Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
Shrimadanuyogdvar Sutram; (1917)
Front matter
No text on this page.
प्रस्तावना। - प्रिय महाशय ! यह संसार चक्र बड़े वेग से चल रहा है उस में प्रतिक्षण और प्रतिपल में अनेक परिवर्तन होते हैं तथा वर्तमान भूत से परिवर्तित होता है इसलिये विचारशील पुरुष अपने भविष्य जीवन को सदुपयोग वा परोपकार तथा आत्मचिंतन आदि में ही लगाते हैं अतः इस संसार चक्र में परिभ्रमण करते हुए प्राणियों को मनुष्य जन्म प्राप्त होना अति दुर्लभ है यदि किसी आत्या को पूर्वोदय से मनुष्य जन्म प्राप्त भी होगया तो फिर उसको पंचेन्द्रिय पूर्ण आयु, नीरोगी शरीर आदि सामग्रियें प्राप्त होनी वहुत कठिन है। यदि उक्त सामग्निये भी मिल गई तो फिर विद्या अध्ययन, करना तो परम कठिन है संसार में अनेक विद्वान् हुए वा हैं अथवा होंगे परन्तु इस विषय में वक्तव्य इतना ही है कि जिस शास्त्र से आत्मवोध की प्राप्ति हो ऐसे शास्त्रों के पठन वा पाठन कराने वाले विद्वान् बहुतही अल्य होते हैं सांसारिक कलाओं के उपदेष्टा अनेक विद्वान् वा उन कलाओं के उत्पादक अनेक तत्ववेत्ता विद्यमान हैं और भूतकाल में विद्यमान थे किन्तु अंत समय यह कलायें आत्मा की सहायक नहीं होती इसलिये सब से बढकर सबसे उत्तम एक धर्म है सो धर्म की जिज्ञासा करने वालों के लिये धर्म श न ही अति उपयोगी हैं जिन में श्रीअईन देव के कथन किये हुए वाक्य परम पवित्र हैं और उन वाक्यों के संग्रह का नाम ही सूत्र वा सिद्धान्त शास्त्र है सो जिन वाणी के पठन करने का अभ्याम प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिये जिस से आत्मबोध की प्राप्ति हो। श्री जिनेन्द्र भगवान् की वाणी ने पदार्थों का सत्य २ स्वरूप प्रतिपादन किया है जिसके श्रवण वामनन करने से आत्मा को अतीव शांति की माप्ति होती है। अत मे आत्माकर्मों से मुक्त होकर मोक्ष में विराजमान होजाता है इस ' लिये माना गया कि स्वाध्याय के समान कोई भी दूसरा तप नहीं है। क्योंकि स्वाध्यायस्तपः ) किन्तु श्रुतज्ञान के प्रति पादक अनेक महान २ ग्रंथ हैं । दिन में जिज्ञासुओं को पहले उन शास्त्रों का स्वाध्याय करना योग्य है कि जिन में अनेक विषयों का समावेश हो और वे शास्त्र नियमबद्ध हों।
३ * अनुयोगद्वार सूत्र * , किन्तु जैन सूत्र, मूल प्राकृत वा वृत्ति संस्कृत में ही प्रायः प्रतिपादित जिन में प्रवेश करना प्रत्येक व्यक्ति को सुगम नहीं है तथा जो गुजराती भाष में "टब्बादि" लिखे हुए हैं यद्यपि वे परम उपयोगी हैं किन्तु वे एक प्रान्त- लिये ही उपयुक्त हैं सर्व मान्तों के लिये नहीं । इसलिये सर्व हितैपी आज दिन हिन्दी भाषा को ही प्रायः सर्व विद्वान ने स्वीकार किया है इसलिये मेरा विचार भी यही हुआ कि जैन शास्त्रों व हिन्दी अनुवाद करना चाहिये जिस से प्रत्येक व्यक्ति आत्मिक लाभ ले सर्व किन्तु इस काम में अपनी असमर्थता को देख कर इस शुभ कार्य में आज तः विलम्ब होता रहा अपितु १९७१वें वर्षका चातुर्मास श्रीश्रीश्रीगणा वच्छेदक वा स्थविरपद विभूषित श्री स्वामी गणपतिरायर्ज महाराज ने कसूर नगर में किया तथा मैं भी आपके चरणों में ही निवार करता था तब मुझे वाचू परमानन्दजी ने व पं० मुनि ज्ञानचन्द्रजी प्रेरित किया कि श्राप श्री अनुयोगद्वारजी सूत्र का हिन्दी अनुवाद करो जिस बहुत से प्राणियों को जैन शासन के अमूल्य ज्ञान की प्राप्ति हो क्योंकि इर सूत्र में प्रायः सबै विषयों का समावेश है और प्रत्येक विषय को बड़ी योग्यता साथ वर्णन किया गया है और जैन सिद्धान्त की बहुत ही सुंदर शली व्याख्या की गई है प्रत्येक विषय की व्याख्या उपक्रम १ निक्षेप २ अनु गम ३ नय ४ द्वारा की गई है। इसी वास्ते इस का नाम अनुयो गदार है। यथा--स्वाभिधायक सूत्रेण सहार्थस्प अनुगीयते अनुकुलोवा योगोस्यद अभिधेय मित्येवं संयोज्यशिप्यभ्यः प्रतिपादनमनुयोगः सूत्रार्थकथनमित्य अथवा एकस्यापि सूत्रस्यानन्तार्थ इत्यर्थो महान् सूत्रं त्वणु ततश्चाणु ना सूत्रे सहाथस्ययोगो अनुयोगः तथा अनुयोगस्य विधिर्वक्तव्यो थथा प्रथम सूत्रार्थ ए शिष्यस्य कथनीयं द्वितीयबारे सोपिनियुक्त्यर्थ कथन मिश्रस्तुतीयवारायां तु पर जानु प्रंसगानुगतः सर्वोप्यर्थोवाच्पस्तदुक्तं सुत्तत्थोखलुपढमोबीओनिज्जुतिमीसा भणियो तइयो निरविसेसो एसविही अणुओगो॥ इत्यादि प्रकार से अनुयोग की विधि वर्णन की गई है तथा अन्य प्रकार ३ * अनुयोगद्वार मूत्र * और भी विधि जाननी चाहिये जैसे कि- ज्ञात, अज्ञात, परिपद् तो अनुयोग के योग्य है किन्तु दुर्विदग्ध परिषद् अनुयोग के अयोग्य है। फिर संहिता, पदच्छेद, पदार्थ, पदविग्रह, शंका, (तर्क) और प्रत्ययवस्थान द्वाराही अनुयोग करना चाहिये इत्यादि अनेक प्रकार से अनु- योग की व्याख्या की गई है। और इस सूत्र में प्रत्येक पद सूक्ष्म बुद्धि-से विचारने योग्य है तथा नाम पद में दश प्रकार के नामों का बड़ी सुन्दर शैली से निरूपण किया गया है फिर प्रमाण विषय तो बहुत ही गहन है इस लिये इस सूत्र के हिन्दी अनुवाद की अत्यन्त आवश्यकता थी तब मैंने बाबू परमानन्दजी की प्रेरणा से व पं० मुनि ज्ञानचन्द्रजी की प्रेरणा से इस काम करने में साहस किया यद्यपि यह वात स्वतः सिद्ध है कि यावन्मात्र अनुवाद होते हैं वे पाठकों की रुचि मूल से हटाकर भाषाकी ओर ही खींचते हैं क्योंकि मनुष्य रवभावतः सुगम मार्ग की ओर ही चलते हैं इसलिये मूल पठन करने का प्रायः अभ्यास स्वल्प होरहा है किन्तु मेरी इच्छा सर्व साधारण की रुचि को मुल की-ओर ले जाने की है इसी भाव से प्रेरित होकर मैंने मूळ पदार्थ की ही व्याख्या तिखी है । . तथा सूत्र व्याख्यान की समाप्ति में पूर्ण सूत्र का भावार्थ भी दिया है जिससे साधारण पुरुप भी मूत्रके आशय को यथार्थ रानि से जान सके। तथा जिन मुनियों को संयोग के न मिलने पर इस अपूर्व ज्ञान से अब तक अपारीचित रहना पड़ा है उनको भी अवश्य लाभ होगा। फिर विहार (भ्रमण ) के कारण व 'मीन ज्ञानचन्द्रजी के रुग्णावस्था के कारण इस काम में विलम्ब होने लगा किन्तु अनुवाद फिर भी कुछ होना ही रहा फिर वरनालामंडी में मुनि ज्ञानचन्द्रजी का स्वर्गवास होगया । यद्यपि यह ग्रंथ पूर्ण तो हो चुका था किन्तु इसकी द्वितीयावृति करने में बहुत ही विलम्ब हुआ मुनि ज्ञानचन्द्रजी की प्रेरणा से इस भापा टीका के लिखने का प्रारम्भ हुआ था इसी वारने इस भाषा टीका का नाम प्रबोधिनी" भाषा टीका * रक्खा गया है इसमें जहां तक होसका है इसको सुगम करने का उचांग किया गया है जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति इससे लाभ ले सके और भाषा के स्पष्ट करने में भी यथाशक्ति उद्योग किया गया है प्रत्येक पद का अर्थ भिन्न २ लिखा है। तथा जो प्रश्न रूप पद है उनको एकत्र लिख कर ही उनकं अर्थ में (प्रश्न) ऐसे लिख दिया है जैसे कि "रोकिंत" शब्द है इसके अर्थ में (प्रश्न) ऐसही " ज्ञान ४ * अनुयोगद्वार सूत्र * लिख दिया है क्योंकि सेकितं शब्द का संस्कृत 'अकिंतत्" प्रयोग बनता है उसको बार वार न लिखकर कंवल " प्रश्न " शब्द को ही लिखा है और "बहुलं" "आर्ष व्यत्ययश्च इन तीन मूत्रों की प्राकृन भापा में विशेष प्राप्ति है किन्तु जहां जिस मूत्र की प्राप्ति है वहां पर हेमचन्द्राचार्य कृत प्राकृत व्याकरण के सूत्र वा संस्कृत शाकटायन व्याकरण के सूत्र दिये गये हैं और संस्कृत के प्रकरणों में केवल संस्कृत व्याकरण के ही मूत्र लगाए गए हैं । और इस सूत्र के संशोधन में मैं तीन पुस्तकों का ऋणी हूं जिन में एक तो बहुत ही माचीन प्रति है, द्वितीय तूतन है, तृतीय रायबहादुर सेठ धनपतिसिंहनी की मुद्रित की हुई हैं। किन्तु तृतीय प्रति में दृष्टि दोष के कारण से कुछ अशु- द्भिय रह गई है यद्यपि बड़ी सावधानी से प्रेस में काम किया जाता है फिर भी दृष्टि दोष के कारण से मनुष्य का भूलना स्वाभाविक है । किन्तु मुझ से जहां तक होपका है इस के शुद्ध करने में मैंने बहुत ही उद्योग किया है और हर्प का विषय है कि मैं बहुत से अंश में इस कार्य में उत्तीर्ण हुआ हूं । इस शास्त्र को योग्यता पूर्वक पठन करने का प्राणी मात्र को अधिकार है । और प्रत्येक व्यक्ति जो इस शास्त्र को पठन करना चाहे उसको उचित है कि अनध्याय काल को छोड़ कर इस शास्त्र का अध्ययन करे । क्योंकि विधिपूर्वक शास्त्र अध्ययन किया हुआ ही फलीभूत होता है इसलिये आशा भन्यजन इस सूत्र से लाभ उठाकर और नय निक्षेप के वेत्ता होकर पूर्ण दर्शन शुद्धि के विषय में स्वात्मा को प्रविष्ट करते हुए मेरे परिश्रम को साफल्य करेंगे और जो कुछ मैंने लिखा है वह श्रीश्रीश्री १००८ श्राचार्य वर्य पटत्रिंशत् गुणालंकृत श्रीश्रीश्री पूज्य मोतीरामजी महाराजजी की कृपा से लिखा है किन्तु मेरी मंद मति इस कार्य में सर्वथा असमर्थ थी। सुज्ञजनो ! अन्य विकथा युक्त उपन्यासादि ग्रंथों के पठन से आत्मिक लाभ नहीं हो सकता है इसलिये इस शास्त्र के पठन से अपने प्रात्मा को ज्ञान से विभूषित कर और अन्य आत्माओं को परांपकार द्वारा सन्मार्ग में प्रवृत्त करायें फिर जव "आत्मा" और "ज्ञान" एक रूप हो जायेंगे उस काल में ही आत्मा सिद्धगति को प्राप्त होगा जो सादि अनंत पदयुक्त है इसलिये उक्त पद के वास्ते प्रत्येक प्राणी को परिश्रम करना चाहिये । गुरु चरणकमल सेत्री, विनीत- उपाध्याय जनमुनि आत्माराम. ( पंजावी ; है श्री पर्द्धमानाय नमः . श्री अनुयोगद्वार सूत्रम् OVOC मूल-नाणं पंचविहं पण्णत्तं, तंजहा-श्राभिणिवोहिय नाणं सुयनाणं ओहिनाणं मणपज्जवनाणं केवलनाणं । तत्थ चत्वारि नाणाई ठप्पाइं ठवणिज्जाई णो उद्दिसति यो समुदिसंति पो अणुएणविज्जति ॥ १॥ हिंदी पदार्थ (नाणं) ज्ञान, (पंच विहं ) पांच प्रकार से ( पएणतं) प्रतिपादन किया गया है, ( तंजहा ) जैसे कि, (आभिणिवेशीहनाणं) आभि- निबोधिक-मति-ज्ञान, ( सुयनाणं ) श्रुतज्ञान, ( ओहिनाणं) अवधिज्ञान, (मणपजवनाणं ) मनःपर्ययज्ञान, (केवलनाणं ) केवलज्ञान( तत्थ) इन पांच ज्ञानों में ( चत्तारि) चार ( नाणाई ) ज्ञान, ( ठप्पाई) संव्यवहार्य नहीं, (ठवणिजाई) स्थापनीय है, क्योंकि मतिज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये चारों ही (णोउसिंति ) उद्देश-उपदेश-नहीं करते हैं ( णो समुद्दिसति ) समुद्देश नहीं करते (ो अणुएणविनंति ) आज्ञा नहीं करते हैं " मुखाभावात् " मुख का अभाव होने से, क्योंकि ये चार ज्ञान अपने अनुभव को प्रकाश नहीं कर सकते. इस लिये परोपकारी न होने के कारण यह चार ही ज्ञान स्थापनीय हैं। भावार्थ:-सर्व पदार्थों का ज्ञाता और शास्त्र की आदि में मङ्गल रूप, विघ्नों को उपशम करने वाला, निज आनन्द का प्रदाता, आत्मा का निज गुण प्रदर्शक, ज्ञान है, इसलिये सब से प्रथम ज्ञान का वर्णन किया जाता है । अहन देवने ज्ञान पांच प्रकार से प्रतिपादन किया है क्योंकि ज्ञान शब्द का अर्थ यही है, कि जिस के द्वारा वस्तुओं का स्वरूप जाना जाय, अथवा जो निज स्वरूप का प्रकाशक है, वही ज्ञान है अथवा जो ज्ञानावरणीयादि कर्मों के क्षय वा सा- " . ( २ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * योपशम के कारण से उत्पन्न होता है वही यथार्थ ज्ञान है सो यह ज्ञान अहन् भगवन्तों ने तो अर्थ करके और गणधरों ने सूत्र करके पांच प्रकार से वर्णन किया है जैसे कि-जो सन्मुख आए हुए पदार्थों को मर्यादा पूर्वक जानता है वह आभिनियोधिक ज्ञान है तथा इस ज्ञान को मतिज्ञान भी कहते हैं । द्वितीय जो सुनकर पदार्थों के स्वरूप को जानता है उसे श्रुतज्ञान कहते हैं । तृतीय जो प्रमाणपूर्वक रूपवान् द्रव्यों को जानता है उसे अवधिज्ञान कहते हैं । चतुर्थ जो मन के पर्ययों को भी जानलेता है वहीं मनःपर्ययज्ञान है । और सम्पूर्ण लोकालोक के स्वरूप को जानने वाला केवलज्ञान कहलाता है किन्तु इन पांचों में से श्रुन ज्ञान को छोड़ कर शेष चारमान स्थापनीय (पृथक् करने योग्य ) हैं । चार ज्ञान लोक में व्यवहार का उपयोगी नहीं है, अर्थात् परोपकारी नहीं है, अपितु जिस आत्मा को जो ज्ञान होता है, वही उस का अनुभव करता है अन्य नहीं; किन्तु श्रुतज्ञान परोपकारी है । इसलिये शास्त्र में अब श्रुतज्ञान का ही वर्णन किया जायगा, क्योंकि उद्देशादि श्रुतज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं, इस से भिन्न शेष ज्ञानों के उद्देश तथा समुद्देशादि नहीं है । जो गुरु कहते हैं वही श्रुतज्ञान है । अपितु जो चारों ज्ञानों का स्वरूप वर्णन किया जाता है वह सर्व श्रुतज्ञान के द्वारा ही वर्णन किया जाता है। अथ श्रुतज्ञान के विषय में सविस्तर स्वरूप । मूल-सुयनाणस्स उद्देसो समुहेसो अणुण्ण अणुशोगोय पवत्तइ । जइ सुयनाणस्स उद्देसो ससुद्देसो अणुराण अणुोगोय पवत्तइ, किं अंगपविट्ठस्स उद्देसो समुद्देसो अणुगण अणुयोगोय पवत्तइ ? किं अंगबाहिरस्स उद्देसो समुद्देसो अणुगण अणु- प्रोगोय पवत्तइ १ ॥२॥, हिन्दी पदार्थ-(सुयनाणस्स ) श्रुत ज्ञान का, ( उद्देसो ) उद्देश, (समुद्देसो) समुद्देश, (अणुएण ) अनुज्ञा, और (अणुओगोय ) अनुयोग (पवत्तई ) होता है । ( जइ ) यदि (सुयनाणस्स ) श्रुतज्ञान का, ( उद्देसो) उद्देश, (समुद्देसो) समुद्देश, ( अणुएण ) अनुज्ञा और (अणुओगोय ) अनुयोग, ( पवत्तई ) प्रवृत्त होते हैं तो ( किं अंगपविठुस्स ) क्या अंगप्रविष्ट सूत्रों में श्रुतज्ञान का (उद्देसो) उद्देश, ( समुद्देसो ) समुद्देश, ( अणुएण) अनुज्ञा, (अणुओगोय पवत्तई ) अनु- - * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ३ ) योग प्रवर्तता है। (किं अंगवाहिरस्स ) अथवा अंगभूत्रों से वाहिर के उत्तरा- ध्ययनादि सूत्रों मे श्रुतज्ञान के ( उद्देसो ) उद्देश (समुद्देसो ) समुद्देश, (अणुएण) अनुज्ञा, (अणुअोगोय पवत्तई ) और अनुयोग प्रवर्तता है ? भावार्थ:-इन पांच ज्ञानों में से श्रुतज्ञान के ही उद्देश, सम्मुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग होते हैं, किंतु शेष चारों के नहीं । ऐसा कहने पर शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! यदि शुतज्ञान के उद्देश, समुद्देश, आज्ञा और अनुयोग हैं तो क्या अंग सूत्रों में जो श्रुतज्ञान है उसके उद्देश, समुद्देश, आज्ञा और अनुयोग हैं वा जो अंग सूत्रों से वाहिर के उत्तराध्ययनादि सूत्र हैं उन में श्रुतज्ञान के उद्देश, समुद्देश आज्ञा और अनुयोग हैं ? शिष्य के ऐसा पूछने पर गुरु कहते हैं। मूल-अंगपविट्ठस्सपि उद्देसो जाव पवत्तह, अंग वाहि- रस्सवि उद्देसो जाव पवत्तइ ? इमं पुण पट्ठवणं पडुच्च अंग बाहिरस्सवि उद्देसो ४ ॥३॥ हिन्दी पदार्थ (अंग पविट्ठस्सवि ) अपि शब्द समुच्चयार्थ में है, अंगाविष्ट सूत्रों में भी, ( उद्देसो जाव पवत्तइ ) उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग प्रवृत्त हैं । तथा ( अंग वाहिरस्सवि ) अंग वाहिर के सूत्रों में भी, ( उद्देसो जाव पबत्तइ ) उद्देश, समुदेश, अनुज्ञा, अनुयोग प्रवर्तते हैं । ( इमं पुण पठ्ठवणं) पुनः इस प्रकार वर्तमान आरम्भ की ( पडुच्च ) अपेक्षा से (अंग वाहिरस्सवि उदेस्रो ४ ) अंग वाहिर के सूत्रों का उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग विद्यमान हैं। भावार्थ-अंगाविष्ट सूत्रों में भी उद्देशादि प्रवर्तमान हैं, और अंगवाहिर के सूत्रों में भी श्रुतज्ञान के उद्देशादि विद्यमान हैं, तथा जो वर्तमान में अनु- योग का प्रारम्भ किया हुआ है, उसकी अपेक्षा से तो अंगवाहिर के भूत्रों में श्रुतज्ञान के उद्देशादि विद्यमान हैं । शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! :- मूल-किं कालियस्स उद्देसो ४ ? उकालियस्स उद्देसो ४ ? कालियस्सवि उद्दसो ४ उकालियस्सवि उद्देसो ४ इमं पुण पट्टवणं पड्डुच्च उकालियस्स उद्देसो ४ जइ उकालियस्स उद्देसो ? ( ४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * के आवस्मयस्स उद्देसो ४ ? अावस्मयवइरित्तस्स उद्देसो ४ ? 1. उद्देसो श्रावस्सयवद्दरित्तस्सवि उद्देसो ४ इम गुण पट्ठवणं पडुच्च प्रावस्सयस्स अणुयोगो ॥ ४ ॥ हिन्दी पदार्थ-(जइ) यदि (अंगबाहिरस्स ) अंग चाहिर के सूत्रों में उद्देसो ४ ) शुनज्ञान के उद्देश, समुद्देश, आना और अनुयोग विद्यमान वो (किं कालियस्स ) क्या कालिक मूत्रों के (उदेसो ४) उदेश, समुदेश, आजा, और अनुयोग है बा ( उक्वालियरस ) उत्कालिक सूत्रों के (उद्देशो ४) उद्देशादि हैं ? गुरु कहते हैं ( कालियस्मवि) कालिक सूत्रों के भी, (उदेसो ४) उद्देश, समुद्देश, श्राज्ञा, अनुयोग हैं और (उकालियस्सबि) उत्कालिक सूत्रों के भी (उदसा ४) उददश, समुददेश, आज्ञा, अनुयोग हैं पुनः (इमं ) इस (पुण पट्टवणं पडुच्च)वर्तमान आरम्भ की अपेक्षा से, ( कालियस्सवि उसो ४ ) कालिक सूत्रों के भी उदश, समुदंदश, अनुज्ञा और अनुयोग है तथा ( उक्का- लियस्स) उत्कालिक सूत्रों के भी (उदेसा ४ ) उद्देश, समुद्देश, अाज्ञा और अनुयोग है, गुरु के ऐसे कहने पर शिष्य ने फिर तर्क की, हे भगवन् ! (जइ ) यदि (उकालियस्स ) उत्कालिक सूत्रों के ( उद्देसो ४ ) उद्देशादि हैं तो (किं आवस्मयस्स) क्या आवश्यक सूत्र के ( उद्देसो ४ ) उद्देशादि हैं वा ( श्रावस्सयवहारत्तस्स ) आवश्यकव्यतिरिक्त सूत्रों के (उदेसो ४) उद्देशादि हैं ? गुरु कहत हैं ( आवस्सयस्सवि ) श्रावश्यक सूत्र के भी ( उद्- देसो ४ ) उद्देशादि और ( आवस्मयवइरित्तस्सवि ) आवश्यक से व्यतिरिक्त सूत्रों के भी (उदसो ४ ) उद्देशादि हैं । ( इमं पुण पट्टवणं पड्डुच) इस वर्त- मान प्रारम्भ की अपेक्षा से ( आवस्सयस्स) आवश्यक सूत्र का ( अणुओगो) अनुयोग, या व्याख्यान किया जाता है। भावार्थ-शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! यदि अंग वाहिर के सूत्रों के उद्देशादि है तो क्या कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि है-जो प्रथम प्रहर और पिछले प्रहर में पठन किये जाते हैं-चा उत्कालिक सूत्रों के उद्देशादि हैं जो अनध्याय काल छोड़कर शप सर्व काल में पठन किये जाते हैं ? गुरु कहते हैं कि कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि हैं और उत्कालिक सूत्रों के भी उद्देशादि है, शिष्य ने फिर पूछा कि हे भगवन् ! यदि उत्कालिक सूत्रों के उद्देशादि है तो क्या
.
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५ )
आवश्यक सूत्र के उद्देशादि हैं या आवश्यक से व्यतिरिक्त सूत्रों के उद्देशादि
गुरु ने फिर उत्तर दिया कि:-आवश्यक वा आवश्यक से व्यतिरिक्त दोनों
सूत्रों के उद्देशादि हैं, इस प्रकार से अनुयोग का वर्णन करते हुए अव आव-
श्यक सूत्र के अनुयोग का वर्णन करते हैं।
मूल-जइ श्रावस्सयस्स अणुनोगो प्रावस्मयं किं अंगं
अंगाइं सुयक्खधो सुयक्खंधा अज्झयणं अज्झयणाई उद्देसो
उदेसा ? श्रावस्सयस्सणं णो अंग पो अंगाई सुयक्खंधो
नो सुयक्खंधाणोअम्झयणं अज्झयणाई यो उद्देसो पो उद्देसा
तम्हा - पावस्सयं निक्खिविस्सामि सुयं निक्खिविस्सामि
खधं निक्खिविस्सामि अझयणं निक्खिविस्मामि जत्थय
जं जाणिज्जा निक्खवं निक्खिवे निरवसेसं जत्थविय न जा-
णिज्जा चउकयं निक्खिवे तत्थ ॥ १ ॥
हिन्दी पदार्थ-(जइ) यदि ( आवस्मयस्स) आवश्यक सूत्र का (अणु-
आगो) अनुयोग-व्याख्यान-किया जाता है तो ( आवस्सयं कि अंग) क्या
आवश्यक एक अंग है वा ( अंगाई ) बहुत से अंग हैं ? तथा (सुयक्खघो) एक
श्रुतस्कंध है वा (सुयक्खंधा ) बहुत से श्रुतस्कंध हैं ? तथा (अज्झयणं ) आव-
श्यक सूत्र का एक ही अध्ययन है । ( अन्झयणाई ) वा बहुत से अध्ययन
हैं ? तथा ( उद्देसो ) एक उद्देश है वा ( उद्देसा ) बहुत से
उद्देश हैं ? गुरु कहने लगे ( आवस्सयस्सणं) आवश्यक सूत्र (णो अंगं)
एक अंग नहीं है (यो अंगाई ) न बहुत से अंग हैं ( सुयक्खधो) आवश्यक
का एक श्रुतस्कंध है किन्तु (णो सुयक्खंधा ) बहुत श्रुतस्कंध नहीं है । (णो-
अझयणं ) और आवश्यक का एक अध्ययन नहीं है किन्तु ( अ-
मायणाई) बहुत से अध्ययन हैं, अर्थात् आवश्यक सूत्र के षट् अध्याय हैं
(णो उद्देसो णो उद्देसा) आवश्यक सूत्र का न तो एक उद्देश है, और न
वहुत से उद्देश है इस लिये आवश्यक को (तम्हा आवस्सयं )
१ सेकिंतं श्रावस्सयमित्यादि अत्र से शब्दो मागध देशी प्रसिद्धो श्रय शब्दार्थे वर्तते । श्रय
शब्दत्तु वाक्यो पन्यासार्थस्तथा चोकम् अथ प्रक्रिया प्रश्नानन्तर्यमं मलोपन्यास निर्वचन समुच्चये
चित, किमिति परम प्रभे सदिति सर्वनाम पूर्व प्रकान्त परामर्शायें, इत्यादि टीकायाम् ॥६॥
( ६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * निक्खिचिस्सामि ) निक्षेपों करके वर्णन करूंगा (सुयं निक्खिविस्सामि ) त को भी निक्षेपण करूंगा, (खंचं निक्सिविस्सामि स्कंध को भी निक्षेप- करूंगा और ( अज्झयणं निक्खिविस्सामि) अध्ययन को भी निक्षेपों करके निक्षेपण करूंगा, ( जत्थ जंजाणिज्जा ) जिस जीवादि वस्तुओं में जि- तना निक्षेपा जाने, (निक्खे निक्खिवे ) उस में उतना निक्षेपों का निक्षेपण करे ( निरवसेसं ) सर्व प्रकार से, अपितु, (जत्यविय न जाणिज्जा ) जिस वस्तु में निक्षेपाका अधिक प्रकार न जाने उसमें भी ( चउकयं निक्खिवे तत्थ) चारों निक्षेप निर्विशेषता से निक्षेपण करे, अर्थात् उस वस्तु में भी चार निक्षेप करके दिखलावे। भावार्थ-यदि आवश्यक सूत्र का अनुयोग किया जाता है तो क्या आव- श्यक सूत्र एक अंग है, या बहुत से अंग हैं, अथवा एक श्रुतस्कन्ध है वा बहुत से श्रुतस्कन्ध हैं ? तथा एक अध्ययन है या बहुत से अध्ययन हैं, अथवा एक उद्देश है या बहुत से उद्देश हैं ? । गुरु कहते हैं आवश्यक सूत्र एक अंग नहीं है न बहुत से अंग हैं, एक श्रुतस्कन्ध है, बहुत से श्रुतस्कन्ध नहीं हैं, और एक अध्ययन नहीं है किन्तु बहुत से अध्ययन हैं, न एक उद्देश है न बहुत से उद्देश हैं इसलिये आवश्यक सूत्र के निक्षेप करेंगे और श्रुत के भी चार निक्षेप करेंगे, स्कंध के भी चार निक्षेप करेंगे, अध्ययन शब्द के भी चारों निक्षेप करेंगे क्योंकि जिन पदार्थों के जितने निक्षेप जाने उनके उतने निक्षेप निर्विशेषता से करे, अपितु जिन पदार्थों के पूर्ण स्वरूप को न जाने, उनमें भी चार निक्षेप करे अर्थात् उन पदार्थों को भी चार निक्षेपों द्वारा वर्णन करें, इसलिये अव आवश्यक का वर्णन किया जाता है । "अथ अावश्यक विशेष मूल-१ सेकिंतं श्रावस्सयं ? अावस्सयं चउविहं पगणतं तंजहा नामावस्सयं १ ठवणावस्सयं २ दवावस्सयं ३भावा वस्सयं ४ सेकिंतं नामावस्सयं २ ? जस्सणं जीवस्सवा अजी- वस्सवा जीवाणंवा अजीवाणंवा तदुभयस्सवा. तदुभयाणंवा प्रावस्सएत्ति नामं कज्जइ सेतं नामावस्सयं ॥ ६॥ " ? ? * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७ ) हिन्दी पदार्थ-( सेकिंतं ) अव वह आवश्यक कौनसा है ? गुरु कहते हैं (आवस्स) आवश्यक (चरविहं पएणचं ) चतुर्विध से प्रतिपादन किया गया है ( तंजहा ) जैसे कि (नामावस्सयं) नामावश्यक (ठवणावस्सयं) स्थापनावश्यक ( दबावस्सयं ) द्रव्यावश्यक (भावावस्सयं ) भावावश्यक, (सेकित नामावस्सयं) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह नामावश्यक किस प्रकार से वर्णन किया गया है ? गुरु कहते हैं कि (नामावस्सयं ) नामा- वश्यक इस प्रकार से है जैसे कि ( जस्स जीवस्स ) जिस जीव का (वा) अथवा ( अजीवस्स ) अजीव का (वा) अथवा ( जीवाणं ) बहुत से जीवों का (वा) अथवा ( अजीवाणं) बहुत से अजीवों का (वा) अथवा (तदु- भयस्स ) जीव अजीव दोनों का (वा) अथवा (तदुभयाणंवा ) वहुत से जीवों और अजीवों का ( आवस्सएत्ति नामं कज्जइ ) आवश्यक इस प्रकार से नाम किया जाता है (सेतं नामावस्सयं) वही नामावश्यक है। भावार्थ-शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह आवश्यक किस प्रकार से वर्णन किया गया है ? गुरु ने उत्तर दिया कि आवश्यक चार प्रकार से वर्णन किया गया है, जैसे कि नामावश्यक १, स्थापनावश्यक २, द्रव्यावश्यक ३, और भाव आवश्यक ४, शिष्य ने फिर पूछा कि हे भगवन् ! नामावश्यक किस को कहते हैं ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! नामावश्यक उसे कहते हैं जैसे कि- किसी ने एक जीव का अथवा एक अजीव का तथा दोनों का वा बहुत जीवों और अजीवों का या दोनों का आवश्यक " ऐसे नाम रख दिया सो वही नामावश्यक है, क्योंकि-फिर लोग उसे भी आवश्यक, इस नाम से आमन्त्रण देते हैं, इसलिये ही उसे नामावश्यक कहा जाता है। ७ अथ स्थापनावश्यक विषय मूल-सेकिंतं वणावस्मयं ! २ जगणं कट्टकम्मे वा चित्तकम्मेवा पोत्थकम्मेवा लेप्पकम्मेवा गंथिमेवा वेढिमेवा पूरि- मेवा संघाइमेवा अक्खेवा वराडएवा एगोवा अणेगोवा सम्भावट्ठवणाएवा असम्भावट्ठवणाएवा प्रावस्सएत्तिष्ठवणा ठविज्जइ सेतं वणावस्सय २ नामढवणाणं को पइविसेसो ?
? (८) * अनुयोगद्दार सूत्र * णाम प्रावकाहियं रावणा इत्तरियावा होज्जा आवकहिया वा (सेतं ठवणावस्सयं)॥७॥ हिन्दी पदार्थ (सेकिंतं हवणावस्सयं) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! स्थापना आवश्यक कौनसा है ? गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! (वणा- वस्मयं ) स्थापना आवश्यक इस प्रकार से है जैसे कि-( जएणकठकम्मे ) जो काष्ठ कर्म अर्थात् काष्ठ में कोतड़ी हुई मूर्ति (वा) अथवा (चित्तकम्मे ) चित्र कर्म-पिक्चर (वा) अथवा (पात्यकम्मे ) वस्त्र की पुतली (लेप्पकम्मे) लेपकर्म (वा) अथवा ( गंठिये ) गुंथकर बनाया हुवा कोई रूप (वा) अथवा (वेढिमे ) वेष्टन से बनाया रूप (वा) अथवा (पूरिमे ) पीचल कांस्य आदि धातुएं पिघला कर प्रतिमा आदि बनवाना वा माता आदि, (वा) अथवा (संघाइमेवा ) वनादि खंडों के संघात से बना हुवा रूप संघातन (अक्खेत्रा) अक्षररूप पासा आदि ( बराइए ) अथवा वराह (कौडी प्रमुग्व) कर्म ( एगोवा) एक रूप अथवा ( अणेगोवा) अनेक रूप । ( सम्भावठवणा एवा ) सद्स्थापना जैसे कि-आवश्यक की आकृति पूर्ण प्रकार से स्थापन करना और ( असन्मावरणाएवा ) असद् रूप स्थापना जैसे कि वराट को आवश्यक मानना ( आवस्सएत्तिवणा ठिविजइ ) इस प्रकार से उक्त वस्तु को आवश्यक के अभिप्राय से स्थापना करना, (सेतंडवणावस्सय) वही स्थाप- नावश्यक है, अर्थात् इस प्रकार से स्थापनावश्यक माना जाता है, शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (नामछवणाणं) नाम स्थापना का (कोपइ- विसेसो) परस्पर क्या विशेष है ? क्योंकि दोनों का स्वरूप परस्पर प्रायः एक सामान्य है, गुरु कहते हैं कि भो शिष्य ! (णाम आपकहियं ) नाम आयु पर्यन्त रहता है अथवा यावत् उस द्रव्य की स्थिति हैं तावत् काल पर्यन्त उसका नाम रहता है किन्तुं स्थापना (हवणा इत्तरियावा होना) स्तोक काल तथा (आ- वकाहियावा हविज्जा) आयु पर्यन्त भी रह सकती है क्योंकि स्थापना मानने वाले की इच्छा पर निर्भर है इसलिये इतना ही परस्पर दोनों का भेद हैं (सेत- हवणावस्सयं) सा वही स्थापनावश्यक है ।। ! १ जैसे मुनि आवश्यक क्रियायें करता है, तद्वत् ध्यानयुक्र इसकी स्थापना करना उसे सद स्थापना कहते हैं।
* अनुयोगद्वार मूत्र * ( है ) भावार्थ:-स्थापना आवश्यक उसका नाम है जो चित्रादि कर्म हैं उनमें आवश्यक की पूर्णाकृति की जाय. यदि वे उसी प्रकार स्थापना की हुई है, तब चे सद्प स्थापना कही जाती हैं, यदि वरायादि को स्थापना माना हुआ है, तब वो असद् रूप स्थापना मानी जाती है और नामस्थापना का परस्पर भेद इतना ही है कि नाम आयु पर्यन्त रह सकता है स्थापना अल्प काल की भी हो सक्ती है, यावत् स्थिति पर्यन्त भी रह सकी है, सो इतना ही भेद होने पर इन को नाम और स्थापनावश्यक कहते हैं। किन्तु यहां पर स्थापना निक्षेप ही दिखाया गया है नतु पूजनीय, क्योंकि यदि वह पूजनीय ही होता तो सूत्रकार यहां उसका अवश्य ही विधान कर देते । अब द्रव्यावश्यक का वर्णन किया जाता है । मूल-सेकिंतं दवावस्सयं? २ दुविहं परणेत्तं तंजहा था- गमो यनोभागमभोय। सेकिंतंभागमो दवावस्सयं? २ जस्सएं श्रावस्सएत्ति पयं सिक्खियं ठियं जियं मियं परिजियं नामसमं घोससमं अहीणक्खरं अणशक्खरं अव्वाइद्धक्खरं अक्खलियं अमिलियं अवच्चामेलियं पडिपुग्नं पडिपुन्नघोसं कंठोढविप्पमुक्कं गुरुवायणोवगयं सेणं तत्थ वायणाए पुच्छ- णाए परियहणाए धम्मकहाए पो अणुप्पेहाए कम्हा ? अणु- वोगो दव्वमितिकडे ॥ ८ ॥ हिन्दी पदार्थ-( सेजिन दव्यावस्सयं ) वह कौनसा ट्रव्यावश्यक है ? गुरु कहते हैं (दवावस्सयं ) द्रव्यावश्यक (दुविहं पन्नतं ) द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है । (तंजहा) जैसे कि (आगमनोय) अागम से और (नोभागमओय) नो आगम से, शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (सेकिंतं आगमओ द- व्यावस्सयं ) आगम से द्रव्यावश्यक कौनसा है ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! (आममो दवावस्सयं ) आगम से द्रव्यावश्यक उसका नाम है कि, (जस्सणं ) जिसने ( आवस्सएति) आवश्यक ऐसे (पर्य) पद (सिक्खियं) सीख लिया है (ठियं ) हृदय में स्थित कर लिया है (जियं) अनुक्रयता पूर्वक पठन किया (मिय) अक्षरादि की मर्यादा भी भली भान्ति से जानता है (प- (१०) * अनुयोगद्वार मूत्र * रिजि) अननुक्रमता से भी पठन कर लिया है (नामसमं) अपने नाम की मापक याद किया गया है (घोससम) उदाचादि घोप भी सम हैं (अहीणक्खर) फिर हीन अलर भी नहीं है ( अणचक्खरं ) अधिक अक्षर भी नहीं है (अ- ब्वाइद्धक्वर) विपरीत अजर भी नहीं है और ( अस्खलियं) पाठ स्खलित भी नहीं है (अमिलिय) परसर मिले हुए अक्षर नहीं है तथा अन्य सूत्रों के पाठों के साथ भी वर्ग एकत्व नहीं हुए हैं (अबच्चामेलिय) अन्य सूत्रों के पाठ एकार्य म ज्ञात करके अन्य सूत्र से एकत्ल कर देने उसका नाम वच्चामेलिय है, तथा स्वमति से कल्पित करके अधिक पाठ कर देना उसका नाम भी बच्चा पलिय है सो वह आवश्यक रूप पद अवच्चामलियं रूप है फिर वह (पडिपुर्व) प्रतिपूर्ण और (पडिपुन्नयोस ) प्रतिपूर्ण घोष है फिर ( कंठोडविप्पमुक्कं ) कंठ और ओष्ट-होठ-दोनों के दोषों से रहित है, क्योंकि शुद्ध उच्चारण कंटादि के दोपों से रहित ही होता है, अपितु (गुरुवायोवगयं) गुरु से पठन किया हुआ है। किन्तु स्वबुद्धि से अध्ययन नहीं किया और नाही अविनय भाव से पठन किया है (सेणं तत्य वायणाए। सो वह आवश्यक पद वाचना करके (पुच्छगाए ) पृच्छणा करके ( परियट्टणाए ) परिवर्तना करके (धम्मकहाए ) धमकया करके तो पुनः पुनः अस्खलित किया हुआ है वह द्रव्यावश्यक है क्योंकि (णोअणुमेहाए) अर्थ जान पूर्वक अनुप्रेक्षा करके जिसकी पठनादि क्रिया एं नहीं की अथवा अनुप्रेक्षा नहीं की। शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि (कम्हा)- क्यों ! उसे द्रव्यावश्यक शहा जाता है ? गुरु ने उत्तर दिया कि (अणुवओगो- दव्यमितिशड) अनुश्योग की अपेक्षा वह द्रव्यावश्यक है, क्योंकि यदि वाचनादि क्रिया उपयोगपूर्वक की जाय तब वे भावावश्यक ही हो जाता, द्रव्यावश्यक इसी लिये ही कहा गया कि वह उपयोगशून्य है। भावार्थ-द्रव्यावश्यक द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- आगम से और ना आगम सरसो आगम रूप द्रव्यावश्यक उसका नाम है कि जिसने "आवश्यक" ऐसे एक पद सीखलिया है और उसको चतुर्दश. ज्ञान के दोषों से रहित ही उच्चारण करता है और घोष भी जिसका शुद्ध है, क- ठादि स्थान भी पवित्र है, साथ ही वाचना ? पृच्छना २ परिवर्तना ३ धर्मोपदेश ४ में भी उक्त पद को व्यवहत करता है। किन्तु एक अनुपेचा ही नहीं करता इस- लिये दह द्रव्यावश्यक है, क्योंकि यदि उपयोग पूर्वज अनुदेशा हो नव वह भा- ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पावश्यक हो जाए सो अनुपयोग के ही कारण से उसे द्रव्यावश्यक ऐसा पद दिया गया है। अथनयों की अपेक्षासे सूत्रकार द्रव्यावश्यक का विवेचन करते हैं। मूल-णेगमस्सणं एगो अणुवउत्तो आगमयो एग दव्वा वस्मयं दोन्नि अणुवउत्ता आगमश्रो दोन्नि दवावस्सलाई तिनिअगुवउत्ता प्रागमयो तिन्निदवावस्सयाई एवं जावइया अणुवउत्तो आगमयो तावइयाई दवावस्लयाई एवमेव ववहा रस्सवि ॥६॥ हिन्दी पदार्थ-(णेगमस्सणं एगो अणुव उत्तो)नैगमनय के मतमें यदि एक व्यक्ति अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करता है तो ( आगमओ) आगम से ( एगं. दवावस्सयं) एक द्रव्यावश्यक है अर्थात् नैगमनय के मत में एक द्रव्यावश्यक है यदि (दोन्निअणुवउत्ता) दो अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करते हैं तो (आगमओ) आगम से (दोनिदवावस्सयाई ) दो द्रव्यावश्यक हैं यदि (तिनिअगुवउच्चा) तीन पुरुष अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करते हैं तो ( आगपो ) श्रागम से (ति- निदवावस्सयाई ) तीन द्रव्यावश्यक हैं ( एवं जावइया) इसी प्रकार से यावत् परिमाण ( अणुवउत्तो ) अनुपयोग पूर्वक आवश्यक करते हैं ( आगमओ) आ- गम से ( तावइयाई) उतने ही परिमाण में (दव्यावस्सयाई ) द्रव्यावश्यक होते हैं ( एवमेत्र ववहारस्सवि ) इसी प्रकार मन्तव्य व्यवहार नयका भी है और अपि शब्द समुच्चार्थ में है ।। भावार्थ-जैगमनय के मतमें यावत् प्रमाण अनुपयुक्त आगम से द्रव्यावश्यक करते हैं उतने ही नैगम नय के मत से द्रव्यावश्यक होते हैं, अपितु इसी प्रकार व्यवहार नयका भी मन्तव्य है। मूल-संगहस्स णं एगोवा अणेगो वा अणुवउत्तोवाअणुव उत्तावा अागमत्रो दवावस्सरं वा दवावस्सयाणि वा से एगे दवावस्साए ॥ १०॥ हिन्दी पदार्थ-( संगहस्सणं) संग्रह नयके मन से ( एगो) एक (वा)अ- १२) * अनुयोगद्वार मूत्र * थवा ( अणेगो) अनेक ( अणुवउत्ती) एक अनुपयुक्त पूर्वक (वा)अथवा (अ. गुवउत्तावा ) वहुत अनुपयुक्त पूर्वक (दवावस्सयंत्रा) एक द्रव्यावश्यक करता है अथवा ( दबावस्सयाणिवा ) बहुत जन द्रव्यावश्यक करता है ( से एगे द- व्यावस्सए ) वह संग्रह के मत से एक ही द्रव्यावश्यक है ।। भावार्थ-संग्रह वय के मत से यदि एक वा अनेक पुरुष अनुपयोग पूर्वक द्रव्यावश्यक करते हैं वह सर्व एक ही द्रव्यावश्यक है क्योंकि समान और वि- शेष भाव को संग्रहनय एक रूप से ही मानता है ।। अथ ऋजुसूत्र नय विषय । मूल-उज्जुसुयस्स एगो अणुवउत्तो श्रागमत्रो एगंदव्या वस्सयं पुहुत्तं नेच्छइ ॥ ११॥ हिन्दी पदार्थ-( उज्जुसुयस्स एगो अणुवउत्तो आगमनो एगं दवावस्सयं पुहुत्तं नेच्छइ ॥ ११ ॥) ऋजुपूत्रनय के मत से एक अनुपयुक्त आगम से जो द्रव्यावश्यक करता है वह एकही द्रव्यावश्यक है किन्तु यह नय पृथक् २ प्रा. वश्यक की इच्छा नहीं करता क्योंकि यह नय वर्तमान काल के पदार्थों को ही स्वीकार करता है ॥ ११ ॥ भावार्थः-ऋजुमूत्रनय के मत में यावन्मात्र प्रमाण आगम से द्रव्यावश्यक करते हैं वे सर्व अनुपयुक्त होने से एकही आगम से द्रव्यावश्यक है क्योंकि अनुपयुक्त भाव सर्व में एक समान ही है, इसलिये यह नय पृथक् २ आवश्यक को स्वीकार नहीं करता ।। अथ शब्द, समभिरूढ एवंभूत नय विषय । मूल-तिएहं सदनयाणं जाणए अणुवउत्ते अवत्थु क- म्हा ? जई:जाणए अणुवउत्ते ण भवइ जइ अणुवउत्ते जाणए ण भवइ तम्हा नत्थि प्रागमत्रो दवावम्सयं सेतं श्रागमत्रो दव्वावस्सयं ॥ १२॥ हिन्दी पदार्थ:-(तिएहं सद्दनयाणं ) तीनों शब्द नयों के मत से जैसे कि शन्दनय १ समभिरूढनय २ एवंभूतनय ३ इन तीनों नयों का नाम ही शब्दनय है क्योंकि यह नय विशेप करके शुद्ध शब्दों पर ही स्थित हैं और Chhor * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १३ ) शुद्ध वस्तुओं को मानते हैं जैसे कि तीनों नयोंके मत से (जाणए अणुन- उत्ते अवत्थु ) जो जानता तो है किन्तु उपयोग पूर्वक नहीं है वह अवस्तु है (कम्हा ) क्योंकि- (जइ जाणए ) यदि जानता है तब (अणुवउत्तण भवइ) अनुपयोग युक्त नहीं है ( जइ अणुवउत्ते जाणए न भवइ ) यदि अनुपयोग युक्त है तब जानकार नहीं है-(तम्हा) इसी वास्ते ( नथि आगमओ दवावस्सयं) तीनों नयों के मत में आगम से द्रव्यावश्यक होता ही नहीं क्योंकि यह तीन नय शुद्ध वस्तु पर ही आरूढ हैं और उस आगमरूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु रूप से ज्ञात करते हैं इसलिये वे आगम रूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु करके मानते (सेतं आगमओ दन्नावस्सयं) वही आगम से द्रव्यावश्यक का स्वरूप सो यह द्रव्यावश्यक का स्वरूप पूर्ण हुआ। भावार्थः-तीनों शब्द नय अनुपयुक्त आगम रूप द्रव्यावश्यक को अवस्तु रूप से मानते हैं, क्योंकि इन नयों का मन्तव्य है कि-यदि जानता है तब अ- नुपयुक्त नहीं है यदि अनुपयुक्त है तब जानता नहीं है सूत्रों में आत्मा का गुण ज्ञान माना है इसलिये ज्ञाता और अनुपयुक्त यह दोनों परस्पर विरोधी भाव हैं इसलिये इन नयों के मत से आगम रूप से द्रव्यावश्यक नहीं होता है सो यह आगम रूप द्रव्यावश्यक का विवेचन पूर्ण हुआ । अथ नो पागम द्रव्यावश्यक का स्वरूप वर्णन किया जाता है। मूल-सेकिंतं नो भागमो दवावस्सयं ? २ तिविहं प. गणतं तंजहा-जाणगसरीर दबावस्सयं १ भवियसरीर दबावस्सय २ जाणगसरीर भवियसरीरवहरितं दवा- वस्सयं ३ सेकिंतं जाणगसरीरदबावस्सयं ? २ श्रावस्सएत्ति पयत्याहिगार जाणगस्स जं सरीरयं ववगयचुयचाविय चत्त देहं जीवविष्पजढं सिज्जागयं वा संथारगयंवा निसीहि- यागवं वा सिद्धसिलातलगर्यवापासित्ताणं कोईवएज्जा अहो! णं इमणं सरीर समुस्सएणं जिणोव इटेणं भावेणं श्रावस्सए- तिपयं प्राधवियं पण्णवियं परूवियं दंसियं निदसियं उवदंसियं . ( १४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * जहा कोदितो ? अयं महुकुंभे अासी अयं धयकुंभे आसी सेतं जाणगसरीरदव्वावस्सयं ॥ १३ ॥ हिन्दी पदार्थ-(सेकिंतं नो आगमो दवावस्सयं ) नो पागम से वह द्रव्यावश्यक कौनसा है जो केवल क्रियारूप तो है किन्तु पठन रूप नहीं है अपितु नो शब्द सर्वथा पठन का निषेध करता है अर्थात् क्रियारूप नो आगम द्रव्यावश्यक कौनसा हैं ऐसी पृच्छा करने पर गुरु कहने लगे कि (नो आगमओ दवावस्सयं तिविहं पन्नत्तं तंजहा) नो आगम द्रव्यावश्यक तीन प्रकार से प्र- तिपादन किया गया है जैसे कि-( जाणग सरीर दव्वावस्सयं ) प्रथमज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक जैसे कि आवश्यक के पूर्ण ज्ञाता का शरीर ( भविय सरीर दवा- वस्सयं) द्वितीय भव्य शरीर द्रव्यावश्यक जैसे कि आवश्यक के सीखने वाले का शरीर और ( जाणग सरीर भविय सरीर वइरित्तं दव्यावस्सयं) तृतीयज्ञ शरीर और भव शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक-यह तीनों प्रकार का नो आगम द्रव्यावश्यक है (सेकिंतं जाणग सरीर दवावस्सयं ) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक कौनसा है--गुरु कहने लगे कि (जाणग सरीर दवावस्सयं ) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक इस प्रकार से है जैसे कि-( आवस्सएत्ति ) आवश्यक के ( पयत्थाहिगार ) पद और अर्थ के अधिकार ( जाणगस्स) के जानकार का ( जं सरीरयं) जो शरीर है किन्तु ( ववगयचुयचाविय चत्तदेहं ) चेतना से रहित प्राणों से मुक्त होकर के बल शरीर ही उपचय रूप है अर्थात् जो जीव से रहित शरीर है ( जीव विप्पजढं ) और जीव का त्यागन किया हुआ जो शरीर हैं (सिज्जागर्यवा) शय्या गत हो अथवा (संथारगयंवा ) संस्तार कगत हो अर्थात् माण छूटने पर भी समाधिस्थ हो अयवा बैठा हुआ हो (सि- द्धसिलातलगयेवा) जिस शिला पर मुनि अनशन करते हैं उस शिला ,पर (पासित्ताणं) देख करके ( कोई वएज्जा) कोई भाषण करता कि (अहोणं इमेणं सरीर समुस्सएणं) अहो यह शरीर का समूह (जिणोव इटेणं भावेणं) जिनेन्द्र देव के उपदिष्ट भावों करके (आवस्सएत्तिपयं) आवश्यक इस प्रकार का पद (आपवियं) प्रतिपादन किया (पएणवियं ) प्रज्ञाप्त किया (परूवियं).विशेष करके प्रतिपादन किया ( दसिय निदसिय उवदसियं) आवश्यक पद को दिखाया और विशेष करके दिखलाया फिर उसका उपदेश करके इसने परिपक्क किया था (जहा को दिलुतो) किस दृष्टान्त से यह कथन सिद्ध हो जैसे कि ( अयं मझुकुंभे आसी) * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १५ ) यह मधु का घट था अधवा ( अयं घयकुंभे आसी) यह घृत का घट था क्योंकि घर वर्तमान काल में विद्यमान रूप तो है किन्तु घृन और मधु से रहित है. इसी प्रकार घट तुल्य शरीर तो है अपितु घृत और मधु के समान जीव आव- श्यक करने वाला वर्तमान काल में नहीं है इसी तिये ही उसका नाम ( सेत- जागगसरीर दव्यावस्सयं ) ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक है अर्थात् आवश्यक के जानकार का शरीर है। भावार्थ:-नो आगम द्रव्यावश्यक तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक १ भव्य शरीर द्रव्यावश्यक २ ज्ञ शरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त, द्रव्यावश्यक ३ सो ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक उसका नाम है जो आ- वश्यक को पूर्ण विधि से करता हुआ किसी स्थान पर मृत्यु को प्राप्त होगया, किन्तु आवश्यक की आकृति पूरी उसी प्रकार से है जैसे कि आवश्यक के करने वालों की होती है, इस में केवल जानने वाले की अपेक्षा से नैगमनय के मतसे ज्ञ शरीर द्रव्यावश्यक कहा जाता है; जैसे मधु वा घृत का घट था। अथ भव्य शरीर द्रव्यावश्यक विषय । मूल-सेकिंतं भवियसरीर दबावस्मयं ? २ जे जीवे जो- णिजम्मणनिक्खते इमेणं चेव प्रात्तएणं सरीरसमुस्सएणं जिणोव इट्टेणं भावणं श्रावस्सएतिपयं सेयकाले सिक्खिस्सइ न ताव सिक्खइ जहा को दिद्वैतो ? अयं महुकुंभे भविस्सइ अयं घयकुंभे भविस्सइ सेतं भवियसरीर दवावस्सयं सेकि- तं जाणगसरीरभवियसरीरवतिरित्तं दवावस्सयं ? २ तिविहं पन्नत्तं तंजहा लोइयं कुप्पावयणियं लोउनरिय। सेकिंतं लोइयं दव्वावस्सयं ? २ जे इमे राईसर तलवर माडंविय कोडुविय इन्भ सेट्टि सेणावइ सत्यवाह प्पभिइनो कल्लं पाउप्यभायाए रयणीए सुविमलाए फुल्लुप्पल कमल कोमलु म्मिलियम्मि अह पंडुरे पहाए रत्तासोगप्पगासकिंसुयसुय मुह गुंजद्धरागसरिसे कमलायर नलिणि संडवोहए उट्ठिय- ( १६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * म्मि सूरे सहस्सरस्तिम्मि दिणयरे तेयसा जलते मुहधोयण- दंतपक्खालणतेल्लफणिहीसद्धत्थयहारीयालय अदागधूव पुप्फ मल्ल गंध तंबोल वत्थाइयाई दवावस्सयाई काउं तो पच्छा रायकुलं वा देवकुलं वा प्रारामं वा उज्जाणं वा सभं वा पवं वाणिगच्छंति सेतं लोइयं दवावस्मयं । सेकिंतं कुप्पावयणियं दवावस्सयं ? २ जे इमे चरग चीरिय चम्मखंडिय भिक्खोंड पंडुरंग गोयम गोव्वइय गिहिधम्म धम्मचिंतग अविरुद्ध विरुद्ध बुढसावयपभिइयो पासंडत्या कल्लं पाउप्पभाए रयणीए जाव तेयसा जलते इंदस्स वा खदस्स वा रुदस्सवा सिवस्स वा वेसमणस्स वा देवस्स वा नागस्स वा जक्खस्स वा भूयस्स वा मुगुदस्सवा अज्जाएवा दुग्गाएवा कोट्टकिरियाएवा उवलेवण सम्मज्जणावरिस्स- पधून पुष्फ गंध मल्लाइयाई दवावस्सयाई करेंति सेतं कुप्पा वयणियं दवावस्सयं ॥ १४ ॥ हिन्दी पदार्थ-(सेकिंतं भवियसरीर दवावस्सयं ) शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! कि भव्य शरीर द्रव्यावश्यक कोनसा है ? गुरु कहते हैं (भः विय सरीर दवावस्सयं) भव्यशरीरद्रव्यावश्यक उसका नाप, है जैसे कि ( जेजीवे जोणिजम्मणनिखते ईमेणं चेव आत्तएणं . सरीर समुस्मएवं जिणोव इटुंगं भावेणं आवस्सएत्ति पयं सेयकाले सिक्खिस्मइ नतावसिक्खइ) जो जीव योनि के द्वारा जन्म को प्राप्त हो गया है और वह आगामी काल में अपने शरीर समुदाय करके जिनेन्द्र उपदिष्ट भाव से “ आवश्यक " एसे पद भवि- ष्यत् काल में सीखेगा; किन्तु वर्तमान काल में उसने आवश्यक के पद को धारण नहीं किया है-इस में दृष्टान्त देते हैं कि (जहा को दिछतो अयं भयकुमेझ विस्सइ ) जैसे कि यह घट घृत के लिये होगा । १ स्याद् भव्य चैत्य चौर्य समेषुयात् ॥ स्यादादिषु चौर्य शब्देन समेषुच सयुक्तस्य यात् पूर्व इद भवति ॥ प्राकृत व्याकरण-अ०८ पा०२सूत्र ।। १०७॥
! * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १७ ) (अयं महुकुंभे भविस्सइ) यह कुंभ मधु के वास्ते होगा, अर्थात् इस में घृत इसमें मधु रखा जावेगा (सेतं भवियसरीरदब्यावस्सयं) वही भव्य शरीर द्रव्यावश्यक है अर्थात् होने वाले शरीर को भव्य शरीर कहते हैं (से- किंतं जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्तं दवावस्सयं) इसके पश्चात् शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ज्ञ शरीर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक कौनसा है ? (जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्तंदवावस्सयं ) गुरु कहते हैं कि ज्ञ शरीर और भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक (तिविहं परणसं तंजहां) तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है-जैसे कि (लोइयं १ कुप्पावयणियं २ लोगुत्तरियं ३ ) लौकिक १ कुमावचनिक २-परमत वालों का और लोकोत्त- रिफ ३ ( सेकिंतं लोइयं दबावरतयं लोइयं दवावस्सयं) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि लौकिक द्रव्यावश्यक कौनसा है ? गुरु कहते हैं कि लौकिक द्रव्या- वश्यक इस प्रकार से है जैसे कि (जेइमे राईसरतलवर माविय कोडुबिय इन्भ सेट्ठिसणावइसत्यवाह पभिइओ) जो राजा, ईश्वर, कोतवाल-थानेदार- माडवि, बड़े परिवार वाला, प्रधान श्रेष्ठि-शेठ-सेनापति, : सार्थवाह प्रमुख लोग (कलंपाउप्पभायाए ) प्रभातकाल में किंचित् मात्र प्रकाश होते हुए और ( रयणीए ) रात्रि के व्यतिक्रम होने पर ( सुविमलाए) अतिनिर्मल आकाश होने पर (फुल्लुप्पल कमलकोमलुम्मिल्लियम्मि) विकसित होगये हैं कमल और नेत्र और (अह पंडुरेपभाए) प्रातःकाल में प्रकाश भी होगया है और जिसमें निम्नलिखित प्रकार से सूर्योदय हुआ है ( रत्तासोगप्पगास किंसुयसुय मुहगुंजद्धरागसरिसे) लाल अशोक वृक्ष के समान और केसुओं के पुष्प वा शुक मुख-तोते के तुल्य-तथा गुंजार्द्ध-अर्द्ध गुंजा, रती- के रंग स- मान ( कमलागर ) कमलों के जलाशय को जिसमें (नलीण संडबोहए) नलि नादि कमल हैं उनको अथवा कमलो के वन को प्रतियोधित करता हुआ । (ट्टियंमिसूरे ) उदय हुआ सूर्य जिसकी (सहस्सरस्सिमि ) सहस्र किरण : है ऐसा (दिणयरे) दिनकर (तेयसा) तेजसे ( जलते ) जो प्रकाश ।मान है उसके उदय होने पर ( मुहधोयणं ) मुख धोते हैं | (दंतपक्खालण) दांत प्रक्षालण करते हैं ( तेल्लफणिहसिद्धत्यय ) तेल * अर्थात् निन्दनीय भूस आदिकों की उपासना करने वाला ॥ - सह इनेन भर्तत इति सेना, इन. प्रभो सूर्ये नृपे इत्यादि ।। ३ 1- * अनुयोगद्वार सूत्र * अथवा केश समाचरण फणि अर्थात्-कंघी (सिद्धत्यय ) सरसों के पुष्प ( हरियालिए.) हरिताल अर्थात् दूब ( अदाग ) दर्पण, (धूव पुप्फ) धूप पुष्प ( मल्लगंध) माला अथवा सुगंध (तंबोल) ताम्बूल-पान-( वत्थमोइयाई वस्त्रादि को भी पहिरते हैं ( दवावस्सयाई करेंति ) सो द्रव्यावश्यक इस प्रकार से वह नित्य ही करते हैं फिर वह इस प्रकार से द्रव्यावश्यक करके ( तमोपच्छा रायकुलं वा देवकुलं वा सभं वा पवं वा) तत्पश्चात् राजकुल में अथवा देवकुल में अथवा सभा में पानी के स्थान में ( आरामं वा उज्जाणवाणिगच्छति ) श्राराम अर्थात् बाग में अथवा उद्यान में वीड-जाते हैं (सेतंलोइयं दव्या- वस्मयं ) वही लौकिक द्रव्यावश्यक है (सेकिंतं कुप्पावयाणियं दव्यावस्सयं फुप्पावयणियं दवावस्सयं) अथ कुभावचन का वर्णन किया जाता है, शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! कुमावचनिक द्रव्यावश्यक कौनसा है ? गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! कुमावनिक द्रव्यावश्यक इस प्रकार से है जैसे कि (जे इमे चरग ) जो चरक (चीरिय ) वस्त्र के पहिरने वाले (चम्मखंडिय ) चर्म खंड रखने वाले तथा मृग शाला धारण करने वाले (भिक्खोंड ) भिक्षा करने वाले ( पंडुरंग ) भस्म शरीर के लगाने वाले (गोयम गोयन्वइयं)वृषभादि के निमित्त से आजीविका करने वाले जैसे वृषभ कोश्रृंगार के आजीविका के करने वाले और गौवृत्ति के समान भोजन करने वाले अर्थात् जैसे गो क्रिया करती है उसी मकार काम करने वाले और (गिहधम्म) गृहस्थधर्म के उपदशेक (धम्म चिंतगा) धर्म के चिन्तन करने वाले अर्थात् लौकिक शास्त्र अध्ययन करने वाले ( अविरुद्ध) विनयवादी-विरुद्ध-नास्तिकवादी ( वुहसात्रय ) वृद्ध श्रावक ब्राह्मणों का नाम है क्योंकि इन्होंने जैन धर्म को श्री ऋषभदेव भगवान् के समय धारण करके फिर पीछे त्याग कर दिया इसी करके इन्होंका नाम आजपर्यन्तभी वृद्ध श्रावक करके चला आता है (पभिओ) सो वृद्ध श्रावक प्रमुख (पासंडथा) यावत्ममाण पाखंडी है वे सर्व (कल्लंपाउप्पभायाए) प्रातःकाल होते ही जिस समय किञ्चिन्मात्र ही प्रकाश होता है (रमणीय) रात्रि व्यतिक्रम होजाती है (जावजलते) यावत् जाज्वल्यमान सूर्य प्रकाश करता है उसी समय वे उक्त सर्व (इंदस्सवा) इन्द्र को अथवा : खंदस्सपा) स्कद को ( रुदस्सवा ) रुद्र को (सिवस्सवा) शिवको (वेसमणस्सवा ) वैश्रवण को ( देवस्सवा ) देव को (नागस्सवा ) नागकुमार को (जक्खस्सवा ) यक्ष को (भूयस्सवा) भूत को (मुगुदस्सवा ) वलदेव को (अ- - * अनुयोगद्वार भून * ( १ ) ज्जाएवा ) आर्य देवी अथवा (दुग्गाएवा ) दुर्गा को ( कोकिरियाएवा ) -कोह क्रिया उसका नाम है जो देवियां हिंसा करवाती हैं-प्रतिमा और यह सर्व उपचार नय के मत से इन के आयतनही समझेन चाहिये क्योंकि यह द्रव्यावश्यक कुमावचनिक तीनों काल की अपेक्षा से है इसलिये इनके मंदिर ही ज्ञात करने चाहिये सो वे लोग इनके स्थानों को अथवा इनकी प्रतिमाओं को ( उवलवण लेपन करते हैं (सम्मज्जण ) संमार्जन करते हैं ( परिसण ) पानी के छींटे देते हैं । (धूव पुष्फ) धूप और पुष्प चढाते हैं (गंध मल्लाइयाई ) सुगंध और पुष्पमालादि भी चढाते हैं इस प्रकार से वे (दबाबस्सयाई करेंति ) द्रव्यावश्यक करते हैं (सेतं कुष्पावणिय दवावस्सय ) यही कुपावचनिक द्रव्यायक है क्योंकि कु अव्यय निन्दा अर्थ में व्यवहत है इसलिये जिन का कुमावचन है वे उक्त प्रकार से द्रव्यावश्यक करते हैं। भावार्थ:-भव्यं शरीर द्रव्यावश्यक उसका नाम है जिस जीव ने भविष्यत् काल में अईन देव के उपदेशानुकूल आवश्यक सीखना है, किन्तु वर्तमान काल में वह आवश्यक का अज्ञाता है जैसे यह घट, मधु वा घृत के लिये होगा. इसी प्रकार अमुक व्यक्ति भविष्यत् काल में आवश्यक सीखगा उसी का नाम भव्य शरीर द्रव्यावश्यक है अपितु जो ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त आवश्यक वह तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि १ लौकिकी, कुमावचनिक २, लौ कोत्तरिक ३ सो लौकिक द्रव्यावश्यक उसको कहते हैं जैसे कि-राजा, ईश्वर, (तलवर ) कोतवाल, धनाड्य कौटुंबिक, प्रधान सेठ, सेनापति, सार्थवाह, प्रभृति लोक प्रातःकाल होते ही मुखधावन, दंतप्रक्षालन, तैल कंघी सरसों को पुष्प, दुर्गादि का स्पर्श करके दर्पण को देखकर फिर धूप पुष्पमाला सुगंध ताम्बूल वस्त्रादि को पहिन कर फिर इसी प्रकार से नित्यमेवही द्रव्यावश्यक करके तत्पश्चात् राजद्वार वा यथेष्ट स्थानों में चले जाते हैं सो इसी का ही नाम लौकिक द्रव्यावश्यक है, किन्तु जो कुमावचनिक है जैसे कि-चरक चीर को धरने वाले, चर्म खडको पहिरने वाले भिक्षा से आजीविका करने वाले अंगपर भस्म लगाने वाले, गोतमवृत्ति, वा गोवृत्ति से निर्वाह करने वाले गृहस्थ धर्म के उपदेशक अथवा धर्म के चिन्तक विनयवादी वा नास्तिक आदि लोग प्रातः काल होते हुए इन्द्रादि के मन्दिरों में जाकर यथोचित क्रियायें करते है तो उसीका ही नाम कुमावनिक द्रव्यावश्यक है और अब लोकोचर व्यावश्यक (२०) * अनुयोगद्वार सूत्र * का वर्णन किया जाता है। मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियं दवावस्सयं ? २ जेइमे समण गुणमुक्कजोगी छकायणिरणुकंपा हया इव उद्दामा गया इव निरंकुसा घट्टा मट्ठा तुप्पोट्टा पंडुरपडपाउरणा जिणाणम पाणाए सच्छदं विहरिउणं उभोकालमावस्सगस्सउवट्ठति सेतं लोगुत्तरियं दवावस्सयं सेतं जाणगसरीरभविय सरीरवहरि दवावस्सयं सेतं नो भागमो दवावस्मयं सेतं दवावस्सयं । पदार्थ-(सेकिंतं लोगुत्तरियं दवावस्सय २) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! लोकोत्तर द्रव्यावश्यक कौनसा है। गुरु ने उत्तर दिया कि (जे इमे समण गुणमुक्कजोगी) जो यह प्रत्यक्ष साधु गुंणों से रहित और जिसने अपने योगों को संयम से वाहिर कर लिया है और ( छक्काय निरणुकंपा) षट्काय के जीवों की अनुकंपा से भी रहित होगया है अपितु निर्दय होकर (हया इक उद्दामा ) अश्व की नाई शीघ्र गामी है क्योंकि जैसे घोड़ा चलता हुआ अवि- वेक से जीवों का उपमर्दन करता है उसी प्रकार वह मुनि होगया, किन्तु (गया इवणिरंकुसा ) हस्ती की नाई निरंकुश है किसी की भी आज्ञा नहीं मानता (घट्टा मट्ठा तुप्पोट्ठा ) नवनीत करके जांघों को मर्दन किया हुआ है, तैलादि करके शरीर और मस्तिष्क भी अलंकृत है फिर जिसके ओष्ट भी शृंगारित हैं अपितु ( पंडुरपडपाउरणा ) श्वेत वस्त्र. को जिसने पहिरा हुआ है, और ( जिणाणपणाणाए ) अर्हतों की बिना आज्ञा ( सच्छंद विहरिउणं ) स्वच्छन्दता सं विचर करके जो ( उभोंकाल श्रावस्सयस्स उवढवि ) दोनों काल में आवश्यक को करता है अर्थात् आवश्यक के लिये दोनों काल में सावधान होता है, अपितु सूत्र में चतुर्थी के स्थान में पष्ठी विभक्ति दी हुई है सो वह (सेतं लोगुचरियं दबाबस्सयं) लोकोत्तर द्र- व्यावश्यक है क्योंकि यह द्रव्यावश्यफ इसलिये है कि कथन मात्र ही यह आ- वश्यक है और यहां पर नो शब्द देश निषेधक है ( सेतं जाणगसरीरभविय सरीर रित्तं दवावस्सयं) अब इस की पूर्ति इस प्रकार से की जाती है कि .
. * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २१ ) यही ज्ञ शरीर भव्य शरीर से व्यतिरिक्त द्रव्यावश्यक है (सेतं नो आगमओ दवाक्स्सयं सेतं दवावस्सयं) अथानन्तरम् नोआगम द्रव्यावश्यक पूर्ण हो गया है और इसी का ही नाम द्रव्यावश्यक है । भावार्थ-लोकोतरिक द्रव्यावश्यक उसका नाम है जो साधु गुणों से रहित पदकाय में दया न करने घाला अश्व की नाई शीघ्रगामी गजवत् निरंकुश श्वेत वस्त्रों को धारण करने वाला, अपितु निसने शरीर को शृंगारित किया हुआ अतः अरिहंतों की आज्ञा से रहित स्वच्छन्दता से विचरकर जो दोनों समय आवश्यक के लिये सावधान होजाता है उसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीरव्यतिरिक्त लोकोत्तरिक नो आगम द्रव्यावश्यक है क्योंकि पठन रूप ही उसका कर्तव्य है । इसीलिये उसका नाम नो आगम द्रव्यावश्यक है। इस के अनन्तर भावावश्यक का व्याख्यान किया जाता है। ® अथ भावावश्यक विषय मूल-सेकिंतं भावावस्सयं ? २ दुविहं पण्णत्तं तंजहा आगमत्रोय नो आगमीय सेकिंतंभागमो भावावस्सयं ? २.जाणए उवउत्ते सेतं प्रागमत्रो भावावस्सयं ॥ पदार्थ-(सेकिंतं भावावस्सयं) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! भा- वावश्यक कौमसा है ? तब गुरु कहने लगे ( भावावस्सयं) भावावश्यक (दु- विहं पएणचं तंजहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (आगम- ओय नो आगमओय ) आगम से और नोआगम से अर्थात् क्रिया रूप | शिष्य : ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ( सेकिंतं आगमओभावावस्तयं २ ) आ- गम से भावावश्यक कौनसा है ? तब गुरुने उत्तर दिया कि ( जाणए उवउत्ते) जो आवश्यक के स्वरूप का उपयोग पूर्वक जानता है, उसी का नाम आगम से भावावश्यक है (सेतं आगमओभावावस्सयं) अथानन्तर इसी का नाम आगम से भावावश्यक है सो आगम से भावावश्यक का स्वरूप पूर्ण हुआ । भावार्थ:-भावावश्यक दो प्रकार से वर्णन किया गया है-एक तो आगम से और द्वितीय नो आगम से जो आवश्यक के स्वरूप को उपयोग पूर्वक जानता है और आत्मा के भाव उसमें स्थित है वह आगम से भावावश्यक है। 1-श्वेतवस्त्रादि इसके विशेषण पद है ॥
" ( २२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ द्वितीय भेद विषय । मूल-सेकिंतं नो आगमी भावावस्सयं ? २ तिविह पन्नतं तंजहा लोइयं कुप्पावणियं लोगुत्तरियं, सेकिंतं लो- इयं, भावावस्सयं? २ पुबरहे भारहं अवरण्हे रामायणं सेतं लोइयं भावावस्सयं। पदार्थः-( सेकिंतं नो आगमओ भावावस्सयं२ ) शिष्यने पूछा कि हे भग- चन् ! नो भागम भावावश्यक कौनसा है ? गुरुने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! नो आगम भावावश्यक (तिविहं पन्नतं तंजहा) तीनों प्रकार से कथन किया गया है जैसे कि-( लोइयं कुप्पावणियं लोगुत्तरिय ) लौकिक १ कुप्रावचानक २ लोकोत्तरिक ३ (सेकितं लोइयं भावावस्सयं २ पुचण्हे भारह अवररहे रामायणं सेतं लोइयं भावावस्सयं) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हेभगवन् ! लौकिक भावावश्यक कौनसा है ? गुरुने फिर कहा कि हे पृच्छंक ! जो लोग प्रथम प्रहर में भारत और अपरान्ह (पश्चिम ) काल में रामायण सुनते हैं वा पठन करते हैं उसी का नाम लौकिक भावावश्यक है। भावार्थः-नो आगम भावावश्यक तीन प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि लौकिक १ कुमावनिक २ लोकोत्तरिक ३ अपितु जो प्रातःकाल में भारत वा वेदाध्ययन करते हैं और अपरान्ह काल में रामायणादि ग्रन्थों को भावपूर्वक अध्ययनादि करते हैं उसी का नाम लौकिक भावावश्यक है । अथ कुप्रावचनिक भावावश्यक विषय । मूल-सेकिंतं कुप्पावयणियं भावावस्मयं ? २ जेइमे च- रंग चीरिय जाव पासंडत्था इज्जं जलि होम जप उंदुरुक्कण मोकारमाइयाई भावावस्सयाई करेंति सेतं कुप्पावयणियं भावावस्सयं । पदार्थ-(प्रश्न ) कुप्रावचनिक भावावश्यक कौनसा है ! (उत्तर) कुभावच. निक भावावश्यक उसका नाम है जैसे कि (जेइमे चरग चीरियंजीव पासंडत्या) जो चरक वस्त्रधारी यावत् पापंडी जो पूर्व कथन किये गये हैं .वे सर्व ( इज्ज- ।
* अनुयोगद्दार सूत्र * ( २३ ) जलि ) यज्ञव्य अपने इष्टदेव के सन्मुख हाथ जोड़ते हैं तथा निज माता को नमस्कार करते हैं अथवा ( इजलि ) अपने इष्टदेव को अंजलि द्वारा नमस्कार करके तथा पानी देकर ( होम ) हवनादि क्रियायें करने हैं फिर (जप) गायत्री प्रमुख मन्त्रों का जाप करते हैं ( उंदुरुक्कणमोकारमाइयाई भाषावस्सयं करेंति ) मुख से वृषभवत् शब्द करके फिर नमस्कार आदि पूर्ण क्रियायें करते हुए इस प्रकार से भावावश्यक पूर्ण करते हैं, (सतं कुप्पावयणिय भावावस्सयं) यही कुमावचनिक भावाश्यक है। भावार्थ-कुमावनिक भावावश्यक उसे कहते हैं जो परमतवाले लोग अपने इष्टदेव को अंजलि द्वारा नमस्कार करते हैं पुनः हवन और जाप करके वृषभवत् शब्द करते हैं, फिर नमस्कार प्रमुख भावावरंयक उक्त प्रकार से करके अपने भावावश्यक की पूर्ति करते हैं, यही कुप्रावचनिक भावावश्यक है । अथ लोकोत्तरिक भावावश्यक विषय । : मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियं भावावस्सयं ? २ जणं इमे समणो वा समणी वा सावत्रो वा साविया वा तचित्ते तम्मणे. तल्लेसे तदभवसिए तत्तिबज्झवसाणे तदट्ठोवउत्ते तद- प्पियकरणे तब्भावणाभाविए रोगमणे अविमणे जिण वयण धम्मरागरते तव्भावणा भाविए' अण्णत्थ कथइ मणमकरे भाणे उभोकालं श्रावस्मयं करेई सेतं लोगुत्तरियं भावाव- स्सयं सेतं नोबागमत्रो भावावस्सयं तस्सणं इमे एगडिया नाणाघोसा पाणावंजला नामधेज्जा भवंति तंजहा अाव- स्सयं अवस्सकरणिज्जं धूवणिग्गहो विसोहीय । अझय- णच्छकवग्गो । नात्रो अाराहणामग्गो ॥१!! समणेण सावएणय।अवस्सकायव्वयं हवइ जम्हा|अंतोंअहो निसस्सय तम्हा श्रावस्सयं नाम ॥ २ ॥ सेतं श्रावस्सयं ॥ पदार्थ-(सेकिंतं लोगुत्तरियं भावावस्सय २) लोकोत्तरिक भावावश्यक कौनसा है ? ऐसे शिष्य के प्रश्न करने पर गुरु कहने लगे कि भो. शिष्य !
( २४ ) * अनुयोगद्वार मुत्र * लोकांपरिक भावावश्यक इस प्रकार से है कि जैसे (जणं समोवा), जो साधु अथवा ( ममणीवा ) साध्वी अथवा ( सावओवा ) श्रावक वा (सावियावा) श्राविका (तचित्त ) जिनका आवश्यक में चित्त है ( तम्मणे ) आवश्यक में मन है ( तल्लेसे ) आवश्यक में भाव है ( तदभवसिए ) आवश्यक के अध्यवसाय है ( तत्तिबज्भवसाणं ) अन्तःकरण में आवश्यक कातीव अध्यत्र- साय है ( तदद्यांवउत्त) और आवश्यक के अर्थों में उपयोग लगा हुआ है (तदपियकरणे) आवश्यक के योग्य उपकरण जैसे कि रजौहरण, मुखपति आदि भी शुद्ध है अर्थात् आवश्यक के अनुकूल है ( तव्भावणाभाविए) और आवश्यक के विषय ही एकांत भाव और उसी की भावना है फिर ( रागमणे ) आवश्यक के विषय एकाग्रमन है (अविमणे ) अपितु विमन नहीं है जैसे कि चित्त की विकल्पता (जिणवयण ) जिन वचनों में अथवा (धम्माणुरागरतमणे ) धर्मानुराग में रक्त है मन जिनका फिर (अण्णत्व कत्थई मणं अकरेमाणे ) अन्यत्र कहीं पर मन न करते हुए जो (रमओकालं आवस्मयं करेई ) दानों काल में शुद्ध आवश्यक को करते हैं (सेतं लोगुत्तरियं भावावस्सयं ) वही लोकोत्तर भावावश्यक है ( सेतं नो आगमओभावावस्मयं) अथ इसी का नाम नो आगम सं भावावश्यक ( सेन भावावस्सयं ) अथानन्तर 'इसी प्रकार से भावावश्यक होता है और यही भावावश्यक है किन्तु (तस्सणं इमे.एगाड़ियां ) उस आवश्यक के परमार्थ करके एकार्थ रूप (मायोसा ) नाना प्रकार के घोप है ( नाणा वंजणा नागवेना भवंति ) और नाना प्रकार के व्यजनों से युक्त इस आव- श्यक के नाम भी हैं ( तंजहा) जैसे कि (आवस्मयं अवस्सं करणिज्ज) आवश्यक उसी का नाम है जो अवश्य करणीय है अपितु यह शब्दार्थ है किन्तु पर्यायार्थ इस प्रकार से है जैसे कि ज्ञानादि गुण वा मोच जिसके वश में है उसी का नाम आवश्यक है अथवा सर्व प्रकार से इन्द्रिय जिसके वश में हो उसी का नाम आवश्यक है अथवा जो सर्व गुणों का आवास भूत है वही आवश्यक है सो यह आवश्यक (धूवनिगहो ) धूव और इन्द्रियों के निग्रह करने वाला है (विसोहीयं) कर्मों की शुद्धि करने वाला है ( अझयणच्छक्क- चंग्गो) सामायिक आदि षट् अध्यायों का एक वर्ग है (नायो आराहणामग्गो) न्यायकारी है जीव को आराधना कराने वाला और मोक्ष का मार्ग है सो - . * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २५ ) (समणेणं ) साधु को अथवा ( सावएण) श्रावक को उपलक्षण से साध्वी और श्राविकाओं को ( अवस्सकायस्सोव्वयं हवइ जम्हा अंतो अहोनिसरंस सम्हा आवस्सयं नामं २ ) जो रात्रि दिवस के अन्तर में अवश्य ही करणीय है, इसी करके आवश्यक इसका नाम स्थापित है अथवा जो दोनों समय अवश्य- फरणीय है इसी करके आवश्यक इसका नाम स्थापित हुआ है ( सेतं भाव- स्सयं) इस प्रकार से आवश्यक का स्वरूप है। इतिश्री अनुयोग द्वार सूत्र में आवश्यक नामक प्रथमाधिकार समाप्त हुआ | भावार्थः-लोकोतरिक भावावश्यक उसका नाम है जो साधु साध्वी श्रावक भाविकायें एकाग्रता के साथ जिनवचनों में चित्त रखते हुए दोनों समय आवश्यक करते हैं वही नो आगम से लोकोत्तरिक भाषावश्यक है अथवा इस आवश्यक के एकार्थरूप शब्दों के नाना प्रकार के घोष व नाना प्रकार के व्यंजन हैं और चतुर्विध के संघ को अवश्य ही करणीय है क्योंकि ब्रुव और इन्द्रियों के निग्रह करने वाला विशुद्धि का मार्ग है सामायिकादि षट् अध्याय रूप एक वर्ग है न्यायकारी और मोक्षकामी मार्ग है साधु साध्वी और श्रावक श्राविकाओं को रात्रि और दिवस के अन्तर में अवश्य ही करणीय है, इसी लिये आवश्यक इसका नाम है और गुणों का आश्रयभूत है । इतिश्री अनुयो- गद्वार सूत्र में ( शास्त्रमेवा ) आवश्यक नाम प्रथमाधिकार समाप्त हुआ । अथ श्रुतशब्द के निक्षेप चतुष्ठय के विषय में कहते हैं . 'मूलं-सेकिंतं सुयं २ चरविह पण्णत्तं तंजहा नामसुयं ठवणासुयं दव्वसुयं भावसुयं नाम ठवणायो भणियो सेकिंतं दव्वसुयं ?२दुविहं परणत्तं तंजहाागमोय नोआगमनोय सेकिंतं पागमत्रो दव्वसुयं १२ जस्सणं सुएत्ति पयं सिक्खियं ठियं मियं जियं परिजियं जीव णो अणुप्पेहाए कम्हा ? श्र- णुवयोगो दव्वमितिकडु णेगमस्सणं एगो अणुवउत्तो पाग- मनो एगं दब्बसुयं जाव जाणए अणुवउत्तण भवइ सेतं श्रा- ( २६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र गमो दव्वसुयं सेकिंतं नो आगगंभो दव्वसुयं ? २ तिविह पण्णत्वं तंजहा जाणमसरीरदव्वसुयं भवियसरीरदव्वसुर्य' जाणगसरीरभवियसरीरबहरिनंदव्वसुयं सेंकिंतं. जाणग सरीरदव्वसुयं ? २ सुयपदत्याहिगारजाणयस्स जं सरीरयं. ववगयचयच । विय चत्तदेहं तंचव पुवभणियं भाणियब्बं जाव सेत्तं जाणगसरीर दव्वसुयं । सेकितं भावियसरीरदव्वसुयं ? २ जे जीवे जोणीजम्मणनिक्खंते जहा दवावस्सए तहेव भाणियव्वं जाव सेत्तं भवियसरीरदव्वसुयं सेकिंतं जाणग सरीरभवियसरीरवइरित्तं दध्वसुयं रत पत्तयपोत्थयलिहियं । पदार्थ-(सेकिंतं सुयं २ चरविहं पन तंजहा ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! श्रुत कितने प्रकार से वर्णन किया है ?.गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! श्रुत चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( नामसुयं ठवणासुयं दध्वसुयं भावसुयं ) नामश्रुत १ स्थापनाश्रुत २ द्रव्यश्रुत ३ और भाववैत ४ सो ( नाम ठवणाओ भणिओ ) नामश्रुत और स्थापना श्रुत का वर्णन पूर्ववत् है जैसे आवश्यक के स्वरूप में किया गया है उसी प्रकार जानना (सेकिंतं देवसुयं २ ( प्रश्न ) द्रव्य श्रुत के कितने भेद हैं ( उत्तर द्रव्य श्रुत ( दुविहं पन्नत्तं तंजहा ) दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( आगमओय नोआगमओय ) आगम से द्रव्यश्रुत ( सूत्र ) और नोआगम से द्रव्यश्रुत ( सेकिंतं आगमउ दव्वसुयं २)(प्रश्न ) आगम से द्रव्य सूत्र (श्रुत ) कैसे होता है ( उत्तर ) आगम से द्रव्यश्रुत इस प्रकार से है जैसे कि (जस्सणं सुएत्ति पयं सिक्खियं ठियं मियं जियं परिनियं जाव णो अणुप्पेहाए) जिसने श्रुत ऐसे पद. सीख लिया है और ह्रदय में स्थापना कर लिया है और जिसको अक्षरों की मात्रा का भी बोध होगया है और पूछने पर अस्खलित है किन्तु पश्चात् अनुपूर्वी से भी स्पष्ट हो रहा है यावत् अनुप्रेक्षा से रहित होकर पठन किया जाता है अर्थात् पठन करते समय उपयोग पूर्वक पठन नहीं किया जाता (कम्हा) किस लिये ( अणुवउग्गो दव्वमितिकड्ड अनुपयोग पूर्वक होने पर ही .उसको द्रव्यश्रुत कहा जाता है सो ( णेगमस्सणं एगो अपुंच .
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( २७ ) उत्तो आगमउ एग दव्वसुय) नैगमनय के मत से एक अनुपयुक्त आगम से एक द्रव्य ध्रुत है ( जाव जाणए अणुवउत्तेण भवइ) यावत् यदि जानता है. तव अनुपयुक्त नहीं है । यदि अनुपयुक्त है तब जानता नहीं है जहां पर्यन्त यह पाठ है वहां पर्यन्त (सेतं आगमउ दबसुयं ) वही आगम से द्रव्य श्रुत है-(से किं तं नो आगमउ दव्वसुयं २ ) (प्रश्न ) वह कौनसा है जो नो आगम से द्रव्य श्रुत माना जाता है ( उत्तर ) द्रव्य से नो आगम श्रुत (तिविहं पन्नत्तं तंजहा) तीनों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि:-( जाणयसरीरदबसुयं) ज्ञ शरीर द्रव्य श्रुत १ ( भविय-शरीर दन्चसुयं ) भव्यशरीर द्रव्यश्चत २ (जाणग सरीरभावियसरीरवइरित्तं दबसुयं) ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्य Qत ( सेकितं जाणगसरीरदासुय २) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हे भग- वन् ! ज्ञ शरीर द्रव्यश्रुत किसको कहते हैं ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! ज्ञ शरीर द्रव्यश्रुत उसका नाम है जैसे कि-(सुयपदत्याहिगार जाणयस्स जं सरीरयं ववगयचुयेचवियचत्तदेहं तं चेव पुनमणियं भाणियब्वं जावसेत्तं जाणय • सरीरँदवसुयं ) श्रुतपद के अर्थाधिकार के ज्ञाता का जो शरीर है जिससे जीव च्युत होगया है और शरीर जीव से रहित है जैसे कि पूर्व वर्णन किया गया है उसी का नाम ज्ञ शरीरं द्रव्यश्चत है (से किंतं भवियसरीरदबसुयं २ जे जीवें जोणी जम्मण निक्खंत्ते जहा दवावस्सयं तहा भाणियव्वं जावसेत्तं भवियसरीरं दव्वसुयं ) ( प्रश्न) भव्यशरीर द्रव्यथुन किस का नाम है ( उत्तर ) जो जीव योनि के द्वारा जन्म लेकर श्रुतपद सीखेगा जैसे क्रि-पूर्व द्रव्यावश्यक का वर्णन किया गया है उसी प्रकार द्रव्यश्रुत का वर्णन जान लेना सो वही द्रव्यश्रुत है (सेकिंत जाणयसरीर भवियशरीरवरितं दव्वसुयं तं० पत्तयपोत्थय लिहियं ) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि भगवन् ! ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यति. रिक्त द्रव्यश्रुत किस का नाम है ? गुरु ने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! ज्ञ शरीर भव्य सरीर व्यतिरिक्त द्रव्यश्रुत उसका नाम है जैसे कि-पत्र अथवा पुस्तक पर जो लिखा हुआ श्रुत है उसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यश्रुत है । पुस्तक को द्रव्यश्रुत का पद इसलिये दिया गया है कि भावश्रुत का अधि- करण है। भावार्थः-श्रुत शब्द के भी चार निक्षेप हैं जैसे कि-नाम १ स्थापना २ द्रव्य ३ और भाव ४ । सो नाम और स्थापना का स्वरूप जैसे आवश्यक शब्द के (. २८) * अनुयोगद्वार सूत्र * स्थान पर वर्णन किया गया है वैसे ही जानलेना किन्तु द्रव्यश्रुत के दो भेद हैं आगम से और नोआगम से आगम से पूर्ववत् कथन है जैसे कि-श्रुतशब्द को सर्व प्रकार से धारण किया हुआ है किन्तु अनुपयुक्त पूर्वक है । इसलिये नैगम और व्यवहार नय के मत से यावन्मात्र अनुपयोग पूर्वक पठन करते हों ताव- मात्र द्रव्यश्रुत हैं किन्तु संग्रह और ऋजुसूत्र नय के मत से यावन्मात्र पठन करते हो अनुपयोग पूर्वक होने से एक ही द्रव्यश्रुत है। अपितु तीनों शब्दादिक नयों के मत से अश्रुत है क्योंकि यदि जानता है तो अनुपयुक्त नहीं है. यदि अनुप- युक्त है तब जानता नहीं है। यही द्रव्य से आगम.श्रुत है और नोआगम से द्रव्य श्रुत तीनों प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ज्ञ शरीर द्रव्यश्रुत १ भव्य शरीर द्रव्यश्रुत २ ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यश्रुत ३ सो प्रथम दोनों का स्वरूप तो पूर्ववत् ही है किन्तु ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तश्रुत जो पत्र और पुस्तक पर लिखा हुआ हो तो उसका नाम भी श्रुत है । क्योंकि जो पुस्तकों पर सूत्र लिखे हुए हैं वे आगम से द्रव्य सूत्र हैं, क्रियादिरहित होने से उनकी द्रव्य संज्ञा होगई है ॥ अर्थात् प्राकृत में श्रुत शब्द तथा सूत्र शब्द इन दोनों के लिये केवल "सुय" पद का प्रयोग किया जाता है । इसीलिये अब सूत्र "डोरा" शब्द के विषय में वर्णन किया जाता है। मूल-अहवा जाणगभवियसरीरवहरिचंदव्वसुर्य पंचविह पगणतं तंजहा अंडयं वोडयं कीडयं वालयं वक्यं सेकिंतं अंडयं? २ हंसगम्भाई वोडयं कप्पासमाइ कीडयं पंचविहं पन्नत्तं तंजहा पट्टे मलए अंसुए चीणंसुए किमिरागे वालयं पंचविहं पएणतं तंजहाउरिणय उद्दिय मियलोमेय कोतवे किहिसे सेत्तं वालयं सेकिंतं वक्षयं सरणमाइ सेत्तं वश्यं सेत्तं जाणगसरीर भवियसरीस्वहरितं दबसुयं सेत्तं नो अागमो दव्वसुयं सेत्तं दव्वसुयं । पदार्थः-(अहवा ) अथवा ( जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्तं दबसुर्य पंचविहं पन्नतं तनहा ) ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यसूत्र पांच प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-अंडयं बोडयं कीडयं वालयं वयं) अंड से * अनुयोगद्वार सूत्र * (२६) उत्तम होने वाला सूत्रफल से उत्पन्न होने वाला कृमि से अथवा वाल और वल्कल से उत्पन्न होने वाला-सूत्र जो हैं सो वे भी ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त सूत्र है। जहां पर कार्य और कारण के सम्बन्ध होने से ही उनको सूत्र शब्द दिया गया है सो (अंडयं इंसगम्माए ) अंडक से हंसगर्भ प्रमुख जान लना (पोडयं कप्पासमाई ) फल से अथवा वनस्पति प्रमुख से कर्पास का सूत्र २ (कीडयं पंचविहं पन्नत्तं तंजहा पट्टे १ मलए २ अंसुए ३ चीणं सुय ४ किमि- रागे ५) कीटक से जो सूत्र की उत्पत्ति है वे पांच प्रकार से कथन कीगई है जैसे कि-पट्ट १ मलयदेश का सूत्र २ अंशुक सूत्र ३ चीनांशुक सूत्र ४ -कृमिराग सूत्र ५-यह पांच ही प्रकार के सूत्र की कृमियों से उत्पत्ति होती है इसीलिये इनको सूत्रपद दिया गया है। अपितु (वालय पंचविहं पनवं तंजहा ) वालों से जो सूत्र की उत्पत्ति होती है वे भी ५ प्रकार से वर्णन कीगयी है जैसे कि-(उ- ग्गिय, उट्टिय, मियलोमए कुतवे किहिसे सेतं वालयं) उर्णिय के रोमों का सूत्र ऊन, उसी प्रकार ऊंट के रोमों की ऊन और मृग के रोगों का सूत्र अथवा मृगवत् अन्य जीव विशेष के रोमों का सूत्र और ऊंट के रोगों का सूत्र जो ऊनादि के वा नाना प्रकार के संयोग से सूत्र उत्पन्न होता है उसका किस सूत्र कहते हैं ।। अथवा अश्वादि के रोमों से जो सूत्र उत्पन्न होता है उसको भी किस सूत्र कहते हैं यही वालों का सूत्र है ( सेकित वक्कयं २) (प्रश्न) वल्कल ( छालि से कौनसा सूत्र उत्पन्न होता है ) (उत्तर ) ( सरणमाइ ) सनि आदि यह वस्कल सूत्र हैं ( सेत्तं वक्कयं ) यही स्वरूप वल्कल सूत्र का है (सेत्तं जाणग सरीरभवियसरीर वइरित्तं दबसुयं) अथानन्तर से यही ज्ञ शरीर भव्य शरीर न्यतिरिक्त द्रव्यसूत्र है (सेच श्रागम उदयसुर्य सेत्तं दध्वसुयं ) यही आगम से द्रव्य सूत्र है और इसी स्थान पर द्रव्यसूत्रका समास पूर्ण होगया है। भावार्थः-द्रव्यसूत्र और भी प्रकार से कथन किया गया है जैसे कि-अंडज? चोडनं २ कीटज ३ वालज ४ वल्कलन ५ अंडज हंसगर्भादि वोडन कर्णासादि कीडन से पट्टज १ और मलय देशोद्भव २ अंशुय ३ चीणांशुक ४ ऋमिराग ५, और वालन सूत्र यह हैं कि-जादि का सूत्र १ उष्ट्रिकसूत्र २ मृगरोमैसूत्र ३ उंदरिक सूत्र ४ किहिस सूत्र और वल्कलज सूत्र सनि आदि है यह सर्व ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त द्रव्यसूत्र है और इसी स्थान पर नो आगम से द्रव्य मूत्र का समास पूर्ण होगया है। १ Band में ( ३० ) . * अनुयोगद्वार सूत्र * (अपितु सूत्र शब्द का वर्णन करते हुए जो सूत्र ( दोरा) का वर्णन किया प्राकृत की शैली के अनुसार किया गया है क्योंकि प्राकृत में सूत्र शब्द दोनों अर्थों में व्यवहृत है ।। ॥ अथ भावंश्रुत विषय ।। मूल-सेकिंतं भावसुयं २ दुविहं पएंणत्तं तंजहा आगम भो नोप्रागमत्रो सेकिंतं श्रागमयोभावसुयं २ जाणए उवउत्ते सनं श्रागमो भावसुयं सेकिंतं नोबागमनोभावसुर्य ? नोबा- गमनोभावसुयं दुविहं पन्नत्तं तंजहा लोइयं लोगुत्तरिय सेकिंतं लोइयनोबाग़मोभावसुयंर इमे अन्नाणीहि मिच्छदिहिहिं सच्छंद बुद्धिमइ विकप्पियं तंजहा भारहं रामायणं भीमासुरुक्ख कोडिल्लयं घोडयमुह सगडमदियायो कप्पासियं नागसु- हमं कणगसत्तरीवेसियं वइसोसयं बुद्धसासणं . काविलं लो- गायतं सहितत्तं माढरपुराणं वागरणं नाडगाई श्रहवा बाव- त्तरिकलाश्रो चत्तारिय वेया संगोवंगाणं सेलेनोमागमत्रो भावसुयं । पदार्थः-(सेकितं भावसुयं २ दुविहं पण्णत्तं तंजहा ) (प्रश्न ) भोवश्रुत कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) भावश्रुत दो प्रकार से कहा गया है जैसे कि-( आगमउय ) आगम से और नो भागम से (सेकिंत भा- गमओ भावसुयं २)(पूर्वपक्ष ) आगम से भावश्रुत कौनसा है ( उत्तरपक्ष) आगम से भावश्रुत उसका नाम है ( जाणय उवउत्ते से आगमओ भावसुयं) जो श्रुत शब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता है वही आगम से भावश्रुत है (सेकिंतं नोआगमनोभावसुयं. २ ) (प्रश्न ) नो आगम से भावश्रुत कितने प्रकार से है ( उत्तर ) नो आगम से भावश्रुत (दुविहं पएणत्तं तंजहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-( लोइयं लोगुत्तरियं ) लौकिक और लो- कोतरिक (सेतिं लोइयंनाागमभोभावसुयं २ ) (पूर्वपक्ष) लौकिक नो आमम से भावभुत कौनसा है ( उत्तरपक्ष) लौकिक नो आगम से भाषचत्त उस - * अनुयोगद्वार सूत्र * का नाम है जैसे कि-(जइमं अन्नाणीहिं मिच्छदिठी हिंसच्छंद वुद्धिमइ विगप्पियं तंज़हा) जो अज्ञानी तथा मिथ्यादृष्टियों ने स्वच्छंदता की बुद्धि से कल्पना किये जो ग्रन्थ हैं जैसे कि-(भारहं) भारत ( रामायणं ) रामायण २ ( भीमा- सुरुक्खं ) भीमासुरुक्ष ३ (कोडिल्लय) कौटिल्य (अर्थ) शास्त्र (घोडयमुह) घोड़ा- मुख शास्त्र (सगड़भदियाउ ) शकटभद्रशास्त्र (कप्पासियं) कासिक शास्त्र (नागसुहुमं ) नागसूक्ष्म ( कणग सत्तरी) कनकसप्तति शास्त्र (वइसोसयं) वैशेषिक शास्त्र (बुद्धसासणं ) बुद्धशासन ( काविलं ) कापिल (सांख्य ) शास्त्र (लोगायतं ),लोकायित (चाक) शास्त्र (सही तत्त) षष्टितंत्र शास्त्र (माटर पुराणं) माढर पुराण ( वागरणं ) व्याकरण शास्त्र (नाहगाई ) नाटिकादि शास्त्र ( अहवा) अथवा ( वावत्तरिकलाओ ) ७२ कलाओं से लेकर ( चचारि वेया संगोवंगाणं से लोइयनोआगमओ भावसुयं) चारवेद सांगोपांगयुक्त जैसे कि-शिक्षा १ कल्प २ व्याकरण ३ छन्द ४ निरुत शास्त्र ५ ज्योतिः ६ यह षट् शास्त्र वेदों के उपांग कहाते हैं यह सर्व लौकिक नोआगम से भावसूत्र हैं । भावार्थ:-भावश्चत दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि आगम से और नो आगम से सो आगम से भावश्रुत उसका नाम है जो श्रुतशब्द के अर्थ को उपयोग पूर्वक जानता है वहीं आगम से भावश्रुत अतः नो आगम से भावश्रुत के दो भेद हैं लौकिक और लोकोत्तरिक, सो लौकिक उसका नाम है जो मिथ्यादृष्टि लोगों ने अज्ञानता के वश होकर नाना प्रकार के शास्त्र कल्पित कर लिये हैं और उन में पदार्थों का असत्य स्वरूप लिखा है वही नो आगम से लौकिक भावभुत हैं । ॥अथ लोकोत्तरिक नो अागम से भावश्रुत विषय ॥ मूल-सेकिंतं लोगुत्तरियंनोभागमश्रोभावसुयं ? २ जंइयम, अरिहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पन्ननाणदसणधरेहिं तीय पड्डुप्पण्ण मणागयजाणएहिं तिलुकनिरविखयवहियमहियपुइएंहिं सब्वाणहि सव्वदरिसीहिं अप्पडिहयवरनाणदसणधरहिं पणीयं. दुवालसंगं गणिपिडगं तं. आयारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओं ४ विवाहपएणत्ती ५ नायाधम्मकहाअो ६उ-- है . ( ३२. ) * मनुयोगदार सूत्र में वासगदसायो ७ अंतगडदसायो ८ अणुत्तरोववाइयदसा- श्रो पण्हावागरणाई १० विवागसुयं ११ दिडिबायो य १२ सेत्तं लोगुत्तरियं नोभागमश्रो भावसुयं सेत्तं नो श्रागमत्रो भावसुयं सेत्तं भावसुयं तस्सणं इमे एगढिया नाणाघोसा नाणावंजणानामधेज्जा प० तं० सुयं १.सुत्तं २ गंथं ३ सि- दंतं ४ सासणं ५ प्राणती ६ वयण ७ उवएसो.८ पण्णवन्ने ६ आगमेय १० एगट्ठापज्जवा सुत्ते ११ सेत्तंसुयं ॥ पदार्थः-(सेकिंतं लोगुत्तरियं नो आगमओ भावसुर्य २) (प्रश्न) वह कौनसा है जो लोकोतरिक नो आगम से भावभ्रत है ( उत्तर ) लोकोचरिक नो आगम से भावश्रुत उसका नाम है (जइमे अरिहंतेहिं भगवतेहिं उप्पन्ननाण -दसणधरेहिं तीय पडुप्पन्न मणागय जाणएहिं ) जो यह अरिहंतो करके भग- बन्तो करके पुनः जिन्हों को ज्ञान और दर्शन उत्पन्न होगया है सो ज्ञान दर्शन के धरने वालों ने तथा जो भूतकाल और वर्तमान और अनागत काल के ज्ञा- ताओं ने ( तिलोकनिरक्खिय चहिय महिय पुइएहिं ) और जिन्होंको देव मनुष्य भवनपत्यादि देवों ने आनन्दाश्रु पूर्णदृष्टि से अवलोकन किया है और जो गुण कीर्तनरूप भाव पूजा करके पूजित हैं तथा जो सर्वत्र पूज्य हैं उन्होंने अथवा जो ( सव्वएहि सव्वदरिसीहिं ) सर्वज्ञ वा सर्वदर्शी हैं उन्होंने फिर ( अप्पडि- इयवरनाणदसणधरेहिं ) अप्रतिहत (न हनन होने वाला ) ज्ञान दर्शन के धरने वालों ने (पणीयं ) प्रतिपादन किया है (दुवालसंगं गणिपिंडगं तंजहा) द्वादशांग की वाणी जो आचार्यों की मञ्जूषा समान है जैसे कि-(आयारो सूयगडो. ठाणं समवायो विवाहपएणत्ती नायाधम्मकहाओ वासगदसाओ अंतगडदसाओ अणुतराववाइयदसाओ पाहावागरणाई विवागसुयं दिछि- वाओय सेत्तं लोगुत्तरियं नो भागमो भावसुयं सेतं नोआगमओ सुयं सेवं भावसुयं ) आचारांग सूत्र १ सूत्रकृताङ्ग सूत्र २ स्थानाङ्ग सूत्र ३ समवायांग सूत्र ४. विवाहमज्ञप्तिमूत्र ५ ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र ६ उपासकदशांग सूत्र ७ अं- वकृतदशांग सूत्र ८ अनुत्तरोपपातिक सूत्र : प्रश्न व्याकरण सूत्र १० विपाक सूत्र ११ दृष्टिवाद सूत्र १२ यही लोकोत्तरिक नोआगम से भावश्रुत है और इसी स्थान पर नो पागम से भावभुत का, संक्षेप से वर्णन पूर्ण किया गया है।
•अनुयोगद्वार सूत्र ( ३३ ) भावार्थ:-लोकोतरिक नोआगम से भावश्रुत उसका नाम है जो अन्ति भगवन्तों ने जिन्होंको त्रिकाल ज्ञान उत्पन्न होरहा है और सर्वज्ञ सर्वदर्शी हैं त्रैलोक्य पूजनीय हैं सो उन्होंने द्वादशांग की वाणी प्रतिपादन की है अतः वही द्वादशांग लोकोतरिक नोआगम से भावश्रुत है। यहां पर नो शब्द देशनिषेध- वाची नहीं है ( वस्सणं इमे एगहिया नाणा घोसा नाणा रंजणा नामधेन्जा पन्नता जहा) उस भावश्रुत के यह एकाथि नाम जिनके नाना प्रकार के योप वा व्यञ्जन हैं निम्न प्रकार से कहे जाते हैं। अथ भावभुत के पर्यायवाची नाम विषय ।। मूल-सुयं १ सुत्त २ गंथं ३ सिद्धन्त ४ सासण ५ श्रापत्ति ६ वयणं ७ उवएसो ८ परणवणे अागमेये १० एगट्ठा पज्ज- वासुत्ते सेत्तं सुर्य पदार्थः-भावश्रुत के निम्नलिखित दश नाम हैं जैसे कि-(सुर्य ) गुरुमुख से श्रवण करने से इस भावसूत्र को थुत कहा जाता है १ ( सुत्रं ) और अर्थ की सूचना होने से ही सूत्र भी इसी का नाम है २ ( गंथं ) अतः नाना प्रकार की ग्रन्थना होने से ही इसे ग्रन्थ कहते हैं ३ (सिद्धन्त ) जो स्वयं प्रमाण में मतिष्ठित होकर ज्ञानस्वरूप को दिखलाता है उसी का नाम सिद्धान्त है । (सासणं) और शिक्षाप्रद होने से ही शासन कहा जाता है ५ ( आणत्ति) और मुक्ति के लिये आज्ञा करना इसी करके भावसूत्र का नाम भी आज्ञा है ६ (वयणं) सत्यवक्ता होने से वचन भी इसी का नाम है ७ (उवएसो) माणीमात्र को सत्य में आरूढ़ करने से ही उपदेश भी इसी का नाम है - (पएणवणे ) सत्य कथन के प्रभाव से प्रज्ञापन नाम है . ( आगमेय ) और परम्परा से आरहा है इसी करके आगम कहा जाता है १० ( एगठे पञ्जवा सुत्ते से सुयं ) सो यह एकार्थी शब्द पर्याय करके भावश्रुत के ही नाम और इनों को भावसूत्र कहा जाता है ।। इति श्री अनुयोगद्वार सूत्र में द्वितीयाधिकार श्रुतरूप समास हुआ । भावार्थ:-भावश्रुत के एकार्थी नाना प्रकार के घोप और व्यञ्जनों से युक्त दश नाम हैं जैसे-भुन १ सूत्र २ ग्रन्थ ३ सिद्धान्त ४ शासन ! आता ६ * अनुयोगद्वार सूत्र * वचन ७ उपदेश प्रज्ञापन ह आगम १० सो यह पर्यायवाची दश नाम भावश्रुत के हैं और इसी स्थान पर अनुयोगद्वार सूत्र का द्वितीय अधिकार पूर्ण हो गया है । अव स्कन्ध का विवर्ण किया जाता है ।। ॥ अथ स्कन्ध शब्द विषय ।। मूल-सेकित खंधे ? २ चउबिहे पण्णत्ते तंजहा नाम खंधे ठवणाक्खंधे दुबक्खंघे भावक्खंधे नाम ठवणाओ ग- याश्रो सेकिंतं दव्वक्खंधे ? २ दुविहे पन्नते तंजहा भागमोय नोभागमो सेकिंतं प्रागमो दव्वक्खंधे २ जस्सणं खंधेति पयं सिक्खियं संसं जहा दवावस्सए तहा मा पियवा नवरं खंधाभिलांवो जाव सेकितं जाणगसरीर भवियसरीरवइरित्ते दबक्खंधे?२ तिविहे पएणते तंजहा सचित्ते. अचित्ते मिस्सए। पदार्थ:- सेकिंतं खंधे ? २ चउबिहे पन्नचे तंजहा नामक्खंधे, ठवणा- क्खंधे, दव्वक्खंधे, भावक्खंधे नाम ठवणाो गयाओ) (प्रश्न ) स्कंध शब्द कितने प्रकार से वर्णन किया गया है? ( उत्तर ) स्कंध शब्द भी चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-नामस्कंध १ स्थापनास्कंध २ द्रव्यस्कंध ३ और भावस्कंध ४ सो नाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व आवश्यक के अधिकार में किया गया है (प्रश्न) द्रव्यस्कंध के कितने भेद हैं ? (उत्तर) (सेकिंत दब- क्खंधे २ दुविहे पण्णत्ते तंजहा आगमओ नोआगमनोय ) द्रव्यस्कंध भी दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-आगम से और नोमागम से ( सेकिंतं आगमओ दबक्खये २ जस्तणं क्खन्धेत्ति पयं सिक्खियं सेसं जहा दव्यांवर ए. तहा भाणियव्या नवरं क्खंधाभिलावो) ( प्रश्न ) आगम से द्रव्यस्कंध किस को कहते हैं ? ( उत्तर ) आगम से द्रव्यस्कंध उस का नाम है जिसने स्कंध ऐसा पढ़ सीख लिया है शेष विवर्ण जैसे द्रव्यावश्यक का है उसी प्रकार जानना चाहिये किन्तु यहां पर स्कंध शब्द का आलापंक ग्रहण करो। जाव.. सेकिंत .जाणगसरीरभवियसरीरवइरिचे दबक्खंधे विविहे ,पएणते महास- - * अनुयोगद्वार सूत्र* ( ३५) चिचे अचिचे मिस्सए ) यावत् ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तं द्रव्यस्कंध तीनों प्रकार से वर्णन किया गया है. जैसे कि सचित्त १ अचित्त २ और मिश्र ३ । भावार्थ:-स्कंर शब्द भी चारों प्रकार से वर्णित है जैसे कि-नामस्कंध १ स्थापनास्कंध २ द्रव्यस्कन्ध ३ भावस्कन्ध ४ सो नाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व आवश्यक के अधिकार में किया गया है किन्तु द्रव्यस्कन्ध दो प्रकार से हैं आगम से और नोआगम से सो इन का भी विवर्ण पूर्व हो चुका है यावत् ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यस्कन्ध के भी तीन भेद हैं जैसे कि-सचित्त द्रव्यस्कन्ध अचित्त द्रव्यस्कन्ध २ मिश्र द्रव्यस्कन्ध ३ । अब तीनों का विवरण सूत्रकार निन्न प्रकार से करते हैं। मूल-सेकिंत सचित्ते दनक्खंधे ? २ अणेगविहे पण्णत्ते तंजहा हयक्खंधे गयक्खंधे नरक्खंधे किंनरक्खधे किंपुरिसक्खंधे महोरगक्खंधे गंधवक्खंधे उसंभक्खंधे सेत्तं सचित्ते दव्वक्खंधे । पदार्थः-सेकिंत सचित्त दव्वखंधे २ (प्रश्न) सचित्त द्रव्यस्कन्ध कौ- नसा है ? ( उत्तर ) सचित्त द्रव्यस्कन्ध ( अणेगविहे पएणते तंजहा) अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि (हयक्खन्धे १ गयखन्धे २ नरसन्धे ३ किंनरक्खन्धे ४ किंपुरिसक्खन्धे ५ महोरगक्खन्धे ६ गंधवक्खन्धे ७ उसभक्तधे ८ सेत्तं सचित्ते ) अवस्कन्ध १ गजस्कन्ध २ मनुष्यस्कन्ध किंनर ( व्यंतर विशेष ) स्कन्ध किंपुरुपस्कन्ध महोरगस्कन्ध गन्धर्वस्कन्ध यह व्यन्तर विशेष हैं वृषभस्कन्ध यह सव सचित्त द्रव्यस्कन्ध हैं। भावार्थ-सचित्त द्रव्यस्कन्ध अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि वृषभ स्कन्ध अश्वस्कन्ध गजस्कन्ध नरस्कन्ध अथवा किंपुरुषादि देवों के गवन सचित्तस्कन्ध उसी का नाम है-जिस जीव के साथ स्कन्ध की उत्पत्ति हुइ हो जैस उपर लिखे हुए नरस्कंधादि हैं। , अथ अचित्त द्रव्यस्कन्ध विषय । मूल-सेकिंतं अचिचे दबक्खंधे ? २ अणेगविहे पण्णत्ते तंजहादुप्पयसिएक्खंतिपएसिएक्खये जावदसप्पएसिएक्खंधे ( ३६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * संखेज्जपएसिएक्खंधे असंखिज्जपयसिएक्खंधे अणतपए- सिएक्खंधे सेत्तं धचित्ते दबक्खंधे । पदार्थ-(सेकिंतं चित्ते दबक्खंधे?२ अणेगविहे पएणचे तंजहा (प्रश्न) अचित्त द्रव्यस्कंध कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ? (उत्तर) अचिच द्रव्यस्कंध अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( दुप्पएसिएक्खंधे तिप्पए. सिएक्खंधे जावदसपएसिएक्खंधे ) द्विपदेशिक स्कंध, त्रिभदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध (संखेज्जपएसिएक्खंधे) संख्यात प्रदेशिक स्कंध ( असंख ज्जपएसिएक्खंधे ) असंख्यातप्रदेशिकस्कंध (अणंतपएसिएक्खंधे ) अनंत प्रदेशिक स्कंध ( से अचित्ते दबक्खये ) यही अचित्त द्रव्यस्कन्ध है, अर्थात् आचित्त द्रव्यस्कंध का समास पूर्ण हुआ। भावार्थ-द्विप्रदेशिकादि से लेकर अनन्त प्रदेशिक पर्यंत अचित्त द्रव्यस्कंथ होता है उसी का नाम अचित्त द्रव्यस्कंध हैं क्योंकि परमाणुद्वय के एकत्व होने से द्विप्रदेशिक स्कंध बन जाता है इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये। अथ मिश्र द्रव्यस्कंध विषय । मूल-सेकिंतं मीसए दव्वक्खंधे ? २ अणेगविहे पन्नत्ते तंजहा सेणाए अग्गिमक्खंधे सेणाए मज्झिमक्खंधे सेणाए पच्छिमक्खंधे सेत्तं मीसए द्व्वक्खंधे ॥ पदार्थ-( सेकित मीसए दचक्खंधे १ २ अणेगविहे पएणते तंजहा )(प्रश्न) मिश्र द्रव्य स्कंध किसका नाम है ? ( उत्तर ) मिश्र द्रव्यस्कंध के अनेक भेद हैं जैसे कि ( सेणाए अग्गिमक्खंधे ) सेना का अग्रिप स्कंध है वा (सेणाएमज्झि- मस्कंधे ) सेना का मध्यम स्कंध है ( सेणाए पच्छिमक्खधे ) अथवा जम्मा पश्चिम स्कंध है (सेत्तं मीसए दमक्खंधे ) इस प्रकार मिश्र द्रव्य स्कंध का विवर्ण समाप्त हुआ। भावार्थ-मित्रं द्रव्यस्कंध उसका नाम है जिसमें सचित्त और अचित्त * मध्यमकतमे द्वितोयस्य ॥ प्रा. श्री. प. पा. १ सूत्र ४८ ॥ मध्यम सन्देक तम शारदे व द्वितीयस्यारा हरवं भवति । - * अनुयोगदार सूत्र * दोनों ही सम्मिलित हो सो सेना का अग्रिम स्कंध कहने से सचित्त इस्त्यादि गर्मित हुए अचित्त खड्गादि शस्त्र लिये गये इसी प्रकार मध्यम वा-पश्चिम भाग की भी संयोजना कर लेनी चाहिये इसी का नाम मिश्र द्रव्य स्कंध है। अथ प्रकारान्तर विषय । मूल-अहवा जाणगसरीरभवियसरीरवइरित्ते दव- खंधे तिविहे पण्णते तंजहा कसिमक्खंधे अकसिणक्खंधे श्रणेगदपियक्खंधे सेकिंतं कसिणक्खंधे ? २ सोचेव हयक्खंधे गयखंधे जाव उसभक्खंधे सेतं.कसिणक्खंधे सकिंतं अक- सिणक्खंधे? २ सोचेव दुप्पएसिवाइसंधे जाव. अणंतपए सिएक्खंधे सेत्तं अकसिमक्खंधे सेकिंतं अगदवियक्खंधे ? २ तस्स चेव देसे अवचिए तस्स चेव-देसे उवचिए सेत्तं अणेग दवियक्खंधे सेत्तं जाणगसरीरभवियसरीरवरित्ते दव्वक्खंधे सत्तं नोबागमत्रो दवाखंधे सेत्तं दबक्खंधे ॥ पदार्थ:-( अहवा ) अथवा ( जाणगसरीरभवियसरीरवीत्त दव्य- खंधे तिविहे पएणते तंजहा ) शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तद्रव्यस्कध तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( कसिणक्खंधे ) सम्पूर्ण स्कंध . ( अकसिंणक्खंधे ) असम्पूर्ण स्कंध ( अणेगदवियखंधे) अनेक द्रव्यस्कंध (सेकिंत कसिणक्खंधे? २ सोचेव हयक्खंधे गयक्खंधे जाव जसमक्खधे सेतं क- सिणक्खंधे ) ( प्रश्न ) सम्पूर्ण स्कंध किसे कहते हैं ? (उचर ) सम्पूर्ण स्कंध उसी का नाम है जो पूर्व लिखा गया है जैसे कि अश्वस्कंध १ गजस्कंध २ यावत् वृषभस्कंध इत्यादि जान लेने क्योंकि वही सम्पूर्ण स्कंध है। उनमें किसी प्रकार की भी न्यूनता नहीं है ( सेकिंत अकसिणक्खघे ) ( प्रश्न) असम्पूर्ण स्कंध किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) असम्पूर्ण स्कंध द्विप्रदेशिक से लेकर अनन्तपदेशी पर्यन्त जो स्कंध हैं उन्ही का नाम असम्पूर्ण स्कंध है क्योंकि द्विप्रदेशिक से लेकर अनन्तप्रदेशिक पर्यन्त असम्पूर्ण स्कंध ही कहे भाते हैं (सेकितं अगदचियक्खध? २) (प्रश्न) अनेक द्रव्यस्कप किस करते ( ३८ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * हैं । उत्तर ) अनेक द्रव्यस्कंध उसका नाम है (तस्स चेव देसे अवचिए तस्सर्व देसे उवचिए सेत्तं अणेगदवियक्खधे ) जो पूर्व अश्वादिस्कंधों का विवरण किया गया है उन्हीं स्कंधों का देशमात्र नखादिस्थान अचित्त जीव प्रदेशों से रहित होता है और हस्त उदरादि स्थान जीव प्रदशों से सहित होते हैं इसी वास्त उसे अनेक द्रव्यस्कंध कहते हैं क्योंकि एक शरीर में ही देशअपचिच देश उपचित्त यह दोनों स्वरूप पाए जाते हैं और यही अनेक द्रव्य स्कंध का स्वरूप है ( सेत जाणगसरीरभवियसरीरवइरिचे दनक्खो सेत्तं नोआगमी दचखंधे से दबक्खंधे ) अब वह ज्ञ शरीरभन्यशरीस्च्यतिरिक्त द्रव्य स्कंध का स्वरूप नोआगम से सम्पूर्ण हुआ क्योंकि इसी का नाम द्रव्यस्कंध है । भावार्थ:--अथवा ज्ञ शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यस्कंध तीनों प्रकार से अन्य भी कथन किया गया है जैसे कि सम्पूर्ण स्कंध १ असम्पूर्ण स्कंध ? अनेक द्रव्यस्कंध ३ सो सम्पूर्ण स्कंध पूर्ववत् अश्वादि के ही स्कंध हैं और असम्पूर्ण स्कंग द्विप्रदेशी आदिस्कंध से लेकर अनन्तप्रदेशिक स्कन्ध पर्यन्त हैं किन्तु अनेकद्र- व्यस्कन्ध उन्हीं का नाम है जो सचित्त स्कंध के विवर्ण में नखादि छोड़ दिये गये थे वही देश अपचित स्कंध हैं और करचरणादि देश उपधित स्कंध हैं सूत्र का आशय यह है कि जो जीव प्रदेशों से सहित स्कन्ध है वह उपचित के नाम से अनेक द्रव्य- स्कन्ध कहां जाता है जो हित हैं वह अपचित संज्ञा के नाम से उच्चारण किये जाते हैं सो इसी स्थान पर ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त नोआगम से द्रव्य- स्कन्ध का स्वरूप पूर्ण होगया है और उक्त लक्षणोंयुक्त को ही द्रव्यस्कंध कथन किया गया है । ।। अव भावस्कन्ध का व्याख्यान किया जाता है ।। अथ भावस्कंध विपय। मूल -सेकिंतं भावक्खंधे? २ दुविहे पण्णत्तेतंजहा भागम' ओय नोभागमोय सेकिंतं श्रागमनोभावस्खंघे २ जाणए उवउत्त से आगमयोभावबंधे। पदार्थ:-(सेकिंतं भावबंधे २.दुविहे पण्णत्ते तंजहा) (प्रश्न) भाव- स्कन्ध किसे कहते हैं। -( उत्तर ) भावस्कन्ध दो प्रकार से वर्णन किया गया है - , * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ३६ ) जैसे कि ( आगमओ नोआगमओ) आगम से और नोआगम से (सेकिंतं आगमश्रो भावक्खन्ध? २ जाणए उवउत्ते सेचं आगमओ भावक्खन्धे ) (प्रश्न) आगम से भावस्कन्ध किसे कहते है? ( उत्तर ) आगम से भावस्कन्ध उसका नाम है जो स्कन्ध शब्द के अर्थ को उपयोगपूर्वक जानता है वही आगम से भावस्कन्ध हैं। भावार्थ:-भावस्कंध द्विपकार से प्रतिपादन किया गया है आगम से और नोआगम से, सो जो स्कंध शब्द के अर्थ को उपयोगपूर्वक जानता है वहीं आगम से भावस्कंध है। अब नोप्रागम के विषय में कहते हैं। मूल-सेकिंतं नो अागमत्रो भावक्खंधे ? २ एएसि चव सामाइयमाझ्याणं छण्हं अज्झयणाणं समुदयसमिइसमागमेण- निप्परणे आवस्सयसुयक्खंधे भावक्खंधेत्ति लब्भइ सेत्तं नो प्रागमोय भावक्खंधे सेत्तं भावक्खंध सेतं क्खंधे तस्सएं इमे एगढिया नानाघोसा नामधेज्जा भवन्ति तंजहा गण १ काए २ निकाए चिए ३ क्खंधे ४ वग्गे ५ तहेव रासीय ६, पुंजय ७. पिंडे ८ णिगरे ६ संघाए १० पाउल ११ समूहे १२ सेत्तक्खन्धे । आवस्सयस्सणं इमे अत्थाहिगारा भवन्ति तंजहा सावंज्जजो- ग विरइ उकित्तण गुणवत्रीय पडिवत्ती खलियस्त णिंदणावण- तिगिच्छ गुणधारणा चेव १ श्रावस्तयस्सणं एसो पिंड- स्थो वरिपत्रो समासेणं एत्तो एक्केकं पुण अज्झयणं कित्तइ- स्सामि तंसामाइयं चउवीमत्थश्रो वंदणयं पडिकमणं काउस- गगो पच्चक्खाणं तत्थ पढम अझयणं सामाइयं तस्सेणं इमे चत्तारि. अणुशोगदाराणि भवंति तंजहा उवक्कमे निक्खेवे अणुगमे नए। पदार्थ:-( सेकिंतं नो आगमओ भावखन्थे १२) (प्रश्न ) नो आगम से . .
