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Gandhivaad Samajwad-050467

Dr. Rajendra Prasad · 2006/06/25

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गांधीवाद : समाजवाद
[ एक तुलनात्मक अध्ययन ]
प्रस्तावना लेखक
डा० राजेन्द्रप्रसाद
१९५३
हिन्दी प्रकाशन मंदिर, इलाहाबाद

mami प्रकाशक- बृहस्पति उपाध्याय हिन्दी प्रकाशन मंदिर, इलाहाबाद पांचवां संरकरण : १९५३ कुल प्रतियां छपी : १२००० मूल्य दो रुपये 1050467 Accession Noche Shantarakshita Library Tibetan Institute-Sarnath मुद्रक नारायण पाठक सस्ता साहित्य प्रेस अजमेर

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गांधीवाद : समाजवाद
(एक तुलनात्मक अध्ययन )

प्रस्तावना इस पुस्तक मे दो प्रकार के लेखो का संग्रह किया गया है । कुछ तो ऐसे हैं जो गांधीजी के विचारो का निदर्शने कराते है और कुछ ऐसे है जो समाजवादी सिद्धान्तों का समर्थन करते हैं । आज हिन्दुस्तान में इन दोनों विचार-धाराओ का संघर्ष चल रहा है और जनता दोनो का परिचय प्राप्त करना चाहती है। गांधीजी के सिद्धान्त बहुत-कुछ क्रियात्मक रूप में सामने आये है, क्योकि गाधीजी इस बात को मानते है कि प्रत्येक व्यक्ति के अपने जीवन को सुधार लेने से ही समाज सुधर जाता है और उसमें प्रचलित बुराइया दूर हो सकती है । अगर व्यक्ति का सुधार हो गया तो साथ-ही-साथ और अनिवार्य रूप से समष्टि का सुधार हो जाता है । इसलिए उनके सिद्धान्तों को क्रियात्मक रूप देना प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार में है और जिस अंश में ऐसे लोग हिन्दुस्तान में मिले है, जो उनको अपने जीवन में परिवर्तित कर सके हैं, उसी अंश में उनका क्रियात्मक रूप देखा जा सकता है। समाजवाद के सिद्धान्तों को परिवर्तित करने के लिए सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। राजसत्ता के बिना उनका क्रियात्मक परिवर्तन एक प्रकार से असम्भव है। इसलिए समाज- वाद का रूप भारतवर्ष में केवल लेखों और भाषणों में ही पाया जा सकता है। इस पुस्तक में दोनों प्रकार के लेखों को एकत्र करके यह प्रयत्न किया गया है कि पाठक के सामने दोनो चित्र आ जायं । मैं समझता हूं कि दोनो पक्षो के सिद्धान्तों को समझने के लिए उनके समर्थकों के ही लेख अधिक उपयोगी हो सकते हैं। इसलिए पाठकों को चाहिए कि अगर वे गांधीमत को समझना चाहते है तो श्री किशोरलाल मशरूवाला, श्री हरिभाऊ उपाध्याय, आचार्य कृपलानी और डा० पट्टाभि सीतारामया के लेखों में ही उनकी खोज करें । उसी प्रकार समाजवाद के सिद्धान्तों को भी श्री सम्पूर्णानन्द, श्री जयप्रकाश नारायण, श्री एम० एन० राय प्रभृति के लेखों से ही ढूढ निकाले। दोनों विषय गूढ़ है । गांधीजी ने अपने विचारों को पुस्तक-रूप में कही इकट्ठा करके प्रकाशित नहीं किया है। मगर उनके लेख और भाषण, जो समय-समय पर जनता के सामने आते गए है, इतने अधिक हुए है कि वे कई हजार पृष्ठो को भर सकते है । समाज- वाद पर तो इस देश और विदेशो मे अनगिनत पुस्तके लिखी जा चुकी है। इन सबका साराश मात्र भी विशेष कर, जब उनमे मानव जीवन के सभी पहलुओं पर रोशनी डालने का प्रयत्न किया गया है, इस छोटी-सी पुस्तक में समाविष्ट करना असम्भव नही तो कठिन अवश्य है । तो भी जो मौलिक बातें इस पुस्तक में आ गई है, वे दोनो विचार-शैलियो के भेद और सामंजस्य का अच्छा परिचय दिलाती है। इसमे कई लेख विवादात्मक शैली पर ही लिखे गये हैं और इसलिए उनमे उतनी सैद्धान्तिक गहराई नही है तो भी आज की परिस्थिति मे उनका उपयोग है और वे एक न्यूनता दूर करते है । आशा है, पाठक इससे यथोचित्त लाभ उठायेंगे। हरिजन बस्ती, दिल्ली --राजेन्द्रप्रसाद - विषय-सूची १० १६ २२ ४३ १. गांधीवाद-श्री किशोरलाल घ. मशरूवाला २. समाजवाद या समाज धर्म? श्री किशोरलाल घ० मशरूवाला ३.. सर्वोदयवाद----श्री किशोरलाल घ० मशरूवाला ४. गांधीवाद : समाजवाद-श्री हरिभाऊ उपाध्याय ५. गांधीजी का मार्ग--श्री आचार्य कृपलानी ६. गांधीवाद : समाजवाद- -डा० पट्टाभि सीतारामैया ७. गांधीवाद और समाजवाद-श्री के० सन्तानम् ८. समाजवाद और सर्वोदय--श्री नरहरि परीख ९. गांधी-नीति---श्री जैनेन्द्रकुमार १०. समाजवादी व्यवस्था-श्री सम्पूर्णानन्द ११. गांधीवाद बनाम समाजवाद-श्री जयप्रकाश नारायण १२. गांधीवाद और समाजवाद-श्री एम० एन० राय १३. गांधीवाद और साम्यवाद--श्री सम्पूर्णानन्द १४. गांधीवाद और समाजवाद-श्री विचित्रनारायण शर्मा १५. उपसंहार : संघर्ष या समन्वय ?--श्री काका कालेलकर १३२ १५५ १६२ १७० गांधीवाद : समाजवाद गांधीवाद [ किशोरलाल मशरूवाला] गांधीजी के विचारों-अथवा यो कहिए, पद्धतियों में कुछ तत्व तो ऐसे है, जो अचल कहे जा सकते हैं, जो लोग उनके जीवन या उपदेश से प्रेरणा या मार्ग-दर्शन चाहते हैं, उनके लिए वे आचरणीय हैं। इस प्रकार का पहला अचल तत्व यह है, कि जीवन की सभी समस्याओं का विचार और हल सत्य, अहिंसा और सेवा द्वारा ही करने का प्रयत्न होना चाहिए। इसमें सत्य, अहिंसा और सेवा, ये तीन अंग या मर्यादायें कही गई हैं। इनका क्रमशः अलग अलग विचार करना ठीक होगा। 'सत्य' में नीचे लिखी बातों का समावेश होता है पूर्वग्रह से दृषित न होना, किन्तु सत्य को मानने के लिए सदा तैयार और इस कारण असत्य से, फिर वह कितना ही पुराना और बहुमान्य क्यों न हो, और उसमें हम कितने ही आगे क्यों न बढ़ चुके हों, वापस लौटने में भय और लज्जा न रखना, और साथ ही, जिस समय जिस बात के बारे में सत्य का विश्वास हो, उसके लिए अपना सर्वस्व खोने को तैयार रहना। अहिंसा' - इसका अर्थ होता है हर प्रकार के अधर्म का-गांधीजी की भाषा में कहें तो-पशुबल से नहीं, बल्कि 'श्रात्मबल' से विरोध करना। गांधीजी कई बार समझा चुके हैं कि अहिंसा कोई निष्क्रिय अभावात्मक मनोवृत्ति नहीं है, बल्कि वह प्रवाह के विरूद्ध चलने की एक क्रियात्मक और भावना प्रधान प्रवृत्ति है । दुनिया में हिंसा का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है । और बुद्धि तथा विज्ञान की रहना, .

गांधीवाद : समाजवाद सहायता से उसकी पद्धतियों को पूर्णता तक पहुंचाने और हिंसा का एक शास्त्र तैयार करने के प्रयत्न सदियों से हो रहे हैं। जिसका हिंसाबल विपक्षी के हिंसाबल की अपेक्षा अधिक संगठित, सुधरा हुमा और साधन- सम्पन्न होता है, उसके लिए हिंसा द्वारा अपने भौतिक पेय को सिद्ध करने का मार्ग खुला है ही। ऐसी कोई बात नहीं है कि इस बल का उपयोग केवल अधर्म और अन्याय के विरुद्व ही हो सकता है । इसमें तो जो ज्यादा बलवान होता है, वही जीतता है, फिर भले उसका पक्ष अधर्म का ही क्यों न हो, इसका एक ताजा उदाहरण इटली-अबीसीनिया का युद्ध है। अगर विपक्षी अधिक बलवान है, तो स्पष्ट है कि इस मार्ग का अवलम्ब करने से हानि-ही हानि होगी। अतएव आध्यात्मिक दृष्टि को भुलाकर केवल व्यावहारिक दृष्टि से सोचें, तब भी यह सिद्ध होता है कि जिन साधनों में विपक्षी हमसे अधिक बलवान और कुशल है, उन साधनों का उपयोग करने की लालच में न पड़कर एक बिल्कुल नये प्रकार के साधन की शोध करना, उसका विकास और संशोधन करके उसे सम्पूर्ण बनाना और उसके प्रयोग में कुशलता प्राप्त करना आवश्यक है । अहिंसा अथवा प्रेम में. अर्थात् विपक्षी को दण्ड देकर नहीं, किन्तु स्वयं कष्ट सहकर उसे जीतने की रीति में-जो शक्ति है, वह है तो हिंसा के जितनी ही पुरानी, किन्तु अभी योग्य अनुशीलन द्वारा उसका सम्यक् विकास नहीं किया गया है। वैज्ञानिकों का कथन है कि गुरुत्वाकर्षण का नियम संसार को पहले पहल न्यूटन ने दिया। इसका यह अर्थ नहीं कि न्यूटन ने ही पहले-पहल गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का और उसके प्रयोग के नियमों का निर्माण किया। गुरुत्वाकर्षण का नियम तो न्यूटन से पहले भी संसार में मौजूद था और लोग उसे बिना जाने, बिना उसका नाम रक्खे व्यवहार में उससे लाभ उठाते थे। किन्तु लोगों को उसका विधिवत् ज्ञान न था,और गणित के नियम न बने थे । न्यूटन ने इन नियमों का पता लगाया और इन्हें दुनिया को समझाया । उसके परिणामस्वरूप अनेक वैज्ञानिक आविष्कार किये गये, और अनेक सुधरी हुई कार्य-पद्धतियों का जन्म हुआ। अहिंसा " गांधीवाद ३ को गांधीजी का 'आविष्कार' कहे तो वह इसी तरह का हो सकता है। अहिंसा या प्रेम नाम की कोई ऐसी नई शक्ति, जो पहले संसार में थी ही नहीं, उन्हें.ने पैदा नहीं की है । यह शक्ति तो संसार में आदिकाल से रही है, और जाने-अनजाने उसका उपयोग भी होता रहा है । इसका तो नाम और स्वरूप भी अज्ञात न था। कुछ क्षेत्रो में इसका ज्ञानपूर्वक उपयोग भी हुआ है और सैकड़ों पुरुषों ने इसकी महिमा का वर्णन किया है । किन्तु इस श्रद्धा के साथ कि हिंसा के समान ही इसका भी नानाविधि उपयोग और विकास हो सकता है, यह एक बलवान शक्ति है, और इसके गर्भ में अनेक प्रसुप्त और अनाविष्कृत विद्यायें (प्रयुक्तियां) होनी चाहिएँ, गांधीजी ने अपने जीवन में इसे संशोधित और विकसित करने का प्रयत्न किया, और आज भी कर रहे हैं । हिंसा के क्षेत्र में सशज मोटर (टेंक) मशिनगन, विमान, विषैली वायु, बम आदि मनुष्य को मारने और पीड़ने की अनेक विद्यानों (प्रयुक्तियों) का तथा इनकी सहायता के लिए गुक्षचर-विद्या, रिश्वतखोरी, झूठे प्रमाण,झूठे प्रचार आदि अनेक अल यात्मक उपकरणों का जो विकास हुआ है, वह भी कोई अाजकल की मेहनत का नहीं, युगों की मेहनत का परिणाम है, और उसके पीछे हजारों बुद्धिमान मनुष्यों की अपार शक्ति और अनन्त धन खर्च हुआ है । यदि अहिंसा की शक्ति का विकास करना हो, तो उसके लिए श्रद्धावान् तथा दृढ़ लगन वाले संशोधकों की सेवा समर्पित होनी चाहिए। अतएव जिन्हें गांधीजी के मार्गों में श्रद्धा है, उनके सामने एक स्पष्ट जीवन-कार्य तो है ही । यह कि अपने जीवन के विविध कार्यो मे बुद्धिपूर्वक अहिंसा का प्रयोग करके उसमें विद्यमान प्रलुप्त शक्तियों का पता लगाने और उनका विकास करने में अपनी ओर से सहायता पहुंचाना । शस्त्रों के प्राविष्कार में पदार्थ-विज्ञान और रसायन शास्त्र की दृष्टि आवश्यक होती है, अहिंसा के संशोधक में प्रेम के उस अटूट भण्डार की आवश्यकता है, जो वेगवान और क्रियावान होते हुए भी स्वार्थ से रहित हो । यह नहीं, कि इसके लिए बुद्धि की कुशाग्रता आवश्यक नहीं है । है; किन्तु यदि संशोधक , 4 गांधीवाद : समाजवाद का प्रेमकोष खाली हो, तो अकेली बुद्धिशक्ति उसके कार्य में बहुत सहायक नहीं हो सकती। 'सेवा' गांधीजी की पद्धति का तीसरा प्रबल तत्व है । वास्तव मे यह कोई पृथक् अंग नहीं है, बल्कि सत्य और अहिंसा के एकत्र प्रयोग में से ही यह पैदा होता है। व्यावहारिक दृष्टि से इसका सीधा मतलब यह है कि यदि जनता की सीधी और प्रत्यक्ष सेवा के किसी कार्यक्रम पर असल न होता हो,तो सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह अादि विषयो पर विद्वत्तापूर्ण और भक्तिपूर्ण पुस्तको, प्रवचनों या कीर्तनों द्वारा गांधीजी के तत्वो या उपदेशों का प्रचार, या सत्य और अहिंसा की शक्तियों का विकास नहीं किया जा सकता । लेख भाषण आदि प्रचार के साधन यन्त्रों के समान हैं। यंत्र की तरह वे स्वयं निर्दोष हैं-अथवा अधिक सच्चे विशेषण का उपयोग करें, तो निर्गुण या गुण-दोषहीन हैं-पर, अाज की परिस्थिति में उनपर अहिंसा के उपासको की अपेक्षा हिंसा के उपासकों का विशेष प्रभुत्व है। इसलिए वे उनका अपने हित के लिए अधिक सरलता से उपयोग कर सकते हैं। अत. जिन साधनों का हम उपयोग करें चे एकदम अनोखे और स्वतन्त्र ही होने चाहिएँ । और ऐसा साधन है, मूक तथा जरूरत हो तो जानबूझ कर अप्रकाशित रक्खी हुई प्रत्यक्ष सेवा । समाज की किसी भी उलझी हुई समस्या के निराकरण के लिए ऊपर के अंगो को ध्यान में रखकर ही कार्य-क्रम की कोई दिशा निश्चित की जा सकती है। इसे आप गांधीजी की मर्यादा कहना चाहें, तो यह उनकी मर्यादा है। असल में तो ये मर्यादायें नहीं, बल्कि मनुष्य जाति के हित- संघर्धन की अनिवार्य शर्ते हैं । इन शर्तों का ध्यान रखकर गांधीजी के विचार अचल तत्वों का शोध करने से मालूम होता है कि जनसाधारण का बल्कि सब प्रकार के निर्बलों का-सबलों द्वारा जो शोषण और वंचना ( ठगाई ) होती है, उनके प्रति उनका विरोध किसी भी समाजवादी के समान ही तीव्र है। यही नहीं, बल्कि उनके प्रयत्नों के पीछे धनी और अधिकारी-वर्गों द्वारा होनेवाले शोषण और वंचना को रोकने भर की ही गांधीवाद अभिलापा नही है, बल्कि बुद्धिमान लोग बुद्धिहीनों से जो अनुचित लाभ उठाते है, उसका प्रतिकार करने की भी इच्छा है । अर्थात् यदि शोपण और ववना को रोकने का कोई सत्याग्रही उपाय उन्हें मिल जाय तो किसी भी प्रकार के निर्बल वर्ग की किसी भी प्रकार के सबल वर्ग द्वारा की जाने- वाली हानि को वे एक दिन के लिए भी सहन नही करेंगे। शोपण और वंचना को रोकने का प्रश्न निजी सम्पत्ति के प्रश्न से जुड़ा हुआ है और प्रायः यह माना जाता है कि ये दोनों एक ही हैं । 'गांधीवाद'-समाजवाद की चर्चाओं में अधिकतर इसी पर गरमागरम वाद- विवाद होता है । सच पूछा जाय, तो इस विषय मे गांधीजी के विचार कदाचित् उग्र-से-उग्र साम्यवादी (कम्युनिष्ट ) की अपेक्षा भी आगे बढ़े हुए हैं। उनके सिद्धान्त के अनुसार तो किसी भी मनुष्य के पास किसी भी प्रकार का परिग्रह न होना चाहिए । सम्पत्ति के व्यक्तिगत परिग्रह को वे सह लेते है इसका यह कारण नहीं हैं कि उन्हें सम्पत्ति या परिग्रह का मोह है, अथवा यह कि मनुष्यजाति के उत्कर्ष के लिए वे सम्पत्ति के संग्रह को आवश्यक समझते हैं, बल्कि कारण यह है कि व्यक्तिगत परि- ग्रह बढाने और जुटाने की प्रथा को मिटाने का कोई सत्याग्रही मार्ग उन्हें अभीतक मिला नही है। मेरा ख्याल है कि सभी पंथों के सनाजवादी मनुष्यजाति के सुख के लिए धन-सम्पत्ति के संग्रह को और उसकी विपु- लता को आवश्यक ही मानते हैं। गांधीजी इसे सिद्धांत रूप में स्वीकार नहीं करते । अाज पसीना बहाकर आज का भोजन पाने और कल के लिए कल फिर पसीना बहाने की तैयारी रखने के आदर्श में किसी समाजवादी को श्रद्धा नहीं है, पर गांधीजी को है। लेकिन यह तो आदर्श की बात हुई । व्यावहारिक दृष्टि से इसका विचार करते हुए गांधीजी इस बात को समझते हैं कि आज ही उस समय की कल्पना कर लेना संभव नहीं है, जबकि मनुष्य जाति परिग्रह छोड़ने को तैयार हो जायगी । अतः विचार के लिए सिर्फ इतनी ही बात रह जाती है कि जिन लोगों के कब्जे में या अधिकार में धन-सम्पत्ति का भण्डार प्रत्यक्ष हो, वे उसे किस गांधीवाद : समाजवाद दृष्टि से अपने पास रखें, अथवा किन शर्तों पर उसे उनके पास रहने दिया जाय ? गांधीजी कहते हैं, कोई भी सम्पत्ति किसी एक व्यक्ति के अधिकार में हो या अनेक व्यक्तियों से बने किसी मण्डल के अधिकार में हो, और वह अधिकार उन्होने उस समय के कायदे के अनुसार पाया हो, या गैरकानूनी तौर पर पाया हो लेकिन वे उसे अपने पास अपने निजी उपयोग के लिए नहीं, बल्कि समाज की ओर से समाज के उपयोग के लिए ही रख सकते हैं, अर्थात् उन्हें और दूसरों को समझना चाहिये कि वे उस सम्पत्ति के 'ट्रस्टी' या संरक्षक हैं । इस 'ट्रस्टी' शब्द के कारण कुछ गलतफहमी पैदा हो गई है। इसकी भी वजह तो यह है कि अभी तक लोग इस बात को समझने के आदी नहीं हुए हैं, कि गांधीजी जब कुछ कहते हैं, तो, जो कुछ कहते हैं, उसके पूरे-पूरे अर्थ पर जोर देकर ही कहते हैं । गांधीजी के शब्दों को भी राजनीति के मुसहियो और वक्ताओं की तरह समझने की भूल की जाती है । अंग्रेज राजनीतिज्ञों ने कई बार है कि हिन्दुस्तान में ब्रिटिश सरकार का अस्तित्व भारतीय जनता के कल्याण के लिए और उसके ट्रस्टी के रूप में है। लेकिन हमें अनुभव तो यह हुआ है कि इस भाषा के अनुसार आचरण करने की उनकी रत्ती भर भी नीयत नहीं है । अतएव अब हम समझ चुके हैं कि इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करके निरे दम्भ और भटेती-भरे शब्दों द्वारा हमें भुलावे में डाने की ही उनकी नीयन होती है। गांधीजी पर भी यह शक किया जाता है कि सम्पत्तिवालों का पन लेने के लिए ही वे इस प्रकार की दम्भपूर्ण भटैती किया करते हैं । पहले एक बार ऐसा हो भी चुका है। गोलमेज परिषद् में जब गांधीजी ने यह घोषित किया कि हरि जनों को हिन्दुओं से पृथक् करने के प्रयत्न का वह प्रणापण से विरोध करेंगे, तो उनके इन शब्दों पर किसी ने बहुत ध्यान नहीं दिया । बहुतों ने तो यही समझा कि यह सिर्फ वक्तृत्वकला का एक अलंकार है। फलतः उन्हें अपने शब्दों को सत्य सिद्ध करने की आवश्यकता हुई। इसी प्रकार जब वे कहते हैं कि जिनके पास सम्पति है, वे उसके मालिक नहीं, कहा - गांधीवाद किन्तु ट्रस्टी हैं, तब उनके इन शब्दों के वाणी का अलंकार-मात्र मान लिया जाता है। प्रादेसकों के मन में इस प्रकार का भी शायद एक अस्पष्ट सा खयाल रहता है कि कानून की रू से बने हुए ट्रस्टियों के और धर्म की रू से बने हुए ट्रस्टियों के कर्तव्य में कुछ भेद होता है। अर्थात्, यदि दूसरे प्रकार के ट्रस्टी सम्पत्ति के सच्चे अधिकारियों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन न करें, और स्वयं ही उस सम्पत्ति का उपयोग करें, तो कोई हर्ज न होगा ! किन्तु गांधीजी ऐसा कोई भेद नही मानते हैं । गाँधीजी की यह आदत ही नहीं कि किसी सिद्धान्त को आचरण का रूप देने की साधन-सुविधा न होते हुए भी, उसका प्रतिपादन करने बैठ जायं । वे मानते हैं कि मनुष्य के सुखपूर्वक निर्वाह के लिए जितना आवश्यक है, उसे छोड़कर शेष सारे अधिकार का उपभोग दूसरों की अनुमति से ही किया जा सकता है, फिर भले ही वह अनुमति निर्बलतावश दी गई हो, या अज्ञानवश । किन्तु निर्बलता के मिटने और उसके स्थान पर शक्ति का उदय होने और अज्ञान के स्थान ज्ञान पैदा हो जाने पर उस अतिरिक्त सम्पत्ति के ऊपर केवल ट्रस्टी के नाते ही अधिकार रह सकता है, अतः यदि आवश्यकता है,तो जनता को बलवान और ज्ञानवान बनाने की है। और जब हम सोचते हैं कि इसके लिए किस प्रकार का बल उत्पन्न करना उचित है, तो हमें पता चलता है कि जनता मे उत्पन्न किया जानेवाला वह बल अहिंसा- मय ही होना चाहिए, बशर्ते कि हम चाहते हो कि जो आज सम्पत्तिहीन है, के हाथ में सम्पत्ति का अधिकार आते ही वे भी आज के सम्पत्ति- शालियों की तरह जालिम या अत्याचारी न बनें। और गांधीजी का तो यह दावा है कि हिंसक बल पैदा करने की अपेक्षा यह अहिंसक बल निर्माण करना अधिक सरल है। इस विषय की इससे अधिक चर्चा नहीं की जा सकती, क्योंकि गांधीजी और उनके इस विचार से सहमत उनके साथी इसे प्रत्यक्ष आचरण में लाने का प्रयोग भी तो कर ही रहे हैं। इतना लिख चुकने के बाद ऊपर दी गई दृष्टि के प्रकाश में गांधीजी की वर्तमान प्रवृत्तियों की छानबीन करना शायद बोधप्रद होगा । कांग्रेस उन गांधीवाद : समाजवाद से अथवा प्रत्यक्ष राजनीति से निवृत्त होकर ही वे संतुष्ट न हुए। मगन वाड़ी में बैठे-बैठे ग्रामउद्योग के भिन्न-भिन्न पहलुओं की ओर ध्यान दिला कर और मार्ग-दर्शन करा के ही उन्होंने सन्तोष न माना । बल्कि उन्हें ाक-तार की सुविधा से रहित; बरसात में कठिन कीचड़ से घिर जाने वाले 'सेगाँव' में जाकर बैठने की इच्छा हुई । देश की जो विकट समस्याएँ कांग्रेस को, विद्वान लेखको को और सरकार को परेशान किये हैं, उन समस्याओं का अहिंसात्मक निराकरण ढूंढने का यह तरीका गांधी- जीने अपनाया है। अगर यह कहे कि विकट या महान् समस्याओं का निराकरण हडने का विचार ही उन्होंने तज दिया है, तो वह शायद उनकी शान मे एक असंगत-सी बात होगी। फिर भी संभव है कि लोग ऐसा समझे और यह सोचकर अपना मन मना लें कि भले अब गांधीजी थोड़ा करें । लेकिन, बहुतों को तो यह कल्पना ही अत्यन्त असंगत और विलक्षण लगेगी, कि इस तरीके से गांधीजी देश की महान् समस्याओं को हल करने की कोई कुंजी तलाश कर रहे हैं ! तो भी गांधीजी के लिए तो यही नितांत स्वाभाविक और सुसंगत रीति है । देहातियों, और उनमे भी समाज की अत्यन्त निचली श्रेणी के कहे जानेवाले देहातियों के सीधे सम्पर्क में आकर वह इन समस्याओं का अहिंसात्मक हल पा जाने की अाशा रखते हैं उन्होंने आस-पास देहाती हरिजनों को इकट्ठा किया है। इन लोगो को अगर वह भूल से धान पैदा करना सिखा सकें इनको इस योग्य बना सकें कि ये अपने लिए स्वच्छ दूध और साफ गुड़ प्राप्त करने लगें इन्हे पढा- लिखाकर वर्तमान घटनाओं से परिचित करा सकें, और यदि इनके गाँव को गन्दगी और गन्दगी से पैदा होनेवाले रोगो से बचा सकें, तो क्या शक है कि सेगाँव के लोगो को मनुष्यमात्र में और फलतः अपने में रहने शक्ति का भान हो जाय । अतः यह कोई असम्भव बात नहीं है कि किसी दिन यही देहाती सरकार का और सारे हिन्दुस्तान का ध्यान अपनी ओर खींच लें। लेकिन इसके लिए तो कल्पना को बहुत दूर तक दौड़ाना पड़ेगा। इस काम की कठिनाइयों का खयाल गांधीजी को है। वाली सुप्त गांधीवाद है किन्तु वह श्रद्धापूर्वक इस बात को मानते हैं कि जो काम मनुष्य से असम्भव मालूम होता है, ईश्वर उसको सम्भव कर सकता है; क्योकि उसके लिए असम्भव कुछ है ही नही । जिसकी कृपा से 'मूक होय वाचाल, पंगु चढे गिरिवर गहन,' उस सत्य और अहिंसा-अर्थात् प्रेम-रूपी पर- मेश्वर-में गांधीजी की अटल श्रद्धा है। गांधीजी की कार्य पद्धति के एक दूसरे लक्षण का उल्लेख करके मैं इस लेख को समाप्त करूंगा। यह तो कोई नहीं कहेगा कि आंदोलनो और मानव-समूहों को इकट्ठा करने की रीति से गांधीजी अनभिज्ञ हैं। उलटे, जब-जब उन्होंने आन्दोलन उठाये हैं और सम्मेलन किये हैं, तब-तब उन्होने सारे संसार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। किन्तु यदि हम विविध प्रश्नों सम्बन्धी गांधीजी के विचारों और आचारों की नीति को शुद्धिपूर्वक समझना चाहते हैं, तो उनके आन्दोलनो और सम्मेलनों के कार्यक्रमों में जो एक विशेषता सदा से रहती श्राई है, उसे हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। और वह विशेषता यह है कि जबतक किसी अन्याय के प्रतिकार के लिये जनता को किसी निश्चित मार्ग से लेजाने की उनकी तैयारी नही होती तबतक उस अन्याय के प्रति उनके मन में कितना ही दुःख क्यों न रहे, वे उसके सम्बन्ध मे जनता के भावो को कभी उत्तेजित नही करते । अन्याय का सीधा इलाज करने के बदले जिन थोथे आन्दोलनो में केवल समाचार-पत्रो के पृष्ठ रंगने और साबुन के बुलबुलो की तरह क्षणिक प्रदर्शन करने की दृष्टि मुख्य रहती है, उनमें उन्हें कोई श्रद्धा नहीं । गांधीजी जब कभी किसी प्रश्न को उठाते हैं, और उस सम्बन्ध में लोकमत को जगाने का प्रयत्न करते हैं और उसके लिए किसी प्रकार का आकर्षक कार्यक्रम सुनाते है, तब जरूर यह प्राशा रखी जा सकती है कि उसके पीछे कोई प्रभावशाली और यदि आवश्यक हो तो अग्रगामी कदम उठाने की बात उनके ध्यान में आई है। जबतक ऐसा नहीं होता, वह इस प्रकार के अन्यायों के विषय में मोन ही रहते हैं, और दूसरों को भी मौन धारण करने की सलाह देते हैं; और ऐसा करके अपने गांधीवाद : समाजवाद । सम्बन्ध में पैदा होनेवाली गलतफहमी का जोखिम भी उठा लेते हैं। मैं समझता हूं कि गांधीजी के 'अनुयायी' को श्रद्धापूर्वक कार्यरत रहने के लिये इतनी सामग्री पर्याप्त होनी चाहिए।' गांधीजी की पद्धतियो पर और उनके 'रचनात्मक कार्यक्रमों पर बहुतेरे बुद्धिप्रधान लोगों की श्रद्धा अाज नही जम रही है । उन्हें ये सब आकर्षक और उत्साहवर्द्धक नहीं मालूम होते । पर इसका कोई इलाज नही है । इस विषय में उनके साथ अनन्त चर्चा करते रहना या उनका दोष ही दिखाते रहना, दोनो ही व्यर्थ है । उनपर नाराज हुए बिना, उन्हें उनके विचारों और भावनाओं के अनुसार रहने और करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि गांधीजी के विचारो और मार्गों का खण्डन किये बिना वे रही नहीं सकते हैं, तो यह सोचकर कि ऐसा करने का भी उन्हें अधिकार है, हमे उन पर गुस्सा न होना चाहिए। क्योंकि हमें तो यह आशा रखनी चाहिए कि प्रत्यक्ष प्रमाणो से सत्य और अहिंसामय प्रवृत्तियो के परिणामों को सिद्ध करके ही हम उन्हे जीत लेंगे। समाजवाद या समाजधर्म? [किशोरलाल मशरूवाला] यह एक विचार करने योग्य सवाल है कि हमको जगत में प्रथम किस बात की जरूरत है- समाजवाद की या समाजधर्म की ? सब लोग सुखी हो, कोई गरीब न हो, सभी को आरोग्य, बल, बुद्धि, विद्या, संपति श्रादि सुख के साधन प्राप्त हों, सर्वत्र समानता का व्यवहार हो, आदि शुभेच्छाएं, पुराने जमाने से प्रार्थना, नाटक, आदि के अन्त में हम लोगों में प्रकट की जाती हैं। मतलब यह कि समाजवाद के इस ध्येय से किसी समझदार (विवेकी) मनुष्य का विरोध नहीं हो सकता है । किसी समझदार मनुष्य समाजवाद या समाजधर्म ? -- को समाज की ऐसी हालत में सन्तोष नहीं हो सकता कि जिसमें कुछ व्यक्तियों के पास तो अपार संपति, अधिकार, उच्च दर्जे और फुरसत हो, और अधिकांश लोगों को अत्यंत परिश्रम करते हुए भी तंगी, अधीनता भय और जी-हुजूरी मे ही जीवन काटना पड़ता हो । न तो हमारे देश के, और न किसी दूसरे देश के ही किसी महात्मा पुरुष ने यह हालत कभी अच्छी समझी है, अथवा वैसा उपदेश ही दिया है । यह भी बात नहीं है कि ऐसे महात्मा पुरुष सिर्फ अरण्यवासी-जनता से अलग रहना ही पसन्द करनेवाले-रहे हैं। इनमें से कई ने तो स्वयं, और कई के शिष्यों ने, राजसत्ता भी प्राप्त की थी, और इस ध्येय की दिशा में कुछ चेष्टाएँ भी की थी ! फिर, अनेक प्रकार की राज्य प्रणालियों के भी प्रयोग हो चुके है । एकतंत्र सत्ता, चन्द बड़े और ऊंचे खयालात के लोगो की सत्ता, सारी जमात की सत्ता-आदि अनेक प्रकार के राज्यतंत्रों का इतिहास में पता चलता है। लेकिन अभी तक मानव-जाति समानता के आदर्श को व्यवहार मे सिद्ध करने में सफल नहीं हुई है। ऐसा क्यों है ? मुझे तो लगता है कि जब तक मानव हृदय में समाजधर्म का उदय न हो, तबतक समाजवाद- यानी समानता का श्रादर्श- अधिकार के जोर पर स्थापित राज्यतंत्रों द्वारा सिद्ध होने वाली चीज ही नहीं है। अभी तक मानव-हृदय इतना संस्कृत होने ही नहीं पाया है कि वह अपने वैयक्तिक सुख, स्वातंत्र्य, कीर्ति, अधिकार आदि की आकांक्षाओं को भूल और सार्वजनिक सुख को ही जीवन का ध्येय बना ले। जबतक मानव हृदय की ऐसी अवस्था है, तबतक किसी भी स्वरूप के राज्यतंत्र द्वारा समानता की सिद्धि होना मुझे असम्भव मालूम होता है। तबतक क्रांति से केवल इतना ही हो पाता है कि एक पक्ष के हाथ में से दूसरा पक्ष राज्यलक्ष्मी को छीन लेता है, कुछ दिन तक उस राज्याधिकार का सदुपयोग करता है और बाद को दुरुपयोग करने लगता है तथा अपना अधिकार बनाये रखने के लिए जनता का दमन करता है। जबतक मानव समाज की व्यवस्था बल की नींव पर बने हुए राज्यतंत्रों पर अवलंबित ही जाय, गांधीवाद : समाजवाद रहेगी, तबतक उस राज्यतंत्र का स्वरूप कैसा भी क्यों न हो, उसमें से वर्ग विहीनता पैदा हो ही नहीं सकती। मानव जाति में निर्माण होने वाली वर्ग-रचनाएं खुदाई-प्रकृति की व्यवस्था मे अनिवार्य - चीजें नहीं हैं। पर जबतक मानव हृदय मे यह वृत्ति जोर पर है कि पड़ोसी के सुख और अपने सुख के बीच में संघर्ष होने पर वह अपने सुख का पहला खयाल करे; अथवा पड़ोसी का सुख बढ़ाने के लिए स्वयं उसे कुछ तकलीफ न उठानी पड़े, बल्कि बन सके तो पड़ोसी के श्रम द्वारा स्वयं ही कुछ लाभ उठा ले; अथवा जबतक यह वृत्ति मौजूद है कि कितना अच्छा हो यदि बिना परिश्रम किये वह सब सुखो को प्राप्त कर सके- यानी परिश्रम से बचने ही में आनन्द माने-- तबतक वह यही कोशिश करता रहेगा कि सुख के साधनों पर उसका अपना कब्जा हो जाय, और वह बल उसे प्राप्त हो कि जिससे वह कब्जा उसके पास कायम रहे। निजी जायदाद न होने से ही मनुष्य प्रोलेटेरियन - अकिंचन--नहीं होता । जो मनुष्य चाहता है कि उसके पास अपनी निजी जायदाद हो और वह बढ़ती रहे, वह आज भले ही अकिंचन हो, पर वस्तुतः वह माल- दारों के वर्ग का ही है। मेरा मतलब यह नही है कि अकिंचनता केवल मानसिक भाव है, और स्थूल रूप में मालदार होने पर भी मानसिक अकिंचनता का दावा करना बिल्कुल सही है । साधारणतया मानव-हृदय में जायदाद पर कब्जा रखने की लालसा इतनी प्रबल दिखाई देती है कि अपनी सारी निजी जायदाद का विसर्जन कर देने पर भी उसकी व्यवस्था और उपयोग में उसकी आग्रह-युक्त दिलचस्पी रहती है। इतना ही नही, बल्कि फिर तो दूसरों की जायदाद की व्यवस्था और उसका उपयोग करने" का भी बलवान मोह आ सकता है। मतलब यह कि संपति का प्रभाव मानव-हृदय पर अजीब-सा है और इसी कारण अकिंचनता की नितान्त सिद्धि होने नही पाती । अकिंचनता को मनुष्य कष्टमय स्थिति ही समझता आया है। आदर्श अथवा इष्ट स्थिति- ऐसा नहीं समझता। इसलिए जबतक यह मानव स्वभाव है, तबतक अकिंचन-वर्गहीन-समाज कायम समाजवाद या समाजधर्म? . नहीं होगा। और जबतक मनुष्य के हृदय पर इस संस्कार का जोर है कि परिश्रम करना आफत है, उससे बचना ही सुख है, तबतक भी वर्गहीन समाज का कायम होना असम्भव मालूम होता है । जीवन-निर्वाह के आवश्यक पदार्थ शरीर-बल से पैदा किये जायं या यंत्र-बल से, यह गौण प्रश्न है। परि- स्थिति के अनुसार समय-समय पर यंत्र के उपयोग की मर्यादा निश्चित करने का ही यह सवाल है । लेकिन इतना तो निश्चित है कि चाहे शरीर- बल का अधिक उपयोग करें अथवा यंत्र-बल का, जीवन-निर्वाह के आवश्यक पदार्थों को पैदा किये बिना काम नही चलेगा। अर्थात् अन्न, चस्त्र, मकान, रास्ते, रोशनी, सफाई, बाल-वृद्ध-निर्बलो का पालन, शिक्षा आदि की व्यवस्था करनी ही होगी। केवल एक बटन दबा देने से ही, इनमें से अधिकांश काम यदि संभव भी हो तब भी, बटन दबाने का परिश्रम और उसकी चिन्ता तो किसी को करनी ही होगी। लेकिन जब परिश्रम को कष्ट मानने का संस्कार मनुष्य बना लेता है, तब बटन दबाने और उसकी चिन्ता करने में भी उसे आफत मालूम होती है, और वह इच्छा करता है कि कोई दूसरा उस जिम्मेदारी को ले ले और वह स्वयं पड़ा रहे अथवा कुछ दूसरा 'विशेष महत्व' का काम करता रहे । उठ कर घड़े में से पानी लेकर पी लेना, अथवा लोटा लेकर जंगल चले जाना, ये तो कोई बड़े परिश्रम के काम नहीं हैं। लेकिन इनमें भी मनुष्य तकलीफ समझता है । चाहता है कि पत्नी या लड़का या नौकर पानी ला दे, लोटा भर दे, और नौकर लौटा लेकर साथ चले । सोना तो हरेक मनुष्य चाहता है और आराम से सोना चाहता है; पर साथ ही वह यह भी चाहने लगता है कि उसका बिछौना कोई दूसरा आदमी तैयार कर दे, ताकि उतने समय में वह श्रमजीवियों की अवस्था पर एक लेख या कविता की कुछ पंक्तियां लिख डाले। यह बात भी नहीं है कि मनुष्य को शारीरिक परिश्रम से ही हमेशा एतराज है । दंड, बैठक, कुश्ती श्रादि व्यायाम के लिए, या पैदल घूमने H गांधीवाद : समाजवाद के लिए वह तैयार हो ही जाता है। पर अजीब बात है कि जिनपर अपना जीवन निर्भर है, उनके लिए तनिक-सा भी परिश्रम करने में वह कष्ट महसूस करता है। मित्रों के साथ गप्प उड़ाने के लिए वह रात भर. जागरण करेगा, लेकिन खेत की रखवाली करने के लिए किसी और को ढूंढेगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि असल बात यह है कि जबतक संकल्प मात्र से जीवन निर्वाह के सब साधन प्राप्त करने की मनुष्य ने शक्ति प्राप्त नहीं की है, तब तक कुछ न कुछ परिश्रम तो किसी-न-किसी को करना ही होगा । और परिश्रम को आफत समझने का संस्कार यदि उसमे दृढ़ हो गया है, तो उस आफत को किसी दूसरे पर ढकेलने का वह प्रयत्न करता ही रहेगा। इस प्रयत्न का ही नाम वर्ग:निर्माण करने का प्रयत्न है। और बल के जरिये किसी खास व्यवस्था के निर्माण करने में जिनकी श्रद्धा है, उनके लिए अन्त में जाकर 'डिक्टेटरशिप' तक पहुंच जाना अनिवार्य हो जाता है। आज दस व्यक्ति यह मान लेते हैं कि सारी जनता से वे समझदार हैं, अधिकतर लोग तो मूर्ख और जड़; वे नहीं जानते कि किस बात में उनका कल्याण है । और कुछ लोग जो विरोध करते हैं वे या तो स्वार्थी हैं, अथवा मूर्ख और जड़ के अलावा हठी भी । इसलिए जनता के कल्याण के लिए विरोधियों को दबा देना और अपने हाथ में सब अधिकार वे ले लेना चाहते हैं। इस तरह ये दस व्यक्ति अधिकार प्राप्त कर लेते हैं और लोक-कल्याण के उपाय आजमाने बैठते हैं। धीरे- धीरे इन दस की समिति महसूस करती है कि इन सबकी भी समझदारी एक-सी नहीं है, और किसी एक की राय से ही काम करना आवश्यक है, अधिकांश अधिकार उसे सुपुर्द कर देने चाहिए, तथा औरों को उसकी प्राज्ञाओं को वफादारी से मानना चाहिए। इस तरह 'डिक्टेटरशिप' आ जाती है। और जिस जन-कल्याण के नाम पर इन दस ने और विरोधियों को दबा देना अच्छा समझा, उसी जन-कल्याण के नाम पर इन दस में से उस 'डिक्टेटर का कोई विरोध करे, तो उसे भी दबा देना आवश्यक , समाजवाद या समाजधर्म ? मालूम होता है । मतलब यह कि जबतक एक समूह मानव-संस्कारों के परिवर्तन के स्थान पर बलात्कार को जन-कल्याण का या अपने उद्देश्य की सिद्धि का अन्तिम उपाय मानता है, तब तक जुल्मी 'डिक्टेटरशिप' और उसके फलस्वरूप एक बलवान दल का प्रभुत्व और अन्त में वर्ग निर्माण बिना नहीं रहेगा। यह न माना जाय कि मैं इन विचारो को समाजवाद के मूलभूत सिद्धांत का विरोध करने के लिए, अथका वर्तमान प्रणाली के समर्थन के लिए प्रकट कर रहा हूँ। मेरा विश्वास हो गया है कि बलात्कार की नींव पर खड़ी हुई किसी भी प्रकार की राज्य-प्रणाली से मानव जाति अपने ध्येय के अन्त तक नहीं पहुंच सकेगी। फिर भी, वर्तमान प्रणाली को तो हटाना ही होगा। लेकिन इन विचारों को प्रकट करने में मेरा हेतु यह है कि समाजवादी का खयाल इस बात पर जाय कि उसे विचार मे और भी गहरे जाना होगा । ऊपरी परिवर्तनों से-वे क्रान्तिकारी हो तो भी काम नहीं चलेगा । यह समस्या केवल किसो विशेष प्रकार की राज्य-प्रणाली या अर्थ-व्यवस्था के कायम कर देने से नहीं, बल्कि मानव-संस्कारों के परिवर्तन से हल होगी । समाजवाद के ध्येय को सफल करने के लिए मनुष्य को व्यक्तिवादी न रहकर समाजधर्मी बनना होगा। पड़ोसी का चाहे कुछ भी हो, पर अपना विकास, भोग, श्राराम, यश, मोक्ष प्रादि सिद्ध कर लेना व्यक्तिधर्म नहीं, बल्कि व्यक्तित्रादित्व है । खुद का चाहे कुछ भी हो, पर पड़ोसी का विकास, भोग, आराम, यश, मोक्ष प्रादि सिद्ध हो, तथा अपने विकास, भोग, पाराम, यश, मोन आदि के प्रयत्न द्वारा पड़ोसी को लाभ हो, यह समाजवादित्व नहीं, बल्कि समाज-धर्म है। समाजधर्मी परिश्रम को आफत नहीं समझता। मेरी दृष्टि में परिश्रम को आफत समझना व्यक्तिवादित्व है। परिश्रम करने की अशक्ति को प्राफत और शक्ति को विभूति समझना समाजधर्म है । . .

गांधीवाद : समाजवाद : :३: सर्वोदयवाद [किशोरलाल मशरूवाला] अगर "वाद" के मानी ये हों कि एक निश्चित ढाँचे में तैयार किया हुआ जीवन का पूरा-पूरा नक्शा, तो गांधीवाद जैसी कोई चीज नहीं है । अगर “वाद” के मानी ये भी हो कि ऐसा एक पूर्ण शास्त्र, जिसे देखकर जीवन सम्बन्धी किसी भी मुश्रामले का जवाब हासिल कर लिया जाय, तो भी कहना होगा कि गांधीवाद जैसी कोई चीज नहीं है। लेकिन, अगर "वाद” के मानी हो जीवन व्यवहार के लिए कुछ मोटे नैतिक सिद्धान्तों का स्वीकार, तो मानना होगा कि गांधीवाद नाम की एक चीज और एक व्यवहारमार्ग उत्पन्न हो चुका है। अगर उनके लिए कोई सूचक नाम देना हो तो क्रमश उन्हें सर्वोदयवाद और सत्याग्रहमार्ग कह सकते हैं। सच पूछा जाय तो ये सिद्धान्त नये नहीं है। गांधीजीने ऐसा कोई नीतितत्त्व प्रकट नहीं किया है जिसका दुनिया में किसी को कभी परिचय न था। अत्यन्त पुराने जमाने से आज तक इन नैतिक सिद्धान्तों पर मानवजाति का भौतिक और सांस्कारिक उत्कर्ष हुया है, और उसके प्रति हमेशा आदर भी रहा है । हर जमाने में सैकड़ो स्त्री-पुरुष अपने निजी जीवन में उनपर चलने के लिए कोशिश करते आये हैं। गांधीजी ने जो विशेषता बताई है वह यह है कि समाज और राष्टीय जीवन मे भी बड़े पैमाने पर उन सिद्धान्तों का अमल किया जाना चाहिए और किया जा सकता है। दरहकीकत, न केवल सारी मानवजाति ही, बल्कि सारी जीव-जाति एक ही बड़ा परिवार है । पर वर्तमान युग के लिए यह एक अति दूर का सिद्धान्त हो जायगा। इसलिए अगर हम इतना ही मानकर चलें कि सिर्फ सारी मानवजाति एक ही बड़ा परिवार है, तो काफी है । इस परिवार में न कोई व्यक्ति ऊँचा है, न कोई नीचा है । न कोई जन्मतः विशेषाधिकारी सर्वोदय है, न कोई न्यूनाधिकारी । सब समान हैं और राष्ट्र निर्माण का आदर्श यह होना चाहिए कि सभी का उत्कर्ष हो। दुनिया के अलग-अलग भौगोलिक विभाग, मानो, एक ही मकान के भिन्न-भिन्न कमरे हैं। उनमें अलग-अलग लोगों का ठहरना केवल व्यवस्था है । अगर उस व्यवस्था मे सबकी सुविधा हो तो उसे बिगाड़ने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर सर्वोदय-सिद्धि के लिए इस व्यवस्था में फेरफार करने की जरूरत हो तो वैसा करने में कोई नैतिक दोष नहीं है । अर्थात् सर्वोदय की सिद्धि के लिए मानवों का एक देश से दूसरे देश में बसना अनाधिकार है। मकान में कुछ इन्तजाम ऐसा होता है, जो हरेक कमरे में पाया जाता है, और कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कुछ में होती हैं, और कुछ में नहीं होती। इन सब व्यवस्थाओं का हेतु मकान में रहनेवाले सब लोगों का सुख और सुविधा है । कहां पर क्या इन्तजाम हो, कितना, हो, उनके उपभोग में किस शख्स का कितना अधिकार हो, किसके सुपुर्द कौनसी व्यवस्था. हो आदि बातें सहूलियत की हैं । इन पर किली का “यावच्चंद्रदिवाकरौं" अधिकार नहीं हो सकता है। सर्वोदय के लिए इन इन्तजामों में जब भी जरूरत हो फेरफार करने में दोप नहीं है, बल्कि कर्तव्य है। यही बात पारिवारिक कामों के प्रबंध की है। किसको कौनसा काम सौंपा जाय, किस तरह किया या कराया जाय, आदि सब बातें सर्वोदयीं व्यवस्था की हैं । किसी का किसी प्रबंध पर कायमी अधिकार नहीं हो सकता। पारिवारिक इन्तजामों में फेरफार कौन करे ? किस तरह करे ? परिवार में परस्पर संघर्ष हो तो उसे किस तरह मिटाया जाय? कभी-कभी परिवार में तीन कलह पैदा होते हैं । यह बात सच है कि उसका नतीजा कभी-कभी अदालत और खूनखराबी तक पहुंच जाता है। जहां इस हद तक मामला नहीं पहुँचता है, वहाँ भी आपस में कुछ- न-कुछ असंतोप का अनुभव होना, अथवा एकाध जबरदस्त और स्वार्थी गांधीवाद : समाजवाद व्यक्ति द्वारा अन्य कुटुम्बीजनों के प्रति अन्यायपूर्ण बर्ताव किया जाना नामुमकिन नहीं है । ये सब मानव स्वभाव के क्रम-विकास के चिन्ह हैं । फिर भी कभी यह नहीं माना जाता कि खून और अदालत इन संघर्षों को मिटाने के वाजिब उपाय हैं। और यह भी नही माना जाता है कि परिवार में किसी प्रकार का स्थायी वर्गविग्रह होता है। संस्कारी और समझदार परिवारों में कौटुम्बिक क्लेश, अन्याय आदि जिन मर्यादाओं में रहकर मिटाये जाते हैं; उन्हीं मर्यादाओं मे रहते हुए सारी मानव जाति के कलह और अन्याय मिटाना नामुमकिन नहीं है, बल्कि, समझदारी और कर्तव्य है। अच्छे खानदान के व्यकितियों के संस्कार किस तरह के होते हैं ? उन सबकी यह इच्छा होती है कि हम सब एकदिली और समानभाव से रहें। हमारे अन्दर जो कुछ मतभेद या असतोष हो, तो साथ मे बैठकर मिटादें। बड़े भाई को हमेशा यह चिन्ता रहती है कि छोटे भाई और उनके लड़के 'बच्चो को कम-से-कम तकलीफ हो । हिन्दू-संसार में तो सैकड़ो बड़े भाई ऐसे पाये जायेंगे कि जिन्होंने अपने छोटे भाइयों के उत्कर्ष के लिए अपनी निजी आकांक्षाओं और सुखो का वर्षों तक बलिदान कर दिया है । अगर कुछ असन्तोष उत्पन्न हो जाय तो प्रायः परिवार के समझदार व्यक्ति अपने वाजिब हकों का भी त्याग करके असन्तोष के बीज का उखाड़ने का प्रयत्न करते हैं । इसी मे खानदानीपन या शराफत मानी जाती है । अगर कुटुम्बीजन दुराग्रही होता है, तो क्या किया जाता है ? उसे समझाते हैं। बहुत ही महत्व की बात न हो और न समझा सकें तो निभा लेते हैं। महत्व की बात हो तो सारे परिवार का उस पर नैतिक दबाव डलवाते हैं। जरूरत हो तो जिस पर उस शख्स का यकीन हो ऐसे किसी मित्र द्वारा भी नैतिक दबाव डलवाते हैं, अथवा उसको पंच बनाते हैं। उसकी शुद्ध बुद्धि और ऊँची भावनाओं को जाग्रत करने और उसमे शर्म पैदा करने का प्रयत्न भी करते हैं। और अन्त में अनेक प्रकार से सत्याग्रह का प्रयोग करते है । ये उपाय बड़ों के सामने भी चलते हैं और छोटों के .

सर्वोदय सामने भी । स्त्रीहठ, बालहठ श्रादि शब्द प्रायः दुराग्रहवाचक समझे जाते हैं, लेकिन वे सत्याग्रही प्रयोग भी हो सकते हैं । मतलब यह है कि परि- वार में आग्रह एक ऐसा शस्त्र है कि जिसका छोटे-बड़े व्यक्ति और कभी कभी जानवर भी उपयोग कर सकते हैं । इसके उपयोग में एक ही शर्त आवश्यक होती है। टूट जाना, पर दब न जाना । यह मुमकिन है कि श्राग्रही पक्ष खुद को सत्याग्रही माने, और उसकी बात को ना मंजूर करने वाले उसको दुराग्रही। फिर भी समझदार कुटुम्ब में कभी ऐसा नही सोचा जाता कि उस पर जबदस्ती की जाय, उसे मारा या पीटा जाय, कैद किया जाय या उसका सब कुछ छीनकर उसे निकाल दिया जाय । अधिक से अधिक यह सोचा जाता है कि उसे उसका हिस्सा देकर अलग कर दिया जाय । कुल अथवा मुगल वंश में जैसे महत्वाकांक्षी स्वकुल शत्रु पैदा हो चुके हैं, वैसे आदमी मानववंश में बाज दफा पैदा हो जाते हैं । वे मानव- जाति की मामूली अवस्था के दृष्टान्त नहीं हैं, रोगी अवस्था के हैं। लेकिन ऐसा होने पर भी हत्याकांड का मार्ग ग्रहण करने से आखिर अंजाम में सारे परिवार की बरबादी न हो जाय, तब तक मामला शांत नहीं होता। अब तक हिंसा का कोई ऐसा मार्ग नहीं पाया गया है जिससे केवल अत्या- चारी और अन्यायी व्यक्तियों का ही विनाश हो और न्यायी पक्ष सुरक्षित रहे। हिंसा द्वारा बुराई हटाने के लिए केवल इतना ही काफी नहीं है कि हिंसक के पक्ष में न्याय हो, लेकिन यह भी लाजिमी है कि उसकी हिंसक- शक्ति और योजना भी विशेष ऊँचे ढंग की हो ! अगर दुनिया के हत्या- कांडों का इतिहास हमें कुछ सिखाता है तो कम से कम इतना तो साफ बताता ही है कि कभी हिंसा के सहारे सत्य और न्याय की जय नहीं हुई है। लेकिन अगर एक-एक बड़े परिवार का इतिहास खोजा जाय तो अहिंसक उपायों से पारिवारिक कलह सफलतापूर्वक मिटाये जाने के सैकड़ों उदाहरण मिल जायंगे। पीढ़ियों तक कलह चलते रहने के बाद, एकाध महानुभावी स्त्री या पुरुष के असाधारण स्वार्थ-त्याग अथवा बलिदान से, अथवा असाधारण प्रेम के कारण कारण निर्माण विवाह सम्बन्ध से परम्परा- .

