Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Prakrit Lakshanam

Kavi,chand · 2010/04

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आर्थिक सहायकः- कलकत्ता निवासी श्रीमान् शेठ डोसाभाई लालचंद कच्छ- भुजवाले की स्वर्गीय धर्मपत्नी श्रीमती कंकुवाई के स्मरणार्थ. 5 पुस्तक-प्राप्ति-स्थान:- (१) शाह मफतलाल माणेकचंद श्री चारित्र-स्मारक ग्रन्धमाला-वीरमगाम (गूजरात). (२) शेठ डोसाभाई लालचंद नं. ३ बाउस्ट्रीट-कलकत्ता. । मुदक शेठ देवचंद दामजी श्रानंद प्रेस-भावनगर.

नि वे द न
कवि चंडकृत प्राकृत लक्षण प्राकृतभाषा के अभ्यासियों की
सेवा में सादर समर्पित करते हमें अति हर्प होता है ।
कलकत्तानिवासी श्रीमान् सेठ डोसाभाई लालचंद कच्छभुजवाले ने
अपनी स्वर्गीय धर्मपत्नी श्रीमती कंकुवाई के स्मरणार्थ
इस ग्रंथ के मुद्रण में आर्थिक सहायता करने की
जो उदारता की है इस के लिये हम आप के
अत्यंत ऋणी हैं व आशा करते हैं
कि आयंदे भी आप ऐसी ही
उदारता कर के साहि-
त्य के प्रचार
मे
सहायता करते
र हे गे ।
-प्रकाशक

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प्रस्तावना
साहित्य की आवश्यकता-
जीवनविकास की साधना में, विश्व की गहन समस्याओं
के सुलझाने में, जीवन का रहस्य समझने में, मनोविनोद के लिए
एवं यावत् आत्मशुद्धि के पवित्र पथ से आत्मसिद्धि को प्राप्त
करने के प्रयत्नों में साहित्य एक अति उपयोगी साधन है । साथ
ही साथ वह अति निर्दोप एवं पवित्र भी है ही । जीवनचर्या में
अन्न और जल के जितनी ही साहित्य की आवश्यकता व
महत्ता है। साहित्यरस से रहित जीवन रसहीन कहा जा
सकता है।
-
इस तरह साहित्य को अति महत्त्व की वस्तु समझ कर
जन उस पवित्र मंदिर में प्रवेश करने की अभिलापा उत्पन्न होती
है तब उस साहित्य को यथास्थित समझने के लिए ग्रहणशक्ति-
बुद्धि-ज्ञान की आवश्यकता प्रतीत होती है। बुद्धि-ज्ञान के
लिए भाषा ही एक मात्र सीधा व उत्तम साधन है; क्या कि-
भाषा और ज्ञान परस्पर में इस तरह मिले हुए तत्व हैं कि
उनको एक दूसरे से सर्वथा भिन्न करना अशक्य है, अर्थात ज्ञान का
मृर्तस्वरूप भाषा में ही विकसित होता है। और भाषा का अर्थ
शब्द नहीं तो और क्या हो सकता है ? एक विचारक ने
बिलकुल ठीक ही कहा है कि-" अनुविद्धमिव जानं, सर्व
शब्देन भासते ।"

६ व्याकरण की आवश्यकता- इस तरह किसी भी साहित्य में प्रवेश करना हो तो सब से पहले जिस भाषा में उस साहित्य का सर्जन हुआ हो उस भापा को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। और किसी भी भापा के ज्ञान के लिए उस भापा का शब्दशास्त्र-व्याकरण ही मुख्य साधन है । इस तरह भाषाज्ञान की द्रष्टि से किसी भी भाषा के व्याकरण का स्थान प्रथम है। अलवत, विविध रसों से भरी हुई अन्य साहित्य-कृतियों के आगे व्याकरण एक अति शुष्क एवं रसहीन विपय प्रतीत होता है। फिर भी इस शुष्कता मात्र से उसकी निरुपयोगिता या अल्प उपयोगिता तिल मात्र भी सिद्ध नहीं होती। प्राकृत भाषा के ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता कहाँ ? अनेकानेक विद्वानों ने, भिन्न भिन्न विषय के अनेक ग्रन्थों की रचना करके, प्राकृत भाषा के साहित्य को समृद्ध बनाया है, और प्राकृत भाषा के ज्ञाता विद्वान उस रस का उपभोग भी कर सकते हैं। फिर भी प्राकृत भाषा के ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता कहां है ?-यह एक चर्चा के योग्य विषय है। किसी भी तत्वज्ञान का रहस्य, उस तत्त्वज्ञान संबंधी परभाषा में लिखे हुए ग्रंथों के वाचन से या उस तत्त्वज्ञान के मुख्य मुख्य सिद्धांतों का नामनिर्देशरूप ज्ञान प्राप्त करने से नहीं समझा जा सकता । किन्तु किसी एक विषय को संपूर्णतया समझने के लिए उस विषय के पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान आवश्यक है ठीक उसी तरह, किसी भी तत्त्वज्ञान के रहस्य को समझने के लिए सबसे प्रथम जिस भाषा में उस तस्यज्ञान ने मृत-

स्वरूप लिया हो-उस तत्वज्ञान के प्ररूपक महापुरुप ने जिस भाषा
का उपयोग किया हो उस भाषा के ज्ञान की आवश्यकता है।
और जैसे किसी देशविशेष या जातिविशेप के साथ विशिष्ट
प्रकार की संस्कृति, रीतरिवाज, वेषभूपा की रुचि और खानपान
की पसंदगी संलग्न होती है वैसे ही विश्व के हरएक तत्त्वज्ञान
की एक विशेष-मौलिक भाषा अवश्य होती है । यदि नया
यौगिक शब्द बनाना अनुचित न हो तो मैं तो बिना संकोच
कहूंगा कि जैसे हरएक विषय के खास पारिभापिक शब्द होते
हैं वैसे हरएक तत्त्वज्ञान की खास पारिभापिक भापा
होती है कि जिस भाषा में ही उस तत्त्वज्ञान की हरएक खूबी
समझ में आती है।
हिन्दू धर्म और उसकी प्रत्येक शाखा का तत्त्वज्ञान
संस्कृत भाषा में अवतीर्ण हुआ है । अलबत, वर्तमान संस्कृत
भाषा और वैदिक संस्कृत भाषा में कुछ विशेषता-भिन्नता अवश्य
है किन्तु वह है तो संस्कृत भाषा ही । एक द्रष्टि से यह
वैदिक संस्कृत भाषा प्रायः अति प्राचीन-५००० वर्ष
जितनी प्राचीन प्राकृत भाषा हो सकती है ।
बुद्धदेव ने बताया हुआ तत्त्वज्ञान पाली भाषा में है, इस्लाम का
तत्वज्ञान, आदि में, अरवी भाषा में बना है, और पारसीयों के
तत्त्वज्ञान की मूल भापा है अवेस्ता-पहेलची। इसी तरह
परमात्मा महावीरदेवमपित तत्त्वज्ञान की भी एक विशेप
भापा है और यह प्राकृत भापा । अलवत, प्राकृत के परामर्श के
समय मागधी या अर्धमागधी (कि जिस में मुख्यतया मौलिक
जैन शास्त्रों की रचना हुई है) के भेद को भूलना नहीं चाहिए,

८ फिर भी वह भेद अति अल्प होने से वे भाषायें एक ही सरीखी भाषायें हैं। यद्यपि संस्कृत भाषा में जैन साहित्य के भिन्न भिन्न विप- यक अनेक महान ग्रंथ बने हैं, बारहवाँ अंग दृष्टिवाद- चतुर्दशपूर्व भी संस्कृत भाषा में ही था (जिसका विच्छेद हुआ है, जो उपलब्ध नहीं है)। कितनेक ग्रंथ तो उस भाषा में मौलिक से प्रतीत होते हैं और किसी अपेक्षा से-विपुलता की दृष्टि से तो संस्कृत भाषा में बना हुआ जैन साहित्य प्राकृत भाषा में बने हुए जैन साहित्य से बढ़ भी जाता है, फिर भी जैन तत्वज्ञान की मौलिकता की दृष्टि से प्राकृत भाषा का स्थान प्रथम है । अतः जैन तत्त्वज्ञान का आंतर रहस्य समझने के लिए प्राकृत भाषा के ज्ञान की अनिवार्य आवश्यकता है। या स्पष्ट- तया कह सकते है कि प्राकृत भापा के ज्ञान के बिना कोई विद्वान जैन तत्त्वज्ञान विषयक स्वतंत्र या संपूर्ण विचारणा नहीं कर सकता। संस्कृत भाषा के नाटक एवं अन्य कितनाक साहित्य समझने में भी प्राकृत भाषा का ज्ञान उपयुक्त होता है । प्राकृत भाषा की विशेषता-- प्राकृत भाषा के संबंध में विचार किया जाय तो कहना चाहिए कि वह आर्पभाषा है, परमतारक तीर्थंकर और गणधरो की भाषा है, एक शास्त्रीय भाषा है। सिर्फ इतना ही नहीं वरन् वह भारतीय सभी भापाभापियों को मानों अपनी नीजी भापा हो ऐसी घरेलु भाषा प्रतीत होती है, याने बह युग- पुरातन एवं भारतीय सभी भाषाओं की मातृभाषा हो और उन सभी भाषाओं का उत्थान प्राकृत भाषा में से हुआ हो ऐसा प्रतीत होता है । उसमें न उच्चार की क्लीटता है और न संयुक्त अक्षरों की अधिक जटिलता। इसी कारण से यह भाषा सरल एवं मधुर लगती है, और आवालवृद्ध सब कोई इसका आसानी से उपयोग कर सकता हैं । प्राकृत और संस्कृत- संस्कृत भाषा अधिक पुरातन है या प्राकृत ?-इस चर्चा के लिये यहाँ अवकाश नहीं है, न इतनी आवश्यकताही है। इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि भगवान महावीर देव के समय वे दोनों ही भाषायें प्रचलीत थीं। फिर भी १२ अंगो में से ११ अंग प्राकृत भाषा में और १२ वाँ अंग दृष्टिवाद संस्कृत भाषा में ग्रथित कर के गणधर भगवान ने प्राकृत को विशेष स्थान दिया । इसका कारण यह है कि संस्कृत भाषा पंडित- भोग्य भाषा है और प्राकृत भाषा लोकभोग्य भाषा है, जिसको कि हरएक आसानी से समझ सकता है। वर्तमान समय की अपेक्षा से ये दोनों ही भापा समानतया महत्त्वपूर्ण हैं। जैन साहित्य और जैन तत्वज्ञान के रहस्य का जिज्ञासु कोई भी विद्वान उन दोनो भाषा में से एक भी भाषा की उपेक्षा नहीं कर सकता। अतः ये दोनों ही भाषा आर्यावर्त-आर्य संस्कृति की महत्व की भाषा हैं । प्राकृत भाषा के व्याकरण- प्राकृत भाषा का सब से प्राचीन व्याकरण महर्षि पाणिनी कृत प्राकृतलक्षण है जो आज उपलब्ध नहीं है, किन्तु जिस के होने का उल्लेख कितनेक अन्यान्य ग्रंथों में मिलता है :

१० इस व्याकरण के अतिरिक्त वर्तमान में अनेक व्याकरण उपलब्ध हैं, वे हैं-वररुचिकृत प्राकृतप्रकाश, हृपिकेशकृत प्राकृतव्याकरण, मार्कडेयकृत प्राकृतसर्वस्व, कामदीश्व-. रकृत संक्षिप्तसार प्राकृत-व्याकरण, लक्ष्मीधररचित षड्- भाषाचंद्रिका, विक्रमदेवरचित प्राकृतानुशासन, कलिका- लसर्वज्ञ आचार्यवर्य श्रीहेमचंद्रसरिविरचित सिद्धहेमशब्दानुशासन ( संस्कृत व्याकरण ) के अष्टम अध्यायरूप प्राकृतव्याकरण और कवि चंडकृत, प्रस्तुत प्राकृतलक्षण आदि । इन व्याक- रणों में से अन्त में दिये हुए तीनों व्याकरण जैन विद्वानों के रचे हुए हैं और उनमें व अजैन विद्वानों के रचे हुए प्राकृत भापा के व्याकरणों में भी आचार्यदेव श्री हेमचंद्रसूरिरचित व्याकरण अति विस्तृत एवं संपूर्णतायुक्त है। कवि चंडकृत (प्रस्तुत) प्राकृतलक्षण- प्रस्तुत, कवि चंडकृत प्राकृत व्याकरण (प्राकृतलक्षण) को सूत्रसंक्षेप की दृष्टि से, उपर्युक्त सभी व्याकरणों में प्रायः प्रथम स्थान प्राप्त होता है । इस व्याकरण से छोटा प्राकृत भाषा का दूसरा कोई व्याकरण प्रायः नहीं है। आचार्यवर्य श्री हेम- चन्द्रमरि का व्याकरण संपूर्ण अवश्य है किन्तु वह अधिक विशाल है और यह प्राकृतलक्षण बहुत संक्षिप्त होने के कारण आसानी से पढ़ा जा सकता है। अलवत, इस व्याकरण के अध्ययन करने पर भी प्राकृत भाषा के ज्ञान में कितनीक त्रुटियाँ अवश्य रह जाती हैं तो भी मुख्य मुख्य सभी वस्तु इस में समा- विष्ट होने के कारण वर्तमान अभ्यासियों के लिये ऐसा लघु व्याकरण अधिक उपयुक्त मालूम होता है ।

