Svclrc

Padartha Ratna Manjusha

Krishna Mishra · 11/13/2002

PDF Proofread

Front matter

राजस्थान पुरातन नाममाला प्रधान सम्पादक पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य [সমৰ সম্বল, জখন হাসি লিস্তান, অদৈ] ग्रन्थाङ्क ३८ प० कृष्णमिश्र विरचिता पदार्थरत्नमञ्जूषा नि -Ram- ----- प्रकाशक राजस्थान राज्य सस्थापित राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर (राजस्थान) RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE, JODHPUR

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक
-
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
[सम्पान्य सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या पतिष्ठाम, जोधपुर
ग्रन्थाङ्क ३८
प० कृष्णमिश्र विरचिता
पदार्थरत्नमञ्जूपा
*
1
4
प्रकाशक
राजस्थान राज्य सस्थापित
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE, JODHPUR

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामा यत अखिल भारतीय तथा विशेषत राजस्थानदेशीय पुरातनकालीन
सस्कृत प्राकृत, अपभ्रश राजस्थानी, हि दी प्रादि भाषानिबद्ध
विविध वाडमयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्र थावलि
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचाय
सम्मा य सचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर,
प्रानरेरि मेम्बर आफ जमन ओरिए टल सोसाइटी, जमनी,
निवत्त सम्मा य नियामक ( प्रानरेरि डायरेक्टर )
भारतीय विद्याभवन, बम्बई, प्रधान सम्पादक,
सिंघी जन ग्र थमाला, इत्यादिG BOOK
No
Um
नंग
AAAAP
SVO Collegi
Libraru
TIPATI
ग्रन्थाङ्क ३८
प० कृष्णमिश्र विरचितम
9678
12/
Acc
पदार्थरत्नमजपा
ut
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )

प० कृष्ण मिश्र विरचिता पदार्थरलमजपा सम्पादक पद्मश्री मुनि जिनविजय प्रवशक लेखक प० श्री दलसुखभाई मालवरिया अध्यक्ष- लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यार्मावर अहमदाबाद प्रकाशनकर्ता राजस्थान राज्याज्ञानुसार सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर ( राजस्थान) विक्रमाब्द २०२० खिस्ताब्द १९६३ भारतराष्टयी शकाब्द १८८५ प्रयमावत्ति ५०० मूल्य ३७५ मुद्रक-मूल पाठ और परिशिष्ट स्वतत्र भारत प्रस पटना । मुखपष्ठ वक्त य और श्लोकानुक्रमणिका प्रादि के मुद्रक- श्री हरिप्रसाद पारीक, साधना प्रेस जोधपुर । ad विषय - सूची प० स० १ १ २ २ ३ १ ३ विपय प्रधान सम्पादकीय किञ्चित वक्तव्य प्रवेशक प्रथम द्र यारयपदाथवणनम द्वितीय गुणारयपदाथवणनम ततीय करियपदाथवणनम चतुथ सामा यारयपदाथवणनम पञ्चम विशेषारयपदाथवणनम ६ २६ ५ २७ २८ २६ ३० ७ षष्ठ समवायारयपदाथवणनम ३२ ३ ३३ है सप्तम अभावारयपदाथवणनम १० मोक्षरूपवणनम ११ परिशिष्टम १२ श्लोकानुक्रमणिका ३७ ३८ ३६ प्रधान सपादकीय किचित् वक्रव्य राजस्थान पुरातन न थमाला के ३८वे मणि के रूप मे यह छोटा मा पदाथ रत्नमजूपा' नामक प्रकरण न थ प्रकाशित हो रहा है। यह प्रकरण ग्रथ जपल मेर के एक भडार मे से ग्राज से कोई बीस वष पहले मुझे उपलब्ध हुआ था । इस ग्रथ की जो प्राचीन हस्तलिखित प्रति मुझे दष्टिगोचर हुई वह बहुत सुवाच्य अक्षरो मे लिखी हुई थी और उसका पाठ भी प्राय शुद्ध था। किसी अव्ययनशील विद्वान ने उस पर कुछ सशोधन प्रादि भी किया था। न थ का कुछ प्राद्यन्त भाग पन्ने से मुझे इस की रचना विशिष्ट प्रकार की मालूम दी और एक प्रकार से मेरे लिये अज्ञात सी प्रतीत हुई । मैंने उस प्रति पर से अपने साथी लेखको मे से किसी एक द्वारा उसकी प्रतिलिपि करवा ली और उसी समय मेरे मन में हुया कि कभी इस ग्रथ को प्रकाशित कर दिया जाय । सन १६५० ई० मे राजस्थान पुरातन न थमाला का काय मैंने प्रारम्भ किया तो मेरे मन मे इस ग्रन्थ को प्रस्तुत ग्र थमाला द्वारा प्रगट करने का विचार हुआ और तदनुसार मैंने जसलमेर मे बनवाई हुई प्रतिलिपि को प्रेस कापी के रूप मे ठीक कर के प्रेस में छपने को दे दिया। प्रारभ म मैंने इस ग्र थ की कोई अ य प्रतिलिपि, कही उपलब्ध हो तो उसको भी प्राप्त करने का कुछ प्रयत्न किया पर उसमे कुछ सफलता नहीं मिली और जो मात्र प्रतिलिपि मेरे पास थी उसी के आधार पर इस न थ का मुद्रण काय चालू किया गया। बाद मे ज्ञात हुआ कि पूना के भाडारकर ओरिएण्टल रिसच इ स्टीटयूट के ग्र य सग्रहो म काश्मीर की पुरानी शारदा लिपि मे लिखी हुई इस ग्रथ की एक पोथी है । तब मैंने उसको मगवाया अोर परिश्रमपूवक शारदा लिपि को पर कर इस न थ का मीलान किया। मीलान करते समय मुझे कुछ पाठ भेद भी दप्टि गोचर हुए परतु शारदा लिपि वाली वह पोथी अशुद्धिबहुल थी। इसलिये मैंने उसके पाठो का सग्रह करना निरुपयोगी समझा (शारदा लिपि वाली प्रति के अतिम पत्र का एक चित्र भी छपवा दिया गया जो इसके साथ सलग्न है) और जिस जसलमेर वाली प्रति के आधार पर इसका मुद्रण किया गया वही इस रूप मे प्रकाशित हो रहा है । इस छोटे से प्रकरण न थ को छपाने में प्रेस क विडबना पार विल बता के कारण बहुत दिनो तक प्रतीक्षा करनी पडी ।

[ २ ] पिछले कुछ महिना से मेरी शारीरिक स्थिति दुबल' एव क्षीण होती जा रही है। मैं अब अधिक लिखने पढने की स्थिति से वचित हो रहा है। यह ग्र थ यूही पडा न रह जाय इसलिए इसके विषय मे एक छोटा सा प्रवेश क लिख देने के लिए मैंने अपने विशिष्ट दशनशास्त्रज्ञ विद्वान मित्र १० श्रीदल सुख भाई से निवेदन किया और उ होने सहष मेरे निवेदन को स्वीकार कर जो प्रवेश क लिख दिया है उसी के साथ आज यह न थ विद्वानो के हाथो म उप स्थित हो रहा है। प० श्रीमालवणियाजी भारतीय दशन शास्त्रो के ममज्ञ विद्वान हैं । इहोने जन बौद्व एव हि दू दशन के अनेक मौलिक ग्र थो का सपा दन किया है और कई वर्षों तक बनारस हिदू युनिवर्सिटी के अ तगत जन दशन शास्त्र के मुरय अध्यापक रूप मे रहे हैं और अब अहमदाबाद मे नूतन प्रतिष्टित 'लालभाई दलपतभाई भारतीय सस्कृति विद्या मदिर के मुरय सचालक हैं । जसा कि 'प्रवेशक' मे श्रीमालवणियाजी ने न थ का सार भाव बतलाया है, तदनुसार पाठको को ज्ञात हो जायगा कि यह पदाथ रत्न मजूषा प्रकरण न थ वशेषिक दशन के तत्त्वो का वणन करने वाला है। हि दू दशन शास्त्र की दष्टि से वशेषिकदशन एक प्रधान और महत्त्व का स्थान रखता है । दशन शास्त्रो की गणना मे छ दशन मुरय गिने जाते हैं, पर तु इस सरया मे नामो के बारे मे अलग अलग उल्लेख मिलते हैं । शायद सब से पहले जिस विद्वान ने दशन की सरया बतलाई वह जन प्राचाय हरिभद्रसूरि हैं । उ होंने सब से पहले 'षडदशन समुच्चय' नामक एक छोटा सा प्रकरण ग्रन्थ सस्कृत पद्य मे लिखा और इसमे जन, बौद्ध, सारय योग वशेषिक, याय और मीमासा इस प्रकार छ दशनो का तत्त्व निरूपण किया। फिर, अन्य विद्वानो ने अय रूप में भी कई दशनी का तत्त्व निरूपण किया। वत्तमान मे लोक प्रचलित विद्वाना मे हि दू धम के जी अगभूत छ दशन माने जात हैं उनके नाम इस प्रकार हैं- याय वशेषिक साख्य, योग, पूर्व मीमासा और उत्तरमीमासा, इन बहुसम्मत छ हि दू दशनो मे वैशेषिक दशन अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है और इसी वशेषिक दशन का सक्षिप्त मे परन्तु सारभूत शब्दो मे यह ‘पदाथरत्नमजूषा' न थ परिचय दे रहा है । आशा है कि विद्वानो को 'राजस्थान पुरातन ग्र थमाला' का यह छोटा सा मणि उपयुक्त मालूम देगा। इसका सारभूत 'प्रवेशक' लिख देने के लिए हम अपने सहृदय विद्वान मित्र एवं आत्मीयजन श्रीमालवणियाजी के प्रति अपना हार्दिक आभार भाव पुन प्रकट करते हैं । श्रावणी पूर्णिमा सवत २०२० वि० मुनि जिनविजय प्रवेशक - पुरातत्त्वाचाय गुरुवय श्रीमुनि जिनविजयजी की आज्ञा हुई कि मैं ‘पदाथ रत्न मजूषा का प्रवेशक लिख दू । प्राचाय श्री जिनविजयजी के सपक मे में करीब ३५ वष से हू कि तु इस प्रकार की प्राज्ञा आज प्रथम वार हुई है। इस प्राज्ञा को पाकर बडभागी अपने को मानता कि तु जिस परिस्थिति के वश यह आज्ञा मिली है वह ऐसा मानने नहीं देती । पचास से भी अधिक वष की साहित्य साधना और वह भी अनवरत एक दिन के विश्राम के बिना आचाय श्री जिनविजयजी की है । इहोने शताधिक ग्र थो का सुसपादन इस दीघकाल मे किया है और पाश्चय तो इस बात मे है कि अनेक साथी होते हुए भी इहीने अपने साथियो को उनके द्वारा सपादित ग्रन्थो का कुछ भी काय कभी सौपा नही । न थ की खोज से लेकर कापी करना अनेक प्रतो को खोज कर उनसे पाठान्तर लेना, प्रेस और कागज की व्यवस्था करना, प्रूफ देखना, बा िडग की और उसकी सामग्री की और अन्तत बिक्री की भी व्यवस्था करना, ये सब काय सिघी जन ग्र थमाला हो या अय माला, अपने ग्रथो के लिए इ होने स्वय ही किए हैं। और इही कार्यो मे अपनी शारीरिक शक्ति और पाख की ज्याति का अतिम बि दु भी लगा दिया है । ग्रथमाला के मुरय सपादक रूप मे अ य द्वारा सपादित न थो का भी बहुत सा काय ये ही निपटा लेते थे तो उनके द्वारा सपादित न थो मे तो अ य की सहा- यता इ होने लेना कभी सोचा भी नहीं। किन्तु आज वे अस्वस्थ हैं, प्राख की ज्योति मद हो गई-ऐसी विवशता की दशा में यह आज्ञा हुई, वह केवल कत्तव्य का आन द देती है। मैं इसके लिए इनका अत्य त प्राभारी हूँ । प्राचाय श्रीजिनविजयजी ने कई भडारो का निरीक्षण किया है और उनमे से जो ग्रन्थ महत्त्व के प्रतीत हुए हैं उनका उद्धार करने की दष्टि से इ होने स्वय सकडो प्रतिलिपिया तयार की हैं या अपने साथियो से करवाई हैं। ऐसी प्रतिलिपियो का ढेर इनके अपने सग्रह मे है और कई पुस्तके प्रेस मे हैं- यह सब काय समाप्त हो इसके पहले ही इनका स्वास्थ्य बिगडा और इनकी उन ग्र थी के विषय में की गई नीधे आज उस ढेर मे से खोज कर निकालना इनके लिए कठिन हो गया है । ऐसी परिस्थिति मे 'पदाथ रत्न मजूषा' नामक न थ का विशेष विवरण देना इनके लिए कठिन हो गया है । अ यथा अपनी प्रादेत के और बहुमुखी विद्वत्ता के अनुसार ये जो कुछ इस ग्रन्थ के विषय मे लिखते, वह विद्वानो के लिए अधिक उपादेय और सतोषप्रद होता, इसमे सदेह नही । - बाद पूना [ ४ ] सिधी जन न थमाला में सम्मिलित करने के लिए महत्त्वपूण ग थो की खोज करने की दष्टि से आचाय श्रीजिनविजयजी ई० १६४२ मे अनेक शारी रिक कष्टो को सहन कर के जसलमेर पहुचे थे। अपनी उस यात्रा का वर्णन ये बनारस म पूज्य पडित श्रीसुख लालजी को लिखा करते थे। आज भी मुझे याद है कि उसमे अपने कप्टा को गौण रख कर नये नये न थो के लाभ से होन वाले आदि को ही विशेष रूप से ये अकित करते थे । उसी याना मे जिन अनेक महत्वपूर्ण ग्र थो की प्रतिलिपिया हुइ उनम से प्रस्तुत पदाथ रत्न मजूषा' भी था । यह आचाय श्रीजिनविजयजी से ज्ञात हुआ कि इस न थ की जो प्रति मिली थी वह १५ १६ वी शती की लिखी हुई थी। आज उसकी विशेष नोध मिलना सभव नही है । यह भी ज्ञात हुमा हे कि प्राचाय श्री ने प्रेस में देने के से शारदा लिपि म लिखी गई एक प्रत का फोटो भी लिया था पोर उसके पाठातर देने की इच्छा भी की थी कि तु उस इच्छा का भी विवशता से सवरण करना पडा हे । पूना की प्रत १६वी शती की होने का उनका दाज है। इस परिस्थिति म ‘पदाथरत्नमजूषा का यह सस्करण केवल एक ही जसलमेर की प्रत के आधार पर किया गया है । हस्तप्रत मे यत्र तत्र टिप्पणी भी मार्जिन मे थी उसे भी यहा टिप्पणी के रूप मे मुद्रित कर दिया है। लेखक का समय निश्चित रूप से तो नहीं जाना जा सकता कि तु ' यायकदली' के बाद कभी यह न थ लिखा गया है । इसकी प्रत जो मिली वह १५वी शती के आसपास की है, अतएव लेखक का समय हम १४वी शती के आसपास रख सकते हैं। 'पदाथरत्नमजूषा षटपदाथरूप मणियो से सुशोभित है' ऐसी बात यद्यपि उसके कर्ता कृष्णभट्ट ने अत मे (श्लोक ३१९) मे कह दी है, कि तु वस्तुत स्वय कृष्णभट्ट ने ही उद्दश प्रकरण मे भाव और अभाव दो प्रकार का पदाथ इस ग्र थ मे निरूपित किया है (श्लो० ११) । इससे यह न थकार वशेषिको की सप्त पदाथ मानने की प्रणाली का अनुसरण करने वाला है, यह सिद्ध होता है । ग्रन्थकार अपना नाम प्रत्येक प्रकरण के अत मे कृष्ण ऐसा दते ही हैं और न थ के अत मे भी दिया है । कितु उ होने अपना कुछ भी विशेप परिचय नही दिया है। केवल इतना हो जाना जाता है कि वे दुर्वादियो के लिये पचानन थे और शाङ्ग धारितनुसभूत अजु नराज के समय मे श्रीरेणुका के प्रीत्यथ यह ग्रथ बनाया है (श्लोक ३१६, ३२१) ।