(४०) * अनुयोगद्वार सूत्र * भावस्कन्ध किस कहते हैं ?(उचर ) नो श्रागम से भावस्कन्ध निम्न प्रकार से है ( एएमि चैव सामाइयमाझ्याणं) यह निश्चय ही सामायिकादि से लेकर (छएई अज्झयणाणं समुदय (पद् अध्ययनों का जो समुदाय रूप है यह ( समिइसमागमेण: निप्पएणे आवस्सयसुयक्खन्धे भावक्सन्धति लगभइ) सर्व परस्पर एकत्व करने पर आवश्यक सूत्र का भाव स्कन्ध निष्पन्न होता है और जो आवश्यक सूत्र क्रियायुक्त किया जाता है ( भाषक्खन्धेचिलब्भइ ) वही आवश्यक सूत्र का भावस्कन्ध कहा जाता है अर्थात् जो भाव स्कन्धरूप आवश्यक सूत्र है वह अवश्यही करणीय है क्योंकि-भावस्कन्ध वहीं माप्त होता है ( सेनोग्रागमओय भावक्खनो) अब नोमागम से भावस्कन्ध का स्वरूप सम्पूर्ण हुआ क्योंकि ( सत्तं भावक्खन्धे सेत्तक्खन्थे ) यही भावस्कन्ध है और यही स्कन्ध का स्वरूप है ( तस्सणं ) उस स्कन्ध के ( इमे एगहिया नाणा घोसा नामधेज्जा भवंति तंजहा) यह एकाथिक और नाना प्रकार के घोपयुक्त नाम है जैसे कि अपेक्षा गण भी इस का नाम है १ ( काय) पदकाय के समान काय भी है और निकाय चिय)शरीर के तुल्य निकाय भी कहते हैं (क्खंध) द्विपदेशिक श्रादिस्कंध के समान स्कन्ध है । (चग्गे ) गो वर्ग के समान वर्ग तहेत्र रासीय ) उसी प्रकार शाल्यादि के तुल्प राशि (पुंजय ) धानों के समान पुंज और गुड़ादि के समान (पिंड ) पिंड भी कहते हैं द्रव्य के तुल्य (णिगरे ) निकर भी इस का नाम है ( संघाय ) संघ मिलने के समान संघात भी इसी का नाम है और महानगर के समान ( पाउल) अाकुल भी कहते हैं और ( समूह ) समूह भी इसे कहा जाता है (सेत्तक्खंधे ) यही स्कंध का स्वरूप है और ( आवस्मयस्सणं इमे अस्थाहिगारा भत्रंति तंजहा) आवश्यक के यह भार्थाधिकार होते हैं जैसे कि (सावनजोग विरइ) सावध योग की विरति • रूप प्रथमाध्याय है ( उकित्तण) गुण कीर्तन रूप द्वितीयाध्याय है ( गुणव- ओयपडिवत्ती ) गुणयुक्त को बंदना रूप तृतीयाध्याय है ( खलियस्स निंदणा- वण तिगिच्छ गुणधारणा चव ) अतिचारों की निवृत्ति रूप चतुर्थ अध्याय है और व्रण की औषधि रूप पंचमाध्याय है मूल गुण और उत्तर गुण के धारण करने रूप छठा अध्याय है ( श्रावस्सयस्स एसो) यह आवश्यक रूप (रि- त्यो वरिणओ समासणं) स्कंध का संक्षप से अर्थ वर्णन किया है किन्तु (पती एककं पुण) स्कंध के एक :( अझयणं कितइससोमि तंजहा) भापयन .
* असुयोगद्वार सूत्र * (४१) की व्याख्या करूंगा जैसे कि-(सामाइयं ) सामायिक ( चासत्ययं चतुर्विश- . ति स्तव (वंदयणं ) वंदना ( पडिक्कमणं ) प्रतिक्रमण (काउसग्गो) कायोत्सर्ग (पञ्चक्खाणं ) प्रत्याख्यान (तत्य पढम अझयणं सामाइयंतस्प्तणं इमे बत्तारि अणुयोगदाराणि भवन्ति तंजहा ) उन षद् अध्यायों में से प्रथम अध्ययन सा. माथिक है उसके यह चार अनुयोगद्वार होते हैं जैसे कि-(उबक्कमे ) जो वस्तु अत्यन्त दूर हो उसको निकट करना उसी का नाम उपक्रम है और फिर उसको निक्वेने ) नामादि निक्षपों में स्थापन करना उसका नाम निक्षप है फिर सूत्रानुकूल कार्य करने का नाम ( अणुगमे ) अनुगम है अपितु (नय ) अनन्त धर्मयुक्त वस्तुओं में से एक अंश को लेकर वस्तु के स्वरूप को वर्णन करना उसका नाम नय है उसी नय के द्वारा सदसद् का ज्ञान भली प्रकार से हो जाता है। भावार्थ-नो आगम से भावस्कंध आवश्यक सूत्र के पट् अध्यायों का ही नाम है और यही भावस्कंध है इन्दी के नानाप्रकार के घोपयुक्त द्वादश नाम हैं जैसे कि- गण काय २ निकाय ३ स्कंध ४ वर्ग ५ राशि ६ पुंज ७ पिंड - निकर ६ संघ १० आकुल ११ और समूह १२ फिरं आवश्यक सूत्र के पद अधिकार रूप अन्याय हैं जैसे कि-सामायिक १ चतुर्विंशति स्लव २ वंदना ३ प्रतिक्रमण ४ कायोत्सर्ग ५ और प्रत्याख्यान ६ अपितु अतिचार रूप व्रण की औषधि रूप पंचम अध्याय है औषधि भक्षण रूप छठा अध्याय है फिर जैसे महा नगर के चार मुख्य द्वार होते हैं उसी प्रकार इस सामायिक रूप प्रथम अध्याय के चार अनुयोगद्वार हैं जैसे कि उपक्रम जो वस्तु दूर हो उसको निकट करना १ फिर उसके निक्षेप करके अनुगम करना फिर नय द्वारा व्या- ख्या करनी यह चार अनुयोग द्वारा पदार्थों की व्याख्या अवश्य ही करणीय । इसी कारण से प्रथम उपक्रम का वर्णन किया जाता है। मूल-सेकित्तं उवक्कमे १ २ छविहे पन्नत्ते तंजहा नामोव- क्रमे ? छवणोवक्कमे २ दबावक्कमे ३ खेत्तोवक्कमे ४ कालोवकमे ५ भावोवको ६ नामठवणानो गयात्रो सेकिंतं दवावकमे १२ दुविहे पण्णत तजहा आगमीय नोागमोग. जाव जाणगसरीरभक्यिसररिवहरित्तेदवावकमे तिविहे पाणसे. है - - - - . ( ४२ । # अनुमोगद्वार व * तंजहा सचित्ते अचित्ते मीसए । सेकिंत सचित्ते दब्बो क्कमे ? तिविहे पण्णते तंजहा दुपए चउप्पए अपए एकेक पुण दुविहे पण्णत्ते तंजहाँ परिकमेय वत्थुविणासय । पदार्थ:-( मेकिंतं उचक्कम १२ छब्बिई पएणत्ते तंजहा ) (प्रश्न ) उपक्रम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) उपक्रम पट् प्रक र म पनिपा- दन किया गया है जैसे कि-( नामोरक्कमे १ ठवणौवको २ दबोवको ३ ख. ताबक्कमे ४ कालोवक्रमे ५ भानोरक्कमे ६ नाठवणाभो गयाओ। नामापक्रम : स्थानोपक्रम २ द्रव्यापक्रम ३ क्षेत्रोपक्रप ४ कालोपक्रम ५ भावोपक्रम ६ सोनाम और स्थापना का विवर्ण पूर्व किया गया है ( सकिने दबोवको २ ) ( प्रश्न) द्रव्योपक्रम किसे कहते हैं ( उत्तर ) द्रव्योपक्रम ( दुविहं पण्ण तनहा) दो. प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-(आगमनाय नाआगमोय ! आगम से और नोआगम से ( जात्र जाणापगैर भत्रियमगरवहरिवेदनांवको तिविहे - पएणते तंजहा ) यावत् शरीरभव्यशरीरव्यानिरिक्तद्रव्यापक्रम तीनों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- सार्चित अचिचे मी- संए) सवित्त अचित्त और मिश्र (सेकिंतं सचिचो बक्कम २ तिविद पाणचे तंजहा दुपए चउप्पए अप्पा ) (प्रश्न) सचित्तद्रव्योपक्रम कितने प्रकार से कथन किया गया है ? ( उत्तर । सचित्तद्रव्योपक्रम तीनों प्रकार से कथन किया- गया है, जैसे कि-द्विपदोपक्रम १ चतुष्पदोपक्रम २ अपदोपक्रम ३ फिर ( एक्ककं पुण दुविहे पएणचे तनहा परिक्कमे वत्युविणासेय ) एक एक के दो दो भेद कहे गये है जैस कि-परिक्रम जो वस्तु का मूल गुण है, उसको प्रकाश करना ति- संको परिक्रम कहते हैं किन्तु जो किमी वन्तु द्वारा किसी पदार्थ के गुण का नाश किया जाय उसे वस्तुविनाश कहते हैं सो उक्त तीनों भदों के साथ इन दोनों गुणों की भी प्राप्ति है। भावार्थ:-उपक्रम का पट् प्रकार से विवेचन किया गया है जैसे कि- नामोपक्रम, १ स्थापनोपक्रम, २ द्रव्यापक्रम, ३ क्षत्रांपक्रम ४ कालोपक्रम, " भावोपक्रम, ६ नाम और स्थापना का विवर्ण नो पहिलं. किया जा चुका है किन्तु शरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्तद्रव्योपक्रम के तीन भेद है जम के सचिन अचित्त और मिश्र फिर सचिच द्रव्योपक्रम तीनों प्रकार से मांगी १ (१३ ) 1 * अनुयोगदार सूत्र * द्विपदोक्रम चतुष्पदोक्रम-अपदोपक्रम, अपितु इनके भी दो दो भेद हैं परिक्रम और वस्तु विनाश वस्तु के मूल गुण का प्रकाश करना उपक्रम. कहाता है यदि मूल गुण का नाश किया जाय उसे वस्तु विनाश द्रव्य उपक्रम कहते हैं । अथ द्विपदोपक्रम विषय। सेकिंतं दुप्पए उवक्कमे १२दुप्पयाणं नट्टाएं नद्यणंजल्लाणं मल्लाणं मुट्ठियाणं लंबगाणं कहगाणं यवगाणं लासगाणं श्राइक्खगाणं लंखाणं मंखाणं तूणइल्लाणं तुंबवीणियाणं कावोयाणं मागहाणं सेत्तं दुप्पए उवक्कमे । पदार्थ-(प्रश्न ) द्विपदोपक्रम किसे कहते हैं ? ( उत्तर ) द्विपदोपक्रम निम्न प्रकार से है जैसे कि ( नहाणं) नचाने वाले ( नट्टाणं) नृत्य करने वाले (जल्लाणं) राज्यस्तुति करने वाले ( मल्लाणं) मुष्टि आदि युद्ध करने वाले (मुठियाणं ) केवल मुष्टि ही युद्ध करने वाले (बेलंगाणं) नाना प्रकार के वेष करने (विदपक ) वाले ( कहगाणं ) कथा करने वाले (पवगाणं ) गादि वा नयादि के तैरने वाल ( लासगाणं) राश खेलने वाले अथवा जयध्वनि करने वाले (आइक्खगाणं) दैवज्ञ आकाश विद्या के कथक (लंखाणं) बंशाण में नृत्य करने वाले (मंखाणं ) चित्र पट्ट के द्वागभाजीविका करने वाले । तूणइल्लाणं) वादिन के बजाने वाले (तुंबवीणियाणं) अलावु की वीणा बजाने वाले ( कादायाणं) कावड (करड ) के वहन वाले (मागहाणं ) मांग- लिक वचन के बोलने वाले इनको यदि घृतादि द्वारा उपचित किया जाये उसे परिक्रम द्रव्योपक्रम कहते हैं यदि खड्गादि द्वारा विनाश किया जाय उसका नाम वस्तु विनाश द्रव्योरकप है क्योंकि-बलवर्ण वृद्धि के लिय प्रथम उपक्रम है इससे विपरीत द्वितीय उपक्रम है ( सेत्तं दुप्पय उवकमे ) अथ द्विपद उपक्रम का स्वरूप इसी स्थान पर पूर्ण हुआ इसी का नाम द्विपद सचित्तोपक्रम है । भावार्थ-द्विपद उपक्रम उसे कहते हैं कि जो नृत्यादि क्रिया करने वाले हैं उनको वलादि की वृद्धि के वास्त प्रथम उपक्रम होता है और नाश के लिये द्वितीय उपक्रम होना है सो इसका नाम दिपद सचित्तोपक्रम है। ... .
( ४ ) * अनुपांगद्वार सूत्र अथ चतुष्पदोपक्रम विषय । सकिंतं चउप्पए उवक्कमे ? २ उप्पयाणं ग्रासाएं हत्याएं इच्चादि सत्तं चउप्पए उवकमे । पदार्थ-(सेवितं चउप्पय उवक्कम १२) (प्रश्न) चतुप्पदापक्रम कौनसा १(उत्तर) चतुष्पदापक्रम इस प्रकार से है जैसे कि-अञ्चों को हस्तियों को इत्यादि चार पाद वाले जीवों का परिक्रम वा वस्तु विनाश के द्वारा शिक्षित वा . नाश करना उसी का नाम चतुष्पदापक्रम है। भावार्थ-चार पैर वाले जीवों को परिक्रम अथवा वस्तु विनाश द्रव्योपक्रम इनके द्वारा शिक्षिनादि कर्म करने उसी को चनुप्पदापक्रम अथवा द्रव्यापक्रम . " अथ अपद विषय । सेंकिंतं अपए उवकमे ? २ अपयाणं वाणं वाडगाणं इञ्चाइ सेतं अपए उबको सेत्तं सचिचदबोवकमे । पदार्य-(सेकिन अपए उवक्रम ? २) (प्रश्न ) अपद उपक्रम किये कहते है ? (उत्तर ) अपद उपक्रम उसे कहते हैं जैसे कि (अपयाणं अवाणं अबाड गाणं इच्चाइ मतं अपए टवक्रम ) आम्रमल अंबाडग फन इत्यादि फलों को परिक्रमद्रव्योपक्रम के द्वारा परिपक्क किया जाता है तथा वस्तुविनाशद्रव्योपक्रम के द्वारा इन फलों को अन्य प्रकार से किया जाय जैसे आम्रफल पाक वा कु- माण्ड फल पाक बदाम पाक अथवा अन्य प्रकार से आपत्रियों का बनाना उस का नाम परिक्रमवस्तुविनाश हैं और इसी का नाम (सेत्तं सचित्तदबावक- में) सचिव द्रव्यापक्रम है। भावार्थ-अपदसचित्तद्रव्यापक्रम उसका नाम है जो फलादि को परिक्रम और वस्तु विनाश के द्वारा बनाया जाए जैसे कि-फलादि के गुण दीर करने तथा उनके पाकादि वनानं उसी का नाम अपदसचित्तद्रव्योपक्रम है । यह मचिनार बापक्रम का स्वरूप पूर्ण हुआ।
-- 4 * अनुयोगहार मंत्र* (४५) अथ अचित्त द्रव्योपक्रम विषय । सेकिंतं अचित्तदबोवक्कमे ? २ खंडाईणं गुडाईणं मच्छं 'डीणं से अचित्तदवोवको । पदार्थ-(प्रश्न) अचित्तद्रव्योपक्रम किसे कहते हैं (उत्सर ) अचिच द्रव्यो- पक्रम उसका नाम है ( खंडाईणं गुडाईण मच्छडीणं ) जो खांड, गुड़, पसंडी (मिसरी ) भादि पदार्थों को परिक्रम और वस्तुविनाश के द्वारा; पवित्र व नाश किया नाय उसी का नाम ( से अचिचदबावको ) अचिच द्रव्योपक्रम है। भावार्थ-अचित्तद्रव्योपक्रम उसका नाम है जो खांद, गुड़, मत्संही आदि पदार्थों को परिक्रम द्रव्योपक्रम द्वारा सिद्ध किया जाता है और वस्तुविनाश के द्वारा उसके रसादि का नाश किया जाता है उसी का नाम अचित्त द्रव्योपक्रम है। अथ मिश्र द्रव्योपक्रम विषय । सर्कितं मीसए दबोक्कमे ? २ सेचेच थासग मंडीए अस्साई सेत्तं मीसए दब्बोवकमे । पदार्थ-(सेकितं मीसएदबोवको ) ( प्रश्न) मिश्र द्रव्योपकम किसे कहते हैं (उचर ) ( सोचेवथासग मंडीए अस्साइ सेत्तं मीसए दबोवक्कमे ) यही अनादि जो भूषणों से अलंकृत होरहे हैं उनका उपक्रम द्वारा वा वस्तु. विनाश द्वारा शिक्षित करना वा नाना प्रकार से दीप्त वा नाशकारी कार्य करने उन्हीं का नाम मिश्र द्रव्योपक्रम है सो इसी स्थान पर उक्त समास की पूर्ति है (सेत्तं जाणगसरीरभवियसरीरवरिच दबोवक्कमे सत्तं नी आगमओ दयोवक्कमे सत्तं दवावक्की ) यही ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्योपक्रम है अब नो आगम से द्रव्यापक्रम का स्वरूप सम्पूर्ण हुआ। भावार्थ-मिश्र द्रव्योपक्रम उसे कहते हैं जो वही पूर्वोक्त अश्वादि आभूषणों से अलंकृत हैं उनको परिक्रम द्रव्योपक्रम द्वारा वा वस्तु विनाश द्वाग शिक्षित करना अथवा विनाश करना सी इसी का नाम ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त नो भागम से द्योपक्रम होता है और यही द्रव्योपक्रम है।
. * अनुयोगदार-स्त्र * ॥ श्रथ क्षेत्रोपक्रम विषय सेकिंतं खत्तोवक्कमे? २जगणं हलकुलियाइहिं खेत्ताई उव- कमिश्रति इन्चाई सेत्तं खत्तोक्कमे सेकिंतं कालोवकमे? २जएं- नालियाईहिं.कालस्सोवकमणं कीरड़ सेत्तं कालोवक्कमे सेकिंतं भावोवक्कमे? दुविहे पराणते तंजहा आगमयोय नोपागमोय अागमत्रो जाणए उवउने नोग्रागमो दुविहे पन्नत्ते तं. जहा पसत्यये अषसत्येय तत्य अपसत्ये डोडिणिगणिया अमच्चाइणं तत्ययसत्ये गुरुमाइणं सेनोआगमत्रो भावो- वक्कमे सेत्तं भावविक्कमे सेत्तं भावोवको सेत्तं उवको। पदार्थः सक्ति खेतोत्रक्कम २ ) ( प्रश्न ) क्षेत्रोपक्रम किसे कहते हैं (उसर) (जष्ण हलकुलिगाड़ी खेत्ताई ओवकमिजंति इश्शाई ) जो (ण इति व्याक्या- लंकारे)ल और कुलिकर के क्षेत्रादि का उपक्रम वा वस्तुविनाशं उपक्रम किया जाता है उसको क्षत्रोपक्रम कहते हैं क्योंकि यह सामान्य वचन है अपितु क्षेत्राधार वस्तु के ही उपक्रम होते हैं. क्षेत्र तो अमृति पदार्थ है क्षेत्राधार भूमि और भूमे आधार तृणादि की उत्पत्ति वा विनाश करने को ही क्षेत्रोपक्रम कहा जाना है. से सत्तावकमे ) अब देवोपक्रम क पीछे कालोपक्रम का विवर्ण किया जाता है (मकिन कालोबकमे २) प्रश्न) कालापक्रम किस कहते हैं (उत्तर) जण्ण नालियाहिं कालस्सीवक्कमणं कीरइ सत्तं कालोबक्कमे ) जो घटी (घंटा) आदि द्वारा कालका उपक्रम किया जाना है उसे कालोपक्रम कहते हैं अथवा तृणादि द्वारा पारुषि आदि का प्रमाण करना और नक्षत्रादि द्वारा काल के फलाफल का उपक्रम करना जमे कि-इन ग्रहों के बल से सुमित वा दुर्भिक्ष होगा इत्यादि परिक्रम . और वस्तुविनाश उपक्रम यह दोनों ही कालोपक्रम में उक्त प्रकार में सिद्ध है। अथ कालोपक्रम के पीछे भावांपक्रम का विवेचन करने हैं। सेकित भाषावक्कम २ दुत्रिई पएणते तंजहा ) (प्रश्न) भावोपक्रम किस कहते हैं। उत्तर ) भावोपक्रम दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैस कि- (आगमनाय नोभागमोय ) आगम में जो जानना है और उपयोग युक्र भी ।
अनुयोगदार संब* (१७) है उसे आगम से भावोपक्रम कहते हैं.द्वितीय नोआग से किन्तु ( नौआगमओ दुविहे पएणचे तंजहा ) नो आगम से भाव उपक्रम द्वि प्रकार से है जैसे कि- (पसत्य अपसत्यय ) सुन्दर भाव उपक्रम और अप्रशस्त भाव उपक्रम अर्थात असुन्दर भाव उपक्रम अपितु ( तत्थ अप्पसत्थे डोडिणिगणिया अमच्चाइणं ) इन दोनों में जो अप्रशस्त भाव उपक्रम है उसकी सिद्धि के लिये सूत्रकार ने तीन उदाहरण दिये हैं जो अनुक्रमता से निम्नलिखितानुसार प्रथम उदाहरण ब्राह्मणी की है द्वितीय वैश्या का तृतीय मन्त्री का । सो प्रथम ब्राह्मणी के उदा. हरण का स्वरूप लिखा जाता है। अमुक नगर में एक ब्राह्मणी की ३ पुत्रियां थी जो कि उसके को रजित व हर्षित रखती थी ब्राह्मणी का भी उन पर असीम अनुराग था. वह सदेव चाहती थी कि क्षण मात्र भी इनका मेरे से वियोग न हो तथा इन को क्षण मात्र भी दुःख न हो, समय बीतने पर वह तीनों कन्या रौवनावस्था को प्राप्त हुई तथा लावण्यवती भी होगई, अतः माताने उन तीनों का विवाह कर दिया परन्नु मनमें सोचने लगी की कोई एसा उपाय करना चाहिये जिस से इन के पति इन पर सदैव प्रसन्न रहें और इनके सुग्व में कोई विन नहीं, ऐसा विचार कर पुत्रियों को विदा करने के समय बडी लड़की को कहीं एकान्त ले. जा कर उसे कहने लगी की हे पुत्रोके ! जब तेरा पति वासभवन में मिलने के लिये आवे तव तूने उसका कोई अपराध जानकर उस के मस्तक पर पाद प्रहार करना, ऐसा करने पर जो वर्ताच वह तेरे साथ करे वह मेरे से आकर कहना. मेरी इस शिक्षा को अवश्यपेव याद रखना, अनन्तर कन्या के वैस ही करने पर उस का पति नह से आई हृदय होकर तथा उस के अपराध को गुण समझ कर उस से बोला कि भियतम ! तेरे चरण रूपी कमल अतीच. सुकोमल हैं और मेरा शिर पत्थर की नाई अति कठिन है इसलिये तेरे पाद में. पीड़ा तो नहीं हुई इस प्रकार अनेक विनय युक्त वचनों से अपनी पत्नी को शीनल करके प्रसन्न किया और उस के पांव की मर्दन किया। अनन्तर कन्याने पाकर समस्त वर्तात्र आयोपान्त माता से कह सुनाया वह भी ऐसे जामात् पर अति प्रसन्न हुई और अपनी पुत्री से बोली कि हे पुत्रिके ! तेरे घर में तेरी अखंड आशा चलेगी क्योंकि तेरे पति आज्ञानुकूल कार्य करने वाला है इसलिये . निर्भय होकर अपने घर में यथेष्ट सुखों को भाग तुझे कोई डर नहीं। इस ( १८. ) ** अनुषोमवार म्न * प्रकार ब्राह्मणी ने दूसरी कन्या को भी करने की शिक्षा दी इसलिये उसने भी. अपने पति के मस्तक में . पादप्रहार किया-तब उस का पति कुछ समय कोष करके तथा श्रेष्ठ पुरुषों को स्त्रियों से ऐसा अपमानित करवाना योग्य नहीं है, विचार कर फिर प्रमय हो गया और कन्या को कुछ भी न कहा । . दूसरी कन्याने भी अपनी माता के पास आकर वैसे ही सारा वृतान्त कहा माता आनन्दित होकर दूसरी पुत्री से बोली कि हे कन्ये ! तूं भी मन माना सुख भोग जैसे तेरी इच्छा हो वैसे अपने घर में वर्ताव कर तुझे कोई भय नहीं है क्योंकि तरा पति क्षणमात्र क्रोधित होकर प्रसन्न हो जायगा, इसी प्रकार ब्राह्मणी ने तीसरी कन्या को कहा उसने भी वैसे ही अपनी माता की आज्ञा पालन की अर्थात् जब उसका पति मिलने के लिये उसके आवास भवन में आया तो तीमरी कन्याने ( अर्थात् उस की पत्नी ने ) उसके मस्तक में पाद प्रहार किया, तब उसका पति विचार. ने लगा कि-पुरुषों को खियों से ऐसी. अधोगति नहीं करवाना चाहिये अथवा कुलीन स्त्रियों का यह कर्तव्य नहीं है। पति की सेवा करनी ही नारियों का धर्म है नकि एसा अपमान करना इस प्रकार साच कर उसने उसको (तीसरी कन्या को) बहुत मारा अंत में स्वगृह से बाहर कर दिया मो वह भी अपने पति से निकाली हुई अपने घर भाई तथा अपनी माता को सर्व वृतान्त कह सुनाया माता सुनकर बड़ी दुखित हुई और बोली कि हे पुत्रीके ! तरा पति दुराराध्य होगा तूं जितनी भी उसकी विनय भक्ति तथा उसकी आज्ञानुसार वर्ताव करंगी उतना ही तुझे सुख होगा: यदि उस से पराङ्मुख होगी तो कदापि तुझे आनन्द और सुख प्राप्त न होगा इसलिये तुझे योग्य है कि सदैव काल अपने पति की आज्ञानुकूल वर्ताव करें. ऐमी शिक्षा दे चुकने के पश्चात् ब्राह्मणी ने अपने जामाता को बुला कर बहुत.. नम्रता से तथा अनेक शीत लोपचारोंसे उसे संतुष्ट व शान कर दिया और पुनः वह स्व पत्नी पर प्रसन्न होगया ब्राह्मणी न एवं (इस प्रकार ) तीनों जा- माताओं की परीक्षा कर ली सो इसी का नाम अप्रशस्त्र भावोपक्रम है। अंथ द्वितीय उदाहरण किसी नगर में ६४ चौसठ कला प्रवीण एक वेश्या व सती थी उसने सरी का अभिप्राय जानने के लिये एक रतिभवन बनवाया जिस की समस्त .
* अनुयोगद्दार सूत्र *. (४६ ) भीतों पर, रानपुत्र, सेठ, सेनापति, आदि नगर में प्रधान पुरुषों अत्युत्तम और मनोहर चित्रों से चित्र कर्म वनवाया अनन्तर राज पुत्रादि जो कोई भी वहां आता है वह वहां अपने सुन्दर चित्र को देख कर अतीव आल्हादित होकर उसकी ( गणिका की) प्रशंसा करता था इस प्रकार उसने- (वेश्याने) नगर के प्रायः सर्व बड़े बड़े पुरुषों को अपने पर मोहित कर लिया और यथेष्ट धन उनसे लूटकर सुखों को भोगने लगी इस प्रकार से अप्रशस्त भावोपक्रम का द्वितीय उदाहरण है। ॥ अथ तृतीय उदाहरण ॥ 'किसी नगरी में कोई राजा राज्य करता था. जो कि राजा के समस्त गुणों से युक्त प्रजा को पुत्रवत् समझने वाला और न्यायविक्रम अनुकम्पादि गुणों से भूषित था पुण्य योग से जिसका मन्त्री भी महाबुद्धि शील और अत्यन्त विच- ताण था किम्बहुना, राज्य में धुरा के समान होने से राज का सारा भार उसपर ही निर्भर था, राजा भी अन्तःकरण से उसपर मुग्ध तथा मोहित था अतएव: सर्व कार्यों में राजा उसकी सम्मति लेता था। एक समय राजा और मन्त्री दोनों ही घोड़े पर आरूढ़ होकर वन क्रीड़ा के लिये गये, तव मार्ग में चलते हुए राजा के घोड़े ने कहीं सखिलभदेश में प्रसूवण (मूत्र ) करने लगा अपितुः वहां पर पृथिवी सुन्दर होने से वह मूत्र चिर के पश्चात् शुष्क होता था, इसलिये राजा ने ऐसी दशा देखकर विचार किया कि यदि यहां पर तड़ाग वनवाया जावे तो वह बहुत सुन्दर चिरस्थायी होवे इस प्रकार चिरकाल तक उस अचंभे को देखता रहा किन्तु मन्त्री को कुछ भी न बोलकर चल दिया और भ्रमणः करके अन्त में वे अपने २ स्थान पर आगये परंच इंगिताकार ज्ञान की कुश- लता से मन्त्री झट ताड़गया कि राजा के मन में यह परिणाम उत्पन्न हुए थे उसके अनुसार राजा के न कहने पर भी विचारशील मन्त्री ने स्वअनुमति में वहां पर एक परम और मनोज्ञ सरोवर बनवाया और उसके चारों ओर नाना प्रकार के वृक्ष तथा अनेक प्रकार के पुष्प देने वाली लवाएं लगवाई जो कि षद् ऋतुओं के पुष्पों को देती थी इस प्रकार वह थोड़े काल में ही एक परम सुन्दर भाराम (वाग ) बन गया तथा उनकी शोभा ने उस सरोवर का महापच शतपत्र सहसूपत्र आदि कमलों से उसका पानी सुगन्धि वाला तथा अतीव शीतल होगया। अन्यथा फिर कभी राजा मन्त्री के साथ वनक्रीडा के (५०) * अनुयोगद्वार सूत्र * लिये गया और जाते हुए राजा ने उसी सरोवर को देखा और आचर्य से मन्त्री को बोला कि हे मंत्रिन् यह सुन्दर और रमणीय सरोवर किसने बनवाया है ! प्रधान ने उत्तर दिया कि हे देव ! यह आपका ही ताल है और आपने ही इसे स्वयं वनवाया था ऐसा उत्तर सुनकर राजा अत्यन्त आश्चर्य युक्त होकर बोला कि हे प्रधान ! इसके बनाने के लिये मैंने कब आज्ञा दी ? तब मन्त्री ने सविस्तर आद्योपांत वह वृत्तान्त राजा को सुनाया सुनने के अनन्तर राना बहुत प्रसन्न हुआ और प्रधान की अति स्तुति करके कहने लगा कि हे मंत्रिन् तूं महा कुशाग्र बुद्धि तथा अत्यन्त मन के भावों का (इंगिताकार का परिचित हैं) इस प्रकार राजा ने मंत्री की बहुतसी स्तुति करी और उसका वेतन अधिक कर दिया इसको सांसारिक फल होने से अप्रशस्त भावोपक्रम केहते हैं, अब प्रशस्त भावोपक्रम दो प्रकार से कथन करते हैं, एक तो गुरु सम्बन्धी, द्वितीय शास्त्र सम्बन्धी । प्रथम गुरु सम्बन्धी का विवर्ण किया जाता है ( तत्थपसत्यो गुरु माइणं) (तत्र ) प्रथम प्रशस्त भावोपक्रम गुर्वादि का इंगितानुसार वर्ताव करना जैसे कि श्रुताध्ययन के समय गुर्वादि के भावों की परीक्षा करना तथा उनके इंगिताकार द्वारा जानकर, अन्न पानी वस्त्रादि द्वारा उनकी सेवा करनी सो इसे प्रशस्त भावोपक्रम कहते हैं (सेचं नो आगम उभावोवक्कमे सेत्तं भावोवक्कमे से स्वकमे ) अथ इसकी पूर्ति करते हैं कि यही नो आगम से भावोपक्रम है और इसे भावोपक्रम कहते हैं इतना ही स्वरूप भावोपक्रम का है अथ द्वितीय शास्त्रीय उपक्रम का स्वरूप वर्णन किया जाता है। भावार्थ-क्षेत्र सम्बन्धी उपक्रम उसे कहते हैं जो हल और कुलिकादि द्वारा क्षेत्र का माप किया जाए, कालोपक्रम उसका नाम है जो घटिकादि द्वारा काल मान किया जाता है किन्तु भावोपक्रम दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है एक तो आगम रूप से दूसरे नोआगम से, आगम से जो सामायिकादि भावों को उपयोग पूर्वक जानता है उसे आगम से भावोपक्रम कहते हैं अतः नोआगम से जो भावोपक्रम है वह भी दो प्रकार से है एक तो प्रशस्त, द्वितीय अप्रशस्त, अपितु अप्रशस्त भावोपक्रम में पूर्वोक्त तीनों उदाहरण हैं प्रशस्त में केवल गुर्वादि के अंग चेष्टानुकूल कार्य करने उसी का नाम प्रशस्त भावोप- क्रम है और इसे ही भावोपक्रम कहते हैं किन्तु एक भावोपक्रम शास्त्रीय भी होता है जो निम्न लिखितानुसार है । ra * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५१ ) ॥ अथ पुनः भावोपक्रम विषय ॥ अहवां ओवकमे छविहे पराणते तंजहा प्राणुपुब्बी १ नाम २ पमाण ३ वत्तवया ४ अत्याहिगारे ५ समवयारे ६ से- किंतं पाणुपुव्वी २ दसविहा पन्नत्ता तंजहा नामाणु पुवी ? ठवणाणपुच्ची २ दव्वणुपुब्वी ३ खेत्ताणुपुन्वी ४ कालाणुगुब्बी '५ श्रोक्कितणाणुपुब्बी ६ गणणाणुपुवी ७ सठाणाणुपुब्बी ८ सामायारीयाणुपुव्वी ६ भावाणुपुव्वी १० सेकितं नामाणु- पुची नामवणाओ गयाो तहेव दवाणुपुब्बी जाव सेकिंत जाणग सरीर भविरा सरीर वइरित्ता दव्वाणुपुब्वी २ दुविहा पण्णता तंजहा ओवणिहिया अणो वणिहियाय तत्थणं जा- सानो वणिहिया साइप्पातत्थणं जासा अणो वणिहिया सा- दुविहा. पन्नत्ता तंजहा नेगम ववहाराणं संगाहस्सय सेकिंतं नेगम ववहाराणं अणो वणिहिया दव्वाणुपुत्वी २ पंचविहा पं० त० अपयपरूवणया १ भंगसमुक्कितणया २ भगोव दंस- पया ३ समोयारे ४ अण्णुगमे ५ ॥ पदार्थ:-(अहवा) अथवा (ओवक्कमे छीवहे पन्नत्ते तंजहा) शास्त्रीय उपक्रम षट् प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (आणुपुची) आनु पूर्वी अनुक्रम १ (नाम) नाम उपक्रम २ (पमाण) प्रमाण उपक्रम ३ (वत्त- चया) वक्तव्यता उपक्रम ४ (अत्थाहिगार) अर्थाधिकार उपक्रम ५ (समवयारे) समवतार-उपक्रम ६ (सेकितं आणुपुच्ची २ दसविहा पन्नत्ता तंजहा) (प्रश्न) आनुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन कीगई है ( उत्तर ) दश प्रकार से जैसे कि- (नामाणुपुचीवाणु धुब्बी दवाणुपुब्बी खेत्ताणुपुन्बी कालाणुपुच्ची) ना- मानुपूर्वी १ स्थापनानुपूर्वी २ द्रव्यानुपूर्वी ३ क्षेत्रानुपूर्वी ४ कालानुपूर्वी ५ ( उक्कित्तणाणुपुच्ची - गणणाणुपुब्बी संहाणाणुपुब्बी सामायारीयाणुपुच्ची भावाणु पुची ) उत्कीर्चानुपूर्वी ६ गणनानुपूर्वी ७ संस्थानानुपूर्वी ८ सामा- ( ५२ ) * अनुयोगद्वारे सूत्र * चारी आनुपूर्वी भावानुपूर्वी १० (सेकितं नामाणु पुच्ची नामवणा उगयाउ तहेव दवाणुपुन्बी जाव सेकिंतं जाणग सरीर भविय सरीर वइरित्ता दवाणु पुन्वी रदुविहा पं० त० उवाणिहिया अणो वणिहिया य)(प्रश्न ) नामानु पूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) नोम स्थापना का पूर्व विवर्ण किया गया है उसी प्रकार जानना यावत् द्रव्यानुपूर्वी पर्यन्त (प्रश्न) ज्ञशरीरभव्यशरीरव्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी कितने प्रकार से कहीगई है। (उत्तर) ज्ञशरीर भव्यशरीर व्यतिरिक्त द्रव्यानुपूर्वी दो प्रकार से पति- पादन की गई है जैसे कि उपनिधि की. और अनुपनिधि की क्योंकि उप नाम समीप का है निधि .नाम निधान तुल्य जो होवे उसे कहिये निधिसो जो समीप. की हुई वस्तुओं का स्वरूप पूर्ण प्रकार से करा जाए उसे उपनिधि कहते हैं तथा प्रयोजनार्थे इकण् प्रत्यायान्त करने से उपनिधि की ऐसे शब्द बन जाता है सो अनुक्रमता पूर्वक पदार्थों को स्थापन करना उसे ".उपनिधिकी" कहते हैं, अथवा वस्तुओं के स्वरूप को जो निक्षेप करे उसी का नाम " उपनिधिकी " है अपितु इससे विपरीत अर्थ देने वालों को अनु- पनिधि की कहते हैं सो यहां पर वर्तमान प्रयोजन सामायिकाधिकार है इस लिये इन्हों की आवश्यक्ता है । अथ इन्हीं का विस्तार फिर करते हैं ( तत्यणं जासा उवणि हिया साठप्पा) उनमें प्रथम जो उपनिधिकी है वह इस समय स्थापनीय है क्योंकि इसका स्वरूप अल्प है और अनुक्रमता पूर्वक है इसलिये सुगम भी है किन्तु ( तत्थणं जासा अणे वणि हिया सादुविह, प० तं० नेगम चवहाराण संग्गहस्सय ) जो अनुपनिधिको है वह भी दो प्रकार से प्रतिपादन की गयी है जैसे कि-नैगम व्यवहारनय के मत से और संग्रहनय के मत से (सेकित नेगम ववहाराणं अणो वणिया दवाणु पुची २ पंच विहा पं. तं. (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि की कितने प्रकार से वर्णन की गयी है (उत्तरं ) पांच प्रकार से जैसे कि ( अकृपयपरूवणया) प्र. थम भेद अर्थ पद का कथन रूप है जैसे कि-अर्थ परमाणु आदि की प्ररूपणा (भं- गंसमुक्त्तिणया) द्वितीय भेद अर्थ पद के भंगो कोउत्कीर्तन रूप है अर्थात् जो भगवनए हुए है उन को प्रकाश करना ( समो पारे) चतुर्थ भेद आनुपूर्वी आदि द्रव्यों को यथा स्थान समवतार करना जैसे कि-जो द्रव्य जिस जाति का हो उसी जाति में स्थापन करना ( अणुगमे ) पंचम भेद अनुयोग द्वार करके वि. चार करना उसे अनुगम कहते हैं अब सत्रकार पृथक २ स्वरूप वर्णन करते हैं । 1 * अनुयोगद्वार सूत्र * (५३) भावार्थ-शास्त्रीय उपक्रम षट् प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि- प्रानुपूर्वी १ नाम २ प्रमाण ३ वक्तव्यता ४ अर्थाधिकार ५ समवतार ६ आनुपूर्वी दश प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि नामानुपूर्वी, स्थापनानुपूर्वी, द्रव्यानुपूर्वी, क्षेत्रानुपूर्वी, कालानुपूर्वी, उत्कीर्तनानुपूर्वी, गणनानुपूर्वी, संस्थानु' पूर्वी, समाचारानुपूर्वी, भावानुपूर्वी, सो नाम और स्थापना का चिवर्ण आवश्यक के अधिकार में किया जा चुका है, द्रव्यानुपूर्वी भी पूर्ववत् ही जान लेनी किंतु शरीरं भव्यशरीर व्यतिरिक्तं द्रव्यानुपूर्वी दो प्रकार से कयन कीगई है जैसे कि उपनिधिकी और अनुपनिधिकी, उपनिधिकी उसे कहते हैं जो अनुक- मता पूर्वक वस्तुओं की स्थापनकरे. इस से विपरीत कानाम अनुपनिधि की इस का विस्तार महान् है इसीलिय प्रथम अनुपनिधिकी का विस्तार किया जाता है वह दो प्रकार से वर्णित है नैगम व्यवहार और संग्रहनय के मत से अंतः नैगम और व्यवहार नयके मत से उस के पार्च भेद हैं जैसे कि अर्थपद प्ररूपणा भंग समुत्कीर्तनता भंगोपदर्शनता, समवतार, और अनुगम अब सूत्रकार इन्हों.का पृथक् २ ता से विवेचन करते हैं । मूल-सेकित नेगम ववहाराणां. अपयपरूव णयाति- पयसिए आणुपुब्बी चउपयसिए प्राणुपुब्वी जावदस-पएनिए आणुपुब्बी संखज्ज पएंसिए श्राणुपुब्बी असंखेज्ज पएसिए आणुपुब्वी अयंत पएसिए आणुपुब्बी परमाणु पोग्गले अ- पाणु पुबी दुप्पएसिए अवत्तव्वए तिपएसिएयाप्राणुपुब्बीओं जाव अणंत पएसियारोप्राणुपुबीनो परमाणु पोग्गला अणा- गु पुब्बीयो दुपए सियई अवत्तब्वयाई सेतं णेगम ववहाराणं अपय परूवणया एयारणे गम ववहाराणं अपयपरूवणयाए कि पयोयणं एयारणं गम ववहाराणं अश्य परूवण याए भंग समुकित्तणया कारह । पदार्य-(सेकिंतं नेगम ववहाराणं अकृपय परवणया ) (प्रश्न ) वह कौन है नैगम और व्यवहार नय के मतसे जो अर्थ पद की प्ररूपणा की जाती है (उत्तर) (५४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * नैगम और व्यवहार नय के मत से जो अर्थपद प्ररूपणा है वे निम्न लिखितानुसार है (तिपए सिए आणुपुलिए चउपएसिए श्राणुपुच्ची जावदस पएसिए आणु पुची संखेज्ज़ पएसिए आणुपुची असंखेज्ज पएसिए आणुपुब्बी अणंत पएसिए आणु- पुन्बी ) जो तीन प्रादेशिक स्कंध चतुर मादेशिक स्कंध यावत् दश प्रादेशिक स्कंध इसी प्रकार संख्यात प्रादेशिक स्कन्ध असंख्यात प्रादेशिक स्कन्ध अनंत प्रदेशिक स्कन्ध हैं वे सर्व आनुपूर्वी में ही गर्भित हैं इन्हें ही आनुपूर्वी कहते हैं ( किन्तु परमाणु पोग्गले अनाणुपुव्वी) केवल परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य है क्योंकि अनानुपूर्वी नञ् समासान्त पद है न आनुपूर्वी यस्यासा अनानुपूर्वी और (दु- पएसिए अव्वत्तव्बए) दिमदेशिक स्कन्ध अवक्तव्य होता है ये सर्व एक वच- नान्त शब्द हैं इसीलिये एक बचनान्त ३ भंग हुए अब वहुवचनान्त तीन भंग दिखलाते हैं (तिपयसिएया आणुपुचीयो जाव अणंतपय सियाओ आ- पुचीओ) बहुत से ३ प्रदेशिक स्कन्ध से लेकर अनन्त प्रदेश पर्यन्त पुद्गल द्रव्य आनुपर्ची द्रव्य में कहे जाते हैं और ( परमाणु पोग्गला अणाणु पुचीनो) बहुत से परमाणु पुद्गल द्रव्य अनानुपूर्वी में होते हैं अर्थात् अनन्त परमाणु पुद्गल जो प्रत्येक २ फिरते हैं वे सर्व अनानुपूर्वी द्रव्य में हैं किन्तु (दुपएसियाई अवत्तव्ययाई ) भनेक द्विमदेशिक स्कन्ध अवक्तव्य हैं (क्योंकि त्रिप्रदेशी से लेकर अनन्त प्रदेशी पर्यन्त द्रव्य आनुपूर्वी है एक परमाणु पुद्ग- लता प्रत्येक २ अनन्त परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी में हैं अपितु विभदेशी स्कन्ध प्रवक्तव्य संज्ञक होता है (सेतणेगमवनहाराणं) यही नैगम और व्यवहार नय के मत से (अपयंपरूवणया) अर्थ पद की पदप्ररूपणा है उक्त पट् भंग दोनों नयों के मत से सिद्ध हैं शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! (एयाणणेगमत्रवहाराणं अट्ठपयपरूवण्या एकिपयोयणं) इन नैगम और व्य- वहार नय के मत से जो अर्थपद की. पदप्ररूपणा कीगई है उसका क्या प्रयो- जन है क्योंकि-सूत्रों में निरर्थक वचन कोई भी नहीं होता फिर इन के कथन करने का प्रयोजन क्या है इसे प्रकार से शिष्य के पूछने पर गुरु कहने लगे कि (एयाएणणेगमववहाराणं अकृपयपरूवणाए भंगसमुकित्तणयाकीरइ ) इन नैगम और व्यवहार नय के मत से जो अर्थपद की प्ररूपणा कीगई है, वे सर्व भंगों की समुकीर्तन वास्ते ही है अर्थात् इनके द्वारा भंगों की समुत्कीर्तनता कीजाती है अतः इन दोनों नयों के द्वारा भंग बनाए जाते हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत में अर्थपद की प्ररूपणा इस प्र- कार से की गई है त्रि प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी-पर्यन्त द्रव्याआनुपूर्वी में गिना जाता है और परमाणु पुद्गल अणाणु पूर्वी में होता है द्विप्रदेशी स्कंध अवक्तव्य संज्ञक कहलाता है एक वचनान्त से और बहुवचनान्त से इनके पद् भंग वन जाते हैं जैसे कि-नीचे पढिये. आनु पूर्वी अनानु पूर्वी अवतव्य १. ३ ३ ३ और इन्हीं नैगम और व्यवहार नयके मत से भंगो की समुत्कीर्तनवा की जाती है अर्थात् उक्न नयों द्वारा ही भंग वनाए जाते हैं । अब भंगो का स्वरूप निम्न प्रकार से सूत्रकार प्रति पादन करते हैं. ॥अथ भंग समुत्कीर्तन विषय ॥ सेकित्त ऐगम ववहाराणं भेगसमुकित्तणया २ अत्थिया- णुपुब्वी १ अत्थि अणाणुपुवी २अस्थि अवत्तव्वए ३ अस्थि आणुपुब्वी ३ ४ अत्थि अणाणुपुब्बी ३ ५ अस्थि अवत्तव्य याई ६ अहवा अस्थि प्राणु पुवीय । अणाणु पुब्बी७ अहवा अस्थि प्राण पुवीय प्रणाणु ब्वीय ८ अहवा.अत्थि प्राणु पुब्बीअोय अणाणुपुवीयअहवाअत्थिाणु पुवीभोय अणा [ पुवीओय १० अहवा अस्थि प्राणु पुवीय अवत्तव्बएय ११ अहवा अस्थि प्राणु पुवीय अवत्त याइंच १२ अहवा अत्थि आणु पुवीभोय अवेत्तव्वएय १३ अहवा अस्थि प्राणुपुवी- । ( ५६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र-* ओय श्रवत्तव्वयाइंच १४ अहवा अत्थि अणाणु पुवीय अ- वत्तव्वएय १५ अहवा अत्थि श्रेणाणु पुवीय अवत्तव्वयाइंच १६ अहवा.अस्थि अणाणु पुब्बीओय अब्बतब्बएय १७ अहवा, अस्थि अणाणु पुवीओय अवत्तव्वयाइंच १८ अहवा अस्थि प्राणु-पुवीय अणाणु पुवीय अवत्तव्वएय १६ अहवा अत्थि. प्राणुपुवीय प्रणाणुपुवीय अवत्तव्वयाइंच २० अहवा अस्थि आणुपुव्वीय अणाणु पुवीभोय अवत्तव्वएवं २१ अहवा अस्थि आणु पुवीय प्रणाणु पुवीभोय अवतव्वयाइंच २२ अहवा आणु पुवीरोय अणाणु, पुब्बीय अवतव्वएय २३ अहवा अंथिप्राणु पुवीय अपाणु पुत्वीय अवतव्वयाइंच २४ अहवा अस्थिप्राणु- पुब्बीउय अपाणु पुब्बीअोय अवत्तव्य एय २५ अहवा भत्थिाणु पुवीय प्रणाणु पुन्वीभोय अवत्त व्वयाइंच २६ एए अभंगाएवं सब्वे विछवी संभंगा सेत्तणे गम वपहाराणं भंग समुक्त्तिणया एयाणंणे. गमववहाराणं भंग समुकित्तणयाएकि पोयणं एयागणे गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणयाए भंगो वदसणया कीरइ। पदार्थ-(सेकितण गमववहाराणं भंगसमुक्त्तिणया २)शिष्य ने फिर पन्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से भंग समुत्कीतर्न कैसे होता है गुरु कहते हैं कि भो शिष्य ! नैगम और व्यवहार नय के मत से षट् पिंशति भंगों की समुत्कीर्तना होती है जो निम्नलिखितानुसार है ( अस्थि, आणुपुब्बी ) जो अर्थपदका पूर्व विवर्ण किया गया है उस द्रव्य से २६ भग होते हैं जैसे कि-एक पुद्गल आनुपूर्वी का है १ (अत्थि अणाणु पुब्बी) ऐक अनानुपूर्वी का है २ (अस्थि अवतव्यए ) ऐक. अवक्रव्य का है ३ फिर (अलि आणुपुचीओ) बहुत से पुद्गल प्रानुपूर्वी के ह ४ अत्यि अणाणुपुचीओं बहुत से पुद्गल अनानुपूर्वी के हैं ५ (अतिय अवत्तव्ययाइंच) बहुत से पुद्रल - * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ५७ ). अवक्तव्य के हैं ६ अव विकसंयोगी १२ भंग कहते हैं जैसे कि- (महवा अस्थि आणुपुची य अणाणुपुबी य) अथवा एक आनुपूर्वी एक अना- नुपूर्वी है ७ ( अहवा अत्यि आणुपुब्बी अणाणुपुच्चीओ य) अथवा एक आनु- पूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी है ८ (अहवा अस्थि प्राणुपुवीओ य अणाणुपुब्बीय) अथवा बहुत से आनुपूर्वी एक आनानुपूर्वी है ६ ( अहवा अत्यि आणुपुची यो य अणाणुपुवीओ य) अथवा बहुत से श्रानुपूर्वी और बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य हैं १० किन्तु जो ऊपर आनुपूर्वी अनानुपूर्वी लिखी है वे इन के अन्तर्गत द्रव्य ही समझने चाहिए-अथ आनुपूर्वी और प्रवक्तव्य के साथ चार भंग बनते हैं जो निम्न लिखिवानुसार हैं ( अहुवा अत्थि आणुपुब्बी य अव्वत्तए य ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और एक ही प्रवक्तव्य द्रव्य है ११ (अहचा अत्थि आणुपुब्बी यु अवत्तन्वयाई च ) अथवा एक आनूपुर्वी और बहुत से अभक्तव्य द्रव्य हैं १२ (अहवा आथि आणुपुब्बीनों य अवत्तच्चए य ) अथवा बहुत से प्रानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य द्रव्य है (अहवा अत्थि आणुपुच्चीओय अवत्तव्ययाईन्च) अथवा बहुत से आनुपूर्वी ब- हुत से ही अवतव्य द्रव्य १४ यह चतुभंग और आनुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के साथ हुए अब अनानुपूर्वी और अवजन्य द्रव्य के साथ चार भंग दिखलाए जाते हैं ( अहवा अस्थि अणाणुपुवीय अवत्तचए य ) अथवा एक अनानुपूर्वी गतद्रव्य और एक अवक्तव्यं द्रव्य है १५ (अहवा. अत्थि अणाणुपुवीय अव- चन्वयाई च ) अथवा एक अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य हैं १६ ( अहवा अस्थि अणाणुपुब्बीओ य अवतबए य ) अथवा वहुत से अनानुपूर्वी एक अ- वक्तव्य १७ ( अहवा अत्थि अणाणुपुबीओ य अवत्तव्ययाइं च ) अथवा वहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य और बहुत से अवक्तव्य १८ यह सर्व एकत्र करने से द्विक- संयोगी द्वादश भंग हुए अव त्रिकसंयोगी ८ भंग का विवर्ण करते हैं ( अहवा अत्थि आणुपुची यं अणाणुपुत्री य अवत्तव्यए य) अथवा एक द्रव्य आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य १६ (अहवां अत्थि आणुपुव्वी य प्रणाणुपुर्वी य अवत्तव्बयाई च) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अनानुपूर्वी द्रव्य बहुत से अवक्तव्य द्रव्य २० (अहवा अस्थि आणुपुव्वीया अणागुपुव्वीऔय अवतव्वए य) अथवा एक आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य २१ ( अहवा अत्थि. आणुपुन्नी य प्रणाणुपूच्चीयो य अवतन्वयाई च) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और बहुत से अनानुपूर्वी और बहुत से प्रवक्तव्य २२ ( अहवा अस्थि आणु E ५८) * अनुयोगद्वार सूत्र * पुचीओ य ायुपुब्बी य अवत्तव्बए य) अथवा बहुत से प्रानुपूर्वी एक अनानु- पूर्वी और एक अवक्तव्य २३ अहवा ( अत्थि आणुपुचिओ य अणाणुपुवी य अवतन्वयाइंच ) अथवा बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य एक अनानुपूर्वी और बहुत से अबक्तव्य द्रव्य २४ ( अहवा अत्थि आणुपुन्वीओ य अणाणुपुच्चीओ य अवतन्व- ए य ) अथवा बहुत से प्रानुपूर्वी द्रव्य बहुतसे अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य २५ ( अहवा-आणुपुचीओ य अणाणुपुच्चीओ य अवतन्वयाई च ) अथवा बहुत से आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी और बहुत अवक्तव्य द्रव्य २६ (गए अह भगा) यह त्रिकसंयोगी अष्टभंग है ( एवं सव्वे विछसि भंगा) अपि शब्द समुच्चयार्थ में है सो यह सर्व एकत्रित करने से पट् विंशति भंग, होते हैं जैसे कि-एक वचनान्त और बहुवचनान्त पर्ट भंग है द्विकसंयोगी द्वादश भंग हैं तीन संयोगी ८ भंग हैं सो (सें णेगम वंहाराणं भंग समुक्तिणया ) यह नैगम और व्यवहार नय के मन से भंग समुकीर्तना पूर्ण हुई-ऐसे कहने पर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! ( एयाएणणगमववहाराणं भंग समुक्तिणयाए किं पोयणं) इन नैगम और व्यवहार नय के मत से जो भंग समुकीतनता है तो इस के करने से क्या प्रयोजन है-ऐसे शिष्य के प्रश्न को 'सुनकर गुरु कहने लगे कि (एयाए गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणयाए भंगोवदसणया कीरई ) भो शिष्य ! इस नैगम और व्यवहार नय के मत से और भंगो को समुकीर्तनता से भंगोपदर्शनता की जाती है अर्थात् प्रथम भंग बनाकर फिर दिखलाए जाते हैं। भावार्थ:-नैगम और व्यवहार नय के मत से भंगों की समुकीर्तनता की- जाती है (गणना) सो सर्व भंग पद विंशति होते हैं जैसे कि-आनुपूर्वी द्रव्य १ अनानुपूर्वी द्रव्य २ अबक्तव्य द्रव्य यह तीन प्रकार के द्रव्य हैं इनके एक बच- नान्त और बहुवचनान्त करने से पट् भंग होजाते हैं और दिसंयोगी द्वादश भंग है तीन संयोगी अष्ट भंग हैं सर्व एकत्रित करने से पट् विंशति भंग बन जाते हैं इनकी पूर्ण गणना पदार्थ में लिखी गई है इसी का नाम समुकीर्तनता है अव सूत्रकार भंगोपदर्शनता क विषय में कहते हैं। मूल-सेकिंतं ऐगमववहाराणं भगोबर्दसणया १२ तिपए सिए प्राणपुची १ परमाणुपोग्गले अाणाणुपुब्बी दुपएसिए * अनुयोगद्वार सूत्र *- ( ५६. ) अवतव्वए ३अहवा तिपएसियाानुपुब्बीश्रो परमाणुपोग्गला अणाणुपुवीओ दुपएसिया अवत्तव्वयाई ३ अहवा तिपए- सिया परमाणुयुग्गले अाणुपुव्वी अप्रणाणुपुव्वी अच:- भंगो अहवा दुपएसिए तिपएसिए अप्रणागुपुवीअ अ अव- त्तव्यए य चउभंगो अहवा दुपएसिया य परमाणुपोग्गले अ श्रवत्तव्वए य प्राणुपुब्बी ३ अहवा तिपयसियाय परमाणु पोग्गलाय आणुपुबीनो अणाणुपुचीत्रोय ४ अहवा तिपए सिए अ दुपएसए अाणुयुब्बी य अवत्तव्वए य ५ अहवा तिपएसिए यदुप्पएसिवाए प्राणुयुवी प्रवत्तब्बयाइंच ६अहवा तिपएसित्रा य आणुपुची अप्रवत्तबगाइंच ७ अहवा तिपए सिया दुपएासिए अप्राणापुब्बीयो अअवतव्वएम अहवा तिपए सिवाय दुपयसिए अ आणु० अवतव्वए अ अहवा तिपएसि- श्राय दुपएसिवाय प्राणु अवत्तत्रयाइंच हवा परमाणु पोग्गले अदुपएसिए प्रणाणु० अवत्तब ए अअहवा परमाणु पोग्गले अदुपएसिआ एश्रणाणु अवत्तव्ययाइं च १० अहवा परमाणु पोग्गलाय दुपएसिए अश्रणागु० अवतब्बए अ ११ अहवा परमाणुपोग्गला य दुपएसिवाय अणाणु० अवत्तव्व- याइंच १२ अहवा तिपएसिए अ परमाणु पोग्गल अदुपए सिए अासुपुब्बी अप्रणाणु० अवत्तव्वए अ.१ अहवा तिपए सिए अ परमाणुयोगले य दुपएसित्रा य प्राणुपुब्वी अव- त्तव्वयाइं च २ अहवा तिपएसिए अ परमाणुपुग्गले य दुपए सिवाय प्राणुपुब्बी अश्रणाणुपुवायोप्रवत्तए १३अहवा तिपएसिए अ परमाणुपोग्गला य दुपएसिएन पाणपुवीय ( ६०, * अनुयोमद्वार सूत्र * अणाणुपुव्वीश्रो अवत्तव्वए श्र४ अहवा तिपएसिए श्रपरमाणु पोग्गला य दुपएसिबाय आणुपुब्वीप्राणुपुष्पीओ अअव- त्तव्वए.अ ५ अहवा तिपएसिया यपरमाणु पोग्गले अदुपए- सिए अप्राणुपुचीनोभणाणुपुबीनाअभवत्तव्वयाइं च ६ अहवा तिपएसिवाय परमाणुपोग्गले अदुपएसिवाय प्राणु पुवीओ अ अणागुपुब्बी अवतव्वयाई च ७ अहवा तिषए सिबाय परमाणुपोग्गले अए दुपएसिया यआणुपुवीश्रोत्र अणाणुपुवीश्रो अवतव्वयाई च ८ से तं नेगम ववहाराणं भंगोवदंसण्या ॥ पदार्थ-(सेकित नेगमववहाराणं भंगोवंदसणया २)(प्रश्न) नैगम और व्यवहार नय के मत से भंगोपदर्शनता किस प्रकार से होती है ( उत्तर) नैगम और व्यवहारनय के मत से भंगोपदर्शनता और भंगो का अर्थ निम्न प्रकार से है जैसे कि (तिपएसिए आणुपुची) तीन प्रदेशिक स्कंध को आनुपूर्वी द्रव्य कहते हैं १ ( परमाणुपोग्गले अणाणपुवी ) परमाणु पुद्गल को अनानानु- पूर्वी द्रव्य कहते हैं २ ( दुप्पएसिए अवत्तवएय) द्विपदेशिक स्कंध को अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं यह तीन भंग एक वचनान्त हैं, अब तीनों भंग बहु वच- नान्त कहते हैं यथा (तिपएसियाई आणुपुव्वीउ ) बहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध अनुपूर्वी द्रव्य हैं ४ ( परमाणु पोग्गला अणाणुपुच्चीउ ) बहुत से परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य हैं ५ ( दुप्पएसियाईअवत्तव्वयाई ) बहुत से द्वि पदे- शिक स्कंध अवक्तव्य हैं ६ यह तीन भंग बहुवचनान्त हैं एवं सर्व पट् भंगहुए अथ विकसंयोगी द्वादश भंगो का विवर्ण किया जाता है ( अहवातिपएसिए य परमाणुपोग्गले आणुपुव्वीय अणाणुपुबीए य ) अथवा एक तीन प्रदेशिकस्कंध और एक परमाणु पुद्गल यदि एकत्व होजाय तो तब उनको आनुपूर्वी और अनानुपूर्वी कहते हैं ७ इसी प्रकार अग्रे भी संभावना करलेनी चाहिये ( अहवा तिपएसिय परमाणुपोग्गलाय आणुपुवीय प्रणाणुपुन्बीउ य ) अथवा एक तीन प्रदेशिक स्कंध और बहुत से परमाणु पुद्गलं उनको आनुपूर्वी और बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं.८ (अहवा तिपएसियाय परमाणुपोग्गले प्राणुपुन्वीउ य * अनुयोगद्वार सूत्र में (६१) अणाणुपुची य ) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध और एक परमाया पुद्गल उनको बहुत से भानुपूर्वी एक अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं ( अहवा तिपए सियाय परमाणु पोग्गलाणं आणुपुब्बीउ प्रणाणुपुच्चीउ य) अथवा वहुत से तीन प्रदेशिक स्कंध और बहुत से परमाणु पुद्गल उनको बहुत से आनुपूर्वी औ- र बहुत से अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं १० ( अहवा पिएसियाय दुपएसिय भाणुपुब्बीउ अवत्तन्वय) अथवा बहुत से ३ प्रदेशिक स्कंध एक द्वि प्रदेशिक स्कंध उसे बहुत से आनुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं ११ ( अहवा तिपए सिय दुप्पएसिया य आणुपुचीय अवत्तव्बयाई च) अथवा एक ३ प्रदेशिक स्कंध बहुत से द्वि प्रदेशिक स्कंध उन्हें आनुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य करते हैं १२ ( अहना तिपएसिया य दुपएसिय प्राणुपुबीड यं अवत्तव्बयए) अथवा बहुत से ३ प्रदेशिक स्कंध और एक द्वि प्रदेशिक स्कंध उसे बहुत से आनुपूर्वी और एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १३ (अहवा तिपएसिवाय दुप्पए सियाय माणुपुवीज्य अवत्तव्वयाइंच ) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध और बहुत से द्वि प्रदेशिक स्कंध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १४ ( अहवा परमाणु पोग्गलेय दुपए सि- ए य अणाणुपुच्ची य अवत्तव्वया य ) अथवा एक परमाणु पुद्गल और एक द्वि प्रदेशिक कंध उसको एक अनानुपूर्वी और एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १५ ( अहवा परमाणु पोग्गले य दुपएसिया य अणाणु पुवीय अवत्तव्वयाइंच ) अथवा एक परमाणु पुद्गल और बहुत से द्विप्रदेशिक स्कंध चे एक अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १६ ( अहवा पर- माणु पोग्गलाय दुपएसिएय अणाणुपुच्चीउ अवत्तव्बएय) अथवा बहुत से परमाणु पुटूल एक द्विप्रदेशिक स्कंध उन्हें बहुत से अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १७ (अहवा परमारण पोग्गलाय दुप्पएसियाय आणुपुचीउ य अवत्तव्बयाई च) अथवा बहुत से परमाणु पुद्गल बहुत से द्विमदशिक स्कंध उन्हें बहुत से अनानुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य व्य कहते हैं १८ (अ- हवा तिपएसियय "परमाणु पोग्गले" दुपएसिए य आणुपुच्ची य अणाणुपुब्बी य अवत्तव्यय) अथवा एक तीन प्रदेशिक स्कंध एक परमाणु पुद्गल एक द्विप्र- देशिकस्कंध उन्हें एक मानुपूर्वी एक अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं १६ ( अहला दिपएसिय परमाणुपोग्गलेय दुपएसिया य आणुपुच्ची य अपाणुपुच्ची और .
(-६२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र *- य अवतव्वयाइंच ) अथवा एक तीन प्रदशिक स्कंध और एक परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदेशिक स्कंध उन्हें एक आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २० ( अहवा तिपएसिय यः परमाणुपोग्गला य दुपएसिए य आ- गुपुच्ची य अण्णायुपुबीउ अवत्तबए य ) अथवा एक तीन प्रदेशिक स्कंध बहुत से परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कंध उन्हें एक आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एक प्रवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २१ ( अहवा तिपएसिए य परमाणुपोग्गला य दुपए सिया य आणुपुब्बी य अणाणुपुच्चीउ य अवतव्ययाइंच) अथवा एक ३ प्रदेशिक स्कंध बहुत से परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदोशक स्कंध उन्हें एक प्रानुपूर्वी बहुत से : अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २२ ( अहवा तिपएसियाय परमाणु पोग्गले य दुप्पएसिए य आयुपुचीउ य अगाणुपुची य अवत्तव्व य) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध एक परमाणु पुद्गल एक द्विप्रदशिक स्कन्ध उसे बहुत से आनुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २३ ( अहवा तिपएसिया य पर- माणुपोग्गले य दुप्पएसिया य आणुपुन्बीउ य अणाणुपुची य अवत्तब्वयाईच) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध एक परमाणु पुद्गल बहुत से द्विपदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी एक अनानुपूर्वी और बहुत से अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २४ (अहवा तिपएसिया यं परमाणुपोग्गला ये दुप्पएसिए य आणु पुनीश्री य अनानुपुव्वीओय अवत्तव्यए य) अथवा बहुत से तीन प्रदेशिक स्कन्ध बहुत से परमाणु पुद्गल एक द्विपदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से आनुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी एक अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं २५ (अहवा तिपएसियाय परमाणु पोग्गलाय दुप्पएसियाय आणुपुव्वीउ य अणाणुपुबीउ य अवत्तन्वयाई च) अथवा बहुत से ३ प्रदेशिक स्कन्ध बहुत से परमाणु पुगल बहुत से द्विप्रदेशिक स्कन्ध उन्हें बहुत से पानुपूर्वी बहुत से अनानुपूर्वी बहुत से अवक्तव्य द्रव्य क. हते हैं २६ (सेच नेगम ववहाराणं भंगोवदसणया) अब इसकी पूर्ति कहते हैं, यही नैगम और व्यवहार नय के मत से भंगोपदर्शनता है । भावार्थ-भंगोपदर्शनता उसका नाम है जो •पूर्व भंग बनाए गये थे उन. को अर्थों में संयोजन करना वही भंगोपदर्शनता है जैसे कि कल्पना करो कि-एक तीन प्रदेशिक स्कंध है, एक परमाणु पुद्गल है तब उनको बहुत से पानुपूर्वी द्रव्य एक अनानुसूची द्रव्य ऐसे कहा जाता है इसी प्रकार सर्व भंग जान लेने .
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ६३ ) जो उपर हिन्दी पदार्थ में लिखे गये हैं यह सर्व समास नैगम और व्यवहारनय के मतं से होता है सो अव नैगम और व्यवहारनय के मत से समवतार का वर्णन किया जाता है। ॥ अथ समवतार दार विषय-॥ मूल-सेकितं समोयारे ऐगमववहाराणं आणुपुब्बी दवाई कहिं समोयरंति किं प्राणुपुत्वीदव्वे समोयरंतिप्रणाणुपुवीदव्वे हिं समोयरंति अवत्तव्वयदव्वेहि समोयरंति णेगमववहाराणं आणुपुवदिव्वाइं प्राणुपुब्बीदब्बेहिं समोयरंति णो अणाणुपु- ब्बी दब्बेहि समोयरंति णो अव्वत्तव्ययदव्वेहि समोयरति एवं प्रणाणुपुब्बीदब्वाइं अवत्तव्वय दव्वाणि विसठाणे समो- यारेयवाणि सेतू समोयारे । पदार्थ-( सेकिंत समोयारे २ णेगमववहाराणं ) शिष्य ने प्रश्न किया कि, हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से समवतार कैसे होता है-अथवा ( आणुपुच्ची दव्बाई कहिं समोयरंति ) आनुपूर्वी द्रव्य कहां पर समवतार होते हैं (किं आणुपुच्ची दब्बेहिं समोयरंति) क्या आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में स्मवतार होते हैं अर्थात् वे स्वजाति में गर्मित होते हैं,वा अणाणुपुव्वी दब्बेहिं समोयरंति ) अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं अथवा ( अवत्तव्बय दव्वेहिं समोयरंति) प्रवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं ऐसे शिष्य के पूछने पर गुरु कहते हैं कि (णेगमववहाराणं आणुपुब्बी दबाई आणुपुन्वी दव्बेहि समोयरंति ) नैगम औ- र व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते किन्तु (णो अणाणुपुब्बी दब्बेहि समोयरंति ) अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार नहीं होते हैं (णो अवक्तव्यय दबेहि समोयरंति) अवक्तव्यद्रव्यों में समवतार नहीं होते ( एवं अणाणु पुची दवाई ) इसी प्रकार अनानुपुर्वी द्रव्य और ( अत्तन्वय दवाणिवि ) अबक्तव्य द्रव्य भी (सेठाणे समोयारे यवाणि सेतंस- मोयारे ) स्वस्थानों में समवतार होते हैं यही समवतार द्वार का वर्णन है भावार्थ-नैगम और व्यवहारनय के मत से जो आनुपूर्वी द्रव्यं है वे स्वस्था- . * अनुयोगद्वार सूत्र * नों में ही गर्मित होते हैं अर्थात् जिस जाति का जो द्रव्य है वे अपनी जाति में ही रहता है अथवा उसकी गणना उसकी जाति में की जाती है उसी का नाम समवतार द्वार हैं। ॥ अथ अंनुगम विषय ॥ सेकिंत अणुगमे २ नवविहे .पण्णत्ते तंजहा संतपयप रूवणया १ दवपमाएं च २ खेत्तं ३ फुसणाय ४ कालो य ५ अंतरं ६ भाग ७ भाव ८ अप्पाबहुंचेव ६ सेकिंतं णेगम ववहाराणं संतपयपरूवणया प्राणुपुब्बीदव्वाइंकि अस्थि नस्थिति नियमा अस्थि एवं दोनिवि १ नेगमववहाराणं आणुपुब्बी दवाइं किं संग्वेज्ज़ाई असंखेज्जाई अपंताई नो संखेज्जाई नो असंखेज्जाई अणंताई एवं दोनिवि ॥२॥ पदार्थ:-(सेकिंतं अनुगमे २) (प्रश्न ) अनुगम किसे कहते हैं (उत्तर) अनुगम (नवविहे पं० तं० ) नव प्रकार से प्रतिपादन किपा गया है अनुगम उसका नाम है जो सूत्रानुसार व्याख्या कीजाए अथवा जिसके द्वारा अर्थों का पृथक् २ बोध हो, उसे अनुगम कहते हैं वे नव प्रकार से निम्न लिखितानुसार है, (संतपयपरूवणया) विद्यमान पदों की प्ररूपणा करनी अर्थात् सवरूप प- दार्थों का विवर्ण किन्तु असत् रूप खरगूगवत् नहीं हैं १ (दत्रयमाणं घ) द्रव्यों का प्रमाण २ (खेत्तं ) क्षेत्रद्वार ३ (फुसणाय) स्पर्शनाद्वार ४ (कालोय) कालद्वार ५ ( अन्तर ) अन्तरद्वार ६ (भाग) भागद्वार ७ (भाव) भावद्वार (अप्पाबहुचेव) अल्प बहुत्वद्वार यह निश्चय ही नवद्वार है ( सेकिंतं णेगम ववहाराणं संतपयपरूवणया) ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से ( आणुपुची दवाई कि अस्थि नत्थिति ) आनुपूर्वी द्रव्यों की अस्ति है किम्वा: नास्ति है.गुरु कहते हैं (नियमा अस्थि एवं दोनिवि ) निश्चय ही अस्ति हैं है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों की भी निश्चय ही अस्ति है ॥१॥ गम ववहाराण आणुपुब्बी दवाई ) नैगम और व्यवहार नय के मत से प्रानु. पूर्वी द्रव्य (किं संखेज्जाइं असंखेज्जाई अणंताई) क्या संख्यात पद वाले हैं 4 * अनुयोगद्वारं सूत्र * (६५) वा असंख्यात अथवा अनन्तपद वाले हैं। गुरु कहते हैं (यो संखेज्नाइंणो अ- संखेज्जाई अणंताई एवं दोनिवि ) आनुपूर्वी द्रव्य उक्त नयों के मत से संख्यात असंख्यात नहीं हैं केवले अनन्त हैं इसी प्रकार अनार्नुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य भी अनन्त है ॥२॥ भावार्थ-अनुगम नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि विद्यमान पदों की प्ररूपणा १ द्रव्यों का परिमाण २ क्षेत्र ३ स्फर्शना ४ काल ५ अन्तर ६ भाग ७ भाव ८ अल्प बहुत्व है सो प्रथम द्वार में नैगम और व्यवहार नय के मतसे तीनों द्रव्यों की सदैच काले अस्ति है फिर नैगम और व्यवहार' नय के मत से तीनों द्रव्यं अनंत हैं अपितु संख्यात वा भसंख्यात नहीं है। अथ क्षेत्र द्वार विषय । मूल-णेगमववहाराणं आणुपुब्बीदव्वाई. लोगस्सकइ भागे होज्जा किं संखिज्जाइंभागे होज्जा असंखेज्जाइंभागे होज्जा, संखेज्जेसु भागे होज्जा असंखेज्जेसु भागे होज्जा सबलोएसु होज्जा ? एगंदब्बं पडुच्च संखेज्जहंभागे वा होज्जा असंखेज्जईभागे वा होज्जा संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा सवलोए वा होज्जा नाना दब्वाइं पडुच्च नियमा सव्वलोए.वा होज्जा ऐगमववहाराणं अण्णाणुपुंवादब्बाइं किं लोगस्स संखेज्जइंभागे होज्जा असंखेज्जइंभागे होज्जा संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेज्जे- सु भागेसु होज्जा सबलोए होज्जा?, एगं दब्बं पडुच्च नो, सं- ज्जहभागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जानो संखेज्जेसु भागे- सु होज्जा नोअसंखज्जेसु भागेसु होज्जा नो सब्बलोए होज्जा नाणा दब्वाइं पडुच्च नियमा सव्वलोए होज्जा, एवं अवतव्य गदव्वाणिवि। .
" ( ६६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ-( नेगमववहाराणं) नैगम और व्यवहारनय के मत से (आणुपुव्वी ददाई लोगस्सकइ भागे होज्जा) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! जो आनुपूर्वी द्रव्य हैं वे लोक कितने भाग में होते हैं (कि संखिज्जाइंभागे होज्जा असंखेज्जाइंभागे होज्जा ) क्या लोक के संख्यात भाग में होते हैं अथवा ( संखज्जेसु भागे होज्जा असंखेज्जे भागे होज्जा ) बहुत से संख्यात भागों में होते हैं वा बहुत से असंख्यात भागों में होते हैं अथवा (सब्बलो एसु होज्जा) सर्व लोग में होते हैं इस प्रकार के शिष्य के पूंछने पर गुरु कहने लगे कि भो- शिष्य ( एग दव्वं षड्डुच्च ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा ( संखेज्जेइमागे वा होज्जा) लोक के संख्यात भागमें भी होते हैं अथवा (असंखज्जइ भावे होना) असंख्यात भाग में भी होते हैं वा ( संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में भी होते हैं अथवा ( असंखज्जेसु भागेसु वा होज्जा)बहुत से असंख्यात भागों में भी होते हैं अथवा (सबलोए वा होज्जा) सर्व लोक में भी होते हैं जैसेकि श्रीकेवली भगवान् के समुद्धात के समय आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक में होजाते हैं किन्तु समुद्घात की स्थिति केवल अष्ट समय प्रमाण मात्र है और यह उन तीनों अंक केवली समुद्धात की अपेक्षा से कहे गये हैं अपितु ( नाणा दवाई पड्डुच्चनियमा सन्चलोए होज्जा ) नाना द्रव्यों की अपेक्षा नियम से सर्व लोक में होते हैं यह सर्व गुरु का उत्तर आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से है, अब शिष्य आनानुपूर्वी द्रव्य की पृच्छा करता है जैसे कि ( नेगमयवहाराणं ) नैगम और व्यवहार नय के मत से (अनानुपुची दवाई कि लोगस्स संखेज्जइ भागे होज्जा) शिष्य पूंछता है कि हे भगवन् अनानुपूर्वी द्रव्य क्या लोक के संख्यात भाग में होते हैं अथवा ( असंखेन्नइमागे होज्जा) असंख्यात भाग में होते हैं अथवा (संखेज्नेसु भागेसु होजा) बहुत से संख्यात भागों में होते हैं वा ( असंखेज्जे- सु भागेसु होज्जा) बहुत से असंख्यात भागों में होते हैं ( सव्वलोए होज्जा) अथवा सर्व लोक में होते हैं गुरु कहने लगें कि (एगं दवं पडुच्च ) एक द्रव्य की अपेक्षा (नो संखेज्जइमागे होज्जा ) लोक के संख्यात भाग में नहीं होते क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्य एक परमाणु पुद्गल का नाम है (असंखेज्जइभागे होज्जा) अपितु लोक के असंख्यात भाग में होता है किन्तु (नोसंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में नहीं होता ( नोअसंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत १ असेसत्तोदो दुहिंहितो लुकू । इस सूत्र से पंचमी लोप होगई है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ६७ ) असंख्यात भागों में नहीं होते क्योंकि केवल एक परमाणु है(नो सबलोएहोज्जा और नाही सर्व लोक में होते हैं किन्तु (नाणादव्वाई पडुच्च ) नाना द्रव्यों की अपेक्षा (नियमा सबलोए होजा) निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं ( एवं अ- वत्तव्यमदवाणिवि ) इसी प्रकार अवक्तव्य द्रव्य भी जानलेने चाहिये जैसे कि अनानुपूर्वी द्रव्य का विवर्ण किया गया है ।। भावार्थ:-नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में अथवा बहुत से संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में अथवा वहुत से संख्यात भागों में और बहुत से असंख्यात भागों में होता है अथवा सर्व लोक में भी हो जाता है (केवली भगवान की समुद्घात की अपेक्षा यह विवर्ण केवल एक द्रव्य की अपेक्षा से है, किन्तु नाना द्रव्यों की अपेक्षा से यह द्रव्य निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं। नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी एक द्रव्य लोक के केवल असंख्यात भाग में होता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा यह द्रव्य निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं सो इसी प्रकार अवक्तव्य द्रव्य के स्वरूप को भी जान लेना चाहिये ॥ ॥अथ स्पर्शना द्वार विषय ।। मूल-णेगमववहाराणं प्राणुपुचीदवाई लोगस्स किं . संखेज्जहभागं फुसंति असंखज्जइभागं फुसंति 'संखेज्जइ. सुभागे फुसंति असंखज्जइसुभागे फुसंति सव्वलोगं फुसंति एगं दव्वं पडुच्च लोगस्स संखेज्जइमागं वा फुसइ असंखेज्जइ भाग वा फुसन्ति संखेज्जेवाभागं फुसन्ति असंखेज्जेवामागे फुसन्ति सव्वलोगं वा फुसन्ति नाणादब्बाइं . पड्डुच्च नियमा सवव्लोगं फुसन्ति । पदार्थः-(गम ववहाराणं ) नैगम और व्यवहार नय के मत से (प्राणु- पुन्नी दवाई) आनुपूर्वी द्रव्य ( लोगस्स किं संस्खेज्जइ भागं फुसंति ) क्या लोक के संख्यात भाग को स्पर्श करते हैं अथवा ( असंखेज्नइ भागे फुसंति) असंख्यात भाग को शार्ण करते हैं (संखेज्जइ सुभागे फुसंनि ) अथवा बहुत प १ (६८) * अनुयोगद्वार सूत्र * संख्यात भागों को स्पर्श करते हैं बा (असंखेन्जेसु भागे कुसंति) बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श करते हैं अथवा ( सञ्च लोगं फुसंति ) सर्व लोक को स्पर्श करते हैं । शिष्य के ऐसा पूंछने पर गुरु कहने लगे कि ( एगं दवं 'पडुच्च लोगस्स संखेज्जड़ भागं वा फुसंति ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग को स्पर्श करता है ( अथवा असंखेज्जइ भागं का ग्फुसंति ) असंख्यात भाग को स्पर्श करता है अथवा( संखज्ज वा भागे फुसंति ) अथवा भानुपूर्वी द्रव्य बहुत से संख्यात भागों को स्पर्श होते है अथवा ( असं- खेज्ने वा भागे सु फुसंति ) बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं अथवा ( सन्च लोग बा फुसंति ) सर्व लोक को भी स्पर्श होते हैं यह केवल एक द्रव्य की अपेक्षा से है किन्तु ( नाणा दवाई पडुञ्च नियमा सव्व लोग फु- संति ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेना से निश्चय ही, सर्व लोक को स्पर्श होते हैं। भावार्थ-एक आनुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात वा असंख्यात अथवा बहुत से संख्यात भाग वा बहुत से असंख्यात भागों को अथवा सर्व लोक को स्पर्श होता है किन्तु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक को स्पर्श करते हैं। अथ अनानुपूर्वी विषय । णेगमववहाराणं अणाणुपुठी दृब्वाणं पुच्छा एग दु- वं पडुच्च नो संखेज्जइभागं फुसह असंखज्जहभागं फुसंति नो संखेज्जे भागे फुसंति नो असंखेज्जे भागे फुसंति नो सब 'लोगं फुसति नाणादब्वाइं पडुच्च नियमा सव्वलोगं फुसति एवं अवत्तव्वगदवाणिवि भाणियवाणि । . पदार्थ-(णेगमववहाराणं ) नैगम और व्यवहार नन के मत ( से अणाणु पुवी दवाणं पुच्छा ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! अनानुपूर्वी-द्रव्य लोक के कितने भाग को स्पर्श होता है, गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! ( एगं दृव्वं पडुच्च ) एक द्रव्य की अपेक्षा से (नो संखेज्जइभाग फुसइ); लोक के संख्यात भाग को स्पर्श नहीं करता अपितु (असंखेनइ भाग फुसति) * अनुयोगद्वार सूत्र * (६६) असंख्यात भाग को स्पर्श करता है किन्तु ( नो संखेन्जेमार्ग फुसंति ) बहुत संख्यात भागों को स्पर्श नहीं होते नाही (नो असंखेन्जेमागं फुसंति) लोक के बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं (नो सबलोग फुसंति ) किन्तु सर्व लोक को भी स्पर्श नहीं होते यह केवल तो एक द्रव्य की अपेक्षा है किन्तु (नाणा दुब्बाइं पडुच्च ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से सर्व लोक को स्पर्श होते हैं ( एवं अवसव्वगवाण विभाणि यवाणि ) इसी प्रकार 'अवक्तव्य द्रव्य भी कथन करने चाहिये । 'भावार्थ-अनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य केवल लोक के असंख्यातवें भाग को ही स्पर्श करते है शेष भागों को स्पर्श नहीं होते। अथ स्थिति द्वार विषय ।। मूल-णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदबाई कालो केव चिरं होइ ?, एगं दब्बं पडुच्च जहरणेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखज्जं कालं नाणादव्वाइं पडुच्च सम्बद्धा एवं दोनिवि । पदार्थ-(णेगमववहाराणं ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् नैगम और व्यवहार नय के मत से (आणुपुव्वी दवाई कालओ केवञ्चिरं होइ) आनुपूर्वी द्रव्य काल से कवतक रह सकता है अर्थात् एक आनुपूर्वी द्रव्य काल की अपेक्षा सं कितने चिर की स्थिति युक्त होता है, इस प्रकार पूछने पर गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! (परां दव्वं पडुच्च जहन्नेयंएगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्जकालं) एक द्रव्य की अपेक्षा से जघन्य (न्यून से न्यून ) एक समय प्रमाण स्थिति होती है उत्कृष्ट काल की अपेक्षा असंख्यात काल पर्यन्त स्थिति करता है अ- र्थात् यदि एक आनुपूर्वी द्रव्य एक ही स्थान पर स्थिति करे तो उत्कृष्ट काल असंख्यात काल पर्यन्त स्थिति कर लेता है किन्तु ( नानादव्याई पडुछ नियः मा सन्चद्धा ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा नियम से सर्व काल में रहते हैं क्योंकि नाना प्रकार के जो आनुपूर्वी द्रव्य हैं वे सदाकाल ही रहते हैं इसलिये उनकी अपेक्षा भानुपूर्वी द्रव्य सदा विद्यमान है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी अन्य और श्रवक्तव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । भावार्थ-तीनों द्रव्यों की स्थिति जघन्य एक सयय प्रमाण उत्कष्ट असं- .. . (.७. ) * अनुयोगद्वार सूत्र * ख्यात काल पर्यन्त है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा सदा ही विद्यमान रहते हैं। अथ अन्तर द्वार विषय । मूल-णेगमववहाराणं आणुपुब्बी दवाणं. कालो के वंचिरं अंतर होइ?,एगं दब्वं पडुच्च जहरणेणं एग समयं उको सेणं अणंतं कालं नाणादब्वाइं पड्डुच्च नत्थि अंतरं । ऐगमव- वहाराणं प्रणाणुपुचीदव्वाणं कालो केवइयं अंतर होइ? एगं दव्वं पडुच्च जहरणेणं एगं समयं उकोसणं असंखेज्जं कालं नाणादव्वाइं पडुच्च नत्थि अंतरं । गमववहाराणं अवत्तव्वय दवाणं काल ओ केवंचिरं अंतर होइ? एगं दव्वं पडुच्च जहरणे- एं एगं समयं उक्कोसेणं अतं कालं. नाणादव्वाइं पड्डुच्च नथि अंतरं होई ॥६॥ पदार्थ-( णेगमवघहाराणं आणुपुव्वीदव्वाणं कालओ केवंच्चिरं अंतरं होइ ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से श्रानुपूर्वी द्रव्यों का काल की अपेक्षा से कितने काल पर्यन्त अंतर होता है अर्थात् आनुपूर्वी द्रव्यों का अन्तर काल कितना है ( उत्तर ) ( एगं दव्यं पडुच जहएणणं एग समयं उकोसेणं अणतं कालं ) एक भानुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल होता है उत्कृष्ट अनंत काल पर्यन्त अंतर काल होता जैसे कि-एक द्रव्य अब भानुपूर्वी द्रव्य की व्यवस्था में है किन्तु वह आनु- पूर्वी भाव को छोड कर अन्य भाव को प्राप्त होगया यदि वह फिर द्रव्य के भाव को प्राप्त हो जाय तो जघन्य एक समय के पीछे हो.जाय उत्क- टता से अनन्त काल पीछे आनुपूर्वी द्रव्य को प्राप्त होवे इसी प्रकार सर्व द्रव्यों की सम्भावना कर लेनी चाहिये किन्तु ( नाणादुबाई -पडुश्च नस्थि अंतरं) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अन्तर काल नहीं होता है क्योंकि वे सदैव काल विद्यमान रहते हैं (गमववहाराणं अणाणुपुब्बी दवाणं काल- ओ केवइयं अंतर होइ)(प्रश्न) नैग और व्यवहार नय के मत से अनानु- . * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७१ ) पूर्वी द्रव्यों का अंतर काल कितना होता है ( उत्तर) एगं दवं पडुच्च जह बेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं ) एक अनानुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल होता है उत्कष्ट असंख्यात काल प्रमाण अंतर काल कथन किया है अंतरं काल का अर्थ प्राग्वत् जान लेना किन्तु (नानादबाई पडुश्च नत्थि अंतरं ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है (णेगमववहाराणं अवत्तव्ययदवाणं कालो केवइ चिरं होइ ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहार नय के मत से प्रवक्तव्य द्रव्यों का काल की अपेक्षा से कितना चिर अंतर काल है ( उत्तर ) एगं दचं पडु- व जहणणं एगं समय उक्कोसेणं भणंतं कालं ) एक अवक्तव्य द्रव्य की अ. पेक्षा से न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतर काल उत्कृष्ट अनंत काल पर्यन्त अन्तर काल होता है किन्तु ( नाणादबाई पड्डुच्च नस्थि अंतर) जो प्रवक्तव्य द्रव्य नाना प्रकार के हैं उन्हों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है क्योंकि ये सदैव काल विद्यमान रहते हैं। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय मतसे आनुपूर्वी द्रव्यों का जघन्य एक समय उत्कृष्ट अनंतकाल पर्यन्त अंतर काल होता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अंतर काल. नहीं है और अनानुपूर्वी द्रव्यों का अंतर काल न्यून से न्यून एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अंतर काल . होता है क्योंकि असंख्यात काल प्रमाण परमाणु पुद्गल की स्थिति है और नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है अपितु अवक्त- व्य द्रव्यों का अंतर काल जघन्य एक समय उत्कृष्ट अनंत काल प्रमाण रहता है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अंतर काल नहीं होता क्योंकि प्रवक्तव्य द्रव्य सदा विद्यमान रहते हैं। अथ भाग द्वार विषय । मूल-णेगमववहाराणं आणुपुब्बीदवाई सेसदवाणं कहभागे होज्जा कि संखेज्जइभागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जा संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेसुहोज्जा नो संखेज्जइभागं होज्जा नो असंखेज्जइभागे होज्जा नो संखेजेसु भागेसु होज्जा नियमाप्रसंखेजेसु भागेसु होज्जा - ( ७२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र में नेगमववहाराणं अणाणुपुब्बी दव्वाणं पुच्छा असंखेज्जा भागे होज्जा सेसेसु पडिसेहा एवं अंवत्तंव्वंगदव्वाणिवि ॥७॥ पदार्थ-(णेगमवत्रहाराणं आणुपुची दवाई सेसदवाणं कइभागे होज्जा) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य शेष द्रव्यों ( अनानुपूर्वी द्रव्य और अबक्तव्य द्रव्य ) के कितने भाग में होता (कि संखेज्जइभागे होज्जा असंखज्जइभागे होज्जा) क्या उन के संख्यात भाग में वा असंख्याते भाग में अथवा ( संखे- ज्जैलु भागेसु होज्जा ) बहुत से संख्यात भागों में होता है वा (असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा ) बहुत से असंख्यात भागों में होता है गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! ( नो संखेज्जइभाग होजा) संख्यात भाग में नहीं होता (नो असंखज्जइमागं होज्जा) और असंख्यात भाग में भी नहीं होता (नो संखे- जइसु भागेसु होज्जा) नाहीं बहुत से संख्यात भागों में होता है किन्तु (नियमा असंखेज्जइसु भागेसु होज्जा) नियम से अर्थात् निश्चय ही बहुत से असंख्यात भागों में होता है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्य तीन प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी पर्यन्त हैं । वे अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य से भसंख्यात गुणं अधिक हैं इस लिये सूत्र में कथन किया गया है कि उक्त दोनो द्रव्यों से अ- संख्यात गुणाधिक-भानुपूर्वी द्रव्य हैं (गमवहाराणं अणाणुपुब्धी दवा- वं पुच्छा) नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्यों का भी शि- व्य ने पृच्छा की गुरु ने उत्तर में कहा कि ( असंखज्जइभागे होज्जा सेसेसु पडिसेहा) आनुपूर्वी द्रव्य से अनानुपूर्वी द्रव्य असंख्यात भाग में होता है, शेष प्रश्नों का निषेध किया गया है जैसे कि संख्यात भाग असंख्या बहुत से संख्यात भाग वा बहुत से असंख्यात भाग इत्यादि ( एवं प्रवत्तव्य गद- ब्बा णिवि ) इसी प्रकार प्रवक्तव्य द्रव्य क भी स्वरूप को अनानुपूर्वीवत् जा. नना चाहिये। भावर्थ--नैगम और व्यवहार नय के मत से भानुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्तब्य द्रव्य से असंख्यात गुणाधिक हैं क्योंकि तीन प्रदेशी से लेकर अनंत प्रदेशी स्कंध पर्यन्त सर्व आनुपूर्वी द्रव्य हैं किन्तु अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्तब्य द्रव्य यह दोनों ही द्रव्य भानुपूर्वी द्रव्य के असंख्यात भाग में होते हैं अर्थात् असंख्यात भाग न्यून है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (७३ ) अथ भाग द्वार विषय । नेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाइं कतरंमि भावे होज्जा ? किं उदइए होज्जा उपसमिय भावे होज्जा खइए भावे होज्जा खोवसमिए भावे होज्जा पारिणामिए भावे होज्जा सन्निवाइय भावे होज्जा? नियमा साइयपारिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ॥८॥ पदार्थ-( गमववहाराण आणुपुची दवाई कयरंमि भाचे होज्जा ) (प्रश्न) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य कौन से भाव में होता है जैसे कि (किं उदइए भावे होज्जा ) क्या उदय भाव में होता है ( उपसमिए भावे होज्जा ) उपशम भाव में होता है (खइए भावे होज्जा) अथवा क्षायिक भाव में होता है या ( खोवसमिए भावे होज्जा) क्षयोपशम भाव में होता है वा (परिणामिए भावे होज्जा ) पारिणामिक भाव में होता है अथवा ( सन्निवाइय भावे होज्जा ) सन्निपात भाव में होता है गुरु ने उत्तर दिया कि (नियमा साइयपारिणामिए भावे होज्जा) नियम से (निश्चय ही) सादि पारिणामिक भाव में होता है अर्थात् जिसकी आदि है और परिणमन शील है उसी का नामा सादि पारिणामिक भाव होता है ( एवं दोन्निवि) इसी प्रकार अनानुपूर्वी अवतव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । भावार्थ-पद् भावों में सादि पारिणामिक भाव में आनुपूर्वी द्रव्य होता है. क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्य परिणमन शील होता है इसीलिये उसका नाम सादि. पारिवामिक भाव है। ॥अथ अल्प वहुत्व विषय ।। एएसि भंते ! ऐगमववहाराणं पाणुपुवीदव्वार्ष अपाणुपुब्वीदव्वाणं अंवत्तव्यगदव्वाणं य दबट्टयाए पए -सहयाए दबटुंपएसट्टयाए कयरे कयरोहितो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा? गोंयमा सबथोवाइंगमववहा ( ७४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * राणं अवत्तव्वगदव्वाई दबट्ठयाए अणाणुपुब्बीदवाई दवट्ठयाए विसेसाहियाई प्रागुपुब्बीदवाई दवट्ठयाए, असंखेजगुणाई पएसट्टयाए सव्वत्थोवाई गमववहाराणं अणाणुपुब्बीदव्वाइं अपएसट्टयाए अवतव्वगदब्वाइं पए सट्ठयाए विसेसाहियाई प्राणुपुब्बीदव्वाई पएसट्ठयाए अणं- तगुणाई दवट्ठपएस्सट्टयाए सव्वत्थोवाइं गमववहाराणं अवत्तव्वगदम्बाई दवट्ठयाए १ अणाणुपुब्बीदवाई दवट्ठ- याए अपएसट्टयाए विसेसा हियाइं २ अव्वत्तवगदम्बाई पए सट्ठयाए विसेसाहियाई ३ आणुपुब्बीदवाई दबट्टयाए असंखेज्जगुणाई ४ ताई चेव पएसट्टयाए अणंतगुणाई ५ सतं अणुगमे सेत्तं गमववहाराणं अणोवणिहिया दवाणु पुब्बी ॥ पदार्थ:-( एएसिंणं भंते णेगम ववहाराणं आणुपुची दवाणं ) हे ! भग- वन् यह नैगम और व्यवहार नय के मत से पानुपूर्वी द्रव्यों की (अणाणपुब्बी दवाणं ) अनानुपूर्वी द्रव्यों की ( अवत्तव्यगदव्याणं ) और अवनव्य द्रव्यों की (दबयाए ) द्रव्यार्थिक से (पएसध्याए ) प्रदेशार्थिक से और (दन्च- टुपएसच्याए ) द्रव्य और प्रदेशार्थिक से ( कयरे २ हितो) सो किन २ से ( अप्पा वा ) अल्प अथवा (वहुपा वा ) बहुत्व (तुल्ला वा )तुल्य अथवा (विसे- सांहिया वा) विशेषाधिक द्वार है अर्थात् यह द्रव्य परस्पर तुल्य हैं वा विशेषा- धिक हैं वा अल्प हैं वा बहुत्व हैं । इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान् कहने लगे कि ( गोयमा) हे गौतम ! ( सर्वत्थोवाई ) (णेगमववहाराणं) नैगम और व्यवहार नय के मत से सर्व द्रव्यों की अपेक्षा से अवक्तव्यद्रव्यस्तोक है ( अवत्तबगदम्बाई दबट्टयाए ) ॥ ( अणाणुपुब्बीदव्वाई दबट्टयाए विसेसा । हियाई ) किन्तु अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थिक से विशेषाधिक हैं (आणुपुच्ची १ स्तोकस्य थोकथो वर्थवाः । प्राकृत व्याकरण पाद २ सू० १२५ स्तोक शब्दस्य एतेभय शादेशा.भवंति वा। U . .. * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७५ ) दखाई दवट्याए ) असंखज्जगुणाई) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थ से असंख्यात गुण हैं (पएसट्टयाए ) अपितु प्रदेशार्थिक से ( सव्वत्थाबाई ) सर्व से स्तोक (णेगमववहाराणं ) नैगम और व्यवहार नय के मन से (अणाणुपुची द- वार्ड अपएसट्टयाए ) अनानुपूर्वी द्रव्य अप्रदेशार्थ की अपेक्षा से हैं और ( अ- वतव्वगदम्बाइं पएसट्टयाए विमसाहियाई ) अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थिक से वि- शेषाधिक हैं किन्तु आणुपुर्वीदवाई पएसयाए अणंतगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से अनंत गुण हैं अपितु (दबठपएसळ्याए सव्वत्त्यो- वाई ) द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक (णेगयववहाराणं अ. वशव्वग दव्वाई दबछ्याए १) अवक्तव्य द्रव्य है अर्थात् नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से अवक्रव्य द्रव्य सर्व से स्तोक है किन्तु (अणाणुपुब्बीदव्बाई दबयाए अपएसठयाए विसेसाहियाई ) अ. 'नानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से अप्रदेशों की अपेक्षा से विशेषाधिक हैं २ ( अव- तब्बग दवाई पएसट्टयाए विसेमाहियाई) अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से वि- शेपाधिक हैं ३ ( आणुपुचीदवाई दवछयाए असंखज्जगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुण हैं ४ ( ताइंचेव पएसट्टयाए अणतगुणाई ) आनुपूर्वी द्रव्य से प्रदेशों की अपेक्षा वे द्रव्य अनंत गुण हैं (सेत्तं अनुगमे ) यहीं समास अनुगम का है इसीलिये इसे अनुगम कहते हैं (सेत्तं गमयवहा- राणं अणोवणिहिया दवाणुंपुची ) अब नैगम और व्यवहार नय से अनुप- निधि द्रव्यानुपूर्वी का समास सम्पूर्ण हुआ सो इसे ही अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी कहते हैं। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य अ- वक्तव्य द्रव्य द्रव्यार्थक और प्रदेशार्थक नयों के मत से निम्न प्रकार से उक्त द्रव्य न्यूनाधिक हैं ।। नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यार्थक से सर्व से स्तोक अवक्तव्य द्रव्य है और अनानुपूर्वी दव्य द्रव्यार्थक से विशेषाधिक हैं और आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं फिर नैगम और व्यवहार नय के मत से अपदेशार्थक भाव से सर्व से स्तोक अनानुपूर्वी द्रव्य है क्योंकि एक परमाणु का नाम अनानुपूर्वी है और प्रदेशों की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य विशेपाधिक है किंतु आनुपूर्वी द्रव्य अनंत गुणाधिक हैं अतः दोनों की अपेक्षा से नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा .
* अनुयोगद्वार सूत्र * सर्व से स्तोक द्रव्यार्थक से अवक्तव्य द्रव्य है १ अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से विशेषाधिक २ बहुत से अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से विशेषा- धिक हैं ३ बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक है । और प्रदेशों की अपेक्षा से वे द्रव्य अनंत गुणाधिक हैं । इसी का नाम अनु- गम द्वार है सो नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी का समास सम्पूर्ण हुआ। अथ संग्रह नय के विषय । सेकिंतं संग्गहस्स अवणिहिया दवाणुपुवी २ पंचं विहा पं० २० अट्ठपयपरूवणया १ भंगसमुक्कितणया २ भंगों वदसण या ३ समोयारे ४ अनुगमे ५ ॥ पदार्थः-( सेकित संग्गहस्स अणोवणिहिया दवाणु पुन्वी २ पंचविहा पं० तं०) ( प्रश्न ) संग्रह नय के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन-की गई है ( उत्तर ) पांच प्रकार से जैसे कि-(अट्ठपयपरवणया) अर्थ- पद की प्ररूपणा १ ( भंगसमुक्त्तिणया) भंगसमुत्कीर्तनता २ (भंगोवदसणया) भंगोपदर्शनता ३ (समोयारे) समवतार ४ और ( अनुगम) पंचम अनुगम ॥५॥ भावार्थ-संग्रह नप के मत से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी पांच प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि-अर्थपद प्ररूपणा १ भंग समुत्कीर्तनता २ भंगोपदर्शनता ३ समवतार ४ और अनुगम् । अथ प्रथम भेद विषय। सेकिंतं संग्गहस्स अपयपरूवणया?,२तिपएसिया प्रा- णुपुब्बी जाव अणंतपएसिया प्राणुपुव्वी परमाणुपुग्गले अ- शाणपुवी दुप्पएसिया अवन्तवग सेत्तं संग्गहस्स अपयपरू- वणया एयाए णं संग्गहस्स अट्ठपयपरूवणयाए किं पयोयणं एयाए णं संग्गहस्स अट्ठपयपरूवणयाए संग्गहस्स. समुक्त्ति- गया कीरइ ॥ ५३॥ पदार्थ-(सेकिन संग्गहस्स अवषयपरूवणया २ तिपए सिया माणुपुब्बी . .