२० गांधीवाद : समाजवाद गत झगडे शांत हो जाने के कई उदाहरण अनेक परिवारो के इतिहास में मिल जायंगे अगर गांधीवाद में कोई भारपूर्वक बताया हुआ न्याय है तो यह 'परिवारन्याय है। इसके अतिरिक्त जो कुछ और विचार-धारायें, योजनायें अथवा कार्यक्रम हैं, वे सब इसी का खयाल करते हैं कि देश की मौजूदा हालत में क्या उचित है, शक्य है और व्यवहार्य है। अगर गांधीवाद में खद्दर और ग्रामोद्योगो पर बहुत जोर दिया जाता है, या कलों पर कम कृपादृष्टि रक्खी जाती है, या उद्योग द्वारा ही पढ़ाई की बुनियाद डालने का कार्य कम पेश किया जाता है, तो उसकी वजह यह नहीं है कि गांधीवाद को कलों के प्रति-चूकि वे कल हैं, इसीलिये- ऐतराज है । बल्कि, गांधीजी मानते हैं कि देश की वर्तमान अवस्था में सर्वोदय की ओर जाने के लिए और कोई दूसरी व्यवहार्य योजना नहीं है अगर कलम की एक झोक से साम्यवाद की स्थापना हो जाय. तो साम्य- वादी शासकों को भी अनुभव हो जायगा कि करोड़ों जनों को स्वाभिमान- पूर्वक रोटी प्राप्त कराने के लिए गाँधीजी के ही आर्थिक कार्यक्रम को चलाना होगा। इसी तरह, अगर गाँधीजी हरेक शख्स से आठ घंटे काम लेकर उसे आठ ही आने मजदूरी देना चाहते है, और यह न्याय वे चर्खा चलाने- वाली बुढ़िया से लेकर वाइसराय तक लगाना चाहते हैं, तो उसकी वजह यह नहीं है कि मानवजाति के भौतिक सुख का उनको इतना ही ख़याल है बल्कि उसका मतलब यह है कि अगर उनके हाथ में देश की पूरी- पूरी बागडोर हो और साथ ही दक्ष और वफादार कार्यकर्ता हो तो निकट भविष्य में किसी हद तक समाज को पहुंचाने की वे हिम्मत रखते हैं, उसका यह नक्शा है। यह बात ठीक है कि वे बहुपरिग्रह और बहुभोग के आदर्श में विश्वास नहीं रखते हैं, और अपरिग्रह और अभोग का श्रादर्श मानते हैं। लेकिन उन्होंने दरिद्रों के सामने कभी भी ये आदर्श नहीं रक्खे । उनके लिए तो उनका सब कार्यक्रम उनके भौतिक सुख सर्वोदय । . बढ़ाने का ही है । यह न भूल जाना चाहिए कि उन्होने दरिद्र नारायण से एकरूप होने का प्रादर्श दरिद्रो की सेवा करने के लिए ही सामने रक्खा है, यह नही कि दारिद्य को स्वतंत्र रूप से जीवन सिद्धान्त बताया है। कई बार उन्होंने कहा है कि जिनके पेट में रोटी नहीं है और बदन पर कपड़ा नहीं है, उनके सामने मैं धर्म की बातें कैसे रक्तूं? इसी तरह अगर गांधीजी ने यह कहा है कि उनके रामराज्य में राजा, जमींदार, धनिक और गरीब सब सुखपूर्वक रहेगे तो उसका मतलब यह नही है कि उनके अंतिम श्रादर्श समाज में एक हाथ पर राजा वगैरा अाराम और आलस्य में रहनेवाले मनुष्यो का और दूसरे हाथ पर निष्कि- चन और सततः परिश्रमी मनुष्यों का रहना आवश्यक है, बल्कि, जिस भूमिका पर आज के हिन्दुस्तान का मानवसमाज खड़ा है, उसमें अगर हम अहिंसा द्वारा सर्वोदय की ओर जाना चाहते हैं, तो उसके लिए प्रथम व्यवहार्य श्रादर्श यही हो सकता है कि आज जो अत्यन्त दरिद्र हैं, उन्हें शीघ्रातिशीघ्र पेटभर अन्न, शरीरभर कपड़ा, आरोग्य-कर मकान और उद्योगपूर्ण देहात प्राप्त कराने का कार्यक्रम सोचें । अगर इतना आदर्श हम सिद्ध कर सकें, तो वर्तमान के लिए कम नहीं है। भले ही तब तक ३५ करोड़ लोगों में थोड़े लोग ऐसे मिल जाय, जिनके पास संपति के ढेर पाये जाते हैं और उन्हें बरदाश्त कर लिया जाय । इसके मानी हरगिज यह नहीं है कि राजा, जमीदार और धनिकों की “यावच्चंद्रदिवाकरौं" संस्थायें बनाई रखने का यह सिद्धान्त है। अखीर में तो सर्वोदय का सिद्धान्त यही हो सकता है कि सबको यथासंभव समान बनाया जाय । पर अहिंसक परिवर्तन में यह तरीका नहीं होता कि सबके मकान समान करने के लिए ऊंचे मकानों को तोड़ने से शुरुआत की जाय, बल्कि यह कि बहुत से छोटे-छोटे नये मजबूत मकान बनाना श्रारम्भ कर दिया जाय, और तब तक ऊंचे मकानोंसे जो कुछ उपयोग लिया जा सके,वह लिया जाय । अगर समाजवाद और सर्वोदयवाद की तुलना करनी हो तो मैं यह कहूंगा कि समाजवाद का ध्येय है क्रांति, यानी सुसम्पनों पर दरिद्रों का गांधीवाद : समाजवाद शासनाधिकार और सर्वोदय का ध्येय है हृदय परिवर्तन यानी सुसंपन्नों द्वारा दरिद्रों की सेवा । समाजवाद में क्रान्ति की सिद्धि के लिए दरिद्र सेवा (बल्कि, दरिद्र संपर्क) एक साधन है । सर्वोदय में मानव-सेवा की सिद्धि के लिए क्रान्ति, यानी शासनाधिकार की प्राप्ति एक साधन हो सकता है । समाजवाद को परवाह नहीं कि जिस क्रान्ति देवी की वह बड़ी दिव्य श्रद्धा से अराधना करता है, उसकी प्राप्ति अहिंसा द्वारा ही हो या रक्तपात द्वारा, सर्वोदय में हिंसा के लिए गुंजाइश नहीं, क्योंकि उसमे परिवार-न्याय है। समाजवाद मे इतनी ही प्रतिज्ञा है कि सब मानव समान हैं । सर्वोदय में यह प्रतिज्ञा तो है ही, साथ ही यह भी है कि मनुष्य अहिंस्य है। गांधीवाद : समाजवाद [हरिभाऊ उपाध्याय १ यह अाजकल ठीक-ठीक जिज्ञासा और चर्चा का विषय बन रहा है । असली की बनिस्बत खेल चर्चा का होना हमें नामवार तो होना चाहिए, परन्तु दिमाग को सुलझाने के लिये आखिर चर्चा ही तो एक साधन है, इसलिये मैं इस चर्चा को इतना बुरा भी नहीं समझता हूं - बशर्ते कि हम पक्षपात और दुराग्रह को छोड़कर दोनों का मर्म समझने की चेष्टा करें । हमें केवल सत्यशोधन की ही दृष्टि और वृति रखनी चाहिए और वह जहां हमें ले जाय वहां बेखटके चले जाना चाहिए फिर उसका परिणाम चाहे मार्क्स के खिलाफ निकले, चाहे गांधीजी के,, चाहे वेदों के खिलाफ हो, या कुरान के । जो सत्य का शोधक है वह न कभी आँख मूदकर बैठ सकता है, . न गलती को छिपा सकता है, गांधीवाद : समाजवाद २ कि किसी के डर या मुलाहिजे से अपने भावों और विचारो को प्रकट करने से डर सकता है। समाजवादियों का भी यह दावा है कि वैज्ञानिक शोधक हैं-विज्ञान की खोज में जो-जो बातें उन्हें सत्य मालूम होती जायगी उन्हें वे बिना चू-चपड़ किये स्वीकार करते चले जायेंगे। इसी तरह गांधीवादी तो निीत रूप से कहता है कि हम सत्याग्रही, सत्यशोधक हैं । दोनो का उद्देश्य सत्य को पाना है, दोनों की वृति एक सच्चे शोधक या साधक की वृत्ति है; हां, दोनों की स्पिरिट में फर्क जरूर है। यह कुछ हद तक स्वभाव से सम्बन्ध रखता है, कुछ हद तक जीवन-सिद्धांतो से और कुछ हद तक परिस्थितियों से। यह महत्व की बात होते हुए भी यदि उद्देश्य और वृति हमारी ठीक ही रखने की कोशिश होती रही तो विशेष हानि पहुंचे बिना हम अपने ध्येय तक पहुंच सकते हैं, इसमें मुझे कोई संन्देह नहीं है। २ सबसे पहले हम आदर्श पर विचार करें। गांधीवाद और समाजवाद के सामाजिक अादर्श क्या हैं ? ऐसा कहते हैं कि समाजवाद ने तो इतना शास्त्रीयरूप अब धारण कर लिया है कि उसका श्रादर्श बताना आसान है; परन्तु गांधीवाद के लिए यह जरा कठिन बात है। क्योकि एक तो गांधीजी ने इस विषय पर शास्त्रीय रीति से न कुछ कहा है, न लिखा । न इस तरह लिखने या कहने की उनकी रीति ही है। वे न अपने को विविध शास्त्रों का पण्डित मानते हैं और न इसे अपने जीवन में विशेष महत्व ही देते हैं । वे अपने को एक सत्य का शोधक या सावक मानते हैं और अपने तथा देश के जीवन में सत्य के प्रयोग करते हैं और अपने अनुभव ज्यों के त्यों लोगों के सामने रखते आते हैं। उनका सामाजिक आदर्श है जरूर; क्योकि यदि ऐसा न होता तो भिन्न-भिन्न जीवन-च्यापी विषयों पर उनके सुसंगत विचार न प्रकट हुए होते; परन्तु सम्पूर्ण शास्त्र या योजना के रूप में वह अभी सामने नहीं आ पाया है । इसलिए उसे, मक्खन की तरह, बिलो कर निकालना ।

गांधीवाद : समाजवाद . " पड़ता है । अव्वल तो 'गांधीवाद' ही नाम उन्हें खटकने वाला है । उन्होने कितनी ही बार कहा है कि मुझे न कोई 'वाद' चलाना है, न सम्प्रदाय मैं तो एक सत्य को जानता हूं और सत्य की ही बातें लोगों से कहता और करता हूं। यह कोई नई बात नहीं है । उनके अनुभव औरों से नये और भिन्न हो सकते हैं। उनके प्रकाश में चीजों का मूल्य भी बदल सकता है, सारे समाज की रचना में उथल-पुथल हो सकती है, परन्तु सत्य की शोध और आराधना में तो ऐसा होना अवश्यम्भावी है। हर युग में सत्य के साधकों के द्वारा ऐसे ही परिणाम निकले हैं। परन्तु गांधीजी को पसन्द हो या न हो, हम लोगों ने तो उनके विचारों को गाँधीवाद' नाम दे ही डाला है । अतएव हमारे लिए यही समझना बाकी रह जाता है कि 'गांधीवाद' है क्या, और गाँधीवाद किस सामाजिक अादर्श को किस तरह पहुंचना चाहता है। यहां हमें यह याद रखना चाहिए कि सामाजिक आदर्श का निर्णय करने या उसके पहुंचने का मार्ग निश्चित करने में ही गांधीवाद खतम नही हो जाता है । मानवी समाज और भौतिक-जगत् के परे भी गांधीवाद जाता है । समूचे जगत् के मूल और ध्येय या आदर्श का निर्णय करने के बाद गाँधीवाद उसके प्रकाश में और उससे सुसंगत मानव-समाज का निर्माण करना चाहता है। उसे ऊपर-ऊपर विचार कर लेने से सन्तोष नहीं होता- वह ठेठ तह में जाकर निर्णय करना चाहता है। आंखों को जो कुछ दिखाई देता है उतना ही उसके मनन या शोध का विषय नहीं है, बल्कि बुद्धि, मन, कल्पना, वेदना, अनुभव, जहाँ तक पहुंच सकते हैं या इनसे भी बड़ी शक्ति अगर कोई हो तो उसकी भी पहुंच जहां तक हो सकती है, वहां तक पहुंचकर वह अपना फैसला देता और अपनी योजना बनाना चाहता है। यदि हम इस बात को न समझेगे या भूल जायेंगे तो गांधीवाद के साथ न्याय न कर सकेंगे। तो पहले हम इसीको क्यो न समझ लें ? गाँधीजी का कहना है कि सारी दुनियां का मूल स्रोत सत्य है, दुनिया के अणु-अणु में, इन भिन्न-भिन्न रूपों और आकार-प्रकारों में वही सत्य " गांधीवाद : समाजवाद , । सत्य पिरोया हुआ है । इसका यह अर्थ हुआ कि हम सब जीव-मात्र, मनुष्य- मात्र एक ही सत्य के अंश हैं, असल में एक रूप हैं, हम सबका नाता आत्मीयता का है । जब हम मनुष्य ही नहीं, जीव-मात्र, भूत-मात्र, आत्मीय हैं तो फिर हमारा पारस्परिक सम्बन्ध प्रेम का, सहयोग का, सहिष्णुता का. और उदारता का ही हो सकता है, न कि द्वेष का, झगड़े का, मारकाट का, या चढ़ा-ऊपरी का । ये दो गांधीवाद के ध्रुव सत्य हैं जिन्हें गांधीजी क्रमशः और अहिंसा कहा करते हैं । यही गांधीवाद के पथदर्शक सिद्धान्त हैं जिनको मिलाकर गांधीजी ने एक सुन्दर और तेजस्वी नाम दे दिया है, सत्याग्रह । वैसे यह नाम साधन या वृत्तिसूचक मालूम होता है परन्तु इसका अर्थ है--सत्य की शोध के लिए सत्य का आग्रह । अहिंसा इसमें, दूध में सफेदी की तरह, मिली या छिपी हुई है क्योकि सब अपने-अपने सत्य का आग्रह तभी अच्छी तरह रख सकते हैं जब एक-दूसरे के प्रति सहनशील बनकर रहें और इसी का नाम अहिंसा है। इन दोनों के दो-दो रूप हैं, एक मूलस्वरूप और दूसरा दृश्य स्वरूप । सत्य मूलरूप में एक तत्व है और दृश्यरूप में यह सारा प्रकट विश्व है अहिंसा मूलरूप में प्रेम-रूपिणी आत्मीयता है और प्रत्यक्ष रूप में जीवन के तमाम सरस और मृदुल गुणों का समुच्चय है। इस तरह सारा जगत् सत्य से ओतप्रोत और अहिंसा से सुखदायी एवं प्रगतिशील है । इस सत्य पर दृढ रहना, वह जिस समय जैसा अनुभव में आवे उस समय उसी पर दृढ रहना, मन को राग और द्वेप से हटाकर आगे सत्य को खोजने और पाने की वृत्ति रखना और जो हमसे मतभेद रखते हैं, उनके प्रति भी सहिष्णुता और प्रेम का व्यवहार करना, इसका नाम गांधीजी ने सत्याग्रह रखा है। यदि इस मूल बात को हमने अच्छी तरह समझ लिया तो फिर गांधीवाद के समाज का आदर्श समझने में न तो भूल होगी और न कठिनाई ही। ३ अब, जब सारे विश्व में सबसे हमारी आत्मीयता है और हमें सबके प्रेम और मिठास से रहना है तो यही आदर्श, वृत्ति और व्यवहार हमारा गांधीवाद : समाजवाद १ का सारे मानव-समाज के प्रति होगा, यह अलहदा कहने की जरूरत नहीं है। जब हम सब आत्मीय हैं तो हम एक दूसरे का भला, उन्नति, सुख ही चाह सकते हैं, बुरा और बिगाड़ नही । तो सारे मानव-समाज का उदय चाहना---सर्वोदय-गाँधीजी का सामाजिक आदर्श हुआ। इसका यह अर्थ हुआ कि समाज-रचना और समाज व्यवस्था इस तरह की हो कि जिसमे प्रत्येक मनुष्य -स्त्री, पुरुष, बालक, बालिका, युवा, वृद्ध, सबके समानरूप से उत्कर्ष की पूरी सुविधा हो । उसमें न ऊँच-नीच का, न छोटे बड़े का. न जात-पात का, न अमीर-गरीब का, कोई भेद या लिहाज रहे । समान सुविधा और समान अवसर खुले रहने के बाद अपनी योग्यता, गुण, सेवा आदि के द्वारा कोई व्यक्ति यदि अपने आप आदरास्पद हो जाता है और लोग से उसे बड़ा मानने लगें तो यह दूसरी बात है; परन्तु समाज- व्यवस्था में ऐसी कोई बात न रहेगी जिसके कारण किसी के सर्वागीण विकास में रुकावट रहे। परन्तु यह तो एक गोल-मोल बात हुई । 'सर्वोदय' में मनुष्य के विकास के लिए किन-किन आवश्यक या अनिवार्य वस्तुग्रा, भावी, नियमों या सुविधाओं का समावेश होता है, यह जानना जरूरी है। मैं समझता हूं 'सर्वोदय' में इतनी बाते अावश्यक रूप से आता है- (१) स्वास्थ्यकर और पुष्टिवर्धक यथेष्ट भोजन, (२) साफ और खुली हवा, (३) निर्मल और निरोगी पानी, (४) शरीर-रक्षा के लिए आवश्यक कपड़े, (५) खुला, हवादार और आरोग्य-वर्धक घर, (६) शिक्षा, स्वास्थ्य- रक्षा और रोगनिवारण की सुविधा, (७) मनोरंजन और ज्ञानवृद्धि के (८) और इस तरह के समाज व्यवस्था के नियम, जिनसे कोई किसी को न दबा सके, न कोई किसी से अनुचित रूप से दब सके, न कोई बेकार रह सके, न कोई बिना मेहनत के धनसंग्रह कर सके। अर्थात स्वस्थ, तेजस्वी, स्वावलम्बी, परस्पर सहयोगी, आत्म-रक्षा-क्षम, सुसंस्कारी, श्रमशील, निर्भय और प्रसन्न मानव-समाज का निर्माण, 'सर्वोदय' का हेतु है। यदि ऐसा मनुष्य-समाज कभी बन सका तो स्वभावतः ही उसमें साधन, गांधीवाद : समाजवाद किपी प्रकार की सरकार की-दंडभय से नियंत्रण करने वाली किसी शासन- संस्था की जरूरत न रहेगी; अधिक-से-अधिक एक व्यवस्थापक मण्डल काफी होगा, जो समाज पर हुकूमत नहीं करेगा, बल्कि समाज की आवश्य- कताओं की पूर्ति करता रहेगा। इसमें यदि समाज-कार्य की सुविधा के लिए कुछ विभाग अलहदा-अलहदा रखना पड़े तो वे आजकल के अर्थ में जातियाँ या श्रेणियाँ (Classes) न रहेगी; बल्कि भिन्न-भिन्न विभागों के काम की जिम्मेदारी लेनेवाले कार्यकर्ताओं का समूह होगा । जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक सुविधायें जहाँ सबको समान रूप से या यथेष्ट रूप से मिलेंगी वहाँ प्रत्येक बालिग स्त्री-पुरुष को उस सुविधा या साधन-सामग्री के पैदा करने या बनाने में आवश्यक सहयोग या श्रमयोग भी देना पड़ेगा। मैं समझता हूं 'सर्वोदय' की कल्पना ठीक-ठीक पाने के लिए यह रूप-रखा अभी काफी होगी। शेष विस्तार की बातों को हमे इसी 'सर्वोदय' के प्रकाश में देखना और समझना होगा। राब हमें समाजवादियों के सामाजिक श्रादर्श को समझना चाहिए। वे उसे 'वर्गहीन समाज' कहते हैं। आज समाज में धनी और गरीब एक श्रमजीवी और दूसरा परोपजीवी; एक पीड़क दुसरा पीड़ित; एक शोषक दूसरा शोषित-ऐसे दो वर्ग परस्पर विपरीत स्वार्थ रखने वाले बन गये हैं, वे न रहें-सिर्फ एक ही काम करनेवालों का समाज बन जाय । समाज- व्यवस्था ऐसी हो जिसमें कोई किसी का शोषण न कर सके और कोई किसी के साथ जुल्म-ज्यादती, मारकाट याने हिंसा न कर सके। ऐसे समाज के लिए स्वभावतः ही किसी शासन-संस्था की जरूरत न रहेगी। अब मानव-समाज की इस आदर्श कल्पना से जहाँ तक ताल्लुक है, मैं समझता हूं दोनों की भाषाओं में भले ही अन्तर हो, बात दोनों एक ही कहते हैं । समाजवादी के सामने चूकि ग़रीबों का पीड़न और शोषण बहुत अधिक है और उसे मिटाने के लिए वह बेज़ार है, इसलिए उसने तदनुकूल भाश बना ली है। वह यह समझता है कि समाज में आर्थिक- गांधीवाद : समाजवाद , व्यवस्था स्वाभाविक और न्यायानुकूल न होने से गरीब पिसे जा रहे है। और अमीर गुलछरें उड़ाते हैं, इसलिए वह इस बात पर जोर देता है कि आर्थिक-व्यवस्था ठीक होनी चाहिए और जो आर्थिक विधान वह उप- युक्त समझता है, वह इस प्रकार का है कि जिससे सारं समाज का ढांचा ही बदल देना पड़ेगा-इसलिए वह सामाजिक क्रान्ति की बात करके सामाजिक आदर्श को 'वर्गहीन' समाज नाम देता है। इससे भिन्न गांधी जी सारे जगत के रहस्य का पता पाते हैं और उसको सामने रखकर जगत के और मानव समाज के दुखो का कारण ढूंढते है और उनका स्थायी इलाज सुझाते है; इसलिए उनकी भाषा दूसरे प्रकार की है। उनकी भाषा के पीछे एक पूरा दर्शन है। वहाँ समाजवादी की और खासकर हिन्दु- स्तानी समाजवादी की भाषा के पीछे शोषण को बन्द करने की व्याकुलता है। इसके सिवा सुझे कोई कहने लायक अन्तर इन दोनों शादी में नहीं दिखाई देता। यदि यह कहें तो हर्ज न होगा कि समाजवादी अंग की बात करता है और गांधीवाद पूर्ण की। समाजवाद की मंजिल तय होने पर भी गाँधीवाद का बहुत काम बाकी बच रहता है । निश्चय ही समाजवादियों का यह दावा नही है कि उनके आदर्श का पूरा चित्र वे बना पाये हैं। परन्तु जितना वे बना पाये हैं उसी को सामने रख कर हमें विचार किये बिना गति नहीं है। यह तो हुई दोनों के आदर्शों की बात । परन्तु श्रादर्शों के ज्ञान से ही काम नहीं चल सकता । उतना ही नहत्त्वपूर्ण और उससे अधिक जटिल प्रश्न यह है कि उस आदर्श को प्राप्त कैसे किया जाय ? यहां जाकर दोनों में मतभेद दिखाई देता है। समाजवादी की निगाह तो शोषण बन्द करने पर है; और गाँधीवाद की नजर सबकी आत्मीयता की रक्षा-सामञ्जस्य- पर है। इसलिए गाँधीवाद को यह भी सोचना और देखना पड़ता है कि शोषण तो जरूर मिटे; परन्तु कहीं वह इस तरह से तो नहीं मिट रहा है कि सर्वोदय - आत्मीयता के मूल को धक्का पहुंच जाय । हाथ यदि सड़ गांधीवाद : समाजवाद गया है, तो शौक से काट डालिए, किन्तु यह तो देख लीजिए कि कहीं बीमार का प्राण न निकल जाय या उसके किसी दूसरे अंग को इतना धक्का न लग जाय जिससे सारा शरीर धीरे-धीरे बिगड़ जाय । दुनिया के समाजवादी तो कहते ही हैं कि खूनखराबी करके भी क्रान्ति कर दो और सत्ता हाथ में लेकर इस शोषण का जल्दी से जल्दी अन्त कर दो; परन्तु गांधीवाद कहता है-नहीं, ऐसा करोगे, तो आज शोषण का अन्त होता हुआ भले ही दिखाई दे, इस खून खराबी से जो प्रतिहिंसा की भावनायें प्रबल होंगी वे शक्तियां मौका पाते ही तुम्हारी व्यवस्था में दखल देकर तुम्हारे बनाये ढाँचे को बिगाड़ देंगी। इसके अलावा वह सर्वोदय के आदर्श और आत्मीयता की वृत्ति के विपरीत है,। एक आत्मीय दूसरे को सुधारेगा, उसका नाश नही चाहेगा । अब चूकि समाजवादी के सामने सर्वोदय या आत्मीयता नहीं है, स्वभावतः उसको समझ में सहसा नहीं आता कि गांधीजी क्या कहते हैं और क्या चाहते हैं ? यद्यपि समाजवादी अपने आदर्श-समाज में हिंसा को बिलकुल स्थान नहीं देता है, तथापि प्रारम्भ में और सन्धिकाल में वह हिंसा को आवश्यक मानता है। किन्तु गाँधीवाद में शुरू से आखिर तक हिंसा त्याज्य है । हाँ हिन्दुस्तानी समाज- चादी जरूर क्रान्तिकाल और सन्धि काल दोनों में हिंसा का प्राश्रय लेना नहीं चाहता है; किन्तु वह तो इसलिए कि हिन्दुस्तान में हिंसा की गुंजा- इश आगे भी बहुत काल तक उन्हें नहीं दिखाई देती है। इसमें कोई शक नही कि ११ फीसदी कांग्रेसियों ने भी अहिंसा को मजबूरी से ही अपनाया है; किन्तु अब कांग्रेसी और कांग्रेसी समाजवादी दोनो मे ऐसे विचारशील लोग बढ़ते जा रहे हैं जिनकी बुद्धि और संस्कृति दोनों ने हिंसा की अपेक्षा; एक कारगर बल के रूप मे, अहिंसा की श्रेष्ठता को मान लिया है । यही, नहीं भारत की इस बेबसी और गुलामी ने भारत को अहिंसा देकर उसका ही नहीं, सारे जगत का उपकार किया है और दूसरे देशो के लोगों को भी 'अहिंसा के रूप में एक नया और हिंसा से अच्छा बल मिला है, जिसका प्रमाण है कई देशो मे रक्तपात-हीन क्रान्तियों का हो .

गांधीवाद : समाजवाद . जाना । प्रायः सभी देशों के विचारवान लोगों की बुद्धि ने 'अहिंसा की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लिया है, राजनीतिज्ञों को भी 'अहिंसा' ने आक- र्षित किया है किन्तु कोई उदाहरण सामने न होने से उन्हें इसके अाज ही व्यवहारोपयोगी होने में सन्देह है। सो सबसे बड़ा मतभेद जो साधन के सम्बन्ध में गांधीवाद और समाजवाद में है, वह तो है क्रान्तिकाल और सन्धिकाल में हिंसा के स्थान के सम्बन्ध में । परन्तु हिन्दुस्तानी समाजवादी के बारे में यह बात नही कही जा सकती। इसलिए यो आज यह भेद भी व्यावहारिक राजनीति का प्रश्न नहीं रह गया है। चाहे किसी ने धर्म के रूप में, अहिंसा को अप- नाया हो, चाहे किसी ने व्यवहार-नीति के रूप में । अब भारत मे हिंसा अहिंसा का प्रश्न तभी उग्र और विकट रूप धारण कर सकता है जब किसी न किसी तरह सफलतापूर्वक हिंसा प्रयोग की सम्भावना अधिकांश राजनैतिक पुरुषों को दिखाई दे जाय । तब तक यह हमारे स्वभाव. वृत्ति या स्पिरिट के अनुसार हमारे कार्यों, दिलों और पारस्परिक सम्बन्ध पर थोड़ा-बहुत असर भले ही डालता रहे इससे आपस में किसी भारी सवर्ष. फूट या झगड़े की सम्भावना नहीं है ।। हाँ, आगे चलकर, और खासकर स्वराज्य सत्ता हाथ में आ जाने पर, इस मतभेद का महत्व बढ़ सकता है । परन्तु यह भी इस बात पर अव- लम्बित रहेगा कि हमें स्वराज्य किस साधन से मिला हे । यदि हिंसात्मक साधनों से प्राप्त हुआ है तो फिर अहिंसा तो राजनीति में उसके पहले ही मर चुकी होगी, इसलिए, उसके बाद तुरन्त ही उसके जी उठने की कल्पना करना फिजूल है; परन्तु यदि अहिंसात्मक साधनों से हुई है और सुझे विश्वास है कि अहिंसात्मक-क्रान्ति से हो हमें स्वराज्य मिल जायगा तो फिर अहिंसावृत्ति की ही प्रधानता हमारे स्वराज्य के विधान मे रहेगी, यह निर्विवाद है। इसलिए उसमें प्रत्यक्ष और शारीरिक हिंसा का तो सवाल ही न उठेगा; हाँ, कानून द्वारा भी किसी वर्ग-विशेष को दवाया जाय या नहीं, यह प्रश्न अलबमा विवादग्रस्त हो सकता है । समाजवादी तो गांधीवाद : समाजवाद कहते ही हैं कि व्यक्तिगत सम्पत्ति रखने का अधिकार किसी को न रहना चाहिए। इधर गांधीजी भी अपरिग्रह के पुजारी हैं। वे व्यक्तिगत सम्पत्ति तो ठीक अनावश्यक वस्तुओ के संग्रह को भी चोरी मानते हैं । तो दोनों इस बात पर सहमत है कि व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहे; परन्तु यदि लोग हमारे कहने से और उपदेश से न छोड़ें तो ? समाजवादी कहंगा कानून बना दो, जिससे ऐसा अधिकार किसी को न रहे । अब यदि बहुमत समाजवादियो का हुआ तो जब तक लोकतनीशासनप्रथा रहेगी तबतक उन्हें ऐसा कानून या विधान बनाने से कैसे रोका जा सकता ह १ परन्तु प्रश्न तो यह है कि गांधीवाद ऐसे अवसर पर क्या सलाह देगा ? बहुमत का अल्पमत पर यह दबाव हिंसा है या नहीं, और यदि है तो क्या किया जाय ? खेती आदि में जैसा अपरिहार्य हिंसा होती है, वैसे ही इसे मानले या दूसरा अहिंसक उपाय बताया जा सकता है । मैं समझता समय श्राने पर गांधीवाद कोई अहिंसक उपाय अवश्य हूँढ लेगा। यह भी सम्भव है कि उस समय सारे वातावरण के अहिंसा प्रधान हो जाने का यह असर हो कि सम्पत्तिवानों का हृदय इतना ऊँचा उठ जाय और वे ऐसे किसी विधान का विरोध न करें । सम्भव है, गांधीजी की ट्रस्टी बनने की सलाह उन्हें और तत्कालीन समाज को पसन्द आ जाय । किन्तु उस समय क्या होगा और कौन क्या करेगा, इसका निर्णय आज करना कठिन . --- हिंसा-अहिंसा प्रश्न का निबटारा इस तरह होजाने के बाद अब दूसरा मतभेद का सवाल है मशीनरी का । समाजवादी उद्योगवाद में विश्वास रखता है; और गाँधीवाद गृह-उद्योग को मानता है । एक कहता है बड़े-बड़े कल-कारखानों के बिना समाज का काम न चलेगा। कल या कारखाने में कोई दोष नहीं है, जो कुछ खराबी है वह तो यह कि उत्पादन के साधनों पर व्यक्तियों का स्वामित्व है। उसके एवज में यदि राज्य या समाज के हाथ में उसका स्वामित्व दे दिया जाय तो बड़े कल-कारखानों के रहते हुए भी कोई किसी का शोषण न कर सकेगा । किन्तु गांधीवादी गांधीवाद : समाजवाद KMAamananeand- इसके विपरीत कहता है कि व्यक्तिगत स्वामित्व ही अफेला दोषी नहीं है: मशीनरी खुद भी, कारखाना खुद भी, एक हद तक दोषी है और जिस हद तक वे दोषी हैं उस हद तक उनमें या उनकी प्रणाली में भी सुधार करना होगा। यह मतभेद इस बात से पैदा होता है कि श्रादर्श समाज में हम मनुष्य को कैसा देखना चाहते हैं। पश्चिम के लोगों की तरह भोग- प्रधान या पूर्व की संस्कृति के अनुसार संयम प्रधान । असल में यह प्रश्न संस्कृति से सम्बन्ध रखता है और संस्कृतियां बरसों में बनती और बरसा में बिगड़ती हैं । पूर्वी संस्कृति में संयम जबरदस्ती नही आ घुसता है। हजारों वर्षों के भोगमय जीवन के बाद अनुभव से उसकी जड़ जमी है और उसे हमें खोदने का उद्योग तबतक न करना चाहिए जबतक हमने संयम को बिल्कुल निकम्मा और भोग को सब तरह अच्छा न पा लिया हो। हाँ, इसमें गांधीवाद निसन्देह संयमवादी है और समाजवाद का झुकाव भोगवाद की तरफ दीखता है। परन्तु हिन्दुस्तानी समाजवाद पश्रिम की तरह ही भोगवाद की तरफ बढ़ेगा, इसमें मुझे सन्देह है। क्योंकि आखिर वह भी तो उसी पूर्वी संस्कृति की उपज है। और यह भोग और संयम का प्रश्न एक समाजवादी के नजदीक उतने महत्व का या तीव्र नहीं है जितना कि शोषण और पीड़न का है। और संयम या भोग का प्रश्न भी तभी तीव्रता से सामने आवेगा जब शोषण को मिटाने का सामर्थ्य हमार हाथ में पाजावेगा । हिन्दुस्तानी समाजवादी शायद भोग को उतना न चाहेगा जितना वह जनता के जीवन-स्टैण्डर्ड को ऊँचा उठाना चाहेगा। परन्तु इसमें तो गाँधीवाद का उससे मतभेद नही है। गांधीवाद भी यह तो मानता है कि जनता का वर्तमान स्टैण्डई वह नहीं है जो एक आदर्श मनुष्य का होना चाहिए। परन्तु उसका कहना है कि जबतक स्टैण्डर्ड बढ़ाने की सत्ता और अनुकूलता हमारे हाथ में न हो तबतक जनता में उच्च स्टैण्डर्ड की भूख पैदा करना कार्य-साधक न होगा। बल्कि कार्य- कर्ताओं को अपना स्टैण्डर्ड घटाकर उनमें घुल-मिल जाना चाहिए औ हमे उन्हें अपने से पृथक् और बड़ा न अनुभव होने देना चाहिए । सच्ची गांधीवाद : समाजवाद ३३ फैसला समानता का भाव तो यह है और यदि हम उनके दुःखो से पीड़ित हैं तो हमारी व्यवहारिक सहानुभूति यही हो सकती है कि हम अपना रहन-सहन भरसक उनसे मिलता-जुलता रखें। इसके विपरीत समाजवादी की दलील है कि मेरे अकेले के सब कुछ छोड देने से सारा समाज कैसे बदल जायगा ? जब सारा समाज एक-सा हो जायगा तब मैं भी अपनी सम्पत्ति छोड़ दूंगा । गाँधीवाद कहता है पहले उनमें मिलो फिर उनके साथ सब मिलकर, ऊँचे उठो। यह एक सीधी और मोटी-सी बात है कि यदि मै किसी बात को ठीक मानता हूँ तो मेरे जीवन और आचरण से भी वह बोलनी चाहिए-नही तो मेरी बात की सच्चाई किसी को कैसे जंचेगी? इस तरह मशीन का प्रश्न असल मे भोगवाद की प्रवृत्ति या जीवन स्टैण्डर्ड से सम्बन्ध रखता है। और इसका मनुष्य अपने-अपने सस्कारों के अनुसार ही करेंगे। संयमवादी होते हुए भी भारत में क्या भोगी लोग नहीं है ? जो उद्योगवाद चाहते हैं उनका कहना यह है कि इससे मनुष्य की सुख-सुविधा की वृद्धि होगी । गाँधीवाद कहता है कि बेकारी, परावलम्बिता, शोपण, कई बीमारियाँ, नैतिक -पतन, इनका यह जन्मदाता या पोपक है । हाथ से काम करनेवाला मनुष्य स्वस्थ, स्वावलम्बी, निर्भय और स्वतंत्र रहता है। अधिक बौद्धिक या शारीरिक सुख-विलास से मनुय्य बोदा बन जाता है और आदर्श मनुष्य-समाज का मनुष्य सत्ववान सबसे पहले होना चाहिए। गाँधीवाद यह नहीं कहता कि मशीन-मात्र बुरी है; वह सिर्फ इतना ही कहता है कि भाफ से चलने वाले बड़े-बड़े यन्त्र, जिनसे कई लोगों का काम एक आदमी करके कइयों को बेकार बना- ता है, और जिनके कारण मजदूर एक जगह एकत्र होकर कई बुराइयो और व्यसनों में फंसकर अपना जीवननाश करते हैं, समाज के लिए हानिकर है। मनुष्य को बेकार बनाकर और मानव-शक्ति को बेकार पड़ी रहने देकर यन्त्रों से काम लेना आर्थिक दृष्टि से भी उलटी रीति है। इसलिए असल में होना यह चाहिए कि पहले समाज के सारे मनुष्यो से काम लो फिर जो काम या चीजें ऐसी बच रहें जो समाज की आवश्यकता , गांधीवाद : समाजवाद के लिए बहुत जरूरी हों; पर जिन्हें वे न बना सके या उनकी शक्ति के बाहर हो, वे शौक से यन्त्रो से बनाई जावें और उनके कारखाने खोले जावें। किन्तु यह मौलिक-सा मतभेद रहते हुए भी हिन्दुस्तानी समाजवादी मानता है कि ग्राम-उद्योगी का भारत की आर्थिक व्यवस्था में काफी स्थान है; इधर व्यावहारिक गाँधीवादी भी यह समझता है कि आज बड़े-बड़े कल-कारखाने और उनकी प्रथा मिट जानेवाली नहीं है; इसलिए दोनों में इस कारण से तोत्र सर्प होने की संभावना मुझे नहीं दिखाई देती है। कम-से-कम जबतक स्वराज्य नहीं जाता है तबतक यह मतभेद भी समझौता करता रहेगा। यह तो गाँधीवाद और समाजवाद दोनों मानते हैं कि आदर्श-समाज में व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहे। परन्तु इसके व्यावहारिकरूप मे दोनो का मतभेद है। समाजवाद चाहता है कि कानून बनाकर इसे बिलकुल नाजा- यज करार दे दिया जाय । गांधीवाद कहता है कि व्यक्ति सम्पत्ति का संग्रह भले कर, पर वह उसका स्वामी न बने, ट्रस्टी बनकर रहे । अर्थात् वह अपने उपभोग की सामग्री उसे न समझे, समाज के उपभोग में लाने का चीज समझे । गांधीजी प्रायः भीतर से सुधार करने कराने के पक्ष में रहते हैं ऊपर से-कानून द्वारा ·-दबाकर कराना उन्हें स्थायी उपाय नहीं मालूम होता । भीतर ले सुधार कराने के मानी होते हैं खुद मनुष्य के ही मन मे अच्छा बनने की तीव्रता पैदा कर देना । अपने आचरण, उपदेश और संगी-साथियों के जीवन से ऐसा वातावरण बना देना कि जिससे मनुष्य अपने-आप अच्छा बनने लगे। शुद्ध, स्वाभाविक और अहिंसामय तरीका यही हो सकता है। बल्कि इसके विपरीत कानून बनाने से मनुष्य स्वेच्छा से उसका लाभ और उपयोग समझकर उसे नहीं ग्रहण करता, मजबूरी से दबकर ग्रहण करता है और उसके दिल में कसक रह जाती है जो उसे अन्तःकरण से वफादार नहीं रहने देती। अतः यदि प्रारम्भ में हमें कानून का आश्रय लेना ही पड़े तो ज्यों-ज्यों हम सन्धिकाल को पार करते जायँ त्यो त्यो हमें भीतरी सुधार पर अधिक और बाहरी दबाब पर गांधीवाद : समाजवाद ३५ कम जोर देते रहना होगा। इसका मजाक-सा उड़ाते हुए बाज-बाज लोग पूछ बैठते है, गांधीजी के इस सिद्धान्त के अनुसार उनके कितने साथियो ने अपनी सम्पत्ति खुद छोड़ दी है और अपने को उसका ट्रस्टी बना लिया है ? यह सवाल पूछ- कर वे ट्रस्टीपन के विचार की असम्भवता बताना चाहते है । इसका उत्तर तो यही है कि किसी चीज को सम्भव बताना या उसका मखौल उड़ाना कोई दलील नहीं हुआ करती । उपयोगिता या अनुपयोगिता हानि या लाभ बताना चाहिए । कितनो ने इसको अपनाया, इसके जवाब भिन्न भिन्न होंगे। १६१८ मे गाँधीजी से कोई पूछता कि खादी पहननेवाले और कातनेवाले तुम्हारे कितने साथी हैं तो इसका जवाब जरूर ही आज से भिन्न मिलता । गाँधीजी के तो बहुतेरे साथी अपरिग्रही हैं, जिन्हें ने अपने धन-दौलत और जायदाद को लात मार दी है और ऐसे धनी अनुयायी भी है जो ट्रस्टी की भावना से ही अपनी सम्पत्ति का उपयोग समाज और देश की सेवा में कर रहे हैं। परन्तु ऐसा कोई एक भी साथी न हो तो इससे क्या मूल सिद्धान्त की उपयोगिता को आँच पा सकती है ? फिर दबाव से काम लेने का पक्षपाती अक्सर नही देखा जाता है जो खुद दबाव में आकर ही अधिक काम करना हो, या जिसमें अधिक धीरज, सहनशक्ति मिठास और क्षमाशीलता न हो; या जिसे हुकूमत से ही काम कराने की आदत हो। किन्तु ऐसे व्यक्ति या समुदाय को यह मानने की भूल न करनी चाहिए कि उसकी यह वृत्ति अहिंसा के अनुकूल है। यदि हमें श्रादर्श समाज मे से हिंसा को सचमुच हटा देना है, नहीं, मैं तो यह भी कहूंगा कि हमें सचमुच किलो ऐसे आदर्श समाज की कल्पना से प्रेम है जिसमें शासन-संस्था जसी चीज न रहे, जिसमे सचमुच जनता सुखी, स्वाधीन और उन्नतिशील रहे तो हमे बाहरी इबाव की अपेक्षा भीतरी सुधार की तरफ ही ज्यादा ध्यान दिये बिना गति नहीं है। परन्तु सवाल यह किया जाता है कि ट्रस्टी बनने के मानी आखिर क्या हैं ? सम्पत्ति पर या उत्पादन के साधन पर व्यक्तिगत स्वामित्व का ३६ गांधीवाद : समाजवाद अधिकार तो कायम रहा ही। और ऐसा अधिकार कायम रखने की भी आखिर क्या जरूरत है ' कानूनन यह अधिकार छीनना यदि दवाव है और दबाव हिंसा है, इसलिए त्याज्य है, और दूसरी तरफ आपके समझाने बुझाने, उपदेश और उदाहरण से भी लोग न मानें तो उन्हें मनवाने का क्या उपाय आपके पास है ? अधिकार उन्हें दिया भी जाय तो कितना" मैंने जहाँ तक समझा है, ट्रस्टी बनने की सूचना 'वर्गहीन समाज' का आवश्यक फलितार्थ है । वर्गहीन समाज में सरकार तो रहेगी ही नही; परन्तु जमीन, छोटे बड़े कारखाने, मकान, कला-भवन आदि तो रहंगे ही। आखिर किसी न-किसी के चार्ज मे इनके रहे बिना गति नहीं है। तो जिनके चार्ज में ये रहेगे उनका इनसे क्या सम्बन्ध रहेगा ? किसी के दबाव से तो कोई उनका चार्ज लेगा नहीं, क्योंकि दबाव रखने वाली सरकार तो रहेगी नहीं । अपनी खुशी से ही लोग उनको अपने चार्ज में रक्खेंगे। वे क्यों रक्खेगे-या तो मुनाफा उठाने के लिए या समाज की सेवा के लिए । उनकी सम्भाल रखने में जितना खर्च होगा और सम्भाल रखनेवाले के निर्वाह के लिए जितना आवश्यक होगा उतना धन तो उसे मिलना जरूरी है। अब सरकार के अभाव में उन्हें वेतन देनेवाला तो कोई रहेगा नहीं, तब सुनाफे के ही रूप मे वह खर्च वह लेगा । हॉ, शोषण उसमें न रहेगा। इस मुनाफे पर तो ऐतराज किया ही कैसे जा सकता है ? आवश्यकता से अधिक मुनाफा न लेना, यह उसकी समाज-सेवा की वृत्ति हुई । अब या तो वह इन चीजो का मालिक बन कर रह सकता है या समाज की तरफ से उनका ट्रस्टी बनकर । मालिक बनाना आप चाहते नहीं, तो फिर ट्रस्टी बने बिना दूसरा क्या रास्ता है ? ट्रस्टी के माने मालिक नहीं, समाज की तरफ से उस वस्तु का चौकीदार । मालिक तो सारा समाज है या वह व्यक्ति मालिक बनने का अधिकारी समझा जा सकता है जिसके परिश्रम ने उस वस्तु को खड़ा किया है। यदि मालिकाना हक रहा भी तो वह नाम-मात्र का रहेगा, स्पिरिट तो ट्रस्टी की ही रह सकती है । यह न भूलिए कि 'वर्गहीन-समाज' उसी दशा में सम्भव हो गांधीवाद : समाजवाद सकता है जब मनुष्य आज से बहुत ऊँचा उठ गया होगा, करीब-करीब वह देव बन गया होगा । यदि आप वर्गहीन समाज को सम्भव मानते हैं तो फिर उस समाज के मनुष्य की ईमानदारी पर आपको इतना विश्वास भी रखना होगा, इतने ईमानदार मनुष्य की ही कल्पना करनी होगी जो या तो मालिक रहते हुए भी ट्रस्टी की स्पिरिट रक्खेगा या मालिक होना न चाहकर ट्रस्टी और समाज का एक सेवक ही रहेगा। जबतक श्राप किसी सरकार की आवश्यकता अनुभव करते हैं तबतक न तो 'वर्गहीन' समाज की स्थिति की ही कल्पना कीजिए, न शोषण बन्द होने की । आप यह क्यों मान लेते हैं कि सन्धिकाल में जबतक सरकार रहेगी तबतक उसके सूत्र संचालक या शासक तो देवता लोग होगे और दूसरे दानव या बईमान ? आप इस बात को क्यों आसानी से भुला देते हैं कि ज्यो-ज्यो राज्य सत्ता केन्द्रित होती गई है त्यो-त्यों शोषण अधिक होता चला गया है ? जिसे हमारे साम्यवादी भाई ‘प्रिमिटिव कम्यूनिज्म' कहते हैं उस समय शोषण था ? वह कब आया और कैसे कैसे बढ़ता गया ? तो आप इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि उसका कारण सशा का केन्द्रीकरण अर्थात् साम्राज्य- वाद है । आपने यह कैसे मान लिया कि किसानो और मजदूरों के प्रति- निधि जालिम या शोषक न बन जायेंगे ? जिन्हें हम राजा, धनी, जमींदार और शोपक या पीड़क वर्ग कहते हैं, ये कहाँ से आये हैं,--इन्हीं किसानो और मजदूरों में से ही तो धीरे-धीरे ये वर्ग निर्माण हुए हैं और जब इनके हाथ में सारी सत्ता आ गई तो यही शोषक और पीड़क बन गये। इसका असली उपाय यह नहीं है कि व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहे या उत्पादन के साधनों पर व्यक्तियो का स्वामित्व न रहे, बल्कि यह है कि समाज में शासन और धनोपार्जन की सत्ता केन्द्रीय शक्ति के हाथ में न रहे और यदि रही तो उसके सदुपयोग और दुरुपयोग का अाधार बहुत-कुछ उस व्यक्ति की सजनता या दुर्जनता पर अवलम्बित रहेगा जिसके पास वह सत्ता रहेगी। यदि जनता को शोषण से बचाना है, उसे स्वतंत्र दबंग बनाना है तो केन्द्रीय-सत्ता को मिटाकर जनता में ही उसे फैलाना होगा।

३८ गांधीवाद : समाजवाद 8 , यदि लोगों ने हमारी बात न मानी तो हम क्या करेंगे? यह प्रश्न सन्धि-काल में ही उठ सकता है । आदर्श-समाज अर्थात् वर्गहीन समाज तो प्रकृति के साथ सामंजस्य रखने वाला ही होगा । सरकार न रहने से किसी की बात मानने मनवाने का सवाल ही नहीं उठता। उसमे तो यही कल्पना की जा सकती है कि सब लोग अपना-अपना फर्ज और जिम्मेवारी अच्छी तरह समझते होंगे और अपने आप ईमानदारी से उनका पालन करते होगे । परन्तु सन्धि-काल में कानून, फौज, जेलखाने सब रखने होंगे। हां, समाज जसे-जैसे आदर्श की ओर बढ़ता जायगा तसे तैसे इनका दबाव कम होता जायगा और मनुष्य एक व्यक्ति तथा सामाजिक प्राणी के रूप में अधिकाधिक आदर्श बने, इसमें उसका उपयोग होता जायगा । यदि आपने यह कल्पना की हो कि सन्धि-काल मे निःशस्त्र फौज रहेगी और कानून द्वारा भी किसीको दबाना नहीं है तो आपका 'सत्याग्रह' शस्त्र कहाँ चला गया है ? या तो आप इस सत्याग्रह के द्वारा--जिसमें जेल जाने से लेकर आमरण अनशन तक की तीव्रता भरी हुई है---स्वराज्य को शक्य मानिए या हिंसा बल के द्वारा । यदि सत्याग्रह के द्वारा शक्य मानते है और उसके द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को पराजित कर देते हैं तो क्या फिर हिन्दुस्तान में और शोषकों का सामना श्राप उपके द्वारा न कर सकेंगे ? यदि आप हिंसाबल के द्वारा शक्य मानते हैं तो फिर मौजूदा सरकार की तरह अपनी इच्छा को मनवाने के सब दमनकारी साधन आपके पास हैं ही। कितना अधिकार दिया जाय--यह कोई सौदे की बात तो है नही। ट्रस्टी बनने की कल्पना में व्यक्तिगत स्वामित्व का रहना अनिवार्य नहीं है। रहा भी तो नाम-मात्र का, जिससे ट्रस्टी कभी-कभी अपने मन में खुश हो लिया करे कि मैं मालिक भी हूं। यदि कारखाने छोटे मोटे रहे, उत्पादन के साधन बहुतेरे हाथों में बंटे रहे तो उसमें स्वामित्व का अधि- कार रहने देने में उतनी बुराई नहीं है जितनी इस अधिकार के एक या गांधीवाद : समाजवाद ३ थोड़े व्यक्तियों के हाथ में देने से हो सकती है। थोड़े लोगों के हाथ में रहने से संगठित शोषण जल्दी और अधिक हो सकता है। अधिकतर लोगो के हाथो में रहने से शोषक को इतने सारे लोगों को अपनी योजना का भागी बनाये बिना चारा नहीं है और यह ज्यादा कठिन है । फिर यदि ऐसे व्यक्ति के पास सत्ता न रहे तो उसके लिए कठिनाई और भी ज्यादा हो जाती है। आज भी पूँजीवाद साम्राज्यवाद थानी सत्ता की सहायता के अभाव मे अपना शोषण जारी नहीं रख सकता। इसलिए एक तरह से तो, उन लोगों ने जिन्होंने वर्ण व्यवस्था चलाई थी, बड़ी बुद्धिमराा की थी कि जिसको सराा दी, उसे धनोपार्जन का अधिकार नहीं दिया, जिसे धनोपार्जन की छुट्टी दी उसके पास ससा नही दी। फिर कितना स्वामित्व का अधिकार देना, किस विधि से देना, मुश्रा- वजा देना या नहीं, ये सब विगत की बातें हैं और जब उचित अवसर आवेगा तब इनका निपटारा कर लिया जायगा। व्यावहारिक कार्यक्रम हमेशा परिस्थिति पर श्राधार रखता है और उसके अनुसार बदलता रहता है। आदर्श, सिद्धान्त और नीति हम आगे तय कर सकते हैं और कर लेना चाहिए । सो यदि हम इस बात में सहमत है-गाँधीवाद और समाजवाद दोनो कि हमे गरीबो के शोषण का अन्त कर देना है और परोपजाची वर्ग को भी इस अधोगति से उठाकर स्वाभिमान और स्वावलम्बी बना देना है तो हमे दोनों की ईमानदारी पर इतना विश्वास भी रखना चाहिए कि जब समय श्रावेगा तो हम इसका राजमार्ग ढूंढ लेंगे। यदि ट्रस्टीपन का हल हानिकर दीखेगा तो गाँधीजी या उनके अनु- यायियों के लिए वह सत्य और अहिंसा की तरह अटल सिद्धान्त नहीं है- इससे ज्यादा अच्छा निर्दोष उपाय कोई बतावेगा तो अवश्य उस पर अमल कर लिया जायगा । समाजवाद और गांधीवाद में वर्गयुद्ध' एक बड़ा मतभेद का प्रश्न 1 साम्यवादिया का कहना है पीड़क और पीड़ित, शोषक और शोषित गांधीवाद : समाजवाद दो वर्ग हैं और इनके हित परस्पर विरोधी हैं। इसलिए इन दोनो का ही वर्ग बन जाना चाहिए। अर्थात् सबको काम करनेवाला बनकर ही रोटी कमाना चाहिए, दूसरों के परिश्रम का लाभ उठाना न चाहिए, जिससे ग़रीब और अमीर में इतनी बड़ी खाई न रहे । हिन्दुस्तानी समाजवादी इस स्थिति को 'दबाव के द्वारा भी बदलना चाहता है। किन्तु दबाव का आश्रय तभी लेना चाहता है जब समझाने-बुझाने का रास्ता बन्द हो जाय । सो भी 'दबाव' का अर्थ 'कानून का दबाव' ही हो सकता है; क्योकि जब तक वह कांग्रेस के अहिंसात्मक ध्येय से बंधा हुआ है तबतक प्रत्यक्ष शस्त्र के द्वारा दबाव का सवाल ही नही उठता । कानूनी दबाव का अर्थ भी बहुमत का अल्मत पर दबाव हो सकता है, जो कि लोकतंत्रीय-पद्धति में 'अनिवार्य-दोष' समझा जाता है। फिर 'युद्ध' से अभिप्राय यहां व्यक्ति से नही, पद्धति से है । हम गांधीवादी और कांग्रेसी भी तो हमारे आन्दोलन को अहिंसा मक संग्राम, सत्याग्रह-युद्ध, इस तरह फौजी-भाषा में पुकारते हैं। इसी तरह ‘वर्गयुद्ध को भी क्यों न समझे? जिस तरह गांधीवादी 'वर्गयुद्ध से भड़कते हैं उसी तरह समाजवादी गांधीजी के 'राम-राज्य' शब्द पर बिगड़ उठते हैं । जैसा 'सत्याग्रह' गांधी- जी का जीवनादर्श, 'सर्वोदय' सामाजिक आदर्श है वैसे ही 'राम-राज्य उनका शासनादर्श है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई एक साम्राज्य हो, और इसका कोई चक्रवर्ती राजा हो । राम-राज्य न्याय और प्रजाहित के लिए प्रसिद्ध था। यही वृत्ति शासकों की गांधीजी के राम राज्य में रहेगी। दूसरे शब्दों में यह कहें तो "राम-राज्य" न्याय और प्रेम का राज्य होगा। उसमें एक ओर बेशुमार धन-सम्पत्ति और दूसरी ओर करुणाजनक फाकेकशी नहीं हो सकती; उसमें कोई भूखा नही मर सकता, उसका अाधार पशु-बल न होगा, बल्कि वह लोगों के प्रेम और स्वेच्छापूर्वक दिये गये सहयोग पर अवलम्बित रहेगा। राम-राज्य करोड़ो गांधीवाद : समाजवाद का और करोड़ों के सुख के लिए होगा। उसके विधान मे जो मुख्य अधिकारी होगा वह चाहे राजा कहा जाय या अध्यक्ष अथवा और कुछ, प्रजा का सच्चा सेवक होने के कारण उस पद पर होगा। प्रजा की प्रीति से वहाँ रहेगा और उसके कल्याण के ही लिये सदा प्रयत्न करता रहेगा। वह लोगों के धन पर आमोद-प्रमोद न करेगा और अधिकार बल से लोगों को न सतावेगा; बल्कि राजा या उसके जैसा कहलाते हुए भी एक फकीर की तरह रहेगा। राम-राज्य का अर्थ है कम-से-कम नियन्त्रण । उसमे लोग अपना बहुतेरा व्यवहार अपस में ही मिल-जुलकर अपने आप कर लिया करेंगे। उसमे ऐसी स्थिति प्रायः न होगी कि कानून बनाकर अधिकारियों द्वारा दण्ड-भय से उनका पालन कराया जाय । उसमें सुधार करने के लिए लोग धारा सभा या अधिकारियों की राह देखते न बैठे रहेगे। बल्कि लोगों ने जिन सुधारों को रूढ़ कर दिया होगा उनके अनु- कूल धारा-सभायें खुद ही ऐसे कानूनो में सुधार करने और अधिकारीगण उनका अमल कराने की व्यवस्था करेंगे। राम-राज्य में खेती का धन्धा तरक्की पर होगा और दूसरे तमाम धन्धे उसके सहारे कायम रहेंगे। अन्न और वस्त्र के विषय में लोग स्वाधीन होगे और गाय-बैल की हालत भी बहुत अच्छी होगी, जिससे आदर्श गो-रक्षा की व्यवस्था होगी । रामराज्य में सब धर्म और सब वर्ग समानभाव से मिल-जुलकर रहेंगे और धार्मिक झगड़े, क्षुद्रस्पर्धा अथवा विरोधी स्वार्थ जैसी कोई वस्तु न होगी। राम-राज्य में स्त्रियों का दरजा पुरुषों के ही बराबर होगा । राम राज्य में कोई सम्पत्ति या आलस्य के कारण निरुद्यमी न होगा । मेहनत करते हुए भी कोई भूखौं न मरेगा; किसी को भी उद्यम के अभाव में मजबूरन पालसी न बनना पड़ेगा। राम-राज्य में आन्तरिक कलह न होगा, और न विदेशी के साथ ही लड़ाई होगी। इसमे दूसरे देशों को लूटने की, जीतने की या व्यापार-धन्धों अथवा नीति का नाश करनेवाली राजनीति अस्वीकृत होगी। दूसरे राष्ट्रों के साथ उनका मित्र-भाव होगा। इस कारण गांधीवाद : समाजवाद -- राम-राज्य में सैनिक खर्च कम-से-कम होगा। राम-राज्य में लोग केवल लिख-पढ ही न सकेंगे, बल्कि सच्चे अर्थ में शिक्षा पाये अर्थात् उन्हें ऐसी शिक्षा मिलती रहेगी जो मुक्ति (परम-स्वतन्त्रता) देनेवाली और मुक्ति मे स्थिर रखने वाली हो । राम-राज्य की यह रूपरेखा श्री किशोरलाल मशरूवाला के गॉधी- विचार दोहन' से दी गई है । यद्यपि इसमे शासन और समाज दोनो के आदर्शों का मिश्रित चित्र आ गया है, तथापि, यदि इन दोनों का हम पृथक्-पृथक् विचार करें तो कहना होगा कि राम-राज्य शासन का और सर्वोदय समाज का आदर्श हो सकता है । अर्थात् इसमे सन्धिकाल की उत्तम शासन-व्यवस्था का चित्र खीचा गया है, न कि आदर्श-काल के पूर्ण समाज की स्थिति का दर्शन कराया गया है । इतने स्पष्टीकरण के बाद मैं नहीं समझता कि किसी हिन्दुस्तानी समाजवादी को 'राम-राज्य' से क्यों असन्तोष रहना चाहिए। . , इनके अलावा ईश्वर और धर्म के विषय में भी समाजवाद और गांधीवाद में मतभेद है। समाजवाद ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता । धर्म को वह ढोग और समाज के लिए जहर मानता है । परन्तु हिन्दुस्तानी समाजवादी इस विषय में चुप हैं । हाँ, उनके नेता पं. जवाहरलालजी ने अपने लिए यह जरूर कहा है कि यदि सदाचार का नाम धर्म है तो मैं भी अपने को धार्मिक कह सकता हूँ। गांधीवाद नीतिमूलक धर्म को ही धर्म मानता है। हाँ, श्रास्तिक होने के कारण उसमें ईश्वरोपासना को भी स्थान है और इसलिए उपासना की विविधता उसको ग्राह्य है । परन्तु हिन्दुस्तानी समाजवादी आज इसे आन्दोलन का विषय नहीं बना रहे हैं, इसलिए इसपर यहाँ अधिक लिखने की जरूरत नहीं । हाँ, इतना स्पष्ट कर देना जरूरी है कि धर्म के बाह्याचार को और ऊपरी विधि-विधानों को गांधी- वाद में धर्म का प्रावश्यक अंग नही माना गया है । इसी तरह ईश्वर सत्य का दूसरा नाम माना गया है; सत्य की पूर्ण सिद्धि का ही नाम परमेश्वर का ७ गांधीजी का मार्ग साक्षात्कार कहा गया है । और गांधीवाद के सत्य का अर्थ इस लेख के प्रारम्भ मे दिया ही जा चुका है। इस तरह जहाँतक मैं सोचता हूँ, गांधीवाद और समाजवाद मे ध्येय या आदर्श का उतना अन्तर नहीं है जितना सन्धिकाल की योजना में या साधना में अन्तर है । गांधीवाद मे अहिंसा शुरू से आखिर तक अनिवार्य है, समाजवाद मे हिंसा से भी काम लिया जा सकता है; यही मुख्य अन्तर है। और इसका मूल कारण है पूर्व और पश्चिम की संस्कृति का भेद । समाजवाद जिन स्थितियो और देशो में जन्मा है वहाँ प्रारम्भ से ही वह अहिंसात्मक नही रह सकता था । परन्तु हिन्दुस्तान में उसका प्रारम्भ अहिंसा से ही शुरू हो रहा है । यह बहुत बड़ा फर्क है जो हिन्दुस्तानी समाजवाद को गांधीवाद के साथ-साथ चलने का रास्ता सुगम कर देता है । का मार्ग गाँधीजी [ आचार्य कृपलानी ] मुझे “गांधीवाद" पर लिखने को कहा गया था, किन्तु मैंने “समाजिक और राजनैतिक समस्याओं के बारे में गांधीजी का दृष्टिकोण" अथवा सक्षेप में कहे तो “गांधीजी का मार्ग' शीर्षक पसन्द किया। क्योंकि मैं मानता हूँ कि गांधीवाद जैसी कोई चीज अभी अस्तित्व में नहीं आई है। सभी "वादों" का जन्म उन लोगों की प्रेरणा से नहीं होता, जिनके नाम पर कि वे स्थापित और प्रचलित किये जाते हैं, बल्कि मूल विचारों पर अनुयायियो द्वारा लादो जाने वाली मर्यादाओं के फलस्वरूप वे अस्तित्व में आते हैं। रचनात्मक प्रतिभा के अभाव में अनुयायी प्रणालियां कायम करते और संगठन बनाते हैं। ऐसा करते समय वे मूल सिद्धान्तो को कठोर, स्थिर, एकपक्षी और कहर बना देते हैं। उनकी प्रारम्भिक ताजगी और परिवर्तन-शीलता नष्ट हो जाती है, जोकि यौवन की निशानी है। इसके गांधीवाद : समाजवाद . अलावा, गांधीजी कोई तत्ववेत्ता नहीं है । उन्होने किसी प्रणाली को जन्म नहीं दिया। शुरू से ही वे अमली सुधारक रहे हैं । इसी हैसियत से वे पैदा होनेवाली समस्या को हल करने की कोशिश करते हैं और उनपर लिखते हैं। वे सर्वोपरि कर्म-प्रधान पुरुष है । यह ठीक ही है कि उनको कर्मयोगी कहा जाता है । इसलिये उनके भाषणों, लेखों और कार्यों में सम्भव है हमको कोई तर्कसंगत अथवा तात्विक प्रणाली न दिखाई दे । इस बारे में उनकी अवस्था पुराने जमाने के पैगम्बरों और सुधारकों जैसी है । उनको भी रोजमर्रा की व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ा था। उन्होंने अपने-आपको कठोर प्रणालियों में न फंसाते हुए उन समस्याओं को हल करने का रास्ता खोज निकाला था। सम्भवतः खास-खास मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त स्थिर कर दिये गये थे और विस्तार की बातें तय करने का काम खास परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार हरेक व्यक्ति पर छोड़ दिया गया था। तत्ववाद प्रणाली और कट्टरता को नीचे के लोगो ने जन्म दिया, उनका जीवन विषयक ज्ञान और दृष्टिकोण संकुचित थ।। गाँधीजी ने अपनी सम्मतियों के लिए पूर्णता का दावा कभी नही किया । वे अपनी प्रवृत्तियों को सत्य की खोज अथवा सत्य के प्रयोग कहते हैं । ये प्रयोग किये जा रहे हैं । उनको सत्य मान लेना अथवा उनके लिए सत्य का दावा करना किसी भी आदमी के लिए अहंकार का द्योतक होगा। यह सच है कि गाँधीजी के कुछ अनुयायी जो बुद्धिमान की अपेक्षा उत्साही अधिक हैं, गांधीजी की सम्मतियों के लिए पूर्णता का दावा करते हैं, किन्तु स्वयं गाँधीजी वैसा कोई दावा नहीं करते । वे गलतियों को स्वीकार करते हैं, और उनको सुधारने की कोशिश करते हैं। वे सिर्फ अपने दो आधारभूत सिद्धान्तों- सत्य और अहिंसा--को प्रकार से भूल से परे मानते हैं । शेप बातो के बारे में वे सीखने के लिए उतने ही तैयार रहते है जितने कि उस बात को सिखाने के लिए जिसे वे अपने दृष्टिकोण के अनुसार सत्य समझते हैं । जहाँ तक दोनों आधार भूत सिद्धान्तों को व्यवहार में लाने का ताल्लुक है, इस बारे में भी कट्टरता का " .

