Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka-1 Adhyay Ka Bhag-2

Sahay, Jagrup · 2011/07

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। एगनिरासी जगरूपसहाय वझील फुत पच्छे और रिमत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका प्रदश हिंदी अनुवाद । अमाप १ च ८ परीव प्रति जघन्येनान्तहिन । उत्कण द्वे सागरोपमसहले देशाने ॥ चतुर्णामुपशमका नानाजीमा पेक्षया सामान्यरत् । एकनीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । उत्कग द्वे सांगरोपममहसे दशोने ॥ चतुर्गा शाकाणा सामान्योक्तम् ॥ अचक्षुर्दनिषु मिथ्यादृष्यादिक्षणिकषायान्ताना सामान्योक्तमन्तरम् ।। न अस्ति एकजीव प्रतिक जप येन : अन्तमा नहीं है एक जीप के लिये अपन्मकार अन्तर्मुहर्व । उत्कग | देशाने ॥ सागरोपमसहस्र उत्कटकार मन दो हजार सागर प्रमाण पताम् ! उपसमकानो । (पशुदर्शनराठों में) चार उपशममेपी अपूर्पकरण-अनिाचिकरण-मसाम्पराप (उपक्षातकपाय) पाठों का नाना-जीन अपेषमा : सामान्यपदक सअन्तर) अनेक जीवकी अपेवासे सक्षेप (में पूर्व उक्त गुणस्थान) मम है अर्थात जपन्य एक समय है उत्कृष्ट प्रयक्त (मन्म तीन भौर नौ) पर्यो (पु. २२४) एकजीव । प्रतिक जघन्पेन : अन्तर्मुहर्त -एक सीवके लिये (=प्रसि) बपत्यकारि अन्तमा उस्कम । देशोने सागरोपमसासे -उत्कृष्टकरि कुछ हीन दो सहस्र सागर प्रमाण है पतुः । सपका पर्दर्शनबाठों में) पार क्षफक प्रेमी मपूर्वकरण भनिाधिकरण मुहमसाम्पराम- (पीपकसाय)बालोंका सामान्फ्-उकम् ॥ (अन्तर) सक्षेप (प्रकरण में) वर्णित (गुणस्पानवत) है अर्थात नाना बीन की अपेक्षा अपन्य एकसमय है। उत्कृष्ट छैमास एकजीव प्रति अन्तरनी (पृ०२२५) पपईनिपु, मिथ्यारस्पिादि-खोनकमाय अचक्षुर्वर्शन वालों में मिथ्यारष्टि से (-मादि) वीणकपाय गुणस्पानवाने मन्तानो।। सामान्य उक्तम् । अन्तरम् । पर्यन्तनिका संक्षेप (प्रसंग में परिडे) प्रा हुवा (गुणस्थानक्त) अन्तर वर्वाद मिथ्याप्टी वचक्षुर्दनिवालीका अनेक बीवकी वपेषा से अन्तर नहीं है (1) मन पाळे आप और मन परे जीव भी प्रपम मिप्यारपि गुण यान से पीपस्य वारय गुणस्थानों में होते हैं। व R-KATऊन एटानिकासी गरुपमहाप यकीकृत परन्छे पौर विभत्सर्थ सहित सार्वसिद्धिका भन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याप एक पत्र ८ अवषिदर्शनिनाधारित निनत् ।। एक जीवके लिये अपन्न गर्व है उत्तर कुछघाटि एकसौ पचीस सागर प्रमाण है। अभक्षुदर्शनवासे सासादन सम्पष्टिका अन्तर नानाजीवकी अपेक्षासे जघन्य एक समय है उत्तम फस्पके असंख्यातलो माग है। एक जोका जवन्य पस्यो असमाना माग है । उस्कृष्ट का हीन बर्ष पुगलपरिवर्तन है । अपार्दनवाले मिश्रगुण- स्थानतिमाम नानानीयले अपेपासे बपन्य एक समय है। उत्कृष्ट परपके बसंसपात्यो माग है । एक मीवका जयप जई है उस्कृट उगीन अपुल परिवर्तन रे । अपार्दनवाले अविरत सम्पग्रटिस मेकर अप्रमन्च गुमस्थानतानिका नाना जीपकी अपेवासे अन्तर नहीं है एक मोपके लिये जवन्य अवर्मुहर्त है । उत्कृष्ट कुछ हीन अपुल परिवर्तन है ॥ अपानवासे पार उपशम श्रेणी (आठ-नामा-दना-म्पारहवा-गुणस्थान ) पालोंका अपर नानानीवकी ओदासे जक्न्य एक समय है उस्कृष्ट प्रपत्त वर्ष है। एक जीवके लिये जवन्य अन्तर्व है। उस्कृष्ट कुछ पाटि मईपुराल परिसान है। चार धाम यी (अर्सहरम आठमा अनिचिकरण नयनो समसाम्पराय दभमा तीनपाय बारहवा गुणस्थान) वालोमा नानाजीरको अपेवासे चपन्य एक समय है । उस्कृष्ट छर मास है एकजीवके लिये अन्तर नहीं है। परधि-दर्भनिन।। अवधि दर्शनबालोंका (विरहकात अर्थात अन्वर) अवपि गानिस्द० अवपिनानियों के समरे अर्याद अवधिदर्शन वाले (-अवधिज्ञानवाले) असंपत सम्यग्दृष्टीका नानाजीवकी अपेक्षासे अन्तर नहीं है। एकजीपके प्रति बपन्यकरि मन्तर्मुह है उस्कृष्टकर कुछ पाटि एक कोट पूर्व है ।। अवोध रश्नवाले संममा संयमीका अनेक प्रीकी अपेक्षासे यन्म नहीं है। शाजीवके लिये जवन्यकरि अन्तमुह रे उत्कृष्टकार (१) मतिमाान, सवमहाम, इमामशान मिरमपम, मामावन दूसर गुणस्य नाम हवा है। बिगुबरपानम तीन माल और मीनभान नीरमोर सम मिळे या परिपषी देसो) । अपिता और मषिवर्शन घोपेत वाat गुणस्थामसमोर मा पर्यपार पठेरो पारा गुपस्पान है।

Co एटानिलामी जगरूपसहाय पीस्कृत पदपथ्य और विमवस्यर्थ सरित सर्वार्थसिदिका शब्द हिंदी अनुपाद | वमाप १ स्त्र ८ केवलदर्शनिन क्वलज्ञानियत् ॥ (१०) लेश्यानुवादेन-कृष्णनील्कापोतलेश्येषु मिथ्यादृष्टयसयतसम्य ग्दृष्टयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । पछ अधिक न्यासठि सागर प्रमाम है ॥ (अयघि दर्शनवाले ) प्रमत्त और अप्रमच गुणस्थानववियोंका नाना भीव अपेवासे मन्तर नहीं है। एक जीपके लिये जपन्यकरि अन्तमा उत्कटकरि कुछ अधिक सेतीस सागर प्रमाण है। (भवधिदर्भनवाले या अवपिमानवासे ) चार उपशम श्रेणीवालोंका नानाजीव अपेक्षासे गुणस्थानवत है (यो पृष्ट २२४ के अनुकूल ) जघन्य ए समय है उत्कृष्ट तीन परससे ऊपर और नौ वर्षक नीचे (म्पयत्व वर्ष) एक श्रीवकी अपेक्षासे जघन्पकार अन्तर्मुहर्त है उस्कृष्टकरि कुछ अधिक छयासठि सागर प्रमाण है (अपधिदर्शनवालमि अवधिमानवामि) चार आपफ श्रेणीवालोंका अनेक जीवकी अपेक्षासे जघन्यकरि एक समम है उस्कृष्टकरि पपपस्व पप है। एक बीपकी अपेक्षासे अन्तर नहीं है। (देखो पृष्ठ २४७-२४८) केबलदर्भनिनः ।। केवलयानिषत् फेवल दर्शनमासोंका (वियोगकाल ) केवलनानी (सयोग केवली और अयोग केवली) सम्म है वर्षात् सयोगफेवलीका नानाबीच अपेक्षासे और एकधीव अपेक्षासे अन्तर नहीं है। अयोग- केवलियोंका नानाजीव अपेक्षासे जघन्यकरि एक समय है उस्कृष्टकरि छैमास में एक बीमकी अपेषासे इछ मी अन्तर नहीं है। (देखो पृष्ठ २२५) [१.] सेन्मा-अनुवादेन कृष्ण नील- सेश्याके कपनानुसारकरि कृष्य-नीस- कापोत-सेन्येषु । मिथ्यादृष्टि कापोत सेझ्यापारकों में मिथ्यादर्शन प्रथम गुणस्मानवाले और मसंपतसम्पन्दृष्टयोः ।। नाना-जीव असंयमी षा अविरत चौपे गुणस्थानवालोंके अनेक जीवकी अपेक्षयान अस्ति यन्तरम् ॥ अपेक्षासे बन्सर (भद विराकाल-वियोगकाल विछोहकाल) नहीं है (१) रुप मीत रापोव त्यापे मिथ्यात्वसे असक्त तक, पीव-पम खेश्याय मिप्यावसे अप्रमच गुणस्थान वक, शुक मिप्यात्वसे मांगी तक है।

स्टानिवासा बगरूपसहाय वाहत पाउदगार समास्यथ सात सवाघासारका सम्पशादा मनुवाद । बम्पाप १८ एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । उत्कण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि देशोनानि । सासादन सम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीव प्रति जघन्येन पल्यापमासख्येयभागो अन्तर्मुहर्तश्च । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि देशोनानि ॥ तेज पद्मलेश्ययोमिथ्याचसयत सम्यग्दृष्टपान नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । उत्कण द्वे सागरोपमे अठादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि ॥ एक पी । प्रतिवपन्न । अन्तमाः एकजीवके लिये जपन्मकार (अन्तर) अन्तर्मत है । उत्कन पसिधव ।। - उत्कृष्टकरि (सातवो नरफकी अपेक्षासे कुछ न्यून) देतीस (सागर प्रमाम) सप्तदश (समय सप्तदक्षत) और पांचवां नरककी अपेक्षासे कुछ हीन) सवह (सागर प्रमाण) सप्त ॥ (सप्त सत) सागरोपमाणि देशोनानि (और तीसरे नरककी विवक्षासे) कुम्याटि सात सागर के पराबर है प्रासादनसम्पाटष्टि-सम्पम्मिम्पारटपो. -(कृष्ण नील कापोत सेश्यावतियोम) सासादनसम्पगष्टी, मिभगुणस्थान वालोंका नाना-जी-अपेक्षमा सामान्प-पह (विरहकाल) अनेक जीव प्रति संक्षेप (प्रसंगमें पूर्व उक्त गुणम्पान) तुल्सरे, वर्षात जघन्य अन्तरकाश एक समय है उत्कृष्ट पल्पका असंस्मासना रमजीम प्रति जपन्पेन पल्मोपम-संस्पेस -एफजीवके लिये अपन्यकरि फ्ल्पके वसंख्याता गः । अन्तमासी । उत्प आग और जन्मा है । उत्कृष्टकरि (सातो नरफमें कुछ हीन) देतीस (सागर प्रमाप) बौर (पपियो नरक प्रति कुछ न्यून) सबर (सागर) -सागरोपमानि देशोनानि :॥ (तीसरे नरककी अपेक्षा से) कुछ घाटि सात सागर प्रमाण (किराफाल पापपलेश्पयो की मिष्याष्टि-मसंपक्सम्यग्दृष्टयोः पीत पञ्च-सेश्यावालों में मिध्यादृष्टि और अपिरतसम्पदृष्टियों में ना-भीम-अपेषया नअस्ति T अन्तरम् ॥ अनेक श्रीव की अपेक्षा से धन्सर काल नहीं है कभी । प्रतिवपन्पेन । मतमा । -एक जीव की अपेक्षा से अपन्यकरि अन्तमह है स्कन सागरोपमे ' स-अतिरेकापि m =उस्कृष्टकार दो सागर प्रमाण है । और (-घ) कुछ अधिक सागरोपमाणि -अठारह सागर प्रमाण है ॥ (१) रिपगि पृष्ठ १२१ पर रेवा ( रिमणि पठण पर देसो । (३) इस सर्व को समास मागकर मम्वमें समस्त पाप मपमा निर्माण गापन पकमिंग में है। (मागो पिसिंपत सावध । 1 महादश in पगनिवासी जगम्पसहाय वकीलकृत पदमोद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १८ सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिध्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया सामान्यवत् ॥ एकजीवं प्रति जघन्येन पल्पोपमा मम्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षण वे सागरोपमे अष्टादश च मागरोपमाणि सातिरेकाणि ॥ सयतासंयत प्रमत्ताप्रमत्तसयताना नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ॥ शुक्लश्येषु मिथ्यादृष्टयसंयत सम्यग्रष्टचोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एल्जीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त' । उत्कणेकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि ॥ सासादनसम्यग्दृष्टिसम्पदिमध्यादृष्टयो मासादन (पीच परस्तेश्यावतियों में ) सासादन मम्परष्टि सम्पग्मिच्यारएपो । सम्पमटीका और मिय (वीसरे) गुणस्थानमतियोंका (अन्तरकाल) नाना जीव अपेसया : सामान्प-वत् अनेक बीवकी अपेक्षासे संक्षेप (प्रसगमें पूर्व कषित गुणस्थान ) गत है अर्थात् अपन्म एक समय है उस्कृष्ट पस्यका असंस्म्यात माग है ( पृष्ठ २२३) एक मोव, प्रतिक जघन्पेन, फ्ल्योपम-असंस्पेय =एक बीपके लिये जघन्पकरि पस्योपमके असंस्पाया मागः प अन्तमुहूर्त' ।। उत्कर्षेण । दे॥ माग और (-च) अन्तर्मुहर्त है । उस्कृप्टकरि (कुछ अधिक) दो सागर मागरोपमः। घ सातिरकाणि अष्टादश ॥ सागर - प्रमाण और (कुछ अधिक) अठारह सागर उपमाणि संपतासंतप-प्रम- -प्रमाण है। (पीपपलेश्यावालों में) पेसंयमी, प्रमसंयमी और अप्रमत्त मेपताना . नाना-जीव-प्रपेक्षया : -अप्रमचसंयमियोंका नानामीन अपेक्षासे पएक-मी-अपेषयाः। न मस्ति । अन्तरम्।। -और एकधीवकी क्षिसासे अन्तर नहीं है अझलश्येप,। मिथ्यारष्टि-असंपतसम्पग्टयो।। -शुझसेश्यावालोम मिष्यादर्शनवाले और असंयमीसम्मम्दृष्टियोंका नाना-जीव अपेषरान अस्ति अन्तरम् ॥ एक--मनेकधीयकी विधासे पिराकाल (-अन्तरकाल) नहीं है। एक जीव, प्रति बघ पेन, अन्तर्मुः। उत्कण, -बीवकी अपेक्षासे जपन्यकरि अन्तर्मुहर्त है उत्कर्षकरि देशोनानि ॥ एकत्रिंशतः।। सागर-उपमाणि.in -मुम्पाटि इफ्तीस सागर प्रमाण है सामाइनसम्पन्दृष्टि-सम्पमिथ्यादृष्टयो ।। -(शालेश्माके पारक) सामान सम्पम्वृष्टि और मिगुणस्थानबागेका Hin 2015 एटा निवासी जगरूपसहाय एकीलान पदच्छेद मौर विमक्त्पी सहित समिसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । वप्पास १ स्त्र ८ र्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीव प्रति जघन्येन पल्योपमासख्येयभागोऽन्तमुहर्तश्च । उत्कर्षेणैकत्रिं शत्सागरोपमाणि देशोनानि ॥ सयतासंयतप्रमत्तसयतयोस्तेजोलेश्यावत् ॥ अप्रमत्तसयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जवन्यमुत्कृष्ट चान्तर्मुहूर्त ॥ अयदोति छरेस्साओ सुहतियलेस्सा हु देमविरदातये ॥ ततो दु नाना-जी-अपेक्षया। सामान्म-क्तक -नानाजीवकी विश्वासे संक्षेप (प्रसंगमें पूर्व कषित गुणस्थान) सदृश्व है अर्माद जपन्प अन्तर एक समय उत्तष्ट पल्प के वसंस्पातना मागहरे एक-जीव प्रतिक जर पेन: परपोरम असम - एकजीव के लिये जनपरि परप के असंस्पातको मागः । प० अर्महतः । उरोग : वेसोनानि:॥ - माग और (घ) अन्तर्महर्व है। उसरकार कुछ पाटि বিশ্ব सागरोपमाणि संपवासपत -वीस सागर प्रमाण है । (शुहतेश्यानाले) देशसंयमी और प्रमचसंपवयोः: वेजा सेश्याक्तक =प्रमघसंयमियों का (विरहकाल) पीवसेश्मावालों के साथ अति नाना जीन अपेक्षा से और एक जीप प्रति कुछ अन्तर नहीं है (पृष्ठ २५८) अप्रमचसंपतस्प ॥ नाना-जीव =(शुक्ललेश्याषाले) अप्रमसंयमी (सातवा गुणस्पानपीका) अनेक बीवकी अपेक्षयान अस्ति । अन्तरम् ॥ एकजीव । = अपेक्षा से मन्दर नहीं है । एक जीवके प्रवि० जनन्पम् ॥ उस्कृट ॥ च अन्तर्व लिये जपन्य और () उस्कप अन्तमात है। अपदोचि ( - अस्दो । सि० =असंमत ।। इति) =असंमत(मिपाव-सामादन-सम्पग्मिप्यात्व अविरत चार गुणस्थानो) तक (-इति) छलेस्साओ (छ-लेस्साओ । =पर ।। श्या ।) =छहो (कृष्ण नील कापोत-पीत-पय-शुस) सेक्ष्या रे॥ सुरवियलेस्सा (=मुदतिपलेस्सा ॥ =नुमत्रालेश्या)-शुम अथवा प्रशस्त तीन (पीत-पप-शुल) लेश्या इवेसविरद-(= वेमविरद %3Dहिक वेशविरत) ही (= =रि) देशविरत वा संमवासयस (पांच) किये। तयो दु(=सिये,॥ तचो-बयेस तु)-प्रमच विरत (छठे) अप्रमच विरत (सातवां इन) तीन गुणस्थानों में है। किन्तु (==) वहां (अपूमच) से (बामे अपूर्वकरण आदि असयोगकेवली सक मे रमामा रमा रमाऊ प्रथमाविभक्ति गुरवन स्त्रीलिंग रमा शम्बफे स्पषसेही छेस्मा शब्द फे लेस्सामा लेस्मा वया लेस्साक रूप । .

SIX --CHACHC0731 पगनिवासी बगरूपसाप पकीलकृत सच्छेद और विमक्त्यर्य सहित सर्वार्थसिदिफा भन्दशः हिंदीअनुवाद अध्याय १ सर्व ४ अभव्यानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ॥ (१२) सम्यक्त्वानुवादनक्षायिक- सम्यग्दृष्टिप्वमयतसम्यग्दृष्ट नाजविापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षण पूर्वकोटी देशोना ॥ संयतासयतप्रमत्ताप्रमत्तसँयताना नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । मव्य जीवों में असंपतसम्परवरी से अप्रमचर्सयमी तकनिका नानाजीव अशासे अन्तर नहीं है। एक नीव के लिये जघन्यकरि अन्तार्त है उस्कृरकार छ पाटि आधा पुद्गल परिवर्तन है। भव्य जीवों में चार उपशममेणीवालोंका नानाजीव अपेवासे बधन्य एक समय है । उत्कृष्ट पृथक्त्व वर्ष है। एफ बीव के लिये जन्म अन्तमहत है। कुछ न्यून अर्द्ध पुद्गल परिवर्तन ॥ मव्य बीमि चार पक मेनीवासीका और अयोगकेवलियों का नाना जीव अपेक्षा से जघन्य एक समय है उत्कृष्ट है मास है । एक जीप की अपेक्षा से अन्तर नहीं है ॥ मन्य जीवमि सोग र लिमों का नाना जीव और एक जीव अपेक्षा से अन्तर नहीं है। (पठ २२२-२२५) अमम्पानाम् । नाना-जी-अपेक्षया ॥ च एक भीव- =ममध्य जीवों का अनेफ जीवकी विना से और एक जीवकी अपपया ॥ न अस्ति अन्तरम् [१२] सम्पक्स-अनुवादेन अपेक्षा से अवर (विरहकाल) नहीं है ।। (१२) सम्पग्दर्शनकी अपेक्षा से धायिकमम्याटिए । अर्मयतसम्यग्दष्टे ।। नाना =क्षायिक सम्पग्डष्टियों में असंपतसम्यग्दर्शनवालेका बनेक जीव अपेकपा : न अस्ति अन्तरम् ॥ एकजी पूविक-जीवकी अपेषासे विरहकाल नहीं है। एक जीवके लिये. जयन्येन । अन्नमुहर्न । उत्कर्पण । देशोना । म्बघन्यकरि अन्तर्गत है उत्कृष्ट करि कुछ पाटि पर कोटी: मेयवासंयत प्रमच- = एक करोड पूर्व है । (धायिक सम्पन्दनविये) संपमासंपमी प्रमत्वसंयमी अप्रमग संपतानाम् ।। माना जीव अपेक्षया -अप्रमत्तसंपमियोंका नानाजीवकी अपेक्षा से -निराकार नहीं है। - नम्भरित T भन्तरम् ।।

एटानिवासी जगरूपसहाय वकीस्कृतपदच्छेद भौर विमक्त्यार्थ सहित स्वार्थसिद्धिका सम्वतः हिंदी मनुवाद ॥ अध्याय १ व ८ एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त उत्कर्षेण प्रयस्त्रिंशत्सागरोंपमाणि सातिरेकाणि ॥ चतुर्णामुपशमकाना नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जवन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरे काणि ॥ शेषाणां सामान्यवत् । एक-जीवम् । प्रतिष्पन्न । अन्तर्मना । - एफ बीवकी अपेक्षासे (-प्रति) अघन्पकार अन्तर्मन है उत्तण : स अतिरेकाणि पनि सागर = उत्कृष्टकरि कुछ अधिक तेतीस सागर उपमाणि ॥ चतुर्णाम् ।। - प्रमाम (- उपम) है ॥ (सायिक सम्पम्दर्शन में) चार (भपूर्वकरण-अनिवृचिकरण-सूक्ष्मसाम्पराक्-उपनातकपाय गुणस्थान) उपसमकानाम् ।। नाना-जीव अपेक्षया -उपसमभेणीवालोंका अनेक जोक्की अपेक्षासे सामान्य यत् - संक्षेप (प्रकरपमें परिले कडा हुबा गुमस्थान सदृश (अन्तर) है अर्थात् अषन्य एक समयो उत्कृष्ट तीन वर्षसे उपर नौ से नीचे(वर्ष) रे (पृष्ठ २२४) रक-मीवम् ।। पूति जघन्येन : अन्तर्मुहर्त = एक जीवके लिये जपन्यकरि अन्तर्मुहर्व है उत्कम । स-अविरकाणि प्रयस्रिनस्सागर- " उत्कृष्टकरि कुछ अधिक तेतीस सागर उपमाणि पापाम् - पूमाण (= उपम) रे ।। अवशेष अक्या पचेडुपे (पार धपकमेणी वाले सपोग फेवली और अमोग केवली) निका सामान्यक्त् . संसेप (पूसंगमें पहिले कसा हुआ गुणस्थान) समान (अन्तर) । अर्थात् पार सफ्कोणी वालोंका और अयोगकेवालयों का नाना जीव अपेक्षासे बपन्य एक समय है उत्कृष्ट छै मासौ । एक जीव वि अन्तर नहीं है। सयोग फेवलियोंका नानाभीप मौर एक जीव पूवि मन्तर न है॥ ( रामसापक भार से मारह गुणस्पान की। पेवक माम्पपल धार से सात गुणस्थान तक मोर भापिक चार से पोरा करे। ॥

ॐa.CEXCLESS पटानिरासी मगरूपसहाय पफीसकृत मामय और पिमत्पर्ष सहित सपर्णिसिलिका शब्दशः दिदीजनुषार अध्याय १४ अभव्याना नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ॥ (१२) सम्यक्त्वानुवादनक्षायिक- सम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टन नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्पण पूर्वकोटी देशोना ॥ संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसँयताना नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । मन्य जीवों में परीयवसम्पदरी से अनमपसपमी राकनिका'नानाजीग अपेक्षासे अरही है। एक भीष के लिये जपन्गकरि अन्तर्मुहर्त है उत्कृस्टकार 3' पावि आमा पुगत परिपर्सन है॥ मन्य जीयों में पार उपसमलेणीवालोंका नानाजीय अपेवासे मान्य एक समय है। उत्कृष्ट पाक्त्व पर है। क जीव के लिगे अपन्य अन्तमा है। उत्कृष्ट फा न्यून अर्थ पाल परिवर्तन ॥ मध्य बीोम गार पक भणीयालीका और प्रयोग गलियों का नारा जीप अपेसा से धान्य एफ समय है उत्कृष्ट है गास। एक जीप की अपेक्षा से पन्तर नहीं है। मन्य जी िसयोग के लिगों का गाना जीप और एफ भीप अपेक्षा से अन्वर नहीं है (पछ २२२-२२५) अम पानाम् । नाजीरजपेक्षया:॥प एम-भीप - पमप्य जीवों का ओजीफी पिता से और पफ भीपकी अपभगान पसि पारम् [१२] सम्पररा-आमान पपेक्षा से अन्दर (पिरहकात नहीं है। (१२) सम्पग्दर्शनकी अपेक्षा से सापिसम्ममादित, अरोगपराम्पर गाना सायिक सम्पदृष्टिगों में परोगतराम्यम्पर्शापालेका अनेक जीर अपेक्षया परित अन्तरम् कभीय विधजीवकी अपेधारो पिरकार नहीं है। पर भी रिपे मग पेग । पनाहः । उरकण । देशोना । मगर पकरि अनाहत है उत्कृष्करि कुछ पाटि पर्प-कोटी संपवारीपर प्रमप - एक करोड पर्व है। (धायिक सम्पदापि संयमासंयमी समयसपमी अपमरा संपवानाम् ।। गाना-जीप अपेक्षपा। - अपमपसंपभिगोंका गानाधीनकी अपेधा से निरकासनी॥ , नगरिय मन्परम् ॥

एटानिवासी जगरूपमहाप पकोड न पदच्छेद और विमपर्प सहित सार्वसिद्धिका सम्पन' दिदी अनुवाद । अम्पाय । म ८ उत्कृष्टं चान्तर्मुद्रुर्तः ॥ संयतासँयतस्य नानाजीवापेक्षया जघन्येनैका समय। उत्कण चतुर्दश रात्रिदिनानि । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्ट वान्तर्मुहूर्त ॥ प्रात्ताप्रमत्तसँयतयो नाजीवापेक्षया जघन्येनेक' पमयः । उत्करेंग पञ्चदश रात्रिदिनानि । एकजीव प्रति जघन्यमुत्कृष्टंचान्तर्मुखते ॥ त्रयाणामुपशमकाना नानाजीवापेक्षया जघन्येनेकः समयः । उत्कर्पण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीव प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्त ॥ उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । उत्कृष्टम् ।।१ अन्तर्मुहर्स' ।। संपतासंपतस्य । =उस्कृष्ट मन्तर्मुहर्त (विरह काल) है। (उपश्चम सम्पदृष्टियोंमें ) देश संयमीका नाना जीव अपेकपा ॥ बपन्न । एक । समयः । अनेक जीवकी अपेक्षासे अघन्पकार एक समय (अन्तरकाल) है उत्तण ! मर्दन ॥ रासिदिनानि । एकत्रीकम् =उत्कृस्करि चौदह रात्रि दिक्स है । एक बीचकी प्रतिक मपन्यम् ॥ घ उत्कृष्टम् । अन्तर्मुहर्व' ।। =अपेक्षासे बघन्य और (= घ) उत्कृष्ट अन्तर्गत है प्रमत-अपमचसंपतयो =( उपशम सम्पगाष्टिमॉम ) प्रमच और अप्रमत्तसंपमियोंका (अन्तर) नाना जीव अपेक्षया : बपन्येन : एक समया। अनेक जीवकी अपेक्षासे जघन्यकार एक समय में उत्कर्पण , पञ्चदश ॥ रात्रि दिनानि ॥ एकनीयम् = उत्कृष्टवरि पन्द्रा राति दिवस है । एक जीवकी प्रति० जपन्यम् । प उस्कृप्टम् अन्ततः । और उस्कृष्ट विरहकाल अन्तर्मुहर्त है। प्रयाणामा = (उपशम सम्यग्दृष्टियों में) तीन (अपूर्पकरण अनिधिकरण समसापराय) उपसमकानाम् ॥ नाना मी-अपेक्षया । वपन्वेन । उपसमभेणियोंका नानामीवकी मपेवासे बपन्यकरि एकः । समयः । उत्कोण । वर्षपपत्यम् ॥ = एक समय है । उस्कृष्टकार प्रात्त्व (तीन से ऊपर नौ से नीचे) एकनीयम् । प्रतिक बन्यम् ॥ र उत्कृष्टम् ॥ =एक बीवकी अपेक्षा से (=प्रवि) उपन्य मौर (-१) उत्कृष्ट भन्तमः । उपशान्तासायस्व ॥ =अन्तर्मत है। (उपशम सम्पम्दर्शनवामि ) उपचान्सकाय पालेका नाना-जीक्-अपेषया । सामान्य-पद. =(विरहकाल) अनेक जीवकी अपेक्षासे संक्षेप में पूर्व उक गुणस्थान समो मर्यावअपन्य एक समप है उत्कृष्ट प्रयक्त्व बरस है (एछ २२४) =मपेवासे मषन्प an - ण्टानिवासी जगरूपसहाय वकीलकुन पदच्छेद और विमक्त्यर्थ सहित स्वार्थसिदि का शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मत्र ८ क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसयतसम्यग्दृष्टानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ॥ एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । । उत्कॅपण पूर्वकोटी देशोना ॥ संयतासयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । उत्कर्षेण षट्पष्टिसागरोपमाणि देशोनानि ॥ प्रमत्ताप्रमत्तयतयो नाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि ॥ औपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसयतसम्यग्दृष्टे नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समय । उत्कर्षेण सप्त रात्रिदिनानि ॥ एकजीव प्रति जघन्यम् पायोपक्षमिक-सम्यम्दृष्टिप । असंयत्सम्यादृष्टोन -वेदफ सम्पम्दर्शनवालों में अविरत सम्पम्दृष्टी का नाना जीव भपेक्षा न बस्तिा अन्तरम् ।। अनेक बीपको अपेथासे विरहकाल नहीं है एकत्रीवम् : प्रति० जघन्येन । अन्तर्मुवः ।। एक भीवके लिये (=प्रति) जघन्यकरि अन्तर्मुहर्त (विरहाल) है उत्कप । पूर्वकोटी ॥ देशोना - उत्कृष्टकरि कुछहीन एक करोड़ पूर्व है। सपवासंपतस्य । नाना-चीक अपेक्षया ।।। घेदकसम्पम्दृष्टियों में) देशसंयमी का अनेक जीव की अपक्षा से न अस्ति अन्तरम् ॥ एफबीवम् । प्रति जघन्येन । विरहकाल नहीं है । एकवीय के लिये (प्रवि) जघन्यकरि अन्तर्मुखः । उत्कर्पण : देशोनानि ॥ पदाप्टि अन्तर्मुहर्त है । उत्कृप्टकरि कुछीन छयासठि सागरोपमानि॥ प्रमप -सागर प्रमाण है ॥ (पेदक सम्यग्दर्शनवालों में) पुमच और अपूमसक्तयो । नाना-जीव अपेक्षया । =भपूमच संपमियों का अनेक नीवकी अपेक्षा से न अस्ति मन्तरम् । एक जीपम् पूति मपन्येन । -विरहफाल नहीं है। एफ जीवके लिये जघन्यकरि अन्तर्मुहवः उस्कोण ।। स मतिरेकानि अन्तर्मुहूर्त हैं। उत्कृप्टकरि कुछ अधिक वपर्खिष्ठ सागरोपमाणि ॥ औपशमिकसम्पादृष्टिः । =वेसीस सागर के परावर (अन्तर काल) है । उपन्चमसम्मम्वृष्टियों में मसयक-सम्मन्द्रप्टे । नाना-जीव-अपेक्षया अविरव सम्यग्दृष्टी का (विछोहफाल) भनेक जीवकी अपेक्षा से मपन्येन । एक समय । उस्कोप । सप्त ॥ जघन्यकरि एक समय है । उत्कृष्टकरि सात रात्रिदिनानि ॥ एक-धीयम् पृतिक जमुन्यम् ॥ रात दिवस है। एक जीवके लिये जपन्य और (घ) ॥

एनिवासी जगरूपसहाय फकीस्कृत परच्छेद गौर विमक्स्पर्ष सहित साप सिद्धिका शम्दशः हिंदी अनुपाद । वपास १ ख ८ असंयतसम्यग्दृष्टयाद्यप्रमत्तान्ताना नानाजीवापक्षया नास्त्यन्तरम । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्पेण मागरोपभगतपुश्क्वम् ॥ चतुर्णामुपशमकाना नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीव प्रति जघन्ये नान्तर्मुहूर्तः । उत्कण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । चतुर्णा क्षपकाणा सामान्यवत् । असंझिना नानाजीवापेक्षय कजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ॥ तदुभय- असंयतमम्पग्रष्टि आदि प्रमच-अन्वानाम् ।। =(सैनी में ) असंयमी सम्पन्दन पालेसे वप्रमच गुणस्पानपी सकनिका नानाजीव अपेक्षया ॥ न अस्ति T अन्तरम् अनेक जीवकी विधासे विरहकाल (- अन्तर) नहीं है एक बीवम् । प्रतिक अधन्पेन । अन्तर्मुहर्तः ।। -एक जीव की अपेक्षा से बघन्यकरि अन्तर्मुस है उत्कण ,। सागरोपम-स्वपृथक्त्वम् in -उलएकरि तीनसौ सागरसे उपर और नौसौ सागर के नीचे प्रमाण है फतुर्णाम् ।। ( सैनियों में ) पार (अपूर्वकरण अनिवधिकरम-सूक्ष्मलोम-उपशान्तकमाय) उपसमकानाम् ।। नानाबीच अपेक्षया । सामान्पवतक उपनम भणीवालोंका अनेक भीषकी अपेक्षासे संक्षेप (में गुणस्मान) पद है वर्षात जघन्य एक समय है उस्कृष्ट प्रषस्व वर्ष अन्तर (२२४) एक जीवम् । प्रतिक जघन्येन । अन्तर्मुहर्व' । -एक जीपकी अपेक्षासे जघन्यकरि अन्तर्मुइर्व है उन्कण : सागरोपम-शत पृथक्स्वम् । -उस्कष्टकर पृथक्त्व (तीन से ऊपर नौसे नीचे) सौ सागर प्रमाण है (सैनिमि) चार (अपूर्वकरण-अनिवृतिकरप-सूक्ष्मलोम-धीजकमाय) आपकाणाम् ।। सामा यक्स्क =सपक श्रेणीवालों का मन्तर संक्षेप (विषयमें पूर्व उक्त गुणस्पान ) सम्म है अर्थात् नानाजीष की अपेक्षा से जघन्य एक समय है उत्कृष्ट छै मास है एक बीय प्रति विरह काल नहीं है (पृष्ठ २२५ पेखो) अमेधिनाम् । नाना-जीव अपेधया :॥ च एकवी- • असंशियोंका (जो मिथ्यात्वगुणस्थानमें है) नाना भीषकी अपेक्षा से और एक जीककी अपसया : न • अस्ति अन्तरम् ॥ -उमय = विवक्षा से अन्तर नहीं है। उन (सैनीमनसहित असैनी मनरहित) दोनों २ (१) सैनी अथषा मनमाहित जीव मम्पारव पपम गुणस्पान से सीगझपाय बारा गुणस्यामत: हावे है असही फेमन मिथ्याश्य गुणस्थान में है। फर्णाम् ।।

- एटानियासी क्गरूपम्हास पफीस्कृत पदच्छेद और मिक्स्पप साहत सवापासावफा शम्मष्ठा हिंदी अनुपाद । यम्माम १ न ८ एकजीव प्रति नास्त्यन्तरम् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यमिथ्यादृष्टयो नाजीवापेक्षया जघन्येनैक समयः । उत्कर्षेण पल्योपमामस्ययभाग । एकजीव प्रति नास्त्यन्तरम् ॥ मिथ्यादृष्टेनानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्यन्तरम् ॥ (१३) सज्ञानुवादेन- सनिषु मिथ्याट सामान्यवत् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यस्मिथ्यादृष्टयो नानाजीवापेक्षया सामाम्यवत् । एकजीव प्रति जघन्येन पल्पोपमासख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण सागरोपम शतपृथक्त्वम् ॥ सामान्यत् एक जीयम् । प्रतिक न अस्सिा मन्तरम् । =एक मीवके लिये वियोगकाल (अन्तर) नहीं है। सासादनसम्पग्रटि-सम्पमिप्याएयो ।। -सासादनसम्पग्दर्शनवासे और मिभगुणस्थानवासेका (अन्तर) नाना-मीक्-अपेक्षयामपन्येन । एक समय ।। •अनेक जीवकी अपेपासे जघन्यकरि एफ समय है ॥ उत्कण । पल्पोपम-प्रसंस्पेय-मागः । एकजीव = उस्कृष्टकार परपके असंस्पाक्वा अंश है। एक जीक्की प्रति न अस्ति अन्तरम् ।। मिथ्यावृप्टे । नानाधीक- = अपेवासे अन्तर नहीं है ॥ मिथ्यादर्शनयालेका अनेक बीयकी अपेक्षया ॥प एक-जी-अपेषमा न अस्ति मन्तरम् = अपेक्षासे और (-च) एफ जीक्की अपेक्षासे अन्तर (काल) नहीं है। [१३] सम्मा-अनुषावेन । समिप । मिथ्यादृप्टेः ।। = (१३) सैनी (मन सहित जीव) निकी अपेक्षासे सैनियम मियादृष्टिका संक्षेप (प्रकरममें पहिले कशा हुआ गुणस्थान) सम्म (अन्तर) है अर्थात सैनियोंमें मिध्यादृष्टीका नाना जीवकी अपेक्षासे अन्तर नहीं है। एक जीवके लिये नपन्य अन्तर्पहत है उत्कृष्ट कुछ न्यून एकसौ पचीस सागर प्रमाण है (पृष्ठ २२३ देखो) खासाइनसम्पग्दृष्टि सम्बधिमध्यादृष्टयोः । =(सैनी जीवोम ) सासादन सम्यग्दर्शनवासेका और मित्रगुणस्थानमालेका नानाजीव अपेपया : सामान्यतः =(अन्तर) अनेक बीष प्रति सक्षेप (पूसंगमें पूर्व उक्त गुणस्थान) सदृश है मर्थात् जघन्य एक समय है। उस्कृष्ट फ्ल्यका असंख्यातका मागो (२२३ २२४) एक जीवम । पति अघन्पेन । पल्पोपम- -एक मीषके लिये नपन्यकरि पस्योपमके घ अन्तर्मुहर्नः उत्करेंग -अस्माक्वा माग गौर (प) मवमति है उत्कृष्टकारि १८ असस्पेय मागा ।

उत्कणागुलासस्येयभाग असंख्येयासंख्येया उत्सर्पिण्यवसर्पिप्य । असयतसम्यग्दृष्टयाद्यप्रमतान्ताना नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त ॥ उत्पण : गुरु-सरस्पेयमार्गः ॥ - उस्कृष्टकरि (सूचीरूप) अंगुठ के मसंस्माता माग है अर्थात् सन्मगुल असंख्याता माग के परावर माकाश में या आकास के मितने प्रदेश गमना है उतने समयों के मरार विरह काल पा तरकास है संसपेमासस्येमा उस्सपिमि-अक्सपिम्पा -(वं पूर्वोक्त समय) वसंम्पावासस्पात उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल में वर्षात एपगुल के असम्पातलो माग में जिक्ने अकाटके प्रदेश संस्पा में हैं उतनी ही (गमना अन्तर काल) के समयों की है और ये समय गिनती में उन समयों के परावर में बिक्ने कि समय सम्पावासंस्मात उत्सपिणी अक्सपिनी कालों (असंस्मातासंस्मात फल्प कालों) में है असक्त-सम्पारटि-आदि-अपूम-जन्तानां । -असंतप्तम्परष्टी से अपूमचसंयमी (साता गुणस्थान पति) नि तक नानाजीव-अपेक्षया : न-अस्ति अन्तरम् । - मनेक पापियों की अपेसा से मन्तर नहीं है एकजीव ।। पूतिमपन्येन । मन्तर्मना । - एक जीप की अपेक्षा से बधन्न अन्तर्मुहर्स है। (१) मसम्मेवा पठन(खिोव संरकरण पठ) में दो पार भाया है। पावापे को भातुमि है । ए (पृष्ठ ४५) में प्रसस्पेयासम्मेवा भावाहेको र सोकि जब सपनो को पक्षमा मुद्रित पृष्ठ १११ मौर हस्तलिखित पचनिका में मो सोनों स्थानों में पसंम्पावासम्मान पाम्य है और मोमो यही है कि सूर्मगुप्त के मसम्पावना माग माकाश प्रदेशों मे गणना असम्मावासस्थान मसपिसी मवसर्पियो (न किमसम्पावे मत्सपिपी भासपियो) प्रमों के समयों परापर है। (२) परिमेय संस्करण के पृष्ठ १९) में दोनों स्थानों मसरपेयमाग'(-मसम्पावबॉमाग) के स्थान में 'मसम्मेमागा मसम्पावेमाग मास पप गया क्योंकि सम्पगुवसंम्मावां मम्ग (नकि प्रसंस्थावे माग) रेभारा के प्रदेशों की संख्या प्रसंस्बावासस्मात रत्सर्पियो भवस पिसो प्रलोके समयों के बावर गवनामें है। गोंकि अंगुल प्रसनमाग्मे इत्यादि गामा वमा टिप्पणी (२) पृष्ठ२२१में रेयो । 'सम्मेगुनासस्पतभाग (३) 'गुप्त' पृष्ठ ७१ ६८ में माँ यहाँ पर गुमरान माये है वहाँ वहाँ सूच्यंगुल से प्रयोजन है न कि प्रवर (वर्ग) गुणसे वा पनगुस से पर्यात् एक प्रमाण चंगुल (म किस्सेय चम वा पारमागुख) मरे और पासपो मोर असे माना मिलने पो होते है से सूबंगुल हवे सूर्यगुव र फपन में सूमो, जपम्पमुख संस्पात प्रमाण स्यापि राग पायेमा भौति गणित (1) सपा मान भौर उपमामान दोनों मेव जो वत्वार्य सूत्र हे भगो मम्वानों के सूत्रों से मो सम्बन्ध रखते हैं नोम हे पृष्ठ २०० से २०६ व लिने प्राते हैं। मोति: गणित के मुरूम वो मेरे पर संन्यामान भोर दूसरा उपमामान । संसामान के मूल ३ भेद, भात । संस्थान एटानिवासी नगरपसहाय वकील मत पदच्छेद और विमचर्य सहित सर्विसिविका अभ्यः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय ८ व्यपदेशरहिताना सामान्यवत् ॥ (१४) आहारानुवादेन-आहारकेषु मिथ्यादृष्टे सामान्यवत् । सामादन सम्यग्दृष्टिसम्यहिमथ्यादृष्टयोनीनाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीचे प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्ययभागो- ऽन्तर्मुहूर्तश्च । व्यपदेशहितानाम् ।। नामों से वस्ति (समोगकेवली और अयोगकेपठी) निका (विरहकाल) संक्षेप (प्रकरणमें पहिसे करावा गुणस्थान) समान है मर्यात् सयोगपतियों सामान्य-पक का नाना जीवकी अपेपासे और एक जीव की अपेवासे भन्तर नहीं हैजयोग केसलियोंका नाना जीपकी अपेपासे अपन्य एक समप है उतन्य छै मास है एकजीव प्रति अन्तर नहीं है (एठ २२५) (१४)माहार-अनुवादेन : आहारकेस । मिथ्याप्टे।। आहारके फक्नानुसारकरि जाहारकोंमें मिथ्यारप्टीका (अन्तर) सप (प्रकरणमें पहिले या हुआ गुणस्थान) समान है अर्थात माहारक मिष्याष्टिका नाना भीषकी अपेक्षासे अन्तर नहीं है एक जीवके प्रति अपन्न अन्तर्मुहर्त है। उत्कृष्ट एकसौ पचीस सागर से कुछ न्यून है सासादनसम्पादृष्टि-सम्पस्मिध्यादृष्टयोः । =(माहारकों में) सासादनसम्पन्दृष्टि और मिषगुणस्थानवालोंका नाना-जीव अपेक्ष्या ॥ सामान्यक्त नाना जीवकी अपेक्षासे संक्षेप (प्रसंगमें पूर्व-उक्त गुणस्पान) पद (अन्तर) है अर्थात् जघन्म एक समय है उत्कृष्ट पल्पका असंख्यात्वांमागी (पष्ठ २२३) एकजीपम् । प्रति अपन्येना। फ्स्पोपम- एक मीष के लिये अपन्यकरि फ्ल्पोपमके असस्पेयभागः, प अन्तर्मुहतः =असंस्थायामाग औरर -घ) अन्तरमुहर्व है ॥ सामान्पपत (१) महारगीष मिण्याब से योगपती गुणस्थान ३ स्थानों में होते है भगातारकीय, मिपाव सामावन मर्सपत सम्पमा सपोगदेवडी मोर मापसी इन पांच सालों में (बोरमसि भात् रिमाविकोपालोबाडेवाएँ गति संबंपी गौर, प्रार और मोफ पूर्ण समुपात परमेशा मयोगवहार मपोगोनयी मसिब (मगा, इसने भीक्तो मनापास होत है। भाप शेष बीप मदारक होते है। गोम्मटसारखीवर गावा ५५ एटानिवासी जगरूपसहाय कीकृत पदच्छेद बौर लिमत्पर्य सहित सर्विसिदिका सम्पया हिंदी अनुवाद । अमाप १ स्त्र ८ इस समस्या के मरमेपर पूसरी एक सरसों अनवस्था को गिनती करने के लिये शमान करमें यमनी । मध्य नाक में मसवात मीप समर है। जिनमें सपके वीपमें सम्पदीप है। इसम्म शम एक उसयामन है उम पारों मोर पण समुद्र है। उसको पारो मोरसे पेरकर पावकीतर।म मार सीपके मामे ममम ममुदा के आमे दीप झमसे असमात ग्रोप ममुद्र । चौहाईवूनी दूनी होती गई है। बिसी पोप पा समुद्र की परिधि ( गोलाई ) के एक वट से गुमरे तस तक की घोदाई को सूची करते है। जैसे मवण समुद्रको सूची ५ पास पोजन। मय अनवस्थाका में से समस्त सरसोंको सिधाकर किसी देव केशारा एक सरसों पीपमें एक मरसों समुद्र में अनुकम से राससे परिये, मिम शीप या समुद्रम समरसों पूर अंतको सरसों रातो ठसी होप वा समुद्र की सूची के समान सूक्षी पाया और एक सहसपासन महावाण दुसरा जनवरपार बनाइये और उसको मी सरसों से शिक्षाऊ मर एक दूसरो सरसों शमामा फरमें शासिये हम दूसरे अनपस्या काकी मरसो को भी निकालकर जिस पीप पा समुद्र में परिये समाप्ति हुई थी उसके मागे एक सरसों दीपमें मोर पक (मरसों ) ममुद्र में शाल परिये at ये मरसों मी समाप्त हो जाये वहाँ उसी दीप पा समुद्र की सूवी प्रमाण घोड़ी और एक महल पाडन गाय वीस अनवरया कुंर परवाकर इसे मरसों से शिक्षक भरिये और शाका ऊर में तीसरी सरसों रानिये इम तीसरे घर की भी सरसों निकालकर आगे दीप समलों में एक एक मरसों राम गालते अप सरसों ममाप्त हो जाय व पूर्वोजनुसार चौथा मनवस्था कर मरफर पोपी मरों छलाका फरमे गाछिये इसी प्रकार एक पक मनवस्था ऊर की पक पर मरसों शहापुर में राम रामते जब पाला दुर मी शिखाकं मरजाप उब एक सरसों प्रति शाम कर में रागिये इसी प्रकार एक एक अनवस्था की एक एक मरसों शबाब कर में असते समते जा पूमरी बार मी शमाका (शिस मर जाप तो मरी सरसों प्रविशालय में गलिये एक एक जनपस्या कुणा दीपक एक मासौ शमाकापुर में और एक एक शलाकी एक एक मरसों प्रविशालाकापुरमें रामते गमते मा मतिरामायकपदमी भर जाय तर एक सरसों महाशलाकाकुममें शामिये, जिम क्रमसे एक पार प्रति ग्रनाकापुर मग उसी कमसे दूसरी पार भरने पर दूसरी मरसों महाशलानग हालिये । इसी प्रकार एक एक प्रविशमका की सरसों महाशमा जमे डालते सराहते मग महाशमान र मी मरमाप उसमप एटानिवासी जगरूपसहाय वकीलकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दतः विदाअनुवाद अध्याय १ सन ८ . (टपपी) २ मसंख्यात और । मनत। मसशानके तीन भेद है १ गरोठासरगत २ युमपात और समातासार। अनतके मी इमर-१ परीतानन २ युनत । अनंत सस्थात पर मेव ही है । पेठे सम्पात का एक मेद मसमपात और मनत के तीन ही मेर मप मिठकर सस्मामान ७ मेाए । हन मातों में से प्रत्येक के समय (मस से पाय मापम घोष के) मोर उररुप ( सबसे पा) की मपेक्षा से तीम तीन मेवरस प्रसर संपामाम के २१ मेपर मर्यात् (1) मा समगत सम्पम संयत कर सात (१) अपम्प परीतासम्पात, मध्यम परीवासंस्पात, उत्तर परीतासम्मात अपय पुढार्सपात मपम पुषसत्यात उत्कप युज्यसम्पात अपम्प मसम्पातासस्पात, मध्यम प्रसंस्थावासभ्यात उम्र मसंस्पातासंस्पाल, (3) समन्य परीतानम्त, मम्पम परीवानम्त, साठ परीक्षामन्त । मयाप युमनात, मपम युष्मनन्त, उत्कृष्ठ युजनम्त, उपायनम्तानम्तमपम मनातामात मकरसमन्वमन्त। एकमें एक माय देने से मपमा पकको पासे गुणाकार करने से पुण्मी हानि पनि नहीं होती। मता संस्थाका मारग्म दा के मानस प्रहप किया। और एक को गफ्ना ( गिनती ) गप्पच वाच्य (काने पाग) माना है, हम पिये समाप संम्पा का प्रमाण दा (२)। तीन बार पचि मावि एक होम रतए सम्मात पपात मभ्यम संहपात के मेव है । एकापून अपम्प परीवासण्याव को उप संम्पात कहते है अब आगे समम्म परीत सम्पात का प्रमाण किया है सो मिलते है। बगैविक गपित पसरूप सौक्षिक गणित से कुछ विलक्षण गरिक गणित से स्पूस मौर स्पस (पोड़े) पाप्यों परिमाप विश जाता है, किन्तु मौविक मर्पित से सूक्ष्म मोर नव पदार्थों की हीन्यापच्या पाप रूपया जाता है। अपम्प फ्रीतासपात का सप समझाने के लिये मो उपाय हिमा माता है यह किसी मे किया नहीं था भितुमो गपत परिमाण मम्माने के लिये पकपित ग्पाप मात्र है। भत्सना कीजिप कि मनपस्था, शलाच, प्रति शमाका, और महा शमाश, नाम के चार गोठ का है। दिन में से प्रक का मास (= गोज, पाप की एस्तर से दूसरे क्ट तक की पौड़ा) एक म्म योजन (पोमन का प्रमाण यहाँ दो सहन काम का समझना ) और गहण (मोशा) प्रमाण पर साहन योजना है। इनमें से ममवस्या का गोठ मरसों से शिक्षाऊ (पृषी पर अपनी राशि मांति), मरम्म । स मनवस्था का में... १९७१९ १८४५ ११५ ११५३५३५ ३६ ३३ ॥ ३६ ३१३६ ३६ ३५ २६ ३६३६ । सरसों मियामोस प्रमाण गणित शाम अनुसार ममात । यहाँ भपूर्णक पान महीपणा ! koASAX , एटानिवासी जगरूपसहाय कीलकृत पदच्छेद और विमत्पर्य सहित सर्विसिदिका अन्दा हिंदी अनुवाद । अमाप १ स्त्र ८ -- इस ममवस्था करणे मरनेपर दूसरी एक सरसो अवस्था कोई गिनती करने के दिये शगध करमें रामनी । मप गोक में भसका मीप समुद्र हैं। जिनमें सपके बीच सम्बद्रीप है। इस शम एक ससयोगमी समरे चारों ओर सव समुद्र है। हमको चारों ओरसे भेरकर पातकीला है। इस प्रकार दीपके आगे ममुन ममुरामागे दीप कमसे मसंगमात होप ममुर। चौड़ाई पूनी दूनी होती है। बिसी पोप वा समुद्र की परिधि (गोगाई) के एक तट से दूसरे पर तक की चौड़ाई का सूची पर है। जैसे उपण ममुमकी सूखी ५ काम योजन । मग अमवस्या कुंर में से समस्त सरसोंको निसार किसी देव के द्वारा एक सरसों दीपमें एक मरसों समुद्र मनुकम से राळरी पसिपे जिम दीप पा समुद्र में मब मरसों पूर्व कर संतश्रीमरसौं गायो उसी दीप पा समुद्रकी सूची के समान सूची वाला और एक सहसयासन महवाग दुसरा मनवस्याकेट बनाइये मोर उसको मी मरसों से शिमा मर ५४ दूसरी सरसों शलाभ कर लिये इस दूसरे अनपरपा कुंडली मरसों को मी निकासकर मिस दीप वा समुद्र में परिले समाप्ति हुई थी उसके मागे एक सरसों पीपमें और एक (मरसो ) ममुद्र में शामते परिये जहां ये सरसों मी समाप्त हो जाये वहाँ उसी दीप पा समुद्र की सूची प्रमाण घोड़ी मोर एक माल योजन गाय तीसरा मनपरया कुर बनवार उसे मरसों से शिवाऊ मरिये मौर शलाका फर में तीसरी मरसों गलिये इस तीमरे ऊर की भी सरसों निकर मागे वीप समद्रों में एक पफ मरसा गाण्वे राधते अब सरसों ममाप्त हो जाय तव पूर्वोषानुमार चौथा अमवस्या कुंर मरकर पोथी सरसों शसाका फुगमें सपिये इसी प्रकार पक पक मनास्था फुर की एक मरसों शावर में राहते गलते सप शमन कुंर मी शिक्षाऊँ भरमाप तप एक सरसों प्रवेशमाा कुंर में रासिये इसी प्रकार एक एक अमवस्था की एक पर मरो शायर में रामते शासते अब मरी पार भी शलाका कुर (शिक्षा) मर जाप तो इमरी सरसों प्रतिशमप्रकण में सांसपे पर एक जनवस्था कुण की एक एक मरसा शापार में और एक एक शखाकाकी पर एक मरसों प्रतिकार गमते रायते सप प्रतिशमायकममी मर जाय तप एक सरसों महाशमाकुण्ड रासिये जिम क्रमसे एक बार प्रति समाचार भरा है उसी क्रमसे दूसरी बार भरने पर दूसरी मरसों महाशयाम कृणमें हालिये। इसी प्रकार एक एक प्रतिशखाका की सरसों महाशलाका कुंड गारते राणते जप महाराणका कर मी मरमाय ममममय एटानिवासी जगरूपसदाय वकीलान्तं परन्छेन और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ मासे पो मतके अस्पारमें जियो सरसों ममा उपमाही अपम्प परीसंस्पात प्रमाण है। संक्पामान के मसमेव सात कामे न सार्वोर अपम्प मपम सम्मकी अपेमासे एलीम मेकहे। पहॉपर मागेके ममेव के समय मेवमें से एक मटाने से पिछे मूस वका रकम मेरा जैसे अफ्ल्प परीवासंबपात में से एक पटाने से उसकम संस्पात तया अपम्प युक्तासंकात में से एक माने से पहर पतासंस्मात होता है। इसी प्रकार मान्य स्थानों मी माममा । समाप मोर गरुम मेदों के बीच मग मेव मापन मेव पाते हैं। इस प्रभर मागम मौर सम साम्प माप के समाप को सामने से ही बात होमले है इममिये मप मामे असम्प महोघही स्वरूप मिलामाता है। जपम्पसकपात मौरसमय परीवासपात र स्वरूप उपर सिक्षा जासुधी भव मागे अपम्य युजसंस्पात प्रमाण मिलते हैं। सपम्प परीवासस्पात प्रमान दो पशि लिखना, एक पिरग्नराशि और उमरी देपराशि पिरणाराशि- विरलन परमा अर्यात पिरम्नराशि जितन्म प्रमाण तने परे रिखना और प्रत्येक परके कर पक पक देवपशि रखकर ममस्त देयराशियों परस्पर गुवन करने से मो एणन फस दो ठल्या होमपम्प युष्मसमपातका प्रमाण मोवार्य परि जमर परीवासस्यातच प्रमाण पार मानाजाय वो चार परिमार ,,,, प्रत्येक एकरे सर पेपराशि चार चार रखकर...पारो पोकोका परसर गुणन करनेसे गुणनफल २५५ अपाय युवासंसावत्र प्रमाण होगा । इसही अपम्प युतसम्मातको मापडीमी कहते है क्योंकि एक माषयी में ममम्प युक्तसत्पातन प्रभाष समय होते है । सम्प युतासमपातकर्म (पक पशिको उसी से गुवापर करने से बों गुणनफल होता है उसको वर्ग कहते है जैसे ५ का पर्म १५) उप मर्मस्पातासम्यात प्रते है। मय मागे सपम्य परीवात प्रमाण पते है- अपय मसंस्थावासरगममाण तीनि पशि मर्याद । विएनराशि ऐवपशि ३ शमन मिखना । पिएसनराशि विरमगार प्रत्येक प.के पर रेपपशि खर समस्त देपराशियों परस्पर गुणाघर फरणा, और शाराशि में से एक पसना, इस पापे पे गुणनफल प्रमाण एटा निवासी बगरूपसमाम कोलकत परछेद और विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका अम्मा हिंदी अनुगाई । अध्याय १२८ पकविरसन और पर देय इस प्रकार दोपधिरना विप्नराशिविरमनार मयेक एके पर देयराशि रखकर समस्त पेपराशियों परसर गुपाभर रमा मौर शाराशिमसे एक मोर पसमा समरीमार पाये हुये गुणनफार प्रमाण पुन: विरम और वेपपशि करना और पूर्वोअनुसार समस वेयराशियोंका परस्पर गुणाकार परमा तपा सकाराशियों में से एक मोर पनमा सही अनुकमसे भवीन नवीन गुणनफल प्रमाण पिरन्न मौर वेरके कमसे एक एक पार देपपशियों का गुणाघर होने पर शायराशि में से एक एक माते पयते अब मासपशि समाप्त होमाय उस ममप जो मन्तिम गुणनफाप महाराशि होप एस प्रमाण फिर विरम्म देशातीनि राशि सिनी। विरस राशिका विरसार प्रत्येक एस्के मार देषराशि रत देपाशिव परस्पर गुणाकार करने परले पूर्वोकमानुसार एक पर देपरशिपोंका गुणाकार हानेपर रामाधारा में से ५० प पयो पयते का यह नितीवार स्पापम की शिगाराशिमी मम्पप्त होजाप उस ममम अम्तकी गुणमफसाप माराशि प्रमाण पुन' विरमा मका ये तीनिराशि विसनी । पूर्वोत मानुमार मा पर तीसरीबार स्थापना की हुई शलाकाराशि भी समाप्त होजाय उस समा पर मन्तिम गुणासम्म जो माराशि वह मसंपावसामान एक मध्यम मेव है। थित समानुसार तोनिवार तोनिवानि पशियों के गुपन विधाको शमाहात्रयनिष्ठापन करते ६ भागे मी जो "शलाकात्रपमिधापन पेमा पर माये व पेमाही विमा सम्मासमा राशि में छोकममान (मिस कथा उपमामान कान में कहा जागा) सोकप्रमाण पमेद्रग्यके प्रदेश गोको प्रमाण भर्मद्रम्प के प्रदेश, मोक प्रमाण पर बीब के प्रवेश गोक प्रमाणपोसकाशके पोश, खोडसे असंभपात गुणा अप्रविष्ठित प्रत्येक बनस्पतियाविनीयों व प्रमाण और उसके भी असंशात गुणा तथापि मामाम्यपनेसे मसंस्थात खोक प्रमाण प्रतिष्ठित प्रत्येक घनस्पविकाफिक मीवों प्रमाण-ये बह राशि मियाना । इस पोगपप्रमाण घिरमोप-शालाका ये वीनि राशि स्थापनकर पूर्वोजानुमार शगाषय निष्ठापन करना । हमार रम से यो महापशि उत्पन हो ग्स में पीसकोरामोशी मागर प्रमाण कमानके ममा मसंशत मोझ माण स्थितित्रापापपारस्थान ( स्थितिपको परण मूतमारमा के परिणाम) से मी मसंस्पात गुने क्यापि मसंस्थान नगर प्रमाण भनुमागभासार स्थान मोर इनसे भी मसंबात गुपे तयारि मर्मस्पान लोक प्रमाण मन वचन पण योगों के भविमाग पूतिय ( गुणफि मश ) पे पार पशि मिसाना । इस मरे पोगस प्रमाण फिर- प्रटानिमासी जगरूपसहाय वील कृत पदच्छेद मौर विमस्पर्ष सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दन हिंदी अनुषाद । अध्याय १ सूत्र ८ A ---- पिरमन-रय शमाया येवोनिराशि स्थापन करना और पूर्वोच क्रमानुसार शलापत्रय निमपम परना । इस प्रकार शलाकात्रम-निष्ठापन करनेसे जो गोश सपना सपो अपाय परीणानत कहते हैं। जपण्य परीठानका विरलनकर प्रत्येक एकके ऊपर मपन्य परीवानरस सब अपम्प परीवानोंका परस्पर गुरापार परनेस मो राशि उत्पन्न हो उसको अपन्य युच्यनंत कहते हैं। ममम्प जीवों का प्रमाण गपम्प 5मुपात समान है। जमान युगामक बीको अमाय मानत करते हैं। भर माग बस मामक मषिमाग प्रतिरोप प्रमाण स्वरूप इतर मानतका स्वरूप परत- अपम्प भनवा' प्रमाण रिकन एयरकामा ये पीमि श रमापनकर रखाकात्रय निधापन परमा। इस प्रकार रालामात्रय मितापमान: जो महाराशि उत्पादो पर मनवानवका एक मध्यम भेर है। अनंतके दूसरे दो भेद है, एक समय मनव और पसरा अश्यमन्स । पर्ष तक जो संख्या हुईवर रुपयन व है इसस भाग अपराभनके भेद । पाकि, इस महाशमें भागे पा राशि अक्षय मनत मिलाई भावी है। नमोन परित न बान पर भी ध्यय परस पर विस राशिका पता नहीं पाये रसको प्रापभनत है। इस महाराशिमें जोपयशिक मन माग सिमरासि, सिद्धरासिस मनसाही निगोपाश, वनस्पतिकारिकराशि, कीरराशिसे मनगुणी पबलराशि, पुदगलसे मी म गुणे ननिकालके समय मौर मनोका काराक प्रदेश पेबर गशि मिलानेसो पोगफल हो उस प्रमाण विरतन देय शशास्त्र य पोनिराशि स्थापनपर शलाकात्रयनिष्ठापन परना । इस प्रकार रामाकावरनियापन परनेसे जो राशि स्पन्न हो उसमें धर्मद्रम्य और भएमएम्पके भगुस्साधु गुपके मनवानत भविमागप्रवियर मिलाएर पागफल प्रमाण विरखन-रेर रामाका स्थापनार फिर राक्षापात्रपनिष्ठापन परना। इस प्रभर शलाकात्रपानापन करनेसे मम्पम मनतानवका म्पसप मो महाराधि सम्पन्न हुई उसको मन शानके भविमागप्रतिष्योंके महरूप राशिमेंसे पटाना चौर बो शेपरचे उसमें पुन बहो महाराशि मिनेस माना अषिमागप्रतिच्थ्योग प्रमाणस्वरूप बलट मनवानव होता है। महाराशिको पलहानसे घटापर फिर मिलानेत्र भभिप्राव पाकिमसानके पबिमागप्रतिरोन प्रमास उत्त महायशिसे पास पसा है। इस महाराशिको किसी दूसरो गशिसे गुणाकार रने पर मो पर मानके प्रमाससे पाय म्युन रहता है इसतिये बन हानरे प्रषिमागप्रवियों प्रमाणन महस्व विस्खलाने शिये उपपंच विधाम किया है। इस प्रचार संस्मा मामरे पोस मेदोंका बम समाप्त हुमा । SC-ST ॐॐ घर भागे उपमामानोभाठ मेयोग सहप लिखा है। जो प्रमाण रिसी पराको उपमा देकर कहा जाता है उसे एपमामान कहते हैं। समाम'ना- मेद १ पम्प (मत् नाज मरनेको जोसतो सही रुपमा है) १ सागर ( प लवण समुद्रको उपमा है) ३ सयंगुल 1 प्रवरागुल ५ घनांगुल ६ जगणो ७ सम्प्रर और ८ लोक। इनमें से पस्प वीनि मेव हैं । म्पपहारपस्य । ग्वारपस्प और ३ पडा पस्य । म्पबहारपम्प प साप पूर्वाधार्पोने इसप्रकार कहा है कि पुद्गलद्रम्प के सबसे मोटे संगको (टुमे) परमाणु करते हैं। मनतानत परमाणुभोंके ससको ( समूहम्प पियरो) अवसभासन कहते हैं ८ भवसनासम म एक सप्तासम, ८ समसमका एक रेणु तूटरेणुगए प्रस'णु, ८ प्रसरेणु म एक रयरेणु ८ रमणुभ एक सचम मोग मूमिवालोम बाशाप्रमाग, ८ उत्तम भोग भूमिपालोंके वालामका एक मध्यममोग भूमिवालोंका गालाम ८ मध्यममोग ममिवानों के मालामका पा समन्यमोगममिवाना वालाम, ८ जपम्पमोगमिानोंडे वानामका एक फर्ममृमिवासोच वालाम ८६ मभूमिमा पालामकी एक लोन, ८ पोलो। एक सरसों ८ सरसोंका एक जो भौर ८ चोका एक गुप्त होता है। इस अंगुलको 'उस्सेमागुन' इते हैं। चारों गलियों में जोवो शरीर और देवों के नगर पा मन्दिराविका परिमाण इसी गुप्लसे वर्णन किया माता उरसेपौगुलमे पापसौ गुणा प्राणागुल ( मरत क्षेत्र प्रासपिणो गल प्रथम पावनिका पंगुल) है। इस प्रमाांगुलसे महापर्वत नवो दोप समत्र इस्पाविकका परिमाण का मावा है । मरत रावत पेत्रो मनुष्यो। अपने अपने कालमें जो अगुप्त है उसे भास्मोगुल कहवे हैं इसपे मारी मस धनुष होल हल मूसल, पत्र, पमर इत्याविष्का प्रमाण वर्णन किया जाता है। पर अंगुलका एक पार, पो पादका एक विस्त यो विजस्वका एक हाव पार हावा एक मनुष, वो सहम मनुषका एक कोस, चार कोसका एक योजन होता है। प्रमाणोगुलसे निम्मन्न एक पोनन प्रमाण गहरा और एक पोजन प्रमारत व्यास HAT पर गोलगत (गना ) पनाना उस गर्भको उत्तम मोगममिवा ने मेरे बाग के अप्रमागोंसे मरना । गपित करने सगरे रोमको संम्मा ४१३५२५३.३०८ ०३१७१४९५१२१९२००००००००००००० ०००० हुई (ममाय । सूत्र ८वी टिप्पणी गणित के मिप नेसो) इसगर्वक एक एक रोमको सौ सौ बरस पंछ निकालवे निहालवे मिलने कालमें वे सब रोम समाप्त होमाय उल्ने काल को म्यवहार पस्यका काल कहते हैं । उपमुख रोम संम्पा ने सौपरस के समपसमूह से गुणा करने पर व्यवहार पस्य के समयोंका प्रमाण होता है। [१ पपैक २ अपन, । प्रयनको होन , १ असे मास, १ मास : ३० मोरात्रि १ महोरात्रि ३० मुहूर्त । मुहूव को संफ्याव प्रागज्ञो भोर पाली के सपन्य मुलसम्यात प्रमाण समय होते हैं ।म्पाहार पस्मो एक एक रोम सारे प्रसंपाव जति वर्ष के समय समूर प्रमाण खेडमरने से प्रशार फल हे रोम ही प्रमाण होता है जिसन ग्वारपस्यो रोम साई ज्वने हो उधार परस्य के समय जानने । एक फोटो में वर्गको ग्रेगो हो प्रते हैं तोप समुद्रों में सम्मा ग्वारपस्य से है अति उसार पस्यो समयोंको पम्पोस कोपागेन गुणा करने से जो गुणनफल हैं। मिनने भारस्वरोमखेड है पवने हो भशपस समय है होता है उतनेहो सा सोप समुद्र हैं। उदार परम प्रस्पेड रोपखा। प्रसंस्पात वर्ष । समय समूह प्रमाय खर रने से मसापस्पो रोम साहोघे F-८ एटानिवासी बगरूपसाय पकीयकृत पान्छेद और विमस्पर्व साइत सार्वसिद्धिका सम्पमा हिंदी अनुवाद । अम्पाप १८ उत्तणागुलासख्येयभागः असंख्येयासख्यया उत्सर्पिण्यवसयिः ॥ चतुर्णामुपशमकाना नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् एकजीव प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कणागुलासख्येयभागः अपख्येयामख्यया उत्सर्पिण्यषसर्पिण्यः॥ उत्कर्षण। अंगुल-प्रसंस्स्पेय-मागा । - उस्कृष्टकार सम्मेगुलफा जसंस्पाता माग है (इस मागके प्रवेशों के सुस्प है) अमरूपेयासंम्पेयाः॥ उस्सपिप्पप्सपिया -(येप्रदेश संस्म्पा) संस्मातामरूपात उत्सर्पिणी धक्सर्पिणीके समयोंके सुल्प है चतुर्णाम् ।। उपशमकानाम् ॥ - चार उपसममेली (आठसे म्पारहयो गुणस्थान) वालेनिका (अन्तर) नाना-जी-अपेषमा 4 सामान्पवय - अनेक बीव की विधासे सामान्य (प्रकरण में फवित गुमस्पान) सम है अर्थात् जपन्यकरि एक समय में उत्कृष्ट करि पृपस्त्व (तीनसे ऊपर नौसे नीचे) पर्प है (पठ २२४) एकवीर्य । प्रतिक मपन्येन । अन्ततः ।। -(चार उपशम भेणी वालों का) एक जीव की अपेषा से अघन्य अन्तर्मुहर्त है उत्कण | अंगुल-प्रसंस्पेयमागः । - उस्कृष्टकरि सम्पंगुल के असंस्पातलो माग (क बकास प्रदेशों के तुल्म) है असेसमेगासंस्म्पेया' ।। उत्सपिम्पसपिंप (ये प्रवेश गिनती) असंस्म्यातासंस्मात उत्सर्पिणी अवसर्पिणीके समर्योक तुल्प है को स्थिति भवापससे पसैन ने गई है परमको परा कोमोडो से गुणा परनपर सागर होवारे मर्यात् पराकोगे म्परहार पस्पा पर म्पपहार सागर मेवानेगे द्वारपसका एक द्वार सागर मोर परासाडी पठापस्मा एकमता सागर होय है किसो राशिको मितनो पार पापा भाषा प्रने से परोप ये सभे भरते है जैसे को पोषार भाषा भाषा करनेसे एक होपाई मत चार मच्छर र है। पाठ के तीन है। सोसहरे भरकर पार इसही प्रकार सर्वत्र लगा सैना मापस्पषी भईयाराम पिरतानकर प्रत्येक एका उपर भवापस रसार सब प्रा पस्पोंग परस्सर गुणाभर रनेसे मो राशि स्पा हो सो सूचगुप्त पाते हैं अर्थात् एक प्रमाणांगुल सेंवे और एक परेरा गौर और उरे भागारमें इतने प्रदेश है। सूबा वर्गको प्रवर्गगुस्न और पन (एक गति को सोनपार परस्पर गुणाकरने से मो गुपन फल हो उसे पन कहते हैं। जैसे दो पन पाठ और कोन चपन सचाइसको पन्चंगुल रहते हैं पस्सने भयो राशि प्रसंम्माया मागा। विरमनार प्रत्येक एक एको अमर पनी म रस समस्त पांगुनोंका परस्पर गुणापर करने को गुसन फर हो सो मगाप्चेणी करते है मापीमा सावर्षा माग राज हा गया है अर्थात् सात रान ए. मगरम होवो है। अगम्बेसीडबर्गो मगनवर और जगपोषोके पनको सोका है।पही पोनों सोमाकाय प्रदेशीी सम्मा। इस एपमामान मेवासे मत्र बासमोर मात्र परिमाण दिया मावीमाश बाइम्प प परिमाणमामाय पाँपने प्रथक २ भागानमा महावा परिमारमा बारमा स्ने प्रदेश मानने पई भनन परिमाण गमाव पाक्ने समप जानने और जहां माव । परिमाणमामाबमने विमाता प्रक्रिमालले ना PICSA एटानिवासी जगरूपसहाय वकीस्कृन पपच्छेद और विमस्पर्य सहित सर्वार्थसिलिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ चतुर्णाक्षपकाणा सयोगकेवलिनां च मामान्यवत् । अनाहारकेषु मिथ्याहऐनानाजीवापेक्षा एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टेनानाजविापेक्षया जघन्येनेक समय । उपेण पल्योपमासख्येयभागः। एकजीव प्रति नास्त्पन्तरम् ॥ असंयतसम्यग्दृष्ट नाजीवापेक्षया जघन्यनेक ममय उत्कण मासपृयक्त्वम् ।। एकजीव प्रति नास्त्यन्तरम् ॥ सयोगकेवलिना पतुर्णाम् ।। (आहारकों में) चार (अपूर्वकरण-अनिचिकरण-महमलोम-सीणकपाय) अपमाणाम् || १ सयोगकेवलीनाम् ।। चपकमणीवाले और सपोगकेवलियोंका (विरहकाल) सामान्यवतक संक्षेप (प्रकरणमें पहिले कहाहुपा गुणस्थान) सघश है अर्थात् हारकर्मि चार धपकभणीवालोंका अन्तरकाल अनेक जीवकी अपेक्षासे जघन्य एक समय है उत्कृष्ट छा मास है । एक बीवके लिये अन्तर नहीं है आहारमि सयोग फेवलियोंका नानाजीव और एक जीवके प्रति अन्तर नहीं बनाहारकपुश मिप्यारटेः । नाना-जीव-अपेषया ॥ =(अनाहारफोमें) मिथ्यादर्शनयालेका अनेक बीवकी अपेक्षासे पएफ जीप-अपेसया ॥ नश्यस्ति अन्तरम् ॥ और एक जीवकी षिक्षासे अन्तर (काल) नहीं है सामादनसम्पर ॥ नाना जीव-अपेक्षया =(अनाहारमि) सासादनसम्पम्दर्शनवालेका अनेक जीक्की अपेधासे जघन्येन । एक. । समयः । उत्कर्मेण । पत्य =जवन्पकार एक समय है। उत्कृस्करि पन्यके उपम-असस्पे भाग । एकजीर्ष । प्रतिक - असंख्याता माग प्रमाण (- उपम) है । एक जीवकी अपेक्षासे न अस्ति अन्तरम् ॥ असंयवसम्पमहे' अन्तर नहीं है । (अनाहारकोंमें) असंयमी सम्पन्दृष्टीका (विरहकाल) नानाजीव-अपेक्षया ॥ अघन्येन । एक' । समयः ।। अनेक जीवकी अपेक्षासे जघन्यकरि एक समय है उत्कग । मास-पषपत्वं ॥ एकरीव ।। उत्कएफरि तीन से ऊपर नौ से नीचे (-पृथक्त्व) मास है एफ जीवकी प्रतिश्न अस्ति अन्तरम् ॥ सयोगकेवलीनाम् । - अपेक्षासे (=प्रति) अन्तर नहीं है ।(अनाहारक अवस्थाम) सपोगकेवलियोंका - SONGa पटानिवासी अंगरूपसंहाय वकीलपतफ्रमोद और विमफ्त्यार्थ सहित सवामिविका शम्मा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ ख ४ नानाजीवापेक्षया जघन्येनेक. समय । उत्कर्षेण वर्षपृयक्त्वम् । एकजीव प्रति नास्त्यन्सरम् ॥ अयोग- केवलिना नानाजीवापेक्षयाजघन्येनेक समय । उत्कर्षेण पण्मासा । एकजीव प्रति नास्त्यन्तरम् ॥अन्तरमवगतम् ॥ भावो विभाज्यते ॥ स द्विविध । सामान्येन विशेषेण च ॥ सामाम्येन तावत्-मिथ्यादृष्टिरित्यौदायको भाव । सासादनसम्यग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः ॥ सम्यस्मिथ्यादृष्टिरिति क्षायोपशमिकोभाव ॥ नानानीक अपेक्षया: जपन्पेन : एक समम ।। (जन्सर काल) अनेक जीव की अपेषासे अपन्यकरि पक समय उत्तरेंग। वर्ष पपस्वम् ॥ एकवीयम् । -उसकरि तीनसे ऊपर नौसे न्यून (पचास्त्र) परस है ॥ एक जीप के प्रतिक न अस्ति मन्तम् ॥ भयोगफेवरिनाम् । पलिये रिह काल नहीं है। (अनाहारकों में) अयोगकेवलिमों का नानाजीव अपेक्षया ॥ वपन्पेन । एका । समयः ।। मन्सरकाल) अनेक जीप की अपेक्षा से नपन्यकरि एक समय में उरफम ।। पमासाः। एबीपम् । प्रति अन्तरम् ।। -उस्कृरकारि छा मास है । एक बीक्की अपेक्षा से अन्तर न अस्ति T अन्तरम् गवगवम् ।। नहीं है ॥ अन्तर (का कपन) बाना अथवा प्राव हुमा । भागः: विमाष्पवेद स विषिष। सामान्पन ॥ -भाव (प्ररूपमा) प्रारंभ की जाती है । सो माव दो प्रकार संमेप से विश्वेपण । प सामान्येन ॥ सारतक चौर (-च) विस्तारकार है। संक्षेपसे प्रथम (सावत) मिप्याटि: इतिक योदपिका , मात्र "मिप्यापटि तो औदमिक माव" क्योंकि यहां मिथ्यात्व का उदय सासाइनसम्पगसि । इति पारिनामिक, मावा ।। -सासादन सम्पगष्टी पारिगामिक माव है अर्थात सासादन दूसरे गुणस्थान में दर्शनमोहका उदय, उपशम, प, समोपशम नहीं होती। सम्पदिममारष्टिः । इति पायोपशमिका । माषा-सम्पम्मिप्यारष्टि यह सायोपशमिक मावई (स्पोंकि यहां दर्जनमोरकी सर्वपाती मिथ्यात्व प्रकृति का यामाषीलय और उपचम तथा सम्पास्व मिप्यास्व का उदय रहता है। देखो बी को गाया ११कीम सं. टीका (१) मिप्यास्व गुमस्थान से मविरत मम्पपरत पुषस्थान तापनि मोह की अपेक्षा से भावो का मन बामना चाहिये। ( शन पर मारो निमित्त कर्म सबसपना रख (फल) देता है वो दरो पर ऐसो मात्माके भाष रोते रेनौषतिमा एटानिवासी वगरूमसहाय यकीन कर पदम्मेद और विमपर्य सहित सार्वसिदिका नशा हिंदी अनुपाद । अभार १८ असयतसम्यग्दृष्टिरिति औपशमिको वा क्षायिको वा क्षायोपशामिको वा भावः ॥ उक्तं च मिच्छे खलु । आदइओ विदिए पुण परिणामिओ मावो । मिस्से खओवसमिमो अविरदसम्मम्मि तिष्णेव ॥१॥ असंयत-सम्पग्रटिश इति औपीमिका वा: =अविरत सम्पग्थ्टी यह बौपशमिकमाव सहित है मपात दर्शनमोहफे उपक्षम होनेसे (-उदयनहोनेसे) मास्माके दर्शन गुणकी विशुदवा है यापिका पास अक्या शामिक माव सहित रेस्मोंकि दर्षन मोहका सर्पचा नाश होने से आस्मा के दर्षनगुपकी मत्यन्त विशुद्धि होजाती है पायोपश्चमिक । वा मावा या पायोपष्ठमिकभाष सहित है अर्थात् मिथ्यात्व सम्पपस्वमिथ्यास्व और सर्वघाती प्रतियोक उदयामाषी धप (-उदयमें आकर-फलनदेकर खिरखाना)और उपक्षम होने से क्या देशपाति सम्पमस्व के उदय होन से दर्शन मोह का बायोपशमी उकम्प (*सा कि निम्न लिखित गाषा में) कहा मी है मिच्छ कल (-मिशासgo-मिप्यास्वे मालक) अमिप्यास्त्र ( पृथम गुणस्थान) में निपमसे (-खस) या " पूकटपन " (-खलु) ओवाजो (-मोदइयो। -जौदामिक ) औदपिक (-कर्मफे उदयसे मात्माफे वो परिणाम हों सो भाव) होवा विदिए पुण (-विदिप,पुण-नितीयेश पुना०) और (-पुण) इसरे (सासादन गुणस्पान) में पारिवामियो(-परिवामियो। -परिमाविका ) पारिणामिक (जिसमें कर्म के उदय उपचमादिक की कुछ मी अपेक्षा न हो सो । मावो ॥ मिस्से (=मावो मिस्से-मावामिभाव या परिपाम होता है। मिम मक्वा सम्पम्मिथ्यात्व (तीसरे गुणस्पान) में सोममगित्रो (= खोपगमियो,। =वापोपपमिक) क्षायोपश्चमिक (सर्वपाति स्पर्मकों के पर्गमान निपेकों के विना फल दियेही निर्मरा होनेपर और उनही सर्वघाति स्पर्षकों के भगामि निपकों के सदवस्था रूप उपासम होनेपर और देश पाति स्पर्धकोंक उदय पर मारमा का) मान होता है। अपिरद- (अपिरद- = अविरत- ) -अविरत भयका मसंपस सम्मम्मि (=सम्मम्मि॥ =सम्परत्वे॥ ) सम्पदर्शन (चतुर्थ गुपस्थान) में विपेव (=विष्ण+एष प्रपः । एव०) -चीनों (ौपचमिक माव, सायिक माघ, बायोपश्चमिक माव) ही होते हैं (१)जैसे मखिम बस में निर्ममी ना फिलकड़ी सबने से वह नीचे बैठ जाती है और कार से जम निर्मम हो जाता है उसी प्रकार कि उपशम SAR । . एनियामी जगम्पमहाय यकील न पदच्छेद और विमपर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अनश हिंदी अनुवाद | अभ्याय ' मूत्र ८ अमर्यत पुनरौदयिन भावेन ॥ सँयतासयत प्रमत्तसयतोऽप्रमत्तसयत इति च क्षायोगशमिको भाव ॥ चतुर्णामुपशमकानामित्यौपशमिको भाव ॥ चतुर्यु क्षपकषु सयोगायोगवारिनोश्च क्षायिको भाव ॥ विशेषण (१) गत्यनुवादेननरकगो प्रथमाया पायव्या नारकाणा मिथ्पाचा यमयतमम्यग्दृष्टचन्तानां असंयते । पुनाम्यौदामिकेन । मावेन । और (यहां चौथे गुणस्थानमें) असंपतपना है सो औदायिक मापसे है सयतासंगत ।प्रमत्तमयत । अप्रमत्त देश संयतगुणस्थान प्रमसर्मपत गुणस्थान और अप्रमत- संयन' । इति धायोपशमिकः । माव ।। सपत गुणस्थान वालोंक धायोपशामिक माव है" चारित्र मोह विशेप का धमोशम (होने से) चतुर्णाम् । -चार (अपूवकरण अनिवृत्तिकरण-सूक्ष्मसापराय उपांतस्त्राय) उपसमकानाम् । इति औपत्रमिकः । मावः ।-उपशमपालकि औपशमिकमाव ह (चारित्रमोहका उपशम होने से) चतुप । धपकेषु ॥ चार (अपूर्वकरण से धीमपाय सक) सपफ अपी में (चरित्र मोह धपसे) पसयोग अयोगपसिनो ॥सायिक ।। मावः ।और (घ) सयोग अयोगकेवलियों में (मी) क्षायिक भाव है विशेपेण । (१) गति-अनुपादेन । नरकगतो , विलेपकरि (१) गतिके कानानुसार से नरफ गति में मधमायाम् पापिष्याम् ॥ नारकागाम् ।। मिष्या--पहिली ममि (नरक) में नारमियोंके मिथ्या दि-आदि अपतसम्पग्दष्टि-अन्तानाम् ।। दर्शनवाले से असंयमी सम्पगदर्शन वाले पर्यताका (0 मसंपतमम्पनष्टौ मम्मवतो ऽ सपतत्वस्पोदपिकावं प्राहा मसपतत्यस्प धारिष मोहावय हेतुस्पात् । अर्मपत मम्पनरों • असपतत्वस्य : मम्मपता. असंयमी सम्पदर्शनयाले में मसंयमपना के (मम्मव) होने से औषयिकस्य५ In Fभादु' T मसंपतात्वस्य । = मौदयिकमारका (कारण) बतलात है (क्योकि) असंयम का हाना पारित माह उदयतुत्पात : = चारित्र माइमाप उच्य हाने (फ हतु ) सरे भावाथ पर है कि धोये गुणस्याम में मौवपिक मायके कारण समीम होता है क्योंकि पाचारित्र मानीपधर्म मम पारगम पाण का उदय है (२) यहाँ ममातः असंयवस्व के मर्प में है। (३) परिणो मरत गुस्थाममे सीच काय पाहा गुणस्थान तक पारिन मोहमीपर्म को पमा में पा करन किा है।

एटार्नवासी जगरूपसंहास बीसकृत पदच्छेद और विमक्स्पये साहत सर्वार्थसिद्धिको सपना हिंदी अनुवाद । अपाप र ८ सामान्यवत् ॥ द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्याष्टिमामादनसम्यग्दृष्टिमम्पमिथ्यादृष्टीना सामान्यवत् ॥ असयतसम्यग्दृष्टेरोपशमिको वा बायोपशामिको वा भाव । असयत पुनरोदयिकेन भावेन ॥ संक्षेप (प्रकरम पहिले कोहुये गुणस्थान) सरश (माय) हैं अर्थात् मिप्यारष्टि सामान्पवत् नारमियोंके औदायिक भाव है। सासादनसम्यगष्ट नारकिर्यांके पारिगामिक भाव है । मियगुणस्थानवी नारकियोंके क्षायोपामिक भाव और असंपन सम्पग्रष्टि चतुर्थ गुणस्थानी नारफियोंक औपशमिक वा तायिक अषया क्षायोपशगिक भाव है द्वितीय आदिए । वा-सप्तम्मा मिप्यारष्टि दूसरी (ममि) आदिमें सार्वी भूमि)तक (=आ) (छैनरकामे) मिभ्याइरानवाम्मे सासादनसम्पम्दृष्टि-सम्मम्मिप्यादृष्टीनाम् ।। =सासादनसम्पम्दर्शनवाले और मिभगुणस्थानवी (नारकि) निक सामान्य =संक्षेप (विषयमें परिले करेहुये गुणस्थान) सदृश (माव) हैं अर्थात् दूसरे नरकसेलेकर सातवे नरक कके मिथ्यादर्शनवाले नारकिर्लोक बोदपिक माव है उक्त महों नरकमि सासादनसम्पम्दर्शनषासे नारकियोंके पारिवामिक माव है और इनही छ. नरकोंके मिमतीसरे गुणस्पानी नारकियोंकि धायापशमिक भाव है (देखो ठ २७८) असमतसम्पदृष्ट । = (दूसरे नरक से सातवां नरक कके) असपमी सम्यग्दृषि (नारकी) क ओपयमिक । वा बायोपसमिका पा माय - औपशामिक वासायोपशमिक मावहै। (नारकियोंके पथमसे चौथतक गुणस्थान) ) पुन: =और (इन दूसरे नरकसे सातवा नरक सकक असयमी सम्मकृष्ण चौथ गुणस्थानपीनारकियाँके) मसयतः ।। औदमिकेन ।। मावेन । = असंयतपना औदयिक मायकार है ॥

एटानियासी जगरूपसदाय पीलात पदपर गौर विमस्पर्ष सहित सर्विसिद्धिका सम्पमा दिदीभनुवाद अध्याय १ सय ८ तिर्यग्गतौ तिरां मिथ्याएयादिसँयतासंयतान्तानां सामान्यवत् ॥ मनुष्यगतो मनुष्याणा मिथ्यादृष्टचा घयोगकेवत्यन्तानां सामान्यवत् ।। विर्यगतो विरमाम् ।। मिप्यारस्बिादि-संपता सिर्यपगतिमें तिर्यचों के मिप्याशी से संगमा मपत-अन्नानाम् । सामान्यक्रम संममी कहानि ( माप ) संक्षेप (विपप में पोक गुमस्थान ) सदृश भाव मिथ्यास्य गुपस्पानवाले तिर्यचों के गोदायिक मात्र है॥ सासादन गुणस्थान- पती तिर्थयों के पारिवामिक माक है। मिश्रगुणस्थानवती तिर्यफिमायोपमिक भाव है। संक्त सम्पम्दृष्टि चतुर्थ गुणस्थानवी तिपचों के मौपश्चमिक वा सायिक वा पायोपशमिम भाव है। संयमासपमी तिपचों के क्षायोपशामिक भाव है (देखो पृष्ठ २७८ से २८०) तिबंध गतिम मिप्यान्व सेसंयतासक्त तफ पांच ही गुणस्थान होते है मनुप्रगतौ ॥ मनुप्पानाम् ।। मिप्यास्मिारि मनुष्यगति में मनुष्यों के (भाव) मिथ्याष्टीसे सेकर (आदि) भोगवलि मन्तानाम् ।। सामान्यरत भयोगकेवलियानिके संक्षेप (विषय में पूर्वोक गुणस्थान) सदन (भाव) अपांव मिप्यारटी मनुम्मों के औवकिक माव है। सासरन सम्पम्वनवाले मनुष्यों के पारिनामिक मार है। मिथ गुणस्पानी मनुष्यों के धापोपचमिक माव है। असंचमी सम्पग्टी मनुप्पोंक औपसमिक पा साविक पालापोपसमिक भाव है।। संपमासंयमी से अप्रमच संपमी तक सामोपचमिक मायापार उपसम मेथी वासों के प्रोफ्लामिक माव है। चार सपा मेणियों और सोग और भयोग फेवलियों के धाषिक मात्र है (देखो पठ २७८, २७९, २८.)॥ मनुप्पों के सर्व चौदा गुणस्थान रोव ॥ LEARNAL एटानिवासी जगरूपसहाय की तकृत परछेद और विमात्पर्य सहित सर्भिसिद्धिका प्रदान हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र ८ देवगतो देवाना मिथ्यादृष्ट याद्यसंयतसम्यग्दृष्ट पन्ताना सामान्यवत् ।। (२) इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकले न्द्रियाणामोदयिको भावः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टयाधयोगकेवल्यन्ताना सामान्यवत् ॥ देषगतो ।। पेवानाम् । मिथ्याष्टि-बादि-असंपत- =पेक्गतिम पेषोंके मिथ्यावृष्टिसे बसंयमी सम्पम्दृष्टि अन्तानाम् । सामान्यक्त. • सम्मम्मनपालेककनि सक्षेप (पिपमें पर्पोक्त गुणस्थान) सम (भाव) हैं भात मिप्याटि देवोंके औदायिक भाव है । सासारन इसरे गुषस्थानी देवकि पारिमामिक भाव है। मिश्रगुणस्थानपती देवों पायोपथमिक भाष है। असस्त सम्परटी देवकि औपशमिक पा धामिक पा धामोपचामिक माष है ॥ देवों के प्रथम से चौथे तक चारही गुणम्पान हैं। इन्द्रिय अनुपायेन : एकेन्द्रिम -(३) इन्द्रिमके कथनानुसारकरि एकेन्द्रियगासेखीव और मिकल मन्द्रिपानाम्।। औदमिक-माव' -विकल (दो-तीन-चार) इन्द्रिपघारक जीकि औदायिक भाव है पञ्चेन्द्रियेषु । मिप्यादृपि-मादि- भयोगकेपलि -पांचन्द्रियवाले बीयमि मिथ्यादृष्टिसे अयोगफेवली अन्तानाम् ।।मामान्म-पर- - पर्वतोंका संक्षेप (प्रकरममें पूर्वोक्त गुणस्थान) सदृश (भाव) हैं अर्थात मियादृष्टि पंचेंद्रिय बीबकि मौदपिक माष है।। (सासाइनसे अयोगीतक के पांचों इन्द्री होती हैं मत इन्द्रिय अन्द लिखनेकी भापश्यकता नहीं है) सासादन सम्पन्दृष्टिके पारिणामिक भाष होताहै। मिभगुणस्पानातीके धायोपसमिक मावहै । असपत सम्पम्वृष्टीके ओपनमिक वा धाफिक वा धायोफ्यमिक मापौ । देवसंपतसे अप्रमयसयतवफ वामोपडमिक भाषी चार उपभमभेभीवालोंके औपश्रमिक मावो । पार पपकर्मभीवालोम और सयोगकेवली- अमोगल्यालयों के क्षायिक माष है। (देखो पाठ२७८से २८० तक) ।

पटानियासी जगरूपसदाय पीलकृत परछेद वोर विमक्स्पर्ष सदिव सांयेसिधिका सप्पः हिदीजनुवाद अभ्याप १ सय ८ तिर्यग्गतो तिरश्चां मिथ्याहयादिसँयतासयतान्तानां सामान्यवत् ॥ मनुष्यगतो मनुष्याणा मिथ्यादृष्टया द्ययोगकेवत्यन्तानां सामान्यवत् ॥ तिमाहौ। विरमाम् ।। मिप्यारस्चिादि-संवता तिगतिमें विर्यषों के मिप्याटी से संपमा मंयत् अन्तानाम् । सामान्पक्तक संयमी तकनिके (माव ) संक्षेप (विषय में पूर्वोक गुणस्थान ) सदृषी वर्षाव मिथ्यास्व गुमस्थानवाले विषयों के मौदायिक भाव है। सासादन गुणस्मान- ची तियचों के पारिपामिक माष है। मिझगुणस्थानवर्ती तिर्यचकिमायोपशामिक माव है। संवत सम्यम्वृष्टि पार्ष गुणस्थानवर्ती नियमों के औपश्चमिक का सायिक पा धागोपशमिक माप है। संपमासपमी तिपचों के धायोपश्चमिक भाव है (देखो पृष्ठ २७८ से २८०) तियच गतिम मिध्यान्य सेसंयतामयत म पांच ही गुपस्पान होते मनुप्पगतो। मनुप्पामाम् ॥ मिप्याष्टिमारि अनुप्राप्ति में मनुष्यों के (भाष) मिथ्यारष्टीसे लेकर (मादि) प्रयोगकेसि अन्वानाम् । सामान्यरत अयोगमस्तिकनिक संक्षेप (विषय में पूर्वोक्त गुणस्थान) सरस (भाव) वर्षाव मिथ्याटी मनुष्यों के मौदपिफ भाष है। सासादन सम्पदर्शनवाने मनुष्यों के पारिवामिक माव है। मिथ गुमस्थानवी मनुप्पों के बापोपथमिक मार है। असंयमी सम्पग्रटी मनुषों औपचमिक पा सायिक वा सामोपसमित भार है। संपमापंयमी से अप्रमच संपमी कसायोपथमिक माव।पार उपथम श्रेणी वालों के प्रोपनामिक माव है। चार धा भेनियों के गौर सपोम और भयोग- वलियों वायिक भाव । (देखो पृष्ठ २७८, २७९, २८.)। मनुप्मों के सब चौदह गुनस्थान होते हैं। XU एटानिवासी मगरपसहाय लोकत पाद और मिक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिद्रिका शम्दा हिंदी अनुवाद । अवाय १ सय ८ (५) वेदानुवादेन- स्त्रीपुनपुंसकवेदाना मववेदानां च सामान्यवत् ॥ (६) कपायानुवादेन-क्रोधमानमाया लोभकपायाणामकषायाणां च सामान्यवत् (७) ज्ञानानुवादेन- मत्यनानिश्रुतामनिविभाज्ञानिनां मतिश्रुतावाधम- न पर्ययकेवलज्ञानिनां च सामान्यवत् ॥ (५) वेद-अनुपायेन ।ती-पुम्-नपुंसक वेदानाम् ।। 3(५) वेदके कपनानुसारसे स्त्री पुरुष नपुंसक वेद वाले (मीप) निके प०अवेवानाम् । = और वेदीत जीत (एमसापरायसे अयोगावली गुमपान पती) निके सामान्यक्त संक्षेप (प्रकरणमें कदाहुआ गुणस्थान) सदृश (भाष) है अर्थात मिथ्यास्पमें और पिक मारे। सासादनमें पारिणामिक। मिभमें पायोपश्चमिक । बसपमें औपसमिक पा धापिक वा पायोपसमिक है । संपवासंक्तसे मप्रमचक्क धामोपचमिक माव है। चार उपझमक के औपचमिक माव और चार धपक्के, सयोगकेवलि वयोगकेवसिकिं धामिक मावहै । (२७८से२८०) (६) कवाय-अनुवादेन । भोप-मान-मागा-सोम-सा • (६) सापकी विस्था से कोषमान कमट (माया) लोम कलाम याणाम् ।। पलायनाम् । पातोंके और (घ) कापनर्मित (उपशावकशापसे अयोगमवली सक) निकम सामान्यरत -संक्षेप (पूकरणमें पहिले बाहुआ गुभस्थान) सदृश (8 २७८ से २८०) [७] मान अनुवायेन । मतिमानि भवानि मानके कपनानुसारकरि कुमतिमान अमान विमासानिन । अप्तिान [ये सीन मान मिथ्यात्व, सासादन गुणस्थान से और चीन मान तीन मति-पत-मवकिसान-मिश्वसम्पम्मिप्पास्व वाले] पक्ष्मवि-धन-अषधि =और [-च] मति भत-अवधि [असंपतसे क्षीण काय ती] मनापर्पप-कासमानिनाम् । • मनः पर्पय [ पूमच संपमीसे सीममाय वाले ] और फेवल हानि निमें 2 सामान्य पत्र *संप पुकरणमें पूर्वकषित गुणस्यान] सदृश मार विसो२८५ पंक्ति से१३] .

माप है पटानिवामी जगम्पमहाग पीलकृत मच्छेद और विभक्त्यर्थ सहिन सर्वार्थसिद्धिका सम्दश्च हिंदी अनुवाद | अध्याय १८ [३] कायानुवादेन-स्थावरकायिकानामौदयिको भाव । त्रसकायिकाना सामान्यमेव ॥ [४] योगानुवादेन- पायवाड्मानमयोगिना मिथ्यादृष्टचादिसयोगकेवल्यन्तानामयोगकेवरिना च सामान्यमेव ॥ [[काप अनुपादेन । स्थावर -(३) कायके कथनानुसारकरि स्पावर (पथिवी-अप्-तेजो वायु-वनस्पति) कापिकानाम् ।। त्रोदायिक । माव' । यस - कायिकोंके बोदयिक भावहै । वस (अर्थात् चलने फिरने वासे) कायिकानाम् । सामान्यम् ॥ एषक - कापधारी (जीव निक संक्षेप (विपय में पूर्वोक्त गुणस्थान) सदृश (- एव) अर्थात् मिथ्यादृष्टी जीव स्पाषर मी और प्रस मी हैं उन दोनोंक औदपिक । दूसर से चौदहा गुणस्पान सक त्रस पम्पेन्द्रिय नीव है ।। उन में सासादन सम्यग्दृष्टीके पारिगामिक माव ह । मिश्रगुणस्थानपीके शायोपश्श्रमिक भाव है । असंयत सम्पन्दृष्टीके औपसमिक सायिक या क्षायोषधष्कि माष है ।। संपतासंयत से वप्रमच संयत तफ धायोपामिक माव है। चार उपक्षमभेदी वालोंके औपशमिक भाव है। चार धपकोणी घालों के, सयोगकेवलियों और अयोगकालियों क धायिक भाव है ( देखा पृष्ठ २७८ से २८० तक) [0] योग अनुवादेन । काय-पान मानस पोपिनाम् ।। =मोग की अपेक्षा से फाय-वचन-मनोयोगीनिक मिध्यापि आदि-मयोगवति-अन्वानाम् ।। १ मिथ्यादर्शन वाले से सयोगकेवली पर्पतों का और (च) भयोग-वलिनाम् । सामान्पम् ॥ पव. =अयोगकेवलियोंका संक्षेप (प्रकरण में पूर्वोक्त गुमस्थान) सदृश (एव) । अर्थात् मिथ्यास्यमें औदायिक माव है । सासादनमें परिणामिक है। मिश्र धायोपश्चमिक है। असंयतमें औपञ्चमिक, वा क्षामिक या क्षायोपशमिक है । वेशपतीसे अप्रमच, तक धायोपसमिक। चार उपचमको औपचामिक है। चार सपकोंक, सगोग- अयोग कवलियोंके क्षायिक माव । (पृष्ठ २७८-२८० तुक देखो) - एटानिवासी जास्पसहाय पकीकृत पदच्छेद और पिमक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिदिका सम्पन्नः हिंदी अनुवाद । अमाय १ ख ८ (१०) लेश्यानुवादेन-फालेश्यानामलेश्यानां च सामान्यवत् ॥ (११) मन्यानुवादेन भन्याना मिथ्यादृष्टचा- ययोगक्वल्यन्ताना सामान्यवत् । अभव्यानां पारिणामिको भावः॥ १ (१०) सेश्या-अनुवादेन । पर = (१०) लेन्याके कपनानुसारकरि है (रुण नील-कमोस पीव-पब-अम) सेश्यानाम् ॥ १० असेश्यानाम्।। = सम्पावालोंके और लेश्यारदित (अयोगकेवति)नि (भाव) सामान्प-वत् = संक्षेप (प्रकरण पहिले कमासे गुणस्थान) समान है अर्थात् छोलेल्या मिप्पास्व-सासादन मिभ-असयत गुणस्थानोंमें है यहां क्रमसे औदापिक-पारिणा मिक-शायोपश्चमिक और बौपठामिक-सापिक-शामोपनमिक माव । पीत- पत्र शुद्ध लम्पा देशविरतसे अप्रमच तक पहशायोपशामिक माष है। शालेल्या चार उपनमक में कहा औपसमिफ मावहै। शुक्रलेश्या पार क्षाफा के भौर सयोगकेवली-अयोगफलीको वहां क्षायिक माव है।। (११)मष्य अनुवादेन । मव्यानाम् ! मिप्पादृष्टि-आदि- = (११)मन्म जीवोंकी अपेक्षासे मव्योंके मिष्मादृष्टिसे अयोगवति-अन्तानाम् ।। सामान्यक्त अयोगकेवली तकनिका संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक्त गुणस्थान) सम भाषौ अर्थात मिथ्यात्व गुणस्थानमें जौदायिक भाव । सासादनमें पारिनामिक है। मिभ- में शायोपशमिको असपतमें गोपामिक, वा क्षायिक पा क्षायोपनामिकी सपनासपतसे अप्रमथक्क क्षायोपशमिक पार उपचमको औपचामिक है। पार शाफक के और सयोगकेवली-अयोगकेवतियों के वाकि माव। ममन्मानाम् । पारिमामि । भाषः । अमोके पारिपामिक मार (षो भाव जिसमें धमकी कुछमी अपेधा नहीं) माया धमन्यस्व पर्मकी मुस्पतासे पारिभामिक पर मिथ्यात्वकी मुमवासे बौदपिकही है।

न एटानिवासी जगत्मसहाय वकील रुत पदच्छेद और विभपर्व सहित स्वार्थसिद्धिका अम्दशा हिंदी अनुवाद । अन्याय १८ (८) संयमानुवादेन-सर्वेषां सैंयतानों सँयतासँयतानामसँयतानां च सामान्यवत् (९) दर्शनानुवादेन-- चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनावषिदर्शनफेवलदर्शनिनों सामान्यवत् ॥ - [८] संपम-अनुवादेन । सर्वेषाम् ॥ संवाना । (८) संयमके कमनानुसारफारि सम संपनी (प्रमपसे अयोग फेवली) निका संपतासंपतानाम् । च. असंयनानाम् । = देशसंपमियोंका और वसंममी (मिथ्याक्से अविरत गुगस्थान तक) निका = (भाव) मेसेप (प्रसंगमे पहिले राहुभा गुणस्थान) कृषी वर्षाद सागान्यवत मिथ्यात्य गुणस्थानमें औदविकमार है। सासादनमें पारिणामिक माव है। मिश्र क्षायोपक्षमिक है। असमतमें औपशमिक वा क्षायिक वा सायोपशमिक है। संपतासससे अप्रमतक लायोपशामिक, घार उपसमको औपशमिड, पार आपकके, सयोगकैवलि, अयोगवलियों के सायिक भाव है। [९] दर्भन अनुवादेन । पार्दन अपभुर्दन = (९) दर्शनकी अपेक्षासे चक्षुर्दर्शन और जनार्दन वालोंके (ये दोनों मिथ्यात्व प्रथम गुणस्पानसे क्षीणकमाय गुणस्थान तक १२ महोते हैं) अवधिदर्शन = भरपिदर्शन (असंयतसे धीपकपाप गुणस्मान तक) निके (भाव) स्क्लवमनिनाम् ग = समसदनमासे (सयोगफलली और अयोगफेमसी) निके (माव) सामान्य-पक = संसेप (प्रकरणमें पहिसे फराये गुणस्थान ) सदृश है अर्थात् सम्वशः वही मात्र प्रत्येक गुणस्थानमें पदलो जो इस पृष्ठकी पंक्ति साक्से दवा दिया है। ११) सामायिक-मोरोपस्थापना हो ससम प्रमत, सम्मानपूर्वकरप, मनितिकरण गुनस्थानमि होते है। पपिार पिशुचि संपम प्रमाचा अम्मत्त गुपरणोंमें होता है। सम्ममाम्पपप संगम सक्ष्म माम्पराप गुपस्थानमें होता है। यथास्पात सपम उपविभाव, सीमापार मपोगकेवमी, मयोमकेवली गुपस्पाना होता है। संपमासंपम देशरिरव गुणस्थानमें ऐसा है मौर असमम मिधारय, मामाइन, मिल और मर्मपत गुपस्थानाम दावा है ।। - एटानिवासी उगस्पसहाप कीलकृत पदच्छेद मोर पिमस्पर्ष सहित सर्वार्षसिद्धिका सम्बधा हिंदी अनुमाद । अमाप १८ (१०) लेश्यानुवादेन-परलेश्यानामलेश्यानां च सामान्यवत् ।। (११) मन्यानुवादेन भन्याना मिथ्यादृष्टया- द्ययोगक्वल्यन्ताना सामान्यवत् । अमव्यानां पारिणामिको भावः। (१०) लेश्या-अनुवादेन । पर = (१०) सेश्याके कथनानुसारकरि है (रुपनील-सोत-पीत-पम-सस) सेश्यानाम् ॥ १० मतेश्मानाम्।। = तेश्यावालोंके और लेश्यारहित (अयोगकेवति)नि (माव) सामान्प-क्तक = संक्षेप (प्रकरणमें पहिले काहुये गुषस्थान) समान । अर्थात् छोलेना मिप्पाक-सासादन मिभ-असंमत गुणस्थानों में पदो क्रमसे और पिकमारिषा- मिक-शायोपश्चमिक और बौपशामिक-सायिक-सामोपत्रमिक माव हैं। पीत- पब शुल लेश्मायें देवक्रितसे अप्रमत्त को परीक्षामोपशामिक भाव है। शालेया चार उपक्षमा में मां भोपामिक भाषौ । शुनतेश्या पार शफक के गौर सयोगवली-अयोगकसलीके है यहां क्षायिक भाव है। (११)भव्य-अनुवादेन ।। मव्यानाम् ।। मिथ्पादृष्टि आदि- = (११)मन्य जीवोंकी अपेक्षासे भन्यों के मिथ्यादृष्टिसे जयोगकेवलि अन्वानाम् । सामान्नस्तक अयोगकेवली तकनिका सपै (प्रसंगमें पूर्वोक गुणस्थान) सम भावद वर्षाव मिथ्यात्व गुणस्थानमें औदायिक मार । सासादनमें पारिभामिक है। मिम में शायोपशमिक है असयतमें बौफ्यमिक, वा क्षायिक पा क्षायोपशामिक है संपवासपतसे मममधवक क्षायोपशमिको चार उपशमा औपटमिक है। पार क्षापक के और सयोगकेपली-अयोगकेवलियों के धायिक माव।। अमन्यानाम् । पारिवामिक भावः । =अमव्योंक पारिपामिक माव है (पोमाव जिसमें धर्मकी मछमी अपेक्षा नहीं) मारार्थ जमव्यख धर्मकी मुस्पतासे पारिपामिक है पर मिथ्यात्वकी मुम्पवासे बौदपिछी है।

पटानिपासी जगस्मसाप यकीय कत पदच्छेद और विमक्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका अदा हिंदी अनुवाद । अन्माय १८ (८) सँयमानुवादेन--सर्वेपो सँयतानां संयतासँयतानामसँयतानां च सामान्यवत् (९) दर्शनानुवादेन-- चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनावधिदर्शनकेवलदर्शनिनां सामान्यवत् ।। [८] संयम-अनुवादेन । सर्वेषाम् ।। संपतानाम् । =(८) संपमके कथनानुसारकरि सब संयमी (प्रमपसे अयोग केवली) निका संपतामयतानाम् । १० असेयतानाम् । = देवर्सपमियोंका और बसपमी (मिप्यात्वसे अविरत गुणस्थान तक) निका = (माव) संक्षेप (प्रसंगमें पहिसे कराहुआ गुणस्थान ) सदृश अर्याद सागान्पक्तूब मिथ्यात्व गुणस्थानमें औदपिकमाव है । सासादनमें पारिणामिक माव है। मिममें सायोपसमिकरे। असंयतम औपसमिक वा धापिक पा सायोपामिक है। संपतासंतसे असमस्तक सायोपसमिक, चार उपशमकके जोपसमिस, चार अफ्रके, सयोगफेवलि, अयोगकेसलियोंके क्षायिक भाव है। [९] दर्शन अनुवादेन । पार्दन अषभुदर्शन = (९) दर्शनकी अपेक्षासे पधुर्वर्शन और अचधुर्दर्शन वालोंके (ये दोनों मिथ्यात्व प्रथम गुणस्थानसे क्षीणपाप गुणस्पान तक १२ महोते हैं) अवषिदर्शन = अपपिदर्शन (असंफ्तसे धीणकपाप गुणस्थान क) निके (मार) पलवसनिनाम् ॥ - मेक्सदर्शनपासे (समोगकेक्सी और अयोगफेवली) निके (मार) सामान्प-पत्क = संक्षेप (प्रकरणमें पहिले फोहुये गुणस्थान ) सदृश में मर्धात् अम्वनः वही माष प्रस्पेक गुणस्थानमें परलो जो इस पृष्ठकी पंक्ति सावसे दशक्क दिया है। (१) गामापिक-पापल्याफ्ना दो सम प्रमत, मममच, मपूर्वकरण, मनिपत्तिकरण गुवस्थानोंमें होते हैं। परिहार पिशुचि संपम प्रमा अभमत्त गुणस्पोंमें होता है। साममाम्पपप संपम साम माम्पराप गुणस्पान होता है। पथारपाव सबम उपर्णतणाव, सीमार मयोगकेवमी, नयोगकेवमी गुणस्पानोंमें होता है। संपमामपम देशपिरत गुमस्थाममें होतामौर मसपम मिष्पारण, मामादन मिल मोर असंपत गुपयानों में होता है।

HERA प्रगनिवासी जगरूपसहाय पील कृत पदच्छेद और निमस्पर्य सहित सर्विसिदिका शम्दमा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र ८ क्षायोपशमिको भाव । क्षायोपशामिक सम्यक्त्वम् । अमयत पुनरोदयिकेन भावेन ॥ सयतासयतमम ताप्रमत्तसंयताना क्षायोपशमिको भाव. क्षायोपशमिक सम्यक्ताम् ॥ ओपशमिकमम्यग्दृष्टिपु असंयतसम्य ग्रोपशामको भाव ओपशमिक सम्यक्त्वम् । असयत पुनरोदयिकेन भावेन ॥ सपतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंय तानां क्षायोपशमिको भाष । ओपशमिकं सम्यक्त्वम् ।। धायोपसमिकः । माका । घाघोपत्रमिकम् ॥ =धायोपत्रमिक भाव है ( सो तो) सायोपत्रमिक सम्पत्तिम् ॥ असंयतः पुन' - सम्पम्दर्शन है । और (=पुन') असंपत्पना (-असंयता असंयतस्वम्) है औदयिकेन । भाषेनी संयत्-अर्सयस -(सो) औदायिक माक्करि है । (वेदक सम्यग्दर्शनवालों में) देशसयमी, प्रमन अप्रमय-सपतानाम् ॥ धायोपसमिकर -प्रमा और अप्रमत्त विरतियोंके पायोपसमिक मावः । सायोपामिकम् ।। सम्पपस्वम् ।। -माव है सो घेदक सम्पदर्शन है ॥ औपत्रमिक सम्पमष्टिषु । - उपशमसम्पग्दर्शनवालों में असंयत-सम्पग्रहे। गौपशमिकमायः - असंयमी सम्यग्दर्शनवाले के औपश्चमिक भाव है ओपसमिकम् । सम्मक्त्वम् ॥ पुना असंपवः। =(सो) उपसम सम्पक्स्प है और असंयमपना है औदयिकेन । मापेन ॥ -(सो) औदयिक माक्करि है ॥ (असंपतः =असंपमपना) संपप-असंमत प्रमत्त अप्रमत्त-संयतानाम् ।। (उपशमसम्पम्दर्शनवालों में) देशसंयमी, प्रमच-अप्रमच संपमियों के क्षयोपशमिक भावासम्पक्त्वम् । औपक्षमिकम् ,।।। -धायोपश्चमिक माव है । सम्पपत्र औपश्चमिक है ॥ (१) अत्र भौदायिको माघ इत्येक पाठः । औपशमिको माया इस्पेका पाठ ॥ अत्र और पिता | भाषाविप पाठा । -यहाँ औदायिक भाव है ऐमा पक पाठ है अर्थात् किसी किसी पुस्तफ फे पाटानुसार श सयमी प्रमत्तसंयमी और अप्रमत्चसामीनि भौयिक माप है। मोपथमिक मातिापक। पाठा। -मोपशमिझ माय ह पसा गौर ( -ए-रमचन्द्र काश पृष्ठ ८४ ) पाद है अर्याय इस पायनुल भोपशामक भाव है मायार्थ पसा है कि मित्र मिथ पाअनुकूल संयमासंपमियों फे, प्रमत्संपमियों के अप्रमसंयमियों के मौवायिक, औपशमिक और मायापशमिक तीनों ही माय समय गनिनासी जगरूपसहाय पकीकृतपान्छेई मौर तिमत्त्वाचे सहित सार्वसिद्धिका सम्पमा हिंदी मनुवाद ॥ अवाय १ से ८ (१२) सम्यक्त्वानुवादेन-सायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टे क्षायिको भावः । क्षायिक सम्यक्त्वम् । असंयतत्वमौदयिकेन भावेन ॥ सयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंपताना क्षायोपशमिको भावः । क्षायिक सम्यक्त्वं च ॥ चतुर्णामुपशमकानामोपशमिको भाव । क्षायिकं सम्यक्त्वम् ॥ शेषाणा सामान्यवत् ॥ क्षायोपशमिकसम्यम्ह टिपु असयतसम्यग्दृष्टः [१२] सम्परत्व अनुवादेन ! धापिकसम्मम्मृप्टिए। =(१२) सम्पदर्शन के अनुवादकरि धाषिक सम्यग्दर्शनपालों में असफ्तसम्पन्दृष्टा भाविक । मार। =" असपत सम्पादृष्टी के क्षायिक भाव तो क्षापिकम् सम्मक्त्वम् ।। मसंपसत्यम् In कायिक सम्बस्व है पर असयसपमा सो औदपिकेन । मान =ोवपिक माष करिहै" बमबंदजीकर पचनिका मुद्रित पठ ११४ । सपवासपत-प्रमच अप्रमत- (क्षामिक सम्पदर्शन वालों में) पेक्षसंगमी, प्रमचर्सयमी, भप्रमच संपतानाम् ॥क्षायोपसमिकः । माग प. -संपमिपों पायोपामिक माव है और (घ) धायिकम् । सम्परत्वम् । "सम्पत्य धामिक (सो धायिक भावकरि" जपाजी व पनिका ११५ मतुर्णाम् ।। उपसमकानाम् ।। (सायिक सम्पन्दृष्टियोमें) चार उपरम मेनी (अपूर्वकारण-अनिवृषिकरन-सामसाम्पराप उपक्षांतासाय) पालों गोषयमिक !! माना साविकम् । सम्मास्यम् नमोपचमिकमाव है । शामिक सम्परत्व (यहाँ) है (सो क्षायिक भावकरि ।। पानाम् ।। = (मासिक सम्पम्दृष्टीयमि) अवशेष (पार काफ्क मेधीवासे-सपोगी-अमोगी)निका सामान्प-क्छ -सक्षेप (विषयमें पूर्वोक गुणस्तान समान माव) है (इन सोशायिक माप) कायोपश्चमिक-सम्पन्दृसि वक्तसम्पन्दृष्टेः ।। = वेवकपम्पन्दनपालोंमें संयमी सम्पग्दर्शनाले (चौये गुणस्थानक्ती) के (१) सायिक मम्पक्स संपत पोपे पुनस्थानसे भयोमरी बौदा गुषस्थान कासाबापश्यमिक (एक) मम्माल मर्सन्त पौने गुर से मप्रमस संपत मा का। उपसममा संक्रषि गुणस्णन से पताम्बारावी लो। (स्परिक सम्परती मीच भीमेनी सामन्च %3D PRESEASONG - । पुना । एनिवासी अगरूपसहाय वकील कृत पपच्छेद और विमक्त्पर्य सहित सपर्थिसिदिका शन्दशा हिंदी अनुवाद । भन्माय १ सूत्र ८ क्षायोगशमिको भाव । क्षायोपशामिक सम्यक्त्वम् । अमयतः पुनरोदयिकेन भावेन ॥ सयतासंयतप्रम तारमत्तसंयताना क्षायोपशमिको भाव । क्षायोपशमिक सम्यक्त्यम् ।। औपशमिकमम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्य- ग्रौपशमिको भाव औपशमिक सम्यक्त्वम् । असयतः पुनरोदयिकेन भावेन ॥ सपतासयतममत्वाप्रमत्तसंय तानां झायोपशमिको भाष । ओपशमिक सम्यक्त्वम् ।। धायोपशमिका । भाषः । पायोपशमिकम् ॥ -धायोपामिक माव है ( सो नौ ) सायोपसमिक सम्परत्वम् ।। असेयत - सम्यग्दर्शन है । और (=पुन') असंयत्पना (असंपता असंयमत्वम्) है बौदयिकेन । मापेन । संपत असंयत -(सो) औदयिक माक्करि है । (पेदक सम्यम्दर्शनवालों में) देशसंयमी, प्रमन अप्रम-सपतानाम्।। धायोपश्चमिक प्रमरा और अप्रमत्त विरविमों के पायोपश्यमिक मावः , सायोपशमिकम् सम्पक्त्वम् ॥ - माव है सो वेदक सम्पदर्शन है॥ औपचमिम-सम्यग्दटिप। - उपशमसम्पदर्शनवालों में असंपत-सम्परटे । मोपत्रमिकमावा - असंभमी सम्पदर्शनपाले के औपशमिक भाव है औपरामिकम् । सम्पक्त्वम् ॥ पुन' असंयतः। -(सो) उपचम सम्पफ्त्व है और असंयमफ्ना है जोदपिकेन मायेन । (सो) योदपिक माक्करि है ॥ (असंयतः =असंयमपना) संपर-प्रसंस्त प्रमच-अप्रमच-संपतानाम् ।। (उपशमसम्पम्दर्शनवालों में) देशसंयमी, प्रमच-अप्रमरा संयमियों के हायोपशमिकः' भावः सम्परत्वम्॥ योपसमिकम् ॥ बायोपामिक भाव है । सम्पत्त औपशमिक है। (1) मप्र मोदपिको माप प्रत्येक पाठः । मोपशमिको भाषा इत्पेका पाठ ॥ अब मोदविका । माप । इति एमः पाठः । - यहाँ मौयिक भाव है ऐमा एक पाठ है अर्थात् किसी किसी पुस्तक के पात्यनुसार । सयमी प्रमचसंयमी, और मप्रमाससम्मीनिकें औदपिक माय है। मौपशमिका । मायाकिएका पाठा। -भोपशमिक माय है पसा और ( -एस-समयम्द्र कोश पृष्ठ ८४) पाठ है मर्याव इस पाउनुकूल औपशमिक भाव है भाषार्थ पसा है कि मित्र मित्र पाअनुकस संपमासंपमियों फे, ममत्वसपमियों के अप्रमचर्सयमियों के औषपिक, मौपशामिक मोर मायापशमिक वीनों ही माय समय है।

है । पटानिवासी जगरूपसंहार फेकीलकृत परम्छेद और विमस्पर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । बाप १ चित्र चतुर्णामुपशमकानामोपशमिको भाव भोपशामिकं सम्यक्त्वम् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टेः परिणामिको भाव ॥ सम्यकमिथ्यादृष्टे क्षायोपशमिको भावः ॥ मिथ्यादृष्टेरोदयिको भाव । (१३) सज्ञानुवादेनसझिनां सामान्यवत् । असझिनामोदयिको भावः ॥ तदुभयव्यपदेशराहतानां फतुम् ।। उपचमकानाम् ।। =(उपशम सम्यग्रष्टियोमें) चार उपशमभेणीवाले (अपकरण-प्रनितिकरण- पक्षमसाम्पराप-उपांतकपाय) नि औपसमिकर 1 मावा । औपठामिकम् । सम्पपलम् ॥ औपसमिक माव है । (सो) उपसम सम्यम्दर्शन है।। सासादन-सम्पग्दो पारिवामिक मावा। सासावन सम्पदर्शनवाले के पारिपामिक भाष सम्महिमप्यारोः पायोपशमिका । मावा । =मिम (तीसरे गुणस्थान) तीक वायोपश्चमिक माष है। मिप्यारा औदमिकामा [१३] सवा-अनुवादेन - मिथ्यारष्टि (प्रथम) गुणस्पानीक औदायिक भाष है (१३) सैनीकी अपेक्षासे सपिनाम् । सामान्य =सैनी (मनसहितभीष) निकै ससेप (पिस्में पूर्वोक्त गुणस्थान) सम है वर्षात मिमाष्टी सश्मिोंके औदायिक माव है । सासादनसम्पग्छष्टी सहियोंकि पारिजामिक माप है। मिभ गुणस्पनीसठियोंके धापोपश्चमिक माप है। असंयतसम्मम्वृष्टी सहिरोके औपचमिक पा धायिक वा थायोपशमिक भाव है। संपतासमतसे प्रामघवी सधियों वायोपसमिक भाव है। पार उपासमक समीयों भोपत्रमिक माव है। चार क्षपक मेणीवाने सवियोंकि पारिक भाव है। असपिनाम् ।। औदकिक । मावः ।। असमियोंके ( जो मिप्यास्त्र प्रथम गुणस्थानमें ही) मौदपिक भाष है। वद् उमय-व्यपदेशरदितानाम् । उन (सैनी-सैनी) दोनों नामोंसे पमित (सयोगकेवली-अयोगलली) निका। ११) संवीजीव मिपाल प्रथम गुरुत्पानसे सीनममप बारह तब है। मसंबो मिप्यात्व में है । सो बसशीसे रहित मपोग भयोग कमी है।

एटानियासी मगरूपसमाप वकीकृत पदच्छेद वोर विमक्त्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका भन्दशा हिंदीअनुवाद अध्याय १ सल ८ सामान्यवत् ।। (१४) आहारानुवादेन-आहारकाणामनाहारकाणा च सामान्यवत् ॥ भावः परिसमाप्त ॥ अल्पबहुत्वमुपवर्म्यते ॥ सामान्य-क्वक संक्षेप (मसंगमें पूर्वोक्तगुमस्थान) सम है अर्थात् प्राषिक माष केवलियोंके हैं (१४) भावार-अनुषादेन । जाहारकामाम् ॥ (१४) बाहारफोंकी विषधासे आहारक (जीय) निके(जो मिथ्यात्वसे सयोगी क.) चम्यन्याहारकामाम् । सामान्य वत और अनाहारकों (भाव) संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक गुणस्पान) समहै अर्थात् मिथ्यात्व गुपस्थानी आहारक नीवोंक औदमिक माप सासादनसम्पदर्शन- पाले याहारक जीवोंके पारिवामिक माव है । मिम गुमस्थान-पाले आहारक जीवोंक क्षायोपश्चमिक भाव है। असयत सम्यग्रष्टि आहारफोक बौफ्यमिक, पा पाक्कि वा सायोफ्यमिक मावहै । संयवासंपन्से मप्रमच गुणस्तानवर्षी आहारकों के पायोपश्चमिक माव है। पार उपक्षममेनी पाले माहारकोंक औपश्चमिक माव है। चार धपक श्रेणी पासे आहारकोंके धायिक माप है। अनाहारक जीवोंमें जो पहिले ईसरे, चौथे, चौदवे गुणस्थानमें और सयोगफेवलीजो प्रवर समुन्यात और लोक पूर्णसमुपातमें अमाहारक, होते हैं, मिथ्यात्व में औदायिक माव, सासादन में पारिणामिक, असंफ्तमें औपसमिक, क्षायिक वा शापोपत्रमिकमार और सयोगी अयोगी के सायिक माव होते हैं॥ मावः । परि-समास: म्भाव (प्रस्सना) परिपूर्ण कीगई बर्याद मावका निरूपम मोह फर्मकी अपेक्षा से उदाहरफरूप समाप्त कियागया अल्प पाहत्वम् ॥ उपवर्मते T -एक पस्तुको अन्य की अपेक्षासे योदे पहुक्के कपनका वर्णन किया जाताहै।

ऐटानिषासी अगस्पंसहाय येकीकृत पदच्छे और बिमवर्य सहित सर्वार्थसिदिका पदमा हिंदी अनुवाद । अमाप १ पत्र । चतुर्णामुपशमकानामोपशमिको भाव. ओपशमिक सम्यक्त्वम् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टः पारिणामिको भाव ॥ सम्पमिय्यादृष्टे झायोपशमिको भावः ॥ मिथ्यादृष्टेरोदायको भावः । (१३) संज्ञानुवादेनसंजिनां सामान्यवत् । असजिनामोदयिको भावः ॥ तदुभयव्यपदेशराहिताना फतुम् ।। उपशमकानाम् ।। (उपशम एम्पपष्टिपर्पोम) चार उपशमश्रेणीवासे (अपकरण-अनिचिकरण- रक्ष्मसाम्पराम-उपशांतपाय) निके औफ्शमिका । मावा । औपसमिकम् ॥ सम्पमस्वम् ॥चौपचामिक भाव है । (सो) उपन्ठम सम्पम्दर्शन है। सासादन-सम्पग पारिपामिकः । मार सासादन सम्पम्दर्षनवाले के पारिवामिक माव है सम्पमिप्यारे पापोपशमिका । मावा । मिम (तीसरे गुणस्पान) पीक धामोपशमिक माष है। मिप्यारटेका योदपिका मामा [१३] खा-अनुषावेन - मिप्याटि (प्रथम) गुणस्थानकि औदपिक माव । (१३) सैनीकी मपेषासे सपिनाम् :: सामान्य-पत् सैनी (अनसहितनीव) निकै संक्षेप (पिपपमें पूर्वोक्त गुणस्थान) सम है अर्थात मिप्याष्टी सशिमोंके औदपिक भाव । सासादनसम्पग्रटी सकियोकि पारिणामिक माष है । मिथ गुणस्पनपतींसलियोंके वायोपश्चमिक माव है। असपतसम्मम्वृष्टी सबिकि औपत्रमिक पाषायिक वा पायोपथमिक माय है। संपतासमवसे भप्रमची सहियो बायोपसमिक माव है। चार उपशमक सनीयर्योक औपचमिक भाव है। चार सफा मेणीवाले संक्षियोंकि पाकि माव है। सनिनाम् ।। औदपिकः । मावः । असझिोंक (जो मिप्यात्व प्रथम गुणस्थानमें ही हैं) औदयिक माव है। तद् उमय-व्यपदेशरदिवानाम् । प्ठन (सैनी-बसैनी) दोनों नामोंसे पर्मित (सयोगबली-भयोगकेवली) निका (1) सीमीय मिप्यार मपम गुणत्पानसे सीनाप बार करें। मसती मिप्याव है । संकी मसशीसे रहित मपो भयोग के पड़ी है।

एटानिवासी मगरूपसबाय कीसकत पदपछेद और विमक्स्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्वना दिदीजनुवार अध्याय १ त ८ सामान्यवत् ॥ (१४)माझरानुवादेन-आहारकाणामनाहारकाणा च सामान्यवत् ॥ भावः परिसमाप्तः ॥ अल्पवहुत्वमुपवर्पते ॥ सामान्म-पतूक (१४) आहार-जनुनादेन । आहारकायाम् । कम्पन बाहारकानाम् ।। सामान्य-पदक संक्षेप (पसंगमें पूर्वोक्तगुणस्थान) समरै अर्थात लामिक भाव केयलियोंक में (१४) आहारकोंकी विषधासे आहारक (जीव) निके जो मिथ्यात्वसे सयोगी तक) और अनादारकोंक (माय) संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक्त गुपस्थान) समरे मर्याद भिप्यात्व गुणस्मानपती आहारक जीयोंकि औदायिक भाव है साप्तादनसम्पदर्शन पाले बापरक बीयोंके पारिपामिक माव है। मिष गुणस्थान- चाले बाहारक जीवोंके सायोपशमिक भाव है। असंभव सम्पष्टि आहारकोंक गोपसमिक, वा धामिक या सामोपथमिक मावहै। संयवासयवसे मप्रम- गुणस्तानपी माहारकों के पायोपत्रमिक माष है। पार उपसमभेषी वाले आहारकोंकि बोपचमिक माप है। चार पक श्रेणी- पाले आहारकोंके धाफिक भाव।। बनावारक बीम जो पहिलें सरे, चौथे, चौदवे गुमस्थानमें और सयोगकेवलीजो प्रतर समुद्घात और लोक पूर्णसमुपातमें मनारारक, होते हैं, मिथ्यास्व में औदयिक मात्र, सासादन में पारिगामिक, भसयतमें औपसमिक, माफिक वा धायोपत्रमिकमाव और सयोगी अयोगी के पारिक माव होते हैं। भाष (प्ररूपया) परिपूर्ण कीगई अर्थात माषका निरूपण मोद ककी अपेक्षा से उदाहरणरूप समास कियागया एक वस्तुको अन्म की अपेक्षासे चोदे बहुतके कथनका वर्णन किया जाताहै। मावः । परि-समाप्त यसपासम् ॥ उपवासे T एटानिवासी जगरूपंसहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विमक्स्पर्व सहित सर्वार्थसिदिका शंम्वषः हिंदी अनुवाद । अमाप १८ चतुर्णामुपशमकानामोपशमिको भाव मोपशमिकं सम्यक्त्वम् ॥ सासादनसम्यग्दृष्टेः पारिणामिको भावः ॥ सम्यममिथ्यादृष्टे झायोपशमिको भाव ॥ मिथ्यादृष्टेरोदयिको भाव । (१३) संझनुवादेनसंगिनां सामान्यवत् । असज्ञिनामोदयिको भाव ॥ तदुभयव्यपदेशराहितानां फतुम् ।। उपचमकानाम् । (उपशम सम्परष्टिमि) पार उपभमश्रेणीवासे (अपकरण-अनिचिकरण- सूक्ष्मसाम्परार-उपशांतापाय) निके औपसमिकः । मावा औपशमिकम् ॥ सम्परत्वम् ।। औपश्चमिक माव है । (सो) उपशम सम्यग्दर्शन है। सासादन-सम्पगटे । पारिवामिकामावः। -सासादन सम्पदर्शनयासेके पारिणामिक माष। सम्पमिप्यार पायोफ्यामिका । मावः । मिम (सीसरे गुणस्पान) वीक पायोपथमिक माष है। मिप्याटेला औदपिकमा माषः। [१२] सहा मनुवादेन - मिथ्यारष्टि (प्रथम) गुपस्थानषकि औदपिक भाषौ (१३) सैनीकी मपेषासे सधिनाम् : सामान्य-पत्र -सैनी (-मनसहितभीव) निकै ससेप (विषयमें पूर्वोस गुपस्थान) सम है अर्थात् मिम्पाष्टी समियोंके भौदरिफ मावहै । सासादनसम्परटी संपिपकि पारिणामिक माव है । मिभ गुणस्पनीसझिोंके बायोपशमिक भाव है। असंपतसम्पदृष्टी संझियोंके चौपचमिक पा क्षायिक वा पायोफ्यमिक माष है। संपतासंपतसे मप्रमपी सपियों धायोपश्चमिक माव है। चार उपशमक समीयोंकि औपश्चमिक भाव है। चार सपा मेणीवासे सझियोंकि शामिक माष है। प्रसदिनाम् ।। औदपिकः । मावा । असलियोंक (जो मिथ्यास्व प्रथम गुणस्थानमें ही) जोदयिक माव है। उन् उमप-पपपेश्वरहितानाम् ।। ठन (सैनी-बसैनी) दोनों नामोंसे पनित (समोगकेवली-भयोगकेवली) निका (१) संघीजीव मिप्यारव प्रपम गुबत्तानसे सीमा पार करें। मसंडी मियाब है । सबो मसंगीसे रहित मपोग भयोग पानी है।

एटानिवासी बमस्मसहाय कीसकस पाच्छेद और विभक्त्यर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सपना हिंदीअनुवाद बन्माय १ मा ८ सामान्यवत् ॥ (१४) आहारानुवादेन-आहारकाणामनाहारकाणा च सामान्यवत् ॥ भावः परिसमाप्त ॥ अल्पबहुत्वमुपवर्ण्यते ॥ सामान्प-पतूक संक्षेप (मसंगमें पूर्वोकगुणस्थान) सम है अर्थात सायिक माष फेवलियोंक है (१४) आहार-अनुषादेन । बाहारकानाम् ।। (१४) बाहारकोंकी विवक्षासे बाहारक (जीव) निके(बो मिथ्यावसे सयोगी को) प०अन-आहारकानाम् । सामान्य पतक और अनाहारकोंक (भाव) संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक गुणस्थान) समौ अर्थात् ॥ मिप्मात्व गुणस्पानवी बाहारक मीक औदयिक मापसासादनसम्पग्दर्शन- पासे बाहारक जीवोंके पारिणामिक माव है । मित्र गुणस्पान- वाले आहारक जीवोंक सायोपश्चमिक माव है। असयत सम्परष्टि आहारकोंक बोपत्रमिक, पा क्षायिक पा मायोपशमिक मावहै। संयतासंयतसे मप्रमच गुणस्थानवी आहारकों के पायोपश्चमिक माव है। पार उपपमप्रेमी पाले माारकोंक औपश्चमिक माव है। चार क्षफक श्रेणी पाले माहारकोंके धायिक माप है ।। अनाहारक बीमि जो पहिले इसरे, चौथे, चौदवे गुणस्थानमें और सयोगकेवलीमो प्रत समुन्यात और लोक पूर्णसमक्षात्में अमाहारक, होते हैं, मिथ्यात्व में औदयिक मात्र, सासादन में पारिणामिक, असंयतमें औपसमिक, सायिक पा धायोपसमिकमाए और सयोगी अयोगी के सायिक माव होते हैं। माना। परि-समाप्त। म्भाव (प्ररूपणा) परिपूर्ण कीगई अर्थात् मारका निरूपम मोह कर्मकी अपेक्षा से उदाहरणरूप समाप्त कियागया अस महत्तम् । उपवठते एक वस्तुको अन्य की अपेक्षासे योदे-बहुतके कपनका वर्णन किया जाताहै। T ऐटानिवासी जगस्मसहाय पैकीकृत पदच्छेद और विमपर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दनः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ चित्र चतुर्णामुपशमकानामापशमिको भाव ओपशमिकं सम्यक्त्वम् ॥ सासादनसम्पग्दृष्टेः पारिणामिको भाव ॥ सम्यामिथ्यादृष्टे क्षायोपशमिको भाव ॥ मिथ्यादृष्टेरोदयिको भाव । (१३) समनुवादेनसंझिनां सामान्यवत् । असजिनामौदयिको भाव ॥ तदुभयव्यपदेशराहतानां फतुर्माम् ।। उपधमकानाम् ।। (उपशम सम्परष्टियों) चार उपसमभेगीवाले (अपूर्वकरण अनिचिकरण- समसाम्पराय-उपशासकपाय) निकें औपयमिकः । माष' । औपमिकम् ।। सम्पत्यम् ॥ औपचमिक माष है । (सो) उपशम सम्पन्दन है। सासादन-सम्परटे। पारिणामिका: माया -सासादन सम्पन्दनवासेके पारिणामिक माय है सम्पलिममाप्टेः । पायोपामि । माया । =मिम (तीसरे गुणस्पान) कि थायोपश्चमिक माव है। मिष्याप्टे। जोदपिका मावा [१३] सम्मा-अनुवावेन - मिथ्याष्टि (प्रथम) गुरुस्थानवर्तकि औदपिक माष । (१३) सैनीकी मपेषासे संक्षिनाम् । सामान्य यत् सैनी (मनसहितमीव) नि सभेप (विषयमें पूर्वोक्त गुणस्मान) सम है अर्थात मिप्याष्टी सझियोंके औदपिक माष है । सासादनसम्परदृष्टी मझियोंकि पारिपामिक माव है। मिम गुणस्पनवतीसशियोंके वायोपश्चमिक माष है। असंपतसम्पन्दृष्टी समियोंकि बौपश्चमिक पाधायिक पा पायोपश्चमिक भाव है।समतासयससे भप्रमचवीं संलियोंक धामोपचमिक माष है। चार उपसमक स्पीकिं मौपशमिक भाव है। चार सपा मेणीवाई सझिोंक वापिक माव है। भसधिनाम् औदपिका । माना। असलियोंक ( बो मिथ्यात्व प्रथम गुणस्थानमें ही है) औदमिक भाष। तद् उमय-व्यपदेशरहितानाम् । -उन (सैनी-सैनी) दोनों नामोंसे पर्मित (सयोगकेक्ली-बमोगकेवली) निका: १) समीनीव मिप्यात प्रपम गुमपानसे भीषसाय मारले तक है। मसंही मिप्पाप है। संबी मसबीसे रहित सपांग भयोग के समी।

पटानिषासी बगरूपसहाय पत्कीकृत पाहोद बौर विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिफा भन्दशः दिदीबनुवाद अध्याय १ सन ८ सामान्यवत् ॥ (१४) आहारानुवादेन-आहारकाणामनाहारकाणा च सामान्यवत् ॥ भावः परिसमाप्तः॥ अल्पवहुत्वमुपवर्ण्यते ॥ सामान्य-वस्क संक्षेप (मसंगमें पूर्वोक्तगुणस्पान) सम है अर्यात क्षायिक माव केवलियोंक में (१४) आहार-अनुषादेन । बाहारकानाम् ।। (१४) बाहारकोंकी विषक्षासे आहारक (जीव) निके वो मिप्यात्वसे सयोगी सका) पम्पन्-आहारकानाम् । सामान्य-चक्र और अनाहारकोस (भाव) संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक गुणस्मान) समहै भर्थात् मिष्यात्व गुणस्थानवी आहारक जीवोंके औदयिक माष है साप्तादनसम्पम्दर्शन पासे बाहारक जीवोंके पारिणामिक माव है। मिम गुणस्थान-- वाले बाहारफ जीवोंके सायोपश्चमिक माप है। असयत सम्पग्दृष्टि आहारकोंक चौपसमिक, पा धापिक वा क्षायोपथमिक मावहै। संयवासयतसे अप्रमत- गुणस्थानवी आहारकों के पायोपरमिक माव है। पार उपसममेमी वाले आहारकोंक औपशमिक माव है। चार पपक पी- पाटे बाहारकोंके यायिक भाव है । वनाहारफ बीमि जो पहिले दूसरे, चौथे, पौवें गुणस्थानमें और सयोगकेवलीको प्रवर समुन्यात और लोक पूर्णसमुद्घातमें अनाहारक, होते हैं, मिप्यास्त्र में औदपिक मात्र, सासादन में पारिमामिक, असयतमें औपसमिक, सायिक या क्षायोपत्रमिकमाव और सयोगी अयोगी के पारिक माव होते हैं। मावः। परि-समाप्त माव (प्ररूपणा) परिपूर्ण कीगई वर्षात मायका निरूपण मोह कर्मकी अपेक्षा से उदाहरणरूप समाप्त कियागया अत्तपत्वम् ।। उपवासे एक वस्तुको अन्य की अपेसासे थोड़े बहुतके कपनका वर्णन किया जाता । T उपरागका च . गनिरामी जगरूपसहाय पकीलपृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ त ८ तत् द्विविध सामायेन विशेपेण च ॥ सामान्येन तावत-त्रय उपशमका सर्वत स्तोका. स्वगुणस्थान कारपु प्रर्वगन तुल्यसंस्या ॥ उपशान्तक्पायास्ताव त एव ॥ तत् ॥ द्वि-विधम् । सामान्पेन ॥ विशेपेण च =यह (अस यात्व प्ररूपणा) दो मकार सोपरि और विस्तारकरि है । सामान्येन ' तावत् प्रयः। अयम (वाक्त) संसेफ्करि सीन (अपूर्वकरण-अनितिकरण-क्ष्मलोम) मवेत स्तोका -उपसमभणीवाले सपसे थोड़े हैं। (वे तीन उपशम मेमी वाले) अपने २ गुण पान कालपु । प्रवेशेन । तुल्पसंस्पा । गुणस्थान कालों में प्रवेशारि समान पा रापर संम्पाषाले होते हैं अर्याद प्रत्येक उक्त तीन गुणस्थान में कोई आचार्य तीनयो (३००) कहते हैं । कोई तीन सौ घार (३०४) कहते हैं। कोई दो सौ निन्यानवे (२९९) कहते हैं। (देखो गोम्मटसारगाषा ६२६ तिसर्य ममंति इत्यादि) उपशान्तपाया तावन्तः । एव० उपक्षान्सकमाय ग्यारहवां गुणस्थानी उपशमषेणीवाले उतने ही हैं अर्थात् उक्त गाथा के अनुकूल २९९, वा ३०० अथवा ३०४ उत्कृष्ट हैं (1) मएमु समयेषु प्रवेशेम एको वा शौ षा क्यो पा इत्यादि अधापा । उस्कयतु १५।२४। ३० । ३६ । ४२ । १८ । ५४ । ५४ । स्थगुपस्थान पालेप प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । संस्थापनावसरे प्रोणा 'ठन द्रष्टम्पम् ॥ पृष्ठामि ९३, ९५ ९५५ मपमनुषावस्य । भए समये । प्रयशेन।पका पादौ -माठ समय में प्रवेश होफर एक अषया दा पाया ।। या इस्या ये जपम्पा रटा ।। -अथवा तीन श्यादि ममम्य (-म्यून से म्यून) सका है। और (- सु) उररुप (सम्पा) -(प्रथम समय से आठ समय तक यथा सख्य) सोलह-चौवीस-तीस छत्तीस ४२।४।५४।१४ | सगुणस्थान -पयालीम-आतालीम-चोपन-चौवन अपने मपने गुणस्थान पाले प्रपशेम" -समयों में प्रवेश होमरि (माठ से पारम् गुणस्थान उपशममेणी) के तुम्यसम्पाः ।। -ममाम सम्पापास (प्रत्येक गुणरयान में) है मर्यास् ३०४ मुाने प्रत्येफ मयेक उपशम श्रेणी वा गुणस्थान में उररएसरि है। (परतो पए ९३ ९४) संम्मा कयन प्रवमरे मामा -संश्मा (प्रणमा) का कथन (शा पहना कर पुके है रम के) प्रसंग में कर चुके पत्र प्रगनि.४ १५ एण्यम् ॥ -कहाँ पृष्ठ ९५, ९४, ९५ (इस मनुवादके देखना चाहिये) एटानिवासी जगरूपसहाय कीलकृत पदच्छेद और धिमक्त्पर्य सहित सार्थसिदिका सम्बना हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ सत्र ८ त्रय क्षपका सख्येयगुणा ॥ क्षीणकपायवीतरागच्छदास्थास्तावन्त एव ॥ सयोगकेवलिनोऽयोगकेवालनश्व प्रवशेन तुल्यसंख्या ॥ प्रय सीन (अपर्पकरण अनिचिकरण-पक्ष्मसाम्पराय) पकाः । संस्येसगुणा' । सफ्कमपीवाले (उक्त तीन उपप्रमभेणीवालोंसे) संख्यावे गुणों अर्थात प्रत्येक गुनस्थानवी सपकमेणी प्रत्येक गुणस्थानपर्ती उपक्षमप्रेणीवालोंसे दूने हैं (गोम्मटसार जीव कोर गापा ६२६) ॥ प्रत्येक उपसमयणी गुणस्थानमें की आचार्योंके मतानुसार २९९ हैं फेईके ३०० केईके ३०४ है अतः प्रत्येक सपकोणी गुणस्पानम कई आपापोंके मतानुसार ५९८ हुये, केईके ६०० मुये कहके ६०८ मुनिहुये ॥ धीणकपाम-पीतरागम्यस्था । ताक्न्तः ।। क्षीणकपाय धीवरागमस्थ मारहांगुनस्थानयती उतने एव ही ( एप) है अर्थात् ५९८ २ अथवा ६०० अथवा ६०८ मुनि सपोगकेवलिना । च अयोग-केवलिना। समोगकेवली और (-घ) भयोगकेवली (चौदहवें गुणस्थानवती) प्रवेशेन । सुल्पसंस्पाः प्रवेशो (नेकी अपेक्षा) करि समानगणनापाले हैं अर्थात सयोगकेवली, अयोग केवली गुणस्थानमि जपन्पफ्नासे बीच प्रवेश करे तो एक समपमें एक वा दो वा तीन इत्यादि जीव (पृषक पृषक् गुणस्पान) में प्रवेश करें और उत्कर्मकार पकसो बाठ जीव तक एक समममें प्रवेश होसक्ते (देखो इसके पठ९४,९५)। स्मरण है कि यह सुल्प संख्या केवल वेरहवें गुणस्थानमें प्रवेश होनेवाले वीयों की, चौदहवें गुणस्थान में प्रवेश होनेवासे बीवोंक तुल्य प्रवेश दोनेकी अपेक्षासे ही तुल्य है । तेरहवें गुणस्पानमें रहने वाले जीवोंकी संख्या चौदहवें गुपस्थान में रहने वाले जीवोंकी सम्माके कदापि तल्प नहीं है मोति एटानिवासी जगरूपसहाप पकीकृत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका पदयः हिंदी अनुवाद । अम्मा १८ सयोगवलिना स्वकालेन समुदिता संख्येयगुणा १८९८५०२ ॥ अप्रमत्सयता संख्येयगुणा १२९६९९१०३ । प्रमत्तसँयता सस्येयगुणा । ५९३९८२०६ ॥ सँयतासयता असख्ययगुणा ॥ रहवें गुणस्थानमें ८९८५०२ वीष उस्कृप्टकरि होसकते हैं और चौदा गुमस्थानमें उत्कृष्टकरि ५९८ अथवा ६०० वा ६०८ जीव हो सकते हैं। पेसो अवश्य इस अनुवादक पृष्ठ ३०८ की टिप्पणी संख्या (२) सयोगकेवलिन' । स्वासेन : समुदिता । सयोगकेपली अपनेकासकरि समुचम मक्वा इकठे हों सम्येयगुणा । ८९८५०२ (वष क्योगकेवलियोंसे) सम्पाऐगुणे हैं। (सपोगकेवली) ८९८५०२ अयोगकेवली ५९८ अथवा ६०० वा ६०८ सफ मिम २ थापाकि मतानुसार उत्कएकार होसकते हैं (इसके पृष्ठ ३०८ की टिप्पणी (२) देखो) अप्रमत्सयता । अप्रमचर्सयमी (सातवें गुणस्थानपती-पन सयोगफेवलियोंसे) संख्येयगुणा' ।। २९६९९१०३ संस्पावगुणे। दो करोद छिपानफैलास निन्यानय सहस्र पकसौ तीन प्रमच संपताः म्पमत्त संपमी (छठवांगुणस्थानबती वन अप्रमच संपमियोंसे) संस्पेयगुणा ।। ५९३९८२०६ -संरम्पारगुणे हैं। "पांच करोड़ तिरानवै लाख हजार कठान्वै दोसौ छ बानोग सैफ्तासंपताः असस्पेयंगुमाः ।। सयमासयमी (प्रमचसंयमियोंसे) असंस्थातगुणे हैं " तेरह करोब मनुष्य हैं। और परपके असंस्मा भाग विर्यध हैं। (1) सपवासपतासापेषगुणाः । सपबसपठानो मारपसालम् । पक गुपस्थानप्रतिवाद । समासपदामामिरगुणस्थानमेवार १३०....०० ॥ संपता संपता सम्पेयगुणापगुणस्थान -देशसपमी वा संपमासपमी समान गुणे है। एक गुणस्थान पतित्वात् 'I॥ सपवासंपताना मामाल -पटी रोने पद से सयमासामियों के मारपात (मिमान पा उपमा) म.अस्विT -ही (हा मसी) क्योंकि अब पर प्रकार की वस्तुवे दोस्वामों में विचम्मन एटानिवासी बगरूपसहाय क्कीसकृत परच्छेद और विमस्पर्व सहित स्वाधसिद्धिका सम्बनः दिदी अनुवाद । बापाप १ ८ सासांदनसम्पग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणा ॥ सम्यग्मिथ्यादृष्टयः सख्येयगुणा । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽमस्येयगुणा ॥ सासार्दनसम्पग्रस्पा बसस्पेनगुना =सासाबनसम्पमष्टि (पेनस्पमियोंसे) वसंस्थात गुहै। . सम्पग्मिप्पापा । संस्पेपगुमाए । = मिमगुस्थानवी (सासादन सम्परष्टियोंसे) संख्यात गुणेहैं। अस्पत सम्पाटमा । बसस्येयगुणाः । = अविरतसम्पराष्टी (सम्पग्मिथ्यारष्टियोंसे) बसंस्पात गुणे हैं। बहते है कि अमुक प्रकारको यसुर्य अमुक गाव की वस्तुमासे योडी वा पनी है। सपमासम्मी एक ही गुपस्थान हाते है। इससे अस बहुत नहीं है। संपमियम मरामास्वीफ्पोंकि वे मिष्यस्व सासादन मिभ और असंपत गुणस्थानमि । पेसी सपमिमि मस पारसी पोतिये छठेसे १४ गुणस्थान तक रे संपता संपवानाप । गुणस्थान मेवात् । वा -सपमासंयमीकी (गणमा) गुणरयानमेवसे परापर (व) १३.0000..विसाम। तेर रोके है। ऐसे (भी) मतसामरमरि (मुवसागरी) काते है (१) सासारनसा सहयगुणा = सामादनमाम्यम्पर्शनवारे (वयसंयमियोंसे) संक्यातगुणे है (अर्याद) ५२००२0000॥ (२) सम्पम्मिवारमा पापााणहैमिमतीसरेगुणस्थानवीं ( सोसावनमम्यगपिनोंसे) संकोरगुणा ।। 0000000 -संगावगुणे रे (मर्याद) एमसौधारकरोगाचार (७) मसेरतसम्पगमा संक्येषगुणा। - अविस्तमम्पमटि ( सम्पग्मिगारपि तीसरे गुणस्थानवामों से) संसातगुणे २ ५०००००००००। पति पुतसागरा । = सावअरब है ।। ऐसे पुतसागरसरि ( धन अवसागरीयसम) रिपपी र पष्ठ २९५ और सिप्पणी१२ पूरा २९५ मुखमागर सरिने चार गुणस्थानोंम या गपना सिसी है पर केपर मनुष्यों की समझना क्योंकि गोम्मटमार जीवर गापा १२३ (प्रेरयम ५) में मिधाप गुमस्थामसे सपवासंपतकी मर्प सल्या पसे सिसी कि मिल सावपसामाजमिस्मापिर या वारता य । पासोदिममसंलगुम संसससगुण ॥१४॥ मिस्या पावसासममिरिया दिवायर्मता । पत्तासंयमस्क्यान संस्वासस्पषम ll %3D ।

पगनिवामी जगरूपसहाप वकीलकृत पदपछेद और विभवयर्थ सहित सर्वार्थसिविका शम्दशा हिंदी अनुपाद । वायाय १ स्त्र ८ मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणा ॥ विशेषण (१) गत्यनुवादेन-नरक्गतौ सर्वासु पृथिवीपु सर्वतः स्तोका. सासा दनसम्यग्दृष्टय । सम्यग्मिथ्यादृष्टय सत्येयगुणा । असंयतसम्यग्दृष्टयाऽमस्येयगुणा। मिथ्यादृष्टयोऽमख्येय गुणा ॥ तिर्यग्गतो तिरमा सर्वत स्तोकाः सँयतासयता । इतरेषा सामान्यवत् ॥ मिप्यारश्य । अनन्तगुमाः । विशेपेम ! गति- = मिथ्याप्टी (असंपत सम्पग्रप्टियोंसे) अनन्गुणे हैं। विशेषारि गसिके अनुवादेन । नरकगतो ।। सर्वासु । पृप्वीषु । = कथनानुसारकरि नरकगप्तिमें सब भूमियों (नरफों) में सबत स्ताका । सासादन-सम्पग्रएमा । - सबसे थोड़े सासादनसम्पम्दर्शनवाले (दूसरे गुणस्थानवती) हे सम्पग्मिप्यारटय ।। = (उन सासादनसम्पमप्टी नारकियों से) मिभगुणस्थानवी (नारकी) संसपेयगुणा असमत्सम्पाटमा।। = संस्पातगुणा है । (मिश्रगुणस्पानवर्ती नारकियोंसे) असंयवसम्पदृष्टि(नारकी) असम्येयगुमा ।। मिप्पाप्म्यः ।। - अर्सम्यातगुणे रें। (असंयमी सम्पहष्टीनारकियोंसे) मिथ्यादृष्टी (नारकी) पसंख्येयगुणाः ।। तिम्गतौ । निरमाम् । सर्वता = असंख्पातगुणे ॥ तिचगतिमें नियमि सबसे स्नोका। मयतासंपताः ।। यससंयमासंयमी(विर्यच) अर्थात् पल्पके असंख्यातवा भागः (देखो टिप्पणी) इतरेपाम् ।। अन्य (असपतसे मिथ्यादृष्टी तक तिर्यों) का सामान्पवत् . = संक्षेप (विषयमें पूर्वोक्त गुणस्थान) सदृश (अल्पबहुत्व) है नीचेकी टिप्पभी देखो अर्प-मिथ्यापि अनम्तानात है। मावा पत्यके मसंस्पातमे भाग है मासादन गुणस्पामपठी भाषकोंसे मसंक्यात गुणे हैं । मिभमासम्बन बामोंमे संख्यातगुणेरे अग्रतसम्पनदि मिभनीयोसे मसंपावगुणे है। इनमें संपमा संगमीमें,सासाबनगुणस्थाममे,मिम मसपवागुणस्थानमें कुल २ मधिक साम्लो मर्याद संपतासंयन्गुषस्थान धारक मनुष्य और नियम ही गति के जीव होते हैं सो इनमें ठेरद करोद मनुष्य है पल्स असा भाग विपत् । सासादमगुणस्पानमें पारो गति के सीप होते हैं। इनमें बाबन करोद मनुष्य है मौर नारकी तिर्पच भौर देव संपता- संरतमे मसमगठाणे । सम्पग्मियामि बीच मी चारों गति में होते हैं मो पसौचार करोष मनुप हैं और सामावठिोसे असंस्पात गुणे भवदार सोमाविक औपरे॥ रोपवीमपरक वियप, देवगवि के सीप रे । मर्मफ्तगपरपानमें भी चामुंगति के नीव है उसमें सातसौकर मनुष्य में मिमनसे संम्बावगुणे %3D - एटानिवासी जगरूपसहाय वकीलकृतपदच्छेद और विमनत्पर्य सहित सार्यसिद्धिका सम्दशः हिंदी मनुवाद ॥ अध्याय १ सय ८ मनुष्यगतो मनुष्याणामुपशमकादिप्रमत्तसंयतान्ताना सामान्यवत् ॥ तत संख्येयगुणा सयतासँयता ॥ सासादनसम्यग्दृष्टय संख्येयगुणा ॥ सम्यग्मिथ्याध्य सख्येयगुणाः ॥ असंयतसम्यग्दृष्टय सस्येयगुणा । मिथ्याप्टयोऽमख्येयगुणा ॥ देवगतो देवानां नारकवत् ॥ मनुष्यगवो । मनुप्पाणाम् ।। उपचमक-आदि मनुप्पगविमें मनुष्पोंका (अल्प-बहुत्व ) उपशम श्रेणीवालोंसे प्रमत्नसयत-अन्सानाम् ।। सामान्यवत् प्रमत्तसंयमीतकनिका संक्षेप (प्रसंगमें पूर्वोक्त गुपस्थान) स्वृक्ष है अर्थात् अपूर्वकरण- अनिकिकरण समसापराय-उपयोवकपाय इन उपसमयेगीवाले गुणस्थानमि प्रत्येकमें २९९, केई आचार्योक मतमें ३०० अथवा फेको मतमें ३०४ जीव हैं और अप्रमत्त गुणस्थानमें २९६९९१०३ बीव हैं इसलिये प्रत्येक उपशमश्रेणीवालेसे अप्रमचमें संरप्पातगुना बीवष्ठुये और प्रमसगुणस्थानवी ५९३९८२०६ जीव है इसलिये प्रत्येक उपशमभेषीपासे, और अप्रमत्तगुणस्थानपीसे मी प्रमचगुणम्थानमें संस्पातगुणे जीव हैं। वना संस्मगुमा । सपतासंयसा । =तिन ( प्रमत्त संपमीयों) से संख्यातगुणे संपमासंगमी ( मनुष्य मेरह फोटि ) हैं सामादन-सम्पमाट्य' ।। संस्म्येयगुमा (उन वेशवतियोंसे ) सासादन सम्यग्दृष्टी (मनुप्प) संस्म्यातगुणे (पापन) करोड़ है सम्पग्मिध्यादृष्टपः । संग्ग्गेयगुणाः । -(सासादनवालोंसे) मिमगुमस्थानपती (नर) संख्यातगुणे (एकसौधार फोरि ) असंपत-सम्यग्दृष्टय ।। संस्पेयगुणाः -(मियपालोंसे) असंयमी सम्पन्दृष्टी (मनुष्य) संख्यात्गुषे (सातसौकरोड) हैं। मिप्यादृष्टया । असम्म्पेयगुणाः ।। - (मसंयमी सम्पम्दृष्टीयोंसे) मिथ्यादृष्टी (मनुम्प नकि पर्वजीव) असंस्पातगुण हैं देषगतौ ॥ देवानाम् ॥ नारक्वत्र - देवगतिमें देवोंका (परस्सर अल्प महत्व ) नारफियोंकि तुस्प है अर्थात् सासादन सम्यम्दृष्टि देव सपसे थोड़े हैं। उनसे संस्म्यासगुपे मिश्रगुणस्थानपर्वी देव है। इन ( मिथवालोंसे ) असंयमी सम्पम्दृष्टी देव मसंख्यात्गुणे हैं। . वर एटा निवासी जगरूपसंहार पीसन पदमोद और विमारपर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका प्रमशः हिंदी अनुवाद । अमाय १ वट (२) इन्द्रियानुवादेन-एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेपु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभाव ॥ इद्रिय प्रत्युच्यते । पंचेठियायेकेन्द्रियान्ता उत्तरोत्तर वइव पंचेन्द्रियाणां सामान्यवत् । (बसपत सम्पादृष्टीदेवोंसे) मिथ्यादृष्टी (देव) असंख्याप्तगुणे हैं। (२) इन्द्रिप-अनुवादेन एकेन्द्रिप-विकत- -(२) द्रियकी अपेक्षासे एकान्द्रिय (जीव) और विकल (दो-तीन-चार) इन्द्रिये : गुणस्थान मेदा । नास्ति T -इन्द्रिपवासे (बीवों) में गुणस्थान विशेष नहीं है इनिरुमन्य महत्व अमावः । = (इनके मिध्यास्त गुणस्थान ही होता है। ऐसे (गुपस्थान प्रति) अल्प बहुत्व नहीं है इन्द्रिपम्, प्रतिः उम्पते । इन्द्रिमोंकी अपेक्षासे (= प्रति) (भत्स मस्य) कहा जाता है पनेन्द्रिय मादि-एफेनिय-अन्दाः । उत्तरोघरम् m = पांच इन्द्रिपासे लीवोंसे (आदि) एक इन्द्रिमवाले जीवों तक आगे आगे पाव - अधिक रेंजर्यात पाँच इन्नूिपवालेपीयोंसे पार इन्द्रियाले जीप अधिक हैं। चार इन्द्रियवालोंसे तीन इन्द्रिलाले बहुत हैं। तीन इन्द्रिमवालोंसे दो इन्दूिपषाले अधिक है दो ईदियवालोंसे एक दिपवाले बीय अक्किो एसे : आमे बागे पहुलता है। पनेन्द्रिमाणाम् । सामान्य = पांच ईदियवालोंका (परस्पर अस बहुत) संक्षेपमें (कषित गुमस्थान) सदृश है । अर्थात् घार मपूर्वकरम अनिधिकरण समसाम्पराम-उपशान्त- कयाम उपचममेयीवाले प्रत्येक गुपस्थानमें २९९ वा (केईक आचार्योक मनमें) ३०० अश्या (अन्य बापायोंके मवमें)३०४ मुनि और इन प्रत्येक प्रस्पेक गुणस्थानकी सपा श्रेप प्रत्येक गुणस्थानों के नीवोंकीमपेवा सबसे अस पा थोड़ीहै । और चार अपर्वकरण-अनि चिकरण पल्मसाम्पराग धीनलायक्षपकमनीबाठे प्रत्येक गुणस्पानमें ५९८ मा (र्षको मतमें) %D पानिवासी मगरूपमा लत पदपोह और पिमध्यर्प सहित सार्वसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अपार १ स्त्र ८ अयं तु विशेषः-मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ॥ (३) एसौ मपया (फरक वाचाकि मतानुसार) ६०८ मुनि हैं इसलिये प्रत्येक उपसमभेणीवाले गुपस्थान से प्रस्पेकसपमीषाले गुनस्थानके मुनियों की संख्या सम्पात्गुणी है । अयोगकेवलीकी संस्था५९८ पा ६०० वा ६०८१ (जी का गाथा ६२६और इस अनुवादके पठ २०८की टिप्पभी संख्या २ देखो) सो मी प्रत्येक उपक्षमभेनी गुणस्थानवालोंसे एक प्रकारसे सम्पातगुणी ई और प्रत्येक इफ्कमेणीवाले गुणस्पान पर्तियों कामर है॥ समोगकेवलियोंकी संस्था आठ लास अठान्नै सहस पापसो दो (८९८५०२) है सो प्रत्येक उपक्षमभेणी गुमस्थानवालोंसे संस्थातगुनी है और प्रत्येक धपकोणी गुणस्थानबालोंसे भी संस्पातगुनी है। इन स्पोगफेवलियोंसे अप्रमत्त संयमी सातवा पर नमी संस्पेपगुपे हैं क्योंकि इनकी संरम्मा २९६९९१०३ है। और इन अप्रमसंयमिमों संस्पात गुणे पोंकि ये ५९३९८२०६ है ।। उक्त प्रमसंयमियोंसे सपमासंयमी असंसपार है क्योंकि मनुम और विर्पय गतियों में ही यह देशसम्म गुणस्पान होता है इनमें तेरह करोड़ मनुप्म और तिर्यप परपके अस्पाव, माग हैं । इन संपमासममियोंसे सासाइन सम्पन्दृष्टी असंस्पात गुणे पोंकि यह गुणस्थान पारों गतियों में होता है इन में पावन करोड़ मनुष्य है और पापकों असमपात गुणे अन्य तीन गतिके भीव हैं । इन सासादन वालोंसे सस्पात गुने मिभगुणस्तानती हैं पोंकि इनमें एकसो मारकरोड़ मनुप्प है और संस्पात गुमे अन्य तीन गतिक बीप है। और असंयत गुणस्थान मी चारों गतिमें होता है इनमें सातसौ करोड़ मनुष्य है और मिश्रवालोंसे अमंस्पामगुणे शेष तीन गतिक जीव है ( गोम्मटमार गापा ६२४, ६२५, ६२६ और एठ २९२ से २९५ तफ देखो) स्मरण रहे कि पनेन्द्रिय बीप संधीही दूसरेसे पारह गुणस्थान रो सक्के हैं। असझी जी मिप्यास्य गुमस्पान ही होता है। अयम् । तुक रिशेपा। मिथ्या परन्तु (-1) यह विशेष है कि पंचेन्द्रिय मिथ्या एस. असंख्येषगमा बष्टी जीव (जन्य किसी गणस्थान के पेमेनियतीसों में) alra :

एटानियासी अगम्पमहवि संकलन मछेद और विमफ्स्पर्थ सहित सपिसिद्धिका न्यः दिदी अनुनाद । अपाय १८ (२) इन्द्रियानुवादेन-एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेपु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभाव ॥ इद्रिय प्रत्युच्यते । पंचेद्रियायेकेन्द्रियान्ता उत्तरोत्तर वव पंचेन्द्रियाणां सामान्यवत् । (नसंपत सम्पन्दृष्टीदेवोंसे) मिथ्यावृष्टी (देव) असंस्पात्गुणे हैं। (२) इन्द्रिप-अनुनादेनएकेन्द्रिप-विकल- -(२) इद्रिक्की अपेक्षासे एकन्द्रिय (मीव) और विफल (दो-तीन-चार) इन्द्रित : गुणस्थान-पेद ।। नम्भस्ति T इन्द्रियवासे (बीपषों) में गुणस्थान विशेष नहीं है इनिधन्य पाहत-अमाव। = (इनके मिप्यास्व गुणस्थान ही होता है। ऐसे (गुणस्थान प्रति) अल्प बहुत नहींह इन्द्रियम् ॥ पनि उम्पने 7 = इन्द्रियोंकी अपेपासे (= प्रति) (अस्प महत्व) कहा जाता है पेन्दिर मादि-एकेद्रिय-अन्ता उतरोचरम् ॥ = पांच इन्द्रियवासे बीवोंसे (आदि) एक इन्द्रियवासे बीयों तक मागे आगे = अधिक अर्थात् पाँच इन्द्रियवालेमीयोंसे चार इन्द्रियाले जीव अधिक हैं। चार इन्द्रियवालोंसे तीन इन्द्रिस्वाले पहुत हैं। तीन इन्द्रियासोंसे दो इन्दियवासे अधिक हैं दो दियवालोंसे एक ईदियवाले बीब अधिक एसे आमे आगे महुलता है। पेन्दिवाणाम् । सामान्य = पांच दियबालोंका (परस्पर अस पहुत्व) संपेपमें (कषित गुमस्थान) = सवृष है । अर्थात् पार मपूर्वकरम-अनितिकरण पक्ष्मसाम्पराम-उपशान्स- माप उपक्षममेभीवाले प्रत्येक गुपस्थानमें २९९ या (ईक वापापीक मनमें) ३०० अश्मा (अन्य वाचार्योंके मतमें)३०४ मुनि है और इन प्रवेक प्रत्येक गुपस्पाकी संस्था शेष प्रत्येक गुणस्पानोंके नीमोंकीप्रपेषा सबसे पा थोड़ी है। और चार अपकरण अनि चिकन-ममसाम्पराग पीनसायपरमेषीपासे प्रत्येक गुणस्पानमें ५९८ मा (ईको मतमे) अप एटानिवासी मममसहाय यात कत पदच्छेद और विमपर्व सहित सार्वसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ १८ अयं तु विशेष:-मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ॥ (३) म्सौ अक्वा (फरक नापाक मतानुसार) ६०८ मुनि है इसलिये प्रस्पेक उपसमममीषाले गुनस्थान से प्रत्येक सपकोणीयासे गुणस्थानके मुनियोंकी संस्पा संस्पातगुणी है । वयोगकेवलीकी सस्मा५९८ पा ६०० पा ६०८ है (जी का गाथा ६२६और इस अनुपादके शा २०८की टिप्पनी संसपा २ देखो) सो मी प्रत्येक उपक्षमभेमी गुणस्थानवालोंसे एक प्रकारसे संस्पामगुणी और प्रत्येक एकमेगीवाले गुणस्थान मतियों के परापर है। सयोगफेवलियोंकी संख्या आठ लाख अठानकै सहस्र पांचसो दो (८९८५०२) है सो प्रत्येक उपनमभेणी गुरुस्थानवालोंसे संस्पातगुणी है और प्रत्येक धपकोणी गुणस्थानवालोंसे मी संस्थासगुनी है। इन सपोगकेवरिवोंसे अप्रमच संयमी साता पर नती संख्येपगुषे मोंकि इनकी संख्या २९६९९१०३ है। और इन अप्रमत्तसंयमियों, संस्पात गुपेरेंसोंकि वे ५९३९८२०६ है ।। उक प्रमसंयमियोंसे संयमासंयमी असंसपार मोंकि मनुप्प और तिबंध गतियों में ही पर देशसंपम गुणस्पान होता है इनमें सेरह करोड़ मनुप है और सिर्पच पस्पके असंस्मात माग हैं। इन संपमासंपमियोंसे सासादन सम्पम्दृष्टी असंख्यात गुणे सोंकि यह गुणस्थान चारों गतियों में होता है इन में पावन करोद मनुप्प है और भावकों से असम्मात गुपे वन्य तीन गतिके नीव हैं । इन सासादन पालोंसे सस्पात गुणे मिगुनस्थानपती हैं सोंकि इनमें एसौ पारफोड़ मनुम्प है मौर समपात गुपे अन्य तीन गतिके मीप है। और असक्स गुमस्पान भी चारों गतिमें होता है इनमें सातसौ करोड़ मनुष्य हैं और मिभवालोंसे अर्मस्पान्गुणे शेप तीन गसिके जीव है ( गोम्मटसार गाथा ६२४, ६२५, ६२६ और पृष्ठ २९२ से २९५ तक देखो) स्मरण रहे कि पनेन्द्रिव बीय सलीही नूसरेसे वारह गुणस्थान हो सक्ते हैं। असंधी जीके मिथ्यात्व गुनस्थान ही होता है। अपम् । विशेषामिप्या परन्तु (-1) यह विशेष किपेन्द्रिय मिथ्या दया । असस्पेक्शुमाः म्दृष्टी बीव (जन्य किसी गुनस्थान के पैनेन्द्रिय जीवों से) बसस्पात गुणे हैं। aa 3D एंटानिवासी जगरूपसंहाय कोलकृत सम्छेद और चिमात्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अन्दशः हिंदी अनुवाद । अम्पाय १८ (२) इन्द्रियानुवादेन-एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभाव ॥ इद्रिये प्रत्युच्यते । पंचेद्रियायेकेन्द्रियान्ता उत्तरोत्तर बहव पंचेन्द्रियाणां सामान्यवत् । (असंयत सम्पन्दृष्टीदेवोंसे) मिथ्यादृष्टी (देव) असंस्पातगुणे हैं। (२) इन्द्रिय अनुवादेन एकेन्द्रिप-पिकस - (२) इद्रियकी अपेक्षासे एकान्द्रिय (जीव) और विकल (दोसीन चार) इन्द्रिो गुणस्थान मेवा निम्नस्ति T -इन्द्रिपपासे (बीवों) में गुभस्थान विशेप नहीं है इनिअल्प बहुत-अमार। = (इनके मिथ्यास्व गुणस्थान ही होता है) ऐसे (गुनस्थान प्रति) अस्य रत्व नहींह इन्द्रिपम् प्रति उन्मते T - इन्द्रियों की अपेक्षासे (=प्रति) (मस पहुस्व) कहा जाता पंपेन्द्रिप भादि-एकेन्द्रिय-अन्ताः । उपरोपरम् = पोच इन्द्रियवाले जीवोंसे (आदि) एक इन्द्रियवाले बीपों वक मागे आगे अधिक र वास् पांच इन्द्रिमवालेभीवोंसे पार इन्द्रियवाले बीच अधिक हैं। पार इन्द्रिपवालोंसे तीन इन्द्रियाले पात ।। सीन इन्द्रियपालोंसे दो इन्दूिपवाले अधिक में दो दियवालोंसे एफ ईदियनाले बीष वपिको एसे बागे आये बहुलता है। पनेन्दुिराणाम् । सामान्य = पाच इंदियषालोंका (परस्सर अस बहुत्व) संक्षेपमें (कषित गुणस्थान) = सदृश है। अर्थात् पार मपूर्वकरम अनिचिकरण-परूमसाम्पराम-उपशान्त- काय उपभमभेषीवाल प्रस्पेक गुणस्थानमें २९९ मा (फेईक आचापोंक मदमें) ३०० अश्या (जन्म आचापोंके मवमें)३०४ मुनि गौर इन प्रस्पेक प्रस्पेक गुणस्मानकी संख्या शेप प्रत्येक गुणस्थानोंके जीवोंकीप्रपेषा सबसे अस पा थोड़ी । और चार भपकरण-अनिधिकरण समसाम्पराम धीनसायकलीवाले प्रत्येक गुणस्थानमें ५९८ मा (रको मवमें) नयमा ण्टानिरामी मगम्पसहाय कीलकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित मर्षिसिदिका मदनः हिंदीअनुवाद अध्याय १ मा ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [५] वेदानुवादेन-- स्त्रीपुवेदाना पञ्चेन्द्रियवत् । फाय-पोगिनाम् । सामान्यपद काययोगियोंका (अल्प-महत्व) संक्षेप (प्रकरणमें पूर्वोक्त गुणस्थान) क्त है अर्थात् अयोगसेवलियोंको छोड़कर पृष्ठ २९८, २९९ में चार अपूर्व पंचेन्द्रिय मिप्याप्पीभीय असल्याव गुपे हैं (२९९के अन्त तक पदलो) (५] येद अनुवादेन : खी पुम्-पेदानाम् ।। %= [५] पेद(स्त्री-पुरुष नपुंसक) की अपेक्षासे स्त्री-पुषेद वालोंका पंनेन्द्रिगपत्र " (अस्स-महुत्व) पाचन्द्रिमपाले (मीव) निके समान है अर्थात् प्ठ २९८ में पनेन्द्रियों का अस पटुत्व गुणस्थानवत है और " "आगमषि गुणस्थानका सवेद माग पर्यत मात सीन वेद रे और द्रव्य एफ पुरुष वेददी है" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गाथा २७१ ॥ नवर्मा गुणस्थानके प्रथम तीनमाग माववेदसहित है । अन्तके तीनमाग (जिनको अपगवमावद करवे ई) माक्यद रहित है । इसलिये नवर्मा गुणस्थानसे मिथ्यात्व प्रथम गुनस्थान के जीवोमं जो अल्प पडत्व है वही स्त्री-पुरुष वेदीयोंका अस्पहत्व होगा ॥ यह ऐसे है कि अपूर्वकरम (1)"पारित्र मोइनोयन भेद मोकगाय वीहरूप पुरपवेद मोवेर नपु सहदेव नामा प्रति दिन के उपयः माव जो लम्प नपयोग शिविर्ष पुष खो म सकसप और हो । परि निर्माण नामा नाम धर्म के उपकार संयुक्त भगोपांग विशेषरूप नाम कमेको प्रावि बप द्रम्प मो पद्रलोकगतीदिनि पुरुषी नपुंसक हा है। माही काहिए है पुरण पदक उदात मीका ममिलापम्प मैथुन माका धारी जीप सो माप पुणदा। परि स्त्रीवद के ग्वाति पुषा का अमिमा मैथु। मंशा धारक जीव गाव स्लीहा बरि मघुमावेश के ग्वपर्ने पुरुर अपनी वोउन युगम् ममिलाप मैतुन संशाध पाक औय सो माप नपुंस्या हो पनि निर्माण माम मामय संयुज पुस्य वेदरूप माकारका मिहिरगापांग नामे म्ममर्मका ग्वपर्व- आत ममप पर्पत इप्प पुरुषो मुंगरामो लिंग्नदिक चिह सयुष शरीरका घारक जीप सो पर्यायका प्रथम ममप लगाप . प्रगनियामी पगम्पसहाय वकील कृत पदरछेद और पिमत्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दश हिंदी अनुषाद । अभ्याय ' सूत्र ८ कायानुवादेन- स्थावरकायेपु गुणस्थानभेदाभावातल्यवहुत्वाभाव ॥ काय प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेज गायिका अल्या । ततो वहव पृथिवीकायिका । ततोडकायिका ततो वातकायिका । सर्वतोऽनन्तगुणा वनस्पतय ॥ त्रमकायकानां पञ्चेन्द्रियवत् ॥ [१] योगानुवादेन- वाल्मानमयोगिनां पञ्चेन्द्रियवत् । [३] काय अनुवादेन । स्थावर-कारे = (३) कामके कपनसे स्थावर (पृथिवी अप-चो-बाय-वनस्पति) कापामें गुमम्मानयेट प्रमागत , अल्प महत्व प्रमाषः । = गुण स्थानमें मेद न होने (फे हेतु) से थोड़े पतपनेका अमाष है (क्योंकि समस्त स्थावर कार्योक पफ मिथ्यात्य प्रथम गुपस्पान ही होता है। (अत गुणस्थानकी अपेक्षासे उछमी अल्प पहुत्व नहीं हो सका है)। सायम् । प्रनि: उच्यते। सर्वन' असा = फापकी अपेक्षासे ( अल्प बहुत ) काजाता है। सपसे गोदे तनायिका तन' महब पपिपी कायिका । = अनल कायिक हैं। तिन (अनल कायिक से भूमिफायिक बहुत तन' अप्कापिका ,। ततः पाक्कायिका' ।। = उन ( ममिकापिकोंसे ) जल कायिक (पटुत) है। दिन (जरकायिकसे ) फ्यन कापिक (महुत ) सक्त अमन्न गुमा।। वनस्पतयः ।। = सपसे अनन्तगुणे वनस्पति ( फायिक) । समकायिकानाम् । पञ्नेन्द्रिपबत्छ = प्रसकापिकोंका (अल्प-बहुप) पञ्चेन्द्रिय समान मर्याद पांचन्द्रिपवाले जीपोंसे पार इन्द्रियाले जीव अधिक हैं। चारबन्द्रियवालेजीवोंसे तीन इन्द्रिय वाले बीष पने । तीन इन्द्रियाल जीपोंसे दो इन्द्रियपाले पहुत हैं। पांच इन्द्रिपयालोंका परस्पर अन्स बहुत्व गुणस्थानक्त है। (देखो-चारमपूर्पकरण इत्यादि लेखसे पठ २९८में और २९९ के अन्तक) [४] योग अनुवादेन ।। पाङ्मानम-योगिनाम् । = [४] योगफे कथनानुसारस पचन मन मोगियोंका [जस-पाव = पाँच इन्द्रियवाल बीपक अस्प-बहुत्मके सदृश २ ।। अर्थात् पाँच इन्द्रियासोंका अरस-पहस्व गगस्थानक्त पिळ २९८से २९९ के मन्त सकारे %3D पंचेनियवत् .