गद्य मे [ ५ ] प्रशस्ति वाक्य 'इति श्री महाराष्टदेश्य श्रीकृष्णभट्टविरचिता पदाथरत्न- मजूषा समाप्ता।' से पता चलता है कि ये कृष्णभट्ट महाराष्ट्र देश के थे। प्रारम्भ मे आठ श्लोको मे कृष्णभट्ट ने जो मगल किया है उससे दो बाते फलित होती हैं-एक तो यह कि लेखक को अलकारशास्त्र का नपुण्य प्राप्त था और दूसरी यह कि वे किसी एक देव के नही कि तु अनेक देवताओ के भक्त थे । यह भी ज्ञात होता है कि सभवत उनके गुरु का नाम मचीश था जिनसे उ होने मीमासा दशन का अध्ययन किया था (श्लो० ८) । पदाथरत्नमजूषा' न थ मे कुल ३२१ श्लोक हैं, उनमे से आदि अत के प्रासगिक १०+३ निकाल द तो कुल ३०८ श्लोक मे ही सक्षेप मे वशेषिक दशन के सारभूत तत्त्वो का निरूपण सुदर ढग से कर दिया है । कही भी अनावश्यक विस्तार लेखक ने किया नही है और वशेषिक दशन की आवश्यक कोई बात छोडी नही है । वशेषिक दशन के कणादसूत्र और उसकी टीकाएँ अनेक हैं । कि तु वे सब । सप्तपदार्थी न थ भी गद्य मे सूत्रात्मक ही है कि तु वशेपिक दशन का समग्र भाव से सक्षेप मे निरूपण करने वाली पद्यात्मक कृति तो सभवत यही पदाथ रत्नमजूषा' एकमात्र उपलब्ध है । कारिकावली नव्य याय युग मे बनी। वह वशेषिको के सप्तपदार्थो का तो निरूपण करती हो है कि तु प्रमाण विवेचन मे उसमे नयायिको के चार प्रमाणो को अपनाया गया है । अतएव सप्तपदार्थो को प्राधा य दे कर वैशेषिक दशन का स्वतत्र पद्यात्मक न थ तो यही एकमात्र पदाथरत्नमजूषा ही उपलब्ध है-ऐसा कहा जा सकता है । ग्र थ मे पदाथ को भाव अभाव मे विभक्त कर के प्रथम क्रमश द्र यादि षडभाव पदाथ का विवेचन किया है (श्लो० ११ २८६) और अन तर चार प्रकार के अभाव का निरूपण (श्लो० २६० २६६) कर के मोक्षस्वरूप के वणन (२९७ ३१८) के साथ न थ को समाप्त किया है । पथ्वी, अप तेज और वायु-इन चार द्र यो का परिचय दे कर के कहा है कि यहा तक कायद्र यचतुष्क का निणय किया गया अब हम उसकी सष्टि और सहार की प्रक्रिया कहते हैं (श्लो० ४०)-इस प्रकार प्रतिज्ञा कर के ग्र थकार ने वशषिक समत सष्टि और सहार का भी कमश वणन (४१४८) कर दिया है । तदनतर आकाश, काल और दिक का वणन (४६ ५४) कर के प्रात्मा के विवेचन मे आत्मा के दो प्रकार किये हैं-ईश और अनीश । इस प्रसग मे स्वतन प्रात्मसिद्वि भी सक्षप मे करदी है (५५ ६२) । + - [ ६ ] द्रव्यो मे अतिम मन का निरूपण (६२ ६५) समाप्त करके यह भी कह दिया कि तम स्वतत्र द्रव्य नहीं है किन्तु आलोकभावरूप है, अथवा मही रूप है अतएव द्रव्य तो नव ही हैं (६६) । इस प्रकार कृष्णभट्ट ने द्र यनामक पदाथ का निरूपण कर के २४ प्रकार के गुणो का वणन किया ह (६८ २३४) । इस प्रसग मे विशेषत पाकजोत्पत्तिप्रक्रिया द्रष्टव्य ह । इसमे पिठरपाक का निषेध कर के पीलुपाक का समथन किया गया ह (७६८०) तथा सयोग नामक गुण का विवेचन भी द्रष्टव्य ह (६५ १०३) । इसमे सयोग की उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया का सुगम वणन ह । बुद्धि के विवेचन मे भेदाग्रहरूप अरयाति, असतरयाति, आत्मरयाति और अनिवचनीय रयातियो का निराकरण कर के विपयय की स्थापना की गई है (१२० १२४) । अनुमाननिरूपण मे तक को अनुमानाग बता कर के उसके एकादश प्रकारो का विस्तत वणन ह जो जिज्ञासुप्रो के देखने योग्य ह । इसमे खास बात यह ह कि ईश्वरसिद्धि मे जो अनुमान दिया जाता ह उसके समथन मे तर्क के इन ग्यारह प्रकारो का वणन ह तथा तकदोषो का भी वणन है (१४२ १६६)। यह भी ज्ञातव्य ह कि प्रस्तुत लेखक ने शब्द को पथक प्रमाण न मान कर के अनुमान मे ही उसका अ तर्भाव कर दिया ह (१८५) । उपमान (१८६), अर्थापत्ति (१८८), सभव (१८६), अभाव (१६०) और ऐतिहय (१६१) । इन सभी प्रमाणो का कणादवर्णित प्रत्यक्ष और अनुमान मे ही यथायोग्य समा वेश कर लिया ह । प्रामाण्य की स्वत सिद्धि का निराकरण (१६२ १९४) कर के प्रमाणता -यह स्वभाव ह कि तु शक्तिरूप नही-इस मान्यता को दृढ करने के लिये मीमासकसमत पथक शक्ति का निराकरण युक्तिपूर्वक किया गया ह (१६६ १६८) शब्दगुण के वणन मे स्फोटरूपता का निराकरण किया गया ह (२२५ २२६) तथा शब्द की अनित्यता स्थापित कर के वेदापौरुषेयता का भी खडन किया ह (२२७ २२६)। कमनिरूपण मे (२३५-२५३) कम की सिद्धि मे प्रमाण (२३५ २३८) देकर के उसके भेदो की सरया पांच हो ह, यूनाधिक नही-इसका समथन ह । सामा यविवरण मे (२५४ २७१) सामा य के विषय मे अपोहवाद प्रादि मतो का खडन कर के जाति की स्थापना की गई है । जातिबाधको का सग्रह श्लोक इस प्रकार है ।

[ ७ ]
व्यक्त्यक्यतुल्यते तद्वदनवस्थितिसकरौ ।
सम्ब धशू यता रूपहानिरित्येष सग्रह ।। (२६५)
ओर “यक्त्यक्य आदि होने पर जाति क्यो नही मानी जाय इसको सोदाहरण
स्पष्ट किया गया ह (२६६ २६६) ।
विशेष पदाथ का वणन अति सक्षिप्त ह, मात्र ६ श्लोको मे उसका विवरण
समाप्त ह (२७२ २७७) ।
समवाय (२७६ २८८) और प्रभाव (२६० २६५) भी सक्षिप्त रूप से हो
निरूपित हैं।
अत मे मोक्षस्वरूप की चर्चा न थ के अनुपात मे कुछ विस्तत ही ह, ऐसा
कहा जा सकता ह (२६७-३१८) । इसमे मोक्षविषयक अयमतो का निराकरण
कर के आत्मा के बुद्धि आदि नव गुणो के उच्छेद को ही मोक्ष स्थापित किया ह
और इस स्वमत का समथन 'अशरीर वा वस त' (३१३) इत्यादि पागम से भी
होता ह ओर उस आगम का भी प्रामाण्य, काय अथ मे ही न हो कर सिद्ध अथ
मे भी होता ह, यह बताया गया ह ।
यद्यपि यह ग्रन्थ सक्षिप्त ह तथापि ऊपर के वणन से यह ज्ञात होगा कि
वशषिकदशन की सभी ज्ञात य चर्चा को इसमे स्थान अवश्य मिला ह । अतएव
वशेषिकदशन का ज्ञान कराने का यह न य एक अच्छा साधन उपस्थित करता
ह, यह नि सदेह ह ।
अहमदाबाद
-दलसुख मालवरिया
दिनाक १०-६-६३

राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
-
विश्वमामाभूति विगचूपिम्
निगमनागणितानुगनियम
नारायमचानने भाषा जापानमा
भनिद्रिश्यनरत विद्यालयमा
भवाड़ना का वागविनितिनिधी
भावनियमन भूय:भात मिीन २१९
मृमीन विभागमायोमा
'निमुमकिडिपालभोलिवितभमानमलिम्भिीय
सीमाभागनमूग कामदितिमीमाभीड
मालग्निनानिगूदेवमनम्मिान
जिनामी वीडय॥
॥ २२०
पदाथरत्नमञ्जूषाकी शारदालिपिवाली प्रतिका अन्तिम पत्र

श्रीकृष्ण-मिश्र विरचिता पदा थे रत्न मञ्जूषा प्रथम - द्रव्याख्यपदार्थवर्णनम् । श्रीस वज्ञाय नम । १ नमाम समारोरुमिहिरदुर तातपहर मुहब्रह्माद्युद्यद्वदनकुमुदोल्लासचतुरम । घनस्वातध्वान्तक्षपणनिपुण चारुकिरण नपचास्यश्रीमच्चरणनखराकेशमरुणम् ॥१॥ खेलति रमारमणीयो यत्र चेन्दुरुदितो मुदिताश । प्र भूतिरुदभूदभिवद्ध नौमि त हरपयोधिमगाधम ॥२॥ घपण्णकलिनाऽतिसुललिता शुद्धबोधकुसुमा हृदि परमा। क्तिविस्ततिफला मम भवताद विघ्नराजकरुणाऽमृतलतिका ॥३॥ जीराद्यभूषणभूषिताया शश्वद्विश्वेशानकै सेविताया । दे वन्ध वेदवृन्दोदिताया पादद्वन्द्व रेणुकादेवताया ॥४॥ डि घ्रयुग परिघ दुरिताना चारुनख सुमुख सुकृतानाम् । (धु गृणामि कणादमुनीना भूधरजापतिजातमतीनाम ॥५॥ १ १ १ १ हम । ४ अपरिमित । २ चेतसि । चद्रम। कृष्ण । २ प्रीणितदिग। प्रकटीबभूव । सूक्तिविस्तारप्रयोजना। (४) १ अनवरत । २ जगतपतिभि । (५) १ समख । २ स्तौमि । इश्वरोत्प नजातबद्धीनाम । म वा। ४ २ पदाथरलमञ्जूषायाम ५ भरतहृदयविज्ञ नीलसुग्रीवभृत्यम, हरिबलकृतयु खाम्भोधिसत्सेतुबन्धम। हतखररिपुवग्ग सीतयालकृताडूम, गुरुवरमहमीश नौमि रामाभिधानम॥६॥ स्वज्ञानाम्बुधिसप्लुते जगति योऽन ताख्यपङ्किका मध्ये क्रीडति यत्पदाब्जयुगल लक्ष्म्या समासेव्यते । यस्यान्त प्रतिभाति सवजगदावासो तो ब्रह्मण प्रादुभूतिरजस्रमस्तकलिल तन्नौमि नारायणम् ॥७॥ यत्पादाम्भोजाऽऽसेवात प्राप्तोऽह मीमासासारम । मचीश त वदे नाथ भ्रान्त्यज्ञानादिध्वसाथम् ॥८॥ मम स िनकषोपलके हि भवेद विशद मतिशुद्धिपरीक्षणकम । इति सकथयाम्यहमेतदिह क्षमतामभियन्तु जना सुजना ॥९॥ अपास्तविस्तरा बालबोधवृद्धिप्रसाधिनीम । पदार्थरत्नमञ्जूषा कुर्वे सर्वेष्टदायिनीम ॥१०॥ शब्दवाच्य पदाथ स्याद् द्विधाऽसौ सप्रकीत्तित । भावोऽभावश्च षोढेष्टो भावो भावविशारद ॥११॥ अस्तीति विधिधीवेद्यो भाव प्रोक्तो मनीषिभि । द्रव्य गुणस्तथा कम्म सामान्य सविशेषकम ॥१२॥ समवाय इति प्राहुर्भेदान् भावस्य सूरय । कारण समवाय स्याद् द्रव्य त नवधा मतम् ॥१३॥ भूजलाग्न्यनिलाकाश काल-काष्ठात्महृद्भिदा । गन्धाढ्या* भू शुक्लपीतहरिताऽरुणमेचकम ॥१४॥ (६) भरतशास्त्र श्रीरामभ्राता च । २ नीलसग्रीव इश्वरस्तस्य भत्यस्तम नील उत्पत्ति । ५ निर सग्रीवी वानरौ भत्यौ यस्य स तम । ३ कृष्ण बलन वानरबलेन वा । ४ हतो निज्जित खर रिपूणा कामादीना वगर्गो यन स त अथवा हत खरो नाम राक्षस स एव रिपु तस्य वगर्गो यन सतम। - ३ or سه मध्य । २ स्थिति । नारायणात । ४ तर । ६ निष्पाप । (९) प्राप्नवतु। (१२) १ ज्ञय । (१४) १ दिक । २ मन *गधवतीत्यथ । ३ रक्त । ४ कृष्ण । १ द्रव्याख्यपदाथवणनम ३ २ or कडार चित्रमित्येव रूप सप्तविध पुन । कटुतिक्तकषायाम्लमधुरक्षारभेदत ॥१५॥ षोढा रसो द्विधा गध सुरभीतरभेदत । स्पशस्तु पाकजोऽनुष्णाशीतो नानात्वमीरित ॥१६॥ सख्या मान द्विधाऽणुत्व-मध्यमत्वविभागत । पथक्त्व योगभागौ च परत्व चेतरत तथा ॥१७॥ गुरुत्व हतुक चव द्रवत्व सस्कृतिस्त्वरा । स्थितस्थापक इत्येते चतुदश गुणा भुव ॥१८॥ नित्यानित्ये ति सा द्वेवा नित्याऽणु परिकीत्तिता। मूर्तोऽवयवहीनश्चेदेतत् स्यादणुलक्षणम ॥१९॥ पटकुम्भस्थजातित्वाद् भूत नित्यस्थमिष्यताम् । सत्तावदित्यणो सिद्धि रनित्या त्रिविधा मता ॥२०॥ विषयेन्द्रियदेहाख्या योनिजेतरभेदत । द्ववाऽन्त्या योनिजा त्वस्मदादीनामितरा द्विधा ॥२॥ धमजाधमजत्वेन मुनिक्षुद शरीरिणाम । न पाञ्चभौतिको देहोऽप्रत्यक्षत्वादिदोषत ॥२२॥ चित्ररूपरसस्पश स्याच्च हेत्वनुसारत । परिमाणविभेदेन बालवृद्धादिभेदत ॥२३॥ भिनो देहो यथा कुम्भकरकोदञ्चनादिकम् । स्याद घ्राणमिन्द्रिय तच्च गन्धधीतोऽनुमीयते ॥२४॥ (१५) १ कपिल । २ इति चार्वाक । अमरभिश्च । २ (२३) १ पथि यादिसमवायिकारणानु बहुसरया उक्ता। (१७) १ अपरत्व । (२४) १ अवस्थाभदनापि शरीरभदो (१८) १ अग्निसयोगात्पाद्य । २ वग । न भवतीति पर वदति। २ तत्र करणजया (२१) १ अयोनिजा। २ अयानिजा। कायवीत्वात। रूपा वत इत्यन्मानन घ्राणेद्रिय (२२) १ मशक । २ पचभूतारब्धा दह । सिद्धि परिशषात । २ लवण। पथि या सारत ।

पदाथरत्नमजूषायाम २ १ २ मृदादिविषयोऽभीष्ट इति प्रकरण भुव । रसवत्त्वादिसारूप्याद वक्ष्यामो जललक्षणम ॥२५॥ पाथस्तु स्नेहवद्रूप शुक्ल स्या मधुरो रस । स्पश शीतो गुरुत्वा ता सख्याद्या पूर्ववन्मता ॥२६॥ अहतुक द्रवत्व च सस्कारो वेग इष्यते । गुणाश्चतुद्दशते स्थुरम्भसस्तद द्विधा कुवत ॥२७॥ अणु नित्यमनित्य तु त्रिधा देहादिभेदत । देहोऽयोनिज एवास्य श्रुतिगम्य प्रचेतस ॥२८॥ लोके त्विद्रियमस्येष्ट रसन रसधीप्रथम् । विषय सरिदादि स्यादित्याप सनिरूपिता ॥२९॥ तेजो गुरुत्ववद्रूपि शुक्ल स्वाऽन्यप्रकाशकम् । रूपमुष्णो भवेत् स्पश सख्याद्या द्रवतोत्तरा ॥३०॥ क्षितिवद्वेग एवेष्ट सस्कारस्तद द्विधाऽम्बुवत् । पराणुलक्षण नित्यमनित्य विग्रहादिकम ॥३१॥ वोऽयोनिजमादित्यलोके रूपमतिप्रथम । इद्रिय चक्षुरग्नीन्दुहेमजाठरसज्ञक ॥३२॥ विषयो रविदीपस्थजातिवाद द्रव्यता यथा । तेजस्त्व हेमवत्ति स्थाद्धम्नस्तजसतेदशी ॥३३॥ अग्नेरपत्य प्रथममित्यादि श्रुतितोऽपि च । इद तेज समुद्दिष्ट वक्ष्यामोऽथ समीरणम ॥३४॥ (२६) १ यत स्नवत तन पाथ इति । (३१) १ परमागलक्षणम । (३२) १ शरीर । २ रूपबद्धधनमय । (२७) १ अग्निसयागानुत्पाद्य । ३ भौम। ४ दिय । ५ आकरज । ६ औदर्य। (२८) १ आदिश न इन्यिविषयौ । (३३) १ साधन । २ वरुणस्य लोके। (२९) १ रसबुद्धिप्रसिद्धमित्यथ । (३४) १ सुक्णमिति शषः । (३ ) १ नमित्तिकी । २ २ २ ३ लक्षणकीत्तनम । २ दृष्टान्त ३ पक्ष ।४ साध्य ।

