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श्रीमद्गगवदी्ता

गणेशीलाल · 2009

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ASE স্বল্পীঃ भाषाटीकासहित। प्रकाशक- गणेशीलाल लक्ष्मीनारायम... लक्ष्मीनारायण यन्त्रालय मुरादाबाद. श

DESH SINAR
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयो ।
ASARAIC
ततोयुन्हाय युज्यस्व नैनं पापमवाप्स्यामि ।।

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MARA पश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहनशः॥ -- . PRETIRIDABAD नानाविधानि दिव्यानि नागावहतीनि च ॥ १॥ Y8993

॥ श्रीः॥
श्रीमद्भगवद्गीता
---
मुरादाबादवास्तव्य
पण्डितबजरत्नभट्टाचार्यण प्रणीतया
रत्नमभाभापाटीकया
समलकृता
सेयम्
गणेशीलाललक्ष्मीनारायणाभ्यां
मुरादावादनगरे
"लक्ष्मीनारायण" यन्त्रालये
मुद्रापयित्वा प्रकाशिताच
तृतीयावृत्तिः,स० १९६७
सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकैः स्वायत्तीकृताः

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प्रध- श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यम भापाटीकासहितम् ॥ धरोवाच । गयन् परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी। रिब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो॥१॥ एक समय पृथ्वी श्रीविष्णुसे पूछने लगी कि- प्रभो ! परमेश्वर ! पूर्वजन्मके किये हुए कर्मों का फल भोग रहे जो प्राणी हैं, उनको, आपकी : दभक्ति कैसे होता है ॥१॥ विष्णुरुवाच । शार भुज्यमानोहिगीताभ्यासरतः सदा।

मामाच्या समुक्त ससुखी लोकर्मणा नापटिप्यात विष्णु कहने लगे कि- पृथ्यि ! पनि किये हुए कमाके फलों को मोगरा जो माना बदं यदि सदा गीताका अभ्यास किया करतो कर्मसे नहीं लिम होना और मुक्त होकर परमा. मन्द को पाता है ॥२॥ महापांपाद्विपापानि गीताध्यानं करोति ने चिस्पर्श न कुर्वन्ति नलिनीदरममासा गीतका ध्यान करने वाले को यद २ पान नही स्पर्मलले म कमलके पंचपर जल नही दरता ॥३॥ गीतायाः पुस्तकं यत्र यंत्र पाठ: प्रवत्तने तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि सनिहि जहां गीताकी पुस्तक रहती है और गातार पाठ होता है वहां निश्रयकरके मंगुर्ग भागमा तार्य रहते है - भोपाटीकासहित ! सर्वे देवाचं अपयोयोगिनः पन्नगाश्च ये। गोपालागोपिकावापि नारदोद्धवपार्षदा।।५।। निवसन्ति सदा यत्र गीतापाठः प्रवर्तते । सहायोजायते शीघं यत्र गीताधृता भवेत् ६ यन्त्र गीताविचारश्च पठन पाठनं श्रुतम् । सत्राहं निश्चितं पृवि निवसामि निरन्तरम् हे पृथ्वि र जहां गीताका पाठ होता है वहां सब देवता, ऋपि, योगिजन, पन्नग, गोप, गोपी और नारद उद्धव आदि परमेश्चरके पार्षद सदैव रहते हैं और जहां गीताको पुस्तक रहती है, वहां विपसि पहनेपर अकस्मात् दैविक संहाय होती है नहीं गानाके अर्थका विचार होता है और गीता पढ़ी या पढ़ाई अथवा सुनाई जाती है वहां निश्चय करके मैं सर्वदा रहेता हूं ॥ ५.१.६ १.७ ॥ गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तम गृहम् ताज्ञानमुपाश्रित्यत्रील्लोकान्पालया गीतामाहात्म्य मैं गीताके आश्रय रहता हूं, गीता मेरा उत्तम मन्दिर है, गीताके ज्ञान के प्राश्रय रहकर में धानों लोकोंकी पालना करता हूं ॥८॥ गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः ।, अर्डमात्राक्षरा नित्यास्वानिर्वाच्यपदात्मिका चिदानन्देन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुनम वेदत्रयी परानन्दा तत्त्वार्थज्ञानसंयुत्ता॥१ अपना नहीं कहनेके योग्य जो ब्रह्मपदकाइ, है, उस करके युक्त यह ब्रह्मरूप गीता मेरी पर वेद्या है, इसका एक पद या आधापद अर्थ एक अक्षर पढ़नेसे परमपद मिलता है इसमें संश नहीं है । चिदानन्दघन कृष्णने अपने श्रीमुखसे अर्जुनमति तत्त्वार्थज्ञानयुक्त परमानन्दमय चेद- प्रयांका सारांश इस गीतामें कहा है ।। ९॥१०॥ योऽष्टादशजपे नित्यं नरोनिश्चलमानसः, पानासहिं. सलभते ततोयाति परांगतिम भाषाटीकासहित। जो. मनुष्य एकाग्रचिन होकर गीताके अठारह अध्यायों का पाठ करता है वह शानकी सिद्धिको • पाकर परमगतिको पाता है ॥ ११ ॥ पाठेऽसमर्थः सम्पूर्णे तदर्थं पाठमाचरेत् । शतगादानजं पुण्यं लभतेऽत्र न संशयः १२ त्रिभागं पठमानस्तु गास्नानफलं लभेत् । . षडशपाठात्प्राप्यत सोमयागफलं ध्रुवम् १३ एकाध्यायं तु योनित्यं पठते भक्तिसंयुतः । रुद्रलोकमवाप्नोति गणोत्वावसच्चिरम् १४ अध्यायं श्लोकपादं वा नित्यं यः पठते नरः। मनुष्यतनुमामोति यावन्मन्वन्तरं धरे॥१५॥ गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पञ्च चतुष्टयम् । द्वौत्रीनकं तदई वा श्लोकानां यःपठेन्नरः१६ चन्द्रलोकमवानोति वर्षाणामयुतं ध्रुवम् । गीतापाठसमायुक्तोमुक्तोन नरतामियात्१७ यदि पूरा पाठ न करसके तो श्राधा पाठ करे तब भी सौ गोदानका पुण्य मिलता है, इसमें संशय नहीं है । तिहाई पाठ से गहास्नानका फल :

. गीनामाहात्म्य मिलता है, छठाभाग पाठ करने से सोमयज्ञका फल मिलता है । जो कोई नित्य भक्तिपूर्वक एक अध्याय गीताका पाठ परता है वह रुद्रलोकमें बहुत दिनोंतक शिवका गण होकर रहता है । एक अध्याय या एक श्लोक अथवा श्लोकका एक चरण जो कोई नित्य पढ़ता है वह एक मन्वन्तर राक मनुष्ययोनिमें रहता है। गीताके दश श्लोक, सात श्लोक, पांच श्लोक, चार श्लोक, दो, तीन या एक वा आधा श्लोक पाठ करने से दस हजार वर्पतक चन्द्रलोकमें रहता है। गीताका पाठ करने वाला मुक्त होजाता है वह फिर मनुष्ययोनि में नहीं पाता ॥ १२॥१३॥१४॥२५॥१६॥१७॥ गीताभ्यासं नरः कृत्वा लभते भक्तिमुत्तमा गीतेत्युचारसंयुक्तोनियमाणोगतिं लभेत् गीतार्थश्रवणासक्तोमहापापयुतोऽपि वा वैकुण्ठं समवानोति विष्णुनासह मोदते गीताका अभ्यास करने से उत्तमः भक्ति r , मापाटीकासहित । मिलती है, मरती वार गीताका केवल नाम लेनेसे उत्तम गति मिलती हामहापापी भीगीताका अर्थ सुन नेसे पवित्र होकर चैकुण्ठको जाता है और वहां विष्णक साथ आनन्दित होताहै ॥ १८॥ १९॥ गीतार्थ ध्यायते नित्यं कृत्वा कर्माणि भूरिशः जीवन्मुक्तः सविज्ञेयोदेहान्ते परमं पदम्२० गीतामाश्रित्य ववोभूभुजा जनकादयः। निधूतकल्मषायाता गीतागीता परंपदम्२१ अनेक कर्मोंको करके भी जो कोई गीताके अर्थ - को नित्य चिन्तवन करता है वह जीवन्मुक्त मानने योग्य है, क्योंकि-उसको देहके अन्त में परमपद मिलता है देखो ! गीताका आश्रय लेकर बहुत से जनकादिक रांजा पापोंसे छूटकर गीताके ज्ञानसे परमपदको गये हैं ॥ २० ॥ २१ ।। गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठते वृथा पाठोभवेत्तस्य श्रमएच उदाहृतः॥२२॥ विना इस माहात्म्यका पाठ किये जो गीताका - गांतामाहारभ्य। 18 करता है उसका पाठ वृथा है, केवल परिश्रम ही होताहै फल कुछ नही होता ॥ २२ ॥ तन्माहात्म्यसंयुक्तं गीताभ्यासं करोति यः जतत्फलमवाप्नोति दुर्लमां गतिमाप्नुयात्।। इस माहात्म्यका पाठ करके पीछे से जो कोई गीतापाठ करता है, उसको गीतापाठका फल और दुर्लभगति मिलती है ॥ २३ ॥ सूनउवाच । माहात्म्यमेतद्गीताया मयाप्रोक्तं सनातनम् जीतादौ च पठेद्यस्तुयदुक्तं तत्फलं लभेत्२४ सूतजी ( शौनकादि अठासी हजार ऋषियों a) कहते है, कि-यह मैंने वहुत पुरातन गीता का माहात्म्य कहा है इसको जो कोई गीताके हिले पढ़ता है, उसको कहा हुआ सब फ़ल प्रवश्य मिलता है ॥२४॥ इतिश्रीवाराहपुराणान्तर्गतं श्रीमद्भगवद्गीतामाहाल्य भाषाटीकासहित समाप्तम् ॥

श्री: श्रीमद्भगवद्वीता रत्नप्रभाभाषाटीका लहिता धृतराष्ट्र उवाच- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। प्रामकाःपाण्डवाश्चैव किमकुर्वतसंजय॥१॥ सङ्गलाचरण। नुमो माधवपादाब्जी कैवल्यपददायकों। यन्मनस्कौभवत्येव तन्मयोनान्यशब्दभाक् । धृतराष्ट्र ने कहा- सञ्जय ! धर्मकर्मों के उत्पशिस्थान कुरक्षेत्र -

भगवद्गीता।
में युद्ध करनेकी कामनासे एकत्रित हुए दुर्योधना-
दिक हमारे पुत्रोंने और युधिष्ठिरादिक पाण्डवों
ने क्या किया ॥१॥
सञ्जय उवाच-
दृष्ट्वातुपाण्डवानकिं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजावचनमब्रवीत्।।२।।.
सञ्जय बोले-
उस समय पाण्डवोंकी सेनाको व्यूहरचनासे
युद्ध करनेके अर्थ खड़ी हुई देखकर राजा दुर्योधनने
गुरु द्रोणाचार्य के निकट जाके यह वचन कहे ॥२॥
पश्यैतां पाण्डपुत्राणामाचार्य महतींचसूम्।
न्यूढां हुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
हे प्राचार्य ! आपके शिष्य जो द्रुपदके पुत्र
बुद्धिमान् धृष्टद्युम्न करके इस मकार व्यूहरचना
से युद्ध के अर्थ खड़ी हुई पाण्डवोंकी इस बड़ी
भारी सेनाको तौ देखो ॥ ३॥

३ भाषाटीका-अ.१॥ अनशूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमायुधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।। ४ ।। धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्ववीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्चशैव्यश्चनरपुंगमः ५ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्ववीर्यवान् सौभद्रोद्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥ इस सेनामें युद्धके वि भीमसेन और अर्जुन की समान पराक्रमी वड़े २ धनुषधारी सात्यकि, विराट, महारथी द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान और पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्. कुन्तिभोज (कुन्ती- का पिता) मनुष्यों में श्रेष्ठ शव्य, अत्यन्त परा. कमी युधामन्यु, तथा अधिक बलवान् उत्तमौजा (अर्थात् पंचालदेशका राजा) सुभद्रा का पुत्र । अभिमन्यु और द्रौपदी के पांचों पुत्र, यह सवहीं १-जो अकेलाही वीर दशसहस्र वीरों के साथ युद्ध करसका हो उसको 'महारथी' कहते है।

भगवतीता। महारथी युद्ध करने के अर्थ खड़े हैं। ४ ॥६॥६॥ अस्माकंतुधिशिष्टाये तानियोधद्विजोत्तम नायकाममसैन्यस्यसंज्ञार्थ तान्त्रवीमित ७ हेब्राह्मणों में श्रेष्ठ हमारी सेना में जो मुख्य सेनापति (शूर वीर ) हैं, आपको स्मरगा कराने के अर्थ उन के भी नाम कहताहूं,आप मुनिय।।७।। भवाभीष्मश्चकर्णश्च कृपश्चसमितिजयः। अश्वत्थामा विकर्णश्चसीलदत्तिस्तथैवच८ एक तौ आए, भीष्मपितामह. कर्ण और संग्राममें जय को प्राप्त करने वाले कृपाचार्य,अश्व- त्थामा, विकर्ण तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा॥८॥ अन्ये च बहवागूरा मदर्थे त्यजीचिताः । नाना शस्त्रप्रहरणासयुद्धविशारदा॥९॥ इन पूर्वोक्त वीरोंके अतिरिक्त और भी विविध प्रकारके शस्त्रमहार करने में निपुण और युद्ध ५ भाषाटीका-अ०३। करने में परम चतुर ऐसे अनेकों शूरवीर हैं कि-- जिन्होंने मेरे हितसाधन के लिये माणतक देदेने का निश्चय कर लियाहै ॥९॥ अपर्याप्तंतदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पयोप्तत्विदमेतेषां चलंभीमाभिरक्षितम्१० हे गुरो! हमारी सेनाके रक्षा करनेवाले भीष्मपितामहनी हैं,नौ भी हमारी सेना वहुत(अ- र्थात्-ग्यारह अक्षौहिणी होकर भी अपूर्ण सी है,और उन पाण्डवोंकी सेनाका भीमसेन रक्षक है, तथा उनकी सेना हमारी सेनासे न्यून(अर्थात् सात अक्षौहिणी) पर भी परिपूर्णसी दीखती है ॥१०॥ अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवंतःसर्वएवहि ११ इसहेतु आप सब शूरवीर अपने२भागोंके अनुसार १-एक अक्षौहिणी में २१८७ हाथी, २१८७ रथ, ६५६१० अश्व और १०९३५० पदाति होते हैं ।

६ भगवडीसा। समस्त अयनों पर स्थित रहकर भीमजी ही की रक्षा करते रहें ॥ ११॥ तस्य संजनयन्दप कुम वृद्धः पितामहः । सिंहनादंविनाचशंखद्धमाप्रतापवान्१२ तदनन्तर कुरुवंशियों में वृन्द्र एवं परममतापी भीष्मपितामहन राजा दुर्गाधनको प्रसन्न करने के लिये सिंहनादकी समान उच्चस्वरस गर्जना करके शंख बजाया ॥ १२॥ तताशग्वाश्च भेर्यश्चप्रणवानकगोमुग्वाः। सहसवाभ्यहन्यतसशब्दस्तुमुलोभवत१३ भीष्मजीके शंखनादको नुनकर उस सेनामें अनेकों शंख, मेरी, पाव, पानक और गोमुाव बाजे शीघ्रही वजने लगे, गया उनका अतिधोर एक बड़ा शब्द होगया ।। १३ ॥ तताश्वतर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थिती । १-सेनाके वलावलको देखकर उनको उचित स्थानपर स्थित करन को 'अयन' कहतहै | ३-दोल। ३ नकारा ।

भापाटीका-अ.१। माधवःपांडवश्वदिव्याशखौप्रदध्मतुः१५ तिसके अनन्तर शेवत अश्वों करके युक्त विशाल रथ में स्थित हुए श्रीकृष्ण और पाण्डुनन्दन अर्जुन भी अपने २ दिव्य शंखों को वजानेलगे। पाञ्चजन्यं हपीकेशो देवदत्तं धनंजयः । पौण्डूंदध्मौ महाशंखं भीमकर्माकोदरः॥ श्रीकृष्ण भगवान् ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देव- दत्त और भयानक कौके करनेवाले भीमसेन ने पौण्डू नामके शंखको वजाया ॥ १५ ।। अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रोयुधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्चसुघोषमणिपुष्पकौ १६॥ कुन्तीके पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नाम वाले शंखको, नकुल ने सुघोप और सहदेवने मणिपुष्पक नाम वाले शखको वजाया ॥ १६॥ काश्यश्चपरमेष्वासःशिखण्डी चमहारथः। धृष्टद्युम्नोविराटश्चसात्यकिश्वापराजितः १७ भगवद्गीता । द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्वमहाबाहुःशखान्दध्मुःपृथक्पृथक् । विशाल धनुपधारी काशीराज, महारथी शि. खण्डी, धृष्टद्युम्न और विराट सर्वत्र विजय को प्राप्त करनेवाला सात्याक,द्रुपद तथा द्रौपदीके पांवोंपुत्र, एवं सुभद्रा का पुत्र महाबाहु अभिमन्यु,यह सब हे राजन् ! चारोंोरसे अपने २ शंखों को पृथक् २ बजाने लगे।। १७ ।। १८॥ सघोषोधार्तराष्ट्राणांहृदयानिव्यदारयत् । नभश्चपृथिवीं चैवतुमुलो व्यनुनादयन्। १९॥ विविध प्रकारके वाद्य और शंखों के उस भी. पणनादने आकाश और भूमिको अपनी ध्वनिसे शब्दायमान करके कौरवों के हृदयों को विदीर्ण कर दिया ॥ १९ ॥ अथव्यवस्थितान्दण्वाधार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः। प्रवृत्तेशस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्यपाण्डवः २०॥ ..