इस व्याकरण के रचयिता कवि चंडे के विषय में कोई भी इतिवृत्त ( इतिहास ) प्राप्त नहीं होने के कारण कवि चंड विपयक या इस व्याकरण विषयक ऐतिहासिक पहलु पर प्रकाश डाल सके ऐसी कोई विचारणा नहीं हो सकती। यह प्राकृतलक्षण सव से पहले एसियाटिक सोसाईटी की तर्फ से मुद्रित हुआ था। इसके पश्चात् अन्यान्य स्थानों से भी इस के भिन्न भिन्न संस्करण प्रकाशित हुए हैं, अतः इस ग्रंथ का यह कोई प्रथम मुद्रण या प्रकाशन नहीं है । इसके मुद्रण के समय हमने एसियाटिक सोसाईटी से प्रकाशित व अन्यान्य स्थानों से प्रकाशित ग्रंथ का निरीक्षण किया है। मुझे कहेना चाहिए कि उन प्रकाशनों तथा दूसरी हस्तलिखित प्रतियों के साथ प्रस्तुत व्याकरण का मुकाबला करने पर कितनेक पाठांतर तथा अधिक पाठ देखने में आये हैं, किन्तु प्रस्तुत प्रकाशन प्राकृत भाषा के प्राथमिक अभ्यासियों के लिए उद्दिष्ट होने से, जटिलता के भयसे, उन सब को इस में समाविष्ट न करते हुए छोटे से छोटी-कमसे कम ( फिर भी सभी मुख्य मुख्य बातों को समाविष्ट करते ) सूत्रयुक्त प्रति के आधार पर यह प्रकाशन तैयार किया गया है । अस्तु । प्राकृतभाषा का अभ्यास- एक बात तो बिलकुल निश्चित है कि प्राकृतभापा का व्यवस्थित ज्ञान संस्कृत भाषा के व्यवस्थित ज्ञान के सिवाय अशक्य सा है । अतः प्राकृतभाषा के अभ्यासी को संस्कृत भाषा का ज्ञान अवश्य संपादन करना चाहिए । अब विचारणीय मात्र इतना ही है कि संस्कृत भाषा का ज्ञान होने के पश्चात १२ प्राकृतभाषा का बोध किस क्रमसे अधिक सरलता से हो सके। यह प्रश्न, एक प्रश्न की दृष्टि से, विशेष महत्व का न होते हुए भी प्राकृत भाषा के भिन्न भिन्न, अभ्यासी, अनुभवी विद्वानों की दृष्टि से उसके लिए भिन्न भिन्न अभिप्राय को अवकाश है। मेरे विनम्र अभिप्राय अनुसार प्राकृतभाषा के अभ्यास के समय, संस्कृत भाषा में बने हुए प्राकृत भाषा के किसी व्याकरण विशेप को मुख्य मानने पर भी, अभ्यास का सभी आधार केवल उस व्याकरण पर ही न रखके साथ में प्राकृत साहित्य का, खास करके व्याकरण की दृष्टि से, वाचन करना चाहिए और वर्तमान में जिसे Direct method ( याने भापा के जरिये से व्याकरण के नियम निश्चित करने की पद्धति) कहते हैं उस पद्धति का आश्रय लेना चाहिए। ऐसा करने से अल्प समय में व आसानी से प्राकृत भाषा का संगीन बोध हो सकता है। सिर्फ प्राकृत भाषा के ही लिए क्यों ? किसी भी भाषा के अभ्यास के लिए यह मार्ग अधिक लाभप्रद व सरल है । कहासंग्गहो- मैंने उपर जिसका सूचन किया है उस Direct method ( भाषा से व्याकरण की पद्धति ) के अनुसरण में उपयुक्त हो सके इस दृष्टि से इस व्याकरण के अंत में कितनीक कथाओं का संग्रह दिया है । वे सभी कथायें श्री आगमोदय समिति-सुरत- द्वारा मुद्रित श्री उत्तराध्ययनसूत्र की चतुर्दशपूर्वधर आचार्य श्री भद्रबाहुस्वामीकृत नियुक्ति के उपर की आचार्य श्री शांतिसूरि- कृत टीका में से; आवश्यकसूत्र की चतुर्दशपूर्वधर आचार्य श्री भद्रबाहुस्वामीरचित नियुक्ति के उपरकी आचार्य श्री हरिभद्रमरि- नाम १ ४ १ ७ कृत टीका में से तथा पूज्यवर्य श्री संघदासगणीकृत वसुदेव- हीडी में से अक्षरशः उद्धृत की हैं । अंत में दिया हुआ पद्य विभाग उत्तराध्ययनसूत्र में से अवतारित किया है उन सब का क्रमशः विवरण निम्न प्रकार है- श्री उत्तराध्ययन से उद्धृत- अंक अध्ययन सूत्र नियुक्ति गाथा पाक १ सिरिथूलभदचरियं १७ १०० से १०५ १०५-१०७ २ दंडगारणस्स उप्पत्ति २ २७ १११ से ११३ ११५-११६ ३ बोडीयमयस्स समुप्पत्ति ३ १७८ १७८-१८० ४ मल्लकहाणगं १९२-१९३ ५ वाणियगपुत्तकहा १५ २७८-२७२ श्री आवश्यकनियुक्ति से उद्धृत- अंक नियुक्ति गाथा पत्रांक ६ अभयकुमार पवजा १३४ ९५-९६ ७ मुग्गसेल मेहसंवादो १३९ १००-१०१ ८ भरहबाहुवलिजुद्धम् ३४८ १५२-१५३ ९ मेअजरिसिचरियम् ८६८ ३६६-३६९ १० तेतलिपुत्तचरियम् ३७३-३७४ ११ जमदग्गि-परसुरामचरियम् ९१८ १२ चाणककहाणगं ९५० ४३३-४३५ वसुदेवहींडो से उन्हृत- १३ संव-सुभाणं कीडाओ १४ कंसस्स पुन्वभवो कण्हजम्मो य १ ८७८ उत्तराध्ययन से उद्धृत- १५ माहणसरूवं- प्रस्तुत प्राकृत व्याकरण कलकत्ता विश्वविद्यालय के अभ्यास- क्रम में समाविष्ट है और वर्तमान में उसकी मुद्रित प्रति विलकुल अलभ्य है अतः इसका पुनर्मुद्रण किया जा रहा है। इसके पुन- र्मुद्रणकी प्रेरणा करने के लिये तथा इसके प्रुफ का संशोधन करने के लिये कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राकृत के व्याख्याता न्याय-व्याकरणतीर्थ, पंडितवर्य श्री हरगोविन्ददास त्रिकमचंद सेठ धन्यवाद के पात्र हैं। इसके मुद्रण में आर्थिक सहायता करने के लिए श्राद्धरत्न श्री डोसाभाई लालचंद की उदारता सराहनीय है। आशा है कि जिस उद्देश से इस छोटे से ग्रंथ का पुनर्मु- द्रण किया है वह उद्देश सफल होगा व प्राकृतभाषा के अभ्या- सियों को इस से यत्किचित् भी सहायता अवश्य पहुंचेगी। अजमेर वीरनिर्वाण सवत् २४६२ अक्षयतृतीया. ता० २४-४-१९३६ मुनि दर्शनविजय

UKRADHUR.OCJI.OR.
LOLKU-THURAR
प्राकृत लक्षणम्

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। ॐ नमः सिद्धेभ्यः । । श्रीचण्डप्रणीतम् । ॥ प्राकृतलदाणम् ॥ प्रणम्य शिरसा वीरं, स्वल्पापिभिरक्षरैः । लक्षणं प्राकृतं वक्ष्ये, किञ्चिद् वृद्धमतादहम् ॥१॥ कचिल्लोपः क्वचित मन्धिः, क्वचिद्वर्णविपय॑यः । आगमोऽन्तादिमध्येपु, लक्ष्यं स्यात तत्तु भापितम् ॥ २॥ [1] अथ विभक्तिविधानम् ॥१॥ सिद्धं प्राकृतं त्रेधा ॥१॥ . 10 सिद्धं-प्रसिद्धं प्राकृतं त्रेधा-त्रिप्रकारं भवति । संस्कृत- योनि, तच्चेदं,-यज्ञः-जन्नो, मात्रा-सत्ता, नित्यं निचं इत्यादि । संस्कृतसमं, तच्चेदं,-सुरो, सोमो, जालं, कन्दलं, कोमलं इत्यादि । देशीप्रसिद्धं, तच्चेदं,-हपित-ल्हसि, स्पष्टं-पुढे, चन्द्रिकोज्वलितं-चंदिकोजलीय इत्यादि । लिङ्गं च ॥ २ ॥ प्राकृते लिङ्गमपि त्रेधा-त्रिप्रकारं भवति । देवो । गङ्गा । कुलम् ॥ तस्मात् संस्कृतवद् विभक्तयः ॥ ३ ॥ तस्माल्लिङ्गात् पराः संस्कृतवद्विभक्तयो भवन्ति । सि-देवो, अग्गी, रिऊ, बुद्धी, घेणू, नई, वहू, पीढं, दहि, महु, तुमं, अहं । जस्-देवा, कुलानि, तुम्हे, अम्हे । अम्-देव, अग्गि, गुरुं, गंगं, बुद्धि, धेणु, नई, पीढ़, दहि, महु, त्वां-तं, मां-म, रक्खउ । शम्---गंगा, तुम्हे रक्सउ रक्खउ वो (वः ), अम्हे रक्खउ, रक्खउ नो (नः)। [2] 15 " , , टा-देवेण, गुरुणा, दहिणा । भिस्-अग्गीहिं, रिवूहि, बुद्धीहिं, नईहिं, दहीहिं, महहिं, तुम्हेहि, अम्हेहिं । उसि-तस्स, तिस्सा। भ्यस्-ग्रामेभ्यः-गामेहितो, गुरुभ्यः--गुरूहितो, धेहितो, 5 नईहितो, दोहितो, वेहितो, तीहितो । उस्-पुत्तो ते, पुत्तो मे, तव सुहं, मम सुहं । आम्-देवाण, बुद्धीण, धेणूण, नईणं, तेस, तेसिं । डि-गामे, कुले, तत्र-तत्थ, तस्मिन्-तम्हि, त्वयि-तइ, मइ । सुप्-देवेसु, अग्गीसु, बुद्धीसु, मालासु, नईसु, कुलेसु, तुम्हेसु, 10 अम्हेसु, इत्यादि ॥ क्वचिद् व्यत्ययः ॥ ४ ॥ एपां लिङ्गाना क्वचिद् व्यत्ययो भवति । जम्-विज्जुणो । देवाणि रक्खंतु ॥ 15 , सागमस्याप्योमो णो हो वा ॥ ५ ॥ सागमस्यामोऽनागमस्यापि णकारो भवति, हो वा। ताण, ताहं । देवाण, देवाहं । कम्माण, कम्माहं । सरिताणं, सरिताहं । तुम्हाणं, तुम्हाहं ।। संख्याया पहः ॥६॥ भन्यायाः सागमस्याऽनागमम्याग्यामो हो 20 भवति । पंचण्हे, तीमण्हं इत्यादि ।। परग्य rm टा राः ॥ ७॥ लिङ्गात् परष्टा इत्यस्य ण आदेशो भवति । देवेण, गुरुणा, महुणा, दहिणा, सिरेण इत्यादि । हिं मिलः ॥ ८॥ लिङ्गात् परस्य भिसो हिं भवति । देवेहि, गामेहिं ।। 5 . हिंतो भ्यसः ॥ ९॥ लिङ्गात् परस्य भ्यसो हितो भवति । गामेहितो, सिद्धे- हितो, बुद्धीहितो, धेहितो, णई हितो, तुम्हेहितो, अम्हेहितो ।। तृतीयादीनामेत्वमेकत्वे स्त्रियाम् ॥ १० ॥ तृतीयादीनां टा-ङसि-उम्-ङिवचनानां स्त्रियां ए 10 भवति । गंगाए । बुद्धीए । नईए । वहए। तीए । ताए। ओ-उ-लोपा जस्-शसोः ॥ ११ ॥ स्त्रियां वर्तमानयोजेयू-शसोरो-उ-लोपाश्च भवन्ति । मालाओ, मालाड, माला । बुद्धीओ, बुद्धीउ, बुद्धी । घेणूओ, धणूट, धे] । नईओ, नईर, नई । एवं शसोऽपि । द्वि-त्रिशब्दाभ्यां जस्-शसोर्णिः ॥ १२ ॥ . 15 द्वि-त्रिशब्दाभ्यां जस-शसानिर्भवति । दुणि, विण्णि, दुवं, दो, वे । तिषिण | एवं शसोऽपि । [4] .