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७७ ) जावं अणत पएसिया प्राणुपुची ) ( प्रश्न ) संग्रह नय से अर्थपद मरूपणा किसे कहते हैं (उत्तर) जो तीन प्रदेशिक स्कंध से लेकर अनन्त प्रदेशिक स्कंध पर्यन्त द्रव्य हैं वे.सर्व आनुपूर्वी संज्ञक द्रव्य हैं और ( परमाणु पोग्गले अणाणुपुव्वी) परमाणु पुद्गल अनानुपूर्वी द्रव्य है (दुपएसिया अवत्तबए) द्विपदेशिक स्कंध अवत्तव्य द्रव्य है (सेत्तं संग्गहस्स अष्ठपएपख्वणयाए ) अथान- तर से इसी का नाम अर्थपद प्ररूपणा है किन्तु ( एयाए संग्गहस्स अपय परूवणयाए कि पयोयणं ) इस संग्रह नय से जो अर्थपद प्ररूपणा कथन की गई है इस का प्रयोजन ही क्या है इस प्रकार के प्रश्न पूछने पर गुरु कहने लगे कि ( एयाए णं संग्गहस्स अट्ठपयपख्वणयाए भंगसमुकित्तणया कीरइ ) इस संग्रह नय से अर्थपद की प्ररूपणा करने से भंग समुत्कीर्तनता की जाती है यही इसका मुख्य प्रयोजन है। भावार्थ-संग्रहनय के मत से अर्थ पद प्ररूपणा उसका नाम है जो तीन प्रदेशी द्रव्यों से लेकर अनन्त प्रदेशी द्रव्य पर्यन्त पुद्गल है वह सर्व आनुपूर्वी द्रव्य कहा जाता है जो परमाणु पुद्गल है उसका नाम अनानुपूर्वी द्रव्य है अत: जो द्विपदेशिक स्कंध है वह अवक्तव्य द्रव्य संज्ञक द्रव्य है और जो अर्थ पद प्ररूपणा संग्रहनय के मत से कीगई है उसका मुख्य प्रयोजन भंग समुत्कीर्तन करना ही हैं। अथ भंगसमुत्कीर्तनता विषय । सेकित संग्गहस्स भंगसमुकित्तणया ? २ अस्थि प्राणु. पुब्बी. १ अस्थि अणाणुपुब्बी २ अत्थि अवतव्वए ३ अहवा अत्थि आणुपुव्वी अणाणुपुब्बी य ४ अहवा अत्थि प्राणु पुब्बी वत्तव्बए य ५. अहवा अस्थि अणाणुपुब्बी य अवन- ब्बए य ६ अहवा अस्थि आणुपुत्वी य अणाणुपुब्बी य अव- त्तव्वए यं७ एवं पंएसत्त भंगा सेत्तं संग्गहस्स भंगसमुक्त्तिणया एयाए णं संग्गहस्स भंगसमुक्त्तिणयाए किं पयोगणं ? एया- ए णं संग्गहस्स भंग समुकित्तणयाए भंगोवदंसण्या कीरइ ।। पदार्थ-(सेकिंतं संग्गहस्स भंगसमुक्त्तिणया २) (प्रश्न) संग्रहनय वे -- (७८). * अनुयोगद्वारं सूत्र * मत से भंग समुत्कीर्तनता किसे कहते हैं ( उत्तर ) संग्रहनय से भंग समुत्कीत- नता निम्न प्रकार से है जैसे कि ( अस्थि प्राणुपुची १) एक आनुपूर्वी द्रव्य १ (अत्थि अणाणुपुवी २) एक अनानुपूर्वी द्रव्य है २ (अस्थि अवतन्वए३) एक अवक्तव्य द्रव्य है ३ और द्विक संयोगी के ३ भंग है जैसे कि (अहवा अत्थि प्राणुपुची अणाणुपुत्री य ) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अनानु- नुपूर्वी द्रव्य है ४ (अहवा अत्थि आणुपुब्बी अवत्तव्वए य ) अथवां एक आनुपूर्वी द्रव्य एक अवक्तव्य द्रव्य है ५ ( अहवा अत्थि अणाणुपुची य अव. चच्चए य ६) अथवा एक अनानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य द्रव्य यह दो संयोगी ३ भंग है किन्तु तीन संयोगी केवल एकही भंग होता है जैसे कि अहवा अस्थि आणुपुच्ची य प्रणायुपुच्ची य अवचन्चए य) अथवा एक आनुपूर्वी द्रव्य और एक अनानुपूर्वी द्रव्य और एक अवक्तव्य यह तीनों भंग एक वचनान्त हैं संग्रहनय के मत से बहुवचन नहीं होता है (एवं पयसत्त भंगा) इस प्रकार से इन पदों के सात भंग होते हैं (सेत्तं संग्गहस्स भंग समुक्त्तिणया) यह संग्रह नय से भंग समुत्कीर्तनता पूर्ण हुई ( एयाए णं सग्गहस्स भंग समुः क्लित्तणयाए इस संग्रह नय के मत्त से भंग समुत्कीर्तना करने से (किं पयोयणं) क्या प्रयोजन है ? गुरु कहने लगे कि (एयाए णं संग्गहस्स भंग समुकित्तणयाए भंगोवदंसणया कोरइ ) इस संग्रह नय के मत से भंग समुत्कीर्तनता करने से भंगोपदर्शनता की जाती है। भावार्थ-संग्रहनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता के ७. भंग होते हैं जैसे कि तीन भंग एक वचनान्त हैं और तोन भंग हिक सयोगी हैं एक भंग तीन्दसंयोगी है इनका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में दिया गया है और इन का मुख्य प्रयोजन भंगो- पदर्शनता करना ही है। अथ भंगोपदर्शनता विषय । मूल-सेकिंतं. संग्गहस्स भगोवदंसणया ? २ तिपएसिया आणुपुब्वी १ परमाणुपोग्गला अणाणुपुव्वी २ दुपएसिया अवत्तव्बए.३ अहवा तिपएसिया परमाणुपोग्गला य आणु- पुषी य प्रणाणुपुवी य ४ अहवा तिपएसियाए दुपएसियाए भाजपब्बीए अवत्तव्बए य ५ अहवा परमाणुपोग्गला य दुपए १ , * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ७६ ) सियाए अणाणुपुब्वी य अवत्ताए य ६ अहवा तिपएसियाए परमाणु पोग्गलेय दुपएसियाए आणुपुब्बी य अणाणुपुब्बी य अवत्तव्वए य ७ सेत्तं संग्गहस्स भगोवदसणया। पदार्थ-(सेकित संग्गहस्स भगोवदंसणया) ( प्रश्न ) संग्रह नय के मतसे भंगोपदर्शनता किसे कहते हैं (उत्तर ) संग्रह नय से भंगोपदर्शनता निम्न प्रकार से है जैसे कि (तिपएसिया आणुपुची) तीन प्रदेशिक स्कंध आनुपूर्वी द्रव्य कहाता है.१ ( परमाणु पोग्गले अणाणुपुची ) परमाणु पुद्गल का नाम अनानुपूर्वी द्रव्य है २ (दुपएसिया भवत्तवए) द्विपदेशिक स्कंध अवक्तव्य द्रव्य है ३ अथ द्विक. संयोगी ३ भंग दिखलाते हैं-(अहवा तिपएसिया परमाणु पोग्ग- ला य आणुपुवी स प्रणाणुपुब्बी यु४) अथवा यदि । तीन प्रदेशिक स्कंध और एक परमाणु पृद्गल इन दोनों का सम्बन्ध होवे तो उन को आनुपूर्वी और अनानुपूर्वी द्रव्य कहते हैं ४ ( अहवा तिपएसियाए दुपएसियाए आणु- पुचीए अवत्तच्चए ५) अथवा तीनप्रदेशिक स्कंध और द्विपदेशिक स्कंध एकत्व होवे तब उनको आनुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य कहते हैं ५ (अहवा परमाणु पोग्गलेय दुपएसियाए आणुपुत्री य अवत्तव्बए य ) अथवा परमाणु पुद्गल और द्विप्रदेशिक स्कंध मिल जावें तो आनुपूर्वी और अवकव्य द्रव्य उन्हें कहते हैं ६ (अहवा तिपएसियाए परमाणुपोग्गले य दुपएसियाए आणुपुचीय अणाणु. पुची य अवत्तव्यए य ७) अथवा तीन संयोगी एक भंग होता हैं उसका विवर्ण किया जाता है जैसे कि-एक ३ प्रदेशिक स्कंध है और एक परमाणु पुद्गल और एक २ प्रदेशिक स्कंध है यदि वे सर्व एकत्व हो जावें तो उन को श्रानुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्तव्य द्रव्य कहते हैं ७ ( सेत्तं संग्गहस्स भंगोवदं-- सणया) यही संग्रह नय के मत से भगोपदर्शनता है और इसे ही भंगोपदर्श नता कहते हैं। भावार्थ-भंगोपदर्शनता के विषय प्राग्वत् ही कथन है ३ भंग एक वचना- न्त है और तीन भंग द्विक संयोगी हैं और एक भंग तीन संयोगी है-इन्हीं का नाम भंगोपदर्शनता है इन का पूर्ण स्वरूप हिन्दी पदार्थ में लिखागया है । अथ समवतार विषय:। सेकिंतं संग्गहस्स. समोयारे १२ संग्गहस्स प्राणुपुवी - है .
(८.) * अनुयोगद्वार सूत्र * : दवाई कर्हि समोयरंति किं प्राणुपुव्वीदब्वेहिं समोयरंति ? अणाणुपुदीदव्वेहिं समोयरंति ? अवत्तव्वगदव्वेहि समोय- रंति ? संग्गहस्स प्राणुपुवीदव्वाइं प्राणुपुतीदव्वेहि. समोयरंति नो अणागुपुत्वीदव्वेहिं समोयरंति नो अवत्त- अवत्तव्वगदव्वेहि समोयरति एवं दोनिवि सहाणे समोयरंतिः सेत्तं समोयारे॥ पदार्थ-( सेकिंत संग्गहस्स समोयारे २ संग्गहस्स प्राणुपुची दम्बाई कहिँ समोयरंति ) ( प्रश्न ) संग्रह नय के मत से समवतार किसे कहते हैं और.भानु- पूर्वी द्रव्य किस द्रव्य में समवतार होते हैं (किं आणुपुवी दबेहि समोयरति), क्या आनुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं (अणाणुपुब्बी दबेहिं समोयरति ) वा अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होते हैं ( अवत्तव्यग दन्वेहिं समोयरंति) अंथवा अवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं (उत्तर) (संगहस्स आणुपुब्बी दबाई आणुपुन्वी दव्वैहिं समोयरंति ) संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्यों में ही समवतार होते हैं किन्तु ( नो अणाणुपुवी दन्वेहि समोयरंति ) भानुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार नहीं होते (नो भव- तन्वगदव्वेहि समोयरंति ) न अवक्तव्य द्रव्यों में समवतार होते हैं. अत: सिद्ध हुआ कि आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में ही समवतार होते हैं ( एवं दोनिविसठाणे समोयरंति सेत्तं समोयारे ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और अवक्तव्य द्रव्य भी स्वस्थानों में ही समवतार होते, हैं अन्य द्रव्यों में नहीं इसी का नाम समवतार द्वार है। भावार्थ-समवतार द्वार उसी का नाम है जो द्रव्य हैं वे अपने २ स्थानों में ही समवतार (गर्भित ) होते हैं अन्य द्रव्यों में नहीं जैसे कि आनुपूर्वी द्रव्य श्रानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार होता है इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और श्रवक्त- व्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये। अथ अनुगम विषय । सेकिंतं अणुगमे २ अट्ठविहे पराणत्ते तंजहा संत पयपरू- वणया १ दवयमाणं च २ खित्त ३ फुसणया ४ कालोय ५ V ,' , * अनुयोगद्वार सूत्र * (८१. ) अंतरं ६ भाग ७ भावे ८ अप्पा बहुं नत्थि १ संग्गहस्स प्राणु पुब्बी. दवाई किं अस्थि नत्थि नियमा अस्थि एवं दोनिवि संग्गहस्स प्राणुपुव्वीदवाई किं संखिज्जाइं - असंखेज्जाई अणंताई ? नो संखिज्जाई नो असंखेज्जाइं नो अपंताई नियमा-एगो. रासी एवं दोनिवि ॥ पदार्थ-(सेकित अणुगमे २ महविहे पण्णत्ते तंजहा) (प्रश्न) अनुगम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) आठ प्रकार से जो निम्न- लिखितानुसार है ( संतपयपख्वणया ). विद्यमान पदार्थों की प्रति पादनता ? (दवपमाणं च ) द्रन्य प्रमाण और २ (खित्त ३ ) क्षेत्रद्वार (फुसल्या ४) स्पर्शना द्वार ४ ( कालोया) कालद्वार ५ (अन्तरं ) अन्तर द्वार ६ ( भागे) भागद्वार ७ (मावे) भावद्वार ( अप्पा बहु नस्थि) संग्रहनय के मत में अल्प वहुल द्वार नहीं होता क्योंकि संग्रह नये के मत में सर्व द्रव्य एक रूप में ही रहते हैं ( संग्गहस्स आणुपुन्नी दवाई कि अत्यि नत्थि) (प्रश्न) संग्रहनय के मत में आनुपूर्वी द्रव्य हैं किम्बा नहीं है (उत्तर) (नियमा अत्थि ) नियम से हैं अर्थात् निश्चय ही हैं ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अब- क्लव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये इसी का नाम विद्यमान पदार्थों की प्रतिपाद- नता है । अव द्रव्यों के प्रमाण विषय में कहते हैं (संग्गहस्स आणुपुत्रीदवाई किं संखिज्नाई असंखेज्जाई अणंताई ) ( प्रश्न ) संग्रहनय के मत से पानुपूर्वी द्रव्य क्या संख्यात है अथवा असंख्यात हैं वा अनंत हैं ( उत्तर) (नो संखि- ज्जाई नो असंखज्जाई नो अणंताई नियमा एगो रासी) संग्रहनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य संख्यात असंख्यात वा अनन्त नहीं हैं किन्तु नियम से ही एक राशि ( समूह ) है क्योंकि संग्रहनय द्रव्यों को अभेद रूप से मानता है सो ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य मी जानने चाहिये। भावार्थ-अनुगम ८ प्रकार से कहा गया है जैसे कि विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता १ द्रव्य प्रमाण २ क्षेत्र ३ स्पर्शना ४ काल ५ अंतर ६ भाग ७ और भाव ८ और संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्यों की सदैव काल अस्ति भी और द्रव्यों का प्रमाण संग्रहनय के मत से संख्यात असंख्यात वा अनन्त ऐसे भेद रूप नहीं है केवल एक राशि रूप है।
(.८२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ क्षेत्र दार विषय । संग्गहस्स पाणुपुब्बीदवाई लोगस्स कहभागे होज्जा! कि संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइ भागे होज्जा संखेज्जे सु भागेसु होज्जा असंखज्जेसु भागेसु होज्जा सवलोए होज्जा संग्गहस्स आणुपुदीदव्वाई नो संखेज्जइभागे होज्जा नोअसंखेज्जइ भागे होज्जा नो संखेज्नेसु भागेसु होज्जा नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा नियमा सव्वलोए होज्जा, एवं दोनिवि । पदार्थ-(संग्गहस्स प्राणुपुच्चीदवाई लोगस्स कइ भागे होज्जा)(प्रश्न) संग्रहनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के कितने भाग में होता है (किं संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेन्जइ भागे होज्मा ) क्या लोक के संख्यात भाग में होता है वा असंख्यात भाग में होता है तथा ( संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा )लोक के बहुत संख्यात भागों में होता है वा बहुत से असंख्यात भागों में होता है (सक्वलोए होज्जा ) अथवा सर्व लोक में ही आनुपूर्वी द्रव्य होता है ( उत्तर ) नो संखेज्जइ भागे होज्जा नो असंखज्जइ भागे होज्जा) आनूपुर्वी द्रव्य ' लोक के संख्यात भागं में नहीं होता और असंख्यात भाग में नहीं होता (नो संखेज्जेसु भागेसु होज्जा नो असंज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यत भागों में नहीं होता वा वहुत से असंख्यात भागों में नहीं होता किन्तुं (नियमा सव्वलोए होज्जा) नियम से (निश्चय ही) सर्व लोक में होता हैं क्योंकि संग्रहे नय अभेद रूप द्रव्यों को मानता है । ( एवं दोनिवि) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और प्रवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये । भावार्थ- भानुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी द्रव्य और प्रवक्तव्य संग्रह नय के मत से सर्व लोक में ही होते हैं। अथ स्पर्शना विषय । संग्गहस्स आणुपुवी दवाई लोगस्स किं संखेज्जह भागं फुसंति असंखेज्जइ भागं फुसंति संखेज्जेसु भागे फुसंति -
* अनुयोगद्वार सूत्र * (३)
असंखेज्जे भागे फुसंति सव्व लोगं फुसंति ? नो संखेज्जइ
भागं फुसंति जाव नियमा सव्वलोगं फुसंति एवं दोनिवि॥३॥
पदार्थ-(संग्गहस्स आणुपुत्रीदवाई लोगस्स कि संखेज्जइ भागे
फुसंति असंखेज्जइ भागं फुसंति ) ( प्रश्न ) संग्रह नय से आनुपूर्वी द्रव्य लोक
के क्या संख्यातभाग भाग को स्पर्श होते हैं ( संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असं-
खेज्जेसु भोगसु होज्जा ) बहुत से संख्यात भागों को स्पर्श करते हैं अथवा
बहुत से असंख्यात भागों को स्पर्श होते हैं तथा ( सव्वलोए फुसंति ) तथा
सर्व लोक में स्पर्श होते हैं ( उत्तर ) ( नो संखेज्जइ भागं फुसंति जाव नियमा
सबलोग फुसंति एवं दोनिवि ) संख्यात असंख्यात वा बहुत से संख्यात बहुत
से असंख्यात भागों को स्पर्श नहीं करते केवल नियम से ही सर्व लोक को
स्पर्श करते हैं क्योंकि जब संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य सर्व लोक में हैं
तव स्पर्श भी सर्व लोक को कर रहे हैं इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य
द्रव्य भी जानलेने चाहिये।
भावार्य-संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्य सर्व लोक को स्पर्श कर रहे हैं
क्योंकि यह तीनों द्रव्य सर्व लोक में हैं इसीलिये सर्व लोक को स्पर्श कररहे हैं ।।
॥ अथ शेष द्वार विषय ॥
संग्गहस्स आणुपुत्वीदवाई कालो केवचिरं होइ
नियमा सव्वद्धा एवं दोनिवि ५ सग्गहस्स प्राणुपुतीदवाई
अन्तर कालो केवचिरं होह ? नत्थि अंतरं एवं दोनिवि ६
संग्गहस्स प्राणुपुत्वीदव्वाइं सेसदवाणं कहभागे होज्जा ?
किं संखेज्जहभागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जा-संखेजे
सुभागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेष्ट होज्जा ? नो संखेन्जह
भागे होज्जा नो असंखेज्जइ भागे होज्जा नो संखेज्जेसु भागे
सुहोज्जानो असंखेन्जेसु भागेसु होज्जा नियमा तिभागे होज्जा
एवं दोनिवि ॥ ७॥
(८४) * अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ-(संग्गहस्स णाणुपुची दव्वाई कालओकेवच्चिर होइ) ( प्रश्न.) संग्रह नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों का काल से अन्तर काल कब तक होता है अर्थात् परस्पर-द्रव्यों का अंतरकाल कब तक रहता है (उत्तर) (नत्यि अतरं एवं दोनिवि ) अंतरकाल नहीं होता है क्योंकि यह द्रव्य सदैव काल वि- द्यमान रहता है और इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ६ ( संग्गहस्स आणुपुच्चीदवाई सेसदनाणं कइभागे होज्जा (प्रश्न.) संग्र- ह नय के मत से बानुपूर्वी द्रव्य, अनानुपूर्वी द्रव्यों के और अवक्तव्य द्रव्यों के कितने भाग में होता है (किं संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइ भागे होज्जा) क्या संख्यात भाग में होता है वा असंख्यात भाग में होता है अथवा (संखेज्जे सुभागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में होता है या बहुत से असंख्यात भागों में होता है (उत्तर) नो संखेज्जइ भागे होज्जा) संख्यात भाग में नहीं होता ( नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) असंख्यात भागों में भी नहीं होता (नो संखेज्जे सुभागे सुहोज्जा ) बहुत से संख्यात भागों में नहीं होता (नो असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से असंख्यात भागों में भी नहीं होता किन्तु (नियमा तिभामे होज्जा) नियम से तीन भागों में से एक भाग में होता हैं.क्योंकि-संग्रह नय के मत से तीनों द्रव्य हैं सो आनुपूर्वी द्रव्यः तीसरे भाग में होता है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये। भावार्थ-संग्रहनय से आनुपूर्वी द्रव्यों का अंतर काल नहीं होता है और यह आनुपूर्वी द्रव्य दोनों द्रव्यों के तीसरे भाग में होता है क्योंकि संग्रहनय में तीन ही द्रव्य हैं सो यह तीसरे भाग में ही होता है । श्रथ भाव विषय। मूल-संगहस्स प्राणुपुत्वीदव्वाइं कयरंमि भावे होज्जा?, नियमा साइपारिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ८ अप्पावहूं नत्थि सेतं अणुगमे सेत्तं संगहस्स अणोवणिहिया दवाणु- पुवी से अणोवणिहिया दवाणुपुब्बी। पदार्थ-( संग्गहस्स) आणुपुब्बीदवाई कयरंभि भावे होज्जा) (प्रश्न) संग्रनय से आनुपूर्वी द्रव्य कौनसे भाव में होते हैं ( उत्तर ) (नियंमासाइ 'पा- * अनुयोगद्वार सूत्र * (८५) यामए भाव होज्जा नियम से सादि पारिणामिक भाव में होते हैं अर्थात् जो भादि सहित परिणमन शील है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ( अया बहुनस्थि ) संग्रहनय से अन्य बहुत्व नहीं होता है ( से अणुगमे ) यही अनुगम द्वार है (सेत्तं सग्गहस्स अणो- वाणिहिया दव्वाणुपुब्बी सेत्तं अणो वणिहिया दव्वाणुपुच्ची ) यही संग्रहनय से अनुपनिधि द्रच्यानुपूर्वी है अपितु अनुपनिधि. द्रव्यानुपूर्वी का स्वरूप. इस स्थल पर ही सम्पूर्ण होगया है। “भावार्थ-संग्रह नयस आनुपूर्व्यादि द्रव्य सादि पारिणामिक भाव में रहते हैं और अल्प बहुत्व द्वार इस नय से नहीं होता है सो इस का नाम अनुगम हैं और संग्रहनय से अनुपनिधि द्रव्यानुपूर्वी का यहां पर ही समास सम्पूर्ण होगया है। अथ उपनिधि का विषय । मूल-सेकिंतं उवणिहिया दवाणुपुवी ? २ तिविहा पं० तं० पुव्वाणुपुवी पच्छाणुपुब्वी अणाणुपुब्बी सेकिंतं पुब्वाणु- पुब्बी २ धम्मत्यिकाए १अधम्मत्यिकाए २ भागासत्यिकाए ३. जीवस्थिकाए ४ पोग्गलत्यिकाए ५ अद्धासमय ६ सेत्तं पुव्वाणु पुब्बी सेकिंतं पच्छाणु पुवी ? २ श्रद्धासमय जावधम्मत्यिकाए सेत्तं पच्छाणुपुव्वी सेकिंतं अणाणु पुव्वी २ एयाए चैव एग: इयाएच्छ गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नम्भासो दुरूनूणो सेत्तं अपाणुपुब्बी। पदार्थ- सेकित उणिहिया दब्वायुपुची तिविहा पं० ) (प्रश्न ) ( उप- निधि का द्रव्यानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीन प्रकार से कथन की गई है जैसे कि (दव्वाणुपुची ) द्रव्यानुपूर्वी (पच्छाणु पुन्वी पश्चात् आनुपूर्वी और (अणाणुपुबी) अमानुपूर्वी ( सेकिंत पुन्वाणु पुची ) ( प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे कि-(धम्मस्थिकाय) धर्मास्तिकाय (अहम्मस्थिकाय ) अधर्मास्तिकाय (मागासत्यिकाए ३)आकाशास्तिकाय (जीवात्थकाए) जीवास्तिकाय ४ (पोग्ग- है (८६) * अनुयोगद्वार भूत्र * लथिकाय) पुद्गल अस्सिकाय ५ (श्रद्धासमय ६) काल द्रव्य (सेत्तं पुन्वाणुपुषी) यही द्रव्यों की पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणुपुची २)(प्रश्न) पश्चात् भानुपूर्वी किसे कहते हैं जैसे कि- अद्धासमय जावधम्मत्थिकाय सेत्तं पच्छाणुपुची) काल द्रव्य १ पुद्गलास्ति काय २ जीवास्तिकाय ३ आकाशास्तिकाय ४ अधर्मास्तिका ५ धर्मास्तिकाय ६ इस प्रकार से गणन करने की संख्या को पश्चात् आनुपूर्वी फहते हैं ( सेकिंत अणाणुपुच्ची २ एयाए चेव एकादियाए छगच्छगयाए सेटीए अनमव्वम्भासो दुरुवुणो सेत्तं अणाणुपुची) (प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन्हीं पद् द्रव्यों की एक आदि से प्रारंभ कर षट् गच्छ रूप श्रेणी करली जावे फिर षद् श्रेणी में रहने वाले अंकों को परस्पर अभ्यास करके जो ७२. भंग होते हैं उन में से आदि और अन्त के दो रूप न्यून कर दिये जायें तब ७१८ भंग शेष रहते हैं इन्हीं का नाम भनानुपूर्वी है और यही भनानुपूर्वी . का स्वरूप है। भावार्थ:-उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है जैस कि-पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ द्रव्यों के स्वरूप को समीप करने के नाम को उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी कहते हैं सो पूर्वानुपूर्वी षद् द्रव्यों को अनुक्रमता पूर्वक गर्णन करने का नाम है पश्चात् आनुपूर्वी उन्हीं द्रव्यों को उल्या गणन करने का नाम है जैसे काल द्रव्य से लेकर धर्म द्रव्य पर्यन्त गिने जाए परन्तु अनानपूर्वी के लिये एक से लेकर षट् पर्यन्त छै गच्छ रथापन करके (१, २, ३, ४, ५, ६) फिर इन्हों को परस्पर अभ्यास करके उनमें से दो अंक न्यून करने से अनानुपूर्वी वनती है जैसे-(१, २, ३, ४, ५, ६ ) ये है अंक स्थिति हैं इनको अन्यो अन्य परस्पर गुणाकार करो अर्थात् जरव दो तत्र ( १४२४३४४**६) ऐसा रूप हुआ पुनः एक को दो गुणा किया तो दो एकमदो, तब दो सिद्ध हुआ फिर दो को ३ से गुणा करने पर २ तीया ६ अर्थात् (छै ) ऐसे सिद्ध हुआ फिर ६ को ४ से गुणा किया जैसे ६ चौका चौवीस (२४) पश्चात् २४ को ५ गुणा करने से अर्थात् २४ पांचे १२० अनन्तर १२० को ६ से गुणा किया तब १२० छिके ७२०, इस प्रकार समस्त भंग सिद्ध हुए. इन में से (१) एक वाला अंक तो पूर्वानुपूर्वी है ,और ७२० वाला अंक पश्चात् भानुपूर्वी है अतः ७२० में से २ कम करने पर (७२०-२) ७१८ सात सौ अठारह शेष अक रहे हुए हैं इनको अनानुपूर्वी कहते हैं ।
4 * अनुयोगद्वार सूत्र *- ( ८७ ) ॥फिर उसी विषय ।। अहवा उवणिहिया दवाणुपुव्वी तिविहां पं० त. पुवाणुपुची पच्छाणुपुची अणाणुपुवी, सेकिंतं पुवाणु- पुची १.२ परमाणुपोग्गले. दुपएसिए तिपएसिए जाव दस पएंसिए संखेज्जपएसिए असंखेज्जपएसिए अणूतपएसिए सेत्तं पुव्वाणुपुबूबी सेकिंतं पच्छाणुपुवी ? अणंतपएसिए असंखेज्जपएसिए संखेज्जपएसिए जाव दसपएसिए जाव परमाणुपोग्गले सेत्तं पच्छाणुपुब्वी ॥ 'पदार्थ-(अहवा उवाणिहिया दवाणुपुची तिविहा पं० तं) अथवा उप- निधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-(पुला- पुच्ची ) पूर्वानुपूर्वी (पच्छाणु पुची ) पश्चात् श्रानुपूर्वी ( अणायुपुची ) अनानुपूर्वी (सेकितं पुव्वाणुपुन्नी) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उ- चर) पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जैसे कि-(परमाणुपोग्गले दुपएसिए तिपए सिए जावदसपएसिए ) परमाणु पुद्गल द्विप्रदेशिक स्कंध तीन प्रदशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंघ ( संखेन पएसिप असंखेज्ज परसिए अणत पएसिए सेतं पुन्वाणुपुबी ) संख्यात्त प्रदेशिक स्कंध असंख्यात प्रदशिकस्कंध और अनंतपदेशिक स्कंध यह सर्व पूर्वानुपूर्वी द्रव्य हैं क्योंकि अनुक्रमता पूर्वक गणन करने का नाम ही पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणुयुनी अणंतपएसिए असंखेज्ज पएसिए संखेज्ज पएसिए जाव दसपएसिप जाव परमाणु पोग्गले सेचं पच्छाणु पुच्ची ) (प्रश्न ) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पश्चात् आन" उसका नाम है जैसे कि-अनंत प्रदेशिक स्कंध असंख्यात प्रदेशिक स्कंध प्रदेशिक स्कंध यावत् दश प्रदेशिक स्कंध से लेकर एक परमाणु जो द्रव्य हैं इस प्रकार से गणना करने पर उसे पश्चात् भानुपूर्वी भावार्थ-उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से और भी, लेकर जैसे-कि नुपूर्वी सो से उत्था 4 (८८) * अनुयोगद्वारं सूत्र * अनानुपूर्वी विषय निम्न लिखितानुसार है। सेकिंतं श्रेणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए जावं अर्थतगच्छगयाए. सेढीए अन्नमन्नम्भासो. दुरूवृषो सेत्तं अणाणुपुब्बी सेत्तं उवाणिहिया दवाणुपुवी सेत्तं जा- पगसरीर भवियसरीर वहरिचे दव्वाणुपुब्बी सेचं नोयागमयो दवाणुपुवी सेत्तं दवाणुपुवी। पदार्थ-( सेकित अणाणुपुब्बी २) (प्रश्न ) बनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) (एयाए चेव एगाइयाए एगुतरियाए जाच अणतगच्छ गयाए जाव अणंतगच्छगयाए. सेढीए )- इन को एक से लेकर वृद्धि करते हुए यावत् अनंतगच्छ किए जाए फिर अनतगच्छ की श्रेणी को (अन्न मन्नम्मासो दुरुचुणो से अणाणुपुब्बी) परस्पर गुणा करने से यावत् भंग बनजाते हैं उनमें से आदि अंत के भंग को न्यून करने से शेष रहेहुए भंगो का नाम अनानुपूर्वी है सेत्तं अणाणुपुब्बी ) यही अनानुपूर्वी का स्वरूप है ( से उवरिपहिया दव्वाणुपुष्वी ) यही उपनिधि का द्रव्यानुपूर्वी है सेत्तं जाणग सरीर भुविय- शरीर वइरित्ते दवाणुपुब्बी सेत्तं नो आगमोदवाणुपुच्ची सेत्तं नो आगमओ सेत्तं दवाणुपुची ) यही ज्ञ शरीर और भव्य-शरीर व्यतिरिक्क द्रव्यानुपूर्वी नो आ- गम से वर्णन की गई है और इसे ही द्रव्यानुपूर्वी कहते हैं। भावार्थ-अनानुपूर्वी उसे कहते हैं कि-जो अनंत प्रदेशि श्रेणी है-उसको. परस्पर गुणा करने से यावत् परिमाण भंग बनते हैं उनमें से दो भंग न्यून करने से अनानुपूर्वी बन जाती है और इसी का नाम उपनिधि को द्रव्यानु- पूर्वी है और इसी का नाम ज्ञ शरीर भव्य शरीर व्यतिरिक्त -द्रव्यानुपूर्वी नो आगम से वर्णन की गई है। अथ क्षेत्रानु पूर्वानुपूर्वी विषय । मूल-सेकिंतं खत्ताणुपुवी २ दुविहा पं० तं उर्वणिहिया अणोवणिहिया तत्थणं जासा उवणिहिया साट्टप्पा तत्थएं. जासा अपोवणिहियासा दुविहा पं० ० ऐगम ववहाराणं १- * अनुयोगद्वार सूत्र * ( 8 ) 'गाहस्स २ सेकित गमववहाराणं अणोवणिहिया खेाणु ब्बी २ पंचविहा पं० तं० अपयपरूवणया १ भंगसमुक्त्ति- ग्या मंगोवदसण्या समोयारे ४ अणुगमे ५ सेकिंतं अपय रूवणया २ तिपएसोगाढे श्राणुपुम्बी जाव असंखेज्जपए सोगाढे प्राणुपुष्वी एगपएसोगाढे प्रणायुपुवी दुपए सोगढे अवत्तव्बएति सोगाढा आणुपुब्बीओ जावं असंखे- ज्जपएमोगाढ़ा श्राणुपुबीनो एगपएसोगढा अणाणुपुब्बीओ दुपएसोगदा अवत्तवए एयाणं ऐगमवहाराणं अकृपयप- स्वपया एणं किं पयोयणं एयाणं णेगमववहाराणं अप- यपरूवषयाए भंगसमुकित्तणया कीरइ । पार्य-(सेकित खचाणुपुन्नी २ दुविहा पं० त० उवणिहिया अणाव- मिडिया ) (प्रन) क्षेत्रानुपूर्वी किसे कहते हैं. (उचर ) क्षत्रानुपूर्वी द्विपकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-उपनिधि का और अनुपनिधि का (तत्यणं जासा उवणिहिया साहप्पो ) उन दोनों में से जो प्रथम उपनिधि है वह केवल स्यापर्नाय है क्योंकि इसका विवर्ण फिर किया जायगा. अपितु जो (तत्यणं जासा अणो वणिहिया सादुविहा पं० त० गमववहाराणं संगाहस २) अनुपनिधि का है वह दो प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि नैगम व्यवहारनय और संग्रहनय स-इस प्रकार के कथन करने पर शिष्य ने फिर शंका की ( सर्किन ऐगमववहाराणं अणोवाणिहिया खेचाणुपुवी २ पंचविस पं० त०) वह कौनसी है जो नैगम और व्यवहार नय से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी है। गुरु ने उत्तर में कहा कि नैगम और व्यवहार नय से अनु- पनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी पांच प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-( अट्ठपय- खाया) अर्थपद की प्रतिपादनता १ (मंगसमुचितणया) भंगसमुत्कीर्तनता २(मंगोवदंसथया) फिर भंगोपदर्शनता ३ और (समायारे । समवतार ४ ( अगमे ) अनुगमना ५ (सक्ति अपयपल्खखया २ (प्रश्न ) अर्थ प्रति- पादनवा किसे कहते हैं (उत्तर) (तिपएसोगाढे आणुपुब्बी जाव असंखेज- (१०) * अनुयोगदार सूत्र * पए सोगाढे माणुपुच्ची ) अर्थपद प्रतिपादनता उसका नाम है जो तीन प्रदेशि से लेकर भाकाश के असंख्यात प्रदेशों पर पुदल प्रगाहन हुआ है उसे के. अमानुपूर्वी कहते हैं और ( एगपएसोगाढे अणाणुपुयी) आकाश के जो एक प्रदेशोपरि अवगाहन हुआ है उसका नाम अनानुपूर्वी है (दुपए सोगाढे अब चन्दए ) द्विप्रदेशोपरि जो अवगाहन हुभा है उसका नाम अबक्तव्य द्रन्य है इसी प्रकार (तिपए सोगाढा आणुपुबीओ) बहुत से आनुपूर्वी द्रव्य बहुत से तीनों भदेशोपरि अवगाहन हुए हैं उनका नाम बहुत सी क्षेत्रानुपूर्वियां हैं ( जाव असं- खज्ज पएसोगाढा आणुपुन्बी ३) इसी प्रकार यावत बहुत से असंख्यात प्रदेशोपरि अवगाहन कीहुई बहुतसी भानुपूर्वीयायें है किन्तु '(एगपएसो गाढा अणाणुपुब्बीमो ) जो एक आकाश के प्रदेशों पर बहुत से पुद्गल भव- गाहन हैं उनका नाम बहुतसी भनानुपूर्वियां है ( दुपएसोगाढा अवत्तव्बए) पूर्ववत् ही बहुत से द्विपदेशों पर अवगाहन हुआ पुद्गल उसका नाम बहुत से प्रवक्तव्य द्रव्य हैं ( एयाणं णेगमववहाराणं) इन नैगम और व्यवहारनय से (अकृपयपरूवणयाए कि पयोयणं) जो अर्थ पद की प्रतिपादनता कीगई है उसका क्या प्रयोजन है ? गुरु कहते हैं कि ( एयाणं णेगमववहाराण अकृपयपरू वण्याए भंग समुक्तित्तणया कीरइ ) इन नैगम और व्यवहारनय से अर्थ पद दिखलाया गया है इसका मुख्य प्रयोजन भंगो का कीर्तन करना ही है। भावार्थ-क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से ही सिद्ध है क्योंकि जैसा द्रव्य जिस प्रकार से क्षेत्र में स्थित है उसी प्रकार उसकी गिणती की जाती है सो क्षेत्रानुपूर्वी द्वि प्रकार से प्रतिपादन की गई है जैसे कि-उपनिधि का और अनुपनिधि का सो उपनिधि का अभी स्थापनीय हैं अनुपनिधि का द्वि प्रकार से प्रतिपादन की जाती है एक नैगम व्यवहारं नय से द्वितीय संग्रह नय से-सो नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपानधि क्षेत्रांनुपूर्वी पांच प्रकार से कही गई है जैसे कि-विद्यमान अर्थों की प्रतिपादनता १ भंग समुत्कीर्तनता २ भंगो- पदर्शनता ३ समवतार ४ और अनुगम ५ विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता उसका नाम है जो तीन प्रदोश से लेकर असंख्यात प्रदेशों पर्यन्त आकाश में पुगल स्थित हैं वे क्षेत्रानुपूर्वी हैं एक प्रदेश पर जो स्थित है-उसका नाम अना- नुपूर्वी है द्वि प्रदेशों पर जो हैं वे अवक्तव्य द्रव्य हैं यह कथन एक वचनान्त है किन्तु इसी प्रकार यही कथन बहुवचनान्त भी जान लेना तब बहुत आनुपूर्वि- 44 * अनुयोगद्वार सूत्र * याय मनानुपूर्वियाँ अवक्तव्य द्रव्य सिद्ध हो जाते हैं अतः इस विद्यमान अर्थ प्रतिपादनता का मुख्य प्रयोजन भंग समुत्कीर्तन करना ही है, अपितु यह सर्व कथन नगम और व्यवहार नय से कहा गया है.जो अर्थ पद है वह सर्व तीनों प्रकार से द्रव्यों की सिद्धि करता है सो लोक में तीनों प्रकार के द्रव्यों की अ- स्ति है इसीलिये इसका नाम अर्थ प्रतिपादनता है ।। अथ भंग समुत्कीर्तनता विषय । मूल-सेकिंतं गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणया ? २ अस्थिप्राणुपुब्वी १ अणाणुपुब्वी २ अस्थि अवत्तव्वएय ३ एवं जहे वहेठा तहेवने यव्वं नवरउगाढा भाणियव्या तहेव मंगो व दंसणया तहेव समोयारे। पदार्थ-( सेकिंतं गमववहाराणं भंग समुक्त्तिणा २ ( प्रश्न )नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता किस प्रकार से है (उत्तर) नैगम और म्यवहारनय से भंग समुत्कीर्तनता निम्नप्रकार से है जैसे कि-( अत्थिाणु पुग्नी १ अणाणुपुची २ अस्थिभवत्तव्वएय ३) एक आनुपूर्वी द्रव्य १ एक अनानुपूर्वी २ एक अवक्तव्य ३ ( एवं जहेवहेठा तहेव नेयच् नवरउगाढा भा- णियब्वा तहेच भंगोवदंसणया तहेव समोयारे ) इसी प्रकार भंग जो पूर्व लिखे गये हैं वैसे ही यहां पर जान लेने चाहिये और उसी प्रकार पट् विंशति भंग क्षेत्रानुपूर्वी के जान लेने किन्तु अवगाहन शब्द का प्रयोग कर लेना चाहिये और पूर्ववत् ही समवत्तार द्वार जान लेना तद्वत् ही भंगोपदर्शनता है ।। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत से प्राग्वत् भंग समुत्कीर्तना और भंगोपदर्शनता समवनार दार अथवा क्षेत्रानुपूर्वी श्रादि सर्व जान लेने क्योंकि- इनका विवर्ण पूर्व कई स्थलों में किया गया है । श्रथ अनुगम विषय। सैकित्तं अणुगमे २ नवविहे पणते तंजहा संतपयपरू- वणया गाहा सेकिंतं संतपयपरूवण्या २ गमववहाराणं खेत्ताणुपुच्चीदव्वाइं कि अस्थि नत्थि नियमा अस्थि एवं दो- १६) * अनुयोगद्वार सूत्र निवि गमववहाराणं खेत्तापुवीदवाई कि संखेज्जाई असंखेज्जाई अणंताईनो संखेज्जाई असंखेज्जाइंनो अणंताई एवं दोनिवि २ णेगमवंहासणं खेत्ताणुपुवादब्वाइं लोग- स्सकहभागे होज्जा. किं संखेज्जइभागे होज्जा असंखेज्जई मागेहोज्जा संखेज्जेसु भागेसु होज्जा असंखेज्जेसु भागे. सु होज्जा सव्वलोएहोज्जा एगं दवं पडुच्च लोगस्स संखेस्जद भागे वा होज्जा असंखज्जइभागे चा होज्जा संखेज्जेसु भागे सुहोज्जा असंखेज्जेसुवामागे सु होज्जा देसूणे लोए वा होज्जा नानादब्वाई पडुच्च नियमा सव्वलोए होज्जा प्रणाणुपुब्बी दव्वाइं अवचव्वग दव्वाणिय जहेव हेडा तहेव नेयवाणि 'फुसणावि तहेव काल तहेवा ॥ पदार्थ-(सेकिंतं अणुगमे २ नवविहे पं० तं० संतपगपरूवणया गाहा ) प्रश्न ) अनुगम किसे कहते हैं ( उत्तर ) अनुगम नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-विद्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता की गाथा पूर्व लिखी जा चुकी है वही जाननी चाहिये ( सेकिंतं संतपयपरूवणया २) पूर्वपक्ष वि- द्यमान पदार्थों की प्रतिपादनता किस प्रकार से है ( उत्तर ) जो निम्न लिखि- तानुसार है ( गमववहाराणं खेत्ताणुपुत्वीदव्वाइं किं अस्थि नत्थि ) नैगम और व्यवहार नय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य है किम्बा नहीं है । इस प्रकार से गुरु को पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(नियमा अत्थि एवं दोनिवि १). नियम से अस्ति है अर्थात् निश्चय यही है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के स्व- रूप को भी जानना चाहिये (णेगमववहाराणं वेत्तायुपुब्बी दयाई कि संखेज्जाई असंखेज्जाई अणंताई ) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नैगम और व्यवहारनय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य क्या संख्यात है वा असंख्यात है अथर्वा अनंत है गुरु कहने लगे कि (नो संखेज्जाई) संख्यात नहीं है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्य तीन भदोश से लेकर अनंत प्रदेशि पर्यन्त है सो वे संख्यात प्रदेशी पर नहीं हैं किन्तु (असंखेज्नाई) असंख्यात प्रदेशों पर अवगाहन की अपेक्षा असंख्यातं क्षेत्रातुपूर्वी * अनुयोगद्वार सूत्र (६३ ) है (नो अणताह एवं दोनिवि २) अनंत भी नहीं है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी जानने चाहिये २(गमववहाराण खेत्ताणुपुचीदव्याई लोग- सिकइ भागे होज्जा कि संखेज्जइ भागे होज्जा असंखेज्जइभागे होज्जा (प्रश्न) नैगम और व्यवहार नय से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्य लोक के कितने भाग में होता है क्या लोक के संख्यांत अथवा असंख्यात भाग में होता है तथा-( संखेज्जे- में भागेसे होज्जा असंखेज्जेसु भागेसु होज्जा) बहुत से संख्यात भागों में वा बहुत से असंख्यात भागों में होता है ( ससोए होज्जा ) या सर्व लोक में होता है । गुरु उत्तर देते हैं कि हे पृच्छक ! ( एगं दवं पडुच लोगस्स संखे- ज्जइ भागे वा होज्जा) एक द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग में भी होता है (असंखेज्नइमागे वा होज्जा) असंख्यात भाग में भी होता है ( संख ज्जेसुभागेसु वा होज्जा) लोक के बहुत से संख्यात भागों में भी होता है (अ- संखेज्जेसु भागेसु वा होज्जा ) बहुत से असंख्यात भागों में भी होता है तथा- (देसूणे लोए वा होज्जा ) एक अंश छोड़कर सर्व लोक में भी होता है अर्थात् अचित महास्कंध आनुपूर्वी द्रव्य तीन प्रदेशों से न्यून सर्व लोक में हो जाता है अनानुपूर्वी द्रव्यं का एक प्रदेश दो प्रदेश प्रवक्तव्य द्रव्य के इनके स्थान को वर्ज कर देशून सर्व लोक में हो जाता है क्योंकि यह तीन द्रव्य सर्व लोक में . व्याप्त हो रहे हैं अपितु ( नानादन्वाई पहुच्च नियमा सव्वलाए होज्जा) नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा निश्चय ही सर्व लोक में होते हैं क्योंकि- यह द्रव्य सर्व लोक में सदैव काल विद्यमान रहते हैं ( अणाणुपुब्बी दव्वाइं अवतन्बए दव्याणिय जहेव हेछा तहेवने यवाणि सणावि तहेव काल तहेव ) अनानुपूर्वी -द्रव्य और अवक्तव्य प्राग्वत् जान लेने चाहिये, स्पर्शना द्वार और कालद्वार यह भी पूर्ववत् है ।। भावार्थ--अनुगम द्वार नव प्रकार से वर्णन किया गया है जिसका विवर्ण पूर्व लिखित गाथा में होचुका है विद्यमान पदों की प्रतिपादनता के विषय में नैगम और व्यवहारनय के मत में क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्यों की निश्चय ही अस्ति इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों की भी अस्ति है फिर नैगम और व्यवहारनय से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य असंख्यात है किन्तु संख्यात वा अनंत नहीं हैं क्योंकि तीनों द्रव्य अनंत है किन्तु नभ के असंख्यांत प्रदेशों पर ही स्थिति करते हैं और दोनों नयों के मन में क्षेत्रानुपूर्वी गत एक द्रव्य लोक के संख्यात 7 * अनुयोगद्वार सूत्र * असंख्यात वां बहुत से लोक के संख्यात भागों में वा बहुत से बा-असंख्या भागों में अथवा अल्प देश न्यून सर्व लोक में होजाता है क्योंकि यदि अविध महास्कंध सर्वलोक प्रमाण भी होजावे तो तब भी तीन प्रदेश न्यून होता है जो अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य के स्थानों को छोड़ देता है यह दोनों द्रव्य सदैव काल इस लोक में विद्यमान रहते हैं अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा निश्चय ही यह द्रव्य सर्वलोक में विराजमान रहते हैं और इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अबक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये और स्पर्शना द्वार काल द्वार प्राग्वत् ही जान लेने चाहिये । अंथ स्थिति द्वार विषय । खेताणुपुब्बीदव्वाई कालयो केवच्चिर होइ एगं दवं पड्डुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्ज कालं नाना दवाई पडुच सव्वद्धा एवं दोनिवि णेगमेववहाराणं खेत्ताणु पुवी दवाई कालउ. केवीचरं अंतरं होइ एगं दबं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेज्जंकालं नानादब्वाई पडुच्च नत्थि अंतरं एवं दोनिवि गमववहाराणं खेताजपुवी दबाई सेसदवाणं कहभागे होज्जा- किं संखेज्जई भागे एवं पुच्छाणि वयणं च जहेव हेठा तहेव नेयजा प्रणाप्पुब्बी दव्याई अवत्तंव्वगदव्वाणिवि जहेव हेठा ऐंगमववहाराणं खेत्तागपुन्वीदवाई कयरंमि भावे होज्जा नियमा साइ परिणामिए भावे होज्जा एवं दोनिवि ॥ पदार्थ-(णेगमववहाराणं खत्ताणुपुनीदवाई कालमो केवचिर होइ). शिष्य ने प्रश्न किया कि हे पूज्य ! नैगम और व्यवहार नय से पत्रानुपूर्वी गत द्रव्य काल से कब तक एक स्थान में स्थिति करते हैं गुरु काने लगे कि भो शिष्य कि नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्यों की गति निम्न प्रकार से है यथा-(एग दव्वं पडुच्चं जहन्त्रेणं एगं समयं उक्कोसणं असंखे ज्जकाल ) एक द्रव्य की अपेक्षा जयन्यस्थिति एक समय प्रमाण उत्कष्ट असं- !
* अनुयोगदारं सूत्र ख्यात काल पर्यन्त होती है यदि एक द्रव्य एक एक स्थान पर स्थित रहे तो न्यून से न्यून एक समय मात्र उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त रह सकता है अ- पितु-(नानादलाई पहुच सम्बद्धा एवं दोनिवि ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा सर्व काल में आनुपूर्वी द्रव्य रहते हैं और उसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्रव्य द्रव्य भी जानने. चाहिये ( णेगमववहाराणं खेशाणुपुच्चीदवाई कालभो केवचिरं अंतरं होई) ३गप और व्यवहार नय के मत से जो क्षेत्रानुपूर्वी गंत द्रव्य है उनका काल से कितना.चिर अंतर होता है-ऐसा शिष्य के पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(एगं दवं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उकोसेणं असंखे- ज्जकालं) एक द्रव्य की अपेक्षा जघन्य एक.समय मात्र अन्तरकाल होता है उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अन्तर होता है किन्तु-( नानादबाई पहुच नस्थि अंतरं एवं दोनिवि ) नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा अन्तरकाल नहीं होता है इसी प्रकार दोनों द्रव्यों के विषय में भी जानना चाहिये (ऐगमवव- हाराणं खेवाणुपुवी दवाई सेस दवाणं कह भागे होज्जा ) (प्रश्न) नैगम और व्यवहार नयं के प्रत से क्षेत्रानुपूर्वी द्रव्य शेष द्रव्यों के कितने भागों में होता है (किं संखेज्जइ भागे होज्जा एवं पुच्छाणि वयणं च जहेवेहेडा तहेव नेयच्चा) क्या संख्यात भाग में होते हैं या असंख्यात भाग में इत्यादि जैसे पूर्व इस वि. पर्य में लिखा गया है कि वैसे ही जानना चाहिये (प्रणाणुपुच्ची दबाई अव: चन्वगदाणीव जहेव हेठा ) अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी भाग्वत हैं। (गमव्वहाराणं खेचाणुपुच्ची दबाई कयामि भाचे होज्जा) नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्य कौन से भाव में होते हैं-ऐसे पूंछने पर गुरु कहने लगे कि-(नियमासाइ परिणामिए भावे होज्जा) निश्चय ही यह द्रव्य सादि पारिमाणिक भाव में होते हैं किन्तु यह द्रव्य नित्य नहीं हैं, इसलिये सादि पारिणामिक भाव में कहे गये हैं-(एवं दोनिवि ) इसी प्रकार दोनों द्रव्य भी जानने चाहिये। भावार्य-नैगम और व्यवहार नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी गत द्रव्यों की स्थिति जघन्य एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त है किन्तु सर्व द्रव्यों की अपेक्षा सर्व काल में नाना प्रकारों के द्रव्यों की स्थिति रहती हैं इसी प्रकार इनका अन्तर काल है शेष द्रव्यों के कितने भाग में यह द्रव्य हैं इस विषय में पाग्वत् जानना चाहिये और यह द्रव्य नियम से सादि पारिणामिक .
* अनुयोगद्वार सूत्र * भाव में होते हैं क्योंकि ये परिणमन शील है अपितु यह द्रव्य स्वाभाविक नित्य नहीं होते इसी प्रकार अनानुपूरी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जा. . नना चाहिये। अथ अल्प बहुत्वदार विषय । एएसि णं भंते णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदवाणं अंणाणुपुब्बीदवाणं अवतव्वगदव्वाण यं दव्वछ्याय पय सट्टयाए दवडपएसडयाए कयरें २ हिंती अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा गोयमा सव्वत्थोचाई गमव- वहाराणं अवत्तवनगदव्वाई दव्वळ्याए अणापुवीदव्वाई दश्वछ्याए. विसेसाहियाई अणाणुपुवीदव्वाई दवट्याए असंखेज्जगुणाई पएसट्टयाए सव्वत्योवाई गमववहाराणं प्रणाणुपुवी दवाई अप्पएसच्याए अवत्तव्वगदव्याई पए सठ्याए विसेसाहियाई आणुपुवीदव्वाई पएसछ्याए असं- खेज्जगुणाई दवठ्ठपएसध्या सव्वत्थोवाइं गमववहाराएं अवतव्वगदवाई दवयाए अपाणुपुवीदव्वाई वड्याए अप्पएसयाय विसेसाहियाई अवत्तब्वगदव्यगदव्वाइं पाए- सठयाए विसेसाहियाइं आणुपुती दवाई दव्वव्याए असं- खेज्जगुणाई ताई चेव पएसध्याए असंखेज्जगुणाई सेत्तं अणुगमे सेत्तं ऐगमववझाराणं प्रपोवणिहिया खेचाणपुवी ॥ सेकित संग्गाहस्स अणोवणिहिया खेत्ताणु जहेव दवायुपुव्वी तहेब खेत्ताणुपुवी विसेत्तं संग्गाहस्स अणोवणिहिया खेत्ता- गुपुती ॥ पदार्थ-(एएस भत्ते गमववहाणं प्राणुयुब्बीदवाएं प्रणाणुनबी दवाणं अवत्तव्यगदव्वाणंय दव्ययाए पएसध्याएं दव्यप्रएसध्याय कयरेर हिंतो अप्पा वा बहुया वा तुल्ला वा त्रिसेसाहियाई गा), श्री गौतम प्रभुजी श्री * अनुयोगद्वारं सूत्र * (१७ ॥ भगवान से पूछते हैं कि-हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय से प्रानुपूर्वी द्वव्य; अनानुपूर्वी ;न्य और अबक्तव्य द्रव्य, यह तीनों ही द्रव्य द्रव्यार्थिक से और प्रदेशाधिक से तथा द्रव्य और प्रदेश दोनों के युगपत् स कौन २ से द्रव्य अल्प हैं वा बहुत हैं वा तुल्य हैं या विशेषाधिक हैं, इस प्रकार के पूंछने पर श्री भगवान् उत्तर देते हैं कि-(गोयमा) हे गौतम ( सवयोवाई ऐममहा- राणं) सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से ( अवतन्धगदव्वाई. दवठयाए ) श्रवक्तव्य द्रव्य द्रव्यार्थक से हैं १ अपितु (अणाणुपुत्वीदव्वाई दन्वयाए विसेसाहियाई ) अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से विशेषाधिक है २ (आणुपुची दबाई दबयाए असंखेजगुणाई ) भानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं किन्तु (पएसच्याए ) प्रदेशार्थक से (सव्वत्थोवाइंणेगम वहाराणं ) सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से (अणाणुपुची. दव्याई अप्पएसट्टयाए ) अनानुपूर्वी द्रव्य अप्रदेशार्थक से हैं किन्तु ( अवत्त- बगदम्बाई परसठयाए विसेसाहियाई ) अवनव्य प्रदेशार्थिक से विशेषाधिक हैं उनसे-( आणुपुब्बीदव्बाई पएसयाए असंखेज्जगुणाई ) भानुपूर्वी द्रव्य प्रदेशार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं अपितु (दबठपएसध्याए सबथो वा णेगमववहाराणं अवत्तबगदम्बाई दवयाए) द्रव्यार्थक और प्रदेशार्थक से सर्व से. स्तोक नैगम और व्यवहार नय की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य हैं अपितु (अणाणपुब्बीदवाई दवअप्पएसट्टयाए विसेसाहियाई) अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से और प्रदेशार्थक से विशेषाधिक हैं फिर उनसे ( अवत्तबगदव्वाई पएसच्याए विसेसाहियाई ) अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशार्थक से विशेषाधिक हैं फिर (आणुपुबीदवाई दबयाए असंखेज्जगुणाई) आनुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं ( ताई चे व पएसठ्याए असंखेज्जगुणाई) सन द्रव्यार्थक से प्रदेश असंख्यात गुणाधिक हैं (सेतं अणुगमे ) यही अनुगम है (सेत्तं णेगमत्रवहाराणं अणोवणिहिया खेत्ताणुपुच्ची ) यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी है । ( सेकितं संग्गाहस्स अणोवणिहिया खत्ताणुपुच्ची जहेव दवाणुपुब्बी तहेव खेचाणुपुब्बी विसेत्तं संग्गाहस्स अणो- वणिहिया खेत्ताणुपुची ) ( प्रश्न ) संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रा- नुपूर्वी किस प्रकार से है ( उत्तर ) जैसे द्रव्यानुपूर्वी कथन की गई है वैसे ही क्षेत्रानुपूर्वी का भी समास जान लेना यही संग्रह नय के मत से क्षेत्रानुपूर्वी है:॥
(EES । * अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-श्री गौतम स्वामीजी उक्त द्रव्यों को अल्प बहुत के नियम से भगवान् से विशेष निर्णय करते हैं कि हे भगवन् ! उक्त तीनों द्रव्यों में अल्प बहुल कौन २ से द्रव्यं हैं, श्री भगवान् कहते हैं कि हे गौतम ! सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यों की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य हैं उन से अनानुपूर्वी द्रव्यों का द्रव्य विशेषाधिक है ! और उनसे पानुपूर्वी द्रव्यों का द्रव्य असंख्यात गुणाधिक है । अपितु प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्य अप्रदेशार्थक हैं। और अवकव्य द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से उनसे विशेषाधिक हैं । फिर उनसे भी , भानुपूर्वी द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से असंख्यात गुणाधिक है किन्तु द्रव्य और प्रदेशों की अपेक्षा से सर्व से स्तोक नैगम और व्यवहार नय के मत से द्रव्यार्थक से भव- वन्य द्रव्य हैं उनसे अनानुपूर्वी द्रव्य द्रव्य और अभदेशार्थक की अपेक्षा से विशेषाधिक हैं फिर उनसे अवक्तव्य द्रव्य प्रदेशों की अपेक्षा से विशेषाधिक हैं फिर भानुपूर्वी द्रव्य द्रव्यार्थक से असंख्यात गुणाधिक हैं किन्तु प्रदेश उनसे भी असंख्यात गुणाधिक हैं सो इसी का नाम अनुगम है नैगम और व्यवहार नय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी का समास सम्पूर्ण हुआ और संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी जैसे कि द्रव्यानुपूर्वी पहिले वर्णन की गई है उसी प्रकार जान लेनी चाहिये और संग्रह नय के मत से इसी का नाम अनुपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी कहते हैं । अथ उपनिधि का पूर्वी विषय । मूल -सेकिंतं उपणिहिया खेत्ताणुपुब्बी २ तिविहा पं० २० पुब्बाणुपुब्बी पच्छापुब्वी प्रणाणुपुब्बी.सेकिंतं पुवाणुपुवीर अहोलोए तिरियलोए उड्ढलोए से पुव्वाणपुवी ॥१॥सेकिंतं पच्छाणुपुत्वी उड्ढलोए तिरियलोए अहलोए, सेत्तं पच्छाणु- पुवी सेकिंतं अणापुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तीर- याएतिगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो सेत्तं अंणाणुपुवी ॥ 4 * अनुयोगद्वार सूत्र में ( ६ ) - पदार्थ-(सेकित उवणिहिया खेत्ताणुपुब्बी २ तिविहां पं० त०) (प्रश्न) अब क्षेत्रानुपूर्वी उपनिधिका कौनसी है ( उत्तर ) उपनिधिका क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि ( पुब्वाणुपुची ) पूर्वानुपूर्वी ( पच्छाणु- पुव्वी ) पश्चात् आनुपूर्वी ( अणाणुपुची ) अनानुपूर्वी (सेकितं पुवाणुपुच्ची २) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर) पूर्वानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि ( अहोलोए तिरियलोए उड्ढलोए ) अधोलोक तिर्यक्लोक ऊर्ध्वलोक ( सेत्तं पुव्वाणुपुब्बी ) यही पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणुपुची २) प्रश्न ) पश्चांव आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर) पश्चात् भानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से वर्णित है जैसे कि (उड्ढलोए तिरियलोए अहोलोए ) अलोक तिर्यक लोक अधोलोक (सेत्तं पच्छाणुपुची ) यही पश्चात् आनुपूर्वी है ( सेकिंतं अ- पाणुपुची एयाए चेव ए गुत्तरियाए तिगच्छगयाए सेडीए अनमन्नन्भासो दुरुजूणो) .(प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन्हीं तीनों आनुपूर्वी द्रव्यों को तीनों गच्छ करके अर्थात् (१-२-३ ) तीनों श्रेणियां स्थापन करके फिर इन्हीं को परस्पर गुणा करके दो आदि अंत के भंग न्यून करने से जो भंग शेष रहते हैं उन्हीं को अनानुपूर्वी कहते हैं ( सेत् अण्णाणुपुदी ) यही अनानुपूर्वी है ।। भावार्थ-उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ सो पूर्वानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से है अयोलोक तिर्यक्लोक ऊर्ध्वलोक इन्हीं को उल्था करके पठन करना उन का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है अपितु अनानुपूर्वी में तीनों गच्छ करके फिर उनको परस्पर अभ्यास (गुणा ) करने से यावन्मात्र भंग बनते हो उनमें से आदि और अंत के भंग को न्यून करने से यावन्मात्र अंग शेष रहे हों सो उन्हीं का नाम मनानुपूर्वी है ॥ श्रथ अधोलोक विषय। अहो लोए खेत्ताणुपुवी २ तिविहा पं० तं० पुब्वाणु पुब्बी पच्छाणुपुब्बी अणाणुपुब्बी सेकिंतं पुव्वाणुपुब्वी २ रयण पभा १ सकरप्पभा २ वालु यप्पभा ३ पंकप्पभा ४ धूमप्पभा ५ तमा ६ तमतमा ७ सत्तं पुन्वाणुपुञ्ची सेकिंतं पच्छाणुपुची २ (१००) * अनुयोगद्वार सूत्र तमतमा जाव रयणप्पभा सेत्तं पुच्छाणुपुब्बी संकिंतं अणाणु पुची २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए सत्त गच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरुपूणो सेत्तं अणाणुपुनी ॥ पदार्थ-( अहो लोए खेत्ताणुपुची २ तिविहा पं० तं० पुव्वाणुपुत्री पच्छा- . पुची अणायुपुब्बी ) अधोलोक की अपेक्षा से क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् प्रानुपूर्वी २ और अनानुपूर्वी ३ '. इस प्रकार के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने प्रश्न किया कि ( सेकिंतं पुवाणु पुच्ची र रयणप्पभा सकरप्पभा वालुयप्पभा पंकप्पभा धूमप्पभा तमप्पभा तमप्पभा तमतमाप्पभा ) हे भगवन् ! पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं, गुरु ने उत्तर में कहा कि अधोलोक के क्षेत्र की अपेक्षा से सात प्रकार की आनुपूर्वी है क्योंकि नीचे लोक में सात पृथिवियां है जैसे कि रत्नप्रभा १ शर्करप्रभा २ वालुप्रभा ३ पंक- प्रभा ४ धूमप्रभा ५ तमप्रभा ६ तमतमाप्रभा ७ से यह अनुक्रमता पूर्वक गणन करने से इनकी आनुपूर्वी बन जाती हैं (सेत्तं पुवाणुपुच्ची) यही पूर्वानुपूर्वी है (सेकिंतं पच्छाणुपुवी तमतमा जाव रयणप्पमा सेत्तं पच्छाणुपुच्ची) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) सातवें नरक से प्रथम पर्यन्त गणन करना उसे (७-६-५-४-३-२-१) पश्चात् भानुपूर्वी कहते हैं, सो यही पश्चात् आनुपूर्वो है ( सेकिंतं अणाणुपुच्ची एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरिया सत्त गच्छगयाए सेढीए. अन्नमनभासो दुरुपूणो सेत्तं अणाणुपुव्वी) (प्रश्न). अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन सातों को एक एक की वृद्धि करते जो सात गच्छ किये हैं जैसे कि (१, २, ३, ४, ५, ६, ७) इनको परस्पर गुणाकार करने से ५०४० अंग बन जाते हैं जिनमें आदि अंत के भंग को छोड़कर ५०३८ भंग रहते हैं उन्हीं का नाम अनानुपूर्वी है । भावार्थ-अधोलोक की तीनों प्रकार से आनुपूर्वी होती हैं सात ही नरकों के नाम ओनुपूर्वी और पश्चात् आनुपूर्वी पूर्ववत् ही जान. लेनी चाहिये किन्तु अनानुपूर्वी में सात को परस्पर गुणाकार करने से ५०४० भंग वन जाते हैं सो उनमें से आदि अंत के भंग को छोड़कर शेष जो ५०३८ भंग रहते हैं उन्हीं को अनानुपूर्वी कहते हैं । , .
* अनुयोगद्दार सूत्र * (१०१) अथ तीर्यक्लोक विषय । तिरिय लोए खेत्ताणुपुव्वी २ तिविहा पं० त० पुवाणु- पुन्वी पच्छाणुपुव्वी अणाणुपुत्री सेकिंतं पुवाणुपुव्वी २ जंबूद्दीवे लवणे २ धायइ ३कालोय ४ पुक्खरे ५ वरुणे ६७। खार ८ घय ६ खोयनंदी अरुणवरे कुंडले रुयगे आभरण १ वत्य २ गंध ३ उप्पल ४ पडमेय ५ पुढवी ६ निधि ७ रयणे ८ वासहर ६ दह १० नइयो ११ विजया १२ वक्खार १३ क- प्पिंदा १४ ॥ १५ ॥ २ कुरा १६ मंदर १७ श्रावासा १८ कूडा १६ नक्खत्त २० चंद २० चंद २१ सूरा य २२ देवे १११ नागे १।१ जक्खो १।१ भूएय १ । १ सयंभू रमणे य १ । १॥ ३॥ सेत्तं पुवाणुमुवी सेकिन्तं पच्छाणुपुब्बी २ सयंभू रमणे भूय जाव जंबूद्दीवे सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकित्तं अणाणुपुवी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखिज्ज गच्छगयाए सेढीए. अन्नमनभासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुष्वी " 1434 पदार्थ (तिरियलोए खेत्ताणुपुली २ तिबिहा पं० त० पुवायुपुब्बी पच्छा- गुपुन्वी अणाणुपुच्ची ) तिर्यक्लोक की क्षेत्रानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ और अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने प्रश्न किया कि ( सेंकिंतं पुन्वाणुपुब्बी २) हे भगवन् पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे कि-(जंबूद्दीचे १ लवणे २) जंबूद्वीप ? लवणसमुद्र २ (धायई ३ कालोय) धात की खंड ३ कालोदधि ४ ( पुक्खरे ५-६ ) पुष्कर- द्वीप ५ और पुष्करसमुद्र ६ (वरुणे ७ । ८ ) वरुणदीप ७ वरुणसमुद्र ८ (खीर ६-१०) चीरद्वीप ९ और क्षीर समुद्र १० (ध्ये ११ । १२) घृत. १--ऋतोऽत् प्रा० ,न्या० भ० सूत्र १२६ आदेकारस्य अत्वंभवनि यथाधयं तणम् कयन् असहो भयो घटो इत्यादि।
(१०२) * अनुयोगद्वार सूत्र * द्वीप ११ और घृतसमुद्र १२ (खोय १६ । १४ ) इक्षुद्वीप १३ और इक्षुसमुद्र १४ ( नन्दी १५ । १६) नंदीद्वीप १५ नंदीसमुद्र १६ (अरुणवरे १७।१८) अरुणद्वीप १७ और अरुणसमुद्र १८ कुंडल १६ । २०) कुंडलद्वीप १६ और कुंडलसमुद्र २० (रुयगे २१ ॥ २२) रुचकद्वीप २१ और रुचकसमुद्र २२॥भत्र विशेष द्वीपों के जानने का उपाय वर्णन करते हैं ( आभरण १) आभूषणों के नामों पर द्वीप और समुद्र हैं १ (वत्थ २) वस्त्रों के नामों पर २ (गंध ३) गंध के नामों पर ३ ( उप्पल ४ पंडमेय ५ पुढवी ६ निधि ७) और यावन्गात्र उत्पल कमलों के नाम हैं ४ पद्म कमलों के नाम हैं ५ पृथिवियों के नाम हैं ६ और निधियों के नाम हैं ७ ( रयणे ८ वासहर : दह.१० नइउ ११ विजया १२ वक्खार १३ कप्पिंदा १४-१५ ) रत्नों के नामों पर ८ वर्ष धरों के नामों पर ६ ( जो.पर्वत क्षत्रों के नियम कर्ता हैं ) इदों के नामों पर १० विनयों के नामों पर इसी तरह आगे भी जान लेने चाहिये वष्करों के नाम पर ( यह भी पर्वत है) कल्पों के नाम पर १४ और इन्द्रों के नाम १५ ( कुरु १६ मंदिर १७ आवासे १६ कूडा १६ नवखत्त २० चन्द २१ सूरे २२ देवे २३ नाग २४ जखे २५ भूयय २६ सयंभूरमणे २७ ) देवकुरु आदि के नाम मंदिरों के नाम आवासों के नाम कूटों के नक्षत्रों के चन्द्रमा के सूर्य के यावन्मात्र नाम हैं उसी प्रकार द्वीप समुद्रों के असंख्यात नाम जानने चाहिये किंतु देव नाग यक्ष भूत स्वयम्भूरमण इन पांच द्वीप. और पांच ही समुद्रों के एकैक ही नाम है इसलिये यह पांच एकत्व वर्णन किये गये हैं ( सेत्तं पुव्वाणुपुची ) यही पूर्वानुपूर्वी (सेकित पच्छाणुपुबो र सयंभूरमणे भूय जाव जंबूद्वीवे सेचं पच्छाणुपुब्बी) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) स्वयंभूरमण समुद्र से लेकर जंबुद्वीप पर्यन्त यावन्मांत्र द्वीप और समुद्र हैं उन्हीं का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है (से- किंत अणाणुपुषी २ एयाए चेव एगा इयाए एगुत्तरियाए असखिज्ज गच्छ- गयाए सेढीए अन्न मन्नम्भासो दुरूवणो सेत्तं अणाणुपुची) (प्रश्न ) अनानु पूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन सर्व को एक एक की वृद्धि करते हुए असं.. ख्यात गच्छ रूप श्रेणि की जाय फिर उन को परस्पर गुणा करें यावन्मात्र भंगवर्ने 'उनमें से आदि और अन्त के भंग को वर्ज करके शेष भंग .अनानुपूर्वीय कह- -लाते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है । भावार्थ-जम्बूद्वीप से लेकर स्वयम्भू रमण समुद्र पर्यन्त गमन करने को * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १०३ पूर्वानुपूर्वी कहते हैं स्वयम्भू रमण से जम्बूद्वीप पर्यंत गिणती को पश्चात् आनु. पूर्वी कहते हैं असंख्यात रूप गच्छ श्रेणी को परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंग वने उनमें से आदि और अंत के भंग को छोड़कर शेप भंग अमानुपूर्वी के होते हैं। ऊर्ध्वलोक क्षेत्रानुपूर्वी विषय । उड्ढलोए खेत्ताणुपुवी २ तिविहा पन्नता तं० पुज्वाणु पुन्वी पञ्चाणुपुव्वी अणाणुपुब्बी सेकिन्तं पुवाणुपुत्वी २ सोहम्मे १ इसाणे २ सणं कुमारे ३ माहिन्दे ४ वम्भलोए ५ उत्तए ६ महासुक्के ७ महस्सारे ८ प्राणएए ६ पाणए १० भारणे १९ अचुए १२ गेविज्जविमाणे १३ अणुत्तरविमाणे १४ . इसीप्यभारा १५ सेत्तं पुववाणुपुवी सेकिन्तं . पच्छाणुपुब्वी इसीप्पभारा जाव सोहम्मे सेत्तं पच्छाणुपुवी सेकिंतं प्रणाणु पुच्ची २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए पन्नरस गच्छ गयाए सेढिये अन्न मन्नम्भासो दुरूवुणो सेत्तं प्रणाणुपुती ।। पदार्थ-( उड्ढलोए खेत्ताणुपुन्बी २ तिविहा पं० त० ) ऊर्बलोक क्षेत्रा- नुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णित है जैसे कि (पुवाणुपुच्ची पच्छाणुपुच्ची अणाणु- पुच्ची) पूर्वानुपूर्वी पश्चात् आनुपूर्वी अनानुपूर्वी ( सेकित 'पुवाणुपुच्ची २) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) उर्वलोक की पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है जैसे कि-(सोहम्मेसाणेसणं कुमारे माहिन्देवम्भलोए लंत्तए महासुक्के सहस्सारे आणय पाण्य पारणे अचुए गेविजचिमाणे अणुत्तरोविमाणे इसी पभारा से पुन्वायुपुब्बी) सुधर्मदेवलोक इसी प्रकार देवलोक शन्द सर्वत्र संयोजन कर लेवें १ ईशान २ सनत्कुमार ३ माहेन्द्र ४ ब्रह्मलोक ५ लांतक ६ महाशुक्र ७ सहसार ८ आनत : प्राणत १० आरण ११ अच्युत १२ अवेयक १३ अनुत- रविमान १४ ईपत्प्रभाग पृथिवी १५ इन्हीं का नाम पूर्वानुपूर्वी है । (सेकिंत पच्छापुपुची २ इसीप्पभारा जावसोहम्मे सेत्तं पच्छाणुपुन्वी) (प्रश्न ) पश्चात् भानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) ईससभा पृथिवी से लेकर सुधर्म देवलोक (१०४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पर्यन्त जो गणना है उन्हीं का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है (सेकिस प्रणाणुपुची र एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए पन्नरसगच्छगयाए सेढीए अन्नपन्नम्भासो दुरू- पुणो सेचं अणाणुपुवी ) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उचर ) इन पंच दश (१-२-३-४-५-६-७-८-8-१०-११-१२-१३-१४-१५) अंको को परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंगबने उनमें से आदि अंत के भंगों को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी कहलाते हैं सो इन्हीं का नाम अनानुपूर्वी है ।। भावार्थ-उर्ध्व लोक की तीनों प्राग्वत् पूर्वियां हैं सो द्वादश कल्प देवलोक ग्रैवेयक १३ अनुत्तरि विमान १४ ईषत् प्रभा १५ इस प्रकार की गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं इससे विपरीत को पश्चात् श्रानुपूर्वी कहते हैं पंच दश अंकों की श्रेणी को परस्पर गुणा करने पर यावन्मात्र भंग वने उनमें से आदि अंतके भंग को छोड कर शेष रहे हुए भंग अनानुपूर्वी कहाते हैं सो इन्ही का नाम अनानुपूर्वी है। अथ प्रकारान्तर विषय । अहवा उवणिहिया खत्ताणुगुब्बी तिविहापं० त० पुव्वाणु पुब्बी पच्छाणुपुब्वी अणाणुपुब्वी सेकिंतं पुवाणुपुब्वी २ एग पए सोगाढे जाव असंखेज्जपए सोगाढे सेतं पुवाणु- सेकिंतं पच्छाणुपुब्बी २ असंखेज्जपए सोगाढे जाव एगपए सोगाढे सेत्तं पच्छाणु सेकिंतं अणाणुपुब्बी एगाए चेव एगा- इयाए एगुत्तरियाए असंखेज्ज गच्छगयाए सेढीए अन्न मन्न म्भासो दुरूवुणो सेत्तं अणाणुपुवी सेत् उवाणिहिया खेत्ता- पुवी। पदार्थ-(अहवा ) अथवा (उचणिहिया खचाणुपुव्वी तिविहा पं० त०) उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से विवर्ण की गई है जैसे-कि पुब्वाणु- पुची १ पच्छापुपुवी २ अणाणुपुब्बी २) पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार गुरु के कहने पर शिष्यने फिर प्रश्न किया कि गुरु *, नोट-१३०७६७४३६८०००१६ इतने भंग १५ अंको के होते हैं।
# * अनुयोगद्वार सूत्र # (१०५) .(सेकिंत पुन्वाणुपुब्बी ) हे भगवन् ! पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरुने उत्तर दिया भो शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जो ( एगपए सोगाढे जाव असंखेज्ज- पएसोगाढे सेतं पुन्चाणपुची ) द्रव्य अनुक्रमता पूर्वक आकाश के एक प्रदेश: से लेकर यावत् असंख्यात प्रदेशों पर्यन्त अवगाहन हुआ है उसे क्षेत्रानुपूर्वी कहते हैं ( सेतिं पच्छाणुपुची २ असंखेज्जपएसोगाढे जाव एगपए सोगाढे से पच्छापुची) ( प्रश्न ) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो असंख्यात प्रदेशीपरि द्रव्य अवगाहन हुआ है यावत् एक प्रदेशोपरि अवगाहन होरहा है उसे पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं ( सेर्कितं अणाणुपुची २ एयाए चैव एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखेज्ज गच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरूवृणो सेत्तं प्रणाणुपुब्बी ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर ) इस आनुपूर्वी को एक २ की वृद्धि करते हुए असंख्यात गच्छरूप श्रेणिये जब होजाएं तब उनको परस्पर गुणाकार करके फिर उसके आदि और अंत के रूप को छोड़ कर शेप जो भंग रहते हैं उनको अनानुपूर्वी कहते हैं क्योंकि अनानुपूर्वी में या- वन्मात्र अंक होते हैं उनको परस्पर गुणा किया जाता है अपितु श्रादि और अंत के अंकों को वर्ज करके शेष रहे हुए अंक अनानुपूर्वी कहलाते हैं । (सेतं उवणिहिया खेत्ताणुपुब्बी ) यही उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी होता है ।। भावार्थ-उपनिधि का क्षेत्रानुपूर्वी तीन प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी, पश्चात् आनुपूर्वी, अनानुपूर्वी जो द्रव्य आकाश के एक प्रदेश से लेकर यावत् असंख्यात प्रदेशों पर अवगाहन हुआ है उसे पूर्वानुपूर्वी कहते हैं ठीक इससे विपरीत गणना को पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं और एक प्रदेश से लेकर यावत् असंख्यात प्रदेश पर्यन्त जो श्रेणिये हैं उनको परस्पर गुणा करने यावत् प्रमाण भंग बनते हैं उनमें से आदि और अंत के भंग को वर्ज करके, शेष रहे हुए भंग'अनानुपूर्वी कहलाते हैं यही. उपनिधिका क्षेत्रानुपूर्वी है और इसे ही उपनिधिका कहते हैं । अथ कालानुपूर्वी विषय । सेकिंतं कालाणुपुवी २ दुविहा पं० तं० उवपिडिया भयोवणिहिया तत्थ एंजा-सा उवणिहिया साप्पा तत्थ णं १४ प * अनुयोगद्वार सूत्र * जांसा अणोवणिहिया सा दुविहा पं० तं गमववहारार्ण संग्गहस्स गमववहाराणं तहेव पंचविहा जाव तिसमय- लिइए प्राणुपुव्वी जाव असंखेज्ज समयलिइए प्राणुपुव्वी एग- समय द्वितीय प्रणाणुपुब्बी दुसमयठितीए अवंतव्वए तिसम- यद्वितीयायो आणुपुब्बीओ जाव असंखेज्ज समयद्वितीयायो प्राणुपुब्बीयो एगसमय द्वितीयाचो अणाणुपुव्वीमो दुसम- यहितीयाइं अवतव्वयाई सेत्तं गमयवहाराणं अपयपरूव- पया एयाए चेव गमववहाराणं अपयपरवणयाएं किं पओयणं २ भंग समुक्त्तिणया कीरइ सेकिंतं गमववहाराणं. मंगसमुक्त्तिणया २ अस्थि आणुपुब्बी .अत्थि, अणाणपुची अस्थि अवतव्वए एवं दवाणुपुब्बी गमेणं कालाणुपुब्बी ए- वित्ते चेव छब्बीसं भंगाणेयन्वा जाव सेत्तं गमववहाराणं भंगसमुकित्तणयाए एयाए ऐगमववहाराणं भंगसमुक्त्तिण याए किं पत्रोयणं २ भंगोवदंसणया कोरइ सेकित्तं गमव- वहाराणं भगोवंदसणया २ तिसमयलिइए प्राणुपुब्बी एगसम- यहिइए अणाणपुब्बी दुसमयहितीए अवचव्यए एत्थंविसो चेव गमो सेत्तं भगोवदसणया सेकिंतं समोयारे णेगमववहाराणं भागुपुब्बी दवाई कहिं समोयरति किं प्राणपुब्बि दब्बेहि समोयरति पुच्छागो, प्राणुपुब्बी दव्वेहिं समोयरंति नो अ- पाणुपुब्बी दबेहिं समोयरंति नो अवत्तबग दव्वेहि समोय- रंति एवं दोनिवि सहाणे २ समोयरति सेत्तं समोयारे सेकिंतं अणुगमे २ नवविहे पण्णत्ते तंजहा संतपयपरूवणया जाव . अप्पाबहु॥
. अनुयोगद्वार सूत्र में (१०७) पैदार्थ-( सेर्कितं कालाणुपुली २ दुविहा पं० त०') (प्रश्न) कालानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) कालानुपूर्वी द्विपकार विवर्ण कीगई है जैसे कि ( उव- णिहियाय अगोवणिहियाए ) उपनिधि का और अनुपनिधि का अपितु (तत्थ णं जा सा उपरिणहियाए साहप्पा ) जो उपनिधि का है वह इस समय स्थापनीय है क्योंकि उसका स्वरूप फिर किया जायगा किन्तु जो (तत्य राजा सा अणाव- णिहिया सा दुविहा पं० ० ) उनमें से जो अनुपनिधि का है वह द्विप्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि (णेगमववहाराणं संग्गहस्स.) नैगम और व्यव- होरनय और संग्रहनय के मत से किन्तु (णेगमववहाराणं तहेव पंचविहा ) नैगम और व्यवहारनय से पूर्ववत् पांच प्रकार से वर्णन कीगई है (जाव तिसमंयहिइए श्रीणुपुन्नी जाव असंखेन्ज समयहिइए आणुपुच्ची) यावत् तीन समय की स्थिति वाला द्रव्य आनुपूर्वी संज्ञक होता है इसी प्रकार असंख्यात समय की स्थिति वाला भी आनुपूर्वी संज्ञक होता है स्थिति की अपेक्षा से द्रव्यों की कालानुपूर्वी वनती है क्योंकि अभेदरूप होने से अपितु ( एगसमयहितीए अणाशुपुची) एक समय की स्थिति वाला द्रव्य अनानुपूर्वी होता है (दुसमय द्वितीय श्रेवतब्बए ) द्विसमय की स्थिति वाला द्रव्य अवतव्य संज्ञक होता है यह तीन भंग एक वचनान्त हैं अब तीनों के सूत्रकार बहुवचन सिद्ध करते हैं (तिसमयहितीयाओ आणुपुच्ची जाव असंखेज्ज समयहितीयायो आणुपु- बीओ) बहुत से द्रव्ये तीनों समय की स्थिति वालों की अपेक्षा से बहुतसी कालानुपूर्वियां होती हैं इसी प्रकार यावत् असंख्यात समयं की स्थिति वालों द्रव्यों की अपेक्षा से बहुतसी कालानुपूर्वियां होती हैं । ( एगसमयष्ठितीयाओ अण्णाणुपुच्चीओ) बहुत से द्रव्यों की एक समय की स्थिनि की अपेक्षा से बहुत सी अनानुपूर्वियां होती हैं ( दुसमयहितीयाई अवत्तव्ययाई ) बहुत से द्विसम की स्थिति वाले द्रव्यों की अपेक्षा से बहुत से अवक्तव्य द्रव्य होते हैं (सेचं णेगमवहाराणं अकृपयपरूवणया) यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थ पद की प्रतिपादनता है । जब गुरु ने इस प्रकार से कहा तब शिष्य ने शंका की कि हे भगवन् ! ( एयाए चेत्र गमववहाराणं अहपयपरूवणयाए कि पओयणं) इन नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थ पद प्रतिपादनता का मुख्य प्रयोजन क्या है ? इस प्रकार शिष्य की शंका होने पर गुरु कहने लगे कि ! इनका मुख्य प्रयोजन (भंगसमुक्त्तिणया कीरइ ) भंगों की समुत्कीर्तन . (१०८) * अनुयोगद्वार सूत्र * करना है अर्थात् इनके द्वारा भंगों की समुत्तीर्तनता कीजाती है जव गुरु ने इस पकार से कहा तब शिष्य ने फिर पूछा कि (सेकिंतं णेगमववहाराणं भंगसमु- कित्तणया) वह कौनसी है जो नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्ती- तनता है, गुरु ने उत्तर दिया कि ( अत्थि आणुपुब्बी अस्थि अणाणुपुच्ची अस्थि अवत्तव्वय एवं दवाणुपुच्ची गमेणं - कालाणुपुव्वी एवित्ते चेव छच्चीस भंगाणेयव्वा जाव सेत्तं गमववहाराणं भंगसमुक्तिणयाए ) एक आनुपूर्वी ट्रव्य है एक अनानुपूर्वी द्रव्य है २ एक अवक्तव्य द्रव्य है उसी प्रकार द्रव्यानु- पूर्वीवत् कालानुपूर्वी जाननी चाहिये सो वही षट् विंशत्ति भंग भी जानने चाहिये प्राग्वत् यावत् यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अंगों की सम्मु- कीर्तनताजव गुरु ने ऐसे कहा, तब फिर शिष्य ने शंका की कि ( एयाए णेगमववहाराणं भंगसमुकित्तणयाए किंपोयणं २ भंगोवदसणया कीरइ) इन नैगम और व्यवहारनय के मत से भंग समुत्कीर्तनता का मुख्य प्रयोजन क्या है जब शिष्य, ने ऐसे कहा तब गुरु ने उत्तर दिया कि इनका मुख्य प्रयोजन भंगोपदर्शनता है.अर्थात् इनके द्वारा भंगोपदर्शनता कीजाती है शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि ( सेकिंतं णेगमववहाराणं भंगोवदंसणया २ तिसमय- डिइए आणुपुच्ची एगसमयहिइए अंणाणुपुची दुसमठितीय अवत्तव्वए एत्य विसो चेव गमो सेतं भंगोवदंसणया ) वह कौनसी नैगम और व्यवहारनयः से भंगोपदर्शनता है गुरु ने कहा कि तीन समय की स्थिति वाला द्रव्यानुपूर्वी सज्ञक है. एक समय की स्थिति वाला अनानुपूर्वी संशक है, द्वितमय की स्थिति वाला अवक्तव्य संज्ञक है, सो इसी प्रकार यहां पर उन्हीं भंगों का उच्चारण करना चाहिये जो भंगपूर्व दिखलाए गए है से शब्द अर्थ शब्द का वाचक है सो यही भगोपदर्शनता है ( सेकिंत समोयारे.) (प्रश्न ) समवतार किसे कहते हैं ( गमववहाराणं आणुयुची दबाई कर्हि सायरति ) और नैगम व्यवहार नयके मतसे आनुपूर्वी द्रव्य कहांपर समवतार होते हैं (किं आणुपुची दबेहिं समोयरंति पुच्छा ) क्या आनुपूर्वी द्रव्यों में ही समवतार होते हैं या अनानुपूर्वी द्रव्यों में अथवा अवक्तव्य द्रच्यों में समवतार होते हैं ( गोयमा आणुपुव्वी दहिं समोयरंति नो अणाणुपुच्ची दव्वेहिं समोयरंति नो अवत्तव्वगदव्वेहि समोयरंति ) भगवान् ने उत्तर दिया कि हे गौतम ! आनुपूर्वी द्रव्य भानुपूर्वी द्रव्यों में ही * अनुयोगद्वार सूत्र * (१०६) समवतार होते हैं अनानुपूर्वी द्रव्यों में समवतार नहीं होते अवतव्य द्रव्यों में भी समवतार नहीं होते केवल स्वजाति में ही समवतार होते हैं । ( एवं दोनिति सहाणे २ समोयरंति से समोयारे ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी द्रव्य और अव- क्तव्य भी स्वस्थानों में ही समवतार होते हैं अन्य स्थानों में समवतार नहीं होते सो यही समवत्तार द्वार हैं ( सेकिंत अनुगमे २ नवविहे पं० २०) (अन) अनुगम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (उत्तर ) नव प्रकार से जैसे किं (सेतं पयपरूषणमा जाव अप्पाबहु ) विद्यमान पदों की प्रतिपादनता यावत् अल्प बहुत पर्यन्त पूर्ववत् जानना चाहिये अव इनका पृथक् २ ता से विवर्ण किया जाता है जिससे बहुत ही सुलभ वोध हो । भावार्थ-कालानुपूर्वी उसका नाम है जो द्रव्य काल से अभेद रूप हैं, जिनकी स्थिति काल से विद्यमान है सो कालानुपूर्वी कही जाती है स्थिति की अपेक्षा से कालानुपूर्वी वनजाती है सो कालानुपूर्वी के मुख्य दो भेद हैं उपनिधि का और अनुपनिधि का उनमें से उपनिधि का स्थापनीय है उसका स्व- रूप फिर किया जायगा अपितु अनुपनिधि का दो प्रकार से कही गई है नैगम व्यवहार से और संग्रहनय से पुनः नैगम और व्यवहार नय के मतसे उसके ५ भेद हैं यावत् तीन समय की स्थिति वाला द्रव्य नुपूर्वी संज्ञक होता है इसीप्रकार असंख्यात समय की स्थिति वाले द्रव्य को भी जान लेनी चाहिये एक समय की स्थिति वाला अनानुपूर्वी होता है द्विसमय की स्थिति वाला अबक्रव्य संज्ञक होता है इन तीनों को बहुवचनान्त करने से आनुपूर्वी द्रव्य अनानुपूर्वी और अवक्नद्रव्य होते हैं, इस प्रकार जान लेने चाहिये यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अर्थपद की प्रतिपादनता है सो इसका प्रयोजन भंगों की समुत्कीर्तन करना है। भंगों की समुत्कीर्तनता जैसे पूर्वद्रव्यानु- पूर्वी में की गई है उसी प्रकार जान लेनी पद विंशति भंगों का स्वरूप वहांपर दिखलाया गया है और भंग समुत्कीर्तनता का मुख्य प्रयोजन.मंगोपदर्शनता है वहभी भाग्वत् है क्योंकि पूर्व इनका सविस्तर स्वरूप दिखलाया जाचुका है अपितु नैगम और व्यवहार के मत यावन्मात्र द्रव्य हैं वह स्व जाति में समवतार होते अन्यजातियों में नहीं जैसे कि आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी द्रव्यों में समावेश किए जाते हैं. अनानुपूर्वी और प्रवक्तव्य द्रव्यों में नहीं, इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये इसी का नाम समवतार द्वार * (११) * अनुयोगद्वार सूत्र * है अतः अनुगम द्वार प्राग्वत् नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है, विद्यमान अर्थाका प्रतिपादन यावत् अल्प.बहुत पर्यन्त जानना ॥ अव इनका सविस्तार स्वरूपं वर्णन किया जाता है। मूल-णेगमववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाइं कि अत्थिनत्यि नियमा अस्थि एवं दोनिवि ॥ पदार्थ-(णेगमववहाराणं आणुपुव्वी दबाई कि अस्थि नात्य नियमा अस्थि एवं दोनिवि ) (प्रश्न) नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों की अस्ति है किम्बा नास्ति है ( उत्तर ) नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्यों की निश्चय ही अस्ति है इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अव- क्तव्य द्रव्यों की भी अस्ति है ।। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मत से तीनों द्रव्यों की सदैव काल अस्ति है तीनों द्रव्य दोनों नयों के मत से सदैव काल विद्यमान रहते हैं । अथ द्रव्यों के प्रमाण विषय । मूल--(णेगम ववहाराणं प्राणुपुब्बीदव्वाइं कि संखे- ज्जाइं असंखेज्जाई अणंताई नो संखेज्जाइं असंखेज्जाइं नो अणंताई एवं दोन्निवि ऐगर्मववहाराणं प्राणुपुत्वीदव्वाई लोगस्स कि संखेज्जइभागे पुच्छा एगं दव्वं पड्डुच्च संखेज्जइ भागे वा होज्जा जाव देसूणे. लोए वा होज्जा नानादवाई पडुच्च नियमा सव्वलोए होज्जा एवं दोनिवि एवं फुसणावि ऐगमववहाराणं आणुपुचीदवाई कालो केवीचंर होइ एगं दव् पडुच्च जहन्नेणं तिनिसमयाउकोसेणं असंखेन्जं कालं नाना दवाइं पड्डुच्च सव्वद्धा ऐगमववहाराणं अणाणुपुव्वीदवाई कालो केवचिरं होइ एग दव्यं पडुच्च अजहन्नमणुकोसेणंएगं समयं नानादव्वाई पडुच्च नियमा सचद्धा अवचष्वगदव्वाणं पुच्छा एगं दव्वं पडुच्च अजहन्नमसुकोसेणं. दोसमगाई नाना - ( १११) * अनुयोगद्वार सूत्र * दबाई पडुच्च सव्वद्धाणेगमववहाराणं प्राणुपुत्वीदव्वाइं अंतर कालो केवचिरं होइ एगंदव्वं पडुच्च जहन्नेणं एगं समयं उकोसे- णं दोसमयानानादब्बाइंपडुच्च नत्थि अंतरं ऐगमववहाराणं श्रणाणु'वीदवाणं पुच्छा एगं दब्बं पडुच्च जहन्नेणं दोस- मया उकोसेणं असंखज्जं कालं नाना दवाई पडुच्च नत्थि अंतरं गमक्वहाराणं अवत्तव्वगदवाणं पुच्छा एगं दवं पडुच्च जहन्नेणं एग समयं उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं नाना दब्वाइं पड्डुच्च नत्थि अंतरं ऐगमववहाराणं आणुपुबीद- -ब्वाई सेसदब्वाणं कहभागे होज्जा पुच्छा जहेव खत्ताण पुब्बीय भावो वितहेव अप्पा वहुंपि तहेवनेयजंजावसेत्तं णेगम ववहाराणं अणोवणिहिया कालाणुपुव्वी पदार्थ-( णेगमववहाराणं आणुपुत्वीदवाई कि संखेज्जाई असंखेज्जाई अणंताई ) ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य क्या संख्णत द्रव्य हैं वा असंख्यात द्रव्य हैं तथा अनंत द्रव्य हैं (उत्तर) (नों संखेज्जाइं असैखेज्जाइं नो अणंताई ) संख्यात नहीं हैं असंख्यात हैं किन्तु अनंत भी नहीं है ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्य भी जान लेने चाहिये । (णेगमववहाराणं आणुपुब्बीदवाई लोगस्स किं संखे- ज्जइ भागे होज्जा पुच्छा ) (प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य लोक के संख्यात भाग में होते हैं वा असंख्यात भाग में अथवा बहुत से संख्यात असंख्यात भागों में होते हैं तथा सर्व लोक में ही होते हैं ( एगं दव्वं पडुच्च संखेज्जइ भागे होज्जा जाव देसूणे वा लोए होज्जा नानादब्बाई पहुच्च नियमा सबलोए होजा) (उत्तर) एक द्रव्य की अपेक्षा से लोक के संख्यात भाग में होजाता है असंख्यात भाग में भी होजाता है यावत् स्वल्प भाग को छोड़कर सर्वलोक में भी होजाता है अचित महास्कंधवत् अथवा केवली की समुद्घातवत् अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से निश्चय ही सर्व लोक में आनुपूर्वी द्रव्य होते हैं ( एवं दोनिवि ) इसी प्रकार अनानुपूर्वी और अवक्तव्य द्रव्यों के स्वरूप को भी जानना चाहिये ( एवं फुसणावि) इसी - २ (११२) * अनुयोगद्वार सूत्र * प्रकार स्पर्शना द्वार भी जान लेना चाहिये (गमववहाराणं आणुपुब्बीदव्वाई कालओ केवचिरं होइ ( प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य काल से कब तक रह सकता है अर्थात् स्थिति कितने चिर पर्यंत होसकती है (उत्तर) (एगं दव्वं पडुश्च जहन्नेणं तिन्निसमया उकोसेणं असंखेनं कालं नानादब्याई · पड्डुच्च सव्वद्धा ) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से. न्यून तोन समय की स्थिति है उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त एक द्रव्य रह सकता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से आनुपूर्वी द्रव्य - सई काल में रहते हैं । अथ अनानुपूर्वी विषय प्रश्न करते हैं । (णेगम ववहाराणं अणाणुपुची दवाई कालओ केवचिरं होइ (प्रश्न ) नैगम और व्यवहारनय के मतसे अनानुपूर्वी द्रव्य कबतक रह.सकता है ( उत्तर) ( एग दवं पडुच्च अजहन्नमणुकोसेणं एग समयं नाणादवाई पडुच नियमा सन्नद्धा) एक द्रव्य की अपेक्षा से न तो जघन्य काल है न उत्कृष्ट काल है केवल एक समय मात्र अनानुपूर्वी द्रव्य स्थिति करता है किन्तु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अनानुपूर्वी द्रव्य सदैव काल रहते हैं । अथ श्रवक्तव्य द्रव्य भी विषय निर्णय किया जाता (अवत्तब गदव्वाणं पुच्छा) (प्रश्न) नैगम और व्यवहारनय के मत से अवक्तव्य द्रव्य. कवतक रह सकता है ( उत्तर ) ( एगं दबं पडुच्च अजहन्न मणकोसेणं दोसमयाई नानादचाई पडुच्च सन्चद्धा ) एक द्रव्य की अपेक्षा से न तो जघन्य काल न उत्कृष्ट काल केवल दो समय की स्थिति होती है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अवक्तव्य द्रव्य सदैव काल- रहते, हैं। अथ अंतर काल विषय प्रश्न किये जाते हैं । ( णेगम ववहाराणं आणुपुचीदव्वाणं अंतरं कालओ केवचिरं होइ) (मन) नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य का काल से कितना.चिर अन्तर काल होता है ( उत्तर ) ( एर्ग दग्नं पडुच्च जहनेणं एगं समयं उक्कोसेणं दो समया नानादब्वाई पडुच्च नत्थि अंतरं) एक आनुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून एक समय का अंतर काल होता है क्योंकि सब से न्यून स्थिति अनानुपूर्वी द्रव्यों की है जब आनुपूर्वी द्रव्य आनुपूर्वी भाव को छोड़कर अना- नुपूर्वी में चलागया फिर वहां से आनुपूर्वी में आगया तब न्यून से न्यून एक समय का अंतर काल हुआ और यदि उत्कृष्ट अंतर काल होजावे तो दो समय मात्र में होता है क्योंकि अवक्तव्य द्रव्य की स्थिति दो समय की है सो प्रवक्तव्य ( ११३ ). * अनुयोगद्वार मंत्र * प्रध्य में जाकर फिर आनुपूर्वी में चला जाये तब उत्कृष्ट अंतर काल दो सगय प्रमाण हुआ; अपितु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल होता ही नहीं क्योंकि वे द्रव्य सदैव काल रहते हैं ॥ अअ अनानुपूर्वी द्रव्यों के अन्तर काल विषय प्रश्न किया जाता है (णेगम वेवहारांणं अणाणुपुच्ची दवाणं पुच्छा ) हे भगवन् ! नैगम और व्यवहार नय के मत से अनानुपूर्वी द्रव्यों का अन्तरकाल कितने चिर का होता है, गुरु कहते हैं भो शिष्य ! ( एगं दवं पडुच्च जहन्नेणं दो समया उक्कोसेणं असंखेनं कालं नाना दबाई पडुच्च नत्यि अंतरं ) एक अनानुपूर्वी द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून दो समय पर्यन्त अंतरकाल होता है जैसे कि अनानुपूर्वी द्रव्य अवक्तव्य द्रव्य में चलागया अतः अवक्तव्य द्रव्यों की स्थिति दो समय प्रमाण है सो वहां पर दो समय स्थिति पूर्ण करके फिर अनानुपूर्वी द्रव्य में आजाए तो न्यून से न्यून दो समय मात्र अंतरकाल हुआ यदि वह द्रव्य आनुपूर्वी में चला जाय तो उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अन्तरकाल होजाता है क्योंकि आनुपूर्वी द्रव्यों की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल प्रमाण है इसलिये उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात काल पर्यन्त होता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से अंतरकाल नहीं होता है क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्यों का सर्वथा कभी भी अभाव नहीं होता है इसलिये अंतरकाल भी नहीं है । अब अवक्तव्य द्रव्य के विषय में वर्णन किया जाता है (णेगमववहाराणं अवतव्वगदव्वाणं पुच्छा ) हे पूज्य ! नैगम, और व्यवहार नय के मत से अवक्तव्य द्रव्यों का अंतरकाल कितने चिरं पर्यन्त होता है गुरु कहते हैं भो शिष्य ! ( एंगं दवं पडुच्च जहन्नेणं एग समय उक्कोसेणं असंखेज्ज 'कालं नाना दवाई पडुच नत्यि अन्तरं ) एक अवलव्य द्रव्य की अपेक्षा से न्यून से न्यून अंतरकाल एक समय मात्र होता है क्योंकि अनानुपूर्वी द्रव्यों की स्थिति एक समय मात्र की है जब अवक्तव्यं द्रव्य अपने भाव को छोड़कर अनानुपूर्वी द्रव्य में चला गया और फिर वहां से अवक्तव्य द्रव्य के भाव को प्राप्त होगया तो न्यून से न्यून एक समय मात्र अंतरकालं हुआ यदि आनुपूर्वी में गया तो उत्कृष्ट असंख्यात काल प्रमाण अंतरकाल होजाता है अतः नाना प्रकार के प्रवक्तव्य द्रव्यों की अपेक्षा से अंतरकाल नहीं होता है क्योंकि इनका सर्वथा अभाव नहीं है अथ शेप द्रव्यों के कतिपय भाग में यह द्रव्य हैं इस विषय में वर्णन किया जाता है.( गमववहाराणं आणुपुचीदवाई सेसदव्याणं कइ- ( ११४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * भागे होज्जा पुच्छा ) हे भगवन् ! नैगम और व्यवहारनय के मत से आनुपूर्वी, द्रव्य शेप द्रव्यों के कतिपय भाग में होता है गुरु कहते हैं ( जहेब खताणुषु बीय भावो वितहेच अप्पाबहुपि तहेव नेयध्वं जान सेत्तं गमववहाराणं अणोव- णिहिया कालाणुपुब्बी ) जैसे क्षेत्रानुपूर्वी का भाव वर्णन किया गया है उसी प्रकार कालानुपूर्वी का भी भाव जान लेना चाहिये और उसी प्रकार अन्प वहुत्वद्वार भी जान लेना यही नैगम और व्यवहारनय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी है से शब्द अथ शब्द का वाची हैं इसीवास्त सूत्र में से शब्द पुनः २ ग्रहण किया गया है। भावार्थ-नैगम और व्यवहार नय के मतसे तीनों द्रव्य असंख्यात हैं और तीनों द्रव्य लोक के संख्यात भाग में वा असंख्यात भाग में वा देशून सर्व लोक में हो सकते हैं अतः तीनों द्रव्य नाना प्रकार के द्रव्यों अपेक्षा से सदैव काल विद्यमान रहते हैं इसी प्रकार स्पर्शनाद्वार जान लेना । नैगम और व्यवहार नय के मत से आनुपूर्वी द्रव्य जघन्य काल तीन समय उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त रहता है अपितु नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से यह द्रव्य सदैवं काल रहते हैं तथा उक्त दोनों नयों के मतसे एक अनानुपूर्वी द्रव्य एक समय मात्र रहता है नाना प्रकार के द्रव्यों की अपेक्षा से सदैव काल रहते हैं और अवक्तव्य द्रव्य की स्थिति दो समय मात्र है. नाना प्रकार के अवक्तव्य द्रव्य सदैव काल रहते हैं और नैगम व्यवहार नय के मत से एक आनुपूर्वी द्रव्य का जघन्य से एक समय प्रमाण उत्कृष्ट दो समय मात्र अंतर काल होता है, किन्तु नाना प्रकार के आनुपूर्वी द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल नहीं होता है. और अनानुपूर्वी द्रव्य का जघन्य दो समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात काल का अंतर काल हो जाता है किन्तु नाना प्रकार के अनानुपूर्वी द्रव्यों का अंतर काल नहीं होता है क्योंकि वे सदैव काल रहते हैं नैगम और व्यवहार नयके मत से एक प्रवक्तव्य द्रव्य का जघन्य से एक समय प्रमाण उत्कृष्ट असंख्यात काल पर्यन्त अंतर काल है अपितु अनेक अवक्तव्य द्रव्यों की अपेक्षा से अंतर काल, नहीं होता है सो अंतर काल का तात्पर्य इतना ही है कि-अपनी जाति . को छोडकर पर जाति में प्रवेश करना फिर स्वजाति में आजाना तो उसको, अंतर काल कहते हैं यह वर्णन उक्त दोनों नयों के.मत से किया गया है और यह तीनों द्रव्य परस्पर द्रव्यों के कतिपय भागों में होते हैं इस विषय में.. - ।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (११५ ) से क्षेत्रानुपूर्वी में कथन किया गया है उसी प्रकार जान लेना चाहिये वैसेही प्रल्प बहुत्व द्वार का.भी समास जान लेना । यह नैगम और व्यवहार नयके उत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी वर्णन की गई है अब संग्रहनय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी का विवर्ण किया जाता है । अथ संग्रह नय विषय । सेकिंतं संग्गहस्स अणोवणिहिया कालाणुपुव्वी पंचवि- हा पं० तं० अट्ठपयपरूवणया एवमाइ जहेब खेत्ताणुपुब्बी संग्गहस्स तहा कालाणुपुब्वी एविभाणियब्बाइं नवरं लिइ अभिलावे जाव सेत्तं अणोवणिहिया कालाणपुवी ॥ पदार्थ-( सेकिंतं संग्गहस्स अगोवणिहिया कालाणुपुव्वी २ पंचविहा पं. तं० ) हे पूज्य ! संग्रह नय के मत से वर्णन की हुई अनुपनिधि का कालानुपूर्वी कौनसी है. गुरु कहते हैं कि-संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी पांच प्रकार से प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-(अठपयपरूवणया एवमाइजहेव खेवाणुपुच्ची संग्गहस्स तहेव कालाणुपुब्बी एविभाणियवाई ) जैसे कि-अर्थ पद प्रतिपादनता १ भंगसमुत्कीर्तनता २ भंगोपदर्शनता ३ समवतार ४ और अनुगम ५ और शेष विवर्ण जैसे क्षेत्रानुपूर्वी का कथन किया गया है उसी प्रकार कालानुपूर्वी का भी समास जान लेना चाहिये ( नवरं लिइअभिलावे जाव सेच अणोवणिहिया कालाणुपुच्ची) किन्तु इतना विशेष है कि स्थिति बोधक सूत्र कहना चाहिये सो इसी का नाम अनुपनिधि का कालानुपूर्वी कहते हैं । . भावार्थ-संग्रह नय के मत से अनुपनिधि का कालानुपूर्वी पांच प्रकार से वर्णन कीगई है शेष विवर्ण जैसे पूर्व क्षेत्रानुपूर्वी का विवर्ण किया गया है उसी प्रकार कालानुपूर्वी का विवेचन जान लेना चाहिये अपितु यहां पर स्थिति का अभिलापक ग्रहण करो सो इसी का नाम अनुपनिधि का कालानुपूर्वी कहते हैं अब इस के पश्चात् उपनिधि का कालानुपूर्वी का वर्णन किया जाता है ।। अथ उपनिधिका कालानुपूर्वी विषय । सेकिंतं उवणिहिया कालाणुपुब्बी २ तिविहा पण्णत्तै 1 -- (११६) * अनुयोगद्वार सूत्र * तंजहा पुव्वाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्बी अणाणुपुव्वी सेकिंतं पुन्या- णुपुब्बी समय १ प्रावलिया २ प्राणा पाणु ३. थोवे ४ लवे ५ मुहुत्ते६अहोरचे ७ पक्खे ८मासे ६ उऊ १० अथणे ११ संवच्छरे १२ जुगे १३ वाससए १४ वाससहस्से १५ वाससंय सहस्से १६ पुब्बंगे १७ पुब्वे १८ तुडियंगे १६ तुडिय २० अङ्- डांगे २१ अडडे २२ अववंगे २३ अववे २४ हुहुअंगे २५ हुहु- ए २६ उप्पलंगे २७ उप्पले २८ पउमंगे २६ पउमे ३० एलिणंगे ३१ पलिणे ३२ अथिणिऊरंगे ३३ अस्थिणिउरे ३४ अजु- यंगे ३५ अजुए ३६ नउअंगे ३७ नउय ३८ पउअंगे ३६ पउए ४० चूलिअंगे ४१ चूलिया ४२ सीसपहोलअंगे ४३ सीसपहे- लिए ४४ पलिउवमे ४५. सागरोवममे ४६ अोसप्पिणि ४७ उस्सप्पिणि ४८ पोग्गलपरियट्टे ४६ तीतद्धा ५० प्रणागयद्धा ५१ सब्बद्धा ५२ सेतं पुवायुपुब्बी सकिंतं पच्छाणुपुब्बी सव्व द्धा जाव समय सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकिंतं अणाणुपुब्वी एयाए व एगाइयाए एगुत्तरियाए श्रेणंतगच्छगयाए सेढीए अन्नमन्न भासो दुरूवूणो सेत्तं. अणाणुपुब्बी अहवा उवणिहिया का- लाणुपुब्वी २ तिविहा पं० त० पुवाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्वी २ अणाणपुब्बी सेकिंतं पुब्वाणुपुब्बी २ एग समयहितीए जाव असंखेज्ज समयहिइए सत्तं पुब्वाणुपुवी सेकिंतं पच्छागुपुब्बी २ असंखज्ज समयछिइय जाव एगसमयहिड्य सेत्तं पच्छाणु- पुवी सेकिंतं प्रणाणुपुब्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुतरि- याए असंखेज्म गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नन्भासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुची सेत्तं उवणिहिया कालाणुपुवी सेत्तं का लाणुपुती ।।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (११७ ) पदार्थ-(सेकित उवाणिहिया कालाणु पुछी २ तिविहा पं० २० पुवाणु पुन्नी पच्छाणपुच्ची अणाणुपुव्वी) हे भगवन् ! उपनिधि का कालानापूर्वी कितने प्रकार से विवर्ण की गई है । ऐसे शिष्य के पूछने पर गुरु कहते हैं भो- शिष्य ! उपनिधि का कालानुपूर्वी तीनों प्रकार से कथन की गई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी (सेकिंत पुवायु पुब्धी २) (प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) उपनिधि का कालानुपूर्वी उसका नाम है जो उपनाम समीप का है कालानुपूर्वी नाम कालानुक्रमता का है सोजो काल को समीप किया जाय वही उपनिधि का कालानुपूर्वी कही. जाती है उस की पूर्वानुपूर्वी निम्न प्रकार से है ( समय १) सर्वसे सूक्ष्म जिस के द्विभाग न हो उसे समय कहते है वही काल की गणना का आदिभूत है इसलिये प्रथम समय कथन किया गया है फिर ( आवलिया २) असंख्यात समयों के काल को आवलिका कहते हैं (आणु पाणु ३) संख्यात आवलिकाओं का एकसा घोछ्वास होता है उसी को एक प्राण कहते है ( थोवे ४ ) सोत माणों का एक थोत्र (स्तोक ) होता है ( लवे ५) सात स्तोकों का एक लव होता है ( मुहु- ते ६ ) और ७७ लवों का एक मुहूर्त ( दोघटिका) होता है (अहोरत्ते७) तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र होता है ( पक्खे ८) १५ पंचदश अरोरात्रों का एक पंक्ष होता है (मासे )२ पक्षों का एक मास होता है ( उऊ १० ) दो मासों की एक ऋतु होती है (अयणे ११ ) और तीन ऋतुओं की एक अयण होती है ( सम्बत्सरे १२) दो अयणों का एक सम्वत्सर ( वर्ष) होता है (युगे) पांच सम्बत्सरों का एक युग होता है और ( वाससए १४ ) वीस युगों के १०० वर्ष होते हैं (वाससहस्से १५) दश शत एकत्र करने पर एक सहस्र होता है (वाससयसहस्से १६) एक शतं सहस्र वर्प एकत्व होने पर एक लक्ष वर्ष होता है (पुवंगे १७ ) चौराशी ८४ लक्ष वर्षों का एक पूर्वाङ्ग होता है (पुच्चे १८) और ८४ लाख पूर्वाङ्गों का एक पूर्व होता है अर्थात् पूर्वाग को चौरासी लाख गुणा करने से एक पूर्व होता है एक पूर्व के सत्तर लाख करोड़ और छप्पन सहस्र करोड़ वर्ष होते हैं तथा अंकों को भी देख लीजिये ७०५६०००००००००० और (तुडियंगे १६ ) और एक पूर्व को ८४ लाख गुणा करने से एक त्रुटि- तांग होता है और (तुडिए २० ) और त्रुटितांग को चोराशी लाख गुणा फरने एक त्रुटित होता है ( अडडांगे २१ ) चोराशी लाख त्रुटितों का एक १११८) * अनुयोगदार सूत्र * अटटांग होता है इसी प्रकार आगे सर्व को चोराशी लाख गुणा करते चले जाना ( अडड २२) चोराशी लाख अटटांगों का एक अटट होता है (भव. चंगे २३ ) चोराशी लाख अटट को गुणा करने से एक अववंग होता है (अवचे २४ ) और उसको चोराशी लाख गुणा करने से एक अवव होता है (हु, हुँ अंगे २५ ) अक्व को चौराशी लाख गुणा करने से एक हुतांग होता है (हु हुए २६ ) और हुहुतांग को चोराशी लक्ष गुणा करने से एक हुहुक होता है (उप्पलंगे २७ ) चोरासी लत हुहुक को गुणा करने से एक उत्पलांग होता है ( उप्पले २८) उत्पलांग को ८४ लक्ष गुणा करने से एक उत्पल होता है (पउमंगे २६ ) उक्त को ८४ लक्ष गुणा करने से एक पद्मांग होता है इसी प्रकार आगे भी समझ लेना किंतु पिछले से अगला चौरासी लाख गुणा करते जाना (पउमे ३० ) पद्म ( णलिणंगे ३१) नलिनांग (णलिण ३२) नलिन ( अत्थिणि उरे ३३ ) अर्थिनि पूरांग (अत्थिणिपुरे ३४ ) अर्थिनी पूर ( अजुयंगे ३५) अयुतांग (अजुय ३६ ) अयुत (नउअंगे ३७ ) नियुतांग. और (नउय ३८) नियुत (पउमंगे ३९) और प्रयुतांग (पउय ४०) प्रयुत (चूलिअंगे ४१) चूलिकांग और (चूलिया ४२ ) चूलिका (सीस पहेलि अंगे ४३) शीर्ष प्रहेलिकांग और (सीस पहेलिय ४४ ) शीर्ष प्रहलिका यह सर्व पिछले अंकों से अगला अंक चौराशी लाख गुणा किया जाता है तत्र शीर्ष प्रहेलिका के सर्व अंक इतने हुए, ७५०२६३२०, ३०७.२०१०२४११ ५७६७३५६६६७५६६४०, ६२१८६६६८४८०८०३२६६ इनों से आगे.१४० चाली केवल विन्दु लिखे जावे तब १६४ अंकों पर्यन्त संख्या शब्द व्यवहृत होता है अर्थात् गणना १६४ वे अक्षरों पर्यन्त है आगे उपमा से काम लिया जाता है जिसका विवर्ण क्षेत्र प्रमाण के विषय में किया जायगा (पलिउवमे ४५) पल्योपम प्रमाण और ( सागरोवमे.४६ ) सागरोपम प्रमाण ( उसाप्पिणि ४७) उत्सर्पिणी काल (उस्सप्पिणिक ४८) अवसर्पिणी काल (पोग्गले परियढे ४६ ) दश कोटाकोटि सागरोपम से एक अवसर्पिणी काल होता है और दश कोटाकोटि सागरोपम प्रमाण एक उत्सर्पिणी काल अपितु अनन्त उत्सार्पिणी और अवसर्पिणियों के एकत्रित करने से एक पुद्गल परावर्तन होता है..( तीतद्धा ५० ) अनन्त पुद्गल परावर्तनों का भूतकाल है.और (अणागयद्धा ५१.) तावत्प्रमाण भविष्यत् काल है ( सम्बद्धा ५२ ) दोनों के मिलने से सर्व .. * अनुयोगद्वार सूत्र * ( ११६ काल होता है ( सत्वं पुवाणुपुची) सो इसको पूर्वानुपूर्वी कहते हैं (सेकिंतं 'पच्छाणुपुची सनद्धा जाव समय सेत्तं पच्छाणुपुच्ची) हे भगवन् ! पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं भो शिष्य! सर्व काल से लेकर यावत् एक समय पर्यंत जो गणना कीजाती है उसी को पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं ( सेकिंतं अशाणु- पुची २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए अणन्त गच्छ गयाए सेढीए अन्नं मन्नभासो दुख्खूणो सेत्तं श्रणाणुपुच्ची ) शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! अनानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! यह जो पूर्वानुपूर्वी की गणना है इसको एक से वृद्धि करते हुए अनन्त गच्छ रूप श्रेणिय जब होजाएं तब परस्पर गुणा करने से यावन्मात्र भंग वनते हैं उनमें से आदि और अंत के भंग के.न्यून करने से शेष रहे हुए भंगों को अनानुपूर्वी कहते हैं । यही अनानुपूर्वी का विवर्ण है । अब सूत्रकार अन्य प्रकार से भी इनका विवर्ण करते हैं जैसे कि-(अहवा उत्रणिहिया कालाणुपुची तिविहा पं० २० पुवाणुपुची पच्छागुपुब्बी आणाणुपुबी) अथवा उपनिधि का कालानुपूर्वी तीनों प्रकार से विवर्ण की गई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ इस प्रकार के गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे पूज्य (सेकितं पुन्वाणुपुबी २ एगसमयहितीए जाव असंखेज समयहिइए सेचं पुंज्वाणुपुत्री) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! पूर्वानुपूर्वी उसे कहते हैं जो द्रव्य काल से एक समय की स्थिति वाला है यावत् असंख्यात समयों की स्थिति वाला है इस प्रकार की अनुक्रमता पूर्वक गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं और यही पूर्वानुपूर्वी है (सेवितं पच्छासुपुची र असंखेजसमयहिइए जाच एग समयहिइय सेत्तं पच्छाणुपुन्बी )(अन) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो पूर्वानुपूर्वी की गणना हैं उससे विपरीत गणना करना उसी का नाम पश्चात् प्रानुपूर्वी है जैसे कि-असंख्यात सपयों की स्थिति वाले द्रव्य से लेकर एक समय की स्थिति पर्यन्त जो द्रव्य हैं उन्हें पश्चात् भानुपूर्वी कहते हैं और यही पश्चात् भानुपूर्वी है ( सर्कितं अणाणुपुब्बी २ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए असंखेज्जगच्छेगयाए सेढीए अन्नमभासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुची सेत्तं उपणिहिया कालाणुपुब्बी से कालाणुपुबी) (प्रश्न-) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन एक समय से जो लेकर भी संख्षात समयों पर्यन्त स्थिति वाले द्रव्य हैं उनकी असंख्यात गच्छरूप श्रेणी. - (१२०) * अनुयोगद्वारे सूत्र * जा की जाये तब उनको परस्पर गुणा करने से योवन्मात्र भंग बनते हैं उनमें से आदि अन्त के रूप को छोड़कर शेष अंक अनानुपूर्वी के माने जाते हैं इस लिये अनानुपूर्वी गत उपनिधि का कालानुपूर्वी का व्याख्यान किया गया और इसी को कालानुपूर्वी कहते हैं अपितु समानता से तीनों का विवर्ण सम्पूर्ण . होगया.। भाषार्थ-उपनिधि का कालानु पूर्वी तीनों प्रकारों से विवर्ण की गई है। जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ अतः कालसे पूर्वानु- पूर्वी निम्न प्रकारसे है जैसे कि-ओ विभाग से रहित और सबसे सूक्ष्म हो, उसे समय कहते हैं सो काल से गणना जो की जाती है उसकी प्रादि में प्रथम समय ही ग्रहण किया जाता है अपितु असंख्यात संमयों के प्रमाण एक आवलिका होती है संख्यात श्रावलिकार्यों का एक प्राण होता है सात प्राणों का थोव ( स्वोक) और सातो थोवों का एक लॅब, ७७ लवों का. मुहूर्त, ३० मुहूतौ की दिन रात्रि होती है १५ दिनों का एक पक्ष, २ पक्षों का मास, २ मासों का ऋतु ३ ऋतुओं की अयण २ अयणों का सम्बत्सर ५ सम्बत्सरों का युग, २० युगों का शतवर्ष १० शतवर्ष का एक सहस, १०० सहस्त्र का एक लक्ष ८४ लेतवर्षों का एक पूर्वाग होता है और पूर्वाग को चौरासी लाख गुणा करने से एक पूर्व होता है इसी प्रकार शीर्षमहेलिका पर्यन्त चौरासी लाख गुणा करते जाना सो यहांसक गणित का विषय है उनके १६४ अक्षर बन जाते हैं इनसे आगे पन्योषम वा सागरोपम से काम लिया जाता, है यह सर्व ५२ अंकों की पूर्वानुपूर्वी है इनका विवर्ण पदार्थ में किया गया है और इन्हीं को उल्था गणन करने पश्चात् आनुपूर्वी बन जाती है अपितु ५२ अक्षरों को परस्पर गुणा करने से फिर आदि और अंत के रूप को छोड़ कर शेष जो भंग हैं उनको अनानुपूर्वी कहते हैं अथवा एक समय से लेकर योक्त् असंख्यात समयों पर्यन्त पूर्वानुपूर्वी होती है इसको उल्था करन से पश्चात आनुपूर्वी बन जाती है जैसे कि असंख्यात समय से लेकर यावद एक समय पर्यंत अनानुपूर्वी है जो असंख्यात रूप श्रोणि को परस्पर गुण करने से जो भंग बनते है उसके आदि और अंत के भंगों को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी का नाम उपनिधि का कालानुपूर्वी है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( १२१ ) अथ उत्कीर्तन पूर्वानुपूर्वी विषय । सेकिंतं उकित्तणाणुगुब्बी रतिविहा पन्नते तंजहा पुव्वा- गुपुची पच्छाणुपुत्वी अणाणुपुवी सेकिंतं पुवायुपुची उसभे १ अजिय २ संभवे ३ अभिणंदणे ४ सुमई ५ पउमप्पहे ६ सुपासे ७ चंद्रप्पहे ८ सुविहे ६ सीमले १० सेज्जसे ११ वा सुपुज्जे १२ विमले १३ अणते १४ धम्मे १५ संति १६ कुंथु १७ अरे १८ मल्ली १६ मुनिसुब्बए २० एमी २१ अरिष्टनेमी २२ पासे २३ वद्धमाणे २४ सेपुव्वाणुपुव्वी सेकिंतं पच्छाणुपुवीर वमाणे जाव उसभे सेत्तं पच्छाणुपुब्बी सेकितं अंणाणपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए चउब्बीसगच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नन्भासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुब्बी सेत्तं उक्कितणाणुपुब्बी॥ पदार्थ-(सेकिंतं उक्किचणाणुपुब्बी २ तिविहा पन्नत्तेतंजहा पुन्वाणुपुची पच्छाणुपुब्बी अणाणुपुब्बी ) ( प्रश्न ) उत्कीर्तनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर) उत्कीर्तनानुपूर्वी भी तीनों प्रकार से विवर्ण की गई है जैसे कि-पूर्वानुपूर्वी १ पथात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ ( सेकितं पुवाणुपुची २) (प्रश्न) पूर्वानु- पूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) पूर्वानुपूर्वी उसका नाम है जो अनुक्रमतापूर्वक गणन किया जावे जैसे कि-( उसमे ) ऋषभदेव १ (अजिय) अजितनाथ २ (संभवे ) शंभवनाथ ३ (अभिणंदणे ) अभिनंदननाथ ४ (सुमई ) सुमति- नाथ ५ (पउमप्पहेसुपासे चंद्रप्पहे ) पद्मप्रभु ६ सुपार्श्वनाथ ७ चंद्रप्रभु ८ (सु. विहे सीयलेसेज्ज सेवासुपुज्जे) सुविधिनाथ : शीतलनाथ १० श्रेयांसनाथ ११ वासुपूज्य स्वामी १२ (विमले अणंते धम्मसंति) विमलनाथ १३ अनंतनाथ १४ धर्मनाथ १५ शान्तिनाथ १६ कुंथुनाथ १७ अरनाथ १८ मल्लिनाथ १६ मुनिसु- व्रतस्वामी २० (णमीअरिहनेमि पासंबदमाणे ) नमिनाथ २१ अरिष्टनेमि २' १ ट्रेनषा प्रा० या..पा. १सू. २. दाम्दे रेफस्प वा लग भवति ।
(१२२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पार्श्वनाथ २३ वर्द्धमानस्वामी २४ (सेत्तं पुव्वाणुषुब्बी ) अथ यही पूर्वानुपूर्वी है अर्थात् अनुक्रमता पूर्वक यह गणना है.( सेकिंतं पच्छाणुपुन्वी २) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर ) पश्चात् आनुपूर्वी उसे कहते हैं जो वर्द्धमानस्वामी से लेकर ऋषभदेव पर्यन्त गणना की जाए उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है ( सेकिंतं अणाणुपुच्ची एयाए चे च एगाइयाइ एगुत्तरियाए घ उच्चीसगच्छगयाएसेटिए अन्नमन्नन्मासो दुरूवुणो सेतं अणाणुपुची सेत्तं कि- तणाणुपुची)(प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं (उत्तर ) अनानुपूर्वी उसका नाम है जो इनको एक २ की वृद्धि करते हुए चतुर्विशति अंकों पर्यन्त गच्छ- रूप श्रेणि की जाए जैसे कि-१-२-३-४-५-६-७-८-8-१०-११-१२-- १३-१४-१५-१६-१७-१८-१९-२०-२१-२२-२३-२४ फिर इनको प- रस्पर गुणा करना जैसे कि-१ को द्विगुण २ को त्रिगुण ६ फिर चतुर्गुण करने पर २४ इनको पांच गुणा करने से १२० फिर इन्हीं को ६ गुणा करने से ७२०, ७२० को ७ गुणा करने से ५०४० यावत् २७१४४६१७५७५८२६२३- ५४७२०९०० इसी प्रकार २४ अंक पर्यन्त परस्पर गुणा करके आदि और अंत के भंग को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है ।। और यही उत्कीर्तनानुपूर्वी है ।। भावार्थ-उत्कीर्तनानुपूर्वी के प्राग्वत् तीनों भेद हैं किन्तु अनानुपूर्वी में २४ चतुर्विंशति तीर्थकरों को चतुर्विशति अंकों को परस्पर गुणा करने से यावन्मात्र भंग वनते हैं उनमें से आदि और अन्त के भंगो को वजके शेष भंग अनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी का नाम अनानुपूर्वी है और इसे ही उत्कीर्तनानुपूर्वी कहते हैं । अथ गणनानुपूर्वी विषय । सकिंतं गणणाणुपुव्वी २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुवी पच्छाणुपुब्वी प्रणाणपुब्बी मेकिंतं पुन्वी एगो दस सयं सहस्स दससहस्साई लक्खं दसलक्खं कोडि दसकोडिनो कोडिसयाई सेत्तं पुब्वाणुपुबी सेकिंतं पच्छाणुपुवी २ दसकोडिसयाई जाव एको सेत्तं पच्छाणुपुब्बी मेकिंतं अणाणपुब्बी एयाए चेव . * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १२३ ) एगादियाए एगुत्तरियाए दसकोडि सयाई गच्छगया सेढीए अन्नमन्नब्भासो दुरूपूणो सेत्तं अणाणुपुवी सेत्तं गणणागु- पुवी ॥ पदार्थ-( सेकिंत गणणाणुपुची २ तिविहा पं० २० पुजाणुपुवी पच्छा- णुपुची अणाणुपुची ) (प्रश्न ) गणनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) गणना- नुपूर्वी उसका नाम है जो गणना कीजाती है वह तीन प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अणाणुपूर्वी ३ (सेकिंतं पुवाणुपुची) (प्रश्न ) पूर्वानुपूर्वी किस प्रकार से वर्णन कीगई है ( उत्तर ) जैसे ( एगोदस सयसहस्स दससहस्साई लख दसलक्खं कोडि ) एक-दश १० शत १०० सहन १००० दशसहल १०.०० लक्ष १००००० दशलक्ष १०००००० कोटि १००००००० (दसकोडिओ कोडिसयं दसकोडिसयाई सेत्तं गणणाणु- पुच्ची ) दश कोटि १०००००००० इस प्रकार सौ करोड़ सहन करोड़ इत्यादि प्रकार से गणनानुपूर्वी होता है ( सेकिंतं पच्छाणुपुच्ची दसकोडिसयाई जाव एको सेत्तं पच्छाशुपुची ) (प्रश्न ) पश्चात् भानुपूर्वी किस प्रकार है ( उत्तर) जो दश करोड़ से आरम्भ होकर एक पर्यन्त गगना कीजाये उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है (सेकित अणाणुपुष्वी २ एयाए चेव एगादियाए एगुत्तरि- याए दस कांडिसयाई गच्छगया सेढीए अन्नमनभासो दुरूवृणो से अणाणु- पुची से गणणाणुपुच्ची ) ( प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो आनुपूर्वी गत गणना है उनको एक से लेकर दश सहस्र कोटि प्रमाण गच्छरूप श्रेणि कोजावे फिर उनको परस्पर अभ्यास करके गुणा किया जावे यावत् प्र- माण भंग बने उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेष रूप अनानु- पूर्वी के ही होते हैं । भावार्थ-गणनानुपूर्वी भी प्राग्वत् तीनों प्रकार से वर्णित है किन्तु एक से लेकर दश सहस्र कोटि पर्यन्त गणना की संख्या वनताई गई है अनुक्रमतापू. र्वक गणना को पूर्वानुपूर्वी होते हैं । ठीक उसके विपरीत गणना का नाम पश्चात् आनुपूर्वी है । इनको हरस्पर गुणा करके जो भंग होते हैं उनमें से आदि और अन्त के भंग को छोड़कर शेष भंग अनानुपूर्वी के ही होते हैं सो इसी का नाम गणनानुपूर्वी है।
(१२४) * अनुयोगद्वारे सूत्र * अथ संस्थानानुपूर्वी विषय । सेकिंतं संडाणाणुपुब्बी २ तिविहा पं० त० पुवाणुपुब्बी पच्छाणुपुब्बी अणाणुपुब्बी सेकिंतं घुब्बाणुपुब्बी २ समचउरंसे नग्गाहपरिमंडले साइ वामणेक्खुज्जे डंडे सेत्तं पुवाणुपुवी सेकिंतं पच्छाणुपुवी २ हुंडे जाच सामचउरंसे सेत्तं पच्छा- णुपुची सेकिंतं अणाणुपुब्बी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरि- याए छगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो सेत्तंभ- पाणुपुब्बी सेत्तं सड्डाणाणुपुब्बी ॥ पदार्थ-(सेकिंता संहाणाणुपुबी २ तिविहा पं० त० पुवायुपुची पच्छा- णुपुब्बी अणाणुपुब्बी) (प्रश्न ) संस्थानानुपूर्वी कितने प्रकार से विवर्ण कीगई हैं (उत्तर) तीनों प्रकार से है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी ३ अनानुपूर्वी ३ यह तीन प्रकार (सेकिंत पुन्वाणुपुच्ची २ समचरंसो नग्गोहपरि मण्डले साइ वामणेक्खुन्नु हुँहे से पुवाणुपची) (प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किस प्रकार से है (उत्तर) षट् प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि-समचतुरंश संस्थान उसे कहते हैं जिसके शरीर के सर्व अंगोपांग पूर्ण हों और परियंक आसन में (जानु और स्कंधों की विषयता न होवे ) न्यग्रोध परिमंडल उसका नाम है जिसका शरीर नाभि से उपरिभाग में प्रमाण- युक्त हो जैसे वट वृक्ष होता है २ सादि संस्थान उसका नाम है जिसके शरीर के अंगोपांग नाभि के नीचले भाग के सुंदर हो, ३ वामन संस्थान उसे कहते हैं जिसका हृदय पृष्टि भाग और उदर को छोड़कर शेष अंग हीन हो अर्थात् प्रमाण पूर्वक न होवें ४ कुञ्ज संस्थान वह होता है जिसका हृदय पृष्टिभाग और उदर यह सर्वथा लक्षण रहित होवे और शेष अंग सुंदर होवें ५ जो सर्व प्रकार के शुभ लक्षणों से वर्जित होता है और अंगोपांग भी सम नहीं है अपितु अद- शनीय हैं उसीको हुंड संस्थान कहते हैं सो इन षट् प्रकार के संस्थानों को अनुक्रमतापूर्वक गणना करना उसी का नाम पूर्वानुपूर्वी है ( सेकिंतं पच्छाणु- पुच्ची २ हुई नाव सम चउरसे सेत्तं पच्छाणुषुब्बी ) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी * अनुयोगद्वार सूत्र * (१२५) किस प्रकार से होती है ( उत्तर ) जो अनुक्रमपूर्वक गणना न की जावे वही पश्चात् भानुपूर्वी है जैसे कि-हुंड संस्थान यावत् सम चतुरंश संस्थान इसीका नाम पश्चात् आनुपूर्वी है-( सेकिंतं अणाणुपुच्ची २) एयाए चेव एगादियाए एगुत्तरियाएं छगच्छगयाए सेढीए अन्नपन्नमासो दुरूणो सेचं अणाणुपुन्नी सेत्तं संहाणाणुपुव्वी) (प्रश्न ) अमानुपूर्वी की व्याख्या किस प्रकार से वर्णन की गई है ( उत्तर ) जैसे इन षट् गच्छरूपों की श्रेणी की जावे १-२-३-४- ५-६ तब इनको परस्पर गुणा करके यावन्मात्र भंग बनें उनमें से आदि और अंत के रूप को न्यून करके शेषरूप अनानुपूर्वी के होते हैं और इसी का नाम अनानुपूर्वी है अत: इसी स्थानों पर संस्थानानुपूर्वी का समास हो गया है ।। भावार्थ-संस्थानानुपूर्वी भी प्राग्वत् है किन्तु स्थानों के षट् भेद हैं जैसे कि समचतुरंश संस्थान १ न्यग्रोध परिमंडल संस्थान २ सादि संस्थान ३ वामन संस्थान ४ कुन्न संस्थान ५ हुंड संस्थान ६ अनुक्रमता से गणना करने का माम पूर्वानुपूर्वी है उल्था गणन करना उस पश्चात् आनुपूर्वी कहते हैं २ षद् रूपों का परस्पर अभ्यास करके रूप बनाने फिर उनमें से भादि और अंत के रूप को छोड़ देना उसे अनानुपूर्वी कहते हैं ।। अथ समाचारी प्रानुपूर्वी विषणः । सेकिंतं समयारी आणुपुब्बी २ तिविहा पं० त० पुब्वाणु पुन्वी पच्छाणुपुव्वी अणागुपुब्बी सेकिंतं पुव्वाणुपुब्बी २ इच्छामिच्छातहक्कारो आवस्सियाए निस्सिहियाए पापुच्छ- णा य पडिपुच्छणा य छंदणा निमंत्तणा उवसंपया य काले समा- यारी भवे दसविडा उ १ सेत्तं पुव्वाणुपुब्बी सेकिंतं पच्छापुब्बीर उपसंपया जाव इच्छा सेत्तं पच्छागुपुवी सेकित प्रणाणुपुब्बी एयाएचव एगाइयाए एंगुत्तरियाए दसगच्छगयाए सेढीए १.७३. भंग होते हैं।
( १२६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * अन्नमन्नम्भासो दुरूवूणो सेत्तं प्रणाणुपुब्बी सेत्तं समायारी आणुपुवी ॥ पदार्थ-( सेक्षितं समायारी आणुपुब्बी २ तिविहा पं० तं० पुवाणुपुब्बी पच्छाणुपुची अणाणुपुव्वी) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! समाचारी भानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरुने उत्तर दिया कि भो! शिष्य ! समाचार्यानुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन कीगई है जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी २ अना- नुपूर्वी ३ इस प्रकार गुरु के वचन सुनकर शिष्य ने फिर शंका की कि हे भग- वन् ( सेकिंतं पुव्वाणुपुची २) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं गुरु कहते हैं पूर्वानु पूर्वी निम्नलिखितानुसार है ॥ (इच्छामिच्छा तहकारो) साधुओं को दश प्रकार समाचारी होती हैं जैसे कि जो शिष्य ने काम करना हो तो पहिले गुरुसे इस प्रकार कहे कि हे भगवन् ! यदि आपकी इच्छा हो तो अमुक काम करूं इसे प्रथम समाचारी कहते हैं १ द्वितीय समाचारी यह है जो भूल होने पर (मिच्छा- मि दुक्कडं ) इस प्रकार कहा जाता है यथा "मैं अपनी भूल पर पश्चाताप करता हूं २ तृतीय समाचारी गुरु के वचन (तहत्ति ) तथा इति कह कर श्रवण करे ३ ( आवस्सियाय निसीहिया आपुच्छणायपडिपुच्छणा ) चतुर्थी समाचारी उसे कहते हैं कि जब साधु उपाश्रय से अन्यत्र कही जाने लगे तब (आवस्सहीर)- मैं आवश्यक कार्य के लिये जाता हूं-ऐसे शब्द उच्चारण करे ४ पांचवीं समा- चारी जब उपाश्रय में प्रवेश करे तब "निस्सहि" २ ऐसे कहे ५ और छठी समाचारी में जो कार्य करने होवें तो गुरु पूछकर करे ६ सप्तम समाचारी में यदि किसी अन्य मुनि ने कहा कि हे भगवन् ! कि आप मेरा अमुक कार्य करदें तब भी गुरु को पूछ ले कि यदि आपकी आज्ञा हो तो अमुक मुनिका अमुक कार्य कर, इसे सप्तम समाचारी कहते हैं (छंदणा निमत्तणाओवसंप- याय काले समायारी भवेदसविहाओ) जो अन्न पानी आदि है उनका सम विभाग करना और ऐसे कहना हे पूज्य ! मुझपर अनुग्रह करो-इसे अष्टम समाचारी कहते हैं ८ । नवमी आमंत्रण समाचारी होती है-जैसे कि पास वस्तु होने पर अथवा भविष्यकाल में किसी प्रकार से आमन्त्रण करना इसे निमंत्रण समाचारी कहते हैं ६ दशम समाचारी उसका नाम है जो श्रुताध्ययन के वास्ते किसी अन्य मुनिवर के पास स्थिति करना और उसे कहना कि, मैं आपको से !
- * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १२७) हूँ इत्यादि शब्दों को उपसंपदा समाचारी कहते हैं सो यह दश प्रकार की समा- चारी होती है (सेच पुव्वाणुपुवी ) और इनकी अनुक्रमता पूर्वक गणना क. रने को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं । अब प्रश्न, पश्चात् भानुपूर्वी के विषय में किया जाता है (सेंकिंतं पच्छाणुपुव्वी २ उपसंपया जाव इच्छा सेत्तं पच्छाणुपुबी) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं (उचर ) जो उपसंपदा से लेकर इच्छाकार पर्यन्त गणन किया जाता है उसे पश्चात् 'श्रा नुपूर्वी कहते हैं (सेकिंतं प्रणाणुपुब्बी २ एयाए चेवा एगाइयाए एगुत्तीरयाएं दसगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो से अणाणुपुवी ) ( प्रश्न) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन दश अकों को १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ६, १०, दश गच्छरूप श्रेणी करके फिर एक की एक के साथ द्धि करते हुए और परस्पर अभ्यास से गुणा करके यावन्मात्र रूप हों (नोट- ३६२८८००) फिर उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेष रूप अनानुपूर्वी के होते हैं और इसे ही अनानुपूर्वी कहते हैं ( सेत्तं समायारीपाणु- पुन्बी) अथ शब्द मंगलवाची है यही समाचारी आनुपूर्वी है अपितु इसको ही समाचारी आनुपूर्वी कहते हैं । भावार्थ-समाचारी आनुपूर्वी तीनों प्रकार से वर्णन की गई है पूर्वानुपूर्वी? पश्चात् आनुपूर्वी २ अनानुपूर्वी ३ अपितु आनुपूर्वी में जो दश समाचारियों के नाम हैं वह श्री उत्तराध्ययन सूत्र के २६ वें अध्याय के अनुकूल नहीं है क्यों- कि अर्थों में तो एकत्वता है किन्तु गणनानुसार एकता नहीं है इसलिये उत्त- राध्ययनजी से उक्त नाम भावार्थ में दिये जाते हैं किसी आवश्यक काम के लिये जब जाना पड़े तब (श्रावस्सहि २) ऐसे कहना चाहिये १ और जब उपाश्रय में प्रवेश करे तव निस्सहि २ ऐसे कहे क्योंकि यह शब्द क्रिया का निषेध का- रक है २ यदि कोई काम अपना करना होवे तब गुरुजी से पूछे कि हे भगवन् ! मैं अमुक कार्य करूं ! ३ यदि अन्य मुनिवर का काम करना होवे तव भी गुरूजी को पूछ के करे ४ और जो अपने पास वस्तु होवे उसकी अन्य मुनि- वरों को निमंत्रणा करे । और अन्य मुनिवरों को उपदेश करे यदि आपकी इच्छा हो तो अमुक कार्य करो ६ किसी प्रकार भी भूल होने पर (मिच्छामि दुक्कडं ) ऐसे कहे ७ गुरु के वचनों को तहित्ति करके सुने - और गुरु की (१२८) * अनुयोगद्वार सूत्र * भक्ति करे । श्रुताध्ययन के वास्ते अन्य के समीप रहे १०॥ इसे आनुपूर्वी कहते हैं । और इन्हीं को उल्था गणन करने को पश्चात् भानुपूर्वी कहते हैं अपितु जो दश अंक हैं उनको परस्पर गुणा करने से ३६ लव २८ हजार ८०० अंक बनते हैं उनमें से आदि और अंत के रूप को छोड़कर शेषरूप मनानुपूर्वी के होते हैं सो इसी को समाचारी आनुपूर्वी कहते हैं अब सूत्रकार भावानुपूर्वी का स्वरूप वर्णन करते हैं जिसके द्वारा भावों का भी बोध होजाए।। अथ भावानुपूर्वी विषय ॥ सेकिंतं भावाणुपुब्बी २ तिविहा पं० त० पुब्वाणुपुवी पच्छाणुपुब्वी अणाणपुब्बी सेकिंतं पुब्वाणुपुब्वी २ उदहए उपसमिय खईय खोवसमिए पारिणामिए सन्निवाइए सेतं पुब्बागुपुब्बी सेकिंत पच्छाणुपुब्बी २ सन्निवाइए जाव उदइय- सेत्तं पच्छाणुपुब्वी सेकिंतं अणाणुपुची २ एयाए चेव एगा- इयाए एगुत्तरियाए छगच्छगयाए सेढीए अन्नमनभासों दुरूवूणो सेत्तं पणाणुपुब्बी सेत्तं भावाणुपुब्वी सेत्तं आणुपुब्बी- ति पयं सम्मत्तं ॥१॥ पदार्थ-(सेकिंतं भावाणुपुब्बी २ तिनिहा पं० २० पुव्वाणुपुची पच्छा: पुन्धी प्रणाणुपुची ) (प्रश्न ) भावानुपूर्वी कितने प्रकार से वर्णन कीगई है (उत्तर ) तीनों प्रकार से जैसे कि पूर्वानुपूर्वी १ पश्चात् आनुपूर्वी अनानुपूर्वी (सेकितं पुन्वाणुपुची र उदइय उपसमिएखईए खओवसमिए पारिणामिए स- निवाइय सेनं पुन्वाणुकुची ) प्रश्न) पूर्वानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उसर) पूर्वानुपूर्वी षद् मकार से वर्णन कीगई है जैसे कि-उदयिक भाव १ उपशमि कभाव २ क्षायिक भाव ३ क्षयोपशमिक भाव ४ पारिणामिक भाव ५ सनि पातिक भाव ६ इनका सविस्तर स्वरूप आगे लिखा जाएगा इसलिये यहां पर इनका अर्थ नहीं लिखा है इस प्रकार इन भावों की गणना को पूर्वानुपूर्वी कहते हैं ( सेकितं पच्छाणुपुची २ सनिवाइय जाव उदइय सेत्तं पच्छाणुपुत्री) * अनुयोगद्वार सूत्र * (१२६) (प्रश्न) पश्चात् आनुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) जो सन्निपात से लेकर उदयिक भाव-पर्यन्त गणना कीजावे उसी का नाम पश्चात् आनुपूर्वी हैं (सेकित्तं अणाणुपुब्बी-२ एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए छगच्छगयाए. सेढीए अन्नमनभासो दुरूवूणो सेत्तं अणाणुपुच्ची सेत्तं भावाणुपुच्ची से आणुपुन्ची तिपयं सम्म ) (प्रश्न ) अनानुपूर्वी किसे कहते हैं ( उत्तर ) इन षट् अंकों को एक से लेकर १-२-३-४-५-६ एक एक की वृद्धि करते हुए जब घट् गच्छरूप श्रेणी होजाए तब परस्पर अभ्यास से गुणा करे जिसके ७२० रूप होते हैं उनमें से आदि और अन्त के रूप. को छोड़कर शेष रूप अनानुपूर्वी के होते हैं यही अनानुपूर्वी है और इसी स्थानोपरि भावानापूर्वी का समास सम्पूर्ण होगया है। अथ शब्द मंगलवाची भी है इसलिये इस समास के अंत में दिया गया है और आनुपूर्वी पद की भी यहां पर समाप्ति है ।। इति श्री अनुयोग द्वार शास्त्र में हिन्दी भाषा टीका रूप भानुपूर्वी पद समाप्त हुआ। भावार्थ-पट् प्रकार के भावों को तीनों प्रानुपूर्वी आदि हैं जिनका सम्पूर्ण स्वरूप तो आगे लिखा जायगा किन्तु अनुक्रमता पूर्वक नामोत्कीर्तन यहां पर किया गया है सब भावों का आधार भूत प्रथम उदयिक भाव है 'फिर उपशम भाव है जिसका स्वरूप स्वल्प है क्षायिक भाव का उपशम से विशेष स्वरूप है अपितु क्षयोपशम का उससे भी विस्तारपूर्वक वर्णन है पारिणामिक भाव का क्षयोपशम भाव से विशेष कथन है सन्निपात का तो महान् स्वरूप है इस प्रकार से इनकी अनुक्रमता बांधी गई है पूर्वानुपूर्वी पश्चात् आनुपूर्वी प्राग्वत् हैं किन्तु अनानुपूर्वी के ७२० रूप बनते हैं जिन में दो रूप. आदि और अन्त के न्यून करने से ७१८ रूप अनानुपूर्वी के होते हैं इसी का नाम अनानुपूर्वी है और भावानुपूर्वी भी इसी का नाम है अतः भानुपूर्वी पद की समाप्ति भी इसी स्थान पर होगई है इसके अनन्तर उपक्रम के द्वितीय भेद की व्याख्या कीजाती है। श्रथ नाम विषय। . मूल-सेकिंतं नामे नामे दसविहे पंगणचे तंजहा एग (१३०) * अनुयोगदार सूत्र* नामे २ दुनामे २ तिनामे ३ चउनामे ४ पंचनामे ५ छानामे ६ सत्तनामे ७ अनामे ८ नवनामे दसनामे १० सेकिंतं एगनामे नामाणि जाणि काणिय दवाण गुणाण पज्जवाणं च तेसिं या- गमणिहसे नामति परूविया सन्ना १ सेत्तं एगनामे सेकिंतं दु- नामे दुविहे पण्णत्त तंजहा एक्खरिए १ अणेगक्खरिएय सेकिंतं एगक्खरिए १ अणेगविहे पं० २० हीः श्री धी स्त्री सेकिंतं ए- गक्खरिए सेकिंतं अणेगक्खरिय २ अणेगविहे पराणचे तंजहा कन्ना वीणा लता माला सेत्तं अणेगक्खरिए अहवा दुनाम दु- विहे पं० तं० जीवनामे य अजीवनामे य सेकिंतं जीवनामे २ अणेगविहे पं० त० देवदत्ते जगणदत्ते विण्हुदत्ते सोमदत्ते सेत्तं जीवनामे सेकिंतं अजीवनामे २ अणेगविहे पं० २० घडो पडो कडो रहो सेत्तं अजीवनामे ॥ २ ॥ पदार्थ सेकितं नाये नामे दसविहे पएणत्ते तंजहा एगनामे दुनामे २ ति- नामे चउनामे पंचनामे छनामे संत्तनामे अहनामे नवनामे दसनामे ) शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! नाम किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि-भो. शिष्य ! नाम उसका नाम है जिसके द्वारा वस्तुओं के स्वरूप का पूर्ण बोध हो सो उस नाम के दश भेद विवर्ण किये गये हैं जैस कि-जो ज्ञानादि गुण का प्रकाशक हो उसका नाम एक नाम है जिसके द्वारा दो पदार्थों का बोध हो उसे द्विनाम कहते हैं २ जिसके द्वारा तीन पदार्थों का ज्ञान हो उसको त्रि- नाम कहते हैं ३ जो चार प्रकार से वस्तुओं का स्वरूप विवर्ण किया जाय वह चार नाम है ४ जो पांच प्रकार से पदार्थों का विवर्ण किया जाय वे पांच नाम हैं जिससे पट प्रकार से वस्तुओं का स्वरूप वर्णन किया जावं वही षट् नाम है ६ जिससे सात प्रकार से वस्तु निरूपण की जावे वही सप्त नाम है जिसके अष्टभेद वर्णन किये जावे उसीका नाम अष्ट नाम है ८ नव प्रकार से द्रव्यादि ! १ नोटानिकप पाटिक चिकुरेह, एएकस्य होभवति ।। .
* अनुयोगद्दार सूत्र * ( १३१) पदार्थों को कहा जाए वही नव नाम हैं । दश प्रकार से जो पदार्थ वर्णन किये जा उन्हीं का नाम दश नाम हैं १० ॥ गुरु के इस प्रकार के वचन सुनकर शिष्य ने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ( सेकितं एगनामे २ नामाणि जाणि काणिय दव्याण गुणाण पज्जवाणं चत्तासें आग मणिहसे नामति परूविया- सन्ना १) एक नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है गुरु कहने लगे कि भी शिष्य ! एक नाम इस प्रकार से है जैसे कि-(नामाणि ) नाम अभिधान (जाणि) यावन्मात्र उनमें से ( काणिय ) कितनेक एक नाम जैसे कि-द्रव्यों के (जीव जंतु आत्मा प्राणीसत्व) नाम जीव द्रव्य के अनेक नाम हैं उसी प्रकार आकाश द्रव्य के नाम हैं नमः आकाशमम्बरं इत्यादि यह द्रव्यों के नाम हैं औरगुणनाम जैसे ज्ञानादि गुण हैं ज्ञान निवोध आत्मा इत्यादि तथा रूप, रस, गंध, स्पर्श यह भी अजीव गुण हैं और पर्यायनाम नरकतिर्यक् मनुष्यदेव इन भावों को माप्त होना उसे पर्याय नाम कहते हैं तथा एक गुण कृष्ण इत्यादि यह भी पर्यायवाची नाम हैं इत्यादि यह सर्व द्रव्य १ गुण २ पर्याय ३ च पुनः (वेसिं) उन सबको आगमरूपी निकप के (कसौटी) विषय नाम पदरूप संज्ञा मति- पादन कीगई हैं अथवा यह नाम पद आगम में कसौटी तुल्य है इसके द्वारा सर्व पदार्थों का बोध यथावत् होजाता है तथा द्रव्य १ गुण २ पर्याय ३ यह तीनों आगमरूपी कसौटी में यथावत् सिद्ध होचुके हैं जो संसार भर में वस्तु चे सर्व समान प्रकार से एक.नाम से भाषण कीजाती है सर्व द्रव्यों के एकार्थ- वाची अनेक नाम होते हैं किन्तु वह एक नाम में ही गर्भित होजाते हैं तथा जैसे कसौटी (परीक्षणप्रस्तर) के द्वारा सुवर्णादि पदार्थों की परीक्षा कीजाती हैं उसी प्रकार ज्ञानरूपी कसौटी में जीवाजीव पदार्थ जो सुवर्णादि के तुल्य उनकी परीक्षा कीजाती है तथा नामपद कसौटी तुन्य है (सेत्तं एगनामे ) सो वही एक नाम है जो अनेक नाम होने पर भी एक ही अर्थ में रहते हैं । इस कथन से जिज्ञासुओं को कोप की आवश्यकता है क्योंकि-एक २ वस्तु के अनेक नाम कोपों में लिखे गए हैं। सो आगमरूपी कसौटी में नामरूपी संज्ञा कथन कीगई है यही संज्ञा एक नाम है ।। अब शिष्य द्विनाम के निणय के लिये पृच्छा करता है कि (सेकित दु. नामे २ दुविहे पं० २० एगक्खरिए अणेगाक्खरिएय) (प्रश्न ) द्विनाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) द्विनाम- दो प्रकार से प्रतिपादन किया है * अनुयोगद्वार सूत्र * गया है. जैसे कि-एकाक्षरिक नाम और अनेकाक्षरिक नाम-शिष्य ने फिर शंका की कि हे भगवन् ! (सेकित एगवखरिए २ अणेगबिहे पएणते तंजहा है। श्री: धीः स्त्री सेत्तं एगक्खरियं ) एकाक्षरिक नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है ।। गुरु ने समाधान किया कि हे शिष्य ! एकाक्षरिक नाम उसे कहते हैं नि- सके उच्चारण में एक ही अक्षर हो तथा जिसके उच्चारण में अनेक अक्षरों की प्राप्ति हो उसका नाम अनेकाक्षरिक है किन्तु एकाक्षरिक नाम के सूत्र ने चार उदाहरण दिये हैं जैसे कि-ही श्री धी स्त्री-यही एकाक्षरिक नाम हैं क्योंकि इनका उचारण रूप एक ही अक्षर है ( सेकिंतं अणेगक्खरिय. २ अणेगविहे पं० त० कन्ना वीणा लता माला सेत्तं अणेगक्खरिएं) (प्रश्न ) अनेकाक्षरिक नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) वह भी अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि कन्या वीणा लता माला, यह सर्व अनेकाक्षरिक नाम हैं क्योंकि मा- कृत भाषा में द्विवचन के स्थानों पर बहुवचन दिया जाता है इसीलिये द्विशब्द के स्थानोंपरि अनेक शब्द ग्रहण किया गया है इस प्रकार गुरु शिष्य का समाधान करके फिर शिष्य को कहने लगे कि हे अंते वासिन् । (अहवा दुनाम दुविहे पं० तं० ) अथवा द्विनाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया है जैसे कि-( जीवनामेय) जीवनाम ( अजीवनामेय ) और अजीनाम च समुच्च- थार्थ में है शिष्यने फिर पूछा (सेकिंतं जीवनामे २) कि हे भगवन् ! जीव नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है गुरु ने उत्तर दिया कि (अणेगवविहे पं० त०) भो शिष्य ! जीन नाम अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- (देवदत्ते जगणदत्ते विएहुदत्ते सोमदत्ते से जीवनामे ) देवदत्त शब्द इसी प्रकार यज्ञदत्त, विष्णुदत्त, सोमदत्त, यही जीव संज्ञक नाम हैं ( सेकिंतं अजी- चनामे २)(प्रश्न ) अजीव नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) अनीव नाम (अ. णेगविहे पं० त०) अनेक विधि से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि-(घडो पडो कडो रहो) घट, पट, कट, रथ (सेत्तं अजीवनामे यही अजीव नाम है क्योंकि-घटपटादि अजीव पदार्थ हैं इसलिये इनको अजीव नाम से लिखा गया है। भावार्थ-नामपद दस प्रकार से वर्णन किया गया है जो पदार्थ हैं उनको विभागों में करके जिज्ञासुओं के सुखाव बोध वास्ते नाम दिखलाया गया है क्योंकि- गारन्मात्र संसार में द्रव्य है उनमें से कितनेक द्रव्य गुण पर्यायों ३ * अनुयोगद्वार मूत्र * ( १३३ ) के अनेक नाम एकार्थी होते हैं जैसे कि जीव चतन आत्मा जंतु सत्त्व इत्यादि यह सर्व अनेक नाम एकार्थी हैं इसी प्रकार गुणों के नाम और पयार्यों के नाम भी समझने चाहिये सो आगमरूपी सुवर्ण की परीक्षा के विषय यह नाम पद- रूप.संज्ञा कसौटीरूप से प्रतिपादन कीगई है इसके द्वारा द्रव्य गुण पर्यायों का भलीभांति सो बोध होजाता है सो इसी का नाम एकनाम है और द्विनाम भी द्विभकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-एकाक्षरिक और अनेकातरिक-एका- तरिक उसका नाम हैं जैसे कि "ड्रीः श्री धीः स्त्री" ये शब्द एकाक्षरिक हैं इससे यह सिद्ध होता है कि प्राकृत भाषा में किसी अनुकरण के विषय में इन संस्कृत शब्दों का प्रयोग हो सकता है क्योंकि प्राकृत के व्याकरण में इनकी सिद्धि इस प्रकार से कीगई है यथा- श्री, ड्री-कृत्स्न क्रियादिष्ट्यास्वित् ॥ प्रा. व्या० अ०८ पा २ सू० १०४॥ ई, श्री-ड्री इत्यादि शब्दों के संयुक्त अन्त व्यञ्जन के पूर्व इकार का आगम होजाता है तब निम्नलिखित सर्व रूप हुए अरिहइसिरी-हिरी-कसियो-किरिया-दिहिया-इस प्रकार रूप सिद्धि होनेपर सिरी (श्री१ *) और हिरी इस प्रकार के रूप घने और स्त्री शब्द प्राकृत भाषा में ऐसे बनता है जैसे कि स्त्री शन्द इस प्रकार से स्थित है तव सर्वत्र लय राम चन्द्रे प्रा. व्या० अ०८ पा २ सूत्र ७८ ॥ चन्द्र शब्दादन्यत्र लवरा सर्वत्र संयुक्तस्योचमधश्च स्थितानां लुग् भवति । इस सूत्र से रकार का लोप होजाता है तब रेफ का लोप होने पर ती ऐसे शब्द बना फिर-स्तस्यथो समस्तस्तम्बे ॥ प्रा० व्या० अ०८ पा २ सू०४५ ॥ समस्त स्तंव वर्जितेस्तस्ययो भवति । इस शब्द से स्ती शन्द के स्त को थी ऐसे रूप बन गया फिर अनादौ शेषा दशयोर्वृित्वम् । सूत्र ८६ इम सूत्र से थी के थकार के दो रूप हुए तव थ्यी ऐसे रूप वना फिर द्वितीयतुर्ययो रुपरि पूर्वः । सू. ६० • इस सूत्र से प्रथम प्रकार के स्थानोपरि तकार होगया तव त्थी इस प्रकार से प्राकृत भाषा में रूप सिद्ध हुआ तथा स्त्रिया इत्थी मुं० १३० इस सूत्र से स्त्री शब्द को विकल्प से इत्थी ऐसे भी आदेश हो * किव्वचि प्रछिअिनुष्टुपुज्ना दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च, उणादिवृत्तौ द्वितीयपा- दस्य ५७ सूत्रम् ।। अनेनसूत्रेण श्रिब् सेवायाम् धातुत्वान् श्रीरूपं सिद्धं भवति ।
- ( १३४) * भनुयोगदार मूत्र * जाता है सो मूल में अनुकरण अर्थ में स्त्री * शब्द ग्रहण किया गया है तथा सूत्र प्रमाण होने पर उक्त प्रयोग सर्वदा आचरणीय है इनी को एकापरिक नाम से लिखा गया है और द्विवचन के स्थान में प्राकृत भाषा में बहुवचन दिया जाता है इसलिये अनेकाक्षरिक नाम कन्या वीणा लतामाला इत्यादि प्रयोग ग्रहण किये गये हैं तथा दिनाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया ई-जैसे कि-जीवनाम और अजीवनाम--जीवनाम के उदाहरण यह हैं-पया देवदत्त यज्ञदत्त (नज्ञोणः ) इस सूत्र से प्राकृत भाषा में ज को णकार हुआ और आदि यकार को जकार होनाता है फिर "अनादि शेषादशयोदित" इस मूत्र से णकार द्वित्व होगया तब जण्णदत्त ऐसे रूप बन गया और विष्णुदत्त को । सूक्ष्म पूनष्ण-नहहृदणं राहः । इस सूत्र से विराहुदच वन गया और सोमदत्तादि यह सर्व जीव संज्ञक नाम हैं अजीव संज्ञक नाम निम्न प्रकार से हैं यथा-घटः पटः कटः रथः यह शब्द प्राकृत में घडो पढो कडो रहो इस प्रकार से लिखे गये हैं क्योंकि-(टोडः ) इस सूत्र से प्राकृत में टकार को डकार हो जाता है तब नड भड घड पड यह शब्द सिद्ध होते हैं (प्रतः से?:) इस सूत्र से प्रथमान्त होजाते हैं क्योंकि सिवि भक्ति के स्थान में डोकार का आदेश होकर पडो घडो इत्यादि रूप सिद्ध होते हैं किन्तु रय शब्द को रहो ।। "ख, घ, थ, घ भाम्" इस सूत्र से यकार को इकार होगया तब रही ऐसे प्रथमान्त शब्द सिद्ध हुआ सो यह सर्व अजीव शब्द के नाम है अतः इस प्रकार से द्विं प्रकार नाम पद की प्रतिपादनता की गई है -इस के द्वारा जो जो द्वि प्रकार के द्रव्य हैं उन सभों का ज्ञान भली भांति से हो सकता इसी कारण से सूत्रकार अब अन्य प्रकार से द्विनाम वर्णन करते हैं ।। पुनः दिनाम विषय ॥ अहवा दुनामे नवविहे पएणत्ते तंजहा .विसेसिएय १ । * स्त्यायतेईर ।। उणादि वृत्तौ चतुथैपादस्य १६५ सूत्रम् ।। स्त्पैशब्द संघा- तयोः ।। अस्मात् ड्रट् । डिस्वान् टिलोप: टितातडीम् । वलिलोप: । त्रीस्तन केरा- वती ॥ इति रूपं सिद्धं । तथा चे स्यतेस्त्यायते स्तृणातेस्तनोतेर्वा । औणादिक सूत्रेण अट् प्रत्ययो धातोच सकारा देशो निपात्यत । टित्वान्डी { तृणाति व परंच दोष- साच्चादयतीति स्त्री। ।
* अनुपोगद्वार सूत्र * (१३५) अवसेसिएय २ ॥ १॥ विसेसियं दव्वं विससियं जीवदव्वं च मजीवदध्वं च २ प्रविसेसियं जीपदव्वं च विसेसियं नेरइड- तिक्ख जाणि उमणुस्सो देवो ३ अविसेसिउनेर इउविसेसि- उरय एप्पभाए सकरप्पभाए वा लुप्पभाए पंकप्पभाए धूमप्प- भाए. तमाए तमतमाए ४ अविसेसिये रयणप्पभाए पुढवीने- रइए विससिए पज्जत्तए अपज्जत्तए ५ एवं जाव अविसेसिउ तमतमा पुढविनेरइउ विसेसिउ तमतमा पुढविनरेइउ पज्जत्ता- पज्जत्तउ ११ अविसेसिए तिरिक्ख जाणिएविसेसिए एर्गि- दिय बेइंदिए तेइंदिए चउरिदिए पदिए १२ अविसेसिए एगिंधिए विससिए पुढविकाइए आउकाइए तेऊकाइय वाऊ- काइय वणस्सइकाइय १३ अविसेसिए पुढविकाइए विसेसिए. सुहम पुढविकाइय वादर पुढविकाइय ११ अविसेसिए सुहुम पुढविकाइए विसेसिए पज्जत्तए सुहुम पुढविकाइए अपज्ज- तए सुहुम पुढविकाइय १५ । अविसेसिए वादर पुढविकाइय विसेसिए पज्जत्तए वादर पुढविकाइय १६ अविसेसियं एवं भाउकाइय १६ तेऊकाइय २२ वाउकाइय २५ वराणस्सइका- इय २८ अविसेसिए अपज्जत्तभेदेहि भाणियब्वा अवसेसियं बेइंदिय विसेसियं पज्जतउय अपज्जचउय २६ एवं तेइंदिए ३० चउरिदिय ३१॥ पदार्थ-(अहवा दुनामे दुविह पन्नाचे तंजडा विसेसिएय १ अबसेसिएयं २) गुरु शिष्य को द्विनाम अन्य प्रकार से भी दिखलाते हैं इसीलिये सूत्र में यह पद है अथवा द्विनाम द्वि प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-- एक विशेष नाम दूसरा विशेष नाम सो सर्व पदार्थ वि प्रकार से हैं इसी कारण से सूत्र- (१३६) * अनुयोगद्वार सूत्र * कार ने इनका सविस्तर वर्णन किया है । अविशेष नाम का यह अर्थ है कि- जो नाम सर्व स्थानोंमें गर्भित होजावे, विशेष नाम उसे कहते है जो केवल उसी द्रव्य का बोधक होवे--जो निम्नलिखितानुसार उदाहरण हैं ।। १ ।। ( अविसे. सियंदव्वं विसेसियं जीवदवं च अजीवदवं च.) अविशेष नाम साधारण रूप से द्रव्य का पोधक है क्योंकि यह शब्द जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य दोनों में व्यवहत होता है इसीलिये अविशेष नोम में द्रव्य शब्द ग्रहण किया गया है भौर विशेष शब्द में जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य हैं २ और इसी प्रकार आगे भी सम्भावना करलेनी चाहिये जैसे कि-(अविससिय जीवदन्वं विससिय नेरइउतिरिक्ख जोणिउ मगुस्सा देवो २) अविशेषक जीवद्रव्य है विशेषक इसी जीव के भेद हैं जैसे कि-नारकीय १ तिर्यग्गेनिक २ मनुष्य ३ और देव ॥ ४ ॥३॥ इसी प्रकार भागे हैं जैसे कि (अविससिय मेरइय ) अवि. शेषक नाम नारकीय है और (विससिए ) विशेषक नाम में नरकों के भेद हैं यथा-( रयणप्पभाए ) रत्नप्रभा च पुनर् अर्थ में है ( सकरप्पभाए.) श- करप्रभा (वालुप्पभाए ) चालुप्रभा (पंकप्पभाए) पंकप्रभा (धूमप्पभाए) धूमप्रभा ( तपप्पभाए) तमप्रभा (तमतमाप्पभाए.) तमतमानभा ७ यह सर्व नरकों के गोत्र विशेषक नाम में है ४॥ फिर (अबसीसए) अविशेषक . ( रयणप्पभाए पुढपी नेरइय.) रत्नप्रभा के नारकीय (विसेसिए ) विशेषक उसके भेद (पज्जचाएय ) पर्याप्त और (अपज्जत्तए) अपर्याप्त हैं ५ ( एवं जाव अविसेसिए तमत्तमा पुढवि नेरइय) इसी प्रकार सर्व नरकों का स्वरूप जानना चाहिये यावत् अविशेषक तमतमापृथ्वी के नारकीय और (विसेसिय- पज्जत्तएय अपज्जत्तएय ११) विशेषक नाम में पर्याप्त और अपर्याप्त भेद जानने चाहिये ११॥ अब तिर्यक योनि के विषय में वर्णन करते हैं जैसे कि- (अविसेसिए ) अविशेषक नाम में (तिरिक्खजोणिए ) तिर्यक् योनिक जीव है और (विसेसिए) विशेषक नाम में. ( - एगिदिए बेइंदिएत्तेइंदिए चउरिदिए पंचेन्द्रिये १२), एकेन्द्रिय जीव हैं इसी प्रकार द्विइन्द्रिय जीव हैं, त्रिइन्द्रिय * अनुयोगद्वार सूत्र (१३७) चतुरिद्रिय और पंचिंद्रिय जीव हैं १२ और फिर ( अविसमिए ) अविशेषक नाम में एकेन्द्रिय पद है और (विसेसिए) विशेषक पद में (पुढविकाइए आउकाइय तेउकाइय वाइय वणस्सइकाइए- १३) पांच स्थावर हैं जैसेकि पृथ्वीकायिक जीव इसी प्रकार अप्कायिक जीव २ अनिकायिक ३ वायु कायिक ४ वन- स्पति कायिक ५ फिर ( अविसेसिए ) अविशेषक नाम में ( पुढविकाइए) पृथ्वीकायिक हैं और ( विसेसिइय ) विशेषक पंद में ( सुहुमधुढविकाइय वादर पुढविकाइय) सूक्ष्म पृथ्वीकायिक और वादर (स्थूल ) पृथ्वीकायिक हैं १४ फिर (अविसेसिए सुहुमपुढविफाइए ) अविशेषक नाम में पृथ्वीकायिक सूक्ष्म जीव हैं और (विसेसिए पजचए सुहुमपुढविकाइए) विशेषक नाम में पर्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक और (अपज्जचए सुहुमपुढविकाइय १५) अप- र्याप्त सूक्ष्म पृथ्वीकायिक हैं (अविसेसिय वादर पुढविकाइय) अविशेषक में वादर पृथ्वीकायिक हैं और ( विसेसिए पज्जत्तए वादर पुढविकाइय) विशे- षक नाम में पर्याप्त वादर पृथ्वीकायिक है १६ (अविसेसिए ) अविशेषक पद में ( एवं पाउकाइय) इसी प्रकार अपकाय के भी भेद जानने चाहिये जैसे कि-प्रथम भेद अविशेषक का होता है दूसरा भेद विशेषक होता है सो पृथ्वी कायवत् अपकाय के भी सूक्ष्म चादर पर्याप्त और अपर्याप्त भेद जानने चाहिये १६ (तेउ) चार भेद तेजस्काय के २२ (वाउ) चार ही वायुकाय के २५ (वणस्सइ २८) चार ही भंग वनस्पति के हैं (अविसेसिए अपज्जत भेदेहि ( भाणियब्वा ) इस सूत्र का सम्बन्ध पूर्व सूत्र के साथ है अविशेषक नाम पद में अपर्याप्तादि भेद पूर्ववत् जानने चाहिये ।। अब द्विइन्द्रिय आदि जीवों के विषय में वर्णन किया जाता है ।। (अविससिउ वेइंदिड) अविशेषक नाम में द्विइन्द्रिय जीव हैं और (विस- सिड ) विशेपक नाम में द्विन्द्रिय जीवों के ( पज्जत्तय अपज्जत्तउय ) पास और अपर्याप्त भेद हैं २६ (एवंते इंद्रिय ३० चरिंद्रिय ३१) इसी प्रकार निरि- द्रिय और चतुरिंद्रिय जीवों के भेद भी जानने चाहिये अव पंचेंद्रियं के विषय में विवर्ण किया जाता है ।। भावार्थ-द्वि नाम अन्य प्रकार से भी वर्णन किया गया है जैसे कि विशे- पंक नाम और अविशेषक नाम २ अविशेषक नाम से समान पदार्थों का बोध होता है विशेषक नाम से उनके भेदों का भी ज्ञान हो जाता है जैसे कि अवि- ~ (१३८) * 'अनुयोगद्वार सूत्र * शेषक नाम में द्रव्य शब्द ग्रहण किया है किन्तु विशेषक नाम में उसी के भेदों, का विवर्ण है यथा जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य-इस प्रकार आगे भी समझना चाहिये अविशेषक पद में जीव द्रव्य है विशेषक पद में चार गति रूप जीवों के भेद हैं फिर नरक गति अविशेषक पद है-सात उन के भेद विशेषक पद में ग्रहण किये गये हैं फिर रत्नप्रभा अविशेषक शब्द है पर्याप्त और अपर्याप्त उसके , भेद विशेषक पद में लिये गये हैं इसी प्रकार सातों नरकों के स्वरूप को जानना चाहिये . फिर अविशेषक शब्द में तिर्यग्योनि है विशेषक पद में एकेन्द्रिय से लेकर पंचेंद्रिय पर्यन्त जीव हैं और विशेषक पद में पृथ्वीकायिक जीव हैं विशेषक पद में सूक्ष्म वादर उन जीवों के भेद हैं इसी प्रकार पर्याप्त और अप- यति यह भी भेद जान लेने चाहिये जैसे कि पृथ्वी के चार भेद विवर्ण किये गये हैं उसी प्रकार अपकाय, 'अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय इन के भेद भी जान लो अपितु द्विइन्द्रिय जीवों के पर्याप्त और अपर्याप्त इस प्रकार के द्विद्धि भेद हैं जिस प्रकार द्विइन्द्रिय जीवों के भेद हैं तद्वत् त्रिरिंद्रिय चतुरिंद्रय जीवों के भेद भी जान लेने चाहिये यहां-तक-३१ सूत्र हुए हैं इसके अनंतर पंचेंद्रिय जीवों के भेदों का विवर्ण किया जाता है जिस के अविशेषक विशेषक पूर्ववद भेद हैं। ॥अथ पंचेद्रियादि जीवों के विषय ।। अवसेसिएपंचेंदिएतिरिक्खजोणिय विसेसिय जलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिय थलयरपंचेंद्रियतिरिक्ख जोणिय खयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ३२ . अविसेसिए जलयर पंचेंदिय, तिरिक्ख जोणिय. विसेसिय समुच्छिय जलयर पंचेंदियतिरिक्खजोणिय गम्भ वकंतियजलयरपंचेंदियति- रिक्खजोणिय: ३३ अविसेसिय · समुच्छिमजलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणियए विसेसिय पज्जत्तएसमुच्छिमजलयर पंचेदियतिरिक्खजोणिय अपज्जत्तएसमुच्छिमजलयर, पंचें- दिएतिरिक्खजोणियए. ३४ अविसेसिए गम्भ वतिय -- * अनुयोगदार मूत्र* जलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिय पंज्जत्तएय गम्भ वतियजलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोषिए य अपज्जत्तए गम्भ वकंतियजलयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए ३५ अवि- सेसिए थलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए चउप्पएं थलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए उरपरिसप्पथलय पंचेंदिए तिरिक्खजोणिए य ३६ अविसेसिए चउप्पएथलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोषिए विसेसिए समुच्छिमचउप्पएथलयरपंचेंदिय तिरिक्खजोणिए गम्भ वकंतियचउप्पयथलयरपंचेंदियतिरि- क्खजोणिएय ३७ अविसेसिए समुच्छिमचउप्पएथलयरपं- दिएतिरिक्खजोणिए य विसेसिए पज्जत्तयसमुच्छिम चउप्पयथलयरपंचेंदियतिरिक्खजोषिए य अपज्जत्तए समु- च्छिमत्रउप्पयथलयरपंचेंदियएतिरिक्खजोणिएय ३८ अवि- सेसिए गम्भ वतियचउप्पयथलयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए पज्जत्तए गम्भ वकंतियचउप्पयथलयरपंचेंदि- यतिरिक्खजोणिय अपज्जत गम्भ वकंतियचउप्पय थल- यरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय ३६ अविसेसिए परिसप्पथल- यरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विससिए उरपरिसंप्पथलयर पंचेदियतिरिक्खजोणिय भुजपरिसप्पथलयरपंचेंदिय तिरि- क्खजोणिए य ४० एतेवि समुच्छमा पज्जत्तगा अपज्जत्तगा य गभ्भवतिय विपज्जतगा अपज्जत्तगा य भाणियव्वा अविसेसिए खेयरपंचेंदिएतिरिक्खजोणिए विसेसिए समु- च्छिमखयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए पज्जत्तय समु- च्छिम खेयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य १७- अविसेसिए समुच्छिमखयरपंचिंदियतिरिक्खजोणिय विसेसिए पज्जत्तए . G ५ (१४२) * अनुयोगद्वार सूत्र * चलने वाला परिसर्प स्थलचर पांचेंद्रिय तिर्यग् योनिक जीव हैं-४० (एतेवि समुच्छिमा पज्जचगा भपज्जचगा गभ्भ वतिय विपज्जतगाय अपज्जतगाय भाणियचा ) फिर इन के भी समूर्छिम अविशेषक पद में रख कर पर्याप्त भौर अपर्याप्त गर्भ से उत्पन्न होने वालों के भी पर्याप्त अपर्याप्त भेद जानने चाहिए ४६ अथ खेचरों के विषय में विवर्ण किया जाता है (मविसेसिए खेयरपंचें- दियतिरिक्खजाणिय ) भविशेषक नाम में खेचर पांचंद्रिय तिर्यम् योनिक शब्द है और (विसेसिए समुच्छिमखेयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिय ) विशेषक में समुर्छिम खेचर पांचेंद्रिय तियर्ग योनिक हैं ४७ फिर (अविसेसिए समुच्छिम खायर पंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए) अविशेषक में समुर्छिम खेचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक हैं और (विसेसिए पज्जत्तर समुच्छिमखयरपंचेंदियतिरिक्त जोणिए य ) विशेषक में पर्याप्त समुच्छिम खेचर पांचंद्रिय तिर्यग् योनिक हैं ४८ फिर ( अविसेसिए गम्भ वक्कंतियखयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए ) अविशेषक में गर्भ से उत्पन्न होने वाले खेचर पांचेंद्रिय तिर्यक योनिक जीव है और (वि- सेसिए पज्जत्तए गम्भ वतिय खेयरपंचेंदियतिरिक्खजोणिए य अपज्मसए गम्भ वकंतियखेयरपंचेंद्रियतिरिक्खजोणिए य) विशेषक में गर्भ से उत्पन होने वाले खेचर पचिंद्रिय तिर्यग योनिक पर्याप्त और अपर्याप्त रूप दो भेद हैं इस प्रकार से तिर्यग योनि के जीवों का विशेष और अविशेष नाम से विवर्ण किया गया है अब मनुष्य विषय विवर्ण किया जाता है। भावार्थ-अविशेष नाम में पचिंन्द्रिय तिर्यक स्थापन करके विशेष नाम में फिर उनके जलचर स्थलचर और खेचर इस प्रकार के तीनों भेद विवर्ण किये गये हैं और फिर प्रत्येक २ के समूर्छिम और गर्भज पर्याप्त और अपर्याप्त इस प्रकार के चार चार भेद कहे हैं किन्तु स्थलचर के भेदों में चार पाद वाले जीव और सोदि भी ग्रहण किये गये हैं इनका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में लिखा गया है क्यूं- कि अविशेष नाम सामान्य अर्थ का सूचक है और विशेष नाम में उसके भेद वर्णन किये जाते हैं सो यह सर्व जलचर स्थलचर खेचर समूच्छिम और गर्भज पर्याप्त और अपर्याप्त प्रथम भेद को अविशेष नाम में रखकर फिर विशेष नाम में उनके भेद विवर्ण करने चाहिये अब मनुष्य जाति के विषय में वर्णन किया जाता है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * ( १४३) अथ मनुष्याणां भेदाना माह । अविसेसियो मणुस्सो विससिओ समुच्छिम मस्सो य गम्भवक्कंति य मणुस्सोय ५० प्रविसेसिउ समुच्छिममणुस्सो विसेसिंउ पज्जतउय अपज्जचउय ५१ अविसेसिउ गभ्भवक्कं. तिय मगुस्सो विसेसिउ कम्मभूमिगो अकम्मभूमिउ य अंतर दीवगो य संखेज्जवासाउय असंखेज्जवासाउय पज्जचउ अपज्जत्तउ भेदो भाणियवो ५७-८५ ॥ पदार्थ-( अविससिओ मणुस्सो) अविशेषक नाम में मनुष्य शब्द है किन्तु (विसैसिओ) विशेष नाम में ( समुच्छिम मणुस्सो य गम्भवक्कंतियमणुस्सोय) समूच्छिम मनुष्य और गर्भ से उत्पन्न होने वाले मनुष्य हैं । अर्थात् गर्भज मनु- ध्य हैं ५० फिर (अविसेसिउ समुच्छिम पणुस्सो) अविशेष नाम में समूछिप मनुष्य हैं और (विसेसिओ पज्जचउ य अपज्जत्तउ य) विशेष नाम में पर्याप्त और अपर्याप्त उसके भेद हैं ५१ और ( अविसेसिमोगभ्भ वक्कतियमणुस्सो) अविशेष गर्भज मनुष्य है किन्तु (बिसेसिओ कम्म भूमिगो अकम्म भूपिउय अन्तरदीवगो य संखज्जवासाउय असंखज्जवासाउय पज्जत्ता अपज्जचड भेड भाणिययो) विशेष नाम में कर्म भूमिज मनुष्य १ अकर्म भूमिक मनुष्य २ और अन्तद्वीपों के मनुष्य ३ फिर संख्यात वर्षों की आयु वाले ४ और असंख्यात वर्षों की आयु वाले ५ फिर पर्याप्त और अपर्याप्त रूप यह दोनों भेद सर्व प्रकार से कहने चाहिऐं अर्थात् मनुष्यों के भेदों में जो मनुष्य पंच दश बैंत्रों में उत्पम होते हैं उनको कर्म भूमिक कहते हैं और तास क्षेत्रों में उत्पन होने वालों को अकर्मक भूमिक कहते हैं ५६ अपितु ५६ अन्तद्वीपों के मनुष्य, भी युगलिय संज्ञक हैं इन सर्व मनुष्यों के भेद पूर्ववत् करने. चाहिये ५७ अब देवों के विषय में व्याख्यान करते हैं। भावार्य-अविशेष नाम में मनुष्य पद है विशेष नाम में समूच्छिम मनुष्य और गर्भन मनुष्य उनके भेदं हैं। इसी प्रकार पर्याप्त और अपर्याप्त भेद भी - १ ५ (१४४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * जान लेने चाहिये किन्तु जैसे समूच्छिम मनुष्यों के भेद हैं उसी प्रकार गर्नभ मनुष्यों के भेद भी जानने चाहिये अपितु विशेष इतना ही है कि गर्भज मनुष्यों के तीन भेद हैं कर्मभूमिक १ अकर्मभूमिक २ और अन्तरद्वीपों के मनुष्य ३ फिर इनके भी संख्यात वर्षों की आयु वाले और असंख्यात वर्षों की आयु वाले पर्याप्त और अपर्याप्त इत्यादि भेद वर्णन करने चाहियें । मनुष्यों के पश्चात् अव देवों का विवर्ण किया जाता है ।। अथ देवों विषय । (अविसेसिउ देवों विसेसिउ भवणवासी वाणमंतर जोइसिय बिमाणिय ५८ प्रविसेसिउ भवणवासी विसेसिउ अंसुर कुमारो १ एवं नाग २ सुवन्ना ३ विज्जु ४ अणग्गि.५ दीव ६ उदहि ७ दिसो ८ वाउ थणिउ १०॥ ५ ॥ सब्वे सिपि अविसेसिउय विसेसिउय पज्जत्तग अपज्जत्तग भेया . भाणियब्बो ६६ अविसेसिउ वाणमंतरो विससिउ पिसाय १ मूय २ जक्खे ३ रक्खसे.४ किन्नरे-५ किंपुरिसे ६ महोरगे ७ गंधवे ८ ॥ ६१॥ एतेसिपि अविससिए विसेसिए पज्ज त्ता अपज्जत्ताया भेया भाणियबा ७८ अविसेसिंउ जोइ- सिओ विसेसिङ चंद १ सूर २ ग्गह. ३ नक्खत्त ' ४ तारा ५ ॥ ७९ ॥ एते सिपि प्रविसेसिए विसेसिए पजत्तय अपज्जत य भेदाभाणियव्वा ८० अवसेसिउ - विमाणिो विसेसिश्रो कप्पोवउयकप्पा तहउय ८४ अविसेसियो कप्पोवउय विसेसि- श्रोसुहम्माए १ इसाणेय २ सणकुमारयं ३ माहिदए ४ वंभलो ए ५ लत्तए ६ महासुक्कय ७ सहस्सारे आणय पाणंय. ए १० श्रारणए ११ अंच्चुयए १२ एतेसिपि य अविसेसिय वि सेसियं पज्जत्तय अपज्जत्तए भेदा भाणियब्वा ६८ अविसेसि. १ * अनुयोगदार सूत्र * (१४५) उ कप्पातइय विसेसिउ गेविज्जउय अणुत्तरोववाहउय ६६ अविसेसिउ गेविज्जउ विसेसिउ हेडिमगेविज्जए मज्झिमगे विज्जए उवरियगेवज्जएय ६३ अवसेसिए हेडिमगेविज्जए विसेसिए हेटिमटिमगेवेज्जए हेडिममझिमगेवेज्जए हेहिम उवरिमगेवेन्जए।४ अविसेसिए मझिमगेवेज्जए विसेसिए माझमहोडमगेवेज्जए मज्झिम मज्झिमगेवेज्जए मन्झि- उवरिमगेवेज्जए १५ अविसेसिए वरिमगेवेज्जए विससिए उवरिमहेडिमगेवेज्जए उवरिम मज्झिमगेवज्जए : उवरिम उवरिमगेवेज्जए ६६ एतेसिपि सम्वेसिं अविससिए विससिए पज्जत्तएअपज्जत्तए भेया भाणियन्वा १०५ अविसेसिय अ- गुत्तरोक्वाइए विसेसिय विजय वैजयंतेए जयंतेए अपराजिए संबष्ठसिद्धय - १०६ एतेसिपि सव्वर्सि अविसेसियविसेसिय पज्जत्तयअपज्जचएभेया भाणियब्वा ११ ॥ ११ अविसेसिए भजीवदब्वे विससिए धम्मत्थिकाय अधम्मत्थिकाय भागास- 'त्यिकाय पोग्गलस्थिकाय अद्धासमय? अविससिए पोग्गलत्थि- काय विसेसिए परमाणु पोग्गले दुप्पएसिय तिपएसिय जाव दसपएसिए जाव अणंत पएसिये २ । २० सेत्तं दुनाम ८६॥. .: पदार्थ-( अविसेसिउ देवो ) अविशेषक नाम में देव शब्द है किन्तु (विसेसिड भवणवासी वाणमंतर जोसिए वैमाणिय ) विशेषक नामा में चारों प्रकार के देव हैं जैसे कि भवनपति १ वाणव्यंतर २ ज्योतिषी ३ वैमानिक ४- :५८ फिर (अविससिउ भवणवासी) अविशेष नाम में भवनपति देव हैं और (विसेसिड असुर कुमारो १ एवं नाग २ सुवन्ना ३ विज्जु ४ अगि ५ दीव ६ उदहि.७ दिसा ८ बाउ ह थणिउ'१०) विशेषक नाम में भवनपतियों को दश प्रकार की जातिग्रहण की गई है जैसे कि असुरकुमार १ नागकुमार २ सुपर्ण- कुमार ३ विद्युत्कुमार वायुकुमार ६ स्तनितकुमार १०१ ५६ ।। (सब्वेसिपि में नुन्नास अविनतम शिनरिय मा अस्मान या भागाला अरे शब्द सन्दर्य में है इसलिये इनके अभियचर और जिर पर्यापाप यह कई नद उन्ले यि अपा का मान देने के अनुरचार अविनर का है और प्रयोग अरन या इंन द्र विष नान में हर जिये गरे , हो र क बहिण ज्ञान लेने चाई अव विक अपन नियमामले बार मंबन अभिप नाम पर शक है और मेरे पकान में विपकर गये हैन-नबहसाब जाति के व्यंचर इसी प्रकार जलने या स्तन किन पुरिन । शिक्षा लिई पुनार नाग नव ८ पद आर नारान कहलाते हैं इसका नाम में दिया गया है और अट मन्द परमादेनदेनर समान । इस लिए ना नालन हुना है ३. अन्ति र एली अईले वितमिर रजच अब्जामार मा मान्दिना ) इनके भो अविकता और भविष का ने अपनी इत्यादि मानन में जाने कहर जाक त्रि नातिन्नर अमिर नन है और विकास यंत्र और - यौन बने हरे और करिमा जोडि) विशेष कार में ज्योतिष देव है किन्तु बिमिरा न माह चरखर जरा विशेषक एक में मु२६३ चना और कार है जिन : रमणि अद- सेक्षित विपतिर जर अजर नहर महिना । इनके भी शप. और शिव पर और मन कहने चाहिये जैतार-चन्द्र मन्द - देशक ई और पयाम क्यान जाने अन दिनाक है इनी कार सई की - भावना करनी चाहिं ४ र अविजितागिर विशेष नार में मानिक शेक ऋतविजिट ऋग्य काय विशेष करू में अन्य देश और समसंग इस दि गई . ८५ { अधिभित कपास्य । भविशेष नन में कल में मरिनु निर नुहम्मार १ संभारे नादिर निश्क नाम बदर जय देवा हैं इसनि-मुबमदेवलोक १ इंसदकोज २ अन्कार देर ३ से. न्द्रदेवलोक मोए लांचए सहल मइन्न नम दंशोक H - * अनुयोगद्वार धूत्र (१४७ ) लातक देवलोक ६ महाशुक्र देवलोक ७ सहस्त्रार देवलोक (प्राणयए पाणथए भारणए अच्चुयए) आनत देवलोक ६ माणत देवलोक १० भारण्य देवलोक ११ और अच्युत देवलोक १२१८६ ।। फिर इनके भी ( एतेसिपि अविसेसिउ विसेसिय पज्जचय अपज्जतय भेदा भाखियो ) अविशेष नाम और विशेष नाम पर्याप्त और अपर्याप्त रूप भेद कहने चाहिये १८.फिर (अविसेसिव कप्पा तई ) अविशेष नाम में कल्पातीत स्वर्ग हैं किन्तु (विसेसि गेविजय, अणुचरो वाइज्य ) विशेष नाम में ग्रैवेयक और अनुत्तरो वैमानवासी देव हैं ६६ अतः फिर भी ( अविसेसिउ गेविज्जर) अविशेष नाम में अवेयक हैं और (विसेसिउ हेछिमहेछिमगेविजउ) विशेपक नाम में अधः अधो गैवेयक १ (हे- हि मज्झिम गेविजउ ) अधो मध्यम अवयक ( हेठिम उपरिमगेवेज्जउ ) नीचे, के उपरला अवेयक फिर ( अविससिए हेछिमगेविज्जउ .) अविशेष नीचे का अवेयक है और (विक्षेसिए हेछिमग्रेवेज्जउ हेहिममज्झिमेगेवजउ - हेष्टिमउच; रिमगवेज्जए ) विशेषक नाम में नीचला अवेयक १ नीचे के मध्मम वेंयकार नीचे के उपरला अवेयक ३ फिर (अविसेसिए मज्झमगेवेज्जउ ) अविशेष नाम में मध्यम अवेयक हैं किन्तु ( विससिए मज्झिम हेछिमगेवेज्जउ मज्झिम मज्झिम गेवज्जए मज्झिमउवरियगेवेज्जए ) विशेष नाम में मध्यम के नीचे का ग्रैवेयक और मध्यम के मध्यम का अवेयक, मध्यम के उपर का ग्रैवेयक फिर ( अविसे- सिड उवरिषगवेज्जए ) अविशेष नाम में उपरला ग्रैवेयक है ( विसे- सिउ उपरिम हेछिमगेवेन्जए उवरिम मझिम गेवेगए उवरिम - उपरिम गेवेज्जए ) और विशेष नाम में उपर के नीचे का ग्रैवेयक, उपर के मध्यमका ग्रैवेयक और ऊपर के ऊपर का नैवेयक ३ । १००॥ (एते सिसवेसि अविसेसिउय विससिय पज्जत्य अपज्जतय भेदाणेयच्या) फिर इन के भी अविशेष और विशेष पर्याप्त और अपर्याप्त रूप भेद सर्व प्राग्वत् कहने चाहिये १०६ फिर ( आविसेसिउ अणुत्तरोववाइट ) अविशेषक नाम में अणुत्व रोपातिक देव हैं किन्तु (विसेसिउ विजय विजयंत जयंत अपराजित सव्व सिद्धङ) विशेषक नाम में विजय १ विजयंत २ जयंत ३ अपराजित ४ सर्वार्थ सिद्ध ५ यह पांच ही लोक देव हैं फिर ( एवेसिपि सव्वेसिं अविसैसिउ विसे- सिर पन्जत्तए अपज्जत्तय भेदा भाणियन्वा) इन सर्वो के अविशेषक नाम और फिर --- ..
(१४८) * अनुयोगद्वार मत्र * विशेषक नाम पर्याप्त और अपर्याप्त नाम यह सर्व भेद कहने चाहिय क्युकि समान भेद अविशेष नाम होता है और उसके भेदों को विशेष नाम कहने हैं ११५ ॥ अब अजीव द्रव्य के विषय में विवर्ण किया जाता है जैसीक (भावसेसि अजीवदव्य ) अविशेष नाम में अजीव द्रव्य है और (विसेसि धम्माधिकाय अधम्मत्किाय आगासत्यिकाय पोग्गलात्काय अद्धाममय ) विशेष नाम में धर्मास्तिकाय १ अधर्मास्तिकांय २ आकाशास्तिकांय ३ पुगलास्तिकार और समय (काल ) फिर (अविससिउ पोग्गलत्यिहाय ) अविशेष नाम में पुद्गलास्ति काय है ( विससिए परमाणु पोग्गले दुप्पएसिए दिएसिएं जावदस पएसिए जाव अणंदपएसिए) और विशेषक नाम में परमाणु पुद्गल द्विरदेशिक स्कंध निदेशिक स्कंध यावत् दश मदेशिक संश संख्यात प्रदशिक स्कंध असंख्यांत मदेशिक स्कंध पावत् अनन्त प्रदेशिक स्कंध यह सर्व भेद विशेष नाम के हैं ( से दुनाये ) अध शब्द अयानन्तर के विषय में है और द्विनाम का विवर्ण पूर्ण हुआ इसी को विनाम कहते हैं । भावार्थ:-अविशेष नाम पद में देव शब्द ग्रहण किया गया है अतः वि. शेष नाम में चारों जाति के देव है फिर अविशेष नाम में भवनपति देव रस कर विशेष नाम में उनकी संख्या की गई है सो इसी प्रकार फिर उनके पर्याप्त अपर्याप्त भेद कथन किये गये हैं जैसे भवन पनियों का विवर्ण है उसी प्रकार वाण व्यंतर ज्योतिषी वैमानिक देवों के भी भेद जानने चाहिये अपितु आर जाति के पंतर ५ ज्योतिषी २६ वैमानिक देवों के भेद हैं यह सर्व जीव द्रव्य के ही विशेष और अविशेष नाम से ११५ सूत्र विवर्ण किये गये हैं किन्तु अ- नीव द्रव्य के विशेष नाम में धर्मास्तिकमायादि पांच भेद हैं क्योंकि जीव द्रव्य का विवर्ण तो पहिले किया जा चुका है और प्रविशेष नाम में पुद्गला- तिकार के परमाणु पुद्गल से लेकर अन्त मदेशिक स्कंध पर्यन्त विवर्ण है क्योंकि यह सर्व पारिणामिक भाव होने से विशेष नाम में ग्रहण किये गये हैं अतः धर्मास्तिकायादि अपने शुद्ध स्वभाव में स्थित हैं इसलिये उनके भेद नहीं कहे गये सो यह केवल दोनों सूत्र अजीव द्रव्य के हैं और इसी स्थान पर दि- नाम का विवर्ण भी पूरा किया गया है इसके अनंवर अव तीन नाम को व्याख्यान करते हैं।
-- * अनुयोगद्वार सूत्र * (१४६ ) ॥अथ त्रिनाम विषय ।। (सेकिंतं तिनामे २ तिविहे पण्णता तंजहा, दव्वनामे गुणनामे २ पज्जवनामे सेकितं दव्वनामे २ छविह पण्णत्ते तंजहा धम्मत्थिकाय अधम्माथिकाय भागासस्थिकाय ३ जीव- थिकाय ४ पोग्गलत्थिकाय ५ श्रद्धासमयएं सेत्तं दध्वनामे सेकिंतं गुणनामे २ पंचविहे पण्णत्ते तंजहा वन्ननामे गंधनामे रंसनामे फासनामे संहाणनामे सेकिंतं वननामे पंचविहे पण्णचेतंजहा कालवन्न परिणामे नीलवन्न परिणामे लेहियवन्न परिणामे हलिद्धवन परिणामे सुकिलवन्न परिणामे सेत्तंवन्न नामे सकिंतं गन्धनामे २ दुविहे पं० त० सुभिगन्धनामे य दुभ्भिगंधनामे से तं गंधनामे सेकिंतं रसनामे २ पंचविहे पं० त० तित्तरसनामे कडुयरसनामे कसायरसनामे अम्बिलरसनामे मुहुररसनामें से रसनामे सेकिंतं फासनामे २-अठविहे पण्णत्तं तं० कक्खड कासनामे मउयफासनामे गरु अफासनामे लहुअफासनामे सीयोफासणामे उसिण फासनामे निद्धफासनामे लुक्खफासनामे से तं फांसनामे सेकिंतं संहाणपरिणामे २पंवविहे ६०तं. परिमण्डलसंधाण नामे बट्टसंडापनामे तंसनामे चउरेसनामे पायासंहाण नामे से संठाणनामे सेत्तं गुणनामे सेकिंतं पज्जवनामे २ अणेगविहे पं० तं० एगगुणकालए दुगणकालए जाव दसगुणकालए. संखेज्जगुणकालए असंखेज्जगुणकालए अयंतगुणकालए एगगुणनीलए दुगुणनीलए तिगुण नीलए जावदसगुणनीलए जावअणंतगुणनीलए एवंलोहि- १३) * अनुयारा * पहालिमुकवादि भाणियचा. घुगगुणसुमिगचे गुण- सुरभिगवे तिगुन्नुरभिग जाइदगुणमुरभिगव - मन्द- जगुणमुरभिगव अमवन्जगुणगुनभिगो अनगुणसुर- भिगवे एवंदुरभिगधो भाणियचा एगगुणनि दुगुण- निचे निगुशदिन जावइमगुपतिन् संखेन्जगुणनित अनं- खजगुणनिने अनुगुणनि एकमुश्कमायचविलमहरा भागियया एगगुपकरवई दुगुरुकवडे निगुणकाव जावदम्गुइकडे मुंबन्नगुणकावई अन्वज्जगुएजनवड़े अपनगुपकावड़े एवंमध्यगनयनहुयाय उर्माणनिद्धमत्र भावियचा सर्व पन्जवनाम ।। हा- पान दिनार २ निवि चनन मुपाने पन्जा नारन नाम त्रिन ऋत है। उन्र वान चार मी नानों . मन किया गया जति ब्यान गुमनाम पचनाल (में- निवनांवर छविंन्यक पत्रिने चार सा गया है। दरबन्छ नाल टन वान किया शिवलिय- आप बशनिवार अवनविकार अवन्तिाय २९ आगन्याय) श्रकाशक्तिशायीचिब डानिकाय? शेगमित्र- इटान्तिकाय और मामय काजन्य (मर इब्वन हान्य नाम है अयन् मयों और डोनर गटे स्थिति अगाइ स्यान इ- न्न संग विवाओं कोसना कता यह अट ही इनके लग हैं माउन्टी टच्या कन्य चार ऋन है पनि गुण नरव परे । (रुन यि इंद्र है (उदर) गुर्शदान पांच सकता में प्रतिफलन किया गया है पानपान) कवनात (नहानानलप नाम् ग्राष्ट्रिययनमा रहने नाब हाजिद- बनाने पवित्र कार डिलनाम) वर्म ना ! मनक पावन नाम है कि द्रव्यों मुख्यदना न ई ई म कार मदन को और भन? ना मनाम ) म - * अनुयोगद्वार सूत्र * (१५१) गंभ नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) गंधनाम (दुविहे पं० त०) दो प्रकार से कथन किया गया है जैसेकि-( सुरभिगधनामे ) एक सुगंध और द्वितीय (दु- रभिगंधनामेय सेतंगधनामे ) दुर्गन्ध नाम अप शब्द प्राग्वत् है सो इसी को गंधे नाम कहते हैं । सेकित रम नामे २,पंचविह पंणते तंजहा (प्रश्न) रसनाम किसे कहते हैं ( 'उत्तर ) रमनाम भी पांच प्रकार से कहा गया है जसें कि- (तितरस नामें ) श्लेष्मादि रोगों को हरण करने वाला तिक्करस होता है। कडु परस नामे ) कंठ रोगादि के विद्धवंस करने वाला कटुकरस होता है ( कसाय रंसनामे ) कवायलारम रनविकारादि के दोषों को दूर करता है ( अविल रसनामे ), खद्यारस जो अग्निदीपक होता है ( महुररसनाम ) मधुररस जो पित्तादि के हरण करने वाला है इनका विवर्ण वैद्यक शास्त्र में सविस्तर क- थन किया गया है क्योंकि यह पांच रस मुख्यता से संमार में हैं इसलिये इन का विवर्ण किया गया है किन्तु जो लवण रस भी एक प्रकार से माना जाता हैं वह इनके संयोग से ही उत्पन्न होता है इसलिये उसकी पृथक् भाव से विवक्षा नहीं की अब स्पर्श विषय प्रश्न करते हैं (मेकितं फासनामे २ अविहे पं० ० (प्रश्न ) स्पर्शनाम किसे कहते हैं (उत्तर ) स्पर्शनाम आठ प्रकार से 'जैसे कि-( कक्खुडफासनामे ) कर्कस्पर्शनाप जैमे पाषाणादि १ ( महुय फासनामे ) मृदुस्पर्शनाम जैसे नवनीतादि पदार्थों में- मृदुता होती है उसे मृदुस्पर्शनाम कहते हैं ( गैरुयफास नामे ) गुरुस्पर्श नाम ,उसे कहते हैं जो पदार्थ उपरि प्रक्षेप किये हैं फिर वह अधीगमन स्वभाव वाले हैं जैसे लवणं पाषाण अपादि ३ ( लहुयफासनामे ) लघुस्पर्शनाप जो पदार्थ लघु हैं जैसे कि अर्कतुलादि आक और सीमल आदि की रई जिन्हों का ऊर्ध्वगमन स्वर भाव हो ॥ ४ ॥ ( सीयफासनामे ) जो शीतस्पर्शनाम जैसे है. मादि पदार्थ हैं ५ ( उसणफासनामे ) उष्णम्पर्शनाम जैसे अग्न्यादि पदार्थ हैं (-निद्धफास नामे ) सनिग्धस्पर्शनाम जिस के कारण से पदार्थ एकत्व, होजावे जैसे तैला- दि फिर लुक्खफासनामे ) रुक्ष स्पर्श नाम जैसेकि-भस्मादि पदार्थ हैं (सेचं फांसनामे.).यही आठ प्रकार स्पर्श नाम है क्योंकि यह सर्व पौगलिक गुण हैं अब सस्थानों के विषय में कहते है (सेकित संगण नामें पंचविहे. पं० ) १-गुरौ केवा ।। प्रा० च्या० भ०८ पाद सूत्र १०६॥ , गुरी स्वार्थ रेसति भाडेदतो मदवा भवति ।। - (१५२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * (प्रश्न ) संस्थान किसे कहते हैं ( उत्तर) संस्थान (आकृति ) पांच प्रकार से कहा गया है जैसे कि (परिमंडल संठाणनामे) परिमंडल संस्थान गोल आकृति जैसे चूड़ी ( चट्टनाये ) वृत्ताकार. मोदकवत २ ( तंस संहाणनामे. ) व्यंसा कार त्रिकोण जैसे सिंघाड़ा (चउरंस संहाणनामे ) चतुरंसाकार चतुष्कोण ( आयत संहाणनामे ) दीर्घाकार दंडवत् (, सेत्तं संहाणनामे यही संस्थान नाम है ( सेत्तं गुणनामे ) और इसी को गुण नाम कहते हैं अव पर्याय विषय में कहते हैं (सेकिंतं पज्जवनामे अणेगविहे पं० तं.) (प्रश्न) पर्याय नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) पर्याय नाम अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि- भो द्रव्य के समान सदा स्थिर नरहे उसे पर्याय कहते हैं अथवा जो द्रव्य को अवस्थांतर करे उसे पर्याय कहते हैं तथा जो पूर्व पर्याय सर्वथा द्रव्य से भिन्न हो जावे और नूतन उत्पन्न हो उसे भी पर्याय कहते हैं जैसे कि-सुवर्ण के आभूपणादि नाना प्रकार के पर्याय धारण करते हैं सी यह पर्याय अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-( एगगुणकालए ) एकगुग-कृष्ण- द्रव्य सर्व द्रव्यों की अपेक्षा से है जैसे असत् कल्पना द्वारा यदि सर्व कृष्ण द्रव्य एकत्र किया जाय फिर उसके भेद किए जाएं उस द्रव्य की अपेक्षा एक परमाण्यादि द्रव्य एकगुण कृष्ण वर्ण कहा जाता है इसी प्रकार (दुगुणकालए ) द्विगुण कृष्णवर्ण ( तिगुणकालए ) त्रिगुणकृष्णवर्ण (. जावदशगुणकालए ) यावदशगुण कृष्णवर्ण ( संखज्ज कालए ) संख्यातगुण कृष्णवर्ण: ('अंसं. खेज्जगुण-कालए ) असंख्यातगुण कृष्णवर्ण ( अणतगुण कालए ) अनंव- गुणं कृष्ण वर्ण इसी प्रकार ( एगगुण नीलए.) एकगुणं नीलवर्ण (दुगुण नीलए ) द्विगुण नीलवर्ण (विगुणनीलए ) त्रिगुण नीलवर्ण ( जावदसंगुण नीलए) यावदशगुण नीलवर्ष ( जावअणतगुण नीलवणय) फिर संख्यात गुण नीलवर्ण असंख्यातगुण नीणवर्ण अनंतगुण नीलवर्ण ( एवं लोहिय हालिहसुकलाविभाणियन्या ) इसी प्रकार रक्तवर्ण पतिवर्ण और शुकवर्ण के भी भेद जानने चाहिए और ( एगगुणसुरमिंगंधे दुगुणसुराभिगधे तिगुण सुरभिगध जावदसगुणसुरभिगंधे) गंध की अपेक्षा से एकगुणसुगंध द्विगुरु सुगंध त्रिगुणसुगंध यावदसगुणसुगंध भी होती है तथा ( संखज्जगुण मुर भगंध) संख्यातगुण सुंगध ( असंखज्जगुण सुंगध असंख्यातगुण सुंगध (अयंतगुण सुराभिगंधे ) अनंतगुण सुंगध (.एवं दुरभिगंध) इसी प्रकार दुर्ग- * अनुयोगद्वार मूत्र * (१५३ ) मके भी भेद जानने चाहिये । अब रसों का पर्याय वर्णन करते हैं ( एगगुण- तिते),एक गुण तिक्त रस ('दुगुण तित्ते तिगुण तिते जाव दस गुणतित्ते (द्विगुण विक्त रस त्रिगुण तिक्त रस यावत् दश गुण तिक्त रस ( संखज्ज गुणतिचे असंखज्ज गुणं तित्ते अणंतगुण तिते) संख्यात गुण तिक्त रस असंख्यात गुण तिक्त रस अनंतगुण तिक रस ( एवं कड्य कसाय श्रीरले महुरविभाणि यन्ना) इसी प्रकार कटु रस कषाय रस खट्टा रस और मधुर रसों के भेद भी जानने चाहिये । अथ स्पर्श विषय । (एगगुण कक्खडे दुगुणकक्खडे तिगुणकक्खडे जावदसगुण कक्खडे संखे. ज्जगुण कक्खडे असंखजगुण कक्खडे अणंतगुण कक्खडे) एक गुण कर्कश- स्पर्श द्विगुण कर्कशस्पर्श त्रिगुण कर्कशस्पर्श यावत् दश गुण कर्कशस्पर्श इसी प्रकार,संख्यात गुण कर्कशस्पर्श असंख्यात गुण कर्कशस्पर्श अनंत गुण कर्क- शस्पर्श ( एवं माय गरुय लहुय सीयउ सिण निद्धलुक्खा भाणियन्ना से .पज्जव नामे ) इसी प्रकार मृदु स्पर्श गुरु स्पर्श लघु स्पर्श शीत स्पर्श उष्ण स्पर्श स्निग्ध स्पर्श रुक्ष स्पर्श इन सबों के भेद जानने जाहिये क्योंकि गुरु कहने से यह तात्पर्य है कि पुद्गल द्रव्य गुण युक्त है और पर्याय परिवर्तन अब- श्य होता रहता है सामान्य गुण द्रव्यों में अवश्य रहता है पुद्गल द्रव्य की पर्याय इसीलिये दिखलाई गई है कि जिज्ञासुओं को शीघ्र बोध होजावे क्योंकि यह द्रव्यरूपी होने से सब के प्रत्यक्ष है किन्तु धर्मादि द्रव्य अबोध प्राणियों के परोक्ष हैं इसी वास्ते उनकी पर्याय नहीं कथन कीगई अपितु सहवर्ती होने पर गुण शब्द ग्रहण किया गया है सो इसी का नाम पर्याय रूप तृतीय भेद है। भावार्थ-जो पदार्थ हैं वे सर्व तीनों प्रकार से हैं जैसेकि-द्रव्यनाम गुणनाम और पर्याय नाम क्योंकि द्रव्य होने पर गुण पर्याय सिद्ध होते हैं इसलिए ए तीन नामे में इन तीनों का ग्रहण किया गया है सो द्रव्य पट् प्रकार से हैं जो पूर्व निखे गए हैं किन्तु पुद्गल द्रव्य पांच प्रकार से गुण कथन किए हैं जैसेकि-वर्ण १ गंध २ रस ३ स्पर्श ४ और संस्थापन ५ वर्ण पांच प्रकार के होते हैं जैसे कि कृष्ण १ नील २ रक्त ३ पीत ४ और श्वेतं ५, गंध दो प्रकार है दुर्गन्ध, रस के पांच भेद है तिक्क रस १ कटुक रस २ कषाय रस ३.खट्टा.रस सुगन्ध और २० - (१५४ ) * अनुयोगदार सूत्र * ४ मधुर रस ५, स्पर्श के , भेद हैं कर्कशपर्श, मृदुस्पर्श, गुरुस्पर्श, लघुस्पी, शीतस्पर्श, उष्णस्पर्श, सनिग्धस्पर्श, रुक्षस्पर्श, और संस्थान के भी पांच ही भेद हैं जैसेकि-परिमंडल संस्थान १ हनाकार संस्थान २ यससंस्थान-३,चतुरस्त्र- संस्थान ४ आयातसंस्थान ५ इनको गुणनाम कहते हैं क्योंकि पुद्गल , द्रव्य के यही गुण हैं और इसी के होने से पुद्रल. द्रव्य रूपी माना जाता है और पर्याय नाम उसे कहते हैं जो द्रव्य से द्रव्यान्तर करे स्यअवस्था से अवस्थान्तर कर देवे अपितु द्रव्य, के समान जो सदा स्थिर से उसे ही पर्याय काते हैं किन्तु जो द्रव्यों को द्रव्यान्तर तो करदेवे और आप उत्पन होकर नाश भाव को प्राप्त होता रहे उसे पर्याय कहते हैं सो वह ऊपर लिखे हुए पुद्गल द्रव्यों के भेदों को एक गुण से लेकर अनंतगुण पर्यन्त वृदिरूप अथवा. हानि रूप करे उसी.को नाम पर्याप पुद्व द्रव्यों के गुणों का नाश कभी नहीं होता किन्तु पर्यान्तर अवश्य होता है सो संसार,भर में जो द्रव्य हैं. वह सर्व तीनों नामों के अन्तर्गत है इसलिये तीनों नामों का विवर्ण पूर्ण हुआ अपितु नाम शन्द नपुंसकलिंग है इसलिये जिज्ञासुओं को लिंग बोध भी सुगम होजाए इस बात के आश्रित होकर सूत्र तीनों लिंगों के अंतिम वर्षों के स्वरूप का सामान्य प्रकार से विवर्ण करते हैं। अथ तीनों लिंग विषय । तं पुणनामंतिविहं इत्थिपुरिसंनपुसगंचव एएसिं तिरह- पिहु अंतमि परूवणं वॉछू १. तत्थपुरिसस्सअंता आई ऊ- हवंति चचारितेचेव इत्थियाए हवंति उयार परिहीणा २ अं. तिय इंतिय उतिय अंताउ नपुंसगस्स बोधब्बा: एएसिंति एह पियवोच्छामि निदरिसणं एतो ३ आकारंतोराया इकारतो गिरीय सिद्धि सीहरी ऊकारतो विराहू दुमोउ अंताउ पुरि- सायं ४ाकारंतोमाला इकारतोसीरीय लच्छीय उकारतो जंबूबहुययताउ इत्थीणं ५ अकारंत धन्नं 'इंकारत नपुंसगं अच्छि उकारंत पीलुमहुंचता नपुंसाणं सेतिन्नामे । ..