भाषाटीका-अ० १
हृषीकेशन्तदावाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच-
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथस्थापयमेच्युत ॥२१॥
इसके अनन्तर हे राजन् ! तुम्हारे पुत्रोंको युद्ध
करने के लिये उद्यतहुए देख शस्त्रोंके चलनेके समय
अर्जुनने अपना गाण्डीव धनुष उठाकर श्रीकृष्ण
भगवान् से यह वचन कहे । अर्जुनने कहाकि-हेश्री-
कृष्ण ! अव मेरे रथको दोनों सेनाओं के बीच में
खड़ा करो ॥ २० ॥ २१ ॥
यावदेतानिरीक्षेऽहंयोटुकामानवस्थितान्।
कैर्मयासहयोद्धव्यमस्मिनणसमुद्यमे।२२॥
अब युद्ध करनेकी कामनास उपस्थित हुए इन
योधाओं को प्रथम मैं देखलूं, कि-इस संग्राम
के बीच में कौन २ मेरे संग युद्ध करेंगे ॥२२॥
योत्स्यमानानवेक्ष हयएतेऽत्रसमागताः ।
धार्तराष्ट्रस्यदुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३॥

भगवनीता।
जो शूर वीर यहां दुर्बुद्धि दुर्योधन के मिय
करने की इन्द्रा से संग्राम के बीच में युद्ध करने
को श्राय है, तिन सब को मैं एकवार देखन॥२५||
संजय उवाच-
एवमुक्तो त्दपीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वारोत्तमम्।।
भीष्मद्रोणप्रमुखता सर्वपांचमहीक्षिताम्।
उवाचपार्थपश्यैतान समवेत्तान्कुरूनिति।।
संजय बोलेकि-हे भरतवंशी राजन् ! अर्जुन
के इसमकार कहनेपर श्रीकृष्णा भगवान्ने कौरव
और पांडवोंकी दोनों सेनाओं के मध्य में भीम-
पितामह और द्रोणाचार्य तथा समस्त राजाओं
के सन्मुख अर्जुन के उत्तमरथको खड़ा करके कहा
कि हे अर्जुन ! इकडे हुए इन कौरवों को तुम
देखो ॥ २४ ॥ २५ ॥

भापाटीका-१०१। तत्रापश्यस्थितान्पार्थ:पितृनथापितामहान आचार्यान्मातुलान्भ्रान्पुत्रान्पौत्रान्सखीं- स्तथा ॥२६॥ दोनों सेनाओं के बीच में स्थितहोकर अर्जुनने दोनों सेनाओं के मध्य में पितृव्य (पिताके भाई) पितामह, प्राचार्य, मामा, भ्राता (भाई), पुत्र मोर, पात्र तथा मित्रों को ।। २६ ।। श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । तान्समीक्ष्यसकौतेयःसर्वान्बंधूनवास्थितान् और श्वशुर, सुहद्, एवं और भी वन्धु वा- न्धवों को युद्ध करने के अर्थ खड़े हुए देखकर कुंतीके पुत्र अर्जुन ने ॥ २७ ॥ कृपयापरयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । अर्जुन उवाच- 'दृष्ट्वेमस्वजनकृष्णयुयुत्सुसमुपस्थितम् ।।

१२ भगवद्गीता। अतिशय करुणासे युक्त होकर विपाद को. प्राप्तहोके कहा । अर्जुन बोले कि हे श्रीकृष्ण ! इन अपने कुटुम्नियों को युद्ध करने के लिये उद्यत हुवा देखकर ॥२८॥ सीदन्तिममगात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरेमेरोमहर्षश्च जायते॥२९॥ मेरे समस्त अंग शिथिल हुएजाते हैं,मुख सू- खाजाताहै, और मेरे शरीर में कंप तथा रोमांच हुए जाते हैं ।। १९॥ गाण्डीवंसते हस्तात्त्वक्त्रपरिदह्यते । नचशक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीवचमेमनः३०॥ गाण्डीव धनुप हाथसे गिरा जाता और सारे शरीर की त्वचामें दाह होताहै, मैं संग्राम के बीचमें खड़ाभी नहीं होसक्ता क्योंकि मेरा मन भ्रम से चलायमान होरहा है ।। ३०॥

भापाटीका-अ० १। निमित्तानिच पश्यामिविपरीतानिकेशव । न चश्रेयोऽनुपश्यामि हत्वास्वजनमाहवे। हे केशव ! मुझे समस्त शकुन विपरीत(उलटे) दीखो हैं, और अपने कुटुम्बियों को संग्राम में मारकर मैं अपना कुछ भलानहीं देखता हूं॥३१॥ न काङ्क्ष विजयकृष्णनचराज्यसुखानिच। किन्नोराज्येनगोविन्दकिंभोगैजीवितेनवा॥ हे कृष्ण ! मुझे विनयकी इच्छा नहीं, और मैं राज्य तथा सुख भोगने की भी इच्छा नहीं करता, हे गोविन्द ! राज्य, भोग और जीवन से भी हमारा क्या प्रयोजन है ? अर्थात् मुझे राज्या- दिककी इच्छा नहीं है ।। ३२ ॥ येषामर्थकांक्षितंनोराज्यंभोगाःलुखानिचा तइमेवस्थितायुद्धप्राणांस्त्यक्त्वाधनानिच॥ जिनके लिये राज्य, भोग और सुखकी इच्छा , -

भगवनीता।
करीजाती है, वे सब वन्धु मारणों और धनकी प्रा-
शाको त्याग युद्ध करने के अर्थ रणमें प्राप्त हुए हैं।
आचार्या:पितरःपुत्रास्तथैव च पितामहा।।
मातुलाःश्वशुरापात्राःश्याला सम्बधिनस्तथा।
आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मातुल(मामा)
श्वशुर, पौत्र और साले तथा और भी सब संबन्धी
खड़े हैं ।। ३४॥
एतान्नहन्तुमिच्छामि नतोपि मधुसूदन ।
अपित्रैलोक्यराज्यस्यहेत्तो किन्तुमहीकृते।।
हे मधुसूदन! चाहें यह मेरे ऊपर शस्त्रमहारभी
करें तथापि मैं इनको त्रिलोकी के राज्य की
; प्राप्ति के अर्थ मी हनन करने की इच्छा नहीं करत्म
तो फिर केवल पृथिवी के लिये क्या मारनेकी
. इच्छा करूं ।। ३५॥
निहत्यधार्तराष्ट्रान्नाकामीतिःस्याज्जनार्दन
पापमेवाश्रयेदस्मानहत्वैतानाततायिनः ।।

१५ भापारीका-अ... हे दृष्टीनकन्दन ! धूमराष्ट्र के पुत्रोंको मारकर हम्को क्या मसनना होगी? यद्यपि यह आततायी (दुष्ट) है, तथापि इनको मारनेसे हमको पाप ही होगा ।। ३६॥ तस्मान्नायियहन्तुंधार्तराष्ट्रान्स्ववांधवान् स्वजनहिकधहत्वासुखिनःस्याममाधव ३७ इसी कारण हे रमानाथ ! धृतराष्ट्र के पुन अ. पने वन्धुओंको हम मारने के योग्य नहीं क्योंकि अपने कुटुम्पियोंको मारकर हम सुखा कैसे होंगे? अर्थात्-बन्धुओं के मारने से पाप होगा और चित्त उद्विग्न रहँगा ।। ३७ ॥ यद्यप्यते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। फुलक्षयकृतं दोपं मिन्नद्रोहेचपातकम्॥३८॥ १-जो आयुध धारण करके प्रहार करनको उद्यत दोरहादो उसको आततायी कहते हैं, भांतताया को मारनेसे पाप नहीं लगता ऐसा शालों में लिखा है।

भगवद्गीता। यद्यपि इनका चित्त लोभ से व्याप्त होरहा इस कारण यह कुलका नाशकरने से उत्पन्न हुए दोपको और मित्रांसे द्वेप करनेसे क्या पातक लगताहै इस बातको नहीं देखते हैं ॥ ३८ ॥ कथं न ज्ञेयमस्माभिःपापादस्पानिवर्तितम् । कुलक्षयकृतं दोपंप्रपश्याजिनादन ॥ ३९॥ परन्तु हे जनार्दन ! हम इस पापसे निवृत्त होनेके अर्थ सब कुछ जानकरभी कुलके नाशज. नित पापसे क्यों नहीं बचें ॥ ३९ ॥ कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मनष्टकुलंकृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत ॥४०॥ हेनारायण! कुलका विनाश होजाने से सना. तन से चले आनेवाले कुनके धर्म भी नष्ट होजा तेहैं, और धर्म का नाश होजाने से कठिन अधर्म कुलको घेर लेताहै ॥ ४०॥ अधर्माभिभवात्कृष्णप्रदुष्यन्तिकुलस्त्रियः .

भाषारीका-अ० १ स्त्रीपुष्टासु वार्ष्णेय जायतेवर्णसंकरः॥४१॥ हे कृष्ण ! अधर्मसे तिरस्कृत होतेही कुलकी स्त्रियों के आचरण दुष्टाचरण होजाने हैं, और स्त्रियों के व्यभिचारिणी होजानेसे वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है ।। ४१॥ संकरोनरकायैव, कुलध्नानां कुलस्यच । पत्तन्तिपितरोधेषांलुसपिंडोदुकक्रिया:४२|| वह वर्णसंकर सन्तान कुलका नाश करने वालोंको और कुलको नरकही में पहुंचाती है, क्योंकि पिंडदान और तर्पण के लुप्त होजाने से उन कुलविनाशियोंके पितर नरकही में गिरते हैं। दोषैरेतैः कुलतानां वर्णसंकरकारकैः । उत्साचंतेजातिधर्नाकुलधर्माश्चशाश्वताः वर्णसंकर सन्तानको उत्पन्न करनेवाले कुल- १-'कुपुत्रमासाद्य कतो जलांजलिः' इतिस्मरणात् ॥

१८ भगवद्गीता। विनाशियों के इन पूर्वोक्त दोपा करके सनातनसे चलेआते जातिधर्म और कुलधर्म यह सब नाशं होजाते हैं ॥ ४३ ॥ उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकोनियतवासोभवतीत्लनुश्रुम ।। ४४ ॥ हे असुरनिकन्दन ! हमने ऐसा सुना है कि- जिनके कुलधर्म [और जातिधर्म ] विनष्ट होजाते हैं उन मनुष्यों का निरन्तर नरक में निवास. होता है ।। ४४ ॥ अहोपत महत्पापंक व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेनहन्तुंस्वजनमुद्यता:४५॥ अहो !!! हम बड़ा पाप करने के अर्थ उद्यत हुए हैं, जोकि-राज्य और सुखके लोभ से अपने वांधवोंको मारने के लिये सन्नद्ध होरहे है ।।४५॥ यदिमामप्रतीकारमशस्त्रंशस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रारणेहन्युस्तन्मेक्षेमतरंभवेत् ४२॥ .

मापाटीका-अ
..
। यदि हाथमें शस्त्रों को धारण करनेवाले धृत-
राष्ट्र के पुत्र समर में मुझे निरस और उद्योग
रहित को मारें तो मेरा बड़ाही कल्याण होजाय ।।
संजय उवाच-
एवमुक्त्वार्जुन सख्य रथोपस्थउपाविशन् ।
चिसृज्यसशरंचापंशोकसार्विनमानस:४७॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतालूपनिषत्सु मालविद्यायां योगशाले
धोकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविपादयोगानाम
प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
-
संजय कहने लगे कि-
युद्ध में शोकसे उद्विग्न चित्तवाला अर्जुन इस
प्रकार श्रीकृष्ण से कहकर धनुपचाणको त्यागकर
स्थमें तकिये के सहारे से बैठ गया ॥४७ ।।
इतिश्रीभाषाटीकायां प्रथमोऽध्यायः॥१॥

२० भगवद्गीता। द्वितीयोऽध्यायः। सञ्जय उवाच । त तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । विषीदन्तमिदंवाक्यमुवाचमधुसूदनः ।।१।। सञ्जय कहने लगे कि- उस समय दयासे कातरचित्तवाले और जिन के नेत्रों में आंसू परिपूर्ण भररहेहैं,इसप्रकार विपाद करते हुए अर्जुन से मधुसूदन श्रीकृष्णने यह बचन कहे ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच-- कुतस्त्वाकश्मलमिदंविषमेसमुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वयंमकीर्तिकरमर्जुन ॥ २ ॥ श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! नीच पुरुषों द्वारा करने के योग्य भाषाटीका-०२। और स्वर्ग की मासिको नाश करनेवाला तथा अपकनिका देनेहारा यह अज्ञान तुमको ऐसे कुसमय में कहांसे प्राप्त होगया ॥२॥ व्यं मास्मगम:पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठपरंतप ॥ ३ ॥ हे पार्थ ! तुम कातरभावको मत प्राप्त होओ क्योंकि यह कायरता तुम्हारे लिये सुन्दर नहीं लग- ती; शत्रुओं को सन्ताप देनेवाले ! हृदयकी तुच्छ कायरता को त्यागकर युद्ध करने के अर्थ उठो ॥३॥ अर्जुन उवाच- कथंभीममह संख्ये द्रोणञ्च मधुसूदन । इषुभिःप्रतियोत्स्यामिपूजाहीवरिसूदन॥३॥ अर्जुन वोले- मधुसूदन ! मैं संग्राम के बीच भीष्मपितामह और द्रोणाचार्य के साथ बाणों से किस प्रकार हे

भगवद्रीता।
युद्ध करसका हूं? क्योंकि हे शत्रुनिकन्दन ! यह
दोनों हमारे पूजनीय ॥ ४॥
गुरूनहत्वाहिमहानुभावा-
ज्छेपो भोक्तं मैक्ष्यमपीह लोके । .
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिदेव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान॥५॥
महात्मा कुरुवंशियों को न मारकर संसार में
भिक्षा मांगके भोजन करने से तो मेरा कल्याण
है, परन्तु इन कौरवोंकी संपत्तिकी कामना करने
वाले द्रोणाचार्यादिकों को मारकर रुधिरसे सनेहुए
राज्य भोगोंको यहां भोगना उचित नहीं ॥ ५ ॥
न चैतद्विनाकतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदिचा नो जयेयुः ।
यानेवहत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखेधार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥

भापाटीका-अ.२ इस संग्राम में हम दुर्योधनादिक को जीत, अथवा दुर्योधनादिक हमको जीतें, इन दोनों पक्षों में कोनसा पक्ष श्रेष्ठ है ! यह हम नहीं जानते, जिन अपने बंधुओं को मारकर हम जीवित रहने की इच्छा नहीं करते, वेही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सन्मुख (युद्धकरने के अर्थ) खड़े हैं ।। ६ ॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावा, पृच्छामित्वां धर्म संमूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं ब्रूहि तन्मे, शिष्यस्तेऽहंशाधि मांत्वांप्रपन्नम्।। दयाके दोषसे मेरा क्षत्रिय स्वभाव नष्ट होगया और क्या धर्म मुझे कर्तव्य है इसका निश्चय करने में मेरा चित्त मूढ होरहा है, इस कारण मैं आप से पूछताहूं कि जिससे मेरा अवश्यही क- ल्याण हो, वह मुझ से कहो ! क्योंकि-मैं माप २४ भगवद्गीता। का शिष्य आपकी शरण में आयाहूं इस हेतु: मुझे उपदेश करो ॥ ७॥ न हि प्रपश्यामि समापनुद्या- घच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् अवाप्य नूमावसपत्नमृद्ध, राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्।।८।। भूमिके ऊपर निष्कण्टक तथा समृद्ध राज्य अथवा देवताओं के स्वामित्व (इन्द्रपद) कोभी माप्त होकर मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं देखताहूं कि-- जो मेरी इन्द्रियों के सन्तप्त करने वाले शोक को दूर करै ।। ८॥ सञ्जय उवाच- एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप । नयोत्स्यहतिगोविन्दमुक्त्वातूष्णीवभूवह॥ सञ्जय वाले कि- अर्जुन,गोविंद श्रीकृष्ण से यों कहकर कि- भाषाटीका -1 "हे परन्नप ! में युद्ध नहीं करूंगा"मौन होगये।। तमुवाच हृपीकेशः प्रहसन्निव भारत । सेनयोरुभयोर्मध्पेविषीदन्तमिदंवचः १० हे भारत ! दोनों सेनाओं के मध्यमें विषाद करते हुए अर्जुन से हपीकेश श्रीकृष्ण भगवान् हँसकर यह वचन कहनेलगे ॥१०॥ श्रीभगवानुवाद- अशोच्यानन्द शोचस्त्वंप्रज्ञावादांश्चभापसे गतासूनगताम॒श्चनानुशोचंतिपंडिताः११ श्रीभगवान वाले कि- हे अर्जुन ! जिसका शोक नहीं करना चाहिये उसका तो तुम शोच कररहे हो, परंतु बातें सब बुद्धिमानों की समान करते हो, पण्डितलोग मरे हुओं का और जीवतों का शोक नहीं करते हैं११ नत्वेवाहंजातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।

२६ भगवद्गीता नचैवनभविष्यामःसर्वेवयमतःपरम् ॥१२॥ क्या मैं प्रथम कभी नहीं हुआ था? क्या तुम और यह सव राजा नहीं हुए थे ? अथवा इससे अगाड़ी को हम सब लोग उत्पन्न नहीं होंगे? अर्थात्-मथमं भी हुएथे,तथा अगाडीको भी होंगे।। देहिनोऽस्मिन्यथादेहे कौमारंयौवनंजरा । तथादेहान्तरप्राप्तिधारस्तत्र न मुह्यति।।१३।। जिस प्रकार प्राणी इसी शरीर में बालकपन, युवावस्था और वृद्धभाव को प्राप्त होता है, हे अर्जुन ! इसी प्रकार दूसरे देहकी प्राप्ति भी होती है, इसीकारण से धार पुरुप इस विषय में मोह- को प्राप्त नहीं होते ॥ १३ ॥ मात्रास्पर्शास्तुकौन्तेयशीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस्वभारत ॥ हे कुन्तीके पुत्र ! शीत, उष्ण, सुख और दुःख इनका अनुभव इन्द्रियों के संयोगही से होता है, भापाटीका-अ० २। और ये सव भागमापायी (उत्पन्न होने और नाश होनेवाले ) है,अतएव अनित्य है, हे भारत! उनका तुम सहन करो, अर्थात्-यह सुख दुःखा- दिक होतेही रहतेहैं, हर्ष विषादको त्यागके उनको सहनहीं करना चाहिये ॥१४॥ यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखंधीरसोऽमृतत्वायकल्पते ॥ हे पुरुपोत्तम ! जिस पुरुषको यह पूर्वोक्त व्या- धिय व्यथा नहीं देतीं, और जो धीर पुरुप मुख तथा दुःखको समान मानता है, साक्षात् वोही मोक्षके लिये योग्य समझा जाता है ॥ १५ ॥ नासतोविद्यतभावोनाभायोविद्यतेसतः । उभयोरपिदृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः।। नाशवान् पदार्थ का विद्यमान होना नहीं होस- क्ता और नाशरहित (सत् पदार्थ) का विनाश कभी नहीं है, इन दोनों का तत्त्व ज्ञानियों ने .

भगवद्गीता। ऐसा ही निश्चय कराहै ॥ १६ ॥ अविनाशि तुतद्विद्धि येन सर्वमिदंततम् । विनाशमव्ययस्थास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।।. जिसने इस समस्त संसार को व्याप्त कर रक्खा . है, उसी (चैतन्य परमात्मा ) को अविनाशी, जानो, अविनाशीका नाश करने को कोई भी सा- मर्थ्यवान् नहीं है ॥१७॥ अन्तवन्तइमेदेहानित्यस्योक्ताःशरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्यतस्मायुध्यस्वभारत ।। हे अर्जुन ! नित्य (सदा रहनेवाले) अवि- नाशी तथा प्रमाण करने के अयोग्य आत्माकेयह देह अनित्य (नाशवान्) कहे गयेहें, ऐसा विचार करके तुम युद्ध करो ॥ १८॥ यएनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते इतम् । उभौतौनविजानीतोनायंहान्तन हन्यते १९ भापाटीका-अ० २। हे पार्थ ! जो पुरुप इस आत्मा को हनन करने ला जानता है और जो इसको औरों के द्वारा नन कराहुआ जानता है, वे दोनों नहीं जानते अर्थात् दोनोंका ज्ञान असत्य है ) क्योंकि यह जात्मा न तो किसी को हनन करता है, और । किसी अन्य के द्वारा स्वयं हनन किया ता है।॥ १९ ॥ न जायते म्रियते वा कदाचि. न्नाय भूत्वा भविता वान भूयः। अजोनित्याशाश्वतोऽयंपुराणो- न हन्यते हन्यमानेशरीरे ॥२०॥ इस आत्माका न कभी जन्म होता है और 'न कभी मृत्यु होती है, यह प्रथम भी कभी उत्पन्न नहीं हुया और न कभी अगाड़ी को होगा क्यों- कि-यह आत्मा अजन्मा, नित्य ( अविनाशी) हाथा वृद्धि और हास (न्यूनता) रहित एवं ३० भगवद्गीता। पुरातन है, असपत्र शरीर के हनन करने से श्रा, त्माका हनन नहीं होता ॥ २०॥ वेदाविनाशिनंनित्यं य एनमजमव्ययम् । कथं स पुरुषापार्थ कं घातयतिहतिकम् ॥ हे पार्थ ! जो पुरुप इस आत्माको अविनाशी नित्य, अजन्मा और विकार रहित जानताहै, वह पुरुष किसका वध करेगा? और किसका वधं करावेगा ।। २१ ॥ वासांसिजीर्णानियथाविहाय- नदालि गृहाति नरोऽपराणि तथाशरीराणिविहाय जीर्णा- न्यन्यानिसयातिनवानिदेही ॥२२॥ जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर अन्य नवीन वस्त्रोंको धारण करेलता है, ऐरे हो यह आत्मा पुराने इन शरीरों को त्यागक भाषाटीका-अ० ३ दूसरे नये शरीरको धारण करलेता है ॥१२॥ नैनं छिन्दतिशक्षाणि नैनदहति पावकः। नचैनल्लेदयंत्यापोनशोषयति मारुतः ॥२३॥ इस आत्माको शस्त्र छेदन नहीं कर सक्ते, अग्नि भस्म नहीं करसक्ती, और इस आत्माको जल आर्द्र (गीला ) भी नहीं करसक्ता, एवं पवन शुष्कभी नहीं कर सक्ता है ॥ २३ ॥ अच्छेद्योऽयमदायोऽयमल्लेद्योऽशोष्यएवच नित्यःसर्वगतःस्थाणुरचलोऽयंसनातनः२४॥ यह आत्मा छिन्न भिन्न करने, भस्म करने, भिगोने और सुखाने के योग्य नहीं है क्योंकि आत्मा तो नित्य, सर्व व्यापक, स्थिर, निश्चल और अनादि है ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिंत्योयमविकार्योऽयमुच्यते तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि२९ इस आत्मा को अव्यक्त (निराकार) चिंता करने के अयोग्य (अर्थात् अगोचर) और विकार भगवद्गीता। राहित कहते हैं इसकारण आत्मा को पूर्वोक्त अवस्थावाला जानकर हे अर्जुन ! तुम शोच मत करो ॥ २५॥ अथचैनं नित्यजातं नित्यंचामन्यसे मृतम् ।। तथापित्वं महाचाहोनेनंशोचितुमर्हसि २६॥ हे लम्बी भुजावाले अर्जुन!तुम यदि इस आत्मा को नित्य उत्पन्न होने वाला और नित्य मृत्यु को प्राप्त होने वाला ही जानते हो तौभी तुम्हें इस का शोच करना उचित नहींहै ॥ २६ ।। जालस्यहिध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थेनत्वं शोचितुमर्हसि २७॥ क्योंकि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी, और जिसकी मृत्यु होतीहै. उसका जन्म भी अवश्यही होगा। इसकारण हे अर्जुन !

