, केवल , सैन जुहार का ही सम्बन्ध था। प्रधान और सेठ जब कभी इधर-उधर मिल जाते, तब परस्पर जुहार- कर लेते और "इशारे से एक दूसरे की कुशल पूछ लेते । इन दोनो मे, इतनी ही मित्रता थी। कुछ दिनो तक मित्रों के साथ प्रधान का मित्रतापूर्ण व्यवहार चलता रहा । प्रधान के साथ नित्य-मित्र तो सदा और पर्व-मित्र यदा कदा आनन्द, उडाता रहा। इनकी परीक्षा का कोई समय न प्राया। एक बार राजा की प्रधान पर कोप दृष्टि हो गई। राजा ने, आज्ञा दी कि प्रधान को पकड कर कारागार में डाल दो। राजा की आज्ञा का समाचार सुन कर प्रधान भयभीत हुआ। उसने विचारा, कि जो, होना होगा सो तो होगा ही, लेकिन यदि इस समय मैं क्रुद्ध राजा के हाय पड गया, तो मेरी बड़ी दुर्दशा होगी । इसलिए इस समय राजा के हाथ न पडना ही अच्छा है। " 71 -- समाय-अनाथ निर्णय -- - इस प्रकार विचार कर, प्रधान घर छोड, कर भाग निकला। उसे सबसे अधिक अपने नित्य मित्र का विश्वास था, इसलिए वह अपने नित्य-मित्र के पास गया । प्रधान ने नित्य-मित्र से राजा के कोप का वृतान्त कह कर कहा कि मेरे घर पर राजा ने पहरा लगा दिया है, मैं जैसे-तैसे निकल भागा हूँ, इस समय यदि में पकड़ा जाऊँगा, तो मेरी बडी दुर्दशा होगी, इज्जत मिट्टी में मिल जावेगी इसलिए तुम मुझे कही छिपने को स्थानदो और मुझे बचाने का प्रयत्न करो । प्रधान की बात के उत्तर में, नित्य-मित्र ने कहा, कि 'जिस पर राजा का फोप है, उसे मैं अपने घर में कदापि नहीं रख सकता । नित्य-मित्र की यह बात सुन कर, प्रधान को बडा श्राश्चय हुआ । 'वह निय-मित्र से कहने लगा कि अरे । तू यह क्या कहता है । मैं तेरा और तू मेरा मित्र है न । अाज तक अपनसाथ रहे, साथ और समान साया-पिया और अाज समय पड़ने पर इस तरह उत्तर देता है १ नित्य-मित्र ने, जुद्ध हो कर प्रधान से कहा कि बस । यहाँ से चला जा, नहीं तो अभी पत्थर से सिर फोड दूंगा या राजा को सपर देकर पकडवा दूंगा । प्रधान अधिक क्या कहता । वह चुपचाप भाग चला। नित्य-मित्र के पास से रवाना होकर, प्रधान अपने पर्व मित्र के यहाँ आया। पर्व-मित्र ने पहले तो प्रधान की सातिर की, लेकिन जब प्रधान ने अपना सकट सुना फर, पर्व-मित्र से सहायता सनाथ-अनाथ निर्णय w . एव रक्षा की याचना की, तब पर्व-मित्र ने हाथ जोड कर प्रधान से कहा कि मैं। राजा के अपराधी, को ,अपने यहाँ रखने में असमर्थ हूँ। यदि राजा को खवर हो जावेगी, तो वह मेरा घर खुदवा कर फिंकवा देगा । इसलिए कृपा करके आप यहाँ से पधार जाइये । हाँ, यदि आप भूसे हो, तो मैं आपको भोजन करादू और यदि द्रव्य की आवश्यकता हो, तो द्रव्य ले जाइये, लेकिन यहाँ मत ठहरिये। नित्य-मित्र ने प्रधान के साथ जो व्यवहार किया था; उसके अनुभव ने, प्रधान में यह साहस न होने दिया, कि वह पर्व-मित्र से और कुछ कहता । वह, पर्व-मित्र के यहाँ से यह विचार कर चलता बना, कि इसके साथ तो मैंने, नित्य-मित्र से कम ही मित्रता का व्यवहार किया था, फिर भी यह पत्थर मारने को तो तैयार नहीं हुआ। प्रधान, सैन जुहारी मित्र, सेठ के यहाँ गया । रात का समय था। सेठ के घर का द्वार वन्द हो चुका था। नित्य-मित्र और पर्व-मित्र की ओर से रक्षा के लिए स्थान नहीं मिला था किन्तु मित्रता के विपरीत व्यवहार हुआ था, इसलिए प्रधान को अपने सैन जुहारी मित्र सेठ से किसी प्रकार की आशा तो न थी, फिर भी उसने सडक पर सडे होकर सेठ को आवाज दी। सेठ ने द्वार खोल कर पूछा कौन है ? प्रधान ने कहा इधर ., मैं ।
सनाथ अनाथ निर्णय , बताता हूँ। सेठ प्रधान के समीप गया। प्रधान को देखकर सेठ ने आश्चर्यान्वित हो कहा--कि आप इस समय कैसे ? प्रधान ने स्तर दिया, कि मुझे प्रापसे कुछ कहना है । सेठ ने कहा, कुछ कहना है, तो घर में चल कर कहिये, यहाँ सडक पर सडे रह कर बात करना ठीक नहीं। प्रधान ने कहा कि आप मेरी बात यहीं सुन लें तो अच्छा होगा, मुझे घर में ले जाने पर सभव है कि आपकी कोई हानि हो । क्योंकि इस समय मुझ पर राजा का कोप है। सेठ ने उत्तर दिया, कि यदि ऐसा है, तो सडक पर सडे रह कर बात करना और भी बुरा है। आप घर में चलिये, जो होगा सो देसा जावेगा। मेठ, प्रधान को अपने घर में लिवा गया। घर में पहुँच कर, सेठ ने, प्रधान से कहा, कि पहले श्राप शौचादि आवश्यक कार्य से निपट लीजिये, जिसमें फिर निश्चिन्त होकर अपन यात चीत करें । सेठ के कथनानुसार प्रधान ने हाथ मुँह धोया। फिर सेठ ने, प्रधान को भोजन कराया। प्रधान को ऐसे समय में भोजन कर अच्छा लग सकता था, फिर भी उसने सेठ के अत्याधिक आग्रह पर थोडाबहुत भोजन किया । भोजन कर चुकने के पश्चान् सेठ ने प्रधान से कहा, कि अब आप सब वृत्तान्त कहिये, परन्तु मैं आपका मित्र हैं, इसलिए श्राप कोई बात छिपाइये या मूठ मत कहिये, कि तु सची २ सात वताइये, .
९८ सनाथ अनाथ निर्णय जिसमें कुछ उपाय किया जासके । प्रधान ने यह बात स्वीकार की। प्रधान, सेठ से कहने लगा, कि मेरे लिए मेरे विरोधी लोगों ने, राजा से अमुक अमुक वातों की चुगली की है। इन्हीं बातों पर से, राजा मुझ पर कुपित हैं, लेकिन वास्तव में ये बातें गल्ल हैं और मैं निर्दोष हूँ। यदि राजा ने मुझे अवकाश दिया होता, या मुझ से पूछा होता, तब तो मैं सब बातें बता देता, परन्तु इस समय तो राजा के पास जाना, अपनी, इज्जत सोना है । विरोधी लोगो ने जो बातें राजा से कही हैं, उनमें की अमुक अमुक बात तो अमुक मिसल में, या अमुफ बही में लिखी हुई है। हाँ, अमुक बात की गल्ती मेरे से अवश्य हुई है। प्रधान ने इस प्रकार अपने ऊपर लगाये जाने वाले सभी अभियोगों एव उनकी सफाइयो से सेठ को परिचित कर दिया और जो भूल हुई थी, उसे भूल मान लिया। प्रधान की सब बातें सुन कर, सेठ ने प्रधान से कहा कि कोई चिन्ता की बात नहीं है । सव कुछ अच्छा ही होगा। अब जब तक राजा की कोप-दृष्टि न मिट जावे, तब तक आप इसी घर में रहिये, किसी प्रकार का सकोच न करिये। आपने मुझे सच्ची वातों से परि- चित कर दिया है, इसलिए परिणाम भी अच्छा ही होगा। प्रधान को, सेठ की बातो से बहुत धैर्य मिला । वह, सेठ के यहाँ ही रहा। दूसरे दिन सेठ, राजा के पास पहुँचा। राजा . ९९ सनाय-अनाथ निर्णय से, सेठ ने अपने श्राने की सूचना कराई। राजा ने विचारा, कि यह सेठ अपने यहाँ कभी कभी ही आता है, और जब भी आता है, किसी न किसी काम से। आज भी यह किसी काम से हो पाया होगा। इस प्रकार विचार कर, राजा ने सेठ को अपने पास बुलाया। उचित शिष्टाचार और थोड़ी बहुत इधर- उधर की बातों के पश्चात् , सेठ ने प्रधान का किरसा छेडा । सेठ ने राजा से कहा, कि प्रधानजी के विषय में बहुत से समा- चार सुनने में आते हैं, और मालूम हुआ है, कि श्राप प्रधानजी पर रुष्ट हैं तथा प्रधानजी भी भाग गये हैं, सो क्या ये बातें सच्ची हैं ? राजा ने उत्तर दिया-हाँ सेठ, प्रधान बड़ा देईमान निकला । उसने राज्य का बहुत नुकसान किया और अब भाग 'गया है, लेकिन भाग कर कहाँ जावेगा। जहाँ होगा, वहाँ से पकड़वा मँगवाऊँगा और उसे दण्ड दूंगा। मेठ-अपराधी को दण्ड तो मिलना ही चाहिए और श्राप फे हाथ भी बड़े हैं, प्रधानजी भाग कर कहाँ जावेंगे, परन्तु प्रश्न यह है, कि प्रधान के पिता राज्य का प्रबन्ध कौन करेगा। राजा-दूसरा प्रधान लावेंगे । सेठ यदि दूसरा प्रधान भी ऐसा ही वेईमान निकला तो? राजा-उसकी जाँच करेंगे, तब रखेंगे। सेठ-मेरी प्रार्थना यह है, कि जब आप उस नये प्रधान सनाथ अनाथ निर्णय १०२ . की जॉच, करेगे,, तो पुराने प्रधान की ही जाँच क्यों न कर ली जावे ? पुराने प्रधान के जिन-जिन कामों के विपय में शिकायत है, उन-उन कामो की कागज-पत्र श्रादि से जाच कर ली जावे,जिसमें मालूम तो हो जावे, कि वास्तव में प्रधान की वेईमानी है, या नही । प्रधानजी मेरे मित्र थे, वे प्राय नित्य ही मुझे मिला करते थे और दरवार में जो काम करते उनका भी जिकर किया करते थे । प्रधानजी के कार्यों का बहुत समाचार मुझे भी मालूम है, इसलिए मैं भी इस जाँच मे कुछ सेवा दे सकूँगा। राजा को, सेठ की बात ठीक ऊँची । उसने प्रधान के विरुद्ध लगाये गये सर अभियोग, सेठ को बतलाये। सेठ ने एक एक अभियोग के लिए राजा से कहा, कि इस अभियोग के विषय में प्रधानजी ने मुझ से यह कहा था, कि अमुक फाइल में-या अमुक वही में-सब खुलासा है। सेठ के कथनानुसार, राजा ने फाइलें और वहियें देखी, तो उसमें प्रधान की कोई बेईमानी मालूम नहीं हुई। कुछ अभियोगो के लिए, सेठ ने कहा कि यह प्रधानजी से गल्ती हुई। प्रधानजी मुझसे भी कहते थे, कि अमुक काम में मेरे से अमुक गल्ती हो गई है। इतना बडा राजकाज चलाने वाले से यदि ऐसी गल्ती- हो जाये, तो कोई आश्चर्य या बेईमानी की बात तो नहीं हो सकती। इस प्रकार धीरे-धीरे सेठ ने, राजा के सामाने, प्रधान को, ।।
१०१ सनाथ अनाथ निर्णय सभी अभियोगों में निर्दोष सिद्ध कर दिया। राजा को मालूम हो गया, कि प्रधान निदोप है, और पिशुन लोगो ने मुझ से प्रधान की झूठी बातें कह कर, मुझे प्रधान पर कुपिन किया है। मैंने भी मूर्खतावश विना जाँच किये ही प्रधान को पकड़ने की आज्ञा दे दी। अच्छा हुआ जो प्रधान भाग गया, नहीं तो मैं उसकी बहुत खरावी करता। . , - राजा, सेठ से कहने लगा कि आपने बहुत अच्छा किया, जो ये सर वातें बतला दी और प्रधान को निर्दोष सिद्ध किया। वास्तव मे, प्रधान निर्दोष एव ईमानदार है, वेईमान लोगो की बातों में पड़ कर ही मैंने उसकी प्रतिष्ठा पर हाथ डाला है, लेकिन अन क्या हो सकता है । जो होना था, वह हो चुका। अब तो केवल यह प्रश्न है कि प्रधानजी को पुन किस प्रकार प्राप्त किया जारे । सेठ ने उत्तर किया, कि यदि आप मुझे और प्रधानजी को क्षमा करें, और 'प्रधानजी की प्रतिष्ठा को जो धको पहुँचा है, उनका सम्मान वढा कर उस क्षति की पूर्ति करें, तो मैं प्रधानजी को हँढ लाऊँ। राजा ने यह बात स्वीकार की, तय सेठ ने कहा कि प्रधानजी मेरे ही यहाँ हैं, आप पधारिये । सेठ के साथ, हाथी घोडे न्यादि सहित राजा, प्रधान को लाने के लिए सेठ के घर को चला। नगर में भी इहा हो गया, कि राजा, प्रधान को लाने जा रहे हैं, इससे नगर के लोग भी सनाथ अनाथ निर्णय प्रधान . . राजा के साथ हो गये । गाजे बाजे से राजा, सेठ के घर पहुंचा। सेठ ने घर में जा कर प्रधानजी से कहा, कि चलिये, आपको राजा लेने के लिए श्राये हैं। सेठ की यह बात सुन कर, घबराया। वह समझा, कि राजा मुझे पकडने आये हैं। उसने मेठ से कहा, कि क्या आप मुझे पकडा देंगे ? सेठ ने उत्तर दिया-नहीं, आप घबराइये मत, राजा श्रापको सम्मानपूर्वक लेने के लिए आये हैं, और द्वार पर हाथी लिये खड़े हैं । राजा ने आपको निरपराधी पाया, इसी का यह परिणाम है। सेठ की बात से, प्रधान को प्रसन्नता हुई । यह बाहर आकर राजा से मिला । राजा ने, प्रधान को हाथी पर बैठा कर शहर में घुमाया, तथा पुन प्रधान पद प्रदान किया। यह दृष्टान्त देकर, श्री जम्यू महाराज ने अपनी रानियों से पूछा-प्रिये, तुम्हारी दृष्टि में, प्रधान के तीनो मित्र में से कौन सा मित्र अच्छा था ? जम्बू महाराज की रानियों ने उत्तर दिया, पहला नित्य-मित्र तो किसी काम का ही नहीं था। ऐसे मित्र का तो मुँह भी न देखना चाहीए । वह तो मित्र नहीं, किन्तु मित्र के रूप में नीच शत्रु था। दूसरा पर्व मित्र, मध्यम है । उसने नीच नित्य-मित्र की तरह अशिष्ट व्यवहार तो नहीं किया, मित्रता का पालन भी नहीं किया । तीसरा सैन-जुहारी मित्र, कि लेकिन १०३ सनाथ अनाथ निर्णय की। उत्तम है। उसने, मित्रता का पालन करके सकट के समय मित्र सहायता जम्बू स्वामी कहने लगे, कि उस प्रधान की ही तरह, मैंने • भी अपने तीन मित्र बना रखे हैं। पहला नित्य-मित्र, यह शरीर है। इस शरीर को नित्य ही नहलाता-धुलाता सजाता पहनाता और सिलाता पिलाता हूँ। मैं, इसे दूसरा नहीं समझता । लेकिन जब कर्म रूपी राजा बदलता है, जब वृद्धावस्था या रुग्णावस्था आती है, तब, सबसे पहले यह शरीर ही धोखा देता है । उस समय यह शरीर, पत्थर मारने ऐसे काम करता है। दूसरा मित्र, कुटुम्ब-परिवार है, जिसमें तुम लोग भी सम्मिलित हो । यद्यपि 'तुम लोग अभी मुझसे इतना प्रेम करती हो, लेकिन जब कर्म रूपी राजा, मुझसे बदल कर मेरा शत्रु बनेगा, तब , क्या तुम लोग, मेरी किसी प्रकार की सहायता कर सकोगी, उस समय, पर्व मित्र की तरह यह तो न फहोगी, कि भूख हो, तो भोजन फरा दें, दवा चाहो, तो दवा का प्रबन्ध कर दें, या हम अपने आभूपण दे दें। क्या उस समय तुम मेरी रक्षा कर सकोगी ? मुझे कोई सहायता पहुँचा सकोगी ? कदापि नहीं । मैंने अपना तीसरा मित्र, सुधर्मा स्वामी को बना रखा है। यद्यपि सुधर्मा स्वामी हैं सैन-जुहारी मित्र ही, उनसे नित्य-मित्र और पर्व-मित्र की तरह फोई विशेष व्यवहार नहीं है, फिर भी , १
सनाय-अनाथ निर्णय
--
-
उन्होंने मुझे ऐसा उपाय बताया, कि जिसके करने
पर, मैं, कर्मरूपी शत्रुओं से लड सकता हूँ और उन
पर विजय प्राप्त कर सकता हूँ। , उनने मुझे सिखाया
है, कि तेरे आत्मा में जो कमी है, तेरे में जो अनाथता है,
उसे निकाल, फिर तेरा कोई कुछ नहीं बिगाड सकता। उन्होंने
मुझसे कहा है, कि तेरा मित्र भी तू ही है और तेरा शत्रु भी तू
"
.
नहीं
कर सकता।
,
तात्पर्य यह, कि मित्र वही होता है, जो सकट के समय
काम आये । जम्बू महाराज के कहे हुए दृष्टान्त में, प्रधान पर
लौकिक सकट था, इसलिए लौकिक मित्र ने सहायता की
लेकिन पारलौकिक सकट के समय, लौकिक मित्र सहायता ,
उस समय, “अपना आत्मा ही अपनी सहा-
यता कर सकता है। क्योंकि, परलोक में, इसका मित्र यही है,
दुसरा नहीं।
आत्मा स्वय का मित्र बन कर, स्वय की सहा-
यता तभी कर सकता है, जब वह स्वय की ; मित्रता के कार्य
करता हो । सकट के समय सहायता करे, वही मित्र है और जो
सकट के समय काम न आवे, किन्तु सकट वढा,दे, वहीशत्रु है ।
अच्छे काम में लगा हुआ आत्मा; स्वय का मित्र, तथ
सुप्रतिष्ठ है और बुरे काम में लगा हुआ आत्मा, स्वय का श
तथा दुष्प्रतिष्ठ है। उदाहरण के लिए, एक ने अपने कानों से,
.