• अनुयांगद्वार भूत्र * (१५५ ) । पदार्थ-(तेपुण नाम तिविहं ) फिर वह नाम तीन प्रकार से और भी कहा गया है जैसेकि-(इस्थिपुरिसंनपुसगंचे) स्त्री नाम पुल्लिंग नाम नपुंसक नाम क्योंकि निश्चयही लिंग तीनों हैं इसलिये (एएसिति राह पिहु ) अब इन तीनों के ( अंतमि परूषणं वोच्छ १)(अंतिम वर्णों की प्रतिपादनता करूंगा अपि शब्द समुच्चयार्थ में है १ अथ अंतिम वर्गों के विषय में कहते हैं (तत्थ पुरि- संस्स अंता) उन में प्रथम पुरुष लिंग के अंत में ( आईऊजहतिचत्वारि ) आकार-ईकार-ऊकार-उकार यह चार वर्ण होते हैं (तेचे इत्थियारहवंति और यही उक्त वर्ण स्त्री लिंग के अंत में होते हैं किन्तु (उकारपरिहीणा) उ- कारांत को वर्भना चाहिये क्योकिं प्राकृत में स्त्रीलिंग उकारान्त शब्द नहीं होते २ (अंतिय इतिय संतिय ) प्राकारांत इकारांत उकारांत (अताउ नपुंस गाणं बोधवा) अंत में वर्णन होते हैं नपुंसक लिंग में ऐसे जानना चाहिये (एएसिति राहे पिवोच्छामि ) इन तीनों के उदाहरण भी कहूंगा-अपि शब्द पूर्ववत् है ( निदरसणंएतो ३) और शब्द भेद भी दिखलाऊंगा इन तीनों के . उदाहरण विषय में कहते हैं। ( आकारांतो राया) प्राकृत में प्राकारान्त राया शब्द है और (इकारतो गिरीयसिहरीय) इकारांत गिरी शब्द और शिखरी शब्द हैं और (अकारांतो मिराहू दुमोउ) अकारान्त विराहू शब्द और दुमोऊ शब्द हैं (अंताउ पुरिस्ताणं ४) अंत में यह शब्द पुरुष लिंग में कहे गये हैं ४ अथ स्त्री लिंग के उदाहरणं कहते हैं (आकारता माला*) आकारांत शब्द स्त्रीलिंग में माला होता है और (कारत सिरीय लच्छीय ) ईकारान्त सिरी और लच्छी शब्द है चपादपूर- णार्थ में है (अकारांता जंवू बहूय ) ऊकारांत जंवू और वह शब्द हैं (अंताउ इत्यीणं ५ ) स्त्रीलिंग में उक्त वर्ण अन्तिम होते हैं ५ अव नपुंसक लिंग के उदाहरण दिखलाते हैं यथा-(अकारधिन्नं) अकारान्त धन और धान्य शब्द हैं (इकारंत नपुंसग अच्छिं) इकारांत नपुंसक लिंग में अच्छि शब्द है ( उका- शु-गामि हादि-विदि--का-मुधि-वचि-छिदि-मिदि-भुजा--बोधछ-छु शेच्छ बेच्छ छ- मोरोई-छ-मेछ- भोछ । चादीनां धातून भविष्यद्विषिीहतम्यन्तानां स्थाने सोच्छमियोनि पारयन्ते ॥ * ऋग्नेन्द्राम बनविभकुन चुबहरखुर भद्रोप्रभे र मेर शुक्र शुक्र गैरवन्नेरा माता ॥ उणादि पा० २५८i मायाने निपास्यमाल-माला सीलिंग सक् ॥
(१५६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * संत पीतुं मंहुच ) उकारान्त पीलु और मधु शब्द हैं (अंतानपुंसगाण) यह सर्व मधुसफ लिंग के अंत में वर्ण होते हैं (सेतति नाम) और यही तीन नाम का स्वरूप हैं। भावार्थ-तीनों नामों के अंतरगत तीनों लिंगों का विवर्ण किया गया है और इनके अंतिम वर्ण बतला कर इनके उदाहरण भी दिखलाए गए हैं अपितु यह सर्व प्राकृत के व्याकरण से ही रूप सिद्ध होते हैं क्योंकि पुल्लिंग में आका- रान्त ईरान्त उकारान्त और जकरांत यह चार शब्द बतलाए हैं किंतु अका- रान्त ऋकारांतादि शब्दों को ग्रहण नहीं कियागया इस से यह न समझ ली: निये कि प्राकृत भाषा में अकारांत शब्द होते ही नहीं अतः प्रथमा को ( अतः से डो) इस सूत्र से डोकार.आदेश होकर ओकारांत शब्द बन जाते हैं यथा धम्मो-घडो-पडो-इत्यादि इसी प्रकार पितृ शब्द को ( आसौनवा ) इस सूत्र से आकारान्त करने से पिया शब्द होजाता है यदि पितृ शब्द को (नाध्यरः) इस सूत्र से परकरेता फिर ( अनः सेडों) इस सत्र से डोकार आदेश कर के पियरो ऐसे शब्द बन गया इत्यादि-इसी प्रकार और भी शब्दों के रूपों को जानना चाहिये किन्तु स्त्रीलिंग में उकारांत शब्द नहीं हैं शेष सर्व शब्द होते हैं क्योंकि स्त्रीलिंग में जो धेनु आदि शब्द हैं उन को (अक्लीवेसौ ) इस सूत्र से, प्रथमा विभक्ति के एक वचन को दीर्घ हो जाता है तव प्राकृत में " घेणू" ऐसे प्रयोग बन गया इसलिये उकारांत शब्दों को छोड़ कर केवल सूत्र में उकारांत ही शब्द-ग्रहण किया गया है तथा सूत्र के लाघवार्थ भी यह कथन ठीक सिद्ध होता है और अंकारांत इकारान उकारांत यह तीनों शन्द नपुंसक लिंग के मंत में होने हैं अन तीनों लिंगों के भारत में उदाहरण निम्न प्रकार से हैं यथ. रा. जन् शब्द को संस्कृत के (न्यक् ) सूत्र से दीर्घ हो कर फिर (नः ) सूत्र से नकार का लोप होकर फिर राजा ऐसे प्रयोग बन गया अपितु (राजा) इस प्रा- कृत के सूत्र से राजा शब्द का "राया " ऐसे प्रयोग बन गयो सो यह शब्द आकारांत पुल्लिंग हो गया और इकारान्त गिरि शब्द है जिसको (अक्लीवेसो) इस सूत्र से दीर्घ होकर गिरी और शिखरी इत्यादि प्रयोग बन जाते हैं फिर उकरांत विष्णु शब्द को ( सूक्ष्म-श्नष्ण सं ह हक्ष्णराहः ) इस सूत्र से विराहु आदेश होकर फिर उक्त सूत्र से दीर्घ हो गया तव विराह ऐसे प्रयोग बन गया और इसी प्रकार संस्कृत द्रुय शब्द का प्राकृत' में दुयोर बन जाता है *.अनुयोगद्वार मूत्र - ( १५७) और स्त्रीलिंग के रूप निम्न प्रकार से है आकारान्तं शब्द स्त्रीलिंग में माला दयालता इत्यादि हैं क्योंकि अदंत ..शब्द. स्त्रीलिंग में होता ही नही अपितु. इकारान्त श्री शब्द को ( ई-श्री ही-कृस्त्रक्रियादिपृयास्त्रित ) इस सूत्र से सिरी ऐसे प्रयोग बन गया फिर (भक्लीसौ ) इस सूत्र से दीर्घ होकर सिरी प्रयोग सिद्ध हो गया और लक्ष्मी शब्द को (छोक्ष्यादौ ) इस मंत्र से लाच्छि शब्द, वनगया अपितु उक्त सूत्र से फिर प्रथमान्त करलेना' तब 'लच्छी' प्रयोग सिद्ध हो गया और अकारान्त जंबू वा वधू इत्यादि शब्द हैं और नपुंसकलिंग के.उदाहरण यह हैं अकारांत शब्द धन है जिस को (क्लीवेवरान्म से ) इस सूत्र से प्रथमा के एक बचन सि के स्थान पर यकार हो गया धन वा धनं ऐसे प्रयोग बन गये और इकारान्त शब्द अति है जिसके क्ष कार को ( छोक्ष्यादौ ) इस सूत्र से छकार होगया. है तब अच्छि ऐसे प्रयोग बन गया फिर पूर्ववत् प्रथमान्त करलेना चाहिये और रकारान्त पीलु और मधु शब्द हैं यह सर्व नपुंसकलिंग के उदाहरण दिखलाए गये हैं इस कथन से निश्चय होता है कि लिंगानुशासन द्वारा लिंग बोध अव- श्य होना चाहिए क्योंकि धर्मादि शब्द पुल्लिंग लक्ष्मी आदि शब्द स्त्रीलिंग धनादि शब्द नपुंसकलिंग यह सर्व. संक्षेप से विवर्ण किया गया है अब इसी की सिद्धि के वास्ते चार नाम के सूत्र में व्याकरण की सन्धि विषय में कहते हैं । ॥ अथ चार नाम विषय ॥ व्याकरण के संधि प्रकरण विषय । : सेकितं चउनामे चउबिहे पं० त० श्रागमेणं १ लोवणं २ पगइए ३ विगारणं ४ सेकिंतं आगमणं २ पद्मानिपयां सिसत्तं '१ लोर्मुदच ॥ उणादि प्र० अ० ३। सूत्र १६० ।। लक्षदर्शनाङ्कनयोः । चुरादिरायन्तः । अस्मादी प्रत्ययः अस्य मुहागमः । पिलोपः । लक्ष्मीः पनाविभूतिन । कृदिकारादितिहिपि लक्ष्मीत्यपि भवतीति दुर्घटे रक्षितः लक्ष्म्या अच्चेति पामादिराठात् न प्रत्ययो अकारान्ता देशश्च | लक्ष्मण: सुमित्रा पुत्रो लक्ष्मण सारसप्रिया इति उज्वलदत्त टीका ।। २ जैन शब्दानुशासन सम्पूर्ण वा उनके सम्वन्धि अन्य प्रन्थ अवश्य देखने चाहिये जिनसे उक्त सूत्रों को श्राशय सुगम होजावे।
( १५८ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * प्रांगणं सेकित लोवेर्ण २ ते पत्र तेच "पठो अत्र पठोत्र घटों अत्र घटोत्र से लोवेणं सेकिंतं पगइएणं २ अग्निएतो पटूइमो शोले एते माले इमे सेत्तं पगईए सेकिंतं विगारेणं इंडस्य अग्र दंडाग्रसाागता सागता दधिइदं. दधीदं नदीहह नदीह मधुउदकं मधूदक सेत्तं विगारेणं से चउनामे ॥ पदार्थ-( मेकित चउनामे २ चबिहे पं. त.) से शब्द भयं शन्द का बाची है इसलिये से शन्द पश्न की प्रादि में ग्रहण किया जाता है सो अब प्रश्न लिखते हैं (प्रश्न) चार'नाम' किस प्रकार से हैं (उत्तर) चार नाम चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-(आगमेणं ?) अक्षरों के भागम से जो.नाम पद बनाया जता है अर्थात वर्गों के आगम से पदबनता है इसी प्रकार (लावणं.) वर्गों के लोप होने से पद होता है ( पगईए ३) प्रकृति भाव से पद बनता है विगारेणं ४ ) अक्षरों के विकार होने से जो पदं बनता है सो इन्हीं का नाम चार नाम है अब सूत्रकार 'इनके उदाहरण देते हैं जैसे कि ('सेफित मागमेणं २)(प्रश्न) भागम से पद किस प्रकार से होता है (उत्तर) विभव्यत पद होता है और उसमें ही वर्ण का आगम हो जाता है जैसे कि-- (पचानि पयांसि ) पम शब्द है फिर " अश्शस:"शि इस सूत्र से नपुंसक लिङ्ग में प्रथमा विभक्ति के बहुवचन (जस् को.) शिका आदेश होगया फिर पम-शि इस प्रकार रूप होने पर शकार का लोप करके इकार मात्र रह गया तब पत्र.इ.ऐसे हुमा फिर “शावधः" इस, सूत्र से. पन शब्द को नम का आगम हुओ तब पम-नम्न इस प्रकार शन्द बना फिर अम् मात्र का लोप होने पर पन-न:इ.एसे पद रहा अपितु "न्यक् सूत्र से नकार से पूर्व पन शन्द का प्राकार दर्य होगया तब पद्यान्ह इस प्रकार से प्रयोग बन गया फिर "अन च शब्द रूपं पर वर्णमा श्रयेत् " इस पचन से पूर्ण प्रयोग बनगया हैं जैसे कि-" पधानि" सो यह नपुंसक लिंग के प्रथमा का बहुवचनान्त प्रद- । यह भागम होने पर पंद बना है इस का अर्थ है कि बहुत से पद्म हैं द्वितीय उदाहरण-पयस शब्द है फिर नपुंसक लिंग प्रथमा के बहुवचन के स्थानों परि " जस्" प्रत्यय को शिका आदेश होगया फिर इकार मात्र शेष रहा ३ शल चलने घमंतात् शाल शब्द सिद्धोभवति पश्चात्-स्त्रीलिंगे शाला इतिसिद्धम्। सा 4 * अनुगोगदार भूत्र * (१५१) तर यस्-इ इस प्रकार से रूप धना फिर " शावचः । सूत्र से नम्का आगम हुआ फिर भम् मात्र का लोप करके न्-कार शेष रहा तब-पय-=-स्-इ इस प्रकार से प्रयोग हुभा क्योंकि नम्का आगम भंते के अच् के पीछे होता है इसलिये इस प्रकार से प्रयोग बना फिर सूत्र से दीर्घ करके भनचकं शब्द रूपं पर वर्णमा श्रयेत् .इस पवन से परिपक प्रयोग बनगया तब " पंयांसि " यह रूप सिद्ध हुआ इसका अर्थ यह है कि बहुत जल है-वा बहुत ध हैं इसी प्रकार मन्य वर्गों के भी आगम होजावे हैं, जैसेकि-" डनस्वट सोऽश्च" इस सूत्र से तटमात्र का भागम होजाता है तथा सद् का आगम इत्यादि अनेक प्रकार के वर्षों का आगम होता है इसी लिये इसे आगम कहते हैं (सेतं आगमेणं). यही भागम वर्ण का सरूप है और प्रागम होने से ही पदवन जाता है। अब लोप वर्षों का विवर्ण किया जातां है। (सकित लोवेणं २)(प्रश्न) वर्गों के लोप होने से पद कैसे बनता (उत्तर) वर्गों के लोप होने से पद इस प्रकार से होता है जैसेकि (ते प्रत्र तेत्र पटौंअत्र पटोत्र ) तद् शन्द को "सोचात् " इस सूत्र से दकार मात्र को 'अत् हो गया तब " एदे" सूत्र से पूर्व अकार का लोप हो गया तब "" ऐसे भयोग बन गया फिर लिङ्ग में प्रथमा के बहुवचन जस् प्रत्यय को "जसः "शि " इस सूत्र से शिकार का आदेश हो गया फिर शिकार का लोप होकर :कार पात्र शेष रहा तब त-इ-ऐसे प्रयोग बन, गया अतः फिर"इक्येनत्र से सषि कार्य करके अर्थात् प्रकार वर्ण को इकार. वर्ण परवर्ती होने पर एकार होजाता है तब, "ते ऐसे प्रयोगवना फिर ते अत्र ऐसी स्थिति करने पर "पदों- न्तेऽतो " इस सूत्र से अत्र शब्द के अकार का लोय कर के "तेत्र, प्रयोग पन गया किन्तु जहां पर वर्णों का लोप किया जाता है वहां पर"" इसे 'प्रकार से एक चिन्ह भी करदेते जैसेकि "तेज" इसी प्रकार आगे भी जा- नना चाहिये, इसका अर्थ यह है कि वे यहां पर हैं इसी प्रकार "पटोभत्र" शब्द को " पदांतेऽत्येत् " इसी सूत्र से पटोत्र प्रयोग होगया. अर्थ यह है कि पख यहां पर है -तथा (घटोभत्र घटोत्र ) घटा शब्द प्रथमा का एक वचन है इसके सकार को "मजूरहस्सोऽतिप्यत्रसन्सु बन्सोरि इस सूत्र से सकार को रिकार होगया फिर इकार मात्र का लोपं करके शेष रकार रहगया फिर "प्र. वोदयः" इस, सूत्र कार को उकार होगया फिर " इक्वेडर " इस सूत्र १ ( १६० ) * अनुयोगदार सूत्र * से संधि कार्य करके घटोअत्र प्रयोग होगया फिर " पदान्तेऽत्येक" इस सूत्र अकार मात्र कालोप करके घटोत्र इस प्रकार से प्रयोग बनगया इसका अर्थ यह है कि-घट यहां पर है ( सेंचं लोवेणं ) इस प्रकार अन्य वौँ उदाहरण भी जानने चाहिये इसाका नाम लोप पद कहा जाता है अर्थात् वर्णो का लोष किया जाता है- अब प्रकृतिभाव का विवर्ण किया जाता है ।। (सेक्षित पईए२) (पश्न) प्रकृति भाव किसे कहते हैं ( उत्तर ) प्रकृतिभाव उसका नाम है जो संधिकार्य के माप्त होने पर भी संधि कार्य न किया जाय और इस, मकरण-को निषेध संधि भी कहते हैं अब इसके उदाहरण दिखलाए जाते हैं जैसे कि-(अग्नीए तोपडूइमा ) जो-द्विवचन होता है,उसको द्विवचन की क्रिया दी जाती है सो यह " अग्नि" इस प्रकार से रूप स्थित है फिर इसको प्रथमा के दिवचन की प्राप्ति होगई तब " अग्निऔ" ऐसे रूप वनगया फिर " इदुतो गिग्यौतोऽस्त्र" इस सूत्र से औ मात्र को गिकार का आदेश होगया फिर अग्नि-गि ऐसे सिद्ध हुआ फिर गकार की इत् संज्ञा करके शेष इकार मात्र रह गया तब अग्निन इस प्रकार से प्रयोग, वनगया फिर “ दीर्घः " इस 'सूत्रसे . दीर्घ करके तब अग्नी ऐसे परिपक प्रयोग वनगया सो यह प्रथमा का द्विवचन है इसको दिवचन की क्रिया करने से अग्नी एतौ ऐसे प्रयोग रकखां किन्तु अब इसको " अस्त्रे " इस सूत्र से संधि कार्य की प्राप्ति हुई थी अर्थात् इकार को यकार 'की प्राप्ति था किन्तु "गित" सूत्र से संधि कार्य का निषेध किया गया क्योंकि जिसका गकार इत्संज्ञक होजाता है फिर उसकी संधि नहीं की जाती इसलिये अग्नी एतौ, ऐसा ही प्रयोग बना रहा इसका अर्थ यह है कि यह दो अग्निवें हैं इसी प्रकार " पटु इमौ " पटु शब्द को " इदुतौ गिग्वौ तोऽस्त्रेः" इससूत्र -से पटु मंयोग बनगया फिर " पटुइमौ" पद रखने पर गितः सूत्र से संघि कार्य की निषेध किया गया क्योंकि यहां पर ". अस्वे " सूत्र की प्राप्ति थी किन्तु " गितः" सूत्रने संधि कार्य का निषेध कर दिया है इसका यह अर्थ है कि, यह दोनों बुद्धिमान हैं सर्व यह द्विवचनांव पद हैं इसी प्रकार ( शाले ए. ते माले एते ) यह स्त्रीलिंग को-द्विवचनान्त दोनों पद हैं इनकी सिद्धि निन्न मकार से, है:- यथा शाल शब्द को. अजाधताम् इस करके शाला.शब्द सिद्ध होता है यह एक वचनान्त शब्द है किन्तु. स्त्रीलिंग - . . सूत्र से-आडत * अनुयोगद्वार मूत्र * के प्रथमा के द्विवचन को " प्राडचौतोगीः" इस सूत्रं से गीकार आदेश :- गया फिर गकार की इत् संज्ञा करके शेष ईकार रह गया तब " इक्येडर् " सूत्र से संधि कार्य किया गया तब शाले एते यह भयोग सिद्ध होगया इसी प्रकार माले एते शन्द भी जानना चाहिये क्योंकि यह दोनों शब्द स्त्रीलिंग के द्विवचनान्त हैं (सेच पगईए.) इसे ही प्रकृतिभाव कहते हैं अपितु प्रकृति भाव के अन्य नियम प्राकृत भाषा के व्याकरण में देखने चाहिये क्योंकि वहां पर प्रकृति भाव के बहुत से सूत्र वर्णन किये गये हैं किन्तु यहां पर तो केवल उदाहरण मात्र ही कयन किया गया है और इनका अर्थ यह है कि दंशामाय हैं दो मालायें हैं यदि यहां पर प्रकृति भाव न किया जाता तक "एवोऽध्यय वापाव" सूत्र से संधि कार्य होजाता सो निपेध संधि के द्वारा संधि कार्य का निषेध होगया ।। अब विकार भाव का वर्णन करते हैं ।। (सेकिंतं विगारेणं २) (मन) वर्णी के विकार होने पर पद कैसे बनता है अथवा विकार करने से पदान्त कैसे होता है ( उत्तर ) वर्णों के विकार करने से जो पद बनते हैं उनके उदाहरण नीचे पदिये (दहस्य अग्नं दंडानं सा आगता सागता) यहां पर प्रकार को विकार होगया जैसे दंड-अग्रं-सा-भागता यह दो शब्द है इनको "दीर्घः"" इस सूत्र से दीर्घ होगया तब दंडाग्रं सागता यह दोनों प्रयोग सिद्ध हुए इनका अर्थ यह है कि दंड का जो अन भाम है उसी को दंडानं कहते हैं और स्त्रीवाची शब्द में सा-का प्रयोग होता है तब "सागता" शब्द का अर्थ यह हुआ कि- "वह आई" इसी प्रकार ( दघि इदं दधीदं ) यह दधि है इस अर्थ वाले शब्द को "दधि इदं को " दधीद" दीर्घः "सूत्र की प्राप्ति हुई तब उक्त भयोग सिद्ध होगया और ( नदिइह नदीह ) नदिइह शब्द को भी" दीर्घः "सूत्र से नदीइ होगया अर्थात् यह नदी है फिर ( मघुउदकं ) (मधूदकं ) मधुउदकं शब्द को" दीर्घः "सूत्र से ही बनगया अर्थात् मधुरूप पानी है (सेचं विगारेणं ) इसी को विकार कहते हैं क्योंकि सबी वर्ण को दाता की प्राप्ति होती है और इसी को विकार के नाम से सूत्र ने सिद्ध किया है यदि असवर्णी वर्गों की प्रालि हो तो नयु वर्णस्यास्व" इस सूत्र में संधि कार्य नहीं होता अर्थात् दीर्घादि कार्य नहीं होते तथा "एदोतोः स्वरे "स्वरस्योद्धृते" "त्यादेः" इत्यादि • दीपः शा व्या० म.पा. सू० ७७ ॥ भकः स्थान परेणा चा साहितस्य तदा सलोषों नित्यं भवन्याच परे, इंदाग, सागता, मुनीन्द्र । नदीय । मध्दक वधूदरं । पितृपयः ।।
(१६२) * अनुयोगद्वार सूत्र * मूत्र संधिकार्य के निषेध-कर्ता हैं अतः ऋकार का प्रयोग सूत्र में इसलिये नहीं दिखलाया कि ऋकार के स्थानों परि इकार अकार उकार आकार इत्यादि आदेश होजाते हैं यथा एक उदाहरण देखिये "महा ऋषि" ऐसे रूप स्थित है. तब इसको " इत् कृयादौ " इस सूत्र से ऋकार को इकार होगया तब " महाइषि.ऐसे प्रयोग बनगया-फिर " शषोस: " सूत्र से मुर्धन्य प्रकार को दंती सकार होगया तव महाइसि इस प्रकार से प्रयोग बनगया फिर इक्येकर " सूत्र से संधि कार्य करने से अर्थात् अकार को परवर्ती अच् के साथ, ही एकार, होगया तब-महसि ऐसे प्रयोग- वनगया फिर " अक्लीवेसौ" सूत्र से 'प्रथमान्त शब्द दीर्घ होकर " महेसी" इस प्रकार से रूप बना सों इसी प्रकार अन्य भी रूप जानने चाहिये (सेतं चउनामे ) यही चार नाम का स्वरूप है और इसे ही चार नाम कहते है अथ शब्द पूर्ववत है ।। भावार्थ-चार नाम चार प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि-आगम ! लोप २ प्रकृति भाव ३ विकारं ४ आगम नाम उसे कहते हैं जो वर्षों के भागम से पदवनते हों जैसेकि-" पद्मानि" "पयांसि " यह नपुंसकलिङ्ग के प्रथमा- न्त बहुवचन हैं इनका नम् का भागम हुआ है सो इसी को आगम नाम कहते हैं लोप नाम यह है कि-तेअत्र-तेऽत्र-पटोअत्र-पटोत्र-घटोअत्र-घटोत्र इनमें पदा न्त से परवर्ती प्रकार मात्र का लोप किया गया है और " पदान्तेऽत्येङ " सूत्रकी सर्वत्र प्राप्ति है सो इसीको लोप नाम कहते हैं क्योंकि अंकार मात्रका लोप किया गया है अतः प्रकृति भाव उसे कहते हैं-जिन शब्दों को संधि का- र्य की प्राप्ति भी होजावे फिर भी वह शब्द वैसे ही बने रहे किन्तु संधि न की जावे उसे प्रकृति भाव कहते हैं जैसंकि " अग्नीएतौ " पटूइमौ ""शागले- एते""मालेइमे " इन शब्दों को "अस्वे " सूत्र से संधि कार्य प्राप्त था भ- पितु किया नहीं गया क्योंकि यदि संधि कार्य करते तत्र " अग्नीतौ " ऐसे अयोग वनजाता इसलिये यह सर्व द्विवचनांत शब्द प्रकृति भाव में रहते हैं और संधि प्राप्त होने पर भी संधि कार्य नहीं किया जाता सो इसी का नाम प्रकृति भाव है ॥ विकार का यह अर्थ है कि यदि दो वर्ण सवर्णी एक रूप हो जाये , तब उनको परस्पर मिलाकर दीर्घ किये जायं उसीको विकार कहते हैं जैसेकि दंड-अग्रं-यह, शब्द है और कार में प्रकार है सो अग्र शब्द के प्रकार के साथ उसको दीर्घ किया जाता है तब "दंडा" यह प्रयोग वनगया इसी प्रकार * अनुयोगद्वार सूत्र ( १६३ ) सा-श्रांगता-सागता । दधि-इदं-दधीदं । नदी-इह-नदीह । मधु-उदकं मधू दकं । इत्यादि रूप सिद्ध होते हैं यह सर्व वर्ण स्वजाति वाले वर्षों के साथ दीर्घता को प्राप्त होगये हैं सो इन्हीं को विकार नाम से कहते हैं यह सर्व व्या- करण के प्रयोग हैं इनके वर्णन करने का मुख्य प्रयोजन यह है कि सर्वनाम चार प्रकार से ही होते है क्योंकि कोई आगम से पद बनता है कोई लोप से २ कोई प्रकृति भाव से ३ कोई विकार से ४ जब इनका पूर्ण बोध होजावे तय ज्ञान के चतुर्दश ढोष सुगमता से दूर होसकते हैं क्योंकि -"हीणक्खरं अच्च- क्खरं पयहीणं" इत्यादि यह ज्ञान के दोप बतलाये गये हैं किन्तु जो व्याकरण के शेष प्रकरण है उनका संपता से विवर्ण पांच नाम में किया गया है इस लिये अब पांच नाम का विवर्ण करते हैं । ॥ अथ पांच नाम विषय ॥ सेकिंतं पंच नामे २ पंचविहे पं० त० नामिकं १ नैपातिक २ आख्यातिकं ३ श्रीपसर्गिकं. ४ मित्रंच ५ अश्वइतिनामिक १ खल्वितिनैपातिकं २ धावतीत्याख्यातिक ३ परीत्यौपस-.. गिकं ४ संयतइतिमि ५ संत पंच नामे ।। पदार्थ-(सकिंत पंच नामे २ पंचविहे पं० त०) अब शिष्य फिर प्रश्न करता है कि हे भगवन् ! पांच नाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है इस प्रकार से शिष्य के प्रश्न को सुन कर गुरुने उत्तर दिया कि भोशिष्य ! पांचनाम पांच प्रकार से वर्णन किया गया है जैसेकि-(नामिकं ) जो नाम (नाममाला) श्रादि कोशों में वर्णन किये गये हैं उनको नामिक कहते हैं तथा नाम.शब्द प्रकृति का नाम भी है क्योंकि प्रकृति से परे ही प्रत्ययों की संयोजना की जाती है सो जो प्रकृति में ही आकृति रहे उसको नामिक कहते हैं द्वितीय (नैपातिक) जी' निपात में वर्णन किये गये हैं उनको नेपातिक शन्द कहते हैं तृतीय ( आख्या- तिक) जो पाख्यात में शब्दों का विवर्ण किया गया है उसकौ भाख्यातिक कहते हैं। चतुर्थ (औपसर्गिक ) नाम जो उपसर्गों में वर्णन किया गया है उसको औप- १ समास तित्ति २ धातु ३ निरुक्ति ४ इनका विवर्य भागे किया जावेगा ।। नोट १४,प्रासन्य प्रायशार्थ प्रतिस्प च निषेधाम निपातनामिति मध्यसमा (१६४ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * सर्गिक कहते हैं पंचम (मिश्रंच ) नाम मित्र होता है जो उपसर्ग धातूक्त आदि प्रत्ययों द्वारा सिद्ध होता है उसको मिश्र नाम कहते हैं अब सूत्रकार इनके उदाहरण दिखलाते हैं ( अश्व इति नापिकं ) अश्व इस प्रकार से एक नाम है फिर इसको प्रकृति रूप स्थापन करके प्रत्ययों की संयोजना करनी चाहिये जैसक अषः, अश्वौ, अश्वाः, अश्व, अश्वौ, अश्वान् इत्यादि सातों विभक्तियों के रूप जानने चाहिये इसी प्रकार पुरुष धर्म वृक्ष घटपटादि सर्व नाम प्रकृति रूप होते है फिर यह प्रत्ययों के लेगाने से विभक्तियांत पद होजाते हैं सो जो नाम (ना- म मालादि ) कोशों में पन किये गये हैं उनको नामिक कहत है जिसको उदाहरण सूत्र में अश्व शब्द से सूचित किया गया है अश्व शब्द गोडेको वाची है १ अब निपातका उदाहरण देते हैं ( सन्विीत नैपातिकं २ (खलु आदि नेपातिक शब्द हैं और इनके अंतरगत ही अव्यय प्रकरण है क्योंकि जो शब्द तानो लिंगों और सातों विभक्तियों और सर्व वचनों में एक समान रहे उस शब्द की अव्यय.संज्ञा होती है । निपात उसको कहते हैं जिसका सूत्रों द्वारा कुछ और रूप सिद्ध होता हो किन्तु निपात करके उसका वही रूप रखा जाए चही नैपातिक होना है २ और जो क्रिया के वोधक पद हैं उनको आख्यातिक पद कहते हैं जैसे कि-( धावत्ति त्याख्यातिकं ३ ) धावति यह क्रिया पद है यथा अमुक पुरुषः धावति अमुक पुरुष भागता है इसकी सिदि निम्न प्रकार से हैं । सर्ने धौवेगे । शाक। ४ । पा० २। सूत्र० • ५६ । इस सूत्र से सृगतौ धातु को "धौ" आदेश होगया फिर " क्रियायों धातु " इस सूत्रसे शतु संज्ञा वांधकर फिर " सति" शा० । अ० ४। पा०३ । सू० २१७ । इस सूत्र से वर्तमान काल में लट् का आगम हुआ फिर लट् के स्थान पर " लोऽन्ययुष्मदस्मासु तितसझि सिप्यस्थ मिब्बस् भस् " इन प्रत्ययों की प्राप्ति हुई अपितु इनके अन्य पुरुष, मध्यम पुरुष, उत्तम पुरुष, तीनों भेद करके फिर एक २ के तीन २ वचन करने चाहिये अतः " धौति" इस प्रकार से अन्य पुरुष के एक वचन को फिर " कर्तरिशप" ।। शा० । अ० ४ । पा०३ । सू० २० इस सूत्र से शप का विकर्ण:हुआ अतः शपावितौ कर के शेष आकार रहा तब "धी-अ-ति" इस प्रकार से.रूप-वना नव " एचोऽच्ययवाया " शा० अ० १ पा० १ मूत्र ६इस सूत्र से औकार को श्राव आदेश कर के फिर अनचक् शब्द रूप पर वर्णमाश्रयेत् इस वचन से सनिकर्ष करना चाहिये तव धावति * अनुयोगद्वार सूत्र * (१६५ ) ऐसे एक क्रियापद सिद्ध हुआ भपित, धावति-धावतः-धावन्ति, यह तीनों व- चन अन्यपुरुष के हैं और धावसि-धावयः धावय-यह तीनों मध्यम पुरुष के है और धावामि-धावावः-धावामः यह तीनों उत्तम पुरुष के हैं सो इसी प्रकार दशों लकारों में सर्व किया पदों के रूप जानने चाहिये अतः इसी को आख्या- तिक पद कहते हैं और आख्यातिक पद में सर्वगण सर्वा प्रक्रियाएं लकारादि सर्वगर्भित हैं किन्तु सूत्र में केवल उदाहरण मात्र ही एक प्रयोग दिखलाया गया है भव औपसर्गिक पद का विवर्ण करते हैं यथा, (परीत्यौपसर्गिक ४) प्र, पर, अप, सम्, अनु, अव, निर्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, भपि, अति, सु, उत्, भभि, पति, परि, उप, यह उपसर्ग हैं और यह नाना प्रकार के अर्थों में प्रयुक्त होते हैं सो परि आदि उपसर्गों से युक्त जो पद कहे गये हैं वह औपसर्गिक पद है अनः उपसर्ग के सम्बंध होने पर धातुओं के अर्थों का भी परिवर्तन होजाता है यथा, आहार, विहार, संहार, महार इत्यादि प्रयोगों में अर्थों का परिवर्तन होता है इसलिये उपसर्गों का विशेष विवर्ण उपसर्ग इत्यादि व्याकरण प्रयों से देखना चाहिये मूत्र में केवल एक उदाहरण दिखलाया गया है किन्तु परि उ- पसर्ग " परिसंमंत्तोभाव व्याप्ति दोपाख्यानो परम भूषण पूजा वर्जन लिंग ननि वसन व्याति शोक वीप्सासु" इन द्वादश अर्थों में वृत्रहत होता है इसलिये उपसर्गों में रहने वाले पद को औपसर्गिक पद. कहते हैं अब मिश्रज पद का विवेचन करते हैं (संयतइतिमि ५) मिश्रन नाम उसको कहते हैं जो दोतीन प्रकरणों से मिलकर शब्द वनता हो जैसेकि सम् उपसर्ग है यमु उपरमै धातु हैं कृदन्त कक् प्रत्यय है सो तानों के मिलने से "संयत" शब्द वनगया है इस लिये इसको मिश्रन नाम कहते हैं ( संत पंचनामे ) सो यह पांच नाम का स्वरूप पूर्ण होगया है और इसको पांच नाम कहते हैं। १ परिएतेषु द्वादश म्बर्थेषुवर्तते । समन्त तो भावे परिम् ठमति ! व्यान परिमतोसिनायामः । दोषाल्याने परिभवति देवदत्तः । परमेपरि पूर्णे घट | भूषणे परि करोति कन्याम् । पूजायां परिचारायति गुरुन् । वर्जने परित्रिगर्तेभ्यो घृष्टोदेवः । भलिङ्ग परिष्वजते कन्याम् । निवसने परिदधाति । व्याप्ती परि वाहकः। शोके परि दाव्यति । वशिायां वृक्षं वृक्ष परि सिंचति । सो यह द्वादश अथों में परि उपसर्ग व्यवहत होते हैं इसी प्रकार अन्य उपसर्ग भी नाना प्रकार के अधों में व्यवहत होते हैं फिर उनका उसी प्रकार से अर्थ किया जाता है इसलिये सूत्रमारने मोपसर्गिक पद उसेही बतलाया है जो पद उपसगों के अंतर्गत रहनेवाला हो ।
* अनुयोगद्वार मूत्र * भावार्थ-पांच नाम पांचों प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जो कि नामिक १ –पातिक २ आख्यातिक ३ औपसर्गिक ४ और मिन्नज ५-नामिक उसे कहते हैं जो मूल प्रक्रति रूप होवे जैस अश्व शब्द के रल प्रक्रति रूप फिर इसको विभक्तियों द्वारा पद किया जाता है नपातिक प्रयोग खल्वित्यादि है जो स्वयमेव होने वाले हों उस नेपातिक पद कहते हैं आख्यान वृति से आख्यानिक पदों का भलीभांनि से बोध हो जाता है जैसे धापनि इत्यादि यह क्रिया पद है इनके द्वारा क्रिया पदों का ज्ञान ठीक होता है यथा स धापति तौ घावनः, ते धारन्ति, त्वं धावसि, युवाम् धावथः ,युयम् भावय, अहं -धावापि, भावाम् धावावः , वयं-धावामः । अर्थात् वह भागता है वह दो भागने हैं, वई बडुन से भागते हैं, तूभागता है, तुम दोनों भागते हो, तुम सब भागते हो, में भागता हूं. हम दो भागते हैं हमसब भागते हैं इत्यादि यह सब आख्यानिक पद । 'जो उपसगों द्वारा मिद्ध हो उसे भोपसर्गिक पद कहा जाता है अनः जो कनिषय प्रकरणों से सिद्ध हो उसे मिस्त्र नाम कहते हैं जैस संयन शब्द है सो यही पांच प्रकार के नाम हैं किन्तु तीन नाम चतुर्नामि पांच नाम इनमें केवल व्याकरण का स्वरूप दिखलाया गया है इस लिये सूत्रकारका आशय सिद्ध होता है कि शन्द शास्त्र (व्याकरण), अवश्यमेव पठन करना चाहिये और साथ ही जैन न्याय.(तर्क ) शास्त्र का भी चौध होना चाहिये इसलिय जो जैन व्याकरण है उनमें ययाशक्ति परिश्रम करना वह शास्त्र-विहिन है क्योंकि श्री प्रश्न व्याकरण मूत्र के द्वितीय श्रुत स्कंध के द्वितीयाध्याय में लिखा है कि तयाच पाठः। मूल-नामक्खायं निवात उवसम्गतड़िय, समाससंधिप- यहे उजोगिय उणाइकिरिय -विहाण धातुसर विभत्तिवणजुत्तं- तिकालं दशविहंषि सच्चं जहभणियं तहयकम्मुणाहुँति दुवा-. लस्सविहायहोइ भासावयषंपिय होइ सोलस्स विहंएवं घर- इंतमगुणाय ॥ टीका-तथा नामाख्यात निपातोपसर्ग तद्धित संमास संधिपद हेतु योगिकी णादि क्रिया विधान धातु स्वरविभक्ति वर्णयुक्तमिनि तत्र नामति पदं शब्द सम्ब- न्यानाम पदमंत्र मुत्रत्तापितचा व्युत्पनेनर भेदात् द्विधानत्र व्युत्पन्नं देवदत्तादि - * अनुयोगदार सूत्र ( १६७ ) अव्युत्पनंडित्थेत्यादि आख्यातिपदं साध्यक्रिया पदं यथा अकरोत् करोति क- रिष्यत्ति तत्तदर्थद्योत नाय तेषु तेषु निपन्ती तिनिपाताः तत्पदं निपातपदं यथा वाचा खरिखत्यादि उपसृज्यंते धातु समीपे युज्यंते इत्युपसर्गास्तद्रूपं पदमुपसर्गपदं अपराऐत्यादिवत् तस्मैहितं तद्धितमित्यान्वर्थाभिधाय काये प्रत्ययास्तेतद्धिताः तदन्तपदं यथा गोभ्योहितोगव्योदेश: नाभरपत्यं नाभेय इत्यादि समसनं समास: पदानामेकी करण रुपः तत्पुरुषा दिस्तत्पदं समासपदं यथा राज पुरुषेत्यादि संधिः सन्निकर्पस्तेन पदं यथा दधीदं नडुपेत्यादि तथाहेतु साध्या विना भूतत्त्व लक्षणा यथा नित्यः शब्दः कृतकत्वादितियोगिकंयदेतेपामेवदुव्यादिसंयोगव- तयथाउपकरोतिसेनयाभि याति अभिषेण्यतीत्यादि तथा उणादिउणप्रभूति प्रत्ययान्तपदं यथा आशुस्वादु तथा क्रियाविधानं सिद्ध क्रिया विधेः कान्तम- त्ययान्तपदविधेरित्यर्थः यथा पाचकः पार्क इत्यादि तथा धातवोभ्वादयः क्रि- यापतिपादिकाः स्वरा अकारादयः खगादयोवासप्तकचिद्रसाइतिपाठः तत्रर- सा:शृङ्गारा देयो नवेयदाह शृङ्गारहास्य करुणारौद्र वीरभयानका वीभत्साद्भुत शान्ताश्चनव नाव्यरसास्मृताः विभक्तयः प्रथमाद्याः सप्त वर्णा ककारादि व्यञ्जनानिएभियुक्तंयत्तत्तथा अथ सत्यं भेद तमाह काल्यं त्रिकाल- विशयं दश विधमपिसत्यं भवतीति योगः दश विधत्वंच सत्यस्यंजन पद सम्मत सत्यादि भेदात् आहच जणवय १ संमय २ ठवणा ३ नाम ४ रूबे ५ पडच्च ६ सच्चेयववहार.७ भाव - जोगे ६ दशमेउवम्म सच्चेयत्ति तत्र जन पद सत्यं यथा उदकार्थे कोंकणादि देशरूढथापय इति वचनं संमत सत्यं यथा समानेपि,पङ्कसम्भवे गोपालादि नामपिसम्मतत्वे नारविन्द मेव पङ्कजमुच्यते न- कुचलंयादीनि स्थापना सत्यं प्रतिमादिषु नामसत्यं यथा कुलमवर्द्धयन्नपि कुल- वर्द्धन इत्युच्यते रूपसत्यं यथा भावतो असमणो पितद्रूपधारि श्रमण इत्युच्यते प्रतीतसत्यं यथा अनामिका कनिष्टकां प्रतीत्यदीर्घत्युच्यतसवमध्य मांप्रतीत्य - स्वेतिव्यवहारसत्यं यथा गिरिततृणादिपुदह्यामानेषु व्यवहारादिरिदह्यते इति भाव- सत्यं यथा सत्यपिपञ्च वर्णत्वे शुक्लत्वळक्षण भावोत्कटत्वाच्छुल्ला बलाकेति योगसत्यं यथा दण्डयोगाहण्डेत्यादि औपम्यसत्यं यथा समुद्रवत्तड़ाग इत्यादि तथा जहभर्णियत वहयकम्मुणाहोइचि यथा येनप्रकारेण भाणितं भणन क्रियादश विधसत्यंसद भूतार्थतयाभवति तथा तेनैव प्रकारेणकर्मणा वातरलेखनाति क्रि-. - ययासद्भूतार्थ ज्ञापने सत्यं दश विधमेव भवतीति अनेन चेदमुक्तं भवति न केवलं 1 (१६८) * अनुयोगदार सूत्र * सत्यार्थ वचनं वाच्यं इस्तादि कर्माप्य व्यभिचार्याय सूचकमेवे मुभयत्राप्य व्यभि- चारि तथा पराभ्यसनस्या कुटिलाध्यवसायस्यच तुल्यत्वादिति तथा दुवाल स- विहाय होइ भासत्ति द्वादश विधाच भवति भाषा तथाच पाकृत संस्कृत भाषा मागध पिशाचसूरसेनीचे षष्टोत्र भरि भेदो देश विशेषादपभ्रंशः इयमेव पविधा नाषा गद्य पच भेदेन भिया माना द्वादश धामस्तीति तथा वचन मपिषोडश विध भवति तथाहि वयणतियं ३ लिंगतियं ३ कालतियं ३ तहपरोक्ख पच्चास उवणीसाह चउकं अज्झत्यं चैवसौलसमं तन दचनत्रयं एक वचन द्विवचन बहु वचन रूपं तथा धर्मः धर्मों धर्माः लिंगक्रिकं त्री पुनपुंसक रूपं यथा कुमारि वृक्षा कुण्डं कालत्रिकमतीतानागत वर्तमान कालरूपं यथा अकरोत् करिष्यति फरोति प्रत्यक्षं यथायं एपः परोक्ष यथा :सातथाउपनीत वचनंगुणोप नयन हो यथा रूपवानयं अपनीय वचनं गुणाय नयन रूपं यथा दुःशीलोयं उपनीताप- नीत वचनं यत्रैकं गुण मुपनीय गुणान्तर मपनीयते यथा. रूप वानपं किन्तु दुःशीलः विपर्ययेणत्वऽपनीतोपनीत वचनं तद्यथा दुःशीलोयं किन्तु रूपवान् अध्यात्म वचनं अभिमतमर्थगोपयितु कामस्य सहसा तस्यैव भणन मति एवं मितिउक्त सत्यादि स्वरूपाव धारण प्रकारेण अहदनुज्ञातं ।। भावार्थ-नाम पद उसे कहते हैं.जो विभक्ति से रहित हो किन्तु कतिपय व्याकरणों में नाम पदकी प्रकृति संज्ञा बांधी हैं और प्रकृतिसे परे प्रत्ययों की संयोजना की है जैसे कि-धर्म शन्द को पुल्लिंग में सातों विभक्तियों से इस मकार साधन किया * "अव्ययात्स्वोजस्"" एकविहो" इन शाकटायन व्याकरण के सूत्रों का यह आशय है कि अन्ययसेपरेसु-औ, नस् । की प्राप्ति होती है फिर उनके यथाक्रम एकवचन द्विवचन, और बहु वचन किये जाते हैं किन्तु उकार और जकार की इतसंज्ञा है अतः जिसकी इद संज्ञा होती है उसका लोप होजाता है तक, स, आ, ऽस्, ऐसे प्रत्यय रहते हैं "मत्ययः कृतोऽषश्याः " शा० अ० २।पा। सू०४१। इस सूत्र से प्रत्यय संज्ञा की गई है किन्तु " परः" ११ ११४४। प्रत्यय प्रकृति से परवर्तीही होते हैं जैसे कि धर्म शब्द तो प्रकृति रूप है सब धर्मस्, धर्म औ धर्म अस्, ऐसे एकत्रचन द्विवचन और बहुवचन किये गये फिर “ सुङपदम् १। श६२। इस सूत्र से सुवन्त और तिङन्त के प्रत्यय लगने से पद बन जाता है तब " धर्म स्" ऐसे शब्द के सकार को " सजू रहस्सो ऽतिप्पक सन्सुध्वन्सोरिः" * यह अधिकार सूत्र है मत्या सूत्र * अतुयोगद्वार, सूत्र में (१६६) "" ' १११।७२। इस सूत्र से रिकार किया गया फिर इकार के इत् संज्ञा करके " पदान्ते विसर्जनीयः शश६७। इस सूत्र से रेफ की विसर्ग, की गई तइ धर्मः, | ऐसे प्रयोग सिद्ध होगया और धर्म औ शब्द को एजू च्यै ॥ १।११८२। दूज से संधि कार्य करके "धौं " प्रयोग सिद्ध होगया और धर्म अस् शब्द को, "एदे " 1१।२।१०६। सूत्र से प्रकार के लोप की माप्ति थी किन्तु भत्या" ।१।२।१६२॥ सूत्र से अत्मात्र को आतु होगया फिर इस के अकार को " दीर्घः". से दीर्घ किया गया और सकार को रिकारादेश और रेफ को विशनीय पूर्व सूत्रों से करलेने चाहिये तव " धर्माः " ऐसे प्रयोग प्रथम विभक्ति के पद बचन का सिद्ध होता है। यदि कार्यान्तर में कोई व्यक्ति व्याप्त हो इसका अपने सन्मुख करना होतो उसको सम्बोधन कहते हैं और उसकी विवक्षायें आपन्व्ये १३शा सूत्र से सु औजस । एकत्वादि संख्या में प्रत्यय लगाये. जाते हैं फिर हस्खोऽनित्याठ॥१।२।१२२॥ सूत्र से एक वचन में सुका लोप करके और सम्बोधन में हें शब्दका प्रयोग करना चाहिये तब हे धर्म, इधर्मों इधर्माः ऐस प्रयोग बन जाते हैं और "क.. मणि" १।३ । १०५ । सूत्र से क्रिया विपर में कर्म होता है सो कर्म में अम् भोर शस्, यह प्रत्यय लगाये जाते हैं जिसमें ट और शकार की इसंज्ञा होती है फिर "'मोऽणोऽमः । १।२।। ३६ । सूत्र से अम् मात्र के प्रकार को मकार होगया फिर " पदस्य " १।२।१२। सूत्र से पदकी ही लुकी प्राप्ति होती थी किन्तु "शष्टयाः स्थानऽतेऽल । ११ । १७ । इस सूत्रों, अन्त के वर्णका लोप किया जाता है तब " धर्मम् " ऐसे प्रयोग सिद्ध होगया फिर धर्म औ शब्द की पूर्ववत् एच् करना चाहिये तब धर्मोप्रयोग सिद्ध हो- गया और " नन्तः पुंसः" १.१ ७६ 1. शस् के स्थान पर साथ अनान्त शब्द होजाता है तब धर्मान ऐसे रूप सिद्ध हुआ और तृतीया विभक्ति के " दाभ्यां मिस्सिद्धौ " सूत्र से यभ्याम् मिस प्रत्यय होते हैं और-" हेतु कर्तृ- करणेत्यं भूतलक्षणे"।१।३। १२८ । हेवादि कारणों में तृतीयाविभक्ति ।
1 (१७०) * अनुयोगद्वार सूत्र होती है फिर " डसास्येस्स्ये नाधम् ॥ १.२ । १६५ । इस सूत्रसे टा मात्रको इन आदेश होगया फिर " अभिने" इस सूत्रसे नकार को णकारादेश होगया' किन्तु "चुल्दुस्तौनान्तरे " १।२ । ५१ श-और च वर्गमें ल-और वर्ग में स और तवर्ग में न को णकारादेश नहीं होता फिर “ इक्य " सूत्रसे' एङ् करने से " धर्मेण " ऐसे प्रयोग सिद्ध हुआ और भ्याम् प्रत्यय के परे होने से " भ्यत्याः " सूत्रसे दीर्घ होकर धर्माभ्याम् रूप बनगया फिर ऐस्भि- सोऽद्मशः । १।२ । १६४ । इस सूत्र से भिस् मात्र को ऐसादेश होगया फिर ऐचादेश करने से और सकार को रिकारादर्श रेफ को विसजर्नीय तब परिपक, प्रयोग धर्मैः सिद्ध हुआ फिर "भ्यां भ्यस्"।१३ । १३४ । सूत्रसे च. तुर्थी को उक्तप्रत्ययों की प्राप्ति हुई फिर सत्यादि सूत्र से कोयकरादेश होगया. और भ्यत्याः सूत्रसे धर्म शब्दका अकार दीर्घ होगया तर एकवचन में धर्माय द्विवचन में धर्माभ्याम् प्रयोग सिद्ध हुए और वहुवचन में वहोसिस्भ्येत् । १.. २ । १६३ । सूत्रसे एकार की प्राप्ति होती है तब धर्मेभ्यः ऐसे प्रयोग बनजाता है " अगायेऽवधौ " ११ । ३ । १५६ इस सूत्रसे पांचवीं विभक्तिः की सिद्धि होती है और उसिभ्यां. भ्यम् प्रत्ययों की प्राप्ति है फिर डितावितौ करके उसेत्यादि सूत्र से छसि को प्रात् का आदेश होजाता है फिर उसे " दीर्घः" सूत्र से दीर्घ करलेना चाहिये फिर " चर्जश" सूत्र से विराम में जश् को चर भी होजाता है तब धर्मात् वा धर्माद ऐसे प्रयोग वनजाते हैं और भ्याम् परवर्ती होने पर माग्वत् ही कार्य किया जाता है और भ्यास को भी पूर्ववत् ही कार्य होता है तब धर्माभ्याम् धर्मेभ्यः प्रयोग सिद्ध हुए और उसो- साम् । १।३ । १६२ । सम्बन्ध में पष्टी होती है उसके प्रत्यय डस् श्रोस् आम हैं फिर उसेत्यादि सूत्र से उस्को "स्प का आदेश होजाता है तब धर्मस्य'- प्रयोग सिद्ध हुआ फिर प्रोस्परे होने पर एवं होगया फिर एचोऽध्ययवायाय' । १ । १ । ६६ । सूत्र से अया देश किया गया फिर सकार को पूर्ववत् कार्य करने से धर्मयोः प्रयोग सिद्ध होगया और नम्हस्वादसाटः । १।२।३३।' , .
* अनुयोगद्वार सूत्र ( १७१ ) इस सूत्र से माम मात्र को नाम् आदेश किया गया फिर ".नाम्यतिसूचतुष्पा १ १२ । १४० । सूत्र से पूर्वअक् दीर्घ किया तब धर्माणां प्रयोग सिद्ध होगया और "आधारे । १ । ३ । १७५ । सूत्र से आधार में सातवीं विभक्ति होती है उसके डिभोर और सुप् प्रत्यय हैं जिनको पूर्व सूत्रों से ही धर्षे धर्मयोः धर्मेषु प्रयोग पनाये जाते हैं। सो इसीप्रकार वृक्ष घटपट कुंभादि शब्दों को भी जानना चाहिये इस प्रकार नाम शब्दको-विभक्तयन्त करना चाहिये सो यही नाम शब्द है और आख्यात प्रकरण में सर्व धातुः प्रक्रियागणादि का समावेश है और धातुऐं भी परस्मैपदी आत्मनेपदी और उभयपदी आख्यात प्रकरण में ही कथन की गई है और धातुओं को क्रिया पद भी कहते हैं और दश ही लकारों में अन्य पुरुष मध्यम पुरुष 'उत्तम पुरुष गिने जाते हैं इसलिये आख्यात प्रकरण का ठीक २ बोध होना चाहिये और निपात उसे कहते हैं जो अप्राप्ति की करे और प्राप्ति का निषेध करे वही निपात होता है जैसेकि खल्वा- दि शन्द हैं और विंशति उपसर्ग गण है अपरादि उपसर्ग के बल से धातु के अर्थ में भी परिवर्तनता होजाती है जैसेकि-आहार विहारादि शब्द हैं दद्धित भकरण में अनेक प्रकार के मत्ययों का विवर्ण है जैनः नामेयः वैयाकरणः सौगतः शैवः वैष्णवः अकारः इत्यादि शब्द सर्व तद्धित प्रत्ययान्त हैं और पद प्रकार के समास होते हैं । जिनके वोध से समासान्त पदोंका ज्ञान भली प्रकार होजाता है और संधि प्रकरण से संधि ज्ञान होता है किन्तु संधियें पांच प्रकार से प्रतिपादन की गई हैं जैसे कि अच्संधि- अचों के साथ अचों का मिलजाना उसे असंधि करते हैं जैसे कि नयन, लवन, रायो, नावा दध्यत्र, शम्पत्र, मध्यपनय, वधानेनं, पित्रर्थः लाकृति, महऋषि दंडाग्रसुनीन्द्र, मधुकर पिवृषभः देवेन्द्र, एहि गंधोदकम् मालोय, महर्षि, तवैवा, तबौदनं, प्रौढः प्रैषः स्वैरिणी प्रक्षोहिणी ताकारः विम्बौष्टी सुखातः मार्यम् -- ( १७२ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * भानोति, पयति, तेऽत्र, पटोऽत्र, गाग्रं, गवेश्वरः गवेन्द्र, गवाक्षः इत्यादि सर्व अधि के हैं निषेधसंधि- प्लुत शब्द के परे होनेपर संधि कार्य नहीं किया जाता किन्तु यह नियम इति शब्द के परे होनेपर नहीं है जैसेकि सुश्लोका-३ इति तव सुश्लोकेति भी बन जायगा । और मुनीइमों, साधूएतौ अमीअत्र, अमूआसाते । खट्वेअत्र कुलेइये । पचेतेअन्न पचेथेअत्र पचाचहेअत्र, अं अपेहि । इ इन्द्रंपश्य । उ उत्तिष्ट भाएवं मन्पसे । आएवकिलंतत् । अहिष्णम् ओष्णम् अथौ अस्मै नो इंद्रियम् ॥ इत्यादि भयोग प्रति भाव के हैं द्वित्वसंधि- तीर्थ महेन् मन्त् निध्यान्तं मच्च्युतं देवदत्ता ३ दध्वस्तः इन्द्रः दर्शन हम तर्षः अाव कुडन्डरस्ते कन्याच्छत्रम् देवच्छत्रम् म्लेच्छति आच्छिनति माच्छिदत्त इत्यादि प्रयोग द्वित्वसंधि के होते हैं । हलसंधि-, अमात्रम्, अजमात्रम्, ककुम्मण्डलं, ककुमण्डलं; वाङमधुरा वाग्मधुरा पएनया षड्नया तत्रयनंतदूनयनम्, वाङमय, गन्ता, चक्रम्पते अभूलिहा त्व- य्यांसि त्वयंसि त्वल्लुनासि, सन्नाट, गूढस्वाराट् उत्थितः कश्शुभः मज्जति। तेच्छेत, यज्ञः कष्षण्डे कष्टीकते पेष्टा तहकारेण । मेधुलिसीदति । महानपण्ड: तल्लुनाति भवालिखति अझलौ त्रिष्टुन्भुतं वाग्धंसति, तद्धित्तम् अच्छपम् भ- वाञ्छूर. भवाशूरः पाति कांस्काने भवांश्छादेयति भवष्टिीकते । भवाष्ठका- रापति, भवान्त्सरति, प्रशाचिनोति पुंश्चली पुंस्काकिलः वृक्षहसति, देवाया- 'न्ति, अंघाँदहि, भगोदेहि, असाइन्दुः असाविन्दुः । असाविन्दुः । तस्मा आस- नम् । तस्मा यांसनं । देवायांसते । श्रवणोऽरिम; धर्मोजयति, ऐषकरोति, सयाति, -पांचो संधियों का पूर्ण विच'शाकटायन याकरण से देखें और इन शब्दोकी साधनि भी प्रक्रिया सग्रह नामक वृत्ति से देखिये।
* अनुयोगदार मूत्र * ( १७३ ) अनेषागच्छति । अहरब, अहोभ्याम्, अहोरूपम्, अहोरात्रिः अहोरूपम् । इत्यादि प्रयोग हलसंधि के हैं विसर्जनीय सन्धि। मुनिरस्मि । साधुर्दयते, करछादयति, कष्टीकते । कश्शुभः काशुभ: । क- एडे कापण्डे । कस्साधु, कासाधु । करस्खलति। काखनति का पचति का सफलति तिरस्कृत्य तिरस्कृत्यतिर कृत्य ॥ नमस्कृत्य पुरस्कृत्य । चतुष्कटकं दुष्कृतं द्विष्करोति धनुष्खण्डयति । अयस्कारः यशस्कामः यशस्काम्यति गीष्या सा, गी+काम्यति चतुष्टयम् निष्टपति । निस्तपति कस्का । कौतस्कुतः सार्पस्छु- ण्डिका भ्रातुपुत्रः इत्यादि मयोग विसर्जनीय संधिके हैं सो. इनकी शब्द- साधिनिका शब्दागम जाननी चाहिये किन्तु किसी २ प्राचार्य ने तीनही संघिय स्वीकार की हैं जैसेकि सजास्वर प्रकृति हल्ज विसर्गजन्मा सन्धिस्तु पञ्चक मितीत्य मिहाहुरन्य तत्रस्वरमकति हलजविकिल्पतोऽस्मिन् सन्धिविधा कथितवान् गुणकीर्ति सरिः ॥ १॥ भावार्थ:-संज्ञा, स्वर, प्रकृतिभाव, हल और विसर्ग संधियों के स्थान पर गुणकीर्तिसूरि ने स्वर, प्रकृति, और हल् यह तीनही संघिय स्वीकार की है वास्तव में तीनों संधियों में पांचौ संधियों का समावेश होजाता है इसलिय संधि पदका भी पूर्ण बोध होना चाहिये फिर सुबन्त और निन्त प्रत्ययों के लगने से पद संज्ञा होती है इसलिय पदज्ञान होने पर हेतु ज्ञान भी होना चाहिए हेतु दो प्रकार से वर्णन किया गया है से कि अन्वय व्यतिरेक जो वस्तु विद्यमान होने पर विद्यमान. भाव रहता है उसे अन्वय-हेतु कहते हैं जैसे कि धूपके होने पर अग्निका अस्ति- स्व है। और व्यतिरेक हेतु वह होता है जो एकके अभाव होने पर द्वितीय का भी अभाव होनाए उसे व्यतिरेक हेतु कहते हैं जैसे कि अग्नि के अभाव में धूमका प्रभाव रहता है सो वही व्यतिरेक देत होता है तथा श्रीस्थानाङ्ग सूत्रके चतुर्थस्थान के तृतीय उद्देश में लिखा है कि अहवाहे ऊचरबिहे पनवे तंजहा (१७४) * अनुयोगदार मूत्र* पंचखं अणुपाण उवये भागमें पहबाहेक चउबिहे पनि नहा अत्यत - त्यिसोज भत्यित्ति सोहे ऊरणत्थितं अत्यिसो ऊपस्थित थिमोजा वृत्ति-अवचि । इतोः प्रकारान्तरता यौनके विकल्पार्ये हिनोति गमयति प्रमयमय सबाहीयते अधिगम्यतेऽननेतिहेतुः प्रमेयस्य प्रमिती कारणं प्रमाण पित्ययः सचतुर्विधः स्वल्पादि भेदाचत्र ॥ पचरखेति प्रश्नात्यभुत्ते न्यानोति अर्यानित्यक्ष भीमनम्मति यतते जान तत्तत्यक्ष नियनोऽवधियनः पर्याय कंबलानि अक्षाणि चन्द्रियाणि प्रति यत्तत्सत्यक्ष व्यवहार तस्तच चक्षुरादि प्रभवमिनि लक्षणमिदमस्य अपरोक्षतयार्थस्य ग्राहक शानमीदृशं प्रत्यक्ष मितव्यं परोक्षं ग्रहणे क्षया ' ग्रहणापयति भावः अन्विति लिङ्गदर्शन सम्बन्धानुस्म रणयोः पवादात्मानं ज्ञानयनुज्ञाने एतल्लक्षणामिई साध्याविना भूतलिङ्गाद साध्यनिधायकं स्मृतं अनुमानं वदभ्रान्त प्रमाणत्वासमक्ष वदिति ॥ १॥ ए. सवसाध्या विना भूतहेतु अन्यत्वेत्रा न्युपचारा तुरिति तया उपमान उपा संघापम्य अनन गयनं सरशी गौरिति सान्त्रय प्रतिपत्ति रूप रक्कंच गान्टलाय मरएंगचे गवर्यबीजने यदा भूयोत्र परसा मान्य भानवर्तुल कण्टकं ॥ १ ॥ तस्यामंत्र स्वस्थायां यदिशानं प्रवर्तते पशुनैतेन तुल्योसौ गोपिएट इविसीपमति २ भय युवाति दशवाक्य समानार्यो पलम्भने, मंत्रासंझि सम्बन्ध ज्ञान मुपमान मुच्यत इनि भागम्यन्त्र परिच्छियो प्रर्या अनेनेत्यागय आसत्रचन सम्पायों विभकृष्टवार्य प्रत्यय कंच-दृष्टेष्टा पाहता द्वाक्यापरमार्याभि यायिनः तत्वग्राहि तयोन्पन्नं मानंशान्दं प्रकीर्तितं ॥ १.|| भातोय जनुलंध्य मदृष्टे विरोधक तत्वो- पदेश कूमार्य शाखेका पथ बहनमिति ॥ २ ॥ इहान्यया नुपपन्नत्व लक्षण ईतुजन्यत्वा दनुमानमेव कार्य - कारणा पचाराद्धतुः सब चतुर्विधः चतुरूंगी रूपत्वा तत्रभस्ति विद्यतेतदितिलिंगभूनं धूमादिवस्तु इतिकृत्वा अस्तिसोन्या- दिः साध्योथै इत्येवं । हेतुरिति अनुमानं त्या वदग्न्यादिकं वस्त्वतोनास्निप्रसा तविरुद्धः शीतादिर्य इत्पत्रपपि हेतुरनुपानमिति तयानास्ति तदग्न्यादिक मतः शीतकावास्त्रि मशीतादिर्य इत्येवमपि हेतुमानमिति तयानास्तितदयून ला. दिकमिति नया नारिन सकिंशयावादिकोर्य इत्यपि इतुरनुमान पनि इचशब्दे - . * अनुयोगद्वार सूत्र * (१७५ ) कृतकत्वस्यास्ति त्वादस्सनित्यत्व घटवत् तथा धूमस्यास्तित्वा दिहास्त्पग्नि म हानस इवेत्यादिक स्वभावानुमान कार्यानुमानञ्च प्रथम भङ्ग के न सूचितं तथा अग्नेरस्तित्वात् धूमास्तित्वाद्वा नास्तिशीत स्पर्श इत्यादि विरुदोपलम्भानुमान विरुद्धकार्यों पलम्भानुमान च तथा अग्नेधूमस्य चाचित्वानास्ति शीतस्पर्श जर नितदंत वाणारोम हर्षादि पुरुषविकारो महानसबदिति कारण विरुदो पलम्भा नुमानं कारणविरुद्धकार्यो पलम्मानुमानचं द्विताय भंग के नाभिहित तथा छत्रा, देरग्नेवानास्ति त्वादस्ति क्वचित् कालादिविशेषे आतपः शीतपर्णीवापूर्वोप, लब्धप्रदेश डुवेत्यादि विरुद्धकारणउपलम्भानुमान विरुद्धानुफ्लम्भानुमानं च तृती- य भन्केनोक्तं तया दर्शनसामयां सत्यां घटोपलम्भस्प. नास्तित्वा पास्तीह घटो; विवक्षितपदेशवदित्यादि स्वभावानुपल-ध्यानुमान तथा धूमस्य नास्तित्वा बार स्त्य विकलो धूमकारणकलापः प्रदेशान्तरव दित्यादिकार्यानुपलब्ध्यमानं तथा, वृक्षनास्तित्वात् शिशपा नास्तीत्यादि ब्यापकार्नु पलम्भानुमानं तया अाने - स्तित्वात धूमो नास्तीत्यादि कारणनुपलम्भानुमान च चतुर्थभंगकेना विरुद्धमिति. म. च वाच्यंन जैनपक्रियेयं सर्वत्र जैनाभिपतान्यथा नुपपन्नत्वरूपस्य हेतुलन, णस्य विपमानत्वादिति . m- सारांश-रंतु 'चार प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसकि-प्रत्य) अनुमान, उपमोन और पागम अथवा अस्तिमें अस्ति १ मस्तिम नास्ति नास्ति में अम्ति ३ नास्ति में नास्ति ४ सो यह सर्व हेतु तत्वों के निर्णय के लिये ही प्रतिपादन किये गये हैं इनका कुछ विवर्ण तो हित्ति में ही किया जा चुका है किन्तु विस्तार पूर्वक कथन इसी सूत्र के गुणा प्रमाण के अधिकार में किया गया है और अन्यवय व्यतिरेक आदि हेतुओं का भी विवर्ण उसी स्थल पर किया है जो अस्तिमें अस्ति पद है उसमें प्रति व्याप्ति अव्याप्ति असंभव श्रादि दोपों को दूर करके केवल शुद्ध न्याय का ही विवर्ण है जैसे कि धूम की अस्ति होने से अग्नि का अस्तित्वस्वतः सिंद हैं इसी प्रकार शेप' भंगों का स्वरूप भी रति में लिखा गया है. इसी लिये यहां पर इसका विस्तार -- (१७६ ) * अनुयोगद्वारं त्र* नहीं किया इसलिये हेतु शान में निष्णात होकर फिर योगिक पदों में विज्ञ होना चाहिये तथा लिंग ज्ञानका पूर्ण बोध होना चाहिये जैसे कि पुलिंग, - स्त्रीलिंग, नपुंसक, जिनके निम्न लिखितानुसार नियमों यथा-पुलिङ्ग कटाए- भमवरपसस्न्वन्त भिमनलौ किश्चित् ।। नन पपी दा किवि खोडवीर चका स्यात् ।। । ॐ नमः सर्वज्ञाय । लिङ्गानुशासन मन्तरेण शब्दानुशासन नापीकलीपति सामान्य विशेषलतणाभ्यां लिङ्ग मनुशिष्यते ॥ नामीत वक्ष्यमाणामिह संबध्यते । कटणर्थपभ पयरपसान्त स्न्वन्तं च नाम "पुलिङ्ग स्यात् । कादयोऽकारान्त ।' गुह्यन्ते पृथकसन्त निर्देशात् । दिस्वरसन्नांना नपुंसकत्वस्य पदयमाणत्वेन. एकत्रिस्वरदिसन्वा गृह्यन्ते । । कान्तः भानकः पटहो दुन्दुभिश्च । इत्यादि । टान्तः कक्षापुटः सार संग्रा ग्रन्थः इत्यादि ।। णान्तः गुणःशुम्मेऽप्रधानादौ । इत्यादि ॥धान्त: निशीथः अर्धरात्रः । शपथः समयः । इत्यादि । पान्तः, चुपो लवा समुदायः । इत्यादि । भान्तः दर्भो वर्हिः । इत्यादि ।। मान्तः गोधूमो नागरहे स्यादित्यादि ॥ यान्त भागधेयो दायादः । राजदेय तुं पुस्निगावक्ष्यते । शुभे तु तन्नामत्वादेव क्लीवत्वम् । तन्दुलीय शांकविशेष । इत्यादि ॥ रान्तः 'निर्दर कन्दरा । इत्यादि ॥धान्त गवाक्षः । गाती शक्रवारुण्यां गवाक्षो जालके को इत्यादि । सन्तः माचन्द्रमासयो मुसि } अनडाः कालः । इत्यादि ॥ नन्तः प्रावा पापाणो, -गिरिश्च । इत्यादि. उकारान्तः तद्दुः सुभबष्ट नमग्न्या धारभाण्डं च मन्तुः अपराधः इत्यादि अन्तान्तं नाम पुंलिङ्गम् । पर्यन्तोऽनसानम् । विष्यन्तः मरणम् । अत्यन्तस्य बाहुलकत्वामसुंसकत्वमेव ।। इमन्प्रत्ययान्तम् अल्प्रत्ययान्तं च नाम पुंलिङ्गम् ।। इयन, प्रथिमा प्रदिमा । द्रढिमा | इत्यादि । जन्वत्वेनैव सिद्ध इमन्ग्रहणम् 'प्रात्वातत्वादिः" इति नपुंसक वाधनार्थम् । यस्त्वौणादिक 'स्तस्याश्रयालि- ङ्गता । भरिमा पृथ्वी, वरिमा तपस्वी । इत्यादि ॥ अल, प्रभवः । " प्रभवस्तु पराक्रमे । बोबेपवर्ग: " इत्यादि ।। तथा क्यवं रितवन्तं च नाम लिगम् ॥ . 3 * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १७६) कि, मयं वृतिः वृतूङ धातुस्तदर्थश्च ॥ रितव, अयं पचतिः डुपचीषु धातुस्त- दर्यच ।। श्तिव साहचर्मत्.' इफिश्तिवस्वरूपार्थे " इवि विहितस्यैव ग्रहणम् । तथा नप्रत्ययान्तं.च नाम पुंलिङ्गम् 'स्वमः स्वापे प्रस्तुप्तस्य विज्ञाने दर्शनऽपि अ॥ प्रश्नपृच्छा । ना विश्नो गमनम् ॥ तथा घप्रत्ययान्तं घमत्ययान्तं च नाम पुंलिङ्गम् यः करता करो वर्षोपले रश्मी पाणी प्रत्यायशुण्डयोः' ।। परिसरो मृत्यो देवोपान्तप्रदेशयोः ॥ उरश्छदः कवचं । प्रच्छदशोत्तरपटः। बदस्य तु नपुंसकता वक्ष्यते । इत्यादि ॥ घमन्तम्, पाद: ।। पादो बुध्नाहि तुर्याशरश्मिपत्यन्तपर्वतादिषु ॥ प्राप्तावः स्नानम् ॥ भावः । 'भावासत्तास्व. भागाभि प्रायचेष्टात्मजन्मसु. ॥ क्रियालीलापदार्थेषु विभूतिबन्धजन्तुषु' ।। अनुबन्धः भकृत्यादेरनुपयोगी, ॥ दामंशकाद्धातोर्यः किः प्रत्ययोवि- दितस्तदन्तं . नाम पुलिङ्गम् ॥ आदिः प्राथम्यम् । व्याधिः रोगः । उपाधि धर्मचिन्ता । कैतवं कुटम्बच्यावृती विशेषणंच । उपधिः कपटम् । उप: निधि न्यासः प्रतिनिधिः प्रतिनिधिः प्रतिविम्बम् । संधिः पुमान् सुरङ्गादा । परिषिः परिवेषः । अवधिस्त्व प धानादो । प्रणिधिः प्रार्थनमवधानं चरच ! समाधिः प्रति समाधान नियमो मौनं चित्तकाय च । विधिः कालः कल्लो ग्रमा विधिवाक्यं विधान, देव प्रकारश्च । बालधिः पुच्छम् । शब्दधिः कर्णः । जलधिः समुद्रः । अन्तर्व्यिवधा । प्रस्तु नेमौ स्त्रीपुंसत्त्वं रोग विशेष स्त्रीत्वम् इपुषेस्तु स्त्रीपुंसत्त्वं वक्ष्यते । इत्यादि ।। भावेखः, भावेऽर्थेयः खो विहितस्तदन्त नाम पुलिङ्गम् । भाशितस्य भवनम् भाशितंभवो वर्तते, तृप्तिरित्यर्थः ।. भाक इति किम् । भाशितो भवत्यनया भाशितंभवापश्चपूली ! प्रकर्तरि व क. स्यात् । भावे कर्तृवर्जिते च कारके य का प्रत्ययस्तदन्तं नाम पुंलिङ्गम् ।। भाचूना मुत्था नमावत्यः विन्यतेऽनेनास्मिन्वा विन अन्तरायः ! इत्यादि। भकर्तरि चैविकिम् । जानानीति मा परिषद् ।। हस्त स्तनौष्ठ नख दन्त कपोल गुल्फ, केशान्धु गुच्छ दिनसतु पत्तद्ग्रहाणाम् । निर्यासना करस कण्ठ कुठार कोष्ठ, हैमारि वर्ष विष घोल रथाशनीनाम् ।।
( १७८ ) * अनुयोगदार सूत्र * हस्तादीनां नाम जलध्यादीनां तु समिदा समभेदानामपि पुलिंग भवति । हस्त- नाम पञ्चशाखः । करः । शयः । अयं शय्या यामपि यान्तत्वात्पुंसि । हस्तस्य तु पुनपुंसकत्वम् ॥ स्तननाम, स्तनः । पयोधरः। कुचः । वक्षोजः । इत्यादि । ओष्ठनाम, ओष्ठः । अधरः । दन्तच्छदः इत्यादि ॥ नखनाम करजः । कररुहः । मदनांकुशः । इत्यादि ॥ नखः पुंल्लीवः ॥ नखरस्तु त्रिलिंगः ॥ दन्तनाम दन्तः । दशनः । अयं रुद्रटेन क्लीवेsपि निबद्धः दशनानि च कुन्दकलिकाः स्युः इति । तञ्चिन्त्यम् । द्विजः रदः रदनः । इत्यादि।कपोलनाम, कपाल गण्डः । गल्लः । इत्या- दि । गुल्फनाम, गुल्फः । गुटुः । प्रपदः । आषपदः। खुरका निस्तादः पादशीर्षः इत्यादि ॥ हस्ति. गुल्फस्तु मौहः । घुटिकघुण्टिंधुण्टगुल्फास्तु स्त्री पुंसलिंगा वक्ष्य- न्ते ॥ केशनाम, केशः । शिरोजः । शिरोरुहः चिकुरः । चिंहुरः । कचः । अयं बाहुलकग्रणेऽपि पुंसि । गुरोःपुत्र तु देहि नामत्वरिसदम् । इभ्यां तु योनिम- स्वास्त्रीत्वम् । अस्रः । बेल्लित्तामः । इत्यादि । वृजिनश्च । यद्गौडः । वृजिन कल्म- पे क्लीव केशेना कुटिले त्रिषु " कुन्तलाश्च । 'कुन्तलाः स्युर्जनपदो हलो पालय कुन्तलः ।हले बाहुलकात्पुंसि । वालः पुनपुंसको वक्ष्यते । तद्विशेषोऽपि कशः। कुरला • अलकः ॥ मंन्धुः कृपस्तमाम, अन्मुः । इहिः । पहिः । इत्यादि । कृपस्तु' स्त्रीपुंसलिंगः ॥ गुच्छनाम, गुच्छः । गुत्सः गुलुञ्छ । स्तवकस्तु पुंक्लीवः । दिननाम, घसः सूर्याङ्कः । दण्डयामः । दिनदिवसवासराणां पुनपुंसकत्वम् । दिवालौस्तुनपुंसकत्वम् ॥ स इति समास- स्याख्या पूर्वाचार्याणाम् । ताम, बहुव्रीहिः । अव्ययीभावः । द्वन्दः । इत्यादि। तुनाम, हेमन्तः । वसन्तशिशिरनिदाघाः पुन्नपुंसकाः । शरत्माहवर्षाश्च स्त्री- लिङ्गाः । ऋतुस्तु उदन्त त्वात्पुंसि । पतद्ग्रह आचेलका धारस्तनाम, प्रतिग्रह। प्रतिग्राहः । इत्यादि । निर्यासनाम, इतादीनारसः । गुग्गुलः । श्रीपृष्टः । श्रीबे- ष्टः । सर्जरसः । उपः । उखुमलनपुंसकम् निर्यासस्तुपुनपुंसकः । कुम्भकुन्दो- लूपले तु बाहुलकानपुंसके। नाकनाम, स्वर्गः । स्व अव्यम् । नाकत्रिदिवापु- नपुंसकौ । दिवंत्रिविष्टपंक्लीवे । घोदिवौस्त्री ॥ रसा:श्रृङ्गारादयः स्तनाम, मा.
। * अनुयोगद्वार मूत्र * ( १७६ ) रहास्यकरुण रौद्रवीरभयानक शान्तवीभत्साद्भुता इति । वत्सलस्तुपुत्रादि स्ने- हात्मारतिभेद एव । भृङ्गार पुक्लीयः । गोडस्तुभृङ्गारवीरौ बीभत्सरौद्रं हा- स्यभयानकम् । करुणाचाद्भुतं शान्तवात्सल्यं च रसादश' १ इति कण्टनाय, गला नालः ॥ कुठारनाम, परशुः । पशुः । स्वधितिः । इत्यादि । कुठार पुत्री कोष्ठनाम, कुशूलः । इत्यादि । हैमनाम, हैमो भेषजभेदः । किराततिक्ता किरात- कसंज्ञः ।। अरिनाम, द्विषन् । प्रत्यर्थी ! रिपुःइत्यादि । वर्षनाम, वत्सः । संव- त्सरः । संवदित्ययमव्ययम पीतिकश्चित् । वर्षहायनाव्दास्तुपुंक्लीषाः ।,शरत्समे- तुस्त्रीलिहणे ॥ विषनाम, गरः । मसुतः । क्ष्वेडः । वत्सनाभः । इत्यादि । विषकालकूटगरलहालाहलकाकोलापुनपुंसकाः । मधुरस्यबाहुलकावक्कीवत्वम् ।। बोलऔषध विशेषस्तमाम, गन्धरसः । प्राणः । इत्यादि । रथनाम पताकी। स्यन्दनः । पुनपुंसकोऽयमितिगौडशेषः । रथापुंसी । अशनिनाम, पविः । इत्यान दि॥ अशनि पुंस्त्री । वनकुलिशो'क्लीचौ । भिदुरबाडुलकातक्रीवम् ।। स्त्रीलिङ्गं योनिमम्रीसेनावक्लितहिन्निशाम् ॥वाचितन्द्राऽबटुग्रीवाजिहाशस्त्रीदयादिशाम्।।१।। नामेति स्मर्यते । यो निमदादीनां नाम स्त्रीलिङ्गं भवति । पुरुषी । स्त्री। रामा । वामा । हस्तिनी । वशा वृषी अन्धा । मकरी मत्सी । मयुरी । इत्यादि वग्रीनाम उपदेहिका इत्यादि । सेनानाम । यमः पृतना । वाहिनी । इत्यादि । वल्ली । अजमोदायां तुअस्य बाहुलका स्त्रीत्वम् ।। ताडिन्नाम। शम्बा । चपला 'चरा । इत्यादि । निशानाम । तुङ्गी | तमी । निशब्दोऽप्यस्ति निशावाची ।। वीचिनाम । पीचिः । उत्कलिका । लहरी । भतिः । इत्यादि । तरङ्गोलोलकल्लोलानां । पुंस्त्वमुक्तम् ।। तन्द्राशब्देनालस्यनिद्रे गृह्यते ।। अवटुनाम् घाटा । ककार्टिका इत्यादि । अक्टोस्तु स्त्रीपुंसत्वम् ॥ ग्रीवानाम । प्रविा । अयं तशिरायामपि ॥ निशानाम । रस त्यादि । शसीनाम । शस्त्री असिपुत्री । इत्यादि । दयानाम । दया! करूणा ! इत्यादि । दिग्नाम । आशा । कक । इत्यादि। ।
(१८०). * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ नपुंसक लिङ्ग नलस्तुतत्तसंयुक्तररूयान्त नपुंसकम् ।। वेधमान् विना सन्तं हिस्वरमन्न- करें। नान्तं लान्तं स्त्वन्नं तान्त तान्तं संयुक्ता येररु यास्तदन्तं च नपुंसकलिङ्ग स्यात् । नान्तमंजिनचर्मेत्यादि । लान्त, चक्रवाल समूहः । 'दलं - शकलम् । स्त्वन्तम् । वस्तुतत्त्वं पदार्थश्च । मन्तु दधिनिस्यन्दः ॥ तान्त शीतमनुष्णम् अद्भुतमाश्चर्यमित्यादि । तान्तं भित्तं शकलम्, निमित्तं हेतुरित्यादि ॥ तस्य संयुक्तम् पृथगुपन्यासत्पूर्वेऽसंयुक्ता गृह्यन्ते ॥ संयुक्तरान्तम् अग्रं पुरः अधिकं च गोत्रं नाम कुल क्षेत्रंच ॥ शुक्र सप्तमो धातुः । इत्यादि । संयुक्तरुशन्दान्तम् श्मश्च कूर्चम् इत्यादि । संयुक्तयान्तं शख्य लक्ष्य वेध्यं च ।साभाय्यं हन्यमित्यादि वेधस्मभृतीन वर्जयित्वा सकारान्तं. द्विस्वरं च नपुंसकम् । इदं रक्षा निशाचरः ।। उषः प्रभातं सन्ध्यायां तु पुंसी । तपः कृच्छ्राचरणम् ॥ माघे पुनपुंसकम् ।। रजो रेणुः । पुंसीति गौडः ॥ जोपान्त्योऽयम् ॥ यादोजलचरः ॥.रोचिः शोचिश्व दीप्ती ॥ वैध-आदीनिति किम् । वेधा बुधो विष्णुर्विषिश्च ॥ सहा हेमन्त ॥ नभा.मेघादिः । श्रीका आश्रयः ॥ ओकस्य तु कान्तत्वात्पुस्त्वम् । पूर्वामि सानो योगः । तेनाम्भः सोतो याद इत्यादीनां नादिनामत्वेऽपि क्लीवत्वमेव ।। गुणलेस्त्वाश्रय लिइता.परत्वात् ।। द्विस्वरमिति अनुवर्तते, अकौर विहिती यो मन्तदन्तं नाम नपुंसकम् ।। धाम तेजः वर्ण प्रमाणं शरीरं च ॥ तम यूपानम् । वर्त्म मार्गः ॥ अकरीति किम् ॥ ददातीति दामा । करोतीति कर्मा । सारांश-लिंगानुशासन विना शब्दानु शासन को सम्पूर्ण बोध नही हो- सक्का इसलिये लिङग ज्ञानकी अत्यन्त आवश्यकता है सो इस कारिका में पु- लिंग के निन्न प्रकार नियम बतलाये गए हैं जैसेकि-के-र--थ-प-भ-म- य-र-प-सान्त-स्नन्त-नाम पुल्लिंग होते हैं . ककारान्त-कान्तानकी पटहोदुन्द्रभिश्वः । टकारान्त-कदापुट सारसंग्रहग्रन्थः । . , * अनुयोगद्वार भूत्र * ( १८१) है " स्थान्तः-गुणः शब्द थान्त: निशीथ शब्द है जो अर्द रात्रीका वाचक है : पान्तः-तुप शब्द है जो लताओं के समुदाय में व्यवहत होता है "भान्तः-दर्भ शब्द है मान्तः-गोधूम शन्द है यान्तः-भागधेया शन्द है रान्तः-निर्दरः पान्त:-वाक्षः सान्त:-मास ( माश्चन्द्रमासयों), नन्तःगीवा उकारान्तः तर्कुः-अन्तान्त नाम । पर्यन्तो । इमन्प्रत्ययान्तम् प्रथिमा । अलन्तः प्रभवः । क्यन्तं । वृति । रितवन्त : पचति । नप्रत्ययान्तः स्वप्रः । घपत्ययान्तः और घनत्ययान्त शब्द भी पुल्लिंग होते हैं. जैसाकि-करस घनन्तः पादः भावः । किमत्ययान्तः आदि व्यादि शब्द हैं भाव में जो "ख मत्यय आता है.वह भी पुल्लिंग ही होजाता है जैसे कि पाशितभवो और भाव कर्तृ को. व के नो अकर्ता क प्रत्यय है वहभी पुल्लिंग ही होजाता है यथा विघ्न । शब्द है ।। फिर इस्तके वाचक शन्द भी पुलिंग होते हैं जैसेकि-पंचशाखः इसीप्रकार स्तना- ओष्ट-करन:-दन्तः-कपोला-गुल्फः शिरोज गौडः कुंतल बाल कुरलः अन्धुः गुच्छ घसः दडयामः हेमन्तः गुग्गुलः स्वर्गः गल पशु रिपुः-वत्स इत्यादि यह सर्व शब्द पुलिंग में ग्रहण किये जाते हैं इसीप्रकार अन्य शब्दों को भी जानना चाहिये। योनि और मदादि शब्द स्त्रीलिंगीय होते हैं जैसे कि-स्त्री-पुरुषा-रामा-भधा इत्यादि और वनीनाम उपदेहिकादि है चमू-वनी-अजमोदा-शम्बा-तुंगी-तमी वी- चिनाम-लहरी-घाटा-ग्रीवा-रसज्ञा-शस्त्री-दया-आशा-फकप इत्यादिशब्द स्त्रीलिंगाय होते हैं और नान्त-लान्त-स्नन्त-तान्त तान्त-संयुक्त येररु इत्यादि यह शब्दनपुंसक लिंगीय होते हैं इनके प्रयोग निम्रलिखितनुसार है जैसेकि अजिन-चक्रवालं.
. (१८२) * अनुयोगद्वार सूत्र दलावस्तुतस्व-मस्तु शीत-भिन्तं-निमित्तंभग्रं-गोत्रं वेत्र-शुक्र-मच-शख्यं ,सामाग्य प्रभात,धाम,शरीरं, इत्यादि यह सर्व शन्द नपुंसकलिंगीय हैं इस प्रकार लिंगा नुशासन से लिंग बोध करके योग पदका अनुयोग करना चाहिये फिर उगा. दि प्रत्ययों को भी अभिगम करके श्रुत ज्ञान में निष्णातहो उणादि मत्यप नित्र प्रकार से है तथा च पाठः- कवाया जिमिस्वादिसा ध्यशूभ्य उण् ।। १ ।। डुकृञ् करणे । वागतिगन्धनयोः ॥ पा पाने ( जि अभि भवे (इमिय प्रक्षेपणे । प्वद आस्वादने साध संसिद्धौ अशू व्याप्तौ । एभ्योऽष्टधातुभ्य उ. एमत्ययः स्यात् । करोतीति कारुः । प्रसिद्धोऽसी क्रियाशब्दः शिल्पिन्यपि च वर्तते । तथा च धरणिकोशः कारः शिल्पिनि कारके। राघवस्य ततः कार्य कारुवानरपुड्यः । सर्ववानरसेनानामावागमनमादिशत् । ७, २८, । इति भट्टिः । खियामुङ्तः कारः स्त्री । वातीति वायुतिः आतो युक् चिणकतो पा, ७, ३, ३३ । इति युक उभयत्र वायो प्रतिषेधो वक्तव्यः पा. ६, ३, २६, १, । इति देवताद्वन्द्वच । पा. ६, ३, २६ इत्यानङ् न भवति । वारपग्नी! अग्निवाय ।। पिवत्यने नीषधमिति पायुमुदस्थानम् । गुदत्वपानं पायुर्नत्यमरः ॥ जयत्याभ- भवति रोगानिति जायुरोप वैद्योऽपि ।। मिनाति प्रक्षिपत्ति देह उमाणमिति मायुः पित्तम् । मायुः पिच कफ श्लेष्मेत्यमरः । गोपूर्वाद गां वाचं विकृतां मिनोति मक्षिपतीति गोमायुः शृगालः ।। स्वद्यत इति स्वादु मिष्टम् । त्रिलिंगः । शीघद्रव्ये. 'असत्त्वे क्लीवम् । क्लीवे शीघाघसच्चे स्यात् । १, १, १, ६३, । इत्यमरनिलि- गे। पृथ्वादिभ्य इपनिच् । पा० ५, १, १२२, .। स्वादिया । स्त्रियां 'डीए । स्वादीत्यपि ।। साध्नोति परकार्यमिति साधुः सज्जनः । स्त्रियां वोतो गुणवचनात् । पा० ४,१,४४, । इति डीप । साध्वी सती पतिव्रता । अम०२ १, ६. पृथ्वादित्वात्साधिमा || प्रश्श्रुत इत्याशु शीघ्रं धान्यस्य च नाम । पृथ्वादित्वा दाशिमा धान्यबाचित्ले पुंसि । आशुत्रीहि: पाटलः । अम० २,६, १५ ।। बहुलवचनात् रह त्याग । ष्णा भौचे ! कक लौल्ये हल विलेखन ! वसू 7 * अनुयोगद्वारं सूत्र * (१८३) निवासे । एभ्योऽप्युण भवति ।। गृहीत्वा रहति त्यजति चन्द्रमिति राहु स्वभानुः । स्नात्यङ्गमिति स्नायु.शरीरबन्धः । स्नायु:खी वस्नसा स्मृतत्यमरः ।। कक्यत नेनेति का स्त्रियां विकारो यः शोकमीत्यादि मिलनें रित्यमरः ।। हल्यतेऽ नेनेति हालुदन्तः ॥ सर्वोऽत्रवसति सर्वात्रासी वसति । अत्रार्थे वासु । वासुश्वासी देवश्चेति वासुदेवः । तथा च स्मृतिः । सर्वत्रासी समस्ते च वासत्पत्रेति वै यतः । ततोसौ वासुदेवेति विद्वदि परिगयिते॥१॥सर्वत्रासी वसत्यात्मरूपेण विश्वम्भर त्वादिति धासुः ॥ वासुनारायण पुनर्वसु विश्वरूपाः । ११२६ । इति त्रिका. एडशेष । वसुदेवस्यापत्य मित्य स्मिअर्थ ऋष्य न्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च । पा०४, १. ११४ इत्यणि कृते वासुदेव इत्यपि व्युत्पत्पन्वरम् ॥ इसनिजानचारिचार्टभ्यो मुण् ॥३॥ दृविदारणे । षण दाने । जन जनने । चर गती । चट भेदने । एभ्यो धुण स्यात । दीर्यत इति दारू क्लीवे काष्ठम । अर्घर्चादिः देवदारुः पुंसि । अनु. पुरः पश्यसि देवदारुम् । २ ३६ इति रघुः । नपुंसके दारु । दारुणी । दारूणि । काष्टे दाविन्धनं वेध इत्यमरः ॥ सनोति सुनुते वा । सानू: पर्वतकदेशः । सानुः शृङ्गेबुषे मार्गे वात्यायां पल्लवे बने । नान्त० १६, । इति विधः । पर्वतैकदेशे स्नु प्रस्थः सानुरखियामिति कचित ॥ जायन्ते जनयन्तिवा। जानुब्योपरिभागः । क्लीवे जानु । मानुनी । जानूनि । जानूरुपष्टिीवदलिया. मित्यमरः । प्रसंभ्यां जानुनार्दुः । पा० ५, ४, १२६ । प्रक्षुः प्रगतजानुका संयुः संहतजानुक इत्यमरः । ऊद्विभाषा । पा ५,४, १३० । अरूलनानुः स्यात् । द्वानुबन्धक ग्रहणं जान्वित्यत्र अनिवध्योश्च । पा० ७, ३, ३५॥ इत्यनेन वृद्धिप्रतिषेधो माभूत् ।। चरति चक्षुरादिष्वितिचारु शोभनम् ॥ चाटू प्रियं वाक्पम् । चाटूनरि मियोक्तिः स्यादीति रलमालाकोशः। चकर च बहुलाटून्ना- द योपिदस्य । ११, ३६ । इति माघः । माघे नपुंसकमपि दर्शितिम् । चार्ट चाकृतकसंभ्रममासां कार्मणत्वमगमन्मणेषु । १०, ३७ । चाटूः पिचिण्डे चं नु तो चाट्रालाप तत्सममित्युत्पलिनीकोशः । मृगवादित्वात्कुमत्पये चद् वित्यपि - ॥ (१८४.) * अनुयोगद्वारं सूत्र * भवति । चटु चा? प्रियं वाक्यमिति हटचन्द्रः । वत्सेनीदस्य मानोरचितचटुमत मोचितः स्वर्गिवर्गेरिति बालरामायणञ्च ।। इपिञ्जिदोङ, ब्यविभ्यो नक् • इक् गतौ । पिम् बन्धने । जि जिये । दीक् क्षये । उप दाहे । अव रक्षणे। एभ्यो नक् स्यात् । इनो राशि प्रभो सूर्ये । नृपे पत्यौ । नान्ते १, । इति विका सह इनेन वर्तत इति सेना,। सेनयाभियात्य भिषणयति ।। सिना काणः ॥ जि. नो बुद्धः । जिनः स्यादतिवृद्धेऽपि बुद्धे चाईति जित्वरे । विश्वे नान्त०, १, दीनौ दुर्गतः ॥ उष्णभीषत्तप्तम् । ज्वरत्वरैत्यूइ । जनमसम्पूर्णम् । सर्वस्वे तु ऊन- यतेरूनमिति साधितम् ॥ सारांश-क-वा-पा-जि-मि-स्वादि-साध-इन धातुओं को उगमत्यय होजाता है तब इनके प्रयोग निम्नलिखितानुसार वनजाते हैं जैसेकि, करोतीतिकारुः । वातीतिवायुवतिः ॥ पिवत्यनेन नींपधमिति पायुर्गुदस्थानम् । जयत्यभि भवति रोगानितिनायुरौषधं वैद्योपि । मिनोति प्रक्षिपत्ति देह उष्माणमिति मायुः पित्तम् । स्वद्यत इति स्वादुपिष्टम् । सानोति, परकार्यमिति का स्वकार्यमिति साधुः सज्जनः । इस प्रकार उण प्रत्ययान्त प्रयोग बनते हैं तथा सूत्र में बहुर- चंन होने से-रह त्यागे । ष्णशोचे । ककलौल्ये । इल विलेखने । वसनिवासे । इन धातुओं को भी उण् प्रत्ययान्तें करने से इस प्रकार प्रयोग बनते हैं जैसेकि. गृहीत्वा रहति त्यजति चन्द्रमिति राहुः स्वर्भानुः । स्नात्यङ्ग मिति स्नायुः श: सैरबन्धः। कक्यतेऽनेनति काकु । हल्यतेऽनेनेति हालुदन्तः । सर्वोऽनवसति सर्वत्रासी वसेर्ति अत्रार्थवासु ॥१॥ ह-घणु-जन-चर-चट-इनधातुओं को बुण प्रत्यय होजाता है तब इनके प्रयोग इस प्रकार से बनते हैं जैसेकि दीर्यत इति दारु । सनोति सनुत वा सानुः पर्वतकदेशः । जायन्ते जनयन्ति वा । जानु जहंगो परिभागः '1 चरति- चक्षुरादिष्वति चारुशोभनम् मचाई प्रियवाक्यम् ॥२-और-इक्राती षि-बंधने, -- * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १८५) जिजये-दीक् क्षय-उपदाहे-अवरक्षणे इन धातुओं को नक् प्रत्यय होजाता है तब इनके प्रयोग इस प्रकारसे बनते हैं जैसेकि इनः तथा सह इनेन वर्तत इति सेना सिनः काणः । जिनो जिनेन्द्रदेवः बुद्धो वा । जिनः अतिवृद्धेऽपि बुद्धे अईतिच। दोनो दुर्गतः । उष्ण भीपत्तप्तम् । इत्यादि अनेक प्रकार से उणादि प्रत्ययों का उणादि वृत्ति विवर्य किया गया है सो जो शब्द उणादि प्रत्ययान्त हो उन्हें उणादि प्रत्ययान्त कहते हैं तथा जिस शब्द की व्युत्पत्ति किसी प्रकार से भी सिद्ध न होती हो वह उणादि प्रत्ययों से सिद्ध की जाती है इसलिये उणादि प्रत्ययों का अवश्य ही बोध होना चाहिये फिर क्रियापद जैसे कि करोति, पच. ति, इत्यादि हैं धातु भ्वादि हैं स्वर अकारादि हैं तथा स्वरषडमादि इनका वेत्ता होकर फिर विभाक्ति प्रकरण को भी जानना चाहिये तथा कास्क विधि को ठी. क २ जानकर फिर उसके अनुसार वचनानुयोग करना चाहिये जैसे कि । तत्र पञ्चविध. कर्ता, कर्म सप्तविधं भवेत् । करणं विविध चैव संप्रदानं त्रिधा मतम् ।। १ ।। अपादानं द्विधा चैत्र तथा धारश्चतुर्विधः । तत्रेति ॥ तय नास्मिन् त्रयोविंशतिधेति दर्शिते कारक चक्रे पञ्चविधः कर्ता, सप्तविधं कर्म, द्विषिर्य करणम्. त्रिविधं संप्रदानम्, द्विविधमपादानम्, चतुर्विधम- धिकरणं चेति । सत्र पञ्चविधः कर्ता यथा स्वतन्त्रकर्ता, हेतुकर्ता, कर्मकर्ता, अभिहितकर्ता, अनभिहितकर्ता चेति । तत्रायोयथा पुण्यं करोति श्राद्धः, मैत्री भजन्ते सन्तः । हेतुकर्ता यथा-हितं लभयन्ति विनीतान्धीराः । क्लेशादेव लोकं नियमन्ति । 'तत्प्रयोजको हेतुश्च ' इति हेतुसंज्ञा ॥ कर्मकर्ता यथा-स्वयमेव मुच्यन्ते कुशन- बुद्धय. । स्वयमेव दृश्यन्ते दुष्टजनदोषाः । स्वयमेव छियन्ते प्राकृतजनस्नेहः । कर्मवकर्मण तुल्यक्रियः' इति हि कर्मवद्भावः ॥ अभिहितकर्ता यथा-साधवः परार्यमापादयन्ति 'अभिहिते प्रथमा' इति प्रथमा । अनभिहितकर्ता यथा-साधु- भिरापायन्ते पराः । अनभिहित कर्तरि ' इति तृतीया ।। . .
( १८६) * अनुयोगद्वार सूत्र * कर्म सप्तविधं कथम् । इप्सितं कर्म, अनीप्सितं कर्म, ईप्सितानीक्षित कर्म, अकथितं कर्म, कर्तृकर्म, अभिहित कर्म, अनभिहितं कर्म चेति ॥ तत्रेप्सितं कर्म यथा-दुर्विज्ञानमपि धर्म विज्ञातुं श्रधात्युदारपी' । कर्तु राप्सितततं कर्म इति कर्म संज्ञा ॥ ( अनभिहिते कर्मणि द्वितीया अनीप्सितं यथा-कल्याणमपि धर्म प्रतिपन्ति पापबुद्धयः विषं भक्षयन्ति मुद्राः। तथायुक्त चानीप्सितम् इति कर्मसंज्ञा ॥ ईप्सितानीप्सितं, यथा-पायस भक्षयंस्तत्र पतितं रजोऽपि भक्षयति बालकः ॥ अकथितं यथा-गां दोग्धि पयो गोपालकः । यज्ञदत्तं याचते कम्बल बामणः । इशितारं भिक्षते सुवर्णमकिश्चन । ब्रजमवरुणाद्धि गां गोपालः । उपाध्यायं पृच्छति शास्त्र शिष्यः। वृक्षमवचिनोति फलानि दारकः । शिष्यं ब्रवीति धर्म गुरुः । 'गतिवुद्धि-' इत्यादिना कर्मसंज्ञा ॥ अभिहित कर्म यथा पटाः क्रियते देवदन्तेन ॥ अनभिहितं कर्म यथा-कटं करोति देवदत्त. ॥ कतमद्विविधं करणम् । वाद्यमाभ्यन्तरं चेति ॥ शरीरावयवादन्यद्यत्तद्वाहा यत्तदाभ्यन्तरम् । यथा मनसा पाटलिपुत्रं गच्छति देवदत्तः । चक्षुषा रूपं गृह्णाति नरः । साधकतम करणम् इत्यनेन करणसंज्ञायां कर्तृकरणयोस्तृतीया इति तृतीया कत्तमश्रिीव, सम्प्रदानम्। प्रेरकमनुमन्तृकम निराकर्तृकं चेति ॥ तत्र प्रेरक यथा ब्राह्मणाय गां ददाति धार्मिकः । स हि ब्राह्मणो मनसाथ गां मधं देहि इति प्रेरयति तस्मात्मेरक मित्युच्यते ॥ अनुमन्तृकं यथासूर्यायाध्यं ददाति पुरुषः । स सूर्यो न प्रेरयति न निराकरोति तस्मादनुमन्तृकः ॥ अनिराकर्तृक यथा पुरुषोत्त- माय पुष्पं ददाति पुरुषः स पुरुषोत्तमोमयं पुष्पं न ददातीति न प्रार्थयते नानुमन्यते न निराकरोति तस्मादनिराकर्तृकमित्युच्यते । कर्मणायमीभैप्रति इति संमदानसंज्ञायाम् चतुर्थी संपदाने इति चतुर्थी ॥ कतमविविधमपादानाम् ।। चलमचलं चेति ॥ तत्र चलं यथा धावतो रथात्पमति सारथि. । परिधारतो । हास्तनोऽङकुशं धारयन्पतत्या धोरण ॥
* अनुयोगद्वार मूत्र * (१७) अंचलं यथा-ग्रामा दागच्छंति देवदतः॥ पर्वतावतरान्त महर्षयः । ध्रुवमपाये ऽपादानम् इत्यपादानसंज्ञायाम् अपादाने पञ्चमी' इति पञ्चमी । कत्तमचतुर्विधमधिकरणम् । व्यापकमौपश्लेषिकं वैषयिक सामीपिकं चेति ।। तत्र व्यापक यथा-तिलेषु तैलं व्याप्तम् । औषश्लेपिकं यथा-कट आस्ते पुरुष । शकट आस्ते ब्राह्मणः । वैपयिकं यथा-वनेषु शार्दूला वसन्ति ॥ सामापिकं यथा नयां वसत्ति घोपः । आधारो.धिकरणं " इत्यधिकरण संज्ञायां " सप्तम्यधिक- रणे च इति सप्तमी। करोति कारक सर्व तत्स्वातन्त्र्य विवक्षया ॥३॥ करोतीति कारकमित्यन्वर्थसंज्ञा तईि कर्ते कारकसंज्ञो भवति नैतरे। - नाच्यते। तान्यपि कारकाऐयव,कुतः, तद्व्यापारपि स्वातन्त्र्याविवक्षायां प्रतिकारक स्वातन्त्र्य विवक्ष्यते । अतः कर्मकरणसंप्रद्रानापादाना धिकरणानामपि कारकता सिद्धम् ॥ ३॥ तत्र कर्तर्य भिहित प्रथमैव विधीयते । A तृतीया वाऽथ वा षष्ठी स्मृताऽनाभिहिते द्विधा ॥ ४ ॥ तत्रेति ॥ तत्र कर्त कर्मकरणसंपदानापादानाधिकरणेषु मध्ये अभिहिते कर्तरि प्रथमैत्र भवति । यथा । पचत्यो दनं देवदत्त ॥ अनभिहिते कर्तरि द्वे विभक्ती भवतः । तृतीया वा अथवा पष्ठीति । तत्र तृतीया यथा । आदेनः पच्यते देवदत्तेन । 'कर्तृकरण- योस्तृतीया" इति तृतीया " 1 पृष्ठी यथा परलोकहितस्य सेवित्तव्यो धर्मः । परलोकहितेन वा सेवितव्यो धर्मः । 'कृत्यानां कर्नरि वा इति पष्ठी ।। तथा कर्मण्यभिहिते, विभक्तिं विद्धि पूर्विकाम् अनुक्ले प्रथमां हित्वा पंचमी सप्तमी तथा ।। ५ ।। तथेति ॥ यथाभिहिते कर्तरि प्रथमा तथा कर्मण्यभिहिते प्रथमैव भवति । यथा श्रोदनः पंच्यते देवदत्तेन । आहारो दीयते देवदत्तेन । अनुक्त इति ।। अ- नुक्के कर्मणि.प्रथमां पंचमी सममी वर्जयित्वा शपाश्चतस्रो विभक्तयो भवन्ति । काः (१८) * अनुयोगदार सत्र * शेषाः । द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, षष्ठी चेति ॥ तत्र द्वितीया यथा-ग्रामंगच्छति पुरुषः कर्मणि द्वितीया' तृतीया यथा-पुत्रेण सजानीते पिता । पुत्रसज्जानीत इत्यर्थः। संज्ञोन्यतरस्य कर्मणि" इति तृतीया ॥ चतुर्थी यथा-ग्रामाय अजति पुरुष । 'गत्यर्थ कर्मणि इति चतुर्थी पष्ठी यथा-कटस्यकारको-: देवदत्तः । कर्तृकर्मणोः कृति ' इति षष्ठी ॥५॥ तृतीया पञ्चमी चैव षष्ठी च करणे त्रिधा ! तृतीयेति ॥ तृतीया यथा-परशुना वृक्ष छिनत्ति देवदत्त । कर्तृकरणयो- स्तृतीया ॥ पञ्चमी यथा-स्तोकान्मुक्तः स्तोकेन मुक्तः । इति तृतीया ।' करणे च स्तोकाल्पकृच्छकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य इति पञ्चमी ॥ षष्ठी यथा-घृतस्य संजानीते मित्रं वृतेन मित्रं प्रेक्षत इत्यर्थः 'ज्ञोविदर्थस्य करणे' इति षष्ठी ॥५॥ षष्ठी चतुर्थी तृतीया संप्रदाने तथा त्रिों ॥६॥ षष्ठीति । षष्ठी यथा-पुषण मृगश्चन्द्रमसो दातव्यः । चंद्रमसे दातव्य इत्यर्थः । चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ' इत्ति संप्रदाने षष्ठी ॥ चतुर्थी यथा-क्षुधिता यौदनं ददाति देवदत्तः । चतुर्थी संमदाने इति चतुर्थी ॥ तृतीया यथा दास्या माला संप्रयच्छते । युवा दास्यै माला ददागीत्यर्य । समस्तृतीया इति सूत्रे दाणश्च सा चेचतुर्थ्यर्थे इति तृतीया उभयमनेसंभाव्यते । तृतीयाविभक्ति रात्मनेपदविधानं च यदययोगस्तृतीयायुक्ताहाणः । दाणश्च सा चेचतुर्थ्यर्थे इत्यात्मनेपद पनुशास्ति अशिष्टव्यवहार तृतीया चतुर्थ्यर्थे भवतीति वक्तव्यम् । अशिष्ठ व्यवहारो धूर्तव्यवहारः ॥६॥ पञ्चमी खन्वपादाने वर्तते न ततोऽन्यथा सप्तम्येचाधिकरणे कारकस्यैव संग्रहः ॥ ७ ॥ पञ्चमी इति ।। पञ्चमी यथा-पर्वतादबतरन्ति महर्षय | अपादाने पञ्चमी । समस्येवेति । सप्तमी यथा-गामे बसति । सप्तस्यधिकरणे च 'इति सप्तमी ।। " * अनुयोगद्वार मूत्र * (१८६) कारकस्येति । दिमात्र प्रदर्शितम् ॥ कारक संग्रहो विस्तरेण वृत्यादिपु द्रष्टव्य इति ॥ सारांश-पांच प्रकार का कता, और सात प्रकार से कर्म, दो प्रकार से करण और तीन प्रकार से संपदान होता है दो प्रकार से अपादान और चार प्रकार से आधार होता है षष्टी को कारक संज्ञा नही है क्योंकि-पष्टी के वल सम्बन्ध में ही होती है इसलिये कारक है ही हैं क्योंकि कारण उसे कहते हैं जिसको क्रिया स्पर्श मानहो इनका पूर्ण विवर्ण ऊपर संस्कृत में किया जा चुका है हिंदी में इसलिये विस्तार नही किया है इसका संस्कृत बहुत ही सुगम है सो इसी का नाम विभक्ति प्रकरण है। फिर अकारादि वर्ण त्रिकाल ( भूत भविष्यत वर्तमान ) दश प्रकार का सत्यवचन संस्कृत १ प्राकृत २ मागधी ३ पेशाची ४ शौरसेनी ५ अपभ्रंश गद्य और पद्य के करने से द्वादश मार की भाषायें और पोड़श प्रकार प्रत्यक्षादिवचन इनफे सीखने की भगवान् की आज्ञा है क्योंकि सत्यवचनानुयोग के लिये ही शब्द नय का उक्त कथन है इसलिये ही श्री स्थानाङ्ग सूत्र के दशवें स्थान में दश प्रकार से शुद्धवचनानुयोग कथन किया गया है जैसे कि-..... .........। दसविहे सुद्धावायाणु जोगे पणचे तंजहा चंकारे मंकारे पिंकारे सेयंकारे सायंकारे एगचे पुडत्ते संजूहे संकामिए भिन्ने । दसेत्यादि । शुद्धा अनपेक्षित वाक्यार्था यावाक् वचनं सूत्र मित्यर्य स्तस्था अनुयोगो विचारः शुद्धवागनुयोगः सूत्रेचामुंवद्भावः प्राकृतत्वा तत्र चकारा दिकायाः शुद्धवाचो-यो नुयोगः स च- कारा दिरेव व्यपदेश्य स्तत्र | चकारेति ॥ अत्रा नुस्वारो लाक्षीण को यथा ॥ सुक्केसणिचरे इत्यादौ । ततश्चकार इत्यर्थ स्तस्यचानुयोगो यथा च शब्दः समा हारत रेत रयोगसमुच्चयान्वा चया वधारण पाद पूरणाधिक वचनादिष्यत्रि तत्र ।। इत्यो औस यणाणियत्ति ॥ इह सूत्रे चकारः समुच्चयार्थः स्त्रीणां शय नाना चा- परि भोग्यता तुल्य व प्रतिपादनार्यः ।। मंकारेति ॥ मकारानुयोगो यथा । स- ( १०) * अनुयोगद्वार सूत्र * मणवामाहणवत्ति ।। सूत्रे मा शब्दो निषेधे अथवा ॥ जेणमेव सपणे भगवं महावीर तेणामेवेति ॥ अत्र सूत्रे आगमिक एव येनैने त्यनेनैव विवक्षित प्रतीतेरिति २ ॥ पिंकारोति ।। अकार लोप दर्शनेना नुस्वाराग मेनचा पि शब्द उक्त स्तुदनुयोगो यथा अपि सम्भावनानिवृत्य पेक्षा समुच्चय गर्दाशिक्षाम र्पणभूषण मश्नष्षिति तत्र ॥ एवं पिएगेआसासे ॥ इत्यत्र सूत्रे एवमपि अन्यथा योति प्रकारान्तर समु. चंयार्थोऽपि शब्द इति ३॥ संयकारोत्ति ॥ इहा प्याकारोऽलाक्षणिकस्तेन सेकार इति तदनुयोगो यथा । सेभिक्खेवे ॥ त्यत्र से शब्दोऽथार्थोऽथ शब्दश्च प्रक्रिया प्रश्नानन्तय मगलोप न्यास प्रतिवचन समुच्चयेष्ठि त्यानन्तर्यार्थः से शन्द इति कचित् तस्येत्यर्थो । ऽथवा सेयंकार इति ।। श्रेय इत्येतस्य फरणं श्रेयस्कारःश्रेयस उच्चारण मित्यर्थ स्तदनुयोगो यथा । सेयमे अहिन्जिओ अज्झयण ॥ मित्पत्र सूत्रे श्रेयोऽतिशयेन प्रशस्य कल्याण मित्यर्थोऽथवा । सेयकाले अकम्भवा विभ- वइ ।। इत्यत्र सेय शब्दो भविष्यदर्थः ४ ॥ सायंकारेत्ति सायमिति निपातः स- त्यार्थ स्तस्मा द्वर्णाकार इत्यनेन छान्दसत्वा त्कार प्रत्ययः करणं वा कार स्ततः सायंकार इति तदनुयागो यथा सत्यं तथा वचन सद्भाव प्रश्नष्विीत एतेच चका- रादयो निपाता स्तेषा मनुयोगगभणनं शेषनि पातादिशब्दानुयोगो पलक्षणार्थ मिति ॥ एगत्तेति ॥ एकत्व मेकवचनं वदनुयोगो यथा सम्यग्दर्शन ज्ञान चारि- त्राणि मोक्षमार्ग इत्यत्रैकवचनं सम्यग्दर्शनादीनां समुदितानामेवै क मोक्षाग- , त्वख्यापनार्थ मसमुदितत्वेत्व मोक्षमार्गतेति प्रतिपादनार्थ मिति ६ ॥ पुढचेति ॥ पृथक्नं भेदो द्विवचन बहुवचने इत्यर्थ स्तदनुयोगो यथा ॥ धम्मत्थिकाए धम्मस्थि- कायदे से धम्मत्थिकायापदेसा ॥ इह सूत्रे धर्मास्तिकाय मदेशा इत्येत बहुवचनं तेषा मसंख्या तत्वख्यापनार्थ मिति ७॥ संजूहत्ति ॥ संगतं युक्वार्थं यूयं पदानां पदयो घी समूह: सयूथं समास इत्यर्थ स्तदनुयोगो यथा सम्यग्दर्शन शुद्धं सम्य- ग्दर्शनेन सम्यग्दर्शनाय सम्यग्दर्शनाद्वा शुद्धसम्यग्दर्शन शुद्ध मित्यादि रनेकधीत Fi संकामियति ॥ संकामित विभक्ति वयनाद्यन्वर तथा परिणामिनं तदनु- योगो यथा साहुणवन्दणेणं नासइपावं असं कियाभावा ॥ इह साधूना मित्ये * अनुयोगद्वार सूत्र * ( १६१) तस्याः षष्टयाः साधुभ्यः सकाशादित्येवं लक्षणं पञ्चमोत्वन विपरिणामं कृत्वा प्रशंकिताभावा भवतीत्ये तत्पदं सम्बन्धनीयं तथा अच्छंदाजेन मुंजवि न से चाइति चुच्चइ ॥ इत्यत्र सूत्रेन सत्यागी त्युच्यत इत्येक वचनस्य बहुवचनतया परिणामं कृत्वा नते त्यागिन उच्यते इत्येवं पद घटना कायेति ॥8॥ भिन्न मिति क्रमकाल भेदादिभिभिन्न विसदृशं तदनुयोगो यथा तिविहंति विहेण मिति ।। संग्रह मुक्ता पुन मणेण मित्यादिना तिविहेणंति विकृत मिति क्रम-भिन्न क्रमेणहि तिविह मित्ये तन्न करोगी त्यादिना विवृत्त्य तत त्रिविधेनेति विवरणीयं भवतीति अस्यच क्रम भिन्नस्था नुयोगोयं पथा क्रम विवरेणहि यथा संख्यदोषः स्यादिति तत्प- रिहारार्थ क्रमो भेद स्तथाहि नकरोमि मनसा नकारयामि वाचा कुर्चतं नानुजा- नामि कायेनेति प्रसज्यत अनिष्टश्चै तत्प्रत्येक पक्षस्यै वेष्टत्वा तथाहि मनः प्रभृ- तिभिनं करोमि तैरेव न तुजानामीति तथा कालतो भेदो तीतादिनिर्देश प्राप्ते वर्तमाना दिनिर्देशो यथा जम्बूद्वीप प्रज्ञप्त्यादिपु ऋपभ स्वामिन माश्रित्य । स- केद विंदेदेवण्या वंदइ नमसइत्ति ।। सूत्रे तदनुयोगश्चायं वर्चमान निर्देश त्रिका- लभाविष्वपि तीर्य करेष्वे तन्न्याय प्रदर्शनार्थ इति इदंच दोषादि सू वत्रय मन्य यापि विमर्श नीयं गभीरत्वा दस्येति वाग नुयोगत स्त्वर्थानुयोगः प्रवर्तत इति । भावार्थ-दश प्रकार शुद्ध वचनानुयोग प्रतिपादन किया गया है जैसे कि चकारानुयोग- १ चाव्य यकिनन २ अर्थों में व्यवहृत होता है इस प्रकार योध होने पर फिर यथा स्थान च अव्यय का अनुयोग करना चाहिये, अनुस्वार फेवल प्राकृत के लाक्षणिक के लिये ही है मंकारे २ मा शब्द किन २ अर्थी में संघटित है जैसाकि " समणंचा माहणंवा" इस सूत्र में " मा " शब्द निषेध के लिये विद्यमान है तथा "जेणा मेव समय भगवं महावीर तेरणा मव" इस सूत्र में मकार वच्मिा अर्थ में व्यवहत है इसलिये मकार के अर्थों को ज्ञाता होकर फिर मकारानुयोग करना चाहिये पिंकारे ३ अपिशब्द किन २ अर्थो में प्रयुक्त किया जाता है जैसेकि-आपसंभावनायाम् समुच्चय गही शिष्या . ( १९२) * अनुयोगद्वार सूत्र * मर्षण भूषण प्रश्नादि में भपिशब्द आता है इसलिए इस का उकि २ बोध होने पर फिर इसका अनुयोग करना चाहिये । * सेयंकार ४ से शब्द मागधी भाषा में प्रय शब्द का वाची है जैसाकि * सेकित " अथ तित् तथा अन्य अर्थों में भी व्यवहृत्त हो जाता है इस लिये से शब्द के अर्थों को जान कर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये । सायंकारे -५-सात् निपात का प्रयोग भी यया स्थान करना चाहिये कों कि यह निपात बहुत से अर्थो व्यवहृत होता है। एगचे ६ एकवचन का अनुयोग करनी चाहिये जैसेकि सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्राणि मोक्ष मार्गः- इस सूत्र में एकवचन का अनुयोग किया गया है इस लिये यथा स्थान एक वचन का जो अनुयोग किया जाता है उसे एक वचनानुयोग कहते हैं पुहुचे ७ । पृथक् २ वचनों का अनुयोग करना जैसे कि धम्मस्थिकाय धम्मस्थि कायदेस धम्मेत्थि पएसी" जहाँ पर प्रदेश शन्द को बहुवचन इस लिये दिया गया है कि प्रदेश असंख्ये हैं इसलिये यया स्थान पहुच शब्द के भयों को जानकर इसका प्रयोग करना चाहिये। संजूहे --जो पद विग्रह किया जाता है उसे संयूथ पद कहते हैं अर्थात् समासान्त जो पद है उनको समासान्त करके दिखलानौ उसे ही संथूथं पद काते हैं। संकामिए ६-विभक्तियों का जो संक्रमण किया जाता है उसे संक्रमण कहते हैं इस लिये संक्रमण के साथ जो पद बनते हैं उन्हे संक्रमनानुयोग भिन्न १०-काल मिमानुयोग जैसे कि-भूत भविष्यत वर्तमान काल के वचनों को यथा योग्य परिर्वतन करना उसे भिन्नानुयोग कहते हैं इन दश सूत्रों का विस्तार पूर्वक विवर्ण दृति में लिखा जा चुका है
.
* अनुयोगद्वार मूत्र
इसलिये इनको संक्षेप में विवर्ण किया है अतएव दशं सूत्रों के जब पूर्ण अर्थों
को जाना जाए फिर उन्हीं के अनुमार भाषण किया जाय तव शुद्ध वचना
नुयोग होता है इस लिये सदैवकाल इनका अभ्यास करके वचन गुप्तिका
करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है शेष व्याकरण के प्रकरणों का पागे विषर्ण
किया जायगा । अब पांच नाम के पश्चात् षट् नाम का विवर्ण किया जाता है
किन्तु छ नाम में षट् भावों का अधिकार है इसलिये भावों का विवंचन करते हैं।
अथ षट् भाव विषय ।
सेकित छनामे २ छबिहे पं० तं० उदइए १ उवसमिए
२ खइए ३ खउपसमिए ४ पारिणामिए ५ सन्निवाइए ६
सेकित उदइए २ दुविहे पं० त० उदइएय उदय निष्फन्नेय
सेकिंतं उदय २ अट्टरहं कम्म पगडीणं उदवएणं सेतं उदंचा
सेकिंतं उदय निष्फने २ दुविहे पं० त० जीवोदय निष्फन्नेय
अजीवोदय निष्फन्नेय सेकितं जीवोदय निप्फने २ अणेग
विहे पं० तं० (नेरइए १ तिरिक्खजोणिए २ मणुस्से ३
देवे ४ पुढविकाइए ५ श्राऊकाइए ६.तेजकाइए ७ वाऊका-
इए ८ वणस्सइकाइए ६ तस्सकाइए १० कोहकसाय ११'
माणकसाए १२ मायाकसाए १३ लोभकसाए १४ करहलेसा
१५ नीललेसा १६ काउलेसे १७ तेऊलेसे १८ पम्हलेसे १६
सुकलेसे २० इथिवेदए २१ पुरिसवेदए २२ नपुंसकवेदए २३-
मिच्छदिट्ठी २४ असन्नी २५. अन्नाणी २६ श्राहारए २७ अत्रि-
१ द्वारेवा । प्रा० व्या० ०८पा० सूत्र ७६ ॥
द्वारशने शास्एर वाभवति क्यनेरड्यो नारइयो ।
२५
.- 1 १६४ ) " भनुयोगदार मूत्र * रए २८ सजोगी २६ संसारत्थे ३० छउमत्थे ३१ प्रसिद्ध ३२ अकेवली ३३ सेतं जीवोदय निष्फन्ने सेकिंतं अजीवोदय निफने २ अणेग विहे पं० त० उरालिय वासरीर १ उरालिय सरीरप्पउगपारिणामियादव्वं वेउब्वियं वासरीरं ३ वेरब्बिय- सरीरप्पउगपरिणामियादव्वं पाहारगंवासरीरं ५ थाहारग सरीरप्पउगपरिणामियं वादव्वं ६ तेयगवासरीरं ७ तेयगस- रिपयोगपरिणामिश्रा वादव्वं ८ श्राहारनसरीरं । थाहा- रगसरीरप्पउगपरिणामियंवादव्वं पयोगपरिणामिए. वरणे, गंधे १२ रसे १३ फासे १४ सेत्तं अजीवोदय निप्फने से उदय- निष्फने सेत्तं उदइए नाम ॥ पदार्थ:-( सेक्षित छनामे २ छब्धिहे पं. त.) वह पद नाय कौनसे हैं. (उत्तर) षट् नाम के प्रकार से प्रतिपादन किये गये हैं जैसेकि ( उदइए १ उपसमिए २ खइए ३ ख उपसमिए ४ पारिणामिए ५ सनिवाइये ६) उदय शब्द से ठसा प्रत्यय करने से औदायिक भाव होजाना है क्योंकि उदये भवं औदयिकं । अर्थात् जो उदय करके भोगा आय उसे औदायिक कहते हैं अतः नाम में जो भाव शब्द ग्रहण किया गया है वह केवल नाम और भाव अभेदो पचार के ही मन से है क्योंकि नाम और भाव में परस्पर अभेद भी होता है इसी लिये औदायिक भाव शब्द ग्रहण किया गया है अथवा यथोक्त उदय करके जो नाम उत्पन्न होता है उसे औदयिक भाव कहते हैं १ दिनीय औपशामक भाव है वह भी उण प्रत्ययान्त है क्योंकि औपशमिक भाव उसे कहते हैं जो प्रकृतियाँ नतो तय हुई हैं और नहीं औदयिक भाव में हैं उन्हें प्रापशमिक भाव कहते हैं भस्माच्छादित अग्निराशिवत् २ क्षायिक भाव भी ठण् प्रत्यया. न्त है जो काँकी सर्व प्रकृतियें क्षय होगई हो उसे शायिक भाव कहते हैं ३ . * अनुयोगद्वार मृत्र *- (१६५) यदि कुछ प्रकृतिये तय होगई हों और कुछ उपशम हुई हो तो उसे जयोपशम भाव कहते हैं । जो परिवर्तन शील हो उसे परिणामिक भाव कहते हैं.५ जो औदीयकादि भावों से मिलकर भंग बनाए जाते हैं उसे सन्निपात भाव कहते हैं । अंथ उदय भावका सविस्तर स्वरूप लिखा जाता है ( सेकित उदइय २ दुबिहे पं० २० उदयए उदयनिप्फनेय ) (प्रश्न ) अब वह औदयिक भाव कौनसा है, (उत्तर ) औदयिक भाव द्विप्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि-एकचों औयिक भाव द्वितीय औदायिक निष्पन्न भाव अर्थात् एकतो उदय में रहने वाली प्रकृति द्वितीय उनके जो फल भोगने में आते हैं उन्हें औदायिक निष्फ- अभाव कहते हैं इस प्रकार से गुरुके कहने पर शिष्यनें फिर प्रश्न किया कि- (सेकित उदइय २ अठण्डं कम्पपगडीणं उदयणं सेत्तं उदइय) हे भगवन् । औदायिक भाव किसे कहते हैं गुरुने उत्तर दिया कि हे शिष्य ! जो आठ को की प्रकृतिये हैं वह औदायिक भाव में हैं और उन्हें ही औदयिक भाव कहने हैं ( सेकिंत उदइय निष्फने २ दुविहे पं० त० ) (प्रश्न) औदायक निष्फन भाव किस प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) औदायिक निष्पन्न भाव द्विप्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि (जीवोदय निष्पनेय अनीवोदय निष्फ- आय ) जीवके उदय से निष्पन और अजीव के उदय से निष्पन्न अर्थात् जो कों के प्रभाव से जीवके भावों से निष्यन्न होता है उसे जीवोदय निष्पन्न क. हते हैं जो अनीव ले फल निष्पन्न हों उन्हें अजीवोदय निष्पन्न कहते हैं अब प्रथम जीवोदय निष्पन्न का विवेचन करते हैं यथा (सेकिंतं जीवोदय निष्पन्ने- य २ अणेग विहे पं० ० (प्रश्न ) जीवोदय निष्पन्न भाव कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उत्तर ) जो मूल कर्मों की मकृतियों के प्रभाव से जो- जीवोदय भाव है वह अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसेकि (नेरइ- प.१ तिरिक्ख जोणिए २ मणुस्से ३ ये ४) नैरयिक भाय १ तिर्यग् योनिभाव २ मनुष्य भाव ३ और देवभाव ४ इसी प्रकार (पुठविका इए आजकाइए ६ तंऊकाइए ७ घाऊकाइए ८ घणस्सइकाइए . (१६६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * ६ तस्सकाइए १० ), पृथ्वी कायिक १ जलकायिक -२ अग्निकायिक ३.-वायुकायिक ४ वनस्पतिकायिक ५ सकायिक १० और (कोर कसाए ११ माण कसाए १२ माया कसाए १३ लोभ कसाए १४) क्रोध काय, मान कपाय, माया (छल ) कपाय, लोभ कषाय १४ ( कएह लेसा १५ नील लेसा १६ काउ लेसे. १७ तेड लेसे १८ पम्ह लेसे.१६ सुक लेसे २०) कृष्ण लेश्या १५ नील लेश्या १६ कापोत लेश्या १७ तेजु लेश्या ८ पम लेश्या १६ शुक्ल लेश्या २०, और (इथिवेदए २१ पुरिसवेदए २२ नपुंसगवेदए २३ ) स्त्री वेद २१ पुरुप वेद २२ नपुंसकवेद २३ (मिच्छदिद्धि २४.) मिथ्या दृष्टि २४ (असन्नि २५) असंझी भाव २५ ( अन्नाणी २६) अज्ञानता २६ (आहारए २७ ) आहारक भाव २७ ( अविरए २८) अन्न तभाष २८ (सजोगी २६) योगयुक्त होना २६ ( संसारत्ये ३०) सांसारिकभाव ३० ( छउपत्ये ३१ ) छमस्थभाव ३१ ( प्रसिद्ध ३१ ) प्रसिद्ध भाव और ( अकेवली ३२ ) अकेवली ,भाव ३३ . ( सेत्त जीवोदयनिष्पन्न ) सो वही जीवोदय निष्पन्न भाव है अब जी- वोदय के पश्चात् अजीचोदय के फल वर्णन करते हैं ( सकिंतं अजीवोदय निष्फन्ने २ अणेगविहे पं० त० (अथ शब्द प्राग्वत् (प्रश्न) वह अजीवो दय निष्फन्ने भाव कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उत्तर) अजीवोदय भाव अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है क्योंकि जो शरीरादिक का द्रव्य है वह अजीव द्रव्य का ही समूह है इसलिये उसको अजीवोदय' निष्पन्न कहा गया है वास्तव में तो.वह भी जीवोदय भाव में है किन्तु विशेष पर्यायों की अपेक्षा प्रयोग द्रव्य अजीवोदय निष्पन्न माना गया है अब इसी बात को सूत्र- कार दिखलाते हैं (उरालियं वासरीरं १) वा शब्द परस्परापेक्षा के वास्ते है मनुष्य और तिर्यग् का सव से प्रधान औदारिक शरीर १और (रॉलिय सरीरप्पगपरिणामियं दध्वं २) शौदारिक शरीर के योग्य पारिणामिक प्रयोग द्रव्य अर्थात् मौदारिक शरीर के योग्य- ५-वर्ण २ गंध ५ रस स्पर्श और .