मापाटीका-अ०५। तथा चित्तको स्वाधीन रखने वाले आत्मज्ञानी यशी पुरुष दोनों लोको मोक्ष ( इस लोक में सुख और परलोक में मोक्षाको मात होते हैं ।।२६ सन्कृित्वा वहिर्वाच्यांश्चतश्चैवान्तरेभ्रुवोः प्राणापानौ सलो कृत्वानासाभ्यन्तरचारिणी यतेन्द्रियमनोशुद्धि निक्षिपरायणः । विगतेच्याभयक्रोधोया सदामुक्तएव सः२८ इन्द्रियोंके शब्दादिक वाहा विषयों को दूर कर, दोनों भ्रुटियों के मध्य में दृष्टि लगाके नासिकामें विचरने वाले माण और अपान वायुओं को समान करें तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धिको स्वाधीनकर मोक्षकी कामना करने वाले विचार- वान तथा जिनके भय, इच्छा और क्रोध दूर होगये हैं ऐसे ज्ञानी पुरुप सदाही मुक्तरवरूप हैं २०२८ १०. भगवनीता. भोक्तारं यजतपसा सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे. सन्यासयोगो- नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ हे अर्जुन ! पुरुष मुझको यज्ञ और तपोंको भोग- नेवाला सम्पूर्ण लोकों का स्वामी, और समस्त प्राणियोंका मित्र जानकर मोक्षको प्राप्त होताह२९ इति श्रीभापाटीकायां पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥ षष्ठोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । अनामित कर्मफल कार्य कम करोति । ससन्दालवयोणीच निरग्निचाक्रिया श्रीमंगवातने कहाकि: जो पुरष कमाके फलकी कामनाको छोड़कर भाषाटीका-अ०६॥ १०१ . -- कर्तव्य कर्मों को करता है: वही संन्याती और योगी है, अग्निहोत्र और कर्म छोडदेने वाले को योगी नहीं कहते हैं ॥ १ ॥ यं संन्यासमिति प्राहुर्योग तं विद्धि पाण्डव नहासंन्यस्तसंकल्पोयोगी भवति कश्चन २ हे पण्डुनन्दन जिसको सन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जानो; क्योंकि--संकल्पको त्याग विना करे कोईभी पुरूप योगी नहीं होता ॥२॥ आरुरुक्षोर्मुनेयोगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३॥ मोक्ष प्राप्त होनेकी इच्छा रखने वाले पुरुपका कर्म ही ( मुमुक्षु होने में) कारण कहा जाता और ज्ञान प्राप्त होज़ाने पर शान्ति ही ज्ञानका कारण कही जाती है ॥ ३ ॥ यदाहि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । मर्वमंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ४ १०२ भगवद्गीता। जब प्राणी इन्द्रियों के विषयों और कर्मों में आसक्त नहीं होता, तब सब संकल्पांका त्यागने वाला वह संन्यासी योगासह कहलाता है ॥४॥ उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । श्रात्मैव धात्मनोवन्दुरात्मैव रिपुरात्मनः५ अपने आत्माका मन करके उद्धार को, विषया- सक्त मन करके उसको क्लेशयुक्त न करे, क्योंकि (विषयों में अनासक्त हुया ) मन अपना वन्धु और ( विषयों में आसक्त हुआ ) मनही अपना वन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित। अनात्मनस्तु शत्रुखे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् दे। जिसने बानके द्वारा अपने मनको स्वाधीन करलिया है, वही स्वयं अपना वन्धु (हितकारी) 'है; और अज्ञानी पुरुपोंका आत्माही उनके शत्रु के समान स्थित रहता है ॥६॥ जतात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ७. : है भाषाउका-अ. ६ मनको जय करनेवाले, शान्त स्वभावयुक्त मनुष्य का आत्मा-शीत, उष्ण, सुख, दुःख तथा मान और अपमान में शान्तही रहता है।।। जानविज्ञानतृतात्मा कूटस्थोविजितेन्द्रियः युक्तइत्युच्यते योगीसमलोष्टाश्मकांचनः॥ शास्त्रज्ञान और आत्मज्ञान के द्वारा भली प्रकार वप्ति को प्राप्त हुआ, निर्विकार तथा इन्द्रियों का जय करने वाला, मिट्टी और सुवर्ण मानने वाला, योगी कहलाता है ॥ ८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थवेष्यवन्धुषु । साधुष्वपि चं पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९॥ जो पुरुष,सुहृद्,मित्रे,शत्रु,उदासीन, मध्यस्थ, -श्रीधर खामीकृत श्रीधरी व्याख्या में लिखा है कि- स्वाभाविक हितैषीको 'सुहृद' ।२ स्नेहवश उपकार करनेवाले को 'मित्र'। ३ वादी और प्रतिवादीकी उपेक्षा करनेवाले को 'उदासीन।४ वादी और प्रतिवादीको एक भावसे देखनेवाले को 'मध्यस्थ, को समान योगनिष्ठ पुरुष १०४ भगवडीसा प्य, और वन्धु तथा सज्जन और पापी इन सवको समान (ब्रह्म) भावसे देखता है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ है ।। योगी युतीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ अपने मन और चित्तको स्वाधीन करके सत्र प्रकारकी कामना और ममताको त्यागके योगी पुरुप अकेलाही एकान्त में स्थित होकर अपने मन को निरन्तर समाधि में लगावे ॥१०॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठान्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् पवित्र स्थान में अपने अचल श्रासनको विछात्र १ और जिसके देखने 'वित्तकी बृत्तिको खेद प्राप्त हो उसको "दुष्यकहते हैं । परंतुं-किन्ही टीकाकारों में 'टंदामीन' का विना निमित्त हित अहित करनेवाला, और मध्यत्य का मंत्रु मित्रो जन्म से समानं जानने वाला, अर्थ किया है। .

भाषाटीका-अ०६। यह प्रासन अन्यन्त ऊँचा और अत्यन्त मीचा न हो, तथा उस आसनको इसप्रकार विछानों चाहिये कि मथम कुशा विछावै उसके ऊपर मय- चर्म और उसके ऊपर वस्त्रं विछावै ॥११॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युज्यायोगमात्मविशुद्धये ॥ उस श्रासन के ऊपर बैठकर मन और इन्द्रियों के व्यापारको रोककर मनको एकाग्र करके अंन्त:- करणकी शुद्धिके अर्थ योगाभ्यास करै ।।१२।। सम कायशिराग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् १३ प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रतस्थिता। मनः संयम्य मचित्तोयुक्त आसीतमत्परः ।। शरीर, मस्तक और ग्रीवाको स्थिर तथा सूधा करके, चारों ओर को न देखता, अपने नासिका के अग्रभागमें दृष्टि लगाकर, अन्तःकरणको शान्त करके, निर्भय और ब्रह्मचर्य में स्थित होकर, मनको चारों ओरसे हटाके मेरे वि लगाकर सब भगवद्गीता कुछ मुझे ही मानके योग में अाम्द रहै ११ युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः । शान्तिनिर्वाणपरमांमत्संस्थामधिगच्छति॥ इस प्रकार सदा मात्माको स्वाधीन रखने वाला और समाधि में स्थित हुया योगी मेरे स्वरूप(मोक्षरूप)परम शान्तिको पाप्त होता है-१५ नात्यश्नतस्तु योगोऽस्तिम चैकान्तमनलता। नचातिस्वप्नशीलस्य जाप्रलोनैव चार्जुन॥१६॥ हे अर्जुन!जो पुरुप अत्यन्त भोजन करता अयवा भोजन नहीं करना,लया जोपुष्प अधिक शयनकरता वा जागताही रहता है उप्तको योग मात नहीं होता। युक्ताहारविहारस्य युरुचेष्टस्य कमलु । युक्तस्वमावबोधस्य योगोभवति दुःखहा१७ जो मनुष्य उचित आहार और विहार करता है, तथा कर्मों को उचित तसे करता है और जो समयानुसार) उचिा ही सोता और जागता उसका योगाभ्यास दुःखोंको दूर कर देना १७ : --

भाषाढीका-अ०६.
.
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निस्पृहः सर्वकामभ्योयुक्तइत्युच्यते तदा ॥
जब वित्त शान्त होकर अपने आत्माही में
स्थित होता है, और सम्पूर्ण कर्मों की इच्छा त्याग
देना है, उसी समय वह पुरुष योगी कहाता है१८॥
यथा दीपोनिवातस्थानेङ्गते सोपसा स्कृता।
योगिनोयतचित्तस्य युजतोयोगमात्मनः॥
जिस प्रकार पवनरहित स्थानमें रक्खा हुआ
दीपक निश्चल रहता है ऐसही चित्तको स्वाधीन
रखने वाला योगाभ्यासी पुरुष भी निश्चल रहता
है, ऐसा दृष्टान्त दिया गया है ॥ १९ ॥
यत्रोपरखते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यन्त्र चैवात्मनात्मानं पश्यत्रात्मनि तुष्यात ॥
जिस अवस्था में योगाभ्यास करके चित्त रुक
कर उपराम(शान्ति)को प्राप्त होता है, और जब
शुद्ध अन्त:करणसे आत्माको देखकर आत्माही
में सन्तोपको पास होजाता है ॥ २० ॥

१०
भगवद्गीता।
सुखमात्यंन्तिकंयत्तद्वंद्विग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितंश्चलति तत्त्वतः२१
तथा जिस समय योगी पुरुप इन्द्रियोंके अगो.
चर केवल शुद्धबुद्धि से जाननेके योग्य अत्यन्त
आनन्दको माप्त होता है और जिस अवस्था में स्थित
होकर अपने स्वरूपसे चलायमान नहीं होता।
यंलब्ध्वाचापरं लाभमन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिस्थितोन दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।
जिस लाभको प्राप्त होकर पुरुप और लाभ
को अधिक नहीं मानता, तथा जिस अवस्था में
स्थित हुवा पुरुष वेडमारी दुःखसे भी चलायमान
नहीं होता ॥ २२॥
तं विद्यादुःखसंयोगवियोग योगसंजितम् ।
सनिश्चयेन योक्तव्योयोगोऽनिविण्णचेतसा।।
दुःखके संयोग से रहिल उसी(अंवस्था ) को
योग कहते हैं । उद्विग्नतारहित मनसे निश्चय उस
योमका अभ्यास करना चाहिये ॥ २३ ॥

भाषाटीका-अ.६। १.९ संकल्पप्रभवान्कामस्त्यिक्त्वा सर्वानशेषतः मनसेवेन्द्रियग्राम विनियम्य समन्ततः २४ शनैः शनैरुपरमेंद् बुद्ध्याधुतिगृहीतया । आत्मसंस्थमनाकृत्वा नकिंचिदपिचिन्तयेत्।। “संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर मनके द्वारा चारोंओर से सव. इन्द्रियों को रोकके धैर्य करके युक्त हुई बुद्धिके द्वारा मनको शनैः २ विपयों से उपराम को माप्तकर और मनको आत्मा में स्थित करके किसी वस्तुकी भी चिन्ता न करै.।। २४ ॥२५॥ यतोयतोनिश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततोनियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् २६ स्वभावही से चचल अतएव स्थिर. यह मन जिधर २ को दौड़े उसी २ ओर से इसको रोक कर आत्मा में स्थिर. करै ।।.२६ ॥ प्रशान्तमनसंस्थेनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजस ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥२७॥ दे ११० भगवता। जिसके रजोगुणादिक दूर होगये हैं अतएव शान्सचित्त वाले निष्पाप और साक्षात्-ब्रह्मस्त्र- आप इस योगी पुरुषको उत्तम मुख माप्त होता है।। युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मपः । सुखेन ब्रमसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८॥ इस प्रकार मनको वशम करने वाला, निष्पाप योगी पुरुपब्रह्मके साक्षात् रूप परमसुखको अना- यास ही से प्राप्त होजाता है ।। २८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनमा२६॥ योगाभ्यासी पुरुष अपने आपको सब प्राणियों में स्थित हुआ, सर्वत्र समान देखनेवाला, अन्य सब प्राणियों को अपने में स्थित देखता है।।२।। पोमां पश्यति सर्वत्र सर्वच मयि पश्यति । तस्याहं न प्रपश्यामि सच मेन प्रणश्यति३० जो ज्ञानी मनुष्य सब प्राणियों में मुझे, और भाषाटीका अ०६१ मुझमें सा मागियों को देखा है, उसमें मैं अदृश्य नहीं रहना, और वह मुझसे अदृश्य वहीं रहना, अशी-दृश्यमान् सम्पूर्ण पदार्थोंको भन देखनेवाला ज्ञानी पुरुप मुझे देखता है और मैं उसे देखता हूं ॥ ३०॥ सर्वभूनायितंयोमा भजत्येकत्वमास्थितः। सर्व यावर्तमानोपिसयोगीमयि वर्तते॥३१॥ जो माणी भेदबुद्धिको त्यागकर सामाणियों में स्थित हुर मुझको एक भाव से माना है वह योगी सा दशाओं में वर्तमान रहकरभी मुझमें ही स्थित रहता है।॥३१॥ यात्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यतियोऽर्जुन । सुखं वायदि वा दुःखं सयोगीपरमोमतः३२ हे अर्जुन ! जो पुरुष अन्य सबके सुख दुःख को अपने ही सुख दुःखकी समान देखता है; वोही परम [अंध] योगी मानागया है ।। ३२ ॥

११२ भगवीता। अर्जुनउवाच । योऽयं योगस्त्वया प्रोक्त साम्बेन मधुसूदन। एतस्याहंनपश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिस्थिराम् अर्जुन ने कहा- हे मधुसूदन ! अपनी समान सवको देखना यह जो योग आपने वर्णन करा, मनके चंचल होनेके कारण इस योगकी चिरकाल पर्यंत. स्थिति मुझे नहीं दीखती ॥ ३३ ॥ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम् ।। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्३४ हे कृष्ण ! यह मन इन्द्रियों को क्षुभित करने वाला, अत्यन्त विचार करनेसे मी जय करने के अयोग्य और दृढ़ तथा चंचल है, अतएव इसके निग्रहको ठीक वायुके निग्रह की- समान : कठिन मानता हूँ ॥३४॥ --- भापाटीका-अ.६ ११३ श्रीभगवानुवाच । 'असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृथत३५ श्रीभगवान् वाले कि- हे महाबाहो ! यह मन निःसन्देह चंचल और कठिनता से वश में होनेवाला है, तथापि हे कौन्तेय ! अभ्यास और वैराग्य से निश्चल और स्वाधीन होजाता है ।। ३५ ॥ असंयत्तात्मना योगीदुष्पान्यहातिलतिः। घश्यात्मनातुयतताशक्योऽवामुपायतः।। जिसका मन अपने वश में नहीं है, हमारी : समझमें उसको योग प्राप्त होना अतिकठिन है, उपाय करते हुए जितेन्द्रिय पुरुषको उपाय के द्वारा योग प्राप्त होजाना सहज है ॥ ३६॥ अर्जुनउवाच । अयति। श्रद्धयोपेतोयोगाचलितमानसः । .

११४ भगवद्गीता। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कांगति कृष्ण गच्छति अर्जुन बोले कि- हे कृष्ण ! जिसके चिच की वृत्ति स्वाधीन नहीं है, श्रद्धायुक्त और जिसका चित्त योग से चनायमान हो, ऐसा पुरुष योग की सिद्धिको न पा. कर कौनसी गति को प्राप्त होता है ।। ३७ ॥ कचिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाश्रमिव नभ्यति । अप्रतिष्ठोमहाबाहो विमूढोब्रह्मणः पथि३८ हे विशालवाहो ! कर्म और ज्ञान इन दोनों के मार्ग से भ्रष्ट हुआ, आधाररहित और ब्रह्म- प्राप्तिके मार्ग से अज्ञानी पुरुष क्या छिन्न भिन्न हुए मेघों की समान नष्ट होजाता है अथवा नहीं।। एतन्मे संशयं कृष्ण तुम हस्यशेषतः । स्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता नापपद्यते॥३९॥ हे कृष्ण ! इस मेरे संपूर्ण सन्देह को दूर करने को आप ही योग्य हैं, आपसे अन्य इस सन्देह भापाटीका-०६१ ११५ - का बेदन करने वाला मुझे और कोई नहीं दीखता ।। ३९ ॥ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। नहिकल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति श्रीभगवान् वोले कि- है पार्थ ! योगमें भ्रष्ट हुए पुरुषका इसलोक सथा परलोक में नाश नहीं है, क्योंकि हेतात ! शुध कम्मों के करने वाले पुरुष कुगति को प्राप्त नहीं होते ॥ ४०॥ प्राप्य पुण्यकृताल्लोकानुषित्वाशाश्वती:समाः शुचीनां श्रीसतां गेहे योगभ्रष्टोहि जायते।। योगभ्रष्ट पाणी पुण्यात्माओंको प्राप्त होने वाले लोकों में प्राप्त होकर और वहां अनेकों वर्ष पर्यन्त निवास करके पवित्र धनवानोंके घरमें जन्म लेते हैं ।। ११ ॥

. ११६ भगवद्रीता। अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्धि दुलभत्तरं लोके जन्म यदीदृशम्४१ अथवा अतीव वुद्धिमान् योगियों ही के घरमें उत्तम जन्म लेता है,हे अर्जुन ! ऐसा जन्म संसार में परम दुर्लभ है ॥ ४२ ॥ तत्र तं वुद्धिसंयोग लभते पोर्चदैहिकम् । यतते च तंतोभूयः संसिद्धा कुरुनन्दन ४३ हे कुरुनन्दन ! वह भ्रष्टंयोगाभ्यासी योगियों के कुलमें उत्पन्न होकर पहिले देहसे अभ्यास- करे हुए वुद्धिसंयोग ( अात्मज्ञान ) को प्राप्त होता है और फिर भी मोक्षम्प सिद्धि के अर्थ यल . करता है ॥४३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ड्रियेत ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ४४ योगसे भ्रष्टहुआ योगी पुरुप पूर्व देहसे करे हुए . अभ्यासके द्वारा भी मोक्षको माप्त होता है, और जो योगके जाननकी इच्छा करनेवाला है वह भाषाका-अ०६ ११७. रुप वेदोक्त कर्मफलसे भी अधिकफलकोमाप्तहोताहै। प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी-संशुद्धकिल्विषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परांगतिम्४५०। अत्यन्त - यत्न से योगाभ्यास करनेवाला, निष्पाप योगी अनेक जन्मों में करेहुए पुण्योंके द्वारा सिद्धिको प्राप्तहोकर मोक्षरूप परमगतिको प्रासंहोताहै। तपस्विभ्योऽधिकोयोगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिकोयोगी त- स्माद् योगी भवार्जुन ॥ ४६॥ तत्वज्ञानी योगी "पुरुष तपस्वी, ज्ञानी और अश्वमेधादिक कर्म करने वालोंसे भी अधिक श्रेष्ठ है. इस कारण हे अर्जुन ! तुमभी योगी होजाओ४६ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान् भजते योमा समे युक्ततमोमतः।। इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपानिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्ने भीकृष्णार्जुनसंवादे शामयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६...

भगवद्रीता।
जो योगीपुरुष अपनी वित्तवृत्तिको मेरे वित
लगाकर श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करता है, उस योगी
को मैं सब योगियोंसे प्रति श्रेष्ठ मानता हूँ||४७
इति श्रीमापाटीवायां षष्टोऽग्यायः॥६॥
सप्तमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच ।
मय्यासक्तमनाः पार्थ योग युजन्मदात्रयः
असंशयं समय मांघधाज्ञास्यसि तवृणा
श्रीभगवान् वोले कि-
हे पार्थ ! चित्तवृत्तिको मुझ में लगाक
मेराही आश्रय करके योगाभ्यास करते हुए सुर
निस प्रकार निश्चय मुझे पूर्णरूप नानांगे, उस
ज्ञानको सुमो ॥ १॥

भाषाटीच... 01 ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं पक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञावा नेहभूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते • हे अर्जुन ! मैं तुम्हारे मसि शास्त्रीय ज्ञान और अनुभवज्ञान इन दोनों झानोंको संपूर्ण वर्णन करताहूं, जिस ज्ञानको जानकर इस लोक में फिर कोई दसरी वस्तु जाननेके योग्य नहीं रहती ॥२॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिहये । यततामपिसिद्धाना कश्चिन्मावेत्ति तस्वतः हजारों मनुष्यों में से कोई एक विरलाही सिद्धिके अर्थ यल करता है, और यत्न करने वाले उन हजारों में से भी कोई एकही मुझ ब्रह्म के सरथको जानता है ।।३।। भूमिरापोऽनलोवायुः ख मनोबुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टवा ॥४॥ भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश मन,बुद्धि १२. সময়। और अहंकार यह आठ प्रकारकी मेरी पकाते है४ : अपरेयमितस्त्वन्या प्रकृतिविद्धि में पराम्। जीवभूता महाबाहों ययेद धार्यते जगत् ५ परन्तु हे महावाहों। यह निकृष्ट प्रकृति है, इस के अतिरिक्त मेरी जीवरूप दूसरी श्रेष्ठ मति है उसे तुम जानो, जोकि इस समस्त संसार को "धारण कररही है।।५।। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ६ हे अर्जुन! यह सव :प्राणी इन दोही-प्रकृतियों से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा.. तुम जानो । तथा इस सम्पूर्ण संसार का उत्पत्तिस्थान और नाशं करने वाला मैं हूं ॥६॥ मत्तापरतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोत सूत्रे मणिगणाइव॥७॥ हे धनन्जय मुझसे परे और कोई वस्तु नहीं ..