- . सनाथ अनाथ निर्णय शास्त्र-श्रवण किया और दूसरे ने, वेश्या का गाना सुना। इन दोनों में से, शास्त्र श्रवण करनेवाला श्रारमा, स्वयं का मित्र एव सुप्रतिष्ठ वना और वेश्या का शृङ्गार रस पूर्ण गाना सुनानेवाला आत्मा, अपने आपका शत्रु एव दुष्प्रतिष्ठापना । आत्मा को प्राप्त-इन्द्रिय मन और बुद्धि साधनो से, दोनों ही प्रकार के काम किये जा सकते हैं। यानी ऐसे अच्छे काम भी किये जा सकते हैं, जिनसे आत्मा स्वय का मित्र और सुप्र- तिष्ठ बने, और ऐसे बुरे काम भी किये जा सकते हैं, जिनसे आत्मा, स्वय का शत्रु एव -दुप्रतिष्ठ बने । इन्द्रिय, मन, और बुद्धि के कामो पर से ही, आत्मा, मित्र, शत्रु, दुष्प्रतिष्ठ सुप्र- तिष्ठऔर सनाथ या अनाथ बनता है। सनाथ बने हुए व्यक्ति को, कभी दुस या कष्ट तो होते ही नहीं। “सासारिक लोग जिन्हे घोर से घोर कष्ट सममते हैं, उन कष्टो के समय में भी, सनाय बना हुआ व्यक्ति, हँसता ही रहता है। शरीर से, चर्म सींचे जाने पर भी, सनाथ बने हुए व्यक्ति को दुस नहीं होता। वह तो यही समझता रहता है, कि यह सब, मैंने ही मेरे लिए किया है, इसमें सुख या दुस मानने की कौनसी बात है । सुन दुस मानने से, कष्ट के समय रोने एवं सुस के समय हँसने से तो और हानि है, तथा यही श्रनाथत्ता बढाने या प्रनाथता में डालने का कारण है। मैं,
सनाथ-अनाथ निर्णय
सनाथ तभी हूँ, जब दुख के समय भी हंसता रहूँ। दुःख को
भी सुस मानने से तथा दुख के समय भी हँसते रहने से,
आत्मा की रही सही अनाथता भी दूर होगी। इस प्रकार विचार
कर, सनाथ बना हुआ व्यक्ति, मृत्यु के समय भी हँसता रहता
है, दु ख नहीं करता। वह जानता है, कि किसी भी समय
रोने से, कुछ लाभ नहीं है, किन्तु ऐसा 'करना, आत्मा को
अनाथ बनाना है । उसको, इस बात पर विश्वास रहता है, कि
श्रात्मा और शरीर, तलवार और म्यान की भाँति, भिन्न-भिन्न हैं।
आत्मा हूँ, शरीर नहीं हूँ। शरीर को चाहे कोई कितना ही
फष्ट दे, उससे मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता । मैं तो व्रती ही हूँ,
जिसे कोई कष्ट दे ही नहीं सकता। मौत भी मेरा कुछ नहीं
विगाड सकती है, क्योंकि मैं अमर हूँ। सनाथ बना हुआ
गीता के कहे हुए निम्न श्लोक को बिलकुल ठीक मानता है ।
गीता में कहा है-
.
नैन विन्दन्ति शस्त्राण नैन दहति पावक ।
न चैन क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥
अच्छेद्योऽयमदायोऽयमक्लेद्यो ऽशोप्य एव च।
नित्य सर्वगतः स्थाणुरचलोऽय सनातन ॥
अध्याय रा।
सनाय अनाथ निर्णय -- अर्थात् यह भारमा, शस्त्र से नहीं कर सकता, इसे आग नहीं जला सकती, यह पानी से नहीं भीग सकता और इसे हवा नहीं सुख सकती। यह मछेद्य है, कट नहीं सक्ता, न जलाया, भिगोया या सुखाया ही जा सका है। यह नित्य, व्यापक, स्थिर अचल और सनातन-यानी सदा रहने वाला है। अनाथता को त्यागकर, सनाथ घनना ही आत्म तत्त्व को समझ कर उसके अनुसार आचरण करना है। जो श्रात्म- तत्त्व को जान चुका, वह न तो किसी को भय देता ही है, किसी से भयभीत ही होता है। वह, हर्ष अमरोप आदि सब से परे रहता है। गीता में कहा है- - सम शत्रौ च मित्रौ च तथा मातापमानयो शीतोष्ण सुख दु.खेषु सम मग विवर्जित ॥ तुल्यनिन्दास्तुति मौनी सन्तुष्टो येनकनचित् । अध्याय १२ वाँ। अर्थात् --जो शन्नु, मिन्न, मान, अपमान, सर्दी गर्मी, और सुख तथा दुप में समान भाव रखता है, जो वासना रहित है जो निन्दा स्तुति में नुल्य भावना रखता है और जो मौनी है, (यही सनाथ है।) ये, सनाथ बने हुए व्यक्ति के लक्षण हैं। इन लक्षणों से हो, सनाथ व्यक्ति पहचाना जाता है। यद्यपि सनाथी मुनि के उपदेश को सुनकर, राजा श्रेणिक, " सनाथ अनाथ निर्णय १०८ अब उसकी न श्रनाथता देने वाली वस्तुओं को त्याग न सका, लेकिन उसकी यह श्रद्वा अवश्य हो गई, कि ये वस्तुएँ अनाथता देने वाली हैं। अव तक, वह इन्ही वस्तुओं को, सनाथ वनाने वाली मानता था मनुष्य-जन्म को, भोग के लिए जानता था और सयम को, मनुष्य-जन्म का दुरुपयोग एव अपमान समझता था। लेकिन अब उसकी, श्रद्वा, इसके विपरीत हो गई है। अब वह, इन वस्तुओ के वास्तविकरूप को समझने लगा है । श्रद्धा. शुद्ध हो गई है। शास्त्रकारों का कथन है, कि कल्याण साधने में, श्रद्धा का शुद्ध होना आवश्यक है। श्रद्धा के अनुसार आचरण करना करना, अपनी अपनी शक्ति पर निर्भर है, लेकिन श्रद्वा तो शुद्ध ही होनी चाहिए। श्रद्धा शुद्ध होने पर, यदि परिस्थिति वश किसी बुरे कार्य में प्रवृत्त होना भी पडा, तो शुद्ध श्रद्धा वाला उस कार्य को समझेगा बुरा हो, और शुद्व श्रद्धा के अभाव में, वह बुरा कार्य भी अच्छा मालूम होगा। जो आदमी, बुरे कार्य को धुरा ही समझता है उससे वह बुरा कार्य कमी छूट सकन सम्भव है, लेकिन जो बुरे काम को बुरा ही नहीं समझता, वह उसे क्यों छोडेगा ? शुद्धाचरण करना, प्रत्येक , की शक्ति से प की बात है, प्रत्येक प्रादमी, ऐसा करने में समर्थ नहीं हो सकत है लेकिन शुद्ध श्रद्धा, प्रत्येक श्रादमी घारण कर सकता है । शुद्ध ,
२०९
सनाथ अनाथ निर्णय
.
यद्धा के होने पर, शुद्धाचरण दुर्लभ नहीं माना जाता, लेकिन
अशुद्ध श्रद्धा के होने पर, शुद्धाचरण दुर्लभ है । और यदि
व्यवहार दृष्टि से किसी में शुद्वाचरण हुआ भी, तब भी, तात्विक
ष्टि से तो यह अशुद्धाचरण ही है। इसी कारण शास्त्र में कहा है-
सदा परम दुल्लहा।
अर्थात् प्रद्धा होना बहुत दुर्लभ हे ।
राजा श्रेणिक की श्रद्धा, अब तक अशुद्ध थी, लेकिन श्रय
युद्ध होगई। इस शुद्ध श्रद्वा मे~सयम न ले सकने पर भी-
जा श्रेणिक ने, तीर्थर गोत्र बाँध लिया। इसलिए प्रत्येक
नुष्य के लिए, गुद्व श्रद्धा धारण करना, उचित एव आवश्यक
। जब तक श्रद्धा शुद्ध न हो, तर तफ कैसा भी ऊँचा धर्म
न्यों न हो, प्राप्त नहीं हो सकता, परन्तु शुद्ध श्रद्वा होने पर, ॐचे
धर्म को प्राप्त करना, कोई कठिन कार्य नहीं है।
आत्मा को, यह सर्वोत्तम मनुष्य शरीर, घडे पुण्य से प्राप्त
आ है। यह शरीर प्राप्त होने से पूर्व, श्रात्मा ने, न मालूम
ौन कौन-से शरीर धारण किये थे, और न मालूम कैसे कैसे
गों को सहा था।
अनन्त काल तक, अन्य अन्य शरीर
गरण करते रहने के पश्चात, इसे यह शरीर प्राप्त हुश्रा
है
यह मनुष्य शरीर, पैसा स्पृष्ट है, यह यात भी मादम
सकती है, जब इसकी तुलना दूसरे जीव के शरीर से फी
.
।
सनाथ-अनाथ निर्णय . जावे। किसी वस्तु की विशेप कीमत तभी मानी जाती है, जब वह वस्तु, अन्य वस्तुओ की अपेक्षा श्रेष्ठ प्रतीत हो । इसी प्रकार, मनुष्य शरीर की विशेषता भी तभी ज्ञात हो सकती है, जब इसकी तुलना, पशु,पक्षी आदि के शरीर से करके देखी जावे। वैसे तो, आँस, नाक, कान, श्रादि पशु के भी होते हैं और मनुष्य के भी, बल्कि मनुष्य की अपेक्षा पशु के बड़े होते हैं, फिर भी पशु-शरीर की अपेक्षा, मनुष्य-शरीर बड़ा ठहरता है। क्योंकि, पशु में, विवेक नही है। पशु-शरीर और पशु की इन्द्रियाँ, विवेक-रहित हैं। लेकिन मनुष्य में विवेक है, मनुष्य-शरीर और मनुष्य की इन्द्रियाँ, विवेक सहित हैं । विवफ अपना लाभ-हानि विचार कर सकने की शक्ति होने से, मनुष्य शरीर, अन्य समस्त जीवों के शरीर से उत्कृष्ट माना जाता है ऐसा उत्कृष्ट शरीर प्राप्त होना, कम पुण्य की बात नहीं है । मनुष्य-शरीर प्राप्त होना तो बडे पुण्य का फल है ही, लेकिन स्वास्थ्य, एव सर्वाङ्ग सम्पन्न मनुष्य-शरीर का प्राप्त होना, और भी महान पुण्य का फल है। क्योकि मनुष्य पाकर भी बहुत से लोग, अँधे, बहरे, गूंगे, या पगु आदि होते हैं। बहुत से मनुष्य, जन्मजात पागल, बुद्धिहीन या किन्हीं रोगों स घिरे होते हैं। यदि ऐसे लोगों में पुण्य कमी न होती, तो उन्हे इस प्रकार का क्यो होना पडता ? -शरीर , और की उनमें सर्वाङ्ग सम्पूर्ण मनुष्य-शरीर, बडे १११ सनाय-अनाय निर्णय -पुण्ये मर कमी है, स्वस्थ एव सर्वाङ्ग सम्पूर्ण मनुष्य की अपेक्षा, वे, कम पुण्यवान हैं, तभी वे, 'प्रगहीन या रोगी हैं। इस- प्रकार, पशु-शरीर की अपेक्षा मनुष्य-शरीर उत्तम है और अस्वस्थ एव अङ्गहीन मनुष्य-शरीर की अपेक्षा स्वस्थ एव पुण्य से प्राप्त हुआ है, यह -बात स्पष्ट है। अब देसना यह है, कि ऐसा सर्वोत्तम मनुष्य-शरीर पाकर करना क्या चाहिए ? यदि इसे खाने-पीने या विषय-भोग में ही लगा दिया, तब तो इसे उत्कृष्ट माने जाने का कोई कारण नहीं- रहता। क्योंकि, यह कार्य तो पशु-शरीर से भी हो सकता है । बल्कि इस विषय में, मनुष्य की अपेक्षा पशु, कहीं चढ़े हुए होते हैं। इसलिए पाने-पीने और दुर्विपय भोग मे लगने के कारण मनुष्य-शरीर उत्कृष्ट नही माना जा सकता। मनुष्य शरीर, इस- लिए उत्कृष्ट माना जाना जाता है, कि इस शरीर को पाकर, आत्मा, अपने आप को सनाथ बना सकता है, जन्म-मरणसे मुक्त कर सकता है- और समस्त कष्टो का अन्त करके, अक्षय सुस प्राप्त कर सकता यह न करके, यदि मनुष्य शरीर को मासारिक विषय-भोग में डाल दिया, तर तो इस उत्कृष्ट शरीर द्वारा वह काम किया, जो काम निकृष्ट माने जानेवाले पशु पक्षी के शरीर मे भी नहीं किया गया था। पशु-पक्षी के शरीर में ८ लगाता है, जिस नीति का पालन, पशु भी करते हैं। मनुष्य-शरीर सनाथ अनाथ निर्णय तो अात्मा ने, शुद्ध परिणाम रसने की वह करणी की, जिससे यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हुश्रा। लेकिन मनुष्य-शरीर पाकर, दुर्विपय-भोग में पडा हुआ आत्मा, वह करणी कर रहा है, जिससे नरक-निगोद में पडे।। श्रात्मा को, मनुष्य-शरीर के साथ ही जो विवेक प्राप्त हुआ है, भोग प्रवृत्त होने वाला, इस विवेक का दुरुपयोग कर रहा है। यद्यपि विवेक द्वारा दुर्विपय-भोग से निवृत्ति के कार्य करने चाहिए, लेकिन दुर्विपय-भोग में प्रवृत्त आत्मा, विवेक द्वारा दुपिय-भोग मे अधिकाधिक प्रवृत्त होने के कार्य करता है, विवेक को, भोग की सुविधा ढूँढने में लगाता है, अधिकाधिक भोग प्राप्त करने में लगाता है, तथा उस नीति को भग करने में भोग से निवर्तने के लिए है, भोग में प्रवृत्त होने के लिए नहीं। भोग में प्रवृत्त होना, मनुष्य-शरीर के ध्येय के बिलकुल विपरीत है। सनाथी मुनि ने, अनाथता सनाथता का जो वर्णन किया है । उससे यह बात सिद्ध हो चुकी, कि सासारिक-वैभव तया भोगादि में पड़ने पर, यह आत्मा सनाथ होता है और इनसे निवर्त कर सयम लेने पर, सनाथ होता है । यदि कोई आदमी, सर्वविरति सयम न ले सके और देशविरति संयम ले, तभी चह, सनाथता के मार्ग का अनुसरण करनेवाला है और कभी- -
११३
सनाथ अनाथ निर्णय
,
र्ण सनाथ भी बन सकता है।
अनाथ आत्मा, निरन्तर दुस
। भोगता रहता है, और सनाथ श्रात्मा, दुस-मुक्त हो जाता
। सनाथता अनाथता का यह भेद, मनुष्य ही समझ सकता
है और मनुष्य ही, अनाथता से निकलकर सनाथ हो सकता है।
मनुष्य होकर भी यदि अनाथता सनाथता के भेद को न समझ,
अनाथता से निकल कर सनाथ होने की चेष्टा न की, तो कहना
चाहिए, कि उसने दुर्लभ मनुष्य-जन्म का वास्तविक लाभ नहीं
लिया। तात्पर्य यह, कि मनुष्य-शरीर में विवेक एवम् अना.
थता से निकलकर सनाथ बनने की क्षमता है, इसी से यह उत्कृष्ट
माना जाता है।
सनाथी मुनि ने, श्रेणिक राजा के समीप, यह तो सिद्ध कर
देखाया, कि असयमी जीवन अनाथतापूर्ण है। अर्थात्, ससार
त्र्यवहार में रहना अनाथता है और ससार-व्यवहार त्याग कर,
सयम स्वीकार करना, सनाथता हे । अब सनाथी मुनि यह
बताते हैं, कि कोई आदमी सयम स्वीकार कर भी, किस प्रकार
अनाथ हो जाते है।
इस दूसरी अनाथता-यानी सयम ले चुकने पर भी आने
'वाली अनायताका वर्णन सनाथी मुनि, फई अभिप्राय से करते
हैं। एक अभिप्राय तो सयमी लोगों को सावधान करना है।
उन्हे यह घतलाना है, कि तुम अनाथता से निकलने के लिए ही,
-
.
.
८
-
सनाथ अनाय नित नहीं करते हैं, संयम के नियम पालने में असावधानी रसते हैं "उन्हें तो उलहना देने का कोई कारण ह, नहीं है। उलहना श्रेणिफ को यह बताते हैं, कि यद्यपि सयम लेना, सनायता ११४ ससार-व्यवहार त्याग कर साधु हुए! हो, लेकिन यदि तुमने साधुता के नियमों का पालन न किया, साधु-नियम के पालने में असावधानी से काम लिया, या जिन पदार्थों को त्याग कर सयम लिया है, उन्हीं से फिर प्रेम किया, तो जिस अनाथता से छु कारा पाने के लिए साधु हुण् हो, उमसे भी अधिक अनाथता में पर जाओगे। इस वर्णन से, सनाथी मुनि का दूसरा अभिप्राय उन लोग को उलहना देना है, जो सयम लेकर संयम के नियमों का पालन या सयम लेकर भी, त्यागे हुए पदार्थों में प्रासक्ति या उनक फामना रसते हैं। जो लोग अनाथता को जानते ही नहीं, जान कर सनाथ हो गये हैं, या सनाथ होने की चेष्टा कर रहे हैं उसी को दिया जाता है, जो जान बूझ कर बुरे काम करता है इस दूसरी अनाथता के वर्णन का तीसरा बहुत बडा श्री प्राय, जनता को सावधान करना है । सनाथी मुनि, रा 1 %3D - अपनाना है और इस कारण अनाथ लोगों की दृष्टि में, संय पूज्य है, लेकिन सयम लेने वालों में भी, कई. अनाथ ही, ।
नार्य-अनाय निर्णयः
१
, बल्कि, ऐसे अनाथ होते हैं, जैसा अनाथ, सयम न-ले
बकने वाला भी नहीं होता। ।
सयम लेकर सनाथ,बने हुए और सयम लेकर भी अनाथ
बने हुए व्यक्ति, वेश-भूषा में समान हो सकते हैं, लेकिन गुणो
में समान नहीं हो सकते हैं। सनाथता, गुणो मे है, केवल,
वेश-भूषा में ही नहीं है। यद्यपि आदरणीय वेश भी है,
लेकिन तब, जब गुण-युक्त हो । गुण रहित वश की पूजा करना,
भगवान महावीर का सिद्धान्त नहीं है।
अनायता से निकल फर सनाथ बनने वाले सयमी को,
जनता, अपना गुरू मानती है और-अपने पारलौकिक जीवन की
नाव को, उसके सहारे छाड देती है। लेकिन जब तक त्राचार
विचार से यह विश्वास न कर लिया जावे, कि यह वास्तव में
सनाथ है इसके पहले अपना आत्मा उसे सौप देना, केवल अन्ध
विश्वास है। सयमी को अपना गुरू, इसीलिए माना जाता है,
कि वे, सासारिक बन्धनों को त्याग कर सनाथ बने हैं लेकिन
उन्होंने वास्तव में सासारिक बन्धनों को त्यागा है नहीं, जिस
सयम में दीक्षित हुए हैं, उसके नियमों का पालन करते हैं, या
नहीं, यह जानना आवश्यक है ।। यह पहचान, केवल वेश से
नहीं हो सकी। वेश में तो सनाथ और अनाथ, ऐसे दोनो ही
प्रकार के रहते हैं। वेशधारी परन्तु अनाथ सयमी को अपना
-
सनाथ अनाथ निगर
सनाथ और
.
,
ही वेश में, दोनों प्रकार के व्यक्ति रहते हैं, इसलिए पहचान
आत्मा सौंप देने से, लाभ के बजाय हानि है ।
अनाथ वेशवारी की पहचान कैसे हो सकती है, अनाथ वेशधारी
के प्रधान लक्षण क्या हैं, यह बात सभी लोग नहीं जानते ।
सनाथी मुनि, इस प्रकार के अनाथ लोगो की पहचान कराने के
लिए ही, इस दूसरी अनाथता का वर्णन करते हैं ।
आज कल, साधु-वेश रस कर असाधुता के काम करने
वाले लोगों की कमी नहीं है। सनाथ मुनि ने, इस दूसरी अना-
थता का वर्णन, लगभग ढाई हजार वर्ष पहले किया है, इससे
प्रकट है, कि ऐसे लोग उस समय भी ये । तुलसीदासजी ने
भी, ऐसे लोगो के लक्षण बताकर, उनकी निन्दा की है। उन्होंने
कहा है-
जे जन्मे कलिकाल कराला, कर्तव वायस वैप मराला ।
वचक भक्त कहाई राम के, किंकर कंचन कोह काम के ॥
अर्थात् करार कलियुग में जन्मने वाले लोग, काम तो बौए के
करते है और वेश, हस का रखते है। वे ठग, राम के भक्त कहा कर
भी काम क्रोध एवम् द्रव्य के गुलाम बने रहते हैं।
तात्पर्य यह, कि मुनि-वेश मे ऐसे लोगो की भी कमी नहीं
है, जो साधु कहला कर भी, असाधुता के काम करते है ।
५
-
-
-
--
एक
,
सनाथ-अनाय निर्णय ११७ , कठिन हो जाती है। उनकी पह्वान कराने के लिए-ही, सनाथी मुनि, इस दूसरी अनायता का वर्णन करते हैं इस दूसरी अनाथता को समझना भी, जनता का कर्तव्य है। इससे मुख्य लाभ तो यह है, कि कुगुरु सद्गुरु का निर्णय हो जाता है। यह वेशधारी, वास्तव मे निम्रन्थ धर्म का अनु- यायी-निर्मन्य धर्म का पालन करने वाला है या नहीं ! यह यात मालूम हो जाती है यह मालूम होने मे, जनता अनेक हानियों से भी बच जाती है। । उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति साधु-वेशधारी है। उस व्यक्ति का आचरण देखकर नहीं, किन्तु केवल वेश के कारण विश्वास किया गया, इसलिए उसके द्वारा किसी भी समय, धन, जन, प्रतिष्ठा और धर्म की हानि -हो सकती है। यदि वेश के साथ ही, उसके आचरण के सम्बन्ध में भी विश्वास कर लिया जावे, तो फिर ऐसी हानि की श्राशका नहीं रहती। इसलिए सनाथी मुनि द्वारा वर्णित, दूसरी अना- यता के लक्षणों को ध्यान मे रत्र कर, इन लक्षणों पर से सयम- वेशधारी अनाथ को पहचान लेना, जनता के लिए, प्रत्येक दृष्टि से हितकारी हैं। कुछ लोगो ने, यह सिद्धान्त बना रखा है, कि 'अपने यानी साधु साध्वियों के चरित्र सम्बन्धी शास्त्राना से, गृहस्य ' को परिचित्त न किया जावे। परिचित फर देने पर, गृहस्थ लोग .