* अनुयोगद्वार सूत्र * (१६७) श्वासोच्छ्वासादि के योग्य द्रव्य हैं उन्हें औदारिक शरीर प्रयोग पारिंणामिक द्रव्य कहते हैं इसीप्रकार आगे भी समझना चाहिये (वेउन्धिय सरीरं ३) वै- क्रिय शरीर ३ और (वेउन्चिय सरीर परोग परिणामियंदवं ४) वैक्रिय. शरीर प्रयोगिक पारिणामिक द्रव्य ४ (आहारगं वा सरीरं ५ ) आहारिक शरीर ५ ५ और (आहारग सरीर पयोग परिणामियंवाददं ६ ) पाहारिक शरीर के परिणामिक द्रव्य ६ (तेयग वा शरीरं ७) तेजस्' शरीर ७ ( तेजस् सरीर पओग परिणामियं वादनं ८ ) तेजस शरीर प्रयोगिक पारिणामिक द्रव्य ८ (कम्मयं सरीरं ६ ) कार्मण, सरीर है और (कम्म सरीर पभोग परिणामियं वादव्वं १०) कार्मण शरीर प्रायोगिक परिणामिक द्रव्य १०) शिष्यने फिर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! प्रयोग परिणाम क्या है गुरुने प्रति वचन में कहा कि भो शिष्य ! (पउग परिणामिय) प्रयोग परिणामिक द्रव्य उसे कहते हैं जो जीव ने ग्रहण किया हुआ द्रव्य है क्यों कि प्रयोग १ मिस्सा २ विसेसा ३ यह तीनो प्रकार से द्रव्य है प्रयोग वह होता है जो जीवन ग्रहण किया है मिस्सा वह होता है जो जीवने छोड़ दिया हो (विसेसा उसे कहते जो अपने आप परिणमनशील ही जैसे वादलादि सो प्रयोग परिणामिक द्रव्यसे परिणमन हुए हैं (वएणे ५) पांच वर्ण (गंध १) दो गंध ( रसे ५) ५ रस (फासे) ८ स्पर्श (सेत अजीचोदयनिष्फन्ने) सो यही मजीवोदय निष्पन्नभाव है क्योंकि यह सर्व , ५ शरीर और पांचों के परिणामिक द्रव्य अजीवोदय निम्पन है ( सेत्तं उ. दय निष्फन सेत्त उदयनामो ) सो वही उदय निष्पन्न और इसे ही औदायिक नाम कहते हैं। नोट-१ औदयिक, २ औपशमिक, ३ क्षायिक, ४ क्षायोपशमिक व ५ पारिणामिक इन पांच भाव के उत्तर भेद ५३ होते हैं सो इस प्रकार हैं। औदयिक के उत्तर भेद २१, औपशमिक के २, क्षायिक के ६, पायोप- शमिक के १८, पारिणामिक के ३ सब मिलकर ५३ उत्तरभाव हुए, . - (१६८) 1 * अनुयोगद्वार सूत्र * : । औदयिक भाव के २१ भेद इस प्रकार हैं-४ गति, ६, लेश्या, ४ कपाय, २ वेद, १ अज्ञान, १ असिद्धपन, १ मिथ्यात्वपन, १ अविरतिपन. औपशमिक भाव के २. भेद-१ उपशम समकित, २ उपशम चारित्र. क्षायिक भाव के है भेद-१ दानलद्धि, २ लाभलद्धि, ३ भोगलद्धि, ४ उप भोगलद्धि, ५ वीर्यलाद्धि, ६ केवलज्ञान, ७ केवलदर्शन, ८ क्षायिक समकित, दायिक चारित्र. . पायोपशप के १८ भेद-दानादिक, ५ अंतराय,' १० उपयोग, १ क्षयो- पशमसमकित, १ क्षयोपशमचारित्र, १ देशपिरतिचारित्र. पारिणामिक के ३ भेद-१ जीव पारिणामिक, २ भव पारिणामिक, ३ अमवपारिणामिक उपर्युक्त ५३ उत्तरभाव का बासठिया लिखते हैं । गा-४ गइ, ५ इंदिय, ६ काए, ३ जोग, ३ वेय; ४ कसाय, ८ नाणेसु, ७' संजम, ४ देसण, ६ लेश्या, २ भव, ६ समे, २ सन्नी, २ आहारे । अर्थः-गति, ५ ईन्द्रिय, ६ काय, ३ योग, ३ वेद' ४ कषाय, ८ ज्ञान (५ शान और.३ अझान) ७ संयम, ४ दर्शन, ६ लेश्या, २ भव्य तथा अभ- व्य ६ शेम, २ संज्ञी तथा असंही, ३, आहारक व अण्णांहारक इन ६२ मार्गणा के ऊपरं ५ मूल भाव व ५३ उत्तर भाव बतलाने हैं।
१ . . . . ० ent * กร” ช * * * * * * * * * * * * * * * * * * am तेउ ३ * अनुयोगद्दार मूत्र में ( १६६ ) ५३ उत्तर भाव के मूल- उत्तर उदय उपशम नायिकाक्षयोपशम पारिणामिक भाव भाव भाव भाव भाव भाव ऊपर मार्गणा के ६२ भाव २१ २ 8 १८ द्वार कहते हैं। १५ ३३ १३ १ नरकमान १ २ तिथंचगति २ ५ ३६।१८ १ मनुष्यगति ३ ३ ५ 8 ५. १८२ १५ देवगति ४ ३७१७१ ५ एकेंद्रिय १ ३ ६ बेंद्रिय २ २६ १३ १० ७ तेंद्रिय ३ ३ २६ ८ चौनिद्रिय ४ २७ १३ है | पंचेंद्रिय ५ ५ ५३ २१ 8 १८ १० पृथ्वी १. २५ | १४ ११ अप २ २५ १४ १२ २४१३ १३ बार ४ २४ १३ १४ | वनस्पति ५ ३ २५ १४ १५ नस६. ५३ १२१ २ १६ मनजोग १ ५३२१ १८ १७ वचन जोग २ ५ २ १८ १८ काया जोग ३ ५३ २१ २ १८ १. स्त्रीवेद १ ५ ४११८ २ १८ २० ५ ४१ १८ २ १८ २१ ५ पुसक वेद ३ २ ४१ | १८ १८ २२ कोध १ ५ ४५ | २१ १८ २३ मान २ ५ ४५ २१ २ १८ माया३ ५. ४५ २१ १८ २५ लोभ ४ ५ ४५ | २१ २ १८ २६ मतिज्ञान १ ४५ | १६ २ १५ २७ श्रुत०२ ४०१४ २ १५ २८ अवधि ३. ४८१६ २६ मनः पर्यव ४ ५ । ३४ १५ २ १४ ३० केवल ५ ३ १४. ३ ३१ मति अ०६ ३ ३५२१ ३२ ३ ३५२१ ११ - w w worororonasaran पुरुष चंद २ SUNo~~~~~~~~~~~~~~~ . . ~ WWW, . • • . श्रुत अ०७ (२००) * अनुयोगद्वार, सूत्र * ३ . OMovowww AC deue.e ~~~ ३ . ५६ उत्तर भाव के मूल | उत्तर उदय उपशमक्षायिक क्षयोपशम पारिणामिक ऊपर मार्गणा के ६२ | भाव | भाव भाव भाव | भाव भाव भाव द्वार कहते हैं। ५ ५३ २१ २ 8 १८ ३३ | विभंग ३५ /२१ ११ ३४ । सामायिक ? १४ ३५ छेदापे स्थापनीयर/ ५ ३३ । १५ ३६ परिहारविशुद्ध ३, ५ २६११ १४. ३७ । सूक्ष्मसंपराय ४ ५ २१ ४ १३ ३८ यथाख्यात ५ ५ २८ २ 8 १२ ३९ | देश विरति ६ ५ ३३ । १६ १ १३ ४० असंयम ७ ५ ४१ / २१ १ १५ ४१ चक्षुद०१ ५ २१२१ ४२ अचक्षु०२ २१ २१ ४३ | अवधि २१ २१ ४४ केवल ४ १४ ४५ कृष्ण १ ५ ३१६ १८ ४६ - नील २ ५ ३६ १६ १ ४७ कापोत ३ २९१६ ४८ तजु ४ ५ ३८ । १५ १ १८ ४९ पद्म ५ ३८ /१५] १ ५० शुक्ल ६ ५ ४७/१५ १८ ५१ भव्य १ ५२ /२१ है ५२ अभव्य २ ३४ २१. ५३ उपशेम १ ५ ३८१६ ५४ क्षयोपशम २ ३. ३६ /१६ १५ ५५ नायक ३. ४५ /१६ १४ ५६ मिश्र ४ ३३ / २० ११ ५७ सास्वादन ५ ३R/१० ११ ५८ मिथ्यात्व ६ ३५२१ ११ ५९ सजी १ ५३ | २१ २ १८ ६० असंज्ञी २ २३ १५ ६१ आहारक १. ५३२१ २ २ १८ ६२. अणाहारक'२ ५०२१ २ 8 १५ मार्गणा ६२ ६२/६२ ४२ ४४,६० ६२ ne orr. ManmomvN०d "० ० ० wowonod.romanbr له سم م ه م . ع س ه س م س س س س س س س س ع م ه م م ه ه س س س س سه | . १ o ano wa . سه سه له عه سه عد مر ore-~~~~~ * अनुयोगद्वार सूत्र (२०१) . भावार्थ:-पदनाम में पद् भावों का विवरण किया गया है अतः भाव और नाम में अभेद माना है इसी लिये नाम पद में भावों का विवर्ण है जैसे कि- औदायिक भाव १ औपशमिक भाव २ क्षायिक भाव ३ योपशम भाव ४ पारिणामिक भाव ५ सनिपाविक भाव ६. औदयिक भाव उसे कहते हैं जिससे कर्मों की प्रकृतिय उदय होकर कमी का फल दें औपशमिक भाव उसका नाम है जो कर्म न तो क्षय हुए हैं और न उदय भाव में हैं इस लिये उन्हें उपशम भाव कहते हैं २ यदि कर्म क्षय हुए हों तो उसे क्षायिकभाव कहते हैं। यदि कुछ क्षय हुए हैं और कुछ उपशमभाव में हैं उन्हें क्षयोपशम भाव कहते हैं ४ जो द्रव्य परिणमनशील हों उन्हें पारिणामिक भाव कहते हैं ५ अपितु जो इन के संयोग होने से नाम उत्पन्न होता है उसे सान्नि- पातिक भाव माना गया है फिर उदय भाव दो प्रकार से माना है जैसे कि-एकतो औदायिक भाव-द्वितीय औदयिक निष्पन्न भाव-औदयिक भाव में आगे कर्मों की सर्व प्रकृति हैं और औदायिक निष्पन्न भाव दो प्रकार से माना गया है क्योंकि जो वस्तु उदय होती है उसका फल अवश्य होता है उसे उदयनिष्पन्न भाव कहते हैं वह भी दो प्रकार से हैं एक तो जीवोदय-द्वितीय अजीवोदय-जीवोदय उसे कहते हैं जो जीव की शक्ति से पर्याय उत्पन्न हों जैसे कि ४ चार गति परकायें चतुर कषायें तीनों वेद पट् लेश्यायें मिथ्याष्टिभाव अवतभाव असंजिभाव अज्ञानभाव आहारिकभाव छद्मस्थ भाव-संयोगभाव संसारभाव असिद्ध और अकेवलीभाव यह सर्व आगे काँ की प्रकृतियों के ही फल हैं और इनके सहचारी ५ निद्रा हास्यादि सर्व और प्रकृतियें भी जान लेनी चाहिये । लेश्यायें इस लिये औदायिक भाव में हैं कि योगों के संबंध होने से ही लेश्याओं की उत्पत्ति है इस लिये अन्य सर्व प्रकृतियें भी ग्रहण करनी चाहिये यह सर्व जीवोदय निष्पन्नभाव है और अजीवोदय निष्पन्नभाव उसका नाम है जिसमें प्रयुक्त द्रव्य परिणाम को प्राप्त हों उसको अजीवोदय निष्पन्न भाव कहते हैं जैसे कि पांच शरीर पांच शरीरो का परिणयनशील द्रव्य और वर्ण ५ गंध २ रस ५ स्पर्श ८ पूर्वोक्त यह सर्व द्रव्यों के कारण से ही परिणत होते हैं इस लिये उन्हें अजीवोदय निष्पन्न भाव माना गया है साथ ही अन्य द्रव्य शरीरों के सहचारी भी जान लेने चाहिये और यह भी जीव के कर्मोदय से ही प्राप्त होते हैं किन्तु विशेष पुद्गलदम्यक सम्बन्ध होने से इनको अजीवोदयनिष्पन्न AN (२०२) * अनुयोगद्वार सूत्र * भाव माना गया है अतः इसी स्थान पर औदयिकभाव का समास सम्पूर्ण हो गया है अब इसके पश्चात् औपशमिकभाव का विवर्ण किया जाता है ॥ ॥ अथ औपशमिकभाव विषय ॥ मूल-सेकिंतं उपसमिए ? २ दुविहे प. तं. उवसमेय उव समनिप्पन्ने यसोकतं उवसमे २मोहणिज्जस्स कम्मस्स उवसमेणं सेकितं उवसम निष्पन्ने ? २ अणेगविहे प. तं. उवसंतकोहे उवसंत माणे उपसंत माया उवसंतलामे उपसंतपेज्जे उंबसंत दोसे उवसंतदंसणमोहणिज्जे ७ उवसंत चरित्तमोहणिजे ८ उव संतियासम्मत्तलद्धि उपसमिया चरित्तलाद्ध.१० उवसंत कसाय छउमत्थे वीयरागे ११ से तं उवसम निप्पन्ने सेतं उपसमिए नामे ॥ पदार्थः-(सेकिंत उपसमिए १ २ दुविहे प० त० ) अब वह कौनसा औपशमिक भाव ? (उत्तर) औपशमिक भाव दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (उपसमेय उवसमनिप्पन्नेय ) उपशमभाव और उपशमनिष्पन्न भाव च पाद पूरणार्थ है (सेंकित उव्वसमे २) वह उपशमभाव कौनसा है ? (मोहणिज्जस्तकम्मस्स उवसमेणं) (उत्तर) मोहनीय कर्म की अष्ठाविंशति प्रकृतियों का उपशम श्रेणी में उपशम होजाना उसे उपशम भाव कहते हैं रणं इति वाक्या लकारार्थ में है (सेकित उवसमनिप्पन्ने २) (प्रश्न) वह उपशम निष्पन्न भाव कौनसा है ? (उत्तर) उपशमनिष्पन्न भाव ( अणेगविहे प० त०) अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है क्योंकि मोहनीय कर्म की प्रकृतियों के उपशम होने से जो फल उपलब्ध होते हैं उन्हें उपशमनिष्पन्न भाव कहते हैं सो वह फल निम्नलिखितानुसार हैं ( उवसंतकोहे १ उपसंतमाणे २ उव- संतमायो ३ उपसंतलोमें ४) क्रोध का उपशान्त होजाना जैसे भस्माच्छा. ---- ? , पन-छम-मूर्ख-द्वारे-वा। प्रा० व्या० म०८ पा. २ ० ११२॥ एषु संयुक्तस्यान्त्य यजमातु पूर्व उहा भवति ॥
* अनुयोगद्वार भूत्र * (२०३). दित अग्नि होती है तद्वत् क्रोध होना इसी प्रकार मान माया लोभ और (पेज्जे ५ उवसंतदोसे ६ उपसंतदसणमोहणिज्जे ७ उपसंत चरित्तमोहणिज्जे ८) उपशान्त राग . ५ उपशान्त द्वेष ६ उपशान्तदर्शनमोहनीय कर्म ७ उपशान्त चारित्र मोहनीय कर्म ८ (उवसमिया सम्मत्तलबी ९ उपसमिया चरित्तलद्धी १०) उपशान्त सम्यक्त्वलब्धि ६ उपशमचारित्रलन्धि १० (उव- संतकसायउमत्थवीयरागे ११) उपशान्तकपायछमस्थवीतराग जो एकादश गुणस्थानवर्ती जीव हैं (सेतं उवसमनिप्पन्ने सेत उवसमिये नामे. ) सो वही उपशमनिप्पन्नभाव है और इसे ही उपशम नाम कहते हैं ।। भावार्थ-औपशमिक भाव भी दो प्रकार से वर्णन किया गया है एक तो उपशम द्वितीय उपशमनिष्पन्न । उपशम उसे कहते हैं जिस के द्वारा मोहनीय कर्म की अष्टाविंशति प्रकृतियें भस्माच्छादित अग्निवत् उपशम हो द्वितीय उपशम निष्पन्न उसका नाम है जो मोहनीय कर्म के उपशम होने से फलों की प्राप्ति हो जैसे कि चारों कषायों का उपशम होना राग और द्वेष का उपशम होना और दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम होना चारित्रमोहनीय कर्म का उपशम होना और इन दोनों के फल उपशम सम्यक्त्वलब्धि और उपशमचारित्रलब्धि, का प्राप्त होजाना अर्थात् शंकादि का उपशम होना और उपशान्त कपाय: छमस्थ वीतराग पद का-माप्त होना यह सर्व उपशम भाव के फल हैं इन्हें उप- शम निप्पन्न भाव कहते हैं।उपशम भाव का प्रतिपक्ष क्षायिक भाव है इसलिये. अब नायिक भाव का विवर्ण किया जाता है। ॥अथ क्षायिक भाव विषय ॥ मूलः-सर्कितं क्खइए ? २ दुविहे प० तं० खइएय खइय निप्पन्नेय सेकिंतं खइए? २ अट्ठएहं कम्मपगडीणं क्खएणं सेतं क्खइए सकिंतं क्खइय निप्पन्ने २ उप्पन्ननाणदंसणधरे - रहा जिण केवली खीणाभिणीवोहियनाणावरणे १ खीणेसुय- नाणावरणे २ खीण उहीनाणावरणे ३ खीण मणपज्जवना- णावरले ४ खीण केवलनाणावरणे ५ अणावरणे निरावग्णे - (२०४) * अनुयोगद्वार सूत्र * खीणावरणे नाणावरणिज्जेकम्मविप्पमुक्के केवलदंसी सव्वदंसी खीणनिदेह खीणनिहानिद्दे खीणपयले खीणपयलापयले खीणथीणनिद्धी १० खीणचक्खुदसणावरणे ११ खीण अच- क्खुदंसणावरणे १२ खीण उहीदंसणावरणे १३ खीण केवल- दसणावरणे १४ अणावरणे निरावरणे खीणावरणे दरिसणा- वरणिज्जस्स कम्मस्स विप्पमुक्के खीण सायावयणिज्जे १५ खीण असायावेयणिज्जे १६ अवेयणे निव्वेयणे खीणवयणे “सुभासुभवेयणिज्जे विप्पमुक्कै खीणकोहे खीणमाणे खीणमा- या खीण लोभे २० खीणपेज्जे २१ खीणदोसे २२ खीणदसण मोहणिज्जे २३ खीणचरित्त मोहणिज्जे २४ अमोहे निमाहे खीणमोहे मोहणिज्जे कम्म विप्पमुक्के खीण नेरइयाउए २५ खीण तिरियाउय २६ खीणमणुयाउय २७ खीण देवाऊय २८ अणाउए निराउए खीणाज्य आउयकम्मविप्पमुक्के गइ जाइ सरीरं गोवंग बंधण संघायण संघयण संहाण अणेग बोंदि- विंद संघाय विष्पमुक्के खीण सुभनामे २६ खीण असुभनामे, ३० अनामेनिन्नामे ३० खीणनामे सुभासुभनामकम्म विप्पमुक्के खीण उच्चा गोए ३१ खीण नीयागोए ३२ अगोए निगोए खीणगोए सुभा सुभ गोत्तकम्म विप्पमुक्के खीणदाणंतराय,३३ खीण लाम अंतराय.३४ खीण भोगान्तराय ३५ खीण उ. 'वभोगान्तरायं ३६ खीणवारियांतराय ३७ अणन्तराय खीण अंतराय कम्मस्त विप्पमुक्के सिद्धे बुद्धे मुत्ते परिनिवुड़े अं- तग सव्वदुख पहीणे सेत्तं खइय निष्पन्ने सेत्तं खइय नामे. पदार्थ-(सेकिंतं खइए? २ दुविहे प००) (प्रश्न) वह नायिकभाव कौनसा है? (उत्तर) क्षायिकभाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि (खइपय * अनुयोगद्वार सूत्र * (२०५) खइय निप्पन्नेय ) एक क्षायिकभाव द्वितीय चायिकनिप्पन्न भाव (.सेकिंतं खइय? २ (प्रश्न) चायिक भाव किसे कहते है? (उत्तर) अहएई कम्म पगडीणं खइयणं सेत्तं क्खइय) आठ कर्मों की प्रकृतियोंका क्षय होजाना उसे नायिक भाव कहते है क्योंकि दायिक भाव उसी का नाम है जो सर्व कर्म प्रकृतियों से रहित हो । अब क्षायिक निष्पन्नका वर्णन करते हैं (सेकिंतं क्खइय नि- प्पन्ने २ ) ( प्रश्न ) क्षायिक निष्पन्नभाव किसे कहते हैं? ( उत्तर ) सायिकनिष्पन्नभाव के निम्र लिखित लक्षण हैं? ( उप्पन्न नाणदसणधरे ) जिनको ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय के तय होने के कारण से ज्ञान ., और दर्शन उत्पन्न हुआ है इसलिये उत्पन्नज्ञानदर्शन के धरने वाले ( अरहाजिणे केवली ) सर्व के पूजनीय अर्हन् फिर राग द्वेष के. जीतने से जो जिन कहलाए हैं और सम्पूर्ण झान के कारण से जिन को केव- ली कहा जाता है और जो आगे कर्मों की प्रकृतियों को तय कर के फिर उन के फल को प्राप्त हुए हैं वह सिद्ध हैं अव प्रथम ज्ञानावरणीय कर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करते हैं यथा (खीणाभिणि वोहियनाणावरणे) तीण किया है आमिनिवोधिक झान का आवरण और (खीण सुय नाणा वरणे) तीण है जिन .के श्रुतज्ञानावरणे (खीण ओहिनाणावरणे) क्षीण है जिन के अवधिज्ञानावरण ३ खीणमणपज्जवनाणावरणे ) क्षीण है मनःपर्यय ज्ञाना वरण ४ (खीण केवलनाणावरणे ) क्षीण है केवलज्ञानावरणे ५ (अणा- ज्ञानावरणे ) आवरण से रहित हैं निरावरणे ) निरावरण हैं ( खीणावरणे) जिनका आवरण क्षीणता को प्राप्त होगया है जबकि आवरण सर्वथा क्षीण है तब (नाणावरीणजे कम्मविप्पमुक्के) ज्ञानावरणीय कर्म से विषमुक्त हुए अर्थात् ज्ञानावरणीय कर्म की पांचों प्रकृतियों के आवरण तय करके केवल ज्ञान के धारक हुए फिर सर्वथा आवरण क्षीण करके केवल दर्शन भी प्राप्त इस लिये दर्शनावरणीय कर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करते हैं (केवलदंसा- सबदसी ) ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय होने से केवल ज्ञानी होकर फिर दर्शना वरणीय कर्म के क्षय होने से केवलदर्शी और सर्वदर्शी हुए हैं अब इन की प्रकृतियों का स्वरूप कहते हैं ( खीणनि ६) जिन्हों ने निद्रा क्षीण की है निद्रा उसका नाम है जिसमें सुखपूर्वक -सो कर अपनी इच्छानुसार उठे ६ और (खीणनिदानिद्दा, ) जिन्हों ने सीण की है निद्रानिद्रा क्योंकि-निद्रा (२०६) * अनुयोगद्वार मूत्र * निद्रा उस कहते हैं जिसमें सुखपूर्वक सोकर दुःखपूर्वक जागृत अवस्था को प्राप्त होवे ( खीण पयले ८) और जिसन क्षीण की है अचला नामक निद्रा जो बैठहुए को भी आजाती है ८ ( फिर खीणपयलापयलाह) क्षीण की है प्रत्रलाप्रचला-जो निद्रा चलते समय भीमाप्त हो जाती है और ( स्त्रीण त्याण- निद्धि १० ) क्षीण है जिनके स्तीनगिड़ जो महा अशुभ कमी के उढय से जीव को होती है (खीणचखुदसणावरण) क्षीण हो गया है चक्षुओं का आररण ११ ( खीण अचक्खुदयणावरणे ) क्षीण है चक्षुभिन्न इन्द्रियों का आवरण अर्थात् चार इन्द्रियों के आवरण भी क्षीण हो गये हैं १२ ( खीण उहीदसणावरणे १३) क्षीण है जिनके अवधि दर्शना वरण १३ और ( खीण केवलदसणावरण १४ ) केवलदर्शनावरण भी नय होगया है इसलिये ( अण्णावरणे ) अनावरण है (निरावरण) निरावरण है (खीणावरणे) क्षीण आवरण है ( दरिसणावरणनिजकम्मस्सविप्पमुके) इसलिये दर्शनावरणीय कर्म से विषमुक्त है अर्थात् जो दर्शनावरण कर्म के आवरण है उन्हों से रहित होगया है इस बास्ने सर्वदर्शी शब्द ग्रहण किया है अब वेदनीय कर्म का स्वरूप कहते हैं ॥ ( खीण साया वयणिज्जे १५ खीण असाया वेयणिज्जे १६) क्षीण है शाता वेदनीय कर्म १५ और क्षीण है अशाता वेदनीय कर्म १६ क्योंकि वेदनीय कर्म के क्षय होने से शाता वेदनीय और अशाता वेदनीय यह दोनों प्रकृतिय क्षय होगई हैं। फिर आत्मिक सुख प्रकट होगया है क्योंकि यह दोनों प्रकृतिये विनाशवती हैं सो वेदनीय कर्म के तय होने से ( अवेयणे नियणे खीणवेरणे) वेदना से रहित हुए। जिनकी वेदना चली गई है अपितु क्षीण वेदना होगई है फिर ( सुभासुभवेयणिज्जे कम्मविप्पमुक्के) शुभाशुभ वेदनीय कर्म से रहित हुए अतः वेदनीय कर्म से पीछे अब मोहनीय कर्म का स्वरुप लिखा जाता है. (खीण कोहे खीण माणे खीण माया खीण लोभे २०) क्षय हो गया है क्रोध मान माया लोभ २० (खीण पेज्जे २१ खीण दोसे २२) क्षीण होगये हैं राग और द्वेष फिर (खीण दसणमाहणिज्जे २३ ) जिनके दर्शनमोहनीय कर्म, की तीनों प्रकृतियें क्षय हो गई हैं जैसे कि सम्यक्त्व मोहनीय १ मिश्र मोहनीय २ मिथ्यात्व मोहनीय तया (खीण चरित्तमोहणिजे २४) चारित्र मोहनीय कर्म की भी दोनों प्रकृतियें क्षय हो गई हैं जैसे कि कपाय और नो कपायों के १६ भेद हैं नो * अनुयोगद्वार सूत्र * (२०७) कषायों के हास्यादि नव भेद हैं २४ इसलिये ( अमोहे निमोहे खीणमोहे) मोहनीय कर्म के तय होने से अमोह निर्मोह और क्षीणमोह हो गये हैं अतः ( मोहणिज्जे कम्मविप्पमुक्के ) मोहनीय कर्म से विप्रमुंक्त हो गये अर्थात् मोहनीय कर्म से सर्वथा रहित होकर फिर आयुष कर्म से रहित हुए इसलिये अब आयुकर्म की प्रकृतियों का विवर्ण करत हैं (खीण नेरईयाउए २५ खी- ण तिरियाउए २६ खीण मणुयाउए २७ खीण देवाउए २८) क्षीण करदी हैं नरकायु तिर्यक् आयु मनुष्य आयु और देवायु जब चारों प्रकार से आयु क्षय करदी तब (अणाउए निराउए खीगाउए ) अनायु हुए निरायु हुए अपितु क्षीणायु हुए फेर ( आउए कम्मस्स विप्पमुके) आयुकर्म से सर्वथा विम मुक्त हुए अर्थात् आयु कर्मों के बंधनो से छूट.गये फिर नाम कर्म की प्रकृतियों से भी रहित हुए जिन का विवर्ण निम्न लिखितानुसार है ( गइ जाइ शरीर गोवंगवं धण संघायण संघयण संहाण अणेगवोधि विंद संघाय विप्पमुक्के) नामकर्म के उदय से ही शरीर की रचना है. इसलिये इनकी सर्व प्रकृतियों का विवर्ण किया गया है जैसे कि चार गतियें पांच जातियें पांच शरीर तीनों के अंगोपांग ५ बंधन ५ संघातन ६ संहनन ६ संस्थान अनेक प्रकार के शरीरों का बृन्द और उनके संघात सर्व प्रकार से विषमुक्त हुए अर्थात् नामकर्म की प्रकृतियें क्षय करी फिर (खीण सुमनामे २८) क्षीण कि- या शुभ नाम २८ और (खीण अशुभनामे ३०) क्षीण कर दिया है अशुभ नाम जैसे अनादेञ्ज नामादि ( अनामे निन्नामे खीणनामे ) इसलिये अनाम निर्नाम और क्षीणनाम हुए अतः (खीण सुभासुभनामकम्मविप्पमुक्के ) तीण कर दिया है शुभाशुभ नाम इसी वास्ते नाम कर्म से रहित हुए फिर (खीण उच्चागोए ३१ (खीण नीयागोए ३२ ) गोत्रकर्म के क्षय होने से ऊंचगोत्र और नाचगोत्र भी क्षीण कर दिया है इस लिये ( अगोए निगोए खीणगोए सुभासुभगोत्तकम्मविप्पमुक्के ) गोत्रकर्म के क्षय होने से अगोत्र निगोत्र क्षीणगोत्र हो गये अतः शुभाशुभ गोत्र कर्म के बंधन से मुक्त हुए फिर (खीण दाणंतराय ३३) अंतराय कर्म के क्षय होने से दानांतराय भी तय कर दी (खीण लाभांतराय ३४ ) क्षीण की है लाभांतराय ३४ खीण भोगांतराय ३५ ) क्षय करदी है भोगांतराय ३५ फिर ( खीण उव भोगांतराय .३६ ) क्षीण करदी है उपभोगांतराय जो वस्तु पुनः पुनः आ- ., (२०८) * अनुयोगदार मूत्र * सेवन करने में आती है उन्हें उपभोग कहते हैं (खीण चीरियंतराय ३७) पौण की है बल वीर्य की अंतराय जब अंतगय कर्म की पांचों प्रकृनिय तय हो गई तब ( असंतराय ) अंतराय रहित हुए ( नाणंतराय ) नही रही है जिनके अंतराय ( खीणतराय अतः क्षय हो गई है सर्वथा अंतराय पुनः ( अंतगर कम्मस्सविष्पमुक्के) अंतराय कर्म के बंधनों से मुक्त हुए इस लिए (मिद्धे बुद्धे मुत्ते परिवीबुडे अंतग) जो आत्मा नायिकं भाव वाले हैं उनको सिद्ध, बुद्ध, मुक्त शीतलीभूत दुःखों के अंतकर्ता ( सम्बदुक्खप्पहीणे) सबै दुखों से रहित ऐसे कहते हैं अर्थात् उनको उन नामों से कहाजाता है (सेते खइय निप्पन सेतं खइय नामे) अथ शब्द प्रागवत है वही क्षायिक निष्पन्न भाव है और इसे ही शायिक नाम कहते हैं.सो इसी स्थानोपरि क्षायिक भाव का समास पूर्ण हो गया है इस के आगे क्षयोपशम भाव का विवर्ण किया जाता है ।। भावार्थ- तायिक भाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि एकनो क्षायिक भाव द्वितीय क्षायिक निष्पन्न भाव है चायिक भाव उसे कहते हैं जि: ससे आठों कर्मों की प्रकृतियों का क्षय हो और सायिकनिष्पन्न भाव उस का नाम है. जो आठों कर्म की प्रकृतियों के क्षय होने से सुख का अनुभव किया जाता है जैसे कि पतिज्ञानावरणीय १ श्रुतज्ञानावरणीय २ अवधिज्ञानावरणीय ३ मनःपर्यवज्ञानावरणीय ४ केवलज्ञानावरणीय ५ इन पांचों के क्षय होने से जीव सर्वज्ञ हो जाता है फिर निद्रा १ निद्रानिद्रा २ अचला ३.प्रचला पुचला ४ स्थानगिद्धि निद्रा ५ चक्षुदर्शनावरणीय ६ अबक्षुदर्शनावरणीय ७ अवधिदर्शनावरणीय ८ केवलदर्शनावरणीय ह इन प्रकृतियों के क्षय होने से जीव सर्वदर्शी होजाता है और शातावेदनीय और अशातावदनीय के क्षय होने से जीव वेदनीय कर्म से रहित होता है फिर क्रोध मान माया लोभराग और द्वेष सभ्यत्व मोहनीय मिथ्यात्व मोहनीय मिश्र माहनीय १६ कपायानव नोकषायों के क्षय करने से जीवं क्षीणमोहणीय कहा जाता है पुनः नरकायु तिर्यग् आयु मनुष्य आयु देवायु के क्षय करने से जीव निरायु हो जाता है अतः चारों गतियां पांचजांतियां ५ शरीर तीनों के अंगोपांग ५ बंधन ६ संघातन श्लेष रुप ६ संहनन ६ संस्थान अनेक प्रकार की शरीराकी आकृतियां और शुभनाम अशुभनाम को लय करके जीव क्षीण नाम वाला हो जाता है अर्थान् अपने निज स्वभाव अमूर्ति भाव में आ जाता है क्योंकि नाम कर्म * अनुयोगद्वार सूत्र * (२०६) सूत्रधार ( वढई ) के समान शरीर की रचना करता है फिर ऊंच गोत्र और नीच गोत्र की प्रकृतियों को तय करने से जीव अगौत्रिक हो जाता है फिर दानां- तराय लाभान्तराय भोगान्तराय उपभोगान्तराय वलवार्यान्तराय इन पांचों प्रकृतियों के क्षय होने से अनंत शक्ति सम्पन्न जीव हो जाता है फिर उस जीव को सिद्ध बुद्ध मुक्त शीतलीभूत सर्व दुखों का अंतकर्ता इत्यादि नाम हो जाते हैं इस लिये इसको क्षायिकभाव कहते हैं और यही क्षयिक भाव का स्व- रूप है अब चायिक भाव के पीछे क्षयोपशम भाव का-विवर्ण किया जाता है। ॥ अथ क्षयोपशम भाव विषय ॥ मूल-सेकिंतं खग्रोवसीमए? २दुविहे प०० खोवसमिए यखओवसम निप्फन्नेय सेकितं खोवसमे?२ चाण्हंघाइकम्माणं खओवसमेणं तंजहा नाणावरणिज्जस्स दंसणा वरणिज्जरस मोहणिज्जस्स अंतराइस्स ४ खओवसमेणं सेतं खोवसमणं सेकितं खरोवसमेनिप्पन्न?२ अणेगविहेप.तं. खोवसीमयात्रा भिणिवोहियनाणलद्धी खोवसमिया सुयनाणलद्धी स्त्रोव समियाओहिनाणलद्धी खोवसमिया मणपज्जवनाणलद्धीष्ट खओवसमियामइअणाणलद्धी५ खीवसीमयासुयअणाणलद्धी ६ खोवसमियाविभंगणाणलद्धी खोपसमिया चक्खुदंसण लद्धी ८ एवं अचक्दसणलद्धी ६ ओहिंदसणलद्धी १० एवं सम्मदसणलद्धी ११ मिच्छादसणलद्धी १२ सम्ममिच्छादसण ल दी १३ खोवसमिया सामाइयचरितलद्धी १४ एवंछेदोवट्ठावण लखी१५ परिहार विसुद्धियलद्धि१६ सुहुमसंपरायलद्धी|१७खयो वसमयाचारताचारत्तलाछ १८ खओवसमियादाणलद्धि १९ एवं लाभ२०भोग२१अोवभोगररखरोवसमियावीरियलद्धी२३ खउव समियावालवीरियलबी २४ खओवसमियापंडियविरीयलद्धि २५ (२१०) * अनुयोगद्वार सूत्र * खोवसमियवालपंडियलबी२६ खओवसामयसोइंदियलद्धि२७, खग्रोवसमियाचखुइंदियलबी२८खओवसमियाघणिदियलाडि २९ खग्रोवसमिया जिभिदियलद्धि ३० खओवसामिय फासिंदिय, लद्धी ३१ खोवसामया आयारघरे ३२ एवं सुयगडधरे ३३ ठाणांगधरे ३४ समवायधरे ३५ विवाह पाण्णात्तिधरे ३६ एवं नायाधम्मकहा ३७ आवासगदसा अंतगओदसा ३६ अणुतरो बवाइयदसा ४० पाराहावागरे ४१ खओवसमिया विवागसुयधरे ४२ खोवसमिया दिठिवायधरे ४३ खोवसमिया नवयुवधरे ४१ जो चौदसपुव्वधरे १५ खोवसमियागणीवायए ४६ सेत खओवसमनिप्फन्ने सेतं खओवसमिये नाले ॥ पदार्थ-(सेकिंतं खओवसमियर दुविहे पं० त०) अब वह क्षयोपशमभाव कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उत्तर) क्षयोपशम भाव दो प्रकार से प्रतिपा दन किया गया है जैसे कि (खोवसमेय १ खओवसम निष्फन्नेय) एक क्षयो पशम भाव द्वितीय क्षयोपशम निष्पन्न भाव (सेकितं खोवसमे २ चउपाइणं- कम्माणं खओवसमेणं तंजहा) (प्रश्न) क्षयोपशम किसे कहते हैं (उत्तर) क्षयोपशम भाव उसका नाम है चारों घातिक कर्मों के क्षयोपशम होने से निष्पन्न होता है जैसे कि- ( नाणावरिणज्जस) ज्ञानावरणीय के (दसण बरणिज्जस्स २) दर्शना वरणीय के २ ( मोहणीज्जस्सइ) मोहनीय कर्म के (अंतराइयस्स ४) अंतराय के ४ (खोवसमेणं) योपशम होने से जो भाव उत्पन्न होते है उसे तयो पशम भाव कहते हैं अर्थात जब चारों कर्म क्षयो पशम भाव में होते हैं तब क्षयोपशम भाव कहा जाता है ('सेतं-खोवसमे सो वही क्षयोपशम भाव है अर्थात कुछ उक्त कर्म तय हो गये हों और कुछ उपशम हुए हों तब उसको क्षयोपशम भाव कहते हैं । ॥ अथ क्षयोपशम निष्पन्न का विवर्ण करते हैं । ( सेकित खोवसमे निष्पन्न २ अणेग विहे पं० त०)(प्रश्न ) क्षयोपशम निप्पन्न भाव कितने प्रकार से विवर्ण किया गया है ( उत्तर) नयोपशम .
- - * अनुयोगद्वार सूत्र * (२११) निष्पन्न भाव अनेक प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि- (खोव- समिया भिणिवोहिय नाणलद्धी १ ) ज्ञाना वरणीय कर्म के क्षयोपशम होने मति ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है अतः पूर्णतया मति ज्ञान का उत्पन्न होना यह क्षयोपशम भाव का मूल कारण है क्योंकि केवल ज्ञान के बिना ही शेष यावन्मात्र सूत्र दिये गये हैं वे सर्व क्षयोपशम भाव से ही उत्पन्न होते हैं इसलिये आगे सर्व अंको की सम्भावना इसी प्रकार कर लेनी चाहिये (खोवसमिया सुयनाणलखी १२ ) क्षयोपशप भाव से श्रुत ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है (खोवसमिया ओही नाण लद्धी १३ ) क्षयोपशम से अवधि ज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है ३ (खोवसमिया मणपज्जब नाणलद्धी-४) क्षयोपशम से मन- पर्यय ज्ञान की लब्धि होती है ४ ( खओव समिया मइअणाणलद्धी ५ ) क्षयोपशम से मति अज्ञान की लब्धि उत्पन्न होती है अत.यह नञ् समासान्त पद है जो कुत्सित ज्ञान है वही मति अज्ञान है क्यों कि न ज्ञान इति अज्ञान-जो ज्ञान का प्रति पक्ष हो उसी का नाम अज्ञान है अतः व्यवहारिक वस्तुओं को छोड कर षट् द्रत्यों के विचार में ज्ञान अज्ञान की भली प्रकार से परीक्षा हो जाती है इसी प्रकार (खोवसमिया सुय. अणाण लद्धीई ) क्षयोपशम से श्रुत अज्ञान की लब्धि है (खोवसमिया विभंग नाणलद्धी ७ क्षयोपशम स विभंग ज्ञान की लब्धि है अर्थात् अवधि ज्ञान के जो विपरीत हो उसे विभंग ज्ञान कहते हैं और (खओवसमिया चक्खु दसण लढी ८) क्षयोपशम भाव से चलु दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है (खओवसमिया अचक्खु देसणतद्धी) क्षयोपशम से अचक्षु चारों इंद्रियों के दर्शन की लब्धि है (खोवसमिया ओहि दंसणलद्धी १०) क्षयोपशग से अवधिदर्शन की लब्धि है १० अथ दर्शन विषय में कहते हैं (खत्रोवसमिया सम्मदस्सणलद्धी ११) क्षयोपशम से सम्यक् दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है अर्थात् जब मोहनीयकर्म की प्रकृतिय क्षयोपशम होती हैं तव सम्यक् दर्शन उत्पन्न होजाता है इसलिए अयोपशम भाव में सम्यक् दर्शन प्राप्त है। ( खोवसामिया मिच्छा दमणलद्धी १२ ) क्षयोपशम से मिथ्या दर्शन की लब्धि उत्पन्न होनी है अतः मिथ्यात्व में रुचि का होना यह भी क्षयोपशम भाव में है ( खोवसामया सम्मा मिच्छा दंसणलडी १३) क्षयोपशम भाव से मिश्र दर्शन की लब्धि उत्पन्न होती है १३ और (खोवसम समाईय चरित लद्धी १४) . • (२१२) * अनुयोगद्वार मूत्र * क्षयोपशम भाव से समायिक चरित्र की लब्धि उत्पन्न होती है १४ ) ( सनोद समझेदोवठा वाणियाचरितलही १५) क्षयोपशम भाव से छेदोपस्थापनीय चरित्र की लब्धि उत्पन्न होनी है १५ और (खोवसमिया परिहार निमुद्धि चरित लद्धी १६) जापशम भाव से परिहार विशुद्ध की चरित्र लब्धि है १६ इसी प्रकार (सुगुम संपरागलद्धी १७) मूक्ष्म सम्यराग चरित्र की लब्धि है और (खयोवसमिया चरिता चरितलद्धी १८) क्षयोपशम भावसे ही चारित्रा चरित्र की लब्धि प्राप्त होती है अर्थात् श्रावक वृति का प्राप्त होना यह क्षयोप- शम भाव का महात्म्य है १८ और (खोवसमिया-दाणलद्धी १६ ) क्षयोपशम से दान लब्धि होती है १६ (एवं लाभ) इसी प्रकार क्षयोपशम भाव से लाभ लब्धि होती है २० ( भोगलद्धी २१) भोग लब्धि होती है २५ (उव योग २२ ) जो वस्तु पुनः आसेवन करने में आती है उसकी लब्धि भी च. योपशम भाव से होती है २२ (खत्रोत्रसमिया बीरियलद्धी २३) क्षयोपशम भाव से वीर्य की लब्धि उत्पन्न होती है यह सर्व अंतराय कर्म के क्षयोपशम होने का फल है तथा भेदान्तर विषय में कहत हैं (खओवसमिय वालबीरियं लद्धी २४) क्षयोपशम से बाल वीर्य को लब्धि उत्पन्न होती है २४ और (खोबसामिया पंडियबीरियलद्धी २५)क्षयोपशम से पंडित वीर्य की लब्धि होती है फिर (खाव समिया वाल पं0 वीरिय लद्धी) २६ क्षयोपशम भाव से वाल पंडित की वीर्य की लब्धि होतीई २६ अर्थात् जो अज्ञानता से मिथ्यात्व में परिश्रम किया जाता है उसे बाल वीर्य कहन हैं जो जान से सम्यग दर्शन में परिश्रम किया जाताहै वे पंडित वीर्यहोता है जो देश वृति जन परिश्रम करते हैं उन्हे बाल पं.वीर्य कहते हैं ३ और (खांबसमिया सोडदियलद्धी २७) क्षयोपशम से श्रोतोंद्रिय के लब्धि प्राप्त होती है और अर्थात जो श्रुन इंद्रिय में सुनने की शक्ति है वह में नयोपशम भाव से हानी है इसी प्रकार-(खोरसमिया चक्खिदियलद्धी २८. चयोपशम से चक्षुरिंद्रिय की लब्धि होती है २८ (खओचसमिया पाणिदि लद्धी २६ ) क्षयोपशम से प्राणेंद्रिय की लब्धि होती है २६ (खओवसमिय जिम्भिदिय लडी ३०)शयोपशम से रसेनद्रिय की लब्धि होती है ३० (खों समियाफा सिदियलद्धी ३१) क्षयोपशम से स्पर्शेन्द्रिय लब्धि होती है ३ (खोरसमिया आयारघरे ३२)क्षयोपशम से अचारांग सूत्र के धरने के लब्धि हानी है अर्थात श्राचारांगकेपठन करने की शक्ति भी षयोपशम भाव पर * अनुयोगद्वार सूत्र * (२१३) निर्भर है इसी प्रकार ( एवं सुयगडे ३३ ) सूत्र कृतांग की लब्धि ३३ ( ठाणां गधरे ३४)स्थानांग की लब्धि३४ )(समयांग धरे ३५)समवायांग सूत्र के धारने की शक्ति ३५ ( विवाह परणतिघरे ३६ ) विवाह प्रज्ञप्ति के धारने की लब्धि ३६ ( एवं नामा धम्म कहा ३७) इसी प्रकार ज्ञाताधर्म कथांग की धारने की लब्धि ३७ ( उवासगदसा ३८) उपासक दशांग के धारने की लब्धि ३८ (अंत गडदसाउ ३६ ) अंतगड़ दशांग के धारने की लब्धि ३६ ( अणुत्तरो वावा इयदसाउ ४० ) अनुतरो ववाइ दशांग सूत्र ४० (पराह वागरे ४१, प्रश्न व्याकरणांग सूत्र ४१ (खओवसमिया विवागधरे -४२) क्षयोपशम से ही विपाक सूत्र के धारने की लब्धि और (खओवसमिया दिछीवायघरे ४३) क्षयोपशम से दृष्टि वादांग के धारने की लब्धि उत्पन्न होती है और ( खोच समिया नवपुव्वधरे ४४) क्षयोपशम से नव पूर्व धारने की लब्धि ( जाव दस चउपुयी ४६ ) यावत चर्दश पूर्व पर्यत क्षयोपशम से ही धारने की लब्धि होती है अर्थात ११-१२-१३-१४ इन पूर्वी के धारने की लब्धि भी क्षयोपशम भाव से होती है और (खोवसमिया गणी वायतए ५०) क्षयोपशम भाव से गणिपद वा वाचकपद की प्राप्ति होती है क्योंकि पावन्मात्र उपाधियें हैं वे सर्व क्षयोपशम भाव से ही प्राप्त होती हैं ५० (सेतं खोवसमे निष्फने सेतं खओवसामिए नामे ) सो यही क्षयोपशम निष्पन्न भाव है और इसी स्थान पर क्षयोपशम भाव की समाप्ति है क्योंकि कर्मों क क्षयोपशम भाव से ही उक्त वस्तुओं की प्राप्ति होती है। भावार्थ-क्षयोपशम भाव भी दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि एकतो क्षयोपशम भाव द्वितीय क्षयोपशम निष्पन्न भाव अतः क्षयोपशम भाव उसे कहते हैं जो चारों घातिओं कर्म क्षयोपशम भाव को प्राप्त हो जाव तव क्षयोपशम भाव होता है जैसे कि-ज्ञानावरणीय कर्म १ दर्शनावरणीय कर्म मोहनीय कर्म ३ अंतराय कर्म अपितु चयोपशम निष्पन्न भाव उसका नाम है जो क्षयोपशम भाव होने पर फलों की प्राप्ति होती है उसको क्षयोपशम निष्प- न भाव कहते हैं सो क्षयोपशम भाव के निम्न लिखित फल हैं चार ज्ञान बान अज्ञान तीन दर्शन तथा सम्यक् दर्शन मिथ्या दर्शन सममिथ्या दर्शन साम यिक चरित्रच्छेदोपस्थानीय चारित्र परिहार विसुद्धि चारित्र मूक्ष्म संपराय चारित्र और क्षयोपशम भाव से चारित्रा चरित्र (देश वृति ) की लब्धि पुनः (२१४) * अनुयोगद्वार सूत्र * पांचों अंतरायों का क्षयोपशम होना इसी प्रकार वाल वीर्य पंडित वीर्य वाले पंडित वीर्य पांचों इंद्रियों की पूर्ण शक्ति का होना द्वादाशांग वाणी का अध्य- यन करना और क्षयोपशम भाव से नव पूर्व से चतुर्दश पूर्व के पठन की शक्ति का होना और गणि आदि उपाधियों का मिलना यह सर्व क्षयोपशम भाव मे फल उत्पन्न होते हैं और इन्ही को क्षयोपशम निष्पन्न भाव कहते हैं अतः विचार- रणीय इतना ही कथन है कि सम्यग् दृष्टि जीवो को तो ज्ञानादि की लब्धियें उत्पन्न होती है मिथ्या दृष्टि जीवों को तीन अज्ञान मिथ्या दर्शन आदि उत्पन्न होते है और यह भाव संसारी सर्व जीवों को होता है इसका लक्षण यह है कि कुछ प्रकीतये क्षय हुई हों और कुछ उपशम हुई हों अब इसके पीछे पारिणा- मिक भाव का विवर्ण किया जाता है । ॥ अथ पारिणामिक भाव विषय ॥ मुल-सेकित पारिणामिए भावे २ दुविहे प० ते साइय पारिणामिय अणादिय पारिणामिण्य सेकिंतं सादि पारिणा- मिय २ अणेगविहे पं० त० जुन्नासुरा जुन्नधयं जुन्नतं दुल्लाचेव- अभ्भाय अभ्भरुक्खा जुन्नगुलासंझागंधव्व नगराय १ उक्कावायां दिसादाहा विज्जुयागज्जिया निग्घाया जूवाजक्खा लिता धूमिया महियारओग्घाया चन्दोवरागा सूरो वरागा चंदपरि- वेसा सूरपरिवेसा पडिचंदा पडिसूरा इंद्रधणुं उदगमछाकवि हसिया अमोहा वासावास धरागामो नगरो घडो पव्वडपापालो भवणो निरयापासा उरपणप्प भासकरप्पभा वालुपप्पहा पंक 'प्पभा धूमप्पभा तमातम तमा सोहम्मे कप्पे ईसाणोजाव श्रा- णपपाणप आरणाप अच्चुरागेवज्जए अणुत्तरे इसाप्पभाए परमाणुपागलेय दुप्पएसिये जावदस परासेये संखेज पएसिये असंखज्ज पएसिये अणंत पएसिये सेतंसादिये पारिणामिए सेकिंतं प्रणादिय पारिणामिए अणेग विहे पं० त० धम्मस्थि " * अनुयोगद्वार सूत्र * (२१५). काय १ अधम्मत्थिकाय २ आगासत्यिकाय ३ जीवात्थकाय ४ पुग्गलस्थिकाय ५ अद्धासमए ६ लोए ७ अलोय - भवसि- दिया : अभव सिद्धिया १० सेतं अणादिय पारिणामिय सेतं पारिणामिए भावे ॥ पदार्थ -( सेकित पारिणामिय भात्रे २ दुबिहे पं० तं० ) अब क्षयोपशम भाव के पश्चात् पारिणामिक भाव का विवर्ण करते हैं शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् पारिणामिक भाव कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है गुरु कहते हैं पारिणामिक भाव दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि ( साइप पारिणामिए य अणादिप पारिणामिए य) एक सादि परिणामिक भाव है द्वितीय अनादि पारिणामिक भाव है सादि पारिणामिक भाव उसे कहते हैं जो पुद्गल सादि सान्त भाव में ठहरते हैं उनको सादि पारिणामिक भाव कहते हैं अतः जो अनादि अमादि काल से परिणत हो रहे हैं और द्रव्याथिक नया पेक्षपा तद्धत् रहते हो उन्हें अणादि पारिणामिक भाव कहते हैं अवप्रथम सादि पारिणा मिक भाव का स्वरूप दिखाया जाता है (सेकित सादि पारिणामि २ अणेग विहे पं० सं० ) (प्रश्न ) सादि पारिणामिक भाव कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है ( उत्तर ) सादि पारिणामिक भाव अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे- (जुन्नसुरा * जुन्नगुला ).जीर्ण सुरा जीर्ण गुड क्योंकि सादि पारिणामिक उसे कहते हैं जो द्रव्य परिणमन शील होते है उन्हें सादि पारिणा मिक भाव कहते हैं जैसे कि जवसुरा के परिणमन की भी श्रादि है और जीर्ण भाव की भी आदि है अर्थात् जव नूतनमुरा उत्पन्न की गई है तब उसमें जीर्ण भाव भी अवश्य है क्योंकि परमाणु परिणमन शील होते हैं जीर्ण शद्ध इस लिये सूत्र में दिया गया है कि जिज्ञासुओं को शीघू बोध होजावे इसी प्रकार गुड के भी स्वरूप को भी जानना चाहिये अपितु जिसका आदि है उस पर्याप का अंत भी साथ है इसीलिये ( जुएणंत दुलाचेच) जीर्ण ताण्डुल आदि को भी निश्चय ही माग्वत् जानना चाहिये अब इसी प्रकार के उदाहरण और भी दिखलाए जाते हैं। नोट-उज्जीर्णे ॥ प्रा० न्या० म०८ पा० ॥ सू० १०२ । जी शब्दे इत उद् भवति ।
. .( २१६) * अनुयोगद्वार सूत्र * (अभ्भाय अम्भ रुक्खा ) बादलों का परिणमन होना तथा वृक्षों के आकार पर वादलों का होजाना (संज्झा) संध्या के समय वादलो का नाना प्रकार से रंगो में परिणमन होना (गंधर्व नगराय) गंधर्व नगर के समान आकाश में बादलों का तथा अन्य प्रकार के परमाणुओं का परिणमन होना ? (उका वाया ) उल्कापात आकाश से अग्नि का पतित होना ( दिसा दाहा ] दिग्दाह होना (विज्जुआ) विद्युत् का होना (गजिया) गर्जित शब्द होना(निग्याया) निधीत होना तथा ( जुवा) शुक्ल पक्ष के तीन दिन पर्यन्त वाल चन्द्र का रहना अर्थात शुक्ल पक्ष के तीन दिन पर्यन्त चंद्रको वालचंद्र कहते हैं । जक्खा लितए) आकाश में यक्षकृत कार्य होने (धूमिया ) धूम का होना (महिया) स्नहका पतित होना तथा श्वेतरजादिका होना तथा ओसका गिरना (रोग्यासा) रजघात का होजाना ( चंदोवरागा सूरोवरागा ) चंद्र स्यों को ग्रहण लगनाना वहुवचन इसलिये ग्रहण किया गया है कि सार्द्धद्वीपवर्ती द्वीपों में सर्व चंद्र सूर्यों को सम काल में ग्रहण होता है ( चंदपरिवेसा सूरपरिवेसा ) चंद्र सूर्य का परिवष होना अर्थात परिवारक होना (कुंडल होजाना) (पडिचंदा पडिसूरा) दो चंद्र दो सूर्यों का आकाश में दृष्टि गोचर होना (इंद्र धनु ) इंद्र धनुष का होना ( उदगमच्छा ) उदकमत्स्य उसे कहते हैं जो इंद्र धनुष का खंड होता ( कवि हसिया) आकाश में भयानक शब्दों का होना तथा वादलों के विना विद्युत् संपतन होना ( अमोहा ) आकाश में नाना प्रकार के चिन्हों का दीखना (वासावासधरा) भरतादि क्षेत्र और हेमवंतादि वर्षधर पर्वत यह सादिपारिणामिक इसलिये हैं कि परमाणुओं की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल पर्यन्त होती है फिर वे अवश्यही चलनशील होजाते हैं इसी अपेक्षा से इन को सादि परिणाम में रक्खा गया है किन्तु द्रव्याथिक नायापेक्षा वे भर- तादि क्षेत्र और चून है मंतादि पर्वत शाश्वत हैं नित्य हैं अतः पर्यायार्थिक नया पेक्षा से वेसादि पारिवामिक भाव में हैं इसी प्रकार आगे भी संयोजना करनी चाहिये (गामो ) शुलक से ( जगात ).सहित होता है ( नगरो) जो शुलक से युक्त होता है घर (घर) गृह पन्चड ( पर्वत ( पयालो') पाताल कलश -(भवण ) भवनपत्यादि देवों के भवन - (निरय नरक और नरकों के आ- बास (पासाउं) प्रासाद-( रयणप्प भासकरपमा ) रन प्रभाशर्कर प्रभा (वालुप्पहा पकप्पहा) वालुप्रभा पंकप्रभा (धूमप्पभा तमप्पभा तमतमाप्पभा . * अनुयोगदार सूत्र * (२१७) धूम प्रभातम प्रभातम तमाप्रया अब देवों का स्वरूप लिखते है ( सोहम्मे कप्पे) मुधर्म कल्प (ईसाणे) इशान कल्प (जाव आणए पाणए आरणए अच्चुए) यावत् आनत देवलोक, प्राणत देवलेाक, आरण्य देवलोक, अच्युत देवलोक (गेवेज्जए नव ग्रैवेयक देवलोक (अणुत्तेर) पांच अनुत्तर विमान और ( इसीप्पभाए) ईषत् प्रभा पृथिवी परमाणु पोग्गले ( परमाणुपुद्गल वा ( दुप्पए सिए ) द्विप्रदेशिक स्कंध ( जाब दस पएसिए ) यावत् दश प्रदे- शिक स्कंध (संखेज पएसिए ) संख्यात प्रदेशिक स्कंध ( असंखंज- पएसिए ) असंख्यात प्रदेशिक स्कंध ( अणंतप्पएसिए ) अनंत प्रदेशिक स्कंध यह सर्व ( सेतं सादि पारिणामिए ) सादि पारिणामिक भाव में हैं क्यों- कि यह सर्व कथन पर्यायार्थिक नयापेक्षा से है अपितु द्रव्यार्थिक नया पेक्षा उक्त सर्व कथन शाश्वत और नित्य है अंतः पुद्गल द्रव्य की उत्कृष्ट स्थिति असंख्यात काल पर्यन्त होती है फिर वह परिवर्तन शील हो जाता है इसी लिये उक्त कथन सादि पारिणामिक भाव में रक्खा गया है । अब अनादि पारिणामिक भाव का कथन किया जाता है क्योकि अनादि पारिणामिक भाव उसे कहते हैं जो अनादि काल से उसी भाव में परिणमन हो रहे हैं कभी भी अन्य भाव में परिणत नहीं होते उसे अनादि पारिणामिक भाव कहते हैं जैसे कि ( सेकिंतं अणादि पारिणामिए ) अथ सादि पारिणामिक मिक भाव के पीछे शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ? अनादि पारिणामिक भाव किसे कहते हैं गुरु ने उत्तर दिया कि भो शिष्य ! (अणेग विहे पएणत्ते- तंजहा ) अनादि पारिणामिक भाव अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि-(धम्मत्थिकाय ) धर्मास्तिकाय १ (अंहमत्यिकाय ) अधर्मास्तिकाय २ (आगासत्यिकाय ३) आकाशास्तिकाय ३ (जीवत्यिकाय ) जीवास्तिकाय ४ (पुग्गलत्थिकाय ) पुद्गलास्तिकाय ५ ( अद्धा समय ) काल ( लेए ) लोक ( अलोए ) अलोक ८ ( भवसिद्धिया ६ अभवसिद्धिया १० ) भव्य सिद्ध भाव ९ और अभव्य सिद्ध भाव १० अर्थात् भव्य भाव अभव्य भाव अतः मोक्ष के योग्य और अयोग्य यह सर्व सादि पारिणामिक भाव नहीं है अतः एव यह सर्व (सेत अणादिय पारिणामिए सेतं परिणामिए नामे ) अनादि पारिणामिक भाव हैं क्योंकि यह सर्व पदार्थ स्वगुण में ही स्थित है किन्तु पुद्गल द्रव्य के समान परिवर्तन शील नहीं हैं यदि यह शंका अनादि काल (२१८) * अनुयोगद्वार सूत्र * उत्पन्न हो कि सादि पारिणामिक भाव में भी सर्व पुद्गल द्रव्य की पार्यो 'का विवर्ण किया गया है और अनादि परिणामिक भाव में पुद्गल द्रव्य को अनादि पारिणामिक भाव में दिखलाया गया है इसका कारण क्या है इस वात का समाधान यह है कि जो सादि पारिणामिक भाव में विवर्ण हैं वह सर्व पर्यायार्थिक नयापेक्षा से सिद्ध है अतः जो अनादि पारिणामिक भाव में पुद- गंल द्रव्य को सम्मिलित किया गया है इसका कारण यह है कि अनादिकाल से पुद्गल द्रव्य परिवर्तन शील है और यह अपना गुण किसी और द्रव्य को नहीं देता इसीलिये इस'द्रव्य को दोनों भावों में माना गया है सो इसी स्थान पर पारिणामिक नाम का समास पूर्ण हो गया है और इसी को पारिणामिक भाव कहते हैं। भावार्थ-पारिणामिक भाव दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है सादि शारिणामिक भाव और अनादि पारिणामिक भाव सादि पारिवामिक भाव उसका नाम है जो द्रव्य परिवर्तन शील हैं उनकी नाना प्रकार की आकृतियों का हो जाना उसे सादि पारिणामिक भाव कहते हैं तथा जो पदार्थ द्रव्यार्थिक नया पेक्षा नित्य और ध्रुव है परंतु पर्ययार्थिक नया पेक्षा से अनित्यता भी दिखला रहे हैं उस अनित्यता की अपेक्षा से उन्हें भी सादि पारिणामिक भाव वाले कह सकते हैं अतः अनादि पारिणामिक भाव उसका नाम है जो पदार्थ अनादि काल से अपने गुण में ही स्थित हैं पर गुण में परिवर्तनता नहीं करते सदैव काल अपनी २ पर्यायों में ही रहते हैं उन्हें अनादि पारिणामिक भाव कहते हैं अब इनके पृथक् पृथक् उदाहरण कहते हैं । जीर्ण सुरा जीर्ण गुड़, जीर्ण घृत, और चांवल, वादल, आकाश में वादलों की वृत्तों की आकृति का होना, संध्या गांधर्वनगर उल्कापात दिग्दाह विद्युत् स्तनित शब्द निर्घात ( रजधूलि ) युव, यताकार, धूममही, रजघात चन्द्रग्रहण सूर्यग्रहण चन्द्र परिवेष सूर्य परिवेष, प्रतिचन्द्र और मातिसूर्य, इन्द्र धनुष और उसका खंड आकाश में भयानक शब्द आमोघ और भरतादिवासवर्प धर पर्वत ग्राम, नगर घर पाताल भूमि भवन नरक प्रासाद ७ सातो नरक स्थान २६ देवलोक सिद्ध शिला परमाणु मुद्गल यावत् अनंत मदेशिक स्कंध यह सर्व सादि पारिणामिक भाव में है क्योंकि पर्याय परिवर्तन शील है इसी लिये इनको सादि पारिणामिक' माना गया है और अनादि पारिणामिक भाव निम्न लिखितानुसार है।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२१६) पट् द्रव्य लोक अलोक भव्य, अभव्य यह दश अंक अनादि पारिणामिक है अतः यह परिवर्तन शील नहीं है अब इसके आगे सन्निपातिक नाम का. विवर्ण किया जाएगा क्योंकि पारिणामिक भाव का स्वरूप सम्पूर्ण हो गया है। . ॥ अथ सन्निपातिक भाव (नाम ) विषय ॥ मूल-सेकितं संनिवाइय नामे २ जन्नं एएर्सि. चेव उदइय उपसमिएखइयखओवसमिएपारिणामियाणं भावाणं दुरा संजोएणं तियसंजोएणं चउक्कसंजोएणं पंचकसंजोएणं जेणं निष्फज्जइ सवें से संन्निवाइए नामे २ तत्थणं दसदुग . संजोगा दस तिगसंजोगा पंच चउकसंजोगाए कंयपंच सं. जोगा तत्थणं जे ते दसदुग संजोगा तेणं इमे अत्थिनामे उद- इएउवसमनिष्फन्ने १ अत्थि नामे उदइयखइगनिप्फन्ने ३ अत्थि नामे उदइय खत्रोक्समनिप्फन्ने ३ अस्थि नामे उदइय पारिणामिएनिष्फन्ने ४ अत्थि नामे उपसमिएखइयनिष्फन्ने ५ अस्थि नामे उपसमिएखओवसमनिष्फन्ने ६ अस्थि नामै उपसमिएपारिणामिएनिष्फन्ने ७ अस्थि नामे खइयखओर समनिष्फन्ने ८ अस्थि नामे खड्यपारिवामिएनिष्फन्नेह अस्थि नामे खओवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने १० कयरे से नामे उदइय उवसमनिष्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया एस णं से नामे उदइयउवसमलिष्फन्ने १ कयर से- नामे उदइयखइयनिष्फन्ने उदइयत्ति भणुस्से खइयं सम्मत्तं एस णं सेना मे उदइयखइयनिष्फन्ने २ कयरे से नामे उदइय खोवसगनिन्ने उदइयति माणुस्से खोवसमियाइं इन्दियाई एसणं से नाले उदइयंखोवसमिएनिष्फन्नेश्कयरेसे नामे उदय .
। ( २२०) * अनुयोगद्वार सूत्र * पारिणामिए निप्फनेउदइयत्तिसणुस्सेपारिणामिएजीवेएसणंसे नामे उदइयपारिणामिशीनष्फन्ने ४ कयरे से नामे उवसामिपखइय निप्फन्ने उवसंता कसायां खइयं सम्मत्तं एस णं से नामे उपस मिये खइयनिष्फन्ने ५ कयरे सेनामे उपसमिएखयावसामिपनि- प्फन्ने वउसान्त कसाया खम्रोवसमियाई इन्दियाई एस णं से नामे उपसमिए खयोवसमनिष्फन्ने कयरे से नामे उपसमिए पारिणामिएनिष्फन्ने उवसन्त कसाया पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उवसमपारिणामिएनिष्फन्ने ७ कयरे से नामे खड्य खओवसमनिष्फन्ने खड्यं सम्मत्तं खओघसमियाइं इंन्दियाई एस एं से नामे खड्य खग्रोवसमनिप्फन्ने ८ कयरे से नामे खझ्य पारिणामिएनिष्फन्ने ? खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे. . एस णं से नामे खड्यपारिणामिपनिष्फन्ने ९ कयरे से नामे . सोवसमियपारिणामिपनिष्फन्ने खग्रोवसमियाई इंन्दियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नामे खग्रोवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने ॥ १०॥ पदार्थ-( सेकितं सन्निवाइए नामे २) अब परिणामिक भाव के पश्चात् सानिपातिक, भात्र का विवर्ण किया जाता है क्योंकि सानिपातिक भाव उसे कहते हैं जो औदयिक औपशामिक क्षायिक क्षयोपशम पारिणामिक भावों के मेलने से भंग वनते हैं उन्हें सन्निपातिक भाव कहते हैं इसी बात को सूत्र में स्पष्ट किया है जैसे कि शिष्य ने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! सान्निपातिक किसे कहते हैं ( उत्तर) (जन्नं एएसिं चेव राय उवसमिय खड्य खोचसमिए पारिणामियाणं भावाणं दुग संजोएणं, तिय संजोएण, चउक्क संजोएणं, पंचक्क संजोएणं जेणं निष्पज्जइ सब्जे से सन्निवाइए नामें )इन औदायिक र औपशमिक क्षायिकं ३ क्षयोपशमिक ४ और पारिणामिक भावों के मिलने से जो द्विक् , संयोगी, तीन संयोग, चार संयोगी, पांच संयोगी भंग वनवे उन सवका सन्नि- म . - * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २२१) पातिक नाम होता है परन्तु उनमें से ( दस दुग संजोगा) दश भंग द्विसंयोगी ( दसतिग् संजोगा) दश भंग तीन संयोगी होते हैं और (पंच चउक्क संजो- गा) पांच भंग चार संयोगी होते हैं अपितु ( एक्के पंचसंजोगा। पांच संयोगी एकही भंग होता है। तत्थणं जे ते दस दुग संजोगातेणं इमे ) उन सर्व भगों में से जो दश भंग दिक् संयोगी हैं वह इस प्रकार से है जो आगे कहे जाते हैं- ( अत्थि नामे उदयिय उवसमनिप्फन्ने ) जो औदयिक और औपशमिक भाव के मिलने से नाम उत्पन्न होता है उसको अस्ति औदयिक औपशमिक सनि- पातिक भाव कहते हैं इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये ( अत्थिनामे उद- इय खइय निष्फने २ ) अस्तिनामे औदयिक क्षायिक निष्पन्न है ( अत्थि नामे उदइय खोवसमनिष्फन्ने ३) अस्ति औदायिक क्षयोपशम नाम है ३ (अस्थि- नामे उदइय पारिणामिए निप्फन्ने ४ ) अस्ति औदायक पारिणामिक निष्पन्न नामे है ४ ( अत्थि. नामे उपसमिएखइयनिष्फने) अस्ति औपशमिक सायिक निष्पन्न नाम है ५ (अत्थि नामे उब ममिए खोवसमीनष्फने ६) अस्ति औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ७ (अस्थि नामे खइयखोव समीनप्फन्ने ८) अस्ति चायिक योगशमिक निष्पन्न नाम है ८ (अत्थि नामे खइय पारिणामिए निष्फने ९ ) अस्ति सायिक परिणामिक निष्पन्न नाम है सो यह भंग सिद्ध भंगवंतों में होता है क्योंकि क्षायिक सम्यक पारिणामिक भात्र में जीव है सो यह भंग सिद्ध में ही होता है आपितु शेष भंग केवल दिग् दर्शन मात्र ही कथन किये गये हैं इस लिये दो संयोगी केवल नवमां भंग विद्यमान रूप हैं शेष भंग अविद्यमान रूप हैं तथा उदय मनुष्य गति १क्षयो- पशमिक इन्द्रिय २ पारिणामिक जीव ३ जघन्यता से यह भंग सर्वत्र विद्य- मान है किन्तु संयोगी केवल नवमें भंग की अस्ति है शेष नव भंग कथन मात्र ही है जैसे कि ( अत्थि नामे खोवसमिए पारिणामिएनिप्फन्ने १०) अस्ति योपशमिक पारिणामिक निष्पन्न नाम है १० यह दश भंग दो संयोगी दिखलाए गये हैं अव शिष्य ने पुन: इस स्वरूप को पूंछ कर निर्णय किया है जैसे कि कयरे से नाम उदइय उपसम निप्फन्ने उदयंइयत्ति मणुस्से उवसंत कसाया एस से नामे उदइयवसमनिप्फन्ने.१) हे भगवन् ! जो औदयिक और औपशमिक निष्पन्न है वह कौनसा नाम है गुरु कहते हैं कि भो शिष्य. औदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशांत कपाय है इसलिये (२१२) * अनुयोगद्वार सूत्र * यही नाम औदयिक उपशम निष्पन्न कहा जाता है १ किन्तु यह भंग दिग् दर्शन मात्र ही है क्योंकि दर्शन मोहनीय कर्म की प्रकृतियें उपशम भाव में सम्भव हो सकती है किन्तु पारिणामिक भाव इस में नहीं है इसलिये यह •भंग केवल दिग्र्दशन मात्र ही है . इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये १ ॥ ( कयरे से नामे उदइयखइय निष्फन्ने उदइयएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्त एस एं सेनामे उदइयखइयनिष्फन्न १) (प्रश्न) औदयिक और क्षायिक निष्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) औदयिक भाव में मनुष्य गति है और क्षायिकभाव समम्यक्त्व है इसलिये इन से उत्पन्न हुए औदयिक क्षायिक निष्पन्न नाम होता २ ( कयरे से नामे उदइए खउत्रसमनिष्फन्ने उदंइयत्तिमणुस्से खोवसमियाई इंदियाई एस णं से नामे उदइय खोवसमिए निष्फन्ने ३ ) ( प्रश्न) औदयिक क्षयोपशम निष्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) उदय भाव में मनुष्य गति हैक्षयोमशम' भाव मे इंद्रिय हैं सो यही औदयिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ३ ) ( कयरे से नाम उदइय पारिणामिएनिष्फन्ने) औदयिक पारिणामिक निष्पन्ने नाम कौनसा है ( उत्तर ) ( उदइएत्ति मणुस्से पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उदइय पारिणामिए निष्फन्ने ४) औदीयक भाव में मनुष्य भाव है पारिणामिक भाव में जीव है सो इसी का औदयिक पारिणामिक निष्पन्न नाम है ४ ( कयरे से नामे उचसमिएखइयनिष्फन्ने ] उपशम और क्षायिक निष्पन्न नाम कौनसा (उत्तर ) उवसांत कसाया खइयं सम्मत्तं एस गं से नामे उवसीमए खान- प्फन्ने ५ ) उपशान्त कपाय क्षायिक . सम्यक्त्व इन्ही का नाम औपशमिक क्षायिक निष्पन्न नाम है ५ ( कयरे से नामे उपसमिएखोवसमनिप्फन्ने उवर्मता कसाया खोवसमियाई इन्दियाई एस'णं से नामे उपसमिएखोव समिएनिष्फन्न ६)(प्रश्न) औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम कौनसा (उत्तर जैसे उपशमक कपाय हैं क्षयोपशमिक भाव में इन्द्रिय हैं सो यही औपशमिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम है ६ । ( कयरे से नामे उपसमिए पा- रिणामिय निप्फन्ने ) ( प्रश्न ) औपशमिक पारिणामिक निष्पन्न नाम किसे कहते हैं ( उवसान्त कसाया पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उपसमिए पारि- णामिएनिष्फन्ने ७)(उत्तर ) उशपम कपाय हैं पारिणामिक जीव हैं सो इसी का नाम उपशम पारिणामिक निष्पन्न भाव है ७ (कयर गे नामे खड्यख- श्रोवसमिएनिष्फन्ने ) ( प्रश्न ) क्षायिक और क्षयोपशामिक निष्पन्न . .
* अंनुयोगद्वार सूत्र * (२२३) नाम किसे कहते हैं ( खइय सम्मत्तं खोव समियाई इन्दिय ई एस से नामें खइय खोव समनिष्फन्न) ८ ( उत्तर ) क्षायिक सम्यक्त्व क्षयोपशामिक इन्द्रिय सो इसी का नाम क्षायिक क्षयोपशमिक भाव है ८ ( कयरेसे नामे ख़इय पारिणामिएनिप्फन्ने ) (प्रश्न ) क्षायिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) ( खइयं सम्मतं पारिणामिए जीवे एस से नामे खइय पारिणामिएनिष्फन्ने ६) क्षायिक सम्यक्त्व पारिणामिक जीव है इन दोनों के निष्पन्न हुए नाम को नायिक पारिणामिक भाव कहते हैं सो यह द्विसंयोगी नवमां भंग सिद्ध भगवन्नों में होता है शेष भंग केवल दर्शन मात्र हैं ( कयरे से नामे खोवमामिएनिष्फन्ने )(प्रश्न ) कौनसा क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम है ( उत्तर ) खोवसमियाई इदिया पारिणामिए जीव एस ऐसे नामे खोवसामएपारिणामिएनिष्फन्ने १० ) क्षयोपशमिक. भाव में इन्द्रिय हैं पारिणामिक जीव है सो इनके निष्पन्न हुए नाम को क्षयो- पशमिक पारिणामिक भाव कहते हैं १० इन सर्व द्विर्मयोगी भंगों में केवल नवमा भंग सिद्ध है शेष भंग दर्शन मात्र हैं अब तीन संयोगी दश भंगो का विवेचन किया जाता है ।। ३ भावार्थ सान्निपातिक भाव से कहते हैं जो औदयिक १ औपशामक २ चायिक ३ क्षयोपशमिक ४ पारिणामिक ५ इनके संयोग से द्वि संयोगी, तीन संयोगी, चार संयोगी पांच संयोगी भंग उत्पन्न होते हैं जिसमें दश भंग संयोग वाले हैं दश भंग तीन संयोग वाले हैं ५ पांच भंग चार संयोगी हैं अमितु एक भंग पांच मयोगी है यह पड् विंशति भंग सानिपातिक भाव में कहे जाते हैं अब प्रथम दो संयोगी दश भंगो का नाम लिखा जाता है। १ औद- यिक औपशमिक २ औदायिक क्षायिक ३ औदयिक क्षयोपशयिक ४ औदायिक पारिणामिक ५ औपशामिक क्षायिक ६औपशामिक क्षायोपशमिक ७ औपशमिक पारिणामिक ८ क्षायिक क्षयोपशमिक ९ क्षायिक पारिणामिक यह भंगसिद्ध भंग वन्तों में होता है १० क्षयोपशामक पारणामिक यह दश भगं दो संयोगी जिसमें नवमां भंग सिद्धों में है शेष भंग दिग्दर्शन मात्र ही हैं और सर्व भंगों के • उदाहरण पदार्थ में दिये गये हैं अब तीन संयोगी भगों का विवरण किया ज्जाता है क्योंकि दो भाव एकत्व करने से दो' संयोगी भंग बन जाते हैं तीन 12 * अनुयोगहर मुत्र* मार पुत्र करने में तीन नयागोमग उपन्न होते हैं इमतिय नान योगी এ ক বিদৰ লন্ত !! अय नीन अयोगी भंग विषय ।। तत्य गज नंदनतिगनंजोगा ते णं इमेअन्थि नाम उद- इचञ्चमीमएखइयनिफन्न ? अत्यि नाम उदइयवमिए अयोरममनिष्पन्न २ अयि नाम उद्यवमामिापारिणा मिय निष्पन्न ३ अत्यि नाम उड्यन्वइयखाबसमनिष्प न्ने ? अत्वि नाम उदइयग्नझ्यपारिणामिपानिफन्नय ५ अयि नाम उदयबआवममियपारिणामिनिम्फन्ने । अयि नाम उवममियन्त्रइयग्नावममनिष्फन्ने ७ अवि उवमामिएखड्यपारिणनियनिष्कन्ने ८ अत्यि नामें उबम- खओवनमियपारिणामियनिकन्ने है अन्त्यि नाम खड्य खओर समिए पारिणामिय निकन्ने ? कयरे मे नामे उद- इयवमामियखड्यनिष्कन्नर उड़पत्ति मणुम्से उवमन्ना कमाया वड्यं सम्मत्तं एम एं में नाम उदइएउवममिएवइय निष्कन्नय ? कचरे मे नाम उदय उवमामिएखओवमामि य निकन्ने उद्दपत्ति मणुन उपमंता कसाया खआवसमि याई इंन्दियाई एम एं में नाम उदय उवममिएचओर मम निश्मन्न २ कयरे में नाम उदय ग्रोवममिा पारिणा मिए निष्पन्न उन्हयत्ति मणुम्ने ज्वमता कमाया पारिणा- मिए जीवे एम णं में नाम उदयखयम्बआवममीनप्फ न्त ३ एवं उदय खायलओचसमिया कवर से नाम उदय खइयपारियमियनिष्फन्ने उदइयत्ति मास्म खइयं मम्मत * अनुयोगद्वार सूत्र * (२२५). पारिणामिए जीवे एस एं से नामे उदइयखइयपारिणामिय निष्फन्ने ५ कयरे से नामे उदइयखओवसमिएपारिणामिय निष्फन्ने उदइपत्ति मणुस्से खोवसमियाई इन्दियाई पारि- णामिय जीवे पस णं से नामे उदइयखओवसमिएपारि- णामिपनिप्फन्ने ६, कयरे से नामे उवसामएखइयखग्रोव समिएनिष्फने उपसन्ता कसाया खइयं सम्मत्तं खओवसमि- याई इन्दियाई पसणं से नामे उक्समियखइयखओव समनिष्फन्ने ७ कयरे से नामे उपसमियखइयपारिणामिए निष्फन्ने उवसंता कसाया खड्यं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे,ए- स णं से नामे उपसमिएसइयंपारिकॉमिएनिप्फन्ने ८ क- यरे से नामे उपसमिएखओवसमिएपारिणामियनिष्फन्ने उवसंता कसाया खओवसमियाइं इन्दियाई पारिणामिए जीवे एस णं नामे उपसमियखोवसमिइयपारिणामिए निष्फन्ने , कयरे से नामे खइयखओवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने खइयं सम्मत्तं खोवसमियाइं इंन्दियाइं पारिणा- मिए जीवे एस एं से नामे खइयखओवसमिएपारिणा- मियनिप्फन्ने १०॥ पदार्थ-(तत्थणं जे ते दसतिग संयोगा तेणं इमे ) इन पट्विंशति भंगों में जो दश तीन संयोगी भंग हैं वह इसप्रकार से हैं (प्राथनामे उदइयउवसमिए- खइय निष्फने १) अस्ति औदायक १ औपशमिक २ क्षायिक निष्पन्न नाम हैं). (अत्यि नामे उदइयउवसमिएखओवसमनिप्फन्ने २) औदयिक १ औपशमिक २ क्षयोपशमिकनिष्पन्न नाम है २ (अत्थि नामे उदइयउवसमिएपारिणामिए निष्फन्ने ३ ) औदपिक १ औपशमिक २ परिणामिक ३ निष्पन्न एकनाम है ३ (अत्थि नामे उदइयखइयखोवसमनिप्फने ४) औदयिक १ क्षायिक,२ क्षयोपशमनिष्पन्न नाम है ४ ( अत्थि नामे उदइयखझ्यपीरणीमरीनप्फने * अनुयोगद्वार सत्र * ५ औदयिक ! ज्ञायिक २ और पारिणार्मिक निष्पन्न नाम है । यह मंग केवला भगवान् में होता है क्योंकि प्रौदयिक भाव में मनुष्य गति है ज्ञापिक भाव में केवल ज्ञान दर्शन चारित्र होता है पारिणामिक भाव में जीव होता है इसलिये पांचयां भंग केवती भगवान में कहा जाता है और (प्रीत्य नामे दइयखावंसमिएसारिणामिएनिफने ६ ) औदायिक १ अयोपशमिक र पारिणामिक ३ निष्पन्न एक नाम होता है ६ यह भंग चारों गतियों में होता है जैस कि औदायिक भाव में कोई गति स्थापन करा १ क्षयोपशमिक भावे इंद्विय होती है २ पारिणामिक भाव में जीव है ३ सो यह भंग चासे गतियों में है जैस कि मनुष्य गंति १ तिर्यक् गति २ देव गनि । नरक गति ४ शेष भाउ भंग दिग्दर्शन मात्रही हैं किन्तु किसी स्थान पर उनकी अस्तित नहीं होती केवल अस्तित्व उक्त दोनों भंगो की है (अत्यि नामे ज्वसमिएखड्य खत्रोक्सानप्फन्ने ७, औपमिकतायिक सयोपशम निप्पन्न एक नाम होता है (अत्यि नामे उक्समिएखझ्यपारिणामिएनिप्फने ८) औपशमिक नायिक और पारिवामिक भाव निष्पन्न एक नाम होता है ८ अत्यि नामे उपसमिए खावसामएनिमने है) औपशमिक क्षयोपशामिक और पारिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है (अत्रि नामे सइय खओक्समिएपारिणामियनिष्फने१०) सायिक योपशामिक और परिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है १० यह तो नीन संयोगी केवल १: भंग दिखलाये गये अनः इनके अयों का व विवर्ण करते हैं। (कपरे से नामे उदइयत्वसमिएखड्यनिष्फने) (प्रश्न) औयिक औपशमिक और कायिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है (उत्तर) (उहएत्ति मगुस्से वसंता कसाया खड्यं संम्मत्तं एस णं से नामे उदयन समिएखड्यनिष्फनेय- १) श्रीदयिक भाव में मनुष्य गति ई उपशान्त कपाय है ज्ञायिक सम्यक्त्व है सो इसी का नाम औदायिक औपशामिक सायिक निप्प •न्न नाम है १ (कयर से नाम उदझ्यज्वसमिएखोवसमनिष्फन्ने ) (प्रश्न) आदायिक औपशामिक-प्लयोपशामिक निष्पन्न नाम किस प्रकार से होता :(उत्तर) ( उदइयोन मगुस्से उबसन्ता कसाया सोवसपियाई इन्दियाई) औदायिक भाव में मनुष्य गान है उपशम भाव में अशान्त कपाय हैं क्षयोपशम ‘भाव में इन्द्रियां है सो (एस रण से नामे उदइएश्वसीमएनओवसमीनकन्न २)इसी को औदायिक औपशामिक भयोपशम निष्पन्न नाम कहते हैं ३ .
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२२७) (कयरे से नामे उदइय उपसमिए पारिगामिएनिष्फन्ने ) (प्रश्न ) औदायिक -औपेशमिक पारिणामिक निष्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) ( उदइएत्रि मणु- स्से उवसता कसायां पारिणामिए जीव एस णं से नामे उदइय खायपारिणामिए निष्फन्ने ३) औदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशान्त कपाय है पारिणामिक जीव है सो इन्हीं का नाम औदयिक क्षायिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम है ३ ( कयरे से नामे उदइयखइयखओव समिएनिप्फन्ने ) (प्रश्न ) औदयिक क्षायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है (उचर ) ( उदइएत्ति मणुस्से सइयं सम्मत्तं खोवसमइन्दि- याई एस णं से नामे उदइयखंइयखावसमनिष्फन्ने ४) औदयिक भाव में मनुष्य गति है क्षायिक सम्यक्त्व और क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां हैं सो इन्हीं को औदयिक सायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न नाम कहते हैं ४ (कयरे से नामे उदइयखइयपारिणामिएनिष्फन्ने ) (प्रश्न) औदीपक क्षायिक पारि- खामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है (उत्तर) (उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उदइयखइयपारिणामिएनिष्फ- न्ने ५) औदयिक भाव में मनुष्य गति है और मायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है और पारिणायिक भाव में जीव है सो इन्हीं को औदयिक क्षायिक पारि- णामिक निष्पन्न भाव कहते हैं ५) सो यह भाव केवली भगवानों में होता है क्योंकि औदयिक भाव मे मनुप्य गति है.तायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है और पारिणामिक भाव में जीव है सो यह भंग श्री केवली भगवानों में है ( कयरे से नामे उदइयखोवसमिएपारिणामिएनिष्फन्ने ) (प्रश्न) औदयिक चयोपशामक और पारिणामिक निष्पन्न भाव कौनमा है (उत्तर) ( उदएचि मणुस्से खोवसमियाई इंदियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नाम उदइयखोवसीमएपारिणामिएनिष्फने ६) औदयिक भाव में मनुष्य गति है तयोपशम भाव में इन्द्रियां हैं और पारिणामिक भाव में जीव है सो इन्ही करके उत्पन्न हुए नामको औदयिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक भाव कहते हैं ६ अतः यह भंग चारो गतियों में होता है जैसे कि औदयिक भाव में चारों गतियों में से कोई गति ले लो क्षयोपशमिक भाव में इन्द्रियां हैं और पारिणामिक भाव में जीव है इसी लिये चारों गतियों में यह भंग होता है शेष वीन संयोगी पाठ ८ भंग दिग्दर्शन मात्र है ( कयरे से नामे 'उत्समिए (१२२८) * अनुयोगद्वार सूत्र * खइएखओवसामएनिष्फने) औपशामिक तायिक और योगशर्मिक भाव किसे कहते हैं ( उत्तर) ( उवसंता कसाया खड्य सम्मत्तं खओवसर्मिया इंदियाइं एस णं से नामे उपसमियखइएखोवसमनिप्फने ७ ) उपशम भाव में कपाय है तायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त है और क्षयोपशम में इन्द्रियां हैं तो इस नाम को औपशमिक क्षायिक और योपशमिक निप्पन्न भाव कहते हैं ( कयरे से नामे उपसमिएखइयपारिणामिएनिफने ७ ) (मन) औपशीमक शायिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) उवसंता कसाया खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उपसमिएखइयपारिणामपनि फन्ने ८ ) अशांत कपाय है शायिक सम्ब- क्त्व है और पारिणामिक जीव है सो इस नाम को औपशमिक क्षायिक और पारिणामिक निप्पन्न भाव' कहते हैं ८ । (कयरे से नामे उपसमिएखोर समियपरिणामिएनिप्फन्ने ) औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है ( उत्तर ) ( उवसंता कसाया खोवसमिया इंदियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नामे उवसामिएखोवसामएपारिणा- मिए निष्फन्ने है ) उपशांत भाव मे कषाय है क्षयोपशम भाव में इन्द्रियां है. और पारिणामिक भाव में जीव है सो इसी नाम को औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निप्पन भाव कहते हैं । कयरे से नामे खइयखउपसमि- एपारिणामिएनिष्फने (प्रश्न) चायिक और क्षयोपशमिक और पारिणामिक निप्पन्न नाम कौनसा होता है (उत्तर) क्षायिक सम्यक्त्वं है क्षयोपशमिक इन्द्रि- यां हैं और पारिणामिक जीव है सो इसी नाम को क्षायिक क्षयोपशषिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव कहते हैं १० सो यह तीन संयोगी दश भंगों का अर्थ वर्णन किया गया है जिसमें केवल दो भंगों का अस्तित्व है शेष भंग दिग्दर्शन मात्र हैं अब चार संयोगी ५ भंगों के स्वरूप कथन किया जाता है। भावार्य-यदि तीनों भावों को एकत्व किया जाए तब उनके तीन संयोगी दश भंग बन जाते हैं जैसे कि ? औदायिक औपशामिक २ क्षायिक २ औदायिक ? औपशमिक २ क्षयोपशमिक २ । ३औदायक १ औपशीमक २ पारिणामिक १४ औदायिक दायिक २ सयोपशामिक ३१ ५ औदीयक १ नायिक २ परिणामिक ३ । यह भंग केवलियों में होता है।६ औदायिक १ यो. . .
* अनुयोगद्वार मूत्र * (२२६) पशमिक २ पारिणामिक ३ । यह ४ गतियों में होता है । ७औपशामक १क्षा- यिक क्षयोपशमिक ३ । ८ अपशमिफ १ चायिक २ पारिणामिक ३18 औपशमिक १ क्षयोपशमिक २ पारिणामिक ३ । १० तायिक १ क्षयोपश- मिक २ पारिणामिक ३ यहतीन संयोगी दश भंग बनते हैं और इनके अर्थ पदार्थ, में दिये गये हैं अपितु पांचवां छठा इन दोनों भंगो के अस्तित्व है शेष भंग दिग्दर्शन मात्र ही कथन किये गये हैं पांचवां भंग केवली भगवान् में होता है छठा भंग चारों गतियों में होता है शेष भंग शून्य कहे जाते हैं अव चार सं- योगी पांच भंगों का वर्णन करते हैं क्योंकि चारों भावों के एकत्व करने से पांच भंग बन जाते हैं सो निम्नलिखितानुसार हैं। अथ चतुः संयोगी पांचों भंगो का विषय । मूल-तत्थ णं जे ते पंच चउक्कसंजोगा तेणं इमे आत्थि नामे उदइएउवसमिएखइयखओवसमिएनिष्फन्ने १ अस्थि नामे उदइय उपसमिएखइएपारिणामिएनिप्फन्ने २ अस्थि नामे उदइयउवसामएखओवसामएपरिणामिएनिप्फन्ने ३ अस्थि नामे उदइयखझ्यखओवसमिए पारिणामिए निष्फन्ने ४ अत्थि नामे उपसमिएखइयखयोवसमिएपरिणामएनिष्फन्ने ५ कयरे से नामे उदइयउंवसामियखइयखओवसमिएनि- 'फन्ने ६ उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया खइयं सम्मत्तं खओवसमियाई इंन्दियाई एस णं से नामे उदइयउवससमिय खइयखओवसामिानप्फन्ने १ कयरे से नामे उदइयउपसमिय- खइयपारिणामिएनिष्फन्ने उदइत्ति मणुस्से उवसंता कसाया खइयं सम्मत्तंपारिणामिए जीवे एस णं से नामे उदइएउवस- मिएखइयपारिणामियनिष्फन्ने २ करें से:नामे उदइयउव- समिए खओवसमिएपीारणीमएनिष्फन्ने उदइएत्ति मगुस्से उवसन्ता कसाया खोवसमियाई इंदियाई पारिणामिए जीवे (२३) * अनुयोगदर मूत्र * एस एं से उदइएउवसामएखइयपारिगामियनिष्फन्ने ३ कयरे से नामे उदइयखइयखओवसमिएपरिणामियनिष्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से खइयं सम्मत्तं खग्रोव समियाई इंदियाई पारिणामिए जीवे एस एं से नामे उदइयखइयखोवसमिए पारणामिएनप्फन्ने ४ कयर से नामे उवममिएसइयंखओर समिएपारेणामिएनिष्फल्ने उपसंता कसाया खइयं सम्मत्तं खावसामेयाई इंदियाई पारिणामिए जीवे एस एणं से नामे उपसमिएखइयखोवसामिएपारिणामिपनिष्फन्ने ॥ ५ ॥ पदार्य-(तत्य णजे ते पंचचउक्कसंजोगा तेणं इमे ) उन पदविंशनि भंगों में जो पांच संयोगी चार भंग हैं वह यह हैं जो आगे कहे जायेंगे- अत्यि नाम उदइयवसमिएखइयख आवसमीनप्फन्ने १ ) औदायिक औपशर्मिक क्षायिक क्षयोपशमिक निष्पन्न एक नाम है १ अतः (अत्यि नामे उदइएज्वमीम एसइए. पारिणामिएनिफने २ ) औदयिक औपशमिक नायिक पारिणामिक निष्पक्ष एक नाम है ३ ( अत्यि नामे उदइएउवसमिए खओवसमिएपारिणामिएनफने ३) औदायिक ओपशमिक क्षयोपगमिक और पारिणामिक निष्पन्न एक नाम है ३ सो यह भंग सर्व गतियों में सतन विद्यमान रहता है परन्तु सूत्र ने मनु- ध्य गति का ही उदाहरण दिया है सो वह इस प्रकार से है जैसे कि औद- यिक भाव में मनुष्य गति है औपशमिकं भाव में जे आत्मा उपशम. श्रेण में पतिपन्न है अथवा जो उपशम सम्यक्त्व करके युक्त है और क्षयोपशम भाव में इन्द्रियाँ हैं परिणामिक भाव में जीव है इसलिये यह भंग मनुष्य गति में कहा गया है किंतु यह भंग चारों गतियों में होता है ऐसे जानना चाहिये। अथ चतुर्य भंग का स्वरूप कहते हैं (अत्थि नामे उदइयखझ्यंखोवममिएपारिणामिए निष्फन्ने ४) औदयिक तायिक क्षयोपशामक पारिणामिक निष्पन्न भाव एक नाम है ४ सो यह भी भंग चागें गतियों में होता है क्योंकि आदायक मात्र में कोई गति लेलो. क्षायिक भाव में ज्ञायिक सम्यक्त्व होना है अनः नरक ३१) * अनुयोगद्वार सूत्र * (२३१) तिर्यग और देवों में क्षायिक सम्यक्त्वपूर्व भाव की अपेक्षा जानना चाहिये और मनुष्य गति में पूर्व प्रतिपन्न भी हो नूतन भी उत्पन्न कर लेवे और तोपशम भाव में इन्द्रियां हैं पारिणामिक भाव में जीव है इमालिये यह भंग चारों गति- 'ओं में होता है सो यह पांचों अंगो से दो भंग अस्तित्व रखते हैं शेष तीन भंग कथन मात्र ही है आत्थि नामे उपसमियखइयखोवसामियपारणामएनिष्फन्ने ५) औपशामक दायिक क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है अतः यह तो पांच भगों केवल नामोत्कीर्तन किया गया है अव इन के अर्थों का विवर्ण करते हैं ( कयरे से नामे उदइयवसामिएखइयखावसामियनिष्फन्ने ) (प्रश्न ) औदायिक ऑपशमिक क्षायिक क्षयोपशामक निष्पन्न भाव किस कहते हैं (उत्तर)(उदइएत्ति मणुस्से उपसंता कसाया क्खइयं सम्मतं खोर समियाई इन्दियाई औदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशांत भाव में कषाय है क्षायिक भाव में सम्यक्त्व है अयोपशमिक भाव में इंद्रियां हैं सो (एस एं से नामे उदइयउपसमिएखइयखओवसमिएनिष्फन्ने १) इसी का नाम औदायक औपशमिक क्षायिक और क्षयोपशमिक निष्पन्न भाव है १ (कयर से नामे उद- इयउवसमियखायपारिणामिएनिष्फने १ ) ( प्रश्न ) औदयिक औपश- मिक सायिक और पारिणामिक नाम किसे कहते हैं (उत्तर) (उदएत्ति मणुस्से ज्यसता कसाया खइयं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे ) औदायक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में कपाय है क्षायिक में क्षायिक सम्यक्त्व पारि- णामिक भाव में जीव सो (एस णं से नामे उदइए उपसमिएखइयपारिणा- मिए निष्फ २ ) सो इसी का नाम और यक औपशमिक क्षायिक पारिणा- मिक निष्पन्न भाव है २ ( कयरे से नामे उदइय उपसमिएखआवसमिए पारिणामिए: निष्फन्ने ) (प्रश्न ) औदयिक औपशमिक क्षयोपशमिक और पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) (उदइएत्ति मणुस्से. उद संता कसाया खआवसमियाइं इंदियाई पारिणामिए जीवे ) उदय भाव में मनुष्य गति है, उपशम भाव में कपाय हैं अपितु योपशम भाव में इंद्रियां हैं इसलिये (एस णं से नामे उयइएउवसमिएखोवसमिएपारिणामिए निष्फने ) यह नाम औदयिक औपशमिक क्षयोपशामिक पारिणामिक निष्पन्न कहा जाता है और चारों गतियों में इस भाव का अस्तित्व है ३ ( कयरे से नामे उदइएखइएखोवसमिएपरिणामिएनिष्फने).(प्रश्न) औदयिक क्षा- (२३२) * अनुयोगद्वार मूत्र * यिक और क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर) ( उदइएत्ति मणुस्से खडयं सम्म खोवसमियाइ इदियाई पारिणामिएजीवे )ो दयिक भाव में मनुष्य गति है दायिक में शायिक सम्यक्त्व और क्षयोपशामिक भावमें इंद्रियां हैं अतः पारिणामिक भावमें जीव है सो ( एस ण से नामे उदइए खइयंखआवसमिएपरिणामिएरीनप्फन्ने ४ ) इसी का नाम श्रीदयिक क्षायिक क्षयोपशामिक पारिणामिक निष्पन्न भाव है अतः इस भंग की भी चारों गतियों में अस्तित्त्व है किंतु सूत्र में मनुष्य गति का उदाहरण दिया गया है अपितु यह भग चारों गतियों में ही होता है ( कयरे से नामे उवसामयखइएखोव समियपारीणामिएनिष्फन्ने ) ( प्रश्न ) औपशमिक दायिक क्षयोपशमिक पा- रिसामिक निष्पन्न नाम कौनसा होता है ( उत्तर ) ( उवसंता कसायाखडयं तं खोवसमियाइदियाइ पारिणामिए जीवे ( उत्तर ) उपशान्त कषाय हैं यिक सम्यक्त्व है क्षयोपशामक इंद्रियां हैं और पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये ( एसणं से नामे उवसामिएखइयखओवसामिएपारिणामिएनिष्फन्न ५ यह नाम औपशामिक सायिक क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न कहा जाता है यह चार,संयोगी पांच भंग हैं जिन में तृतीय चतुर्थ भंगों की चारों गतियों में अस्तित्व रहती है शेष तीन भंग दिग्गदर्शन मात्र है किंतु अस्तित्व इन की नहीं है अब पांच संयोगी भंग का विवेचन करते हैं । भावार्थ-चारों भावों के एकत्व करने से चार संयोगी पांच भंग उत्पन्न होते हैं जैसे कि- १ औदुयिक औपशमिक नायिक क्षयोपशमिक २ औदयिक औपशमिक सायिक, पारिणामिक । ३ औदायक, औपशमिक, क्षयोपशर्मिक, पारणामिक है । इस भंग की अस्तित्व है। ४ औदायिक, नायिक भयोपशमिक पारिणा- मिक-इस भंग की अस्तित्व है । ५ औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक ५ ॥ यह चतुस्सयोगी पांच भंग हैं अपितु इन के अर्थों का विवर्ण पदार्य में दिया गया है और इन पांच भंगों में से तीसरे चौथे भंग की अस्तित्व है शेष भंग केवल दिग्दर्शन मात्र हैं अब पांच सयोगी एक भंग का विवर्म करते हैं।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२३३). मूल-(तत्थणं जे ते एगोपंच संजोगो सेणं इमे-अस्थि नामे उदइयउवसमिएखइयखओवसमिएपारिणामिय निष्फन्ने कयरे से नामे उदइएउपसमिएखइयखोवसमियपारिणामिए निप्फन्ने उदइएत्ति मणुस्से उवसन्ता कसाया खइयं सम्मत्तं खओवसमियाइं इंन्दियाई पारिणामिए जीवे एस णं से नाम उदइएओवसमिएखइयखओवसमिए पारिणामिएनिष्फन्ने से तं सन्निवाइए सेत्तं छन्नामे ।। पदार्थ- (तत्थ णजे ते एगो पंचसजोगो से एं इमे ) उन पर विशंति भंगों में जो एक भग पांच संयोगी है वह इस प्रकार से है ( अत्थि नामे उदइयउव सामिएखइयखोवसमियपारिणामिएनिष्फन्ने ) जैसे कि-औदायक, औपशमिक धायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक निष्पन्न एक नाम होता है ( कयरे से नामे उदइएउपसमिएखइएखओवसमिएपारिणामिए निप्फन्ने) (प्रश्न) श्रौदयिक औपशामिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक पारिणामिक निष्पन्न भाव किसे कहते हैं (उत्तर )( उदइएत्ति मणुस्स उपसंता कसायाखइयं सम्मत्तं खओवसपियाइं इंदि- याई पारिणामिएजीवे) औदयिक भाव में मनुष्य गति है उपशम भाव में उपशांत कपाय हैं और क्षायिक भाव में क्षायिक सम्यक्त्व है क्षयोपशम भाव में इंद्रियें हैं पारिणामिक भाव में जीव है इसलिये ( एस ण से नाये उदइयउपसमिए पारिणामिए निष्फन्ने सेत्तं सान्नवाइए सेनं छन्नामे) इसको औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशमिक, पारिणामिक निष्पन्न भाव कहते हैं सो इसी का नाम सान्निपातिक भाव है और यही पद नाम का स्वरूप है अतः इसीको षट् नाम कहते हैं भावार्थ-पांच भावों के एकत्व करने से पांच संयोगी एक भंग बनता है जैसे कि औदीयक औपशमिक क्षायिक और क्षयोपशमिक पारिणामिक यह भंग केवल उपशम श्रेणि में होता है सो यह पांच संयोगी एक भंग का स्वरूप पूर्ण हो गया है -अपितु सर्व पदविंशति भंग कथन किये गये हैं जैसे--कि दोसंयोगी दश भंग है तीन संयोगी दश भंग है और चार संयोगी पांच भंग हैं किन्तु पांच संयोगी एक अंग है सोयह सर्व २६ पत्रिंशतिभंग होते हैं फिर दुगसंजोगो सिद्धाणं केवल संसारियाई . (२३४) * अनुयोगद्वार सूत्र * ढुंतांती संजोगो चउ संजोगो दुचउसगई उवसम सेठिउ पण संजोगाय ३१ अर्थात् दो संयोगी नववा भंग सिद्ध भगवंतों में होता है और तीन संयोगी पांचवां केवली भगवान् में होता है और तीन संयोगी छठा भंग चारों गतियों में है अपितु चार संयोगी तीसरा और चतुर्थ भंग मनुष्य देवता नारकी में होते हैं तथा संज्ञि पांचेंद्रिय तिर्यग में भी हो जाता है किन्तु पांच स्थावर तीनों विकलेंद्रिय में नहीं होता और पांचवां भंग उपशम श्रेणी गत जीवों में होता है इसलिये पर विशति भंगों में से ६ भंग अस्तित्व रूप में हैं.शेष २० भंग दिग्दर्शन मात्र कथन किये गये हैं तथा अन्य ग्रंथों में (तत्वार्था दि शास्त्रों में* ) पांच भावों का मूल प्रकृतियांच मान कर उतर प्रकृतियें ५३ लिखी हैं जैसे कि मूल प्रकृति औदायिक १ औपशमिक २ क्षायिक ३ क्षयो- पशामक ४ और पारिणामिक ५ यह पांच मूल प्रकृति हैं अपितु उतर प्रकृतियें निन्न लिखतानुसार हैं औदयिक भाव की उत्तर प्रकृतियें २१ चारगति पट् लेश्या ४ कषाय ३ वेद प्रसिद्ध १ अज्ञानी १ अविरति १ मिथ्यात्व १औपशमिक भाव की २ प्रकृतिये हैं उपशम सम्यक्त्व और उपशम चारित्र २ क्षायिक भाव की ९ प्रकृतियां हैं ५ अंतराय क्षायिक भाव में है अर्थात् पांचों अंतरायों का क्षय करना और केवल ज्ञान १ केवल दर्शन २ क्षायिक चारित्र ३ तायिक सम्यक्त्व ४ और क्षयोपशमिक भाव के १८ भेद हैं जैसे कि ४-चार ज्ञान ३ तीन अज्ञान ३ तीनों दर्शन ५ अंतराय क्षयोपशम भाव में क्षयोपशम चारित्र १ क्षयोपशम देश- व्रतक्षयोपशम सम्यक्त्व । और पारिणामिक मात्र के ३ भेद हैं जैसे कि भव्य पारि- पामिक अभव्य पारिणामिक २ जीव पारिणामिक ३ यह सर्व ५३ उतर प्रकृतियां *नोट-१ औपशमिक हायिको भावी निश्रश्व जीवस्य स्वतत्व मौदयिक २ पारिणामिकौ च २ द्विनवाटा दर्शक विंशति वि वेदायकथाक्रमम् । ३ सम्यक्त्व चारित्रे । ४ ज्ञान दर्शन रान लाम भोगोपभोग वीर्याणि च । ५. ज्ञाना ज्ञान दर्शन लब्धाश्वतुस्त्रि त्रियंच भेदाः सम्यक्त्व चारित्र संयमा संयमाश्च । ६ गति कपाश लिंग मिथ्या दर्शना ज्ञानासंयतासिद्ध लेश्या श्वतु श्वतु स्त्रै के के के कपडू भेदाः। ७ जीव भण्या मध्यत्वानिच । तत्वार्थ सत्र के दूसरे अध्याय के हैं। TA * अनुयोगद्वार सूत्र * (२३५) हैं और इनके ऊपर ही एक ६२ अंकों का स्तोक बना हुआ है जिसकी मूल गाथा यह है-गई १ इंदिय २ काय ३ जोए-४ वेद ५ कसाय ६ नाणे ७ संजए ८ देसण : लेस्सा १० भव ११ समे १२ दिहि १३ सन्नि १४ आहारए १५ ॥१॥ इन ६२ अंकोपरि ५ मूल प्रकृतियां ५३ उतर प्रकृतियां की गणना की जाती है और सन्निपातिक भाव के पद विंशति भंग पूर्व लिखे गये हैं सो यह सर्व पट् भावोंके समास से षद् नामका विवर्ण पूर्ण होगया है यह सर्व जैन सिद्धान्त है सो जैन सिद्धांत का स्वरूप तीनों स्वरों वा सात स्वरों में प्रतिपादन किया गया है इसलिये सात नाम के प्रकरण में सातों स्वरों का स्वरूप लिखा जाता है। ॥ अथ सप्त नाम के अतरगत सप्तस्वरों के विषय ॥ मूल-सेकिंतं सत नामे २ सतसरा पण्णत्ता तंजहा सजे १ रिसमे २ गंधारे ३ मग्झिमे ४ पंचमेसरे ५ घेवएचेव ६ निसा- एसरासत वियाहिया? एएसिणं सतण्हं सराणं सत्त सरठाणा पं० २० सज्जं च अग्गजीहाए उरेण रिसमं सरं कंठुग्गएण गंधार मज्झजीहा ए मज्झिमं २ नासाए पंचमं बुया दंतोटेण धेवय भमुहक्खेवण णेसाए सरहाणा वियाहियाइ ॥ पदार्थ-(सेकितं सत नामे २ सतसरा पन्नत्ता तंजहा ) अथषट् नाम के पश्चात् सप्त नाम का विवेचन किया जाता है जैसे कि-शिष्य ने प्रश्न किया कि है भगवन् सप्त नाम कितने प्रकार से वर्णन किया गया है इस प्रकार के शिष्य के प्रश्न को सुनकर गुरु कहने लगे कि -भो--शब्द प्राट् ! सप्त नाम को अंत- गत सप्तस्वरों का विवेचन किया गया है क्योंकि सूट शब्दोयता पनयोः धातु से स्वर शब्द की उत्पति है सो जो ध्वनिरूप है वे स्वर होता है सो जिसके सतनाम निन्न लिखितानुसार हैं ( सज्जे १) षड्जस्बर उसका नाम है जोपटं. स्थानों से शब्द रूप ध्वनि उत्पन्न हो जैसे कि-नासिका १ कंठ २ उर (छाती). ३ तालु ४ जिहा ५ दंत ६ जो इन' षट् स्थानों से-शब्द उत्पन्न होकर उच्चारण । (२३६), * अनुयोगवार सूत्र * किया जाए उसको पढ्नु स्वर कहते हैं । और जो ऋषभवद् शन्द हो उसे , अपम् स्वर कहते हैं क्योंकि नाभि से वायु उत्पन्न होकर कएट यस्तक में स- मावर्तन हॉफर जो शब्द ऋषभवत् उच्चारण किया जाये उसीका नाम (रिस- में २) ऋषभ स्वर है अतः (गंधारे ३) नामि से वायु उत्पन्न होकर जो म- इनकादि में समावर्तन करके जो नाना प्रकार के गंध से युक्त है उसे गांधार स्त्र कहते हैं (ममि ) मध्यम स्वर उसका नाम है जो काया के मध्य भाग- नाभि से उत्पन्न होकर हृदय आदि में होकर जो शब्द उच्चारण कियाजावे उसे मध्यम स्वर कहते हैं ४ (पंचमे ५) जो षड्नादि की पंचम संख्याको पूर्ण करना है उसे पंचम स्वर कहो हैं वया जिसमें पांच स्थानों में वायु समा वर्तन हो उसे पंचम कहते है जैसे कि-नाभि १ उदर २ हृदय ३ कंड.४ मस्तक ५ सो जो इन में समावर्तन होकर शब्द उच्चारण किया जाने उस को पंचम स्वर कहने हैं ५ (वेवय प ६) धैवत स्वर उसका नाम है जो अन्य स्वरों को धारण करना हो तथा अन्य स्वरों का साधन करना हो अपितु पागन्तर में इस. स्वर को खत स्वर भी कहते है (निसार ७) निषाद स्वर उसे कहते हैं जिससे अन्य स्वरों का परिभव हो नाए नया जिसका महा स्थल शब्द हो उसे निषाद स्वर कहते हैं इस प्रकार से ( सगसत वियाहिया १) सस स्वर अहन्ता भगवंताने प्रतिपादन किये हैं शंका ) अंसख्यात जीव रसन्द्रिय द्वारा शब्द उच्चारण करते हैं इस अपेक्षा से असंख्यात स्वर होने चाहिये ( समाधान ) अपितु ऐस नहीं हैं यावन्मात्र रसनेन्द्रिय के शब्द है वे सर्व सात घरों के ही अंतर्गत रहते हैं इसलिये स्वर सात ही हैं और इनके अनेक स्थान उत्पत्ति के हैं किन्तु मुख्य स्थान निहा ही इसलिये स्थल स्यानों की अपेक्षा से सप्त स्वरों के स्थानों का निर्णय करते एपनिणं सतण्डं सगणं सत्तसरंटाणा पगणना तंत्रहा ) इन सप्त स्वरों के स्वर स्थान प्रतिपादन किये गये हैं जैसे कि-(सज्जंच अग्गजिम्भाए) पडड . जिला के अग्र भाग में उत्सन्न होता है यद्यपि पडत स्वर के पट् स्थान वर्णन किए गए हैं किन्तु मुख्य स्थान जिदा ही है इसलिये पडज स्वरका स्या न जिहा का अन भाग प्रतिपाइन किया गया है और (उरेण) घर से (छाती में) रिसभं* ऋषभ (स्वरं ) स्वर उत्पन्न होता है और (कंलुगाएणं) कंठ से * :-रिकेत्रलस्य । प्रा०प०१०।११08 वजस्य ध्यान ना संपृकस्य अशोरिरादेशी भवति .