मापाठीवर-अ०७॥ १२१ M- है, जिस मकार सूत्र में मणिय पुदी रहती है, इसी मकार मुझ में यह सारा जगत् प्रोतं प्रोत होरहा है ॥ ७ ॥ रसोऽहमसुकौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः स्ने पौरुषं नृषु ॥८॥ हे कौन्तेय ! मैं परब्रह्म जलोंमें रसरूप, सूर्य चन्द्रमा में मभारूप, सब वेदों में 'ओंकार और आकाश में शब्द तथा मनुष्यों में पुरुषार्थरूप से विद्यमान हूँ॥८॥ पुण्योगन्धः पृथिव्यांचतेजश्वास्मिविभावसौ जीवन सर्वभूतेषु तपश्वास्मि तपस्विषु ॥६॥ पृथ्वी में पवित्र गन्धरूप, अग्निमें तेज और समस्त प्राणियों में तपरूप में ही हूँ ॥ ९ ॥ बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि प्रार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ हे पार्थ । तुम मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका सनाः १२२ m भगक्ट्रीता-1 तनवीन (उत्पत्ति का कारण ). नानो, और बुद्धिमानों में बुद्धिरूप तथा सेनस्वियों में तेज स्वरूप में ही हूं ॥१०॥ चलं बलवतामरिम कामरामदिवर्जितम् । धर्माविरुद्धोभूतेषु कामोऽस्मि भरतप।११ हे भरतर्पम ! बलवान् पुरुषों में काम और रागरहित, बल (पराक्रम) तथा सम्पूर्ण प्राणियों में धर्म के अनुकूल जो काम है, सो मैंही हूँ |११|| थेचैव सास्विकामावा राजसास्तामसाध्ये मत्तएवेति तान्यिाधि नत्वहं तेषु ते माथि१२ सतोगुण, तमोगुण और रजोगुण में उत्पन्न हुए जितने पदार्थ हैं. वे सब मुझही से उत्पन्न होते हैं, परन्तु हे अर्जुन ! मैं उम के आधीन मही हूँ, किन्तु वेही मेरे वि स्थित है ॥१२॥ त्रिभिर्गुणमयीवरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानातिमामेभ्यः परमव्ययम् भाषाटीका--अ.. १२३ . यह सारा संसार सात्विक आदि सीनों गुणों उत्पन्न हुए पदार्थोंसे मोहित होरहा है, अत- व इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को ही जानता ॥ १३ ॥ श्री ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया मेव ये प्रपद्यन्तमायामतांतरन्ति ते१४॥ है अर्जुन ! अद्भुत और त्रिगुणात्मक यह मेरी गया परम दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष अनन्य- वसे मेरा भजन करते हैं,बोहाइस दुस्तर मायाको रजाते हैं ॥१४॥ मां दुष्कृतिनोभूदाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। अययापहृतज्ञाना आसुरंभावमिश्रिताः१५ | दुराचारी, मूढ (अज्ञानी) और जिनका ज्ञान गया से दूर होगया है, तथा (हिंसा आदि) सुरीयभावको प्राप्त हुए अधम (नीच ) रूप मुझे नहीं पाते हैं ॥ १५ ॥ -~- भगृहीता... चतुर्विधा भजन्तेमां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन आत्तौजिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानीच भरतर्षभ हे भरतर्षभ अर्जुन ! आर्त (रोगादिसे पीडित जिज्ञासु(आत्मज्ञानकें जानने की इच्छा करनेवाला अर्थार्थी ( धनादिक भोगों की इच्छा करनेवाला तथा ज्ञानी ये चार प्रकार के पुण्यात्मा :पुरूप मेरा भजन करते हैं ।। १६ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकाक्तिर्विशिष्यते। प्रियोहि ज्ञानिनोत्यर्थसह.स च ममप्रिया१७ पूर्वोक्तं चारों प्रकार के भक्तों में से सदा मेरे बि. निष्ठा रखने वाला और केवल मेरी ही भक्ति करने हारा, ज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ है, क्योंकि मैं ज्ञान को अत्यन्त प्यारा हूं और ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्यारा है ॥१७॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानीत्वात्मैव मे मतम् । आंस्थितांसहियुक्तात्मामामेवानुत्तमांगति भाषानीका-अ.७॥ १२५ . यद्यपि उक्त चारों प्रकार के भक्त श्रेष्ठ हैं, तथापि ज्ञानी मेरा आत्मा ही है, क्योंकि वह ज्ञानी पुरुप चित्तकी वृत्तिको मेरे ही वि लगाके सबसे श्रेष्ठगति मुझही को मानकर मेरा आश्रय करता है ।। १८॥ बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।। ज्ञानी पुरुप सब संसारको वासुदेवरूप ही देखना२ अनेक जन्मों के पीछे मुझे माप्त होता है, परन्तु ऐसा महात्मा दुर्लभ है।। १९ ।। कालस्तैस्तीतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । तंत नियममास्थाय प्रकृत्यानियताः स्वया२० वासनाके अनुरूप गुणों करके - जिनका ज्ञान नाशको प्राप्त होगया है ऐसे पुरुप पूर्वजन्मके की- नुसार स्वभावसे.अनेकों नियमोंको ग्रहण करके अन्यान्य देवताओंका भजन करते हैं ॥ २० ॥ -

भगवद्रो
योयो यां यां तनुं भक्ताश्रद्धयार्चितुमिच्छति
तस्य तस्याचलां अद्धां तामेवविदधाम्यहम्।।
जो २ पुरुप जिस २ देवताकी मूतिमें भक्ति
करके श्रद्धासे पूजन करते हैं, मैं उन्हीं उन पुरुषोंकी
उन्हीं उन देवताओं में दृढ श्रद्धा करदेता हूं ॥२१
सतया अध्या युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लमतेचततःकामान्मयैव विहितान हितानं
उसी श्रद्धासे युक्त होकर वह पुरुष उन्हीं देव..
ताओं के आराधन करने की इच्छा करना है,गनदन्तर
मेरे दिये हुए मनोमिलपित मनोरथों को प्राप्त
होता है ।। २२॥
अन्तवतु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजोयान्ति मद्भक्तायान्ति मामपि
हे अर्जुन ! उन देवताओं की पूजासे उत्पन्न
हुआ जो फल अल्पवुद्धि पुरुषों को प्राप्त होता
!

गावातीला-१० ७॥
१२७
है वह नाशवान् है,देवताओं की पूजा करनेवाले
पुरुष देवताओं को माप्त होगे है, और मेरे भक्त
मुझेही माप्त होते है ।। २३ ।।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन मन्यन्ते मामधुन्डयः।
परं भावमजानन्तोरमाध्ययमहत्तमम् २४
अज्ञानी पुरुप मुझ
अगोनर को व्यक्त(मत्यक्ष
हुधा) मानते हैं ये अज्ञानी पुरुप सबसे श्रेष्ठ
और अविनाशी मेरे भावको नहीं जानने २४
नाहं प्रकाशः सर्वत्य योगनायासमाहतः।
मूढोऽयनाभिजानाति लोकोमामजमव्ययम्
योगमाया से श्रावृत हुआ मैं सबके अर्थ प्रकट
नहीं दीखता हूं, अतएव अज्ञानी पुरुप मुझ
अजन्मा और अविनाशी को नहीं मानते।।२५
-अर्थात् देवपूजन से उत्पन हुए स्यगादिक अनित्य हैं
क्योंकि-"क्षीणे पुण्य मयलोकं विशन्ति" ऐसा लिखा है।
और श्रीकृष्णका आराधन करने वालों को मुक्ति होजाती है।

१२८
भगवद्गीता
वेदाह समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मा तुवेदन कञ्चन।।
हे अर्जुन ! मैं भूत (वीतेहुए) भविष्यत् (होने
बाल) और वर्तमान इन तीनों काल के सम्पूर्ण
विपयों को जानता हूं, परन्तु मुझे कोई नहीं
जानना ॥ २६ ॥
इच्छादेपसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्च यान्ति परंतप २०
हे परंतप ! सृष्टि अर्थात्-स्थूल शरीर के उत्पन
होते ही इच्छा और देपसे उत्पन्न हुए मुहै,
दुःखादिकों से संपूर्ण माणी मोह को प्राप्त होजाते हैं।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्
ते द्वन्द्रमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढवता:२०
"जिन सुकृती पुरुषों के पाप नाशको प्राप्त हो
गये हैं, वे सुख दुःखादिक मोहसे मुक्त होकर
दृढ निश्चयसे मेरा भजन करते हैं ॥ २४ ॥

भाषाटीका-अ०७॥
१२९
जरामरणमोक्षाय नामाश्रित्य पतन्ति थे।
तंब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्मचाखिला
जो पुरुप जरा (वृद्धावस्था ) और मरणको
दूर करने के अर्थ मेरा श्राश्रय लेकर साधन
करते हैं, वे मनुष्य परवल, आत्मज्ञान और,
समस्तकमों को जानते है ॥ २९ ॥
साधिताधिदैवं सांसाधियतं च ये वितुः ।
प्रयाएकालेऽपिच सांते विदुर्शक्तचेतसः३०
इति श्रीमद्भगवद्गीतास्पानिपत्सु नानविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे शानविज्ञानयोगो नाम
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
जो अधिभूत, अधिदेव और अधियज्ञ, इन
करके सहित मेरा याराधन करते हैं, वे समाधि-
निष्ट पुरुष मरणकाल में भी मुझे नहीं भूलते,
अर्थात् उनके चित्तकी हात्त स्थिर रहती है, इसी
कारण उन्हें मेरा ध्यान बना रहता है।॥ ३० ॥
इतिश्री भापाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥ ४॥

११० भगवद्गीता। अष्टमोऽध्यायः अर्जुन उवाच । किं तवम किमध्यात्म किं कर्म पुरुषोत्तम 'अधिकृतं च किं प्रोत्तमधिदैवं किमुच्यते ? अर्जुनने पूछा कि- हे पुस्पोत्तम । वष्ठ ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म किसको कहते है ? कर्म क्या पदार्थ है ? और अधिभूत तथा अधिदेव किसको कहा जाता है। अधियाः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुमुदन । प्रयागाकालेचक्यज्ञयोऽसिनियतात्माशिः२ हे मध्वरे ! इस देश में अधिया कैसा और क्या है ? स्थिरचित्त वाले पुरुष मृत्युके समय ध्यापको किस प्रकार जानसक्त है ।। २ ।। श्रीभगवानुवाच । धक्षरं ब्रह्म परम स्वभावाऽध्यान्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरोविसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३॥ -- मायापा-१० ८॥ १११ श्रीभगवान वाले कि- जिसका किसी भी काल में विनाश (और विकार ) न हो वह परब्रह्म है, (जीवों के स्वरूप द्वारा प्रकट होनेवाले उनके) स्वभावको अध्यात्म कहते हैं , सम्पूर्ण जगन्की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाले ( यज्ञादिक ) आचरण की कर्मसंज्ञा है ॥३॥ अधिभूतं क्षरोभायः पुरुपश्चाधिदैवतम् । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां घर।। ४। हे शरीरधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! नाशवान पदार्थों को अधिभून कहत है, पुरुष (मर्थात्- सब देवताओं के प्रात्मस्वरूर हिरण्यगर्भ) को अधिदेवत्त कहते हैं (इन्द्र आदिक देशों में विद्य- मान् , यज्ञों में आराधन करने के योग्य ) अधियज्ञ हूँ॥ ४ ॥ अन्तकालेधमामेघ स्नरन्मुक्त्या कलेवर छ । या प्रयाति समझावं याति नास्त्यत्र संशयः १३२ भगवनीता। जो पुरुष अतके समय मेरा ध्यान करता २ शरीर को त्यागता है, वह पुरुष निःसन्दह मेरे ही स्वरूप को माप्त होजाता है ॥ ५ ॥ थं वं वापि स्मरन् साचं त्यजत्यन्तेकलेवरम् तंतमेवैतिकौन्तेय सदातद्धावभावितः ६ हे कुन्ती के पुत्र ! अन्त के समय जिस जिस पदार्थों को स्मरण करता हुआ शरीरको त्या. गता है, पदार्थ की भावना करने के कारण वह उसी २ भात्रको प्राप्त होता है ॥ ६॥ तस्मात् सर्वेषु कालेषु भामनुस्मर युध्य च । मर्पितमनोबुद्धिर्मामेवष्यस्यसंशयम् ॥७॥ इसकारण हे अर्जुन ! सदा मेरे वि चित्त और बुद्धिको लगाकर युद्ध करने के लिये प्रवृत्त रहो तो तुम निश्चय मुझे ही प्राप्त होओगे ॥७॥ अभ्यासयोगयुशन घेतमा लान्यगामिला । परसंधुरुषं दिव्य यातिपार्थासुचिन्तयन् ॥८॥ हे पार्थ ? अभ्यास के साधनों के द्वारा एका- मापारीका. अ०८। १२३ ग्रता को प्राप्त हुए अतएव सब ओर से हटेहुए चित्त से मेरा चिन्तबन करता हुआ पुरुप दिव्य और परमपुरुप परमात्मा को प्राप्त होता है ८ कविं पुराणमनुशासितार- मनोरणीयांसनुस्मरेद्यः ॥ सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप- मादित्यवर्ण तमसःपरस्तात् ॥ ६॥ प्रयाणकाले मनसा. घलेन, भक्त्या युक्तोयोगवलेन चैव ॥ भ्रुवोर्मध्ये प्राण्मावेश्य सम्यक, सतं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥१०॥ भक्ति और योगवल करके युक्त हुआ जो पुरुप प्राण त्यागने के समय प्राणों को दोनों भृकुटियों के मध्यमें भली प्रकार प्रवेश करके सर्वज्ञ, अनादि, सम्पूर्ण जगत् के शिक्षक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सम्पूर्ण माणीमात्र के धारण और १३४ भगवद्गीता . पोपण करने वाले, अचिन्त्य रूपवान् , और सूर्य की समान प्रकाशवान् तथा तमोगुण से पृथक् परब्रह्म ( परमेश्वर ) का स्मरण करता है, वह परब्रह्म को माप्त होता है ॥ ९॥ १० ॥ यदक्षरं वेदविदोबदन्ति, विशन्ति यद्यतयोवीतरागाः॥ यदिच्छन्तोब्रह्मचर्य चरन्ति, तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥१३॥ वेदको जाननेवाले पुरुष जिस (पदार्थ ) अविनाशी कहते हैं, रागरहित सन्यासी जि प्रविष्ट होते हैं, और ब्रह्मचारी जिसके प्राप्त की कामना करके ब्रह्मचर्य का आचरण करते उस पदका संक्षेप से मैं तुम्हारे प्रति करता हूं ॥ ११॥ सर्वद्वाराणि संयम्य मनोहृदि निरुध्य च मून्याधायात्मनः भाषाटीका-०८॥ १३५ मित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । :प्रयातित्यजन्देहंसयाति परमां गतिम् ।। जो ज्ञानी पुरुप सम्पूर्ण इन्द्रियों के द्वारों को रोककर मनको हृदयमें निश्चल (स्थिर ) करके अपने प्राणवायु को मस्तक में लेजाकर योग- गरण करता, मेरा स्मरण करता हुवा,विकार- हित,ब्रह्मरूप "नों" इस एक अक्षर को उच्चा- ण करके देहको . त्यागता है, वह परमगति मोक्ष)को प्राप्त होजाता है।॥१२॥ १३ ॥ मनन्यवेताः सततं योमांस्मरति नित्यशः। स्याहं सुलतःपार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥ हे पार्थ ! प्रति दिन चित्तकी अनन्यवृत्ति से जो योगी) मेरा स्मरण करता है, उस निरन्तर १-मूर्धा शब्दका ब्रह्मरन्ध्र' भी अर्थ है, क्योंकि अथर्व- में हृदयन्यापार के अर्थ जो १०१ नाडिये हैं उनमें से एक ही ब्रह्मरन्ध्र को गई है, उस नाड़ी के द्वारा प्राणवाय ऊपरंकोच मुक्तिको प्राप्त होता है। M भगवद्गीता। योगाभ्यासी योगी पुरुषको मैं सहज ही में प्राप्त होजाता हूं ॥१४॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । नामुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गत मुझे प्राप्त होकर परमसिद्धि को माप्त हुए महात्म पुरुष दुःखके स्थानरूप और अनित्य ऐसा जो जन्म तिसको प्राप्त नहीं होते, अर्यान-उनकी मुक्ति होजाती है ।। १५ ।। आब्रह्मभुवनालोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ! मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते । हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत जितने लोक है, वे सब उत्पत्ति तथा नाशसहित हैं (अर्थात्-ब्रह्म लोक पर्यंत सम्पूर्ण लोकों में रहनेवाले प्राणियों का जन्म मरण होता है, परन्तु हे कुन्तीनन्दन! मुझे प्राप्त होकर फिर जन्म नहीं होता ॥ १६ ॥ सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रि युगसहस्रांतां तेऽहोरात्रविदोजना) भाषाटीका-अ०८॥ हे अर्जुन!(सन्युग त्रेता-द्वापर- कलियुग इन) हजार युगोंका ब्रह्माजीका एक दिन होता है, तथा हजार युगकी जो ब्रह्माजीका एक रात्री होती है उसको जो पुरुष जानते हैं, वास्तव में वेही पुरुप दिन और रात्री के जानने वाले हैं ॥ १७ ॥ अव्यक्तादयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। राभ्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके १८ ब्रह्माजी के दिनमारम्भ में अव्यक्त (अर्थात् अप्रकट जो ब्रह्माजी का स्वरूप तिस से स्थावर जंगमादिक सम्पूर्ण व्यक्तियें उत्पन्न होती हैं और रात्री के प्रारम्भ में सब व्यक्तिये उन्हीं अव्यक्त में लय होजाती हैं ॥१८॥ भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। राज्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवन्त्यहरागमे १९ वहीं यह सम्पूर्ण माणियों का समूह वारम्वार (दिन के मारम्भ में) उत्पन्न होकर (रात्र १३८ भगवद्गीता। में ) माशको प्राप्त होजाता है,कर्मोके परवंश यह सब जीव दिन प्रारम्भ में उत्पन्न होते और रात्री के आंगम में नाशको माप्त होजाते हैं।। परस्तस्मात्तुभावोन्योन्गोव्यक्तात्सनातन यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ परन्तु हे अर्जुन | उस व्यक्त से परे सदा रहनेवाला एक व्यक्त पदार्थ है, जो सम्पूर्ण प्रा. णियों के नाश होजानपर भीनाशको माप्त नहीं होत अव्यक्तोऽक्षरइत्युक्तस्तमाहुः परमांगतिम यं प्राप्य न निवर्तन्ते तधाम परमं मम॥२॥ हे अर्जुन ! अव्यक्त ही को अक्षर (अवि- कारी) कहा गया है और उसीको परमगति कहते हैं, जिसको प्राप्त होकर फिर कोई प्राणी नही लौटना वही मेरा सबसे श्रेष्ठ धाम है ।।२१।। पुरुषःस परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिद ततम हेपा जिसके भीतर सम्पूर्ण प्राणी स्थिन हैं औ भापाटीका-१००! ११९ जिसने इस सम्पूर्ण संसारको व्याप्त कर रक्खा है, वह परमपुरुप अनन्यभक्तिके द्वारा माप्त होसक्ता है यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयातायान्ति त कालं वक्ष्यामि भरतर्पः ।। हे भरतर्षभ ! जिस समय शरीर त्यागने से योगीजनों का पुनर्जन्म होता है, और जिस समय शरीर त्यागने से योगीपुरुषोंका पुनर्जन्म नहीं होता है, उन दोनों समयों का मैं तुमसे वर्णन करता हूं ।। २३ ॥ अग्निज्योतिरह शुक्लापएमासा उत्तरायणम् तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदोजना।। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, और उत्तरी- यण-सूर्य के छ महीने इनमें प्राणीका परित्याग करके जानेवाले ब्रमज्ञानी पुरुप ब्रह्मही को प्राप्त होते हैं ॥ २४ ॥ १ मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, और मिथुन छन प्रशियों के सूर्य उत्तरायण कहाते हैं।