भाराय- राजा, एक मनायपना और है, जिसे तुम स्थिर चि सनाथ अनाथ निक ९९८ - ऐसा उपाय करो, कि हम में से अनाथता का वह लक्षण- में कैसे पड़ते हैं, और फिर अनाथता में पड़ना कितना एव कैस इमा हु अण्णा विश्रणाहया निवा, नमगचित्तो निहुनो सुनहि नियरठयम्म लहियारण वी जहा,मीयन्ति एग बहु कायराना । अपने को पद-पद पर टोकेंगे, इससे अपनी मनमानी न चन सकेगी।' इस प्रकार के विचार से कई लोग, साधु के प्राचार से गृहस्थो को अपरिचित रखते हैं, लेकिन ऐसा करना, उनका संयम पाल सकने की क्षमता के सिवा और कुछ नहीं कहला सकता। जो सयम पालने में वीर होगा, वह, इस प्रकार की सिद्वान्त कभी न वनावेगा। वह तो सनाथी मुनि द्वारा वर्णित, इस दूसरी अनाथता को जनता के सन्मुस विस्तृत रूप में रख फैर, यह घोपण फरेंगा, कि अनाथता के इन लक्षणो में से यदि कोई लक्षण हम पर घटता हो, तो हमें उलाहना दो और फई आदमी, गृह-ससार त्याग कर और संयम को अपना कर भी, अनाथता मे पड़ जाते हैं। सयम लेकर भी अनायत मिट जावे। । । बुरा है यह बताने के लिए, सनाथी मुनि कहते हैं " वैसी ही प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए, साधु-वेश पहन लेते हैं। ११९ सनाय अनाथ निर्णय से सुनो। , - सनाथ बनाने वाले निर्गन्ध धर्म को प्राप्त करके भी, बहुत से कायरलोग, पतित हो जाते हैं और निम्रन्यपने में दु ख पाते हैं। सनाथी मुनि कहते हैं-हे राजा, निग्रन्थ-धर्म, शूद्रों द्वारा पाला जा सकता है। इसे फायरलोग नहीं पाल सकते, लेकिन बहुत-से कायरलोग, निर्मन्य धर्म स्वीकार करके, घर-धार, कुटुम्ब ससार आदि छाड भी देते हैं, सयति का वेश भी पहन लेते हैं, रजोहरण एव सुसवस्त्रिका श्रादि भी धारण कर लेते हैं और फिर कामना पूर्ण न होने पर, साधुपने में दुख पाते हैं । कई लोग क्षणिक आवेश में, सनाथ बनने की क्षणिक भावना से प्रेरित होकर, सयम ले लेते हैं। कई, ससार-व्यवहार का भार सहन न कर सकने के कारण, कमाकर साने की, अश- क्तता के कारण, सयम ले, लेते हैं। कई- . - ३ r 'नारि मुई गृह सपति नासी ।' मूड मुडाय भये सन्यासी । इसके अनुसार, यानी स्त्री सम्पत्ति श्रादि के नष्ट हो जाने से, सयमी बन जाते हैं। कई साधुओ की प्रतिष्ठा देस कर, इस प्रकार बहुत से फायर लोग, भिन्न भिन्न कारणों से मयम स्वीकार तो कर लेते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हे सच्चा वैराग्य
१२०
सनाथ अनाथ निका
-
-
नहीं होता, श्राकाक्षा रहित, मयम लेने की भावना नहीं होती,
सनाव धनने के परिपक्व विचार नहीं होते, इसलिए सयम में
दीक्षित होने के पश्चात्, वे, पश्चाताप करते हैं, सयम में कष्ट
अनुभव करते हैं और फीचड में फंसे हुए हाथो के समान, दुखी
रहते हैं। ऐसे लोग, वीर नहीं, किन्तु कायर हैं ।' सयम
लेकर सयम में दु स मानना वैसी ही कायरता है, जैसी कायरता,
घर से लडाई के लिए निकल कर फिर मरने में और घर से सती
होने के नाम पर जीवित जलने के लिए निकल कर फिर अग्नि
में जलने से भय करने मे मानी जाती है। जिस प्रकार लडाई
के लिए घर से निकला हुआ, मृत्यु से भय न करने पर ही लोक
व्यवहार में वीर माना जाता है, उसी प्रकार संयम लेकर उस में
दुस न मान कर सुख मानने वाला ही वीर है।
राजा, सयम लेकर फिर,सयम में टु स अनुभव करने वाला
व्यक्ति, किसी भी ओर का नहीं रहता।
का ही रहता है, न सयम का ही। उसकी दशा, धोवी के कुत्ते
की-सी होती है, जो न घर का ही होता है, न घाट का हो । इमी
प्रकार, सयम लेकर फिर सयम में 'दु ख अनुभव करने वाले
व्यक्ति का जीवन, ससार और सयम, दोनो की उलझन में ही
न वह असयमी ही रहता है, न सयम लेकर
सनाव ही बन पाता है। वह संसार की अनाथता से निकल
न वह मसार-च्याहार
बीत जाता है।
सनाय भनाथ निर्णय . कर, दूसरी अनाथता में पड़ जाता है, जो अमयम की प्रनाथता मे भी बुरी होती है। कायरलोग, सयम लेकर उसमे सासारिक सुखो की इच्छा करते हैं। वे, अच्छा-अच्छा भोजन, मान प्रतिष्ठा, अच्छे अच्छे बरन श्रादि चाहत रहते हैं और जन इनकी प्राप्ति नहीं होती, तब वे सयम में दुस मानते हैं । यद्यपि सयम लेने के समय, सासा- रिक सुखों को त्याग चुके हैं लेकिन कायरलोग, सयम में सासा- रिक-सुस चाहते हैं, और उसे प्राप्त करने के लिए, वे अपने सयम के ध्येय को भुला देते हैं। उन्हें यह ध्यान नहीं रहता, कि हमारा ध्येय क्या है, हम किस भावना को लेकर उठे हैं और सयम लेने के समय हमारा उद्देश्य क्या था। वे लोग, एक ओर तो सासा- रिक सुख भी भोगना चाहते हैं, और दूसरी ओर, साधुपने की मान प्रतिष्ठा भी। यानी यह भी चाहते हैं, कि हमे कोई अस- यमी भी न कहे, किन्तु सयमी मान कर सब हमारी पूजा-प्रतिष्ठा करें और यह भी चाहते हैं, कि हमें ससार के समस्त सुख भी प्राप्त हों। इसके लिये, वे, और परोक्ष में, सासारिक-सुख प्राप्त करने के उपाय करते रहते हैं, तया सासारिक सुस न मिलने पर, अपने आपको कष्ट में मानते हैं। यदि वे, सासारिक सुख प्राप्त भी कर लेते हैं, तब भी उन्हे दुस घेरे ही रहता है। उन्हें सदा यह भय बना रहता है, प्रकट में तो साधु का वेश रसते हैं -
१२०
सनाथ भनाय निमा
-
-
में
-
नहीं होता, श्राकाक्षा रहित, मंयम लेने की भावना नहीं होती,
सनाय वनने के परिपक्व विचार नहीं होते, इसलिए सयम
दीक्षित होने के पश्चात्, वे, पश्चाताप करते हैं, सयम में कष्ट
अनुभव करते है और कीचड में फंसे हुए हाथी के समान, दुःखी
रहते हैं। ऐसे लोग, वीर नहीं, किन्तु कायर हैं । संयम
लेकर संयम मे दुस मानना वैसी ही कायरता है, जैसी कायरता-
घर से लडाई के लिए निकल कर फिर मरने में और घर से सती
होने के नाम पर जीवित जलने के लिए निकल कर फिर अम्-ि
में जलने से भय करने में मानी जाती है। जिस प्रकार लडा
के लिए घर से निकला हुआ, मृत्यु से भय न करने पर ही लो
व्यवहार में वीर माना जाता है, उसी प्रकार संयम लेकर उसके
दुस न मान कर सुख मानने वाला ही वीर है।
राजा, सयम लेकर फिर संयम में दुस अनुभव करने वाल
व्यक्ति, किसी भी ओर का नहीं रहता। न वह ससार-व्यवहां
का ही रहता है, न सयम का ही। उसकी दशा, धोबी के कु
की-सी होती है, जो न घर का ही होता है, न घाट का हो । इस
प्रकार, सयम लेकर फिर सयम में दुस अनुभव करने वा
व्यक्ति का जीवन, ससार और सयम, दोनों की उलझन मे
न वह असयमी ही रहता है,
सनाम ही बन पाता है। वह ससार की अनाथता से निक
बीत जाता है।
न सयम लेव
सनाथ भनाय निर्णय १२१ का, . . दुसरी अनाथता में पड़ जाता है, जो असंयम की अनाथता से भी बुरी होती है। कायरलोग, सयम लेकर उसमे सासारिक सुखों को इच्छा करते हैं। वे, अच्छा अच्छा भोजन, मान प्रतिष्ठा, अच्छे-अच्छे वस्त्र आदि चाहत रहते हैं और जब इनकी प्राप्ति नहीं होती, तर वे सयम में दु.स मानते हैं। यद्यपि सयम लेने के समय, सासा- रिक सुखों को त्याग चुके हैं लेकिन कायरलोग, मयम में सासा- रिक-सुस चाहते हैं, और उसे प्राप्त करने के लिए, वे अपने सयम के ध्येय को भुला देत हैं । उन्हें यह ध्यान नहीं रहता, कि हमारा व्यय क्या है, हम किस भावना को लेकर उठे हैं और सयम लेने के समय हमारा उद्देश्य क्या था। वे लोग, एक ओर तो सांसा- रिक सुस भी भोगना चाहते है, और दूसरी ओर, साधुपने की मान प्रतिष्ठा भी। यानी यह भी चाहते हैं, कि हमे कोई अस- यसी भी न कहे, किन्तु सयमी मान कर सब हमारी पूजा-प्रतिष्ठा करें और यह भी चाहते हैं, कि हमें ससार के समस्त सुस भी बाप्त हों। इसके लिये, वे, प्रकट में तो साधु का वेश रसते हैं और परोक्ष में, सासारिक-सुख प्राप्त करने के उपाय करते रहते हैं, तया सासारिक सुस न मिलने पर, अपने आपको कष्ट में मानते हैं। यदि वे, सासारिक मुख-प्राप्त भी कर लेते हैं, तब भी उन्हे दुस घेरे ही रहता है। उन्हें सदा यह भय बना रहता है, . ३ , १२२ सनाथ अनाथ निर्णय 7 . कि हमारे इस असयमपूर्ण कुकृत्य का कहीं भण्डा न फूट जावे । भण्डा फूट जाने पर, हम अपमानित हो जायेंगे, इस आशका से, वे, यह सोचते रहते है कि हमने सयम क्यो ले लिया । उन से सयम का वेश भी त्यागते नही बनता । ऐसा करने मे, अपमान एव निन्दा का भय है। इस प्रकार के कायर लोग संयम: को दुःस मानते है ओर सयम से, पतित भी हो जाते हैं । अब सनाथी मुनि, सयम-पतित के लक्षण बताते हैं और यह बताते हैं , कि कायर लोग, सयम लेकर भी, असाधुता के कौन- कौन-से कार्य करते हैं। वे कहते हैं- जो पव्वहत्ताण महब्बयाइ सम्मच नो फासयई पमाया । "अनिग्गहप्पा यरसेसु गिद्धे न मूलभो छिन्दई वधणसे ॥३६॥ भावार्थ-जो लोग, सयम लेकर भी, पच महावत को प्रमादवश सम्यक प्रकार नहीं स्पशते-पालन नहीं करते-जो अपने आपको सयम में नहीं रख सकते, तथा रस लोलुप बने हुए हैं, वे, संसार-बंधन के मूल- राग देप-का छेदन नहीं कर सकते । यानी समार में, जन्म-मरण किया ही करते है। सनाथी मुनि कहते है-राजा नाथ बनने के लिए , उठकर किर अनाथता मे पड़ने वाले कायर लोग; सयम तो ले लेते हैं। लेकिन सयम मे जिन पाँच महाव्रत का पालन करना आवश्यक है. उनका भली प्रकार पालन नहीं करते, किन्तु उसके, पालन मे सनाथ अनाय निर्णय १२३ प्रमाद करते हैं। यद्यपि उन्होंने, घर संसार छोड कर, सयम लेते समय, पच महाव्रत पालने की प्रतिज्ञा की है, लेकिन वे कायर लोग या तो अपनी प्रतिज्ञा भूल जाते हैं, या उसकी उपेक्षा करते है। सयम लेने के समय, जिन पाँच महाबत की प्रतिज्ञा ली जाती है. उनमे से पहला महानत अहिंसा है। अहिंसा महा- व्रत का पूर्णतया पालन तभी होता है, जत्र, तन, मन या 'धचन द्वारा छ काय के जीवों में से, किमी भी जीव की तीनों करण से हिसान की जाये। इस महानत की रक्षा के लिए; सयम लेने वाले लोग, प्रारम्भ को सर्वथा त्याग कर, निरारम्भी होते हैं। वे किसी भी प्रकार का प्रारम्भ, नहीं करते। दया, क्षमा, रक्षा, अक्रोध श्रादि का समावेश, अहिंसा की रक्षा के लिए, इन सदगुणों के पालन का विशेष रूप से ध्यान रसते हैं। । सनाथी मुनि कहते हैं- राजा, कायर लोग, अहिंसा महा- नव के पालन की प्रतिज्ञा तो करते हैं, लेकिन वे, अग्नी, पानी, श्रादि का प्रारम्भ भी करते हैं, लोगो से, लडाई-झगडा एवं निर्दयता का व्यवहार भी करते हैं, क्षमा को पास भी नहीं थाने देते और धात-बात में क्रोध करते रहते हैं। ऐसा करने वाले अहिंसा महाव्रत का पालन करने वाले नहीं हैं। अहिसा महा- प्रत का पातन करने वाला, अपनी प्रतिज्ञा को कभी भी न १२४ सनाथ-अनाथ निर्णय भूलेगा, किन्तु यह ध्यान रखेगा, कि 'मैं' अहिसा महाव्रत को स्वीकार करके सयम मे प्रवर्जित हुआ हूँ, मैंने, संसार के सब जोवो को अपना मित्र माना है, फिर किसी जीव को हिंसा कैसे करूँ। किसी जीव के शरीर या मन को कैसे 'दुसाऊँ। किसी पर क्रोध कैसे करूँ। ऐमा करने पर, मैं, अहिंसा महाव्रत का पालन करने वाला कैसे रह सकता हूँ।" राजा, अहिसा महाव्रत का पालन करने वाला, किसी दूसरे जीव को भी दु स नहीं देता है और अपने काम को भी दुखी नहीं करता है। ऐसे व्यक्ति को, चाहे कोई मारे, गाली दे, अपमानित करे और घोर कष्ट देकर प्राण भी हरण करले, तर भी वह प्रसन्न ही रहता है । ' अपने-आप को, 'दुख में तो मानता ही नहीं, न प्रतिहिंसा या वैर विरोध के भाव ही हृदय में आने देता है। ऐसे समय मे, अहिंसापानी विचारता है कि 'यह व्यक्ति जो मार रहा है या , गाली दे रहा है, आत्म-स्वरूप को भूल कर, पतित हो रहा है, तथा हिंसा कर रहा है । यह दूसरे को दुस देने वाला, अपने आत्मा को नीची दशा में गिरा कर ही, दूसरे को दुम देता है । यदि इसका आत्मा, उर्ध्व दशा में होता, तो यह ऐसा करता ही क्यों। इसमें, काम क्रोध आदि दुर्गुण विद्यमान हैं, तभी तो यह ऐसा कर रहा है, यदि इसके साथ में भा ऐसा करने लगूं, मैं भी अपने प्रात्मा को , सनाय-अनाथ निर्णय १२५ दुखी करूँ, मैं भी अपने में, वैर-विरोध या क्रोध आने दूं, तो हिंसा करने वाले में और मुझ अहिसा का पालन करने वाले में, क्या अन्तर रहा । फिर मैंने, प्राणिमात्र से मित्रता क । क्या व्यवहार किया । मुझे दुस देने के नाम पर, यह, अपने यात्मा को दु सित कर रहा है। यदि में भी इसी की तरह अपने आत्मा को दुसित फरूँ, जिसे यह दुख मान रहा है, उसे ही मैं भी इस मानें, तो मैं सनाथ कैसा फिरतो मैं भी इसी की तरह अनाथ हुआ!' इस प्रकार के विचार रख कर, अहिंसा महावत का पालन करने वाला, 'श्राप खय भी दुसी नहीं होता, न किसी दूसरे को ही दुसी करता है । वह तो प्रत्येक दशा में, श्रान- न्दित ही रहता है । कायर लोग, अहिंसा महावत के पालन की प्रतिज्ञा लेकर भी, इसके विपरीत व्यवहार करते हैं। वे लोग, प्रकट या अप्रकट हिसा करते हैं, लेकिन अपनी कायरता छिपाने के लिए, उम हिंमा को भी अहिमा के ही अन्तर्गत पतलाते हैं। और इस प्रकार अपने आपको, अहिंसक घोषित करते रहते हैं। सयम लेने के समय स्वीकार किये जाने वाले, पाँच महावत में दूसरा महावत, सत्य है । इस सत्य महावत का पूर्णतया पालन भी होता है, जन, मन, वचन, और काया से झूठ का त्याग किया जावे । सत्य महावतधारी, कभी और किसी भी दशा में, झूठ का प्रयोग नहीं करता । "भय, क्रोध, हास्य आदि सनाथ अनाय निर्णय सयम में प्रवर्जित के वश हो कर भी, झूठ नहीं बोलता । व्यक्ति, झूठ तो बोलता ही नहीं, लेकिन ऐसा सत्य भी नहीं बोलता, जिसके कारण दूसरे को दुस पहुँचे । सनाथी मुनि कहते है-राजा, कायर लोग प्रतिज्ञा करके भी, इस सत्य महाव्रत का पालन नहीं करते। झूठ को काम में लाने से किंचित् भी नहीं हिचकिचाते और ऐसा करके भी, अपने आपको, सत्य महाव्रत का पालन करनेवाला बतलाते हैं। तीसरा महाबत अदत्ता दान त्याग है। कोई वस्तु चाहे वह किसी के अधिकार में हो या न हो-निना किसी के दिये, लेना, अदत्तादान है। तीसरे महानत का पालन करनेवाला, ऐसी कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करता, जो किसी के द्वारा दी हुई न हो । उसे यदि मार्ग पर को धूल की आवश्यकता होगी, तो वह भी, 'किसी न किसी स्वीकृति से लेगा, बिना स्वीकृति न लेगा। वह विचारेगा, कि 'ससार की समस्त वस्तुओं पर सेमैं अपना अधिकार उठा चुका हूँ। मेरे अधिकार मे, केवल वे ही वस्तुएँ हैं, जो सयभ को रक्षा के लिए आवश्यक हैं। इसलिए में, अपने अधि- कार से,परे की कोई वस्तु, बिना किसी के दिये, नहीं ले सकता । इस प्रकार के विचार से, वह अपने अधिकार से बाहर की, छोटी से छोटी और आवश्यक से श्रावश्यक वस्तु भी, विना किसी के दिये, न लेगा ।