एटा निवासी मगरूपसार वलात परम्छेह बौर विमक्स्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्मशः हिंदी अनुवाद । अमाप स ८ नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् ॥ (६) कषायानुवादेन-क्रोधमानमायाकपायाणां पुवेदवत् । अयं तु विशेष -मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणा. ॥ लोभकपायाणा द्वयोरुपशमक्योस्तुल्या सख्या । क्षपका नपुंसकोदानाम् ।। अदानाम् ।। च नपुंसक वेद वालोंका तथा (-च) केह (माववेद) पनित (समसाम्परापसे भयोगकेवली गुणस्थानपति ) निका (अल्पबहुस्त्र) सामान्पक्तक संक्षेप (प्रसंगमें पहिले कक्सि गुणस्थान) समान है अर्थात् नपुंसक माक्वेदी मिप्यास्त्र प्रथम गुणस्थानसे अनिधिकरण नवमें गुणस्थान तक है । और माक्पद रहित दशा गुभस्थानसे चौदहवां क है । देखो एठ २९८ मार अपूर्वकरण मियवालासे असम्पास गुणे शेष तीन गतिके जीव है । मिथ्या प्टीमीय नपुसकलिंगी अनंतगुमे इंपोंकि स्त्रीलिंग पुल्लिंगजीव पंचेन्दूिग होत हैं। और सैनी (मनसहित) होते हैं (पेखो चोपीसस्थाना प्रय) परन्तु नपुंसक लिंगी मीव एकेपि-दीन्दूिप-त्रीन्दूिप-चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय सैनी अर्सेनी दोनों होते हैं (देखो चौबीसस्थानाग्रन्थ) साप-अनुगादेन कोष-मान-माया-कलापानाम् ।। =(६) कायके कथनानुसारसे क्रोप-मान-कपट कपायवालोंका (अल्प बहुत्व) पुषेदव -पुरुष वेद समान है (और पुरुषवेदका अस्प महत्त्व पंचेन्द्रिय पद है अतः क्रोध मान माया-पाय वालोंका अल्प महुस्व पैनन्द्रियपतु ३) पनेन्द्रिय जीवोंके अल्प पहुत्व के लिये " चार अपर्व २९८ से २९९ पृष्ट के अन्त) अयम् : तु० विशेषामिप्याप्ट्या । अनन्तगुनाः परन्तु मेद यह है कि मिथ्यारष्टि (पूस्येक गुमस्थानघालोंसे) अगन्स गुपे है लोमपापापामा। दमोः । उपशमक्यो । -लोमकपायवाले दो (अपूर्वकरण अनिवधिकरण) उपष्ठममेभीवालोंकी तुस्सा ॥ संस्पा ॥ धकाः । समान गणना है। (उन दो उपशमवणीवालों से) धपकोणी प्रगनिवागी जारुपमहाय वकील कृत पदन्छेद और विभत्सर्प सहित सर्विसिद्धिका शमा हिंदी अनुनाद । अपार मंत्र और अनिवृषि फारम उपभमभेनीवाले जीव माव पुरुषवेदी और माव स्त्रीवेदी सपसे चोरे २९९ वा ३०० वा ३०४ प्रत्येकगुणस्पानके मेंसे भाष नपुंसमवेदी घटादिये जायें तो भाव पुरुषवेदी और भाव खीवेदी शेप रस चामे । इनसे संख्यामगुपे प्रत्येक अपूर्वकरण आपकश्रेणी और अनिवृधिकरण सपकोणी रोंगे क्योंकि इन प्रत्येक दोनों गुमस्पामि ५९८ वा ६०० वा ६०८ जीव टकटकरि तीनों वेदपाले हो सके हैं। अप्रमच संयमी इनसे संस्पात्गुणे क्योंकि इनकी संस्म्या तीनों वेदवालोंकी २९६९९१०३ हो सकी है। इनसे अधिक प्रमसंयमी है क्योंकि तीनों पेदवालोंकी संख्या ५९३९८२०६ जीप ।। शेपके लिये देखो उक्त प्रमपसे अन्त तक पृष्ठ २९९ बदुरि निमाल नाममप संयुक्त स्रीवेदन भामरका दिशेप लीए अगोपांगेमामा नामक हदय रोमरहित मुमा स्तम योमि इत्यादि पिसबुत शरीरमा पारक जीव सो पापका प्रथम समपते गाइ मतसमवपर्पत दम्प स्त्री साहरि निर्माण नामका उपपते संयुतमर्पुसावेदरूप मारण विशेष पिएं अंगोपांगतामा मामपातिके ग्वपत मूग ही माल पा स्तम यानि र विक दाऊ चिन्ह रहित शरीरकाधारक जीव सो पर प्रथम समयते लगाए असमयपर्वत ब्रम्प नमक ही है। सा प्रायेण करिए पासताकरितो ममान वेद हाई मा पद हार साही मापन हरिची ममान वदमहोदम्पवेद अन्य हा माष वेद अम्प हार। तहाँ देय जर मारकी मर मागमूमियाँ तिर्पच मनुम्प निक तो जमा दम्पपेर वेसा ही भावषेप गरिधर्म भूमि तिर्यम भर मनुष्पवि का गीपनि तो जैमा ब्रम्पयेद दो तमाही माव वेद है गरिक जीनि: दम्पद मम्प दौमर मापद अम्प हारे दम्पत पुष मर मारते पुरा ममियापाप नोवती पानी भर पुरुष पामनिका ममित पुसावेदी है। जैसे ही पते स्त्री पो है मापत नीका अभिवावकप पुरुषपदी है या वोमिका अमिलापल्प नपुंसक बेदी । गरि दर मसक वे है मारते नीका अभिमास पुरवेदी का पुरका अमिलापका स्त्रीवेदी है। भैमा विशेष मानना, माते आममरियममा गुपस्पानन मवेद माग पर्यंत मावते तीन वेद मर पवें एक पुरुम्वेद ही अम कपन परया है गाम्मर सीब० मुद्रिव पृष्ठ ५९२, ५९५॥ पुरोध परिणाम मात्र अग्नि समान है। सोदो परिणाम कारीपकी अग्नि समान नपुसक वेदोन परिमाम पनापाकी मामि पमान है मे तीनाही आतिक परिणामनिकी यो पीडा तोचिरिने रित भए है स मावषेष अपेसा मनिवृत्तिकरमा नपगत देव मागते समय अपागी पर्यंत माद्रप मावरमपेक्षा गुमरपानातीव सिह भगवान मानने । गो भीष मुद्रित पए १९८ निवासी बगरूपसहाय पोसान पाम्छेद और विमान सहित स्वार्थसिदिका अम्मा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ च ८ नपुंसक्वेदानामवेदानां च सामान्यवत् ॥ (६) फषायानुवादेन-कोषमानमायाकपायाणा पुंवेदवत् । अयं तु विशेष' मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः ॥ लोभकषायाणां द्वयोरुपशमक्योस्तुल्या सख्या। क्षपका नपुंसमवेदानाम् ।। अदानाम् ।। च नपुंसक वेद पातोंका तथा (-च) वेद (माक्षेद) पनिस (समसाम्परायसे मयोगकेपली गुणस्थानपति ) निका (अल्पमहत्व ) संक्षेप (प्रसंगमें पहिले कपित गुणस्थान) समान है अर्थात् नपुंसक मायकेही सामान्पवत् मिथ्यात्व प्रपम गुणस्पानसे अनिचिकरण नवमें गुणस्पान तक है । और भाववेद रहिस दसवां गुणस्थानसे चौदहवां तक है ॥ देखो पृष्ठ २९८ पार अपूर्वकरण मिश्वालोंसे असम्म्पात गु शेप तीन गतिक जीव है । मिथ्या प्टीधीव नपुंसकलिंगी अन्तगुणे ई स्पोंकि स्त्रीलिंग पुल्लिंगजीव पंपेन्दूिग होत हैं। मोर सैनी (मनसहित) होते हैं (पेखो चौपीसस्थाना प्रप) परन्तु नपुंसक लिंगी नीव एकेद्रिन-श्रीन्द्रिय-श्रीट्रिय-चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय सैनी सैनी दोनों होते हैं (देखो चौबीसस्थानानन्य) साप अनुगावेन-भोप-मान-मामा-कलापामाम् ।। (६) कपापके कपनानुसारसे कोष-मान-कपट कसायनालोंका (अन्स पहुत्व) पुवेदवत् -पुरुष पेद समान है (और पुरुषपेदका अल्प बहुल पंचेन्द्रिय क्त है अतः क्रोष मान-मामा-पाय वालोंका अल्प बहुस्व पंनेन्द्रियवत् 1) पंचेन्द्रिय जीवकि अल्प पहुस्व के लिये “ चार अपर्ष २९८ से २९९ पृष्ट के अन्त) अयम् ।। १० विशेषः । मियाप्टमा मनन्तगुमाः -परन्तु मेद यह है कि मिथ्यारष्टि (पूस्पक गुणस्थानवालोसे) अनन्त गुणे ई सोमक्सापाणाम्। यो । उपसमायोः । -लोमक्सायवाले दो (अपूर्पकरण अनिवत्तिकरण) उपशमनेगीवालोंकी सुस्मा संख्या :॥ धपका समान गमना है। (उन दो उपसमममीवालों से) पाणी ।

प्रगनियामी जगरुपमहाप वकीलकृत पदाद मौर विमपत्यप सहित सर्वार्थसिद्धिका मदन पिंदी अनुवाद । जन्याय १ सय ८ मम्येयगुणा । सक्षममाम्पराय शुध्दयुपशमक्मयता विशेषाधिका । सूक्ष्क्षमापरायक्षपका संख्येयगुणा । शपाणा सामान्यक्त । (अपूर्वकरन पाठा बनितिकरण नमो गुणस्थानयासे) संस्पायगुपे वर्षाव संरस्पेक्-गुणा पस्पेक उपनुमणीफे माठ नवमें गुणस्थान,२९९ मुनि में था कि लाचा के सतमें ३०० अषया अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रत्येक पक मेत्तीके भाषे नवमें गुणस्थान में ५९८ मनि में किसीके मत में प्रत्येकौ ६००, अन्पके मतुमें प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्येक उपसमगीवाने से प्रत्येक पप में संख्यात गुणे हुए गममाम्पगय मुदि-उपसमझ-संपता' प्यामसापराप अयसंगत उपचमकणीवासे दश्वो गुणस्थानी विशेष अधिका। विशेपकरि अधिक पामसाम्पराय-धपका (उन सूक्ष्मसापराय उपचमक्से) सूक्ष्मसापराय पपफमणीवाले संस्पातगुणे। क्योंकि उपचमक सक्ष्मसापराय २०९ वा १०० वा ३०४६ और सूक्ष्मसोफाम पाक ५९८ पा ६०० वा ६०८ हैं पाणाम् । क्ने हुये (उपश्चान्तरूपाय-सीणाप-सपोगरेयसी-वयोगफेवली गुषस्थानवती) निका (अल्पमहत्व परसर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिसे कहा हुआ गुणस्पान ) सहा वर्षाव उपभोक्सास गुणस्थानमें मिन मिम मतानुसार २९९ या ३०० वा ३०४ मुनि । मीन माय में इन से तूने हैं मसा उपयर्यातकपाय से क्षीनकपायमें सम्मात गुपे हैं। समोगकेवली ८९८५०२ - सम्मेष गुणा । मामान्पवत - एटानियामी जास्पसबार वकीलकृत पदच्छे और विमक्स्पर्ष सहित सर्विसिक्किा मदनः हिंदीअनुवाद अन्याय १ सय ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [२] वेदानुवादेन-- स्त्रीपुंवेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । काय-योगिनाम् । सामान्फ्यद कापयोगियोंका (मल्प पहुत्व) संक्षेप (प्रारणमें पूर्वोक्त गुणस्थान) क्त् है मर्याद अयोगकेसलियों को छोड़कर पृष्ठ २९८, २९९ में पार अपूर्व पंचेन्द्रिय मिध्यादृष्टीजीव जसम्पात गुणे (२९९के अन्त तक पदलो) [५] वेद अनुवादेन : स्त्री-पुम्-वेदानाम् ।। =[4] वेद(स्त्री-पुरूस नपुंसक) की अपेक्षासे स्त्री-पुवेद पालोंका पंचेन्द्रियवद - (अल्प महत्व) पोचन्द्रिपवाले (बीन) निके समान है अर्थात् ठ २९८ में पंथेन्द्रियों का अल्प पहुस्व गुणस्थानक्त है जोर "बागमवि नवमा गुणस्पानका सफेद भाग पर्यत मार्फत तीन वेद है और म्यते एक पुरुष केदही है।" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गामा २७१ ॥ नवमा गुणस्थानके प्रथम तीनमाग भाववेदसहित हैं। वन्तके तीनमाग (दिनको अपातमाक्वेद करते हैं ) मावद रहित हैं। इसलिये नवा गुणस्पानसे मिप्यास्प प्रथम गुणस्थान के जीयोंमें जो अल्प बहुत्व है पही स्त्री-पुरुष वेदीयोका अल्पपहत्व होगा । यह ऐसे है कि अपूर्वकरण (१) मारित्र मोइनोवा मेप नोमार वीहरूमा पुनर सीवर नपु सायर नामा प्रति दिन के भय माव मो पेवाय फ्योग विवि पुष्प को नए सकल्प मीर हो है। परि निर्माण नामा नाम कर्म के प्रवकरि संवुत म गोपोगका विशेषरूप नाम कमेको प्राविक माप द्रम्म मो पुद्रमोका पवितीदि पिन पुग्न स्त्री ममत्र हो है। सारी करिए । पुल वेदक अप नीका ममिलाप मैपुग संशाका पारी जीव सा माय पुमा दोहै। परि स्त्रीवेद के करपते पुणका अमिमापण मैथुन संबाच धारक जीव मान ली हा परि ममवेष के उत्पते पण माझी पाउन युगमत् ममिवारूप मैथुम संबाका पाएक जीप सो मा नपुम्क हो है परि निर्माण माम कमात्र उदय संयुग पुस वेवमय भाचारका पिशप मिस मंगोपाय नाम नाम कर्मका ग्यवे भूमो लिंगदिक चिन्ह सयुष शरीरका धारक जीप सो पर्यापन प्रथम ममय जगाय मान्त ममप पर्पव बम्प पुस्य हो।

- एगनिमी जगरुपमाय मफीलमृत पद हेद और विमपत्यर्थ सहिस सायसिदिका सप्दमा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ न ८ मम्येयगुणा । सूक्ष्ममाम्पराय शुध्दयुपगमकमयता विशेषाधिका । सूक्ष्मसापरायक्षपका संख्येयगुणाः। शपाणा मामान्यवत् ॥ मंगप्पेय-गुणाः । (अपूर्वकरप आठवा अनिचिकरम नवमा गुणस्थानयासे) संस्म्यातगुणे अर्थात प्रत्येक उपनमनीफे बाठ नवमें गुणस्थान,२९९ मुनि ने मा क बापायों के मतमें ३०० अथवा अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रत्येक पपक मेतीके पादप-नवमें गुणाथानमें ५९८ मुनि में किसीके मन में प्रत्येकमें ६००, जन्मके मदमें प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्यक उपभोपीवाले से प्रत्येक पपा में संस्पात गुपे हुए गममाम्परायमुदि-उपसम-सेयता -सक्ष्मसापराप शुदसंपत उपनमकभीवाले दो गुणस्थानवर्ती दिनप अधिका' । विशेषकर यषिक ग्राममाम्पराय-पकार (उन सूक्ष्मसापराय उपश्चमकले) सूक्ष्मसापराय परमीषाले संम्पातगुण है क्योंकि उपचमक ग्रामसापराय २०९ वा ३०० पा ३०४ हैं और सामसापराप धपक ५९८ वा ६०० वा ६०८१ बचे हुये (उपशान्तकपाप-सीकमाय-समोगकेवली-अयोगकेवली गुणस्थानसी) निका (अल्सपाहुत्व परस्सर) मामान्परत संक्षेप ( प्रारममें परिले कया हुआ गुणस्थान ) सत्य है वर्षात उपशावकलाप गुमस्पानमें मिम मिम मवानुसार २९९ वा ३०. वा ३०४ सनि है। दीन- कमाय में इन से ने है नवा उपांतपास से क्षीणकपा में सम्मास गुमे ।। सयोगरेयसी ८९८५०२ मेमगेग गुणा । पाणाम् ॥

एटानियासी जगरूपसमाप वकीलकृस परछेद और विभक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः दिदीअनुवाद अध्याय १ मत ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [५] वेदानुवादेन-- स्त्रीपुंवेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । काय-योगिनाम् । सामान्यत् . काममोगियोंका (अल्प-महुत्य) संसेप (प्रकरणमें पूर्वोक्त गुणस्थान) क्त है भास् मयोगकेवलियों को छोड़कर पृष्ठ २९८, २९९ में चार अपूर्व पंचेन्द्रिप मिच्यादृष्टीनीव असस्पात गुपे हैं (२९९के अन्त तक पदलो) (५] षेद अनुवादेन । स्त्री-पुम-वेदानाम् । =[५] बंद(ती-पुरुस-नपुंसक) की अपेक्षासे स्त्री-पुवेद बालोंका पंचेन्द्रिययत् . - (अस्प-महत्व) पांचन्द्रियपाले (बीव) निके समान है अर्थात पा २९८ में पैपेन्द्रियों का अल्प बहुत्व गुणस्थानक्त है और "बागमवि नवमा गुणस्पानका सयेद माग पर्यत माक्त तीन वेद और ठेय एक पुरुष वेदही है" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गापा २७१ ॥ नवमा गुणस्थानके प्रथम वीनमाग माक्वेदसति ।। अन्तके तीनमाग (जिनको अपावभावद करते हैं ) माक्येर रहित । इसलिये नवमा गुमस्थानसे मिप्पास्व प्रपम गुणस्थान के जीयोंमें जो अस्प पहुत्व है वही स्त्री-पुरुष वेदीयोंका अल्सपाव होगा । यह ऐसे है कि अपूर्वकरण (1)"पारित्र मोइनोवा मेद नोक्पार वीहरूप पुरपर सीवेर नपु साव नामा प्रति दिन पयः भाव मो वैवाय पपयोग सीधिप पुण्य स्रोन्स सकस्म जीव हो। पारि निर्माण नामा नाम कर्म के उदयकरि मयुज अगोपांगका विशेषरूप नाम कर्मको प्राविक पब द्रष्य मो पुसीका पर्यापतीहि यि पुरुषलो नपुंसकहा है। सा ही कहिए है पुष येद उवा लीका अमिनागप मैपुन संशाका धारी जीव सो माव पुष्पदा है। गरि सोपेद से उनपत पुल का अमिमाषा मैथुन समाच धार बीय माप स्त्री कारगारममावेष के उदयते पुल मय सी पाउन युगमत् अमिनारस मधुन संबाका धारक जीप सो माप मपुम्फ है परिनिर्मान नाम कम उदय संयुगपुर वेदप भावारका विशप जिस अंगोपांग नामे मम कर्मका उपयो {सनो लिंगादिक चिन्द समुष शरीरका धारक जीप सो पर्षापका प्रथम ममपते लगार अन्त ममप पूर्वव ब्रम्प पुरप हो।

प्रगनितामी जगत्पमहाप यकीलकृत पदग्छेद और विमारपर्म सहित सपिसिलिका पन्दना हिंदी अनुषाद । अध्याय १ सूत्र ८ मम्येयगुणा । सूक्ष्ममाम्पराय शुध्दयुपशमकमयता विशेषाधिका.। सूक्ष्मसापरायक्षपका संख्येयगुणाः । शाणा सामायवत् ॥ मंग्व्येय-गुणाः । (अपूर्वपरम आठवां अनिवतिकरण नवमा गुणस्थानमाले) संस्मातगुणे वर्वाद प्रत्येक उपञ्चमभेनीके बाठ नवमें गुमरवान,२९९ मुनि में पाक भाचार्यो के मतमें ३०० भएका अन्य के मतानुसार ३.४ है और प्रस्वेफ धपक मेली के पाठवे-स्वमें गुणस्थान में ५९८ मुनि है, फिसीके मत में प्रत्येकौ ६००, अन्पके मतुम प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्यक उपम भणीवाले से प्रत्येक घर में संस्पात गुपे हप सम्ममाम्परायशुद्धि-उपनमरू-संपता -पक्ष्मापराप शुवसंपत उपचमणीवाले दशं गुगरपानवी विशेष अधिकार -विश्पकार अधिक प्राममाम्पराक्-वफका (उन सक्ष्मसापराय उपसमकसे) यक्ष्मसापराय पाणीवाले संस्पावगुप हैं क्योंकि उपसमक सूक्ष्मसापराम २९९ पा ३०० पा ३०४ हैं और सूक्ष्मसापराय पपक ५९८ वा ६०० वा ६०८१ पामाम् ॥ बचे हुये (उपशान्तकपाप-सीणापाय-स्पोगकेवली-अमोगकेपली गुणस्थानपती) निका (अल्स-पस्व परस्पर) संक्षेप ( प्रकारनमें पहिले कहा इजा गुणस्थान ) सम्म अांत उपांतकवास गुणस्थानमें मिम भिन्न मतानुसार २९९ मा ३०.मा ३०४ मुनि।पील- आप में इन से बने है अतः उपर्यातकपाम से सीणकपायमें सस्पात गुणे ॥ सयोगमती ८९८५०२ संस्गेस गुमा । मामान्पवत एटानिवासी जगरूपसहाय यकीकृत परस्छेद और विभक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिद्धिका भन्दवः दिदीबनुवाद अध्याय १ सय ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [२] वेदानुवादेन-~ स्त्रीपुवेदाना पञ्चेन्द्रियवत् । काप-पोगिनाम् । सामान्यक्त है =फारमोगियोंका (अल्स-बहुत्य) संक्षेप (प्रकरणमें पूर्वोक्त गुणस्पान) क्त् है मर्थात् वयोगसेवलियोंको छोड़कर पृष्ठ २९८, २९९ में चार अपूर्व पंचेन्द्रिप मिथ्यादृष्टीधीव असम्पात गुपे है (२९९के अन्त तक पदलो) [५] पेद अनुवादेन । स्री-पुम्-वेदानाम् ।। = [4] पेद(सी-पुरुष नपुंसक) की अपेक्षासे स्त्री-पुषेय पालोंका पंचेन्द्रिपवत् = (अल्प-पहत्व) पांचन्द्रियवाले (जीव) निके समान है अर्थात् पठ २९८ में पंचेन्द्रियों का अल्प पहुत्न गुणस्थानक्त है और "आगमविप नवमा गुणस्थानका सपेद माग पर्यत मासे तीन वेद है और पते एक पुरुष वेदही है" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गापा २७१ ॥ नमो गुणस्थानके प्रथम चीनमाग भाषवेदसहित । अन्तके वीनमाग (बिनको अपगतमापद करते हैं) माक्यद रहित हैं । इसलिये नवमा गुणस्थानसे मिथ्यात्व प्रथम गुणस्थान के जीवमि जो अल्प महत्व है वही सी-पुरुष वेदीयोंका अल्पाहुत्व होगा । यह ऐसे है कि मपूर्वकरण (१)"चारिख मोइनोवा मेद नोकपार वीइस्प पुरमयर सीमेर नपुसम्यर नामा प्रति दिन पय माव जो पैदम्प रपयोग नीति निर्व पुस मो नप सकसप जीव हो । पारि निर्माद मामा नाम कमे के उदयकरि संयुतमगोपांग विशेषरूप नाम कर्मको प्रतिक रूपमा दम्ब मो पुरमीत पर्णपतीदि विर्ष पुग्ण श्री मधुमकदा है। मारी दिए । पुल पेदक उपते स्नीका ममिनापाप मैथुग संगाका पारीजाब सा माव पुपादा है। परिसीवेद के गदपी पुल का मिमा मैथुन संबाध धार जीय माव भी हारेर ममावेद के उदय पुरुष मग मी पोरगम युगमत् अमिनारूप मेधुन संसाका घारकगीय सो भाव नपुंसकता है गरि निर्माम माम कमका उदय संयुज पुस वेदम आगरका विशय तिर अगोपाम माम माम कर्मका उदयत मुंबलो हिग्यदिक चिन्द सपुत शरीरका पारफ जीप सो पायका प्रथम ममयते गाय मन्त ममय पर्फत ब्रम्प पुरुष हो।

पानिवामी जगरुपमहाप पकीस्कृत पदाछेद और विभास्यर्थ सहित सार्थसिद्धिका पदमा हिंदी अनुषाद । अध्याय १ घन ८ मन्येयगुणा । सूक्ष्ममाम्पराय शुध्दयुपशमक्मयता विशेषाधिका । सूक्ष्म्सापरायक्षपका संख्येयगुणाः । शाणा सामान्यवत् ।। संम्म्येय-गुणा' । -(अपूर्वकरण बाठयां अनिकिकरण नषमा गुणस्थानवाले) संस्पातगुणे वर्षाव प्रत्येक उपप्तमनीके आठवें नरमें गुमस्तान,२९९ मुनि में पाक बापाला के सतमें ३०० भाषा अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रस्पेक,धएक महीके बाद नवमें गुणाधान में ५९८ मनि में किसीके मत में प्रत्येकौ ६००, अन्पके मृतमें प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्येक उपष्मणीलाले से प्रत्येक एक में संस्पात गुणे हुए सम्ममाम्पगय मुदि-उपनमक-संपठाः प्यूक्ष्मसापरास शुद्धसंमत उपसमक्षणीवासे दो गुणस्थानपी विशेष अधिका । विशेषकारि अधिक हैं गम्ममाम्मराय-चपकार =(उन सक्ष्मसापराय उपसमकसे) समसापराय आपकरणीवाले संरम्पासगुणे हैं क्योंकि उपत्रमा सूक्ष्मसापराय २०९ पा ३०० का ३०४ गौर सूक्ष्मसापराय आप ५९८ का ६०० पा ६०८ हैं अपे इसे (उपशान्तकमाय-सीणपाय-सयोगफेवली-अपोगकेवली गुमस्थानवी) निका (अल्प पाहुस्व परस्पर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिले कया हुवा गुपस्थान ) सरशी वर्षात उपयोक्कसाय गुणस्पानमें मिम मिम मतानुसार २९९ वा ३०० वा ३०४ मुनि । पील समाप में इन से बने है मत उपश्चातकपाय से सीनरूपायमें सम्मात गुपे हैं। समोगफेवली ८९८५०२ माणेय गुमा । पाणाम् ॥ मामान्यत ण्टानिवामी जगरूपमहान वकीलकृत पदच्छेद और विमस्य सहित सर्वार्थसिदिका सदस हिंदीमनुवाद अध्याय १ मत ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [५] वेदानुवादेन-- स्त्रीपुंवेदाना पञ्चेन्द्रियवत् । काग-योगिनाम् । सामान्यक्त् . -कापयोगियोंका (अन्य महत्व) संक्षेप (प्रकरणमें पूर्वोक्त गुणस्थान) वन है अर्थात् अयोगकेवलियों को छोड़कर पृष्ठ २९८, २९९ में चार अपूर्ष पंचेन्द्रिप मिज्यादृपीजीव असस्यात गुमे हैं (२९९के अन्त वक पदलो) (५] पेद अनुपादेन : सी-पुम्-वेदानाम् ।। = [५] वेद(स्त्री-पुरुष नपुंसक) की अपेक्षासे सी-पुपेद वालोंका पंनेन्द्रिययत् । -(अल्प पहुत्व) पांचइन्द्रिपवाले (जीव) निके समान है अर्थात् पृष्ठ २९८ में पंचेन्द्रियों का बस पहुत्व गुमस्थानफ्त है और "आगमयि नवमा गुणस्थानका सवेद भाग पर्यंत मासे तीन वेद हैं और द्रव्यते एकं पुरुष दही है" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गाथा २७१ ॥ नवमो गुणस्पीनके प्रयम तीनमाग माववेदसहित हैं। अन्तके तीनमाग (मिनको अपगतभाववेद करते हैं) माववेद रहित । इसलिये नवमा गुणस्थानसे मिथ्यात्व प्रथम गुणस्थान के जीपोंमें जो अल्प बहुत्व है वही सी-पुरुष वेदीयोंका अल्पबहुत्व - होगा ॥ पद ऐसे है कि अपूर्वकरण (1) चारित्र मोहनोपा भेद मोकपार वीहरूप पुरावेद स्वीवेर नपु सम्मेव नामा प्रति दिन के व्यय माव मो घेवग्य उपयोग विकिप पुग्स खो ना सकाप मोव हो है। परि निर्माद नामा माम कर्म के सरपनी संयुक्त भगोगका विशेषरूप नाम कमेको प्राविक वय द्रव्य मो पुद्रलोका परितीरि पिर्ष पुरुष स्नी नपुंमक हा है। साहो कहिप पुरुष पदके उदयत स्नीका अमिनापम्प मैथुम संगाका पारी सीप सी माय पुण है। गरि नीयत के व पुष्पा ममिला मैथुन संबाका धारफ मीर भाप नी । है परि गपुमम्वेद उदय पुष्य अपनी वारान युगमत् ममिनावरण मैगुन संबा धारकमीप सो मात्र नपुमा परि निर्मान माम धर्मका ग्वय सयुज पुर वेदश मागरका विगलि अगाin नाम नाम कर्मका ग्वयन- भा ममप पर्यंत प्रम्प पुरुष हो। मूंगादो लिंगादिक चिन्द समुक्त गरीरका धारक जीप सा पर्यायच प्रथम ममप लगाय । प्रगनिवामी जगरूपमाप पकीलमृत पदपछेद भौर विमपत्यर्य महित सर्वार्थसिद्धिका घम्दया सिदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ मम्येयगुणा । सक्षममाम्पराय शुध्दयुपशमक्मयता विशेषाधिका । सूक्ष्मापरायक्षपका संख्येयगुणा । गरणा सामान्यक्त ।। मंग्येप-गुगाः -(अपूर्वकरण आठषा अनियत्तिकरम नषमा गुणस्थानवासे) संख्यावगुणे अर्थात मस्पेक उपक्षमभेमीफे माठ नसमें गुणस्पान;२९९ मुनि में वाईक वाचार्यों फे सतमें ३०० अथपा अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रत्येक पाक मेलीके भादवेन्वमें गुणस्थान, ५९८ मनि रे किसीके मत में प्रत्येकमें ६००, अन्यके मतमें प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्यक उपमनीवाले से प्रसरोक धपक में सुम्याद गुपे हुए माममाम्परायनुदि-उपसमक-संपता सूक्ष्मसापरास शुदगा उपनमा पीकाले दो गुणस्थानी विशेष अधिका विपकरि अधिक है ग्राममाम्मराय-वफा ।। (उन रस्मसापराय उपनमकसे) समसापराय पपकमपीवाले संख्यातगुषे। क्योंकि उपशमक सक्षमसोपराय २०९ या ३०० वा ३०४१ और समसापराय धपक ५९८ पा ६०० पा ६०८ हैं मे हुये (उपशान्तकपाय-सीमापाम-समोगकेवली-अयोगकेवली गुणस्तानवती) निका (अल्प माहुत्व परस्सर) संक्षेप ( प्रकरममें पहिले या दुधा गुणस्थान ) सरल है अति उपयोतकमाय गुणस्थानमें मिम भिम मतानुसार २९९ वा ३०० रा ३०४ मुनि । वीप- साय में इन से बने हैं अता उपनातकपास से क्षीणकपा में सम्मान गु॥ ससोगकेवली ८९८५०२ ममगेय गुणा ॥ नेपामाम् ॥ मामान्यवतक पानिपामी मगरूपमहाप वकीस्कृत पदच्छेद और विमापर्ष सहित सर्वार्षसिदिका सन्दशः विदीयनुपाद अध्याय १ मत ८ काययोगिनां सामान्यवत् ॥ [५] वेदानुवादेन-- स्त्री'वेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । काग-योगिनाम् । सामान्यक्त . =कापयोगियोंका (अस्स-बहुत्व) संक्षेप (प्रकरणमें पूर्वोक्त गुणस्थान) पद है अर्थात् अयोगकेवलियोंको छोड़कर पठ २९८, २९९ में पार अपूर्व पंपेन्द्रिय मिथ्यादृष्टीजीव असम्पात गुपे हैं (२९९के अन्त तक पदलो) [५] येद मनुवादेन । स्त्री-पुम-वेदानाम् ।। = [५] पेद(स्त्री पुरुष नपुंसक) की अपेपासे सी-पुवेद पालाका पंनेन्द्रिमवत् है - (अल्प-महत्व) पांचइन्द्रियवाले (बीप) निके समान है अर्थात पृष्ठ २९८ में पंषेन्द्रिमों का बस पडत्व गुपस्थानवत है और "आगमपि नवमा गुणस्थानका सवेद माग पर्यत मातें सीन वेद हैं और वठ्यते एक पुरुष केदही है" गोम्मटसार मुद्रित पृष्ठ ५९३ गाथा २७१ ।। नयमो गुणस्थानके प्रथम तीनमाग माषवेदसहित है। अन्तके तीनमाग (जिनको अपातमाक्वेद करते है ) माक्कैद रहित । इसलिये नषमा गुणस्थानसे मिध्यास्य प्रथम गुमस्थान के मीमि जो बरस पटुत्व है पही त्री-पुरुष वेदीयोंका अल्पाहुस्व होगा ॥ कह ऐसे है कि अपूर्वकरण (१)"पारित्र मोइनोमा मेष नोकगाय वील्म पुररर सोफेर नपु सापेर नामा प्रति दिन दयः माय मो वैवाय पपयोग हीदि पि पुण खो न सकसप भीर हो । पारि निमोब नामा नाम फर्म सयभर संयुक्त भगोपांगध विशेषरूप नाम को प्रतिक म्पपर्व द्रव्य पुरलोका पर्यापतीहि यि पुरण ली मघुमकहा है। साहो करिए हे पुरुष व उत्पति स्त्रीका अमिनायाप मैपुरा संशका धारी जीव सा भाव पुगा दी है। बहुरि स्खीयेव के उदर्पत पुल का भमिमा मैथुन संबाला धारक बीय भाव सी होरि गमवेद के उदय पुष भर मी पाउन युगमत् अमितापरप मैथुन संवा धाएफ सीप सो भाव मपुमारि निर्मान माम मा उदय सयु पुरा वेदप प्रावगरका विश अंगोपाप मामे माम धर्मका ग्यपः मूंगहो निगाविक चिन्द सयुष शरीका घारक जीप सो पर्यायच प्रथम ममप लगाम अन्त ममप पर्पत बप्प पुपए है।

पानियामी जगरूपमहाप पकीला पदपछेद और विभपस्यय सहित सर्वार्थ सिदिका सदश दिदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ मन्येयगुणा । सूक्ष्ममाम्पराय शुध्दयुपशमकमयता विशेषाधिका । सूक्षणमापरायक्षपका संख्येयगुणाः। शशाणा सामान्यत् ॥ म्सपूर्वकरण बाठो मनिवकिरण नवमो गुणस्थानवासे) संस्पातगुणे बात संम्म्येन-गुना प्रत्येक उपसमभेपी बाठमें नवौ गुणस्पानमे२९९ मुनि 'पा क बापानी के मतमें ३०० अथवा अन्य के मतानुसार ३०४ हैं और प्रत्येक पक श्रेणी आठवे-नयम गुणस्थानमें ५९८ मुनि में किसीके मन में प्रत्येकौ ६००, अन्यके मतम 'प्रस्पैक में ६०८ इसलिये प्रत्येक उपक्रमभेणीवाले से प्रत्येक वर्ष में : संस्पात गुणे हुए गममाम्परागुद्धि-उपनमक-मयता सूक्ष्मसापराय मुद्धसंवत उपशेमगीपाले दना गुसस्थानयती विशेष अधिका' । -विशेपकरि अधिक गुम्ममाम्पराग-चपका। (उन यस्मसापराय उपनमासे) मसापराम पाथणीवाले संम्यावगुणे हैं क्योंकि उपशमा मसापराय २०९ पा ३०० या ३०४ है और समसापराय धपक ५९८ पा ६०० पा ६०८ हैं नेपाषाम् । पये हुये (उपश्चान्तकपाय-सीणम्माय-सपोगकेवली अयोगकेपली गुणस्थानी) निका (अत्य-महत्व परस्पर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिले कहा था गुणस्थान ) सध्या अर्थात उपयोतकाम गुणस्थानमें मिन मिम मतानुसार २९० वा ३०० वा ३०४ मुनि । धीम कपाप में इन से इने बतः उपनातरूपाय से सीगकपाय मस्मात गणे॥ मपोगकेवली ८९८५०२ गंम्गेग गुणा ।। मामान्पकार SASAHassasa: एनिवासी जगरूपसहाय पीलम्त पदच्छे और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका अवता हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र । [७] ज्ञानानुवादेन-मत्यज्ञानिश्रताज्ञानिपुः सर्वत स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः।। विमज्ञानिपु सर्वतः स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणा ॥ ये उपशान्तकपायसे और धीपकपापसे संस्पात गुणे हैं अयोगफेमली मिन मित्र मता- नुसार ५९८ या ६०० वा ६०८ हैं (देखो अवश्य इस अनु पादके पृष्ठ३०८ की टिप्पणी संस्था (२) ये उपक्षातकपारपालोंसे तो संम्पात गुणे हैं॥ धीमापावालोंके उपर्युक्त अयोगकेवली समान हैं। इनसे सयोगकेवली संख्यात गुणे में शान अनुरादेन । मति अन्मानि-मुतअनानिपु ।। (७) धानके कयनसे कुमति और फुयुत प्रानियों में मर्यत स्तोकाः । साम्दनसम्परताप।। -सरसे थोडे (-स्तोक) स्पसादनसम्पम्दर्शनवासे (दूसरे गुणस्थानवती) हैं (उन मति उभुत मानी सासादनसम्पादृष्टियोंसे) मिथ्यारएप । अनन्तगुणा ।। समिध्याष्टी अनन्त गुपे पा "विन अनवगुर्गा मिप्यारष्टि है" जय० पप० ११७ विमानानिप, मना मनोका' मासादामम्यग् अधिनानिमि सबसे थोडे सासादन सम्पग् दर्शनवाले हैं (विन फुअवधिज्ञानी सासादन सम्गग्राष्टिमसि) गिध्यादृष्टय' । असुम्येयगुमा (-अवपिसानी) मिध्यादृष्टी असंख्यात गुणे हैं 'सर्पता म्मामा मामापनसम्पमय । मिप्यारापोऽान्तगुणाः । मर्पतः स्तोमा निमशानिपु मागादनमम्पनपा। मिपारएपोऽसपायगुणा इस पाक्यो सान में मरम्स स्वार्थसिदि की दोनों आपत्तियों की प्रतियों में सर्वपः स्ताका सासादनसम्पन्हष्टप।। मिपाएयोऽ सकगुणाः । भूसमे उपगया अर्थात् "मिपारस्योऽमम्तगुणाः । सर्पतः स्तोका पिभर पानिपु सामादनमाश्मयः वाम न गया है क्योंकि अपचवनी पी पनिका हरत मिखित और मुद्रित (पृष्ठ११७ में "सर्वते स्साक मामावमसम्पमष्टि है। वीनित अनंत गुण मिपारष्ठि है। विभंग पानीनि विषे गवत गोरा मामावन सम्परामि है। तिनित असंम्पावगुणां मिभ्यारष्टि ऐसी मारा पनिका है वह शम्पशा उपर्यु संस्तके प्रथम भार का अनुपाददै । (२) नगरा देतु यह है कि संसार में मिप्याप गुणस्थानमें जितने भी सीव है सब इम्बिपपालोफे, मयंगविम, सर्व कापवामि पमति मान और पुश्त मान होते हैं और मियाप सासादन दो ही गुजस्थान इन अमति कुश्त शानियोंकि रएमा।

। मतम प्रत । PORA गनिवामी जगरूपमाप पकीला पदईद और विभक्त्यय सहित सर्विसिद्धिका शयन रिदी अनुवाद । अध्याय १ सय ८ मम्येयगुणा । सक्ष्ममापराय शुध्दयुपशम.मयता विशेषाधिका । सूहम माम्परायक्षपका संख्येयगुणाः । शाणा सामान्यवत् ॥ मम्म्पेय-गुणाः (वपूर्वकरण पाठयां अनिचिकरण नमो गुणस्थानवाले) संस्पायगुणे में वर्वाद प्रत्येक उपनमश्रेणी बाठ ननमें गुपस्थान,२९९ मुनि 'पा कई मापायों के मतमें ३०० अथवा अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रत्येक एक मेनीक आट नपम गुणस्थानमें ५९८ मुनि में किसीके मत में प्रत्येकौ ६००, अन्यके म 'प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्येक उपभणीवसि' से प्रत्येक क्षपर्क में संग्य्यात गुपे हुए मुक्ष्ममाम्परापशुदि-उपनमक-मयमा मसापरायशुद्धसंयंत उपक्रमभनीवाले दश गुरुस्थानपती गि अधिका =पिशेषहरि अधिक है ग्राममाम्पराग-चपका। (उन सक्ष्मसापराय उपग्रमकसे) सूक्ष्मसापराप रुपयनीवाले संम्प्यातगुण है क्योंकि उपप्रमक सूक्ष्मसोपराय २०९ पा ३०० वा ३०४ हैं और सूक्ष्मसापराय पक ५९८ वा ६०० पा ६०८ हैं गाणाम्। आपे हुये (उपशान्तकपाय-सीमापाम-सपोगफेयली-अयोगफेक्ली गुणस्मानमसी) निका (अल्प-महत्व परस्सर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिसे कहा हुआ गुणस्थान ) सरसो वांत उपातिकमाय गुणस्थानमें मिम मिम मतानुसार २९९ या ३०० ना ३०४ मुनि । पील समाप में इन से तूने है मता उपस्किपाय से लीपकपायम मुस्मात गुप में। मयोगकेसी ८९८५०२ गम्ग गुणाः ।। मामान्यतः -UAE एमनिरामी जगरूपसहाय पकीलकत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका स्वतः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मत्र । [७] ज्ञानानुवादेन-मत्यज्ञानिश्रतान्नानिपुः सर्वत स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः।। विभज्ञानिपु सर्वत स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यानटयोऽमस्ययगुणा ॥ ये उपदान्तकपास और धीनामापसे संख्यात गुपे हैं अयोगफेपसी भिन्न भिन्न मता- नुसार ५९८ वा ६०० वा ६०८ हैं (देखो अवश्य इस अनु पादके पठ३०८ की टिप्पणी संस्पा (२) ये उपांतफसायषालोंसे सो संस्मात गुणे।। क्षीणकापार्लोक उपर्युक्त अयोगकेवली समान हैं। इनसे सयोगकेवली संख्यात गुपे हैं मान अनुवादेन । मति अनानि-मुतअनानिए ।। (७) शानके कपनसे कुमति और इयत शानियों में गर्यता स्तोकाः । सासदनसम्परएप ।। मनसे पोरे (-स्सोक) गसादनसम्पदर्शनयाले (इसरे गुगस्पानवती) है (उन इमति-भुत नानी सासादनसम्परष्टियोंसे) मिथ्याटम' , अनन्तगुणा । -मिप्याटी अनन्त गुणे हैं या "विन अनंतगुणां मिथ्याष्टि" नय० वप० ११७ विभ-नानिप, मान : स्नाका मासादामग्यम्-अपधिनानिमेिं सबसे घोडे सासाइन सम्पग् -दर्शनवाले हैं (तिन अवधिज्ञानी सासादन सम्पग्रयिर्सि) गिज्यादृश्य जगग्गेयगुणाः ।। (अवधिमानी) मिथ्यावष्टी वसम्म्यास गुपे हैं दृष्टया मि पाप "सर्यतः तामामामावनसम्पमएस । मिप्यारण्योऽन्तगुणाः । गर्पता मता विमरमानिए मामादयसम्बनापः । मिप्पारएपोऽसपोषगुणाः में मरम्स मपामिदिरोनों आसियाकी प्रतियोम सर्वच स्ताका साप्सादनसम्पनपा। मिप्यारएपो ऽ सक्ये गुमाः । भूसमे एगर अर्थात् ' मिपारस्पोऽनम्तगुणाः । सर्पता स्तोका विमा मानिपु सासादनमापासप: पाप न गया है क्योंकि मपर्धवजी की पनि हस्त लिखित और मुद्रित (पृष्ठ११७ में "सर्वते स्ताक मामादनसम्पमप्ठि है। तीनि अनंत गुण मिप्यायष्ठिहै। विभंग पानीनि विणे मयने गोरा मामादन सम्यन्टमि है। निमित असस्थावगुणां मिध्यारष्ठि है। ऐसी भाषा पनिका वह शप्पशा स्पर्मुख समस्तके प्रयास पावर का आपाद है । (२) मरा देतु यह है कि संसार में मिपाल गुणस्थाममें जितमे भी जीव है साइन्द्रियपामोंक मर्पगनिमें, सर्प कापयामा मनि मान और पृथत मान होते हैं और मिपाव सासावुन पो ही गुणस्थान इन इमति पुश्व मानियोंकि । गनिवामी जगरूपमहाप यकीसट्टा पदपछेद और विभक्त्यर्थ सहित सपिसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ मम्येयगुणा । सूक्ष्ममाम्पराय शुप्दयुपशमक्मयता विशेषाधिका । सूक्ष्ममाम्परायक्षपका संख्येयगुणाः । पाणा सामान्यवत् ॥ (अपूर्पकरण माठषो मनिकिकरण नवमो गुणस्थानवाले) संस्पारगुणे २ वर्षात मम्म्पेय-गुणाः । प्रत्येक उपक्रमणीके बाठ नवर्मे गुणस्थान,२९९ मुनि ?षा ईक आपायों के मतमें ३०० अथवा अन्य के मतानुसार ३०४ है और प्रत्येक पपक मेणीक आठ नयाँ गुमरथानमें ५९८ मुनि । किसीके मत में प्रत्येकमें ६००, अन्पके मतम प्रत्येक में ६०८ इसलिये प्रत्येक उपभणीवाले से प्रत्येक धपक में संख्यात गुणे हुए मम्ममाम्परायदि-उपनमा-मपना मधर्मसापराय शुसयत उपश्चम जीयाले दशवा गुरुस्थानवी मि अधिका' । विशेषकरि अधिक है ग्राममाम्पगय-चपका =(उन सक्ष्मसापराय उपसमक्से) सक्ष्मसापराय आपकमनीयाले सम्यातगुण है क्योंकि उपनमा सूक्ष्मसापराय २०९ पा ३०० वा ३०४ ई और सक्ष्मसापराय क्षपक ५९८ या ६०० पा ६०८१ बये हुये (उपशान्तरूपाय-सीजकमाय-सयोगकैपली-अयोगफेपली गुणस्थानपी) निका (अल्प-बहुत्व परस्सर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिले कहा हुना गुपस्पान ) सरल है अर्थात उपयोतकमाय गुणस्पानमें भिन्न भिम मतानुसार २९९ वा ३०० वा ३०४ मुनि । चीन- फसाय में इन से बने है मता उपातापाप से क्षीणफपायमें सस्पात । मयोगकेवली ८९८५०२ गम्णेय गुणा' ।। पाणाम् । मामान्परत SAESALSAR प्रगनियामी जगरूपसहाय यकीलकत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मत्र । [७] ज्ञानानुवादेन-मत्यज्ञानियताज्ञानिपुः सर्वतः स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः विभज्ञानिपु मर्वत स्तोका सासादनसम्यग्दृष्टय । मिथ्यादृष्टयोऽसंख्ययगुणा ॥ ये उपशान्तपायसे और क्षीणकपायसे संख्यात गुपे । अयोगफेवली मिन्न मिम मता- नुसार ५९८ या ६०० वा ६०८ हैं (देखो अवश्य इस अनु पादफे पळ३०८ की टिप्पणी संख्या (२) ये उपशातफपायवालोंसे सो संस्पात गुणे हैं। क्षीगमायवालोंके उपर्युक्त अयोगकेयली समान है। इनसे सयोगकेवली संस्पात गुपे हैं वान अनुवादेन । मति-अन्नानि मतअनानिए । (७) पानके कपनसे उमति और प्रभुत शानियों में सति स्तोकाः । सासदनसम्पग्दृष्टयः ध्यमसे थोडे (-स्तोक) स्गसादनसम्यग्दर्शनयाले (लूसरे गुपस्पानपी)। (उन झमति-अभुत मानी सासादनसम्पग्रष्टियोंसे) मिथ्याएमा । अनन्तगुणा' ।। =मिमाटी अनन्स गुणे हैं या "तिन अनंतगुणा मिध्यारष्टि" नय० पप० ११७ मिट्गानिप, मयन' स्नोका मासादासम्यग् अधिनानिमि सरस पोटे सासादन सम्पग् -दर्शनवाले हैं (तिन अवधिधानी सासादन सम्परष्टियोंसे) गि यादृश्ण : असम्यगुणाः ।। (-अपधिनानी) मिध्यादृष्टी वसंस्पात गुपे हैं 'मर्गत मतान: मामावमसम्परस्य । मिपारएपाऽमम्तगुणाः । मर्यत: मताका विममानिगु मामाइनसम्पमापा । मिपारपयोऽसोपगुच्या' mपापा समान में मरत मार्थसिविरमा भ पतियों की प्रतियोम सर्ववास्ताका सासादनसम्पमधया। मियारण्योऽ सहयेगुवा । मनमे छपगरा दै अर्थात् "मिप्यारस्योऽनन्तगुणाः । सर्पता स्तोत्र विमा सानिपु मामादनमायः पाप न गया है क्योंकि यचपनी की पनि हम्त मिस्थित और मुद्रित (पृष्ठ११७ में "सर्षत स्ता मामादनसम्पमाएि है। तीनिः ममत गुछ मिष्याठिहै। विमंगशालीमि विषे मात गोरा मामादन मम्यनपि है। तिनि असंम्पावगुण मिपारप्ठि है ऐसी भाषा पचमिका है वह शप्पशा स्पयुत समस्तके प्रथम बार का मनुयाय है । (२) मरा हेतु पह है कि संसार में मिप्यात्य गुषस्थानमें जितने भी जीष है सब इम्पिपालोंक, मर्पगतिमें, मर्प कापवाय मति नाम और पुश्त मान होते हैं मोर मिप्पाप साम्भवन दो ही गुवल्यान इन मुमति मत बानियोके दृष्टया - । पगनिवामी जगरूपमहाप पकीस्कृत पद छेद और पिमपत्यर्ष सहित सथिसिसिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ र ८ मम्पेगगुणा । सूक्ष्ममापराय शुध्दयुपशमक्मयता विशेषाधिका । सूक्ष्ममाम्परांयक्षपका संख्येयगुणाः । गाणा सामान्यरत् ॥ संम्प्येप-गुणाः (मपूर्पकरम आठवां अनिचिकरण नषमा गुणस्थानवासे) संल्पावगुणे अर्थात् मस्पेक उपमयेमीके ऑठि नवौ गुणस्थान,२९९ मुनि पा क मापायों के मतमे ३०० अथवा अन्य के मवानुसार ३०४है और प्रत्येक वर्ष मेणीक आठ नवमें गुणाथानमें ५९८ मुनि में किसीके मत में प्रत्येकमें ६००, अन्पके मतम प्रत्येके में ६०८ इमलिये प्रत्येक उपक्षमणीवाले से प्रत्येक क्षपक में संख्यात गुपे हुए ग ममाम्परापमुदि-उपनमक-संगत मूक्ष्मसापराय मुसंवत उपसमणीवाले दर्या गुणस्थानवी शिरोप पपिका -विशेपकरि अधिक गुप्ममाम्पराय-भपकार (उन मसापराय उपसमकसे) मसापराय पायपीवाले सम्यानगुण गोंकि उपनमक सूक्ष्मसापराय २०९ पा ३०० पा ३०४ और समसापराय क्षक ५९८ वा ६०० पा ६०८ हैं पाणाम्। -पपे हुये (उपशान्ककपाप-सीनकमाय-सयोगफेपली-अयोगफेपली गुणस्थानपी) निका (अल्प-पदुत्व परस्पर) संक्षेप ( प्रकरणमें पहिले कहा हुमा गुणस्थान ) सरल है अर्थात उपचावकलाम गुमस्थानमें मिम मिम मतानुसार २९९ वा ३०० वा ३०४ मुनि । चीन- पाप में इन से तूने । अतः उपचानकपाप से भीगकपा में संस्पात गुमे ।। सयोगकेवली ८९८५०२ संम्गेस गुणा ।। मामान्यरत असेमग एगुणाः एटानिवासी बगरूपसहाय पीतकृत परमोद और विमस्पर्य सहित सर्विसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अप्पाप १ पत्र ८ सयतासंयता असंख्येयगुणाः । असंयतसम्यम्दृष्टयोऽसस्येयगुणा ॥ मन पर्ययज्ञानिपु सर्वतः स्तोका श्रत्वार उपशमका । चत्वार क्षपका सख्येयगुणा । अप्रमत्तसंयता संयमी ५९३९८२०६ है । अत प्रमचर्सयमी संम्पात गुणे हैं। संपता संयताः। (उन मति-युत अवषिष्ठानयाले प्रमत्त संयमियों से) संपमा संयमी =असंख्यात्गुणे हे अर्थात् 'मनुष्य और तियच इन दो गतियों में ही देश सयम गुणस्थान होता है । इन में रह करोड मनुष्य और फ्ल्प के असंम्पासम माग विप है। गोम्मट जीव० गाथा० ६२४ ॥ मसिज्ञान-भुतहान-अधिवान चौथसे पारह गुमस्थान सर ९ स्थानों में है। इन में मति मन शान पार से पारह गुणस्थान तक सब जीवों के होता है ॥ अवधिज्ञान यह आवश्यकता नहीं कि सबके हो किसीके होता है किसीके नहीं। असंमत सम्पग्दृष्टया ।। असंरम्येमगुणाः । (पेशसममियोंसे) असंपत सम्पम्वृष्टि असंख्यात गुणे अर्थात् इन में सात सो करोद मनुष्य हैं और मिश्रवालोंसे असंख्पात गुणे शेष तीन गति के नीवर मनः पर्पय-पानिए । सवा सोका कत्वारा: =मनः पर्पय मानियोंमें सबसे अल्प मयमा सपसे योरे पार (मपर्षकरण-अनिधि फरम-मासापराय उपशांतकपाय) पवार -उपसम अणीवाले से ह (मन' पर्यय शानियों में) चार (अपूमकरण अनिवृति कर-सूक्ष्मसांपराप क्षीणपाय) धपकाः । संसपेपगुणा । धपक मणी पासे (रक्त चार उपसम यणीवालोंस) संस्म्याव गुपे हैं। मममप संपता। (उक्त चार धपक श्रेभीवालों से) अप्रमच संयमी (मन पर्पय हानी) उपमहा पगनिवासी जगापमहाप पकी कृतं पदमोद और विमबरपर्ष महिन सवार्थसिदिका गनश हिंदी अनुवाद । अपार १८ मतिश्रुतावधिज्ञानिषु सर्वत स्तोकाश्चत्वार उपशमकाश्चत्वार क्षपकाः संख्येयगुणा । अप्रमत्तसयताः मम्येयगुणा । प्रमत्तमयता सख्येयगुणाः । मति-मत प्रयधिवानिए । मनस्तोका' : पवारा। -मनि ध्रुत अवधिमानियम सबसे अल्प पार (आठसे ग्यारह गुणस्थानतक) उपशममणीपाले हैं। (उन चार उपसमभेणीवालोंसे ) पार उपमा पम्पार। (अपूर्षकरण-अनिवृत्तिकरग-सूक्ष्मापराय धीणकपाय ) पका मेयगुणा । चपक भणीताले सम्पानगुणे । अर्थात मिम मिम मतानुसार चार उपशम भणीवाले ११९६ वा १२०० वा १२१६ है और चार पकभेणीवाले इस प्रकार २३९२ वा २४०० पा २४३२ हैं अतः सस्पातगुणे हैं अपमनमेयता: =(मप्ति-भूत-और अवधिन्नानिर्योम सपक भेणीवालोंसे) अप्रमच संयमी सम्म्यावे गुपे। अर्यात धपक श्रेणीवाल २३९२ वा २४०० का २४३२१ साको गुणस्थानवी २९६९९१०३ प्रमतर्मपता मंगपेपगुणा परस्त अप्र co-Saal असंस्येषगुणाः ।। एटानिवासी बगम्पसहाय पकीकृत पदम् और विमक्स्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अम्माय १ पत्र ८ संयतासंयताः असंख्येयगुणाः । अर्सयतसम्यम्दृष्टयोऽसस्येयगुणा ॥ मन पर्ययज्ञानिषु सर्वत स्तोका चत्वार उपशमका । चत्वार क्षपका संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसंयता संयमी ५९३९८२०६ है। अत' प्रमघसंयमी संख्यात गुणे हैं। संपता संपताः। (उन मति-मृत-अवधियानवाले प्रमस संयमियों से) संपमा संयमी असंस्थातगुणे है अर्थात् 'मनुष्य और तिर्यच इन दो गतियों में ही देश सयम गुनस्थान होता है। इन में रह करोड़ मनुप्प और फ्स्य के असंख्यातमे भाग विर्यच ॥ गोम्मट० जीव० गापा० ६२४ ॥' मसिज्ञान भूतक्षान-अवधिज्ञान चौधसे मारह गुणस्थान क ९ स्थानों में है। इन में मति-मस-झान मार से मारह गुणस्थान कसम जीवों के होता है ॥ अवधिज्ञान यह आवश्यकता नहीं कि सपके हो किसीके होता है किसीके नहीं । वसंपस सम्पग्रस्पा ।। असंसपेयगुणाः । (पेशसंयमियोंसे) असंयत सम्पम्दृष्टि असंख्यात गुपे हैं मर्यात् इन में सात सौ करोड़ मनुष्य में और मिभवालोंसे असंख्यात गुणे शेप तीन गति के बीच में मनः पर्पप-धानिए । सर्वता- स्सोका क्वार। मना पर्यय मानियोंमें सबसे अल्प अपवा समसे थोडे चार (मपर्षकरण-अनिषि- करण-यमसापराय उपशातपाय) उपशमका चत्वार । -उपशम यमीवाले रोते ह (मन' पर्यय शानियों में) चार (अपूरण अनिवृति- करन-सूक्ष्मसापराय धीमकमाय) आपका संस्पेयगुवा । चपक मेणी वाले (उक पार उपशम श्रेणीवालोंसे) संख्याव गुपे हैं। मममप संववाद उक्त धार धपक श्रेणीवालों से) अप्रमच संयमी (मन पर्यय मानी) - गानिकामी जगापमहाप पकीलकृतं परमोर और विमवस्य मदिन मनामिद्विका गदशः हिंदी अनुवाद । अगाय १८ मतिश्रुतावधिज्ञानिपु मर्वत स्तोकाश्चत्वार उपगमकाश्चत्वार क्षपकाः सख्येयगुणा । अप्रमत्तसंयताः मम्येयगुणा । प्रमत्तमयता सम्येयगुणाः । मनि-भत प्राधिनानिए । मम स्नोका' । मत्वार' । अति भूत अधिशानिर्योग समसे अल्प पार (आठसे ग्यारह गुणस्पानवक) -उपसममणीवाले हैं। (उन घार उपभमभणीवालोंसे) चार उपमा मनार' ।। (अपूर्वकरण अनिवृषिकरग-पक्ष्मसापराय धीणकपाप) सपा । मैग्ग्गेयगुणा ।। -धपक भणीवाले संरम्पासगुपे है अर्थात् भिन्न भिन्न मतानुसार चार उपशम भेणीवाल ११९६ वा १२०० वा १२१६ ह और चार धामणीपासे इस प्रकार २३९२ वा २४०० वा २४३२ है अतः संस्पासगुणे हैं अनमानमेपना । (मति-मत-और अवधिनानियोंमें सपक श्रेणीवालोंस) अप्रमत्त संयमी -संस्यावे गुणे है अर्थात् पक मेणीवाल २३९२ पा २४०० वा २४३२ परन्तु अप्रमच सातयां गुणस्पानती २९६९९१०३ प्रमनमपताः। (उन मति-भूत-अवधिनानि अप्रमत्तसंयमियोंसे) प्रमस संयमी संरम्पानगुणे । अर्थात् अप्रमत्त संपमी २९६९९१०३ और प्रमच रोनी मौरीय गान मामा प) मिशास्व गुणस्थान मीयों की समग मी सत्र की सम्या प्रमाणाम अनंतमत भी देखा १९) और गाम्मरमार जीपाली गापा २५ "मिप्या दुधाप्पताय में मिप्यारष्ठि अनंतानत है। मौर "सी गाया मासादम गुवस्थाम में पापन र मनप और माशों से असमातगुणे इतर तीन गतिफे सीप है ऐसी गणमा लिसीमसे स्पीकि कुमति मत बानियों मागास गुपरणनपतियों से मिप्यापी पुति मतवानी मर्मत गुपे ही है मधि मसंन्यात गुण । (३) तीसरा हेतु यह मीकि जबभिवानी मी मिया और मामाहरो गुमरवानोंमें होते है (रेला बीस स्थान चरमा) मौर यदि हम सस्कृत सादि का पाठ शुबमान में हो मिपा और ग्रसाद गुपस्यमातियों पर पिशानियों को अपेक्षाम सर्वथा छालाता है । मतः हमने जा उपर्यु पाठ मिला है पुरो मिटा मतगण्या मान मर्मत सम्पनरियों से मिष्यामि मान्त गुण है ।। (पट 10 मो उपर्युटिपानीका समर्थन मंगपेपगुणा ।। मेम्पेपगुणा' ।

एटानिवासी मगरूपसहाय वासकृत परमोन और विमत्पर्य सहिस सर्विसिरिका अपना हिंदी अनुवाद । वम्याप १ पत्र ८ संयतासयताः असंख्येयगुणाः । असंयतसम्यम्दृष्टयोऽसस्येयगुणा ॥ मन पर्ययानिषु सर्वतः स्तोका. श्चत्वार उपशमका । चत्वार क्षपका संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसयता संयमी ५९३९८२०६ है । अत प्रमसंपमी संम्म्यात गु॥ संयता संपताना =(उन मति-मुख-अवधियानवासे प्रमस संयमियों से) संपमा संयमी असंस्पे गुना असंम्पानगुणे हे अर्थात 'मनुम्प और वियप इन दो गतियों में ही देश संपम गुणस्पान होता है । इन में रह करोड़ मनुष्य और परप के असंसपासमे माग सिर्मच है ॥ गोम्मट० मीय० गाथा० ६२४ ॥ मतिमान-अतझान-अवधिज्ञान पोथसे बारह गुणस्थान का ९ स्थानों में है ।। इन में मति प्रप्तहान चार बारा गुणस्थान कसप जीवों के होता है ॥ अवषिशान यह आवश्यकता नहीं कि सपके हो किसीके होता है किसीके नहीं। असंमत सम्पग्दृष्टयः ।। असंख्यगुमा । (पेचसंयमिपोंसे) असंयत सम्पादृष्टि असंम्पात गुमे हैं अर्थात इन में सात सौ करोड़ मनुम्म में और मिभवालोंसे असंस्मात गुणे शेष तीन गति के भीवों मनः पर्षय-शानिपु । सवा स्तोका पत्तारः । =मनः पर्यम शानियोंमें सबसे अल्प अश्या सबसे थोरे पार (मपूर्पकरण अनिधि करण-सूक्ष्मसापराय उपप्रांतापाय) पत्वारः ।। =उपसम भणीवासे होते है (मनः पर्यय झानियों में) पार (अपकरण अनिवृषि- करण सूक्ष्मसापरामधीणक्याप) आपका सस्पेरगुना -पक भेणी वाले (उक्त चार उपयम भणीषालोंस) संस्म्मान गुपे हैं। मममप संपताना (उक्त धार धपक मेणीवालों से) अप्रमत्व संयमी (मनः पर्पयशानी) ठपदमका प्रगनिधामी नगरपमहाप वकीलंकृत पदलोद और विमवस्यर्थ सहित गवार्थसिद्धिका गन्नशा हिंदी अनुवाद | गाव १८ मतिश्रुतावपिज्ञानिपु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाश्चत्वार क्षपकाः सम्येयगुणा । अप्रमत्तसंयताः मम्येयगुणा । प्रमत्तमयता सख्येयगुणा । मनि-मन प्रगपियानि ॥ मवन स्तोकाः । पवार ,। =मति त अवधिशानिर्पोम सबसे अल्प नार (आठसे ग्यारर गुमस्थानसक) उपसमम्मीवाले है । (उन पार उपशमभेणीवालोंसे ) चार उपपमा । मन्वार। (अपूर्वकरण-अनिचिकरण-मस्मतापराप धीणक्याय) सपका'। मेयगुणा -धक भणीले सम्पानगुणे ई अर्थात् मिम भिन्न मतानुसार पार उपशम धणीयाले ११९६ या १२०० वा १२१६६ और चार धपकमणीवाले इस प्रकार २३९२ वा २४०० वा २४३२ है अतः संरम्पातगुणे हैं अरमानर्मपना : =(मनि-भत और अवधिशानिर्योग सपक श्रेणीवालोंस) अप्रमत संगमी संग्पगुणा' संम्पाते गुपे है अर्थात् धपक श्रेणीवाले २३९२ वा २४०० मा २४३२१ परन्तु अप्रमत्त सावा गुणस्पानवः २९६९९१०३ प्रमत्तमपना। =(उन मति-भूत-अवधिधानि अप्रमत्तसंपमियोंसे) प्रमत्त संयमी मंग्येयगुणा' संस्पातगुणे रे अर्थात् अप्रमत्त संपमी २९६९९१०३ है और प्रमत्त ना पोपीय काम नरपा प्रप) मिपाल गुणस्थान के जीयों की समय सी.प पत्र की समस्या प्रापनाम जनतामत जी (देला पठ) और गाम्मरम्पर जीपरी गापा २५ "मिप्पा पुषारताप में मिथ्यापि अनतान्तरे। और "सो गाया मासादन गुणस्थान में पर रामनय और मापकों से असमयातगुणे इतर तीन गतिके मीप है ऐसी गणना मिस्त्री इममे स्पप है कि हमति नत शानियों गामारन गुपापातपतियो से मिप्यारि पुमति मतवानी अनंत गुण ही है महि असणात गुणे । (३) तीसरा हेतु या मी ( बिपि बानी मी मिशन मोर मासादन दो गुणरपानाम वे हैं दिला पोलीस स्थान परपा) और यदि हम सराव समिम पाठ शुरमान में हो मिशन और गमावर गुमत्तमतियों का प्रारण पिशानियों से अपेमामे सर्वपा माशाता है । मतः हमने जा उपर्युज पाठ मिला है। मिपाएपमनम्तगुणा मान मर्सयत मम्पनरियों से मिUNR अनन्त गुण है ।। (पृष्ठ ३१) मी उपयुष टिप्पनीका समर्थन .

एटानियासी जगरूमसहाय वकीलकृवपदच्छेद और विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दमा हिंदी अनुवाद ॥ अप्पाप १ सूत्र ८ (८) संयमानुवादेन-सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसँयतेपु द्वयोरुपशमकयोस्तुल्यसँख्या । तत सख्येयगुणों क्षपको । अप्रमत्ता संख्येयगुणा । प्रमत्ता सख्येयगुणाः ॥ परिहारविशुद्धिसँयतेषु अप्रमत्तेभ्यः प्रमत्ताः सख्येयगुणा । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसयतेपु उपशमकम्य. [८] संपम-अनुपादेन । सामायिक-च्छेदोपस्थापन (८) संपमके कपनानुसारकरि सामायिक च्छेदोपस्थापना सुमिसयनेषु । यो । शुदिसंयमिमों में दो (अपूर्वकरम-अनिचिकरम) उपशमकयो : तुल्प-संख्या ॥ वता उपसममेनीवालोंकी समान गणना है। उन (दो उपभमभेणीवालों) से संस्पेम-गुनो धपको।। संख्यात गुणे दो (अपूर्पकरण-अनिक्तिकरण) धपक ग्रेणीवाले (सामायिक च्छेदो- पस्पापना शुदि संपमी) हैं अर्यात प्रत्येक उपसमयेणी वालों की संख्या २९९ पा ३०० या ३०४ है और प्रत्येक सपकरेणीवालोंकी संख्या ५९८ वा ६०० वा ६०८१ अप्रमतारा संख्येय-गुना। प्रमपारा अप्रमच संयमी (सामायिक और च्छेदोपस्थापन शुदि संचमी) (उक्त दो सपक सामायिक और व्हेदोपस्याफ्न शुद्धि संपमियोंसे) संस्पातगुणे। अर्थात् धपक श्रेणी प्रत्येक गुणस्पानववी ५९८ या ६०० वा ६०८ है और अप्रमरासंयमी गणना में २९६९९१०३ है अमघसंयमी (सामायिक और च्छेदोपस्थापना शुदिसंयमी) (उन प्रममचसंयमी सामायिक च्छेदोपस्थापना शुद्धिसंपमियों से) -संस्ल्यात गुपे हैं। परिहार विशुदिसंपमियों में - अपतसंयमियोंसे प्रमचसंयमी संस्थात गुणे हैं -सूक्ष्मसाम्पराप दिसंपमियों में उपसमगी वालोंसे संस्म्पेय-गुमा' । परिहारषिमुदि-संपतेषु । अप्रमतेम्पा । प्रमत्ताः । संस्पेक्-गुमाए। यमसाम्परायशुदिसयते' । उपचमकेम्पा गगनिमी जगम्पाय कीरत पदग्छेद और विमपत्यप सरित सपिसिदिका सदशा हिंदी अनुयाद । अध्याय १ त ८ माये यगुणा प्रमत्तसयता सस्पेयगुणा ॥वरज्ञानिपु अयोगफेवलिभ्य सयोगफेवलिनः सख्येयगुणाः॥ गेप-गुणा संस्म्यात गुपे हैं। (अप्रमत्सयमी मनः पर्षपशानियोंसे) प्रमगगंगना । गेयगुणाः ।। प्रमचसंयमी (मना पर्ययमानी) संख्यात गुणे हैं। मनः पर्यय ६ से१२ तक पल मानिए । अयोगपलिम्पः । मयोग फ्बल मानियोंम वयोगकेवलियोंसे सयोग गारिना । मगगगगुमा । -कासी संग्ग्यात गुपे है अर्थात् अयोगकेवली मिन्न भिन्न मतमें ५९८ पा ६०० पा ६०८ और सयोगकेवली ८९८५०२ तक हो सक्ती गायमिना पका पाठौ पायो पा उत्तपाठोतरशतमम्प्या रयकालम समुदिताम्तेन संनयार सपोमकेपमिमा ५ ८९८५०२ । प्रयोग रेपमिम ।। पर पामो यात्रा • मयागरेचमी (अपायकार) एक अश्या गोअषया तीन मवेशीकर) गा: अमरगतममया पचन्टेन | "पा सरकार एकसामाठी संस्था (प्रपेशाहोकधिमपने सपने काम गमविगाः । नेम्या : मनपा मयागपसिना . म्मुपयहार रन (मयोगवलीनि) मे सम्पाते (गुष) मागवली है -(अर्यास् सेगम) बाठे नाव इसार अठानपै पापसौ दोय (पसाने) (२) फरिणाम यह बात परतीचौदा गुपस्थान परप समवा १० साअपागकेपलीकी हो मची है। क्योंकिम मनुपावके पाठ मो.५ पायपिपरपार सपा अयोगपविनय प्रवेशन एका या मौ या त्रयो वा। सपापोत्तरशतसस्मा । स्यालेन समुदिता गरा प्राट हि सपकणी पामोरे प्रवेश होमेफे मुल्य जपागोपनियां नमी प्रयेश हाना है और सपाणीपाळे जीय (गाग्मरमार भीगर-मास २८पत्तीम भारदाले स्पादि के अनुमार) अन्तगप रहित आठ ममप पर्पतोंमें मे प्रथम ममपम ३२. म ममयम ४८ वीमरे गम., ममा ७२ पापमे ममप छठ समर्म , मातमे ममयमै १०८ आठमे ममय, १०८ बात है। मर्पयोग ६०८ एये। गिगो रिली गापार्षमा मत है जिसपर पीपा प्रमरगुबस्थानम उपप ममुपप हो सके कि मतमें ६०० मेकके मतमें १०८ unt पाग्मगाररात्रीय गाया १३१ मम्तादी माता यादिम जा सप कमेषी प्रत्येक गुणस्थान ५९८ मामे है वे उन आचार्यो मतानुमार गमन मिपा उपम १९९ और पे भए ५९८ हो मने है इस गापा तान घादि मा पराप मुमिकी संम्पा का वर्णन है। (१) मपागोमिना वारस पण पृष्ठ ३१० F०२ पील सत परछेद और विमष्पर्य सहित सार्थसिदिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय । सूत्र ८ एटानियासी जगरूपसहाप असयतसम्यग्दृष्टयोऽसख्येयगुणाः । मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः ॥ (९) दर्शनानुवादेन चक्षुर्दनिनां मनो- योगिवत् ॥ अचक्षुर्दर्शनिना काययोगिवत् ॥ अर्यास् मिश्रगुणस्थान मी चारों गतियोंमें होता है इसमें एकसौ पार करोर मनुप्प और सासादनवालोंसे संम्पात गुमे शेप वीन गसिके नीव है (गोम्मट० बीव० गाथा ६२४) संस्कृत सर्वार्थसिद्धि मुदित की दोनों मापियोंमें सरम्येयके स्थानमें मसंस्म्पेय अनुद छपगया है ।। असपत-सम्परए । असंस्येक- (उन मिभगुणस्थानववियोंसे) मसपमी सम्पम्दर्शनपाले असल्यास गुणे हैं अर्थात् भवत गुणस्थान चारों गतियोंमें होता है। इनमें सातसो 2 गुणाः। करोड मनुष्य हैं और मिश्वालोंसे असरण्यातगुणे शेप तीन गतिके बीच है ( गोम्मट जीव० गाथा ६२४ देखो) मिप्यारटपः । अनन्तगुणाः । मिप्यादर्शनषाले (इन असंयमी सम्यम्दर्शनफ्लोंसे) अनन्तगुणे।। (९) दर्शन-अनुवादेन । पशुप-दर्भनिनाम् ।। =(९) दर्षनकी विवक्षासे पार्दर्शनवालोंका (अल्प-महत्व) मनर-पोगिन-यत - मनयोगीवालोक सदृश है अर्थात् पञ्चेन्द्रियवत् है क्योंकि पृष्ठ ३०० फे अनुराल मनयोगियोंका पन्चेन्द्रियवत् है जिसके कपन के लिये पृष्ठ २९८ चार अपूर्वकरण पञ्चेन्द्रिय मिथ्यादष्टि जीव (अन्य किसी गुणस्थानके ? पञ्चेन्द्रिय जीवोंसे ) असस्यान गुपेरें पृष्ठ २९९ के अन्क्तक समयः पदलो पाप्दर्शनिनाम् ।। काययोगिक्तक - अचक्षुर्दर्शनवालोंका (अल्प-पात्व) काययोगियोंके सदृश है और काय योगियों का गुणम्पान तुल्य है (सयोगी अयोगीको छोरकर पृष्ठ) २९८मपर्व-२९९तक) (क्वार्थमें या समापनसका च परिवर्तन र में हाकर चक्षुर्शन होगया । म और पिसर्ग () का परियतम र में दनिके लिये रिप्पनी योग . । पनिगामी जगम्पर्मदाय वकीलकुल पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ बाट क्षपका मन्येयगुणा ॥ यथास्यातविहारशुद्धिसयतेषु उपशातपायेभ्य क्षीणकपाया सख्येयगुणा ॥ अयोगवलिनस्तावन्त एव । सयोगक्वालिन सस्येयगुणा ॥ संयतासँयताना नास्त्यल्पबहुत्वम् । असंयतेपु मर्वत स्तोका मामादनसम्यग्दृष्टय । सम्यमिय्यादृष्टय सत्येयगुणा । -धपक अणीवाले (मूक्ष्मसाम्पराय शुद्धिसंयमी) संख्यासगुणे में मग्येयगुणा पयाग्यान विहार गुदि-भपता 1 उपात व्यथाग्ल्यात विहार शुदिसंयमियोंमें उपरांत मागेम्प सीगाया। कपाय ग्यारहवां गुणस्थानवालोंसे लीगकपाय (ययाल्यात सयमी) -संम्पात्गुणे है अर्थात् ग्यारहम २९९ या ३०० या ३०४ मुनि और मंगणेप-गुणा । धीणापाय पारवें गुणस्थानमें ५९८ मा ६०० या ६०८१ प्रयोगमानिन । नाम । एप = अयोगकेवली (जितने क्षीणकपाय गुणस्थानती है। उसने ही हैं अर्थात् ५९८ वा ६०० अथवा ६०८ में मयोगानतिन ममयेय-गुणा' । - सयोगवली (अयोगकेवलियोंसे) संक्पावगुपे (८९८५०२ सयोगी) मपनामपतानाम् : न अस्ति अल्प-बहुत्सम् ।। -संपमासंपमी वा वेशसंयमियोंका अल्पमत्व नहीं है क्योंकि गुणस्थान सीन मार्गो विमकई असंयत (प्रथमसे चार गुणस्थान तक), संपत छठेसे पोटर गुणस्थानतक और संयवासयत एक ही है इससे अल्पमहत्व नहीं है (पेसो टिपणी (१) पृष्ठ २९४ २९५) == असंयमियोम अर्थात् प्रयमगुणस्थान पालोंसे चौथा गुणस्थानबार्लोम स्तोत्रा "मामाइन-सम्पराष्टप' । = सबसे थोड़े सासादन एम्परराष्टी हैं। अति सासावनगुमस्थान पारों गतियों होता है। इनमें पावन करोड़ मनुष्य और भानकोंसे असंख्यात्गुषे इतरतीनिगति के बीच है। गोमहजीवगाया ६२४ मम्मदिमध्याप्टप ।। संतयेय-गुणाः ।। %3(उन सामाइन सम्परराष्टिपोसे) मिभगुणस्थानमवीं संक्पावगुण अपनान मम -- । 1141N एयनिवासी बालपसाप बी पवन और षिमत्वर्थ सहित सर्विसिरि का शमशाहिदी मनुवाद । मागप-सक्षम तेज पद्मलेश्यानां सर्वत स्तोका अप्रमत्ताः । प्रमत्ता सख्येयगुणा । एवमितरेपा पञ्चेन्द्रियवत् ॥ नेजा पप-सेश्यानाम् ॥ सर्वतः स्तोका। वप्रमघाम पीत-पमा लेश्यावालोंमें सबसे चोदे अप्रमच संपनी है अर्माद अप्रमच विरव २९६९९१०३ मुनि है (पष्टी सप्तमी अर्थ में ) प्रमचा # स्पेय-गुना। प्(इन अप्रमात संपमियों से) प्रमस संघमी संख्यात गुपे अर्यादाइने (५९३९८२०६) मुनि है एवम् इवरेपाम् । ऐसे अन्य (मिप्यास्त्र गुमस्थान से संयतासमव पीस-पच लेश्यागालों) का पञ्चेन्द्रियपदक पेन्द्रिय जीवों के साथ (अल्प-पहुख ) है क्योंकि पीक-पबसेश्यावाले पंचेन्निव ही होते हैं और मिप्यात्वसे अपम गुणस्वान का जति "मनु और सिपथ गतियों मेंगी पेशसयम गुणस्थान होता हैन में देर करोदामनुप्प जोर पल्पके वसंम्पाक्यो माग' तिच रास संस्मामे से अलसेश्यायाले संक्मासंयमीको घटादेनेसे शेप पीस पपलेश्यावाले सजाते सासादन गुणस्तानमें। बापन करोए मनुष्म और आवफोंसे असंस्थावगुणे अन्य तीन गतिके जीव इनमेंसे रुष्ण नील कापोते और अकलेश्यावालोंको घटायेनेपा शेष जीषः पीक पचासेश्यावाले रहजायेंगे। मिश्शुषस्थानमें एक सो चार करोड मनुप्मचौर सासादनपालोंसे संस्पायगुपे तीन गतिक जीव हैं। इनमें से कृष्णनीस कापोठ और अहसेन्या वालोंको पटाने से शेप पीसपपलेश्या पाले बीच रावाते हैं। अप्रत सम्पन्टीमि सातसो करो ।' मनुप्प है और-मिमवाठों से असंख्यात्गुणे शेष तीन गविक जीव है। - - TS --- ग निरामी जगम्पसहाय यकीलकन पदच्छेद और विमक्स्पर्थ सहित सर्वार्थसिद्रिका सन्दमा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ८ अवघिदनिनामवधिज्ञानिवत् ॥ केवलदर्शनिना फेवलज्ञानिवत् ॥ (१०)- लेश्यानुवादेन- कृष्णनील- कापोतलग्याना अमयतात् ॥ फ्योंकि चक्षुर्दर्शन, अचक्षुर्दर्शनवाले मिथ्यात्वसे धीमपास कफ होते हैं। माभिमनिनाम् ।। अवधिमानिरन्। - अपपि दर्शनवालों का (अरस-पहुत्व) अवधि शानियों के सदृश अर्यात पृष्ठ ३०६ अवधि मानियोम असयत सम्पादृष्टि असंस्मात गुण 1 पृष्ठ ३०७ में देखो । अयधिशान चौथ से पारा गुणस्थानतक है ॥ काल मनिनाम करर मानिन कवल दर्शन (सरहवें चौदहवें गुणस्थान) पालों का केवल मानियोंवत् है। अर्थात् कवल सानियमि सपोग फेवली अयोग कवलियों से सख्यात गुणे हैं अयोग फवली ५९८ करक के मन में ६१० अथवा केक के मतानुसार ६०८ ह और सयोग फेवठी ८९८५०२ हो सके। (१०) मेन्या-अनुवादेन कृष्ण नील-कापोतलेश्यानाम् 1 - लेश्या के कयनानुसार से कृष्ण नील कापोत लेश्यावालों का (अल्प पहुत्व ) पमपनरत =अर्मयमी (मिथ्यात्व-सासादन मिश्र-मविरव गुणस्थानी ) नि सम है। अर्थात् ये ग्रीन अनुम लेश्या उक्त पार गुणस्थान तक ही हैं। मावार्य सासादन गुणस्पान चारों गतियों में होता है। इनमें मापन करोर मनुष्य और आयकोंसे असंस्प्यात गुणे इतर तीन गतिके बीव हैं। ये इन चारों गुणस्वामि मरसे धोड़ हैं। मिथगुणस्थानमें १०४ करोद मनुष्य है। और सासादनवालोंसे संध्यातगुणे शेप तीन गतियाँके नीय है। अविरत गुणस्थान भी चारों गतियों होता है इनमें सातसौ करोड़ मनुप्प हैं। मौर मिभवालोंसे असैक्पागु शेर सीन गविके नीव है ॥ मिप्यारष्टि इन असंयत सम्वस्पिोंसे अनंतगणे । (पृष्ठ ३११) वैसे अनंतानत है। (गाथा ६२४) । - पानिधसी जगम्पसहाय वकीय पदव और पिमपवर्ष मरित सर्वार्थसिदि का शमशाहिनी मनुवाद । माग पूल Fennaज पद्मलेश्यानां सर्वत स्तोका अप्रमचा । प्रमत्ता सस्येयगुणा । एवमितरेपी' पञ्चेन्द्रियवत् ।। नेशा पप-सेश्यानाम् ।। सर्वतः स्तोका! अपमघाम पीच-पया सेश्यावामि सबसे गोड़े अप्रमत्त संगमी है अर्थात् अप्रमत्त रित २९६९९१०३ मुनि (पटी सामी अर्थ में ३) प्रमचा संस्पेक्-गुणा मन अप्रमच संपमियों से) प्रमच संपमी संख्यात गुपे हैं अर्यादाइने (१९३९८२०६) मुनि हैं एवम् साम् । म्ऐसे अन्य (मिथ्यात्व गुणस्थान से संयतासंयत पीत-पच लेश्यावाठों) का पामेनियक्त पेन्द्रिय जीवों के सम्म (बरस बहुत्य ) है क्योंकि पीक पपलेश्यावाले ...चेन्द्रिय ही होते हैं और मिथ्यात्वसे अपमक गुणस्पान का। जांद 'मनुम्म गौर निर्मचं गलियों मेंगी पेनसंपम गुणस्थान होता है इन में तेरह करोडमनुष्य और परसके संस्माया माग' विच है इस संस्पाम से समासेश्यावाले संयमासंयमीको घटावेनेसे शेष पीक पचलेश्यावाले समावे। सासादन गुणस्मानमें। माक्न करोड़ मनुप्प बौर आवकोंसे असंस्पातगुणे अन्य तीन गतिक बीव रे इनमें से कृष्ण-नील कापोनं जोर शुकालेश्यावालों घटादेनेपर शेप श्रीवर पीक-पपलेश्यावाले राखावेंगे। मिश्रगुणापानमें एक सौ पार करोड़ मनुप्प गौर सासादनवालोंसे संस्पास्गुषे तीन गतिक जीव हैं। इनमें से कृप्यनीस-कापोत और सुझतेश्या पालोको पटाने से शेष पीपबलेश्या वाले जीव राजाते हैं। आमत सम्यगष्टीयोम साक्सो । मनुष्प हैं और मिभवाठों से वसंस्पातगुणे शेष तीन गतिके जीव है। इनमें से सपा-नील - -- -- 'पा निगासी जगा सहाय यडीस एव पदापोर और पिमत्यय मरित सर्वार्थ सिसिका शम्नत हिंदी अनुवाद । अपाय १ स्त्र - । शुरलेश्पाना सर्वत स्तोका उपशमका' । क्षाका'। सस्ययगुणा । सयोगकेवग्नि संख्येयगुणा । प्रमत्तपॅयता मम्येयगुणा । प्रमत्तसँयता सस्येयगुणा संयताKयता-असत्येयगुणा सामादनसम्परदृष्टया ! अगम्येयगुणा । मम्यग्मिथ्यादृष्टय संस्येयगुणा । मिध्यामष्टयोऽमख्येयगुणां । असयतसम्यग्दृष्टियोऽसंख्येय Himchi Maa Teeth गुणा । (११) भव्यानुवादेन ५.aante At HAVELIE । कापोत-शुक्लान्यावालों को घटाने से पनपीव-पर-छेश्यायालेर जावे इससे रानाम् ।। मनः स्तोका' ।। उपसमका ।। गुमलेश्यावाठों में सबसे अस्सा(जार) उपनाम मणी या! समग्णय-गुणा ॥ (चार उपशम् भगीदवासोंसे (चारपश्रेणीवा संस्पात गुणे हे अर्थात् प्रत्येक उपशम, श्रगीवाले..गुणस्वाना में २१२४वा ३०वा है और प्रत्येक पपक भणी.वाले गृणास्थान में ५२८ वा.या ६८ जीब प्रयोगहालिन । मग्ग्ययगुणा' ।। =(उन चार पक भणी पाठोंसे),संयोगकेवळी संख्यात गुपे है ।।१९८५०२ बाट अरमनपना' । मंग्म्पेरगुमा' । =(सयोगकेवलियों से), अप्रमतुः संयमी संस्माता गुषे हैं. १०२६६१६१०३१॥ अमनमा समपेयगुणा' ।। =(अप्रमत संसमियों से प्रमत्तःसंपमी(मख्यात गुमे हैं ।.५९३,९८२०६ हैं। मरता मुमाः असंसपेप- (प्रमच संपमी एक्कदेश्सावालों से संपमासंघमी (कालेमायाले) असरस्पात) गुना। मामादन-सम्परप्टयः॥ =गुपे हैं। देवासंयमी शाश्यावाठों से मामादनसम्पम्दष्टि (शुश्ललेश्या) पाले मर्मम्पयगुपाः ।।" =असंस्पात. गुणे (सामादन सम्पररटि शुक्लेश्यावालों से) सम्पनिमप्याप्टप' ।। मप्पेपगुणा ।। =मिश्रगुणसालवी (शुक्लालेखापाले) संख्याक गुणे हैं. (EJERAT निप्पाटप 10 11 12 13 14 14. (मिथगुपस्थानसी. मुक्ललेलाशलों से) मिप्या' राष्टि-शुक्लछेश्यावासे) ममम्प्पेसगुणा बानर्मपन सम्पमस्पा अमस्यात गुणे ई। मिथ्या इष्टि शुक्लले यावालोस) असंयत सम्पष्टि मर्मगोपपगुपा[२] मय अनुपादेन TEE शुलोमावास) मनात गुण है। मध्य जीवा) के कथन करि , नाम ने पहा रिमनि अमापायी २.३, ४१, सनसे सममी विमलिक मंध में है। पप १३८ में या रिप्पणी पूर्ण रूप से है।

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या निशासी जगए महार यकील एस पद और पिम पर्व महित सर्याय सिसिका शप्नत हिंदी अनुवाद । अपाय । म शुरुलेश्याना सर्वत स्तोका उपशमका' । क्षाका सध्ययगुणा । सयोगकवग्नि संख्येयगुणा । अप्रमत्तयता मम्येयगुणा । प्रमत्तमयता संस्येयगुणा संयनासयता-अयस्पेयगुणामा सामादनसम्यग्दृष्टया । अगम्येयगुणा । सम्पग्मिथ्यादृष्टय मख्येयगुणा । मियाईटयोऽमस्येयगुणा असयतसम्पदृष्टया संख्येय In Retiri-Reat ETE गुणा । (११) भव्यानुवादेन ALLIAMARA LINKS कापोन-गुक्यालेण्यापालों को जाने से नेपाल प्रीत पर ज्यापालेर यावे । समे पानाम् ।। मरन' स्तोका' ।। उपसमका ॥ -गुलेश्यावालों में सबसे असा(जार) उपशम-ली बाई 14 31LL धाका ॥ मय-गुपा। -(धार उपशम श्रेणी वालोंसे (चार सम्प्रेणीवाले संस्पात गुणे- अर्थात् प्रत्येक उपञ्चम, अगीवाले गुणस्थान में १२१९ या ३० वा-३८ हैं और प्रत्येक क्षपक भणी याने गुणास्थान में ५९८ वावा ६८ जीव है । भयोगकेनिन ॥ मग्णयगुणा'। =(उन चार श्रुपक भेषी पाठोंसे), संयोगकेवाली सैल्यात गुपेरें11८५८५२ है। भजनमपता' ।। मंगम्येपगुमा ।। =(सयोगकैवलियों से) अप्रमाद, संपमी संस्माता गुणे १२६३५६१०३।। मगमक्ताम् । सम्प्पेयगुणाः ।। (अप्रमन संयमियों से) प्रमत्तःसंपमी(संख्यात गुथे हैं १५९३९८२०६ हैं ।।। मेरा मन अमएयेस- =(प्रमच संयमी शुष्टतेसावालों से). संयमासंयमी (शुसलेमयावाले) असस्यात gir | मामाइन-सम्यग्रएप =गुपे हैं। (देवसंयमी शुरयावाला से सामादनसम्परष्टि (शुकलेश्या) पाले ममन्येषगुना ॥५ - असंस्म्यात गुणे (मामादन सम्परष्टि शुक्लालेमावालों से) सम्मग्निभ्याटस' । मंग्णेयगुणा' । =मिथगुणस्थानवी:(गुस्सयावाले अग्यात गुणे ted in निप्पारस्प IE PARELI .. 114। (मियगुपस्पायसी, मुच्छलेसागलों से) मिथ्या दृष्टि (फ्लसेश्यावाले) अमरूपपगुना अका-मम्पमस्या- असंख्यात गुपे हैं। मिथ्या रष्टि शुक्लले, त्यावाला से) असंपत सम्पष्टि ममग्न्यैपपगुण- [१२] भव्य अनुवादेन FLA क्ललेमावास) धर्मसमात गुंग है । भय्या जीवा) “नाम प में नामिनि मगोपी २,४१, स्त्र सातमी विमनिक मप में है। पर ५८ में यह टिप्पणी पूर्ण रूप से है।

पनिवासी मापसाप कीस स पररडेप और विमलयप सहित सर्वार्थ सिारका शष्यहिदी ममुपाद । सम्पाय १ सूत्र : असंयतमम्यग्दृष्टयो-मस्येयगुणा । शेपाणा नास्त्यल्पवहुत्वम् । विपक्षे एक्गुणस्थानग्रहणात् ॥ (१३) सहानुवादन-साहनां चक्षुर्दशनिवत् । यसयत -विसयमी उपशम सम्पन्दर्शनपालोसे) असंयमी [उपशम] मम्पग्दृष्टय' ।। असंस्पेयगुना ॥ - सम्पन्दननवाले प्रसंस्म्यात गुपे है। पक्षान्तरमें वा अन्य ओर में एफएक गुणस्थान प्रामाव।। - एफ एफ गुणस्थान का (मिम मित्र) मान सनेसे वा विवक्षित एफ एक विपधे । गुणस्पान होने से T अपाणाम्॥ - मचे हुये (मिथ्यात्व-मासादन-मिभ-असंगत सम्यग्दृपिवालनिके अल्पपस्वम् ।। न अम्ति -थोरा और अधिकपना नहीं है (क्याकि जब एक प्रकार की वस्तुमें कर स्थानों में हो ता कहते हैं कि अमुक स्थानकी वस्तुये इतर स्थान की वस्तुजों से अल्प बहुस्ख है। मिथ्यादृष्टि एक पृथम गुणस्थान में ही ह ॥ सासादन सम्पम्दृष्टि उमरे में ही हैं सम्पग्मिभ्यादृष्टी मिम तीसरे गुणस्थान में ही हैं और असंपमी सम्पदृष्टी एक अविरत गुमस्थान में ही इमलिये इन चारों गुणस्थानों में मम्यक्त्वकी अपेक्षा से अल्प पहुस्त्र नहीं है परन्तु असंयमकी अपेक्षा से पूपम गुणस्थान से चतुर्ष तक ( असंयम होन से) और पर असंरमकी अपेक्षा से अल्प पहुस्स इस प्रकार है कि असंयमिममि मवसे थोडे सासादन सम्यादृष्टी हैं। इनस मिश्रगुणस्पानसी संस्म्यात गुण । उनसे अविरत सम्यग्दर्शन वाल असंख्यात गुणे हैं। इनसे मिथ्पादनवाले अनंत गुमे हैं। (विभेप जानन के लिये पूठ ३१० ३११ देखो। (१३) संघा अनुषादेन । संजिनाम् ।। च दयनिषत् -(१३) संझा की अपेक्षासे सैनीनिका (अल्प बहुत्व ) पभुदर्शनवालों के सम है और पसुदर्शनवालों का अल्प यात्व मन योगी क ममान है और मनयोगियों का - ALE LI । । अप्रमा । "य निगाली जगहाय पपेर रन पर होव और यिमनपर्ष सरितमपिसिविध शमशः हिंदी अनुपा । अपार १ सूत्र तत संयतासयता संस्येयगुणा । अस्युतसम्यग्दृष्ट्योऽमस्येयगुणा ।। क्षायोपशामिकमम्यग्दाष्टषु सर्व स्तोका अप्रमत्ता । प्रमत्ता संस्येयगुणा । सयतासंयता असंख्येयगुणा । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसख्येयगुणाः औपदायिकमम्प्रदृष्टीनां सर्वत स्तोकाश्चत्वार उपशमका अप्रमताः सख्येयगुणा । प्रमता संख्येयगुणा भयतामयता सम्येयगुणा ॥ मन मंफ्ना मंपता ठन (प्रमजा संयमियो] से देश संयमी [धायिक सम्पमष्टी] मम्प्पेय-गुणाः ।।अर्मय-मम्परप्टप ।। =संस्पात गुपे हैं। [उन संयमासंयमियोंसे] असंयमी सम्पगठी, प्रमग्प्पेयगुणा । पायोपनामिकसम्पगणि =असल्यातगुणे हैं। वैदक सम्पन्दनपालमि मरतः मनोका सबसे घोर अप्रमच संयमी [सातागुणस्थानवी] [उनसे] प्रमगाम्येयगुणाः॥ प्रमग संपमी [पदक सम्पग्दर्शनवाले] संस्म्यातमुणे । [उन प्रमा संयमी घेदकसम्पम्दानवालोंसे] सयमा संयमी पिदकसम्पम्दृष्टि] असंम्पाक्गुणे हैं। दिन संपमी वेदक सम्पदृष्टियोस] अर्मपत-मम्पाइएप । असस्पेपगुणा' । असंयत्त सम्पादृष्टी असंख्यात गुपे हैं। औपनमिम्मम्पन्दृष्टी नाम् ।। मर्पत' म्तोका । उपशम सम्पादन [१] पालों में सप से योद चार [अर्व करक-अनिविकरण-सम्म सापराप-उपासक्कसाय । उपनमा अपमन्ना। -उपप्रम भणी वासे हैं। (चार उपसम नी वालों से ] अप्रमग संयमी - सम्पास गये हैं। [ अप्रमरा सपमी उपश्चम सम्पादृपियों से] प्रमणा ॥ मम्ऐपगुमा। -प्रमग सपमी [ उपशम सम्पम्दशन पाते ] संस्थात गुणे है मयतापताः । अमस्येपगुणा । -[प्रमत्त सपी उपनम सम्यग्दर्शन पालों से] संयम संयमी असलयात गुणे • या पटो रिमनि मम्मी विमती के भाप माई मतारिनी भनुवार गरि स्थान मोम रिसाला स्पिनी ५८ मपनामपना ।। अमरप्पेपगुणा मार। . मम्प्पेपगुप्त।

पठानियासी जमापमाप बीम व पण्डेय मौर विभपय महित सर्वार्थ सिधिका हमश हिंदी ममुमार । अाप १म असेंदतसम्यग्दृष्टयो-सस्येयगुणा । शेपाणा नास्त्यसबहुत्वम् । विपक्षे एफैक्गुणस्थानग्रहणात् ॥ (१३) सम्झानुवान-साजना चमुर्दनिवत् । अप्सयत -विक्षसंयमी उपशम सम्पम्दर्शनवासे] असंयमी [उपनम] सम्यग्दृष्टप' । असम्प्पेयगुणाः । विपक्षे ।। - सम्यन्तनवाले असंख्यात गुपे है। पक्षान्तर वा अन्य ओर में एकएक गुणस्मान-प्रहमा ।।। - एक एक गुणस्थान का (मिम मिन्न) मान लेनेसे वा विवक्षित एक एक गुणस्थान मेने से पानाम् ।। अल्प पाहत्वम् । न० अम्मि T --पचे उप (मिप्यात्व सोसादन मित्र असंगत सम्यम्लपियालेनिके घोडा और अधिकफ्ना नहीं है (क्योंकि जब एक प्रकार की वस्तुयें कई स्थानों में हो तप करते ह कि अमुक स्थानकी वस्तुयें इतर स्थान की वस्तुओं से अल्प पहत्व है। मिथ्यावृष्टि एक पृथम गुणस्थान में ही है। सासादन सम्पम्दृष्टि दूसरे में ही र सम्पग्मिध्यादृष्टी मिश्र तीसरे गुणस्थान में ही हैं और असंयमी सम्यग्दृष्टी एक अपिरत गुणस्थान में ही है इसलिये इन चारों गुणस्थानों से सम्पनत्वकी अपेक्षा से अन्य बहुत्व नहीं है परन्तु असंयमकी अपेक्षा से प्रथम गुणस्थान से चतुर्य तक ( असंयम होने से ) है और वह असंवमकी अपेक्षा से अल्प महत्व इस प्रकार है कि असंयमिपामें सरसे योरे सासादन सम्यग्दृष्टी है। इनसे मिश्रगुणस्थानी सैम्पात गुणे है। इनस अविरत सम्पदर्शन पाले असंम्पात गुमे । इनसे मिध्यादर्शनवाले अनंत गुपे हैं । (विभप जानने के लिये एठ ३१० ३११ देखो। (१३) सेना अनुवादेन । सैमिनाम् ।। मदर्शनिवत् -(१३) सना की अपेक्षास सैनीनिका (उस पहल ) पदर्षनवालों के सम है पौर चक्षुदर्शनवालों का अल्स यहत्य मन योगी क ममान है और मनयोगियों का , 11 ग्य निगागी जगपमहाप परत पपथ्येव-और पिमनपर्थ सहित मर्योपसिविष शम्पशास्दिी अनुपा । अपार सूत्र ८ तत संयतामयता संस्येयगुणा । असयतसम्यग्दृष्टयोऽमख्येयगुणा ॥ क्षायोपशमिकमम्यग्दृष्टिपु सर्वत स्तोका अप्रमत्ता । प्रमत्ता मम्येयगुणा' । मयतासयता असंख्येयराणा । असयतसम्यग्दृष्टयोऽसख्येयगुणा । ओपदायिक्सम्प्रटीनां सर्वत स्तोकाश्चत्वारः उपशमका- अप्रमत्ताः संख्येयगुणा प्रमता 'संख्येयगुणा ॥ भयतासंयता सत्येयगुणा ॥ -14 H मन मयता मंफ्ना -उन (प्रमुख सममियों से देश संयमी [धायिक सम्पमष्टी] मैम्प्पेय-गुणा । अर्मपत-मम्परप्टप ।। =मपात गुणे। [उन संपमासेपमियोंसे] असंयमी सम्पगष्टी, अमम्प्पेपगुणा ॥धायोपशामिझमम्पमणि अर्सस्स्यात्गुषे हैं। वेदक सम्पदर्शनवालोम मतः स्तोका ॥ अप्रमत्ता प्सनसे थोड़े अप्रमत्त सयमी [मायांगुणस्थानवी हैं [उनसे] प्रमगामग्प्पेपगुमा ।। प्रमग संपमी विदक सम्यग्दर्शनवाले] सस्पाक्युपे हैं मेपता पता उन प्रमग संयमी षेदकसम्पम्दसनवालोंसे] संयमा संयमी अर्मग्णेयगुणा विदकसम्यग्दृष्टि] असंस्म्पानगुपे हैं। विश संयमी वेदक सम्पन्दृष्टियोस] अमपा-मम्पादृष्टय ।। असरम्पेयगुणा' ।। असंयत सम्यादृष्टी असण्यात गुपे हैं। औरममिम् सम्पदण नाम् ।। मनः स्तोका' -उपशम सम्पादन [१] पालों में सप से थोड़े म्बार [वपूर्व फरण-अनितिकरण-सम्म सापराय-उपसंताप । ॥ अप्रमत्ता' -उपनाम भैमी वाले हैं। (चार उपसम मेपी वालों से ] अप्रमा संयमी - सम्पात गणे है। [ अप्रमग सपमी उपशम सम्पादृष्टियों से ] प्रमणा ॥ ममयेपगुणा। - प्रमर सपमी [ उपशम सम्पन्दन वाले ] संस्थात गुणे मपना पना' ।। असल्यगुणा -[प्रमत्त सलमी उपसम मम्पदर्शन पालों से] संपम सयमी असल्यात गुमेरे • गाती रिमनि मममी बिमली के न ममता रिमी मनुवाद कि स्थानमें शामिल किया जा विप्पणी acn । ॥ पचार। उपमा ॥ मम्प्पेषगुणा ।।

पयनिवासी मगरूपसहाय वीस व परमेव मौर विमषपर्य महिव सार्यसिदि का शमशः विधी अनुयाद । अपाय १ सूत्र अनाहारकाणां सर्वत स्तोका सयोगकेवलिन । अयोगवकिन संख्येयगुणा । सामादामदग्दृष्टयो ऽमस्येयगुणा । असॆयतसम्यग्दृष्टयोऽपस्येयगुणा मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणा ॥ एव मिथ्याष्टिचादीनाम् गत्यादिपु मार्गणा कृता सामान्पेन ॥ तत्र सूक्ष्मभेद आगमाविरोधेनानुस्मर्तव्य ॥ नाहारकानाम् । सर्वतः * स्तोका' । सयोग - अनाहारकों में सब से पोरे सयोग- फेवलिन फेवली है (अर्थात् यपपि सयोग केवलियों की सस्म्पा ८९८५०२ तक उत्कर्षकार होसक्ती है और अयोग फेवलियों की संख्या ५९८ या ६०० ६०८ तक हो सकी है परंतु सयोगकेलियों की अनाहारक अवस्था पूवरसमुद्घात और लोकपूर्ण समुपात में ती होती है दंड समुद्घात और फवाटसमुद्घात में आगरक ही अवस्था होती है इस अपेदा से सयोग केवली अनाहारकों की संस्म्या सर्व से अल्प है ॥ जीवों की अनाहारक अवस्था मिथ्यात्व सासादन-असंयत और अयोग केवली गुणस्थानों में ही होती है । सयोग केवली उक्त समुद् धातों में ही अनाहारफ होते हैं। अमोगकेवलिना ॥ सम्पेयगुणाः ।। (सयोग केवलि अनाहारको से) अयोग फेवली संस्पात गुण में सासादन सम्परष्टया ।। असस्पेयगुणा (अनाहारक अयोगकेवलियों से) सासादन सम्यष्टी असंख्यात गुण हैं असंयत सम्पापा का असम्म्मेय गुणा ।। (सासादन सम्पारष्टियों से) असममी सम्पग्दृष्टि असंख्यात गुण रे मिपाय ।। अनन्त गुमा -(असंयमी सम्पदर्शन वालों से) मिथ्यादृष्टी अनन्तगुण हैं एवम् - मिथ्यारष्टि-मादीनाम् गति-आदिपु -ऐसे मिथ्यादर्शन वाले आदिकनि गति आदिकों में सामान्पेन H मार्गमा a कृता सब सूक्ष्म मेदः । संक्षेप कपन करि मार्गमा निर्देश की गई । तहरो (इनके) यक्ष्ममेद जागाम-अविरोपन : अनुस्मतम्मा । भाख के अनुसार करि अंगीकारकरना या अनुस्मरण करना योग्य है पनिरमी अगामाय पाहीन स परम्प और विमत्तया सहित मर्यायमिमि नपशारिती अनुपाव । आध८ ना नास्त्यल बहुत्वम् । तदुभयव्यपद ारहिताना केवमानियत् ।। (१४) जागरानुव देन माहारकाण पाययोगमत् । अन्पयत्व पंचन्द्रियवत् है (पूर ३११ और पृष्ठ ३०१ ३०२ को कम से देखो) इसलिये संनियों का अल्प पत्त पंचेन्द्रियों क सदृश हुआ (सपी मिथ्यात्व प्रथम गुणस्थान स धीणकपाय पारहा गुणस्थान तक सत है) पैनन्द्रिया का अल्पपटुत्व गुणस्थानसान है इसलिये अंतमें संनियाका अल्पयाहुत्व मिथ्यात्व गुणस्थान से क्षीण कपाय गुणस्पानवी जीवा क अल्प बहुत्व क सदृश हुआ। चार अपूर्व पग्ण पृष्ठ २९८ से २९९ फोअंत तक ॥ मानिनाम : अन्य-पहत्वम् न अम्ति T -मन गहित पीया क अत्स-बहुत्व नहीं है (फ्योंकि ये सप मिथ्यादृष्टी है) { उभप-प्यपदा-हिनानाम् : केलियानि - उन (मैनी अमनी ) दाना नामों से पर्जित (जीव) निके कवल शानियों क - ममान (अस-पस्व ) ६ अर्थात अयागकवलिया से सयोगफेपली संख्यात्गुपे ईयाग कक्ली उत्कृष्टकरि ५९८ वा ६०० या ६०८ ६ ओर सयोग फयली उत्कृष्ट फरि आठलाख अठानहबार पाचसो दो हैं १४) आगरस-अनुवादेन । पारकाणाम् । -(१४) आहारक की अपवा से आहारकों फा (अल्प-यहुत्य) पि पागिर . -काप यागिया क मदृश है ( और फाययोगिया का अल्प-पात्र गुणस्थानपत् ) । आहारकों का असयल गुण स्थान सदृश हुआ। कापयोगी प्रथम मिप्पात्र गुणस्थान स सयोग काली सरहवा गुणस्थान तक है अत' अयाग केवलियां को छोड़ कर पा २९८ में चार अपूर्व करण से २९९ पृष्ठ क अंत तक शम्दशा पदलो सो वही आहारकों का असपास्य दोयेगा। अत' एटानिवासी जगरूपसहाय वकीलकृत पदच्छे और सिमक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्रिका पदमा हिंदी अनुवाद । वप्पाम १ पत्र ९ ॥ मतिश्रुतावधिमन पर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥ ९॥ मति-मुत-अवधि मना र्पय-फेवलानिशानमः॥- मनि-मन अनधि-मनः पर्यप और फेवल ऐसे पान (पाच प्रकार) है अर्थात् (१) यो पांच इन्द्रियों से और मनसे पदार्थ को जाने सो मति बानो, (२) मति मानके द्वारा बाने हुये पदार्थ की सहायतासे उसी पदार्थ के मेदोंको वा अन्य पदार्थों को जाने सो घुम्न है। इसका लक्षण अन्य प्रकारसे मी है। (३) क्षेत्रकात माष तथा द्रन्यकी मर्यादालिये रूपी पदार्य को प्रत्यक्ष रूपसे जाने सो अवधि मान है (४) अन्यके मनमें तिष्ठे हुए रूमो पदार्थोको प्रत्यक्ष जाने सो मनापर्यम मान है (५) समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-मावको प्रत्यक्ष रूप से जाने अर्थात् स्व-भविष्पत पर्वमानमें होने वाली पदार्थाकी समस्त पायोको एकत्री समयमें माने सो फेवल शान है। पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित इस सूत्र पर सर्वार्थ सिद्धि बृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद । (1) दिगंबर आम्नापमें किसी किसी पुस्तक "मन:पप्प पाठ है और किसी किसीमें "मनार्यय' है। श्वेताम्मर माम्मायके ममाप्पतत्वापा- धिममसूत्र में "मनापर्याप' मन पर्यप भयमा मनः पप्पपके स्थानमें है। शेष पाठ इस सूत्रका दोनों सम्प्रदायमि एक।मर्थ मी दिगमर माम्नाच दगताम्बर आम्नाय में एसा है। मा पर्याप और मन पर दोनों पक मर्य है । मना पप्प मोर मन पश्यप दोनों ठीको क्योंकि किसी शाद र अथवा इसे प्रथम को स्वर मा मोर पा) पसात हू को साहार को म्यान भाषे तो यह म्यमन विकसकरि अर्थात् लेखक की रणनुमार अग्रगपी आपाय ८ पाद ४ सून (भयो गाम्या -मवा गोम्पा में पा) पेरिव रोजाता है- म म्यंजन को पुहंग करतो पो म हराओ। जैसे मईया मझम पा मर्म-धर्म पा धर्म-कर्म पा कर्म ग्रामा पा ग्राम्मा-अपातुवे वा अगस्नुते । पेसेही वर्ष वा सम्प- माना पर्यप वा मन पर्पय दोनों ही ठीच और शुर। (२) यहाँ शान शब्द के साथ सम्पक शपकी अनुमति दे (पृष्ठ ३४२) और अधिगम उपाया। शमियामी मम पत पवार और विमल मति मायसिरिता मत हिंदी अनुभव । मवाय १ म: व सम्यग्दर्शनस्यादानुद्दिष्टस्य लक्षणोत्पत्तिस्वामिविपयन्यासाधिगमोपाया निर्दिष्टा । तत्सम्बन्धेन च जीवादीना सजापरिणामादि निर्दिष्टम् । तदनन्तर सम्यमान विचाराहमित्याह प्यम भारी उदिष्टम्प ॥ मम्पननम्पm मप्रकर प्रथम् में उपदेन कियागया सम्पन्शनका - लवण (नेदो मप्र २ पृ. ३१) उनि =(म माय मनक) उपनाका निमिन (देखो सूत्र ३ पृष्ठ ३६) पामिसिंग = (मम्य मनका) अधिपति (जीध); (मम्यग्दर्मनका) विपय (मत्र ४ पृष्ठ ४०) (मम्य उनका) याम या निक्षेप का लोक यवहार (मत्र ५ पृन ४४ देखो) =(मम्यग्नक) शान या ग्वरूप (नानन) क उपाय ( मा ६१४५४, मत्र ७ ५ठ ५८, मन ८ पृष्ठ ८१ को देखो) निशि । १० मर न । नाम । पह गय है । और (च) उम ( मन) + मयाकरि जीवादिक (तस्या) के पच्या परिणाम भाटि In -नाम (देवा मत्र ४) परिणामारिफ अपघा भावादिक (देखो सत्र ६, ७, ८) -कह गय ना । अनन्तरम् । सम्पवानम | विचार -निम (मम्पदमन) के निकट का ममप मम्पपान (दै सो) विधारने इनि० - योग्य है । मा (भाषाय] इसप्रकार करते ह कि (निपपानुपातिदनुर्माणम् = परम्पर वा भापम मिमीर (यतिकीण) परतुर्मि सानि- मणम् ॥ - नफे म राममें (ण्यापन)ीमा मनन निरिएन । प्राम् ।। नितीण पतु एटानिवासी जगरूपसहाय वकीलकृत परम्छेद और विमात्पर्य सहित सर्विसिदिका सदधा हिंदी अनुवाद । अम्मा १ पत्र ९ ॥ मतिश्रुतावधिमन पर्ययकवलानि ज्ञानम् ॥ ९॥ मति मुत-अवधि मनः पर्यर-फेक्लानि सानम्:- मति-मम्-अवधि मना पर्यप बौर केवल ऐसे धान (पांच प्रभार) है अर्थात् (१) जो पांच इन्द्रियों से और मनसे पदार्य को पाने सो मति मान है, (२) मवि मानके द्वारा जाने हुये पदार्य की सहायतासे उसी पदार्य के मेदोंको मा अन्य पदार्थों को जाने सो पुतब।इसका लक्षण अन्य प्रकारसे मी है ।। (३) क्षेत्रकाल माव तथा द्रम्पकी मर्यादालिये रूपी पदार्थ को प्रत्यक्ष रूपसे जाने सो अवधि ज्ञान है (४) अन्यके मनमें विष्ठे हुए रूपी पदार्गाको प्रस्मस पाने सो मन पर्पय पान है (५) समस्त द्रव्य-शेष काल भाषको प्रत्यक्ष रूप से जाने अर्थात् सव-मविपत वर्तमानमें होने वाली पदाचोकी समस्त पापोंको एकत्री समयमें बाने सो केवल धान है। पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित इस सूत्र पर सर्वार्थ सिद्धि बृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद । (१) दिगंबर आम्नायमें किसी किसी पुस्तकमें "ममःपयेप* पाठ है मौर किसी किसीमें "मनापर्य है। श्वेताम्बर आम्नापके समाप्तत्वार्या- घिगमसूबमें "मनापय मापर्वप अपना मनः पर्ययके स्थानमें है। शेष पाठ इस सूमन दोनों सम्पयामि एक है।मर्थ भी दिगमर माम्नाय और पताम्बर आम्नाय में एकसा है। मना पर्याय और मन पर्प र दानोंका एक अर्थ है । ममा पर्यप मोर मन पर्पय दोनों टीमोक्योंकि किसी शयम र अपग इसे प्रथम कोई स्वर आफै भोर ( पा) पधात् इ को बोरकर को म्प इन आवे तो वह प्यंजन विकल्पहरि बर्यात् लेखक की रपमनुसार अयायी अम्पाय ८ पाद सूत्र (नयो हाम्या -भयो होम्यो देवा) से हित्व रोमाता-पाई ग्स म्पंजन को पुराग फरलो पार न पारामओ । असे मईपा मक मई वा मई-मर्म पा धर्म-कर्म या धर्म प्रहमा पा प्रहम्मा-मपानुते वा महम्नुते । ऐसेही पर्प वा सर्प- ममा पर्यय वा मना पपेय दोनों ही ठीक और शुभ है। (२) यहाँ शान शब्द के साथ सम्पन शपकी अनुमत्ति है (पृष्ठ ३४२) अनकन पानिरागी जगापमहाप पीरकृत पदच्छेद और विभवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ र ९ नानगर प्रत्येक परिसमाप्यते । मतिज्ञान श्रुतज्ञान अवधिज्ञानं मन पर्ययज्ञान केवलज्ञानमिति ॥ इन्द्रियैर्मनमा च ययास्वमयन्मन्यते अनया मनुते मननमात्र वा मति ॥ मानाद परकम् ॥ मानशब्द प्रत्येक (मति भूत-अवधि मन पर्यय-फेवल) को परिसमाप्पन T मनिपानम् ॥ तपानम् ॥ - लगाया गया है। (तब) मतिम्रान प्रतज्ञान मापिधान ॥ मन पपयमानम् ॥ -अवधिज्ञान-मन पपयज्ञान सामानम् ॥ निन्द्रय मनसा च केवल ज्ञान ऐसे है। पांच इन्द्रियातरि और (च) मनकार पदाम्पमत मन्यता = मपनी (शक्ति) के अनुकूल (=पयास्त्रम्) पदार्याको जानता अर्थात् पांच इन्द्रियोंकार और मनकरि अपने योग्य वेश में स्थित पर्वमान पदार्प को जो पहचानता है या जानता है सो मविधान है मनपा । मनुते । = (अथवा) जिसकरि मानता (मनुते ) पारमननमायम् : मनि -(मो मतितान ) या जानने मात्र मविज्ञान है। परिसमापन यह एप माप (=प्राप्त ह) स्यादिमियें गणके परस्मैपद घासु परि और सम् उपसर्ग मगाने से मौर वर्मणि प्रधाम मयप मौरन मम्म पुरापर्वमानसम, आग्मनेपर पापचन के प्रत्ययका माइकर पेमे बना लेते है कि परि+मम्-माप्+1+ परिममाप्यते (4) गो मन जानमारिपारि पनुषगण मारममाही सर्मक, अनिद् पातुमे प बतुपगप पिकरण सागर मम्प बना लिया परमात् ने पर्तमानधारका पायपन मम्प पुरुन, मारमनेपदी पप जानेसे (मम्प+ते) मम्पते (=जामता बनगया ॥ 1३) मनुन मन मानना, (Oriपर) तनादि माठ गमन आमनेपदी, मर्मक सेट् पातु, उ मोठम गपका विकरण गोडनेसे (मन्+3)=मनु लगा पीप तमनपसमा पारपन, मम्पपुषा मारमनेपदी प्रापग, जादने से मनुते (- जानता है) बनगा ॥ मानपते-मम्मकार परमा पुnि गप नाममपी मर्म सर् पातु है। इस गप अप विकरण पातुर्म लगाने से पहिसे मायके स्वर मौर रपात मी पनि संगती र मत मान+म प्राप्त मा ते उकनारमनेपदी वर्तमान सावरि मानपते हुमा । मावि ममचादि प्रपमममा पार करने के गई में सरपरस्मैपरमोर करने में महर्मक मारिगल परस्मैपद।

पगनिगगी वगरपमर पताल पदनद और मिस्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अपाप १६ तदापरणक्षयोपशमे मति निरूप्पमाण श्रुयते अनेनेति तत् श्रणोति श्रवणमात्रं वा अतुम् ॥ अनयोः प्रत्यामन्ननिश स्त कार्यकारणभावात् । तथा च वक्ष्यते "श्रत मतिपूर्वमिति" ॥ अना मागारम धपापनम । मनि । -उम (स्त मान) प्रावरणीयकमके क्षयोपशम होने पर (= सति) निरमाणम् ॥ अनन HD पन T इति. = फपित यस्तु का नाम (-निरूप्यमाण) जिमसे सुनकरि माना जाता स्वज्ञान) है। नत गानि 7 =वा उम (निम्प्यमाण वस्त) को (-तत ) सुनकरि जानता है (वो तमान पायामात्र ॥ एतम् ।। = अथवा (=पा) नो मुनकरि जानन मात्र ( सो) भूतमान है। =(दोनों मतिमान और यतमान का आपस में) कार्य-कारणमाव होने से काय-कारण मारात" ॥ प्रगामम निर्देश । कन। =इन दोनों(मतिमान और भुतघाना) का अति निकट उपदेश किया गया है। अर्थात् मतिनान कारणस्प है और भूतमान कापरूप है। नया म०प्यत T जैसा कि (=क्या च आगे इसी अध्याय के पीसवा सूत्र में) करेंगे (टिप्पणी पृष्ठ ४१) ४. मतिपूरम् ॥ इनि० - एतमान मतिमान पूर्वक होता है तमान मतिनान के पश्चात् होता अर्थात् भूत मान फ उत्पन्न हाने यो मतिनान कारण है। और भुक्तान कार्य (ति-पा मन् शम त्रिनिंगी है। पापर सोम समी विमति एक पर पुलिंगर्म है अत: मति शप मी सप्तपी एकवचन पुगिरी पर पिपमानवा अधर्म है। महावारी, पर पहुत उपम, पयार्य ठीक) राय न मान भी माता है (लेस्सा रिस प प ) (A) पपगम ग माश्म तात् -मगम मप ( गम् ) वा (तत ) म्पन (• सत्) (२) ~गरि प्रगम गणका परस्मैपदी जाना पा रिलमा भौम प्राता है। इस गपके पातु म जतिम स्थर और पातु का उपान्त दूरव मरिमोपरि पहिल गुण संक्षा का प्राप्त हा मान । मनमा भी - ध्र+म (विकरण आपकर रिपणी पुर १३ वाय) -भगति, माय पुल पसरप पर मेपर पतमानाल का ति प्रयय जाड़ने म ध्र+ति-पति ( माता) बन गया पति नुनु रिफरण want timl गप म पातु में मारा जापता यह धातु पविया स्थाहि गवस हा जाता है और काम हो जाता है | H+गु( नु) देखा रिलनी ! ५५॥ गु-भुना ( प ५१ ) TE माहा गणाति-ममरि जानता है । ३१४ यह पत्र १७५६८५स्त्रों से मनुनिया mynापसापानुत्तरिया) स्थान में हो और उसके पश्यावप्न विकरण हो पदि कर्ता में सार्य पानुष Likestra पानमन्द प्रत्येक %3D एरानिगामी नगरपमहाय पीलकृत पदच्छेद और विभेनत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १९ ज्ञानगर प्रत्येक परिसमाप्यते । मतिज्ञान श्रुतज्ञान अवपिज्ञानं मन पर्यययनं केवलज्ञानमिति ॥ इन्द्रियमनमा च यथास्वमर्यान्मन्यते अनया मनुते मननमात्र वा मति ॥ प्रानन्द प्रत्येक (मति दक्-अवधि-मन पर्यय केवल) को परिसमाप्पन T मनियानम् ॥ नमानम् II लगाया गया है। (तर) मतिज्ञान-तमान माधिपान ॥ मन पपगानम् ।। अपषिद्वान-मन पयपहान कानमानम् इनिये मनसा ॥ च केवल शान ऐसे है। पांच इन्द्रियारि और (-घ) मनकरि यथासभर्यात , मन्यता = अपनी (शक्ति) के अनुकूल (=यथास्वम्) पदार्थीको आनता अर्याद पांच इन्द्रियोंकार और मनकरि अपने योग्य पेट में स्पित र्वमान पदार्थ को जो पहचानता है वा बानवा है सो मविवानो अनाज मनुन T = (अथवा) जिसकरि बानता (१-मनुते ) सामननमायम् .in मनि -(मो मनिशान 1) वा जानने मात्र मतिमान है। परिणत या शममाए (= प्राप्त हान्य) रपारि पमिये गणके परस्मैपद पातु परि और सम् उपसर्ग लगामे से मौर कर्मणि प्रभाग मन्पप और ने मग पुरुष, पर्वमानमन, मारमनेपद पम्पपनके पपका जाकर पेमे बना मेते है कि परि+मम् माप++ते म् परिममाप्यते (३) मगले मनमानमा, रिपारि पनुपगपो प्रारमनेपदी सर्मक, ममिट् पातु प पतुषगणका विकरण जासकर माय बना सिपा परमात्मे पर्नमानपनापापयन अन्य पुरुष, मारमनेपदी प्रपय जोड़नेसे (मम्पाते) मन्यते (जामता बनगया | (1) मनुते मम्मानना, ( पर) तनादि माठ गपका मारमनेपदी, मर्मक सेद् धातु, उ माठर्म गणका पिकरण जोड़नेसे (म13)= मनु पनगरा पीए तेजमान समा एउपयन, मम्पपुरुष मारमनेपदी प्रयप, साइने से मनुते (-मामा ) बनगया ॥ मानपते-मन्नरंकार करना पुगरिस गम नामनपदी मकर्म से धातु है। इस गमक मप विकरण पातुर्मे मगामे से पहिले मनके स्वर और उणम्त म की पति सारामतीमत माम्म प्राप्त मा मारमनेपदी पतमानायी मामयते हुमा । मनति मनशादि प्रथमममका चानुपमा करने के मर्प में सर्च परस्मैपा मोर मरमर पर मप में मकर्मक मादिगन परमेपर।

, एटानिवासी अगस्पसहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विमपत्यर्थ सहित सर्विसिद्धिका सम्पशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र ९ परकीयमनोगतोऽयों. मन इत्युच्यते साहचर्यात्तस्य पर्ययणं परिगमर्न मन पर्ययः । मतिज्ञानप्रसग इति चन्न । अपेक्षामात्रत्वात् । क्षयोपशमशक्तिमात्रविजम्भित तत्केवल 110 परकीय-मनस्-गता - परसमधी (-परकीय) वा अन्यके (= परकीय) मनमें प्राप्त वा विष्ठे हुये अर्थः । सारापात ॥ = रूपी पदार्थ (= भ) की साहासे-अनुरूपतासे-समवायसे पा समागमसे = मन ऐसा (नाम) कहा गया है अर्थात् तिस (अन्यके मनमें चितमन किये हुये) पदार्थका मना इति उच्यते T तस्य । पर्पयणम् परिगमनम् ॥ मनः पर्ययः ।। = प्रान वा जानना (= पर्ययणम् = परिगमनम्) सो मनः पर्यय है अर्थात् जो मना पर्यप धानावरणीय कर्मके षयोपश्चमत्ते परके मनमें तिष्ठे हुये रूपी पदार्थको जाने सो मन पर्यप मान है। मतिमान प्रसंगः । इति • पेत् = (मन पर्पय ज्ञानके) मतियानका संयोग वा मेल होता है ऐस संदेहर (= चेत) न अपेषा-मात्रस्वात् ॥ =(उत्तर है कि) नहीं क्योंकि (मन पर्यय पानमें मन) अपेवामात्र हे कार्य कारण माव नहीं है अर्थात् मनः पर्यय मानकी उत्पत्ति का कारण मन नहीं है बैसाकि मतिज्ञान के उत्पम होने का कारण मन है। समोफ्लम-शक्ति मात्र- (मन' पर्यय भानावरणीय फर्मके) वयोपशमकी शक्ति माणसे विमृम्मितम् ।। तत् ॥ फेवलम् ॥ =विकसित वा प्रकाशित (विजृम्मितम्) हुआ है। वह (मनः पर्षय भान) फेक्स पश्यन्ति T उपरिक स्तोत्रम् ॥ पश्पति T -देखते है । कपर मका या घोड़ा देखते हैं। निषिमान पम पम पर्यम्तम् ॥ प्रतिक मर्यः ।। -मपना विमान पजा र पर्यंत ( देखते है ) ऐसा ममिपाय है। अपरिय-विषयत्वात् ॥ भवपि अर्थ -मणि विषपश्य मीत मवधिम है (इस वाक्पका) सामर्थ है। कपिम्पसण पिश्यत्वात् ॥मबपि। -सी पक्षणवाला ( पदार्थ) पिप जिमनसो मवधि शान है। (१) विग्मित, (वि.) वि+मि+छापिकसित । सिकाइमा। मापे। प्रमश । नमक । पपवन कोश पष्ठ ३५२ देखो। 1 गनिनामी नगरपमदार वकील कृत परम्छेद मौर विभत्त्यर्थ सहित मर्थिसिद्धिका शम्दाम हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ९ अवारपानादवच्छिन्नविपयाद्वा अवधि ॥ OTO-CHCCE (अपधिशानावरणीप फर्मके षयोपशमसे द्रव्य-क्षेत्र-काल-मावकी मर्यादासे) प्रगग पानात पा० भासिम =पुद्गल्फो (प्रत्यक्षपने करि) जाननसे अथवा रूमी पदार्य (अवरिछन ) सिपान मामि। (जिमका) विषय ऐन (के हत) से अवधि (पान कहावा) है। अर्यात मयादा लिगे हुये रूपी पदार्थ को जो प्रत्यक्षपनेसे माने सो भवपिझान है।। (immप प म मारनेम अमान् (अवाक् भगा देवा रिणमी १५, १५) यधन पा बोल रहित अर्याद मा पदार्प पा पुरी गा माग्निपग पुगमा तान धातिमान्यताप्राधि प्रवाधानापुद्गल परिमानावित्यर्थः ।। प्रगान TET ति अमाप पुद्गताः । =मही दोसते है (वा नहीं ) हिलसे पलते है ऐसे पवन विमानस्तु है। नादानि Tमानाति TTE माधिः। = तिन (पुद्गलों ) को प्रहम करता है जामबारे पेसा अवधि (बाम) है। माया | पुद्गम-गरिमानात In ति अथ ।। आपापामात् (पाप )मे मा पदापका विरोम्हप पानसे ममिपाय है। (२) अपमान मापे निपटत्येनापचीपते निपम्पते प्रमीयते परिरिण्यत् (d ) इत्यर्थः । सामानमा निरत स्पन | मारपीयते T द्वार-क्षेत्र व मायमे मर्यादाकरिसीमारिया गया? पिन Tमीपते T परिछिपते T =नियम किया गया है परिमित किया गया है विशेष रूप स सीमा किया मया है। प्रिया -इस प्रनर ममियाय है (1) प्रायन प्राधिs: | मघम्त्याइतर पिय प्ररणावपपिरुप्यते । देवा पनुमवधिधनेन ममम नरक पर्यम्त पHिITRA म्ति । निगयिमानयमणुपर्यम्तमिरयष || अपशिष विश्वावधिः । काऽर्थः पित समणविषयत्वाइपषि भषधान मत प्राप मीचले पा पासास (-वियोमर(= पारे। माधि मा अपातारातर सा अयपि है। (इम याफ्य मे) क्या अमिप्राप है। मीपळे वा पाताम के अधिश्वर नि मापा मारपि । म T देवा =विपर ग्रहण करनेसे अपपि कहा गया है। देव मधिमान 1 ममम मरक-पर्यनम् ।। -नियाकार (मा) अवपिडाम से सात मरक तक मापनमा एटानिवासी जगरूपसहाय कीलकृत पदपछेद और विमात्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्पन्नः हिंदी अनुषाद । अध्याय १ पत्र ९ परकीयमनोगतोऽयों मन इत्युच्यते साहचर्यात्तस्य पर्ययण परिगमन मनापर्यय । मतिज्ञानप्रसग इति चन्न ! अपेक्षामात्रत्वात् । क्षयोपशमशक्तिमात्रविजम्भित तत्केवलं K ८ मना, परकीय-मनम् गत ॥ -परसम्पधी (-परकीय) या अन्पके (= परकीय) मनमें प्राप्त या विष्ठे हुये मर्यः । साहपहि = रूपी पदार्य (= अर्थ) की साहपर्यासे अनुरूपतासे-समवायसे पा समागमसे इति उप्यते T तस्सग = मन ऐसा(नाम) कहा गया दैवयोव विस (अन्यके मनमें चिंतमन किये हुये) पदार्थका पर्यपणम् ॥ परिगमनम् ॥ मनः पर्पय :। = मान वा मानना (= पर्यपणम् = परिगमनम्) सो मन' पर्यय है भात् जो मनः पर्यय मानावरणीय कर्मके क्षयोपशमसे परके मनमें तिष्ठे हुये रूपी पदार्थको बाने सो मन' पर्यप शान है॥ मविज्ञान-प्रसंग । इति चेत् " = (मनः पर्षय मानके) मसिवानका संयोग वा मेल होता है ऐस संदेहपर (= घेत) न अपेक्षा-माप्रत्याव ॥ =(उच्चर है कि) नहीं क्योंकि (मन पर्पय मानमें मन) अपेक्षामात्र कार्य कारण भाव नहीं है अर्थात् मना पर्यय शानकी उत्पधि का कारण मन नहीं है बैसाकि मतिमान के उत्पन्न होने का कारण मन है। थपोपशम-शक्ति-मात्र- (मन पर्पय मानावरणीय कर्मके) मोपनमकी शक्ति माणसे पिजृम्मितम् ॥ । तत् ॥ केवलम् ॥ विकसित वा प्रकाश्मित (विजृम्मितम्) हुआ है। वह (मनः पर्पय मान) फेवल पश्यन्ति T उपरिक स्टोकम् ॥ पश्यन्ति T -देखते है। कार मका या थोड़ा देखते हैं। निप्रयिम्मनप्या पण पर्यम्तम् ॥ इतिक मा। -अपना विमान पसार पर्यंत (देखते है ) ऐसा अभिप्राय है। अयरिएन विषयस्यात् ॥ अपपि10:अर्थ। -मवगिर विषय माहित अवापाम है (इस पापका) साम। फपिक्ससण पिण्यत्वात् ॥ मधि। -स्पी मक्षप्पवासा ( पदार्य) विषय जिमन सो अवधिशान है। (1) विग्भित, (नि.) वि+मि+। विकसिव । लिला इा। मापे माश। पमक । पमन्त्र कोश पृष्ठ ३५१ देसो॥

पनिागी जगापगदाप यकील कुन पदपछेद भौर विमस्त्यर्थ सहित सर्वाधमिद्धिका सम्मणः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय ९ अवांग्मानादवन्छिन्नविषयाद्वा अवति ॥ (अधिमानावरणीय क्मके पयोपशमसे द्रव्य-क्षेत्र-काल-माक्की मर्यादासे) प्राग पानात 10 आन्टिना पुद्गलको (प्रत्यक्षपने करि) जाननेसे अथवा रूपी पदार्थ (अपरिन्न) सिता भाषि (जिमका) विषय दोन (के हेतु) से अवधि (शान कहावा) है। अर्थात मर्यादा लिगे हुये रूपी पदार्थ को जो प्रत्यक्षपनेसे नाने सो अवधिमान है। (१'मा गम् तपम जाने मार (अवार-भागग देवो रिणणी १५, १५) पवन पा गोल रहित मर्यात् महा पदार्प षा पुती TIME मनम्तिण- पुगमाः । तान् पाविज्ञानातास्यवधिः मवाग्धान पुगा परिमानारिस्पः ॥ प्रगान THAT हि राणा | पुगताः ।। =मही पासवेरे (पा मही) रिमसे पलने है ऐसे समन गर्मित ना बस्तु है। गनिजामानि प्रापित = तिन (पुद्गलों ) को प्राण करता है मामला है ऐसा अपपि (बाम) है। मापा । पुद्गम-गरिबानात् ॥ ति म । प्रयाग्यानात् (वास्य )मे जा पदार्प विशेषकप पानसे अभिप्राय है। (मन मापे निपट लोन पधीयते निरम्पते प्रमीयते परिरियपत् (ते) इत्यपः ।। मरपा :नित स्पन : अवपीपते T प्राप-सेत्र पण मायमे मर्यादाकरि सीमारिया गया है मिTमीर Tपरिपिछपने T = निपम किया गया है परिमित किया गया है विशेष रूप स सीमा किया गया है। - इस प्रकार मिप्राप (1) मापन माKिISAN I मपम्तावावर विश्य महपादयधिकरपरी । देपा पनु मयपिडानेन मप्तम मरक पर्यम् पHिAI परिव । नियपिमानवादणुपर्पन्तमिरपप || अपपिएम विस्वावपपिः काया मपित लसणविषपत्वावधि • भयपान मर्यात प्राप मीयले पा पाताल का (-अपियों का मामधामहै। माफि माग्तान्तर सा अपधि है। (म याश्य मे) क्या अभिप्राय है।नीयवा पाताय के मधिस्तर रिमाप मपपिउणते T देपा। =पिपर प्राण करनेसे अवधि कहा गया है। देव पिसनेन । ममम माल-पर्यन्तम् ।। -निरपराधी (=म्या) अपविधान से सात मरका 204)

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T एरानिगमी नगरपमहाय पीतकृतपदपोद भौर विमप सहित सर्वार्थसिद्रिका मन्दनः हिंदी अनुवाद ॥ अध्याय १ सूत्र ९ स्वपरमनोभियपदिश्यते । यया अने चन्द्रमसं पश्येति ॥ वाद्येनाभ्यन्तरेण च तपसा यदर्यमर्थिनो माग रेवन्ते मेवन्ते तत्तेवरम् । असहायमिति वा ।। स-पर मनोमिदिम्पत अपन और परके मनों (की अपेसा) करि निर्देश किया गया है । अर्थात इसकी मन पर्यायवान संघा इस इतुसे रक्सी है कि इसमें अपने और परके मनकी अपेक्षा मात्र है नफि मसिमानकी मांति इसमें (इन्द्रिय और) मनके द्वारा रूपीपदार्थका ज्ञान होता है। पार प्रा । ममम् । पश्यनि पतिक =जसे पादलमें चंद्रमाको देख अर्थात् जैसे इस वास्यमें पादल सन्द केवल अपेशामात्र लाये है चंद्रमा यादलसे उत्पन्न नहीं हुआ है वैसे मन' पर्यय वाक्पमें मन झुम्द अपेक्षामात्र है मन पर्ययज्ञान मनद्वारा उत्पन्न नहीं हुआ। पापन ' अम्पन्नाप : न तपमा ॥ यद् अर्यम् : पाम और (च) अंतरंग तपकरि जिस वस्तुको ( यद् अर्थम्) मागम् । अनि फेरन्त T सेग्न्त T =जिस पयको तपस्वी उपासना करते हैं (केवन्वे-सेवन्से) सेपन करते हैं ना सनम् : या प्रमहापम् । इतिक =सो (तत्) फेवल (मान) है अथवा ( यह केवल मान ) असहाय ऐसा है पाम किसीका सहाय नहीं चाहता है अर्थात् जैसे मविशन और मुक्तान इन्द्रियों और प्रकारमादितकी महायनासे पदार्थको जानते है वैस यह मान नहीं है क्या अबधि शन और मना पर्यय मान अपनी अपनी उत्पनिमें पयासंख्य अवधिनानापरण और मनः पर्यय पानावरम कर्मकी अपेक्षा रखते है जैसे भी फपत मान नई पर मान एकमात्र आरमास ही प्रपतता है इसीसे इसको फेवल (हान) कहते हैं। मारिप-RRAN रारिण्टगपरे गमप परस्मेपर और मरममेपर मकर्मक अनिर पातुस पि और मप उपसकि मोरनेसे वि+अप+विश् रवि प्रापप ओर भोरते मम्पपुरा, म, वर्तमानपाल, भारमनेपदी रपका आमसे परिपते पनावि पधातु मिसेदारमा मनिसा है।

एटानिवासी जगरूपसहाय कीलकत पदच्छेद और विमपर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ मत्र १ तदन्ते प्राप्यते इति अन्ते क्रियते । तस्य प्रत्यासन्नत्वात्तत्समीपे मन पर्ययग्रहणम् । कुत प्रत्यासत्तिः। संयमेकाधिकरणत्वात् । तस्य अवाधिर्विप्रकृष्टः । कुतः । विप्रकृष्टेतरत्वात ॥ सत् बन्ते । प्राप्यते इति अन्वेश नियोग -वो (केवल मान) अन्तमें प्राप्त किया जाता है सो इस (स्यके) अन्तमें लाया गया? वस्प ॥ प्रस्पासमत्वाम् ॥ सत्-समीपे : -तिस (केवलमान) के निकट उत्पन होनेसे उस (फेयलमान) के पास में मनः पर्मम-ग्रहणम् ॥ मनः पर्यय (मान) का अहम है। (प्रभ) कहांसे (= कुसा) वा क्योंकर (जता) प्रस्पासचि (मनः पर्पय मान फेवल बानफे) अति निकट है। केवल (= एक) संयम-अधिकरणत्वात् ॥ म्सयमके आश्रयफ्ना से (मन पर्ययशान फेवल मानके अति निकट) है अर्मात्मनः पर्यपन्नान और केवलशान ये दोनों संयमी मुनिफे होते हैं मत' मनः पर्यशानको संपमकी अपेक्षा से केवल मानकी निकटता प्राप्त है तस्य :In अवधि विष्टः =विस (कक्लबान) के अवधिज्ञान दूर है (अतः इसको मनः पर्पयज्ञानके समीप कहा) =(प्रम फेवलपान से अवधिशान) क्योंकर (क्सः) (पूर है- उत्तर) विस्वरत्वात् । क्योंकि (केवलज्ञानकी अपेपारो) एरवी (तीनशानों)मेंसे (यह अवधिशान )एको (१समानापेसपा विपकरेषु मतिमतापधिप्यास्तमत्वात् । केपमार-मपेक्ष्या विप्रकोप: मवि एक - क्योंकि केपरपानकी अपेक्षा से दूरपती मविधान समान भवषिषु । मातमत्वावा -मवषिशानों में से ( यह भवधियाम एक) (२) 'तम्य'-वहारस्पलिये माया क्योंकि पनि मन पर्पयशानके लिये माता सो पत्तिा प्रयामति पाइसी मर्यकाको शम्म देते (३) “समीपे " मिलिंगी राव है यहाँ पर इसको सप्तमी एक पवन पुलिंग में पा सप्तमी एकाधन मपुमक लिंग में मान सकते है।

एटा निवासी बगपसहाय वकीलकृतपदन्छ भौर विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सत्र ९ स्वपरमनोभिर्व्यपदिश्यते । यया अने चन्द्रमस पश्यति ॥ वाद्येनाभ्यन्तरेण च तपसा यदर्यमर्थिनो मार्ग विन्ते सेव ते तत्केवलम् । असहायमिति वा ॥ स्व-पर मनोमियपदिश्य T अपने और परके मनों (की अपेक्षा) गरि निर्देश किया गया है। अर्थात् इसकी मन पर्यायवान संता इस हेतुसे रक्खी है कि इसमें अपने और परके मनकी अपेक्षा मात्र नफि मतिज्ञानकी भांति इसमें (इन्द्रिय और) मनके द्वारा रूपीपदाका शान होता है। पया अन मनमसम् । पश्पति T इतिक -जैसे पादलमें चंद्रमाको देख अर्थात् जैसे इस वाक्पमें पादल शम्द फेवल अपेक्षामान लाये । चंद्रमा पादलसे उत्पम नहीं हुआ है वैसे मन पर्यप वाक्यमें मन शुम्द अपेक्षामात्र है मनः पर्यवसान मनद्वारा उत्पम नहीं हुआ। शामन ॥ अभ्यन्तरण ॥ प तपसा ॥ मद्-अर्थम् ।। -पास और (च) अंतरंग सपकरि जिस वस्तुको (व्यत् अर्थम्) मागम् । अनि । केवन्ते T सेपन्त र =जिस पथको तपस्वी उपासना करते हैं (फेवन्ते सेक्न्ते) सेवन करते हैं मत 1 केवलम् । पा० असहायम् । इतिक सो (तत्) केवल ( शान) अथवा ( यह केवल मान ) मसहाय ऐसा है बाम फिसीका सहाय नहीं चाहता है अर्थात् बैसे मतिशान और मतज्ञान इन्द्रियों और प्रकाशादिककी सहायतासे पदार्थको जानते हैं यस यह मान नहीं है तथा अपधि वान और मनः पर्यम शान अपनी अपनी उत्पसिम यथासंस्म अवधिभानाकरण और मनः पर्यय धानावरण कर्मकी अपेक्षा रखते हैं से भी केवल शान नहीं है यह मान एकमात्र आरमासे ही प्रर्वता । इसीसे इसको फेवल (पान) काते । पपरिस्पते-गपशप्प विश तुरादि ण्ठेगपके उमप परस्मैपद और मरमनेपद मर्मक मनिन् धातुस वि और मप उपसकिशोरनेसे वि+म+विम् कप बना यह धर्मविप्रपप जोरकर और ते मम्पपुरय, एसधन, वर्तमानकाल, भाममेपली प्रयोग से प्रविष्यते पनाहियामानु शिमला सेवामा समनिता है।

एनिवासी बगरूपसहाय मीसात पदच्छेद और मिक्स्पर्प सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दशः हिंदी अनुवाद ! अध्याय १ मुत्र ९ तदन्ते प्राप्यते इति अन्ते क्रियते । तस्य प्रत्यासन्नत्वात्तत्समीपे मन पर्ययग्रहणम् । कुत प्रत्यासत्तिः। संयमकाधिकरणत्वात् । तस्य अवाधर्विप्रकृष्ट । कुतः ! विप्रकृष्टतरत्वात ॥ व अन्से । प्राप्यते इति अन्ते मिससेT वो (फक्लमान) अन्तमें प्राप्त किया जाता है सो इस (पत्रके) अन्तमें लाया गया। तस्प ॥ प्रस्वासमत्वात् ॥ क्त्-समीपे : -तिस (कपलपान) के निकट उत्पम होनेसे उस (केवलशान) के पास में मनः पर्पय-प्रामम् ॥ =मना पर्पप (मान) का अहम है। (प्रभ) कहांसे (=कुतः) या फ्योंकर (कुता) प्रस्यासपि (मनः पर्यम मान फेवल ज्ञानके) अति निकट है। केवल (= एक) सपम-अधिकरमत्वात् ॥ संयमके आभयपना से (मन पर्ययमान केवल मानके अति निकट) है अर्थात् मनः मन्नान और केवलशान ये दोनों संयमी मुनिके होते हैं अत' मनः पर्यशानको संपमकी अपेक्षा से केवल मानकी निकटता प्राप्त है सस्य भवधि विप्रष्ट । -तिस (केवलबान) के अवधियान दूर । (अस' इसको मन पर्पयज्ञानके समीप कहा) (प्रम कवलशान से अपचिन्नान) क्योंकर (क) (पूर- उत्तर) विप्रकृष्टतरत्वात् ॥ = क्योंकि (फेवलशानकी अपेक्षासे) रक्ती (तीनहानों)मेंसे (यह अवधिशान )एको (१) देवस्थानापेक्षा विपहलेषु मतिमुतापषिप्यायतमत्वात् । पदान-प्रपेक्ष्या ।। विग्रहण : मवि एक क्योंकि फेवर मानकी मपेक्षा से दूरपर्ती मतिवान पुतवान अवधिषु । सम्पतमावाव। -मपितामों में से ( यह भषधिशाम एक) (२) 'वस्य-वधानस्पलिये माया क्योंकि यदि मन पर्यवधामके लिये प्राता तो पत्तिा प्रस्यामक्ति पा इसी मर्यको शम्य देते (३)" ममीपे " निलिंगी एप है यहाँ पर इसको मप्तमी पर पचन पुलिंग में षा सप्तमी एकायम नपुंसकसिंग में मान सकते है।

प्राणन T एगनिवासी जगरूपमहाय यफीलकृत पदपछेद और विमत्पर्ध सहित सर्वार्षसिद्धिका सदशा दी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र प्रत्यक्षारोक्ष पूर्वमुक्त सुगमत्वात् । श्रुतपरिचितानुभूता हि मतिश्रुतपद्धति. सर्वेण प्राणिगणेन प्राय में प्राप्यते यत । एवमेतत्पञ्चविध ज्ञानम् ॥ तद्धदादयश्च पुरस्ताद्वक्ष्यन्ते ॥ प्रमाणनयैरधिगम इत्युक्तम् । प्रमाण च पाञ्चित् ज्ञानममितम् । पाञ्चित् सन्निप । प्रत्ययात् ॥ परोषम् ॥ अत्पक्ष (अवधि-मन पर्यप-फेवलमानों) से परोष (मति-मुलान) स्पष्ट पा सुगमोने (के हेतु) से (इस नवमें सूत्रमें) प्रथम कडेगये हैं मुगमत्तात् ॥ पूपम् ।। उक्तम् In यत भूत-परिचिता अनुप्ता : दिक =क्योंकि (-पस ) श्रुतकरि जानागपा (परिचिता) और मनुमफिमागया ही मति भापति ॥ सर्वम । प्रापि-गपेन । प्रायस् =मतिमान और भूतमानका मार्ग (= पति) सरजीवोंके समूहद्वारा माषा प्राप्त किया जाता है। माषार्थ मति-मुन्धान परिचय किये जाते हैं, अनुमवमें आते हैं इसकी पति सुनी जाती है समस्त प्राणियोंक पाल्पपनेकरि था पहुतापक्करि पायेजाते हैं और (मतिमान मुख्यान) सुगम है अतः ये दोनों परोपमान तीन प्रत्यक्ष शानोंसे पहिले करे । एवम् एतत् ।। पम्प-विषम् ॥ मानम् ॥ पक् - इस प्रकार यह पांच मांति शान है । और उस (=सद्-मान) के मद भादयः ।। पुरस्तानन्यस्यन्त T - मेद आदिक आगे कदे बायंगे । प्रमाण नये (सम्पग्दर्शन-भान-पारित्र और बीव-अनीवादि साव तस्वों का) प्रमा-नयोंसे अधिगमः । इति उत्तम् -शान होताहै ऐसा (सूत्र ६ में) फागया है प्रमाणम् ॥ न पात्मिानम् ॥ अमिमतम् ॥ =और(= घ) कितकारि प्रमाण मान माना गया है (अमिमतम्) कगायित्वसमिकर्ष । -किसेक (प्रमान) सन्निकर्म (मानागया है) भास् कितेक मताचार्य पिय और इन्द्रियका सम्बन्ध वा व्यापार को प्रमाण मानते हैं 1) तप रचितानभूता-भुतेन पारपिता मा चानुमूना ब-श्रुतेन परिविता साप अनुमृताच थतम । परिपिता मा.मनुस्वा । साभुतकारिमानाबा.मौर मनुभव लियामाता सो अवपपिपितापुस्तके SC-C-sa GGER . ऐटानिवासी अगरूसहाय वमन पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शवशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र १ पाश्चिदिन्द्रियमिति । अतोऽधिकृतानामेव मत्यादीनां प्रमाणत्वस्यापनार्थमाह- ॥ तत्प्रमाणे ॥१०॥ तद्वचन किमय। प्रमाणान्तरपरिकल्पनानिवृत्यर्थम् । सन्निर्प प्रमाणामिन्द्रिय प्रमाणमिति केचित्कल्पयन्ति केपम्पिक इन्द्रियम् ॥ इति० केवेक इन्द्रिय ऐसे (प्रमाण माना गया ) है-इस समका मापाप है कि सुगत (पद्धदेव ) के माननेवासे प्रानको प्रमाण मानते हैं और योग मत वाले इन्द्रिय और पदार्थका जोरूप संनिकर्मको प्रमाण मानते हैं और सांस्य मत पाले इन्द्रियोंको प्रमाण मानते हैं। इत्यादि बानके संबन्ध मिष मिन मवाक्लम्झ्यिोंकी मिम मिम अनेक कल्पनायें । अत: अधिकतानाम् ।। नस हेतुसे (बा) अधिकार फिगये पा पकरणमें लायेगये मति-आदीनाम् । एक न्मति-प्रत अवषि-मनः पर्यय केवलशानोंके ही (एव) । प्रमानस्व-स्पापन अर्थम् ॥ आT म्पमाणताकीप्रसिदिके लिये करते है कि ॥ तत्प्रमाणे ॥१०॥ तत् ये ( मविज्ञान भूतान-अवधिान मनः पर्पमान और केवलनान ) प्रमाणे दो (परोस और प्रत्यक्ष ) प्रमाण है। उन मानांचेही प्रमाण संखा है। अर्थात् उपर्युक्त पांच मान ही दो प्रत्यक्ष बौर परोक्ष प्रमाण हैं । अन्य प्रकार नरे॥ पदच्छेद और विभक्त्यसहित इस सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद ॥ वत्-वचनम् । किमर्थम् सद पद (इस दशमें सूत्रम) किस लिये है १ ॥ प्रमाणान्तर-परिकल्पना-निवृश्चि-अपम् ।। - (इस स्त्रमें तद पद) दूसरे दूसरे प्रमाणोंकी अनेक कल्पनाओं के निपेष करनेके लिये है समिकः । प्रमाणम् ॥ इन्द्रियम् वा प्रमाणम् ॥ = समिकर्प प्रमाण ( अर्यात इन्द्रिय और पदार्थाका संप घ) और इन्द्रिय प्रमाण इति केचित् कसयन्ति T = ऐसे किटक ( मवषारी) पसना करत । .