द्र याख्यपदाथवणनम ५ नीरूप स्पशवान वायु स्पर्शोऽस्यानुष्णशीतक । अपाकजश्च सख्याद्या अपरत्वोत्तरा गुणा ॥३५॥ पूर्ववनवमो वेगो द्वविध्य चापि पूर्ववत । नित्योऽणुरितर प्राणविषयेद्रियदेहभाक ॥३६॥ अयोनिज महल्लोके वष्मस्पशनमिन्द्रियम । स्पशबुध्दयऽनुमेय स्याद विषयस्तु महानिल ॥३७॥ स च न स्पशनाध्यक्षो वियदात्मदिगादिवत् । नीरूपद्रव्यरूपत्वादिति हेतो समीरण ॥३८॥ प्राणोऽपानस्तथा व्यान उदानोऽथ समानक । एकोऽपि स क्रियाभेदात प्राण पञ्चविधो मत ॥३९॥ कायद्रव्यचतुष्कोऽय निरणायि प्रयत्नत । अधुना सृष्टि सहारविधिमस्याऽभिवध्महे ॥४०॥ क्षुब्धश्रीमन्नृपञ्चास्यजगत्सहरणेच्छया। प्राण्यदष्टादणुष्वाद्य कम सजायते तत ॥४१॥ भागस्ततो योगनाशस्तस्माद द्रव्य विनश्यति । ततश्चन्द्र ललामस्य सिसक्षात क्रियाऽणुषु ॥४२॥ ततो योगस्ततो भूतभौतिकोत्पत्तिरीरित।। अणुद्वयेन द्वयणुक तस्त्रिभिस्त्र्यणुक भवेत ॥४३॥ इत्यादिक्रमत सष्टिरङ्गीकार्या विचक्षण । अणोरारम्भकत्व चेदकस्यानाशिता भवेत ॥४४॥ २ (३५) १ उष्णश्व शीतकश्च उष्णशीतको Tभ्याम् अन्य । (३६) १ अनित्य । (३८) १ स्पशन प्रत्यक्षो वायरिति यि । २ घटादिव्यदासाथ नीरूपप स्पशा व्युदासाथ द्र यपदम । (४०) १ निपीत । २ कायद्रव्यचतुष्कस्य (४१) १ क्षोभवत परमश्वरस्य सजिघृपया प्राण्यधमवशात्परमाणुष प्रथमत क्रियोत्पद्यत । (४२) १ असमवायिकारणनाश । (४३) १ असमवायिकारण । उत्पत्तिमतो य भौतिका पथ यप्तजवायवस्तषा मुत्पत्ति । ३ घणुक । (४४) १ अनित्यता। २ भूता ३ ६ २ पदाथरत्नमञ्जूषायाम कायस्थ सततत्व चापेक्षणीयाथहानित । बहूना च न कायस्य महत कायतो जनि ॥४५॥ दृष्टा घटादिषु ततो द्वयोरण्वो समुद्भवेत । द्वयणुक तश्च बहुभि कायमारभ्यते महत् ॥४६॥ न द्वाभ्या कारणारूढ स्थौल्यबाहुल्यहानित । अन्त्यावयविन काय मणु चव प्रसज्यते ॥४७॥ द्वयणुकादिक्रमेणात कार्यात्पत्तिरितीदशी । लयोत्पत्तिस्थिति प्रोक्ताऽधुना गगनमुच्यते ॥४८॥ आकाश शब्दवत्तस्य शब्दकत्वादयो गुणा । भागान्ता षडज तच्च कारणत्रयहानित ॥४९॥ नित्य च नाशहेतूनामभावाद् विभु चेरितम् । नीरूपद्र व्यताऽतश्चाचाक्षुषत्व विहायस ॥५०॥ तत शब्द कमेय स्यादित्यम्बरपरीक्षणम् । अयाभिवध्महे कालकलनामलमावृता ॥५१॥ कालश्चिरादिधीहेतु सख्याद्या पञ्च तदगुणा । आकाशवल्लयोदक्कलवादिव्यवहारकृत ॥५२॥ निरशद्रव्यरूपत्वादजो नित्यश्च गीयते । नानातीपाधिको तस्यत्येषा कालनिरूपणा ॥५३॥ (४५) १ स वदोत्पत्तित्व । २ परमाण्व त्र्यणकेऽपि स्यात । न च तथा अतस्त्र्यणभिद्वयणक "तरापेक्षाभावादित्यथ । ३ परमाणूनाम् । स्त्र्यणकमारभ्यत दति सिद्धा त । त्र्यणुकनिष्ठस्य ४ अणुकादिलक्षणस्य महत्कायस्य कायत । मध्यमपरिमाणस्य च त्रिचणुकनिष्ठा बहुत्व उत्पत्तिमत पदार्थात । ५ समवायिकारणस्य । सरया असमवायिकारण सरयापरिमाणप्रचया नित्यत्वात असमवायिकारणस्य चाभावात । समवायिकारण परिमाणमिति भाष्यकारनिकर ६ उत्पत्ति । रुररीकृतत्वात् । २ अणपरिमाण स्यात । (४७) १ द्वयणकाभ्धा च अणकमारभ्यत (४८) १ सहारसष्टिप्रकार । तहि घणुकनिष्ठमेव परिमाण त्र्यणकेऽपि स्यान। (५१) १ कालस्वरूप अणुपरिमाणस्य द्वय गकादिनिष्ठस्यासमवायि १२) १ विनाशोत्पत्तिस्थिति यवहारह कारणत्वानगीकारात बहुत्वसरयायाश्चा यणकनिष्ठमव परिमाण (५३) १ निरवयव । २ भिनता। तश्चत्यथ । भावात । अत द्रव्याख्यपदाथवणनम ७ ३ दिक पूर्वापरधीगम्या कालवद गुणभूषिता । तनानातेनसचारोपाधिकेति दिगीरिता ॥५४॥ आत्मा तु चेतनो द्वधा स्यादीशानीशभेदत । अनीशश्च न देह स्यात पार्थिवत्वाद् घटादिवत ॥५५॥ इद्रियाणि च नवाऽऽत्मा भौतिकत्वात पटादिवत् । अणुत्वान्न मनस्तच्च मनस साधयिष्यते ॥५६॥ अतस्तदव्यतिरिक्त स्यादात्माऽहबुद्धिगोचर । करणप्रेरको नित्योऽस्पशद्रव्यत्वतो मत ॥५७॥ सुखादिनियमान्नानाऽमूत्तद्रव्यत्वतो विभु । गुणाश्च तस्य धीदु खसुखेच्छायत्नभावना ॥५८।। अदृष्टद्वेषसख्याद्या विभागा ताश्चतुदश । इशस्तु क्षितितोयादिकतृ त्वेनानुमीयते ॥५९॥ य सवज्ञ सव्वविदित्यादित श्रुतितस्तथा । ज्ञानेच्छायत्नसख्यादिभागाताष्टगुणान्वित ॥६॥ अविद्योपाधितो भि नौ जीवेशानी न नो मतौ। शुद्ध ब्रह्मण्यऽविद्याया अयुक्तरितरत्र च ॥६१॥ २ (५४) १-२ नानत्यस्य भावो नानाता कश्चन सुखी कश्चन द खी इति यवस्था तस्या नानाताया इनभूतस्य सचार आत्मनो नानात्वम तरणानुपपद्यमाना आत्मनो स एवोपाधियस्या सा इनसचारोपाधिका । नानात्व गमयति । (५५) १ साध्य देह एवात्मति नास्तिका (५९) १ धर्माऽधम । क्षित्यादि २ पक्ष । ३ पथिवीस बधित्वात । चतष्टय सकतक कायत्वात घटवत । (५६) १ अणुत्वम । (६०) १ इश्वरसिद्धि । (५७) १ यतो देहातीति आत्मा न भवति । ६१) १ अविद्योपाधिकृतो २ देहन्द्रियमनो यतिरिक्त । ३ करणानि | मात्मनो द इति वदातिन । २ अविद्या जाव केमचित्प्रेर्याणि करणत्वात कठारवत । निष्ठा ब्रह्मनिष्ठा वेति विकल्प ऽत्य द्विषयति । (५८) १ आत्मा न भवति अणत्वात ३ जीवपक्ष। परमाणवत् । जीव पर- पदाथरत्नमञ्जूषायाम परस्पराश्रयात्तस्माद भेदो वास्तव एतयो । निरधार्येवमात्माऽथ मन सप्रति रूप्यते ॥६२॥ अस्पशवन्मनोऽणु स्यात प्रमाण तत्र चेदृशम । सुखधी करणोत्पाद्या जन्यबुद्धित्वतो यथा ॥६३॥ रूपादिधीरिति प्रोक्तमानतो नित्यताऽणुता। नैरश्यादणुवत्तस्य परताऽपरता त्वरा ॥६४॥ विभागो योगपाथक्ये नानातेति गुणाष्टकम । मन इत्थ तमोद्रव्य दशम नव सभवेत् ॥६५॥ आलोकाभावमात्रत्वा महीरूपतयाऽपि वा। अतो नवव द्रव्याणीत्येव सवमनाकुलम् ॥६६॥ पदाथरत्नमञ्जूषान थे कृष्णविनिर्मिते । पदार्थो द्रव्यसज्ञोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम् ॥६७॥ (६२) १ जीवसिद्धी अविद्यासिद्धि अविद्यासिद्धौ जीवसिद्धिरिति परस्पराश्रयो विज्ञेय । २ पारमार्थिक । ३ निरणायि । (६४) १ मनो नित्य अस्पशद्रव्यत्वात गगनवदित्यव लक्षणात । आकाशादिषु अनकाति कव्य दासाथ मूत्तत्वे सतीति विशषणमूह्यम। (६५) १ भाटटाना मत तमो न द्र पातरम्। (६६) १ नवद्र यस्वरूप स्वच्छ निरव यवत्वात।

द्वितीय - गुणाख्यपदार्थवर्णनम् । में जात्येकनिलय कर्माऽन्यत्वे सति गुणो मत । चतुर्विशतिधा भिन्नो रूप सरसग पकम् ॥६८॥ स्पशसख्ये तथा मान पृथकत्व योगभागको। परताऽपरताबुद्धि-सुखदु खेषगास्तथा ॥६९॥ द्वेषयत्नगुरुत्वानि द्रवत्वस्नेहसत्क्रिया । धर्माऽयमौ तथा शब्द इत्यूचे कणभुक् मुनि ॥७०॥ चक्षुहिय भवेद रूप गुणत्वे सति सप्तधा । शुक्लादिजलतेजोऽणुनिष्ठ नित्य क्षमाऽणुषु ॥७१॥ अग्निसयोगज हेतुरूपज द्वषणुकादिषु । आश्रयस्य विनाशेन विनाश्यऽग्निकुनीरगम् ॥७२॥ रसो रसनमेय स्याद गुणत्वे सति षड्विध । कटवादि क्षितितोयस्थो रूपवन्नित्यतादय ॥७३॥ घ्राणग्राहयो भवेद गन्यो गुणत्वे सति स द्विधा । सुरभ्यादिरनित्यश्च पितिस्थोऽयद् रसादिवत् ॥७४॥ स्पश स्पशनवेद्य स्याद् गुणत्वे सति स त्रिया । शीतादिजलभूम्यग्निवायुस्थोऽन्यद रसादिवत् ॥७५॥ रूपादे पाकजोत्पत्तिश्चतुष्कस्येदशी मता। आपाकक्षिप्तकुम्भाणुष्वग्निघातात क्रियाजनि ॥७६॥ (६९) १ इच्छा। (७२) १ परमाण्वादिष्वरूपजम । (७१) १ सरयादिष्वति याप्ति पदासाथ (७६) १ पथिवीनिष्टस्य । २ 'क्षत्रिति मात्रपदमभ्यूहनीयम। एवं स्पर्शेऽपि द्यामद्र यपाका) कुलालकृता गाविशष आपाक मित्यच्यत । ३ अग्निमयोगात । ४ क्रियापत्ति। ३ घटा तिव्यम।

१० पार्यरलममायाम १ ततो विभाग सयोग नाश कार्यक्षयस्तत । ततोऽग्नियोगादौडण्याढ्यो रूपादे प्रक्षये सति ॥७८॥ अन्यस्मात पाकजोत्पत्तिस्ततोऽण्वाऽऽत्मयुजे क्रिया। अणुषु स्यात ततो योग कार्याणामुदयस्तत ॥७९॥ पिठरस्यव पक्तिश्चेदतरग्नेरभावत । पाको न स्यादत पोलुपाकवागेव सुदरी ॥८॥ सख्यकादधियो हेतुनन्वभेदत एकधी । भेदाद् द्वित्वादिधीरस्तु नेदशीय कणादगी ॥८१॥ स्वरूप वस्तुनो भेदाभेदाविष्टौ तथा सति । घटस्वरूपाभेदेन कथ स्यात पट एकधी ॥८२॥ परस्पर स्वरूपाणामनुवृत्तेरभावत । भेदस्य चैकरूपत्वाद विशेषस्त्र्यादिको न ते ॥८३॥ अत सख्या पृथक् सा च द्वधकद्रव्यका तथा । अनेकद्रव्यका चाऽऽद्या त्वेकतामतिगोचर। ॥८४॥ यावदद्रव्या द्वितीया च द्वित्वाधा सा त्वनित्यका । अपेक्षाबुद्धिनाशेनाश्रयनाशाच्च नश्यति ॥८५॥ (७८) १ द्विण (यणु) कस्य क्षय । ८१) १ अभे-ति ब धन एक यवहार २ परिमाणनिष्ठस्य । भेद निब धनश्च द्वित्वादि यवहार टति भूषण (७९) १ परमाण्वदष्टवदात्मसयोगात । ८०) १ पिरस्य । पिठरस्यव पक्ति (८२) १ वस्त्र। रिति भटटा । २ पीलूना परमाणू ना पाक इति या वाक (८३) १--उभयकरूपत्वात । सा सुदरी शोभिष्टत्यथ । (८४) १--एक द्रय आश्रयो यस्या सा। (८६) १-- चक्षुषा घटसयाग -१ एकत्वाधारावयव कम --१ । एकत्वसामा यज्ञान तनिष्ठकत्वसामा ग्यानि-२ ततो विभाग अपेक्षाबद्धरुत्पत्ति अक्षाबुद्धरुत्पत्ति द्र पारम्भकसयोगनाश द्विवोत्पत्ति द्वित्वगुणोत्पत्ति ततो द्र पनाश द्वित्वसामान्यज्ञानम् कार आशकत । -२ ني -- L गणाल्यपदार्थवणनम २ परिमाण वितस्त्यादिमानविज्ञानकारणम । चतुर्द्धा च महद्दीघह्रस्वाणुत्वादिभेदत ॥८६॥ नित्यानित्यभिदा द्वेवा सवमत्य पराणुषु । नित्य स्याद द्वयणुकेऽनित्य महादत्मादिषु ध्रुवम् ॥८७॥ अध्रुव त्र्यणुकादौ स्याद् दीघताह्रस्वते पुन । अणुत्वमहदेकाथनिष्ठे तादग्विधे तथा ॥८८॥ मानप्रवयस ख्याभिश्चतुर्विधमनित्यकम् । जायते द्वयगुकेऽणुत्वह्रस्वत्वे अणुसख्यया ॥८९॥ द्वित्वाक्षयासमारब्धे स्वकार्ये त्र्यणुकस्थितात । महद्दीर्घात महद्दीघे जायते शिथिलो युजि ॥९०॥ प्रचय स्यात ततस्तूलपिण्डद्वितयनिर्मिते । तूलपिण्डे महद्दीघे जायते इति मानदिक् ॥९१॥ पृथक्त्वम यताबुद्धे कारणत्वेन सम्मतम् । स्वरूपभेद एव स्यात पथकत्व चेद घट पट ॥९२॥ इत्येव स्यात पट कुम्भादिति वाड नव युज्यते । अयोयाभाव एव स्यादिति चेहि पञ्चमी ॥९३॥ १ त्वगणसामायज्ञान --५ । ततो द्वित्वगणनाश अपक्षाबद्धर्माश --५ पेक्षाबुद्धविनाश -६ पक्षाबद्ध शाद द्वित्व गुणनाश वमनन प्रकारण द्वित्वगणस्याप एवमाश्रयनाशाद द्वित्वगुणनाश । नाबद्धविनाशाद विनाश ।।६०॥ (८७) १ अणत्वमहत्परिमाण' यस्मिन्नर्थे । (८९) १ असमवायिकारणभताभि । त्तित तत्रास्मा न कस्मि नर्थे एव दीघताह्रस्वते २ द्वयणुकनिष्ठाणपरिमाणस्य निष्ठादित्व पि वर्तते । तच तादगविध भवत । अयमभि सरयाऽसमवायि कारणम यि यथा अणत्वमहत्परिमाण नित्यनिष्टे ९ ) १ वर्तेतति शष । २ चतुरणुक त्य अनित्यनिष्ठ अनित्य तथत्यथ । ३ असमवायिकारणभतात । ४ सयोग । २ मित्यम् । (९१) १ प्रचयात । २ अधिकरणे । (८८) १ अनित्यम । ३ परिमाणमाग्ग ।