१४०
भगवद्गीता ।
घूमोरात्रिस्तथाकृष्ण षण्मासादक्षिणायनम
तत्र चान्द्रमसंज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते।।
धूम, रात्री, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन-सूर्य
के छ महीने इनके मध्य में प्राणों का परित्याग
करने वाले योगीपुरुषः चन्द्रसम्बन्धी तेज
(अर्थात्-स्वर्गादि लोकों) को माप्त होते हैं, और
(पुण्य भोगने के अनन्तर)फिर लौट आते हैं ।
शुक्लकृष्णे गती येते जगतः शाश्वते मते
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः २०
शुक्ल (देवयान ) और कृष्ण (पित्यान)
संसारकी यह दोनोंगति सनातन से मानी गई हैं,
इनमें से एक (शुक्ल ) गति से चलने वाले
योगियों का तो पुनर्जन्म नहीं होता और दूसरी
(कृष्ण) गतिसे चलने वालों के फिर जन्म
धारण करना पड़ता है ।। २६ ॥
१-कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धन इन राशिय
के सूर्य दक्षिणायन फझते हैं ।

मापारीफा-अ०८॥ १४ी नेते तीमार्थ जानयोगी मुखाति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तोमवार्जुन २७ हे पार्थ ! दोनों गतियोंको जाननेवाला कोई भी योगी पुरुष मोहको प्राप्त नहीं होता, इस कारण हे अर्जुन! तुम सब कालमें योग से युक्तरहो ( अर्थात् योगी वनो)।॥ २७ ॥ वेदेषु यज्ञेषुतपास्नु चैव, दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।। अत्येति तत्सर्वभिदाविदित्वा, योगी परं स्थानमुपैतिचायम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाने श्रीकृष्णार्जुनसम्वादेऽक्षरपरब्रह्मयोगो- नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥ वेदाभ्यास करने से, यज्ञ और तप करने से, तथा दान देने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है, मेरे कहे हुए इस सत्वको जानने वाला पुरुष उन सब १४२ भगवद्वीता। पुण्यों का उल्लंघन करके परमोत्तम आद्यस्थान (ब्रह्मको) प्राप्त होता है ॥२८॥ इति श्रीमापारीकायामटमोऽध्यायः॥८॥ नवमोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । इद तुते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्पनसूयवे । ज्ञानविज्ञानसहितयज्ज्ञात्वामोक्ष्यसेशुभात् श्रीभगवान् बोले कि- हे अर्जुन ! तुम्हारे विर्षे अवज्ञावुद्धि ( किसीसे असूया करना) नहीं है, अतएव अत्यन्त गोपनीय शास्त्रज्ञानसहित अनुभवज्ञानका तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार के वन्धन ) से मुक्त होजाओगे ॥१॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धयं सुखं कर्तुमव्ययम् २ भाषाटीका-अं. '१४३ यह आत्मज्ञान समस्त विद्याओं का राजा और गुप्त रखने के योग्य, सम्पूर्ण वस्तुओं में श्रेष्ठ अत्यन्त पवित्र तथा सर्वोत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानरूप फलका देनेवाला, धर्मका साधक, सुखपूर्वक आचरण करने के योग्य और नाशरहित है॥२॥ अश्रदधानाः पुरुषाधर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवमनि३ हे परन्तप ! इस परमधर्ममें श्रद्धा न करने वाले पुरुष मुझको प्राप्त न होकर मरण (अर्थात् जन्म, मरण) सहित संसारके मार्ग में फिर लौट आते हैं ॥ ३ ॥ भया ततमिदं सर्व जगदव्यक्तमार्सना । मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः। मैंने अव्यक्तरूप से इस संसार को व्याप्त कर रक्खा है, इसकारण सम्पूर्ण पाणी मेरे श्राधीन हैं और मैं उनके आधीन नहीं हूं ॥४॥ .

१४४ भगवडीता नव मत्स्यानि तानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थ्योममात्मा भूतभावनः ५ हे अर्जुन ! मेरे योग के प्रभावको देखा कि वे पाणी मेरे विर्षे नहीं है, यद्यपि मैं सम्पूर्ण प्राणियों का पालन पोपण करने वाला हूं, तथापि मेरा आत्मा सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित नहीं है ।।५।। यथाकाशस्थितोनित्यं वाशुलवत्रगोमहान् तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय तुम ऐसा जानो कि जैस आकाश में स्थित हुआ अत्यन्त वेगवाला वायु नित्य सर्वत्र गमन करता है (अर्थात् आकाश में विचरता हुआ वायु शाकाश से भिन्न है। ऐसे ही संपूर्ण माणी मेरे विकें स्थित हैं ( अर्थात् मेरे विपें स्थित हो. कर भी मुझ से अलग हैं)॥६॥ सर्वभूतानिकान्तये प्रकृतियान्तिमामिकाम् ऋल्पक्षयेपुनस्तानि कल्पादाविसृजाम्यहम्

मापाटीका-6101
१४५
कौनोय! कल्पके अन्त में सत्र प्राणी मेरी
मकाने को प्राप्त होने हैं, और कल्पके पारम्भमें
फिर मैं उनको उत्पन्न करता हूँ ॥ ७ ॥
प्रकृति स्वासवष्टस्य विजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिनं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ८
हे अर्जुन ! मैं अपनी मायारूप प्रकृतिका अव-
लम्बन करके स्वभाव से अविद्या के वशीभूत
दुग सम्पूर्ण माणियों को वारंवार उत्पन्न करता हूं।
नाचमातानि कर्माणि निवशन्ति धनंजय।
उदासीनचदालीनमसक्तं तेच कर्मसु ।।
परन्तु हे धनंजय ! वे कर्म मुझे क्न्धन में नहीं
ढालसक्त, क्योंकि मैं उन कम्मों के विर्षे
श्रासक्त नहीं हूं, केवल उदासीन की समान उन
कम्मों में स्थित रहता हूं ॥६॥
सयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगविपरिवर्तते ॥१०॥

१४६
भगवद्गीता।
प्रकृति जो है वह सब के साक्षीरूप मुभ
परमेश्वर का आश्रय करके सम्पूर्ण चराचरको
उत्पन्न करती है, हे कौन्तेय ! इसीकारण यह
संसार वारम्वार जन्म लेता और मृत्युको प्राप्त
होता है ॥ १०॥
अवजानन्ति मां मूढी मानुषींतनुमाश्रित
परंभावमजानन्तोसम भूतमहेश्वरम् ॥११॥
अज्ञानी पुरुप सम्पूर्ण प्राणियोंके ईश्वरस्वरूप
मेरे स्वरूप (प्रभाव ) को न जानकर मनुष्यदेह
धारण करने पर मेरी अवज्ञा करते हैं ॥११॥
मोघाशामोधकर्माणो मोघज्ञानाविचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृति मोहनींश्रिताः१:
वुद्धिको मोहित करनेवाली राक्षसी और
आसुरी प्रकृतिका आश्रय करनेसे उन पुरुपोंके
अभिलाषा, कर्म और ज्ञान निष्फल तथा वुद्धि-
विक्षिप्त हैं ॥ १२॥

भाषाटीका-१०९। १४७ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीप्रकृतिमाश्रिताः भजन्त्यनन्यमनसोजात्वा भूतादिमव्ययम् हे पार्थ ! देवस्वभाव को प्राप्तहुए महात्मा लोग चित्त को एकाग्र करके मुझको सम्पूर्ण प्राणियों का आदिकारण और अविनाशी जानकर मेरा भजन करते हैं॥ १३ ॥ सततं कीर्तयन्तोमा यजन्तश्च दृढव्रताः । नमस्यन्तश्चमां भक्त्या नित्ययुक्तांउपासते।। सदा मेराही कीर्तन और पूजन करते तथा मुझेही नमस्कार करते हुए दृढभक्तिसे चित्तको एकाग्र करके नित्य मेरीही उपासना करते हैं१४ जानयजेन चाप्यन्ये यजन्तोमामुपासते। एकत्वन पृथक्त्वेन वहुधा विश्वतोमुखम् १५ कोई २ ज्ञानी पुरुप ज्ञानरूप यज्ञके द्वारा भजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, कोई ज्ञानी मुझ में और अपने में अभेद देखते हैं और कोईर १४८ भगवद्गीता । . भिन्नभाव देखकर बहुत प्रकारसे संसार के स्वामी रूप मेरी उपासना करते हैं।। १५ ।। अहं क्रतुरहं यजः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमाग्निरहं हुतम् १६ वेदोक्त (अग्निष्टोमादिक ) यज्ञ, स्मात( पंच- यज्ञादिक ) यज्ञ, स्वधा (पितृयज्ञ) और औषध यह मैं ही हूं, तथा मन्त्र, घृत, यज्ञाग्नि और हव. नीय द्रव्य यह सब मैं ही हूं ॥ १६ ॥ पिताहमस्य जगतोमाताधाता पितामहाँ । वेध पवित्रमोङ्कारक्सामयजुरेव च।॥१७॥ मैं ही इस अखिल संसारका पिता, माता, पालन-पोपणको, और पितामह हूं तथा. जानने के योग्य ( वस्तु) पवित्र, ॐकार स्वरूप, ऋ. यजुः और सामवेदभी मैं ही हूं ॥ १७ ॥ गतिभती प्रभुःसाक्षीनिवासाशरणंसुदृत्। प्रभवःप्रलया स्थान निघालं पीज़मव्ययम् ।।

भाषाढीका-म..!
संसारकी गति, पालन करने वाला, प्रभु
(शिक्षक), साक्षी (शुभाशुभ को देखनेवाला)
निवासस्थान, शरण का देनेवाला (रक्षक)
और मुहृद्, उत्पन्न और नाश करने वाला
आधार, निधान (मलयस्थान) तथा अविनाशी
वीज भी मैं ही हूं ॥ १८ ॥
तपाम्यहमहं वर्षे निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमजुन॥१६॥
है अर्जुन ! आदित्यरूप से मैं ही तपता हूं, मैं
ही जलको खीचता और नरसाता हूं, अमृत
(जीवन ) और मृत्यु भी मैं ही हूं, तथा मैं ही
सत् ( विद्यमान् ) और असत् (अविद्यमान्)हूं।
विद्या मां सोमपाः पूतपापा-
यहरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मनन्ति दिव्यां दिवि देवभोगान् ॥ २०॥

१५० . भगवाहोता। अक्, यजा, साम तीन वेदों के अनुष्ठानमें तत्पर, ( यज्ञशेष ) सोमका पान. करने वाले निप्पाप पुरुष यज्ञों के द्वारा मेरा पूजन करके स्वर्ग प्राप्ति की मार्थना करते हैं, और वे पवित्र इन्द्रलोक (स्वर्ग) को प्राप्त होकर स्वर्गमें देवताओं के दिव्य भोगों को मोगतेहे ॥ २०॥ तेत भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं, क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक विशन्ति । एवं प्रयी धर्ममनुप्रपन्ना- गतागत कामकामा लभन्ते ॥२१॥ परन्तु फिर वे पुरुप अनेक प्रकार के स्वर्गीय- सुखाको भोगकर पुण्यक्षीण होजानेपर मर्त्यलोक को प्राप्त होते हैं । स्वर्गादि की प्राप्तिरूप कामना से तीनों वेदोंके अनुसार अनुष्ठान करने वाले पुरुष वारम्बार इस लोक और स्वर्गलोक को पाते जाते हैं ।। २१॥

भाषाटीका-०९। १५१ अनन्याश्चिन्तयन्तोमा येजनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् चित्तकी वृत्तिको चारों ओरसे हटाकर मेरा ही चिन्तयन करते हुए जो पुरुष मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य योगाभ्यासी पुरुषों को योग, क्षेम करता हूं ॥ २२ ॥ येऽप्यन्यदेवताक्षरतायजन्ते अंधयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्यकम्।। हे कौन्तेय ! जो पुरुष यदायुक्त होकर अन्यान्य देवनामों की भक्तिसे उपासना करते हैं, परन्तु भी अनानसे मेरीही उपासना करते हैं ॥२३॥ १-अप्राप्त वस्तु के लाभको योग कहते हैं। .१-प्राप्त वस्तु का पालन करना क्षेम कहाता है। ३-अर्थात ने यह नहीं जानते कि सब देवताभों में परमेश्वर ही की सत्ता है,अतएव सव देवताओं की पूनासे परमेश्वर ही की पूषा होती, है ऐसा न समझनेही के कारण उनकी मुक्ति भी नहीं होती।

भगवीता।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
नतु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते
सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूं,
परन्तु वे मुझे(यज्ञोंका भोक्ता और फल देनेवाला)
नहीं जानते, इसीकारण जन्म, मरण को प्राप्त
होते हैं ॥ २४॥
यान्ति देवव्रता देवान पितृन् यान्तिपितृव्रताः
भूतानियान्तिभृतज्यायान्तिमद्याजिनोपिमाम्
देवताओं की उपासना करने वाले देवलोकों
को, पितरों की भक्ति करने वाले पितृलोकों को,
और भूतोंकी आराधना करने वाले भूतलोकों को
प्राप्त होते हैं, ऐसे ही मेरा आराधन करने वाले
पुरुष मुझे प्राप्त होते हैं।॥ २५ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयंयोमे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपसृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६॥

भाषाटीका-भ. ९ हे अर्जुन ! जो शुद्धचिस होकर पत्र,फल, फूल और जल,भक्ति से मेरे अर्पण करता है, उस (भक्ति से दियेहुए को)मैं भी प्रसन्न होकर ग्रहण करता हूं।॥ २६ ॥ यत्करोषि यदनालियज्जुहोषि ददासियत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् २७ हे कौन्तेय ! तुम जो (कार्य) करते हो, जो भोजन करते हो, जो आहुति देते हो,ऐसेही जो दान देते और तप करते हो, वह सब मेरे अर्पण करदो(अर्थात् सचकों को निष्काम होके करो)। शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मवन्धनः । संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तोमामुपैष्यसि है.अर्जुन ! इस प्रकार कर्मरूप. बन्धन के शुभ और अशुभ फलों से मुक्त होजाओगे, और . सम्पूर्ण कर्मों को मेरे विषै अर्पण करके एकाग्र- चित्त होके जीवन्मुक्त होकर मुझे प्राप्त होोने ॥

१५४ भगवदीता : समोऽहं सर्वभूतेषुन मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्तितु मां भक्त्यामयिते तेषु चाप्यहम् मैं सब प्राणियों में समान ई, मेरा प्यारा और शत्रु कोई नहीं है, जो पुरुप भक्ति से मेरा भजन करते हैं, उन के विपैं मैं और मुझ में वे विद्यमान् है ।। २९॥ अपि चेत्सुदुराचारोभजतेमालन्यमान । साधुरेव समन्तव्यः सम्यग्व्यवसितोहि सः।। जो दुराचारी भी अनन्यभाष ले मेरा भजन करता है, उसे साधु (उत्तम.) ही समझना. चाहिये कारण कि यह सन्मार्ग में प्रवृत्त हो रहा है ॥२०॥ क्षमं भवतिधर्मात्मा तम्बाच्छान्ति निगच्छति कौन्तेय प्रतिजानीहिन मे भक्त प्रणश्यति बह दुराचारी शीघ्रही धर्मात्मा होजाता है, (और धर्मनिष्ट होने के कारण) सदा शान्तिही भापायका-अ०.९। को प्राप्त होता है, हे कौन्तेय ! तुम यह निश्चय जानो कि-मेरा भक्त नाशको प्राप्त नहीं होता ३१ मांहि पार्य व्यपाश्रित्य येपिस्युः पापयोनयः स्त्रियोवैश्यास्तथाशुद्रास्तेपियान्तिपरांगतिम् हे अर्जुन ! जबकि-मेरा प्राश्रय लेकर नीच- कुल में उत्पन्न हुए, स्त्रिय, वैश्य तथा शूद्र भी परम- गात (मोक्ष) को प्राप्त होजाते हैं ।। ३ ।। किं. नाह्मणाः पुण्यातक्ताराजर्षयस्तथा । अनित्यमसुखलोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् तो फिर पवित्रकर्म करने वाले ब्राह्मण, मेरे भक्त तथा राजर्षियों के लिये तो कहना ही क्या (अर्थात् उनका तो अवश्य ही मोक्ष होता है। इस कारण हे अर्जुन! सुखरहित नाशवान् इस संसार में आकर तुम मेरा भजन करो ॥ ३३॥ - १५६ -भगातारा मन्मनाभवमलोमयाजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ।। इति श्रीमद्भगवद्गीतासुपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायायोगशारे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुय- योगांनामनवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ हे अर्जुन ! अपने मनको मेरे विर्षे लगाओ, मेरेही भक्त वनो, मेरा ही भजन पूजन करो, और मुझे ही नमस्कार करो, इसप्रकार मेरे विर्षे चित्त लगाकर मेरा ही श्राश्रय लेके मुझको प्राप्त होनोगे ॥ ३४ ॥ इति श्रीभापाटीकायां नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ दशमोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । भूय एव महावाहो शृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहंप्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया । .. . 1.

मापाटीका-अ०१०१
१५७
श्रीभगवान् वोले कि-
हे महाबाहो ! अर्जुन ! फिरभी तुम मेरे परम
(परमात्मतत्वनिष्ठ ) वचनको सुनो, अत्यन्त
नीति करने वाले तुमसे में हितकी कामना करके,
कहता हूँ ॥ १॥
ल मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिहिं देवानां महर्षीणां च सर्वशः २
मेरे जन्मको देवसमुदाय और महर्षिगण
भी नहीं जानते क्योंकि मैं सम्पूर्ण देवता और
महर्षियोंका आदिकारण हूं ॥ २ ॥
घो मामजमनादि च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असंहः स बापु लीपापः प्रमुच्यते॥३॥
जो पुरुप मुझको अजन्मा,अनादि और समस्त
लोकांका महश्वर जानता है वही नर सब
मनुष्यों में मोहरहित होकर सब पापोंसे मुक्त
होजाता है ॥ ३॥

"१५८
भगवादीता।
चुहिनिमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः |
नुवंदुःखं भवोभावोसयं चाभयमेव च ।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपोदानं यशोऽयशः
भवन्ति भावाभूतानां मत्तएव पृथग्विधाः५
हेअर्जुन!बुद्धि,ज्ञान,मोहका अभाव,क्षमा, सत्य
दम,शम, सुख दुःख, उत्पत्ति,विनाश,भय और
अभय, अहिंसा, सवको समान देखना, सन्तोष
तप, दान, यश और अपयश, प्राणियों के यई
भिन्न २ प्रकार के भाव मुझसेही उत्पन्न होते हैं।।
महर्पयः सप्स पूर्व चत्वारोमनवस्तथा
मायामानसाजाता येयां लोकामाःप्रजा
भेरे वि4 चित्तकी वृत्तिको लगाने वाले माची.
सप्तैपि और चार मनु यह सब मेरे मन से उत्५
१-बाह्य इन्द्रियों की शान्तिको दम और अन्तःकरण की।
को श्रम कहते हैं।
२-भृगु, मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, ऋतु,और वसियुजी
३-सनकादिक ।

भावासा-80901 हुए हैं, जिनकी सन्मान यह सब मजा है ॥६॥ एतां विभूति योगं च मम योवेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन गुज्यते नात्र संशयः७ ; मेरी इस विभूति ( अर्थान्-ईश्वरत्व सूचक रेश्चर्य) को और योग (चातुर्य ) को जो पुरुप पथावन जानता है, वह निःसन्देह निश्चल योग 'हा मास होजाता है।॥७॥ हाई सदस्य प्रभवोमत्त सर्व प्रवर्तते । इति सन्याभवन्ते मां बधामावसमन्विताः।। में संपूर्ण जगत् का उत्पन्न करनेवाला हूं, संपूर्ण चर अचरको मत्ति मुझही से होती है इस कार मेरे ऐश्वर्य को मानकर भेमसहित ज्ञानी शुरूप मेरा भजन करते हैं ॥४॥ पचित्ता सद्गतमागा बोधयन्तः परस्परम् । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च चित्त और प्राणांको मेरे ही विपै लगाकर

भगवीता।
परस्पर मेरा ही विचार करते हुए सज्जन पुरुष
मेरा ही कीर्तन करके नित्यं सन्तुष्ट होते और
रमण करते हैं ॥९॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते२०
जो पुरुष सदायोगमें चित्त लगाकर प्रीतिपूर्वक
मेरा भजन करते हैं, उनको मैं वुद्धिझप ऐसा
श्रेष्ट साधन देता हूं, कि-जिसके द्वारा (वेदान्त-
विचार करके) वे मुझ को प्राप्त होजाते हैं १०
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।.
नाशयास्यात्मभावस्योज्ञानदीपेन शास्वता।।
उन्ही भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके निमित्त
मैं वुद्धिमें स्थित हुआ उनके अज्ञानजनित अंध-
कारको प्रकाशमान् ज्ञानरूप दीपकसे . नाश
कर देता हूं ॥ ११ ॥