, यहाँ तक कि वह अपने सहधर्मी एव साथी सत " M , सनाय-अनाय निर्णय १२७ के अधिकार की वस्तु भी, विना उसकी स्वीकृति के, अपने काम में, या अपने अधिकार में न लेगा। वह ऐमा फोई कार्य नहीं करता, जो शास्त्राज्ञा के विरुद्ध हो । उसको यह ध्यान रहता है,कि कहीं मुझे, देव, गुरु, सहधर्मी और गाथा पति का अदत्त न लगे। जिस काम के करने से शास्त्र रोकता है, उसे करना और जिसके करने को कर्तव्य बताता है, उसे न करना, देव-प्रदत्त है। गुरु, जो नियम बनाने, या जो आज्ञा दे, उसका पालन न करना, और उसके विरुद्ध करना, गुरु, अदत्त है । अपने साथी साधुओं के साथ विचर रहे हैं, उस समय भिक्षा में भोजन की कोई अच्छी वस्तु मिल गई और उसे अकेले ही खा लिया, साथी सहधर्मियों को उस वस्तु से वचित रस दिया या उनकी स्वीकृति के विना उनकी कोई वस्तु ले ली, तो यह, सहधर्मी-अदत्त है। राजाज्ञा का भग करना, यह राजा का श्रदत्त है। और किसी सार्वजनिक त्या व्यक्ति विशेष के स्थान या पदार्थ. को, गृहस्थ की आज्ञा विना काम में लेना, गाथापति (गृहपति) का अदत्त है। सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, सयम लेकर, भी, कायर लोग, इस तीसरे महानत का पालन नहीं करते और फिर भी, अपने आपको, पादत्तादान का त्यागी ही, घतलाते हैं। चौथा महाबत, ब्रह्मचर्य है। इस महावत के पालन में, अब्रह्मचर्य का सर्वथा त्याग करना पड़ता है। सयम में प्रवर्जित - १२८ सनाय-अनाथ निर्णय एव इस महाव्रत का धारक, किसी भी प्रकार के मैथुन का सेवन नहीं करता । वह, इस सम्बन्धी उन समस्त नियमों के, पालन का पूरा ध्यान रखता है, जो शास्त्र मे बतलाये गये हैं, इस महावत को धारण करनेवाला, केवल शरीर से, ही नहीं, किन्तु मन और वचन से भी, मैथुन का चिंत्तवन या सेवन नहीं करता । सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, कायर लोग, सयम लेकर भी इस चौथे महाव्रत का पालन नहीं करते । वे, किसी न किसी रूप में मैथुन का सेवन करते रहते हैं, ब्रह्मचर्य की रक्षा के नियमों की अवहेलना करते है और ऐसा करके भी अपने आपको पूर्ण ब्रह्मचारी बतलाते हैं। पॉचवा महाव्रत, अपरिग्रह है। इस महानद में, परिग्रह का विलकुल त्याग किया जाता है। किसी वस्तु पर ममत्व रसने का नाम ही, परिग्रह है, फिर वह चाहे सोना चाँदी हो या, कपड़ा कागज आदि । छोटी से छोटी, एव बडी से बडी वस्तु-यदि उस पर ममत्व रखा तो वह परिग्रह में है । इस महाव्रत का पालन करनेवाला, और किसी वस्तु पर ममत्व रसना तो दूर रहा, अपने शरीर पर भी ममल नहीं रसता। उसके शरीर को, चाहे कोई क्षत-विक्षत कर डाले या नष्ट कर डाले, तब भी उसे चिन्ता नहीं होती । वह किसी भी छोटी या बडी-ऐसी वस्तु को अपने पास नहीं रसता, जिसकी सयम पालने मे आवश्यकता न हो। - ।
१२९ साथ अनाथ निर्णय , सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, सयम लेकर भी, कायरों से वस्तु का ममत्व नहीं छूटता । अपरिग्रह व्रत लेकर भी, वे, घर- घार स्त्री, पुत्र, या शिष्य-शिष्या से ममत्व रसते हैं। उनसे, स्वीकार किये हुए अपरिग्रह व्रत का पालन नहीं होता फिर भी वे, अपने आपको अपरिग्रही ही कहते हैं । : राजा, सयम लेने के समय पाँच महाव्रत को, तीन करण और तीन योग से पालन करने की प्रतिज्ञा ली जाती है, और हिंसा, मूठ, अदत्तादान, अब्रह्मचर्य और परिग्रह का, तीन फरण तीन योग मे त्याग किया जाता है। गृहस्थों द्वारा स्वीकार किये जाने वाले पाँच अणुव्रत में जो सकुचितपना रहता है, इन महाव्रतो में, वह सकुचितपना नहीं है. किन्तु इनमे विशालता है। गृहस्थ लोग, इन भ्रतो को स्थूल रूप में स्वीकार करते हैं और स्थूल व्रत में भी प्रागार रखते है। वे, स्थूल अहिंसा व्रत स्वीकार करके, अपराधी को दण्ड देने, स्थूल सत्यवत स्वीकार करके बिना जानी बात के लिए मूड का प्रयोग हो जाने, अदत्तादान व्रत स्वीकार करके, अपने मित्र भाई आदि की वस्तु बिना दिये लेने, स्थूल ब्रह्मचर्य व्रत स्वीकार करके, स्वनी सेवन करने, स्थूल अपरिग्रह व्रत स्वीकार करके मर्यादित परिग्रह रखने का श्रागार रखते हैं, लेकिन मयम लेनेवाले, इन ब्रतों को महाबत के रूप में स्वीकार करते हैं, तथा किसी भी प्रकार का आगार . , स्थूल २ सनाथ अनाथ निर्णय १३० . नहीं रखते । गृहस्थो के व्रत मे, स्यूल एवं श्रागार की जो सर- चितता है, साधु, उस मकुचितता से निकल जाता है। वह इन व्रतो को, सूक्ष्म रूप से स्वीकार करता है। गृहस्थ, दो करण तीन योग आदि भेदो से प्रत स्वीकार करता है, लेकिन साधु तीन करण तीन योग से व्रत स्वीकार करते हैं। राजा, पच महावत को स्वीकार करके फिर उनका भली प्रकार पालन न करने वाले, उनके पालन में प्रमाद करने वाले, पासत्था कहलाते है । पासस्था लोग पच महाव्रत के पालन में शिथिलता करते हैं, अर्थान् भली प्रकार पालन नहीं करते, किन्तु सासारिक सुखों की चाह करते हैं और ऐसा करके भी, अपने श्रापको साधु बतलाते हैं। यदि कोई उनसे पूछता है, कि तुम अपने आपको साधु कैसे कहते हो, तो वे कहते हैं, कि हमने पंच महाव्रत धारण किये हैं। लेकिन राजा, पच महाव्रत धारण करने मात्र से साधु नहीं होता, साधु तो पच महाव्रत का पालन करने से होता है। सनाथ तभी तो हो सकता है, जब पच महाव्रत का भली प्रकार पालन करे, प्रमाद न करे। पच महाव्रत धारण करके भी जो उनका पालन नहीं करता है, वह पासस्था, एक अनायता से निकल कर दूसरी अनाथता में पड़ जाता है । राजा पासत्था का मन स्थिर नहीं रहता है । महानतो का पालन तभी हो सकता है, जब मन चचल न हो, किन्तु स्थिर हो। .
सनाथ अनाथ निर्गव , महावतों का धारण तथा अव्रतो का त्याग, मन से किया जाता है। जब मन ही अस्थिर हो, तब को हुई प्रतिज्ञा का ध्यान एच उसका पालन कैसे हो सकता है । मन के अस्थिर रहने से, वह पासस्था, जान वूम कर भी महानतों का उल्लघन करता है, फिर भी वह स्वय, महानतों का उल्लघन नहीं समझता। अब सनाथी मुनि उन कार्यों का वर्णन करते हैं, जिनके करने से महावतों का उल्लघन होता है । वे कहते हैं- पाउत्तया जस्स य नस्थि काइ इरियाए भासाए तहसणाए । श्रायाण निक्खेव दुगुछपाए न वीर जाय अणुजाइ मांग ॥४०॥ भावार्थ-वह (कायर ) ईर्यासमिति, भापासमिति, एपणासमिति, आढानभाण्डपाननिक्षेपणसमिति और उच्चारपस्त्रवणसमिति में, तनिक भी यल नहीं रखता । यानी चलने, बोलने, आहारादि लेने, वस्त्र पानादि रखने उठाने एव परठने परठाने में, किंचित भी सावधानी नहीं रखता। ऐसा करने वाला कायर, वीरों के मार्ग पर नहीं चर सकता। शास्त्रकार कहते हैं, कि साधु, निना कारण गमनागमन न करे, किन्तु अचल बनकर, काया को गोप कर रसे। मुनि को, चलने का अधिकार उसी समय है, जव, श्राहारादि लाना हो, विहार करना हो, बैठे-बैठे शरीर को कष्ट होने लगा हो, मल मूत्र त्यागने को जाना हो और अपने गुरु श्राचार्य को वन्दना करनी हो या उनसे कुछ पूछना हो । ऐसे समय में भी, ईर्यासमिति का .
सनाथ अनाथ निर्णय १३२ N - ध्यान रसना, आवश्यक है । मुनि का कर्तव्य है, कि चलने के समय, साढे तीन हाथ आगे की भूमि पर दृष्टि रसे, तथा और किसी भी ओर ध्यान न जाने दे, किन्तु इसी बात का ध्यान रसे, कि आगे कोई जीव-जन्तु तो नहीं है । चलने के समय मुनि का ध्यान दूसरी ओर जाने पर, चाहे मुनि के पाँव से कोई जीव मरे या न मरे, ईर्यासमिति भग हो जाती है। क्योकि दूसरी ओर ध्यान रखने पर, प्रतिक्रमण के समय, अपने गमानागमन, जीव मिलने-लगने आदि का वर्णन न कर सकना, स्वाभाविक है,। गमनागमन की तरह, शास्त्रकारो ने, साधु के लिए विना काम बोलने एव सावध भाषा का प्रयोग करने का भी निषेध किया है । साधु को, अकारण बोलना मना है। कारण सहित बोलने पर, साधु निर्वध भाषा ही बोल सकता है, सावध भाषा नहीं बोल सकता । साधु, जो कुछ भी बोले, वह, यतना सहित एव ब्यान रखकर बोले,' जिसमें प्रतिक्रमण के समय, बोली हुई सन वाते याद आ जावे । यदि कोई साधु, इन बातों में असाव- धानो रसता है तो वह, भापासमिति का उल्लघन करता है। ईर्यासमिति और भापासमिति की ही तरह, मुनि को, एपणा समिति के पालन का ध्यान रसना भी आवश्यक है। आहार लेने की विधि को, ऐपणा समिति कहते हैं। शास्त्रकारी ने, साधु को, केवल उतना और वैसा ही आहार लेने की आज्ञा दी है, , .
१३३
सनाथ भनाथ निर्णय
.
-
जितना माहार, जीवन के लिए आवश्यक हो, तथा जो दूषित
एवं विकार उत्पन्न करनेवाला न हो। शक्ति बढ़ाने, या शरीर को
हष्ट-पुष्ट करने के लिए श्राहार लेना, मुनि धर्म के विरुद्ध है।
मुनि, केवल जीवन की रक्षा के लिए ही थाहार ले सकता है, और
यह भी, किसी एफ घर में नहीं, किन्तु थोडा-थोड़ा अनेक घर
से। एक ही घर से भिक्षा लेने का निषेध, अन्य प्रन्थकार भी
करते हैं । यति-धर्म की विधि बताते हुए अवि-स्मृति मे कहा है--
चरेन्माधुकरी वृत्ति मपि म्लेच्छकुलादपि ।
नी
एकान्न नैव भोक्तव्य वृहस्पति समो यदि ॥
अर्थात् यति, भँवर-वृत्ति का अवलम्बन लेकर चाहे म्लेच्छ
के घर का भी अन्न महण करे, परन्तु एक के घर का अन्न
कदापि न खाने, चाहे वह वृहस्पति के ही समान क्यों न हो ।
अनेक घर से बाहार लेने में भी, साधु को, इस.बात, की
सावधानी रखनी चाहिए, कि यह पाहार, दोष सहित एव सयम
का बाधक तो नहीं है. जो साधु, इन नियमों का पालन नहीं
करता, वह एपणासमिति को भग करता है।
चौथी, आदानभाण्डमात्रनिक्षेपणममिति है। वल, पात्र,
उपकरणादि रसने उठाने की विधि को, प्रादानभाण्ड:
मात्रनिक्षेपणसमिति कहते हैं। इस समिति का पालन करना
भी, मुनि का कर्तव्य ।
साधु को चाहिये, कि अपने वस्त्र
सेनाथ अनाथ निर्णय
१३४
.
पात्रादि रखने उठाने, और प्रतिलेसन करने में, यना का विशेषरूप
से ध्यान रसे । वस्त्र पात्रादि रसने उठाने में, किसी जीव की हिंसा
न हो जावे, इस बात की सावधानी रसना आवश्यक है। जो
मुनि इसमे असावधानी रसता है, वह इस चौथी समिति को भग
करता है।
L
.
' पाँचवी उच्चारप्रस्रवणादिपरिस्थापनसमिति है । त्यागी
जानेवाली वस्तु को त्यागने की विधि का नाम, उच्चार प्रस्रवणा
दिपरिस्थापन समिति है । साधु का कर्तव्य है, कि त्यागी जाने
वाली
वस्तु
को त्यागने या परठने में यत्ना का पूरा ध्यान रखें।
जो साधु इस ओर मे असावधान रहता है,वह इस पाचवी समिति
का भंग करता है।
'सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, कायर लोग इन पॉच समिति
'के पालन में, असावधानी रसते हैं। कार्य का अभ्यास करने में
गल्ती होना दूसरी बात है। किसी वीर से यदि इस प्रकार गल्ती
'हो भी जावे, तो वह अपनी गल्ती निकालने की चेष्टा करेगा
और भविष्य में सावधानीरसेगा । अभ्यास में गल्ती होने मात्र से
कोई साधु, कायर नहींकहलाता । क्योंकि, छद्मस्थ अपूर्ण है लेकिन
बहुत से लोग, जान बूझ कर पाँच समिति की अवहेलना करते
है। समिति की उपेक्षा करते हैं और दिन प्रति दिन इस ओर स
'पतित होते जाते हैं। ऐसा करने वाले कायर लोग, वीर मार्ग
१३५ मनाथ अनाध निणय , के पथिक और पच महाव्रत के पूर्ण श्राराधक नहीं हैं । यद्यपि कायर लोग, समितियों के न पालने में, पच महानत का भग नहीं समझते, लेकिन वास्तव में, पच महाबत भग हो जाते हैं। क्योंकि, पच महानत का सूम रूप से पालन तभी सम्भव है, जब पाँचों समिति का भली-प्रकार पालन किया जावे। यद्यपि 'पच महावत एव पंच-समिति का पूर्णतया पालन तो, यथाख्यात- चरित्रवाला ही कर सकता है, लेकिन इस ओर गति करना, प्रमाद न करना, प्रत्येक साधु का कर्तव्य है। अपने इस कर्तव्य को समझ फर, जो साधु सावधानी रखता है, उससे यदि कभी कोई गल्ती हो भी जावे, तो वह पतित नहीं कहलाता। 'पतित तो तभी कहलाता है, जन, जान बूझ कर उपेक्षा की जाने और जो गल्ती हुई है, उसे सुधारने की चेष्टा करने के बदले और बढने दे। हे मुनियो । तुम्हारा पद, चक्रवर्ती राजाओ एव देवताओ से भी बड़ा है। देवता लोग, चक्रवर्ती के सामने अपना मस्तक नहीं झुकाते, लेकिन तुम्हारे आगे अपना मस्तक मुकाते हैं। चक्रवर्ती राजा भी, तुम्हारे दर्शन को लालायित रहता है। ऐसे प्रतिष्ठित पद को पाकर भी, पाँच समिति के पालन में सावधानी नरसने पर, तुम्हारी गणना, फायरों एच पतितो में होगी। इस के साथ ही, जिस उद्देश्य से तुमने घर-बार छोडा है, जिस ध्येय - * सनाथ अनाथ निर्णय -- को लेकर, सांसारिक सुख त्याग संयम में प्रवजित हुए हो, समिति पालन में असावधानी रखने पर, उसकी भी पूर्ति नहीं होती। तुम्हारे पदकी प्रतिष्ठा, तुम्हारे ध्येय की पूर्ति, एव गृह- ससार छोडने से लाभ, तभी है जब तुम पंच महाव्रत के साथ ही पच समिति के पालन में सावधानी रखो । यदि तुम से कोई गल्ती भी हो जावे, तो उसका प्रतिशोधन करो, लेकिन उसे घढने मत दो। पहाड पर से एक पाव फिसला और दूसरे पाव से उसी समय सम्हल गया, तब तो गिरने से ' रुक जाता है, और यदि दूसरे पाव । को भी ढील दे दी, तो लुढकता हुआ नीचे ही चला जाता है । इसी प्रकार, पॉच समिति के पालन में कोई गल्ती हो जावे और उसी समय अपनी गल्ती को मान कर, भविष्य के लिए सम्हल जाओगे, तव तो तुम्हारी गणना, कायरो मे न होगी, तुम दूसरी अनाथता में न पड़ोगे, अन्यथा, सनाथी मुनि के कथनानुसार तुम कायर एव अनाथ के अनाथ ही माने जाओगे। तुम्हारे लिए, इससे अधिक लज्जा की बात क्या होगी । इसलिए पच महावत एव पच समिति के पालन मे, किंचित् भी असावधानी या प्रमाद मत करो। एक कदम आगे बढाने वाला, वीर माना जाता है और एक कदम पीछे हटाने वाला, कायर माना जाता है। • तुम अधिक आगे न बढ सको तब भी, पीछे तो कदम मत हटायो। यानी तुमने जिस चरित्र को स्वीकार किया है, 7 , "
सनाथ-अनाथ निर्णय
उसके पालन मे तो प्रमाद मत करो। तुम्हे समिति गुप्ति के