१२ पदाथरस्नमजूषायाम घटापट इति व्यक्तु घटो न पट इत्यद । वचो युक्त तत सिद्ध पृथक्त्व तदपि द्विधा ॥९४॥ सख्यावत्तस्य नाशादिसख्ययैवोपणितम । प्राप्तिरप्राप्तयोर्या हि स सयोग समीरित ॥९५॥ (९५)- (अ) १ एकद्र यकमनकद्र यक चति । काल । तत पिडविनाशाद्दिकपिडसयोगनाश । (आ) एकपथक्त्व नित्यनिष्ठ नित्यमनित्य अपेक्षाबद्धविनाश । एतत्स व यगपत त्रयाणा निष्ठ अनित्य । अनेकपथकत्वमनित्यमव । समवाय्यसमवायिनिमित्ताना विनाशात्परत्वस्य २ त तुसयोगस्य स्वकार्येण सह सयोग विनाश ॥४॥ कार्येण पटन सह एकस्मि नथ त तलक्षण वत्ति । (उ) द्रयापक्षाबुद्धयुगपद्विनाशादपि कथम । (अ) ३ अवयवे कर्मोत्प न यदावयवा तरा पर वाधारेऽवयव कम अपक्षाबद्धरुत्पत्तिरित्यक भाग करोति तदाऽपेक्षाबद्धरत्पत्ति । इत्यक काल । काल । ततश्च विभाग परत्वस्य चोर तिरित्यक काल । ततश्च द्रयारम्भकसयोगनाश सामा य यदा द्रयारम्भकसयोगनाश तदा परत्वानु त्पद्यत इत्येक काल । द्रयविनाश सामाय बुद्धेरुत्पत्ति अपक्षाबद्धश्च विनाश इत्यक काल । द्रयविनाशा ततश्च द्रायविनाश अपक्षाबद्धश्च नाश इत्यक बुद्धभ्यश्चोत्पत्तिरित्येक काल । च्च परत्वस्य विनाश ।।१।। कालस्ततो द्रयबद्धचोविनाशात्परत्वस्य विनाश ॥५ (आ) असमवायिकारणविनाशात कथम । (ऊ) द्रव्यसयोगविनाशादपि कथम । परत्वा धारावयव कम इत्यक काल । ततश्च विभाग अपेक्षाबुद्धि परत्वाधार च कर्मेत्यक काल । ततो दिक पिडविभाग परत्वस्य चोत्पत्तिरित्यक पिड कम चात्पद्यत अपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिरित्यक काल । ततश्च परत्वस्यो पत्ति द्रयारम्भक काल । सामा यबुद्ध रुत्पत्ति दिकपिंडसयोगस्य सयोगनाश दिकपिडविभाग इत्यक काल च विनाश ॥२॥ ततश्च सामा यबद्धरुत्पत्ति पिडविनाश दिक (इ) अपक्षाबुद्धिविनाशात्कथम । उत्पन पिडसयोगविनाशश्चत्यक काल परत्वे सामा यबुद्धरुत्पत्ति अपेक्षाबुद्धविनता समकाल पिडसयागयोविनाशात परत्वस्य विनाश (विनाशता) गणबुद्धेरुत्पद्यमानतत्यक काल । इति ॥६॥ उपेक्षाबद्धिविनाश गुणबद्धरुत्पत्ति गणस्य विनाशात द्र यबुद्धिरुत्पद्यतेत्यक काल । ततो (ए) सयोगापक्षा बुद्धयोयु गपद्विनाशादपि द्रव्यबुद्धिरुत्पद्यत गुणस्य च विनाश ॥३॥ कथ। परत्वोत्पत्ति परत्वाधार कम चत्येक (ई) समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणाना काल । ततश्च परवसामा यज्ञानम दिकपिंड- विनाशादपि कथम । अपक्षाबद्धरुत्पत्ति पिंडाव विभागश्च यक दिकपिण्डसयागविनाशश्चत्यक यवऽपि कर्मेत्यक काल । ततश्चावयवान्तरावि काल । तत सयोगापेक्षाबुद्धयाविनाशात्परत्वस्य परत्वस्य चोत्पत्ति पिडऽपि कम इत्येक काल । विनाश । ततश्च द्रव्यारम्भसयोगनाश दिकपिडसयोग अनन प्रकारण नाश परत्वस्य सतविधो सामा यबद्धेश्चोत्पत्ति अपेक्षाष नाशता इत्येक ज्ञालय || इतरत्सुगम ॥७॥ ततो गुणबुद्धि गुणास्यपदार्थवणनम सयुक्तबुद्धिगम्य स्यात विविध स च वणित । गुणद्रव्यक्रियाहेतुराद्यश्चित्तात्मनोमत ॥९६॥ द्वितीयोऽवयवाना च ततीयो घातनोदने । पुनस्त्रिधोभयेक स्थ-कमसयोगजत्वत ॥९७॥ आद्यो महिषयोरय शुकमाक दयो पर । शाखालतायुजे शाखिलतायोग प्रकीर्तित ॥९८॥ चतुर्धाऽत्योऽपि बहुभिद् द्वाभ्यामेकत एव च । योगी द्वौ चैकत स्यातामाद्यस्तन्तु भिरीरित ॥९९॥ तुरीयोगस्तुरीचेलयोगोऽन्यस्ततुकद्वये । वियवयोगद्वयाद् व्योमद्वितन्तुकयुजिभवेत ॥१००॥ ततीयस्तूक्त एवाऽऽदावत्योऽण्वो पार्थिवाप्ययो । सयोगे सति तत्तुल्यजात्यणुद्वययोगत ॥१०१॥ द्वचणुकद्वितये जाते पार्थिवद्वयणुकस्य हि । आप्याणुना भवेद योग आप्यस्यापीतराऽणुना ॥१०२॥ नाशस्त्वाश्रयनाशेन विभागाद् द्वकनिष्ठत । सयोगस्याश्रितस्य स्यादित्यल विस्तरेण न ॥१०३॥ गुण सयोगह ता स्याद विभाग प्रविभक्तधी । तत्र प्रमाण न वस्तु योगनाशे विभागधी । १०४॥ नैतदाश्रयनाशेन योगनाशोऽपि नव हि। विभागधीरत सिद्धो विभाग स त्रिधा मत ॥१०५॥ (९६) १ गुणादित्रिकस्यासमवायिकारण। (९८) १ आश्रय । (९७) १ उभयश्चव उभयौ को तयो (९९) १ सयोगज । २ सयोग । कस्थकमणी, ल च सयोग च उभयकस्थकम (१०१) १ तल्या जातियस्य तत्तुल्य स्तभ्योऽसनवायिकारणभ्यो जातिश्च तत अणुढय च तुल्येत्यादि, ताभ्यां लल्यजात्यणु द्वय तस्य योगस्तस्मात । स इति उभयकस्थ ते च ते कम्मणी च जातस्तस्य तत्त्व तस्मात ॥

१४ १ १ २ पदाथरत्नमञ्जूषायाम योगवत् पूर्वको तूक्तौ तद्वदेव तृतीयक । हेतुमात्रविभागोत्थो हेत्वहेतुविभागज ॥१०६॥ इति द्वधाऽन्तिम प्राग्वदायस्ततोविभागत । त त्वन्तरात तदाऽऽकाशदेशतो भाग इरित ॥१०७॥ नाशस्तूत्तरसयोगाश्रयनाशत इष्यते । पराऽपरधियोर्हेतू परताऽपरते मते ॥१०८॥ तनुयोगाल्पभूयस्त्वनिमित्ताऽस्तु परादिधी । द्रष्टरि व्यभिचारित्वान्नैतद्युक्त द्विधा च ते ॥१०९॥ दिक्कालाकृततातस्तन्नाश सप्तविधो मत । हेतुत्रयस्य प्रत्येक युगपच्च विनाशत ॥११०॥ द्रव्यापेक्षाधियो शात समवाय्य योस्तथा निमित्तासमवायिस्यनाशाश्चेत्येष सग्रह ॥११॥ कार्य यदाश्रय तत्स्यात समवायीतरत्पुन । तत्प्रत्यासत्तिभाक् सा च द्वेधैका हेतुसयुजे ॥११२॥ स्वकार्येण सहकस्मिन्नऽर्थे वृत्ति परा पुन । हेतुरूपस्य तत्कायकारणेन सह स्थिति ॥११३॥ एकस्मिन्निति सप्रोक्त ताभ्याम यनिमित्तकम । परताऽपरते प्रोक्त धिषणा प्रोच्यतेऽधुना ॥११४॥ बुद्धिर्ज्ञान प्रमाण तु स्यादनुव्यवसायधी । जानामीति द्विधा सा च नित्यानित्यविभेदत ॥११५॥ । (१०३) १ एकाथसमवेतादित्यथ । (१०७) १ द्वितत कपटदश्यविशिष्टाका शात । (११०) १ दिक्कालकृतत्वनत्यथ । २ समवायादिकारणत्रयस्य । (१११) १ असमवायिनो । २ तन्तरूपस्य । (११३) १ तच्छ देन हेतरूप तस्य तत्कायपटनिष्ठ रूप तस्य कारणन पटन ।

गुणात्यपदाथ वनम १ २ नित्येश्वरगता तस्यानित्यता चामुतो मता । घटोऽयमेतज्जनकानित्यज्ञानायबुद्धित ॥११६॥ जय कायत्वतो यद्वत पटादिरिति मानत । अनित्या जीवसस्था स्याद बुद्धि सा द्विविधा मता ॥११७॥ विद्याऽविद्या च तत्रान्त्या चतुर्दा समुदीरिता । सशीतिपययस्वप्नानवसायविभेदत ॥११८॥ सशयोऽनेकपक्षाणामवसायो विकल्पत । स्थाणु स्यात्पुरुषो वेति स्याद यत्रा यशेमुषी ॥११९॥ विपययो यथा रज्जौ सम्पधीननु दशनात् । स्मतेर्भेदाग्रहादेष व्यवहारो न तच्छुभम ॥१२०॥ वस्तुस्वरूपभेदस्य वस्तुनोग्रहणे कथम् । अग्रहो गुरुराद्धा ते भवे नाप्यसत प्रथा ॥१२१॥ रज्जावहेविय पुष्प न हि क्वापि प्रतीयते । नासरख्यातिरतो नाऽऽत्मख्यातिरप्यत्र चातुरीम ॥१२२॥ धत्ते यद्यपि विज्ञानाकार आशीविषो मत । बाह्यस्थ त्वा तर नव नाप्यऽनिवचनीयता ॥१२३॥ असत्सद्भया यस्मि नर्थे मानस्य हानित । अतो वल्मीकदष्टोऽही रज्जावाभाति दोषत ॥१२४॥ (११६) १ वक्ष्यमाणात प्रमाणात । (११७) १ प्रमाणात २ निष्ठा । (१२२) १ आत्मख्यातिवादी च बाद्धभद। (११९) १ कोटिद्वयस्य । (१२३) १ अनिवचनीयरयातिवादिनो (१२४) १ अख्यातिवादी प्रभाकर आ वदातिन । पपति । (१२४) १ अ यथारयातिवादी तार्किक (१२१) १ प्रभाकर परिहरति । २ असतख्यातिवादिन बौद्ध निराचष्ट । १ ३ ज्ञानम । - पदाथरत्नमञ्जूषायाम २ इति चारु वचो युक्त सिद्ध स्वप्नस्तु लोकत । स्यादनध्यवसायो न कि सज्ञो वक्ष इत्ययम ॥१२५।। विद्याऽपि स्याच्चतुर्भेदा प्रत्यक्षमनुमानकम । स्मतिराषमिति प्राहुरपरोक्षा यथाथधी ॥१२६॥ प्रत्यक्ष द्विविध तच्च योग्यऽयोगिविभागत । धर्मोऽध्यक्ष प्रमेयत्वात् केषाचित्स्याद् घटादिवत् ॥२७॥ योगिसिद्धिरिति द्वधेतरदा रदाद्यमकल्पकम् । निविशेषायधीरयत सविकल्पकमीरितम ॥१२८॥ शब्दोल्लेखभव तत्र षोढा सबन्धमूचिरे । जनक ज्ञातशीषण्या अत्रैषा प्रक्रियोच्यते ॥१२९॥ योगाद् द्रव्यग्रहो युक्तसमवायाद गुणादिधी । सयुक्तसमवेतस्थ समवायाद गुणत्वधी ॥१३०॥ शब्दधी समवायात स्याच्छन्दता समवेतगात् । समवायात प्रतीयत विशेषणविशेष्यता॥१३१॥ एतत्सब धवन्निष्ठाभावधीहेतुरिष्यते । अविनाभावज ज्ञानमनुमान प्रचक्षते ॥१३२॥ दृष्टसामान्यतो दृष्टभेदाद् द्वेधा तदीरितम । दृष्टमध्यक्षयोग्याथग्राहि धूमाद यथाग्निधी ॥१३३॥ स्वभावविप्रकृष्टाथभासक चेतरद यथा । चक्षु: रूपधीतस्तत पराथस्वाथभेदत ॥१३४॥ (१२७) १ प्रत्यथ । (१२९) १ उच्चार २ सविकल्प (१२८) १ अयोगिप्रत्यक्ष निर्विकल्प ३ तकविद । सविकल्पकभदन द्विधा भवतीति। २ निर्विक (१३२) १ अविनाभावोपतधूमज शानम ल्पम् । ३ विशषरहितार्थधी । २ कदलीकारा।

गुणाख्यपदाथवणनम १७ पुद्वियोपदेशेन हीनमन्त्यमथाऽग्रिमम । तद्युक्त स च पञ्चाश वाक्यमिष्ट प्रतिज्ञया ॥१३५॥ सह हेतु सदृष्टा ते उपनीत्युपसहती। इत्यशा पक्षवागाद्या सिसाधयिषया यथा ॥१३६॥ अग्निमान् गिरिरित्यन्यो धूमवत्त्वादितीदृश । साधनख्यापका लिङ्गवागिष्ट स त्रिधा मत ॥१३७॥ अन्वयव्यतिरेकी च व्यतिरेक्यवयी तथा । पञ्चरूपो भवेदाद्य पक्षधमत्वमादिमम ॥१३८॥ रूपसत्त्व सपक्षेऽन्यद् विपक्षापेतताऽपरम अबाध्यता तु प्रत्याथिपक्षता चेति पञ्चमम ॥१३९॥ स्याद व्याप्यवृत्तिता हेतो पक्ष आद्य द्वितीयकम । सपक्षेल्पे समग्ने वा वत्तिावृत्तिरिष्यते ॥१४०॥ विपक्षात्सकलादन्यच्चतुथ त्वविरोधिनि । प्रामाण्येन प्रतिज्ञासे (स्ये) साध्यतद्विपरीतयो ॥१४१॥ साधनस्य त्रिरूपत्व पञ्चम रूपमीरितम । विपक्षे बाधकस्तर्कोऽप्यऽनुमानाङ्गमिष्यते ॥१४२॥ उपाधे_तकत्वेन व्यभिचारस्य चाध्रुवम् । साधनाव्यापक साध्य समव्याप्ति समीरित ॥१४३॥ उपाधिरग्नीषोमीहिसाऽधमत्वसाधने । (१३५) १ स्वाथ २ पराथ । (१३६) १ उपनयनिगमने । (१३९) १ विवत्तता २ असत्प्रति क्षता (१४३) १ अनकातिकस्य । २ साधनाध्यापक उपाधिरित्युक्त अनित्य शद कृतकत्वादित्यत्र सावयवत्व उपाधि स्यात । तदथ साध्यसमयाप्तिरिति पदम । साध्यसम यान्तिरूपाधिरित्युक्ते तस्मि नवानुमाने कायत्वमण्यपाधि स्यात। तदथ मुक्त साधना यापकपदम । तद यत्वोपाधियदासाथ पमसदम ।। (१४४) १ वैधी हिंसा ।