मापाटीका-अ.१०॥
अर्जुन उवाच ।
परब्रह्म परंधाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुपं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।१२
आहुस्त्वामृपयः सर्वे देवर्पिनारदस्तया ।
असितोदेवलोव्यासः स्वयं चैव ब्रवीपि मे ।।
अर्जुनने कहा कि-
तुम परब्रह्म, परमधाम (तेजःस्वरूप ) और
परमपवित्र हो, देवर्षि नारद, असित,देवल और
व्यासजी आदि संपूर्ण ऋपि अापको नित्य,
दिव्य, आदिदेव, जन्मदिन और सर्वव्यापक
पुरुष कहते हैं, और ऐसाही आप स्वयं भी
कहते हैं ।। १२ ।। १३ ।।
सर्वमेततं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
नहिते भगवन्व्यक्तिं.विदुर्दैवान दानवा:१४
. हे केशव ! तुम जो कुछभी मुझसे. कहने हो

भगवद्गीता। मैं इस सबको सत्य मानता हूं, हे भगवन् आपके स्वरूपको देवता और दानव कोई भी नही जानते ॥ १४ ॥ स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम !.. भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१५॥ हे पुरुषोत्तम ! हे सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पन्न कर्ता । हे सब प्राणियोंके ईश्वर ! हे देवाधिदेव! हे जगन्नाथ ! आपही अपने आत्माको आत्म- ज्ञानके द्वारा देखते हैं ॥ १५ ॥ धक्तुमहस्यशेषेण दिव्याह्यात्मविभूतयः ।। पाभिर्विभूतिभिलॊकानिमास्त्वंव्याप्यतिष्ठसि हे नाथ ! अपनी संपूर्ण दिव्यविभूतियों को तुम, मेरे माति वर्णन करो, जिन विभूतियों के द्वारा संपूर्ण लोकोंको व्यासकरके तुम स्थिर होरहे हो ॥ १६ ॥ कथं विद्यामहं योगिस्त्वांसदा परिचिन्तयन् केषु केषु च भावेघु चिन्त्योऽसि भगवन्मया१५ - 1. भाषाटीका-अ० २। इस अवश्य होनेवाली वातमें तुम्हें शोच करना योग्य नहीं ।। २७॥ अव्यक्तादीनिभूतानि व्यक्तमध्यानिभारत अव्यक्तनिधनान्येवतत्रकापरिदेवना॥२८॥ हे भारत ! यह सब पाणी जन्म लेने से प्रथम अव्यक्त थे (अर्थात् इनका नाम रूप कुछ भी नहीं था) और मृत्यु होजाने के पीछे भी अव्यक्तही होजायंगे, केवल जन्म और मरण के मध्यही में व्यक्त हुए से दीखते हैं अतएव इनके लिये विलाप करना वृथा है ॥ २८॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः । आश्चर्य वच्चैनमन्यः भृणोति- श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ २९ ॥ कोई मनुष्य तो इस आत्माको आश्चर्यकी समान.

भगवद्गीता। देखा है, नथा अन्य पुरुष आत्माको आश्चर्यकी स- मान वर्णन करता है, एवं अन्य पुरुप इसको.पा- श्वर्यकी समान श्रवण करताहै परंतु देखकर,कह कर और सुनकर भी इस आत्मा को कोई जान नहीं सक्ता ॥ २९ ॥ देही नित्यमबध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानिनत्वंशोचिंतुमर्हसि हे भारत ! यहात्मा नित्य (अर्थात् सदा- वर्तमान ) और अवध्य ( मारेजाने के अयोग्य) होकर समस्त प्राणियों के शरीरमें वर्तमान हारहा है, इस कारण तुझे किसीभी प्राणी के लिये सोच करना उचित नहीं ॥ ३०॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धाद्धियुद्धाच्छयोऽन्यत्क्षत्रियस्वनविद्यते हे अर्जुन ! तुम अपने क्षत्रिय धर्म को देखकर भाषाटीका-अ० २ कमायमान होने के योग्य नहीं हो, क्योंकि क्षत्रियों के लिये धर्मयुद्ध के अतिरिक्त और कुछ कल्याण- कारी नहीं अर्थान् क्षत्रियों का कल्याण धर्मयुद्ध ही से होता है ।। ५१ ॥ यदृच्छ्याचोपपन्नं स्वर्गमारमपावृतम् । सुविनाक्षत्रियाःपाल भंतेयुद्धमीदृशम् ।। हे पार्थ स्वयंही माशहुर और खुलेहुए स्वर्ग के द्वार स्वरूप ऐसे युद्ध में लड़कर क्षत्रिय लोग सुखको माप्त होते हैं ॥ २२ ॥ अथ चेचमिमं धभ्यसंग्राम न करिष्यासि । ततःस्वधर्मकीतच हित्वापापमवाप्स्यास हे अर्जुन ! अब जो तू धर्मके अनुकूल (माप्तहुए) इस युद्धको नहीं करेगा तो अपने धर्म और कीर्ति इन दोनोंको खोकर केवल पापही को भोगेगा ॥१३॥ अकीर्तिचापिभूतानिकथयिष्यतितेऽव्ययाम् भगवद्गीता । सम्भाषितस्यचाकीर्तिमरणादतिरिच्यते३४ और सब लोग बहुन दिनातक तुम्हारे अपयश को कहते रहेंगे, तथा प्रतिष्टित पुरुपके लिये वह अपयश मरणसभी अधिक है ॥ ३४ ॥ भयाद्रणादुपरतं मस्यते त्वांमहारथाः । येपांचत्वंबहुमतोभूत्वायास्यसिलाघवम् ।। हे अर्जुन ! भय के कारण युद्ध करने से तुझ विमुख हुपको यह महारथी जोकि-तुझे बड़ा (वली) समझ रहे हैं, उनकी दृष्टि में तू हलका होजायगा ।। ३५ ॥ अवाच्यवादांश्च वहन्वदिष्यन्तितवाहिताः निन्दन्तस्तवसामर्थ्यततोदुःखतरंतुकिम्३५ और तुम्हारे शत्रुभी तुम्हारी शक्तिकी निन्दा करके वहुत से कुवाच्य भी कहेंगे, भला इससे अधिक १-सम्भावित कहूँ अपयश लाहू । 'मरण कोर्टिसम दारुण दाट ।

भाषाटीका-०२। तुम्हारे लिये और क्या दुःख होगा ? ॥ ३६ ।। हतोवाप्राप्स्यसिस्वर्गजित्वावाभोक्ष्यसेमहीम् तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ३७ इस युद्ध में यदि मारेजाओगे तो स्वर्गकी प्राप्ति होगी और याद जयको माप्त होजायोगे तो पृथिवी के ( राज्यसुख को भोगोगे ) इस कारण हे कुंति- नन्दन ! युद्ध करने के लिये निश्चय करके उठो३७ मुग्वदुःखेसमेकृत्वा लाभालाभौजयाजयो ततो युद्धाय युज्यस्व नैवंपापमवाप्स्यसि हे अर्जुन ! सुख और दुःख, हानि और लाभ तथा जय और पराजय को समान मानकर युद्ध करने के लिये उद्यत होओ ! इसमकार युद्धकरके तुमको पाप नहीं लगेगा ॥ ३८ ॥ एपातेऽभिहितासांख्येचुद्धियोंगे विमांशृणु चुद्धयायुक्तोययापार्थकर्मवन्धप्रहास्यसि ।। हे अर्जुन ! सांख्य अर्थात् परमार्थ वस्तुके ज्ञान भगवद्गीता । के विषय में यह उपदेश हमने तुमसे वर्णन किया, अव योग के विषय में इस आगे कहे हुए ज्ञानको सुनो, इस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मवन्धन से मुक्त होजाओगे ॥ ३९ ॥ नेहाभिकमनाशोस्तिप्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्यधर्मस्यत्रायतेमहतोभयात४० जिस निष्काम कर्मरूप धर्माचरणका यदि पूरा आचरण भी न होसके तौमी इसकानाश नहीं होता इस कर्भ में न्यूनता रहजाने से भी कुछ दोप नहीं लगता, तथा इस धर्म का थोडासा भी आचरण व भारी भयसे रक्षा करताहै ॥ ४० ॥ व्यवसायात्मिका वुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखाह्यनंताचवुद्धयोऽव्यवसायिनाम् हे कुरुनन्दन ! जिनकी प्रवृत्ति उद्योग करने में नहीं है तिनकी बुद्धि अनेक प्रकार की और अनेक

भाषाटीका-अ. २१
मार्गों में चलनेवाली होती है, परन्तु सिन सवमें से
उद्योग करने में लगी हुईही एक बुद्धि श्रेष्ठ कहातीहैं।।
यामिमांपुष्पितांवाचं प्रवदंत्यविपश्चितः ।
वेवादरताःपार्थनान्यदस्तीतिवादिनः ४२
कामात्मानः स्वर्गपराजन्मकर्मफलमदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलांभोगैश्वर्यगतिप्रति।४।
हे अर्जुन ! जो स्वर्गादिक फल प्रातिका वर्णन
करने वाले वेदवाक्यों से प्रसन्न हैं, तथा कर्म-
काण्ड के अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तु को भी न
माननेवाले, अनेक प्रकारकी कामनाओं से कर्म
करने में प्रवृत्त हुए एवं स्वर्ग की प्राप्ति करने में प्रवृत्त
ऐसे अज्ञानी पुरुषभोग और ऐश्वर्यकी प्राप्ति के द्वारा
जन्म के कर्मफलको देनेवाली और अनेक प्रकार
के कर्म करने से फैली हुई वाणीको विस्तार कर-
के कहते हैं ॥ ४२ ॥४३॥

भगवट्टीता।
भोगैश्चर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिकाद्विःसमाधौनविधीयते।।
जिनका चित्त भोग और ऐश्वर्य में लगरहा है,
तथा कर्मकाण्डों में जिनका चिन आसक्त होरहाहै,
उनकी बुद्धि तत्वज्ञानका साधन होकर समाधिमें
स्थित नहीं होती ॥ ११ ॥
बैगुण्यविषया वेदा निन्त्रगुण्यो भवार्जुन
निईन्टोनित्यसबस्थोनियोगक्षेमआत्मवान्
यह वेद त्रिगुणात्मक सांसारिक कमों को प्रकाश
कानेवाले हैं (अर्थान-सकाम पुरूपों के लिये कर्म
‘फलकी प्राप्ति का वर्णन करते हैं ) परन्तु हे अर्जुन !
नू तो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से रहित
निप्काम हो तथा निद्वन्द्व होकर सदा पराक्रमका
अवलम्बन करके, प्राप्त हुई यस्तुकी रक्षा और अ-
प्राप्त वस्नुकी चिंताको त्याग कर आत्मा का
विचार कर ॥ १५॥

४१ भापारीका अ० २। यावानर्थ उदपाने सर्वतः मप्लुनोदके । तावान्सपुवेदेषु व्राह्मणस्पविजानतः ४६ स्वल्प जलवाले सरोवरों से जो (स्नान और पानादि) एक २ काम सिद्ध होते हैं, वे काम प्रभूत जलवाले जलाशयोंसे अनायासही में होजाते हैं, समस्त वेदों के जानने से होनेवाले ( स्वर्गादिक की मासिरूप ) वे काम ब्रह्मज्ञानी को सहजही में प्राप्त होजाते हैं ॥ ४ ॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते माफलेषु कदाचन । माकर्मफलहेतुर्भूर्मातेसंगोस्त्वकमणि॥४७॥ हे अर्जुन केवल कर्म करनेही में तुम्हारा अधिकार है, उनका फल भोगने में तुम्हारा अधिकार नहीं, तू कर्म के फलोंका हेतु (अर्थात्-फल पाने की इच्छा करनेवाला) मत वनै, और कर्म न करने में तेरी प्रवृत्ति न हो (अर्थात्-कर्म तो कर परन्तु ... ४२ भगवहीता। उन के फलकी कामना मन करें)।। १७ ।। योगस्थःकुरुकर्माणि संगत्यक्त्वांधनंजय । सिद्ध्यसिद्धयोःसमोभूत्वासमत्वंयोगउच्यते हे धनंजय ! एक परमात्माही में चित्त लगाकर संग (अर्थान्-मैं करता हूं इस अहंकार) को त्या- गकर कार्य की सिद्धि और आसद्धि को समान मान के सब कर्म करो, चित्तको समान करनेही का नाम योग है॥४८॥ दरेण वरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौशरणमन्विच्छ कृपणा:फलहेतवः ४९ हे अर्जुन ! केवल कर्मही का आचरण करना ज्ञान योगसे अत्यन्त निकृष्ट है (अर्थान-सकाम कर्मों से निष्काम कर्म श्रेष्ठ हैं) इसकारण ज्ञान (अर्थात् निष्काम कर्म करने ) में मनको लगायो जो पुरुष सकाम कर्म करते है,वे अधम कहातेहैं४९ ૪૨ भापाटीका-१० २॥ बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाययुज्यस्वयोगःकर्मसुकौशलम्॥ आत्मज्ञान से युक्त पुरुप इस संसार में पुण्य 'और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है इस कारण योग ( निष्काम कर्म ) करने के लिये उ- धोग करो,क्योंकि-कर्मों के विपय ज्ञानकी योजना करने को योग कहते हैं।। ५० ॥ कर्मजं वुद्धियुक्ता हिफलं त्यक्त्वामनीषिणः। जन्मवन्धविनिर्मुक्ताः पदंगच्छंत्यनामयम् ॥ ज्ञानयुक्त बुद्धिमान् पुरुप कर्मसे उत्पन्न हुए फलों का त्यागकर जन्म और मरणरूप वन्धनसे मुक्त होके परमपद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं ॥ ११ ॥ यदातेमोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । तदागतासिनिदंश्रोतव्यस्यश्रुतस्यच ॥५२ हे.अर्जुन ! जब तुम्हारी बुद्धि अज्ञानरूप मलको ४४ भगवदगीता। त्यागदेगी, तब तुम सुनेहुए और सुनने के योग्य (सकाम कमाँ) से विरक्त होजाओगे ॥५२॥ श्रुतिविप्रतिपन्नाते यदास्यास्पति निश्चला । समाधावचला बुद्धिस्तदायांगमवाप्स्यसि। हे अर्जुन ! जिस समय अनेक प्रकार के वेदवा- क्यों से भ्रांतिको प्राप्त हुई तुम्हारी बुद्धि निश्चल होकर समाधि (ब्रह्मका मनन कान) में नगेगी उस समय तुम्हें योग की प्रालि होगी ॥ ५३ ।। अर्जुन उवाच । स्थितप्रज्ञस्यका भाषा समाधिस्थस्यकेशव । स्थितधीःकिंप्रभापेत किमामीतव्रजेतकिम्।। अर्जुन ने पृाकि- हे केशव ! समाधि में स्थितहुग और जिसकी वुद्धि निश्चल हैं ऐसे पुरुपका क्या लक्षण है ? निश्चल बुद्धि वाला पुरुप किस प्रकार वोलता बतलाता है ? कैस बैठता और कैसे चलता है ? ॥ ५४ ।।

भाषाटीका-अ० २। श्रीभगवानुवाच । प्रजहातियदाकामान्सन्पिार्थमनोगतान् । आत्मन्येवात्मनातुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! मनुप्य जिस समय अपने मनमें माप्तहुई समस्त कामनाओं को त्यागकर आत्म- मनन करके अपने आत्माही में संतुष्ट होजाताहै उस समय स्थितप्रज्ञ (निश्चल बुद्धिवाला) कहा जाताहै ॥ ५५ ॥ दुःखेष्वनुहिनमनः सुखेषु विगतस्पृहः ।। वीतरागभयकोषः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ५६ जिस पुरुएका चित्त दुःखमें उद्विग्न नहीं होता और जो सुखों में आसक्त नहींहै, एवं जिसके प्रेम,भय और क्रोध यह सबदूर होगयेहैं,उसी मनन- शील ( विचारवान् ) को स्थिसमझ (निश्चल वुद्धिवाला) कहते हैं ।। ५६॥

मगयादीता। यासर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्यशुभाशुभम् नाभिनंदतिनद्वेष्टितस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता ५७ . जिसका सांसारिक किसी भी वस्तु में प्रेम नहीं है, तथा जो पुरुप शुभ ( अनुकूल) पदार्थ को पाकर प्रसन्नता एवं अशुभ (प्रतिकूल) वस्तु को पाकर खेद नहीं मानते उन्हींकी बुद्धि निश्चल है अर्थात् उन्हीं को तत्वज्ञानी कहते हैं ।। ५७ ॥ यदासंहरतेचायं कूङ्गिानीव सर्वशः। इंद्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्यप्रज्ञाप्रतिष्टिता।। जैसे कच्छप अपने सम्पूर्ण अंगों को समेट लेताहै, ऐसेही ज्ञानी पुरुष जिस समय अपनी सम- स्त इन्द्रियों को उनके कर आदि विषयों से हटा- लेता है, तब उसकी बुद्धि निश्चन्न होजाती ॥५॥ विपया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसर्जरसोप्यस्य परदृष्ट्वा निवर्तते ।५९।

भाषाटीका-१० । जो पुरुप विषयोंका सेवन नहीं करता उसके विषय तो स्वयंही नाश होजाते हैं, परन्तु उनमें अमिलापा वनीही रहती है और जिसी बुद्धि स्थिर है उसको विषयोंकी अभिलापभी नहीं रहती,क्यों- कि-उसको परब्रह्मका दर्शन होजाताहै ।। ५९ ॥ यततो हास्यकौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इंद्रियाणिप्रमाथीनि हरंतिप्रसभमनः ।। हे कुन्ती के पुत्र ! यह वलवान् इन्द्रिये प्रयत्न करने वाले विज्ञानी के भी मनको बलात्कार से चलायमान् कर देता हैं।॥ ६॥ तानिसर्वाणि संयम्य युक्त आसीतमत्परः घशेहियस्योंद्रियाणितस्यप्रज्ञाप्रतिष्ठिता६१ । उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को जीतकर योगयुक्त होके मेरे ही में मन लगाए रहना चाहिये जिसकी समस्त । इन्द्रियें वशमें होजाती है उसी की बुद्धि मतिष्ठित (निश्चल) कही जाती हैं ।। ६१।।

४८
भगवद्गीता
ध्यायतो विषयान्पुभः संगस्लेषूपजायते ।
संगात्संजायतेकामाकामाक्रोधोऽभिजायते
विपयोंका चितवन करने से पुरुपको उनमें
प्रेम उत्पन्न होजाता है, प्रीत (प्रासक्ति ) से
भोगनेकी कामना और कामना से क्रोध उत्पन्न
होताहै, अर्थात् उस कामना में विघ्न पड़जानेसे
क्रोध अंवश्य होता है ।। ६२ ।।
क्रोधाद्धतिसंमोहासमोहात्स्मृतिविभ्रमः
स्मृतिभ्रंशानुद्धिनाशो वुद्धिनाशात्मणश्यति ।
क्रोध से अज्ञान, अज्ञान होनेसे सत्पुरूपों के
उपदेश का स्मरण न रहना, स्मृतिके नाशसे !
बुद्धि का भी नाश होजाता है और बुद्धि का
नाश होजाने से सवकाही नाश होजाता है।६३॥
रागद्वेषधियुक्तस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति
-

भापाटीका-१० २ ॥ जो पुरुप राग द्वेपसे रहित हुई अपने स्वाधीन इन्द्रियों करके विपयोंको भोगता है, वह जितेन्द्रिय शांतिको प्राप्त होता है ।। ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । प्रसन्नचेतसोह्याशुद्धिःपर्यवतिष्ठते॥६५॥ इस पुरुपको शांति प्राप्त होजानेपर सम्पूर्ण दुःखों का नाश होजाताहै और शांत चित्तवाले. पुरुपकी बुद्धि शीघ्रही स्थिर होजातीहै अर्थात्- ब्रह्म में लगजातीहै ॥ १५ ॥ नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नचायुक्तस्यभावना। न चाभावयताशांतिरशान्तस्यकुतासुखम् जिस पुरुपका चित्त स्वाधीन नहीं उसको बुद्धि ( अर्थात्-श्रात्मविषयक ज्ञान) उत्पन्न नहीं होता और उस पराधीन इन्द्रियवाले पुरुप से विचारभी नहीं होसक्ता, जोपुरुष विचार नहीं करता उसको भगवद्गीता। शांतिकी माप्ति भी नहीं होती और जिसका चित्तही शांत नहीं उसको (मोक्षरूप) मुख कहां।। ६६ ॥ इन्द्रियाणांहिचरतां यन्मनोनुविधीयते । तदस्यहरतिप्रज्ञांधायु वमिवाम्भासि ।। विपय भागमें प्रवर्तहुई इन्द्रियों में से जौनसी इन्द्रियकी ओरको मन जाताहै, वोही इन्द्रिय पुरुषकी बुद्धिको इस प्रकार हरलेती(अर्थात् विषयों में डुबो- देती है) जैसे प्रचण्ड पवन जल में नावको निमग्न करदेती है ॥ ६॥ तस्माद्यस्यमहाबाहोनिगृहीतानिसर्वशः । इंद्रियाणीन्द्रियार्थभ्यस्तस्यप्रज्ञाप्रतिष्टिता। हे महावाहो ! इसकारण जिस पुरुषने अपनी इन्द्रियोंको विपयोंमें से सर्वथा हटालिया है, उसी की बुद्धि स्थिर होती है ।। ६८ ॥ यानिशासर्वभूतानांतस्यांजागर्तिसंयमी। १ "दुःखिते मनसि सर्वमसह्यम् ॥