पटाविासी जगस्पसहाय यफीलकृत पदरछेद और पिमफ्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सप्दशः इदी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र ९ प्रत्यक्षात्परोक्षं पूर्वमुक्न सुगमत्वात् । श्रुतपरिचितानुभूता हि मातिश्रुतपद्धतिः सर्वेण प्राणिगणेन प्राय प्राप्यते यत ॥ एवमेतत्पञ्चविध ज्ञानम् ॥ तद्भवादयश्च पुरस्ताद्वक्ष्यन्ते ॥ प्रमाणनयैरपिगम इत्युक्तम् । प्रमाणं च केपाश्चित् ज्ञानमभितम् । पाञ्चित् सन्निप । प्रत्यक्षात । परोषम् ॥ -प्रत्पक्ष (अवधि मनापर्यप केवलमानों) से फरोध (मति-मुन्धान) स्पष्ट पा सुगमने (के हेतु) से (इस नमें सूत्रमें) प्रथम करेगये। गुगमत्वात् । पूयम् उक्तम् ॥ यस भन-परिनिता-अनुप्ता | हिक =क्योंफि ( यत) धुस्करि बानागपा (परिचिता) और अनुमफिमागया ही। मनि-भूतपदति सर्वेण : प्राणि-गपेन । प्रायस् =मतिज्ञान और मृतवानका मार्ग (= पद्धति) सबजीवोंके समूहद्वारा बधा प्राप्त -प्राप्त किया जाता है। भावार्य मवि-मसन्धान परिषम किये जाते हैं, अनुमयमें आते हैं इसकी पद्धति सुनी जाती है समस्त प्राणियोंकि पाल्पपनेकरि या पटुतायतकरि पायेजावे हैं और (मविधान-अमान) सुगम है अतः ये दोनों परोक्षनान चीन प्रस्पक्ष शानोंसे पहिले कहे। यम् एतत् ।। पच विधम् ।। मानम् ॥ च क्लू - इस प्रकार यह पांच मांति मान है । और उस (=सद्-शान) के भेद आइप' । पुरस्तात्याय व T - मेद आदिक यागे कह जायंगे । -(सम्पन्दर्षन मान चारित्र और जीव अभीवादि साव तत्वों का) प्रमाण-नयोंसे -मान होता ऐसा (सय ६ में) कयागया है प्रमाणम् 'In मरेपाम्बित्मानम् ; अमिमतम् ॥ =और(=च) फिकारि प्रमाण मान माना गया है (अभिमनम्) पाणिमामिहर्ष - किसक (प्रमाण) सन्निकर्ष (मानागया है) अर्थात् कितेक मताचार्य विपय और इन्द्रियका सम्बध का व्यापार में प्रमाण मानते हैं भुतपरपितानभूता = धुतेन पारपिता मा बानुम्ता प-भुस्न परिचिता सा प अनुभुताच पुतम परिभिः ॥ सा ॥ पक्षमनुभूताकि सातकरि जानाशाय ,मोर ममुमप दिसामा सो पतपपिपितामूत। (२) सौगतानाम सगा पुरेपके मानने वालोंके (0ोगमार-योगमकवार प्रमाणन अधिगम ॥ इतिउक्तम् ॥

SMACHAR पटानिवासी मगरूपसबाप कीमत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाठ । अध्याय १ सूत्र १ पाञ्चिदिन्द्रियमिति । अतोऽपिकृतानामेव मत्यादीना प्रमाणत्वस्यापनार्थमाह- ॥ तत्प्रमाणे ॥१०॥ तद्वचनं किमर्य? प्रमाणान्तरपरिकल्पनानिवृत्यर्थम् । सन्निवर्ष प्रमाणामिन्द्रिय प्रमाणमिति केचित्कल्पयान्ति केपाञ्चित इन्द्रियम् ॥ इवि० केवेक इन्द्रिय ऐसे ( प्रमाण माना गया ) है-इस सपका मावार्य है कि मुगत (पुददेव ) के माननेवाले मानको प्रमाण मानते हैं और योग मत वाले इन्द्रिय और पदार्यका बोदरूप सनिकर्मको प्रमाण मानते हैं और सांस्य मत वाले इन्द्रियोंको प्रमाण मानते हैं। इत्यादि मानके संपन्धमें भिन्न मिम मतावलम्बियोंकी मिम मिम अनेक कल्पनायें है अव अविस्वानाम् । इस हतुसे (=अव:) अधिकार फियेगये वा पकरणमें लायेगये मति-आदीनाम् :: एप मवि-भत भवधि मनः पर्यय केवलझानोंके ही (एव) प्रमाणत्व-स्पापन अर्थम् ॥ जाह T पमाणताकीप्रसिदिके लिये करते है कि ॥ तत्प्रमाणे ॥१०॥ सद ये ( मतिज्ञान भूतान-अवधिमान मन पर्यवहान और फेवलमान ) म्दो ( परोम और प्रस्पष) प्रमाण हैं। उन मानांको ही प्रमाण सना अर्थात् उपर्युक्त पाच मान ही दो प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाण । पन्य प्रकार न पदच्छेद और विभक्त्यसहित इस सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद ॥ सद-वचनम् , किमर्थम् । स्तन पद (इस दशमें सूत्र ) किस लिये है १ ॥ प्रमाणान्तर-परिकल्पना-निपत्ति-अर्थम् = (इस सूत्रमें व् पद) दूसर दूसरे प्रमाणोंकी अनेक कल्पनाओंके निषेध करनेके लिये है समिकी । प्रमानम् ॥ इन्द्रियम् ॥ प्रमाणम् ॥ = समिकर्ष प्रमाण ( अर्थात् इन्द्रिय और पदार्थोंका संपन्ध ) और इन्द्रिय प्रमाण इति केपित्त्पयन्ति T = एसे किसक ( मतधारी) हल्पनाम प्रमाणे ।

गनिगागी जगपगहाय कीस कन पदपछेद और विमत्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय । यत्र १० तनित्यथै तरित्युच्यते । तदेव मत्यादि प्रमाणं नान्यदिति ॥ अय सन्निर्पप्रमाणे सति इन्द्रिये वा को दोप ? यदि सन्निकर्ष प्रमाण, सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टानामर्यानामग्रहणप्रसंग । नहि ते इन्द्रियैः सनिकृष्यन्ते अत सर्वज्ञत्वाभाव स्यात् ॥ इन्द्रियमपि यदि प्रमाण, स एव दोप । अल्पविपयत्वात् चक्षुरादीना । ज्ञेयस्य चाररिमाणत्वात् । मोन्द्रियसन्निकर्पामावश्च चक्षुर्मनसो प्राप्यकारित्वाभावात् । मा निपूमि अयम् ॥ वदतिक - उन (सन्निकर्प प्रमाण और इन्द्रिप प्रमाणादि) के निपेष के लिये छह ऐसा शब्द उच्पस In एष मति आदि ॥ प्रमाणम् ॥ = कहागया है। वोही (- एव) मतिकान आदिक कान प्रमाण है। नयति अपसमिकर्ष प्रमाण : सति .in - दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। अथ (- अप) समिकर्ष के प्रमाण होने पर गान्दिये Bn का | दोपा । यदि समिर्प । = अथवा इन्द्रिय (पूमाप) मानने में क्या दूपण है । जो ( यदि) सनिर्म एमाणम् ' ग्राम -प्रमाण हो तो सूक्ष्मपदार्य (परमाणु आदिक) निका व्यवाहिन- =अन्तरित वा पहिसे (उयपरिस) पदार्थ (राम-रावणादिकों फा) विकानाम् ।। अर्थानाम् । - दूरवी पदार्थ (मेरु-पर्वतादिक) निके (सन्निकर्मको पूमाग माननेमें) अग्रहण-पूसरः । =ग्रहण का अक्सर नहीं आता है। क्योंकि म । इन्द्रिय In नदिक पे (पक्ष्म पदार्थ अन्तरितपदार्य-उपती पदार्प) इन्द्रियों द्वारा नहीं ममिछप्पन T अत सर्वसत्य-अमावः । सात T =सन्निकर्म वा स्पर्श किये बासकते हैं । इसलिये सर्वपना का अमाव होगा (क्योंकि सन्निकर्ष जप पूमाण होगा, पही पूमानसर्वस मानना पढेगा, सन्निकर्म सक्ष्म । अन्तरित-धरीक्ती पदापों को जानता नहीं आता सर्वशमी न जान सकेगा अत' असर्पकस्य हुआ) । इन्द्रिपम् अपि पूमाणम् ॥ -इन्द्रिय प्रमाण होतो मी (पही असर्वलताका पण आता है) पभु आदीनो । यस विषयत्वात् ॥ च श्रेयस्स -क्योंकि नेत्र आदिका पोड़ा विपर होने (क हेत) से प-नके प्राण करने योग्य पदार्पोका अपरिमाणत्वात् प स एव दोपः ।। अपरिमित होनेसे (वा अनन्त होनेसे) वो (-स) एव (ही) दोप (असर्वतका) आता है (अमर्वतताका दोष होनेके अतिरिक्त मामात मी कि) पाप मनसो ॥ पाप्यकारित्व अमावात् ।। क्षेत्र मनके पदायाँको प्राप्त होनेके अमावसे(वस्तुओं के साप मिदन न होनेपरमीग्राम) सन्द्रिय-मत्तिकमा -गमन (A) मत मनिपी.

एटा निवासी जगरूपसमाप कीसहत पदम्छेद गौर विमस्पर्व सहित सार्यसिद्रिका अदा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र १० अप्राप्यकारित्व च उत्तरत्र वक्ष्यते ॥ यदि ज्ञान प्रमाण, फलाभाव । अधिगमो हि फलमिष्टं न भावान्तरम् । स चेत्रमाणे, न तस्यान्यसल भवितुमर्हति । फलवता च प्रमाणेन भवितव्यम् ॥ सारांश-इन्द्रियको प्रमाण माने सो (१) इंद्रियोंका पिप भल्स और परिमित है। मेम पदार्य अनंत धौर अपरमित हैं अतः असर्पक्षता दोप जाता है (२) समिकर्मको प्रमाण मानें तो अंतरित-रामभरती पदार्पोका इन्द्रिपद्वारा समिकर्प न होनेसे असर्वत्रता दोप आता है (३) नेत्र बोर मन (पदार्थके साथ) मिदन न होने से नेत्र और मनके साथ समिकर्म नहीं बनता ॥ अप्राप्पकारित्वं =और नेत्र तथा मनको) अप्राप्पकारित्व (वस्तुओंके साथ मिदन न होनेमें मी ग्राम) उपरक पत्य =आगे (उमीषा सूत्र न पारनिन्द्रियाम्याम्" में) कहा बापगा यदि मान :॥ प्रमाण फल-अमावः । हि० (प्रभ) जो मान प्रमाण होगा वो फलका अस्तित्व नहीं होगा क्योंकि -हि) अधिगमः । फलम् ॥र्ट । न. =मान पा अधिगम ही प्रमापका फल है नकि मावान्तरम् ॥ स: । चेत्, पूमार्ण ॥ =अन्पपस्तु मारान्तर (पोछित फल) है यदि (=षेत्) अधिगम (-सा) प्रमाण होवो सस्य । अन्यत्र फलम् ॥ मवितुम्न आंति T =तिस (अधिगम) का दूसरा फल होनेको ( =भक्तिम् ) समर्थ नहीं है फलमता :॥ च. प्रमाणन ॥ मविष्यम् =(अधिगमका अन्पफल नहीं हो सका है) और पूमाण फलसहित होना चाहिये (१) न घर निन्द्रियाम्पामिति सन म्यामानापमरे । -(पनमस्प अपमा) न चाम् मनिन्द्रिपाम्याम् ति सूत्र-म्पान्यान-मपसरे (पम्मानस्प। मवम1) पक्षस्- -(ममाटरूप शम्दादिक पदार्पोका अपारस शाल) मेन और भनिद्रियाम्पाम् न. -मनसे नहीं होता है। इमलिये उनका हा मावाय पारणास्प बान भी नहीं हो सका। फ्योंकि जिस पदार्थ का मपमा नहीं होता है उसके हावि मी नहीं होते है मम्प (पार स्पर्शन रसाप्राण भात्र) इन्द्रियों से म्यंजन (अप्रगररूप पस्सुमों ) का केवळ मात्र अवमहाप पान ही होता है। हा भावाय पारपनहीं होता है। पति पत्र-रामपान-भपसरे नास प्रमर (उपर्यु) सूत्रके मपमर पर " अमाप परिवे कहा।

प्रगनिवामी जगरपगहाय यकील कस पदच्छेद और विमस्य सहित सर्वार्थ सिद्धिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सत्र १० तनिवत्यर्थं तदित्युच्यते । तदेव मत्यादि प्रमाण नान्यदिति ॥ अथ सन्निकर्पप्रमाणे सति इन्द्रिये वा को टोपः १ यदि सन्निकर्ष प्रमाण, सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टानामानामग्रहणप्रसंग । नहि ते इन्द्रियैः सन्निकृष्यन्ते। अतःसर्वज्ञत्वाभाव स्यात् ॥ इन्द्रियमपि यदि प्रमाण, स एव दोप । अल्पविषयत्वात् चक्षुरादीना । यस्य चारिमाणत्वात् । सन्द्रियसन्निकर्पाभावश्च चक्षुर्मनसो प्राप्यकारित्वाभावात् । ना निमि-अधम् । नातिक - उन (मन्निकर्प प्रमाण और इन्द्रिय प्रमामादि) के निपेध के लिये तद् ऐसा शब्द उच्यते - नर : एव मति आदि ॥ प्रमाणम् ॥ = कहागया है। वोही (-एव) मतिमान आदिक मान प्रमाण है। नवषयकइति अपसमिर्प पूमाष सति दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। अप (- अय) समिकर्ष के पूमाण होने पर पागन्द्रिये ॥ का । डोप : यदि समिकर्म = अथवा इन्द्रिय (पूमाण) मानने में क्या वूपण है ! जो (=पदि) समिकर्म प्रमाणम् । राम- -प्रमाण हो तो सूक्ष्मपदार्थ (परमाणु आदिक) निका प्पवहिन =अन्तरित वा पहिले (पहित) पदार्थ (राम-रायमादिकों का) विशनाम् । अयानाम् । - दूरवर्ती पदार्थ (मेरु पर्वतादिक) निके (सभिकर्पको पूमाण माननेमें) अप्राण-पून ग्रहण का अवसर नहीं पाता है। क्योंकि इन्दिप नदिक व्ये (पक्ष्म पदार्य-अन्तरितपदार्यभरपती पदार्थ) इन्द्रियों द्वारा नहीं ममिठप्पन T अत सर्वस्व प्रमाव ।। स्यात् T =सन्निकर्ष वा स्पर्म किये जासकते हैं। इसलिये सर्पमफ्ना का अभाव होगा (स्पोंकि सन्निकर्ष बब पूमाण होगा, वही पूमाण सर्व मानना पढ़ेगा, सन्निकर्म सक्ष्म अन्तरित-दुरीवर्ती पदार्थों को बानता नहीं आता सर्वसमी न जान सकेगा अतः यसर्फत्व हुमा) इन्द्रिपम् अपि पूमाणम् - इन्द्रिय पूमाण होतो मी (पही असर्वत्रताका वूपण आता है) पशु-पादीनां ।। अन्प-विपयत्वात् ।। च यस्म ॥=क्योंकि नेय आदिका थोड़ा विषय होने (क इनोसे गनके प्ररण करने योग्य पदायाँका मपरिमापत्ता HD स एवब्दोप ॥ अपरिमित होनेसे (वा अनन्त होनेसे) वो (-स) एव (घी) दोप (असर्वतका) आता है (अमर्वाताका दोप होनेके अतिरिक्त यह बात मी कि) पहुए मनसो , ॥ पाण्यकारित्व प्रभावात् । भत्र मनफे पयायोको प्राप्त होनेके अमावसे(बस्तुओं के साथ मिदन न होनफ्रमी प्रान) मनहन्द्रिय-मन्निया-घभावः । पर =समस्त (1) पत्रियों में पदासे पर्पन पा सन्निर्स मी (-) नहीं है।

- एटानिवासी जगरूपसदार वकीकृत पदच्छे और विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिविका सम्दानः दिदीवनुवाद अध्याय १ र १० आत्मनश्वतनत्वात्तत्रैव समवाय इति चेन्न । झस्वभावाभावे सर्वेषामचेतनत्वात् । ज्ञस्वभावाभ्युपगमे वा आत्मन । स्वमतविरोध: स्यात् ।। (ऊपर यह सिदकिया है कि मिर्पको पूमाण माननेमें मन्य सचेतन पदार्य के मी अर्थ का मान आता है इसके पूत्युचरमें अन्यवादी कहता है कि) आत्मनः । पेतनत्वात् ॥ ० एव. समयापः । मात्माको चेतन होनेसे महो (भास्माम) ही (धानका) नित्यसम्बन्ध (समवाय) है (अन्य बड़ पदार्य के पस्तुका पान नहीं होता है) इविक्षपेत् न. ऐसी मुक्ति पेने पर (=पेत्) (उत्तरमें करते हैं कि यह मुम्हारी युक्ति ठीक) नहीं म-स्वभाष-अमावे: सर्वेषाम् ।। क्योंकि (मात्माके) मानस्वरूपताका अमाव होने में सम (मात्मा और अन्य पदार्थों) को : अनेतनत्वात् ॥ वा आत्मना ।स्वमाक् अदता (समानरूपसे आजादी) है। और (या) मात्माके शानस्वरूपस्व अभ्युपगमे । स्त्र मानने पर माप के (अर्थात् नैयायिकोंके) मतविरधा । स्यात् T =सिद्धान्तका (कि गुण गुणीसे मिम है) विरोध हो जावेगा। (१) नेयायिक मोगपते है लिगमा चेतन होनेसे उसमें शाम निस्प संबप वा समवाप रहवा इसलिये यास्माके अतिरिका पदार्थ मान मसंग नहीं आम परंतु पह कथन उनका ठीक नहीं है क्योंकि उनके सियास्त (मत)में बिसी पदार्थको स्वयं कामरूपता नहीं मानी पेसी : अवस्था मर्व पदार्थ मचेवम ही ठहरते हैं तब मामाही शान समपाय किस प्रकार कहा मा मजहै। पदि मेपापिक योग मारमाको पानस्परप मानेंगे तो सर्प सनके सिवान्त का (कि गुम मर गुपीसे मिष यते हैं ) शापात (नाश) हो जावेगा। क्योंकि मारमाको पहापर मनमे सर्य मान गुणसे अभिन्न अङ्गीकार कर लिया है। योग-सांस्य मर्याद मांश्यमत्वाछे । पौग-मैयायिक (मतगाठे)।

परम् । अर्थान्तर पटा निवासी जगरूपसंहाप यकीलाच पद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शवना हिंदी अनुवाद । अध्याय १९ सनिक इन्द्रिये वा प्रमाणे सति, अधिगम' फलमर्थान्तरभूत युज्यते इति तदयुक्तम् ।। यदि सन्निकर्प प्रमाण, अर्थाधिगम पलं, तस्य द्विष्टत्वात्तकलेनाधिगमेनापि द्विष्ठेन भवितव्यमिति अर्यादीनामप्यधिगम प्रायोति । भावार्थ यदि शानको प्रमाण मानोगे तो उस पूमाणका कुछ फल नहीं होगा क्योंकि यदि अधिगम फल कहोगे सो मान पूमाण-अधिगम सब एफार्थवाची होनेसे कुछ फल पा लाम नहीं है और पूमाणका फल अवश्य होना ही चाहिये सनिक । इन्द्रिये ॥ 4 प्रमाने, सति अधिगमः , समिकर्ष वा इन्द्रिय के प्रमाण होते सते अर्थका ज्ञान-वस्तु का मान =(-अधिगम) (उस प्रमाण का फल है । बो (फल) पदार्य या द्रव्यसे भिमरूप (अर्थान्तर) भूतम् ॥ पुत्पत T इति तत् ॥ अयुक्तम् । हुआ (=मृतम्) ऐसा युक्त उचिव वा ठीक है । वो युक्त नहीं है। यदि० ममिकः । प्रमाणम् ॥ अर्प-अधिगमः ।। =क्योंकि वो समिकप प्रमाण हो (और) पदार्थ का ज्ञान (-अधिगम)- फलम् ॥ वस्प। (उस सम्भिकर्ष का या ऐसे पूमाण फा) फल हो तो उस (सन्निकर्प) के विष्ठपना से अर्थात् इन्द्रिय और स्पर्शे हुये पदार्प दोनों में तिटने से नन-फसन ॥ अधिगमन : अपिल -उस (सन्निकर्ष) का फल पदार्थ का मान मी शिष्टन : मक्तिव्यम् । -पूमाता और पुमेप ( पदार्थ) दोनों को होना चाहिये (अर्थात सन्निकर्म शिष्ठ होने के कारण पूमेय को मी पदार्थ का छान होना चाहिये) की. अपांदीनाम् । अपि अधिगमः -ऐसे पदार्थ आदिकों को भी (चो अचेतन है) मधिगम वा वस्तु का मान प्राप्त होता है। भावार्थ यह है कि सन्निकर्ष से पदार्थ का मान होता है और सन्निर्स इन्द्रिय और पदार्थ के बोड़ रूप है । तब उकपदार्य का मान इस इन्द्रिय मौर पदार्थफे जोहरूपसे हुआ, इस पूकार सन्निकर्ष वाले पदार्थ को मी अन्य पदार्थ का ज्ञान होना, यह दोपरूम है क्योंकि जड़ रूम पदार्य को दूसरे पदार्थ का धान मानना दोषरूप है मता सन्निर्म पूमाण नहीं हो सका। ठिम्लात् I ARCH पामोनि ।

-- एटानिवासी जगरूपसहाय पकीस्कृत पदच्छेद गौर विमस्पर्य सहित सार्थसिदिका सम्दशः हिंदीअनुवाद अमाप १ सन १० आत्मनश्यतेनत्वात्तत्रैव समवाय इति चेन्न । अस्वभावाभावे सर्वेषामचेतनत्वात् । ज्ञस्वभावाभ्युपगमे वा आत्मन । स्वमतविरोधः स्यात् ॥ (उपर यह सिद्धफिमा है कि पम्भिकर्मको पूमाण माननेमें मन्य अचेतन पदार्म के मी अर्थ का पान आता है इसके प्रत्युत्तरमें अन्पपादी करता है कि) भारमनः। चेतनत्वात् । स एव. समषाया। = पास्माको चेक्न होनेसे यहां (पारमा) ही (मानका) नित्पसंम्बन्ध (-समवाय) (अन्य मद पदार्थ के पस्तुका धान नहीं होता है) इति चेत्, न. =ऐसी युक्ति देने पर (-चेत् ) (उचरमै कहते हैं कि यह तुमारी युक्ति ठीक) नहीं -स्वभाव-ममावे : सर्वेपाम् ।। क्योंकि (वात्माके) मानस्वस्पताफा अमाव होने में सम (भास्मा और अन्य पदार्थो) को अचेक्मत्वात् पाल आत्मनः स्वमाक -प्रदता (समानरूपसे आवावी) है । और (बा) मात्माके मानस्वरूपस्व अम्युपगमे । स- मानने पर भाप के (अर्थात् नैयायिकोंके) मतविरघा । स्मात् T -सिद्धान्तका (कि गुण गुपीसे मिम है) विरोध हो जायगा । (नैयायिक योग करते है विमामा चेतम होनेसे उसमें बानपा निस्प संबंध पा समवाप हवाइमलिये मात्माके मतिरिकमा पदार्यक माना मसंग नहीं बामण परंतु पद पन उनका रकमही है क्योंकि उनके सिमान्त (मत)में किसी पदार्थको स्वयं मानरूपता नहीं मानी है ऐसी अपस्था मर्व पदार्थ मधेतन ही डरते हैं व मामाही भाग समपाय किस प्रकार कहा या मण। पति नेपायिक योग आरमाको शानस्पस्स मामेंगे तो स्वयं समके सिदाम्त का (किगुण मौष गुमीसे मित्र यते) व्यापात (नाश) हो जायेगा। क्योंकि मारमाको पहापर सम्होंने स्वयं बाम गुणसे अभिन्न अङ्गीकार कर लिया है। पोग-मरण मर्याद साम्पमतमा । योग-मैयापिक (मला)।

FFECE एटानिवासी जगरूपसदाय पकीलकृत पदमोद और पिमक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्रिका प्रदशः हिंदी अनुवाद विध्याय ११० ननु, चोक, ज्ञाने प्रमाणे सति फलाभाव इति । नेप दोप० । अर्थापिगमे प्रीतिदर्शनात् । ज्ञस्वभावस्थात्मनः कमलीमसस्य करणालम्वनादानिश्चये प्रीतिरुपजायते । सा फलामत्युच्यते । उपेक्षा अज्ञाननाशो वा फरम् ।। रागद्वेपयोरप्रणिधानमुपेक्षा । अन्धकारकल्पाज्ञानाभाव अज्ञाननाशो वा फलमित्युच्यते॥ प्रमिगोति प्रमीयतेऽनेन =पुनः प्रभ कहा जाचुफा है कि (अर्थात शकाकार कहता है कि मैं कह चुकाईकि) ननु.न. उत्कम् 1 पान : प्रमाण सति ॥ फल-अमावासाइवि. जानको प्रमाण होने पर फलका अमाव होगा अर्थात सकाकार करता है कि मैं पहले कर चुका है कि शान को प्रमाण मानने में उसका कुछ भी फल न होगा (उचर) एप दोप नपर्ध-अधिगम प्रीति-दर्शनात् ।। यह दूषण नहीं है क्योंकि पदार्थ के शानमें प्रीति उपजती है। (अर्थात्) पदार्थ का यथार्ष शान होने पर आनन्द(=प्रीति)और सन्तोप(=प्रीति)होता है या आनन्द, संतोपही फल है। सम्पमायस्प । फममलीममस्य । आत्मनः । करण--झान स्वमायवाले कर्मकरि मलीन चेतनके इन्द्रियों के मालमनान् । जरिये प्रीति ॥उपनायवे T =अक्लम्पन या माथयसे वस्तुके शानमें प्रीति उपजती है। मा ॥ फल्पम् ॥ तिउच्यत T | उपेक्षा । =सो (पह प्रीति उस प्रमाणका) फल है ऐसा कहा गया है । मध्यस्थ भाव (उपेक्षा) अभाननासावा =और (-वा) अज्ञानका लोप, अनान का नाश (उस प्रमाणका क्रमसे दूसरा तीसरा) फलम् ।। फल वा परिणाम है । (उपक्षा और अमाननाशका विवरण नीचेकी पंक्तियों में ऐसेहै) राग-रेपयो । अप्रणिधानम् उपेक्षा ॥ गरेप में प्रयास रहित मध्यस्व स्वभावका वा उदासीन होना सो उपेक्षा है। पगार-कसा ॥ अन्धकार की प्रलय (-कल्या अर्थात् मन्नानका मिलाना) अहानका न होना मान-अमाव' यमान नामावा अमानका यस, अवानका मिटबाना पा अमानकी भूपता फलम् । इतिठस्मता -(प्रमाण का तीसरा) फल ऐसे कहागया है सारांश इस सस्का यह है फिप्रीति-उपेक्षा अमानका नाश ये तीन प्रमाण के फल है। -(पदार्थ का) सखा शान करता है सो प्रमाण है (कर्तरि प्रयोग का फर्जु साधन है) -निससे सवाहान (वस्तुओं का) किया जाता है सो प्रमाग है। (पहा पर कर्ममि पूयोग मा करण साफ्न इमा) . Rasa भमिगोति T प्रमाणम् । पूमीप अनेन । प्रमाण , किम् ॥ पटानिवासी जगरूपसहाप बफीलकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अन्याय १ सूत्र १० प्रमितिमात्र वा प्रमाणम् ॥ किमनेन प्रमीयते ? जीवादिरर्थ ॥ यदि जीवादरधिगमे प्रमाण, प्रमाणाधिगमे अन्यत्प्रमाण परिकल्पायतव्यम् । तथा सत्यनवस्था । नानवस्था । प्रदीपवत् ॥ यथा घटादीना प्रकाशने प्रदीपो हेतु , तत्स्वरूपप्रकाशनेऽपि स एव, न प्रकाशान्तरमस्य मृग्य, तथा प्रमाणमपीति अवश्यं चेतदभ्युपगन्तव्यम् । प्रमेयवत्ममाणस्य प्रमाणान्तरपरिकल्पनाया स्वाधिगमाभावात् स्मृत्यभावः । पाक मितिमात्रम् ॥ पूमानम् ॥ - अथवा (पदार्थका) सभा मान मात्र ही पूभाग है (यहाँ मायेपूयोग वा भाषसाधन या क्रिया साधन हुआ) अनेन ॥ पूमीयते T बीव-आदि। अप। इस (पूमाग) करिक्या मान कराया जाता है । (उचर) बीवादि पदार्थ (जाने जाते हैं) यदि, जीव-आदे। अधिगम प्रमाणम् ॥ प्रमाण- -यदि जीवादिफ (फ्दार्थ) के मान (कराने) में प्रमाण (हेत) है तो पूमागके मधिगमः। अन्यतः॥ पूमानम्॥ परिकल्स मितव्यमा बान (फराने) में मिम पूमाण कल्पना करना चाहिये सथा. सविः अनवस्था। -तिस पूकार(=वधा) होने पर अवस्थाका अभाव होगा(अर्थात् अनवस्थादोष आवेगा) नक्ष अनवम्बा -(अक्या पूर्वोक्त तर्कका अन्त न होगा) (उत्तर) अनवस्था (दोप) न होगा द्रीपक्व, पपा घट प्रादीनाम्।। -(क्योंकि) दीपक (के प्रकाप्स) के समान (अवस्था) है (अर्यात) जैसे घटादिकके प्रकासने । दीपः । इतुः । स्तु-स्वरूपकाचने १ =पुकान करने में दीफ (= प्रदीप) कारण है उस (दीपक) के रूप पूकाशने में अपि साता एवम् अस्य ।। =मी यह (दीपक) ही (कारण) है । इस (दीपक) के (अस्य) (प्रकाशके लिये) पूकाठान्तरम् ।। नमुम्पम् ॥ अन्य प्रकास (=प्रकाशान्तर) नहीं अपेपण किया जाता है (न मम्यम्) प. तथा एतत् ॥ प्रमाणम् ॥ अपि मपश्यम् {11 =और (-घ) येसेही (=पया) यह ( = एतद् ) प्रमाण मी अवश्य अभ्युपगन्तव्यम् ॥ इति प्रमेय = (स्व परस्वरुपका प्रकाशक) मानना योग्य है । यदि प्रमय(=सामान्य विशेषात्मकवस्तु) बतक पूमापस्प प्रमाणान्तर-परिकल्पनापामा -सम प्रमाण को अन्य प्रमाणकी (-प्रमाणान्तर) कल्पना करने पर स अधिगम अमावात् । स्मृति-अमाषमा -(प्रमाण) अपना (स्यरूपके) जानने के अमावसे स्मरणका अमाप पोजायेगा॥३३५ पगनियागी जगम्पसहाय वकीलकृवपदच्छेद और विपत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दशः हिंदी अनुवाद ॥ अध्याय १ सूत्र १० तदभावाद यवहाररोप स्यात् ।। वक्ष्यमाणभेदापेक्षया द्विवचननिर्देश । वक्ष्यते हि "आयेपरोक्षं प्रत्यक्षमन्य दिति म व द्विवचननिर्देश प्रमाणान्तरसख्यानिवग्यर्थः ॥ ८ तर अमावात् ।। म्यपहारलोप - उस (स्मृति) की शून्पवासे व्यवहार पा लोक की प्रवृधि वा लोकाचारका अमा = होगा (अता प्रमाणको मपना प्रकाशक और अन्यका प्रकाशक मानना मोम्यो, स्पान T पक्ष्पमाण-मेद अपेक्षया : हि-पान = आगे कहेबाने पाले (प्रमाणके) मेदोंकी विवधासे ("पूमामे" ऐसा) दो षचनका निर्देशः । दि० वापत T = उधारम वा उपदेश है । क्योंकि (-दि) (अग्रिममत्र दस म्पारदर्षे) कहेंगे माघ : परोधम ॥ अन्पत् ॥ इति =कि परिसे दो - आये-(मतिमान मुतझान) परोष (प्रमाण) है। अन्यथा पचे पूम्परम् in -प्रत्यक्ष प्रमाण (रीन अवधिमान मना पर्यमझान-फेवलमान) है। स1 १० दियचन और (=च) यो (पुमाणे शष्दका नवमें सत्रमें पूयमा विमक्ति) दो पचनमें निर्देश पूमाणान्तर =उपदेश था उधारण मानकी मिन्न (मिन्न) (-प्रमाणान्तर) मम्या- गगना (एक-दो तीन-चार-प आदि अन्य मतावलम्बियों स्वीकत प्रमाणोंक) =निपधके लिये भी है अर्थात् इस नपमें एनमें " प्रमाणे" पम्द दोक्षनमें (१) दशास्त्र माघे परोक्षम् थापे (शब्द यो दो वचनमें है उस) के लिये है (२)अन्यवादियोंकि कल्पेहुये वा मानेडु एकदो तीन, चार, माइत्पादिक पूमापों की संख्याके निराकरण के लिये है (१) माहिती एमपस प्रमाण ही माने है। परि पौर मौर वैशेषिक प्रयास मनुमान ये दोप प्रमाण मान है साम्य प्रपसा अनुमान, भागम तीन मानते है गरि नेपापि प्रत्यास, अनुमान, मागम, उपम्पन पेस पारि प्रमाण मान है। बारिमीमांसक चारि वोए मर मर्यापत्ति ममाप, ऐसे- प्रमाप माने है। सा प्राण परान ए दोप संबन पाने प्रमाण इनिमें गर्मित होय, पासपर्यती पनि मुषित पष्ठ १५८ निमि-धी -SEREG.Sek एरा निवासी जगरूपसहाय पीतात पदच्छेद और विमपर्य सहित सर्वार्थसिट्रिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ स १० उपमानार्थापत्यादीनामवान्तर्भावादुक्तस्य पञ्चविधस्य ज्ञानस्य प्रमाणद्वयान्तःपातित्वे प्रतिपादिते प्रत्य क्षानुमानादिप्रमाणद्वयफ्ल्पनानिवृत्यर्थमाह- उपमान-अर्यापति- क्योंकि उपमान (-साश्पज्ञान) अपिचि अर्थात् न करे गये अर्थको समझना (पैसे घेवच जीता है पर परमें नहीं, तो समस सक्त हैं पाहर अवश्य है) आदीनाम् ।। अत्र एवं बन्दरमावात् । म्यादिका यहाँ (अर्थात सप्रमाणे-आपेपरोध पुत्पथमन्यतमे) ही गर्मित हैं उक्तस्प I पञ्च विषस्य । वानस्य । पूमाणदम =कहे हुए पाप पुकारके मानका पूमाणमें र अन्नपानिये प्रतिपादित व पूस्पष-अनुमानादि गर्मित (-अन्त पातित्ये) करनेमें (= पूतिपादिते) पुत्पक्ष और अनुमानादि माणश्य-कल्पना-निवृत्ति अर्थम् ।। = (अन्प पुकारके) दो पूमाणोंकी कल्पनाके निपेषके लिये परवर पानुमान व शाम घोपमया सह । मर्यापत्तिरमावश्च प प्रमाणानि अमिन । मिने। प प्रमाणानि स्वारिम्यायपादिन । मारपस्प त्रीणि पापानि व पशपिक बोप्पा ॥२॥ इत्पप्यपिका पाठ वापपुस्तके वर्तते । (प प्रत्यसम्॥प मनुमानम् प शादम् । च मापसममाण मौर (-1) अनुमानप्रमाण मोर (-प)मागम पा शाम्बप्रमाण मोर उपमग सामिपति॥ मउपमान प्रमान महित, (और) मर्मापत्ति प्रमाण (बहे गये मर्थ समझने वाला) पभमाया प्रमाणानि ॥ मैमिने 11 - मौर (1) ममाव प्रमाण ण प्रमाण जैमिनी मुनि (पूर्वमीमामा के सबक) के है जैमिना । पद -जैमिनीमुनि के यह ( प्रत्यक्ष अनुमान-मागम उपमाम अर्यापत्ति-अमाव) प्रमाणानि गत्यारिता -प्रमाण है। घार ( प्रापस मनुमाम मगम-उपमान ) प्रमाण रायगरिन । सविपस्प: म्यायवादी (गौतममुनि के म्पाय शासके मानने वाले) है। सांस्य अर्थात -(कपिलमुनि के पर्शनशासके मानने पालेके) तीन (प्रत्पस-मनुमान-मोगम) पायनि कहे है। दो (प्रत्यक्ष और अनुमान ) दो (प्रारत और अनुमान ) येशेविक-सपास पेशेषिक ( कणादमुनि के बनाये हुये शासफे मानने पाठे) के मोर पोर के है ।। इति अपिक मधिका;। पाठ ।। बसपपुस्तके । पर्तत - ऐसा भी अधिक पाठ तार पस के पृष्ठों की ( से बनी हुई) पुस्तक में गर्वता है।

जाक ॥ आये परोक्षम् ॥११॥ आदिशब्द प्राथम्य (प्रयम ) वचन ! आदो भवमाद्यम् ॥ क्यं द्वयो प्रथमत्वं । (अर्थात् पौद्ध और वैशेषिक प्रत्यक्ष तथा अनुमान ऐसे दो प्रमाण मानते हैं उनके निपेधार्य तथा अपने माने हुये दो प्रमाण समर्थन करने के लिये) आT 19 आद्य परोक्षम् ॥ ११ ॥ पापम् च बाघम् च आघे मतिमुते जाने परोक्षम् प्रमाणम् मक्ता जापम् ॥ ५. आयम् ॥ प. (पांच शानों में) आदि में खो हो सपा प्रारम्भ में ओ हों पे माप । मनि-मुख माने In =दो आदि घाले (-आये) अपवा पहिले दो (-आप) मतिमान भूतमान परोधम I पूमापन 1 मवत' T -परोध (इन्द्रिय मन तथा परका उपवेष प्रकाशनादि अन्प) प्रमाण हे मर्यात वह मसिान नेत्र आदि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय मन इनसे उत्तम होता है। परमात्मा से मिम निमित्त की अपेक्षा रखता है अतः परोध है और मति पूर्वक होनेसे क्या फ्रोपदेश मन्म होनेसे मतमान मी परोपदी है पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित इस सूत्र पर सर्वार्थ सिदि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद वारिसन्द | पापम्प-बचना । आदो (इस सूत्र में) आदिशब्द पहिलेका (-पापम्प) वाफक है। भारम्म में (-आदो) माम्,In आपम् In कयम् यो पृथमत्वम् म्हुआ है सो माध है। दोके वादिफ्ना (=पूषमस्प) कैसे है वर्भात मादि पुपम या परिला ये सम्द आरम्म को पूगट करते हैं और एकही वस्तुको (पहतों में से) पूधम पा पहिली पा सके हैं यहां आपे रो पपन में सारे वो दो पस्तुओं के पूथमफ्ना पैसे मासका है। साराध-पांच बान मनमै झमें कोई भाष नमी से भागपा ॥

० उपफर्मवे T एटानिवासी बर्गरूपमा कोतव पदच्छेद और निमत सहित सर्वार्थसिद्धिका दाना हिंदी अनुवाद । बन्याय १ सय ११, मुख्योपचारपरिकल्पनया । मतिज्ञानं तावन्मुख्यकल्पनया प्रथमम् । यतमपि तस्य प्रत्यासत्तया प्रथमभित्यु पचर्यते । द्विवचननिर्देशसामर्थ्यादगाणस्यापि ग्रहणम् । आद्यं च आद्य च आये मातियते इत्यर्थः । तदुभय मपि परोक्ष प्रमाणमित्यभिसम्बध्यते ॥ कुतोऽस्य परोक्षत्वं ! परायत्तत्वात् ॥ मुम्प-उपपार-परिकल्पनया ॥ = मुरूम उपमार या व्यवहारफे मानसेनेसे (दोनों के आदिपना कहा है क्योंकि) मसिनानम् ॥ वाक्त्वमुस्म्प-फरफ्नया ॥ पूषमम् = मतिवान तौ (=ताक्त) प्रधान माने जानेसे आदिमें व पूयम हो मतम् । मविस्म परमासरमा ।। प्रथमम् इति मतमान मी उस (मति मान) के अविनिम्ट होनेसे प्रथम ऐसा -मानलियागया है । उपचार फियागया है अर्थात उपचारसे प्रथम कहा। दि-वचन-निर्देश सामान्यात् गौणस्य अपि -दो षचनके निरूपण वा उचारणकी शक्तिसे अप्रधान (मतदान) का मी = ग्रहण है । (मत्रमें आधे पाक्यका समास यह है कि) पापम् । प, आपम् : प. आये =आदि में वो हो और (घ) आरम्म में जोहो सो दो आदिम थानेवाले (- आये) मवि-पुत ॥ इति० मर्मः •मविज्ञान मतवान है ऐमा मभिप्राय है। (आय ष आध प वाफ्यमें पदिला च संस्कतकी मोलचाल के लिये आया है। अतः इस च का अनुषाद नहीं हो सका) .in प्रमाणम् ॥ पे (मति-मत) दोनों ही परोक्ष ममाण है ऐसा सम्पन्ध कियागया है (जब सूत्र मतिमान परोक्ष मतमान परोक्ष च है) -(प्रश्न) इस मतिमान वा युतमान) के परोषपना स्योंकर (=ता) है अन्यके आधीनपना पा वशीभूसपना से (मति भुवानों के परोक्षपना है) ग्रहणम् ॥ पद-उमयम् 'm अपिपरोपम् इति ममिसमापसे T तामस्प ॥ परोसस्वम् ।। पर आचस्वात (१) पर का मत है कि समय का शिवधन नहीं होता है रितु पं. हरवत्त और पूरापाव स्वामी के मन में दो पचन होता है। (२) परमपेक्षयान् पिमर पर पेशवा की आवकता से) ऐसा मी मन्य वा मित्र पाठ है ASTHAN आद ॥ आये परोक्षम् ॥११॥ आदिशन्द प्राथम्य (प्रयम ) वचन । आदौ भवमाद्यम् ॥ क्थं द्वयो प्रथमत्वं ? (अर्थात् पौद और पैशेपिक प्रत्यक्ष क्या अनुमान ऐसे दो प्रमाण मानते हैं उनके निपेधार्य सथा अपने माने हुये दो पमाण समर्पन करने के लिये) आद करते हैं कि आये परोक्षम् ॥ ११ ॥ आपम् च आपम् च आघे मतिमुते पाने परोक्षम् प्रमाणम् भवता आघम् ॥ आपम् ॥ . (पांच धानों में) आदि में जोहो तथा प्रारम्म में मोहों पे माप । मति-भूत माने । =दो आदि वासे (-आधे) अथवा पहिले दो (-आप) मविज्ञान भुलान परोधम् ॥ पूमापन H॥ भवतः T -परोष (इन्द्रिय मन तया परका उपदेश फूकाशादि अन्प) प्रमाण है अर्थात पर मतिज्ञान नेत्र वादि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय मन इनसे उत्पन होता है। यह मात्मा से मिम निमिच की अपेषा रखता है मतः परोष है और मति पूर्वक होनेसे तथा परोपदेश बन्य होनेसे मतमान मी परोस ही है पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित इस सूत्र पर सर्वार्थसिदि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद भादिसप्दा । प्रायम्प-पचना । बादौ । - (इस स्त्र में) आदिपन्द पहिरोका (-पापम्प) वाक है। आरम्भ में (-बादौ) मयम्,In आपम् 'In कपम् इयो । पृथमत्वम्-हुआ है सो माध है । दोके आदिफ्ना (=पूपमत्व) से है अर्थात् बादि पुथम मा परिला ये शम्द आरम्म को पूगट करते हैं और एकही वस्तुको (बहुतों में से) पूषम वा पहिली कह सक्त है यहां बापे दो सपन में लाये है तो दो पस्तुभों के पूपमपना से मासका है। साराष्ट्र-पांचबान नसमें एक भाष सपन में मविज्ञान भासकारे मुवान मी से भागना ॥

एटानिवासी मगासहाय पदोलन परपोच और निमात्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अपना हवी अनुपदि । बप्पार १०१२ अभिहितलक्षणात्परोक्षादितरस्य सर्वस्य प्रत्यक्षतप्रतिपादनार्थमाह- ॥प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ मक्ष्णोति व्यामोति जानातीत्यक्ष आत्मा । तमेव प्राप्तक्षयोपशमं प्रक्षीणावरण वा प्रतिनियतं प्रत्यक्षम् ॥ अमिहिक्लपानात् ॥ परोक्षाव | इयरस्म ॥ कथित वा को हुये (=अमिहित) लसन सहित परोष (शान) से जन्म सर्पस्य । प्रत्यक्ष प्रतिपादन वर्षम् । माह T -सब (पान) के प्रवषफ्ना के काने लिये (भाषा) करते हैं कि प्रत्यक्षमन्यत् ।।१२॥ पदच्छेद और एत्राम:-अन्यत् ॥ (मविज्ञान और मतवान से) मिम अथवा अवशेष (= अन्यस्) प्रत्यक्षम् ।। (अधिमान मनः पर्ययमान और केपलपान) प्रत्यक्ष प्रमान है अर्थात् बास्मा के ही आयप से पिन (=पिना) मन और किसी इन्द्रिय की सहायता से उत्पम होते हैं । अतः ये तीनों शान अतीन्द्रिय है। उक्त तीनों मानों से अवधिज्ञान और मनः पर्यपशान में परिमित वस्तु विपन करने से विकल (-सीमापद) प्रत्यक्ष है और केवलपान समस्त द्रव्य व पर्यायको प्राण करने से साल ( सम्पर्ष) प्रत्यक्ष पुमान है। पदच्छेद और विभवत्पर्य सहित इस सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद ॥ अयोति T व्यामोति T जानाति T पापानता है या पोष करता है (अक्ष्योति) व्याप्त होता है जानता है । विश्य आत्मा । प्राप्त वयोपशम : या -ऐसा अव (वर्षात) माग्मा है या चेतन है । कर्मका श्योपयम माप्त वपना प्रतीक-वापरणम् । सम् । एक के बापरम के नाप प्राप्त क्सि (वारमा) के ही (-एव) भाभय से (बिना किसी अन्य की सहायता लिये हुये) उत्सम हो सो प्रत्यक्ष है वर्षात् कर्मके क्षयोपशम और षय के अनुसार विना किसी इन्द्रिय, मन, प्रकास, पर उपदेशादिफ की सहायता लिये हुये मात्मा के मामय से ही उत्पम ही मौर विशेष रूप से दावों को जाने पे प्रत्यक्ष (अवधि-मनः पर्पर केवस्थान) हैं। उनमें पविनिपतम् । प्रस्तषम् ॥ Aasat निक प्रगनियामी नगरपमहाय यकीलकृत पद है। और यमपत्यर्थ सहित सपिसिदिका सम्दशः दिदी भनुयाद । अध्याय १ मत्र ११ गनि ज्ञामिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तमिति वक्ष्यते श्रुतमनिन्द्रियस्पेति च । अतः परराणीन्द्रियाणि मनश्च प्रकाशोपरेशादि व वापनिमित्त प्रतीत्य तदावरणकर्मक्षयोपशमापेक्षस्यात्मन उत्पद्यमान मतिश्रत परोक्ष मित्यास्यायते । अत उपमानागमादीनामात्रैवान्तर्भाव ॥ मनिमानम् ॥ इन्द्रिय अनिन्द्रिप-निमित्तम् ॥ = मतिमान (पापमें पांच) इन्द्रिय (मौर) मन जन्य, निमिचक या कारणक है अर्थात मतिझान पांच इन्द्रिय मोर येत करण छ। पाम निमितोंसे उत्पन्न होता है इनिक पप्पत T पर भवम् ।। = ऐसा (तदिन्द्रियानिन्द्रिय निमिचम ! चौदहवां पूनमें ) कहेंगे । और मुन्सान अनिन्द्रिपस्प ॥ (अप) = मनका विषय वा अप है अर्थात मुतमान मनसे उत्पम होता है = ऐसा (दूसरे अध्यायके इकीसोपत्र "मुतमनिन्तिपस्य" में कहेंगे) अनपगणि इन्द्रियाणि 10 मनम् ॥ = इस हेतुसे (अव) पर जे पांचों) इन्द्रिय बौर (च) मन (अंताकरण) प. प्रकाश-उपदेशादि बारानिमिधम् । = और (=घ) प्रकाश उपशादिक वाहिरके कारणको पतीन्य - तद् भावरण-पम- = सहाय लेकर (-प्रतीत्य) उन (मतिज्ञान और प्रतज्ञान) के ढकने वाले कर्मके षयोपशम अपघस्प: आत्मन' । उत्पपमानम् ॥ = क्षयोपशम स्युक्त (अपेक्षस्म) बीवके उत्तम हुये मतिभ्नम् । परोक्षम् ॥ इति आरम्यायते T = मतिभूतनान परोक्ष है ऐसा कहा गया है अर्थात् जीव मतिनान और मुतमान उत्पन्न होनेकेलिये वरिंग कारण इन्द्रिमें मन-प्रकाश और पर उपदेशाविक है इससे इन दोनों शानोंको परोक्ष करते हैं और अंतरंग कारण इनदोनों शनोंके उत्पम होनेका आत्माकै मतिमानापरणीय और भूतकाना वरणीय कौडा अयोपशम ही है ॥ (प्रतीत्य सम्बन्ध सपा स्वकृदन्त है)। मन उपमान-आगम आदीनाम् ॥ अन्तर्मावः । = इसलिय उपमानप्रमाण, मागम (शाप्द) प्रमाम भादिका गर्मित होना = इस(परोक्षगन) में ही (-एब) (भन्योक मानेहुये प्रमाण इनमें गर्मित ॥ %3D पत्र पर - पटानिघासी वगरूपसदाय कीलकृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्विसिद्धिका सम्दनः ।हदी मनुवाद । वपाप १२१२ । अभिहितरक्षणात्परांचादितरस्य सर्वस्य प्रत्यक्षतप्रतिपादनार्थमाई- ॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ अक्ष्णोति व्यामोति जानातीत्यक्ष आत्मा । तमेव प्राप्तक्षयोपशम प्रक्षीणावरण वा प्रतिनियतं प्रत्यक्षम् ॥ । ममिहित-सपनाता परोधात गा इतरस्म । कषित वा कटे हुये (ममिहिस) लक्षण सहित परोष (ज्ञान) से अन्य सर्वस्म ॥ मत्पमत्व-प्रतिपादन अर्थम् ।। बाद T -सब (धान) के प्रत्वफ्ना के करने के लिये (बाचार्य) कहते हैं कि प्रत्यक्षमन्यत् ॥१२॥ पदच्छेद और सूत्रा:-अन्यत । मितिबान और मतदान से) मिन्न अया अवशेप (अन्यस्) प्रस्पदम् ॥ (अपषिशान मनः पर्ययनान और केसलमान) प्रत्यक्ष प्रमाण है अर्थात् मात्मा के ही माभय से पिन (=विना) मन और किसी इन्द्रिय की सहायता से उत्तम होते हैं। क्या ये तीनों पान अतीन्द्रिय है। उक्त सीनों मामि से अवधिज्ञान और मन पर्पयनानगे परिमित वस्तु विषम करने से विकल (- सीमापद) पुत्पथी और फेक्लमान समस्त द्रव्य व पर्यायको ग्रहम करने से सकल ( सम्म) प्रत्यक्ष पुमान है। पदच्छेद और विभवन्धर्य सहित इस सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश. हिन्दी अनुवाद ॥ अमोति T व्यामोति T मानाति र पाचानता है वा पोध करता है (अस्मोति) व्याप्त होता है जानवा है। विअधः । आत्मा । प्राप्त पयोपशमम् : पा -ऐसा वष (अर्थात) आग्मा है वा चेतन है । कर्मका क्षयोपशम प्राप्त अपया प्रतीन-आवरणम् । तम् । एक कर्मके बावरण के नाश प्राप्त विस (मात्मा) के ही (-एष) आश्रम से (बिना किसी अन्य की सहायता लिये हुये) उत्पम हो सो प्रत्यय है वर्षात् कर्मके सपोपश्चम और आय के अनुसार बिना किसी इन्द्रिप, मन, प्रकाश, पर उपदेशाविक की सहायता लिये हुये मास्मा के मामय से ही उत्पमाही और विशेष रूप से पदार्थों को जाने से प्रत्यक्ष (अवधि मना पर्यय-फेवस्थान) हैं। उनमें प्रतिनिपतम् । स्पषम् ।। ASCASA । गनिगी नगरपमहाय शीलात पदच्छेद और विमपन्यव सहित सार्थसिद्धिका सदशा हिंदी अनुवाद । अभ्याम् १ ५ १२० अवधिदर्शन केवलदर्शनमपि अक्षमेव प्रतिनियतमतस्तस्यापि ग्रहण प्राणोति । नैप दोप । ज्ञानमित्यनुवर्तते, तेन निस्य व्युदा । एवमपि विभगज्ञानमपि प्रतिनियतमतोऽस्यापि प्रहण प्रायोति । सम्यगित्याधिकारात्। ततस्तनिति ॥ सम्यगित्यनुवर्तते, तेन ज्ञान विशिष्यते, अवधिमान और मनः पर्यप शान तो विकल ( अधा-अपूरा ) प्रत्यक्ष है और फेवस मान सकल (सम्पर्ण) प्रत्यक्ष है। प्राधिदानम् केवलदशनम् अपि अधम् ॥ -(प्रश्न) अवधिवदर्शन (और) केवलदर्शन मी (अपि) आत्मा (-मषम्) पप० प्रनिनिपतम् ॥ प्रमा दी जनित या आश्रित (प्रतिनियत) वा व्यवस्पित (प्रतिनिपत) है इसलिये नम्य ॥ अपिग्रहणम ॥ प्रामोति T तिस (अवधिदर्शन केवलदर्शन) का मी ग्रहण प्राप्त होता है (अर्थात् अवधिदर्शन और केवलदर्शन मी पूमाप ठहरेंगे ऐसा पूभ है) न०प । दाप । मानम् ॥ इति अनुक्तते T (उत्तर) यह दोप नहीं है । (फ्योंकि इस सत्र में) सान ऐसा अधिकार-करण है तनादानस्य:॥ युदामः। =तिस (गनके अनुवर्तनसे) दर्शन का निराकरण वा निवारण है अर्थात् पहासान का पूरण होनेके हेतुसे शानका ग्रहण किया दर्शन का निपेष एपम् अपि विमान पानम् : अपि प्रविनियतम् ॥ (पून) ऐसाही (अपि)फुभवधियान मी (-अपि) व्यवस्थित वा (आत्माके) आभिती अनः अस्य :In अपि० प्रणम् ।। पामोति T =इस लिये इस (उअवधिगन) का मी पूसंग वा ग्रहण प्राप्त होता है अर्थात पून का आशय यह है कि पदि गान का पुफरण है तो सो अवधिमन को भी यहां ग्रहण करफ प्रत्यक्ष पूमाण करना चाहिये क्योंकि कुअवधिमानी बारमासे विना किसी इन्द्रिय-मन-फूकान और पर उपदेशादिक द्वारा उत्पम होता है मम्य ॥ इनि० आधिकारात् In वतम् सन् "(उपार) सम्पन (पूशस्त) ऐसा फूकरण होनेसे वहाँ (-तता) उस (विमंगलान) का निामि ।। सम्पम् ॥ इति अनुवर्तते T -निपेध है। सम्यक् ऐसा (पद) अनुक्तता है उपस्थित है मानम् ।। विनिप्पमे निस (मम्य पदकी अनाचि) से शान विशेफिस फिमा गमा मनन %3D एटानिवासी जगरूपसहाय कीलकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्विसिदिका सन्दमा हिंदी अनुवाद । अभ्याप १ र १२ ततो विभाज्ञानस्य निवृत्ति' कृता । तद्विमिथ्यादर्शनोदयाद्विपरीतार्थविषयमिति न सम्पक ॥ स्यान्मत मिन्द्रियव्यापारजनित ज्ञान प्रत्यक्ष, व्यतीतन्द्रियविषयव्यापार परोक्षमित्यतदविसवादिग्क्षणमभ्युपगन्तव्य मिति । तदयुक्तम् । आप्तस्य प्रत्यक्षनानाभावप्रमात् ॥ यदिइन्द्रियनिमित्तमेव झ्यन प्रत्यक्षामिप्यते, एव प्रसक्त्या आदस्य प्रत्यक्षज्ञान न स्यात् । नहि तस्येन्द्रियपूर्वोऽर्थाधिगम ॥ अथ तस्यापि करणपूर्वकऐवज्ञान कल्पते तस्या सर्वज्ञत्वस्यात् ॥ तस्य मानस प्रत्यक्षमिति चेत् मन प्रणिधान पूर्वकत्वात् क्त विमान-मानस्य :॥ निवृश्चिः ॥ फवा ।। = विससे कुअवधिगनका (प्रत्यक्ष शानमें ग्रहण करनेका) निपेष किया गया। त वि. मिम्पादर्शन उदयात । विपरीत क्योंकि (= 1ि) पह (= सद्) मिथ्यादर्शनके उदयसे प्रतिकूल भय-विपषम् ॥ इति न सम्पक । पदार्थका ग्रहण करता है । ऐसे (कुअवधिज्ञान) प्रशस्त (= मान) नहीं है स्पादा मतम् ॥ इन्द्रिय-व्यापार = (वैशेपिफके मतानुमार-प्रश्न) मत है (= स्यात) कि इन्द्रियोंके व्यपसापसे-वयोगसे अनितम् ॥ ज्ञानम् । प्रस्पसम् FIE = उस्फम हुआ शान प्रत्पक्ष है व्यतीत-इन्द्रिय विपप-यापारम् In परोषम् ॥ इति = इन्द्रियों के विषयके उपोग (-व्यापार) वर्जित (मान) फरोध है ऐमा एतत् ॥ अविसंवादि-लक्षणं । अम्युपगन्तव्यं ॥ इति = यह वाधारहित स्वरूप मानना योग्य है आप्तस्मा पूत्पध-शान अमाव-पूसात् ।। = (उचर) मापके फूत्पक्ष शानफे लोपका पूसंग बाने (फ हेत) से तत् । अयुकं ।। यदि इन्द्रिय-निमिषम् ॥ एप = पह (इन्द्रियजनित धानको प्रत्यक्ष मानना) ठीक नहीं है । जो इन्द्रिय जनित ही मान । पूत्पतम् । इप्प एवं पूसक्त्या ॥ = शान प्रत्यक्ष (पूमाण) माना जाप सो ऐसे पूसंगसे माप्तस्य । प्रत्यक्ष मान न सात् T = आप्तके पुत्पलशान नहीं होता (होगा)। नदि तस्य । इद्रिय-पर्वः । अयं अधिगमः । = क्योंकि नहीं तिस (बाप्त) के इन्द्रिय पूर्वक या इंद्रिय बनिव वस्तुका मान अप, स्म ।। अपि. करम-पर्पफम् ॥ एषक = यदि (अप) तिस (आप्त)के मी इन्द्रिय पर्षक वा इन्द्रिय निमिक्क ही शान कल्प्यवे T सस्प । असर्वप्नत्वम् ॥ स्यात् T =धान माना जाय तो तिस (प्राप्त)के असर्वक्षता होगी। तस्य ।। मानसम् ॥ पूत्पतम् ।। = विस (आप्त) क मानसिक या मनसा (मानसम्) मान पुस्पक्ष मानाजाप 'कल्प्यवे' इति. चेत्, मनसू पूणिधान-पूर्वकस्वात् । =ऐसी शंका होनेपर (उचर है कि) मनके चितवन पा उपोग जनित होनेसे प्रगनियागी जगम्पमहाय पीतयुन पदपछेद और पिमपन्गर्व सहित सवार्थसिद्धिका मुन्दशा दिदी अनुवाद । अध्याय १ । १२, अवघिदर्शन केवलदर्शनमपि अक्षमेव प्रतिनियतमतस्तस्यापि ग्रहण प्रागोति । नेप दोप । ज्ञानमित्यनुवर्तते, नेन दर्शनस्य व्युदा' । एवमपि विभगज्ञानमपि प्रतिनियतमतोऽस्यापि प्रहण प्रायोति । सम्पगित्यधिकारात्। नतम्तनियति ॥ सम्यगित्यनुवर्तते, तेन ज्ञान विशिष्यते, अवधिमान और मनः पर्यय ज्ञान सो विकल (अधूरा-अपरा ) प्रत्यक्ष हैं और केवल मान सकल (सम्पूर्ण) प्रत्यक्ष है। अवधिताननम् केवलदमनम् ॥ अपि अधम् Im (प्रभ) अवघिदर्शन (मौर) केवलदर्शन मी (अपि) आत्मा ( अवम्) पर प्रतिनिक्तम् । मन नी जनित पा बामित (प्रतिनियत) वा व्यवस्थित (प्रतिनिफ्त) है इसलिये तस्प ॥ अपि० ग्रहणम ॥ प्रामोति । =विस (अपषिदर्शन केवलदर्शन) का मी ग्रहण प्राप्त होता है (अर्थात् अवषिदर्शन और कवलदर्शन मी पूमाण अरेंगे ऐसा पूभ है) न दापमानम् ॥ इति अनुक्वते T (उचर) यह दोप नहीं है । (फ्योंकि इस सत्र में) भान ऐसा अधिकार-पूरण है मन मनस्प:। व्युदामः। नविस (मानके अनुवर्तनसे) दर्शन का निराकरण वा निवारण है अर्थात् पहा शान का पूकरण होनेफे हेतुसे मानका ग्रहण किया है दर्जन का निपेष है एवम् अपि रिमा यानम् अपि प्रतिनियतम् ॥ =(पून) ऐसाही (=अपि)अवधिनान मी(अपि) व्यवस्थित षा (आत्माके) आश्रितो अतः अस्य :In अपि० ग्रहणम् ॥ पामोति T -इस लिये इस (अधिमान) का मी पगा--- एटानिवासी जगत्मसाय कीसस्त पदच्छेद और निमत्यर्व सादिव पिसिद्धिका सम्बना हिंदी अनुवाद । अध्याय १ एन १२ आगमतस्तत्सिद्धिरिति चेन्न । तस्य आगमस्य प्रत्यक्षबानपूर्वकत्वात् ॥ योगिप्रत्यक्षमन्यज्ञान दिव्यमप्य स्तीति चेत्,न तस्य प्रत्यक्षत्व इन्द्रियनिमित्ताभावात् । अक्षमक्षं प्रति यद्वर्तते तत्प्रत्यक्षमित्यभ्युपंगमात ॥ बागमत' तस्सिदिरा इतिक चेतन त्रास्त्रसे उस (सर्वशफ्ना) को सिदिऐसी शंका (-पेस) है। (उचर) मा ठीक नहीं है। सस्प आगमस्स • प्रत्यध्यानपूर्वकस्वात स्पोंकि उस शाख को प्रस्मस शान निमिरा वा कारण अर्थात वही आगम माना जाता है जो प्रत्यक्षप्रमाण अन्य है भावार्य यह है कि प्रस्पस शानी ही प्रमाणस्त मागम कह सकता है परंतु इन्द्रिय अनित प्रत्यक्ष मान सब पदायाँको प्रदान नहीं करसक्ता, नहीं जानसका ल उससे स्नाहुबा बागम मी सर्व पदार्थों का मान कैसे करा सकता है जिस (आगम) से प्राप्तके मानको सर्वशवा मानीधार॥ मोगिन प्रत्यक्षम् ॥ अन्यत् ॥ बानम् ॥ =(पोदमतवाले) योगियोंका प्रत्यक्ष एक जुदा शान (अन्पत् शान) दिव्पम ॥ अपि अस्ति T इतिक चेतक =अलौकिक (-दिव्य) दी ( अपि) है यदि (-चेत्) ऐसा है ? वस्प ॥ प्रस्पषत्वम् ना (उत्तर) (तो) तिस (अलौकिक) धान को सासावाना नहीं हो सकेगा इन्द्रिय-निमिच अमावात् । अक्षम ॥ अक्षम् ॥ क्योंकि यह इन्द्रियोंक निमिचसे नहीं होता है। (और आफ्ने) शन्द्रिप इन्द्रिय प्रति यत् ॥ पर्वते T तत् । प्रत्यक्षम् ll प्रति जो पूर्तता है पो (ही) प्रत्यक्ष अथवा साधा है इति अभ्युपगमात् । =ऐसा माना है (अतः) बलोकिक ज्ञान प्रत्यप्त नहीं हो सकवा) मावार्य अलौकिक धान वही है जिसका इन्द्रियों से कुछ किसी प्रकारका संघ नहीं है और प्रत्यक्ष पमान यही माना गया है वो इन्द्रिय बन्य है अतादिव्ययान पुस्पक्ष ज्ञान नहीं है। मम एक साथ सर्व पदार्थों का प्रहप नहीं कर सण मौर कमरिमर्व पदार्थोका जान पलता नहीं। क्योंकि पदार्थ अनन्त है पुगपत् जावक मनात पदार्थों को म जाने स्तर सर्वच नाही इसरिये मनवारा युगपत् सर्व पदार्थों के माननेवासा प्रत्यक्ष मान मही हो मणमसिये सर्पमता का (१) तस्प मौर भागमस्प शनों के पुछि और मपुंसक लिंग दोनों हो सके है। भमाहीमा एनिवासी जगरूपसहाप पकीकृत पदपछेद और विमर्मस्पर्य सदित सर्वार्थसिद्धिका शम्बा हिंदी अनुवाद | पाप र १३ ज्ञानस्य सर्वज्ञत्वाभावएर पानस्य ममत्व प्रमाः । एष . मानके सर्वशफ्नाका लोप ही [-एष] आता है अर्थात् यदि मनजन्य ज्ञान पस्थध माना बाप तौ मी सपना नहीं बनता है [निम्नटिप्पणीमें विशेप है] (१) युगात मामानुशातिमनसो मिमिति परैरम्युपममामवस्ता पुगरमा प्रणिपान म घटते । तम महत्वाभावः। पानमनेकार्य न मानानोति । प्रतिमाम्मापाप क्रमेव सर्ववस्तुमाने चम भरते । बरदूनामानम्पादेवयम्तु पाणान्वयमरे अम्यवस्तुपरिवानामावाब सर्वसत्तामायः मु॥ मुगार हान-मनुचिः ।। -पक पार ही एक माप (= मुगपत् ) नामक सम्बम्प मा सात मना मनगरिय पति परममि ग्पगमात् ।। -मनन ससप्प पेमा है। दूसरों करि मानने से मग परतुन । युगपत् • ममस् प्रणिपानम् । =समस्त पदार्थों में एक साप मनमा चितवन वा ग्योग वामापार मपर T नहीं करता है मर्यात् मरमत के सिदान्त अनुसार मी मन सर्व पदापों को एक साथ प्रहण नहीं कर मचा है। मत मपसार नमामा परmare अनेक -विमसे सने अमाप है। (मौर) पहशान भनेक बनाना बम समाति इति प्रतिमा सनावात्। -पदायों को नहीं मामता है। ऐसी प्रतिज्ञा को रिचमानता से मात मेष' गपरनुमान परते ? -मनुकमसे मर पदार्थों का मान होना भी नहीं बना है सम्नाय ।। मानसात रुपमा गरिमान अपमरे । - पसार्यो के मनम्त होने के हेतु से पर पदार्थ के वानरे प्रसग में म• भार सानु परिहानमभावात् । और मित्र पदार्थ परिवान की शुम्पतासे सर्वेक्षणाममाष =म प्रभार परखा है पाता है भावार्थ परीकि -- मसममा सुध एमनिवासी अगरुपसहाय पकीस्कृत प्रमोद और विमक्स्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्देशः दिदीअनुषार अम्माय १ व १२ अनेकार्यग्रहणं क्रमेणेति युगपदेवेति ॥ चेत् , यो स्यजन्मक्षणः स आत्मलाभार्थ एव । लब्धात्मलाम हि किञ्चित्स्वकार्य प्रति व्याप्रियते, अनेक प्राणम् ॥ मन । इतिक (और) पहुत-पदार्थीका प्रण अनुहमसे होता है मावार्थ पौदोंका सिदान्त है कि पदार्पको पहिसे अपमें उस्पचि होती है उसी पदार्यका दूसरे धममें नाश होजाता है और यह मी करते हैं कि एक मिशान एकवार एकत्री पदार्थको बानता है सो अनेक पदार्योंका शन क्रमसे हो सकने के कारण एक विज्ञानको अनेक क्षमयी दोनेसे सब संस्कारोंके एक क्षणवती होनेमें पण आगया । युगपत् एच. -एकसाथ या एककालमें (अनेक पदार्थोका ग्रहण एक क्षणती विज्ञान हीरे इति. मेस्, या अस्म । बन्म-अना जोसा मदि (पेत्) हो तो ? (उचर) जो (-1) इस (ज्ञान) के उत्पम होनेका धपद सा: आत्म-सामाः। एत. वह अप (उस शानके) स्वरूपके उपार्जनके लिये (मर्य) ही है लम्प-आत्म लामम् .. हिक क्योंकि (हि) स्वरूपके लामको प्राप्तकरि अर्थात् स्वरूपको प्राप्त करनके पीछे विपिन० स्वकार्यम् । व्यापियवे' अछ प्रपन कार्य (-पदार्थोके ग्रहण) की ओर ताप होता है वा व्यापार करता है मर्यात् यदि पौद कहें कि नाना पहायोका ग्राम एक धनवती विज्ञान एक साप होता है सो असम्भव है क्योंकि जिस सममें विज्ञान उत्पन्न हुआ। वह सप उस विमानके होनेमें सगई । उसके पीछे वह विज्ञान पदार्यके मान या प्रश्रम करनेमें लमेगा। INR (१) म्याप्रियते-यापर परि ठामपा मारमनेपदी मममनिन् पातुगपार करना वा काम फरमेस अर्थम है। पटवा गपके पातुमों श्रीमत की हस्व में रिशमावेश होता है पचात् रिको रिय कर देते है और म जो गव के विकरणको मारकर और मि आर उपसर्ग मयम साबर पिपिप् मामिप मा पमात् है, पाचन, आमने पदी, मम्पपुरुष वर्तमान कायम प्रयप मगानेसे पामियो' परम्वा॥

। अमाव . एनिवामी नगरूपेमाय पीतात पच्छेद और निमक्त्यर्थ सहित स्वार्थसिद्धिका अम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ व १२ विच सर्वज्ञत्वाभाव प्रतिज्ञाहानिर्वा । तस्य योगिनो यज्ञान तत्प्रत्यर्थवगवर्ति स्यात अनेकार्यपाहि या ? यदि प्रत्यर्थेवरावर्ति, सर्वज्ञत्वमस्य नास्त योगिन, ज्ञयस्यानन्त्यात् ॥ अथानेकार्थग्राहि,या प्रतिज्ञा "विजानाति न विज्ञानमेकमर्यद्वयम् यया । एकमर्थं विजानाति न विज्ञानद्वप तथा" इति सा हीयते ॥ अथवा क्षणिका' मर्वसंस्कार। इति प्रतिज्ञा हीयते । अनेकक्षणवत्येकविज्ञानाभ्युपममात् ॥ मर्माणत्व (अलौकिक मानको प्रत्यक्ष स्वीकार करनेमें) सर्वशवाका अमाष, मी( किञ्च) है मा. प्रनिमाहानि ॥ नस्स : योगिन' । यत् ॥ अथवा प्रतिना मंग पा प्रणकी क्षति हो बापेगी क्योंकि तिस योगीफे मो (-पत् ) मानम् ॥ नन्। प्रति-मर्य- समवति ।। स्पात् T मान है सो एक पदार्थ के (अत्पर्ष) पाशीभूत है । अर्थात् योगीश्वर का यह धान एक एक पदार्थ अपया एक एक वस्तुको क्रमानुसार प्राण करेगा वा०अनेक भयग्रादि । पदि अथवा पहुत पदार्थोका ग्रहण करने वाला होगा। जो (योगीश्वर का शान) प्रनि अर्थ-वति । सप्रतम् ॥ अस्प । -एक वस्तु का प्रहण करने वाला हो तो सर्वसपना इस यागिनः । न अस्ति T सस्य । -योगी नहीं (पोसका) है। क्योंकिशानमें ग्रहण होने योम्म पदार्यके (-अपस्म) अनन्न्यात् ॥ -अनवा है (और सर्वत्र तनहीं हो बम सम पदार्थों को एक कालमें बान सबै) अप०अनेक-अर्थ-यादि । भो (अप) (इस योगीश्वराधान)अनेक पदार्थका बाननेवालाहोवाग्राहीहोवो (निम्नलिखित श्लोकमें) यो (-या) मण अथवा नियम है कि विजानाति T न विशनमकमद्वयम् IIn यथाय -जैसे (- पया) एक विज्ञान दो पदार्पोको नहीं जानता है (=विजानाति) एकमयम् ॥ विजानादि T न विनानइय ॥ पा -तैसे (= तया) दो विमान एक अर्थ षा वस्तुको नहीं बनाते हैं नि, मागायत T अथवा समसंस्काराः। -ऐसी प्रतिज्ञा (-सा) पति की बाप है। अथवा सप संस्कार (बानमन) प्रषिकाः । इति प्रतिशतबीयते T अनेक एक समयवतीं हैं ऐसा प्रण वा नियम ला जाय है क्योंकि बनेक -पणवीं एक शिान मानागयामा स्वीकार कियागया है। पा ।। निमा पति एक-विधान अभ्युपगमात् ।।

ण्टानिवासी जगामसहाम वकीलकृत पदच्छेद बौर विमस्यय सदित स्वपिसिद्धिका सप्दशः दिदी अनुवाद । अम्पाप १ पत्र १२ अभिहितोभयप्रकारस्य प्रमाणस्य आदिप्रकारविशेपप्रतिपत्यर्थमाह- निर्विकल्प (निधयरहित तथा भेद विवधारदिव) मानते हैं। अतः उसके द्वारा किसी भी पदार्थका निभय नहीं होसक्ता सम स्वपम उसयोगीके शानका भी निभम न होनेसे उस (पितानकी) शून्पताका प्रसंग पाता है। क्योंकि किसी भी पदार्मका अस्तित्व निभग आत्मा शानके पिना सिद्ध नहीं हो सका है। अमिरित-उमय-प्रकारम्य : प्रमाणस्म । =माफ्ति या कह हुये दोनों (परोक्ष तथा प्रत्यक्ष) पूकारके पूमाणके आदि पूकार विशेप-यूसिपचि अर्थम् आइ । =पुथम (परोध पान) के मेदों के विशेप मानके लिये कहवे हैं कि पूसर वियों ( -निधारमफ बागों ) से नहीं जाना आ मजद व उसका अस्तित्व केमे माना जा सका है मतः विज्ञानाद्वैतवादी योगाचार बौद्धोंका मत शून्य ही है ॥ उपर्युक्त श्लोकका अनुवाद - all निशुय।।। मारी : पिकटी। (गतम्तम् ॥)-(पर यिमान) रूप संपूर्ण कसनाओं (मेयों से रहित (-मनीप्तम् ) यिगुर पा पिशव है अर्थात् पिशाम साक्ष्य प्राहक, याप्य याचक, पेच पेवफ और पप हायफ फरसगायें नहीं होनेसे पर विशुस निर्मम है। पिम्प अगिलागा-जास्परम् | जीतग ॥ - (-विश्य) (यहााकि वालनेकी) इम्सकी (-अमिलापा) पोपवासे(-मास्क्वताम) ररित है अर्थात् पिशन तत्य संमार में अनिर्धमनीय है या अपप है मास्यम्प पेषम् ॥ -(पह विग्रन वस्य) अपने का नहीं जानता है (-येधम) भयात् अपना मी यि नहीं है। ग. तत् 11 गिगाचम् । - गौर (घ) वह (- घस् - विमानरम्य) (किसी शम्ववारा) को सामे याग्य (मी) मही है सुपसि-मस्या २ शुगग (-सुपुति) गास्थायाला है ( - अयरप्यम् ) अर्थात् स्वमवशामें रहनेया चैतन्य फे मध्य है गगाव-यामा 'ससारके दुख (और विफलोसे) रहित है (न्यामम्) ॥१॥ समस्त लोकका मायार्य यह है कि वन विमानस्य संपूर्ण फरसामोसे रहिए होनेसे पिशव है तथा विश्वफा कोई भी पण फया फरगे का मार्य गहीं (मीर्यगमीय है) अपनेका नहीं जानता है अर्थात् रूप में मान पेय माप रहित औरण या कका विगेशने याम्य है । स्वादशाम रहनेयाम तापके सशएं । मारमधी मर्प शोम रहित पा पर्जिती पति पयात एग (गगास यिमामा देसवादी यागावार पौनीका पिनानसत्व शम्पदी सिब आ पानिगामी जगरुपमहाय पकीसकृत पद और निमक्स्पर्थ सदिस सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र १२ प्रदीपवदिति चेन्न । तस्याप्यनेकक्षणविषयताया मत्यामेव प्रकाश्यप्रकाशनाभ्युपर्गमात् ॥ विकल्यातीत त्वात्तस्य शून्यताप्रमगध ॥ प्रदीपरत दीपक (के प्रकाश) मरस (विज्ञान) है अर्थात पौद कहते है कि विज्ञानकी दीपकके समान उत्पचि तथा परपदार्थका प्रकाश वा पोध करा देना दोनों पाते युगपत् एफसी समसमें पन बापेगी इति पतन =ऐसी (इति) का (बोने) पर ( नेत्) । (उचर है कि उक्तनका ठीक) नहीं है नरण : अभिनधि-विपपनापा । सत्पांना एप-क्योंकि उस (दीपक) का मी अनेकवावी होने पर (सत्याम्) ही ( एय) प्रायासन प्रम्पपगमात । -प्रकार किये जाने योग्य (पदार्थ) का प्रकाशन कर देना माना जाता है। प्रभोचर का सारांश, दीपकके समान प्रानकी एक ही समयमें उत्सधि और विपय ग्राहकला मानना ठीक नहीं है दीपक मी स्वयम् अनेक समपवर्ती होकर पदार्थों का प्रकाश करता है मता पूर्वोक्त नियममें (कि सब संस्कार क्षणिक हैं) मंग (दोप) यना रहता है १० नरम मिल्स प्रतीतपात Hm और (च) तिस (पियान) के निर्विकल्पता होनेके हेतुसे (अनिश्चय प्रात्मक होनेसे) न्पना-प्रमान। अमायका प्रसंग (मी) आता है अर्थात् पौद्ध प्रत्यक्ष मानको (1) परिमापियामागगन पिपापिषयस्याप गागिप्रस्यसम्य शरपनाप्रसंगा॥ तवं पिपुर्य सकलैपिकल्प । विश्वामिमायस्प पतामतीतम् ।। म स्वस्य चपतभिगाये। सुपुरस्यपरणं भय समायम् ॥ १॥ रति पवनात् ॥ गरिमन ॥ मम विस-मभावात् ।। क्योंकि पार्टी के अनुसार-विधाम) अपने स्परूप में संपूर्ण पिम्पों वा मे से रहित म सम्नपिपरा मपिपरयन् ॥ -मौर (-१) (दूसर) संपूर्ण विकम्पों मारा (पर पित) विषप पा प्रहव किये जाने पोम्प महीं हैमर्थात् मोर पिसापामेद उसका प्रहण मोर निएमय नहीं कर मले पोनिमपसस्पस्पता-प्रम। -(भतरप) पापी मापक्ष वानको शूपता वा अपिपमानता का प्रसग माता तात्पर्य यह किस वागीशान स्वयं अपने स्वास में निभव रहिवरे तपा ण्टानिपासी मगरूपसहाय वकीलकृत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित सर्विसिद्धिका सम्वना हिंदी अनुवाद । अग्याप १ बत्र १२ अभिहितोभयप्रफारस्य प्रमाणस्य आदिप्रकारविशेषप्रतिपयर्थमाह- निर्विकल्प (=नियपरहित क्या मद विवक्षारहित) मानते हैं। अतः उसके द्वारा किसी भी पदार्थका निमम नहीं होसक्ता वन स्थयम् उसयोगीके मानका भी निमय न होनेसे उस (विज्ञानकी) शून्पताका प्रसंग भाता है। क्योंकि किसी भी पदार्गका अस्तित्व निधय आत्मक मानके विना सिद्ध नहीं हो सका है। अभिदिख उभय-प्रकारम्य ॥ प्रमाणस्प ॥ मापित या कह हुये दोनों (परोष तथा प्रत्यक्ष) पुकारके पूमाणके मादि प्रकार विशेप-पूतिपपि अर्थम् Imआइ T न्यूधम (परोध थान) के मेदों के विशेष मानके लिये कहते है कि दूसरे विकल्पों ( -निघगरमक धानों ) से नहीं माना जा मम है तब उमा मस्तिष कैसे माना जा मकाई मता विज्ञानाद्वैतवादी योगाचार बौद्धाका मत शून्य ही है ॥ उपर्युक्त श्लोकका अनुवाद - rinगिशुई। साले । पिसावीतम् =(वर विमान) सत्य संपूण सपनामों (मों से रहित (-अतीतम् ) पिशुय वा विशव है अर्थात् यिसाममें प्रारूप प्राहक, पाम्य पाचक, येच पेदक और माय बापक कल्पनायें मही दोनेसे वा विशुग है मिर्मळहै। पिप-मिठाम-रावर राग ॥ अतीतम् ।। -मब (-विश्य) (पचमकि वालमेडी) एखकी (-मभिष्ठापा) पोफ्तासे(-प्रास्फ्यताम) रहित है अर्थात् विधान तत्व सम्पर में ममियमनीय है पा मषम्य है नक स्यम्प ।। पेचम् ॥ - (पह विधान तत्व) अपने को नहीं जानता है (-येचम) अयात् अपना मी देय नहीं है। मा| निगापम् I और (घ) यह (-तस् - पिशनसत्व) (किसी शम्बतारा) कहे जाने पाग्य (मी) नहीं है सुप्ति अवस्था - शगन (= सुपुप्ति) अगस्पायाठा है ( अपरपम् ) अर्थात् स्यमयशामें रहमेया चितम्य फे मशहै मगदुस-पाझम् In समारके पुरस (मौर विफल्योंसे) रहित है (न्यामम्) १|| समस्त लोकका मायार्थ यह है कि पा पिशामतत्य सपूर्व फापमाओंसे रीत होनसे विशव है सपा विश्वका कोई भी पण कया करने को समर्थ महीं है (- अनिर्वचनीय है) गरमेका नहीं मानता है मपात सम्पर्म साल पेय माप रहित है ओरग पद कपन विमाने याम्य है । स्वप्नवशामें रहनेवाले चैतन्य साश। समारसबंधी सर्प शोसे रहिवद पा यजित इति पयनाद । -ऐग (गगन से विमाना देवपाली यागापार मौनीका विज्ञानवत्व शून्य हो सिम इमा - CAXX पटानिकासी पगरपमहाप यकीसक्य पद और निमारगर्ष सरित सार्थसिदिका सम्पशा हिंदी अनुवाद । अन्याय १ पत्र १२ प्रदीपयदिति नेन । तस्याप्पनेरक्षणविषयताया सत्यामेव प्रकाश्यप्रकाशनाभ्युपगमात् ॥ विक्ल्यातीत त्वात्तस्य शून्यतामम॥ -दीपक (प्रकाश) गदश (विधान) है अपाय यौद्ध कहवे है कि निशानकी दीपकके प्रदीप समान उत्पपि पया परपदार्थका प्रकाश या योष करा देंना दोनों पा पुगपद एफसी रामगमें पन बायेगी शी1070 सी (इति) का (दोने) पर (नेस) । (उपर है कि उक्तका ठीक नहीं है नम्ग अपि भनेकधण-पिपगनायो । मत्यो । प-क्योंकि उग (दीपक) का भी अनेकक्षणवती होने पर (सत्याम) ही (एव) प्रास फिगे जाने योग्ग (पदार्ग) फा प्रकाशन कर देना माना जाता है। प्रभोपर प्रमाण प्राभिन अपुषगमात् । का सारांश, दीपकले समान पानकी एक ही समयमें उत्पषि और विपय प्रारफता मानना ठीक नहीं है दीपक भी स्वयम् अनेक समययती होकर पदार्थों का प्रकाश फरता है भगा प्रोक्त नियममें (फि सव संस्कार थणिक है) मग (दोप) पना रहता १० नमशिन्स प्रतीतपात m और (प) विरा (पिसान) के निर्विकल्पना होनेके देतुसे (अनिष्पप आत्मक होनेसे) एन्पना-प्रगा। अमापका प्रसंग (मी) आता है अर्थात् यौन प्रत्यक्ष मानको (परिमगामपियामासम्मपिम्यापित्यागाच मागिसण मामगंगा। पर पिश मपि । पशागिमाग्मस्प- रामतीप रपएर पेमग तपिगा। गुराण मग ममाता ॥ १॥ वि पगमात् ।। मन मम विस-प्रमापात् ।। क्योंकि दोनों के प्रागार-विधाम) अगमे स्पनर संपूर्ण पिसा पा मे मे रहित पसमागिर पिपाय॥ -ौर (-1) (मरे) मपूर्ण पिषम्पा द्वारा (पद पिगम) विषय पा प्रदव पिये आने पोम्प नहीं है अर्थात् और पिमा पामे उसका प्रामऔर नियामीरगळे गाणिसम्मानपत्र प्रा। -(भारप) योगीक प्रापानी पूरयता या भपिपमानता का प्रमंग माना तात्पर किसय नागीका काम रपणे मपने साग में निमय दमण एटा निवासी जगरूपसहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विमक्स्पर्य सहित स्वार्थसिदिका सपना हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ पत्र १२ अभिहितोभयप्रकारस्य प्रमाणस्य आदिप्रकारविशेषप्रतिपत्यर्थमाह- निर्विकल्प (=निमपरहित पया मेद विवधारहित) मानते हैं। अतः उसके द्वारा किसी भी पदार्थका निमय नहीं होसका तय स्वपम उसपोगीके शानका भी निमय न होनेसे उस (विज्ञानकी) मून्यताका प्रसंग माता है। क्योंकि किसी भी पदार्यका अस्तित्व निक्ष्य आत्मक दानके विना सिद्ध नहीं हो सका है। अमिरित-उभय-प्रकारम्य प्रमाणस्य । माफ्ति वा कहे हुये दोनों (परोक्ष तथा प्रत्यक्ष) पूकारके पूमाणके मादि प्रकार विशेष पूतिपति-मर्थम् In आइ T -पूषम (परोक्ष मान) के मेदों के विशेप मानके लिये कहा है कि दूसरे विकल्पों ( - निघगरमक भानों ) से नहीं माना जा मन है तब उमका अस्तित्व कैसे माना मा मक्ता अवा विज्ञानाद्वैतवादी योगाचार वोदॉका मत शून्य ही है ॥ उपर्युक्त श्लोकका अनुवाद artun frशुर। सास विकलो (गतीतम् =(पा विधान) सत्व संपूर्ण कल्पनामों (मेवों से रहिस (-मतीतम् ) विशुख मा पिशव है मर्थात् यिशाममें प्रात्प ग्राहक वाच्य पाचक, पेय पेदक और पयाय समायें नही होमेसे पा विशुग निर्मल है। गिग्य अगिलापा-गासवराग मासिम् || -मव (-विश्व) ( पकि वालमेकी) इण्टाकी (-अमिळापा) योग्पतासे(-मास्पवताम) पीस है अर्थात् विशाम तस्य सम्र में मनिर्षमनीय है पा अवस्य है -(पद विशा तस्य) अपने का नहीं जामता (-पेपम) अथात् सपना भी पेय नही है। २. प. मिगाराम् ॥ -मौर (घ) यह (-त- विशामप्तस्व) (किसी शप्पतारा) कहे खान याग्य (भी) मही है • शान (= सुपुप्ति) आस्थायाला है ( अपस्यम् ) अर्थात् स्वमदशामें रहनेयाले मेलम्प के महश दे *समारके पान (और विकयोंसे) रहित है ( पाम) १॥ ममस्त लोकका मावार्थ यह है कि वह पिशामतत्य संपूर्ण फायनामोंसे रहित हमिसे विशव दे तथा विश्वका कोई भी पण फया बरो को ममर्थ नहीं है (-मीयमीय है) अपोका नहीं जानता है अर्थात् स्वरूप में मान पेय माव रहित है और पद का किगेजाने योग्य है। स्वप्नवशामें रहनेवाले चैतन्य के सरशद समारमधी सर्व शोसे रहिवद पा पजिती -एम (गगन से विसामा द्वैतवादी यागाचार मौर्माका वित्रामतष शाप ही सिब हुआ ग, सागपम् । एपहि-जप गरा कापात्पम् ॥ - सीप एटानियामी अगलपमहाय वकीलकुल पद और विमस्पर्प सहित सर्वार्थसिद्धिका अम्दशा हिंदी अनुवाद । अष्पाप १ पत्र १९ प्रदीपवदिति चेन्न । तस्याप्यनेक्क्षणविपयताया सत्यामेव प्रकाश्यप्रकाशनाभ्युपगमात् ॥ विकल्पातीत वात्तस्य शून्यताप्रमा॥ -दीपक (के प्रकाश) सरस (विज्ञान) है अर्यात बौद्ध कहते है कि किशानकी दीपकके प्रदीपरत समान उत्पति तथा परफ्दाका प्रकाश या योष करा दैना दोनों पाते युगपत एकही समयमें पन जावेगी पनि मनन -ऐसी (इति) का (दोने) पर (चेत) । (उत्तर है कि उकसका ठीक) नहीं है नग अभिनेवण-चिपपनायो । सत्पांना एव-क्योंकि उस (दीपक) 1 मी अनेकवावी होने पर (सत्याम्) ही (एव) प्रकाश प्रकासन-प्रभ्युपगमात् " प्रकाश किये जाने योग्य (पदार्थ) का प्रकाशन कर देना माना जाता है ॥ प्रभोधर फा सारोस, दीपकके समान प्रानकी एक ही समयमें उत्सचि और विषम प्राहकता मानना ठीक नहीं है दीपक मी स्वयम् अनेक समयी होकर पदायों का प्रकाश करता है अतः पूर्वोक्त नियममें (फि स्व संस्कार क्षणिक है) मंग (दोप) पना रहता है १० नस्पm किस प्रतीनपात m और (च) सिस (विज्ञान) के निर्विकल्पना होनेके हेतुसे ( अनिश्मय आत्मक होनेसे) मून्पता-यमन अमावका प्रसंग (मी) आता है अर्थात् बौद्ध प्रत्यक्ष नानको (१) परिमगरपियामापारमसविन्यापिवयत्याप यागिमस्य सस्य शबतासंग ॥ सर्व पिशु सालैपि । विश्वामिसापास्य- दत्यमवीवः ॥ न स्वस्थ वे न प सनिगा। सुपुराण मग साधम् । १॥ इति रपस्मिन मान वितर-ममापात् ।। सक्योंकि वोी फे अनुमार-पिधान) अश्मे स्वरूप में संपूर्ण विष्मयों या मेसे परितो गमम्मरिश भविपरवान् -मौर (-) (दूसरे) संपूर्ण वियों शारा (पार विगत) विपक्ष वा प्रण किये जाने योग्य नहीं हैमर्थात् मौर विधान पाभेद उसका प्रहण और निश्वयमही र म -(अतएर) पापी प्रत्यक्ष दानको शम्पती वा मविपमानवा का प्रमग माता तात्पर्ष पर कि जब योगी का जान स्वर्ग मपने स्वरूप में निभप दवा है सपा . N यामिरम्पसस्प पत-प्रमा।

एटानिवासी अगस्पसहाय यकीकृत पदच्छेद और विमत्पर्य सहित सर्वार्थ सिविका शब्दशः हिंदी अनुवाद | अप्पार १५१३ तर्क करते हैं, और अमिनामाव सम्पन्ध को व्याप्ति करते है ॥ अहो जहां साधन ( हेतु ) होय, यहां वहाँ साध्य ( सिद्ध करने की इच्छा किया गया वा साधने योग्य वस्तु,) का होना, और वहाँ वहां साध्य नहीं होप, वहाँ वहां साधन के भी न होने को अविनामाष सम्बन्ध करते हैं। जैसे जहां वहाँ पम है, यहां पदो अम्नि है और वहां वहाँ अग्नि नहीं है यहाँ यहाँ धूम भी नहीं है । अथवा "व्याप्तिान को तर्क करिए है। जहाँ मन्वय व्यतिरेककरि नियम होप सो व्याप्तिमान है यह माई होते स्ते होई यो तो अन्वय पर नहीं होतें संत नहीं होय ऐसा व्यतिरेक ऐसे दोऊनित व्याप्ति- शान होय ॥ बैंसें अग्नि के होते सर्वे ही धूम होय अर अग्नि का अमाव होतें धूम ना होय इत्यादि निश्रय करने का नाम है सो प्रमाण है" ॥ अर्थ प्रकाचिका में इसी सूत्र को देखो अमिनियोध =आमिनिपोषिक्वान या "स्वार्थानुमान" (झान) बय० षपनिका पान १४० वा "अनुमान" (शान-अर्यप्रकाशिका ) अर्थात् सन्मुख लिंगादि (=पिनादिक) देखकर उस लिंगी वा चिन्याले आदिका निधम करना सो अमिनिपोध है। जैसे धूम को देखकर अग्नि का निधय करना कांचती देखकर सर्पका वोध करना साफ्न कीये लिंग पिन तातें साम्प कहिये नानन योग्य वस्तु लिंगी-चिन्हवान साका निश्चय करना सो स्वार्थानुमान है। हो साधन साई करिये, बाकी महा साध्य वस्तु न हो वहां प्राप्ति न होय "जैसे वहां साम्प वस्तु (अग्नि न हो) सहाँ घूम (अनिके साधनकी प्राप्ति न होगी "तथा मा साधन शेप तहां साध्य होयही होय" जैसे जहां जहां धूम (अग्निका साधन) होगा वहाँ २ मग्नि (घमका साभ्य) अवश्य ही होगा ॥ देखो सर्वार्थसिदि पनिका पठ १४२ १४३ ॥ (१) अभिनियोपिक-संक्षा प्रापय मिलाकर भर्य पदल देते है उसीहो तरित करते है। यहाँ सम्बापो अर्थमें ममिनिवाघमें ठक् (सइ) । प्रत्यप पगार मौर उसे (क) से पदकर बावि में पूमि पर देते है जैसे ममिनियोप शप मिमियोपाठशप अमिनि पोषक शाम्य पनि करने से मामिनियोपिक और शाबिक सपनाये . एनिवासी अंगरूपसदाय वकीलकृत पदच्छेद और विमक्त्पर्य सहित सार्थसिद्धिका धन्दनः विदीनुषाद अध्याय १ सय १३ मति स्मृति सज्ञा चिन्ताभिनिवोध इत्यनन्तरम् ॥१३॥ मति स्मृति संज्ञा चिन्ताभिनिवोध इत्पनर्यान्तरम् ॥१३॥ =मति ॥ स्मृतिः ॥ संवा ॥ चिन्ता ॥ अमिनिमोघः । इति-अन्-अर्थ-अन्तरम् ॥ ॥१३॥ प्रार्थ:- मनि' =मति अपात् मन और इन्द्रियोंसे वर्तमानकालपी पदार्थको अवग्रहादि रूप साधाव जानना सो मति (पान) है ॥ स्मृतिः ॥ स्मृतिमान अथात् अनुमक्ति पदार्थोका कालान्धरम वा और समयमें स्मरण होना या सुधि बाना सो स्मृति (ज्ञान) है। ममा । -शा मान अर्थात् वर्तमानमें किसी पदार्थको देखकर यह वही है जो परिसे देखा था इस प्रकार जोड़ रूपका कान होना मो संन्ना-बान है या प्रत्यभिज्ञान है उसके अनेक मेद हैं उनमेंसे मुस्प पार हैं। अर्थात (१) एकस्व प्रग्पभिमान (२) सारन प्रत्पमित्रान (३) तदिलक्षण प्रत्यमिझान (४) सत्प्रतियोगी प्रत्यमिशान ॥ एकत्व मत्यभिधान स्मृति मौर प्रत्यक्षके विपपमत पदार्थमें एकता दिखाते हुये बोदरूप मान नैसे किसी पुरुपको देखकर बानले कि- यह प्रयम देखा था सो ही पुरुष है । सारस प्रत्यमिमान स्मृति और प्रस्पक्षके पिममच पदार्यों में सारश्य दिखाते हुये जोररूपवान बसे फिसीने वनमें गवयनामा तिर्यघ, नीलगाव, रोम, देखकर माना सो यह गौको देखा था सैसा है। सदिसक्षण मत्पभिवान-स्मृति और मत्सबके पिय भूत पदार्थों में क्लिक्षणता दिखाते हुए जोहरूपमान- जसे फिसी मैसेको देखकर जानना कि प्रपम जो बैल देखा था उससे विलक्षण ये मैंसा है।। सत्प्रतियोगि प्रत्ममिवान किसी वस्तुको निकर दसकर अन्य किसी वस्तुको ऐसा जानना जो यह इससे दूर है। मिन्ना , निन्तयन शान अर्थात् किसी चिनको देखकर " महापर इस चिन पाला अवश्य होगा " ऐसा विचार सो चिंतन मान है। इसको उत्र, या, तर्क या व्याप्ति बान मी करते है ॥ व्याप्तिके मानको- (१) दिगम्बर जैव सम्प्रदाय तथा श्वेतामर न सम्प्रदाय दानोमें इस स्त्रका पाठ और मर्य एकसा है। (३) विस चमके पी0 5 पम्म चिन्ह माव उस शमके भम्तमेस एक प्रकार की जाती है। जैसे मगर पिता शम्ब से एक भकार की जायेगी ऐम ॥ चिना पम बिगो पहिले सपके भाव दा अकार ठी गागो : जैसे शमन्पसौरम्पस्पोपसस्थानमेवामछाया जसपो पावसयाममाप पत्र २४ पहा मावप रायमपाके पापा । -a-sarSC a

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पशानियामी नगरपमाय + लत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ गरिन गाथसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद | अध्याय १ सय १३ CLICEscastrack अनुमान - "सामनरो सायके मानका अनुमान कहत है। जैन सिद्धान्त प्रषेशिका प्ठ ८॥ "साधन कहिए हेतु चाते गाध्य कहिए गाधने योग्य वस्तु माका चिम्मान सो अनुमान प्रमाण है' साध्यके तीन विश्वेपण हैं (१) अबाधित वा -"तदा प्रमाणकारि अपा पन पणारि साक्षिक सत्य होय सोही साध्य होय है जाम साधने की योग्यता नहीं गो गाय नाहीं । जैसे भाकामा फूल साधने नस्य नाहीं ॥" अमि का ठंडापन प्रत्यक्ष प्रमाण से याक्ति है इस कारण यह रडापन गाय नहीं सकता है। (२) अभिप्रेत या इ-चादी जिसको सिद्ध करना चाहे अश्या जिसको माधनेवाला पुरुप अभिप्रारम के, सो ही साध्य है विम अमिप्रत पिना जगतमें अनक वस्तु हैं वे साध्य नहीं (३) असिद-जो प्रतिवादीको दूसरे प्रमाणसे सिद् न हो अथवा जिसका निधय न हो अर्थात् जो पहिले मिद नहीं हुवा है सो साध्य है जो प्रथमही सिद्ध रोचुका है उसको क्या साघेगा ? सिद् एप को साफ्न निष्फल है निमगे कुछ संदेहादिक हो सो अमिद है मोही साधने योग्य है । इस प्रकार के विशेषम युक्त साध्य के सन्मुख जो पर्गत मापनकरि नियमम्प मान होय ताते याई ममिनियोग करिये ॥ साधनके संसेपसे दो मेद है (१) उपलब्धि (२) अनुपगि ॥ अमावके ग्रहणको अनुपलन्धि कहते है ।। इन्द्रियमनकरि वस्तुके सदायका ग्राम हो सो उपलब्धि है उसके तीन प्रमेद है कार्योंफ्लन्धि जैसे इस पर्वतमें अग्नि है क्योंकि अमिफा कार्य धूम दीखे है । (२) "कारणोप लम्बि से वर्षा होगी जाते याका कारण यादल सघन दीसे है" ॥ (३) स्वमायोपलब्धि जैसे वस्तु उत्पाद-व्यप धौम्य स्वरूप सहित है ।। (अर्थात् यस्तु उत्पत्ति-विनाश अस्तित्व वा विधमानता स्वभाषवाली है अघ्याप ५ सूत्र ३०) क्योंकिमत्व स्वरूप है। मत्वका समाव ऐमारी है । इत्यादिक साघनके भनेक मेद श्लोकवार्विक में कहे हैं।

पटानिवासी जगरूपसहाय वकीस्कृय पद छेद और मिक्स्पर्य महित सपर्थिसिदिका शम्पा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र १३ R इति अन् अर्यान्तरम् Fill इस प्रकार (इस मतिमानके) अनन्तिर या नामान्तर (मति स्मृतिः संशा-पिता-अमिनियोष) है अर्थात मति, स्मृति, संक्षा, चिंता, अमिनिपोष, इनके शब्दभेद (के हेतु से वा नाममेदसे अर्थमेद होखे संते मी वरिप्रसिदके फ्लसे मतिके नामान्तर ही है। मालार्य जैसे इन्द्र (ऐश्वर्य क्रियावाला पचीपति) शक्र (शक्तिरूप क्रियावाला अभीपति) पुरन्दर (पुरका फाउनेहारा शचीपति) ऐसे इन तीन शन्दोंमें ऐश्वर्य-शक्ति-फाउनेवाले प्रियायोंके मेद होने पर मी एक शचीमाका नाम सममिस्डनय ( नाना अर्पको भेटकर एकही अर्थमें स्थापित करने वाली नीति वा रीति) की अपेक्षा (इन्द्र) ही है वैसे मति, स्मृति, संघा, पिसा, अमिनिपोष, सम्दोंका मिम मिम अर्थ होने पर भी एक मविमानके नामान्तर ही माने गये हैं क्योंकि ये सर्व एक मविज्ञानावर्णकर्मके क्षयोपशम से उत्पन्न होते हैं तिससे ये मविज्ञानही है अन्य (पदार्प) नहीं है ॥ सारांश यह है कि जैसे इन्द्र शक पुरन्दर न्यारी न्यारी क्रियार्योक करनेवाले को प्रकट करने परमी एक शचीपति काही नाम है वैसेही मवि-स्मृति-संक्षा निता अमिनिमोघ मन्प अन्य अर्थयोधक होने परमी एक मतिनान केही नाम है क्योंकि सप मनिपानावरणीय कर्मके धयोपशमसे उत्तम होते हैं। (३) मत्र विच इति प्रभारपाची है, सा पुाय मतिम प्रसार माना । जाते पदाथके प्रहपके शक्ति स्यम्पई पुरि कहिये। गरि मेया स्मृतिका प्रचार है। सात शम्बके रमरणभी शाकि मेघा कहिये है। परि मा चिताका प्रकार है। जति क्तिपणा निषेध स्थाप है। परि प्रतिमा उपमा गे गंगका प्रकार है। जति सामाम्य पदार्थ को मारश्य विसापने स्प है । परि समय अपत्ति ममाप प सार्यानुमानके प्रकार देशात ये सर्प सिंगही झानिये है। जया पचनिका मुद्रित पृष्ठ १४॥ (२) काएक मतावलम्बियोंफे अनुमार "मान दोपचारका है वस्तुमात्रको प्रमाश फरनेहारा निर्विकासक, समा (नाम) आदिको प्रकाश करनेहारा मपिफमा । पद (मयिकाक) साना, सशप मावि, सहति साश, नियर और अनुमय मादि मदसे कई प्रकारका " ५म. काप पृपया undelay stlidaself UANKalyticdg ME HAV- एटानिषामी जगरूपसहाय धकीलात परछेद और विमत्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका भन्दशा दिदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र १३ आदो यदुद्दिष्ट ज्ञान तस्य पर्यायशब्दा एते वेदितव्या । मतिज्ञानावरणक्षयोपशमान्तरनिमित्तजनितोपयो गविषयत्वात् । एतेषा श्रुतादिप्वप्रवृत्तेश्च ॥ मनन मति । स्मरणं स्मृति । सज्ञान सज्ञा । चिन्तनं चिन्ता । "ऐसे स्मृति आदिक यार कहे ते सर्व मतिमान है सो परोक्ष प्रमाण है। बहुरि आगमनामा परोस प्रमाण है सो भन्ज्ञानरूप है। "बहुरि हा अन्पपादी अर्यापस्पादिक प्रमाण मारा माने है त सर्व इस मविमानमें अन्तत होम है। ॥ मर्यप्रकासिका मुद्रित पृष्ठ ४३ ॥ पदच्छेद और विभक्त्यर्थसहित इस (तेरहवें) सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः हिन्दीअनुवाद ॥ भागे । यत् ॥ उदिष्टम् ॥ धानम् in =पहिले मो ( इस तेरहवा सूत्र में ) उपवेशकियागयामान ( अर्थात् मतिज्ञान ) तस्य : पपापना । -तिस (मविनान) के पर्यापशन्द-नामान्तर-अनान्तर-वामिषेपार्थवाची । यदिनय्या 1 मनित्रान = ये (स्मृति-संझा-पिता-अमिनियोघ) बानने पाहिये । मविज्ञान आवरण- =आवरणीय कर्मका घयापमम मन्नरंगनिमिप- षयोपशम अन्तरंग कारणसे जनित उपपोग-रिपयस्वात् ॥ - बन्प पा उत्पन्न हुआ वो उपयोग विस सम्बन्धी (ये मति-स्मृति-समा-चिता-ममिनिरोघ) हैं म नेप: अत: ॥ भूत- - और (च) क्योंकि इन (मति-स्मति सक्षा-चिता अभिनिगोष) की अप्रवृधि भवमान = यादिकमाना है ॥ मानना (मनन) अर्थात् मन, और इन्द्रियोंसे वर्तमानकालक्वीं पदार्य के अवग्रहादिरूप साक्षात् जानना सो) मनि । स्मरणम् ।। स्मृतिः ॥ =मतिन्नान है। सुघ ( स्मरण) (अति अनुमवित पदार्थोंका कालान्तरमें स्मरण होना) सो स्मृति है • नोडपमान वा प्रत्यभिमान (स्मृति और प्रत्पपके विपपस्त पदामि जोदप ज्ञान) (अर्याद वर्तमानमें किसी पदार्पको देखकर यह वही है जो पहिसे देखा था ऐसाजोदस्म भान) मना ॥ पितनम् ॥ म्सो सम्वाशन ह॥पितवन -किसी चिनको देखके पहाइस पिनवासामान्य होगा ऐसा विचार) सो पिता बावकमा म्याधिशाम पा सामा बाम है। - .. आदिशा मननम् ।। मानन् । सिका R SAXERCE अमिनिमोपनम् । अमिनिपाप एटानिवासी भगरूपसाय पीसकृत पदच्छेद और विमारपर्य सहित सर्विसिद्धिका सम्वधा दिदीबनुपाद अध्याय १ ख १३ अभिनिवोधनममिनियोधः । इति यथासम्भवं विग्रहान्तर विज्ञेयम् ॥ सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबललामात पर्यायशब्दत्वम् । यथा-इंद्र शकर पुरन्दर इति, इन्दनादिक्रियाभेदेऽपि शचीपतेरेकस्यैव संज्ञा । सम भिरुवनयापेक्षया तेषामन्तिरकल्पनायां साधन (-लिंग वा चिन्द या हेत)से साम्प (सिद्ध करने योग्य वस्तु)का धान (मांव सन्मुख चिनादिक देखकर उस पिनवालेका निधय करसेना सो) प्रमिनियोधाान पा सानुमान धान का अनुमान हान है (यहाँ भति-स्मृति-संवा-चिता ममिनिपोध शोंका माव साधनमें वर्ष किया है। इविक यथासम्भवम् ॥ विवा-अन्दरम् ॥ -ऐसे योग्यता पूर्वक वा योम्पवानुसार ( - यथासम्भव ) अन्य किया (समासके अर्थको बनानेवाले अन्यषास्य जैसे इनके करण साधन कर्तृ साधन) विधेयम् । प्रतिमेदे । जानना योग्य है। (मति-स्मृति-संवा चिंता-अमिनियोधके ) अर्थ (-प्रकवि) भेद सति अपिक सरि-पत-सामा " नोनेपर (- सति) मी (-अपि) डि (-प्रसिद्ध) की सामर्थ्य प्रापिसे पर्याय-छन्दस्वम् ।।१ या इन्द्रः ।। =मितिके) पर्यापशन का नामान्तर है। वैसे इन्द्र (-ऐश्वर्य मिपावाला अचीपति) सक' पुरन्दर चक्र (प्रतिरूप क्रियावाला शचीपति) पुरन्दर (-पुरके फाउनेवाला शचीपति) इति इन्दन- -ऐसे (इन तीन इन्द्र-शक-पुरन्दर श्रोंमें) ऐश्वर्य होनेरूप आदि किपा मैदे । अपि मुक्ति होनेरूप, फाइने (अथासमय) क्रियायोंके मेद होनेपर मी एकस्मनची-पतेः एष संज्ञा । सममिस्टनय -एक पषी मां के ही नाम सममिस्टनम (नाना अर्यको छोड़कर एक ही अर्थमें स्थापित करनेवाली नीति पा रीति की अपेक्षया : पाम् । अर्प-जन्तर-कल्पनायाम् ॥-मपेक्षा दिन (इन्द्र शक-पुरन्दर) के मिम मिल अर्थ माननेमें - ण्टानिषासी जगरूपसहाय पकीलच्च पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अन्दशः हिंदी अनुवाद । अभ्याप १ १३ आदो यदुदिष्ट ज्ञान तस्य पर्यायशब्दा एते वेदितव्या । मतिज्ञानावरणक्षयोपशमान्तरनिमित्तजनितोपयो गविपयत्वात् । एतेषां श्रुतादिप्वप्रवृत्तेश्च ॥ मनन मति । स्मरण स्मृति । सज्ञान सज्ञा । चिन्तनं चिन्ता । "ऐसे स्मृति आदिक यार कह ते सर्व मतिझान है सो परोक्ष प्रमाण है। पहुरि बागमनामा परोस प्रमाण है सो भुतज्ञानरूप है। "पहुरि हा अन्यवादी अर्यापस्पादिक प्रमाण न्यारा माने है ते सर्व इस मतिनानमें अन्तर्भूत होय है" ॥ मर्यप्रकाशिका मुद्रित पृष्ठ ४३ ॥ पदच्छेद और विभक्त्यर्थसहित इस (तेरहवें) सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः हिन्दीअनुवाद ॥ भादौ । यत् ॥ उदिष्टम् ।। मानम् ॥ =परिसे जो ( इस तेरहवा स्त्र में ) उपदेशकियागयामान ( अर्थात् मतिज्ञान ) नस्य ॥ पर्यायानन्दा ॥ -विस (मतिधान) के पर्यापसन्द नामान्तर-अनान्तर-वामिषेयार्थवाधी पते ।। यदित पाः ।। मतिनान = ये (स्मृति-समाचिंता-अमिनियोघ) जानने चाहिये । मतिमान प्रावरणीय फर्मका धयोपशम अन्तरंगनिमित- षयोपशम अन्तरंग कारणसे अनित उपयोग-विषयत्तात् - कप पा उत्पभ हुआ जो उपयोग तिस सम्बन्धी (ये मति-स्मृति-सन्ना-क्सिा ममिनिरोष) हैं च एन । अप्रवृत मत- और (च) क्योंकि इन (मति-स्मक्सिचा चिंता अभिनिवोष) की अप्रवृति पुतदान = आदिकसानोंमें है। मानना (-मनन) अर्थात् मन, और इन्द्रियोंसे वर्तमानकालपती पदार्थ के अवग्रहादिरूप साक्षात् जानना सो) मनि ॥ स्मरणम् ।। स्मृतिः - मतिमान है। सुध ( स्मरण) (अर्थात् अनुमपित पदार्थोका कालान्तरमें स्मरण होना) सो स्मृति है जोदरूपमान वा प्रत्पमिलान (स्मृति और प्रत्पपके विपपमत पदायोंमें बोररूप हान) (अर्याद पतमानमें किसी पदार्पको देखकर यह वही है जो पहिसे देखा था ऐसाजोइस्म हान) मुम्नास्तिनम् ॥ मो सम्भावान ह॥ चितवन -किसी पिनको देसके पास निवासामान्य रोगा ऐसा विचार) मो पिता माकपा माप्तिमान पा साना समान है। जावरण- % 3D ता - बादि | मननम् ॥ मदानन् । GRA पिता

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पगनिगमी जगरूपमहाप वकीलक्त पदच्छेद और विमक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिफा शम्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र १३ मत्यादिप्वपि म क्रमो विद्यत एव । किंतु मतिज्ञानावरणाक्षयोपशमनिमित्तोपयोग नातिवर्तत इति अयमत्राों विवक्षित । इतिशब्द प्रकारार्थ । एवषकारा अस्य पर्यायशब्दा इति । अभिषयार्यों वा । पति स्मृति सज्ञा चिन्ता अभिनियोष इत्येतेयोऽभिधीयते स एक एव इति ॥ ति प्रादिए । अपि मा । क्रम', विक्त T -मति आदिकमें मी वह निपम रीति-धानय (=क्रम) क्यिमान रक्ति: मति-धान प्रापरण- -ही है क्योंकि (=कित) (मति-स्मृति समा-चिंता अमिनियोघ) मविज्ञानावरणकर्मके पोपामनिमित-उपयोगम् : न० प्रति पतेत T अयोपशम जनित उपयोगको उलघकरि नहीं वर्तते हैं या नहीं छोड़ते हैं अर्थात इन पांचोंक अर्थ तो मिम है परंतु मतिनानापरणकर्मके पयोपमसे ये सप उपजते है। अत' सम मतिज्ञान के ही पर्याय वाची शम्द या नामान्तर माने जाते हैं। सारांश-जैसे इन्द्र-शक-पुरंदर न्यारी न्यारी क्रियाफे करनेवालेको प्रगट करने पर मी सममिस्टनयकी अपेक्षा से शचीपति के ही नाम है वैसेही मति स्मृति संघा पिता अमिनिमोघ अन्य धन्य अर्यों के पोषक होनेपरमी एक मतिज्ञानकही नाम उक्तनपसे हैं क्योंकि पांचों मतिझानावरमीय कर्मके धमोपशमसे उत्पम होते हैं। नि० प्रयक अपम् , अर्थ । विक्षित, -ऐसे यहां यह अर्थ अपेक्षा से किया गया है (विवसिता) निमदः । प्रकार अर्थ (इस सूत्रमें) इति शब्द प्रकारके निमिष (अ) हे अर्थात् मेदोंका पापक रम् अस्य प्रकाराः । पाप-सन्दा =ोसे ( एवम्) इस (मवित्रान) के (अस्म) मेद है (अकारा) नामान्तर अथवा (या) (इति शब्द मनमें) अमिषय अर्थवाची है अर्थात ति स्मृति' । मातिा ॥ ममिनिसोधः ।। अति स्मृति सम्मा पिता अमिनियोध ने नै । य॥ अप। अभिधीयत T इस प्रकार इन (शन्दों) करि जो अर्थ कहा गया है (अभिधीयते) । सो । एकाशिक म्एकी अर्यात प्रनिता.... . इनिक 10 अभिषय प्रया रणवा नामान्तर ॥

एटानिवासी जगरूपसंहाय वसंकृत पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सवाईसिदिका शमशा दिदी अनुवाद । अमाप १ च १५, अयास्यात्मलाभे किं निमित्तिमित्याह ॥ तनिन्द्रियाऽनिन्द्रियनिमित्तम् ॥ १४ ॥ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥ १४ ॥ इन्दतीति इन्द्र आत्मा तस्य स्वभावस्य तदावरणक्षयोपशमे सति स्वयमर्यान् गृहीतुमसमर्यस्य यदोपलब्धि निमित्त लि तदिन्द्रस्य लिंगमिन्द्रियमित्युच्यते ॥ अप अस्प गरी आरम-सामे । किम् निमित्तम् ॥ =अम (-अप) इस (मविधान) के स्वरूपके (आस्म) उपार्जन में फ्पा हेतु है इविक माह T -ऐसा (प्रभ होने पर) करते हैं कि तदिन्द्रियाऽ निन्द्रियनिमिचम् ॥ १४ ॥ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥ १४ ॥ यह (पूर्वोक्त मति-स्मृति-संघा चिता-अभिनियोघ इस्पादि शन्दरूप मतिमान) सद इन्द्रिम-भनिन्द्रिप-निमित्तम् ॥ (वहिरंग में) पांच इन्द्रिय और मननिमियक, वा मनबनित वा मनमन्प है अर्थात उस मतिज्ञानके उत्पम होनेके लिये स्पर्शन-रसन-प्राण-पक्षुः भोत्र मन ये है वाम कारण है पर अंतरंग मतिवानापरण कर्मका षयोपशम है ॥ मना, मंतः करम, अनिन्द्रिय (-किचितू पाईपद् इन्द्रिय, न कि इन्द्रिय रहित) है। पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित इस (चौदहवें) सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः हिंदी अनुवाद ॥ इन्दति T इतिइन्द्रः । आत्मा । =परम ऐचर्यरूप प्रतिा है (इन्दसि) ऐसा इन्द्र है वा (अर्यसे) चेतना है बारमा है। तस्प- स्वमावस्य प सद्भावरण-क्षयोपश्मे -तिस (आत्मा) के (ज्ञान) स्वमात्र को उस पानावरणीय कर्मके क्षयोपशम सति , स्वयम् अर्थान् । गृहस्तम् मोनेपर आपही भाप (-स्वपम्) पदार्थों को ग्राम (करने) के लिये असमर्थस्य । यद् अर्थ-उफ्लम्धि निमिघम् ॥ -मसमर्प (आत्मा) को जो पदार्थ लिगम् ॥ क्व-इन्द्रस्य । लिगम् ॥ इन्द्रियम् ॥ सो लिंग या चिन्ह है। यह बात्मा का चिन्द इन्द्रिय इतिक उच्यते । कहा जाता है । मावार्थ यह है कि पेवनके असरंग मतियानावरणीय कर्मक पयोपसम से पदार्थों के जानने की अंतरंग शक्तिं वो । जनापने का कारण RA is Tन अथवा लीनसय गमयतीति लिङ्गम् । आत्मनः सूक्ष्मस्यास्तित्वाधिगम लिममिन्द्रियम् । यया इह धूमो ग्ने ॥ एवमिद स्पर्शनादिकरणं नासति कर्तर्यात्मनि भवितुमर्हतीति ज्ञातुस्तित्व गम्यते ॥ अथवा इन्द्र इति नामकाच्यते । तेन स्पृष्टामिन्द्रियमिति । तत्स्पर्शनादि उत्तरन वक्ष्यते ॥ अनिन्द्रिय मनम्मतःकरणमि त्यनान्तरम् ॥ आत्मामें प्रगट हुई परन्तु वही मारमा पास उपकरम पिना बाननेको समर्थ नहीं हो सका है अता पदार्थाक बनावनेके लिये पाप कारणको इन्द्रिय कहते हैं। मया सीनम् ।। अयम् । गमपति इसिक अथवा गड वस्तुने बताता है (-गमयति-योधपति) ऐसा रिकम n पात्मन' । रामस्य । अस्तित्व अधिगमे । -लिंग पा चिन्ह है । चेतनकी गुड़ पा रदृष्ट क्यिमानता बानने में लिम m इन्द्रियम् ॥ ययाक + घमा :। अमेः । = चिन्द वा लिंग है सो इन्द्रिय है । जैसे यहां (=प्रह) अनलका धूम (लिंग) है एकदम पर्गन-आदि-करमम् आत्मनि =ऐसे यह स्पर्शन आदिक (पाँच इन्द्रिय) करम या साधन है सो चेक्न असति । परि । मयितुम् आति =क के न होने पर अस्तित्व वा दोनेकने (=मक्तुिम्) समर्थ नहीं है (न-ईति) इतिक मातुः अस्तित्वम् ॥ गम्पवे T =ऐसे धाता (जो आत्मा विस) की विधमानता इन्द्रियों फरि वानी बावी है अर्थात् सर्वन-रसन-प्राण-पक्षुः योस इन पांचों इन्द्रियोंका अस्तित्व यदि आत्मा न हो तो असम्भव है क्योंकि आत्मा कर्ता है और पाचों इन्द्रिय करम हैं मां विना करण नहीं हो सका है । इस प्रकार ये पांचों इन्द्रिय माता जो आस्मा है विसका अस्तित्व प्रफट करती है मयान्द्रा इति नामर्म उच्यते। =अथवा इन्द्र ऐसा नामकर्म कहा गया है तन ।। स्पृष्टम् । इन्म् ि॥ इति तत = तिस (नामकर्म) करि रचीगई है सो इन्द्रिय इसप्रकार है ॥ सो स्पर्शन समन आदि । उतरत्र • वस्पते T -रसन घाण-पधुरा-पोत्र यहांसे वागे (मध्याय २ एन १९म) कडेमे अनिन्द्रिपम् ॥ मनस् : अतकरणम् इति -अनिन्द्रिप-मन, अंताकरण ये अन् अष-अन्तरम् ॥ अन्य पदार्प नहीं है (पापयाची पद , एका पानी पद, समानार्थक) ASARA -- पित एटानिवासी जगरूपसहाय कीमत परम्छेद और दिमत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अम्दशा हिंदी अनुवाद । अप्पाप १ पत्र १४ क्यं पुनरिन्द्रियप्रतिपेयेन इन्द्ररि एव मनासे अनिन्द्रियशब्दस्य प्रवृत्ति । ईपदर्यस्य नत्र प्रयोगात। ईपदिन्द्रियमनिन्द्रियमिति । यथा अनुदरा कन्या इति ॥ कयमीपदर्थ ?! इमानीन्द्रियाणि प्रतिनियतदेश विपयाणि कालान्तरावस्थायीनि च । न तथा मनः इन्द्रस्य लिङ्गमपिसत्प्रतिनियत पुनः इन्द्रिय-पतिपेपेन : अनिन्द्रिय-सम्दस्प (प्रश्न) और (-पुनः) इन्द्रियका निपेष करनेसे अनिन्द्रियशम्दकी प्रवृति ॥ इन्द्र सि॥ एक मनसि ॥ कथम् । प्रति आस्माका चिन्द मन (बर्ष) में ही कैसे है अर्थात् जो इन्द्रिय न हो सो अनिन्द्रिय है वो मन बनिन्द्रिय कैसे है। (उचर) (इन्द्रिय रहित वा पर्चित अनिन्द्रिय नहीं है फिन्तु) अल्प पा किञ्चित् मर्मस्य ।। नामयोगाव। -अर्यम (इन्द्रिय शब्द) नञ् (अत्) समासके प्रयोग से ईपन . इन्द्रियम् ॥ अनिन्द्रियम् ॥ इति पथा • फ्त इन्द्रिय सो अनिन्द्रिय है। वैसे अन् उदरा ॥ कन्या ॥ इति. धन्-पेट पाली मारी ऐसे (पहाफर अन् नश्समास निपेघ अर्थमें नहीं है किन्तु ईपद् वा किम्बत् अर्थम है अनुदरा उस कन्या को नहीं करते हैं जिसमें पेट न हो परन्तु उस कन्या को करते हैं विफ़्का पेट पतलाहो, सीणो, को और बो गर्मधारगमें असमर्थ हो) कथम् पिस + अर्थ । इमानि Im इन्द्रियाणि in =(प्रश्न) किञ्चित् अर्थ कैसे है (उचर) ये (-मानि) (पांचौ) इन्द्रिय मति-नियत वेश विपाणि ॥ प० नियमित स्थान पाली (वस्तु को) विषय करती हैं और (च) कालान्तर-अवस्पायीनि ॥ कालान्तरमें (=मन्य २ कालमें) ठहरनेवाली हैं सर्वात सर्शन-रसन-प्राण-पक्षु' भोत्र पांचो इन्द्रियोंक एफ दूसरे से मिम मित्र स्थान है और मिम मिम विषय है और मिसकालमें अपने अपने विषयों से उपयुक्त न हों उसकालमें मी अवस्थित राती है वमा, मनस् ॥ इन्द्रस्य ।। लिगम् । प्रविनिपक -वैस मन यात्मा का (इन्द्रस्य) लिंग होवे पर मी (सव-मपि) माननिपत समक | आत्मनि । अथवा लीनाथ गमयतीति लिगम् । आत्मनः सूक्ष्मस्यास्तित्वाधिगम लिमिन्द्रियम् । यया इह घूमो ग्ने ॥ एवमिद स्पर्शनादिकरणं नासति तर्यात्मनि भवितुमर्हतीति ज्ञातुस्तित्व गम्यते ॥ अथवा इन्द्र इति नामकमान्यते । तेन स्पृष्टामीन्द्रयमिति । तत्स्पर्शनादि उत्तरन वक्ष्यते ॥ अनिन्द्रिय मन अतःकरणमि त्यनान्तरम् ॥ आत्मामें प्रगट हुई परन्तु यही आत्मा पास उपकरण विना जाननेको समर्प नहीं हो सका है अतः पदार्पोक अनावनेके लिये पाप कारणको इन्द्रिय कहते हैं। अपराक लीनम् । अथम् ,। गमयवि T इसि० अथवा गट वस्तुको बताता है (-गमपति-पोषयति) ऐसा रितम् ॥ आत्मन' । मदमस्य । अस्तित्व-अधिगमे लिंग का घिर है । चेतनकी गुढ वा रदृष्ट विपमानता जाननेमें लिगम् ॥ इन्द्रिपम् ll पयाइर. धूम' । ममे = चिर पा लिंग है सो इन्द्रिय है । वैसे यहाँ (=इह) अनलका धूम (लिंग) है पर्व० इदम् ॥ समन-आदि-करणम् =ऐसे या स्पर्शन आदिक (पाच इन्द्रिय) करण या साधन में सो चेल्न अमति : कतरि । भवितुम्बईति T न =फाक न होने पर अस्तित्व वा होनेको (-भक्तुिम्) समर्थ नहीं है (न-ति) इति० प्रात: अस्तित्वम् ! गम्यते T -ऐसे पाता (जो आत्मा विस) की विपमानता इन्द्रियों करि बानी बाती है अर्थात् सर्शनमसन-ग्राम-पक्षः मोख इन पांचों इन्द्रियोंका अस्तित्व यदि आत्मा न हो तो असम्भव है क्योंकि आत्मा का है चोर पापों इन्द्रिय करम हैं फां पिना फरम नहीं हो सक्ता है । इस प्रकार ये पांचों इन्द्रिय माता जो आत्मा रे विसका अस्तित्व प्रकट करती है अपराकइन्द्रः इति नामकर्म उच्यते। =अथवा इन्द्र ऐसा नामकर्म कहा गया है बन । सृष्टम् । इन्द्रिम् ॥ इति तत् = तिस (नामकर्म) करि रचीगई है सो इन्द्रिय इसप्रकार है ॥ सो सनन समन आदि । उतरत्र - वल्पते T -रसन घाण-चक्षु-भोग यहाँसे आगे (मध्याय २ सूत्र १९में) मे अनिन्दिपम् । मनम् ॥ अवारणम् । इति -अनिन्द्रिय-मन, अंतःकरण ये अन् अष-अन्तरम् । अन्य पदार्थ नहीं है (पर्यायवानी पद , एकार्प माची पप्प , समानार्थक) ANGLA -- एटानिवासी झारूपसहाय पीसकत पदच्छेद बोर विभवस्पर्य सहित स्वार्थ सिद्धिका अपना हिंदी अनुवाद । सम्पाप १ का १४ क्यं पुनरिन्द्रियप्रतिपेपेन इन्द्ररिले एव मनासे अनिन्द्रियशब्दस्य प्रवृत्तिः । ईपदर्थस्य नग प्रयोगात्। ईपदिन्द्रियमनिन्द्रियमिति । यथा अनुदरा कन्या इति ॥ कथमीपदर्य. १। इमानीन्द्रियाणि प्रतिनियतदेश- विपयाणि कालान्तरावस्थायीनि च । न तथा मन इन्द्रस्य लिङ्गमपिसत्सतिनियत पुनः इन्द्रिय पतिपेपेन । अनिन्द्रिप-शब्दप : -(प्रश्न) और (-पुन) इन्द्रियका निपेष करनेसे बनिन्द्रिमसदकी प्रवृति ॥ इन्द्र-तिमा एक मनसि ॥ कथम् . प्राधि आत्माका पिन मन (अर्थ) में ही कैसे है अर्थात् मो इन्द्रिय न हो सो अनिन्द्रिय है वो मन बनिन्द्रिय कैसे हैं। (उचर) (इन्द्रिय रहित वा पति अनिन्द्रिय नहीं है किन्तु) अस्प षा किष्मित अर्यस्प । नामयोगात् । अमें (इन्द्रिय पन्द) नम् (-अत) समासके प्रयोग से ईपद ० इन्द्रियम् ।। अनिन्द्रिपम् ॥ इतिक पया - पद इन्द्रिय सो बनिन्द्रिय है। पैसे अन् उदरा ॥ कन्या इति. वन-पेट वाली कुमारी ऐसे (महापर मन नझसमास निपेध वर्षमें नहीं है किन्तु ईपद् वा किम्चत् अर्थमें है अनुदरा उस फन्मा को नहीं करते है जिसके पेट न हो परन्तु उस कन्या को काते हैं जिपका पेट पक्लाहो, सीमहो, लक्षदो और जो गर्भधारणमें असमर्थ हो) कवम् क ईपत् • अर्थ । इमानि ॥ इन्द्रियाणि ॥ (प्रश्न) किञ्चित् अर्थ कैसे है (उचर) ये (ममानि) (पांचों) इन्द्रिमें मति नियत-देश-विपयाणि :m : नियमित स्थान पाली (षस्तु को) विषम करती है और (-1) कालान्तर-अवस्पायीनि ॥ -कालान्तरमें (अन्य २ कालमें) परनेपाली अर्यात स्पर्शन-रसन-प्राण-चक्षुः भोत्र पांघो इन्द्रियोंक एक दूसरे से मिन मिम स्थान हैं और मिम मिम विषयों और निसकालमें अपने अपने विषयों से उपयुक्त न हों उसकालमें मी अवस्पित रहती हैं वथा : मनस् ॥ इन्द्रस्य ।। लिकम् ।। प्रविनिपत -वैसे मन आस्मा का (इन्द्रस्प) लिन होने पर मी (स्तन्मपि मविनिपत अथवा नसर्थ गमयतीति लिङ्गम् । आत्मन सूक्ष्मस्यास्तित्वापिगमे लिङ्गमिन्द्रियम् । यया इह घूमो ग्ने ॥ एवमिद स्पर्शनादिकरण नासति कर्तर्यात्मनि भवितुमईतीति ज्ञातुस्तित्व गम्यते ॥ अथवा इन्द्र इति नामकमाच्यते । तेन स्पृष्टामीन्द्रयमिति । तत्स्पर्शनादि उत्तरत्र वक्ष्यते ॥ अनिन्द्रियं मन अतःकरणमि : त्यनान्तरम् ॥ आत्मामें प्रगट हुई परन्तु वही मारमा पाप्स उपकरण पिना बानको समर्थ नहीं हो सका है अतः पदार्थो जनावनेके लिये वाम कारणको इन्द्रिय कहते हैं ।। मथवा ठीनम् । अयम् । गमपति T इविक =अथवा गुड वस्तुको स्वाता है (-गमपति-पोषपति) ऐसा लिङ्गम् ॥ आत्मनः । महमस्य । अस्तित्व-अधिगमे । लिंग या फिर है। चेतनकी गुड या दृष्ट विद्यमानता बाननेमें तिम् ॥ इन्द्रियम् THI यया. इस घूम' । अग्नेः । =चिन वा लिंग है सो इन्द्रिय है । जैसे यहां (=इह) अनलका घूम (लिंग)ो एक इदम् ॥ स्पर्धन आदि-करणम् ॥ आरमनि ! =ऐसे यह सर्शन थादिक (पांच इन्द्रिय) करण या साधन है सो पेक्न अमनि । परि । मवितुम् आईति T न =कर्ताके न होने पर अस्तित्व पा होनेको (=मक्तुिम्) समर्थ नहीं है (न-मईति) इतिक मातम अस्तित्वम् ॥ गम्पवे T =ऐसे शाता (जो आस्मा विस) की विधमानता इन्द्रियों करि पानी बाती है अर्यात स्पर्शनरसन-प्राण-पचा श्रोतल पांचों इन्द्रियोंका अस्तित्व पदि आत्मा न हो तो असम्मव है क्योंकि बात्मा फर्ता है और पाचों इन्द्रिय करम है कर्ता विना करण नहीं हो सका है । इस प्रकार ये पांचों इन्द्रिमें मावा यो आत्मा है सिसका अस्तित्व प्रकट करती है अपराकइन । इति नामर्म उच्यते। =अथवा इन्द्र ऐसा नामकर्म कहा गया है सेन । स्पृष्टम् ।। इन्द्रिम् ।। इति स्तु = तिस (नामकर्म) करि रथीगई है सो इन्द्रिय इसप्रकार है । सो स्पर्धन समन प्रादि उतरण. पपवे T -रसन-प्राण-पत्र-प्रोग यहाँसे आगे (मध्याय २ सूत्र १९में) फमे अनिन्द्रियम् ॥ मनस् ॥ प्रकरणम् ॥ इति =अनिन्द्रिय-मन, अंताकरण में अन् प्रष-अन्तरम् । अन्य पदार्थ नहीं है (पर्यायवाची शप्प में, एका माची सर , समानार्पक) aln .