पुंसि पूर्वत्वम् ॥ १३ ॥ पुंसि-पुंलिङ्गे वर्तमानयोर्जस्-शसोः पूर्वस्वरो भवति । अग्गी । गुरू। णो ङसेश्च ॥ १४ ॥ पुंलिङ्गे वर्तमानयोर्जस्-शसोों भवति, पञ्चम्येक- वचनस्य च । अग्गिणो जलन्ति । मुणिणो पस्स । गिरिणो एति नई। 5 स्सश्च उसः ॥ १५ ॥ पुसि वर्तमानस्य उसो णो भवति, स्सश्च भवति । मुणिणो रूपं, मुणिस्स रूपं । अग्गिणो सिहा, अग्गिस सिहा । 10 देवस्स सोहा। ए सिम डेः ॥ १६ ॥ पुंसि डिवचनस्य ए भवति । म्मि च भवति । अग्गि- म्मि | गुरुम्मि । गामे, गामम्मि । ए शसोऽतः ॥ १७ ॥ अतोऽकारादुत्तरस्य शसः पुंलिङ्गे ए भवति । देवे, 15 भणे । तो-तु-हिंतो-लोपास्तस्याऽऽतः ॥ १८ ॥ पञ्चमी-आतः आदेशतकारस्य तो-तु-हितो-लोपा एने आदेशा भवन्ति । गयणाओ. गयणाउ, गयगाहितो, गयणा । 20 [5] तदिदमोः से षष्ठीरूपाणाम् ॥ १९ ॥ 5 तद्-इदम् अनयोरेकत्व-द्वित-बहुत्वेपु स्त्री-पुं-नपुंसकेषु यद् रूपं तस्य से भवति । तस्याः रूप-से रूयं । तस्याः- गुणाः-से गुणा । अस्याः रूपं-से रूप । अस्याः गुणाः-से गुणा । एवं शेषेष्वपि द्रष्टव्याः । युष्मदः ॥२०॥ अत ऊर्ध्व युष्मदध्यायो भवति । तुमं सौ सविभक्तेः ।। २१ ॥ युष्मच्छब्दस्य सविभक्तेः सौ परतः तुम आदेशो भवति । तुम देवो । 10 अमि तुए च ॥ २२ ॥ युष्मदोऽमि परे तुमं भवति, तुए च सविभक्तेः । तुम भणामि । तुए भणामि । तुम्हे जसि ॥ २३ ॥ युष्मदो जसि परे तुम्हे भवति, सविभक्तेः । तुम्हे 15 मणुस्सा सूरा। तुम्भे शसि ॥ २४ ॥ युष्मदः शसि परे तुम्भे भवति, सविभक्तेः। तुम्मे मणुस्से भणामि । [6] 5 ते-तुमे-तइ-तए टायाम् ॥ २५ ॥ युष्मदः टावचने परे ते-तुमे-तइ-तए एते आदेशा भवन्ति सविभक्तेः । किं ते कतं । तुमे दिहो। तइ मज्ज कतं । तए पलत्तं । तुमाहि-तुमाहितो-तुमातो-तइत्तो पञ्चम्याम् ॥ २६ ॥ युष्मदः पञ्चम्येकवचने परे तुमाहि-तुमाहितो-तुमातो- तइत्तो एते आदेशा भवन्ति, सविभक्तेः । तुमाहिं अहं सूरो । तुमाहितो अहं सुहओ। तुमातो अहं नाणी । तइत्तो निक्खतो। 10 तुह-तुज्झ-तुम्ह षष्ठयाम् ॥ २७॥ युष्मदः पष्ठयेकवचने परे तुह-तुज्झ-तुम्ह एते आदेशा भवन्ति, सविभक्तेः । तुह सीलं । तुज्झ कलाओ । तुम्ह गुणा ।। तुम्हमामि ॥ २८ ॥ युष्मदः आमि परे तुम्हमादेशो भवति, सविभक्तेः । 15 तुम्हं चिय ते गुणा-युष्माकमेव ते गुणाः । तइ डौ ॥ २९ ॥ सविभक्तेः । तइ । तुम्हम्मि । तुम्हेसु । अस्मदः ॥ ३० ॥ अत ऊर्ध्व अस्मदध्यायो भवति ।। [7] 20 हउं-ह-अहं सौ सविभक्तेः ॥ ३१॥ अस्मदः सौ परे हउँ-ह-अहं-एते आदेशा भवन्ति, सविभक्तेः । हउं सो णरो । तेण है विद्धो । अहं कयपणामो । अम्हे जसि ॥ ३२ ॥ अस्मदो जसि परे अम्हे भवति, सविभक्तेः । अम्हे 5 मणुस्सा सूरा-वयं मनुष्याः शूराः । ममामि ।। ३३ ॥ अस्मदोऽमि परे ममादेशो भवति, सविभक्तेः । मं पेच्छ-मां पश्य । अम्हे शसि ॥ ३४ ॥ 10 अस्मदः शसि परे अम्हे भवति, सविभक्तेः। अम्हे पेच्छ-अस्मान्पश्य । मे-मए टायाम् ॥ ३५ ।। अस्मदः टावचने परे मे-मए भवतः, सविभक्तेः । मे कतं । मए दिह। 15 मइत्तो ङसौ ॥३६ ॥ अस्मदः पञ्चम्येकवचने परे महत्तो भवति, सविभक्तेः । महत्तो तुम सूरो। [8] अम्हाहिंतो भ्यसि ॥ ३७॥ अस्मदो भ्यसि परे अम्हाहिंतो भवति, सविभक्तेः । अम्हाहिंतो तुमं सूरो। मह-मज्झ ङसि ॥ ३८॥ अस्मदः षष्ठ्येकवचने परे मह-मज्झ भवतः, सवि- 5 भक्तेः । मह सीलं, मम शीलं । मज्झ गुणा, मम गुणाः । अम्हमामि ॥ ३९ ॥ अस्मदः आमि परे अम्हं भवति, सविभक्तेः । अम्हं चिय ते दोसा, अस्माकं ( एव ) ते दोषाः । मई ङौ ॥४०॥ 10 सविभक्तेः । मइ, अम्हम्मि । अम्हेसु । इति चण्डकृते प्राकृतलक्षणे विभक्तिविधानं प्रथमं समाप्तम् ।। [ ] २ 5 10 अथ स्वरविधानमाह- संस्कृतवत् संधिकार्य पदयोः ॥ १॥ प्राकृते पदयोर्यत् सन्धिकार्य, तत् संस्कृतोक्तवद् भवति । स्वराणां स्वरे प्रकृति-लोप-सन्धयः ॥ २ ॥ स्वराणां स्वरे परे प्रकृतिलोपः सन्धयश्च भवन्ति । इह अच्छति । इहच्छति । इहागतो। मह इव हितो । देविंदवंदितो। सक्कीसाणा । स ईसरो। तियसीसो । गहेसो। चंदुञ्जला । तपोपरोहो । सा ऊढा। नीसासूसासा। मोरो । गामओ। गामो। बुद्धी इमा । वुद्धिंदो । वुद्धीसो । बुद्धीओ । नईओ । स्वरस्योवृत्ते ॥३॥ व्यञ्जनसंपृक्तस्वरो यो व्यञ्जने लुप्तेऽवशिष्यते, स उद्वृत्त इहोच्यते । स्वरस्य उद्वृत्ते स्वरे परे सन्धिर्न भवति । गगनं- गअणं । गन्धकुटी-गन्धउडी। न युवर्णस्याऽस्वे ॥४॥ इवर्णस्य उवर्णस्य चाऽस्वे वर्णे परे सन्धिर्न भवति । न 15 वैरिवर्ग अपि अवकाश:-ण वेरिवग्गेवि अवयासो । संयोगे परे लोपः ॥ ५॥ संयोगे परे स्वरे परतः पूर्वस्वरस्य नित्यं लोपो भवति । धनाढ्यः-धनड्डो । देव इन्द्रः-देविंदो । कृत उद्योगः- कतुजोओ। [ 10 ] 20 5 10 हूस्वत्वं संयोगे ॥६॥ स्वराणां इस्वत्वं भवति, संयोगाऽक्षरे परे । कव्वं । कजं। इच्छि । तिक्खं । सिग्यो । उड्डूं । सुजो । स्वरोऽन्योऽन्यस्य ॥ ७ ॥ स्वरोऽन्योऽन्यस्य स्थाने भवति । कातव्यं । सुइणं । इंगाला । विंशतिः-वीसा । त्रिंशत्-तीसा । वक्ष्ये-वुच्छं । वच्मि-वेम्मि । बुद्धीए । घेणूए । नेपुरं। संगृह्णाति-संगिण्हइ । कृत्वा-कह । नयनविहूनं मुहं । निवार्यते-नीवारइ । कुत्रापि गच्छति-कृत्थवि गच्छइ । स्वरा रि च ऋवर्णस्य ॥ ८॥ ऋवर्णस्य स्थाने स्वरा भवन्ति, रि च भवति । धृतं- धतं । कृत्वा-कातूण। दृश्यते-दीसते । ऋषि:-इसि । पृथिवी- पुहवी । वृद्धः-वुड्डो । घृतं-बेटं । उत्कृष्टं-उक्कोसं। ऋणं-रिणं । एर ऐतः ॥९॥ ऐतः स्थाने ए भवति । वेतड्डो । तेल्लं । सेंधवं । वेरं ।। 15 अइ च ॥ १०॥ ऐतः स्थाने अइ च भवति । ऐश्वर्य-अइसरियं । वैरं-चरं ।। ओर औतः ॥ ११ ॥ औतः स्थाने ओ भवति | ओसहं । सोवञ्चलं ।। - 20 [ 11 ] अउ च ॥ १२॥ 5 औतः स्थाने अउ च भवति । सउरो। कउरवा । कउला । सौध-सउ । मौन-मउणं । पौरुष-पउरिसं। एदोद्रलोपा विसर्जनीयस्य ॥ १३ ॥ ए-ओ-र-लोपा विसर्जनीयस्य स्थाने भवन्ति । कतरे गच्छति । दिवरूपे । देवो । बंमणो । पुणरवि । स । एस। नई । बुद्धी । वहू ॥ अदागमोऽनुस्वार-लोपौ च व्यञ्जनस्य ॥ १४ ॥ अकारागमोऽनुस्वार-लोपौ च व्यञ्जनस्य भवन्ति । अरहंतो । सरिताणं । पडिवयाणं । यत्-जं । तत्-तं । कम्मं । 10 सम्यक्-सम्मं । ईपत्-ईसं । सीसं । नहं । सिराणं ।। 15 द्वित्वं बहुत्वेन ॥ १५ ॥ द्विवचन बहुवचनेन वाच्यम् । हत्था । पाया । देवा । वंभणा । णयणा सोहंते ।। पष्टीवच्चतुर्थी ॥ १६ ॥ पष्ठीवचतुर्थी द्रष्टव्या । नमो जिणस्स | नमो गुरुणो। प्रथमाया द्वितीया आर्षे ॥ १७ ॥ चतुर्विशतिरपि जिनवरा:-चउवीसंपि जिणवरा तित्य- यरा मे पसीअंतु ॥ [ 12 ] सप्तम्यास्तृतीया आर्षे ॥ १८॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं-तस्मिन्काले, तस्मिन्समये । न प्लुत-ङ-आः ॥ १९ ॥ प्लुता वर्णा उकार-अकारौ च प्राकृते न भवन्ति । 5 अनुस्वारो बहुलम् ॥ २० ॥ अनुस्वारस्य क्वचिल्लोपो भवति, क्वचिदागमः । क्व- चित्प्रकृतिः। बंभणा । मंजरो। विंचुओ। चुनी । काणं । काई । नईहिं । सकतं । संगो । भंगो । दुद्धं । समिद्धं । गोर्गावि ॥ २१ ॥ गोशब्दस्य गावि इति भवति, निपातेन । गावी । 10 गावीओ । गावि । गावीए । गावीहितो । गावीणं । गावांसुं । एवार्थे गइ-चेय-चियाः ॥ २२ ॥ एव शब्दार्थे णइ चेय चिय एते आदेशा भवन्ति । गत्या एव-गति गइ । मति णइ । तं चेय । सञ्चिय । अप्यस्योरलोपः ॥ २३ ॥ 25 अपि असि एतयोरस्य लोपो भवति । सूरो पि । कतं पि। तं सि इह । [18 ] तु-त्ता-च्चा-टु-तुं-तूण-ओ-प्पि पूर्वका- लार्थे ॥ २४॥ एते पूर्वकालार्थे भवन्ति । वंदित्तु । वंदित्ता । सुच्चा । कट्टु । भोत्तुं । मोत्तूण । वंदिओ। एवं कपि । मत्वर्थे आल-इल्लौ ॥ २५ ॥ मत्वर्थे एतौ प्रत्ययौ भवतः। जडालो। जडिल्लो । फडिल्लो॥ त्ता-ताव-जा-जावास्तावद-यावतोः ॥ २६ ॥ 5 1 तावच्छब्दस्य यावच्छन्दस्य च ता-तावौ जा-जावी भवतः । 10 ता वित्थिणं गयणं, तावच्चिय जलहिणोपि गंभीरा ।। ता गरुआ सुरसेला, धीरेहि न जा तुलिजंते ॥ १ ॥ उपमाने पिव-इव-विव-विय-व-व-जहाः॥२७॥ उपमानार्थे वतः शब्दस्य एते आदेशा भवन्ति । चंदणं पिन । चमरमिव । कमलं विव तुज्झ मुहं । गिम्हो विय । 15 सायरन्च । सेसस्स व एस फणो तुह । भाति जसो जहा संखो ।। ओत्वमवाऽपयोः ॥ २८ ।। अव-अपयोः स्थाने ओ भवति । अत्रहसितं-ओहसितं । अपसरित-ओसरितं । अपवरकः-ओवरमओ ।। [ 14 ] 10 खलोः खु ॥ २९ ॥ खलुशब्दस्य खु आदेशो भवति । एवं खु जंतपीलणं । तो वर्तमानार्थे ॥ ३०॥ यो वर्तमानकालाऽर्थे आन प्रत्ययस्तस्यार्थे तकारो भवति । भिद्यमानं-भिजंतं । कथ्यमान-कथिजंतं । साध्यमानं- साहिजंतं ॥ भे सर्वासु युष्मदः ॥ ३१ ॥ युष्मच्छब्दस्य सर्वासु विभक्तिषु मे भवति । भे निसामेथ (यूयं निशाम्यत)। भे भणामि (युष्मान भणामि)। मे कतं ( त्वया कृतं)॥ अस्मदोऽपि ॥ ३२॥ अस्मच्छब्दस्यापि सर्वासु विभक्तिषु भे भवति । नेहेन भणामो भे तुम्भे ( वयं युष्मान् स्नेहेन भणाम इत्यर्थः) इतेरियः ॥ ३३॥ इति शब्दस्य इय आदेशो भवति । इय एवं । भावे तणः ॥ ३४॥ भावार्थे त्तणः प्रत्ययो भवति । गामत्तणं । नयरत्तणं ।। इति चण्डकृते प्राकृतलक्षणे स्वरविधानं द्वितीयं समाप्तम् ।। 15 [ 15 ] अथ ३ व्यजनविधानमाह- हाद य-बौ लोप्यौ ॥१॥ हात् हकारात् यकार-वकारौ परत्र अवस्थितौ लोप्यौ भवतः । मुह्यते-मुज्झते । दह्यते-डज्झते । विह्वलः-विमलो । जिह्वा-जिम्मा। स-व-लेभ्यो व्यञ्जनम् ॥ २॥ स-व-लेभ्यः परं व्यञ्जनं लोप्यं भवति । स्वयं-सयं । स्वर्ग-सगं । श्रोतव्यं-सोतन्वं । काव्य-कव्वं । शल्यं-सल्लं । बिल्व-विल्लं । शस्य-सस्सं । श्रुतं-सुतं । श्लेष्मा-सिम्मा । वर्गे ॥३॥ 10 15 वर्गे च परे तल्लोप्यं भवति । शक्तः-सत्तो। रक्तं-रत्तं । दुग्ध-दुद्धं । वच्मि-वेम्मि । पदकं-छकं । षट्पदः-छप्पओ । खड्गं-खग्गं । षण्मुखः छम्मुहो। आत्मा-अप्पा । उत्पलं- उप्पलं । सद्भाव-सम्भावं । मन्मथः-वम्मथो। प्राप्तं-पत्रं । प्रद्युम्न:-पज्जुनो। अर्का-अक्को । उल्का-उक्का । भास्कर:- भक्खरो। ब्रह्मा-बम्हा । शे वर्गायं ॥४॥ वर्गाचं शे परे लोप्यं भवति । वृक्षा-वच्छो । क्षमा- खमा । संवत्सरः-संवच्छरो । मत्सरः-मच्छरो । अप्सरा- अछरा । ईप्सितं-इच्छितं ॥ [ 16 ] 20 10 10 वर्गादवय॑म् ॥ ५॥ वर्गात् परमवयं व्यञ्जनं लोप्यं भवति । सौख्यं सुक्खं । शक्रः-सको । क्लीव:-कीवो । विध्वंसितं-विद्धंसितं । ऊर्ध्व- उर्दु । प्राप्तं-पत्तं । शाच्च पंचमो वा ॥६॥ वर्गपरः शपरश्च वर्गपञ्चमो वा लोप्यो भवति । ज्ञान- नाणं । यत्न-जत्तं । लक्ष्मणः-लक्षणो । लक्ष्मी-लच्छी । तीक्ष्णं-तिक्खं । आत्मा-अप्पा । दो वे ॥७॥ दकारो वकारे परे लोप्यो वा भवति । द्वारं-वारं । वेति कि ? दारं। षाहः॥ ८॥ पकारात्परएकारो वा लोप्यो भवति । उत्कृष्टं-उकोसं, उकिट्ठ । स्पष्टं-फुडं, पुढें । रेफः पूर्वश्च ॥ ९॥ सर्वस्माद् व्यञ्जनात् परः पूर्वस्थश्च रेफो लोप्यो भवति । तक्रं-तकं । अर्कः-अक्को । मूर्खः-मुक्खो । न्यग्रोधा-निग्गोहो । स्वर्ग-सग्गं । शीघ्रा-सिग्घो। अर्घ:-अग्यो । अर्चनं-अच्चणं । वजं-वजं । दुर्जनः-दुजणो उष्ट्र:-उट्टो । सुवर्ण-सुवणं । शत्रु:-सत्तू । कर्तव्यं-कातव्वं । कर्दम-कद्दमं । ऊर्व-उर्दू । 20 प्रवरः-पवरो । भ्रमरः-भवरो, भमरो, मसलो। धर्मः-धम्मो । सूर्यः-सुजओ । व्रत-वतं । पर्वतः-पच्चतो । श्रुतं-सुतं । इस्व:- 15 हस्सो। [ 17 ] असंयोगस्य ॥ १० ॥ अत ऊर्ध्व ये व्यञ्जनाऽऽदेशास्ते असंयोगस्य भवन्ति । गृहं-घरं । स्तम्भ:-खंभो। प्रथम-द्वितीययोद्वितीय-चतुर्थौ ॥ ११ ॥ वर्गाणां प्रथम-द्वितीययोः स्थाने यथासंख्यं द्वितीय-च- 5 तुर्थों आदेशौ भवतः । भास्करः-भक्खरो। निश्चया-निच्छओ। दुष्ट-दुई । स्तंमः-थंभो । परुषं -फरुसं । विक्षयते-विज्झते। दंष्ट्रा-दाढा । मथुरा-मधुरा । नाथ:-नाधो । प्रथमस्य तृतीयः ॥ १२॥ प्रथमस्य स्थाने तृतीयो भवति । एक-एगं । तीर्थकर:-ति- 10 त्थगरो । पिशाची-पिशाजी। जटा-जडा । कृतं-कदं । प्रवि- षिद्धं-पडिसिद्धं । हो ख-घ-ध-भानाम् ॥ १३॥ खकार-घकार-धकार-भकाराणां स्थाने हकारो भवति । मुख-मुहं । मेघा-मेहो । मधव:-महवो । वृषभ:-वसहो । सस्य ख-छ-हाः ॥१४॥ सकारस्य स्थाने ख-छ-हा भवन्ति । मिक्षा-भिक्खा । षण्मुखः-छम्मुहो । पाषाणः-पाहाणो । दश-दह । यस्य जः ॥ १५ ॥ यकारस्य स्थाने जकारो भवति । यौवनं-जुन्वणं । सूर्य:-20 सुनो । यात्रा-जत्ता। [ 18 1 15 प-वयोमों वा ॥ १६ ॥ 5 पकार-वकारयोः स्थाने मकारोवा भवति। शवर:-सबरो, समरो। स्वप्न:-सिविणो, सिमिणो । नीवी-णीमी । पूर्व:-पुन्बो, पुरिमो ॥ तवर्गस्य च-टवौ ॥ १७ ॥ तवर्गस्य स्थाने च-टवौं भवतः, यथासंख्यम् । नित्यं- णि । पथ्यं-पच्छं । विद्या-विजा । वंध्या-वंझा। नृत्यं-णटुं । स्थिता-ठिओ। दंडा-डंडो। दग्धः-दड्डो। धान्यं-धणं । वर्धमानः-चड्डमाणो । वृद्धः-वुढो । खिद्यते-खिज्जए । रुदितं- रुण्णं । युष्मदो यस्य तः ॥ १८ ॥ युष्मत्संबन्धिनो यकारस्य तकारो भवति । तुम्हेहि । 10 जस्य रः ॥ १९ ॥ जकारस्य स्थाने रकारो भवति । व्युत्सृजामि-वोसरामि । व्युत्सृजति-वोसरइ । यष्टिः-लट्ठी । यष्टिका-लहिआ । 15 र-श-षाणां सः॥ २० ॥ रेफ-शकार-पकाराणां स्थाने सकारो भवति । शिरः-सीसं । शशी-ससी । आमिपं-आमिसं। ह-ज-थानां र-न-खाः ।। २१ ।। ह-ज-थानां स्थाने र-न-खा भवन्ति, यथासंख्यम् । 20 [ 10 ] गृहं-घरं । ज्ञान-नाणं । राजा-राणा । आज्ञा-आणा । स्तंभा-खंभो। ग-र--हाणां घ.---झाः ॥ २२ ॥ ग-र-हाणां स्थाने घ-ण-झा भवन्ति, यथासंख्यम् । गृह-घरं । करवीर:-कणवीरो । वाह्यः-चज्झो । 5 मड-हानां व-ल-भाः ॥ २३ ।। म-ड-हानां स्थाने यथाक्रमं व-ल-मा भवन्ति । मन्म- थः-वम्मथो । षोडश-सोलस । जिह्वा-जिम्मा । य-वयोर्व्यत्यासः ॥ २४ ॥ यकार-वकारयोय॑त्यासो भवति । पर्यंक:-पल्लंको । 10 वैदूर्यः-वेदुलिओ । त्रयोदश-तेरह । वृक्षा-रुक्खो। श-हयोोपे न-ण-मानामधो होऽपदादौ स्थितानाम् ॥ २५ ॥ न-ण-मानां सम्बन्धिनौ यौश-हौ तयोर्लोपे हकाराऽऽगमो भवति । अधः पदादावस्थितानाम् । प्रश्न:-पण्हो । तृष्णा-तहा। यस्मात्-जम्हा । गृह्णाति-गिण्हति । वह्नि-वण्ही । जिह्मः- जिम्हो । अपदादाविति किं ? श्मशानम्-मसानं । लोपे द्वित्वम् ॥ २६ ॥ संयोगाक्षरस्य लोपेचशेषस्य द्वित्वं भवति । दुर्गा-दुग्गा । शक्रः-सको। तस्कररा-तक्करो । व्याघ्रा-वग्यो । [ 20 ] 15 20 क्वचिदलोपेऽपि ॥२७॥ 5 10 कचिदलोपेपि द्वित्वं भवति । न ज्ञायते-न नजते । वाध्यते-चाहिजते । तस्मिन् द्वितीय-चतुर्थयोः प्रथम- तृतीयौ ॥ २८ ॥ तस्मिन् द्वित्वे वर्तमानयोर्द्वितीय-चतुर्थयोः स्थाने प्रथम- तृतीयौ भवतः । सौख्यं-सुक्खं । अर्घा-अग्यो । पथ्यं-पच्छं । साध्यः-सज्झो । षष्ठः-छट्टो । वृद्धः-वुड्डो । पार्थ:-पत्थो । वर्धमानः-वद्धमाणो । पुष्पं-पुप्फ । जिह्वा-जिब्मा । स एवाऽन्येषाम् ॥ २९॥ अन्येषामुक्तविशेषाणां द्वित्वे स एव भवति । अर्क:-अको। सत्यं-सच्चं । भुक्तं-भुत्तं । धान्य-धणं । सर्पः-सप्पो । शुल्वं- सुलं । कायं-कव्वं । शस्यं-सस्सं ।। न पदादौ ॥ ३०॥ पदादौ द्वित्वं न भवति । क्रोधा-कोहो । क्षुद्रः-खुद्दो । पदादाविति किं १ भद्रः-भद्दो । क्वचिदन्यत्राऽपि ॥३१॥ क्वचित् पदमध्येऽवसाने च लोपे कृते द्वित्वं न भवति । काश्यपः-कासवो । वैश्रवणः-वेसवणो । स्पष्टं-फुड । कर्तव्यं- कातव्वं । शीपी-सीसो । दीर्घः-दीहो । उत्कृष्टं-उकोसं । । 15 20 [1] । - 5 . संयोगस्येष्टस्वराऽऽगमो मध्ये ॥ ३२ ॥ द्वयोव्यंजनयोर्मध्ये इष्टस्वरागमो भवति। अग्नि:-अगणी। विश्लेषः-विसलेसो । प्लक्षा-पलक्खो। रत्न-रतनं । वर्ष-वरिसं। सूर्य:-मूरिओ। सर्पपः-सरिसवो । वैदुर्य:-वेदुलिओ । आमा- खमा । सूक्ष्म-सुहुमं । पद्म-पदुमं । य-वयोरिदुतौ ॥ ३३ ॥ य-वयोः स्थाने इकारोकारों भवतः । त्रयोदश-तेरह । भवति-होति । संख्यायास्ति-शयोलोपः ॥३४॥ संख्यासम्बन्धिनोः ति-शयोलोपो भवति । विंशति:-10 वीसा। पश्चाशत्-पन्ना । तस्य च ॥३५॥ संख्यासंबन्धिनस्तकारस्य च लोपो भवति । पञ्चपञ्चाशत्- पणपण्णसं। क-तृतीययोः स्वरे ॥३६॥ ककारस्य वर्गतृतीयस्य च स्वरे परे लोपो भवति । कोकिल:- कोइलो । भौगिका भोइओ । राजी-राई । नदी-नई । 15 यत्वमवणे ॥ ३७॥ ककार-वर्गतृतीययोरवणे परे यत्वं भवति । काका:-काया । नागा:-नाया। , 20 [22] शिष्टप्रयोगाद् व्यवस्था ॥ ३८ ॥ व्यवस्था वर्णाऽवस्थानं शिष्टप्रयोगात् ज्ञातव्या। अर्की- अक्को । सूर्यः-सूरिओ । भिक्षा-भिक्खा । लक्ष्मी-लच्छी। न लोपोऽपभ्रंशेऽधो रेफस्य ॥३६॥ अपभ्रंशेऽधो रेफस्य लोपो न भवति । वरत्रु ग्रामो वाघो घ्रसि जादि । पैशाचिक्यां र-णयोर्ल-नौ ॥ ४०॥ पैशाचिक्यां रेफस्य लकारो भवति, णकारस्य नकारः । अले अले दुट्ठलक्खसा पनमत पनइद्वितासा । मागधिकायां र-सयोर्ल-शौ ॥४१॥ मागधिकायां रेफ-सकारयोः ल-शौ भवतः । चन्दकल- निकलं हवति । शेशे । हंशे । पशुत्ते । इति श्रीचण्डकृते प्राकृतलक्षणे ॥ व्यञ्जनविधानं तृतीयं समाप्तम् ॥ . 10 इति प्राकृतलक्षणं संपूर्णम् । [23 ]