. * अनुयोगदार मूत्र * (२३७) उत्पन्न होता है ( गंधार ) गांधार स्वर अपितु (मज्जपंजीहाए) जिहा के मध्य भाग से (मज्जिपमर) मध्यम स्वर उत्पन्न होता है २ और (नासाए) नासिका से (पंचम ) पंचम स्वर ( व्या ) भाषण किया जाता है दंतोडणेय दान्त और ओष्ठों से उच्चारण किया जाता है धेवयं धैवत स्वर अपितु भमुह खेवेण भ्रकुटों के आक्षेप पूर्वक ऐसाए निषाद स्वर उच्चारण किया जाता है सो (सर) स्वर (ठाण ) स्थान ( वियाहिया ३) अहन्तो भगवंतोने इस मकार से स्वर स्थान प्रतिपादन किए गये हैं क्योंकि इनके भिन्न २ स्थान होने पर भी मुख्य २ स्थान वर्णन किए गये हैं अब अग्रे जीव नित्सृत स्वरों के विषय में कहते हैं। भावार्थ-सात नाम के अंतग्गत सात स्वरों का विवेचन किया गया है जैसे कि षड्ज स्वर-१ ऋषभ स्वर २ गांधार स्वर ३ मध्यम स्वर ४ पंचम स्वर ५ धैवत स्वर ६ और निपाद स्वर ७ और जो नाभि आदि षट स्थानों से उ- त्पन्न हो उसे षडज स्वर कहते हैं १ जो ऋषभवत् शब्द उच्चारित हो उसका नाम स्वर है २ जो नाना प्रकार की गंध से युक्त भाषण किया जाए उसे गांधार स्वर कहते हैं ३ काया के मध्य भाग से जिसकी उत्पत्ति हो उस मध्यम स्वर कहते हैं ४ तथा नाभि-आदि पांच स्थानों से जो उत्पन्न हो वह पंचम स्वर होता है ५ जो और स्वरों को धारण करे वह धैवत ६ जिस का स्थूल शब्द हो वही निषाद स्वर है आपतु मुख्य स्थान इन के निम्न प्रकार से हैं जैसे कि-षड्ज स्वर जिहा के अग्र भाग से उच्चारण किया जाता है उरसे ऋषभ गाया जाता है कंठ से गांधार स्वर जिहा के मध्य भाग से मध्यम नासिका से पंचम दांत और ओष्टोंसे धैवत भ्रकुटिके आक्षपसे निषाद स्वर उच्चारण होता है इस प्रकार से अईन देवों ने सप्त स्वरों के सप्त स्थान प्रतिपादन किए हैं किन्तु यावन्मात्र रसेंद्रिय युक्त जीव हैं उन सवोंके स्वर सात स्वरों के अंतरगत ही जानने चाहिए ऐसे नहीं है कि तावन्मात्र स्वर संख्या भी हो जैसे कि अनेक वर्ण । रंग ) होने पर भी वे सर्ववर्ण पांच वर्षों के अन्तरगत होजाते हैं उसी प्रकार स्वर संख्या भी जाननी चाहिए अब सात स्वर जीवों की निश्राय से वर्णन करते हैं कि जिसके द्वारा जीवों को स्वर ज्ञान का शीघू वोध होजाए।
(२३८) * अनुयोगद्वार सूत्र * ॥ अथ सप्त स्वर जीवनिश्राय विषय ॥ सत्त सरा जीव निस्सिया पं. तंजहा। पदार्थ-(सत्त, सप्त (सरा ) स्वर (जीव निस्सिया पं० तजहा) जीव निस्सत प्रतिपादन किए गये हैं जिन के द्वारा स्वर ज्ञान की शीधू पाप्ति हो जाती है। सो वे निम्न लिखितानुसार हैं । भावार्थ-सात स्वर जीव निस्सृत १ प्रतिपादन किए गए हैं जो निम्न लिखितानुसार हैं। ॥अथ जीव निश्राय विषय ॥ सज्जरवइ मऊरोकुक्कुडो रिसभं सरं हंसो रवइ गंधारम- झिमंतु गवेलगा ४ ॥ पदार्थ-(सज्ज खइ मऊरो पड्ज स्वरको मोर बोलता है (कुक्कुड़ोरिसभंसरं) कुछड़ अपम स्वर को, हंसोखड्गधारं ) हंस गांधारको, (मझिमंतुगवेलगा.) गाय और वकरी मध्यम स्वर को बोलती हैं। भावार्थ-मयूर पड्ज स्वर उच्चारण करता है, कुक्कुड़ का ऋषभ स्वर होता है, अपितु इस गांधार स्वर में वोलता है, और गौ एलकं आदि पशु मध्यम स्वर में बोलते हैं ॥४॥ ॥ अथ शेष स्वरों के विपय ॥ श्रह कुसुमसंभवे काले कोइला पंचमं सरं । छटुंच सारसा कुंचा नेसायंसत्तमं गओ ॥ ५ ॥ पदार्थ--(अह) अव (कुसुमसंभवे ) पुष्पों के उत्पन्न होने के (काले) कालमें (कोइला) कोइल (पंचमं ) पंचम ( सर ) स्वर भापण करतीहै अतः (छठंच) धैवत स्वर ( सरसा कुंचा ) सारस और कोंच पक्षी वोलते हैं पुनः ( नेसायं ) निपाध स्वर (सतम ) जो सप्तम है वह (मतो ५) गज का होता है अर्थात .
- * अनुयोगद्वार सूत्र * (२३६) जो निपाद स्वर है वो हस्ती का होता है इसालिये (सतमंगतो ५) यह सूत्र दिया गया है । यह सप्त स्वर जीव की निश्राय कथन किए गये हैं अब सात ही स्वर अजीव की निश्राय कहते हैं अर्थात जो वादिन से उत्पन्न होते हैं । भावार्थ-वसंत ऋतु में कोइल पंचम स्वरमें बोलती है सारस और क्रौंचपति धैवत स्वर में शब्द उच्चारण करते हैं अपितु सप्तम स्वर में इस्ती का शब्द होता है यह सात ही स्वर जावों की निश्राय वर्णन किए गए हैं - अव इस के आगे सातों स्वर अजीव की निश्राय में जो हैं उनका विवर्ण करते हैं । ॥अथ सप्त स्वर अजीवनिश्राय विषय ॥ सत्त सरा अजीवनिस्सिया पं, तं.। पदार्थ- (सत ) सप्त ( सरा ) स्वर ( अजीव ) अजीव वादिनादि की (निस्सिया) निश्राय (पं. तं.) प्रतिपादन किए गये हैं जैसे कि- भावार्थ-सप्त स्वरा अजीव की निश्राय में कह गए हैं जो आगे कह जातेहैं। मूल-सज्ज रवइ मुयंगो, गोमुही रिसभं सरं संक्खोरवइगं- धारं मज्झिमं पुणज्झल्लरी ६ चउचलणपइट्ठाणा गोहिया पंचमं सरं आडंबरो यरवइयं महामेरी य सत्तमं ॥ ७ ॥ पदार्थ- (सज्जरवइमुयंगो) मृदंग पड्ज स्वर में वजता है और (गोमुही) गोमुखी रामावादिन (रिसभं ) ऋपभ ( सरं ) स्वर में वोलता है अतः (संक्खो) शंख (खइ ) वोलता है ( गंधारं ) गांधार स्वर और (मझिम) मध्यमस्वर (पुण) पुनः ( ज्झलरी ) छैणों का होता है क्योंकि छैणोंका शब्द मध्यभाग से निकलता है इसलिये उनका मध्यम स्वर होता है ६ (चउचलण ) चार जिसके चरण ( पइठाणा ) भूमि पर प्रतिष्ठित हैं और (गोमुही ) गोधिका उस चादित्र का नाम है वह (पंचम ) पंचम नामक (स्वर) स्वर में बोलता है और (आडवरोय ) पटह ( ढोल ] नामक वादिन (रेवइयं) रेवत (धैवत) नामक स्वर मे शब्द उच्चारण करता है और ( महाभेरीय) महा भेरी नामक चादित्र (सतमं७) सतम निपाद नामक स्वर में उच्चारण करता है ७किंतु यह सर्व एक अंश को लेकर इन के उदाहरण दिए गए हैं । ~ ( २४०) * अनुयोगद्वार सूत्र * भावार्थ-षड्ज स्वर मृदंग नामक वादित्र से निकलता है क्योंकि यह सर्व देश मात्र उदाहरण हैं अपितु पड्ज स्वर की षट् स्थानों से उत्पत्ति मानी गई . है किन्तु यहां पर केवल अग्र भाग के प्रमाण को मानकर मृदंग मानकर मृदंग को षड्ज स्वर माना है इसी प्रकार गोमुखी नामक वादिन ऋषभ स्वर में शब्द उच्चारण करता है और शंख का गांधार स्वर होता है झलरी ( छैणों का) का मध्यम स्वर है पटह (ढोल) का स्वर धैवत स्वर होता है और महा भेरी सप्तम स्वर में शब्द उच्चारण करती है अतः जिस वादित्र के चार चरण हैं गोधिका उसका नाम है और भूमी पर रखकर उसे वजाया जाता है उसके शब्द को पंचम स्वर कहते हैं ७. यह सर्व सप्त स्वर जीव और अजीव की निश्राय वर्णन किये गये हैं किन्तु कतिपय ग्रन्थकारों ने जीव निश्राय स्वरों के विषय में निम्न प्रकार से भी उदाहरण दिये हैं जैसे कि--पंड्जरौ तिमपूरस्तु गावौ न- देति वर्षभम | अनाविको चंगांधारे क्रौजौनदति मध्यमम् ॥ १॥ पुष्प साधा रणे काले कोकिलोरौति पंचमम् अश्वस्तु धैवतं रौति निपादं शौते कुंजरः ।।२।। अर्थात् मोर षड्ज शब्द को बोलता है. वैल ऋषभ शब्द को बोलता है भेड वकरी गांधार स्वर को वोलते हैं क्रौञ्च पक्षी मध्यम स्वर को वोलता है घोडा धैवत स्वर को वोलता है कोकिल वसंत ऋतु में पंचम सुर बोलता है हस्ति निपाद स्वर को बोलता है सो यह सप्त स्वरों के जीव निश्रित उदाहरण दिख लाये गये है अब जिस जीव को जिस स्वर की स्वाभाविक प्राप्ति होती है उस के लक्षणों के विषय में कहते है क्योंकि लक्षणों द्वारा उस स्वर का पूर्ण प्रकार से निश्चय होता है। अथ सप्त स्वरों के लक्षण विषय । एएसि णं सतण्हं सराणं सत्त सरलखणा पं० त० सज्जे ण लहईवितिं कयं च न विष्णस्सइं गावो पुत्ता य मित्ता य नारीणं होइ बल्लभो ७॥ पदार्थ-(एएसिं णं) इन ( सत्तएहं ) सातों ( सराणं) स्वरों के (सत सर) सात स्वर ( लक्खणा) लक्षण प्रतिपादन किए गए हैं अर्थात सप्त स्वरों की लक्षणों द्वारा प्रतिती होती है जैसे कि (सज्जणं.) पड्ज स्वर से
.
* अनुयोगद्वार सूत्रं *
(२४१)
( लहइ ) प्राप्ति होती है (वितं ) वृति का अर्थात पड्ज स्वर के प्रभाव से प्रा-
जीविका की वृद्धि होती है फिर (कयं च ) उसका किया हुआ कार्य (नवि-
राणस्सइ) विनाश को प्राप्त नहीं होता.अतः जो वह करदे वह सबको माननीय
होता है और (गायो ) गौएँ (पुताय ) और पुत्र तथा (मिताय ) मित्र भी
उसके बहुत से होते हैं पुनः (नारीणं) नारियों को (होइ ) होता है
(बल्लभो ) वल्लभ ॥ १॥
भावार्थ-सात स्वरों के सात लक्षण बतलाए गये हैं जिन के द्वारा स्वर
ज्ञान बहुत ही शीघू उत्पन्न होजाए जैसे कि जिस व्यक्ति का पड्ज स्वर होता
उसकी आजीविका ठीक होती है और उसके द्वारा उसे धन की प्राप्ति भी
अतीव होती रहती है फिर उसका किया हुआ कार्य सवको माननीय होता है.
गौऐं पुत्र वा मित्र उसके बहुत से होते हैं अतः नारी जनों को भी वह बल्लभ
होता है सो इन के द्वारा प्रथम स्वर की लक्ष्यता होती है ॥ १॥
॥ अथ ऋषभ स्वर लक्षण विषय ॥
रिसभेणउ एसज्जं सेणावच्चं धेणाणि य । वत्थगंधमलंकारं
इत्यिो सयणाणि य ॥ ६ ॥
पदार्थ- ( रिसभेणउए ) ऋषभ स्वर से प्राप्त होता है (सज्ज ) ऐश्वर्य
भाव और (सेण वच्च ) सेनापतिभाव और (धणाणिय ) धन का संग्र
अतीव होना तथा (वत्थ ) वस्त्र (गंध ) सुगंधादि पदार्थ ( अलंकार) अलं-
कारादि पदार्थ उसको मिलते हैं तथा (इथिओ) स्त्रियों की भी उसको मा
होती है (सयणाणिय 8 ) और पर्यकादि की भी उसको अत्यंत प्राप्ति
होती है।
भावार्थ- ऋषभ स्वर के महातस्य से ऐश्वर्य भाव चा सेनापति श्री
धन का अतीव संग्रह व स्वगंध अलंकार लिये पयकादि प्रप्या सर्व प्रकार
पदार्थ उपलब्ध होते हैं और इन लक्षणों से निश्चय होता है कि इस ा
का ऋषभ स्वर है ॥६॥
(२४२)
* अनुयोगद्वार सूत्र *
॥ अथ गांधार स्वर लक्षण विषय |
गंधारे गीइजुत्तिन्ना वज्जविति कलाहिया ॥ हवंति कवि-
गोपन्ना जो अन्ने सत्थपारगा ॥ १० ॥
पदार्थ- (गंधारे) गांधार स्वर वाला पुरुष (गाई ) गीतोंका ( जुइना)
ज्ञाता होता है और जिसकी (वज्ज ) प्रधान (वित्ति) आजीविका होती है
पुनः (कलाहिया) कला अधिक होती है अथात कलाओं में प्रवीण होता है
पुनः इस स्वर वाले (हवत्ति कविणोपन्ना ) कवि होते हैं अपितु ( प्रज्ञा ) बु-
द्धिवान् कवि होते हैं (जे) जो ( अन्ने ) अन्य छंदादि ( सत्य ) शास्त्रों के
भी (पारगा १०) पारगामी होते हैं ॥ १० ॥
भावार्थ-गांधार स्वर वाला गीतों के ज्ञान का मीतज्ञ होता है और जिस
की संसार में (वज्जविति । प्रधान आजीविका होती है पुनः कलाओं में
प्रवीण होता है फिर इस स्वरं वाले कवि होते हैं अतः बुद्धिमान कार्य होते हैं
जो अन्य छंदादि शास्त्रों के भी पारगामी होते हैं सो इन लक्षणों द्वारा गांधार
स्वर की पूर्ण लक्षणता होजाती है कि इस व्यक्ति का गांधार स्वर है ॥ १० ॥
॥ अथ मध्यम स्वर लक्षण विषय ॥
मज्झिमसर मंत्ताउ हवंति सह जीविणो । खायइ पिया
देई मज्झिम सरमास्सिउ ॥ ११ ॥
पदार्थ- (मझिम ) मध्यम (सर) स्वर (मत्ताड ) वालेजीव ( हवंति)
होते हैं (सुह जीवणे ) सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करनेवाले जैसे कि (खाइय)
खाना (पीयइ) पाना ( देइ) देना अर्थात खाना पीनाहै देनाहै (मज्झिम)
मध्यम (सर) स्वर ( मस्सिर ११) आश्रित वाला जीव ॥ ११ ॥
भावार्थ-मध्यम स्वर वाले जीलं सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले होने
हैं उनके खान पान करने में वा देने में किसी प्रकार से भी विघ्न उपस्थि
नहीं होते किंतु पदार्थों के विशेष मंग्रह करने में वे. असमर्थ होते हैं इसी करके
वे मध्यम स्वर आश्रित कहे जाते हैं ॥ ११ ॥
* अनुयोमद्वार मूत्र * (२४३). ॥अथ पंचम स्वर लक्षण विषय ।। पंचम सरमंताउ हवंति पुहवीपती । सुरा संग्रह कत्तारो अणेग नरणायगा ॥ १२ ॥ पदार्थ - (पंचम ) पंचम ( सर ) स्वर (मंताउ ) वाले जीव (इचंति ) होते हैं ( पुहवी ) पृथवी (पति) के पति पुनः (सूरा) शूरवीर होते हुए (संग्गह ) पदार्थों के ( कत्तारो ) संग्रह करने वाले होते हैं, और ( अणेक) अनेक (नर नायगा ) नर नायक होते हैं अथा नरों के अधिपति होते हैं यह सर्व पंचम स्वर के लक्षण हैं और इन्हीं लक्षणों द्वारा स्वर को प्रतीति होती है ॥ १२ ॥ भावार्थ-पंचम स्वर वाले जीव भूमी के अधिपती होते हैं और समर में शूर वीर भी होते हैं तथा अनेक प्रकार के पदार्थों के भी संग्रह करने वाले होते हैं फिर अनेक नरों के नाय भी होते हैं यह पंचम स्वर के लक्षण हैं इसके पीछे अव छठे स्वर के लक्षण कहते हैं।॥ १२ ॥ धेवयं सरमंताउ हवंती दुहजीविणो कुचेला य कुविति उ चोरा चंडाल मुठिया ॥ १३॥ . नोट-१ रेवत सरमताउ भवति कलहथिया साउंणिया वगुरिया सोयरिया मच्छ बंधाय , - रेवत स्वर वाले जीवों को नेश प्रिय होता है वे पक्षियों के मारने वाले वा मृगादि के पकड़ने वाले होते हैं तथा सुकरों के पकडने वाले वा मत्स्य के बंधन करने वाले होते हैं ।। १२ ॥ २ चडाला मुठिया मेया जे अग्ने पाचं कम्मुणो जोधात गाजे चोराणे साय सरमस्सिया ॥३॥ जो चंडालादि कर्म करने वाले और मुष्ठिक आदि का प्रहार करने वाले तथा जो अन्य प्रकार के पाप कर्म करने वाले है जैसे कि गो घातक गाना की घात करने वाले अथवा जो चोर है वे सर्व निपाद स्वर के आश्रित होते हैं अर्थात् गो आदि उपकारी पशुओं की हिंसा करने वाले होते हैं। ॥ श्रीस्थानांग सूत्र अध्याय ७ गाथा १२-१३॥
(२४४.), * अनुयोगद्वार सुत्र * पदार्थ-(धेवयं ) धैवत (सर ) स्वर (मंताउ) वाले जीव ( इति.) होते हैं ( दुहजीविणे) दुःख पूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले फिर, जिनके. (कुचेला) कुवस्त्र पहिरे हुए होते हैं और जिनकी ( कुवितिय कुत्ति होती है यह स्वर प्रायः (चोरा) चोरों का ( चंडाल ) चंडालों का (मुडिया) मुष्ठि मल्लादिका होता है और यह स्वर निपिद्ध होता है ॥ १३ ॥ भावार्थ-धैवत स्वर वाले जीव दुःख पूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं पुनः जिनके कुवस्त्र और दुष्ट आजीविका होती है इस स्वर के धारने वाले जीव चोर्य कर्म करने वाले होते हैं वा चांडालादि के क्रिया करने वाले वाटिकादि से प्रहार करने वाले होते हैं इसीलिए यह स्वर निपिद्ध होता है तया इस स्वर वाला जीव पाप कर्म विशेष करता है ॥ १३ ॥ अथ सप्तम स्वर लक्षण विषय । निसाद सरमंताउ हवंतिहिंस गावरा । जंघाचारा लेह- वाहा हिंडगा भारवाहगा ॥ १४ ॥ पदार्थ (निसाद ) निपाद ( सर ) स्वर (मंताउ ) वाले जीव ( हवंति ) होते हैं। हिंसगा) हिंसक ( नरा ) नर अर्थात् व हिंसा करने वाले होते हैं पुनः (जंघाचाए ) जंघादिकों को समर्दन करने वाले (तेहवाह ) लेख वाहक (लेख के लेजाने वाले (हिंडगा ) प्रमाण से रहित भ्रमण करने वाले और (भार वाह गा १४) भार वाहक होते हैं क्योंकि निपाद स्वर वाले जीवों की भी क्रियायें अयोग्य होती हैं ॥ १४ ॥ भावार्थ-निपाद वाल जीव हिंसक और अतीव भ्रमण करने वाले होते हैं तथा जंघाओं के मर्दन करने वाले लेख वाहक और भार वाहक भी होते अर्थात् जो शूद्र क्रियायें हैं उनके करता निषाद.स्वर वाजे ही होते हैं अब इनके सप्त स्वरों के तीन ग्राम और सप्त मूर्च्छना के विषय में कहते हैं ॥ १४ ॥ अथ सप्त स्वरों के ग्राम वा मूर्च्छना विषय । एएसि णं सतण्हं सराणं तओगामा पं० त० सज्जगामे मज्झिम गामे गंधार-नामे सज्जगामस्सणं सच मुच्छणायो * अनुयोगद्वार सूत्र * (२४५) पं०० मंगी को रविया हरिया रयणी य सारकता य छट्ठी य सारसी नाम सुद्ध सज्जा य सत्तमा ॥ १५॥ मझिमगाम- स्स णं सत्त मुच्छरणाओ पं० तं० उत्तर मंदारयणी उत्तरा उत्तर समासम्मो कंताय सो वीरा अभिरुवा होइ सतमा ॥१६॥ गंधार गामस्सणं सत मुच्छणाश्रो पं०.तं. नंदिया खुहिया पूरिमाय चउत्थी सुद्ध गंधारा उतर गंधारा पुणसायं च मिया हवइ मुच्छा ॥१७॥ सुठुतर मा यामीसाबट्ठी सव्व उयनायव्वा अह उत्तारायत्ता कोडिमा य सा सत्तमा हवइमुच्छा ॥ १ ॥ पदार्थ-( एएसि ण सतएहं सराणं तउगामा पं० तं०) इन सात स्वरों को तीन ग्राम प्रतिपादन किए गए हैं ग्राम उसे कहते हैं जिन में मूर्छनाओं का स- मूह हो सो वह ग्राम समूह तीन प्रकार से कथन किया गया है जैसे कि (सज्ज गामे १ ) षड्ज ग्राम जिसमें षड्ज ग्राम सम वंधि मूर्छनाओं का समूह हो इसी प्रकार (गांधार नामे ३) गांधार ग्राम (मझिम गामे २) मध्यम ग्राम यह सर्व ग्राम मूर्छनाओं के समूह रूप होते हैं किन्तु ( सज्ज गामस्सणं सत मुच्छणा उ ५० त०) पड्न ग्राम की सात मूर्छनायें प्रतिपादन की गई है अपितु मूर्छना उसे कहते हैं जिस के द्वारा श्रोता वा वक्ता मूर्छित हो तथा मूर्छित के समान ओता गण वा वक्तागण होवें उसे मूर्छना कहते हैं अथवा राग भेद का नामभी मूर्छना कहते हैं तथा जहां पर रागों के भेदानुभेद होते हैं वे मूर्छनायें हैं वे पड् न ग्राम की सात मूर्छना प्रतिपादन की हैं जैसे कि ( मंगी १ ) मांगी १ (को रवीया २) कोरवी २ ( हरिया ३ ) हरिता ३ ( रयणीय ४ ) रत्ना ४ (सा- र कंता ५) शारकांता ५ (छट्ठीय सारसी नाम ) छठी मूर्छना सारसी नाम क है (सुद्ध सज्जाय सतमा १५) शुद्ध षड्ज नामक सप्तमी मूर्छना है १५ 'किन्तु इस स्थान में इनके नाम ही वर्णन किए गए हैं किन्तु इनका पूर्णस्वरूप दृष्टिवाद के अन्तर जो पूर्व हैं उन में सविस्तर वर्णन किया गया है तथा जो सांगीत विद्या के पुस्तक हैं वहां से इनका स्वरूप जानना चाहिये और (म- झिप गामस्सणं सत मुच्छणाउ पएणता त० (मध्यम ग्राम की भी सात मूर्छ- नायें प्रतिपादन कीगई है जैसे कि-(उतरमंदा १) उतरामंदा १ (रंवणी २) ( - (२४६) * अनुयोगद्वार मृत्र * एला २(उचग) उत्तग३ (इतर समा) तर ममा ४ (समानाप ५) समकांता ५ ( मोविरा ६) मुबारा ६ (अभिवाडाई मनमा १६) अभिरूप होती है सावर्मा मर्छना १६ फिर (गांधार गामास्सणं सन मुच्छणार ५०० गांधार ग्राम की मान मुर्छना प्रतिपाइन की गई है जैसे कि (नंदिया १) नंदिका ? (बुड़िया ?) झुद्रिका २ (पुरिमाय ) और पुरिमाई पुनः (चढ- स्वाय मृद्ध गंवारा ) चनुर्या शुद्ध गंवार नामक मूडना है ( उतर गंवारा ५) जनर गंधारा (पुग्णसा) पुनः वह (पंचमिया ) यांचमिका (इचई) दाना है (मूडा १७ ) मी १७ और (सुटुनरमायमा ) मुहतर मायाम ) साट्टी सन्च उयनायब्चा वह छठी मुर्छना मईया प्रकार से जाननी चाहिय (अह) अथ उतारायता काडीमाय ) उनरायन को टिमा नामक (सा ) वह सचमी इबई (मछी १०) मृत्री होती है मानवी : १८ ॥ भावाय-इन सान स्वरों के तीन ग्राम है और एक एक ग्राम में मान १ मूछनाये हैं मुच्छना उस कहते हैं जिम ग़गके कयन करने से बचा वा श्रोता मूर्टिन के समान हाजा, नया यह मुर्छना गगों के भेट हैं इन का पूर्ण वित्रणे दृष्टिबाद अंतरगत पूत्रों में सबिचरता से किया गया है तथा किंचिद् विवर्ण जो राग विद्या के (गायन विद्या के ) पुस्तक है इन में भी कियागया है आपनु इस भूत्र में जो केवल सुचना मात्र ही विवणं है इसलिए इन का नामा लेख किया गया है तथा वृतिकार ने भी इनकी नि विस्तार पूर्वक नहीं तिल्ली है अपितु सूचना मात्रही वृति लिखी गई है अब सम्म स्वों के विशेष वर्णणन में भृत्रकार प्रश्नोत्तर के रूप में विवर्ण करने हैं ॥ १८ ॥ ॥ अथ मप्त स्वरों के विशेष प्रोत्तर विषय ।। सतसरा कोहबई गीयस्स का हवइ जोणी काममया ओसासा कावा गीयस्स आगारा ॥ १६ ॥ पदार्य-(सतसरा कोहाइ) (प्रश्ननि) सानो स्वर किस ज्यान में उत्पन्न होते हैं | और ( गीयस्स का इबइ जाणी) गौन की कौनसी, योनि (जाति स्थान ) होती हैं ३ (कई समिया ओसासा) और कितने समय ।।
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२४७) प्रमाण स्वर का उच्छास है ३ अपितु (कइ वागीयस्स आगारा १६) गीतों के कितने आकार ( स्वरूप ) हैं ।। १६ ॥ भावार्थ -इस गाथा मे चार प्रश्न किए गए हैं जैसे कि सात स्वर कहां से उत्पन्न होते हैं गीत की योनि क्या है और स्वर का उच्छास कितना होता है और गीत का आकार कैसा है इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर निम्न प्रकार से दिए जात हैं ।। १६ ।। ॥ प्रश्नों के उत्तर विषय ॥ सत सरा नाभीओ हवंति गीयं च रुनजोणी पाय समा अोसासा तिन्नि य.गीयस्स आगारा ॥ २० ॥ पदार्थ--( संतसरा) सातों स्वर ( नाभीओ) ( हवंति ) उत्पन्न होते हैं और (गीयं चरुन्न जोणी ) गीतों की रुदित योनि है ( पायसमा उसासा ) गीतों के के पद पद में उच्छ्वास है अर्थात् जो पद सम है वह गीतों के पद पद में उच्छास हैं और (तिनिय ) तीन (गीयस्स) गीतके (आगारा २०) आकार होते हैं ॥ २० ॥ भावार्थ--उक्त प्रश्नों के निम्न प्रकार से उत्तर दिए गए हैं जमे कि (प्रश्न) सात स्वर कहां से उत्पन्न होते हैं ( उत्तर ) नाभिसे ( प्रश्न ) गीतों की योनि क्या है ( उत्तर ) गाना ( प्रश्न ) स्वर का उच्छ्वास कितने समय प्रमाण होता है (उत्तर) पदकी पूर्ति के अंत प्रमाण उच्छ्वास होता है (प्रश्न ) गीत के आकार कितने प्रकार से वर्णन किए गए हैं ( उत्तर ) गीतों के तीन प्रकार से आकार वर्णन किये गये हैं ( प्रश्न ) वे कौन २ से हैं ( उत्तर ) निन्न लिखित गाथा देखिये ॥ २० ॥ आइमउआरंभता समुबहता य मज्झयारंमि अवत्याणे भविचा तन्निवि गीयस्स श्रागारा ॥ २१ ॥ पदार्थ--(आइ) गीत की आदि में (आरंभता) आरंभ करता हुआ (मउ ) कोमल स्वर होना चाहिए फिर ( समुन्न हताय ) महा ध्वनि (मज्झ (२४८) * अनुयोगद्वार सूत्र * यारंमि ) मध्य भाग में होवे (अब साणेय ) गीत के अंत में ( भविता) मंद स्वर में होवे (तिनिवि) अपि शब्द समुच्यार्थ में है इस लिए यही तीन (गीय स्स आगारा) गीत के आकार है ।। २१ ।। भावार्थ-गीत के तीन आकार होते हैं जैसे कि जब गीत की ध्वनि उ. ठाई जावे तव मृदु स्वर होना चाहिए जब मध्य भाग में ध्वनि जाए तव महा ध्वनि होनी चाहिए अपितु जब गीत का अवसान समय आवे तव प्राग्वत् मृदु ध्वनि और मंद ध्वनि होनी चाहिए यही गीते के तीन प्रकार हैं अवगीत के दोपं वा गुणों का विवर्ण करते हैं ॥ २१ ॥ ॥ अथ स्वरों के मेदानुभेद गुण और दोष विषय ॥ छदोसे अदृगुणा तिनि य विचाई दोनि भणिइनो। जो नाहि सो गाहिई सुसिखिओ रंग मज्झमि ॥ २२ ॥ पदार्थ-(छदो से ) गीत के पद् दोष हैं और ( अट्टगुणा ) अष्ट गुण है फिर (तिनिय ) तीन ( वित्ताई) छेदों के भेद हैं (दोनिय भणिइओ ३) स्वर मंडल में दोनों भाषाएँ कथन की गई हैं ( जो नाहि ) जो उक्त सर्व भेदों को जानता है ( सो गाहिइ ) सो गीत शुद्ध गाता है अपितु ( सुसिखित्रो रंगम झिमंमि २२ ) जिसने गायन विद्या को भली प्रकार से सीखा है रंग भूमी में रंग भूमी उसे कहते हैं जो नाटक घर होता है अर्थात् गायन शाला अव सूत्र कार पद् दोपों के विषय में कहते हैं ॥ २२ ॥ भावार्थ-गीत के पद दोष अष्ठ, गुण होते हैं और तीन प्रकार के छंदों के भेदहोते हैं अपितु दो भाषाओं में स्वर मंडल गायन किया जाता है सो जो इस को पूर्ण विधि से जानता है वही गीत गाता है किन्तु जिसने भली प्रकार से गीत विद्या को रंग भूमिका में सीखा है २२ अब दोषों का विवर्ण करते हैं । ॥ अथ षट दोष विषय | भीयं १ दुय २ मप्पिच्छं ३ उत्तालं च कम्म सो मुणे पव्वं ४ कागस्तर ५ माणुणासं ६ छदोसा होति गीयस्स ॥ २३ ॥ १ * अनुयोगद्वार सूत्र * (२४६) पदार्थ-(भीयं १) भय के साथ गायन करना अथवा ( दुयं २ ) शीघ्र २ गाना २ (अपित्थं ३) श्लेष्मा सहित गला होने पर गान करना तथा अती व श्वास के होने पर गान करना ३ तथा ( उत्तालंच ) ताल से विपरति गाना (कम्मसो मुणेयन्वं ४) इसी प्रकार अनुक्रमता पूर्वक भेद जानने चाहिए (काग- स्सरं ५) अथवा कागवत् यदिस्वर होवे तब भी गीत में दोष होता है ५ (अनुः णासं ६) और नासिका में स्वर उच्चारण करना यह भी दोष है सो ( छद्दो सा) यह पद दोप ( होति ) होते हैं (गीयस्स) गीत के ॥ २३ ॥ . भावार्थ-गीत के गाने मे पट प्रकार के दोष होते हैं जैसे कि-भय के सा. थ गाना १ शीघ्न २.गान २ श्वास होने पर गाना ३ ताल से विपरीत गाना ४ कागवत् स्वर के होने पर गाना और नासिका में गाना ६ अथ गुणों का विवर्ण करते हैं। अथ गुणो विषय में सूत्रकार कहते हैं । पुण्ण रतं च अलंकियं च वत्तं हेव विघुटुं मुहरं समं सुललियं अठ गुणा होति गीयस्त ॥ २४ ॥ पदार्थ--(पुण्ण ) स्वर कला पूर्ण होवे १ (रतंच) पुनः राग में रक्त होवे २ फिर (अलंकियंच) राग अलंकार के सहित होवे ३ (वतंत हेच विघुलु) और प्रगट वचन होवे अर्थात् स्पष्ट वचन होवे ४ उसी प्रकार शुद्ध स्वर होवे ५ फिर ( मुहुरं ६ ) कोकिलावत् मधुर स्वर होवे ( सप्त ७ ) ताला दे वादिन सम होवें और ( सुललियं ) राग वा स्वर सुलालित होवे ८ ( यह गुणा ) यह अष्टगुण ( होति ) होते हैं (गीयस्स ) गीत के ॥ २४ ॥ भावार्थ-गीत के गाने के अष्ट प्रकार के गुण निम्न प्रकार से प्रतिपादन किए गए हैं जैसे कि-स्वर कला में प्रवीणता १ राग में रक्तता २ अलंकार सहित ३ प्रगट वचन ४ शुद्ध स्वर ५ कोकितावत् स्वर मधुर ६ तालाटि वादिन सम हो ७ मुललित स्वर वा राग़ ८ यही गीत के गाने के आठ गुण हैं इन गुणों के साथ गीत गाने से गीत निर्दोष कहे जाते हैं अब इन के अतिरिक्त गुणों का वित्रण करते हैं जो अवश्य ही जानने योग्य हैं।
(२५०) * अनुयोगद्वार सूत्र * अथ स्वरों के अन्य गुणों विषय में । उरकंठ सिरपसत्यं च गिज्जते मउयरिभियपदबंध समताल पउक्खवं सतसरसी भरणेय ॥ २५ ॥ अक्खर समं पदसमं समंताल समंलय समंगेह समंच निस्ससियोससिय समंसंचार समंसरासत ।। २६ ।। पदार्थ--( उरकंठ ) यदि स्वर विशाल होता है तब उर (वृक्ष स्थल ) विशुद्ध कंठ विशुद्ध (सिर वसत्वंच ) और शिर प्रशस्त फिर (गिज्जते ) गी- त गाएं जाएं किन्तु ( मउय ) मदुः स्वर के साथ (रिभियं ) स्वर को संचारण करता हुआ चातुर्यता के साथ उस रिभित कहते हैं और ( पदबंध शुद्ध पद- कद्ध वृत होवे और ( समताल ) समताल होवे तथा वादिनादि भी सम्यक् प्रकार से ध्वनि निकालवे हो ( पुच्चुखवं ) प्रत्युत्तैप उस का नाम है जो कोसिकादि वादिन हैं उन के शब्द वा नृत्य करने वाले के आक्षप भी ठीक होवें इसी लिए ( सत्तसरसी ) सात स्वर ( भरणय २५ ) संयुक्त और अक्षरादि सम गीत कहाजाता है ५५ पुनः (अक्खरसमं ) दीर्घ इव प्लुत वा अनुनासिकादि अक्षर सम होवें और (पयसम ) पिंगल शास्त्रानुसार पद सम होवे ( ताल सम ) हस्तादि ताल सम होवें ( लयसमं ) लतादि वादंतादि के वादित्र बने ही बंह भी सम हो फिर (गहसमंचं) जो वीणादि राग मे गृहीत है वह भी सम हो (निस्सासियउससियसमं ) निःश्वास और उवास भी सय हों क्योंकि श्वासोच्छास के ठीक होने परही गाना गाया जाता है (संचारसमं ) तंती सतार आदि में अंगुली आदि का संचार भी सम.हो ( सरासत २६) यह सात स्वरों के सात लक्षण प्रकारांतर से कहे गये हैं ।। २६ ॥ अव इस के आगे छद के लक्षण वर्णन करते हैं। भावार्थ-प्रकारान्तर से भी गीत शुद्धि का विवर्ण इस प्रकार से किया है जैसे कि उर १ कण्ठ २ शिर ३ विशुद्ध होवें मृदु गीत गाया जावे चातुर्यता के साथ अत्तरों का संचारण किया जाए पद बद्ध- रचना होवे फिर हस्तादि की ताल सम होवे प्रत्युक्षेप नृत्य करने वाले का ठीक होवे इस प्रकार विशुद्धि के साथ जव गाना गाया जाता है तब उसगीत को सप्त स्वर विशुद्ध कहते . .
. (२५१) ܠܢ * अनुयोगद्वार सूत्र * '२५ फिर अक्षर सम हॉ१ पद सम हो, २तात सय हो, ३ लता सम हो,४ 'ह सम हो ५, सावोवास समहो ६, और (संती ) सवार आदि में संचार भी अम हो.७, यह भी सात गुण रबरों के प्रकारान्तर से कहे गये हैं क्योंकि जो गीत विद्या के वेत्ता हैं यदि वे शुद्धि पूर्वके उसे ग्रहण करते हैं तब वे विद्या उनकी फली भूत होती हैं जब कि सर्व प्रकार से शुद्धि हो जावे तब जो छंद हैं वह भी शुद्ध होने चाहिए इस लिए अब वृतादि विषय में कहते हैं । ॥ अथवत्त शुद्धि विषय ॥ निहोसे सारवतं च हेउज्जत मलं कियं उवणयं सो वयारं च मियं महुरमेव य ॥२७॥ समंअद्ध समं चेव, सव्वत्थ विसमंसजं तिन्निवित्तपयाराइं चउत्थं नो बलम्भई ॥२८॥ पदार्थ-(निदोस ) द्वात्रिंशत् दोपों से रहित और ( सार वतंच ) विशिष्ट अर्थ का सूचक पुनः ( हे उज्जुतं ) हेतु युक्त और (-अलंकिय ) उपमादि अलं- कारों से अलंकृत पुनः ( उवण्यं ) नैगमा दिनों से युक्त अयुक्त अथवा (सो- वयारं च ) कठिन वचनों से रहित लज्जा युक्त अविरुद्ध अर्थ का प्रकाशक (मियं ) मिताक्षर वा मर्यादा पूर्वक अक्षर फिर (महुर ) मधुर अक्षर युक्त ( एवय ) इस प्रकार के शुद्ध गीत को वृत्त कहते हैं अव वृत्त के सम विषय में कहते हैं ( समं ) जिस छंद के चारों चरणों के समान अक्षर हों उन्हें समछंद कहते हैं और ( अद्धसमं चेत्र ) जिस छंद के प्रथम पाद और तृतीय पाद द्वितीय पाद और चतुर्थ पाद के परस्पर सामान वर्ण होवें उन्हें अर्द्धसमच्छंद कहते हैं और ( सव्वत्थ विसमं चज्ज ) जिस वृत्त सर्वथा प्रकार से ही विषमता होवे उसे सर्व विपम छंद कहते हैं सो यह (तिनि तीनों (वित्त) वृत्त के ( पयाराई) प्रकार कहे गये हैं इस लिये (चउत्थंनो लभइ २८) वृत्त का चतुर्थ प्रकार कीसी प्रकार से भी उपलब्ध नहीं होत अर्थात् सम, अर्द्धसम, विपम यही तीनों प्रकार छंद के हैं ।। २८ ॥ भावार्थ-वृत्त के आठ गुण होते हैं जैसे कि छंद निर्दोष १ विशिष्ट अ का सूच कर हेतु युक्त ३ अलंकृत-४ नयों से युक्त ५ शुद्ध अलंकार पूर्वक दि
(२५२). * अनुयोगटार मूत्र
द्धादि दोषों से रहित ६ मित्तानो ७ और मधुर ८ फिर तीनों प्रकार से हा
कहे गये हैं २७ जिनके चारों पादों के परस्पर समान वर्ण होने हैं उन्हें सम
छंद्र कहते हैं जिनके प्रथम पाद और तृाय पाद द्वितीय पाद और चतुर्य पाद
परस्पर सम हों उन्हें अर्द्ध समच्छंद कहते हैं किन्तु जिस वृत्त के चारों पाद
विषम हो उन्हें सर्व विषय छंद कहते हैं यही तीन वृत्तों के प्रकार कहे गये हैं
किन्तु चनुथ प्रकार कहीं भी उपलब्ध नहीं होता अब भाषा विषय में कहा है।
अथ भाषा विषय ।
सक्क्या पागया चेव भणिइओ होति दोणिवि सर मंडलं
मिगिजंते पसत्था इसी भासिया ॥ २६ ॥
पदार्थ (सक्कया ) संस्कृत (पागया चेव ) और प्राकृत (भणियन हो-
नि दोन्निवि ) दोनों भाषाएँ कही गई हैं (सर मंडलंमि) स्वर मंडल में
(अर्थात् अहं गणधरों ने दोनों भाषाओं में स्वर मंडल प्रतिपादन किया
है ) (गिज ) और इन्हीं में ( गिर्जते ) स्वर मंडल गायन किया है क्यों कि
यह स्वर मंडल और यही दोनों भाषाएँ ( पसत्या ) प्रशस्त (सुन्दर (इसी)
ऋषि श्री भगवन् वर्द्धमान स्वामी से (मासिया ) भाषित हैं २६ अर्यान दोनों
भापाएँ प्रशस्त श्री भगवान् ने प्रतिपादन की है ॥ २६ ॥
भावार्थ-तीर्थंकरों ने संस्कृत और प्राकृन यह दोनों भाषाएँ प्रतिपादन
की हैं और दोनों भाषाओं में स्वर मैडल गायन किया जाना है और यह दोनों
भाषाएं मुन्दर हैं और ऋषि भाषित है यहां पर ऋषि शब्द का सम्बन्ध
भगवान् से है २९ अब कुछ विशेष प्रश्नों के विषय में कहते हैं ।।
अथ विशेष प्रश्न विषय।
केसी गायइ महुरं केसी गायइ खरं वरुक्खं व केसी गायई
उरं केसी य. दिलंबिय दुपं केसी विस्सरं पुण केरसी ॥३०॥
* अनुयोगद्वार सूत्र * (२५३) पदार्थ-(कसी.) कौन सी स्त्री (गायइ) गाती है (महुरं) मधुर गीत और (केसी) कौन सी स्त्री ( गायइ ) गाती है ( खरंच) खर और ( रुक्खंच) रुक्ष ककर्श गीत और (केसी) कौनसी स्त्री ( गायई ) गाती है (चरं ) चातुर्यता पूर्वक और ( केसी य ) कौन सी स्त्री ( विलंबियं.) विलम्ब से गाती है ( दुयं ) शीघ्र (केमी ) गाने वाली कौनसी स्त्री फिर (विस्सरं पुण के रेसी ३०) विस्वर गीत कौनसी स्त्री गाती है अर्थात् राग का विध्वंस करनहारी कौनसी स्त्री होती है ॥ ३०॥ भावार्थ-उह गाथा में यह प्रश्न किए गये हैं कि कौनसी स्त्री मधुर गीत गाती है कौनसी स्त्री कर्कश और रुक्ष गीत गाती है कौनसी स्त्री दक्षता पूर्वक गाना गाती है कौनसी स्त्री विलम्ब से गाती हैं कौनसी स्त्री शीघ्रता से गाती है कौनसी स्त्री विस्वर गीत ग ती है ॥ ३० ॥ इन प्रश्नों के उत्तर निम्न गाथा में दिए गए हैं। अथ उत्तर विषय । गोरी गायइ महुरं काली गायइ खरंच रुक्खं च सामा गा- यइ चउरंकाणीयाविलबियं दुतं अंधा विस्सरं पुणपिंगला ॥३१॥ पदार्थ- (गोरी गायइ) गौर वर्ण वाली स्त्री गाना गाती है ( महुरं) मधुर और ( कालीगायइ ) कृष्णा गाती है (खरं च रुक्खं च ) कर्कश रुक्ष अ- पितु (सामा गायइ चाउरं ) श्यामा गाती है दक्षता के साथ ( काणीयविलवियं) एक चक्षुबाली विलम्ब से गाती है और (दुयं अंधा )शीधर अंधी स्त्री गाता है पुनः (विस्सरपुणपिंगला ३१) विस्वर पिंगला गाती है अर्थात् कपिला स्त्री विस्वर गीत गाती है ॥ ३१ ॥ भावार्थ-जो तीसवी ३० गाथा में प्रश्न किए गए थे उनका अनुक्रमता पूर्वक ३१ वी गाथा में उत्तर दिए गए हैं जैसे कि (प्रश्न) कौनसी स्त्री मधुर गीत गाती है (उत्तर) गौर वर्ण वाली ( प्रश्न ) कौनसी स्त्री कर्कश और रुत गाना गाती है (उत्तर) कृष्णा (काले वर्ण वाली ) ( प्रश्न) कौनसी स्त्री चातुर्यतापूर्वक गाती है ( उत्तर ) श्याम वर्ण वाली (प्रश्न ) कौनसी स्त्री विलंब से गाती है (उत्तर) एक आंख वाली ( प्रश्न ) कौनसी स्त्री शघि २ गाती है । (२५४ * अनुयोगहर मूत्र * (उचर ) आंश नत्रज्ञान (न) कौनसी वी विश्वर गाना गानी है (उचर) निंगला (पिता) बी विस्वर गानी उक्त प्रश्नों के उत्तर अनुजमना पूर्वक ३१ वीं गाया में दिए गए हैं अत्र च्चा मंडल का उपहार करते है ।। अथ उपहार विषय। मतमरा तओगामा मुच्छणाएगवीसड़ ताणाएगुणपन्नास ससम्मत्तं मरमंडलं मतमत्तनामे ॥ ३३ ॥ पदार्थ- (अनुसरा ) पजाद सह स्वर हैं और (नागामा इन के नीन ग्राम है कि इन की ( मृच्छणारगीलड़ ) २१ मृछनायें हैं क्योंकि एक.२ ग्राम जो सान बान चनायें हैं, और ( ताणामगृहपन्नास ) ४६ इन की तान हैं जैन कि एक तंत्री श्री नान है उनमें एक २ वर सान सात बार गाया जाना है इयरिय ४६ नान कयन की गई है सो इसी विधि पूर्वक ( सम्मन यमाम हो गया है (ममहत )वर मंडल २सेनेसजना) सो वा मन नाम है अयान दश प्रकार के नामान्तर विश्य लमनाम इस प्रकार से वर्णन किया गया है अब उनके अागे त्राट नार का विवरण किया जायगा । भावाय-इस स्वर मंडल में सुन कर नि ग्राम २१ मूडना और ४६ नान वचन की गई है किन्तु नाम उम करने है न कि एक बीमा में छिद्र ग्न में एक एक स्वर मान सात बार गाया जाता है तो इस प्रकार से जाना मान ४६ हुए बोयह नान भी चर महत कार में है उस प्रकारले स्वर मंडल की समामि की गई है अपितु इन ही मन नाम कद ईअइसके पश्चात् आटप्रकार नाम का चिन किया जाता है किन्तु बाट नाप में बाद प्रशारद विय- कि हिलताई गई हैं इमानिए अब विनियों का सत्य दिहलाते हैं । अय अष्टनामान्तर्गत अष्ट विभक्ति, विषय । सक्ति अष्टनामे२ अट्टाविहा वयणविभनी पं० त० निमें पदमाहोइ वियाउनएम तड्या कारणमि क्या वडा संप- * अनुयोगदार सूत्र * (२५५) यावणे१ पंचमीअवायाणे छटीस्सामिवायगे सत्तमि सिन्निहा- णत्वेअट्टमी ग्रामत्तणीभवे ॥२॥ पदार्थ सेकित अद्द नामे २ अट्टविहा वयणाविभत्ति पं० त०) सो सप्त नाम के अनन्तर आठ प्रकार के नाम का नाम किस प्रकार से विवर्ण किया गया है अर्थात् वह आठ प्रकार का नाम कौनसा है इस प्रकार शिप्य के पूछने पर गुरु कहने लगे कि भो शब्द प्राट् ! पाठ प्रकार के नाम में आठ प्रकार की वचन विभनि कयन की गई है वचन विभनि उसे कहते हैं जो अर्थों के विमा ग को करे और वचनों के अनेक भेद करके दिखलाए किन्तु यह सुखंत वचन हैं अपितु तिङन्त न समझने चाहिए सो यह विभागिय पाठ प्रकार से प्रतिपादन कीगई हैं जैसे कि (निस पठमा होइ) केवल लिंग वोधनार्थ जो वचन भापण किए जाते हैं उनमें प्रथमाविभक्ति होनी है अर्थात् निर्देश में प्रथमा होती है और ( विड्या उच एसणं ) द्वितीया उपदेश में होती है अर्थात् द्वितीया विभ- क्लिादेश में होनी है । तइया ) तृतीय ( करणमि ) करण में ( कया) वि- धान की गई है अपितु ( चउत्था ) चतुर्थी ( संपयावण १) संप्रदान में कही गई है १ और पंचमी पांचवी (आवादाणे ) अयादान में होती है (छही सस्सा .मि वायणे ; किन्तु पष्टी स्वस्वामि वचन में होती है अर्थात् सम्बंध में पष्टी हो ती है और ( सप्तमी ) सातवी ( सणिहाणत्ये) सन्निधानार्थ में होती है अर्थात् आधार में सप्तमी विभक्ति होती है और (अठमी) आठमी विभक्ति (आमंतणी भव २) आमंत्रण अर्थ में होती है अर्थात् अष्टमी विभक्ति सम्बोधन में कथन की गई है किन्तु अाधुनिक व्याकरणों में संबोधन को पृथक करके सात विभानिये लि- खी है और वृद्ध व्याकरणों के मत में विभक्ति पाठ ही होती है क्योंकि की के वचन भेद में ही आमंत्रण होता है सो वचन भंद का नाम विभात है यथा विभज्यन्त विभागी क्रियन्ते संख्या कर्मादयोा अभिरिनि विभक्तयः विभनिनां अर्थाः विभक्तार्थाः इसलिए आमंत्रण को भी विभनियों की संज्ञा में रखा गया ह॥२॥ भावार्थ-आठ नाम के बीच में आठ प्रकार से विभक्तिये कथन की गई हैं क्योंकि वचन के भेद को ही विभक्ति कहते हैं सो यह नाम विभक्तिये हैं तिडन्त नहीं है और इसी को कारक प्रकरण जानना चाहिये अब जिन २ स्थानों में १२५६) * अनुयोगद्वार सूत्र * जो जो कारक होता है वे निम्न लिखितानुसार है निर्देश में प्रथमा होती है उप देश में द्वितीया होती है इसी प्रकार करण में तृतीया समदान में चतुर्थी अपादा न में पंचमी सम्बन्ध में पष्टी आधार में सप्तमी और मित्रण में अष्टमी विभात होती है इस प्रकार के कारकों के स्थान वर्ण करने के पश्चात् अब इन के उदाह ५ण दिखाए जाते हैं। अथ अष्ट विभक्तियों के प्राकृत उदाहरण विषय । तत्थ पढमा विभत्ति निद्देसे सो इमो अबति विइया पुण उवएसे भणकुणसु इमं वयं वति ३ ॥ पदार्थ-( तत्थ पढमा विभत्ति ) इन आठों विभक्तियों में जो प्रथमा है वो (निदेसे सोइमो अहंवत्ति ) निर्देश रूप इस प्रकार से है जैसे किसः अपं-अहं- इत्यादि किन्तु अयं प्रयोग पुलिंग का इसलिये दिखलाया गया है यह भी प- योग केवल निर्देश मात्र ही है और ( विइया पुण ) द्वितिया फिर ( उवएसे ) उपदेश में होती है जैसे कि-(भणकुण सुइमं वयं वत्ति) शास्त्र को पढ़ कार्य को कर इस प्रकार के वचनों में द्वितीया होती है किन्तु इन से अन्य स्थानों में भी द्वितीया होती है जैसे कि-कटं करोति, शरं लनाति, इत्यादि ३ ॥ भावार्थ-आठों विभक्तियों में से प्रथम प्रथमा के ही स्थान वर्णन किए गये हैं जैसे कि- केवल निर्देश में प्रथमा होती है यथा सः अयं, अहं, इत्यादि निर्दे- श बचन प्रथमा में रहते हैं और उपदेश में द्वितीया होती है जैसे कि-शास्त्रं पठ कार्य कुरु अर्थात् शास्त्र को पढ कार्य कर इत्यादि अर्थों में द्वितीया होती है अ- थवा इन से अतिरिक्त अर्थों में भी द्वितीया होती है जैसे कि-कटं करोति, शर लुनाति अर्थात् कट को बनाता है शर को काटता है इस में उपदेश कुछ भी नहीं हैं, अपितु वह स्वयमेव ही वह क्रियाएं करता है यथा कुभं करोति इत्यादि प्रयोग जानने चाहिए अव तृतीया और चतुर्थी के उदाहरण कहते हैं। अथ तृतीया और चतुर्थी विषय । तइया करणमि कया भणियं च कयं च तेणेव मएवा हं- दिनमोसाहाए हवइ.चउत्थी संपयाणमि ४ ॥
.
* अनुयोगद्वार सूत्र *
(२५७)
पदार्थ--(तइया ) तृतीया (करणमि ) करण में ( कया ) विधान की
गई जैसे कि- (भणियं च कयं च) षठन किया और कृत किया (तेणे वमएवा)
उसने अथवा मैंने अर्थात् पठितं मया पठन किया मैंने तेन ताड़िता उसने मारी
इत्यादि अर्थों में तृतीया होती है और ( हंदि ) इत्युपदर्शने यह अव्यय दिख-
लाने अर्थ में है यथा (नमो साहाए ) नमो देवेभ्यां स्वाहा अग्नये अहते नमः
इत्यादि अथों में ( हवइ ) होती है ( चउत्थि ) चतुर्थी विभाति होती है (संप-
याणंमि)ो दान पात्र में संप्रदान कारक होता है यथा उपाध्याय गां ददाति
इत्यादि प्रयोग जानने चाहिये ॥४॥
भावधि--तृतीया विभक्ति करण में होती है क्योंकि साधक समं करणं इस
प्रकार से माना गया है यथा शरेण हन्ति असिना छिनन्ति इत्यादि प्रयोग जा
नने चाहिये और चतुर्थी संप्रदान में है जैसे कि नमो देवेभ्यः अर्हते नमः स्वाहा
अग्नये उपाध्याय गां ददाति इत्यादि अर्थों में संप्रदान होता है क्योंकि नमः
शब्द का सम्बन्ध सम्पदान के साथ ही प्रायः होता है सम्प्रदान उसे कहते हैं
जिसको कोई वस्तु दीजाए अर्थात् लेने वालासम्पदान कहाता है इसके अन्तर
पंचम और छठे कारक के विषय में विवेचन करते हैं ।
अथ पंचम और छठे कारक विषय ।
अवणय गिएह य एतो इउत्तिवा पंचमी अवा याणे ।
छछी तस्स इमस्सवा गयस्स वा सामिसवंधे ॥ ५ ॥
पदार्थ-(अवनय ) दूर कर ( गिराहय ) ग्रहण कर ( एतो ) उससे ( इउ
ति वा पंचमी अवायाणे.) अथवा इससे मुक्ति होती है यथा रत्न त्रयान्योक्षः इत्यादि
अर्थों में पांचमी विभक्ति अपादान नायक कारक में होती है क्योंकि अपायेय
धौ ॥ शाव्या.प्र.पा.३ सू.१५६। बुधि छत्त जो विभाग है उसके विषय अपादान
कारक होता है और ( छही ) छठी विभक्ति इन अर्थों में होती है जैसे कि-
( तस्स) उसकी वरतु हैं (इमस्स) इसकी है ( गयस्स वा ) अथवा गए हुए
की है क्योंकि यह कारक (सामि सम्बन्धे ५) स्वामी सम्बन्ध में होता है
यथा " राशः पुरुषः" यह राजा का पुरुष है इत्यादि अर्थों में पारी विभक्ति
होती है ॥५॥
(२५%) अनुयागनार न भावार्थ-शंबई विभाव असलान में होती है जैसे कि इसमें दूर करो इन से लोइयादि अर्यः नेत्री है और कष्टो सन्बन्ध में होती है कि यह उसको बनु है उसको है इत्यादि ज्यों में स्वामी सम्बन्ध होता है इसर्गि इन ऋयों में पष्ठी दी गई है वह इसके आंग समनी और आमंत्रण शिष्य में प्रय सप्तमी विभक्ति और आमंत्रण के विपरयो । हाइ पुण सत्रमी तामनि याहारकालभावेय आमन- पी भरे अडमी जहाहे जुवाणेत्ति सतं अहनामे ।। पहाय-( ) बानी है। एस) फिर (अक्षरी मानी विभत्री नन दिवाइस (आहारावर नाज माय काल और भाव के विषय में कि आधार के विषय में नो समनी हान्द्रो के साथ ही काद और मात्र का भी मन्वन्द करतेना चाहिए जैसे कि मी रसते वसंत माम में लोग कीड़ा ऊन्द हैं यहां प्रकाश में उभी हो गई है और "वाचिनिष्ट है" चाम्लिनि रहने हैं यहां पर बाद में सममी है क्योंकि आसा निज भा- में यदि करता है इत्यादि प्रयोगों में समनी होनी है और (आणी भवे अपनी) आमंत्र में अभी झेनी है यशा (उमानि) हे युबान इस प्रकार के शेयर में अपनी हानी है क्योति { "बानिया" ) इस सूत्र सेवन २ सदन प्रदान करना चाहिए ६ ( अ नाम ) यही श्रा नाम है सो उसी स्थान पर ऋ प्रकार का नाम पूर्ण हो गया है अब इ- ग नव दार विषय में कहते है ! भावार्थ- दिन िार में होती है क्या ज्ञान और भाव में भी हो जाती है क्या म्हास शास्त्रजनित यह कान और भाव के और आप में ऋछी विमा कयन की गई है जैसे कि हे युक्न् मो पुरुष न्यादि योग विन्नु वनान काल में व्याकरण में प्रचतित है उन्ने मात्र प्रयगान माना गया है और त्र मात्र को पानी विभकि का माना गया इससे सिद्ध होता है कि प्राचीन पाकास मंत्रस को भी . * अनुयोगद्वार सूत्र * ( २५६) विभक्ति मानते थे और इन के सर्व प्रत्यय निम्न प्रकार से हैं जैसे कि-- सुऔ जस् । अम् औद् शस् । टाभ्याम् मिस् । के भ्याम् भ्यस् । उसि भ्याम् भ्यम्। इन्स ओस् आम् किओस् सुप् । पुनः आमंत्रण में सुऔ जम् । सो इस प्रकरण में कारक प्रकरण दिखलाया गया है अपितु इसका सविस्तर स्वरूप व्यकरणों में देखना चाहिये क्योंकि यहां पर तो सूचना मात्र ही वर्णन किया गया है सो इस प्रकरण को अवश्य ही ध्यान से पठन करना चाहिए अब इसके अनन्तर नव नाम के विषय में कहते हैं किन्तु नाम के अंतर्गत नव प्रकार के रस वर्णन किए गए हैं इस लिए नवरसों की व्याख्या की जाती है। अथ नवरस विषय । नव कव्वरसा पन्नता तंजहा वीरो. १ सिंगारो २ अभ्भु- तोय ३ रादोय ४ होई बाधब्बो वेलणो ५वीभच्छो हाम्रो ७ कलुणो ८ पसंतोय ॥ पदार्थ-(नव कन्वरसा पन्नता तंजहा ) नव प्रकार से काव्य रस प्रतिपा. दन किए गए हैं क्योंकि वे वः काव्यं कवि काजो अंतःकरण का भाव है व फिर वो वीरादि रस काव्य में बंधे हुए हैं उन्हीं को काव्य रस कहते हैं यथ वा ह्या लंवनो वस्तु विकारो मान सो भवेत समावः कथ्यते सद्भिस्तस्योद कर्षों- रसः स्मृतः १ यह काब्य रस नव प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (वीरो १) दान तप युद्ध इत्यादि में वीरता करना उसे वीर कहते हैं १ और (सिंगारो२) काम जन्य सर्व रसों में प्रधान स्त्री संग से उत्पन्न होने वाले रस को शृङ्गाररस कहते हैं २(अभ्भुतोय ३) अद्भत पदार्थों के देखने से जो रस उत्पन्न होता है उसको अद्भत रस कहते हैं और ( रोहोय ४) वैरी के दिख- लाए हुए भयों को देखकर जो रस उत्पन्न होता है उसे रौद्र रस कहते हैं। (होई वोधव्वा ) अर्थात् इस रस को रौद्र रस जानना चाहिए (वेलणओ ५ ) जो लज्जा का उत्पादक होवे और लोकों में स्तुति का पात्र भी हो उसको वीडन रस कहते हैं ५ (विभच्छो ६) जिन पदार्थों के सुनने से वा देखने से घृणा उत्पन्न हो उस रस को विभत्स रस कहते हैं ६ (हासो ७) जिसके द्वारा हास्य की प्राप्ति हो उसे हास्य रस कहते हैं जैसे कि वेष परिवर्तन करना . - (२६०) * अनुयोगद्वार सूत्र * भाषा परिवर्तन भांड चेष्टा वा ऋतुहल उत्पादक वचन उच्चारण करने उसी को हास्य रस कहते हैं ७ ( कलुंणे ८) प्रिय वस्तुओं के वियोग से दुःख उत्पन्न . होता है फिर मुखाकृति मलीन हो जाती है चित्त व्याकुल रहता है इत्यादि भावों को करुणा रंस कहते हैं ८ फिर ( पसंतोय ९) जो क्रोध मान भाषा रांग लोभ और देशादिके बंधनों से विधुत हुआ है अत एव आत्मज्ञान में हिनि मन्न है सदैच काल प्रशान्तात्मा है इत्यादि गुण पूर्वक जीव को प्रशान्त रस माप्त होता है ॥ ९॥ भावार्थ-नव प्रकार के नाम नव रस प्रतिपादन किए गये हैं और इनको नव काव्य रस भी कहते हैं क्योंकि कवि के भावों का नाम काव्य होता है अतः उनमें जो निवंधन किया हुआ है उसी को रस कहते हैं सो यह नव प्रकार के रस काव्य रस होते हैं जैसे कि वीर रस १, भृङ्गार रस २, अद्भुत रस ३, रौद्र रस ४, नीडन रस ५, वीभत्स रस ६, हास्य रस ७, करुणा रस, और प्रशान्त रस : यही नव प्रकार के रस हैं और अलंकार ग्रन्थों में प्रायः इन्हीं रसों का विशेष वर्णन होता है वह भी नव रसों के विधायक होते हैं और स्वरों में नव रसों का परसर विशेष सम्बन्ध रहता है सो जो संसार भर में पदार्य हैं वे नव रसों के ही अंतरगत रहते हैं अब रसों के उदाहरण दिखाये जाते हैं। अथ वीर रस का उदाहरण विषय । तत्थ परिच्चागंषि य दाणेतवचरणा सत्तुजण विणासे य अणसंसयषितीपरकमलिंगो वीरो रसो होई ॥२॥वीरोरसो जहासोनाम महावीरोजो रज्जं पयहिऊण पब्वइनो कामको- हमहासत्तु पक्ख निग्घायणं कुणई ॥३॥ पदार्थ-(तत्थ परिच्चामि यदाणे ) इन-नव रसों में प्रथम वीर रस का विवर्ण किया गया है सो यह वीर रस स्याग में दान में तपश्चरण में च पुनः (तवचरणसत्तुजविणासे य) शत्रु जन के विनाश में होता है जैसे कि (अणणं सयधिती ) दान करके गर्व न करना जैसे किममतुल्यादानी ना- स्तीति अर्थात् मेरे समान कोई दानी नहीं है इस लिए दान देकर मान न .
भ
* अनुयोगद्वार सूत्र *
(२६१)
करना तप करके शांति रखना और (परकम ) वैरी के हनन में पराकम करता
है किन्तु व्याकुलता नहीं करता सो (लिंगो वीरोरसो होई २) इन लक्षणों से
वीर रस की पहचान होती है क्योंकि त्याग करना दान देकरे पश्चाताप न करना
वप में घृति धारण करना यह सव वीरता के लक्षण हैं और संसार पक्ष में.
यह रस शत्रु के विनाश में भी होता है इसी का नाम वीर रस है अब इस रस
का उदाहरण देते हैं किन्तु यह उदाहरण भाष शत्रु के हनन करने का ही है
क्योंकि शास्त में मोक्षमार्ग का ही प्रारम्भ हुआ है सो उसी के अनुसार उदा.
हरण हैं ( वीरोरसो ) वीर रस (जहासोनाम महावीरो) जैसे वह मुप्रसिद्ध
नाम से श्री महावीर स्वामी जिन्होंने ( जोरजं) राज्य को (पयाहिऊण)
त्याग करके और वर्षीदान देकर ( पन्चइनो) दीक्षा ग्रहण की फिर ( कामकोह)
काम क्रोध-रूपी जो ( महासत्तु ) महा शत्रुओं का ( पक्ख') समूह वा गर्व था
(निग्घायणकुण ३) उसका नाश किया अथवा श्री महावीर देव स्वामी भाव
शत्रुओं को नाश करने लगे सो इसी का नाम वीर रस है ३ इस रस में भाव
वरिता का ही उदाहरण दिया गया है किन्तु भावार्थ यह है कि जिस काव्य
के सुनने से वीरता उत्पन्न होवे उसे ही वीर रस कहते हैं।
भावार्थ-इन नव रसों में प्रथम वीर रस का विवर्ण किया गया है जैसे
कि यह रस त्याग में, दान में, तप में और शत्रु के विनाश में होता है दान देकर
अहंकार न करना, तप मैं धृति धारण करना, शत्रु के विनाश में पराक्रम करना,
इन लक्षणों द्वारा वीर रस की प्रतीती हो जाती है इस में उदाहरण श्री भगवान्
महावीर स्वामी का ही है जिन्होंने राज त्याग कर दीक्षा लेकर काम क्रोध
रूपी भाव शत्रुओं के नाश करने में उद्यत हुए यही वीरता का लक्षण है तथा
जिस काव्य के सुनने से वीरता की प्राप्ति हो उसे ही वीर रस कहते हैं ।
अथ श्रृंगार रस विषय ।
सिंगारो नाम रसो रइस जोगाभिलासं संजणणो मंडण
विलास विब्वोय हासलीला रमण लिंगो॥४॥ सिंगारो रसो
जहा महुर विलास ललियं हिययउम्मादण कर जुवाणाणं सा
मासदु.दामं दायति मेह लादामं ॥५॥
) (२६२) * अनुयोगद्दार मूत्र * पदार्थ-( सिंगागे नाम रसो) शृङ्गार नामक रस ( रई रति कामदेव सं- जोगा भिलास ) स्त्री आदि के संजोग की अभिलाषा के ( संजणणो) उत्पन्न करने हारा है और ( मंडण ) कंकणादि का मंडण और नेत्रादि (विलास ) . विलास युक्त होने वा ( वियोयण ) अंग विकार युक्त होजाने फिर (हास ) हास्य करना अथवा ( लीला) काम जन्य वार्ताओं का उच्चारण करना फिर रमण लिंगो ४) स्त्री पुरुष का परस्पर संजोग होना वा क्रीडा करना इस रस का चिन्ह है ४ अब इस रस का उदाहरण दिखलाते हैं (सिंगारो रसो जहा) शृङ्गार नामक रस इस प्रकार से है जैसे कि ( महुर ) मधुर वचन ( विलासल लियं ) विलास और ललित पुनः ( हियय उम्मादण कर जुवाणाणं ) हृदय के उन्माद कारी अर्थात् काम के उत्पादन करने हारे जो वचन हैं अतः किनको ! युवा पुरुषों को (सामासदु ) श्याम वर्णा स्त्री के घुगुरुओं के शब्द ( दामं दायंति ) कींकणी आदि के शब्द ( मेहलादामं ५) मेखला के शब्द इत्यादि शब्दों को सुनकर युवा पुरुषों की काम अग्नि संदीप्त होती है सो इसी कोशृङ्गार रस कहते हैं ॥५॥ भावार्थ-शृङ्गार रस का लक्षण इस प्रकार से है काम की आशा शरीर काम उन काम चेष्टा युक्त अंगों का हो जाना, हास्य करना, लीला युक्त वचन बोलने और क्रीडा में लगे रहना इन लक्षणों से शृङ्गार रस की प्रतीति होती हैं. ४ जैसे कि युवा पुरुषों के हृदय में विकार उत्पन्न करने वाले मधुर और विला सालीलाकारी श्यामा नाम की स्त्री के आभूषणों के शब्द होते हैं अतःबेशन्द युवा.पुरुषों के काम उत्पादक होते हैं सो इसीको शृङ्गार रस कहते हैं. ५ किन्तु इस रस का लक्षण हास्य क्रीडा रमणादि क्रियायें करना ही है और इसके अ- नन्तर अद्भुत रस का विवर्ण करते हैं ॥ ५ ॥ अथ अद्भुत रस विषय । विम्हय करो अपुव्वो अणुभुयपुवो य जो रसो- हाइ सोहास विसाउपतिलक्खणो अभुओनाम ॥ ६॥ अन्भुओ रसों जहा अभुतरमिह मित्तो अन्नं किं अस्थि जीवलागमि जंजिणंचयणे अत्थात्तिकालजुता मुणिज्जति ॥ ७ ॥ - * अनुयोगद्वार सूत्र * (२६) पदार्थ-( विम्हय करो ) विस्मय करने हारा जो ( अपुग्यो) पूर्व अनुभव नहीं किया उसके (अणुभुयपुव्वोय) अनुभव करने से अपूर्व ( जो रसो होई) जो रस उत्पन्न होता है पुनः जिसकी (सोहा सविसाउपति) हास्य और विषा द से उत्पति है (.लक्षणो अभुए नाम ७) सो इन लक्षणों से अद्भुत रस जाना जाता है अर्थात् जो आश्चर्य कारी वस्तु को देख कर हर्ष वा विपाद उ त्पन्न होता है इन लक्षणों से अद्भुत रस की प्रतीती होती हैं ॥६॥ अथ इसका उदाहरण दिखलाते हैं (अभुय रसो जहा ) अद्भुत रस इस प्रकार से होता है जैसे कि (अब्भुतर इहमिता ) अद्भुत वस्तु इस लोकमें श्री जिनेन्द्र देव के वचन ही हैं क्योंकि जो यथार्थ पदार्थों के उपदेष्टा हैं इसलिये (अन्नं कि अस्थि ) और कोई अद्भुत वस्तु है (जीव लोगमि ) समस्त संसार में आपितु नहीं है क्योंकि ( जंजिण वयणे अत्था ) जो जिन वचनों में जीवादि पदार्थों का अर्थ है वे (तिकाल जुत्ता ) त्रिकाल युक्त मुणिज्जति जाना जाता है ७ अर्थात् वे पदार्थों का अर्थ त्रिकाल में सद्प है इत्यादि भावों में जो हर्ष उ- त्पन्न होता है उसे अद्भुत रस कहते हैं ।। ७ ॥ भावार्थ--आत्मा को विस्मय करने वाला जिसका पूर्व अनुभव नहीं किया जिसके अनुभव करने से हर्ष और विषाद उत्पन्न होता है वह अद्भुत रस है ६ इसका उदाहरण इस प्रकार से है जैसे कि-इस प्रकार से विचार करना कि इ. स संसार में जो अर्हन् देवों ने पदार्थों का स्वरूप प्रतिपादन किया है उसके समान कोई भी इतरजन पदार्थों का स्वरूप वर्णन नहीं कर सक्त जो अईन देव के पदार्थ कथन किए हुए हैं वे त्रिकाल युक्त जाने जाते हैं अर्थात् जो लक्षण वर्णन किए गये हैं वे यथार्थ हैं और तीनों कालों में इस प्रकार रहते हैं इसलिये विस्मय करने वाले इस संसार भर में श्री जिनेन्द्र देव के वचन अन्य कुछ नहीं इस प्रकार के भावों का अद्भुत रस कहते हैं ।। अथ रौद्र रस विषय । भयंजणणरूवसबंधयारचिंतकहासमुप्पन्नो. संमोह संभम विसायमरणलिंगो रसो रुद्दो ॥ ८॥ रुद्दो रसो जहा भि- (२६४) * अनुयोगद्वार सूत्र * ऊडीविडंबियमुहो संदुोड्डइय रुहिरमाकिन्नो हणसि पहुं असुरनिभो भमिरसिय अइरुदो रुदोऽसि ॥ ६ ॥ पदार्थ-( भय जणण ) भय के उत्पन्न करने वाला (स्व) पिशाचादि का रूप और ( सधयार) शब्द तथा अंधकार तथा भय जन्य वाताओं की चिंता करनी वा (कहा) कथा करनी ( समुप्पन्नो) इन कारणों से रौद्र रस उत्पन्न होता है और ( संमोह संभम ) संमोह उत्पन्न होना क्या किया जाए वा चित्त की व्याकुलता अथवा (विसाय) चित्त का निषाद जैसेकि यहां पर मैं क्यों आ गया हूं इत्यादि विचार करने और ( मरण लिंगो रसो रुद्दो ८) सोमल ब्राह्मण वत् मृत्यु चिन्ह है जिसका सोरौद्र रस है ८ अब इस रौद्र रस का उदाहरण लिखते हैं ( रुदो रसो जहा ) रौद्र रस जैसे कि-(भिऊडी विडंबियमुहो ) ललाट में जिस के भौंहे चढ़ी हुई हैं और मुख जिस का विकृत होरहा है इसी के संबोधन में कहा गया कि-हे भ्रकुटि विहंबित मुख' (संदु होइयरहिर माकिनो) और जो होठों को चवारहा है सरिर से अंगोपांग बाकीर्ण हैं फिर इसी के आमंत्रण में कहा गया कि हे संदष्टौष्ट वा हे रुधिरा किन्न ( हणसियसु) तूं मारता है पशू को किस प्रकार से मारता है जैसे कि (अमुरानिमो) असुर के समान अतएव जैसे असुर (भीमरसिय) भीम शन्द करता है उस के संबोधन में कहा गया कि हे असुर इव भीम रसितं (अइरुरोरुद्दोसि 8) तूं अतीव रौद्र वा रौद्र परिणाम युक्त हैं : शंका भय जिसका कारण है कार्य उसका रौद्र किम प्रकार से हो सका है (समाधान) शत्रु के देखने से रौद्र ध्यान की उत्पत्ति हो जाती है इसलिए इस में कोई दोष नहीं है। भावार्थ-भय के उत्पन्न करने वाले रूप शब्द अंधकार चिंता कथा व्या- मोह व्याकुलता विषाद मृत्यु इस रौद्र रसके चिन्ह हैं - और हे भ्रकुटि विडवित मुख हे सदष्टौष्ट हे रुधिर क्लिन तूं पशु को मारता है असुर इव भीम रासित तं रौद्र परिणामि है किन्तु शत्रु आदि के दर्शन से रौद्र ध्यान की. उत्पत्ति हो जाती है इसलिए इस को रौद्र रस कहा गया अब वीडन रस का विवर्ण करते हैं। - * अनुयोगद्वार सूत्र * (२६५) अथ लज्जा रस विषय। विणोवयारगुज्मगुरुदारमेरावइकमुप्पन्नोवेलणोनाम रसो लज्जासंकाजणणेलिंगो ॥१०॥ वेलणउरसो जहा कि लो; इयकरणीयानो लज्जपतरंगतिलिज्जिया। मेति वारिज्जमि गुजणो परिवंदेइज वहुप्पोति ॥ ११ ॥ पदार्थ-(विण्योद यार गुन्झ गुरुदार) विनय उपचार के उल्लंघन करने से अथवा गुप्त तथा अश्लील वार्ताओं के करने से शिष्ट पुरुषों को लज्जा रस उत्पन्न होता है तथा अयोग्य कृत्य करने से भी लज्जा रस उत्सन्न होजाता है जैसे 'कि उपाध्यायादि की स्त्री से मैथुन क्रीडादिका आसेवन करना तथा (गुरुदार) जो पितृव्य आदि हैं उनकी स्त्रियों से काम क्रीड़ा करना फिर ( मेरावइक सु- फन्नो ) सुंदर मर्यादा के व्यतिक्रम से उत्पन्न हो जाता है (बलस्त्रो नाम रसो) बीड़न नामक रस (लज्जासंका जणण लिंगो १०) शिर और नेत्र नीचे करने गात्रादि का संकोच हो जाना इसे ही लज्जा रस कहते हैं और सदैव काल मन में शंका का रहना कि मुझे अमुक व्यक्ति क्या कहेगा तथा यदि में शमुक स्थान पर गया तो लोग मुझे क्या कहेंगे इत्यादि वार्ताओं में शंका रखना सो लज्जा और शंका के उत्पन्न करने वाला चिन्ह है जिसका १० अब इस में उदाहरण देते हैं। (वेलणओ रसो जहा) बीड़ा नामक रस में यह उदाहरण दिया गया है जैसे कि किसी देशवा किसी कुल में प्रग है जव वधू स्वभती से संग करती है तव अक्षतयोनि के कारण से उसके वनादि रुधिर से भर जाते हैं तब उस के श्वसुरादि उन वस्त्रों को बहुत से नर नारियों को दिखलाते हैं कि हमारी नव वधू पतिव्रता धर्म में भूत इसने कभी भी पर पुरुषों का संग नहीं किया इसमें रुधिर चर्चित वस्त्र ही प्रमाण भूत हैं अब यावन्मात्र वे नव वधू के शील की प्रशंसा करते हैं तावन्मात्र ही वह नव वधू लज्जा को प्राप्त होती है क्योंकि मैथुन के नाम से ही लज्जा की प्राप्ति होती है जब उसके सेवन का ही उदाहरण दिया जाए तब तो क्यों न लज्जा प्राप्त होवे इसलिए वह नव वधू अपनी लिय सखी से कहती है कि (किं लोइय क- रणयाओ लज्जयंतरगतिलज्जामोति) हे मेरी पारी, सखी! इस लौकिक नत्र है !
. (२६६) * अनुयोगद्वार सूत्र * क्रिया से और क्या लज्जा स्थान होगा अपितु कोई भी नहीं है इसीलिए इन क्रियाओं से मै पुनः २ लज्जित होती हूं और फिर यह ( वारिज्जमि ) विवाह के समय में गुरुजणो ) श्वसुरादिजन ( परिवंदेइ ३ ) बांधते हैं अथवा ( परि- वदइ ) विवाहादि कार्यों में कहते हैं कि यह ( जंबहुपोत्ति ११ ) रुधिर चर्चिव हमारी अभिनव-वधू का वस्त्र है सो इस कारण से वधू परम लज्जा को प्राप्त होती है यही लज्जा रस का उदाहरण है ॥ ११ ॥ भावार्थ-विनय उपचार अश्लील वार्ता उपाध्यायादि की स्त्रियों से मैथुन क्रीडा मर्यादाओं का अतिक्रम करना इत्यादि कारणों से लज्जा नामक रस उत्प न होजाता है और शंका वा लज्जा इस रस के चिन्ह हैं। १०। जैसे कि नव वधू अपनी प्यारी सखी से कहती है कि हे मेरी प्यारी सखी ! जो मेरे भादि के संयोग से रूधिर चर्चित वस्त्र हुए हैं उन वस्त्रों को मेरे श्वसुरादि अनेक नर नारियो को दिखलाते हैं यद्यपि यह मेरे पतिव्रता धर्म ही की प्रशंसा करते हैं किन्तु इन कारणों से मैं तो परम लज्जित होती हूं क्योंकि जब मैथुन क्रियाके नाम से ही लज्जा उत्पन्न होती है अपितु यह तो मेरे उदाहरण ही दे रहे हैं इसलिये इस संसार में इससे बढ कर लज्जा का स्थान क्या होगा अपितु कोई नहीं है अतः विवाहादि में भी मेरे वस्त्र दिखलाये जाते हैं इसलिए मैं परम लज्जित होती जाती हूं। ११ । सो इसी का नाम लज्जा रस है अव वीभत्स रस का विवर्ण करते हैं। अथ वीभत्स रस विषय ।। असुइकुणवदुदंससजोगाभासगंघनिष्फनो निब्वेयवि- हिंसालक्खणो रसो होई वीभच्छो ॥ १२ ॥ वीभन्छोरसो जहा असुइमलभरिय निझरसभावडुंगधिसब्ब-। कालंपि धन्नाओ सरीरकलिं बहुमलकलूसं विमुंचति ॥१३॥ पदार्थ ( असुई ) अपवित्रता मूत्र पुरीषादि की वा (कुणव) मृत्तक कलेवर ( मांसपिंड ) ( दुदंसंण ) दुर्दर्शन लालादि वा दान्तादि ( संजोगम्भास ) के वारम्बार देखने से और (गंधनिष्फन्नो-) उसकी दुर्गंध से उत्पन्न हो गया है .(निन्वेयविहिंसा) वैराग्य अहिंसा सो यही ( लक्खणो) लक्षण है जिसके * अनुयोगद्वार मूत्र * (२६७) ( रसो होई वीभच्छो १२ ) सो वही भित्स रस होता है अर्थात् वीभत्स लक्ष ण वैराग्य और अहिंस ही कथन किए गये हैं किन्तु यह वार्ता महा भागवशाली मोक्ष गमन करने वाले आत्माओं की अपेक्षा ही ज्ञात करनी चाहिये अन्यत्र नहीं अब इस का उदाहरण कहते हैं जैसे कि किसी सुज्ञ पुरुष ने कहा कि वी: भच्छो रसो जहा ) वीभत्स्य रस वह है जैसे कि (असुईमलभरिय निझर) अशुची मूत्र विष्टादि और मल से भरे हुए हैं यह सर्व श्रोत्रादि विवर (स्थान) फिर यह ( समावदुगंधि सम्बकालपि ) स्वभाव से दुर्गधि युक्त है अपितु सर्व काल में इसलिए (पन्नामओ) व धन्य है जो ('सरीर काले ) इस शरीर को जो अनिष्ट रूप है फिर ( बहुमलं कलुसं ) बहुत मल से कलुषित है अर्थात् मल का पिंड है इसको (विमुंचति १३ ) छोडने हैं अर्थात् जो इस दुर्गध मय शरीर को छोडकर मोक्ष गमन होते हैं वे धन्यहैं ।। १३ ।। भावार्थ-वीभत्स रस उसे कहते हैं जो अशुची मांस पिंड' दुर्दर्शन इत्यादि के बारम्बार देखने से और दुर्गन्धि के निमित्त से वैराग और दया भाव उत्पन्न होता है वही वीभत्स रस है अपितु यह वाती मोक्षगमन आत्मा की अपेक्षा से कही गई है ॥१२॥ और वे धन्य हैं जिन्होंने.अशुचि और मल से भरे हुए श्रोत्रादि विवर जो स्वभाव से दुर्गध यह शरीर है इसको छोड़ दिया है क्योंकि यह शरीर मल से कलुषित हो रहा है सदैव काल इसके सर्व द्वार मत को प्रस्रवण कर रहे हैं इस लिये वे धन्यवाद के योग्य हैं जो इस असार मय शरीरं को छोड़ कर मोक्षगमन हो गए हैं | अब इसके' अनंतर हास्य रस का विवर्ण करते हैं ॥ १३ ॥ अथ हास्य रस विपय । रूववयवेसभासाविवरिथनिलवण समुप्पन्नो हास मणप्प हासोप्पगासलिंगो रसो होई ॥ १४ ॥ हासो रसो जहा पासुत्तमसीमंडियपडिबुद्धं देवरंपलोयंति हाज हणथणभर कंप्पणप्पणनियमझा हसई सामा ॥ १५ ॥ पदार्थ-(स्ववयसभासा) रूप, वय, और भाषा (विवरिय) से; विपरीति जैसे कि हास्य रस के उत्पादन करने के लिए पुरुष स्त्री के रूप को ( २६८) *.अनुयोगद्वार सूत्र * धारण करता है तथा स्त्री पुरुष के रूप को धारण करती है और तरुण पुरुष हास्य रस के वश में होता हुआ वृद्ध के रूप को धारण करता है और राजा के वेष से वणिा का वेप धारण करता है अथवा भांडादि की नकले इत्यादि (विवरिय विलंवरण समुप्पो) विपरीत भावों से वा विंडवनासे उत्पन्न होता है ( हासो पणप्पहासो) हास्य रस जो मन को प्रर्कप करने वाला है अर्थात् अतीव मनको प्रफुल्लित करने वाला प्रफुल्लित करने वाला है इसलिए ( पगासालिंगोरसो होई १४ ) नेत्र मुखादिका विकाश रूप वा उदर कर प्रकंपण अह हास्य आदि इस रस के चिन्ह होते हैं १४ अब इसमें उदाहरण कहते हैं (हासो रसो जहा) हास्य रस जैसे (पासुत्तमसिमंडियं) प्रमुप्त देवर को देखकर कर मपी के द्वारा मुख को मंडित करती है फिर ( पडिवुद्धं देवरं यलोयति ) जागृत हुए देवर को विशेप करके देखती है और कहती है कि ( हा ) हा इति खेदे क्या हुआ मेरे देवर के सुख को जो मपी से अलंकृत हो रहा है अथवा (ही) शब्द कामका उत्पादक है इसलिए देवर के मुख को देखकर जो मपी ( स्याही ) से अलंकृत हो रहा है इस निमित्त को रखकर काम जन्य वार्ताओं को भापण करती है फिर जिसके ( जहथणभरकप्पण) कलश के सामान स्तनों के भार से कांपती है और ( पणमियमज्झा) जिसका मध्य भाग स्तन भार से झुक रहा है इस प्रकार से कोई किसी व्यक्ति को आमंत्रण देकर कहता है कि देखो (हसइसामा) अपने देवर के मुख को देख कर यह श्यामा किस प्रकार इंसती है सो इसी का नाम हास्य रस है अब इसके आगे करुणा रसके विषय में कहते हैं क्योंकि करुणा रस भी दीन वचनों से युक्त है इसलिए हास्य रस का प्रतिपक्ष है सो प्रतिपक्ष का विवर्ण करते हैं ॥ १५ ॥ भावार्थ-रूप का परिवर्तन करना अथवा वृद्धादिका रूप धारण करना भाषा विपरीत भाषण करनी जिसके द्वारा हास्य की उत्पत्ति हो और मन प्रफु ल्लित हो जाए सो यही उक्त चिन्ह हास्य रस के हैं अर्थात् इन लक्षणों ही से हास्य रस की प्रतीती होती है॥१४॥ इस के उदाहरण में केवल इतना ही विवर्ण है कि जैसे कि श्यामा स्त्री निज देवर का उपहास करती है और उस के मुखा दि को मपी से अलंकृत करती है केवल उपहास्य के लिए उसी को हास्य रस कहते हैं ।।.१५ ॥
* अनुयोगद्वार मूत्र *
(२६६)
अथ करुणा रस विषय ।
पियविष्पओयवधंवहवाहिविणिवायसंभमुप्पन्नो सोईयविल-
वियपण्हयरुन्नलिंगो रसो करुणो ॥ १६ ।। करुणो रसो ‘जहा
पभ्भायकिलामिअयं बाहा गयपप्फ। अच्छियं बहुसो तस्स
विओगे पुत्तया दुव्वलयंते मुहं जायं ॥ १७ ॥
पदार्थ-(पियवप्पोय ) प्रिय का वियोग(बंध वह ) बंध और वध (वा-
हिविणीवापसंभमुपनो ) व्याधि पुत्रादि की मृत्यु अथवा स्वचक्र पर चक्रों के
भय से उत्पन्न होता हैं करुणा रस अपितु ( सोइय ) शोक करना (वितविय)-
विलाप करना (पएहय ) खेद का होना ( मूर्छागत ) सो (रुन्नलिंगो, रसो
करुणो १६) रोना लिंग होता है करुणा रस का अर्थात् नेत्रों से आंसु विमो
चन करने इन्हीं लक्षणों से करुणा रस कीप्रतीती होती है ॥१६॥अब इस का
उदाहरण दिखलाते हैं (करुणो रसो जहा) करुणा रस इस प्रकार से होता
है जैसे कि कोई वृद्धा स्त्री युवती स्त्री से कहती है कि हे पुत्रिके (प्पभ्भायाकला
मि अयं) परम प्रिय ( पति के) के वियोग से तूं परम दुःखित (क्लामना)
हो रही है फिर (वाहा गयपफअच्छियं बहुसो) पुनः २ तेरे नेत्रों में पानी के
आने से नेत्र जल से भरे रहते हैं (तस्स विनोगे) उस प्रिय के वियोग से
(पुत्तया) हे पुत्रिके ! (दुव्बलयं ते मुहं जायं १७) तेरा मुख परम दुर्वल
हो गया है इसी का नाम करुणा रस है ॥ १७ ॥ अव प्रशान्त रस के विषय में
कहते हैं।
भावार्थ-करुणा रस उसे कहते हैं जो प्रिय के वियोग से अथवा बंध
और वध व्याधि से अथवा पुत्रादि की मृत्यु से चित्त को अशान्ति उत्पन्न
होती है उसी के कारणों से चिंता करना, विलाप करना, मूर्छा वश होना.
इत्यादि लिंग यह सर्व करुणा रस के होते हैं इस में उदाहरण यह है कि जैसे
किसी युवती कन्या के पति के रियोग होने पर वह कन्या परम दुखित अश्रु
पूर्ण नेत्र जिसके मुख की आकृति मलीन है इत्यादि लक्षणों से निश्चय कराती
है कि यह करुणा रस से व्याप्त हो रही है सो इसी को करुणा रस कहते हैं अव
प्रशान्त रस के विषय में विवर्ण किया जाता है ॥ १७ ॥
( २७०) * अनुयोगद्वार मूत्र * अथ प्रशान्त रस विषय। निहोसमएसमाहाणंसभवो जो पसंतभावेणं अविकार लक्खणो सो रसो पसंतोचिनायवो ॥ १८॥ पसंतो रसो जहा सम्भावनिविकारं उवसंतपसंतसोमदिडीयं ही जण मुणिणो सोहइ मुहकमलं पीवरसिरीयं ॥ १६ ॥ एए नवकव्वरसा वत्तीसादोसविहिसमुप्पन्नो गाहा हिं झुणेयव्वा हवंति सुद्धा मीसावा ॥ २० ॥ सेतं नव नामे ॥ पदार्थ-(निदोसपणं समाहाणं ) हिंसादि दोपों से रहित मनका समाधान (धारण) करना सो उसी से (संभवो जो पसंतभावणं) उत्पति है जिसकी अर्थात् प्रशान्त भावो से ही प्रशान्त रस की उत्पति है और जिसका (अधि- कार) निर्विकार (लक्खयो) लक्षण है ( सोरसो) वह रस (पसंतोनि नाय, व्वा १८) इस प्रकार से प्रशान्त जानना चाहिये ॥१८॥ अब इसका उदाहरण कहते हैं ( पसंतोरसो जहा ) कोई पुरुष किसी व्यक्ति को आमत्रण देकर कहता है कि प्रशान्त रस वह होता है जैसे कि - (सम्भावनिन्विकारं ) यह साधु स्व- भाव से वा सद्भाव से निर्विकार है फिर (उच्चसंत ) इस का उपशान्त और (पसंत) प्रशान्त चित्त है पुनः सोमदिठीयं ) सौम्य दृष्टि है आपितु (ही) ही शब्द विशेष प्रशान्त रस का द्योतक है इसलिए (ही) शब्द ग्रहण किया गया है सो (जह) हे प्रिय तूं देख जैसे (मुणिणो सोहइ मुह) मुनिका शोभता है मुख रूपी (कमल) कमल (पीवर सिरियं १६ ) जो उपशम रूपी रस से पुष्ट हो रहा है अर्थात् जिस के मुख पर उपशम रूपी लक्ष्मी (श्री) निवास कर रही है ॥ १६ ॥ (एए नव) यह नव (कच रस ) काव्य रस (वतीस दो स- * नोट : इतिहास शुचः क्रोधे त्याही भयजुगुप्समे ॥ विस्मयः शाम इत्युक्तः स्पयायिभावा नवक्र मात १ सम्भो गगो चरो वाच्छा विशेषो रति । विकार दर्शनादि जन्यो मनोरथो हासः । स्वस्देष्ट जय पियोगा दिना स्वस्मिन दुःखोत्कर्षः - शोकः । रिपु कृताय कारिणश्चेत सिप्रज्वलनं क्रोधः कार्येषु लोकांस्कृष्ठमु स्थिरतर प्रवस्न उत्साह ।' रौद्र विलोकनादिना अपर्चा शंकन अर्थाना दोष विलोक नादिभी गही । जुगुप्सा अपूर्व बस्तु दर्शनादिना चितवस्तारो विस्मयः। विरागरवा- * अनुयोगद्वार सूत्र * ६.२७१) विहि ) सूत्र के द्वात्रिंशत् दोषों की शुद्धि के प्रयोग से ( समुष्पन्ना) समुत्पन्न हैं जैसे कि सूत्र वह होता है जिसमें अलीक दोष न हो सो इसी के द्वारा अद्भुत रस की उत्पति है इसी प्रकार आगे संभावना कर लेनी चाहिए अपितु ३२ दोषों का स्वरूप आगे लिखा जायगा पुनः (गाहाहिं मुणेयचा ) यह सर्व रस गाथाओं करके जानने चाहिए अर्थात गाथा वा छंदादि के विषय यह सर्व रस होते हैं तथा (वंति सुद्धा) किसी२ काव्य में एक २ ही रस होता है अथवा (मीसावा२०) किसी २ काव्य में एक वा २-३ इत्यादि रसों का सम्बन्ध होता है अर्थात् एक काव्य में कई रसों के उद हरण होते हैं ( सेतं नव नामे ) अब इसी का नाम नव नाम है अर्थात् नव नाम के अन्तर्गत नव प्रकार के रसों का संक्षेप से विवर्ण किया गया है ॥ २० ॥ भावार्थ--मन के निर्दोष होने पर और भावों की विशेष शान्ति होने पर प्रशान्त रस की उत्पत्ति होती है और निर्विकार रूप का होना यही प्रशान्त रस का मुख्य लक्षण है ॥१८॥ इस रस में उदाहरण इस प्रकारसे दिया गया है कि जैस कषायों के उपशम होने से और सौम्य दृष्टि होने से अतः परम शान्ति युक्त होने पर मुनि का मुख रूपी कमल उपशम रूप श्री से अलंकृत होता है उसीका नाम प्रशान्त रस है ॥१६॥ यह नव काव्य रस सूत्र के ३२ दोषों की विधि की रचना से उत्पन्न होते हैं जैसे कि अलीक दोष से रहित अद्भुत रस की उत्पत्ति होती है ऐसे ही और संभावना कर लेनी चाहिये सो यह रस गाथा काव्य छंदादि में जानने चाहिये किन्तु काव्यादि में शुद्ध रस भी होते हैं मि- श्रित रस भी होते हैं जैसे कि एक काव्य में एक रस हो उसे शुद्ध रस कहते हैं यदि एक काव्य में २-३ तीन रसों का समावेश हो उसे मिश्रित रस कहते हैं किन्तु ३२ दोषों के प्रयोग से भी इन की उत्पत्ति है अन्य प्रकार से भी उत्पत्ति हो जाती है अलंकार, चंपू और छंदादि ग्रंथों में इनका सविस्तर स्वरूप जानना चाहिए सो इसी स्थानोपरि नव नाम का स्वरूप पूर्ण होगया है अब दश प्रकार के नाम का विवर्ण करते हैं ।। २० ॥ दिना निर्विकार मनस्तंशम, । इति अलंकार चिंतामणि वुक्तम् अलकार चिंतामणि नामक प्रत्य मे उक्न रसों का महान् सविस्तर स्वरूप वर्णन किया गया है और इनके पृथक २ उद हरण और उहीयन.दि के क रण भी बतलाए गरे हैं किन्तु मूल सूत्र मे तो केवल नव - रसों का स्वरू सूचनामात्र ही दिखलाया गया है।
(२७२). * अनुयोगद्वार मूत्र अथ दश नाम विषय । सकिंतं दसनामे २ दसविहे पण्णते तंजहा गोणे १ नो. गुगे २ आयाणपदेणं ३ पडिवक्खपएणं ४ पाहाण पुण्ण ५ अणाइयसिद्धतणं ६ नामेणं ७ अवयवेणं = संजोगेणं ९ पमाणणं १० सेकिंतं गोणे २ अमुद्दो.समुढो ३ अलालं पलालं ४ अकुलिया सकुलिया ५ नो पलं असइ पलासं अंमाइवाहए माइवाहए अबीयवावर बीयवावए नो इदंगोवए इंदगो- वए ९ सेतं नो गोणे ॥ पदार्थ-( सेकितं दसनामे २ दसविहे पं. तं.) वह प्रतिपादित दश नाम कौनसा है ( उत्तर ) दशनाम दश प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (गाणे १) जो शुग निष्पन्न हो उसे गुण नाम कहते हैं १ (नो गुणे २) जो गुण से रहित उत्पन्न हो उसे नो गुण निष्पन्न नाम कहते हैं सो प्रथम यथार्थ नाम है द्वितीय अपार्थ है २ (अयाण पदेणं ३) जो आदि पद से उत्पन्न हो उसे आदान पद नाम कहते हैं ३ और (पडिवक्खपएणं ४ ) जो प्रति पक्ष से उत्पन्न हो उसे प्रतिपक्ष नाम कहते हैं ४ पाहाण पएणं ५) प्रधान वस्तु के संयोग से जो उत्पन्न हो उसका नाम प्रधान पद है ( अणाइयासद्धि तेणं ६ ) जो अनादिकाल से सिद्ध है उसी का नाम अनादि सिद्ध नाम है ६ (नामेणं ७) नाम से जो निष्पन्न होता है उसे नाम पद कहते हैं ७ (अवय- वो ८) अवयवों के संयोग से जो नाम उत्पन्न होता है उसे अवयव नाम कहते हैं ८ और ( संजोगणं ९) द्रव्य के संयोग से जो नाम उत्पन्न होता उसे संयोग नाम कहते हैं (पमाणणं १०) जो प्रमाणों के कारण से नाम उत्पन्न हो उसे प्रमाणपद' कहते हैं १० अब इन के पृथक् २ उदाहरण दिख. लाए जाते हैं (सेकित गोणे २) (प्रश्न) गुण निष्पन्न नाम किसे कहते हैं (उत्तर) गुण निष्यन्न नाम निम्न प्रकार से है-जैसे कि-(खम इति खमणो १) जो क्षमा करे उसे क्षमण कहते हैं यह नाम तमा के गुण से निष्पन्न है इस लिए यथार्थ नाम है इसी प्रकार (जल इति ज़लणो ) जो जलती है वह ज्वलन है सो यह ज्वलन गुण से निष्पन्न नाम है २ (तवं इति तवणो ३) जो तपता * * अनुयोगद्वार सूत्र (२७३) ई उसे तपन कहते हैं (पव इति पवणो ४ ) जो पवित्र करता है उसे पवन कहते हैं (सेतं गोमं ) इत्यादि और नामों की भी संभावना करलेनी चाहिए सो यही गुण निप्पन्न नाम है अव नोगुण निष्पन्न नामे के उदाहरण देते हैं ( सेकिंत नो गुणे २) (प्रश्न ) नो गुण निष्पन्न नाम कौनसा है ( उत्तर ) नो गुण निष्पन्न नाम इस प्रकार से है जैसे कि- (अकुतो सकुंतो १) जिस के नाम शस्त्र विशेष नहीं हैं उसे अकुंत कहते हैं यह अयथार्थ नाम है क्योंकि कुंत नाम शस्त्र (वी) का है और सकुंत नाम प्राकृत में पक्षी का है सो शस्खादि के न होने पर भी उसे शकुंत कहा जाता है सो इसी को नो गुण निष्पन्न नाम कहते हैं इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिए १(अमुग्गोसमुग्गो ३) नहीं है मुदग जिस के उसी का नाम अमुद्ग अर्थात् मुद्र के न रखने पर भी समुद्र कहा जाता है) मुद् वस्तु आधार भाजन (करंड) विशेष होता और ( अमुद्दो सेमुद्दो ३) नहीं है मुद्रा जिसके उसी को समुद्र को कहत हैं अतः मुद्रा न होने पर भी सागर का नाम समुद्र कहा जाता है ३ (अलालं पलालं ४ ) मुखादि के लालों के न होने पर भी तृण विशेष को पलाल कहते हैं।) (अकुलिया सकुलिया ५) कुलिका से रहित होने पर सकुलिका कहते हैं यह सर्व प्राकृत की शैली से नामो का विवर्ण है परंतु संस्कृत में तो शकुनिक पक्षी का ही नाम होता है ५ (नोपलं असइ पलासं ६). जो पक्ष (मांस) का आस्वादन नहीं करता उस को पलाश कहते हैं यह भी एक वनस्पति के पत्रों के नाम है ६ (अमाइवाहएमाइचाहए ७) जो मात वाहक नहीं होता उसे मातृ वाहक कहते हैं द्विइंद्रिय जीव विशेष होता है ७ ( अवीय बावए बीयवावए ८) जो बीज के वोने वाला नहीं उसे बीज वायक कहते हैं विकल्लेंद्रिय जीव विशेष का नाम है ८ (नोइंदगोवए इंदगोवर ) जो इंद्र गोपक नहीं होता उसे इंद्र गोपक कहते हैं यह भी विकलोद्रिय जीव विशेष (सेतं नो गुणे ) अव यही नो गुण निष्पन्न नाम होता है अर्थात् यह ना यथार्थ नहीं है किन्तु प्रसिद्धि में इसी प्रकार से उच्चारण किये जाते हैं इस वास्ते इन को नोगुण निष्पन्न नाम कहते हैं ।। भावार्थ-दश नाम दश प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि गु निष्पन्न जाम १, अगुणनिष्पन्न नाम २, आदानपद नाम ३, प्रतिपक्षपद न -४, मधानपद नाम ५, अनादिसिद्ध नाम ६, नाम पद ७, अवयव नाम, (२७४) * अनुयोगद्वार सूत्र * योग नाम:, प्रमाण नार्म १०, अपितु गुण निष्पन्न उसे कहते हैं जैसे कि क्षमा के गुण से क्षमण १ ज्वलन होने से ज्वलन २ ताप होने से तपन ३ पवित्र करने से पवन ४ यह सर्व गुण निष्पन्न नाम हैं ॥ किन्तु नो गुण निष्पन्न नाम निम्न प्रकार से हैं कुन्त के न होने पर शकुन्त १, अमुद्गन होने पर भी समुद् २, मुद्रा के न होने पर समुद्र ३, लाल के न होने पर पलाल ४, कुलिका के न होने पर शकुलिका ५, मांस के न खाने पर पलाश ६, अमात वाहक को मान वाहक ७, अचीज वापक को वीज वापक ८, इन्द्र के न गोपने पर इन्द्र गोप है, इत्यादि यह सर्व प्रयोग गुण निष्पन्न नहीं हैं किन्तु गुण से विरुद्ध नाम प्रसिद्ध हैं ॥ अव आदान पद और प्रतिपक्ष पद के विषय में लिखा जाता है में अथ आदान पद और प्रति पक्ष पद विषय । (सेकिंतं आयाणपएणं २ आवन्ती १ चउरंगिज्जं २ असंखयं ३ जनइज्जं ४ पुरिसविज्ज ५ एलइज्ज ६ विरियं ७ धम्मो ८ मग्गो ९ समोसरणं १० अहात्तहीयं ११ गन्धो १२ जमइज्जं १३ अद्दइज्जम् १४ सेतआयाणपएणं ॥ सकिन्तं पडिवक्सपएणं २ नवेसुगामागर २ नगर ३ खड ४ कवड ५ म- डव ६ दोणमुह ७ पट्टण ८ आसम ६ सेवाह १० सन्निविसे- सुय ११ णिविस्समाणेसु असिवा सिवा १ अग्गी सीयलो २ विसे महुरं ३ कल्लालघरेसु अविलं साउयं ४ जे लत्तए से अलत्तए.५ जे लाउए से अलाउए ६ जे सुम्मए से कुसुम्भए७ आलम्बते विवलीएभासए ८ से तं पडिवक्सपएणं ॥ पदार्थ-(सेकित्तं अयाणपएणं २)(प्रश्न ) जो आदान पद करके पद :, वनते हैं वे किस प्रकार से हैं ( उत्तर ) जिस अध्याय वा उद्देश के आदि पद के उच्चारण करने से उसी अध्याय वा उद्देश का बोध हो जाय उसे आदान पर से निप्पन्न नाम कहते हैं इनके उदाहरण निम्न प्रकार से हैं (वित्ती) आवाराङ्ग सूत्र के प्रथम श्रुत स्कन्ध के पंचम अध्याय के आदि में प्रावन्ती * अनुयोगद्वार मूत्र * (२७५) के यावन्ती इत्यादि पद हैं सो वह अध्याय आदि पद के नाम से प्रसिद्ध है जैसे कि आवन्ती अध्याय इसी प्रकार आगे भी जान लेना चाहिये (चउर- गिज्ज २) चतुरंगी अध्याय (श्री उत्तराध्ययन सूत्र के तीसरे अध्याय का आदि पद है (चत्तारि पर मंगाणि इत्यादि) ( असंखयं ३ असंख्यय अध्याय उत्तराध्ययन सूत्र का ४ अध्याय (जनइज्जम् ५) यज्ञ का अध्याय ( उत्तरा (ध्ययन सूत्रका २५ अध्याय ) (पुरिस विज्ज ) पुरुष विद्याध्याय ( उत्तर सूत्राध्याय ६ ( एल इज्जम् ६) एलक अध्याय ( उत्तर सूत्र अध्याय ७.) (वीरिपं ८) वीर्याध्याय ( सूयगडांग सूत्र १०८) (धम्मो ८ मोक्षधर्म अध्याय (सू० सू० अ० ११) (मग्गो) मार्ग अध्याय (सू० सू० अ०६) (समोसरणम् १०) समोसरण अध्याय (सू० सू० अ० १३) (आहात्तहीयम् ११) यथा तथ्याध्याय (सू० सू० अ० १३) (जन्थो १२) ग्रन्य अध्याय (सू० मू० अर १४) (जमइज्जम् १३ ) यमईय अध्याय (सू० सू० अ० १३) (अइज़्जम् १४) आर्द्रकुमाराध्याय (सं. सू० अ० २२) (सेतं अयाणपएणम् ) सो इसी का नाम आदान पद है अर्थात् जिन अध्यायों का आदि पद से निष्पन्न नाम है उन्हीं अध्यायों को आदान पद कहते हैं इसी प्रकार और अध्यायों का भी सम्बन्ध जानना चाहिये । अव प्रतिपक्ष विषय में कहते हैं ) सेक्तिं पविक्ख- पएणम् ) (प्रश्न) प्रतिपक्ष धर्म से जो पद उत्पन्न होते हैं वह किस प्रकार से हैं (उत्तर) प्रतिपक्ष धर्म निष्पन्न पद निम्न प्रकार से होते हैं जैसे कि (नवे सुगा- माम २) नूतन ग्रामों और.आकरों में इसी प्रकार (नगर) जो शुल्क रहित होता है उसे नगर कहते हैं ३ (खेड ४) धूलिमय कोट वाला खेडा होता.है ? (कवर्ड ५) कुनगर को कर्वट कहते हैं ५ (मंडव ६) जिसके दूरवर्ती नगर हों उसे मंडप कहते हैं (दोणमुह ७) जिस स्थान पर जल और स्थल दोनों मार्ग हों उसे द्रोण मुख कहते हैं (पट्टण ८) नाना प्रकार के पदार्थ नाना प्रकार के दोषों से विक्रीयमाण होते हों उसे पत्तन कहते हैं (आसम ९) तापसादि के स्थान को आश्रम कहते हैं (संवाह १०) जहां पर बहुत से लोकों का समूह हो उसे संवाह कहते हैं अथवा (सन्निवेसे सुअ०) घोसादिक में (णिविस्स- माणेसु) वसते हुओं में यदि (अशिवा सिवा) शृगालादि प्रवेश करते हैं या शब्द करते हैं वेह शब्द अशिव (अशुभ) होने पर भी उन्हें शिवा ( कल्याण रूप ) कहा जाता है क्योंकि शृगाली का नाम कोस में शिया भी लिखा (२७६) * अनुयोगद्दार सूत्र * तथा कोई व्यक्ति (अंग्गी सीयलो २) अग्नि को शीतलं कहता है और (विस- महुरं ३) विषको मधुर कहता है अथवा (कलालघरेलु अविलसायं ४) कलाल के गृह में मदिरा स्वरस चलित होगई है अर्थात् अम्ल को स्वादु कहता है फिर (जे लत्तए से अलत्तए ५) जो लाक्षादि से रक्त है उसको प्राकृत में अलत्त कहते है और (जे लाउए से अलाउए ६) जो जलादि से वस्तु को ग्रहण करता है उसी को अलायुतूंचा कहते हैं और जो (जे सुभए से कुंसुभए ७) शुभ (प्रिय) है उसे देश भाषा में कुशुभा कहते हैं कु अव्यय कुत्सित अर्थ में है सौ (आलंबते विवत्तीयभासए ८) जो उक्त प्रकार से भापा भाषण करते है वह विपरीत भापा है क्योंकि पक्षधर्म से प्रतिपक्षधर्म है इसीलिए इस को विपरीत भापा कहते हैं अथवा भाषा के न होने से इसे अभापा भी कहते हैं सो यह समासान्त पद है (सेतं पडिबक्खपएणं) सो वही प्रतिपक्ष पद अर्थात् पक्षधर्म से प्रतिकूल होने से प्रतिपक्ष कहा जाता है शंका क्या यह प्रति- पक्ष पद नोंगुण पद में अन्तर्भूत नहीं हो सकता है (समाधान ) नहीं हो सका है क्योंकि नो गुण पद कुन्तदि की प्रवृत्ति के निमित्तसे पैदा हुआ है और यह पढ़ प्रतिपक्ष धर्म वाचक है इसलिये सापनत्वादितिशेषः ॥ ४॥ भावार्थ-आदान पद उसका नाम है जिस अध्याय का आदि सूत्र से नाम प्रसिद्ध होजाय और उसी नाम अध्याय से उच्चारण किया जाय सो. इस पद में चतुर्दश उदाहरण दिखलाए गये हैं जैसे कि आवन्ती अध्याय १ चतुरंगि अध्याय २ असंख्याध्याय ३ यज्ञ नियमाध्याय ४ पुरुष विद्याध्याय ५ एलका- ध्याय ६ वीर्याध्याय ७ धर्माध्याय ८ मोक्ष मार्गाध्यायह समोशरणाध्याय १० याथा तथ्याध्याय ११ ग्रन्धाध्याय १२ यमइयध्याय १३ आर्द्रकुमाराध्याय १४ यह सर्व अध्याय श्रीआचारांग मूत्र श्रीसूयगडांग मूत्र श्रीउतराध्ययन सूत्र के अन्तर्गत हैं सो इन्ही का नाम आदान पद नाम कहते हैं और प्रतिपक्ष पद उस का नाम है जो धर्म से विरुद्ध पद हैं जैसे कि नूतन ग्राम नगरों में जब शृंगा- लादि शब्द कहते हैं तव वे शब्द अशुभ होते हैं किन्तु उनको लोक शिवा कहते हैं क्योंकि (शिवा गौरी फेरखयोः) इत्यंमदः शिव शब्द पार्वती गीदडी शमी का वृक्ष हरे तया आंवला इन अर्थों में भी व्यवहृत किया जाता है इसलिये आशिवा शब्द को शिरा कथन करना प्रतिपक्षधर्म वाचक पद है इसलिये आगे भी जानना चाहिये जैसे कि अनि शीतल १, विष मधुर २, कलाल के घग्भे मदिरी । * अंनुयोगदार मूत्र * (२७७) स्वी, ३, रक्त की अलक्त ४, खात्रु को अलावू ५, शुभ को कुशुभ ६ इस प्रकार प्रतिपक्ष वचन उच्चारण करने उसी को प्रतिपक्ष धर्म कहते हैं और यह नोगुण मे उदाहरणे नहीं गिने जाने क्योंकि यह कथन प्रतिपक्षधर्म वाचक पद है अब प्रधान पट और अनादि सिद्ध नाम का विवेचन करते हैं । अथ प्रधान पद और अनादि सिद्ध पद विषय । सेकिंतं पहाणपएणं २ असोगवणे १ सत्तिवणे २ चंप गवणे ३ चूयवणे ४ नागवणे ५ पुन्नागवणे ६ उच्छवणे ७ दक्खवणे - सालवणे ९ सेत्तं पहाणपण्णम सेकिंतं अनादिय- सिसिद्धतेणं २ धम्मत्थिकाय १ अधम्मस्थिकाय २ आगास., थिकाए ३ जीवत्यिकाए ४ पुग्गलत्यिकाए ५ अद्धासमए ६ सेत्तं अनाइयसिद्धतेणं ॥ ६॥ पदार्थ-(सेकित पहाणपएणं २) से शब्द अब्द का बाची है और किं अर्थ में होता है वे शब्द पूर्व सम्बन्ध के लिये होता है सो तात्पर्य यह हुआ कि प्रधान पद कौनसा हुआ गुरु कहने लगे कि भो शिष्य ! प्रधान पद उसे कहते हैं जिस वन में आम्रादि वृक्ष अनेक जाति के होते हुए उन में जो प्रधान और बहुत हो उन्ही के नाम से वन मसिद्ध हो जाता है जैसे कि (अ. सोगवणे १) अशोक वृक्ष अतीत्र होने से अशोक वन कहा जाता है उसी प्र- कार( सत्तिवएणवणे ३ )सत वर्ग वन (चंपगत्रणे ४ )चाकवन ( चूयत्रणे ५) आम्रवन (नागवणे ६) नागवन (उच्छ्वणे ७) इक्षुवन (सक्खवणे ८) द्राक्षावन और ( सालवण ) शालवन ग्रह सर्व प्रधानता की अपेक्षा से कथन किये गये हैं ( सेतपहाण पदणं ५) सो यही प्रधान पद है ५ (सेकिंतं अना- इय सिद्धं तेणं २ ) ( प्रश्न ) अनादि सिद्धांत नाम किसे कहते हैं (उत्तर) जो अनादि काल से मिद्ध और निर्णीत हो उसी का नाम अनादि सिद्वान्त नाम है क्योंकि जो अनादि सिद्धांत पद है वह कभी भी परिवर्तित नहीं होता. प्रश प्रवासाक्षी ॥श:० व्या० १०८ पा०१ सू० १५ अनयोरादे दित उत्वम् भवनि पावासु मो- - (२७८) * अनुयोगद्वार मूत्र * जैसे कि ( धम्मत्यिकाय १) धर्मास्किाय १ (अधम्मत्विकाय २) अधर्मी स्तिकाय २ (आगासत्थिकाय ३) आकाशस्तिकाय ३ (जीवत्थिकाय ४) जीवस्ति- काय ( पुरगलस्थिकाय ५ पुद्गलास्तिकाय ५ ) (अद्धासमय ६) समय (से तं अनाइय सिद्धतेणं ६) ये ही अनादि सिद्धांत नाम हैं क्योंकि यह पद नाम द्रव्य के किसी समय में भी परिवर्तन शील नहीं है अतः स्वतः सिद्ध हैं इसीलिये इन्हें अनादि सिद्धांत नाम कहत हैं ॥ ६ ॥ भावार्थ-प्रधान पद उसका नाम है जो वृत अनेक जाति के हों उनमें जो अतीव प्रधान वृत्त हों उन्ही के नाम से वन शब्द व्यवहन किया जाता है जैसे कि अशोक वन १ सप्तपर्ण वन २ चम्पा वन ३ आम्र वन ४ नाग वन ५ पुनाग वन ६ इन वन ७ द्राक्षा वन ८ शाल वन सो इसी का नाम प्रधान • पद है ५ किन्तु अनादि सिद्धान्त नाम उसे कहते हैं जो अनादि काल से सिद्ध रूप और निर्णत हो वही अनादि सिद्धान्त नाम है जैसे कि धर्म ? अधर्म २ आकाश ३ जीव ४ पुद्गल ५ समय ६ यह अनादि निष्पन्न नाम है इसीलिये इन्हें अनादि सिद्धान्त नाम कहते हैं क्योंकि नाम और नाम कर्म भिन्न है अतएव नाम कर्म स्थिति वाला होता है नाम अनादि निष्पन्न है इसीलिये इन्हें अनादि सिद्धांत नाम कहते हैं ॥ ६॥ अब नाम पद और अवयव नाम पद् विषय में विवर्ण किया जाता है । अथ नाम पद और अवयव नाम पद विषय । (सेकितं नामेणं २) पिउपियामहस्स नामणं उन्ना मिजइ सेतं नामेणं ७ से किंतं अवयवेणं सिंगी १-सिखी २ विसाणी ३ दाडी ४ पक्खी ५ खुरी ६ एही ७ वाली ८ दुप्पय ६ चउप्पय १० बहुप्पया ११ गंगुली १२ केसरी १३ कउही १४ परियरबंधेणं भउंजाणेज्जा १५ मिहिलियं निवसणेणं-१६ सित्थेणदोंणयांगं १७ कविं च एगाए गाहाए १० सेंतं अवय- वेणी १६) .