गांधीजी का मार्ग परिचय नही दिया जाता । वे खुलेतौर पर स्वीकार करते हैं कि अलग- अलग परिस्थितियों और अवस्थाओं में उनका अलग-अलग तरह प्रयोग किया जा सकता है । उनके इस प्रकार के रवैये की वजह से ही बहुधा उनके अनुयायी और दूसरे लोग गड़बड़ी में पड़ जाते है और यह कह सकना प्रायः मुश्किल हो जाता है कि वे किन्ही खास परिस्थितियों में क्या करेंगे । चूंकि उनका व्यक्तित्व उन्नतिशील और विकासमान है, इसलिए उनके चारो ओर कार्यों का आकार-प्रकार अन्तिम तौर पर निश्चित नहीं हो सकता । जिन्होने उनको नजदीक से देखा है, उन्होंने इस बात का अनुभव किया है । कार्यों और विचारो के बारे मे उनके बदलते हुए रुख से यह बात बहुधा स्पष्ट हो जाती है । भीतरी धारा और मार्गदर्शक भावना तो वही होती है, किन्तु उसका बाहरी रूप भिन्न होता है। यही कारण है कि उनमें युवकों जैसी ताजगी है और वे समय से आगे चल सकते है । जहाँ उनके कई युवा अनुयायी जड़ बन जाते हैं और अपनी जीवन-शक्ति खो बैठते हैं, वहाँ गाँधीजी हमेशा शक्तिशाली, क्रियाशील और उत्साह से भरे रहते हैं । जहाँ दूसरे लोग नई पीढ़ी की युवकोचित स्वच्छता के प्रति अधीर हो जाते हैं, वहाँ वे हमेशा समझाने की कोशिश करते हैं, धीरज से काम लेते हैं और नये प्रस्तावों पर खुले और अपेक्षाकृत निष्पक्ष दिमाग से विचार करते हैं । इसीलिए गाँधीवाद जैसी कोई चीज अभी पैदा नहीं हुई, सिर्फ गाँधीजी का बताया हुआ मार्ग और दृष्टिकोण है; जो न सख्त है, नियमित और न अन्तिम । वह व्योरेवार बातें अन्तिम रूप से अथवा हर समय के लिए तय करने की कोशिश नहीं करता, सिर्फ एक दिशा सूचित करता है। हमारे देश की विशेष प्रकार की परिस्थितियों के कारण गाँधीजी सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्र में आये । अपने कुछ अधिक भाग्यशाली देशवासियों की तरह वे इंग्लैण्ड गये, वकालत की परीक्षा पास की और रुपया कमाने तथा अपना और परिवार का जीवन सुख-सुविधापूर्वक बिताने के लिए धन्धा करने लगे । उनका विवाह हो चुका था। वे अपने धन्धे के , , गांधीवाद : समाजवाद सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गये । परिस्थितियो ने उनका अपना भाग्य वहाँ रहनेवाले अपने देशवासियों के भाग्य के साथ जोड देने और उनकी लड़ाइयों लडने के लिए मजबूर किया। उनमें से अधिकांश दरिद्र और अशिक्षित थे। कुछ लोग मालदार भी थे, किन्तु उनका उद्देश्य धन कमाना था। उनमे सार्वजनिक भावना और राजनैतिक प्रेरणा का अभाव था। एक विदेशी मुल्क में, जहां जातिगत पक्षपात और आर्थिक द्वेप का बोलबाला था, सभी को मार्ग-प्रदर्शन और नेतृत्व की जरूरत थी । उनको कई तरह की सामाजिक और राजनैतिक बाधायें सहन करनी पड़ती थी और वे अनेक अपमानकारी प्रतिबन्धो के शिकार थे। गांधीजी को उस मुल्क में बस जानेवाले अपने देशवासियो के छिनते हुए अधिकारो की रक्षार्थ लड़ाई में कूदना पड़ा। एक बार उसमे कूद पड़ने के बाद उन्होंने सच्चाई, योग्यता और जोश के साथ अपनी सारी शक्ति उसमे लगादी। उन्होने अपना सर्वस्व उस लड़ाई में लगा दिया और किसी भी जोखिम की परवा नहीं की। उस संघर्ष में उन्होने सामूहिक शिकायतो को दूर करवाने के लिए नये युद्धकौशल का विकास किया और सत्याग्रह के मोटे सिद्धांतो का पता लगाया । हमेशा की तरह, पहले सिद्धान्त पर अमल किया गया और नाम तथा सैद्धान्तिक प्रणाली का जन्म बाद में हुआ। इस लड़ाई में गांधीजी को मालूम हुआ कि सत्य और अहिंसा व्यक्तिगत और कौटुम्बिक मामलो मे ही उपयोगी नहीं हैं, बल्कि समूहों के पारस्परिक सम्बन्धो को स्थिर करने के लिए भी वे अच्छे और योग्य साधन हैं। मानव इतिहास में ये सिद्धान्त कोई नये नहीं हैं । पुराने जमाने के कई पैगम्बरों ने उन पर अमल किया है और उनका प्रचार किया है किन्तु राजनैतिक सम्बन्धी और झगड़ों पर उनको लागू करने का अभीतक कोई व्यापक प्रयत्न नहीं किया गया था। गांधीजी को ही एक बड़े पैमाने पर इस बात को साबित करने का श्रेय है कि जो नैतिक और सज्जनोचित आचरण व्यक्तिगत सम्बन्धों के लिए उपयोगी हैं, वे अन्तर-सामुदायिक सम्बन्धों के लिए भी उपयोगी और कारगर हैं। उन्होंने यह भी सिद्ध किया - गांधीजी का मार्ग कि सत्य और अहिंसा द्वारा बाहरी तौर पर इस प्रकार प्रभावशाली ढग से लड़ाई संगठित की जा सकती है कि जिसका विरोध करना मुश्किल हो जाय । उन्होने मालूम किया कि अच्छे उद्देश्य के लिए लड़नेवाला चाहे तो बिना हिंसा का सहारा लिए अपनी शिकायतें दूर करवा सकता है, और यह कि अन्याय और अत्याचार के मुकाबिले में परम्परागत हिसात्मक हथियारों की अपेक्षा सत्य और अहिंसा कहीं अच्छे और अधिक कारगर हथियार हैं। गाँधीजी ने यह साबित करने के लिए कि सभी सफल कार्यों के मूल मे सत्य और अहिंसा है, अन्य बातों के साथ एक सीधी कसौटी का प्रयोग किया । जहाँ सत्य की सफलता के लिए असत्य और हिंसा के सह- योग और समर्थन की जरूरत नहीं होती, वहाँ असत्य और हिंसा की सफलता के लिए हमेशा सत्य की जरूरत होती है। क्योंकि जीवन में हरेक कार्य की, चाहे वह कितनी ही स्वार्थमय और असामाजिक क्यों न हो, जड़ में यह बात होना जरूरी है कि जो लोग उसमें पड़े एक- दृसरे के प्रति सच्चे रहें । उदाहरण के लिए व्यापार ऐसा क्षेत्र है जिसमे अन्य स्थानों की अपेक्षा स्वार्थपरता और लालच का सम्भवतः ज्यादा बोलबाला होता है। किन्तु व्यापार में भी कोई व्यवहार अथवा धोखा अधिक समय तक नहीं चल सकता, अगर व्यापारी एक-दूसरे के प्रति सच्चे न रहे और उनका जबानी कथन लिखित इकरारनामे जितना ही महत्व न रखता हो । चोर और हत्यारो को एक-दूसरे के प्रति सच्चा रहना पड़ता है। कई बार उनको व्यक्तिगत लाभ का बलिदान करके पारस्परिक वफादारी की रक्षा करनी पड़ती है। कोई भी काम हो, उसमें अाधारभूत सिद्धान्त के तौर पर किसी-न-किसी रूप मे सत्य का सहारा लेना ही पड़ेगा, चाहे वह सत्य कितना ही मर्यादित क्यों न हो । यही बात अहिंसा के बारे मे है। कोई भी व्यापक और संगठित हिंसा सम्भव नहीं हो सकती, अगर उसमें लगे हुए लोग अपने दल के भीतर अहिंसा के नियमो का पालन न करें, इस मूल सिद्धान्त के बिना वे शत्रु के साथ सम्भवतः हों वे ।

गांधीवाद : समाजवाद इसके अपनी लड़ाई जारी नही रख सकते । यदि कोई सेना केवल अहिंसा में विश्वास रखती हो तो शत्रु के खिलाफ उस हिंसा का उपयोग होने के पहले वह अपने-आपको ही खत्म कर लेगी। सत्य और अहिंसा को सभी संगठित जीवन के आधारभूत सिद्धान्त मानकर गाँधीजी उनका राजनैतिक क्षेत्र में उपयोग करते हैं जहाँ अभी- तक परिणामो को देखते हुए असत्य और हिंसा को ही हमेशा श्रेष्टतर समझा गया है। किन्तु गांधीजी परिणामों का पैदा होना उच्चतर शक्तियों के हाथ में छोड़कर केवल कोरे सिद्धान्तों के अचूकपन पर ही निर्भर नही रहते हैं । यद्यपि वे चाहते हैं कि विरोधी का हृदय-परिवर्तन हो, किन्तु वे केवल इसी बात में विश्वास नहीं करते। वे सबसे अधिक उन लोगों को संगठित और मज़बूत बनाने की कोशिश करते हैं, जो कि अन्याय और अत्याचार से पीड़ित होते हैं । वे ठीक तौर पर संगठित हो सके, लिए गाँधीजी चाहते हैं कि वे सब अन्यायों से अलग हो जायं, सब मत- भेदों को दूर कर दें, निर्भय हो जायें और छोटे-मोटे स्वार्थों को तिलाञ्जलि दे दें। इस प्रकार अपने आपको मजबूत और संगठित करने के बाद, गांधीजी चाहते हैं कि वे अन्याय और अत्याचार को जो. सहायता देने आये हैं, उसे वापस ले लें । संक्षेप में, वे चाहते हैं कि लोग बुराई की ताकतो के साथ सहयोग करें। भूतकाल में कैसी भी स्थिति रही हो, श्राज की दुनिया में अत्याचार तभी सम्भव होता है जब कि अत्याचार-पीड़ित ईच्छा-पूर्वक या अनिच्छा से, जान में या अनजान में, खुशी से या जबरदस्ती अत्याचारियो को सहयोग देते हैं। यदि अत्याचार-पीड़ित सब प्रकार से सहयोग देना बन्द करदें और इस इन्कारी के परिणामों को भुगतने को तैयार हों, तो अन्याय और अत्याचार लम्बे अर्से तक जारी नहीं रह सकते। औद्योगिक झगड़ों से इसका परिचय मिलता है। जब कभी श्रमिकों ने सफलतापूर्वक अपना सहयोग वापस ले लिया है, तभी पूंजीपतियों ने हमेशा हार मानी है। अलग-अलग औद्योगिक झगड़ों के परिणामों को देखते हुए श्रमिक अपनी गांधीजी का मार्ग , शियायतो को दूर करवाने के लिए और राजनैतिक अथवा क्रान्तिकारी उद्देश्यो के लिए आज आम हड़तालो की बातें करने लगे हैं। अब बाह्यतः हड़ताल असहयोग सत्याग्रह के अतिरिक्त और क्या है ? औद्योगिक झगड़े में काम करने वाली आन्तरिक भावना गाँधीजी द्वारा कल्पित सत्याग्रह की भावना से भिन्न है, हालांकि यह भिन्नता कोई जरूरी नही है, किन्तु सहयोग वापस ले लेने का तरीका दोनों अवस्थाओं में समान है। यदि औद्योगिक झगड़ो मे सहयोग से दृश्य परिणाम निकल सकते है, तो सत्याग्रह के बारे में शंकाशीलता क्यो होनी चाहिए ? सत्याग्रह हड़ताल तो है ही, उसमें कुछ और विशेषता भी है । वह विशेषता लड़ाई लड़ने- वालों में अनुशासन और आत्मविश्वास की उच्चतर भावना जाग्रत करती है और विरोधी की इस प्रकार की भावना को कुण्ठित बनाती है । तटस्थ रहनेवालों में उसके कारण अधिक सहानुभूति पैदा होती है । सहयोग वापस ले लेने के बाहरी साधनों को अधिक मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म प्रभावों द्वारा मदद मिलती है और वे मजबूत बनते हैं। सत्याग्रही अपेक्षाकृत अच्छा असहयोगी अथवा हड़ताली होता है ! उसका निर्णय आवेश, क्रोध और घणा के द्वारा आच्छादित नहीं होता । वह अपने विरोधी को निशस्त्र बना देता है। वह अधिक सहानुभूति प्राप्त करता है। वह इस विश्वास के सहारे निश्चिन्त रहता है कि स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहन से हमेशा व्यक्ति की प्रगति होती है। किन्तु थोड़ी देर के लिए उसके पक्ष में काम करनेवाले सब नैतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों और शक्तियों को एक ओर रख दिया जाय और हम सहयोग वापस ले लेने की बाहरी बात का ही विचार करें तो भी इस तरीके में रहस्यपूर्ण क्या चीज है ? यह तरीका श्रौद्योगिक झगड़ों के निपटारे के लिए, पिछले डेढ़ सौ वर्षों से, कम- ज्यादा सफलता के साथ काम में लाया गया है। उसके अभाव में आज आम हड़तालों और समाजवाद अथवा साम्यवाद की शायद ही चर्चा सुनाई देती । सत्याग्रह उसी दशा में कुछ रहस्यमय और आध्यात्मिक अस्त्र हो सकता है जब उसका मतलब किसी ऐसी चीज़ से हो जो अज्ञात हो, गांधीवाद : समाजवाद अज्ञेय हो और अव्यावहारिक हो । आम हड़ताल ऐसी चीज है जो व्याव हारिक निश्चित और बुद्धिगम्य है। तब सत्याग्रह बुद्धि से परे की चीज क्या होना चाहिये ? मनुष्यों के लिये यह कितनी आसान बात है कि वे वाक्यो, शब्दी और नामों के जाल में फंस जाते है और इस प्रकार जहां मतभेद न हो वहाँ मतभेद खड़े कर देते है। आप गाँधीजी की भाषा में और सत्याग्रह की शब्दावली में चर्चा कीजिये और एक निश्चित, दृश्य सघर्ष रहस्यपूर्ण, अध्यात्मिक, आदर्शवादी और फलस्वरूप अवास्तविक रूप धारण कर लेगा। इसके विपरीत आम हड़ताल की भाषा में बात कीजिये और एकदम वही चीज वैज्ञानिक ही नहीं, ऐतिहासिक आवश्यकता में बदल जायगी। आधुनिक विचार-धारा सत्याग्रह के मामले मे ही मूलतत्व को नहीं भुलाती, बल्कि राजनैतिक क्षेत्र मे गाँधीजी के सत्य प्रयोग के बारे मे यही हाल हो रहा है । आज दुनिया की जो हालत है उसको देखते हुए यह अत्यन्त जरूरी समझा जाता है कि अन्तर-सामूहिक और अन्तर- राष्ट्रीय मामलों मे सत्य से काम लिया जाय । यदि कूटनीति जैसी अबतक रही है, वैसी ही आगे भी रहनेवाली हो, तो आज इस बात का भारी खतरा है कि प्राधुनिक सभ्यता की सारी इमारत टुकड़े-टुकड़े होकर नष्ट हो जाय । डॉ०वुडरो विल्सन और दूसरे अत्यन्त व्यावहारिक राजनीतिज्ञों ने गत महायुद्ध मे इस बात को साफतौर पर समझ लिया था । अब राजनीति में सत्य इसके अलावा और क्या है कि जिसकी खुली कूटनीति कहकर तारीफ की गई है ? जब डॉ. विल्सन ने इस सिद्धान्त को दुनिया के राष्ट्रों के सामने रक्खा और जब उन्होंने इस सिद्धान्त के आधार पर राष्ट्रसंघ बनाने की सलाह दी तो किसी ने भी उनको रहस्यवादी, अध्यात्म वादी या अव्यावहारिक राजनीतिज्ञ नहीं समझर । जब रूस, समाजवाद तथा साम्यवाद खुली कूटनीति का जिक्र करते हैं तब अाधुनिक मस्तिष्क मे कोई गोलमाल पैदा नही होता । क्या इसकी यह वजह है कि वह जो कुछ कहते हैं वैसा करना नही चाहते ? किन्तु जब गाँधीजी राजनेतिक मामलो गांधीजी का मार्ग , मे सत्य की चर्चा करते है तो सभी ज्ञानवान और बुद्धिमान भयत्रस्त होकर अपने हाथ ऊंचे उठा देते हैं और चिलाकर कहते है मानव- स्वभाव जैसा भी है और राजनीति जैसी है और हमेशा से रही है, उसको देखते हुए यह सम्भव नही हो सकता । हमेशा की भांति कहरता शब्दो के लिए लड़ने लगती है । धर्म के मामले मे हमको इसका उदाहरण दिखाई देता है । यदि ईसाई यह कहता है कि देवीप्रात्मा फाख्ता की शक्ल मे अवतरित हुई तो यह बुद्धिसंगत समझा जाता है । किन्तु यदि हिन्द यह कहता है कि मनुष्य के उच्चतर स्वरूप मे उसने अवतार लिया है, तो इसको पूर्वी अन्धविश्वास कह दिया जाता है । यदि हिन्दू मूर्ति की पूजा करता है तो वह अन्धविश्वास के अलावा कुछ नही, किन्तु यदि कोई किताब या धर्मग्रन्थ सैकड़ो तह मे लिपटी हुई हो और उसे छूने या खोलने के समय हरबार उसे चूमा जाय तो यह तर्कयुक्त बात हो जाती है। यदि कोई खुली कूटनीति की बात करे तो वह व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हो गया, किन्तु अगर कोई राजनीति में सत्य का जिक्र करे तो वह एकदम रहस्यवादी, सन्त और अव्यावहारिक राजनीतिज्ञ बन जायगा । आप प्राम- हड़तालो की भाषा में बात कीजिए, आप वैज्ञानिक कहे जायंगे; किन्तु आप सत्याग्रह का नाम लीजिए, और आप एकदम अवैज्ञानिक और प्रतिगामी बन जायंगे। हाँ, तो गांधीजी ने लड़ाई का अपना तरीका और उसकी व्यूह-रचना को दक्षिण अफ्रीका में स्थापित और विकसित किया । उसका उन्होंने वहां इस तरह उपयोग किया कि जिससे कुछ नतीजा भी निकला । उन्होने सत्याग्रह के उसी हथियार का यहाँ भी कई मौको पर यानी चम्पारन में और असहयोग की गत तीन लड़ाइयो में उपयोग किया है। इन सभी उदाहरणो मे, जब वे अपने अथवा राष्ट्र के उद्देश्य को सिद्ध न कर सके तब भी उन्हें काफी सफलता मिली है। सशस्त्र विद्रोह में भी पहले ही धावे में अथवा एक ही बार मे सफलता नहीं मिल जाती । जब किसी उद्देश्य की रक्षार्थ लम्बा युद्ध होता है तो उसमे कई लड़ाइयां लड़ी जाती गांधीवाद : समाजवाद G . हैं, छुटपुट हमले होते है और घेरे डाले जाते हैं, विफलतायें और सफल- तायें मिलती हैं। यदि कोई ताकत मामूली मुठभेड़ों में सफल होती है तो उसे अपने-आपको सफल समझना चाहिए और वह सकारण आशा रख सकती है कि आगे चलकर वह पूरी विजय प्राप्त करेगी और अपने उद्देश्य को हासिल कर सकेगी । यदि मामूली भिड़न्त में हार भी हो जाय तो भी यदि सेना बिना किसी रुकावट के कदम आगे बढाती रहे और उसकी अनुशासन और आत्मविश्वास की भावना ज्यों-की-त्यों कायम रहे, उसकी मुकाबिला करने की शक्ति बढ़े और वह अपनी सफलता का क्रमशः अच्छे-से-अच्छा हिसाब देती रहे, तो चाहे उद्देश्य की प्राप्ति न हो तो भी जो तरीका काम में लाया गया हो वह अच्छा समझा जाना चाहिए । अब शायद ही कोई इससे इन्कार करेगा कि गांधीजी की अधीनता में राष्ट्र ने जो भी लड़ाई लड़ी है, उसमें उसने अागे प्रगति की है और उसकी मुकाबिले की ताकत बढ़ी है। पक्षपात के वशीभूत होकर ही यह कहा जा सकता है कि इन सत्याग्रह-युद्धों के फलस्वरूप राष्ट्र ने ताकत, बलिदान, संगठन निर्भयता और अनुशासन की दृष्टि से प्रगति नहीं की है। प्रत्येक संघर्ष मे दमन की मात्रा बढ़ी, और फलतः ज्यादा मुसीबतों और कष्टों का सामना करना पड़ा । किन्तु हरबार लोगों ने अधिकाधिक हिस्सा लिया और मुकाबिला कड़ा-से-कड़ा हुआ । सन् १९३० में राष्ट्र ने १६-२०-२१ की अपेक्षा अपना अच्छा हिसाब पेश किया । सन् १९३२-३३ मे हालत उससे भी अच्छी रही। लड़ाई का बाहरी नतीजा उतना अनुकूल नही आया जितना कि सन् १९३० मे आया था, किन्तु राष्ट्र ने ज्यादा लम्बी लड़ाई लड़ी और ज्यादा कड़े आघात का मुकाबिला किया । दमन ज्यादा कठोर और व्यापक हुआ और यद्यपि राष्ट्र को शत्रु के थककर अपनी लड़ाई स्थगित करनी पड़ी, किन्तु उसकी भीतरी ताकत सन् १६३० की अपेक्षा कहीं ज्यादा थी। इसका परिचय धारासभा के चुनाव मे राष्ट्र की ठोस विजय से मिला । राष्ट्र उस समय सत्याग्रह पर डटे रहकर कष्टसहन को जारी रखने के लिये तैयार न था, किन्तु उसका दिल दुरुस्त पशुबल के आगे गांधीजी का मार्ग " था और उसकी फौजी भावना कायम थी। इस प्रकार तीनों लाड़ाइयो का तात्कालिक परिणाम कुछ भी निकला हो, पहले हार, फिर सन्धि और फिर हार हुई हो, किन्तु राष्ट्र अपने लक्ष्य की ओर बराबर कदम बढ़ाये जा रहा है, अाखिर अन्तिम लक्ष्य पर एक ही बार तो पहुंचा नही जा सकता है। यह हो सकता है कि लगातार सफलताओं के बाद भी हम लक्ष्य तक न पहुंच पावें; किन्नु चाहे प्रकटतः सफलता हो या असफलता, जिस किसी कारण से हम ज्यादा ताकतवर बनते है, उसे मूलतः सफलता ही समझना चाहिए, कारण उससे हम अपने लक्ष्य के अधिक नजदीक ही पहुंचते हैं। अब हम इसपर विचार करें कि क्या राष्ट्र सत्याग्रह के पहले वाले तरीकों द्वारा इतनी प्रगति कर पाता ? उन लोगो के अलावा जो हर सम्भव परिस्थितियों में वैध उपायो के पक्षपाती हैं, प्रत्येक निष्पक्ष व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि गांधीजी के आने के पहले कांग्रेस की राजनीति में वैध आन्दोलन का अर्थात् अर्जी देने, प्रार्थना करने और विरोध करने का जो तरीका प्रचलित था, उसमें सत्याग्रह का तरीका निश्चित रूप से अच्छा तरीका है । किन्तु अालोचक यह कह सकता है कि यद्यपि पुरानेसे यह अच्छा तरीका है और उसके द्वारा राष्ट्र कुछ आगे भी बढा है, किन्तु उसका कार्य अब खत्म हो चुका; उसका उद्देश्य पूरा हो गया। अब हमारे लिए उसका कोई उपयोग नहीं रहा । यदि बात ऐसी ही हो तो यह आलो- चक का काम है कि वह अधिक अच्छा और ज्यादा असरकारक तरीका सुझावे । क्या किसी भी आलोचक ने अभीतक हमारे सामने संगठित प्रतिरोध का कोई नया तरीका पेश किया है ? इसके विपरीत यह प्रकट है कि सभी विचारशील लोग, यहाँ तक कि कथित प्रगतिशील दलों के लोग भी, मानते हैं कि जिन परिस्थितियों में आज संसार और खासकर हिन्दु- स्तान गुजर रहा है, उनको देखते हुए लड़ाई का तरीका अहिंसात्मक ही हो सकता है। युद्ध और संहार के वर्तमान हथियारो पर राज्यो और सरकारों का एकाधिपत्य होने के कारण बन्दूक और पिस्तोल, लाठी अथवा पुराने जमाने के तीर-कमान से अच्छे साबित न होंगे । हवाई और रासा- गांधीवाद : समाजवाद यनिक युद्ध के ज़माने में जब कि लड़ाई के सब साधन सरकारों के हाथ मे है, सशस्त्र लोग भी हिंसात्मक युद्ध में राज्यों के मुकाविले सफल होने को आशा नहीं कर सकते । फिर हिन्दुस्तान जैसा निःशस्त्र राष्ट्र क्यों कर विजयी हो सकता है । इसके अलावा सैनिक अर्थ में खुले तौर पर संगठन करना सम्भव नहीं हो सकना । हम अहिंसात्मक उपायो द्वारा ही अपना संगठन कर सकते हैं । और आखिर हिंसात्मक लड़ाई में भी संगठन अनुशासन, एकता, बहादुरी और त्याग जैसे नैतिक गुणो का ही सबसे ज्यादा महत्व होता है। सत्याग्रह इन गुणों का विशिष्ट रूप में विकास करता है । अन्तिम विजय किसी उपाय से हो; हिंसा से हो या अहिंसा से, गाँधीजी के नेतृत्व में राष्ट्र जिन गुणो को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है, वे आचरण मे लाने और प्राप्त करने योग्य हैं । उनपर व्यापक श्रमल शान्तिपूर्ण उपायो द्वारा किया जा सकता है। यह बिल्कुल सम्भव है कि एक छोटे से गुप्त क्रान्तिकारी दल में ये सब नैतिक गुण हों। किन्तु सारा राष्ट्र अथवा उसका विस्तृत अग गुप्त तरीकों से इन गुणों को नहीं पा सकता । इसलिए अन्तिम हिंसात्मक संघर्ष के लिए भी वे गुण जिनका सत्याग्रह ने भारतीयों के चरित्र में विकास किया है, उपयोगी साबित होंगे; क्योंकि सभी लड़ाइयों के लिए, चाहे वे हिंसात्मक हो या अहिंसात्मक, वे आधारस्वरूप होते हैं । अतः यदि हमेशा के लिए नही तो, कम-से-कम वर्षों के लिए हमारे लिए सत्याग्रह अथवा हड़ताल का तरीका ही शेष रह जाता है । अमली सुधारक के लिए यह न तो सम्भव है और न वाञ्छनीय कि वह अति दूर के भविष्य में झांकने की कोशिश करे । वह सिर्फ वर्तमान का ही खयाल करेगा तो गलती करेगा । और यदि वह अति सुदूर भविष्य की कल्पना करके सोचेगा तो भी वह ग़लती करेगा । उसको दो अतिरेको के बीच एक व्यावहारिक रास्ता ढूंढ लेना चाहिए । स्वराज्य के लिए हमारी सत्याग्रह की अहिंसात्मक लड़ाई ही वह बीच का रास्ता है। इसलिए राजनैतिक सत्ता हस्तगत करने के लिए जहाँतक लड़ाई के किसी क्रान्तिकारी कार्यक्रम का सवाल है, अभीतक किसी भी दल ने गाँधीजी गांधीजी का मार्ग के सत्याग्रही तरीके के बजाय कोई दृसरा योग्य उपाय अप्रत्यक्षतः भी मूचित नही किया है। किसी क्रान्तिकारी लड़ाई में प्रत्यक्ष संघर्ष का उतना ही महत्व है जितना कि उस समय का, जब संघर्ष सम्भव नही होता, जब राजनैतिक दमन अथवा रुकावट के कारण राष्ट्र प्रत्यक्ष संवर्प की जोखिम और तकलीफें बरदाश्त करने को तैयार नही होता । ऐसे समयो के लिए राष्ट्र के सामने कुछ रचनात्मक और उपयोगी काम होने चाहिएँ । यदि ऐसा न होगा तो सैनिक-दल असंगठित हो जायेंगे । सत्याग्रह के सैनिको को समय- समय पर अपने केम्पो मे विश्राम करना पड़ता है। वहाँ उनके सामने ऐसे काम होने चाहिए जो उनको दुरुस्त और सुव्यवस्थित रख सके । तुलनात्मक शान्ति के समय का उपयोग संगठन को मजबूत बनाने के लिए किया जाना चाहिए। यदि इस बात की उपेक्षा की गई तो अगली लड़ाई के समय राष्ट्र असंगठित और बदहवास हो जायगा । गाँधीजी ने राजनैतिक शिथिलता और शान्ति के ऐसे समयो के लिए रचनात्मक कार्यक्रम का विकास किया है। खादी, ग्राम उद्योग, ग्राम सेवा, राष्ट्रीय शिक्षा, हरिजन- कार्य, हिन्दुस्तानी-प्रचार आदि कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ है जिनको उन्होंने संगठित किया है और जिनको चलाने के लिए उन्होंने संस्थायें बना दी हैं। ये प्रवृत्रियों स्वयंमेव अच्छी हैं और कार्यकर्ताओ की सेना को काम मे लगाये रखती है । राष्ट्र भी इन प्रवृत्तियों में हिस्सा लेकर और सहायता देकर सार्वजनिक कार्य और जिम्मेदारी की शिक्षा प्राप्त करता है । इतना ही नही, जब सविनय अवज्ञा स्थगित होती है, खास प्रश्नो पर सरकार के साथ स्थानीय लड़ाइयाँ भी जारी रहती हैं । बारडोली की ऐसी ही लड़ाई थी। इन रचनात्मक और आंशिक प्रवृत्तियों में उन लोगो को भी खीच लिया जाता है जो या तो सीधी राजनतिक लड़ाई मे विश्वास नहीं करते या राजनैतिक काम की अपेक्षा सामाजिक काम में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं । गाँधीजी और उनके साथी कार्यकर्ता इन प्रवृत्तियो को सामा- गांधीवाद : समाजवाद जिक और राजनैतिक दोनों दृष्टिकोणों से देखते हैं । इन कामों में लगे हुए होने पर भी वे इस बात को कभी नही भूलते कि वे मुख्यत. स्वतंत्रता की लड़ाई के सैनिक हैं । इसलिए इन प्रवृत्तियो को केवल संकुचित समाजसुधार के अथवा बुढ़िया के या प्रतिगामी काम कहना उनकी व्यर्थ ही निन्दा करना है। यह समस्याओं को उलझा देना है। यदि मोटे तौर पर और सहानुभूति-रहित दृष्टि से देखा जाय तो जो काम फौजी स्वरूप के न हो वे सभी सुधारक काम प्रतीत होंगे, क्रान्तिकारी नहीं। किन्तु यदि लक्ष्य और उद्देश्य को न भूला जाय तो वही काम सुधारक और क्रान्ति- कारी हो सकते हैं - सुधारक तात्कालिक परिणामों की दृष्टि से और क्रान्ति- कारी भावी लड़ाई पर पड़नेवाले उनके अन्तिम असर की दृष्टि से । जब सेना लड़ाई में नहीं पड़ी हुई होती है और बैरकों में रहती है, उस समय वह बहुत से ऐसे काम करती है जिनके बारे में अपठित आदमी यह समझ सकता है कि उनका वास्तविक लड़ाई के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। सैनिक खाइयाँ खोदते हैं जो पुनः भर दी जाती हैं। वे लम्बे कूच करते हैं जो किसी लक्ष्य पर नहीं पहुंचते; चे निशाने मारते हैं किन्तु उनकी गोलियों से कोई मरता नहीं । वे नकली लड़ाईयां संगठित करते हैं। ये सब काम यदि इसलिए बन्द कर दिये जाय कि उनका वास्तविक लड़ाई के साथ कोई खास ताल्लुक नहीं दिखाई देता तो सेना का संगठन टूट जायगा और जब प्रत्यक्ष लड़ाई का समय अायगा तो वह बेकार साबित होगी। क्रान्तिकारी दलों के भी रोजमर्रा के सुधारक कार्यक्रम होते हैं । इन कार्य- क्रमों के आधार पर ही उनके बारे में फैसला नहीं किया जाना चाहिए। यदि ऐसा किया जायगा तो वह सही फैसला न होगा । शहर में रहने वाले मजदूरों को संगठित करना होगा। यह कैसे होगा ? श्रमिक सघों द्वारा ही यह हो सकता है । अब कोई भी श्रमिक संघ, चाहे उसका उद्देश्य कितना ही क्रान्तिकारी क्यों न हो, विशुद्ध क्रान्तिकारी प्राधार पर संगठित नहीं किया जा सकता । श्रमिकों के रोजमर्रा के अभाव-अभियोग ही वह आधार हो सकता है। इन अभाव-अभियोगों का क्रान्तिकारी उद्देश्य के साथ कोई गांधीजी का मार्ग ताल्लुक नहीं होता। एक अर्से तक श्रमिक संघ इसी बात की कोशिश करेंगे कि थोड़ा सुधार यहां हो जाय तो थोड़ा सुधार वहां हो जाय, वे चाहेंगे कि थोड़ी मजदूरियाँ बढ जायँ, थोड़े काम के घंटे कम हो जायँ और थोड़ी सामाजिक सुविधाओं में वृद्धि हो जाय । कोई भी श्रमिक संघ एक- मात्र और विशुद्ध क्रान्तिकारी आधार पर संगठित नही किया जा सकता। किसानो के संगठनो को इसी प्रकार काम करना होगा । रोजमर्रा के कामों में वे सुधारक रहेंगे, किन्तु उनका उद्देश्य क्रान्तिकारी होगा । सभी सुधा- रक कामों को क्रान्ति-विरोधी और प्रतिगामी काम कहकर बदनाम करना, क्रान्तिकारी आन्दोलन के विभिन्न पहलुओं को दृष्टि से अोझल करना होगा: क्योंकि क्रान्तिकारी अान्दोलन तो सभी मोर्चों पर चलाना पड़ता है। गु अभी तक कोई ऐसा समूह या दल दिखाई नहीं दिया जिसने गांधीजी द्वारा प्रस्ताचित और कोंग्रेस द्वारा स्वीकृत कार्यक्रम के बजाय अपना कोई कार्यक्रम पेश किया हो । मैने कुछ उग्र और क्रान्तिकारी कार्यक्रमो की चर्चा सुनी है, किन्तु मैने उनको व्यवहार मे आते कहीं नहीं देखा। गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम के एक अंग-खादी की उत्पत्ति और बिक्री को ही ले लीजिए । मैंने अभीतक यह सुना नहीं है कि अगांधी- वादी नमूने का क्रान्तिकारी साधारण खरीददार को क्या सलाह देगा । निश्चय ही वह खादी की सिफारिश न करेगा, क्योंकि ऐसा करना प्रतिगामी कार्य होगा। तो क्या वह मिल के कपड़े की सिफारिश करंगा ? वह ऐसा नहीं कर सकता । यदि वह करता है तो वह खरीददार से उन लोगों की सीधी मदद करने के लिए कहता है जो रोजमर्रा और प्रतिक्षण मजदूरी का शोषण करते हैं, और जिनके शोषण और लोभ को रोकने की भाव- श्यक राजनैतिक सत्ता उसके हाथ में नहीं है। क्या वह विदेशी कपड़े की सिफारिश करेगा ? और किसी बात का ख़याल न किया जाय तो भी इस प्रकार की सिफारिश का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से तात्कालिक राजनतिक लड़ाई पर हानिकारक असर पड़ेगा। मैंने अक्सर यह जिक्र सुना है कि फिर भी गांधीवाद : समाजवाद वह इस आशा से हिन्दुस्तानी मिलो के कपड़े की सिफारिश करेगा कि जैसे-जैसे प्रौद्योगिक जीवन का विकास होगा, वैसे-वैसे शहरी मजदूरों की संख्या में वृद्धि होगी, जो क्रान्ति के लिए हमेशा अच्छी सामग्री सिद्ध होती है। यदि वह इस बात की भी गारन्टी कर सके, तो उसकी दलील सुनी जा सकती है। किन्तु यह कुछ भी कहे या करे, वह भारतीय उद्योग का विस्तार और संजीवन नहीं कर सकता । विदेशी सरकार की नीति के कारण भारतीय उद्योग कभी भी एक निश्चित संकुचित सीमा के आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। मर्दुमशुमारी की रिपोर्टों से पता चलता है कि भारतीय उद्योग देश की बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ आगे कदम नही बड़ा सका है और अधिकाधिक लोगो को क्रमशः जीवन निर्वाह के लिए भूमि का सहारा लेना पड़ा है। सारी जनसंख्या के लिहाज से प्रौद्योगिक जनसंख्या का औसत घटता जा रहा है। दूसरो दलील यह पेश की जाती है कि भारतीय उद्योग को सहायता देने से हमें वह आधार मिल जाता है जिस पर आगे चलकर अपने प्रौद्योगिक जीवन का निर्माण कर सकते हैं। किन्तु यह दलील अत्र काम नही दे सकती । रूस ने यह दिखा दिया है कि राजनैतिक सत्ता हस्तगत कर लेने के बाद पंच या दस-वर्षीय योजना द्वारा देश को पूरी तरह औद्योगिक बनाया जा सकता है । जब हमारे हाथ में ससा होगी तो औद्यो- गिक पुनर्निर्माण की हमारी भावी योजनाओं में आज के दकियानूसी और कमजोर उद्योग से शायद ही कोई उल्लेखनीय सहायता मिल सकेगी। अतः जिस चीज में आज गरीबों के लिए निश्चिन लाभ है, उसको भविष्य के अनिश्चित लाभ के लिए छोड़ देना बुद्धिमानी का काम न होगा । हम पिछले अनुभव से भी लाभ उठा सकते हैं । बंग-भंग के ज़माने का स्वदेशी-आन्दोलन इसलिए विफल हुआ कि राष्ट्र ने मिलों के एजन्टों पर विश्वास किया। मिल-एजेन्टों ने कपड़े की कीमतें बढ़ादी और राज- नीतिज्ञों के उद्देश्य को विफल कर दिया । राजनीतिज्ञा ने उद्योगपतियों की सद्भावना और देशभक्ति पर ही भरोसा किया । इसका परिणाम घातक 0 गाँधीजी का मार्ग निकला । यदि हमको स्वदेशी से लाभ उठाना हो और अदेशभक्त और अदूरदर्शी जीवाद के हाथों में अपने-आपको निस्सहाय न छोड़ना हो, तो हमारे पास दूसरे साधन भी होने चाहिएँ । खादी और ग्रामोद्योग आन्दो- लनों के रूप में गाँधीजी ने ये सावन हमारे लिए पैदा कर दिये हैं । ये आन्दोलन किसानों को अवकाश के महीनो में काम भी देते हैं । किस अर्थ मे ये प्रतिगामी प्रवृत्तियां हैं ? कुछ उग्र विचारक कहते हैं कि इन प्रवृत्तियों के कारण गरीबों की हालत में जो सुधार होगा, उसकी वजह से उनका क्रान्तिकारी जोश ठण्डा पड़ जायगा। यदि खादी के बारे में यह सही हो तो श्रमिक संघो की हड़तालो और दूसरी प्रवृत्तियों के बारे में भी यही बात कहनी होगी। हड़ताल आम क्रान्तिकारी उद्देश्यों के लिए कभी भी नहीं की जाती, बल्कि एक निश्चित सुधारक उद्देश्य के लिए उसका आश्रय लिया जाता है । उसके द्वारा क्रान्ति के लिए जो शिक्षण मिलता है, उसे तो केवल उप-परिणाम ही कहना चाहिए । जहाँतक खादी और ग्रामोद्योगों का ताल्लुक है, गाँधीजी इस बात का काफी सबूत दे सकते हैं कि वे खूब जाग्रत हैं। कम-से-कम जीवन निर्वाह योग्य मजदूरी निश्चित कर देना और वह भी राजनैतिक सत्ता के बिना, इससे बढ़कर क्रान्तिकारी काम और क्या होगा ? फिर भी गाँधीजी ने अपनी सलाह और पथ-प्रदर्शन में चलने वाले सब संगठनो में यह क्रान्तिकारी योजना जारी कर दी है । उन्होने कार्यकर्ताओं और संगठनकर्ताओं द्वारा पेश किये गये व्यापारिक आँकड़ों के आधार पर मिली हुई विशिष्ठ सलाह के विरुद्ध जाकर ऐसा किया है । उन्होंने वास्तविक तथ्यों की उपेक्षा को और अपने क्रान्तिकारी दृष्टिकोण और उत्साह का परिचय दिया। उनको चेतावनी दी गई थी कि थोड़ी-बहुत खादी जो बच रही है वह नष्ट हो जायगी, किन्तु उन्होंने स्पष्टतः सही और क्रान्तिकारी सिद्वान्त के लिए अपनी प्यारी योजना के विनाश को भी पसन्द कर लिया। उनका दृष्टि- कोण और विश्वास सही साबित हुआ। नये प्रयोगों के कारण खादी को ज्यादा हानि नहीं पहुंची है गांधीवाद : समाजवाद , - अब औद्योगिक मजदूरों की बात लीजिए । उनके विचारों के अनुसार संचालित और प्रेरित एक मज़दूर-संघ है। हिन्दुस्थान में अाज अहमदा- बाद मिल मजदूर यूनियन से बढ़कर सुसंगठित और आर्थिक दृष्टि से मज़बूत यूनियन दूलरी नहीं है। किसी भी दृसरी यूनियन की अपेक्षा उसके ज्यादा, वास्तविक और चन्दा देनेवाले सदस्य हैं। इसके अलावा शि गुग्रहों, बालको और वयस्को के लिए रात्रि और दिवस पाठशालाओं, छात्रावास हरिजन संस्थाओं, सहयोग भण्डारी आदि के रूप में सबसे अधिक संस्थायें उसके साथ जुड़ी हुई हैं। गांधीजी स्वराज्य के लिए आतुर होते हुए भी बड़े पैमाने और स्थायी आधार पर अपनी योजनायें बनाते हैं। जब उन्होंने एक साल में स्वराज्य मिलने की बात कही थी, तब भी उन्होंने दीर्घकालीन कार्य के आधार पर अपनी संस्थाओं का निर्माण और संगठन किया था। राष्ट्रीय शिक्षा, खादी, हिन्दुस्तानी-प्रचार, हरिजन-कार्य एक साल में पूरे नहीं हो सकते । इसलिए जो योजनायें और संस्थायें बनाई गईं. वे कई वर्षों का खयाल करके बनाई गई । तात्कालिक राजनैतिक उद्देश्य सिद्ध नहीं हुआ, किन्तु संस्थायें संगठन का काम करती रहीं और अपने-आपको उन्नत बनाती रहीं। इस प्रकार उन्होंने क्रान्ति की चिनगारियों को जीवित रक्खा । ये सब अग्रगामी संस्थायें हैं । वे असफल हो सकती हैं; उनको तोड़ा जा सकता पहले से नई, अच्छी और बड़ी योजनायें भविष्य में बनाई जा सकती हैं; किन्तु इन संस्थाओं से राष्ट्र को जो लाभ हुआ है, उसने जो प्रगति की है; उसकी अवगणना वही लोग कर सकते हैं जो राष्ट्रीय आन्दोलन का बहुत ही छिछला ज्ञान रखते हैं। निन्दा या आलोचना करना बहुत आसान होता है । किन्तु जब आलोचक खुद काम करने के लिए और संगठन करने के लिए जुटेंगे तो उन्हें मालूम होगा कि सार्वत्रिक क्रान्ति के अपने ल्यापक आदर्श के लिहाज से उनकी प्रवृत्तियां केवल सुधारक प्रवृत्तियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध रोजमर्रा की उन छोटी बातों से है, जो प्रकटतः उद्देश्य के साथ कोई सम्बन्ध गांधीजी का मार्ग नहीं रखती। क्रान्तिकारी आन्दोलन के उस स्वयंसेवक के उदाहरण पर विचार कीजिए जिसको दफ्तर में लिफाफों पर टिकिट चिपकाने का काम सौंपा गया है । वह अपने इस विनीत साधारण रूखे काम का दल द्वारा कल्पित भावी क्रान्ति के साथ कैसे सम्बन्ध जोड़ेगा ? उसको व्यापक दृष्टि- बिन्दु और किसी जीवित श्रद्धा की सहायता लेनी होगी ! इस तरह ही वह यह समझ सकता है कि उसका मामूली काम क्रान्ति के लिए आवश्यक काम है । गांधीजी में वह दूरदृष्टि और प्रात्मश्रद्धा है जिससे कि वे सभी कामो में निहित इस सिद्धान्त को समझ सकते है । एक धार्मिक पुरुष की तरह जो प्रत्येक आत्मा मे परमात्मा के दर्शन करता है, गांधीजी हरेक छोटे सुधारक काम में, जिसे वे करते हैं या दूसरो को करने की सलाह देते है, स्वराज्य-देवता के दर्शन करते हैं। वे चाहे ब्रिटिश सिंह की गर्दन को हिला देने वाली लड़ाई के मोर्चे पर डटे हो, छोटे से चर्खे को दुरुस्त कर रहे हो अथवा सेगाँव जैसे छोटे से गांव की तंग गलियो में झाडू लगा रहे हो, वे यही समझते हैं कि वे क्रान्ति के लिये कार्य कर रहे हैं। अपने पूर्ण- स्वराज्य के स्वप्न के लिए काम कर रहे हैं जिसमे गरीब अपने घर खुद मालिक होगे। चूकि वे इस आत्मश्रद्धा के साथ काम करते हैं, अतः अपने अनुयायियो और साथी-कार्यकर्ताओं में वही आत्म श्रद्धा जाग्रत कर देते है । इस प्रकार गांधीजी ने दुहेरा कार्यक्रम बनाकर राष्ट्र के सामने रक्खा है। एक कार्यक्रम तो हलचलपूर्ण और क्रान्तिकारी समयों के लिये है जब कि राजनैतिक जीवन की रफ्तार खूब तेज होती है, और दूसरा कार्यक्रम अपेक्षाकृत शान्तिमय समयों के लिए है जबकि राष्ट्रीय जीवन धीमी और साधारण हालत मे होता है । किसी व्यक्ति या दल ने इन दोनों अनिवार्यतः एक के बाद एक आनेवाले समयों के लिये इससे अच्छे कार्यक्रम का आविष्कार नहीं किया है। अवश्य ही ये कार्यक्रम स्वाधीनता-प्राप्ति के लिये बनाये गये है। शहरी मजदूरो की एकतंत्री सत्ता अथवा किसानों और मजदूरों के प्रजातंत्र की स्थापना के लिए उनका निर्माण नहीं हुआ है। गाँधीजी के कार्यक्रम और उनके स्वराज्य का यही अर्थ है कि हिन्दुस्तान के गांधीवाद : समाजवाद की आम जनता का हित साधन हो । गोलमेज़ कान्फ्रेंस में बोलते हुए उन्होने घोषित किया था कि भारतीय राष्ट्रीय महासभा का ध्येय है; “विदेशी जुए से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करना ( प्रत्येक अर्थ मे ), ताकि देश के करोड़ों मूक अधिवासी सुखी हो सके। इसलिए हरेक स्वार्थ को, जो करोड़ो के हितों के विरुद्ध हो, अपना रवैया बदलना होगा और यदि परिवर्तन सम्भव न हो तो खत्म हो जाना पड़ेगा।" यह बिलकुल सम्भव हो सकता है कि आम जनता के हित शहरी मजदूरों की एकतंत्री सत्ता द्वारा ही सबसे अधिक अच्छी तरह पूरे हो सकें। किन्तु गाँधीजी का अभीतक यह खयाल नहीं है कि इस प्रकार की योजना द्वारा आम जनता का सबसे अधिक हित होगा। इस बीच में जो लोग मज़दूरों की सत्ता स्थापित करना चाहते हैं उनका काम है कि वे खुद अपना दुहेरा तरीका खोजें और उसको केवल सिद्धान्त-रूप में ही राष्ट्र के सामने न रक्खें, बल्कि अमली- रूप देकर उसकी योग्यता सिद्ध करें। जबतक इस प्रकार के कार्यक्रम सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनो रूपों में हमारे सामने न श्रावे, बल्कि सैद्धान्तिक की अपेक्षा व्यावहारिक रूप में अधिक न आवें, तबतक हमको अपनी जगह पर ही रहने दिया जाय तो ठीक होगा। गाँधीजी ने लोगों से केवल सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तवाद और श्रादर्शवाद के नाम पर ही अपील नहीं की है, बल्कि उनके साथ उन्होंने अपने कार्यक्रम भी रक्खे हैं । उनका आदर्शवाद संसार की विचारधारा से शताब्दियों अागे रहा हो, किन्तु उन्होने उस समय की प्रतीक्षा नहीं की जब कि हिन्दुस्तान की ग्राम जनता ने उनके आदर्शवाद को अपना लिया होता । इसके विपरीत उन्होने अपने आदर्शवाद के अनुसार कल्पित काम राष्ट्र के सामने पेश करके अपने प्रादर्शवाद की उपयोगिता सिद्ध कर दी। उन्होंने यह ठीक ही सोचा कि किसी भी आदर्शवाद के प्रचार का सबसे उत्तम तरीका यही है कि चाहे कितने ही विनम्र रूप मे क्यों न हो, उसपर अमल किया जाय । इस प्रकार की महत्वाकांक्षा रखनेवाले दूसरे लोगों को भी उनका अनुसरण करना चाहिए. यदि वास्तव में वे अपने विशिष्ट आदर्शवादों के सच्चे पुजारी गांधीजी का मार्ग ६३ है। आखिर हमारे लिए गाँधीजी का आदर्श और अमल नया ही था । उनके साथ शामिल होने के लिए हमें भूतकाल से, अपनी विचार करने और काम करने की आदतो से, अपनी कनौटियो से एक बड़ी हद तक नाता तोडना पड़ा। यदि कोई व्यक्ति या दल ज्यादा अच्छे और व्याव- हारिक कार्यक्रम हमारे सामने रक्खेगा तो यह विश्वास रक्खा जा सकता है कि हम फिर वैसा ही कर सकते है । आखिर गांधीजी ने यह अपने अनु यायियों के सामने दरिद्रता और कष्ट सहन का आदर्श रक्खा है । यदि कम कष्ट सहकर और कम त्याग करके लोगो को कुछ निश्चित फल मिल सकता हो तो वे इतने मूर्ख नही हैं कि ऐसे मौके को यो ही हाथ से निकल जाने दें। उनमे से कुछ अपने धन्धे और अामदनिया छोड़ चुके हैं और खादी तथा ग्रामोद्योगो के काम मे लगे हुए है । इस काम के द्वारा गरीबों को सम्भवत एक-दो अाना मिल जाता है और जब वस्तुतः सत्याग्रह की लड़ाई जारी नही होती है तो कार्यकर्ताओं को काम मिल जाता है। यदि कोई उनको यह बतादे कि इस तरह काम करने से ग़रीबो की जेवों में एक रुपया या इससे अधिक पहुँचने लगेगा और यह भी कि विदेशी साम्राज्यवाद से लड़ने का अमुक तरीका ही अचूक और उत्तम तरीका है तो वे ऐसे लोग नहीं हैं जो इस प्रकार के आकर्षक प्रस्तावों को ठुकरा दें। यदि उन्होंने छोटी बातों के लिए उन वस्तुओं को त्याग दिया जिनको लोग जीवन में महत्वपूर्ण खयाल करते हैं (अपने धन्धो और अपनी आमदनियो को) तो ज्यादा अच्छी और श्रेष्ट बातों के लिए वे इससे कम त्याग न करेंगे। वे गांधीजी के नये तरीको के योग्य शिष्य सिद्ध हैं.-ऐसे तरीको के जिन पर इतिहास में अभी तक कभी अमल नही किया गया और जिनकी पहले कोई मिसाल नही मिलती है। यदि अधिक परिचित, सुपरीक्षित, और आसान तरीके उनके सामने रक्खे जायंगे तो वे निश्चय ही उनका स्वागत करेंगे। किन्तु साफ कहा जाय तो उनको अपना रास्ता स्पष्ट नहीं दिखाई दे रहा है। ज्योही उनको कोई प्रकाश दिखने लगेगा, वे इन मित्रा के साथ शामिल हो जायेंगे, जिनसे वे श्राज गांधीवाद : समाजवाद मतभेद रखते हैं । इस बीच में उनको बिना किसी रुकावट के अपनी योजनाओं पर अमल करने देना चाहिए । साथ ही वे भी इस बात के लिए हमेशा तैयार हैं कि दूसरे समूही को अपने खुद के श्रादर्शों के अनु- सार अपनी योजनाओं पर अमल करने दिया जाय । किन्तु सवाल यह पैदा होता है, कांग्रेस का संगठन किसके हाथ में रहे ? इस बारे में भी गांधीजी का तरीका हमें रास्ता दिखा सक्ता है। चम्पारन की लड़ाई में कॉग्रेस ने गांधीजी को मदद देने का प्रस्ताव किया था। किन्तु उन्होंने अस्वीकार कर दिया। उन्होने कहा कि काँग्रेस एक बडी और महत्त्वपूर्ण संस्था है। वह नये और अपरीक्षित प्रयोग नहीं कर सकती । वह ऐसे प्रश्न पर अपनी बुद्धिमत्ता और धीरता की ख्याति की बाजी नहीं लगा सकती जिसमें वह बिना फलितार्थों और परिणामों का खयाल किये अनजान उलझ सकती है। गाँधीजी ने सिर्फ नैतिक समर्थन चाहा, इससे अधिक कुछ नहीं। उन्होंने चाहा कि काँग्रेस अपने इतिहास और विकास की मान्यता के अनुसार अपने रास्ते पर चलती जाय । सन् १६२० में चे खिलाफत के प्रश्न पर सत्याग्रह कर चुके थे। वे अपने प्रस्ताव लेकर काँग्रेस के पास आये । उन्होने काँग्रेस से कहा कि खास सवाल को अपने हाथ में लेना संस्था के लिए अच्छा होगा, किन्तु यदि वह लेना पसन्द न करेगी तो मैं अपने रास्ते पर आगे बढ़ना जारी रक्खूगा । उन्होने यह नहीं कहा कि जब काँग्रेस मान लेगी तभी उनकी योजनाओं पर अमल किया जा सकेगा। एक बार फिर स्वराज्यपार्टी के जमाने में बहुमत साथ होते हुए भी वे हट गये और स्वराज्यपार्टी वालो के लिए खुला क्षेत्र छोड़ दिया । इसलिए सभी दलो को अपनी-अपनी योजनायें काँग्रेस के सामने रखनी चाहिए, किन्तु यदि वे योजनायें स्वीकृत न हों तो उनपर उनको अपने-आप अमल करना चाहिए और निश्चित परिणामों द्वारा लोगों का विश्वास प्राप्त करके कॉंग्रेस को हस्तगत कर लेना चाहिए। यह जरूरी नही है कि इन परिणामों से योजनाओं की सफलता साबित हो जाय, किन्तु वे ऐसे जरूर होने चाहिए जो संगठन, प्रयत्न और गांधीजी का मार्ग सफलता के द्योतक हो । वे ऐसे होने चाहिए जिससे शंकाशील लोग देख सकें कि कुछ कदम आगे बढा है। किन्तु यदि विभिन्न दिशाओं में प्रार- म्भिक काम करने के बजाय काँग्रेस संगठन को केवल ऊपर से ही हस्तगत करने की कोशिश की जायगी, तो सफल दल को शीघ्र ही मालूम हो जायगा कि ज्यादा-से-ज्यादा प्राप्त करने की आतुरता में उसने सोने का अण्डा देनेवाली मुर्गों को ही मार डाला है । पाखिर काँग्रेस कोई सरकार नही है जिसके संगठन को हस्तगत करने के बाद अपने-आप सारी सत्ता हाथ में आजाती है । काँग्रेस में जो शक्ति है वह हमने ही देश में अपने काम द्वारा, अपने संगठन के द्वारा और अपने त्याग और बलिदान के द्वारा दी है। इसलिए जल्दबाजी करके काँग्रेस संगठन को हथिया लेने से किसी भी दल का भला न होगा । यह सच है कि काँग्रेस की प्रतिष्टा महान् है, किन्तु उसका उपयोग वही लोग कर सकते हैं जो काम करें, संगठन करे और कष्ट-सहन और त्याग करने के लिए तैयार हों। और कोई उससे लाभ नहीं उठा सकता। गाँधीवाद : समाजवाद [ डा० पट्टाभि सीतारामैया ] समय-समय पर नये विचारो के प्रयोगों द्वारा दुनिया के इतिहास का निर्माण हुआ है । हरेक देश का एक प्रधान सुर रहा है जो उसके अब- तक के राष्ट्रीय जीवन की धाराश्रो की असलियत मालूम करने के लिए कुंजी का काम देता है । हम यह देखते हैं कि एक देश तथा युग विशेष प्रचलित विचार और आदर्श दूसरे देशों और दूसरे युगों में बड़ी तेजी के साथ फैले है । अन्तर इतना ही रहा कि एक जगह के सभी भले बुरे संयोगों को दूसरी जगह सामना नहीं करना पड़ा। आज के जमाने में भी गांधीवाद : समाजवाद ने , है हम देग्यत है कि विभिन्न देशों और महाद्वीपों में रहनेवाले लोगों की भावनाओं और विचारों में किस कदर विचित्रतापूर्ण और शीघ्रगामी परिवर्तन हो रहे हैं। हमारी आँखों के आगे उदाहरण इतने अधिक और इनने स्पष्ट है कि उनको गिनाने अथवा उनकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं मालूम देती। किन्तु इनमें से हम एक विचार की चर्चा करेंगे जिसका हमारे उद्देश्य के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। एक जमाने में समाजवाद नास्तिकता अथवा दिमागी फितूर तक समझा जाता था। उसके आक्रमणों से अपनी सम्मानित और परम्परागत संस्थाओं की रक्षा करने के लिए विभिन्न देशों तरह तरह के उपायों की योजना की । इस प्रकार वे केवल उसके श्रादशी की तीव्रता को कम कर सके, किन्तु उसकी लहर के प्रवाह को हमेशा के लिए नहीं रोका जा सका । एक ओर इंग्लैंड में समाजवाद का विचार एक उदार विचार रहा है, जो समाज और अर्थ-व्यवस्था के पुराने आधार पर हावी होने के बजाय प्रायः खुद उसका शिकार हो गया अवश्य ही उसका अंग्रेज-समाज पर असर पड़ा, किन्तु यह कोई नहीं करेगा कि अंग्रेज जाति की अर्थ-नीति अथवा उसके राजनतिक सिद्धान्त सम्पूर्णतः बदल गये हैं। दूसरी ओर रूस में समाजवाद के सिद्धान्तों पर पूरी तरह अमल किया गया है। उसके फलस्वरूप वहाँ के हालात में जो श्राकस्मिक और जबरदस्त परिवर्तन हुवा है, उसका असर ऊँची. ऊँची दीवारें खड़ी कर दी जाने के बावजूद दुनिया के कोने-कोने में पहुंच गया है। इस प्रकार, जैसा कि बरट्रन्ड रसल खुद स्वीकार करते हैं, इंग्लैंड में समाजवाद की ओर झुकाव रहा, किन्तु उसे एक निश्चित ध्येय के तौर पर नहीं माना गया। वहाँ खुद मजदूर-आन्दोलन का राजनेतिक दलबन्दी के प्राधार के अलावा कोई खास विरोध नहीं हुआ, हालांकि वह समाजवादी दृष्टिकोण रखने का दावा करता है। निस्सन्देह समाजवाद ने शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा बढ़ाई है और उन लोगों के लिए बौद्धिक और राजनैतिक गांधीवाद : समाजवाद सुविधायें सुलभ कर दी हैं जो अब तक दिल और दिमाग़ से शून्य केवल हाथ से श्रम करनेवाले मजदूर समझे जाते थे। इसके अलावा उसने कुछ रचनात्मक प्रसन्नता का भी संचार किया है, किन्तु इसके बाद उसकी गति रुक गई। वह न तो बेकारो को ज्यादा आशा का सदेश दे सका और न बेकारो को ज्यादा सुख पहुंचा सका । पश्चिम में राजकीय समाजवाद की ओर मुकाव बढ़ रहा है, किन्तु इस दशा में भी सिर्फ मालिक ही बदलते हैं । मजदूर तो फिर भी गुलामी ही करता है। यह ठीक ही कहा गया है कि आत्म-प्रेरणा की मात्रा में वृद्धि होने के बजाय उससे केवल पार- स्परिक हस्तक्षेप बढता है। हर हालत में समाजवाद की सभी समयसाधक योजनायो मे श्रमिक को अपने काम में उस गौरव और प्रसन्नता का अनुभव नहीं होता जिसकी वह आकांक्षा रखता है । सहयोग-आन्दोलन, श्रमिक संघवाद अथवा राजकीय समाजवाद आदि सभी के बारे में यही बात कही जा सकती है । ये विभिन्न समाजवाद योजनायें हैं जो पश्चिम में पूँ जोवाद की बुराइयों का मुकाबिला करने के लिए खड़ी की गई हैं। अब यह भली प्रकार से और आमतौर पर मालूम हो चुका है कि पश्चिम मे परिस्थितियो का जो समूह लोगो के सामाजिक और आर्थिक जीवन का नियंत्रण करता है, उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया-स्वरूप समाजवाद का जन्म हुआ है । सम्पत्ति और उत्तराधिकार विषयक कानूनों ने, जो परिवार में सबसे बड़े लड़के का ही अधिकार स्वीकार करते हैं, नौजवानों का एक ऐसा वर्ग पैदा कर दिया है जिसमें परिवारों के सबसे बड़े लड़के शामिल हैं। वे ऐशो-आराम करते हैं, पूंजी के उपयोग द्वारा अपनी सम्पत्ति बढ़ाते हैं और शोषण तथा साम्राज्य-निर्माण करने के लिए कटिबद्ध रहते हैं। उनके पास खूब सारी दौलत होती है और महत्वकांक्षा की भी कमी नहीं होती। इसके विपरीत छुटभय्यो को समाज में खुला छोड़ दिया जाता है । ये लोग अपने धनी और महत्वाकांक्षी बड़भय्यों की शोषण-योजनाओं को कार्यरूप देने के लिये कारगर एजेंट सिद्ध हुए हैं । इस प्रकार कुलीन लोगों का एक छोटा वर्ग और आम लोगो का एक गांधीवाद. समाजवाद है बड़ा वर्ग अस्तित्व में आया है । दूसरे शब्दो में दोनों वर्ग पूजीवादी और उद्योगवादी प्रणाली के एक ही चित्र के दो पहलू हैं । वास्तव में ये देश की समाज-व्यवस्था के प्रत्यक्ष परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में घटनाक्रम और भी स्पष्ट है। वाप्प-इजिन के प्रावि- कार और चीजों के उत्पादन और निर्माण में बिजली के उपयोग के कारण पश्चिमी राष्ट्र व्यापार पर एकाधिकार जमाने, बाजार तलाश करने, राष्ट्रों को गुलाम बनाने और व्यापार तथा हथियारों की श्रेष्ठता के सहारे साम्राज्यवादी प्रणाली की रचना करने में सब से आगे बढ़ गये हैं। शांति और युद्ध दोनों अवस्थाओं में ठोस और व्यापक संगठन द्वारा दुनिया का व्यापार और प्रदेश हस्तगत कर लिये हैं। यह संगठन कभी उद्योग- वाद और कभी सैनिकवाद के रूप में प्रकट हुआ । इसके फलस्वरूप उस प्रणाली का जन्म हुआ है जिसमें धनी को और धनी बनाया जाता है और ग़रीब के पास जो थोड़ा-बहुत बच रहा हो वह भी छीन लिया जाता है । इसलिये एक ओर लन्दन के पश्चिमी कोने में गगनचुम्बी महल खड़े हो रहे हैं और दूसरी ओर पूर्वी कोने में दुर्गन्धित घर हैं, जिनमें दरिद्रता का भीषण नृत्य होता है। बेकारी बढ़ गई है, क्योंकि यह प्राशा नहीं की जा सकती कि विदेशी निर्यात के लिये उत्पत्ति करने के सिद्धान्त का हमेशा समर्थन होता रहेगा। गत महायुद्ध ने पूर्वकालीन अवस्थाओं को उलट दिया है और पश्चिमी राष्ट्रों में विद्रोह की लहर उठ खड़ी हुई है। इंग्लैंड ने परम्परागत दूरदृष्टि से काम लेकर मजदूरों, व्यवसाय- संवों और समाजवाद की लहर को रोकने के लिये कई दीवारें खड़ी की हैं। दर-असल मजदूर-आन्दोलन का पिछले एचास-वर्षों का इतिहास यह बताता है कि इंग्लैंड ने, जो योरुप का सबसे अधिक उद्योगवादी राष्ट्र है और दुनिया के राष्ट्रों में सबसे ज्यादा कट्टर है, समयानुकूल रियायतें देकर किस प्रकार समाजवाद का मुकाबिला किया है। उदाहरणार्थ उसने बालिग़मताधिकार जारी किया, व्यवसाय-संघों को स्वीकार किया, हड़- तालियों को रियायतें दी, बुढ़ापे की पेंसनों, प्रसूतिकालीन सुविधाओं और , गांधीवाद . समाजवाद n बीमारी के बीमों की व्यवस्था की, भारी उत्तराधिकार-कर, अतिरिक्त आय- कर और पूँजी पर कर लगाये और बेकारों को बेकार वृत्तियों दी जहाँतक आम लोगों का सम्बन्ध है, इन रियायनो की अब आखिरी सीमा पहुंच चुकी है। इसके विपरीत उच्च श्रेणी के लोग अर्थात् नेता, जो समाजवादी सूत्रों के हामी रहे, कट्टरवाद की गोद में छिपकर खत्म हो चुके है । इंग्लैंड आज एक बड़ी क्रान्ति के मुहाने पर खड़ा है । हम आज यह नही कह सकते कि उसके फलस्वरूप फासिज्म की स्थापना होगी या समाज- वाद की। किन्तु परिस्थिति पर सावधानी के साथ निगाह रक्खी जाने की जरूरत है। इंग्लैंड मे उद्योगवाद की बुराइयों के विरुद्ध जो प्रतिक्रिया हुई, उसने इतना अरुचिकर रूप धारण नहीं किया, किन्तु योरुप के अन्य राष्ट्रो ने कम कट्टर अथवा अधिक उग्र संहारक तरीके अख्तियार किये हैं। हिटलर ने समाजवाद के साथ शुरुवात की और उचित सुधारों के साथ उद्योगवाद की गति तेज़ करने के लिए तानाशाही हुकूमत की स्थापना की । इटली ने राजतन्त्र की अोट मे जो मार्ग ग्रहण किया, वह तानाशाही से ज्यादा भिन्न नहीं है, किन्तु वहां की सस्थाओ ने हिंसा को उस हद तक नही अपनाया जिस हदतक हिटलरवाद ने अपनाया है। रूस ने एक कदम और आगे बढ़ाकर जार और उसके परिवार को मौत के घाट उतार दिया, निजी संपत्ति और निजी विदेशी व्यापार को उठा दिया और उस दल के द्वारा शासन चला रहा है जिसकी सदस्य संख्या कुल आबादी का सौवाँ हिस्सा भी नहीं है । हाँ, रूस का उद्देश्य अपने आपको स्वावलम्बी बनाना है, और इसके लिए उसने उद्योगवाद को उसकी बुराइयाँ दूर करते हुए अपनाया है। इस प्रकार हर उदाहरण मे बीसवी शताब्दी में योरुष के विभिन्न राष्ट्रो की सामाजिक और आर्थिक प्रणालियों में जो परिवर्तन हैं, वे उन देशों में प्रचलित पुरानी प्रणालियों के प्रत्यक्ष परिणाम है। इतना ही नहीं, उसको प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। लोगों ने लम्बे अर्से तक सहन किया, और खूब सहन किया, और अब उसके ७० गांधीवाद : समाजवाद . है विरुद्ध विद्रोही बन गये हैं। इन बातों से मालूम होगा कि प्रत्येक देश में जहां समाजवाद नै या उससे सम्बन्धित और किसी वाद ने सिर उठाया है, वहां प्रत्यक्षत. सामा- जिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण ही ऐसा हुआ । बहुत से स्थानों में निराशा के भीतर से आंदोलन पैदा हुआ और लोगों के अस- न्तोष ने अमुक आदर्शवाद से प्रेरित होकर श्रेष्टतर समाज-व्यवस्था और अर्थिक संगठन की रचना की, जिसकी कल्पना आन्दोलन की प्रारम्भिक अवस्था में सम्भवतः मुश्किल से ही किसी ने की हो । हिन्दुस्तान में भी सर्वत्र इसी प्रकार का असन्तोष विद्यमान है। इसलिए सरल आलोचक की निगाह मे वही उपाय तत्काल आ जाते हैं जिनको पश्चिमी राष्ट्रों ने अपनाया है किन्तु यदि हम अपने यहां के हालात पर कुछ विस्तार के साथ गौर करेंगे तो यह मालूम करना मुश्किल न होगा कि पश्चिम की उन परि- स्थितियों में, जिनके कारण वहां विद्रोह की हलचलें शुरू हुई, और पूर्व अर्थात् हिन्दुस्तान को परिस्थितियों में व्यापक और मौलिक भेद हैं । हमारे देश में पश्चिम सरीखा उद्योगवाद नही है । आखिर सारे हिन्दुस्तान के शहरों में कल कारखानों से सम्बन्धित जन-संख्या १५ लाख ही तो है। और हमारी कुल आबादी ३५ करोड़ है, जिसमे से प्रायः नौ-दसांश लोग खेती के धन्धे पर निर्वाह करते हैं । बम्बई के मजदूर भी अंशतः खेती- हर आबादी में से निकले हुए हैं। वे आस-पास के गांवो से वहां इकटे हो गये हैं । हिटले कमीशन ने इस प्रकार के मिश्रित शिक्षण के लाभ को महसूस किया है, हालांकि विशुद्ध औद्योगिक दृष्टिकोण से यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस प्रकार की व्यवस्था दुधारी तलवार का काम देती है। कुछ भी हो, यह सत्य है कि नौ-दसांश लोग अब भी गांवों में रहते हैं। उनकी किस्मत अपने गांवो के साथ गुंथी हुई है । वस्तु-स्थिति यह होने पर भी राजनैतिक क्षितिज पर शहरों की समस्याएं ही निस्सन्देह ।