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5 कहासंग्गहो। सिरिथूलभद्दचरियं. पुब्धि खिइप्पइट्टियं णाम नयरं । तत्थ वत्थुमि खीणे चणगपुरं णिविटुं, ततो उसहपुरं, ततो रायगिहं, ततो चंपा, ततो पाडलिपुत् इच्चाइ भाणियध्वं, जाव सगडाले पंचत्तमुव- गते [देण सिरितो भणितो-कुमारामचत्तणं पडिवलाहि । सो भणइ-मम भाया जेट्टो थूलभद्दो बारसमं वरिसं गथियाघरं । पविट्ठस्स । सो सद्दावितो भणइ-चिंतेमि । राया भणइ-असो. गवणियाए चिंतेहि, सो तत्थ अतिगतो चितेति करिसं भोगकजं वखित्ताणं ? पुणरवि णरगं जातियव्वं होहित्ति, एए णाम परिणामदुस्सहा भोगत्ति पंचमुट्टियं लोयं कालण. पाययं कंबलरयणं छिदित्ता, रोहरणं काउंरण्णो मूलं गतो, 10 (२५) ४ एयं चिंतियं । राया भगाइ-सुचिंतियं, विणिग्गतो, राया चिंता-पिच्छामि कि कवडत्तणेण गणियाधरं पविस्सइ, ण वत्ति ? पासायतलगो पेच्छह, नवरं मयगकलेवरस्स जणो प्रोसरह, मुहाणि य ठएइ, सो मझेण गतो, राया भणइ- णिविएणकामभोगो भगवंति सिरियो ठावितो । सो संभूय- 5 गविजयस्स मूले पध्वतितो, थूलभद्दसामीवि संभूयविजयाणं मूले घोरागारं तवं करे । विहरता पाडलिपुत्तं आगया तिण्णिअणगारा अभिग्गहे गिण्हंति एक्को सीगुहाए, तं पेहंतो सीहो उघसंतो, भन्नो सप्पगुहाए, सोऽवि दिट्ठीविसो उत्रसंतो, थूलभद्दो 10 कोसाघरे, सा तुट्ठा, परीसहपराजिओ प्रागोत्ति, भणइ- किं करोमि ? उजाणघरे ठाणं देहि, दिन, रतिं सन्चा- लङ्कारविभूसिया आगया, चाडुयं पकया, सो मंदरोपमो भकंपो, ताहे सम्भावेण पडिसुणेइ, धम्मो कहितो, साविगा जाया, भणति-जतिरायचसेणं अनेणं समं वसेजा, इयरहा 15 वंभचारिणीवयं गिण्हति । ताहे सीहगुहाओ भागो चत्तारि मासे उववासं काऊणं, अाइरिएहिं ईसत्ति अभुडिओ, मणिओ य-सागयं दुक्करकारगस्सत्ति । एवं सप्पईत्तोऽवि । थूलभद्दसामी तत्थेव गणियाघरे भिक्खं गिण्हइ, सोवि चउमासेसु पुण्णेसु 20 आगतो, आयरिया संभमेण उडिया, भणियो य-सागयं ते अइदुक्करदुकरकारगस्सत्ति । ते भणंति दोषिणवि-पेच्छह मायरिया रागं वहति अमच्चपुत्तोत्ति, वितियए वरिसारत्ते सीहगुहाखमणो भणति- गणियाघरं बच्चामित्ति अगिरगहं गिण्हइ, अायरिया उवउत्ता, 25 ( २६ ) , वारियो, अप्पडिसुणंतो गतो, वसही मग्गिया, दिण्णा, सा सन्मावेण ओरालियसरीरा विभूसिया अविभूसिया वा, सुणति धम्मं, सो तीसे सरीरे श्रझोववन्नो, ओभासइ, सा ण इच्छति, भणति-जति नवरि किंचि देसि, किं देमि ? सयसहस्सं, सो मग्गिउ मारद्धो, णेवालविसये सावतो, जो 5 तहिं जाइ तस्स सयसहस्समुल्लं कंवलं देइ, तहिं गतो, तेण दिण्णं सडरायाणएणति । एगत्थ चोरेहिं पंथो बद्धो, सउणो वासति-सयसहस्संति, चोरसेणावई जाणइ, नवरि संजय पेच्छइ, वोलीणो, पुणो वासति-सयसहस्सं गतं तेण सेणा- वइणा गंतूण पलोइनो, सम्भावं पुच्छिो भणति-अस्थि 10 कंवलो, गणिकाए णेमि, मुक्को गतो, तीसे दिण्णो, ताए चंदणिकाए छूढो, सो भणइ-मा विणासेहि, सा भणइ- तुम पि एरिसम्रो चेव होहिसि, उवसामेति लद्धबुद्धी, इच्छामि अणुसलुि, गतो, पुणो आलोएत्ता विहरइ । मायरिएणं भणियो-एवं दुक्करदुक्करकारो थूलभद्दो 15 पुब्बि खरिका (दुअक्खरिया ) इच्छइ, इदाणीं सड्ढी जाया, अदिदोसा तुमे पत्थियात्ति उवालद्धो, एवं चेव विहरति ।

दंडगारण्णस्स उप्पत्ति.
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सावथीए नयरीए जियसत्तू राया, धारिणी देवी,
तीसे पुत्तो खंदो णाम कुमारो, तस्स भगिणी पुरंदरजसा,
सा कुमकारकडे नयरे दंडगी नाम राया तस्स दिना, तस्स
य दंडकिस्स रण्णो पालगो णाम मरुतो पुरोहितो । अन्नया 5
सावत्थीए मुणिसुव्वयसामी तित्थयरो समोसरिमो,
परिसानिग्गया खंदतोऽवि निग्गतो, धम्मं सोचा सावगो
जाभो । अन्नया सो पालकमरुतो दूयत्ताए प्रागतो सावत्थिं
नयरिं, अस्थाणिमझे साहूणं अवण्णं वयमाणो खंदएणं
निप्पिट्ठपसिणवागरणो कतो, पतोसमावण्णो, तप्पमिई चेव 10
खंदगस्स छिद्दाणि चारपुरिसेहिं मग्गावितो विहरह, जाव
खंदगो पंचजणसएहिं कुमारोलग्गएहिं सद्धिं मुणिसुव्वयसा.
मिसगासे पव्वतितो, बहुसुतो जातो, ताणि चेत्र से पंच
सयाणि सीसत्ताए अणुण्णायाणि । अन्नया खंदो सामिमा-
पुच्छइ -बच्चामि भगिणीसगासं, सामिणा भणियं-उबसग्गो 15
मारणंतितो। भणइ-बाराहगा विराहगा वा?, सामिणा
भणियं-सच्चे पाराहगा, तुमं मोतुं । सो भणइ-लटुं, जदि
एत्तिया अाराहगा, गो कुम्भकारकडं । मरूएण जहिं उजाणे
ठिो तहि आउहाणि णूमियाणि, राया बुग्गाहिओ-जहा
एस कुमारो परीसहपराइतो एएण उवाएण तुमं मारित्ता रजं 20
गिण्हिाहत्ति, जदि ते विपचतो उजाणं पलोएहि, भाउहाणि
.
( २८ )