नटल पटानिषासी जगरूपसहाय : इहार्थमुत्तराय च तदित्युच्यते ॥ यन्मत्यादिपयायश ५५० ।- hts वायधारणा इति । इतरथा हि प्रथम मत्यादिशब्दवाच्यं झनामत्युक्त्वा इन्द्रियानिनियनिमित्त अतम् तदेवावग्रहहावायघारणा इत्यनिष्टमभिसम्बध्येत ॥ हकमर्थमा • उत्तर =(उत्तर) यहाँक लिये अर्थात इस सूत्रके लिये और (च) पात् वा पिल्ले अर्थम् । तद् ॥ इति० =(स्त्र) के लिये (अर्यात कहे जाने वाले पंद्वषां मूत्र के लिये) तद् (भाद) है।पेरो उच्यते T यद् ॥ मति आदि पर्याय सध्द == कहा गया है (कि) जो मसि स्मृति संमा विता प्रमिनितोष समानार्थक शम्दोपरि पान्यम् । मानम् ।। क्या इन्द्रिय वाच्य (कहे जाने वाला) धान है सो (मान) इन्द्रिय अनिन्द्रिय निमित्तम् ।। क् ।। = तथा अन्त' करण जनित है (और) यो.(मतिशान) एव • अक्प्रदर्ना-आपाय-धारणा' ॥ इति =ही अवाहनहा-आवाय धारणा रूप (देखोस्न १५)। क्योंकि (=रि) इवरपा विप्रथम मति-आदि = अन्यथा (तस् शब्द न लाया बाय वो) पहिले मति स्मृति सम्मा-पिता अमिनियोध सप्व-पापम् । मानम् ॥ इति उक्त्वा शब्दोंकरि वाच्य (= कईजानेवाला) मविज्ञान ऐसा करकर वा कपन करि इन्द्रिय-अनिन्द्रिय-निमिचम् ।। स्तम् ।। - इन्द्रियानिन्द्रिमनिमित्त (इन्द्रिव और मन बनिस) भूत शान है ऐसा समय होजाता उद-एव अवह हा आवाय-धारमा, इतिक - सावद (धान) ही अपग्रहहा-आपाय धारणा (सन १५) रूम है ऐसा अनिष्टम् ॥ अगिमम्मध्येत T - विरुद्ध वा प्रतिकूल सम्पन्ध वा प्रसंग हो जाता यदि इस सम तद् अम्द न लावे) सारांश'-"इन्द्रियानिन्द्रियानिमित्त ऐसा स्त्र दोसा तो वद् शब्द का लाम होजाता (उच्चर) पादिके दो मनिशान और श्रुत्तमान परोक्ष है (देखो मूत्र ११) मति-स्मृति- सना चिंता अमिनियोघ ये मविके पर्यायसम्द है (मत १३) अप यदि वन शन्द न लाते तो (यथा संख्य के नियम से) इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्त का संबंध तवान घोपा सममें है) उससे होकर यह अर्थ होता कि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय जन्म पुनशान है पमात् Rasad 10 मकालान्तर पगनिवासी जगरूपसबाप वकीलकून पद और विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशा हिंदी अनुनाद । बम्पायर मंत्र १४ देशविपयं कालान्तरावस्थायि च। तदन्त करणमिति चोच्यते । गुणदोषाविचारस्मरणादिव्यापारेषु इन्द्रियानक्षत्वानक्षुरादिवद् वहिरनुपलधेश्च अन्र्तगत करणमित्युच्यते ॥ तदिति किमर्थम् ? । मतिज्ञान निर्दगार्थम ॥ ननु च तदनन्तर अनन्तरस्य विधिवी भवति प्रतिपघो वेति, तस्यैव प्रहण भवति । ' विपर -स्थानवाला (और प्रतिनियत ) विपयवाला और कालान्तरमें वा अन्य अन्य कालमें आस्थायि । न त । अवस्थित रहनेवाला नहीं है अर्थात् मन पंचल है । षह (-स्व-अनिद्रिय-मन) अन्तःकरणम् । पति० १० उम्पते। -अन्त करण या अम्पन्तर इन्द्रिय ऐसा मी (नाम) है। गुण-दोष विमार-स्मरण-आदि-व्यापारेषु । इन्द्रिय-गुण-दोपके विधारण वौर स्मृति आदि व्यवसाय वा उयोगमें इन्द्रियोंकी अन् अपवतान् ॥ १० चक्षुरादि-वत्स अपेक्षा न होनेसे क्या (=च) नेवादिकके सम्म (मन अन्य मनुप्पों द्वारा) परिम. अन् उपलब्ध । अन्तर्गतम् ॥ करमम् ।। आपसे न देखे जानेसे (-अनुपलम्बे.) या न जानेबानेसे अन्तर्गत इन्द्रिय अन्न'परणम् ॥ इति उन्पत T (वा) तकरण वा मन ऐसा कहा गया है (ऐसे पत् भर्य अनमें सम्भव है) न ॥ इति० किमयम् ॥ मतिधान निर्देश (इस स्त्रमें) तद् ऐसा शब्द किस लिये है। (वव शम्द) मविधानके कपनके मधम्ननु० च. अनन्तरम् । लिये है। और (च) प्रश्न (=नन)। वा (मविज्ञान भन्द इस सत्रके) लगवाही है (अर्थात् इस पके अत्यन्त समीप लगता ही मतिस्मृतिसम्हाचिन्तामिनिबोध इत्यादि सूस कर चुके हैं तिस सूत्रका मवि शब्द इस रसके लगता ही है बप एक पन्न के पीछे दूसरा सूत्र बायै वो दूसरे सूत्रसे पहिले सत्रफी) मनन्तरम्प विधिः । वा भवतिा प्रतिपेषा अत्यन्तसमीपती (वस्तु) का विधान होता है या निरोप ऐसा (परिमापा रस)। -(अतः इस सूघमें पिना तत् सम्द लाये हुये) विस (मविज्ञान) का ही भावान होता है (इसलिये इस एपमें तत् शब्द निरर्यकही। नस्प एवप्रामम् । भावित एटानियासी अगरूपसहाय यकीकृत पदच्छेद और पिमस्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दमा दिदी अनुवाद । अन्माप १ सय १४, इहार्यमुत्तरार्थं च तदित्युच्यते ॥ यन्मत्यादिपर्यायशब्दवाच्य ज्ञानं तदिन्द्रियानिन्द्रियानिमित्तं तदेवावग्रहेहा वायधारणा इति । इतरया हि प्रथम मत्यादिशब्दवाच्य ज्ञानमित्युक्त्वा इन्द्रियानिनियनिमित्त श्रुतम् । तदेवावग्रहहावायधारणा इत्यनिष्टमभिसम्बध्येत ।। वर्षम प.उपस (उत्तर) यहाँके लिये वर्षात् इस सबके लिए और (च) पात वा पिसे अर्थम् । सन् ॥ इति (पत्र) के लिये (अर्थात कहे जाने वाले ग्रहया सत्र के लिये) तद् (शब्द) है॥ऐरो उच्यते T यद । मति त्रादि-पर्याय शब्द = कहा गया है (कि) जो मति स्मृति संज्ञा मिता अमिमियोप समानार्थक शब्दोंवरि वान्पम् । भानम् ।। क्व ।। इन्द्रिय वाच्य (कहे जाने वाला) नाम है सो (धान) इन्द्रिय अनिन्द्रिय निमिषम् ॥ उद् । = तथा अन्त' करण जनित । (और) पो मितिमान) एव . जवाहनहा-आगम-धारणा' ॥ इतिः ही अवहनहा-आवाय धारणा रूम देखो.स्त्र १५) है क्योंकि (=हि) इवरवा दिप्रपा मति-आदि = अन्यथा (सत् शम्द न लाया बाय वौ) पीले मति स्मृति-सत्रा-चिता अमिनियोध सम्द वानम् ॥ धानम् ॥ इति उक्त्वा ब्दोंकरि वाम (= कहेनानेवाला) मविज्ञान ऐसा कहकर वा कपन फरि इन्द्रिप-अनिन्द्रिय-निमिचम् - इन्द्रियानिन्द्रिमनिमिर्च (-इन्छिन और मन बनिस) पुत शान है ऐसा संबंध बोजाता सद-एच० अवग्रहदा आवाय-पारमाः । इति =ोवा एखान) ही अवग्रहहा-पाय धारणा (सन १५) रूपये ऐसा अनिष्टा ।। अमिमम्मध्येत T - पितु वा प्रतिटन सम्बन्ध वा प्रसंग हो जाता यदि इस पत्र वद शब्द न लाते) सारांश'--"इन्द्रियानिन्द्रियानिमित्त ऐसा स्व होता ते पद पद का लाम होजाता (उत्तर) आदिके दो मतिज्ञान और पुडान परोक्ष रे (देखो मत्र ११) मति-स्मृति सज्ञा चिंता भमिनिमोघ ये मति के पर्यायसन्द है (सन १३) अब यदि तव शब्द न लात तो (यया संख्य के नियम से) इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्त का सनंघ सज्ञान सोया स्त्रमें है) उससे होकर यह अर्थ होता कि इन्निय और अनिन्द्रिय जन्य भुवमान है. पथात् THI एनिवासी जगरुपमहाप यकीलकृत पद और विभात्पर्य सहित संवर्थिसिदिका भन्दा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ प १४ देशविपयं कालान्तरावस्थायि च। तदन्त करणमिति चोच्यते । गुणदोपविचारस्मरणादिव्यापारेषु इन्द्रियानो परवानभुरादिवद् वहिरनुपलधेश्च अन्र्तगतं करणमित्युच्यते ॥ तदिति किमर्थम् १ । मतिज्ञान निर्देशार्थम् ॥ ननु च तदनन्तर अनन्तरस्य विधिवी भवति प्रतिपयो वेति, तस्यैव ग्रहण भवति । देशविपर -स्थानवाला (और प्रतिनिफ्त) विपपवाला और कालान्तरमें पा अन्म अन्य कालमें in चकालान्तर आस्थापि नकल अवस्पित रहनेवाला नहीं है मर्माद मन पंचल है। यह (--अनिद्रियमन) अन्त करणम् ॥ इति० प. उपदेश अन्तकरण या बम्पन्तर इन्द्रिय ऐसा मी (नाम) है। गुण-दोष चिनार-स्मरण-आदि-व्यापारेष । इन्द्रिम-गुण-दोपके विचारण धौर स्मृति आदि व्यवसाय वा उपोगमें इन्द्रियोंकी अन् मपवतान् ॥ १० पक्षुरादि-चत्य अपेक्षा न होनेसे पषा (1) नेवादिकके सास (मन अन्य मनुप्पों द्वारा) पहिम, अन् पलम्प ।। अन्तर्गतम्॥ फरमम् । आपसे न देखे बानेसे (अनुपलब्धे!) वा न जानेबानेसे अन्तर्गत इन्द्रिय अन्त परणम् । इति उन्पत T =वा) अंतकरण वा मन ऐसा कहा गया है (ऐसे ईपत मर्म अनमें सम्मष है) मा ॥ इति० किमयमा मतिमान निर्देश (इस इनमें) तद् ऐसा मम्द मिस लिये है। (तद शन्द) मविज्ञानफे कपनके मधम् । ननु पकता अनन्तरम् । लिये है। और (घ) प्रम(नन)। यह (मविधान भाद इस स्त्रक) लगवाही है (अर्थात् इस सूत्रके वस्पन्त समीप लगता ही मतिस्मृतिसम्बाचिन्तामिनियोधा इत्यादि सत्र कर चुके हैं विस स्त्रका मति शब्द इस स्वके उगता ही है सप एक पत्र के पीछे दूसरा न आवै वो इसरे सूत्रसे परिसे सूत्रकी) भन्न विपिपा मतित प्रसिपेषा-अत्यन्तसमीपती (पस्स) का विधान रोता है वा निषि ऐसा (परिमापा स्त्र) है नस्य एष: प्राणम् ।। (अता इस एनमें स्निा तत् सम्म लाये हुये) विस (मविज्ञान) का ही बादान होता है (इसलिपे इस पत्रमें तत् पद निरसी) Sasa माति एटानियासी अगरूपस्खा कीसकत परच्छेद और विमस्पर्व सहित सार्षसिद्धिका सपना हिंदी अनुसार । अपार १ मा १५ विषयविपयिसन्निपातसमयानन्तरमाद्यग्रहणमवग्रह । विषयविषयिसन्निपाते सति दर्शनं भवति तदनन्तर- मर्यस्य ग्रहणमवग्रहः। वैसे नेत्र इन्द्रिपके अहपमें बापा जो से खेत है ॥ (२) महुरि श्वेत रूप जाने हुये पदार्य में विशेष आननेकी आकांक्षा मो यह श्वेत है सो पाक्ति होना चाहिये अथवा श्वेत धुधा होना चाहिये इस प्रकार का होना सोहा मविज्ञान है। ऐसे ही मन्दादिकॉम अन्य इन्द्रियों द्वारा ईहा होती है । (३) हाकरि जाने हुये पदार्पका विशेष निर्णय होनेसे बैसा पदार्थ दो तिसमें सैसा ही निभय होना सो अवाय मसिझान है। जैसे बगुला ( पगला-पग-पक)की पंक्तिमें पगलोंकी पंक्तिहीकी मान्नेरूप इच्छा थी परंतु यमाका निषेध नहीं किया था ऐसा तो ईहा शान था । अब ऊंचा नीचा भावना पंसोका सावना इत्यादि क्रिया घिनकार ऐसा निषय हुआ जो ये पक पंकिही है अन्य धुवादिक कुछ मी नहीं है ऐसा निमय पान अवाम है (४) अवाक्करि निश्प या निर्णय किया को वस्तु उसका ऐसा वधान होना जो मिन भिन्न कालमें वा कालान्तरमें मूलना नहीं सुफानी है उसको धारण धान वा धारणा मतियान करते हैं। पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित इस सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद ॥ पिप-सिपिन- -विषम (सदस्पादि) अक्वा इन्दियार्थ और पिपयी वा विपक्चाले (पोमान्दिय और मन) निके सन्निपा समय-अनन्तरम् ॥ संबंध होने के समयसे समताही (अनन्तर) आप-रणम् ॥ ववमहा। अयम ग्रान वया जो पहिलेही ग्रहणमें आप (सो) अयग्रा है (अर्थात) विषय-विपमि- (सर्व रस-गंध-रूप-मन्द ) विपय और विपपको ग्रहण करने वाले पांच इन्दिय और मन समिपाते आप वा संयोग होने पर (सति) (किसी वस्तु के) सघा पा होने मात्रका अहम दर्शन नोवा है। उस (दर्शन)के लगता ही अश्या अत्यंत निकट (अनन्सर) पर्यस्य ।। प्राणम् ॥ क्या। पदाका ग्रहण सो अवग्रह है। सति । दर्शनम् ॥ मवति T तद्-अन्तरम् ॥

इविकता अराए- ॥ अवग्रहहावायधारणा ॥१५॥ इस भुक्की अनुपधि १५३ स्त्रमें जाकर इस१५ सम्मका अर्थ होजाता कि अपग्रह ईहा- मवाय-धारमारूप भूतवान है, ऐसे अर्थ विरुद्ध हो जाता अत' उस शब्द लाये हैं। गरम निमात-उत्पमि निमितम् ॥ -ऐसे (मसिवानके) उत्पन्न होने का हेतु जानागपा (परन्तु मतितानके) अनित-मेदम् =मेद वा विधान नहीं जाने गये इस प्रकार (प्रभ होने पर) उस (मविज्ञान) के भेद प्रतिपक्ति-अर्थम् । माइT =मेदोंको बानने के लिये ( आचार्य वपर सतमें ) करते हैं कि सूनम् अवग्रहहावायधारणा ॥ १५ ॥ ग्याय (पूर्वोक पांच इन्द्रिय और अनिन्द्रिय बनित मतिनानके एक होने पर मी) अग्रिम अवग्रह (पदार्यके सचामात्र जाननेके पीछे श्वेत कप्णादि विशेप विकल्परूप मान) दहा (अवग्रह से जाने हुये पदार्यके विशेप बाननेकी आकांक्षा रूप ज्ञान) अवाय वा अपाय (ईहासे जानी हुई वस्तुका अषधारणरूप वा निषयरूप शान) धारणा (अवायसे जानेहुये पदार्थको अन्य कालमें न मूलना, सुध रखना (ये चार मेद) मावार्य -जो इन्द्रिय अर इन्द्रियके ग्रहण योम्प विषय के संयोग होते ही मो वस्तु मत्तामाय का ग्रहण सो दर्शन है जैसे एप्टिके पडते ही वस्तुका प्रकास मात्र निर्विकल्प में आया सो चक्षुर्दर्शन है। ऐसेही कर्णादिक पार इन्द्रियोंके दारं सामान्य विकल्प रहित ग्रहण होम सो अभक्षुर्दर्शन है । और विस (दर्शन ) के लगता ही वो देसेहुये पदार्थ का वक्न संस्थानादिक विशेप ग्रहण में आयै सौ अपग्रह नामा मतिधान है ।। (Onागर मानापरे "समाष्प ख्याधिगम सबने अवाप और आपाय' दानों पाठ है। शेष पाठ दानों मानार्यों में एक है अथ भी एक है। (२)विक पान विना मयप्रहर नहीं हा मस्त किंतु भवप्रा पूर्वकही जाते हैं इसपिये भवाह मारिवारों भर्मि मामे पहिम अपमह का ग्लेगमपार मौर पारणारा पूर्वक हाते है इस लिए मवप्रहके पात् हासन है धारणा मान अयाप पूर्वकाम मिपे हाके पीएमसावधापा । पारपा पान मस अवम होता है इसलिये सब अवमें पारणा मान एकागपारे। इमप्रकार उत्पत्ति क्रमकी अपेक्षा भवमाशिम रमे पारणा एटा निवासी अमरूसहाय पीला पदच्छेद वोर विमक्स्पर्य सहित साधसिविका नशा हिंदी अनुवाद । अपाप र १५ विपयविपयिसन्निपातसमयानन्तरमाद्यग्रहणमवग्रह । विपयाविषयिसनिपाने सति दर्शनं भवति तदनन्तर मर्यस्य ग्रहणमवग्रहः। बैसे नेत्र इन्द्रिपके ग्राम में पाया जो ये श्वेत है ॥ (२) बहुरि श्वेत रूप जाने हुये पदार्य में विशेष माननेकी बाकांक्षा मो यह खेत है सो पंक्ति होना चाहिये अश्वा श्वेत घुजा होना चाहिये इस प्रकार इच्छा होना सोईसा मकिशान है। ऐसे ही शम्दादिकोंमें अन्य इन्द्रियों द्वारा ईसा होती है ॥ (३) शिकार जाने हुये पदार्थका विशेष निर्णय होनेसे जैसा पदार्थ हो तिसमें सैसा ही निधय होना सो अवाय मतिज्ञान है ।। जैसे पगुला (बगला-का-प)की पक्तिमें बगलोंकी पंक्तिहीकी आग्नेस्म इछा थी परंतु चबाका निषेध नहीं किया था ऐसा तो ईहा शान था । अप ऊंचा नीचा शाक्ना पंखोंका हलाना इत्यादि क्रिया फिनकार ऐसा निमय हुआ जो ये पक पंकिही है अन्य धुबादिक कुछ मी नहीं है ऐसा नियम मान अवाम है (४) अवाक्करि निश्य वा निर्णय किया जो पस्तु उसका ऐसा मान होना बो मिन भिन्न कालमें या कालान्तरमें भूलना नहीं सुफानी से उसको धारण शान वा धारणा मविज्ञान काते हैं। पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित इस सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद ॥ पिफक्सिमिन् -विषय (सब्दरूपादि) अथवा इन्द्रियार्य और विपयी पा विषयपाले (पापान्दिय और मन) निके समिपा समय-अनन्तरम् ॥ संबंध होने के समयसे रुगताही (अनन्तर) आय-प्रानम् ॥ अवाहा। अपम ग्राम अषया जो पहिलेही ग्रहण, आय (सो) अक्ग्रह है (मास्) विषय-रिपमि- (सर्व रस-धि रूप-अन्द ) विषय और विपपको ग्रहण करने वाले पांच इन्द्रिय और मन । समिपावे । सति । दर्शनम् ॥ संबंध वा समग होने पर (-सति) (किसी वस्तु के) सत्ता या होने मात्रका ग्रहण दर्शन होता है । उस (दर्शन)के लगता हो अथवा अत्यव निकट (अनन्सर) अर्षस्म । नापम् ॥ अवा। पदाका ग्रहण सो अपग्रह है॥ भवसि T रुद् अन्तरम् ।

जगनिगागा नागणाप पीरन पदच्छेद और मित्यर्थ सहित सार्थसिदिका सदर विदीअनुवाद अध्याय १ सय १४ यगा नशुपा शुभ रूपमिति ग्रहणमवग्रह ॥ अवगृहीतेऽयं तद्विशेपाकाङ्क्षणमीहा । यथा-शुक्लं रूपं कि पलाम पतामेति ॥ भावार्य - किसी पदार्यका इन्द्रिय और मनके संबंध होने से उस वस्तु के दोन वा सघा मावको जानना सो दर्तन है। दर्शनके पभाव ही पा लगता ही यस्तुका सेस अस्मादिरूप विशेषशान सो अपग्रह नामा मतिशान है पथा , पापा , गाम् ॥ म्पम् । इति गृहणम् जैसे नेत्रकरि श्वेतरूप इसप्रकार आदान गा गरम परण" । अाग्रह गृहीत । अर्थे । वद् सो अवग्रह है। अपग्रहरि ग्रहग किये गये पदार्थ में उस पदार्थ के शिप्राहाणम् गदा =अधिक या विशेष (जानने) की अमिलापा वा पांछा रूप मान सो ईहा है पपा • गुरम् ' रूपम् किम् पलाका ॥ पताका ।। इति = जैसे यह श्वेत रूप क्या क श्रेषी होना चाहिये (अथवा) घना । (१)या और मंगनमें पह अन्तरमि संशय पान तो वाय पसमें अनिधित मान है अममाण गरिहा एबीसमें पक्षिारूप मान है जापति ना उमदीकी आमनी न्यासा पताका है ता उमदको जाननेडी अमिसाया है। बादार साप पानमें न आने वगुलाकी पाती न जाने पताग॥ १ ननु रामपणानं मचितुर्गति पिलाका पतामेति उमयकोटीपरामर्शप्रापयत्वात् , सिमसामानवत् । या पामा प्रामा पपिति न मिताम् । देतारमियः । तस्या मरितम्यताप्रत्ययसरयेन उमाबाटो ग्याशियपत्यापटमात् । किं बाका पता- पनि गर्न गु निनावापद नामुरूम् । तपसारपत्र गया मवितमिति तात्पर्यम् । किं पातपन घ पताकपा मषितम्पमिति मयमय प्रोसिरिति पत् प्रामशास्त्र मानमार्गयाणां मटियानव्यायामापमरे मीमामा परिणपरतयेव निपित्यात् ॥ ययादि तप मापदप र तामिति मानेऽर्ष विदोपस्य भानापस्य पताकाम्यस्य या पधापस्थितस्य आक्षापाय ममितव्यमिति मषितप्पतामात्पबम्पा पमा गन्नम्माना हान शितीय मानमवेत् । मप गतामा विमानमारमना ममम ममम मषिवम्फामति भक्तिप्यताम्पमा AsaxESO एटानिवासी जगहेपसामि tra छे गौर विमात्पर्य सरिवासिविका भन्दा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय १५ म HTROOOK मात्रामा समाम मिती कान भवेव । पमिम्तिमान्तर विपयेषु मनोविषये च मपनी पमा पस्थितम्प वियोगस्प माणसाइपा दिति सितार । मतिमामावरण मयोपशामत्यातम्यमेन मायोमेव समात् ॥ अस्मिन् सम्पारणे या तापापविः संशयस्य पणत्रयो पतामा भवितव्यमिति विपर्याप मिथ्यावागसमक्वारम् । अनुहार संशपालमा मष्तुिस्सहति T -प्रशामा संदेवान हाना चाहिये वा होना शेष। भवितुम वर्षमूत रूपात है) बिमा साकारला विश्वमातीपम-योंकि यह ऐनी (1) पजा पेसा पामों पर अपयन नेश प्रत्यमत्वात् ।। मसियसराय मागवत् । -बाल हाने या प्रतीति होनेसे प्रारकरि सशपशान साप है। -सपरमी (पाच) अहि दोनों पक्ष रामेपरमी इस (प्रमाणस होम देश है व्यापापम् अस्या प्रामा इति-रिता । -पेसा संदेश (भाषाप करते मय चाहिये । प्रश्नहाभावार्य यह पछि पापया ऐसा घिमार होनेसे संशयानमा पारिये, उचर यह है कि बोनों पसमें विचार मानेपर मी हिाको संशयपान न करना चाहिये। देता। मस्तिो -(क्योंकित (मापन) की सिपि मा हाती मारांश पाकिहानको समयमान माने लिये मो हेतु "दोहोरि परामशी बान होने दिया पर असियदेलामाल । तस्यामिवितासा- बेना -योकि विस (हा) के दोनेकी (मविकाता) मतीवि सफा से समय-फोती पाशि प्रस्पया त्वमममात् | -मोनो पक्षमाम्मी पानापन होना नहीं भटता रेवा महीपमा|| किम बाह्य पठाइति वचनम् ॥r - राम की पहिरे (वा) अशा पेम्स बाप तो (-3) मिकापरप-मर्पकम् -हाके) दो उदाहरण (-निपत) दिसमाने के लिये कहा गया।

गनिमी नगगणााय पीरकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्धिसिदिका उम्दा विवीअनुवाद अध्याय १ सन १४ यगा चक्षुषा शु रूपमिति ग्रहणमवग्रह ॥ अवगृहीतेय तद्विोपाकाङ्क्षपीहा । यया-शुक्ल रूपं कि पला पतारेति ॥ PORxOr । मार्य'- किसी पदार्थका पद्रिय और मनके संबंध होने से उस वस्तु के होने वा समा मायको जानना सो दर्शन है। दर्शनके पधात ही पा लगता ही वस्तुका शेत अरुणादिस्प विशेषतान सो अवगर नामा मतिधान है गया + गभुगा ' 'गम् ।। पम् । इनि गृहणम् -जैसे नेग्रकरि श्वेतरूप इसप्रकार मादान पा गृहण गरम पार गृहीत अर्थे । तद् सो अवग्रह है। अक्प्ररकरि प्ररण किये गये पदार्प में उस पदार्थ के शिशाकावणम् , या =अधिक या विशेप (जानने) की अभिलापा या वांछा रूप शान सो ईहा है पया • गाम् ॥ पम् किम् फलाका ॥ यतारा ॥ इति =जैसे यह पत स्प क्या पक श्रेमी होना चाहिये (अथवा) ध्वजा । (Uऔर गाय नमें पह मम्मर है कि सराय पान तवाय पलमें अनिषित पानी मममाण है पारि हा एकही दसमें पक्षिारूप पानी माmast साउदीमी जाममायामा तारादा उमदीकी जाननेकी अगिला है। संशय शानमें न जाने घगुनाकी पाती म जाने पतामा। ननु रामायन मयितुम्मति दिपठान पतामेति उमयकोटीपरामशप्रत्पपावाद, प्रमियसंशयानवत् । तया मम प्रामाणमिति नक्लिासग। दताामियो । वस्या मस्तिग्यताप्रस्पयस्येन उमरकाटोरशिप्रयरूपत्याघटनात् । कि पलास पता पनि पपने गु निदर्शनापपर्शमामुळम् । तथा चरितारपान वाया मविसम्पमिति तापम् । किपातकेयन व पताच्या मषितप्पमिति तान कपमेग प्रोतिपिति पत् प्रणाम पनि मानमर्मयाणा मविधानण्याख्यानापमरे धीमदभापरिवरसव निरूपित्यात् । यथादि प्रय भाप्रपाले प्रतमिरि गान विशेष पसाभरपस्य पताकाम्यस्य या यथापस्थितस्य मासा, या ममियप्पमिति मषितप्पतामत्पपापा पागलपेगमरमानासारण दिलीप मानमवत् । अपय मतामा विषामालमा उताचमना सनम पत्ता मपितम्याति भवितरपनामत्स्यममा एटानिवासी जगरूपसहाय कास्कृत पपच्छेद बौर पिमस्पर्प सहित स्वायसिविका भन्दा दिदी अनुवाद । बम्पाम १४ १५, OM पपर। इन्द्रियाम्वरपिपये -इस पर अम्प (स्पर्शम रमन, प्राण मोत्र)न्द्रियों के विक्योंमें मनमपिपये -मौर (-१) मानिन्द्रिय विषयों पा मम्वः करम गोचर (पस्तु) में भवप्राग्रहीते 1 पपायरिफ्तस्म ।। -मपमा पानसे प्राप किये गये या जाने ये (पदार्प) में यया भवस्थित (पदार्थ) विडोपस्प"मासापाहा इति नियम्यम्॥-बपिस (जानने) की पाम्रपान इस प्रकार मिमप किया जाना चाहिये (वा) मविपान-मापरयापशमस तारतम्यमेदेन । -मतिमापरपीप कर्मक सयोपशमके म्यूमाधिक्य मेवफरि अपमह हा भागयोमेवसमवाव ।। अस्मिन् , -ममहहा मानोंक मेव संमवीस सम्पयामप्रकरण का पाठ पताका -सुमामो मपिकार में गुठोंडी पाठी है भयवा पारे पातिक संशयस्य बाबाकायाम् । -ऐसे संतो की या पधेची में पताम्या : मषिम्यम् ॥ इति विपर्पपस्य॥ -पताका बली चाहिये पेशे विपर्यय मिप्यायामपसन्अवतराद । -मिमा मानव मवार (प्रसंम) मही दोषण।। प्रश्न और पपरका सारांश पह सजीयापक पंकिपाको संशय सान हुआ। उत्तर में से है किदा सान के दो उदाहरण दिये हैं मानवाला नको देवकर यामही करता है कि वह पावक पंधि है पाया करता है पा विधारणा है फि पहवेत पस्तु पता होना चाहिये, यक पंक्ति होना चाहिये । उमका सान दो ओर नहीं जम्सादिम माने चमा है कि न जाने क लिहे उपदो ओर जाने वाले मामको संशर माम कहते है यजा होना चाहिए, पर पंजियोन्य पारिये पेसी को हा करते है (२) दूसरी पात है कि यहाँ सम्पविमान या प्रकरण है और मा सम्पवान का भेद ,संथप जो मिप्यामान सपा मफ्तरणका प्रसंग नहीं जाता। (मरण पै कि मप्रिम पृष्ठ ३६८ में लपाप और मयाप लोकार के पाठोके मामले में को पोर नहीं क्योंदिया पुल्य दमिनीही। मिस ममय ऐसा अपाय निषेप किया जाय है उसममय 'उत्तरी है। इस मर्यसे अयाय पानसे प्रहण होब और जिस समय यह उत्तरीम पसे पदार्यका महण होता है इस समय 'यह दक्षिणी नहीं है इम पदार्थ का निपेष दो जाता है इस लिये अपाय और अपाय पह दोनों प्रवर का पाठ है और पामीरमरण रहे कि जिस पदार्य को जाना जाता है पर विषय है और जिसके द्वारा मान्य मावा यह विफ्पी का जावा इन्द्रिय कारा पदार्थ माने जाते है इस सिपे पहा विषयी शम्पसे इन्द्रियों का प्रप कौर विश्व का सर्य पद पर नाविक त.. किस IIRO ||ति अत्र • माया । जैसा कि (-तथा च) क्या गुलों की पक्कि ऐमारे पापम्पति मपितणपति • मायम.म. किम् ।। -अवश्य होनी चाहिये (-मषितमम् ) ऐसा नाशय । और (प) क्या पनाका अर, पतकया । मरितय्यम् Iगा -यजा ऐमारे यहां पताका मवश्य होनी चाहिये। नितारापमा -ऐसा आशय है भावार्य यो पगुठों की पाति वोटसहीकी सामने और हैजो पसाबाहे वो उमहीकी जानमकी माम्म पेसा पपस प्रहप्प हावाम है। माम * पति पति पेत् । -कमे पर विश्वास हो (किहा जान पक्पस प्रहण करता है) पेमा संदेह है। प्रापमा TEAO मागणायाम् • मतियान =(उत्तर) प्रमपणा प्रथमें शाम मागमा वि मतिधान न मागरे । भीमद गमपमरि-यय । - वणन के प्रसग में श्रीमद् अभयपरि श्रेष्ठ द्वारा मा.प. निरुपियवान् गा पाहि तद्- =dमाही म्पश्याम वामपन दिये जाने से (प्रतीत होती जमा किमह माया आमदारमा वेवम् गारति. -शान है। अब प्रहमान करि परशुली ऐसा ने । म । यिोगस्य गलाकारपस्य। -विरित पा जामठेमे पर मम वा स्वरूप विशेष कोणी पकी ग. पायल्पम्य 'पण प्रारियतस्य ।। आम्रक्षा। = अथवा (विशेष) थमा पकी अपस्था के अनुमार (बालने की लामयितरम II रवि भयितम्यता म सो बसाया होनी चाहिये । ऐसी (पक पस) की संभावनात्मक प्रयपानासापाम्,। पप समापम्पना। -प्रतीतिरूप है, बगुला की पांती होने पर ही उत्पचमान (संजायमान्त) वा उपमने वाला हमाराम ॥ दिनीयम् II मानम् ।। मवेत् । मगरा पतानला विषयम् । सागप+ पन्ना। प्रनया पतारा | मयिवम्पम् ॥ इति. मरितामा प्रथयाणा ॥ बाशीक्षा जिमाप दिवीयम् ॥ पान | मये हा नाम (=माम्या) दसरा मान होना है। =अथषा यशाम्प विषय को प्रहण परिपा अपस्यमा करि -संमायमान पर पता होनी चाहिये ऐसी - समापन्य की प्रवीतिम्प अमिणा (मांसा) +सो मामक इसप पाना पटानिवासी अगस्मसहाय यात परप्ले और विमपर्व सहित सारसिदिका पदा हिंदी अनुवाद । अप्पास १५, एयर इन्द्रियातरपिपये -इस प्रकार सम्म (स्पर्धम, रमन, प्राण, मोन) इन्द्रियों के वियोम मानसूविषयेच -और (-घ) भनिन्द्रिय विषपमें पा मन्तःकरण गोचर (पस्तु) में ममतापदीते । पचापरिपतस्प। -मपम मानसे प्राण किये हुये था जाने गये (पदार्प) में पषा सपरिपत (पदाप) के विवोपस्यामाकासापान इति नितम्पधा-अधिक (चालमे) की पायपशाबान इस प्रकार निर्णय पिया बाना चाहिये (1) मतिमान-आपरसयोपशमस तारतम्पमेदेम । -महिवालापरवीन कर्मक क्षयोपशामके न्यूनाधिक्य मेवारि अपमहामानयो : मेवर्समपात् । अस्मिन् अवमह हा मानो मेव समय है इस सम्पमाप्रारणेलाका पाक पताका। -बाम मधिभर में पागोंकी पाती है भयवा पडा है पास इतिक संशपस्य | पलाम्पाम् । -ऐसे संदेह की सया परमेणी में पतफया भवितव्यम् इति धिवर्षपस्पा -पता होनी चाहिये ऐसे विषय मिप्यामानस्म ॥ मन भूपतरात् ॥ -मिप्पा झानका अवखर (संग) नहीं होस। मन और उपर सारांश पहजकि पवा है पाप पंधि है-यह तो संशप मान मात्र में व्हते है किहा मान के दो ग्वादरण दिये हिम्मानवाला उसको देखकर पानी कहता है कि मनपा पक पहिया करता वा यिपारवा कि यह मत बस्तु प्यमा होना चाहिये पक पंकि होना चाहिये । उसका मान दो मोर नहीं मावा है कि नमामे यजा है कि न जाने पर पछि दो ओर जाने वाले मानको संशर मान कहते है या होय पाहिए, वर पहिरोना चाहिये ऐमी इसमको हा करते है दूसरी पाव कि यहाँ सम्पमविमान का प्रकरण है और वहा सम्पपान का मेव,संम्प जो मिभ्यामनरेसका अपहरण का संप ही बता १२ मरण पै कि मप्रिम पृष्ठ ३६८ में अपाम और अपाय होतोके पाफि माग्ने में कोई दोष नहीं क्योंकि 'या पुरुष सिपीसी जिस समय पेसा अपाय निषेप किया जाता ससममर उत्तरीम पर्यसे अपाय सालसे पहप होब मोर खिस समय 'यारी पसे पदार्थ प्राण होता है उस समय यह पसिनी नदी में इस पदार्य का मिपेप हो जाव है इस लिपे पाय और अपय पहपोनों प्रकार पाठारे और यामीरमरण रहे कि जिस पदार्य को माना जाता है पर पिफ्प है और जिसके द्वारा मामा वाता है यह विषयी कहा जाता इन्द्रिणेके द्वारा पदार्थ जाने जाते है इस लिये पहा विपी रायसे इन्द्रियों का पाप कौर विषयमा सर्य घर पद माविक कालान्तरे विस्मरणकारण धारणा । यया सेवेय बलाका पूर्वाद्धे यामहमद्राक्षमिति ॥ एपामवग्रहादीनामुपन्या । सकम उत्पत्तिकमत. कृतः॥ पि निशानाद In हासे जाने हुये पदार्यका) अधिक निर्णय (मोने) से वास्तविक वा ज्योंका स्यों स्वरूपका (भ्यायात्म्प) निमित पान सो अवाय है। पापारम्य प्रगमनम् ॥ अपाय ।। उरपतन निपतन-पविलेप मादिमिः ।। -ऊना पढ़ना (उत्पतन) नीचे आवना (निफ्तन) पंख फेंकना हिलारना आदिसे पना | एप० पम् | न० पनाका ॥ इविक =पगुलोंकी पांतीही (एव) यह है पताफा नहीं है। मय० एतस्य ॥ कास पन्तरे अविस्मरण -उपरान्त, पभाव या पीछे (अप) इस (भपाय मान) के अन्यकालमें न भूलनेका फारमम् 'In धारणा ॥ कारण धारणा मान है अर्थात् अयाय धानकरि निधय की हुई वस्तुका ऐसा शान होय मो उस पस्तुको अन्य अन्य कालमें मूलने न वै सो धारणा है पपा० मा एक पम् ॥ पलाका पाम् । -जैसे यो (सा) ही (एव) यह (-इसम्) एक पंक्ति जिसको (-याम :) पर मदम् , भदायम् T इविक -पात कालमें या प्रमातमें मैंने देखा था। (इसमत्पमित्रानका कारण धारणा)। पाम् । अपग्रह प्रादीनाम् । उपन्यास-क्रम । बन भवग्रह आदिकोंका करनेका (उपन्यास) अनुक्रम (इनके) -उत्पषिके क्रमानुसार किया गया है अर्थात् जिस जिस प्रमसे ये उनमें वर्णित उसी उसी क्रमसे ये जीव के उत्पम होते हैं । इस समका मावार्य यह है कि जो वस्तु सामान्य विशेष स्वरूप है उस (पस्त) के और इन्द्रियों के संबंध होने पर प्रथम तो सामान्य अबलोकनरूप निराकार दमन होता है । पमात् उसी (पस्तु) का सामान्य विशेष रूम साकार ग्रहण होता है उस को अवग्रह करते हैं। विस के पीछे उन्क पम्नमें विशेष पहत उन विनेपमि से किसी एफ पिशेपम्प जाननकी अभिलापारूप जो शान प्रपतवा है मो यह अमुक विष होना चाहिये सिमको ईशा करते है। पभाव उती विदोपकी क्रिया चिन्ह पेशकर यह निमय हुआ कि जो मा अमिलापा प्ररण र थी सोही।मो जयाप है। पभाव उस पिधेप में ऐसा पान-पहुआ मो भन्म काल में उसका नी यले उत्त में पारणा पीपे ।। (१) वापपामापक संपामै देखो दिप्मनी (१) पृष्ठ ३६॥ त्यति समास BECECECEXCL एटानिगासी अगलपमहाप पमीलफस परछेद और विमास्पर्ष सहित समर्षिसिद्धिका दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मा १५ उक्तानामवग्रहादीना प्रभेदपतिपत्र्यमाह ॥ बहुबहुविधक्षिप्रानि संता नुक्तध्रवाणा सेतराणाम् ॥ १६ ॥ उक्तानाम् ॥ अपर-आदीनाम् । प्रमेद -वर्णित अवग्रह, ईहा, अपाय धारणा के (आदीनाम्) विशेप मेदोंकी प्रतिपति मपम् ॥ आइ T प्राप्ति (-प्रतिपति-यह अर्थ पं.बपदबीने किया है)के लिये (बगले यसमें) काते है कि सूनम बहु वहविषं क्षिप्राधनि-सृताऽनुनभुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ पदच्छेद पहुबहुविध-विप्र-अनिासत-अनुक्त-धवाणाम् सेतराणाम् (अवार्दा अपाय-धारणा मवन्ति एस एसे इन्द्रिय अनिन्द्रियै प्रत्येक प्रादुर्माव्यन्ते) ॥ (इस सून सपोनों वेवामर और दिगम्बर आनापों में एक अपी। वागर मम्मदाप में इस सत्रका पाठ ऐसे है कि बहुगविक्षिपानिमित तानुण्य पापी मेतरामाम् । अर्यात नियत के स्थान में मिथित' ऐसे दो रणनों में चिन्ह मही। शेष पाठ एक है। (२) अधिग्तम पाठों में हमारे यहाँ पेमा घिदमी है। यह पिम्ह म पत का पोतक है कि 'मिमा' और "भनिसता में से वय लघु प्रकार माप किया। (देखो पृष्ठ ३५०) (३) विमर्ग के पमात श- भगवा म् माघे तो हम पिमर्गा विमर्गही बना रहता है अपया यह यिसग श प्-म् में पयामक्ष्य परिवर्तन होजावा मत हमारे यहाँ की कही निःमत' पाठ है और कहीं कहीं 'मिस्पत' मा पाठ॥ (इम अनुवाद के पृष्ठ ४८ में मो यही नियमदिया है) (M) किसी किसी प्रति में हमारे या 'सेतराण' भी पाठ है वह प्रायुत पाणिनि-शानापम और जैनेन्द्र प्रक्रिया के रचयिता के मतानुमार पशुबई परातु कातंत्ररुपमाता म्पारण मनुसार गुर है जैसा कि हम इस पुरता के प्रारम्भ में सिय कर चुके है। (देखा टिप्पणी पृष्ठ ५ और। (१) पहाणोपा-बपिप-शिप-अनि सम्मान ध्रुष शमों में पपी यिभलि है सो सम्प समामके हामेसे अतके शम्द ध्रप में और उनके प्रतिपक्षी इतर पण में समा गई है अर्यात मनुका, पदायिधि, सिमका अनिायतका, अनुकम्प ध्रुवन्न (अवाहनहा-मपाप मोर धारणा होता) है मौर इनके प्रतिपक्षीपों अनका मत्सपिप असिमका-निःस्तका-का-अभ्य (मवह हा प्रवाय धारणा होता है)। इस सूवर्मे 'ग' शम (१)संख्या, गणना मा गिनती के मय में है जैसे एफ दो-तीन-चार-पाच मह स्यादिगा ये तो मल्या हुई मरे विपुल भयवा सम्हपना ममें माया असे मात पातशाल पाठ दे पा यिपुरसाही नहीं। सूत्रमें पशप दोगे अर्थों में है। (एपसिधवात प्रभार ( के पदार्थों) मा, मने प्रकार (की परराओं) का मानामांति (की वस्यों ) का मेवे सैनामें इस्ती, घोड़े कर देख, भैसा स्पारिक मनेक माविका प्राण करनेवाला पविष है।

कारान्तरे-विस्मरणकारण धारणा । यया सेवेय वलाका पूर्वाद्धे यामहमद्राक्षमिति ॥ एपामवग्रहादीनामुपन्या- मक्रम उत्पत्तिकमत कृत ॥ निशाना In हासे आने हुये पदार्थका) अधिक निर्णय (होने) से वास्तविक पा ज्योंका त्यों स्वरूपका (-यायाम्प) निमित मान सो अवाय है। पापारम्य प्रगमनम् । अपाय।। उस्पतन निपतन-परिप मादिमिः । ऊंचा चढ़ना (उत्पतन) नीने भावना (=निपतन) पंख फेंकना दिलाना आदिसे पठारा ॥ ए० इयम् ॥ न० पनाका ॥ इति० -पगुलोंकी पांतीही (एष) यह है पताका नहीं है। मप० पनस्य ॥ फार अन्तरे अविस्मरण -उपरान्त, पभात या पीछे (अथ) इस (अपाय मान) के अन्यकालमें न मूलनेका =कारम धारणा मान है अर्थात् अवाय मानकारि निश्प की हुई वस्तुका ऐसा द कारणम् 'In धारणा ॥ मान होय जो उस वस्तु अन्य अन्य कालमें भूलने न देवै सो धारणा पपा० मा एव० इयम् ॥ पताका पाम् : बसे पो (सा) ही (एष) या (इयम्) पक पक्ति है जिसको (-याम ) पो॥ माम् , भदावम् T इतिक -भाव कालमें वा ममातमें मैंने देखा था । (इसमस्पमित्रानका कारण धारणा)। पपाम् । अाग्रह प्रादीनाम् । उपन्यास-क्रम । इन अवग्रह आदिकोंफा करनेका (उपन्यास) अनुक्रम (इनके) -उत्पचिके क्रमानुसार किया गया है अर्थात् जिस जिस कमसे ये सनमें वर्णित उसी उसी क्रमसे ये जीव के उत्पम होते हैं। इस समका मावार्य यह है कि जो कम्नु सामान्य विशेष स्वरूप है उस (वस्तु) के और इन्द्रियों के संबंध होने पर प्रथम तो सामान्य अवलोकनरूप निराकार दमन होता है। पपाद उसी (वस्तु) का सामान्य निक्षेप रूप साकार मरण होता है उस को अपग्रह पाते हैं। विस के पीछे उन्क प्रस्तुविप पहुत हैं उन विशेषोंमें से किसी एफ विपरूप बाननकी प्रमिलापारूप जो शान प्रवर्तता है मो यह अमुक गिर होना पारिसे निसको ईहा करते हैं। पपाद उसी पिरोपकी क्रिया चिन्द घेसकर यह निभप हुआ कि जो यह अमिसापामें प्राण पपी मोरी।सो अयाय है। पपात उत रिशेप में ऐसा शानब हुआ मो अन्य काल में उसका नहीं मुझे उस भारणा परिपे ॥ (1) मारनामसापक संपाव में वो टिमनी (१) पृष्ठ २५णा उत्पमि समतः उन R-721333 एटानियासी जगरूपसहाप पकीलफत पद और विभास्पर्व सहित सर्विसिदिका दश हिंदी अनुवाद । अन्याय १ मत्र १५ उक्तानामवग्रहादीना प्रभेदपतिपत्यर्थमाह ॥ बहुबहुविधक्षिप्रा नि संतानुक्तघ्रवाणा सेतराणाम् ॥ १६ ॥ उकानाम् १ अवग्रह आदीनाम् । प्रमेद -वर्णित अक्ग्रह, ईहा, अयाय धारणा के (आदीनाम्) विशेष मेदोंकी प्रविपति-मथम् ॥ आइ T प्राप्ति (-प्रतिपति-यह वर्ष पं.बपचदबीने किया है)के लिये (जगले सत्रमें) काते हैं कि सूत्रम् बहु बहुविषं क्षिप्रानि सृताऽनुक्तभवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ पदच्छेद पाहु-महुविध-क्षिप्र-अनिासृन-अनुक्क ध्वाणाम् सेतराणाम् (अवर्ना वाय-धारणा मवन्ति एम एते इन्द्रिय अनिन्द्रियैः प्रत्येक प्रादुर्मान्यन्ते) ॥ (1) म सूत्र का दामों वेताम्मर और दिगम्बर आम्नापों में एक अर्थ है। श्वेताम्बर मम्प्रदाय में इस सत्रका पाठ ऐसे है कि बहुगविधक्षिानिमि- तानुपम पाणा मेतराणाम् । अर्थात् निसत के स्थान में मिति'है ऐसे दो रणनों में निम्ह महीं है शेष पाठ एक है। (२) अपिवम पाठों में हमारे पहो। ऐमा विन्द महीं है। यह चिन्ह हम बात का योतक है कि 'सिपा' और "ममिसता में से केवा लघु नकार पाप किया। (देखो पठ ३५०) (विमर्ग के पघात - अगवा म् आये तो हम पिमा पिमगही बना रहता है अयया यह यिमग शप-म् में पयामम्प परिवर्तन होजावा अतरमारे यहाँ की कही नि मत पाठ और कहीं कहीं 'निस्पट' मो पाठहै। (इम मनुवाद के पष्ठ ४८ में मो यही नियमदिया है) (किसी किसी मति में हमारे या तराणा भी पाठ है वह प्रायुत पाणिनि-शानापम और जैनेन्द्र प्रक्रिया के रचयिता के मतानुमार अशुप है पए कानपमाला प्पाफरपय अनुसार गुरु है जैसा कि हम इस पुस्तक के प्रारम्भ में मिव कर चुके है। (देखा टिप्पणी पृष्ठ ५ और।। (१) या दो पहु-बयिफ-सिम अनि सत-जनुक ध्रुप शमों में परी विमति है सो सम्व समामके हानेसे अतके शव ध्रव में और उनके प्रतिपसीवर सगाई गभर्या पाका, वादपिधिर सिमका मनिस्तिका, अनुजम, ध्रुव (अममहहा-अपाय मोर धारणा होता) है मौर इनके मतिपक्षीयों अन्सका अल्पवियफा-मक्षिका-नि:स्तका उजमा अध्रवन (अषपद हा प्रवाय धारणा होता है) । इम सूधर्म 'बा' शम (१)सम्पा, गणनामा गिनती के अर्थ में है जैसे रफा-वीम-धार-पार वह यादित ये तो मख्या दुई मरे पिपुस अथवा सम्पमा अर्थ माया असे मात्र यातील बहुत है पहा पिपुरमाही नदी। सूबमें पर दोनों अर्थों में है। ( परिष-पात प्रकार (फे पदार्थो ) का, मनेक प्रकार (की पशुओं ) का मानामांति (की गुम्यों ) का मैसे सैनामें इस्ती, घोड़े कर देख भंस्प रपारिक मनेक माविका प्ररण करनेवाला पविष है ।। - एगानगामी जगप्पसहाय पीता पद और विमस्थर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । आपाप १ पत्र १६ =(१) ओर (पायों) का अयया ठेर ( पदार्य) का (२) अनेक प्रकार के वा नाना मांति के (पदाणे) का, पर रिप धिमा पनि मत -(३) शीघ्र गमन करते हुये (पदार्थ) का(=धिप्रस्य) (४) छिपे हुये (पदार्थ का पा अल्पमागदीखते हुये (पदाप) का अनुष्क (प्रन् उक्त) (५) स्निा यह एपे (अभिप्राय से ही) (पदार्थ) का वा पचनसे सुने फ्निा (अभिप्राय म ही पदार्थ) का (1) स्थिर (पदार्थी) का, निपत (पदायों) का, अथवा बहुत काल क जितनाका तितना निफ्लरूप (फ्यायों) का धाणाम् ।। इन छरोंसे विरुदकि प्रतिपक्षीर्योक या विपरीवों के सरित अर्थात् (७) एक पदार्थका या अन्स ( पदार्थ) का मनराणाम् ।। (८) एक प्रकार के (पदापी) का (९) अधिप्रका या मंद गमन करते हुए (पदार्थ) का (१०) निास्त का वा समस्त पास निकसे हुये (पदार्थ) का (११) उक्त पदार्थ का, कहे हुये (पदार्थ) का, या शब्द सुनकर के (पदार्प) फा (१२) अधक्का, अस्थिर (पदार्थ) का, चलायमान (पदार्थ) का, अश्या क्षणमात्र स्थिर रहने वाले (पिजली सास) कादन वारहों में से- गाग्रह का प्राय यस्येकके पा भिन्न निमकेवा पृथक् पृषकके (उक्त पारह प्रकारके पदार्थोके) अवग्रह मोर ईशा और मावाप (अवार) पारणा : मान्नि TH, भौर धारण होते है और (इन अरवालीस में से) प्रत्येक इन्द्रिय प्रन्द्रिय प्रत्येक समशन-मन गण पशु-भोप और ईपद इन्द्रिय (मन, अनिन्द्रिय) द्वारा प्रादुर्भा पन्न =(समुमय होर दोसो अठासी मति मानके मेद) प्रगट किये जाते है या प्रकाश किये जाते है कि (१) सार्मन (अथवा पननइन्द्रियजन्य) या पदार्य (अर्थ) का अपग्रहरूप मविधान (२) स्पामन अल्पपदार्थका अवग्रारूप मतिज्ञान (३) सार्शन पहुविध पदार्पका अपग्रहरूप मशिान (४) सामन अल्पविध पदार्थका अपग्रारूप मविधान(५) सार्सन विप्र पदार्थका अपग्रहरूप मविज्ञान (६) स्पार्सन अधिप्र पदार्यका अपग्रहस्प मतिमान (७) सार्शन अनिासव पदाका अपप्रहरूप मनिान (८) स्पामन नि मृत पदार्थका मवग्रारूप मतिलान (९ सार्यन मनुक्त पदार्थका अपग्रारूप मविज्ञान (1.) सामन उक्त पदार्यका मायारूप मतदान (११) सासन ध्रव पदार्यका भवनहरूप मविधान (१२) साधन प्रय पदार्थ प्रयप्रारूप मतियान।।

SC एटानिवासी जगरूपमा वकीलकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित सार्यसिक्किा सर्वशः हिदीबनुवाद अध्याय १ र १६ (१३) रासन पहु पदार्थका अवग्रहस्प मविज्ञान (१४) रासन अस पदार्थका अवाहरूप मविज्ञान (१५) रासन बहुविध पदार्यका अवग्रहस्प मैतिज्ञान (१६) रासन मसविध पार्षका अवग्रहस्म मतिश्चान (१७) रासन सिप्र पदार्पका अवाम मतिनान (१८) रासन अधिम पदार्थका अवग्रहरूप मविज्ञान (१९) रासन अनिास्व पदार्षका अवग्रहरूप मविधान (२०) राम्न निस्स्त पदाका अवग्रहरूप मलिवान (२१) रासन अनुक्त पदार्पका अपग्रहरूप मतिज्ञान (२२) रासन उक्त पदार्षका अवनहरूप मनिधान (२३) रासन ध्रव पदार्थका अक्ग्रहस्म मविज्ञान (२४) रासन अध्रव पदार्थका अपनारूप मतिज्ञान (२५) घ्राणज पहु पदार्यका अवग्रहरूप मतिधान (२६) वामन बस पदार्यका अपग्रहस्म मतिज्ञान (२७) घानब बहुविध पदार्थका अपग्रहरूप मतिधान (२८) घाणम अस्पविध पदार्थका अवतास्म मतिज्ञान (२९) प्राफा क्षिम पदार्थका अक्प्रास मरिझान (३०) मापन अक्षिय पदार्थका मषप्रारूप मतिधान (३१) प्रापब अनिस्स्व पदार्थका अवग्रहस्प मतिधान (३२) घाणज निस्पत पदार्थका अवग्रहस्प मतिज्ञान (३३) प्राणज अनुक पदार्पका अवग्रहरूप मतिम्रान (३४) घापम उक्त पदार्पका अपग्राम मनिशान (३५) प्राणज ध्रव पदार्थका अवारूा मतिणन (३६) घ्रामम अध्रव पदार्थका अवास्प मतिज्ञान (३७) चाक्षुप महु पदार्थका वनहरूप मविज्ञान (३८) चाक्षुप अन्य पदार्थका अवग्रहम्म मसिशन (३९) चाप या विघ पदार्थका अवग्रहरूप मतिमान (४०) चाक्षुप अल्पविध पदार्थका अवग्रहम्प मतिमान (४१) चाक्षुप विप्र पदार्थका भवग्रहम्प मतिवान (४२) चाक्षुप अक्षिण पदार्थका अवग्राम्प मतिमान (४३) चाक्षुप अनिस्मत पदार्थका अपग्रहम्प मविमान (४४) चाक्षुप नियत पदार्थका अवग्राम मविज्ञान (४५) पाशुप अनुक्त पदार्थका अवप्रारूप मसिझान (४६) पाशुप उक्त पदार्थका अवमाम मतिज्ञान (४७) चाक्षुप धा पदार्थका अवग्रहप मविमान (४८) पासुप मध्रव पदार्थका अवमहम्म मविज्ञान . (१) र भेदसे चौबीस मेद तफ रामन' शम्पफ एपानमें 'रसनेन्द्रिय सम्प ( पदार्थका अपप्रहल्प मतियान) पेसा मी वाफ्प नासकेसी पर पीस भरसे तीस 65 और वीस यावानीस व 'माण के स्थान प्राणेन्द्रियम्पऔर वासपके स्थाममें पद्रियाम्पमासके।

एनिगमी जगरपसाप पकीला पदच्छेद और विमस्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र १६ =(१) अमेल (पान) का अथवा देर ( पदार्य ) का (२) अनेक प्रकार के या नाना मांति के (पदाग) का, पर रिप चिम-अनि मन (३) भोघ गमन करते हुये (पदार्थ) फा(-धिप्रस्य) (४) छिपे हुये (पदार्य का वा अल्पमाग दीखवे हुपे (पदार्थ) का अनुम (प्रन् उक्त) (५) पिना कह एये (अभिप्राय से ही) (पदार्थ) का वा पचनसे सुने बिना (अभिप्राय म ही पदार्थ) का (१) स्थिर (पार्यो) का, निमल (पदाथों) का, अथवा बहुत काल तक जिसनाका तिवना निश्लरूप (पदायों) का धाणाम्॥ मनराणाम् । भन छोसे विरुदोक प्रतिपक्षीयोंके या पिपरीवों के सरित अर्थात (७) एक पदार्थका वा अल्प ( पदार्प) का (८) एक प्रकार के (पदार्थों) का (९) अधिप्रका या मंद गमन करते हुए (पदार्थ) का (१०) निास्त का पा समस्त पाम निकले हुये (पदार्थ) का (११) उक्त पदार्य का, फरे हुये (पदार्थ) का, वा शम्द सुनकरि के (पदार्थ) का (१२) अधक्का, अस्थिर (पदार्थ) का, चलायमान (पदार्य) का, अथवा षणमात्र स्थिर राने पाले (विजती सश) फाइन पारदों में से- मापदाय प्रत्येकक या भिन्न निमकेषा पयायकके (उत पारह प्रकारके पदार्थोके) अपग्रह मोर हाऔर मापाप (अवार) पारपा मान्नि पत, मौर धारण होते हैं और (इन अड़तालीस में से) प्रयेन्द्रिय प्रन्द्रिय' ॥ प्रत्येक समन-सन प्राण पशु-गोत्र और पित् इन्द्रिय (मन, अनिन्द्रिय) द्वारा' पादुमायपत =(ममुगय होकर दोसो अठासी मति ज्ञानके मेद) प्रगट किये जाते हैं पा प्रकार किये जावे है कि (१) साशन (अयया स्पर्शनइन्द्रियजन्य) पहु पदार्थ (अर्थ) का अवग्रहरूप मन्धिान (२) साशन अस्पपदार्थका अपहरूप मविधान (३) सामन बहुविध पदार्षका अवगृहरूपमविहान (४) सामन असयिष पदार्थका अपग्रहरूप मतिधान(५) सार्चन क्षिप्र पदार्पका अपग्रहरूप मविज्ञान (६) पान अथित पदार्थका अपप्रारूप मतिज्ञान (७) साठन अनिःस्त पदार्यका अपग्रहस्म मदिवान (८) स्पाशन नि मृत पहायका भयग्रहरूप मनिशान (९ साशन अनुक्त पदार्यका भवप्रारूप मतिज्ञान (१०) सान उक्त पदापका मवप्रारूप मतिमान (११) सार्शन पदाका भवप्रारूप मविधान (१२) सासन अधय पदापा अपग्रहस्प मतियान॥ ध्रुव ऐटानिवासी बासमार होतात पदच्छेद मौर विमक्स्पर्ष सहित सायसिद्धिका सन्दशा ही अनुवाद । अध्याय १५२१६ (८५) रासन बहु पदार्थका ईशारूप मतिधान (८६) रासन बल्प पार्षका ईहास्प मतिनान (८७) रासन बहुविध पदार्पका हारूप मतिमान (८८) रासन अन्सविध पदार्थका ईनारूप मविधान (८९) रास्न घिन पदार्थका दाम मनिशान (९०) रासन अक्षित पदार्यकाशिरूप मविमान (९१) राख्न अनिस्सृत पदार्थका हारूप मनिशान (९२) रासन निस्सृत पदार्यका हारूप मतिमान (९३) रासन बनुन पार्षका दाम मनिज्ञान (९४) रासन उक्त पदार्पका बहारूप मनिशान (१५) रासन ध्रुव पदाका हिम्म मविज्ञान (१) रामन यध्रव पदार्यका ईहास मविज्ञान (९७) घामज महु पदार्यका ईरारूप मतिधान (९८) बाब अप पदार्थका हारूप मदिवान (९९) धानज पहाविध पदाका विस्म मविहान (१००) प्राय असविध पदार्मका शाम मतिमान (१०१) प्राणा विप्र पदार्गका शाम मविधान (१०२) प्रापज अक्षिा पदार्यका ईशारूप मतिज्ञान (१०३) घाण अनिम्स्त पदार्थका दास मतिमान (१.५) घागज निस्सा पदार्थका ईहास्प मतिमान (१०५) प्राणज बनुक्त पदार्पका हास्म मविधान (१०६) प्राणज उक्त पदापेका हास्य मसिम्मान (१०७) प्राणज व पराका हारूप मतिणन (१०८) प्रामन मधम पदार्यका ईहारूप मतिज्ञान (१०९) पाप बहुपदाका ईहारूप मनिशान (११०) चाक्षुप यस पदाका शाम्प मतिज्ञान (१११) पाशुप पहुविध पदार्थका हाम मतिधान (११२) पानुष अत्यविध पदाका ईशाम मविज्ञान (११३) पाहम क्षिप्र पदार्पका हम मतितान (११४) चाक्षुप मक्षिा पदार्यका शिरूप मतिमान (११५) पाप मनिस्सूत पदार्थका ईशारूप मशिान (११६) चाक्षुप निस्श्व पदार्थका ईशारूप मनिशान (११७) चाभुप मनुक्त पदार्थका हारूप मविज्ञान (११७) चाक्षुप उक्त पदार्यका इहाम्प मतिमान (१११) चाप ध्रुव पाका हारूप मविज्ञान (१२०) पानुष अभव पदार्यका ईहारूप मतिषान ACHHORIGHAGRA NEXT (४) भाषण पद पदाथा अपहरूप मतिशान (५०) धारण अन्य पदार्यका अवग्रहरूप मतिनान । (११) धारण परिष पदापका अवग्रहम्प मतिशान (५२) श्रावण अस्सविध पदार्थका अवग्रहस्प मविज्ञान । (५३) श्रापण पिप्रादायका भवप्रारूप मनिशान (५४) श्रावण अधिप्रपदायका अग्रहस्म मविज्ञान (५५) थायण अनिस्पत पदायका अग्रहरूप मनिशान (१६) थावण नि मृत पदायका भवनहरूप मतितान (७) भाषण अनुन पाधा पाटम्प गतिमान (५८) धारण उक्त पदार्थका अवग्रहरूप मतिमान (५०) धारण ध्रर पदाथका अयगम्प मतिज्ञान (६०) भावण अध्रव पदापका अपग्रहरूप मविज्ञान (६१) मानम यापदायका अवमहरप मसिवान (६२) मानस अन्पपदाथका अवमहरूप मतिमान (६३) मानम पश्धिपदायका प्रमहरूप मतिनान (६४) मानस असविध पदार्थका अवग्रहस्प मतिमान (६५) मानम सिम्पदायका अवसरम्प मविज्ञान (६६) मानस अतिप्रपदार्थका अवमहरूप मविज्ञान (६७) मानस अनिम्गतपदार्थका अवगृहरूप मनिशान (६८) मानस निामृत पदाथका अवगूररूप मतिज्ञान (६९) मानम भनु म पदाधका अवगृहस्पतिज्ञान (७०) मानस उक्त पदार्थका अवगूहरूप मविज्ञान (७१) मानम ध्रव पदाधका अवगररूप मविज्ञान (७२) मानस अध्रव पदार्यका अवगृहस्प मविज्ञान साान यापदायका हाल्प मतिद्वान (७४) स्पार्शन अल्प पदार्पका ईहास्प मविज्ञान रोगन यहुविध पदायका बाल्प मनिशान (७६) साईन अल्पविध पदार्यका हास्म मतिज्ञान सागन विषपदाधका हास्य मनिशान (७८) स्पार्शन अधिप्रपदार्यका ईहाल्प मतिभान ९) साशन अनिस्मृत पदार्थका ईहाल्प मविज्ञान (८०) सार्सन निसृवपदार्थका ईहाल्प मविधान (८1) पान अनुक्त पदाधका ईहाल्प मसिमान (८२) पार्शन उक्त पदार्थका हाम्म मविज्ञान ४३) साशना पापका हारूप मतिमान (८४) स्पार्शन अध्रव पदार्थका ईहाल्प मतिज्ञान मों में अरियाग तस्पप्य पता है क्योंकि अपमह शान म्पक पदार्प और पयन (सम्यक) पवाण दामोका होता है। हा पारपा मान पंपळ पाहो हाते दे पंजन पदार्य नहीं होते है इसलिये अपग्रह शानोदी मर्यापगृह मौरम्पशनापन अपके नौ । तिसपर भी स्मरण रहे कि म्यंगना अवगृह मेत्र और मनके पदार्थ से सिहन न होने हेतु से रिचार - ऐटानिवासी जगरूपसहाय वकीलगत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्विसिद्रिका शब्दशः हिदी अनुवाद । अन्याय १०१ (८५) रासन या पदार्यका ईशारूप मतिधान (८६) रासन अस पदार्थका ईहारूप मतिमान (८७) रासन बहुविध पदार्यका हारूप मतिनान (८८) रासन असविध पदार्यका ईहारूप मतिज्ञान (८९) रासन विप्र पदार्पका हारूप मविधान (९०) रासन अधिम पदार्यका ईशारूप मतिज्ञान (९१) राख्न अनिस्सृत पदार्पका हारूप मतिज्ञान (९२) रासन निस्सृत पदार्थका हारूप मतिज्ञान (९३) रासन अनुक्क पदार्थका ईराइप मतिज्ञान (९४) रासन उक्त पदार्यका हारूप मविशान (१५) रासन घन पदार्थका शाम मविज्ञान (१६) रामन अध्रय पदार्यका ईहाम्प मतिज्ञान 9-980889 (९७) प्राणज पहु पदार्यका ईशारूप मविज्ञान (९८) घामज अल्प पदार्पका ईहारूप मतिवान (९९) प्रानज पहुविध पदार्यका हारूप मविप्नान (१००) घामज अल्पविध पदार्थका ईहास्प मतिवान १०१) प्राणज विप्र पदार्थका हारूप मतिमान (१०२) प्रापन अक्षिप्र पदार्यका ईवारूप मसिधान (१०३) प्राणज मनिस्स्त पदार्थका हारूप मनिपान (१०४) घाणज निस्पत पदार्थका ईहारूप मतिज्ञान (१०५) प्राणज अनुक्त पदार्यका हारूप मशिन (१०६) प्राण उक्त पदार्थका हारूप मतिज्ञान (१०७) प्राणज घय पदार्थका हारूप मतिणन (१०८) घामज अध्रव पदार्थका ईहारूप मविज्ञान (१०९) चाक्षुप बहु पदार्पका ईहारूप मविज्ञान (११०) चाक्षुप अल्प पदार्थका शाम्म मतिनान (१११) चाक्षुप बहुविध पदार्थका ईशाम्प मतिनान (११२) पाक्षुप अल्पविध पदार्थका हाम्म मविधान (११३) पाप विप पदार्थकाईम्प मविज्ञान (११४) चाक्षुप मक्षिप्र पदार्थका रूप मविधान (११५) चाक्षुप अनिस्सृत पदार्थका ईदारूप मविज्ञान (११६) चाक्षुप निस्सृत पदार्थका ईहारूप मतिनान (११७) चाक्षुप मनुक्त पदार्थका हारूप मसिशन (११७) पारुप उक्त पदार्थका इहाम्प मविज्ञान (११९) पाप पर पदार्थका दारूप मविधान (१२०) चाक्षुप मच पदार्थका ईशारूप मविधान PC-MAHASAntason . (2.) श्रावण यह पदार्यका अयमहरूप मविज्ञान (५०) आपण अस पदार्यका अवग्रारूप मविधान । (५१) थावण पहुविध पदार्यका अवग्रहरूप मनिशान (१२) श्रावण अस्पषिध पदार्थका अयग्रहरूप मविज्ञान । (५३) श्रावण सिमपाथका अपग्रहस्प मतिमान (५४) श्रावण अधिप्रपदायका अवग्रहस्प मसिझान (५५) श्रावण अनिस्पत पदार्थका अपग्रहस्प मतिशन (५६) थावण नि मृत पदार्थका अपप्रवरूप मतिज्ञान (७) भाषण गनुन पाधका अपग्रहस्प गनियान (५८) थायण उक्त पदार्थका अवारूप गतिमान (५९) थापण ध्रर पदाथका अवहगरूप मतिज्ञान (६०) पावण अध्र पदायका अवग्रहस्प मविज्ञान (६१) मानम बहुपदाधका अपग्रहस्प मसिमान (६२) मानस अल्पपदार्थका अश्यहरूप मतिमान (६३) मानम पहुपिधपदाधका अयमहरूप मनिशान (६४) मानस असविध पदाथका अवग्रहस्प मसिमान (६५) मानम सिमपदायका अवमहरूप मविज्ञान (६६) मानस अभिप्रपदार्थका अपमहरूप मतिज्ञान (६७) मानस अनिस्मठपदार्यका अयग्रारूप मनिशान (६८) मानस निसृत पदायका अपगृहरूप मतिनान (६९) मानम अनुक्त पदार्यका अवगृहरूपमतिमान (७०) मानस उक्त पार्थका अपग्रहरूप मतिमान (७१) मानम ध्रव पदाधका अयगृहरूप मतिज्ञान (७२) मानस अध्रव पदार्थका अपगृहल्प मनिशान (७३) पाशन पहुपदाधका ईहाल्प मतिज्ञान (७४) पार्शन अल्प पदार्थका ईहाल्प मविमान (७५) सामन यहुविध पदायका ईहाल्प मनिशान (७६) स्पार्सन अल्पविध पदार्थका ईशाप मतिमान (५७) सामन क्षिप्रपदायका ईहाल्प मतिमान (७८) साधन अधिप्रपदार्थका हारूप मप्तिधान (७९) सामन अनिस्मृत पदाथका ईहाल्प मतियान (८०) स्पार्धन निसृतपदार्थका ईदाल्प मविधान (८) सानन अनुक्त पदार्थका हारूप मतिनान (८२) स्पार्शन उक्त पदार्थका ईहाल्प मतिमान (८३) सासनयर पदार्थका हाम्य मतिमान (८४) सार्शन अध्रय पदार्यका हारुप मविधान SaSA-ATCSC . . (१) मरररमों में अग्निदम तारपण पसारे क्योंकि अपप्रा मान म्पक पदाथ और भजन (अन्य) पवाए दानोंका होता है। ra, सरापमान, पारपा पार ये एक पदाधा ही होते है यमन पदायके मही हाते है इसलिये अवगृह मानकही मर्यामगृह और न्यजनावगूर मे दो मे होते. मनरेनो ॥ विसपर मी स्मरण द फि पंधमध अवगत नेत्र और मनके पदार्थ से सिहन न होने हेतु से केपचार पोगरा दोवाई॥

एटा निवासी अगस्मनाय पीला पच्छे और पिमस्पर्य सहित सार्वसिरिका पदशा हिंदी अनुपाए । अध्याय १ मत्र १६ (१५७) रासन बहु पदार्यका भवापरूप मविज्ञान (१५८) रासन अल्प पदार्षका मवायस्म मविज्ञान (१५९) रामन रहुविध पदार्थका वायरूप मतिशान (१६०) रासन अल्पविष पदार्यका क्वायरूप मविज्ञान (१६१) रासन क्षिम पदार्थका बवायरूप मतिज्ञान (१६२) रासन अक्षित पदार्थका अवायरूप मतिज्ञान (१६३) रासन बनिस्सा पदार्थका अपायल्प मविज्ञान (१६४) रासन निघत पदार्थका अवायस्प मविज्ञान (१६५) रास्न अनुफ पार्यका अवायम्प मविज्ञान (१६६) रासन उक्त पदार्षका अवायल्प मसिज्ञान (१६७) रामन भूम पदार्पका क्यापम्प मविज्ञान (१६८) रासन अब पार्वका बपापम्प मविज्ञान (१६९) प्राणन महुपदार्यका अवापरूप मविज्ञान (१७०) वामन अल्प पदार्थका अवायम्म मनिशान (१७१) घापन बहुविध पदार्थका अपारम्प मविज्ञान (१७२) मानध असविध पदार्थका रुपापम्म मविज्ञान (१७३) माणच शिम पदार्थका सपापम्प मनिशान (१७४) प्रापन मक्षिण पदार्यका प्रवासम्म मविज्ञान (१७५) मानब अनिस्सृत पदाका अवायम्प मविज्ञान(१७६) प्रामा निस्सृत पदार्यका अवापम्प मविज्ञान (१७७) नामज अनुक्त पदार्थका क्यापम्प मतिमान (१७८) प्राणघ उक्त पदार्थका अवायल्प मतियान (१०९) प्राणच घ्षपदार्पका क्वायम्म मतिज्ञान (१८०) प्राणज मध्रव पदार्यका अवारस्प मतिज्ञान (१८१) पाषुप बहुपदार्पका बवायम्म मतिमान (१८२) पाशुप बस पदार्थका अवापम्प मतिज्ञान (१८३) चाक्षुप महुपिय पदार्थका अवासम्म मतिनाव (१८४) चाक्षुप अस्सविष पदाका अवायम्म मतिज्ञान (१८५) चाप सिमपदार्यका वापरप मविज्ञान (१८६) चाक्षुपअतिम पदार्थका अवासम्म मतिमान (१८७) पाप वनिस्सृत पदार्थका मपापम्म मतिनान (१८८) चाक्षुप निस्सृत पदार्पका बवायम्प मसिवान (१८९) चाभुप मनुक्त पदार्थका अवायम्म मविज्ञान (१९०) पाप उक्तपदार्थका अपापम मतिद्वान (१९२) पाशुप ध्रवपदार्थका अवारूप मविज्ञान (१९२) चाधुप अध्वपदार्थका अवापरूप मविवान प्रटानिगमी मगरूपमााय यौलकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्य ससि सार्थसिद्धिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ १११, (१२१) श्रापण पहु पदायका हारूप मतिमान (१२२) श्रावण अल्प पदार्थका ईहारूप मसियान । (१२३) धारण पविध पदार्थका हारूप मतिवान (१२४) यापण अत्यविध पदायका हारूप मलिशान । (१२५) यारण सिमपदायका ईहारूप मविमान (१२६) श्रावण अधिप्रपदार्यका ईरारूप मतिष्ठान (१२७) श्रावण अनिस्सृत पदार्थका ईहरारूप मतियान (१२८) पापप नि मृत पदार्थका हरूप मतिमान (१२९) भावण अनुक्त पदार्थका हारूप मनिपान (१३०) भावण उक्त पदार्थका हारूम मविज्ञान (१३१) श्रावण ध्रव पदार्थका शाम मसिशान (१३२) श्रावण अध्रय पदार्थका हारूप मविधान (१३३) मानस बहुपदार्यका हारूप मविमान (१३४) मानस अल्पपदार्थका हास मतिज्ञान (१३५) मानस पविध पदार्थका सारुप मतिम्रान (१३६) मान्स अल्पविध पदार्थका ईहास मतिप्रान (१३७) मानस तिप्रपदार्थका हारूप मतिज्ञान (१३८) मानस अतिप्रपदार्यका ईशास्स मतिवान (१३९) मानस अनिस्मृतपदार्थका हारूप मतिवान (१४०) मानस निःसृत पदार्थका ईदासप मविज्ञान (१४१) मानस अनुक्त पदाका ईशल्प मनिशान (१४२) मानस उक्त पदार्थका हारूप मतिमान (१५३) मानम ध्रव पदार्यका हाप मसिमान (१४४) मानस बधव पदार्थका दाम मनिशान (१४५) सामान बहुपदार्थका अनायस्प मतिवान (१४६) सास्न अल्प पदार्यका अपायल्प मतिभान (१४७) सामन पविध पदार्थका अवापरूप मझिान (१४८) सार्शन अल्पविध पदार्थका भवायल्प मतिमान (१४९) साम्न विपदार्थका अवायल्प मविज्ञान (१५०) सार्शन अधिप्रपदार्थका अवायरूप मविमान (१५१) सामन अनिस्मृत पदार्थका अवायल्प मतिधान(१५२) सार्शन निस्मृतपदार्थका मषापरूप मविशन (१५३) साशन अनुक्त पदाधेका मपापल्प मतिधान (१५४) सार्शन उक्त पदार्थका अवायल्प मविमान (१५५) सानिधन पायका अवापम्प मतिमान (१५६) सार्शन अप पदार्थका अवायम्प मत्तिमान (} भान पर मोर मानस मारने एपान धोनेदिष मन्य मौर ममीजाप कम माफे वापरणों में खासकरे।। sasara Saesaad एटानिवासी अमरूपम्नाय पीलास पदप्छेद और विमत्पर्ष सहित सार्वसिविका या हिंदी अनुषाद । अध्याय १ मत्र १६ (१५७) रासन महु पदार्यका वायरूप मनिशान (१५८) रासन भल्स पदार्यका अपायल्प मविज्ञान (१५९) रामन बहुविध पदार्थका भवाररूप मतिशान (१६.) रासन अल्पविध पदार्थफा अवायरूप मतिज्ञान (१६१) रासन विप्र पदार्थका वयापरूप मविज्ञान (१६२) रासन अक्षिण पदार्थका अपायरूप मनिशान (१६३) रासन बनिस्बत पदार्यका अवाप मशिान (१६४) रासन निासत पदार्थका अवायल्प मतिज्ञान (१६५) रासन अनुक्त पदार्थका बारम्प मतिज्ञान (१६६) रासन उक्त पदार्थका अवारम्प मतिज्ञान (१६७) रासन व पदार्थका अवायपि मनिशान (१६८) रासन अव पदार्यका अवायव्य मनिशान (१६९) प्राणन महफ्दाका अवायल्प मन्धिान (१७०) घामय वरप पदाका अवापम मशिान (१७१) घामब बहुविध पदार्थका अवासम्म मदिशान (१७२) घाण अल्पविध पदार्थका स्वायम्प मतिज्ञान (१७३) प्राणज तिन पदार्यका सवायम्प मविज्ञान (१७४) घामन मषिप्र पदार्थका अवासम्म मविज्ञान (१७५) घाम अनिस्सृत पदार्षका अवासम्म मविनान(१७६) प्राणा निस्सृत पदार्थका अवापम्प मतिज्ञान (१७७) प्राणज अनुक्त पदार्थका अवायम्म मतिनान (१७८) घाम्म उक्त पदार्थका नायल्प मशिनान (१७९) घाना धक्पदाका नवायम्म मतिमान (१८०) प्राणज अघ्रय पदार्पका क्यापस्प मतिमान (१८१) पाप बहुपदार्पका क्यापम्म मतिमान (१८२) पाधुप यस पदार्यका अवापम्प मविज्ञान (१८३) चाक्षुप पहुविध पदार्थका मवायम्म मतिशत (१८४) पाभुप अल्पविध पदार्थका मवायम्म मनिशान (१८५) चानुप सिमपदार्थका अवापम्प मविज्ञान (१८६) पाशुपतिप्र पदार्थका अवायम्म मतिमान (१८७) चाधुप अनिस्सृत पदार्थका मवापम मतिद्वान (१८८) चाक्षुप निस्सृत पदार्थका अवायस मतिमान (१८९) पाशुप अनुक्त पदार्थका अवायम्म मतिमान (१९०) पाप उक्तपदाका अवासम्म मतियान (१९२) पानुप ध्रवपदार्थका अवायरूप मविज्ञान (१९२) चाक्षुप अषपदार्यका बवायल्प मनिशान MORA (१९३) धारणपटू पदायका वायरूप मतिमान (१९५) भावगपहुविध पदाधका अपायरूप मनिमान (१९७) थायपपिय पदार्थका आयप मतिनान (१९९) थावगानिस्मत पदार्थका अवायम्प मतिज्ञान (२०१) थाषणअनुक्क पदार्थका अवारम्प मतिज्ञान (२.३) श्रावणम्य पदार्थका अवायम्प मतिनान (१९४) श्रावणअल्प पदार्थफा अवायम्प मविज्ञान (१९६) श्रावणअल्पविध पदार्थका अवायरूप मतिष्ठान (१९८) श्रावणमसिन पदार्यका अपायकप मतिज्ञान (२००) यावणानिःसृत पदार्थका श्वायरूप मतिमान (२०२) श्रावणठक पदाथका अवायल्प मन्धिान (२०४) थावणअध्रुव पदार्थका अयायस्म मतिबान (२.५) मानसरह पदार्थका अवायल्प मतिशान (२०७) मानसाइविध पदार्थका अवापरूप मविज्ञान (२०९) मानसपिन पदार्यका प्रयापल्प मविधान (२११) मानसप्रनिस्मृत पदार्थका अवायल्प मविज्ञान (२१३) मानमअनुक्त पदाधका अवापल्प मतिमान (२१५) मानमय पदार्थका अवायल्प मविशन (२०६) मानसअल्प पदार्यका अवायम्प मतिज्ञान (२०८) मानस अल्पविध पदार्थका अयापस्प मविधान (२१०) मानसप्रतिम पदार्थका अवायल्प मतिमान (२१२) मानसनि सृत पदार्थका अवायल्प मतिचान (२१४) मानसउक्त पदार्थका अपायम्प मतिमान (२१६) मानसमध्व पदार्थका अवापस मतिमान (२१७) साशनरहु पदापका पारणारूप मतिमान (२१९) सामनपविध पदार्थका धारणारूप मतिमान (२२१) सामनधि पदाका धारणारूप मविज्ञान (२२३) साशन अनिस्मत पदायका धारणास्प मतिमान (२२५) सानन अनुक्त पदार्पका घारणाम्प मदिनान (२२७) सामनन wri (२१८) स्पार्शनअल्प पदार्थका धारणारूप मविधान (२२० सार्शनअल्पविध पदार्थका धारणारूप मतितान (२२२) सार्शनअसिम पदार्थका धारणारूप मतिधान (२२४) सार्शननिःसृत पदार्थका धारणारूप मविमान (२२६) सामनठक्त पदायका पारणारूप मतिमा एटा निवासी बगरूपसहाय सोलात पदच्छेद और विमफ्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशा हिंदी अनुवाद । अभ्याप १ सूत्र १६ (२२९) रासन पहुपदार्थका धारणास्म मनिशान (२३०) रासन अल्प पदार्यका पारणास्प मतिज्ञान (२३१) रासन बहुविध पदार्थका धारणारूप मतिशान (२३२) रासन अन्सविध पदार्थका धारणारूप मविज्ञान (२३३) रासन क्षिप्र पदार्यकाधारणारूप मविज्ञान (२३४) रासन अक्षिप्र पदार्यका धारणारूप मतिशान (२३५) रासन अनिस्सत पदार्यकाधारपारूपमनिशान (२३६) रासन निस्पत पदार्थका घारणारूप मनिशान (२३७) रासन अनुक्त पदार्थका धारणारूप मतिशान (२३८) रासन उक्त पदार्यका घारणारूप मविशान (२३९) रासन भय पदाथका पारणारूप मतिज्ञान (२४०) रासन अव पदार्थका धारणारूप मसिज्ञान (२४१) घाणज पहुपदार्थका धारणारूप मविमान (२४२) घ्राणज यस पदार्थका धारणाम्पमतिशान (२४३) प्राणज वहुविध पदार्षका धारणारूप मनिशान (२४४) घागज असविध पदार्थका धारणाम्प मतिज्ञान (२४५) घ्राणज सिम पदार्थका धारणारूप मसिशान (२४६) घाणन मक्षित पदार्थका धारणाम्प मतिशान (२४७) घापन मनिस्सृतपदार्थका पारणारूपम तिमान (२४८) घाणज नि सृत पदार्थका धारणाम्प मतिबान (२४९) प्राण अनुक्त पदार्थका पारणारूप मविज्ञान (२५०) घागज उक्त पदार्थका धारमाप मतिमान (२५१) घ्राणज ध्रवपदार्थका पारणाम्म मतिमान (२५२) घ्राणज अधव पदार्थका धारणारूप मतिनान अनबन (२५३) धाधुप पहुपदार्थका घारगाम्प मतिज्ञान (२५४) पाक्षुप अल्प पदार्थका धारणाम्प मतितान (२५५) पाचप बहुविध पदार्यका घारणारुप मतिनान (२५६) पाशुप अल्पविध पदार्थका पारणारुप मतिज्ञान (२५७) चाक्षुप तिपदाका धारणास्प मतिमान (२५८) चाभुपअक्षिप्र पदार्थका घारमाम्म मतिमान (२५९) चाक्षुप अनिस्सृत पार्थका धारणाप मविज्ञान (२६०) चाक्षुप निस्सृत पदार्थका धारणा प मविज्ञान (२६१) चाक्षुप भनुक्त पदार्थका धारणाप मतिशान (२६२) चातुप उक्तपदार्थका धारणाम्म मतिमान (२६३) पाशुप घुपक्वार्थका पारणारूप मनिशान (२६४) चाक्षुप अध्रुवपदार्थका धारणल्म मतिमान (१९३) धारणा पदार्यका अवायरूप मतिमान (१९५) धावणयहुविध पदाधका अवायरूप मतियान (१९७) भापपक्षिय पदार्थका अवापम्प मतिज्ञान (१९९) आपणानिस्स्त पदार्थका अवायम्प मविज्ञान (२०१) थापगअनुक्त पदार्थका अवायम्प मतिज्ञान (२०३) पापणा पार्षका अवायाप मतिमान (१९४) श्रावणअल्प पदार्थफा अवायम्प मतिज्ञान (१९६) श्रावणअल्पविध पदार्थका अवायम्म मसिष्ठान (१९८) पावणअतिप्र पदार्थका अपायरूप मविधान (२००) थावणानिःसृत पदार्थका अवायल्प मविधान (२०२) श्रावणठक्क पदाथका अवायल्प मविज्ञान (२०४) श्रावणअध्रुव पदार्थका अवायठप मतिमान (२०५) मानसपद पापका अवापल्प मतिनान (२०७) मानमबहुविध पदार्थका अवायरूप मविधान (२०९) मानसधित पदार्यका अरायल्प मतिनान (२११) मानमनिस्मृत पदार्थका अपायल्प मतिज्ञान (२१३) मानसमनुक्त पदार्थका अवापल्प मविधान (२१५) मानसमुप पदार्थका अवायस्प मविधान (२०६) मानसअल्प पदार्यका अपायरूप मतिज्ञान (२०८) मानस असविध पदाका अवायल्प मतिमान (२१०) मानसपक्षिा पदार्थका अपापम्म मतिमान (२१२) मानसनिःसृत पदार्थका अयापस्म मविवान (२१४) मानसउक्त पदार्थका अवामठप मविज्ञान (२१६) मानसअव पदार्थका अवायठप मविधान (२१७) सामनपद पदार्थका धारणारूप मतिज्ञान (२१९) सामनपहुविध पदार्थका धारणारूप मतिमान (२२१) सामनधिष पदायका धारणारूप मतिमान (२२३) सामन अनिस्मन पदार्थका पारणारूप मनिशान (२२५) साधन अनुक्त पदार्यका पारणारूप मतितान (२२७) सामनन पदार्थका पारणाम मनिमान (२१८) सार्शनअल्प पदार्यका पारणारूप मतिमान (२२० सार्भनअल्पविध पदार्पका धारणारूप मतदान (२२२) स्पार्भनअसिम पदार्थका पारणारूप मतिमान (२२४) सामुननि मृत पदार्थका धारणारूप मतिमान (२२६) सामनउक्त पदाफ्का पारणास्प मविधान (२२८) सासनमभव पहायका पारपारप मविज्ञान । एटानियासी जगरूपसहाय वकीत मत पदपछेद और पिमपर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका भन्दा दी अनुवाद । अध्याय १ सत्र १६, बहुश-दस्य संख्यावैपुल्यवाचिनो ग्रहणमविशेपात् । सख्यावाची यथा--एक द्वौ बहव इति । वैपुल्यवाची यथा-बहुरोदनो वहु सूप इति । विघशब्द प्रकारवाची । क्षिपग्रहणमचिरप्रतिपत्यर्थम् । अनि सूतग्रहणं असकरपुरलोमार्यम् बहु शब्दस्य । संम्पावैपुल्प-वाचिना ग बहु शब्दका (जो) गणना वा गिनती तथा समूह का वाचक है (वाचिन्) अविशेपाच ।। ग्रहणम् । -अमेदपना से ग्रहण किया गया है अर्थात् दोनों गणना और ढेर (समूह) में मेद नहीं माना है सामान्य रूप से सख्या तथा रेर अर्थों में यह शब्द को प्रख्या है। सम्पाषाची यया एकामाशी, पदामा इतिक आपना पाचक जैसे एक दो बहुत इस प्रकार है पपुस्पवाची,। यथा बहु । ओदन' । पह।। =समूह पाचक जैसे अधिक मात बहुत सपः । इवि० । विषदः । मकारवाची: दाल (प) ऐसे है ॥ विघ सन्द प्रकार याची है या मेद पाचक है (जसे इस्ती-उंट, घोडा, बैल, गाय, पकरी, पन्दर इत्यादि अनेक जाति का ब्रहण करने वाला पहुविध अपग्रह, यहुविध ईहा, महुविध बवाय, यहुविध धारणा क्षिप-प्राणम् ॥ अचिर-प्रतिपति अर्थम् ।। =(ग्रप्रमे) क्षिप (शब्द) का लाना सीघ्रता (अचिर) के प्राप्ति के लिये है यर्वात शीघ्रता से पदाका अवग्रहरूप ज्ञान होना, ईहारूप मान होना, वायरूप मान होना, धारणारूप पान होना सो विप ग्रहण है अनि सुक्-ग्रहनम् । असकल-पुद्गल उद्गम =(यन में) अनिस्सृत (शब्द) का ग्रहण असमस्त पुद्गल वा असमस्त शरीर के प्रगट के लिये है अर्थात् समस्त वस्तु पाप प्रगट नहीं निकली हो जैसे बलमें रखे हुये इस्ती मनुप्यादिफ का एफ देश जानने से संपूर्ण पदाथका अवग्रह रूम चान होना, ईशारूप घान होना, अपायस्प मान होना, धारणास्म पान होना सो अनिासुत ग्रहण है ॥ । अर्थम् ॥

...' 'IROHin (२६५) धारणयह पदार्थका धारणाम्पमतिज्ञान (२६६) श्रावणप्रल पदार्थका घारणाम मतिज्ञान (२६७) धारणाहुविध पदाथका धारणास्प मतितान (२६८) श्रावणअल्पविध पदार्थका घारणाम्प मतिज्ञान (२६९) थारगधिन पदाधका घारणाप मतिवान (२७०) श्रावणममिन पदार्थका धारणाप मशिन (२७१) थारगयनिस्मृत पदाथका धारणाप मतिमान (२७२) श्रावणनि सृत पदार्थका घाराणाप मविमान (२७३) श्रापणपनुक्क पायका धारपाठप मतिमान (२७४) श्रावणउक्त पदायका पारणारूप मसिझान (२५५) यारणधय पदार्थका धारणाप मरिजान (२७६) भाषणअभुव पदार्मका धारणाप मसिझान (२७७) मानमा पदार्थका धारणारूप मनिगान (२७८) मानसयल्प पदायका घारणास्प मविज्ञान (२७°) मानगरिय पदाधका धारणाल्प गति तान (२८०) मानस मन्परिघ पदार्थका धारणाम्पमतिनान (२८१) मानमविष पदाथका धारणस्प मनितान (२८२) मानसप्रतिम पदार्थका धारणाप्प मतिधान (२८३) मानमनिस्मृत पदार्थका धारणास्प मतियान (२८४) मानसनि मृत पदार्थका धारणाहप मतिशान (२८५) मानममनुक्त पदाथका पारपारप मतिमान (२८६) मानसउक्त पदार्थका धारणारूप मविप्नान (२८७) मानमभव पदार्थका पारणारुप मतिनान (२८८) मानसाधुव पदार्थका धारणाप मतिचान पदलेद और विभक्त्यर्य सहित इम (लोल्हा) सूत्रपर सर्वार्यासद्धि वृत्तिका शब्दश भापानुवाद पानामाग्रह अधिकृत या अधिकार में लाये गये यथवा पूर्वकधित अवग्रह पार किसा-पिरोपा भरा अवाय तया धारणा (जानना रूप अथवा मानरूप) मिया के विशेष वा मेद हैं। लाप्राक । मपन् । -उन (मानम्प क्रियायों) की अपेयास्प यहाँ (अयम् या इस सूत्र में) स-निर्देश (पष्ठी विमतिरि) फमका निदश अश्वा उपदेन किया गया है (अर्थास्) बहु इति० प्रादीनां । महतरामा ।। -पादिकांका नया इनले उलगता (यादरमजाननाहारूपधानना अवायस्पजानना धारणारूपमानना होता है इस प्रकार (पष्टी विमतिपरि फना निर्देन या उपदेश किया गपा) है COME TAदी मारिमणि परमा पुगिदै। मोर मायके दो सप पह-गागका चुप में किये है। हमने नपरोपमपमै मिरा एटानियासी बगरूमसहाय वकीलत पदच्छेद और विमत्पर्य सहित सर्विसिविका अन्दा fiदी अनुवाद । बायाम १ सत्र १६, वहुशब्दस्य संख्यावैपुल्यवाचिनो ग्रहणमविशेषात् । सख्यावाची यथा--एक दो वह इति । वैपुल्यवाची यथा--बहुरोदनो बहु सूप इति । विधशब्द प्रकारवाची । क्षिप्रग्रहणमचिरप्रतिपत्यर्थम् । अनि मृतग्रहणं असकल्पुलोमार्यम् यह भदस्य , संख्यायपुल्प-याधिना ग पहु शब्दका (जो) गणना का गिन्ती तथा समूह का पाचक है (याचिन्) अविशेपास । ग्रहमम् त -अमेदफ्ना से ग्रहण किया गया है अर्थात दोनों गणना और देर (समूह) में मेद नहीं माना है सामान्य रूप से संख्या तथा ठेर अर्थों में पटु शन्द को प्रत्या है। संम्पावाची,। यथा एकही। पहरामा इतिगणना पाचक जैसे एक दो बहुत इस प्रकार वैपुल्यवाची,। यथा वह । ओदनः । पर। =समूह पाक्क बसे अधिक मात पहुत स्पा । इति । विषप्तदा । प्रकारवाघीः । दाल (-भूप) ऐसे है ॥ विध शम्द प्रकार याची है या मेद पाचक है (जैसे इस्ती-ऊंट, घोडा, पैल, गाय, पकरी, पन्दर इत्यादि अनेक जाति का ग्राम करने वाला बहुविध अपग्रह, बहुविध ईहा, पहुविध अवाय, बहुविध धारणा सिप-प्रहणम् ॥ अफिर-प्रतिपति अर्थम् -(सत्रमें) विष (शब्द) फा लाना शीघसा (अचिर) के प्राप्ति के लिये है अर्वात शीघ्रता से पदायका अक्प्रहरूप ज्ञान होना, ईहारूप शान होना, अवायरूप शान होना, घारणारूप शान होना सो विम ग्रहण है अनि स-प्रामम् ॥ असफल युद्गल उद्गम =(स्त्र में) अनिस्सृत (शब्द) का ग्रहण समस्त पुद्गल वा असमस्त शरीर के प्रगटके लिये है अर्थात् समस्त वस्तु पाच प्रगट नहीं निकली हो जैसे जलमें डूबे हुये इस्ती मनुप्यादिफ का एफ देश जानने से सपूर्ण पदार्यका अवग्रह रूप मान होना, ईशारूप घान होना, अवायस्प शान होना, पारमात्म मान होना सो अनिासुत ग्रहण है ॥ अर्थम् ॥

पानिवासी जगापमहाप यहीतात पदम्छेद और विमक्त्यर्थ सहित स्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदा अनुवाद । अध्याय १ र १६ बहूनामनुगमभिप्रायेण ग्रहगम् । अव निरन्तर यथार्थग्रहणम् । सेतरग्रहण प्रतिपक्षसग्रहाथै ॥ वहनामवग्रहः। अलास्यावग्रह । बहुवियस्यावग्रह । एकविर्घस्यावग्रह पानाम् । ममिनारोण । ग्रहणम् || -बहनों का (निना फह एये) अभिप्राय अथवा प्रयोजन स ग्रहण सो अनुक्त है अथात वचन से सुने विनाही अभिप्राय से जान लैना अनुक्क (ग्रहण) है अन् उनम् ॥ निरत्नरम् पयाय ग्राणम । भुपम् ॥ =अमीम पा लगातार जैसा का तैसा (-यथार्थ-ठीक ठीक पदार्थ फा) ग्रहण धव है अर्थात् निरन्तर पदार्थ के सत्य स्वरूप का निघलरूप से मान होते रहना सो ध्रुव ग्रहण है मलग्राणम् ॥ =(इम म्पमें) सेवर (वाक्य) का ग्रहण (इन बहु-बहुविध आदिक के) पतिपधियों के वा विरुदों के सचये के लिये है (अधात्) पाना मयग्रहः । जसम्य अपग्रह =बहुत (पदार्प) निका अवाह और योदे (पदार्य) निका अवग्रह पर परम्प । अरना। यहुविध वा पनेक प्रकार क (पदार्थ) निका अपग्रह (और) एपिम, अरना एकविध अथवा एक मांति के (पदार्थ) निका अवग्रह प्रनिरव मंग्रह प्रयम् ।। - - (ग्विाति न मातम्यम् । बह-मयह पत्र वाव समापा मुख्यसरा महण एक विपस्पापग्रह गया । पपपप दारात न मम्तमम् ||| -पापप (और) रफ विष में मेव न र ऐमा न समझना चाहिए (दोनों म मेव) गन्दर। माम, पति गय पर समारा-बामों का गपग्रह पमा पर्श पहुस्व गणना की मुगाना पकरियर बमहा। -प्रधानता म प्रहपरि एक प्रकार की (पस्तुर) अपग्रह अर्पः -पमा मय। जैम पशुओं में हाथी धादा वेळ, ममा इत्यादिक अनेक प्रकार के है इनका प्रहण मा पदुपिय पा मन प्रकार प्राण है और इनमें दापी पा पाया पापा क्र या भमा परुमातिक पास ग्रहण मा पविध मपमरादि-मयमा इम एटानिवासी जगरूपेसहोप कंकाकृत पदच्छेद वोर विमक्स्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका शेम्मका हिंदी अनुवाद । म्याय र त्र १६, क्षिप्रमवग्रहः । विरेणावग्रहः । मनि सृतस्यावग्रह । निःसृतस्यावग्रहः । अनुक्तस्यावग्रहः। उक्तस्यावग्रहः । प्रवस्यावग्रहः। अवस्यावग्रहश्चेति भवग्रहो द्वादशविकल्पः॥ एवमीहादयोऽपि । ते पते पञ्चभिरिन्दियाद्वारेमनसा च प्रत्येकं प्रादुर्भाव्यन्ते ॥ -सिप अवग्रा वर्षाव शीरता से पदार्थका अवमास्स शान होजाना धिम् । अवमा चिरेन अवग्रह धेरी से वा चिरकालकरि वा बहुत कालकार अवग्रह अर्थात वस्तुका धीरे धीरे पहुत कालमें मानना (सो पिर अवग्रह है) अनिःस्वस्या। अवग्रह । निासस्वा मगमा सर्व प्रगट न हो वाका भवना, पाप निकले हुये प्रगटस्म का अपग्रह अन् उत्कस्प। अवममा उक्तस्पा अपमान विना को हुये (पदार्य) का अभिप्राय से अवग्रा, कबीई वस्तुका अपग्रह धुमस्यः। अवमान अवस्था। अवम्ममा भुक्का भवनर और (-च) अवका अवग्रह पा अधुपका ग्रहण इतिक अवमहामावशक्किसा एवम् इस प्रकार अवमा मारह प्रकार है । (और) इस मांति (एक्म्) विवादया : अपि दहा बवाय-धारमा (यादयः) मी (अपि) (पारह पारद प्रकार) हैं अर्थात सब मिलकर बदतालीस मेद हुये प्ये (अपग्रह पारद प्रकार जौर) ये (इदा, बवाप, धारणा छसीस प्रकार में से) प्रत्येकमा अभिमान्द्रिपदारेममनसाव: प्रस्पेफ पांच इन्द्रियों द्वाराकार और (प) मनसे प्रावुभान्यन्ते | याविाष या प्रगट वा प्रकार किये जाये हैं अर्यास् अवमहा ईशा अवाय, धारपा प्रत्येक के मारह पारह येद है सो इन अदवालीस मेदों को पांच और छठा मन पर लगाने से सम दोसों अठासी मेद हुये टात वारदाहरणका यों भी से सौदात गापों में काली श्वेक्-कापरी-खासी मुंही अनेक पर कीविष हाइमपायों में से मात्र खारकी गायों का मादी है मौर पकाविध फेफ्स एक पर्षकी मायका मरण करने पाया है। विष और पामिष में पड़ी मेव पा मम्वर ।

एनिवासी बगरूपसहाय वकीलात पदच्छेद और विमस्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशः हिदा अनुवाद । अध्याय १ र १६ वहूनामनुगमभिप्रायेण ग्रहणम् । अव निरन्तर यथार्थग्रहणम् । सेतरग्रहण प्रतिपक्षसग्रहार्थ ।। वर्नामवग्रह । अल्पस्यावग्रह । वहुवियस्यावग्रह । एकविर्घस्यावग्रह पदनाम् । अभिप्रायेण । ग्रहणम् । बहुतों का (पिना कहे हुये) अभिप्राय अश्वा प्रयोजन स ग्रहण सो अनुक्क है अथात वचन से सुने विनाही अभिप्राय से जान लेना शुक्त (ग्ररण) अन् उक्तम् ॥ निरन्तरम् पयार्य अमीम पा लगातार जैसा का तैसा (=यथा-ठीक ठीक पदार्य का) ग्रहण ध्व है ग्रहणम् नवम् ।। अथात् निरन्तर पदार्थ के सत्प स्वरूप का निपलरूप से शान होते सना सो ध्रुव ग्रहण है सइतरग्रहणम् (इस मूत्रमें) सेतर (वास्प) का ग्राम (इन बहु-पहुविध आदिक के) प्रतिपय-संग्रह प्रर्थम् In अतिपक्षियों के वा विरुद्धों के सचये के लिये है (अर्यात) पानाम् । भरग्रह । अलस्प । अवग्रहा। बहुत (पदार्य) निका अक्ग्रह और योदे (पदार्थ) निफा अवग्रह पर 'पघस्म ।। अवर। बहुविध वा अनेक प्रकार के (पदार्थ) निका अपग्रह (और) एक पिषस • अवग्रह एकविध अथवा एक मांति के (पदार्य) निका अवग्रह (पा विधवारविदाप इति न मम्तम्पम् । बहु नमषप्रद प्रत्यक वस्व सस्थाया मुख्यतया ग्रहेण एक पिघस्पायमह इस्पा । पीप भविसर त म मम्तम्पम् || -पाविध (और) २फ विष में मेव न है एमा न समझना चाहिये (दोनों म मेव है) गन्यम् । मम इति अप बस्य समगाया -बहुतों का मवह ऐसा या पदुस्ख गणना की मुरपा प्राणेन । एकनिघस्स: अपप्रहः ।। -प्रधानता से प्रहणरि एक प्रकार की (यस्तु का) अयग्रहो तिकमा -पेसा अथ है। जेस पशुओं में हाथी पापा कम वेल मैमा इरयादिक अनेक प्रकार के है रममा प्रहण सामुषिध पा अनक प्रकार प्राण है मौर इनसे हाथी वा पारा वा मरवा पेट पा मैसा एक जाति के पशु का प्राण मा पयिष मनप्रान-मपवा इम - HOS एटानिवासी जगरूपसहोप कासकृत पदच्छेद वोर विमस्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका शब्दषा हिंदी अनुवाद । बमोय १ पत्र १६, क्षिप्रमवग्रह । चिरेणावग्रहः । भनि सृतस्यावग्रह । निःसृतस्यावग्रहः ।अनुक्तस्यावग्रहः । उक्तस्यावग्रह । घवस्यावग्रहः। अध्वस्यावग्रहश्चेति अवग्रहो द्वादशविकल्पः॥ एवमीहादयोऽपि । ते एते पञ्चभिरिन्दियाद्वारेमनसा च प्रत्येक प्रादुर्भाव्यन्ते ॥ सिप अवह वर्माद धीमता से पदार्थका स्वमास्प धान होजाना विनम् ॥ अवमा चिरेण अवग्रह देरी से वा रिकारकरि पा बहुत कालकार भवग्रह अर्यात वस्तुका धीरे धीरे बहुत कालमें बानना(सो पिर अवग्रह है) अनिम्सतस्प। अव निास्मस मगमका सर्व प्रगट न हो ताफा भवग्रह, बाप निकले हुये प्रगटस्म का अपग्रह अन् उकस्य:। अवग्रहमा उक्तस्प:। अफर बिना कहे हुये (पदार्थ) का अभिप्राय से अपना, कत्री हुई वस्तुका मवग्रह भुवस्य:। अवमा। अभुवस्पा। अवनमा भुषका मवग्रह और (च) अषका अवगर पा अधुषका ग्रहण इतिक अवमहामावक्किस ॥ एवम् इस प्रकार अवमा चारह प्रकार है । (और) इस मांति ( एवम्) हा ॥ बादयः : अपि दहा वाय-धारमा (आवयः) मी (अपि) (पारा पारर प्रकार) है अर्थात् सब मिलकर बदतालीस मेद हुये । एसे। प्पे (अवग्रह पारह प्रकार और) ये (इदा, यवाप, धारणा छचीस प्रकार में से) भरपेकम् ।पापभिमान्द्रियदारेमानसामा प अस्पेक पाँच इन्द्रियों द्वाराकार और (८५) मनसे मातुर्मास्यन् -माविर्भाव वा प्रगट वा प्रकाश किये जाते हैं अर्थात् अवग्रह, ईहा, अवाय, धारपा प्रत्येक के पारद पारह मेद हैं सो इन अदवालीस मेदों को पाप और छठा मन पर लगाने से सम दोसों अठासी मेद हुये प्यात वा बाहरण को यों भी से सौ कियात गायों में काली श्वेशापरी-शांशी मुंरी मनेकर कीरगविमोम गायों में से मान्ध कारकी गायों का प्राही है मौर पकविध रेक्स एक पर्षकी गायका मरण करने मात्र है। पपिप और पारिध में पाही भेद वा अम्बर है।

ण्टानियामी जगम्पसहाय वकीलकुल पद-17 और विमपत्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय १६ तत्र वढवग्रहादय मतिज्ञानावरणक्षयोपशमप्रकर्षात् प्रभवन्ति । नेतर इति । तेषामभ्यार्हितत्वादादी प्रहणं क्रियते ॥ बहुवहुविषयो क प्रतिविशेषः । यावता बहुषु बहुविधष्वपि वहुत्वमास्ति । तरक पर अपमहादया। वहाँ (मूत्रमें) पहु अवग्रह आदि (बहु विघ, क्षिप, अनि सस, अनुक्त, भूव) मनिशान भावरम-चपोपत्रमा प्रकांत , मखिानावरणीकर्मके धयोपशमकी अधिकतासे वा उत्कर्पतासे प्रभवन्ति T इतरे । उपज है। अन्य वा बाप अर्याद अस्प, एकविध, चिर, निमृत, उक्त, अध्य इति० =ऐसे नहीं है अर्थात् ये मविधानावरणीय कर्मके क्षयोपशमकी उकाता से नहीं होते है परन थोटे अयोपशमसे होते हैं अत ये है पीछे कहे गये है साम् । मम्पतित्वात -तिन (बहु, बहुविध, क्षिप्र, बनिस्मृत, अनुक्त, भूष) का प्रधान होनेके हेतुसे भादो ग्रहणम् 1 झियतेश प-महुविधयो ।आदि में षा प्रारम्भ में ग्रहण किया गया है। (प्रश्न) बहु और पहुविध में का प्रतिषिनेप' । यावता । बा । क्या मेद या अन्तर है (क्योंकि) पयार्य में ( याक्वा) महु में और बहुविधषु । अपिक बहुत्वम् ॥ बहुविध में मी (अपि) बहुतफ्ना है (1) आदि शादेन गुविधावप्रहाइपो एमन्ते । मारि-शग्देन '। गरिय अपग्रह आवया ।-आदि शम्दसे गाषिप अपना आदि मर्यात सिप्रमषामा मनिस्मतअवमा, प्रमुफभवग्रह, भुपमवमा प्रवन्ते - ग्रहण किये गये है (१) मे वरमदएहीता यामहादयः ।। तोताराम-गीता । मब अवामह -इस सोलहवां सूत्र में सर शप्पसे लिये गये है मारपा । -मादिक मर्यात् भयभवग्रह (धा भबहमपम माविषमवार, मसिपप्रपमर निएतमाद युष्मम ममममयमः ॥ यस्ति T ना 110 एक एटानिवासी जगरूपसदाय वकीसकृत पदच्छेद बोर विमवत्पर्य सहित सार्वसिक्किा सम्पमा दिदीबनुवाद अध्याय १ सय १५ एकप्रकार नानाप्रकारकृतो विशेष ॥ उकानि सृतयो के प्रतिविशेष ।।यावता सकलनिःसरणानि सृतम्। उक्नमप्येवविधमेव ।। अयमस्ति विशेष -अन्योपदेशपूर्वक ग्रहणमुक्तम् । स्वत एव ग्रहण निःसृतम् ॥ अपरेषां क्षिपनि-सृत इति पाठः ॥ त एव वर्णयन्ति-श्रोवेन्द्रियेण शब्दमवगृह्यमाण मयूरस्य वा कुररस्यवेति कश्चि त्यतिपद्यते । अपर स्वरूपमेवानिसृत इति । एक प्रकार नाना प्रकार कृता । विनेपा । एक प्रकार अनेफ पकार से किया हुआ मेद अथवा अंतर है उक्त-निास्तमोक प्रतिषिोपा उक्त और नि मृत में क्या मिमवा (अविविभेप) है पापता० सक्लनिःसरमाव ॥ निसृतम् ॥ -ज्योंका स्पों समस्त प्रगट होनेसे नि सूव है न्यात् पुरा व्यक्ति से सो निासूर है ठकम् अपिल एवम् विषम् -उक्क मी इसी (-एपम्) प्रकार ही है अर्थात् उक्तमें मी समस्त प्रगटवा है अयम् । अस्ति T विशेपा । बन्य-उपदेश =(परंतु पनि मृत और उक्त में) यह मेद है कि दूसर के उपदेश पूर्वकम् । रगम् ॥ उक्तम् ॥ स्वतस्क एक -निमिपक ग्राम सो उक्त है। अपनेमाप (स्वतस् ) ही पाहणम् ॥ निःसृतम् ॥ नपरेपाम् । विप्र -प्राण सो निःसृत है । अन्य पा दूसरे (आचार्य) निा धिम निमृता । इति० पाठः । निसृत पाठ है अर्थात् सोलहवां सत्र बहु बहुविध इत्यादिमें "विप्रानि सूत" के स्थानमें क्षिप्रनिःसृत करते हैं बत निरस्त क्षन्द पहसे के शब्दों में जाता है ते । एवम्० वर्षपन्ति : गोभन्द्रियेम । ये (प्राचार्य) इस प्रकार कहते है कि कर्ण इन्द्रिय से अब्दम् विगृपमाणं । मगरस्य ।। का पुरस्म । वा अपग्रह किया हुवा सम्द मोरका पारधि (कुरूर-मंच) पक्षीका (उम्द)। इसिक कमित प्रतिपद्यते T -ऐसा कोई प्रतिपादन करते है (कमित प्रसिपपते) (सो निसृत है) अपरः । स्वरूपम् ॥ एव अनिासवः । इविक पसरा रूपही अनिःसृत है अर्थात् सूत्रमें मप्रथम छै शब्दमि नि मृत माना तब उससे मिम अपया उलदा सम्व अनिामृत सोलइयां रख पहुबहुषिध इत्यादिमें प्राण होवेमा AXERROREAK 5 ग्टानिवासी जगम्पसहाय वकीलकुल पद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्पन्नः हिंदी अनुवाद । यध्याय १ सत्र १६ तत्र रहवग्रहादय मतिज्ञानावरणक्षयोपशमप्रकर्षात् प्रभवन्ति । नेतर इति । तेषामभ्याईतत्वादादी प्रहणं क्रियते ॥ बहुवहुविधयो क प्रतिविशेष ! । यावता बहुषु बहुविधष्वपि बहुलमास्ति । तपक पर अवमा पादयः ।। नहो (मत्रमें) पहु अपग्रह आदि (बहु-विघ, धिप्र, मनि सत, अनुक्क, भव) मनिवान आवरण-षयोपशम प्रकांत अतिधानावरणीयफर्मके क्षयोपशमकी अधिकतासे वा उत्कर्पतासे प्रमयन्ति T इतरे।। उपज है। अन्य षा अवशेप अर्थात् अल्प, एकविध, चिर, नि'मृत, उक्क, अध्य माइतिक =ऐसे भी है अर्थात् ये मनिशानावरमीप कर्मके षयोपशमकी उत्कर्पता से नहीं होते है वरन थोडे धयोपशमसे होते है अत ये छ पीछे कहे गये हैं लपाम् । अम्परितस्यात् ॥ तिन (बहु, बहुषिध, विप्र, अनिस्सृत, मनुक्त, भूष) का प्रधान होनेके देतुसे मादौ । प्ररणम् HII प्रियतेत पहु-बहुविषयो ।आदि में पा प्रारम्म में ग्रहण किया गया है। (प्रश्न) पहु और पहुविध में प्रतिविमेप दायापता पड़ा। स्पा मेद या बन्तर है (क्योंकि) यथार्थ में (-याक्ता) महु में और पविषषु । अपिक बहुत्वम् ॥ अस्ति =बहुविध में मी (अपि) बहुतफ्ना है (१) आदि दादेन विपावप्रहारपा एमन्ते । भारिशम्देन ' परिध प्रयग्रह आवपा.-आदि शमसे पुविष भामा आदि मर्यात सिप्रमपमह,अनिस्सम्मवर अनुकमवप्रह, भुपमपमह एवम् T -प्रहप लिये गये है (१) मवे विमाप्दएहीवा ऽवारमहादप ॥ तारण-ग्रहीता मा भयग्रह -इस सोगावा सूपमें इतर शप्पस पिये गये है बामवप्रह पाया। -माविक मर्यात् मत्सअपमा (वा मगमवम) माविषमयमा, अभिपषमा मिसमपान रामबम मामबमा । T पा ठकम् ना एक एटानियासी जगस्पसहाय पकीलकृत पदच्छेद और विमफ्स्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सम्पशा रिवीजनुवाद अम्माय १ सन १६ एकप्रकार नानाप्रकारकृतो विशेषः॥ उक्तनि सृतयों के प्रतिविशेषः ।।यावता सकलनिःसरणानि सृतम्। वक्कमप्येवविधमेव ॥ अयमस्ति विशेषः-अन्योपदेशपूर्वक ग्रहणमुक्तम् । स्वत एव ग्रहण निःसृतम् ॥ अपरेपा क्षिपनि-सृत इति पाठ ॥ त एवं वर्णयन्ति-श्रोतेन्द्रियेण शब्दमवगृह्यमाण मयूरस्य वा कुररस्यवेति कश्चि मतिपद्यते । अपरः स्वरूपमेवानिःसृत इति । एक प्रकार नाना प्रकार कृतः॥ विपा एक प्रकार अनेक प्रकार से किया हुआ मेद अथवा अंबर है उक्त-निासूतयोः प्रतिक्शेिपर । उक्त और निःसृत में क्या मिश्ता (अतिविशेप) है पावता: सकलनिासरमात H॥ निसृतम् । ज्योंका त्यों समस्त प्रगट होनेसे निःसृत है यदि परा व्यक्ति हो सो निःसुव है अपि पषम् विषम् उक्त मी इसी (-एपम्) प्रकार ही है अर्थात् उक्कमें मी समस्त प्रगटता है अयम् । वस्ति T विशेषः । अन्य-उपदेश =(परंतु अनिःसूत और उक्त में) । मेद है कि इसरे के उपदेश पूर्वकम् हा प्राणम् ।। उक्तम् ॥ स्वतस्क एव० निमिचक ग्रहण सो उक्त है। अपनेमाप ( -स्ववस्) ही ग्रामम् । निःसृतम् गपरेपाम् । विप्र प्ररण सो निःसृत है । अन्य पा इसरे (आचार्य) निका क्षिप निःमृत । इति० पाठ । =निसृत पाठ है अर्थात सोलहवां स्त्र पहु बहुविध इस्पादिमें "षिपानि सूत" के स्थानमें क्षिप्रनिःसृत पढते हैं अतः निःसृत शम्द पहले है शम्दों में बाता है । एषम् पर्मपन्ति । योसन्नियेन । ये (आचार्य) इस प्रकार करते है कि कर्म इन्द्रिय से शम्पम् । वगृममाणं । मपरस्य । पारस्प " पाए भयह किया हुआ शम्द मोरका पाकुरधि (इस्र-ज) पक्षीका (सम्द) है इति० कमित० प्रतिपयते T -ऐसा कोई प्रतिपादन करते हैं (कमित प्रतिपयते) (सो निःसृत है) अपर । स्वरूपम् ॥ एव अनिासृन । इविष बसरा रूपही अनिःसृत है अर्थात् सप्रमें बम प्रयम छै शब्दमि निःसृत माना ता उससे मित्र अथवा उलदा शव धनिःसृत सोलहवां प्य महमहुषिष इस्पादिमग्राम होवेमा । नतिक संपाम् । ण्टानिवासी बग-पगदाय वकीलच पद के और विमत्यर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । वायाय १ पत्र १६ तन बद्धवग्रहादय मतिमनावरणक्षयोपशमप्रकर्षात् प्रभवन्ति । नेतर इति । तेषामन्याहतत्वादादी प्रहणं झियते ॥ वहुवहुविधयो क प्रतिविशेष ! । यावता बहुषु बहुविधष्वपि वहुत्वमास्ति । तपक पर अपमा आदय' । वहां (मत्रमें) बहु अवग्रह आदि (पाहु-विघ, क्षिप्र, भनि सुन, अनुक्क, ध्व) मनिवान आवरण-धयोपनम-प्रकर्षात -मतिपानावरणीयकर्मके भयोपशमकी अधिकतासे वा उत्कर्पतासे ममपन्ति | इतरे । उपजे हैं। अन्य वा अरशेप अर्थात अल्प, एकषिघ, चिर, निम्मूत, उक्त, अष =ऐसे नत्री है अर्थात ये मतिनानावरणीय कर्मके वयोपशमकी उत्कर्पता से नहीं होते है परन थोरे क्षयोपशमसे होते है अतः ये छ पीछे कहे गये हैं सम्पतिवात् -विन (पह, बहुविध, क्षिप्र, अनिस्सृत, अनुक्त, न्य) का प्रधान होनेके देतुसे मादौ । प्रणम् H॥ मियतेग बहु-पविधयो आदि में वा प्रारम्भ में प्राण किया गया है । (प्रम) महु और महुविध में । प्रतिविशेष । यावता । बहुपु ।। =पा मेद वा अन्तर है क्योंकि) यथार्य में (याफ्ता) पाहु में और बहुविधषु अपि परत्वम् । अस्ति बहुविध में मी (=अपि) पदुतपना है (१) आदि शादेन गविपापमहादया पूछन्ते । भारिवाग्देन '1 बहपिप अवह आवशः ।-आदि शप्पसेपपिप अपना मादि मर्याद लिममपा अनिस्सवमयमह, अमुक्तमपमह, पनवप्रा एबग्ने T -प्रहव किये गये (१) मवे सरप्परहीता ऽ यहाहादप' । मो तस्य-गीता । म अवाह -इस सोमहवा सूपमें स्वर शप्पसे मिये गये प्रामपप्रह भादरा -मादिक मर्यात् असमवह (पा अपहुभवमह) मसविधवप्रह, असिपमपा मिासम्मपाए उम्भवमा भामुषमवा।। T एंटानिवासी धमसहाय यकीमत परच्छे और विमस्पर्म सहित समिसिद्धिका पद हिंदी अनुवाद । वाम १ व १६ १७, पघवग्रहादयो बतादीनां कर्मणामाक्षेपार , बहादीनि पुनर्विशेफ्णानि कस्येत्यत माह-- ॥अथस्य ॥१७॥ मावार्य धयोपयमात्र प्राप्तिक कालविर्ष शुद्ध परिमाणके संतानकरि पाश जो क्ष्योपशम वा पासे समय जैसा अपमह मया जैसाही द्वितिमादिक समपनिर्वि दोप है किछ कम मी नाही होय अरु अधिक मी नाही होग है भाई वो ध्वावमा करिये । परि पारमा है भो वा पदार्थक प्रया साई नाही मूलनेका कारण रूपधान है।" ऐसे पुरावा और पारमा में पा मन्तर वा मेद है। प० वम० पचनिका मुद्रित छठ १५१, १५२ परिक भवना-जादया। पह मादीनाम् । ओ भवनहा प्रवास धारणा (आदया) पहु धादिक (जार) अर्गनाम् In आधेसारमा पुनरम-आदीनि =कर्माक प्रण करने वाले है फिर (पुना) पर मादिक (पारह) स। विशेषणानि इति० मा आह T =किसके पिमेपण है । ऐसा (प्रभ होने पर) इस लिये कहते है कि अर्यस्य ॥ १७॥ अवमहादयो मतिज्ञान विकल्या अर्थस्य भवन्ति मना-जारमा मविधान अवना, ईशा, मवाय, धारमा, (आपया) जो (पूर्वोक २८८) महान के लिसा मस्त : मपन्ति T म्भेद है सो वर्ष, पदार्थ, द्रष्य वा वस्तु के होते है. मानार्थ पेभा, मस, पडुपिप, अल्पविध, क्षिप्र, अधिष, अनि सन, निासम, अनुक्क, उक्त, और भुष-अभुव नारद हैं से द्रव्य, वस्तु, वर्ष वा पदार्थक विशेषन है और अर्थ (पदार्प-पस्तु-म) इन पहु आदिकका विशेम है और अपमा, हा, असाय-धारणा हु आदिक (पारड) कोकि माण करने वाले है जैसे अल्प पदार्षका अवग्रह पहु वस्तु या पदाका अवह इत्यादि अवग्रहके पारही बस पदार्य का हा, बहु पदार्थका हा इत्यादि का के पार पहुद्रध्य पावर्षका अवाय, बस वर्य वा पदार्थका अवाप ऐसे बनायके पारहा इसी प्रकार माक्सका पारमा अस्प वस्तु या अर्थ का घारमा इत्यादि पारह, ऐसे ४८ हुये पांच इन्द्रिय और के CONOIDAri SCA-Sae . एटानिपासी गापसाप पकीउकृत पदच्छेद और विमाप सहित सपार्षसिदिका सम्वा हिंदी अनुवाद | अध्याप ११५ धवावग्रहस्य धारणायाश्च का प्रतिविशेपः १ उच्यते । क्षयोपशमप्राप्तिकाले विशुद्धपरिणामसन्तत्या प्राधा क्षयोपशमात्सयमसमये ययावग्रहस्तथैव द्वितीयादिष्वपि समयेषु नोनाम्याधिक इति धुवावग्रह इत्युच्यते ॥ यदा पुनर्विशुद्धपरिणामस्य सक्लेशपरिणामस्य च मिश्रणात्क्षयोपशमो भवति तत उत्पद्यमानोऽवग्रह कदाचिढळूनां कदाचिदल्पस्य कदाचिद्वहुविधस्य कदाचिदेकविषस्य वेति न्यूनाधिक भावात ध्रुवावग्रह इत्युच्यते ॥ धारणा पुनीतार्थाविस्मरणकारणमिति महदनयोरन्तरम् ॥ भयपनयास्य " पर धारणापा का =ष अवग्रहके और (च) धारणाके क्या प्रतिनिक्षेपा । उभ्यते T सयोपक्षम प्राप्तिकाले =मेद अक्वा अन्तर कहा गया है। क्षयोपशमके ठाम कालमें वितुदपरिमामसन्तस्पा समोपचमात् । -विशुद्ध स्वमावके विस्तार वा सन्तानकारि षयोपशमकी प्राप्ताद प्रियमसमये यया० अवमा लन्धि से पहिसे समय में बैसा ववह है तपा० एक द्वितीयादिए । समयेए । अपि -वैसा ही दूसरे प्रादिक समयों में मी (होय) न० उन । न मम्यधिक इतिक न हीन (होय) न अधिक (होय) म+अवग्रहा। इति उच्यता पदा पुन ध्रुव अपना ऐसा कहा गया है। और (-पुन) बन विशुपरिणामस्य । च० संगपरिणामस्प । =विशुद्ध परिमाणका और ( घ) संक्षेस परिमाणका मिभणान् । घोपसमा । मपति T वता -मिलाप होने से पा संयोग से प्योपशम होता है । पहो से उत्पपमान । अपना कदापि० पानाम् । -उत्पम होनेवाला अवग्रह कमी ( कदाचित) बहुतों का कदापि मसस्म । याचिक पहुविषस्य । कमी थोठों का कमी बहु प्रकार का पाराचिन् एफपियस्य । इति न्यून अपवा (बा) कमी एक प्रकार का ऐसे दीन अधिकमावात् । अनुगमपग्रहा।। इतिः उप्पते T अरिपना से (अधिकमावाद) मभवभक्ग्रा इस प्रकार कहा गया है पारणा । पुनः गृहीत अर्प-मविस्मरप-कारण -गुनि पारगा ग्रहण किपे हुये पदार्पका न खनेका हेतु (रूपयान) -एम चार रन रोना ( मगर मोर पारमा) में परा पेद॥ इवि मनपो महत् । अन्तरम् ।

एटानिषासी वगरूपसहाय पीलात परछेद और बिमवर्ष सहित सर्वार्षसिद्धिका सदशा हिंदी अनुवाद । अप्यार १ पत्र १७ अर्थस्येत्युच्यते । केचित्तवादिनो मन्यन्ते रूपादयो गुणा एव इन्द्रिय सनिकृष्यन्ते तेपामेव प्रहणमिति। तदयुक्तम् । नहि ते रूपादयो गुणा अमूर्ती इन्द्रिय सनिक र्पमापद्यन्ते । न तर्हि इदानीमिदं भवति रूप मया दृष्ट, गन्धो वा प्रात इति भवति कयम् । अस्प ।। इति उच्यते । केचित प्रवादिनः । = 'अस्प' ऐसा (स्त्र) कहा गया है। (क्योंकि) क (= केपित) अन्पवादी मन्यन्ते रूप-आदयः । गुणाः । एष इन्द्रियैः॥ = मानते है (कि) रूपादिक गुण ही इन्द्रियोंकरि समिकृप्यन्ता तपाम् । एपक्ष = स्पर्शे जाते हैं या ग्राण किये बात है (=समिछष्यन्ते)। दिन (स्मादिक गुषों का ही = अयग्रह होता है (ग्रहमम्) (नकि द्रव्योंका अक्पद इन्द्रियों से होप है॥ ग्रहनम् ।। इति तत् । अयुक्तम् ॥ = ऐसी (कल्पना) है वह ठीक नहीं है। अर्थात् ऐसा मानना कि इन्द्रियों द्वारा रूपादिक गुणोंका ही प्रहण होता है द्रव्यका प्ररण नहीं होता है ठीक नहीं है। उक्त कल्पनाके निपेध के लिये यह स्त्र कहा है। रूप-आय' । गुपा' । अमूर्ता = (क्योंकि फामकी अपेक्षासे) स्मादिक गुण अमूर्तिक (अाकार रसि) हैं। के । इन्द्रियामा। सनिर्मम् । नfa माफ्यन्त = थे (रूपादिक गुण जैन मतानुसार) इन्द्रियोंकरि सम्भिकर्ष वा स्पर्शको नहीं प्राप्त होते हैं। सहिदानीम = (अयवादी फिर मन करता है कि) सौ (= तहिं) इस समय इदम् न भवतित रूपम ॥ मया। एम् ॥ = यह (कपन) नहीं पनता है कि रूप मुझसे देखा गमा गन्य' ।। वाल घात इति भवतिT कपम् = पा गंघ मुझसे रंधा गया। ऐसा फैसे (पतीवि) होगा [शब्दसा होता है अर्थात पादी कहता है कि यदि आप स्मादिक गुणका इन्द्रियों के साथ संबंध न मार्ने वा (मैनं रूप देखा और मैनें गंध संघा मा प्रतीति न होगी ॥ (उत्तर) (1) परमा अपेसमा । (परमतापेमया) --मन्यातकी मपेसासे। संस्समाधि पृष्ठ ११४ की टिप्पनी माघारपर अनुवाद में 'परमतकी मपेसासे' ऐसा पाक्य कोठकमें मपिक सिसदिया है। . ।

विनियम् । अपग्रह पानिवामी जगरूपमहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशा हिंदी भनुषाद । मध्याम १ स्त्र १७, चक्षुरादिविषयोर्थ । तस्य बहादिविशेषणविशिष्टस्य अवग्रहादयो भवन्तीत्यभिमम्वन्ध' क्रियते ॥ किमयमिदमुन्यते यावता बहादिर्य एव ? सत्यमेव पिन्तु प्रमादिपरिकल्पनानिवृपर्यम् । मनपर प्रत्येक ४८ मेदको लगाने से सर्व २८८ दुये (देखो पृष्ठ ३७० ३७८) पदन्छद और विभात्यर्थ सहित इम सत्रहवां सूत्रपर सर्वार्थमिद्धिका शब्दश' भापानुवाद पा मारि-विश्य = नेत्रादिक इन्द्रियोंका विषय वा नेत्रादिक इन्द्रियोंसे ग्रहण होनेवाला (सो) अ । तस्य । पारि-विमपण = अर्थ है । तिस (अर्थ) के पहु आदिक (पारह) विक्षपण है। = (उपयुक्त अर्थ) विशेष्य के (= विशिरस्म) अवमह भादयः ।। मान्नि। इति अमिमम्बन्ध । = अवाप-धारमा (= आदयः) होते हैं। ऐसे समय (अर्थ और अवग्रह आदि में) निपता = किया गया है अर्थात द्रव्य, वस्तु, अर्थ या पदार्थ के अवसह, ईहा, अबाप, धारणा शान होते हैं । ऐसा अमिस्पष 'अर्थ' और वकार आदिका मापसमें है। पाना । यह आदि = (प्रश्न) बन (= पाषता) पहुआदि (पार) बर्ष वा वस्तु पर०मिम् ॥ अपम ॥ इदम् ॥ उच्यतेत मत्पम् । = ही (= एव) है तो फिसलिये यह (सम्र) कयागया है । (उचर) सस्प पा ठीक पव०किन्तुक प्रादि परिकवना-निधि-पर्यम् ॥ -दी (तुमारा करना) है परन्तु अन्य वादियोंकी कल्पनाके निरोधके लिये (१)नम्न पनि विशेषण मिशिन्स -तस्प पहु-मादि विशेषणेन विशिएस्प यहाँ॥विशेषण शब्द करण तृतीया विमति है ममासके घरण करण पिमलिन लोप है। मत वाक्य का कम ऐसे है किस्म विशिएस्य विशेषणेन मपग्रह आदय मवम्ति । तस्य' पिपिए; बदु मादि -विम विशेष्य (विशेषम पाले-विशेष युज मर्प) पाभादिक (उपराए) पिपणेन । अवग्रह पाइप। मपति -विशेषणरि ग गुणपामारि सुषमा हा साधाप पारणा (AM) होत ॥ एटानियासी बगरमसहाय वकीलपत परम्छेद और विमस्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी मनुवाद । अध्याय १ सय १७,१८ तस्मिन्निन्द्रिय सन्निकृष्यमाणे तदव्यतिरेकाम्पादिष्वपि सव्यवहारो युज्यते ॥ किमिमे अवग्रहादयः मर्व स्येन्द्रियानिन्द्रियस्य भवन्ति उत कश्चिद्विपयविशेषोऽस्तीत्यत आह ॥ व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८॥ वस्मिन् इन्द्रिमा im समिप्पमापे । स्मादिपु । -विस (द्रव्य) में इन्द्रियों से संबंध होने पर (= सनिकप्पमाणे) रूपादिकों में अपि अव्यतिरेकात । संव्यवहारः ।। =भी उस (द्रव्य) से (उन स्पादिकोंक) अमिम होने (के निमिच) से व्यवहार पुन्य T प्रवर्तता है अर्थात् अब वष्य से और इन्द्रियों से संबंध होता है सप (क्योंकि स्मादिक गुण द्रव्य से सदा अमिन है) उन गुणों में ऐसा व्यनहार प्रवर्तता है कि रूप मैंने देखा वा गंध मैंने सुंघा इत्यादि किम् ॥ इम । अवमा भादयः । सर्वस्य प प्रश्न) क्या ये अपग्रह ईशा अपाय घारमा ( आदय) सप इन्द्रिय अनिन्द्रियस्म : भवन्ति T उत० कामित इन्द्रियों (सपा) मनके होते है अपपा (=उत) कोई (मिस्) सिम-विशेपा । मस्ति T इतिक मत माह T विपपका मेद या अन्तर है ? ऐसा (पूछने पर) इसलिये (आचार्य) कहते हैं कि ॥ व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥ =व्यञ्जनस्यावग्रहः ( एव भवति नेहादय ) ष्पजनस्पतमवग्रहा। =अश्यक वा अप्रगट (जे भन्दादिक) पदार्य है सिसका अवग्रहस्पमान एक मववि T नईहा-आदया। -ही (एष) शेता है न कि हा अवाय और पारणारूप शान होते हैं अर्थात इस प्रकार अवयह पान दो प्रकार का होता है एक तो व्यक्त प्रगट पस्तुओंक सबंध में दूसरा बम्पक वा अप्रगट वस्तुओंके संबंधौ परंतु ईशा अवार-धारणा ये वीन ज्ञान केवल प्रकट वा व्यक्त पदार्थोके संयोगमें होते हैं क्योंकि नम पदार्य मषिक जानने योम्प होनाता है अथवा यों कहिये किम पदार्थ व्यक्त होबाता है तब व्यजनावग्रह नहीं राता है इतिज भी ।। ष्पम् । एटानिवासी नगरपसहाय मीसस्त परपद और विमात्पर्य सहित स्वार्थसिदिका पदमा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र १७ इयतिपर्यापोस्तेर्वार्यत इत्ययों द्रव्य । पर्यापान पनि पाते। =जो पापोंको प्राप्त होता है अथवा (=पा) तिन (पायों) करि (=d.) यो प्राप्त फिया बाता है। = ऐसा अर्थ अर्थात फार्म वा वस्तु है (सो गुण पर्यायोंका समुदाय) द्रव्य है। (१) पति-पापमयादि वीमर मरे (-मामा गमन परमा) भातुके प्रथम (मम्प) पुसारि प्रमान परस्मैपर ए. पवन पर्वमान असोशियो। यापम प्रभर पता है कि वतीयमणके पातुनो भगबमानेमें पातु नियमोंके मनुहम पोहफ्या जाता है। इम पातु“एडामा प्रथमस्प १-१ महापापी ।। (पातुके) प्रपम पर (अपक्ष) को मिल हो मर्याद वे पातु जिनमें एक सेर वारस परका दारा देत (जैसे प्रभातुन स्वर दोहराने से हम ऐसा म्प पर) परि धातु परमम्पजन हो तो प्रारंभिक पंजस मरित स्परकोपहरा देते है (जैसे पुर-पास का पुपए आप हो जाता है)। सुमित्यादि का विकरण ) पर हो (पमादमें मावे) वो अति और पिपति धातुक अम्पास को मादेश हो गाय अर्यात् १ सपके प्रथम को स्थानमें पहोवे अता पत्र (-४-मापायी )-पा (मम्पामस्पामवर्षे-मम्म-मसवर्षे (पोपिषमे)-भसवर्ष भर पर होता मभ्यासो (पप गौर समाप(-ए) ग्वर (-) आपेश हो ६-५-८ टिप्पणी पृष्ठ ५६से इस एम गुण होकर पमर पेसा कप हुआ एममें प्रथम पुरुष तरि प्रधान परस्मैपद एक पचन वर्तमान चमकी क्रियापति प्रस्पर मोनेसे स्मर विमा-स्पति । (मानुपी (अदादि नितीगगन मारमने पदो)-सोन्म स्पन परमा) ई स्वरो स्थानमें म्ति स्याक फ्पके परिले सिमके प्रारम्भमें दो मोर पातु (प्रथम मौर तोमरे गप पातु परस्मैपदी-प्राप्त जा, आमा) मोर गए (-मगमा रितीपमन के) गुण रोगाते है मामले परम प्रवर सर्मपि प्रपानमें पाया माता मत शी द्वितीय गाय अरमनेपदी-एणते मुगावा गावागाए- दिवीपाव पीपदो सागपत-म जाता है (देखो पातु हा निकष पृष्ठ ४)प्रर् (गुण संहा परमेसे) पर्मपि प्रधान प्रपर मानेसे मामात् । प्रथम पुरवि प्रधान मारमनेपदी एका वर्तमान वागाने से सात मत प्रातडिया मावा॥

अरट एटानिषासी बर्गरूपसहाय कीलकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्ष सहित स्वार्थसिद्रिका शम्दा हिंदी अनुवाद । अभ्याम १ यत्र १७,१८ तस्मिनिन्द्रिय सन्निकृष्यमाणे तदव्यतिरेकाइपादिष्वपि सव्यवहारो युज्यते ॥किमिमे अवग्रहादय. मर्व स्पेन्द्रियानिन्द्रियस्य भवन्ति उत कश्चिद्विपयविशेषोऽस्तीत्यत आह ॥ व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८॥ सस्मिन् ॥ इन्द्रिय समिकप्पमापे रूपाविपु=तिस (द्रव्य) में इन्द्रियों से संबंध होने पर (= सनिकायमाणे) रूपादिकों में अपि० सद् अन्पतिरेकात , संध्यपहारा =भी उस (इन्प) से (उन स्पादिकोंक) अमिम होने (के निमिस) से व्यवहार मुन्यते T पर्तता है वर्षात जब द्रव्य से और इन्द्रियों से संबंध होता है तप (क्योंकि स्मादिक गुण द्रव्य से सवा अमिन है) उन गुणों में ऐसा व्यवहार प्रर्वता है कि रूप मैंने देखा वा गैप मैने सुंघा इत्यादि किम् ॥ इम । अपग्रह प्रादयः । सर्वस्स : (प्रभ) क्या ये अवग्रह ईहा अवाय धारणा (आदय) सप इन्द्रिय प्रनिन्द्रि पस्प ।, मपन्ति र उत० कमिव इन्द्रियों (सपा) मनके होते हैं अथपा (=उत) कोई (अमित) विषय-विशेपा । अस्ति T इतिक मत' मार T -विषयका मेद वा अन्तर है ? ऐसा (पूछने पर) इमलिये (आचार्य) करते हैं कि ॥ व्यञ्जनस्यावग्रह. ॥ १८ ॥ =व्यञ्जनस्यावग्रहः ( एव भवति नेहादय ) ध्यम्मनस्य ममग्रह भव्यक्त वा अप्रगट (जे शब्दादिक) पदार्थ है सिसका अपग्रामपमान एप भवति स नईहा-आदय' । -ही (एव) होता है न कि ईहा अवाप और धारमारूप मान होते है अर्थात इस प्रकार अवग्रह शान दो प्रकार का होता है एक तो व्यक्त प्रगट पस्तुओक समंध में सरा अव्यक्त वा अप्रगट वस्तुओंके सनंघमें परंतु ईरा अवाय-धारणा ये तीन मान फेवल प्रकट या व्यक्त पदार्थोके संयोगमें होते हैं क्योंकि बम पदार्य मषिक जानने मोम्प होनाता है अथवा यों कहिये कि वम पदार्थ व्यक्त होजाता है तब व्यञ्जनावग्रह नहीं रहता है इति अकाद्रव्यम् ॥ एटा निवासी जगपसहाय पीतात पदपोव और विमस्पर्य सहित सर्विसिदिका पद हिंदी अनुवाद । अन्याय १ मत्र १७ इयतिपर्यापोस्तैर्थित इत्ययों द्रव्यं । पर्यापान, पति या अर्यते = को पर्यापोंको प्राप्त होता है मया (=पा) विन (पायों) करि (के) मो प्रास किया जाता है। = ऐसा अर्थ अर्थात कार्य या वस्तु है (सो गुण पामोंका समुदाय) द्रव्य है। (पति-पागम होम्यादि वीमर (-सामा गमन करमा) पातुके प्रयम (अन्य) पुख्य करि प्रपात परस्मैपद प. पचन वर्तमान कि है। पर हम पर ना कि स्वीपरक पातुनो मम बमानेमें पातु फर निचोक मनुहम दोहराया जाता है। हम पातु “एभषा र प्रथम 1-1-1मराापी ।। (पातुरे) प्रथम पाव (मप) को दिलो मर्याद वे पातु जिनमें पा सेर पारस सरको दुहरा देते हैं (जैसे ए पातुप स्वर वोहराने से पाक पेसा सपना) पनि भातुके प्रारंभमें पंजन हो तो प्रारमिस प्पैजन मरिव स्वरको बाहरा देते (जैसे पर-पोप प प हो जाता है)।(सोत्पादित विवरण) पर हो (पमादमें मावे) को गति और पिपति घासुर मम्पासमोरमादेश हो माय मर्यात् अमापके प्रथम पो स्थानमें बहते अता परक (--- यापी )-१५ (मम्पमस्पासवर्षे- अमाम-मसवर्षे (पोरयाक)-ममम अन् पर होता अम्पासो एक मोर माइपर (-ए) गर-) आऐशो-४-०८ रिप्पणी पृष्ठ ५६से सहमा गुम होकर पूजर ऐसा रूपमा मि गण पुरुष तरि ममान परस्पर एक रन पर्तमान कापी किरानविपक्ष मारनेसे स्मरतिमा-पति । 10 पातु पी (अदादि द्वितीय मामने पी)-सोना शपन परस्पर स्थानमें निद सार प्रत्ययो पहिले जिसके प्रारम्ममें को और पातु ( प्रथम मौर तामरे पास पातु परस्मैपदी-प्राप्त करना, माना ) मोर माण( -बाना दितीपगप के) गुण होजाते है भने पर श्यप मर्मणि प्रधानमें पाया गावात ची शिवीप गण मामनेपदी-पते सुनपा जावा जाए- द्वितीयाल परस्मैपदी सामर्पते-गाबाद (देखो पातु का पत्रिका पY) अर् (पुब मारनेसे ) पनि प्रधान प्रत्यय जगानेसे मामात ने प्रथम पुरुविधा भएमपी परमाबाबा म माविमा मा तस्मिन् । पटानिवासी पिसबाप वकीसकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सम्वनः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय १७,१८ तस्मिन्निन्द्रिय सन्निकृष्यमाणे तदव्यतिरेकामादिष्वपि सव्यवहारो युज्यते ॥किमिमे अवग्रहादय. मर्व स्येन्द्रियानिन्द्रियस्य भवन्ति उत कश्चिद्विपयविशेषोऽस्तीत्यत आह ॥ व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८॥ इन्द्रियैः सभिकप्पमा कस्पादिए । विस (द्रव्य) में इन्द्रियों से संबंध होने पर (= समिकम्पमाणे) रूपादिकों में मपिक व अल्पतिरेकात् संव्यवहारा। =भी उस (द्रव्य) से (उन स्मादिकोंके) अमिन्न होने (के निमित्त) से व्यवहार पुज्यते प्रयतता है अर्थात् जम द्रव्य से और इन्द्रियों से संबंध होता है तब (क्योंकि सादिक गुण द्रव्य से सदा अमिम ) उन गुणों में ऐसा व्यवहार प्रतिा है कि रूप मैंने देखा वा गंघ मैने संघा इत्यादि किम् ॥ इम । अपग्रह प्रादयः । सर्वस्य । =(प्रश्न) क्या ये अवग्रह ईहा मवाय धारणा (आदय) सम इन्द्रिय अनिन्द्रिपस्य ।। मपन्ति T उत० कमिव इन्द्रियों (तपा) मनके होते है अथपा (=उत) कोई (अमित) रिफ्य विशेषः । अस्ति T इतिक मता मार T -विषयका मेद वा अन्तर है ? एसा (पूछने पर) इसलिये (आचार्य) करते हैं कि ॥ व्यअनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥ =व्यञ्जनस्यावग्रह ( एव भवति नेहादय ) मम्चनस्य भवन =भव्यक्त वा अप्रगट (षे शम्दादिक) पदार्थ है विसका अवग्रहसम्मान एप मवति T न ईहा-आदयः । दी (-एय) होता है न कि ईहा अवाय और धारमारूप मान होते हैं अदि इस प्रफार अवग्रह मान दो प्रकार का होता है एक तो व्यक प्रगट वस्तुओंके संबंध में :सरा बव्यक्त वा अप्रगट वस्तुओंके संबंधों परतु ईटा अवाय-धारमा ये वीन घान केवल प्रकट वा व्यक्त पदापोंके संयोगमें होते है क्योंकि बम पदार्य अधिक जानने योम्प होबावा है अथवा यों कहिये कि अम पदार्थ म्पक होमाता रेसन व्यम्ननाव नहीं रहता है स इति अल्पम् ॥ एटानिरासी मारपसहाय पीतात पदच्छेद और निमत्पर्य सहित स्वार्थसिदिका शमा हिंदी अनुवाद । बप्पाप १ सूत्र १७ इयतिपर्यायांस्तेर्वायत इत्ययों द्रव्य । पर्यायान। पति वा वै अर्यता =जो पर्यामोंको प्राप्त होता है अथवा (=पा) तिन (पायों) करि (वै.) जो प्रात किया जाता है। = ऐसा अर्थ अर्थात् फार्थ वा वस्तु है (सो गुण पर्यायोंका समुदाय) द्रव्य है। (On-या राम रहोस्वाद वीमर गया (-साना गमन करना) पातुके प्रथम (पम्प) पुख्य पर प्रधान परस्पर प. पचन वर्तम्भम HORAN है। पहप हम पर ना है कि तृतीयपको पाचौर मंग बनाने में पातु नियमों के अनुइस बोहरापा माता है। हमर पातु पारापमस्त-महानायी॥ (धातुके) प्रथम पथ (अपक्ष) को हित्व हो अर्थात् वे भातु जिनमें पकसर पारस गरका पुरा देव है (जैसे पातु व स्वर दोहराने से आप ऐसा समा) परिधातुके मारंभमें पंजन हो तो प्रारमिः मेजय मरित स्परको गहरा देते है (जैसे पर-पोमा पुपुए रूप हो माता है)॥नु (जोत्यादि का विकरम) (मादमें भावे। वो भर्वि और पिपति पातुमोक जम्पासोमादेश हो साय अर्यात् ।। सके प्रथम को स्थान र मत मात्र (---गामापी)-रएम (मम्पासस्यामवर्षे-असमस्य-असवर्षे (मोरपरक)-ममपर्ण असू पोहो तो मम्पासो पप और उपकापर(-१) स्वर (-) आ.८ टिप्पणी पृष्ठ पासे इस एम गुण होकर मर ऐसा पहला एममें अपम पुग्न न परम्मैपद पावन पर्वमान कासी किसान ति प्रस्पर मोड़ने एस्मर तिएमा पनि -११-सोन्य शपम परमा) सिरके स्थान मिलापम परिसिमके प्रारम्ममें करना, गावा) मौर बाप(-अपना दितीमगन) गुण बाते है गादी-शुपत सुमापा मार- मिठीपगल गे) पधर्मणि प्रधान मस्पप छपानेसे पाशचिपा आता ।

% 3D एटानिवासी जगरूपसहाप पकीस्कृत पदच्छेद और विमक्स्पये सहित सार्थसिद्धिका शमशा दिदी अनुवाद । सापाप १८ स तर्हि एवकार कर्तव्यो न कर्तव्य ।। सिद्धे विषिरारभ्यमाणो नियमार्थ इति अन्तरेणेवकार नियमार्यों भविष्यति ॥ ननु अवग्रहाइणमुभयत्र तुल्यं तत्र किं कृतोऽय विशेषः ।। = (मन या पत्र पदि) निस्मार्थ (स.) है तो (= तर्हि) एक्कार सा, वर्दिक एपकार । नव्या = (इस पत्रमें) लाना चाहिये (कर्तव्या) भावार्य-बो यह स्त्र निश्प पाचक है तो इसमें अवमद शम्दके पचात् "एव" सम्द लाते और एम ऐसा होता म्यानस्पानगृह एप ॥ कर्वव्य । = (उचर-एष इस पत्रमें) नहीं लाना चाहिये विधिः ॥ = (समानां पत्रमें अवगा शन्दका) विधान सिद्ध होने के हेत) से । आरम्पमाणानियम-अर्थः । इतिक = (पुनि इस स्त्र में अवर सम्बका) आरम्म किया जाना नियमके लिये है अन्वरेन एवकारम् । -विना (म्अन्तरेम) एक्कार (भर्वाद इस सूत्रमें पिना एष शम्द लाये हुये दी) नियम-भय । मविपतिा । ननु अवगृह-गृहमं । नियमके लिये (यह सूत्र) होगा। प्रभ (मनु) अवगृहका लाना उमपन. तुल्पम् ॥ = दोनों स्थानों (अवि अर्थमें तथा व्यंजनमें) समान है वक अपम् ॥ = उस स्थानमें (सत्र-अपगृह सन १७ में और) यहाँ (अपम्) किन का विशेषः ॥ = अर्यात् (संजनावग्रह सूत्र १८म) क्या विशेप, मेद या अन्तर किमागया है (१) "वम् (नि०) (अयं-पु., पं सी०एन०) पर किसी पेसी पोजको जवगवा है जो कएने हारके रिंग हो । यद । यहाँ पप० पट जा पहाके अर्थ में लिया (१) विशेष्यमाये पर निशर्षिशत मविशाम सम्पा पिघनमाविश्यमिप्राप' पूर्वपक्षिणः । विशेष-अमावे । निशपिंशव मतियाम (मर्यावह मोर म्यमनापाके मेद न होमेमें वीनसौ पचीस मसिमान समा पिघटस्पद गति ममिण पूर्वपक्षिया (मेमोकी) गफ्नाके म्यून करने (के हेसु) से है-पेमा अभिप्राय मनका को C एरानियासी जमरूपसराप तकृत परन्छेद और रिमस्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शदशा हिंदी अनुवाद । मनाप ११८, यञ्जनम यात शब्दादिजात तस्यावग्रहो भवति । किमर्थमिदं । नियमाथै, अवप्रह एव नेहादय इति । अविग्रह हो जाता है जैसे माटीके रेल अपग नवीन मोला-मटकनावा और कोई मिट्टीका नवीन माजन लीजिये और उसमें उसके कण-पदें गलिये तब दो तीन आदि कग तक सीधा हुमा गीला या वाला नहीं होता है तब तक अव्यक है तिसको ध्यंजन करिये और वही उक्त माजन बम धीरे धीरे (मंद मंद) गीला हो बाप तब व्यक्त होता है। वैसे ही वर्णमादिक इन्द्रियोंके अवग्रह में शम्दादिरूप परिणमें पुद्गलके सकन्ध दो तीन आदि समोम प्रहग हुये प्रकट ग्रहण नहीं होते हैं व्यक्त ग्रहण में नहीं पाते हैं मा तक व्यंजनाया है। पुनि पुनि उन पुगत स्कन्धोंके प्रण होनेपर प्रगट होते हैं तब वर्वावग्रह है इस प्रकार व्यक्त ग्राणसे पूर्व पूर्व वो ठमेबनावग्रह है व्यक्त प्रम होने पर वही वर्षावग्रह है इसलिये धप्रगट या बव्यक्तके ग्रहणमें अवग्रह ही होता है ईशा अवाय धारणा इन तीनमिसे कोई भी नहीं होता है। ॥ पदच्छेद और विभक्त्यर्यसहित इस अठारहवां सूत्रपर संस्कृत सर्वार्थसिद्धिका शब्दश हिंदी अनुवाद । म्पननम् ॥ मन्यतम् ॥ शन्द मादि जातम् = व्यवन अर्पात् अप्रगट शम्दादिकों का समूह सस्य () अवग्रह। मपवित =विस (व्यंजन) का अवग्रहरूप (भान) होता है किम् ॥ अर्थम् । इदम् ॥ नियम-अर्थम् ॥ = (प्रश्न) यह (अठारहमा स्त्र) किस सिये (भागया) है। निमय के लिये है भवप्राः । एषन हा मादय । इति = (अपान व्यंजन का) अवग्रह (मान) ही होता है नकि का बाप धारणा ।।

नियम भ R4141 गाणेनियमके लिये ( मह सत्र ) होगा । प्रश्न ( नन ) मगृहका साना 110 ) ( 4 ) AATM को माओकरमे हरेक हिंगो । यह । यहाँ पप ० पृष्ठा 49 / HIT HAS HE HAIR NA मरामा । +44101411104 Northy ht मभिमण प्रश्नकता है XAMIRROR फसव्या एटानिवासी बगरूपसहाय पकीस्कृत पदच्छेद और विम्बस्व सहित स्वार्थसिदिका सम्बया हिंदी अनुवाद । आपाप १te स तर्हि एवकार कर्तव्यो न कर्तव्यः । सिद्धे विपिरारभ्यमाणो नियमार्थ इति अन्तरेणेवारं नियमार्यो भविष्यति ॥ ननु अवग्रहग्रहणमुभयत्र तुल्यं तत्र किं कृतोऽय विशेष १॥ परिक एवकारः ।। = (स-यह पत्र पदि) निपमार्य (=सा) है तो (= सहि) एपकार = (इस एप्रमे) लाना चाहिये (कर्तव्या) मावार्थ-यो यह सत्र निभय वाचक है तो इसमें अपनर शब्द पधात "एव" शम्य छावे बौर पत्र ऐसा होता "जनस्वावगृह पवा' ॥ (उचर-~-एष इस स्त्र) नहीं लाना चाहिये = (सत्रहवां अनमें अनगा शन्दका) विधान सिद्ध होने के हेतु) से = (पुनि इस सूत्र में अवाह सम्दका) आरम्म किया जाना निगमके लिये है =पिना (अन्तरेण) एवकार (मर्यात इस सत्रमें बिना एष पद साये हुये ही) EART दोनों स्थानों (अर्यात अर्थमें तया संजन) समान है 43 पानमें (वन-अर्यावह पत्र १७ में जौर) महा (अपम्) - nhr (पानगा या रम) क्या विशेप, मेद वा अन्तर किमागया है %3D लिमा भाना htतिय रेल 114 32 Hindi AM HHA TARATHITA तीस तीस मतिमान रूपम० मिना एटानिवासी अगस्पसहाय पकीरत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित सार्यसिद्धिका शब्दशः हिदीबनुवाद अध्याय १ ख १८ अर्यावग्रहव्यञ्जनावग्रहयोळक्ताव्यकृतो विशेषः । कथम् । अभिनवशरावार्दीकरणवत् । यथा जल पणद्वित्रिसिक्न शरावोऽभिनवो नार्दीभवति, स एव पुन पुन सिच्यमान शनस्तिम्यते, एवं श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु गन्दादिपरिणता पुढ्ला द्वित्र्यादिपु समयेपु गृह्यमाणा न व्यक्तीभवन्ति, पुन पुनरवग्रहे सति व्यक्तीभवन्ति । अतो व्यग्रहणात्माग्व्यअनावग्रह । व्यक्त ग्रहणमर्थावग्रहः। ततोब्यक्तावग्रहणादीहादयो न भवन्ति अधे अपनर-यंत्रन अपग्रहयो ।व्यक भव्यक -प्रर्धावग्रह मोर व्यंजनावग्रहमें प्रमट और अप्रगट छतः । विशेष ॥ फत मेद वा अन्तर है अर्थात् प्रगट पदार्थोका ग्राण हो सो अर्थावग्रह है और थप्रगट वस्तुओंफा ग्राण हो सो व्यंजनावग्रह (प्रम) किस प्रकार है (उचर में करते हैं कि) नवीन (माटीका) परार प्रादरंगात यपा० जल- कटोरा वा सकोराके भिबोने (गीला करने के सास है । वैसे जलके सम-विनिसित । रावा। अमिनव' नयादी -दो वीन कापसे सींचा हुआ नवीन माटीका कटोरा गीला नहीं एव पुनःपुन० सिन्यमानः । होता है (वनतक अव्यक्त है) वो (स.) ही (एव) फिर फिर सींचा हुआ =धीरे धीरे ( गनैः) गीला होजाता है (वन व्यक्त है। ए० घोष वादिय-इन्द्रियेपु॥ सम्दादि-परिपताः, ऐसे कम आदिक इन्द्रियों (क अवग्रह में शब्दादिक रूप परिणम्पा पता, दि मिश्रादिष; समयेप, गृममाणा!!! =पुद्गलके स्कन्ध (=पुद्गला') दो तीन आदिक समर्पोम ग्राम हुये (-गृपमाणा:) नम्पतीमयन्ति पुन' पुन अफट नहीं होते है (सपवक व्यंजनावग्रह है) पार पार भरपद मति व्यकामरन्ति । (उन पुद्गलस्फयोक) ग्रहण ( अवग्रह) होनेपर प्रगट होते है (तब अविग्रह होता)। मत' म्पत-प्ररणात् । प्राग्-व्यंजन अपग्रहा। इसलिये प्रगट ग्रहणसे पहिले पहिले पबनावग्रह है म्पक-ग्रामम् ॥ मर्य अवगा। तः अव्यक्त =प्रगटका ग्रहण (है सो) अर्यावह है। तिससे अप्रगटके भरग्रापात भावयः -मानो देशा-अपाय धारमा नहीं होते हैं मातिस " मन तिम्पद सर्वेन्द्रियाणामविशेपेण व्यञ्जनावग्रहप्रसगे यत्रासम्मवस्तदर्थप्रतिपंधमाह - न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १६ ॥ सरनन्दियामा मरिशेपेपर" न्यमापमा = परोंक कपन म) विशेष न होनेसे सपस्त इन्द्रियों के व्यमनावमाका संगे।' = संयोग पा समन्ध प्रामेपर महा ( मिस मिस इंद्रियमेंपंधनापर)। असम् तद्-अयम् " प्रतिषम् ' मा T = सम्पद है। विस (म्पमनापमा) के लिये निषेप (को) कावे कि ! सूत्रम्-न 'चक्षुरनिन्दियाभ्याम् ॥ १६ ॥ - (ध्यजनस्यावग्रहो) न(मयति) चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् सप्रार्थ-पधुर्-भनिन्द्रिपाभ्याम् ॥ = नेमान्द्रिय और भनिद्रिय (पन, पद इद्रिय, नो इंद्रिय पारन्तारम) से प्पमन-प्रबमा म मावि T प्रगट पदार्णकापाष्पक प्रस्तुभों का अवमासान नहीं होता। (रितु स्पर्शन-रसन-प्राय पोपइनपार इन्द्रियों द्वारा यमनावमा होवा) स्पा - उपयुक्त गर्भ से पगठन पसुरनिन्द्रिपाम्पाम्" सूत्र में "ध्यममस्यापमा मगरहमा समस्त सूत्र की अनुचि भावी है और उन्नीसा मय अठारहना मन का अपवाद मर्यात् ष्यमनस्पावणा स्त्र से पर मलवा है कि पांच इन्द्रिप और छठ पन इन छो द्वारा अपगट या प्रकास शान सेवा। पासूत्र उपयुक्त सूत्र का रस बना विरोपण लिम्पमन (प्रगट ) पदाया गपग्रारूपनान नेप्र भौर पन को लेकर अपशेप पशन-सन-नाग-भोत्र पार इन्दिपों द्वारा ( मग रूप मान ) होता है। मन सेलि व्यमन पदापरे ई भाषाप धारया बिसी मी इन्द्रिय से- प्पळोजा उसको मादी मपति मौर पकी मति पाते हैं। पथप्यायी ५.४५. सूत्र से भभूतवमा कम्पस्तियोगे संपचकरिस्पिा- ममतवमाये भू-मस्ति-पोगे सम्पचकरि सम्पप पर्वा मे ( वर्तमान प्रातिपदिक से) (करना) मु(होना) - मस्ति (रोमा) के योग में वि (1) प्रायप हो जो मवस्था प्रपम पो उसके हो जाने पर (वि प्रापप हो) सरिये भार+मपनि, मारकरोति, प्पकरमपति कम से । मस्प ध्या सून (.--१२) मारा-मस्य जी (६)॥खिये पहिले मंग मातम हे स्पान मे मा मात्रा मपति मानी परोलि, म्यछी मववि पापे-10 दोनो समान में इस सूत्र का पाठ बर मर्प एप है।

छन । विशेष कपम० मिन- एटानिवासी जगरूपसहाप पकीकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्षसिदिका भन्दा दिदीबनुवाद अध्याय १ स १८ अर्यावग्रहव्यञ्जनावग्रहयोळक्ताव्यक्तकृतो विशेप. । कथम् । अभिनवशरावार्दीकरणवत् । यथा जल पणद्वित्रिसित. शरावोऽभिनवो नाभवति, स एव पुन पुन सिच्यमान शनस्तिम्यते, एव श्रोत्रादिष्विन्द्रियेषु शब्दादिपरिणता पुदला द्वित्र्यादिपु समयेपु गृह्यमाणा न व्यक्तीभवन्ति, पुन पुनरवग्रहे सति व्यक्तीभवन्ति ॥ अतो व्यग्रहणात्साग्व्यञ्जनावग्रह । व्यक्त यहणमर्थावग्रह । ततोऽव्यक्तावग्रहणादीहादयो न भवन्ति अर्थ अवग्रह-म्यवनप्रवग्रहयो ।ध्यक्त-अव्यक -अर्यायग्रह और व्यंजनापग्रहमें प्रगट बौर अप्रगट =कत मेद वा अन्तर है अर्थात प्रगट पदार्थोका ग्रहण हो सो वर्षावग्रह है और यप्रगट वस्तुओंका ग्रहण हो सो व्यबनापग्रह है (प्रभ) किस प्रकार है (उचरमें कहते हैं कि) नवीन (माटीका) भरार पार्दीरमात यथावल -कटोरा वा सोराके मिबोने (गीला करन)के सम्ठ है। जैसे बलके काग-दिन-सिक्तः । मराव' । अभिनव मायादी -दो तीन कणसे सींचा हुआ नवीन माटीका कटोरा गीला नहीं मातिर । एव०पुनपुनसिन्पमान. गोता है (सबक्क अव्यक्त है) यो (स.) ही (-एम) फिर फिर सींचा हुवा पन तिम्पत =धीरे धीर (सनी) गीला होजाता है (तम व्यक है। एवं० भोव प्रादिपु-इन्द्रियेला सम्दादि-परिणताः, ऐसे फर्ण आदिक इन्द्रियों (क अवार में शब्दादिक रूप परिणम्मा पुगता। दिदि-आदित, समयेप, गृपमाणाः। =पुद्गलके स्कन्ध (-पुद्गलाः) दो तीन आदिक समयोंमें ग्रहण हुये (ममाणा:) न म्पनीमान्ति पुन पुन अफट नहीं होते हैं (सयवक व्यंजनावग्रह है) वार पार अरमान मति म्पकामवन्ति । (उन पुद्गलस्कन्धोंक) ग्रहण ( अपग्रह) होनेपर प्रगट होते है (तब अर्पावार होता है)। अन० व्यक्त-प्राणाद !प्राग्यंजन अपग्रहा। इसलिये प्रगट ग्रामसे पहिले पहिले व्यवनावग्रह है म्यक्त-प्राणम् अर्प-अवरः ।। तत' अव्यक्त प्रगटका ग्राण (है सो) अर्यावह है। विससे अप्रगटके अप्ररणात् ॥ हा प्रादयान मन्ति हमसे इदा-अयाय पारणा नहीं रोसे है - प १२:41 एवानिवासो नगमसहाय पीसकत पदच्छेद भौर विपक्पर्प सरिस सपिसिदि का शम्दशः हिंदी अनुवाद । अप्याय १ स्त्र ११ (१३) रासन परम्मना भवमाम मविवान । (१५) रासन अस म्यमन का समाप पविज्ञान। (१३) रासन परिप यमन का प्रवास्प पविज्ञान । (१५) सन बसविष पंधन का प्रयास मधिान । (१७) रासन सिप म्पपना भयमाम मविधान (१८) रासन पक्षिम भ्यंगन का भरमास मतिज्ञान । (१७ सन मनिस्सव म्यंमन का प्रावमाप मविान (२०) रासन निस्सव म्यंमन का भरमारूम मविधान (२२) रासन अनुकम्पमन का प्रयारूप पविमान (१२) रासन उस म्पमना अवग्रारूप मविज्ञान (२१) रासन धुर पमन का परमाप मविद्वान (२४) रासन मष व्पमन का भमयाम मधिान (२५) मापन पर मन का भरमहरूप पविज्ञान (२६) प्राणम भत्स व्यंमन का प्रयास मविधान (२७) प्रायम विष म्यमन का अपमारप मविज्ञान (२८) प्रापन प्रस्पविध ष्पनन का प्रवग्राप मसिवान (२) माया सिम म्पनन का प्रवगारूप मविज्ञान । (३०) मायम प्रतिम पमन का अपमास्प मविज्ञान। (२१) मायम मनिस्सूव म्पमन का प्रयगास्प मविज्ञान (३२) प्राणम निस्सव म्यंमन का भवग्राम्प मविज्ञान (१) प्रायम भनुक्त बमना भवगारूप मसिजन (१४) प्रायम कम्पनन भवास पविधान (३५) पापम धुबम्पशन का भवसाप मविधान (३६) प्रायम भुष यमन की अवमाप पनि (२७) मारय पप्पनन का प्रयास्प पविज्ञान (२८) मारय अस व्यंमन का अरगास्म मविज्ञान (१६) थावण परिष पमन का भवगारूप पविधान (४०) धावण प्रसपिय म्पमन का अपमास्स मविवान (११) थापय सिम पंभन का भषमाम्प पविज्ञान (४२) थापय बासिम न्यमन का अपमास्म मविज्ञान ४३) थारम मनिस्सव म्पमन का ममगारुप पसिनान (१४) भाषय निस्सव म्यमन का भयगास्प मतियान । (५५) भाषण अनुसत म्पमन त परमास मविज्ञान (४५) भाषण समय म्यमनका प्रवगास्म मविज्ञान (४७) पापण मुव म्पैमन का अपमाप मविधान (४८) श्रावण मरम्पंगन का अपमारूप मविज्ञान । पविान २२८८ मेद पृष्ठ ३७० से ३०० क लिलै १८ मेद ये हुये ऐमे ३३६ मेद सर्व मिसपर हुये । पदग्धेव और विभक्तयर्थ सहित इस (उन्नीसवां) सुन पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश भाषानुवाद ॥

एटा निवासी प्रमापसाप पीसकत पदच्छेद मौर विमपर्य सहित सार्यसिदिका सम्मशः हिंदी अनुवाद । मवाय १ प १५ नी। क्योंकिम्ममन पदार्प का भरमास मान ही होता बापाय पारमा कदापि हो सकते । प्रश्न-नेत्र इदिप भोर मन भनिन्द्रिय द्वारा म्यमनपा अध्यक्त पदार्य का प्रपगारूप पान क्यों नहीं होता है? सच 'नेप्रदिप और मन ए दोऊ पदानि मिटकरि ना पाने है अपने पिपम ई दरि की माने । पाते पदोक इन्द्रिय अपाप्यकारी है। मेले में मापके मध्य विष्ठता मम्ममा ना माने । रिती विष्ठता पार्य कमान है । पर मन है सोह हरि विष्ठवा पदार्थ के विचार में है। ऐसे नेत्र पर मम ए दोक प्रमाणकारी है" भर्य मकासिता पठ १९ ॥ ममाप्यारी = पदार्थों से भिरार स्पर्शनकारि नहीं मानते है दरि ही वे मानवे । ॥ इन दोनों घनों का सार पार कि 'अम्पक पदार्थों का प्रयास शान मी पक्ष स्पर्शन, रसन, पाठ और भोग द्वारा पता मोर इनका फल पाया कि स्पर्शन, रसन, घास, भौर भोष इन चार ही इनियों से म्पंधनावमा पाम्पक पदार्थों का परमास शान होता है और म्यमनपा ममगट सार्यों के ईशा, ब्रायरूप, और पारवामान नहीं है इसलिपे पर्शन, रसन, घाण और भात इन परवेक इन्द्रियों से प्राप्त हुये म्पमनापमारूप ज्ञान को पर एक [मस) परिप, एपिष, तिम, पानिम, मान सूत, निःसृत, अनुक्क, उक्त भुष, मधुष, में से प्रषक २ पर लगाने से म्पममाना [अर्थात् ममगट पदार्प रे प्रबमामान ] के निम्न खिलिव प्रवासीस मेद होते हैं (१) सार्शन पायमन का प्रयास मतिमान । (१) सार्शन परिष म्पंगन प्रवास परिधान ! (1) सार्शन धिम म्यमन का प्रायास्प मविधान । (७) सार्शन मनिस्मत न्यनन नाप्रमग्रामम मविान। (९) साशन अनुक्क मन का बापाप पविान । (११) सार्शन मुरम्यमन समाप पशिान । (२) स्पार्शन प्रस पमन का माम्म मयिान । (४) साशन प्रत्सविष यमन समस्यास्प पविज्ञान । (६) स्पार्शन चिपू म्यमन का अपमहरम मलिान । (८) साशन निस्मत बन समास पतिमान । (१०) सार्शन पक्त पंकन प्रामामा मधिान । (११) सार्सम प्रभुकम्पममा महम मधिान ।

पठानिवासो प्रगासहाय पडीकन पदरछेद भौर रिपपर्य सहित सर्यिसिदि का बम्पर हिंदी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र १९ (१३) रासन पशुमन मामाला मविमान । (१४) रासन मास मेमन का अपमा म्प मविज्ञान (११) रासन परिप बमन का प्रवास्प पविज्ञान । (११) रासन प्रसविषयमन का प्रयास पविान । (१७) सन सिप पान का अपमारूप माविधान (१८) रासन अधिमपंगन का प्रयास्प मविधान । (१६) सन मनिरासत म्यंमना भरमस्प मविधान (२०) रासन निस्सत म्पंमन का भवगास्म विज्ञान (२१) रासन मनुक यमन का अपमास्प मविज्ञान (१२) रामन उधा ष्यमन का अपमारूप मविज्ञान (२३) रामन धन यमन का परमात्म विज्ञान (२४) रासन मध्य पमन का प्रयास्प मविधान (२३) मापन पर यमन प्रवरूप मविनाम (२६) प्राणम अप म्यंजन का अपमारूप मविज्ञान (२७) मापन पविष म्यान का अपमाम मविज्ञान (२८) प्राणम मसविष ष्यनन का नवमास्प मविज्ञान (२७ प्रायन चिम म्पमन का अपमारूप मविज्ञान । (३०) प्रायम बतिम ध्यान का अपमास्प मसिमाम । (२१) बाबम निस्मृव म्पंधन का भरगाम मविधान (३२) प्रायम निस्सव भ्यमन का भयास्प मतिद्वान (२१) प्रासम अनुक्त मन का प्रयास मसिजन (३४) प्रायम कम्पनन भवगारूप विधान (२५) प्रायन धुपम्पमन का भरमारप मविधान (३६) प्रायम अबम्पमन की अवमाम्प विधान (२०) भारय परपनन का भरमारूप पविज्ञान (२८) मापद बस व्यंमन का अवमास्प मविान (१६) थारपरिप म्पमन का भवमाम मविधान (४०) पावण सरिप म्यमन का भवमास्म मविान (११) भाषण सिम म्यमनका भरमास पविज्ञान (४) भापर अतिम म्यमन का भवप्रारुप मसिन ४५) पारण मनिस्सव म्पमन प्रवास पतिमान (१४) भाषय निस्सृत यमन का प्रयास पविधान । (४) भाषण मनुएव म्यनन का मामारूप पविज्ञान (५९) भाषण उपस म्यंमन का प्रयास मविज्ञान (५७) भाषण व म्यंमन का अपमास्प मविमान (४८) धारण अर म्यमन का प्रमग्रारूप परिवान । पविज्ञान २२८८ मेद पृष्ठ ३७० से ३०० तक सिख ४८ मेद ये हुये ऐसे ३३६ मेद सर्प मिसार हुवे । पदच्छेद भौर विभक्तयर्थ सहित इस (उन्नीसां) सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश भाषानुवाद ॥

एरोनिवासी भगरूपसपीमात पदरछेद और मिस्पर्वसहित सर्भिसिदिका शमशः हिन्दी अनुवाद । मध्याय १ च १९ चक्षुषा अनिन्दूियेण च व्यजनावग्रहो न भवति । कुत १। अप्राप्यकारित्वात् ॥ यतोऽप्राप्तमर्यमवि दिफ युक्तसन्निकर्गविशेषेणघस्थित पाद्यप्रकाशामिव्यकमुपलभते चक्षुः, मनश्चाप्राप्तमतो नानयोव्यंजनाव ग्रहोऽस्ति ॥ चतुपोऽप्राप्यकारित्व कथमप्यवसीयते ? । श्रागमतो युक्तितश्च ।। पागमतस्तावत्- पर पनुपाप भनिन्द्रयेय " म्पमन-भवमा नेत्र से और (च) चन्ता करण से अपगठ पस्तु का अपमारप पान (मी) म मा T अपाप्यारिताद 11 = मी गेला ।। (पन्न) क्योंकर मस्पर्शनियापन से अर्थात नेत्र भौर मन यदोंनों बिना स्पर्श किये हुये था बिना मिट हुये [दूगी से] पदार्य को पायपाते हैं। भगमम् ' भयम् ' भनिदिकम् । = क्योंकि पिना स्पर्शे हुये (बम्स) को (अमाप्तम्) सन्मुख माये हुपे को (अपिदिक) पुन-समिप-विशष ; परिषतम् । = सचित ( युक) निकटवा पिशेप में । = समिपंपिटेप) गरे दुये (रस्सिर्व) पाप-मिग्पकम् ।" पण =[ौर] बाम उमासारि प्रगट दिये गये को [ = अमिष्पक) नेप्र (द्रिय) परसम Tपनस अपाप्यम् ' = माने है (= उपसमवे) और मसारण विनास हुये को पा र विष्ठ हुये को (पतम) वा भनयो। - (पिचार में आता है। इसलिये इन (नेत्र और मन) दोनों में प्पंदन-मन मस्ति T = म्पमनारमा (= अम्पक पदार्थ राजमारूप ज्ञान) नहीं होता पनुपा पाप्यारिसम्पम् अप्परसीपते = (पम) नेस के प्रमाप्यकारीपना कैसे निपव किया गया है (अध्वरसीवे) यकिन प' प्रामपता' वापत् = (मासपे भोर न्याय का अनुमान से अवम (= तापद) माहारा ऐसे है कि . [१] ममाप्य चारिस्वात-पर शप म+नहीं, पाप्प-गम्य, पहुंचने पोम्प, कारि (लीमि+डियो + नी भाववाली पुत्वको परमात पमपी मिनिमपापानविर मोनेसे+पाय+R+ माप्पालान-बमरियाफ्नसे मालसे [२] मसाज-मगिरि-मपरिपत-मिप्पन्द "म" राबविशेषनरमपनामम् नाममा एटा निवासी घमरूपसाप पकीस्कृत पदच्छेद और निमवत्पर्य सहित सर्वार्थ सिटि का शम्दशा हिंदी समाद । अध्याप १ सूत्र १९ पुठ मुणादि सद्द भपुट घेव (१)पस्सदे स्वम् । फाम रसं च गन्ध वट्ठ पुठ्ठ च (२)जाणीहि युक्तिश्च-अप्राप्य-कारि चतुः स्पृष्टानयमहात् । यदि प्राप्यारि स्यात् स्वगिन्द्रियवत् पुछ '। मुणोदि' सद [स्पृष्ट गणोति। शम्द। स्पर्भ ये शन्द को सुनवाई अपुट पर प (१)परसदे स्वम् ।। / = और [ = घ] विना स्पर्श हुए थी [ = [व] अर्थात् क्निास्पर्शवियेहुयेहीलपकोदेखता है अस्पृष्टः।। घ* एव परपवे रूपम् ।। फासासाचगा 1[= स्पर्श संघ गन्ध] = स्पर्शको रसको और गन्धको वटा पुन्छ । (२ जाणीवर रपृष्टं च मानाति)= पन्ध [पन्धन] से और [ = घ] स्पर्श से मानता है युतित पई स्पृष्ट बन्-अवमहात्। = और अनुमान से स्पर्श सेवा मिड़े ये [पदार्थ] को न मानने के हेत से अमाप्पकारि॥ पक्षः = नेत्र [इन्द्रिय] अमाप्पकारी है अर्थात् नेत्र विना स्पर्श किये ये वा बिना मिले हुये दूर ही से] पदार्थ को महण करता है यदि प्राप्पकारि ।। स्पाव" त्वन्द्रियपत् =मो [नेत्र इन्द्रिय माप्यकारी होती [ो] स्वघा पा स्पर्श इन्द्रिय के साश (१) र पातु म्याद प्रपम सफा है उसका परि प्रयोगम 'पश्य होजाता है। मविकरण या चिम्ह भ्यारिगणका सगानसे 'पक्ष्य हो जाता है। पारम्प मामा और परमपदी है। प्रथम्पुम्प वा सम्पुरुप पथवचन मा मनपदी कमिमाम यतमान मियाका ते प्रत्यय लगारसे परय+-पश्यते (-ता)गता है। इसी प्रकारसे प्रयमपुरुप एक षचन परस्मैपद कसरि प्रधान परमारिया का ति परमासे पश्य +fa - परतिमा है पतु प्यानरहे है। कर्मणि प्रर गम एए इसी रूपमें यक् (-य) प्रत्यय लगार से स्प हो जाता है पुनः त भारमम पई सगर रस्य+से-पसे -पवागावा या ग्पा बनसाता है। (देखो पातुरूप घम्बिका पृष्ठ ५०१ जिसमें 'परपति और पत्पवे नो रूप दिये हैं)। (२ नमावि- (-गममा)प्रपाद मम्मा म्सका भात है प्रस्यरसे प्रपमा गये पार मोमें नाजोपाता है। मा अनोक (शिति WE महापायो-शित प्रहय पर हो तेशऔर उन् घालुकाको समावेश हो (-शिति सामना 'सा') परन्तु ना में बो भाई उसक स्थानम ई साते हैं पदि प्य वनहित साक मस्यप मा के पश्चात् का हो डा+ना+ति-जा+ नो+प्ति - मानोति यन गया ।

पटा निवासी अगमपसाप वकीस्कृत पदच्छेद और विभवत्यर्य सहित सर्वार्थसिद्रिका शब्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय ' सूत्र १९ सप्टभजन गृहणायात् । न तु गृहणात्यतो मनोवदघाप्यकारीत्ययसेयम् । ततश्चक्षुर्मनती क्जयित्वा शपागामि द्रयाणा व्यअनावमह । सपामिद्रियानिन्द्रियाणामविग्रह इति सिद्धम् ॥ भाह मिादष्ट मनिज्ञान क्षचणतो विकल्पतश्च, तदनन्तरमुषिष्ट यत् अत तस्येदानी जपण थिल्पश्च वक्रव्य इत्यत माह ।। % 3D %3D %3D स्म ॥ अना[ीपात् । = स्पर्शाये अर्थात् आँख में लगाये हुवे अंजन को प्राण करती वा देवी न. १. गृवाति अव = फिन्त [व] नहीं ग्रहण करती है अर्थात् नहीं देखती है । इसलिये मनोरन् अमाप्पकारिता इति अवसेयम् ।। = अन्त करण सघश अमाप्पकारी है इस प्रकार निश्चय पा प्रतीति करना चाहिये सतर्मनसा ॥ पिया शेषाणा। = तिससे [ = ता ] नेत्र [और] मन को छोड़कर अवशेष वा वषी हुई इदिपाणाम् । पन्धन प्रवाह। = [चार स्पर्शनरसन घ्राण प्रोत्र] इन्द्रिों का व्यंजनरूप अवग्रह होता है माम्। इन्दिप प्रनिन्द्रिपाणाम = सप [स्पर्शन-रसन घाण-नेश्नोत्र] इन्द्रियों का और मन का अर्थ अपार। इति सिदम्।।।। = अविग्रहरूप ज्ञान होता है ऐसा सिद्ध होगपाहै पारामविज्ञानन ॥ सण पविकल्प B [शिष्य] पूछता है कि मविज्ञान स्वरूपसे और [ = घ] भेद से निस्टिम अनन्तरम् ।। = फा गपा है उस मतिमान के निकट [अर्थात् नवा स्त्र में] पन् । तम् ॥ उगीटम् ॥ सस्प '॥ दानीम् =मो [= पत् अवशान उपदेश्या गया है विस [अ तज्ञान] का अभ[ = इदानीम्] स्याणम् ।।। विधप । वकल्प' । इविप्रआरस्वरूप और मद काना योग्प है। ऐसा [परन होने पर] इससिपे करते हैं कि । पहफगदि नाम गणम्न मारमनवा मोर रस्मदा पातु है पराप्याय मधाप पाद १.१६ । पहिल्या पाप • पिपाएषिपति गमति नि मातीना मिति (-फिनि) से भष्यत् मित् मोर फित् प्रत्यय परे तो परिस्पा-वत्यम्प पनापिविकिमत राति भीर भति पातुमारे परम अनुभमसेर उपमहो माये । इसलिप पार पास गरा गया क्योक पात् प्रपपपुर (पा पर पुदर ) एपमन परस्मैपद रिमपान पिपिहिरदिपाय - ममता ग+पात्र ऐमा रमागर गपनमा गिरज लातामा पबरसाना रोप.)+ना+मान्स गममा जापचापानमा ७ एटा निवासी जगरूपसाप बकौलत पदच्छेद और विश्वस्पर्ष सहित स्वार्थ सिद्धिका हिंदी अनुमाद । अध्याय १५ २४ श्रुत मतिपूर्व द्वयनेकद्वादशमेदम् ॥ २० ॥ अतशब्दोऽय श्रवणमुपादाय व्युत्पादितोऽपि कठिवशात् अत मतिपूर्व व्यनेकद्वादशभेदम् ॥ २० ॥ १) असम् ॥ मतिपूर्वम् ॥ -अवज्ञान मत्किान पूर्वक (मतिमान निमित्वक,मम्मिानकारणक,मतिज्ञानमन्योअर्थात् मतिमान है निमित्त वा कारण अपना उत्पन्न करनवापामितको मात्र ज्ञान मावा श्रुझान को मतिज्ञान उत्पन्न करता है और शुतज्ञान मविज्ञान के पश्चात हाताई अनेकवादशभेदम् ॥ = (वा अवज्ञान)दो (भा वामरूप और मंगमविष्टकर) है । पहुत आर पारा प्रकार है वर्वात् अगनोल और अंगप्रविष्टरुप मो श्रुतमान है उनमें से मंगवाण अनेक प्रकार हैं। भगवान पोदर प्रवर्णक हैं और भाषरांग पत्र कृतांगादि पारद अंग प्रविष्ट है पातशब्द । क्षणम = महा श्रुत शब्द सुनने को दाय ॐ व्युतपादित । अपि - प्रण करके उस्पन्न हुआ तो भी (अपि) नेवशात् - हरि का प्रतिदि के वशसे अश्या नल्से (१) मी दिगार पीर श्वेता र सम्मवापी में इस पुत्रका पाठ मोर सामाप मा मा एफसा परम्तु अगाके मो मेमेक भेव उनमें मदद स्य संगस के उदाहरण दि० मा के भगवासोके उदा रण/ पैसे ये नामंग वास के बाहरण विग मग पान हे उदार १)मामायिक प्रकार्यक (१) सामायिक प्रकोर्मक (७) उत्तर प्रन्याय (८) उसपम्ययन २) चतुर्षिशतिस्तय मकार्यक (२) सम्सय प्रकोर्सक () या स्तोत्र पम्पन प्रकर्षक (३) सम्बना मकार्यक (१) कल्प १०) ध्पषवार (१) कस्प 3) प्रनितमस पकार्यक (४) प्रतिक्रमण प्रफोक (११. निशीथि इत्यादि (१४) निपिषिका ।) काय म्पुतसगै मोर्णफ मर्यत् () पियो से मापित प्रमेक (पिनप प्र०) किये हुये पागको गुमग हा शरीर के त्याग से वर्णन को गाई मारमा अंग पियो काकाप प्र () प्यारtani FO: (१) पराव नसिक पका क म फत्प प्रण समाभ्यवस्वाधिगमसूत्रस२०पुरक प्र० महापुररोफ प्र०को उपपदार कनिकर्म म० नन्छ बने । पटा निवासी जगरूपसाप यकीकृत पदरछेद और सिमक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शग्दश हिंदी अनुवाद । अध्याग १ एप्र २० वस्मिर ज्ञान विशेप वर्तते ॥ यथा कुशलवनका प्रतीत्या व्युत्पादिऽपि कुशनशब्दो रूढिवशात्प ययदाते वर्तते ॥ फ पुनरसी ज्ञानावशप इति मत माह "श्रत मतिपूर्वमिति' तरय प्रमाणत्व पूरय ताति पुर्य निमिच कारणमित्यनर्यात म् ।। परिमन्- निशान विशपे । वर्तते । = कोई एक (= पस्मिंश्चित्) मानके विशपमें प्रवर्तता है अर्थाद श्रुतशब्द सुननके अमें व्याकरणी तिस आता है तोमी करिवसे एक मानफा नाम है पया पुसम्बन फर्म प्रतीत्या '॥ व्युवपादित । = नैसे फुशल दाभ वा कोश( = फुश) काटने किया निरचय कर व्युत्पन्न हुआई भपि, पुराउभन्द' । रुटिचशात् । पर्यवदाते । = तौभी (= अपि) कुशल शब्द रूढिके घर से बहुत प्रवीण वा चतुर पुरुपकेअर्थ में = प्रवक्ता है भावार्थ जैसे कुशल शब्द व्याकरण की रीतिसे दामके काटनके 2 में । आता है तौभी रूविके वलसे यदुव चतुर पुरुपके अर्थमें प्रयोग किया जाता है सेसे श्रुत शब्द पद्यपि सुनने के मर्थ व्याकरणानुकूल आता है तोमी रूटिफी सामर्थ्यसे एक शानफा नाम है पुन'का असो । ज्ञान-विशफातिमतः आदत = और पह श्रुत कौनसा (=क) मानविशेष है ऐसा(प्रश्नहोने पर)अत कहते हैं। अतम् । मतिपूर्वम् ॥ इति तस्य प्रमाणत्वम् = श्रुत है सो मतिपूर्वफ है ऐसे शुक्के प्रमाणरूप मानपनारे। पति पति पूर्व निमित्तम् । कारणम् ॥ = जो पद उत्पत्ति पर है सा पूर्व होता है निमित्व है कारणको इति मन् अर्थ-अन्तरम् । = इसमकार (इन तीनों पूर्व निमिर्च कारणं शम्दामें ) अर्यभेद नहीं है (१ मिरिया-मम्तका न जब उसके पात् , ए, न.५ पौर र र भाषे नी (पहम् । अनुष्यार और पिसर्ग (बामे ) पसर गना है हमासये पस्मिन + चित् - सिक्ति पर विसर्ग पर्तमान रण पारसिनित निएमानुमार 'य' में परिवर्तित रामनाही-बिसारे पाात् पदि (परा तो विसर्ग' में पति पदोनो में और सरिर र हानी 'ए में पलर गाना जोतिपाति-रिलनि (इति) (गम Anti) समिरा ना पमा तरत-राहगल (राम नारा)। पमा पमयपी एगानवासी नगलपमहाप कीस्कृत पदच्छेद और विमक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिटिका शम्दश दी अनुपाद । अध्याप १ सूत्र २० मतिनिर्दिष्टा । मति पूर्वमस्य मतिपूर्व मतिकारणमित्यर्य ॥ यदि मतिपूर्व भत तदपि मस्यात्मक प्रामाति कारणसदृश हि लोके कार्य पृष्टामिति । नेतदेकान्तिमम् । दण्डादिकारणोऽय घटो न दाया स्मक । भपि च सति तस्मिन् तदभावात् सत्यपि मतिज्ञाने पासश्रुतज्ञाननिमिच्चसन्निशनेऽपि प्रबम आतापरणोदयस्य भताभाव मति ॥ निर्दिष्टा ।।। मविपूर्वम् ।। अस्पती मति - मविज्ञान [पहिले] या गया है। मति के कारण मिसका [ =अस्प] सो मति पूर्वम्।।।। मति कारणम् ।। इति अर्य । = पूर्व है। मविकारणकपा मविनिमिता है ऐसा मर्य वा अभिमाप है। पदि 8 मतिपूर्वम् । एवम् ॥ तद् ॥ अपि 9 = [प्रस्न] मो [ = यदि]मतिझान निमित्वकवा मन्प जान है वो यह मानमो मानिआरमकम ।। प्रामोति T हि लोके । कारणा- = मतिस्वरूप को प्राप्त होता है। क्योंकि [=]ि नगत में कारण के सदृशम् ॥ कार्यम् । एम। इति = समान कार्य ऐसा देखा जाता है। एकदा एकान्तिकम न® = [उचर] या एकान्स वा अपरप होनेवाण नियम नी॥ पामावार्थी कि यह नियम कि कारण के समान ही कार्य होता सर्वत्र ठीक नहीं है पदों कही पर कार्य कारण के सहश नहीं भी होता है जैसे मपम् ।। घटः । दण्ड आदि कारणः । दण्ड-आदि = पा घर दण [घाफ] आदि निमित्तक है परन्त] दर पाक आदिके प्रात्मक।न = स्वरूप [पूर्वोक घट] नहीं है अर्थात् घड़ाके वनानेके लिये दंर पाक आदिक कारण है परन्तु यह उत्पन्नाआघटदर पाक मादिके समान नही मिन्नस्वरूपहाई प बस्मिन् । सति ।।।। अपि - और क्योंकि उस [मविज्ञान] के अस्तित्वमें वा विचमानता में भी वद अमावात् ।। सति ॥ अपि 8 मविज्ञाने ॥ उस सज्ञानको अभाव [रहवा] [अर्थात् ] मनिशान होने पर मी बाम तज्ञान-निमित्त समिधाने । * वामम श्रु मानके [अन्य अन्य] निमित्त निफ्ट होने पर भो जैसे गुरुवपदेशादि। प्रवल युवावरण-नदयस्प । शुक्समाव" । = श्रुतमानावरण कर्मका प्रक्स उदय वाले [ नीव ] के शुनगान नहीं होता (1) सपार्य सिदिसम्सावाचि प्रथम संस्करणमें 'तरमागत' के स्थानमें सपाषान् भएर छप गया है।