पालन मे, फिस प्रकार एकाप्रचित्त रहना चाहिए, इसके लिए
एक दृष्टान्त दिया जाता है।
एक पारधी, शिकार को ताक लगाये बैठा था। उसके
पास होकर एक पारात निकली। थोड़ी ही देर बाद, उसी
पारात के कुछ आदमियो ने पारधी के पास आकर, पारधी से
पूछा, कि क्या इस तरफ से वारात निकली है ? पारधी ने उत्तर
दिया-कि मैंने नहीं देसो। उनने पूछा तुम यहाँ कितनी देर
से हो ? पारधी ने उत्तर दिया-सुवह से ।
उन लोगों ने कहा-
कि जब तुम यहाँ सुबह से हो, तो तुमने बारात अवश्य ही देखी
होगी। क्योंकि उस वारात के जाने का मार्ग यही था। पारधी
ने उत्तर दिया-कि यदि गई भी हो, तो मुझे पता नहीं। मैं,
शिकार की ताक में बैठा था, बारात की ओर ध्यान क्यो
।
देने लगा।
हे मुनियो । वह पारधी, रुद्रध्यान में था। उस ध्यान से
उसे हिंसा करनी अभीष्ट थी । उस रुद्र ध्यान में भी वह
ऐसा एकामचित्त रहा, कि उसे पास से गाती धजाती हुई वारात
निकल जाने की भी सबर न हुई, तो तुम्हे धर्मध्यान में अपना
चित्त कैसा एफाम रसना चाहिए। इसका विचार करो।
4
-
सनाथ आआय निर्णय १३८ - , - चिरपि स मुण्डरुई भवित्त अथिख्यए तव नियमेहिं भट्टे । चिराप अप्पाण किलेसइत्ता न पारए होइ हु सपराए ॥४१॥ भावार्थ व्रत नियम और तप में अस्थिर रहने वाला, चाहे चिर काल तक सिर मुण्डन कराता रहे और आस्मा को फष्ट में डालता रहे, तव भी ससार से पार नहीं होता। सनाथी मुनि कहते हैं-हे राजा, कई कायर लोग, सयम लेकर, शिर के केश तो लुचन करते हैं लेकिन व्रत नियम और तप की आराधना रूप भगवान महागर के मार्ग पर नहीं चलते । ऐसे लोग, चाहे चिरकाल तक केश लुचन किया करें, चिरकाल तक कष्ट उठाते रहे, लेकिन जन्म-मरण से नहीं छूटते । राजा, कायर लोग, व्रत नियम का पालन न करके भी, साधु-वेश का त्याग नहीं करते, किन्तु साधु-वेश रख कर, केश लुचनादि बाह्य क्रिया करते रहते हैं। लेकिन, केवल याह्य क्रिया से, कोई भी जन्म-मरण मुक्त नही हो सकता । जन्म-मरण से मुक्त तो तभी हो सकता है, ससार के कष्टों से, तभी छूट सकता है, अनाथता से निकल कर सनाथ तभी हो सकता है, जब, सयम में प्रव्रजित होने के समय लिये गये व्रत-नियमादि के पालन में प्रमाद न करे। राजा,' सयम में प्रवजित होकर भी, व्रत- नियमादि का पालन न करना और फिर साधु-वेश धारण किये रहना-यानी साधु बने रहना-फैसा है, यह सुनो- . - । । . -- 1 १३९ सनाथ-mय निर्णय । पल्लेव मुष्टी जह से असारे अयन्तिए कूड कहारणे या । रादामणी वसालयप्पगा से अमहग्धए होड़ यजाणएस ॥४२॥ कुसील लिङ्ग इह धारइत्ता इसिज्मय जीविय चूह इत्ता । असजए सजय लप्पमाणे विणिधाय मागच्छइसे चिरपि ॥४३॥ भावार्थ-जिस प्रकार भिड़ी हुई होने पर भी खाली मुही, मणि समान चमकता भी काँच का हुदा और अनियन्त्रित एवं खोटा सिका, जानकार के समीप भसार है, इसी प्रकार, मत नियम रहित 'साधु चिन्ह धारण करने वारा भी है। भसयति होता हुआ भी, साधु वेश धारण करके जो अपने आप को सयति बताता है और इस प्रकार आजीविका करता है, वह बहुत काल तक नर को पीडा भोगता है। सनाथी मुनि कहते हैं, कि मुट्ठी में कुछ न होते हुए भी साली मुट्ठी वन्द करके अजान लोगों को धोखा दिया जासकता है। अजान लोग, गली परन्तु बन्द मुट्ठी देशकर चाहे. यइ धोना सा जावें, कि इस मुट्ठी में कुछ है, लेकिन जानकार दापि धोसा न खावेगा। काँच के चमकते हुए टुकड़े को, कोई अजान चाहे मणि मान भी ले, लेकिन मणि को पहचान सकनेवाला, काँच को कदापि मरिण नहीं मान सकता । सच्चे सिक्के के समान दिसनेगले सोटे मिश्के को, जानकार कभी सथा सिक्का नहीं मान सकता। ठीक इसी प्रकार, संयम न पाल कर लिग (वेश) धारण करके श्राजीविका करनेवाले - -
सनाथ अनाथ निर्णय
धारक को, अजान लोग चाहे साधु मान लें, अजान लोग ऐसे
कुशील के विषय में चाहे धोसा खा जावें, लेकिन जानकार,
लोगो को साधु नहीं मान सकता। जानकार की दृष्टि में तो ऐसा
आदमी घृणा का ही पात्र है, श्रद्वा या प्रतिष्ठा का पात्र नहीं ।
मनाथी मुनि ने, व्रत-नियम-रहित साधु-चिन्ह को, साली
मुट्ठी, काँच के टुकडे और ग्बोटे सिक्के की उपमा दी है। वे
कहते हैं, कि जिस प्रकार साली मुट्ठी वन्द करके भरी का बोध
करानेवाला, काँच के टुकडे को मणि कहनेवाला और सोटे सिक्के
को अच्छा बतानेवाला, अपने आत्मा को ठगने के साथ ही
दूसरे को भी ठगता है, इसी प्रकार पच महाबत एव पंच समिति
का पालत न करके, केवल साधु-वेश एव साधु-चिन्ह रखनेवाला,
अपने आप को भी ठगता है और दूसरे को भी ठगने की चेष्ठा
करता है । यद्यपि वह अजिविका एवं मान प्रतिष्ठा के लिए ऐसा
‘करता तो है, लेकिन इस प्रकार थो
साधु-चिन्ह मे न तो वह
जानकार को ठग ही सकता है, न सनाथ ही बन सकता है ।
राजा, जिस प्रकार काँच का टुकडा, मणि का काम नहीं दे
सकता, रयाली मुट्ठी भरी मुट्ठी का काम नहीं दे सकती और
नकली सिका, असली सिक्के का काम नहीं दे सकता, उसी
प्रकार पच महाव्रत एव पच समिति के बिना खाली, साधु-चेश,
साधुपने की गरज को पूरी नहीं कर सकता।
साधुपने का
-वेश
१४१ १५ सनाथ-अनाथ निर्णय . और चिन्ह रखने पर, सयम के व्रत-नियमो का पालन करना ही चाहिए। यदि सयम के व्रत नियमों का पालन न हो सके, तो साधु- वेश को पृथक करके स्पष्ट कह देना चाहिये, कि मैं, साधु नहीं हूँ। ऐसा न करके जो लोग साधु-चिन्ह धारण किये रहते हैं और पच महावत की विराधना करते हैं, वे अपीश्वरो के चिन्ह को दूपित करते हैं। व्रत नियम का पालन न करने पर, जो साधुलिङ्ग सनाथ बनाने वाला है, वहीं महान् दुस देनेवाला बन जाता है। असयम के साथ सयमावेश किस प्रकार हानि करने वाला होता है व्रत-नियम-रहित साधु-वेश क्या करता है, यह सुनो। विस तु पीय जह कालकूड हणाइ साथ जह कुग्गहस्य ।। एसो व धम्मो विसोववन्नी हणाह वेयाल इवा चिवन्नो ॥४४॥ भावार्थ-जिस प्रकार, पिया हुआ कारकूट विष मार डालता है, उटी रीति से पकड़ा हुआ हथियार काट डालता है, अविधि से जपा हुआ मात्र प्राणनाशक होता है, उसी प्रकार दुरपयोग किया जाने पाला विषय भोग मिश्रित यति धर्म-(व्रत नियम रहित साधु वेश ) भी अनिष्ट परिणाम देता है। राजा, मुनियो के चिन्ह-रजो हरण मुसवत्रिका आदि सयम पालन के लिए है, लेकिन कुशील लोग, मुनियों का चिन्ह अस- यम की सहायता के लिए-असयम को छिपाने के लिए--रसते - - सनाथ अनाथ निर्णय १४२ . हैं। वे लोग, ऋषियों की ध्वजा-रजोहरण मुसवत्रिका - रख कर यह अभिलापा रखते हैं, हम असयम का आचरण करके भी इस धजा से सयमी का गति प्राम कर लेंगे। उनके समीप पच महाव्रत एव पच समिति, मोक्षादि का कारण नहीं है, किन्तु केवल वेश ही मोक्षादि का कारण है। इसीलिए वे, असयम का पाचरण करके भी, केवल वेश से सयमी को गनि चाहते हैं, लेकिन उनकी यह प्राशा, दुराशा मात्र है। ऐसे लोग, स्वर्ग या मोक्ष प्राप्त करना तो दूर रहा, नरकादि के कष्ट भी नही मिटा सकते, किन्तु बहुत काल तक नरक के कष्ट भोगते रहते हैं। राजा, मोक्ष की अभिलाषा मे धारण किया हुआ नत नियम- रहित यतिवेश, उसी प्रकार उल्टा फल देने वाला होता है, जिस प्रकार, दीर्घायुपी होने की अभिलापा से पिया गया कालकूट विष, रक्षा की अभिलापा से पकडा गया, उल्टा हथियार और साँप को वश में करने की अभिलापा से प्रविधि-पूर्वक जपा गया मन्त्र उल्टा फल देने वाला होता है । व्रत-नियम-रहित साधु वेश रख कर वह कुशीललिङ्गी चाहता तो है मोक्ष या स्वर्ग के सुस, लेकिन जाता है नरक को और पाता है वहाँ के घोर दुस । राजा, तेरे कार्यकर्ता राज-मुद्रा इसलिए धारण करते हैं, कि वे राज्य में होनेवाले अन्यायो का प्रतिकार करें। राज मुद्रा, इस बात की द्योतक है, कि ये धारण करनेवाले राजकर्मचारी १४३ सनाथ-अनाथ निर्णय हैं, तथा अन्याय अत्याचार को रोकने वाले हैं । जनता, राज- मुद्रा धारण करनेवाले को अपना रक्षक मानती है और उस पर 'विश्वास करती है। राज-मुद्रा धारण करनेवाले राज-कर्मचारियो का भी यह कर्त्तव्य होता है, कि वे राज्य के नियमों का विशेप रूप से पालन करें। लेकिन राजा, यदि कोई आदमी राज-मुद्रा धारण करके भी राज्य के नियमों की अवहेलना करे, अन्याय अत्याचार करे, तो क्या तू उम राज-मुद्रा-धारण करके अन्याय करनेवाले को दण्ड न देगा ? बल्कि ऐसे व्यक्ति को तू अधिक दण्ड का पात्र मानेगा। अपराध करने पर, वह राज-मुद्रा, दण्ड से बचाने मे तनिक भी सहायता न पहुँचावेगी, किन्तु अधिक दण्ड दिलावेगी। उसे, अपराध करने का भी दण्ड मिलेगा और राज मुद्रा कलकित करने का भी। दण्ड देने के साथ ही, उस अपराध करने वाले व्यक्ति से, राज-मुद्रा भी छीन ली जावेगी। क्योकि, यदि अन्याय अत्याचार करनेवाला भी, राज-मुद्रा धारण किये रहेगा, तो इस बात की पहचान ही कठिन हो जावेगी, कि कौन अन्याय अत्याचार को रोकने वाला है और कौन अन्याय अत्याचार में वृद्धि करनेवाला है। राजा, यही थात साधु-वेश के लिए भी समझ ले । साधु का पेश, सयम के लिए है। साधु-वेश से, सयम पालने की पहचान होती है । वेश को देसफर, जनता यह जानती है, कि सनाथ अनाथ निर्णय १४४ ये वेश धारण करनेवाले, पच महावत के पालक और सनाथ हैं । लेकिन राजा, यदि कोई आदमी केवल वेश धारण किये रहे, पच महावत का पालन न करे, तो यह साली वेश, उसे उस दण्ड से कदापि नहीं बचा सकता, जो दण्ड, पच महाबत स्वीकार करके फिर पालन न करने से मिलता है। बल्कि यह थोथा साधु वेश, उस दण्ड में उसी प्रकार वृद्धि करता है, जिस प्रकार अप- राध करने पर, राज मुद्रा दण्ड मे वृद्धि करती है। राजा, कभी कोई यह कहे, कि साधु-चिन्ह रजोहरण मुस वस्त्रिका श्रादि रसकर, यदि पच महाव्रत का पालन न किया, तब भी कुछ न कुछ यतना तो करेहीगा। फिर उसने बुरा क्या किया, जो उसे अधिक दण्ड नरकादि-मिलता है ? लेकिन राजा, महाव्रतो का पालन न करके भी, वह रजोहरण मुसवस्त्रिका आदि किस अभिप्रायासे रखता है इसे देखो। पच महाव्रत का पालन न करके भी, रजोहरण ' मुसवस्त्रिका श्रादि रखने से उसका अभिप्राय जयणा करना नहीं है, किन्तु लोगों को धोसा देना है। पच महावत की घात करके, वह, रजोहरण मुसवस्त्रिका आदि आजीविका के लिए रखता है। यदि यतना के लिए रसता होता, तो पच महाव्रत की घात ही क्यो करता १ कोई चोर, पैसो की चोरी न करके, रुपयो की चोरी करे, तो इसका यह अर्थ नहीं है, कि वह इतने अश में ईमानदार है। ईमानदार १४५ सनाथ अनाथ निर्णय तो न होता, जय रुपयों की भी चोरी न करता । रुपयों की चोरी करता है इसलिए पैसों की चोरी छोडने का कोई मूल्य- नहीं है। बल्कि, पैसों की चोरी छोडकर रुपयों की चोरी करने वाला अधिक धूर्त है। उसने, धूर्तता के लिए पैसों की चोरी छोड़ी है। इसी प्रकार १च महाप्रत की घात करे और जयणा के नाम पर साधु-लिङ्ग धारण किये रहे, तो यह धूर्तता के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता। जिस आदमी को जयणा का ध्यान होगा, वह पच महानत को घात करे, यह कदापि सम्भव नहीं है सनाथी मुनि ने मूल गुण की ओर से होनेवाली अनाथता पवाई । अब वे उत्तर गुण की ओर से होनेवाली अनग्थता का वर्णन करते हैं और साथ ही यह भी बताते हैं, कि पच महा- व्रत रहित साधु-लिङ्ग धारण करके आजीविका करनेवाले की, प्रकट में क्या पहचान है। इसके लिए वे कहते हैं- ज लक्खण सुविण परज माणे निमिश कोडहल सप गाढे कुहेड विज्जा सबदार जीवी न गन्छई सरण तम्मिकाल ॥४५॥ भावार्य-जो भादमी, साधु बन कर रोगों को स्वम एव लक्षणादि का फल यताता है, भूकप भाकाश रिग्रह बताता है, पुनादिप्राप्ति के उपाय 10 सनाथ अनाथ निर्णय और इन . , , कराता है, तथा भारचर्य उत्पन्न करनेवाली यात, यताता है, कामा द्वारा भाजीविका करता है, वह दुसों कदापि शरण नही पा सकता। सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, कई कायर लोग, सयम स्वीकार करके, स्वप्न, लक्षण, भूकप, ग्रहण आदि का फल और निमित्त आदि बताने में पड़ जाते हैं। इस प्रकार वे, अपनी महिमा पूजा वढाते एव आजीविका करते हैं । वे लोग, इन्द्रजा- लादि कुविधा द्वारा भी लोगों को आश्चर्य में डालते हैं, लेकिन ये विद्याएँ, सनाथ बनाने वाली नहीं, किन्तु अनाथ बनानेवाली हैं। अन्त में, ये विद्याएँ शरणदात्री नहीं होतीं। ऐसे लोग, थोडी देर के लिए सासारिक मान प्रतिष्ठा चाहे प्राप्त कर लें, संसार के लोभी लोगों को ठग कर आजीविका भले कर लें लेकिन मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते । संसार मे इस उपाय से जमाया हुआ क्षणिक प्रभाव, मोक्ष-मार्ग का बाधक है । ऐसे लोग, अनाथ के अनाथ ही हैं। जैन शास्त्रों में तो साधुओ के लिए स्वप्न लक्षण प्रादि का फल बताना मना ही है लेकिन अन्य ग्रन्थकार भी निषेध ही । करते हैं। सन्यासाश्रम को विधि बताते हुए मनुस्मृति में ॥ कहा है- न चोत्सात निमित्ताभ्या न नक्षत्राङ्ग विद्यया । नानुशासन वादाभ्या भिक्षा लिसेन् कर्हिचित् ॥. - अध्याय ६ ठा r- - - . A - १४७ सनाथ अनाथ निर्णय अर्थात् -(सन्यासी) भूकम्प आदि उपात, निमित्ति नक्षत्र- पिया (ज्योतिप) और अग-विद्या ( सामुद्रिक)धतलाकर, तथा धर्म एव नीति का उपदेश देकर घटले में कदापि भिक्षा प्राप्त न करे। सयम लेफर, फिर , अहिंसादि पच महानत की विराधना करने, पच समिति का पालन न करने और स्वप्न लक्षण श्रादि का फल बताने से, क्या हानि होती है, यह बताने के लिए सनाथी मुनि कहते हैं- तम तमेव उ से असीले सया दुही विपरिया मुवति । सधावई नरग तिरिक्ख जोणी मोण विराहन्तु असाहु रूवे ॥४६॥ भावार्थ-वह सयम की विराधना करनेवाला साधुलिंगधारी दुखी होता हुआ विपर्यास को प्राप्त होता है, यानी उल्टा समक्षता तथा करता है। इस कारण वह असाधु सयम स्वीकार करने पर भी नरक तिर्यक् गति के कार्य करता है और नरक तिर्यम् गति में भ्रमण करता रहता है। राजा, जिस ध्येय को लेकर उठा है, उसे भूल जाना और उसके विपरीत कार्य करना, दुस का कारण है। सयम के विराधक लोग, ससार में चाहे सुखी भी देसे जाते हों, लेकिन ससार में दिसनेवाले सुख के पीछे, बहुत- दुस छिपा हुआ है।