गांधीवाद : समाजवाद ज्यादा अंकित होती हैं । किन्तु जब नये अान्दोलन जारी किये जा रहे हैं, यह अच्छा होगा कि हम ज्यादातर अपनी आँखों के आगे आनेवाले दृश्यों के साथ बह जाने के बजाय स्थिति की वास्तविकताओं को भी समझ लें । बुद्धिमान पालोचक समाज की परिस्थितियों का अध्ययन करेगा और इस बात का खुद ही निर्णय करेगा कि जो इलाज बताया जाता है वह वर्तमान परिस्थितियो मे कहांतक अनुकूल है। हम देख चुके हैं कि पश्चिम में किस प्रकार उद्योगवाद का असर लोगों पर क्रमशः कमजोर होता गया है। दो राष्ट्रो ने, जो उसके सबसे खराब पुजारी रहे हैं अर्थात् इंग्लैंड और जर्मनी ने, कटु अनुभव बाद यह महसूस किया कि हमेशा के लिये आयात की अपेक्षा विदेशी निर्यात पर निर्भर रहना असम्भव होगा। जहां तक इन देशों का सम्बन्ध है, निर्यात तयार माल का होता है और आयात कच्चे माल और खाद्य- सामग्री का होता है। यदि प्रौद्योगिक मनोवृत्ति रखनेवाला हरएक राष्ट्र उद्योगवाद के सिद्धांत पर चलकर समृद्ध होना चाहे तो उसको हमेशा अपना तैयार माल दूसरे देशों को भेजना होगा । किन्तु न केवल स्वा- वलम्बी होने की बल्कि निर्यात करने की वही लगन दूसरे राष्ट्र पर भी हावी हो सकती है । उस दशा में सतत प्रतिरपी का क्रम शुरू हो जायगा और हरेक राष्ट्र ज्यादा से ज्यादा बेचना और कम-से-कम खरीदना पसन्द करेगा । जब सभी राष्ट्रों की ऐसी प्रवृत्ति हो जाती है तो उनको बाजार नही मिलते और उन्हें दूसरी निर्बल जातियों का शोषण शुरू करना पड़ता है। अबतक पश्चिमी राष्ट्रों के लिए पूर्व शोषण का अच्छा क्षेत्र रहा है। किन्तु जब जापान पश्चिम के सर्वोपरि औद्योगिक राष्ट्रों का सफलतापूर्वक मुकाबिला करने लगा है, जब चीन युगों की शिथिलता छोड़ चुका है और हिन्दुस्तान में नवीन राष्ट्रीय चेतना प्रस्फुटित हो रही है, जब अफगा निस्तान प्रगतिशील राष्ट्रों के साथ कदम बढ़ा रहा है, फिलस्तीन और सीरिया पश्चिम के हाल के आक्रमणों से बच कर तेजी से उठ रहे हैं, और गांधीवाद: समाजवाद जब तुर्किस्तान योरप का बीमार और मिश्र विदेशी राष्ट्रों का खिलौना नहीं रहा, तब यह कहा जा सकता है कि इङ्गलैंड और जर्मनी के लिए शोपण का क्षेत्र कम-से-कम रह गया है। सौभाग्य से फ्रांस इस स्थिति में है कि वह अपनो औद्योगिक और कृषि की पैदावार का संतुलन कर सकता है । इटली प्रौद्योगिक की अपेक्षा कृपि-प्रधान देश अधिक है । वह भी उन क्षेत्रो मे स्वावलम्बी बनने की तेजी के साथ कोशिश कर रहा है, जिनमे वह पिछड़ा हुआ था। इन सबसे रूस का उदाहरण भिन्न है । उसने अकेले और सफलता पूर्वक लड़ाई लड़ी है। उसने उत्पादन की जबरदस्त योजना बनाकर अपनी सब जरूरतें स्वयं पूरी की हैं। उसने न केवल कल-कारखाने ही बनाये, विशाल धोकनियां और भट्टियां ही बनाई, बल्कि मांस की अायात बन्द करने के लिए प्रथम पांच वर्षों में एक करोड़ खरगोशों का लालन-पालन किया । उसने विदेशी व्यापार का दरवाजा भी बन्द कर दिया है। विदेशी व्यापार की मात्रा घटाकर कम-से-कम करदी है। जो थोड़ा-बहुत व्यापार होता है वह राज्य की मार्फत होता है, ज्यादातर चीजों के विनिमय के लिए होता है और तभी होता है जब रुपये की अनिवार्य आवश्य- कता होती है। इस प्रकार पश्चिम के राष्ट्र स्वावलम्बी बनने के लिए मजबूर हो गये हैं। उदाहरणस्वरूप हमने पढ़ा कि जर्मनी को इस साल सर्दी में अपनी चीजों का हरेक व्यक्ति के लिए निश्चित बँटवारा कर देना पड़ेगा, क्योंकि वहाँ निर्यात से आयात का खर्च पूरा नहीं हो पाता है। इस प्रकार यदि पश्चिम के राष्ट्र अपने पूर्वी बाजार खो चुके हैं और अपना तैयार माल आपल मे एक-दूसरे को नहीं बेच सकते तो उन सबको आत्म निर्भर और स्वावलम्बी बनना पड़ेगा । जब यह स्थिति पैदा हो जायगी तो निर्यात के लिए चीजों का बनाना बन्द हो जायगा, स्थानीय खपत के लिए उत्पत्ति होती रहेगी और लोग इस बात को कभी मंजूर न करेंगे कि एक प्रादमी तो माल पैदा करे और वे लाखो की संख्या में माल का उपयोग कर गांधीवाद : समाजवाद . उत्पादक के लिए मुनाफे या दौलत का ढेर लगावें और गगनचुम्बी महलो का निर्माण करके खुद तग और अंधेरी कोठरियो में पड़े रहे । जब बडे पैमाने पर माल तैयार होना बन्द हो जायगा, तो श्रमिको को मजदूरी न मिलेगी। उस दशा में बेकारी का यही इलाज हो सकता है कि या तो सह- योगात्मक पद्धति पर उत्पत्ति का मुनाफा बाँट लिया जाय या प्राचीन गृह- उद्योगो का आश्रय लिया जाय । इस प्रकार शायद हम थोड़े सुदूर भविष्य की कल्पना कर रहे हैं, किन्तु जब हम राष्ट्रो के भाग्यो को कल्पना कर रहे हैं और सारे भविष्य की ही योजना बना रहे हैं तो यह अच्छा होगा कि हम धुंधलेपन की अपेक्षा गहराई से दूर तक देखने की कोशिश करें। डेढ शताब्दी तक अकल्पित समृद्धि और अप्रत्याशित कष्ट सहन के बाद योरुप ने महसूस किया कि श्राम-निर्भरता और स्वावलम्बन का आदर्श अनिवार्य है और यह कि गृह-उद्योग और हाथ की दस्तकारियों की ओर लौटना होगा। सौभाग्य से यह आदर्श ही हिन्दुस्तान की युगों पुरानी समाज व्यवस्था का मूल आधार है-उस व्यवस्था का जो समय और परिस्थितियो की टक्करें झेलने और लगातार आततायी आक्रमणी का सामना करने के बाद आज भी जीवित है । भूतकाल में हमारे यहाँ भी शहर बसे थे जो दुनिया के काफिलों के लिए मोती और सोने के बाजार थे । वे देश में दौलत लाते थे, आजकल के शहरों की तरह देश की दौलत को खींच नहीं ले जाते थे। किन्तु हिन्दुस्तान प्रधानतः गांवों का सुल्क है, क्योकि सात लाख गांव के मुकाबिले में दर्जन दो दर्जन शहरो और हजार दो हजार कस्बो की क्या गिनती ? हमारे गांवों में बिखरे हुए झोंपड़े नहीं है, बल्कि उनमें एक ही किस्म की सुगठित सुविभाजित आबादी बसी हुई है, सभ्य जीवन के लिए श्रावश्यक हर दस्तकारी का उसमें समावेश है। गाँवों में बढ़ई और लुहार, राज और सुनार, कतवैया और जुलाहा, छीपा और रंगसाज, धोबी और नाई, मोची और किसान, कवि और लेखक सभी रहते हैं । ये सब मिलकर गांव को राष्ट्र की स्वाश्रयी और स्वावलम्बी इकाई बना देते हैं। ऐसी दशा में आवागमन के साधन बन्द ।

गांधीवाद : समाजवाद हो जायँ अथवा गाँव बाढ या सेना ले घिर जाय तो भी उसका क्या बिगड़े हमारे लिए यह लाल तौर पर सौभाग्य की बात है कि हन ऐसे मामा- जिक और आर्थिक संगठन के धनी हैं जिसके लिए पश्चिमी राष्ट्रों को खोज करनी पड़ी और जिसके पुनरुद्धार के लिए उनको गुश्किल का सामना करना पड़ रहा है । यह ऐसा संगठन है जो सबके लिए काम सुलभ करता है और सबके लिए काम सुलभ करने का अर्थ हुश्रा हरेक के लिए भोजन और वस्त्र की व्यवस्था करना । जब भोजन और वस्त्र की व्यवस्था हो गई तो बाद मे अवकाश भी मिलेगा । अवकाश ज्ञान और संस्कृति प्राल करने का अवसर देता है और मनुष्य के लिए उच्चतर जीवन का, आत्मनुष्टी का द्वार खोल देता है । गांवो में न केवल सबके लिए काम की ही व्यवस्था की गई है, बल्कि धन्दों को प्रायः वंशपराम्परागत बना दिया गया है ताकि हस्तकौशल और बौद्धिक प्रतिभा सुरक्षित रह सके । यही वजह है कि हिन्दुस्तानी दस्तकारी को इतना महत्व प्राप्त हुआ, आज भी ग्राम है और जुलाहे और कुम्हार तत्त्ववेत्ता बन सके । कारीगरों की पंचायतें पता नहीं यहाँ कितने अर्से से कायम हैं जो न केवल उत्पादन की मात्रा पर ही अंकुश रखती हैं, बल्कि चीजो की अच्छाई-बुराई पर भी निगाह रखती है। इसीलिए सस्ती और रद्दी चीजें बनाना, पश्चिम जैला दिखावटी किन्तु बेकार माल तैयार करना गुनाह ही नहीं पाप समझा जाता है । दस्तका- रियों में न केवल कला का ही खयाल रक्खा जाता है बल्कि धार्मिक श्रद्धा-भक्ति का अादर्श सामने रहता है। इस प्रकार धार्मिक निषेध प्रति- स्पर्धात्मक प्रणाली की अनैतिकताओं पर बांछनीय अंकुश का काम करते है । संक्षेप में, हमारे गांव सहयोगी परिवारों के समूह हैं जहाँ व्यक्ति समाज के लिए और समाज व्यक्ति के लिये काम करता है अतः हिन्दुस्तान की वर्तमान परिस्थितियों में समाजवाद की योजना लागू करने के प्रश्न पर विचार करते समय हमको इस बात से प्रभावित न होना चाहिए कि कुछ उद्योगपतियों ने मजदूरो को चूसा है अथवा अधिकतर जमींदारों ने किसानों का शोषण किया है। इन परिस्थितियो गांधीवाद . समाजवाद . का बेशक हमको सामना करना पड़ेगा, किन्तु देश को जरूरतों का फैसला करते समय यदि हमने उनको अपने पर हावी हो जाने दिया तो हम अपना संतुलन खो देगे। यह हमारी खुशकिस्मती है कि हम ऐसे सामाजिक और प्रार्थिक संगठन के उत्तराधिकारी हैं जिसमें रुपये और संस्कृति के बीच बरावर साम्य कायम रक्खा गया है। उसमें ज्ञान कमाने का नही सेवा का साधन माना जाता है, और यह निर्देश किया गया है कि सम्पत्तिवान ज्ञानवान लोगो का निर्वाह करे। विद्या का दरिद्रता से नाता जोड़ा गया है और धन को समाज में दूसरा स्थान दिया गया है। समाजवाद केवल पैसे की प्रधानता के खिलाफ बगावत है, किन्तु जिस समाज-व्यवस्था में पैसे को प्रधानता नही दी गई, वहाँ इस बगावत की क्या जरूरत रह जाती है ? दरअसल भारतीय समाज का निर्माण ही उस विद्रोह के फलस्वरूप দুস্থা है। वह युगों की कसोटी पर सफल साबित हुआ है, और इसलिए उनकी एक बार फिर परीक्षा की जानी चाहिए । समाज के संगठन का आधार पैसा नहीं, सेवा है और यह नया माप प्रस्तुत करता है । यह प्रेम का परिचायक और संयुक्त जीवन का स्तम्भ है । जहाँ सेवा मानवी सम्बन्धो का मूल आधार होती है, वहाँ प्रेम जीवन का स्रोत सिद्ध होगा। उसी के बल पर वास्तव में सेवा की भावना कायम रह सकती है। और जब प्रेम और सेवा समाज के आधार बन जायेंगे तो शक्ति और धन को बाद में स्थान मिलेगा । शक्ति का स्थूल स्वरूप पैसा है । पश्चिम में शक्ति और पैसा ही समाज के आधार हैं। उनके कारण वहाँ वर्गों और प्राम- जनता मे संवर्ष है, प्रतिस्पर्धा की भावना सर्वव्यापी हो रही है, भौतिक सम्पत्ति की भावना को भूख बढ़ी हुई है, बाजारों की तलाश है और सनिकवाद की भावना जोरों पर है । उनको हटा दीजिए या उनका प्रभाव कम-से-कम कर दीजिए; आप ऐसे समाज की रचना कर सकेंगे जो दूसरे समाजो से सर्वथा भिन्न होगा। एक शब्द में कहें तो हम अपने प्राचीन समाज पर पुनः पहुंच जावेंगे। अवश्य ही उस पर धूल चढ गई है। योरूप के इस आदर्श ने कि ज्ञान पैसा कमाने का साधन है, विद्या के , गांधीवाद : समाजवाद , . पूर्वी आदर्श को भ्रष्ट कर दिया है। पिछली शताब्दी में सत्ता और अधि- कार की भूख ने मानव स्वभाव को पतित कर दिया है, हालांकि सत्ता और अधिकार वास्तव में सेवा के ही साधन है । यह जो जग लग गया है, भ्रष्टता आगई है, बिगाड़ पैदा हो गया है, उससे हमको अपनी रक्षा करनी होगी और भीतरी धातु को गलाकर, जलाकर साफ करना होगा। जाति-प्रथा लोगों की परम्परागत शक्तियों की रक्षा करने के बजाय लड़ाई- झगड़े का दूसरा रूप बन गई है। कुछ अर्से से ब्रिटेन के संरक्षण में राजनीति को जातिगत और समुदायगत रूप दे दिये जाने के कारण उसका और भी पतन हो गया है। अतः यह हमारा तात्कालिक काम है कि हम अपने वर्ण और आश्रम के आदर्शों का पुनरुत्थान करें और उनमें उनके धर्म की प्रस्थापना करें। जब किसी जमाने में कोई बड़ा आदमी पैदा होता है तो यह निश्चितरूप से नहीं कहा जा सकता कि उस आदमी ने जमाने को बनाया या जमाने ने उस श्रादमी को बनाया है। जहाँतक गाँधीजी और भारतीय समाज का ताल्लुक है, हम यह मान सकते हैं कि दोनों का एक-दूसरे पड़ा है। समाज की परिस्थितियो ने गाँधीजी के मानस का पुनर्निर्माण किया है और गाँधीजी ने अपने व्यक्तित्व की छाप भारतीय समाज पर लगा दी है। उन्होंने एक नये धर्म का विकास किया है जो हिन्दू समाज के चार वर्णों और चार आश्रमों के अलग-अलग धर्मों का सम्मिश्रण है। गाँधीजी ने अपने व्यक्तित्व में किसान और जुलाहे के, व्यापारी और व्यवसायी के, युद्ध करने और रक्षा करनेवाले क्षत्रिय और अन्ततः लोकसेवक के गुणों का एक साथ समावेश किया है। सेवा और प्रेम के द्वारा वे स्मृतिकर्ता और सूत्रकार के दर्जे तक पहुंच गये हैं। उन्होंने ब्रह्मचारी, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्मों को भी एक साथ अपनाया है। उन्होने जीवन के आदर्शों का, जो एकान्तिक समझे जाते थे, सामंजस्य और समन्वय कर दिया है और उनको व्यापक और सर्वांगीण बना दिया है। पर प्रभाव .

गांधीवाद : समाजवाद . इस दृष्टि गाँधीजी, अनुभव करते है कि आज चार वर्णों का अस्तित्व नही रहा है, इसलिए जो लोग वर्गों को मानते है उनका यह कर्त्तव्य है कि वे पवित्रता और संयम के सर्वोपरि सिद्धान्तों का पालन करके उनकी पुनर्स्थापना करें। उन्होंने हिन्दू-समाज की शुद्धि करने की कोशिश की है, सोने पर जो आवरण चढ़ गया है उसको हटाने का प्रयत्न किया है। वे एक बार फिर सेवा और प्रेम के आधार पर समाज को पुनर्रचना करना चाहते है । "सर्वेजनाः सुखिनो भवन्तु” इस प्रार्थना का आदर्श उन लोगो के सामने फिर से पेश किया गया है जो दिन में तीन बार मन्त्रों का उच्चारण करते हैं। किन्तु उनका अर्थ कुछ नहीं समझते से गांधीजी के स्वराज्य का अर्थ सत्ता और शक्ति का उपयोग नहीं है, बल्कि प्रेम और सेवा के आदर्श के प्रचार द्वारा सबके लिए भोजन और वस्त्र सुलभ करना है । किन्तु भोजन और वस्त्र आकाश से नहीं गिर पड़ते, उनके लिए मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है । इस उद्देश्य के लिए गांधीजी ने शरीर-श्रम का उपदेश दिया है और प्रत्येक स्त्री-पुरुष और बच्चे के लिए कातना दैनिक यज्ञ करार दे दिया है । इस प्राचीन देश की विशाल मानवशक्ति में, जिसकी आबादी चीन से कुछ ही कम है। उन्होने धन- दौलत का अभूतपूर्व स्रोत ढूढ़ निकाला है। यह स्रोत व्यापार के संतुलन पर, बाजारो पर, साम्राज्यगद और सैनिकवाद पर, विनिमय अथवा मुद्रा के पराभव और विस्तार पर अथवा वैज्ञानिक आविष्कारों और अन्वेषणों पर निर्भर नहीं करता है । यन्त्रों की प्रतिस्पर्धा से इस मूलभूत स्मृद्धि के लिए कोई खतरा पैदा नही होता, क्योंकि सादा जीवन और उच्च विचार, कड़ी मेहनत और ईमान की कमाई का सादा आदर्श उसका आधार है। गांधीजी का मार्ग नकारात्मक मार्ग नही है। वह बड़ी ताकत अथवा बड़ी प्रतिस्पर्धा के आगे झुकने का तो मार्ग है ही नहीं। जब विचार अनुकूल होते हैं और दिल में प्रेम पैदा हो जाता है तो मां की ओर से मिली हुई तुच्छ-से-तुच्छ चीजें अमूल्य हो जाती हैं और वे विदेशों से आने वाली बढ़िया-से-बढ़िया चीजों के मुकाबिले में खड़ी रह सकती हैं।

गांधीवाद : समाजवाद इसके विपरीत गांधीजी ने तो चीजें तैयार करने का बड़ा सस्ता तरीका बता दिया है। वह इस प्रकार कि जो श्रम ठेके पर नही किया जाता बल्कि अवकाश के समय और प्रेम को खातिर किया जाता है उसके मूल्य का हिसाब नही लगाया जाना चाहिए। इस प्रकार मालूम होगा कि भोजन और वस्त्र के मामले में, जो मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है, गांधीजी प्रायः स्वावलम्बन के पक्षपाती हैं। जहां व्यक्ति स्वावलम्बी है, वहां गांव स्वावलम्बी हैं, कस्बे स्वावलम्बी हो जायेंगे और शहरों की वृशि स्वावल- म्बन की ओर रहेगी। यह सब रक्त बहाकर शक्ति के जोर से, न होगा। इसके लिए अधिकारों पर निरन्तर आग्रह करने के बजाय सीधी तरह कर्त्तव्य को अपनाना होगा, जबरदस्ती श्रम करने के बजाय स्वेच्छापूर्वक श्रम करना होगा, ताकत के बजाय प्रेम से काम लेना होगा, महत्वाकांक्षा के बजाय सन्तोष धारण करना होगा, जीवन निर्वाह का माप बढाने के बजाय घटाना होगा, मौज-शौक के बजाय संयम का पाठ पढाना होगा कूट-नीति अथवा दम्भ के बजाय सत्य का श्राश्रय लेना होगा। यदि समाजवाद का उद्देश्य सबको समान सुविधायें देना है, तो गांधी- वाद का यह उद्देश्य है कि हरेक आदमी अपने समय और सुविधाओं का उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयोग करे। यदि समाजवाद पूजी-कर, भारी अतिरिक्त आय-कर. जन्ती और शक्ति द्वारा सम्पति को स्थानाच्युत करता है, तो गांधीजी युगों पुरानी परम्परा का आह्वान करते हैं, जिसने अमीरी के मुकाबले में निर्धनता को और धन के मुकाबिले मे ज्ञान को महत्व दिया है । यदि समाजवाद अपने उद्देशो की पूर्ति के लिए राज्य की सहायता लेता है, तो गांधीवाद अपनी सफलता के लिए प्रत्येक नाग- रिक के अन्तःकरण की उन्नति और संस्कृति के विकास पर विश्वास करता है। समाजवाद के बाहर से लादे हुए परिणाम दिखाने में शानदार मालूम देते हैं, किन्तु वे वास्तव में अनिश्चित और खतरे से परिपूर्ण होते हैं। गांधीवाद के परिणाम जो छोटे दिखाई देते हैं, लोगों की सद्भावनाओं के आधार पर मजबूत और गहरी जड़ें जमा लेते हैं। समाजवाद को यह और .

गांधीवाद : समाजवाद -- दुःखद दृश्य देखना पड़ा कि उसके पुजारी अपने सिद्धान्तो और शक्ति को स्थिर रखने के लिए तानाशाह बन गये : गांधीवाद स्वेच्छापूर्वक स्वार्थत्याग करने में विश्वास करता है। उसने सांगली के ठाकुर, ढसा के इरबार गोपालदास देसाई और कालाकांकर (संयुक्तप्रान्त) के राजा जैसे आदमी पैदा किये हैं। अधिकांश लोगो के लिए समाजवाद एक वृत्ति है, किन्तु गांधीवाद कठोर सत्य है। समाजवाद दूसरो को उपदेश देता है; गाधीवाद हरेक आदमी को उसका करीव्य सुझाता है। समाजवाद घृणा और फूट द्वारा मानवता का प्रचार करना चाहता है। गांधीवाद मानव सेवा के लिए घृणा और फूट का त्याग करता है। समाजवाद ऐले देश की खाद्य सामग्री को इकट्ठी करता है; जहाँ के कुछ भाग बजर हैं और फिर उस सामग्री को बांट देता है, गांधीवाद ऐसे देश में जहां हर तरह की मिट्टी और सतह मौजूद है और हर तरह की जलवायु और परिस्थि- तियां विद्यमान हैं, हरेक आदमी से अपना भोजन-वस्त्र खुद पैदा करने का आग्रह करता है; समाजवाद मजदूरी का हिसाब रखता है और हरेक आदमी को राज्य के लिए श्रम करने को विवश करता है; गांधीवाद दुनिया को इस बात की श्रेष्ठता बताता है कि व्यक्तियों के प्रत्येक परम्परा के अनुसार उस समूह के हरेक स्त्री-पुरुप को अपने और अपने परिवार के लिए काम करना चाहिए। समाजवाद ऐसे समाज मैं, जहां परिवार के भीतर भी असमानता का बोलबाला है, सम्पत्ति का समान विभाजन करना चाहता है; गांधीवाद हिन्दुओं के उत्तराधिकारी विषयक कानूनो से लाभ उठाता है, जिनके अनुसार सभी लड़के पिता की सम्पत्ति के समान हकदार होते हैं और मुसलमानों मे तो लड़कियों को भी उचित हिस्सा मिलता है । समाजवाद पश्चिम की समाज व्यवस्था के गोलमाल का इलाज हो सकता है, किन्तु गांधीवाद समाज के ऐसे संगठन और कर्तव्यों को व्यक्त करता है जिनकी ऋषियों ने हजारों वर्षों पहले रचना की थी और जिनको आज दूसरा ऋषि पुनर्सगठित कर रहा है । इसीलिए तो गांधीजी ने करांची में कहा था- "गांधी मर सकता है, किन्तु गांधीवाद अमर रहेगा।" समूह की । - गांधीवाद : समाजवाद गांधीवाद और समाजवाद [ के० सन्तानम् ] मुझे इस ख्याल के लिए कोई वजह नहीं मालूम होती कि गांधीवाद और समाजवाद तत्वज्ञान की दो प्रतिस्पर्धी प्रणालियां हैं अथवा वे समाज के पुनसंगठन की एक-दूसरे से भिन्न योजनायें हैं। मुझे इस बात में बड़ा नुकसान दिखाई देता है कि हमारे नौजवान विचारक और कार्यकर्ता यह मनकर चलें कि उनको दोनो में से किसी एक को पसन्द करना होगा। गांधीवाद और समाजवाद ये दो शब्द जिन विचारों के द्योतक हैं. उनको हिन्दुस्तान के दो सर्वप्रथम नेताओं ने निश्चित रूप में देश के सामने पेश किया है और जब महात्मा गांधी और पण्डित जवाहरलाल नेहरू कुछ मतभेदों के होते हुए भी निकटतम सहयोग के साथ काम कर रहे हैं, तब हम दोनों प्रणालियों के आदर्शों और तरीको की भिन्नताओं पर जोर देने के बजाय क्यों न उनके बीच में कोई-न-कोई सामंजस्य खोजने की कोशिश करें ? इसमे कोई शक नहीं कि दोनों प्रणालियां पहली नजर में बिलकुल विरोधी प्रतीत होती है । समाजवाद का यह दावा है कि वह मानव जाति के ऐतिहासिक विकास के सूक्ष्म विश्लेषण पर खड़ा है; गांधीवाद अपनी कल्पना के अनुसार उस विकास के लक्ष्य को अपना आधार मानकर चलता है। पहला बहिर्मुखी है और दूसरा अन्तर्मुखी । एक भौतिकवादी दूसरा आदर्शवादी । समाजवाद बुद्धिवादी होने में गर्व अनुभव करता है और गांधीवाद मूलतः धार्मिक है । समाजवाद भाप और बिजली द्वारा संचालित उद्योगो और आधुनिकता की जोरो से वकालत करता है, किन्तु गांधीवाद गृह-उद्योगों को पहली जगह देना चाहता है । समाजवाद यांत्रिक कुशलता पर जोर देता है और गांधीवाद व्यक्तिगत चरित्र को है और गांधीवाद : समाजवाद समाज-पुनर्रचना का मुख्य आधार मानता है। दोनो की सभी विभिन्न ताओ को एक शब्द मे कहा जाय तो समाजवाद को "वैज्ञानिक भौतिक वाद" और गांधीवाद को “क्रियाशील आदर्शवाद" कहा जा सकता है। इस बात पर विचार करने के पहले कि क्या यह विरोधाभास उतना ही मौलिक है जितना कि पहली नजर में दिखाई देता है, यह उपयोगी होगा कि मैं उन बातों को संक्षेप मे लिख दूजिनको मैं दोनों के मुख्य सिद्धान्त मानता हूं। गाँधीवाद, जैसा कि मैंने उसको समझा है, इस मौलिक अाधार को लेकर चलता है कि मानव विकास का सर्वोपरि उद्देश्य है आत्मा की आध्यात्मिक पूर्णता । इसका निश्चय ही यह मतलब नहीं है कि मानव- शरीर अथवा मन या उन सामाजिक परिस्थितियो की उपेक्षा की जाय जो शरीर और आत्मा दोनों की स्वस्थता के लिए आवश्यक हैं। गांधीवाद के अनुसार शरीर, मन और आत्मा के बीच में कोई विरोध नहीं है। किन्तु वह मानता है कि आत्मा अथवा आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए शरीर और मन का कड़ा नियमन आवश्यक है । गांधीवाद खुराक और दैनिक जीवन क्रम पर, विचारो और शब्दों की मितव्ययता पर, बड़ा जोर देता है। सबसे अधिक वह शरीर की स्वस्थता के लिए मन की शुद्धता के लिए और आत्मा की प्रसन्नता और पूर्णता के लिए, जो कि मानव प्रयत्नों का महान् उद्देश्य है, यह बिलकुल आवश्यक समझता है कि विकारों को वश में रक्खा जाय । उपर्युक्त मौलिक कल्पना से तत्काल अहिंसा का सिद्धान्त सामने आ जाता है। अव्यवस्थित विकार और स्वार्थपरता ही हिंसा की जड़ें हैं। इनके साथ निरन्तर जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहना आन्तरिक विकास की अनिवार्य शर्त है। यह संघर्ष ढीला पड़ा नही कि अपने आप जड़ता श्रा जाती है और पतन होने लगता है । जहाँ अहिंसा के सिद्धान्त का नकारात्मक रूप यह है कि हम अपनी घृणा करने, दबाने और सताने की वृत्तियों और इच्छाओ को धीरे-धीरे कम करें, वहां अहिंसा के सिद्धान्त .

गांधीवाद : समाजवाद के अनुसार यह भी कम जरूरी नहीं है कि विशुद्ध प्रेम और नि स्वार्थ कर्म का अभ्यास किया जाय । गांधीवाद के अनुसार समाज को इस प्रकार संगठित किया जाना चाहिए कि उसके सदस्यों को ऊपर लिखे मुताबिक आध्यात्मिक विकास का अधिक-से-अधिक मौका और सुविधाएं मिल सके । इसलिए गांधीवाद शहरी जोवन की अपेक्षा ग्रामीण जीवन को पसन्द करता है। ग्रामीण जीवन सादगी, शान्त विचार और अस्वास्थ्यकर उत्तेजना से बचाने के लिए अधिक उपयोगी होता है। गांधीवाद सादे गृह-उद्योगों को पसन्द करता है, क्योंकि बड़े पैमाने पर चलनेवाले उद्योगों में पेचीदा और दमन कारक संगठन कायम हो जाता है जो व्यक्ति को अपने विकास के लिए आवश्यक स्वतन्त्रता से वंचित कर देता है । गांधीवाद की सबसे बड़ी खूबी शायद इसी में है कि उसने अपने तरीके को पूर्णता की हद तक पहुँचा दिया है । वह अन्याय के सामने चुपचाप सिर झुका लेने में विश्वास नहीं करता। वह कठोर-से-कठोर दिल को पिघलाने के लिए अहिंसात्मक कष्ट सहन की शक्ति में असीम विश्वास रखता है और सत्याग्रह का अमोघ हथियार देता है जो हर समय और हर परिस्थिति में मिल सकता है। अब समाजवाद का विचार करें। सभी समाजवादी समाज विकास की मार्क्स-कृत व्याख्या को समान रूप से स्वीकार करते हैं। यह खयाल करना गलत है कि मार्क्स ने मानव-विचारों अथवा आध्यात्मिक मूल्यो को कोई महत्व नहीं दिया। समाज की भौतिक व्याख्या का जो दावा है वह यही कि यद्यपि समाज के ऐतिहासिक विकास में पा-यात्मिक विचार अंगभूत तत्वों के रूप में काम करते हैं, किन्तु आम जनता प्रभावित और संचालित सम्पत्ति के उत्पादन और विभाजन के तरीके द्वारा ही होती है। अबतक पूजीपतियों के एक वर्ग ने उत्पत्ति के साधनों पर कब्जा जमाकर मनमाने तौर पर उत्पादन और विभाजन का काम किया है। इस वर्ग ही ने धर्म, कला और मनुष्य की दूसरी हर महान सफलता का इस तरह उपयोग किया है कि जिससे उसके ही उद्देश्यों की पूर्ति हो और उसकी ताकत गांधीवाद : समाजवाद ८३ में इस सजबूत बने । मध्ययुग वर्ग की सशा सीमित थी, कारण उस जमाने में उत्पत्ति के साधन भी प्रारम्भिक ही थे । किन्तु विज्ञान और यन्त्र-विद्या के विकास के साथ इस सत्ता में भारी और भयंकर परिणाम में वृद्धि हो गई है और उसी हिसाब से शोषित लोगो को निर्भयता, और निस्सहायावस्था बढ़ गई है। वर्ग-युद्ध के इस विस्तार के कारण प्राधुनिक समाज तेजी के साथ भयंकर संघर्ष की ओर चला जा रहा है। इस संघर्ष का यह नतीजा होगा कि शोषित लोग उत्पति के साधन पूँजीपतियों के हाथ से छीन लेंगे, उनको सार्वजनिक सम्पत्ति बना डालेंगे और वर्ग-हीन समाज की स्थापना करेंगे जो पहली बार जन-साधारण को शरीर, मन और आत्मा के विकास का खुला अवसर देगा। समाजवाद का यह मानना है कि जबतक ऐसा नहीं होता, इस प्रकार के विकास का सच्चा अवसर पूँजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग के चन्द लोगो को ही मिलेगा। श्रमिक वर्ग के लोगों को यह अवसर इसलिए मिलेगा कि पूँजीपति श्रमजीवियों में फूट डालने और उनको गिराने के लिए श्रमजीवियों में से कुछ पर कृपा कर दिया करते हैं ! समाजवादियों में जो मतभेद है वह ज्यादातर इसलिये है कि उनकी वर्ग-युद्ध की प्रगति सम्बन्धी कल्पनायें भिन्न हैं और वे इस बारे में एकमत नहीं हैं कि उन्हें किस हद तक और किस रूप में वर्ग युद्ध को जान-बूझकर बढ़ाना और चलाना चाहिये। अब मैं इस बात पर विचार करूँगा कि गाँधीवाद और समाजवाद का प्रकट विरोध कहाँतक वास्तविक है। यदि मैं इस बात का सम्पूर्ण और विस्तृत विश्लेषण करूँ तो यह लेख बहुत लम्बा हो जायगा । किन्तु मुझे ऐसा मालूम होता है कि दो बाजू होते हुए भी सिक्का एक ही हो सकता | क्या गाँधीवाद और समाजवाद एक ही समस्या के दो पहलू नही हो सकते ? यह सम्भावना के क्षेत्र से आगे की बात है, यह स्पष्ट हो सकता है यदि हम समाजवादी तत्वज्ञान का श्राम समाजवादियों की अपेक्षा थोड़ा ज्यादा अध्ययन करें। वर्ग-रहित समाज का उद्देश्य क्या है ? यदि उसका है गांधीवाद : समाजवाद है । उद्देश्य केवल शारीरिक आवश्यकताओं और सुविधाओं की व्यवस्था करना हो तो ब्रिटेन, अमेरिका, स्केण्डिनेविया आदि देश उस सतह पर पहुँच गये हैं, जो मैं समझाता हूँ, उस स्थिति से ज्यादा कम नहीं है जिसको पाने की समाजवाद आशा कर सकता है । सच तो यह है कि यदि ब्रिटेन वास्तव में समाजवादी हो जाय और पिछड़े हुए देशो का शोपण करना बन्द करदे तो उसके जीवन का भौतिक माप बढने की अपेक्षा घट ही सकता है । मेरा कहना यह है कि मानव कार्यों में मुख्य प्रेरणा के तौर पर लोभ और लालच को नष्ट करने के लिए वर्गरहित समाज की जितनी जरूरत उतनी भौतिक सुख के लिए उसकी जरूरत नहीं है । भौतिक सुख तभीतक आदर्श हो सकता है जबतक कि आप लोग अनिवार्य रूप से कुचल डालने वाली दरिद्रता के शिकार हैं। इसके अलावा बौद्धिक और धार्मिक पहलू मे भी इतना विरोध नही होता, जितना कि कुछ लोग ख्याल करते हैं। जहां किसी लक्ष्य अथवा उद्देश्य की प्रत्येक कल्पना मूल में अनिवार्यत: धार्मिक होती है, वहां कोई धार्मिक मत-मतान्तर अधिक दिन तक जीवित नहीं रह सकता यदि वह बुद्धिसगत विचारों का विरोधी हो। यह विवाद तकदीर और तदबीर के पुराने झगड़े का ही दूसरा रूप है। जब हम इतिहास पर नजर डालते हैं, तो हमको मालूम होता है कि कठिन आवश्यकताओं ने ही उसका निर्माण किया है। वर्तमानकालीन नाटक के पात्र और भविष्य के निर्माणका होने की हैसियत से हमारी विचारधाराएं और आकाँक्षायें घटनाओं पर गहरा असर डालती हैं । कोई भी व्यक्ति या राष्ट्र बाह्य तत्वों की मर्यादानो से आगे नहीं बढ़ सकता। किन्तु उनके भीतर रहते हुए हमको अलग- अलग योजनाओं में से किसी एक को पसन्द करने का अधिकार मिला हुआ है। हम उसका तभी उपयोग कर सकते हैं जब हमारा कोई लक्ष्य हो । इस लक्ष्य का निर्माण करना ही धर्म का अनिवार्य गुण है । हिन्दुओ ने अपनी धार्मिक प्रणालियों में चार्वाक की भौतिक प्रणाली को शामिल कर दूरदर्शिता का परिचय दिया है।

गांधीवाद : समाजवाद शक्ति द्वारा संचालित उद्योगो और गृह उद्योगों का सवाल ही एक ऐसा सवाल है कि जहाँ गांधीवाद और समाजवाद का विरोध मिटना करीब-करीब असम्भव-सा प्रतीत होता है । यहाँ भी मुझे ऐसा अनुभव होता है कि व्यवहार की अपेक्षा सिद्धान्त में विरोध अधिक है। समाजवादी रूस का उदाहरण इस बारे में अच्छी रोशनी डालता है। यद्यपि वहां एक सिरे पर बड़े-बड़े कल कारखाने कायम किये गये है, किन्तु दूसरी ओर उतना ही शक्तिशाली किन्तु कम प्रकाशित आन्दोलन चलाया गया है जिसके अनुसार हरेक श्रमिक को थोड़ी निजी जमीन दीगई है,और गौ. -पालन मुर्गी व मधुमक्खी-पालन और हर तरह के ग्रह उद्योगो की शिक्षा दी गई है। रोजमर्रा बड़े पैमाने पर घिस-घिस करने के बजाय प्रकृति द्वारा प्राप्त की गई शक्तियों के उपयोग से मानव कौशल के लिये विस्तृत क्षेत्र खुल जाता है। मैं नहीं समझता कि कल-कारखानों और गृह-उद्योगों का अपना-अपना स्थान निर्दिष्ट करने में कोई कठिनाई हो सकती है। यह ऊटपटांग दंग से अथवा कठमुल्लापन से न होना चाहिए । किन्तु मुझे इसमे कोई सन्देह नहीं है कि यह हो सकता है और होना चाहिए। तरीके के बारे मे भी एक शब्द कह दू। आम जनता के संगठन की प्राथमिक अवस्थानों में समाजवादी भी सत्याग्रह की ताकत को महसूस करने लगे हैं। उनका कहना सिर्फ इतना ही है कि सम्पत्ति और सत्ता के वास्तविक परिवर्तन के लिए थोड़ा शारीरिक बल आवश्यक है। मेरा खयाल है कि यह कथन सही है, किन्तु यह तत्व आधुनिक राज्य-संस्था की कानून बनाने की ससा मे मौजूद है । सत्याग्रही इस सत्ता का दोनों तरह उपयोग कर सकते हैं। प्रथम तो वे जो अधिकारादरू हो उनको अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस सा का उपयोग करने के लिए विवश कर सकते हैं, दूसरे वे खुद समय-समय पर लोकसत्तात्मक शासन-तन्त्र का लाभ उठाकर इस सत्ता का सीधा उपयोग कर सकते है। पिछली बात ज्यादा असरकारक मालूम होती है और यही मुख्य कारण है कि मैंने कांग्रेस द्वारा पदग्रहण का समर्थन किया है।

गांधीवाद : समाजवाद यद्यपि मैं यह मानता हूँ कि दुनिया भर मे दोनों प्रणालियो का सामंजस्य हो सकता है, किन्तु मुझे इसमें सन्देह नहीं है कि हिन्दुस्तान के लिये तो इस प्रकार का सामंजस्य ही एकमात्र प्रगति का मार्ग है। दो कारणो से हरेक हिन्दुस्तानी को इसी परिणाम पर पहुचना चाहिए । हथियारो पर प्रतिबन्ध होने, धार्मिक परम्परा और साम्प्रदायिक तथा जातिगत विभिन्नता के कारण इस देश के श्राम लोगों को हिंसात्मक क्रान्ति के लिए संगठित करने में जो कठिनाइयाँ थी, वे गत १७ वर्षों से गाँधीजी द्वारा अहिंसा के प्रचार के कारण हजार गुना बढ़ गई हैं । इस महापुरुष के काम को नष्ट करके लोगो के सर्वदा भिन्न राह पर चलाने की कोशिश करना मूर्खतापूर्ण कार्य होगा। दूसरे, हमारी कृषि की आबादी, हमारी औद्योगिक आबादी के परि- माण से बढ़ रही है और प्रति व्यक्ति एक एकड़ से भी कम जमीन हिस्से में आती है ! भौतिक सुख के अजीबोगरीब स्वप्न बिलकुल अव्याव- हारिक है और लोगो को गुमराह ही करते हैं । हिन्दुस्तान मे सादगी का प्रचार उसके तत्वज्ञान की अपेक्षा उसकी आबादी के कारण अधिक है। यदि सारी निजी सम्पत्ति पूरी तरह से राष्ट्रीय सम्पति बना दी जाय और रूस की तरह पूनर्रचना करदी जाय तो भी जन-साधारण का जीवन-माप सामान्य से उचा नहीं बनाया जा सकता। हमको राष्ट्र के नाते सादगी के सौन्दर्य को अपनाना होगा। कुछ मोटी सूचनायें देकर यह लेख समाप्त करूंगा, जिनके आधार पर हिन्दुस्तान गांधीवाद और समाजवाद में सामंजस्य कर सकता है। १. उसको पूरी तरह अहिंसा के तरीके को अपनाये रहना चाहिए, बल का उपयोग लोकतन्त्रात्मक पद्धति द्वारा कानून बनाने तक ही मर्या- दित रक्खा जाय। २. उसको सादगी के आदर्श का पूरी तरह अनुसरण करना चाहिए। ३. राजनैतिक सत्ता को एक जगह केन्द्रित न करके ज्यादा-से-ज्यादा मैं समाजवाद और सर्वोदय विभाजित किया जाय । ४. शक्ति द्वारा सवालित उद्योगों का स्वामित्व और संचालन राष्ट्र के हाथ में हो। ५. कृषि की जमीन न तो बेची जाय, न रहन रक्खी जाय । किन्तु खेती के कामों के लिए जमीन को निजी सम्पत्ति माना जा सकता है । ६. प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति का काम राज्य के हाथ मे रहे । ७. कृषि, करघे और दूसरे गृह-उद्योगों को संरक्षण दिया जाय और आधुनिक कल-कारखानों को उनके क्षेत्र में दखल देने से कड़ाई के साथ रोका जाय। समाजवाद और सर्वोदय' [नरहरि परीख] दुनिया के सभी देशों में आज पूंजी का जोर है । जमीन, खान तथा छोटे-बड़े कारखानों पर; जिनमें उत्पत्ति के साधन और माप के जोर पर चलनेवाली रेल तथा स्टीमर जैली सवारियों के साधन भी आजाते है, थोड़े से पूजीपतियों का ही स्वामित्व है । स्वामित्वहीन हो जानेवाले किसानों तथा मजदूरों को अपने रोजमर्रा के खाने-पीने के लिए रोज मजूरी करके कमाई करनी पड़ती है। वे अगर पूजीपति के कब्जे में पड़े हुए उत्पत्ति के साधनों पर मजूरी न करें तो उन्हें खाने को न मिले । पूजीपति अपनी ही शतों पर मजदूरो को अपने स्वामित्व वाले साधनों पर काम करने देते हैं। उन्हें जितना चूसा जा सके उतना चूसकर और यथासम्भव कम-से-कम १. कार्लमार्क्स के सिद्धान्तों के अनुसार होनेवाली समाज-रचना के लिए, जिसे अमल में लाने का जबरदस्त प्रयत्न अाज रूस मे हो रहा है, हमने समाजवाज शब्द का प्रयोग किया है।

गांधीवाद : समाजवाद मजदूरी देकर ज्यादा मुनाफा वे ले लेते हैं । इस प्रकार उत्पत्ति के साधनों पर स्वामित्व रखने के बल पर यह छोटा सा पूँजीपति वर्ग किसान-मजदूरो पर अपना आधिपत्य रखता है और उन्हें चूसता है । राजनैतिक सत्ता भी हर एक देश में इस पूजीपति वर्ग के ही हाथ में इंग्लैण्ड, फ्रान्स और अमेरिका जैसे देश प्रजातन्त्रीय कहलाते है; लेकिन वहाँ भी प्रजा यानी श्राम लोगो का राजनैतिक मामलो में कोई अंकुश नहीं होता। सारा तन्त्र इस तरह आयोजित होता है कि उसने जीपतियों की ही चलती है और उन्हीं के स्वार्थों का ध्यान रक्खा जाता है। निजी स्वामित्व वालो के पारस्परिक सम्बन्धी पर नियन्त्रण रखना और मजदूरवर्ग की ओर से उन पर कोई आक्रमण हो तो उससे पूजी- पतियों की सम्पत्ति की रक्षा करना, यही सब पूंजीपति देशों में सरकार का मुख्य काम हो गया है । इस कार्य के लिये भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न- भिन्न पद्धतियो की योजना की जाती है । फिर सारी दुनिया को लूटकर उस लूट में से थोड़े बहुत टुकड़े अपने मजदूरों को देकर उन्हें संतुष्ट रखने का प्रयत्न भी जारी है। फोर्ड जैसे लोग अपनी मोटरें बेचकर सारी सर्वोदय का मतलब है, समाज के केवल एक वर्ग का नहीं बल्कि सारे समाज का उदय । समाज के सारे वर्ग और सारी जातियां अपनी अपनी मर्यादा में रह और अन्य वर्गों' या जातियो का न तो शोषण करे और न उन्हे सतायें, बल्कि परस्पर न्यायपूर्ण व्यवहार करें और हिलमिलकर रहे, वह सर्वोदय है । अमीर-गरीब, मालिक-मजदूर, जमीदार और किसान इन सब वर्गों के बीच श्राज जो विद्वेष नजर आता है उसके कारण दूर हों। उनके बीच पड़ी हुई खाई पटे, उनमे परस्पर विश्वास और मेल पैदा हो, तथा समाज से अन्याय और जुल्म का अन्त हो । गाँधीजी के इस कार्य- क्रम को हमने सर्वोदय नाम दिया है । रस्किन की Unto This Last पुस्तक का गांधीजी ने गुजराती मे जो अनुवाद किया, उसका उन्होने 'सबोंदय' नाम रक्खा है, उसी पर मे यह शब्द लिया गया है।