० तर पटा निवासी गरूपसहाप रफोस् पृष्ठ पदरछेद और सिमपत्स्य सहित सर्वार्थसिदिका शन्दश हिंदी अनुवाद । अाग १ सूत्र २० कस्मिर ज्ज्ञान शेप वर्तते ।। यथा कुशलवनका प्रतीत्या व्युत्पादिनाऽपि कुशजशब्दो कादिवशात्य यपदाते वर्तते ॥ क पुनरसौ ज्ञानावशप इति मत माह "श्रत मातिपूर्वमिति' अतरय प्रमाणत्व पूरय ताति पुर्व निमित्त कारणमित्यनर्यात म् ॥ परिमन्-पिकसान विरापे । वर्तते । = कोई एक (= कस्मिरिचत) मानके विशेषमें प्रवर्तता है अर्थात् श्रुतशब्द सननके अर्थ में व्याकरणी शसि माता है तोभी रुटिवशसे एक मानफा नाम है पया पुरन वर्म प्रवीन्या '। प्युतपादिवः । = जैसे कुशल द्राम वा कोश( = कुश) काटने की क्रिया निरचय कर व्युत्पन्न आहे भषि पुरशद । रुटिवशात् ।। पर्पक्दाते ,। = तौमी ( अपि) कुशल शम्द सटिके परसे बहुत प्रवीण वा चतुर पुरुपकैमर्थ में = प्रवक्ता है मावार्य जैसे कुशल शब्द व्याकरण की रीतिसे दामके काटनके 2 में 'आता है तौभी सटिके बससे वात चतुर पुरुपके अर्थमें प्रयोग किया जाता है से श्रृत शब्द यद्यपि सुनने के पर्थ व्याकरणानुफला आता मी तिकी सामर्थ्य से एक मानका नाम है पुनः । असो '। मान-विशप 'इतिमव आT = और यह ग्रस कौनसा (= फ) मानविशेष है ऐसा(प्रश्नहोने पर)मतः कहते हैं, प्रतम् ।।मतिपूर्णम् ॥ इति श्रुतस्प HIप्रमाणत्वम्'।= अत है सो मतिपूर्वक है ऐसे अतके प्रमाणरूप ज्ञानपना है। पति 7 वि पूर्व all निमियम् । कारणम् ॥ = नो पूरे उत्पाद का है सा पूर्व होता है निमित्तो कारणक है इति मन् अर्थ मन्तरम् ॥ - इसप्रकार (इन तीनों,पूर्व निमिज़ कारणं शब्दो में ) अर्पमेद नहीं है (१ स्मिश्तिा- सम्तका न जब उसके पार, छ, न.प. मौर र छ. भावे तो (पान मनुसार और विसग (बाम) पार गना मतिये पस्मिन् + चित् - पहिला चित या विसर्ग वर्तमान शाम प्यावरण मिति मिरमामुमार 'च में परिवर्तित रोगता है-दिमा पात् पदिए तो पिसर्ग'' में पदित ५होता - मै और परिर छाता में पार गाना और पति-पतिरति (-हित) पमा ताति-पाति (राम सापारा)। पमाने-पमासे ( राजा) ये पर विवाधिनता, एटा निमासी पापसभाप पासास पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० प्रव्यादिसामान्यार्पमात् तमनादिनिधनमिष्यते ॥नहि केनचित्पुरुपेण कचिस्कदाचिस्कथञ्चिदुत्प्रेषित मति । तेषामेव विशेषापेचया भादिरन्तश्च सम्भवतीति मतिपूर्वमित्युच्यते ॥ ययाकुरो थोजपूर्वक स व सन्सानापेचया अनादिनिधन इति ॥ न चापौरुपयरवं प्रामाण्यकारणम् । चौर्याधुपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृक स्प प्रामाण्यप्रसंगात् ॥ भनित्यस्य व प्रत्यवादे प्रामायये को विरोध दम्पादिसामान्य-पणाव : शुल्म अनादि निधनम् ॥ = द्रव्यादिक सामान्य को अपेमा से शुत यादि अत सहित (= अनादिनिफ्न) इप्प र निषित - परपेग । कचित ® = माना गया है। क्योंकि (पा शान)किसी मनुष्य करि की या किसी क्षेत्र में कदाचित कम्भिव = कमी वा किसी समय में (= कदायित्) किसी प्रकार से (= क्ययित्) न® उत्प्रेमियम इति। तेषाम् । स विशेष-अपेक्षा नवीन नहीं किया है उन (द्रव्य ) क्षत्र, कास, माप, की ही भेद विक्षा से मादिभात प सम्ममति इति छ मतिपूर्वम् = आदि अव मो( घ) सम्मब है। इस प्रकार मविज्ञान जनित वा जन्य (घ सज्ञान है) इति के उभा र पथा और बीमपूर्वकः । ऐसा कहा मया है। मैसे अंकुरा बीन मनित है साप सन्तान जोमया । अनादिनिधना वि* =ो [अग] हो[= घ] सन्तान की अपेक्षा करि मादि अवरहित रेसे [चठा आवे] न®® अपौरुपमेस्वम् । मामाण्यकारणम् 1 =और [ = घ] अपौरुपेयपना प्रमाणतो [सत्मता] होने को हेद नहीं है अर्थात् प्रमाणता होने के लिये इस बात की अपारपकता नहीं है कि पह पुरुपकृत न हो कोई वस्तु मनुष्य फुच नहाने से ही प्रमाण रूप नही कही ना सकी। चौर्य-प्रादि-नवेशस्य । अस्मर्यमाण कर्मकस्य ।। पों कि स्वेप वा घोरी आदिक के उपदेशो के जिनके करनेवाले को स्मरण नहीं [कि कल ऐसे उपदेश करनेवाला हुआ और कम ऐसे उपदेश दिये और किसने ऐसे उपदेश दिय] मामाणप-प्रसङ्गात् । अनिस्पस्पा • = प्रमाण होने का[= प्रामाण्य प्रसंग पा सम्पन्ध आता है। अनित्य के और[ =घ] मस्पस प्रादेप्रमापे ,III विरोष। - मत्सम आदि के प्रमाणवा होने में क्या विरोध [प्रोता] १ अर्थात् संसार में अनित्य मस्पक्षादि प्रमाण हैं कुछ विरोध नहीं है (१) अपपाव-पश्चिमो विमति एक पान पुलिंग और मपु सक हित है। (२) सम्य, मादि (-क्षेत्र, काल, मात्र ) %3D द्रष्य, सेत्र, कास, माष एनिवासी जगरूपसाप यकीकृत पदच्छेद और विमात्पर्य सहित स्वार्थसिदि का शन्दशा हिंदी, अनुवाद अध्याय १ सूत्र २० श्रतावरणचयोपशमप्रक तु सति अतज्ञानमुत्पद्यत इति मातज्ञान निमित्तमात्र ज्ञेयम् ॥ माह श्रत- मनादिनिधनामिप्यते । तस्य मतिपूर्वकत्वे तदभाव । भादिमतोऽन्तवत्वात् । ततश्च पुरुषकृतत्वादप्रामाण्य- मिति, नेप दोप ॥ शुक भाररण- सपोपशम प्रकों ।। ® सति ।। = परन्तु अज्ञानावरणीयकर्मफे क्षयोपशम के मर्म होनेपर [ सवि] शुरुवानम् ।। उत्पपते इति मविज्ञानम् ॥ = प्रज्ञान उत्पन्न होता है। इस प्रकार मसिमान निमितमा पम् ॥ = निमिचमात्र (सहायक निमिछ) मानो। भावार्य ऐसा कि समव है कि शुकशानके उत्पन्न होने के लिये माहिरी कारण मझिानादि पर्वमान भी हो तो भी श्रुत मानारणीय कर्मका बीव के ऐसा प्रवल उदय हो कि असमान न होने दे। अब असमानावर्णीय फर्म का स्पोपशम अन्तर ग कारण विद्यमान हो स्वही मीव के समान होता है इसलिये मविज्ञान केवल नाममात्र वाम कारण सुतज्ञान के उत्पन्न होने को हुषा ॥ मुख्य मौर अवर ग कारण श्रुसकान के उत्पन्न होने के लिये सजानावरणीय कर्म का क्षयोपशम ही है ॥ भारतम् ।।प्रनादि + अनिधनम् ॥इप्प = पूख्खा र [] कि अस आदिरहित अन्तरहित [= अनिधन] माना गया है तस्य HIT मति तद् प्रमा = तिस [वज्ञान] के मतिज्ञान कारणहोने में नित्यपने का वा अनादि निधनवाका [सद अमाव बाता है परन का सारांश या कि शुतज्ञान को अनादि निधन मानाई और पदि सुखानको मविज्ञान वस्पन मनसा है वो अवमान नित्यपने का अमान प्राप्त हुला क्योंकि मादिमव :अन्तस्वात् 'm =मादि गासे का भम्ब होने से अर्थात् मिसका मावि है उसका भंत भी हैं ममामाष्पम् । इति न दो =[पुरुषसोने से रममाण है ऐसामिरन होने पर रचरह किपा दोष नहीं। प्रमारिनियम-नारि(-मारिदित) + मनिधनपरला निपन-मारा गत (श्री पमन्याय १२) एरा निवासी घमासाप सकस पपच्छेद और दिमापर्व सहित सर्विसिदिका शदशा हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० प्रन्यादिसामान्यार्पणात् मतमनादिनिधन मिष्यते ॥नहि केनचित्पुरुपेण कचिस्कदाधिस्कथञ्चिदुप्रेक्षित मति । तेषामेव विशेषापेवया भादिरन्तश्च सम्भवतीति मतिपूर्वमित्युच्यते ॥ ययाकुरो जिपूर्वक स च सन्तानापचया भनादिनिधन इति ॥ न चापौरुपयस्वं प्रामाण्यकारणम् । चोर्यायुपदेशस्यास्मर्यमाणकर्तृक स्प प्रामाण्यप्रसंगात् ॥ भनित्यस्य च प्रस्यवादे प्रामायये को विरोध दम्पादिसामान्य-र्थपणात् । श्रम मनादि निधनम ॥ = द्रव्याक्षिक सामान्य की अपेक्षा से धूत आदि अव रहित (= अनादिनिधन ) इम्पवे निषिद पुरुपेग । कचिव = माना गया है। क्योंकि (यह अवज्ञान)किसी मनुष्य करि कही या किसी क्षत्र में पदाक्ति कपश्चिदछ = कमी वा किसी समय में (= कदाचित) किसी प्रकार से (यश्चित्) न उस्प्रेमियम इति । तेषाम् । स विशेष-अपेक्षया नवीन नहीं किया है उन (द्रव्य ) क्षेत्र, काल, माव, की ही भेद विवक्षा से पादि अन्त । सम्भवति । इति छ मतिपूर्वम् = धादिमत मो( घ) सम्भव है। इस प्रकार मतिमान मनित वा अन्य (असमान ) इति उच्यते । पया 8 अफरः ॥ बीनपूर्वका । = ऐसा कहा गया है। जैसे अकरा वाज अनिव है सबसन्तान प्रापापनादिनिधनावि = सो [अफग] हो[घ] सन्तान की अपेक्षा फार भादि अवरहित ऐसे [चला आवै। प अपौरुपयेत्यम् । मामाण्पकारणम् ॥ =ौर [3] अपौरुपेयपना प्रमाणतो [सत्यता] दोने को हेद नहीं है अर्थात् प्राणवा होने के लिये इस बात की अपारयकवा नहीं है कि वह पुरुष फूत न हो-कोई वस्तु मनुष्य कृत न हाने से ही ममाण रूप नहीं की जा सकी। धोप-त्रादि-उपदेशस्प । असमर्पमाण-कर्मकस्य ।। = क्यों कि स्वेप वा चोरी आदिक के उपदेशो के निनके करनेवाले को स्मरण नहीं [कि कम ऐसे उपदेश करनेवाला हुआ और कब ऐसे उपदेश दिये और मामाच-प्रसार । भनिस्पस्प | Ra घिसने ऐसे उपदेश दिय] = प्रमाण होने का प्रामाण्य प्रसंग वा सम्पन्ध आता है। अनित्य के और[3] मस्पक्ष प्रादेप्रमाण्पे ,II विरोधः । = मस्पक्ष आदि के प्रमाणवा होने में क्या विरोध [आता है अर्थात् संसार में वनित्य प्रत्यक्षादि प्रमाण हैं ही कुछ विरोध नहीं है (१) अपणाव-पचमो विमति एक पचन पुटिंग और मपु सफ सिा है। (२) प्रम्प, मादि (-क्षेत्र, कास मात्र ) -प्रष्य, क्षेत्र, काल, भाष %3D पटा निवासी नगापमाप वकीलकृव पदच्छेद और विझारपर्य सहित सर्वार्थसिटिका शवशः हिन्दी अनुवाद । अध्याप १ व २० भाह, प्रथमसम्यक्त्वोत्पनो युगपज्ज्ञानपरिणामान्मतिपूर्वकस्व अतस्य नोपपद्यत इति । तदयुक्त सम्यक्त्वस्य तदपेचस्वात् । भात्मनाभस्तु क्रमवानिति मतिपूर्वकस्वव्याघाताभाव ॥ माह मातिपूर्व श्रतमित्येतसक्षणमव्यापि अतपूर्वमपि तमिष्यते । तयथा आर प्रयमसम्गक उत्पयो ,युगपद्म = पूछता है कि प्रथमसम्पन्दर्शन की उत्पति में एक्वार वा एक काल[ = युगपत] शान परिणामात् ।तस्प , मतिपूर्वकत्वम् । = [मति त] हानके उत्पन्न होने से [= परिणामात्] ध्रुवज्ञान के मतिनिमित्तफ्ना न0 उपपपवेति । अयुक्तम् ।। = उत्पन्न नहीं होता है। [उत्तर] सो [= तद] [ मारा पायन] टोक नही सम्पाचस्प । तइ प्रपेशत्वात् २॥ = क्योंकि [ज्ञान के] सम्गफ्ना उस [सम्पादन] के प्रसग से हैं अर्याद सम्यक्त्व के उत्पन्न होते ही कुमतिज्ञान और पुत्र मान का परिर्वतन मतिमान और अतमान में हो जाता है। पारमताम || कमवान् । = परन्तु [पूर्वोक्त परिवर्तन होने पर भी ] गान के स्वम्प की लम्धि कमपासी? अर्थात् प्रथम मविज्ञान होता है उसके पश्चात् असमान होता है इति मति पूर्वकला व्यापाव-जमार! -इस प्रकार मवि निमिछपने में विरोध नहीं है भावार्थ यह है कि महिान प्रथम होता है फ्यात् अतमान होता है। गद्यपि इन मविज्ञान और अतान के सम्पपना सम्यक्त्व ही उत्पत्ति होते ही एक साप पा एक कास में ही होता? मविज्ञान और श्रुवमान के सम्गपना एक साथ होने के कारण से उन मस्तिान और सज्ञान की प्रमानुसार एक दूसरे के पमास्]तस्पत्ति में कुछ भएपन नहींहै। पार परिम् ।। वृतम् ॥इति छ एवद् !ul = पूछता है कि "मविज्ञान जनित श्रुतमान' ऐसा यह । अत्यापि = लक्षण यामापक या असर्वमत है अर्थात् सप श्रुतमान में सागू नही पिमा अपि यताप्यते सपया क्योंकि अबान निपिचक मी शुलपान माना गया है। जैसे [= तपपा] (४) परमपराम मम्मच पहारेकार और प्रपमराम सम्पत्य होना। दिलीप पायम सानपण स्पानमस्तार 11 -- %3D % 3D %3D स्टा निवासी मारूपसहाय कीव पदच्छेद और विभसत्पर्य सहित सार्वसिदिका शदशा हिन्दी अनुवाद । अम्याप १ यत्र २० शब्दपरिणतपुनलस्कन्धादाहितवर्णपदवाक्यादिभावाच्चक्षुरादिविषयाच्च भाद्यप्रतविषयभावमापन्ना- दव्यामंगारिण-कृतसगीतिर्जना घटाजनधारणादिकार्यसम्पन्ध्यन्तर प्रतिपयते धूमादग्न्यिादिद्रव्य तदा भतात् भुतप्रतिपत्तिरिति । नैप दोप । तस्यापि मतिपूर्व कत्वमुपचारत ॥भुतमपि कार्यन्मातिपूर्वकखान्म तिरित्युपचर्यत इति ॥ शरपरिणत- पल्पस्कन्यात् आदिक = क्योंकि शम्वरूप परिणपे वा शम्दरूप अवस्थाको पहुँचे पुनलों के स्कंध स्थापित निर्मित वर्णपदवाक्यादि भावात् ।। पभुः प्रावि-विषपात् माघ = अभर पद पपनादिक 'रूप) होते मौर(= घनेत्रादिक इन्द्रियों के विषय होते? भाप तविषयमापन् । आफ्नात् ।। = (उन जसर पदवाफ्गों को) प्रथम वा पहिला श्रुतमानके विषयभाषको प्राप्तहोनमें अपभिधारिणा कृतसंगीविना (फूल) व्यभपार पा दोष नहीं है। उन (अमर पद वाक्पों) से सकेसिव पुरुष घटात् । जस-पारणादि- (घर शम्द से गोचर होनेवाला) घट (नामा पदार्थ) में पानी रखने प्रादिक कार्यसम्पन्धअन्तरम् ।। प्रविपयते Tuया धूमात् ।। कार्य रूप अन्यसयोग को माप्त होता है। वैसे ही (तया ) घुर्वा ( पदार्य) से एव अम्नि आदि द्रव्यम् ॥ श्रुतात ॥ - दो अनल आदिक वस्तको (माप्त होवाहे बानता है)।।शुस मानसे अज्ञानकी प्रतिपचि ॥ इति न एप दोष ।। = प्राप्ति (मति पत्ति) इस प्रकार है। (सर) या दूषण नहीं है वस्य । अपि मति- पूर्वकत्वम् ।उपचारता, तिस (शु तमान) का भी मविज्ञान पूर्वक दोना उपचार से है वा मानलेने से है अर्थात् श्रतज्ञान से जो अज्ञान उत्पन्न हुआ है उस श्रुच मान के उत्पन्न होने को भी उपचार से मतिमान ही कारण है युवम् ॥ अपि कषित् • मतिः ॥ इति शुतज्ञान के भी कहीं वा किसी स्थान में 7 = कृषित् ) मति ही का उपपर्यते इति । मति पूर्वकत्वा ॥ = उपधार कीनिये क्योंकि मवि पूर्वक हो सोहो पूर्वोक्तश्र समान मया सरांशहे कि शुतज्ञान को मति निमित्तक कहा है उसपर प्रश्न है कि जय अवज्ञान से मीनतमान होता है तब मतिजन्य ज्ञान कैसे रहा मैसे पहिले घट शम्द को श्रोत्र इन्द्रिप ननिव मविज्ञान से सुनकर अक्वा उसके कप को नेत्र इन्द्रिय जनित मतिमान से देख कर घट को नानता है यह प्रथम वतमान है फिर उस ही नियत सवयवाले घट से दूसरे संबंधी नल धारण आदि का मान होता है सो श्रुतमान पूर्वक ही असमान माफिर मविपूर्वक शुतमान कैसे ! (उचर) उपयुक्त उदाहरण में प्रथा %3D %3D %3D पण निवासी जगरूपसहाय कीकृत पदच्छेद और विमक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० भेदश पत्येक परिसमाप्यते विभेद नने भेद द्वादशभेदाीति ॥ विभेद तावत्-भगवासमग प्रविष्टमिति । अगवाझमनेकविध दशकालिकोटराध्ययनादि। अनशान मति ज्ञानजन्य है दूसरा अज्ञात प्रथम श्रुतमान से हुआ है वो भो मतिमान पूर्वक उपचार से श्रुतमान दुआ मा कदन में कुप नहीं क्योंकि श्रुततान फदी साक्षात् मतिपूर्वकदै कही परपरा मतिपूर्वक है अतः "श्रुत मति पूर्व" ऐसा कहा है। भर गया। प्रत्यास || परिसमाप्पते द्वि-मदम ||| = (इस एत्र में ) मेदशन्द प्रत्येक पर रूमापा गया है। (अज्ञानके) दो मेदों प्रोत भई ।।। द्वादाभव इति । वावत् ® अनेक भेद हैं । पारह भेद हैं। प्रथम द्विभेद । अग्लायम । पङ्गमविष्टम् ।।इति® = दो मेद अपाय (और ) अङ्ग प्रविष्ट इस प्रकार हैं अत्ताय 11] प्रना. विषम् ॥ दसवैकारिक अगाम अनेक प्रकार वा पातमद रूप है। दशवकालिक (साया प्रकीर्णक) उसरा-पपन-त्रादि = उत्तराध्ययन (आठवा मकीर्णक) (१) आदिफ (पारर प्रकीर्णक दौर है) अर्थात् अक्षरारमा श्रुतमान में पारा और चौदह प्रकीर्णक समिसिस है। मार गाय में (१) मामायिक मोणक (२) सस्वर १३) सम्बना प्र (४) पविक्रमप प्र (५) विनय प्र () कृतिकर्म . (मर () वार म (१११ महाफम : (१२) पुररर.कम० (१३) महापुरक प्र० (१४) निविधिका मकीक निषेशित है मान) मामरिकमक-जिसमें माम स्पाफ्ना द्रव्य सेन काल मारकरि पट प्रकार सामायिक का वर्णन हो। (7) नाम प्रकोप को जिसमें तीथरीके पबकायान चौतिस प्रतियप अप्ठ प्रा वहा परमोवारिक विष्पद समवसरण पोपणाविक भौर धोध महारम्य का प्रफर करनेषापा सपन का पणन हो । (ग) तामाम प्रश्य क पद है जिसमें एक हो तीर्थ फरमानप के मर्च प्रतिमा स्याहयादि स्तषन का व्यापान । () प्रतिक्रमपनाम प्रकोणफ पहरे जिसमें एक दिन समम्या पोप के निराकरण के लिये पसिक प्रतिकमत से ही राधिक पाक्षिक अनुमामिक मापामरिक ऐपिपिफ भीर सम्पास मरण के भवसर में संपूर्ण पर्यायों में उपजे दोपों के निराकरण के लिये प्रतिम मापन हा (रिनयनाम प्रणामसमें दनमान पारित तप रपचार इन पश्चमकार को विनय का कायम हो । व तिच्यनाम प्रसारक या सिसमें जिन पूमनादिक क्रिया करने के विमान का वणन वा पमपरमेसो निधर्म निप्रतिमा मिन पणन मिदिर के पम्ना के लिये दोन मया तोन भवनति भार शिशिपाए मारत पाद और नित्यनैमितिक टिपाराप्रकरण (a) राफासिझनाम प्रकयाफवाहास मसापुमा " (ज) उतराययन प्रकारका है जिसमें चार प्रकार उपसग मौर वार्षियति परिपद सामे के विधान तया इनके पसका वर्णन हो। (म फत्तपयहारनाम प्रकोणक पाद जिसमें साधुमारे योग्य भवरण ध विधान और प्रयाग्य सेघन होते प्रायमितका षयम हो ( काकत्वमाम प्रोणक वो है जिसमें प्रम्य क्षेत्र, कास भाष का प्राध्यकरि साधु के यह पोम्प है यह भयोम्य हैसे द्रष्प, क्षेत्र काल मार के मनुकूल पपन हो। (ड) माफिपसरफ मनमाक वह है जिसमें उमए संहममादि सहित जिन कम्पो साघुमा के द्रव्य क्षेत्र काल माप के योम्य विकास पोगा एकनि का भाचरण फा पर्णम और स्थापिर कल्यो सामुमो का दोसा रिसा गणपापण मारमसस्कार साल मना उत्तमार्थस्थानगत उदरभारापना का यणम हो। (8) पुरनाम - जिसमें चार प्रकार के देवों के उपममे का कारण दान पूजा तपमएस मकाम निर्जरा सम्यकरष सेसमादिक का देया के उपपावस्थान के पिमयका कथन हो । (ड) महा पुरक सम्म प्रकाण क वह हे मिसमें एक प्रतियादिको में उत्पत्ति का कारण तपमायादिफ का परम न हो। (४) मिविधि का नाम प रषा है जिसमें प्रमाव अनिवदोष दूर करने के लिये पात प्रकार प्रायश्चित्तादिक का कथन हो इनो उपसिधवा विशेप कयन ऐसे है कि संसात वर्णमाला में माथे के १२ प है परन्तु प्राकृति भाषा में और देशांतर मापा में ए ऐ मा मो इस्य भो होते हैं और एक दोघं बकार संस्कप्त में नहीं है मनुकरण विपांतर की माषा में दीर्घ वकार होता है . इस र यो अनुमासिक घिय म् यह प्रक्षर पे पार पम महीं है भोरखा प्रपोग पार रूपये १३ संसद में। स्व स्पर वोर्म स्यर प्रत स्यर पवन २४ मूल प्रसरई सूचना काग-कम्प विसनीय हरण कवर्ग-कम् ग् घ् २ घर्ग एम् सिम्सोय * पोर्ष पवर्ग-म् एन २३ | टपगंदण | उप मानोय * अनुनासि उ स्वर्गरम्प सः नयर्ग-त्यापन क चिन्ह वर्ग त् थ् प्न् भनुम्पार पषग-प् फ् प् म् म प्रम् मदरशनफा मास्य परी य् स् चार पम मो उन्म-य पर.६ पे ऐ३ पोगवाद में मा कहते है। ४प अनुरुगविसर्ग यो। मो२ जिहाम्लोपटपम्मानीय मोमोर मी२ चार है। दस्य दोप स्पर क पौर पह . परर्गप्फ्यम् . प२ .

% 3D ग निवासी जगरूपमहाय वकीलकृत पदच्छेद और विमक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका भन्दशः हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ सूत्र २० भेदश गरयेक परिसमाप्यते विभेदननेरभेद द्वादशभेदाति ॥ द्विभेद तावत्-भगवाझमग प्रविष्टमिति । अङगवाझमनेकविध दशकालिफोचराध्ययनादि ॥ शुनगान मति मानजन्य रे मरा शुतज्ञाा प्रथम श्रुतज्ञान से हुआ है तो मो मतिज्ञान पूर्वक उपचार से श्रुतमान हुआ है मा कान में दाप नहीं क्योंकि मान कहीं साक्षात् मतिपूर्वको कही परपरा मविपूर्वक प्रत "श्रुत मति पूर्व" ऐसा कहा है। भगन्द । मन्यस्त ,परिसमाप्यते Tद्वि-भेदम ॥ = (इस सूत्र में ) भेदशम्द प्रत्येक पर लगापा गया है। (सज्ञानके) दो भेद । मार मर्द द्वादमा म ॥ इति तावत् ® अनेक भेद है। पारा भेद हैं। प्रथम 'मद । अनवासमा अगमविष्टम् ॥इति ॐ दो मेद अझ्याम (और ) बल प्रविष्ट इस प्रकार है भन्साय , मनक विधम् ।। दसवैकारिप = अङ्गालोम अनेक प्रकार वा पावभव रूप है। दशवैकालिक (सातवां प्रकीर्णक) उत्तरा-पपन-पादिः॥ = उच्चराष्पपन (आठवां प्रकोणक) (१) बादिक (पारा प्रकीर्णक और हैं) अयात् अक्षरात्मक तज्ञान में वाहअङ्ग और चौदह प्रकीर्णक समिलित है। मागप्प में (1) मामायिक प्रमोणक (२) सस्तव प्र (३) पम्पनाम (४) प्रतिगमप म (१) विनय प्र (6) रुतिकर्म . भारपार (0) साफर प्र (११॥ महाकटर म (१९) पपरक प्र० (१३) महापुडयक प्र० (१४) निपिधिका प्रकीर्णक निवेशित है पण 1) माविक प्रयोक-ससमें नाम स्थापना दम्य क्षेत्र फार मारपरि पट प्रकार सामायिक का पर्णम हो । (1) ननाम प्रकोप क वो है जिसमें टोकरके पंचकरयान चौतिस प्रतिरूप प्रपमा वहाय परमीदारिक दिष्पद समवसरण पोयाविक मार तोक्ने महारम्प का प्रकट करनेषामा तपम का वर्णन हो। (ग) परनानाम प्रमेण व पदसिसमें एक सोपं करके भाभप के प्रर्य प्रतिमा स्याहयारिके स्तषन का म्याग्यान हो। (७) प्रतिकपणनाम प्रकोगा वह है जिसमें एक दिन सम्बम्पा दोप के निराकरण के हिप देवसिक प्रतिक्रमण से दो रात्रिक पासिक मनुमासिक माय-मरिक ऐपोपधिफ मोर सन्यास मरण के अवसर में संपूर्ण पर्यायों में उपमे दोपो के निराकरण के सिप प्रतिम सपना (७) दिनयनाम प्रभग्मक पहरेगिसमें दरान पाम पारित तप उपमार इन पदमकार को विमप का क्यन हो । (पतिर्मनाम प्रमाण वा मिसमें जिन पूजनाविक निया के करने के विपान का बपन मा पमपरमेोही सिमपर्म मितिमा । दिन पपन जिसमरि के पदमारे निपतोन प्रतिवमा तोम प्रवनति र शिशिह भावते पार भीर मिरपनैमित्तिक दिशामाप्रपादो एरा निवासी मगरूपसहाय वकीसफत पदधछेद और विभास्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सम्बश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० मा'मा शादी को पाना गप सुमता है तो इस प्रकार का सुनना मतिज्ञान है सुमन के पश्चात् मौका मो मात्मा के गुमो पापय म माना भुतपान है इसफर अपरामक इसलिये कहते है कि हमका इस का पान शपाय होता है जो राम प्रक्ष से बने भयषा रचे गये है। इमपाति से मनमक भुतपान के दो मेद पयापमान मोर पपाय समास हान है। सूक्ष्म निगोविया गय पर्यातक सम्मि प्रपयापक) गोपके उत्पम हाने के प्रयम समय में सपसे जघन्य मुबान होता है उसको फ्यायपान करते हैं । इतमा पान जप के सदर निराधरण तया अरमान रहता है इसमें विशेषता यस यहो किस के मायरन फरने वाले कर्म के उदय का फह इस पपायाम में नहीं होता किन्तु इसके प्रनम्बर पान ( प स समास) के प्रथम मेद में बोसा है। मावा प्रदिपपायापरण फर्म के उदयका फल पर्यायबान में हाजाय तोपानापयोग कर ममाय हाम से जोयका मो प्रभाव होजाय इससिये फ्यायपरण समका फल उसके भाग कबामफे प्रथम मेद में ही होता है। दगोसिये म्यून से न्यून पयायस्प बात जोपर्क प्राश्य पाया जाता है : “मसम्यात साफ प्रमास पर्याय समास कानके भेद है १४ ७२६ दूसरे प्रकार से प्रसय मकप्तान के मरद भेद म सर, पा संघात प्रतिपत्तिक अनुयोग प्रासतमामत प्रोभत पस्तु पूर्व ये नब भेव पीर कमसे एक एक मसर को वृद्धि के मारा उत्पत्र हानेरे मसर समास भाव नप ऐसे सय मित भयरह मेव अथापर, मर्याधरसमास पद पदसमास समाव संपात समास प्रतिपत्तिफ प्रतिपसि फसमास भनुयोग अनुपांग समास प्रामृतप्रामृत मामृतमामृत सनास प्रामृत भामृत समाम पस्तु पस्तु समाम पूप पूषसमास । मसरात्मक दृष्ययन के है । और गामको भरोसा इनहो सम्ममुननिफे सुनने से जा पान मया सा उस बामके म अठारह मेद (भाष भुवहान ) काहिये। पदि पम्य (शास्त्र) कपको विरक्षा कागार तो गये पारपप घोरस ( - प्रन्ये मावयच तुवरार्फ) (मोम्मट जो० का गाया ३॥ के अनु र मापा गावि मावरमा मोर गपाद पूर्व प्रादि योदर पूष भोर धकार से सामायिवावि चतुदय प्रकार्णकतिमि साप प्रम्पभुतबान जानना तिमफे सुमने से जो शान रमा सो माप भुतगम मानना । पुदगल मध्यस्थमा मातर पदादिक मय तौ द्रष्पचन है जिसके मुमने से जो शुतमान का पर्यायरूप मन मा है सो भाय धुत है माो घस पर घात होगा कि चोवह पृय परिवाद पारइये प्रा में गमिव है ऐसे वापरा अाफा अंगप्रषिए दिने है मोर पोदा मकाए फो प्रगपाल कहते है। प्रागे इस याउको विजमाते हैं कि यह प्रगयाम मोर 'अंग प्रयप्तरूप दृष्य शुनशानको स्परा मया पटा निराप्ती मगरूपसहाय वलित पदच्छेद और विमफ्रयर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शब्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २० रियणो-पे पीसटि मल मक्षर मनादि निपन परमागम में "सियोपर्णः सम प्रायः" म से प्रसिद है। माधो मात्रा जिसके बोलने के पातनिहाप विममा पंजन कहने । मिसको एक मात्रा हो उसको इस्पदा मात्राहों उसको दाई धोनमात्रा उसको हात फहवे है इस पर मरतो हाते हैं। मुनसान के दो भेद है (१) प्रसारमक पा राम्पज प्रयपा रामगभ्य प्रतलाम (२) मनसरारमक, लिगाम या सिंगार भूमाता (घ) मनम्तम गारिम सम्पावम गादि सम्भावमागवृधि सभ्यातगुणपति मसभ्यातगुणपदि अनन्तगुणधरम पद्स्यानपतित रिकी प्रपेशा से मनपरारमफ मुनपान फेसब सेडपम्प स्थान से रेफर उहए स्पान पर्यंत भसम्याप्त लाक प्रमाण भेद होते हैं। प्रनतारात्मक भान रेममन्यात भेद है। सिंग मा चिन्ह वा उत्पत्रमा भैसा मनसरामक भुतपान सो एफे दियाँ लगार पचेन्द्रिय पर्यंत सर्व गोपनि फेवपि याने किएम्पपा र मत्ति नावातप्रधान नाहीं गाम्मटसार मुक्ति पर ६७३ स शातस पषन तो सतत परम प जानना ती मनिपान है पारि तिसफा छानकार वापु को महति पाले को यह गोतल पषन भनिए है भैसा जानना पाभनगन रे सा पर मनसपरमक धुनपान है । अक्षर के निमित्त मया माहीं । जैसे हो सर्प मनसरात्मक भुतान का स्वरूप गनना' गाम्मरमार मुक्ति पर १७५ । (6) "गगा पीए भरार वादिरूप सहते सपन मया मा मसयामा भुमशान सो प्रमुख कहिए मुख्य है प्रधान है जात देना सेना र पाना एयादि सप व्यवहारनिय मूस अतरारमक ध्रुवमान है" पृष्ठ ६७४ " तर मस्ति' मेसा सप फमाता कर्णरूप इस्ट्रिय मप्तिसामरि गोवा मस्ति मेसे शपकी प्रपा । र तीहिं जानकारि पनामा पदापरे भागात भया सो मतमान है।शप और अर्थ फे याम्य याचक संबंप है। वाभ्य है जब पाचक है, भये है मा उमगार काने पापा उस प्रपत्र कान पर प्रेसा जो बान मया सो तबान है ! सो रहा गोवा मंस्ति' से गमका मारना नौ मतिमन र म सिमिम वनामा पदाप का प्रस्तिस्य मानमा सो भुवान है। हो सब मसपरमक भूतान का सास गना। परमको पात मपम म्या माशान नाचे मो मलामक कमा। हो कार्यपि कापण का उपचार किया परमाने पर ो मदरमाईमा मसरारमक शुनगान का एक मोर पसा मारण से गप कोई ममुप्प नीका' और एटा निवासी जगरूपसहाय वकीकृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० मा'मा रायों को कानो मारा सुनता है तो इस प्रकार का मुनना मतिज्ञान है सुनन के पश्वा नौका मो मारमा के प्रयो पापय में भाना भूतमान है इसको असरस्मक इसलिये कहते कि हमास का हान शमसाय होता है जो राम मारो से पने मथवा रखे गये है। दूसपमााति से मनवयरमक भुवधान के दो भेद पयायाम और पयाय समास बान है। सम्म निगादिया राय पर्यातक - सम्मि प्रपयापक) सोष के उत्पा हाने के प्रथम समय में सबसे जमन्य भुमधान होता है उसको पयायाम कते हैं। इतना पान जप के सदे मिरापरब व्या प्रकाशमान रहता है इसम नियता यस यहोमिएस के माधरन फरमे पाले फर्म के उदय का फल इस परीय बाम में नहीं होता किन्तु इसके भनम्तर पान ( पथास समास) के प्रथम मेद में होता है। मावार्य मदि पपायावरण पर्म के उदयका पास पर्यापमान में होगाय तो गानोपयोग का अमाप हामे से जोषका मो प्रभाव होजाय इसलिये फ्पायषरण कर्मका फल उसके भागे पानफे प्रथम मेद में ही होता है। इसोसिये म्यून से म्यून पर्यापरूप बात बोव अवश्य पाया जाता है : "प्रसंस्यात लोक प्रमाण पर्याय समास पानफे मेव है पृष्ठ ७२६ पूसरे प्रकार से अभय मकवान के अठारह भेद भासर, पा संघात प्रतिपतिफ अनुयोग मामतमामत प्रोमत पस्तु पूर्व ये नप मेर मोर कमसे एक एक प्रकार को दिकेशाय सत्पन हामेबारे प्रहर सनास सादे नप ऐसे सष मित पठारह मेद मर्यासय पर्यावरसमास पद पदसमास संपात संपाव समास प्रतिपत्तिक प्रतिपतिफसमास अनुयोग अनुपांग समाम प्रामृतमाभूत प्रामृतप्रामृत समाप्त प्रामृत, मामत समाम वस्तु वस्तु समान पूप प्वसमास । असयामक प्रभु के है । और वामको भरोसा नही पशुतनिके सुनने से जा पान मया सो उस बामके म अठारद मेद (माष मुसकान ) कहिये। पदि पाय ( शास्त्र)काको विवक्षा काजार सो "गये वारस्य पोरस ( -मन्ये वावग्र च चतुपरफ) (मोम्मट जो० का गाया ३४॥ के भनु राधारा गाधि मावश्यान मोर उत्पाद पूर्व मावि चोदह पूर्व भोर वकार से सामायिकादि चतुदश प्रकोर्णकतिनि स्वरूप प्राप्रभु तकान मानना विनफे सुनने से जो शान पमा सो माव युतगम सानमा | पुगत सम्यस्षापा मार पदादिक मय तो द्रप्पन है तिसफे मुनमे से जो ध्रुसपान का पर्यायरूप मान हुमा है सो भाय धुत है माो घस कर पात होगा कि चौदह पृध रतियार पारहपे मन में गर्मित है ऐसे हादरा महका अंगमपिए रहते हैं मोर चोवा मकार्यों प्राधाप करते है। भागे इस पातको दिखलाते हैं कि यह अंगणाम भोर प्रेग प्रपिटकप द्रग्य ध्रुमपानको पटा निरासी नगरपसाप पचपत पदच्छेद और विमफस्पर्ष सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्पशः हिंदी नुवाद । अध्याय १ सूत्र २० रिपणा-ये चीसठि मस मसर मनारि मिपन परमागम में "सिदोष: समसाया" स मसिर । प्राघो मात्रा जिसके बोलने के पतनिहाय तिमा मन कर है। जिसको एक मात्रा हो उसको इस्य दा मात्राहा उसको दार्च तोनमात्रा हो उसको लत फहते है उस पाप न मरतो होते हैं । धागान के दो भेद है (३) मसात्मक पा राम प्रयवा शम्पसम्प भूतबान (२) मनसयामक, सिाग पा सिंगार मनगन। (भ) मरम्तम गामसभ्यातम गादि सभ्यातमागपि संम्पातगुणधि मसभ्यातगुरापदि मनम्सगुणधिन पद्स्यानपतित परिको मासे भनमयरमफम नगन फे मब सेमपन्य स्थान रा ऐकर उदए स्थान पर्यंत असभ्यात साक प्रमाण मेव होते हैं। मनपरात्मक मान सम्मान मेर है । "सिंग सा चिरताने उत्पन मया भैसा मनसग मक भुतपान सो पके दियते लगार पवेत्रिय पर्यंत सर्प गंपनिफे तयापि पान कियूपया र मात्ति माहो' वाप्रपान नाहीं गाम्मटसार मुद्रित पृष्ठ १७४ जैसे शोतल पषन का स्पय मया ना लस एन मानना ती मनिशान है पारि तिसका नकरि वायु को पति पाले को पहशोतस पवन पमिए है जैसा जानना पोभुतगत रे सा या प्रतक्षयरमा शुनपान है। मसर के निमिव भया नाही । मेसें दो सर्ष मनसरात्मक भुवमान का स्वरूप गमता गोम्मरमार मुदित पूर ६७५ ॥ (6) "पीए मरण यादिप शप्पा सपा मया ना मायामा मुगान सो प्रमुख कहिए मुग्म है प्रधान है जाते देता तेन्या मप्र पाना हरयादिक सप पपारमिम मूल प्रवपरम भुतबान है पृष्ठ १७४ । "atो मस्ति' मेसा ग्रप कमा वा कम्पपि मविज्ञान करि जोका मस्ति भैसे रामको प्रह्मा । बार तारि बामकरि पनामा पापभपाशान मया मो भान है। शाम मोर मय के याम्य पाचक संबंध है। पाम्य हैकम वाचक है, भर्य है सा मगर साने याप्प है राप उम मय का करना है जैसा जो शान मपा सो शुतजाम है। मो इहो जोवा मस्ति' जैसे शमा मारना नो मनिमन है पर उमरेनिमिन गोवनामा पदाप घ अस्तित्व मानना सा भूतबान है। भैस हो सप प्रमपरमक भूतान भ सार गता। परमसोरतात अपन मया मापानमामो मसपामक या काविप काप्ण का गधार किया पपमान परमात्मा : ३४ मतपत्मक गुनगान का एक मोर पणा पाइप से गप कोई ममुष्प नीका' और निवासी अमापसहाप यकीकृत पदच्छेद और विपत्पर्य सरिस सार्थसिदि का अन्दश हिन्दी अनुवाद (भगाग १ सूत्र २० मप चार घिसंयोगो मंगवा धासपोगो मंग पार पधमयोगो मंग ( गम् ३) एक ऐसे साला मंग है व पर्य सहित दिप मर्यात् कपणे से च पर्वको अपेक्षा से प्रत्येक मंग (-) एक है निसंयोगो पांच मंग है बिसयोगो दश भंग है, चासंयोगो पय भंग पंप संयोगो भग पांच और परमयोगा मंग (क् ख् ग २ च ) एक है । ऐसे मग पचास है। पर्ण सहित वि अर्यात कप में पपणे ठकइन मा अक्षरों विवना से प्रत्येक मग (७) एफदिमयागो मंग है । विसंयोगो भंग पर दम है चासयोगो मा पोस है पासयोगो मंग पन्द्रह है पद सपोगो मग यह है भीर सप्त संयोगो मग (न् ग् पप्छ ) एक है इस प्रकार चौसठि है। ज् पसा सहित विर्ष अर्थात क्यण से यषय तफ इन पाठ मझरों का अपेक्षा से प्रत्येक मग (म) एक है विसंयोगो भग सान: । विसयोगी भग एकोस चतुासपोगो भंग पाम है। पचसय गो मग तोम है पर सयोगो भग इस सप्तसंयोगो मग मात हे भर सयौगो मंग (फ्स् ग् एच् छ् ज् ) एक है ऐसे एकसी माईस । पप सहित वि अपाद कयण से म पण तफ में प्रत्येक मंग एक (म्) है विसयागा मंग भाउ है त्रिसंप गो भंग २८ भास है। चतुसंय गमग वप्पन में पंच संय गो मग सत्तर हैं। पद्सयोगो भग एप्पन है । सप्त संयोगो भग मास है। मस्योगो भंग माठ ई नषसयोगो मंग (कम्प पर ज् म् ) एक है ऐसे कपल से म तक वोमीयप्पन मंग है। भौर काल से अपम पर्यन्त इन दस प्रारों का मपेक्षा से प्रत्येक मेग (म्) एक है। दिसंशेगो मग मी है । विसवोगो भंग बचोस , धतुम्संयोगो मंग चौराप्ती में पंचम योगी एकसीबम्पस। परसयोगो मग मो एफसो पम्पोस है। सप्तसयोगी मंग चौरासी है भएसयोगा भग बीस मप संयोगी मग नप है परा संपोगो भग 'कल ग घ च प प म प्र) एक पेमे ये ५१२ मग है ये सच मग एक सहसमस गोदने पर होते है ये सब पृथक् पप लिने गमक्ते है पिसार भय से महीं सिमे लिखने का ऐति उपर पता चुके हैं। स्मरण रद कि ये भंग भपुमरुक मारों मारा पने पेमात् पर भंग में उलटफेर कर पो मार नहीं मामको । मेसे कन्ग मोर ग वा गमक यह तीनों भपुनरुन्त भंग को अपेक्षा से पफ ह भंग है। इस दो प्रम से चौसठि स्थानों में प्रत्येफ मग विसयोगी मग त्रिसंयोगो मंग, चतुः संयोगो मग इत्याविक मंग पूप पूर्व स्थानों के मंगौ से रचर उत्तर भर्थात् मग अगले स्थाना से दूने दूने होवै जाते हैं। जैसे- एग निवामी जगम्पसमाग वीरत पदच्छेद और विझारपर्य सहित सर्यिसिद्धि का शम्दश' हिन्दी अनुवाद । अध्याग १ सत्र २० Jee घ म प . ४ ५ ७ ८ १ २२ २८ १० १० ४ मोर ४ विकार मीर ग्निागो सिन भयर प्रमाण हे पीर वॉकर हनन दो मार होते हैं न्यूनाधित स्पो नहीं हाते और किस प्रकार होते हैं। उन्ड मनादिनिधन प घौगरि मा भसर पक संघागो हिमयागो निमयागो चासयागो पयसयोगो आदि चौमठि संयोगा पर्यम् जानना ग मागियों पा पाना) का उत्पत्ति का मनुकम मूलवण बीमाठि मसरा के समय में निम्नसिनित चित्र विकाते है- ६५ असर पर्वत यहाँ केवल क वर्गम को एक प्रत्येक प मंग (क) दो है इस कपणमें दि १ प्रत्येक मा संयोगो 'मिसपोगो भाविक मा १ २ विसंयोगा मन नहीं है। पर्म सहित वि मर्यात २सार १५ क्रू को प्रपेक्षा से प्रत्येक मा प पफ और दिसंयोगो मंग कम् ३५ ५६ एक ऐसे दो माहै। और ग पर्य ८ मोड़ १५ १२६ पंच सहिन मित्कगका अपेक्षा ६ से प्रत्येक माग एक दिसंयोगो २१ ५२ भडक व् ग दो त्रिसंयोगो मङ्ग ३२ जोड़ मग एक ऐसे चार माहै। पपर्ण सहित विमर्थात् गुप ३५ १२८शेगा का विषक्षा से प्रत्येक मंग ए एक है, नियोगो मग कप-म्-गए योग पेतीन सिंगोगो तंग कग गम् गए ये तीन बामपोगी २१२योग मागप्रकार गोरमदिन मनोरनसान पनि मग निषालन गर मार पर होगा हिमपोगी ५ ३२ , १ ७ , ए योग १ n 7 - म पटानिवासी मगरूपसहाय वकीकृत पदच्छेद बौर विमास्यर्थ सहित स्वार्थसिदि का प्रदश हिन्दी अनुवाद (अध्याग १ सूत्र २० - . मंग पार लिमयोगो भंग कह चतुासंयोगो भंग पार पचतंयोगा मंग (क् न ग म २) एक ऐसे सालद मंग हैं। प गयो सहित दिप माद कपर्ण स प षर्य को प्रोता से प्रत्येक भंग (ए) एक है विसंयोगा पांच मंग है पिसयोगो वरा मंग, चतुासयोगी वश मंग है पंच मयोगा मग पाय मोर पटसंयोगो मंग ( क्व् ग र ) एक है। ऐसे मग पचोस है । ७ वर्ण सहित विर्षे प्रात् कप से पर्य तक इन मास मसा को विवक्षा से मत्पर मम (8) एक है दिमयोगो मग छ । विसंमोगो मंग पास पासपोगो भी बोस पसंयोगो मंग पन्दर पद सयोगों मग पर है और सह संयोगो मग ( ख ग घ ) एक है इस प्रकार वीसठि है। ज् पण सहित षि अर्थात् कपा से अपय सफ इन माठ प्रहरीका अपेक्षा से प्रत्येक मग (ज) एक विसयोगो मेग सात सियोगी मग इकोस चतुःसंयोगो मंग पाम है, पसमयेगो मग तोमरी पद सयोगो भंग कम हैं सप्तसंयोगो मग मातभर संयोगो मैग ( य ग घ च छ म् ) एक है ऐसे एफसी हास हैं । पप सहित वि अर्थात् करण से म पण तक में प्रत्यैक मंग एक (म) है, विसयोगा मंग भाठ है विसंय गो मंग २८ महामि है। चतुर्सय ग मंग वप्पन है पंच संप गो मा सत्तर है। पद्सयोगो मग पप्पन है । सप्त संयोगो मग मस है। प्रसंपोगो मंग माठ ३ मपसयोगो भग ( क स ग घ २५५ झ् ) एक है ऐसे कपल से झ तक दोसीयप्पन मंग है । और काम से प्रवण पर्यन्त इन पय मारों को अपेक्षा से प्रत्येक मंग (म्) एक है। दिसंयोगो भंग नौ हैं। विसंतोगो मंग रसोप्त है, चतुःसंयोगी मग चौपसोई यसपोगी एकसीबमसमें। पदसयोगो मग मो एकसौ सम्पीस हैं । सप्तसयोगो मग चौरासी है भएसयोगा मग बोस है नप सयोगी मग मष हैं परा संपोगो भंग 'कन गम्छम छम्मम) एक है ऐसे ये ५१२ मंग है ये सष मग एक सहस्र तेईस जोड़ने पर होते है ये सब पृथक् पृथइ लिने मासकते हैं पिस्तार मय से नहीं सिनेरिसमे का येति उपर पता चुके हैं। स्मरण रहै कि ये मंग अपुनरुक अक्षरों मारा पने हुमत् एस मंग में उलटफेर कर बडो मार नहीं प्रासको ३ पैसे कमा भौरम्पद वा यह तीनों अपुनयत मग को भपेसा से एफ ह मंग है । इस हो कम से चौसठि स्थानों में मत्येक मग विसयोगी भग त्रिसंयोगो मंग पतुः संयोगी भेग इत्यादिक मंग पूष पूर्व स्थानो के म से रतर सर मर्यात् मग मगले स्थानों से दूने दूने होते जाते हैं। जैसे- - .

एटा निवासी जगरूपसहाय पीलात परच्छे और विभरपर्थ सहित सार्यसिद्धि का शब्दश दिन्दी अनुवाद । अध्याग १ सून २० ग ~ १ २ ४ २ ७ कर २८ ४ २ ४ घ- ८ जोड ५ उगभीर भिमपाणी पिसन मपर प्रमाण हे शीर फौगर तन दो पर होते है न्यूनाधिक क्यो माी पो भीर विस मकार पोते है। उन्ड मनादिनिधन ये घोगठि सूरा प्रसार एफ संथागो जिमयोगी सियागो चासंगो पासयोगो यादि गाँसटि संयोगो पर्यमा जानना मागियो या पाना) को उत्पति का अनुकम मूलपण धीमति अारों के सम्बन्ध में निम्नलितिरा चित्रमे दिखाने- छ यहा केयल फापर्गम तो एक मायक ६५ असर पयत गंग (क) हो है स क प में दि प्रत्येक गा संयोगो प्रिसंयोगी आदिक मङ्ग है दिसंयोगो मन नहीं है। पगसदित नि मात् २मोर १ फ् ग् को प्रपेक्षा से प्रत्येक भान ૧૫ म् एफ और द्विर्मयोगी भंग फ्म् ४ मोड़ १ ३५ एफ ऐसे दो माह भीरगपर्ण १५ ३१ सहित विमर्थात् फागको अपेक्षा रो प्रत्येक गाग एफ विसंयोगो । भाग् र ग वो जिसपोगो मङ्ग (३२ जोड़ २८ गएका ऐसे चार भा है। घ पण सहित विभिर्यात् फन्नुप १२८पोग को पिपक्षा से प्रत्येक मग एक सिंगोगो माकप-प-गम् R१६ योग्य पेसीम सिंगोगो संग कन्ग गम् एर पे तीन चामपोगी २१२पोग गपरेमाटर गोरगति Friचत्रानामा राति गंग मिकामा गरम पम दोगा लियोनी पंज . ६ २१ ५१ सप्त ४ पोग U . H H पटानिवासी घमस्पसहाप वकीकृत पदच्छेद और विम्पत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धि का शम्दशा हिन्दी अनुवाद (अभ्याग १ पत्र २० - मम पार विसयोगो मंगम चतु संयोगी मंग चार पचममोगो भंग (म् ग् म ३) एक ऐसे सासह मंग है। च गयो सहित विप मर्यात् क पर्श से च पर्म को अपेक्षा से प्रत्येक मंग ( ) एक है विसयोगो पांच मंग ६ बिसयोगो परा भंग , चतुासयोगी पण मग है पंप संयोगा मा पाप भीर पटसंयोगा मंग (क्छ ग र च् ) एक है । ऐसे मंग पत्तोस है । वर्ण सहित वि मर्यात् कप में सवर्ण तक इन मास मसले पर विवता से प्रत्येक मंग (3) पक है दिमयोगा मंग छा है । विसपोगो मंग पहचासयोगो भम बोस हैं पसंयोगो मंग पद पद् सपोगो मग पर भोर मप्त संयोगो भग ( फस् ग् पप्प छ ) एक है इस प्रकार घौसठ । ज् पण सहित विप मर्याद अयण से अषय तफ हम माठ मसरों को अपेक्षा से प्रत्येक मग (ज) एक विसयोगो मग साउत्रिसपोगी भग कोस है चतुासयोगो भंग गाम है। पचसये गो मग पंतीम है पट संयोगो मग इ स है सप्तसंयोगो मग सात है पर सयोगो मंग (क् म् ग् च छ ज ) एक है ऐसे एकसौ ग्रहास।म पण सहित वि अर्यात् कषण से म यप तक में प्रत्येक मग एक (म् ) है, विसपागो मंग पाठ है विसय गो भंग २८ मामि है। धनु-संय ग मग वयन वे पंच संप गो मंग सत्तर है । पद्सयोगो मग पप्पन है । सप्त संयोगो मग मांस है । मासयोगो भंग पाठ ई नयसपोगो मंग (कलम् परम् म् ) एक है ऐसे कषण से म सक दौमौवप्पन मंग है । भौर काप से म पम पर्यम्त इन परा मारो को मपेक्षा से प्रत्येक मेग () एक है। विसयोगो मंग मौ हैं। मिततामा मंग बचोस, धतुम्सयोगी मंग चोयसो पंचसयोगो पकसीसम्म स हैं। पदसयोगो मंग मो एकसौ एम्पीस है। सातसयोगी मंग चौरासी है प्रासयांगा भग बचीस है मप संपोगी भग मष है दरा संगोगो मग म ग प छन् म म ) एक है पेसे ये ५१९ मग है ये सव मग एक सहसस जोटमे पर होते है ये सब पृथक् पपक लिने गमफते है पिस्वार मय से मही सिने निधने का येति उपर पता पुरे है । स्मरण रहे कि ये मैग अपुनरुत मारों द्वारा बने हुये हैं अर्थात् पर मंग में उलटफेर कर पहो मार नहीं ग्रामकते ३ जैसे क्वम् और ग्क् वा गला यह तीनो अपुनरुक्क भंग को अपेक्षा से एकर भंग है। इस हो क्रम से घोंसठि स्थानो म प्रत्येक मग निसयोगी मग मिसंयोगो मग चतुर संगोगो मग इत्याधिक मग प्य पूर्व स्थानों फे मगों से उपर उत्तर प्रर्थात् मगरे प्रगले स्थानो से ने दूने होते जाते है । जैसे- सपमवार स्पान स्थान ९ एटानिवासी जगरूपसहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विभात्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० सपमाप्तिफे स्यान स्थान Jaविके भगका जोन सप मांति के मंगाका गोर मगोपाया भगोका जोड़ सहपा ६५५३८ सेसोसा ४२६१४६७२६६ उनवासपा २१४७-६७६७१०६५६ पिप भटाणप १३.०० घोप्तीसा पू३६५४२ पचासो ५६२६४६६५२४२१३१२ तोसरा ४ समोसा २५२ ४४ पैतीसपा २०१६ ६६२४ इस्पायन १९२४२६६०६२३२४ पाण सपी ५२४८ पत्तोसो ३५३५६७३८३६८ णयनया २११७६६१३६५२४८ गांची सोमया १०४५ संतीसा ६८१६७६७३३ वेपन ४२०३५६४६२७३७०४१६ ३२ पासा २०६७१५५भक्तीमा १६७४२४७२ चोयनया ६००७१४१२५४७४०६३२ माप ५५ तास ४२९४३०८ उम्पालोसपा २७५EAR०६२४३ पचपना १८०९४३६८५०६४८४ १२ चीयोमा 10 चालोसपा ५४१७१५:१३ स्पनी २६०२८७६७०३८६५३८६८ नपप! २।। परचामा १६७रकतासोसवा १०६६।११५२७७७६ सवाषनषा ७२०१७५६४०३७६२७६३३ पराय। ५१२ पभोसो ३३५५४४ पियाप्तोसपा २९६६०२३१५५५२ मापना १४४११५१८८०७५८५५८७२ म्पारपा १०२४ सांसयां M० तेवालोसपा ४२८८०८६५१११०४ उनसठया २८८२३०३७६१११०१९७४४ पारपा २०धन महासिपी | १९४२२७रन पपालीसयां 81०९३०२२२०८ माठयो ५७५४६०७३२३०३४२३४ तेरड्या ४०६६ सम्वोसो | R४२५४५८ पैतालोसपा ७२१८६०४४४१६ इकसठ्या २२५२६ १५०४१०६८४१४७६ गोदरपो ८१६२ दोसपा ५१०४१ पपासासवा ३५१५४१७२ ८-१२ पामठवा २०५४२००४२१४६५२ पतोमा १ एमएम साहोमपी 011-mom. देशच्या १५.१२७२५७६.४ मिरपो मनोमा iumnामानामा भाग्यो Redweeted / पोस भीमदत एटा निवासीजगरूपसहाप पकीमच पदरछेद भार विपत्पर्य सहित सर्वार्थ सिद्धि का शदश हिन्दी अनुवाद । अभ्याप १ एन २० m इन सर प्रत्येक मगों को विसंयगो मंगो पो प्रिसंगोयादि पीसटि मलय के मंगों का पग १८४४००१७ १५५१३१५ है पेही |सयम भुतान के एक घाट पकलो प्रमाण अपुनरुक असर इमर्यात् पती चोरासी शक पासासक्रम चौरतरि नोस चालोस मरण तेहरिपरष सतार कराइ पचानष साव इत्यापन सहन सी पम्प इतमे प्रसर निम मिन प्रत्भपुनरु प्रसर दम्प शुबान के हुपे पास सो पाप का म. पर प्रयोति २ मि मत उनहो को प्रसरनिका पारंपार कहे तो उन कि संस्था का निपम है माही" गाम्मरसार पृष्ठ पर ( ) हमरे प्रथर 36 पोस मदर प्रमाण ठपधु तबान ऐसे मिपाते हैं विरकसठ प्रदरों को पिरलन कर हे मर्यात् बरोबर पफिकर एक स का पृथक् प्रयप चौंसठि स्थानों में मारिए । प्रत्येक चौसठ मय पर दावा का मा देकर परस्पर समर्ण वा के मो का निम्नति से गुणा करके मा सम्प पशि भाषे उसमें से एक मटा देने से मा प्रमाण रहता है उतने हो अवमान के अपुनरुक अमर रहमे है -म्'-ग - - इत्यादि चौसठ स्थानों पर रखिये कि दयप के प्रोपा हो परस्पर गुणन करते है । दो फे मापने मूसासठ महर विकार फा प्राप्त नहीं हते है मता प्रत्येक चौसठ मूस भार के स्थान में एक का मारिखकर प्रवया D ऐसे बिम्ह चौसठ सिनकर उन प्रस्पैक के ऊपर दादा का पलिम पुन सय दो दो के मौका परस्पर गुथा करें तो मी पदो (परिणाम) होगा वेसे 0000000000000000000000000.0DDDDD. ם םים םם ם ם םים ם ם םים ם ם םים ם ם ם יםיםיםיםיםים םיםים ם -२४२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२४१४२४२४२४२४२४१४२x२x२x२x२x२४१४२४२४ २४२४२४२४१४१५२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x.x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२x२४१४२ १५४ १२४१३४१५४१६४१५४१६४१६४१६४१६४१५४११४१६४११४१५४१५ - १५६४२११४१५३४५२६४२११५२१६४ २२४२६ पौ। २५६ गुणा किये गये २५६ से परापर ३५३६ के इस लिये समस्त सम्पा-६५५३६४ ६५५३६४ ६५५१२४५५॥ १२२३६ १४३३ १४.३६/REस पोछे ४१४ देवा - ४ : एटानिवासी जगरूपसहाय पोलमृत पदच्छेद और विभात्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० सयप्रकारको सपमांतिके समान स्थान स्यान स्थान सपयतिफे भोफाजो सप मावि के भंगाका जोर ममोपा मोड़ मगोकाया परिसा सत्रहो ५५५३६/ सेवीसी ४२६१६६७२६६ उनचासर्या २८१५७०६७६७१०६५६ भारइयों १३१०२/ चौतीसयां ८५६६२५३२ पचासपा ५३२६४६६५३४२१३१२ तीसरा उन्नोसयों २६२ । पैतीसपा १७१७६ १६१४ स्यायन ११म९६६०६४२६२४ पाग कीसपा ५२ पत्तोसा २३५६७३८३६६ पायनयो २२५२७BEE१३३५२४८ गांप इयोमा १०४५/ संतीसा २३७६७३६ नेपन ४२०३५४६६२७५७०४६६ ३२ पासिया २०१७१५२/ मरतीसा १९७४९५२४१२ घोपना १०००१६६२५४७४०६६२ Arml सास ४१६४३०८ उम्सालोरूपा २७४८998०६६४३ पचपनया १८०१४२४८५०६४१६८४ मागो धीबोमन १०८ चासोसयो ५४२७२३८ सपनो ३६०२८७६७०१४५३६८ नपप २।१ पापोमष १९७०२ तासोसवा १०६६।१९५२७७७६ सतापना ७२०५७१६४०३७६२७६२१ राय પર पपासा २.५५४३२ पियालोसपा २९६६०२३२२५५१२ महापना १४४११५१८२००५८५८७२ पारपी १०२४ सत्ताासपो| १० तासोसष|| REE५१११०४ उनसठवा २८८२३०३७६५५१०१९७४४ पाइप २०४८ मासयो | १३४२९०७ पवालीसष| Ex०१३०२२२०० साठयो ५७६४५४२२०३४२२४८८ ५०६१ उम्तोसो | २८३५१ पैतालोसपा १७७४२१८६०४४४१५ किसठया १२५२६ १५०४१३८४०७६ म११२ दोसपा ५१०३१५ पयालामा ५१२४२०२ २ पामठया २३ ५४२००४२११२६५६५५ बतोस Rom सोमपी ३६ENom क्या U१.५०५-408 नौगो tusaniमरतानाaunwun तेरहयो पोदापो गम्भापो १५३ असम.H..

एटा निवासी मगरूपसहाप वकीस्कृत पदच्छेद और विभकरपर्य सहित सर्वार्थसिन्द्रिका शम्दशः हिन्दी अनुवाद । अध्याप १ सूत्र२० इमो भेन ने तोमरे प्रकार से मे मो मारा फ क के हिसगधागा ( मया नाके पर्ग पाप में चा वगान किये गयमा पदो सम्पाके वरापर है। इस एकडो प्रमामा सम्पा म कमगोसे जा भय र सम्भा रहे हो अनमत चमार जाप शुमधामके हैं प्राद के कारे २ षग रमफर जप पठवा पगम स्थान पा(२) गुग्मनफसमें र एक प्रयदा घेश प्रम्पभुनके पुनरणामसर जैसे दो फा एक वगस्थान २' - ५ कामरा घर्गस्थाम २ २१५ दोत्र तोमरा वास्थान - ३५६ कागधार्ग थान - _ - - -Tail- -- दोका और पगस्पान ०४१८५७२२५ दोचना पगम्यान E -२१४१७२ - ४२४४४३५४५२५५३७२५ - 100000५५१ ससे पष घटाने पर १४ १५१५१५ रोप रहे येही भएन भाष्प भुतभान १ पटा निवासी मगरूपसहाय वकीलच पदच्छेद और विमबरपर्य सहित सर्वार्थसिदिका शन्दश' हिंदी अनुवाद । अध्याय १त्र २० ६५५३१ ५५३६ ५५५ ६५५३३ ५२१५ ३८३२१६ १९६६०८ २२७५० ३२७६८ ३२७६८ ३२ २०२१६ ૧૨ ४२४६२२५ ४२५४६६७२५६ अय ४२६४५६७२६६ को मास में गुणा फरने पर जोसम्म गपि भाषे उसमें में एफ घटाने पर पाए राशि है मर्यात् ४२६४८६०६६ ४२६४३६७२६६ २७६८८ ३७७६ ३८३५२७५१६४ पम्हट३४२६२ ३ ६५७७१ ७२ २१७६३७६ ३६६५४७ ५६६४ २७१७६८२४ ३1180 ५६६४ FIC९६३:५४२ १७१८१२१४ १८४७४३ ०३७०६५५१६१३ .inrise-५५१ND गरी प्रमाणपतगमलेमपुमपन्य मशर एटा निगासी मगरूपसहाय यकृत पदयोर और विमारपर्य सहित सार्यसिदिका शब्दश रिन्दी अनुवाद । अभ्याप १ पत्र२० इमो मेर को वोसरे प्रकार से से मो ममा कहे विधायन ( मगमा पाके गर्ग गठन गर्गमगाम जि को गणमा पद्रो संम्पारे परापर है। स एको प्रमाण सम्पाने एक गो मायरो र सम्मा सेउदो याममा सार शामफे प्रात् पाके कारे २ पग रमकर अप मठपो पगका स्थान पा(२ ।।..) गुग्यनफसमें एसपटावा दो वापसाफे पुराया ममर असे दो का एक पगस्पान २ -४ पाकामरा धस्मान ४ २ . २५ रोप तोमरा पग स्थान न -५५६१ का बोधार्ग पान - दोका पगस्थान २५६ - ४१५८५७२५ Fil-d -- |AEE दीपमा पगम्यान -४२४४५६७२६५४४२८४५६RA -es४४ ७७०॥२५१११ पसे पण घटाने पर १८१४१०४४ ०३. ११५१५१५ प रहे पेही अपुन भन्न दम्य भुगभान २६ एटापांसी जगरूपसहाय वकीस्कृत पदच्छेद और विमास्थर्य सहित सवार्थसिदिका श्वशः दी, अनुवाद अध्याग ' सूत्र २० जितमे मा अंगर पंप और मगाय को ऊपर दिपते है । एस मसर से रामा जापान सिसके ऊपर से एक एक महर को पछि इस हा मध्यात मक्षपकी पृधि हावार सप पहनामक भूतानमा है। मसरवान के मार मोर पवगन के पूष तक। (गम के भेव मण्या में पदक भव से दो म्यूम होते हैं। सब भर समासवान के मेद है। (बो० फा० गो ३३५ गाथा। स्मरण रहे कि पद मे भभप्रारमम्पमपर से है कि पर दोन प्रकार के हैं .प) मर्यप (फ) प्रमय पर (प) मध्यम पर वहां जितने अस क समुदायोजित जाना माता है उसको अपर कहते हैं या विवक्षित अर्थ के पी एक दा मादि मनपा समूब ताको पपरपीपे' से 'गामम्पान शुक्लो दन पाल मै गाम अम्यास शुक्रो रन ( स्पेत गाय को करेके पस) से बम्द करवा। गान् अभ्याम गहन पार मर्प पर पे। ऐसे हो मम्मिमानप, पाका मम्निम् मामय (-भाग को ला) वामप पदाये। मार दान शालम्पा में निपाप' पात्र में सेन - सिम्य -- निवारय - दासे गाय का पानों म से निकाल दी) ये चार अर्थ पर पै। इन सबाहरणों से मनरेकि भर में प्रत्येक पर फे मार परावर महीं होत म्यून हो म मा हो कमी कमी पर मो हो ममाप्येन मोक्षरादिसम्या निपा महासमा प्रमाण पर तथा ममामाई मानाय । नियमित सम्या का खिमेपे माठ भसर मादि गपना करि उत्पदामा माय समूहमा प्रमाण पर जैसे धो यद मान (मगपान् ) क नमस्कार दो मम्प बाहरण प्रमाणपके मका मप्रणवमीति माय प्रमाणाम् मन प्य पदक नर पर साहव साय पारलेपाः । इस्य दि इन तोन प्रमाणपद के उपायों से प्रगट है इनके मसरों को सम्पा दोन मपि १५९परक बन्द भयरोप तीन प्रमाण पत्रों के मारों का प्रमास परावर हागा । उक्त सव याहरयों के मिलाने से पर फल मिलता १म्मियपर और प्रमायादमापे को कोई गणना नियत नाही। मगर भिनिता पा और मौलास चीनीम पारितियासी पाच सात हजार माटसे अय्यासी (१५२४८३.८८ ) गाया विष(-परमागम है अपुनमक मो मध्यमपद कहिये। शनि पि भयपद भर प्रमाणपती होन अधिक प्रदरनिका प्रमाय को लिए सोकम्पबारकरिपक्षण पिमा कार हैवान साघर परमागमति गावाविप कहो सो सम्मा दोहा विष पतमाम जो मम्पम पर वापी का पदम कानमा मातंग, मयपर और म मप न्यूनापिम्प माण होने से सारप्यपहार में पास है ठिससे साक्षातर गाथा दिप [-पामागम में] पे परके म का प्रमाण १५३४ : सर्वदा के लिये निश्चित है। इसी को मध्यम पदबात है.

एनिवासी जगरूपसदाप वीस्कृत पदच्छेद और विमक्त्या सहित सर्वार्थसिदिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अमाप १ सूत्र २० भगप्रषिष्ट द्वादशविधम् ॥ तद्यथा-- अामविष्टमः। द्वादशविरमा तयया म = अगमविष्ट पाय प्रकार है जैसे (सो- तद् ज्यों है = यथा एसा शब्दार्थ ) हमका मानिसमा मिनपाए. (प्रथात् दम्मभुपात प स १८४४१७४४०२३० १५५१५१५ मपुतर मभर प्रमाण इन पोस यो में १९५४५ GREE सको का भाग ने सम्मान के मध्यम पदों को सपा इसमाति निकसम है कि १५३४८३०.) १८:४७४४ ७३७ ८५५१३१५ (१९२८३५८ ।। इती अंगाषिए भुतहान फे मम्मम पर ये १६३४८३०. इतने पदों का तासावयाग कप इष्पभुत है २०१८४३६१८७ और शेप असर भाउ कपर एक लासभर ११३८ER सहस एकसौ पचहतर १८९७१) रहे इनका पूराएक मध्यम पद नही हौसका ३२६४२७६ इनसे मंगवायको उत्पचिपात् इन ११६२६२३९१४४ मापे से पौष पूर्वांत प्रकको को १३ १४५३१ ४ उत्पत्तिई है। ५८२२०४२२ ४०४४५२१३ २४-२८३५५५१५ E.४१२२४४४. १३ परम् २०१४ ८१८२१६४७.१५ ८१.४१२३४५४ एगावासी जगलपसहाय कीस्कृत पदच्छेद मौर विमात्पर्य सहित स्वार्थसिद्धि का शम्दशा हिंदी, अनुवाद अध्याग । सूत्र २० मा मंगपए और भगवान को सपत सिपते है। एक मार से सराब हुमा गोपान तिसके ऊपर से एफ एक प्रहर को परि इतनाम मेम्पात प्रक्षय की पृषि हाजाप तब फ्यनामक भुकान क्षता हा मारहान के ऊपर मोर पदवान के पूष तक मतने पान के मेद २(पान के मेद मस्या में पदभाव से दो म्यून होते है ये सब अपर समासवान के मेव है। (जो० फा० गो २३५ गाथा) स्मरण है कि परी रगर मे म.गार मम्पमपद से है क्योफि पद तोन मकार के है .१)मर्थपा (फ) प्रम पद (प) मम्पम पम् । वहां जितने मसरी क सम्बा पौरित प्रय माना जाता है उसको मर्यपद' कहते है पथात् विवक्षित अर्थ मी पक दा मादि भकनिषा समूह ताको परपर पीये' से 'गामम्याम गुरु दरेन पाम में गाम अम्पाज का दरेन (= षेत गाय को के पास ) से बन्द करवा। गान् प्रम्यान यला-पान पार मर्प पदापे। ऐसे हा 'मम्मिमानप पाका अम्मिम् भानप (-माग पो ला) दोमय पदपे। मार दान शासम्या" निषारप' पाप में दन - गालिम्या-गो - निषारयर - दोसे गाय का पानों म स निकाल दो) ये चार अर्थ पद पे। इन उदाहरणों से प्रदरे कि भाई पत्र में प्रत्येक पद के भमर पराबर नहीं होत म्यून दो म मा हो कमी कभी बरावर मो हो प्रमापेन प्रयोमरादि म्या निमय सम्हा ममाय पदपथा ममा यार मानाय । नियमित सम्या का वियेये माठ मसर मादि गणना गरि सत्पनमा मसरोय सम् सो प्रमाण पद है जैसे धो पर मान (मगषान् ) कानमस्पर दो प्रम्य उदाहण्य प्रमाणपत्रे भवा मरमसमीति मपि प्रमाणाम् पैमा) प्य गफ नर पर सात माय परमेश्याः । इत्पदि इन तोन प्रमाणपद के न्याहय्यों से प्रगर है इसके ममरों की सच्या दोन भपिक परामु परक बन्द मप दोन प्रमाण पत्रों के मदरों का प्रमाण परापर दागा। उस सव उदाहरणों के मिलाने से पर फस निकलता प्रियपर और प्रमाणपद के प्रत्येको कोई गणना मियत नारी है। मा मौर सोत्यस चीतीस फारि तियासा लास सात हसार माठसे अध्यासी (१६५४८३ ८८८ ) गाथा पिते(-परमागम कई अपुनरुछ मश तितिका मम्। सो मध्यमपर कहये । इनि पि अर्थपद पर प्रमाणपत्र तो होन पायक मदरनिका ममायकी लिप सोफम्पवहार करिपक्षण का कोपरे तालाकार परनागमति गाविप कहो मो सस्या दोहा चिप बतमाम नो मध्यम परवाही का पहम जानमा माग, भयपर मौर म प्रपणे न्यूनाधिम्य माण होन से साइपबहार में प्राप है विससे साफातर गापा विप [-पामागम में] बरे से परके भाप का प्रमाण २३४ NEE सर्वदा के लिये मिस्थित है। इसीको मध्यम पर पा निवासी मनपसाप पकीस व पपच्छेद और विपत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिफा शन्नशा हिंदी अनुवाद । अष्पाप १सूत्र २० भरतकरयम् । अनुचरापपादिकदशम् । प्रभव्याकरणम् । विपाक् सूत्रम् | हष्टिवाद इति ॥ दृष्टिबाद पथविष - = अन्तरांग जिसमें प्रत्येक तीर्यकरके तीर्यमें (= एक वीके पीछे नवतक दूसरा तीर्थकर दो वो काल) अन्काशम् ॥ मो पन दश मुनि घार प्रकार का वीम उपसर्ग सहन करके संसारके अन्त को प्राम पुए उनका वर्णन है इसके ईस लाख बदाईस सरस २३२८००० पद है अनुत्तरोत्पादिश्यम् । = अनुत्तरोपपादिक पशांग वह है जिसमें एक एक तीर्य करके तो में दश दश महामुनि घोर उपसर्ग साफर अन्तमें समाधि के द्वारा मपने माणों को त्याग कर के विजप आदिक पांच प्रकारके अनुचर विमानों में उत्पन्न हुए । इसमें मानवै लाख घालीस सहस् ९२०४००० पद है। मरन म्पारणमा = मरन व्याकरणांग वो है जिसमें अतीत अनागत काल सम्बन्धी साम असाम सुख दुख मीवित मरणादि शुभाशुपका कोई प्रश्न कर तिसके उपर पपार्थ कहीका उपाय वर्णन और आधेपिणी, विधेपिणी सवेजिनी निमनी इन चार प्रकारकी क्याओं का वर्णन है इसमें तिरानवै साख सो सहन ९३१६००० पद हैं। विराम ॥ = विपासना यह है जिसमें प्रम्प, क्षेत्र, काल मारके अनुसार शुभाशुम कमी की तीन मन्द मध्यम बादि अनेक प्रकारकी अनुभाग-शक्तिके फल देने सप विपाक का वणन है इसमें एकसरोर चौगसोलाग पद है घटियावा। = दृष्टिवादा वह आई जिसमें तीनसौ तिरेसठ मिध्यिा मतों का वणन और उनका निराकरण दे इसमें एक्सौ आठ करोर अडसठाव छप्पन सास्र पांच १०८६८५६००५ पद में घटियार पानिपः । = घष्टिवादः (मारहवां भा) पांच प्रकार का है (इसो पुस्तक का पृष्ट ४२० देखो) ।

एटा निरासी मंगरूपसाप पोटकृत पदच्छेद और विमात्पर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सपश हिंदी अनुवाद । यध्याय १ सूत्र २० भाषाः । सूत्रकृतम् । स्थानम् । समवाय । व्याख्याप्रज्ञाप्त । ज्ञातृधर्म कथा । उपासकाम्ययनम् = आधारांग अर्यात वह है जिसमें साधुओं के समस्त माधरणका पर्णन हो । अठार सहन मिसके पद हैं। भापार ॥ सूत्रकृतम् ॥ -प्रकृांग अर्यात् रहै । जिसमें ज्ञानका विनयादिक नया धर्मपामें स्वमत परमक्की क्रियाफा और निर्विघ्न अध्ययन किपाका विशप निरूपण हो इस में तीस साल ३६००० पद है। स्थानम् ॥ स्याना अर्थात् जिसमें सम्पूर्ण द्रव्यों के एकसे लेकर किसने विकल्प होसकते हैं और उन विकल्पों का वर्णन किया है मैसे समान्या अपेक्षासे मीक्वम्प का एक ही विकल्प वा मद है, संसारी और मुक्त की अपेक्षा से दो मद में उत्पाद व्यय धौठपकी अपेक्षा से तीन भदौ । पार गतियों की अपेक्षा से घार भेद है, इत्पादि । इसी प्रकार पाल बादिक द्रव्यों के भी मेद समाना । इस में विपासीस साल ४२००० पद हैं। समाप = समवापाङ्ग अर्थात् वह बन है जिसमें द्रष्प क्षत्र, काय भाव को अपेक्षासे सामा पताका वर्णन है । सारांश सम्पूर्ण द्रव्यों में परस्पर किस किस धर्म की अपेक्षा से साहश्य है यह पाया है। जैसे द्रव्पकारि धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाप समान है। अत्रकरि मनुष्यक्षेत्र और प्रथम नरकका प्रथम इन्द्रकविल, अर प्रथम स्वर्गका प्रथम इन्द्रक विमान समान है । कालकार उत्सर्पिणी अवसर्पिणी समान है। मावकारि केवल ज्ञान फेवल दर्शन समान है। इसके एक साल चौसठ सहल १६४००० पद हैं। म्पारपामास = पारपामप्ति अन वह है जिसमें जीव के अस्तिनास्ति, वक्तप प्रवक्तप नित्य अनित्य पफ अनेक इत्यादि साठ सहस्र प्ररन गणधर देव ने तीर्थकर भावान के निकर किये सो फयन है । दोलाखअट्ठाईस सास्र पद हैं । मापन। शाद धर्म पयांग वा है जिसमें भीषादि वस्तुओं का स्वभाव, तीर्थरोंका महात्मप, तीर्थकरॉकी दिव्यध्वनिमय समप सपा मारम्प, उत्तम क्षमा आदि दशधर्म सम्पपदर्शनादि रचत्रपका स्वरूप तथा गणधर इन्द्र चक्रवर्ती मादिकी क्या उपक्याओं का वर्णन है पांचलाख छप्पनसान पद है। उसकामपनम् ॥ II उपासकापपना पहरे निसमें उपासाकी (यायफॉफी) सम्पदर्शनादि ग्पारा प्रतिमा संबंधी प्रव गुण शील मापार तथा दूसरे क्रिया कार मौर पनके मताधिकों का विस्तार वर्णन । ग्यारासाष सरार साम पर स्व निवासी मनहफ्सहाय कीस कृत पदच्छेद और निमक्त्यर्व सहित सर्वार्थसिधिका शब्दश हिंदी अनुवाद । अध्यापसूत्र २० भरतकरणम् । अनुसरोपपादिकदशम् । प्रभव्याकरणम् । विपाक सूत्रम् । दृष्टिवाद प्रति ॥ दृष्टिवाद पचविष- - = अन्तकृाशांग जिसमें प्रत्येक तीर्पकरके वीर्यमें (= एक वीर्यके पीछे जयतक दूसरा तीर्थकर हो पो काल) अन्तकाम् ॥ मो दश दश मुनि चार प्रकार का वीम उपसर्ग सहन करके ससारके अन्त को माम हुए उनका वर्णन है इसके ईस लाख अट्ठाईस सहल २३२८००० पदरें अनुत्तरोपादिक्दसम् । = अनुत्तरोपपाविक दर्शाग यह है जिसमें एक एक तीर्थ करके तीर्यमें दश दश महामुनि घोर उपसर्ग साफर बन्तमें समाधि के द्वारा अपने माणों को त्याग करके विजप आदिक पांच प्रकारके अनुचर विमानों में उत्पन्न हुए इसमें वानवै छाख पचालीस सहसू ९२४४००० पद हैं। मरन म्याकरणम् ॥ = प्रश्न व्याकरणांग यो है जिसमें अतीत अनागत काल सम्बन्धी साम असाम सुख दुख जीवित मरणादि शुभाशुमका कोई प्रश्न कर तिसके उत्तर पदार्थ कहोका उपाय वर्णन है और आक्षेपिणी, विक्षेपिणी सपेजिनी निमनी इन चार प्रकारकी क्याओं का वर्णन है इसमें तिरानवै लाख सोम साल ९३१६००० पद ।। दिपाकम् ॥ = विपाफसूत्रापा मग जिसमें द्रव्य, क्षेत्र, काल भारके अनुसार शुभाशुम कौ की तीम्र मन्द मध्यम आदि अनेक प्रकारकी वनुभाग-शक्तिके फल देने रूप विपाक का वणन है इसमें एककरोष चौगसोलाग पद हैं पष्टिवाद। = दृष्टिवादाम पा मग मिसमें तीनसौ तिरेसठ मिथ्यिा मों का वर्णन और उनका निराकरण है इसमें पक्सो आठ करोड अम्सठलाख छप्पन सहस्र पांच १०८६८५६००५ पद हैं राष्टिा परिषः । = घष्टिवादा (पारावां भा) पांच प्रकार का है (इसो पुस्तक का पृष्ट ४२० देखो) ।

पटा निगसौ भगकपसाप पोरकृत पदच्छेद मौर निभात्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शमश हिंदी अनुवाद । बप्पाप १ पत्र २० भाचा । सूत्रकृतम् । स्थानम् । समवाय । व्याख्याप्रज्ञाप्त । ज्ञातृधर्म कथा । उपासकाध्ययनम् = आमासंग अर्यात वह है जिसमें साधुओं के समस्त आचरणका वर्णन हो । अठारह साल जिसके पद हैं। जापार सूत्रकृतम् ॥ सूत्रांग अर्थात् वह है । जिसमें ज्ञानका विनपादिक त्या धर्मपामें स्वमत परमतकी किपाका और निर्विप्न अध्ययन कियाफा विशेष निरूपण हो इस में छतीस सान्न ३६००० पद हैं। स्थानम् ॥ =स्याना अर्थात् निसमें सम्पूर्ण द्रव्यों के एकसे लेकर किसने विकल्प हो सकते हैं और उन विकल्पों का वर्णन किया है मे समान्य अपेक्षासे जीवद्रव्पका एक ही विकल्प वा मद है, ससारी और मुक्त की अपेक्षा से दो मदरे उत्पाद व्यय घौपकी अपेमा से चीनम्द हैं। धार गठियों की अपेक्षा से पार मेद है, इस्पादि । इसी प्रकार पाल बादिक द्रव्यों के मी भेद समप्तना । इस में विपालीस सहस्र ४२००० पद हैं। समाप = समवापाङ्ग अर्थात् वह बाद मिसमें द्रष्प क्षत्र काउ माव को योक्षासे सामा पवाफा वर्णन है। सारांश सम्पूर्ण दपों में परस्पर किस किस धर्म की अपेक्षा से साहरप है यह बताया है। जैसे ठपकारि धर्मास्तिकाय अधर्मास्विकाप समान है। क्षेत्रकरि मनुष्यक्षेत्र और प्रथम नरफका प्रथम इन्द्रकपिल, अर प्रथम स्कोका प्रथम इन्द्रक विमान समान है । फालपरि उत्सर्पिणी अवसर्पिणी समान है। भाषकारि केवल मान केवल दर्शन समान हैं। इसके एक लाख चौसठ सहन १६४००० पद हैं। म्पारुपामप्ति = ग्यारूपाममाप्ति अझ वा है जिसमें नीव के अस्तिनास्ति, वक्तप प्रवक्तप नित्य अनिस्प एक अनेक इस्पादि साठ सहस्त्र प्रश्न गणधर देव ने वीर्यकर भगवान क निकर किये सो कथन है। दोलाखअठाईस साम्र पद हैं।' भारपाया =साद धम फयांग वह है मिसमें जोयादि वस्तुओं का स्वभाव तीर्थरोंका महात्मय, तीर्यकरो दिठपध्वनिफा समप तया महारम्प, उराम ममा आदि दशधर्म सम्पफदर्शनादि रखत्रपका स्वरूप तथा गणघर इन्द्र चक्रवर्ती बादिकी क्या उपझ्याओं का वर्णन है पांघल्मस्व छप्पनसान पद हैं। उपसकाप्पपनम् = उपासकाप्पफ्ना बारे जिसमें उपासकी (घावोंकी) सम्पफदर्शनावि ग्पारा मतिमा सर्वपी प्रत गुण भील मापार तथा दूसरे किया कार और उनके माविकों का पार पण नरे। ग्यारहवाम सर साल पदरे %3- एटा निवासी मगरूपसहाप कीलकृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्षसिटि का सन्दश हिंदी अनुवाद । अम्माप १ एत्र २० वगतम् । चूलिका चेति ॥ तस पूर्वगत चतुर्दशविधम्-उत्पादपूर्वम् । भमायणीयम् । पूर्वगवम् । = [चतुर्य भेद घटिवाद मग का] वारे विसके चौदह प्रभेद हैं। जिसमें पचानने करोड़ उनघास लाख निन्यानवै सास्न नौ सौ निन्यानवे (९९४९९९९९९] पद हैं। (नके विशेष के लिये देखो पृष्ठ ४२१, ४२२) घ पूलिका ॥ इति = और = च) चूलिका( पचम भेद घटिवाद अंग फा) है। (जिसके पाप प्रभेद निनका वर्णन निम्न टिप्पणी में) • पूर्वगतम् ॥ वहाँ (= तत्र) पूर्वगत (घष्टिवाद अग का धौया मेद) चतुर्दशविषम m = चौदा मकार है अर्थात् दृष्टिवाद अन के चौथे भेद पूर्वगत में निम्नलिखित चौदा पूर्वगभिंती उत्पादपूर्वमा वह मिसमें प्रत्येकवष्य के उत्पाद व्पय धौम्य और उनके सपोगी धर्मों का वर्णन है । इसके एक करोरपद अपापणीपम = पर पूर्व है जिसमें द्वादशाम के प्रधानमूद सादसौ सनम और दुर्नय पवास्तिकाय पट्टा सस्तत्व नव पदार्य आदिका वर्णन है इसमें छिगानचे लाख ९६००००० पद ? (१)[क] असगता यूसिका [व] स्थलगता लिफा [ग] मापागता भूलिका [५] रूपगता सिका [माकाशगतासिका पाच भेद है [ ममगठा लिन था जिसमें समगमन सलस्तम्मम अग्नि के प्रासन फे, मग्नि के मनगारे, अनि को प्रवेश अग्नि के स्तम्भन मावि के मंत्र तर तपश्चर्यामादिक का फयन है। इन प्रत्येक केवा करोड मोबाप नपासी सहस्र दासी पद है। [गस्पलगता पतिका पद है जिसमें मेरुहसाबस भूमि पर्वत भाव में प्रवेश करना शाप गमम करना स्याधिक क्रिया के कारणमूत मंत्र गदिक का परुपया है। इससे भी दो करानी साथ मपासो सहस्र पासी पर है। (ग] मायागता पृतिका पह है जिसमें मायामयो इदमायादि यिप्रिया के कारण मन्त्र विभाचरणादि का कपन है २०१८४१० पर है। घ) माता यूसिका यह है जिसमें सिंह हाथी घोडा प्रेस विरत इत्याविफ रूपके पलटने के कारण मात्र वपश्वरमादिक का प्ररूपपई तथा त्रिय कारपारिकापर्णन है। तया पातु रस रमायन का निर्माण है २०४८४२०० पद [+] माकायगता पलिका पद है जिसमें माफाश में गभमादिफ के कारणभूत मत्रतंत्र सत्वरणाविक का वर्णन है। इसके भी दो करोड़ नप मत मासो सहन दाग्रत् (२ १८८२० ) पर है।

एत्रम् ॥ एटा निवासी जगरूपसहाय वकीलकृत पदच्छेद और विझवत्पय सहित सर्वार्थसिटिका शम्पशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० परिकर्म । सूत्रम् । प्रथमानुयोगः । ( परिस्म' = (प्रथम भद दृष्टिवाद अग का) परिकर्म १ वह है जिसमें गणित के करण सूत्रों का वर्णन है = (दितोय मद दृष्टिवाद अगका) पत्र वा है छिसमें तीनसोगेसठ मिथ्याष्टियों का पूर्व पक्षपूर्वक निराकरण अयात् जिसमें मिप्यादर्शन सम्पपी तीनसोगेसी कुवाद क्निका पूर्वपक्ष खेकर नीवादिक पदायों ऊपर एगावने का वर्णन है । तिन निघ्याघटियों के अन्यों में नीव प्रबंधकही है, अकर्म ही है निर्गुण ही है। अमोक्का ही है। रवप्रकाशक दी है। पर प्रकाशक हो है। अस्विरूप ही है। नास्विरूप हो है इस्पादि एकांत पक्षपात को दूर कर ययार्थस्वरूप का वर्णन है। इसमें अठासीलाख पद हैं। मयमानुयोग। (मनीय भव दृष्टिवाद अगका) मयमानुपोग वह है जिसमें पतुर्विशति तोकर, दादा पावती नव नारायण नव प्रतिनारापण और नव यलम्य इन प्रेसठ शलाका (= सप्तम) पुरुषोंका वर्णन है। इसमें पांच सदस्य पद हैं। १)इम ( परिका ) के प च भेव (फ) घर प्रगति (स) सूप प्रगति (ग) जम्मोपप्रमि (घ) सोपसागर प्रबप्ति ( व्याल्या प्राप्ति (5) मारगी में घमा माघा थिमान मायु परिगर मटि गमन मा ने वृद्धि पूण पाण अपमहण चतुर्याशपाहण मादिका पणन है हममें स्लासला पांच महल २६०५ ००) पर है (ग) सर्प प्रनि म गप मघ प्रायु परिवार गमन पाण मुदि पिसषका पण म है इसमें पाचसा तीन सदस्य पद है। (५०००) (ग) मगर मारि म माप मपधा मरू पूसा बल म (सषर) क्षेत्र कर पेदिका दम्पतरों के मावास महामो भाविका पगम है। हममें गान साप पोस सहन ३५ . (ो गोषमागर प्रणाम में प्रसमपात टोप मीर सनुवो का माप तया यह निष्ठने वाले मषन मी म्पम्पर पोतिकी के भाषारुका पणन मोर-यहा पर हाल पा माथिम देण्यासयों का घणम इसमे पावन लाज पनीस सहम ( ५२३५. पप)* (ज) पाम्पा में माप प्रमप-मेद प्रमाण सरुप पो भरपा प्रवद्रमों का और मनम्वरसिर परपप सिबोका तपा । मरा परमों का मी पणन है । इस चौरासी पाम तास साम { ८४११०००) प्य* क D स्या निवासी ममम्पसहाय एकीकत पदकेद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिटि का शन्दश हिंदी अनुवाद । अभ्याप १ सूत्र २० पूर्वगतम् । चूलिका मेति ।। तस पूर्वगत चतुर्दशविधम्-उत्पादपूर्वम् । अमायणीयम् । पूर्वगवम् । = [पहर्ष मेव दृष्टिपाद बा का] वारे निसके चौदा प्रभेद है। मिसमें पचानवे करोर उनचास लाख निन्यानवै सहस्र नौ सौ निन्यानवे [१९४९९९९९९] पद हैं। (नके विशेष के स्पेि देखो पृष्ठ ४२१, ४२२) प* पूलिका ।। इति छ = और = ष) चूलिका ( पञ्चम भेद टिवाद अंग का) है। (जिसके पांच प्रभेद हैं जिनका वर्णन निम्न टिप्पणी में है। वत्र पूर्वगवम् ।। वहाँ (= तत्र) पूर्वगत (हरियाद अग का चौया मेद) चतुर्दशरिषम् ॥ = चौदह प्रकार है अर्थात् राष्टिवाद अझ के पौधे भेद पूर्वगत में निम्नलिखित चौदह पूर्षगर्भित है उत्पादपूर्वम् ॥ वह मिसमें प्रत्येकद्रव्य के उत्पाद व्यय ध्रौव्य और उनके सपोगी धर्मों का वर्णन है। इसके एक कोरपदों अमापणीपम् । =पर पूर्व है जिसमें द्वादशांम के प्रधानमूत सातसौ मनप और दुर्नय पश्चास्तिकाय पट्य सप्ततस्य नव पदार्य बादिका वर्णन है इसमें छिगान साख ९६००००० पद है (१) [१] गलगता पूलिका [क] स्यगता पसिघ्र [ग] मायागता भूतिका (] अफ्गता लिका [७] भाकारागवा चूमिका में पांच मेव है [जमगवा पतिका पा है जिसमें समगमन के ससस्तम्भन के अग्नि के पासन फे, अनि के भक्षण के मनि के प्रवेश के प्रग्नि के स्तम्मम भादि के मंत्र तंव तपश्चर्याभाविक का कथन है। इन प्रत्येक के दा फरोज नीताप मवासी सहस्र दो सौ पद। [4] स्थलगता सिच पद है जिसमें मेमसावत्र भूमि पर्षत भाव में प्रवेश करना गोप गमन करना इत्यादिक किया के कारणमूत मग वादिक का मरूपण है। इसके मी दो फराह नौ लान नपासो सहन दा सो पर है। [ग] मायागवा लिया पह है सितमैं मायामयो इन्द्रधागादि पिक्रिया के कारण मात्र माचरणादि का कपन है २०६८४१० पद है। [म फगता कृतिम यह है जिसमें सिंहायो घोगा पत शिरसा दण्याविक म्पके पलटने के कारण मंत्र क्षेत्र तपश्चरणादिक का प्ररूपण है तथा चित्राय यसपादिका वर्णन है। तया पातु रस रसापम फा मिरूपण है २०१८२१०० पद है { भाकायगता पमित्र यह है मिसमै माकाश में गमनाविक के कारणभूत मत तपश्चरणादिक का वर्णन है। इसके भी दो करोड़ मप मम नासो सहम दो शत् (२ १८४२० ) पद हैं।

पटा निवासी नगरूपसाप पकीकृत पदच्छेद और विभवत्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्रिका शब्दशः हिंदी अनुवाद। मध्याप १ स्त्र २० वीर्यानुप्रवादम्। भस्तिनास्तिप्रवादम् ॥ ज्ञानप्रवादम् । सत्यप्रवादम्। भास्मप्रवादम् । कर्मप्रषादम् प्रस्यास्याननामधेयम् । पीपानुरादम् I = (३) वीर्यानुवाद पूर्व वह है जिसमें आत्मपीर्य परवीर्य रमपपौर्य कारवीर्य गुणवीर्य वपोषीर्य द्रव्यवीर्य पर्यापवीर्य क्षेत्रवीर्य मारवीर्य आदि अनक प्रकार के मीर्य (सामर्थ्य ) का वर्णन है। इसमें सवराव ७००००००पद।।। मस्विनास्तिपवादम् {m =(१) अस्तिनास्तिवाद पूर्व वो है जिसमें बीवादिक वस्तुओंके स्व पर द्रष्प क्षेत्र कास माव की अपेक्षाकरि स्यादस्ति स्पान्नास्ति आदि अनेक धर्मों में विधि निपेषकरि सप्तमाकार मुख्य गौणकरि वर्णन है। इसमें साठ साल (६०००००० ) पद है। हानमवादम् । = (५) माननाद पूर्व वह है जिसमें मविज्ञान श्रुतमान अवधिज्ञान मन' पर्पयज्ञान केवलमान और समविज्ञान फुय तमान अवधिज्ञान इन विभंगद्वानों का स्वरूप संख्या विषय फसादिको का वर्णन है इसमें एक पाटि बगेर ९९९९९९९ ) पद हैं। सत्पमसादम् । = (६) सत्यमवाद वह पूर्व है जिसमें आठ प्रकारके शग्दोस्पारण के स्थान, पांच प्रपन, वाक्पसस्कारके कारण, शिष्ट दुष्ट शब्दों के प्रपोग, रूक्षण, वचन के भेद बारा मकारकी भाषा अनेक प्रकार के असत्य षषन वाम्यसि मीन आदि का वणन है। इसमें एक करोड़ छा (१००००००६) पद हैं। मा मारादम् । (७) आत्ममगाद पूर्व वा है जिसमें आत्मा के पर्वा भोका मादि अनेफ धर्मों का निरचपनप और सर्मपरादम् ॥ प्पणार नपफी अपेक्षा से विशेषरूपमे वर्णन है । इसमें छपीस कोर ( २६००००००० पद हैं। =(८) कर्मप्रसाद पूर्व वह है मिसमें ज्ञानारर्णादि कर्मों की मूल प्रकृति रत्तरप्रकृति उत्तरोत्तर प्रकृतियों के भवलिये संघ ससा उदग उदीरणा उतर्पण अपक्षण संक्रमण उपशम निपति निकोषित आदि मास्याओं का वर्णन है।। इसमें एक करोड मासोळास (१८०००००० पद हैं। मस्पास्माननामधेगम् !13 (९) मस्गारमाननामघय पूर्ण जिसमें माम स्थापना द्रष्य क्षेत्रका मावको मामगार पुरुषों के एरा निमासी नगरूपसाप पकौस्कृत पदच्छेद और विमपत्पर्य सहित सार्थसिदिका शम्श हिंदी अनुवाद । बध्याय १ यत्र २० विद्यानुप्रवादम् । कल्याणनामधेयम् । प्राणावायम् । क्रियाविशाम्नम् । लोकबिन्दुसामिति ॥ संहनन पठादिफ के अनुसारकरि प्रमाणीक पाल पर्यन्त वा अममाणीक कालपरि त्यागकरना तथा सापय वस्तुओं का स्याग और उपवास विधि और इनकी मावना और पचसमिति और वोनि गुप्ति आदिका वर्णन है। इसमें चौरासी लाख ( ८४००००० ) पद हैं। विधानुप्रसादम् ! = (१०) पियानुवाद पूर्व पर है जिसमें भगुमसेना आदि सातसौ अस्पविया क्या रोहिणी आदि पांचसो महा विधाओक्य स्वरूप सामर्थ्य मंत्र वत्र पूमा-विधानादिका वया सिद्ध मई विद्याओं का फस और अन्तरिक्ष भौम माग स्वर स्वम रक्षण य्पन्नन छिन्न इन बाग निमितों के ज्ञान का वर्णन है॥ ११०००००० पद हैं। कल्याणनामधेपम् =(११) करपाणनामधय पूर्व यह है निसमें तीर्थकर पक्रपर परदेव वासदेवादिकों के गर्मावतारण आदि करपा णकोंके महोत्सव तथा उनके कारण (तीपरत्वाति पुन्प निशपका रेत पोशकारण भावनादि तपश्चरणादिको का क्या चन्द्र सूर्यादि यह नक्षत्रादिकों के गमन माण शकुनादिकों के फल वर्णन है इसके प्रयास कोर २६००००००० पद है। मणानापम् ॥ = (१२) माणावाद पूर्व पा है जिसमें काप पिकिन्सा आदि पाठ प्रकार के आयुर्वेद का, इग (= पृथिली) पिङ्गला (= अग्नि) आदिका दशप्राणों के उपकारक अपकारफ दग्गोवा गविगों के अनुसार वर्णन है। इस में रहकरोड १३००००००० पद? । किमविशालम (१३) किपाविशाल वा पूर्व है मिसमें संगीत छन्द असतार पुरुषोंकी वातर कठा स्त्री घौसठ गुण तथा गर्भाधानादिकचौरासी क्रिया, शिल्पावि विज्ञान सम्पदर्शनादि पम सौ आठ किगा, देववन्दनादिफ पच्चीस किया और निमित्त नैमित्तिक क्रियाओं का वर्णन है। इसमें नौ करोड़ पद हैं। लोकपिन्दसाग्म-इति ® = (१४)ोकपिन्दुसार पूर्व गाई निसमें चीन कोषका स्वरूप Bीस परिकर्म बाठ व्यवहार, चार वीजगणिवादिक मोस का स्वरूप उसके गमन का कारण, किया ,मोसमय के स्वरूप का वर्णन है। इसमें साढ़े बारह करोड़पद हैं।

एटा निगसी नगरपसहाय कीकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्व सहित सर्वार्थसिद्रिका शब्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २० वीर्यानुप्रवादम्। अस्तिनास्तिप्रवादम् ॥ ज्ञानप्रषादम् । सत्यप्रवादम् । भारमप्रवादम् । कर्मप्रवादम् प्रत्याख्याननामधेयम् । वीर्यानुवादम् ॥ %=(१)वीर्यानुवाद पूर्व पददै निसमें प्रारमपीर्य परवीर्य रभप पौर्य कालवीर्प मुणवीर्य तपोषीर्य द्रव्यवीर्य पर्यापषीर्य क्षेत्रवीर्य मावीर्य आदि अनक प्रकार के वीर्य (सामर्थ्य ) का वर्णन है। इसमें सवरलाख ७००००००पदो। अस्तिनास्विमवादम् । = (१) अस्निास्सिमवाद पूर्व पोरे जिसमें नीवादिक वस्तुओंके स्व पर द्रव्य क्षेत्र कास भाव की अपेक्षाकरि स्यादस्ति स्पान्नास्ति आदि अनेक धर्मों में विधि निषेपकार सप्तमप्रकार मुख्य गौणकरि वर्णन है। इसमें साठ साल (६०००००० ) पद हैं। सानमगादम् ॥ = (१) मानमवाद पूर्व वह है जिसमें मतिज्ञान सुतमान अवधिज्ञान मनः पर्पयज्ञान केवलज्ञान और कुमतिज्ञान फुल वहान कुश्वविज्ञान इन विमंगवानों का स्वरूप संख्या विषय फलादिको का वर्णन है इसमें एक वाटिकोर ( ९९९९९९९ ) पद हैं। सत्पागदम् । =(६) सत्यप्रसाद वह पूर्व है जिसमें आठ प्रकार के शग्दोच्चारण के स्थान, पांच प्रयम, वाक्पसंस्कारके कारण, शिष्ट दुष्ट शन्दों के प्रयोग, एक्षण, वनके मेद बारह प्रकारकी भाषा अनेक प्रकार के असत्य वचन पाम्लप्ति मान आदि का वणन है। इसमें एक करोर छा (१००००००६ ) पद है। भाग्मादम् । = (७) आत्ममवाद पूर्व यह है जिसमें आत्मा के कर्वा भोक्ता आदि अनेफ धर्मों का निश्चयनप और पगार नपकी अपेक्षा से विशेषरूपमें वर्णन है । इसमें छब्बीस करोड (२६००००००० पद हैं। पर्मवादम् । = (८) कर्मप्रवाद पूर्व यह है यिसमें मानावर्णादि कर्मो को मूम प्रकृति उत्तरप्रकृति उत्तरोत्तर प्रकृतियों के भलिये । बघ ससा उदग उदीरणा उसीण अपरण सम्मण उपशम निधि निकाचित वादि भास्थाओं का वर्णन है। इसमें एक करोड़ सीमा ( १८०००००० पद हैं। मस्यास्पाननाममैगम्(९) मस्गाज्माननामय पूर्ण जिसमें नाम स्याफ्ना द्रष्य क्षेत्रका मापको भारी पुरुषों के - एग निवासी नापसाप पकीकृत पदच्छेद और विभपत्यर्थ सहित सर्वार्थसिधिका शवशः हिंदी अनुवाद । बप्पाप १.५त्र २० विद्यानुप्रवादम् । कल्याणनामधेयम् । प्राणायायम् । क्रियाविशाप्तम् । लोकपिन्दुसामिति ॥ संहनन बसादिक के अनुसारधर प्रमाणीक कोर पर्यन्त वा अपमाणीक काटकर स्मागकरना तथा सावध वस्तुओं का स्याग और उपवास विधि और इनकी भावना और पचसमिति और दोनि गुप्ति आदिका वर्णन है। इसमें चौरासी लाख ( ८४००००० ) पद हैं। विपानुभवादम् ॥ =(१०) विधानुमवाद पूर्व पर मिसमें बमुटमसेना आदि सातसौ अस्पविया क्या रोहिणी जादि पांघसौ महा विधाओं का स्वरूप सामर्थ्य मंत्र सत्र पूषा-विधानआदिका क्या सिद मई विद्याओं का फस और अन्तरिक्ष मोम मा स्वर स्वम सक्षण व्यञ्जन छिन्न इन पांग निमित्तों के मान का वर्णन है॥ ११०००००० पद हैं। कल्याणनामधेपम् = (११) कल्याणनामधप पूर्व वह निसमें वीर्यकर पक्रवर वलदेव वासदेवादिको के मर्मावतारण भादि कस्पा- णके महोत्सव तथा उनके कारण (तीर्थक्रस्वादि पुन्य विशषका हेतु पोशकारण भावनादि तपमरणादिको का तथा चन्द्र सूर्यादि ग्रह नक्षत्रादिकों के गमन प्राण शकुनादिका के फल वर्णन इसके सव्वीस करोड २६००००००० पद हैं। मणारापमा %=(१२) प्राणावाद पूर्व वह है जिसमें काय चिकित्सा बादि आठ प्रकार के वायुर्वेद का, इग (= पृथिवी) पिङ्गला (= अग्नि) आदिका दशमाणोंके उपकारक अपकारक गोवा गविगों के अनुसार वर्णन है। इस में सेरह करोड १३००००००० पद है। झिगरिशासम 1 = (१३) किपाविशास पर पूर्ष है जिसमें संगीत छन्द मलकार पुरुषोंकी पातर कला स्त्रीके पौसठ मुण तथा गर्भाधानादिकचौरासो किया, शिल्पादि विज्ञान सम्यग्दर्शनादि एक सौ आठ किया, देवन्दनादिक पस्पीस किया बौर निमिच नैमिचिक क्रियाओं का वर्णन है। इसमें नौ करोड़ पद हैं। लोकपिन्दुसारम् इति ® =(१४ोकपिइसार पूर्व महर निसमें वीन खोपका स्वरूप छत्तीस परिकर्म आठ व्यवहार, पार बीमगणितादिक मोम का स्वरूप,उसके गमन का कारण, किमा,मोमास के स्वरूप का वर्णन है। इसमें साढ़े यारह करोड़पदो एटा निवासी नगरूपसहाय पीकृत पदच्छेद और विमवस्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २० धीर्यानुप्रवादम्। अस्तिनास्तिप्रवादम् ॥ ज्ञानप्रवादम् । सत्यप्रवादम् । भारमप्रवादम् । कर्मप्रवादम् प्रत्याख्याननामधेयम् । बीर्यानुनादम् ॥ = (१) वीर्यानुवाद पूर्व वह है जिसमें यात्मवीर्य परवीर्य रमपवीर्य कासवीर्य गुणवीर्य तपोषीर्य द्रव्पषीर्य पर्यायवीर्य क्षेत्रवीर्य भाषवीर्य आदि जनक प्रकार के वीर्य (सामर्थ्य ) का वर्णन है। इसमें सघरलाख ७००००००पदो। अस्विनास्तिपनादम् । = (१) अस्तिनास्तिप्रवाद पूर्व पो है मिसमें नीवादिक वस्तुओंके स्व पर मुख्य क्षेत्र कास भाव की अपेक्षाकरि स्यादस्ति स्पान्नास्ति आदि अनेक धर्मों में विधि निषेपकार सप्तमप्रकार मुख्य मोणकरि वर्णन है। इसमें साठ लाख ( ६०००००० ) पद है। मानबादम् । = (५) मानमवाद पूर्व वह है निसमें मतिमान श्रुतमान अवधिमान मनः पर्पपज्ञान फेवसझान और कुमविज्ञान कुयु तमान कुमवधिज्ञान इन विमंगझानों का स्वरूप सख्या विषप फलादिको का वर्णन है इसमें एक पाटि परोक ( ९९९९९९९ ) पद हैं। सत्पमवादम् = (६) सत्यप्रवाद यह पूर्व है जिसमें आठ प्रकार के शब्दोच्चारण के स्थान, पांच मपम, वाक्यसस्कारके कारण, शिष्ट दुष्ट शब्दों के प्रयोग, एक्षण, वचन के मेद पारह प्रकारकी मापा अनेक प्रकार के असत्य पधन वाम्नुप्ति मौन आदि का वणन है। इसमें एक करोड छह (१००००००६) पद हैं। मा मावादम् ।। (७) आत्ममनोद पूर्व यह है जिसमें आत्मा के कर्ता मोक्ता आदि भनेक धर्मों का निश्चपनय और व्यवहार नपकी अपेक्षा से विशेषरूपमें वणन है । इसमें एप्पीस करोड (२६००००००० पद हैं। पर्मपरायम् ॥ %=(८) कर्मप्रवाद पूर्व वह है जिसमें ज्ञानावर्णादि कर्मों को मूम प्रकृति उत्तरप्रकृति उतरोत्तर प्रकृवियों के भवलिपे । घ ससा उदग नदीरणा उस्तपण अपर्पण संक्रमण उपशम निषसि निकाषित आदि अवस्थाओं का वर्णन है। इसमें एक करोड अरसोडाख ( १८०००००० पद हैं। मस्यासमाननामपेगम् = (१) मस्गास्माननामघय पूर्व पर मिसमें नाम स्थापना दम्पत्रकार भाव भामगार पुरुषों के एनिपाप्ती नगरपसाप बलत पदले मौर रिमापर्यसहित समिसिदिका सम्पराः रिम्दी अनुपाद । भम्याप १ सत्र २० भारतसार " . प्ररXRRRRRRRR) टिप्पणी-अंगपरिए मुवज्ञान के पदों की सम्मा- १-पन्द्रपाप्ति (परिम) ३६०५००। (5) मायावाद पूर्व १३००००००० (१)माग १८० . (२) मरुतांग एसीससास २-सूर्यप्राप्ति ५.३००० (1) हिपापिसाखपूर्व ९.०..... (३) स्पानांग पिपासीससास ४२... ३ सम्वृद्वीपम्पप्ति ३२५०.० (१) सायम -धीपसामरमप्ति ५२३१... (बोबिंदुसारपूर्व१२५००००.. (१) मासपा प्राप्तिभंग २२८... ५म्पाल्पामाप्ति ८११६.०० (4) पादपर्मपाम ५५६००० (१) मसगसाधूलिका२०९८१२.० (७)पासाम्पपनाम ६-सूत्र (दूसरा मेद) ००.०० (८) अन्तकरयांम ० अपमानुयोग (वीसरा मेद) .... (२) स्थावगवालिका २०६८१२०० २३२८... (१) अनुचरोपगदिश्यांग १२४४... (नत्पादपूर्ण(चौपाभेदा१.०००.०० (१०) परनम्पारपांग" (२) मगवाधिक २०६८९२००४ (स) ममापीपपूर्व १६००००० (११) शिपा सूत्रांग १८४..... (म) बीर्यानुयायपूर्व (४)मापागवाप्तिका२०९८४२.० (१२) रहिवाशंग १०८६८१५.०५ दादांग सर्वपदोष योग (4) मास्तिनास्विफ्यादा ९०००००० (५)माकाशगवा २०१८२२०. ११२८३५८०.५ (क) मानप्रमादपूर्व रसिद भग पांच मेद रेग्नमें से प्रथम भेद पार (घ) सस्यबादपूर्व १०८८५६.. म के पार प्रमेद रे और पतुर्यमेद पूर्वगत २ पोदर (छ) मात्समपादपूर्व २६००००००० ममेद और पांच मे पूसिका मी पनि मभेद (म) धर्ममयादपूर्ण १८.००००० "स्व" दूसरे मेद और 'मयमानुयोग' तीसरे मेद का कोई (झ) मस्पास्पान नाम रष्टिपाद भग के इमीस स्थानों के पमेद नीरेइन सपके १.८६८५६००५ पप्पम पद है।पन एक सौ माठ बरोड़ मत्सठ सास ममेदों को प्रपा २ सस्या भोर पत्येक प्रमेद के पदों की भी (म) पिपानुपपादपर्व ११०००.०० उप्पन तास पाच पद हुये।। सरूपा इस पृट रे तीसरे स्वस्म या पारा में बिसवे हैं। (३) पत्यायनाम पेय पर्व । २६००००.०० FREEKRRRRधार H ७००...॥ 9 ८१००.०० पेप पूर्ण एटा निवासी जगरूपसहाय फीसकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिटिका शवशरिंदी अनुवाद । अध्याप १ एत्र २० तदेतत् श्रत विभेदमने कभेद द्वादशभेदमिति ॥ वदा पवद ॥ विभेदम् ॥ = पूर्वोक्त ( = तद्) या (= एवइ) (अवज्ञान अवाम और अगमविष्ट) दो भेदरूप अनेक मेदम द्वादशभेदम् वि. (इनमें से अगवास) अनेक भेदरूप (अङ्गमविष्ट) पारह भेदरूप ऐसे हुआ (१ मतिमन-भुवनया प्रतिषियपाति' - मतिपान भोरगुतकान में क्या मेवा-प्रति विशेष)। ऐसा ( प्रश्न होने पर) मा उग्यो T रत्पत्र -मपिनर-मर्प- । यही कहा जाता है कि उत्पन हाफर जो नए नहीं हुषा है ऐसे पदार्य (-अर्थ) माम्मास - पिपय का पादक मतिरानम् ॥ -घतमान (-साम्प्रतम) कास के विषय को पहण करने या मसिवान भुनगन' ।।®निकाल - पिपरा उत्पन्न = मोर (-1) सिपाल पियस तमाम है (प्रयात) उत्पन पदार्य का (पौर) रिनिए- अनुस्पष- - (उत्पसहकर) नए मये पदार्प का (और) मनुत्पब (मो मषिष्यम सम होगा उस) म पाम् । -पदार्य का (भुवहार) प्रहण करने वाला है (देवा समाप्यतापायाधिगम सूत्र पर १०) प. पिरायवर इति. = सीर(-1) प्रपिफ पिशर (मतिवान से शुतमान) 8 Froma मन्यन् • मविपानम् प्रिय- - कुछ और मा (मतिमान से भतपान में पिरोप) है। मविधाम है सो भय और मग्निर निमिणम् ॥ मारमनःप-स्पमापात् । -मनिष्ट्रय सामन (तिम) निमित्वक मारमावस्यमाप (- सानो स्पमाव)से होता पारिमामिम् ॥ मनवान तु वत् - (मायापारियामिक है। एतु (-) सुजान उस (मविज्ञान) पूरम्म् ।। प्राप्त-उपदेशात् । भवति । दि. - सम्प(पूर्वक) मातफे उपोशसे (म्पन)ोता है। ऐसा (प्रतिपिशेप मौ)ह समाप्प०१. (२) भनगन और केवल पान में भतरपा मेष पहरेक तपान पराम है फेसपान मस्पक्ष है पयपिशात को अपेक्षा से भूतबान वय। मात मान दोनों ही सरगमापाप-जिस प्रकार तमान मम्पूर्ण र भीर उनको पर्यायो को जानता है पम दो प्रकार भवन पान भो मगर्यम्प भोर पायो को मामता विशेषता नमी हो है कि समान इन्दिप और ममका सापता से होता है इसलिये इसको मगले पापों में भीर नरी भये पाप तथा इसरे मम शो में परस्प मे अपषि महो तो। बिन पान लिपपरन सराप्य समम्मपरापोपटरापिपला एयनिवासी मस्ससार बीसव मच्छेद और निप्पसहित समिसिविका सपना हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ मत्र २० " RRRRRRRE १६४...नक्सामरम्यप्ति " टिपही-अंगविट मुवान पदों की सस्या- १-चम्पप्ति (परिम) ३६०३०.1 (5) मामापाद पूर्व १३००००००० (१)मापारगि मठारासस (२) सूत्रकाम मपीसप्तास ३५.०० २-सूर्यपाणि (१) शिपारिशासपूर्व ९००००.०० ३) सानांग विपाशीससस ४२००० ३-सम्पूद्वीपम्पप्ति, २२५... (१) सपायांग ५२३५. (1) बोकपिवुप्तारपूर्ण १२५०००००० (१)मामा प्राप्तिमंग २२८... १.म्पास्यामप्ति ८१३६.०० (4) जापान ५५६००. (१) मलगवानिकार०९८१२.०. (७)पासाप्पपनाम ई-स्त्र (दसरा मेद) म.... (८) मामि ० अयमानुयोन (वीसरा मेव) ४... (२) स्यमगधापूनिका २०३८१२०० २३२८... (१) अनुसरोपादिक्पामा १२४१... (त्पादपूर्व(पौयाभेद)१०...... (३) मगवाविना२०१८१२०० (१०) मरनम्पावरपांग" (स) प्रमाक्वीपपूर्व (११) पिसांग १८१००००० (म) मीर्यानुभावपूर्ण ७०.....(४)मापागवासिधा२.९८४१.० (१२) रहिवादांग १.८६८५६.०५ (प) मास्तिनास्विफ्यादपु ५०००.०० (५)माकाश्रममा हवाग के सर्वपदोंका योग २०१८२२०. ११२८३५८०.५ (क) शानभपादपूर्व परिवाद के पांच मेद है उनमें से मयम मेद परि (1) सस्पमवादपूर्व म के पाप पभेद हैं और पतुर्वमेद पूर्वगत २ चौदह (ख) मात्मम कावपूर्व २६०००००.. १०८९८५६०.५ प्रमेह और पापा भेट पनिका भी पांच ममेद (क) कर्ममवावपूर्ण "स्त्र" रसरे मेद और 'प्रथमानुयोग' वीसरे मेद का कोई (म) मस्पाख्यान नाम रहिवार अगहनीस स्थानों के प्रमेद नहीन सपके १०८५८५६.०५ मध्यम पदापन पय पूर्व एक सौ पाठ करोड बरसठ साल प्रमेवों की पूरक २ सम्पाचौर पत्येक प्रमेव रेवों की मी (म) विषानुमपावर्ष ११०००० छप्पन तास पांच पद हुये ।। (3) फत्पादनाम संख्या इस पृट देवीसरे स्वस्म का पारा में रिसते हैं। प पर्व } २६००००.०० APNEKHERIRHAR .... 44 ... R ८१००००० पा निवासी नगलपमहाप परत पदच्छेद और विमरत्यर्प सहित सार्थसिटिका सम्बस हिंदी मनुवाद । अध्याप १ एत्र २० तदेतत् अत विभेदमनेकमेद द्वादशभेदमिति । स एक्टा असर ॥ विभेदम् ॥ = पूर्वोक (= तद्) यह (एव) (वज्ञान प्रवास और भङ्गमविष्ट) दो मेवरूप भनेक भेदम । द्वादशमदम् । इति. - इनमें से अगवास) अनेक मदरूप (मङ्गमविष्ट) वारा मेदरूप ऐसे मा (१ मविगन-भुगनपो || प्रतिपिपाति - मतिपान भोरच तमान में क्या मेवर-प्रसि विशेष) ऐसा ( प्रश्न होने पर) मा उम्प उत्पन-मपिनर-मर्य- - यदी कहा जाता है कि उत्पम होकर जो नए नही दुपा ऐसे पवार्य (-भर्य) के माम्मनपस - विषय मा पाइक मविधानम् -घतमान (-साम्प्रतम्) काल के विषय को पहण करम पासा मतिज्ञान है T RAधत - पिपर अपर = मोर ("तु) विनस विपपर थठमान है (भयान) उत्पण पपा कर (मौर) - (उत्पन ह फर) नए भये पदार्थ का (मौर) मनुत्पम (जो मषिपणमें सच होगा उस) -पदार्थ का (भुतमार) पहल करने वाला है (या समाप्यत पायाधिगमन पर २०) = सौर -घ) अधिक पिराब (मतिधाम से मुबान) है 1 और भो (मविपान से प्रसपान में विरोप)है। मतियान सोप और निमितकमारमा स्यमाप (-मानम स्थमापसे रोताहै 1.) मधाम रस (मनिशान) (प्रतिषिरोप मो) सभाप्प०० %3D HARKHER. एयनिवासी मनमपसाव पीसकृत पदस्छेद और विमम्पर्व सहित सर्विसिदिका सदसः रिदी अनुवाद । अम्पाय । म २. किंकृतोऽय विशेष ? । वक्तृविशेषकृत ॥ प्रयो पक्कार । सर्वज्ञतीर्थकर । इतरो वा भुसफेवली ॥ बिम् "अयम् "रिशेप ? - या पूमेद (= विशेष) क्योंकर दिया गया है। मईद या मुत मान दो मेदम, प्रदेस मेदम मोर वारा मेदस्प है सो क्योबर है। पपिरोप-व" = ( या पिशर ) पका के पिशेष मा मेद [ होने के कारण से किया गया है। प्रब"पकार = तीन [ पूधारक] पक्का है अर्थात् शासपामागम के गाने पासों के तीन भेवर सपा-भीपर सबोधकर मर्यात् वीर्यकर पर पश्चात् सहसा को प्राप्त करनेवाला इना = प्रपया (= पा) दुसरे [पारफे सर्वत्र] प्रर्वाद वीर्येर फेरती के प्रसिरिक मिम = भष्ठ मनुम्म पिसने वपश्परपके द्वारा सर्वत्रता प्राप्त की। भुवनेगसी - मुकेम्सी अर्थात् का भेष्ट पुरुप भो दादांग भोर चौवा पदीको शासा १-10) म्यापमा पार पाठी (0) "गि पा(ग) तपी (प) "पूविता नारा दायों के भावार्य सिबते हैं (1) मानविन पट से बात है पिररिपाद बाबा का चौथा मेन पूर्वगत' मौर जिस क्रम से इममे मान सिमे पाय मात्र के मेव दिये रसही क्रमसे जोपर गोम्मरसारगापा ११ भयंप्रजातिका पूर १५, सर्वार्थसिदि वनिका पृष्ठ १६ में इसी विवाद मंग के मेव दिपये इससे यह बात मानती है मामा म्वाद मम मोर पूर्वगटके मेव का पाठो हो पर्यात म्यारहमा म्णयमा मोर पावर पपिपरिकर्म, , यमानुयोम और मोका हावा सपा म्पायमग पावर पका पाठी कांगे कि उसको जोड पूषना पाटी परिधर्म-सूत्र प्रथमानुयोग को वोरकर हो। मामले पठमम सरेप क्षिकापपिगमाती है। () arपगारी" पनको कामे मो नारा मारेपाटो पोसवापानीकापोरसर शेप सप मुख्यान के पाठी () मुखोपली यो मारोग भोर पावह प्रापको जाता। मत समरसम्म मुहात को जानते हो। (घ) “पूरविव' पाप माम मामा के समोसा न परेचा" में भाया है और इसका मर्प सासिनि महत्वृति (४५२) हवापारपाशिक ( पृ ३५४) और तस्वाप सामातिक पृष्ठ ५८४) मोरामो मनमा सिब मारोशावास में जैसे ५.३पादाजी सामुग्यो पIBRai नामनी यादिने "केवी" विपा मषमान पह भात पूर्ण क मानमे पाठे मापार्षक 'मारमा बौदा पर्म कक के पात्र हो । विविवाफ्यामपसमा किशापम में पप विदा" समय पूर्वक सामन पासे ऐसा होता प्रभRRRRRRRRRHEK याप्प -मम्मदीपमाप्ति नीपसागर समि म्पारुपामाप्ति परिस (0) माग (३) स्पानांग (५) सपापांग (५)म्पास्यायप्तिमग (५) भावपर्मव्यांग (७) पासप्पपनांग (८) अन्वकागंग (१) मनुरोपपारिश्याम (१०) मश्नम्पाहरणांग (११) विपासांग (१२) भगनिष्ठ द्रव्य श्रुतज्ञानको मानचित्र () पूर्वगत ग्साहपूर्व अमायनीपूर्व वीनुरादपूर्व अस्तिनास्तिपवाद पानमगाव -सत्यमवाद भारमपणावपूर्ण कामगावपूर्व मृत्यस्पामनापपेपर्ण -विधानुपपादपूर -त्पाणनामपेपपूर्व मूवमा पूग्णागदपूर्व -पिापियासपूर्व -सोपविदुमारपूर्व असगवा चूमिका -सजगता यूखिका -पापारवा चूक्षिा नाचगता हिता -उपगवा तिता भंगपाम ( ये पौदा प्रकीर्यक) (१) सामायिस्मकीण (२) चतुर्विधविस्तवपकीय (३) पानामकार्य (५) मतिझमण प्रकीर्यक (५) पैनयि पूकीय (१) रुविर्म पूकीर्ण (७) दशकालिक पूर्ण (८) राष्पपन प्रकीर्णक (१) कल्पम्पपार प्रकीय (१०) सारस पकीपक (११) महाकस प्रतीक (१२) पुरारी प्रकीर्ण (१३) मापयरीक पूडी (१४) निषिधिका मीणा पूखिका ० पग निरासी जगरूपसहाय वकीसव पदपछेद और विमरत्यय सहित सर्वार्थसिटिका शब्दमा हिन्दी मनुवाद । अमाप पत्र २० प्रस्पपशिस्वारपक्षीपदोपरवाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साचाच्छिष्येवुध्यतिशयर्षियुक्तगणधरै अतकेव लिभिग्नुस्मृतमन्परचनमगपूर्वसघण तत्प्रमाण तत्प्रामाययात्॥भारातीय पुनराचार्य कामदापासगचिप्ता युर्मतिपक्षशिष्यानुग्रहार्य दशवेकाधिफायपनिषद्ध तस्प्रमाणमर्थतस्तदेवेदामितिाचीरार्णवजनघटग्रहीतमिव । प्रम्पपदर्शित्वात् ।। प्रभोण-दोपत्वात् । । घ. = (सर्वज्ञ ३) प्रत्यम देखने से और = घ) उस्कृष् निदोपपना से है तस्प । सामाद • सिप्पै । पुरि-अविशप = विस (सर्वझ) के निकटवर्ती (= साभात् ) शिष्य पुद्धि के अतिशय और प्रदियुत ।। गणपविकेवसिमि ।। मसि फरि सहित ने गणघरद्वारा और शुतकेवड़ियों करि अनुस्मृक-न्यापनम् ॥ = (उन गणघरों और असवलियों के) स्मरण के अनुसार मन्य रचना भन - पूर्व स्मणम् ॥ = मो प्रमों और पूर्वो का हेतु वा पासर (= एक्षण-देखो वैधजी रचित कोष पृष्ठ ३१७) वत्ममाण ॥ स्त्-मामाण्यात् ॥ के वचन] का प्रमाण उन (सर्वज्ञ के पचन) के प्रमाण होने से है, भारावीपः । पुनर , भाषापः ।। = और धाराविपों कार [मर्यात् ] पिछले आधाग्यो करि भावार्य केवड नानियों, मणघरों और सफेवरियों के अतिरिक्त ने पिछले प्रोपायों कार कालदोषात् ।। संक्षिप्त-पायुस्-मति-मरू-भिप्पनुमा = काके दोप से थोड़ी अथवा अल्प आयुबुद्धि सामर्थ्य धारक)शिष्पों के उपफारके अर्थम् ॥ दशवकालिक आदि उपनिषदम् | 10 = लिये दशवकालिक आदिक (प्रकीर्णक) रचे गये हैं यद् ममाणम-1॥ अर्थव = उन (दशकातिकआदि प्रकीर्णको) का प्रमाण अयसे, तात्पर्य से अपवा अभिप्राय से । (मो सर्वत और गणघरों ने कहा) है। वत् [ark] सइदम् । इवि. = सो (स) ही (एस) या (= इदम ऐसे है (इति) पट-महीम् ।। धीर-अर्णव-जसम। ॥ इव ® = मानो (ख) पहा ग्रहण किया गया याभागपा क्षीर समुद्र का ममे अर्थात् जैसे शीर समुद्र का थाना सा मस घट में मरा हुआ यह प्रकट करता है कि घरे का जल क्षीर समुद्र का नल ही अन्य नहीं है तैसेहो ये दशकारिक सर्वन को परम्परापसे उसी अर्थ का लेकर पापायों ने अपनी अपनी घुवि अनुकूल कहे हैं वोही है वास्तव में सर्वशक्तिपदाथ ही इनमें कहा गया है अव पर प्रमाणभूत है।

एयनिवासी मगरूपसाप कीसकर पदच्छेद भौर विमत्पर्य सहित सार्यसिदिका शम्श हिन्दी अनुपाद। अम्पाय १ म्ल २. भारतीयश्चेति ॥ तत्र सर्वक्षेनपरमर्पिणा परमाचिन्स्यफेवलज्ञानविमृतिविशेपेण पर्यत बागम उदिष्ट ॥ तस्य %3D प० भारावीपः पति- = इस दूसरी गणना में गएपर मो पार धान के धारक होते हैं सम्मिसितारे मौर (= पा पारावीय अर्थात् देवलशानियों, गमषरों और भुवपतियों को ोहार मन्य प्रापार्य, समकार टीकाकार और बाप्पकार ऐसे है। १० सनि पिया परम-मपिन्त्य = सारि (यो) नस कृष्टि (चौर )मो नसर्प वा सपान अचिन्त्य समान रिति रिझेपेण ।। समान ऐश्वर्य रे विशेष सहित है। माग गरपा" = मते, नागम का शास्त्र उपदेशागया है प्रात् अर्यको मामयकरि अभिमाप को पाट पर हुए पावापर्य को सिये पे उकसाने बागम बारे मम "मासाररम् । = विस (मागम ) का प्रेमाबपना था रिश्वसनीयता ( प्रामाण्यम् ) पिश्यास्पदा (उचर) रिप्पो से विkिatमरामक मुलाम मटारा मेद मक्ष, पर सपात, प्रतिक ममुपोग प्राभृवमाभव मान, प पूर्व पब मेद और कम से परमार की परिमारा रत्पमोमेबारे मार समास मादिमम पसे सप मिछि मटारड मेर ए मपात सl मेर पूर्व मौर पठारहमा मेव "समास- पूर्व भावका मेप मी मेद में से उतारा। मेरी समम में "पपि पायस "पूर्वसमासविदा" प्रपोजमी भाव मतदान का पह सर्व से रहठ मेव है कि मिसके ऊपर भर किसी महर कम से दिया सहवीशप्प भुनान सबसे राकर मेद को बामन वा सो पर्वसमासविदाई पोसते बोलवे म्पबहार में समास रामगोड़ दिया और समासका स्थान में पूर्व विवाहन रगे। जब मुबानक सपसे सत्ता मेव के साये मार मुत एमका रस मेर से उपर गई मेरी मही पूर्णसमास भुधाम ऊपर काई मार भूतान का भवशेष रहतादी दी कि कोई मान्य हरियाापीरपुतदेवसी पी है जो समस्त सप्प मुतबान को सामना है-समय पूर्वपि (सिमासविदा) भर्य सण एमबापुरीस मगर प्रमाण नावामा मत भुकमोवी मापर मर्य सममक मनुरुल मिचा विरोप भर्प पारगम विचार। (१) मामाघरोन एप प्रमाणाला दसरा विसरमनीपताना विरहाचो पैचोख पू५. भोर मासेमात पृ) %3D %3D एग निरासी जगरूपसाप पकीसव पदच्छेद और विमास्पय सहित सर्विसिष्टिका सम्वासीन्दी मननाद । अध्याप। सूत्र २० प्रत्यक्षदर्शिस्वास्पधीपदोपत्वाच्च प्रामाण्यम् । तस्य साधाच्छिष्यैर्बुध्यतिशयभियुक्तगण! भ्रतकेव लिभिग्नुस्मृतग्रन्परचनमगपूर्वक्षघण तरप्रमाण तयामाययात् ॥भारातीये पुनराचार्ये कामदापासंगचिप्ता युर्मतिवसशिष्यानुग्रहार्थ दशवेकाधिकायपनिषद्धं तपमासमर्थतस्तदेवेदामिति॥चीराजमघटगृहातमिव । प्रत्यक्षदर्मिलाद । ॥ ममीण-दोपवात् । ।। प* = (सर्वन ) प्रत्यक्ष देखने से और = 1) उत्कृष्ट निदोपफ्ना से है वस्प ! साक्षात् • शिष्यैः ।। पुष्टि-अविशप विस (सर्व) के निकटवर्ती (= साक्षात् ) शिष्य बुदिके अविशप और प्रदियुक्त । । गणधर अवस्वसिमिा । अष्टि फार सहिच ने गणधरद्वारा और असोभियों करि अनुस्मृत-प्रन्यापनम् ॥ = (सन मणरों और श्रुतचलियों ) स्मरण के अनुसार अन्य रचना है आर-पूर्व पक्षणम् ॥ = मो मगों और पूर्वो का रेत पा सर (= समाण-देखो पैपनी रपित कोष पृष्ठ ३१७) वरममाण ॥ स्त्-मामाण्यात् ।। = उन [गणघर के वचन] का प्रमाण उन (सर्वन के वषन) के ममाण होने से है, माराठीपः । पुनर * भाषायै ।। = और आरातियों कार [अर्थात् ] पिम्ले आपायों करि मावार्य केक्स मानियों, मणघरों और शुक्केवलियों के प्रविरिक्त ने पिछले प्राचारयो कार फासदोषाद ।। समि-प्रायुस्-मदि-बस-भिष्यअनुमह = कालके दोप से थोड़ी अथवा अल्पायुपुदि सामधारक) शिष्यों के उपकारके अर्थम् ॥ दशकालिक आदि उपनिषदम् ॥ = सिपे दसवैकालिक आदिक (मकीपरक) रचे गये हैं तत् प्रमाणम-1।। अर्थवः । = उन (दशवकालिकआदि प्रकीर्णको)का प्रमाण अथ से, वात्पर्य से अथवा अभिमाय से (नो सर्वन और गणघरों ने कहा है। वत् 1 [व] एस . इदम् ॥ इति = सो (तत्) हो (एव) यह (इदम ऐसे है (पति) पट-ग्रहावा । धीर-अर्णक् जसमा इव = मानो (स) पहा माण किया गया वाभरागया क्षीर समुद्र का मलहे अर्थात् जैसे क्षीर समुद्र का थोपा सा जल घट में भरा हुआ यहप्रकट करता है कि घड़े का नल क्षीर समुद्र का मल ही है अन्य नहीं है तैसेदो ये दशकालिक सर्वन की परम्परापसे उसी अर्थ का लेकर आघाययों ने अपनी अपनी युधि अनुयल करे। वोही वास्तव में सर्वज्ञकयितपदार्थ ही इनमें कहा गया है अत यह प्रमाणभूत है। .

पटानिरासी नापसाप कीसव पदच्छेद और निमस्पर्प सरिस सायसिदिका शम्बनः हिन्दी अनुपाद । मनाय १ मत २. भारतीयश्चेति ॥ तत्र सर्वक्षेनपरमपिणा परमाचिन्त्यकेवलज्ञानविभूतिविशेपेण अर्थत बागम उदिष्ट ॥ तस्य प० भारावीपापवि. =इस दूसरी गगना में गयपर नो पार जान पारक होते हैं सम्मिसिवरे भौर (घ) बारावीय अर्थात् देवसमानियों, गयपरों और भुवनेपक्षियों को हार अन्य भाचार्य, समकार टीकाकार और भाप्पकार ऐसे है। व० सीन पिया परम-मपिम्स- =an साकरि (पो ) उस अष्टि (और) नो रूप पा मपान चिस्य रेसान रिति रिशेपेय।। = रेखान ऐश्वर्य के विशेष सरित है। पर मागपति = भर्पते, मागम वा शाख पदेशामया है अर्थात् अर्यको प्रामपकरि भभिमाय को प्रगट पर हुए वा वासर्यको सिपे हुये श्वासाने मागम को पारे नस्प"मामारपम् । = विस (मागम ) का प्रमाणपना पा विश्वसनीयता (= प्रामारपम् ) विश्वास्पता . (रतर) रिप्पो से विवि मसरामकथाममा मेद मर्याक्षर, पर सघात, प्रतिपतिक भनुपेग प्राभूतमामृत मामत, पात, पूर्व नप मेद मौरबम से एक एक मसर की गिमारा उत्पन होनेवाले मर समान मादिपसेस मिमि भठाय मेर ए मपांव सर मेर पूर्व है मौर मठाए मेद पूर्वसमास"।" पूर्व ' मन्तका मेव मा मेवों में से रहा है। मेरी समझ में "पपिया' पाक्पसे 'पसमासविरा" प्रपोजन है मत मतमान का यह सबसे कठ मेव कमिसके ऊपर मर किसी भार कर परिसस्ती है। दम्प मुतमान सरसे गहा मेव को जाममे पास से पूर्वसमासविदापोते बोम्त पहार में समात समोर दिया और पूर्व समासविदा के स्थान में पूर्व विवाह सगे। सब भुतमा सबसे सत्ता मेरो शाखा पे भार भूत नारस मे से ऊपर मेरी नही पूर्वसमास मुबान ऊपर काई भार भूतहान का भोप हतारी नही कि मान्य मेर रिया अपारपुरेसी सी समस्त प्राण प्रतिमान को मानना है-समय पूर्व पिदा (-पूर्वसमाविका का अर्थ सण समानीस मार प्रमापातामा भात मुखदेवमीमा। यह पर्ष समम मम बिया विशेष भर्प पाठवाव विचार (१) सामान्य मोम एप प्रमामला एसरा विश्वसनीयता वा विपस्पायड पूरा.मोर मावास) एटा निरासी मगरूपसहाय मौसकत पदच्छेद और रिमापर्व सहित सर्वार्षसिदिक्ष शदशा गन्दा मदनाप । नाप यथा पतत्रियो गमनमाकाशे भवनिमिर्च न शिवागमविशेष, तथा देवनारकायां व्रतनियमाय भावेऽपि जायत इति भवप्रत्यय इस्युच्यते ! इतरया हि भवः साधारख इति कृत्वा सर्वेषामविशेषः स्यात् इप्यते च तत्राषधे प्रकर्षाप्रकर्पत्ति । पपा. पक्यापिण। गमनम् | बाकाशेमर = जैसे पसी का बाकाश में गमन करने को माया पर्याय निमिचमू न० शिक्षागुणविशेष तपा. = कारण है न कि शिमा घमण विशेष से देव नारकाणाम् प्र-नियमादि प्रभावे। अपि = देव और नारकियों के नव नियम मादि के न होने पर मी = (भवश्विान) उत्पन होता है इस बार भा निमितक है ऐसे कहा नपारे नापते वि. भर पस्पप । इति • उस्पते T इतरया.. = अन्गपा (%Dइवरया) को (D) वर्षात पदि मामत्यय भवधिज्ञान के होनेनन्धरण देव मोरनारकियोंजारत भवही होवो माः । साधारणः । इति कृत्वा स्पाम् । = मा (सप देवनारकियों के समान है ऐसा मानकर समस्व (देवनारकियों) के अनिशेस्पाच = (भा प्रत्यय अरविज्ञान) पिप रहित वा एक्सा होना चाहिये प.व • अवः । म प्रक-वृत्ति । और वहाँ (देवनारकिमि ) अधि कीमपतिमा स्थिति (= पशि)दीनाधिक - मानी मई ? अंगीकार कीगई। वहां अपोपशम का विशेष है। यहाँ सार यह है कि सर्व प्रकार के प्रवधिज्ञानों में अवधिज्ञानावरणीप कर्म का पोपशम दो अन्तरजकारण मौष भवरप ही है पिना इस अवरङ्ग कारण के अवधिज्ञान भी रिसी भी जीव के नहीं होसकता है देवनारकियों में भी बाधिज्ञान पाटि बारि सो हीनाधिक क्षयोपशमके देवसे है परन्तु अयोपशमका अस्तित्व सबके। (१)माकाय राम पुलिंग औरनपुसकसिंग रम्नो है (२) गन् । - उमहामा) दिपादि पनुरंग मारममेपो भनेक पात। प्रयोग अपपा पदार में जन् प मा भादेश दोपता है। पतुर्पगण का विकरण है। ते भम्पपुरुष (-प्रथमपुष्प) एक पपन पर्वमान समय मारमनेपदा प्रत्यपहै ।मना गम्+प+-गा++ते - गायवे, उत्पन होता है। इणते ?

( निवासी भगापसाप वोरक्त पदच्छेद और विमवस्पर्ष सहित सर्वार्थसिष्टिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अमाप १ एन २१ तत्र बयोपशम निमित्तरव प्राप्नोति । नेप दोप । तदाश्रयात्तस्सिद्धे ॥ भव प्रतीत्य घयोप । सआयत इति कृत्वाभव प्रधानकारणमित्युपदिश्यते ॥ सुसपोपमानिमितत्वमा (मामोति;न एप-दीप = वा क्षयोपशम का निमिसपना नहीं प्राप्त होता है (उचर) यह दूषण नहीं है -प्रायपात् । = क्योंकि उस(देवनारकियों के भयो आयय से उस (क्षयोपशम निमित्त पना) की 1-सिदे मा ।। मवीत्य + = सिदि होती है ।भव को समर्थन करि वा प्रतिपादनकरि वा निर्गतकरि (= प्रतीत्य) पोपशम समापवे(.) | इति कृत्वा । क्षयापशम साथ साथ अवधिज्ञान के उत्पन्न होता है। ऐसा करके समपान मारणम् ॥ = (देव नारिकियों का) (मन) उक्त अवधिज्ञान का मुरूप निमिप है (और अवधि जानावरणकर्म का पोपशम तो भव के हेत से होता ही है) इवि उपदिश्यते । = ऐसा उपदेश किया गया है। इस परन और उत्तर का स्पष्ट सारांश यह है कि सिदान्त के अनुकूल सिी प्रकार का अवधिज्ञान की और कमी मो अवधिज्ञाना वरण कर्म के क्षयोपशम के बिना नहीं होता है इसी मागम के सिद्धान्तको शिष्य में चिस में रखकर मरन कर दिया कि पवि देव और नारकियों को पर्यायवा मन हो अवधि झान को उत्पन्न करता है तो पह अवधिमानावरणोप कर्म के क्षयोपशम की कुछ मी अपेक्षा न यरी (उत्तर) अवधिज्ञानापरण अपोपशम तो अवर ग कारण हैही। सो दोन प्रकार की अवधि में पाईये है या पिना तो अवधिज्ञान उपमे नाही । वातै यहां पाम निमिस की अपेक्षासे वायन है । कब मर प्रत्यगअवधिक तो प्रधान कारण मन ही है। ११) मामा के सरे दे ग () प्रोस्प और पत्या शेनौ संवपस्पकमत श्वन है । 1॥ मम् + मापने -मम् + जायते। किसी राम मया प्रत्यय के अन्त में 'म् हा भोर इम म् के पात् काई प्यञ्चन मा तो माप मेपर को इम्यानुमार अनुस्मार में परपतिमाता है और एक म् मा पो मनुस्वार में पसर जाता है कि म के पोले-प्-म्रप्रपा मारे। यदि हम पहिले नियम में अनुस्वार में म् को न पल तो यह म् उम्पर्ग के पांच महर परपास्ति हो गया है जिस पर्ग को मवर जम के पणेचे पाये प्रतः पहा सम् का सम् होकर सम्यते होगया।

zo एटा निवासी जगरूपसहाय पस्कृित पदच्छेद और विमापय सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद । जम्माय । २१ यदि भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम् । यदि मामयप । अवधि । देवनारकाणाम्।। = जो मवनिमित्तक अवधिमान देव और नारकियों के होवारे भपप्रत्यय अधिवान देव मारको तथा तरीके हावा है पीर या । मयप्रस्यप मवपिपान) संपूर्ण अंग से उत्पन्न होता है प्राद समय मा मगर म उरपर दाता है। मीर गुणप्रत्यय या श्योपशम निमिसक अषधिशान नाभि के ऊपर गण पन पन स्पतिक सय नापिया माता साविक राम चिन्हों से हाता है। उस जगह के माम प्रदेशों में होने वाले भषभिडानापरस कर्म के सपोपरामसेस्क पपशम राम हाता है। मयम् पय स्यधिगन नियम से वेणपापेह होता है । (गोम्मट गाया. १५३.३ निरकगति में भवपि के विषय भूत सेशका प्रमाण यह कि सातयों भूमि में अपपिवान के पिपयमूत क्षेत्रका प्रमाण एक फोम है। ज्यों भूमि में गयोस पाँचषों में दो कोस, प्रया में भाई फरस, सोसरो में तोन फोस पूसरा में साढ़े वोन कोप प्रथम पयिषो में धार कोस (भवधि विपप भूत क्षेत्र का प्रमान है। "पनयासो मौर प्यम्त का प्रवधि के क्षेत्र का जघन्य प्रमाण पचास योमन और अन्य काम कड होम एक दिन है। और स्पोतिपी यंक भयपि का (घर मेत्र इस (पीम योमन) से संरगत गुणा मोर (अपम्प) काल इस (कच दोन एफदिम) से पूत अधिक है घरकुमाको अघिका उप विषयक्षेत्र मसम्पात कोटि योजन है (-मसुराणमसंमेखा कोडोमो-ममुराणाम् सम्पेयरकोटप.) गोम्मटमार पांच गाया ४७ मुदित १५ सो पर भीषतत्व प्रदोरिका टोका “भमुपणा सरर पिपप सम्यमाद्रि पाजन मान-मसुप्रै फा उस्फूप (भपिकामफा) विषय भूतमेव प्रसन्मात फरार योमन मात्र है परंतु तत्वापरामवातिको का मनमुसार माधि "उसमयभागमें वा मसुरफकार निमें भसंम्पास यायन कोटा परि पर्यंत है- "उत्पमोऽसुराणामसंन्याता पायनोरि काटपोपा पानासास जानो अनुपायत रामपातिक सूच ११ मीर संसात तरवार्य पसवातिक मुद्रित रोम नौ प्रकार मवनवासी देव पवार मोर पलिपी देयोंफो भवधिश हर पिपप से असम्यात सहन योग्न है । देखो यो की गोम्मट गापा स्पोतिपियों को अवधि पभाग में प्रपा विमा ये उपरि माग पर्यंत हे मर तिर्यग् मसभ्यात कोटा कोटीयोसम प्रमाण है पन्नालाल से पूमौ का मनुवाद सूबर “म्पाविप अप्या मारमीय विमानस्य उपरि पयता-तिपंग-मसंन्यता योग्न फोटो कोटपा) मसुरमाय को प्रयमि के उस्फुए कास का प्रमाण मसम्पात दर्प है और शेष मौ प्रकार के भवनयाप्ती स्पर पोतिषीयों की मपधिरे उ पृर पास का प्रमाण पत्रों का अपपि के तस्कृए बस के प्रमाण से नियम से सम्यात में मागमात्र है।

14 निवागा नगरपमहाप वकीयकृत पदच्छेद और विपत्पर्य सहित सर्वार्थसिधि का अन्दशा हिन्दी अनुवाद । अभ्याग १ पत्र २१ रेयना फाणामित्यविशेषाभिरानेऽपि 'सम्यग्दृष्टीनामेव ग्रहणकृतः १ भवाध महणात् मियादृष्टीनांच विभय इत्युच्यते ॥ प्रकर्षाप्रकर्षातच भागमतो विज्ञेया गनारफाणार इति =(मय प्रत्यय अवधिमान का होना) "देवनारकाणाम् " ऐसा (इस पत्र में ) जस्निप अभिधान । अपि 60 = विशप रहित वा भेद रहित (= अविशेष) करने पर भी ( = अमिषाने अपि) गम्टीनाम ।। एवमरणम । कुव ?. = केवल (= एव सम्गम्दर्शनधारकनि( देव नारकियों) का महण कैसे (कुवा) हुआ ! प्रश्न का तात्पर्य यह है कि पविज्ञान सदैव सम्मष्टियों के होताहे और चौथे गुणस्यान से पारा गुणस्थान क इसका अस्तित्व में आपने 'देवनारक्षिों में अभेदरूप से सूत्र में मनमत्ययअवविज्ञान का होना कैसे कर दिया क्योंकि सव देवनारको सम्बन्टो नहीं हैं इस पत्र- से प्रचमिन का होगा. केनछ सम्माष्टी देवनाफियों के कैसे निकलता है सो करिये।।।।। अधिप्राणाय । =(सर) (पुत्र में) क्वधि(शब्द के साने से (स्पष्ट है कि सम्गष्य देवनारकियों से मयोमन)- १ परममाटोनाम विभाग ..' = और(घ) मिय्यादृष्टो (देवनारकी-ममुष्प-विर्यघ) निकविर्भम भवधिज्ञानी विपते T ऐसास अध्याग का इकतीसको मत्र) या मया हे मतितावषपो पिपर्पगरप = [मक्सि वववधि-येतीन ज्ञान-विपर्प भी होमर्यात् मिथ्याशान भी ] पहर प्रमप-वृत्ति = और (देवनारकियों) हीनापिकावधिकी स्थिति (प्रतिवादियमानता(पति) विनेया॥ =(अन्य)शाखसे नानोवा नाननापोग्य है । [इस पृष्ठ की पृष्ठ४३५की टिप्पणी देखो (OPRA फाप माय अपेक्षा मसिमके विषय को सोमा हारमको अपविधान प्रथमा सीमाहते है tv या प्रमा म अधिगायएमाम मनपापशम कर मोमाधिमम हो उसको मपप्रत्यप माम पाते हैं। m 1 सागमन 1 त एटा निवासीनगरूपसहाय वकीलफत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सदश हिन्दी अनुवाद । मध्याय १ सत्र २१ इत्यत भाह॥ इति 23 अव • आT = ऐसा (मरन होने पर) सिसिये (आचार्यअग्रिम सूत्रम) कहते हैं कि मप प्र पेयिफ निपामा देया क मधाभाग में मपम्प अवधिशान घूम प्रमा (पाची प्रथियो) के अंत पर्यत है। मोदय राम से अपोमाग में अधिक भीर म्यारह पर से म्यून है । और इम ही देवों का उत्पार भवधिशान प्रपोमाग में तमप्रभा (छठीं प्रषियो) के मम्स वफ है सा माप में प्रपोमाग को शोर ग्यारह पजू है सौधर्माविया उपरि स्यस्पस्वर्गधिमानप्पधर शिखर पयम्त पश्यति गोम्मटसार पृष्ठ ५३ -सीपर्माविषासो दिनों से नषयिक तक) कपरि अपने अपने स्वर्गका थिमान का भ्यमा पररका शिकार पर्यम्त देने हैं। "मप मनुविषिमाम मर पाप अनुत्तर विमान के पासो सवतोमालो जो प्रसनासो ताकी देसे है बहुरि मष अनुविम पंच मनुत्तर यिमान फे यासा देव परि मपने यिमान का शिखर पर्यन्त्र भर नोवे को पाप तनुवात पर्यम्त सर्व प्रसनासो को देने सो मनुदिय विमानपामे ती फर एकमधिक तेहरान प्रमाण लम्पा पर अनुत्तर विमानवाले चारिसे पषोस धनुप घाटिकवोस पोजन करि दोन धीवर राज प्रमाण लम्बा भर एक पल पीड़ा प्रयधि का पिपय भूत क्षेत्र की मेले में चौवह राम क्षेत्र में से एकवीस योजन और पारसी पपास पनुप पदारये जो क्षेत्र ऐप रहे सो मनुचर विमान पाले प्लम्बाई में पर एफ पजू यौई में अपधि द्वाप देखते हैं ऐसा मर्य "पंचपिराहि उपर पतुः शतपना ऊनपकारिणति योजने म्यूम चतुक्य रम्या यतां परम् यिस्तारा सर्वलोकनालिं पश्यन्ति इस संमत पाक्य का बात होता है मनुदित विमान पासे रुष अधिक तेरह राजू प्रमाण सम्मा और एक राजूदा भवशिान सारा देते है। उपयुबमा क्षेत्रो का "परिमाण कोपा है सो स्थानफका नियमरूप सामना ।सेका परिमास खोए नियम म्प न जानमा। मार्स मम्पुत स्यर्ग पपत के वासी विहार फरि अन्य क्षेत्र की मार पर तहां मपपि मोर ती पूर्वांछ स्थानक पर्यन्त ही होइ पेसा नाही जो प्रपम स्वर्गवासा पदिले मरक मा मर वा सेतो डेरामा और जामें। सौधर्म विक के प्रथम नरक पर्यत भवधि क्षेत्र है सो वहाँ मो विष्ठता वहाँ पर्यव क्षेत्र हीरोमाने भेस सर्व मानना' । जो० को गाम्मठ मुखिव पूठ १३ १४ ॥ मपमपासी ध्यातर ज्योतिपा देयों को भषधिका सेष परावर घनरूप नहीं है। कश्पपासी देवों को मपपिका क्षेत्र मायव पतुरल (चौकार) फिम्मु सम्पाट म अधिक प्रोर पाई म थोड़ा) है। शेप मनुप्य तिबंध नारफो इनको अयधि का विषयभूत क्षेत्र परावर घनरूप है। साधर्म गान स्वों के देने को मवधि का फास प्रसंग्यात कोटि थप है। इसके ऊपर सनरकुमार माहेन्द्र प्रम ब्रझोत्तर करपपासे देपों का मयपि का काल यथायोग्य पश्य फा प्रसंच्यातयां भाग है। इसके ऊपर लावथ स्थग से मेकर सर्वार्थनियि पर्यतया देवो को मयभिषामा पुण् पारि पम्प प्रमाण है। - AGRAT पटानिरासी जगरूपसाप कस्कृत पदचोद मौर दिमस्त्पर्य सहित सोपेसिदि का अन्दर हिंदी, अनुराव ! अध्याग १ एत्र भप षयोपशमहेतु केषाम् गए • सपोपसमा पर (मप-अवधि ज्ञान के उत्पधि का) समोपक्षमनिमित किन मरनासो पम्वर ज्योतिषी न भवधि पसे नीचे पाये म्यूम होता है मोर तिगर से (भाव पर पर विणेस से) मपियोतारा मपनपासो देख अपने प्रापित (पानियत) सान से सुरगिर रे (मेड) शिवर पर्यत भवपि धाय वीरें मानिस रेपो में सौपर्म और गान स्थलो के अपम्प प्रमिशान पोदिपा रेखासो मदिसण्याव सहम गेन । मोमर एमा पापम भूमिप मम्त पर्यत है जो मीरेष सोप शिम सर्ग से रोग है। 'समाजमार और महेन स्वगो यो पोम्पग में अम्प प्रापिधान तो मामा (प्रपम भूमि) समस्त पर उत्तर प्रयाग में परममा मिरिपो) पत जो समाजमार मोट मागों से भी पार पता है योत्तर गोवद अधि गावो भाग में अपम्प भाषिन मा ( सये परियो) व लगाम मोपर खगौ से शल्प मा माये को सारे चार पर है और तोप पछि रप से शाप ममा सपे पपियो] पाप परमौर रख भार सर्ग निवासियो परमपविधान मगेमाग में पारामामा (सोस पिषी) व पत tiमप्रमोचर ससा से पाप प्रमा मोमाग में साढ़े पांच पर tal चिसो से प्रपोमाग में तीसपे पपियो परराव है। एकमातार साम्पर सर्ग निवासी पोरे प्रपोमाग में अपम्प बरविहान प्रममा (तोस पिka गुरु रामगो से गम ममा सादेवापर मोचे है और मगर सागर सगी से करो पिलो मीचेोमात प मपापणन गुण मायः शवार सावार समों को केमधीमाग में पंकपमा (बीपी प्रपियो का मंद पर गों से सोने प प पा साव पर मोर रातार साखार से रख बीपी प्रपिषी अभाग में भाठ पर ममत गरम पापुर मगो देवीप समय भाभियान भयोमाग में पंप्रमा (बोण भूमि) रेव परमानव प्रापत सामों से जमा (भोपा पिपा मोरे मारपहराव और माय मम्मुत तगोसे परममा मौ पर भयोमाग में है। मोर मिाम सामान में भारत मानाभायण भयुन सौ २२वोभमप्रमा (पारदो प्रथिवी) मत तामय प्राप्त गोमबमममा सारमा राममा सरप्राण गुल एमपम्प कोरण्याचोमाग में में पटा निवासीमगदपसहाप कीलपत पदच्छेद और विमपत्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शदश हिन्दी अनुवाद । अध्याप १ पत्र २१ - इत्यत भाह॥ इति अत' आरन = ऐसा (प्रश्न होने पर) इसलिये (प्राचार्यअग्रिम ममें) कावे हैं कि मपथिक नियासो देयो भयाभाग में उप मपधिपान घूम प्रभा (पाषषी प्रपियो के मंत पर्यंत है । मोदय यजू से अधोमाग में अधिक भोर म्यारह राजू से म्यूम है । और इम देवो का उपए भरधिशान मधोमाग में तमममा (छठवीं पृथियो) फे अन्त तक ६ माप में मधोमाग को शोर पाप राजू है । साधर्मादिवपाः उपरि स्पस्वस्यर्गपिमानम्ममवरर शिखर पयत परवि गोम्मटसार पृष्ठ ८५३ -नधिमादियामी (घों से नपधेषिक तक) कारि भपने अपने स्यर्गा विमान का भ्या एका शिधर पन्त देने है। "मप मनुरियिमान भर पाच अनुत्तर विमान के पासो सपलोकमारो जो अप्सनासो साको देखे है परि मय अनुविण पंख मनुत्तर पिमान फे यासा देय ऊपरि मपने पिमान का शिखर पर्यस्त भर नोर्वे का पाव तनुपात पर्यन्व सर्वसनासा को देचे है सो अनुविण पिमानपाले वो फर एकमधिक तेहरान प्रमाण लम्पा भर अनुचर विमानषाले पारिसे परोस धनुप घाटि इकोस पोजन करि दोन पौरद गर ममाह लम्बा भर एक या पीकर अपधि फा विषय मूत क्षेत्र की देसे है। चौवह राजू क्षेत्र में से एकवीस योजन और पारसी पणस पनुप पटापे जो क्षेत्र प रहे सो मनुत्तर विमान पाले लम्या मैं भर एक गणू चौई में भपधि दारा देखत है पेसा अर्थ "पंचपिराति उत्तर चतुः एमपना कनएकषिणति योजनेः म्यून चतुयश रग्यायो घरम् विस्तारा सर्वलाकनालिं पश्यन्ति इस संसहत पाप का पात हाता है मनुदिव पिमान पासे फुय अधिक रह रात प्रमाण लम्बा और एक पोहा प्रयघियान मारा देखते हैं। उपगु क मा शेषों का “परिमाण फोपा है सो स्थानफका नियमरूप जामना । क्षेत्रका परिमाण सोए नियम रूप न जानना । गाते भन्युत स्या पयत फे यामी विहार फरि अन्य क्षेत्र को मार भर सहा मपघि हो तो पर्योस स्थानक पर्यन्त ही हो। ऐसा नादो यो प्रथम स्पर्गयामा पदिसे मरफ बार पर वहां सेतो छड़ पर नाचे भौर नाम । सौधर्म तिक के पपम नरफ पर्यत अपधि सेव है सो वहो भो तिष्ठता वही पर्यत क्षेत्र दी जाने भेस सप जानना । जो० को गाम्मठ मुदित पर ५३ म. भयनवासी ध्यातर ग्योतिपा देवों की प्रधिका क्षेत्र परापर घनरूप नहीं है। पश्पपासी देयों को भषधिका क्षेत्र प्रापत चतुरस (धोकार) फिम्मु सम्पा में अधिक और थोपा में थापा) । शेप मनुप्प विष नारफो इनको अवधि का विषयभूत क्षेत्र परापर घनरूप है। सीधम गान स्यगों के देशको प्रपधि का फास मसम्यात कोटि पप है। इसके ऊपर सनस्फुमार माहेन्द्र प्रम ग्रामोत्तर फरूपयाले देयों को प्रपिप बस यपायोग्य पश्य का असभ्यातयो भाग है। इसके ऊपर लांतष स्थग से लेकर सवानियि पर्वधवा देषों भवधिकाकारा कुछ यादि पम्प प्रमाण है।

पटानिवासी अमापसाप पकीकृत पदोद मौर विभात्पर्य सहित स्वार्थसिदि का शदशा हिंदी, अनुसाद । अध्याग १त्र २१ भय चयोपशमहेतु केपाम् अप • सपोपशमीना =गम (अप-अवधि मान के उत्पचि का) पोपशमनिमिव किन है मवनपासो पम्तर ज्योतिषी दल भवधि समेत मोघे मीये म्यूम होता है और तिगप से (अर्थात घर पर विर का से) भपिहोता तपो भवनपासो देप भने जस्ति (पानिपत) बान से मुगिर के (मेव) लिवर पर्यत मयपि बाप रखते हैं मानिस देवो में सीपर्म और रंगाम स्वर के देवो रे अमाप अपपिकाम ग्योविपो देवों के सहा सोहै मर्यात् प्रसंन्याव सहन पोगन है। मोर मार रमप्रभा मा प्रथम भूमिप मम्स पर्वत है जो मोचेम सोपर्म मि स्पर्प से पर है। 'सनमार और महेन्द्र स्वगो पो रेमपाश्रम में अपम्प भप पिपान वो (फामा (प्रथम भूमि) प मस्त तक भर उत्तर प्रयामाग में शराममा (मपेपियो) पर्वत जो समहमार मय नगों से नीचे से पार पाता है। प्रयोत्तर मविप प्रतिसगारे पो मपामाग में उमस भपपिधान मा ( सो परियो) तग है। प्रम प्रशोचर ममों से कप प्रमा माये को सादे पार पर है और तब पति पर्यों से सकरा प्रमा [इसपे थियो] पाप पडू है। भीर पक धार स्वर्ग निवासियो म पाकृष्ट अवधिवान अपोमाग में गनुपममा (तोसये पृथिवी) के अंत पर्पत है। मोत्तर स्वाँ से वाहन प्रमा प्रयोमाग में साढ़े पांच पर है मोर तप पिर सगों से अपोमाग में तीसपे पपियो कहा। यकमहागुरु वार साधार म्यर्ग निषासी पपों के प्रयोमाग में अपम्प अवपिगम बाहुम प्रमा (वोस प्रत्य) के सम या मापा मगों से पाचप्रमा सादेपर पर मोचे का है और महार सहमार सौ से उकवीसपे पपियो मीचे सात पर मार भपपिरान गुरु माए सवार सायरसों के देयो मधामाप में पकामा (बीपी प्रथिवी का अंत पर्वत मायक स्सों से मोपेच या सारे सात पर मोर पवार सहसार से कबीपी पिवी प्रथामाग में भाठ परामतममा माय मम्युन सगों के बीच जमाव भपिशान अपोमाग में पकनमा (चोपो भूमि) रेमात परत भामत प्रावन नामो से प्रमा (पोपा पूपिया ) मोरे सामाठ और भारत मध्युत खासे पंचममा मी पर नोमागम बोर करमपसिान भयोमाम में मानन प्राना भाप्म मयुन खगों खोज पमप्रभा (पाचको पपियो) २ मत तक मानत प्रावन गाम पुमनमा मामी परमाने पर भीर माप मन मे पूममा रिलो रापम् सोमाग म.