, 5 भोलइयाणि दिवाणि, ते चंधिऊण तस्स चेव पुरोहियस्स समप्पिया, तेण सव्वे पुरिसजतेण पीलिया, तेहिं सम्मं अहि- यासियं, तेसिं केवलणाणं उप्पण्णं, सिद्धा य । खंदतोऽधि पासे धरिश्रो, लोहियचिरिकाहिं भरिजंतो सबतो पच्छा जंते पीलितो णिदाणं काऊण अग्गिकुमारेसु उववण्णो । तंपि से रयहरणं रूहिरलित्तं पुरिसहत्थोत्ति काउं गिद्धेहिं पुरं- दरजसांते पुरतो पाडियं, सावि तद्दिवसं अधिर्ति करेइ जहा साधू ण दीसंति, तं च णाए दिढ़, पच्चभिन्नाप्रो य कंबलो, णिसि- जातो छिण्णातो, ताए चेव दिण्णो, ताए नायं-जहा ते मारिया । ताए खिंसितो राया-पाव ? विणट्ठोऽसि । ताए 10 चिंतियं-पच्चयामि, देवेहिं मुणिसुव्वयसगासं नीया । तेण वि देवेणणगरं दड्ड सजणव्ययं, अज्जवि “ दंड- गारण्णं " ति भण्णइ । . (२९) बोडियमयस्स समुप्पत्ति. छुव्वाससएहिं एवोत्तरेहिं लिद्धिं गयस्स वीरस्स। तो बोडियाण दिट्टी रहवीरपुरे समुप्पन्ना ॥१॥ . - तेणं कालेणं तेणं समयेणं रहवीरपुरं कन्नडं, तत्थ दीवगं गणाम उज्जाणं, तत्थ अज्जकण्हा आयरिया समोसढा। 5 तत्थ एगो सिवभूई णाम साहस्सिमल्लो, सो रायाणं उवगतो, तुम मोलग्गामित्ति, जा परिक्खामित्ति, रायाए अन्नया मणितो वच्च माइघरे सुसाणे किण्हचउद्दसीए वलिं देहि, सुरा पसुतो दिनो भन्ने य पुरिसा भणिया-एयं वीहाविजाह, सो गंतूण माइबलिं दाऊण छुहिनोमित्ति तत्थेव सुसाणे तं 10 पसुं पोलिचा खाइ, ते य गोहा सिवारसिएहिं समंता भैरवं रवं करेंति, तस्स रोमुन्भेोऽवि न कजइ, ता अन्भुट्टियो गतो, तेहिं सिटुं वित्ती दिन्ना | अन्नया सो राया दंडे आण- वेति-जहा महुरं गेहह, ते सबवलेणं उद्धाईया, ततो अदू. रसामतेणं गंतूण भणंति-अम्हे ण पुच्छियं कयरं' महुरं 15 बच्चामो, १ राया य अविण्णवणिजो, ते गुंगुयंता अच्छति, सिवभूई आगतो भणति-किं भो ! अच्छह ?, तेहिं सिटुं, तो भणति-दोऽवि गिण्हामो समं चेव, ते भणति-ण सक्का, दो मागिएहिं एकेकाए बहूकालो होतित्ति, सो भणति-जं दुजयं तं मम देह, भणितो जाणिज्जाइ, भणइ- - , 20 (३०) - . 5 (सूरे त्यागिनि विदुपि च, वसति जनः स च जनाद्गुणी भवति । गुणवति धन धनाच्छ्री, श्रीमत्याज्ञा ततो राज्यम् ॥११॥ एवं भणित्ता पहावितो पंहुमहुरंतेमां, तस्थ पचताणि ताविउमारद्धो, दुग्गे ठितो, एवं ताव जाव रणगरसेसं जायं, पच्छा णगरमवि गहियं ओवइत्ता, ततो णिवेइयं तेण रण्णो, तुडेण 5 भणियं-किं दमि ?, सो चिंतियं भणति-जं मए गहियं तं सुग- हियं, जहिच्छतो भविस्सामि, एवं होउत्ति । एवं सो य वाहिं चेव हिंडतो अवरत्ते आगच्छति वा ण वा, तस्स मजा ताव ण जेमेइ सुयति वा जाव ण (गतो भवति, सावि णिविण्णा । अन्नया मायरं सा वड्डेति-तुम्ह पुत्तो दिवसे दिवसे अड्डरते एति, अहं 10 जग्गामि, छुहातिया अच्छामि, ताहे ताए भणइ-मा दारं देजाहि, अहं अज जग्गामि, सो दारं मग्गति, इयरीय अंबाडितो, भणितो य-जत्थ इमाए वेलाए उग्घाडियाणि तत्थ वच्च । तस्स भवियव्वयाए तेण मग्गंतण उग्घाडितो साहुपडिस्सतो दिट्ठो, तत्थ गतो, वंदति, भणइ-पवावेह मए, नेच्छति, सयं 15 लोगो कतो, ताहे से लिंग दिनं, ते विहरिया । पुणोऽवि आगयाणं रण्णा कंवलरयणं से दिन्नं । आयरिएण-किं एएण जईणं १, किं गहियति भणिऊण तस्स अणापुच्चाए फालियं, णिसेजातो कयातो, ततो स कसाइतो । अण्णया जिणक- प्पिया वणिजंति । जहा- जिणकप्पिया य दुविहा पाणिपाया पहिग्ग- हधरा य । पाउरणम-पाउरणा एकेका ते भवे दुविहा ॥१॥ ( इत्यादि), " 20 { )

--
सो भणइ-किं एस एवं ण कीरइ ?, तेहिं भणियं-एस
वोच्छिश्नो, ममं ण वोच्छिजइत्ति सो चेव परलोगस्थिणा
कायच्चो ।। कम्मोदयेण चीवराइयं छड्डेचा गतो ॥
तस्स उत्तरा भइणी उजाणे ठियस्स बंदिया गया, तंच
दुहुण तीएवि चीवरातियं सव्वं छडियं ताहे भिक्खाए पविट्ठा, 5
गणियाए दिट्ठा, मा अम्ह लोगो विरजिहित्ति उरे से पोत्ती बद्धा
साणेच्छति, तेण भणियं अच्छउ एसा तव देवयादिन्ना ।
तेण य दो सीसा पवाविया-कोदिण्णो कोट्टवीरो य,
तो ससाण परंपरफासो जातो।।

-- . - मल्लकहामार्ग . " उज्जेणी नयरी, जियशचू राया, लस्स अट्टणो सल्लो, सव्वरजेसु बजेतो । इतो य ससुद्दतडे लोपास्यं गायरं, तत्थ सिंहगिरी राया, सो य मल्लाणं नो जिणति तरख नहुँ दवं देति, सो य अट्टणो तत्थ मंतूण परिसे बारिसे पडागं हरति । राया चितेइ-एस अन्नाओ रजाओ आगंतूण पडाणं हरति, एसा ममं श्रोहावणत्ति पडिमल्लं मग्गति, तेण मच्छितो एगो दिवो वसं पियंतो, वलं च से विन्नासियं, गाऊण पोसितो, पुणरवि अदृणो आगतो, सो य किर मल्लजुद्ध होहितित्ति प्रणागते चेव सगातो णयरातो अपणो पत्थयणस्स वयल्लं 10 भरेऊणं अव्वाबाहेणं एति, संपत्तो सोपारयं, जुद्धे पराजियो मच्छियमल्लेणं, गतो सयं आवासं आवासं चिंतेइ-एयस्त बुड्ढी तरुणस्स मम हाणी, अन्नं मग्गइ मलं सुणेति सुरहाए अ- स्थिति, एतेणं भरुकच्छ हरणीगामे दूरेल्लकूवियाए करिसतो दिहो, एकेणं हत्थेणं हलं वाहेइ, एकेणं फलहितो उपाडेति, 15 तं दगुण ठितो, पेच्छामि तार से आहारेति, आवल्ला मुक्का, मजा य से भत्तं गहाय आगया, पत्थिया, कूरस्स उम्भीजय घडतो पेच्छति, जिमितो सपणाभूमि गतो, तत्थ परिक्खइ सव्वं संवटिं, स वेयालियंमि बसहिं तस्स घरे मग्गति, दिना । इतो य संकहा य, पुच्छइ--का जीविका ? 20 तेण कहिए भणति-अहं शाहणो तुम इसारं करेमित्ति, तीसे . ५ , . महिलाए कप्पासमोट दिन्नं, सा य उबलेद्धा, उजेसिए गया तेणवि वमणविरैयणाणि कयाणि, पोसितोणिजुद्धं सिक्खा- वितो, पुणरवि महिमाकाले तेणेव विहिणा भागतो, पढम दिवसे फलहियमल्लो, मच्छियमल्लोबि, जुद्धे एको भजितो एक्को अपराजितो, रायावि वीयदिवसे होहित्ति अतिगतो, 5 इमेवि सए सए आलए गया, अट्टणेण फलहियमल्लो भणितो कहेहि पुत्ता ! जं ते दुक्खावियं, तेण कहियं, मक्खित्ता मलितो से एणं पुणण्णवीकतो, मच्छियस्सवि रण्णा संमगा विसजिया, भणइ-अहं तस्स पिउणोऽपि ण वीहमि, सो को वरायो ? बीयदिवसे समजुद्धा, तईयदिवसे अंबप्पहारो 10 णीसहो वहसाह ठितो मच्छितो। अट्टणेण भणितो-फल- हित्ति तेण फलिहग्गहेण कड्डितो सीसे कुंडिकागाहेण, सक्का- रितो, गतो उज्जेणीं। तत्थय विमुक्कजुज्झवावारो अच्छति, सो य महल्लोत्तिकाउं परिभृयए सयण वग्गेणं जहा अयं संपयं ण कस्सइ कलस्स खमोत्ति, पच्छा सो माणेणं तेसिं 15 अगाउच्छाए कोसंविए णयरिए गतो, तत्थ वरसमेत्तं उवरेग- मतिगतो रसायणं उबजीवति, सो बलिट्ठो जातो, जुद्धमहे पवत्तति, रायमल्लो णिरंगणो णाम तं णिहणति, पच्छा राया मएणुइतो-मम मल्लो आगंतूणा विहणितोत्तिण पससई रायाणे य अपसंसंते सन्चो रंगो तुहिको अच्छति, इतो य अट्टणेण राइणो जाणणणिमित्तं भण्णति- साहह वण ! सलणाणं साहह भो सउणिगा ? सउ- णिगाणं। णिहतो पिरंगणो अट्टणेण णिक्खित्त सत्थेणं ॥ १ ॥ एवं भणियमेत्ते राहणा एस अहणोतिकाउं तुद्वेण 25 । 20 1 (३४) पूजितो, दवं च से पजत्तियं आमरणतियं दिया, सयणनग्गो य से तं सोउं तस्स सगासमुवगतो, पायवडणमाईहिं पत्ति- यावेडं दवलोभेणं अल्लियांवितो, पच्छा सो चिंतेइ-ममं एते दबलोभेण अल्लियाति पुणोवि मम परिमविस्संतित्ति, जराप- रिगतो अहं ण पुणो सुम हल्लेणावि पयत्तेण सकिस्सं जुबत्तं 5 काउं। तं जावजवि सचेटो ताव पव्ययामित्ति संपहारे पब्वतितो।। - IP . (३५) वाणियगपुस्तकहा, जहा एगल्स वाणियगर तिन्नि पुत्ता, तेण तेसिं सहस्सं सहस्सं दिन्नं काहाबणाणं, भणिया य-एएण ववहरिऊण एचिएण कालेण एजाह । ते तं मूलं घेचण णिग्गया सण- सरातो, पिथप्पिथेसु पट्टणेसु ठिया । तत्थेगो सोयणच्छायणवजं जूयमजमंसवेसावसणविर- हितो विहीए ववहरमाणो विपुललामसमनितो जातो। वितितो पुण सूलमवि दव्वंतो लाभगं भोयणाच्छाय- यमन्त्रालंकारादिसु उवधुंजति, ण य अचादरेण ववहरति । ततितो न किंचि संदवहरति, केवलं जूयमञ्जमंसवेसगं- 10 धमलतंबोलसरीरकियासु अप्पेणेत्र कालेण तं दवं णिवि- यंति । जहावहिकालस्स सपुरमागया। तत्थ जो छिन्नमूलो सो सवस्स असामी जातो, पेसए उवचरिजति, वितितो घरवावारे णिवुत्तो भत्तपाणसंतुहोण दायव्यभोचब्बेसु ववसायति, ततितो घरवित्थरस्स सामी जातो। 15 केति पुण कहंति-तिन्नि वाणियगा पत्तेयं पत्तेयं ववह- रति, तत्थेगो छिन्नमूलो पेसतमुवगतो, केण वा संववहार करेउ ? अच्छिन्नमूलो पुणगवि वाणिजाए भवति, इयरो) बंधुसहितो मोदए । एस दिलुतो । (३६) अभयकुमारस्त पवजा. रायगिहे णगरे सेणिनो राया, चेल्लणा तस्स मजा, सा वद्धमाणसामिमपच्छिमतित्थागरं वंदित्ता वेयालियं माह- मासे पविसति, पच्छा साहू दिहो पडिमापडिवण्णो, तीए रत्तिं सुत्तियाए हत्थो किहनि विलंबित्रो, जया सीतेण गहिओ 5 तदा चेतितं, पवेसितो हत्थो, तस्स हत्थस्स तणएणं सव्वं सरीरं सीतेण गहिरं । तीए भणि-स तवस्सी किं करिस्सति संपयं । पच्छा सेणिएण चिंतियं-संगारदिण्णो से कोई। रुद्वेण कल्लं अभयो भणिो-सिग्घं अंतेउरं पलीवेहि | 10 सेणियो गतो सामिसगासं । अभयेण हत्थिसाला पलीविया। सेणिो सामि पुच्छति -चेलणा किं एगपत्ती अणे- गपत्ती ?, सामिणा भणिभं-एगपत्ती, ताहे मा डज्झिहि- तित्ति तुरितं णिग्गो, अभो णिप्फिडति । 15 सेणिएणं भणियं पलीवितं ? सो भणति-प्राम, तुमं किं ण पविट्ठो ?, भणति अहं पव्वहस्सामि किं मे अग्गिणा? पच्छा गेण चिंति-सा छाडिजिहितित्ति भणितं-ण उज्झति । . (३७)

सुम्गसेल-मेहसंकादो.
-
+
10
चरियं च फापितं का आहरणं दुविहमेव नायब्वं ।
अत्थस्स साहणटा इंधणमिव प्रोदणट्ठाए ।। १ ।।
तस्थ इमं कपिधे, जहा-
मुन्गसेलो पुक्खलसंवट्टओ अमहामेहो जंबूदीवप्पमाणो। ।
तत्थ णारयस्थाणीओ कलई आलाएति । मुग्गसेलं
भणति-" तुज्झ नामग्गहणे कए पुक्खलसंवट्टो भणति-
जहा गं एगाए धाराए विराएमि,"।
. सेलो उप्पासितो भणति-"जदि मे तिलतुसतिभागंपि
उल्लेति तो णामय वहामि"।
पच्छा मेहस्स मूले मणति-मुग्गसेलवयणाई ।
सो रुट्ठो, सचादरेण परिसिउमारद्धो जुगप्पहाणाहि
धाराहिं सत्तरत्ते वुढे चिंतेति-विरायो होहित्ति ठिमो ।
पाणिए ओसरिए इतरो मिसिमिसिंतो उन्जलतरो जातो
भणति-जोहारोत्ति । ताहे मेहो लजितो गतो।।
एवं चेव कोइ सीसो मुग्गसेलसमाणो एगमवि पदं ण
लग्गति, अण्णो आयरिश्रो गर्जतो आगतो, अहं णं गाहेमिति।
(आह-आचार्यस्यैव राजाज्यं, यच्छिष्यो नावबुध्यते
गावो गोपालकेनेव, कुतीर्थनावतारिताः ॥११)
ताहे पढावेउमारद्धो ण सकियो, लजिओ गो।
15
20
( ३८)