क-ज्ञानी पुरुष में भाषाटीका-अ० २। स्यांजाग्रतिभूतानिसानिशापश्यतोमुनेः । सम्पूर्ण प्राणियोंकी जो ज्ञानरूप रात्री है उसमें जितेन्द्रिय (ज्ञानीपुरुष) जाग्रत् रहते हैं, और जिस विषय भोगादिकरूप रात्री में सम्पूर्ण माणी जागतेहैं प्रात्मज्ञानियोंकी वही रात्री है, तात्पर्यार्थ यह है सांसारिक दुःखरूप अन्धकार बुद्ध रहते हैं, अर्थात् उन दुःखों से लिप्त नहीं होते पौर जिन सांसारिक सुखोंमें अज्ञानी लोग आस- क रहते हैं,उनको ज्ञानी पुरुप अंधकाररूप रात्री समझते हैं ॥१९॥ आपूर्यमाणमचलमातिष्ठं- समुद्रमापाप्रविशन्ति यत्।। चित्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे- सशांतिमानोतिन कामकामी। जिस मकार परिपूर्णतासे भरेहुए समुद्रमें जल

भगवद्गीता
चारों ओर से आकर प्रवेश करते हैं, परन्तु वह
अपनी मर्यादाको नहीं त्यागता, ऐसही जो पुरुष
विषयोंके माप्तहोने परभी उनमें आसक्त नहीं होता
उसीको शांति प्राप्त होती है, और भोगकी कामना
वाले को शांति प्राप्त नहीं होती ॥ ७० ॥
विहायकामान्यः सर्वान्पुमांश्चरतिनिस्पृहः।
निर्ममोनिरहङ्कारासशांतिमाधिगच्छति ॥
जो पुरुप सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर इ.
च्छारहित, ममता और अहंकार रहित होजाता है
वही पुरुप शांति को प्राप्त होता है ।। ७१ ।।
एषा ब्राह्मीस्थितिःपार्थ नैनांप्राप्य विमुद्या,
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेपिब्रह्मनिर्वाणमृच्छी
इतिश्रीमद्भगवद्रीतासूपानपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादसांख्ययोगी नाम
द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

भावार्टीका अ०. ३ । हे पार्थ ! हमने जिस मकार वर्णन कियाहै यह रह्मरूप निष्ठा है, इस ( ब्रह्मरूप) स्थितिको माप्त कर माणी मोह को प्राप्त नहीं होता, अन्तकेस- श्यमी इस ब्रह्मरूप स्थिति में स्थित होकर माणी रोक्षको प्राप्त होजाता है ॥ ७२ ॥ इतिश्रीभापाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ तीयोऽध्यायः अर्जुन उवाच । न्यायसी चेत्कर्मणस्तेमतावुद्धिर्जनार्दन । किंकमणि घोरे मां नियोजयसिकेशव १ अर्जुन बोला कि- हे असुरारि ! याद तुम्हारे मत में सकाम कर्म की अपेक्षा ज्ञानही श्रेष्ठ माना गया है तो फिर हे भगवद्गीता। केशव ! मुझे इस घोर कर्म करने के लिये क्यों प्रवृत्त करतहो ॥१॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येनवुद्धिं मोहयसीवमे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमामुयाम् । हे भगवन् ! ज्ञान और कर्म दोनोंकी प्रशंसा कर के आप मेरी बुद्धिको मोहित करते हैं, इस कारण दोनोंमें से एकका निश्चय करके मुझे उपदेश करों कि जिससे मेरा कल्याणहो ॥ २॥ श्रीभगवानुवाच! लोकेऽस्मिन द्विविधानिष्ठापुराप्रोक्तामयाऽन ज्ञानयोगेनसांख्यानां कर्म योगेन योगिना श्रीभगवान् बोले कि- हे निष्पाप ! मथम मैंने इस लोक में दो प्रकार, की स्थिति (ब्रह्मनिष्ठा) वर्णन करी, अर्थात् ज्ञान योग के द्वारा तौ सांख्यशास्त्र के जाननेवालों की, और कर्म योग करके योगियों की निष्ठाहोती है।

भाषाटीका-अ
..
कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोश्नुते ।
चसंन्यसनादेवसिद्धिंसमधिगच्छति॥४॥
हे अर्जुन ! कर्मों के विना किये पुरुष को ज्ञान
माप्ति नहीं होती, और केवल संन्यास लेलेने
[ से मोक्ष की भी प्राप्ति नहीं होती ॥४॥
हिकश्चित्क्षणमपि जातुतिष्ठत्यकर्मकृत् ।
गायतथचशः कर्मसर्व प्रकृतिजैर्गुणैः ॥९॥
हे पार्थ ! विना कर्म किये कोई भी पुरुप किसी
मी अवस्था में कदाचित् ठहरही नहीं सक्ता,क्योंकि
वारणमात्र मकतिजनित रागादि गुणों करके परवश
होकर कर्म करने में प्रवृत्त रहते हैं ॥५॥
कर्मेन्द्रियाणिसंयम्ययआस्तेमनसास्मरन् ।
इंद्रियान्विमूढ़ात्मामिथ्याचार सउच्यते
. जो पुरुष कर्मेन्द्रियों को रोककर मन में विषयों
का स्मरण करता रहता है, उस मन्दबुद्धि को
दुराचारी कहते हे ॥६॥

भगवद्गीता यस्त्विन्द्रियाणमनसानियम्यारभतेऽर्जुने कर्मेंद्रियाकर्मयोगमसत्तासविशिष्यते। हे अर्जुन ! जो पुरुप मन और ज्ञानेन्द्रियों रोक कर कर्मेन्द्रियों के द्वारा कर्म करता और में आसक्त नहीं होता है, वह सब से (ज्ञानवान् ) कहाजाता है ॥७॥ नियतं कुरुकर्मत्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपिचतेनप्रसिध्येदकर्मणः।। हे धनंजय ! तुम कौंको अवश्यही करो क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है.और कर्म न करने से शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सक्ता है॥८॥ यज्ञात्कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयंकर्मयन्धन तदर्थकमकौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ।।९। ईश्वर प्राप्तिके निमित्त किये हुए कौक अति . मापाटीका- क्त और सब कर्म संसारके लिये बंधन हैं, हे तिनंदन ! इसकारण कर्मों में आसक्तिको स्या- कर कर्म करो ॥९॥ सहयज्ञाःप्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। मनप्रसविष्यध्वमेषवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ सटिकी आदिमें प्रजापति ब्रह्माजी ने यज्ञरूप कर्म करने वाली सृष्टि ( ब्राह्मणों ) को उत्पन्न करके उन से कहा कि इस यज्ञरूप कर्मके द्वारा तुम उत्पात करो, येही यज्ञ तुम्हारी समस्त कामनाओं को पूर्ण करेगा ॥ १० ॥ देवान्भावयतानेन ते देवाभावयन्तुवः । परस्परंभावयन्तःश्रेयःपरमवाप्स्यथ ॥११॥ हे ब्राह्मणों ! तुम यज्ञों के द्वारा ( हावके भा- गादि से) देवताओं को प्रसन्न करो। और संतुष्ट हुए वे देवता (वर्षा आदि से ) तुम्हारा पालन करें, इस मकार परस्पर एक दूसरे का पालन पोषण भगवद्गीता। करके परम मंगल को माप्त होओगे ॥ ११ ॥ इष्टान्भोगान्हवोदेवादास्यन्तेयज्ञभाषित तैर्दत्तानप्रदायेभ्योयो भुङ्क्ते स्तेन एव सः यज्ञ करने से संतोषको प्राप्त हुए देवता तुम्हा लिये सम्पूर्ण अभीष्ट भोगोंको देंगे । देवताओं के दियेहुए अन्न को जो पुरुष (पंचयज्ञादि करके दूसरे को विनादिये भक्षणकरता है वह चोरहै? यज्ञशिष्टाशिनः सन्तोमुच्यन्तेसर्वकिल्विा भुञ्जते तेवघं पापायेपचन्त्यात्मकारणात जो पुरुप वलिवैश्व देवादिक यज से शेप व हुए अन्नादिक को भोजन करते हैं, वे सम्पूर पापों से छूटजाते हैं और जो केवल अपनेही लि पाक करते हैं, वे अधम पुरुष पापका- मक्षण क रते हैं॥ १३ ॥ . १-कर्मकिल्बिपरित्यपि पाठान्तरम् ॥

भाषाटीका-अ०३१ ५९ पन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादनसंभवः । ज्ञाभवतिपर्जन्यो यज्ञःकर्मसमुद्भवः॥१४॥ सम्पूर्ण प्राणी अन्नही से उत्पन्न होतेहैं, वह पन्न वर्षा से और वर्षा यज्ञ करने से होती है, वं यज्ञ कर्म करने से उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ में ब्रह्मोद्भवविद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । स्मात्सर्वगतंब्रह्मनित्ययज्ञेप्रतिष्ठितम् १५ वह कर्म वेद से उत्पन्न हुआ है और अवि: पशी ब्रह्म से वेदकी उत्तात्त हुई है, इस कारण वव्यापक ब्रह्मको सर्वदा यज्ञ में प्रतिष्ठित श्रा जानो ॥१५॥ वं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । घायुरािंद्रियारामो मोघंपार्थसजीवति ॥ हे अर्जुन ! जो पुरुष इस मकार प्रवृत्त हुए कर्म प चक के ऊपर नहीं चलता, इन्द्रियों के सुख.

६०
भगवदीता।
में रमे हुए उस पापी पुरुपका जीवन तथा है १६
यस्त्वात्मरातरवस्यादात्मतृप्तश्च मानरः !
आत्मन्येवचसन्तुष्टस्तस्यकार्यनाविद्यते १.
जिस पुरुष का आत्माही में प्रेम है, जो
आत्मा के सुख से तृप्त है और आत्माही
विर्षे संतुष्ट है उसके लिये और कोई कर्तव्य कर्म
नहीं है ।। १७
नैवं तस्य कृतेनार्थी नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्पसर्वभूतेषुकश्चिदर्थव्यपाश्रयः १८
उस मनुष्य के कर्म करने और न करने से कोई
भी लाभ (और हानि ) नहीं है, उस ज्ञानी पुरुप
को सम्पूर्ण प्राणीमात्र में मोक्ष के लिये किसी
कीभी शरण लेने की आवश्यकता नहीं है ।। १८ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर ।
असतो ह्याचरन् कर्म परमामोतिपूरुषः१९

भाषाटीका-अ० ३
हे अर्जुन ! इस कारण कर्म के फलकी इच्छा
त्यागकर निरन्तर कर्म करो, क्योंकि-निष्काम
[: करने से परमपद (मोक्ष) की प्राप्ति
.
रणव हि ससिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
कसंग्रहमेवापिसंपश्यन्कर्तुमर्हसि २०।।
जनक आदिक अनेकों महात्मा. पुरुष कर्म
केही सिद्धि को माप्त हुए हैं, इस प्रकारके सां.
रिक वर्तावको देखकर भी कर्म अवश्य करना
हिये ॥ २०॥
पदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः॥
पत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥२१॥
जनरकामों को श्रेष्ठ पुरुष करते हैं, और पुरुष
उन्हीं उन कर्मोंका आचरण करते हैं। महा-
प जिस २ को श्रेष्ठ मानते हैं और पुरुष भी
को श्रेष्ठ मानते हैं ॥ २१ ॥

भगवदीता। *. नमेपार्थास्तिकर्तव्यंत्रिषुलोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवच कर्मणि॥२२॥ हे पार्थ ! यद्यपि त्रिलोकी में मुझे कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं, क्योंकि-प्राप्त होने के योग्य, कोई भी वस्तु नहीं जो मुझे प्राप्त न हो, तथा मैं कर्म करने में प्रवृत्त होरहा हूं ॥ २२ ।। यदि ह्यहं न वयं जातु कर्मण्यतन्द्रित ममवमानुवर्तन्ते मनुष्या:पार्थसर्वशारः हे अर्जुन ! यदि मैं आलस्य को त्यागकर का करने में महत्त न होऊं तौ सम्पूर्ण मनुष्य चार ओर से मेरही मार्ग पर चलने लगेंगे,अर्थात्-मेर श्राचरण देखकर सभी कर्म करना त्यागदेंगे॥२३॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्या कर्मचदहम् सकरस्यचकर्तास्यामुपदन्यामिमा:प्रजाः२ यदि मैं कर्म न करू तो सब पुरुष (धर्मसे ६३ भाषाटीका-अ०३। घट होजाय इसी कारण वर्णसंकर मजाका कर्ता और मजाका हनन. करनेवाला होजाऊंगा, अर्थात् में भ्रष्ट होजाने से मना वर्णसंकर होजायगी,वर्ण- कर होजाने से मजाका नाश होजायगा इन सवका कारण मैंही रहूंगा, क्योंकि मुझेही कर्म करने । विरक्तहुआ देखकर मनुष्यकर्म करनाछोड़देंग२४ रक्ताकर्मण्यविद्वांसोयथाकुर्वन्तिभारत। कुर्याद्रिद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्।। हे अर्जुन ! जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष कर्म में प्रासक्त होकर कर्म करते हैं, ज्ञानी पुरुष संसार की मर्यादाको स्थिर रखने के अर्थ उसी प्रकार मों को करते तो हैं परन्तु उनमें श्रासक्त नहीं होते।। न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञान। कर्मसंगिनाम् । तोषयेत्सर्वकर्माणिविद्वान्युक्तासमाचरन्। कर्म करने में प्रवृत्तहुए अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि

६४
भगवद्गीता।
में ज्ञानी पुरुषों को भेद उत्पन्न नहीं करना चाहिये
किन्तु जानी पुरुष स्वयंभी योगयुक्त होकर शुभकमों
का आचरण करता हुआ उनसे कर्म कराता रहै।।
प्रकृतेःक्रियमाणानिगुणैःकर्माणिसर्वशः।
अहंकारविमूढात्माकर्ताहमितिमन्यते२७
यद्यपि यह सम्पूर्ण कर्म प्रकृति जनित सत्व रज
तमरूप गुणों करके किये जाते हैं, परन्तु-अहंकार
करके इन्द्रियों में आत्माद्ध माननेवाला मूर्ख
पुरुष यह समझता है, कि मैंही करताहूं।।२।।
तत्ववित्तुमहावाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणागुणेषुवर्तन्तहतिमत्त्वा न सज्जते।।२।
हे महावाहो ! इसी कारण तत्वज्ञानी पुरुष
आत्माको गुण और कर्मके विभाग से भिन्न जानकर
प्रकृति के गुण (बुद्धि आदिक) स्वाभाविकही गुणों
(विपयों ) में प्रवृत्त होते हैं ऐसा जानता है,

भाषाटीका-अ. ३७ अतएव उनमें आसक्त नहीं होता ॥ २८॥ कृतेगुणसमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मच। निकृत्स्नविदोमन्दान्कृत्स्नचिन्नविचालयेत् जो अज्ञानी पुरुष प्रकृति के सत्व रज तम इन पुणों करके मोह को प्राप्त होकर इन्द्रिय और उनके बोगने के योग्य देहादि के व्यापार में आसक्त होजाते हैं, आत्मज्ञानी पुरुष को उचित है कि- इन मन्दबुद्धियों को कर्म करने से विमुख न करै ।। यिसाणिकर्माणिसंन्यस्याध्यात्मचेतसा। नेराशीनिर्मलोचूत्वा युध्यस्वविगतज्वरः।। हे अर्जुन ! इसकारण ज्ञानकी दृष्टिसे सम्पूर्ण मों को मेरे अर्पण करके उनका फल भोगने की मना ममता और शोक को त्यागकर युद्ध करो। मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः बद्धावन्तोऽनसूयन्तोमुच्यन्तेतेऽपिक मैमिः

भगवद्गीता ।
जो मनुष्य दोषदृष्टिको त्यागकर श्रद्धापूर्वक
मेरे इस मतका नित्य आचरण करते हैं, वेभी
अवश्यही कर्मरूप बन्धनसे मुक्त होजाते हैं।॥३१॥
घेस्वेतभ्यस्सूयन्तोनानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानाविमूढास्तान्विद्धिनष्टानचेतसः।।
और जो पुरुष दोषदृष्टि से मेरे मतका आध-
रण नहीं करते, हे अर्जुन ! उनको सम्पूर्ण ज्ञान
से शून्य, मूर्ख और नष्ट हुआ जानो ॥ ३२॥
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतहीनयानपि ।
प्रकृतियान्तिभूतानि निग्रहः किंकारिष्यति
ज्ञानी पुरुषभी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्ट
(अर्थात्-कर्म)करता है,क्योंकि-सम्पूर्णही प्राण
अपनी प्रकृति के अनुसार वर्ताव करते हैं, उनके
निग्रह (अर्थात् शिक्षा ) क्या करेगा ॥ ३३ ॥

भाषानीका-अ.३
६७
इन्द्रियस्थेन्द्रियस्वार्थरागद्वेषौव्यवस्थितौ।
नयोन वशमागच्छेत्तौ यस्यपरिपन्धिनौ३४
सम्पूर्णही इन्द्रियोंका स्वभाव है कि अनुकूल
विषय में राग (मेम) और प्रतिकूल विषय में
द्वेष होता है, पुरुषको उनके अधीन होना न चाहिये
क्योंकि-यह राग और द्वेष पुरूपके ( मोक्ष मार्गमें)
विघ्न करनेवाले हैं ।। ३४॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणापरधर्मात्स्वनुष्ठितात्
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मोभयावहः॥३५॥
। दूसरों के धर्मका पूर्णतया आचरण करने की
अपेक्षा अपना धर्म यदि थोड़ाभी वनपड़े तो श्रेष्ठ
है. क्योंकि-अपने धर्म में प्राण त्यागकर देनाभी
श्रेष्ठ ( कल्याणकारी ) है, और दूसरोंका धर्म भय
( नरक) का देनेवाला है ॥ ३५ ॥

भगवदगीता।
अर्जुनउवाच ।
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि याह्णय बलादिव नियोजितः।।
अर्जुनने पूछाकि-
हे वार्णय ! यह पुरुष यद्यपि स्वयं पाप करने
की इच्छा नहीं करता, तथापि-वह पुरुप किसकी
बलात्कार प्रेरणासे युक्त होकर पाप करता है ३६
श्रीभगवानुवाच ।
काम एप क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनोमहापाप्मावियेनामिह वैरिणम्।।
श्रीभगवान् दोले कि-
यह काम और क्रोध . रजोगुणसे उत्पन्न
१-कोई १ महाशय तो 'वार्ष्णेय' शब्दका वृष्णि-
: कुलोत्पन्न अर्थ करते हैं , परन्तु-श्रीशंकरानन्द कृत व्याख्या
में लिंन्नाहाक-ब्रह्मानन्दरूप अमृत वर्षाने वालको कृष्णि' कहते हैं
उसके द्वारा जाननेयोग्य (परमात्मा ) को 'वार्ष्णेय'कहते हैं ।

भावाटीच-अ०३। ६१ होते हैं, यह काम अनेक प्रकारक उपभोगोंसे भी शान्त नहीं होता, और पापरूप है, इस संसार में हे अर्जुन ! इसको अपना शत्रु जानो ॥ ३७॥. धूमेनानियते वहिर्यथादर्शोमलेन च । यथोल्बेनावृतोगस्तिथा तेनेदमावृतम् ॥३८॥ जिस मेकार धूम अग्निको, और मल दर्पण को आच्छादन करलेता है, तथा जिस प्रकार जरायुसे गर्भमें स्थित हुवा वालक आच्छादित रहता है इसी प्रकार कर्मसे ज्ञानभी वेष्टित रहता है।। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनोनित्यबैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३६॥ हे कुन्तिनन्दन ! अग्निकी समान कभी भी कृप्त न होने वाले इस काम (इच्छा) रूप शत्रुने १-जो चर्म गर्भको चारोंओर से लपेटे रहता है उसे जरायु कहते हैं।