समाजवाद और सर्वोदय । दुनियां से धन खींच लाते हैं और फिर अपने मजदूरो को खूब सुविधायें देते हैं । इंग्लैंड को हमारे देश तथा दूसरे उपनिवेशों में से लूटने का खूब मौका मिलता है, इसलिए वह और देशो के मुकाबिले अपने यहाँ के मजदूरो को अधिक अच्छी हालत मे रख सकता है। मगर वहां भी बेकारी और दरिद्रता न हो ऐसी बात तो नही ही है । इस समय प्रचलित पूंजी- बाद के जो अनिष्ट परिणाम सारी दुनिया को सता रहे हैं उनमें से खास- खास निम्न प्रकार हैं: १. बेकारी; २. दरिद्रता और भुखमरी; ३. मूल्य का निश्चय मानव-सुख के माप से नहीं बल्कि धन के माप से होना; ४. जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं की उत्पत्ति की उपेक्षा करके कम जरूरत वाली वस्तुओं की अधिकाधिक उत्पत्ति; ५. सट्टे तथा बाजार की प्रतियोगिता के कारण उपयोगी वस्तुओ का विनाश और बिगाड़ा ६. उद्योग व्यवसाय में पिछड़े हुए देशो का शोषण और वहाँ के लोगो की दुर्दशाः ७. जनता की कमर तोड़ दे, ऐसा उत्तरोतर बढता जानेवाला सैनिक- व्यय का बोझ। हरेक पूजीपति देश को शोषण करने के लिए उपनिवेश चाहिएं। इसके लिए, वे अन्दर-ही-अन्दर लड़ने के लिए सदा तैयार रहते हैं । एक देश सेना बढ़ाये तो दूसरे को भी बढ़ानी ही पड़ती है। यह चढ़ा-ऊपरी कहां जाकर रुकेगी यह नहीं कहा जा सकता । जापान चीन पर कब्जा करने को ताक में रहे और इटली अबीसीनिया को हड़प जाने का जाल रचे, यह सब तो चलता ही रहता है । इससे सारी दुनिया में युद्ध का दावानल चाहे जब सुलग उठने का भय है। इस सब दुःख और त्रास से संसार तभी बच सकता है जब सारी , गांधीवाद : समाजवाद समाज-रचना बिलकुल ही नये आधार पर हो । आज उसकी दो योजनायें अथवा कार्यक्रम संसार के सामने हैं। एक रूस में समाजवादियो की और दूसरी हमारे देश में गांधीजी की। सरकार के पास जितनी सत्ता और साधन हो सकते हैं उन सबके जोर पर आज रूस में यह कार्यक्रम चल रहा है, इसलिए सारी दुनिया का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुया है। हमारे देश में सरकार की सत्ता और साधन जितना विघ्न डाल सकें उस विघ्न के बावजूद इस कार्यक्रम को कार्यान्वित करने का प्रयत्न हो रहा है, इसलिए ध्यान आकर्षित करने जैसे परिणाम आज हम नही बतला सकते । फिर भी इस कार्यक्रम की सम्भावनाओं को देख सकने वाले विचारशील लोगों का ध्यान तो इसकी तरफ आकर्षित हुना ही है। इन दोनों कार्य- क्रमों का तुलनात्मक विवेचन ही हमारा उद्देश्य है। समाजवाद और सर्वोदय के दोनो ही कार्यक्रम अंतिम ध्येय के बारे में बहुत-कुछ मिलते हुए हैं। दोनो ही कार्यक्रम मनुष्य-जाति की मुक्ति और सुख संतोष चाहते हैं। आज दुनिया में जो सामाजिक एवं आर्थिक विषमता दृष्टिगोचर होती है, जो अन्याय और जुल्म नजर आता है, दोनों ही कार्यक्रम उसका अन्त करना चाहते हैं। दोनों ही कार्यक्रम यह कहते हैं कि हरेक स्त्री-पुरुष को निष्ठापूर्वक अपना-अपना काम करना चाहिए । जो काम न करे उसे खाने का अधिकार न हो और जो अपनी शक्ति के अनुसार काम करने को तैयार हो उसे कम-से-कम इतना तो मिलना ही चाहिए जिससे वह ठीक तरह अपना जीवन निर्वाह कर सके, यह दोनों ही कार्यक्रम चाहते हैं। समाज में से ऊँच-नीच का भेदभाव मिटे, अपनी प्रगति और विकास करने में किसी भी तरह की रुकावट न हो, सबको आगे बढ़ने के निर्विन अवसर मिलें और सबको समान अवकाश हो, यह दोनों कार्यक्रमो का ध्येय है। यहाँ वहाँ किये जानेवाले नाममात्र के सुधारों से इनमें के एक भी कार्यक्रम को संतोष नही होगा। क्योंकि दोनों ही कार्यक्रम क्रान्तिकारी प्रचलित रूढ़ियो, विचारो तथा स्थापनाओं का मूल से ही संशोधन है।

समाजवाद और सर्वोदय , करके समाज की नई रचना करने का दोनों कार्यक्रम प्रयत्न कर रहे हैं। करोड़ों दलित और पीड़ित लोगों की सैकड़ों वर्षों से दबी हुई अभिलापाओं और आकांक्षाओं को दोनो कार्यक्रमों ने प्रकट किया है । इससे सर्वसाधा- रण को अपनी शक्ति का पता लगा है, वे उसे महसूस करने लगे हैं और उनका श्रात्म-विश्वास बढा है । इन दोनो कार्यक्रमों के नेता गाँधीजी, लेनिन, ट्राटस्की तथा स्टालिन अत्यन्त उद्यमी और सादा जीवन व्यतीत करनेवाले हैं। उन्होने सर्वसाधारण के साथ तादात्म्य करके उनका प्रेम और विश्वास प्राप्त कर लिया है । इसलिए आज इन दोनों कार्यक्रमों में इतना जोर दिखलाई देता है और लोग इनकी तरफ अाशा की टकटकी लगा रहे हैं। लेकिन साधनो के बारे में इन दोनों कार्यक्रमों में बहुत बड़ा अन्तर है, जिसके कारण तफसील में तथा नवीन समाज-रचना की कल्पना में भी दोनों कार्यक्रमो में बड़ा भेद हो जाता है । नवीन समाज रचना के लिए समाजवाद हिंसात्मक क्रान्ति को अनि- वार्य मानता है। वर्तमान सरकारों के समस्त तंत्र का सूत्र सचालन पूंजी- पति वर्ग के हाथों में है । और इस पूंजीपति-वर्ग के हित का संरक्षण करने के लिए हरेक सरकार की सेना कटिबद्ध है। उसके सामने नवीन समाज-रचना अमल में ऐसे प्रयत्नो से श्रा ही नहीं सकती जिन्हें कि वैधानिक कहा जाता है। मौजूदा सरकार के सैनिक बल का सामना किये बगैर कोई भी क्रान्तिकारी पक्ष राजसत्ता पर अधिकार नहीं कर सकता, और सत्ता प्राप्त किये बाद भी अगर राजतंत्र का पुराना स्वरूप कायम रहे- यानी इस समय कहे जानेवाले प्रजातन्त्रों में जैसा होता है -उस तरह पालमैण्ट का नया चुनाव हो और नये चुने हुए सदस्यों के द्वारा राज्य का कारबार चलाया जाय तो कोई भी क्रान्ति नही की जा सकती। क्योंकि जबतक सारा समाज क्रान्ति के सिद्धान्तो को न समझने लगे तब तक चुनाव में क्रान्तिकारियों की बनिस्पत पूंजीपति और ऊपरी सुधारक ही सफल होंगे। इसलिए अगर क्रान्ति करके नवीन समाजवादी समाज- - गांधीवाद : समाजवाद रचना करनी हो तो पुगने राजतंत्र को जड़मूल से उखाड़कर समाजवादी सिद्धान्त से ओतप्रोत संगठित पक्ष को सारी राजसत्ता हस्तगत करनी चाहिए । सार्वजनिक मताधिकार, देश के समस्त मतदाताओं के द्वारा पार्लमेण्ट के सदस्यो का निर्वाचन, जिसे प्रत्यक्ष चुनाव (Direct election ) कहा जाता है, ये सब इस नामधारी प्रजातत्र के करिश्मे । इनके मोह मे न आकर समाजवादी पक्ष का अधिनायकत्व चलाया जाय तभी क्रान्ति कायम रह और सफल हो सकती है। इस तरह के राजतंत्र को वे श्रमजीवी-वर्ग का अधिनायकत्व ( Dretatorship of the Proletariat )कहते हैं। श्रमजीवी-वर्ग में उन्हीं की गिनती होती है जो समाजवादी हो और राजनैतिक सत्ता उन्हीं के हाथ में होनी चाहिए । श्रमजीवी होने पर भी जो निजी स्वामित्व में विश्वास रखते ही और भविष्य में खुद श्रम किये बगैर दूसरे के श्रम पर जीने की आशा रक्खें, वे श्रमजीवी-वर्ग के ( प्रोलेटेरियट ) नहीं कहला सकते । पूजीपति अथवा भद्रलोक-वर्ग के होने पर भी जिनके विचार बदल गए हो, जो समाजवादी हो जाये और उसी आदर्श के अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए तैयार हो, उन्हें श्रमजीवी-वर्ग के यानी 'प्रोलेटेरियट' कहा जाता है। नये समाजवादी समाज मे सभी 'प्रोलेटेरियट' ही होने चाहिए। शारीरिक श्रम किये बगैर पूंजी के ब्याज पर, जमीन के भाड़े पर, अथवा अन्य किसी तरकीब से दूसरे के श्रम का लाभ उठाकर जीवन-यापन करने वाला वर्ग 'बुर्जा' है । हम उस वर्ग के लिए भद्रलोक शब्द काम मे लायेंगे । समाजवादियो की मान्यता के अनुसार आज सारे जन-समाज मे दो वर्ग होगये हैं; एक निजी स्वामित्व तथा व्यक्तिगत स्वामित्व के हक अथवा उसमें विश्वास रखने और उसके जोर पर दूसरो के श्रम का लाभ उठाने अथवा उठाने में विश्वास रखनेवाला पूजीवादी अथवा भद्रलोक (बुर्जुवा) वर्ग; और दूसरा निजी स्वामित्व तथा व्यक्तिगत स्वामित्व के हक न रखने मे और इस बात में विश्वास रखनेवाला श्रमजीवी-वर्ग (प्रोलेटेरियट) कि हरेक स्त्री-पुरुष को किसी-न-किसी प्रकार का समाजो- ।

समाजवाद और सर्वोदय CU पयोगी श्रम अपनी शक्ति के अनुसार जरूर करना चाहिए । भद्र वर्ग के लोग आज अपनी-अपनी शक्ति और गुंजाइश के मुताबिक श्रमजीवी-वर्ग का शोषण कर रहे हैं। इसलिए इन दो वर्गों को शोषक और शोषित नाम भी दिये जा सकते हैं। दोनो वर्गों के स्वार्थ परस्पर विरुद्ध होने के कारण, इन दोनों वर्गों में जाने-अनजाने हमेशा संघर्ष होता ही रहता है। श्रमजीवी-वर्ग को अपनी स्थिति का यथोचित भान करना, उसमे अपने वर्ग का अभिमान (class-consciousness) पैदा करना और भद्र-वर्ग के मुकाबिले के लिए उसे संगठित करना यह समाजवादियो का एक कार्यक्रम है । इसे वे वर्गयुद्ध (class-war) कहते हैं। इस तरह समाज मे आज जो अनेक वर्ग दिखलाई पड़ते है, उन सबका आधार केवल धन ही नहीं होता । विद्या तथा संस्कारिता, कुल, जाति, सत्ता आदि अनेक कारणो से वर्ग बनते हैं। लेकिन समाजवादी ऐसा मानते हैं कि इन सबके पीछे असली कारण आर्थिक ही होता है । इस- लिए जो प्रोलेटेरियट न हो जायें उन सबके विरुद्ध युद्ध घोषणा करके उनको नष्ट ही कर देना चाहिए । बस, एक 'प्रोलेटेरियट' वर्ग ही संसार में रहे । समाज की अन्तिम स्थिति की उनकी कल्पना यह है कि उसमें समस्त जन-समाज वर्ग-हीन (elass-less) हो जाय । इस वर्ग-युद्ध मे वे हिंसा को अनिवार्य मानते हैं। प्रचलित सरकार को उखाड़ कर राजसत्ता अपने हस्तगत करना, यह इस कार्य की शुरूआत है। फिर इस सत्ता के जोर पर पूजीवादी अथवा भद्र-वर्ग के निकन्दन का काम होता है । इसमें प्रेम, दया आदि भद्र-समाज में पोषित कोमल भावनाओ से प्रेरित होना निर्बलता है। समाजवादी कहते हैं कि हम हिसा के उपासक नही हैं, जहां हिंसा के बगैर काम चलता हो वहाँ हम हिंसा हर्गिज नही करेंगे। फिर आज पूंजीवादी समाज में जो प्रत्यक्ष और परोक्ष हिंसा जारी है उसकी बनिस्बत तो हमारी हिंसा एक ही बार की और परिणाम मे कम ही है। पूजीवाद का नाश होने के बाद जोर-जबरदस्ती की जरूरत नहीं रहेगी, इसलिए हिंसा अपने आप मिट जायगी। ।

१४ गांधीवाद . समाजवाद सर्वोदय के यानी गांधीजी के कार्यक्रम में सारा दारोमदार अहिंसा पर है । उच्च और शुद्ध साध्य की सिद्धि उतने ही उच्च, शुद्ध और निर्दोप साधन बगैर सम्भव नही है । जोर-जबरदस्ती और जुल्म ज्यादती करके शान्ति और न्याय की प्राशा रखना व्यर्थ है। हिंसा द्वारा प्राप्त किया हुश्रा हिंसा-द्वारा ही कायम रह सकता है । राजसत्ता क्रान्तिकारियों के हाथ मे आये बाद भी मशीनगर्ने, वायुयानों आदि फौजी सरंजाम और फौज का कञ्जा तो अमुक थोड़े श्रादमियों के ही हाथ में रहेगा। सारा जन-समाज कभी फौज पर कब्जा नही रख सकता, और न उसके मुका- बिले हिंसा का प्रयोग ही कर सकता है । इसलिए जनता के उपर कौज और पुलिस की ससा तो जारी ही रहेगी। रूस के समाजवादी चाहे श्रम- जीची-वर्ग के हित की दृष्टि से ही सारा काम कर रहे हो, पर उनका काम फौज और पुलिस के जोर पर चल रहा है । फौज और पुलिस के बल से ही वे समाज पर अपना कब्जा रख रहे हैं । रूस नथा अन्य देशों में आज उनकी प्रवृति भय और द्वेष ही फैला रही है। समाजवादी कहते तो यह हैं कि हम पूंजीवाद का नाश करने जितना ही हिंसा का प्रयोग करेंगे, लेकिन आम वर्ग की मुक्ति उनका ध्येय हो तो यह दलील किसी काम की नहीं है । क्योंकि अाज अापशि पूंजीवाद के रूप में है तो कल दूसरे किसी रूप में आ खड़ी होगी। जो छोटा-सा समाजवादी मण्डल आज ससा हस्तगत करके बैठा हुआ है उसके हृदय में कलियुग का प्रवेश हो और वह ससा छोड़े ही नहीं, तो लोग उसका क्या कर सकते है ? पुरानी नौकरशाही की जगह इस नई नौकरशाही के नीचे भी जनता को तो पिसना ही होगा । क्योकि जोर-जबरदस्ती के आधार पर निर्मित तंत्र के प्राधीन रहने वाली जनता सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव कभी नही कर सकती। गांधीजी के कार्यक्रम की श्रेष्ठता यह है कि सरकार चाहे स्वदेशी हो या विदेशी, समाजवादी हो या पूंजीवादी, उसमें उसे सर्वोपरि कभी नहीं माना जाता है। सरकार आखिर मनुष्य की ही पैदा की हुई है, इसलिए समाजवाद और सर्वोदय , उसका बनाया हुआ कोई कानून जब अन्यायपूर्ण मालूम पड़े तब उसका सविनय भंग करने का हरेक आदमी को हक ही नहीं है, बल्कि ऐसा करना उसका फर्ज है। किसी भी प्रकार के अधर्म या अन्याय का अहिंसक प्रतिकार करने की रीति जनता को सिखलाकर स्वातंत्र्य-सिद्धि का एक उत्तम मार्ग उन्होने जगत को बतलाया है। आज जो देश स्वतन्त्र कहलाते हैं, उन देशो में सारी जनता कोई स्वतन्त्र नहीं है। परन्तु गाँधीजी का यह शस्त्र ऐसा है कि इसका उपयोग बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, शिक्षित-अशिक्षित कोई भी करके अपनी स्वतन्त्रता का उपभोग कर सकते हैं । मनुष्य की धर्मबुद्धि (Conscience) की स्वतन्त्रता को गांधीजी अमूल्य वस्तु मानते हैं और किसी भी आर्थिक लाभ की खातिर उसको छोड़ने से वह इन्कार करते हैं। गाँधीजी सरकार की ससा अमुक हद तक ही स्वीकार करने को तैयार हैं; जहाँ धर्म या सिद्धान्त का प्रश्न आवे वहाँ वे जरा भी झुकने को तैयार नही है । सब तरह के भय-प्रलोभन, जोर-जबरदस्ती, शरीरबल या हिंसा का वे सब तरह से बिलकुल निषेध करते है। समाजवादियों को मनुष्य-स्वभाव या उसकी धर्मबुद्धि पर विश्वास नहीं है। धनिक और मालिक मे धर्मबुद्धि हो ही नहीं सकती और न प्रकट ही होगी, यह उन्होने मान लिया है। धर्म जैसी किसी चीज को ही वे स्वीकार नहीं करते । उसे तो वे एक नशा समझते है । इसीलिए सैनिक बल वाली बाह्य सत्ता की सर्वोपरिता का वे आग्रह रखते हैं। गाँधीजी मनुष्य-स्वभाव पर विश्वास रखते हैं । संयोगवश आज उसमें विकृति चाहे आ गई हो, लेकिन अगर लोगों को पूरी तरह शिक्षा दी जाय तो समाज मे परस्पर विश्वास और प्रेम की स्थापना होने में देर न लगे और हिंसा अथवा सरकार की जोर-जबरदस्ती के बगैर सब सुधार समाज में किये जा सकते हैं । आज तो अन्य सरकारों की भांति रूस की समाजवादी सरकार भय और दबाव से ही सुधार करा रही है। सत्ता के जोर पर सुधारो का अमल जल्दी होता हुआ दिखलाई पड़ता है, परन्तु सत्ता के बल पर जनता के हृदय मे उसका प्रवेश नहीं हो सकता और इसलिए, ।

गांधीवाद : समाजवाद । वह चिरस्थायी नहीं होता । बहुत बार ऐसा होता है कि इस तरह की जोर- जबरदस्ती से कराये हुए सुधार दूसरी पीढी संतोपपूर्वक स्वीकार कर लेती है । मगर मूल की जोर-जबरदस्ती का असर तो नहीं ही मिटता। जोर- जबरदस्ती की दूसरी और नई लहर आते ही सारी इमारत फिर से ढह जाती है। अन्य देशो की प्राचीन और अवाचीन संस्कृतियाँ तुलनात्मक रूप मे थोड़े-थोड़े समय चमककर मिट गई, पर हिन्दुस्तान और चीन की प्राचीन संस्कृतियां तत्वतः अपने मूलस्वरूप में अभी भी कायम हैं । ऐसा क्यो है, यह सोचने की बात है। बात यह है कि हिन्दुस्तान और चीन ने दूसरे देशों की तरह सैनिक दिग्विजय नही की, बल्कि उनके ऊपर अनेक सैनिक अाक्रमण हुए हैं। हमारा देश तो अनेक वर्षों से राजनैतिक पराधीनता में भी ग्रस्त है तथापि हमारे ऊपर आक्रमण करनेवाले देशो की संस्कृति के नाम शेष हो जाने पर भी हमारी संस्कृति कायम है। क्योंकि हमारे यहाँ उसका निर्माण शरीरबल पर नहीं बल्कि आत्मबल पर हुश्रा है । साधनों के भेद की वजह से दोनों कार्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण अंतर यह हो जाता है कि जब तक राजसत्ता हाथ में न श्रावे तबतक समाजवादी कार्यक्रम का अमल बिल्कुल ही नहीं हो सकता। वे जो आर्थिक फेर-बदल करना चाहते है उसकी शुरूआत भी राजसत्ता के बगैर नहीं होसकती । रूस में राजसत्ता हस्तगत करने का अनुकूल अवसर मिल गया, यह दूसरी बात है, पर अन्य देशो में तो आज समाजवादियों को मार-मारे ही फिरना पड़ रहा है । क्योंकि अपने को उलट देनेवाले किसी भी कार्यक्रम को- फिर वह हिंसात्मक हो या अहिंसात्मक कोई सरकार नहीं चलने देना चाहेगी। अहिंसात्मक कार्यक्रम की यह खूबी है कि चाहे जितनी प्रबल सरकार भी उसे रोक नही सकती। तब फिर पिछली लड़ाई में हम क्यो नहीं जीते, यह प्रश्न पाठकों को जरूर होगा। लेकिन हमारी यह लड़ाई सत्य और शुद्ध अहिंसा के आधार पर न रह सकी, यही उसकी निष्फलता की सबसे बढी वजह है। मगर अभी भी हम अपना रचनात्मक कार्य कर के जनता की शक्ति बढ़ा सकते हैं । इसके विरुद्ध समाजवादी कार्यक्रम मे तो जनता .

समाजवाद और सर्वोदय N । जितनी ज्यादा कुचली जायगी, उसका जितना अधिक शोपण होगा, और उसे जितना अधिक सताया जायगा, उतनी ही वह अधिक व्याकुल होगी, अन्त में सामना करेगी, ऐसी धारण के ऊपर आधार रखकर बैठना पड़ता है । सत्ता हाथ में आवे तबतक खाली बातें स्पीचें और योजनाये ही करने को रहती हैं । जिसे 'आर्गनाइज' (संगठित) करना कहा जाता है, उसके सिवा दूसरा कोई कार्यक्रम होता ही नहीं। 'आर्गनाइज' करने के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता । और वह भी ऐसे गुप्त रूप में अथवा अन्य किसी प्रवृत्ति के अन्तर्गत करना पड़ता है कि मूल प्रवृत्ति बहुत बार विस्तृत हो जाती है और गुप्त रहना ही मुख्य प्रवृत्ति बन जाती है। गाँधीजी के कार्यक्रम में राजसत्ता हस्तगत करने से पहले भी सामा- जिक और आर्थिक रचनात्मक कार्य किया जा सकता है। लोग अपने ही पुरुषार्थ तथा स्वावलम्बन से बहुत कुछ कर सकते हैं। कोई कुटुम्ब अथवा गाँव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति जितना स्वावलम्बी हो जाय तो वर्तमान पूजीवादी उद्योग-व्यवसाय के द्वारा चलनेवाले शोषण में से बहुत-कुछ तो बच ही सकता है। गाँधीजी के खादी तथा ग्राम-उद्योग के कार्यक्रम में यही बात है। मार्क्स का कहना है कि राजनैतिक स्वतंत्रता बहुत कुछ आर्थिक स्वतंत्रता पर ही निर्भर है। आर्थिक स्वतंत्रता से ही राजनैतिक स्वतंत्रता का उदय होता है । यह देखते हुए तो राजसता हस्तगत करने के लिए केवल शरीरबल पर प्राधार रखने के बदले, उद्यम और स्वाव- लम्बन द्वारा जनता की आर्थिक और नैतिक शक्ति बढ़ाने का गांधीजी का कार्यक्रम अधिक महत्वपूर्ण है। उनके कार्यक्रम में मनुष्य को अपनी स्थिति का भान होते ही वह उसे सुधारने के लिए स्वयं प्रत्यक्ष कार्य करने में प्रवृत हो सकता है, और ऐसा करते हुए वह अपनी शक्ति बढाता जाता है। बालक-बृद्ध, पुरुष स्त्री, अमीर-गरीब, शहरी या ग्रामीण, शिक्षित-अशिक्षित, हरेक कुछ-न-कुछ कर सकता है। जनता अपनी शक्ति जितनी बढ़ाती जाय उतने स्वराज्य का उपभोग करती जाती है। फिर जब गांधीवाद . समाजवाद क्या खाना, राजनैतिक स्वराज्य स्थापित हो तब भी, इस रचनात्मक प्रवृति से प्राप्त शिक्षा के कारण, अपने प्रतिनिधियों के ऊपर उचित अंकुश रखने की शक्ति जनता मे आगई होती है। समाजवादियों का दावा ऐसा है, अथवा वे ऐसा ध्येय रखते हैं, कि समाज का सारा तंत्र भौगोलिक आधार पर अथवा धन्धों के आधार पर छोटे-छोटे स्वसशाक (खुदमुख्तार) मण्डलों के, जिन्हें कि रूस 'सोवि- यट' कहते हैं, द्वारा संचालित हो । परन्तु इस ध्येय की सिद्धि के लिए साधन-रूप तो अत्यधिक केन्द्रीभूत सशावाला और मनुष्य-जीवन के प्रत्येक अंग पर अंकुश रखनेवाला एक जबरदस्त मध्यवर्ती (केन्द्रीय) तन्त्र उन्होंने खड़ा किया है। आज रूस में हरेक आदमी को क्या करना, बच्चों को कैसी शिक्षा देनी, स्वयं कैसे विचार बनाने चाहिएं, इस सबकी व्यवस्था का काम सोवियट सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है। प्रेसों, पुस्तकों और संस्थाओं पर रूस में सरकार का जितना अंकुश है उतना अन्य किसी देश में शायद ही होगा। समाजवादी उपदेशको और प्रचारकों के सिवा अन्य कोई उपदेश या प्रचारक वहां अपना काम नहीं कर सकते। ऐसी परिस्थिति में क्या छोटे-छोटे मण्डल (खुदमुख्तार) रह सकते हैं ? हम साध्य चाहे जो तय करें, परन्तु उसका निर्माण तो स्वीकृत साधनों को अमल में लाकर ही होता है। जबरदस्त मध्यवर्ती समाजवादी तन्त्र मे से छोटे खुदमुख्तार ग्राममण्डलों का अस्तित्व मे आना दूसरी क्रान्ति हुए बगैर सम्भव नहीं मालूम पड़ता । गांधीजी के कार्यक्रम में थोड़े-बहुत अंश में खुदमुख्तार ग्राममण्डलों पर पहले ही जिम्मेदारी का भार रक्खा जाता है। राजनैतिक प्रवृत्ति में पड़ने से पहले भी ये ग्राममण्डल बहुत-सी बातों में स्वावलम्बी और इस- लिए स्वतंत्र हो सकते हैं । यह बात हम लोगों की जन्मघुट्टी में ही मिली हुई है। हमारे देश में जनता की प्राणशक्ति, विलायत में जिसे 'स्टेट' कहते हैं और अपने देश की आज की भाषा में जिसे 'सरकार' कहा जाता है, उसमें कभी नहीं रही । राजनैतिक दृष्टि से हम अनेक वर्षों से पराधीन हैं समाजवाद और सर्वोदय -- और हमारे यहां अनेक सरकारें आई-गई हैं, मगर हमारी जनता ने अपनी सामाजिक स्वतंत्रता बनाये रक्खी । इस अग्रेज सरकार ने ही हमारी इस नष्ट प्राणशक्ति हमारी उस स्वतन्त्रता पर प्रहार किया है। जनता की इस की हुई प्राण शक्ति में नवजीवन का संचार करके गांधीजी जनता की सच्ची स्वतंत्रता सिद्ध करना चाहते हैं। अपनी जरूरत की सारी चीजो का उत्पादन यथासम्भव कल-कारखानों के द्वारा करना समाजवादी कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग है। वर्तमान पूंजीवाद में एक छोटे वर्ग ने उत्पत्ति के साधनों पर अधिकार किया हुआ है और वह वर्ग समाज की उपयोगी वस्तुओं की आवश्यकतापूर्ति के उद्देश्य से नहीं बल्कि मुनाफे की दृष्टि से अपने कारखाने चलाता है। यंत्रों की ज्यों-ज्यों नई खोजें होती जाती हैं स्यों-त्यों बेकारी बढ़ती जाती है। फिर ये सब यन्त्र जिसके कब्जे में हैं वह उनपर अपने अधिकार के जोर पर गरीबों का शोषण करता है, जिससे गरीबी और भुखमरी भी बढ़ती जाती है। समाजवादियों का कहना यह है कि ये यन्त्र और कारखाने स्वयं कोई खराब चीज़ नहीं हैं। इनके दुरुपयोग, इनके स्वामित्व द्वारा होनेवाले आम लोगों के शोषण, मौजूदा गरीबी, बेकारी तथा भुखमरी की तो वजह है। उत्पत्ति के समस्त साधनों पर यदि सारे समाज का स्वामित्व कर दिया जाय, तो उसमें मुनाफे की बात न रहकर समाज की आवश्यकताएं पूरी करने की ही बात रहे । फिर समस्त उत्पादन नियन्त्रित हो सकता है, यानी समाज की आवश्यकतानुसार ही चीजें तैयार की जारों । इस समय निजी उत्पादकों में जो प्रतिस्पर्धा होती है वह प्रतिस्पर्धा फिर रहे ही नहीं। फिर समाज में हांक को उसकी शक्ति के अनुसार काम देने तथा उसकी श्रावश्यकतानुसार उसे मिलने की व्यवस्था भी समाज की तरफ से ही हो। इसलिये बेकारी तो फिर हो ही नहीं। क्योंकि जो काम करने को तैयार हो उन्हें खाने को तो मिलेगा ही। फिर यन्त्रों और भाप तथा बिजली जैसी भौतिक शक्तियों द्वारा काम लेने की वजह से मनुष्य जाति पर से श्रम का एक बड़ा बोझ उतर जाता है, और उत्पादन तेजी से होने के कारण लोगों गांधीवाद . समाजवाद को कम घण्टे काम करना पड़ता है। इससे हरेक को खूब फुर्सत मिलती है, जिसका उपयोग वह अपनी संस्कारिता बढ़ाने में तथा आमोद-प्रमोद के कामो में कर सकता है । इस कार्यक्रम के अनुसार सारे रूस को कारखानेमय कर डालने की-खेतीतक यन्त्री से करने की-जबरदस्त प्रवृत्ति इस समय जारी है, जिसके फलस्वरूप एक बिल्कुल नई संस्कृति का निर्माण हो रहा गांधीजी यन्त्र के दुश्मन तो हर्गिज़ नहीं हैं। उनका विरोध यन्त्रों से नही बल्कि यन्त्रों के लिए दीवाने होने से है। वैज्ञानिक और यांत्रिक संशोधन निजी लाभ और नफे के साधन न होने चाहिएँ । श्रम का बचाव अमुक वर्ग के लिए नहीं बल्कि सारी मानव-जाति के लिए होना चाहिए, इस बारे में समाजवादियों और उनके विचार मिलते हुए है। परन्तु गांधीजी ऐसे यन्त्रों को सीमित करना चाहते हैं जो अत्यन्त खर्चीले हो और बड़े पैमाने पर ही चल सकें। उनका कहना है कि यन्त्र का विचार वक्त उत्पादन का नहीं बल्कि मनुष्य का विचार प्रधान होना चाहिए। जिन यन्त्रों के कारण, उपयोग में न आने की वजह से, मनुष्य के अंग निकम्मे हो जायें, उन यन्त्रों के वे विरुद्ध हैं। जो यन्त्र मनुष्य तथा द्वारा काम के लिए पाले जानेवाले पशुओं को निकम्मा और उसके फलस्वरूप निर्वाह के साधनों से रहित बना देनेवाले हों, उन्हें वे अनिष्ट मानते हैं । परन्तु जो यन्त्र मनुष्य और उसके पाले हुए पशुओं के श्रम को हल्का करने की दृष्टि से अथवा उनका समय बचाने की दृष्टि से ही बनें, उन्हें आमतौर पर इष्ट मानते हैं। ऐसे यन्त्र बनाने के लिए बड़े कारखानों की जरूरत हो तो वे रहें पर उन पर स्वामित्व सारे समाज का होना चाहिए । यन्त्रों के बारे में इसे गांधीजी के विचारों का सार कहा जा सकता है । परन्तु असली बात तो यह है कि हमारे देश की मौजूदा हालत मे देश को यन्त्रमय और कारखानेमय कर डालने का प्रश्न व्यावहारिक ही नहीं है। अभी तो ऐसी परिस्थिति है कि अपने देश में जितने यन्त्रों का प्रवेश करेंगे उतने ही अधिक शोषित और पराधीन बनेंगे। फिर रूस में जबरदस्ती कल-कारखाने दाखिल करने की जैसी प्रवृत्ति चल रही है +4 050467. समाजवाद और सवोदय वैसे प्रवृत्ति तो, हमारे पास सत्ता हो तो भी, गांधीजी की कार्य-पद्धति और सर्वोदय के सिद्धान्तों की दृष्टि से अनिष्ट ही है। गांधीजी तो यही कहते हैं कि खेती और दूसरे उद्योग-धन्धो में जहांतक मनुष्य के हाथ पैरों का उपयोग हो सकता हो वहांतक यंत्रों से काम न लिया जाय । अनिवार्य अर्धबेकारी हमारे देश की सबसे विकट समस्या है। यन्त्रो के आक्रमण से मनुष्य के साथ उसके पाले हुए पशु भी बेकार होने लगे हैं । इसलिए जबतक अपार मानव-शक्ति और पशु-शक्ति हमारे देश में निकम्मी पड़ी रहेगी, तबतक भौतिक शक्ति का प्रवेश कर यन्त्र जारी करने का विचार हमारे लिए बेहूदा है । इसके अलावा यह बात तो हुई कि मनुष्य शारी- रिक श्रम करे तो उससे उसकी कला-कुशलता बढ़ती है, बौद्धिक विकास विशेष होता है और काम में से प्रानन्द और सन्तोष अधिक मिलता है। इसलिए सीमित क्षेत्र में यन्त्रो को स्वीकार करके गाँधीजी का झुकाव तो छोटे-छोटे गृह-उद्योगों की और ग्राम-उद्योगों की ओर ही है । विज्ञान और यन्त्रविद्या में आज जो प्रगति हुई है उसका अपने गृह-उद्योगों तथा ग्राम उद्योगो के साधनो का संशोधन करने में जितना उपयोग किया जा सके उतना तो करना ही चाहिए। पुराने अर्थशास्त्रियों की तरह समाजवादी भी यह मानते हैं कि श्राव- श्यकतायें और सुख-सुविधा के साधन बढ़ाते जाना संस्कृति की एक निशानी है। इस सम्बन्ध में समाजवादियो की विशेषता यह है कि वे ऐसी अर्थ व्यवस्था करना चाहते हैं जिससे मनुष्य-मात्र को ये साधन उपलब्ध हो। परन्तु लोगों का ध्येय अपनी सुख-सुविधायें बढ़ाते जाना ही रक्खा जाय, तो यह निश्चित करना बहुत मुश्किल है कि उसका अन्त कहाँ होगा और सन्तोष या तृप्ति कहाँ जाकर होगी। फिर मानव-पुरुषार्थ का अन्तिम ध्येय कोई सांसारिक सुख-सुविधायें ही नहीं है । सर्वोदय का कार्यकम यन्त्रों की तरह आवश्यकताओ की भी मर्यादा रखने के लिए कहता है । जीवन कष्टमय न होना चाहिए और उसके लिए अमुक सीमा तक आवश्यकतारी बढ़ानी ही चाहिएँ । उदाहरण के गांधीवाद : समाजवाद लिए, इस समय हमारे देश में रहन-सहन का जो ढंग है वह तो ऊँचा होना ही चाहिए। लेकिन आवश्यकताओं को अमर्यादित रूप से बढ़ाते ही चले जाओ और उसके लिए उत्पादन के पीछे लगे रहो यह बात गाँधीजी को पसन्द नहीं है। हम अपने जीवन को यथासम्भव सादा पर सादे का मतलब कष्टपूर्ण नहीं है- बना लें तो इस समय के बहुत से अनिष्टों से सहज ही बचा जा सकता है। गाँधीजी के स्वदेशी धर्म का विवरण देने की यहाँ कोई जरूरत नहीं है। आयात-निर्यात के व्यापार की इस समय जो बहुत अनावश्यक और निरर्थक वृद्धि हुई है तथा जिस व्यापार ने विभिन्न देशों के बीच लड़ाई का स्वरूप धारण कर लिया है, वह व्यापार-यानी झगड़े का बड़ा कारण-इस धर्म के पालन से अपने श्राप मिट जायगा। अब हम निजी स्वामित्व पर विचार करें । जमीन, खान, जंगल, कारखाने जैसे उत्पत्ति के जो मुख्य साधन हैं उन्हें इस समय समाजवादी सामाजिक स्वामित्व के कर ही रहे हैं। लेकिन उसके अलावा निजी स्वामित्व के जो हक हैं उन्हें भी वे नष्ट करना चाहते हैं। क्योंकि निजी स्वामित्व के जोर पर ही मनुष्य दूसरों पर सत्ता चला सकते और दूसरों के श्रम का अनुचित लाभ उठा सकते हैं । मनुष्य के पास बहुत-सी सम्पत्ति हो तो अपने उपयोग जितनी रखकर बाकी पर से उसे अपने स्वामित्व का अधिकार छोड़ देना चाहिए । मनुष्य के पास बहुतसे मकान हों तो अपने उपयोग लायक ही वह रख सकता है । दूसरों को भाड़े पर वह मकान नहीं उठा सकता । उनपर अपना अधिकार भी उसे छोड़ देना चाहिए। फिर अपने उपयोग के लिए रक्खे उसपर भी उपयोग जितना ही उसका अधिकार हो सकता है। वह अपनी जीविकावस्था में उसे बख्शीस में या मरने के बाद विरासत में किसीको नही दे सकता । यह राजसत्ता के किया जाना चाहिए। गाँधीजी निजी स्वामित्व के हक को नष्ट करने के लिए नहीं कहते, लेकिन उसके ऊपर अंकुश जरूर लगाना चाहते हैं । अपने पास जो सम्पत्ति हो उसका स्वामी समाज की ओर से उसका ट्रस्टी हो, ऐसा वे समाजवाद और सर्वोदय कहते हैं । इसलिए स्वामित्व के हक के साथ उसके उपर स्वामित्व की जिम्मेदारी भी आती है । तस्वतः इन दोनो कार्यक्रमों में अन्तर इतना ही रहता है कि समाजवादी जिस सम्पशि को समाज के स्वामित्व की बनायें उसका प्रबन्धका सरकार की ओर से नियुक्त होता है, जबकि गाँधीजी के कार्यक्रम में समाज के हित की दृष्टि से सम्पत्ति का उपयोग करने के लिए उसका मालिक स्वयं ही अपने को ट्रस्टी अथवा प्रबन्धका बना लेता है । समाजवादी कार्यक्रम में सरकार इस बात को देखती है कि प्रबन्धकती अपना कर्तव्य पूरी तरह पालन करता है या नहीं; जबकि गांधीजी के कार्य- क्रम में मौलिक या ट्रस्टी अगर पूरी तरह अपने कर्तव्य का पालन न करे तो समाज को उसके विरुद्ध सत्याग्रह करना पड़ता है। गांधीजी के कार्य- क्रम में सशा लोगो के पास रहती है और अपनी शक्ति के अनुसार वे उसका अमल कर सकते हैं । समाजवादी कार्यक्रम में सत्ता लोगों के प्रति- निधि होने का दावा करनेवाली सरकार के हाथ में रहती है। एक दूसरी दृष्टि मे देखिये तो गांधीजी का कार्यक्रम समाजवादी कार्य- क्रम की अपेक्षा श्रेष्ठ लगता है। उत्पति समस्त के साधनों पर समाज का स्वामित्व हो जाय, उनकी व्यवस्था निर्वाचित मण्डलों या मनुष्यों के द्वारा हो, तो दूसरे सब लोगों को तो अपने को सौपा जानेवाला काम अथवा अम उनकी सूचना के अनुसार करना ही रह जाता है। फर्ज कीजिए कि समाजवादी सिद्धान्तों के अनुसार किसी गांव की सारी खेती का विभाजन हो गया है। उस खेती की व्यवस्था सारा गांव इकट्ठा मिलकर तो कर नहीं सकता, इसलिए उन्हें उसके लिए कोई मण्डल नियुक्त करना पड़ेगा। जमीन कब जोती जाय, उसमें कितना खाद काफी होगा, उसमें क्या-क्या बीज बोई जाय और कब-कब उसकी निंदाई-बुआई वगैरा की जाय, यह सब वह मण्डल ही तय करंगा । अगर सिंचाई करनी हो तो वह भी कब की जाय, यह मण्डल ही सोचेगा । इसलिए दूसरों के सोचने की तो कोई खास बात रह ही नहीं जाती । गांधीजी के कार्यक्रम में काम करनेवाले हरेक कुटुम्ब के पास उत्पति के साधन अधिकांश में अपने स्वामित्व के गांधीवाद : समाजवाद ही होते हैं । इसलिए खेती करनी हो तो उस सम्बन्धी सारी और दूसरा कोई उद्योग करना हो तो उसकी तफसीली बातो पर- जैसा कच्चा माल कहाँ से लाना, कब खरीदना, उसमे से क्या-क्या बनाना क्या क्या बेचना, इस सबका-उसको विचार करना पड़ता है और इस सब नफे-नुकसान की जिम्मेदारी उसी पर रहती है। इस तरह काम करने से जिस जिम्मेदारी और होशियारी का खयाल रहता है, जो विचारशक्ति पैदा होती है, विविध विषयों का जो सामान्य ज्ञान मिलता है; वह सौंपा हुअा काम निश्चित समय करनेवाले मजदूर में नहीं होता। काम के द्वारा जो शिक्षा मिलती है और जीवन का जो विकास होता है, वह मनुष्य के खाली मजूर बन जाने पर नहीं हो सकता। इसके विरुद्ध समाजवादी यह दलील जरूर कर सकते हैं कि गांधीजी के कार्यक्रम में हरेक मनुष्य को अधिक घण्टे काम करना पड़ेगा, जबकि हमारे कार्यक्रम में यन्त्रों और भौतिक शक्ति की मदद होने के कारण समाज की आवश्यकताओं जितनी चीजें थोड़े घण्टों के काम से ही तैयार की जा सकेंगी और सब लोगों को जो अधिक अवकाश मिलेगा, उसका उपयोग वे जीवन का विकास करनेवाली प्रवृत्तियों में करेंगे। लेकिन अव- काश या फुर्सत का सदुपयोग करना उतनी सहज बात नही है जैसा कि समझा जाता है। हमारे शिक्षित माने जाने वाले व्यक्ति उन्हें मिलनेवाल अवकाश का कैसा उपयोग करते हैं, उसकी अगर ठीक-ठीक जांच की जाय तो इस बात की कल्पना हो सकती है कि अवकाश मे से जीवन के विकास की सम्भावना कितनी कम है। गांधीजी स्वामित्व का हक मिटाने के लिए नही कहते, मगर उनकी सारी अर्थ व्यवस्था ऐसी ही है कि मालिकों के लिए शोषण की गुन्जाइश ही नहीं रहती । गृह-उद्योग और ग्राम-उद्योग द्वारा होने वाली उत्पशि में पूजी और श्रम के झगड़े के लिए भी गुंजाइश नहीं रहती। कारखानों के जीवन में फिर चाहे वे कारखाने सामाजिक स्वामित्व के ही क्यों न हों- तथा जीवन के प्रत्येक अंग पर अंकुश रखनेवाले केन्द्री समाजवाद और सर्वोदय . भूत सत्ता वाले राजतंत्र में कुटुम्ब-प्रथा टूट जायगी, ऐसा भी एक भय है । समाजवादी कहते हैं कि हम कुटुम्ब-प्रथा तोड़ना नही चाहते, पर यह हमे जरूर मालूम पड़ता है कि हमारी अर्थ-व्यवस्था में कुटुम्ब-प्रथा निभ नहीं सकेगी और इसका हमे कोई दुःख भी नहीं है। पुरुष-स्त्री दोनों कारखानों अथवा खेतो में काम करने जायँ, दोनों को अपने सोवियट की ओर से खाने को मिले और बालकों की शिक्षा की व्यवस्था भी सोवियट अपने ऊपर ले ले, बीमारी, बुढापे अथवा अल्पायु के बालको के लिए भी कोई सम्पत्ति जमा करने को जरूरत न हो, क्योंकि इस सबकी जिम्मेदारी सरकार के ऊपर होती है, तो फिर कुटुम्ब-संस्था का प्रयोजन बहुत कम रह जाता है । इस समय रूस में विवाह तथा तलाक केवल उस विभाग के दफ्तर में जाकर स्त्री-पुरुष द्वारा अपनी ऐसी इच्छा जाहिर करने मात्र से हो सकते हैं । अन्य देशों में विवाह-सम्बन्ध के बगैर होनेवाले स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध अपमानजनक अथवा कलंकरूप माने जाते है; पर वहाँ ऐसी भी कोई बात नहीं है । इतने पर भी ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि वहाँ दुराचार का साम्राज्य है । संसार के हरेक बड़े शहर में बड़े-बड़े चकले (वेश्यालय) उस उस शहर को कलंकित करते हैं, पर मास्को में आज यह बात बिल्कुल नहीं रही है, और इस धन्धेवाली स्त्रियों को खास तौर से शिक्षा देकर विविध कामों में लगा दिया जाता है। गाँधीजी के कार्य-क्रम में कुटुम्ब-प्रथा के महत्व पर खासतौर से जोर दिया जाता है । कुटुम्ब-प्रथा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य बालकों की शिक्षा है । कुटुम्ब की सार्थकता इसी बात में है कि जिन बालकों को खुद ही पैदा किया है उन्हें स्त्री-पुरुष दोनों साथ मिलकर अच्छी तरह शिक्षित बनायें । बालकों के सर्वाङ्गीण विकास के लिए प्रेममय वातावरण की अत्यन्त श्राव- श्यकता है । बिल्कुल छोटे बालकों के पोपण के लिए 'नर्सरी' (शिशुगृह) और उससे कुछ बड़ी उम्र के बालकों के लिए बाल-छात्रालय बनाये जाते हैं, परन्तु कुटुम्ब का प्रयोजन उनसे कभी सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि शिक्षक चाहे जितना शास्त्रीय ज्ञान रखते हों, पर वे माता का स्थान नहीं , गांधीवाद : समाजवाद ले सकते। कुटुम्ब में बालकों को माता-पिता के प्रेम की जो शीतल छाया मिलती है और माता-पिता की देखभाल में वे जितनी अच्छी तरह पर- वरिश पाते हैं उतनी शीतल छाया और देखभाल 'नर्मरी' तथा बाल- छात्रालय में मिलना लगभग असम्भव ही है। आज के हमारे कुटुम्बों में ऐसा वातावरण दिखलाई नहीं पड़ता तो उसमें सुधार करना चाहिए, पर इतने वर्षों के सामाजिक पुरुषार्थ के बाद कुटुम्ब-प्रथा का जो विकास हुमा है उसे नष्ट हो जाने देने अथवा उसका नाश हो जाय, ऐसी रचना करने मे तो दुनिया का नुकसान ही है। कुटुम्ब मे जिन सामाजिक सद्गुणो का विकास होना सम्भव है, के 'नर्सरी' या बाल-छात्रालय में नहीं श्रा सकते। दोनों कार्यक्रमों की तुलना का सार निकालने पर मालूम पड़ता है कि समाजवादी कार्यक्रम कुछ विशेष निश्चित स्वरूप का है, क्योंकि उसकी सारी योजना सैनिक ढंग पर की हुई है। समाजवादी सेना तथा पुलिस की मार्फत और सरकारी अंकुशवाले प्रेस, रेडियो, सिनेमा आदि प्रचार के साधनों द्वारा नवीन समाज-रचना खड़ी करना चाहते हैं। बाहरी दबाव पर उसमें विशेष प्राधार रहता है, इसलिए उसमें बाह्य परिवर्तन जल्दी होता है। गाँधीजी की प्रवृत्ति आन्तरिक परिवर्तन करने की है। उनके कार्यक्रम में बाहरी दबाव की गुंजाइश नही है। उनके कार्यक्रम का मुल्य अंग यह है कि लोगो को नये ढंग से विचार करना आ जाय। उनकी अपील केवल मजूर-वर्ग, किसान-वर्ग अथवा दलित वर्ग से ही नहीं है, बल्कि धनिकों और मालिकों से भी है । धनिकों और मालिकों का वह नाश नहीं चाहते, पर उनका हृदय-परिवर्तन करके उन्हें अन्याय-अत्याचार करने से रोकते हैं । फिर उनके कार्यक्रम के अनुसार सारी अर्थ-रचना अपने आप ऐसी बनती है कि उसमें अन्याय अत्याचार की गुंजाइश ही नहीं रहती। उसमें सगा और धन की प्रतिष्ठा के बदले सेवा और शरीर- श्रम की प्रतिष्ठा की स्थापना होती है । ये सब फेर-बदल आन्तरिक होने के कारण जितना मूल्य-परिवर्तन गाँधीजी के कार्यक्रम में होता है उतना ।

गाँधी-नीति मूल्य परिवर्तन समाजवादी कार्यक्रम में नहीं होता। समाजवादी कार्यक्रम में सैनिक बल, बड़े पैमाने पर उत्पादन, यंत्रो का दीवानापन, आवश्यकताओं की अमर्यादित वृद्धि, ये सब चीजें पुरानी अर्थ रचना में की ही रहती हैं, जब कि अहिंसा तथा स्वदेशी धर्म द्वारा गाँधीजी एक बिल्कुल ही नये दर्शन का निर्माण करते हैं। उसमें बाहरी दबाव न होने से उनकी कल्पनानुसार हुई रचना अधिक चिरस्थायी तथा सुखशान्तिमय होने की सम्भावना है। उसमे किसी के प्रति कोई द्वेष या ईर्ष्या न होने के कारण वह एक पक्ष या वर्ग के कल्याण का नहीं बल्कि सबके कल्याण का कार्यक्रम है । इसलिए गाँधीजी ने उसका नाम जो सर्वोदय रक्खा है वह सार्थक है। गाँधी-नीति [जैनेन्द्रकुमार] मेरे लेखे गांधीवाद शब्द मिथ्या है । जहां वाद है वहां विवाद अवश्य है। वाद का क्षण है कि प्रतिवाद को विवाद द्वारा खंडित करे और तरह अपने को प्रचलित करे । गांधी के जीवन में विवाद एकदम नहीं है। इसलिए गांधी को वाद द्वारा ग्रहण करना सफल नहीं होगा। गांधी ने कोई सूत्रबद्ध मंतव्य प्रचारित नही किया है । वैसा रेखाबद्ध मंतव्य वाद होता है । गांधी अपने जीवन को सत्य के प्रयोग के रूप में देखते हैं । सत्य के साक्षात्कार की उसमें चेष्टा है। सत्य पा नहीं लिया गया है, उसके दर्शन का निरन्तर प्रयास है। उनका जीवन परीक्षण है । परीक्षाफल प्रांकने का काम इतिहास का होगा, जबकि उनका जीवन जिया जा चुका होगा । उससे पहले उस जीवन-फल को तौलने के लिए वाद कहां है, Perspective कहां है ? जो सिद्धान्त गांधी के जीवन द्वारा चरितार्थ और परिपुष्ट हो रहा है गांधीवाद : समाजवाद वह केवल बौद्धिक नहीं है। इसलिए वह केवल बुद्धिग्राह्य भी नहीं है। वह समूचे जीवन से सम्बन्ध रखता है। इस लिहाज से उसे आध्यात्मिक कह सकते हैं । आध्यात्मिक यानी धार्मिक । व्यक्तित्व का और जीवन का कोई पहलू उससे बचा नही रह सकता । क्या व्यक्तिगत, क्या सामाजिक, क्या राजनैतिक, वादगत अथवा अन्य क्षेत्रो मे वह एक-सा व्यापक है। वह चिन्मय है, वादगत वह नहीं है । गाँधी के जीवन की समूची विविधता भीतरी संकल्प और विश्वास की निपट एकता पर कायम है । जो चिन्मयतत्व उनके जीवन से व्यक होता है उसमें खण्ड नहीं है । वह सहज और स्वभाव-रूप है। उसमें प्रतिभा की आभा नहीं है, क्योंकि प्रतिभा द्वंद्वज होती है। उल निर्गुण अद्वैत-तत्व के प्रकाश में देख सकें तो उस जीवन का विस्मयकारी वैचित्र्य दिन की धूप जैसा धौला और साफ हो पायगा । अन्यथा गाँधी एक पहेली है जो कभी खुल नही सकती ! कुंजी उसकी एक और एक, ही है। वहाँ दो-पन नहीं है । वहां सब दो एक है। "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं प्रज।" समूचे और बहुतेरे मत- वादों के बीच में रहकर, सबको मानकर किन्तु किसी में न फंसकर, गांधी ने सत्य की शरण को गह लिया । सत्य ही ईश्वर और ईश्वर ही सत्य । इसके अतिरिक्त उनके निकट ईश्वर की भी कोई और भापा नहीं है, सत्य की ही कोई और परिभाषा है । इस दृष्टि से गॉधी की आस्था का आधार अविश्वासी को एकदम अगम है । पर वह आस्था अटूट, अजेय और अचूक इसी कारण है । देखा जाय तो वह अति सुगम भी इसी कारण है। कहाँ से गाँधी को कर्म की प्रेरणा प्राप्त होती है, इसका बिना अनु- मान किये उस कर्म का अंगीकार कठिन होगा । स्त्रोत को जान लेने पर मानो वह कर्म सहज उपलब्ध हो जायगा। गाँधी की प्रेरणा शत प्रति-शत आस्तिकता में से आती है। वह सर्वथा अपने को ईश्वर के हाथ मे छोड़े हुए हैं। ऐसा करके अनायास वह भाग्य-पुरुष (Man of Destiny) " .

गाँधी-नीति । . हो गये हैं। जो वह चाहते हैं, होता है क्योंकि जो होने वाला है उसके अतिरिक्त चाह उनमें नहीं है बौद्धिक रूप से ग्रहण की जानेवाली उनकी जीवन-नीति, उनकी समाज-नीति, उनकी राजनीति इस आस्तिकता के आधार को तोड़कर सम- झने की कोशिश करने से समझ में नही आ सकती । इस भाँति वह एक- दम विरोधाभास से भरी, वक्रताओं से वक्र और प्रपंचो से क्लिष्ट मालूम होगी। जैसे मानो उसमे कोई रीढ ही नहीं है । वह नीति मानों अवसर- वादी (Opportunist) की नीति है । मानो वह घाघपन है । पर मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह घाघपन, यह कार्यकौशल, अनायास ही यदि उन्हें सिद्ध हो पाया है तो इसी कारण कि उन्होंने अपने जीवन के समूचे जोर से एक और अकेले लक्ष्य को पकड़ लिया है । और वह लक्ष्य क्योकि एक दम, निर्गुण निराकार, अज्ञेय और अनन्त है, इसमें वह किसी को बांध नहीं सकता, खोलता ही है। उस आदर्श के प्रति उनका समर्पण सर्वांगीण है। इसलिए सहज भाव से उनका व्यवहार भी आदर्श से उज्ज्वल और ग्रन्थिहीन होगया है । उसमें द्विविधा ही नहीं है । दुनिया मे चलना भी मानो उनके लिए अध्यात्म का ध्यान है। नर की सेवा नारायण की पूजा है। कर्मसुकौशल ही योग है। ईश्वर और संसार में विरोध, यहां तक कि दित्व, ही नहीं रह गया है । सृष्टि सृष्टामय है और विष्टा को भी सोना बनाया जा सकता है। यों कहिए कि सृष्टि में सृष्टा, नर में नारायण, पदार्थमात्र में सत्य देखने की उनकी साधना में से ही उनकी राजनीति, उनकी समाजनीति ने वह रुख लिया जिससे राजनीति आध्यात्मिकता से अनुप्राणित हुई, स्थूल कर्म में सत्यज्ञान की प्रतिष्ठा हुई और घोर घमसान में प्रेम और शान्ति के आनन्द को अक्षुण्ण रखना बताया गया । सत्य ही है । भेदभाव उसमे लय हे । इस अनुभूति की लीनता ही सबका परम इष्ट है। किन्तु हमारा अज्ञान हमारी बाधा है। अज्ञान यानी अहंकार । जिसमे हम हैं उसमे ही, अर्थात स्वयं मे शून्य, अपने को गांधीवाद : समाजवाद है -- अनुभव करते जाना ही ज्ञान पाना और जीवन की चरितार्थता पाना यही कर्तत्य, यही धर्म। विश्वास की यह भित्ती पाने पर जब व्यक्ति चलने का प्रयासी होता है तब उसके कर्म में आदर्श सामाजिकता अपने पाप समा जाती है। समूचा राजनैतिक कर्म भी इसके भीतर श्रा जाता है। देश सेवा आती है। विदेशी सरकार से लड़ना भी आ जाता है। स्वराज्य कायम करना और शासन विधान को यथावश्यक रूप में तोड़ना-बदलना भी आ जाता है। पर वह कैसे? सत्य की आस्था प्राप्त कर उस ओर चलने का प्रयत्न करते ही अभ्यासी को दूसरा तत्व प्राप्त होता है - अहिंसा । उसे सत्य का ही प्राप्त पहलू कहिये । जैसे रात को चांद का बस उजला भाग दिखता है. शेष पिछला भाग उसका नहीं दिखाई देता, उसी तरह कहना चाहिए कि जो भाग सत्य का हमारे सन्मुख है वह अहिंसा है । वह भाग अगर उजला है तो किसी अपर-ज्योति से ही है लेकिन फिर भी वह प्रकाशोद्गम (सत्य) स्वयं हमारे लिए कुछ अज्ञात और प्रार्थनीय ही है। और जो उसका पहलू आचरणीय रूप में सम्मुख है वही अहिंसा है। सत्य में तो सब हैं एक । लेकिन यहां इस संसार में तो मुझ जैसे कोटि-कोटि श्रादमी दिखते हैं। उनके अनेक नाम हैं, अनेक वर्ग है । ईश्वर में आस्था रक्खू तो इस अनेकता के प्रति कैसा आचरण करु ? उन अनेको मे भी कोई मुझे अपना मानता है, कोई पराया गिनता है। कोई समा है दूसरा द्वेशी है। और इस दुनिया के पदाथों में भी कुछ मेरे लिए जहर है, कुछ अन्य औषध है। इस विषमता से भरे संसार के प्रति एक्य-विश्वास को लेकर मैं कैसे वर्तन करू, यह प्रश्न होता है प्रास्तिक अगर ऐसे विकट अवसर पर संशय से घिरकर आस्तिकता को छोड़ नहीं बैठता, तो उसके लिए एक ही उत्तर है। वह उत्तर है, अहिंसा । " गाँधी-नीति . . जो है ईश्वर का है, ईश्वर-कृत है । मैं उसका, किसी का, नाश नहीं चाह सकता। किसी की बुराई नही चाह सकता | किसी को झूठा नही कह सकता । घमण्ड नही कर सकता अादि कर्तव्य एकाएक ही आस्तिक के ऊपर आ जाते हैं। लेकिन कर्तव्य कुछ आ जाय तर्क सुझायगा कि - सचाई भी तो मैं देखू। आंख सब ओर से तो मूदी नही जा सकती । वह प्राख दिखाती है कि जीव-जीव को खाता है। मैं चलता हूं, कौन जानता है कि इसमे भी बहुतो को असुविधा नहीं होती, बहुतों का नाश नही होता ? अाहार बिना क्या मैं जी सकता हूं ? लेकिन आहार क्या हिंसा नही है ? जीवन का एक भी व्यापार ईश्वर के बिना सम्भव नहीं बनता दीखता । जीवन युद्ध दिखलाई देता है । वहां शान्ति नहीं है । पग-पग पर दुविधा है और विग्रह है। तब कहे, कौन क्या कहता है। ऐसे स्थल पर आकर ईशनिष्ठा टूटकर ही रहेगी। ऐसे समय पागल ही ईश्वर की बात कर सकता है। जिसकी अांखें खुली हैं और कुछ देख सकती हैं वह सामने के प्रत्यक्ष जीवन मे से और इतिहास द्वारा परोक्ष जीवन मे से साफ-साफ सार-तत्व को पहचान लेगा कि युद्ध ही मार्ग है। उसमें बल की ही विजय है, और बल जिस पद्धति से विजयी होता है उसका नाम है अहिंसा । जो मजबूत है वह निर्बल को दबाता आया है, और इस तरह विकास होता आया है । मेरे ख़याल में श्रद्धा के अभाव में तर्क की और बुद्धि की सचाई और चुनौती यही है। किन्तु समस्या भी यही है । रोग भी यही है। आज जिस उलझन को सुलझाने का सवाल हर देश में, हर काल में, कर्म-क्षेत्र में प्रवेश करनेवाले योद्धा के सामने आयगा वह यही है कि इस कुरु-क्षेत्र में मैं क्या करूं ? किसको छोडू, किसको लू ? बुराई को कैसे पछाडू ? बुराई क्या है ? क्या बुराई अमुक अथवा अमुक नामधारी है ? या बुराई वह है जो कि दुःख देती है। इतिहास की आदि से दो नीति और दो पद्धति चलती चली आई हैं।

गांधीवाद : समाजवाद , । एक वह जो अपने में नहीं, बुराई कहीं बाहर देवकर ललकार के साथ उसके नाश के लिए चल देती है। दूसरी जो स्वयं अपने को भी देखती है और बुरे को नहीं, उसमें विकार के कारण श्रागई हुई त्रुराई को करना चाहती है । आस्तिक की पद्धति यह दूसरी ही हो सकती है। आस्ति- कना के बिना बहुत मुश्किल है कि पहली नीति को मानने और उसके वश मे हो जाने से व्यक्ति बच सके गांधीजी की राजनीति इस प्रकार धर्मनीति का ही एक प्रयोग है । वह नीति संघर्ष की परिभाषा में बात नही सोचती । संघर्ष की भाषा उसके लिए नितान्त असंगत है । युद्ध तो अनिवार्य ही है, किन्तु वह धर्म-युद्ध हो। जो धर्म-भाव से नहीं किया जाता वह युद्ध संकट काटता नहीं, संकट बढाता है । धर्म साथ हो. फिर युद्ध से मुंह मोड़ना नहीं है। इस प्रकार के युद्ध से शत्रु मित्र बनता है। नहीं तो शत्रु चाहे मिट भी जाय, पर वह अपने पीछे शत्रुता के बीज छोड़ जाता है और इस तरह शत्रुओं की संख्या गुणानुगुणित ही हो जाती है। अतः युद्ध शत्रु से नही, शत्रुता से होगा। बुराई से लड़ना कब रुक सकता है ? जो बुराई को मान बैठता है, वह भलाई का कैसा सेवक है ? इससे निरन्तर युद्ध, अविराम युद्ध । एक क्षण भी उस युद्ध मे आंख झपकने का अवकाश नहीं। किन्तु पल-भर के लिए भी वह युद्ध वासनामूलक नही हो सकता । वह जीवन और मौत का, प्रकाश-अंधकार और धर्म-अधर्म का युद्ध है। यह खांडे की धार पर चलना है। इस प्रकार गांधी-नीति की दो आधारशिला प्राप्त हुई:- (१) ध्येय- सत्य । क्योकि ध्येय कुछ और नहीं हो सकता । जिसमें द्विधा है, दुई है, जिससे कोई अलग भी है, वह ध्येय कैसा ? जो एक है, वह संपूर्ण भी है। वह स्वयंभू है, आदि-अंत है, अनादि-अनंत है। प्रगाढ़ आस्था से ग्रहण करो तो वहीं ईश्वर । (२) धर्म अहिसा । - .