- * अनुयोगद्वार सूत्र * (२७) पदार्थ-(सेकित नामेणं २)(प्रश्न ) नाम से नामपद किस प्रकार बनता है (उत्तर ) नाम से नामपद निम्न प्रकार से है जैसे कि ( पिगपया महस्सना मेणं उन्नामिज्जा) पिता अथवा पितामह पितृ पितामह इत्यादि के नामो परि नाम प्रसिद्ध किया जाय जैसे पिता के नाम पर तेतलीपुत्र अथवा माता के नाम से मृगापुत्र थावचा पुत्र पितृ पिता के नाम पर वरुण नाग नतश्रा इत्यादि यह नाम पूर्व पुरुषों के नाम पर प्रसिद्ध हैं सो इसी का नाम (सेतं नामेणं ) नाम से उत्पन्न नाम है. इस नाम के द्वारा पूर्व पुरुषों के नाम भी प्रगट हो जाते हैं अब अवयव विषय में कहते हैं (सेकितं अवयवेणं) (प्रश्न) अवयव नाम कौनसा है गुरु कहते हैं भोशिष्य ! अवयवों के प्रधान होने से जिस का नाम अवयवों के अनुसार किया जाय उसी को अवयव नाम कहते जैसे कि (सिंगी १)श्रृंगों के होने से भृगी कहा जाता है ( पक्षविशेष) इसी . प्रकार (सिंखी २) शिखा होने से शिखी ( मोर) (विसाणी) विषाणों के होने से विषाणी ३१ दाढी ४) दादों के होने से दाढी (सूबर ) (पंक्खी.) पांख होने से पक्षी ६ फिर अवयव प्रधान होने से पादादि प्रधान भी होते इसलिये उस विषय में कहते हैं (खुरी ६) खुर होने से खुरी ६ (नही ७.) नख होने से नखी ७ (वाली ८) (केश) चाल अधिक होने से वाला ८ (दुप्पए ६ ) द्विपद होने से मनुष्य कहा जाता है इसी प्रकार ( चतुप्पय १० चारपाद वाले गवादि १० (बहुप्पया ११) बहुपाद वाले कान खजूरा आदि (णंगुली १२) पूंछ होने से नंगुली वानरादि (केसरी १३ ) केसर होने से केसरी १३ (कही १४ ) ककुभ होने से ककुभी (स्कन्ध वाले वृषभादि) (परियरवदेणं भउंजाणिज्जा १५) विशिष्ट वस्त्रादि की रचना देखकर शूर पुरुष जाना जाता है अर्थात् जिसके विशिष्ट वस्त्र राज चिन्हों से अंकित हैं चही शूर पुरुष होता है ( महीलियं निवसणेणं १६ ) इसी प्रकार वस्त्रादि की रचना देखकर और वेष को देखकर स्त्री जानी जाती है क्या यह पतिव्रता है अथवा घुचली है (सित्येणं दोणवायं १७) द्रोण पाक वर्तन से एक किणका मात्र अन्न ग्रहण करने से परिपक्क अथवा अपरिपक्क जाना जाता है (कविंच एगाए गाहाए १८) और कवि एक गाथा के उच्चारण करने से जाना जाता है कि यह सुकवि है वा कुकवि है विद्वान् है वा मूर्ख है साक्षर है वा निरक्षर भट्टाचार्य है (सेतंअचवेणं ) सो वही वोक्त अवयव प्रधान नाम पद होता . (२८०) * अनुयोगद्वार सूत्र * क्योंकि जिसका जो अवयव प्रधान हो उसके अनुसार उसका नाम अहस किया जाय उसी को अवयवी नाम कहते हैं ॥ ८ ॥ भावार्थ-नाम से नाम निष्पन्न उसे कहते हैं जो पिता और पितामह पितृ पित्तामह के नाम से नाम निष्पन्न होता है उसी से मिद्धि को भी प्राप्त हो जाता है जैसे तेतली पुत्र वरुण नागनतुश्रा अथवा मृगापुत्र थावचा (स्तापत्य) पुत्र इत्यादि यह सर्व नाम से निष्पन्न नाम पद हैं, और अवयवों की प्रधानता से जो नाम उत्पन्न हो उसे अवयवी नाम कहते हैं जैसे कि इस कथन में १८ उदाहरण दिये गये हैं जो निम्न लिखितानुसार हैं। श्रृंगी १ शिखी २ वि- पाणी ३ दाही ४ पक्षी ५ खुरी ६ नखी ७ वाली ८ द्विपद ६ चतुष्पद १० बहुपद ११ नांगुली १२ केसरी १३ ककुभी १४ सैनिक वेष से शूरवीर जाना जाता है १५ वेप से ही सती वा असती स्त्री जानी जाती है १६ गले हुए अन्न के एक कण से टोकणे वा कडाहे का पाक जाना जाना है १७ कवि एक गाथा से १८ यह सर्व अवयव प्रधान पद हैं क्योंकि जिस जीव का जो अवयव प्र- धान होता है उसी के प्रयोग से उसका वही नाम उच्चारण किया जाता है. इसी करके इसे अवयव प्रधान नाम पद कहते हैं और गौण निम्पन्न नाम के यह अनतर्भूत है अब संयोग नाम विषय में विवेचना करते हैं। ॥ अथ संयोग नाम विषय ॥ सेकिंतं संजोएणं २ चलबिहे प्राणते त० दव्वसंजोए ? खेत्तसंजोए २ कालसजोए ३-भावसंजोए ४ सेकित्तं दध्वसं- जोए ५ तिविहे पं० त० सचित्ते १ अचित्ते २ मीसए ३ सेकिं सचित्ते २ गोहिंगोमिए १ महिसिंहिं महिसिए उट्टीहिं उडीए प्रसूहि पसूइए ३ ऊरणीएहिं ऊरणीए ४ सेतं सचित्ते सेकिंचं अचित्ते २ छत्तेणं छत्ती १ दंडेणं दंडीरपडेणं पडी घडणं घड़ी ३ कड़ेण कडी ४ सेत्तं अचित्ते सेकित्तं मिहस्सए २ नावए जानिए १ सगड़ेणं सागडिए २ रहणं रहिए ३ हलेणं हालिए सेतं मिस्सए सेतं दध्वसंजोए सेकित्वं खचं संजोए २ भरहे परपए * अनुयोगद्दार सूत्र * (२८१) हेमवए एरणवए हरिवासए रम्भगवासए देवकुरुए उत्तर कुरुए पुब्वविदेहए अवरबिदेहए अहवा मागह मालवए सोरठ्ठए मरहठ्ठए कुंकगए कोसलए से खेत संजोए सेक्षित कालसंगोए २ सुसुमसुसुमाए लुसनार सुसमहुसमाए दुसमसुसुमाऐ अहवा पावसए १ वासारतए २ सरदए ३ हेमंतए ४ वसंतए ५ गिम्हए ६ सेतकाल संजोगे सेकि भाव संजोगे २ दुविहे पण्णत्ते तंजहा पसत्ये अपसत्येए सेकिंतं प- सत्थे २ नाणेणं नाणी दंसणेगं दसणी चरित्तेयं चरिती सेतं पसत्थे सेकिंतं अपसत्थे २ कोहण कोही माणेणं. माणी मायाए मापी लोभेणं लोभी (सेतं असत्थे ) से भाव संजोग संत्रं संयोगे ॥ ८॥ पदार्थ-( सेकिंतं संभोरण २ चउबिहे पएणते तंजहा ) (मन) संयोग जन्य नाम कितने प्रकार से प्रतिगदन किया गया है (उत्तर) संयोग जन्य नाम चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (दब संजोग ९ खेतं संजोगे २ काहा संजोगे ३ भाव संजोगे ४ ) द्रव्य संयोग जन्य नाम १ क्षेत्र संयोग जन्य नाम २ काल संयोग जन्य नाम ३ भाव सयोग जन्य नाम ४ (सेकिंतं दब संजोगे २ तिविहे पएणते तंजहा सेचित्ते १ चिते २ मीसर ३) (प्रश्न) द्रव्य संयोग जन्य नाम कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (उत्तर) द्रव्य संयोग जन्य नाम तीन प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे- कि-सचित्त १ अचित्त २ मिश्र ३ (प्रश्न) (सेनिनं सचित्ते ) द्रव्य संयो- गज सचित्त के उदाहरण किस प्रकार से हैं (उत्तर ) ( गोहिंगोपए १ उटिहिं उट्टीए.२ पसूहि पसूइए ३ ऊरणीहि ऊरणीए ४ सेत्तं राचित्ते ) जैसे जिसके पास गौऐ हैं उसे गोमान् कहते हैं १ इसी प्रकार जिसके पास ऊंट है उसे औ- ष्ट्रिक कहते हैं तथा जिसके पास पशु हैं उसे पशुओं वाला कहते है ३ जिसके पास अजादि हैं उसे अजादि वाला कहते हैं (सत्तं सचित्ते ) यही सचिव द्रव्य संयोगज नाम हैं इसी प्रकार अन्य भी उदाहरण जानने चाहिए १(सात (२८२) * अनुयोगद्वार मंत्र'* अचिचे ) ( प्रश्न ) अचित्त द्रव्य सम्बन्ध कौनसा है और - उसके उदाहरण जानने चाहिए ? (सेकितं अंचित ) (प्रश्न ) अचित्त द्रव्य सम्बन्ध कौनसा है और उसके उहाहरण किस प्रकार से हैं ( उत्तर ) अचित्त द्रव्य सम्बन्ध वह होता है जिस अचित्त के प्रयोग से संबोधन किया जाय और उसके उदा- हरण निम्न लिखित प्रकार से हैं (छत्तेण छत्ती १ दंडेण दंडी २ पडेण पड़ी ३ कडेण कड़ो ४ ) छात्र के सम्बन्ध होने से (छत्री) १ दंड के सम्बन्ध होने से दंड़ी पटके सम्बन्ध होने से पटी ३ कटके सम्बन्ध होने से कटी ४ ( कट ) चटाई (सेतं अचित्ते ) सो यही अचित्त द्रव्य स- म्बन्ध है अब मिश्र द्रव्य सम्बन्ध विषय में कहते हैं (सेकित्तं मिसए २) (प्रश्न) मिश्र द्रव्य सम्बन्ध किसे कहते हैं (उत्तर) मिश्र द्रव्य वह होता है जैसे कि ( नावा एनाविए १ सगडेणं सगडिए २ रदेणं रहिए ३ हलेणं हलिए ४ सत्तं मिसए ) (सेतं दब संजोगे १) नाव के संयोग होने पर नाविक होता हैं ? शकर के संयोग से शाकटिक २ रथ के संयोग से र. थिक ३ हलके संयोग से हालिक ४ क्योंकि इन पदार्थों में सचित्त अचित्त दोनों प्रकार के पदार्थों का संयोग है जैसे कि पभ (बैल) सचिन है हलं अचित्त है सो दोनों के संयोग होने से हालिक कहा जाता है सो यही मिश्र, संयोग है और इसे ही द्रव्य संयोगज कहते हैं। अवं क्षेत्र संयोग विषय में विवे- चन किया जाता है (सेति खेत्तसंजोए २) ( प्रश्न) क्षेत्र संयोगज नाम किस प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) क्षेत्र संयोगज नाम इस प्रकार से वर्णन किया गया है ( भारहेए रखए हेमवए एरणवए हरिवासए रम्मगवासए) जैसे जिसका जन्म भारत में हुआ है अथवा भरत क्षेत्र में निवास करता है उ- से ही भारत कहते हैं इभी प्रकार ऐरवर्तक है मवर ऐ रण्यवर हरिवर्षीय रम्य कवर्षीय (देवकुरुए उत्तरकुरुए पुव्यावदेहए अवविदेहए) देवकुरुक उत्तर कुरुक पूर्व विदेहक अपरविदहक यह सर्व क्षेत्र संयोगज नाम हैं (अहवा) अथवा अन्य प्रकार से थी क्षेत्र संयोगज नाम का वर्णन करते हैं जैसे कि (मागहे १ माल- पए २ सोरहए ३ मरठए ४ कोकणए ५ कोसलए ६ सेतं क्खेत संजोए) जिसका जन्म मगध्र देश में हुआ है अथवा मगध देश में वसता है उसे मागध कहते हैं इसी प्रकार मालवीय २ सौराष्ट्रिक महाराष्ट्रिक ४ कौंकण ५ कौशालिक ६ येही क्षेत्र संयोगज़ नाम होते हैं इसी प्रकार अन्य देशों के सम्बन्ध होने पर * अनुयोगद्वार-सूत्र * (२८३) भी संभावना करलेनी चाहिये जमे अंचनदीए (पंजावी ) गुर्जरी (गुजराती) इत्यादि (सेत्तं काल संजोगे २) (प्रश्न) कात संयोग जन्य नाम किसे कहते उत्तर जिसका जन्म सुपम सुषम फाल में हुआ है उसको सुपम सुषमज कहते हैं इसी प्रकार (सुसमाए) सुषमज (सुसमदुसमाय ३) सुधमदुपमज दुसमास- माए) दुषम सुपमज (दुसमाए) दुपमज ( दुसम दुसमाए ) दुषम दुषमज यह सर्व सप्त म्यन्तपद पंचम्यन्त जानने चाहिए सो जिस काल में जिसका सम्बन्ध हुआ है वह कालिक संयोग से उसी प्रकार कहा जाता है अथवा काल का. संयोग अन्य प्रकार से भी कहते हैं (अहवा पाक्सए ? वा सारत्तय २ सर- दए ३ हेमंतए ४ वसंतए ५ गिम्हए ६ (सेत्तंकाल संजोगे) यदि पावस ऋतु में जन्म हुआ है तब उसको परावसिक कहते है इसी प्रकार वर्षा ऋतु २, शरद ऋतु ३, हेमन्त ऋतु ४, वसंत ऋतु ५, ग्रीष्म ऋतु ६, सो जिस ऋतु में जन्म हुआ हो उसी ऋतु के नाम से कहा जाता है वह भी काल संयोगन नाम है।। अब भाव संयोगज नाम विषय में कहते हैं ( सेकित्तं भाव संनोगे २) (प्रश्न) भाव संयोगज नाम किसे कहते हैं (उत्तर ) भाव संयोगज नाम (दुविहेपएणत्ते तंजहा ) दो प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (पप्रत्येय अपसत्येय २) प्रशस्त भाव जन्य नाम और अप्रशस्त भाव जन्य नाम (सेहि पसत्ये२) (प्रश्न) प्रशस्त भाव जन्य नाम किसे कहते हैं अर्थात् जो सुन्दर भारों से निप्पन्न नाम कौनसा है ( नाणणं नाणी १) (उत्तर) जैसे ज्ञान से युक्त होने पर ज्ञानी कहा जाता है १ (दसणेगंदसणी २ ) इसी प्रकार दर्शन से दर्शनी २ ( चरित्तेणं चरित्ती चरित्र से चारित्री (सेत पसत्ये) सो यही प्रशस्त नाम होता है । (सतिं अपसत्ये) (प्रश्न) अपस्त निष्पन्न नाम कौनसा होना है (को- इणं कोही १)(उत्तर) जैसे क्रोध से क्रोधी (मागणं माणी २) मान से मानी (मायाए मायी ३) माया से मायी (लोभेणं लोभी'४) लोभ से लोभी ४ क्योंकि जो अप्रशस्त पदार्थ हैं उनके संयोग से अश्शत नाम निष्पन्न होजाता (सेतं अपसत्थे सेतं भाव संजोए से संजोएणं ) सो यही अप्रशस्त नाम है और यही भाव संयोग है और इसी स्थान पर संयोग निष्पन्न नाम का समास पूर्ण होगया है । भावार्य-सांयोगिक नाम चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि. द्रव्य संयोगज १ क्षेत्र संयोगज २,कात संयोगज ३,भात्र संयोगज ४, अपितु १ . (२८४) * अनुयोगद्वार मूत्र * द्रव्य रांगोगन नाम तीन प्रकार से वर्णित है सचित्त १ अचित्त २ मिश्रित ३ सो सचित्त के उदाहरण इस प्रकार से हैं. जैसे गौओं के होने से गोमन् ?, उष्ट्रों के होने से मौष्ट्रिक २, पशुओं के होने से पशुओं वाला ३, ऊरणीयों के होने से उरणीस ४, यही सचित जन्म-नाम है और अचिनन नाम ऐसे हैं जैसे कि छत्र के संयोग होने से छमी कहा जाता है १, और दंड के संयोग होने से दंडी २, एट के संयोग होने से पटी ३, कट के संयोग होने से कटी.४, सो येही अचित्त संयोगज नाम हैं और मिश्रन नाम निम्न प्रकर से हैं जैसे कि नाव के संयोग से नाविक १, शंटक के संयोग से शाकटिक २, रथ के संयोग से रार्थक ३, हल के संयोग से हालिक येही मिश्रन नाम हैं क्योंकि हल अचित्त सुपम सचित्त दोनों के संयोग से मिश्रज नाम उत्पन्न होजाता हैं इसे द्रव्य संयोगज नाम कहते हैं ? और क्षेत्र के संयोग से जो नाम' निष्पन्न हो उसे क्षेत्रज नाम कहते हैं जैसे कि भरत क्षेत्र के संयोग से भारत यावत् अपर विदेहादि अथवा मामधे १ मालवी २ कोशली इत्यादि यह क्षेत्र निष्पने नाम हैं २ और काल के सम्बन्ध से जो नाम निष्पन्न होते है उन्हें कालज नाम कहते हैं जैसे एक काल के चक्र के षट् २ भाग होने हैं उन के संयोग से अथवा पद् ऋतुओं के संयोग से जो नाम उत्पन्न हो उन्हें काल जन्य नाम कहते हैं ३ और भाव संयोग से जिस की उत्पत्ति है उसे भावज नाम कहते अतः प्रशस्त भाव वा अप्रशस्त भाव यह दो प्रकार के भाव हैं इन दोनों से निष्पन्न नाम निम्न प्रकार से हैं जैसे कि प्रशस्त भाव सम्बन्धी ज्ञान से ज्ञानी १ दर्शन से दर्शनी २ चारित्र के संयोग रो चारित्री ३ और अप्रशस्त भाव सम्बन्धो क्रोध के संयोग से क्रोधी १ मान के संयोग से मानी २ माया के संयोग से मायी ३ लोम के संयोग से लेोभी ४ सो यही भाव संयोगज नाम हैं और इन्हें ही संभोगज नाम कहते हैं क्योंकि यह सर्व नाम संयोग से ही उत्पन्न हुए हैं। अब प्रमाण नाम के विषय में विवेचन करने है ।। अथ प्रमाण विषय । सेकिंतं पमाणेणं २ चउविहे पं० तं. नामप्पमाणे १ उक्णप्रमाणे २ दन्नप्पमाणे ३. भावप्पमाणे १ सेकिंतं नाम- * अनुयोगद्दार मूत्र * (२८५) प्पमाणे जस्मणं जीवस्त वा अजीवस्स वा जीवाणं अजी. वाणं तदुभयरस वा तदुभयाणं वाप्यमाणेत्ति नाम कज्जा सेत्तं नामप्पमाणे १ सेकितं दृवणाप्पमागे २ सत्तविहेय पगण- ते तंजहा नक्खत्ते १ दवय २ कुले ३ पासंड ४ गणेय ५ जीवियाहे ६ आभिप्पाइयनामं ७दृवणानामंतु सत्तविहं ॥ १ ॥ सेकिंतं नक्खत्तनामे २ कित्ति याहि जाए कित्तिए १ कित्ति- यादत्ते २ कित्तियाधम्मे ३ कित्तियासम्म ४ कित्तियादेवे ५ कित्तियादासे ६ कित्तिथासेणे ७ कित्तियारक्खिए ८ रोहि- णीहिं जाए रोहिणिए रोहिणिदिन्ने रोहिणिधम्मे रोहिणि- सम्मे रोहिणिदेवे रोहिणिदासे रोहिणिसेणे रोहिणिरक्खेय एवंसब्वनक्खत्तसु नामा भाणियव्वा एत्थं संगाहणि गाहाओ कित्तियरोहिणिमिगसिरमदा पुणव्वसू य पुस्से, य तत्तो य अस्सिलेसा महा उ दा फग्गुणीअोय १ हत्थो चित्ता साती वि साहा तह य होइ अणुराहा जट्ठा मूला पुव्वासाढ़ा तह उत्तरा चेव ॥२॥ अभिई सवण धणिट्ठा सत्तभिसदा दा अहोति भई वया रेवई अस्सिाणि भरणी एसा नक्खत्तपरिवाडी ॥३॥ सेत्तं नक्खत्तनामे । सेकिंतं देवयानामे २ अग्गिदेवयाहि जाए अग्गिए अग्गिदिन्ने अग्गिसम्मे अग्गिधम्मे अग्गिदवे अग्गि- दासे अग्गिसेणे अग्गिरक्खिए एवं सब्बनक्खत्तदेवतानाम भाणियब्वा एत्यपि अट्ठनामे जावजमो इत्थपियं संग्गाणिगा हामोग्राग्ग १ पयावई २ सोमे ३रुदो ४ आदिती ५ विहस्सई ६ सप्पे ७ पिति ८ भग ९ अज्जम १० सविया ११ तट्टा १२ चाउय १६ इंदग्गी १४ मित्तो १५ इन्दो १६ निरई १७ आऊ - १८ विस्सो य १६ वंभ २० विएहुआ २१ वसु २२ (२८६) * अनुयोगद्वार भूत्र * वरुण २३ अय २४ विवाद्धि २५ पुस्सो य २६ अग्गि २७ जमे चेव २८ सेनं देवयानामे २ सर्कितं कुलनामे र उग्गा १ भोगा २ राइन्नो ३ खातिए ४ इक्खगा ५ णाया ६ कोरव्या ७ सेत्तं कुलनामे ३ सेकित्तं पासंडनाये र समणे १ पंडुरंगे २. भिक्खू ३ कावालिए ४ ताव से ५ परिवायए ६ सेपास डनामे ४ सेकित्तं गणनामे २ मल्ले १ मल्लदिन्नं २ मल्ल धुम्मे ३ मल्लसम्मे ४ मल्लदेवे ५ मल्लदासे ६ मल्लसेणे ७ मल्लराक्खिए ८ सेत्तं गणनामे ५ सेकित्तं जीवियानामे २ अवकरण १ ऊक्कुरुडिए २ सुप्पए ३ उज्झियए ४ कज्जवए ५ सेत्तं जीवियानामे ६ सेकित्तं आभिप्पाइयनामे २ अंबए ? निंबए २ ववूलए ३ पलासए ४ सिणए ५ पीलए ६ करिए ७ सेत्तं आभिप्पाइयनामे ७ सेत्तं ठवणाप्पमाणे ॥ पदार्थ-( सेकितप्पम णे २ चउविहे पं० त० ) शिष्यने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! प्रमाण कितने प्रकार से प्रतिपादन किया गया है क्योंकि प्रमाण उसे कहते हैं जिस के द्वारा वस्तुओंका निश्चय किया जाय सो गुरुने उत्तर दिया कि वह प्रमाण चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि (नाम- प्पमाणे १ वरणाप्पमाणे २ दबप्पमाण ३ भावप्पमाणे ४ ) नाम प्रमाण ? स्थापना प्रमाण २ द्रव्य प्रमाण ३ भाव प्रमाण ४ (सेकिंत नामप्पमाणे २) (मन) नाम प्रमाण किसे कहते है ( उत्तर ) नाम प्रमाण के निम्न लिखिता- नुसार उदाहरण हैं जैसे कि (जस्सणंजीवस्सवा) जिस जीव का अथवा (अजी- वस्सवा ( अजीवका अथवा ) जीवाणंवा (बहुत से जीवों का अथवा) अजी- वाणवा ) बहुत से अजीवों का (तदुभयस्सवा) अथवा एक जीव और एक अजीव का अथवा (तदुभयाणंबाप्पमाणेति नामंकिज्जइसे नामप्पमाणे १) बहुत से जीव बहुत से अजीवों का " इस प्रकार से नाम रक्खा जाता है इसे ही नाम प्रमाण कहते हैं क्योकि नाम प्रमाण से.यह तात्पर्य है कि नाम प्रमाण के द्वारा पदार्थों का निर्णय किया जाता है सो यही नाम प्रमा ममाण . * अनुयोगद्वार सूत्र * (२८७) ण है १ (सकिंत ठवणाप्पमाणे २ सचविहे पं० त०) (प्रश्न) स्थापना प्रमाण कितने प्रकार से प्रतिपादित है ( उत्तर ) स्थापना प्रमाण सात प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि ( नक्खते १) नक्षत्र के नाम पर जो नाम स्थापन किया जाये उसी को नक्षत्र स्थापना कहते हैं इसी प्रकार (देव- य २ ) देवों के नाम पर स्थापना (कुतेयं ३ ) कुल के नाम पर स्थापना ३ (पासंउ ४) पासंउ के नाम पर स्थापना ४ ( गणेय ) ५ गण के नाम पर ५ (जीवियाहेतु ६ ) जिस नाम के द्वारा पुत्र जीवित रहे ऐसे नाम की स्थापना करना ६ ( अभिप्पाइय नाम ७) और निज अभिप्रायिक नाम अर्थात् जैसे मन का अभिप्राय होता है उसके अनुसार नाय स्थापन किया जाता है इसलिये (वणा नामंतु सत्तविहं १) स्थापन नाम सात प्रकार से कथन किया गया है (सेकितं नक्खतनामे) (प्रश्न) नक्षत्र नाम के ऊपर स्थापना नाम किस प्रकार से प्रतिपादन किया गया है (उत्तर) नक्षत्र नाम निम्न प्रकार से है जैसे कि (कित्तियाहि जाए कत्तिय १) जिसका कृत्तिका नक्षत्र में जन्म हुआ हो उसे उस नक्षत्र की अपेक्षा से कार्निक कहते हैं १ (कित्तिया दत्ते २) जो कृत्तिका ने दिया हो वही कृत्तिकादत्त २ इसी प्रकार (कित्तियाधम्प ३) कृत्तिका धर्म (३ वित्तिया सम्मे ४) कृत्तिका शर्म ४ (कित्तियादेवे ५) कृत्तिकादेव ५ (कित्तियादासे ६) कृत्तिकादास ६ (कित्तियासेणे ७) कृत्तिकासेन ७ (कि- तियारक्खिए ८) कृतिका रक्षित और इसीपकार (रोहिणिहिं जाए रोहिणिए) जिसका रोहिणि नामक नक्षत्र में जन्म हुआ है उसे रोहिणेय कहते हैं (रोहि- णिदत्ते १) फिर रोहिणिदत्त २ (रोहिणिधम्मे ) रोहिणि धर्म (रोहिणि सम्मे). रोहिणि शर्म (रोहिणिदेवे । रोहिणि देव (रोहिणिदासे) रोहिणिदास (रो- हिणिसेणे ) रोहिणिसेन (रोहिणि रक्खिए) रोहिणि रक्षित (एब्वं सव्वं न. क्खतेसुनामाभए यिन्या) सो इसी प्रकार सर्व नक्षत्रों के नाम कथन करने चा- हिये परन्तु (इत्थं संग्गहणीगाहाऊ) इस स्थान पर संग्रहणी गाथाएँ कही जाती हैं जिनके द्वारा सर्व नक्षत्रों का वोध होजाय जैसे कि (कित्तिए रोहिणि मिगसिर ) कृत्तिका १ रोहिणि २ मृगशीर्ष ३ (अदाय पुणवसुय) आर्द्रा ४ पुनर्वसु ५ (पुस्सोयतत्तोय असिलेसा) फिर पुष्प ६ तत्पश्चात् आश्लेषा ७ (म- घाउ दोफग्गुणीउय) फिर मघा ८ और पूर्वा फाल्गुणी ९ उचरा फाल्गुणी १० ( इत्योचित्ता स्थाई ) हस्त ११ चित्रा १२ स्वानि १३.(विसाहातहय अ- (२८) * अनुयोगद्वार सूत्र * णुएहा ) विशाखा १४ तथा अनुराधा १५ (जहा मूला पुबासाहा) जेष्ठा १६ मूल १७ पूर्वाषाढा १८ (तहउत्तरोचव ) तथा उत्तराषाढा १६ (अभिहीसवणे धणिहा ) अभिजित् २० श्रवण २१ धनिष्ठा २२ ( सत्तभिसय.दो अहोतिमद्द- चया) शतभिषा २३ पूर्वा भाद्रपद २४ उत्तराभाद्रपद २५ (रेवई अस्सिणि भरणी) खती २६ अश्विनी. २७ भरखी (एसा नखत परिवाडी) यही न- पत्रों की परिपाटी वर्णन की गई है (सेत्तं नक्खननामे ) यही नक्षत्र नाम हैं अर्थात् नक्षत्रों के नाम पर स्थापना नाम वर्णन किया गया है ॥१॥ (सीक देवयानामे २ ) (प्रश्न ) देवताओं के नाम पर नाम किस प्रकार से होता है (उत्तर) देवताओं के नाम पर नाम इस प्रकार से है जैसे कि (अग्गि देव- याहि जाए अग्गिए) जिसका अग्निदेव के समय जन्म हुआ है वह आग्नेय १ इसी प्रकार (अग्गिदिन्ने ) अनिदत्त २ (अग्गिसम्मे) अग्निशर्म ३ (अग्गि धम्मे ) अमिधर्म ४ (अग्गिदेव) अग्निदेव ५ (अग्गिदासे) अग्निदास ६ ( अ- गिसणे ) अग्निसेन ७ (अग्गिरविखए) अग्नि रतित ८ (एवं सव्वनक्खत नामामाणियन्या ) इसी प्रकार सर्व नक्षत्र देवों के नाम पर नाम कहने चाहिएँ इसलिये ( इत्थंपियसंगाहणिगाहाउ ) इस स्थान पर भी संग्रहणी गाथाएँ कही जाती हैं क्योंकि अष्टाविंशति नक्षत्रों के अधिष्ठाता अष्टाविंशति देव हैं जिनके नाम निम्न गाथाओं में दिखलाए जाते हैं तथा उक्त आठ २ नाम देवों के नाम पर लोग नाम संस्कार करते हैं (अग्गि पयवइ सोमेरुद्दे ) अग्नि ? प्रजापति २ सोम ३ रुद्र ४ (अदिति विहस्सई ) अदिति ५ वृहस्पति ६ (सप्पेपिउभग अ- • ज्जम) सर्प ७ पितृ = भग ६ अर्यमा १० ( सवियातहावाउय) सविता ११ स्वष्ठा १२ वायु १३ (इन्दग्गी मिताइन्दोनिरत्ती ) इन्द्राग्नि १४ मित्र १५ इन्द्र १६ निर्जति १७ (आउविस्सोय वंभविएहय) अम्भः १८ विश्व १९ ब्रह्मा २० विष्णु २१ ( वसुवरुणअयविवद्धि ) वसु २२ वरुण २३ अज २४ विवर्द्धि २५ (पुस्सो आग्गि- जये चेव) पूषा २६ अग्नि २७ यम २८ (सेतं देवयानामे) सायही देव नाम हैं अर्थात् अष्टाविंशति नक्षत्रों के अधिष्ठाता अष्टाविंशति देव' हैं यदि उन देवों के नामों पर नाम स्थापन किया जाये तब उनको देव नाम कहते हैं ॥ २॥ अब कुल नाम का विवर्ण करते हैं (सेकित कुल नामे ) (प्रश्न ) कुल नाम किसे कहते हैं (उत्तर) उग्ग १ भोगा २ राइना खत्तिय ४ इक्खागा ५ णाया ६ कोरवा ७ सेत्तं कुल नामे ३ जिसका उग्र कुल में जन्म हुअा है उसको उग्र कुल कहते हैं ? इसी प्रकार भोग कुल २ राज्य कुल ३ में * अनुयोगद्वार सूत्र * (२८९) क्षत्रिय कुल ४ इक्ष्वाकु कुल ५ ज्ञात कुल ६ कौरव्य कुल ७ सो जिस कुल जिसका जन्म होता है उसी कुल के नाम से फिर उसकी प्रसिद्धि होजाती है येही कुल नाम हैं ॥ ३ ॥ (सेकिंतं पासंडनामे) (प्रश्न) पाषंड नाम किसे कहवे हैं (उत्तर) (समले पंडुरंगे भिक्खू ) श्रयण परमतादलम्बी पांडुरंगादि वस्त्रों के धारण करने वाले वौद्ध भिक्षु (काबालिएतावसेय) कपिल मतानु- यायी और तापस ( परिवायए ) परिव्राजक (सेतं पासंड नामे ) यह सर्व अन्य दर्शनीय पाषंड नामाश्रित हैं। (सेकित गण नामे २) (प्रश्न ) गण नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) मल्ले १ मत दिने २ मल्ल पम्मे ३ मल्ल सो ४ मल्ल देवे ५ मल्ल दासे ६ मल्ल सेणे ७ मल्ल रखिए ८) मल्लादि गण नामों पर जो नाम स्थापन किया जाता है वही गण नाम है जैसे कि मल १ मल्लदत्त २ मल्ल धर्म ३ मल्ल शर्म ४ मल्ल देव ५ मन्ल दास ६ मन्लसेन ७ मन्ल रक्षित ८ ( से गणनामे ) सो येही गण नाम है ॥ ( सेकितं जीवियानाम) (पश्न ) जीवक नाम किसे कहते हैं अर्थात् जिसका पुत्र जीवित न रहता हो वह पुत्र के जीवित रहने के वास्ते इस प्रकार से नाम स्थापन करता है (उत्तर) अवकरए १ उकुरुडिए २ सुप्पए ३ उझिर ४ कुज्जवए ५ सेत- जीवियानामे ) जैसे के पुत्र के जीवित रहने की इच्छा से जन्म हुए के पश्चात् पुत्र को कचरादि में गेर कर फिर उसका नाम स्थापन करना जैसे कि अवकरक १ उत्कुष्टक २ सूर्यक ३ उझित ४ कार्यापत ५ यह सर्व जीवित रहने को इच्छा से नाम स्थापन किये जाते हैं इसी को जीवित नाम कहते हैं ६ ( सेकि- तं अभिप्पाइय नामे २) ( प्रश्न ) अभिमायिक नाम किसे कहते हैं ( उत्तर) जो अपनी इच्छानुसार नाम स्थाएन किये जाये जले कि ( अवए निवए २ वबूल ३ पलासए ४ सिणय ५ पीलूए ६ करीर ( सेशंटवरणाप्पमाणे ) वृक्षा दि के नामों पर स्थापन करना यथा अंबक १ निवक २ बबूल ३ पलासक ४ सिनक ५ पीलु ६ करीर ७ यही सप्त प्रकार से स्थापना प्रमाग वर्णन किया गया है इसलिये स्थापना प्रमाण की समाप्ति हुई है। अथ द्रव्य प्रमाण विषय। सेवितं दब्बप्पमाणे २ छविहे पं० २० धम्मत्थिकाए जाव अद्धालमय ६ से दवप्पमाणे २ ।
(२६०) * अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ- सेकित्तं दव्यप्पपाणे २) ( प्रश्न ) द्रव्य प्रमाण किसे कहते हैं (उत्तर) द्रव्य प्रमाण पद् प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि धम्म स्थिकाय नाव श्रद्धासमय ६ सेसंदचप्पमाणे ) धर्मारितकाय १ अधर्मास्ति- काय ३ आकाशास्तिकाय ३ जीवास्तिकाय ४ पुद्गलास्तिकाय ५ समय ६ यही द्रव्य प्रमाण हैं क्योंकि जो अनादि सिद्धांत मे नाम वर्णन किए हैं वह केवल अनादि सिद्ध की अपेक्षा से वर्णन किये है और जहां पर द्रव्य अनंत धर्मात्मक होने से कथन किए गये हैं किन्तु पुनशक्ति दोष न जानना चाहिए तथा धर्म शब्द अन्यत्र कहीं नहीं जा सप्ता केवल द्रव्याश्रित धर्म रहता है इस लिये पुनिरुक्ति न जाननी चाहिये सो यही द्रव्य प्रमाण है। भावार्थ-प्रमाण नाम चार प्रकार से विवर्ण किया गया है जैसे कि नाम प्रमाण १ स्थापना प्रमाण २ द्रब्य प्रमाण ३ भाद प्रमाण ४ सो नाम प्रमाण उसे कहते हैं जो एक जीव और एक अजीव अथवा बहुत से जीप वा बहुत से अजीव वा बहुत से अजीव अथवा जीव अजीव दोना का प्रमाण नाम इस प्रकार से जो स्थापन किया जाता है उसे ही नाम प्रमाण कहते हैं अपितु स्थापना प्रमाण सात प्रकार से कथन किया है जैस कि नक्षत्र १ देव २ कुल ३ प पंड ४ मण ५ जीविका हेतु ६ और अभिप्रायिक नाम ७ सो इन्हों के कारण से जो नाम स्थापम किया जाता उसे ही स्थापना नाम कहते हैं जैसे कि जिसका कृत्तिका नक्षत्र में जन्म हुआ है उसका नाम कार्तिक १ छत्तिका दत्त २ कृत्तिका धर्म ३ कृत्तिका शर्म ४ कृतिका देव ५ कृषिका दास ६ कृत्तिका सेन ७ कृत्तिका रक्षित ८ इसी प्रकार २८ नक्षत्रों की कल्प ना कर लेनी चाहिए ॥ १॥ और २८ नक्षत्रों के अधिष्ठाता २८ देव हैं यदि उनके नामों पर नाम स्थापन किया जाय उन्हीं को देव नाम कहते हैं जैसे कि कृतिका नक्षत्र का अधिष्ठाता अग्नि नामक देव है उसी के नाम पर आने- यक १ अग्नि देव २ अग्नि दन ३ अग्नि शर्म ४ अग्नि धर्म ५ अग्नि सेन ६ अग्नि दास ७ अग्नि रक्षित - इसी प्रकार २८ देवों पर नाम स्थापन कर लेने चाहिये और उन १ भोग २ क्षत्रिय ३ राज्य ४ इक्ष्वाकु ५ ज्ञात ६ कौरव्य ७ इत्यादि कुलों के नामों पर नाम स्थापन किया जाय उसी को कुल नाम कहते हैं ३ जो श्रमण पांडुरंग मिनुका पालिक तापस परिव्राजक आदि के नामो पर नाम स्थापन हो उसे ही पापडनाम नाम कहते हैं ॥ ४ ॥ जो मल्ला- * अनुयांगद्वार सूत्र * (२६१) दि गुण के नामों पर नाम हो उसे गण नाम कहते हैं ५ तथा पुत्र के जी- वित रहने की आशा पर गुम को नेर देना फिर उसके अबकर उत्कुरुट आदि नाम रखते नही जीवित नाम है ६ अरसा गुण मिषन वा नो गुण नियन आदि को न विचारते हुए अपने अभिप्राय के अनुसार नाम रखे उसे अभि- प्रायिक नाम कहते है जैसे कि अंक १ निंदक २ बबूल ३ पलाशक ४ सि. नक पीलुक ६ करीरक ७ यही अभिप्रायिक नाम हैं और इसे ही स्थापना प्रमाण कहते है इसका पूर्ण विवर्ण पदार्थ में लिखा गया है और द्रव्य प्रमाण में पद् द्रव्य वर्णन किए गए हैं क्योंकि द्रव्य संशा उन्हीं की ही है इसीलिये यह द्रव्य संज्ञक हैं अब इसके आगे भाव प्रमाण का विवर्ण किया जाता है। अथ भाव प्रमाण विषय । सेकिंतभावप्पमाणे २ चउविहे पन्नता तंजहा सामासिए तद्धितए धाउय निरुत्तिय स्र्कतं सामासिए २ सत्तसमासा भवन्ति तंजहा दंदे अ १ वहुब्बीही २ कम्मधारए ३ दिगए ४ तप्पुरिसे अव्वइमावे ६ एमोले य सत्तमे सेकिंतं दंदे २ दंताच आष्टा व दंतोष्टम् १ स्तनों च उदरं व स्तनोदरम २ वलंच पात्रंच वनपात्रम् ३ अश्वा महिपाश्च अश्वमहिर्ष ४ अहिश्च नछुलंच अहिनकुलम् ५ से दंदे ॥ १ ॥ पदार्थ-(सेकित भावपमाणे उबिहे पनना तंजहा ) (प्रश्न) शिम्म कहता है कि हे पूज्य भाव प्रमाण कितने प्रकार से वर्णन किया गया है (उत्तर) गुरु ने उत्तर में कहा कि भाव मारण चार प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि सामासिक १ तद्विाज र धातुज ३ और नैक्तिक ४ भाव प्रमाण इन्हें इसलिये कहा गया है कि अर्थ के युक्त होने पर गुण उत्पन्न होता है सो गुण भाव में होता है मारा शब्द का अर्थ यह है " प्रमीयतेच्छिान निश्चयी क्रियते अनेनतत्प्रमाणम् " जिसके द्वरा पदायों का प्रमाण किया जाय अश्वा निर्णय किया जाय वेडी प्रमाण हैं सो इसीलिये शब्द दोध होने के लिये उक्त चारा का भाव ममाण मे रक्खा है, अतएव यह युक्ति संगन कथन है कि (२६२) * प्रयोगद्वार सूत्र * शब्द बोष होने से अर्थ बोध शीघ्र हो जाता है पुनः अर्थ बोध से गुण की प्राप्ति है गुण है सो भाव है इसीलिये यह भाव प्रमाण है ( सेकिंतं सनासिर २ सत्त समासा भवन्ति तंजहा ) ( प्रश्न ) सामासिक प्रमाण कितने प्रकार से वर्णन किया गया है ( उत्तर ) सामासिक प्रमाण में सात समास होते है जैसे कि (दे १ बहुब्बीही २ कर्म धारए ३ दिए ४ तप्पुरिसे ५ अम्बई भाव ६ एग सेसेय सत्तमे ७) इन्द १ वहुव्रीहि २ कर्म धारय ३ द्विगु ४ तत्पुरुष ५ अव्ययी भाव ६ एक शेप येही सात प्रकार के ससास हैं क्योंकि समास शब्द का यह अर्थ है कि बहुत से पदों का एक पद किया जाय उसे ही समासान्त पद' कहते हैं जैसे कि " समसनं संक्षेपण परस्परा पेक्षयोः पूर्वोत्तर पदयो रेकत्वेनन्यसनं समासः" सो जो सम्मिलित हो कर पद उत्पन्न होता है वही सामासिक पद है अपितु वर्तनान समय के सब्दानुशासनों में समास षट् प्रकार से वर्णन किये गये हैं जैसे कि बकुन्नीहि १ अव्ययी भाव २ तत्पुरुष ३ कर्म भरय ४ हिगु ५ द्वन्द्व ६ तथा " परस्परा पेक्षाणाम् पूर्वोत्तरपदानां सुवंतानां कथं चिर्दकपद्यम् समासः" परस्पर की अपेक्षा से पूर्वोत्तर सुवंत पदों का एक पद किया जाय वही समा- सान्त पद है क्योंकि जहां पर अनेक सुवंत पद हों उनको एक पद में वर्णन किया जाय वही समासान्त पद है सो श्रव अनुक्रमता पूर्वक इनके उदाहरण दिखलाए जाते हैं जैसे कि (सेकित दंदेश २) (मश्न ) इन्द्व समास किसे कहते हैं (दंतोश्च ओशैच देतोष्टम् ) ( उत्तर ) इन्दू समास दो प्रकार से होता है एक अवयव प्रधान द्वितीय समाचार प्रधान सो यहां पर समाहार प्रधान के उदाहरण दिखलाए गये है जैसे कि दान्त और श्रोष्टों का समाहार करने से " दंतोष्टम् " ऐसे प्रयोग बन जाता है क्योंकि " प्राणि सूर्याङ्गम् " शा० ब्या० अ० २ पा० १ सू१०१ प्राण्यज्ञानां तू-जानां इन्दुः एकार्थोनित्यं भवत्ति पाणिपादम् शङ्ख पटहम् इत्यादि इस सूत्र से दंतोश रूप होकर फिर " अतोऽम्" शा.व्या. अ० १ पा० २ सू०-४ अकारान्तस्म नपुंसकस्य सन्वन्धिनोः स्त्रमोरमित्या देशो भवति फिर "मोणोऽमः " . पदस्य पष्टया स्थानेऽन्तेलः इन सूत्रों से " दंतोपम् " शब्द सिद्ध हो जाता है किन्तु यह दन्तोष्ट शब्द नपुंसक लिङ्ग का एक वचनान्त है और द्वन्द्व समासान्त एद है और (स्तनौच उदरंच स्तनोदरं ) जव स्तन और उदर का समाहार किया तब स्तनोदरस् प्रयोग सिद्धहुआ सो " प्राणि तूर्याङ्गम् " अतोऽम् इत्यादि सूत्रों की प्राप्ति है यह इन्द्व समासान्त पड़ है: ( वसच पानंच अनयोः समाहारः क्त्र पात्रम्) जव * अनुयोगद्वार मूत्र * (२६३) वस्त्र और पान का समाहार किया गया तब द्वंद्वी वा शा. व्या० १०२ पा० १ सू० ६३ इस सूत्र से वस्त्र पात्र प्रयोग सिद्ध हुआ फिर " अतोऽम् सूत्र से विभक्तायन्स पद वन पात्रम् हो गया त्था (अश्वश्व महिपश्च अश्व महिषम्। अन्व और महिप का जब समाहार किया गया "नित्य वैरावरे" शा० २-११०३ और मोऽणोऽम् इन सूत्रों से प्रश्न महिषम् प्रयोग सिद्ध हुआ क्योंकि यह सर्वद्धि पक्षान्त और इंदू समासान्त पद है फिर " अहिश्य नकुलश्च अहिनकुलं" सर्प और नकुल का जब समाहार किया गया " नित्य बैरावैरे " २-१-१०३ इस सूत्र के द्वारा अहि नकुल प्रयोग सिद्ध हो गया फिर "अहतोऽम्" सूत्र से अहि नकुलम् शब्द वना सो यह सर्व द्वन्द्व समासान्त पद हैं क्योंकि जिस समास में चकार बहुत बार आता हो उसे ही द्वंद्व समास कहते हैं अपितु "प्रत्यय स्यच सुपः श्लूक" शा० अ० २ पा० २ सू० १ समासस्य प्रत्ययस्यश्च निमित्त स्य सुपः श्लूक् भवनि इस सूत्र से समाहार करते समय सुप् प्रत्यय का लोप जाता है ( सेतं द्वन्द्वे १) सो यही द्वन्द समास अर्थात् । चकार बहुलो इन्द्रः जिसमे चकारों की संख्या अधिक हो वही द्वन्द्व समास होता है। भावार्थ-वंद्वसमास उसे कहते हैं जिस में चकारों का प्रयोग अधिक हो और मुख्यतया उसके दो भेद होते हैं जैसे कि अवयव प्रधान और समाहार प्रधान जिसके निम्न लिखित उदाहरण हैं जैसे कि "दन्ताश्च ओष्ठौच दंतोष्टम्" " स्तनौच उदरंच स्तनोदरम् ॥ "वस्त्रंच पाच वस्त्रपात्रम्" " अश्वश्च महिष अश्वमहिषम् " अहिश्च नकुलंच " अहिनकुलम् "इसे ही द्वंद्वसमास कहते हैं अर बहुत्रीहि और कर्म धारय समासों के विषय में कहते हैं। मूल- सेकिंतं वहुव्वीहीसमासे २ फुल्लाइममि गिरिमि छ डय कडयंबा सो इमोगिरी फुल्लिय कुडिय कयंवोसेतं बहुब्बीई समासे २ सेकिंतं कम्मधारय २ धवलोवसहो धवलक्सहो किण्हो मिग्गो किण्हमिग्गो र सेत्तो पडो सेतपडोर रत्तोपर रत्तपडो सेतं कम्मधारय ॥ ३ ॥ पदार्थ- (सेपित्तं बहुब्बीहीसमासे २) (प्रश्न ) बहुव्रीहि समास । कहते हैं (उत्तर) बहुमीहि समास तीन प्रकार से कहा गया है जैसे कि ) (२६४) * अनुयोगद्वार मूत्र * पदार्थ प्रधान. उभय पदार्थ प्रधान, अन्य पदार्थ प्रधान, किन्तु सूत्र में केवल स्- चना मात्रही उदाहरण दिया गया है जैसे कि ( फुल्ला इममि गिरिमि झुडयक- डयंवा सो इमो गिरी फुल्लिय कुडयंदो से पहुबोही रामासे ) विकसित हुए हैं जिस गिरिमें कुटज क्ष और कदंव वृक्ष सो यही गिरिविकसित कुटज कदवज है सो यही अन्य पदार्थ प्रधान का उदाहरण दिखलाया गया है और यह पद सप्तम्यन्त है और यही बहुव्रीहि समास होता है तथा यस्य येषां बहुव्रीहिः ॥२॥ सेकित कम्म धारय २ ) (प्रश्न ) कर्म धारय समास किसे कहते हैं (उत्तर) कर्म धारय समास द्वि प्रकार से प्रतिपादन किया गया है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्रधान प्रधान १ और पूर्व पदार्थ प्रधान २ अब इस समास के उदाहरण दि- खलाते हैं जैसे कि ( धवलो वसहो धवलवसो १ किएहोमगो किराहामग्गो २ सेतोपडो सेतपडो ३ रत्तोपडो रत्तपढो ४ से कम्म धारय समासे ३) धवल- श्वासौ कृपभश्च धवल वृषभः इत्यादि संभावना करलेनी चाहिये अर्थात धवल है जो वृपभ उसे "धवलपम" कहते हैं इसी प्रकार कृष्ण है जो मृग सो वही कृष्णमृग है २ जोधेत पर है उसेही श्वेतपट कहते हैं । रक्त (लाल) है जो वस्त्र वही रक्त वस्त्र होता है सो इसी का नाम कर्मधारय समास कहते हैं किन्तु इन सर्व पदों में “ विशेपणं व्याभिचार्ये कात्थं कर्म धारयश्च" शा० व्या० अ० २ पा १ सू ५८ व्यभिचारि विशेषणं समानापि करणं सुवन्तं विशेष्येण सुपा- समस्यते सच समासः तत्पुरुषसंज्ञः कर्म धारय संज्ञश्च और " जात महद् वृक्षा दुक्ष्णः कर्म धारयात् " शा० व्या० अ० २ पा० १ सु १५८ इन स्त्रों की प्राप्ति जाननी चाहिये सो इसे ही कर्म धारय समास कहते हैं। भावार्थ- बहुचीहि समास तीन प्रकार से होता है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्र- धान १ उभय पदार्थ मधान २ अन्य पदार्थ प्रधान ३ उत्तर पदार्थ प्रधान तो जैसे द्विदशानि वखाणि यह शब्द है उभय पदार्थ प्रधान जैसे " दिना पुरुषाः " शब्द हैं अन्य पदार्थ प्रधान जैसे कि " उपविशाः" शब्द है किन्तु सूत्र में केवल विकसित है यह गिरि कुटज और कदंवा वृक्षों से सो यह गिरि विकसित कुटज कदम्बज है अर्थात् वृक्षों से यह गिरि विकसित हो रहा है और गिरि के विषय वृक्ष विकसित हैं यह सप्सम्यन्त वचन है इसी को बहुवी हि समास कहते है १ और कर्म धारय समास भी दो प्रकारसे प्रतिपादन किया गया है जैसे कि उत्तर पदार्थ प्रधान १ और पूर्व पदार्थ प्रधान २ उत्तर पदार्थ * अनुयोगद्वार सूत्र * (२६५) प्रधान जैसे कि " नीलोत्पलम् शब्द है और पूर्व पदार्थ प्रधान जैसे कि "क्ष. त्रियभीरुः" इत्यादि शब्द जानने चाहिये किन्तु सूत्र में धवलजो है वृषभ सो कहिये धवल वृषभ १ इसी प्रकार कृष्ण मृग २ श्वेतपट ३ रपट ४ इत्यादि कर्म धारय समास के उदाहरण जानने चाहिये अब द्विगु और तत्पुरुष समास के विषय में विवेचन किया जाता है। अथ द्विगु और तत्पुरुष समास विषय । सेकिंतं दिगुसमासे तिरिण कटुगानि तिकटुयं १ तिषिण महुराणिति महुरं २ तिगुणोणि तिगुणं ३ तिपिण पुराणिति पुरं ४ तिण्णि सराणि तिसरं ५ तिषिण पुक्खराणि तियुक्खरं ६ तिणि विंदुयाणि तिर्विदुयं ७ तिण्णि पहाणि तिपहं ० पंच नदीयो पंचनदी ६ सच गया सत्तगयं १० नवतुरंगा नवा रंगं ११ दस गामा दसगामं १२ दस पुराणि दसपुरं १३ सेत दि गुसमासे १४ सेकिंतं तप्पारसे समासे २ तित्थे कागोथिकागो वणे हत्थीवण हत्थी २ वणे वराहो वणवराहो ३ वणे महिसो वणमहिसो ४ वणेमयूरो वणमयूरो ५ सेतं तप्पारसे समासे ।' पदार्थ- सेकिंतं द्विगुसमासे २) (मन) द्विगुसमास किसे कहते हैं (उत्तर) जो संख्यावाची शब्दों से समाहार किया जाय वही द्विगु समास होता है जैसे कि (तिरिणकटुगानि तिकटुग १) संख्या पूर्वोद्विगुः त्रीण कटुकानिसमाहृतानि त्रिकटुकं अर्थात् जब तीन कटुक वस्तुओं का समाहार किया तव त्रिकटुक शब्द सिद्ध हुआ जैसे कि झूठ, पीपल, मरिच ३ और इसी प्रकार (तिएिणमहु राणिति महुरं ) "त्रिणि मधुराणि समाहृतानि त्रिमधुरम्" जव तीन मधुर वस्तुओं का समाहार किया गया तव त्रिमधुर प्रयोग सिद्ध हुआ इसी प्रकार आगे भी संभावना कर लनी चाहिये जैसे कि ति पण गुणाणि तिगुणं ३.तीन गुणोंके समाहार से त्रिगुण शब्द सिद्ध हुआ (तिरिण पुराण तिपुरं) तीन पुरी के एकत्व करने . गुणाया. झीवत्रा प्रा० च्या० ०८ पा० सु० ३४ ॥
(२९६) * अनुयोगद्वार मूत्र * से तीन पुन (तिरिण संराणि तिसरं ) तीन सरों के एकत्व करने से त्रिसर (तिरिण पुक्खराणिति पुक्खरं ६) तीन कमलों के एकत्व होने से त्रिपुष्कर (तिरिण विंदुयाणिति बिंदुनं) तीनों विदुओं के एकत्व होने से त्रिविंदुक (तिरिस पहाणिति पहं तीन पंथों के एकत्व होने से त्रिपंथ और (पंचनदीओ पंचनर्दे) पंच नदियों के एकत्व होने से पंचनद ( सत्तगया सत्तगयं १०) सात हस्तियों के एकत होने से सप्त गज अथवा सप्त गदाओं से सप्त गदा (नवतुरंगा नवतुरंग) नर अश्वोंके एकत्व होनेसे नव अश्व (दसगामा दसगाम ) दशनामों के मिलने से दशग्राम ( दसपुराणि दमपुरं १३) दशपुरों (नगरों) के एकत्व होने से दशपुर इत्यादि सर्व शब्द सिद्ध होते हैं क्योंकि "संख्या समाहारेच द्विगुचाना- म्न्ययम् ।। शा० व्या० अ० २ पा० १ ० ६१ संख्यावाचि भुवन्त मेकार्थ सुबन्तेन समस्यते संज्ञायां तद्धित प्रत्यये उत्तर पदेपरे समाहारेच गम्यमाने सच तत्पुरुषः कर्म धारयो द्विशुसंज्ञश्चद्विगुर्ननाम्नि ।। इस सूत्र की सर्वत्र प्राप्ति है और इस सूत्र से ही सर्वत्र प्रयोग सिद्ध होते हैं ( सेत्तं दिगु समासे ४ ) सो पूर्व क- थित ही द्विगु समास है ४ अव तत्पुरुष के विषय में कहते हैं (सेकिंतं त- रिसे समासे २ ) ( प्रश्न ) तत्पुरुष समास किसे कहते हैं (उत्तर) तत्पुरुष समास दो प्रकार से वर्णन किया गया है जैसे कि पूर्व पदार्थ प्रधान १ और उत्तर पदार्थ प्रधान २ और इस संज्ञा कोही तत्पुरुष समास कहते हैं "अनच" यह शब्द पूर्व पदार्थ प्रधान है और “ दुर्जनः" यह उत्तर पदार्थ प्रधान है और उत्तर भेद इसके आठ होते हैं जैसे कि सात विभक्तियों से आठवां तब् तत्पुरुष समास होता है किंतु सूत्र में सर्व उदाहरण सप्तम्यन्त त पुरुष के ही दिखलाये गये हैं जैसे कि ( तित्थे कागोतित्यकागो) तीर्थ में जो काक रहता है वह तीर्थ काक होता है (वणेहत्थी) वन में जो हस्ती है उसे वन हस्ती कहते हैं २ (वणेवराहो वणवराही ३) वन में जो सूअर है उसे वन वराह कहते है ३ ( वणेमहिसो वण महिसो) वन में जो महिष है सो वन महिब कहा जाता है (वणेमयूरो वण मयूरो) वन में जो मयूर है उसे वन मयूर कहते हैं यह सर्व सप्तम्यन्त तत्पुरुष समासान्त पद है में सप्तमी शौंडादिभि " शा० व्या० अ० २ पा.१ सू० ५२ सप्तम्यन्तं शौंडादिभिः सुवन्तैस्समस्यते" इस सूत्र की सर्व प्रयोगों में प्राप्ति है (सेत्तं तप्पुरिसे सपासे ५) सो यही पूर्वोक्त तत्पुरुष समास है किन्तु यहां पर केवल एक सप्तम्यन्त के ही प्रयोग दिखलाए . गए है।
(२९७) * अनुयोगद्वार सूत्र भावार्थ-द्विगु समास में संख्या पूर्वक समाहार करने से पद होता है जैसे कि “ संख्या पूर्वोद्विगुः" त्रीणिकटुकाति समाहृतानि निकदुक १ एवंत्रीणि. मधुराणि समाहवानि मधुरम् २ प्रयाणां गुणानां समाहारः त्रिगुणम् ३ त्रीशिपुगणि समाहृतानि त्रिपुरम् ४ त्रीणिसरांसि समाहवानि विसरलं ५ त्रीणि पुष्कराणि समाहृतानि त्रिपुष्करम् त्रयो विन्दवः समाहृताः त्रिविन्दुकम् ७ त्रयाणां पयां समाहारः त्रिपथम् ८ इत्यादि सर्व प्रयोग द्विगु समास के जा. नने चाहिये ४ और तत्पुरुष के उत्तर भेद आठ हैं किन्तु यहां पर केवल सप्त- म्यन्त वचन हैं जैसे कि तीर्थ में जो काक है वह तीर्थकाक कहा जाता है ? वन में जो हस्ती है वह वनहस्ती २ वन में जो वराह है वह वनवराह ३ वन में जो महिष है वह वन महिष ४ वन में जो मयूर है वह वन मयूर ५ ये सर्व तत्पुरुष समास के उदाहरण हैं, क्योंकि सूत्र में केवल सूचना मात्र ही कथित है किन्तु सात त्रिभक्तियों के निम्न लिखित उदाहरण हैं मथमा पूर्वकायस्पति पूर्वकायः १ द्वितीया धर्मश्रितः धर्मश्रितः २ तृतीया मदन विव्हलः मद दिव्हलः ३ चतुर्थी रथाय दारु रथदारु ४ पंचमी सिंहात् भयः सिंह भयम् ५ षष्टीराज्ञः पुरुषो राजः पुरुषः ६ सप्तमी अक्षेषु शौडः अनशौंडः ७ कर्मणि कुशलः कर्म कुशलः इत्यपि नन् तत्पुरुष धर्मविरोद्धोधर्मः पापाभावः अपापस न अन्यः अनव इन्पादि प्रयोगों की संभावना कर लेनी चाहिये । अब इसके पश्चात् अव्ययीभाव और एक शेष समास का विवर्ण किया जायगा क्योंकि जो पदार्थ हैं उनके कोष के लिये समासों का दोष आवश्यकीय है क्योंकि फिर पदार्थ बोध शीघ्र हो जाता है। X अथ अव्ययी भाव और शेष समास का विषय । सेकिंतं अब्बईभावे समासे २ अणुगामा अषण- यं १ अणुगामं २ अणुफरिहं ३ अणुचरियं ४ मेतं अब्बई भाव समासे ६ सेकितं एगसेसे समासे २ जहा एगो पुरिसो तहाय- हवे पुरिस जहा वहले पुरिसा तहा एगो पुरिसो २ एवं करिता वणो ३ जहा एगो साली तहा वह साली सेत्तं एगसेसे समासे ७ सेत्तं सामासिए॥
(२९%) * अनुयोगद्वार सूत्र * पदार्थ-(सकिंतं अर्चई भारे समासे ) (मन) अव्ययी भाव समास किसे कहते हैं ( उत्तर ) अव्ययी भाव समास के निम्न लिखित उदाहरण जानने चा- हिए ग्राम के समीप जो ग्राम हो उसे अनुग्राम कहते हैं ( अणुणईयं ) जो नदी के समीप वा मध्य में हो उसे अनुनदी कहते हैं क्योंकि अनु अव्यय पश्चात् तुल्य अनुभव आदि अर्यों में होता है इसी प्रकार (अणुगाम २) ग्राम के समीप वा ग्राम के मध्य में जो हो उसे अनुग्राम कहते हैं २ (अणुफरिई ) साई के पास वा मध्य में जो हो वह अनुफरिहा होती है ३ (अणुचरियं ४) जो मार्ग के समीप हो वह अनुमार्ग होता है क्योंकि (शन्द प्रथा सम्यत्समृद्धिव्य र्याभावात्पया सम्प्रति सुप्पश्चायुग पद्यथा सक्साकल्यान्तेऽव्ययम् ) शा० न्या अ३ पा०१ सू० १८ और (समीपे ) शा. व्या० अ० २-१-१४ समीप वर्त- मानम् अन्वेतत्सुवनं समीपवाचिना मुर्वतेने सह समस्यते । सर्व उक्त प्रयोगों स्क सूत्रों की प्राप्ति है और इन सूत्रों से प्रयोग भली भांत्रि सिद्ध हो जाते हैं (सेत अब्बई भावे समासे ६) यही अव्ययी भाव समास है अब एक शेष समास विषय में कहते हैं (सेकिंत एग सझे २) (प्रश्न) एक शेष समास किसे कहत हैं (उत्तर ) जो सामान्य जाति के वाचक शब्द हैं उनका लोप कर जब एक पद शेष रह जाए उसे एक क्षेप समास कहते हैं किन्तु वह एक शेष पद पूर्व पदों को भी वाचक रहेगा जैसे कि पुरुषश्च पुरुषश्चेति पुरुषो पुरुष २ लिखकर विचन पुरुषों बना लिया इसी प्रकार बहुवचन की भी संभावना कर लेनी चाहिए तथा जातिवाचक शब्द होने से एक ही वचन होता हैं अथवा बहु वचन भी हो जाता है क्योंकि यह समास द्वन्द्व समास के ही अंतर्गत होता है इस लिये (समानामेका)शा अ०२पा०१सू०-१ समानां तुल्यायर्यानां शब्दानां मर्य- स्यसह वचने तेषायक एव प्रयोवव्या वक्रश्च कुटिचवको कुटिलौवा बहुवचनम- तंत्रम् " सुप्पसंख्पेयः शा० २ पा १ र २ इन सूत्रों से एक शेष समास होता है अब इस समास के उदाहरण कहवे हैं (जहा एगो पुरिसे तहा वहवे पुरिसा १ ) जैसे एक पुरुष है वैसे अन्य बहुत पुरुष हैं यहां पर एक शेष नाति वाचक होने पर किया गया है इसी प्रकार (जह यहवे पुरिसा तहा एगो पुरिसो.२) जैसे बहुत पुरुष होते हैं वैसे ही एक पुरुष होता है यह भी एक शेष समास है (नहा एगो साली नहा वहवे साली) जैसे एकशा ली है वैसे बहुत से शाली हैं ( एवंकरिसावणो इसी प्रकार सुवर्ण की मुद्राओं की भी संभावना कर लेनी चाहिये (सत्तं एगु सेस समासे सेनं समासिए) अथ * अनुयोगद्वार मूत्र * (२६६) शब्द पूर्ववत है तं शब्द पूर्व सम्बन्धार्थ में है सो यही एक शेष समास है और इसी स्थान पर समास की व्याख्या पूर्ण हो गई है इसी लिये यह सामासिक पद कहाते हैं। भावार्थ-अव्यवी भाव समास तान प्रकार से प्रतिपादन किया गया जैसे कि अन्य पदार्थ प्रधान १ पूर्व पदार्थ प्रधान २ उत्तर पदार्थ प्रधान ३ अन्य पदार्थ मधान दंडा दाड मुष्टा मुष्टि इत्यादि पूर्व पदार्थ प्रधान पारगङ्गे मध्ये समुद्रं इत्यादि उत्तर पदार्थ प्रधान सूपमति दधिप्रति इत्यादि और इनके उदाहरण अनुनदी १ अनुग्राम २ अनुफरियं ३ अनुवरियं यही दिये गए सो यही अव्ययी भाव समास होता है ६ और एक शेष समास उसे कहते हैं निसके अनेक पदों का लोप करके शेष एक पद रह जाए वही एक शेष समास होता है जैसे कि " समानामेक" इस सूत्र से वक्रो वा कुटिलौ इत्यादि पद बन जाते हैं तथा जातिवाचक होने से इन का एक पद भी किया जाता है सो यही एक शेष सपास है अपितु समासों का पूर्ण विवर्ण वैयाकरण जानते हैं तथा यह पूर्ण समास शकटायनादि व्याकरणों से जानने चाहिये सूत्र में तो केवल सूचना मात्र ही कथन है और हेमचंद्र कृत माकृत व्याकरण दीर्घ इस्त्रौ मिथोवृत्तौ " अ०८ पा० १ २०४ और " समासेवा" अ०६ पा०२मूह केवल दो सूत्र ही उपलब्ध होते हैं क्योंकि प्राकृत व्यारण में समास प्रकरण संस्कृतवत् माना गया है इसलिये समास बोध व्याकरण से अवश्य ही करना चाहिये ॥ प्रसंग वशात् एक अनुक्' समास भी जानना चाहिये जैसे कि "ओजोऽअस्सहोऽम्भस्तपसष्टः" शा. अ. २ पा. २ सू. ४ इस सूत्र से भोज साकृतमिति ओज साकृतम् इसी प्रकार अंज साकृतं सहसाकृत अभ्भ साकृतं तपसाकृतं इत्यादि विवर्ण अलुक् समासान्तर्गन जानना चाहिये सो सो जैन व्याकरणों से सगास प्रकरण अध्ययन करके फिर तद्धित प्रकरण पठन करना चाहिये इसीलिए अन सूत्रकार तदित के विपय में विवेचन करते हैं। अथ तद्धित विषय सेकिंतं तद्धित २ अष्टविहे पाते मंजाहा कम्मे १ सिप्पे २ सिलोए ३ संयोग ४ समीवहोय. ५ संजूहो ६ .
* अनुपाबहार सूत्र * इस्तरिया ७ बचणय ८ ततद्धितनामं तु अवविहं १ मेकि तं कम्मनामे २ ताहारए ठहारग प्रत्तहारए दोसिए पत्ति पोतिए कपासिए कोलालिए मंडवे यालिए सेतं कम्म नाये सेलिप्पलामे २ अच्छिए तंतो २ तुन्नाए ३ तं- तुदाय ४ पटवाए ५ उपट्टे ६ वल्डे ७ सुंजकारए ८ कठ का- रए छत्तकारए १० वम्भकारए ११ पोत्थकारए १२ चित्त- कार र दन्तकारए १३ सेवकारए १४ लेपकारए १५ को- टिमकाए १६ तेत्तं सिपनामे सेवितं सिलोगनामे २ सपणे माहये सवातिही सत्तं सिलोगनामे २ सेकिंतं संयोगनामे २ रनो समुरए १ रन्नो जामाउए २ रन्नो सालए रन्नोदुए ४ रनोभगपीपई ५ सेकं संजोग नामे ।। पदार्थ-(सेक्षित तद्धितर २ विदे पं० २०.) (प्रश्न) तद्धितज किसे कहते हैं (जर) जो तद्धित मत्ययों के लगने से नाम उत्पन्न होता है उसे नद्धिनज का है किन्तु वह नतिज नाम आठ प्रकार से वर्णन किया गया जैन कि जो कर्म नाम उत्पन्न होता है उसे कर्म नाम कहते है इसी प्रकार शिल्प नाम २, लोक नाय ३, संयोग नाम ४, समीप नाम ५, संयुय नाम ६, ऐशय नाम ७, अपत्य नाम - जिसका सूत्र यह है कि (कम्मे । सिप्पे २ सिलोय ३ संजोग ४ सगीवाय ५ जुहो ६ ईसरीमा ७ बच्चणय ८) सो (तद्रियनानु अट्टबिहे १) नद्धित नाम पुनः आठ प्रकार से कहे गये हैं अब प्रत्येक २ विषय में कहने है। प्रश्न ) (सहित कन्म नामे २)(प्रश्न) कर्म नाम किन कहते ( उत्तर } कर्म नाम के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं जैसे कि तलारए कठहारर) तृणहारक काठहारक यद्यपि प्रत्यक्ष भाव में नदिन प्रत्यय यहां नहीं दीखने हैं किन्तु उत्पत्ति कारण की अपेक्षा तद्धित प्रत्यय की प्राप्ति है इसी प्रकार ( पत्तहाररू) पत्रों के लाने वाला (दोसिए) दौषिक अहां पर टण् प्रत्यय की प्राप्ति है अर्थात् बन्न बेचने वाला क्योंकि दृष्य नाम चन्न काई (सौतिए) सौत्रिक ठम् प्रत्ययान्त सूत्र केचने वाला (कप्यासिए) * अनुयोगद्वार सूत्र * (३०१) कार्यासिक ( उण् प्रत्यय ) कपास का विक्रय करने वाला (कोलालिए) (ठणं प्रत्ययान्त ) कौल.लिक भाजन विक्रय करने वाला (भंड वेयालिए ) भांड वैचारिक (ठण पत्यय ) कांस्यादिक के विक्रय करने वाला (सेत्त कम्म नामे) यही कर्म नाम है इन में प्रत्यक्ष तद्धित प्रत्यय उपलब्ध नहीं होते किन्तु ऋषि प्रणीत होने से यह कथन सर्वथा माननीय है ( से किंत सिप्प नाम२) (प्रश्न) शिल्प नाम किसे कहते हैं (उत्तर) शिल्प नाम भी निम्न प्रकार से है (वस्थिए), वास्त्रिक बस के शिल्प का झाता इसी प्रकार (तंतीर ) तंत्रीवादनं शीलमस्येति तांत्रिकः अर्थात् जिसका वीणा बजाने का शील है वह तांत्रिक कहाता है (तुमाए ) इसी प्रकार तुनार (तंतुवाए ) तंतुओंके समाहार करने वाला (पट्ट वाए ) पट्टवायक (पट्टे) उपट्ट (वडे ) वरुट यह देश रुहि नाम जानने चाहिये ( मुंजकारए) भूज के कर्म कर्म करने वाले मुंजकार इसी प्रकार ( कह कारी ) काष्टकार (छत्तकारी) छत्रकार (वम्भकार ) वध्यकार (पोत्यकारए) पुस्तक लिखने वाला (चित्तकारी) चित्रकार ( दन्तकारए ) दान्तकार (सेलका रए ) पाषाण का कृत्य करने वाला (लेपकारए ) लेपकार (कोटिमकारए.) भूमि आदि को सम्पार्जन करके चित्रित करने वाला इत्यादि सर्व कर्म शिल्प -विज्ञान के अन्तभूत हैं (सेत्तं सिप्प नामे ) और यहीं शिल्प नाम है तद्धित प्रत्यय की प्राप्ति होने पर ही इन्हें तद्धित प्रत्ययान्त मानागया है ( सेकिंत सितोगनामे २ ) ( प्रश्न ) श्लाघनीय तद्धित नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) श्लाघा पूर्वक तद्धित नाम निम्न प्रकार से है जैसे कि (समणे माहणे सव्या तिही से सिलोगनामे ) श्रमण ब्रालण सर्व अतिथि इत्यादि श्लाघनीय नाम साघ्र पद में देखे जाने हैं किन्तु श्लाघनीय अर्थ की उत्पत्ति हेतुभूत अर्थ मात्र में तद्धित प्रत्यय होता है इसीलिये श्रमग भवं श्रामण्यं इत्यादि शब्दो में तद्धिव के "राय" आदि प्रत्यय संयोजन करने चाहियें सो यही श्लोक नाम है सो अब संयोग नाम के विषय में कहते हैं ( सेकित संजोग नामे) ( प्रश्न) संयोग नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) संयोग- नाम उसे कहते हैं जिसे संयोग पूर्वक उच्चारण किया जाय जैसे कि (रनोमुसुरए १) राजा का सुसुर (रनाजामाजए) राजा का जायातृ ( रनो साला ) राजा का साला (रन्नोदुए) राजा का दूत ( रनो भगणी पति ) राजा की भगिनी का पति है (सेत्तं संजो ग नामे २) सो यही संजोग नाम है क्योंकि सम्बन्ध में षष्ठी होती है इसीलिये.
(३०२) * अनुयोगद्वार मूत्र * पष्टी के प्रयोग हैं अथवा इन शब्दों में तद्धित प्रत्यय अप्रत्यक्ष है तथापि इनके हेतुभूत अर्थों में विद्यमान होने से सर्वथा माननीय हैं तथा पूर्वगत शब्द, भाभृन श्राजीदन अप्रत्यक्ष है इसीलिये स्वरूप के सम्यक् प्रकार के अवगमन होने पर भी यह कथन सर्वथा अशंकनीय है ।। भावार्थ-तद्धित प्रकरण आठ प्रकार से प्रनिपादन किया गया है जैसे कि कर्म १ शिल्प २ श्लोक ३ संयोग ४ समीप ५ संयूथ ६ ऐश्वर्य ७ और अपत्य - इन अर्थों में तद्धित प्रत्यय होते हैं सो क्रम से उदाहरण तृणहारक काष्टहारक पत्रहारक दौषिक पत्रिक सौत्रिक कार्यासिक कौलालिक भांड वैचारिक तथा शिल्प के उदाहरण वास्त्रिक तांत्रिक तंतुवाय पट्टवाय उपट्टे वरुड मुंजकारक काष्टकारक छत्रकारक वध्यकारक पुस्तककारक चित्रकारक दंतकारक पाषाण कारक लेपकारक कोहिमकारक श्लोक के उदाहरण श्रमण ब्राह्मण अतिथि संयोग के उदाहरण राजा का ससुर राजा का जामातृ राजा का साला राजा का दूत राजा की भगिनी का पति यह सर्व संयोग नाम हैं उक्त अर्थो मे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तद्धित प्रत्यय सूत्र विहित हैं क्योंकि कतिपय शब्दों के हेतु भूत अर्थो में तद्धित प्रत्यय होता है। अथ शेष तद्धित नाम विषय (सेकिंतं समीव नामे २ गिरिसमीवे नगरं गिरि नगरं १ विदिसाए समीवे नगरं विदिसा नगरं २ वेनाय समीवे नगर वेनाएनगरं ३ नगर समीवे नगरम् नगरायउं सेतं समीव नामे ५ सेकिंतं संजूहनामे २ तरंगवकारए । मलवईकारए २ अत्ताणुसहिकारए । विन्दुकारए ४ सेतं संजूहनामे ६ सेकिंत ईसारय नामे २ ईसरे १ तलवर २ माडंविए ३ कोडविए ४ इम्भसेट्टी -५ सेणाई ६ सत्थवाह ७ सेत्तं ईसरिय नामे : सेकिंतं अवच्चनामे अरिहंतमाया १ चक्कवट्टीमाया २ वल- * अनुयोगद्वार सूत्र * देव माया ३ वासुदेवमाया ४ रायमाया ५ मुणिमाया ६ वाय गमाया ७ सेत्तं अवञ्चनामे सेत्तं तद्धितए) पदार्थ-(सेकिंत समीवनामे २) (प) समीप नाम किसे कहते हैं ( उत्तर ) समीप नाम इस प्रकार से है जैसे कि (गिरिसमीचे नगर गिरिनगरम् १) जो गिरि के समीप नगर है वह गिरि नगर होता है और (विदिसासमीचे नगरं विदिसानगरम् ) जो विदिसा के समीप नगर है वह वैदिशा नगर है यहां पर अण् प्रत्यय है और (वेनाय समीवेनगरं वैनाय नगरं ) जो वेनानदी के समीप नगर है वोह वेनाय नगर है (नगरसमविनगरं नगरायनगरम् ) जो नगर के समीप नगर होता है उसे नगराय नगर कहते हैं ( सेत्तं समीवनामे ) यही समीप नाम है ५ (सेर्कित संजूह नामे ) (प्रश्न) संयूथ नाम किसे कहते हैं (उत्तर) संयूथ नाम के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं जैसे कि ( तरंगवइकारए). तरंगपतिकारक ( मलयवइकारए २ ) मलयपतिकारक २ (अत्ताणुसष्ठिकारए) आत्मानुषाष्टिकारक ३ (बिंदुकारए) विन्दुकारक (सेत्तं संयूहनामे ) यही संयूथ नाम हैं ( सतिं ईसारयनामे) (प्रश्न ) ऐश्वर्य नाम किसे कहते हैं (उत्तर ) ( ईसरे १ तलवर २ मांडविए) युवराज्य तलवर मांडचिक ( कोडं- विएइम्भेसेहि ) कौटुम्बिक प्रधान सेठ (सेणावई सत्यवाह ) सेनापति सार्थ वाह (सेतं ईसरियनामे ७) येही ऐश्वर्या नाम है इनकी उत्पत्ति में तद्धित प्रत्यय है ७ (सेकिंतं अवच्चनामे २)(मश्न ) अपत्य नाम किसे कहते हैं (उत्तर ) अपत्य नाम उसे कहते हैं जो पुत्र के नाम से माता का नाम प्रसिद्ध हो जैसे कि ( अरिहंतमाया १) यह अरिहंत की माता है अर्थात तीर्थंकरो अपत्ययस्याः सा तीर्थकर माता एवमन्यत्रापि सुप्रसिद्ध नामसिद्धं विशिष्यते अतस्तीर्थ करादि मातरो विशषितास्तदित नाम अतः प्रसिद्ध नाम के द्वारा जो अप्रसिद्ध नाम भी प्रकाशित हो जाए उसी का नाम अपत्य नाम है जैसे कि तीर्थकर देव के सुप्रसिद्ध होने से माता भी प्रसिद्ध हो जाती है इसी प्रकार (चक्कवट्टीमाया २) चक्रवती की माता( वलदेव माया) वलदेव की माता (वासुदेव माया) वासुदेव की माता ( रायामाया ) राजा की माता (मुणिमाया) मुनि की माता ( वायगमाया) वाचक की माता (सेत्तं अबच्चनामे सेत्तं तद्धितए) येही अपत्य नाम है और येही तदित नाम AM है ॥ (१०४) * अनुयोगद्वार सूत्र * नाम कहाते हैं किन्तु इन में आर्ष वाक्य होने से और सर्व प्रत्यय हेतुभूत अर्थो में विद्यमान होने से सवा माननीय हैं अब इसके आगे धातु का विवर्ण किया जाता भावार्थ-समीप नाम उसे कहते हैं जो किसी प्रधान वस्तु के समीप हो जैसे कि जो गिरि के समीप नगर वसता होवे उसे गिरि नगर कहते हैं ? जो विदिशा के समीप नगर हो वह विदेश नगर होता है २ अथवा जो नदी के समीप नगर वमता हो वह नदी नगर होता है ३ जो नगर के समीप नगर हो वह नगराय नगर है ४ इसे ही समीप नाम कहते हैं ५ अपितु संयूथनाम के निम्न उदाहरण हैं जैसे कि तरंगपतिकारक १ मलयपतिकारक २ आत्मा की पुष्टि कारक ३ विन्दुकारक ४ यह सर्व संयूथ नाम है क्योंकि समूह में संध्य नाम की प्राप्ति है और एश्वर्य नाम राजादि में होते है ईश्वर तलवर मांडरिक इभ्य सेठ सेनापति सार्थवाह इत्यादि ऐश्वर्यवाची नाम हैं ७ और अपत्य नाम उसका नाम है जो पुत्र के नाम से माता की प्रसिद्धि हो जैसे कि यह अरि हंत की माता है इसी प्रकार चक्रवर्ती की माता १ वासुदेव की माता वलदेव की माता राजा की माता, मुनि की माता वाचकाचार्य की माता यह अप त्य नाम हैं इसे ही तद्धित नाम कहते हैं किन्तु इस प्रकरण में उत्पत्ति रूप भाव में तद्धित प्रकरण माना गया है विशेष विवर्ण तो पूर्वो में था- अतः लेश मात्र है। यहां पर दिखलाया गया है इसलिये यह कयन अशक नीय है तथा वणों के अनंत पर्याय हैं इसलिये यह कथनं आदरणीय है अब इसके आगे धातु प्रकरण का विवेचन करते है। अथ धातु विषय । सर्कितं धाउए २ भू सत्तायाम् परस्मैभाषा एंध वृद्धौ स्प- र्द्धसंघर्षे गाध प्रतिष्टा लिप्साग्रंथेषु वाधृ रोट (लोडने) सेत्तं धातुए। नोट- जैन कवि कल्पगुम में लिखा है कि एपितु वृद्धौस्पर्दितु संघर्षे गाड् भवेत् मतिदा लिप्सी ग्रंथेषु रोटनेवाधृ और इन के अनुबंध के पृथक र फल लिखे हैं. :
* अनुयोगद्दार सूत्र * पदार्थ-(सेकितधाउए २) (प्रश्न) धातु कौन २ से हैं ? गुरु ने उत्तर दिया कि (भूसत्तायां) भूधातु विद्यमान अर्थ में होता है फिर उसके (परस्मैभाषाए) परस्मै भाषा में भवति भवतः भवन्तिः भवसि भवथः अवय भवामि भवावः भ- वामः तीनों पुरुषों के उक्त प्रयोग क्न जाते हैं किन्तु इनकी साधना निम्न प्र- कार से की जाती है भूधातु को रखकर "क्रियाोधातुः शा० च्या० अ०१ पा० १ सू० २२" इस सूत्र से धातु संज्ञा वांध कर "सति २ शा. व्याअ० १ पा० ३ सू० २१७" इस सूत्र से वर्तमान काल में लट् प्रत्यय होगया फिर "कृष्णोऽन्त्याम्" शा० अ० ४ पा० ३ सू० ४५ । लट् प्रत्यय को कर्ता में रख कर "लोऽन्य युष्मदस्मासुजितस्झिसिंप्यस्थीमव्यस्मस्" शा० अ० १ पा० ४ सू० १ । इस सूत्र से अन्य पुरुष मध्यम पुरुप और उत्तम पुरुप में अनुक्र- मता पूर्वक तीन २ प्रत्यय कर लेने चाहिये किन्तु लट्लकार में अकार और. कार की इसंज्ञा होती है शेष ल के स्थान में अनुक्रमता पूर्वक तिष् तस् कि सिप् यस् थ मिप् वम् मस् येह प्रत्यय कर लेने चाहिए फिर "कर्तरिशप् शा. अ० ४ फा० ३ सूत्र २० । इस.सूत्र से कर्ता में शप् का विकरण हो जाता है और श् और प् की इत्संज्ञा करके केवल अकार मात्र ही शेष रह जाता है नये भू-अ-ति ऐसे रुप हुआ फिर "अकिङ्घग्घेतौ" शो० अ०.४.पा.-२ १७ । इस सूत्र से एङ् और श् करके फिर “एचोऽध्ययवायाव" इस सूत्र से ओका अव होता है फिर "झोन्तः" १-४-८८ | इस सूत्र से झ मात्र को अंत आदेश कर लेना चाहिए फिर "प्रायव्यतः" शा० ४.२२३४ इस सूत्र से. मकार वकार के परवर्ती होने से अकार को आकार होजाता है तब इस प्रकार से उक्त रूप सिद्ध होते हैं और (एधवृद्धौ) (एधिवृद्धौ) एध धातु वृद्धि अर्थ में होता है और ( स्पर्द्ध संघर्षे ) स्पर्द्ध धातु संघर्ष अर्थ में होता है (गाध प्रति- छालिप्सामन्थेषु ) गाधृ धातु प्रतिष्ठा लिप्सा (इच्छा ) और संचय इन अर्थों में होता है (वार्थ विलोउने) वा धातु विलोउन अर्थ में होता है और फिर इनके दश लकारों में गण वा प्रक्रियाओं में भिन्न २ प्रकार से-रूप क्नाये जाते परस्मैपदी और आत्मनेपदी सेट् अनिदै सकर्मक अकर्मक भाव कर्म इत्यादि अनेक प्रकार से तिङन्त प्रकरण में धातुओं के भेद वा किये गये हैं और उपसर्ग वशात् धातुओं के अर्थों में भी परिवर्तन होजाती जसे कि हज हरणे धातु के उपसर्ग पूर्वक रूप आहार विहार संहार प्रहार परिहार इत्यादि प्रयोग * अनुयोगद्वार सूत्र * बन जाते हैं किन्तु इनका पूर्ण स्वरूप व्याकरण से देखना चाहिये स्त्र में तो, केवल सूचना मात्र ही कथित है (सेत्तं धातुए ) इसे ही धातु कहते हैं । 5 भावार्थ-धातु से जो नाम उत्पन्न हुआहो उसे धातुज नाम कहते हैं जैसे कि भूससायां-धातु के परस्मै भाषा में रुप बनाए जाते हैं इसी प्रकार एधि बृदोस्याद. "संघर्षे गा मातिष्ठा लिप्सा ग्रन्थेषु वा, लोडने इत्यादि धातु हैं इन का. पूर्ण-: बाँध व्याकरण के तिङन्त प्रकरण से हो सकता है दश लकार गण प्रक्रिया सकमक-धातुं अकर्मक धातु आत्मनेपदी उभयपदी इत्यादि विषयों का स्वरूप 'व्याकरणों से देखने चाहिये यहां पर तो केवल सूचना मात्र ही क्यन है और भाकृत भाषा में ए भुवेर्तो इव इवाः ॥ प्रा. व्या. श्र. ८ सू. ६. भुवो पातोहो. हु-हव आदे -शावा भवन्ति इस मूत्र से.हो हुम.इव येह तीनों विकल्प से आदेश हो जाते हैं जैसे कि होइ होंति दुवइ दुवन्ति हई हवन्ति पद में भगा- इत्यादि कयन भी उक्त व्याकरण से देखें अब नैस्क विषय में व्याख्या करते हैं। अथ निरुत विषय । (सेकिंतं निरुत्तिए मह्यां शेतमहिपः भ्रमति चरोतीतिभ्रमर) मुहुर्मुहर्ल सतातिमुसलं कपिरिवलम्बते कपित्थं चिच्च करोति खलंच भवति चिक्खलं उर्द्धकर्ण उलूक मेषस्य माला मेपला सेत्तं. निरुत्तिए सेत्तंभावप्यमाणे सेत्तं पमाणे सेत्तं दस नामे सेतनामे नामेति पदं सम्मत्तं ॥२॥ पदार्थ -(संकित्तं निरुत्तिए २) ( प्रश्न निरुक्ति किसे कहते हैं (उत्तर) तो वर्णों के अनुसार अर्थ किया जावे उसे निरुक्ति कहते हैं सो जो निरुक्ति पद हो उसे नैरुक्तिक पद कहते हैं जैसे कि ( मह्यांशेतेमहि ) जो पृथिवी में यन' करे वही माहिप है और (भ्रमति रौतिइतिभ्रमरः ) जो भ्रमण करता बा शब्द करे वह भ्रमर है ( मुहुर्मुहुर्ल सती.त मुसलं.) जो पुनः २ ऊंचे नांचे वे. ( पड़े ) उसे मुसल कहते हैं किन्तु मुश खंड ने धातु से (" वृषादिभ्य- त्").उणादि प्रकरण-पा. १ सू. १८८ इस सूत्र से कल प्रत्यय होगया तब तल शब्द सिर्द्ध कोकिन्तु ॥ शपोः सः ॥ इस प्राकृत के सूत्र से तालव्य कार के स्थान पर त्यसकार होगया तब : मुसल शब्द सिद्ध हुआ और प्रेरिव लम्बने करोति पतति च कपित्थं जो कपि की बाई धुन शाखा में ले- r . १ * प्रानुयोगद्दार सूत्र * ३०७ वायमान हमेचे और चेष्टा करै वायू के प्रयोग से कंपायमान होकर गिरपड़े उसे कपित्य कहते हैं और (चिच्च करोति खल्लं च भवति चिक्खल्लं ; पादों को श्लेष करने वाला और पादों का स्पर्श होकर कठिन करने वाला वही चिखल होता (ऊर्द्धकर्णः उलूक ) जिस के ऊर्ध्व कर्ण हो वही उल्लू होता है ( मेषस्य • माला मेखला ) मेप ( मुख ) की जो माला हो वोही मेखला है ( सेत्तनिरुत्तिए से भावप्पमाणे.) यही निरुक्ति है इसे ही भाव प्रमाण कहेत हैं ( सेत्तदसनामे. सेत-नामे यही दश नाम का स्वरूप है और यही नाम पद है। और इसी स्थान पर (नामेतिपयंसम्मत्तं ) उपक्रमान्तर्गत द्वितीय नाम द्वार का स्वरूप सम्पूर्ण दुबा है अब इस के अंतगर्त तृतीय प्रमाण द्वारके विषय में व्याख्याकी जाती है। भावार्थ-निरुक्ति उसे कहते हैं जो वर्षों के अनुसार अर्थ किया जाय जैसे कि मशित महिषम् जो पृथ्वी में शयन करे वही माहिष है जो भ्रमण करता हुआ शन्द करे सो अमर पुनः २ ऊँचे नीचे गिरे सो मुसल कपि की पाई चष्ठा करे सो कपित्य पादों का स्पर्श करे उसे चिक्खल करते हैं ऊर्ध्वकर्ण होने से उल्लू और मेरस्यमाला मेखला बेह, सब नरुक्तिक पद हैं क्योंकि सुरपसर्ग. शोभन अर्थ में आता है और नृ शब्द का प्रथमैकवचनांत "ना" होता है तब सुना प्रयोग सिद्ध होगया फिर सीर (लांगलहल ) का नाम है इसलिये जिसके आप में अप्लांगल है उसे सुनासीर काते हैं तथा अनासीर मांस यह भी शब्द नैरुपक है तथाअस्मद शब्द के द्वितीया के एक बचन में "म" वान्द रूप बनता है और अन्य पुरुष के एक वचन में सः रूप होता है दोनों के एकत्व होने से (मांस ) प्रयोग सिद्ध होगया इस का तात्पर्य यह हुआ कि जिसको मैं खाता हूंबह मुझे खायगा सो इसी का नाम निरुक्ति है और येही भार प्रमाण- ह और इसी स्थान पर दशनाम का स्वरूप सम्पूर्णहो गया है अतःउपक्रमान्तर्गत द्वितीय नाम द्वार की समाप्ति है इस के आगे प्रमाणहार के विषय में कहते हैं। * वागमोवणं विपर्ययश्च द्वौचापरौ बयाचिकार नागौ। पातोस्तदतिशयन । योगस्तदु ध्यते पर विष निरु.॥ वर्णागमो गवेन्द्रादौ सिंह वर्मविपर्यय । पोडशादी विकारास्स्मारनामारा: सोरे. २ वई नाश विकाराभ्यां धातोरतिशयेनय. योगस्तदुग्यते प्राहमयूर अमरदिपु . ३ ॥ अविहित लोपागमादेश विकाराः सिष्टमाइज्यमाना: अव रूपेशानिरप्रतिशतीति अरवपः इति हिसु हिसायामिति धातोरुत्पत्रस्वादाहिनस्तीति सिहइति कार विपर्ययः विकार परिवाना यथा पातशेरपत्र दकारस्य दकारः । महा रौतीति मयूरः । अन्न महाशब्देकारस्य नाश हफारस्व विकारोयकारः रूपातो. जर इत्योदशः । भूमन् भ्रमर । नलोपोरू शब्दस्यरादेशश्च ॥ . - शोभनना सीरमग्रयानमस्प शुनासीर'शु पूजामान बरवायपादिरपिाइन्द्रस्यनामाइतिहमः । टीका निरन्तर व्यारव्या इति हैमः टीकाति गमयरक्षयान् टीका सुपमाणं दिनमा प निरतर व्याख्या यल्या सातथा ॥ बिंगा भव्यामुकम् । .. .
॥ अथाऽस्मदीया गुर्वावलिः ॥
श्री वर्धमानस्यमहेशितुर्वे ह्याचार्य मुख्यस्य परात्मनश्च ॥
शिष्य प्रशिष्यादि परम्परायां वस्त्येव चेयं गुरुनाममाला ॥१॥
सुधर्मगच्छस्य प्रधानरूपा आचार्यवा यतिधर्मनिष्ठाः॥
श्रीपूज्यपादामरासंहवाच्या वन्द्याः सदैवापि ममात्र सन्तः॥२॥
तच्छिष्यभूतास्तु तदीयगच्छे आचार्यपदवीमनुलब्धवन्तः ॥
श्रीपूज्यपादाभिधमोतिरामाः वन्द्याः सदैवापि मया महान्तः ॥३॥
तच्छिष्या यतिवाः स्थविर पदविभूषिता महात्मान : ॥
श्रीयुत गणपतिरायाः सुगणालच्छेदकावन्द्याः ॥ ४ ॥
तच्छिष्या मुनिवर्याः सुगणावच्छेदकास्तुजयरामाः॥
सन्तितुममगुरू गुरवः सदैव वन्द्यामहात्मानः ॥ ५॥
तच्छिष्या यत्तिवाः प्रवर्तकपदेनभूषितालोके ॥
ज्योतिषि कुशलाः श्रीमच्छालिग्रामाभिधागुरवः ॥ ६ ॥
तच्छिष्योऽस्मितुस्वल्पः पूर्वेषांपदसरोजमधुपोऽहम् ॥
आत्मारामानाम्नापाध्याय पदंगतः सोऽहम् ॥ ७ ॥
स्वप्रियशिष्यस्यैव ज्ञानेन्द्रोः प्रार्थनां स्वहदि धृत्वा ॥
व्याख्याकृता मययंत्वनुयोगदारसूत्रस्य ॥ ॥
ज्ञान प्रबोधिनी नाम्ना टीकेयंगिराकृता ।
ज्ञानचन्द्रस्यनामापि प्रकाशयतुसर्वदा ॥ ६ ॥
टीकेयं ज्ञानचन्द्रस्य स्मृतये रचितोमया ॥
कल्याणकारिणी भूयाव्यानां पठितानृणाम् ॥ १० ॥
करमुनिग्रहचन्द्र समेऽब्द के कुजदिनेखलु फाल्गुणशुक्लके ।
प्रथितजाङ्गलदेश इयायवै त्ववसिति नगरे वरुणालये ॥ ११ ॥
शुद्धाशुद्धि पत्रम् । पृष्टांक पंक्ति अशुद्ध २ १ २३ ५ २३ २५ २६ ३० ३२ ३२ चुयच । विय १४ w २२ २२ ४१ ४५ ४५ ५ १४ अईन् अहन् (जहाँ ) अणुराण (1) (वहां) अणुराणा (चाहिये) স্বাস্থ্য অথবা भाणे माणे जीव जान चुयचाविय सेत्तंनो भागमो सेत्तं लोइयं नो भागमों पएणवन्न परावण अणुचरावेवाइय अगुत्तरोववाइय স্থাখাগন্ধা अर्थाधिकार अणुंआगदाराणि अणुप्रोगदाराणि मच्छडीणं मच्छडीणं अस्साई सेत इमिवानुसार इंगितानुसार ओवको उचक्कम नाम २ पमाण ३ वत्तत्रया नाम २ पमाणं ३ वत्तमया दवणुपुन्नी दवाणुपुची संगाइस्सय संग्गहस्सय समो पारे समीयारे सत्रकार सूत्रकार संस्थानुपूर्वी संस्थानानुपूर्वी दुपएसियाई एयारणेगम एयाएणं गम समुक्कीर्तन समुत्कीर्तन द्रव्या अवत्त याइंच अवत्तव्ययाइंच अस्साइ से ૨ ५१ ५१ ३ ५१ ५२ ५२ ૫૩ २६ २६ २१ २२ दुपए सियई ५३ ३.
( २ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्टा पशि शुद्ध MAmAm ग ५७ ५७ ५४ ६३ ११ प्राणपुव्वी उप २० पद पिंशति भग आनानुपूर्वी भव्यत्ता भना समुकीर्तना २२ श्रदत्त एम द्वव्य ६ आणुपुदी दन्छ २२ प्रवक्तव्यय २४ স্বশ্ব सेक्षित दधयमाणं २०.२१ संज्जइ भाग ३ लोक भावे श्रानानुपूर्वी पञ्च सम्वद्धा ५-१० विधि २७ भागं १ भाग द्वार , ६४ ६५ आयुपुची ओय पट विंशति मंग अनानुपूर्वी अवतन्त्रए भंगा समुत्कीर्तना अवत्तव्यएय द्रव्य प्राणुपुछी दव्वेहि अबत्तन्दर अन्वन्तश्य से कित देवपमाणं संखज्जइ भागे लोक के भागे अनानुपूर्वी पंडुच्च नियमा सम्बद्धा केवचिरं भागे भाव द्वार उदइए भावे होज्जा श्रवत्तन्त्र रोगम अणोचणिहिया प्रवत्तवए भंगसमुक्किचाया प्रवक्तव्य अनानुपूर्वी नो उदइए होज्जा ६६ ६६ ७० ७१ ७३ ७३ ७४ ७५ ७६ -७६ ७६ ७७ ७८ अवतन्त्र ऐगय अणेव पिहिया २२ अवन्त्तवग २४ समुक्त्तिणया श्रवत्तव्य ५-६ अनानुनुपूर्वी ४. नो प्रवत्त- * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * दवपमाणं Co भाग गें २७ दन्दय माणं १७ | असंज्जेसु असंखेज्जेसु १८ संख्यत संख्यात २२ श्रवक्तव्य अवतव्य द्रव्य ८३ ६ भोगसु भागेसु ८३ १८ सरग इस्स १ णाणुपुत्री । आणुपुब्बी ८४ १७ भाग में २८ संग्रनय संग्रडनय -१६ एगइयाए एगाइयाए ८६ .१ अस्सिकाय अस्तिकाय ७ अन्नमवस्मासो अन्नमामासो ८६ १६ মাখন ८६ २२ ४+५+६ ४४५४६ ६ पुवाणुपुत्री पुवाणुपुत्री १ संगाहस्स संगहस्स परुबखया पवण्या ११८-१४ अणाणुपुच्ची अत्यि प्रणाणुपुन्नी ६२ ६ संखेरना संखेज्जा ६४ २६ / जयन्य जघन्य २ अनानुपूरी १६ अवत्तबगदबग दवाई अवत्तबगदवाई ६६ २०-२१ / संगाहस संग्गहस्स २३ गमववहाणं ऐगमयवहाराएं हेट २. परिणडिया उपरिणहिया १८ १२] पुन्वाणपुच्ची पुदाणुपुब्बी १] पुच्छाणुपुब्बी पच्छा पुच्ची तमप्पभा तमपभा तमप्पभा कुरा 8 | २० चंद २० चंद २०चंद पाचगान यावस्मात्र अनानुपूर्वी . ०२ * अनुयोगद्वार सूत्र * - पृष्टांडू पंक्ति अशुद्ध १०२ ११ हृदों है महस्सारे 8 आणएए १०३ | १० अचुए इसाप्यभारा पुन्वाणु पच्छाणु ६ पच्छापुत्री जहां (द्वि) है १०७ २२ द्विसम स्वस्थानों में १०६ २० अवक्तव्य नेय ११२, २१ (अन्न) सगय ११३ अस ११४ । ११ द्रव्यों ११४ २६ परस्पर २ आणा ५ तुडिय अडांगे सागरोवममे १२-१३, एक साचोछ्वास ११७ सोत ११८ । १४ पउमंग ११६ । २६ अन्नमन्भासो १२१ अजिय १२१ ५ सीपले १२२ २४ पुच्ची १२३ । २६ हरस्पर १२४ ५ सामचउरसे द्रहों. सहस्सारे आगए अच्चुए इसिप्पभारा पुव्वाणुपुब्धी पच्छागुपुवी पच्छापुची वहां (हि) चाहिये द्विसमय स्व स्व स्थानों में अवतव्य द्रव्य नेयव्यं (प्रश्न) समय प्रथ द्रव्योंकी पर आप तुहिए अडंगे सागरोचमे एक श्वासोच्छवास सात १ ३ पउ अंगे अन्नमनभासो श्राजिये सीतले. पुव्वाणुपुत्री परस्पर समचउरसे * शुद्धाशुद्धि पत्रम् , १ पृष्टांक पति अशुद्ध Burmamature Parkinnaahunarwwarvembraneer १२५ १७ममयारी १२६ १५ भात्रों को निय भावाशा १३२११० १३५ : २० अजीनाम श्रगविह ; असिएग निहाय सनीनाम शादि शानिमिय निरिकम १३३ ३ । तिक्त नरहन एगिविंग T ११४ १४ १३५ । १०. ជូខ្មែ १३५ १६ बराबस्सा वरागराइ १३७ । पाठ में , पंचंद्रिय पंचिंदिय २३ सानिय संमुन्द्रिम १३६ ५ घलय यलपर १४४ , १ गर्नभ गयन १४४।१० थगि अग्गि मृय भूष १४५ मझि मगिम विद्युत्कुमार = वायुकृपार ६ विकुमार ४ अनिमार : द्वीपमार ६ उदयिमार ७ ११७ २७ लोक देव देवताक १४३ १४० १० मुगिन्ध गुगभित्र १४६ ११ कामनाम दुगणकानद दृमण्डकाला दिगकुमार पायुकुमार ६ लहियवन्न नारियन - m १५२ १३ . विराह पगुण १५५ ३ १५५ १७ , निए . निरास विराह नकारांत विभन्नत - १५७ १५ । । विराट जानन वियन ( ६ ) * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्णाङ्क पंक्ति জ शुद्ध- स्वरस्योढते कृपादौ डकार विभक्त्यत घोड़े का मिश्रज यूयम् ८ १६१ १६२ ४ १६२ २८ १६४ १६४8 १६६ २ १६६ १६६ १३ १६६ २२ १६८ ८ १६८ २० १६८ २३ २४ १६॥ 8 १७३ ४-५ १७४१ १७४ । १३ स्वरस्योद्धृते कृयादौ उकार विभक्तियांत गोड़े का मिस्वज युयम् मिस्त्र दशविहंपि लिंगाक्रम प्रत्पों श्रा, कृतोऽषश्या: व्यापून कष्ाड उवमें भागमें सात्रय पलभानुमानचं द्विताय अन्यवय कुटम्ब स्वः अव्यम् अनुवतते, अकीर देवदन्तेन हगद्य सेंक्तिं उच्चसमे खाणवयणे लाभ अतराय अहएई नाणावरीगज्जे शरीर गोव गवं परिची बुडे मिश्र दसविपि लिंगत्रिक प्रत्ययों औ, कृतोऽषष्ट्याः व्यात कपण्डे उवमे अगमे सादृश्य पलम्भानुमानंच द्वितीय अन्वय १७७, १२ १७८ । २४ १८० १८६ ११ १८४ १२ २०२ २०४ १६ २ २०५ २१ २०७ १२ २०८६ स्व: अव्ययम् अनुवर्तते, अतरि देवदत्तेन ६ गद्य सेकिंत उपसमे खीणवयणे तामांतराय अण्इं नाणावरणिज्जे सरीरंगोवंग बंधण परिनिबुडे * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * ( ७ ) ময়ঃ पृष्टांङ्क पंक्ति २०८६ २०८ २३ २०४ २०४ १३ २०६ । २३ २१० २१० २१० २१० उपभोग caloremmer पाराहा वागरे २१०७ २१० २१० 8 २११ । १७ २१२ । १६ २१२१ २१२ ५ २१२ २६ २१२ २६ २१३ २ २१३ ४ २१३ ६ २१३ २१३ १५ २१४ । १३ २१४ २१४ १८ २१४ । १६ २१४ २२ प्रागवत प्राग्वत् सभ्यत्व सम्यत्व खोवसीमए खोवसमिए खोवसीमया खोवसपिया श्रीव भोग घणिदिय घाणिदिय . जिंभिदिय जिभिदिय पारणत्तिधरे पण्पत्तिधरे ओवासगदसा अंतग धो- उवासगदसा अंतगड दसा दसा ३६ अणुनरो ३६ अणुत्तरो पएहावागरे नवपुवधेर नवपुबघरे जो जात्र नाणावरिणज्जस नाणावरणिज्जस्स लद्धाई लद्धी ६ समायिक चरित्र सामायिक चारित्र सम्पराग चरित्र सम्पराय चारित्र रसनेंद्रिय रसनेंद्रिय फो सिंदिय फासदिय समयांग समवायांग नामा नाया अणुत्तरोवा वाइ अगुत्तरोव वा पराइ वागरे पण्डवागरे पादमान यावन्मात्र पारिवामिण्य पारिणामिय जुन्नासुरा जन्नसुरा इंद्र घरां इंद्रधणू पापालो पायालो नारणपपाएप श्रारण्य पारण्य श्रारणाप अच्चुरा श्रारणाय अच्चुए इसाप्पभाए इसीप्पभारा २१४ । २२ (६) * अनुयोगद्वार सूत्र * पृष्टाङ्क पंक्ति স্ময় Bar २१५ १२ अनादि अयादि अनादि २१५ १२ नयापेक्षपा नयापेक्षया २३ पर्याप पर्याय २१६ ૨૨ नायापेक्षा नयापेक्षा २१६ / २३ चूलहैमवंतादि २२० बउसान्त उपसंता २२२ समम्यक्त्व सम्यक्त्व २२२ २७. उशपम उपशम २२३ । १९ संयोग दो संयोग २२३ २० अमिनु अपितु २२३ भंगवन्तो भगवन्तों २२४ ११ उनस-. उसीमय २२५ ६ उषसन्ता उसंता २२९ इंन्दियाई इंदियाई २२९ १६ उवससमिय उपसमिय २२8 पीरणीमउ पारिणामिए २३१ अस्तित्व अस्तित्व २३४ १ सेठित २३४. है प्रकृतियांच प्रकृति पांच २३५ अत्तरगत अंतर्गत २३५ १२ रिसमे रिसभे २३७ १-२ | मज्जपजीहाए मज्झजीहाए २३७ २ (मन्त्रिपपर) मझिम २ २४१ २-३ | नविराणस्सइ नबिएणस्सइ ४४२ १८ मंत्ताउ मंताउ २१४ १६ | जंघाचाए जघाचरा २४४ २६ गंधार नामे गंधार गामे २४५ ३ | मुच्छरणाओ मुच्छणाओं सतमा सत्तमा २४५ ६ उतर गंधारा पुण सायं उत्तर गंधारा से दिउ १० . - च मिया पुण सा पंचमिया * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * पृष्ठाक पंक्ति স্মথুন उच्छ्वास होता है . मायामा ७ / मायामी २४५ २४५ उत्तारायता उत्तरायत्ता २४६ १०-११ / इबई मूळ हवाइ मूच्छा २४७ १० (नामीनो) (नाभीओ) नाभीसे २४७ १२ उच्छ्वास है गीतों के उच्चास १२ गीतों के पद पद में उच्छ्वास २४७ २४७ २२ . समुन्ध समुन्ध २४७ २२ अबल्याण प्रसाणे २४७ २३ तन्निवि तिनिधि २४८ २४ मुणे पन्न मुणेय २५० २. सिरपसत्यं समंतार समलय सिरपसर्थ तालसम लयसमं समंगेह समंच गेहसमं च कद्ध वद्ध १४ २५ २५१ निहोसे सारवत निदोसं सारमंत २५२ २३ दुपं दुयं ૨૫૨ २३ केसी केरिसी २५४ ६ ससम्पत्तं सम्मत्तं २५५ १ बट्टीस्सामिवायेण , सत्तमिछट्टी सस्सामिवायणे सत्तमी सन्निहा- २५६ ७ वत्ति अवत्ति २५७ १८ सबंध संबंधे ७ आमतणी आमंतणी २५८ स्त्रोऽनित्पाट: १स्त्रोऽनित्पादः २५ १४ मांव है वही काव्य है २५६ वीर भाषा माग्रा २६० हिनि ही नि- १८ दाणेतवचरणा दापतवचरण २६० । १६ अणस्णुं अण २६१ . ७ शास्त्र सिनिहा- - भाव है वीर रस २६०, * अनुयोगहार मृत्र * - पृष्ठांक पति अशुद्ध । २६३ २५ २० . चिता संजोग धन्ना वितरण प्पणमि २६७ ' २२ नित संजोगा घना निलंबण पणनि वर्ष पएहय सभवो . बंध २६६ २७० २ ३ २ १ ५ पम्हाण संभयो मकिन गांग २ । 7 १३ सकिनं गाण २ खमईनि मा पनि नवणो जल. जलपो पकडनि पश्गी से गोएण। सेकिंतं नोगुराण, : कुंता सकुंनो अमुग्गो समुन । अयथार्थ खड मंडन संवाद विसं मुम्भप मत्तवरण वणे सिई श्रयायः खड पंडव मराह विम सुम्पप মাল मिमिदं २७४ २७४ १८ १६ ह . गई -- २३ १६ २९ मिहिलियं अवयवेणी अनाभून मिहस्सए सुसुममुगुमाए दृममसुमुसमाप महिलिये अवयवेणं अन्तर्भून मीसए सुखमयुसमाए दुसमसुसमाप दुममाप दुसमदुमाए अपसन्ध २८१ २-१ १० अमन्ये (११) * शुद्धाशुद्धि पत्रम् * शुद्ध স্ময়ুর १५ २१ १ ४ ४ काहा अप्रस्त संयोगन काल अप्रशस्त संयोगज जन्य देवय दा अ प्रधान १ १५ TRE दवय दा अ प्रधान प्रधान १ तिगुणाणि मधुरम् पुरिस न्यारण सजाहा ततद्धिननाम वम्भकारए तिरंगकारए तिनि गुणाणि त्रिमधुरम् पुरिसा व्याकरण तंजहा तद्धितनाम वज्झकारए | तरंगवइकारए १७ २२ दार ६ २० - " उपकार। निम्न लिखित महानुभावों ने इस सूत्र के प्रकाशन कार्य में निम्न लिखित आर्थिक सहायता प्रदान की है जिससे हम उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हैं। २५१) श्रीमान् सेठ महावीरसिंहजी साहेव रईस पाटीदार-हांसी. १००) सेठ वालमुकन्दजी साहब सतारा. ५१) सेठ मंघजी गिरधरलालजी साहेव-छोटीसादड़ी. ५०) सेठ राजमलजी साहेव ढढा वेंकर-मद्रास. ५१) लिखमीचंदजी साहेब डागा-बीकानेर ५०) जेकीमल्स एन्ड सन्स-जालंधर. ५०) हीरालालजी साहब बहोरा-बगेरा. ५०) उदैचदजी साहब डागा-बीकानेर. ५०) मा० साहब भुरीवाई-मंदसोर. श्री अनुयोगद्वार सूत्रका यह हिन्दी अनुवाद श्रीमदुपाध्यायजी मुनि आत्मारामजी महाराज ने मेरी व स्वर्गस्त पं० मुनिश्री ज्ञानचंद्रजी की प्रार्थ एर उन प्राणियों के हितार्थ जैन सूत्रों के पठन पाठन की सुविधा के लिये कि है कि जो धार्मिक साहित्य को पहना चाहते है इसकी प्रस्तावना पढने ये है और इस सूत्र के पठन पाठन के लिये यह एक कुंजी है, जिससे सूत्रका भलीभांति प्रकट होजाता है. मैं विद्वान् लेखक का उनके प्रेम के लिये बड़ा आभार मानता हूं और मेरी प्रार्थना को स्वीकार करके श्री अनुयोगद्वा हिन्दी अनुवाद को पूर्ण किया इसलिये मैं उनका ऋणी हुँ । स्वर्गस्त पं० ज्ञानचन्द्रजी कि जिन्होंने इस अनुवाद के प्रारम्भ में परिश्रम किया था और जो तमाम जैन सूत्रों का सरल, शुद्ध और में अनुवाद किया चाहते थे उनके स्वर्गवास से इस काममें बहुत कुछ बाधा हु उपाध्यायजी महाराज ने पदार्थ भावार्थ समेत तय्यार की हुई का हरफ बहुत सूक्ष्म होने से कम्पोमीटरों की सुविधा के लिये इसकी फे गानि अक्षरशः नकल करने की आवश्यक्ता थी सो लुधियाना निवासी गेंदामल रामरतनदास रईस व चौधरी और लाला मीड्डीमलजी पाबूल रईस ने उसकी नकल करने को द्रुव्यकी सहायता प्रदान की इसलिय पंज जन संघ आपको धन्यवाद देता Parmanand B.A. Pl Chief Court (Pul मृदु।
No text on this page.