१८ पदाथरत्नमञ्जूषायाम हिसा हेतोनिषिद्धत्वमुपाधिर्यादृगिष्यते ॥१४४।। तर्को युक्तिरिह प्रोक्तस्तक्कतत्त्वविचक्षण । यथा यद्यग्न्यभाव स्याद धूमाभावोऽपि ते भवेत् ॥१४५॥ इत्येकादशधा चासावन्तर्वाणिभिरीरित । क्षितितोयादिजन्य स्यात कर्ता कायत्वहेतुत ॥१४६॥ यथा घटादिन-वस्तु कार्यता कतृ जयता । माऽस्तु को बाधकस्तक्क इति पष्टेऽभिधीयते ॥१४७॥ व्याघातात्माश्रयान्योन्याश्रयता चकास्थिती। प्रतिबदी च कल्पनालाघव गौरव तथा ॥१४८॥ उत्सगश्चापवादश्च वैयर्थ्य चातिम मतम । अकतृ ताकायतयोर्व्याघात स्यात समुच्चये ॥१४९॥ हिमाग्न्योरिव नन्वस्तु तत्र नातिचेद् वद । कि विशेषोऽस्ति नो वाऽत्र नास्ति चेमूकता वज ॥१५०॥ यद्यस्ति कि स एव स्यान्मानमात्म युतायक । स चेदाऽऽत्माश्रयत्व स्यादन्यश्चेततत्र कि भवेत ॥१५१॥ पूर्वो मान तृतीयो वा पूवश्चेत स्याद ध्रुव तदा । अन्योन्याश्रयताऽथ स्यात तृतीयश्चकक भवेत ॥१५२॥ तृतीये तु चतुथश्चेदनवस्थवमासजेत । चतुथस्तु प्रमाण चेदाद्य कि नवमीदशी ॥१५३॥ प्रतिबदीत्यकत त्वे कायतवन सेत्स्यति । सिद्धोऽत इश एकश्च कल्पनालाघवाद भवेत ॥१५४॥ (१४६) १ शास्त्रविदभि । (१४८) १ चक्रकाश्रयानवस्थे । २ कल्प (१५०) १ तत्र हिमाग्याविषयाघा नालाघवम ३ कल्पना गौरवम् । (१४९) १ शरीरषु अपवादित्वात अप (१५१) १ तस्मिन विषये । वादस्तक्क तदपतत्वात । तोऽस्तु।

१९ गुणाल्यपदार्थवर्णनम कल्पनागौरव तु स्याद् बहुताया परेशितु । नन्वदेहस्य कतृ त्वमेव नास्ति जगत्कृति ॥१५५॥ कुत स्यादिति चेत पश्य कत त्व चेतनत्वत । उत्सर्गात् सभवेत् कि न निश्चयोऽस्तीति चेच्छृणु ॥१५६॥ मुक्तात्मस्वपवादित्वादस्तु मान परेश्वरे। तन्माने कि प्रमाण स्यादिति चे मौनमुत्तरम ॥१५७॥ वयात्यसज्ञ नह्यस्य प्रश्नस्यान्तोऽवसीयते । इत्थ तर्कास्तक्कदोषा सप्रोक्तास्तवककर्कशै ॥१५८॥ आपाद्या सिद्धिराद्य स्याद यथा कर्ता यदश्वर । रागी स्थादित्यसिद्धिश्चापादकस्य द्वितीयक ॥१५९॥ यथा यदीशो देही स्यात कर्ता स्यात् तदितीदृश । उभयाऽसिद्धता यादृक देहीशश्चेत तदा भवेत् ॥१६०॥ धादिभागिति प्रोक्तो मूलशैथिल्यमुत्तर । यथा यदीश कर्ता स्याद् विप्र स्यात् ताऽसाविति ॥१६१॥ मिथस्तक्कविरोधस्तु पञ्चमो यद्वदीश्वर । कर्ता यदि भवेद् रागी तहिस्यादित्युदाहृत ॥१६२॥ कर्ता चेन्न भवेत तहि जगदाऽऽकस्मिक भवेत् । तक्कद्वयविरोधोऽयमिष्टापत्ति पुन पुन ॥१६३॥ यथा यदीश्वर कर्ता स्यात तहि ज्ञानवानिति । इश्वरश्चेतनश्चेत्स्यादनित्यज्ञानवान् भवेत ॥१६४॥ (१५६) १ सामा यविधे । ५ इष्टापत्ति । ६ विपययापयवसार (१५८) १ ज्ञान न प्राप्त । २ आपाद्या ७ इति सप्त तर्का । द्ध १ आपादका सिद्धिः। (१६०) १ दाहित्वमापादकम् । द्ध । ३ मूलशथिल्य । ४ तक्क विरोध । (१६२) १ इत्यक्ते । २ उभया २० पदाथरत्नमजूषायाम् तथा तु न भवत्येष , तस्मान्नो चेतनोऽप्यसौ। इति वक्तुमशक्यत्वादित्यऽपयवसायिता ॥१६५॥ विपययस्य दोषोऽयमुक्तस्तक्कस्य सप्तम । सोऽय तर्कोऽतुमानाङ्गमित्यल बहुनाऽमुना ॥१६६॥ पक्षव्यापी सपक्षस्थोऽविद्यमानविपक्षक । स्यात्केवला वयो प्रोक्त स च योगिप्रसाधने ॥१६७॥ पक्षव्यापी सपक्षेण हीनोऽपतो विपक्षत । केवलव्यतिरेकी स्याद् यथा कायमशेषकम ॥१६८॥ सम्वविकत जन्य स्थात् कादाचित्करवतो नयत् । एव तदेव नव' स्याद् ययाकायमितीदशम ॥१६९॥ हेतुर यत्वत सर्वो हेत्वाभास स षड्विध । असिद्धश्च विरुद्धश्च स्यादनकान्तिकस्तथा ॥१७०॥ अनध्यवसित कालातीत प्रकरणे सम । पक्षेऽनिश्चितवृत्ति स्यादाऽऽद्यो यादृगनित्यक ॥१७१।। चाक्षुषत्वेन शब्द स्यादिति पक्षविपक्षग । विरुद्धो नित्यक शब्द कायत्वादितिवत्पर ॥१७२॥ पक्षत्रयस्थो यद्वत्त्यात प्रमेयत्वादनित्यक । शब्द इत्यपरो हीनसपक्षकविपक्षक ॥१७३॥ पक्षव्यापी यथा सवमनित्य सत्त्वतो मतम् ॥ प्रमाणबाधिने पक्षे वत्तमान उदीरित ॥१७४ । कालातीतो यथाऽनुष्ण पदाथत्वाद् हुताशन । (१६७) १ धम्म कस्यचित्प्रत्यक्ष प्रमय (१७०) १ पूर्वोक्तलक्षणकृता द्व त्वात घटादिवत। (१६८) १ यावृतत्त । (१७१) १ यथा । तु त्रयात।

२१ गणाल्पपदाथवणनम् Library, Date REmagepaperpregnTrhymiatneerpa स्वपक्षे परपक्षे च त्रिरूपोऽन्त्य समीरित ॥१७५॥ सपक्षपक्षयोर यतरत्वात् स्यादनित्यक । शब्द इत्यादिवत्तेषा भेदा सन्ति सहस्रश ॥१७६॥ सम्यगदृष्टा तवागिष्टमुदाहरणमत्र च । साधम्य वैषम्यभिदा द्वविध्य सप्रतीयते ॥१७७॥ यद्यद् धूमवदग्याढय तत्तद्यद्वन्महानसम । इत्याद्य न यदेव स्थान तदेव यथा ह्रद ॥१७८॥S,VOCallege इत्यत्यमेतदाभासा मनो मूत्तत्वत क्षयि । TIRUPATI अणुवत् कमवद व्योमव नृशृगवदित्यऽमी ॥१७९। Acc N96.78 स्यु साध्यसाधनद्वन्द्वाश्रयशूया परौ पुन । वागदोषो व्याप्त्यनुक्ति स्यादेको घटवदित्ययम्॥१८० व्याप्तेविषययोक्ति स्यादपरो यदनित्यकम् । तन्मूत दृष्टमित्येव ववर्येऽप्यूह्यमीदशम् ॥१८१॥ दृष्टान्तस्योपमानेन पक्षे व्याप्त्यभिधायि यत् । वचन सोपनीति स्यात् सा द्वधा सप्रकीर्तिता ॥१८२॥ उदाहरणवद धूमवाश्चायमिति साऽऽदिमा । अधूमवान् गिरिर्ने ति द्वितीयोक्ता विशारदै ॥१८३॥ सहेतुका प्रतिज्ञाया वाक स्यान्निगमनाऽभिधा । अतोऽग्निमाने च गिरिरित्युक्तमनुमानकम् ॥१८४॥ अन्तर्भावोऽनुमाने स्याच्छब्दस्य ज्ञातसंगति । यत प्रत्याययत्यऽथ शब्दो नाज्ञातसगति ॥१८५॥ (१७७) १ (१८१) १ एवमेव साधनाव्यावृत्त (१७९) १ वाग्दोषद्वयोपेत चोदाहरणम । पूर्वानमान दृष्टा (१८०) विकला । भदन । साध्या पावत्त उभययावत्त आश्रयविकल । उदाहरणाभासा । तष्वेव क्रमेण ऊह्यमा २२ पदार्थरत्नमञ्जूषायाम उपमान तु गोतुल्यो गवय स्यादितीदशम । तच्च शब्दो वने दृष्ट गवयेऽनेन तुल्यका ॥१८६॥ मद्गौरित्युपमान चे नैतदेषा स्मतियत । श्रुतातिदेशवाक्यस्य वने या गवये मति ॥१८७॥ न सोपमानमध्यक्षमेव तत् सविकल्पकम । बहिर्भावाविनाभूतो गृहेऽभावोऽवधारित ॥१८८॥ जीवतोऽतोऽनुमान स्थादर्थापत्तिरपि ध्रुवम् । सभवेदयुत लक्ष इत्यय सभवोऽपि न ॥१८९॥ अनुमान यतो लक्षेऽयुतव्याप्ति प्रतीयते। ग्राह्य प्रत्यक्षतोऽभावो नातोऽभावप्रमाणता ॥१९०॥ अज्ञातकतृ क वादपारपयमुदाहृतम् । ऐतिह्य तच्च शब्देऽतर्भूतमित्यनुमानकम् ॥१९१॥ प्रत्यक्षमिति माने द्वे कणादेनोपणिते । प्रामाण्य च तयोर्नैव स्वतस्तन्मानहानित ॥१९२॥ धीहेतुमात्रजन्यस्थ प्रामाण्य द्वित्ववद भवेत् । दोषोऽनुत्पाद्यमानत्वे सति ज्ञानाश्रयत्वत ॥१९३॥ इति चेदप्रमाणत्वेऽप्येव वक्तु प्रशक्यते। तस्मात् प्रमाण धोहेतुव्यतिरिक्तात्महेतुकम् ।।१९४॥ (१८५) १ ज्ञातसबध आगम । अनु २ इदानीत ननयायिकाभिमतमपमान प्रत्यक्ष मानमपि ज्ञातसबधमवाथ ज्ञापयति । अतर्भावयति । २ ज्ञापयति । ३ अय गवय इति मति । (१८६) १ चिरतन नयायिकाभिमतमुपमान (१८९) १ दशसहस्र नाम । २ वनक शद अतर्भावयति । २ मीमासकाभिमतमुप २ मीमासकाभिमतमुप १ विषये (२) । मानमाशङ्कन। (१९२) १ स्वतस्त्वप्रमाणाभावात् (१८७) १ श्रुत अतिदशवाक्य गोसदशो १२ स्वत प्रामाण्यवादिनो मीमासका गवय इति वाक्य येन स तस्य । तानिराचष्टे।

गणाख्यपदाथवणनम् २३ धीविशेषत्वतो यादगमानमिति सुन्दरम् । अबाध्याऽनवबुद्धाथबोधकत्व प्रमाणता ॥१९५॥ तच्च वस्तुस्वभाव स्थान शक्तिर्मानहानित । दाहस्फोटादिकार्याणामन्यथाऽनुपपत्तिता ॥१९६॥ शक्ति स्यादिति चेन्मैव कायमग्नेभविष्यति । कि शक्त्या ननु मन्त्रादौ सति काय न दृश्यते ॥१९७॥ सत्यप्यग्नौ न मन्त्राद्य भावनावितवह्निना । कायसिद्धरत शक्तिङ्गिीकार्येति संग्रह ॥१९८॥ ज्ञान सस्कारमात्रोत्थ स्मति सा चाप्रमा मता। सशयादिवदध्यक्षानुमाना यत्वतस्तथा ॥१९९॥ इच्छा द्वेषाऽनुमानादि कायमस्या प्रकीतितम् । आर्ष तु प्रातिभ ज्ञान मुनीना तपसेरितम् ॥२००॥ बालाना च यथा कया ब्रूते प्रात पिता मम । आयास्यति मनो मेऽत्र प्रमाणमिति वण्णिता ॥२०१॥ बुद्धि सविभवा सम्यग व्याख्यास्यामोऽधुना सुखम् । निरुपाधिय इच्छाया विषयस्तत् सुख मतम् ॥२०२॥ धर्मो हेतुमनो मान काय माऽऽस्यप्रसनता । द्वेषस्य गोचरो दु ख निरुपाधिनिमित्तकम् ॥२०३॥ अधर्मोऽत्र मनो मान कायमास्यविषण्णता । २ धियो हतव (१९८) १ स्यमतमपसहरति-परत (१९६) १ बोधकत्व पथक पदाथशक्ति- माणवादी तस्मादिति । रिति मीमासका । निकर्षा य धीहेत यतिरिक्तब ध्य यवहार २ दाहस्फाटादिकार्याणि शक्तिम तरण क्षणहतुकरवदृष्टा त ज्ञात यम । पक्षे च-धी नपपद्यमानानि वह्नी शक्ति गमर्या त । इत्यर्थापत्ति तुव्यतिरिक्ता बाध्य यवहारस्वरूपहेतकत्व प्रमाणम । ति यम । (१९९) १ पक्ष २ साध्यम। (१९५) १ अज्ञाताथ । ३ दष्टान्त । ४ साधनम् । २ बोधकत्व प्रमाणस्वरूपमिति ताजिका । (२२) १ सविस्तरा। ।

२४ पदाथरत्नमञ्जूषायाम १ २ इच्छा स्यात प्राथना सा च द्वेधा नित्यादिभेदत ॥२०४॥ नित्यशी जीवगाऽनित्या कार्य चास्या प्रयत्नक । रोषो द्वेषो भवेत् कायमस्य प्रोक्त निवत्तनम् ॥२०५॥ द्रोहक्रोधादयो भेदा द्वेषस्यव समीरिता । उद्योग स्थात प्रयत्नोऽसौ द्वेधा नित्यादिभेदत ॥२०६॥ नित्य ऐश परो जैव सोऽपि द्वेधाऽग्रिमस्तु न । इच्छादिपूवकोऽन्याऽपि प्राणधारणपूवक ॥२०७॥ मान च तत्र स्वपतोऽसुक्रिया यत्नहेतुका । प्राणक्रियात्वतो जाग्रदसुचेष्टावदिष्यताम् ॥२०८॥ गुरुत्वमाद्यपातका हेतु स्यात् परिशेषत । पार्थिवाऽऽप्याणुग नित्य कायग हेतुपूर्वकम् ॥२०९॥ नित्याऽनुमेयमन्भूग हेतुनाशाच्च नश्यति । द्रवत्व स्यदने हेतु स्याद् भूमिजलवह्निगम् ॥२१०॥ जले सासिद्धिक भूमितेजसोरग्नियोगजम् । जत्वादावग्निसयोगाश्रयनाशाच्च नश्यति ॥२११॥ स्नेहधीविषयस्नेहो जलकनिलयो मत । नित्यतानित्यतोत्पत्तिव्यवस्था तु गुरुत्ववत ॥२१२॥ सस्कारस्त्रिविधो वेगस्थितस्थापकभावना । तत्र वेगो महीतोयवह्निवायुमनोभव ॥२१३॥ स द्वेधोक्त क्रियावेगजत्वेनाद्य शिरादिषु । जलेय स्पशवद् द्रव्ययोगनाशी समीरित ॥२१४॥ (२०६) १ उद्यम । (२०८) १ (२०७) इच्छानिलिङ्गक । २ प्राण (२११) १ १ anam प्राणचष्टा । लाक्षादौ। चष्टालिगकम्य।