गाँधी-नीति ११३ क्योकि उस ध्येय को मानने से जो व्यवहार-धर्म प्राप्त हो सकता है वह अहिंसा ही है। अहिंसा इसलिए कहा गया कि उस प्रेरक (Positive) तत्व को स्वीकार की परिभाषा मे कहना नहीं हो पाता, नकार की ही परिभाषा हाथ रह जाती है । उसको कोई पॉजिटिव संज्ञा ठीक ढक नही पाती । हिंसा का अभाव अहिंसा नहीं है, वह तो उसका रूपभर है। उस अहिंसा का प्राण प्रेम है। प्रेम से और जीवन्त ( पॉजिटिव ) शक्ति क्या है ? फिर भी अहिंसा-गत और लौकिक प्रेम में अन्तर बाँधना कठिन हो जाता, और 'प्रेम' शब्द में निषेध की शक्ति भी कम रहती; इसी से प्रेम न कहकर कहा गया, 'अहिंसा' । वह अहिंसा निष्क्रिय (Passive) पदार्थ नहीं है। वह तेजस्वी और सक्रिय तत्व है। अहिंसा इस प्रकार मन की समूची वृत्ति द्वारा ग्रहण की जानेवाली शक्ति हुई । कहिए कि चित्त अहिंसा में भीग रहना चाहिए । और सत्य है ही ध्येय । कहा जा सकता है कि मात्र इन दोनों - सत्य-अहिंसा के सहारे साधारण भाषा में लोक-कर्म के संबंध में कुछ प्रकाश नहीं प्राप्त होता । सत्य को मन में धार लिया, अहिंसा से भी चित्त को भिगो लिया, लेकिन अब करना क्या होगा ? तो उसके लिए है। (३) कर्म-सत्याग्रह । 'सत्याग्रह' मानों कर्म की व्याख्या है । सत्य प्राप्त नहीं है । उस उपलब्धि की ओर बढ़ते रहना है। इसी में गति (उन्नति, प्रगति, विकास प्रादि ) की आवश्यकता समा जाती है । इसी में कर्तव्य ( Doing) श्रा जाता है। यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि जब पहली स्थापना में सत्य को अखंड और अविभाज्य कहा गया तब वहां अवकाश कहां रहा कि श्राग्रह हो ? जहाँ आग्रह है वहां, इसलिए, असत्य है। यह शंका अत्यन्त संगत है । और इसी का निराकरण करने के लिए शर्त लगाई गई-सविनय । जहां विनय-भाव नहीं है वहां सत्याग्रह हो गांधीवाद : समाजवाद नही सकता | वहां उस 'धोप' का व्यवहार है तो जान अथवा अजान में छल है। व्यक्ति सदा ही अपूर्ण है । जबतक वह है, तबतक समष्टि के साथ उसका कुछ भेद भी है। फिर भी जो समष्टिगत सत्य की झांकी ज्यक्ति के अंतःकरण मे प्राक्ष होकर जाग उठी है, व्यक्ति की समूची निष्ठा उसीके प्रति समर्पित हो जानी चाहिए। उस डटी रहनेवाली निष्ठा को कहा गया आग्रह, किन्तु उस आग्रह मे सत्याग्रही अविनयी नहीं हो सकता, और उस आग्रह का बोझ अपने उपर ही लेना है। उसकी (नैतिक से अतिरिक्त) चोट दूसरे तक नहीं पहुंचने देता । यानी सत्याग्रह है तो सवि. नय होगा। कही गहरे तक में भी वहां अविनय भाव नहीं हो सकता । कानून ( सरकारी और लौकिक ) तक की अवज्ञा हो सकेगी, उसका भंग किया जा सकेगा, लेकिन तभी जबकि सत्य की निष्ठा के कारण हो और वह अवज्ञा सर्वथा विनम्र और भद्र हो । गांधी-नीति के इस प्रकार ये तीन मूल सिद्धान्त हुए । यो तीनों एक ही है। फिर भी कह सकते हैं कि सत्य व्यक्तिगत है, अहिंसा सामाजिक और सत्याग्रह राजनैतिक हो जाता है । इसके आगे संगठित और सामुदायिक रूप से कर्म की व्यवस्था और आन्दोलन का प्रोग्राम पाने के बारे में कठिनाई नहीं होगी। व्यक्ति किन्हीं विशेष परिस्थितियों को लेकर पैदा होता है । इन परिस्थितियो मे गर्भित आदि-दिन से ही कुछ कर्तव्य उसे मिलता है। वह कर्तव्य कितना ही स्वल्प और सकड़ा प्रतीत होता हो, लेकिन वहीं व्यक्ति की सिद्धि और वही उसका स्वधर्म है । उसको करके मानो वह सब कुछ करने का द्वार पा लेता है । 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः ।" इस भांति वर्तन करने से विकल्प काल कटता है । कल्पना को लगाम मिल जाती है। बुद्धि बहकती नहीं और तरह-तरह के स्वर्ग-चित्र (Utopias) तात्कालिक कर्म से बहकाकर व्यक्ति को दूर नहीं खींच ले जाते । क्षणोत्साह की (Romantic) वृत्ति इस तरह मंद होती है और परिणाम में स्वार्थ जन्य स्पर्धा और आपाधापी भी कम होती है।

गाँधी-नीति सबको दबा देने और सबसे आगे बढ़े हुए दीखने की ओर मन उतना नहीं लपकता और परिणामतः व्यक्ति विक्षोभ और विषमता पैदा करने में नही लग जाता । महत्वकांक्षा ( Ambition) की धार तब काटती नही। व्यक्ति कर्मशाली तो बनता है, फिर भी भागाभागी से बच जाता है । वह मानो अपना स्वामी होता है । ऐसा नहीं जान पड़ता जैसे पीछे किसी चाबुक की मार पर बेबस भाव से अन्धी गति में भाग रहा हो। मुझे तो मालूम होता है कि हमारी सामाजिक और राजनैतिक उल- झनो की जड़ में मुख्यता से यही आपाधापी और बढ़ाबढ़ी की प्रवृत्ति है। ऊपर यह आन्तरिक (Subjective) दृष्टिकोण की बात कही गई । यानी भावना शुद्धि की बात । मुख्य भी वही है । पर प्रश्न होगा कि घटना की दुनिया (Objective Conditions) के साथ गाँधी-नीति क्या करना चाहती है। उसमें क्या सुधार हो, और कैसे हो ? समाज का संगठन क्या हो ? आवश्यकता और अधिकार का, उद्यम-प्राराम का, विज्ञान-कला का, शासन का और न्याय का परस्पर संपर्क और विभाजन क्या हो ? श्रम और पूजी कैसे निपटें ? आदि-श्रादि । तो प्रश्नकर्ता को पहले तो यह कहना आवश्यक है कि सारे प्रश्न अाज अभी हल हो जायेंगे तो काल भी आज ही समाप्त हो जायगा। इससे प्रश्नों को लेकर एक घटाटोप से अपने को घेर लेने और हत्बुद्ध होने की अावश्यकता नहीं है। फिर उनका हल कागज पर और बुद्धि में ही हो जानेवाला नहीं है । सब सवालो का हल बताने वाली मोटी किताब मुझे उन सवालों से छुटकारा नहीं दे देगी । इसलिए विचार-धाराओं (ideologies) से काम नहीं चलेगा । जो प्रश्न हैं, उनमें तो अपनी समूची कर्म की लगन से लग जाना है। ऐसे ही वे शनैः शनैः निपटते जायेंगे। नही तो किनारे पर बैठकर उनका समाधान मालूम कर लेने से कर्म की प्रेरणा चूक जायगी और अन्त में मालूम होगा कि वह मन द्वारा मान लिया गया समाधान न था, फरेब (illusion) था, और जरा बोझ पड़ते ही वह तो उड़ गया और हमें कोरा-का-कोरा वहीं-का-वही गांधीवाद : समाजवाद छोड़ गया । अर्थात् उन प्रश्नों पर बहसा-बहसी और लिखा-पढी की अपने आप में जरूरत नहीं है। उनमें जुट जाना पहली बात है। गाँधी-नीति है कि समस्या को बौद्विक कहकर केवल बुद्धिक्रीडा से उसे खोलने की आशा न करो। ऐसे वह उलझेगी ही। समस्या जीवन की है, इससे पूरे जीवन-बल के साथ उससे जूझो । इस कार्य-पद्धति पर बढ़ते ही पहला सिद्धान्त-सूत्र जो हाथ लगता है, वह है स्वदेशी । स्वदेशी द्वारा व्यक्तिगत कर्म में सामाजिक उपयोगिता पहली शर्त के तौर पर मांगी जाती है। उस शर्त का अर्थ है कि हमारे काम से आस- पास के लोगों को लाभ पहुंचे। आदान-प्रदान बढ़े, सहानुभूति विकसे, और पड़ोसी-पन पनपे । Neighbourliness (पास-पड़ोसपन) स्वदेशी की जान है । मेरा देश वह जहाँ मैं रहता हूँ। इस भाँति सबसे पहले मेरा घर और मेरा गाँव मेरा देश है। उत्तरोरार वह बढ़कर जिला, प्रांत, राष्ट्र और विश्व तक पहुंच सकता है । भूगोल के नक्शे का देश अन्तिम देश नहीं है। मेरे घर को इन्कार कर नगर कुछ नहीं रहता, उसी तरह नगर, प्रान्त को हंकार कर राष्ट्र कुछ नहीं रहता ! उधर दूसरी ओर नागरिक हित से विरोधी बनकर पारिवारिक स्वार्थ तो निषिद्ध बनता ही है। स्वदेशी में यही भाव है। उसमें भाव है कि मैं पड़ोसी से टूटू नहीं और अधिकाधिक हम में हितस्य बढ़े। दूसरा उसमें भाव है, सर्वोदय । एक जगह जाकर शरीर भी आत्मा के लिए विदेशी हो सकता है। समाजवादी अथवा अन्य वस्तुवादी समाजनीतियाँ इसी जगह भूल कर जाती हैं । वे समाज को सम्हालने में उसीकी इकाई को भूल जाती हैं । उनमें योजनाओं की विशदता रहती है, पर मूल में Neighbourliness के तत्वे पर जोर नहीं रहता । सामाजिकता वही सच्ची, जो पड़ोसी-प्रेम से प्रारम्भ होती है। इस तत्व को ध्यान में रखें तो बड़े पैमाने पर चलनेवाला यांत्रिक उद्योगवाद गिर जायगा । जहाँ बड़े कल- कारखाने हुए वहाँ जन-पद दो भागों में बंटने लगता है। वे दोनों एक- दूसरे को गरज की भावना से पकड़ते और अविश्वास से देखते हैं । वे गाँधी-नीति परस्पर सह्य बने रहने के लिए एक-दूसरे की आँख बचाते और मिथ्या- चार करते हैं । पूजी-मालिक मजूरो की झोपड़ियों को यथाशक्ति अपने से दूर रखता है और अपनी कोठी पर चौकीदारों का दल बैठाता है, जिससे खुद दुश्प्राप्य और सुरक्षित रहे। उधर मजूरों की आँखों में मालिक और मालिक का बंगला काँटा बन रहते है। इस प्रकार के विकृत और मलिन मानवीय सम्बन्ध तभी असम्भव बन सकेंगे जब समाज की पुनर्रचना पड़ौसपन (neighbourliness) के सिद्धान्त के आधार पर होगी । वह आधार स्वार्थ-शोध नही है । वस्तुवादी भौतिक (materialistic) नितियाँ अततः यही पहुंचती है कि व्यक्ति स्वार्थ के आधार पर चलता और चल सकता है। स्वदेशी सिद्धान्त में से उद्योग का कार्यक्रम प्राप्त होता है, उसमें मानव सम्बन्धों के अस्वच्छ होने का खटका कम रहता है। उसमे उत्पादन केन्द्रित नहीं होगा, और खपत के लिए मध्यम-वर्ग के बढ़ने और फूलने की गुंजाइश कम रहेगी । मानव-श्रम का मूल्य बढ़ेगा और अनुत्पादक चातुर्य का मूल्य घटेगा । महाजन, श्रमी और ग्राहक सब आसपास मिले- जुले रहने के कारण समाज में वैषम्य विषम न होगा और शोषणवृत्ति को गर्व-स्कीन होने को अवकाश कम प्राप्त होगा। इस भाँति चरखा, ग्रामोद्योग, मादक-द्रव्य निषेध, और हरिजन (दलित) सेवा यह चतुर्विध कार्यक्रम हिन्दुस्तान की हालत को देखते हुए अन्तः शुद्धि और सामाजिक उपयोगिता दोनों अन्तो को मिलानेवाली गाँधीनीति के स्वदेशी सिद्धान्तो से स्वयमेव प्राप्त होता है । यह शक्ति- संचय और ऐक्य विस्तार का कार्यक्रम है । शक्ति और अवसर प्राप्त होने पर फिर सत्याग्रह (Direct Action) द्वारा राजनैतिक विधान में परिवर्तन लाने और उसे लोक कल्याण की ओर मोड़ने की बात विशेष दुस्साध्य नहीं रहती। यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि स्वदेशी का प्रारम्भ राष्ट्र-भावना से नहीं होता । इसलिए उसका अन्त भी राष्ट्र-भावना पर नहीं है । राष्ट्र-भावना , , गांधीवाद : समाजवाद मध्य में आजाय तो भले ही आजाय । स्वदेशी को भौगोलिक राष्ट्र के अर्थ मे लेने से गड़बड़ उपस्थित हो सकती है । इससे ‘देशी' पूजीवाद को बढ़ावा मिलता है। और उस राह तो एक दिन (State capitalism) मे उतर आना होगा । उसके अर्थ होगे, एकतंत्रीय शासन । यांत्रिक- उद्योगाश्रित समाजवाद का परिणाम आनेवाला है। यानी ऐसा समाजवाद एकतन्त्रवाद ( फासिज्म आदि) को बुलाकर ही रहेगा । गाँधीनीति का स्वदेशी सिद्धान्त, हिन्दुस्तानी मिलो को नही, घरेलू चरखों को चाहता है। - सक्षेपमे गाँधीनीति इस स्थापना से प्रारम्भ होती है कि जीवात्मा सर्वात्मा का ही खंड है। इससे व्यक्ति का ध्येय सत्य से एकाकार होना है। उसकी इस यात्रा में ही समाज, राष्ट्र और विश्व के साथ सामंजस्य की बात आती है। वह जितना उत्तरोतर इन व्यापक सत्ताओं से एकात्म होता चला जावे रतना अपने और संसार की बंधन-मुक्ति में योगदान करता है । इस यात्रा के यात्री के जीवन-कर्म का राजनीति एक पहलू है । आवश्यक है, पर वह पहलू भर है। वह राजनीति कर्म में युद्ध-रूप हो, पर अपनी प्रकृति में उसे धर्ममयी और शान्ति-लती ही होना चाहिए। उस यात्रा का मार्ग तो अपरिचित ही है । फिर भी श्रद्धा यात्री का सहारा है । भीतरी श्रद्धा का धीमा-धीमा श्रालोक उसे मार्ग से डिगने न देगा।। उस राही को तो एक कदम बस काफी है । वह चले, फिर अगला सूझा ही रक्खा है, मुख्य बात चलना है । राह चलने से ही खुलेगी । इस प्रकार इस यात्रा में प्रत्येक कदम ही एक साध्य है। यहाँ साधन स्वयं साध्य का अंग है। साधन साध्य से भिन्न कहाँ हो सकता है। इससे लम्बा चलना है, लम्बी बातों का उसके लिए अवसर नहीं है। वह तो चला चले, बस चला चले। व्यवहार का कोई भी कर्म धर्म से बाहर नहीं है। सबमें धर्म की श्वास चाहिए। उसी दृष्टिकोण से जीवन की समस्याओं को ग्रहण करने से समुचित समाधान का लाभ होगा। अन्यथा नहीं । सबके मन में एक जोत समाजवादी व्यवस्था है। उसे जगाये रखना है। फिर उस लौ में जीवन को लगाये चले चलना है । चले चलना, चले चलना । जो होगा ठीक होगा। राह का अन्त न नाप । तुझे तो चलना है। . : १० : समाजवादी व्यवस्था [ सम्पूर्णानन्द ] समाजवादी के लिए पहली जरूरत यह है कि वह राज्य पर अधिकार प्राप्त करे । सम्भव है कि यह अधिकार वैधानिक उपायों से ही प्राप्त हो जाय-कुछ लोगों का यह विश्वास है कि फ्रांस मे पापुलर फ्रन्ट सरकार की स्थापना इसकी शुभ सूचना है-परन्तु अबतक यह अधिकार परिवर्तन क्रान्ति द्वारा ही होता रहा है । समाजवादी क्रान्ति का यह अर्थ होगा कि राजनैतिक अधिकार उस वर्ग के हाथ मे आजाय जो आज शोपित है। इस क्रांति की पद्धति क्या होगी यह हिंसात्मक होगी या अहिंसात्मक यह हमारे लिए अप्रासंगिक है। पर यह आवश्यक है कि राजनैतिक अधिकार समाजवादियो के हाथ मे आये । केवल इतना ही काफी नहीं है कि जिन लोगों का राजयन्त्र पर कब्जा हो वे समाजवादी विचार रखते हो परन्तु यह नितान्त आवश्यक है कि ये समाजवादी अद्यावधि-शोषित वर्ग के हों, अर्थात् मजदूर और किसान एक शब्द मे सर्वहारा या तत्सम अर्थात् निम्न मध्यमवर्ग के हो। इसका तात्पर्य यह है कि यदि समाजवादी अधिकारियो को इस दलितवर्ग की सक्रिय सहानुभूति के द्वारा अधिकार की प्राप्ति हुई होगी तब तो वे समाज वादी व्यवस्था की ओर निर्भयता के साथ बढ़ सकेंगे अन्यथा यदि वे दूसरे अर्थात् आजकल के साधिकारवर्गों की सहायता से शासन की गद्दी पर बैठेंगे तो उनको पद-पद समझौते की नीति बरतनी पड़ेगी और अपनी गांधीवाद : समाजवाद । । समाजवादी कार्यशैली को पीछे रखकर अपने हिमायतियों का हित साधन करना पड़ेगा। उनके हाथो बहुत से उपयोगी सुधार हो जायेंगे, पर सुधार मात्र के लिए क्रान्तियों नहीं होती। इसका एक और अर्थ निकलता है, वह भी समझ लेना चाहिए। यदि समाजवादियो की परिस्थिति वैसी ही रही जैसी कि लोकतंत्र देशो में विभिन्न राजनैतिक दलो की होती है, अर्थात् यह कि कभी पार्लमेंट बहुमत हो गया तो दो-चार वर्ष तक मन्त्रिमण्डल में आगये, अल्पमत हुआ तो पद से पृथक हो गये तो भी वे कुछ नहीं कर सकते । ऐसे राजनैतिक दलो से सदैव यह डर लगा रहता है कि यदि हमने कोई व्यापक उलट फेर किया तो हमारे बाद जिस दल का बहुमत होगा वह हमारा किया-धरा सब उलट देगा, अतः वे डरकर ही आगे बढ़ते हैं। न तो उनको अतीत से नाता तोड़ते बनता है, न अनागत की ओर लम्बे डग डाल सकते हैं। ऐसे लोग भी साधारण सुधारक होकर ही रह जाते हैं । यदि समाजवादी व्यवस्था कायम होनी है तो यह आवश्यक है कि समाजवादी देश के एक नहीं एकमात्र राजनैतिक दल हो। यह निश्चय होना चाहिए कि वे जो कुछ करेंगे, उसमें स्थायित्व होगा और उनको दूसरे दलों के साथ समझौता करके अपनी कार्य-पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है । यह स्थायित्व तभी हो सकता है जब साधारण पार्लमेंटरी ढंग कुछ काल के लिए स्थगित-सा हो गया हो और समाजवादियों के हाथ में क्रान्ति के द्वारा अधिकार आया हो। कुछ लोग यह कहते हैं कि यदि समाजवाद में कुछ तथ्य है तो समाज- वादी कही छोटे से क्षेत्र में उसका प्रयोग करके उसकी व्यावहारिकता सिद्ध करें । भारत में बहुधा यह सुना जाता है कि गाँधीवाद और समाजवाद का इस समय मुकाबला है । इन दोनों में गाँधीवाद तो नित्य व्यवहार में बरता जा सकता है, पर समाजवाद की परीक्षा नहीं होती, इसलिए उसके पीछे पड़ना अपने को संदिग्ध चीज के हाथों बेच देना है। यूरोप में कई बार छोटे से क्षेत्र में समाजवादी प्रयोग करने का प्रयत्न .

समाजवादी व्यवस्था . । किया गया । समाजवादी बस्तियां तक बसाई गई। पर वे सब प्रयोग असफल रहे । आज रूस में ही ऐसा प्रयत्न सफल हो रहा है। कारण स्पष्ट है। जबतक सारे देश में समाजवादी वातावरण न हो तब तक कोई एक कल कारखाना समाजवादी ढंग से नही चल सकता । यदि कोई व्यक्ति किसी समाजवादी को यह चुनौती देता है कि तुम समाजवाद की व्यावहारिकता छोटे क्षेत्र मे दिखला दो तो उसका यही उत्तर है कि ऐसा नहीं हो सकता। गाँधीवाद और समाजवाद का सवाल उठाना भी निरर्थक है। गांधीवाद या तो साधन है या साध्य । यदि वह साधन है तो वह तप, इन्द्रिय-निग्रह, उदारता आदि का नाम है । इन चीजों के स्वरूप के विषय में थोड़ा-बहुत मतभेद भले ही हो, पर समाजवादियो को इनसे कोई सैद्धान्तिक मतभेद नहीं है। हाँ, दोनों में एक प्रत्यक्ष भेद है । एक का सम्बन्ध व्यक्तियो से है, अतः उसका फल जल्दी देख पड़ता है; दूसरे का सम्बन्ध राष्ट्रों से है, अतः उसका फल दीर्घकाल में देख पड़ता है। वस्तुतः समाजवाद की व्यावहारिकता का सबूत माँगना वैसा ही है जैसे स्वाधीनता की व्यावहारिकता का प्रमाण मांगना । न समाजवाद का प्रयोग छोटे-से क्षेत्र में हो सकता है, न स्वाधीनता का । दोनो के लिए कठिन परिश्रम करना होता है और यह परिश्रम दीर्घकाल तक जारी रखना होता है। बिना राजयन्त्र पर कब्जा किये दो में से एक का भी प्रास्वाद नहीं हो सकता। अधिकार प्राप्त करके समाजवादी कल-कारखानों, बैकों, रेलों, जहाजों, खानो और जंगलो को सार्वजनिक सम्पत्ति बना देंगे, इसमें तो कोई संदेह ही नही है । यह सम्भव नहीं है कि कोई ऐसा कारखाना चल सके जिसमें कई व्यक्ति मजदूर की हैसियत से काम करें और एक या थोड़े से व्यक्ति मुनाफा लें । जो लोग माल तैयार करने वाले और ग्राहक के बीच में बड़ी-बड़ी आढ़ते खोलकर मुनाफा करते हैं, उनका स्थान सार्वजनिक दुकानें या ग्राहकों की सम्मितियाँ लेंगी । खेती की अवस्था भी आज जैसी नहीं रह सकती। शोषण तो खत्म हो ही जायगा । न तो जमींदारी प्रथा रह जायगी । , .

१२२ गांधीवाद : समाजवाद न काश्तकार ही अपनी भूमि लगान पर उठा सकेंगे ! छोटी-छोटी टुकड़ियों की खेती लाभदायक नहीं हो सकती है, चकबंदी की कोशिश हो सकती है, पर इससे भी अच्छी चीज सम्मिलित कृषि है - अर्थान् गांव के सब कृएको की भूमि की एकसाथ खेती हो । सबकी जिम्मेदारी पर बीज, खाद इत्यादि के लिए ऋण भी सुगमता से मिल सकता हैं; मशीनें भी खरीदी जा सकती हैं या राज की ओर से मिल सकती है, पैदावार की बिक्री का भी अच्छा प्रबन्ध हो सकता है। सब खर्च काटकर जो सुनाफा बवेगा उसमे सबका हिस्सा लग जायगा। निजी सम्पत्ति का भी कुछ-कुछ पुनर्वितरण होगा । एक मकानो का ही उदाहरण लीजिए। ऐसे भी लोग है, जिनके मकानों में इतनी जगह है कि सारे घर के लोग कितना भी फैलकर रहे उसका उपयोग नहीं कर सकते। एक एक मकान के चारों ओर बाम के रूप में इतनी भूमि घिरी पड़ी है जिसमें एक-एक छोटा गांव बस सकता है यह अनुचित है कि इतनी जमीन एक परिवार के कजे में रहे और हजारों परिवारों के सिर पर श्रावण-भाद्र की वर्षा में एक छप्पर तक न हो। ऐसे मकानों में सैकड़ो परिवार बसाये जा सकते हैं और जायेंगे। परयों का परिसीमन भी करना होगा। प्रत्येक देश के समाजवादी शासकों को अपने देश की परिस्थिति के अनुसार काम करना होगा। सिद्धान्त और लक्ष्य सबका एक होगा । सबकी कोशिश यह होगी कि उत्पादन, वितरण और विनिमय के मुख्य साधनों पर सार्वजनिक अधिकार हो और शोषण बन्द हो, ताकि वर्ग-संवर्प खत्म होजाय और सारे देश में अपनी मेहनत से कमाकर खानेवाले ही देख पड़ें अर्थात् वर्ग भेद मिट जाय । इस लक्ष्य को सामने रखकर चलने में भिन्न-भिन्न देशो मे किंचित भिन्न मार्गों का अवलम्बन करना पड़ सकता है। अक्सर लोगों को यह ख्याल है कि समाजवादी दस्तकारियों का विरोधी होता है, क्योकि वह मशीनो के प्रयोग का पक्षपाती है। ऐसे लोग यह समझते हैं कि समाजवादियों के हाथ मे अधिकार आते ही सब हाथ समाजवादी व्यवस्था " के काम स्वत्म कर दिये जायेंगे। यह खयाल गलत है। समाजवादी न तो मशीनो के हाथ बिका है, न उसको हाथ की कारीगरी से शत्रुता है। वह इन चीजों पर किसी रूढि का दास होकर विचार नहीं करता । हाथ की कारागरी प्राचीन है अथवा उसमे कोई विशेष धार्मिकता या पूज्यता है, ऐसा वह नहीं मान सकता ! मशीन नई चीज है, इसलिए उसका प्रयोग होना ही चाहिए, यह भी कोई अकाध नियम नही है । सब बातें परिस्थिति पर निर्भर हैं। एक और खयाल बहुत फैला हुआ है । लोग समझते हैं कि समाज- वादी पारिवारिक जीवन के शत्रु हैं और उनके हाथ में अधिकार आते ही विवाह की प्रथा तोड़ दी जायगी और कौटुम्बिक जीवन का अन्त हो जायगा। यह खयाल भी गलत है। इतना अवश्य है कि समाजवादी स्त्री को पुरुष का गुलाम नहीं मानता और समाजवादी शासन में न केवल स्त्रियों वरन् बच्चों के स्वत्वों का भी लिहाज किया जायगा । समाजवादी न तो विवाह- प्रथा को नष्ट करना चाहता है, न पारिवारिक जीवन का अन्त करना चाहता है । हाँ, यह अवश्य है कि बच्चे केवल बाप-माँ की नहीं, वरन् सारे समुदाय की सम्पत्ति हैं। उनके भरण-पोषण, शिक्षा श्रादि का दायित्व सारे समुदाय पर है; अतः बाप-माँ या अन्य अभिभावक इस विषय में स्वतंत्र नहीं छोड़े जा सकते । दि इस देख-देख का प्रभाव यह पड़े कि दो-चारसौ बरस या और अधिक समय में पारिवारिक बन्धन धीरे-धीरे दीला होते-होते आप ही राज की भांति खत्म हो जाय तो इसकी बाबत कुछ कहा नहीं जा सकता। समाजवादी धर्म के प्रति क्या करेंगे, इस सम्बन्ध में बहुत लोगों को चिन्ता है। ऐसे प्रसंग मे धर्म का अर्थ मजहब या सम्प्रदाय होता है जहाँतक धर्म का अर्थ मनुप्रोक्त धृति क्षमादि दशलक्षणात्मक वस्तु से है वहाँतक कोई चिन्ता की बात नहीं है । वह तो सचमुच सनातन है। पर वैष्णव, शैव, शाक्त, इस्लाम, ईसाई मत, हीनयान आदि सम्प्रदायों के विषय में यह बात नही कही जा सकती। इनकी क्या गति होगी ? इस । ७ - १२४ गांधीवाद : समाजवाद सम्बन्ध में इतना निश्चय रूप से कहा जा सकता है कि समाजवादी राज में किसी की उपासना में बाधा नहीं डाली जायगी, पर किसी सम्प्रदाय के साथ कोई खास रियायत भी न होगी। कोई पद किसी सम्प्रदाय का अनुयायी होने के कारण नही दिया जा सकता । यह भी तय है कि सम्प्रदायो की आड़ में जो अनाचार होते हैं या विशाल सम्पत्तियाँ थोड़े. से व्यक्तियों के भोग की सामग्री बन जाती हैं उनपर रोक होगी। पर इससे किसी भी सच्चे धर्मभीरु को क्षुब्ध न होना चाहिए। समाजवादियों को यह विश्वास है कि साम्प्रदायिक झगड़ों का निपटारा तभी हो सकता है जब उनकी तह में छिपे हुए आर्थिक संघर्षों का निपटारा हो । यह कहना न होगा कि इस जमाने में जनसाधारण की अवस्था में कल्पनातीत उन्नति होगी। समाजवादी राज इस बात का जिम्मा लेगा कि हर स्वस्थ व्यक्ति को काम दिया जायगा । कोई बेकारी के कारण नगा- भूखा न रहने पायगा। जबतक काम नहीं दिया जाता तबतक उसका भरण-पोषण सरकारी कोप से होगा। पर काम देने का तात्पर्य वैसा काम देना नहीं है जैसा हमारे देश में कभी-कभी कहत के जमाने में दिया जाता है । काम इतना लिया जायगा जितना स्वास्थ्यकर हो । यह भी ध्यान में रखना होगा कि देश के सब लोगों को काम देना है, अतः किसी एक आदमी से बहुत काम कराने का फल यह होगा कि दूसरों की बारी न प्रायगी। काम अधिक न होने से सबके पास पर्याप्त अवकाश रहेगा। आजकल अवकाश काटने का साधन नहीं मिलता । फुर्सत वाले बहुधा मद्यपान करते, जुआ खेलते या ऐसे ही दूसरे निंद्य काम करते पाये जाते हैं । फुर्सत से लाभ उठाने की योग्यता भी सबमें नहीं है । समाजवादी सरकार पर इसका भी जिम्मा होगा। वह शिक्षा का व्यापक प्रबन्ध करेगी। बच्चो को ही नहीं, बूढ़ों को भी इतिहास, राजनीति. विज्ञान आदि विषयों के भाषण सुनने का मौका मिलेगा । थियेटर, पार्क, बाग, संग्रहालय और चित्रागार, मनोरंजन तथा शिक्षा की सामग्री सबके पास पहुंचायेंगे । जिस प्रकार किसी का नंगा-भूखा रहना राज के लिए लान्छन होगा, उसी , ।

समाजवादी व्यवस्था प्रकार किसी रोगी का औषधोपचार के बिना रह जाना उसका कर्तव्य से पतन होगा । जवानी में अनिवार्य बीमा करके राज सबके बुढापे को निष्कण्टक बना देगा । अदालतों का काम बहुत हल्का हो जायगा । सम्पत्ति की अवस्था बदल जाने से दीवानी के मुकदमे बहुत कम हो जायेंगे। खाने-पीने का सुख होने पर ऐसे कामों की ओर बहुत कम लोगों की प्रवृत्ति जायगी जो फौजदारी कानून के भीतर आते हैं । सब लोग इंद्रिय- निग्रह करने में समर्थ हो जायंगे । ऐस दावा तो नहीं किया जा सकता, पर पेट के लिए वेश्यावृत्ति धारण करनेवाली स्त्रियाँ बाजारों को कलुषित करती न देख पड़ेंगी। जागरित लोकमत बहुत से अपराधों का आप ही दण्ड दे लेगा । क्षुद्र वैयक्तिक स्वार्थों का शमन करके समाजवादी व्यवस्था कला की धात्री होगी। यह सब होगा, पर हम उस बात की और फिर ध्यान आकर्षित करना उचित समझते हैं जो प्रारम्भ में कही गई थी-यानी यह कि समाजवादी इस बात को कदापि पसन्द न करेगा कि जो अधिकार उसको इतनी दिक्कत से मिला है वह हाथ से निकल जाय और समाजवाद का प्रयोग अपूर्ण रह जाय । इसलिए वह किसी भी व्यक्ति को ऐसी बातो के कहने या करने का कदापि मौका न देगा जिससे समाजवादी राज आपन्न हो। आलोचना हो सकेगी, पर एक निश्चित सीमा के भीतर । इसमें भी सन्देह है कि पार्लमेन्ट या इस नाम की किसी अन्य सभा द्वारा शासन होगा या नहीं। शासन का सारा भार समाजवादियों को प्रायः अपने ही ऊपर लेना पड़ेगा। कुछ लोग यह आक्षेप करते हैं कि इससे, अर्थात् राज द्वारा लोगों पर कड़ी देख-रेख रहने से व्यक्ति-स्वातंत्र्य में बाधा पड़ती है । हम इसको स्वीकार करते हैं, पर यह बात वस्तुतः उतनी भयावह नही है जितनी कि सुनने में प्रतीत होती है । सोचना यह है कि किसके व्यक्ति- स्वातंत्र्य में रुकावट पड़ेगी। जो लोग नये विधान के साथ होंगे, उनको तो डरने की कोई बात नहीं है। यह भी मानना चाहिए कि ये सब लोग गांधीवाद : समाजवाद जो आज शोपित और उत्पीड़ित है अर्थात् सब शरीर और मस्तिष्क से काम करने वाले श्रमिक और कृषक । वे लोग जो वर्ग-संवर्ष तथा शोषण के विरोधी होंगे वे लोग जो पूजीशाही और साम्राज्यशाही से व्यथित होंगे, नये विधान के साथ होंगे। पर ऐसे ही लोगों का नाम तो जनता है । इनको निकालने के बाद तो वही मुट्ठीभर आदमी बच जायेंगे जो अपने स्वार्थ के कारण पुरानी व्यवस्था को फिर लाना चाहेंगे। ऐसे लोगों के स्वातन्त्र्य पर अंकुश लगाना बुरा नहीं हो सकता । जो लोग इनकी बिगाड़ी हुई दुनिया को बनाने का बीड़ा उठाकर चले होगे, वे इन- को फिर बिगाड़ने का मौका तो नहीं दे सकते । इनके प्राण कोई नहीं लेता। इनको भी औरो की भाँति काम करने का पूरा अवसर है, पर यदि वे इस अवसर से लाभ उठाने का अर्थ यह लगायें कि उनको नये शासन की जड़ खोदने दी जाय तो ऐसी हठधर्मी का लिहाज नहीं किया जा सकता। जमाने में काम करनेवालों को मजदूरी मिलेगी। मजदूरी के दो रूप हो सकते हैं । रूस में भी दोनों चलते रहे हैं। कुछ मजदूरी तो नगद रुपयों ( या उनकी जगह कागज की मुद्रा) में मिलेगी। इससे लोग अपने- अपने शौक की चीजें, जैसे पुस्तके या चित्र या बाजा या बाइसिकल खरीद सकते हैं । शेष मजदूरी पण्य रूप में दी जायगी। प्रत्येक श्रमिक को एक सार्टिफिकेट मिल जायगा, जिसको दिखलाकर वह अन्न, वस्त्र आदि के भण्डारों से एक निश्चित परिमाण में इन अावश्यक चीजों को प्राप्त कर सकता है। मजदूरो में आज कुव्यवस्था न होगी । राज्य यह स्वीकार करेगा कि समुदाय के जीवन के लिए सभी मनुष्यो की आवश्यकता है। न तो सभ्य सामूहिक जीवन गणित के अध्यापक के बिना चल सकता है, न सड़क पर झाडू देने वाले के बिना । जो भी व्यक्ति अपने श्रम की कमाई खाता है और कोई ऐसा काम करता है जिसका सामूहिक जीवन में उपयोग है तो उसके योगक्षेम का भार समुदाय पर है। यह भी मानना होगा कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की आवश्यकतानो में भेद होते हुए भी बहुतसे अंशों जैसी समाजवादी व्यवस्था में सभी मनुष्य बराबर हैं । अनः समाजवादी का यह अाग्रह है कि देश काल देखकर ऐसी मजदूरी नियत होनी चाहिए जिससे जीवन-यात्रा चल सके। उससे कम पारिश्रमिक या वेतन देना और लेना कानून से जुर्म करार देना चाहिए । इस नीचे की सीमा पर ही वेतन और पुरस्कार कायम होंगे। मजदूरी या वेतन निश्चित करने में एक सिद्धान्त से काम लिया जा सकता है, बराबर काम के लिए बराबर मजदूरी दी जाय । इसीको दूसरे शब्दों में यों कहते हैं, जो जैसा और जितना काम कर उसको वैसी और उतनी मजदूरी दी जाय । यह सिद्धान्त आजकल भी माना जाता है, यद्यपि इसका व्यवहार ठीक-ठीक नहीं किया जाता ! लोग इसको न्यायमूलक समझते हैं, क्योकि ऐसा प्रतीत होता है कि इससे सबके स्वत्वों की उचित रक्षा होती है। परन्तु विचार करने से प्रतीत होता है कि न इसमे न्याय है, न सबके स्वत्वों की रक्षा । जैसा कि 'क्रिटीक आव दी गेथा प्रोग्राम मे मार्क्स ने कहा है, बराबर श्रम और सामुदायिक पण्य भण्डार में बरा- बर भाग (अर्थात् बराबर मजदूरी) की अवस्था मे वस्तुतः एक व्यक्ति को दूसरे से अधिक मिलता है, एक व्यक्ति दूसरे से अमीर होता है। इन दोषी को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि स्वत्व बरावर नही किन्तु विषम हो । सुनने में तो यह बात आश्चर्य की प्रतीत होती है कि समता से अन्याय और विषमता से न्याय होता है. पर जैसा कि लेनिन ने कहा है, "हक का अर्थ है एक ही मानदण्ड से विभिन्न व्यक्तियों को, जो एक दूसरे के बराबर नही हैं; नापना । इसीलिए 'बराबर हक' वस्तुतः बराबरी का उच्छेदक और अन्याय है।" आज से कुछ काल पहले प्रमुख समाजवादियो को यह आशा थी कि बहुत शीघ्र विश्वक्रान्ति हो जायगी और सारी पृथ्वी पर समाजवादी व्यवस्था कायम होगी । इच्छा तो ऐसी अब भी है, पर उसके शीघ्र फलीभूत होने की अाशा अब उतनी तीव्र नहीं है। जबतक वह दिन नहीं पाता तबतक जो देश अपने सामूहिक जीवन को समाजवादी साँचे में ढालना चाहेगा उसे , १२८ गांधीवाद : समाजवाद बलवान पूजीवादी देशों के मुकाबिले के लिए तैयार रहना पड़ेगा। वह उनका प्रत्यक्षरूप से कुछ न बिगाड़ता हो, पर किसी भी देश में समाज- वादी शासन का सफल होना पूजीवादियों को बुरा लगता है। वे समझते हैं कि इससे लोगो का विश्वास समाजवाद की व्यवहार्यता पर जम जाता है। इसलिए प्रत्येक समाजवादी देश को प्रत्येक पूंजीवादी देश अपना नैसर्गिक शत्रु समझता है । अाज रूस को इसका अनुभव हो रहा है। इस विद्वेष का सामना करने के लिए समाजवादियों को अगत्या राष्ट्रीय नीति बरतनी पड़ेगी। समाजवाद का सिद्धान्त अन्तरराष्ट्रीय है, पर समाज- वादी शासन को कई अंशों में राष्ट्रीय सरकारों का अनुकरण करना होगा। दूसरों के स्वत्व का अपहरण वे न करेंगे, पर अपनी रक्षा के लिए बल- वान सेना रक्खेंगे । सारे राष्ट्र को सैनिक शिक्षा ग्रहण करनी होगी। इतना ही नहीं, पूजीवादी देशों में से कुछ के साथ संधि और मैत्री करने की भी आवश्यकता पड़ सकती है। उनका लक्ष्य यह होगा कि पराधीन देशों को स्वाधीन बनाने में सहायता दें और लोकतंत्रात्मक सरकारों को अधि- नायकों के चंगुल में फंसने से बचावें । राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय भावों का समन्वय कठिन होते हुए भी असम्भव नहीं है, क्योकि समाजवाद राष्ट्रीय पराधीनता का प्रबल विरोधी और राष्ट्रीय संस्कृति की रक्षा का समर्थक है । परन्तु अपनी वैदेशिक नीति में सफलता प्राप्त कर लेने और पहले से इंगित दिशाओं में उन्नति कर लेने से ही कोई देश अपने को पूरा समाज- वादी नहीं कह सकता । ये बातें समाजवाद की ओर ले जाती हैं और वर्तमान पूजीवादी प्रथा से तो बहुत दूर हैं, पर शुद्ध समाजवाद के सिद्धान्त के तौलने से इनका पलड़ा हलका, बहुत हलका, ठहरता है । अाज उन्नीस वर्ष के प्रयोग के बाद भी रूस का यह दावा नहीं कि उसने पूर्णरूपेण समाजवादी व्यवस्था कायम करली है। जो कुछ अब तक हुआ है, वह मार्ग के बड़े स्टेशन के तुल्य है। इसलिए इस अवस्था को समाजवादी व्यवस्था का प्रथम सोपान कहते हैं। समाजवादी व्यवस्था क्रांति के बाद भले ही स्थापित हो, पर उसका जन्म मर समाजवादी व्यवस्था . पूजीवादी व्यवस्था के गर्भ से ही होगा, अतः वह उसके दोषों से एकदम मुक्त नही हो सकती । वर्तमान अतीत से अपना पीछा नही छुडा सकती। इस समय कामों का विभाग ऐसा है कि उसमे कोई ऊंचा कोई नीचा माना जाता है । कामो का बँटवारा आग भी रहेगा, पर यह ऊंचे-नीचे का भाव क्रमशः मिट जायगा। इसके लिए शिक्षा की आवश्यकता है। शिक्षा पुस्तको से तो मिलती ही है, उसका बहुत बड़ा साधन मनन है। सिद्धान्तों पर विचार करना, अच्छे लोगो को काम करते देखना, सामुदायिक प्रयोगो की सफलता और असफलता के कारणों पर गौर करना, दूसरो के साथ मिलकर सार्वजनिक हित के कार्य करना, ये सब शिक्षा के साधन हैं। सच्ची शिक्षा का परि णाम यह होता है कि व्यक्ति की कर्तव्य बुद्धि जागती है । जहाँ साधारण मनुष्य को कर्तव्य-पथ पर लगाने के लिए पुरस्कार और दण्ड की जरूरत पड़ती है वहाँ सच्छिक्षा-मण्डित मनुष्य अपनी आन्तरिक प्रेरणा से काम करता है। उसकी स्वार्थबुद्धि तिरोहित हो जाती है और उसे स्वहित और लोकहित में कोई भेद नहीं प्रतीत होता वह 'सर्वभूतहितेरत' इसलिए नहीं होता कि उसको इहलोक या परलोक मे किसीको खुश करना है, वरन् इसलिए कि लोकसंग्रह उसकी बुद्धि का स्वाभाविक अभ्यास हो गया है। उसको यह खयाल भी नहीं आता कि मैं दूसरो का उपकार करने जा रहा वरन् समाजोपयोगी काम उसको श्राप ही आकृष्ट करते हैं। कुछ लोगों को यह शंका रहती है कि समाजवादी व्यवस्था को पुरस्कारों का अभाव विफल कर देगा । आज जो मनुष्य कोई नई बात खोज निकालता है या अधिक परिश्रम करता है उसको अधिक रुपये मिलते हैं और वह इन रुपयों को बढ़ा सकता है। यह प्रलोभन लोगों से काम कराता है। समाजवादी व्यवस्था में बहुत रुपया भी न लगेगा, पूँजी भी न जुट सकेगी; फिर कोई अपना दिमाग क्यो लगायेगा, या दूसरों से अधिक परिश्रम क्यों करेगा ? इसका उत्तर यह है कि प्रलोभन पर काम करना अशिक्षा और असंस्कृति का द्योतक है । संसार के जितने स्थायी काम हुए ।

१३० गांधीवाद : समाजवाद । । हैं वे रुपये के लोभ से नहीं हुए है । न तो व्यास को किसीने रुपये दिये थे न शंकराचार्य को । फिर उन्होने अपने अपूर्व दार्शनिक ग्रन्थ क्या लिखे ? चरक को किस विश्वविद्यालय में नौकरी मिली और बाल्मीकि के हाथ पर किस प्रकाशक ने चार पैसे रक्खे ? तुलसीदासजी ने क्या यह झूठ कहा है कि उन्होने रामायण को 'स्वान्तः सुखाय लिखा ? यह कहने से काम नहीं चल सकता कि ये असाधारण महापुरुष थे । हम इस बात को स्वीकार करते हैं, पर यह भी देखते हैं कि ये महापुरुष ही सब लोगों को इन्द्रिय-निग्रह, अस्तेय निर्लोभता आदि का उपदेश देते है । इसका अर्थ यह है कि इनकी राय में साधारण मनुष्य का अन्तःकरण सदा के लिए पतित और स्वार्थी नहीं है। यदि उसपर का कपाय साफ कर दिया जाय तो वह निर्मल हो सकता है। समाजवादी भी ऐसा ही मानता है । उसको मनुष्य की नैसर्गिक पवित्रता पर विश्वास है । पर वह देखता है कि कुशिक्षा और बुरी परिस्थिति ने लोगो को ऐसा लालची बना दिया है कि बिना पैसे के कोई काम नहीं करना चाहते । यदि परिस्थिति में सुधार हो जाय, अर्थात् शोषण मिट जाय और सब के लिए मानवोचित सुविधाएं मिल जाय तथा उसके साथ ही उराम शिक्षा दी जाय तो फिर प्रलोभनो की आवश्यकता न रहेगी प्रत्युत लोग शौक से और केवल लोकहित के भाव से प्रेरित होकर अपनी पूरी शक्ति- भर काम करेंगे । न कोई शारीरिक श्रम से जान चुरायेगा, न बुद्धि से काम लेने से रुकेगा। जब काम में ऊँच-नीच का भाव मिट जायगा, जब काम लोकसेवा की दृष्टि से किया जायगा, जब श्रम जीवन का आवश्यक अंग बन जायगा और सब लोग स्वतः अपनी पूरी योग्यता और शक्तिभर काम करने लग जायेंगे, उसी समय सच्ची लोकतंत्रता सम्भव होगी क्योकि उसी समय मनुष्य सचमुच मनुष्य होगा और सब मनुष्यों का बराबर माना जाना सम्भव होगा । बराबरी का अर्थ यह नही है कि किसी में विशेष प्रतिभा नहीं होगी या प्रतिभा वालो की पूछ न होगी । वस्तुतः प्रतिभा की तभी कद्र हो सकती है जब ईर्षा द्वेप का तिरोभाव हो और प्रतिभावान व्यक्ति समुदाय का विशेष समर्थसेवक, अथच सम्मान्य माना जाय । उसी समय समाजवादी व्यवस्था १३१ मजदूरी के अन्याय का भी अन्त होगा। जब बिना किसी दबाव या लालच के सभी अपने सामर्थ्यभर श्रम कर रहे होगे, उस समय किसीके श्रम की नाप-तौल करने की आवश्यकता न होगी। उस समय समाजवादी व्यवस्था उन्नत अवस्था को प्राप्त होगी। इस अवस्था को दूसरा सोपान कहते हैं। इसके बाद सरकार का क्या रूप होगा ? न तो उस समय कोई ऐसा वर्ग रह जायगा जिसका दमन करना हो, न लोगो से जबरदस्ती काम लेना पड़ेगा, न भोग्य वस्तुओं का मजदूरी के रूप में वितरण करना रह जायगा, फिर सरकार के जिम्मे क्या काम रहेगा ? उद्योग-व्यवसाय की व्यवस्था की तब भी आवश्यकता रहेगी। यदि कोई दुष्ट प्रकृति या श्रम से जान चुराने- वाला पैदा हो ही गया तो उसका नियत्रण करना होगा। पर जहाँ लोकमत इतना जागृत होगा वहां इन कामों में सबको अभिरुचि होगी और किसी विशेष संगठन की आवश्यकता न होगी । जनता विभिन्न कामों के लिए समितियाँ और परिषदें बनायेगी, पर इन संस्थाओं की समता आजकल की दण्डधारी सरकारो से न होगी । काम के प्रभाव से सरकार आप ही न रह जायगी। परन्तु जब सरकार ही नहीं तो राज कैसा ? राज की सत्ता का भी लोप हो जायगा और एंगेल्स के शब्दों मे उस चरमावस्था में बिना किसी प्रयास के 'राज मुर्भाकर झड़ जायगा ।" वह दिन कब पायगा, यह हम नही कह सकते । कभी पायगा भी या नही, यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता । जैसा कि लेनिन ने 'दि स्टेट एण्ड रेवोल्यूशन' कहा है, "यह बात किसी समाजवादी के दिमाग मे नही आई कि वह यह वादा करे कि यह चरमावस्था अवश्य श्रा जायगी।" पर द्वन्द्व न्याय के अनुसार अबतक की प्रगति की जो कुछ पालो- चना की जा सकती है, उससे ऐसी आशा और दृढ़ आशा की जा सकती है कि पृथ्वी के भाग्य जागेंगे और वह उस दिन को देखेगी। अभी वह काल बहुत दूर है, परन्तु क्षितिज पर उसकी धुन्धली अाभा देख पड़ने लगी है। . st , गांधीवाद : समाजवाद गाँधीवाद बनमा समाजवाद [ जयप्रकाशनारायण] गाँधीजी ने अबतक व्योरवार और सीधे तौर पर यह नहीं बताया है कि उनके स्वगज्य के अन्दर समाज का निर्माण किस आधार पर होगा, वह कैसा होगा; इसलिए यह कहना मुश्किल है कि समाजवाद के बदले मे वह हमें क्या देने जा रहे हैं। लेकिन उनके कुछ वक्तव्य हैं, उनके कुछ लेख हैं, जिनसे इस सम्बन्ध मे कुछ अन्दाज लगाया जा सकता है । उनके अनुयायियों की नजर में ये चीजें समाजवाद की जगह एक नये ढंग के समाज का खाका हमारे सामने रखती हैं । वे तो यहां तक कह बैठते हैं कि 'गॉधीजी ही हिन्दुस्तान के लिए सच्चा समाजवाद है। गाँधीजी ने भी जब-तब ‘स्वदेशी समाजवाद' या 'हिन्दू धर्म का मौलिक विचार' 'भारत की अपनी प्रतिभा ऐसी शब्दावलियों का व्यवहार किया है। इसका मतलब यह होता है कि शायद उनकी यह धारणा है कि उनका यह 'स्वदेशी समाजवाद' हिन्दुस्तान की जलवायु के लिए पाश्चात्य ढंग के समाजवाद की अपेक्षा अधिक उपयुक्त है। पहले हम यही विचार करलें कि गाँधीजी समाज के निर्माण के बारे में जो विचार रखते हैं क्या वह सच्ची 'स्वदेशी' और 'भारतीय प्रतिभा का चमत्कार है ? हमें तो ऐसा नहीं दिखाई पड़ता । पाश्चात्य देशों के बहुतेरे लेखकों और विचारकों ने ठीक गाँधीजी के ढर्रे पर लिखा है और कहा । उनकी तर्क-प्रणाली का मूलाधार एक है-हां, किसी ने किसी पर जोर दिया है, किसी ने किसी पर। 'वर्ग युद्ध' एक बेवकूफी की बात है, पूँजी और मजदूरी एक-दूसरे पर निर्भर और एक-दूसरे के लिए श्राव- श्यक है। क्रान्ति तो ध्वंसात्मक है; समाज के द्वन्द्वात्मक वर्गों का समन्वय क्रान्ति की अपेक्षा कहीं अच्छा है । मुनाफा, मजदूरी और कीमत पर! है गांधीवाद बनाम समाजवाद १३३ विचारपूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। जमीदार और पूंजीपति धन और जमीदारी के ट्रस्टी हैं-ये बातें पाश्चात्य देशो के प्रोफेसरों, विचारकों और धर्मोपदेशको ने बार-बार दुहराई हैं । कुछ दिनो पहले इंग्लैंड के सु- प्रसिद्ध लेखक एच० जी० वेल्स और सोवियट रूस के डिक्टेटर स्टालिन मे जो बातें हुई थीं, उसमे वेल्स ने स्टालिन के समक्ष यही दलीलें पेश की थी, जो गाँधीजी हमारे यहां कहा करते हैं। उसने कहा था कि यह वर्ग- युद्ध बेवकूफी और खुराफातों से भरी हुई चीज है; पूजीवाद का खात्मा वर्गों के हितों के समन्वय से ही सिद्ध हो सकता है, जरूरत है तो सही नेतृत्व की । गांधीजी पूजीपतियों के हृदय का परिवर्तन चाहते हैं; वेल्स साहब भी यही चाहते हैं। स्वर्गीय रैमजे मैकडानल्ड अपने समाजवादी दिनों में वर्ग युद्ध के विरुद्ध थे। एक जगह उन्होंने लिखा है। -पूजी और मजदूरी दोनों को समाज की सेवा करनी है और समाज के नेताओं का यह कर्तव्य है कि वे इन दोनों में आज जो संघर्ष है उसको खत्म करने और उनमें समन्वय स्थापित करने के तरीके ढूढ़े। निःसन्देह, अपने इस समाजवाद को मैक- डानल्ड इंग्लैंड का स्वदेशी समाजवाद' कहते थे, लेकिन सभी स्वदेशी समाजवादियों की तरह इसकी क्या गति हुई, यह जग जाहिर है । मैकडा- नल्ड साहब ने कट्टरपंथियों और पूजीपतियों के स्वार्थ में अपने समाज- वाद को विलीन कर दिया । 'जमींदार और पूजीपति ट्रस्टी हैं'- इस सिद्धान्त के शुद्ध भारतीय होने पर बहुत नाज किया जाता है और कहा जाता है कि हमारे देश की अहिंसा नीति के यह बिलकुल अनुकूल है, लेकिन विलियम गोडविन ने अपनी 'पोलिटिकल जस्टिस" नामक पुस्तक में इसका प्रयोग किया है। उसने लिखा है - "सभी धार्मिक सदाचारों का एक ही आधार है और वह है धन के सम्बन्ध में किया गया अन्याय, इसलिए सभी धर्मों के अवतको ने अपने धनी चेलों से कहा है कि उन्हें यह समझना चाहिए कि जो धन उनके पास है, उसके वे ट्रस्टी हैं, उसमें खर्च के एक-एक १३४ गांधीवाद समाजवाद . जरें के वे जवाबदेह हैं । उनका काम केवल व्यवस्था करना है, किसी भी हालत में वे उसके मालिक या प्रभु नहीं है।" देखिये गोडविन आज से डेढ शताब्दी पहले हुए थे, अतः जो लोग गांधीजी के इस सिद्धान्त को हिन्दुस्थान का शुद्ध स्वदेशी सिद्धांत कहकर खुश होते हैं. उन्हें इस तरह खुश होने का कोई सबब नहीं है । साफ बात तो यो है कि सुधारवाद और क्रान्तिवाद में शुरू से ही झगड़ा है । गाँधीजी के जो विचार हैं, वे सुधारवादी हैं उसकी भाषा भले ही हिन्दुस्तानी हो, लेकिन उसका मूल तो अन्तर्राष्ट्रीय है । सुधारवाद का सबसे मुख्य काम यह है कि वह समाज की प्रचलित व्यवस्था को कायम रखना चाहता है। उस व्यवस्था को खत्म करने वाली शक्तियो को देखते ही वह चौकन्ना हो जाता और उन्हें नपुंसक बना देना या सदा के लिए चुप कर देना चाहता है, इसीलिए वह सदा स्वार्थों के समन्वय के राग अलापा करता है। गाँधीजी जमींदारों और पूजीपतियों से यही कहा करते हैं कि आप अपने किसानो और अपने मजदूरों की हालत सुधारिये, उनसे अच्छा सम्बन्ध स्थापित कीजिए । बस फिर न कहीं यह युद्ध रहेगा, न असन्तोष रहेगा, न विद्रोह रहेगा,न उखाड़ फेंक रहेगा । सुधारवाद का काम समाज में न्याय की स्थापना नहीं है। उसका काम है समाज में जो दरारें पड़ गई हैं, उन्हें किसी तरह मूद देना । काँग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद गाँधीजी से अवध के ताल्लुकेदारों ने भेंट की थी और समाजवादी पार्टी की जमींदारी, पूजीशाही और व्यक्तिगत सम्पत्ति उठा देने के निर्माण हर सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए उनसे संरक्षण माँगा था । उस अवसर पर गांधीजी ने जो कुछ कहा था, हम उसके कुछ उद्धरणों को ही देखें । उन्होंने कहा था-“मैं जिस राम राज्य का स्वप्न देखता हूँ, उसमें राजाओं और भिखारियों-दोनो के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।" सच पूछिये तो गांधीजी की सामाजिक 'फिलासफी का यही मूलमन्त्र है। उनके स्वप्न में राम-राज्य में राजाओं के साथ-साथ बेचारे भिखारी कम्बख्त वर्ग , -- गांधीवाद बनाम समाजवाद १३१ भी विद्यमान रहते हैं। इसमें शक नहीं कि गांधीजी उन भिखारियों के हक की हिफाजत करना चाहते हैं। यद्यपि हमे यह भी नहीं बताते कि उन बेचारो के हक क्या होगे और उन्हें लेकर वे अभागे क्या करेंगे। लेकिन सबसे मनोरंजक, नहीं, नहीं, हैरत में डाल देने वाली बात तो यह है कि गांधीजी के उस सपने के राम-राज्य में भी कुछ लोग भिखारी बने ही रहेंगे। 'रामराज्य' - और भिखारी' और राजा दोनों का ! क्यों नहीं ? मला भिखारी नहीं रहेंगे, तो ये 'उन्नत विचार वाले 'उदार', 'दानी' अपनी आत्मा की महान् उदारता और सदाशयता का परिचय देकर किस तरह मानवी स्वभाव का हिन्दू आदर्श पेश करेंगे। मला समाज में कोई आदमी भिखारी क्यों रहे ? समाजवाद का यह मुख्य प्रश्न गांधीजी के दिमाग में कभी उठा ही नहीं -उठ भी नहीं सकता, क्योकि गांधीजी की नीति के सफल होने के लिए यह आवश्यक है कि समाज मे कुछ लोग भिखारी रहे । लोग कहते हैं, गांधीवाद और समाजवाद में अध्यात्मवाद और भौतिकवाद का भेद है। यह बातग़लत है। भेद है तो यह ऊपर का सवाल । समाजवाद आर्थिक असमानता के कारणों का अनुसन्धान करता है । राजाओं, जमीदारो, पूजीपतियो और भिखारियों की उत्पत्ति के मूलाधारों की खोज-ढूढ़ करता है और खोज इंढ़ करता है मानवी शोषणों के रहस्यों की । इस खोज-दूद और जांच-पड़ताल के बाद जब समाजवादी उसकी जड़ का पता लगा लेता है, तो उसे उखाड़ फेंकता है। क सामाजिक बुराईयो के मूल पर ही कुठाराघात करता है । लेकिन गांधीवाद इन प्रश्नों पर विचार करना भी जरूरी नहीं सम- झता । उसके मन में तो यह सवाल भी नहीं उठता कि क्या बात है कि मुट्ठी भर लोग राजा, जमीदार और पूजीवादी बनकर गुलछरें उड़ा रहे हैं और बाकी पूरा समाज या तो भिखारी बन चुका या बनने की तैयारी में है ? वह समाज की नीची और ऊंची सतह को स्थायी मान लेता है गांधीवाद : समाजवाद और फकत यही चाहता है कि उपर की सतह के लोग नीची सतह के लोगो से जरा रहम का बर्ताव रक्खे । उसमे यह हिम्मत नहीं होती कि वह इसकी जांच करें कि जमीदारो और पूजीपतियों का यह धन प्राता कहां से है। वह इतना ही कहकर संतोष कर लेता है कि 'भाई, अपने को इन गरीबों का ट्रस्टी समझो और धन का उपयोग इनके हित में ही करो।' एक समाजवादी के लिए यह फिलासफी धोखेबाजी है--धोग्वेबाजी अपने प्रति और शोषित जनता के प्रति । हम समाजवादी डंके की चोट यह कहते हैं कि जमीदारो और पूंजीपतियों का यह धन किसानी और मजदूरों की मेहनत से ही पैदा हुआ है, इसलिए प्राउधन के कथनानुसार 'चोरी का माल है। इस चोरी को छिपाना, इसे बेपूछताछे चलने देना, नहीं, इसपर पवित्रता की पुट देना तो निःसन्देह धोखेबाजी है, भले ही यह धोखेबाजी श्राप अनजाने ही क्यों न कर रहे हों। ये ऊंची सतह के लोग केवल चोरी के ही अपराधी नहीं है, ये तो हिंसा के भी अपराधी हैं। क्योंकि इस चोरी के माल को वे हिंसा के बल पर ही अपने कब्जे में लिए हुए हैं। अगर संगठित हिंसा का और उसको सही साबित करने वाले वर्गगत कानून का भय न हो, तो किसान और मजदूर कल ही जमीन और कारखानों पर कब्जा करलें । राजानो, जमींदारों और पूंजीपतियों के अधिकारों पर चरा न करके गाँधीजी ने इस बड़े पैमाने पर और संगठित रूप में होने वाली चोरी और हिंसा पर चुपचाप मोहर लगादी है । चुपचाप ही नहीं,उन्होंने तो खुले श्राम और ऐलानिया तौर पर इसको मान लिया है। उन्होंने तो अवध के जमींदारो से साफ-साफ कह दिया है कि यदि कोई उन जमींदारों की सम्पति को लेना चाहेगा, तो वह (गांधी जी) खुद लड़ेंगे । और इसके कुछ दिन पहले ही उन्होंने अहमदाबाद के पूजीपतियों से कह दिया था कि उन्हें अधिकार है कि वे धन इकट्ठा करें। गांधीजी ने इन धनियों से यह भी कहा कि वे इस धन को किनानों और मजदूरो के ट्रस्टी की हैसियत से ही रक्खें; इस धन में उनका बरोबर का हिस्सा है। इस धन को वे गरीबो गांधीवाद बनाम समाजवाद के हित के लिए ही खर्च करें और वे उन्हें एक परिवार के सदस्यों की तरह ही माने । यही गांधीजी का शुद्ध स्वदेशी समाजवाद है, जिसमें मज- दूरो और पूंजीपतियो, जमींदारों और किसानो मे हार्दिक सहयोग होगा। थोड़े ही गौर से देखने पर इस कथन की अस्पष्टता और परस्पर विरोध प्रकट हो जाता है। मान लीजिए कि जमीदार 'ट्रस्टी' है। अब सवाल यह उठता है कि धन के किस हिस्से को वह ट्रस्ट समझे-समूचे को या किसी हिस्से को । अगर किसी हिस्से को, तो वह हिस्सा क्या हो और उसे कौन निश्चय करेगा ? अगर उसका किसान उसके धन का बराबर का हिस्सेदार है, तो इस बराबर के ठीक मानी क्या हैं ? क्या इसका मतलब यह है कि धन का आधा हिस्सा जमींदारों का है और आधा किसानो का ? या इसका मतलब यह है कि जमींदारों और किसान दोनों ही मिलकर बराबर-बराबर के हिस्सेदार हैं ? फिर कोई हिस्सेदार 'ट्रस्टी' किस तरह हो सकता है ? 'एक ही परिवार के व्यक्ति' का क्या मतलब ? क्या इसका मतलब यह हुआ कि किसानों का यह हक है कि वे जमींदारों के महलों में डेरा डालें और उनकी चमकती सवारियो पर शहर की सैर करें ? 'हार्दिक सहयोग' का ही क्या मतलब ? यह सहयोग कौन लायेगा? ये सवाल ऐसे नहीं हैं कि इन्हे यों हल्के हल्के 'नजर अन्दाज' कर सके। काफी वजनदार और अहम सवाल हैं। क्या किसानों और मजदूरों का धन पर उतना ही अधिकार है, जितना कि उनके मालिकों का ? गाँधीजी के पास इसको मान लेने का कौन-सा प्रमाण है ? यदि यह कहा जाय कि किसानों और मजदूरों का बराबर हिस्सा इसलिए है कि वे ही धन पैदा करनेवाले हैं, तब वे अपनी पैदा की गई चीज को दूसरों के हाथ में क्यों सौंप दें ? क्यो उनसे कहा जाय कि इन्हें दूसरो के हाथ में सौंप दो, जो तुम्हारे लिए ट्रस्टी का काम करेंगे ? क्या इसलिए कि जिसमें ये बड़े लोग अपनी उदारता का विपुल प्रदर्शन करते फिरें ?