१४८ सनाथ-अनाथ निर्णय , सासारिक सुख ही तो जन्म-मरण का कारण है। साधुपने में, सांसारिक सुस यश वैभव कीर्ति आदि की चाह करना, उनकी प्राप्ति के उपाय करना, साधुपने के लक्षण नहीं हैं। साधुपने में तो इन सब का बलिदान करना होता है । साधुपना लेकर, उत्तम ज्ञान, दर्शन, और चरित्र की अराधना करनी चाहिए । जो लोग, साधु होकर भी सासारिक सुसों की अभिलाषा करते हैं, वे, अपनी गाँठ मे बँधे हुए चिन्तामणि रत्न को देकर बदले में पत्थर ले रहे हैं। जो मनुष्य सयम रूपी चिन्तामणि रत्न सोकर, बदले में सासारिक सुस, यश, कीर्ति आदि रूपी पत्थर लेता है, वह सुखी कैसे हो सकता है ? वह तो 'सदा ही दुसी रहता है और मरने पर नरक या तिर्यक् गति में जाता है । यहाँ प्रश्न होता है, कि साधुपना लेकर असयम में पड़ने- वाला, अाखिर साधुपने का-अपने वेश का कुछ भी तो ध्यान रसता ही होगा। वह जो भी सासारिक सुस भोगता होगा, वह गृहस्थ की अपेक्षा थोडे और गृहस्थ के दिये हुए या उनके, जूठे । ऐसा होते हुए भी, उस द्रव्यलिंगी साधु को नरक विर्यक् को गति प्राप्त होती है, तो फिर गृहस्थो का तो कभी कल्याण ही नही हो सकता । गृहस्थों को तो इससे मी भारी दण्ड भोगना पडता होगा। यदि गृहस्थों को इससे भारी दण्ड नहीं भोगना पडता है, तो फिर द्रव्यलिंगी साधु को, थोडे से सांसारिक सुख १४९ साथ माय निर्णय मोगने के कारण ऐसा कठिन दण्ड क्यों प्राप्त होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि गृहस्थ जो सासारिक भोग भोगता है वह अपनी की हुई किसी प्रतिज्ञा से भ्रष्ट होकर नहीं, किन्तु प्रतिज्ञा पर स्थिर रह कर । वह, सासारिक भोगों के लिए, छल कपट नहीं करता । यह नहीं करता, कि सासारिक मोग भी भोगे और साधु-वेश पहनकर, अपने आपको पच महाव्रत धारी भी प्रसिद्ध करे । वह जो कुछ भी करता है, चुरा छिपा कर नहीं करता है। लेकिन द्रव्यलिंगी साधु, अपनी प्रतिज्ञा से भ्रष्ट होकर सासारिक विषय-भोग भोगता है । वह, गृहस्थों की तरह गृहस्थ- वेश में सासारिक सुख नही भोगता, किन्तु उस वेश में भोगता है, जो सासारिक-भोग त्यागनेवालो का है। गृहस्थो के पास, सासारिक भोगों के साधन भी रहते हैं, इसलिये उन्हें छल कपट नहीं करना पडता, लेकिन सयम में प्रव्रजित होने वाला, ऐसे साधनों को, सयम में प्रवजित होने के समय ही त्याग चुक्त्ता है। इसलिए उसे, सासारिक भोग के साधन जुटाने में, छल कपट से काम लेना होता है। उदाहरण के लिए, गृहस्थ स्त्री है, लेकिन द्रव्यलिगी, स्त्री आदि त्याग कर ही सयम में अवजित हुआ था, इसलिए उसके पास स्त्री नहीं है। अब यदि चह स्त्री-भोग भोगेगा, तो पर-स्त्री के साथ ही और पर-स्त्री प्राप्त करने में उसे न मालूम कैसे कैसे छल कपट का श्राश्रय लेना के पास सनाथ अनाय निर्णय १५० होगा । यही बात धन वैभव आदि के लिए भी है। तात्पर्य यह, कि द्रव्यलिंगी एक तो त्यागियों के वेश में सासारिक सुस भोगता है । दूसरे, प्रतिज्ञा के विपरीत कार्य करता है। तीसरे, सासारिक भोग प्राप्त करने में, छल कपट से काम लेता है। और चौथे, गृहस्थो की अपेक्षा उसकी लालसा बढी हुई होती है । इन्हीं कारणों से, वह, ऐसे कठिन दण्ड का पात्र है । शास्त्र में कहा है- माई मिच्छा दिही अमाई समदिट्ठी । अर्थात-माया छल कपट-करने वाला मिथ्याटष्टि है और माया नहीं करने वाला समदृष्टि है। साधु-वेश मे रहकर, जो सासारिक भोग भोगता है, वह, छल कपट करनेवाले मिथ्यादृष्टि के समान है। इसीलिए उसे, सनाथी मुनि के कथनानुसार कठिन दण्ड प्राप्त होता है । गृहस्थी 'मे भी, जो छल कपट करनेवाला है, जो प्रतिज्ञा-भ्रष्ट है, एव व्रत- 'नियम का पालन नहीं करता है, वह भी ऐसे ही कठिन दण्ड का पात्र है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जो व्रत-नियम के विरुद्ध कार्य करके, उस विरुद्ध कार्य को, व्रत-नियम के अन्तर्गत ही 'यतलाते हैं, या अपवाद-मार्ग के कार्य की प्ररूपणा, उत्सर्ग मार्ग में करते हैं। ऐसे उत्सूत्र प्ररूपक भी उसी दण्ड के पात्र हैं, जो सनाथी मुनि ने ऊपर बताया है। । . 1 , सनाथ-अनाथ निर्णय - मयम को विराधना के दुष्परिणाम का वर्णन करके सनाथी मुनि कहते हैं- उदसिय कीयगड नियाग न मुचई किंचि अणेसणिज्ज । अग्गी विवा सव्वभक्खी भावत्ता इत्तो चुए गच्छ कटु पार ॥७॥ भावार्थ-सयम लेकर भी, जो अग्नि की तरह सर्वभक्षी बन जाता है, उडेशिव-साधु के निमित्त बना हुआ क्रांत साधु के लिए खरीदा हुआ हुभा नित्य पिण्ड एक ही घर से नित्य लेना और अनएपणिक यानी न लेने योग्य आहार भी नहीं छोडता, किन्तु रेकर पा जाता है, वह इस भव से पतित होकर कटु पाप के फल को प्राप्त करता है। यानी दुर्गति में जाता है। सनाथी मुनि ने, सयस में प्रत्रजित होने के पश्चात् आनेवाली अनाथता के तीन कारण पच-महाव्रत का पालन न करना, पच- समिति का पालन न करना, और लक्षण स्वप्न श्रादि का फल एवं निमित्त, इन्द्रजाल के तमाशे आदि बत नाना-कहे । अरचे, साधु- पने की अनाथता का, भोजन सम्बन्धी चौथा कारण बताते हैं। वे कहते हैं, राजा, साधुपने के व्रत-नियम की अवहेलना करनेवाले बहुत से-थोथे वेशधारी-लोग अमि की तरह सर्व भक्षी बन जाते है । जिस प्रकार अग्नि, अपने में पष्ठी हुई सर वस्तुओं को भस्म फर देती है, उमी प्रकार के द्रव्यलिंगी मी, सय पुछ सा ।
सनाथ अनार निर्णय ५१५२ - जाते है। वे, भोज्य-अभोज्य किसी भी प्रकार का श्राहार नहीं छोडते । यद्यपि उनका कर्तव्य तो यह है, कि वे, आहार लेने में, एपणासमिति का भजी प्रकार पालन करें, लेकिन वे लोग, एपणा- समिति का किंचित् भी ध्यान नहीं रसते । वे, अनएपणिक आहार भी ले लेते हैं, और वह आहार भी ले लेते हैं, जो 'गृहस्थो ने साधु के निमित्त से हो बनाया या सरीदा है। इसी प्रकार वे, एक ही घर से नित्य-नित्य आहार लिया करते हैं तथा असूझता आहार भी ले लेते हैं। राजा, कुशील लिड्गी, स्वाद, या शरीर को पुष्ट करने के लिए, अग्नि की तरह सर्वभक्षी बन कर, एपणासमिति को भुला तो देता है, जिस तरह अग्नि अपने मे पडे हुए दुर्गन्ध युक्त, गीले और अपवित्र प्रादि सभी पदार्थों को भस्म कर देती है, इसी प्रकार वह भी, उद्देशिक, क्रीत, नित्यपिण्ड और अप्रासुक आदि अशुद्व आहार लेकर सा तो लेता है, लेकिन मरण निश्चय है । ससार का कोई भी जीन, मरने से नहीं बच सकता, तो क्या ऐसा करनेवाला कुशीललिंगी न मरेगा। अवश्य मरेगा और उस ऐसा करनेवाले कुशीललिंगी का आत्मा, हृष्ट पुष्ट शरीर एव रसलोलुप जिह्वा को छोडकर महान् दुर्गति में जावेगा। उसने, रसलोलुप बनकर, सयम का नाश किया है, इसलिए कटु- के फल को प्राप्त करेगा। . - -
१५३
सनाथ अनाथ निर्णय
A
-
राजा, वह असाधु जर गृहस्थ था, तर इन्छानुसार भोजन
बनाकर या बनवाकर सा लेता था। लेकिन उसने यह इच्छा की कि
'श्रम में इन्छित भोजन नहीं करूँगा, किन्तु ऐसा भोजन करूँगा, जो
मुझे शुद्ध-भिक्षा में मिल जावे। इस समय, मेरे भोजन के
लिए, अनेक उस स्थावर जीव को कष्ट होता है । मैं, अपने साने के
लिए ही, बस स्थावर जीवों को कष्ट देता हूँ। लेकिन अब, मैं,
किसी त्रस स्थावर जीव को, अपने भोजन के लिए, कष्ट न होने
दूंगा, किन्तु इस प्रकार भिक्षा करके क्षुधा मिटाऊँगा, जिस तरह
भ्रमर, बिना निश्चय किये ही फूलो का रस लेने के लिए जाता है
और एक ही फूल से नहीं किन्तु अनेक फुल से रस लेकर अपनी
तृप्ति कर लेता है। मैं भी भ्रमर-मिक्षा से अपना पेट भरूँगा,
जिसमें मेरे भोजन के कारण, किसी भी बस स्थावर जीव को
कष्ट न हो। अब मैं, रसलोलुप न रहूँगा।'
राजा इस प्रकार की भावना से, वह गृह-ससार त्याग कर
वह, जन सयम में प्रमजित नहीं हुआ था, तब
जैसा चाहता था, वैसा भोजन बना कर या चनवाकर साता था,
फिर भी, उसके लिए उपालम्भ की कोई बात न थी। लेकिन,
उक्त भावना से साधु हुआ और फिर भी उससे स्वादलोलुपता न
छूटी, तो यह, प्रतिज्ञा के विपरीत एव उपालम्भ का कार्य है।
उस असाधु की रसलोलुपता से, अनेक त्रस स्थावर जीव की
साधु होगया ।
सनाथ-अनाथ निर्णय १५४ हिसा होती है, फिर भी, वह जैसा इच्छित भोजन गृहस्थावस्था में कर सकता था, वैसा भोजन प्राप्त नहीं कर पाता । इस कारण उसका चित्त, स्वादिष्ट भोजन के लिए सदा लालायित रहा करता है। इन्हीं कारणों से, वह दुर्गति में जाता है । राजा, सयम का पालन करने वाले लोग अपने लिए बनाया गया, या अपने लिए खरीदा हुआ आहार नहीं लेते । - क्योंकि, ऐसा आहार लेने से, साधु के लिए अनेक त्रस स्थावर जीवों की हिसा होती है। इसी प्रकार, साधु, नित्य एक ही घर से भिक्षा नहीं किया करते। एक ही घर मे भिक्षा लेते रहने पर, उस घर-वाले को यह मालूम रहता है, कि साधु आवेंगे, इसलिए वह, साधु के वास्ते विशेप तयारी करता है-विशेप भोजन बन- वाता है जिससे साधु के लिए, उस स्थावर जीवों की हिंसा होती है। सयमी लोम, भिक्षा मे वैसा ही आहार ले सकते हैं, जो बयालिस दोप से रहित हो। वे उद्देशिक, क्रीत, नित्य पिंड तथा आमन्त्रित होकर या पहले से सूचना देकर थाहार नहीं लेते। लेकिन कुशील लिङ्गी लोग, भोजन सम्बन्धी इन निमयों का पालन नहीं करते। वे, एपणिक एव अनैपणिक ही प्रकार का आहार लेते और साते हैं। परिणाम यह है, कि ऐसे लोगों को इस लोक में भी सम्मान-पूर्वक - ,
१५५
सनाथ अनाथ निणय
-
-
आहार नहीं मिलता-अनादर-पूर्वक आहार मिलता है, और
परलोक मे भी, दुर्गति मिलती है ।
जैन भिक्षु के लिए, भिक्षा सम्बन्धी जो विधि बताई गई है,
बहुत अश में वैसी ही विधि, अन्य ग्रन्थो में भी बताई गई है।
जैसे-
विधूमे भ्यस्तमुपले व्यगारे भुक्तवज्जने ।
श्रतीत पात्र सपाते नित्य भिक्षा यतिश्चरेत् ।
सप्तागाराश्चरेद्भक्ष्य भिक्षित नानुभिक्षयेत् ।।
शहम्मृति ०७
अर्थात् -गृहस्थों के यहाँ जन मूमल चलना-कूटना-चन्द हो
गया हो; धुनों न निकलता हो, गृह के लोग भोजन कर चुके हो,
और जल-पात्रादि का रसना उठाना न हो रहा हो, उस समय
यति, भिक्षा के लिए जाचे। यति, सात घर से भिक्षा ले, और
जिस घर से पहले मिक्षा ले चुका है, उस घर से भिक्षा न ले ।
न तापसैंग्रोमणैर्वा वयोभिरपि वा श्याम ।
पाकीर्ण भिक्षुकान्यैिरागारमुपसनजेन ॥
मनुस्मृति अ० पठा
अर्थात् सन्यासी, उस घर मे भिक्षा के लिए कदापि न
जाये, जिस घर में, भोजन के लिए आये हुए तापस, ब्राह्मण,
कुत्ते, कौए या दूसरे भिक्षुक मौजूद हों।
.
सनाथ अनाथ निर्णय १५४ हिंसा होती है, फिर भी, वह जैसा इन्छित भोजन गृहस्थावस्था में कर सकता था, वैसा भोजन प्राप्त नहीं कर पाता । इस कारण उसका चित्त, स्वादिष्ट भोजन के लिए सदा लालायित रहा करता है। इन्ही कारणो से, वह दुर्गति में जाता है । राजा, सयम का पालन करने वाले लोग अपने लिए बनाया गया, या अपने लिए सरीदा हुआ आहार नहीं लेते ।, क्योंकि, ऐसा आहार लेने से, साधु के लिए अनेक त्रस स्यावर जीवो की हिसा होती है। इसी प्रकार, साधु, नित्य एक ही घर से भिक्षा नहीं किया करते। एक ही घर मे भिक्षा लेते रहने पर, उस घर-वाले को यह मालूम रहता है, कि साधु आवेंगे, इसलिए वह, साधु के वास्ते विशेप तयारी करता है-विशेप भोजन बन- वाता है जिससे सावु के लिए, उस स्थावर जीवों की हिंसा होती है। सयमी लोय, भिक्षा मे वैसा ही आहार ले सकते हैं, जो बयॉलिस दोप से रहित हो। वे उद्देशिक, क्रीत, नित्य पिंड तथा आमन्त्रित होकर या पहले से सूचना देकर आहार नहीं लेते। लेकिन कुशील लिङ्गी लोग, भोजन सम्बन्धी इन निमयो का पालन नहीं करते। वे, एपणिक एव अनैपणिक नों ही प्रकार का आहार लेते और खाते है। परिणाम यह ॥ है, कि ऐसे लोगों को इस लोक में भी सम्मान-पूर्वक
१५७
सनाथ भनाथ निर्णय
वैर
कि 'अमुक व्यक्ति यदि हमारा वैरी है, तो अधिक से अधिक
हमारा गला काट डालेगा, और क्या करेगा?' अर्थात, पूरा
करने की सीमा इतनी ही है, इससे अधिक वैरी कुछ नहीं कर
सकता । यह भी वही वैरी करेगा,जो दयाहीन हो । लेकिन राजा,
दुरात्मा से तो अपने आपका वह अहित होता है, जो अहित,
वैरी कहलाने वाले से भी नहीं हो सकता। बल्कि वैरी बने
हुए व्यक्ति को, सुआत्मा अपना हित करने वाला मानता है, जैसे
कि गजसुकुमार मुनि ने, सोमल को अपना सहायक माना था।
ऐसे समय पर, सुश्रात्मा सोचता है, कि मैं इस मारने वाले से
नहीं मर सकता, मैं तो अपने आप से ही मर सकता हूँ यानी
अपने काय्यों से ही दु स पा सकता हूँ । यदि, वैरी द्वारा
गर्दन कटने पर, प्रात्मा में समता रहे तो वह गर्दन काटनेवाला,
मोक्ष प्राप्त कराने का साधन भी हो सकता है दुरात्मा
अपनाश्राप का, वैरी के गला काटने से भी अधिक श्रहित
करता है। मृत्यु के मुस में पड़ने पर, दुरात्मा, अपने आप
ही पश्चाताप की अग्नि से जलने लगता है। जिस समय यह
नरकादि की वेदना भोगता है, उस समय उसे यह पश्चाताप
होता है, कि 'मैंने सयम स्वीकर करके भी उसकी विराधना
क्यों कर डाली । मैं, थोडे से नाशवान विषय-भोग के लोभ में
क्यों पड़ गया । यदि मैंने विपय लोलुपता से, या प्रमाद यश,
। लेकिन
सनाथ अनाथ निर्णय १५६ - -- - सनाथी मुनि कहते है -राजा, सयम मे प्रव्रजित होना, सनाथ होना है और अपने आत्मा को, सुआत्मा बनाना है। सयम मे प्रवजित होकर, फिर जो असयम में प्रवृत्त होता है, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का लोलुप वन कर-या प्रमादवश- साधुता के ब्रा-नियम का उल्लघन करता है, वह अपने आत्मा को, दुरात्मा बनाता है । दुरात्मा, अपने-आपकी क्या हानि करता है, यह सुन- न त अरी करठ छेत्ता करेइ ज से करे अप्पणिया दुरप्पा । से नाहई मच्चमुहतु पत्ते पच्छाणुतावेण दया विहूणो ॥४८॥। भावार्थ -गला काटनेवाला दयाहीन वैरी' भी यह अहित नहीं जो अहित दुरात्मा अपने आप का करता है। दुरात्मा को, मृत्यु के मुस में पड़ने पर महान् पश्चात्ताप होता है। सनाथी मुनि कहते है-राजा, ससार मे वैरी को अहित करनेवाला माना जाता है। जो जितना अधिक अहित करे, वह उतना ही अधिक दुश्मन समझा जाता है । दुश्मन द्वारा अधिक से अधिक अहित गला काटने का होता है, इससे अधिक कोई अहित वैरी द्वारा नहीं माना जाता। यह, वैरी द्वारा होने वाले अहित की चरम सीमा है। ‘सासारिक लोग कहते हो हैं, - करता, .