एटा निवासीजगरूपसहाय वकीलकृत पदच्छेद और निभात्पर्य सहिछ सर्वार्थसिद्धिका सदश हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २१ इत्यत माह॥ इति अत आह ऐसा (प्ररन होने पर) इसलिये (आषार्पअग्रिम सूप्रमे) कहसे हैं कि नप में पेषिक निपागो देयो फ भभामाग में जघन्य अपधिपान धूम प्रमा (पांचवी पृथिषो) के मेत पर्यत है।गो दश पन से अपोभाग में अधिक है और म्यारह पपू से म्यून है। भीर इन हो देवा का उरसर भवधिज्ञान प्रयोमाग में समप्रभा (ठवी प्रथियों) के अन्त तक 8 सा माप में अघोमाग को शोर ग्यारह राजू सौधर्माविवेषा उपरि स्यस्पस्वर्गविमानप्यम्बरस शिपर पयत पश्यति गोम्मटसार पृष्ठ ८५३ -सीपर्मादिपासी (वनों से मयप पेयिक तक) अपरि अपने अपने स्यर्गका विमान का प्यमा बरसका विसर पर्पत देने है। नप भनुरिपिमान भर पनि अनुत्तर विमान के पामो सवसोमालो जो प्रसनालो ताको देस है पारि नप अनुदिश पंथ मनुत्तर यिमान के पासा देप ऊपरि मपने पिमान का शिखर पर्यस्त भर ना को पाम तनुषात पयम्त सर्य प्रसनासा को देखे है सो प्रदिप पिमानपाने तो फनू एकमधि क तेरा प्रमाण लम्या भर अनुत्तर विमानपाले पारिसे पचोस धनुप धाटि एफवोस योमन करि दोन पीदव या प्रमाण लम्पा भर एक या बीड़ा प्रयधि का पिपय भूत क्षेत्र को देख है। चौवह राजू सेत्र में से कियोस योजन मौर चारसी पपास पनुप पगापे को क्षेत्र येप र सो मनुत्तर विमान पाले लम्या में भर एफ राजू पौड़ाई में अपधि शाप देखते है पेसा भर्य "पंचविंशति उपर पनुः एतपनुः समपरिणति योजः म्यूम चतुवय रग्यायो प रम विस्तारा सर्यलोकनालिं पश्यन्ति इस संसस्त पाक्य फा बात होता है। मनुविय घिमाम पामे दुध अधिक रह पा प्रमाण सा भोर एक पजू घडामपविधान मारा देखते हैं। उपयुब जा क्षेत्रों का परिमाया कोया है मो स्थानफका नियमप जानना । क्षेत्रका परिमाण लोए नियम रुप म मानना । जात मध्युत स्यग पपत पे पासी विकार करि अन्य क्षेत्र की माह भर सहा भय पिछोर ती पूर्षोक स्थानक पपन्त दी दोर ऐसा माही बो भयम स्वर्गपामा पदिसे मरक सारभर वर्षा सेतो टेक राजू नाचें और मान । सीप विक के प्रथम मरक पर्यंत मवधि सेम है सो सही मो विधवा वहां पयत क्षेत्र हीदी जाने भेसेसया जानना । जो० को गाम्मठ मुदित पर ५३.८५४ भपनयासी प्यन्तर ज्योतिपा देवों को मधिका क्षेत्र परापर मनरूप नहीं है। पल्पपासी देवों को भवधिका सेवमायत चतुरन (चीकार) पितु सम्पाम अधिक और पाडाई में थोपा) है। ऐप मनुप्प हिपच मारको इनको अपधि फा पिपपभूत क्षेत्र परापर घनरूप है। सीधम जान स्पों के देने को भवपि का फाल मसम्याप्त फोटि वप है। इसके ऊपर सनत्कुमार माहेन्द्र म प्रयोचर फल्पकामे रेपो को मपधि का कास पयायोम्प फ्ल्प फा मसम्यातपो माग है। इसके ऊपर सदिष स्यर्ग से मेकर सांयमिति पर्वतबा देवो को भयधिकाश्चरा घाटि पत्य प्रमाण है। Reabe स्टानिवासी नगरूपसहाप वकीस्कृत पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित सर्वार्थसिदि का शन्दश' हिन्दी अनुवाद । अध्याग १ सूत्र २१ ॥ क्षयोपशमनिमित्त. पडविकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥ समाप्यनतार्या क्षयोपशमनिमित्त पविकल्प शराणाम् ॥२२॥ = चयोपशमनिमित्त (भवधि ) पशिल्प शषाणाम् (जीवानाम् भवति) सुत्रार्थ,-पोपशमनिमित्ता = [अवधिमानावरणीय कर्म के] क्षयोपशम निमिव [से उत्पन्न होने] पाला अवधिमा = अवधि जिसके [अनुगामी अननुगामो, पर्दमान, दीयमान,अवस्थित अनव स्थित] पर विकल्प ।। शेषाणाम्।। जीवानाम् ।। भवति = छा झ्द हैं सो शेष जीव [ने पर्याप्त सैनी सम्परदृष्टी मनुष्य तिर्यच] निकै हातारे सम्पम्दर्शनादिगुणोंसे क्षयोपशम होता है इससे इसको गुणप्रत्यय अवधिमी करते हैं। (१) श्वेताम्बर मानाय म इस सूत्र का सम्पा तेसिपी है “पयोनिभिता पर पिकल्प शेषाणाम् ॥२३॥ ऐसा पाठ पिगमा गुट २२ में "यपाद निमिता सय परामनिमिता इत्यर्थ प्रत वनो भानायों में इस सूत्र का प्रये एकसाहोसाता है। (२) नेपणाम् ।-निमसिमित म्पारण सत्र के पास प्रत्यार में इस प्रकार हैं कि तत्त्वार्य श्रयाने सम्यग्दशनम् -तत्त्वाप प्रशान मारामन रामपाम पास्त्रमा पसंपर निर्गरा मोक्षास्तरयम् । सूत्र गोवामापा नषवम्पसबर नियमोवास्तव बस्न ४० मतिश्रुतावधिमन।। पर्षय केवल नि मानम् : घर है। मरिच तावपि मनः पर्पय केयसानि पानन् । सूत्र हा भाये परोक्षम् ॥ ११५ माथे पर चे ॥११॥ मतित स्मतिः संग बिग्वामिनियोघः इमान्तरम् ॥ १३॥ मतिः स्मृतिः सखा चिम्माभिनिबोधात्यनर्याप्तरं अध्याय १ सूत्र १३ ॥ ववन्दियानिन्निनिमित्तम् ॥ १५॥ तविम्पयानिध्यनिमित्त । भम्पाप १ सूत्र १४ ॥ पवहुविवक्षिप्रानिः सानुकधुवाणा सेतराणाम् । सूत्र १६१ गुरियविनातिन्यतानुवषाणांसेवराणाम् ॥ १५ ॥ न चधुरनिमियाभ्याम् ॥ १६ ॥ म चपरनिन्द्रियाभ्यां ॥ १॥ तमतिपूवरमेकदावश भेरन् । २ । घुतमतिर्मयकदादरा भेद । मषप्रत्य पायपिदेवनारकायाम् । स्य २१ । मघप्रत्ययाऽपधिदेवनारकाणां । अन्याय १ सूत्र २१ ॥ पपयम निमित्ता पायरया रोगणाम् । स्त्र २१ । सपोपएम निनिस पबिफरा शेषाणाम् । स्त्र २५ इन प्रत्येक बने प्रयम पाठ के प्रत में ₹ और प्ररपेक स्त्र के दिनोप पाठ मनुस्वार है। म्फे स्थान में बोम् पद केतका हो दो माता है यदि उमम् के पोधे का मंजन माये किमी मो पाठ के पमान कार मंजन नहीं भागा इसलिये म् के स्थान में अनुवार मही हो महा है - अर्थात् अनुसार - - शानवासा नगरपसहाप पकाउकृत पदपद आर विमरत्यय साइत सवायसिदिका सदशा दिदी, अनुराद । अध्याय १५त्र २१ भवधिज्ञानायाणस्प देशवातिस्पर्द्धकानामुदये सति सर्वघातिस्पन्द्रकान मुदयाभाव चयः । तेपामेदानुदय प्राप्त ना सवस्था उपशम | तो निमित्तमस्पेत्ति क्षयोपशमनिमित्त । स शेषाणा घेदितव्य ॥ के पुन शपा ?। मनुप्यास्तियञ्चश्च । तप्यपि यत सामर्यमस्ति तसेव वेदितव्य । नझसजिनामपर्याप्तकाना प तस्मामयनस्ति । साजना पर्याप्तकाना च न सपाम् ॥ फेपातर्हि प्राधिशान -प्रावरणस्म देगघावि स्पर्दानाम्।। = अवधिशानावरणीय कर्मके देश घाति स्पर्टकोंके (स्पर्दक पुल्लिंगन पुसक दोनों है) उदये। सति । सर्वघातिस्पर्ट कानाम | उदप- = उदय होने पर (= सति) और सर्वघाति स्पर्डको के उदय में (पाकर फल न दे) प्रभाष । सय पाम् । एव . = अमाष रूप (सोमय है (और) तिन (सर्वघोति पदका) के ही जो आगे उदपमें आयेंगे वर्तमान में अनु-उदय मतानाम् ।। सत्-अवस्था ॥ उपशमः। = उदय रहित प्राप्त नो सत्ता रूप अक्स्या सा उपशम है तो, निमित्तम ॥ अस्य । इति० भयोपशमनिमित्त । ते दोनों (उपर्युक्त आय और उपशम) रे कारण जितके ऐसा भयोपशमत है स। शपाणाए। पदितष्पा । पुनर शेषा' । ? -यह [क्षयोपशम निमिच] शेष [जीव तिनि जानौं । पुनि कौनअवशेष हैं ? मनुष्या , विध , प. = [उतर] मनुष्पौरवियच हैं अर्याद देव और नारको पूर्व इन्वेसर्वे सूत्र में कई अत' मनुष्प और तिर्यघ शेष रह गये सो इस सूत्र में कह दिये वेषु । अपि • पा • सामर्थ्यमा अस्ति T तप . = तिन [मनुष्य और तिपंचा) में भी जहां योग्यता [- सामर्थ्य है वहां पस.पदितव्य । नहि अस्ति असेमिनाम् । घ . =ही मानना पोग्यदे॥ नहीं है असलियों के और [ 3 घ] अपारकानाम्। तत्सामर्थ्यम्/m = अर्पयाप्तकों के उस क्षयोपशम निमित्तक अब किशान होने की योग्यता पतिनाम् । पर्याप्तकानाम् । घ. सर्वेपाम् । = सैना पायप्तकों के मी [-घ] सर्व [अव विज्ञान नहीं होता है ।। [मरन] केपाम, सर्दिक = तौ [ = त]ि किन [मनुष्प और विर्य!] (अवधिज्ञान) होता है। अपेक सूत्र हितोर पाठ मिनमें मनुसार म फेयान में पाया गया है अमेरकरण जैनेन्द्रमझिया शवाय चमिका पाणिनि मुनि कर मशणारी शाकायम पारण मनुमार मगुय । परन्तु कातम्भ रूप माला फे “पिरामे वा (घामकारस्य पदासम्म मनुस्यार माति पिगमे) म् मा पदाच हो उसको पिक फरि (हमारी इच्ानुसार) अनुस्वार होमाता है पदि म् फेपघात में पिराम हो सो म के पास कोई पन न पाये तो मा इस पानये पत्र के अनुकूल गुर है ( अपश्य देखो टिप्पणो पृष्ठ ५,६ ५४० ५४१) 'मायसिमि-सोक यातिक मुद्रित-इस्पात में मरेपरन्तु यसपातिक मुद्रित में और फिसी किसी अन्य पुस्तफ फे पाठ में मनुस्यार मो है। %3D पटा निवासी नगरूपताप वलित पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २२ यथोमप्सम्यग्दर्शनादिनिमित्तसन्निधाने सति शान्तक्षणकर्मणा तस्योपलब्धिर्भवति । सर्वस्य क्षयोपशमान मितत्वे चायोपशमग्रहण नियनार्य क्षयोपशम एव निमित्त न भव इति ॥ पयोक्त सम्यग्दर्शनादिनिमिन समिधाने । = जैसाकि ऊपर कहा गया है(= गथा उक्तोकि सम्पदर्शनादिक कारणों के निफ्ट सति । शान्तक्षीणार्मणाम् -हाने पर (= सति) कर्मों का उपशम(शान्त) और प्रभाव (=क्षीण - क्षय) सस्प '॥ उपरयिमवति | होनेवालेकअर्थात् अपधिमाना वरणीग फर्मका क्षगोपशम आहे जिसके उस(मीवर = तिस (गुण मत्ग। अधिशान) की प्राप्ति होती है (मव सर्व प्रकार के अवधिज्ञान के उत्पन्न होने का देत किसी भी नीव के कोई भी स्वधिज्ञान दो (अवविज्ञानावरणीग फर्म का) मगोपशम निमित्त है वो इस सूत्र में 'मगोपझम निमित्तः' वाम का मार्च क्गों प्रगोग किया ) सवस्पक्षपोपशम-निमिररे । = (उत्तर) सय (जीयों) के अवधिज्ञानापरणीय कर्मका भयोपशमकारण होनेपर सयोपशम पार्ण निपम वा।। (अवधिज्ञान होता है सौ मी पत्र में) भगोपशम' का प्रयोग मर्यादाके लिये है सपोपनम । एव निमिपम् ॥ नवा इति = (पॉकि) क्षयोपशम ही (मनुष्य तिपचों के अघि मान होने का ) कारण होतो है न कि मन Vatat मपप्राययोऽपि भवधिमपति-तीपरों के (तीर्थक्ता ) मव प्रत्यप भी (-मवप्रत्ययः । भपि) प्रयपि पोती है। १२) नारक देय तापक पे भवों को प्रपेदा भयभिधानापरखीय कर्मका ज्यापशम हासर जो भवपि हा उसको मकास्पय अवधि कहते १ गुण गो मभ्यवशादि कारणों का प्रपेसा मे प्राधिनापरणोय फमका जयापशम होकर भवधिवान होता है उसको गुगा प्रत्यय मयधिगन भपया सपापयम निमित्त प्रापिपान कहते “मव प्रस्पय अपपिकान में मा सम्पादनादि गुण का समाप तयापि इन गुणों को अपेक्षा करने मे मा प्रत्यय पहा" । मय प्रत्यप माविशन प नारसी और तीर्थकर की पार पावे हो र पत्र हमा मोर मयों का माप प्रविणोपकर्मापराम मी मातार प्रांत के दीपक को पपोति . भार अपारा मारा पर सापही तRA दी श्य भारम पा कार्यकर का भय भप पत्पप समपि %3D %3D एटा निवासी जगरूपसहाय पकौसकृत पदच्छेद और विमक्स्पर्य सहित सर्वार्षसिदिका सम्वनः हिन्दी अनुवाद । अम्माप १ र २२॥ स एषोऽवधि पविकल्प । कुत ? भनुगाम्यननुगामिपर्द्धमानहींयमानावस्थितानवस्थितभेदात् ॥ कश्चिदवधिर्भास्करप्रकाशवगच्छन्तमनुगच्छति ॥ कश्चिन्नानुगच्छति तत्रैवातिपतति उन्मुग्धप्रश्नादेशिपुरुष पचनवत् ॥ स। एप। अधि। = सो यह (सपोपशमनिमियक वा गुणनिमिचक, गुणमत्यपक, गुणाइतक)भवकिसान पहिकरूप । फुत १० अनुगामिभवात्।। = छाभेवरूप (मभदवासा)है। (प्रस्न) कैसो (उत्तर)कनुगामि वानमामिको अननुमामिभेदात्ती पर्दमानभेवात् । हापमानभेदात्।। अननुगामि (अनानुपामिक) भेद से वर्दमान भेद से हीपमान मेद से अवस्थितभेदात् । बनवस्थितमदात् । = मवस्थित भेद से बनवस्थित मेद से (मयोपशममस्पप-अवधिज्ञान) कषित अवधि । मास्करप्रकाशव गान्तम् ।। जो कोई विज्ञान पूर्पके जाले सक्ष गमन करनेवाले (माब)को(गच्छन्तम्) अनुगच्छति T = नहीं होगा अर्थात् जौक्के साबर माता है। (सो 'ममुगामि वा मनुगामिद कमित न अनुमच्छति तत्र एष मो कोई (अवधि गमन करने वाले भाव को)ोड़ देवा (न-अनुमघावि)वाही उन्मुग्धपरन-मादेशिपुरुपवधनपत् अतिपततिर = मूर्ख मरन करनेवाले मनुष्य के वधन सदृश पिर माता (रामाता) फर्मका पयोपराम ये तीनों साप साथही वत्सरी उत्पत्र हाते हैं। और गुण प्रत्यप भवपि हानम मो मनुष्य विच भोंका पा अस्तित्व है तथापि उन पर्यायो को अपेक्षा न करने से गुण प्रत्यय का है। 'जीव० गाम्मट मुधिन पृष्ठ SEE GRE मपम्पय मष घमान सम्पूर्ण प्रग्न से सम्पन होता है (-समय मा ममदेशों से होता )मामि के ऊपर ख पम पम स्विफमासरा सापयामकरी माविमो राम पिा होते है उस स्थानके प्रारम प्रदेशों में हामेवा अवधि वातावरण कर्मके योपराम से गुणमस्यय भवधिमान होता? (१) भगानो भविमान के तोन बानुगामा मवानुगामो भयानुगाम, मेद है। जो दूसरे ममें मपने स्वामी के साप सारे सो सेशानुगामी है। मरे मप में अपने स्वामी के साप माप सो मवानुगामो अपपिडाम है। जो दूसरे क्षेत्र और मप दोनों में अपने स्वामी के साथ जाय मोरमयागामो अवधिमान है। मननुगामी प्राधितानके मी तीन सेवाननुगामो मपाननुगामी उमपाननुगामी मेव है। जो अपने स्वामोके साथ दूसरे क्षेत्र में म माये सोसेनाननुगामा अवपिधान है।गो अपने स्वामोरे साथ दूसरे भवमै न जाय सो मवाननुगामो अवधिमान है। जादूसरे भव और सेन पनो में साप न आप सो उमपामनुगामोविपिशान है। D - एटा निवासी जगलपसहाय वकीलकृत पदच्छेद और विभत्त्पथ सहित सर्वार्थसिद्धिका शन्दना हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ एन १२ अपरोऽवधि अरणिनिमपनोत्पन्नशुष्कपत्रोपचीयमानन्धननिचयममिद्धपावकवत्सम्यग्दर्शनादिगुणवि शुद्धिपरिणामसन्नि रामायरपरिमाण उस्पन्नस्ततो वईते मतख्येयलोकेभ्य ॥ अपरोऽवधि भन्तरितपरिच्छि नोपादानस तस्यमिशिखावरसम्यग्दर्शनादिगुणहानिसमाशपरिणामाषिवृद्धियोगायत्परिनाण उत्पन्नस्ततो मीयते । या अगुप्तस्यासख्येयभागात् ॥ इतराऽवधि सम्यग्दर्शनादिगुणावस्थानायपरिमाण उत्पन्नसारपरि माण एचायतिष्ठते न हीयते नापि वर्द्धते लिंगवत् । आ भवषयादा केवलज्ञानास्पचेर्वा ॥ अपर। अवधिः । अरणि-निर्मथन-उत्पन्न - अन्य अवधि (अर्थात् पईमान अवधितान) वो है जो अरणि के मथन से उपभी शुल्क प उपचीयमाननन्धन निषय- समिद = तया सूखे पचों के संघप येईन के समूह पर (फैकी हुई) वर्द्धमान = (समिय) पावपात्, सम्पदर्शन-प्रादिगुणविशुद्धपरिणाम = अम्नि के सदृश सम्यमर्शनादि गुणों से निर्मल परिमाणों की सभिधानात् ॥ यत्परिमाण' । उत्पनः । तत® =सामो पता से नो परिमाण व माप ममाण उत्पन्न हुआ था तिससे नवे बोल अस्पातलोकेम्प' । = असंख्यात लोक पर्पत (=आ) पड़ता जाय। अपर । भवधिः । अन्तरित- 'दूसरा अवधि (अर्थात् होपमान अवधिमान) वाहे मो तिरस्कृत (= अन्तरित) और परिचिग्न-उपादान-सन्तति- = परिमित (परिच्छिन्न) उपादान कारणवारे)(= उपादान सन्तति) अर्थात् इन्धनवाले अग्निशिखावत् । सम्पग्दर्शनादि-गुणाहानि-संक्रोश- = अम्नि शिखा के समान सम्पम्दर्शनादि मुणों की हानि रूप सफ्लेश परिणाम- विदि-पोगात् । यत्परिमाण । उत्पन्न । परिणामों के पात पर योग से नो परिमाण उत्पन्न हुआ था उता प गुलस्म । असपेप-मणार नाहीयते। = विस (परिमाण) से अगुल के असेपास्यो अंश तक (= ओ) घटता नाय है इवर । अवधिः । सम्पन्दशन-बादि-गुण दूसरा अवधि (अर्थात् अवस्थित अवधिज्ञान) पा है नो सम्पग्दर्शनादि गुणों की अवस्यानात् ।। पत्-परिमाण उत्पन्ना। = स्थिति से जो परिमाण (प्रमाण) उत्पन्न दुबा या वत्-परिमाण । स अवविष्टलिभवत् नीयते T=पा परिमाण ही स्थिर रहता(शारीर के तिल मस्सा मादि)पिा के सहश न घटवारे न अपिवईने पा. मापात पाप्राकमान पता = परसामी पर्यायकसय वा बसप (तक) वा केयर मान की प्राप्ति पर्पत नही रे (1) अरमिा-पार चत पाविशेप। पत्र माग मिस ने अपनाभर पोचदानका राव (पप सरसो से भाग पा) %3D सत्र २२ %3D एटा निवासी नापसहाय कोस्मृत पदच्छेद और विभपस्पर्व सहित सर्वार्थसिटिफा शम्दश हिंदी अनुवाद । अध्याप ? अयोऽवधि सम्यग्दर्शनादिगुणहानिवृद्धियोगायस्परिमाण उत्पन्नस्ततो वद्धरी यावदनेन वर्धितव्य, हीयते च यावदनेन हातव्य वायुवगप्रेरितजसोर्मिवत् ॥ एव षड्विकल्पोऽवधिर्भवति ॥ एव व्याख्यातमवधिज्ञान तदनन्तरीमदानी मन पर्ययज्ञान वाळय, तस्य भदपुर सर नचण व्याचिख्यासरित्याह- अन्या अवधिः । सम्मम्दर्शन-आदि = इतर अवधि अर्थात् अनपस्थित अवधिज्ञान यह है जो सम्पग्दर्शनादि गुण-नि-शि-योगात्।। यत्-परिमाण' । उत्पन्न । मुणों के घटने पड़ने के संयोगसे जो परिमाण उत्पन्न हुआ था तव ४ वर्षसे T यावर अनेन। वधिर्तव्यम् ।। = सिससे महां तक (= यावत्) इसे पहना चाहिये वावा है घीयते T योक्त्# जनन । हातष्पम् ।। = और (= घ) महा तक इसे घटना चाहिये घटवा है वायुवेगम रित नल-उर्मिवत = मैसे पवन धरू से पेरा हुआ असकी बार (घटती भी है और बरती भी है) एवम् । पर विकल्प । अवधि । भवति । एवम् # = इस प्रकार 'छा भेद रूप अवधिमान होता है। इस प्रकार अवधिज्ञानम ।।। व्याल्यातम।। बद-अनन्तरम् ॥ = अवधिमान वर्णन किया गया है। उस (अवधिशान) के लगता ही इदानीम् मन' पर्पय मानम ॥ वक्तव्यम् । तस्य = अप मनः पर्पय ज्ञान फाइना योग्य है ।। उस (मनः पर्पय ज्ञान) के भवापुर सर । = भेदों को (उसके लक्षण के कयन की अपेक्षा) अपसर वा अपामी कर (= पुर सर) पक्षणं ।। व्याधिरप्पास।। इति आइT = (और पीछे उसके) बक्षण को (भी) करने का इच्छफ (आचार्य) ऐसे काला अथात् मन पर्पपमानके भेद पूर्वक क्षण को करने के इच्छफ (आचार्य) ऐसे करते हैं भावार्थ मनःपर्यय मानके भेद" प्रथम (= अग्रसर चोर पाछे उसके लक्षण को करने के इच्छक (आचार्य) शुमति और विपुलमति भद तेईस्वां सूत्र में और इन उक्त भदों के सक्षण घौवीसवां सूत्र में ऐसे करते है कि (३) पर्षिफल्पा- मागम विष सप्रति पात भमन्तिपात तथा देशावधि परमाषधि सविधि ए सर्वानुगामी भादि मर मेद कहे मिन म मन्सब जानने नपचजो स० पनि मुद्रित पूछ १७४ १७ । उक परिरतमीने खोक पार्तिककी सासोदा है जिसके पूपरपमे स है कि %3D एनिवासी नगरूपसहाय वीमत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित स्वार्थसिदि का अवशः हिन्दी अनुवाद । यम्याग १ एत्र २२ "अनुगाम्यननुगामा पर मानो हपमानोऽपस्थितो -अनुगामो अमनुगामी षयमान दीपमान अपस्थित निस्यिा इति पविफल्पाऽपि सपतिपाठा -मनपस्थित इस प्रकार हमेवरूप अवपि (बाम) है (क्योकि) संमविपात प्रतिपातयोरपाम्वर्मपात्। -मौर श्रमविपाव दागे का पही (पाइस स्थानम, अन्तर्माव वा समावेश है दिशापषि परमापपिा सरपिरिति प परमागम -ौर (-) योकि देशापपिपरमावपि सपायपि ऐसे शास्त्र में पमिसानो पूर्वोठयुक्रया सम्माविताना मयोपसंपदाद - प्रसिर षा समायित (- प्रसियर मये) बान) पूर्वोत ताप पहों (इयो पह शानों में) संपही परन्तु वरवाय रामपातिक मुदित पृष्ठ ५६ और गोम्मनसार पाकार गाग ३०२ निमसिसित से प्रगट है कि पुनरपरेऽपम्रपाभेदादेणपधिपरमावधि:सर्वाधिश्वेति - भोर अन्य भवधि के वोन भेद देणवपि परमापपिपीर सर्वावधि ऐसे है गुमरपटगोप्या) अणुगापरिपवारमारिवरा, - गुणप्रापय (-सपोपण्मनिमिक) अवपिकान छह (भेवरूप) है अनुगामी भष गुणध वफा, पाता। अनुगापस्थितप्रवृपमानेवरे, स्थित प्रवर मान पप्पो (-) ममनुगामा मनस्थित, होयमान है देमाहोपरमोशी'। सप्पोझित्तिय विधा मोहो, - शावधि परमात्र पे सप पवि ऐसे मो (- पोम प्रकार प्रवधि पेशापपिपरमापपिविपिनाविषत्रिपा प्रवपिण सिके पिपप को परिमित होने से इस मान प्रवपिधान मण्या सीमावान कहते है। पपपि दूसरे मतिनादिक के पिपप का मो सामाम्प से सीमा है मस्तिपे दूसरे गानों को मो अपविधान करना चाहिये वपापि सममिकानयका प्रपेसा से (अर्थात् बा नप जो मामा पर्य का उधिन परि मा एक हो भय में कर (-प्रसिद) हो उसका जाने पा को) बामविशेप को हो प्रवभिान कहते हैं। मान पर प्रयपि निपम से देशावधि हो होता है। और दर्शम विधि प्रादि गुणों के निमित से होनेवासा गुणप्रत्पप प्रबभिवान रेशापि परमावपि सर्वावधि (ऐसे) दोनों प्रकार होता है। देशायपि और परमावपि प्रवपिवान के अन्य सम्पम परतोन तोन मे होते हैं। सारपि प्रापियाम निसिपमा से एकल रोहै। मारपि में अपम्प हमादि भेद महा। सविधिप'चम मिपिसाप (- मेदnिayt.

एटा निवासीमगरूपसहाप कोणकृत पदच्छेद और रिमात्पर्य सहित सर्वार्थसिदि का शदश हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २२ समम्म देशावधि मा है सा उरसेपीगुल का मसभ्यातचा भाग मात्र क्षेत्र पर्यत है भीर उस्कर येणयपि सवालोफ पर्यन्त है और इन दोनों क्षेमध्य में पषतनेयाला अनेक विकारूप मध्यम देशावाप। अपम्प परमावपि एक प्रदेश अधिक लोकसेव प्रमाण है और उत्तर मसभ्यात मोकक्षेत्र प्रमाण है और मध्यम का मरम क्षेत्र है म अपम्य है म उत्तर : सायषि उतर परमावधि के क्षेत्र सेवाम प्रसन्यात सेन प्रमाण है। जैसा कि परकर पुरे कि प्रतिपातो और अप्रतिपातो दोनो अनुगामी मननुगामा पय मान होयमान अवस्थित मनयस्थितन पदोंमें अम्तभूत है शायपि हम भाउ रूप होता है । परमावपि अनुगामो अननुगामी, वर्षमान प्रवस्थित अनयस्पित और मप्रतिपाती पर भेदकर होता है। सर्वावधि मनुगामी पपमान भवस्थित मौर मप्रतिपाती हाता है । विसा के प्रकार के समान पिनायीक प्रतिपाती है भोर इससे विपपेत अविनायो मप्रतिपादोहै। जमम्य देशापधि पाम संपत तपा ममयत ननुम्य नियंचों में होता है देव नारकियों में नहीं होता है। उत्तर देशावयि पान सयमो महाप्रमी मनुष्यों में हाता है कि भारोप सानि गतियों में महारत का होना सम्भव नहीं है। परमारपि और सपायपि पमश्र उसो भव से मोमगामा) महामती के सहावा है य तोकपदिक गृहस्थ मनुप्प तिर्वध घेष मारपनि के नही होई। इनिरे देशवपि हो को योग्यता है अर्थ प्रकाशिकपा ७ देखो। परमावपि भोर सावधि यातले मोप नियम से मिप्यास्त्र और प्रवत अवस्था को प्राप्त मा) होते । सम्परप मोर पारिवसे युत होकर मिप्मात्य ममपमको प्राप्ति का प्रतिपान कहते है। यह प्रविपात देवावधि वासका दो होता है, परमावधि सर्वावधि पालेका मही होता है। अपपिणन के जपम्य मेव से लेकर उत्कर मेद पयत प्रसंगात लोक प्रमाण भेद है सो सर्व प्रव्य संघकास भार को अपेक्षा से पो (पुमत) प्रम्प को हो तथा रस (पुरत) के संघ से संसाये जोव द्रव्य का मो प्रत्यय जानते हैं। पारि सर्पावधि भान है सो अघम्प मध्यम नहर मेद रहित अवस्थित सर्वोपता को प्राप्त है जाते प्रषषिशानावरण का उडाए मयोपशम तहो हो समवै है ताते देशावधि परमावधि के जघम्प मायम उस्कृट मेर समवे ।

गनिवासी नगरूपमापनकीलकृत पदच्छेद मौर विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दश हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २३ ऋविपुलमती मनःपर्ययः ॥ २३ ॥ सूसम्-जुविपुलमती मन पर्यय ॥ २३ ॥ = शुजीवपुलमती मन पर्यय (द्विविकल्प सन्त ) ॥ विकल्प शब्द की अनुवृत्ति २२वा सूत्रस ले है मविपुलमती :। मन' पपंप' । दिविकल्प सन्त T = मन पर्यय ज्ञान अनुमति और विपुस्मति दो भद रूप हे अर्थात् मन वचन कारकी सरलता सप पर के मन में विष्ठे हुये रूपो पदार्थों को जाने पर अनुमति मन' पपपज्ञान है और जो मन वचन फायकी सरसता रूप और मन पचन कायकी वक्ता रूप वा कुटिलता रूप पर के मन में अवस्थित रूपी पदार्थों को जाने सो विपुलमति मन' पर्पय ज्ञान है ॥ ११) दिगम्बर मामायमें कहीं कही "मना पपय" पाठ है। और कहीं कहीं “मनापम्पय' पाठ है। भचारहाम्यावे (-अधारसाम्मविया) पापापात्र से दोनों ही पाठ अक है। (दयो दिप्पयो पृष्ठ ३२१ में) । मनः पर्यय हो सिपना चाहिये क्योंकि यह सूत्र है और पत्र समय यह है कि प्रशावरमसदि सार परिश्यतो मुखं प्रस्तोम मनषय प सूर्व सविदा पिदुर प्रस भवम् प्रसंदिग्ध सारपत्० विनत- मुखम् -पोड़े भक्षर हो मिनका मर्य संदेह रहित हो सार वा सत गर्मित हो सर्षता श्रेष्ठका रस्तोमम् मनपप घम्पविदा ।। पिदु सूत्रम् - निरर्यक राय (-स्तोम) सेरहित (-) भोर पूषण पर्मित हा सूत्रहाता उसको समझते हैं येताम्पर भाग्नार में मनः पर २ म्यान में "मनापर्याय देशेष पाठ पफ है। भर्य भी एक है हमारा समझ में सघु पाठ दो सेना पित है। इस सूत्र को सम्या ममाप्प० में २४१ पोंकि विविधोऽयपिा सूत्र पड़ गया है (२१ सिमा मनोव (मन) फात में चिपन किया हो अपवा जिमया मनाग (मविप्यत्) काल में सिवन फिपा जापगा अपना नमानमें जिमका मापा पितवन दिया है रादि अनेक भेद लिये दूसरे मन में स्थित पदार्य जिसके द्वारा मामा मार उस गानका ममा पर्यप दसरय मामिप्पपम्पिताऽया मनातत् पति गतिमानातोति ममा पपप": पर मम में विधता दो पदार्थ सो मना करिये म(परार्प) पपरम करा(-पतितिमम ममेरा दोवाt(-गप्पति) दिसमो जामता(-मामाथि) पेसामनापपपद। जीप गोम्मर %3D %3D एटा निपासी मगरूपसाप स्कीमत पच्छेद और विमपत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अपाय १ सूत्र २३ शुज्धी निर्तिता प्रगुणा च । स्मानिर्तिता ? पाकायमनस्कृतार्थस्य पर मनोगतस्य विज्ञानात् । ज्वी मतिर्यस्य सोऽय अजुमति ॥ वृत्त्यनुवाद -निर्वर्तिवा ॥ उत्पन्नई (= निर्वतिता)अयमा निष्पन्न भई (= निर्वतिता) शवी ॥ ॐ गुणा ॥ सरल [ = मम्मी = ऋगु) और (% घ) सीघो (= प्रगुणा) (मति) कस्मात् । निर्वर्तिता किस हेतु से (= कस्मास्) उत्पन्न ह वा निम्पन्न हुई है(= निर्तिता) ? पा-काय-मनस्कत परमनोगवस्य । = (उत्तर) पपन-काय-मनकार किये हुये अन्य (नोव) के मन में माप्त भये अर्थस्य ।। विज्ञानात् ।। ; सी ॥ रूपी पदार्य के(= अर्यस्य)जानने से (= विज्ञानाव)॥ - सगल (= शाम्बी) मसि ॥ यस्य ।। स अपम् शुमति । मति(= जान पा पुष्टि) जिसका सो यह जुमते है।मावार्य सरल मनसे, सरल वघन से सरल काय से किये ये अन्य जीप के मन में प्राप्त हुये मारूपी पदार्थ तिसके जानने से (= वितानाब) उत्पन्नाई (- निर्वतिता) जो सरल मति सो अनुमति १स पुस्पति से प्रगट है कि अनुमति शम्द पवित्र है सामान्य फा अपेक्षा से मना पर्यय पान एक प्रकार का है मीर विशेष को विषमा से मजमति मनः पर्यपान और विपुलमति मना पर्यबाम से दा मेद है। अनुमति मन पर्पय हान के तीन मेव पर्याद (का अजमन गताप विषयफ (-ससमनविर्ष मास मया सर्प का गननहारा) या शसमनस्तार्थ (-असुमनहस भय का जाननेवासा) (म) प्रवचनगता विषयक ( - अनुप बन विष प्राप्त मामय का जाननहाय) वा ऋजषावार्य (-अनुषचनाहत भय का जामनेषाला) (ग) मनुकापगवार्य विषयक (-भकाय विप प्राप्त मया भर्य का जाननहारा) या यजुकाय नाड (-खकाय व अर्थ का जाननेवारो) । २) जैसे किमी मनुप्प मे मन से व्यक सरस वा प्रगटरूप पदाय का पिनयन किया । धा िक पा लौकिक पचमों को मा मिन भिम कर से उमाण किया और दोनों लेक के फस का प्राप्ति के लिये अंग और उपांगों का पटकना सफोगना भीर फैसाना रूप काय की चेपा मो क किंतु उसके फध दिवस पचात् अपवा पर कास पीछे उस मन से विचारे पे था पचन से कहे ये मयया शरीर से किये गये काम को भूताने के फारण कि मैंने मन पचन काप मे क्या किया था इस बात के षिघारने फे सिये पह समर्य न रहा उसके उस प्रकार के मन पवनदाय किये गये कार्य का पावनुमतिममा पर्यय ज्ञान पाने से पुको पाद मत पूछो यह अपने शमतिममा पयय ज्ञान से स्पर जान खेता है कि उस मनुष्य ने मन से पद पवास म्प से घिमारा था, पचन से इस प्रकार कहा था और शर से इस प्रकार किया था।

%3D य रा निवासी नगल्पसहाय बोसकस पदच्छेद और विभात्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दश हिन्दी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २३ भनिर्तिता वाटला च विपुला घ । कस्मादनिर्वर्तिता ? वाकायमनस्कृतार्थस्य परकीयमनागतस्य विज्ञासात् । विपुला मनिर्यस्य साऽय विपुलमति ॥ अनिर्वरिता । कुरिला । पर = और( = घ)नहीं निष्पन्न हुई वा नहीं उत्पन्न ईवक (= कुटिला) और (=प विपुग। विस्तीर्ण(% विपुला), विशाल (= विपुला) वा नानार्थक (= विपुला) कस्मात् ।। अनिर्वविता ॥ किस कारण से नहीं निपमाई या नहीं निष्पन्न भई (= अनिवर्तिता) बाकाय-मना-कृक्-परकीय-मन-गस्प ।। (उत्तर)वषन कायमन फरि किये हुये मन्प (जीव) के मन में प्राप्त भये पर्पस्य । विज्ञानात् । ।। रिपला ॥ = रूपी पदाप के (= अर्यस्य) मानने से ॥ विस्तीण-विशाल नानाफ है मति ॥ यस्य ।। स अपम् । विपुलमति । = मति (अर्थात् मान या पुचि)निसकी सो यह विपुल मति है। भावार्थ फिर किस देव से उत्पन्न पई है। (उचर) "स्वयमवही मई है" (नय० पनिका मुद्रित पृष्ठ १७५)। कैसे ? भविष्यत कास में कोई जीष रूपी पदार्थ को वितबैगा बप वफ उसके मनद्वारा पा स्त्री पदार्थ विधारा नहीं गया है उसके मन में वारूपी पदार्थ श्रम तक नहीं तिष्ठारे पाने वाले काल में पितवन फर गा इसको मो विगुरुमति मन पर्यय कानो मानता है। इसलिये ना पदार्थ अब तक परमनोगत नहीं हुआ है भार उसको विपुउ मतिमन पर्यय ज्ञानीने मान रिया ही है तो ऐसी अवस्था में कर सकते हैं कि नह) निम्पन्न हुई है परमनोगत पदार्थवारा मति मिसको बरन स्वयमेव ही मई' क्योंकि उस समय दूसरे के मन में उस रूपी पदार्थ का अस्तित्व नहीं आ ॥ पथार्थ में विपुल शन का अर्थ विस्तीर्ण, विशाल, गंभीर है जिसमें कुटिल, असरस नानार्थफ, विषम सरल इस्यादि गर्भिव है। और जिससे यह मार सकता है कि निपुटमति मन पर्पप ज्ञान से पर के मन में राने वाले काश-पक सरल देसर्वप्रकार के रूपी पदार्थों का नया भरने मागमासे मा मा को मार मम्मा और परका चितवन जोषित मरण सुख दुख लाम भीर प्रक्षाम माविका मो मतमतिमनापपर बानो मामता है। किंतु यह नियम है कि मुनुप्प म्पकमना है मरे प्रकार चितवन पर जिन्होंने प्रगर कप से मन से पदापों का मिथप पर सिया है दीवारा विचारे गये परी का अहमतिमना पपप कामी मानता । पामो प्रम्पक मनाम प्रचार तिवम पर मितापमारे पास निमा महो पिया समाप मम में विचारे पेप्पी पापी महमति ममा पर्यप बानो नहरों मानता मीरमअपेक्षा परमतिममा पप बामका चिपबो. राम बार्तिक).

DODARIODTI एटा निवासी जगम्पसाप पास इस पदद मौर विमवर्य सहित सर्विसिविका शमशःffदी अनुवाद । मध्याप' प २३ ऋजुमतिय विपुलमति जुविपुलमतो। एकस्य मतिशब्दस्य गतार्थत्वादप्रयोग । अथवा ऋजुभ विपुला च ऋजुविपुले । ऋजुविपुले मती ययोस्तौ ऋजुविपुलमती । स एष मन पर्ययो- जान होता है। अपने और परफे मीवित मरण सुख दुःख साम और महामका भी मान गया है या मिस पदार्य म्पकमनकरि तिन दिया गया हैगा भम्यक मनकारि तिमन कियागया भयवा नहीं चितवन कियागया है मागै मार पितवन हागा ग्न सप प्रकारके पदार्यो पिपुल मति मन पर्याय शानी मानता है । (राम० बा• पार्तिक १.) या बम्म और मारकी अपेक्षासे रिश्वमति मनः पर्यय मान विपयका निरूफ्स है। अनुमतिपरिपुनमति प० विपुलमवी | स्वया (=प) अनुमति और (=प) पिपुलमवि (मिखानेसे) अजपिपुनमतीमा मर्थात् अनुमविकामविशम्द खेकर और पिपुलमतिका मविशमलकर दोनों मति शम्दोको मिशानसे "मती" ऐसा दिवधन दुमा भौर अजशब्दका निपुनशम्दक साब मिलानसे अहरिपुल दुभा मतः “मुजविपक्षमतौ" दद् समास दुमा एकस्य ।। मतिराम्दस्य ।। गवार्थसाद ।। =एक पविगम्द भर्षकी माप्ति हानेसे (गतार्थसान्) पा तात्पर्यकी चम्भि होनेसे म प्रयोगा। स्त्र-दूसरे मविशम्दा) प्रयोग भषा व्यपहार नहरि मर्याद एकही मविशन्दको दोनों श्रज मौर विपुलके साप बगानसे भय का भभिमापीमाप्ति होगावीर भव' इस सूममें दूसग मविशम्प नहीं जाये। अथवा अपकमिक्षा।प -मयमा (पेसा भी समास होसका है कि) ऋजु भौर (म्प) विपना (मिलकर) अनुविपुते ॥ अमधिले ॥ मता ॥ ययोरा अनुपिपुलपाक्य) हुमा । अनु और पिपुलर एसी (पती) मिनकी (=पया) वो चिपिपुलमवी । साए । मनःपर्ययः। =ने ऋजुपिपुलमवी है ॥ सो या मनः पर्यय (१) सरह पा असमति जिसकी सो अनुमति इससिपे मविरान स्त्री सिंग होने पर भी अनुमति"राच पुशिाद इससिये ऊपर पुशिाही सियाई (२) पर वार पास्य भूपन के सिपेरे मम्त संस्मताकी पोलधासमै साया माताहै परन्तु इसका अनुवाद रिलीमापाशी पोलचासमें नहीं होसकता है। LAJ % 3D - % 3D एटा निपसी बापमहाप नकोसकस पदणेद मौर विभवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्पन्नः हिन्दी अनुवाद । अध्पाप १ सूत्र २३ भनिवर्तिता काटला च विपुला च । कस्मादनिर्वर्तिता ? वाकायमनस्कृतार्थस्य परकीयमनागतस्य विशात् । विपुला मानियस्प साऽय विपुल मति ॥ घ. अनिर्वविता । कुटिला ॥ * = और( = घ)नहीं निम्पन्न हुई अथवा नहीं उत्पन्न दुई रक(= कुटिला) और ( = घ विपुग॥ विस्तीर्ण (= विपुला), विशाल (= विपुला) वा नानार्थक(= विपुला) कस्मात् ।। अनिषेविता ॥ किस कारण से नहीं निपमाईवा नहीं निष्पन्न मई (= अनिवर्तिता) पापकायमन कृक्-परकीय-मन -गस्प। (उचर) सपन कायमन करि किये हुये अन्य (नीव) के मन में प्राप्त भये अर्यस्य ।। विज्ञानात् । । विपुला । रूपी पदाप के (= अर्यस्य)नानने से । बिस्तीण-विशाल नानार्थको मनि । यस्प ।। अयम् । विपुसमवि ।। मति (अर्थात् मानवाधि)निसकी सो या विपुल मति है ॥ भावार्य फिर किस हेतु से उत्पन्न हुई है। (उत्तर) "स्वयमबाही मई है" (जय० वनिका मुद्रित पृष्ठ १७५)। कैसे ? भविष्यत काल में कोई नीव रूपी पदार्य को विलेगा अब तक उसके मनवारा यह रूपी पदार्य विधारा नहीं गया है उसके मन में वारूपी पदार्थ अम तक नहीं विष्ठाई आने वाले फाउ में चितवन कर गा इसको भी विपुषमति मन पर्पय ज्ञानी जानता है। इसलिये जा पदार्थ वष तक परमनोगत नहीं हुआई और उसका रिपुउ मतिमन पर्यप मानीने मान लिपाही है तो ऐसी अवस्था में कर सकते हैं कि नहाँ निष्पन्न ई है परमनोगव पदार्थारा मति निसको चरन स्लपमेन ही मई' क्योंकि उस समय दूसरे के मन में उस रूपी पदार्थ का अस्तित्व नहीं हुआ ॥ पवार्य में पिपुल शब्द का मर्थ विस्तीर्ण, विशास, गमीर है जिसमें कुटिस, असरल नानार्थक, विषम सरल इत्यादि गर्मित है। और जिससे यह माव अरुकता है कि विपुलमति मन पर्पप हान से पर के मन में राने पाले आशु-पक सरल येसर्वप्रकार के कपी पदार्यों का सपा अपने भा'मासे मा मा गगा कर मना पीर परफा चितवन जोषित मरण सुख दुमक्षाम मोर शाम भाविक मो प्रहमतिममाप सामो सामवायह नियम है कि जो मनुष्य म्पकमना मरे प्रकार चितवन पर सिम्होंने प्रगर रूप से मनसे पदार्थों का निम्प कर लियाग केमाप विचारे गये पर पो से भरमनिममा पपप बानो मानता है। पतु सो प्रम्पक मनाम मघर चितवन पर शिमलसे पास मिथप नहीं किया समाप मन में विचार पेरूपी पदापों सामति मनः पर्पप पानी नहीं मानता परमबीररीपेशा पनि मना परवाना विपरिमो. रामन बार्तिक पा निवासी भगमसाप पकी हर परमोद और निपक्त्पर्य सहित सार्वसिदिका शम्दशः दी अनुवाद । मध्यापरस्त्र २५ आह उक्तो भेद , लक्षणमिदानी वक्तव्यमित्यत्रोच्यते । वीर्यान्तरायमन पर्ययज्ञानावरण- क्षयोपशमागोपागनामलाभावष्टम्भादात्मन परकीयमन सम्बधेनलब्ध वृत्तिरुपयोगो मन पर्यय॥ मतिज्ञानप्रसग इति चेदुक्तोत्तर पुरस्तात् । अपेक्षाकारण मन इति DOTCOMXOOTEDOMROOOOOOT शिष्य वा अन्यषादी मापार्यसे) मरन करतारे (आर)मा पूरुवार (-मार) कि (मनः पर्यप जान के ऋजुमति मनः पर्याान और विपुलमति मनापर्ययान) उक्त मेदा । इदानीम् ० घणम् कम्पम् । =मेद फरे गपे भव (इन) लक्षण पा सस्प रानी पाये। वि० मप्र सपसे वीर्यान्तराय-मन पर्यय- -ऐसे (मरन करने पर) यहां कामावा किपीर्यान्वराय कर्मका और मनापर्यय मानापरण-सपोपगम-भोपादनाम नानापरणीय धर्म का पोपशमसे और भगोपांगनामा नामकर्म के (उदय) वाम-मएम्मात् ।। मात्मनामा परकीय मलापके भपकम्पनसे पा माप्त हानसे (मवष्ट-मात्) मारमाके परके (पराये) मनासमन्पेन । सम्मति ॥ उपयोगा। म्पनके संपोग करि माप्ति हुई है (सम्प) मो मचि ( ऐसा) मानोपयोम मना-पर्यपा पना पर्यप शान हैमर्यात् उक्त कर्मों के प्रयोपशम से भौर उदय के खाम की प्राप्ति होने से प्रात्मा ने ट्रम्प-क्षेत्र काछमावको माग खिये हुये जो सरेके मनमें विष्ठत हुये सौ पदार्य को सस से मान लिया है सो मन पर्यय शान है। मविधान-मसा =(पदि मनः पर्पयशान मन के सम्बन्ध से है नौ) मविधान का प्रसंग हुमा । इविक घेत० पुरस्वात ऐसा संदेर (रम) पर (उपर में का है) कि परिचे (=पुरस्वाद) रक उचरम् ॥ मामा नपरे (मिसकेक्षियेदेखो पृष्ठ ३२५, ३२६ मिसका संपनीचे मी भपेघासारणम् ।। मनः । इतिक (भात् मनः पर्यय शान) मन मषेपामात्र कारण । न कि उत्पत्तिका कारण है) (१) इसका सार्पण पाल्य यासिन्द्रियों और मम शोरा मदिवान सत्पथ होता है। पर मविवान भुवामके होने के लिये कारण रविना मविधान मुबान कमी मी नहीं होता मशिान कारपम्प है और भुवाम कार्यकप रेव मविधान और मुतबाना परस्पर कार्यकारण माव पोंकि मविधाम (इन्द्रियों और) मनरेष बिना नहीं होता है इसलिये शिष्यको यह मान करनेका अवसर मिला कि DOOMOONIDO Oircori 0 ORDOIDOT एटा निवासी गम्पसहाय यकीनरुत पदप्मेद और विमरत्यर्य सहित सर्वार्थसिदिक्षा शमश हिंदी अनुवाद । भष्याय १ सूत्र २३ द्विविध ऋजु मतिर्विपुलमतिरिति ॥ दि रिप । अनुमतिः । पिपुलमविः । इवि० दो प्रकार अनुमति और विपुलमवि इस भांति (वि) २॥ MOONNED ORNDERREDICOROOMPOORBOHPODance - (१) अनुमखिममा पपय मानके तीन मेव मजुमनस्कतापा जुवावस्वार्थ प्रकापहवाह (इनके तप के लिये देखो पृ ४४७) (२) पिपुलमतिमना पर्यपमान पद प्रकार है। (क) अनुमनोगताथविषय अजमनसणार्या अर्थात् अजुमनको प्राप्त पे मर्थ का मामने पाला () पशुपचमगतार्थ विषय वा प्रमुपास्ता भात् अनुपचन में प्राप्त भया अर्थ का सामनहारा (ग) प्रजुकायगताप विषय अनकापावार प्रात् मनुकाप में प्राप्त हुपे प्रयका (=पी पदार्थ घ) सामनहारा (प) अनुजुमनोगताय विषय कामनस्कतापंक प्रात् कामनसे प्राप्त मया अर्मा का सामनहारा (क) अनुगमगतार्प विप पवावापंच अर्थत् पाठवचनको प्राप्त हुमा कपी पदार्पका जानने पाता (क) अनुमकाय पता विषय पापवाद साय में प्राप्तमपा रूपी पदार्थ का सामनेवाला । सम्मति तथा पिपुसमति मा पर्यय बान विपप गदगद और भगव दानो ही प्रसार के हाते से? सो पाते। कोई मी सरल मन परि निप्पय हाव संता विकास संबपी पदानिकी पिबत भया पा सरल पचम करि निप्पम व संता तिनको हत मपा पा सरस पाप पर निष्पन्न भाव संवा तिमय करत मपा पीई मुसि परि फासातरवि भरणा करनेकौं समर्थ नवा पर मायकरि मजुमतिममा पर्यप पवत मपा वा स्मरण करन का अभिप्राय को पारि मौन ही पड़ा रहा वहां अनुमठिमना पपपवान स्वयमेव पर्ष जाने है । वैसे ही : परत पाक मन पपन काय परि निप्पन होत सेवा विकास सम्बन्धी पदार्ममिको तिक्त मपा पा पात भया पापरत भा गरि भूमि परि प्रतेक प्रत पीके मरम करम को समयमा भाप करि विपुनमति मन पर्पपानी के निकन पषत भपा पा मौन से मापात विपुल मन्तिममा पपपदाम सर्पगमे से इनका परप सामना । विकात समापी पुरस इम्प पर्तमान काम विरों जीव चितवन रे तिस पुल द्रस्य को अनुमति ममा पर्यपहान मानता है और विकास संबंधी पुस म्प भूतबार में विपन किया हो अपना शिमला मरिष्यत् में चितवन किया मागा पदा वर्तमान में सिमा चितवन पररारपतीनी रामभर पदाधिपुलमन्ति ममा पर्पपवान बानता TOOGNFO एय निगासी नगस्मसहाय पकीय संच वर्षद मौर निपपत्पर्य सहित सार्यसिदिका शम्दशः विधी अनुवाद । मध्यापरस्त्र २३ आह उक्तो मेद , लक्षणमिदानी वक्तव्यमित्यत्रोच्यते । वीर्यान्तरायमनः पर्ययज्ञानावरण- क्षयोपशमागोपागनामलाभावष्टम्मादात्मन परकीयमन सम्बधेनलब्ध वृत्तिरुपयोगो मन पर्यय॥ मतिज्ञानप्रसग इति चेदुक्तोत्तर पुरस्तात् । अपेक्षाकारण मन इति RoaapoorCOMEDY (शिष्य वा मन्पषादी मापासे) मरन करतारे (मा)पा पुसतारे (मा)कि (मना पर्यय बान के जुमति मना पर्याान और पिपुलमवि मन पर्ययज्ञान) पक मेरः । इदानीम् अषणम् पिकप्पम् ॥ =भव को गये भव (इन) लक्षण पा सरप करना चाहिये। वि मप्र सम्पते बीर्यान्तराय-मन पर्यय- -ऐसे (मरन करने पर) यहाँ कामासा कि पीर्यान्वराय कर्मका और मनापर्यय मानावरण-प्रयोपशम-भोपानाम मानावरणीय धर्म का प्रयोपशमसे और भगोपांगनामा नामकर्म के (उदका) खाम भनष्टम्मात् । मत्मिनामा परकीय -शामके अपवमानसे वा प्राय हानसे (प्पा-मात्) भात्माके परके (पराये ) मनासम्मन्पेन । सम्पपिः॥ उपयोगा। अनके संयोग परि माप्ति हुई है (सम्प) मो मचि (ऐसा) पानोपयोम मना-पर्ययः ।। अनः पर्यय शान है अर्थात् उक्त कर्मों के प्रयोपशम से और उदय के लाभ की माप्ति होने से भास्मा ने दम्प पत्र काममापकी मर्यादा लिये हुये भोसरेके मनमें विष्ठत हुये स्पो पदार्थ को स्पष्टरूप से मान लिया है सोमनापर्यय शान है। मविज्ञान-प्रसार (पदि मनः पर्पयज्ञान मन के सम्मन्म से है सो) मविधान का प्रसंग हुमा । इतिघे पुरस्वाद ऐसा संदो (परम) पर (उचर में करते है कि परिचे (=पुरस्वाद) पक्क उचरम् ॥ का हुभा नचरी (मिसकेलिये देखो पृष्ठ ३२५, ३२६ मिसका संप नीचे भी है भपेसाकारणम् । मनः । इतिक -(माद मनः पर्यपधानम) मन अपेषामात्र सारणी ( न कि उत्पचिका कारण है) (१) इसका सारा पा सत्य यह है बिशनियों और मन दोरा मविधान सत्पन्न होता है । पर मतियान मुबामके होने के लिये परब है पिना मतिबान के मुबान कमी मी नहीं होता, मविधान घरपस्प है और भवबान कार्यकप रेत मविशाल और भुमान का परस्पर पार्मपरष माप है।पयोंकि मविधान (इन्द्रियों मौर) मन के संबंध बिना नहीं होता है इसलिये शिप्यको यह मान करने का अवसर मिला कि एय निवासी नगरस सार वडील व पदयद भौर विभक्स्पर्ष सरित सर्वार्थसिदिको राम्दशः रिदी अनुवाद । ममाप रसभ २३ परकीयमनसि व्यवस्थितोऽर्थ अनेन ज्ञायते इत्येतावदत्रापेच्यते। परकीर-पनेसि ॥ म्यनस्पिता। मनेन ॥ ब्सरे मन में विष्ठता हुआ पी पदार्य इस (मनः पयेय मान ) से शापवे 1 इविक एतारक मात्र अपेक्यते । माना जाता है इस प्रकार इवनी ही (एसानद) यही विपना की गई। जमना पप गाम में मो मन का सम्मापौर महिमान में मन प्रसंबपद वो मना पपंपदाम में भी मतिबान का प्रसंग माया से मन और स्पर्शन रसम पास बहु भोप इन्द्रियों के संबर से स्पर्शन रसन पाव चा भोगापमान प्रार होते हैं सो मसिवान है से ही मना पर्पप बान मी मन संप से पाईपत्ति (मति निसने ऐसा ( मना पयप बान) है रस लिये (मनः पर्यय बान मी) मविहान माम पमा मर्यात् मनः पपपवान मन मिमिरापने से मविज्ञान को प्राप्त होता है।=मनः परपदाल मनो निमित्तामात् मतिजा प्राप्तम्) मावाप मनापपबान भी मन शारा उत्पन होता है और मविधान भी मन शारा (और पांच इन्द्रियों द्वारा) उत्पन होता है इसलिये मनाः पय बामभे मतिबान र सकते हैं क्योकि ऐसोही भा पचनी परिपारी है (= एवम् हिमापी प्रविया) कि अपने मनभरि परम्या मनमै ठारे पे पहा चितवन रास्मारि मनसा मासंपरिचित्य+इति)। (ग्वर) अपेशामात्रपना से ' =अपचामानत्वात् ) तहो । =तम) मन पर्षय बान में अपना और पर के मन की अपेक्षा मात्र परिये है (मना पर्पय पाने का स्वपप्मनोपेक्षा मात्र क्रियते) जेसे (कोईई) बादल में =मम ) अपपा माकाय में ( =प्रम् भरमा को देको (= पपा मम चन्द्रमस पश्य+सि) यह देखने सप काय चन्द्रमा है और पास बा मोकाश राय अपेक्षा मात्र है। वैसे ही ममा पर्मय बान में लिपे वा अवसित रूपी पदार्याका माननारी पाय और स्वपर मम अपेक्षा मार मीर जैसे ममका पाय मतिद्वान है तेसे मनाप मना पपया महीमलकाय मतिदानयत्) । योटिस (मनापम्प हाम) : माशुदिप निमिरापना है। एतस्प प्रारमशुदिनिमित्तत्वात् इति इमो राप्रपतिक मै पात्तिक ५ साह परममा पपंथ धाम तो वीर्यान्तरापर्म और मना पानावरदीप पर्मक यापशम की शक्ति मात्र से और अंगोपांगमामा नामकम के सपनाम से प्रारमा रेविसित वा प्रचशित दुमा है। (देना और २१)ीर गोम्मरसार में इस सब प में मिला है किसे पूर्व प्राथा भवप्रत्यप भवपियान समाते उपर मुणस्पप समाविक विनित उप मे मना कपमान मम्पमिपमत और गमिरे प्रदेशनिधिमा पर गोम्मरवार गापा HRI "मोप्प मन एप मानविन प्रधिन मार पासीसमाचार अंगोपांगनामक मामलम पप तल मालिश्री बमोनालिन मनाय.intaiनरि निपना nिt नौम्मरमारनामा.

एटा निमासी पगलपसहाय दोहकृत पदरछेद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिटिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २३ तस अजुमातर्मन पर्ययः कामतो 4 व ऋणुमतिः । मनः पर्यय कोरत - सही अनुमति मनः पर्यय ज्ञान काल (की अपेक्षा) से "Aस ममका नोष्ट्रिय समम है ना कहिये रितविधिमाइन्द्रिय है से स्पशमादक इन्द्रिय पुक्ट है तैसे मन के पुकटपना नाही सारें मका नौन्द्रिय महामाम है सो तिस म्प माघि मतिभानरप माषमन मी उपो है पर मना पायाम भी उप है गाथा rea रमप्ति मनः पर्यय दान है सोने का प्राय सबके स्पशनादिक हन्दी भर मन भर मावचम काप योग तिमको सापेक्स उपसे है। बारि विपुसमतिमना परंप । सो अवधि शा की सीमाई तिनको अपेक्षा बिनादी निगमकरि जाने " । गाथा ५४५. ग पके मनविर्ष सरमपमें रिसनाप तिता यो पदार्थ ताकी पहर तौहानाम मनिशानकार प्राप्त हाइ भैसा विचार कि पाका मनषिर्ष कहा है। पीजरिनुमप्ति मना पपयशानपरि तिसमको प्रस्वास पने करि रिलुमति मनः परय शामी साने है यह नियम है । पाण ५४८ ॥ व्य प्रति पात्र प्रति पा फास प्रति पा मान प्रति विकार सति कीप चितवन कीया वा नो रूपी पुस मष्य वा पुनसके संबंध धरै संसार साप प्रम्प ठाको समन मापम राए मेदकार मजुमति पा विपुसमति ममः पर्षय शान जाने है। गाथा : अनुमति मनः पयाम रघर पर करि औदारिक शरीर पा मिग्याप समय प्रपद को जाम । मोवारिक शरारविर्ष समप समय मिर्जरा हो है सो एक स्मय विर्ष गोवारिक सपैर के जितने परमाण निजर तितमे परमासूमिका स्कंधों जप्रम्य रिखमति मन पर्यय कान जान है। परिसरफ दिएकी निप्प का ।। सो जितमा है । पौवारिक शरर की अवगाहना संन्याव प्रमागस प्रमाण तिमरिक पर सरितवारिक पर पा समय माय ।मण परमार निर्जरा कप भये तो मेन इम्लिय को मम हर मिति - गुप्त के पारने माग प्रमाण है सि वि पिचने परमाणू निरय रूपम असायशिक करि ग्विना परमाय भापा विठने परमार मिफा स्कंधको सकृए अनुमति मना पर्यय धाम मान है। मेरो समझ में मना परंप बाम म मा कासव पेशा मात्र है। म कि शक्ति अपेक्षा से ,मतिमान में शति अपेक्षा से है। स्मरस रहे मितिवान तो मम और इन्द्रिय तमो की सहायता से ही होता है। और चतुर्थ गुणस्थाम से वाण तक होता है। सबो (-समनस्क) समताप मत हान सा गलियों में रूपे इमिहय पाले जाँघो के होता है की (-समनरक) मसशी (भमनरक) गायों के भी होता है इसलिये पल्पन्द्रियों द्वारा मन की दिना सहायता के भी हो सका है और इन्द्रियों और ममार भी हो सका है।४५१।

एटा निवासी जगरूपसहाप पकीस्कृत पदच्छेद मौर विभक्स्पर्य सहित सायसिदिफा शम्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २३ जय येन जीवानात्मनश्च द्विसीणि भवग्रहणानि, उरकण सप्ताष्टो गत्यागत्यादीम प्ररूपयति ॥ क्षेत्रतो जघन्येन गन्यूतिपृथक्रय(१), उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तर न पाहि ॥ द्वितीयकापतो जघन्येन सप्ताप्टो भवग्रहणानि उत्कर्षेणासख्ययानि गत्यागत्यादिभि प्ररूपयति ॥ क्षेत्रतो जमन्येन योजन पृथक्त्य, उत्कण %3D नघन्येन नीगनाम् । आत्मन द्वि-श्रीणि ॥ = जघन्प करि (अन्य) जीवों के और (घ) अपने पात्मा के दो सौन मतप्राणानि ।। उपेण। = मनका ग्रहण करनेवाला है। उत्कृष्ट कार (अन्य के तया अपने) गक्यिामकिपारिभिः'। (२)सप्त अधै। परापपति। = पहले अगलं आदि से साव बाठ (मो) को मानता है प्ररूपयति अर्थात् कास करि मालुमति मन पर्पप ज्ञान का विषय जघन्यपने अतीत अनोगव रूप दोप तीन मब है उस्कृष्टपर्ने सास-पाठ भव है क्षत्र जघन्येन । (गव्यक्-िपृषास्त । = सत्र (की अपेक्षा) से जघन्य करि तीन से ऊपर नौ से नोचे (= पृथक्त्व) कोश है उस्कपण। पोजन-पृषकत्वस्य । अम्पन्तरम् ।। = उत्कृष्ट करि तीन से उपर नौ से नीचे (= पृथक्त्व) पोमन के भीतर है नए पॐि द्वितीय-कालता = न कि वाहिर । दूसरा (विपुलमति मन' पर्यप मान) काल (की अपेक्षा) से जघन्येन ग सम-प्रो मामाणानि | उत्करण। = अन्य करि सात बाठ भव का ग्रहण करनेवाला है। उत्कृष्टकर असख्येपानिः पविभागति-प्रादिभिः। प्ररूपयतिा = असल्याते (भव) पहले अगले वादिकार कपन करता है क्षेत्र ॐ मघन्येन। = (विपुलमति मनः पर्पय मान का विषय) क्षेत्र (की अपेक्षा) से बचन कार पोजन-पृथक्त्वम् ।।। उत्कोण। = तीन से ऊपर नव से न्पून (= पृषाव) पोमन (ममाण) है। उक्तटकार (१) सपम्पेन पाक्य पुहिगौर नपुसंकहिगी। हममेहमालगोपाई मत मियतमही या है। पता कहांपुलिंगदानपुसकर्मिग मिला। (२) मीराम पुलिंग पवन क्योकिरसमाप गण "मवाप्रपार किया गया। (३) गम्पनि-गप्युत-गम्पएपनाची रसके अप (1) रामोसी सम्बाई या एक कोमnो पासो एप (m) पर भूमिमदारपेये पामोनो।(नामा मनन गा पासपोय. गाम्मरमार (बोका गापा ) अपचपनी स चमिपनि पभोमामालीचरन सिनापाकोगकिया. : % एटा निवासी ममहासापकीय पदच्छेद और विश्वस्पर्व सहित स्वार्षसिदिका सम्पम विदी खुमाद । सम्पाप १ एन २१, २४ मानुपोचरशलास्याभ्यन्तर न पहि ॥ उक्रयोरनयो पुनरपि विशपप्रतिपत्त्पर्यमाह- ॥ विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥२४॥ मानुपासरशैलस्प। = (विपुलमविमन' पर्पपज्ञान का विषय सेन की अपेक्षा से) मानपायर पर्वत के अम्पन्तरम् ॥ न (१वदि उपोः । अनयो। = मीवर (भीतर) है न कि वाहिर ।। कदे ये दोनों (मे मन पर्यय सान) में पुनः अपि विशेष प्रतिपनि-अर्यम् । बाह = फिर मी विशेष की प्राप्ति के लिये (आचार्य अमिम सूत्र) कहते हैं कि विशुद्धप्रतिपाताभ्या तविशेष ॥ २४ ॥ रिशुदि अमविपावाम्पान्। (मार्यो पापरिणामोको )विशुदिऔर अप्रतिपात(पारिश्ररूपोपर्वतसे नहीं गिरन)ोतुओंसे सह विशप । = उन (मथुमति और विपुलमतिमन पर्पयमान) में भद है अर्थात् पशुमतिमन पर्षय ज्ञान से विपुलमतिमन फ्पपज्ञान विशुदतर हे वा अधिक विशुद्ध है और ऋजुमति मन पर्यममान वोधर्मे छूट जाता है परन्तु विपुलमतिमनः पर्पपतान केवल झानहोने तक राता है यही परस्पर दानों में अन्तर वा भद है ॥ (१) यह पार म सा दे कि मानुपातर पपरके वाहिर मनुम्पनही है इसलिए नरखाक प्रयद पह स्यान महा मनुष्य पास फरते ६ उक मानुपातर पमतके मवर हा मावर है । गम्मत तार मायकोर गाया में सेवको अपेसा इस प्रकार कहा है "भरक्ष कमला पवन कया है साहा मनुष्य ल कर पिम्फाका मा परिमास है सा सेना पर मनुष्य सत्क तो गात है पर यह विपुसमविका विषयभूत क्षेत्र समुचतुरस्र धन प्रार कहिए समान पोकोर घन रूप प्रतर मेन फमा है सामासास ला पासन लम्बा सिवना ह चाड़ा मैसा परिमास जाना। रहा ना यारो हैवाने घन प्रतर कमा है जाते मानुपोत्तर पर्वतके पान चारा कायनिरिप सिरा देष शिव चितप हुए विनकी मा असर यिपुसमनिमनः पपयवान माने है " ०" सास योजन (२) इस सूयका पाठ मार मर्य दिगम्बर मार धिर दानों भामाशेने एकपा है। हमारे यहाँ मो महो यहाँ यद लिपि ६ पकहासा पाउ मिसता है। श्येताम्मर मानायके समाष्प तत्वार्याधिगम सूत्र (इस पत्य) में यह २५वा सत्र है पयोकि यहाँ "तिषिपाप' सूत्र अधिक है। (पिराधिय अप्रतिपातम पिराम्पप्रतिपानी ताम्मा पियरमविपाताम्पो तयार्षिशेषस्तविशेषः। सूत्रा सुनेरे सर पदोको ४लासपोजन ४५ साल योजन एटा निवासी मगरूपसदाप वकीलकृत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्भः हिंदी अनुवाद । मध्याप १ सूत्र २३ जय येन जीवानात्मनश्च द्विसीणि भवग्रहणानि, उत्कण सप्ताप्टो गत्यागत्यादीभ प्ररूपयति ॥ क्षेत्रतो जघन्येन गव्यूतिपृथक्रव(१), उत्कर्षेण योजनपृथक्त्वस्याभ्यन्तर न पहि ॥ द्वितीयकाखतो जघन्येन सप्ताप्टो भयग्रहणानि उस्फणासख्ययानि गत्यागत्यादिमि प्ररूपयति ॥ क्षेत्रतो जघन्येन योजन प्रयक्रव, उत्कर्पण %- - मयन्येन। नीपानाम् । आरमन द्वि-त्रीणि.in = अघन्य करि (अन्य) जीवों के बौर (= घ) अपने आत्मा के दो तीन भामरणानि ।। उत्कण। = मक्का ग्रहण करनेवाला है। उत्कृष्ट कर (जन्य के तथा अपने) गति-प्रागति-आदिमि । (२)सत-अयो। प्रयपपति। = पहले आले आदि से सात आठ (भवों) को मानता है मरूपपति अर्थात् काठ करि अनुमति मनः पर्यप मान का विषय अघन्यपर्ने अवीव अनोगत रूप दोप तीन मब में उत्कृष्टप. सात-बाठ भव हैं क्षेत्र मा जयन्पेन । (गव्यति-पृषक्त्व ,।।। = क्षेत्र (की अपेक्षा) से जघन्प करि तीन से ऊपर नौ से नोचे (= पृषकस्य) कोश उत्कर्षण। पोजन-पृथक्त्वस्य । अम्पन्वरम् ।। = उत्कृष्ट करि तीन से उपर नौ से नीचे (= पृथक्त्व) योमन के भीतर है नक वहि द्विसीप-कारव8 = न कि वाहिर । दूसरा (विपुस्मवि मन पर्यप मान) काल (की अपेक्षा) से गधन्येन । सप्त-अधै। भवमाणानि उत्कण'। = जघन्य करि सात आठ भव का ग्राण करनेवाला है । उत्कृष्टकर असत्येपानिः॥ पविभागवि आदिमिः। महफ्पविा = अप्तख्याते (व) पाले अगले माविकी कपन करता है सेवस नवन्येन। =(विपुस्मति मन पर्पप ज्ञान का विषय) मेत्र (की वपेक्षा) से वन्य परि पोजन-पृथक्त्वम् ।।। उत्कोण। = तीन से ऊपर नब से न्यून (= पृपाख) पोमन (प्रमाण) है। उत्कृष्टकर (१) अपम्पेम वाक्प पुहिगौरमपुरुसग है। हमनेमामगोप्रा संत मिपात नहींच्या है। प्रवाहोंपुलिंग कहानपुसकसिंग लिना। (२) मोयम पुलिंग गुपचन योकि इसके मारे राम "भव प्रअन्पाहार किया गया है। (३) गम्पनि गप्पत गप्प पार्यबाचो इसके प्रर्य ( दो मामय सम्पाई पाएकोम दो कोसी उप (1) मा भूमि महारोगे पाम होता है। (मा भाप्त संसपोरा सचत कारा पा र गोम्मरसार (जो की माया w५) पचायो त पचामिप सहित पठापनोमामानी दिने कसम मम पिनासमोभवादने एक तकिया। .

गिनिमी जगरूपसहाय पीलात पदम्छेद गौर विमक्त्यर्थ सरित सार्यसिद्धिका सदशा हिंदी अनुवार । अध्याय १ मत्र २४ विशुद्धिश्व अप्रतिपातश्च विशुध्द्यप्रतिपातो ताभ्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेप ॥ विमुदिः ॥ प० भाविपातः । प विशुदि अप्रतिपाने । पहुरि विशुद्धि और अप्रतिपात (मिलकर) विशुद्धधमतिपातौ (ऐसा पाक्य) हुमा वाम्पाम् ॥ (विशुद्धषप्रतिपाताम्पाम् ।) नाम्याम् (बोदकर) पिभुदयप्रतिपानाम्पा (यह वास्प) छुआ यो रिशेप । वरिपर म्सयोः (विनमें) विशेप सो तविशेष है। यह व्युत्पत्ति इस " विशुद्धयति- पाताम्पो तदिशेप " सय पकी हुई । जिसका अर्थ ऐसे है कि उज्वलता वया न च्युत होना विन दो हेतुओंस दिन (मनुमतिमनः पर्पयज्ञान, विपुल मतिमनः पर्ययप्तान)में विशेष अथवा मेद है। (१) प्रश्न पाठविपुरमती मन' पर्प सूधम हो जुमतिमा पयमान सया यिपुलमतिमनः पर्पयाममें मतर या भेव है सा स्पप है फिर 'पिशुपतिपाuniविशेष: इस सूचका फ्यों आरंभ किश गया है (उत्तर) मया सूर्य से गुमतिमनः पर्य ग्याम और विपुग्मतिमन' पमानका आपसमें विशेष पतझापा पपा है यह मापारण है । मर्वमनुभ्योंका उमस संतोष महीं हो सब इसलिए विशेष म्पसे इन दोनों पानाम भेदभार पतसाने के लिये यह ५४वा सम फहा है। (२) माना- सिम र मन फ्याशन प्रमति गौर पिपुलमति भेव है उमही भांति उमफे ही पिशुसि और मप्रतिपात भी मेव है। यदि । यो अभिप्राप दे तव ता इस सूत्रमे पगमका प्रयाप करना चाहिये । (उत्तर) घ शपका उळेश्य नहीं करना चाहिये फ्योंकि जिस प्रकार मम qmमामा कनुमति और विपुलमति भेर उसी प्रकार दिपिशुभि और मप्रतिपात मी मना पफ्यमानके भेव हाते तप वासूधमें घ शम्ध करमा पुछदाता । माटोमही किनु पे (विशुयि मोर अप्रतिपात) काठमति और विपुममी के समान भेव नहीं है परम विशुचि और अप्रतिपात ये दो जमवि पिपुस मतिमा पल्प विशेष । तिससे न शप्पका मप्रगग है। सारांश इन दानो मामुमति और पिपुसमति मा पर्यपसानों में मानमति पिगुम दे मोर पिपुनमतिमा पयज्ञान अनुमविकी अपेक्षासे द्रम्प क्षेत्र काल भाव फे विशेष माननेकरि पिशुखतर है अथवा अधिक पिपुर। मामवि विपाना दैविपुग्मवि अमतिपाधी है इसलिये स्थस्य विशेष होने से घसम्म सूत्रमें नहीं लाये है।

एरा निवासी नगरूपसहाय वोरकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २४ तदावरण चयापशमे सति भारमन प्रसादा विशुद्धि । प्रतिपतन प्रतिपात न प्रतिपात अप्रति पात । उपशा तकषायस्य चारित्रमोहोद्रेकापच्युतसँयमशिखरस्य प्रतिपातो भवति । क्षीणक्षायस्य प्रतिपातकारणाभावादप्रतिपात %- (१)पदच्छद और विभवस्यर्थसहित इस सूत्र पर सस्कृत सर्वार्थसिद्धिपत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद । सद मारण-पोपशम । सति। =स (मन पर्यपनानावरणीयम) के आवरण के क्षयोपशम होनेपर (= सति, आमन । प्रसाद निशुर ॥ प्रतिपक्षनम् ॥ = आत्माकी सवरता (प्रसाद) सो विशुदिहै। (सपमसे) गिरनावाच्युत होना प्रतिपात । शान्त पारस्प। सो प्रतिपाता है। उपदान्त मोरवाले (जीव) का अर्थात् म्यारावामुणस्थानवतीका पारिशमोर-सायात् । प्रायुवत यमसित्तरस्य'। चारित्रमोहनीय कर्म की उत्कटतासे सयमरूपी शिस्तरका (से) प्रस्युत होना (२) गिर परना, उसटा आय पड़ना, उखटा आना, मावार्थ संपमपरिणामको घटवारी महिपान भवति क्षीणपापस्प = सो मतिपात है । क्षीणक पायपारे के अर्थात् पारावो गुणस्थोनवीके मविपाचारण-अमात् । अतिपात ।। = (संयम से) गिर पड़ने के निमित्त के अमाष से वातिपात है (१) स्मरण रहे कि यहां पर मी। समापृष्ट ४१ में है।, पोन्तिपप कर्मका और मनः पर्यय पानापरणीय कर्मका ज्योपशमसे और मगापाग नामानार के ( रपयके ) लामकी प्राप्त होमसे प्रारमाके परिणामोंकी उर पळता सो पिएर षा विस्ता। यहां ससेपार्य एकप नाम पचिम सिया है। ११२) पासा समति मना पाय मोप्रतिपाती है पयोधिप्रामतिणसा पराम तथा चपक दोमो श्रेणियों पर पड़ता है उसमें पद्यपि सपी मासे घर मतिया'का पतन नही होयापि उपयमासी अपेक्षासे पतन होता है और दूसरा पिपुलमति मना पर्पयशाना पंपस सपकासो मारता है और पाता है रसका पतन कदापि नहीं होता नियस पेषल बाम प्राप्ति करता है। इसय पिपुलमति मनः पयन है मोमपरिपाली मिसिएर परिणामानों पर पाम्पमा हा सो पुतिपाती कर लाता है जिसके पिएस मार्च को पनमा म हो रम्भा पनिपाती पहने । घरमति' मना पपप पान तो नियम है कि पुतिपक्षी कमके स्योपरामसे निरल मया है। परिमितमान मा पर्दय पाम विरासतरा पोकि मन गर्यपानापरणीप के पापशमसे प्रतियपकारि निमसमा॥

- (टानिमोसी जगरूपसहाय वीसात पदच्छेद और विमत्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मत्र २४ विशुद्धिश्च अप्रतिपातश्च विशुध्धप्रतिपातो ताम्याम् । तयोर्विशेषस्तद्विशेष ॥ विमुदिर 1II च मप्रतिपातः । प विशुद्धि-अप्रतिपादौ । पारि विश्वधि और मप्रतिपात (मिलकर) पिशुपातिपातो (ऐसा पास्प) हुआ वाम्याम् । (विमुदपप्रतिपाठाम्माम् ।) नाम्याम् (बोदकर) रिनुवातिपादाम्या (यह वाक्य) हुआ तमो । विश्शेप । तनिश्चेपा। -तपोः (तिनमें) विश्वेप सो तविशेष है । यह व्युत्पचि इस "विशुपति- पाताम्यो सदिशेप " सब स्त्री हुई। जिसका अर्थ ऐसे है कि उज्वलता सवा न प्युत होना तिन दो हेतुओंस तिन (अजुमतिमनः पर्यपधान, विपुल मतिमनः पर्यवधान में विशेष अथवा मेद है। (१) प्रश्न पतविपुलमती मम पर्य। म सूत्रस ही जमतिमनः पर्ययमाम तया विपुलमतिममा पर्यपकानमें मतर या भेव है सा स्पप फिर 'विशुपातिपादाभ्यातविशेषः इस सूत्र का क्यों प्रारंभ किया गया है (उचर) ईसर्या सूत्र में मो मासुमतिमनः पर्यमाम मौर विपुलमतिमान पपपमानका आपसमें विशेष पवन पा गया है यह साधारण है । मर्वमनुष्योंका उमस संतोष महीं हो मम है इसलिए विशेष म्पसे इन दोनों मानों में मेव-भवर समाने के सिये या २४वा पुत्र कहा। (२) प्रश्नः-मिम प्रकार मन पपयमान के अनुमति और विपुसमति भेद है उमही मांति उमफे ही विशुषि और अप्रतिपात भी मेव है। यदि यही अमिमापीर वो इस पूनमें च शापका प्रयोग करना चाहिये । (उत्तर) च शपका सल्लेम नहीं करना चाहिये फ्योंकि जिस प्रकार मन पर्पयमामा नुमति मौर विपुममति भेद है उसी प्रकार रवि पिशुदि और मप्रतिपात भी मना पफ्यमानके मेव हाते तप तासूत्र में च शब्द कहना युज हाता । सो वो है नहीं किये (विशुवि और मप्रविपात) मति मौर विपुग्मति सम्पन मेष नहीं है परन विशुसि और अप्रतिपात ये दोऊ शमति विपुल मतिका पल्प विशेष है। विससे प शम्दन मप्रयागरे। सारांश इन दानो कनुमति और विपुग्मति मा पर्यपसानों असमति पिगुम है और पिपुलमतिममा पर्ययज्ञान अनुमतिकी अपेक्षा दग्य क्षेत्र मात्र पिशेष जाननेकरि विशुबतर है मपया अधिक पिगुर है। सहमति प्रविपाता है विपुग्मति अप्रविपाती है इससिये स्वस्य पिशेष होमे से यशप मूवमें नहीं पे है॥ मना RIGURENA . पटानिवासी जगस्पसहाय पकीलात पदच्छेद और पिमपत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दप्स हिंदी अनुवाद । अध्याय १२त्र २४ तत्र विशुध्या तावत्--ऋजमतेर्विपुल्मतिर्द्रव्यक्षेत्रकालभार्विशुद्धतर । कयमिह ? य कार्मणद्रव्यानत भागोऽन्त्य सर्वावधिना ज्ञातस्तस्य पुनरनन्तमागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेर्विपयः । तस्य ऋजुमतिविषयस्या नन्तभागीकृतस्यान्त्यो भागो विपुलमतेर्विफ्य । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् ॥ द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुता । १० पिशुद्धा ॥ सात समवे, -तहां मिलताफरि वो (सावत) अनुमति मन' पर्यप झानसे रिपुलमति द्रव्य-क्षेत्र-कार-माथे । विपुलमतिमनः पर्वमशान द्रव्य, क्षेत्र, काल, माघ (के विशेप मानने) करि 'विमुडवर' । यम् ! " इह अधिक या कतिशय विशुद्ध है (-पिदतर:) यह (म) कैसे (=प्रथम्) ? या । कामणद्रव्य भनन्दमाग' । अन्त्या बो फार्माण इल्म के अन्तिम ( अन्त्प) अनंतो माग मपिपिना 'शात । तस्य । पुन' म्सविषिशान द्वारा जाना गया है तिउ (अतिम वनंतवा माग) के फिर (-पुना) अनन्तमागीकतस्प । मन्त्यः भाग -अनंत माग किये जा (वो यह) अंतिम माग वा यन्त का अंध (अन्त्य भाग.) अजुमः । विपया - जुमतिमन पर्पप शान का विषय है अर्थात् कार्माप द्रव्य के अनन्त मागके अनन्तले माग रूपी द्रव्य को शुमति मनः पर्यय मान वाला बानता तसा अनुमतिविपपस अनन्तभागीकक्स । -विस अनुमतिमनः पर्यय मान के विषय के अनन्त माग किये जायें (नौ यह) अन्त्य । माग । विपुलमते ग विषया । संत का वा अंतिम माग विपुलमति मनः पर्यय धानका पिपप है अर्थात् मिस जनसवें मागको अनुमति मनः पर्यय जानने पिपप किया है उसका मी अनंस्वा माग जो कि र म्यवहित ( किया हुआ) और यरूल है पिपुलमतिमनः पर्यय मानका विषय है अनन्तस्य । अनन्त मेदत्वात् ॥ क्योंकि अनन्त की (गिनती वा गणना के) मर्मत मेद होते हैं (वता अनन्त में और मनन्त के अननावे माग में अनन्त का माग फिर फिर कहा ) ग्य सेम-कारत विशुदि-उक्ता ।। ठप, क्षेत्र, काल (की अपेक्षा) से विशुद्धता वा उज्वलता कही गई अर्यात् ग्रन्मकी अपेक्षासे वो विशन्ता यहाँ यी क्षेत्र और कालकी अपेक्षा के लिये देखो पृष्ठ६५३६५५५५५५५४ ART" - माफ्ठा ण्टानिवासी जगरूपसहाय वकीतहत परछेर और विभवस्यप सहित सार्वसिदिका सम्पमा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २४ भावतो विशुद्धि सूक्ष्मतरद्रव्याविषयत्वादेव वेदितव्या, प्रकृष्टक्षयोगशमविशुद्वियोगात् ।। अप्रतिपातेनापि विपुल्म तावशिष्टः । स्वामिना प्रवर्द्धमानचारित्रोदयत्वात् ॥ ऋजुमति पुन प्रतिपाती, स्वामिना पायोडेका द्वीयमानचारित्रोदयत्वात् ॥ यद्यस्य मन पर्ययस्य प्रत्यात्ममयं विषेप., अयानयोरवधिमन पर्यययो कुता विपेश इत्यत आह . =माप (की अपेक्षा) से (जुमतिमन' पपपमानसे विपुलमति मनः पक्वान) विशुदिर ममता =(परिणामों की) उज्वलता वा विशुद्धता अधिक सूक्ष्म (सक्ष्मतर) ट्रम्प रिपपत्वात । एव० दिसध्या ।। छपके पानपनेस ही जानना योग्य है मकृष्ट क्योंकि (अणुमतिमनः पययज्ञान से विपुलमति मन पययवान में) उत्कप क्षयोपशम-विशुद्धि-योगात ॥ =(मन पर्पयशानावरणीय कमके) धयोपनमकी रन्ज्वलवाफा प्रसग है अर्थात पिपुलमति मन' पपय मान अत्यन्त सूक्ष्म द्रव्यको विषय करता है इसलिये उसका अस्पन्त सूक्ष्म स्मी पदार्थोका विपय करनाही माषफी अपेक्षा विश्वदि है। अप्रतिपातेन , अपि (सपमकी) पट पारी न होने की अपेवा से मी (ऋणुमति मन' पपय मानसे) विपुलमतिः ।। विशिष्ट । स्वामिनाम् ।। =पिपुलम तमना पयपमान विशेषयुक्त वा भष्ठ है फ्पोंकि (इसके) स्वामियों में अर्थात विपुलमतिमन' पयपशानिर्यो वा विपूल मतिवान पारकोंक प्रमईमान चारित्र उदयस्वाद ॥ बढेडुये पारित्र का उदय होवाई (संयम पदार्गा जाता है बपतक केवली न हो) पुन' . अजुमतिः। प्रतिपाती । और (-पुना) ऋजुमतिमना गययज्ञान प्रतिपाती है अर्यात पारित्र एटमी जाताई क्योंकि (इसके) अधिपतिमों के अदि ऋमुमतिमनः पययसानियोंक कपार-उद्रेकात् ।। दीयमानचारित्र उदयवाद । कपायकी उत्कटतासे डीयमान (फ्टवे हुए) पारित्रका उदय होता है यदि • अस्य ।। मन पर्पयस्य । प्रस्यात्मम् ।। अयम् जो इस मन' पर्यप ज्ञानका अपना स्वरूप प्रति (प्रति-आत्मम्) यह पिशेर । अप . अनयो । वाघिमन पर्पयो -विशेष है तो अब (अथ) इनदोनों अवधिशान और मना पपयवानों में मृत * विशेष मावि अत: बाइ क्सोकर मेदहै ऐसा (प्रश्न होने पर) इसलिये (प्राचार्य करते हैं कि नमसन स्वामिनाम:

ण्टानिवासी जगरूपसहाय यकीलात परछेद और विमक्स्पर्ष सहित स्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिदी अनुवाद । अध्याय १ सय २४ तत्र विशुध्या तावत्--ऋजुमतेर्विपुल्मतिर्द्रव्यक्षेत्रकालभाविशुद्धतर । क्यामिह ? य कार्मणद्रव्यानत भागोऽन्त्य सर्वावधिना इतस्तस्य पुनरनन्तभागीकृतस्यान्त्यो भाग ऋजुमतेविषयः । तस्य ऋजुमतिविपयस्या नन्तभागीकृतस्या त्यो भागो विपुलमतेर्विपय । अनन्तस्यानन्तभेदत्वात् ॥ द्रव्यक्षेत्रकालतो विशुद्धिरुता । सपा विमुद्या ॥ तावत मामुमते । को मिनदसाकार तो (भाषत) अनुमति मनः पर्यय शानसे पिपुलमतिः । द्वन्म-क्षेत्र काल-मावैः ।। पिपुलमतिमनः पर्यय मान द्रव्य, क्षेत्र, काल, माप (के विशेष जानने) करि विगुड्वर सपम् !* इ. अधिक या अतिशय विशुद्ध है (-क्तिवतरः) यह (1) कैसे (यम्) ! या कामपद्रव्य मनन्तमाग । अस्पः।। यो कार्माण द्रव्य के अन्तिम ( अन्स्प) मनता माग मावपिना नाव । तस्य । पुन' सविपिसान द्वारा बाना गया है तिज (बतिम अनंतवा माग) के फिर (=पुन.) मनन्तमागीमतस्य । अन्स्फा मागः । अनंत माग किये जायें (तो यह) असिम माग वा अन अंध (अन्त्या मागा) अजुमलेसिया अहमतिमनः पर्पय ज्ञान का विषय है अर्थात् कार्माण द्रव्य के अनन्त मागके मनन्तवे माग रूपी द्रव्य को अनुमति मनः पर्यय भान पाला जानता है सम्प। जुमतिविपपस्य ॥ अनन्तमागीकृतस्स । तिस ऋजुमतिमन पर्पय ज्ञान के विषय के अनन्त माग किये जायें (सौ यह) अन्स्पा । मागः । विपुतमवे ग पिपयः । =अंत का वा अंतिम माग विपुलमति मना पर्यय ज्ञानका विषय है अर्थात निस बनर्व मागको वमुमति मना पर्यय छानने पिपय किया है उसका भी अनक्यो माग बो कि र ध्यपरित (=किया हुआ) और सूक्ष्म है विपुलमतिमनः पर्यय पानफा विषय अनन्नस । अनन्क्मेदत्वात् ॥ क्पोंफि अनन्त की (गिनती या गणना के अन्त मेद होते है (वतः अनन्त में और अनन्त के बननाषे भाग में मनन्त का माग फिर फिर कहा) द्रन्ग क्षेत्र भारत विदि-उका ॥ द्रव्य, क्षेत्र, कास (की अपेक्षा) से विशुद्धता वा उन्मठता कही गई अति व्यकी अपेषासे तो विश्वा यहाँनी क्षेत्र और कालकी मपेषाके लिये देखो पृष्ठ५५३,३५५:५५५ प्र . Raar- 17. माक्ता प्रगनियामी जगापमहाय पीताव परपद और निमस्पर्ष सहित सर्विसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय २४ भावतो विशुद्धि सूक्ष्मतरद्रव्यविषयत्वादेव वेदितव्या, प्रकृष्टक्षयोपशमविशुद्वियोगात् ॥ अप्रतिपातेनापि विपुल्म तविशिष्ट । स्वामिना प्रवर्द्धमानवारित्रोदयत्वात् ॥ ऋजुमति पुन प्रतिपाती, स्वामिनां कपायोडेका दीयमानचारित्रोदयत्वात् ॥ यद्यस्य मन पर्ययस्य प्रत्यात्ममय विपेष, अथानयोरवधिमन पर्यययो' कुतो विपश इत्यत आह - माप (बी बपेधा) से (ऋजुमतिमनः फ्पयधानसे विपुलमति मनः पक्वानमें) पिनुदिा ॥ पक्षमतर =(परिमामों की) उज्ज्वलता या विशुद्धता अधिक सूक्ष्म (क्ष्मतर) द्रव्य विपपत्यात । एव० वेदितव्या ।। अन्यके जानपनेसे ही जानना योग्य है क्योंकि (ऋजुमतिमन' पपपशान से पिपुलमति मन पयपमान में) उस्कप षयोपशम विशुदि-योगात ॥ (मन पर्पयन्नानावरणीय कमके) क्षयोपशमकी उज्ज्वलताका प्रसग है अर्थात पिपुलमति मनः पयय धान अत्यन्त सूक्ष्म द्रव्यको विषय करता है इसलिये उसका अत्यन्त सूक्ष्म रूपी पदार्योका पिपय करनाही भावको अपेक्षा विशुद्धि है। मप्रतिपासेन : अपि (संपमकी) घट पारी न होने की अपेक्षा से मी (अनुमति मनः फ्यम मानसे) विपुलमति । विशिष्ट । स्वामिनाम् ।। =पिपुलमतिमना फ्ययान विशेषयुक्त या श्रष्ठ है क्योंकि (इसके) स्वामियों में अर्थात विपुलमतिमनः पक्यानिक वा विपुल मतिमान धारकों प्रबदमान-धारिय उदयस्वात् ॥ पढ़ेहुये चारित्र का उदय होताई (संयम पढ़वाई बाता है अपतक केवली न हो) पुनः माजुमति प्रतिपाती। और (-पुना) काजुमतिमना गययज्ञान प्रतिपाती है अर्थात् चारित्र एटमी जावाई स्वामिनाम: -पयोंकि (इसके) अधिपतियों के अति मजुमतिमन' पपपशानियों फपाय-उद्रेकात् ।। दीयमानषारित्र उदयत्वात् । कापकी उत्कप्तासे हीयमान (पटते हुए) चारित्रका उदय होता है यदि ० अस्य । मन परयस्य ।। प्रत्पात्मम् ।। अयम् जो इस मना पर्पय प्लानका अपना स्वरूप प्रति (प्रति-आत्मम्) यह विशेष । अप अनया पाघिमन पर्पयो =विशेष है तो अब (अय) इनदोनों अवधिज्ञान और मनः पपपमानों में इस विशेष इति अत: आT म्क्योल भेद ऐसा प्रश्न होने पर) इसलिये (पाचार्य कहते हैं कि ABELGAO एटानियासी उगमसहाय वकीलकृत पदं छेद और विमक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय २५, विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनः पर्यययोः ॥ सूत्र २५॥ विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविपयेभ्योऽवधिमन-पर्यययो २५ -विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविपयेभ्योऽवधिमनः पर्यययो (विशेप. भवति) निमुदि क्षेत्र विशुद्धता उन् क्लवा वा निर्मलता, वही कके विद्यमान पदाकि हानका होना स्वामिन् पिपयेम्प' । -स्वामी या झानोंका प्रयोग करने वाला और पेय वस्तुओंके हेतुसे अर्थात इन चारोंकी अपेक्षासे वा क्लिक्षपतासे पाधिमनपर्ययो , अवधिशान योर मन पर्पप शनाम पि भवति T विशेष, मेद या अंतर होता है मावार्य अवधिधानकी अपेयासे मनः पर्पय धान अधिकतर विशुद्ध है (जिवने रुपी पदार्थाको अवधिधान पाला जानता है उनको मन पर्यपमानी मनोगत होने पर भी अधिकतर शुद्धता स जान लेता है अवधिमानीसे मन पपयवानीके परिणामोंमें अधिकतर विशुदता है) ॥ () अधिमानसे मन' पर्ययज्ञान पोडे क्षेत्रवाला है। अवधिमानके उत्पचिका क्षेत्र प्रसनाली पर्यत है और विपयका क्षेत्र रावे लोक है । मनः पपपज्ञान मनुष्य लोकही उत्पन्न होता है और मनुप्प लोकका विष्कम्म पैतालीस लाख योजन चौडा और पैतालीस ठास योजन लमा समान चौकोर घनरूप स्तर क्षेत्र (पहरा ऊंचाई थारी है इससे धन प्रसर कहा ) इसका पिप क्योंकि मानपोचर पर्वतके वाहिर चारों कोनों में तिमुवे देव और तिर्यप द्वारा चितित और स्थिव पदापीको मी विपुल मवि मनः पर्यय शान जानता है ।। () अवधिमानसे मन पयज्ञानके स्वामी का पानोंके प्रयोग करने यासे बोरे हे संम्मामें नमन है क्योंकि अवधिमान पारों गति के सैनी पंचेंद्रिय जीपोंक होता है और मनः पर्याान गर्मज मनुप्प फर्मममिके पर्याप्तनिकेत्री प्रम छठवें गुणस्थानसे धीपकपाय पाएको गुणस्थान तक उपरे है स्यादि देखो पृष्ट ४६४ से ४६६ तक ।। (१)त्म कसमार यहाँ मपत्र पक पाटी। पतामर मान यमें मनः पयशप स्थनमें 'भग: पोप पाठ भागों संप्रदापोंमें एफ।। ममा पर्ष मोर मनापार रानो एकाधवानी है । रमारी ममममें मन पर्पय मितमा ठीक है क्योंकि सूचका पाठ छनुदामाता है दाना मम्मवापामें समसम मप मो पानावर अप्राय विधाऽयधि २१ पुष भधिक हानेस इस पूनमो गणनारथी हमारे यहाँ पचीसी है। - - । एटानिवासी गरुपसाय वक्रीसकृत पदोद चौर दिमदर सहित सर्वोपसिविका यादी अनुवाद । मण्याप १५ २५ विशुद्धि प्रसाद । क्षेत्र यतस्थान्मावान्प्रतिपद्यते । स्वामी प्रयोक्ता । विषयो ज्ञेयः ॥ तत्रावघे (१) अबपियानसे मनः परम शानका विषय सम है। कार्माण उज्य के निस अंतिम मनतवें मागको सर्वावधि मानने विषय कर रस्सा उस अनत मागका मी मनस्वो माग अनुमतिमनः फ्पम बानका पिययोर जिस पनत्व मागको अनुमतिमनः फ्पपज्ञानने विपय किया। उसका भी अनक्यो माग बोकि र व्यवरित और सक्ष्म है यह पिपुलमतिमना पपपलानका विषय (खो स्त२७,२८) पोंकि धनतके अनतमेद माने है॥ पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित पच्चीसवां सूत्रपर सस्कृत सर्वार्थमिद्धि वृत्तिका शब्दश अनुवाद विशुदि प्रसाद । पत्रम् ॥ यत्र - उन्न्वरमा, निमलता है वह विशुद्धि वा प्रसाद ॥ स पारवा सकके स्वान् ।। मावान् । प्रतिपयते T तिष्ठहुये मावनिकों वा रूपी पदार्थों को प्राप्त होता है अथवा बान्ता है प्रयोक्ता । स्वामी । विपमा पा सत्र अवघा (मानक) प्रयोग करनेवाला स्वामी है॥झयषस्तु सो विषय है। वहाअवधि पानसे [१] प्रश्न:-शासों में मन पश्य पान की अपेसा मवधिमान प्रविषप भषिक दम्प मापा गया है और मन पल्प शामका विप मप द्रम्प कहा क्योंकि सर्वावपिक विम्बमूत सीद्रम्प का मन्तवा भाग मना पर्पय मामका ट्रम्प वा विषय है ( सत्रर) और पापात प्रसिमकिजिसका विश्व अधिक दम्प होता है वा अधिक विशुर और सिमका विषय न्यून वा माप दम्य होता है पर अन्य विशुस कसा माता मता अधिक द्रव्यको पिपप करने के हेतु मम पयामान की अपेसासे अपधिमान ममिक विशुप और सम्पद्रम्पको विषप परनेके कारण मम पपप घन अस्स पिशुग है॥(उत्तर) संसारमें एक मनुष्य तो ऐसारे जो समस्त शासोवा प्पास्यान तो फरहा है परन्तुग्नका एक देश रूपसेही म्याम्मान करता है, कहा क्या सिमा किन रूपसे मिखाइम मयर ममस्त म्पमे उनके मर्यका म्पाधान नहीं करमाय-म्म कर मम्मय है। दसरा मनुष्य पेसा है कि केवम पत्री शखका म्यास्पान करता है परन्तु प्रत्येक अर्य को मिय मिप दर्या कर समस्त पसे अयोधमेमें ममयन पोनों प्रकारके मनुष्योंमें पीछे का मनुप्प विशेप विशुष साना पार समझा जाता है उसी प्रकार पपपि मनः फ्यय जानकी अपेक्षा भवधिपान का विषय मधिषवम्य है पातु पर उसे एक देश स्थूल स्पसे जामता है और मना फ्यय पाम पिपय अवधिम के विषप का मर्मता भागीठो मी पहात से रस मादि पपायों के माथ समस्त रूपसे मानता है इसलिये अयविज्ञान की अपेमा मना पर्यवान दो मपिक पिशु।।

एटानिवासी वगरपसहाय पफीरकत परच्छेद और विमत्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका धन्दना हिंदी अनुवाद । वप्यार १ सय २५, मन-पर्ययो विशुद्धतर । कुतः । सूक्ष्मविफ्यत्वात् ॥ क्षेत्रमुक्त विशेषो वक्ष्यते ॥ स्वामित्व प्रत्युच्यते । मना पर्ययः । विशुदवरा । कुता मन पर्ययवान अतिशय का अधिकतर विशुद्ध है।क्योंकर (विद्यादतर है) सूक्ष्म विपपस्वाद || क्योंकि (मना पर्यशानका ववविधानसे) पिप पा जानपना सूक्ष्म है क्षेत्रम् ।। उकम् ॥ क्षेत्र (क्वधिनान और मनः पर्यय हानका) (पहिले) कहा गया है अर्थात जुमतिमनः पर्यपधानका विषय क्षेत्रकी अपेक्षासे बपन्यकरि तीनसे उसर । नौ से नीचे कोन है। उत्करकार तीनसे उसर नौसे नीचे (प्रपत्व) योमनके भीतर है न कि पादिर। (विपुलमतिमनः पर्पय धानका विषय) क्षेत्र (की अपेक्षा) से बषन्पकार तीनसे उमर नवसे न्यून (-प्रपात्र) योजन प्रमाण है। उत्कृष्टकरि (विपुलमति मनः पर्पम झानका विषय क्षेत्रकी अपेक्षासे) मानपोचर पर्वतके भीतर मीवर है नकि पाहिर (पेखो पृष्ठ ४५४-४५५-टिप्पमी (१) पृष्ठ ४५५की अवश्य देखो) पहुरि "अवधियानके उत्पचिका क्षेत्र असनाली पर्पत है वर विपक्का क्षेत्र सर्वलोक है" अर्थप्रकाशिका सूत्र २५ पारों गतियोंकी अपेक्षासे अवधिमानके क्षेत्रके सपन्धौ (पृष्ठ ४३५, ४३६, ४३७ अवश्य देखो) विषय (मर्थात् अवधि मना पर्यपहानके खानपने का मेद स्त्र २७, २८ में पल्पता =कहा जायगा मावार्य अवाप्तिान और मनः पर्यपवान रूपी पदापों को विषय फरते है सर्वाषषि मानके पिपसे अनंता माम सूक्ष्म मनापर्यय मानका विषय होता है (वदनन्तमागे मनापर्ययस्य स्त्र २८)। -(भपषितान और मनापर्यपमानमें) स्वामीपन या अधिपतिपन (का मेद) प्रत्युम्मा कहा जाता है। विषयः ।। स्वामित्वम् ।

एंटीनिवासी अमरूपंसदाम पफीलकृत पदच्छेद मौर विभक्त्यर्य सहित सर्विसिद्धिका सम्दशः हिंदीजनुवाद अध्याय १ सय २५ प्रकृष्टचारित्रगुणोपेतेपुवर्तते प्रमत्तादिक्षीणकपायान्तेषु।तत्र चोत्सद्यमान प्रवर्द्धमानचारिपु न हीयमानचारित्रेपु प्रकट चारित्रगुण-उपेवेषु ।। प्रम-आदि -ठम पारित्र गुणको प्राप्त होने पर प्रमच (छठे गुणस्थान) से वीपकपाय-अन्वेष वेr शीणकाम (पारहवा गुणस्थान ) पर्यन्तमें (मनः पर्यपमान ) होता है अर्थात प्रमत्तसंपमी मुनिसे मेकर क्षीणकपाप स्पमी मुनियों तफले उक्त शान होता है तदा (छठे गुणस्थान से पारदर्ने क्क) मी (-च) उपजने वाला पा उपनाऊ (मना पर्यय) तत्रक १० उत्पपमाना। प्रार्दमान पारिप न हीपमान-मारिप, करते हुये पा विधील चारित्रों वालोंमें है न कि घटते हुये चारित्रों पालम भाषार्थ छठे गुपस्थान पतीनि से मारहमा गुणस्पान फ्तीनि में भी सब के मना पर्पयशान नहीं होता परन कमायोंकी दिनोंदिन मंदतासे पडवे हुये चारित्र के ही धारक मुनिकदी होता है और कपायोंकी उत्कटवासे घटसे हुये चारित्रपाले मुनियोंके कदापि उक्तमान नहीं होता है (० मषिधान मोर मनः पर्यपशामके स्वामित्वक भर दिलाने में यह भेद लिख देना भी उचित है कि अपपिकमिका स्वामी मपर्याप्त मषस्था पापा सीप हासना है पपा अपर्याप्त अवस्था पाखा जीव मनापर्ययशानका स्वामी नहीं होम अर्यात जीव अमिशान मपर्याप्त अवस्थामें हो सनी मनापर्यशाम महीं होमपदे (मामाम्पसे अधिशामके देशापपि परमापधि सविधि तीन भेद होते हैं। भवप्रत्ययमवपि नियमसे पेशा वधि ही होगा। और पनविशुधि मादि गुणों के निमिचस होने वाला गुणामस्क्य अवधिणाम देशापधि परमावपि सावषि पेसै तीनों प्रकारका होता है।बपन्य देणपथियान सपत वप मसयत दोनोही प्रकार मनुप्प तथा वियोंक हो । उत्कट देशापविधान सयस जीवक ही हतार चिन्तु परमावधि भौर सर्वावपि चरमशरीरी और मामतीही होता है। पेशापपिधान प्रतिपाती होता है (सम्पपप और चारित्रसे व्युत होकर मियान मोर बसपमकी प्राप्ति) और परमावपि तथा सपिपि मप्रतिपाती होते है। देशावधि परमावधिक अपम्य मध्यम E मेव संमये है किन्तु विधियानमें अपम्प मध्यम समय मेद नहीं है -मा निर्षिस। "भवानुग्नमी मपपिसान मपर्याप्त मबस्थामें पक्रिस्मसे पता है जैसेकि तीर्थक पूर्व मुबान सम्म समयमें भी होता है। किन्तु प्रम्प क्षेत्रकी सामग्री के न मिसनेसे मपात अवरपामें स्फूर्ति अन्य हावी है अपिमाग प्रतिरोष मी धुवकेपटीके मुवानसे कम होते ६ मा सम्पमापि देष नापकियों से अपव मपस्था मी अघिनन होता है और यह प है यिाय पं० माणिकचंद मोरेमा से प्राप्त ।

- एटानिवासी जगरूपसहाय कोउकृत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित स्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २५, : प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमान सप्तविघान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूपजायते नेतरेषु । ऋद्धिप्राप्ठेषु केयुचिन्न सर्वेष्विति ॥ प्रपदमानचारित्रप। चउत्पपमानः ।। पाते हुये चारित्र (वासे) निमें भी उपलने वाला वा उपनाउ (मनः पपयनान) सप्तवि-अन्यतम-शादि -सात प्रकारकी (-विध) अधिोग से कोई एक (=अन्यतम ऋद्धि) प्रासर , उपजायता न उतरेप प्राप्त होने (घालों) में उपजता है कि अन्योम । =स्निा अणि प्राप्त वालोम) अदि-ग्राम केपित० न० सर्वपु कतिक ऋद्धमाप्त वार्लोम किनि म (मना फ्पयन) होय नकि सम्में ॥ (३) मन्यतमनि-मायतम + शशिमो टिप्पणी (प्रम ७11 (३) उपजायते - मि शब्दमें 'जन्' पाय निवानि गणका मामक मारमने पनी पानी पापगप प पिकाम (अर्थात वह मभरी जो स्प बनाने से प्रथम धातमें जोड़ा जाता है। 'अन्' का विना किमी निम्मोपोर बनाने में जागोजानाम मा में प मगानेमे जाय' होशाता है। यात पक वचन मम्पपुण्य प्रारमनेपदी पतमान काळका पोतक 2' मगानेमे शापो बममाता मय होता। ऐमाह (वैप साकत कोश पृष्ठ २१) 'उप' उपम्गके जोड़ने से उपजायते' (-उपजताह) पनता है। मरण सेकि 'जन' पातुझे सम्यते, जापते दो रूप कमणि प्रयोग बनते हैं। ऐसद जन् जाम समणि प्रयोगका 'य' जोड़ने से गौर पमा रकमारमनेपदी एक पखन पतमाकाम मय पुकपका प्रत्पप गाकर जा+प+'मायत अन् + u+ते-जम्पत मनात है। मप उत्पनयिा जाता ऐमारे। (या पर विशि गा प्रसमान संपम होगा वही मनापपयमान होगा सम्पत्र नहीं इसकी विशेष म्याख्या इस प्रकार किममा पयय मामी म्पत्ति मनु रिडी होती है देव नारकी और तिपोम मी होती । मनुष्य? मी गमा मनु पोम ही होती है सम्झनज मनुष्यों में नहीं होती। (पजातिक गमा मनुष्योंमें मी म भमिके मनुष्योकी होती है मोगसूमिके मनुष्योम मही हो सकती। कम मूमि मनुष्योंमें भी दो पर्याप्ति पूर्ण होने से जो पनि बि होती है अपर्याप्तकों के नहीं। पर्याप्तम मी मम्पनमियोंके ही यह पत्पन होताई, मिप्यारपि सासादनसम्पमापि मम्य- मिणारि गुपस्पानातियों के नहीं। मम्पएपों में मी जो मनुप्प सयमी रेग्मोरे होता है असंपत सम्पष्टि चतुर्प गुणस्थानपतियों मौरसपतासंपत पांच पुषस्थानवतियोकि नहीं। संपमियों में मी म्ठे गुणस्थान प्रमत्तसे पारहर्षे तीमकाय गुणस्थान पर्यंत सपमियोंके हो होता है। पाय गुणल्यान मागेर गुणस्थानों पने वार सामियों के महीं। के एपस्थान से बार गुणस्थानतक होमेपरमी सिनन पारित मोको दिनों दिन मातामे दिनोंदिन वर्षमा सहोर होता कि परायों को कटवासे बिना पारिन हस्पमान मदहोवा मचा माता है। पृष्ठ५१७ Get 2.

प्राण ॥ एंटानिवासी मंगरूपसवाय कोलकत पदच्छेद बौर विभक्त्पर्य सहित सार्थसिलिका भन्दया हिंदी अनुवाद । बाय १ व २५ अस्य स्वामिविशेषविशिष्टसंयमग्रहणं वाक्ये कृतम् ॥ =स (मनः पर्पस) के (अवधि से) स्वामीके मेदमें विशिष्ट संपम (-क्तियन पारित्र)का मस्सा स्वामि स्वामिपिोष-विशिएसपम- पारसे ग्राम बाक्स ('प्रकटचारित्रगुणोपेठेप तवे इस पाप) में किया है (नकि सूत्र में) १॥ तम्॥ भावार्य मन पर्पधान की उत्पचिमें विशिष्ट संपमका ग्राम प्रधान हेतु है उनके नहीं होता । मवर्षमान पारिववालोंमें मी मात प्रारती (बुषि-तप-वैकिपिए-मौषपरसपर मझोप ) को पनि बिमके को एक साथ होगी कि बोवा मित्र को प्रधरको विहीं उनके नहीं होता है। वथा कवि मारक पुस्यों में भी किन्हीं शिदिवा सपोरनहीं होता। इस प्रकार ममा पर्वय सामग्री उत्पत्ति विशिप संपमा मरण प्रमान कारण बताया है। परंतु अपपियान देर मनुष्य विर्यव मोर नारको पायें गतियों के जीवोर होता है इस पसे अवधि और मा पर्पयो स्वामियोंच मेद होनसे भी दोनों जानम मेदी।। (0 मस्पार्य स्वामिविशेषण विशिर्ष स्यममार्ण वा प्राइवर || श्येका पाठ । मस्पाप स्वामिविशेषा विशिष्ठ संपवमा पा व मसूत्रे ।। स्पप्यन्या पाठपुस्तकान्तरे वियते॥ अल्प 'मयम् सामी विशेष । पिशिवा संयम -इम (मन पर्पयशान) के यह स्वामीका विशेष अपवा विशिए सपमा पहन । प्रासावर -प्राण पहिले (मर्यात सर्वार्थ सिरिकी परिप्रकट चारिण गुणोपेतेषु में) किया। विक एक। पाठः । अस्प । अयम् ।। स्वामिविशेषः। - ऐसा एक पाठ है। इस मना पर्ययमानके यह स्वामीका विशेष वा मेष पाविति सयसमाप तर नको ॥ -वा विशिष्ठ संयमन महणतत्वार्यसूत्रमें नहीं किया है (वाक्प पा पुचिम किया। विकमपि माप! पाठ । पुस्तक-अन्तरे विपते। -ऐसे भी दूसरा पाठ अन्य पुस्तक (सर्वार्थसिरिकी दूसरी प्रति) में विद्यमान है नवीनों पाक्योंक हिंदी अनुवादसे मात है कि संसस्तके सरके वाफ्य मौर टिप्पणीके दो पाक्योंका भाशय पकसा है।वार्यरामवार्तिक इस मा सरकी "विशिष्ट संपमापेकार्यममवापी मन पर्यया दूमरी पार्तिक है ॥ मर्य-विशेष रूप सपम गुणकरि एकार्य ममापी मन पर्पप काम है मर्यात् मनापर्यशामक अविनामाव विशिष्ट संपम गुणके माथ है। इसकी वृत्ति विशिष्टः संयम गुणा पत्राधिपते तत्रय पर्वते मना पर्ययो' जा पिशुव संपम दो वादी मन पर्पयशान मते है (मम्पन नहीं)। इसी वृति 'विशिष्ठसयममार्ण वाक्ये सम्' का मर्य पमाणास हनी सीने "पावै विशिष्ट सपम पदका प्राण वाक्य " यहाँ पाक्यम्न मर्प पाश्मि है अथवा 'पृश्चिमें होगा क्योंकि विशिष्ठसंयम पद पति पार्विक पार्मि माया र पिपिएसपम, प्रकस पारित, विशुखसंपम वा विशुर चारित्र पनपाची है। हमारी समममें जैसा अर्थ माया यही मिक्षा पटानिवासी जगरूपसदाप रोकृत पदच्छेद और विमपर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र २५, प्रवर्द्धमानचारित्रेषु चोत्पद्यमान सप्तविघान्यतमर्द्धिप्राप्तेषूपजायते नेतरेपु । ऋद्धिमाप्तेषु के चिन्न सर्वेष्विति ॥ प्रबदमानचारित्रा। पउत्पयमान । पाते हुये चारित्र (वाले) निमें भी उपजने वाला वा उपनाऊ (मनः पपयवान) सप्तविष-अन्यतम मदि =सात प्रफारकी (-विध) अद्वियोग से कोई एक (-अन्यतम ऋवि) प्रासर । उपनापने नतरेषु म प्राप्त होने वालों) में उपजता है कि अयोम ( पिना ऋदि प्राप्त गोम) अदि-ग्रामप। पुनित न: सर्वे कातिक =सदप्राप्त पार्लोम किनि म (मन' पपयान) होय नकि सपमें । - (२) भगतमि '-मगतम + अमिनो टिणणी (प्रपा (३) रपजायते-इम शम्दमें 'म धनरा विवाति गणमा मामक मामने पो पात पनवगण 'प' पिकाण (भर्यात पह अमर है जो ल्प बनाने से प्रथम पातमें जोड़ा जाता है । 'जम्' का बिना किमी मिन्मोपोंक लाने का होगातार म मा में यलगानेसे 'माय' होजाता है। माप्त एक वचन सम्पपुष्य मारमनेपदी पतमाम कालका घोतक 'A' प्रलप मगानेमे खायो नातारे अपोता है। पेमाद (य सरकत कोश पृष्ठ २०) 'उप' उपसगके जोर से 'उपजायते (-उपजता) बनता है। मरण रहे कि 'मन' पातुके अम्पते, मापते दो नप कमणि प्रयोगमें स्नते है। ऐसकि अन् मा म कमणि प्रयोगका 'प' जोड़ने से और पमान एक त आत्मनेपदी एक वचन पतमानकाल मन्य पुरुपका प्रत्यय भगाकर 'मा+य+ते' आयत जम् + य+-अम्पत वनात है। मप उत्पलिया जाता ऐमा है। 10) जहाँ पर विशिमा प्रपयमान सपम होगा यही मनापपपसान होगा भन्यत्र मही।इमकी विशेष म्पाख्या इस प्रकार है कि ममा पपयशानी माधि मनुष्यक्तिी होती है देप भारती मौर सियमि महीं होती । मनुपर्यों में भी गर्भस मनुष्योम ही होती है सम्भनय मनुष्यों में नहीं होती। (पजपातिक पृष्ठ ५९ पमा मनुष्योम मी म ममिक मनुष्योंकि दो होती है मोगरमिक मनुयोम मी रोमकती। कर्म भूमि मनुर्योम मी जो पर्याप्ति यो पनि यही होती अपर्याप्तकों मही। पर्याप्तकर्कोम मी मम्पमपियोंके ही यह स्त्पन्न होताहै, मिप्यापि सासादनसम्पनपि मम्प- मणारधि गुणगानतियों के नहीं। मम्पनियों में मी जो मनुप्प संयमी है उनी होता असयत सम्पष्टि बमुप गुणस्थानमतियों और सपत्सव पनि गुणस्थानविपकिन्हीं। संपमियों में भी छठे गुणस्थान प्रमत्तसे पार क्षीपष्यप गुणस्थान पर्यंत संपमियोंके हो होता है। गरहवें गुपरपान मागे गुषस्थानाम पने पाछे संरमियों नहीं। के गणस्थान में पाए गुणस्थानतक होनेपरमी गिनका धारिष अपर्योको दिनों दिन मंदवाले दिनोंदिन पपमान है मौक होवा ईपिन रापोडी करवाये बिन बारिणीपमान मद दोबा पवा माता है। पूर्ण होने से G एटानिवासी बगरूपसहाय लीलात पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सपिसिद्धिका सम्मादी अनुवाद । अपाय१त्र २६ मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥ २६ ॥ CSCA-SAR-SCA पवम्- मतिमतयोनिमन्धो द्रव्येप्वसर्वपर्यायेपु मतिमतयोः विपयस्पनिमन्धा द्रव्येषु मसर्व पर्यायेषु मषति सार्पः मनिम्नयोग, पिपस्सना निमन्य। -मविज्ञान और मध्यानके विपयका सम्बन्ध या नियम (निपन्ध) ठये म्यूठप (जीव भजीप-धर्म-अधर्म-आकाश-काल) निकेपिये असर्व-पर्यायेषु । मपति T कुछ एक, कतिपम, किसनेरु, (न फि सप) पर्यायोमें होता है बर्षाव मतितान और मस मानके वानने (क्फ्यि) का संपन्य सम (छो) पोंकि कुछ पर्यायों में होता है-छको द्रव्यों को सो बानते हैं परंतु उनकी चोटी सी पर्यायोंको दी जान सकते हैं। (२) स्वेताम्बर मानापके ममान्य वस्वार्यापिगमसूममें 'दम्येन्द' के स्थानमें 'सर्वदम्पेय'। शेष पाठ पकनर्य भी पसमायोकि हमारे पहा 'इम्पे' का वर्ष मदम्पेषु लिया है। उसमाप्पमें इस पत्रको संस्था ससिपी प्योंकि हमारे पाकिणीमा पत्र समाव०में दो सरपर दिये है। (३)हमारे पानी पाधा पुस्तकोंमें 'निकाय' पचास है किसी किसी प्रतिमें 'निषेध है। अप्सम्पापीके निम्न सूत्रोंसे निषय मी ठीक पमचन्द्रकोश पृष्ठर में " निय (पु.) नि+मा+पम्' पेमा गडेखोमव प्रम यह किस मपदान्त नया मनुस्वारमें कैसे परिवर्तन मा॥ मपदम्त म्॥ मधापदाम्तस्प झा" या मठाम्पायीने माठयां अम्पायका तीसरे पाएफा चौपीसषा सूत्र। इस पपसे परिमेका मन 'मोग्नुस्वार साहै। इससे मनुस्वारी मनुचि चौवीसवां स्त्रमें जाती है। वष पौषीस मध स्प इमप्रकार होताता है कि " पभपावतस्प समि (मनुस्वार) से सपा सूत्रोमो (म)माकर्षण होता है। इसलिये पेमा म मा कि "मा. मिपावतस्प। शनिमनुस्वाय) समि प्रयाहारसमोर उसमें झम्के मध्य मभर सहित मर्व मासाते है। मर्यादरम्गघ । शरिरात पद।प्रमश स्-सम्मिा अर्याल चौबीस अमके पहिले माने पाण। अपाद-विमकिपाकाल जिसके अंतमें दो। समका मर्प पडामा लिमपवान्त समयमा अपदान्त परे स्थानमें मनुस्वार होवे पदिय अथवान पूर्वोचौबीस मसमिसे किसी भसरके पहिये हो।सरिये निवन्य प्रअनुयार होकर निमहोपया क्योंकि पीप॥मम्प उदारमा जैसे पचानमा पसि, यह पासिापरा मर्दुमकलिंगीय पवन रेपो मपरम्त म प मनुस्वार होगया, पासि का मर्य है बहुत पछ । माकम्+स्पते, कम धातुम् च मनुस्वार होकर मारपते (-पह पोन पिडप, परेमा, सीवेग्म) दोपय । देखो टिप्पणी पृष्ठ सौर पृष्ठ ५४010 4 . पटानिवासी अगस्पसहाय कीसकृत परछे और विमत्यर्थ सहित सर्वार्थसिदिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २५ अवधिः पुनश्चातुर्गतिकेप्विति स्वामिभेदादप्यनयोक्शेिप ॥ इदानीं केवलज्ञानलक्षणाभिधान प्राप्तकाल तदुल्लष्य ज्ञानाना विपयनिवन्ध परीक्ष्यते।कुतातस्प मोरक्षयात ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलामत्यत्र वक्ष्यमाण त्वात् ॥ यद्येवमाद्ययोरेव तावन्मतिश्रुतयोपियनियन्ध उच्यतामित्यत आह पुन अवधि पातुर्गतिका इतिक परंतु (-पुना) वषधिज्ञान पारों गतिवानॊमें है इस प्रकार सामिमेदाद । अपि अनपो विशेपर स्वामी विशेपसे मी दोनों (अवषिशान तथा मनः पद्यान) में मेद है मर्याद मना 1 पर्पयमान तो केवल विशिष्ट संयम धारक मुनियों के ही होता है परंतु अवपिमान देव मनुष्य तिर्वच भौर नारकी पारों गतियों के बीषों के होता है इस प्रकार अवधि और मनः पर्यपके स्वामियोंका मेद होनेसे मी दोनों धाम मेद है इदानींव फेवट्यान लक्षप-अमिधान!In प्राकास॥ -अप (इदानीम्) केपलवानके स्वरूपके कपनका अवसर प्राप्त है ना उठव्य + मानानां विषयनिकन्धा परीक्ष्यते T -उसको मेहकर (उम्म) शानोंक विषयों की सीमा का नियम परखा जार है फिवल ज्ञानके स्वरूपके कयनको मेकर पाक विषम निपम) रमों (करते ) समोर (उच्चर) स्पोंकि सिस (कैक्सयान) के (रपण अमिधानको) मोहनीय कर्मी पसाव । प० पानदर्शन-आवरण- नाश होने (फ हेतु) से और (-१) उसके पभात झानापरणीय दर्शनावरणीय मन्तरापथयात् । केवलम् ।। इतिक अन्तराय कौक पय होने के निमिप) से केवलपान होता है इस प्रकार मा० पापमाणता in न्या (अर्थात दरमा अध्यापके प्रथम सत्रम) कहा मार्गा पदि० एम० आधपोIn एव० तापक यो ऐसे है तो (वाक्त) मादिके दोही (एच) मतिमतयो हा विषय निम्या ।। उप्यताम् T इति अतिज्ञान, प्रसन्मान के विषयका नियम (निमन्स) कहा जाना चाहिये इस लिये (आधा) पते है कि (पुला - पल-णि ("पुनरप्रपमे मेने वथा पक्षविपपिच" स्यमय सापपुर मप्रपमे मेवे पक्षातरे अपि प॥ जनमा(T एटानिषासी मारूपसहाय वकीसात पदच्छेद और विमल सहित सार्वसिदिका सम्वना हिंदी अनुवाद । अध्याय १ व २६ मतिश्रुतयोर्निवन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥ २६ ॥ SSCRECISCESAR द्रन्पेए । भवति T स्त्रम्- मतिमतयोनिपन्धो द्रव्येवसर्वपायेषु =मतिमतयोः विपस्सनिफ्धा द्रव्येषु मसर्व-पर्यायेषु भवति प्लाः मनिमुतयोमा विपयस्यमा निवन्धः। मन्धिान और मुबानके विपपका सम्बन्ध वा नियम (निष घ) -द्रव्य (जी-मजीव-धर्म-अधर्म-आकार-कात) निकेविन असा पर्यायेषु छ एक, कतिपय, कितनेक, (न कि स्प) पर्यायोंमें होता है वर्षात मतिवान और मत मानके बानने (विषय) का संबन्ध सब (छको) द्रव्योंके कुछ पर्यायों में होता है-छो द्रव्यों को वो बानते हैं परंतु उनकी पोरी सी पापोंको ही बान सकते हैं। (१) स्वेताम्बर मामायके ममान्य तत्वापोधिगमस्वपमें 'दम्येव' के स्थानमें 'सर्वदम्पेय' है। शेप पाठ एक है नर्थ मी पपसा क्योंकि हमरे पा 'इम्पेषु' का गर्व मवम्येषु निया॥उसमाप्य में इस पपको सम्पा सांसद रेवोंकि हमारे पाक पीसा के समाप्य में दो पत्र पर दिये॥ (हमारे यहांकी गुषा पुस्तकों में निकाय गमन गवकिसी किसी प्रतिमें 'निबंध। अयम्मायी निम्न सूत्रोंसे निष्प भी ठीक। पाचन्द्रको प्रस१४में "नियात्म, (पु.) निमपम ऐम्म नखोप प्रम पहरे किस अपदास्त ना मनुस्पारमें केसे परिवर्तन एमा मपदम्य म्-५।। माघापदाम्तस्प सा पद बहाम्पायीफे पाठयां अध्यायका तीसरे पावका चोवीसर्वा सूर्य है। इस सत्रसे पहिलेका मन 'मोऽनुवाद" सिलाई। इससे अनुरपारको मनपत्ति चौपीस्वा ममें भावी है। वा पोरीसा साम्प इसप्रकार होजाता है कि "मा पमपादन्तस्य समि (मनुस्वार)!प से सां सूबके मो (क) मार्पयता। इसरिये पेमा रूप दुखा कि "नामा अपारस्प। शनिबनुस्वार) शसि प्रत्याहार है और उसमें झम्के मायके मक्षरस सहित मर्व मानते है । अर्याद वगपू।।ददर एदए। परम् । शप-मित्र बन चौबीस ससक पहिले माने पाग। मपावत-विमति वा कारक जिसके मतमें महो। सुमन मर्ष पहामा हिमपात र मया अपदान्त र स्थानमें मनुस्वार होवे यदि म अयपान पूजपोपीस मामिसे किसी मसरके पहिले हो।सपिये निवपके का अनुस्वार होकर विष दोपपा क्योंकि पीछे ॥वम्प उदाहरण से यशामस्त पसि, या पशासिाप मपुंसकलिंगीय मारमा पहा नफ्यात म् अनुस्वार होम्पा, पासि का भयगत पश || मानवमापते, कम धातुरे म् मनुस्वार होकर आस्यते (-पापमा विमम, करेगा, गीतेमा) दोमया । देखो टिप्पणी पृष्ठ ५ मोर पट १४०,५४५ GGER विपपस। एटानियासी जगरूपसहाय बालकृत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सम्दा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सत्र २६, निवन्धन निवन्ध । कस्य विषयस्य । तद्विपयग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम् ।। प्रकृतं विषयग्रहण । क प्रकृतं ! विशुद्धि क्षेत्रस्वामिविपयेम्य इत्यतस्तस्यार्थवशाद्विभक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्येत्यभिसम्बध्यते ॥ द्रव्येष्विति बहुवचननिर्देश सपा जीवधर्माधर्माकाशपुरलाना सग्रहार्यः । तद्विशेषणार्थमसर्वपर्याय- पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित छब्बीसवा सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश अनुवाद नम् । निरन्धाः म्लगाव (निबन्धन, नो) है सो निमन्ध है अर्थात विषयमत सम्पन्ध है मावार्थ सूत्रमें निबन्ध सन्द है उसका वर्ष समय है और 'निबन्धनं निमन्ध' उस निबन्ध पदकी व्युत्पधि वा व्याकरम की रीति से उत्सधि है वा निकास है। (प्रभ) किसका (निझन्ध) (उत्तर) विपमका (निबन्ध) ॥ (प्रभ) उस पिपय-प्रहर्ग,व्यम्।।तद् न० कर्तव्यम् । =विषय (सम्द) का महण (इस स्त्रमें) करना योग्य वा । (उचर) नहीं करना योम्प पा विपप-प्रार्ण । प्ररुतं । विश्य (पम्द) का ग्रहण (इस सत्रमें) प्रकरण प्राप्त (अरु) है प्रस्नक विशुदिक्षेत्रस्यामिविपयेम्पः । =(प्रश्न) प्रकरम प्राप्त की है । (उचर) 'विनुदिक्षेत्रस्वामिक्सिपेम्प' इति० अव तस्स। ऐसा (पास्प पचीसा स्वमें) है । इस लिये तिस (विषय पर) के मालय वा वाफे के बाभम से (अर्थात् जहाँ बैसा अर्थ लिया जाता है वहां पैसाही) विमतिपरिणाम मवति T इतिक विमतिका परिवर्तन या विपरिणाम या परिपमन होनाता है। ऐसे (इस खाके मतिभुक्योः और निमन्ध सम्दोक नीधर्मे) विपस्स इविक अभिसम्बध्यते T द्रव्येषु इति ऐसा (पद) लगाया गया है पा बोड़ा गया है। द्रन्पेषु (-द्रोलि) ऐसा पहुवचन निर्देश । सर्वेषाम् । बहुवचनका क्तलाने पाठा पा पहुषचनका निर्देशक (पास्प) सप दी-पम-अधम आगाम्माल मुद्गलानाम्।। संपर श्रीवद्रव्य, धर्मदष्प, मधर्मम्प, बाकायद्रष्य, कास्तव्य पुद्गलोक समुबपके अबका वन-विशेषक-अर्यम् मसरपपाय- मर्प । उन अन्यों के विशेषणके लिये मसपर्याय (वाम) का अर्य-वधात रिपपस्स।

।। एव० पर्याः । मअनन्त एटा निवासी जगरूपसहाय पकीलक्स पदच्छेद वौर विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्वना हिंदी अनुवाद । अध्याग १ सय २६, ग्रहणम् ॥ तानि द्रव्याणि मतिश्रुतयोफ्यिभावमापद्यमानानि कतिपयैरेव पर्यायविषयमावमास्कन्दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्तेरपीति ॥ अत्राइ-धर्मास्तिकायादीन्यतीन्द्रियाणि तेषु मतिज्ञानं न प्रवर्तते । अत. सर्वद्रव्येषु मतिज्ञान वर्तत इत्युक्तम् ॥ नैप दोपः। मनिन्द्रियाख्यं करणमस्ति तदालम्बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमलब्धि पूर्वक उपयोगोऽवग्रहादिरूप प्रागेव- प्रान है मर्वाद द्रव्ये शाद विधेष्य है और असपर्यायेषु विशेषण है सानि। याणिया मतिम्तयोमा पिपमाषम्।। ते द्रव्य मति सचानके विषय माषफो जापपमानानि । कतिपयैः प्राप्त हुये (अपने अपने) कितनकदी पायोकारि पियमाक्म् । बास्सन्दन्ति T न -विपयमावकों प्राप्त होते है न कि सर्वपान अनन्त । वपिक इविक पर्यायों सहित ही (अपि) (मतिमममानके विषय मावको प्राप्त होते हैं) सारांश-मतिज्ञान मुबान सप द्रव्यों की कुछ ही पर्यायोंको विपय करते है सर्व षा अनंत पर्यायोंको विपय नहीं करते हैं। पत्र बाह T धर्मास्सिकायादीनि । -यहां प्रम करता है (आर) कि धर्मास्तिकाप आदिक (अधर्म भाकाठ काल मोक्षजीव) अतीन्द्रिय (पदार्थ) है अर्थात इन पदार्योको इन्द्रिये ग्रहण नहीं कर सकती है वेप ॥ मविधानम् ॥ न प्रपर्वते | तिन (धर्मास्तिकापादिक) में मविज्ञान (मो इन्द्रियों द्वारा होता है) न प्रतवा बत सर्वद्रव्येषु ॥ मतिष्ठानम् ॥ पर्वते इसठिये सन (व्हो) द्रोम मविज्ञान प्रतता है इविक अयुक्तम् ॥ न एपदोपः । बनिन्द्रिम्- ऐसा (फयन) ठीक नहीं है। (उचर) यह पण नहीं है। (क्योंकि) मन (अनिन्द्रिय) धास्पम् । परमम् ।। वस्ति 1 तद् मामा (आरम्य) (अंतरंग) करण वा इन्द्रिय है (द्रठगमन है) उस (मन) के बालम्पनः। =निमिचक या कारक (सत्-आलम्वन अर्थात् मन है निमिघ पा देतु मिसको ऐसा) नो-इन्द्रिय-प्रावरम-सयोपशम-सम्धि-पूर्वक मलनोइन्द्रियोमानावरणकर्मके श्योपशमकी प्राप्तिपर्वकालम्बिहे निमिच जिसको ऐसा) उपयोगः । अवार-सादिरूपः । प्राक् एव सउपयोग (हे सो) अवमानहा-आवाय-धारणा (क्तुएय) स्वरुप पहिले दी अतीन्द्रियामि T । एटानिवासी वगरूपसहाय वालकुन पदच्छेद और विमपत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सम्पशा हिंदी अनुवाद । अम्पाम १ सत्र २६, निवन्धन निवन्ध । कस्य विषयस्य । तद्विपयग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम् ॥प्रकृतं विषयग्रहण । क प्रकृतं ? विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविपयेभ्य इत्यतस्तस्यार्थवशाद्विभक्तिपरिणामो भवतीति विषयस्येत्यमिसम्बध्यते ।। द्रव्येष्विति बहुवचननिर्देश सर्वेपा जीवधर्माधर्माकाशपुम्लाना सग्रहार्यः । तद्विशेषणार्थमसर्वपर्याय- पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित छब्बीसवा सूत्रपर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः अनुवाद निरन्धनम् निवन्धः -लगाव (निबन्धन, मो) हे सो निन्धहै अर्यात पिपमत सम्बन्ध है भावार्थ सत्रमें निमन्ध । सम्द है उसका वर्ष संपध है और 'निमन्धनं निपन्छ' उस निमन्ध शब्दकी व्युत्पचि वा व्याकरण की रीति से सस्पचि है या निकास है। पस" विषयस्स म =(प्रभ) फिसका (निबन्ध) (उचर) विपयका (निबन्ध) ॥ (प्रस) उस विषय-ग्रहम, तामन्यात न० कर्तव्यम्, 11 =विषय (शब्द) का महल (इस एपमें) करना योग्य था । (उचर) नहीं फरना योग्य या सिप-प्ररण । प्रकट विषय (पन्द) का मरण (इस सत्रमें) प्रकरण मात (अत) है प्रात तक पिशुद्धिक्षेत्रस्वामिविपयेम्या (प्रम) प्रकरण प्राप्त कहां है । (उचर) 'विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविपयेम्प' इति० मा वस ऐसा (पास्म पचीसा स्त्रमें) है । इस लिये तिस (पिय शम्द) के मप-वनात् ॥ म्भाशय वा वास्पर्म के आभय से (बर्षात् वहां बैसा बर्थ लिया जाता है वहां वैसा) विमतिपरिणाम:। मवति T इतिक विमतिका परिपर्सन वा विपरिणाम पा परिणमन होपाता है। ऐसे =(इस सबके मतिम्तयोः बौर निफ्ध सम्दकि पीच) विपरस्म इति० ममिमम्मम्पते Tयेषु ।। इति। -ऐसा (पद) लापा गया है या बोरा गया है। द्रव्येषु (-इन्योक वित) ऐसा पवयन निर्देश सर्वेषाम् । पचनका बतलाने वाला पा पहुषचनका निर्देशक (वाक्प) सप जीपम-अधर्म मामास-काल-पुद्गलानामा। संग्रा =जीवद्रव्य, धर्मद्रव्य, मपर्मठप, याकामद्रव्य, कासव्य पुरोक समुषयके माता-विशेषण-अर्यम् । मसपाय- भो। उन अन्यों के विशेषको तिपे नसम्पर्याय (पास) का रिपपस ॥ एषक पर्याय एटानिवासी जगरूपसदीय पकीकृत पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्पन्नः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ र २६, ग्रहणम् ॥ तानि द्रव्याणि मतिश्रुतयोपियभावमापद्यमानानि कतिपयैरेव पर्यायैर्विषयभावमास्कन्दन्ति न सर्वपर्यायैरनन्तेरपीति ॥ अत्राह-धर्मास्तिकायादीन्यतीन्द्रियाणि तेपु मतिज्ञानं न प्रवर्तते। अत' सर्वद्रव्येषु मतिज्ञान वर्तत इत्युक्तम् ॥ नेप दोपः । मनिन्द्रियाख्यं करणमस्ति तदालम्बनो नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमलब्धि पूर्वक उपयोगोऽवग्रहादिरूप प्रागेव- प्राण हे मर्याद द्रव्येषु मन्द विश्वेप्प है और असपर्यायेषु विधेपण है प्रणम् ॥ वानि गन्याणि । मतिमतयोता विषयमाषम्। ये द्रव्य मति एतमानके विषय माक्को प्रापपमानानि कतिपयैः याप्त हुये (अपने अपने) किल्नेकडी पागोंकरि विपपमानम् । मास्कन्दन्ति T न =विषयमाक्कों प्राप्त होते हैं न कि वपर्याय अनन्त । अपिक इविक म्प्रान्त स्व पर्यायों सहित ही (अपि) (मतिमखानके पिय मावको प्राप्त होते हैं) सारांश-मतिधान मुनपान सप द्रव्यों की कुछ ही पर्यायोंको पिप करते है सर्व वा अनस पर्यायोंको पिप नहीं करते है। ० थाह T धर्मास्तिकापादीनि । ध्याप्रम करवाई (आर) कि धर्मास्तिकाप थादिक (अधर्म बाकाक्ष काल मोषधीव) वीन्द्रिपाणि अतीन्द्रिय (पदार्थ) है वर्षात् इन पदार्योको इन्द्रिय ग्रहण नहीं कर सकती है प.। मशिनम् न प्रते T =फिन (धर्मास्तिकायादिफ) में मसिम्रान (जो इन्द्रियों द्वारा होता है) नहीं प्रर्ववा है सर्वद्रव्ये मविज्ञानम् ॥ पतते इसलिये सम (छहो) द्रम्ममि मविधान प्रतवा है वेळ अयुक्तम् ।। न एपा। दोपः । अनिन्द्रि-- -ऐसा (कपन) ठीक नहीं है । (उत्तर) मह पण नहीं है। (क्योंकि) मन (अनिन्द्रिय) स्पम् ।। करणम् ।। अस्ति T तत् मामा (आम्म) (अंतरंग) करण वा इन्द्रिय है (द्रव्यमन है) उस (मन) के निमिचक वा कारणक (वत्-आलम्पन अर्याद मन है निमित्त वा हतु मिसको ऐसा) इन्द्रिय आवरण-सयोपशम लम्धि-पूर्वक त(नोइन्द्रिय)शानावरणकर्मके धयोपशमकी प्राप्तिपर्वकालन्धिहै निमिच जिसको ऐसा) सोमा । अवाह-वादिस्मा प्रा एव उपयोग (है सो) अवग्रह-दहा-बावाक्-धारमा (क्तुष्टय) स्वरूप पहिले ही T लिम्पन'।

० - प्रगनिमी उगम्पसहाय वकीलकृत पदच्छेद और विमस्पसहित सार्थिसिद्धिका दश हिंदीअनुवाद अध्याय १ सन २६ उपजायते ततस्तत्पूर्व श्रुतज्ञान तद्विपयेपु स्वयोग्येपु व्याप्रियते ॥ अथ मतिश्रुतयोरनन्तरनिर्देशाईस्यावधे को विपयानिवन्ध इत्यत आह- -उपजता है । पयाव (तता देखो वैद्य कोश पष्ठ ३००) उस (अपग्रह आदिरूप उपयोग) के उपाय T ततस० वस् =निमिसक (अर्यात अवमहर्दहा अपाप-धारणाम उपयोग है फारण जिसको ऐसा) पूरम् ॥ फागनम् ॥ स्वपाग्ये न अन्तमान अपने योग्य उन धर्मास्तिकाय अतीन्द्रिय पदार्पो) के पियेगस यांप्रिय T विपर्यो (अर्याद ग्रहण करनेमें) प्रवर्तता है। सारांश पाहै प्रश्न फरनेपर कि धर्मास्तिकाय पदार्थ इन्द्रिय गोचर नहीं है इन्द्रयोंकी अपेक्षा रसने पाले मविमानकी उनके जानने में प्रशचि नहीं हो सकती इसलिये सप द्रव्यों को मविज्ञान बानता है, यह कहना ठीक नहीं है उचघरमें कहते हैं कि धर्मास्तिकाप आदि पदाकि शानमें मन कारण है श्रुतधानावरण (मोइन्द्रिपधानापरण) कर्मकी श्योपशम लम्धिरूप विचलिके रहनेपर उससे मर्मास्तिकाय आदि अतीन्द्रिय पदार्थों का अवग्रह हा अवाय धारणा स्वरूप उपयोग प्रथम री होलेवाने उसके पीछे भूतमान की अपने योम्य धर्मास्तिकाय अतीन्द्रिय विपयोंमें प्राचि होती है इसलिये धर्मास्तिकाप आदि अतीन्द्रिय पदार्योका पान का मनसे होता है सब यह मतिमान नहीं है क्योंकि मनसे मी मतिज्ञान होता है। अ५० मनिम्नयोः ॥ अनन्तर अप मतिनान और मुवानके निकट अथवा लगवाही निर्देस-मास्य || अवघा ! | =निरूपण चा कपन करने (=निर्देश) योग्य (बईस्प) अपषिमानके क्या पिरनिर यः । इति अत' आह T =विपयका नियम है ऐसा (प्रश्न) है। इसलिये करते हैं कि (१) "तरपुर्ण पप पुशप्पथ प्रयाग उसकी मांति है असकि 'शुतमति पूर्व हमनेक शाक्य भेदम्' पुत्र मर्याद पूर्णम् -पूर्वकम् (१) प्याम्पिा-१ गुदावि गणम यहाँ पर अधर्मक आत्मने पी पातु है इसके साथ मनुषा षि, मा (अर्थात् म) पग माते. पप मित्र हो जाता है औरण्ठे पपच 'म' पिकरप-जोड़नेस 'पानि हाजन है पमात् एकवयन अम्प पुरुष मारमने पदी वर्तमान का 'पप मगररिप्रपागमें शाप्रियत' बनता है। मणिप्रयाग में काम' हामाता है यमणिप्रयोगका प्रस्पप मोड़ो, म्या प्रिया पीछे वा ! गो पानिपत हा जाता है। यहां पश्चिम तरि प्रयोग में इस सप्द का गप। AFE एटानिशसी जगरूपसहाय वकीसकन पदच्छेद मोर विमस्पर्व सहित सर्थिसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । वप्पाप । पत्र २७, रूपिष्ववधेः ॥२७॥ विषयनिवन्ध इत्यनुवर्तते । रूपिष्ववर्ष =रूपिपु (असर्व-पर्यायेषु) अवध (विषय निवन्ध भवति) रूपिए । असर-पर्याये । भूर्तीक (पदार्थ) निके (पिप) किसनेक वा थोरे (नफि सप) पर्यायों में, अपघेता विषय निमन्यः । मनति T अवधि शान के विषयका सम्म प होता है सारांश्च यहहै कि, पुद्गल द्रमके बनते पर्याया। अवधिशानके मिपपसूत्र नहींह किन्तु उसके कतिपय पर्यायोंको और बीवके औदासिक औपश्चमित पायोपयमिक परिणामोंको ही (भवधियान) पिफ्य करता है क्योंकि रूप रस गंष सर्श विशिष्टही पदार्थ मवपिनानके विषय होते हैं मर जीवके पायिक और पारिणामिक माव सथा धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकारद्रव्य, कालव्रत्य मरूपीपदार्थ होनेके, निमित अवधिधान के विषयमत नहीं सकते पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित सत्ताईसवा सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दशः हिन्दी अनुवाद विपपनिपन्य' ।। इति अनुवर्ववे T -पियका निवन्ध पेसी अनुमति (इस पत्रमें) फ्धीसवां और। एबीसपा सूत्रसे यथासम्प आतीहै तपत्र "रूपिष्ववाः पियनिनन्ध" ऐसा हुआ (१) मग सरम गंध स्पर्शच मरण समसमा पारोही मयिनाभाषी ६ मत एकमे ग्रहणस थारों महण होता है। ता-पितत माति शम (२) इस सूचका का पाठ हमार पर्वा सर्वत्र मौर श्वेताम्बर अम्रायफे समाप वार्यअपिणमसूनमें एक और मथमी पोनों समादायमें एसा है। (२) पिजयपे। सूबमें उपराध उपसण है। इससिपे स्पशाप्दके कहमेसे उसके अविनामाधी (सुदे म रह सपने वाडे) रस गप स्पर्शा भी प्राण है। "प्रत्यायपक्षणपाध्यमासकम', उपपक्षणम् । अरस्वार्यससमया (-अपने अर्यका मजाफर),जापूसरे पदार्थों का महण बरनार सफा माम उपसमई जिस प्रकार 'फेम्यो दधि रस्पता' कामोस की पारो। यहां पर कार शम्य उपयसमौसलिये जिनमे मी जीप दहीके विधायक है उन साका काक शप्पसे हम है उसी प्रकार प्रकसमें स शामको उपक्षण माननसे। मिवने उस रूपके मविनामापी रस गप स्पश गुण रम मात्र मायसे प्रान है॥