गांधीवाद : समाजवाद हम इस सवाल को दूसरे छोर से हो लें । ये धनी लोग ही ट्रस्टी का काम क्यो करें ? वे ऐसा क्यों न कहें कि यह धन हमारा है, इसे हमने अपने दिमाग और अपनी पूजी से पैदा किया है और किसीको इस पर दावा करने का दम नही है ? यह धनियों का धन उनका अपना नहीं है, तो वह कौन-सा न्याय है कि उन्हें उसे रखने और उसके बल पर उदारता दिखलाने के लिए उत्साहित किया जाय ? और अगर यह उनका सही तरीके से अर्जित धन तो फिर किमी को क्या हक है कि कहे कि इसे तुम दूसरे को दे दो ? अगर गरीब भूखो मरते हैं, तो मरने दीजिए । इसमे धनी बेचारो का क्या कसूर? इस तरह यदि हम ब्योरेवार देखते हैं, तो गाँधीवाद कायरतापूर्ण आर्थिक विश्लेपण, शुभ और महान् सदिच्छाओं और प्रभावशून्य नैतिकता की एक खिचड़ी मात्र है। उपाय केवल दो ही हैं । या तो मान लीजिए कि धनियों का यह धन अन्याय से उपार्जित है और तब उनसे मनमाना वसूल कीजिए; या मान लीजिए कि उन्होंने न्यायपूर्वक उसे उपार्जित किया है इसलिए भलेमानस की तरह चुप्पी मार कर बैठिये । इसका तो कोई मतलब नहीं होता कि आप गरीबों को फकत यह जताने के लिए कि मैं तुम्हारी सुध भूला नहीं हूँ, चिकनी-चुपड़ी उदारता की बातें कहा करें। सवाल नैतिकता या सदाचार का नहीं है, यह समस्या तो धन और उसके उत्पादन के वैज्ञानिक विश्लेषण की है। इस समस्या का हमें साहस से सामना करना चाहिए, न कि भावुकता के बुर्के में उसे ढंक देना चाहिए । कार्ल मार्क्स ने पूँजीवादी धन का विश्लेषण कर और यह साबित करके कि धन कमाने के लिए मजदूरों का शोषण आवश्यक हो जाता है, मानवता का महान उपकार किया है । पूँजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले प्रोफेसर उसे इस अपराध के लिए आजतक भी क्षमा नहीं कर सके हैं। एक बात और रह जाती है । इस ट्रस्टी के सिद्धान्त को आखिर .

गांधीवाद बनाम समाजवाद काम में किस तरह लाया जायगा ? गाँधीजी धनियों को गरीबों के ट्रस्टी बनने के लिये किस तरह प्रभावित करेंगे ? क्या उनकी नैतिकता को अपील करने, उनके दिलो के अन्दर पहुँच कर ? उन्होने उन जमींदारों से कहा कि मैं चाहता हूँ कि मैं आपके दिलों में समाऊं और उन्हे परि- वर्तित करूं, जिससे आप यह अनुभव कर सके कि वास्तव में यह धन आपकी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं, वरन् किसानों का टूस्ट है और आप उन्हीकी भलाई में इसको खर्च करेंगे।' हमें शक है, हमारे कुछ भाई इसे भी भारतीय संस्कृति की देन समझेगे । लेकिन सचाई यह है कि दुनिया के सभी बड़े धार्मिक उपदेशको ने इसी तरीके का इस्तेमाल किया था। उन उपदेशकों को इसमें कितनी सफलता मिली, इसका साक्षी इतिहास है। अब गाँधीजी अपनी जादू की छड़ी लेकर आये हैं और एक नया इन्द्रजाल हमें दिखलाना चाह रहे हैं। मुझे मालूम नहीं कि उन जमींदारों के दिलों को गाँधीजी की बात बदल सकी या नहीं। ये जमींदार बड़े लाट और छोटे लाटों से भी इसी तरह मिलते और गिड़गिड़ाते रहे हैं। हां, यह तो साफ ही है कि गाँधीजी की बातचीत से उन्हें तसल्ली जरूर हुई होगी और उनमें से कुछ तो गाँधीवाद के कट्टर समर्थक बन गये हैं । गाँधीवादी बनने में उन्हें लगता ही क्या है ? बस, मौके-बे-मौके चन्दा दे देना, जिसकी रकम भी उन्हें वापस मिल ही जाती है। अखबारों में उनकी तारीफें और तसवीरें निकलती हैं और इस प्रशंसा का प्रयोग वे अपनी व्यापारिक तरक्की के लिए करते हैं। गाँधीजी ने उस मुलाकात में यह भी कहा है कि उन्होंने पूंजीपतियों से भी कहा है कि वे ऐसा सदा अनुभव करें कि ये मिलें केवल उनकी नहीं हैं, वरन् मजदूरो के भी उनमें हिस्से हैं । अफसोस की बात यह है कि हमें इसका पता नहीं कि गाँधीजी को इस दशा में सफलता मिली है या नहीं। गाँधीजी का सम्बन्ध अहमदाबाद के मजदूर-संघ से भी है । क्या वह या उनके कोई अनुयायी हमें बतायेंगे कि संघ और मिल-मालिकों गांधीवाद . समाजवाद के संघर्ष के दरम्यान इस तरह के हृदय परिवर्तन का कोई लक्षण दीख पड़ा है ? क्या यह ठीक नहीं है कि ये मिल-मालिक जब कभी भुके हैं, तो सघ की शक्ति के डर से, आम हड़ताल के डर से ? गाँधीजी के समझौतों को तो उन्होंने बार-बार तोड़ा है, यद्यपि उन समझौतों की शत ऐसी कभी नही रही हैं कि मिल मालिकों को कोई यथार्थ त्याग करना पड़े। . गांधीवाद और समाजवाद [ एम० एन० राय] गाँधीवाद और समाजवाद के विषय पर कुछ कहना या लिखना कठिन काम है। फिर भी मैंने इस विषय पर कुछ लिखना चाहा है तो इसका मुख्य कारण यही है कि इस विषय पर लोगों में काफी भ्रम फैला हुआ है। सबसे पहिले मैं पाठकों से यह निवेदन करूँगा कि वे इन पंक्तियों को पढ़ते समय इस बात को ध्यान में रखें कि गाँधीवाद और समाजवाद की तुलना करने और उन दोनों का पारस्परिक भेद बताने में मेरा कभी भी यह इरादा नहीं है कि मैं गांधीवाद की निन्दा करूँ। मैं प्रत्येक विषय को बौद्धिक दृष्टिकोण से देखा करता हूँ । भावावेश का मुझपर कम प्रभाव होता है। जब मेरे सामने कोई बात होती है, तो मैं उसको अपनी पसन्द- नापसन्द की नजर से नहीं देखता -बल्कि उसको समझना चाहता और यदि उससे मुझे अपने आदर्श की ओर बढ़ने में सहायता मिलती है तो मैं उसे ग्रहण कर लेता हूँ । यदि अपनी कसौटी पर कसने पर मैं किसी बात या विचार को ठीक नहीं समझता तो मुझे उसको ग्रहण न करने में भी हिचकिचाहट नहीं होती, चाहे उस बात या विचार का सम्बन्ध कितने ही बड़े व्यक्ति से क्यों न हो। कुछ पहले की बात है, मेरठ जिले के राजनीतिक कार्य-कर्ता और विद्यार्थी मुझसे विविध राजनैतिक विषयों पर विचार-विमर्श करने , गांधीवाद और समाजवाद आये । उस समय इस बात पर बड़ी गरम बहस छिड़ गई कि गाँधीजी सोशलिस्ट हैं या नही? उन्होने सम्भवतः यह सोचकर कि शायद इस विषय में मेरे विचार उनके कुछ काम प्रा सकें, मुझसे भी इस विषय में अपना मत प्रकट करने का आग्रह किया। एक युवक का दावा था कि “गाँधीजी अपने समय के सर्वश्रेष्ठ समाजवादी हैं ।” यद्यपि ऐसी बात सुनने का मेरा यह पहला ही अनुभव न था, मुझे उस समय लगा कि लोग समाजवाद के विषय मे तरह-तरह की भ्रान्तिपूर्ण धारणायें बनाए हुए हैं। इसके प्रतिकूल दूसरे मत के समर्थकों के विचार भी मुझे स्पष्ट न लगे। उन्होंने जो राय प्रकट की, वह केवल नकारात्मक ही थी । तब मैंने उन लोगों से भी यह बात कही थी, और आज फिर उसको दोहरा देना चाहता हूं। जहाँ तक मेरा अपना सम्बन्ध है, मैं किसी बात को केवल इसीलिए गलत नहीं समझता कि मैं उससे सहमत नहीं हूँ। मैं किसी बात को तभी अस्वी- कार करता हूँ जब वह आलोचना की कसौटी पर नहीं ठहर पाती । लेकिन इस लेख में तो मैं गाँधीवाद पर अपना मत भी प्रकट करना नहीं चाहता। मेरा इस विषय मे क्या मत है. यह प्रायः सभी लोग जानते हैं । इस लेख मे तो मैं केवल इतना भर करना चाहता हूं कि गाँधीवाद और समाजवाद की व्याख्या करके श्रापके सामने रख दूं ताकि आप अपना परिणाम स्वयं निकाल सकें और यह देख सके कि क्या यह संभव है कि गांधीवाद और समाजवाद में समन्वय हो सकता है या वे दोनों परस्पर विरोधी सिद्धांत हैं। समाजवाद क्या है, इस विषय में बड़ा भ्रम फैला हुआ है । कोई समाजवाद को मानवता का सिद्धान्त समझता है, कोई उसे उपयोगिता का सिद्धान्त मानता है, तो कोई उसे समानता का सिद्धान्त माने बैठा है। मेरे कहने का मतलब यह कभी नहीं है कि भारतवर्ष में ऐसे लोग है ही नहीं, जो समाजवाद के विषय में सही जानकारी रखते हो। पर उनसे मुझे कुछ कहना भी नही है। मैं इतना अवश्य कह सकता कि जो लोग गांधीजी को समाजवादी समझते हैं, या यह प्रश्न पूछते हैं कि "क्या गांधीजी समाजवादी हैं ?" वे समाजवाद से जानकारी नही रखते गांधीवाद : समाजवाद क्योंकि गाँधीवाद और समाजवाद में कोई सामंजस्य नहीं है। अपने विषय को सहल बनाने के लिए यह आवश्यक जान पड़ता कि हम कुछ शब्दो और वाक्यों आदि की परिभाषा कर लें। मैं स्वीकार किये लेना हूँ कि गाँधीवाद की व्याख्या करना आसान नहीं है। क्योंकि जो लोग यह दावा करते हैं कि गांधीवाद ने समार को सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं को हल करने का एक नया ढंग सिखाया है, वे भी अभी तक गाँधीजी की सीख को किसी दर्शन व्यवस्था के रूप में पेश नहीं कर सके हैं। उदाहरण के लिए, प्राचार्य कृपलानी ने गाँधीवाद पर बहुत कुछ लिखा है, पर उन्होंने भी यह मत प्रकट किया है कि गाँधी- वाद नाम की कोई चीज नहीं है । यह सिद्ध करने के लिए उन्होने एक अच्छी बड़ी पुस्तक तक लिख दी है-उसका नाम उन्होंने रखा है "गाँधीजी का रास्ता।" मेरे लिए तो, “गाँधीवाद" और "गाँधीजी का रास्ता" इन दोनों में कोई विशेष अन्तर नही है । लेकिन चुकि यदि मैंने गांधीवाद की कोई परिभाषा की भी तो उस पर आपसि उठ सकती है, इसलिए मैं गाँधीवाद की व्याख्या के विषय में चुप रहूँगा । गाँधीजी के नाम के साथ कुछ सिद्धान्तों का सम्बन्ध जोड़ा जाता है, मैं उन्हीं की समीक्षा करूंगा और यह दिखाने की कोशिश करूंगा कि समाजवाद से उनका कितना सम्बन्ध है। मैं पहले समाजवाद की व्याख्या करना चाहूंगा । आप जानते हैं, समाजवाद के अनेक पहलू हैं । विशेषतः जिसे हम मार्क्सवादी समाजवाद (Marxian Socialism) कहते हैं, उसको तीन विभागों में विभाजित किया जा सकता है यद्यपि इन तीनों में से किसी एक भाग को अन्य दो भागो से अलग नहीं किया जा सकता । ये तीन विभाग हैं - (१) दार्शनिक जिससे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Moterialism) भी कहते है (२) आर्थिक और (३) राजनैतिक । लेकिन इस समय मैं समाजवाद के दार्शनिक और आर्थिक पहलुओं पर ही विचार करना चाहूंगा। वैसे तो अकेले दार्शनिक पहलू पर भी पूर्णतः विचार करने के लिए इतना स्थान गांधीवाद और समाजवाद . चाहिए, जितना कि मुझे भय है, इस समय मुके नहीं मिल सकता । फिर भी मेरी राय है कि समाजवाद का दार्शनिक पहलू ही ऐसा है, जिसका किसी प्रकार भी उस विचार-प्रणाली से समझौता नहीं हो सकता जिसे हम लोग गांधीवाद के नाम से जानते हैं । गांधीवाद का दार्शनिक पहलू क्या है ? गाँधीवाद दार्शनिक दृष्टिकोण से परम्परागत हिन्दू विचार, हिन्दू दर्शन ही का दूसरा नाम है । गांधीजी स्वयं बड़े धार्मिक और श्रद्धालु व्यक्ति हैं। उनका भगवान पर भरोसा है, और अनेकों बार वे यह कह चुके हैं कि प्रार्थना ही से उनको यह प्रकाश मिलता है, जिसके सहारे वे ससार की समस्याओं को समझ सकते हैं। दूसरे शब्दो में मैं यूँ कहूँ कि गाँधीजी केवल धार्मिक व्यक्ति ही नहीं हैं, बल्कि सच्चे मानी में धर्मप्राण महानुभाव हैं। क्योंकि वे अपने विश्वास के विषय में बड़े स्पष्ट हैं इसी- लिए हमको गाँधीजी के जीवन-दर्शन की समाजवाद के दार्शनिक पहलू से तुलना करने में कठिनाई का अनुभव नहीं करना पड़ता । जो लोग अपने को धार्मिक बतलाते हुए झेपते हैं, और फिर भी भारतीय दर्शन- शास्त्र और समाज-शास्त्र के प्रतिपादक होने का दावा करते हैं, उनकी स्थिति को समझना बड़ा कठिन होता है। वे लोग अपनी धार्मिकता को तर्क का जामा पहनाने का यत्न किया करते हैं। मैं तो उनके विषय में यही कह सकता हूँ कि वे अपने विश्वास ( एतकाद ) के प्रति सच्चे नहीं हैं । उदाहरणार्थ, आपको ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे जो यह दावा करते हैं कि मार्क्स ने दुनिया को कोई नई बात नहीं बताई, क्योंकि उसकी कोई ऐसी नई बात नहीं है जो वेदान्त या उपनिषदों में न मिलती हो । प्राध्या- स्मिक कम्युनिज्म और धार्मिक समाजवाद की बातें करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। मुझे तो ऐसे लोगों के सम्पर्क में आने का भी अवसर मिला है जिनका कहना है कि भौतिकवाद या वेदान्त, मार्क्स के सिद्धान्त या मनु के सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं है । जैसे कि मैं ऊपर कह चुका ऐसे लोगों से पार पाना मुश्किल है। लेकिन गाँधीजी के साथ ऐसी बात नहीं है। क्योंकि वे स्पष्ट ईमानदार हैं और अपने विश्वास के -- .

१४४ गांधीवाद: समाजवाद , सम्बन्ध में किसी को भ्रम में रखना नहीं चाहते । इसीलिए हम सहज ही में गाँधीवाद और समाजवाद के दार्शनिक पहलू की परस्पर तुलना करके इस परिणाम पर पहुंच सकते हैं कि जिसे हम गाँधीवाद के नाम से जानते हैं, उसका और समाजवाद का समन्वय नहीं किया जा सकता। समाजवाद का दार्शनिक आधार भौतिकवाद है, जो धर्म को विधना द्वारा ब्रह्माण्ड और जीवन के रचे जाने के सिद्धान्त को, स्वीकार नहीं करता । ऐसे समाजवादी के लिए जो अपने विषय से भलीभाँति परिचित है, गाँधीवाद और समाजवाद के विरोधाभास को जानने के लिए केवल इतना ही काफी है । वह बिना किसी कठिनाई के इस परिणाम पर पहुंच सकता है कि गाँधीवाद के गुण दोष कुछ भी क्यों न हों, उसका समाज- वाद से कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । क्योकि समाजवाद का मूल सिद्धान्त है द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद । मेरा इससे क्या अभिप्राय है, यह श्राप भागे चलकर अच्छी तरह समझ लेंगे। मैं एक बार फिर दोहरा दूं कि समाजवाद से मेरा अभिप्राय मार्क्सवादी सोशलिज्म से ही है। कार्ल मार्क्स से पहले भी समाजवादी विचार प्रचलित थे-किन्तु काल्पनिक या धार्मिक समाजवाद सम्बन्धी ही। उस समय के समाजवाद और गाँधीवाद में कुछ सामंजस्य पाया जा सकता है। उस समय समाजवादी अपने समय की गरीबी और शोषण से असन्तुष्ट थे, और ऐसे समय की कल्पना करते थे, जब समान रूप से सुखी होंगे । मार्क्स ने सबसे पहला जो काम किया वह यह था कि उसने उन 'काल्पनिक' समाजवादियों की आलोचना की, क्योंकि मार्क्स का यह दावा था कि समाजवाद की स्थापना होगी तो इसलिए नहीं कि कुछ दयालु लोग अधिकांश जनता को गरीबी में पड़े देखना नहीं चाहते. या मानव द्वारा मानव के शोषण को ठीक नही समझते । समाजवाद की स्थापना उसकी आवश्यकता करेगी। जिस प्रकार सामन्तवाद के बाद पूंजीवाद की स्थापना हुई उसी प्रकार पूजीवाद का स्थान एक उच्चतर समाज-व्यवस्था.-समाजवाद-लेगी । पूंजीवाद की विवेचना करके, ।

गांधीवाद और समाजवाद . उसके आन्तरिक व्यघात को स्पष्ट करके, कार्ल मार्क्स ने यह बताया कि पूंजीवाद का नाश होगा और उसके स्थान मे एक अधिक उपयुक्त और तर्कयुक्त समाज व्यवस्था की स्थापना होगी। मार्क्स ने यह बात अवश्य कही थी कि समाजवाद की स्थापना आवश्यकता द्वारा की जायगी, अर्थात समाजवाद तभी स्थापित हो सकेगा जब पूजीवादी व्यवस्था में विकास की कोई गुञ्जायश न रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि पूजीवादी समाज- व्यवस्था और उसकी विशिष्ट राज्य प्रणाली को उखाड़ फेंकना अनिवार्य है। इसी सम्बन्ध में मार्क्स ने अपने प्रख्यान दार्शनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और बताया कि 'अबतक दर्शन ने संसार का स्पष्टीकरण किया है अब उसे संसार को बदलना भी होगा।" इस सिद्धान्त का तर्कयुक्त अर्थ यह भी हो सकता है कि मानव का निर्माण उन परिस्थितियों द्वारा होता है, जिनमें वह रहता है-किन्तु क्योंकि वह स्वयं भी उन परिस्थि- तियों का एक अंग है, वह उन परिस्थितियों को प्रभावित और परिवर्तित कर सकता है। आप देखेंगे कि अन्य किसी भी दर्शन प्रणाली मे मानव की रचनात्मक क्षमता को इस रूप से नहीं रवीकार किया गया है । मार्क्स- वादी दर्शन के अनुसार मानव किसी मानवोपरि शक्ति के हाथ का कठ- पुतला नहीं है, और न किसी विराट कल का एक पुरजा ही है। बल्कि मानव उस संसार का, उस समाज का, जिसमें वह रहता है, सृष्टा है आप यह समझ गये होगे कि इस दर्शन प्रणाली और उस प्रणाली में, जो मानव को किसी सार्वभौम-शक्ति या विधाता द्वारा निर्मित पुतला मानती है, कितना बड़ा मौलिक भेद है। गाँधीजी कभी-कभी विशुद्ध आस्तिक की तरह बोला करते हैं-भगवान् की शक्ति और उसकी प्रार्थना से उनको प्रेरणा मिलती है, इसकी बात वह बताया करते हैं। गीता से प्रेरणा लेते समय तो वह स्पष्ट रूप से यह कहा करते हैं कि वह ऐसे सार्वभौम नियम में, ऐसी शक्ति में विश्वास करते हैं, जो प्रत्येक सांसारिक वस्तु का स्रोत है; जिसपर मानव के अभिमत का कोई और प्रभाव नहीं। गाँधीजी व्यक्तिगत देन मे विश्वास रखते है, या समस्त गांधीवाद. समाजवाद तो स्पष्ट ब्रह्माण्ड के एक नियन्ता में आस्था रखते है, इतना है कि मानन- समाज और मानव-गतिविधि के विषय में जो मार्क्सवादी दृष्टिकोण है उससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । साधारणतया समाजवाद के आर्थिक पहलू पर ही वाद-विवाद हुआ करता है । लेकिन उस क्षेत्र में भी हम यदि समाजवाद और गाँधी की नुलना करें तो हमको दोनो का विरोधाभास प्रकट हो जायगा। माल के सिद्धान्तों के अनुसार आप या मैं अपनी इच्छा के अनुसार सामाजिक सम्बन्ध को निर्धारित नहीं कर सकते। आप आदर्श समाज-व्यवस्था की कल्पना कर सकते हैं। आप यह कल्पना कर सकते हैं कि समाज की व्यवस्था शेती होनी चाहिए जिसमें कोई किसी पर जुल्म न करता हो, जिसमें सब सुखी हो । कल्पना की स्वतन्त्रता आपको है, पर कल्पित व्यवस्था को स्थापित करने की, अपनी इच्छानुकूल समाज स्थापित करने की, स्वतन्त्रता आपको उपलब्ध नहीं है। आप केवल उसी व्यवस्था को स्थापित कर सकते हैं जो चारों ओर के वातावरण में सम्भव है । गाँधीजी के सामाजिक आदर्श और मार्क्स के आर्थिक सिद्धान्तो में यही सबसे बड़ा व्याघात अाता है । मानव-समाज की विवेचना ,और विश्लेपण करके मार्क्स इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि मानव इतिहास में समय-समय पर एक समाज-व्यवस्था के (जिसका आधार कुछ विशिष्ट सामाजिक वर्गों का पारस्परिक सम्बन्ध था) स्थान में दूसरी व्यवस्था स्थापित हुई है। पहली उस समाज व्यवस्था का जिसमें मानव विकास की कोई संभावना शेप न रह गई थी,स्थान किसी अन्य अधिक उन्नत समाज-व्यवस्था ने लिया है । इस नूतन व्यवस्था की स्थापना के लिए मानव-इतिहास में समय-समय पर क्रातियां हुई हैं, अर्थात् पुरानी व्यवस्था को उलटकर नई व्यवस्था का अंकुर पुरानी व्यवस्था के गर्भ में ही जम चुका था-वास्तव मे बिना इसके कोई नई व्यवस्था स्थापित नही हो सकी। समाजवाद का मूल आर्थिक सिद्धान्त है-उत्पादन, वितरण और विनिमय के साधनो पर से व्यक्तिगत स्वामित्व उठा देना । समाजवाद के गांधीवाद और समाजवाद . विषय में साधारणतया यह भ्रम फैला हुआ है कि समाजवाद एकता का हामी है। मुझसे अनेको बार यह पूछा गया है कि रूस में असमानता क्यों है ? तब रूस में समाजवाद कहाँ है ? इसलिये मैं इस पहलू पर कुछ कहना चाहता हूँ। समाजवाद का यह इरादा कभी नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्राज के मजूर की स्थिति में ला रखा जाय । समाजवाद का प्रोग्राम तो उत्पादन, वितरण और विनिमय के साधनों पर से व्यक्तिगत स्वामित्व को मिटाना ही है। समाजवाद प्रत्येक वस्तु पर से व्यक्तिगत स्वामित्व उठा देना नहीं चाहता ! सोशलिज्म से आप यह न समझिये कि वह किसी कालिज के सभी विद्यार्थियो को एक ही प्रकार के पाजामे या पतलून पहनवाया चाहता है। सोशलिज्म यह भी नहीं चाहता कि किसी के पास अपनी किताब, अपना घर या अपनी मोटर तक भी न रहे। समाजवाद तो केवल ऐसी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही को मिटाना चाहता है, जिसके पास होने से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का शोषण कर सकता है, किसी दूसरे की कमाई पर स्वयं सुख और ऐश्वर्यपूर्वक रह सकता है । मैं फिर दोहरा रहा हूं, समाजवाद का यह प्रोग्राम किसी की सद्भावना या असद्भावना का परिणाम नहीं है। स्वयं पूजीवाद ने यह स्थिति पैदा करदी है। वास्तव मे ब्यक्तिगत सम्पत्ति को समाजवाद नष्ट नहीं करता; उसका नाश तो स्वयं पूजीवाद ही कर देता है । बड़े-बड़े कल-कारखाने किसी व्यक्ति-विशेष की ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जिसे वह जहां चाहे पल्ले में बाँधकर चलता बने। इनका स्वामी कोई व्यक्ति नहीं, समाज का एक भाग होता है-बहुत ही छोटा भाग, यह मैं मानता हूँ। मेरे कहने का मतलब यह है कि समाज के कुछ मुट्ठी भर लोग बडे-बड़े कल-कारखानों के मालिक है, पर अधिकाँश जनता अकिंचन है। समाजवाद चाहता कि सम्पत्ति का मालिक सारा समाज हो, न कि समाज का एक छोटा-सा भाग । समाजवाद तो एक ऐसे काम को, जिसे स्वयं पूंजीवाद ही सम्पादित कर चुका होता है, केवल स्वीकार भर करता है । साधारण भाषा में समाजवाद कहता है, व्यक्तिगत सम्पत्ति वस्तुतः नष्ट हो चुकी है, हम है गांधीवाद : समाजवाद के बावजूद कानूनी भ्रम को कायम रहने देना नही चाहते ।" लेकिन बावजूद इस बान के कि समाज की भलाई की दृष्टि से व्यक्तिगत सम्पत्ति की कोई उपयोगिता शेष नहीं रह गई है, समाज का एक अंग ऐसा है, जिसके पास सम्पत्ति है और जो उस सम्पत्ति से व्यक्तिगत लाभ उठाता है। इसलिए यह वर्ग इस प्रकार की व्यक्तिगत सम्पत्ति को कायम रखना चाहता है। जनता के बडे भाग को कानूनी भ्रम में रखकर अपना उल्लू सीधा करते रहना चाहता है। पूजीवादी समाज व्यवस्था के अन्तर्गत एक शक्ति इसी वर्ग के हाथ में है, दमन के सब साधन उसके पास हैं । इसलिए समाज का बहुमत विरुद्ध होते हुए भी यह वर्ग अपनी मनमानी करता रहता है। जब समाज के बहुमत के संगठित प्रयत्न और इच्छा सस्पतिशाली-वर्ग अपनी उस सम्पचि को, जिसके बल पर वह सम्पत्तिहीन बहुसंख्यक-वर्ग का शोषण करता है, छोड़ने को तैयार नहीं होता, तो दोनो वर्गों का संघर्ष सतह पर आजाता है, मैदान में खुल खेलने लगता है। यह संघर्ष दबाया या छिपाया जा सकता है, नष्ट नहीं किया जा सकता, क्योकि जब तक सम्पत्तिशाली और सम्पत्रिशून्य--अकिंचन- वर्ग रहेंगे. यह संघर्ष भी रहेगा । सम्पत्रिशाली वर्ग की पीठ पर, जैसा कि ऊपर भी कहा जा चुका है, सरकार है.राज्य व्यवस्था है। इसलिए, वह अपनी इच्छा से अपनी सुविधाओं को नहीं छोड़ सकता । तब उसको रास्ते से हटाना आवश्यक हो जाता है । यह मार्क्स के समाजवाद का राजनैतिक पहलू है। मार्क्सवादी राजनीति का अर्थ है, शोषित और पीड़ित जनता का शक्ति हस्तगत करने के उद्देश्य से चलाया जाने वाला युद्ध । गाँधीजी हमें क्या सिखाते हैं ? गाँधीजी इस बात में समाजवादियों से सहमत हैं कि जनसाधारण का शोषण नहीं होना चाहिए । वह जन- साधारण की गरीबी की भी निन्दा करते हैं । यहाँ तक कि वे पूंजीवाद की निन्दा करने से भी नहीं चूकते । लेकिन वह समाज को इस व्यथा से मुक्त होने का जो मार्ग बताते हैं, वह समाजवादियो के मार्ग से सर्वथा भिन्न है। वास्तव में समाजवादी दृष्टिकोण से तो उनका बताया हल कोई हल ही गांधीवाद और समाजवाद के नही है। क्योंकि वह आज की जिस विषमता को दूर करना चाहते है. उसके आदि-स्रोत को नही पहचानते । वर्ग-वैर का मूल कारण है, व्यक्ति गत सम्पशि; वर्ग-वैर का कारण है, सम्पतिशाली वर्गों का सम्पत्तिशून्य- अकिंचन-वर्ग को लूटना । गाँधीजी का मत है कि “पारस्परिक वैर उत्पन्न करने के बजाय हमको पूजीपति, जमींदार तथा ऐसे अन्य वर्गों को निर्धनो के प्रति दयालुता का बर्ताव करने के लिए राजी कर लेना चाहिए।" वह प्रत्येक मानव को समान रूप से स्वभावत. भला मानते हैं। इसलिए वह मानद के सहज सौजन्य को जगाना चाहते हैं । अच्छा; हम यह मान लेते है कि एक जमींदार या एक पूजीपति भी स्वभावतः उतना ही भला है, जितना एक साधारण व्यक्ति। मानव स्वभावतः भला होता है या नही, इस विवादग्रस्त विषय को मैं यहाँ उठाना नहीं चाहता । मैं इसमे विश्वास नहीं करता, क्योंकि मेरा विश्वास है कि मानव अपनी जीवन-अवस्थाश्रो अनुकूल बुरा या भला होता है। अक्षुण्ण मानव-स्वभाव का कोई प्रमाण है भी नहीं। लेकिन मैं माने लेता हूं कि स्वभावतः जमीदार या पूजीपति भी भला है, और यदि मै उसके हृदय तक पहुँच सकू और उसको यह विश्वास करा सकू कि जो कुछ वह करता है, वह ठीक नहीं है, तो मैं उसका हृदय-परिवर्तन करा सकता हूं। यह मानकर कि ऐसा होना संभव है, मैं यह कहना चाहता हूं कि आप जिस क्षण भी जमीदार या पूंजीपति का हृदय परिवर्तन करा सकेगे, वह जमीदार या पूंजीपति न रहेगा। पूंजीपति उसी समय तक पूंजीपति है, जबतक वह अपनी पूजी के बल पर दूसरों का शोषण करता है, दूसरो के श्रम का अनुचित लाभ उठाता है। यदि ५० प्रतिशत लाभ करने के बजाय वह पांच प्रतिशत लाभ करे, तो भी उसके पूंजीपति होने में कोई फर्क नहीं आता। क्योंकि वह शोषण तो तब भी करता है। जहाँ शोषण है, वहाँ समानता नहीं; और जहाँ समानता नहीं वहाँ समान सौजन्य भी नही। जमीदार की भी यही बात है। गाँधीजी दो परस्पर विरोधी बातें एक साथ करना चाहते है- ओर वह पूंजीपति का हृदय-परिवर्तन कराया चाहते हैं, तो दूसरी ।

गांधीवाद : समाजवाद ओर पूजीपति और मजूर के हितों में समन्वय । लेकिन जबतक पृजीपनि हित हैं, तब तक पूंजीपति भी हैं, और इसीलिए मजर के हितों के साथ उसके हितो का समन्वय कैसे सम्भव है ? वास्तव में आप जब तक इन परस्पर विरोधी हितो का समन्वय कराने के लिए चिन्तित है, तब नक मैं कहूंगा कि आप हृदय परिवर्तन कराने में सफल नहीं हो सके वचोकि इस चिन्ता में दोनो के पारस्परिक हितो का व्याघात सन्निहित है। गांधीजी के सामाजिक आदर्श का यही तर्क-विभ्रम (Fallacy) है । वह ऐसे दो हितो में सम्बन्ध कराना चाहते हैं, जिनका समन्वय हो नहीं सकता। यदि वह स्पष्ट रूप से यह कह दें. कि "हां मैं भी पूंजीवाद और जमींदारी के अस्तित्व को नहीं चाहता; लेकिन मेरा ढंग तुम्हारे ढंग से भिन्न है." तो मैं उनके दृष्टिकोण को समझ सकता हूँ- भले ही ढंग के विषय मे उनसे सहमत न होऊ । लेकिन जब आप एक तरफ तो दो ऐसे हितो मे समन्वय कराने का यत्न करते हैं. जिनमे समन्वय संभव नही, और दूसरी ओर सम्पतिशाली और सम्पशिगन्य के बीच समानता होने का दावा करते हैं. तो मैं कहता हूं कि आप तर्क से काम नहीं ले रहे हैं। मैं आपकी ईमानदारी या नेकनीयती पर सन्देह नहीं करता । लेकिन यह जरूर कहता हूं कि आप तो ऐसी बात कराने का स्वप्न देखते हैं जो असम्भव है. या आप जो-कुछ कहते हैं उसका अर्थ ही नहीं समझे। पारिभाषिक दृष्टि से, गांधीवाद और समाजवाद के आर्थिक कार्यक्रम के विरोधाभास को संक्षेप में यों रक्खा जा सकता है। समाजवाद का कहना है कि जनसाधारण का आर्थिक कल्याण प्राचुर्य में हो सकता है; गांधीवाद कहता है, सार्वजनिक कल्याण सादगी के वातावरण ही में हो सकता है। समाजवाद प्रचुरता का दर्शन है; गांधीवाद दीनता का दर्शन है। समाजवाद पर साधारणतया यह अारोप लगाया जाता है कि वह मानव के उच्चतर गुणों को नहीं छूता; जीवन के अन्न-वस्त्र के अतिरिक्त भी कुछ है। इसके उरार में मैं केवल यही कहूंगा कि ऐसी बातें करने.

गांधीवाद और समाजवाद - । वाले लोग समाजवाद सम्बन्धी अपनी अज्ञानता ही का परिचय देते है। सांसारिक कल्याण अर्थात् न्यूनतम परिश्रम से सब आवश्यकताओं के पूरा हो सकने की अवस्था ही से मानव को बौद्धिक, नैतिक और प्राध्या- त्मिक विकास का अवसर मिला सकता है। दूसरे शब्दों में सांस्कृतिक- मिद्धियो के लिए किसी निश्चित न्यूनतम अवकाश की आवश्यकता है । समाजवाद तो मानव के लिए वे अवस्थायें पैदा कर देना चाहता है, जिनमे उसको दिन-रात अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए न जुटा रहना पड़े, जिनमें उसको उच्चतर बातो के लिए भी सुविधा और समय मिल सके । मानव ने ऐसे यन्त्र बनाए है, जिनकी सहायता से यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है। मानव जाति का इतिहास प्रकृति से मानव के निरन्तर युद्ध करने और उस पर विजय पाने ही का इतिहास है। आदमी के प्रारम्भिक औजार बनाने के समय से लेकर बड़ी-बड़ी समय और श्रम बचानेवाली मशीनों के बनाने के समय तक का इतिहास मानव-विजय का ही इतिहास है । परिणाम इसका यह हुआ है कि, यदि सब कुछ ठीक हो तो, प्रति दिन कुछ घण्टे काम करके ही प्रत्येक मनुष्य के जीवन की आवश्यकता पूरी हो सकती है । लेकिन मानव ने जो मशीन बनाई वह उसकी दास न रह सकी, क्योंकि पूजीवाद ने उससे मानव का शोषण और पतन करने का काम कराया है। यह कहना भूल है कि दोष मशीन का ही है और मशीन-सभ्यता का अन्त कर देना चाहिए । मशीन-सभ्यता जैसी कोई वस्तु नहीं है, जो कुछ हो, वह तो मानव सभ्यता ही है । लेकिन गांधीवाद कथित "मशीन सभ्यता के अनाचारो से इतना बौखला गया है कि सिर-दर्द को दूर करने के यत्न में सिर तक काटने को तैयार है। वह समझता है कि जब तक श्रादमी पुराने जमाने की सादगी को फिर से न अपनायेगा, तबतक इस दैत्य से उसका छुटकारा न हो " सकेगा। मैं यह कहना नहीं चाहता कि उस पुराने युग को पुनः लाना सम्भव गांधावाद : समाजवाद भी है या नहीं। यदि मै यह मानलूं कि मानव-प्रकृति की घड़ी की सुई को कई सौ साल पीछे हटाया जा सकता है, तो भी तो यह परिणाम नहीं निकल सकता कि तब हम अधिक सुखी होगे ! यदि हम पुराने जमाने के उत्पादन-साधनो को अपना लें, तो न्यूनतम शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी आज से कई गुणा अधिक श्रम करना पड़ेगा। लेकिन गाधीजी का इस सम्बन्ध में जो तर्क है, उसे हम समझ सकते हैं । वह कहते है कि हमने व्यर्थ ही अपनी आवश्यकताओं को बढा लिया है। इसलिए हम ऐसा उपाय क्यो न करें, ऐसे युग मे क्यो न चले जायं जहां न तो इतनी आवश्यकता हो और न इतना श्रम करना पड़े ? लेकिन कौन कह सकता है कि नैतिक या आध्यात्मिक दृष्टि से, आज से २०० माल पहले, हमारे पूर्वज अधिक उन्नत थे ? मैं इस बात का मानने वाला नहीं हूँ, कोई इति- हासज्ञ भी इस मत को ग्रहण नहीं कर सकता। लेकिन सादगी के सिद्धांत में एक और भी तर्क-विभ्रम ( Fallacy) है। यदि हम यह मान भी लें कि सादा जीवन आदर्श-जीवन है, तो भी हम यह नहीं कह सकते कि एक धोती-कुर्ता पहनने वाला व्यक्ति कोट: ट-पतलून पहनने वाले व्यक्ति से अंतर है; क्योकि तब लगोटी ही पहनने वाला व्यक्ति तो धोती-कुर्स पहनने वाले से भी अधिक ऊचा होगा । कहने का मतलब यह है कि श्राप यह नही बता सकते कि सादगी कहां शुरू होती है और कहां समाप्त । र्याद सादगी ही को मानव की सांस्कृतिक सिद्धियों की जांचने की कसौटी बनाया जाय, सम्भवतः सर्वश्रेष्ट आदर्श व्यक्ति हमारे उन पूर्वजों में मिलेगा, जो पेड़ों पर जीवन व्यतीत किया करते थे। मुझे तो लगता है, गांधीजी को अपनी बातों पर विचार करने का अवसर ही नहीं मिला, इसलिए वह उनका तर्कयुक्त परिणाम नहीं समझ सके हैं। “सादा जीवन, उच्च विचार" की एक कहावत भी प्रचलित है। लेकिन इस समय संसार के प्रमुख वैज्ञानिक और दार्शनिक उच्च विचार नहीं रखते, यह भी कौन कह सकता है ? एक ऐसे मजदूर की कल्पना कीजिए, जो जीवन की न्यूनतम आवश्य- कताओं को पूरा करने के लिए दिन में ८-१० घरटे काम करके घर लौटा - गांधीवाद और समाजवाद १५३ हो गई। सुबह है। क्या आप समझते हैं उसको "उच्चतर" बातों पर विचार करने का अवसर है ? थके-मांदे शरीर को लेकर एक बार वह जहां चटाई पर लेटा कि सुबह उसको फिर उसी संकटमय काम के लिए उठा लेगी । मजदूर खेत में हो या कल-कारखानों में चरखा चलाता हो या मशीन से काम करता हो सभी जगह उसकी यही दशा है । लेकिन समाज- चान्द ने रास्ता दिखाया है। प्रत्येक मानव-प्राणी को नैतिक और आध्यात्मिक विकास का अवसर मिल सकता है । लेकिन तभी, जब उसको अपना पेट भरने और तन ढकने भर के लिए जानवर की तरह ८-८ और १०-१० घण्टे तक अपनी शक्ति व्यय न करनी पड़े। समाजवाद उन अवस्थात्रो को पैदा करना चाहता है, जिनसे ऐसा होना सम्भव है। समाजवाद गांधी- वाद की तरह नहीं कहता कि मानव का सांस्कृतिक विकास सादगी के वातावरण से हो सकता है, क्योंकि सादगी दीनता का दूसरा परिष्कृत नाम भर ही है। समाजवाद का दावा है कि मानव की सांस्कृतिक उन्नति भौतिक पूर्णता में ही सम्भव है। गांधीवाद और समाजवाद के राजनैतिक पहलू पर विचार प्रकट करना सहल काम नहीं है। समाजवादी दृष्टिकोण से राजनीति में दबाव ( Pressure ) अनिवार्य है। क्योकि कैसी भी राज-व्यवस्था क्यों न हो, वह किसी-न-किसी वर्ग का दमन करती ही है। आज की समाज- व्यवस्था में, सरकार समाज के कुछ लोगों के हाथ में दमन का एक साधन मात्र है। अधिकांश जनता का उसके द्वारा दमन किया जाता है। समाज के बड़े अंग को मुट्ठीभर लोगो के चंगुल से मुक्त करने के लिए, राजसा पर जनसाधारण द्वारा अधिकार किया जाना नितान्त आव- श्यक है । दूसरे शब्दों में, मैं कहूँगा, जनसाधारण को शासक-वर्ग से शक्ति छीननी है । लेकिन यहां पहुंचते ही हमारे सामने गांधीजी की सीख पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। गांधीजी ने हमको जो शिक्षा दी है, उसी को उनकी सबसे बड़ी देन समझा जाता है। मेरा मतलब अहिंसा के सिद्धान्त से है। उनकी धारणा है कि आज की समाज-व्यवस्था गांधीवाद . समाजवाद . में किसी प्रकार की उथल पुथल किये बिना ग्राज के सामाजिक बधनी को बिगाड़े बिना भी, अहिंसा का वातावरण पैदा किया जा सकता है। यदि ऐसा हो सके, तो कम-से-कम मैं, व्यक्तिगतरूप से. इसका स्वागत करूंगा । मैं भी चाहता हूं कि समाज हिसा से मुक्त होजाय, समाज ने पशु-बल का नियम न रहकर नैतिक नियम का बोलबाला हो। लेकिन आदर्श के मोह में पड़कर ही क्रूर वास्तविकता से मुंह नहीं मोड़ लेना चाहिए। वास्तविकता यह है कि आज की यमाज-व्यवस्था का प्राधार हिसा है। लेकिन गांधीजी के अहिंसा सिद्धान्त का अर्थ यह है कि आज की उस समाज व्यवस्था को भंग न किया जाय, क्योकि उसको भंग करने का प्रयत्न हिंसा है। लेकिन आज मैं हिंसा-अहिंसा के विषय को भी नहीं उठाना चाहता और पाठको से गांधीजी के कुछ वक्तव्यों और उक्तियों को पढ़ने ही का अनुरोध करूगा । सांधीजी अनेकों बार यह कह चुके हैं कि आज मजदूर और मालिक के बीच जो सम्बन्ध है, वह हिंसात्मक मालिक साधन-सम्पन्न है; वह मजदूर को, जिसके पास अपना जीवन चलाने के लिए अपनी मेहनत के सिवाय और कुछ नही मनचाही मजूरी स्वीकार करने को विवश कर सकता है। क्योंकि यदि मजदृर उसकी बताई मजूरी स्वीकार न करे तो भूखों मरने के सिवाय उसके पास चारा ही क्या रहता है ? भूखों मार डालने की धमकी देकर जनता के एक बड़े भाग को अपनी मनचाही मजूरी देकर काम करने को बाध्य करना यदि हिंसा नहीं तो क्या है ? यदि मजदृर इस शोषण को, इस जुल्म को रोकने के लिए हड़ताल करते हैं, तो शोर मच जाता है कि मजदूर हिंसा पर तुले हुए हैं। गांधीजी ने मजदूरो के इस प्रकार के कार्य को हिंसा कहा है, और उसकी निन्दा की है । इसलिए तो मैं कहता हूँ कि आजकी अवस्थाओ में अहिंसा का प्रचार करना हिंसा पर, उस हिंसा पर जो विराट जनसमूह को पीस रही है, परदा डालना है । अहिंसा सुन्दर और वांछनीय आदर्श है । गांधीजी ने इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया हम उनके आभारी है। पर उन्होने अहिंसा को सिद्ध करने का मार्ग नहीं " गांधीवाद और साम्यवाद बताया । गांधीजी आदर्शवादी है-ऐसे आदर्शवादी, जो दुर्भाग्यवश वस्तुस्थिति को भूलते है। समाजवादी भी आदर्शवादी हैं, पर वे वस्तु- स्थिति से मुंह मोडकर हवा में उड़ना नही चाहते । हम अहिंसा स्थापित कर सकेंगे; पर पहले उन अवस्थाओं को बदलना होगा, जिनमें हिंसा होती है । हम ऐसा समाज स्थापित किया चाहते हैं जिसमें आदमी आदमी का, समाज का अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक वर्ग का शोषण न कर सके; जिसमे हिंसा न तो संभव ही होगी और न आवश्यक । उस आदर्श को कैसे प्राप्त करें ? गांधीवाद और समाजवाद के साधनों में भेद है। मुझे विश्वास है, पाठक यह समझ गये होंगे कि गांधीवाद और समाजवाद में सामन्जस्य नहीं है । श्रादर्श का सामन्जस्य भी तनिक ध्यान- पूर्वक विचार करने पर नहीं रहता। गांधीजी कुछ भी हो, समाजवादी नहीं हैं । मुझे तो यकीन है, यदि उनको यह पता हो जाय कि समाजवाद के प्रवर्तकों के सिद्धान्तो को स्वीकार करके ही समाजवादी हुआ जा सकता है, तो स्वयं गांधी भी समाजवादी होने से इन्कार कर देंगे। : १३ : गांधीवाद और साम्यवाद [सम्पूर्णानन्द ] महात्माजी के नेतृत्व में कांग्रेस और गवर्मेण्ट के बीच जो संघर्ष १६२१ से चला आ रहा है, उसमें प्रारम्भ से ही सम्मिलित हूँ पर 'गांधीवाद' का अर्थ निर्णय नही कर सका हूँ। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भिन्न-भिन्न लोग इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में करते हैं--जिस व्यक्ति को महात्माजी के उपदेश में जो बात सबसे उत्तम और अपूर्व जंचती है, वह उसीको सर्वोपरि महत्व देकर उसीके आधार पर अपने 'गांधीवाद' की गांधीवाद : समाजवाद रचना करता है। साम्यवाद के भी कई भेद है । इस लेख में में अपने सामने उसीको रक्खूगा, जिसका स्पष्टीकरण कार्ल मार्क्स ने किया, जो लेनिनिज्म या बाल्शेविज्म के नाम से रूस में व्यवहन हुआ । यही साम्य- बाद का सबसे व्यापक और शुद्ध रूप प्रतीत होता है। महात्माजी के जीवन और उनके समय-समय के उपदेशः पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट समझ मे आती है कि गांधीवाद और चाहे जो कुछ हो, निम्नलिखित बातें उसके श्रावश्यक अग है. (क) अहिंसा का सिद्धान्त-महात्माजी भारत में क्रान्ति चाहते है। पर अहिंसात्मक नीति से। औरों के लिए अहिंसा साधन मात्र है: पर उनके लिए उस साधन का इतना महत्व है कि इसके लिए वह साध्य तक को छोड़ दे सकते हैं (ख) मशीनों का विरोध - महात्माजी चाहते हैं कि कम-से-कम चे मशीनें तो शीघ्र-से-शीघ्र हटा दी जाय, जो मनुष्य से प्रतियोगिता करती है, और उनके स्थान पर हाथ से चलने वाले यंत्र --उदाहरण के लिए चर्खा, फिर से चलाये जायें । (ग) मनुष्य का जीवन धर्ममय बनाया जाय । सदाचार कुछ विशेष अवसरों के लिए नही, वरन् सभी अवस्थाओं के लिए हमारा पथ- प्रदर्शक बने । (घ) समाज के आर्थिक विभाजन का रूप प्राय: ऐसा ही रहे, अर्थात् जमीदार भी रहें और किसान भी, कोट्याधिपति भी रहें और निर्धन भी। धनवान् अपने को निर्धनों का वली, अभिभावक समझे, अपने को उनके भरण-पोषण के उत्तरदायी समझे। सम्भव है, उपयुक्त बातो में से कोई गौण हो, यह भी सम्भव है कि गांधीवाद के कुछ और भी परमावश्यक अंग हों; पर मैं इनको ही मुख्य समझता हूँ, और इन्हीं के आधार पर गांधीवाद और साम्यवाद से तुलना करना चाहता हूं। अहिंसा का उपदेश तो सभी साधु-महात्माओं ने दिया है, पर यह गांधीवाद और साम्यवाद इस बात को महात्माजी की ही शिक्षा है कि अहिंसा सार्वजनिक होती है, इसके द्वारा राष्ट्रीय कान्तियां हो सकती हैं । हममे से बहुत-से लोग जाते हैं कि महात्माजी भारत में क्रान्ति चाहते हैं; वह लिबरलो की तरह क्रम-विकास नही चाहते । बहुत-से कांग्रेस वालों में अभी क्रान्तिकारी मनो- वृत्ति नहीं है; जेल जाते हैं, लौटकर कौटुम्बिक व्यापार मे लग जाते हैं । कांग्रेस वाले अभी इस भाव को नही जगा सके कि जबतक स्वराज्य नहीं होता तब तक हम घरवालो के लिए और घर वाले हमारे लिए उसी प्रकार मर चुके, जिस प्रकार कि एक बम चलाने वाले क्रान्तिकारी के लिए होता है । यह हमारी दुर्बलता है; पर महात्माजी ऐसी ही मनोवृत्ति चाहते है, और उनको दृढ़ विश्वास है कि ऐसी मनोवृत्ति वाले मनुष्य शुद्ध अहिंसा का पालन करते हुए अपने उद्देश्य में सफल होंगे। साम्यवाद भी क्रान्तिकारी मनोवृत्ति चाहता है। साम्यवादी चाहते हैं कि प्रत्येक राष्ट्र में राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति हो; क्योंकि बिना विश्वव्यापी क्रान्ति के साम्यवाद का समुचित प्रयोग नहीं हो सकता । साम्यवादियो का दृढ़ विश्वास है कि क्रम-विकास से साम्यवाद की स्थापना किसी भी देश में नही हो सकती, और सच्चे साम्यवादी उन लोगो पर हंसते है,जो इङ्गलिस्तान के श्रमिक दल की भांति यह समझते है कि वे क्रमशः वैध उपायो से पूजीवाद की नींव पर जमी हुई शासन तथा आर्थिक व्यवस्था को साम्यवादी साँचे में ढाल देंगे। अत: क्रांति तो अव- श्यम्भावी है पर वह कैसे और किस प्रकार की होगी, इसके सम्बन्ध में साम्यवाद का अपना कोई सिद्धान्त नहीं है। साम्यवादी कोई हिंस्र हत्यारे नही होते । नरमेध में उन्हें कोई मजा नही पाता । पूजीपति जो साम्राज्य- वाद का आश्रय लेकर आज करोड़ों मनुष्यो को दास बनाये हुए हैं, जिनके लिए भीषण जगतव्यापी युद्ध छोड़कर भीषण रासायनिक उपचारों से काम लेना एक साधारण सी बात है, मनुष्य जीवन को भले ही तुच्छ पदार्थ समझते हो, पर साम्यवादी जीवन के मूल्य को समझता है। वह रक्तपात को अच्छा नहीं समझता । यदि बिना रक्तपात के उद्देश्य की .

गांधीवाद : समाजवाद सिद्धी हो जाय, तो उसे हर्ष होगा. पर व्यावहारिक बात यह है कि आज तक जितनी भी क्रांतिया हुई है. सबमें कोई न कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है जिसने रक्तपात करा कर छोडा है। बस, यही पर ग धीवादा और साम्यवादी का साथ छटता है। साधारण साम्यवादी का यह विश्वास है कि शान्ति के लिए क्रांति आवश्यक है, क्रांति में कुछ हिंसा होती ही है इस हिंसा से विचलित होकर हम अपने लक्ष्य को छोड़ नहीं सकते । हम हिंसा का स्वागत नहीं करते। पर उसमे वबराते भी नहीं। गांधीवाद कहता है कि हम भी मानते है कि बिना क्रांति के शांति नहीं होगी: पर शत्रुनो और विरो- धियो की हिंसात्मक कृपायो का उत्तर हम अहिंसा से ही देंगे । सम्भवतः हमको इसमे कुछ अधिक कष्ट उठाना पड़ेगा: पर विजय भी हमारी ही होगी। हम अहिंसक रहकर भी लक्ष्य को सिद्ध कर देंगे। विचार करने से दीख पड़ता है कि दोनों पक्षों में कोई सैद्धान्तिक विरोध नही है । अहिंसा एक नया साधन है, जिसकी परीक्षा साम्यवाद ने नही की है, बम इतनी-सी ही बात है। भारत में साम्यवादी भी है और अहिंसावादी भी। यह कोई आश्चर्य की बात न होगी, यदि वे दोनों को मिलाकर भारतीय साम्यवाद का स्वरूप स्थिर करें। यह भारत का जगत् के लिए एक महान संदेश होगा, और गांधीवाद तथा साम्यवाद के समन्वय का प्रथम उपाय । महात्माजी मशीनों के विरोधी हैं ! वह कम-से-कम यह चाहते हैं कि ऐसो मशीनें जो मनुष्यों से प्रतियोगिता करती हैं, जो मनुष्यों को हटा कर काम करती हैं, वे हटा दी जायं । सीनेवाली मशीन भले ही रह जायं, क्योंकि उनके साथ दर्जी की भी आवश्यकता पड़ती है, पर स्पिनिंग फैक्टरी (सूत कातने का कारखाना) तोड़ दी जाय और चर्खा फिर से चल जाय । यूरोप और अमेरिका में भी इस मत के कई विद्वान हैं । उनका विश्वास है-और यह विश्वास निराधार नही है कि मशीनो के कारण ही पूंजीवाद का आना हुआ है। मशीनों के कारण गांव उजड़कर बड़े-बड़े नगर बस गये: जबतक मशीनें रहेगी, बेकारी की समस्या कभी .