गुणाख्यपदाथवणनम २५ तथा सत्यक्षगम्य प्रागवस्थाऽन्यधीभूतस्वाश्रयप्रागवस्थिते । सपादको गुणोऽभीष्ट स्थितस्थापकसजित ॥२१५।। नित्यताऽनित्यतोत्पत्तिप्रक्रिया तु गुरुत्ववत । गुणोऽसाधारण पुसो भावना स्मतिकारणम् ॥२१६॥ पटवभ्यासादरज्ञानजन्यो नित्यानुमेयक । अतीन्द्रियौ गुणौ पुसो धर्माधर्माबुदाहृतौ ॥२१७।। पुत्राद्यभ्युदये हेतुधर्मो नि श्रेयसे तथा। कैवल्यसने दु खैकहेतुधर्मेतरो मत ॥२१८॥ द्रव्यादेधम्मता बूते तौतातितपदानुग । स्याद धर्मो नो वेदगोचर ॥२१९॥ क्रियाया क्षणभगित्वा न तस्याश्च फल भवेत् । अत सोमादिकर्मभ्यो जात शब्बैकगोचर ॥२२०॥ आत्मनिष्ठ फलोत्पादि कतृ तत्कालवत्ति च । अपूर्व यत्तदेव स्याद् धर्माधमवच पदम ॥२२१॥ तो चान्त्यसुखदु खादिविनाश्यौ वण्णितौ बुध । शब्द श्रोत्रकविज्ञेयो जात्याधार स च द्विधा ॥२२२॥ वर्णो ध्वनिश्च तत्राद्य कादिरन्त्य करादिज । पद प्रोक्त नन्वेतवसमञ्जसम् ॥२२३॥ प्रत्येकमभिदध्यु किमर्थ ते सघशोऽथवा । नाद्योऽप्रतीतेन्त्यिोऽपि वर्णाना क्षणिकत्वत ॥२२४॥ सघातानुपपत्तेस्तद् यतोऽथप्रत्ययो भवेत् । स शब्द स्फोटसज्ञ स्यादित्यूचे पाणिनिर्मुनि ॥२२५॥ (२१६) १ (२१९) १ भाटट । (२१७) १ त्रिभ्योज य । वण्णसघ आत्मन ।

पदार्थरत्नमञ्जूषायाम नैतदेव यत पूववण्णसस्कारसयुत । वर्णान्त्यो बोधकस्तस्मान्न युक्ता स्फोटकल्पना ॥२२६॥ विकर्षोत्कषकत्वेनानित्य शब्द सुखादिवत । सब धोऽप्यथशब्दाना जय स्याद् द्वित्वशब्दवत ॥२२७॥ सबधत्वात् तथा वेदवाक्य पुरुष निर्मितम् । वाक्यत्वहेतुतो हष कालिदासादिवाक्यवत् ॥२२८॥ ताल्वादिस्थानसभूतशब्दत शब्दसतति । जायतेत्रान्तिम शब्द श्रौत्रोऽयो नित्यमेयक ॥२२९॥ कर्मान्यत्वे सति ज्ञेया सामायकाश्रयत्वत । शब्दस्य गुणता रूपस्पर्शगधरसादिवत ॥२३०॥ स त्रेवा भाग सयोग शब्दजत्वविभागत । वशादिदलभागोत्थ आद्यो भेर्यादिजोऽपर ॥२३१॥ तृतीयस्तूक्त एवादावित्युक्तो गुणसग्रह । अन्तभावस्तु विज्ञेय इच्छादौ करुणादित ॥२३२॥ चतुर्विशतिरेवातो गुणा इति समञ्जसम् । अथाभिधीयते कम्मनिण्णयसग्रहोऽधुना ॥२३३॥ पदाथरत्नमञ्जूषाग्रन्थे कृष्णविनिम्मिते । पदार्थो गुणसज्ञोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम ॥२३४॥ . - -- वृत्तीय-कर्माख्यपदार्थवर्णनम् । सयोग-भागयो कर्माऽसमवायिनिमित्तकम् । मान कम्मणि नास्तीति चेत् पश्य चलतीति धी ॥२३५॥ मान नन्वस्तु योगादिसततिस्तद्धिय पदम् । नैतदेतेन सयुक्त विभक्त चात इत्यपि ॥२३६॥ प्रतियोगिनिरूप्यत्वात तयोश्चलन वाग्धियो । प्रतियोगिनिरूप्यत्व न कदापि प्रतीयते ॥२३७॥ तथा पिपीलिकायोगभागसततिशालिनि । शाके चलनधीनवोदयमासादयत्यलम् ॥२३८॥ तस्मात् कम्म पृथक् सिद्ध तच्च पञ्चविध स्मृतम् । उत्क्षेपण तथैवापक्षेपणाकुञ्चने परे ॥२३९॥ प्रसारण गतिश्चेति तेषा लक्षणमीदृशम् । ऊध्वदिग्योगहेतु स्यादाद्य चाधोदिशो युजे ॥२४०॥ निमित्तमन्यदृजु नोऽग्रभागानां वियोगके। तद्देशैर्मूलदेशैश्च सयोगे दोरको यत ॥२४१॥ कुटिल स्यात् तृतीय तु तविरुद्ध प्रसारणम् । अव्यवस्थितदिग्वेशयोगाद्युत्पादि पञ्चमम् ॥२४२॥ मुशलोत्क्षेपणेच्छाया प्रयत्न स्यात् तत करे। यत्नापेक्षात्महस्तस्थयोगावुरक्षेपण भवेत् ॥२४३॥ (२४१) १ ऋजुनो द्र यस्याग्रभागाना , स्याग्रभागाना मूलदशश्च सयोग सति यतो दोरक काशदेशवियोगे विभागे सति, तस्यव द्र य कुटिल स्यात तदाकुञ्चन कम्मत्यथ ।

२८ पदाथरत्नमजषायाम तयत्नापेक्षमुशलहस्तयोगादुबेत्यनु । मुशलोत्क्षेपण पूषयत्नेच्छोच्छेदने तत ॥२४४॥ ततोऽपक्षेपणेच्छाया प्रयत्नस्तदक्षत । करात्ममुशलोहस्तयोगद्वन्द्वात समुदभवेत ॥२४५॥ अपक्षेपणकद्वद्व युगप मुशले करे । रज्जोराकषणेच्छाया प्रयत्नस्तदपेक्षत ॥२४६॥ हस्तात्मरज्जुहस्तस्थसयोगद्वयत करे । रज्जौ चाकुञ्चने स्यातामय रज्जुप्रसारणे ॥२४७॥ इच्छायत्तस्तत पाणिकर्माऽतो रज्जुहस्तयो । सयोगो नोदनाख्य स्यात् ततो रज्जुप्रसारणम् ॥२४८॥ उत्पद्यते जलादौ च विना यत्नादितो जनि । गतरुत्तरसयोगाद् विनाश सवकर्मणाम ॥२४९॥ विनश्यद्व्यनिष्ठस्याश्रयनाशत इरित । भ्रमपातप्रवेशादि त्वतभूत गतौ ध्रुवम ॥२५०॥ न जात्य तरता तेषा जातिसकरदोषत । कूपादौ वशपत्रादेर्वेशभ्रमणपातधी ॥२५१॥ जायते जातिभेदे तु जातिसकर आपतेत् । तस्मात् पञ्चव कर्माणीत्येतत् सम्यग् व्यवस्थितम् ॥२५२॥ पदाथरत्नमञ्जूषाग्रन्थे कृष्णविनिर्मिते । पदाथ कमसज्ञोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम् ॥२५॥ (२४४) १ उत्क्षेपणप्रयत्नापेक्षात ।

चतुर्थ-सामान्याख्यपदार्थवर्णनम् । अनेकवत्ति नित्य यत तत सामायमुदाहृतम् । अतश्चापोह एव स्यादश्वत्वमिति चे मतम् ॥२५४॥ अन तत्वादनश्वानामग्रहेऽश्वत्वधी कथम । न शुक्लेऽश्वे न चाभावे, गृह्यते नाश्वता तथा ॥२५५॥ अश्वधीपरतन्त्रा वाऽनश्वधीस्तदधीनका । अश्वधीरिति दुवारमन्यो याश्रयमापतेत ॥२५६॥ नातो बौद्धमतापोहो जातिव्याडिमत वच सादश्य जातिरेष्टव्या जातिमूल हि तद्यत ॥२५७॥ भूयोऽवयवसामा ययोगो जात्यन्तरस्य य । तत्सादृश्यमतोऽपोहसादृश्या यदवस्थितम् ॥२५८॥ सामाय तत्र मान चालवत्तप्रत्ययो भवेत । पराऽपरभिदा द्वधा तत्र सत्ता पर मतम् ॥२५९॥ अनुवृत्त्यकहेतुत्वाद भवेत सामान्यमेव सा । प्रमाणग्राह्यतवास्तु सत्ता न प्राक प्रवत्तिता ॥२६०॥ मानस्यासत्त्वमेव स्यात वस्तुनो नाप्यसत्यद । प्रवत्तत्ते तथा च स्यादयोन्याश्रयता च ते ॥२६॥ सति मान प्रमाण च सति सत्त्वमितीदृशी । अथक्रियापटुत्वेऽपि सत्त्वे दोषोऽयमेव ते ॥२६२॥ द्रव्यत्वादिपर तच्च व्यावत्तेरपि कारणम् । अतो विशेषसज्ञामप्यास्कन्दति तदेतयो ॥२६३॥ (२५७) १ पाणिनीयमतम् । (२५८) १ पदार्थान्तरस्य पदाथरत्नमञ्जषायाम परतापरते भूय स्वल्पाथत्वानमते मुने । तत्रव जातियस्मिन षटक स्याज्जातिबाधकम् ॥२६४।। व्यक्त्यक्यतुल्यते तद्वदनवस्थितिसकरौ । सबन्धशून्यता रूपहानिरित्येष सग्रह ॥२६५॥ जातिनाऽऽकाशता व्यक्तरेकत्वाद् घट कुभते । न जाती व्यक्तितुल्यत्वाद योन्यव्यभिचारिणो ॥२६६॥ एकत्रस्थितिसज्ञस्य सकरस्य प्रसगत । दण्डिता-खगिते न स्तो जाती नो जातिताऽपि न ॥२६७।। जाति स्यादनवस्थानान्न चापि समवायता । सबधायभावतो नापि समताऽत्यविशेषता ॥२६८॥ स्वरूपहानितो जाति षडेते यत्र बाधका । तात्पयत समालोच्यमाने सति मनीषिभि ॥२६९॥ न सति , जाति सष्टव्या सा च नित्यैव समता। विनाशहेत्वभावादित्येतत् सर्व सुमगलम् ॥२७०॥ पदाथरत्नमञ्जूषाग्रन्थे कृष्णविनिर्मिते । सामान्याख्य पदार्थोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम ॥२७१।। (२६४) १ कारित्वे ।

पञ्चम-विशेषात्यपदार्थवर्णनम् । विशेषा हेतवोऽत्यतव्यावृत्तप्रत्ययोदये। नि सामान्यविशेषाश्च नित्यद्रव्याश्रयास्तथा ॥२७२।। उष्ट्रादिभ्यो गवाश्वादौ व्यावृत्तप्रत्ययो यथा । गोत्वादिहेतुकस्तद्वत्तुल्याकृतिगुणादिके ॥२७३॥ व्यावृत्तप्रत्ययोऽण्वादौ प्रतिव्यक्ति यतो भवेत् । योगिना ते विशेषा स्युन वण्वात्मादिषु स्वत ॥२७४॥ व्यावृत्तधीविशेषाणामिव कि नोररीकृता। तुल्यजात्यादिभाकत्वान व्यावृत्तप्रत्ययोदय ॥२७५॥ स्वतो द्रव्येषु जात्यादिहीनत्वात्तु विशेषधी । विशेषेषु स्वतो युक्ताऽत एवान्त्या उदीरिता ॥२७६॥ नित्याश्चाश्रयनाशादेशि हेतोरभावत । इति सिद्धि समाभ्यागाद्विशेषाणा निरूपणम् ॥२७७॥ पदाथरत्नञ्जूषानथे कृष्णविनिर्मिते । विशेषाख्य पदार्थोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम् ॥२७८॥ miunekaran on Colley Libras. TIKIPAIT Aoo No Date ..

कृष्ठ-समकायाख्यपदाधवर्णनम् ।
सबन्धोऽयुतसिद्धानामिहधीहेतुरीरित ।
समवाय पथसिद्धि सप्रोक्ताऽयुतसिद्धिका ॥२७९॥
नित्यानित्याश्रयत्वेन द्वेधा चासौ समीरिता।
अन्योन्यपरिहारेण पृथगाश्रयतोदिता ॥२८०॥
अनित्यगाऽम्बुघटयोरिव नित्याऽऽश्रयस्थिता ।
पथग् गमनयोग्यत्व स्यादणु स्वान्तयोरिव ॥२८१॥
युतसिद्धिरिय प्रोक्ताऽयुतसिद्धिरतोऽन्यथा ।
एका तन्तुपटारूढा वियद्रव्यत्वगाऽपरा ॥२८२॥
इह तन्तुषु शुक्लत्वमितीह प्रत्ययो ध्रुवम् ।
सबन्धपूवको ज्ञेय इहधीत्वाद् यथोदके ॥२८३॥
कजमित्येतदभ्युक्त परिशेषानुमानकम् ।
प्रमाण समवायोऽसौ नाशहेतोरभावत ॥२८४॥
नित्यो लिङ्गाविशेषात स स्यादेकोऽनेकता पुन ।
द्रव्यादिव्यञ्जकाधीना वृत्तिद्रव्यादिपञ्चके ॥२८५।।
नास्याद्रव्यत्वतो योगो नापि स्यात् समवायक ।
अनवस्थासमासत्तेरत स्वेनैव पञ्चसु ॥२८६॥
वृत्तिरिन्द्रियसबन्धाभावानेद्रियगोचर ।
अतो नित्यानुमेय स्यात् समवाय इति स्थितम् ।।२८७।।
पदाथ षडविधो भाव इत्यद कणभुड मतम् ।
अथाभिदध्महेऽभावपदार्थ सग्रहानुगम् ॥२८८॥
पदाथरत्नमञ्जूषाग्रन्थे कृष्णविनिर्मिते ।
समवाय पदार्थोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम ॥२८९॥

सप्तम-अमाकाख्यपदार्थवर्णनम् । पदाथ इतरोऽभावो नेतिधीशब्दगोचर । प्रमाण चाभ्यधाय्यस्मिन् स च ज्ञेयश्चतुर्विध ।।२९०।। प्रध्वस प्रागभावश्चान्योयाभावस्ततीयक । अत्यन्ताभावकस्तुर्यो दण्डघाताद् घटादिषु ॥२९१।। प्रध्वसो जायते नित्य स पटानुदयात्पुन । प्रागभावस्त्वजय स्याज्जनकाभावत स च ।।२९२।। अनित्यो घटजन्मादिनाशकारणसभवात् । गोरश्वो न भवेदित्थमयोयाभाव उच्यते ॥२९३।। अनादिनिधनोऽभीष्टोऽत्य ताभावो विशारदै । वन्ध्यापुत्रो वियत्पुष्प नरशृड गमितीदृश ॥२९४॥ पदार्थाविति सप्रोवतौ भावाभावौ सुविस्तरौ । अनयोस्तत्त्वविज्ञाना मोक्ष सजायते नृणाम ।।२९५।। पदाथरत्नमञ्जूषान थे कृष्णविनिर्मिते। अभावाख्य पदार्थोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम ।।२९६।।

मोक्षस्वरूपवर्णनम् । ननु को नाम मोक्षोऽय शुद्धधीसततेज्जनिम । केचिदाहु परे तस्या अपि च्छेद परे पुन ॥२९७॥ सततोवर्गात प्राहु पु प्रकृत्योविवेचनात् । औदासीय पर पुस ऊचु कपिलसेविन ॥२९८॥ परिणामविहीनामावस्थान क्लेशसक्षये । नित्यान दगुणव्यक्ति मीमासाकुशला विदु ॥२९९।। ब्रह्माशकस्य जीवस्योपाधिनाशेऽशिरूपताम् । केचिद् भवप्रवाहकबीजाज्ञाननिवत्तनम ॥३००। नित्यात्मरूपानन्दाभिव्यक्ति वेदातिनो विदु । नेषामेकतमोऽप्यत्र पक्ष फाटसमथन ॥३०१।। विषयोपप्लाभावे ज्ञानानुदयतोऽग्रिम । न युक्तोऽपुरुषाथत्वादितरोऽपि न शोभन ॥३०२॥ स्वोच्छेदार्थी यतो नैव कश्चिदप्यस्ति बुद्धिमान । परिच्छिन्नत्वतोऽनित्य स्यादात्मा च ततीयके ॥३०३।। चतुर्थे मोक्षहेतूनामनुष्ठन न सभवेत् । उदासीनत्वत पुस प्रकृतेश्च जडत्वत ॥३०४॥ नित्यानन्दगुणास्तित्वे मानाभावान पञ्चम । षष्ठेशाशित्वतो ब्रह्मानित्यमेव प्रसज्यते ॥३०५।। सप्तमे ज्ञानहानिन सती द्वैतप्रसक्तित । नासती ज्ञानवयान्नह्यसज्जन्यते क्वचित् ॥३०६॥ (२९५) १ बौद्धा । (३०१) १ अनायासकृत 'फाट' मित्यु (२९८) १ साल्या । च्यत।