सनाथ अनाध निय , . कि 'अमुक व्यक्ति यदि हमारा वैरी है, तो अधिक से अधिक हमारा गला काट डालेगा, और क्या करेगा?' अर्थात, वैर करने को सीमा इसनी ही है, इससे अधिक वैरी कुछ नहीं कर सकता । यह भी वही वैरी करेगा, जो दयाहीन हो । लेकिन राजा, दुरात्मा से तो अपने श्रापका वह अहित होता है, जो अहित, बैरी कहलाने वाले से भी नहीं हो सकता। बल्कि वैरी बने हुए व्यक्ति को, सुश्रात्मा अपना हित करने वाला मानता है, जैसे कि गजसुकुमार मुनि ने, सोमल को अपना सहायक माना था। ऐसे समय पर, सुश्रआत्मा सोचता है, कि मैं इस मारने वाले से नहीं मर सकता, मैं तो अपने श्राप से ही मर सकता हूँ-यानी अपने फाय्यों से ही दुस पा सकता हूँ। यदि, चैरों द्वारा गर्दन कटने पर, आत्मा में समता रहे दो वह गर्दन काटनेवाला, मोक्ष प्राप्त कराने का साधन भी हो सकता है। लेकिन दुरामा अपनेआप का, वैरी के गला काटने से भी अधिक श्रहित करता है। मृत्यु के मुस में पडने पर, दुरात्मा, अपने आप ही पश्चाताप की अग्नि से जलने लगता है। जिस समय यह नरकादि की वेदना भोगता है, उस समय उसे यह पश्चाताप होता है, कि 'मैंने सयम स्वीकर करके भी उसकी विराधना क्यों कर डाली । मैं, थोडे से नाशवान विषय-भोग के लोभ में क्यों पड़ गया। यदि मैंने विषय लोलुपता से, या प्रमाद वंश, सनाय अनाथ निर्णय १५८ - - . लेकिन दुरात्मा, सयम की विराधना न की होती, तो श्राज मुझे, नरक । तिर्यक गति में जन्म लेकर, ये कष्ट क्यो भोगने पड़ते। वे ,सासारिक विषय-भोग-जिनमे पड कर, मैने सयम की विराधना की थी- वही रह गये, और मुझे ये कष्ट भोगने पड़ रहे हैं। यदि मैंने, सयम का भली-प्रकार पालन किया होता, संयम की अवहेलना न की होती, तो आज मैं उस, सुख में, होता, जो सुस अविनाशी है।' यहाँ प्रश्न होता है, कि गला काटने वालावैरी तो प्रत्यक्ष में ही गला काटता है शरीर नाश करता है, अपने आपकी प्रत्यक्ष में ऐसी कोई हानि नहीं करता, फिर दुरात्मा को कण्ठ काटने वाले वैरी से भी अधिक अपने आपका अहित करनेवाला कैमे कहा ? ' इस प्रश्न का उत्तर यह है, कि सिर काटनेवाला वैरी, शरीर का ही नाश करता है, आत्मा का वह कुछ नहीं बिगाड सकता । केवल शारीरिक हानि ही, हानि नहीं है, किन्तु श्राध्यात्मिक हानि ही वास्तविक हानि है । श्रास्तिक लोग, श्रात्मा को अविनाशी और शरीर को नाशवान मानते हैं। इसलिए उनके समीप, शरीर का नष्ट होना कोई हानि नहीं है। वे, प्रत्यक्ष या इस लोक को ही नहीं मानते, किन्तु इनके साथ ही, परोक्ष और परलोक को भी मानते हैं । यह उपदेश, आस्तिकों के लिए ही है । जो लोग, " - . - १५९ सनाथ गाय निर्णय " शरीर के साथ ही, प्रात्मा का भी नाश मानते हैं, श्रामा ओर शरीर को, दो नहीं, किन्तु एक ही जानते हैं, ऐसे लोगों के लिए यह उपदेश नहीं है । इसलिए, दुरात्मा द्वारा का हुई अपने आपको हानि, प्रत्यक्ष में चाहे न दीसती हो, प्रत्यक्ष में चाहे लाभ ही दिखता हो, लेकिन मृत्यु के पश्चात् परलोक में वह दुरात्मा भीपण सकट में पड़ता है, और श्रास्तिक लोग, परलोक मानने से इन्कार नहीं कर सकते । आस्तिक लोग, श्रात्मा को अविनाशी मानने के साथ ही, परलोक पर भी विश्वास करते हैं। तात्पर्य यह, फि हानि की सीमा, प्रत्यक्ष दिखने तक ही नहीं है, किन्तु, चर्म-चक्षु से न दिसनेवाली हानि भी है, जिसे ज्ञानी लोग, अपने ज्ञान द्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं। परलोक में होनेवाली हानि को, चर्म-च से नहीं देखा जा सकता। किन्तु ज्ञानचक्षु से ही देखा जा सकता है। उस हानि को, चर्म-चक्षु मे देखने की इच्छा करना, भूल है और नास्तिकता का चिन्ह है। सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, मृत्यु के मुख में पड़ने पर, दुरात्मा को महान् पश्चात्ताप होता है । पश्चाताप के साथ ही, उसे नरक तिर्यक गति के महान् से महान् कष्ट भी भोगने पड़ते निहिया नग्गरुई उ तस्स जे उत्तमद्धे विवज्जासमेई ।
सनाथ-अनाथ निर्णय इमे वि से नत्थि परे विलोए दुही विसे झिज्झइ तत्थ लोए ॥४६॥ भावार्थ-जो उत्तम सयम रेकर भी उसमें रुचि नहीं रखता और सयम की विराधना करता है, उसका सयम ऐना निरर्थक होता है। उसके लिये यह लोक भी लाभप्रद नहीं होता और परलोक भी नहीं होता। वह दोनों ही रोक में दुख पाता है। सनाथी मुनि कहते हैं-राजा, बहुत से लोग, संयम के प्रति रुचि न होने पर भी, सयम ले लते हैं और फिर उसका पालन नहीं करते, किन्तु उसकी पिरापना करते हैं। मानापमान की दृष्टि से, वे, सयम का वेश भी नहीं त्यागते और रुचि न होने से, सयम का पालन भी नहीं कर पाते । उनके लिए, सौंप छछूटर को सी गति हो जाती है। इस प्रकार उनका यह लोक भी सुख- प्रद नहीं रहता और सयम की विराधना करने से, परलोक तो दु सप्रद है ही । चे, इस लोक और परलोक, दोनो मे ही मुरते रहते हैं किसी भी लोक में, निश्चिन्त और सुखी नहीं रहते । इस लोक में लोक लज्जा के मारे, केशलुचन, नगे पाँव चलना, भिक्षा मॉगना आदि प्रकट कार्य तो उन्हे उसी प्रकार करने पड़ते हैं, जिस प्रकार सयम पालनेवाले करते हैं, फिर भी उनके ये कार्य निरर्थक होते हैं, उत्तम अर्थ में नहीं लगते। क्योंकि, वे, जो कुछ करते है, जो कष्ट सहते हैं, सन आडम्बर के लिए।
सनाथ अनाथ निर्णय - . राजा, रुचि और उत्साह पूर्वक सयम का पालन करने पर, कप्ट नहीं होता । रुचि और उत्साह सहित केशलुचन में, पैदल चलने में, तथा भिक्षा मांगने में, अपूर्व आनन्द अनुभव होता है । जिस प्रकार सासारिक लोग, पुत्र पुत्री के विवाह में दिन रात परिश्रम करते हैं, क्षुधा तृपा सहते हैं, और भी अनेक कप्ट उठाते हैं, फिर भी वे, इसमें आनन्द ही मानते हैं, उसी प्रकार, रुचि और उत्साह सहित सयम पालनेवाला, परिपह सहन केश- लुचन, मिता, पैदल चलने अदि में आनन्द हो मानता है, कष्ट नही समझता । ऐसे ही व्यक्ति का सयम लेना सार्थक है। जो लोग अरुचिपूर्वक मयम लेते हैं, सयम मे कष्ट समझते हैं, उनका मयम लेना निरर्थक है और ऐसे सयम लेनेवाले, दोनों ही लोक में दुस अनुभव करते हैं। सनाथी मुनि, साधुपने में होनेवाली अनाथता का वर्णन करके,उपसहार में कहते हैं- एमेव हा छन्द कुसील रूपे मग पिराहिन्तु जिणुत्तमाएं । कुररी विचा भोग रसाणु गिद्धा निरहसोया परियाव मेड़ ॥५०॥ भावार्थ-जिस प्रकार कारी (मादापक्षी विशेष) मांस के लिए शालापित रहती है, उसी प्रकार साधुवेश धारी असयमी लाग, रसादि एवं मानपमान आदि के आगे सयम का ध्यान नहीं कर की विराधना कर डालते हैं। सयम की विराधना के मरवा रसादि भोगो की तृपणा के वश होने से, उन्हें कुछ विचार करते हैं। लेकिन राजा, समय बीत जाने पर, सोर त्ताप करने से क्या लाभ । फिर तो सोच पश्चात्ताप । है । सयम की विराधना करते समय उन्हें भूत भविष्य शा" को उठाया और क्या करता है, तथा इसका फल क्या सनाथ अाथ निर्णय भोग के लिए रालायित रहा मरते है और स्वच्छन्द होकर, उचन नि मार्ग को विराधना करके, फिर निरर्थक सोच तथा पश्चाताप करते हैं। सनार्थी मुनि कहतेहैं -राजा रहुत से फायर लोग, . की अनायता मे निकलने के लिए, संयम लेकर, सासारिक में को त्याग तो देते हैं, लेकिन फिर उन्हीं त्यागे हुए भोगों के दिन इस प्रकार लायायित रहते हैं, जिम प्रफार, पुररी मास के लालायित रहा करती है। मंसार के रसादि भोगों के लिए स्वच्छन्द पाचरण करने लगते है और सयम के प्रत-निम्न पालन न करके भी, साधु बने रहकर लोगों को भ्रम में रहते हैं। स्वच्छन्दाचरण द्वारा वे लोग, उत्तम जिन मार्ग- होता, लेकिन मृत्यु के मुसमें पड़ने पर, वे सोच एव ।- करना चाहिए था और यह देखना चाहिए था, नि उम समय तो विचार नहीं किया, उस समय तो सही मनाथ साथ निर्णय 1 अब पश्चात्ताप किस काम का ! इस निरर्थक पश्चाताप का कारण, वह स्वय ही तो है। यदि वह अपने ध्येय को न भूला होता, सासारिक भोगों में न पड़ा होता समार के मानापमान का विचार करके उसने मयम को दूपित न किया होता, तो अन्त में उसे पश्चात्ताप भी न करना पड़ता । सयम की विराधना करने से, पश्चात्ताप भी करना होता है और मनाथ का अनाथ ही रहता है। सोचाण मेहावि सुभासिय हम 'अणुसासण नाणगुणोववेय । मग कुसीलाण जहाय सव्व महा नियएटाण वए पहेण ॥५१॥ भावार्थ-मेधावी लोग, इस ज्ञान गुण सयुक्त सुभापित सिसावन पर विचार करके, कुशीलों के मार्ग को त्यागकर; सर्वथा प्रकार से महा निप्रथ के मार्ग पर चलेंगे। चरित मायार गुणान्निए तत्री अणुत्तर सजम पालियाण- निरासवे सखवियाण उवेड़ ठाण विउलुत्तम धुव ॥५२॥ भावार्य-ये, गुणयुक्त चरिन का आचरण करके अणुत्तर यथारख्यात- सयम,का पालन करेंगे और निराश्रयी होकर, तथा कर्मों को क्षय करके, बहुत उत्तम एव ध्रुव स्थाा-मोक्ष करेंग। " . :-मोक्ष को प्राप्त सनाथ अनाथ निर्णय - सनाथ मुनि कहते हैं--राजा, मैंने माधुपने की अनाथता का वर्णन, किसी की निन्दा के लिए नहीं किया है, किन्तु सयम लेने वालो के हित की दृष्टि से किया है। यह, सुभापित एव ज्ञान-गुण-युक्त शिक्षा है। घरवार छोड़कर संसार की अना- थता से निकलने के लिए, संयम में प्रव्रजित लोग फिर अनाथता में न पड जावें, इसी के लिए यह उपदेश है। इसके साथ ही, उन लोगों के लिए भी यह उपदेश है, जो स्वय अनाथता में पडे हुए हैं, लेकिन सनाथता को समझते हैं और सनाथ व्यक्ति की उपासना करते हैं। इस शिक्षा द्वारा, ऐसे लोगों को सावधान किया गया है, कि तुम जिसको उपासना सनाथ समझ कर कर रहे हो, कल्याण और मंगल करने वाले कह कर जिसे वन्दन नमस्कार करते हो, जिसे अपना मार्ग-दर्शक समझते हो, उसकी पहचान करलो, कि वह कहीं सनाथ के भेष में अनाथ तो नहीं है । जो सनाथ के वेश में रहकर भी अनाथता में पडा है, जिसमें अनाथता के लक्षण विद्यमान हैं, वह, अपना ही कल्याण नहीं कर सकता, तो तुम्हारा कल्याण क्या करेगा ? जो स्वय अपने लिए ही अमगल है, वह तुम्हारे लिए मगल करनेवाला कैसे होगा ? इसलिए तुम अपने कल्याण के वास्ते जिसकी उपासना करते हो, उसकी भली प्रकार पहचान कर लो और देखलो, कि वह अनाथ है या सनाथ । सनाथ व्यक्ति की उपासना से तो , मनाय-अनाय निर्णय क तुम्हारा हित होगा, लेकिन अनाथ व्यक्ति की उपासना से, तुम्हारा हित न होगा, किन्तु अहित होगा। तुम और ज्यादा अनाथता में फंसते जाओगे, तथा जिन-मार्ग को दूपित करने वाले की सहा- यता करने के कारण, फम पन्ध करोगे। राजा, यह शिक्षा, सुभापित है। बिना राग प, हित की दृष्टि से कहे गये प्रिय वचनों को, सुभापित कहते हैं। सुभापित होने के साथ ही, यह शिक्षा, ज्ञान और गुण से युक्त है। यानी ज्ञान-गुण उत्पन्न करने वाली है। राजा, इस भापित और ज्ञानगुणसयुक्त शिक्षा पर, बुद्धिमान लोग भली प्रकार विचार करके, कुशीलो के मार्ग को त्याग देंगे। सयम लेकर भी, जो आचार पालने में कमजोर हैं, जिनका उद्देश्य, राग-द्वेप मिटाना नहीं, किन्तु राग द्वेप बढाना है, जो ससार की अनाथता मे पडे हुए लोगों द्वारा त्याज्य कार्य करने तक में नहीं हिचकिचाते, उनके अनुशासन (शिक्षा) को बुद्विमान लोग कदापि न मानेंगे । बुद्धिमान लोग, इस शिक्षा पर विचार करके महा-निग्रन्थ के मार्ग को अपना कर जो सयम के व्रत नियमों का पूर्णरीत्या पालन करता है, उसके अनुशासन मे चल कर, गुणयुक्त चरित्र का श्राचरण एव यथा ख्यात सयम ऐसा करके वे, निराश्रयी एव कर्म-रहित होकर, मोक्ष प्राप्त करेंगे। का पालन करेंगे।
सनाथ अनाथ निर्णय . * . । - राजा, मोक्ष प्राप्ति के लिए, ज्ञान युक्त चारित्र ओर चरित्र युक्त ज्ञान होना चाहिए। इन दोनों के होने पर ही, मोक्ष प्राप्त होता है । यदि दोनों में से कोई एक हो और दूसरा न हो तो काम नहीं चलता। जिस प्रकार एक पहिये से रथ नहीं चलता, उसी प्रकार ज्ञान और चारित्र में से केवल एक के होने पर, मोक्ष नहीं मिलता। चारित्रहीन ज्ञान, और ज्ञानहीन चारित्र मोक्ष के लिएः पयोप्त नहीं है। ज्ञानयुक्त पाला गया आचार ही उत्तम आचार है और ऐसा प्राचार ही मोक्ष प्राप्ति का हेतु है। राजा, ससार की अनाथता से निकलने के लिए, 'सयम स्वीकार करने की आवश्यकता है, लेकिन सयम ले लेने मात्र से, सनाथ नहीं हो जाता। सयम स्वीकार करना सनाथता को मार्ग अपनाना है । इस मार्ग को पकड लेने वाला, भगवान महावीर के'चल माणे चलिए' सिद्धान्त के अनुसार सनाथ अवश्य कह- लोता है, एक प्रकार से वह सनाथ ही हो जाता है, लेकिन यदि उसने सयम-मार्ग को त्याग दिया, संयम के व्रत नियमों को अवहेलना की, तो वह फिर अनार सयम से पतित बन कर अना रिक अनाथता से अधिक - . जाता प्रकार गड्ढे में १६७ मनाय भनाय निर्णय . चढता है, लेकिन असावधानी के कारण फिर गड्ढे में गिर जाता है और गिरने के साथ ही, अपने शरीर के किसी अंग को तोड लेता है, तथा इस प्रकार फिर बाहर निकलना कठिन बना लेता है, उसी प्रकार, सयम से पतित होनेवाला व्यक्ति, अपने आपको पहले की अपेक्षा अधिक अनाथ बना लेता है। यदि वह संयम- मार्ग पर सावधानी से चलता रहा, पतित न हुआ तो वह अना- यता में नही पडता, किन्तु अन्त में, ऐसा स्थान प्राप्त करता है, जहाँ अनाथता का किंचित् भी भय नहीं है । अनाथता के भय से रहित स्थान का नाम 'मोक्ष' है। मोक्ष प्राप्त कर लेने वाला व्यक्ति सदा के लिए सनाथ हो जाता है, फिर कभी भी अनाथ नहीं होता। जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं हुआ है, तब तक संयमी व्यक्ति भी-असावधानी या प्रमाद से अनाथता में पड़ सकता है। इसलिए, सयम लेकर सावधानी से उसका पालन करने और मोक्ष प्राप्त करने की अावश्यकता है। मोक्ष में पहुँचा हुआ, यानी सिद्ध, बुद्ध और मुक्त बना हुआ थात्मा ही पूर्ण सनाथ है। श्रीसुधर्मा स्वामी, सनाथी मुनि द्वारा वर्णित मनाथना का वर्णन करके, श्रीजम्बू स्वामी से कहते हैं- एउग्गदन्ते वि महा तयोवणे महामुणी महापड़न्ने महायसे ।
सनाथ अनाथ निर्णय १६८ सयम महानियरिठज्जमिण महासुय से कहेई महया वित्थरणं ॥५३॥ भावार्थ-इन्द्रियों का उग्रता से दमन करने वाले, महातपो धनी, महामुनि, महाप्रज्ञावान, महायशस्वी सनाथ-मुनि, ने इस महानिप्रथ के मार्ग रूपी महाश्रुत को, पढ़े विस्तार पूर्वक राजा श्रेणिक से कहा। हे जम्बू, जिन सनाथी मुनि ने, राजा श्रेणिक से यह वर्णन किया है, वे सनाथी मुनि, इन्द्रियों का उपता से दमन करने वाले थे। इन्द्रियों का दमन करने में, वे, नम्रता से किंचित् भी काम नहीं लेते थे। वे, महान् तप के धनी थे। उन्होंने, असाधारण तपस्या कर रसी थी। वे, महामुनि थे। के व्रत-नियमों पर, वे, ऐसे दृढ थे, कि उन्हें इन्द्रादि भी विच- लित नहीं कर सकते थे। व्रत-नियम पर अनुपम दृढता के कारण, वे, महा-मुनि कहलाते थे। वे मुनि महा-प्रज्ञावान, यानी ज्ञानवान थे। उनके ज्ञान का पार न था । से युक्त होने के साथ ही, वे सनाथी मुनि, महा यशस्वी थे। चाहे कोई उनकी निन्दा करे, या प्रशसा, वे, यश के कामो को नहीं त्यागते थे । उन सनाथी मुनि ने, इस महाश्रुन को (इस बड़े अध्याय को ) श्रेणिक राजा से, विस्तार पूर्वक कहा । दूसरे अध्याय तो, केवल अध्याय ही कहे जाते हैं, लेकिन इस अध्याय को सुधर्मा स्वामी, महाअध्याय कह रहे हैं । , इन सब विशेपणो - १६९ सनाथ-अनाथ निर्णय क्योंकि, इस अध्याय में उस महाकथा का वर्णन है जो, महामुनि सनार्थी ने, महाराजा श्रेणिक- को सुनाई थी। यह कथा, उस सनायता एव उस स्थान की मार्गदर्शिका है, जो नित्य, अविचल एवं दु ससतापरहित है। श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं, कि महामुनि सनाथी ने, यह महाकथा, महानिप्रथों का मार्ग बताने, एव उस पर दृढ रखने के लिए कही है। सुबर्मा स्वामी के इस कथन का यह अर्थ नहीं है, कि यह कथा, केवल उन साधुओ के ही काम की हो, जो व्रत नियमों का भली भाँति पालन कर रहे हैं। यदि ऐसा होता, तो सनाथी मुनि, यह कथा राजा श्रेणिक को-जो गृहस्थ था न सुनाते । हाँ, मुख्यत यह कथा, निप्रन्थ-मार्ग को अपनाने वालो के लिए ही है, लेकिन साधारणतया इस कथा से सन लोग लाभ ले सकते हैं। महा-निमन्ध के मार्ग पर चलने वाले लोग, इस कथा से यह जान सकेंगे, कि हम इन इन कार्यों से बचे रहे, अन्यथा, फिर दूसरी अनायता मे पड जावेंगे । जो लोग गिर चुके हैं, उन्हें निकालने उनका उद्धार करने से पूर्व, जो लोग नहीं गिरे हैं, उन लोगो को न गिरने के लिए-सावधान कर देना आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से, यह कथा मुख्यत उन लोगों के लिए है, जो महा-निप्रन्थ के मार्ग पर चल रहे हैं। यानी, ऐसे लोगों को सावधान कर दिया गया है, कि तुम अना-
सनाथ अनाथ निर्णय
१७०
-
पर
थता से निकलने के लिए ही मयम मे प्रव्रजित हुए हो, लेकिन
विपय लोलुपता, असावधानी, या प्रमाद से फिर अनायता में
मत पड जाना।
सयम,
मार्ग चलने वाले लोगों को सानधान करने के
साथ ही, जो लोग सयम लेकर फिर अनायता में पड़ गये हैं, या
पड़ रहे हैं, तथा जो लोग ससार की प्रनाथता से निकल कर
सयम मे प्रवजित हो रहे हैं, ग्व जो लोग, सयम में प्रव्रजित को
अपना गुरु मानकर उनकी उपासना करते है, उन लोगों का भी,
इस महाकथा से हित होगा। सयम में प्रव्रजित होकर फिर
अनाथता मे पडे हुए लोग, इस कथा से यह बात समझ सकेंगे,
कि 'हम फिर अनाथता में पड़ गये हैं। हमारे पास तो केवल
सयम का वेश ही वेश है, जो व्रत नियम का पालन न करने पर,
हमे और अनाथता मे धकेलने वाला है। इस बात को जान
वे
पुन अनाथता से निकलने के उपाय करेंगे। जो लोग,
सयम में प्रव्रजित होकर भी अनाथता में पड़ने वाले हैं, वे, इस
कथा से सम्हल जायेंगे। उन्हें मालूम हो जावेगा, कि हम तो
मयम लेकर भी प्रानाथता' की ओर अग्रसर हो रहे हैं। यह
मालूम होने पर, वे, अपने आप को अनाथता में पड़ने से बचा
लेंगे। इसी प्रकार जो लोग, ससार की अनाथता से निकलने
फे लिए सयम ले रहे हैं वे, इस 'महाथा पर विचार करके
कर,
,
R- - सक लोग, धोसा नसावेंगे और धर्म ममझ कर, पाप में प्रवृत्त साना होता है, लेकिन उससे छाया भी मिल जाती है, इसी प्रकार यह कथा, महानिप्रथों के मार्ग को अपनाने वाले लोगों के लिए होते हुए भी, इससे, सभी लोग लाभ उठा सकते है। श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं---जन्यू, इस महाकथा २७१ सनाथ अनाथ निर्णय मंयम में प्रमाद न करेंगे, फिन्तु सावधानी रखेंगे । उन्हें यह माल्म रहेगा, कि हम एक अनाथता से तो निकले हैं, लेकिन एक अनाथता और है, हम असावधानी से उसमें न जा गिरें, नहीं तो कहीं के न रहेंगे। जो लोग, सयमी लोगो को अपना गुरु मानकर उनकी उपासना करते हैं इस महा-कथा द्वारा वे, अपने माने हुए गुरु के लिए यह जान सकेंगे, कि हम जिन्हे अपना गुरु मान रहे हैं, वे वास्तव में सयम पालन करने वाले और सनाय हैं या सयम के नाम से आजीविका करने वाले अनाथ है । केवल वेश से तो साधु असाधु की परीक्षा हो नहीं सकती, क्योकि वेश तो सयम पालने वाले और न पालने वाले दोनों का समान ही है, लेकिन इस महाकथा में जो तनण वताये हैं, उनसे, अनाथ, मयम का पालन न करने वाले और थोथा वेश धारण करने वाले, जाने जा सकेंगे। जिससे ये उपा. 1 . न होंगे। तात्पर्य यह, कि जिस प्रकार वृक्ष लगाने का उद्देश्य, फान का सनाथ-अनाथ निर्णय १७२ - . महामुनि सनाथी ने बडे विस्तार पूर्वक वर्णन किया। श्री सुधर्मा स्वामी के कथन का अभिप्राय यह है, कि मैंने जो वर्णन किया है, वह तो संक्षिप्त है, लेकिन महामुनि सनाथी ने इसे विस्तार-पूर्वक कहा था। शास्त्रों में, किसी बात का विस्तृत वर्णन नहीं हो सकता । विस्तृत वर्णन से, असुविधा के साथ ही, प्रन्थवृद्धि का भी भय रहता है। शास्त्रो में, यदि प्रत्येक बात का विस्तृत वर्णन किया जावे, तो शास्त्र बढ जावेंगे और साधु उन्हें स्मृति में न रस सकेंगे। इसीलिए शास्त्रो मे, प्रत्येक बात का सक्षिप्त वर्णन किया गया है। सूत्र' शब्द का अर्थ भी, बहुत अक्षर वाले अर्थ को थोडे में बताना है। उस सक्षिप्त वर्णन की, विस्तृत रूप मे व्याख्या करना वक्ता का काम है । हाँ, वक्ता उस विस्तृत व्याख्या में, कोई ऐसी बात मिलाने का अधिकार नहीं रखता, जो शास्त्र-सम्मत न हो, लेकिन शास्त्र की सक्षिप्त बात की विस्तृत व्याख्या करना और उस व्याख्या को युक्ति दृष्टान्त श्रादि से पुष्ट करना वक्ता का काम है। महा मुनि सनाथी द्वारा वर्णित अनाथता का, राजा श्रेणिक पर कैसा प्रमाव पडा, यह बताने, के लिए श्री सुधर्मा खामी कहते हैं- - - सनाय-अनाथ निर्णय तुहो ये सेणिो राया इण मुदाहु कयजली । अनाहय भुय सुट्ठ मे उपदसिय ॥५४॥ भावार्थ-समायी मुनि से अनाय की व्याख्या सुनकर, राजा श्रेणिक, बहुत सन्तुष्ट हुभा और हाथ जोड कर कहने लगा, कि मापने मुझे मनायता के स्वरूप का अच्छा उपदेश दिया। तुम्भे सुलद खु मणुस्स जम्म लामा सलद्धाय तुमे महेसी । तुब्भे सणाहाय सबन्धवाय ज भेठिया मग्ग जिणुत्तमाण ॥५५॥ भावार्थ-हे महर्षि, मापका मनुष्यजम पाना सफल है। भापने मनुष्य जन्म का बहुत अच्छा राम लिया । आप हो का सुन्दर रूप और मनोहर आकार सार्थक है । आप, जिन मार्ग के यथार्थ सेवी हैं, इसलिए सनाथ और बधु बान्धव से युक्त भी भाप ही हैं। श्रेणिक राजा ने, पहले तो यह कहा था, कि इन अच्छी प्राकृति और सुन्दर रूप वाले युवक ने, संयम लेकर मनुष्य जन्म का अपमान क्यो किया । इस प्रकार राजा श्रेणिक, पहले वही मनुष्य जन्म सार्थक समझता था, उसी की प्राकृति और उसी का रूप सफल मानता था, जो सासारिक भोग भोगने में रहे। जिसके माता, पिता, सनाथ अनाथ निर्णय १७४ - - , . - भाई, बहन मित्र आदि हो, उसो को वह सनाथ समझना था। लेकिन सनाथी मुनि से, अनाथ-सनाथ की व्याख्या सुनकर, उसकी यह मान्यता पलट गई। अब वह इस बात को समझ गया, कि जिन कारणों के विद्यमान रहने पर, में, अपने पापको तथा दूसरे को सनाथ समझता था वे कारण तो अनाथता बढाने वाले हैं । यह समझ मे आ जाने से, वह, सतुष्ट हुआ और हाथ जोडकर सनाथी मुनि से कहने लगा, कि आपने मुझे अनाथता के स्वरूप का अच्छा उपदेश दिया । आपके उपदेश से, मुझे यह ज्ञात हो गया, कि इस ससार में, किन लक्षणों वाले अनाथ हैं और कौन सनाथ है । मैंने आपसे, केवल उपदेश में ही अनाथ सनाथ का स्वरूप नहीं सुना, किन्तु इसके साथ ही, मैंने यह भी देखा, कि आप अनाथता के लक्षणों को त्याग चुके हैं, और उस जिन मार्ग के सेवी हैं, जो अनाथता देनेवाला है । आप, अनाथता से निकलकर सनाथ हो चुके हैं, इसलिए आप ही का मनुष्य जन्म सफल है। आप दोनो ही प्रकार की अनाथता से बचे हुए हैं। इतना ही नहीं, किन्तु मनुष्य जन्म का लाभ भी आप ही ने लिया है । मैं, अब तक यह समझता था, कि मनुष्य, जन्म का लाभ, भोग भोगना ही है, लेकिन आपके उपदेश से, मैं यह जान गया, कि मनुष्य जन्म का लाभ, भोगो को त्यागकर, सयम अपनाने पर ही है। आपने ऐसा ही किया है, इसलिए मनुष्य जन्म का १ , . -
सनाथ श्रथ निणय
लाम भी पाप ही को मिला है। आपने सयम लेकर सुन्दर रूप
और मनोहर श्राकृति को भी सार्थक बना लिया। जिस सुन्दर
रूप और मनोहर प्राकृति की प्राप्ति बडे पुण्य का फल मानी
जाती है, उसे आपने मयम में लगाकर, सुलब्ध वस्तु से मुलाभ
ही लिया है। मासारिक और अनाथता में पड़े हुए लोग, इन
सुलभ वस्तुओं मे सुलाम नहीं लेते, किन्तु अधिक श्रनाथता में
पड़ने के कारण उत्पन्न करते हैं, लेकिन आपने इनसे मयम का
सुलाम ही लिया है । इसलिए आपको मनुष्य जन्म भी श्रन्छा
मिला और उसका लाभ भी अच्छा मिला।
हे मुनिराज, सासारिक ऋद्धि-सपदा का सामी होने के
कारण, में, अब तक अपने को सनाथ और आपको अनाथ
मानता था, तथा इसी कारण से, आपका नाथ बनने के लिए
भी तयार हुआ था। बल्कि मेरे लिए आपका कहा हुआ
'श्रनाथ' शब्द, मुझे बुरा तथा मिथ्या मालूम हुआ था, लेकिन
श्रापने अनाथता सनाथता का जो रूप बताया, उसे सुन समझ
कर, मेरा उक्त विचार बदल गया। श्रन मैं, समस्त सासारिक
लोगों के साथ ही अपने आपको अनाथ मानता हूँ और आप ऐसे
सयमी को सनाथ मानता हूँ।
हे आर्य, बन्धुबान्धवो से युक्त भी आप ही हैं। अब तक
यह समझता था, कि जिसके मों, बाप, बहन, भाई, स्त्री आदि
.