गांधीवाद और साम्यवाद है हल न होगी, न श्रमिक और पूजीपति का संघर्ष समाप्त होगा। मशीनों ने जीवन की सादगी को भी नष्ट कर दिया है, और वस्तु की बहुतायत होते भी आज कल जो त्यापक दारिद्रय है, उसका मूल कारण मशीनें ही हैं, अतः मशीन-युग की समाप्ति में ही जगत् का कल्याण इस मत से साम्यवाद का सैद्धान्तिक विरोध तो नही है। पर एक बात अवश्य है कि यह कार्यान्वित हो जाय तो साम्यवाद की बहुत कुछ आवश्यकता ही मिट जाय । साम्यबाद ने इस विषय पर व्यावहारिक दृष्टि से विचार किया है। साम्यवादियों का कहना है कि यदि मनुष्य मशीन को अपना स्वामी बना लेगा तो दुखी होगा, पर यदि मशीन को अपना सेवक बनाये रक्खेगा तो सुखी रहेगा। मशीन भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुओं को शीघ्र बना देती है । थोड़ी-थोड़ी देर काम करने की व्यवस्था करने से बहुत-से श्रमिक काम पा सकते हैं और बेकारी का निराकरण हो सकता है । साम्यवादियों का खयाल है कि मशीन के द्वारा थोड़ी देर में काम से छुट्टी मिल जाती है, शेष समय में मनुष्य आध्यात्मिक, सांस्कृ- तिक और बौद्धिक उन्नति कर सकता है। बिना मशीन के वह फिर तेली के बैल की तरह काम में फंस जायगा । सम्यवादी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था भी मशीनों के अस्तित्व की कल्पना पर ही स्थित है। पर चह थोड़ा उलटफेर करके मशीन विहीन युग में भी चलाई जा सकती है। फलतः इस अंश में भी साम्यवाद और गाँधीवाद का समन्वय हो सकता है। यह एक ऐसा विषय है, जिसमें गाँधीवाद और साम्यवाद दोनो ही भिन्न-भिन्न शब्दों में एक ही बात कहते हैं। लोगों को यह आश्चर्य होगा कि मैं साम्यवाद-रूसी कम्युनिज्म को धार्मिक जीवन का पक्षपाती बताता हूं;पर बात वस्तुतः ऐसी ही है । वे लोग ईश्वर को तो नहीं मानते ऐतिहासिक कारणो ने, उनके देश में संस्थापित अर्ध-सरकारी धर्म-संस्था चर्च की शरारत ने, उनके चित्र को ईश्वर, ईश्वरोपासना आदि की ओर से खट्टा कर दिया है । परन्तु दया, शौच, वात्सल्य, अस्तेय, सत्य, अपरिग्रह, त्याग और लोकसंग्रह का वे लोग आदर करते हैं । इन बातो को पोथियो - .

गांधीवाद : समाजवाद ** - .. और धर्मकथानों के लिए नहीं छोड़ रखते । इनको व्यवहार में लाते है और बच्चो को सिखाते हैं। उनका विश्वास है कि गलत शिक्षा ने मनुष्य को स्वार्थी और परिग्रही बना दिया है। सुशिक्षा उसे फिर पराथीं और अपरिग्रही तथा त्यागी बना सकती है, और यही साम्यवाद की जड़ है । यदि मनुष्य वस्तुतः स्वार्थी और धन-संग्रह का लोभी है तो साम्यवाद चल नहीं सकता। अतः लोगो में त्याग निःस्वार्थता, परार्थता और अपरि- ग्रह का फैलाना साम्यवाद के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। साम्यवादी के सामने एक आदर्श है -आप भले ही उससे सहमत न होइए -- और यह सदैव होता है कि आदर्शवादी का जीवन साधारण मनुष्य के-खाने- पीने और कमाने वाले पशु के जीवन से ऊँचा होता है । गाँधीवादी भी आदर्शवादी होता है। दोनों के आदर्शों के रूप में भेद है: पर दोनों मनुष्यों के स्वभाव और अतीव को बदलना चाहते हैं: दोनो मनुष्य को परार्थी, अपरिग्रही, त्यागी देखना चाहते हैं । साम्यवादी समझता है कि इन गुणों को वृद्धि से ही भौतिक सुग्वों का भोग सबके लिए सम्भव होगा। गाँधीवादी भौतिक सुखों के भी परे जाना चाहता है । यह बड़ा भेद है, पर आदर्शवादी होने के कारण दोनों के व्यवहार में बहुत कुछ साम्य है । घर के लिए एक नीति, बाहर के लिए दृसरी, राजनैतिक क्षेत्र के लिए तीसरी--यह दोनों की दृष्टि में हेय है ! साम्यवादी प्रायः ईश्वर को नहीं मानता ( यह समझ रखना चाहिए कि वह ईश्वर के नाम के ठेकेवाले धर्माध्यक्षों के हाथ से सताये हुए यूरोप के साम्यवादियों की बात है। अन्यत्र के लिए नहीं है); पर अपनी बुद्धि के अनुसार वह भी सत्य का अनु- यायी है। भारत के साम्यवादी चाहें तो ईश्वरवाद, धार्मिकता और साम्यवाद अर्थात् गाँधीवाद और साम्यवाद का अच्छी तरह समन्वय कर सकते हैं । दोनो वादों में यह मौलिक भेद है, और मेरी समझ में तो यहां समन्वय हो ही नहीं सकता । साम्यवाद आर्थिक श्रेणियों को मिटाकर अमीर-गरीब का भेद गायब कर देना चाहता है -न कोई जमींदार रहेगा, न कारखानेदार, न महाजन । महात्माजी के मत से जमींदार भी रहेंगे.

गांधीवाद और साम्यवाद १६६ , महाजन भी, और यदि मशीनें भी रह गई तो कारखानेदार भी । हाँ, उन लोगो को शिक्षा ऐसी दी जायगी कि वे अपने को निर्धनों के लिए उत्तर- दायी समझेंगे और उनकी अविरल दान-धारा निर्धनों का काम चलाती रहेगी । यह अवस्था अबसे लाख दर्जे अच्छी है। पर यदि विचार किया जाय, तो इसमें बड़े दोप है । श्रेणी-भेद रहने के अर्थ ही हैं श्रेणी-दोष, चाहे वे कितने ही क्षीण क्यों न होजायें । साम्यवाद सबको पूर्णत्याग और अपरिग्रह की शिक्षा देना चाहता है। गाँधीवाद एक वर्ग को अपूर्ण त्याग और अपरिग्रह सिखलायेगा, दूसरे वर्ग को सन्तोष । संघर्ष की जड़ बनी रहेगी। दान का भाव बड़ा उराम भाव है; पर इसका भाव यह नहीं है कि समाज में दान-पात्रों का एक वर्ग उत्पन्न किया जाय । सबसे अच्छा तो यही है कि कोई किसीका आश्रित न हो । जब एक बार संग्रह की अनु- मति मिली, तब वह कहां जाकर रुकेगी, यह कहना कठिन है । इस दृष्टि से गांधीवाद सदोष है; क्योकि वह आधी ही दूर जाकर रुक जाता है । समाज का श्रेणी-भेद और तज्जन्य श्रेणी-संघर्ष रोग इतना भीषण होगया है कि अब बिना पूरे छेदन के वह दूर नहीं हो सकता, और इस छेदन का ही नाम साम्यवाद है । और सब बातों में मेल और समन्वय हो सकता है, पर मेरा ऐसा विश्वास है कि इस बात में समन्वय नहीं हो सकता। सम्भव है; महात्माजी ने इस प्रश्न की ओर पूरा ध्यान न दिया हो, या उनके अनन्य अनुयायी उनके उपदेशो को समझे न हो, जो कुछ हो, यह बात भी गांधीवाद का एक अंग बन गई है। साम्यवाद की स्थिति स्पष्ट | इस सम्बन्ध मे रत्ती भर दबने, हटने या समझौता करने से वह साम्यवाद रह ही नही सकता। साम्यवाद और गांधीवाद के संयोग से क्या फल होगा ? साम्यवाद के भी देश काल-पान के भेद से रूप बदल सकते हैं। रूस का लेनिनिज्म शुद्ध मासिज्म साम्यवाद नही है। भारतीय साम्यवाद का भी विशेप स्वरूप होगा । सम्पति के विभाजन और राष्ट्रीकरण में तो वह दृढ़ रहेगा, क्योकि यही उसका अपनापन है। इस मार्ग से डिगना उसके लिए पतन . ७ गांधीवाद . समाजवाद और आत्मसंहार होगा। परन्तु इसके अतिरिक्त उसमें परिवर्तन अब होगे । उस पर गांधीवाद और भारतीय संस्कृति का, जो गांधीवाद की जननी है, प्रभाव पड़ेगा, और वह अधिक याध्यात्मिक हो जायगा सम्भ- वतः अहिंसा को अपना लेगा। यह पराजित गांधीवाद की महान् विजय होगी और वर्तमान काल मे जगद्धित के लिए भारत का सबसे बड़ा प्रयत्न होगा । यहांतक दोनों वादों का समन्वय भी सम्भव है, इसके आगे बहने से एक का अस्तित्व दूसरे में लोप हो जायगा । यह गंगा जमुनी मेल भी श्रेयस्कर हो सकता है । सम्भवतः गांधीवाद भारतीय साम्यवाद के लिए यमुना का ही अभिनय करेगा। Hon र: गाँधीवाद और समाजवाद [विचित्रनारायण शर्मा ] गांधीवाद कोई अलग 'बाद ही नहीं है। जो कुछ मूल बातें गांधीजी हमारे सामने रख रहे हैं, वे सब हिन्दू धर्म में विद्यमान हैं सिर्फ हिन्दू धर्म में ही क्यों, सभी धर्मों में विद्यमान हैं। गांधीजी तो सिर्फ उनपर दृढतापूर्वक अमल करना चाहते हैं और दूसरों से उनपर अमल करने का अाग्रह करते हैं । या दूसरे शब्दों में समाज के सामने जो प्रश्न हैं उनका हल उन्हीं पुराने आजमाये हुए उसूलों से करना चाहते है। यह तो गांधीजी के प्रबल प्रभावशाली व्यक्तित्व का प्रभाव है कि पुरानी चीजें भी उनके नाम से पुकारी जाने लगीं। दूसरी ओर हमें यह भी नहीं समझ लेना चाहिए कि नैतिकता के लिये समाजवाद में कतई कहीं भी कोई जगह है ही नहीं। सच तो यह है कि आज जो भी थोड़ी-बहुत मान्यता या प्रभाव समाजवाद का है, वह इस नैतिकता ही के सहारे है। समाज और गरीबों की सेवा या उनके कष्टों को करने का प्रयत्न स्वयं ही एक बड़ा नैतिक सिद्धान्त है। इसके अलावा गांधीवाद और समाजवाद । , समाजवाद के प्रवर्तको के जीवन में खुद नैतिकता एक बड़े भारी दर्जे तक मौजूद है। उनमें त्याग है, तपस्या है, सद्भावना है । लेकिन यह सब अज्ञातरूप से है। उनकी फिलासफी मे उनके 'वाद' में इसका कहीं कोई खास रूप से जिक्र नहीं होता है, न इसपर कोई जोर ही दिया जाता है। दूसरे लफ्जों में अगर यह कहा जाय कि समाजवाद में इनपर कोई खास विचार स्थिर ही नहीं किये गये हैं, तो बहुत गलत न होगा । फलस्वरूप समाजवादियों की विचार-धारा मे और उनके भाषणो और जीवन मे, जहांतक इस सवाल का ताल्लुक है, बहुत विरोध है । और 'ईश्वर'-उसे तो समाजवादी संसार में प्रवेश करने का कोई अवसर ही नहीं है । यद्यपि कुछ समाजवादी ईश्वर को मानते हैं, हवन-संध्या भी करते हैं, कुछ भाई चोटी भी रखते हैं और चन्दन भी लगाते हैं, फिर भी सिद्धान्त से अध्यात्म जैसी वस्तु को समाजवाद में स्वीकार नहीं किया गया है। समाजवाद सच पूछो तो भौतिकवाद पर स्थिर है। इसी तरह सच को भी सच मानकर कोई मान का स्थान नहीं दिया गया है। सच की यह उपयोगिता स्वीकार नहीं की गई है कि सदा उसे व्यवहार में लाने से समाज का कल्याण ही होगा। समझ में अगर न आये और प्रत्यक्ष रूप में चाहे थोड़ी-बहुत हानि भी हुई दिखलाई दे तो भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए, यह उपदेश नहीं दिया जाता है । यद्यपि यह हमें तसलीम करना पड़ेगा कि उसका एकदम वहिष्कार भी नहीं कर दिया गया है । दूसरे शब्दो में निष्काम भाव से 'असत्य' की पूजा नहीं की गई । समाजवाद में "टैक्टिक्स" को सबसे बड़ा स्थान दिया गया है। कार्य- सिद्धि के लिए जो भी तरीका ठीक हो, उसे काम में ले आना चाहिए। कार्य-सिद्धि असली मकसद है; और जबतक वह मकसद दुरुस्त है, वह आला है और उसे हासिल करने का तरीका भी जायज़' है, बशर्ते कि उससे मकसद हासिल हो जाता हो, अगर सच को साथ रखते हुए काम चल जाता है, तो उससे नफरत करने की जरूरत नहीं। पर जो उसकी वजह से अड़चन हो, दिक्कत या रुकावट हो, तो उसे गले लगाये रखने की गांधीवाद : समाजवाद . भी क्या आवश्यकता ? मूठ या असत्य भी उतना ही अच्छा खिदमतगार हो सकता है जितना सच । जब एक खिदमतगार काम न दे सके तो दुसरे को तलब कर लेने में मालिक को कोई शर्म न होनी चाहिए। इस हिंसा-अहिंसा की वजह से सिर्फ इसी एक जगह झगड़ा नहीं आता है । यह साफ बात है कि कांग्रेस पर आज गांधीजी की भारी बाप लगी है और उसके सारे प्रोग्रामो को निश्चय करने में गांधीजी का बड़ा हाथ होता है। गांधीजी का स्वयं अपना सारा रुख अहिमा से तय होता है। उनकी सारी चालों, सभी नीति के पीछे अहिपामक मनोवृत्ति या विचार-धारा मौजूद है। उधर समाजवाद की भिशि स्थिर है शक्ति या हिंसा पर । लोग समता का तथा अच्छे भावों का प्रचार करने मात्र से ठीक आचरण नहीं करने लग जावेंगे। दान, दया, उदारता की नसीहत से पूंजीपति अपनी शोषण नीति न छोड़ देंगे। इसलिए राष्ट्र की मजबूर करनेवाली शक्ति समाजवादी के हाथ में होनी चाहिए, ताकि वह अपनी योजनाओं को पूर्ण करा सके । यह हिंसा-अहिंसा का प्रश्न इतना मौलिक और इतना व्यापक है कि प्रायः हरेक प्रश्न पर आज गांधीवादी और समाजवादी भित्र-भिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं । इस दृष्टि-भेद से काफी संघर्ष पैदा होता है और कभी-कभी काफी कटुता भी। किसान, जमींदार, मजदूर. मिल-मालिक, प्रजा और देशी नरेश इन सबसे सम्बन्ध रखने वाले प्रश्नो पर दोनों के रुख भिन्न-भिन्न रहते हैं । दूसरी तरह अगर इसी बात को कहा जाय, तो यू' कहना होगा कि समाजवाद और गांधीवाद का मुख्य भेद हिंसा और अहिंसा है। जहां तक समाज को अधिक सुन्दर और अधिक सुखमय बनाने का आदर्श है, वहां तक दोनो वादों में एक ही भावना काम करती है, पर सारा अन्तर तो है साधनों का। गांधीवाद के सारे साधन अहिंसा और अहिंसा के परिणामो या अभिप्रायों से निश्चित होते हैं, जब कि समाजवाद के हिंसा और हिंसा के जो परिणाम और अभिप्राय होते हैं उनसे । चाहे तो अहिंसा स्वीकार कर लेने के परिणाम स्वरूप और चाहे .

गांधीवाद और समाजवाद , , अहिंसा ही हम क्यो स्वीकार करते है इस वजह से, अहिसाबादी का एक खास रूख बन जाना है । वह सारी बुराई या उस बुराई का सम्बन्ध जहां- तक हमारे से है, उसका मुख्य कारण अपने ही अन्दर देखता है । समाज में जो पाप हैं उनका मूल कारण मनुष्य, उसका स्वभाव, उसकी अपनी प्रवृत्तियां और अपनी खामियां हैं। इसके अलावा उसका पहला लक्ष्य होता है, उन्हें दूर करने का । चूकि हमारे अन्दर स्वयं दोष हैं, इससे दृसरों में भी दोपो का होना स्वाभाविक है, इस कारण दूसरों के प्रति उदारता और सहिष्णुता का बर्ताव करना हमारा फर्ज है। अपनी भूल देवकर जैसे हम उसे दुरुस्त कर लेना चाहते हैं और उसको दुरुस्त कर लेने का प्रयत्न करते हैं, वैसे ही दूसरे भी पसन्द करेंगे और प्रयत्न करना चाहेंगे। भूल करने में हमारी हानि है, भूल न करने से हमारा ज्यादा लाभ भी है, इसका प्रदर्शन अगर हम खुद अपने आचरण में नहीं करते हैं, तो दूसरों से यह आशा रखनी बेकार है कि वे हमारे उपदेशो से, भूलों से बचेंगे । अपने आचरण द्वारा हम उन पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं, बनिस्बत उस आचरण के अभाव में | उसकी धारणा कि चरित्रहीन अच्छी मे-अच्छी संस्थानो द्वारा भी बुराई पैदा करेंगे । इसलिए संस्थाओं के सुधार में जहां वह प्रयत्नशील होता है, वहां यह भी जानता है कि संस्था को सुधारने से ही कोई लाभ न होगा, अगर साथ- साथ हमारा चरित्र भी नही सुधरता है। स्वभावतः वह कष्ट सहता है, विरोधी को अपने प्रेम से वश में करना चाहता है, और जिसे ठीक सम. झता है, उस पर आचरण करता है। समाजवादी ठीक इसके विपरीत विश्वास करता है। वह संस्थाओं, परिस्थितियों और ऐतिहासिक प्रवृत्तियो का परिणाममात्र मनुष्य को सम- झता है। अगर किसी भी तरह ये संस्थायें और परिस्थितियां दुरुस्त हो जाये तो समाज आप-से-आप ठीक हो जायगा। समाज में जबतक परिस्थिति हमारे विपरीत है, तबतक हमारे एक या दो व्यक्ति कर सकते है ? लिहाजा बलपूर्वक इन परिस्थितियों को बदल देना पहला और क्या गांधीवाद : समाजवाद मुख्य काम है। लोगों के अन्दर विरोध, अमन्तोष की भावना को प्रबल करके उन्हें स्थापित प्रणाली के विरुद्ध खड़ा कर देना चाहिए, और अगर वे इस एक बार पलट देने में सफल हो गये तो फिर यंत्र की तरह सारा काम ठीक से चलने लगेगा। क्योंकि जो पीड़ित हैं, पद-दलित है वे जब अपना स्वयं प्रबन्ध करेंगे, तो ऐसा कुछ न करेंगे जिससे अपने को कष्ट हो। इसलिए एकमात्र काम है इम स्वर्णयुग का प्रचार, इसकी अाशा लोगो मे जागृत करनी और मौजूदा तंत्र के विरुद्ध लोगों को भड़काना व विप्लव के लिए तैयार करना । गांधीवाद और समाजवाद के सारे भेद इन्ही दो मौलिक विचार- धाराओं से निस्सरित होते हैं। पर विस्तार से उन पर विचार करना इस लेख के दायरे से बाहर हो जाता है । प्रसग था; नैतिक सिद्धान्तों को समाजवाद में कहां तक स्थान है ? और हमने देखा है कि सत्य, अहिंसा आदि के लिए वहां कोई स्थान नहीं है । इसी तरह त्याग, वैराग्य, संयम आदि के लिए भी सुनिश्चित स्थान नहीं है । गाँधीजी की सादगी, उनकी छोटी धोती आदि को समाजवादी कभी भी श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देख सकता । गाँधीजी के महात्म्य या महात्मापने को ये लोग नहीं समझ पाते। वे तो समझते हैं कि धर्म का नाम और त्यागियों जैसा वेश लोगों की आँखों में धूल डालने का तरीका है । गाँधी बड़ा चतुर चालाक है । वह जानता है कि इस देश के पुरुप अशिक्षित और गंवार हैं। उनके दिलों में इन चीजो के लिए बहुत बड़ा स्थान है। इससे वह इन चीजों के नाम से अपनी सारी चालें चलता है। गाँधीजी में सचमुच में कुछ सार भी है, ऐसी कोई शक्ति भी है जो चतुर-से-चतुर मुखालिफ पर भी प्रभाव डाल लेती है, ऐसा वे स्वीकार नहीं करेंगे। पर हमे यह भी मालूम है, और समाजवादी मिन खुद भी तसलीम कर लेते हैं कि वह एक बड़ा , - । । जादूगर है। और यह सब होते हुए भी समाजवादी जवाहरलालजी के त्याग, लेनिन की एकनिष्ठा, उसकी तपस्या की स्तुति करेंगे । इतना ही नही, गांधीवाद और समाजवाद - अगर उनसे कहा जायगा कि 'श्राप लोग नैतिकता को मानते है ?' तो वे हाँ कहगे । कम-से-कम उनमें जो समझदार हैं, वे जरूर मान लेंगे-गो उनमें से बहुतसे ऐसी किसी चीज की सत्ता स्वीकार नहीं करते हैं पर उनमें जो नैतिकता को स्वीकार करते है, उनका अर्थ भी क्या है, यह समझ लेना चाहिए । उनका अर्थ है कि समाज के हित के लिए जो- कुछ भी किया जाता है वह सही है और इसलिए जायज है। आज जो उचित है वही कल अनुचित होजायगा और आज जो सत्य है वही कल असत्य हो सकता है । इससे सत्य-असत्य, उचित-अनुचित निर्भर करते हैं समाज की आवश्यकताओं पर । इन सिद्धान्तों में स्वयं ही कुछ ऐसा है जिससे समाज का हित होगा ही. चाहे व्यक्ति-विशेष के आचरण करते समय ऐसा न भी मालूम हो-यह वे नहीं मानते हैं। और इसलिए सिद्धान्त में एक दर्जे तक इनकी बात सही होते हुए भी वास्तविक जीवन में बहुत ही गलत और सारी नैतिक व्यवस्था को नष्ट करने वाली हो जाती है। समाज का हित-अनहित किसमें है, इसका निर्णय भी तो हरेक व्यक्ति स्वयं ही करेगा। और अगर झूठ बोलकर समाज का हित होता है, तो वह झूठ क्यों न बोले ? चोरो करने से अगर उसकी अपनी समझ में देश का, समाज का, लाभ होगा, तो वह कर्त्तव्यच्युत क्यों हो ? स्वभावतः जो पुरानी नैतिक व्यवस्था है वह सारी तो लोगो के शोषण और पीड़न पर निर्भर करती है। इसलिए वह बुरी ह ही। और बुरी चीज के जो विपरीत हो वह अच्छी होगी ही। धर्म के, ईश्वर के, नाम से ही इन गरीबों के शोषण का पोषण हुआ है । उसे जायज बताया गया है, उसे पवित्रता दी गई है। इसलिए धर्म और ईश्वर का खास तौर से विरोध किया जाना चाहिए नतीजा यह है कि आज समाजवादी दायरों में ये चीजें अत्यन्त अप्रिय हो उठी हैं। नैतिकता, आध्यात्मिकता आदि चीजें हंसी-व्यंग की सामग्री तो होती हैं, पर गम्भीर विचार की नही । करोड़ों और अरबी मनुष्यो के सदियों के अनुभवों को इस तरह ठुकरा देने में उन्हें कोई हिचकिचाहट " । ।

गांधीवाद : समाजवाद नहीं होती । ऐसा मालूम होता है कि उनकी राय में सभ्यता का श्रीगणेश ही कार्ल मार्क्स के बाद हुआ। राजनैतिक और आर्थिक प्रश्नों पर हरेक व्यक्ति ने अपने अलग-अलग नियम और विधान बनाये: यह आजादी व व्यक्तियों को नहीं देना चाहंगे। पर जहाँतक नैतिक आचरण का ताल्लुक है, मनुष्य को पूर्ण मान लिया जाता है और उसी के हाथ में सारा फैसला छोड़ दिया जाता है। यहांतक कि उसकी सलाह के लिए कुछ मोटे-मोटे नियम स्थिर कर दिये जायें,इस- की भी जरूरत कभी महसूस नहीं की जाती है। फल यह होना है कि हरेक समाजवादी व्यक्ति नीतिशास्त्र पर अपनी व्यवस्था देता है । स्वभावन: ये व्यवस्थायें हमारे नीतिशास्त्र से तो टकराती ही हैं. पर आपस में भी बिना तकल्लुफ टकरा जाती हैं और सिवा इसके कि जिसे जो ठीक जंचे वह कर. उन व्यवस्थानो में कोई समानता नहीं। और इसलिए व्यवहार में जो ठीक जै' का अर्थ हो जाता है 'जो रुचे', जिसमें अपनी सुविधा हो'. 'अपना स्वार्थ हो', 'जो अपने को प्रिय लगे', 'जिसमें तकलीफ न हो', 'आराम हो', 'यानन्द हो।' अपनी प्रवृत्तियों की धारा के साथ बहने की यह नीति गांधीवाद के एकदम विपरीत है और यही सारा विरोध है। गांधीवाद मानता है-मनुष्य मूलतः तो पशु ही है। अहंकार, भय, निद्रा, मैथुन अादि जो धर्म उसमें हैं वे पशु होने की हैसियत से उस मिले हैं। और अगर इस पाशविक धर्म को पूर्ण छूट दे दी जाय, इसे हर पहलू में जायज मान लिया जाय, तो हमारे धर्म में और पशुओं के धर्म में कोई अन्तर न रहेगा। पशुओं और मनुष्यों में जरा-सा ही तो भेद है । एक में बुद्धि है और दूसरे में है उसका अभाव । पशु बुद्धि के अभाव में स्वभाव से शासित होता है। मनुष्य, बुद्धि के जोर से, अपने स्वभाव पर काबू करना सीखना जहां वह समझता है कि स्वभाव के वश आचरण करने से अपना, अपने परिवार- प्रियजनों और इसलिए समाज का, अहित होता है। , गांधीवाद और समाजवाद . है मनुष्य ने सदियों के अपने कड़वे और मीठे अनुभव के बाद सीखा है कि सत्य, सरलता, प्रेम, अहिंसा, परोपकार, दया, क्षमा कर्त्तव्यभावना, त्याग, वझादारी आदि-आदि नैतिक गुणों को जितना भी अधिक समाज में स्थापित किया जायगा उतनी ही शान्ति --उतना ही सुख समाज मे बढ़ेगा। इसके विपरीत अगर हरेक व्यक्ति के स्वार्थ-उसकी अपनी रुचियों और प्रवृत्तियों को निर्वाध छूट दे दी जायगी, तो समाज छिन्न-भिन्न हो जायगा और मानव-समाज पशु-समाज से भी नीचे गिर जायगा ! क्योकि पशु जहां अपनी असामाजिक कुप्रवृत्तियों में अपने स्वभाव से ही शासित होता है वहां मनुष्य अपनी बुद्धि की सहायता से बुराइयों को चरमसीमा तक पहुँचाने की शक्ति रखता इसके अलावा जबतक भी शासन कायम रखने की जरूरत है, तब- तक यह अनिवार्य है कि कुछ व्यक्तियों के हाथ में अपरिमित अथवा बहुत अधिक शक्ति रहेगी। वे व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ में इस शक्ति का दुरुपयोग न करें। इसे रोकने का एकमात्र सम्भव तरीका यही है कि उनमें छुटपन से ही अपनी पाशविक प्रवृत्तियों पर काबू रखने की आदत डाली जाय, और समाज सिर्फ ऐसे व्यक्तियों को आगे बढ़ाये और उन पर निर्भर करे और विश्वाल करे, जिनमें ये आदतें एक काफी बड़े दर्जे तक पुष्ट हो गई हो। समाज ऐसे व्यक्तियों पर अपनी प्राशा के पुल न बांधे जो इन गुणों का अपने जीवन में कोई सबूत नहीं देते, बल्कि उल्टे इन गुणों की अवहेलना करते और उनका मजाक उड़ाते हैं । कोई भी विधान, कोई भी तंत्र, शासन के इस दोष को दूर नहीं कर सकता कि कुछ व्यक्तियों के हाथ में हजारों दूसरे व्यक्तियों से ज्यादा शक्ति -ज्यादा अधिकार रहे। इसी भारी खतरे से मनुष्य की रक्षा तब ही हो सकती है जब शासकों और शासकों को चुननेवालों का चरित्र ही ऐसा हो, इतना उठ जाये कि शासन में यह दोप विद्यमान रहते हुए भी इससे कोई हानि न हो । यह भी स्मरण रखना चाहिए कि दो-वार,दस-बीस या हजार-दो हजार व्यक्तियों गांधीवाद , समाजवाद - के चरित्रबल से ही समाज सुरक्षित न रह सकेगा । साधारण जनता और समाज का चरित्र भी इतना तो ऊपर उठना ही चाहिए कि उसमें हजारों लाखों का चरित्रबल बहुत ही अधिक हो सके, और चे चरित्रवल पाने व्यक्तियों को ही अपना नेतृत्व दें। इसलिए गांधीजी का अधिक से अधिक जोर चरित्रवल को बढाने उसे परिष्कृत करने पर है। जहां वह शासन विधान को बदलने, सुधारने मे प्रयत्नशील हैं, वहां वह यह भी जानते हैं कि उनके और उनके साथियों के सारे प्रयत्न निरर्थक जायगे अगर साथ ही समाज का चरित्रवल भी ऊपर नहीं उठता है। समाजवाद और गांधीवाद में यही भेद मूल का है; और देश के लिए वह दिन बहुत शुभ होगा जब समाजवादी मित्र चरित्रवल और उसे बढ़ाने की आवश्यकता को स्वीकार करेंगे और गांधीजी का हाथ बटायेंगे। उपसंहार संघर्ष या समन्वय ? [काका सा कालेलकर मुझे डर है कि समाजवाद के साथ तुलना में पड़ने के कारण गांधी- जी की कार्य पद्धति के लिए 'गांधीवाद' नाम रूढ़ होने वाला है। जितने लोगों ने गांधीजी की दृष्टि और उनकी कार्य-पद्धति को पहचाना है, चे सब हमेशा यह कहते आये हैं कि 'गांधीवाद' जैसी कोई चीज है ही नहीं। स्वयं गांधीजी ने अनेक बार लिखा और कहा है कि उन्होंने किसी नये सिद्धान्त का आविष्कार नहीं किया है। सनातन-काल से मनुष्य-जीवन और मनुष्य-समाज में जिन सिद्धान्तों और तत्वों का मर्यादित क्षेत्र में पालन होता आया है उन्हीं को व्यापक और सार्वभौम बनाने की कोशिश वह कर रहे हैं। कौटुम्बिक जीवन में जिन सिद्धान्तों का पालन सफलता संघर्ष या समन्वय ? । पूर्वक किया जाता है उन्हीं तत्वो पर व्यापक संत्र में अमल करने की हिम्मत मनुष्य नहीं करता है । क्योंकि मनुष्य के हृदय का विकास प्राज- तक इतना नहीं हुआ है। उसकी श्रद्धा की मात्रा उतनी बढ़ी नहीं है। प्रेम की शक्ति पर मनुष्य का अमर्याद विश्वास बैठाने के लिए जितनी आस्तिकता मनुष्य जाति में चाहिए उतनी उसमें नही है। यही पैदा करने का गांधीजी का प्रयत्न है। ऐसी हालत में गांधीजी की दृष्टि और कार्य पद्धति को 'वाद' का नाम देना सर्वथा अनुचित है। ऐसा होते हुए भी मनुष्य का स्वभाव इतना अनुप्रास-प्रिय है कि समाजवाद के साथ लोग जब गांधी-मत का उल्लेख करेंगे तब उसे 'गांधीवाद' ही कहेंगे । गांधी-मत और समाज-सत्तावाद इन दोनों का ही आजकल विशेष बोल- बाला है। इन दोनों ने मिलकर और सब मत और सब 'वाद' पीछे हटा दिये हैं। हमारे देश में तो यही दो मार्ग हैं जिनके प्रति लोगों की कोई खास श्रद्धा है और सम्भव दीख पड़ता है कि सारी दुनिया में भी और वादों का श्रस्त होकर इन दोनों वादों का ही विचार चलेगा। यूरोप में इस वक्त फासिज्म का बोलबाला सबसे अधिक है, तो भी उसके लिए कोइ उज्ज्वल भविष्य नहीं दीख पड़ता। फासिज्म में सामर्थ्य बहुत कुछ है, किन्तु कृतार्थता नहीं है। गांधी-मत और समाजवाद कहने की अपेक्षा सर्वोदयकारी समाज- व्यवस्था और रामाज-सत्तामूलक समाज व्यवस्था ऐसा शब्द प्रयोग हम करें तो शायद अच्छा होगा। क्योंकि सर्वोदय शब्द के साथ अहिंसा और सत्याग्रह का भाव आ ही जाता है और समाज-सत्ता के साथ सामाजिक १. दो वस्तुओं के बीच जब किसी भी किस्म की संगति नहीं दीख पडती तब अंजी में प्रायः कहते हैं-There is neither rhyme nor reason. यही बताता है कि अगर अनुप्रास मिल जाय तो तर्कशुद्धि की कोई जरूरत नहीं। मनुष्य-श्रुद्धि की बाल्यावस्था का यह लक्षण है। ----लेखक गांधीवाद : समाजवाद क्रान्तिकारी राजनैतिक शक्ति का भाव भी स्पष्ट हो जाता है। सबसे पहले ध्यान में रखने लायक बात यह है कि इन दो मनी के आदर्श में बहुत कुछ साम्य है। दोनों को सामाजिक अन्याय असहा है। दोनों को समता प्रस्थापित करनी है। दोनी 'अर्थ' का अनर्थ देव मके है। दोनों क्रान्तिकारी हैं। दोनों में यह श्रद्धा है कि अन्तिम स्थिति में मनुष्य-जीवन के लिए राजनैतिक सता का नाश ही अभीष्ट है। जब मनुष्य सुसंस्कृत और सुसंगठित होगा तब उस पर किसी भी प्रकार का वाहा नियन्त्रण रखने की आवश्यकता नहीं होगी। राजसता का होना मनुष्य संस्कृति का अपमान है। जब सब के-सब सज्जन बन जायंगे अथवा दुर्जनता का कोई आकर्षण ही नहीं रहेगा तब बिना किसी ब्राह्य सत्ता के मनुष्य का सामाजिक जीवन अच्छी तरह से चल सकेगा। अन्तिम आदर्श का जब हम खयाल करते हैं तब सामान्य जनता दोनों को स्वप्न-सेवी और तरंगी कहती है। और ये दोनों अपने को शास्त्रशुद्ध और व्यवहार-कुशल मानते हैं। गाँधीजी अपने को व्यावहारिक श्रादर्शवादी (Practical Idealist) कहते हैं । और समाजवादी अपने को पूर्णतया विज्ञानानुयायी। इतना साम्य होते हुए भी दोनों की कार्य पद्धति में घोर विभिन्नता है । गाँधी-दर्शन मनुष्य की व्यक्तिगत शक्ति के ऊपर अमर्याद विश्वास रखता है । समाज ससा दर्शन मनुष्य की सामाजिक शक्ति पर ही पूर्णतया श्राधार रखता है। गांधी-दर्शन सामाजिक न्याय और समता की दृष्टि से एवं आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से जीवन की सादगी को अनिवार्य समझता है । दूसरा मत इसके विपरीत है। मनुष्य अपनी आवश्यकतायें बढ़ाकर भी सामाजिक न्याय को प्रस्थापित कर सकता है और मानवी विकास के लिए साधन-समृद्धि बाधक नहीं वरन् अत्यन्त पोपक है, ऐसा उसका विश्वास है। समाज-दर्शन का झुकाव सत्ता, सम्पत्ति और लोक-वस्ती केन्द्रित करने की ओर है। इधर गांधी-दर्शन में जहाँ तक हो सके सत्ता का । .

संघर्ष या समन्वय ? । निर्मूलन करना ही अभीष्ट है । सम्पत्ति वर्षा की बूंदों के समान समाज के सव व्यक्तियों के हाथ में बिखेरी जाय, यही इससे हितकर मानते हैं। और जनसंख्या भी बड़े-बड़े शहरों और कल-कारखानों में भीड़ कर बसने की अपेक्षा गांवों में अपनी अपनी जमीन पर अलग अलग बाड़ी बनाकर रह जाय तो उसे अच्छा समझते हैं । दोनों पक्ष जबर्दस्त मिशनरी वृति के हैं। तो भी गांधीजी व्यक्तिको के जीवन में परिवर्तन करके उसीके द्वारा सामाजिक जीवन को बदलना चाहते हैं। और समाजवादी व्यक्तियो की राय में परिवर्तन करके उसका असर राजलता पर डालकर उसीके कानून द्वारा समाज-व्यवस्था मे एक ही साथ क्रान्ति कराना चाहते हैं । वे कहते हैं-जबतक बहुतो का विचार परिवर्तन नहीं होगा तबतक कानून में परिवर्तन नहीं होगा । जिनके पास सम्पत्ति, सामर्थ्य और सत्ता है उनमें उसे छोड़ने की बुद्धि जागृत होना नामुमकिन है । थोड़े लोग साधुत्व के आदर्श से वैराग्य से अथवा समाज- सेवा की इच्छा से धन और सत्ता छोड़ दे सकते हैं; किन्तु सारे समाज में ऐसे लोगों का बहुमत मिलना असम्भव है । इसलिए जिनके पास सत्ता और सम्पत्ति नहीं है उन्हीको जागृत करके उनके बहुमत के सामर्थ्य का लाभ उठाकर कानूनों से परिवर्तन करना चाहिए और राजसत्ता अकिंचनों के हाथ रखनी चाहिए और एक बार अंकिचन सत्ताधारी हो गये तो फिर तमाम सम्पत्ति और उसे पैदा करने के साधन धनिया के हाथ से छीनकर सारे समाज के हाथ में सौंप देना आसान है। यही व्यव- हार का मार्ग है। अगर यह इन्किलाब धनी लोग स्वाभाविकता से होने देंगे, तो उसमें हिंसा का कोई कारण ही नहीं है । किन्तु यदि धनी लोग बहुमत के अधीन नहीं होंगे और गरीबों की सत्ता के विरुद्ध षड्यंत्र करते रहेंगे तो उनका दमन और शासन हिंसा द्वारा भी करना पड़ेगा। यही समाज-दर्शन की भूमिका है । अगर बहुमत की बात सर्वमान्य होजाय तो बिना रक्तपात किये क्रान्ति आसानी से की जा सकती है, किन्तु जब सताधीश और धनपति ऐसे परिवर्तन को परास्त करने के लिए प्रति- गांधीवाद : समाजवाद । । क्रान्ति करने की कोशिश करने है नब धौर रक्तपान की नीयत पहुंच जाती है और उसकी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर पर है जो बहुमत का विरोध करने हैं । यह है भूमिका सामाज-दर्शन की । इस भूमिका के मूत में यह विवार निर्विवाद है कि बहुमत की सशा के लिए कोई मयांदा ही नहीं है। अपनी मेहनत से पाये हुए धन पर व्यक्ति की जो अवाधित सशा श्राज मानी जाती है और उसकी पवित्रता की घोषणा की जाती है उस पर समाजवादियों का तनिक भी विश्वास नहीं है। वे कहते हैं कि सम्मति का निर्माण सामाजिक सहकार के बिना हो ही नहीं सकता । इसलिए यह सम्पत्ति सामाजिक चीज है। हवा और पानी पर जिस तरह किसी व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं, उसी तरह हर तरह की सम्पत्ति पर विसीका भी व्यक्तिगत अधिकार नहीं है। और जिस तरह सामान्यतया हवा और पानी हरेक को चाई जितना ले लेने का अधिकार है उसी तरह जब समाज-ससा प्रस्थापित होगी और विज्ञान के सहारं अन्न-वनादि सब वस्तुयें सामाजिक सहयोग से पैदा की जायंगी. तब उनकी भी बहुतायत हवा-पानी के जितनी नहीं तो काफी तो हो ही जायगी। फिर तो किसी को चोरी करने की इच्छा ही नहीं रहेगी । और श्रम टालने की वृत्ति भी लोगों के हृदय में नष्ट हो जायगी । जिस हद तक परिश्रम आनन्दायी होता है उसी हद तक काम करने से ही मनुष्य-समाज की जरूरतें पूरी हो जायंगी। यह अतिम आदर्श बड़ा सुहावना मालूम देता है और साथ-साध यहां तक हम कैसे पहुंच सकते हैं ऐसी शंका भी मन में आ जाती है । समाजवाद के नाम से इतनी अनेकानेक योजनायें दुनिया के सामने रक्खी गई हैं और इतने भिन्न-भिन्न प्रयोग भी जगह जगह किये गये हैं कि उनके बारे में एक सर्वसामान्य चित्र खींचना कठिन है। कई योज- नायें सौन्य हैं, कई अत्यन्त कड़ी हैं। अगर इनके तारतम्य भेद देखकर इनकी श्रेणियां बनाई जाये तो इनमें कम-से-कम तीन ससक तो मिल ही जायंगे। .

संघर्ष या समन्वय ? । और भी कई बातें इस तुलना में ध्यान में रखनी चाहिए । गांधी दर्शन के सिद्धान्त सष्टतया शब्द-बद्ध नहीं हुए हैं। गांधीजी का यह तरीका ही नहीं है। किसी प्रसंग को समझाने के लिए ही वह तत्व चर्चा करते हैं। और प्रसंग उपस्थित होने के बाद ही अपने इष्ट-देवता सत्य- अहिंसा से तस्व-निर्णय पूछ लेते हैं और उससे जो जवाब मिलता है उसका अनन्य निष्ठा से पालन भी करते हैं। इसलिए गांधी-दर्शन के सिद्धान्त स्वतन्त्रतया तारिखक रूप में लिखे हुए नहीं पाये जाते हैं ! इसके विरुद्ध समाजवाद में सिद्धान्त-चर्चा की प्रचुरता है। किन्तु आज के लिए, गांधीजी के जैसा, तुरंत का कार्यक्रप्त कहीं भी स्पष्टतया नहीं पाया जाता। ऐसी विषम स्थिति में इन दोनो के बीच तुलना करना कठिन है । और सुकाबला तो हो ही नहीं सकता। मुकाबला करने के लिए समान भूमिका कहीं भी नहीं पाई जाती है। दोनों पक्षों को एकसाथ काम करते देखने की जिनकी तीन किन्तु भोली अभिलाषा है, वे दोनों के बीच जो आदर्श-भेद और साधन भेद है, उसे ढकने की कोशिश करते हैं। अगर ये दो पन पूर्णतया पारमार्थिक (Indead earnest) नहीं होते तो दोनों भी मान जाते कि दोनों में विशेष मतभेद नहीं है। जो दोनों को जानते हैं उनके लिए यह बात स्पष्ट है कि दोनों के बीच जो भिन्नता है वह तात्विक है, मौलिक है, तीव्र है और अटल है। इन दोनों के बीच सहयोग हो सकता है, किन्तु कुछ काल के लिए ही। थोड़ा आगे जाते हुए दोनों के बीच कभी-कभी संवर्ष और संग्राम अवश्य होने वाला है। संग्राम का खयाल मन में उठते ही कल्पना उसका चित्र खोचना चाहती है, क्योंकि यह सग्राम अपूर्व और अद्भुत होगा । समाज-दर्शन की संग्राम पद्धति एकदम नवीन और बहुरूपी है और उसमे किसी भी किस्म का परहेज नहीं है। इधर गांधीजी की- गांधी मार्ग की -संग्राम की पद्धति भी अजीब है। गांधीजी के साथ लड़ना मानो पानी के साथ लड़ना है। पानी दीख गांधीवाद: समाजवाद . पड़ता है निराग्रही, किन्तु हे अटल जीवन-धीं। उसे गरम करी, भाद होकर अदृश्य हो जायगा किन्तु हवा में तुरन्त ऋन्नि कर देगा । उस हद मे अधिक ठंडा करो, वह पत्थर के जैसा मजबूत बनेगा और मामूली मौलिक नियमी को तोड़ कर अपना आकार भी बढ़ा लेगा । काटने से वह टूटता नहीं, जलाने से नष्ट नहीं होता। सचमुच गांधीजी की युद्ध पद्धति देवी है । जब समाजवाद और गांधी-दर्शन के बीच संघर्ष शुरू होगा तब स्वर्ग के देव विमानों में बैठ-बैठ कर हाथ में मालाएं लेकर बिना पलक हिलाए उसे देखते रहेंगे। समाजवाद का विरोध करने वालो में ऐसे बहुत कम लोग है जिन्हो ने समाजवाद का मूलग्राही अध्ययन किया हो। समाजवादियों पर इलजाम लगाया जाता है कि वे केवल शब्दशन बोलते हैं, लेकिन कुछ करते नहीं। हमारे देश के लिए शायद यह सही होगा, किन्तु समाजवाद की ताविक भूमिका अन्य वादों से कम ठोस नहीं है। अन्यान्य देशों में वहां के प्रवर कर्मयोगियों ने समाजवाद के असंख्य छोटे-मोटे प्रयोग किये हैं। रूस में समाजवाद को सफलता भी अच्छी मिली है। इधर हिन्दुस्तान के समाजवादियों में भी ऐसे लोग मौजूद है जिन्होंने समाजवाद पर ईमान लाने के पहिले गांधीदल में रहकर गांधीमत का प्रचार किया है, ठोस काम किया है और औरों के साथ बलिदान में भी शरीक हुए हैं । ऐसे लोगों के समाजवादी होते ही उनकी हंसी उड़ाने से लाभ नहीं है। हंसी उड़ाकर समाजवाद को हम उढ़ा सकें, इतना वह पोला या हलका नहीं है। इन दो दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन करने में और भी एक कठि- नाई सामने आती है । यद्यपि यह मानना होगा कि गांधीजी स्वयं अपने ढंग के असाधारण और सफल प्रचारक है. उनका प्रचार, संकल्प, वाणी और क्रिया तीनों ढंग से चलते हैं और वे प्रतिपक्षी को जीतने में भी कुशल हैं, तो भी यह बात निर्विवाद है कि गांधी पक्ष अक्सर संघर्ष या समन्वय ? प्रचार-विमुख है । स्वयं गाँधीजी ने इस प्रचार-विमुखता को उत्तेजन दिया है। इसके विरुद्ध समाजवादी दल में केवल प्रचार-ही-प्रचार है। प्रति- पक्षियों के साथ और अपने पक्ष के अन्दर भिन्न-भिन्न राय रखने वाले सपक्षियों के साथ चर्चा करते वे कभी थकते ही नहीं। अब इन दोनो के कारी का असर जनता के हृदय पर कैसा पड़ता है. यही हम देख लें तो सामान्यतया कह सकते हैं कि सामान्य लोगों को मुनने में तो समाजवाद अधिक प्रिय लगता है, किन्तु वे गांधीपंथ की छत्र छाया में अपने को अधिक सुरक्षित पाते हैं । आजकल के जमाने में दैनिक मासिक आदि वृत्तिविवेचन के द्वारा तत्त्वचर्चा बहुत कुछ होती है, तो भी परमार्थ से सोचने वाले लोग न तो तत्वविवेचकों में मिलते हैं, न उनके पाठकों में। आजकल लोग अपनी मेहनत से विचार करना मानो भूल गये हैं। लोग विचार करने की अपेक्षा कपड़े की तरह विचार प्रोदने के ही श्रादी बन गये हैं। इसका इलाज एक ही है। दोनो पक्ष के विचार पास-पास लाकर लोगों के सामने रख देना चाहिए । जहांतक मैं जानता हूँ इसी उद्देश्य से भिन्न भिन्न व्यक्तियों के विचारों का यह संग्रह प्रकट किया गया है। प्रका- शकों ने मुझे इस संग्रह का संपादक नियुक्त किया है, किन्तु लेखकों की और लेखो की पसंदगी प्रकाशक की ही है । इस पसन्दगी पर अपनी सम्मति देने का काम मेरा नहीं है । चुनाव तो अच्छा ही हुआ है । जिन- जिन लोगों को प्रकाशको ने पूछा वे सब के सब यदि सहयोग देते तो संग्रह की उपयोगिता और बढ़ जाती। रिवाज कहता है कि लेख और लेखकों का चुनाव जो करे उसी को संपादक समझना चाहिए । मूल संकल्प में मुझ पर भार केवल भूमिका लिखने का था, वह मैं नहीं कर पाया । अब लगता है, यह अच्छा ही हुा । हमें श्रद्धय राजेन्द्र बाबू की भूमिका मिली, पर भूमिका न लिखने से मेरा छुटकारा नहीं हुआ । उपसंहार लिखने का मार मुझपर आ पड़ा इस गांधीवाद : समाजवाद है । आशा करता हूँ, यह उपसंहार सामान्य वाचको के लिए बिलकुल दुर्बोध नहीं होगा। जो लोग विचार करना पसन्द नहीं करते और कंवल तैयार माल ओढ़ लेने की जिनकी आदत है, वे मुझसे अपेक्षा करेंगे कि मैं दोनों पक्षों की तुलना करके दोनो का समन्वय कर बताऊं, अपवा कम-से-कम न्याप तुला हाथ मे लेकर न्यायधीश के जैसा निर्णय सुना दू। किन्तु मेरी इच्छा ही नहीं कि मैं ऐसा करू। ऐसा निर्णय देने से किसी का कुछ लाभ भी नहीं होगा। आखिरकार गांधी-दर्शन और समाज- दर्शन के बीच समन्वय तो अवश्य होगा; किन्तु याद रहे कि समन्वय करने का काम आखिरकार दिमाग का नहीं, जीवन का है इस समन्वय की क्या क्या शते हैं, वे भी देखनी होगी। जब लेनिन का बड़ा भाई फांसी पर चढ़ रहा था तब उत्कटना से सोचने वाले लेनिन को उसी वधस्थान पर साक्षात्कार हुआ कि आतंकवाद से देश का उद्धार होने वाला नहीं है। अहिंसा का वह साक्षात्कार नहीं था, किन्तु लेनिन ने प्रत्यक्ष देखा कि वैयक्तिक खून करने और प्रातक जमाने के प्रकार विफल है। उसने देखा कि आर्थिक क्रांति और Mass action ही सर्वसमर्थ इलाज हैं। उसकी नसीहत जब रूस ने मान ली सभी रूस 'रशिया' विजयलक्ष्मी की कृपादृष्टि पा सका। लेनिनको एक साक्षात्कार हुआ। मेरी कल्पना है कि हिन्दुस्तान में समाजवाद को दूसरा साक्षात्कार आहिस्ते-नाहिस्ते हो रहा है। यह मेरा केवल दृष्टिभ्रम हो सकता है, लेकिन मैं तो उसके स्पष्ट चिन्ह देख रहा हूं। हिन्दुस्तान में समाजवाद को अहिन्सा का साक्षात्कार कणशः और वणशः हो रहा है। समाजवाद ने अगर अहिंसा का तत्व समलिया तो समन्वय की बहुत कुछ तैयारी हो चुकी । श्राजकल का इतिहास हमें बतलाता है कि हिंसा के डर से न तो दुर्जन अपनी दुर्जनता से बाज आये हैं, न सज्जनों ने कायर होकर अपने सत्पथ को कभी छोड़ा है । हिंसा जैसी निर्वीर्य चीज दूसरी है ही नहीं ।

संघर्ष या समन्वय ? । और यूरोप में अब जो हिंसा का महोत्सव जम रहा है वह अभी हमें बताता है कि कम-से-कम हमारे लिए हिंसा मार्ग नही है। हिन्दुस्तान जैसे समृद्ध राष्ट्र को सदियो से लूटकर इंग्लैंड ने जो फौजी तैयारी की है उतनी तैयारी निस्सत्व हम सैकड़ो वर्षों की तैयारी के बाद भी बता नहीं सकेंगे। और इंग्लैंड के पास इतनी तैयारी होते हुए भी इग्लैंड जिस तरह जर्मनी- इटली के सामने कांप रहा है, उसे देखते हुए कोई भी विचारशील मनुष्य हिन्दुस्तान में हिंसा के मार्ग से विजय पाने की आशा नहीं कर सकेगा। अगर हमने हिंसा का आश्रय लिया तो या तो चीन और स्पेन जैसी हमारी गति होगी अथवा सुन्द-उपसुन्द की नाई हम आपस में एक दूसरे को काट मरेंगे। अहिंसा पर जिनका विश्वास नहीं बैठता है वे भी अब हिला पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते हैं । जगत परिस्थिति ही हिन्दुस्थान के समाजवादियों को अहिसा की शिक्षा दे रही है। समन्वय की दूसरी शर्त है साधन-शुद्धि की, जिसे गांधीजी सत्य के नाम से पहचानते हैं। बहुत से लोगों को गांधीजी का यह अाग्रह अखरता है। साधन-शुद्धि पर विश्वास करने वाले लोग भी अक्सर मानते हैं और कभी- कभी कहते हैं कि 'गांधीजी साधन-शुद्धि के आग्रह में अतिरेक करते हैं। इस अपूर्ण दुनिया में एक ही किस्म के साधन से काम नहीं चलता है । अगर तात्कालिक फल चाहिए तो भले-बुरे सब साधनों का व्यवहार करना पड़ेगा । अनेसर्गिक आहार-व्यवहार रखनेवाले लोगों के बीमार पड़ने पर नैसर्गिक उपचार से ही काम कैसे चलेगा ? एक दिन में बुखार बन्द कराके अगर इम्तहान में बैठना है या काम पर जाना है तो वहां लंघन-चिकित्सा काम मैं नहीं आयेगी । वहां तो बीस-बीस ग्रेन कुनेन भी लेनी पड़ेगी। बुखार से बरी होने के बाद दूध और नींबू लेकर कुनेन का बुरा असर धीरे-धीरे दूर किया जा सकता है, जिसे तुरन्त फल-प्राप्ति चाहिए उसे साधन-शुद्धि का अति आग्रह नही रखना चाहिए।' गांधीमत और समाज के बीच जो संघर्ष होनेवाला है वह शायद इस बात पर होगा । उस समय गांधीमत को माननेवालों की पूरी-पूरी गांधीवाद . समाजवाद -- कसौटी होगी। यहां पर भी ईश्वर की कहें या इतिहास-घटना की कहे, व्यवस्था ही एखी है कि हिन्दुस्तान मलिन साधनों से आगे नहीं बढ़ सकेगा । जबतक हमारा पाप शाप का रूप धारण करके हमारे सामने खड़ा है नबतक मलिन साधनों से राष्ट्र को फायदा पहुंचने की बजाय विनाशक पापो को ही यल पहुंचेगा । हरिजनो का प्रश्न हिन्दु-मुसलमानों की समस्या, हमारा सामा- जिक उच्च-नीच का भाव और धूर्त साम्राज्य की पकड़ को, मजबूत करने वाली हमारी राजनैतिक नादानी, यह सब हिन्दुस्तान के पुराने पाप हैं । इनका शाप हिन्दुस्तान को धेरै हुए है। कहीं भी मलिनता का संग्रह किया तो ये दोष बढ़ेंगे ही। और अन्त में साधन-शुद्धि का महत्व राष्ट्र के सामने सिद्ध हो जायगा समाजवाद जब अहिंसा और साधन-शुद्धि की दीक्षा लेगा तब उसे सत्याग्रह का किसी-न-किसी रूप में दर्शन हो ही जायगा । पाल के सत्या- ग्रह में शायद कुछ अन्तर होगा किन्तु उसमें समाजवादी और गाँधीवादी दोनों दल सम्मिलित हो जायेंगे और उनके जीवन द्वारा हमें इन दोनों का समन्वय सिद्ध करने का रास्ता मिल जायगा । साधन-शुद्धि और अहिंसा की बुनियाद पर यह जो समन्वय खड़ा होगा वह स्थायी और कल्याण- कारी होगा। किन्तु आज हम उस समन्वय की आशा नही कर सकते हैं। आज तो दोनों के बीच एक समझौते की ही हम अपेक्षा करते हैं । मेरे ख्याल से समाजवादी लोग अपना दल बनाकर कांग्रेस में पाये सो तो ठीक हुा । जो लोग प्रत्यक्ष कार्य में और राजनैतिक संस्थाओं में शरीक नहीं होते उनकी बातों पर कोई ध्यान नहीं देता है। इसलिए विचार-प्रचार के लिए राजनैतिक संस्थाओ में घुस जाना जरूरी होता है; किन्तु काँग्रेस की कार्यवाही में शरीक होने में उन्होंने जल्दबाजी की; समाजवादियों के पास जो कार्यक्रम है, वह स्वराज-प्राप्ति के बाद ही काम आ सकता है । स्वराज प्राप्ति के लिए तो काँग्रेस की शक्ति बढ़ानी, संघर्ष या समन्वय ? । विभिन्न दलों मे काम चलाऊ एकता स्थापित करनी, यही परमोच्च कर्तव्य है । काँग्रेसी ढंग से ही स्वराज-प्राप्ति का कार्य चलाने में सहायक बनकर समाजवादी अगर-अपनी उपयोगिता सिद्ध करें और ऐसा करके काँग्रेस पर कब्जा करें और स्वराज-प्राप्ति के बाद आगे के समाज- संगठन मे अहिंसा और साधन-शुद्धि से परिपूर्ण कार्यक्रम अमल में लायें तो उनके लिए यह सबसे उत्कृष्ट नीति होगी । स्वातंत्र्य-युद्ध में जिस क्षण हम विजय पायँगे उस समय देश मे बहुत-कुछ विचार परिवर्तन हुआ हम देखेंगे। स्वतन्त्रता की साधना राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी दीक्षा है। उसमे सब हीनता भस्म होकर राष्ट्र में जो कुछ स्वर्ण हो, वही चम- कने लगता है। मुझे आशा है कि समाजवादी अब धीमे धीमे समझ गये होंगे कि गाँधीजी का विरोध करते-करते उन्होने राष्ट्र को क्षीण और प्रतिगामी तत्वो को मजबूत किया है । स्वराज-प्राप्ति तक हम दोनो का साथ-साथ चलना अनिवार्य है। स्वातन्य-प्राप्ति के बाद अगर आन्तरिक क्रांति करने की बात रह गई तो समाजवाद उस कार्य को अपने हाथ में ले सकता है। उसके पहले करने की राजनैतिक क्रांति तो गांधीजी की बताई हुई काँग्रेस की नीति से ही हो सकती है। इसलिए आज तो दोनो को हार्दिक सम- झौता करके देश की शक्ति ही बढ़ानी चाहिए । यह समझौता अगर काफी दिन तक चला और दोनों ने धैर्य के साथ काम लिया तो दोनो दलो के विचारों में, और कार्य-पद्धति मे काफी परिवर्तन हो जायगा । समाजवादी दल अगर गाँधीजी की और काँग्रेस की शक्ति को नष्ट नहीं करेगा, तो काँग्रेस उसी के हाथ में जानेवाली है और अगर, जैसी कि मुझे उम्मीद है, दोनो दल एक-दूसरे से बहुत कुछ सीख लेंगे तो-संघर्ष की जगह स्थायी समन्वय सिद्ध हो जायगा । - "Accesib50467 -- Shantarakshita Library WM Tibetan Institute-Sarnath

Gandhivaad Samajwad-050467

Author
Dr. Rajendra Prasad
Title
Gandhivaad Samajwad-050467
File name
Gandhivaad Samajwad-050467
Text
OCR done
Citation
1953
Published
2006/06/25
Publisher
Hindi Prakashan Mandir
Language
Sanskrit
Pages
187
Classification
Literature
DLI number
448245
Barcode
5990010124661.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Rights
In Public Domain
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