मोक्षस्वरूपवणनम्
विराधात्सदसत्त्व न नाप्यनिवचनीयता ।
अनिवाच्यनिवत्तित्वान्नापि स्यात्पञ्चमी विधा ।।३०७।।
मानाभावादथात्मैव निवृत्तिरिति चेन्न तत् ।
तस्य नित्यत्वतो ज्ञानवयर्थ्यस्य प्रसगत ॥३०८।।
सुखस्यानुभवोऽभीष्ट पुरुषाथ सुख न तु ।
सुख च दु खयोग्ये च तस्मा नाद समञ्जसम् ।।३०९।।
अतो विवेकिन पुसो विषये दोषदशनात ।
विरक्तस्य निषिद्धादित्यागे नित्यादिसेवनात ॥३१०।।
निवत्तकस्य धमस्योदयनेन समुच्चितात् ।
ज्ञानाच्छरीरबुध्यादिनवात्मगुणसभो ॥३११॥
दग्धे धनाग्निवत् पुसोऽवस्थान मोक्ष उत्तम ।
अत्य तोच्छेदिनी दु खसतति
सततित्वत ॥३१२॥
दीपसततिवमानमेतन्मोक्षे समीरितम् ।
अशरीर वा वसत न प्रियेत्यागमस्तथा ॥३१३।।
तस्मि मान न सिद्धेऽर्थे वचसो मानतेष्यते।
कार्यान्वितार्थवाचित्वात् पदानामिति चेन तत् ॥३१४।।
कायशब्देष्वनैकात्या नहि कायपद वदेत ।
कार्यान्तरावित स्वाथ काय द्वितयहानित ॥३१५।।
एकवाक्येन चाप्यस्यान्वितमात्राभिधायिता ।
गौरवात स्वाथमेवातोऽभिदध्यादखिल पदम् ॥३१६॥
आकाक्षादित्रयोपेता पदार्थी प्रतिपादका ।
वाक्याथस्यति सिद्धेय मोक्षे शब्दस्य मानता ॥३१७।।
तस्मादकस्मानरपञ्चवक्त्रपादाम्बुजद्वन्द्वसमाधिभाजाम ।
वैराग्यविज्ञानसमृद्व धमजुषा भवेद् दु खनिवृत्तिरग्र्या ॥३१८॥

३६ पदाथरस्नमञ्जूषायाम विद्यागाद्रि रूढातिचपलरसनाग्रोग्रचित्तातराल- प्रोद्यत्पाषण्डदण्डादितजनचयवादिपञ्चाननेन । मञ्जूषा षटपदाथाऽमलमणिगणसराजिता निर्मितय कृष्णेनागव्वविद्वज्जनचरणयुगाम्भोजसेवारतेन ॥३१९।। पदाथरत्नमञ्जूषाग्र थे कृष्णविनिर्मिते । निर्दोषो मोक्षवादोऽय समाप्तोऽतिप्रिय सताम् ॥३२०।। ॥ इति श्रीमहाराष्टदश्यश्रीकृष्णभटट विरचिता पदाथरत्नमञ्जूषा समाप्ता ।। नि शेषक्षितिपालमौलिविलसद्धास्व मणिश्रेणिसद दीपोद्दीपितपादपद्मयुगल श्रीरेणुकासेविनि । पृथ्वी शासति शाङ्गधारितनुसभूतेऽर्जुने राजनि ग्रन्थोऽय समकारि कृष्णकृतिना श्रीरेणुकाप्रीतये ॥३२१।। ॥ श्रीरस्तु शुभ भवतु ॥

परिशिष्टम् पदाथ रत्नमञ्जूषाया परत्वविनाशकारणानामभिधानमात्रमेव येन क्रमेणोक्त तेन प्रकारेणायमङ्कव्यवहार । (१) अनेन प्रकारेण द्रव्यविनाशादेव (२) अनेनप्रकारेण सयोगविनाशा- देव परत्वस्य विनाश । विनाश । -१ पडावयव कम परत्वाधार पिड कम १ अपेक्षाबद्धि अवयवातर विभाग -२ अपक्षाद्धि -१ दिक पिडविभाग २ परत्वम्यात्पत्ति पिडारभक स योगनाश-३ परत्वस्यात्पत्ति -२ दिक पिंड सयोग सामा यबुद्धरत्पत्ति -३ पिडविणाश •४ सामा यद्धमत्पत्ति -३ विनाश -३ तनिष्ठपरविनाश --५ परत्वस्य विनाश -४ -- -१ -- (३) अनेन प्रकारेण निमित्तविनाशादेव परत्वस्य बिनाश । अपक्षाबुद्धि गणबद्धरुत्पद्यमानता-३ अपक्षाबद्धविनश्यता --३ परत्वस्योत्पत्ति -२ गणस्य विनश्यता गणबद्धरुत्पत्ति सामा यबद्वरत्पत्ति द्र यबद्धरुत्पत्ति द्र यबद्धरुत्पद्यमानता--५ अपक्षाबद्धविनाश ततश्च परत्वगणविनाश .५ T (४) एतत्प्रकारेण समवायिकारणनिमित्तकारणासमवायिकारणाना युगपन्नाशात परत्वस्य विनाश । पिंडावयव कम्म अपेक्षाबद्धि पिडे कम। अवयवातर विभाग परत्वस्यात्पत्ति दिकपिंडविभा । पिंडार भकस गोगनाश --३ सामा यबद्धरत्पत्ति -३ दिकपिडसयोगविनाश । पिंडविनाश अपक्षाबविनाश परत्वस्य विनाश । पिंडनिष्ठपरत्वविनाश -५ ततश्च परत्वम्यविनाश -५ (५) एव द्रव्यापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशात परत्वस्य विनाश । १ पिंडावयव कम अवयवातर विभाग पिंडारभकसयागनाश -३ पिंडविनाश पिंडनिष्ठपरत्वविनाश --५ Î Î Î Î अपेक्षा बद्धि । परत्वस्य योत्पत्ति । सामा यब द्वरुत्पत्ति । अपक्षाबुद्ध विनाश । ततश्च परत्वाश ।