७ प्रगनिवासी बगम्ममहाग पकीलकृत पदम्छेद और विभरपर्थ सहित सनिसिदिफा शम्दन दिदीअनुवाद अध्याय १ पत्र २६ उपजायते ततस्तत्पूर्व श्रुतज्ञान तद्विषयेषु स्वयोग्येपु व्याप्रियते ॥ अय मतिश्रुतयोरनन्तरनिर्देशार्हस्यावधेः को विषयनिवन्य इत्यत आह - -उपजता है । पचात् (तता देखो वैध कोश प्ठ ३००) उस (अवग्रह वादिरूप उपयोग) के उसजाय ग ततम० सद निमिषक (मर्थात अवमहर्नहा भषाप-धारणास्म उपयोग है कारण बिसको ऐसा) पूषम् ॥ स्मानम् । स्पयोग्पेस अतमान अपने योग्य उन धर्मास्तिकाय अतीन्द्रिय पदापों) के पियेग । व्याप्रियत T -पियोंमें (अर्याद ग्रहण करनेमें) प्रीता है ॥ सारांश यहहै :- :- प्रश्न करनेपर कि धर्मास्तिकाम पदार्य इन्द्रिय गोचर नहीं है इन्द्रयोंकी अपेक्षा रसने पाले मविधानफी उनके बानने में प्रति नहीं हो सकती इसलिये सप व यों ने मतिनान जानता है, यह कहना ठीक नहीं है उत्तरमें कहते हैं कि धर्मास्तिकाय वादि पदार्योफ शानमें मन कारण है घुसधानावरण (-मोइन्द्रिपज्ञानावरण) कर्मकी धयोफ्लम लम्धिरूप विशुद्धिके रहनेपर उमसे धर्मास्तिकाय आदि अतीन्द्रिय पदार्थों का अपग्रह हा भवाय धारणा स्वरूप उपयोग प्रथम ही होता है उसके पीछे भूतमान की अपने योग्य धर्मास्तिकाय अतीन्द्रिय विपर्यो प्रवृत्ति होती है इसलिये धर्मास्तिकाम मादि अतीन्द्रिय पदार्योका मान जय मनसे होता है स्प यह मतियान नहीं है क्योंकि मनसे मी मविधान होता है। अय० मतिम्तयो अनन्तर -अप मविज्ञान और मतदानके निकट मक्वा लगवाही =निरूपम वा कयन करने (=निर्देश) योग्य (स्पि) अवधिष्ठानके क्या सिपनिम्या । इति अत' आह T =विषयका नियम है ऐसा (प्रश्न) है। इसलिये करते हैं कि (१) ""यापर्मे पुर्प'शम्पमा प्रयाग उसही मांति है जैसाकि एतमति पूर्व प्रयनेक शावश मेवम्' सत्रमें मर्याद पूर्षम् - पूर्वम् (२) पानिपट-नुदाविले गमय यहां पर ममक माममे पड़ी भातुरे इसके साथ पनुषा वि मा (भर्यात पा) उपसर्ग माते हैं पत्र मिय जाताय औरण्ठे गमका अधिकरण मोड़नेस 'पापिरजाय है पमात् एकवचन अन्य पुस्य प्रारमने पदी वर्तमान कायम पत्र मगर प्रियागमें "प्रिय बनाता है। मणिप्रयोग में 'T'मि' हाशाता है 'य' कर्मपिपयोगका प्रत्यय मोड़ो म्या प्रिपा पीछे एकते। मार गित राजाता है। यहां प्रति मरि प्रयोग में इस सप्द को मार्य है। निर्देश स्पि ॥ अवया ॥ PEOPM ASSOSORS एटानिवासी जगरूपसदाय षकीलकृत पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्शा दिदीअनुषा अध्याय १ पन २८ तदनन्तभागे मनः पर्ययस्य' ॥२८॥ • यदेतद्रापिद्रव्यं सर्वावधिज्ञानविपयत्वेन समर्थित तस्यानन्तभागीकृतस्यैकस्मिन्भागेमनः पर्यय प्रवर्तते ॥ अथान्ते यनिर्दिष्टं केवलज्ञान तस्य को विपयनिवन्ध इत्यत आह- सूत्रम्-तदनन्तभागे मन पर्ययस्य तदनन्तभागे मन पर्ययस्य (विषयस्य निबन्धः भवति) वत् अनन्तमागे न मनापर्पयस्य ।। -उस (सर्वाषधिय) के मनतो अंश (सक्ष्मवर) में मना पर्यय शानके विषयस्प : निषपामवति ? =विषयका सम्बन्ध है मावार्य नो परमावविज्ञानके विपयस्व पुद्गल स्कन्धमें अनन्तका माग दीजिये तो एक परमाणु माघ सर्वावधिका विषय होय है पहुरि विसमें अनन्तका माग दीजिये वप राजमति मनः पर्पयानका विषय होताहै विसमेंमी अनन्तका माग दें तप निपुलमतिमनापर्ययम्मानका विषय होता है (५० जयचंद जी) पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित अट्ठाईसवा सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिदृचिका शब्दश अनुवाद (२)यत् ॥ एतद रूपिन्द्रयम् सर्वावषिशानविपयत्येनबो यह रूपी पदार्य सर्वावधिष्ठानका विषय होने से समर्भिवम् ।। तस्स : समर्थन किया है वा सिद्ध किया है। विस (सावधिक विषयभूतरूपी पदार्थ) के अनन्तमागीश्वस्य । एकस्मिन् ।। मागे । अनन्त माग किये जाये तो उसके एक अंश में मन' पर्यय ।। प्रपर्व ||अय० अन्से =मनः पर्यय (पान) मयता है । अब अन्त में यत् ॥ निदिरम् फेफ्लमानम् कषित (=निर्दिय) जो (व्यव) केवलज्ञान है विस (केवलज्ञान) फे विपय-निपपा H इतिक अतः माह T विषयका नियम क्या है । इस लिये (आचार्य) कहते हैं कि (१) पायाम्पर जानायके ममाप मनापर्यरस्य के स्पानम 'मनपर्यापस्य' है। माल पाठ और मर्यमी दोनों माघापोंमें एफसा है। मनपर्पयस्य। (२) अवधर्मना पर्ययस्य सामयिषपस्वदर्शनार्थ सूमियम तु विश्पनिबन्यनार्थम् । पतो मनापर्ययस्थावधिविषयानम्तमागेऽम्पनापि पर्शितासि प्रपर्वते हास पासवरम् । सर्वार्थसिविमो शिवीगासिमें ति पायम्वरम् के स्थाममें 'इस्यप्पधिका पाठा पेसा पाक्यो । पेसा अधिक पाठ भी है। मयो । मन पर्पयरस : सूरमविषयत्व दर्शन -अवधि (पान) से मना पर्यप (पान) का सरम विपपताके समझानेफे पापवाने के अर्थमः॥ पवन ॥ पम्। म पिएपनिसर्पम् -लिये (अर्यम्) या सूत्र है जिन्तु (अ) विषयकी इयचा पा सीमाके लिये नहीं है तस्य एटानिवासी जगरूपसहाय पीलकृत फहन्छेद और विमवस्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याप १५ २७ : रूपिप्वित्यनेन पुद्गला पुलद्रव्यसम्वन्धाश्च जीवाः परिगृहयन्ते । रूपिष्वेवावघोपियनिवन्धो नारूपष्विति । नियम' क्रियते । रूपिप्वपि भवन्न सर्वपर्यायेषु स्वयोग्येष्वेवेत्यवधारणार्थमसर्वपर्यायेष्वित्यभिसम्बध्यते ॥ अय तदनन्तरनिर्देशभाजो मन पर्ययस्य को विषयनिवन्ध इत्यत आह- सपिए । इनि० अनेन । पुद्गला' । १० पुद्गलद्रव्य- कमी (पदार्थ) निमें ऐसे इस (शब्द) करि पुल और पुद्गल द्रव्यके समपाः । वीवाः परिगणन्ते T रूपिए । एक सयोगी जीव लिये गये हैं पा ग्रहण किये गये हैं । रूपी (पदार्थ) निमें ही पापा । विपरनिराध । न० अरूपिए । =अवधिधानके विषयका (सम्बध) है न कि अमूर्तियों में इतिक नियम । मियत T रूपिए । अपि भवत्।। =ऐसा नियम कियागया है। स्पी(पदार्य) निमेंमी (अपधिष्ठानका पिफ्य) होता हुआ न० सर्वपर्यायेण । स्वयोग्येषु । एव० असमस्त (किसनेक) पर्यायोंमें अपने योम्पही है अर्थात् पुद्गल द्रपके ककपर्यायों । में और पुद्गल सयोगी जीवके औदायिक औपठमिक क्षायोपचमिफ परिणामों को ही अवपिठान को विपप करनेकी योग्यता है (देखो त्रार्थ पृष्ठ ४७१) इति० अवधारम-वर्थम् ।। असपायेपु । -ऐसा निश्प करने के लिये (अवधारण-अर्थम्) असपर्यायेषु इति० पमिसम्बन्ध्पते T =ऐसा (वास्प सूत्र) लगाया गया है अर्याद विपय सन्दकी अनुचि पचीसो और 'निपन्ध सम्दसी भौर 'यसपायेपु षास्पकी मनुवधि सम्पीसो एनसे लीगई तव पत्र ऐसा हुमा कि 'असर्वपापपुरूपिष्वरः विपपसनिपन्या मया का अनन्तर निर्देशमाजा। म्भय उस (अवधियान) के लगवा ही (अनन्तर) कहने मोम्प (=निर्देशमाजा) मनः पर्यपस्य । विषपनिपन्ध ।। इति यता आए मना पर्यय (मान) क विषयका नियम क्या है इसलिये करते हैं कि (१) मपत्'-'म' पातुध पर्तमान ध्वम्त रागापा वर्तमान हबम्त पेस बनाये मते कमातुध पदप छेता जो अभ्यपुस्य पवन वर्तमान मनरेभपय मग्नने से पहिले बन जाता है। इमरे पमात् वर्तमान पता मत् पदि पातु परस्मैपदमें हो और (वर्तमान दम्तका) मान प्रत्यय परि पार मात्मने परमें हो जाता जाय । अब भूको गुनसका मामा म मा प्रफम गपञ्चम विकरण छगाने से भय हुआ मत् जोड़ने समप+मामा परि मस्पय माररममें महो वो उसप परखा 'म' गिरा देते है भता मपत्मा। ROR पटानिवासी अमरुपसहाय पीसकृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २९ सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेपु पर्यायेष्विति ॥ जीवद्रव्याणि तावदनन्तानन्ताान, पुलद्रव्याणि च ततोऽप्यनन्ता- नन्तानि अणुस्कन्धभेदेन भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि, कालश्वासख्येयः इतिक सर्वेषु ॥ द्रव्येषु ॥ सर्वेष । पर्याये। इस प्रकार समस्त प्यों की ।। पामि (फेवलपानझे सिमका नियम) है वापत् जीव द्रव्यानि ॥ अनन्तानन्तानि १० प्रथम (स्तावत्) जी द्रज्य 1 व नन्त है और (-) पुलद्रव्यानि तामपि ० अनन्तानन्तानि-पुदतवमै उन (जीवों) से भी (-ता अपि) अनन्तानन्गुणे यमुस्कन्धमेदेन मिमानि - धमअधम- अणु स्कन्पके मैदकरि जुदे मुदे वा पृथक पृथक् है । धम द्रव्य, अधमद्रव्य आपसानि ॥ श्रीणि॥ १० काला। असस्येया। =और बाकाप्नद्रव्य वीन हैं अर्थात् ये सीन एफ एक द्रव्य है और काल असंम्पास है अर्थात् "कालद्रव्यके कालाणु असंम्पात द्रव्य है। ये गिने जाने योग्य नहीं है X (१) छोगागामपदेसे पोकेमे रिसाहु पदारपणाण रासी प ते कासाणू मुणेयप्या ॥१॥ इति गायोफ प्रकारेव कामद्रम्पस्या- रुपायामात्य धर्माधर्मामशानामनेकप्रदेशवेऽपिक्षबारमायामाषादेफेकायमपयोयम्पम् पोगग्स-पदेसे एकत्रो (-लोकप्रकाश-प्रदेशका परिकस्मिन्दा)-सोकाशाशके एक एक प्रदेश में दिपायोमारपणा (स्थिताहि. एकेकारखानाम् Im) --एक एक ही (दु-मलु) स्थित है। रगोकी पसीप. (राशि) - राशि वा समाके सटश (परस्पर मिप मित्र) तेसमापू मुपेयम्या (ते। काम-अपपः । मन्तम्पा.) - फाळके अणू समझना चाहिये ॥ घे असंख्यदण्य है तिक गाथा-उज्यकारेषाद्रम्पस्य ॥ अणुस्पस्यात् ॥ -ऐसे गाया में कप मेद करि कालन्द्रमा के अनुरूप होने से मानप्रत्वम् ॥ घम-अमर्म-जामशामाम् | अनेक प्रदेशवे ॥ - मनेकता है । (पण्ठ धर्म अपम आकाशवम्मों के पास प्रदेश होने पर अपि सहारमक-अमापात् ।। पके कपम् ममायणम् । -मी सरस महोने (के हेतु) से पृथक् पृषक पना जाना चाहिये। भाषापा-जिस प्रकार रपोध र एकत्र होमेपर भी उसमें प्रापेक रन जवाद पैसेही कासवाणु सुदे सुदे पर पायात् एक छोनाराके के प्रत्येक मवेश पर परुपा कर ममसे विष्ठे हुय परम् पर्मदम्य अपर्मद्रम्प और माकासम्म फे प्रसस्पात असख्यात प्रदेश ये प्रदेश ऐसे मिले ये है कि कमी जरे उदेमनी होमकये है इमसे य तीनों पक पक द्रण ही है । धम द्रव्य अधर्म द्रव्य सम्पूण सोको विछमें सेल की माति प्यार मौर आफाशके जिन देशोंमें स्थित है नहीं प्रदेशोमें स्थितरहते हैं इसके प्रदेश अस्प है ॥ देखो स्पपिसिचि पुचि अभ्याप ५ म १९ पर संर्वद्रव्यपर्यायेषु पानिपासी जगरूपसाप पकोलकत पदपछेद मौर विमफ्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका अप्दशः हिंदी अनुपाद । अध्याय १ पत्र २९, केवलस्य॥२९॥ द्रव्याणिव पर्यायान द्रव्यपर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्वः॥ तद्विशेषणं सर्वग्रहण प्रत्येकममिसम्बध्यते सूत्रम्-सर्वद्रव्यपयायपुकवलस्य सर्वद्रव्यपर्यायेपु केवलस्य (विपयस्य निवन्यः भवति) मद्रव्पपर्याये रतस्य विपयस्य । सम्पूर्ण द्रव्योंकी सम्पूण पार्योम केवलज्ञानके पिपयका निरन्माः । भवति T नियम है मावार्थ एक एक द्रव्यकी त्रिकालवती अनन्तानंत पर्याय है सो छों ठयोंफी समस्त अवस्थाओंको केवलमान युगपत् पफ साप जानवा है पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित उनतीसवा सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश अनुवाद इन्पामि, १० पर्यायाः, प० द्रव्यपर्याया। इति =द्रव्य और पर्याय (मिलकर) 'द्रव्य पर्यया' ऐसा वाक्स इतरेमरयोगलपणा, इन्द। परसर (इतरेतर) योगलक्षणवाला वा अन्योन्मयोग नामका इन्द्र समास है छन्-विरोपणम् ।। सर्वप्रहणम् ॥ -उस (द्रव्यपर्याया इन्द्र समास) का विशेषण "सर्व। (ऐसे शब्द) का प्रहण प्रत्येकम् अमिमम्मध्य T अस्पेक (द्रव्य सन्द और पर्याय शम्द) पर लगाया गया है (अमिसम्मप्यते) पर मनापर्पपस्व अपधि शिष्य अनम्त -पपोंकि (-यता) ममा पर्यप मानका (विपप) अपपिक विषपसे सनम्ता मागे मग मपि.दर्शिता पश्चिम -भाग है। दूसरे स्थानमें मी (इम संसव सार्थसिविकी) प्रकाशित पत्ति में प्रपतति पाठ अन्तरमप्यधिक पाठ-प्रवर्तता है पा विधमान है (देला पृष्ठपट चिसूम को) ऐमा अन्य पाठहै। (अम्प अथ) फ्योंकि मना पर्पपमानकी प्रवृत्ति (नधि) अधिनामकोपके समता मागमें तपा(-अपि) अवधिमा पसे मिन्न पस्तुोम मी ( सम्पत्र) (भागम में) ताई को (-दर्शिता)। ऐसा अन्य पाठ है। ऐसा नपिक पाउ मोरे (१) म मत्रका पाठ और मर्प रोनों सम्पयामि एक॥ (२) अपके अपरपा विदोष धोत्र नाम पर्याप है प्रम्यकी पपरया विशेषजोसो पर्याप पायान् द्रवति भूयते वा ताति प्रणम्मो) मपनी पर्यायों को प्राप्त हो पा तिन (पायों) करि (-) प्राप्ति की माप ऐसा दम्म। पानुमे पर पत्थर का मेपर (पु-यो-पू) वप्प शपकी सिदि। (३)ोतीन मादि पप सपनो मरनी पिमपि त्यागकर जोनमा ग्गा शप्पा गम महते है। मौर मे मो पहले हो पर मुखित तथा पीपा शप्प समुपप कमाता है मो समुश्वि सपा समुप सिमारपमा सोपा मम्मत पहले। a एटामिपासी ममरूपसहाय पीसकृत पदग्छेद और विमवत्पर्य सहित सार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुपाद । मप्पाप १ पत्र २९ सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेषु पर्यायध्विति ॥ जीवद्रव्याणि तावदनन्तानन्ताान, पुम्लद्रव्याणि च ततोऽप्यनन्ता नन्तानि अणुस्कन्धमेदेन भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि, कालश्वासख्येय' इवि० सर्वेषु ॥ द्रव्येप.। सर्वेष । पाये। =इस प्रकार समस्त यों की म पर्यायमि (केवलपानके विषयका नियम) है साक्क मीष द्रष्याणि ॥ अनन्तानन्दानि 14 प्रथम (स्वाक्त) बीर द्रज्य । वनत है और (-१) पुगलद्रव्याणि ॥ तः अपि अनन्तानन्तानि-पुद्गलद्रव्ये उन (जीवों) से भी (ततः अपि) अनन्वानन्गुणे अशुस्कन्धमेदेन । मिनानि धर्म-अपम अणु स्कन्धके मेदकरि मुदे मुदे वा पृथक् पृथक् है । धर्म द्रव्य, अधर्मद्रव्य जानाशानि वीणिm काल । असंरस्येयः। =और आकाशद्रव्य वीन है अर्थात् ये तीन एक एक द्रव्य है और काल असंस्पात अर्थात् "कालद्रव्यके कालामु असंम्पाव द्रव्य है" गिने जाने योग्य नहीं है (1) छोगागासपदे पर रिपाई पाटेबारपणाम रासी इव ते कानाणू मुप्पेयप्या ॥॥ इति गापोळ प्रकारेण सम्वम्पस्याणु- पत्याचामा धर्मापर्मानानाम्नेकप्रदेशवेऽपिसप्यास्मफलामावादे कस्वमववोयम्पम् योगापास-पदेसे पोधे ।। (लोकाकाश-प्रदेशे। एकैकस्मिनः। ये-मोकाशके पर एक प्रदेश से रिया पोलारयाण (स्क्विा मारिएका खानाम् Im) -२क एक ही (हु-सलु) स्थित है। खोकी पसीप. (राशि) -पशि वा समूहके साश (परस्पर मिम मित्र) ते कालाणू मुणेयम् (ते. काम्मणवाा मन्तष्या) -वे काठ मण समझना चाहिये ॥पेमसंस्पद्रम्प है इतिः गापा-उप-प्रशारेमकासम्यस्य ॥ अणुरूपस्वात् ।। -ऐसे गाया में कहे एपे मेद करि रुद्रप्प के मणुरूप होने से मागावर पम-अधर्म माघशानाम् । मनेक-अरेस्पे -मनेकता है। (परन्तु धर्म अपम मामगदम्पों के बहुत प्रदेश होने पर मपि वपारमक अमापार पककलम् । अपरायणम् ।। -मी खरप महोने (के हेतु) से प्रपा प्रपा पना जानना चाहिये। मावापा-सिस प्रकार रमोधरेर एकत्र होनेपर मी उसमें प्रत्येक रत हवाई वैसेही काउकेमणु मुदे लदे एकके पमात् पक छोघाशक के प्रत्येक प्रदेश पर पक पक करकम तिष्ठे हुवे परत धर्मदस्य अपमदम्प और भाकाशदम्य के मसल्पात भसस्यात प्रदेशई ये प्रदेश पेसें मिले हुये है कि कमी जो उदे नही होसकते हैं इससे य वीनों पक पक द्रप ही है। धम द्रष्य मर्म द्रस्य सम्पूण सोडमें विप्लमें देख की मांति प्यारे और माकाशके दिन प्रदेशॉर्म स्थित है उनहीं प्रदेशोम स्पितरहते हैं इनके प्रदेश माम्म है। देखो सर्विसिदि ति मन्याय पक्ष १९ पर पगनिवासी जगरूपसहाय एकीकत पदच्छेद और विमपत्पर्य सहित सर्विसिदिका सन्दवा दिदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २९, संर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य॥२९॥ द्रयाणि च पर्यायाश्च द्रव्यपर्याया इति इतरेतरयोगलक्षणो द्वन्द्व ॥तद्विशेपण सर्वग्रहण प्रत्येकमभिसम्बध्यते सूत्रम्-सर्वद्रव्यपर्यायेपुकेवलस्य सर्वद्रव्यपर्यायेपु केवलस्य (विषयस्य निवन्ध भवति) सनद्रव्यपर्याये । केवलस्य । विषयस्य -सम्पूर्ण द्रव्योंको सम्पूण पर्यायोम केवलदानके विपयका निरपामवति T =नियम है मावार्थ एक एक द्रव्यकी त्रिकालवती अनन्तानंत पर्याय है सो छों द्रव्योंकी समस्त अवस्थाओंको फेयरमान युगपत् एक साप जानता है पदच्छेद और विभात्पर्य सहित उनतीसवां सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश अनुवाद दम्पाणि, न० पर्यायाः । १० द्रव्यपर्याया। इति =ष्य और पर्याय (मिलकर) 'दल्य पर्यया: ऐसा पाक्स तोमरपोगलपण'। इन्द।। परसर (इतरेतर) योगलधणवाला वा अन्योन्ययोग नामका इन्द्र समास है तर विशेषणम् ॥ सर्वग्रहणम् ॥ -उस (द्रव्यपर्याया इन्द्र समास) का विशेषम "सर्व। (ऐसे शब्द) का ग्रहण प्रत्येक अभिमम्मध्य T प्रत्येक (द्रव्य शब्द और पर्याय शष्द) पर लगाया गया है (अमिसम्पपवे) पत.. मनः पपस्ता अवधि विषय-मनन्त. -पयोंकि (-यवा) मनः पर्यय मानका (विषय) अवधिक विषयसे मनम्तयां मागे सम्मपि दशिता ति। -मागमें है। दूसरे स्थानमें मी (हम संसात सर्वार्थसिद्धिकी) प्रकाशित पचि में प्रपती इविक पाठ अन्तरमप्यधिक पाठा-प्रवर्तता या पिपमान है (लो पृgv५८में पतिसूभर४को) ऐमा मम्य पाठहै। (मम्य मप) क्योंकि मनः पपपमानकी प्राति (गति) अधिशामके शेयके ममतर्या भाममें तया (-अपि) अपपिशान रेयसे मित्र पस्तुमि मी (अन्य ) (मागम में ) पता गो (-दर्शिता)। ऐसा मम्य पाठ है। ऐसा अपिक पाठ भो। (१) म मन पाठ और मर्ष दोनों सम्प्रदामि पक। (२) परे अवस्था विशेष पोश नाम पर्यापी प्रम्पकी पपरपा विशेष मोसो पाप । वार्यापान पति पते पाती इति यम्-(भो) अफ्नो पायों को प्राप्त हो या तिन (पर्यायों) रि (-) प्राप्ति की माप ऐसा ट्रम्प है। साम्मे पत् प्रापप समेपर (तु-दो-ए) इप्प मादकी सिसिदि। (वातीन आदि पद भपको अपनी रिमतिरपागकर यो एपमारे उस पदो ममग मले। मौर में भी पहले हो पर समुचित वया पीऐ शपममुपप कहावामा समुचित व्या समुप मिलकर पना गोमम्मस ले। SGBT4U एटानिपासी अगस्पसहाय पीसकृत पदपछेद और विमस्पर्ष सहित सार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र २९ सर्वेषु द्रव्येषु सर्वेपु पर्यायेष्विति ॥ जीवद्रव्याणि तावदनन्तानन्ताान, पुग्लद्रव्याणि च ततोऽप्यनन्ता- नन्तानि अणुस्कन्धभेदेन भिन्नानि, धर्माधर्माकाशानि त्रीणि, कालश्वासख्येयः इति० सर्पए । द्रव्येषु ॥ सर्वेषु ।। पर्यायेषु । -इस प्रकार समस्त , यों की । पर्योम (केवलयानके विश्पका नियम) है वाक्त नीव द्रव्याणि अनन्तानन्तानि - प. प्रथम (जावत्) पी द्रव्य । वनन्त है और (च) पुद्गलद्रव्याणिस्त मपि अनन्तानन्तानि-पुनलद्रव्ये उन (बीवों) से मी (ता अपि) अनन्तानन्तगुपे अणुस्कन्धमेवेन । मिमानि , धर्म-अधम =अपु कन्यके मेदकार दे मुदे वा पृषक पृषक है। धर्म द्रव्य, अधमद्रव्य भासमानि ॥ त्रीणि प० काला, असंख्येयः। =भोर आकाशद्रव्य तीन में वर्षात ये सीन एक एक द्रव्य है बौर काल बसस्पात है अर्थात् "कालद्रव्पके कालापु असंस्पात द्रव्य है। गिने बाने योग्य नहीं है Ra. (१) योगागामपदेसे पोजे रिपातु पवाायणाप रासी इव ते कासापू मुणेयम्या ।।। इति गायोक प्रकारेण काग्दम्पस्या पत्यष्यनार्व पापांकाशानाममदेशत्वेऽपिसमात्मकरलामावादेकैफरवमवायम्पम् लोग्नास-पदेसे पोजे । (-छोकामाय प्रवेशः। पकस्मिन्दा-सोकाशके एक एक प्रदेश में रिया-पोवा ।। रपणाणं : (स्मिता पाहि. एका रमानाम् Tim) - २फ एक ही (इ-बल) स्थित है। रखोकी रासी (राशिः) -राशि पा समूहके सदश (परस्पर मि मिच) वागणू मुगेपम्या (से. काम-अपवा। मम्तम्या..) -वे काटक अणू समझना चाहिये। बसस्पदम्प है इति गापा-उपप्रकारेण ।। कालदम्पस्प | अणुरूपत्वात् ॥ -पेसे गाया में कहे पे मेव परि कामद्रय अणुस्म होने से नागात्पम् । घम-अधर्म-माकाशामाम् । अनेक प्रदेशवे ॥ -अमेहता है। (पणतु धर्म अपम आकाशद्रों के पत प्रदेश होने पर अपि नपामा ममापात् ।। पोत्पम् ॥ मवायम्पम् ।। -मी परस्य महोने (के हेतु ) से पूषन पृयक पना जाना चाहिये। भाषापा-मिस प्रकार रसोंच र एकत्र होनेपर मी उसमें प्रत्येक रखनुवाई पैसेही काम्केमणु दुवे जुदे एकके पमा एक लोके के प्रत्येक प्रदेश पर एक एक कर फमसे विष्ठे हुये परम्त धर्मद्रष्य अधर्मद्रम्य और आकाशवम्य के मसम्पात मसस्पात प्रदेश पे प्रवेश पेसे मिले दुये है कि कमी गरे जुदे नहीं होसकते है इमसे य तीनों एक एक प्रण्य ही है । धम द्रम्प अर्म द्रव्य सम्पूण गोडमें तिसमें टेट की भांति स्यामा मौर माकाय जिन प्रदेशों में स्थित है हमही प्रवेशो स्थिवरहते हैं इस देश मझम्प है। देखो सार्थसिसि पि ममृत्य ५ सूत्र ११ पर प्रगनिवासी जगरूपसहाय कीलकृत पदग्छेद और विभक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सय २९, तेपा पर्यायाश्च निकालमुव प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेपु द्रव्य पर्यायजात वा न किञ्चित्केवलज्ञानस्य विषयभावमतिकान्तमस्ति ॥ अपरिमितमहात्म्य हि तदिति ज्ञापनार्थं सर्वद्रव्यपर्यायेष्वित्युच्यते ॥ आह विषयनिनन्योऽवघृतो मत्यादीनां, इदं तु न निर्जातमेकस्मिन्नात्मनि स्वनिमित्वसन्निधानोपजनित वृत्तीनि ज्ञानानि योगपद्येन कति भवन्तीत्यत उच्यते- cacaSaa-CIOLad पः वाम् ॥ निकालभव। =और विन (सर्वदन्यनि ) के (अतीत अनागत र्तमान ) तीन काल में होने वाले प्रत्यामः मन्तानन्ताः । पपाया । वेषु ।। =प्रत्येकके मनन्तानन्त पर्याय है। उन (द्रव्यों) में पादपंपापवान वा कपल शानस्प विपय मावम्।। -या ठप पर्यायों का समूह केवल पान के विपप भाव को अनिकान्तम् । नरिचित अस्तिा नि उल्लंघन करनेको किंचित मी समर्थ नहीं है क्योंकि (1) पूर्वोक्त ( नद) केवलबान पारिमिन माहात्म्प इतिः शापन अर्थम् म्भपरिच्छिम पा असीम महत्वरूप है। ऐसा (इति) बनाने के लिये मा पपपाय इति उच्यत T समस्तद्रव्योंकी समस्तपर्यायों में (केवल पानके विषयका नियम) है ऐसा कडागमा है मा विश्पनिर्वधः अमृता मतित्रादीनाम् ॥ (निप्प-अप) पूछता है कि मसि (मान) आदिकनिके विषयोंके नियम फगये दम् । ॥ तु नः निर्वातम् In एकस्मिन् ।। परंतु यह ( दम्) घाव नहीं हुआ (कि) एक मात्मनि । स्व-निमिघमभिधान-उपनिवातीनि भीषमें अपने अपने कारणों के निकट होते (उपजनित) प्रपर्वनेवाले मानानि पोगपयन Tu कति । भवन्ति T इवि: पान एक काल मथवा एक पार करि कितने होते है ऐसे (प्रश्न पर) मन उन्मत् T =इसलिये (आचार्य उचर सूत्रमें) काव कि १ पास यायेप मरम्त समाग का पूर १५ में भम्पप लिया। इमरिये हमने मी इमको सम्पपरिमा २ माता -पिता इति. मपि प्रनम्तम-विता (=पायात) पेसा मो अम्य पाठो । मति+मातीनाम् - मत्पादीनामस्मादि समासों मतिम अश्यपवन इस सप्य' 'मौर अम्य' 'मौर माप वैसे ही इन माम माता है। बावमा पातमा यो पर प्रादप सदगपवन पुलिंगम है पेमेही मयादीनाम् का पठो विमति बारवा पुलिंगमें पिता है (देखा उसोश पृष्ठ १५) . पौगाप पा योगायनमानिया (पेप का पट १०१) दानों समकामा एमारता मर्यमें है जवा इमने ममकविता। ५ वि मरमाम मा गुपयनमें माता रे मोर पुलिंग म प प्रपाम हुआ है।

२ ऐटानिवासी गरूपसंहावं वकालंकृत पदच्छे मौर विमक्त्वर्ष सहित सर्विसिद्धिका धन्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३०, एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्थ्यः॥३०॥ मान्मानि ॥ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्म्य =एकादीनि (ज्ञानानि ) माज्यानि युगपदेकस्मिन् (जीवे) आ चतुर्म्य (ज्ञानेभ्यः) सम्भवन्ति एकादीनि पानानि =एक मानकों आदि लेकर (-एकादीनिमान्यरूप पा विमाग किये (मान्यानि) पुमा एकस्मिन् : सीवेजा पतुर्मानेमा एक साप (=युगपद्) एक वीवमें घारमान तक (आ) सम्भवन्ति | सम्मबहे, थर्यात् यदि एक पान होगा सो केवलमान, दो होंगे वो मतिमान मतमान, तीन छोरी तो मतिधान, एतवान, अवधिधान या मविधान भूतमान मनः पर्पयज्ञान हगि पदि पार बोमे तो मतिज्ञान, एतमान, अवधिशान, मनापर्ययज्ञान होये १ इस पत्रका पाठ दोनों मम्प्रदायों में एक और अर्प भी दोनों मानापोंमें एक है जैसाकि अगसी विणमियोंसे प्रगट होगा। २ पाकि-सस्पा पघमोवेकशप्पा-(पति) मथषा सम्या पसमाऽयमेकामा मयपा(सममें यह एक शण सख्याषाघीहै।एकएफस्यसंख्या पाम मावि पापम् वामि इमानि एमादीमि कथम् - =एक मादि मिनके ये एकादि है। (मम) कैसे? पास्मिम् । आस्मनि । मविशाम ॥ एकम् ॥ =(उत्तर) एक प्रारमा एक (मान) मतिमान होय है (सुचान दो प्रकार है एक अक्षरारमक एवमान दूसरा अनमयरमक अतमान) पर मसर एनम् ॥ दि+भनेक+मावशमवम् , यो समयमा युवपान है सो दो अनेक गावश भेषरूपरे पपेयपूर्वकम् ॥ =(वह मसरारमफ एकान) उपदेश वाराहाता है (जैसाकि इस अपायका पोसा सूत्र ) पर मजमीपम् । स्पात् Tपा =पह (मक्षयमक युवपात) भजनीयरेषा माग्य रूप है किहीं दीयोंकि दोसारे -फिकिमही(मसरात्मक तमामकी मपेप्ता एक मारम्पमें मफेला मतिमाम मी हो सब है) श्वस्य ।। पूर्ववत् . =अन्य पूर्व (पहिले) सप्श होय है अर्थात् दो पान हों तो मविवान हुवमान में तीन बान हो सो मतिमा। पुत्पान, अपपिशान हों अथवा मविधान, शुतवान मन पर्ययमान हो, चार हों तो मविराम, अक्वान, अवपिधान, मनःपर्ययमान हो पटानिवासी नगरपसहाय कीलकृत पदपछेद और विमक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिलिका सम्वना हिंदी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र २९, तेषा पर्यायाश्च त्रिकालभुव प्रत्येकमनन्तानन्तास्तेषु द्रव्यं पर्यायजात वा न किञ्चित्केवलझनस्य विषयभावमतिक्रान्तमस्ति ॥ अपरिमितमहात्म्यं हि तदिति झापनार्य सर्वद्रव्यपर्यायेष्वित्युच्यते ॥ आह विषयनिवन्नोऽवधृतो मत्यादीनां, इदं तु न निर्झतमेकस्मिन्नात्मनि स्वनिमित्तसन्निधानोपजनित वृत्तीनि ज्ञानानि योगपद्येन कति भवन्तीत्यत उच्यते- च. वपाम् ॥ विकालमवः ।। =और विन (सर्पदन्यनि ) के ( अतीव अनागत वर्तमान ) तीन कालमें होने वाले प्रस्पकम, मन्न्तानन्ताः । पयांमाः । तेप -प्रत्पेकके अनन्तानन्त पर्याय हैं। उन (द्रव्यों) में या द्रव्म पर्यापजात काल मानस्य विपर-मावम् ॥ या द्रव्य पर्यायों का समूह केवल मान के विषय माव को अविक्रान्तम् ॥ न किञ्चित मस्तिा हिल । उल्लपन करनेको किंचित मी समर्थ नहीं है क्योंकि (-1) पूर्वोक्त (अव) केवलपान अपरिमित-माहात्म्प इविवाफ्न-अर्थम् म्भपरिन्छिम वा असीम महत्वस्म है। ऐसा (ति) बनापने के लिये सद पपर्यापपु । इति उच्यते T समस्तद्रव्योंकी समस्तपायों में (फेवल पानके विषयका नियम) है ऐसा फहागया है मा त विपपनिर्वषः । अवपूतः। मविषादीनाम् । (शिप्प-अप) पूछता है कि मति (पान) आदिकनिके विपर्योक नियम करेगये दम् ॥ न निर्यातम् ॥ एकस्मिन् । परंतु यह (इदम्) घात नहीं हुआ (कि) एक आत्मनि । स्व-निमित्तसभिषान उपजनितचीनि ॥ जीवमें अपने अपने कारणों के निकट होते (=उपनिद) प्रतनेवाले सानानि पौगपपेन III फैति । भवन्ति T इति -पान एक काल अयवा एक पार करि कितने होते हैं ऐसे (प्रश्न फर) अतक उपदेश =इसलिये (आचार्य उचर सूत्रमें) फातेहैं कि alll - १ मत्परम् पहवेप संरत प्रासमा कोप प ४६२ में मम्मय निशा। इसलिये हमने भी इसको सम्पय रिहा है। २ मवपत यिस्ताविक अपि पाठयम्तमा-पिता (=म्याम्याव) ऐसा मो मन्य पाठ है । मति+मादीनाम् - मस्पादीनार आदि समासो अंतिम भापषवद इस सश' और भम्य' 'मौर मम्प वैसे हम अपाम पायो।म्मावा पातर पहां पर भावप शप्पावरन पुलिंगमे है ऐसे ही मरपादीनाम् को पठो विमति पहुवचन पुलिंग सितारे (देखो रखनेश पट १९॥ ४ पौगरप पा योगपद-नमा विंग है (देय कोश पष्ठ १०१) दोनों समानता एकाग्रता मर्यमें है जता हमने नपुंसक सिखारे। ५ फवि ममम मा गुपचनमें मातरमौर पूलिंग रसका पां प्रपोग एमा।

पटानिपासी मगरूपसहाय वकीकृत पदच्छेद और निमत्यर्थ सहित सर्विसिदिका सम्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र ३० एकशब्द सख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचन पदच्छेद और विमात्यर्थसहित त सवा सुत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद एकता संख्यावाची, आदिसम्द। अवयववचना। (यमें) 'एक' अम्द गमनाका वाक्क है आदि शब्द टुमदा (क) के अर्यमें है [१) पृष्ठकी दूसरी रिपणीमें हम दिलायुके है कि तत्वार्यराजषार्तिक के कर्ता के मतानुसार एक शम्प सल्यापायक भोऔर मम्प मावाकि मतम पही पर शम्पमसंख्या ममहाप प्रधान मर्थ का वाधक है अब तत्वार्य रासपातिकके मनुकम मनेक मर्थ समय होने पर (मी) पकी इम्प्रसे (= विमा) प्रथमावाची एक शादो (-मनेकार्य मम्मवे विपक्षा प्रापम्पवयनः एकरावा) अनेकार्य ये है किहीं सम्या (मर्य) में प्रवर्वता जैसे एको मौ बहय' एकदा गाव । दी मन्य (मर्य) में से एक माचार्या - अम्पे माचार्या-दूमरे आचार्याः कहीं असार (बर्ष) में 'एमिस्ते विधान्ति पीया ते शूरवीर अफे वियरतेहै। यहीं प्रधान मर्य में जैसे एकाता सेनी करोमि = प्रपामहतो सेमरामि इति अर्थ अबान शाप सैनाको मष्ट करता पेसा अर्थ है और कहीं पर प्रथम अर्थ में जैसे: एकमागमम : प्रपमागमनम् इति - पहिला आन्याआ। सूधमें प्रथम वा पहिममें एक शण छायेरे और मपर्मा सूप 'मतिनुतापपिमा पर्पपकेवळाभिमानम् है तब पपीमि पार का मर्ष 'प्रपम पा परिने बामको मादि सेवर एला मर्यात् मविधाम मारि का विकल्पम्पसे वा मान्यम से एक मामा में पक साय पार पान तक विपसित है। [२] तत्त्वार्पराजपातिक के रपयिताने 'आदि" शब्द मनेक मर्य होने पर मी'अवयव' मौर सामीप अर्थ म लियाहै "मादि शम्दस्वाषयपवचनः' "सामीप्पयनो का" -मादि शम (इस सम्में ) दुपाची अथवा निकटवा का वाचक है। कहीं पर म्पषस्था (मर्प) में (मादि शप्प) पर्वता है असे माझपावयश्चत्वारो पर्मा (प्रामणाविक धार वर्ण है) ग्रामपम्पवस्या (=कि ग्राम प्यवस्था प्राझणसविपक्टिशमा एस्पी मिाण सपिय वैश्य धन है ऐसा मर्य) मर्यात् प्रापप समिय पैश्य मौर शनन धारों वर्षोंकी ग्रामप्प वर्षके साधीन म्यपस्या पारधना है। जी पर (आदि सद) कार (मर्प) में प्रवर्तता है जैसे मुगादयः परिहतम्या ( मुझंगादिक परिहार करने योग्य है) मुगप्रायः विपक्षत इत्या (= भुजगका प्रकार कहिये मुसंग सम् विपान मर्दोष स्यागने योग्य है। ऐमा मय है भावाप सर्पआदि विषयाने (स) बीवोंको पूरसे ही छाइ पेना चाहिये । कपिरामादि शम) मवयप, टुकड़ा, ईक, या माग अर्थ में पर्वताई जैसे िकगादिमधीवे भागवत सपीधे पति जर्ष एम्वेद(ए) का माग को (=मययवम् ) पाता है (अधोते) ऐसा अर्थ है।

एटानिवासी जगरूपसदाय वकीलकत पदच्छेद और विमस्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शन्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३० परा आहT असम्पासहाय -दूसरा करता है (मर्यात् मन्य मन्य भाचार्योम मत है) कि असल्या ममहाप प्रपाम्पपचने पकशम्दे, सति । पकादीनि:॥ -प्रधान मयका वायक (इस सूपमें माये हुये) 'एक' शम्मके होते एकादीनि फेवलादीनिः॥ इतिकमर्याएकस्मिन्प्रारममिसायिकत्वात्-सोक्त (हान) आदीनि पेसे मर्यमें है कि एक मात्मा सायिकपनासे एक पलहानम् ॥ मतिभुते ॥ -एक केवळ मान होता है। (दोहाय वहां) मतिबाम भुतझान होते है इस्पारिपूर्षवत् . -स्पादि पहिले (फयित) सामापाप ऐसा कि भौर और मादाय कहते है कि इम गरमें 'एक' शम्बका मसम्मा असहाय मौर प्रधान अर्थमें प्रयोग कियागया है मत स (एक शम) का अय केवळ शाम है क्योंकि भन्य पारमान ममाय और मपान नहीं होमकसे है ये पारो मायापरामिक शान है इस रीतिसे पफ जीव एक साथ केक्सचानको आदि लेकर पार पाम तक होना संभपौ यदि एक सान होगा तो फेयमबान होगा (मयषा असरात्मक मुतमामकी अपेमासे पक मारमा प्रकला मविमान भी हो सकता है)। यदि दो एक साथ होंगे तो मविज्ञान और सम्मान होंग, यदि तीन एक कार में होंगे तो मविमान, तमान, अपपिहान पा मतियान, मुबान, मना पर्यपमान होंगे यदि धार मान होंगे तो मतियान, मान, अपपियाम मौर मना पर्ययवान होंगे । (देखो तत्वार्य- गजपातिक पृष्ठ २०॥ श्वेताम्बर मानापमें भी पही है कि मतिमान मी असा होसी और फेसबान मी मकेला होसको जैमा कि निम्न मिसिसे प्रगट है (देखो समाप्य वार्यापिगम सूच प्रष्ठ २८) सुवमानस्पएक मतिमाने निपता। सइमाव -भिन्तु (या मवश्य जानन्न उचित है) पुतधानका मानमानसे सहमाष अवश्य है (अर्थात् जहाँ यह मुखबानी पर्दा वहाँ मतिबामका अस्तित्व अबस्य ही) वद् पूर्वकत्वात् ॥ -पाकिम (मतियान) द्वारा (मतहान) हाता है मतमानके दोनेको मविधान कारण है। पस्य । तु मविधान तस्य अवमान स्यात् T या न पाइवि-परंतु जिसके मतिकान है दिमके मसरामक मुसान हा अपवा (=पा) न हो ऐमारे माता माहा फेवणानस्प। पूर्व मविधानादिमि - यहाँ प्रम करता है कि फेषलवानके पहिले होमे पाने मविवान माविषसे चिम् मामाषा । मपति Tन इति उच्यते। -क्या सहभाव होता है। (उचर) नहीं ऐसा मागया हैमर्थात् अदा केपटवान वहाँ पर मविमान अब्हान अवपिकान, ममा पर्पयानका अस्तित्य मही asa ९ । पटानिवासी अगस्पसहाय कीलकृत पदच्छेद और मिक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । मम्माय १ पत्र ३० एकशब्द संख्यावाची, आदिशब्दोऽवयववचनः पदच्छेद और विमात्पर्यसहित तीसवां सूत्र पर सर्वार्थसिद्धि वृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद एकादा संस्थापाथी, माविशम्दः। अवयववचन। (में) 'एक' शब्द गणनाका वाचक है मादि सम्द टुकड़ा (-टूक) के ममें है (१) पृष्ठ ४० की दूसरी पिणीमें हम दिलायुके है कि वार्पराजमार्तिक के कता के मतानुसार एक शम्ब सल्यावाचक भी है और अन्य भाषाकि मतमें पी एवं शप्पमसंख्या मसहाय प्रधान अर्थ का पाचक व तत्वार्य राजषार्तिक के अनुरुल अनेक मर्थ संमत होने पर (मी) वणवी रम्मसे (=विवसात) प्रथमश्नवाची 'एक' शप्पो (अनेकार्य मम्म विषसात प्राथम्पपना पक्रयाक) अनेकार्य ये है कि कही संस्था (मर्य) में प्रवर्तता है जैसे 'एका गौ पाप' एक पो पात : कहीं मम्य (अर्थ) में से एक माचार्या - अम्ये बाघार्याः समरे आचार्याः कहीं असाप (बर्य) में जैसे 'पकानिस्ते विचरम्ति पीया ते शूरवीर मकेळे पियरतहै। कहीं प्रधान अर्थ में जैसे एकाता सेना करामि - प्रपामहवा सेना करोमि इति मर्य' =प्रान शाप सैनाको मट करताईपेसा अर्थ है और कहीं पर प्रथम मर्य में जैसे एकमागमन - प्रथमागममम् इति- पासा मामा । सूत्रमें प्रथम पा परि के ममें 'या' शम्म गाये है और मवर्मा सूत्र 'मविस्तायभिमनः पर्ययकेवळामियोमम् “हे व एकादीनि पाप का अर्थ 'प्रथम पा पहिले पानो मावि लेकर' दुलो मर्यात् मतिबान मारि पर विकल्पम्पसे पा माम्यल्प से एक मात्मा में एक साप पार जान कविवक्षित है। [२] तस्वार्पराजपाविक के रपिताने 'आदि शम्बके ममेक मर्य होने पर भी मवपव' और सामीप मर्थ म मियाहै "मादि शम्दश्यावयपषचना' "सामीप्यषपनो का - मावि शन (इस सत्रमें ) बड़े का पाचौ है अपवा निकटता का पाचक है। कहीं पर म्यषस्था (मर्प) में (आदि शप्प) वस्तार से माझपादपावत्यारो पर्णाः (=प्राह्मणाविक चार पर्ण है) प्रामणम्पवस्थाः (=फि प्राक्षण व्यवस्था । माझप्पसपियफ्टिामा इस्पा कि प्रापय सप्रिय वैश्य याद है ऐसा मर्य) मत् व्याण समिय वैश्य और शमान चारों वर्गों की सण व मापीन म्यषस्था या रचना है। कहीं पर (आदि शाम्प ) प्रकार (अर्थ) में प्रयतता है जैसे मुखंगावया परिहर्तम्या ( मुजंगादिक परिहार करने पोप है) मुजंगामा विपक्षत इत्यर्यः (- मुजगन पर कहिये मुजंग सप्श विषपान मर्वशोष त्यागने योग्य है) पेमा अथ मावाय सर्पमादि पिक्याले (सप) जीवों को दूरसे ही यह देना चाहिये प्रीपरमादि शप) अवयप, टुकरा, ईक, पा भाग अर्थ में पर्वताद जैसेकि मदिमधीवे मागवयन- मपी पति अर्थ - अन्येपो (Pकस भाग को (अयपषम) पड़ता है (अपीते) ऐसा अर्थ है । SSC-SARGE एटानिवासी मगरूपसहाय वकीलकस पदस्छेद और विमस्त्यर्य सहित सर्वार्थसिदिका सदशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मत्र ३० परामा T मसम्पासहाय -मरा भता है (मर्यात् मम्प अन्य माचार्योका मत कि मसख्या भमहाय प्रयाम्पवयन गएकशी सतिष एकादीनिः॥ -प्रधाम अथक पापक (इम सूममें आये हुये) 'एक' पाम्के होते 'एकादीमिरे फेयमादीनिः॥ इतिकअपायकस्मिम्मामनिसायिकरपात - सोरेवछ (पान) मादीनि पेसे मर्यमें है कि एक मात्मामें सापिकफ्नासे एकम् । फेवलाहामा मतिपुते ॥ -एक फेवल शाम होता है। (दोहोय हैं तहां) मतियान भुतमान होते है इत्यादिपूर्ववत् . -स्यादि पहिले (कथित) मश: मावार्य ऐसा है कि मोर और माथाय करते है कि इम पवमें 'ए' शम्पका संस्था मसाप मोर प्रधान ममें प्रयोग कियागया है मत इस (एफ शप्प) का अप केवल शान है क्योंकि अन्य चारपान अमात्य और मपान नहीं होमकते है ये चारो सायापशमिक शान इस रीतिसे पफ जीप एक साथ फेवरसाम मावि लेकर चारपान कक हाना समपी पदि एक माम होगा तो केवमहान होगा (मयवा असयमक मुहानकी अपेक्षासे एक मास्मामें मफेता मतिबान । भी दो सम्ता)। पदि दो एक साप होंगे वो मतियान मौर शुबान होंगे, पवि तीन पक कालमें होंगे तो मतियान, मुबान, अपपिवान या मतिमान मुवान, मना पर्पपमान होंगे, यदि धार मान होंगे तो मविधाम, मुवमान, मपपिशान और मन पर्ययबान होंगे। (देवो वाचार्य गावपातिक पृष्ठ १०॥ श्वेताम्बर आम्नायमें भी पही है कि मतियाम मी अफेठा होसबोरवयान मी मरेमा होमम जैसा कि मिन सिसितसे प्रपद (रेको समाप्य तत्वाधिगम सूत्र पठ २८) मुखपाना तुमतिमानेन ॥ निपता! | सहमाका -पितु (पा मवश्य जानन्य रपिता मुतवानका मातमानसे महमाव अवश्य । (मर्यात् यहाँ जापान है पाबहाँ मविवानका मस्तित्व अवश्य ही है) बद पूर्ववत्वात ॥ -पपींकि हम (मतिमान) द्वारा (मान)हावा है स्वाहामके होनेका मविज्ञान कारण परे॥ परवा तु मतियान तत्प मुतमान स्यात् T याम वा इति-परंतु लिमके मतिबान दिसके असरRमक मुवान हा मधषा (=पा) न हो ऐमा है अब आहा रमानस्मा पूर्व मविवामादिमि' -पहाँ प्रम करतारेकि केवलहानके पहिये होने पाले मविधान आदिपमे कि सामापः ।। मपदि Tविक रयतेT - सहमाप होता है। (उत्तर) नहीं ऐसा मागया ( मर्यात् जहाँ रेवान पर्वा पर मलिदान एवज्ञान भवधियान, ममा पर्यपसाना मस्किप नही saSCE नयमन एटोनिवासी बंगरूपसहायपकीलकृत पदच्छेद मौर चिमात्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशः दिदीअनुवाद अध्याय १ बल ३० युगपदवतिष्ठन्ते । द्वे मतिश्रुते । त्रीणि मतिश्रुतावपिज्ञानानि, मतिश्रुतमन पर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमन पर्ययज्ञानानि । न पञ्च सन्ति केवलस्यासहायत्वात् ॥ युगपदक अवतिष्ठन् T दे । मतिम । -एक काल में विष्ठ हैं। दोहों तो मविज्ञान मतवान हों। श्रीगि, मविभुत अवधिज्ञानानि पा० मवि-मन- चीन में सो मतियान म्यान अवपिवान हों । अषया (या) मतितान मतमान मन पर्पयमानानि पवारि मदि-श्व-भवधि- =मनःपर्पयज्ञान हो । चार हों तो मविपान मसमान अवधिशान मन पर्पपशनानि In न पम्प सन्ति T मन पर्ययज्ञान हो ॥ नहीं होते हैं (एक काल में) पांच मान फेवसस्प ! असहायत्वात् ॥ क्योंकि कवस शान असहाय रूम है अर्थात् अन्य पार पान सोपानावरणीयकर्मके धयोपशम से होते हैं केवल मान उक्त कर्म के धम से ही होता है (२) मतिमान, तमान अयधिपान मनापर्ययमान सापोपशमिशान मर्याद ये मारो मान मानावरणीय धर्मकी प्रकृतियों के सयोपशम से दाते है। (प्रम) पेक्षापापशमिश तो एक कास पदो प्रवर्तता कहा है । इहाँ प्यारी कैसे कहताका उत्तर जा पानापरण धर्मका सयोपाम ते पारी पागकी मानन शठिाप मरिब एक कार होप है। बारिम्पयोग इनिका रफ का एकही हार है। वाले एक हेय उपयुक्त हानेकी मपेसा स्थितिमी मम्तमुहको कही है। पीछे नेपातर उपयुवोपमाय है सपोरशम मिमिका हो रहे त पिम्प एककालही है। वहां काई कहे उप पाम भपेस्यमी मौसीके (पुरी) मसप ते स्पारिक पश्चिमान एकाळही दीख पर्मससीन दी है म्याव ही है। गंध वाका माये ही सभी साकमा मारि जाने दी। मसण पर शप्प हार पेसे पांयका पान एक फार मी देखिये है। ताई कहिये, जो यहाँ उपयोगन फिरण की शोपता का भेद म साम्पा मारह | जैसे कमानसा पत्र दोय चारि में सुका प्रवेश होते काळ मेव साम्या न आप मद पाल मेदनी।से इहा मी जानना ।। ६० अयवदनी की पवनिम्न मुद्रित पू १८५, १८ ॥ (२) उस पाबी शामिसे कमलान अमहायशान है यह को सयापशमकी अपेक्षा नहीं रखता हे मतिमान मुमान मधियान और मनापर्पय कानों को फौरसपापशमकी अपेक्षा रहती है इसलिय ये पार पान असहाय नहीं है। इस मांति उक बार शामोंमें और केयरकान में विरोष बनेके देतुम पास को एक साथ हाना नमम्मव है। (प्रम) जैसे जिस काल सूर्यका प्रकाश पृप्या मरठ पर पड़ता है उस समय नक्षत्रों का प्रमश दब जाता। वापर नहीं कहा जामजकिनमत्रोंकी पिघमानताही महहि पैसही जिस ममय मारमा मस्यन्त जाज्वल्यमान कवसमानका मफाश होगा उस समय मवि-शुक्मवधि मनपर्पपयामा ममाव पजापया नदिउ पार मानो अस्तितही महाजागा फिर यह कहमा कि पटा निवासी बगेस्मसहाय वकीला पदच्छेद और धिमक्त्यर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशा दिदा अनुषाद । अप्याप १३३० एकमादिपा तानि इमान्येकादीनि माज्यानि विभक्तव्यानि योगपद्येनेकस्मिन्नात्मनि ॥ आ कुत ! आ चतुर्म्यः ॥ तद्यथाएक तावत्केवलान न तेन सहान्यानि क्षायोपशमिकानि एकमा आदि। येषाम् । वानि,॥ इमानि॥ एकादीनि =एक है आदि निन (-येपाम्) ते (तानि) इसने (-इमानि) एकादीनि है मान्यानि ॥ विमतव्यानि : सो मान्यानि (कहिये) है मेदरूप फरने पर या विकल्परूप करने पर(=विमक्तव्यानि) यर्याद एक सानको आदिलेकर(एकादीनि)माज्यरूप वा विकल्परूप(-विमतव्यानि) योगपपेना। एकस्मिन् । आत्मनि, या चतुn =एक कालपि एफ (-एकस्मिन्) आत्मामें पार (मान) तक दो (सक) वे हैं आता -(प्रश्न) (सूत्रमें) या (अव्यय) क्योंकर (=कुत) है (उत्तर-सीमा वा अमिविधिके लिये है कि एक साप एफ आत्मामें पार पर्यत ही मान होसके हैं सब पापो नहीं होते) वधवा एक FIR माक्य फेवलपानं ॥ न न ॥ जैसे (-तयपा) एक हो तो (वाक्त) केवलज्ञान हो । नहीं विस (फेक्लज्ञान) करि सहा मन्यानि पायोपामिकानि ॥ सहित (सह) मन्य (चार) पायोपशमियान मर पाशवका मपम मर्प मोर आदि सम्बका मायव अर्प लेकर “मपाका भग्यव" यह अर्थ एकत्रवि याफ्पका हुआ: (प्रम) किम (प्रथम) का (अवयव या भाग) । (उत्तर) परोमानध (प्रथम मवक्त) अर्यात् मविधान | मप्ता पश्चशिका मर्य मविवान हुमा यहाँ पर स्मरण है कि सूत्रमें 'पानि पाकर सोप कादिग्दीनि" (-एकादिका मावि रोकर सो शान है प एकावीमि कोमाते है। इस अर्थ है क्योंकि-पातिक-'सोन्य पायें पारस्पादिशप्पस्प निवृत्तिष्ट्रमुखयत्-त: अम्यपदायें पत्तौ एकरयाविशम्दस्य निवृत्तिारष्ट्रमुभमत्-मम्पपदाथ त्ति (- समाममें) ए मारिएपको निवृत्ति पानिपेय "उष्ट्रमुख (प्रीहि समासरूप वाफ्यके) मशः अर्थात् जैस जिसका मुन्न त मर्पसा हो पर उष्ट्रमुख (पुस्खा कसा बता मौर जिसका मुख करके मुख मा पुस सरीखा हो परमी स्ट्रमुखही कक्षा माता है यहापर जैसे उष्मुस रायका मीदि समास की समय पोमुखशप्पोका रस रहतार मौर ममासमें एकही मुसशप या जाता एक मुणशमी निवृत्ति होमाती मर्यात् या मुखशय म्यून रोगता है वैसेही एकादीनि पहा परभी वो "मामि शर्मि एकही "आदि शम्दप जाता है एक 'शादि' शम्पमा गोप होमाता है॥ मावि शम्पा मर्य समीप मी? मखियाके ममीप ममान है मता एई शप यो सूत्र है उससे मतिमान और मादि सदके उखसे मुवमानका महणमा ॥ विशाल मुबानको मादि लेकर पसा मर्प "एनवीमि" पापा हुमा ॥ एक+मावि+मादि-एमदिनमावोनि- एकादीनि ORNOR ७ एटीनिवासी अंगरूपसहायकीलकुन पदच्छेद और विमनस्य सहित सर्विसिद्धिका अम्दशः विदीजनुवाद अध्याय १ सय ३० युगपदवतिष्ठन्ते । वे मतिश्रुते । त्रीणि मतिश्रुतावधिज्ञानानि, मतिश्रुतमन पर्ययज्ञानानि वा । चत्वारि मतिश्रुतावधिमन पर्ययज्ञानानि । न पञ्च सन्ति केवलस्यासहायत्वात् ॥ पुगपत् ववसिमन्वे TT ॥ मतिम -एक काल में सिष्ठते हैं । दोहों तो मविज्ञान मतदान हों। पीमित मविभुत अवधियानानि पा० मति-- चीन में दो मविधान मुतवान अवधिज्ञान हो । अथवा (आ) मविज्ञान मतवान मनापर्यपनानानि पत्वारि ॥ मवि मत भवधि- -मनार्पयधान हों । घार हों तो मविधान मनमान-अवधिज्ञान मनापर्यपानानि न० पञ्च ॥ सन्ति T अनापर्ययमान हो । नहीं होते हैं (एफ काल में) पांच ज्ञान केपटस्प बसहायस्वाद ॥ क्योंकि केवल मान बसबाप रूम है अर्थात् अन्य चार शान तो मानावरणीयकर्मके फ्योपशम से होते हैं केवल पान उक्त कर्म के क्षय से ही होता है (१) मतिमान, मतवान अपधिपान मनापर्पयशाम सापोपशमिक शाम मर्यात् पे पारो मान सामावरणीय कर्मी प्रातियों के सयोपशम से दाते है । (प्रम) “सायापशमिका नौ पक का पयो प्रवर्तता कदा है। होम्यारी कैसे करे ताबा उतरनाकामापरण धर्मका सयोप म ते पारी मालकी खानन शाकिरप पनि एक कान होप है । पारि उपयोग दनिका एक कार एकही हाहै। वाको पकोय उपयुफ हानेकी भपेस्य स्थितिमी भन्तर्मुसको पी।पीतर उपयुक होपयाम रेसयारशम मिनिका हो । सम्पिाप पसलही है। हा को कहे उप योम मपेसामी मालीके (बाड़ीपुरी) ममप र रूपाविक पाचन माम एककारही दीय है वर्मसाकसीका दीये है साथ ही है। गंध पाका माये ही मी साकामादि साने हीरे ममण परत शप होपरे पसे पबिस पान एक पास मी देखिये है। ठाई कहिये यो रहा उपपोमा फिरप की शीता हात मेदन दाम्पा बाप है। जैसे मममा पत्र दोष भारि में सुखा प्रवेश होते प्रख भेद नाम्पा म बाप मर कास मेवासे हो मी बामना ॥ ५० सय बंदगी की वयनि मुदित पर १८५, १८ ॥ (२) पायौ मनोमसे कमजान महापमान पाको सपोपशमकी अपेप्सा नहीं रखता हे मतिमान प्रदानमवपिसान मोर मनापर्यय सानों को आमंसिपोपशमकी अपेक्षा रहती है इसलिये ये पारपान मसहाय नहीं। इस मांति उपचार शानोंमें भोर केयवान में विरोष रहनेतुमे पांचों पानों एक साप होना ममम्भव है । (प्रम) असे जिस कास सूर्यका प्रकाश प्रभो मंठ पर पड़ता है उस समय मसत्रों का प्रधश दक्ष जाता। वहाँपर या नहीं पा आमलिनमोडी पिघमामताही माहि पैसेही जिस समय भारमार्म अत्यन्त जाग्यासमाम कवयनका प्रकाश होम उम समप मति-एक्-मवधिमार्पयमान ममाव बसायगा मदिरखपार मानो मस्तित्वही महागाईम फिर यह कहना कि पटानियासी ममरूपसहाय पकीलकत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्भिसिदिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ यत्र ३०, और इसको कति पयोपशमकी सहायताफी अपेक्षा नहीं रती है अतः फेयल मानी मति-पत-अवधिमनापपय ज्ञान नहीं होते है पेयषपाम साथिम्मान है और ममहापमान है इमसे पांचों या नहीं हाते में टफ नहीं है ।(उच्चर)जैसे शव का स्थान सयया और सर्व प्रकारसे गुर होयुक्त है को मागभी उम स्थान माय मही काा जामकता है पेमेही उप मर्य मानायरणीयकमकी प्राप्तियोंका मप प्रकार नाश होचुका है तव उम कर्मकी प्रतियों सयोपशम कहना और अत्यन्त नाश होनामी कहना ये एक मरेफे विस्थ है मोर नहीं कहे मासकते है इमरिये एक साथ मात्मामें मतिमाको मादि कर यार तक पानोका जा नियम है यह नियोप और निदोष है॥ इस विषयमें अब हम श्वेताम्बर आम्नाया मत लिखते हैं ।। (मम) केपलमामफा मतियान एवमान अपघिसान और ममपपयमानके मापसा भाव है किसी(उत्तर) परमानके साथ मसिमानाविका महमाव नहीं है। परतु कोई काई माघार्य कहते है कि केपसमानकी सत्ता दशा में मतिमानारि पानोंका अमाव नहीं है किन्तु पिम्मानसे चे मस्याविधान अमिभूत (पराजित) होनेसे ऐसे अफियिकर सकि मेषादि इन्द्रियाँ । केपलमानकी दशा मविवादि भन्यवान ममिमूत होकर पेसे अकिंचित्कर है जैसे मेपरहित माका मयेके उदित हानेपर मधिक तेमके कारण सूर्यसे अमिमूत अग्नि मणि पन्द्रमा तथा नसतादिफे तेच, प्रकाश फरमेमें अकिविफर है। मौर कोई पेमा कहत है कि अपाय मन्दम्यता अर्थात् मोमारित्रियोंम पलम्प पदार्थक निमपाथ मविपानकी मचि हावी है। मुबान मतियान पूर्वक है । अपधिसान तथा मनपर्ययान मी स्पी प्रम्पके विस्यमें अपाय मनग्पतासेही प्रयत्त हावा है अतः उनकी सचा में मविवाम ए सफता है और फेषतमानी का स्त्री द्वारा पदार्योंपसन्धि मही होती, इस परमसे केवस्थानीको मतिमामारि मान नहीं है॥पायस् । औरमी पह पाती किमविबानाविचारों मामि पर्याप पाकमसे उपयोग होता है न कि पर ही पारमें और मिलित है मानदर्शन जिसका ऐसे मगवाम फेवळी फा तो एकही काखमें मर्षमावके मापक या प्राहक मोर मम्प माननिरपेक्ष केपम्मान तथा फेयस्पर्शन होते हैं मोर प्रविसण वा प्रति समय पानोपयोग मया दर्शनोपपाप हाया है। और यामी है कि पूर्व मविधानादिपार मान घाबानापरणके सयोपशमसे उत्पथ होते है । और केयरमान सयमेही मत्पथ होता है। इमरियेभी देवसमानीकोमति पानादि शेष धार मान मी हाते। ममापः पृष्ठ १५२९॥ हमारा एप मी इस पदको स्वीकार नहीं करता कि परमान की पिपमानवा R एटानिवासी जगरूपसहाय वकीलान पदच्छे और विमापर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुमाद । अध्याय १ मत्र ३. यथोक्तानि मत्यादीनि बानव्यपदेशमेव उभन्ते, उतान्ययापीत्यत आह- पपोकानि। मस्पादीनिशानध्यपवेशम् ॥ एव कानानुसार (-यधोक) मवि आदिक हान शान नामही तमन्ते T उत अन्ययावपिक आते हैं । अथवा (उत) अन्यथा मी है अर्थात् मसिधान, प्रधान, अवधिधान, मन' पर्पयवान ये ज्ञान संक्षा से दी जाने जाते हैं कि ये किसी और इति० मत पाइT नाम से मी करे बाते है। ऐसा (प्रभ होने पर) इस लिये कहते हैं कि माम्य पार किंपिकर में भी मस्तित्व रहता है क्योंकि यदि हम ऐसा मान तो इस सूत्रका "आषतुम्पा' पाक्य म्पर्पला जावा है। मोर पांची मामा मस्तित्व पुगपद्मा जाता। (प्रस) मसी पंचेद्रिपसे र मयोपबयो पर्पत मा जीव धेन्द्रिप है। जिनक केपमान है वे मी जीव अब पंचेम्ब्रिप और पांचों इन्द्रिय मोनियमान है सब इन्द्रियों के कार्य मतिमान मावि सायोपशमियान होने चाहिये क्योंकि ममर्थकारण इन्द्रियोंके रहते कार्यशाल ममप मावी है। अत परफला कि वहशामके अस्तित्व समपमें मविवान मावि नहीं होसकते पद प्यम निर्मम है (उचर) मपोगकेपसी मोर प्रयोगकेसी कोजो पंधेन्द्रिय पतष्ठाया है परम्पेन्द्रियको मपेसासे है माछिपकी अपेसासे महीं है क्योंकि मावेन्द्रियाचे विद्यमानता में समस्यामापरपोप- का सप नहीं रोसमोर मामापरणर्म के निर्मग सपके पिना मशफ्ना मी नही होसजो यदि सपोगकेवी और मयोगवलीक भावं बिपको सत्ता मानी आपगी तो उनके मानापरणकर्मम सप निर्मूळ म होसम्म मता वे मध नहीं कहे जासकेंगे । जहाँ पर भावेन्द्रिय है वहीं पर मशिलादिक सायोपशमिकानोंका आविर्भाव होता है केवल दम्येन्द्रियके मस्तित्व काममें नहीं क्योंकि दम्येन्द्रियकी सत्ताको मिशक्ति मामा है परमानोंकी पत्पत्तिकारण नहीं है । इस रिये अब कवरमानके उदय राने पर मावेन्द्रिय अस्तित्व नहीं पता तब केवलहानके साय, कारण भाषेन्द्रियके ममानमें कार्य मविधानादि महीं हो सकते । मत एक मातम माम्प रूप मविधान से छेफर पार पान तक एक माप हो सकते है या गत निर्वापर जितु पचिों मान एक साप नहीं हो सकसे है।।

रटानियासी ter aneति सद और निमत्यर्थ सदित सायसिविका शिद विी भनुम । अध्याय १३१ ॥ मतिश्रुतावधयो विपर्ययच ॥३१॥ विपर्ययो मिथ्येत्यर्थः । कुतः १ । सम्यगधिकारात् ॥ चंशब्द समुच्चयार्थ । विपर्यश्व सम्यक्चेति ।। सूत्रम्-मतिश्रुतावघयो विपर्ययश्च मतितावधयो विपयर्यश्च (भवति यनम्) मति-मत्-अवधयः । विपर्यय । प मवति मानम् अति मत अषधि विपर्यय, उल्टे वा मिथ्याधान भी (=प) होते हैं। अर्थात् मतिज्ञान, भुखान, अधिमान ये तीन मान विपरीत मी होते हैं मति आदि पांचों मानोंको जिनको सम्पग् मान का माये हैं उनमें आदि के तीन शान मिप्या, या विपरीत पान भी होते हैं और सम्पर पान मी होते हैं। पदच्छेद और विभक्त्यर्य सहित इकतीसवा सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश हिंदी अनुवाद पिपर्यया । मिथ्या० प्रतिक अर्थ: (इस सूत्रमें) विपर्यय (भम्द) अयधार्य अन्यया वा मिथ्या ऐसा अर्थ (में) है Fता १० सम्मा अधिकारात् (प्रभ) क्योंकर (विपर्पय शब्द मिथ्या अर्थ में है) (उत्तर) सम्यक् अधिकारसे वर्षात इस सत्र में सम्पन्नध्दकी अनुचि "सम्पन्दन चानचारित्राणिसे आरही है। परम् । समुचम अर्थ (स्त्र में) पद या अठ य समुचय के लिये अथवा समुदाय के लिये है विपर्यय । प० सम्पन्न १० इति० =अयथार्य क्न्पचा (विपर्यय) मी (घ) हे पथार्य (सम्पक्) मी (=प) है (१) इस स्त्रका श्वेताम्बर और दिगमर वामों मानायोंमें पाठ मोर मर्प एक है।मान शयकी अनुपत्ति मबम सूत्रस माती ॥ (२) अम्पयके गुस्से मय ममें से पा समुपपके लिये प्रहण किया है इसलिये मविज्ञान महान और मपधिहाम सम्मम् शान मी होते है भौर मिप्यावान मी होणे ऐम्न मर्पतवार्य सोपातिकमे चशम्य समुषवार्य से पह ममियप सिया है कि उससे सूनमें मुख्य और म्यवहार दानों प्रकार मम्यम्योच पापो यदि सत्रौषमम्पयन होता तो मविप्रतापपया विपर्यय:' ऐसा सम होता मौर रमका मये यह होगा कि मात-भूत-मपपि मिमा (धान) हाते है।। (पभ) 'मणिमुठ मबपि मिथ्या पाम होते है हमसे या पानी निकली हि मतिमुवावधि' सम्पमान नहीं हो सकते फिर पाप सबमें म्पर्य है। (च) सोर पालिक के रचयिता करते है कि परिमामय बिमा व अपके या मानविरम मिष्याशान मौर पम्पबाब रोबों प्रगर दावे है वप समें विपप्पा मर्प मियाान चमसे संप मोर मनपवासपा मरण मात् एटानिवासी जगरूपसहाय संस्कृत पदच्छे और विमात्पर्य सहित सार्यसिदिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । अभ्याय १ सूत्र ३१, कुत पुनरेषांविपर्यय ? अर्थात् मविमान भतधान अपकिसान मिथ्याशान भी है और सम्पन्धान मी हैं त: पुनः एपाम् ॥ विपर्ययः ।। (प्रभ) बहुरि इन (मानों) के विपरीवता (-विपर्यय) क्योंकर है ? मतिमामादि सराप मनम्यवसाय स्वरूप मी समर्पले परमेमें चशम्ब' का सूबमें माना पर्थ महीं है। सोक पा० पृष्ठ २५५ सोक ९,१० ११ देखो॥पो पर स्मरण रोपि मविज्ञान इद्रिय मोर मनसे बाता है बता उसके विपरिणाम संशय विपर्यय और ममापवमाय तीनों मिप्पाधाम हैमोर-समान मनकी सदाफ्तास होता है इसनिये सभी विपरिणाम तशव विपर्यय और मनपवसाप तीनों मियाज्ञान है किन्तु मपधि- जानके पिपरिणाम पिपर्यय भौर समापवसार ही सशप महीं क्योंकि यह स्याणु हे षा पुसा है। ऐसे ममेक काटियोंको स्पर्श करनेवाले शान पनाम संशयी और सही पर बंपर रहनेसे दूर में स्थित पदार्थ स्थाणुरे वा पुरुष है ऐमा परमानम होनेसे उन दोनों में रहने वाले कर्पता मामाम्पका प्रत्पस वक्र फोर मादि स्थाणुके विशेष एव शिराय आदि पुरुषक यिशेपों का प्रयास नहीं किन्तु पहले उनका बान हो चुका सपिये मनके द्वारा उनचा स्मरण है इस रीतिसे सामान्यम्यस विदोषारयस मौर विशाल स्मरण है वहीं पर संशयमान होने के कारण इन्द्रियों के मापीन इसकी रत्पति मानी परतु अपपिकाममें इन्द्रियों म्यापारकी काई अपेसा नहीं न मनके शपारकी काई मपेसा है क्योंकि अयधि- मानको त्रिय मौर मनसे मान्य माना है किन्तु अपधियानापरणले क्षयोपशम विशुखता यने पर यह सामाम्य विषय स्वरूप मपने विषयभूत पदार्थोका जानता है इसलिये मपधियाना विपरिषमन संशय स्पम्प नहीं हासकता किम ! मितत्व माम फर्मक विपरीव प्रशान स्वरूप मिप्यावशनके माप अवपिन रातामरिये पा विपरीत सस्प है तथा मिम पदायकी आर मयपिज्ञानका उपयोग छग सा है कारण पश उमा पूरा मान पहोनेफे पहिले ही दूसरे किसी मानके विषपभूत दूसराही पदार्थ को मोर उपयोग नग जाय उस समय मार्गमे जाते हुये पुरप की तम स्पर्श पान समान अनिमारमक मपपिधान रामावा इसलिये अपापपानका विपरिणमत भनम्पपसाय स्यख्य मोहे पितु जिम समय जिस पदार्थ का भवपिया विक्प कर हाउस ममप यदि पहफ्याग पोगा तो अपपि मानका मन पवमाय स्वरूप विपरिणमन नहीं हा समता ।। (देखो सोकपातिक सोक १२, मोर १३ पृष्ठ २५६) (१) मामाम्परूपसे विपप्पा अथ मिप्यमान मी सयप विपर्यय मोर अनध्ययमापन तीनों प्रकार के मानों यहां प्राण परतु रमरण ऐकि मविशाल मुबान और अपपिसान येही तीनों भान विपरीत पा मिप्याधाम हासके है म मिनापपय मौर केपलपान (मम)क्यो । ( एटानिवासी बगस्मसहाय कीलकृव पदच्छेद और विमक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका सन्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सत्र ३१ मिथ्यादर्शनेन सहकार्यसमवायात सरजस्ककटुकालाबुगतदुग्धवत् ॥ मिथ्यादानेन सर० (उत्तर) मिथ्यात्य ( के उदयकरि ) सहित (सर) (आत्मा और मतिज्ञानादिक का) एकार्थ-समवापाव -एकमेकतारूप (-एफार्य) यमघ, सम्मेलन, पा सरसेप (के हेतु) से (-समवायात) ( मविज्ञान, भूतज्ञान और अवधिज्ञान के विपरीतता होजाती है) सरबस्क कटुक-बालानग दुग्यवतक सेकि गिरी वा रख सहित कवी (कटुक) तुम्पीमें (=अलाषु) क्षेपा हुआ(=गत) दूध मर्यात बैसे गिरी सहित वा रज सहित (=सरजस्क) कइवी तुम्पीमें दूध रखनेसे फरवा होजाता है वैसेही दर्शन मोहनीय फर्म के उदमसे आत्माका मो मिमादभन परिणाम होता है उसके साथ मति आदि शान मी एक स्थानमें रहते हैं - दोनों (मिप्यावर्धन परिणाम और मति आदि शान) एक साथ आत्मामें राते हैं इस लिये मिथ्यात्व के सबंघम मति आदि शान मिमा शान को बाते हैं। . (उचर) स्पोकि दर्शन मोहनीय के रवपस जो आरमाका मिष्यावर्शन परिणाम होता है उमके माप मतिमान शुतमान , मषधियान भो एक स्थानमें रहते है। एक मवाविधान मौर आत्माका मिप्यापर्धान परिणाम दामों एकसाथ आरमामें रहते है इसलिये मिष्णात्यफे सरपसे मसिधान आदि मिप्यावान को मावे है । परतु ममापर्पयवान और फेवखपानका मास्मामें मिथ्यावनिफे पारणों सर्वपा नष्ट होजाने पर मम्पफ्व गुणची प्रगटता से जिम मम्य मामा पिपुर जाता टम ममय उपप होता है । विना मम्पकत्वगुणके उदय नहीं होता इम छये मिष्मात्यके सपसे सर्वथा र एनके कारण ममापर्यपहात मौर विमान कमी मिशही होसकते। दोनों मानॊमें मिम ममय दर्शन मोहनोय कर्मका मर्षया भय हो जाता है और बारिण माहनीय कर्मका उपाराम ( अात् मनःपययमान छठ गुमरपानमें भी होताता है अतः या प्रख्यानादिके उपशमकी अपेक्षा अपनरोजाबी उमममप मारमा मन पर्यपधानका उदय होता है इसपिये मिप्य तो साथ समय न रहनेफे चरण षह मियान नहीं होसष वपाशामावरणीप वर्शनावरणीय मोहनीय भौर मतपय इन पार पाक्यिा प्मों के मर्वया मर होमाने पर मारमा यलबार का उपप दाता है। इस सम्म परिपूर्ण विशुपता केवशयाममें प्रगर होगादीसखिये यह भी मिघ्यावान नहीं पहा ना सकता । OROACA PHGARH ॥ । एटानिवासी मगस्पसहाय कीलकत पदच्छेद बौर विमस्पर्य सहित स्वार्थसिदिका सम्पः हिदा अनुवाद | अध्याय १ सय ३१ ननु च तत्राधारदोपात् दुग्धस्य रसविपर्ययो भवति, न च तथा मत्यज्ञानादीना विपयग्रहणे विपर्यय ॥ तथाहि, सम्यग्दृष्टिर्यथा चक्षुरादिमि रूपादीनुपलमते, तथा मिथ्यादृष्टिरपि मत्यज्ञानेन ॥ यथा च सम्यग्दृष्टिः अतेन रूपादीनि जानाति निरूपयति च तथा मिथ्यादृष्टिरपि ताज्ञानेन ॥ यथा चावधिज्ञानेन सम्यग्दृष्टि रूपिणोऽर्थानवगच्छति तथा मिथ्यादृष्टिविभाज्ञानेनति ॥ अतोच्यते- ननु च तत्र बाधार-दोषात् ॥ दुग्धस्स 'm =फिर (-प) प्रभ (जनु) वहाँ (तुपीम) भाषारके दूपणसे दूधका रस-विर्पयः। मपतित न प सपा -स्वाद उलटा हो जाता है (अर्थात् करका होजाता है) महुरि (-१) नहीं है तैसे मति-अमान-आदीनो ॥ विषय-ग्रहणे पिर्पया मतिप्रधानादिकोंके विषय ग्रहण (करने) में विपरीक्तिा अर्याद मानमें तो विपय का ग्रहण सम्पत्यमें और मिथ्यात्वमें समान होता है तपाहिक सम्पमष्टिर, मथा सक्षुरादिमिः ॥ उदाहरण (-तयारि) सम्यग्दर्शनवाला जैसे नेत्र आदिक इन्द्रियोंसे रूमादीन् । उफ्लम तया मिथ्याष्टिः । अफिस रूपादिकों को जानवा है (-उफ्लमते) वैसे मिथ्यादर्शनवाला मा मति-अज्ञानेन । पवा० प सम्परष्टि। मसेनः॥ =मतिलाना रि (जानता है) और (-) जैसे सम्पन्दनवाला भूतमानकरि स्पादीनि : बानातिा निरूपपति पर क्या -रूपादिकों को जानता है वया (-घ) कयन करता है वैसे मिप्यारष्टिः । अफि० मत प्रशानेन । पया 4 मिथ्याटि मी कुमतज्ञान द्वारा (जानता है और व्यारम्पान करता है) और जैसे स्वधिनानेनःसम्पष्टिप। रूपिकारअर्थान्छ। -अवधिमानकरि सम्यग्दर्शनपाला रूपी या मूर्तीक वस्तुओं को अषगष्ठति सपा मिभ्याष्टिका विभेगमानेन जानता है (अवगच्छति) तैसे मिथ्यादर्शनवाला अवधिदानकरि (जानता है) इति० अ० उन्मते T =ऐसा (प्रन्न होने पर) यहां करते हैं कि (१) मान्यति T निरुफ्पति | इति अपिक पातरम् ॥ कपन करता । ऐसा भी सम्य पान है । ग्रामवा है एटानिवासी महाप कीलकृत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित स्वार्थसिद्धिका सन्देशः हिंदी अनुवाद । अभ्यपि १ २ ३९, संदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धरुन्मत्तवत्॥३२॥ सद्विद्यमानमसदविद्यमानमित्यर्य । तयोरविशेषेण यदृच्छया उपलव्यविपर्ययो भवति ॥ सदसतोरांविशेषाद्यदृच्छोपलधेरुन्मत्तवत् =सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलषेरुन्मत्तवत् (विपर्ययो भवति ज्ञानम् स्त प्रस्तो विधमान और वपिपमान (पदार्यो) का या प्रशस्त (मसे) अप्रठस्त (पुरे) का अक्षिात =विशेषरूप या प्रमेदरूप शान वा ज्योंका त्यों विषेक न होने (के हेतु) से मस्च्छ-उपसम्मे .॥ उन्मवत् अपनी बदामाच्छा द्वारा ग्रहण करने से उन्मच ( पुरुष ) के समान विर्पयः । मनतिश मानम् ॥ विपरीत पा मिथ्यावान होता है माषार्थ जिस प्रकार म्हमाता वा उन्मत्त पुरुष मायाँको मावा और माता को भार्या समझता है या उसका ज्ञान मिथ्यानान है परंतु किसी समय यह मार्याको मार्या और माताको माता कहता है तो भी उसका यह जानना सम्यम्झान नहीं करलावा मोंकि उसको मार्या और माताके मेदका यथार्थ विवेक या न्योंका त्यों शान और विचार नहीं उसी प्रकार मिथ्यात्वके उदयसे सद और असत् पदाका यथार्थ पान न होनेके हेतु से कुतिमान महान अवधिमान (विमा अवधिज्ञान) मी मिप्या पान है॥ -पदच्छेद मोर विभक्त्यर्थ सहित वत्तीसवा सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शब्दश. हिन्दी अनुवाद ॥ । मत् । नियमानम्॥ अस्व॥ अषियमानम् ॥ ८त् विधमान वा पर्तमान (पस्तु) है असर भविषमान पा अनछती (वस्तु) है इति वा । यो अविश्वेपेण ।। -ऐसा तार्प है इन दोनों (सद मसस्) का यथार्थ पिपेक न होने से परम्पा ।। उपसम्धेमा विपपया । मपति T अपनी मनमानी इच्छाकरि (=पाच्छया) प्राण करनेसे विपरीत वा मिप्पा (मान) है (इस समय हामो स्वेताम्बर मोर दिगम्बर सम्पदापोंमें पाठ और मर्य एकीकाम शम्बकी नोवा मोर रापपर्यपफीस्थिस मनाति छीग (१) तपोसम्मत् मोर मसत् शमय सिप है मोर सत् मसत् विधमान पतिपमानके परप मपुंसकलिंगी है मत तपो नमुमलिंगी॥ (एम्स्प्रसंगामात लहान (विपमान । मसमप्रशस्त मर्यात ममास्त्र सामान (मपिपमाल (देखो तत्वाप पसबार्विकप) sales-Masc FROTRAE एंटानिवासी अंगरूपसहायकीकृत पदच्छे मौर विमात्पर्य सहित सवर्षिसिदिका सम्मशः हिंदीअनुवाद वम्पाम १ स ३२ कदाचिद्रूपादि सदप्यसदिति प्रतिपद्यते, असदपि सदिति, कदाचित्सत्सदेव, असदप्यसदेवेति मिथ्या दर्शनोदयादघ्यवस्यति ॥ यया पिचोदयाकुलितमुदिातर मायेति, भार्यामपि मातेति मन्यते । यदृच्छया मातरं मातेवति भार्यामपि मायैवेति च ॥ तदपि न तत्सम्यग्ज्ञानम् ॥ एव मत्यादीनामपि रूपादिषु विपर्ययो वेदितव्य ॥ तथा हि कश्चिन्मिय्यादर्शनपरिणाम आत्मन्यवस्थित रूपाद्युपलब्धौ सत्यामपि कारणविपर्यास भेदाभेदविपर्यास स्वरूपविपर्यास च जनयति । कदाचित रूपादि। सव ॥ अपि मसत् ॥ क. (कदाचित) रूपादिक छटी वा विषमान (पस्त) को भी अक्यिमान इदि० प्रतिपयते T असत् ॥ -ऐसा करता है( प्रतिपयवे)वा अंगीकार करता है(अतिपयते)अविधमान(वस्त) को अपि सवा॥ इति० कदाचित सवसः॥ एक० =मी विपमान है ऐसा (कहता है) कमी विद्यमान को क्पिमानही मस्त पिक असद एव० इति० मिथ्या म्अश्यिमान को मी अक्पिमान ही ऐसा मिप्या दर्शन उदयात् । अभ्यवसातT यथा- पिच-उदम ननिक उद्रकसे पा उदपसे निषय करता है (अध्यवस्पति) जैसे पिचके उदयसे आइलिननिमा मारम्।। मार्गाः॥ इति माम् =घबराई हुई है बुद्धिजिसको (एसा पुरुस) जननीको मार्या वा पनी ऐसा पनीको मपि माता ॥ इति मन्मते परच्छया । मी जननी एसा मानता पा बानता है अपनी मनमानी इच्छ। से मातरम् ॥ माता ॥ एन० इति च माम् nais मावाको माता ऐसा ओर (-च) मार्या को भी मायां, एवमतिदपिकन वत्सम्पशान ॥ एवं -माही (मानता है) पहमी (उदपि) उसक (ना) सम्यगान नहीं है इस प्रकार मति-आदीनाअपि स्मादिपुनाविपर्पयादिवन्यास-मतिबान आदिकोका मी रूपादिक विपरीक्ता बानना योग्य है (सोही करते हैं कि) तपाहिकमित मिप्यादर्शन-परिणामालास्मनि, मपस्पिता-जेसे (-उषा रि) किस बात्मा ठपरा हुमा मिथ्यात्वपरिणाम स्मादि-उपसम्घौ । (नेत्रादि करि) रूपादिकों के बानने में (सम्पग्छ मिथ्याटि के) सत्पाम् । मपि म्साफा वैसा(-सत्पा)पयार्य वा समान( सत्पाम)(बानमोने परमी(-मपि) कारपपिपासम् ।। भेदामेदविपर्यासम् ।। कारण विपर्यास को मेदामेद विपर्यासको १७ स्वरूप विपर्यासम् । बनयति । और (च) स्वरूप विपर्यास को उपजाता है। Rea तात. कारणविपास एटानिवासी मगरफ्सलाम वकीस्कृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्विसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ ३२ कारणविपर्यासस्तावत्-रूपादीनामेकै कारणममूर्त नित्यमिति केचित्कल्पयन्ति ॥ अपरे पृथिव्यादिजातिभिन्ना परमाणवश्चतुस्सिद्वयेकगुणास्तुल्यजातीयाना कार्याणामारम्भका इति ॥ । पादरीनाम् । एकम् m =अपम कारण विपर्यास (कहा जाता है । स्मादिकों का एक (ही) कारणमा अचम् ॥नित्वम् नाति फेषितम्कल्पपन्तिा कारण अमूर्तीक नित्य है ऐसी कितनेक (वादी) कल्पना करते हैं अर्थात् प्रमा- दैतवादी मानते हैं कि स्पादिकोंका कारण एक ममूतीक नित्य प्रमही है प्रमहीसे हुये है। सांस्पमती कहते हैं कि रूपादिकों का कारण अमूर्तीक नित्य प्रति ? प्रकृविसे ही ये रूपादिक उपधे है॥ (पद्यपि नेत्रोंको ये बसे हैं वैसे ही दीखे है। मपरे । पश्विी-बादि चूसरे अति नैयायिक और पैशेपिक मानते हैं कि पृथिवी जलअनिघायुकी (म्बादि) माविमिमाः । परमाया । पर आविरूप जुदी जुदी (=मिमा.) परमाणु (यथाक्रम या क्रमसे) गंघरसरूपस्पर्श घार इस रूप स्पर्ष तीन (गुणपाली) रूप स्पर्श (दो गुपवाली) सर्व एक गुणवाली है तुप-चापीयाना का माम् ॥ बारम्मकामा इसिक (सो अपने अपने)समान जातियोंके (कंघरूप) कार्योको बारम्भ करनेवाली है अर्थात पृषवी आदि चारों अपनी अपनी बातिके मिन्न मिम स्कंघल्प कार्योको उपजाते हैं (१) पाविपरमापुर पपरसम्मस्पर्णा बाप्पु रसम्पस्पर्शा । बसेषु स्पस्पर्टी । पापषीयेषु स्पर्शः॥ परिपरमा गरमध्यपः। -पियों से होने पाळे परमाणुओं में परस-वर्ण-स्पर्श (ये चार गुण)* पाप्पेषु रसपर -ससे होने वाले (परमाणु नि में रम, वर्ण और स्पर्श (पे तीन गुण)हा है। सेमसेन स्म-स्पी -बमि से होने वाले (परमाण) नि में कर और स्पर्ण (ये दो गुण) होते है। ) पापुराचे स्म - पवन से होने पाडे (परमाणु) नि में प ( एक गुण) होता है। माप्येषु और वायुपीयेष निगी नपुंसकलिंगी पलों है। SARG .. एटानिमासी जगरूपसहाय पीलात पदच्छेद और विमस्वयं सहित सर्वार्षसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अम्पाय १ सत्र ३२ अन्ये वर्णपन्ति-पृयिव्यादीनि चत्वारि भूतानि, भौतिकधर्मा वर्णगन्धरसस्पर्शाः, एतेषा समुदायो रूपपरमा गुरप्टक इत्यादि॥ इतरे वर्णयन्ति-पृयिव्यतेजोवायव काठिन्यादिद्रवत्वायुष्णत्वादीरणत्वादिगुगा जातिभिन्नाः परमाणव कार्यस्पारभकाः॥ भेदाभेदविपर्यास कारणात्कार्यमर्थान्तरभूतमेवेति अन्ये पियन्ति प्रिथिवी-बादीनि सरे (अर्थात् पौदम्ती) वर्णन करते है कि प्रथिवी बल-केज-वायु (आदि) पस्पारि । भूतानि ॥ मौक्किधर्माः घार विशेष गुणवाले द्रव्य है (-सूतानि) इन विशेष योक स्वमाव धौर धर्म पर्णगन्धरससाः। एनेपाम् ॥ इप, गंध, रस, सर्भ है इन (प्रविधी, अल, केज, पाय, पर्ण, गंध, रस, सई) का समुदायामपरमामुः ।। अष्टका । इस्पादि॥ =समूह रूस परमाणु अष्टक है एसें और (पासें मी मानते) है इवरे । र्मयन्तिा प्रपिषी-मप्-वेबस्-पावा। अन्य (अर्थात पार्षाक मसी) कहते हैं कि भूमि, जल, अमि, पक्न, (क्रमसे) काठिन्पादि-पत्यादि-उप्मत्वादिदरणत्यादि -कठोरतादि, पहनापनादि, सादि, प्रेरणत्वादि (रणत्वादि) गुणाः जाविमिमाः। परमाणः । -गुण पासे मिम मिम बातिवारे परमाणु हैं। कार्यस्म ॥ आरम्मका से मिम मिम बावि पाले परमाणु पूषियी आदिक स्कंघ रूस) कार्य के आरम्म करने वाले हैं। (इस सपका भावार्य यह है कि) ममि के परमाणं के काठिन्यादिगुण और लके परमाणुओंके द्रक्त्वादिगुण और अभिके परमाणुमो प्रणत्वादिगुण और फ्पनके परमाणुबों के ईरपत्वादिगुण है ते मिम मित्र परमामु पपिवी आदिक मिममिन्न स्कन्ध अपनी अपनी बातिरूप उत्पम करते हैं। (इस प्रकार वो पृथिवी आदिक पदार्थों के कारण में विपपय मानते है) मेदामेदविपर्यासः । कारपात् ॥ कार्यमा म्मेदामेद विपर्यासः मैसे कारणसे कार्य अर्थान्तरस्तम् ॥ एषक इतिक भिम पदार्थ ( अर्थान्तर) ही होता है वर्षात् प्रक्विी बादिक परमाएं निस्य है पिन से स्कन्धरूप यो कार्य उत्पन्न होते हैं पे उन परमाणुषोंसे मिम है वा गुमसे गुणी मिम ही है वा द्रव्यसे गुम पक्क् ही है एटानियासी घमस्मसहाय कीसकर पाछेद और विमत्पर्य सहित सर्विसिद्धिका घम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ त ३२, अनर्यान्तरमूतमेवेति च परिकल्पना ॥ स्वरूपविपर्यास रूपादयो निर्विकल्पा सन्ति न मन्त्येव वा। तदाकारपरिणतं विज्ञानमेव । न तालम्बनं वस्तु बाह्यमिति ॥ एवमन्यानपि परिकल्पनाभेदान दृष्टेटविरुद्धा मिथ्यादर्शनोदयात्कल्पयन्ति तत्र च श्रद्धानमुत्पादयन्ति । ततस्तन्गत्यज्ञान श्रुताज्ञान अवघ्यज्ञानं च भवति ॥ सम्यग्दर्शनं पुनस्तचार्याधिगमे श्रद्धानमुत्पादयति । ततस्तन्मतिज्ञान श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं भवति आह प्रमाणं मनन्तिरम् ।। मतम्।। एव इतिक परिकल्पना, और (-१)(कारमसे काये) अमिम पदार्थ ही होताहै इस प्रकार (किसी किसीकी) कल्पना पा मानना है। जैसे घट पटादिक और ग्राम पन पर्वतादिक ग्रामसे उत्पम हुये है वा ब्राहीह जदे नहीं हैं। (इत्यादि मेदामेद विपर्यास है जहाँ मेद होय तहाँ अमेदही कल्पना नोअमेद होप वहां भेदही फल्पना,ऐसे विपर्यय यौगियोंकी है) स्वरूपपिपासा। स्पादयामा निर्विकलामा सन्तिा =स्वस्प विपर्यास कैसे रूपादिफ निर्षिकस है अर्थात इनकी करसना नहीं होसकी है (ऐसी पैमाप्पफ मतवालों की कल्पना है) न सन्ति T एष. पाक अथवा रूपादिक कोई पदार्थ नहीं है तदू-बाकार-परिणतम् । विज्ञानम् ठन (सादिक) के कारपरिणया विज्ञान ही है * बासम्बनम् ।। वस्तु । बागम् ॥ इति =तिस (विमान) के बाथपभूत या अवलम्पनरूप पापद्रव्य (स्पादिक) नहीं है (विज्ञान तिवादियोंका जो पौदस्तका एक भेद है ऐसीउपर कटी हुई कल्पना है) एवम मन्मान । अपिल परिकल्पनामेदान् ।। इस प्रकार मिम मिम बहुत (=परि) पारसना के मेदों को मी स्टटविरुवान् ।। मिप्यादर्शनदयात् ।। जो प्रत्यक्ष मनुमान प्रमाण से विरुद है मिथ्यास्त के उदय से मन्मपन्तिा प प प्रदानम् In उत्पादयन्तिा -मानते हैं। मौर (च) तहाँ प्रतीति या रुषि ( अदान) को उत्पम करते हैं स्वः Im मतिमझानम् ॥ मत्-अयानम् -विससे वह (-) समविमान (वर) समुतमान प, अवषिषडानम् 1 मपति पुना सम्पन्दनम्।। -बौर (पह) अपधिधान या विमंग अवधिमान होता है। और सम्पक्स्प वल-अर्ष पधिगम, भवानम् ॥ उस्पादयतिर पयार्य वायपावस्थित(-तमोवस्तु वा पदार्यके (-मर्य) माननेपर प्रवीति उपमाता तवा वद् । मविधानम् । मुबानम् । -तिससे वो मलिान (प) परमान मवधियानम् । मति माह प्रमाणम् स्या -(4) मरमिान होता है। फवा है कि प्रमाण (प्रस्थानौर परोष) न। एक STEG FROR पटानिवासी अगरूपसमाय वकीलकृत पदच्छेद और मिक्त्यर्थ सहित सपिसिदिका सम्मका हिंदी अनुवाद । अध्याय १ पत्र ३२, ३३ द्विप्रकार वर्णितम् । प्रमाणेक्देशाश्च नयास्तदनन्तराइंगमाजो निर्देव्या इत्यताह ॥ नेगमसाहव्यवहारर्जुसूत्र शब्दसमभिरूढवम्भूता नयाः ॥३३॥ विप्रकारम ॥वर्णिम् ॥प्रमाण एक वेशाः च नया,। दो प्रकार पणन किया गया और (24) प्रमाक्के एफदेश (जे) नस (से) स्व-अनन्तर =(पमाणनयरधिगमः इस पत्र में) उस (प्रमाग) के अत्यन्तसमीप (अनन्तर) देस माजा :। निदेष्टव्या । इति० बवा० बाद नाममात्र कहे (उदेशमाज) (अर) कपन किये जाने योग्यहैं । इसलिये करते हैं कि नेगमसाहव्यवहार सूत्रशन्द समामरूढेवम्भूता नया ॥३३॥ नगमसाव्यपहारजुस्वशम्दसममिरु?यम्भूता (सप्त) नया) : (मवन्ति) ॥३३॥ नगम-सग्रह व्यवहार ऋजुमक सन्द नैगम सग्रह (साई), यवहार, ऋजुत्र, शरद, सममिर एवम्मताः । सप्त , नपाः मवन्ति T -सममिन, और एवम्भत सात नम विद्यमान है (भवन्ति) अर्थात (१) म्पबहारनपत्र -म्पयहार+यसपत्र (दोनों पावर टोकरे देखा टिप्पणी पृष्ठ ४)। (२) पवम्भूत एवमूत (देखो टिप्पणी पृष्ठ ५ और मीधे की रि०) । म पदाम्त दो पा किसी प्रत्यय के अतमें हो मोर इसके पश्चात् को प्यमन मावे तो म् का विस्करि मनुस्वारमें परिवर्तन होडावारे पनि मरे पश्चात् श्रममन् माये तो म अवश्य ही अनुसार में पलट गायेप । यदि हम इस म को मनुस्वार में म पम दो उम मनुमासिक स्मन् म परिवतन होगा निम वग काम्पडन स स के पीछे प्रापै मोर पवि स म के पश्चात य-ए- म से कोई भाषे तो म मनुमासिक प्यम में क्रमानुसार वा पदापोम्प पमन सबैमा। प्रता एवम् +मृतामपा सब काम मनुस्वार में परमपर एक भूखानपा पेसा शब्द ना । सविप एगम्मतामया और पवस्तामा दोनों पाप ठीक रे॥ (मापारकर मार्गोपदेशिय पृष्ठ १३) (३) स्वेताम्बर माम्मायके ममाम्य में हमारे पाहा के तेतीमय सूत्रके स्थान में " मेगमसमहाराहारजसरशमा नया" तीसर्वा स ।इम चौतीसा पत्रके माग ही "भापशप्यो विनिमेयो (-माविकी नगमनय) के दो (मेद। राम (नय) के तान मेव) पेसा समाध्य० में पेंतीसा सत्र ॥ (रेको पूछ ९)॥ मप (देखो प० जयबा की अचमिका मुद्रिव पृष्ठ १९५) दमों मम्मागे कीय वंशावली मिगतीसीप भय दिखो ममाप्यतत्वाधियमधर पृर ३१) है। मय मयमय शयनप संप्रा म्पपहार ऋजपत्र राम्द SKELEASEGE । मगम संमद श्यपहार पासून शब्द T पपमूव देश परिसपी सममिम समय परियोपी सामत सममिन्न एवमूव पैदानिवासी वीर और विमात्यर्ष सहित सपार्षसिदिको दिशादी अनुवाई। अध्याय १ ३३ पसमें अनेक धर्म (स्खमाष) दोसे हैं उनमें से किसी एफ धर्मकी मुस्पवा सेकर भब (नमयोंडी परिमावा मौर म्यारपाके पिये देखा रिपनी पृष्ठ १९५४५८ 1 निमय मय पवहार मप, उपनय, उपचार मप (अपक्ष १०२१३२१५) शुबनिय समूत पवारमय मसमूतम्पपहारमय पपरित म्पपदारनय अभ्याधिक पर्यापापिकम- व्ययाय -गुदममतम्यवाणय -समानमातोप भभमतम्यवहारनप -मसमानतातोप समूतपबहारनप -मिसन्मूतव्यबहारमा --समानमातोप उपचारमा उपचार --विज्ञातोपबारकावार -मित्र उपचारका पवार LIKASE । म सामस पर्वत सम्पार्थ पनि म सम्पपर्याय नम । भनमा नपान पर्याय अन्य प. व प्रमा मरम्प 40 गम मेगम बैंगम मंगम पोप मेनन पर्वायनेबम पांवगम पावनेगम पदार्पधार मेमोरपचार दोनोप मारने वाली एलपचा उपबायोमर्यात पापणार नपानपके नियम नप मौर मारमा यो मेखिOM TO MANOमो समय के साप प्रामदिन पार्षः मेव ममेर करती है।

पठानियासी बस मन पर वोर निमस्पर्य सहित स्वार्थसिरिका पारित अनुनाद । पापा ३३ भनिरोपस्म साम्य पदार्य को पाने सो नर्म है । उसके उपर्युक्त सातमेद है। (१)मा-पस्तुदे पर देश को सामने बाबान बोपपते है॥ बस्तुगिसी सस्प वा पयार्य मेश महण करने पापानको निमप गरमते है।जैसे मिट्टी भलो मिस घरमा । (३) पिसी निमिचो परासे पर पवार्यको पूसरे पदार्थरूप सामनेवाले मामको म्यपहारनप रते । जैसे मिहीरपणे पार पाने के निमिचसे पी पापा । (५) "माव मोघ मादिक राग्पदिक मप मशुर नि परवान' पापी मनुवादित प समर का जीवई मविकासादिकका का कपि सो अयुब विश्वयनयर मय प्राशिका ।। जीपको भोपामस मविपन मुवान अपपिन माया र मनों का मत करना या तो अशुबनिश्यप नव १ ओर (५) शुय पसल मामा सपोरेसन और मानकाना सौ शुरु निश्वानप है।। "निहाये (अपसे) शुए पुय निजगुनमें केवल पशन बाम सरुम । प्रम संगर (0) गोम्म मात् सामान को महबरै सो द्रम्मानियो (७) यो विधेप मपाट गुम अपपा पर्वार का रिक्य कदै सो पार्पिक नपर) मगर संम्पा, पवार यायिक पर मोर जासून गप्प, सममिल, एवमूव में पर्यायोपिक मपहे बड़ी पारमा मते एस्पर्ष में वीरव्हा परतावा विधामा किम्पपहार शम्ब मो शमसाव नपके प्रसग सम्म व "संमानपस प्राणाये तुप पपार्षाका विधिपूर्वक प्रमेव मारे "फिर किसी प्रहारबरिमामनदास "सोयो प्रससवा विषपोखर पवार सम्म प्रहार भगबजार पमपा पृष्ठ २०१ परमपर्व नपखामे (३५) मिश्वपनपके निकट मोम्यपहार मप बी सिसका एपनय मोर उपचार समीरमौर जिसके माठ मेव कोपर"पिसी निमिपके पास एक पदाथको पूसरे पदार्य रूप बामनेवाले शासक मामद साकिस पठन संस्था (मे याद सत्र विशेष ऐसौ कियहां बम्प पदार्थ मायको मम्स पदार्थविव मापेपरिवा पनिमित्त मप जनैमितिक माव वाई से पस्त पानिधमाष वा मापार माघेरमा मारियोजनके प नारोपण कीमिप वपा एक दशमें सर्वदेश का उपचार करे बम बारमविप्रचापपार कर हयादि सर्वही पयहार (मय) का अप्रकाशिका पृष्ठ हमारी समपर्ने म्यवहारनप मा सावमपोंमें पर्मिवी और पवारणप, उपमय पाम्पवाारनप को निश्वप मपके निकट पंगपळीमें दी है हम दोनों में यही उपयुष दिपा दुमा अवरो पदि बम विचार कि समहनक्से मान सिप पे पापं का मेद प्रमेह व्यवहारमासे मोपहार न घर सकता और उपचार मप रुपमय रखमीही समोर (सनिक वितरप पाली पक्षन) से मी म्पहार यो वो इस अपरया में दोनों नप म्पपहार की पगने पासी सामाग्यल्प से RASI पटानिवासी प्रगल्पसहाय कीराकृत पदच्छेद और विभक्पर्य सहित सर्षिसिक्षिका सप्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ र ३३, (१) जितने द्रव्य है-ये मफ्नी मूत, भविष्मत, पतमान काल की समस्त पर्यायों से () एक मरम्पको मेरम्प विप करनेवामे शानको सदस्त बहार मय रहते। जैसे-जीप सबानाविक वा मतिज्ञानादिक गुण हो। (अर सिखम्त प्रवेशिका पाठ २३) रतनपके शस मदमत पगार मौर मशुखसमृत व्यवहार येवा मेव हैं। ()शरगुप्प पौर शुरगुणीका मेरमामा लिप्त प्रकार जीवो पम्पादिगण है अण्वा राय पर्याय और पर्यायीका भेदभामा जिम प्रकार सिब जोषको मिस पर्याय पर थर सामत म्यपहार अशवगण ओर अशुभ गुणीत मे कहना उसे जीवो मतिमानादिक गुण मग मशुख पर्याय मौर प्रशुख पर्यापीका मेव कामा जसे समाजीकी देव मावि पर्याय में यह मशुभ समय पचहारनय है। १) 'मान्य स्वतुका गुण आपके सौ मसमत म्पबहार सय पृष्ट १४ जिसबाग स्वचानि सबपी ममत् म्यवहार होता वा मसाप मदमस्मगाराप से परमाणु पर प्रदेशी।। पो पर बदमवेशी पुनम इम्प परमाणुका समातीय परतु परमाणुपदेशी नहीं पर पर प्रदेशीही इमलिये एक प्रशीके स्थानमें वह प्रवेशी पहनेसे 'परमाणको प्रदेशीयानाममान जातीय मसबभूव म्पसारनपहा विपOजिस मपके द्वारा विवाति रूपपी मम्ट पवहार हेता हो पा विजास्यसमूत म्यवहार से जहां एकॅन्द्रियाविक वे सो पुल सपरे जमको जीवइना सो मममान मातीव ममदमत मबहारनपका विषय है। 1) दिसायके शाप स्वगति विवाति सबपी ममदमबहार को मा पानि वित्तममृत म्पबहारनप है जैसे यहां मतिशामको मृतींक पमा योनि मूवीबसे उपरोया है। मा प्रतिमान तो ममतीक जीषा पम है और मुठीकरना पुनपका धर्म पर मिम मसमव प्यबहारमा (अन्य उदाहरप) से मान पामे पता है यहां पर अयमे मीच मीष दोनों प्रकार पपमाणेकर हमारे उनमें जीव पाय सानप मजातीय है और अजीब पाप मामा विजातीवानोंको मानका आपार पाना स्वजातिविमास्यसमत प्यपदारमयका विल्प है। Oमसत मित्र पदायोफोमा ममेरा परम करै उमको पवरित म्यवहारमय भयपा उपचरित असत म्पमारमय कहते है। जैसे हापो घोड़ा, पर मेरे पादि। इसके मी तीम भेव (१) समास्युपमरितामदत मापहार पा समान जातीय उपचारका उपचार (२) विज्ञास्युपपरिता सद्भुत प्यार पा विजातीय उपचारका उपचार (1) पवाति विजापुपपरिकमाइभ्व मवार वा मिन रपचारका उपचार।जिस भपके भाग खादि संधी मारोपित असत म्यवहार है जैसे स्नी, पुत्र, भी, मावा, पिता आदि मेरे। यहां पर सी , मी, मावा पिया मामा की ५ एटानिनासी बगरूपसहाय वकीलफत पदच्छेद मौर विमक्स्पर्य सहित सार्थसिविका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १५ ३३ अन्वरूप (मोहरूप) अपनी किसी भी पाय से कोई द्रव्य मिझ नहीं है । सो, मपेक्षा मे रपमातीय है। उमका मेरा कामा त्यजातीय आरोपित मम्मत है इसलिये पद पवारयुपचरितासद्भुत प्यार मयका विषय है अथपा ग्रमान जातीय उपधारमाया । ( ) जिसके मारा पिजाति संबंधी मारोपित मसव म्पबहार दो पह विज्ञास्युपचारितामस्त म्पबहार मयो। जैसे पस्न मामाप मानि मेरे। पहॉपर पस आमरण आदि भनेतन पाथ मारमाफे विभागीयो । उनको मेरा पाना पियातीय आरोपित मसात् सिमिये यह पित्रस्युपपरिणाममूव पयाहार मय का विषय है मया विजातीय उपचारका उपचार है () जिम मयफे मारा स्वजाति विज्ञाति दोमों सोमारोपति मम म्यवहार हो या स्यमाति पिनायुपधरिताममृत म्पबहार मय जसे देश, राज्य, गढ मावि मेरे ६ यहां पर पेशा आदिके फरनेसे उनमें बने पाले मनुष्य तियष आदि धीय और प्रर कप आदि मधीप दोनों प्रकारके पदार्थों का प्राण है। उनमें मनुष्य प्रापि जारमाके स्वातीय और मह र धादि विधातीग है मत राम्प पुर नेश गह मावि मेरे इस स्थान पर स्वजातीय विमाप्तीय दोनों प्रकार के पदार्थी को मेप कहना स्थति पिमरगुपपरियामध्भूत पयहारमय का विषय है मघवा मिन उपचार का उपचार है। ऐसे म्पपार नय अनेक प्रकार प्रपते है "पा नामके भेद तीन है। म्यनेगम, पर्यायमैगम द्रणपर्यापनेपम । वहां प्रण नगमके दोष मेष है। शुखदम्पनगम, बशुखदम्पनगम । गरि पर्यापनगमके तीन मेव मयपर्यायमैग्म, प्यमनपर्यापनगम अयम्यमनपयनगम । बरि प्रणपपिनेगाफे गारि मर गुपद्रणापपर्याय मगम भगुरुद्रम्पाथपर्यायगम गुरम्पम्पजनपायमैगम, मज्वपम्पसमपर्यायगम ऐसे मगमनएफे नयमव भये । वहां पदाहरण जाम सम्ह नप का विषय मम्मान (=सा मात्र) शुखदप है साका पद मेगमाप सम्न्स कर है जो मम्मान दम्य ममस्तवस्तु, पेसे फो वह मद मौ विशेषण मया तात गौणौ। बारिद्रम्प विशेष मण वा मुख्य है पर शुखदम्यनेगम है। पारि जो पर्यायवान् । सो द्रम्प है तथा गुमपान है सो बप्पी पेमा म्पपहारमय भद परि की है। ताका या मैगममय समाप करे। हा पर्यापपाम् तथा गुणयाम् यस्तो विशेषल मया तावे गोम है बारिप पिशेण भया तात मुख्य है। ऐसे अशुस दम्य भगमनय मया'। परि प्राणी सुरवमपेदम दे मोक्षण पसी है ऐसे अपवसी ऐसा तो सत्ताबा अय पर्याय है सो पिशेषम है बरि सम सो सेपेदनका अपपर्याप सा पिशेष्य भया तावें मुल्य है । तात यह मथपर्याय भेगम मया ।। - एटानिरासी अमरूपता की परछेद और मिस्त्वप सहित सर्विसिद्धिका पद हिंदी अनुवाद । वन्याय १ स्ने ३३, मतीव पायोंकों को, मविपत पर्यापोंने क्या पर्वमान पर्यायों को पर्वमानकालमें संकल्प करै ऐसे धानको सपा वचनको नैगमनप प्रते हैं। उसके वीनदा (१) मृत नैगमनम (२) मापी पा मविप्पत नैगमनय (३) समान नैगमनय । जहाँपर अतीतकालमें पर्वमानका धारोपन किया जाता है उसको मत नैगमनय करते हैं। जैसे "थप दीपोत्सव दिने भी कमान स्वामी मोक्ष गवा" पर पुस्पविच सम्म सो सतह सत् नामा म्यंजन पर्याप हे सा विशेषपद गरि चेतम्य मामा म्यंबन पयाय । सो विशेम्परे वा मुम। परम्पजन पर्याय नेमा । ( ) पारि धर्मामावि मुबीवीपना है। मुख वो अथपर्याप रे सो विशेपपहै। पारि जीवित जन पाप रे सा विशप्पो वा मुस्प है। पामर्षम्यमनपप गम है। परि ससार विर्व सत् विपमान सुधा सोसणमात्र। हो मत् पुर दम्म सो विशेषण है। सुख सोमर्य पर्याय है सो विशेष्य है, मुरूम है। या शुखम्प मर्प पर्याय मंगम मा परि विषयी भावी सापक सण सुखी जीव है सो मधुर प्रम्य सा नियम पर सोमव पर्याप सा विशेपनीता गौण परमशुखम्प मर्यपर्यापनगम मया ॥ (परि चित् मामाम्पो सो सत् रेसिव पेसा शुखम्पद सोतो विशेषयोति गोप । पिता सोमेमन पर्याप है सो विशेण वा मुख्य है। पाक शुद्रण मन पर्याप भगम मया () परि जीव ईसा गुपी हां जीप सा मशुखम्प, सो विशेम्प है सो मुम्प है। बहार गुण हे साम्पंडम पाप रे सा विशेष पाल गौपा। पह मशुखम्म मन पर्याय मैगम मया । सात मोके निप्न मान चित्र भी हैं - नय अम्बाधिक मम बिसय प्रयोजन द्रम्पको पर्यापाधिषमय विसन प्रयोगम पाप हो मा अर्यको प्रपानकरि प्रवत या शम्की मपान परिप्रदते (सो) मर्य मप नगम सो (शममय) म्पपदार 1 न्य सममिष एवंभूत । मैगम T Sas शम्य ममभिम पर्वमूत । समकालसर इटानिवासी जगरूपसहाय पीलात पदच्छेद और विमर्प सहित सर्यिसिदिका शम्दक्षा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ स्त्र ३३, मान दिनासीके दिन भी बईमान मगवान मोसको गये । यहां पर स्यपि मगवान को मोध गये सहसों वो बीत गये परंतु संसारमें सा म्यवहार होता है मांद नस सहस्रों वर्ष पहले के दिनका किस मानक दिनने किया जाता है। यत नेगम नयशी अपेक्षास । सरका पास ठीक समझा जाता है (२) वहां पर होने वाले पदार्थ, चुन्नक समान सकल्पाकमा बाताह वा कपन सामावाह उसका 'माना । पा मविपत् नैगम करते हैं। जैसे न सिन एव अमोद भरत मगवान सिही है । यपपि अरस्त भागे दहांगे अभी सिद हुये नहीं है होने पासे है क्यापि चुकने के समान कपन किया गया है इसलिये इसको मावि नेगम करते हैं ।। (३) नहोपर कोई काम करना प्रारम कर दिया हो पाई वा पोरा पना हो पाई योग मीन पना हो तथापि उसमे बने हुयेके समान काना पर वदमान नगमनय हास कई पुरुष रोटी पनानेकी साममी इकडी कर रहा है और उसे कितीने पूछा क्या करत हो ? यह उचर दवा हक रोटी बनाताकिन्तु पहा रोटी मनानेरूम पर्याप अभीतक प्रगट नहीं हुई फेपलमाष लकरिये पल और अन्य सामान रख रखा ह व्यापि मान नगम नपस ऐसा बन कर सकता है कि रोटी मना रहा । (२) मो एक मस्तुका समस्त माविकी और उसकी सर पर्यायों को संग्रहरूप करके एक स्वरूप है, उसका सानप फार नस 'घट' करनेसे सप पर्दाको समतना मक्या द्रव्य कहनेसे घाव बनीवादि तथा उनक मेद प्रमदाद सरकार समसना साह॥ (३) वो संग्रश्नपस प्ररण किये पापोका विधि पक्षक (व्यवहारक अनुकूल ) व्यपहरण अवात मद प्रमद कर सा व्यवहारनय ह । जैसे संग्रानपसे 'द्रन्या कानसे समस्त मेद प्रभेदरूप द्रव्यांका सामान्पवास महण होता है । परन्तु द्रव्य दाप्रकारक हजार आर पजाय । जीवदेव नारकी मनुप्प तिषचारमकारक है । अजीव पुद्गल, धने, अपन, काल, माकाश ये पाच प्रकारक है । इस प्रकार म्यवदारक सावक जिवन भेदप्रमेद होस उनको जाने सो व्यवहारनय। साराश-संग्रश्नपस ग्राण किये हुय पदावा लाकव्यवहारक अनुसार वा विधिस मेद प्रमेद महावका कारकि फिर किसीमकारका क्भिागनहोसके। सो जहाँ अनुसूत्रका विषयहासक पहलक सह और व्यवहार दाननिय चस बाप है। (४) बतीत अनागत दानो पपायाको छोड़कर पवेमान पयोय मानको ग्रहण कर सा जुवनय ॥ मावठयहा पयाय समय समय (काठका सरस आटे माग) में पारणमती (फ्लटती) रहती है । सा एक समपर्श पयाय को अय पपाय कहत ।। बव पपाप । नवनयका विषय है । जुम्बनय पर्तमान एक समय मात्रा पपाय कसा वा अहण करता है। बात अनागत समपका पपासका प्राण नहीं करता । जैसे कोई पुरुस कीसे आकर भेठा है किसी दूसरे ने पूछा कहा माई कहांसे भारद हो ? उस समय उसका यह करना किबीसे नहीं आता। क्योंकि उस समय गमन क्रियाका सर्तया ममाव है अतः शुदयमानी अपया इस समय कसे नहीं आता है या मानुसत्रनय का विषय है और ठीक है। Bre एटानिवासी जगरपसहायकीमत पदच्छेद वौर पिमफ्त्यय सहित सर्वार्थसिद्धिका शय्दशः दिदीअनुवाद अध्याय १ धन २३ (५) जो व्याकरण सबंधी लिंग, संख्या (वचन), साधन (पुरुष), काल, पुरुष, उपसर्ग, उपग्रह (-परस्मैपद, यास्मनेपद) आदिक के व्यभिचारोंको (दोपोंको) दूर करके बाने पा को उसे शब्दनय कहते हैं (इसके उदाहरण प्रषिके अनुवादमें बहुत दिये ) (६) वनेक अयोको छोरकर प्रधानतासे शो एफही अयमें रूट (-प्रसिद) हो चसी अथको विपय करने वाला हो अर्थात उसी मर्यको बान पा कह सो सममिल्टनम है । नस-गो शम्दके वाणी प्रथिवी गमन आदि अनेक अप होते तयापि मुस्पता से गो नाम गाय नामा पशुका ही ग्राण किया जाता है। यहां पर यह अवश्य समझ लेना चाहिये कि सोती, उठती, पठनी, चलती, फिरसी, किसी मी अवस्था में यह पयों न हो सब लोग उसको गायही कहते हैं। सो यह सममिरुदनय है । (७) मिस कालमें यो क्रिया करता हो उसको उस कालमें रसही नामसे जाने वा फौं उसको एवं भूत नय कहते हैं। जैसे देशों के पतिको परम ऐश्वय सहित हो, उसी अवस्थामें इद्र कहना पूजन, अमिपेकादि करते हुये इन्द्र नहीं करना क्या जिस कालमें वह शक्तिरूप शियाको करे उसी समय "सका कहना अन्य समपम शक नहीं कहना ॥ यहां पर "एषभ्यत =ऐसा होना इस एवमूत नय के बर्थ की प्रतीति (निमय) शब्द से होती है इस रिये शब्द ही एवमत नय माना है कारण काय का उपचार है अवि एवंभूत नय के अर्थकी प्रतीति में कारम पद और काय एषस्तनम हैं। (१) सममित्य और एक्भूत मोमें पह मेव वा अंतर किम्युत्पत्ति सिय अथ क्या है (अर्थात् प्यापरपकी रीतिसे शब्द सापममें फ्या मर्प होत्यास पात मी विचार न कर प्रसिद अथका जान मा सममिस्टनयका विषय है '' शवका म्युत्पचिसिय मर्य जो गमन करे सो प्रय पारसका तो विधार परणा किंतु हमके स्वर्ग, किरपवन अळ मयंकवायु, सप्यापि, वापी, दिशा माता पाणी, भूमि स्यादि अनेक अर्योर्म प्रसिर पर्ष 'पाप' सेना और मब अर्थोको छोड़ कर उस गायका सोती रती, पेरती परती मा मषस्थाओंमें गाय कहना यह सममिमा मपका विषय है । ऐसेही इन्द्र शम्बका भ्युत्पतिसिर अय परमैश्वर्यका मोगमा सातौ विचार न करना किंतु शक्तिमान होमा पुरोन पिदारण परमा एत्पावि अनेक मोका सोकर प्रसिद नर्थ परमैश्वर्यका मोगलाही मैमा, पर्ष उस स्त्रको परमैश्वर्यका भोग कर रहा हो, पान कर रहारो पूजा करते समय, भमिपेकरते समय इत्यादि सब भवस्यामि रम्य पाला यह सममिस्टनपका विषय है। परंतु जापर यम प्युत्पत्ति सिब ही अर्प विषय हो वा प्रहण दो पार एवंमूत मप है असे गात करने वालीको ही गाय कहना जारी रहने पापी पा सोने पालोदी गाप माना पा जिस समप एक परमप्यर्पन माग कर रहा हा उसी समय इन्द्र कारमा मन्य ममप एव न कहना यह एपमत नपका विषय है। L HD . पटानिवासी बास्साब कीमत पच्छे वौर किमक्स्पर्ष सहित सर्वार्थसिदिका धम्दषा हिंदी अनुवाद । वपार १ र ३१ एतेषा सामान्यविशेषलक्षण वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्यविरोधेन इत्वर्पणात्साध्य विशेषस्य यायात्म्यमापणप्रवणप्रयोगो नय । स द्वधा द्रव्यार्थिकः पर्यायाथिकश्चेति पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित तेतीसवां सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिका शन्दश हिंदी अनुवाद । एवेषाम् । सामान्य-विशेष सवनम् ॥ चन्नम् । 7 (यों) का संक्षेपस्वरूप और म्पोरा पार (पिशेप) स्वरूप करने योग्य है वात सामान्य उपपम् ॥ मनेका यात्मनि अपम (सावन) सामान्य स्वरूप (यह है कि) अनेक धर्म स्वरूप पा स्वभाष वाला वस्तुनि बविरोपेन । हेतु-अर्पणात Hin -वस्तुमें अविरोधकार (=निदोफ्तासे) वषिरुद्धवासे हेतुरूप समर्पण करनेसे साम्य (पदार्प) के (जिस पदा को सिद्ध करना चाहते हैं उसका वा सापनीय वस्तु): विशेपस्मयापारम्प-प्राफ्न- -विशेक्का वा म्पोरेवारका क्य र्थ स्वरूप (=पापात्म्प) प्राप्त करने को व्यापाररूप प्रयोग सो नप है म पार्य वामें अनेक धर्म या म्बमार होते है उनमेंसे किसी एक धर्मकी मुस्म्पताकरि अविरोधरूप (पिना किसी दोपके) विसकरि साप्प (सापनीय वा सिद्ध किये जाने गोम्य पदार्थ) बाना माय सो नमो साषा द्रव्यापि पर्शयार्षिक इतिया (नप) दो प्रकार द्रव्यार्षिक मौर (-प) पर्यायार्षिक ऐसे है साम प्रस्म-प्रयोगा। नया (१) मवकी परिमाय ममे प्रकार मम्स में मा मा स्वार्य ग पार्तिक मे मेरे प्रमाण प्रचशिवाय विधोप प्रसपो नया प्रमाणहरि प्रय माव्येि पदार्थ विशेष प्रापम करने पाठा (-निदोष पौरापार फयन करने पामा) जो शाल है सो मय भावार्य प्रमाणात प्रशित मस्तिस्य मास्तिव, मिस्यत्व, मनिरपव मारि मनत पर्म सस्प वा अमंत स्वमाष पाले जीव मखीव मादि पदार्यों को परदेश रूप से निरूपण करमे पाया रसको मप पते ॥म्पाम्या ।। प्रहसमाम पा कर प्रानको प्रमाण पते है। पापक धर्म हारा पदार्य सा धर्माको सन टेवा इसलिये समनको मानने हेतुसे सच मर्प मझयादेश है॥ प्रमाण प्राशितात्यादि मपके उसपम मा 'प्रमाण प्रकाशित पदका शौरमा परबत किमोवार्य प्रमाप के वारा प्रकाशित है उसीके पकोशको मेद प्रमेव स्पसे निवाब व्यापरने वाम पपितु तिन पवार्यों का प्रसय प्रमाणामास सौ(-सदोष शान मारा है) नन्न प्रकाशमय नही है मिप्यानय (प्रभोपाल मारे मन में बस यमके स्थान में मो प्रमद शम्दम सवारिया है इस वारपर्म यादि प्रमाण प्रमश्रित मनंत धर्मसाप एटानिवासी कारपसहायकीलफूस पहच्छेद और विमपत्यर्प सहित सर्वार्थसिदिका शम्दया हिंदीअनुषाद अमाप १ सय २३ (५) बो व्याकरम संबंधी सिंग, सख्या (पचन), साधन (पुरुष), फाल, पुरुप, उपसर्ग, उपग्रह (-परस्मैपद, आत्मनेपद) आदिक के व्यभिचारोंको (दोपोंछ) दूर करके पाने वा कर उसे सदनय कहते है (इसके उदाहरण वृश्चिके अनुवादमें बहुत दिये ।) (६) अनेक वर्षाष्पे छोरफर प्रधानप्तासे बो एफही अवमै स ( असिन) हो उसी अवको विपम करने वाला हो अर्थात उसी मर्थफो जाने वा कई सो सममिस्टनम है। मैसे—गो शब्दके वाणी प्रविधी गमन आदि बनेफ अथ होते है क्यापि मुख्यता से गो नाम गाय नामा पका ही ग्राम किया जाता है। यहां पर यह अवश्य समझ लेना चाहिये कि सोती, उठती, पठती, पलसी, फिरती, किसी भी अवस्था में पह क्यों न हो सब लोग उसफो गामही करते हैं। सो यह सममिल्टनम है। (७) मिस कालमें बो क्रिया करता हो उसको उस कालमें रसदी नामसे बाने वा कई उसफो एष मूत्र नय कहते हैं। जैसे पेंषों के पतिको परम ऐश्वय सहित हो, उसी अवस्थामें केंद्र काना पूजन, अमिपेकादि फरसे हुये इन्द्र नहीं कहना तया जिस कालमें वह शक्तिरूप प्रियाको फरे उसी समय तक करना अन्य समयमें शक न काना ॥ यहां पर "एषमता - ऐसा होना इस एवंमत नप के अर्थ की प्रतीति (निप्रय) शब्द से होती है इस लिये चम्द ही एचमत नप माना है कारण काय का उपचार है अर्थात् एवम्त नय के अर्षकी प्रतीति में कारग सम्दी और काय एषमतनय हैं। (१) सममित्य और पक्मत मोम यह मेव चा अतर है कि म्युत्पत्ति सिर अर्थ क्या है (अर्यात व्याकरणकी रीतिसे शम्द सापनमें क्या मर्य होवा) इस पतका इस मी विचार मकर प्रसिस अर्थका जान मा सममिस्टनयका विषय है 'गो' शब्दका ग्युत्पतिसिर अर्थ 'जो गमन करेसो तो विचार न करना किंतु ठमके स्वर्ग, किरण,वप्न असमर्थक पाय, पर्परपि, पाणी, दिशा माता पाणी भूमि इस्पादि मनेक अमिं प्रसिद्ध मर्थ 'गाय ना मोर माअोंको छोड़कर उस गाका सोती उठली बेटी पलती मब मपस्यामोंमें गाय करना या सममित नपका विषय है । ऐसेती व शम्दा प्युत्पत्तिसिर अर्थ परमैश्वर्यका मापनासका तो विचार न एरला किंतु शक्तिमान होना पुरोका पिदारण, करमा स्पादि मनेक मोडो छोरकर प्रसिद मर्थ परमेसर्पका मोमनाही ना, पर्व सम्द्रको परमैश्वर्यका भोग पर राहो, पान पर हो पूजा करते समय, अमिपेक करते समय इत्यादि सब भवस्थामि द पाना पह सममिमनपका पिषय है। परंतु जहापर केवल प्युत्पत्ति सिब ही मर्य विषय हापा महण हो वह एषमूत नय है वैसे गमन करने पालीको ही मायन्यसरी पने पाली पा सोने वालीफी गाय मसना पा मिम ममप इन परनैश्वर्या मोग कर रहा हो उमी सम्पन्न करना अन्य समय एद्र नपाना यह एवंमत नपका विषय है। पायपासका एटानिवासी अगरूपसार मीलन पदच्छेद और स्मिात्पर्ष सहित सर्वार्थसिदिका पदमा हिंदी अनुवाद ! अध्याय ! एतेषां सामान्यविशेषलक्षणं वक्तव्यम् । सामान्यलक्षणं तावद्वस्तुन्यनेकान्तात्मन्यविरोधेन हेत्वर्पणात्साभ्य- विशेषस्य याथात्म्यमापणप्रवणप्रयोगो नय । स द्वेषा द्रव्यार्थिकः पर्यायायिकश्चेति पदच्छेद और विभक्त्पर्य सहित तेतीसवां सूत्र पर सर्वार्थसिद्धिवृत्तिकाशन्दशः हिंदी अनुवाद ॥ एवेपाम् । सामान्य-विशेष लक्षणम् ॥ वचनम् । 7 भों) का संक्षेपस्वरूप मौर म्यौरा पार (विशेष) स्वरूप करने योग्य है गात सामान्य लक्षणम् ॥ भनेका स्यात्मनि अपम (स्ताक्ट) सामान्य स्वरूप (यह है कि) अनेक धर्म स्वरूप पा स्वभाष पाता वस्तुनि अविरोधन हेतु अर्पपात । वस्तुम अविरोधकार (=निवोपठासे) अविरुदतासे हेतुरूप समर्पण करनेसे सान साभ्य (पदार्प) के (जिस पदा को सिद्ध करना चाहते हैं उसका पा सापनीय वस्तुके): विदोपस्सन पापात्म्प-प्रापण- विशेषका वा म्योरेषारका ययर्थ स्वरूप (व्याधात्म्य) प्राप्त करने को परण-प्रयोगाना मापाररूप प्रयोग सो नप है म पार्य वस्तुमें अनेक धर्ममा म्वमाव होते हैं उनमें से किसी एक धर्मकी मुस्यताकार अविरोषरूप (पिना किसी दोपके) विसकर साम्प (साफ्नीय वा सिद्ध किये जाने पोम्प पदार्प) पाना वाम सो नप है सा देघा न्यापिकप पर्यायापिका । इति =बा (नय) दो प्रकार द्रव्याथिक और (-घ) पर्यायाबिक ऐसे है " (1) मपी परिमाय मसे प्रभार ममझ में मायें मन तत्वार्य गम यातिक मे खेते प्रमाण प्राशिवाय विशेष प्रहपको नया प्रमाणपत्र मनमरिये पदार्प पिशोप प्रम्पण करने पाठा (-निकोप पौरावार कपन करने पाला) मो सान है सो मप है भावार्य प्रमाण मारा प्रभाशित मस्तित्व मास्तिप, मित्यता, अमित्यत्व गरिममन धर्म सस्प वा मर्मत स्वमाष पाळे जीव मजीव मादि पदार्थों को एक देश रूप से निरूपण करमे पामारसो मय पम्पास्या ।। माठमान पाकर मामको प्रमाण एते है। पापा पर्म हारा पदार्प सा बर्माको जामाता ममिये मगरको जानने ऐसे सच मर्य मम्मादेश है। प्रमान प्रमशिवायेंत्यादि मपके आसपमें जाममा प्रकाशित पर गोबरे ग्मच पायर्प हिमो पदार्प प्रमाण के साप प्रकाशित सीके पोशो मेव प्रमेव स्पसे मिदोष या परने वाया मम लिन पदायों का प्रकाश प्रमाणामासब-सोर काम शरा) उन प्राय मही है मिष्यानर (मप्रकारेवाल सके ग्रुप में समय एमके स्थान में मोपमा सम्पम मास किया सम्म यात्पर्म या कि प्रमाप प्रमाणिव मनव धर्मस्वरूप एंटानिवासी दगम्पसदायवकीलकृत पदमले वोर विमक्त्यर्व सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दनः हिंदीअनुषाद अध्याय १ पत्र ३३ द्रव्यं सामान्यमुत्सर्ग अनुवृचिरित्यर्थ । ताद्वषयो द्रव्यार्थिक ॥ पर्यायो विशेषोऽपवादो व्यावृत्तिरित्यर्य । तद्विपयः पर्यायार्थिका। द्रन्पम् in सामान्यम् ॥ उसमा । मनुधिः ॥ इति । द्रव्य, सामान्य, उत्सर्ग, और अनुचि ये एकार्य है (अर्थ) सदिपयः । द्रव्याधिक द्रव्य है विपय जिसका सो द्रव्यार्षिक है अर्थात् यह द्रव्याकिनय केवल द्रव्यका ही विषय करती है । पदार्थोक विकार ( पर्याय) और अमाप को विपम नहीं करती क्योंकि द्रव्य से अन्य पर्याय और अमान कोई पदार्य नहीं पाया है। विशेषः ।। मपवादा । व्याइचि इति वः । =पाय, विशेष, अपवाद और व्यापूचि ये एफार्थ है तद्विषय" ।। पारार्षिक पर्यायी विनय जिसका सो पर्यायाधिक है अपात यह नय केवल जन्म मरण बादि पर्यायों को ही विषय करती है द्रव्यको विषय नहीं करती है क्योंकि पर्यायों स मिम कोई द्रव्य पदार्थ नहीं । पदाखि एक देश मेव ममेवम्म पयारे पद समय मादि सब प्रकार के रोपों स रहित है ।इसरूप से भयका पह सामान्य लक्षण निर्दोष है। (१) यह मगध प्रकरण पात महतका मौर कार्यप, अपित कियार्थ पजपातिक सइमकी नियति माषा मनुपाद सहित दी जाये। वाणम् अस्ति इति मति मस्प मा म्यास्तिको दम्प-भवनम् - ऐसी पुलिस-मति) गाकी सा ब्रम्पास्तिक है (मर्यात दम्पका हाना पप.नामा • मम्।। मापविकारा, मपिक अमावा-ही है इस उम्प) से मम्य पदार्पके विकार (-भावविपर) करिये पर्याप मही मौर समाच मी (बोई पदार्थ) भवद् तिरेपमनुम्लग्यो कि मासिक-मही रेस्पोंकि ट्रम्प विना (-उद्-म्पतिरेकेण) पर्यायको प्रामि मही है पसे द्रशास्तिये पर्याचा एक मस्ति इति मतिमपस पास्ति'सम्मादि -पर्यापही है ऐसी मति मिसकी सो पर्यास्तिक है । सम्म मरण आदि भावविपरमात्रम् ॥ एष मदन, ना मम्प द्रम्पमा-पर्यापपत्र (मापविमरमान) ही हाना (भषन) विम (पर्यापमात्र) से मान्यम्स नहीं मस्तित-मतिरेकपा मनुपरवि पर्वापानियोंदिग्सपाप) किमा(=विरमापकी) मनुफ्सम्मिा पेस पास्तिको एटानियासी गरूपसदीय कीमत पच्छेद और विमात्पर्य सहित स्वार्थसिदिका पदाहिदा अनुवाद । अभ्यास १३३३ तयोर्भेदा नेगमादयः। क्यो। मेदाः ।। नैगम- उन दोनों प्रमार्थिक और पांगार्षिक नयों) के मेद नैगम -संगूर, व्यवहार, मानुस्त्र, शम्द, सममिल्ड, एवंभूत है अर्थात् वादयः। भपाम्पम् । एपमा सस्य गुणकर्मनी ।। -पा म्यही हे प्रयाचन जिसका गुष फर्म जे है से (प्रयाग्न रूप) मी है यद् अपस्यास्पात् । ति म्यापिका -क्योंकि पे (तद्गुण और फम) (इम्य पी) अवस्थारूपरे पेमा दम्याधिक पोयः । एमावस्य ।। (सा पर्यापार्षिक) पादि -पर्याय ही है प्रयोजन (=मर्थ) निसफा सा पर्यायाथिको फ्योंकि पारिगुण परोपण-मादि सक्षणा।। -बोर सोपण पा सर को फैकमा मादि फर्मस्प (पर्याप ही है। मतता अन्पत् सम्पम् ।। इति पर्यावापिका।। Dविन (पायों) से (मित्र) मम्य द्रभ्य (कार पाथ) मही पेमा पर्यायाधिकरे अपवा-मर्थ T गम्पत निप्पचते T अपवा प्राप्त किया जाय (-मर्यग) माना जाय ( गम्यते) बनाया जाय (निप्पपते) इतिर्थ कार्य ।। द्रववि T गति T =ऐम्म मय है। कार्य को प्राप्त करे (द्राय) कार्यरूप परिममे (गछति) पति पम् कारणम ॥ इम्यम् एव मर्य सस्वापरयम् एप = एमा द्रम्प वही कारण है। प्रम्य ही मर्य जिसका (मर्थात् ) कारण ही पर्यम् म मर्याम्वरम् न प फार्य कारपयो । करिब स भेवा कार्य का दूसरी पस्तु नहीं है । मार पाये फारप्पम कुछ पम्पमय मी मर्यात् कार्य और कारण वाना एक ही स्वरूप मन नही वद् ग्मपर पकाकारम् । एवम्पगुति = वोनों (कार्य और पारप एक माकार हा सगुली और उसकी गांठे(=पर्ष) उम्मवतात. इम्पाधिका परि = एकाम्प (=म्य) है । ऐसा म्यापिफ (मय) समका)पारो मार स (परि) समता माप । पर्यापा। पर्यायात प. -सपबार से (=समेतत् पार) उत्पति हा सा पर्याय । पायही अपा कार्यम् ॥अस्प:मम्मम् ॥ =प्रपाजम (अर्य) पहिये कार्य विसका म कि द्रम्य (मर्यात् ब्रम्प प्रयासन नहीं) अतीवानागतयोपिनियनुत्पयस्वेन । =क्योकि अतीतकायका रम्परामापुका आगामी काटका म्याशगमा उस्परमही पवहार ममावात्मा एप, एका। =(अव) उसका म्पपहार नहीं सकता | सापक (वर्तमानकात पर्याय) कार्पधारणम्पपदेशमार ॥ कार्यकारण (दोनो नामका) धारण करने पासी है मर्यात् कारण आरमार्य पानी मामाको धारण करने वाला उम पर्तमान पाठीम पोप को फ्यायाधिपाय पिपय करसस्ता देयको माग . GGECleSCHAR एटानिवासी मगरमसहाय कीकृत सपोद मौर विमापर्व सहित सर्विसिदिका सदशः हिंदी अनुवाद । सम्भार १२ १३, तेपा विशेफ्लक्षणमुच्यते नेगम, संश, व्यवहार ये द्रव्याथिक नपके मेद है बौर ऋणुमत्र शब्द सममिन्द, पर्वत ये पर्यापार्मिक नपके मेद है। नीचे की टिप्पणी देखो। क्षेपाम् । विशेष क्षणम् ॥ उच्यते | -उन (गमादि सातों नयों) का विस्तारसे (विशेषण) लक्षण करा जाता है इतिक पाकिमया मनमर्य -ऐम्न पर्यायापिकी अपक्षा मर्य शम्मका (-मर्थन) ममिप (-मर्य) प्रपोजमापार मः, मस्प इति ट्रम्पापिया-पोसन । दम्प ही प्रपोजम जिस (मप) न यह र पिक प्रपथ मिपान मोकि (म्मकी) प्रतीति (-प्रत्यय-विश्वास, निमय साम) नाम /- अमिपान) अनुमत्तिगि पनि -दम्प के समुहल) प्रवर्तन स्प (ब) चिन्होंमे (-लिंग) देणेबानेपासे (म) मितुम्भशस्यवाद -छिपाने को मममप मर्यात् संसार में जो ट्रम्पकी प्रवाति होती है जो संका है। पर्व ब्रम्पले मनुसमाधिसचिन उमा गोप नहीं हो सस्ता-सारंग इम्पन्न शान, द्रम्पका नाम मोर मोम प्रति लचिोंसे देखे जाने वाले सम्म बफ्टाप बा समाव नहीं कहा मा सब । पाया मर्या प्रयोजनमद अल्प' पतिकपर्यापापिता-पायोमर्प कहिये प्रयासन जिस (मप) ऐसौ पर्यापार्थिको पाह -पयोगि(याम्पवर पर्याय को विप परतीम परमसे) म(-बार) विमान-पाधि मौर चालल माप (-पिटम) वाशामकी निधि और मात्ति (-पाति) नियम्यवहारमानना -मापीन (-निबन्ध) वा प्रापभूत (-मिवाम मोपहार रसती प्रसिर मात् म रिसे पर पर्यापकी उत्पत्ति होती दो मद् शम्मकी मोर मकान पी निति मौर पर सम्बके मोर रसोबासकी प्रतिमापवहार यादोबा है। पदि पर्यावको विषय रमे पाग पर्याप्पषिकन्दम दावा वा सम्पर पर, पर मह पुत्र पिता मादिम्पपहारों खोपोहोजाय ॥ (१) मपया अपाय और शप्पाप ऐसे भी दो मेरो मर्याद मैगम, सम्ह पार, पासप पेचार मर्य का प्रमोमगतले प्रमाकरि प्रवर्तवीरे हमसे इनसा मर्दय प्रते है और शा, सममिमा एमृत राम्दको प्रधान परि मनवीरे मका इनको दामनवमते ।। +4 नेगमा एटानिवासी बगरूपसहास बकीस्कृत पदच्छेद और विमत सहित सपिसिद्धिका समय दिदी मनुवार । बप्पार १ का ३३ अनमिनिवृत्तार्थसङ्कल्पमात्रग्राही नगमः ॥ मन-धमिनिर्वृत्त-वर्ष सकल्पमाल प्रादी । -अनिष्पम वा अपूर्ण (-जन-अमिनिवृत्त) पदार्म के संकल्पमात्र ग्रहण करने वाली नैगमनय है वर्षात संसार में मिलने द्रव्य वे अपनी भूतमक्मित (१) गम् (म्मावि प्रथमगण) चातुर्मे नि' उपसर्ग और मम् (28) प्रापय समाने पर निगम (शम्प) मनजाता है । पहा नियम (Om मर्प संकससे संम्पो निगमस्वर मयोऽर्य तत्प्रयोजन" कोक पाकिस्मोक १८ पृष्ट १९, संकल्प मामस्य प्रारको मैकमो गया (= पदार्थ का संकल्पमात्र का माण करने बाग मैगम मप) तत्त्वार्य शोक पाक्कि सोक १७ । निगम शमसे अर्थम गए मस्यय करने पर अपवा निगम एप से मपअप में भर मत्पय परमे पर मैगम शब्द की सियि । निगमायस्मिमिति नियमनमा पा नियमः- निगन्ति मस्मिन वि वा निगमन मात्र निगम'-(पदार्थ) मिसमें प्राप्त हो सो निगम अथवा जो प्राप्त होना माधी सो निगम॥"निगमे फसलो भवा वा मैगमा (राजपा) निगमे खो मैगम पा विपमे भयो बियामा =नियम (संकाय) में (बो) कृपा सो मैगममा निगम में दोप सो मैगमोमः सत्पमें जो शो मथवा जो संकल्प में होने वाला होमा परे । पेसा नैगम शब्दाव। "मय सम्म मात्रमाहो मैगमा" (=पार्य को संकल्पमात्र प्राण करने पाठा बा विषय करने पासो ममम मय) तवा राज पार्तिक १५ । " मसतीवि निगमो पिस्ता भयो गममनेक (=नेकन-पक) (पदा जिममें) प्रा हो सो निगम नर्यात विगोवा (पिकास पानिपम में) प्राप्ति (-मय) सा नमम । (पक संग्रह में पमित मागप पयति पृष्ठ १४१)। विष्स -संध्या मर्य में मी पहा मरे। यिप -विविषयमा । देखो रेप कौर पठ ६६८ पर्युक गम की परिमापाये जो पर पार्तिक स्लोग पार्तिक माछापफ्रवि दी है ये एकार्य पाचौहै। पुम्सपाय स्वामीकी परिमापा 'बामिनि शप पिक है शेष भाग जवानों परिमापामों से सगमग मिळप हमारे सब स ह कि 'मनमिलिई का परिमापा पर क्या प्रमाण है ॥ (उचर) सीमा पर होने से गायरे वर्तमानमसमैगम और भविष्यत्कासनपम दो मेदो को गमिव परवी है मनमानयम का मेव नमाजरे क्योंकि मर्य मायिक मौर विीभनुवाद तत्वार्थ पवाटि मोर मागफ्फ्यति त्यादि मन्योंमें मेगमपके मुखारगम, पर्वमाननाय मेगम मौर माचौपा नेगन पीन मेव कहे। मप इन तीनों मेघों की परिमापा और उदाहरण देकर हमको पर दिबसन्त है कि सर्विसिदि में पी परिमाय मैगमनपकी लोकी मपेमा सीमापयौ।

एटोनिवासी साल बारपार मौर विमस्पर्व सहित समर्थिसिद्धिका अम्बा सिी अनुवाद । अमाप १३३, पर्वमान काल की समस्त पर्मानों से अन्वय स ( बोररूप) है अपनी किसी मी ()ो मठीत पामि वर्तमानपत बारोपपरैवासंप करे सो भूतमैगमनपरे मैस "मय दीपोरेसवादिने प्रीपर्वमानस्वामी मास मता' मात्र विचार दिन पर मी मावीर स्वामी मोर पसरे है यहां पर पचपि मगवानको मार गये हुये मरो पर्ष म्पतीत होगये कपात् प५१ मा पीत गपे पण संसारमें पम्स म्पपहार रोतारमा भेगममय की अपेक्षा पेसा क्यम वापिस नहीं परम ठीबाही समझा जाता है। (मो मागममी पपाचे वर्तम्मनपद समसार सो मविप्पत मैगमनमो से एक मनुप्प पारसे इन्द्रकी प्रतिमा बनाना चारतारेममी पर बस इम्य प्रतिमा पनाने की योजना परपा पनि उससे पूण जावई माई क्या रखे दो। तो सचर मिलता है कि मै छ ना या पपपि ममी एका मतिमा उपस्थित नहीं रतु की मूर्ति बनाने का संकल्प ठौमी में इन्द्र बनाया है यह पचन नेयमारकी मपेमा ठीऔ (मायाप्रमीपविल्पमनिल्प वा पस्तु मिपावत् प्यते " = न माराम्पर ईद निप्पन्न वा पनि पर्व पस्तु निमामबद अप्पते = (पर्वमा में पर्याप पा) पस्तु मारम्म भरने पर पूर्ण मय कुछ पूर्ण नहीं हुमा (मगमग परिपूर्ण होमे फ्यो । उसको परिपूर्ण मा बाप सो पर्वमान मैगमनमरे (जैसे मोरमा पसते "मात पर गया) देखो प्रासाप पदति ।। अर्थात् वर्तमाम में जोपर्य करने के लिये राप मिा है सो पूर्व मया त्या परिपूर्ण मामा मस्कात मिस्त समयमें परिसमाप्त होपा रमको परिपूर्ण म संपन्न कर मैन्य वर्तमान भाममय पविषयी अपपापों मार सकते है जिओ कार्य वर्तमान काळमें हापमें लिया है यह होवे होते ऐसी अवस्था में पांच पया है कि सको प्यबहारमें पाछे है कि पा पूर्ण है यपि रमत्री परिपूर्णता पत्पम्त म्यूनता अवशेषों जैसे एक ममान पायाभो गई । सबकी समिनित रसोई में वार मात हा पाए मात ऐसे पक्ष पर एक दो पछमें वह अग्निसे नीचे उतरे याने को दरसोईया पुपरवा किसो माइयो बाटो मात निममबस मी देरी या विषम नहीं है (पास्तिविक वा सासी पाकमा माय भाग से पपिपी पर रखने की देशी पोही बिरसोपा में सड़सी पर दास मावदो मप्रिसे प्रपत्र दिया) स इतनेही में बार भात पूर्णतया परिपड होगपे मोर गमनपका दिन माता रहामारी ममममें वर्तमान मैगमनय भी सम्म पस्सेि मविपत मैगममय में ही पति हो पाठी रवा मोना मेरासिली परिमाण में बात होमाते र भूगमप अन्तर्गत नहीं होती मत पिकार की परिभाषा सौमासा हमारी समय में मापा है सोलिया।

एटानिवासी ममम्मदारकीसव मजे और विमाप सहित सार्यसिदिका सम्मका हिंदीममुगार ममान १ ३३ कञ्चित्पुरुष परिगृहीतपरशु गच्छन्तमवलोक्य कश्चित्पृच्छति किमर्थं भवान्गच्छतीति । स माह प्रस्थमा नेतुमिति । नासौ तदा प्रस्थपर्याय सन्निहित । तदमिनिवृत्तये संकलमात्र प्रस्थव्यवहारः॥ तया एपोदका थाहरणे व्याप्रियमाण कञ्चित्पृच्छति किं करोति भवानिति । स आइ ओदन पचामीति । न तदोदनपर्याय: सनिहितः । तदर्थे व्यापारे स प्रयुज्यते ॥ एवम्प्रकारो लोकसव्यवहार मनभिनिर्वृत्तार्य पाय से कोई द्रव्य मिन्न नहीं है सो मविपत् पर्यायोंका, उन पर्यायों का जो वमी परिपूर्ण नहीं हुई है वर्तमानकालमें सफल्स करे ऐसा मान सपा बपन नैगमनयई । इसमें मुक्नैगम अन्तर्गत नहीं हुई। देखो टिप्पणी ५०६, ४९९ । पृष्ठ कञ्चित् पुरुसम् । परिशीत पातुम् ।। किसी मनुप्प को इयादा लिये हुये गच्छन्तम् । मालोम + कविता प्रभवित किम् बाते हुए देख कर कोो पछता है फिस- अर्यम् In मवान । मसतिश इतिवसा वाह प्रस्वम् ।।-सिये आप बाते हो। वह करताहै पान्पमापनेका लकदीका परिमाण ( अस्प) बानेसुम इति । मसौदा प्रस्थपर्याया। सेनेने (बावाई) । उस समय पह (-तदा) प्रस्प पर्याप समिहिना न-अमि- निकटस्य नहीं है । उस (प्रस्य) को मार्ग पा मविपद में (-अमि) निर्वाचये । सस्पमारे ॥ =निप्पन्न करनेके लिये अर्थात् लकारी काटकर मनानेके लिये फेयलमनकी इच्छामें प्रस्तष्पहारा क्या एक्स् उदयादि अस्पका उयोग या व्यवहार हैं। वैसे ही (-तया) लकड़ी पल आदिक बाहरणे ॥ मामिपमाफम् । कञ्चिन्छति ? -हाने में (आहरम) समेहुयेको कोई पछता है किम करोति मवान्। इविक साधावाहा मोदनम्:आप सा करते हो । वह करताहे मातको पचामि T इति वा बोदन पर्याया। समिति नभम्पकाताई । उस समय मावका पर्याप निकटस्य नहीं है ब- बम्मापारे । सः। प्रयुत्पते T एषम् . उस (मात) के लिये व्यवहार या उपोगमें वह (पुरुष) लगा हुआ इसी (एषम्) मारा लोक संन्यमहाराजमिनित्रप-बर्थ प्रकार संसारका व्यवहार है। मनपस्थित (अनमिनिवृष) पदार्थ को संग्रह एटानियासी जगरूपसहाय कीलकृत पदच्छेद और विमस्पर्व सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । अन्याय १ सूत्र ३३, संकल्पमात्रविषयो नैगमस्य गोचरः॥१॥ स्वजात्यविरोधेनेफध्यमुपनीय पर्यायानाक्रान्तमेदानविशेषण समस्तग्रहणात्सग्रहः ॥ संकल्पमाप्रक्पिया की नेगमस्स ! गोपा -संकल्पमात्र ग्राण करने वाला नैगम (नय) का विषय है सजाति-अक्रोिधेन । एकपम् ॥ उपनीय अपनी बातिक पस्तुषों को अविरोधकरि एक प्रकारपनाको प्राप्तकर पायान् । यात्रान्तमेदान् ।। अविशेषेण ।। पायोंको वा प्राप्त होने वाले मेदोंको सामान्य रूपसे ( अविधरेग) समस्तपणाव समस्तको प्राण करनेके देतसे वा समस्तको विषय करनेके कारणसे -संग्रह (नय कत्री वाती) है अर्थात अपनी बातिके सम पदार्थोंको मिना किसी विरोक्ताके (एक आतिके कितने ही पदापोंमें भी विरोध नहीं होता परंतु उसका मिम माविक पदापों से विरोध होता ) (1) पुदि नाम,मनुका प्रान्तिय विनोकी समानता रखने वाग दो सरप्पी यही जातिमात् सिन पदार्थोकी प्रतीति ममान होगी माम मी समान होमा, मनुकूल प्रति भी समाम होगी ऐसे पदाकि समूहका नाम जाति मपया यहां स्वम्पका मनुगम (-प्राण) जिस प्रकार गोत्व स्वस ममस्त संसारकी गोमि रहताइसलिये यह जाति वा बावि घेता अचेतन मावि पदार्प सम्मन मादि पदार्यों से निधनहीं। तथा उसकी प्रतिम कारण गोय, पाव इम्पत्व,सत्व आदि ममेक पप इस लिये वहां नो पप होगा सीके मनुसार एसा नाम भी मित्र होगा तथा मचि मी रसी मिपत सप्यमनुसार होगी। (२) उक समस्त चिौ यो मविरोध शम्मी सत्र मर्य समापसे धिगावा स्वरुपसे न प्रध्ययम होगा।मपनी सतिसो सम्मावि है।नहीं गिना पम्ही रिमनासो मषिरोपी मपनी गाविसे नही बिगना (जो) है सो स्वसत्पविरोष है। अपनी जातिसे मत चिमने आप एक प्रवरफ्नाको प्राप्त होता है सो "स्वसम्ववियेनेरप्यमुफ्नीय' ।।ऐसे सर्यिसिमिति मायेपे "समात्पपिरोनेकाम्पमुपनीर पायको मिति है। (प्राति पातु प्रयप मादि भवपर्योक भर्थ को हर समास के अर्यको सवाय) सो मिली। (३) मावार्य जपातिक समानदय एसप पसे की "सखात्पपिरोपेमेलोपनपासमस्त प्राण संहा उपर्युक चिमें दो समर नएकी परिमापा से उस इस परिमाणको रुमा परेको "पर्यापान मात्राम्तमेवान माविशेषेच पाच समाविक से अधिक पाते है शेष पार पोनॉप मगमग एक्सपरक बाप दोनों परिमापाओ एकमाई क्योंकिमपिक वापरामर्ष पायादो मविपरित ऐसा॥ Sardar SASARA एटानिवासी गस्पसहाय की सात परपछेद और निमावर्ष सहित स्वार्थसिदिका सन्देश दिदी अनुवाद । अध्याय १६०३३, सत् द्रव्यं घट इत्यादि । सदित्युक्ते सदिति वाग्विज्ञानानुप्रवृत्तिलिङ्गानुमितसत्ताधारमूतानामविशेषेण सर्वेषां संग्रह । द्रव्यमित्युक्तेऽपि द्रवति गच्छति तांस्तान्पर्यायानित्युपत्लक्षिताना जीवाजीवतद्वेदप्रभेदानां सग्रहः । तया घट इत्युक्तेऽपि घटयुष्य एक रूपसे पावकि मेदोंको व्यक्तनार समस्त भेदोंका महम करने पाता ऐसा संग्रहनको । सारांश यह है किमपनी नाति को प्रगट करके पर्यायका भेद न करके समस्तका समुदाय रूप ग्रहण करने वाला संग्रानय है ॥ सद ॥ इन्पम ॥ घटा । इस्पादि । -सव, द्रव्य, घट इत्यादिक (समानयके उदाहरण) हैं। सव In इविक उक्के । सत् । इति० वाप-विज्ञान- =सद ऐसा करने में सत् ऐसा पचकार या धानकार मनुप्रचिलित- जन्यपरूप चिन्हसे (अनुप्रवृचिलिंग) पा ओररूप पिनसे ( अनुप्रचिलिंग) मनुमित्र-सपा-माघारमवानाम् ।। सर्वेषाम् ।। =अनुमान किये हुये (म्भनुमित) सचाको आमपभूत सम (वस्तु) निका अविशेषेण ।। संग्रह सामान्य रूपसे (अविशेपेप) संग्रह है अर्थात ऐसे सन पस्तु सवा स है सापपा-सद ऐसा उधारण करने पर द्रव्य, पर्याय और उसके मेद प्रमेद सब सन्चासे अमिम है मशः एक सत्व धर्मसे उन सपका महण होजाता है न्यम् इति उक्त । अपि तानातान पापानावपति र इल्प ऐसा करने में मी (बो) मिन जिन पर्यापोंको प्राप्त होता है (अवति) गम्छवि T इति उपलसिवाना । जी-अपीय अक्वा (बिन जिन पर्यायोंको) पावा है ऐसे उपलक्षित जीव और बढ़ पद् भेद-प्रमेदानाम् ।। संग्रह। सपा उन (बीच अचीव) के मेद और प्रमेदोंका संग्रह है अर्थाद द्रव्य करने में गुण पायों सहित जीव अवीव उनके मेद प्रमेद सबको समझ लेना चाहिये या पटाइवि० उके अपि० पटपुदि पैसेही (-तथा) घट (बा) ऐसा उच्चारण करने में भी पदाका शान क्या संपनियः॥ एटानियासी बगरूपसहाय पीलकृत पदच्छेद और विममत्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्दशः हिंदी अनुवाद । अम्माय १ सत्र ३३ भिधानानुगमलिंगानुमितसकलार्यसग्रहः । एवम्प्रकारोऽन्योऽपि सग्रहनय ॥२॥ संग्रहनयाक्षिप्तानामर्थानां विधिपूर्वकमवहरण व्यवहार ॥ को विधि' । य. संग्रहगृहीतोऽयस्तदानुपूर्येणैव व्यवहार प्रवर्तत हत्यय विधिः। अमिषान अनुगमलिंग- नामके अन्ययरूपचिन्हकरि (मनुगमलिंग) वा जोररूप पिन फरि (-मनुप्रवृधिलिंग) अनुमित सकल-मर्थ-संग्रह। अनुमान फिरोहुये (अनुमित) सब पटरूप पदार्पफा (अर्थ) संग्रह होता है एवम्० प्रकारः। अन्यः । बपि. इसप्रकार अन्य मी (मति उपर्युक कहे हुये उदाहरणोंक अतिरिक) और भी (असे मठ, फ्ट, गृह, इस्यादि एक बातिकी सब वस्तुओं का कपन करने वाला) -संग्रह नम है ।। (संग्रह नप के सामान्यसंग्रह विशेप'सग्रह दो मेद हैं (देखो नियटिप्पणी) (२) संग्रहनय-भातिप्तानाम् ।। अर्थानाम् ।। संग्रानय से विपय फियेगये पा ग्रहण किये गये (आक्षिप्तानाम्) पदार्थों का विधिपूर्वकम् HIn वहरणम्॥ व्यवहार क्रमानुसार वा अनुक्रमसे या विधिपूर्वफ भेद करना सो व्यवहार (नय) है का विधि या संग्रा-गृहीतामा यः। --विधि क्या है ? खो संग्रह (नम) द्वारा ग्रहण किया हुआ पदार्थ है उसका (त) बानुपथ्र्येण ॥ एव • व्यवहार का प्रतते T मूलसे सेबर क्रम पूर्वक (आनुपर्पण) ही व्यपहरण होता है का भेद किया जाता है इतिक अपम् । -ऐसी यह विधि ( संग्रहनसे पये पदार्थको आदिसे लेकर मेद फरै सो)है॥ (1) संपदो विविध सामान्य संमहो पा सर्वाणि ॥ दम्माणि -संग्रह (नय) दो प्रकार । सामाम्यसमा से सब में परस्परमपिरोपोनि । विशेष संमहोपया -मापसमें (स्परपसे) चिगने वाली महहि (=अविरोपीनि)। (और) विशेष सर जैसे मशीबा परस्परमपिरोपिना" माग पदविसे पिार। -समस्त जीव परस्पर मविरोधीई मर्यात् (मपने पम्पसे) प्रयका होमेबारी (२) 'मतो विधिपूर्वकमषारण प्यपहार" इस (समय) से (प्रहण किये गये पदार्यका) वनुक्रमसे (-विधिपूर्वक) मेव परमा (-मवारण) सो म्यवहार यह परिमास प्यपारमयका तत्वार्य रामपातिकमें से सिपा मोर पर्युत संग्रहमपामिप्तानामाना का बही वापप्पो जो हमारे (३) विधिपूपक-मानुपूर्वीचर, बानुपर्पकरि, आनुपूर्वरि अर्थात् अमानुसार, मामुल मनुक्रमसे समपूर्वक ॥ सूपसे देवर भमपूर्वक -आनुपूव) देखो पक्षचन्द्र बोरा पटाका मारण -पारच-मेव किया माता, रेनो कमपनो मतासविचिदि पनिका पुर विधि:

एटानिवासी मगरूपसहाय कीलकत पदच्छेद और विमफ्त्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका अन्वया हिंदी अनुवाद । अपाय १ सूत्र १३ * तद्यया-सर्वसग्रहेण यत्संगृहीत तचानपेक्षितविशेष नाल संव्यवहारायेति व्यवहाग्नय आश्रीयते । यत्सतत् द्रव्य गुणो वेति । द्रव्येणापि संग्रहाक्षिप्तेन जीवाजीवविशेषानपेक्षेण न शक्यः संव्यवहार इति जीव द्रव्यमजीवद्रव्यमिति वा व्यवहार माश्रीयत । स्पपा० सर्पसंग्रहेण : सत्संगीतम् । = सो (तत्) ऐसे है (=पया) कि सर्वका संग्रहकार सद ग्रहण किया गया है पर स्व ॥ मन-अपेक्षितविशेपम् । = बौर (-) वह (तत्) अर्यात सद विशेषकी क्विया रहित है संध्यवहाराय न० कलम = सो योग्य व्यवहार (प्रापने के लिये समय (अल) वा योग्य (- मल) नहीं इति० व्यपहारनपा । बाभीयवे T = ऐसे व्यवहारनय अवलंपन कीगई है वा आश्रय कीबाती है (वन कद है कि) यतामा सत्य व द्रव्यमा पा० गुणाम। इति० = मो सार (= सत) है सो द्रव्य है और गुण है मावार्य यह है कि बैसे (-वपया) संग्रहनयका विपय सत पदार्थ है किंतु सत शम्दसे संसारका व्यवहार हो नहीं सकता बत. मो सव है या द्रव्य और गुण है यह व्यवहार नयसे मानना पड़वा है ऐसे सत् विष मेद करें कम संसार का व्यवहार चलता है। द्रव्येण ॥ अपि० सपा-आधिप्तेन ॥ जीय-अभी = (मौर यहाँ) द्रव्य (सम्द) कर भी संग्रनयसे ग्रहण किये हुये बीय अजीव के विशेष-अन-अपेण संन्यवहार नामः ॥ = मेदकी (= विशेप) अपेषा न होने से योग्य व्यवहार नहीं होसकता है इति० मीवद्रव्यम् ॥ पा० अबीवद्रव्यमामा इतिक = ऐसे जीव द्रव्य है और (या) अबीव द्रव्य है ऐसे व्यवहारा वाधीयते T = म्यवहारनय बाप कीगई है अर्थात जब हमने सबके दो भेद किये तो यहां पर भी संग्रहनयका विषय द्रव्य हुमा उसके बीप और अजीव मेद माने विना ससारका व्यवहार नहीं होसकता है इसलिये वह द्रव्य बीव और अजीव है यह व्यवहारसे करना पड़ता है (१) मा सरितीनों माचियोंमें 'परसंमहीप्तम्' अर्प यह होगा विसर्वध समहकारियो (मत्) प्राण किया गया है परंतु सव स्वार्थ पनपातिक में रेवया वर्षद रापजीने और अन्य मापा मनुपावकों में 'यके स्थानमें सत् मानहरि मनुपाद पिया इस लिये हमने सरसपही वम पाठ दिया है यपपि यत्' से भी वही अर्थ निश्च सस्ता है जो सर से परंतु इमने प्रतिमें ' पाखण्डीवं 'ही पाठ रक्खा है। प समान ।। एटानियासी बगरूपसहाय पकीकृत पदच्छेद और विमपत्यव सहित सर्वार्थसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । बन्याय १ पत्र ३३ भिघानानुगमलिंगानुमितसकलार्थसंग्रहः । एव-प्रकारोऽन्योऽपि सग्रहनय ॥२॥ संग्रहनयाक्षिप्तानामर्यानां विधिपूर्वकमवहरण व्यवहार.॥ को विधि. १। य. सग्रहगृहीतोऽर्थस्तदानुपूर्येणेव व्यवहार प्रवर्तत इत्यय विधिः। अमिधान अनुगमलिंग- नामके वन्वयम्पचिनकरि (भनुगमलिंग) वा बोरम चिन करि (मनुप्रचिलिंग) अनुमिल सकत-वर्ष-संग्रह। =अनुमान कियेहुये (अनुमित) सप घटरूप पदार्थका (-वर्ष) संग्रह होता है एवम् प्रकार अन्पा अपि -इसप्रकार अन्य मी (वर्वात उपर्पक कहे हुये उदाहरणोंक अतिरिक्त) और मी (बसे मठ, पट, गा, इत्यादि एक माविकी सम वस्तुओं का कपन करने वाला) =संग्रह नप है ॥ (समा नपके सामान्पसमा विशेष संग्रह दो मेद है (देखो निवटिप्पणी) (२) संप्रनय माक्षिप्तानाम् ।। अर्थानाम् ।। संग्रानय से पिम कियेगये षा ग्रहण किये गये (आलिप्तानाम्) पदार्थों का विधिपूर्वकम् ॥ वकहरनमा व्यवहार क्रमानुसार वा अनुक्रमसे का विधिपूर्वक भेद करना सो व्यवहार (नय) है का विपिता या संग्रा-गृहीवासी उत्-विधि क्या है ? नो संमा (नम) द्वारा माग किया हुमा पदार्थ है उसका (ग बानुपम । एष व्यवहार का प्रसवे r =मसे सेकर क्रम पूर्पक (-आनुपूर्पण) ही व्यपहरण होता है या मेद किया जाता पिपिए # -ऐसी यह विधि ( संग्रहनवसे यो पदार्थको आदिसे सेकर मेद करे सो) है। (0 संपदो शिविपासामाम्प संपदो पपा माणि ॥ द्रम्पाणि -संग्रह (नय) दो प्रकार । सामाम्पसमह जैसे सब प्रये परस्परमविरोपीमि । विशेष संग्रहो पया -मापसमें (स्वापसे)चिन पाशी महाद(अपिरोपीनि)। (भोर) विशेष समासे मजीवा परस्समविरोपिमा माछाप परतिसे मिपा है। -समस्त जीव परस्पर विरोपीहे मात् (अपने सम्पसे) प्रम्यान होमवारी (२) 'मवो विपिम्मपारणं म्पबहार" स (सम्हनप) से (प्रहण किये हुये पदार्पा) बमुझमसे (-विधिपूर्वक) मेद पणा (-मवारण) सो म्पपहार परिमाण पवायदा वत्ता रामपातिकमे से पिपाई मौर"उपर्युक्त संग्रहमपामिप्तानामनिकापही वापी यो सिमी (३) पिपिपूपा-मानुपूर्वीपि भानुपूर्पकर मानुपूर्वरि मर्यात् समानुसार, कमानुकूल, मनुकमसे क्रमपूर्वक ।। सपस र कमपूर्वक -मानुपूव) देखो पप्रचन्द्र कोश पूछ)) भगहरण -पवारण- मेव विमा बाला, रेसो पासपचंमी हतासायसिदिपावमिका पार है इति अपम् ।