-
-
।
-
सनाथ अनाथ निर्णय १७६ , . परिवार और स्वजातीय लोग तथा नौकर चाकर आदि हो, वही बन्यु वान्धवो से युक्त है, लेकिन आपके उपदेश ने, मेरा यह भ्रम मिटा दिया। मैं समझ गया, कि इनके होने से कोई भी, बन्धु-यान्धव युक्त नहीं हो सकता। क्योंकि, जो असमय मे काम आवे, वे ही वन्धु वान्धव हैं। माता, पिता, आदि कोई भी, असमय में सहायता नहीं कर सकते । कष्ट के समय यदि ये लोग सहायता कर सकते होते तो आपके ये सर थे, फिर श्राप का कष्ट क्यो न मिटा दिया। जब कष्ट-मुक्त नहीं कर सकते तो फिर बन्धु-बान्धव कैसे | आपका उपदेश सुन कर, मेरे हृदय मे यह विश्वास हो गया कि मनुष्यों से बन्धु-बान्धव युक्त नहीं' हो सकता, न वे, कष्ट के समय सहायता करके कष्ट-मुक्त ही कर सकते हैं । हाँ, कष्ट बढा भले दें। उन लोगों में, कप्ट मिटाने की क्षमता, है ही नहीं। कष्ट को तो सयम ही दूर कर सकता है, जैसे, आपका कप्ट सयम ने दूर किया था। हे मुनिराज, कप्टों से मुक्त करने वाला सयम आपमें मौजूद है, इसलिए वन्धु चान्धवों से युक्त भी प्रापही हैं । सयम में दृद्ध होने पर, कष्टो का कारण ही मिट जाता है। ।
सनाथ अनाथ निर्णय . - 1 कष्ट नहीं मानते। सासारिफ लोग, जिन्हें फप्ट कहते हैं, सयमी लोग, उन्हे ही अपना सहायक मानते हैं। सयमी विचा- रते हैं, कि 'ये कष्ट नहीं हैं, किन्तु हमारे सयम की परीक्षा करने वाली कसौटी है और इस कसौटी के पीछे ही वह सुस छिपा हुआ है, जिसके लिए हमने ससार त्याग कर सयम लिया है। फष्ट, ये नहीं है, किन्तु पुन पुन संसार में जन्मना भरना ही कष्ट है। यदि जन्म-मरण का दु ख मिट जाने, और इस दुस मिटने के बदले में, हमें यह शरीर भी दे देना पड़े, तोहर्ज नहीं । इन विचारों के कारण, मयमी के समीप फष्ट तो आते ही नहीं। 'राजा श्रेणिक, सनाथी मुनि से कहता है- त सि नाहो प्रणाहाण सव्व भूयाए सजया । खामोमि ते महाभाग इच्छामि अणुसासिउ ॥५६॥ । 'पच्छिजग मर तुम्भ झाण विग्धोय ज को। निमंतिया य भोगेहिं त सन्ब मरिसहि मे ॥१७॥ भावार्थ हे मुनिराज, सब अनाथ प्राणियों के नाथ भाप ही है। 'हे महामाग, में आपकी शिक्षा को इच्छता हूँ-स्वीकार करता हूँ और भापसे क्षमा प्रार्थना करता हूँ | मैंने, प्रश्न करके आपके ध्यान में विन किया और आपको भोग भोगने के लिए भामन्त्रित किया, ये सप अपराध क्षमा करें। हे मुनिराज, मैं, श्रापका अनुशासन श्रापको शिक्षा-इच्छता हूँ-स्वीकार करता है। यह बात नहीं है, कि मैं आपकी शिक्षा * १ सनाय-अनाथ निर्णय -- को आपके प्रभाव से प्रभावित होकर, या आपको प्रसन्न । करने के लिए, या स्वीकार न करने पर आप नाराज होंगे, इसलिए स्वीकार करता होऊँ, किन्तु आपके उपदेश का मनन करके, उसे अच्छा समझ कर स्वीकार करता हूँ। मुझे, यह ता भय ही नहीं है, कि आपकी शिक्षा स्वीकार न करने पर, आप नाराज हो जावेंगे। मैंने, जब आपको भोगों के लिए आमन्त्रित किया और श्रापको मुंपावादी ठहराया, उस समय भी श्राप रुष्ट नहीं हुए, तो आपका उपदेश नामानने पर, आप,' रुष्ट क्यो होंगे। इसी प्रकार, आपका उपदेश मान लेने से, आपको असाधारण प्रसन्नता भी न होगी। क्योंकि, मैंने जव आपको रूप सौन्दर्य की प्रशंसा की, तब आप पर मेरे' कथन का कोई प्रभाव नहीं पडा और आपने मुझे, अनाथ कह ही तो, दिया । इसलिए, आपकी प्रसन्नता अप्रसन्नता को दृष्टि में रसकर, मैं आपका उपदेश स्वीकार नहीं कर रहा हूँ, किन्तु आपके उपदेश ने, मेरे हृदय को पलट दिया, मेरी उलटी समम मिटा दी, इसलिए मैं आपके उपदेश को स्वीकार एव हृदय में धारण करता हूँ। हे महाभाग, । श्राप, मेरे अपराध क्षमा करो। यद्यपि श्राप क्षमावान हैं और मेरे अपराधों पर ध्यान न देकर, मुझ पर दया ही करते रहे हैं। मेरे अपराधों के बदले में, आपने मुझ पर क्रोध नहीं किया, न रुष्ट ही हुए, और न बुरा ही माना, किन्तु मुझे १७९ सनाथ अनाथ निर्णय - दयनीय मानकर मुझे अनाथ सनाथ का स्वरूप समझाया और मेराभ्रम तथा अज्ञान मिटा दिया। फिर भी, यदि मैं अपने अप- राधों को आपसे क्षमा न फराऊँ, अब भी मैं अपने अपराधों को न समझ सकूँ, तो यह मेरी महान् कृतनता एव मूर्सता होगी। सव से पहले तो मैंने अापके ध्यान में विन्न किया, और श्राप से यह पूछ कर श्रापकी असातना की, कि इस भोग के योग्य अवस्था में, आपने दीसा क्यो ले ली ?' यद्यपि मैंने,। यह प्रश्न अज्ञानवश किया था, क्योंकि, उस समय तक मैं, इस अवस्था को भोग के ही योग्य समझता था, फिर भी वास्तविक बात को समझने से पूर्व ऐसा प्रश्न करना, अपराध है । मैंने आपके ध्यान में भी विघ्न किया और आपसे प्रश्न भी ऐसा किया, कि जिससे आपकी प्रासातना हुई। यह, मेरा अपराध आप क्षमा करें। महाभाग | मेरा दूसरा अपगध यह है, कि मैं आपका नाथ पनने को तयार हुआ और आपको, सासारिक भोग भोगने के लिए यामन्त्रित किया। यह अपराध भी, मुझ से अज्ञानवश ही हुआ है। अज्ञान से ही, मैंने, श्राप से त्यागी को, सासा- रिक भोगो के लिए आमन्त्रित किया था। श्राप, मेरा यह अपराध भी क्षमा करें। "सांसारिक भोगों के त्यागी सनाथी मुनि को, राजा श्रेणिक ने, भोग भोगने के लिए नामन्त्रित ही, किया था। इस श्राम- सनाय अनाथ निर्णय १८० . , न्त्रण को भी, राजा श्रेणिक अपना अपराध मान रहा है और उसे क्षमा करा रहा है। ऐसी दशा में, त्यागियों के लिए भोग- सामग्री जुटाना, उन्हें भोगी बनाना, या मोगी बनाने की चेष्टा करना, प्या अपराध नहीं है। अवश्य ही अपराध है, और बहुत से लोग इस बात को जानते भी हैं, फिर भी इस पाप में क्यों प्रवृत होते हैं, यह समझ में नहीं आता। राजा श्रेणिक कहता है-हे महामुनि, मेरा तीसरा अपराध यह है, कि मैंने आपके कथन,को मिथ्या कह कर, आपके महा- व्रत को दूपित बताया ।। यद्यपि,, आपने मुझे अनाथ ठीक ही कहा था, लेकिन मैं अनाथ हूँ और जिन्हे में,' सचमुच अनाथ समझ रहा था, वे श्राप सनाथ हैं, यह बात मेरी समझ में, श्राप का उपदेश सुनने पर , ही आई ।। असातना की, इसके लिए, मैं आप से क्षमा 'प्रार्थना करता हूँ। श्राप, क्षमा करें। यद्यपि श्राप सन्त हैं, आपके समीप, कोई अपराधी या उपकारी तो है ही नहीं। चाहे कोई आपकी निन्दा करे या प्रशसा, श्रापको अवज्ञा करे या वन्दना, आप सभी पर समान कृपा रसते हैं। यह, सन्तों का स्वाभाविक लक्षण ही है। फिर भी, मैं अपने आत्मा को हलका करने के लिए अपने हृदय को शुद्ध बनाने के लिए और अपने पापों से निवर्तने के लिए आपसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ। आप, मुझे क्षमा प्रदान करें। मैंने, , अज्ञानवश आपकी - २८१ सनाथाय निर्णय . स ओरोहो य. । - - । यह कद्द कर, श्री सुधर्मा स्वामी, श्री जम्बू स्वामी से कहते हैं- -एव थुणित्ताय स रायसाहो अपगारसहि परमाइ भत्तिए । स बन्धयोय धम्माणुरत्तो विमलण चेयसा ॥८॥ उस्सासिय रोमकूपो काजणय पयाहिण । अभिवन्दिऊण सिरसा अइयाओ नराहियो ॥५६॥ भावार्थ-वह राजसिंह 'श्रेणिक, इस प्रकार भक्ति पूर्वक मुनिसिंह की स्तुति करके, निर्मल मन से, बन्धु यान्धवों और अन्तपुर सहिन धर्म का 'अनुरागी हुमा। प्रसता के कारण, उसके शरीर में, रोमांच हो रहा था यह, मुनि की प्रदक्षिणा एव मुनि को बन्दना नमरफार करके, अपने स्थान पर चला गया। राजा श्रेणिक, उस समय के राजाओ में, सिंह के समान बडा माना जाता था । दूसरे राजाओ की अपेक्षा, उसमें, पल, बुद्धि, साहस, धैर्य, श्रादि सद्गुण भी अधिक थे, राज्य विस्तार भी अधिक था, वैभव सम्पदा मे भी अप्रतिम था। इसी प्रकार, । वह सत्य बात को स्वीकार करने, या कहने में भी भय या सफाच नहीं करता था। सनाथी मुनि ने, प्रारम्भ में जय उसे अनाथ बताया था, तब उसने, मुनि से निर्भयता-पूर्वक यह फहा था, 'मैं अनाथ कैसे हूँ ? मुनि को, झूठ तो न बोलना चाहिये ।' । . , सनाय-अनाथ निर्णय .१८२ " इस प्रकार निर्भयतापूर्वक बात कहने का साहस, प्रत्येक श्रादमी में नहीं हो सकता । उस समय तक, वह अपनी बात सत्य समझ रहा था, इसलिए, मुनि की बात को मिथ्या घताने में, वह किंचित भी भयभीत नहीं हुआ। इसी प्रकार, जब उसने अनाथता का खरूप समझ लिया, तब अपने आपको अनाथ मानने में, सकुचाया भी नहीं । वल्कि, सनाथी मुनि का उपदेश, खीकार कर लिया। राजा श्रेणिक ने, पहले तो मुनि के सामने जाते ही उन्हें वन्दन-नमस्कार किया था। पश्चात्, मुनि से अपने प्रश्नों का उत्तर मुन कर उनका उपदेश श्रवण करके जाने के समय भी उसने क्षमा- प्रार्थना की और प्रदक्षिणा एव वन्दन-नमस्कार किया। यह साधुओं के समीप जाने श्राने एव प्रश्न करने श्रादि के समय काम में लाई जाने वाली, बहुत साधारण सभ्यता है । इस सभ्यता एव भक्ति के विना, किसी सदुपर्देश से पूर्णतया लाभ भी नहीं होता। सनाथी । मुनि ने, राजा श्रेणिक को जो उपदेश दिया था, उसमे, उन्होंने ऋद्धि-सुस या स्वर्ग का लोभ नहीं बताया था, किन्तु सासारिक बातों से, परागामुस होने का उपदेश दिया था। फिर भी। मुनि का उपदेश सुनकर, उसे अपूर्व हर्ष हुआ। वह, वीर और सत्य का जिज्ञासु था। इसी कारण, मुनि का उपदेश सुनकर, उसने अपना हृदय पलटने मे, किंचित भी देर नहीं की। उसने अपने पूर्व-विचारों को त्याग दिया और मन में किसी प्रकार , १८३ सनाथ अनाथ निर्णय . की मलिनता रखे विना, निर्मल मन से, सनाथी मुनि द्वारा उपदे- शेत धर्म का अनुरागी हुआ। सनाथी मुनि के उपदेश द्वारा माप्त धर्म से, केवल उसने अकेले ने ही लाभ नहीं लिया, किन्तु अपने साथ ही, रानियों एव वन्धुबान्धवो को भी उस धर्म का लाभ दिया । अर्थात्, वह बन्धु, बान्धवों और रानियो सहित धर्म का अनुरागी हुआ। " सत्य के जिज्ञासु वीर का हृदय, सच्चे उपदेश से, बहुत जल्दी पलट जाता है। ऐसा व्यक्ति, दुरामह या पक्षपात में नहीं पड़ता'। यह वात दूसरी है कि परिस्थिति आदि के विचार से, ऐसा व्यक्ति, 'प्रकट में अपनी मान्यता न पलट सके, लेकिन उच्च कुल एव उच्च करणीवाला व्यक्ति, सच्ची बात स्वीकार करने में, कदापि देर न करेगा। मुनि के सच्चे उपदेश को स्वीकार करने, एव व्यवहार में इस उपदेश को दृष्टि में रसने के कारण ही, राजा श्रेणिक, भविष्य में पद्मनाथ नाम का तीर्थकर होगा । • श्री सुधर्मा स्वामी कहते हैं- ईयरो वि गुण समिद्धो तिगुत्ति गुत्तो तिदड विरो य । विहा इव पिप्पमुको विहरइ वसुह विगय मोहो ॥६॥ मागर्य-गुणों से समृद्ध, मिगुप्ति से गुप्त और मन पचन काय से किसी को दण्ड न देनेयाले सनाथी मुनि भी, पन्धन रहित स्वतन्य पक्षी की तरह, मोह रहित अन्य विचरने लगे।
No text on this page.