पदाथरलमञ्जूषायाम (६) अनेन प्रकारेण द्रव्यसयोगयोनाशात् युगपत परत्वगुणस्य विनाश इति । । परत्वाधारावयव कम अवयवातगद्विभाग पिडारभक सयोगनाश पिडविनाश पिडनिष्ठपरत्वविनाश -१ पिंडकम --२ दिक् पिंड विभाग ----३ दिक पिंड स योगनाश --४ परत्वविनाश ĭ ĭ 7 --१ अपेक्षाबुद्धि परत्वस्य योत्पत्ति सामायबद्धरत्पत्ति अपक्षाबद्धविनाश - (७) अनेन प्रकारेणापेक्षाबुद्धिसयोगयो युगपद्विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ज्ञेयम्। अपक्षाबद्धि -१ पर वाधार कर्मोपरि (प?) द्यते दिक पिंड विभाग --२ सामायबद्धरुत्पत्ति दिक पिंडसयोगविनाश अपक्षाबद्धविनाश परत्वस्य विनाश ततश्च परत्व) विनाश --५ ॥ इति शुभम् ॥ परत्वस्य चोत्पत्ति T T MÌ TH NRO ।। श्री ॥ पदाथरत्नमञ्जूषाया श्लोकानुक्रमणिका श्लोक सख्या पष्ट सख्या क्रमाक १७ ७२ ५ २२ ५ १६१ २८ २४ १० ३१० २०४ २४ ११ २० २६ १ अग्निमान गिरिरित्य यो० २ अग्निसयोगज हेतुरूपज ३ अग्ने रपत्य प्रथम ४ अडि घ्रयुग परिघ दुरिताना प्रज्ञातकत क वाद ६ अणु नित्यमनित्य तु अतस्तद यतिरिक्त प्रत सख्या पथक ६ अतो विवेकिन पुसो १० प्रदष्टद्वषसख्याधा ११ अधर्मोऽत्र मनो मान १२ अध्रव व्यणुकावो स्यात १३ अनध्यवसित कालातीत १४ अन तत्वावनश्वाना० १५ अनादिनिधनोऽभीष्ट १६ प्रनित्यगाऽम्बुघटयो १७ अनित्यो घटज मावि १८ अनुमान यतो लक्ष १९ अनुवत्यकहेतुत्वात २० अनकबत्ति नित्य यत २१ अतर्भावोऽनुमाने स्यात २२ अयस्मात पाकजोत्पत्ति २३ अवयव्यतिरेकीच २४ अपक्षेपणकर २५ अपास्तविस्तरा बालक २६ अयोनिज मल्लोके २७ प्रविद्योपाधितो भिन्नी. २८ घश्वधीपरतत्राचा २६ प्रत्ससदुभया यस्मिन ३० प्रस्तीति विधिधीवेधो. अस्पशव मनोऽणु स्यात ३४ २५५ २६४ २८१ २६३ १६० २६० २५४ १८५ २ २२ २६ २६ २१ १० १७ ७६ १३८ २४६ १० २ ५ ६१ ७ २६ २५६ १२४ १२ २ ८ [ ४० ] क्रमाक श्लोक सरया पष्ठ सख्या २७ ४३ २२१ २५ १३ १६ १५६ २१ २८ . २०० २४८ १२५ १६४ १०७ १७६ २२ १४ २१ ४५ ४४ १८ ३२ अहेतुक द्रवत्वञ्च ३३ प्राकाक्षादित्रयोपेता ३४ प्राकाश शब्दवत्तस्य ३५ प्रात्मनिष्ठ फलोत्पादि ३६ प्रात्मा नु चेतनो द्वधा ३७ प्राद्यो महिषयोरय पापाद्या सिद्धिराद्य स्यात ३४ पालोकाभावमात्रत्वात ४० इच्छा द्वेषाऽनुमानादि ४१ इच्छायत्नस्तत पाणि ४२ इति चारुवचोयुक्त ४३ इति चेदप्रमाणत्वे ४४ इति द्वधाऽतिम प्राग्वत इत्य त्यमेतवाभासा ४६ इत्यादिक्रमत सष्टि० इत्यकादशधा चासा० ४८ इत्यव स्यात् पट कुम्भात ४६ द्रियाणि च नवात्मा इह त तुषु शुक्लत्व ५१ उत्पद्यते जलादी च ५२ उत्सगश्चापवावश्च ५३ उदाहरणवद धूमवाश्च उपमान तु गोतुल्यो ५५ उपाधिरग्नीषोमीय ५६ उपाधे_तकत्वेन ५७ उष्टादिभ्यो गवारवादी ५८ एकत्रस्थितिसज्ञस्य ५६ एकवाक्यन चाप्यस्या. ६० एकस्मिन्निति सप्रोक्त ६१ एतत्सब धवनिष्ठा ६२ कजमित्यतदभ्युक्त कडार चित्रमित्यव ६४ कल्पनागौरव तु स्यात ६५ कर्ता चेन्न भवेत तहि ५६ २८३ २४९ २८ १४६ १८३ २१ २२ १४४ १७ १४३ २७३ २६७ ३५ १३२ २८४ ३२ ३ १५५ १ १६ । ४१ ] क्रमाक श्लोक सख्या पष्ठ सख्या २३० १४ ४० ५ ७० ३५ ६ ३१५ ५२ १७५ २४२ १५६ २२० १६ : १३ १०४ १८ ३ २४ ६४ १२ ७४ ६६ कर्मा यत्वे सति ज्ञया काय यदाश्रय तत्स्यात ६८ कायद्र यचतुष्कोऽय ६६ कायस्य सतत्व कायश देवनेका त्यात ७१ कालश्चिराविधीहेतु ७२ कालातीतो यथाऽनुष्ण ७३ कुटिल स्यात ततीय ७४ कुत स्यादिति चेत पश्य ७५ क्रियाया क्षणभगित्वात् ७६ क्षितिवदवेग एवेष्ट ७७ क्षुब्धश्रीमन्नपञ्चास्य ७८ गुण सयोगह ता स्यात ७९ गुरुत्व हैतुक चव गुरुस्वमाद्यपातका ८१ घटात्पट इति व्यक्तु ८२ घ्राणग्राह्यो भवेद ग धो. r३ चक्षुर्माह्य भवेद्रूप ८४ चतुर्थे मोक्षहेतूना ८५ चतुर्दा त्योऽपि बहुभिव १६ चतुविशतिरेवातो. ८७ चाक्षुषत्वेन श द स्यात चित्ररूपरसस्पश ८६ ज य कायत्वतो यद्वत जाति ssकाशता व्यक्ते. ६१ जाति स्यावनवस्थानात् ६२ जात्येक निलय कर्मा यत्व ६३ जायते जातिभेवे तु ६४ जीवतोऽतोऽनमान स्यात ६५ ज्ञान सस्कारमात्रोत्थ ६६ तच्च वस्तुस्वभाः स्यात ९७ ततोऽपक्षेपणेच्छायां ६८ ततो विभाग सयोग १६ ततो योगस्ततो भूत. ३०४ ३४ २६ २३३ १७२ ३ ११७ १५ ३० २६८ ह २५२ २८ १८६ २२ १९ २३ २४५ ७८ 0 ४३ ५ [ ४२ ] क्रमाक श्लोक सख्या पष्ठ सख्या १६५ २. . २७ . २३८ २४४ १०६ १४५ २३६ ३१८ ३१४ २२९ १०० १४ १८ २७ ३५ २६ १३ १३ २३२ १५३ १५ ४ २२२ २५ ३१२ तत शब्दकमेय स्यात तथा तु न भवत्यष १०२ यथा पिपीलिकायोग १०३ तद्यत्नापेक्षमुशल १०४ तनुयोगाल्पभूयस्त्व० १०५ तर्को युक्तिरिह प्रोक्त तस्मात कम्म पथक सिद्ध तस्मादकस्मारपञ्चवक्त्र. १०८ तस्मिन मान तु सिद्धर्थे १०६ ताल्वादिस्थानसभूत० १२० तुरीयोगैस्तुरीचेल. १११ तृतीयसूक्त एवाऽऽवा० ११२ ततीयसूक्त एवाऽऽदा ११३ ततीये तु चतुथश्चेत ११४ तेजो गुरुत्ववपि ११५ तो चा त्यसुखदु खादि ११६ दग्धेधनाग्निवत् पु सो ११७ विक पूर्वापरधीगम्या० ११८ दिक्कालाकृततात ११६ दीपसन्ततिव मान १२० वष्टसामान्यतो वष्ट १२१ वष्टा तस्योपमानन १२२ वष्टा घटादिषु ततो १२३ द्रव्यत्वादिपर तच्च १२४ द्रव्यादेधम्मतां व ते १२५ द्रोहक्रोधावयो भेवा वणुकद्वितीये जाते १२७ घणुकादिक्रमेणात १२८ द्वितीयोऽवयवानां च १२९ विश्वाक्षयासमार-धे १३० वषयत्न गुरुत्वानि १३१ धत्ते यद्यपि विज्ञाना० १३२ धमजाधमजत्वेन १३३ धर्माविभागिति प्रोक्तो० १३४ धर्मों हेतुमनी मान ११० १४ ३५ १८२ ६ २६ २५ २६२ २१६ २०६ १०२ २४ १३ ४८ ६ १३ १ ६० ७० १२३ २२ १५ ३ १४ २३ २०३ [ ४३ ] श्लोक सख्या पष्ठ सख्या क्रमाक २३ २२ २५१ ४७ ६ २६७ १ १ . २७० १८८ २५७ १०८ २२ २६ १४ ३२ २८६ ६ २५ २१६ २०७ १६ ३ १३५ धीविशेषत्वतो यादक १३६ घोहेतुमात्रज यस्थ १३७ न जात्य तरता तेषा १३८ न द्वाभ्यां कारणारूढ० १३६ ननु को नाम मोक्षोऽय १४० नमाम ससारोरुमिहिर १४१ न सति जाति सष्टव्या १४२ न सोपमानमध्यक्ष १४३ नातो बौद्धमतापोहो० १४४ नाशस्तूत्तरसयोगा० १४५ नाशस्त्वानयनाशेन १४६ नास्याद्रव्यत्वतो योगो० १४७ नित्य च नाश हेतूनां १४८ नित्यताऽनित्यतोत्पत्ति १४६ नित्य ऐश परो जव १५० नित्यानित्यति साधा १५१ नित्यात्मरूपान वाभि० १५२ नित्यानित्यभेदा द्वधा १५३ नित्यानित्याश्रयत्वेन १५४ नित्यान वगुणास्तित्वे १५५ नित्याऽनु मेयमन्भूग १५६ नित्याश्चाश्रयनाशादे० १५७ नित्यश्वरगता तस्या० १५८ नित्यो लिङ्गाविशेषात १५६ नित्यशी जीवगानित्या १६० निमित्तम यदुगुनोऽग्र० १६१ निरशद्रव्यरूपत्वावजो० १६२ निवतकस्य धमस्य १६३ नि शेषक्षितिपालमोलिविलसत १६४ नीरूप स्पशवान वायु १६५ नतदाश्रय नाशेन १६६ नतदेव यत पूध ० १६७ पक्षत्रयस्थो यद्वत्स्यात १६८ पक्षव्यापी यथा सर्व १६६ पक्षव्यापी सपक्षस्थो० २४ २८० ३०५ २१० २७७ ११६ २५५ २०५ २४१ १५ २७ ३११ ३२१ ५ १३ २२६ १७३ १७४ २० [ ४४ ] क्रमाक श्लोक सख्या पष्ठ सख्या २० ३ २० २१७ २५ १७० पक्षव्यापी सपक्षण १७१ पटकुम्भस्थजातित्वात १७२ पटवभ्यासावरज्ञानजन्यो पदाथ इतरोऽभाको १७४ पदाथरत्नमञ्जूषाप्रणे १७५ १७ ६७ " २५३ २७१ २८९ २८ ३० ३२ ३४ १८० २६४ ३२० २६५ ३ २८८ ३२ ३० २६४ ८३ १ . ६२ २९६ . ८६ २६ १० १ ३ २१८ १५२ पदाथविति सप्रोक्तों १८३ पदाथ षडविधो भाव १८४ परतापरते भूय १५५ परस्पर स्वरूपाणी १८६ परस्पराध्यात्तस्मात् १८७ परिणामविहीनात्मा० १५ परिमाण वितस्त्यादि १८६ पाथस्तु स्नहबदरूप ११० पिठरस्यव पक्तिश्चेत १९१ पुण्यपण्णकलितातिसुकलिता १९२ पुत्रायभ्युदये हेतु १९३ पुनधिोपदेशेन १९४ पूर्ववन्नवमो वेगो १९५ पूर्वोमान तृतीयो वा १९६ पथकत्वम यता बुद्धे १६७ प्रचय स्यात ततस्तूल० १९५ प्रतिबदीत्यात त्वे १६६ प्रतियोगिनिरूप्यत्वात् प्रत्यक्ष द्विविध तच्च २.१ प्रत्यक्षमिति मानवे २०२ प्रत्येकमभिवध्यु किमर्थ २०३ प्रध्वसो जायते नित्य प्रध्वस प्रागभावाच २५ १७ ५ १५२ ११ १५४ २७ १६ २२ १२७ १९२ २२४ २६२ २६१ ३३ ३३ [ ४५ ] श्लोक सख्या क्रमाक पृष्ठ संख्या २४० २७ २५ २०८ २०१ २३ १४ २३ २०२ २ ५ ६ ४२ २४ १४ २ २९ १८७ २२ २ २४ २०८ २३६ २०५ प्रसारण गतिश्चेति २०६ प्रागवस्थाऽ यधीभत. २७ प्राणोपस्थानस्तथाव्यान बालानाच यथा काया २०६ बुद्धिज्ञान प्रमाण तु २१० बुद्धि सविभवा सम्यक २११ ब्रह्माशकस्य जीवस्य २१२ भरतहृदयविज्ञ २१३ भागस्ततो योगनाश २१४ भिन्नो देहो यथा कुम्भ. २१५ भूजलार यनिलाकाश. २१६ भूयोऽवयवसामा २० २१७ मञ्जीराद्यभूषणभूषिताया २१८ मदगोरित्युपमान चेत् २१९ मम सनिकषोपपलके २२० मान च तत्र स्वपतो. २२१ मान न वस्तु योगादि २२२ मानप्रचयसख्याभि २२३ मानस्यासत्वमेव स्यात् २२४ मानाभावावथात्मैव २२५ मिथस्तकविरोषस्तु २२६ मुक्तात्मस्वपधादित्वात २२७ मुशलोत्क्षपणेच्छायाँ २२८ मदादिविषयोऽभीष्ट २२६ यत्पादाम्भोजाऽऽसवात २३० यत्र खेलति रमारमणीयो० २३१ यथा घटादिन वस्तु २३२ यथा यदीश्वर कर्ता २३३ यथा यदीशो देही स्यात २३४ यद्यद धूमवदग्याय २३५ यद्यस्ति कि स एव २३६ य सवज्ञ सवविद २३७ पाववद्रव्या द्वितीया २३८ यतसिद्धिरिय प्रोक्ता २६१ २९ ३५ १६२ १६ १९ २४३ २५ २ २ १ १८ १९ १४७ १६४ १६० १७८ १५१ ६० १८ २८२ ३२ [ ४६ ] क्रमांक श्लोक सख्या पष्ठ सख्या १४ १०६ १३० १२८ १२२ ७३ ६४ 8 १७ १२६ २११ २६ २४ २५ ३६ २३६ योगवत पूर्वको तूक्तों २४० योगाद द्रव्य ग्रहो युक्तः २४१ योगिसिद्धिरिति द्वेधो० २४२ रज्वावहेवियत्पुष्पा २४३ रसो रसनमेय स्यात २४४ रूपादिधीरिति प्रोक्त २४५ रूपादे पाकजोत्पत्ति रूपसत्व सपक्षऽयत २४७ लले सासिद्धिक भूमि० २४८ लोके विद्रियमस्येष्ट २४९ वर्णो ध्वनिश्च तत्रांद्य २५० पठाऽयोनिजमादित्यः २५१ वस्तुस्वरूपभेदस्य २५२ विकर्षोत्कषकत्वेन २५३ विद्याग द्रिरूढान २५४ विद्याऽपिस्याच्चतुर्भेवा २५५ विद्याऽविद्या च तत्रा त्या० १५५ विनश्यवतव्यनिष्ठस्या २५७ विपक्षात्सकलाप यत २५६ विषययो यथा रज्जी २५७ विपययस्य दोशोऽय २५८ विभागो योगपार्थक्ये २५६ विरोधात्सवसत्वं न २६. विशषा हेतवोऽत्यन्त २६१ विषर्या द्रयवेहाख्या २६२ विषयोपप्लाभावे २६३ विषयोरविदीपस्थ. २६४ वत्तिरिद्रियसब पा. २६५ वयात्यसज्ञ न ह्यस्य २६६ व्यक्त्यषयतुल्यते तद्वत २६७ व्याघातात्माश्रया यो या० २६८ व्याप्तैविपययोक्ति स्यात. २६१ ध्यावत्तधीविशेषाणा २७० व्यावत्तप्रत्ययोऽग्यावी २२३ ३२ १२१ २२७ ३१६ १२६ ११८ २५० १४१ १२० . १७ २० واه 3 २७२ ३५ ३१ ३ ३०२ ३२ १६ १ ३० १५८ २६५ १४८ १८१ २१ २७५ [ ४७ ] क्रमाक श्लोक सरया पष्ठ सरया १६७ २३ २ १२६ १६ ३ १३ २३५ २७ २४ ३ २१३ १७ ६५ २२५ ८१ १२ २५ ३८ ५ २७१ शक्ति स्यादिति चे मव २७२ का दधी समवायात स्यात शदवाच्य पदाथ स्पात २७४ शदोल्लेखभव तत्र २७५ षोढा रसो द्विधा गध २७६ सयुक्तबुधिगम्य स्यात सयोग भागयो कर्मा० २७८ सशयोऽनकपक्षाणां २७९ सस्कारस्त्रिविधी वेग २८० सडख्यामान विधाऽणुस्व० २८१ सड ख्यावत्तस्य नाशादि २८२ सइघातानुपपत्तस्तद २८३ सड क्यकादधियो हेतु २८४ सच न स्पशनाध्यक्षो० २८५ सततोध्वगति प्राहु २८६ सत्यप्यग्नौ न म त्राद्य २८७ स त्रधाभाग सयोग २८८ सद्व धोक्त क्रियावेग० २८९ सपक्षपक्षयोर यतरत्वात २६ सप्तमे ज्ञानहानिन २९१ सति मान प्रमाण च २६२ समवाय इति प्राहु २९३ सम्बधत्वात तथा वेद. २६४ सम्ब धोऽयुतसिद्धानां २६५ सम्यगदष्टा तवागिष्ट २६६ सम्वविकत जय स्यात २६६ सह हेतु सदष्टा ते २६७ सहेतुका प्रतिज्ञा या २६८ साधनस्य त्रिरूपत्व २६६ सामाय तत्र मान चा. ३०० सुवस्यानभवोऽभीष्ट ३०१ सुखादिनियमानाना० ३०२ स्नहधीविषयस्नहो. स्पशसख्य तथा मान २६८ १६८ २३१ २१४ १७६ २६ २१ ३४ २६ २ २६२ १३ २२८ २७९ १७७ १६९ १३६ २६ ३२ २१ २० १४२ २५६ २६ ३१२ २४ ६६ 8 । ४८ ] क्रमाक श्लोक सरया पष्ठ सख्या & १४० १८० ११३ २१ २ ३०४ स्पश स्पशनवेद्य स्यात स्याद व्याप्यवत्तिता हेतो ३०६ स्य साध्यसाधनद्वा ३०५ स्वकार्येण सहकस्मिन् ३०८ स्वज्ञानाम्बुधि सप्लुते ३०६ स्वतो द्रव्येषु जात्यादि० ३१० स्वभावविप्रकृष्टाथ ३११ स्वरूप वस्तुनो भेदा० ३१२ स्वरुपहानितो जाति ३१३ स्वोच्छेवार्थी यतो नव ३१४ हस्तात्मरज्जुहस्तस्थ० ३१५ हिमार योरिव नवस्तु ३२६ हेतुर यत्वत सर्वो. २७६ १.४ ८२ १६ २६६ ३४ २४७ २८ ज्योतिर्विद जयपुर। राजस्थान पुरातन ग्रन्थ माला प्रधान सम्पादक-पद्मश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वाचाय प्रकाशित ग्रन्थ सस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश १ प्रमाणमजरी, ताकिकचूडामणि सवदेवाचायकृत सम्पादक मीमासा यायकेसरी प० पट्टाभिरामशास्त्री विद्यासागर । मूल्य-६०० २ यत्रराजरचना, महाराजा सवाईजयसिंह कारित । सम्पादक-स्व प० केदारनाथ मूल्य-१७५ ३ महर्षिकुलवभवम स्व० प० मधुसन्नरोझा प्रणीत भाग १, सम्पादक-म म० ५० गिरिधरशर्मा चतुर्वेदी । मूल्य-१०७५ ४ महषिकुलवभवम, स्व ५० मधुसूदन अोझा प्रणीत भाग मूलमात्रम् सम्पादक-१० श्रीप्रद्युम्न ओझा। मूल्य-४०० ५ तकसंग्रह अन्नभट्टकृत सम्पादक-डॉ जितेन्द्र जेटली एम ए पी-एच डी मूल्य-३ ०० ६ कारकसबधोद्योत प रभसन दीकृत सम्पादक-डा हरिप्रसाद शास्त्री एम ए , पी एच डी । मूल्य-१७५ ७ वत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टकृत सम्पादक-स्व प पुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदो साहित्याचाय । मूल्य-२ ८ शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातकतृक सम्पादक-डा हरिप्रसाद शास्त्री एम ए, पी एच डी । मूल्य-२ ६ कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डा प्रियबाला शाह एम ए पी एच डी डी लिट । मूल्य-१७५ १० उत्तसग्रह, अज्ञातकत क सम्पादिका-डा प्रियबाला शाह, एम ए पी एच डी, डी लिट। मूल्य-१७५ ११ शृङ्गारहारावली श्रीहष कवि रचित, सम्पादिका-डॉ प्रियबाला शाह एम ए पी एच डी डी लिट । मूल्य-२७५ १२ राजविनोदमहाकाव्य महाकवि उदयराजप्रणीत, सम्पादक-प० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम ए, उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर । मूल्य-२ २५ १३ चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित, सम्पादक-प० श्रीकेशवराम काशीराम शास्त्री। मूल्य-३५० १४ नत्यरत्नकोश (प्रथम भाग) महाराणा कुम्भकरणकृत सम्पादक-प्रो रसिकलाल छोटा लाल पारिख तथा डा प्रियबाला शाह एम ए, पी एच डी, डी लिट । मूल्य-३ ७५ १५ उक्तिरत्नाकर, साधसु दरगणिविरचित सम्पादक-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी, पुरा- तत्त्वाचाय सम्मा य सचालक राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-४७५ १६ दुर्गापुष्पाञ्जलि, म म०प० दुगप्रिमादद्विवेदिकृत, सम्पादक-प० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी साहित्याचाय । मूल्य-४२५ १७ कणकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, इ ही कविवर की अपर सस्कृत कृति श्रीकृष्ण लीलामत सहित सम्पादक-प० श्रीगोपालनारायण बहुरा एम ए, मूल्य-१५ १८ ईश्वरविलासमहाकाव्य, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्ट विरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरा नाशास्त्री साहित्याचार्य, जयपुर । स्व पी के गोड द्वारा अग्रजी में प्रस्तावना सहित । मूल्य-११५० १९ रसदीपिका कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-प. श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम ए मूल्य-२०० २० पद्यमक्तावली कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित सम्पादक-भट्ट श्रीमथ रानाथ शास्त्री, साहित्याचाय । मूल्य-४०० . . - - [ २ ] २१ काव्यप्रकाशसकेत भाग १ भट्टसोमेश्वरकृत सम्पा -श्रीरसिकलाल छो० पारीख अग्रजी मे विस्तत प्रस्तावना एव परिशिष्ट सहित मूल्य-१२० २२ काव्यप्रकाशसकेत भाष २ भट्टसोमेश्वरकृत सम्पा -श्रीरसिकलाल छो० पारीख, मूल्य-८२ २३ वस्तुरत्लकाष अज्ञातकत क सम्पा०-डा प्रियबाला शाह । मूल्य-४० २४ दशकण्ठवधम प० दुर्गाप्रसादद्विव दिकृत, सम्पा०-५० श्रीगङ्गाधर द्विवदी । मूल्य-४ . २५ श्री भुवनश्वरीमहास्तोत्र, सभाष्य पथ्वीधराचायविरचित कवि पदमनाभकृत भाष सहित पूजापञ्चाङ्गादिसवलित । सम्पा०-4 श्रीगोपालनारायण बहुरा। मूल्य-३० २६ रत्नपरीक्षादि सप्त न थ सग्रह ठक्कुर फरू विरचित, सशोधक-पद्मनी मुनि जि विजय पुरातत्त्वाचाय। मूल्य-8 २७ स्वयभूछ व महाकवि स्वयभूकृत, सम्पा० प्रो० एच डी वेलणकर । विस्तत भूमि (अग्रजी मे) एव परिशिष्टादि सहित मूल्य-७ २८ वत्तजातिसमुच्चय कवि विरहाङ्करचित, मूल्य-५ २९ कवितपण अज्ञातकत क, मूल्य-६ ३० कर्णामतप्रपा भट्ट सोमेश्वर कृत सम्पा -पद्मश्री मुनि जिनविजय । मूल्य-२ ३१ त्रिपुराभारती लघुस्तव लघुपण्डित विरचित सम्पा० मूल्य-३ ३२ पदाथरत्नमञ्जूषा प० कृष्ण मिश्र विरचित सम्पा० मूल्य-३ । प्रेसो मे छप रहे ग्रंथ सम्कत प्राकृत १ शकुनप्रदीप लावण्यशमरचित सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्री जिनविजय । २ बालशिक्षाव्याकरण ठक्कुर सग्रामसिंहरचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय। ३ नदोपाख्यान, अज्ञात त क सम्पा -डा० बी जे साडसरा । ४ चा द्रव्याकरण आचाय च द्रगोमिविरचित, सम्पा०-श्री बी डी दोशी। ५ प्राकृतान द रघुनाथकवि रचित सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । ६ कविकौस्तुभ प रघुनाथरचित, सम्पा०-श्री एम एन गोरे । ७ एकाक्षर नाममाला--सम्पा०-मुनि श्री रमणिकविजय । ६ नत्यरत्नकोश भाग २, महाराणा कुभकरणप्रणीत सम्पा०-श्री पार सी पारिख डा प्रियबाला शाह । १० इद्रप्रस्थप्रब ध, सम्पा०-डा दशरथ शर्मा। ११ हमीरमहाका यम, नयच द्रसूरिकृत, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । १२ वासवदत्ता, सब धकृत, सम्पा०-डा० जयदेव मोहनलाल शुक्ल । १३ वत्तमुक्तावली कविकलानिधि श्रीकृष्ण भट्ट कृत , स० ५० भट्ट श्री मथुरानाथ शाह १४ भागमरहस्य, स्व ५० सरयूप्रसादजी द्विवेदी कृत, सम्पा०-प्रो० गङ्गाधर द्विवदी ।

Padartha Ratna Manjusha

Author
Krishna Mishra
Title
Padartha Ratna Manjusha
File name
Padartha Ratna Manjusha
Text
OCR done
Published
11/13/2002
Publisher
Rajasthan Oriental Research Institute, Jodhpur
Language
Sanskrit
Pages
63
Library
Svclrc
DLI number
382799
Barcode
2040100028210.00
Scanning centre
S.V. Digital Library, Tirupati
Digital publisher
UDL.TTD TIRUPATI
VMLT id
eacJ7Npm0kD
Download PDF

Padartha Ratna Manjusha