एटानियासी मममसहाय पीसकर परम्छेद मोर विमरवर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय । मत्र ३३, ॥३॥ ऋजु प्रगुणं सूत्रयति तन्त्रयत इति ऋजुसूत्र । पूर्वान्परात्रिकालविषयानतिशय्य वर्तमानकाल विश्यानादचे अतीतानागतयोविनानुत्पनत्वेन व्यवहाराभावात् । तच्च वर्तमान समयमात तद्विषयपर्यायमान ग्राह्योभ्यम्जुसूत्रः॥ पहिले पहिले संग्रहनय और व्यपहारनप दोनों चले जाते है अम् । गम् । स्त्रयति । सीपे (राजु) और सरल (-प्रगुण ) (विषय पा पस्तु। को सूचित करता है (पत्रपति) वन्सपवे T इविक अस्त्रामा =फैलाता है (वन्सयते) ऐसा अजुम्मनपी (संतयति मी आता है, देखो राजपा० पृ० ६६) विकासविषयान् । पूर्वान् ॥ परान् । म्दीन काउके विषय (अर्थात् पर्याय वा माय) निमें से अमीर-अनागत (विपयों) को मवियप्पन वर्तमान-कास-विषयान् नामावचे T-उल्लंघकरि वा छोड़का विद्यमान कालके विपयों को (मामुम्तनप) ग्रहण करता है भवीव-अनागवयो। विनिए- क्योंकि भूत और भविष्यत् (विषयों) को (यथासंस्म्य) विनाश होनेसे और अनुत्पमस्वेन ॥ व्यवहार-जमावात् ।। तब-न उत्पन्न होनेसे व्यवहार नहीं होता है। तात्कालिक (वय-वैद्यकोश ५० ३०१) वर्तमानम् । समपमानम् । तद्-पिप -विधमान केवल एक समयवर्ती उस (बजुधवनय) का विषय पर्यापमासमाय: असम् । असना। पर्यापमातका ग्रहण करनेवाला है सो यह नुसत्रनय है अर्थात् द्रव्यको पर्याय समय समय में परिणमती (पलटती) रहती है सो एक समपती पर्यायको अर्थपर्याप करते हैं । अर्थपयांप दी जसपनयका विषय है । मजुमननय वतमान एक समयमात्र की पर्याय को करता है पा ग्राम करता है अवीव मनागत समपकी पर्यायको प्रहण नहीं करता है। नपुंस रिंग में यहाँ बाया है (१) समु-पर प्रसप्प निलिंगी (+5) मलिंग में पिम्स से मे हाता है जसे ऋयी ॥ ॥ ॥ द्वितिया पुलिंग (२) प्रगुणा-पर निलिंगी है। प्रगुणा पत्नीविंग है। यहाँपर दितीय पकपदम पुलिंग अपश मपुसकलिंगमें अनु शादा आनना चाहिये THERE एटानिवासी जगरूपसदाय की गौर विमस्य सदित सार्वसिद्धिका समय दिदी अनुपाद । अध्याय १०५३ जीवाजीवावपि संग्रझक्षिप्त नालं संव्यवहारायेति प्रत्येक देवनारकादिर्घटादिश्च व्यवहारेणाश्रीयते । एवमयं नयस्तावद्वर्तते यावत्पुनास्ति विमागः भी-अभीयो मपिक वोर इस मवस्था में) बीष और अजीव मी संप्रे-आषितो को संमानपके रिफ्पमत है संग्रानप गोचर वा प्राग संग्रहनपसे किसेगये हैं सम्पबहाराप । असम् न इतिक प्रत्येकम् 11 =पवहार (प्रक्नेि) के लिये समर्थ नहीं है। प्रत्येक (जीव और ममीव) देवनारकादिक पटाविरमगारेण ।। (पया संस्म पा क्रमसे) वेक्नारकादिक सपा घट मादिक व्यवहारनय करि आमीयते म्भाभय किये गये हैं अर्थात यहाँ संग्रहनस का विषय जीव और असीय माने गये। परंतु बीपके देव, नारक, मनुप्प, विर्वच, सिद्ध मेद माने पिना संसारका व्यवहार नहीं पत सकता इसलिये लोक म्यमहारकी सिद्धि के लिये बीप द्रव्यके देव नारक वादि मेद व्यवहार से मानने परसे हैं। मौर मवीव के पट, फ्ट, मठ, गह इस्पादि भेद माने बिनामी संसार का व्यवहार नहीं हो सका है इसलिये मजीव के पट, पट, मठ, गरमादि मेद व्यवहार नप से मानते हैं एवम् मपम् । नया वात् पर्वते =सप्रकार यह व्यवहार नप सपतक पला मावा गास्त् . पुना न बस्ति T विमामा ॥३॥ यावा फिर दिमाग नहीं हो (सक) वाहै अर्थात् अनुसत्र नम के सिपके (१) महारोऽपि देवा । मामाम्पसन मेवको म्यवहारो -म्पपहारमय मी दो प्रकार सामान्य सममेकम्पपहारमाद साम्पसमारनप की मेदरने पाठी म्पपहाणय पया-द्रम्पाणि मोबासीवा। विशेफ्समा मेदोपहारो -सदापर साजीवप और बबीवरूप है। विशेपसंपामेकम्पकार मर्यात विशेषम्प सम्बनपके मेव करने वाली म्यवाणय पा-ओवासंसारियो मुमच" -वैसे जीव रे सा संसारी बोर मुज्य है। (भाणपपति से मत) (२) माप स्थापन द्रम्प ये तीन मिसेप सम्हास से सम्झनामा पशुपमाण होताद गये मित्र मित्रपारसजक्योंकि पे तीनोंडी भाति परेप्पलिवानी सखिम्पपहार लिपे पतमान पोय भाव मिसेप ही ममी रसीका पd महन।म परिसरमपमपाकवि फिर सी प्रचारमा बिमालनीस॥ T एटानिषामी जगरूपसहाय कीलकन पदच्छेद और पिमत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका पम्दर हिंदी अनुवाद । मध्याम १ मूत्र १३, परतु (स) मानुमच नप का विषय प्रस्य मी परतु जिम मम मन आदि पदाय सेर नाप मारा तुल रहा है उसी समय प्रस्य माजब मपविषप हा ममता . जिम मे धाम्प तुरखुन अयथा आगे जाकर नुसैगपासूच नय फा विपप नही हो ममता क्योंकि जो तुन शुभ यह भूतम्मा म विषय है जो प्रागे तुलेग्य वह भविष्यत् अलका विषय है भूतकाल की पर्याप मोर मविपत् कापणी पर्याय अनुसूत्र नयका पिप है महीं किंतु वठमानकाम की एक मामय पर्ती पर्याप ही उसका विषय है इसलिये मूतमाम वा भविपत् काम की अपेक्षा भानेवाला प्रस्वरूप रजसत्र नपत्र पिपप होना मसमय है। (प) कुमार ममाष पासमा नपका विषय है क्योंकि कुमको परमे वाला कुम रक्षा मागोजम समय कुमार पुर कम पड़ा नसमाफर नमकी शिविक भावि पर्याय मा रहा है एम ममय वह सूत्र नयकी अपेक्षा पढेका पनामे वाला नहीं कहा जामा क्योंकि शिविरूषक मादि पर्यायदि आगे जाकर पर पर्याय बनमे पाठोसोमिये भविष्यत् कासका विषय है वर्तमान काम का नही एक मिस ममप या पापमा सारे सम ममय घर की उत्पत्ति उमके विशेष अवयवोंसे हो रही है मौर यही शुर वर्तमान काम जुसत्र नयका विषय है चिन्तु उस ममप कुमकार पुण्नहीं कर रहा इमलिये ऋजुत्र मपका विषय कुमकार ही सब फिन्तु मकार का अमाप उसका पिपप है। तपा- (प) कोर पर कहीं से माकर पैठन किसी दूसरे मे पूछा- हो मा कहाँ से आ रहे हा ! उस समय उसका यह कहना कि कीसे नहीं मारहाई क्योंकि उस ममय मर्वया गमन क्रिया का अभाव है इसलिये शुभवर्तमान की अपेक्ष्य इस समय कहींसे नहीं मा बाई' यह मसूत्र मपच पिश्यो। (१) किसी पठ मवमी को पेसफर यह पूछना किमाई! इस समय तुम किस स्थान पर हो । उस समय वर्तमान में वह जितने जितने माझाशके प्रदेशों में विधवानी उतने ही प्रदेशोंच नाम लेकर को फि मैं यहाँ पर है, किसी पुरी प्राम घर आदिका नाम मही के पह शुय पर्तमान कामकी अपेक्षा म्पन होने मे ऋतसूत्रनप का विषय है। अयथा उस समय जितने बारमवेशॉक लाकारमें उमा पहना हो उतने ही प्रमाण मारम प्रदेशों का उल्लेख कर वा या कहे कि मैं पा पर ह पद ऋचम नयका विषय है क्योंकि उसकी स्थिति का शुख पर्तमान समयमें पही मागर, मम्प म। HEO है एटानिवासी जगरूपसदाययकोरकृत पदच्छेद योर विमक्त्यय सहित सर्वार्थसिद्धिका सम्बया विदीअनुवाद अध्याय १ सा ३३ ननु सव्यवहारलापप्रमग इति चेन्नास्य नयस्य विपयमात्रप्रदर्शन क्रियते । सर्वनयसमूहसाध्यो हि लोक मव्यवहार सर्वनयसमूहसाध्य ननु संव्यवहारलोप-प्रसंगः । प्रश्न (मनु) लोकव्यवहार के अमाक्का प्रसंग आता है अर्थात् लोकमें बतीत अनागत का न्यौपार मी प्रवर्तता है सो किस प्रकार पलंगा जो मनु सूत्रनय फेवल समान पाय मात्र को ही ग्रहण करेगी इति चेतना -ऐसी का (=पेनोने पर उच्चर में कहते हैं कि) (यह पात) नहीं है अस्पानगरपापिपयमात्र प्रदर्शनम् पिसे=इस (अमुसननय) का केवल विषय (=विषयमात्र) दिखाया गया दिक लोकसंव्यवहार .। सर्वनपसमासाम्य' ।। =क्योंकि (=ी) लोकका व्यवहार वा कार्य सपनोंके समूह शारा साधने योग्य है अर्थात लोक व्यवहार में मिस नयका जो कार्य है उसी नयको काममें लाना चाहिये (१) अनुसूत्रो निषिप सश्मसूत्रा यथा एक समय -अजस्त्र (नय) दो प्रकार है सूक्ष्म सत्रमय जैसे एक समय तक मवस्पापी पर्यापास्यूमसुसूत्रो यपा -घारमे वाली पर्याय और स्यूलमजुम्बनय जैसे मनुप्यादि पर्यायास्तदायुः प्रमाणघस तिष्ठम्ति -मनुष्प मावि पर्याय (-तद) मायुपरिमाणकाल तक रहती है। मालाप फ्यातिसे पाव (निम प्रधर स्वधगिरमा सरस होता है उसी प्रकार मा मरल विषयका सचित करता है उसका नाम समुपूजनप॥ परमप निकाल संम्पी विपॉम से पर्दमान कालीन विषयों का प्राण करता है क्योंकि जा पर्याप पोप्त चुदी मयता गो पर्याय ममी उपस्थित नहीं हुई मागे जाकर रपस्थित हानी उन दोनो पर्यापोस प्यवहार नहीं पा मकाममिये शुग एक समय मात्र ही मुत्र नपत्र विश्य माना गया है। सूत्र नपरे। कुछ मो मो सवारण ऐसे है कि (क) 'फाययो मेमाप' कारा प्रोपप है यहाँ पर जिन पगर्यो काडा रेग्न पदार्थोप रम निकाय कर जिम समय साक्षात् मौरय स्वरूप पाढा बन जाता है वही शुर वर्तमान कालोन ए. ममपती मससमनपका विम्य है किन्तु पादळे हरी परिवजिमय ग्म अमी तर प्रगर नहीं मा मागे जाकर प्रगट होने वागमता जो मामात् मौषप महीं हे वा मनुसूधमयका पिपनी पोरिपर पर्तमान एक समयबती नहीं भविष्यत् परपी अपेक्षा रखता म FOR एटानिवासी मगरूपसहाय वकीलकत पदच्छेद और विमक्स्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका सन्या हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३३ ॥ ४॥ लिङ्गपंख्यासाधनादिव्यभिचारनिवृत्तिपर शब्दनय ॥ तत्र लिमयभिचार पुप्यस्तारका नक्षत्रमिति ॥ सख्याव्यभिचारः जलमा वर्षा ऋतु सिम-संम्पा-साधन-आदि-व्यभिचार-निधि =लिस, पचन (सम्या) साधनादियाय वा दोपोंके (व्यभिचार) दूर करनेम (=निधि) -सगा हुआ (=परः) पा तत्पर (पर) है सो स्रष्दनय है अर्थात् लिग, वचन, साधन, कारक पर मनपा कास, उपमा 'बादि व्यवहारनपसे माना हुआ दोप है उसके दूर करनेको यह सम्दनप है। पुल्लिंग सीलिंग और नपुंसक लिंगके मेइसे लिंग तीन प्रकार है । एकवयन, वचन और यापचनसे सस्या तीन प्रकार है॥ साधनका अर्थ (पय चन्द्र कोश पृष्ठ ४१९ और वैध संस्कृतांगल कोप पष्ठ ७७१ के अनुसार) करण तृतीया विमति का है परंतु यहाँ पर (वधार्थ राजपातिक पृष्ठ ६७ और सोक वार्तिक 18 २७३ और सर्वार्थ सिदि चिके अनुसार ) प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष अपवा युप्मद् भौर अस्मद् सन्द साधन माने गये हैं। साधन व्यभिचार को पुरुष ध्यमिचार मी करते हैं या मानते है जैसा कि आगे जाकर (टिप्पणी संस्पा दो पठ ५१८ से ५२१ तक में) सिद्ध करने कारक संस्कृतमें कर्चा, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिारण माने है संबंघको कारक नहीं माना है क्योंकि सना और मिया परस्पर यह किसी प्रकारके सपंधका प्रादुर्भाव नहीं करता है। मृतकाल, मविप्यत काल, पर्वमानकाल ये वन काल है "उफ्ना का अर्थ परस्मैपद वा आत्मनेपद परस्मैपदफे स्थानमें आत्मनेपद का दैना और आत्मनेपदके स्थानमें परस्मैपद का देना उपना व्यमिधार है "उपमह" व्यभिधार "करिये उपसर्ग व्यभिचार ह" ५० पन्नालालजी बनी० अनुवादित वधार्य रामवाविक पृष्ठ २६४ और प० गजाधर लालजी अनुगदित तया4 गमवार्तिक मुद्रिन पट ४८० की टिप्पणी देखो । वत लिंग म्यमिपार । पुष्पा । वारका | सहा लिंगदूपण -(जैसे) पुप्प पुल्लिंग है उसको तारका स्त्रीलिंग नक्षत्रम् ॥ इHिo) संस्पान्यमिधारः । (वा) नक्षत्र नपुंसकलिंग ऐसा करना । घचन दूपण --(मैसे) घसम् ।। मापस् ॥ ॥ तुः ।। -जलम् एक्यपन को प्राप् पहुवचन वर्षा पहुवचन को पतु एकवचन CO-SASAKSa: (1) "मच लिंगसंक्पासापनादिम्पमिधार निरास परतणार्यराजचार्तिक पर ६७॥ म:- शदना । सार्थिमिरि की परिभाषा से यह परिमाय शम्बया मिसी) वर्षा लागि मस्य पुष धन है (३) मापम् -'मागम्' शम्म प्रशमा पटुमघन माविंग अप् शब्दका है। 'अप' एप मा सपा पम्पयन और सोविंग हावा (पैप सस्वाय कार ३५. पनवनाश ४३०)॥ आपा स्त्री स्पमरः ॥ 'वन वाप' एटानिवासी जगरूपसदीय वकीत परछेद मौर विमवत्पर्य सहित सपिसिलिका सदा हिंदी मनुवाद | अम्याप ११ (ब) पम्पमा-सारंप पाईमोर पा-जोरपचुका हे पापजत मय का विपर। यहाँ पापमान और पका मर्यापित पप्पमान मोर पवित् पापा ममझ लेना पारिये ! (मान) पप्यमान पद वर्तमान पर्याप और पक या अवीत पर्याय है, हम दानों का एक स्थान में कैसे ममावेश हाम (RO परिनेही पहिले का समयका कोई विमाग नहीं उस समय मातका कुरा मा पा सीमारे, वामही tantी सीमा परिमी सोझारपतीयादि समयोंमें भी यह नहीं सोझ सकता इसरिये पारका अमाप ही कहा राग। परन्तु प्रति सपा सीझव बायोसहिये परमों में रमले ये पांवों में सीसे और पे सीझे की भपेमा जनयका पचित् पम्पमान नौरपति पर विएप पापित भी यदि यहाँपर यह मपमा म मानी जानी मोर पपमान मवरपा मोर पर समस्या सण विरोप माना जापता पध्यमान (मिमित) पचित पम्पनाम मोर पक इस प्रकारसे विपयो वीम मे हामानेस समग मी तीन प्रकार माया हो परन्तु तीन मेदों का सर्षया विम्य मानने से एक समय में वे तीनों मे नहीं इसकमरिये अपेचित् पम्पमान और व्यथित् पामें सर्वपा पिरापनही माना बासका। इसलिये या पहात सम्झटमी पहिय किसी रसाईपाका या अभिमाप रोबिनोवांस मसी घर से सीह गरे। कोई भी बचा पाय नहीं रहा है उस (रसाया) की अपेक्षा वो मळेप्रकार रपे हुये पायम ही और जिम संपने वाले या ममिप्राय हो किवह कुरा सोझे और सीमे पंचित् पम्पमान मोर मयंचित् पर पसे पम्पमान वारों को पाप गावसकी मपेक्षा पम्पमान ही पक। क्योंकि पद गम्ममामा काही पक माममा समय समझता सम्येि पारा सिभितो पुग्ध कियन पत्र पच्यमान अर्थात् कपित् पम्पमान कथंचित् पफ बाहरण निकोप तथा पक पदुको के पाप ए ममय बी पाप मी पण नपत्र विषय है। पेसेही क्रियमाण व (ज्यचित् क्रियमाण पर्यवत् वा मुग्यमान मुख (पचिव मुरमान पवित् मुज) पापमान पर (स्यचित् पम्पमान पषिद क्य) भौर सिम्पद सिर (पबित् सिम्पत् कथित् सिम्) मादिमी पासून मपदे पाहरण समसमेने पारि। मर्यात् यो किया बारहामोर जो किया जा चुकी और से मोगा सापा मोर यो मोम बाइचजो सिर मियामाहा मोरयो सिश किया साधुधरे ये सपही असूच नपके विषय पर ६ क्योकिम सों में मी यो पर्वमान पर्यापच पहप होता , जिसमे मंगों में वर्तमान पोपका ग्रहण है उतने ही मशों में प्रसव नपकी विषयताई इमलिये मनसे पाबापता पर विरोणार पावाप्रविस्तार और समानपाप पम्पमान १का समान धार्परामवार्तिक मुद्रित पए ३. से पटानिवासी बाल्पसहाय वकीलकृत पदच्छेद औरमित्यर्य सहित सर्विसिद्धिका पदाहिंदी ममुगाव । बप्पाप १सत्र ३५ अर्थात पुरुष इपण यह कि उचम पुरुष के स्थान मम्मम पुरुस लाना, वया तत्पर्य सोक वार्तिकर्ताओं व मत पुज्यपाव स्वामीसे मिनतामकि मापन म्पमिवार को कारक प्य मधार माना साकि बोरोन मम है। इस मवर्षिसिदिशक्ति को सकरप मुद्रित ये प्रथम मावृत्ति प्रपे भी इसमी मशुधियां हैं कि दो बार गुरुपनि पर देने पर मी पुरसी मशुशियार सियको हमने शुरु करके भनुपाद शष्या किया और स्थान स्थान पर समयदेव भी किया दोनों पारियों का कमसे पाठ ऐसे १कि "सत्यापमिचार-जम्मापो वर्षा राम्रा ममिति ॥ वर नमर मापन गमिचाया परफ ममिवाय-सेना पर्वतमधिपसवि ॥ पुष्प प्यमिचाए-पी •ण्यावि पठ १३८ ॥ संस्थाम्यमिधार-सम्मापो बर्ष मात्रा कम परवानमिति ॥ मापन पमिवारा-(परक प्यभिचार) सेना पर्वतमपिपमति ।। पुसमिधार:-पी माये रपेन पाएपसि, महिपास्पसि, पारस्ते पितेति ।। उपर्युकदोनों पाझेकी सुमना करने से शात होता कि प्रपम सस्करणमें पनामिति ॥परपा मार मार पा सको शिवीर संस्करण में "चर्न परपा नगरमिति' करके इतना पाठ गुव पर दिया । परतु पमा साभन पमिषार' वापर निब करारक म्पमिवार) मोनिको र बिग पाक मही किया, 'सेना पर्वतमपिएमति' पधनके पात् और "पुरुष म्पमिधार के प्रथम "सापन म्पमिचाय मिखाना ठीक होता असा विमने परिका पाठ १३५१८में मिला है। क्योंकि () अपर्णपसीने पनि पृष्ठ २०१ में पान पियार गरि साफा प्यमियार वाई पुष ममिवार मी कहिये-पहि मम्ये रपेन वास्पसि । महिपास्पसि न यावस्ते पिता पेमारी मेन पस्त लिपित पवामिका में है। हमरा हेतु गरे कि 'सायनमा मर्प तवाय राउपातिकके तपा तत्वाचे साकपातिब के कामिनि मामा-पुमा, प्रथम पुरुष, मम्पम पुका मोर रसम पुश ऐसा रिपार और सम्प' पाकरणों मे साधम मर्य करण परक वा तृतीश पिमणि लिया। (देवोपोय पूरा प० कोश पृष्ठ ४१९) और परख (का-गर्म-गरण संपनि-मपाराम-अपिकरण) मिथिए मापन कारा पमियाद करण परकम्पमिपार हो सकते है। परतु "सेना पर्वतपपिवई (-सेमा पर्वत को पसतो) इस ग्वाहरण में मापन कारक मिचार महीपण मधिकरण र स्पानमें काम कारक ऐमा ममिचारोमात् जहाँ प्य कारण (मधिकरण परक) प्रयोग होना पाहा दिलीप पवार्मधारक प्रयोग किया मावार्य पेसा "सना फ्यतेऽपितसवि-सेना पर्वत गमती स्पान में "सेना पवािमति ऐमा है। यदि करण पारफम्पमिवर षा साधन कारक म्पमिपार का उपयुष ग्वारण होता कौम एक प्रकार से हम बात को मान लेते दिसायन ममिवार-बारक म्पभियाप) एक रेस्पोकि सापन प्यमिवारपरकम्पमिधाम से पासपस्या में एटानिवामी वगस्पसहाय वकीलकत पदच्छेद और विमस्पर्य सहित मर्वार्थसिदिका सदा हिंदी अनुवाद । वघ्याव १ त्र ३३ मामा वन वरणा नगरमिति ॥ कारकव्यभिचार सेना पर्वतमाघवसति ॥ साधनव्यभिचार पुरुषव्यभिचारः बाम्रा (=मामके वृक्ष) पक्पनको क्नम् एकवचन (करना वोर) माम्रा बनम्ना परमा नमरम् । इति =परणा (प्राकार वा कोट) बहुवचनको नगर एकवचन ऐसे (मना) कारकम्पमिपास, सना पचतम् अधिवसतिकारक व्यभिचार-जसे सना पर्वतको (=पर्षत वा पर्वत पर) बसे। सापनयमिपारा पुस्मन्यभिचारः ="साधनध्यमिधार ताई पुरुषव्यभिचार मी करिये प० अप० पचनिका पठ २.३ (-मामा निगम पहले पान मापस' शाप नीरिंग और मन में सौप अाता है । इस मशम्य का एकचन और शिवनन तेसकी सब दिम को गुपचन में ऐप है कि भाग (मापस् प्रण्मा विमलि), भपा (शितिया विमति), मभिः (व.पि.), (oftor, हर(१००), अपाय (rofen), अमु (Eof० । १)पर प्पमिगया माय पान वा मोकारिष्ठ ०३ में स प्रकार fruit 'वण करोत क्रियते इति परकयोः मियोमेरेऽप्यमिकमपत पवादियो । स एव करोति रित् स एव किपते मचिदिति प्रतीतेरित पिन भया परीक्षायां । देवदता रोतापाप कपमयोगाच कायोरमेव प्रसगात ॥ पण रोपित तिपरयोकमणो मौर रोति (smal) क्रियते ( दिया जाता) पेसे पा मोरम भरकम मेवे । बपिमित्रम् ॥ मर्पतः एपमानियतT भर होमेपर मी मामा मर्यसे ही (देवारों द्वारा) भापर किपेसते है अर्यात् ऐति कमि प्रत्यय और क्रियते णहममें प्रययनका और परकोंमें मेवर तो मी यावरणवाले उनको एक मानारा कि सा स्पेतिविचित् सा प हिमतानचित् इमियो ही कुछपरता मोर पोराक्सिीसे (ग) विमा माता पेसी॥ : म्हीयेति. क्योंकि (समारमें) ऐसी प्रतीति। (मिरियेार्म पोनों पकती। परस्पर पर मरेकी पर्याप माते है ऐसे परक पोरगाव पता) दमपि०० मेपम् ।।n परीस्पाम् ) तो मी परीक्षा करने पर (पह) मेएनहीं। (परिचर्ममममेद मानतो) रेवरचाकरोति मा. मपि. देवर परामि देवता ऐसे पदों पर मी व धर्मयो देवपचप्रपो। ममेद-पसमात् । देवदतमोरर्म में मेवामा एनका संपाप माता। (गावा प्ता पर्मको एक मानारकारकको रमरमा बापित औरणयु" इस रिप्लासे हमको पात सिर परजीवि मापन पमिधारका मोर पुष्य समचारको पदीय और ताचार्य पनपातिक एटानिरासी मगम्पसहाय वीजात पदच्छेद मौर विमतघर्ष सहित सर्वार्थसिद्धिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । मध्याप १ सूत्र ३३ गत रामनय की परिमापो के क्रमानुरुमा प्रथम सिंगप्यभिचार का पाइरस सहित हा पचात् सपशम्पमिवार को परास्त मस्ति या तत्पश्चात् सापनम्पमिसार क्रमानुन अवश्य ही पाना पारिपे । पापात बितनी कम विस्य है कि क्षिणम्पभिवार चौर सम्पयामि चार को बहकर घोर सापानम्पभिवार को पार "मादि राम्प में मन्तर्गत व्यभिचार्गमसे कारकम्पमिवार का प्रहप करमा पभात 'प्रावि' शप्प में अन्तयंत कासम्पमिचार और ग्पनाम्यमिवार को मौसोड़कर फिर साधनम्पभिचार का यन पारम्भ कर देना । मादित में भम्तर्गत म्पमिघारीको स्पर को ये प्यमिधारी से पीछे होकाना पड़ता है क्योकि समय है कि मादि शम कारण व्यभिचार कासम्पमिचार और उपमहम्पमिधार मतिरिक भ्रम्प प्रन्प प्यभिचार मी समिसित हो जैसा तिरषार्थ राजपातिक पृष्ठ १७, ६८ में भादि राप्य पर कामयभिचार मोर म्पप्रहम्पमिचार को आम हुए "एषमादयो म्पभिगारा प्रयुक्का! (-ऐसे काल उपप्रहमादिक व्यभिचार भयुष बथम दिया है । ( ) रपयुक्त पार्तिक के पृष्ठ १७ १८ में सिंगसल्या सापनादि" वाक्य + पीपे कमसे लिंगम्पमिवार, संख्याम्पभिचार सापन पमिवार का व्यन रातो सरित किया मोर 'मादि गप्प में कायम्पभिखार और उपप्राम्यमिधार को दारणो सहित निर्देशकर प्रात विपाल पसे मारिएप में और और म्यभिचार मी है पे सर्प प्रयुल है। तचार्यश्लोकषार्तिक पाठ २७२, २७३ मै कालकारक लिंगस स्या सापमोपमहमेदाचिमयं शपतीति राप्दा नप पह वाफ्प देकर साहो कम से शप नप की अपेक्षा से इन सपका कथम उदाहरणों और तर्क वित सहित दिपा है। पही क्रम सारामपार्तिको दोनो मनुवादकों ने प्राण किया है। प० गजापरखो ने २७२ २०३ तक पृष्ठौ बाभनुवाद रिपा उसमें भी वही कम स्पचा है। देखो पृष्ट ४३ से ४८ तक ) । प.अपमम्द जी म पचमिका पृष्ट २०२ से २०५ तक में सिंगप्पमिधार समपाम्पभिपाप, साथमायभिचार ताक् पुरुप म्पभिचार मी कहिये "कासम्यमिवार उपमहायमिधार कारक प्पभिचार इस फम से उक्त म्य भिचार कर उनकी व्याल्पा उदाहरण सहित अनुकम से की है। पं० सदासण मी मे भर्य प्रकाशिका पृष्ट ४ ५ में प०अयचम्द जी सारा उक्त म्पभिचारों का उदाहरण सहित उस्लेख किया है परन्तु उनमे परकम्पमिषारका स्थान हादिया है। पृष्ठ ४८० से ५० पमानास म्पायविधा परलिंग संम्पा के प्यभिचारों के पोछे सापमापभिषार पार पुरपम्पमिधार मी पहिये इसब धन परत है फिर कालम्पमिधार इत्पादिका । हमने पाठ ती सर्वार्थसिविवृत्तिका राय र दिया है परन्तु कारकम्यमिधार को सस्याव्यभिचार और साधनम्पमिवार के (-पुरुष प्पमिवार) मप में हो सणापयोकि हमारे मित्र कोई ऐसी प्राचीन प्रति नहीं है जिसके सापार पर हम कारकठयमिवार को साधन ग्यमिवार (=पुरुष पमिचार) के पश्चात् रक्ो । विचार में मापा पहो सिधा मागे पान महादप भूब सूक सम्हार मे।

Pट्रानियासी जगरूपसहाय कोलकृत पदच्छेद और विभक्त्यर्थ सहित सर्वार्थसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सत्र ३३, और मध्यम पुरुष के स्थान में उत्तम पुरुष लाना, अस्मद् (=में) के स्थान में युष्मद् साना और युप्मन् (तू) के स्थानमें अस्मद् लाना (जसा कि नीचे के दृष्टान्तसे ज्ञात है ) मापारकारभिचार:-(सापमपरकम्पमिवार) पे गानों पाप, पाक्याप पूरा कर देने म अर्थात् 'माफर पमिधारम पारक शम्द जोड़ने से और भार प्यमिवार, साधन शमगानेसे पक जाते है। परंतु उक्त ग्वादरण (सापवत मघियसमि)में तौ माधनमारक म्पमिपारका कुछ भीमशमी रे ॥मारी समझ सापनपरक पमिधारके वा अर्थ है) सापन (तृतीय करण) कारक द्वारा जा दाप उत्पम दा सा साधन मिबार अर्थात मम्य परक प्रयोग से ठीक होता उमरे स्थानमें फरण कारक (-हतीश विमतिमा) प्रयाग पाया जाना । () साधन पर (0) अतरण परम (-तृतीया विमति) के स्थानमें भग कारकका प्रयाग पाया जाना सा साधनकारक मिमार पा करण परस्पमिवार हा सम्ता मलिए हमारी समझ में संस्था द्वारा प्रकाशित सस्वाथगनपातिक मनुपाद प3 10 के नीचे जा निम्न रिप्पणी सीने पर ममापानोसे विसी । मायसिदिम साधनम्पभिसार ( कारक समिधारा) सेमाश्यतमधिपतनि । पुरुषमधारा पहि मम्य एपेन पास्यसि नहि यारासि पातर रिख मर्यात सापनका मय फारफ मामा हैनौर साधन प्यभिचार मना पयत म रहती। यह उदाहरण दिया है। पुरुषम्पमिर एक मित्र म्पमिधार माना है भौर उसका पति मन्ये रपेनस्यावि उदाहरण दिया है । ससिमिति, तम्याथ गतवार्य साकतिक, जपचवनी एत यचनिका और अप प्रमाशिका में सि क्रमस उक्त म्पमिपाके माम दिये ग्सी कमस मनकी मिन मिध पाया की और क्रमानुसार ही उबाहरण दिये। इमस पाहात सरफमी कि मरम्पभिवाप नामपिरमतिम सपका स्मन पाहि मापे रपेन पास्पसि म हि यासासि यातस्ते पितवि' पचास् हाना चारिपे और 'फाळ- पमिदा परादि पाररक पहिच दोन्ग धादिये माद "कारक निधारा सेना पर्वतमपिमति ५ माघम मिपारा, पुरुषम्पमिधार-वि मोरया पास्पसि मतियारससि यातस्ते गिति प्रभाभिगरात सके स्थानमें परमापमिधारम- सेना पर्वतमभिषसविस खने मेसो पाना परिवर्तन करते हुये पेमा पाठ दाना चाहिय "सान अभिभारा पुसम्पमियार-परि मम्प रपेन पारसि म हि पास्यसि पावस्ते पितेति ॥ पारामिपारा समा पर्वतमपिशमति कामम्पधिपारा यार क्योति सपिसिरिमें "मामहगमाप निप्पभिचार नितिपय एसो परिमाम सम्पनप की है। इस मारनपम घाममभिचार प्ररम्पमिधार मौर उपमा पमिपार गर्मित है।

एयनिवासी जगरूपसहाय पकीसव पदच्छेद और विभक्तपर्ष सहित सार्यसिद्धिका शम्दश हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूप ३३ 980- उक्त गणमप को परिमापा कमानत प्रथम निंगापभिचार को बाहरण सहित कहा पपात् संम्पमिमार को पान्त सहित पा तत्पमात् सापनापभिधार क्रमामफूल अवस्पी काना चाहिपे । पापात बितनी कम विस्य है कि लिंगम्यभिचार चौर संक्याम्पमि पार को पहसार और साथमम्पमिपार को बाहर मारि" शप्प में मन्तर्गत म्यमिपागैस कारकम्यमिचार का महत परमा परमात 'मारि" गण में अन्तर्गत प्राप्ममिवार और उपप्राप्पमिधार को-मायोड़ कर फिर सापमम्यभिचार का धन प्रारम्भ कर देमा । मादित शप में मम्तर्गत पमिचारीको सर को हुपे पमिपारी से पीपेकी काना पड़ता क्योकि सभव है कि माविशप में कारक म्पमिधार चलम्पमिधार मौर उपमहम्पमिधारक पतिरिक भाप सम्पपमिधार मा समिलित हो जैसा कितस्वार्थ राजपातिक पृष्ठ ५७ ६८ में मादि' राज्य परिकापभिचार और उपप्रारम्पभिचार को न हुए एपमादयोः प्यभिधारा अपुताः (-ऐसे काल उपमह भाविक व्यमिधार भयुक्त रूपम चिया है। () उपर्युक्त पार्तिक के पृष्ठ १७ १८ मे सिंगप्तम्पा सापनादि पाप क पीके कमसे सिंगम्पभिवार, सम्याप्पभिधार साधन पमिपारपन राम्तो सहित किया है मोर भारि शप्प में कापम्पमिधार और स्पमापमिवार को उदाहरणों सहित निवेश कर प्रकट गि ऐसे मालिशप में और और पभिघार मौ है ये सर्व प्रयुक्त है। वत्तापरलोकपातिक पृष्ठ २७२, २१ मे पकारक सिंगस स्या सापनोपनामाभिमयं शपतीति शम्यो मय यह पापप देकर सही कम से राय नय की अपेक्षा से इन सबका कथन उदाहरणो भोर तर्फ वित सहित रिया है। यही क्रम तत्वापबपातिक के दोनो मनकापकों ने प्रहस किया है।प. गजापरयो मे २७२ २७३ ठक्त पृष्ठों का अनुवाद रिपा उसमें भी पही कम पवार (देबो पृष्ट ४३ से ४८ ) 4. अपवाद जी न पधनिका पृष्ट २०२ से २०५ तक में सिंगष्यमिधार संपाम्पमिका, 'सापनम्पमिचार ताक् पुरुष म्पमिबार मी कहिये "कालप्यमिवार पमाप्पमिपार फारक प्यभिचार इस कम से उक्त म्य मिचार र रनडी ग्याल्पा उदाहरणो सहित मनुक्रम से दो ० सामुबबी ने अयं प्रकाशिका पृष्ठ ८४ ८५ मै प०अयचन्द वी सरा रकम्पभिचारी का उदाहरण सहित उस्लेख किया है परन्तु उनने कारकापमियारका कथन कादिया है । पृष्ट ४०० से प० पयामास म्यापदिया पर हिंग सम्या के व्यभिचार पोषे साधनापभिवार पाक् पुरुषम्पभिधार मी कहिये इसका कधन परत है फिर मालम्पमिधार इस्पादिका । पमने पाठ तो सर्वार्थसियित्तिका गुर र दिपा है परन्तु भारकाम्यमिवार को संभ्याम्पभिधार और साघमम्पभिचार के (- पुरुष पमिवार) मप में ही रमणा फ्पोकि हमारे मिस्र कोई ऐसी प्राचीन प्रति नहीं है जिसके मापार पर हम 'कारकायप्रिसार को 'साधम प्पभिषार (=पुरुष म्पमिधार) के पश्चात रक्ने । विचार में माया यही मिया मागे पाठक महापय गम चूरू समार एट्यनिपासी नगरपसाय वकीलकृत पदच्छेद मौर विमनस्यय सहित सार्य सिद्धिका शमश हिंदी अनुपाद । अध्याय १ सय ३३ (एहि मन्ये रथेन यास्यसि, न हि यास्यसि, यातस्ते पितेति ॥ पhि T मन्ये T रपेन यास्यसि T =(त् । भाउ, (मैं ) मानवा इषा समझना ह, (तू) रय (पढ़) करि मायगा,(सो) न० पास्यसि T या पिता ।। इति =(द ) नहीं नायगा, इस प्रकार ( इति ) तेरा पिता (पला ) गया । (सभ्य शब्दों में उक्त पारप का अनुगाद ऐसे होगा कि) तुम भाभो मैं मानता हूं पा सपमवा ईतूप रप घर परि मानोगे सो नहीं भागोगे, इस प्रकार (तो) तुमारे पिता चले गये । उपर्युक्त सस्कृतमाश्य में मौर वदानुसार शनार्थ हिंदी अनुवाद में मी 'एमि' उच्चम पुरुप एक पचन के स्थान में "एरि"मध्यम पुरुप एकवचन लाया गया है। "मन्यसे" मध्यम पुरुप एक पपन के स्थान में “मन्ये" उत्तम पुरुष एकपचन साया गया है और "यास्पामि" उत्तम पुरुष एकपपन के स्थान में "यास्पसि" मध्यम पुरुप एकपचन नाया गया है॥ (मैं ) के स्थान में "व" और "तु" के स्थान में "#" फिर 'मैं' के स्थान में '' लाया गया है हिन्दी अनुवाद में इन तीनों को मिलाके ऐस साधन पा पुरप म्पमिपार हुमा । (१)स पाप का पाठ सर्वार्थसिदि की दोनो आपत्तियों में तत्वार्य रामपातिकतया रामबार्तिक दोनों प्रमुबादों में एकसा है। श्लोक पार्मिक में एक 'स अपिल और 'पिवेति वाक्य की सघि महीदी पिता इति' ऐमे रूप में मात्' पति मध्ये रयेम यास्यसि न दि पास्यसि स पातस्त पिता इति" ऐसा पाठपं.अपचाप जी भी पचमिकामें "" अधिक और इति' महो अर्थात् 'पहिमम्य स्पेन पास्पसि मदि पास्यसि म पातस्ते पिता' है। (२)"एरितमानि दिनोय पण वाईगमन भवासी घासु से होर सकार पा प्रासापोतक निया मापम परुपमा एकवचन रूप मा पर्ष “पहिरिपे त भाइ (-तुभाउ ) पया दूमीवाने पृष्ठ २१४ परित्वमागण्य (-तू भार ) सार्थ प्र. सस्करण पु. १५८ रिणतो द्वितीय भावृत्ति पृ. रिपसी । 'पदि मम्पे स्पेन पास्पसि महिपास्यसि पात पिता । प्रर्यात् जामो में ऐसा सममता कि तुम रणसे जानोगे पण अब म जानोगे सुमारा पिता पसागवा । इस पाश्य के शो मत तो यह हाताप-आपरलालजी अनुवादित नस्वार्थराजपातिक प. बरमको परपात निमय करना कि परिवाक्प का अर्थ नसा ठोकोमोत् 'तमार' अथवा त् आयो। मारि प्रथम गप परस्मैपर मोर मारमने पर पातुबाना भ में माना हैगुणमा एमविर मोरकर-भय +4 पमता पमा वि-समय पुरुष एकवचन व मान पामरे परम्मैपरना प्रारमनेपामा प्रत्पप कमसे सगारमपति प्रपत्ते-जानाई बने। (रमौर मारि प्रपम मरादि हितोप दिवादि पतुर्थ पर्षों में मिन मिन प्रवनिये हुये माते ईग्म सोय कर पर्श पर -१ महादिपप के बाना बागमन प्रर्य में प्रापे (पचास १५.१७ पृ.)मा मन्त का स्वर और भरतपोवाम सरपितसंपा to - एठानिगासी पगम्पसहाय बीचकत पदच्छेद और निमात्पर्य सहित सर्वार्थ सिद्धि का शम्दशा हिंदी अनुपाद । मध्याय १ सम ३३ हिंदी भनुपाद में पदि उस पुरुष पण प र करदें तो मी ईसीका प्रसग पना रहेगा जैसे में माताह न समझता है "मेरप पढ़ फरि भाऊगा" तू रप पढ़ करि नहीं पायेगा, वरा माप (वादा भी कमी) ऐस गया है! माचार्य नो महत्व का कार्य वरे पाप दादा से नहीं हुआ है तुझ से देस हो सकता है कदापि नहीं हो सका है। परन्तु संस्कृत में पदि म शम्म नयक अनुकूल पुरुष पण रर कर के "एमि मन्यसे स्पेन पास्यामि नहि यास्यसि यातस्ते पितेति" करदें तो पास माता रहेगा और सीधा साधारण संस्कृत पाप का या पर्व हो जायेगा । जैसे किसी बहुत परे मनुष्य को कोई पश्चा मिला और दोनों को किसी पराव में नाना है तो उस वृद्ध पुरुष कहता है । (पयेत् परे साय चलता है तो चल ) 'मैं (दो) भाता हूं समझता है 'मैं रप पारि माऊंगा' ( सो भा) स् (स्य पद करि ) नहीं भाषेगा । ( पोंकि न तो अभी ग्राम सभाया है, पर भी नहीं पहुपा है इससे मुझको मानकारी नहीं है कि मो रय पस्तुतः वेरे घरमें पा उस पर सौ ) तरा पिता (घर कर परास ) (मि सिति । प्रम-स-त् । मानि-पाप-प्राम-तु परस्मैपदी और ऐ-भावा-माम है। भारमनेपदी ) पापय के पदिमे गुण सा प्रादेश रोभाता है पर रोप ति सभा प्रत्यय वस्-थस-पस् हि-तम्-तम्म्-त अन्तु इत्यादि - पहिले गुण सपा नहीं होती (पातुचन्द्रिका पृष्ठ७२)इसलिये हम पातुभो भमि पित् संबक प्रत्यप के परिजे गुण संशा बार एप ऐसा कप पना { प्रमादि रितीप गरपातु माप कोई विकर नहीं गता है इसलिये पुरुषगत प्रस्यप पातुभो के साप तत्ववनगाये बात है। एमि- पातु का मोर एमि (A) पातुप उत्तम पुरुष एकवचन परस्मैपर पर्तमान काम को हिमा का कपमा जिस पमि अप (मैं) जाता आकि परम पहिरे स्थान में पमि परेंगे तब पर पर्ष धाम देगा । हि प्रत्यप म्ति सा है और पा मम्पम पुरुष एक पचम परस्मैपद, बोर वा मामा पोता क्रिया कास पहिले भारत स्वर और प्रा उपास्ताव सर का गुरु सार मादेश मही होता समिपे +rt+दि-हि-तू भार t+दित भाउम्प पने और अप हुमा । (यो पातु चन्द्रिका पप्ठ 1) म प्रम पर निहि-हिप्पो का पदि से पना और पा प्रर्ष दोमा मार उपसर्ग फेवा भय होते हुये जब भार(-मा) उन झिपामो के पहिले माता रेमो सिन-पान-मह बरने इस्मावि भयों की पोतक होती है तो उनका म विपरीत बावा से गम् जामा भागम् - मामा । सी प्रभार मा+मा+t का मानगुणा ० ( १-१-८७) से ए-ए रूप पने क्योकिरन की गुरु का इसमें पर्युक दो प्रस्पप मगागे से पहि-परि कप बने। इसनिये 'त् भाउ' पाम हुमा। इससे हमने मनुबाद मै तू मामो मर्प म निपार परेशमर्थ तू माउ भयका तुम मामा ऐसा किया है।

AARA पानिपासी नगरमसहस्प यकीखव पदच्छेद और रिममत्यर्यसहित सार्वसिद्धिका शम्दश हिंदी अनुपाद । अध्याय १ सप्र ३३ पखा गया। भीयुम भीमन्द्र अनुपादित भ्रष्टाध्यायी पृष्ठ २११ देखो । “एहि मन्ये (१ ) रयेन यास्यसि, न हि यास्यसि, यातस्वे पितेति" ॥ या संस्कृत पाप ईसी में करा गया है। पर म्याकरण और व्यवहार नप दोनों के अनुकूल शुद है मौर लोक म्यवहार में ऐसा प्रयोग होता है और यह ठीक समझा जाता है परन्तु शम्न नय की प्रधानता से उक्त संस्कृत पाफ्य का प्रयोग ठीक नहीं है, प्रयुक्त है पिव है पहारनप और व्याकरण से या भलेनी ठीक हो । या पर वो शम्म नय का प्रकरण है इस से हम उसको दृपित मानते हैं। . (१) बमका इस रिणी में हम बात को सिय करना है कि पादिनीपछत प्राप्मायी भोर जैनेन्द्र म्याकरस के मी अनुसार और म्यवहार मप से मो "परि सम्ये रपेन पास्यसि न हि पास्पमि पातस्ते पितति" पर पाय ठीक है और यदि राम्द नप अमुल मन्ये" उत्तम परुप स्थान में मम्पमे मापम पुरुष कर दिया जाये मोर 'पास्यसि मध्यम पुस्प के स्थान में 'यास्पामि उत्तम पुरुष करविया माधै तो उक्त पारस चमीषा सारा साधारण म होगायेमा और उपहात वा परिहास प्रसंग गाता रहेगा परतु राम नय से जिसको पम पहां पर प्रधान मानते हैं रक्त वाक्य ठोस नहीं प्यार और म्यपदार नप कुछ भी सिर क्यो म करता हो। प्रथम हम अप्राप्यापी के सूत्र का उल्लेख करते हैं। पाम प मापापपरे मम्यते सचमः एकवर" 11-मासे । पमम्प-उपपदे ॥ पातोः । (मत्र ० से लिया है) मध्यमः ।। 11 पासून से लिया ) (मम्पत्ति की ) महतो , उत्तमः । एषप...॥ प्रहारसे 4. -ौर (-1) प्रहास पाहसी (अर्थ) में प्रति मप किसी क्रिया के सम्बाप में किसी से प्रहाप्त करने का प्रमिप्राय हो। मापोपपरे । पाठो मापम ।। माय-उपपद ( मम्य पासु सिरे साप हो ऐस) धातु से (: ऐसी पान के पीछे ) मध्यम परुप हो भात जिस धातु के साप में मम्प (धातु ) उपप्प में पाई रोती वह प्रतिभूत वा विपप ‘भूत घातु प्रपपा पर किपाघोतक पातु मम्पम पुरुप में लाई माती है। से (=मम्पो-या मम्पत्ति की पथमी मपादान विभक्ति परचम है ) पचम पुरुष दो। एच. = वह पकवचन मी (प)दो सारांश पदम बिसो प्राली से विसी किपा जैसे पाना माना बसे मानास्पादि सम्बन्ध रसोरना दो और मम्प धातु उक्त विषयमूत किगरे पास प्राचे चा परिणे पाचे भयपा प्रथम बोला साप तो इस क्रियापीने मप्यम पुरुष अप्रत्यय बाया बापगा और रकमन्च धातोः = मम्पत उत्तमा - - और माय धातु पटानिवासी बगरूपसहाय बीमार करने और निमसर्व माहित ममिपिका शमशः हिरामनु । अपार " PARIKSss भात रेपमा प्रम पुस मय पचा मामा, पापप एक पल मौ (-) रोग मे-पर्व मन्ये व मपसे पति, गदि मोससे मुसोलिपिमा इस पापमें भरं पातु मिस वर्ष 'मन ममा मचाना' दिपा के समय में किसी प्रकारे परिदास वा सो करना है और एक वाक्य में माप (मर-समझा, दिवाविमपा प विकरण ) पातु विपत वा प्रकरण बाई गई 'भर पातुसे पहिले माई है. प्रथम बोगी पसपिवे इस मुई पातु के पात् स्यसे (-मुझस्पसे-मांकास्पसे- मोदाम्पसे- मोस्पसे) माम पुरम स्पा बाम गयी और मार पातु मी बाम उपपद (-अपन, गौर, मुजी): उमके पी (-म+ प, विकरप+-मम्ये) उत्तम पुर पपवन पर पाया गया। बस पही स सत्रय पोसत्यो अपमोर माशपरे। महममें महास पासमान मीबिये कि एस पुष्पके पाहो मात मस मी नहीं बना मोर एक न्यून की भाव जाने को पासहीमो परस्पर हममें पास मी हावा पानवापुर पुमी में बवार पेमा समझा है "मैं मात साम दूनी सायमा र भात नौ मामामो मायाचिया गया यहाँ मात सौर दि मी विचमाया पण मास मोर पहास ही है। पान कि सीरूप अर्थ जमकर ही सम्व पाय पेमा दबदबाम शममपके विद्रय 'मम् पातु मवम पुरो स्थानमें शो सचम पुस मोर मोस्पसे ग्राम पुरके स्थान में माराम पुतीमा रहमपति शवपके मनुमार हम रस म्पाहरण घे ऐमा परे एवं मापसे मारन भास्वसि ना मास, मुक सोऽतिथिमि अर्थात् मन्ये म पुके स्थान में मापसे मथम पुरस पर मोर मोरस माम पुन स्थान में मारपरम पुणबारे वो हसीनपिप गाव येगा और सपाक्सका सीधा साधा साधारण मर्यावैमा वार्य रोगावेगा विरागारमर्म सारस पुरा पा भात पार्यमें एसाथ मौर मामाम उस मास मो सास सब वास्तविक बागये तो बिना किसी हमारे सारेकि एसा माना है मैं मात सामानही जायगा, वह (मास वो) मामान बागये । ७९ष मायमरस पस भी है "प्रास मम्प पावि गुप्ममापरलोकमा भात यास (म) में सवार (माय पातु जिस बार का पठनमें आपसे) पास युष्मद् (मसम पुरुष) हो मोर मम्य धातुसे ममा(उत्तम पुरुष) हो और वा (महमद) पण पन मी।। सवीत RAA-% EFER एटानिपासी नगरपोप पफीलम्त पदमोद और निमपत्यर्थसहित सार्गसिलिका शम्दश हिंदी मनमाद । मध्याप १ सप ३३ पला गया ।। श्रीगुप्त धीयन्द्र भनुवादिव भष्टाध्यायी पृष्ठ २११ देलो ।। "एहिमपे (१) रथेन यास्यसि, न हि यास्मसि, पातस्ते पितेति" ॥ पा संस्कृत पारस इंसी में कहा गया है॥पा प्याकरण और प्यपार नय दोनों के अनुएल शुद है मौर सोश गवहार में ऐसा प्रयोग होता है और पह ठीक समझा जाता है परन्तु शन्द नग की मानता से उक्त संस्थत पापय का प्रयोग ठीक नहीं है, अयुक्त है पित है प्यपहारनय और प्याकरण से पा भले ही ठीक हो। पहा पर वो शम्द नग या प्रकरण है इस से हम उसको दृपित मानते हैं। (१) बमका इस रिपी में मतमो सिय घरमा ऐकि पाणिगौरा चपाध्यायी तौर अंगेन्द्र प्याकरण के भी ममुसार और पहार मग से मो 'पदि माय स्पेम पास्यसि महियारसि रास्ते पिरोति' पर पाय ठीक है और यदि आप मप के महल 'मम्ये" उत्तम पण के स्लाम में मम्पस मापम पुरा कर दिया खापै भोर यायसि मागम पुरुष के बाग में 'यास्पामि' उत्तम पुगप करदिया जाये तो उगा पापा ब सौपा सादा पापार भई दोजायेगा मौर उपहास पा परिवास का प्रसंग जाता रहेगा परतु सद गग से जिसका हम गक्ष पर प्रधा मानते हैं एक पाय ठोक गयी है प्यार और गवार गय कुप गो सिय फ्यो म करता होn प्रगम हम पापाणी के सूत्र का उभर करते हैं। महासे न मापापपरे मम्पते नत्तमा एज्यप १५१०॥ प्रदामे । पमम्प-उपपदे । पातो (मा० से लिग है ) गायमा । 1 पो म पेखिपा)(मम्पत्ति की ) मम्मतो , उत्तमा । पत्. ५०॥ - मोर (-1) मदास पा इसी (म) में भत्रिविसी मिया के सम्बन्ध में किसी से प्रहार करने को ममिमायदो। मम्योपपरे । पातो । मापा । - माप-जगपर ( मम्य पातु जिसके साग हो ऐम ) धातु से ( - पातो त एमी घागुने पीछे) मध्यग पुरुष हो भनाग जिस धातु के साग में मम्य (पात) उपपरमें भाई दो तो यह प्रतिभूत पाविषय भूत पातु मापा पा फियाघोतक पातु गापम पुप में माई माती। भोर मग्य पातु से (= गम्यतो पार गम्पति की पचमी पपाताल विगति परूपमा है) उत्तम पुरो। - पापमन सी (प)दो मारांश पद किया जिसी प्रान्ती रो रिसो लिपा सेनामा जामा नसे बामाइस्यादि के सम्मापने रंगो परमा दो मोर माग धातु उग पिगत नियाले पारा गा पा पहिले मापे मधपा प्रधा बोला माय ती महिला गोरो मध्यम पुपर समाप मापा जापगा और हम प्रहार Direra: मग्पतारतमा पपक.

RORosar एटानिवासी जगरूपसहाय पीसकृत पदच्छेद बौर विम्बरवर्य सहित मायसिदिका सपना दिदी अनुवाद । अम्पाय' त्र २५ काल व्यभिचारके दोनों उदाहरण व्याकरण और व्यवहारनय से ठीकहे परंतु शम्दनपसे इपित है मैसाकि तवार्य लोक पेरियारणा म्पयहारमय मनुरोपेन ॥ -ये करणवाले गवहारमा अनुमण्णम (पापिमीय अष्ठाम्पायी ३५१) 'भातुर्सपाये। प्रपया ।। ति सूत्रम् II मारम्प+ -ऐसे सबको कि "पायय समय में भपयानमोफ मी प्रस्पप हो' आरम्भकारि अर्याद पारवर्य साधी र जिम काम को गये हमसे मित्र काममें भी होते है ऐसे मथवा पत्रमा निर्माण कर विवारवाभस्यपुर। अनिद्या मापिएत्यमामासीदा-विषयको जिसने पेश किया ऐमा इमक पुष उत्पच होगा, होनहार यंदुला इति वा समेअपि पापदायम् मारपापिये। इस प्रकार यहाँ कास दहाने। पर मी एक पदार्थ का मानतेहै । जो विष को स्पति! म अपि पुका अनिता इति भपिप्पाकालेन-देखेगा सा हो (मपि) पुत्र उत्पन होगा ऐसा अनागत काठफरि मतीवसस्य अमेव । मभिमता वया. -अतीत कामका भमेव माना गया है मौर (सपा) म्पपहार पर्शनात् ॥ इति. -लोक पहारमें ऐमा सना तारे अर्थात् सम्गरमें ऐमा रेखा माता मागर्थ पारपाय संबन्धी प्रत्पर निम काममें कई गये है उनमे मियाममें मी होते है पेमे अर्थपाछे सूबा निर्माण कर पिपाशास्य पुत्रो अनिता माविष्टस्यमासीद' यहाँ पर मा मयिप्यात् कामाय को मृवपळमें मानने से कामका भेद रहने पर भी मविष्यत् मोर अतीतकायको पैपाकरण एक मानते है मौर दानों कासोंके ममेव मामले में याद रेसमार में पैसा म्पपहार होता है। (1) सवमा सेपम् ।। (सपा) -पा (महागधीन मषिष्यत् और मतीतकालका अमेवरम सियांत) मानी। (पाठान्तर-तत्रा) -[मम्प पाठ-सहा जा (म्यवहाराधीन भविष्यत गौर मतीतकाळोका अमेवरूप सिांसद सो, परीसाग । गक्षत कालमेदे ।। मपि अर्पस्य-परीक्षा (करने)से जड़ से ज्ञाता गता है। क्योंकि कामभेद गने पर मी (मिम) पदार्यन ममेरे प्रसंमात् ।। -एक मानने नियम अतिविष्य आता प्रतिप्रसंगान मेसो पंचकोश १०) कि गवमर्शवमतिनो अपिक -राषण और सिपाहवा में मी (जो गया संख्य और अनुक्रम से) मतीत ममासपो परव-आपले -अतीत मोर मविपत् पालमें (हुमा और हामे पाला हे दो म) एकता मापाती। अर्याद वालोंमें एकता भावी अथवा दोनों एकाए मारे है एटानिवासी नगरमसहाय बोलाव पदच्छेद जोर विमात्यय सहित सर्वार्थसिद्धिका अदा दिदी बमुगए । अध्याय । मूत्र ३३ कालव्यभिचार'-विश्वदृश्वाऽस्य पुत्रो जनिता । भावि त्यमासीदिति ।। कासष्यमिधारा । विश्वस्या कालव्यमिधार (जमै ) समस्त लोफ को जिसने देखलि है वा जान लिया है ऐसा पुनःवस्य अनिवार पुत्र इसके उत्पन्न होगा (जनिता) अर्थात यहाँ समस्त प्रमाउका देख लेना म पप्यत् कालका कार्य है उसका भूतकालमें ना मान लिया गया है अतः यहां मविप्पत्काल में होनेवाले कार्यके स्थानमें भूतकालमें हुआ कार्य करदना कालव्यमिपार ॥ मावि मत्यम् आसीता कि चोनहार (आपिन्) कार्य ( उत्पम् । मुआ ऐसे यहां होनहार काय इतनावाप्प आगामी फालका वाचक है और भासीस (हुआ) यह वाक्य अवीवफालका वाधक है इसलिये यहाँ अनागत कालमें या आमे होनेवाले कालमें भूतकालकी (प्रकासक) विमकिपा मियाका प्रत्यय लगाया है ( मषिप्यत्कालेतीतकालषिमक्तिी) ।। क्योंकि समाग्मे हम एक प्रासप वाक्यों मारा प्रसार पा प्यपहार देस है इसलिये सहारमपमे भी एहि मायग्नपावि पापप ठीक है। बाइम एप्पनयकी प्रपामता मानकर मौर पपहारको गौण करके या दिलामा माइन है कि यदि युष्मदु माम पुरुष के स्थानमें भस्मद् उत्तम पुणवाविवा मापे मौर मस्मद् उत्तम पुपके स्थान में युपा ममम पुश्य करदिया जाये तो पा शम्दनपसे ठीक महागा क्योकि मापनका मेव गोभी पक्षोंने एक माना जावेगा तो महंपशामित्व पसि' में गपठाई पता है) यहाँपर भी पुमद् अम्मद् स साधनोंडा मेवो इसलिये पदापर भी पर मामना पोगा फिर भिध मित्र पसे शो का प्रयाग होते है पेन होमकेंगे मत: माधन म्पमिपारकर करनेके म्पेिको यानि ममामान दिया मयुतरे। (देखो तत्वार्य सोक कार्तिक पृष्ठ १) (१) इस पक्पमें विश्वावा वो पुत्र विशेष्य है इसके द्वारा मताठ प्रगर पियारे और रितीप काम आसीत् ममपनमूत किया प्राणतीय प्रगर पिया। रसा शपवरच प्रयमा विठि एक पवन पुसिंगारे (तिमीमा, दिपा मारमप मम सदा नमो ता पुन मविपत् मल प्रथम पुरुष, एक था। नामनेपदी झियाप पपप मापसे समित्य (- उत्पाहाय) यह बना। (३) मामीत्-मम् अदादि द्वितीयगण, अकर्मक परमेपी सर यात 'हाय मय में पहो माया बनपटनभूत मी हियाम 'म' मा आगन मापा फिर 'त्' प्रथम पुल, एक गम, उप मूवकासका परस्मैपय प्रत्यय म्याने स(मामा)-माखीव (-मा)ला।।

एमनिपासी मगससाय पीसकर पदरछेद और विपक्पर्य सहित सर्विसिदिता शम्श हिन्दी अनुपाद । मायाप १ मत ३३ उपमहव्यभिचार--सन्सिष्ठते प्रतिष्ठते रेपमा म्पमिपास सन्विष्ठT भविष्टवे T = उपमा पण प्रपमा उपसर्ग म्पमिवार-(मैले ) = सतिष्ठते (=पा अपनी प्रतियानुसार पालता है या मतिमा पर दृढ रावा पसिष्वे ( = वा पस देखा है भयरा या गमन का है पर्यात् 'त्या' %3D (१) हमको इस निप्पणो में यह विणलामाकि यहां पर उपप्रह' सन्द का मर्थ 'उपसर्ग' कैसे हमा। उपप्रह गम्प के सात मर्य। (क) बारागार, कारागा सपनागार, बन्दीगृह, पम्पनाबप, (ब) बम्दोगह में सलमा (ग) बग्दीगृह में रहने वाला बघुमा (घ) दपा (- धुमकेतुमा, केतुमा (देखो परवद्रोग, पेपकोण प.) (च) सापता (७) किसी वस्तु को किसो पस्तु के साथ वोहमा पा मगाना (वयोग्य परपमा राम रस मायने मर्यमें मेरी समझ लिया पण मर्यात् यहाँ एक परतु मे उपसर्ग पे उसको दुसरी परत यो'स्था पातु रस साप सोड़ना मयना मगामा । पौकि निपावेमिसे प्र-पर-मप-सम्-मप-मनु-निम्-मिर-दुस-दुर-वि-भार मि-अधि-पि-मति-स-त्-ममि-प्रति-परि-पपास निपात उपसर्ग सर ही कहलाते हैं मप किसी हिया के साप माये नही तोल निपातो को उपसग'कवापि महीका सकते इममिये इस समामता सेतु से 'उपमा" का मर्प 'उपसर्ग' मान लिया या से लिया है, पो मर्प निम्न रासेपित पाक्यों से निकला है "से उपग्रह कहिये उपसग (प्यमिवार) " पखालाल दूनी वाले रामवार्तिक पु. १०॥ऐसे पसगरेपसवे मारमनेपदो पातु का परस्मैपद पपन मया। पारिपरस्मैपदोका मारमनेपदो मया। ऐसे उपग्रह म्पमिवार" ..अयापयनि० पूछ २०४ "परि मास्मनेपदोक परस्मैपर मया पसे दो उपसग व्यभिचारक प्पपाणप म्याप माने है तथापि शम्दय का पपी विषय है। मर्ष प्रकाशित : (भाषाप दूसरे वीसरे वाफ्प का पह है कि प्यपहार नप उपसर्ग पमिवार को न्याय मानतीरे पप्पू सपनप रसको मम्पाप ठापता है पण्ड हमारी समझ में यह नही माया कि सस्थानुगदित राजपातिक पठ४मैं "उपप्रा चा मर्य' परस्मैपर पा मारमने पर सामर्थ उपमा शप्प का कहाँ से सिपा है मौर कैसे हो गया। (२) स्था () पति निवची इति मन परस्मैपदोपहा । समवप्रविम्या स्था महापापी १-१-२२। इति म्पमिषार धम् । मध्यप मात् स्पा नेम्य पावरणम् १ मध्माया २ पापा २१वम सूत्रम् । इति पमिसार सूपम् । स्था गतिमिरची इवियस परस्मैपर-उपमहा-स्था पातु से गमन मिनि- हरना) मई में परस्मैपदका लगाना होता है। मम्-मप-:-पिम्या स्थाो (भाश्मने पदम् ) -(परम्सु)-पम-मप-प्र-वि पूर्वक 'स्पा' पोतु से मात्मनेपद । ARRERAKHREEरमRESHERE OCT bटानियामी प्रमपमहाय कीसान परछेद और विमपर्व सहित संसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुवाद | अध्याय १ पत्र ३५, पातिक के पष्ठ २७२, २७३ से सिद्ध है जिसका सम्पन्न अनुगद हम टिप्पणी में देते है भासातासमाबमामाविमतिas - (प्रम) प्रपन समापुत्र शंखवाझवीं मविष्यत् काम में होपा ऐष पाययो । मिषिपालात् ॥ पाता। -पनों (एवष और शंख) शोक मित्र मिन विषपाने से एक पदार्यपनासे -हित (ब) १ पेसा हो (पति) पनि (न्धेत ) माने तो मर्याद पर मौरक्षको म. तिथे मिचमाया पाहिये पर मानना बाधित ॥ तसा प. -(रस) वैसेही पद पर) forwarसमितिक -विश्वया (जोहोवुष) मौर सनिय (ो मागे होगा) पेर्स बाममो -दोनों (आप यो एक इमर से मित्र मित्र एवाप पकमिमानपाडे) अपिमा T -मी (मपि) मा (m) हो (स) () किराया -(विसावा पापका मर्थ) विश्वका भाग्यमी कसमें देखने पासा (-विश्वं पराम) विकदिन -पेमा (भर्प) ब्यापि नहीं हासका निम्सिी मबरसे नहीं रोमा विNिRNI-Tतिभाम्पस्पाप म:मतीतपस्मा-विस्तारित पेसे शपच जो अर्थ र सामतीत वाद अनि परमप्रगत -अनिता ऐसे सम्पन्न (ग) बमागवमसामोशमोगामित्र भित्रम) पुपमा माविमा मतीय निरोप सात मविपत्यकाबासा (म्माविमा) पुत्र भीतमयमै एमा (40 विशेष मवीपसमा मपिक मनायजाम्पफ्रोपार ।। प्रम) मूवमम्मी भविष्यवाहमयमारोप करनेसे (मविष्य में होने पाया पुनस्पकर्व मातीमा एमादलों) पार्पता | बमिया तिकता म्या पदार्पणमा यदि () ऐसा मान लिया जाब (अभिवा । (a) परमाप समेदे मपि. गस (ग्पचारको) भवरण में (मिमे रहने पर मी पपाता (पामा) भमिसाल्पा ॥ ध्या पदार्थम्म (पमित्राप) मा ममेरका पास्पदी (मानी जा सकता) भर्वाद पारसे महकानमेव मानपर मार को भूत सामन मोकिया मापामीर पाचपन मानावासामोरचारिका OPUR AURece पटानिवासी मममसाप पीबहन पदच्छेद और रिम्पर्ष सरिव सपिसिदिक्षा समता हिंदी अनुवाद । अन्याय १ स्त्र ३३ विरमत्युपरमतीति ॥ 'स्पा पातु के ग्पापमयों व से पहोरम विवि के पर्य या गरवारे पापा वा रे पक्ष दो लेते हैं। सम् और म पसौके पससे सस 'तिष्ठवि' परस्मैपदका (मष्टापापी १ ३२२ पो सूत्र से) मारपने पद होकर सम्-विष्ठवे मौर -विठवे, सन्तिम्वे और मावठवे दोनों मस मम से बन गये। ऐसे सम् और दो उपसर्गों द्वारा परस्मैपद 'स्पा' पातु का प्रारमने पढ़ी होकर एक पातु म्पमिचरित (=निपत निपमसे भूए) हो गया। अब इस को उपसर्ग व्यमिपार कावे है। ऐसे पी विरमवि T परमवि T इति • = पर ठहरवा है (यो पियाम करता है ) ॥ पा (इंत्रियों के विषयों से ) हटाता है अर्थात् रम् प्रथम मण का मात्पने पदी धातु है उसमें म विकपर मोर पे मात्मनेपदी वर्मपान काम का मस्प समाने से रमवे (= पर रमवा है) बनवा है परन्तु वि मौर उप सगाने से परस्मैपद हो पाता है। भRKHALER संविप्ठेत मविप्ठेव इत्यादि -हाविप्ले (-पवन के मनुसार पने) मपतिप्ठेत (-पदार) हरपादिक उपमह मेहने । -उपमा (पभिचार) के मेद ।मता एक उपसर्ग स्पाम में दूसरा मिचाच उपसर्ग मामा मी उपसर्ग पमिपार ऐसे दो मर्य उपमरम्यमिवार के। (३) पिरमति उपरमति के मनुवार से सम्माप में मोर मध्य मम्प पावसाम्प में भी इमारी वही समाजोपना जिसको बमने संविप्ने प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में पृष्ठ ५२३, ५० मे दी है। विरमति रपरमति पाश्य चोक वार्षिक में दमको कहा पर नही मिले मवा परतोल वारिक कार मी विप्ठत स्थान पर भवतिप्ठने कहमा भोर विरमठि जगह पर परमति नाना उपमा म्पमिषार मानते है स्पा के राजाजी परिप्पणो महीं है (देखो लोकपा. पप २) यहाँ वधा सतिप्ठते भविष्यते इति पर उन्म जिसका भनुपाद मनु गा महायप मे सर्प पृष्ठ ४०० पर "तथा सतिष्ठव की जगह पर मतिमते बाहना उपमर मिवार ऐसा किया है। (4) रमुआयामित्यमारमनेपदोपहा । पारिम्पो म । उपाष । मापायी प्रथमाध्याये वतीयापापे पूर्व पनि म्यामिवारपत्र । पारप र २५ ग्पात् ।१२।६ चैनेन्द पाकरणम् (ति प्यभिषारोऽपि : देवदामुपरमति । मु-कोरापाम् इति मत मारमनेपर-उपप्रह -रम् (भ्यादि प्रथमगण) पातु से बीड़ा (म) में पहा मारममेपद का मोरना होता वि-माज-परिम्पो प उपा मार्ग -(प) वि-मार-परि मोर (-1) अप (उपयों) से भागे रम् धामु पये पर ASKA एव्यनिवासी अमापसाय पीसकत पदच्छेद और निमस्पर्ष सहित सार्यसिरिका सम्पादी मनुपाद । अम्पाप १ वा ३३ पातमादि प्रयपगर (गर) परस्मैक्या है। इस धातु कप पहुपा प्रयोगों प्रथमपुरुष, एकपवन, परस्मैपर) पर्वमानसी क्रिया का 'वि' मस्पप मोरहर विष्ठदि बन मावा मारबारमा मशम्पापी -मराम्यापी के अध्याप अपम, पादवीन, सूनबाईससे दो ऐसे (पर) म्पमिचार-समोर -प्पमिचाररूप र मपद एक मियत नियम से एयरने वाला सादे माषार्य स्पा' धातु से मियमकरि परस्मैपदमा प्रयोग होता है उस निपम को इस पूष मे रह पातु फे प्रथम सम्-मय-म-विरपसर्ग साकर पाट दिया और मारमने पर का प्रयोग नियुद्ध किया। इसी प्रकार) उम्-मि-मप-पात् स्या३ (मात्मने पदम् ) -सम-वि-मप पूर्पक स्पा' पातु परै मारमने पद मेन पावरपम् १-१-२१ -मनेन्द्र म्यावरण के प्रथम मध्याय दितीय पाद, एकोसळ सर से हो रवि ममिवार-सूत्रम् । =ऐसे पह (मी) नियत निपम को पटरने वाग (-म्पमिचाररूप) सूत्र (1) “संविएते प्रतिमते विरामस्नुपरमत्युत्तर पमिधार" (पपातिक पूछ ६८ )परम्पमिधा संविश्वे प्रति विमति ग्पमति रस पी पाठ सर्यिसिदिम मातमै 'वि' भषिक सो पाद प्रण रेसिपे है इसका कोई मर्प विशेपर से बहरीसका मय (4. पनामाम दुनी के मनुवार पठ १५ में ऐसे कि मरविष्ठ की स्थान में प्रतिप्यते कई तथा रिमविस्थान में ग्परमतिको सो उपमा पहिरो उपसण म्पमिवार। इस अनुवाद से मका पह पमिप्रापबान पवारियमग किया साप पोसने में कोई मनुष्य जोड़ता है वा गाता है वो अब नहीं उगाता है माय उपसा जाता है मर्यात् महा सम् उपसा माना चाहिये महा म स्पर्ण सणवारे मोर रम पातु के साथ भी यहां पि उपसग पाना चाहिये पहा उपरपसर्ग गता है ऐसे पक उपसर्ग के स्थान पूसरा मिना उपसर्गाने पारप उपसर्ग पमिवारा पा रपसगे सम्हालीप पण मा पिसी प्रकार का गम ख मनुपावक ने परस्मैपर मोर मारमनेपद सम्बन्ध में नहीं किया । माग पारकगण विचार। इसी प्रचार सविठले पदविष्यते इति' (सवाडावपातिक पूप का अनुवाद प० गमावर मी ने पुष्प में पद दिया। कि विपकी सगा परवधिमकाना स्पारम्पमिवार तिवारविष्ठेतेत्याचुपप्रहमेक बरकाको बार्शिका SPLEOUCSGLISA एटानियासी बगरूफ्सहाप कीकृत पदच्छेद और विमात्य सहित सर्विसिदिका शमा दिदी अनुवाद । अध्याय १ ३३, अत. समान सिंग समान वचन समान साधनादि पदों का ही आपस में सबंध होता है । इस बावका मापक सदनय है इम सांप का अपरजी की पनिका मुद्रित पृष्ठ २०५, इस्वनिषित पर ५ का पूर्ण लेख शदशा ऐसे है बरि कारकम्पभिचार सेबपर्वतमधिपसति सेना पर्वतके समीप बसोपेमा माघारले सो सप्तमी विमपि चाहिये, दाहितीया कही। वाते पारम्पमिमार भषा या मकार पपहारमय ताहि मायाय माने है। जाते मान्य मर्पक अम्म मर्यकरि संधि होप माही। जो अन्य मर्पक मापसे संबंध होग, वा भरन पर होप गाय पर महत हाप जाय । वात पैसा मिंग भाविकोप वैसाही म्याप है।हां कई कामोफ विप वया शाम विष पिरोप माम । गाई कहिये विराम मावै तौ भावो, हां वो पधार्यस्थम्प षिवा रप है। मौपपी पगीकम मनुमारगेनोनी॥ अपर केस में बाह्यम्पसे 'शाहि शमपरकम्पमिवार को मोर संकेत करन वाण मानकर काम है किसाहि मर्यात् विस कारक पमिषार को कर मर्य आदि या प्रकार प्यपहारनप है तिम (कारकम्यमिवार) को मम्याप मानस मर्यके समर्थन में हमारे एक मित्र मर्यप्रकाशिन पृष्ठ ८५ रे इस पाप का कि"ऐसेही उपमर्ग म्पभिषारकू म्यवहारमय अग्राय माने रे हमारे समक्ष रखते और करते है कि.अपदजीने परकम्पमिषार मदमें कहा है मोर पं० महाससजीने उपसर्गम्पमिवारका वर्णन मतमें किया है इसलिये ६० जपचदमी मे ताहि (-विसको) का अर्थ परकम्पमिषार सिपाहै और मर्यप्रगशिम्न में उपमर्गम्पमिपार ग्यिा है इससे को मंवर भी पड़ता है। और परमीपते विमाप मी ठीक इस हेतु स कि 'कारमभिधार को लौर उपौम्पमिधार को अर्थात् 'सना पर्वतमधिवसति' 'मन्तिम प्रतिर' विमति उपरमति हल पाक्यों को दोयल्प पाना, म्पमिवार इनका नाम रखना पपहारनपके मनुहम वामपेसासे सम्पाय १ मतमोर पेसे प्रपोप व्यवहार में तो बाते ही है। (उचर) मर्यकाशिपके पृष्ठ ५ में म्याप शम्बके स्थान मन्याय शम्प अशुस मुद्रिव होगा। सदासुखजी शुम पाठ ऐसे है कि पुरि मारमन पदी परस्मपद मपा पेसेहो उपमर्गपमिचारई मबहार नप म्याप माने हैवथापि शम्दमयका पदी विषय है। वRH या कि मारमने पद पातु में उपमर्ग लग जाने से प्रपागमें परस्मैपर पातु होमाती है और परस्मैपद पातुमें उपसर्ग मा जाने से प्रारमने परी (पातु) से जाती है इमको पाकरण, नोक प्रयोग पबहारनय पाप मानते है ने भी शम्दनयमा रही विषय है कि इन सब प्रयोगोंको जागपहार में प्रचरितारम्पमिपरित या पूपित मान । अता मात्र काम ठोस माहीं है। उपर्यु कारकम्यमिधार भौर उपसाम्यभिचार बारमप की अपेमासे मयुका अन्याय को मापकी पर पारपा ठीक नहीं । पाम पे समिधार म्याकरपके अनुच्छ और पपहार मगरे मनुफा है इनसे प्यवहार परवा है पर एणमय मका पिव मामती है।'

पठानिवासी बमस्मसहाय लीलात परवेद और पिमक्यप सहित सर्गसिदिका शमन्स हिंदी अनुपाद । अध्याय १ पुत्र ३३ एवम्प्रकार व्यवहारनयमन्याय्य मन्यते । मन्यार्थस्यायन सम्यन्धाभावात् -RRis । परम्पकारम् । = इसमकार (शम नप या शन्द नय का अनुयायी वा शन्द नपका मानने माला) सार नपस् ।' मन्पायम्' मन्पते T =म्पारनयको भन्याय अनुपिद को न्यायवस्भूिन मानता सम्प-अर्यस्म पम्प भवन सम्प-प्रमागतू = क्योंकि भिम पाय सापन पदार्य से सयोग या मेव न हो सकता है [पा सिदति सिदि वाव 1] ॥ मागाय को व्यभिचार मोर इस मार के और भी म्यभिचारों को व्यवारनपवो ठीक सपनवार यस नप की अपेक्षा से पैसे प्रयोग किये ना सतर पाकरण मी ती प्रयोग के अनुसार सिदि परतारे परतु सम्म नप की ममानवा से ये प्रयोग ठीक नदि नय उनको अम्पाय पा भयुक्तरूप माना ॥ फ्योंकि यदि मन्य पदार्थ का बम्प पदार्थ के साथ समाप हो माप वो घट का पट रो माय फ्ट का यह माय वा पठो पाप इत्यादि । [पस्मैपदम् ]] - परस्मैपर हो [३, ४ सो मे ७८ का सूत्र से परस्मैपदम् भनुपर्राता है] जयप्पानी अपम-भपापे खोप पारे -भशाप्यापी के पहिले मापाप में तीसरे पाप में पोपा सत्र है विपमिचार से -ऐसे दोनों सूत्र[-सूत्र] भ्पमिपारप[-नियत नियम के विरोपा] विरमा । स ( मा परस्मैपदम् ) -पि-भार-परि(-2) रप ( उपसगों) पूर्वक रम् पातु से परस्मैपद हो जैनेन्द्र म्याकरण प्रघमामा वतीय पादे । १५ -अमेन्द्रम्पारण पहिने भण्यायो तीसरे पाद में ३५ षां पारति पमिचार ऽपि वा (सूज) है। ऐसे दोनों सत्र मी -ऽपि) प्यमिधार रूप। ऐक्यचम् परमति -देपपत्तो हावापत् देषवरको (विषयों से पाकिसी ऐसी ही वस्तु से) रोक्तालाप परस्मैपर किया तुम में है। उपरमति के समय मय देती है। या एक प्रचार का क्रिया का उदाहरण है शिप्तमें सुपीतक प्रत्यपपिच (१ का प्रमाव सम्मिमियो। (0 इस परम्भर प्यपहारनयम् मन्याप्प मन्यते" पाक्प का पय स्पर परतुरमों पर रिप्पणी इस गिये जिमनी परती। साप सिदिमितीप सरबरे एपम्प्रचार प्यपदारनय म्याय मम्प नह पर समालोचना क पपपि मपमावृत्ति में 'एवम्मकार प्पहारनपमम्पाप्प मम्पवे ऐसा पाठ पर्समम प.पवादमी ने पष्ठ २५ में इस वाक्य की यह पनिका कोकि "पा प्रकार म्पहार पtar मापाप माने है.-पा पार पहारमप (तिस (भाजप)को नामाप माने (पल) बौन मन्माप मान है? (पर) सम्ममप पा समनका नमुपापी मानी।

DRY - एटानिवासी बगरूपसबाप पकीसकृत पपच्छेद मोर विमात्पर्य सहित सपिसिद्धिका हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३३, अत' समान लिंग समान पचन समान साफ्नादि शब्दों का ही बाफ्स में संबंध होता है । इस पावका झापक शम्वनय हे इस संबंध पं० अपर्चर जी की पवनिम मुद्रिव पृष्ठ २०५, हस्तमिसित पृष्ट ५ पूर्ण स शप्पशा ऐसे रे"एरिपरकम्पमियार समपर्वतमपिवसति सैया पर्वतके समीप पसऐमा माघार सो ससमी विमति पारिये, दावितीया परी। वापरकम्पमिवार भया का प्रचार पबहारमपी ताहि अन्याय माने है। जाते सम्प मर्या मम्प मर्यकरि सम हाय माही। शोभाय अर्थका मापते संबंध होग, ता परन पर रोप शाप क्ट महल बाय साप । ताते जैसा मिंग आदि होय देसाही म्याप है। कोई बोप विप तथा शाम विप पिरोप माग्म । चाहे काहिये विराप आवे तो भावो, इहो तो पयार्थवष्य विधा रये है। मौषधी रोगीय मनुमारको मा॥ पर के सेल में वापसे 'सार' शम्म कारकम्यभिचार को मोर संकेत करने पाम मानकर काम है हिवाहि अर्थात् विस कारक प्पमिपार हो तब मर्य आकिया प्रकार प्यपहारनप है तिम(परकम्पमिवार ) को मन्याय मास अर्थ ममर्थनमें हमारे एक मित्र मप्रमधिय पृष्ठ ८५ रेस वाफ्प का कि “ऐचडी वपन भ्यभिचार म्यवहारमय अपाय माने है हमारे ममस रसते. मौर करते है कि.अपदवीने परफम्पमिषार मम पदारे मोर पं० मवासुखजीने उपौम्यभिचारका वर्णन मठमें किया सरिये ५० अयचंद जी मे तारि(-तिसको) का अर्थ कारकप्पमिधार लिया है और अर्यप्रकाशिमा में उपसर्गम्यमिधार लिया है इससे को मंवर मी पड़ता है। मोर पहमीदवे किमाष मी ठीको ससु स कि 'कारक म्यभिचार को मोर उपमर्ग म्यभिचार को अर्थात् सन्य पर्यवषिषसति' 'मन्तिा प्रविएवे विरमति उपरमति न वाक्यों को दोषरूप पना, प्पमिवार इनका नाम रखना पहारनपफे भनुकूल वाजपेमासे अम्पाय हेमपुक और ऐसे प्रपाम म्यवहार में कमाते ही। (उत्तर) मर्यकाशिका पाठ ५ में म्याय शम्बके स्थाममें मन्याय शम्य अशुय मुद्रित होगया है। सदासुखजी शुर पाठ ऐसे है कि "पुरि मारमन पदीर परस्मपप भयो ऐसेहो सपमर्गपमिचारवं अपहार मय म्पाप माने हैवथापि शम्बनयका ही विषय है। वर्य पाएकि मारमने पद पातु में उपसर्ग मग जाने से प्रयोग, परस्मैपद पात होगाती है और परस्मैपद पातुमें उपसर्ग लग जाने से मारमने पदा (पात)ो जाती हमदो प्रय, लोक प्रयाग, पबहारनप पार मनते है वो भी शब्दमका एही विषय है कि इन सब प्रयोगोंको जागार में प्रनलित है पमिधरित या दुफ्ति माने । अवा भाषका कथन ही नहीं है। पर्युक कारकम्पभिचार और उपसम्म्यमिचार परमयी भपेभासे मला मम्पाय को आपकी यह धारणा ठीक नी । परम ये पमिचार म्याकरण मनुकम और प्यपहार मपके अनुपको इमसे म्पयहार घज्यादै परन्तु राममय इनका पूपित मागती है।' . .

पटानिवासी सगासहाय पीलात परछेर और विमपत्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका अन्दशः हिंदी अनुवाद । जापार १ सूत्र ३३ लोकसमयविरोघ इति चेत् । विरुप्यताम् । तत्वमिह मीमास्यते न भेषज्यमातुरेच्छानुवति । सो सम-विरोमाविक वेतन यात पा संसार बोर शासमें यदि (-पेव) ऐसा है सो विरोघ आयेगा ! अर्थात जो प्रयोग व्यवहारनप और व्याकरण के अनुकूल है परंतु मदनपसे षे वृपित हैं उनको यदि दोपस्स मानोगे तो ऐसा मानना संसार और शास्त्र के विरुद होगा। उपरमें करसे कि- निरुपवामा वस्वम् ॥ ० मीमांस्वदेश विरोध किया बाउ । हाम-पपार्वस्वम्म (सस्त्रम्) विचारा गया परीक्षा किया गया? न० मपन्यम् ॥ वारसा-मनुमति क्योंकि औपघि रोगी को इच्छा के अनुसार नहीं होती है मामि हमको कार 'मनारम्य प्रसाद' (मकि म्याप मोबिलिंगो) सिंग ही मिले गत सो रोस की परंतु मपुमक लिंगी माँ मि (बोकाए अमर कोष वर्म । सोका माते माल सह कोष पट २२८ पप्रचन्द्र कोष पष्ठ २४८ पैवसंस्कताल कोप माति-(पाय) या अमरकोप बर्य ३२ सोक ९ इसी सूममें सात माठ स्थानों पर मय शम्ब आया, प० पष्ठ २० वैय३७०) 60 माक्पमें प्रकार प्यारणपम् (-प्यपारम्पको) नोव शिवीया विमदिवा पर्मारक है।। मम् दिगदि चतुर्थ गणका पासु मम्मने पदोपूस पण रिपोत मम्प पुस पकान मारमने पदी पर्वमान किपाका पोठक प्रापप है अतः मम्पते पना अप मानता है पररि प्रयोग बम पीवीन विशेषज्म बिससे बायर्प मिकता है अतः शम्बा म मा कम प्रकार (पह) पहाणपत्रे पाप मामती॥ स्वम इसके विरम दिवीन माति पाठ पर 5 समायाचनारै म पातको दिखाना चाहते हैं कि सार्पसिसि पिके गाने पार पाक्योंकि मर्थका सा पनि समाप वा प्रसंग मिमता है "स प्रकार (शम्बमम) पपहारनपको मम्प्राय मारवार के पानी पाम्पमें इस प्रपम पास्यकारिणीकि मम्प पदार्पा अन्य पदार्यकारि सम्पमही दोमतीमरे वाश्य में इस पर प्रा लिया कि परि शम्दनय पवारणपणे मापाप मानगो वोडोर (म्पबहार) विरोप मौर शान (-समय मर्याद ग्यारप) के विरोध होगा क्योरिपरिप समया, सायन, कारला मोर उपसर्गक संपत्य मा उदाहरण दिये है मौर रनको शमनपकी अपेमपसे म्पमिधार मान्य समस्त ही मोहम्मबहारकी बपेसासे ठीक सन सपशमाह पवहार होता है प्रयोग होता पोसपास, माते है और मारपके नियोक अमुहै। इस गरमें चौपा पाप दिया कि "विश्वाम् माक और शान्तके विषय होमे दो कण चितामही । फिर इस पर मीहेतु सियाबिस स्पान जय (पदार्थक पणार्य स्वरूप) का निर्णय विरुध और पाकरणशाम बामन्य असके विधामापेक्योंकि मौषि बाद मरी-मीक्षारोपनी दोसपी श्यादि हो रोगको पूर ने बाम्बी एण की Son-SC-SCHO SECREA एटानिवासी बगरूपसहाय पीलकृत परम्छेद और विमवत्पर्य सहित स्वार्थसिदिका शम्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १यत्र ३३ पी जामीन किरोगीको रमके अनुकसके समर्थनमें देखो वयवदमीका लेख पिण्मा पठ५३३, गजपातिक मुद्रित पाद सस्था पारा मशित राज्यार्तिक १४ ४८० १८१ पम्पायसनी वा अनुवादि सवातिय मुक्ति पृष्ठ ३१ मा यह समझ महीं आता कि "पषम्प्रकार प्पपक्षारय म्यारय मापते स पापया ऐसा किम सारण मनुभाव परे किमो शम्दाय हो और विमत्यय मस्ति दो और पूत्तिके उपयुक्त पार पापोंसे संघ मी कर जाप मोर साप ही साप रितीयावृश्चिक संपावक की 'अम पतप्तीति प माप: पतन्तीति म्हारी मापते परिप्पणी मी मनुहम रोजाय पपपि यह रिप्पणी मासिरके प्रथम संसारम में मही है और पति पाउमें भी "या" के स्थान प्रयम मासिने "मम्पाय। गर्युव पाय मार्य मोर पिमतप अनुपाए पाकिस प्रकार (पह) म्यपहारमयका न्याय पापित मानताकोम और फिस प्रभार पहारनएको ग्राप मानता है। पेशावरण 'सन्दिर, मसियते, पिरमति परमति, ऐसे प्रयागों को जो भोक प्यपहार में मी भाते है प्पाप मोर पवहारनपी मपेक्षा पाय मानवा परि या मर्प लिया जाये तो सार्य सरि तिरे भी दो से पांच सस्या तो पापोप सर्वप उपर्युव मनुपावसे मेल नहीं जाता है। इसलिये हमारी ममास में प्रथमासिका पाठ ठीक मौर शुभ है द्वितीय संस्करणमें पर्य 'अम्पारण गप्प स्थानमें 'स्पाग्यम्' पर दिया है। उपर्युक पूर्ण रिपणी का अनुपाद पहरि- () म पततीति पण मापा पतम्तीवि पपहारो नापते पापमोचर खामिपाया प्रत्ययापनिवधर्म वस्तुतो निरपंपमेय, बतुलस्य असे सम्बयापोगाद । तपापि शप्पानुशासन घाममहिम्ना पात्याचपयसममिग्पाहार तम्यएवमयति सम्पति वियप आप पततिर ति -पामो गिरतास प्रकार आने पर माप (एत से सस) गियो पसा पहा । जापते मत्रमशमोत्तर स्वामिफाप- -पवार होता है। सहा नप यम्य फे मार्ग पावावाचक मपय उपमिापन परतुवा मिस्र्याएको-पय कामगामा यथार्थवावा यथार्थमासे अपर इतनी है क्योंकि जमविणे गुत्पस ॥ अम्बप-मपागात तणपिशव्यानुशासन -त्वका समन्ध पा मा मयुखाने मी म्याकरण (-शम अनुशासन) शामहिम्मा पारवाचक प्रस्पयमममिम्पपान -शाम प्रभाषसे एवधन याची प्रत्ययका संस्प (अर्थात् प्रयोग) कम्पपप भपति T -परना ही होता ASANSOLA - . एंटानिवासी नगरपसवाय कोलकृत पदपछेद बौर विमपर्य सहित सर्विसिद्रिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३३, नानार्थसमभिरोहणात् समभिरूढः। नाना-अर्थ-सममिरोहमात् ॥ सममिस्वा बहुत मिस एफ अर्थको प्राप्त होनेसे ( सममिरोहणात्) सममिस्ट है (१) समभिनयी उपर्यु परिमाया तपा तत्वार्य राजवातिकमें दीपरिमा। पानोपाठ शमशा एक है। सम-भमि-अपात्-राहम (पुष्पक पर्वच पदास (म०) पाना, उपमा (पप्रयाका ४३.५, पैवकोश पृष्ठ६१६)में है,यहाँपर मधुमक सिंगौ माया है। (मममिरामात- नानार्यसममिरोहणात् ' म वाक्य का अनुसार मानाअम्ममतारपैकमर्थम् ला" पेसा पाप है (प्रम) 'मातीपणाकरि, पर ऐसा मनुषाद सममिरोहणात् वाक्यका रेसा (उत्तर) पापिनीय मणप्याची प्रथम भम्याप चतुर्पपादके एम्तीमय भुषा प्रमका भुगा सुः प्रमव' अपावानम्-मपादामकी भनुति चोपोमा मोर पर्नुको तीसस्त्रिस मी? -मूहोना, पातु धि दो प्रमय (पत्तिरपान) यह परक अपाबाम समक हो । जैसे हिमवता गङ्गा प्रमपति-हिमाम्स (पर्वत,से गंजी निकमतीहै। के मीचे निम्न ग्लेशित वार्तिक दी है उसके निमित्से 'उपर ऐसा मनुवाद मा॥ सपोपे फमम्पधिकरपेच स्पनोपे धमणि अधिकरणे व पल्बमी विमतिपम्पिांची विमक (पप्रपप) गर्म (घर) मौर (म) गपिकरण कारको सचित करने का निर्देश करने में माता है कि स्पफन्त (सभ्य, मम्स) संपग्धक सबा मूवलम्व का दिको पृष्ठ १६) अर्थात् पा समापसपक भूतायव प जिमके मम्वमें प हो (जैसे अनुमूग) खोप किया जाये जैसे प्रासावम् मापन प्रेक्षत (रायभवनको पै) पर देवता मावाद प्रेसते राजभषमसे देखता॥ मधिकरण हवाारण, मामने उपविषय प्रेसवे (बासापर प्रवेश हाकर देना मामला प्रेक्षते मासनस देखता है। (स) मारके ममम ग्वादरणमें 'प्रासादम्' र्मकारक सूपित करनेमें उसी शम्य प्रसाद को मपादान कारक खाये है से "मानार्याम्ममतीत्येक मर्यम्मभिमुस्व मामममिमा विमा पाक्पमें सममिरोहण "म्पको कर्मचारफर्म नही माये समिप मपापापीका पार्तिक लागू नहीं है। (स्तर पृध्यपाद स्वामीने मागसममितापात् ' इसके समता ही मारपमें तात्पर्य दे दिया है। पर्युपातिकके अनुइस विमह इस प्रकार हो मका ? मानापमममिणणम् समीप सममिसमानार्थमममिराहमा सममिमा मात् नाना मपकी प्राप्तिका (मममिराहणन् ) पा मापको ( सममिरोपम् ) गईयर (समतीप) पा छाहार (समतीत्य) एक ही मर्यमें सही (सममिल) पदी ममें प्रसव हो (सममिमा सो नलामममिरोहणात् सममिर। इसलिये 'प्रामादम् माया प्रेमते-प्रामापात प्रेसते' मर्यात् प्रासावर भाष्य स्थानमें प्रमादात् पंचमी विमति राई इसी प्रधर नामासममिराहणम् ममतीस्प सममिला मायके मामार्पसममिणणम् ममतरिक स्थानमें पालासममिराहप्प पंचमी विमणि रोपई मता रखमाविक मोर रसधर्मारप्रसारण सर्व प्रसारसे कार रोपणा॥

एटानिवासी बगरूपसहाय पीसकृत पदच्छेद और विमवत्पर्य सहित सर्विसिद्धिका सम्मका हिंदी अनुवाद । वप्पाप १ १ ३३ यतो नानार्यान्समतीत्येकमर्थमाभिमुस्येन रूढ. समभिरूद्ध ॥ गोरित्यय शब्दो वागादिषु अपु वर्तमान पशावभिरूढः। अथवा अर्थगत्यर्थ शब्दप्रयोग । तत्रैकस्यार्यस्येन गतार्थत्वात्पर्यायशब्दप्रयोगोऽनयेक.॥शब्द भेदभेदस्ति अर्थभदेनाप्यवश्य भवितव्यम् पता नानानि सम्-अतीत्य-एकम्प मर्थम् । (अर्थात) जहो (म्पतः) अनेक वर्षों को उठपन करि एक अर्थ को (अर्ष में) अमिमुस्पेन । समासममिरुना। प्रधानवा से (अभिमुस्मन) रुडो प्रसिद्ध से सो सममिरूड है ।। (इसलिय सम्दक अनक अमिंस एकवी अर्थका जो जाने या कदे सो समनिस्टनप है) गौमा इतिक अपम् । सदा पाग् मादिपु गो एसा यह पद वपन (पयियी, पानी, गमन, वारे, आकार, हीरा, फिरण) मादि मध। पर्वमानः । पछौ । मभिरुवा ।। अमि विधमान है (ोमी) चोपाय (अर्थ) में अति प्रसिद्ध (भि-रून) है अदि गो लनामा पमुफ अर्थ में पलन फिर मापस पैठच ठप सा पीछे, अफठत, अगत इत्यादि सब अवस्थामोम ग्रहण किया जाता है ।। मना सन्दप्रयोगा। अर्धगति या शम्दाका प्रयोग किया जाता)ह सा अर्थशान (अवगतिक या अर्धप्राप्ति (मर्षगति) के वर्ष व एकस्म । वर्षस्य ॥ एकेन । लिय (1) है । वहां एक अर्थका एक (सम्दक प्रपोग) से गतायेत्या ! पर्याय अभिप्राय सिद्ध जानेस (वार्थत्वाव-गवार्थपणास) (इसर) समानार्थ बोधक पदप्रयोगः ।। अनर्थका सम्दका अनुष्ठान, या काममें लाना निष्प्रयोजन है माया गुम्दाका जो प्रयाग किया जाता है यह अर्थशानक लिये किया जाता है यदि यह अर्थमान एकही पदके प्रयोगसे सिद्ध सजाय तो फिर दूसरे पपाप शन्दका करना व्यर्थ है पदमेदमा पेद अस्तिT अर्थमेदेन । अपिक (प्रश्न) जो (च) भन्द भेद है तो ? (उच्चर) अर्धमेद (सदित) मी मनस्यम् । मक्तिव्यम् अपत्य होना चाहिये । उपयुक्त प्रश्नोचरका तात्पर्य यह है कि यदि यह (1) समतापापा सांसपक महन्त । (२) ममिमुस्पेन-यनिंग मोर नपुसकरिगवानों में मिकता है। OROREA SPESALA . एंटानिवासी बगरूपसहान पत्रीलकृत पदच्छेद बौर विमत्पर्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्वचा हिंदी अनुवाद । अध्याय १ सूत्र ३३, नानार्थसमभिरोहणात् समभिरूढः। नाना-म-सममिरोहनात् । सममिका बहुत बर्मिसे एक अर्थको प्राप्त होनेसे (=सममिरोहणात) सममित है (१) सममिम्मपत्री उपर्युत परिमापा तथा तत्वार्य सवातिकमें कोई परिभान पामोभ पाठ शमशा एक है। सम-ममि रोरणात् रावण (पुष्पक पर्वत-पस (म०) पड़ना, उगना (पप्रचाका पठायेपकोरा पृष्ठ६१५)में है,यहाँपर नपुमक लिंगमें आया है। (२) मममिराहपात्- 'नार्पसममिरोहणात्' इस वाफ्य का मनुषाद भानासम्ममतीपैकमर्थम् सा ऐसा पाक्य है। (a) 'मातीपस्योरपरि, रघरि ऐसा अनुवाद समभिराइप्ात् पापका सार (उत्तर) पापिनीय मशम्यापीके प्रथम अभ्याय पतुर्पपावके इस्तीमर्थ पुष भुषा प्रमका मुवा प्रमव' अपादानम्-मपादामकी मनुचि पोपोमा और पर्नुपी तीस सूत्रस मी भू-दोना, पातु धि जो प्रमर (पत्तिस्थान ) पह परक अपादाम ससक हो । मे हिमवता गला प्रमपति हिमाम्प (पर्वत, गंगाजी निकलती है । के नीचे मिन ग्लेखित वार्तिक दी हैग्सके निमिचसे 'रसंचार पेसा मनुवाद एमा॥ स्वप्पोपे कमम्पधिकरणे घ स्पानोपे धर्मणि पिकरणे च पञ्चमी चिमतिर्मनाहि पापी विमक (पप्रफ्य) गर्म (परक) मौर (4) अपिहरण परको सूचित करने का मिर्देश करमेमें माता सकि स्पपम्त (पप्प, अम्त) सापक सचा मनवन्त का विमो पृष्ठ (६) मर्यात् पर संसपहपक भूतम्यम्त का जिमके मम्तमें प हो (जैसे अनुभूप) गोप किया जावे जैसे प्रासादम् माम्य प्रेसते (पबमबमका (पे) पाकर देवता मावात प्रेसतेराजमवनसे देखता ॥ अधिकरणम हवारण, आमने उपविषय नेसते (मासनपा प्रवेश होकर देवबमासमात् प्रेस आसनस देना है। (म) कपरके प्रम गदाहरणमें 'प्रसाद'मकारको सूचित करनेमें उसी शम्द पसाद को मपावान कारक लाय है से "भानाम्ममतीत्यैक मर्पम्पमिमुम्पेन सा सममिमा विमह पायमें सममिरोहण इपको मघरकर्म नही माये सठिय मप्टापायीका पार्तिक मागू नहीं है। (ग्तर पृभ्यपाद स्वामीने मागसममिरापात् ' इमरे भगता ही पायम वापर्य दे दियो। उपर्युकबार्तिको मनुहम विप्रह इस प्रकार से मार मानापमममिरवणम् समीप सममिला'मानापमममिराहमान सभिसामर्थात् माता भपकी प्राप्तिका (मममिराहणम्) रामाणका (सममिणम्) गांपाकर (समतीस्प) पार (सम्तीत्य) एक ही अर्थमें सो (सममिक) एकरी ममें प्रसर (सममिमा सो मानार्यसमिरोहणात् सममिकर|इसलिये प्रामाधम भारम प्रेसते-पामादात प्रेसते मर्यात् प्रासापर भावारे स्थानमें साम्प्रदात्' पंचमी विमति हो या इसी पर मानार्थसममिराहणम् समतोप सममिमा पापक मानापमममियामम् ममत' स्थानमें नामार्यमममिररहणात् पंचमी विमधिदरोगा भता रातिकमोर समर्मपरप्रसारण समरसे कागऐपया॥

HABAD-Ca एटानिवासी अगस्पसहाय मीमत परछेद वोर विमस्त्यर्व सहित सर्वार्थ सिदिका शप्पशा हिंदी अनुवाद । अमाप १ सय ३३, अथवा यो यत्राभिरूढः स तत्र समेत्याभिमुख्येनारोहणात्समभिरूढः । यथा व भवानास्ते । आत्मनीति । कुत । वस्त्वन्तरे वृत्यभावात् ॥ यद्यन्यस्यान्यत्र वृत्ति स्यात्, ज्ञानादीना रूपादीना चाकाशे वृत्तिःस्यात्॥६॥ येनात्मना भूतस्तेनैवाध्यवसाययतीति एवम्मूतः ॥ अपवार या।। यत्र अमिटा सा पत्र अभिमुस्पेन। -अश्या मो जहाँ (-पत्र) अमिरूद है पा प्राप्त है सो तदा प्रधानतासे भारोहणाव समेति । (सम-एति) प्राप्तहोकरि (आरोदमास) पसता है ( समेति) क्तता है (समेति) रहता सममिलामा पा०० मवान्। वास्त आत्मनि। (तिससे) सममिरूद है। जैसे करो आप तिष्ठते हैं ? आत्मामें (विष्ठता ) इति० सम्म १० -ऐसे (सममिस्त) है। (प्रश्न) क्योंकर (आस्मामें वा निजरूपमें सिएते हो) पस्तु-अन्दरे पति-अमावाद। =(उचर) अन्य वस्तुमें प्रधिका वा स्थितिका अमावसे अर्थात् मिस वस्तुका मिल वस्तुमै ठारना नहीं होसकता है। प्रधानतासे आस्माका राना आत्मामें ही है इसरे पदापोंमें उसका रहना नहीं हो सकता है (और) पदिक वन्यस्म ॥ अन्यत्र पचि ॥ स्यावा बो (यदि) अन्य (पदार्य) का अन्य स्थानयि स्थिति वा प्रवृधि या रहना मानादीनाम् । स्पादीनाम् ।। १० तो धानादिकोंका (जो आत्मगुण है) और रूपादिकोंफा (जो पुद्गलके गुण है) माका पिस्पात T आकाश्में प्रचि या स्थिति या प्रतना वा रहना होजाय(सो आकाशमें है नहीं) () येन । मास्मना ।। मूतः ।। -विस स्वरूपकरि (अर्यात् अर्थ मियासे कोई पदार्थ परिणत) हो वेन । एर अध्यवसायमविर -उसकी (म्वरूप मर्य क्रिया परिपाम) से निषय कराता है पा प्रतीति करावा इतिक एवम्मुता। -ऐसा एवम्मत (नय) है। (एवमूतः मी ठीक है देखो टिप्पणी पृष्ठ ५४०,५४१) (इसी एवंमत की परिमापाका माष इसके लगतापी पाफ्यमें दिया है देखो पृष्ठ ५४२) (१) समेविसमपति '' मदादि सोमण परमपम धातु पहाँ जामा अर्थमें भाया है। 'सि' फत् सार प्रत्यफे (देखा पृष्ठ ५२२, ५२३) पहिसे ।' पातुको गुनसंसा होकर जाता है । मिति' प्रथम पुरुष एक वचन परस्मपय पर्वमा ' फासका प्रण जारनेस पति-पन जाताई पसमें 'सर उपसग पगाने से (मसपति) समेधि कम साता समेति यह साथ साप पवाद मर्यात् मारमा मारमा पा है पसवारे तिष्ठता (१) पूषपाद स्वामी की मी एवंमूलनपती परिमापाको प्रमाण पलार्य प्रमाविक एपिवाने मान को दिखो प० दिख ८) SCORR पटानिवासी वास्फ्सहायवकीस्कृत पदच्छेद गौर विमपर्व सहित सर्वार्थसिदिफा शब्दशा हिंदीअनुवाद अध्याय १ सन २३ इति नानार्यममभिरोहणात्समभिरूढ ॥ इन्दनादिन्द्र शक्नाच्छक पर्दारणात्पुरन्दर इत्येव सर्वत्र ॥ या जाय कि एक मर्य के प्रतिपादन करने वाले अनेक शब्द मी होते है इसलिये अर्थ एफ ही रहता है परंतु शब्द मेर यहाँ रहता। उसका उचर यह है कि यदि शब्द मेद होगा हो अर्थ येद मी नियम से होगा क्योंकि जितने पद मेद में उतने ही उनके अर्थ है या नियम है। उक्तंच'-"बित्तिय मिचा सदा तिचिय मिचाणि होति परमस्या" याफ्न्माषाः पदाः तान्मासाः परमार्था मनन्ति मितने शम्द होते हैं उतने ही उनके उचित (=परम) अर्थ होते हैं। इति नाना-अर्म-सममिरोहणात् । सममिमः। ऐसे नाना मयों में से एक अर्य को प्राप्त होन से (सममिरोहणात ) सममिल है (और अनेक अर्थोम से एक विशेष गृहोप्त अर्थ को कहन वाला अथवा बानने वाला है सो सममिरूदनय है। वैसे इन्दनाव Im इन्द्रा -परम ऐश्वर्यम्म क्रिमा करन (के हेतु ) से इन्द्र है अर्थात् जम परमेश्वरूप क्रिया करे स्म इन्द्र है। पुर-पारपात समर्परुप प्रर्सने से श्रम है, पुर (नगरादि) के मेदन करने से पुरन्दरा इत्येवम् सर्वत्र =पुरन्दर है। इस प्रकार ही सब स्यामि (माना बाता) है ( ऐसे सममिस्तनप इन अमिसे एक ही अर्थ को ग्रहण करि प्रवर्तती है) माता- यपपि इन्द्र शक पुरंदर वादि पद एक ही संधीपतिमन्द्र अर्थक काने वाले है क्यापि परमैश्वर्यका मोक्का होनेसे इन्द्र सामर्घमान होनेसे शत्र और पुर नगरादिका पिदारन करनेसे पुरंदर इस प्रकार इन मिम मिल छन्दोंक मिम मिम वर्ष है। इस रीतिसे पार्योक अनुसार इन्द्र पदके वनेक अर्थ राते मी वा स इन्द्र (चीपति) अर्थ में ही है और इस सबर्ष को ही सममित नय विषय करवाई यहां पर मह बात समझलेनी चाहिये कि पाहै इन्द्र परमंवयका भोग करे वा न कर किसी मा आस्था रोता मी मा सममिन नपका विषय है। (१ रारत इस पैराको पृष्ठ ३५० में नमकिंगम दिया है इससे मरना पकान मी भाव पोवन होने से नपुंसा मिंग है। प ARE एटा निवासो मगरूपसाप पकीवात पाद और रिभक्त्यर्व सहित सापैसिविका शप्रया हिंदी अनुवाद । अध्याय १ मम०३३ 10000019 QDco ONBIDABOND OOORD OORDON ORBI असे ययानसकर यांसि यह पति पप् नपुसकसिमीका गायन है यहा पर अपवात नका अनुस्वार दामपा । रहुत पश- पांसि मा+छ+स्यते ऽम् पातुके मका अनुस्वार होगया । पारस्पते - वर पकड़ेगा (वर) विजयकांगा जीतेगा। (७) अपसम्म मनुस्वारा-मनुस्वारस्प पयि परतवर्ष FILE - मनुस्वारस्य परसवर्षः यपि-मनुस्यार हे स्थान में परसवश हो पथि (उत अनुस्वार ) परे में यप् प्रत्याहार के मरों में से को भी मात्रै प्रयात् अनुस्वार के पश्चात् में इग्पुर । पनमम । र सपारमा पर। परमम् । यस मद में से मी एक भार पारेका उक मनुरवार के स्थान में परसवर्ण समय सम्पच-स) हो जाने से शामतः पर्श नरवापदान्तस्य मति उपयुक सूप से मका अनुस्वार होकर शांता एसा मा फिर इस सूत्र से परमार त उस तकार प सवय न होकर रास्त रूप बना । ऐसेदो मरिता पुरगया गड़गया । मशिता - पूजाकिया गया भावर किया गया सिकोड़ मिपा गया। इपिटता - प्रतिपात किया पपा गुम्फितः - गूपागया रवागया गांठागया अपवनगपे । शान्ता कार्य शामयुत पा शान्त वाला है कुस्ति-वे परते हैं। पति-वे उत्पन पाने के योग्य है वे सोते हैं। नदोनों राज्यों के न् पहिसे नस्वापदाम्तस्पति ग्छ सग से मनुस्वार में परिवर्तित हो जाते हैं पत्चात् इस सूम से उनके पश्चात् न होने के कारण न् परसवन के मै पसट जाते हैं। (५) पन्त मनुस्वाय- पा परन्तस्य" HERE = (पपातस्प मनुस्यारस्य यपि परसपी) वा इस सूत्र में अट्ठावन सूत्रकी अनुपसि माती है। पाचस्प अनुस्वारस्य परसपका पायपि = पशत भनस्वारका परसपर्ण विकासे हो (चाई परसपरो मनम पाई मतको) पपि ( उस पवम्त अनस्वार) पश्चात् ऊपर कहे पे २६ प्पजनों में से कोई एक प्यंजन भाये तो जैसे त्वम् बयपि यो मोऽनुस्वार' सूत्र से म्ो भनस्वार किया तो व रोपि बना फिर अब सवय हुमा तो स्वास्पपिरता है। ऐसा रूप पमा नहीं तो त्व बरोपि रूपही पमा । ऐसेही वम चिनोपि से त्वचिनीपि पापा फिर वशिनोपि पबमा नही त्वं चिनोपि हा बुनता है।) लम् रीयसेतू शताहै, त्वरीयसे फिर पा पदातस्प से त्व पीय से रुप बना नही पायेगका मारमने पदी अकर्मक पातु है।त्पम् परिश्ता परित है) व परिता 'मोऽमुस्वार से हम फिर वा परस्तस्य' से त्वम्पपिडका रुप बना नहीं तो त्वं पक्षिरता दी, उप रहा () त्वम् पलाइका (दू पनवान है) मोऽनुस्वार सून सेव पनामा पशुमा मा पा पदान्तस्य" द्वारा त्यापनाइया रुप बना नहीं त्वं धनाया। (Od कर्य चित्रपप रापमान ममा स्वं पुरुषोऽवपोत्तर पवित्र पक्षपापमानन ममा स्थम्पुरषाऽपपीत् । माकम्प मेममा स्य) उड़ते हुये (अपमान ) रस (Sa) चित्र विचित्र पर पास पपेरमो (विध पक्ष ) पुस्प मे देसे मारा (= अवधीद ) म BIRDOIEDOCIRC एटानिषासी अंगस्पसहाय पीलम्स पदच्छेद और विमक्त्पर्य सहित सर्वार्थसिद्धिका शदशा हिंदी अनुवाद | अन्याय १ मत्र ३३, इस बात पर हम एक पूर्ण टिप्पणी सिखते है कि पराम्त सम् भौर मपदान्त म् न् की अवस्था में क्या क्या परपर्तन हाते हैं और दोनों प्रसार मनुस्वार पदाम्त मौर भएदात में क्या क्या परिवर्तन होते है (1) क्वान्त प्-मोऽनुस्वारः (प्रपाम्पापो - । ३ । २३) इस सूत्रमें 'पदस्य की मनुत्ति अष्टाध्यायी भापाय पार १ सूत्र १५ (परस्प) से मौर रवि भावकी अनुपत्ति पनि सर्वेपाम्' ८।३। २सूत्रसे छीगा इसलिये 'मोऽनुस्वार (-पदस्य ' मा अनुस्वार पनि) पमय मागत पदको मनुस्वार हो पदि कोई हम (अर्थात् मंजन) फमात् म हो तो (ऐसा होता है। जैसे हरिम् पम्दे में म् पदान्त है और जन पसात में है इसलिये हरि पन्देहमा पेसेती पबरमता में म् पदाम्त है स उसके पीछे भ्यंजन । अतः एवंभूतः गया इसलिये एवम्भूत मोर पर्षमूत दोनों स्प ठीक (इस सूत्रकी पिम्प प्यास्या के लिये देखो पृष्ट ५, ६॥ 'गम्पते । पह गया है) यहाँ म मपवान्त है इससे मनुस्सारममा ॥ (२) पदाम्व म्-अन्तका र सब उसके पश्चात् प-ए-पद- मायै तौ (पहम् ) अनुस्वार और पिमर्ग में परुट साता है जैसे विराणाम् वामपति पुरम (या मनुष्य विलियों को मारता है) =विरागे तारयति पुरुषा मा पह विमर्ग निभ ग्लेखित नियमस म् में परिवर्तित माता है या पियस्तिरयति पुस्य ऐमा दमा (नियमा-विसग के पश्चात् परि महाकौश में परि तप हो ता स् में पवि हो तोप में यह विसर्ग पर जया) (३) आपदाम्त म्॥ नम्बाहाम्तस्य सपि यह भष्टाम्पापी के आउषा मप्यार का तीसर पारका चोवीसपा पुत्र है -३-२४ । इम से परिक सत्र 'मोऽमुस्यार उपयुज सेमिया । इससे मनुस्वार की मनुत्ति चौबीसा सूत्र में माती है तब चौबीसवा सूत्रा रूप इस प्रकार होता है कि बाप अपदाम्तस्प साप (अनसार) से सवा सूत्र के मा (-म.) का आकर्षण होता है इमठिय पेमा पहुना कि 'मामपण्वस्म परि अनुस्वार हरि प्रस्पाहारी मौर रसमें सलूके मध्यके मसर मरित सर्व माजा मात्र प्रश्न । ए-दापार पस-स् । पाम् ह । 'समि' का मर्यो लौबीस ममरो पहिऐ आने पापा । अपवान्त-विमति पा कारक जिसके मंतमें नहो। सूत्र का अर्थ यह मा अपात न अपना भपदान्त सरे स्थान में मनुस्पार हो पदि म् अपणम् पूर्वोचौबीम मसरों में से किसी मसर के परि हो इसरिये मम्तरापम् का मनुस्त्यार होबर मतराप गया और मे' का 'पदे होगया क्योंकि दोवों के म् के फबात कमसे दो।

HOOTOCHROOM पदा निपासी नगम्पसहाय कील व पदग्वेद मौर विमस्पर्य सहित ससिदिका शमशाहिंदी अनुवाद । अभ्यापरस्त्र३३ न स्थितो न शयित इति । अथवा येनात्मनायेन ज्ञानेन भूत परिणतस्तेनैवाध्यवसाययति। यथेन्द्राग्निज्ञानपरिणत मात्मैवेन्द्रोऽग्निधेति ॥ नस्पित' न पिता इविक =न पैगामा वा नगरा हुभा गो (पेस) है (मौर) न शयन करता हुमा गो (पैन) =अषया (एएम्बनयकी एक परिमापो में पाये हुये शन्द) प्रवर्ग पेन भात्मना पेन मानेन भूवः । ="पनात्ममा भूता" (कहिये किसी पदार्प) मानयुफ (-बानेन) हुमा परिणवा सेन एव मध्परसापपवि T -परिणया (मात्माको) विस (हान) युक्त ही निधय करावा है या मतीविकराया है (ऐसा एवम्भूव-नयो) भर्पाद् इस परिमापा में 'मास्मन् शब्दका भर्य पनि ममिपेप क्रिया सिया' प्रा 'मान' लिया (मात्मना मानेन) इसरिये भास्मा मिस पण में जिस पदार्य के मान से युक्त हो उसे पी करना एवम्भूतनयका विपय ॥ पवामनमनपरिमता अग्निशानपरिणवा जैसे इन्द्र(फा मांकाररूप)मान और अग्नि(का भाकाररूप) मान परिणया मात्मा एष इन्द्रा प मम्निः इति , आत्माही इन्द्र भौर मग्नि पसे (प्रमसे) मात् मैसे जिस त्रणमें मास्मा इन्द्र पदार्य शान से परिणत दो से इन्द्र फहदेना मा मिस समय मग्नि पदार्य के शाम से परिणव हो रहा है से अग्नि का दैना एवं भून नयका विपप रे ॥ ऐसे पाकर सपा अनुपात रस होना चाहिये पागम होना चाहिये "मलिता न पिता इस पाप में मिता राम और शपिका शव पुसिम में लाये है इस से परीकि पैस से तात्पर्य रेता पौ" का अनुवाद गौ (स) किया है यदि पिता के नाम में 'लिता' हाता जी श्रीसिम है और गतिमान में 'पिता' स्त्री सिंग हाता तो अनुवाद गी उप का गाय (गम) होता। (१) इन्द्र बान परिषत मारमा इन्द्र उच्यते । अम्मिशान परिस्त त्वादरमा मम्मि श्वेति एपम्मूतम्यापम् । पद्रपान परिमवा मारमा पस्दा उच्यते T = स्द्रय (भाफार स्प) शोन परिणया मारमा इन्द्र कहा जाता है चामियान परिपत त्वार प्रात्मा मम्मिा- और अग्निशान परिपमम से मात्मा अम्नि (इतावा) इति. एपम्भूतमपलपम् - ऐसा एवम्भूल्नयका विषय (सरुव) है। प्रशंसा पर है कि OUROOOOOOOOOOOGATH ATTITNAAT MTTTTTTTTTT - एटा नियासो नगरपसांप पकीसाव परखेद और विमपत्पर्य सहित सर्वायसिदिका शब्दशः हिंदी अनुराद। मध्याय ११३३ स्वामिधेयक्रियापरिणतिक्षणे एव स शब्दो युक्तो नान्यदेति । यदेवेन्दति तदेवेन्द्रो नामिषेचको न पूजक इति । यदैव गच्छति तदेव गौ । स-मनिय-किया परणविषसः एप स्पो शब्द) अपने प्रर्य (=अमिरेप) प्रियासे निस समय ही (एस) परिणत हो सा शम्दः युक्तः न अन्पदा इति. ना शम ( प्रयोग उसी समय ) उचित है न कि और समय (=मन्पदा) मागार्व मिस पस्तुको निस नामकरि कहै उसाड़ी भर्य की क्रियास्स रा रस्त परिसमवी से सो विसही पास उस पस्तुको रस नाम से कौ मन्य बाल पही पस्तु अन्य परिणविरम परिण में सौ पूर्व रक्क नाम से उस वस्तुको न करे एक इन्दवि T वर एस इन्द्रः। असे परती परमैश्वर्यरूप क्रिया करता है सकती इन्द्र है। नामपिपेपरः । न • पुनका इति । अफि (पाही प्राणी ) भभिषेक करने पाशा न पूमा फरने पाखा ऐसा (इन्द्र) रे भर्यात् इन्द्र शम्ब का भर्य परमेश्वर है मिस समय या परसर्य का मोग कर रहा । उसी समय पसदा इन्द्र पाना यह एवं मूतनपका विषय है किंतु मिसा पल नाम मात्र इन्द्र है (नाम निप) पापा पर किसी पदार्यमें इन्द्रको स्थापना है (स्थापना निक्षेप) मा मो इस समप इन्द्र नहीं मागे माकर इन्द्र हाने वाला( अम्प निघेपनाएर मूतनपका विपय नही पोंकि उपर्युक्तवीनों अबस्याभोंमपरमैश्वर्यका मोग नहीं हो रहा है। इसी प्रकार गोइस्पादि अन्य प्रमों में भी मिस मिस पणमें उनकी मिस मिस मर्य क्रियाको परिणमन हो सास सस पण स उस परिणपनकी अपेक्षा से पर्ष स्वनयकी यामना कर लेनी चाहिये यदि मर्प क्रियाकी परणविदा दसरा दूसरा काम होगा वौषे एवंभूतनपके विषय नहीं हो सकदेखोनीचे गोकाष्टान्त) पद एष + गावि वद् एव • गौः अपायद) हो (-एष) गमन करवा रब ही गो (ख) (१) गोनस सच के बीस भय से मी अधिक पर पुखिग और मीटिंग में माता (कोरा पण २५० देखो ) गो पुशिग में ह-पम (पशु) रेप्रमे पहा लिया गया और उसकी प्रथमा पिमलि एक पवन पुसिंग गरे और गो मर गम्-पाप के मयं मैमोहिग है तब भी उसका प्रथमा विमधि एक पचन स्त्रीलिंगकारूपपुरुष झिगसाश गो (क) रोपाईस लिये प्रश्न पर रहता है कि पति मै दियाऐगी NIOSCOREOORROGROUNBeneONAGAROO एटा निपासी अगम्मसहाय पीवत पदखेद और पिमक्स्पर्म सहित सार्यसिदिका शम्दशः निंदी अनुवाद । अध्याय १ सूम.३३ LITCTDOPO DURO ONMONDOOMOO OMOTOOOOOO प्पचवारमय मैगमनपके पीछे संप्रइनप कही गई है सो इसका विषय सम्पत्व माविही है इसके परस्पर निपेयम्पमसम्मादि या विषय नी इसलिये मैगमन्यसे संप्रमय प्राप विषपक वा पोड़ी विषप बासी है पषम्मतरत्रम् मपिम्पोन्यम् -इस प्रकार यहां से भागे (= सत्तरत्र) भी सगाभो वा सगामे योग्य है अर्थात् संममयके पत्वात् म्यबदार नप है सा इसका विषय संमहनयके विपयका मेद है वहाँ ममेद विपप रपये प्रता संग्रहनयसे म्पपहारमय प्राप विषय वासी है के पस्यात् प्रसूबो सो इसका विषय वस्तुका वतमान पर्याय मात्र मतीत अनागत पाप रदगा मा प्यपहारनयसे सममपका पोहा विषय है। सूत्रनय सिंग संख्या सापन कारक उपग्रह प्राविक मेव करके केवल पर्तमान पयायको विषय भरता है परम्सु राममय उस एक पर्याय मी सिंग संन्या साधन कारक उपमा काम मानिने मेहसे मर्पका भेद प्रकाशन करता है इसलिये मसूत्रन्यकी अपेपासे रामपका मप विषय है अर्थात् समनप भय पर्याप और रालपर्याय सपो ही विपप करता है परन्तु रापनप देवल शब्द पयाय को ही विपय परता है इसलिपे शास्त्रनपका विषय रामनयसे प्रपितर है। इसके पश्चात् सममिम नप यहागया है मो एक परतु के अनेक माम है विनका पय पराव करते हैं जिन पपंय शामोंका पकली मर्प मानने वासी दो शप मप है परन्तु सममिमानय विस रावने प्राव रखा है विसही मर्पकपको कहता है क्योंकि उन पयाय सदोंके दे अपं मी है। जैसे न शक पुरन्दर माहि पे तीन राम एक ही रावीपति अपने पाले है तथापि परमेश्वर्यता का माग होने से पन्द्र सामवान होनेसे शा और पुर मार विवारपरने से पुरंदर इस प्रकार इन मिन मिन्न शमों के मिन्न मित्रमय है इस रीविसे पपापों के नुसार पद सम्बो मनक मर्य रहते भो परम्प म्द्र (राचीपति) मय में ही है और इस प भएको हो 600 एटा निपासी नगरपसहाय कीसव पदावेद और विपक्स्पर्य सहित सार्यसिदिका शमशः हिंदी अनुवाद । अध्याय ११३३ उक्ता नैगमादयो नयो । T उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वात् =नैगम, संग्रा, म्यपहार, ऋजु सूत्र, शन्द, सममिस्त, (१) एवम्व (ये साव) नय नैगम - भादयः नया । उत्कार । सचराचर-सूवमपिपयत्तात् । बोमये है। मामे मोमेडी (नय एक रेमे) पम्प विपन (पाचो) होने से टिप्पणी-यदि अग्नि मानसे परिप्पुप्त नात्माको एषमूतनपकी अपेपासे मम्नि कहा मायमा तौ मलाना, राधना, पकाना भादि निवने धर्म मग्नि में है सब प्रास्मा में मी मानने पड़ेने इस लिये प्रास्मा अम्नि नहीं गा ना सवा १ (सचर) नाम का स्पना भादि निस सम्म स को माते है ये रस से अभिम राते है और मिस पदार्य के मो मो धर्म होते है ये निपपित रूप से उसी में राते है। भास्मा का मो भग्नि नाम है सका भात्मा के साथ ममेद है परतु भग्निके मो अजाना पकाना मावि पर्म है ये अम्मिमें ही रहते हैं भात्या में नहीं हो सकते इस खिये नो मानम पाव भर्यात् साचात् अग्नि में राने वाला दारकपना भागमभाव अर्थात् प्रौपचारिक अग्नि में नहीं हो सकता । इस रीतिसे यदि भास्मा का नाम भग्नि माना मायगा तो अग्नि दारक त्व मादि धर्म मात्मा में मानने पड़ेंग या मो ऊपर का दी गई वी पर निर्मुख सिर हो चुकी । (१) यहां पर 'एरंम्पत इति' 'ऐसा होना इस एपस्तनय के मर्यकी प्रवीति या निप्रय शम्भ से होती है इसलिये शब्द हो एनभवनप माना कारण कार्यत्र उपचार है मर्याद एयंमूवनयके अर्पकी मनोवि में फारण शम्दी और कार्य एवं भूसनप है (T नगपासंग्राोऽपरिषयः तन्माप्रमादित्वात् । नैगमस्तु भाषामापषिषयाविषयः । यपैर हि मान सकून्पस्तपाऽभारे मगमस्य सम्पः । एषाचरमापि पोम्पम् ।। नेगमात् संग्राः अन्पविषयः। नंगम नयस सानप पोड़ी विषय पानी है सन्मान (= वर - मात्र ) प्रारिस्वात् । =क्योंकि केरल उतने विषयकी मर्यात् केवल सन्पविषयकी ( = तन्मात्र ) पानी नैगम हुमाव - प्रमाण रिपयात् -गौर (-1) नेगपनय सत् (रूस) और असत् (रूप) प्राण परन (केरळ) से मापिपय पासी पा बहुत विपपकरे। (बहुविषप-बहुवर विषप सिका) पपाएर मात्र मान्पा । पोंकि (1) मैमा ही सत् (प) में सप प्रर्थात् सत् स में मामना है वाममारे मैगमस्य सम्पा। मोसा मसन् (म्म) में नैगमनपका सम्पदा माममा भाषाप । IBHOOMBOMBOORBOAROO DOOGIADODARONM हुविषय BONDORIEDORAEROENOGROCERPAN एटा निमासी नगरपसाप पडीकत पदावेद और विभत्सर्प सहित सार्यसिदिका शमशः fiदी अनुवाद । अध्याय १ सय ३३ "तन्त्वादय इवेति विषम उपन्यास । तन्त्वादयो निरपेक्षा अपि काश्चिदर्थमाता जनयन्ति। भवति हि कश्चित्प्रत्येक तन्तुस्त्वक्त्राणे समर्थ । एक्श्च बल्वजो बन्धने समर्थ । इमे पुनर्नया निरपेना सन्तो न काश्चिदपि सम्यग्दर्शनमात्रा प्रादुर्भावयन्तीति ॥” नैष दोष । अभिहिता- नवयोधात् । अभिहितमर्थमनयबुध्य परेणेदमुपालभ्यते । "तन्तादय इम .. " इति विपम । उपन्यास । =(परन) “वन्वादय दर - " ऐमा (उपर्युक्त) उदारण भनमेल है त-सादय ।निरपेवाःमपि क्योंकि) तारादिक (एक दूसरेकी) भपेशाररित भी ( एक तार दूसरे से भिम काचित ( मान्+चित् ) भय-मात्राम् ।। =भिम राने परभी) कई ए. (= आश्विन ) पयोमनमात्रामोंका (=मर्यमामान्) मनपन्तिा भिक मत्येकम् तन्तुः ।। =उत्पन्भारो । काई एक (= कमिद ) पृथक् प्रयक् (प्रत्येकम् ) वार तम् - पाखे । ॥ समर्यः । भरवि कि -सघाफे रक्षा करन में ( भर्यात् सीवने त्यादि में ) समर्थ हावारी (1) एक । क्रमः। और (-प) कोई एक (वार) भोपाल से उपमाहे राम मारे मर्यात् पक्कलका वार बन्पन | समयः।। ( मार-मनुष्य भादिक के ) बांधने में समर्थ है पुनः मे | नयाः । निरपेनाः ।। सन्तः ।। -पहुरि ( पुनः ) य ( इमे-परस्पर ) अपेक्षारित रिचमान (=सन्तः ) नय सचिन , भपि • सम्पदर्शनमाषाम् ।। =किना मी (मपि) सम्यक्सही मात्रा को पा सम्पग्दर्शन के भोंको नम्मादुर्मारपन्ति । इति । न ० एपः ।। दोपश ग मगट नहीं करती हैं ऐसी (शंशापर करते है कि) या दूपण नहीं है मभिरिव-मनसापात् । ममिरितम् ।। कयिका पाप न होने ( के हत) स (भर्याद ) कहे हुये के (=अमिरियम् ) मर्पम् । मनमध्य-परेण ।इदम् पातम्यते I =मात्पर्य को न समझ करि मत्ययासे ( =परेण ) या जाना दिया गया है (१) भपति रिकस्वित्प्रत्येक वस्तुस्वमाण समथा होता ही है को एक मित्र मिघ सस्तु स्वघाके रक्षाकरमे (सीपने मादि) में समर्थ ।। प्रार्मा अपने प्रश्नकी नाता में पुसतया विश्वास करते शब्दों पर मत्यन्त बस देकर उपर्युक वाक्यका करता है और इस गौरव उचारण में भवति हि से प्रथम साबर समर्थः' मन्त में लाता है मता इस वाक्य का शम्बया अनुषाव सो टिप्पणी में दिया है यही होगा। (२) पल पसस (पुष्न)पकर (10)=पासावरका पलातम पस्कटम-पाश से उपना पासका वश्व वा पत्यसकोराम नहीं मिला मता वितीया पत्ति भार पपगयाहै। (३) मन् मयदुप्य संक्च सूचक भूतानन्तहै। पर (ए०) शत्रुके भयम है परनु पर्दा पादी के प्रयमै मायाहै। PORRONARBONEBOBORNMEMORROSAROSAROOKC एसा निकासा नगरपसराय महोबरुव पदच्छेद और विमात्पर्य सहित सपिसिद्धिका शम्दशा हिंदी अनुवाद। अध्याय १ सूत्र३३ त एते गुणप्रधानतया परस्परतन्त्रा सम्यग्दर्शनहेतवः पुरुषार्थक्रियासाधनसामर्थ्यात्तन्त्वादय इव यथोपाय विनिवेश्यमानाः पटादिसंज्ञाः स्वतन्त्राश्चासमर्थाः ।। पुस्पार्प प्रिया-सापनसोपा इव =पुरपार्यस्प किया सापनस्वस्प शक्ति से जैसे सन्त भावय' यषा-उपायम्कमिनिदेश्यमानाः स्तके तारमादिक ययायोग्य उपायद्वारा नियकिये हुये वा पायेड्ये पादि संशा . पक्षादिक नाम पानेवाले आते है भोर (प) स्तिके) स्वतन्त्रतार प्रयात् परस्सर भपेसारहित पारे न्यारे धोर ममम तवे (खादि नाम पानेवास) नहीं होसके है। वैसे) वे इसने (नय) -गौण रूपपनापरि पा मपान मप्रधानरूपसे -आपसमें सापेसस्प हुये चा परस्पर एकदुसरेके भाषीन रूप हुये (माश्रय) सम्परदर्शनमा -सम्पग्दर्शन [रे उत्पम होने का पारण होते हैं [और यदि ने नक नव परस्पर अपेमारीव हो तो सम्यक्त्वके उत्पत्तिका कारण कदापिनी सक्त मित्रमिनाक वारोंके सदृश कार्यकारी नहीं होवे] मागर्म निसप्रकार प्रापसमें एक दूसरेकी अपसा करनेवाल सूतकासार जिस समय पुनमाते हैं उस समय उनकी पटादि संहा रो माती है और प्राणियों के शीत निवारण तप्यनिवारण मादि मयोभनीय पर्यों के सिद्ध करने में समर्थ होना किन्तु मी वार मा मिन भिम राव रे किसी भी प्रयोजनीय कार्यको सिद नही रसके उसी प्रकार परस्पर सापेच मापस एक दूसरेकी अपेक्षा रमनेवाले और की गौण तो कहीं मपानरूपसे विधिव ही नय सम्पक्त्वकी उत्पत्तिके भरण हैं। यदि निप] परस्पर मापेच न होंगे तो भिन्न मिल पा न्यारे न्यारे स्तके वारों के समान कमो भी कार्यकारी नने मीर सम्पपस्वकी उत्पचिके कारण मी नी तोमे ।। १ गुणा-भान विनय भावि गुवात कादि वपर प्रोसे मिल मोमें पद एव मातापपर अप्रपाम पागप प्रम (पमा १०मिरपा मया मिप्पा सापेक्षा पण उपस पागम १.८) परम्पर निरपेकप मिण्या परस्पर सापेक्ष नप कार्यपारी है। MPORRONIFOQADRIDEOBPORNO गुप्स मधानवपा परस्परवन्त्रा एटा निरासी भगरमसहाय पकीस इस पदपेद और निमक्त्पर्य सहित समायोसादका शमशः हिंदी अनुवाद । अध्यापरष ३३ हतुवपरिणतिसनावात् शक्ल्याऽऽत्मनास्तित्वमिति साम्यमेवोपन्यासस्य ॥ GavenaBIDHOOLOONDOOREEmewBOUTODAI कारण सका विशेष सपरिण मनके सपाव से देतस-परिणवि-समाबाद ।। शरया ॥ मात्मना । मस्तित्वम् ।। शक्ति (शरस्पा) का (-आस्मना) करि अस्विसह-सगंश-निरपेन नयों में भी नन नाम और मान क कारस से सम्पमस क फारण पनेका शक्तिस्म से अस्विस है इतिक उपन्यासस्प। -ऐसे दृष्टान्तकी (कि जैसे पुरुपके रागस सन्तु अदि परस्पर मिलन पर पटादि पस्तुगों को पाते हैं पैसे ही उक्त सास नय परस्पर सापेन होकर साम्यम् । । एष . =सम्पफ्स का पनातीरें । समानता है (विपमता पा मममेखता नी)। "अय सन्साविपु न्यासस्प" पाय का तात्पर्या–बादीको इस शफापर frनिरपेत्र पंचमों में शक्तिकी अपेचा पटादि कार्य करनकी सामर्थ्य है इस लिये निरपेनवंतु वनादि कार्य स्वरूण को मो सकतेर (वैसे नयों की निरपेन रूप में शक्ति नहीं है) इस फ समापानमें कहते है कि निरपेत्र नयोको मिभ भिम नाम और उन पा त्याग न्यारो मान भी सम्यग्दर्शको माप्ति में कारण म शक्ति रखता ही है । इस लिये निरपेक्ष नय भी सम्पक्सके कारण पन सकते है रा रीति से हटात गौर दार्शव वानों में समानता रहने से वतुओंके वक्त उदाहरणको विपम वा अनमेल उदाहरण पयजाना मसंग रे॥ पान रीजियपार्य में किसी भभिमाय विशेषको नय करते है मिवने अभिप्राय हो सकता उखने ही नय को मा सके। भव अमिमायों के मेद भनन होने से नपाद मी भनत हैं। वे स्पून रूपसे परिणत किये जाते हैं इसलिये संस्पावे नय है। (३) मिस पापा जाना जाताहै यह पिपयह मोर सिसके द्वारा माना जाताहै वह पिपपीहै । मिजप विषय है मय विपपी है। माम स्थापना-उम्प निरुप म्याथिक मयके विषय मत मर्यात् महल किये जातेहै और माव निक्षेप पर्यायधिक नपका विषय भूत है । सममिल नय भोर एवं भूत मन्तर या म एकेलिये देया पृष्ठपात अनागत दानो पायाका घोरकर पतमान पापोंको प्रहपफर सो शव सूत्रमयद। पह सम्म श्वसन सबसे पो मेरे रूप । एक समय पर्वा पर्याय श्री भवाम्यह भीर जिसको अर्थ पर्याप कहते हैं (फ्याफि पस्तु समय समय परिष सूक्ष्म बहसपमयका पिपयाभोर एक पर्यापके प्रारम्मसेमत कक ग्रहण करसो एप्स महसूबई से मनुप्यादि पर्यापईसा मपमे अपने मायु परिमाण रहती हैं मुसून मय और सममिलनय में मेष यह है कि प्रससूभनय पवमान रछ पर्यापोका ही प्राण करवा है। Digcoasterate eRANDORR0YARiteraceaseOG Oure और स्थलगत ० पटा निवासी नगरस सराय पील कत पदफेद और पियक्स्पर्य सरित सर्मायसिदिका गन्दसा दिी अनुवाद । मध्याप र स ३३ एतदुक्त निरपेनेषु तन्त्वादिषु पटादिकार्य नास्तीति॥ यत्तु तेनोपदर्शित न तत्पटादिकार्य, किं तर्हि केवल तन्त्वादिकार्य, तन्त्वादिकार्यमपि तन्वाद्यवयवेषु निरपेनेषु नास्त्येवेन्यस्मत्पक्षप्ति- दिरेव ।। अथ तन्वादिषु पटादिकार्यशक्त्यपेक्षया अस्तीत्युच्यते । नयेष्वपि निरपेक्षषु वुध्यमिधान- रूपेषु कारणवशास्सम्यग्दर्शन एतद १ ।। उक्तम् ३.४ निरषयेषु ।। तस्त्वाहिया का है (कि) परस्पर अपेचा रहित ताराविकों में पर-मादिकार्यम् ॥ न अस्ति । इति . वनादिक कारभ (अर्थात् यम-निवार-त्यादि पुनने रूप कार्प) नहीं होता पर ।।। (पद) वेन । उपदर्शिवम् ।।। =और (-४) मो (कार्य) विस (तार) करि (वादीद्वारा) वनगाया गया है न० छत् ।। पटादिकार्यम् ।। किंचाईक पापनादि कार्य नहीं है परन्तु (किंव) वा किन्तु (-किं तरि) केवलम् । सन्तादिकार्यम् | तन्मादिकार्यम् ॥ केवळ वारा दिकोंका (न्योराणी) कार्य है। वारादिकों का (यादीद्वारा उपदर्शित)कार्य भी उन्तादि-भायपु । निरपेक्षेप न भस्ति एर भी वारादिओंके भशोमै परस्पर अपेतारदिवशी (-एप) नहीं है भर्यात् वारादिकोंका (पसादिक चुनने के कार्यसे न्यारा वादीदारारणित) कार्य मी कितने ही धागे वा तरि परस्पर यया याग्य मिसनवमी रोतारमन्पपा नही ।। इवि० ममद-पत्र (-भस्मस्पन)-सिदिः ॥ एष=स मकार हमारा (मसाद) पक्ष (फि सापेस ही कार्य चलम करते है परस्सर निरपेन राने पर कोई भी कार्य नहीं हो सका) सिदि ही (एव) है प्रय वन्सादिपु ।। पादि- परन (अप) (निरपेस) सन्तु प्रादिक (फे भरपपनि)में सादिक (पुननाने) मार्यम् । शक्ति अपेधया।मस्ति इति उप्पते कार्य शक्तिकी विषक्षा से है पसे परिये है निरपेक्षेप । भषिक पुदि- चर) परसर अपेझारहित नयों में मो (उनके भिम मिम) शान मोर मभिधान रूपेषु । कारणपशाद । । सम्मम्दर्शन- =(उन के न्यारे न्यारे) नाम के कारण परासे सम्पगदर्शन के :00NmeindaynamroSUBeatureMROORBA ४ मरक्षा से भी गम मिस प्रयासमा ८ अमेगा 1 पो मनेगा पर्वते मना 14 पयसिपीमा डेरोसिमपर्व मालपसार गट अनुगमनाप १ ब १ सेटर गुसार ति (रापाप से पहिले न प्राधियों से गुर र लीमिपे) पृष्ठ भगुज विस्तारणास्पादि) (सम्पापनादि मौर सावता) फेविस्तार अपेक्षा सेविग सम्मयों में •०८ पाना मुशिबिमले सपिन्स' १०.११ पुतपय स्थाप तपाय स्पा 낸 infrint परेषा परिणाम स्वरा" शि २.१३ भोपथमिक उप पमित्र, उ पता २.१. ममेरपाना माहारका मनेपानामाहारको प्रमतिमिा. प्रतिमि & बने १०१३।, मपपिप इति.. मपपिपपा मादीनि मापनि ॥ पियरेण पिसापा मेर रिरमा मिप्याधि जीपा मोपामिप्याटपा" १२१ (i) (जीप) (मनुप्य) (मनुप्प) २१ सोपेकी मनुष्यों की ५. लगा ओपन प्पवित चा पूपाने १.१ १३ पग-गोप) पाग- मनु) enthonfion athरिवार मावार्थ-हीरोसती स मत पदोषिमुमती 11 माद- बास मरहे सोपविणे या ममापी भान हरोई और दूसरेसे पाणात प्ररपेक १५ से ८ , रोड रुपम" गम (पम्पका मायाय माग Rama पापन रोग पस्यामा माग' सम्पपर्शनमा बाना बरोरा (सनोम परिये अपम विपा ११ १९१६ मा भरपर गहरो प्रापेकपापले मरणयात मागई मामा देहरोदर पत्त्य महयावा मागर मेरेमो मागम म्योप.८ १५ पापनारोगसीमार मार रपेक गुपस्थान में परस बरोक पाव करोरामसपास मागरे अपि म . . भनुप्प - लिए एटा निपासी मगरमसहाय पकील कव पदच्छेद और विमरस्य सहित सर्वार्थसिदिका शम्दश हिंदी अनुवाद । मध्याय? स्त्र ३३ ज्ञानदर्शनयोस्तत्त्व । नयाना चैव लक्षणम् ॥ ज्ञानस्य च प्रमाणत्व । मध्यायेऽस्मिन्निरू- पितम् ॥ १॥ ॥ इति तत्वार्थवृतौ सर्वार्थसिद्धिसज्ञाया प्रथमोध्याय ॥ शानदर्शनयोमा तत्त्वम् ।।।। नपानाम् ।। प. बान और दर्शनका यथार्य सस वा व्यों कास्यो स्वरूप भौर(च) नोंका एम० उघसम् ।। ज्ञानस्य ॥ प.भमाणसम् ।। मी (-एन) लक्षण, और (-च) (पांच) मानके ममाणता (पान को ही प्रमाणता सिद्ध करना) अध्याये । अस्मिन् । निरूपिवम् ! | ॥१॥ नस (मपम) अध्याय में पणन कियगये हैं। दाहा, "दर्शन पाप ययार्यता नयलक्षण परणाय ॥ शान परकै मानता । कही भादि भध्याय 'जय०२२१ इवि. सर्विसिदिसमायाम् ॥ इस प्रकार सार्य सिदिनाम (अन्य ) में तसार्थ-नवी १॥ मथमः ।। मध्याय ।। अवार्य विवरण में परिला भध्याय ( समाप्त पा पूर्ण ) हुमा परंतु सममिसानप रस गप से प्रगट होने वाले भयको ही प्रहबरता से जसवनप उत्पन्न होने से मरण पर्यन्त रम्द पद धारण करने पाखे रामी पतीच न बता पण्तु सममिसानप इम्पम शीस ऐश्वयवान होते ये कोही इन्द्र कहलाई म्द्र जिस समय पूजा करता है उस समय भासवनय से इन्द्रो परम्तु सममि नप से इम्ब नही है। सब सग भौर एपम्मतनों में पद भन्यो कि मासूम नप वस्तुकी वजमान कालकी पपाय को प्रहल करताहे पण्तु पतम्भूतनय जिस कालमें जो किया करता हो वा म्यिा कर रहा हो उसको उस काल में उसी नाम से प्रगट करताहै वा कहता है जैसे श्रम सजा मय उत्पन्न होने से मरण पपद पन्द्र पर पारण करने वाले शची पतिको इन्द्र कहताहै चाहे वह किसी समय कोई भी त्रय कर रहा हा परन्तु पचम्मूतनय देवों के पतिका परम ऐश्वर्प सहित हो उसी प्रवासा में एत्रताहे पूजन अभिषेकात करते हुये का इन्द्र नहीं कहेगा इसी प्रकार जिस समय यह शक्तिम्प पिया पपरे उसी समय सकलेगा अन्य समय में शक नहीं पड़ेगा। न इन्द्र कहेगा जप कि वहश के रूप झिया पर रहा हा () प्रजम्म-सममित और एवम्मत नयों में यह प्रत कि असमान्य वस्तुकी एक समय मात्र पय यफा अपपा प्रारम्मसे मत तक एक पत्रका प्राही है सम्मूिमनप नाना अर्यका उसंपन करके यो एक ही साथ में एस (प्रसिय) हा उसका प्रादी है परन्तु एषम्मूतमय यो सिस समप जो विया कर रहा हो उसको रस सम रस मिया पीके सबंध पा सपोग से प्रगट करता है देस गाय पर्याय लीनियेता मजस समय सन्म से मेकर मरण पपत उसय गाय समजा । सम्मूिलनय गाय सबके पृथिवो माता पवन इस्पादि भनेक प्रपोका छोड़कर जिसमे चलने को गति ऐस गाय (पोस्ता पर चमती हो वैसी हो साती हो भारही रो सब अपणा में सम्मिानपफी अपेक्षा से पागाप (पाही पाम् परम्मतमप जिस समप वर पो फिर उस ममप गापगी सोने वही हरे को गाय नबगीचा रस चलने पिणेभी दियो TOONLODineONAC000OARONORGEORAPOOR TRAPAANTA - पनाममापी गिरणीनोमो पचम्म माना गम्पनीtगा.

पृष्ठ पदि पृष्ठ पदि प परी RAKERY . 11 स्टानिवासी जगमपसाप बीस व पदफेद और विमारपर्व सहित साप सिदिशा हम्पस हिंदी अनुवाद । अम्पाप १ सूत्र ८ भय बीपि पसापमानि पस्योपमानित फेरि ममत सपमे मियो, मप्रमान, संपमियों, मिध्यावश्मामानाशीप मिप्यार मोफ्यापिक सम्मस्तिो मापयमिक सम्पमा मानाजोमपेतया"खामाप सम्पास्पा 110 मपेक्षया सामान्य सम्परायः ३२२ ५.११ मत मागवा (ममुषे) मुल, बामवा (-मनुते) पद १२३ २५ म प, भूपते भूपते, मपवे सागरोपमसार, सागरोपमसाल tu भप ( मप) भमा-मय) २५ १५ पूर्वकोटि पूषोटी २२१ ११ फमम् ॥ फसम्॥ ॥ ६१५ मही, कारिकामा १५१ १५ प्रमाणवाफसई (ममाषका) फल ૧૮ ૨ मानसपागिनी मानसयोगिमा, २३२७ बानागीव- पस्तुशाम (-मधिगम) २१८ १५ नामाजीव नामाग्रीव ॥ २५ उपमानापत्या पर्यापति पमानापरपा, पोपत्ति उपापम् " बपन्यम् १० ११२ भावरमापा, मममम मम्तावाद। स्पसम् ।। १८ १८ प्रयोग। पापम् । जपत्रम् प. प्रयो। प्रस्पतम्।।उत्पादो मस्यसम, उत्पादो ४४२१३०००० ४२३५५९५१.३.८२० १४२ ११,१४ पा, माप्नोति पपाशप्नोवित मावावा दियाघाती भाषका, किया जाता पूर्वकपेमार्ग करपते, पूर्व मेवमान कम्पावे पसिमा, मापामो केमिना, मोगामो ३४५ उदयात २८० १२० गुणस्पान मोरलीयकर्म | गुषस्थान में, मोरोपका उपपाव ३७५ १९,२३ दिग्पमा, स्पॉat १९१० धोदपिक-मा, वन | मोदयिक मापत् मापा सहति मापाप, स्मृति २१२ २५ प्रापम् । भयम् ॥मनुपावस्य ३१८ १५२० वर, स्पर्शन-मावि वद-सन मावि प्रस्थ्यम् २५॥ ५२१ (मत्) तपा, (-मम्मपा २५ १५२० । चार मिस्सापिर। 1. मिस्सापिरदा तिम्, से, मसंण्यात संम्पावणे सिंगम यमपिन्सत नही तसे २६१ २. सम्पावणे मम्वावगुणे ... ना, मही, मविपेप। महा है। विषमावासि मावः फरणम् ॥ (भावकारपम नर्वा गुणस्पानवठी, से प्रमचयमी पामवासरप पो मन १८८1०। मयोग पनिाब, मयोगले पसिना पाते है (वा माता करण पा मन) २६१ ५.१५२० भर्यम, पद तो मर्यम्, जो पच, रुपक उपवाम | प. सपण उपग्रम १६२ ११ मापाय, ८ विष्णम् स्थान म अपाय पदि पट पति एयनिवासी मगमसाप पकीस व पदच्छेद और विनायर्य सहित सर्विसिदिश शम्शा हिन्दी अनुवाद समाप म भाय मगुप पम्प संच्या तब भाग एकोषम् पवि एमजीवरमति पापले मसण्यावा माग परसा चार करोष १८. एक जोवम् प्रति 14 एपीपम् ।। प्रतिक १२ सावर पम्पमसम्पावा माप है विपाती। 4 १२ लियामती पण संपावर रोज इन प्रत्येशुषस्थायोंकी जीवों की १६४ १५,१५. देवगती, सर्मा " देयपदी ।। सर्म। पासोपारपरेडमा संम्मा पल्मो ममत्या माम? परिणामानि मा परिणामानि सागर पपरोड १४. १४ पपक्कएका सावमल वेपारोड प्रत्येक मै पम्प मसातमाग पपपएका पम्योपमपूपस्वम् गावा परोप, पस्यस्यातवा भोग पापापमयतपूयारवम् २. परसाचार रोड पस्यो मसभ्याता माग, पक्ष्य+ उपम पक्षमा पस्प+उपमशवपुषत्वम् २०१ २. पम्पपराबर पावन पर सो फ्ल्पपपपर पायोमरस्याता माप २०६ १२, वेदोरपराद सविसाकरोग पत्यचे मसक्यात माम बेदोत्पाद, पोटे मतिबाग मपस्या अपेमया मतिममानी पसंपत भसंपत पारि २१२ १६ मपेसमा ममाबात। भमावान् मांगोपापेक्षया कापनम् । मानानीवासपा रूपमम् ॥ १२. ३ समस्येयाम्पेया मपारस्पेया १. १५.१० निापरवरगोनागापे समो, पाणीm२९१ . पापा शूपापा १३] पनात् । वि अपात् ॥ समा। पानाविहारपत् २२३ १०१५ मपेसमामाची मपेसपासातोसोखिमको परिपस्तस्तापत् विसतिग्रासपा विसापासमा मिप्पायका ममापेषु। २२४ ६१५, पम्पोषमया भावाना पायो wal १ कास्य। २२४ १६ मालपा" मपेमपा॥ पषि, मषिक सप्ततिषि, पतिसप्तति मपितसम्ममोर्सब सम्मगलो। ५५१. पेपसम्पत्त भएम् बेपसम्मक भवम् ।। २११ ११२. विरxt मन्तो तिपा, मत ५२. मिपाव मिप्यावं मिपाचे मिपाये १० १११२ प्रापुका (-4) मापुन (-) १५५मासम्मति सम्मपति इति मता माना मिप्पा मापात बियाणे मपेसयो २१५ २ २२ . अमपा। देवाला परिणते स्वागत मिप्या त्व .

पृष्ठ वाह नामति करा सेमा ४५ समातरम्स ४७५ एटानिपासी मगरूपसहाय पकीजकच पदपद मौर विमपत्पर्य सहित सर्यिसिदिका शब्दशः हिंदी अनुवाद । अध्याय १ माय शुर पष्ट पति ४३. २०११ पातु मेपर पौतुम अपर ४५ २०२१ पुठ (मो इन्द्रिप) भाषा ( भुत)मो इन्दिय प्रवास २४ निमित्तष मिमितत्वम् निमित्तस्मन मिमित्तत्वम् न ४५ ८१५ निरक मति, करा ततस मही ४. १७ भुतमति पूर्वपमेशापरामद | भुत मतिपूर्व वयोमारामेए ४३८ १५१८ बामम् शेपाराम् पान शेपाल प्रबमा पिपर। भयो पिण ४१६५१८ तिर्यत, तिम्मा म सेमी १७३४० विपुम बिमात्पर्य ४२ ३१६ भसम्पेय भसम्पेयमपात | भासस्पेय । प्रसंम्पेयमागात विपुम बिमपर्व (मम्यमय) (अन्यमय) ५५०६१ प्रमुखका तसता माम तसता सब, मनम्तायत सम्पत्ति उसमे सम्पत्ति सका। मेर ०३ टिपाए टिपा ठिठया ठिया ४॥ १२.१८ शरीरवा शक्तिमपेक्षा शरीरका, ममका सम्बन्ध १७१८ (परन्तु परम (परत) पसरम ४५४ ८,१५ मानिमिा मादिभिः ।। मारिमिः । मारिमिः ।। ४१६१५ मी पहचानक (मी) (वस कान) ४१५ शुष मामपोतर वियुश्य है (प्रथा (प्रपा पनि सूत्र में ए. वियुदण्या । तावत विष्यया ।। सावत् शम कोपसम्पा असाप ४५६ ३. स्वामिमा षिपयस्वात सामिना विषयत्वात प्रधानमपी में तो ४४४१० मसग प्रति प्रसम अर्थात् ve६०४पही अनेकार्य मम त्यहीमनपर्थ मीसित प्रपा ev४ १५, प्रमविपातन । स्वामिनाम अप्रतिपाठमस्वामिनाम् ४८० ११५ पहा परामर्थ में । पारा पर, प्र में मीरा सा १ ६,१२ भाषामू विएस है। भाषाम् विषय VEL १० ११५१८१ पर १८५११ १२ २,४ बिरोपो, विपपत्वात विपयो बिपपस्वाद ३८३ ३, १५, बानापपोखम् ॥ सासम्पपरे गम् ॥ पा १४ ४१२२ मम्पतम् पुषित सपा अम्यतम पचित्रमा १४ मध्य प्राप १५ १५, स्वामी विएप संपम प्राण ) स्मामी-विशेप सयम-प्रह सबप में आप से का ४१५ १४ "प्रष्ट पारित गुणोपेतेपु | "प्रपचारिषगुषोपेते 'बाप्प विपर्यपछी मीम विएप को की गई ४७ ११५ मिबम्पो,मास निर्षन्पो मसि क. भम्पबसवि कमी, मापास्पति ५७ २. पक्षानम् +६, पशासि पणन्स+पोस पर १३५ जनना पसा 6 सबमनी, पेसा से रख मानपावर १८ ५ पराम प्रम्पप सम्पर प्रम 22222222222 पछ पछि भादी । । पटानिवासी मनपसाय पस त मन और शिमम्पपे सरिव सर्विसिादासमता हिन्दी अनुवाद मध्याय १ सय १५ । माय २४३९. भवराने, मामाप मवालपरी, मामाण्य 50-4दाम, मायाजाल-पान, दाम, कांश ५५ वचनमा पचनम् । १.१ - मतिपम, मारमयमा मवि पूर्वम, भात्मकम् ॥ १५८२३ पिसपादि, सैषेप, पिसेपादि, पेये १०२ २. मपामाग्यम पुस्पतत्वात् ।। ममामाम्पमा R, (आ) मारिया विरोRAT१२ मति, भपेसयाका मिति मपेक्षया परमोऽकम मा १७२२ परतेपाया, ममति कामेवाला, मर्पपात बादामा सेतराणामिति । भमिभ्य सम्पापस्य मुतमिप्यते, सम्पकत्वस्य । नाम, प्रहणेन सम्पम्पमम्वरम सम्बग्धिभातरम् २८१३१४ मरस्पा भुषस्सा पुदगम्प, ४.५ बाफ्यादि. मावा पारमावि-भावात् । १९१५ सायम् । विशिरस्म एवम् विस्पिपst मायसंयोग मापस योग, ५.८ २२४ समम्माप,,प्त समाम्मापा, पत्र, उस ३४१ १५, ८.१३ विशेषा, निविण्य विशेषाभिकर्षियत, सिंगान Vod SM, मषि,पयोथवरण,मामृत, पदि, पर्यायावरण, पामृत R१० fo-मावपाहा-मादय हा १११ १२१६ विसंतोगी, पर बिर्सयोगी, एक १० १.१३७दा मम्न, जल, (प, निम्स प्यमय १४ २५.२० एकही,२४ 8 अपमप्य त्व+पन कपमम्म तपम, १५५ 4. नशासम्पा, संध्या पोन शामिम्मोगामापा (स्रोशिम)+in, (लीनि)-पा, ४१३ १८ बमान पदकाबी, पीपे है, १४० १३१६, 'पत्व'गबोटी मौर पूमामा में, मका, ८ ५६ पसेपम्पमपिता लिद पसेयम, पवित्या, लाविध २०१४३३१ २०११ R॥ मनावत् रक्तम्या ममोपा, खम्मा १२१५५३२॥8708 १५१६३६५ पुस,मादावनमा सम्पर्म कपा ८१५१८ मार्च, बापिए. विपिन विति १२० १६.१५ ()चा प्रपितामही (क) पायप्ति, सम्सीप विधि ५२१५ ४२९,५२९ पूर२१, २२, २, २६८१ +पात, चावात् +ोबार, परोपात क्षिका Ha.५५१. मतम, भवान, पाम भुषम, भुवान माना २. १५२१ का स्पापान व मापतीपातिक (इसमेवाबापी पचिपाली मिलि वीषि 'पाय' या ४२० स्पाल्पामा

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एनानिमासी मगरपसाय पीस कृत पदच्छेद और विमस्पर्व सहित सर्यिसिदिका शम्दशा हिंदी अनुगाद । अध्याय १ पृष्ठ मपुर पंक्ति ver २०१६ (तौर) पक्षिणी (और) पुनिगी, ५१८ १९, २२ करयोग्मदप-कर्मयोपोरभेद, तु-धर्मपोो vet पर्यस्य। भारम्मान कार्यस्वा प्रारम्भबास ५१४०९,१६ वम प्रपम पमहीरे पन प्रथम, वसती) Neu 1,८ रेबम्मूतो (सप्त)मया) सम्भूता (सप्त) नया ५२३ २२ भानुमोका ऐसा पपना पातुओंके ऐसे रूप मे ४६५ १५ २५ एवं मूतामया परिपा, एवमूता नपा., परिक्षेपी ५५४ १२ मम्य-उपपये मात्योपपये। ४६४ मसमानजातीय समूत | असमानयातीय प्रसदन ५२५ ६१९,१० प्याक मारये मोस्प,प्रहास म्ययाण, मोरपे मोक्पे प्रहासे 2" समीमा सममित ५२५ १७ मम्यवाचणामम्पतरस्मदेश्यप मम्पबाधि युप्मम्मम्पवरस्मरेश्वर VE५ १० ११ पारमापा, मापेमा परिमापा माघेषमा |१३१ १५ २१ मार-परिम्प व्ही मार-परिम्पा HEL ८१. साथ प्रदेशी पस्तुकाप्रोशी ५. ५१७१ भयम उपरमति भयन पपरमयति Ves ५५ होमक, माषा, रोचुनने भावी, ५४ १२१ तो-पाय, साकांक ती यथार्ण, नोक, लोक Ve१६ २० पाप मवाद, पपाप, पप स्वीत, पवित्र, ५. १५५१ साक्षी परममा ५३५ ४ अनुवादि प्यपहारलब अनुवादित, प्यपाल, पार पमेनका (पु०) ३२ मा (५.१ ५.२ (माँ) पा, पपर्व इम (नौ), पदार्य पथा पमा मन भयोमेस समरे अनेक मोमेसे ५०॥ १.१७ मते, पाप मर्यठे परि ५१७ १. १४ पयुक, पसल, मवायत्वात् पसरे पलते नसार्थत्वात নন এখবি, मर्थनम् द्रापारिक ५३४ ३,१६ वृत्पमावत, पत् पृस्पमाषा पित को पर २ः परतिवरे परिक्ष में परपतिक्षप, परिपमें १६१८ मारपम् मपिपत भाराणम् मविपत् १८,१७२० परिणे अप परिवत्ता पहिलो पारमे) रूप परिसक्त्वात ५.० ८,२१ मनपम भूतहरत ym.. पारपना, प्रति स्थापना भग्नि -मानुपए) को -मानुपमेव (रेगे m१५३७ मामे रोति, स्पर्क (गावा) प्रामे रीति स्प।। पाम, स्थापना २०२१ पास रेषागम १-८) तह (ऐबोगम १.८) ५॥ १॥ सिमरान अनुसूमा चिनपान अमुक ५२२ मतारितोषा पति में सिमित मतिम मिना, मतादोनों सप्प सुनपसमूर सणार चेत अदरकपपया पस लिये गये साता ११.१८ पर्व मपि नये नये।पि ५१५ ११० मार पचित समानदार और विच समाधान, ५५१ १.१६१५ सरति घंटा सच्चा १९. १७ विगप्पमिवार GRयभिचार पर १२१ विनती नविनतम भूननेगमनप भूतलब नाप स्पापमा परम

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Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka-1 Adhyay Ka Bhag-2

Author
Sahay, Jagrup
Title
Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka-1 Adhyay Ka Bhag-2
File name
Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka-1 Adhyay Ka Bhag-2
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/07
Publisher
Avagarh, Shri Krishan Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
439
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314014
Barcode
99999990312170.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Sarvarth Sidhi Vrati Khand-1 Ka-1 Adhyay Ka Bhag-2