भरह-बाहुबलिजुद्धम् . 5 कुमारेसु पव्वइएसु भरहेण बाहुबलिणो दूझो पेसिओ । सोते पव्वइए सोउं प्रासुरुत्तो, ते बाला तुमए पयाविमा, अहं पुण जुद्धसमत्थो, ता एहि, किं वा ममंमि अजिए भरहे तुमे जिति । ततो सव्वबलेण दोवि मिलिया देसंते । बाहुबलिणा भणिनं-किं अशवराहिणा लोगेण मारि- एणं ? तुमं च अहं च दुवेऽवि जुज्झामो । एवं होउत्ति। तेसिं पढमं दिद्विजुद्धं जायं, तत्थ भरहो पराजिनो, पच्छा वायाए, तत्थ वि भरहो पराइझो, एवं बाहाजुद्धेण पराजिभो मुट्ठिजुद्धेऽवि पराजियो, दंडजुद्धेवि जिप्पमाणो 10 भरहो चिंतियाइओ-कि एसेव चक्की ? जेणाई दुब्बलोत्ति, तस्स एवं चिंतंतस्स देवयाए भाउहं दिण्णं चक्करयणं. ताहे सो तेणं गहिएणं पहावियो । इओ वाहुबलिणा दिहो, गहियदिन्नरयणो आगो, सगच्वं चिंतियं चाणण-सममेएण भजामि एयं, किं पुण तुच्छाण 15 कामभोगाण कारणा भट्ठनियपइण्णं एयं मम वावाइरं न जुत्तं, सोहणं मे भाउगेहिं अणुद्दिशं । महमवि तमणुढामित्ति चिंतिऊण भणियं चाणण-धिसि धिसि पुरिसत्तणं ते मह- म्मजुद्धपवत्तस्स अलं मे भोगेहिं, गेहाहि रजं, पञ्चयामित्ति, सकदंडो पवमो। , 20 (३९) - 5 , भरहेण बाहुबलिस पुत्तो रहे उविनो। वाहुवली विचितेइ-तायससीचे भाउणो मे लहुयरा समुप्पण्शनाणाइसया, ते किह निरइसरो पिच्छामि । " एत्थेव ताव अच्छामि जाव केवल नाणं समुप्पण्णं ति," । एवं सो पडिमं ठिओ, माणपध्वय सिहरे । जाणइ सामी तहवि न पट्टवेइ, अमूढलक्खा तित्थयरा । ताहे संवच्छरं अच्छइ, काउत्सग्गणं, वल्लीविता- णणं वेदिओ, पाया य वम्मीयनिग्गएहिं सुयंगेहिं । पुणे ये संवच्छरे भगवं बंभीसुंदरीमो पट्टवेइ, पुब्धि न पट्ठविचा, जेण तया सम्म न पडिवाइत्ति, ताहि सो सरगतीहिं वल्लीतणवे- 10 दियो दिट्ठो, परूढणं महल्लेणं कुच्चेणंति, तं ददुण वंदिओ, इमं च भणियं-तानो प्राणवेइ "न किर हत्थिविलग्गस्स केवल- नाणं समुपपज्जत्ति" भणिऊणं गयायो । ताहे पचिंतितो -कहिं एत्थ हत्थी,'' तोश्रो अलियं न भणति, ततो चिंततेण णायं 15 जहा-माणहस्थित्ति । को य मम माणो १, वच्चामि भगवंतं वंदामि ते य साहुणोत्त, पादे उक्खित्ते केवलनाणं समुप्पण्णं, ताहे गंतूण केवलिपरिसाए ठियो। ताहे भरहोऽवि रज्ज झुंजइ । . (४०

मेअंजरिसिचरियम्.
अण्णया सो माइसवत्तिं मणइ-गेण्ह रज्ज, पुत्ताण ते
भवउत्ति, अहं पव्वयामि । सा णेच्छइ, एएण रजं वायत्तंति ।
तो सा अतिजापनिजाणेसु रायलच्छीए दिप्पंतं
पासिऊण चिंतेइ-मए पुत्ताण एजं दिजंतं ण इच्छियं, तेवि एवं 5
सोभन्ता, इयाणी वि णं मारेमि । छिद्दाणि मग्गइ । सो य
छूहालू, तेण सूतस्स संदेसओ दिण्णो, एत्तो चेव पुव्वण्हियं
पढविजासि, जइ विरामि । सूएण सीहकेसरो मोदओ
चेडीए हत्थेण विसजिओ। पियदसणाए दिहो। भणइ-पेच्छामि
णं ति । तीए अप्पितो। पुव्यं णाए विसमक्खिया हत्था कया, 10
तेहिं सो विसेण मक्खियो। पच्छा भणइ-अहो ! सुरभी
मोयगोत्ति पडिअप्पियो। चेडीए ताए गंतूण रणो समपिओ।
ते य दोवि कुमारा रायसगासे अच्छंति । तेण चितियं-
किह अहं एतेहिं छुहाइएहिं खाइस्सं ? । तेण दुहा काऊण तेर्सि
दोण्हवि सो दिण्णो । ते खाइउमारद्धा, जाव विसवेगा आगंतुं 15
पव्वत्ता।
राइणा संभंतेण वेजा सहाविता। सुवण्णं पाइया, सज्जा
जाया । पच्छा दासी सद्दाधिया, पुच्छिया भण्इ-ण केण वि
(४१)

,
दिहो, णवरं एयाणं मायाए परामुट्ठो। सा सहाविया भणिया-
पावे ! तदा णेच्छसि रजं दिर्जत, इयाणिमिमिणाहं ते
अकयपरलोयसंबलो संसारे छूढो होतोत्ति तोसि रजं दाऊण
पबहनो।
अण्णया संघाडओ साहूण उजेणीओ आगो । सो ।
पुच्छिो-तत्थ णिरुवसग्गं? । ते भणंति-वरं रायपुत्तो पुरो-
हियपुत्तो य वाहिन्ति पासंडत्थे साहूणो य । सो गओ अमरि-
सेणं तत्थ | विस्सामिश्रो साहूहि, ते य संभोइया साहू,
भिक्खावेलाए मणिो-प्राणिजउ । भणइ--अत्तलाभित्रो अहं, 10
णवरं ठवणकुलाणि साहह । तेहिं से चेल्लो दिण्णो, सो तं
पुरोहियघरं दंसित्ता पडिगो । इमोवि तत्थेव पइटो वडवड्डेणं
सद्देणं धम्मलाइ। अंतउरियामओ निग्गयाओ हाहाकारं करें-
तीओ । सो वड्डवडेणं सद्देणं भणइ-किं एयं साविएत्ति । ते
णिग्गया बाहिं वारं बंधंति । पच्छा भणंति-भगवं ! पणचसु। 15
सो पडिग्गहं ठवेऊण पणचित्रओ। ते ण याणंति वाए।
भणंति-जुज्झामो दोवि एकसरा ते आगया, मम्मेहिं आहया,
जहा जंताणि तहा खलखलाविश्रा ! तो णिसिढ़ हणिऊण
वाराणि उग्धाडिता गयो, उजाणे अच्छति। राइणो कहियं,
तेण मग्गावियो। साहू अणंति-पाहूणो आगो, ण 20
याणामो। गोसंतेहिं उजाणे दिट्ठो, राया गो खामिओय।
णेच्छइ मोर्चे, जइ पव्वयंति तो मुयामि । ताहे पुच्छिया, पडि-
सुयं । एगत्थ गहाय चालिया जहा सहाणे ठिया संघिणो लोय
काऊण पच्चाविया, रायपुचो सम्मं करेति मम पित्तियत्तो त्ति ।
पुरोहियसुयो दुगंछह-भम्हे एएण कवडेण पन्नाविया ।
Y
25
(४२)

दोवि मरिऊण देवलोगं गया, संगारं करति-जो पढमं चयइ तेण सो संबोहेयव्यो। पुरोहियसुओ चइऊण तोए दुगुंछाए रायगिहे मेईए पोट्टे आगो, तीसे सिद्विणो वयंसिया। सा किह जाया सा मंसं विकिणइ। ताए भण्णइ, मा अण्णत्थ हिंडाहि, अहं सव्वं किणामि। दिवसे २ प्राणेइ । एवं तासि पीई घणा 5 जाया । तेसिं चेव घरस्स समोसीइयाणि ठियाणि । सा य सेट्टिणी णींदू । ताहे मेइए रहस्सियं चेव तीसे पुत्तो दिण्णो । सेहिणीए धूया मइया जाया, सा मेईए गहिया। पच्छा सा से- द्विणी तं दारगं मेइए पाएसु पाडेति, तुम पभावण जीव- उत्ति। तेण से नामं . कयं मेयजोत्ति । संवडिओ, कलाओ 10 गाहिओ । संवोहिओ देवेण, ण संबुज्झइ । ताहे अढण्हं इन्भ- कण्णगाणं एगदिवसेण पाणी गेण्डाविश्रो, सिभियाए णगरि हिंडइ, देवोवि मेयं अणुपविट्ठो रोइउमारद्धो-जइ ममवि धूया जीवंतिया तीसेवि अज विवाहो को होतो, भत्तं च मेताण कयं होतं। ताहे ताए मेईए जहावत्तं सिटुं, तो रुट्ठो, देवाणु- 15 भावेण य तामो सिवियाओ पाडिओ, तुम असरिसीओ परि- णेसित्ति खड्डार छूढो । ताहे देवो भणइ-किह १ । सो भणइ- अवण्णो । भणइ-एत्तो मोएहि किंचिकालं, अच्छामि बारस वरिसाणि । तो भणइ-किं करेमि ?। भणइ-रण्णो धूयं दवावेहि, तो सव्वाश्रो अकिरियानो ओहाडियारो भविस्संति । 20 ताहे से छगलो दिण्णो। सो रयणाणि वोसिरह, तेण रयणाण थालं भरियं । तेण पिया भणियो-रण्णो धूयं वरेहि । रयणाणं थालं भरेत्ता गओ। किं मग्गसि ?, धृयं । णिच्छूढो । एवं थालं दिवसे २ गेण्हइ, ण य देइ । अभयो भणइ-कमो रयणाणि । सो भणइ-छगलो हगइ । सम्हवि 25 (४३) . 1 दिजउ । आणीओ, मडगगधाणि वोसिरह । अमनो भणइ- देवाणुभावो । किं पुण ?, परिक्खिजउ, किह ?, भणइ-राया दुक्खं वेन्मारपचतं सामि चंदो जाति, रहमग्गं करेहि । सो कमो। अञ्जवि दीसह । भणियो-पागारं सोवणं करोहि, कमओ। पुणोवि भणिो-जइ समुदं आणेसि, तत्थ ण्हारो सुद्धो होहिसि, तो ते दाहामो । आणीमो, वेलाए पहावियो । विवाहो को सिविचार हिंडतेण, ताोवि से अण्णाओ प्राणियायो। एवं भोगे भुंजंति वारसमरिसाणि । पच्छा बोहितो । 10 महिलाहि वि वारस वरिपाणि माग्गियाण, दिण्णासि य। चउच्चीसाए वासेहिं सवाणिवि पन्चयाणि । णवपूच्ची जाभो । एकल्लविहारपडिमं पहिययो, तत्थेव रायगिहे हिंडइ, सुवण्णकारगिहमागयो। सो सेणियस्स सोवण्णिवाणं जवाणमट्ठसतं करेइ, 15 चेइयच्चणियाए परिवाडिए सणिो कारेइ तिसंझं । तस्स गिहं साहू अइगो । तस्स एगाए वायाए मिक्खा ण णीणिया । सो य अइगो। ते य जवा कोंचएण खाइया । सो आगो ण पेच्छइ । रण्णो य चेतियच्चणियवेला ढुक्कइ । अज अद्विखंडाणि कीरामित्ति, साधु संकइ, पुच्छइ, 20 तुहिको अच्छह । ताहे सीसावेढेण बंधति । मणिमो य- साह जेण गहिया । तहा आवेढिो जहा अच्छीणि भूमीए (४८)

पडियाणि । कोचो य दारुं फोडें तेण सिलिकाए श्राहलो
गलए, तेण वन्ता । लोगो भणइ-पाय ! एए ते जवा ।
सोवि भगवं कालगो, सिद्धो य ।
लोगो आगो, दिवो मेतजो। रण्णो कहियं, वज्झाणि
माणत्ताणि। दारं ठइत्ता पव्वयाणि भणंति-सावग ! धस्मेण 5
चड्ढाहि, मुक्काणि । भणए-जइ उप्पचयह तो भे कविल्लीए कड्डेमि।
एवं समइयं अप्पए य परे य कायध्वं ।
( तथा च कथानकाथैकदेशाप्रतिपादनायाह )-
जो कोंचगावराहे, पाविदया कोंचगं तु णाइक्खे ।
जीवियमणपेहंतं, मेयजरिसिं णमंसागि ॥ ८६६ ॥ 10
ངང་
(१५)

तेतलिपुत्तचरियम् .
5
-
10
तेतलिपुरणयरे कणगरहो राया, पउमाई देवी । राया
भोगलोलो जाते २ पुत्ते वियंगेइ ।
तेतलिसुयो अमच्चो, कलाश्रो पूसियारसेट्ठी, तस्स
धूया पोट्टिला आगासतलगे दिट्ठा, मग्गिया, लद्धा य ।
अमच्चो य एगते पउमावईय भण्णइ-एर्ग कहवि कुमार
सारक्खह, तो तब य मम य भिक्खाभायणं भविस्सइ ति ।
मम उयरे पुत्तो, एयं रहस्सगयं सारक्खेमो। संपत्ती य, पोट्टिला
देवी य समं चेव पसूया । पोट्टिलाए दारिया देवीए दिण्णा,
कुमारो पोट्टिलाए । सो संबड्डइ, कलाओ य गेण्हइ ।
अण्णया पोट्टिला अणिट्ठा जाया, णाममविण गेण्हइ ।
अण्णया पब्वइयाओ पुच्छह-अस्थि किंचि जाणह, जेणं
अहं पिया होजा। तानो भणंति-ण वह एयं कहेउं । धम्मो
कहिओ, संवेगमावण्णा । आपुच्छइ-पव्वयामि । भणइ-जइ
संवोहेसि । ताए पडिस्सुयं । सामण्णं काउं देवलोगं गया ।
सो राया मम्रो । ताहे पउरस्स दंसेइ कुमारं, रहस्सं
च भिंदह, ताहे सोऽभिसित्तो।
कुमारं माया भणइ-तेतलिसुयस्स सुटु वढेजाहि, तस्स
पहावेण तं सि राया जाओ।
15
( ४६ )

.
.
तस्स णाम कणगज्झनो।
ताहे सव्वट्ठाणेसु अमच्चो ठविभो ।
देवो तं वोहेइ, ण संबुज्झइ । ताहे रायाणगं विपरिणा-
मेइ । जो जो ठाइ तो तमो राया परमुहो ठाइ । मीओ
घरमागो, सोऽवि परियणो णाढाइ, सुझुतरं भीो। ताहे ताल- 5
पुडं विसं खाइ, ण मरइ । कंको असी खंधे णिसियो, ण छिदइ।
उब्बंधइ, रज्जु छिदइ, पाहाणं गलए बंपित्ता अत्थाहं पाणियं
पविट्ठो, तत्थवि थाहो जाओ । ताहे तण कूडे अरिंग काउं
पविट्ठो, तत्थवि ण डज्झइ ।
ताहे गणयरामो णिफिडइ, जाव पिटुःो हत्थी धाडे 10
पुरओ पवातखड्डा, दुल्झो अचक्खुफासे मज्झे सराणि
पतंति ।
तत्थ ठिो। ताहे भणइ-हा पोट्टिले साविगे २ जइ
णित्थारेजा, आउसो पोट्टिले ! कओ वयामो ? । ते आला-
वगे भणइ जहा तेतलिणाते ॥
ताहे सा भणइ-भीयस्स खलु भो पयजा। पालावगा।
तं दट्टण संवुद्धो भणइ-रायाणं उवसामेहि, मा भणि
हि त्ति-रुट्ठो पव्वइयो । ताहे साहरियं जाव समततो मगि-
जइ । रण्णो कहियं, सहमायाए णिग्गसो खामेत्ता पवेसियो ।
निकखमणसिवियाए णीणिो, पवइमो ।।
तेण दढं आवइगहिएणाधि पचक्खाणे समया कया ।।
15
20
(७)

जमदग्गि-परसुरामचरियम. , 10 वसंतपुरे णयरे उच्छन्नवंसो एगो दारगो देसंतरं संक- ममाणो सत्थेण उज्झिो तावसपल्लिं गओ, तस्स नाम अग्गियो ति । तावण संवड्डियो, जमो नामं सो तावसो, जमस्स पुत्तोत्ति जमदग्गिो जाभो । सो घोरं तवचरणं करेइ, 5 विक्खायो जाओ। इओ य दो देवा, वेसाणरो सड्डो, धनतरी तावसभत्तो। ते दोवि परोप्परं पनवेति, भणंति य-साहुतावसे परिक्खामो। आह सड्ढो-जो अम्हं सच्चअंतिगो तुभ य सबप्प- हाणो ते परिक्खामो। इश्रो य मिहिलाए णयरीए तरुणधम्मो पउमरहो राया, सो चंपं वच्चइ वासुपुजसामिस्त पामूलं पधयामित्ति । तेहिं सो परिक्खिज्जइ भत्तेणं पाणेण य, पंथे य विसमे सो सुकुमालमो दुक्खाविजइ, अणुलोमे य से उचसग्गे करिति । सो धणिय- तराग थिरो जाओ, सो तेहिं न खोभित्रो । अन्ने भणंति-सावनो भचपचक्खाइओ । ते सिद्धपुत्तरू- वेणं गया, अइसए साहिति, भणंति य-मा इमं करेहि जहा चिरं जीवियन्वं । सो भणइ-बहुओ मे धम्मो होहीति,न सक्को खोभेउं । गया जमदग्गिस्स मूलं । सउण रूवाणि कयाणि । कुच्चे से घरभो कमओ । सउणमो भणइ-"भद्दे ! जामि हिमवत," सा 20 , 15 (४८) . 10 . न देह "मा ण एहिसित्ति" । सो सवहे करेइ-गोपायकाई जहा एमित्ति । सा भणइ-न एएहिं पत्तियामित्ति, जइ एयस्स रिसिस्स दुक्कियं पियसित्ति, तो ते विसजेमि । सो रुट्ठो, तेण दोवि दोहिंवि हत्थेहिं गहियाणि । पुच्छियाणि भणंति-मह- रिसि ! अणवचो सित्ति । सो भणइ-सञ्चयं । खोभियो । एवं सो सावगो जाओ देवो । इमोऽवि ताओ आयावणाउ प्रोत्तिन्नो मिगकोद्वगं णयरं जाइ । तत्थ जियसत्तू राया, सो उडिओ-किं देमि ?, धूयं देहित्ति । तस्स धूयासयं । जा तुम इच्छइ सा तुज्झत्ति । कनतेउरं गओ, ताहिं दट्टण निच्छूढं ,न लजिसित्ति भणियो। 10 तामो खुजीकयाओ । तत्थेगा रेणुएणं रमइ तस्स धूया, तीए णेणं फलं पणामियं, इच्छसित्ति य भणिया। तीए हत्थो पता- रिओ, निजंतीए उवट्ठियारो खुजाओ, सालियरूवए देहि, ताओ अखुजामो कयाओ । कन्नकुजं नयरं संवुत्तं । इयरी वि णीया श्रासमं । सगोमाहिसो परियणो दिनो, संवड्डिया, 15 जोवण पत्ता जाहे जाया ताहे विवाहधम्मो जायो । अण्णया उर्दुमि जमदग्गिणा भणिया-अहं ते चरुगं साहेमि, जेणं ते पुत्तो बंभणस्स पहाणो होहिति । तीए भणियं-एवं कजउत्ति। मज्झ य भगिणी हस्थि- णापुरे अणंतवीरियस भजा, तीसेऽवि साहेहि खत्तियचरु- 20 गति । तेण साहियो। सा चिंतेइ-अहं ताव अडविमिगी जाया, मा मम पुत्तो वि एवं नासउत्ति तीए सत्तियचरू जिमिओ । इयरीए इयरो पेसिभो। दोण्हवि पुत्ता जाया । तावसीए रामो, इयरीए कत्तवीरिमो । सो रामो तत्थ संवइ । , , 25 (४९) . 5 , अन्नया एगो विजाहरो तत्थ समोसढो, तत्थ एसो पडिलग्गो, तेण सो पडिचरिमो, तेण से 'परसुविञ्जा' दिण्णा, सरवणे साहिया । अण्णे भणंति-जमदग्गिस्स परंपरागयत्ति परसुविजा, सा रामो पाढियोति । सा रेणुगा भगिणीघरं गयत्ति, तेण रण्णा समं संप- लग्गा । तेण से पुत्तो जाओ, सपुत्ता जमदग्गिणा आणिया, रुद्यो । सा रामेण सपुत्तिया मारिया । सो य किर तत्थेव इसुसत्थं सिक्खिो । तीसे भागणीए सुयं, रण्णो कहियं, सो आगो, आसमं विणासित्ता गावीए घेत्तूर्ण पहाविमो । 10 रामस्स कहियं, तेण पहाविऊण परसुणा मारियो । कत्तवीरित्रो य राया जाओ, तस्स देवी तारा । अन्नया से पिउमरणं 'कहिय, तेण आगएणं जमदग्गी मारिओ । रामस्स कहियं, तेणागएणं जलतेणं परसुणा कत्तवीरित्रो मारियो । सयं चेव रज-पडिवन्न। इयो य सा तारा देवी तेण संभमेण पलायंती ताव- 'सासमं गया, पडियो से मुहेणं गम्भो। नाम कयं सुभृमो । रामस्स परसू जहि २ खत्तियं पेच्छइ तहिं तहिं जलइ । अत्रया तावसासमस्स पासणं वीईवयइ, परसू पञ्जलिओ । तावसा भणंति-यम्हे ञ्चिय खत्तिया। तेण रामेण सत्त वारा निक्खत्ता पुहवी कया, हणूणं थालं भरियं। एवं किर रामेणं कोहेणं खतिया बहिया । 15 20 (५०) चाणक-कहाणगम. गोलविसए चणयग्गामो, तत्थ य चणगो माहणो, सो य सावओ । तस्स घरे साहू ठिया । पुत्तो से जाओ सह दाढाहिं, साहूण पाएसु पादिमो, कहियं च-राया भविस्म- इत्ति । मा दुग्गइं जाइस्सइत्ति दंता घटा । पुणोऽवि आयरि-5 याणं कहियं । भाइ-किं कजउ ? एत्ता विवंतरिओ भविस्मइ । उम्मुक्कचालभावेण चोद्दस विजाटाणाणि श्रागमियाशि, सो य सावो संतुट्ठो। एगारो भद्दमाहणकुलामो भजा से भाणिया । अण्णया कम्हिवि कोउते माइघरं भजा से गया । केइ भणंति-भाइविवाहे गया । तीसे र भगिणीओ 10 मण्णेसिं खद्धादाणियाणं दिण्णेचियाओ । ताओ अलंकियवि- हूसियानो भागयाओ, सब्योऽपि परियणो ताहि समं संलव- एति । सा एगते अच्छा, अद्धिई जाया, घरं आगया ससोगा । निबंधे सिटुं । तेण चिंतियं-नंदो पाडलिपुत्ते देइ, तत्थ बच्चामि । तमो कत्तियपुण्णिमाए पुषण्णत्थे श्रासणे पढ में णिसण्णो, तं च तस्स सल्लीपतियस्स सया ठविजइ । सिद्धपृत्तो य देण समं तत्थ श्रागयो । भणह-एस भणो गंदसरस छायं अकमिऊण ठिो । भणि सो दासीए-भगवं ! बितीए पासणे णिवेसाहि । अत्थु, तितिए भासणे कुंडियं ठवेह, एवं 20 15 ( ५१ )

ततिए दंडयं, चउत्थे गणित्तियं, पंचमे जण्णोवइयं, धिट्ठोत्ति
निच्छूढो ।
पायो उक्खित्तो । अण्णया य भणइ-~
(कोशेन भृत्यैश्च निवद्धमूलं, पुत्रैश्च मित्रैश्च विवृद्धशाखम्।
उत्पाख्य नन्दं परिवर्तयामि, महाद्रुमं वायुरिवोप्रवेगः।।१।)
निग्गओ मग्गइ पुरिसं, सुयं चणेण वितरिओ रामो
होहामित्ति । नंदस्स मोरपोसगा, तेसिं गाम गमो
परिवायगलिंगणं ।
तेसिं च महत्तरधूयाए चंदपियणे दोहलो । सो समुदा-
णितो गयो । पुच्छति, सो भणइ-जइ इमं मे दारगं देह तो 10
णं पाएमि चंदं । पडिसुणति, पडमंडवे कए तद्दिवसं पुण्णिमा,
मझे छिडं कयं, मझगए चंदे सचरसालहिं दव्वेहि
संजोएत्ता दुद्धस्स थालं भरियं । सद्दाविया पेच्छइ पिवइ य ।
उवरिं पुरिसो अच्छाडेइ । अवणीए जानो पुत्तो, चंदगुत्तो
से नामं कयं । सोऽवि ताव संवड्वइ, चाणको व धाउविलाणि 15
मग्गइ । सो य दारगेहिं समं रमइ रायणीईए, विभासा,
चाणको पडिएइ, पेच्छइ । तेणवि मग्गिो-अम्हवि दिजउ ।
मणइ-गावीओ लएहि, मा मारेजा कोई । भणइ-चीरभोजा
पुची । णात जहा विष्णाणपि से अस्थि । पुच्छिनो-कस्सति।
दारएहिं कहियं-परिचायगपत्तो एसो । अहं सो परिवायगो । 20
जामु जा ते रायाणं करेमि, पलामो, लोगो मिलिमो,
पाडलिवृत्तं रोहियं ।
,
(५२)

, शंदेण भग्गो परिशयगो, भासेहिं पिट्टीओ लग्गो। चंदगुत्तो पउमसरे निब्बुडो, ( इमो उपस्पृशति ) सण्णाए भणइ-चोलीणोति। अन्ने भणन्ति-चंदगुत्तं पउमिणीसरे छुभिः ता रयो जाओ। पच्छा एगेग जच्चवल्हीककिसोरगएण पासवारेण पुच्छिो भणइ-एस पउमसरे निविट्ठो। तो आ- 5 सवारेण दिहो । तोऽणेण घोडगो चाणकस्स अल्लितो, खग्गं मुक्क, जाव निगुडिउं जलोयरणद्वयाए कंचुगं मिल्लइ, तावणेण खगगं घेतूण दुहा को । पच्छा चंदगुत्तो हक्कारिय चडाविभो, पुणो पलाया । पुच्छिोऽणेण चंदगुत्तो-जं वेलं तं सि सिट्ठो तं वेलं किं तुमे चिंतियं ? तेण भणियं-धुर्व एवमेव 10 सोहणं भवइ, भजो चेव जाणइत्ति । तमोऽणेण चिंतियं-जोग्गो एस, न विपरिणमइति । पच्छा चंदगुचो छुहाइयो । चाणको तं ठवेत्ता भत्तस्स अगओ, बीहेइ य-मा एस्थ नजेजा,मोडोडस्स बाहिं निग्गयस्स पोट्ट फालियं, दहिकूरं गहाय गयो । जिमियो दारो। अण्णया अण्णस्थ गामे रत्ति समुयाणेइ, थेरीए पुत्तगर्म- डाणं विलेवी वट्टिया। एक्कण मज्झे हत्थो छूढो, दड्डो, रोवइ । ताए भण्णइ-चाणक्कमंगलयं । पुच्छियं, भणइ-पासाणि पढमं घेप्पंति । गया हिमवंतकडं, पन्चाइयो राया, तेण समं मित्तया जाया। भणइ-समं समेण विमजामो रजं । उपर्वताणं एगत्थ 20 खयर न पडइ, पविट्ठो तिदंडी, वत्धुणि जोएइ, इंदकुमारियायो दिवाओ । तासि तण एण ण पडइ, मायाए णीणावियाओ, परियं जयरं। पाडलिपुत्तं रोहियं, नंदो धम्मवारं मग्गड, एगेण रहेण जंतरसि तं नीयाहि । दो मजाओ एगा कण्णा दव्वं च 25 15 ( ५३ ) . . गीणेई । कण्णा चंदगुत्तं पत्नोएड, भमिया जाहित्ति । ताहे विलग्गंतीए चंदगुत्तरहे णव अरमा भग्गा। तिदंडी भणइ-मा वारेहि, नवपुरिसजुगाणि तुझ वंसो होहिचि अइयो, दोभाकियं रजं। एगा कण्णगा विसभाविया, तत्थ पन्चयगस्स इच्छा । जाया, सा तस्स दिण्णा। अपिगपरियंचणे विसपरिगमो मरि- उमारद्धो भणइ-वयंस ! मरिआइ ! चंदगुत्तो रुमामिति वच- सिनो, चाणक्केण भिउडी कया, णियत्तो । दोवि रआणि तस्स जायाणि । नंदमणुमा चोरियाए जीवंति, चोरग्गाई मग्गइ । 10 तिदंडी बाहिरियाए नलदामं मुइंगमारणे दटुं प्रागो, रण्णा सद्दाविओं, आरक्खं दिण्णं । बीसत्था कया, भत्तदाणेण सक- हुंचा मारिया । आणाए-चंसीहिं अंबगा परिक्खित्ता, विवरीए सट्टो, पनीविओ सन्चो गामो तेहिं गामील्लएहिं कप्पडिया मत्तं न दिण्णं ति काउं। कोसनिमित्तं पारिणामिया बुद्धी-जूयं रमइ कूडपास- एहिं । सोवणे थालं दीणाराणं भरियं, जो जिणइ तस्स एवं अहं जिणामि एगो दीवारो दाययो । भइचिरं वि अन्नं उवायं चिंतेइ । णागराण भत्त्रं देइ मजपाणं च । मत्तेसु पणच्चियो, भाइ-"दो मज्झ धाउरत्ता कंचरण- 20 कुंडिया तिदंडं च रायावि य बसवची, एत्थवि ता मे होलं वाएहिं अण्णो असहमाणो भणति-गयपोययस्स मत्तस्स उप्पझ्यस्स जोअणसहस्सं पए पए सयसहस्सं, एत्थवि ता मे होलं वाएहिं । 15 9 23 (५४ ) 5 अण्णो भाइ-तिलमाढयस्स वुत्तस्स निप्फण्णस्से बहुसइयस्स तिले तिले सयसहस्सं, ता मे होलं वाएहिं । अण्णो भणइ-नवपाउसंमि पुण्णाए गिरिणईयाए सिम्यवेगाए एमाहमहियमेत्तेण नवणीएण पालि बंधामि, एत्थवि ता मे होलं वाएहि । अन्नो भणइ-जचाण नवकिसोराण तद्दिवसेण जाय- मेत्ताण केसेहिं नहं छाएमि, एत्थवि ता मे होलं वाएहि । अन्नो भणइ-दो मज्झ अस्थि रयणा सालि पमई य गद्दभिया य छिन्ना छिन्नावि रुहंति, एत्थवि ता मे होलं वाएहि । अन्नो भणइ-सयसुकिल निचसुयंधो भन्ज अणुव्वय नत्थि पवासो निरिणो य दुपंचसओ, एत्थवि ता मे होलं . वाएहिं । एवं णाऊण रयणाणि मग्गिऊण कोद्वाराणि सालीण भरियाणि । गद्दभियाए पुच्छिश्रो छिन्नाणि २ पुणो जायंति । 15 मासा एगदिवसजाया मग्गिया, एगदिवसियं णवणीयं । एस परिणामिया चाणकस्स बुद्धी । 10 संब-सुभाणूणं कीडायो. 10 संघ-भारणणं कथाइ सयाए कीलंताणं पणी (णि) यं समुप्पण्णं-जस्स सउणो विचित्तं वासति सो जिणति कोडिं ति। ठविया पासणगा। वितियदिवसे भाणुणा सुमो आणीभो, संघण सारिगा पज्जुएणगिहलालिया कंतसंजोइयसुहुमविवि- 5 हवण्णपिच्छच्छयणा एगदेसुट्टियरोमखयखारसेगा। सुगो पकड्डियो सि लोगजुयलं- सतेसु जायते सूरो, सहस्सेसु य पंडिओ । वत्ता सयसहस्सेसु, दाया जायति वा ण वा ।। इंदियाण जए सूरो, धम्म चरति पंडिओ। वत्ता सच्चचो होइ, दाया भूयहिए रमो ।। त्ति पाणउ सुओ ठिो। सारिया संवेणं चोइया- मयणे । भणसु तुमं किंचि सुभासियं । सा भणइ--- सव्वं गीयं बिलवियं, सव्यं नर्से विडंबियं । सम्वेआभरणा भारा, सब्वे कामा दुहावहा । ततो खारसित्ते पएसे छित्ता रसि उमारछा, भणइ य रासियावसाणे-देव ! को विमं पीलेइ, परित्तायसु, मरामि, मा में उक्ख । तिगिच्छगा सदाविजंतु लहुं ति, ते मे परिवाधापडि गारं करेंति, नेहि मे देविसमीवं । एचमाइ कलुणं विलवंती पुणो वि चोइया-सुंदरि ! अलं विसाएण, भणसु किंचि, ततो जं 20 वोच्छिसि तं सन्वं कीरइ । ततो भइ- 15 (५) ent - . उकामिव जोइमालिणि, सुभुयंगामिव पुफियं लतं । विषुधो जो कामवत्तिणिं, मुयई सो सुहिमो भविस्सइ ।। खारे छिका पुणो रसइ विलवइ य । पुणो मणिया- पढसु ताव किंचि । ततो भणति- न सुयणवयणं हि निहुरं, न दुरहिगंधवहं महुप्पलं । न जुवहहिययम्मि धीरया, न य निवतीसु य सोहियं थिरं ।। 'एवं सा विचित्तं वासई' त्ति जियं संवेण । 'सुमो सि- लोगजुयलमेव लवइ' त्ति पराजिओ, भोयणवेलाए य सदा- विभो सुभारणू रुद्धो ‘पणिए कोडिं देहि ति। सुयं सबभा. माए, कयं च कण्हस्स विदियं । पेसिओ कंचुकीमो संवं मणइ- 10 कुमार ! सुव्बउ, 'भारणू भुत्तभोयणो दाहिति' ति देवो माणवेइ । संबो भणति-जो सिणेहिभो सो दाऊण शं नेउ अथवा एस जाणइ जं कायव्वं । सुभारणू भएण ण वच्चइ, णिवेइयं कण्हस्स, दिण्णे विसजिओ । दुईता पूइया संवेण पियपुच्छगाण य दीणाणाहाण य दत्तं वित्तं । केसु वि दिवसेसु गतेसु पुणो माणू मणइ-संव ! होउ पणीयं । जस्स उकडा गंधा सो जिणइ दोनि कोडीउ । संवो मणह-भलं तुमे सह पणिएण, तुमं जिओ देवस्स कहेसि । सो भणइ-अंबाए कहियं देवस्स, न मया । ततो 'एवं होउ' त्ति कया सक्खी। संवेण चिंतिय-गंधजुत्तीसु माणू न 20 जिणिजा, देवसंतएहिं गंधेहिं सो विलिंपिजा, करोमि पाण- पडिलोमदब्बसंजोगं ति । ततो गेण पलंदु-लसुण-वेकड- हिंगणि छगलमुत्तेण सह रुहयाणि सरावसंपुडेण आणी- याणि । सुभाणू य पुन्चपविट्ठो समं सुरहिविलेवखो । पसंसिभो गंधविहायकसलेहिं । संवो य सभाद्वारे विलित्तो 26 15 - (५७) घाणपडिक्लेणं लसुणादिजोएण । तेण य गंधेण परब्माहतो सभागमो कुमारलोओ संवरियनकदुवारो समंतभो विपलानो- संबसामि ! भइउक्कडा गंधा, पसीय, विसजिजंतु, कुणह पसायं । तेण भणिया-भणह निन्वयणं । ते भणंति-जियं तुमे । भारणू भणइ-दुरहिगंधा एयस्स | संबेण भणियं-उक्क- डस्स पणियं, न य विसेसो सुभाऽसुमेसु कमो। पासणिएहिं संवपक्खो उक्खित्तो । जियो भाणू रुद्धो । देवीए रडंतीए वासुदेवस्स कहियं । तेण पेसिए ण मुक्को, दिण्णे विस- जिओ । संवेण परियणस्स दिण्णो विभत्तो भत्थो, दिण्णं दुईताण य । 10 द ( ५८ )

कंसस्स पुत्वभवो कण्हजम्मो य.
.
कंसेण य पगतीमो रंजेऊण वजहभावेण उग्गसेणो
बद्धो। तस्स य पियरम्मि पओसो पुच्चभविश्रो अइसयनाणिणा
साहुणा मे कहियो । सो किर अणंतरभवे चालतवस्सी
प्रासि । सो मासं मासं खममाणो महुरिपुरिमागतो । उहि- 5
याए मासं मासं गहेऊण पारेइ । पगासो जातो। उग्गसेणेण
य निमंतिभो-मझ गिहे भयक्ता पारेयव्वं । पारणकाले
वक्खित्तचित्तस्स वीसरियो । सो वि अण्णत्थ भुत्तो। एवं
रितिय-तइयपारणासु । सो पदुट्ठो ' उग्गसेणवहाय भवामि
त्ति कयनिदाणो कालगतो उवयण्णो उग्गसेणघरिणीए उयरे । 10
तिसे यतिसु मासेसु दोहलो राइणो उयरवलिमसे समु-
प्पण्यो। मंतीहि य सरसमंसवलीरयणाय वत्थे सवा करणे
य कए आलोए देवीए कप्पियानो बलीयो । तीसे उवणीया ।
उवभुजिऊण य विणीयडोहलाए कमेण य दंसियो उग्गसेणो ।
तीए य (ए) स गम्भे वडिओ असंसयं कुलविणासो' 15
त्ति जामो कंसमयीये मंजूसाए पक्खिवेउण जमुणाए पवाहियो
गहिओ सोरिएण रसवाणियगेण संवडियो य मम समीवे ।
मया य एवं कारणं मुणेऊण एस जायसतु उग्गसेणस्स
त्ति तस्स मोक्खे गा कमो पयत्तो।
कलायरिश्रो य संगहिरो कुमारे गाहेउ कला अणा- 20
(५९)

- हटिपमुहे। कंसेण वि णीश्रो सबहुमाणं महुरं सविहचो, विसेसेण से विणीओ मि होऊण । एवं मे वच्चइ कालो सूरसे- णभवण (वण ) संडेसु सपरिजमस्स । कयाई च कंसाणुमए पत्थिया मो मत्तिकावती देवग- स्स रण्णो धूयं वरेऊण देवई । अंतरा य नेमिनारदो दिहो । पुच्छिओ य-अज ! तुम्मेहिं दिठ्ठपुवा अवस्सं देवई रायक- ण्णा, कहेह मे तीसे विणय रूवाऽऽगमे । ततो भणइ-जाणामित्ति, सोम! सुणाहि-सा देवयाणं सरिसी होजा त्रवेण अंगविंदूपसत्थचक्खणकिण्णदेहबद्धा बंध- वजणणयणकुमुदचंदलेहा (नेहा)दिकलाविहाणं जुवइजणजो- 10 गकुसला लक्खणदुवखनिमत्तणिजरूवा पुहविपइमारिया जोग्गा जणवण्णणिज्जा विणीया । मया य भणिमो नारदो-अञ्ज! जह ते सा मह कहिया तहा ममं पि जहाभूयं कहेहि से । ' एवं ' ति य वोचूण उप्प- इयो । अम्हे वि सुदेहि वसहि-पायरासेहिं पत्ता मित्तियावर्ति 15 नयरिं, कंसेण य बहुप्पयारं जाइमो देवको राया कण्णं । ततो हेण परिगणेऊण सोहणे दिणे दिण्णा देवकी । वत्ते कन्लाणे रायाणुरुवाये इड्डीए दिण्णं च भारग्गसो सुवण्णं मणिणो य, महग्घा सयणा-ऽऽसणऽच्छायण-भायणविही य बहुविकप्पा, णिपुणपेसवग्गवंद (दं) बहुकदेसुब्भवं, गावीण 20 य कोडीणं गंदगोयवल्लहगोकुलं । ततो ससुराणुयाओ सुर- सरिसीए रिद्धीए निग्गतो मित्तियावइयो । नियत्तितो राया। कमेण पत्तो महुरं । पमोदे य वट्टमाणे कंसो ममं उवगमो पायवडियो विण्णवेइ-देव ! महं देह जे अहं जायामि । मया भणियं-देस, 25 (६०) , - . भणसु दुयं ति । ततो पहलमणसो कयंजली भणइ-देह मे देवईए सत्तगम्भे ति । ' तह ' त्ति मया पडिवण्णं । गते कंसे सुयं मया-अइमुत्तो किर कुमारसमको कंसपरिणीए जीवजसाये महुमत्ताये बाहिओ 'देवरो' त्ति चिरं । तेस भयवया सबिया-सक्खणे ! जीसे पगते पमु- दिता नबसि तीए सत्तमो सुतो होहिति तव पिउणो पतियो वहाय त्ति वोत्तूण अंतरहिओ गतो । कंसेण य सावभीएम सत्त गन्मा मग्गिमो ति । एवं नाम कीरउ जं सया पडिवण्हां सुद्धहियएण | एवं बच्चइ कालो। तस्थ देवकीय छसुवा मम वयणदोसेण कसेण 10 दुरप्पणा वहिया । कयाई च देवकी देवी सत्त महासुमिणे पासिचाणं महं कहेइ, जहा-मए सच सुमिणा दिठा । वसु. देवो भणति ( मया भणियं )-ता सुयणु ! एस ते सत्तमो पुत्तो होहिति जहानिदिछो अइमुत्तेण कंस-जरासंधविघाती, मुयसु विसायं अपूइवयणा धारणसमण ति । तीए पहट्टाए 15 ' एवं ' ति पडिस्सुयं । गएसु य केसु वि दिवसेसु वड्डमाणे गन्मे देवीए विण्णविओ समागयाहिं पच्छण्णं-अजउत्त ! कुणह पसायं, जत्तं कुणह देव ! सत्तमगमस्स एको विता मे जीवउ पुचो, जं एत्थ पापकं तं अम्हं होहिति ति। मया वि य तेसिं पडिवण्णं एवं करिस्सं, निन्चुया होहि, संयमत्ता 20 होहि ति। पसवणकाले य कंसनि उत्ता मयहरका दिन्नपहा- वेण सुणिसटुं पसुत्ता । तो जातो कुमारो कयजा. यकम्मो मया नीमो। समणे णखत्ते जोगमुवागए वासे य वासमाये देवया अदिलं छत्तं घरेइ, दिविका य उमभो 25 , ६१) पामे, समो वसद्दो पुरतो ठिनो । उग्गसेणण य पहाव- विम्दिए मणिो-वसुदेव ! कहिं इमं महन्मयं नेसि ? त्ति । मया य तस्स पतिवणणं-जहा होहिति - महन्मुयं तहा सि तुम अम्हं राया ण रहस्सभेदो कायन्बो चि । तो में जउणाणईयथाहे दिण्णे उत्तिण्णो मि । पचो । मि य वयं । तस्य नंदगोवस्स घरिणी य जसोया पुन्नयरं दारियं पश्या । अप्पियो ताए कुमारो। दारियं गहेउस तुरियं नियगभत्रणमागतो। देवइसमीचे य तं निक्सिविउस अवकता दुयं । सपरिचारियायो य पडिबुद्धाओ तंवेलं । निवेइयं कंसस्म । तेण तीसे पकडं विणासियं 'अलक्वणा 10 होट' चि। ' (६२) माहणसरूवं. . जो लोए बंभणो वुत्तो, अग्गी वा महियो नहा । सया कुसलसंदिहुँ, तं वयं वूम माहणं ॥ १६ ॥ जो न सजइ आगंतु, पन्चयंतो न सोभइ । रमए अजवयणंमि, तं वयं बूम माहणं ॥ २० ॥ जायरूवं जहामढे, निद्धंतमलपावगं । रागद्दोसभयाईयं, तं वयं वूम माहणं ॥ २१॥ [तवस्सियं किसं दन्तं, अवचिययं ससोणिअं सुम्बयं पत्तनिन्वाणं, तं वयं वूम माहणं ॥१॥] तसे पाणे वियाणित्ता, संगहेण य थावरे । जो न हिंसह तिविहेणं, तं वयं घूम माहणं |॥ २२ ॥ कोहा वा जइ वा हासा, लोहा वा जइ वा भया । सुसं न वयई जो उ, तं वयं बूम माहणं ॥ २३ ॥ चित्तमंतमचित्तं वा, भष्यं वा जइ वा बहुं । न गिण्हा भदत्तं जो, तं वयं बूम माहणं ॥ २४ ॥ दिवमाणुसतेरिच्छं, जो न सेवइ मेहुणं । मणसा काय वकेणं, तं वयं वृम माहणं ॥ २५॥ जहा पोउम जले जायं, नोवलिप्पह वारिणा । एवं मलितं कामेहिं, तं वयं चूम माहणं ॥ २६ ॥ (१) ॥ २७॥ ॥ २८ ॥ ॥ ३०॥ , अलोलुभ मुहाजीवी, अणगारं अकिंचणं । असंसत्तं गिहत्थेसु, तं वयं वूम माहणं जहिता पूच्चसंजोगं, नातिसंगे अबंधवे । जो न सज्जइ एएसु, तंवयं चूम माहणं नवि मुंडिएण समणो, न ॐकारेण भयो । न मुणी रणवासेणं, कुसचीरेण न तावसो समयाए समयो होइ, बंभचेरेण बंभयो । नाणेण य मुणी होई, तवेणं होई तावसो कम्मुणा बंभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तियो। कम्मुणा वइसो होइ, सुद्धो हवइ कम्मुणा ए ए पाउकरे बुद्धे, जेहिं होइ सियाणयो । सव्वसंगविणिमुक्क, तं वयं बूम माहणं एवं गुणसमाउत्ता, जे भवंति दिउत्तमा । जे समस्याउ उद्ध, परं अप्पाणमेव य इइ सम्मत्तो कहासंगहो. ॥ ३२ ॥ ॥ ३३ ॥ ॥ ३४ ॥ (१५

Prakrit Lakshanam

Author
Kavi,chand
Title
Prakrit Lakshanam
File name
Prakrit Lakshanam
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2010/04
Publisher
Gujarat,saha Mafatlal Manakchand,veeramgaown
Language
Sanskrit
Pages
79
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327470
Barcode
99999990003059.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
ePRdDx0EqAX
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