भगवहीता। ज्ञानी पुरुपोंको चारोंओरसे ढकरक्खा है ॥३९॥ इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्टानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४०॥ इन्द्रिय, मन और बुद्धि यह तीन कामनाके निवासस्थान कहेजाते हैं, इन्हीं के द्वारा यह कामना ज्ञानका आवरणकरके मनुष्यको मोहित करलेती है॥४०॥ तस्मारवामिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्४१ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस कारण तुम मथम इन्द्रियोंको स्वाधीन करके पापरूपी तथा शास्त्रज्ञान और आत्मज्ञानके नाशकरनेवाले काम, (इच्छा) का जय करो ॥ ११ ॥ इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियभ्यः परंमनः। मनसस्तु परावुद्धिर्योबुद्धेः परतस्तु सः॥४२॥ देहादिक स्थूल पदार्थों से इन्द्रिय पर (सूक्ष्म भाषाजीका-अ०४॥ वा श्रेष्ठ ) हैं, इन्द्रियोंसे मन, मनसे बुद्धि और बुद्धिसे भी आत्मा सूक्ष्म( और श्रेष्ठ ) है।।४२|| एवं बुडेः परंवुध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ४२ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवारे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ हे महावाहो । इस प्रकार आत्माको बुद्धिसे परे जानकर और मनको निश्चल करके कठिनता से जीतने के योग्य इस कामनारूप शत्रुका जय करो। इति श्रीभापाटीकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ चतुर्थोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । इमं विवस्वते योग प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

भगवहीता। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्। श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! मैंने प्रथम इस अव्ययज्ञानको सूर्यसे.. कहा, सूर्यने अपने पुत्र मनुसे और मनुने इक्ष्वाकु राजासे वर्णन किया ॥१॥ एवं परम्परामासमिमं राजर्षयोविदुः। सकालेनेह महता योगोलष्टः परन्तप ॥२॥ हे अरिमर्दन ! इसत्रकार क्रमानुमार प्राप्त हुए. इस अक्षय ज्ञानको राजर्पियोंने पाया, मदनन्तर चिरकाल पीछे वह ज्ञान नाश होगया ॥३॥ स एवायं मया तेऽच योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोसि भेसवाचेतिरहस्यं होतदुत्तमम्३ वोही प्राचीन योग हमने तुम्हारे प्रति वर्णन किया, क्योंकि तुम हमारे भक्तं और मित्र हो. तथा यह उत्तम ज्ञान भी परम गोपनीय है।

मापाटीका-अ०४!
अर्जुनउवाच ।
अपरं सवलोजन्म परंजन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां मादौ भोक्तवानिति।।
अर्जुनने कहा कि-
हे कृष्णा ! सूर्यका जन्म तो आपके जन्मसे
बहुनही प्रथम हुआ था,तो फिर मैं यह कैसे जानें
कि-गृष्टिके मारम्भमें सूर्यको आपने यह ज्ञान
दिया था ॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
वहनिमेव्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुना
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५॥
श्रीभगवान् वोले कि-
हे शत्रुनिकन्दन ! तुम्हारे और हमारे बहुतसे
जन्म हुए हैं, हे अर्जुन ! उन सव ( जन्मों ) को
मैं तो जानता हूं परंतु तुम नहीं जानते ॥ ५॥

भगवद्गीता। अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरो- पिसन् । प्रकृति स्वामाधिष्टाय संभवाम्या- त्ममायया ॥ ६॥ यद्यपि मैं जन्म-मरणरहित और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर भी हूं, तथापि-अपनी प्रकृति का आश्रय लेकर अपनी मायाकरके जन्म लेताहूं ६ यदायदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् हे भारत ! जिस २ समय धर्मकी हानि और अधर्मकी उन्नति होती है, उसी उस समयमें अवतार धारण करता हूं ॥७॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥८॥ हे अर्जुन ! साधु-सज्जनोंकी रक्षा और दुष्टों का विनाश करनेके लिये तथा सनातनधर्मकी.

भाषाटीका-अ.४॥ स्थिति करनेके अर्थ में प्रत्येक युगमें जन्म लेताहूं।। जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैतिमामेतिसोऽर्जुनह हे अर्जुन ! जो ज्ञानी पुरुप इस प्रकार मेरे जन्म और कर्मको भली प्रकार दिव्य जानता है वह शरीर त्यागकर फिर जन्मधारण नहीं करता किन्तु मुझे प्राप्त होजाता है ॥९॥ वीतरागक्षयकोचा सन्मया मामुपाश्रिताः। बहवोज्ञानतपसा पूता सद्भावमागताः १०॥ जिनके प्रीति, भय और क्रोध यह सब निवृत्त होगये हैं,जो समस्त संसारको मेरा ही रूप जानते और मेरीही उपासना करते हैं, ऐसे अनेकजन ज्ञान और तपसे पवित्र होकर मेरेही रूपको मास होजाते हैं ॥१०॥ ये यथा मां प्रपद्यन्तेतास्तथैव भजाम्यहम्।

मंगवहीता। मम वानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ११ हे अर्जुन ! जो पुरुष जिस भावसे मेरा-भजन करते हैं,मैं भी उनको उसी भावके अनुसार फन देता हूं। क्योंकि-समस्त मनुष्य सर्वथा मेरेही मार्गपर चलते हैं, अर्थाद मुझेही प्रसन्न करने को सव भकारके भक्तिभाव करते हैं ॥ ११ ॥ काङ्क्षन्तःकर्मणां सिद्धि यजन्त इहदेवताः क्षिहि मानुषेलोके सिद्धिर्भवतिकर्मजा१२ इस संसार में कर्मसिद्धिकी कामना करतहुए अनेक पुरुष देवताओंकी पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्यलोकमें कर्मसे उत्पन्न हुई सिद्धि शीघ्रहीं प्राप्त होजाती है ॥ १२॥ चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपिमा विद्ययकर्तारमव्ययम् ।। गुण और कर्म के विभागोंसे मैंने चारों भापाटीका-१०४॥ व को उत्पन्न करा है, अतएव मैं उनका की भी हूं तथापि मुझ अविनाशीको उनका अका जानो॥१३॥ नमांकर्माणि लिस्पन्तिन मेकर्मफले स्पृहा। इतिमायोऽभिजानातिकर्मभिन सबध्यते।। । मुझे कर्म स्पर्श नहीं करते,और मुझे कर्मके फल ‘में कामना भी नहीं है,जो पुरुप मेरे स्वरूपको इस मकार जानताहै,उसको कर्मरूप वन्धन नहीं बाँधसक्ते एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि सुमुक्षुभिः । कुरु कसैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कुतम् ।१५।। इसप्रकार ( आत्माको अकर्ता और अभोक्ता जानकर जनकादिक ) प्राचीन मुमुक्षुपुरुषान भी कर्म करे हैं, इसीकारण हे अर्जुन ! जो पुराने मुमुक्षुओने कर्म करे हैं उन्हीको तुमभी करो१५ कि कर्म किमकति कम्योऽप्यत्रमोहिताः। तत्तेफर्मरवक्ष्यामियज्ज्ञात्वालोक्ष्यसेऽशुभार

भगवद्गीता।
हे अर्जुन ! (कर्त्तव्य) कर्म क्या हैं ? और अक-
तव्य कम कौनसे हैं ? इस विषयमें वुद्धिमान्भी
मोहित हो ाते हैं । इसकारण मैं उसी कर्मको
तुमसे वर्णन करता हूं जिसे जानकर दुःखरूप
संसारसे मुक्त होजाओगे ।। १६ ॥
कर्मणोह्यपि बोडव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहनाकर्मणोगतिः॥१७॥
हे अर्जुन ! विहितकर्म,निपिद्धकर्म और अकर्म
(कर्मसे मुक्त रहना) इन तीनोंका तत्त्व अवश्य
जानना चाहिये,क्योंकि-कर्मकी गति परम कठिन है।
कर्मण्यकर्म यः पश्यदकर्माण च कर्म यः॥
सवुद्धिमान्मनुष्येषुसयुक्तः कृत्लकर्मकृत् ॥
Vजो कर्मों में अकर्म और अकौम कर्म देखता है,
सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान वह पुरुप समस्त
कोका करनेवाला योगी है॥ १८ ॥

भापाटीमा-अ०४॥
यस्य सर्व समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुःपण्डितंबुधाः१६
जिस पुरुपके सम्पूर्ण उद्योग कामनाके सकल्पसे।
रहिन है, और जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूप अग्निसे,
भस्म होगये हैं,पण्डित लोगउसीको ज्ञानी कहते है।
त्यल्या कर्मफलासंग नित्यतृप्तोनिराश्रयः।
कर्मण्यसिमवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः।
जो
पुरूप
कोके फलमें शासक्तिको त्याग
कर सना तृप्त और निराश्रय रहता है, वह पुरुप
कर्म करने में प्रवृत्त हुवा भी कुछ नहीं करता है ।।
निराशीयंतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलकर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।
हे अर्जुन ! जिसने सम्पूर्ण कामनाओंको
त्याग दिया है, जिसका चित्त और आत्मा स्वाधीन
है, जो वंधन के कारणोंको छोड़कर केवल

८6 भगवद्गीता। शरीरकी स्थिति के अर्थ कर्म करता है, वह पुरुष कर्मकरके भी पापका भागी नही होता ।। २ ।। पहच्छालाक्षसन्तुष्टो छन्द्वातीतोविमत्सरः। समालिखायसिद्धौच कृत्वापि न निवध्यते। जो प्राणी स्वयं माप्त ई वस्तुसे सन्तुष्ट हो जाता है ऐसा और सुख दुःखादि इन्द्रोंका सहन करने वाला तथा जो मत्सरवारहित है, एवं अर्थकी सिद्धि और प्रसिद्धि में जिसका चित्त समान रहता है, वह पुरुप कर्मकरके भी उनमें नहीं वधता ॥ २२॥ गंतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । यज्ञायाचरतः कर्म सम प्रथिलीयते ॥२॥ : जो निष्काम और रागद्वेपसे मुक्त है, और :: जिसके चित्तकी वृत्ति झानमें लगरही है,वो पुरुष यदि यज्ञके लिये कर्मानुष्ठान करै तो भी उसके 'कर्म सय नाश होजाते है ।। २.३ ।। .

भाप टीका-अ०४" ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविब्रह्माग्नौ ब्रमणाहुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना २४ आहुति देना और ब्रह्मरूप होता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें होनेवाला हवनभी यह सब ब्रह्मरूपही हैं और यज्ञादि शुभकर्मोंके द्वारा जो स्वर्गादिक की प्राप्ति होती है वह भी ब्रह्मही है, जिस पुरुष की कोंमें इस प्रकार चित्तवृत्ति लगरही है, यह ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥२४॥ दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। माग्नावरे यज्ञ यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥२५॥ कोई २ योगी देवताओंके उपदेशसे यज्ञा. दिक कर्म करते हैं और अन्य योगीपुरुष ब्रह्मरूप ही हविका हवन करते हैं अर्थात् समाधि के द्वारा जीवात्माको परमात्मामें लय करते हैं ॥ २५ ॥ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निबुजुह्वति। शबादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु शुदति।।

भगवद्गीता।
कितने ही योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रा
दिक इन्द्रियोंकी आहुति देते हैं, और कितने ही.
पुरुष शब्दादिक विषयोंको श्रोत्रादिक इन्द्रियों
में आहुति देते हैं ॥ २६ ॥
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुइति ज्ञानदीपिते.
कितने ही योगी आत्माके संयमरूप अग्नि:
को ज्ञान केद्वारा प्रदीप्त करके उसमें समस्त इन्द्रियों
के कर्मोंकी और प्राणों के कर्मोंकी आहुति देते हैं।।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्याय ज्ञानयजाश्च यतयः संशितव्रता.२८
कोई पुरुष दानब्ध यज्ञ करते हैं,कोई २ सप-
रूप यज्ञ करते है, कोई योगरूप यज्ञ करते हैं,
कोई पुरुष वेदपाठरूपी यज्ञ करते है और कोई २
ज्ञानी पुरुष दृव्रतरूप यज्ञ करते हैं ॥२८॥

भापाटीका-भ०४। अपाने जुवति प्राणं प्राणोऽपानं तथाऽपरे। प्राणापानगतीरुदध्याप्राणायामपरायणा:२६ कोई२ ज्ञानीपुरुप प्राण और अपानकी गतिको रोककर मागणायाम करने में तत्पर रहके अपानमें प्राणका और प्राणमें अपानका हवन करते हैं२९ अपरे नियताहारा प्राणान्प्राणेषु जुवति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदोयजक्षपितकल्मषाः ३० कोई २ मनुष्य नियषित भोजन करनेवाले वनकर प्राणोंमें प्राणोंका यज्ञ करते हैं,यह सब यज्ञ करने वाले ज्ञानी पुरुष यज्ञोंके द्वारा अपने पापोंको दूर करते हैं ॥ ३० ॥ यजशिष्टामृतभुजोयान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययजस्य कुतोऽन्याकुरुसत्तम हे कुरुसत्तम! जो पुरुप इसप्रकार यज्ञसे शेषवचे हुए अमृतरूप अन्नका भोजन करते हैं, वे सनातन भगवद्गीता । ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यज्ञहित मनुष्यको यह मनुष्य- लोक भी माप्त नहीं होता तो फिर परलोक कैसे मिल सका है ? ॥ ३१॥ एवं पहुंविधा यजा वितताब्रह्मणोमुखें। कर्मजान्विद्धि तानसर्याने जात्वा विमोक्ष्यसे हे अर्जुन ! इस भांति वेदमें अनेक प्रकारके यज्ञ वर्णन किये गये हैं, उन सबको कर्मसे उत्पन्न हुआ जानो,ऐसा जानने से तुम्हारी मोक्ष होजायगी। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञादं जानयजः परन्तप । सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाले परिसमाप्यते३३ हे परन्तप! द्रव्यमय (दानरूप ) यज्ञसे ज्ञान- रूप यज्ञ श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि-हे पार्थ । जितने कर्म हैं, ज्ञान होजानेपर वे सव समाप्त होजाते हैं ॥ ३३॥ तनिधि प्रणिपातेन परिप्रश्न सेवया ।

भाषाटीका--अ०४॥ ८५ उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः३४ हे अर्जुन ! गुरुको प्रणाम करके बारम्बार पूछने ने और सेवा करनेसे उस ज्ञानकी प्राप्ति होगी त्योंकि-तत्वज्ञानी पुरुप वारम्बार प्रश्नादिक करने ही से ज्ञान का उपदेश करेंगे ॥ ३४॥ ज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। न भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथामयि३५ हे पाण्डुनन्दन ! उस ज्ञानको पाकर फिर तुम स प्रकार मोहको माप्त नहीं होओगे, और उसी उनके द्वारा संपूर्ण माणियोंको मुझसे और अपनेसे अभिन्न देखोगे ॥३५॥ प्रपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यास॥३६॥ यदि तुम अन्य सम्पूर्ण पापियोंकी अपेक्षा धिकतर पापी भी हो तो भी इस ज्ञानरूप नौका ६ भगवडीता। के द्वारा पापरूष समुद्रको अनायास हाँसे तरजाओं यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। हे अर्जुन ! जिस प्रकार प्रज्वलित हुई अग्नि प्रभूत ईंधन को भस्म करदेती है,इसी प्रकार ज्ञान- रूप अग्नि समस्त कर्मोंको भस्म करदेती है ३७ नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रामिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धःकालनात्मनि विन्दति इस लोकमें ज्ञानकी समान दूसरी कोई भी वस्तु पवित्र नहीं है, उस द्वानको योगके द्वाराशुद्ध अन्तःकरणवाला पुरुष विचार करते२ चिरकालं में स्वयं ही आत्मामें प्राप्त होता है ॥ ३४॥ अद्यावाँल्लभते जानं तत्परः संयतन्द्रियः। ज्ञानलब्ध्वापरांशान्तिमाचरेणाधिगच्छति जितेन्द्रिय, ज्ञानमें निष्ठा करने वाला. औं श्रद्धालु पुरुष ही ज्ञानको प्राप्त होता है, मैं

भापारीका-१०४॥
८७
गनमाप्त होजाने पर तुरंत ही परमशान्तिको प्राप्त
जाता है ।। ३९ ॥
प्रज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
माय लोकोऽस्ति न परोन सुखंसंशयात्मनः।।
• जो पुरुष अज्ञानी, श्रद्धारहित और सदा
देह करने वाले हैं, वे नाशको प्राप्त होजाते हैं,
असं पुरूप को सदा सन्देह बना रहता है उसे
सलोक और परलोकमें मुखकीमाप्ति नहीं होती४०
रोगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
प्रात्मवन्तंन कर्माणिनिबध्नाति धनंजय४१
'हे धनंजय ! जिन पुरुषोंने योगके द्वारा अपने
सम्पूर्ण कर्मोंको परमेश्ररके अर्पण करदिया है,
और जिनके समस्त सन्देह ज्ञानके द्वारा छिन्न
भन्न होगये हैं, ऐसे आत्मज्ञानी. पुरुषको कर्म
ही बाँधते ॥ ४१॥

८८ भगवद्गीता। तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं जानासिनात्मनः। छित्त्वनं संशयं योगमातिष्टोत्तिष्ठ भारत ४२ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाख्ने श्रीकृष्णाजिनसंवादे ज्ञानयोगो नाम 'चतुर्थोऽध्यायः ।। ४॥ इस कारण हे अर्जुन!अपने हृदयमें उत्पन्न हुए अज्ञानजनित सन्देहको ज्ञानरूप खड्ग से छेदन करके योगका आश्रय लेकर युद्ध करने के लिये उठो॥४२ इति श्रीभाषाटीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः अर्जुनउवाच । संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि यच्छ्रेयएतयोरकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।

भाषालीका.-०५1 अर्जुनने पूछा कि- हे श्रीकृष्ण! आप कोके त्याग और उन कर्मोंके अनुष्ठान इन दोनोंही की प्रशंसा करते हैं, इन दोनों से जो श्रेष्ठ हो उसका निश्चय करके मुझसे कहो ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । तयोस्तुकर्मसंन्यासाकर्मयोगोविशिष्यते।। श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! यद्यपि काँका त्याग और कर्मा- नुष्टात यह दोनोंही मुक्तिके देने वाले हैं, तथापि कर्मत्यागनेकी अपेक्षा कमीका करना श्रेष्ठ है ।।२।। ज्ञेयः सनित्यसंन्यासीयोन बोष्टिनकांक्षति निन्दोहिमहाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते जो किसीसे द्वेष नहीं करता, और किसीकी भगवद्रीता। कामना नहीं करता, वोही पूरा सन्यासी है, महावाहो ! सुख दुःखसे रहित वह पुरुप सहजही में सांसारिक वन्धनसे मुक्त होजाता है ॥ ३॥ सांख्ययोगौ पृथग्वालाप्रवदन्ति न पण्डिता एकमप्यास्थितःसम्यगुभयोर्विन्दतफलम्४ सांख्य ( अर्थात्-ज्ञानपूर्वक कर्मों का त्याग.) और कर्मयोग, इन दोनोंको अज्ञानी पुरुप भिन्न भिन्न कहते हैं, तथा पण्डित (ज्ञानी पुरुप) एवं ही कहते हैं, क्योंकि इन दोनोंमेंसे एकका भी आश्रय करलेनेसे मनुष्यको दोनोंका फल मिल जाता है ॥ ४ ॥ यत्सांख्यैः प्राप्यतेस्थानं तद्योगैरपिगम्यते। एकं सांख्यंच योगं च यः पश्यति सपश्यति जो मोक्षरूप स्थान सांख्य (ज्ञानी)सन्न्या --प्राप्यते, इत्यपि पाठः॥

भाषाटीका--०५।
सयों को प्राप्त होता है, उसी स्थानको कर्मयोगी
भी प्राप्त होते हैं। इस कारण सांख्य ( कोंके
याग) और कर्मयोगको जो पुरुष समान देखता
है, उसीका देखना यथार्थ है ॥ ५ ॥
उन्यासस्तुमहाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
गोगयुक्तोमुनिब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६
हे महावाहो ! योगके विना किये सन्न्यासकी
वाप्ति होना महाकठिन है और योगकरके युक्त
हुए मुनिको ब्रह्मकी माप्ति शीघ्रही होजाती है।।६॥
गोगयुक्तीविशुद्धात्माविजितात्माजितेन्द्रियः
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ७
जो पुरुष योगकरके युक्त और शुद्ध चित्त.
बाला है जिसने आत्मा और इन्द्रियोंको जीत
लया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने
प्रात्माकी समान जानता है, वह प्राणी कर्म
करता हुआ भी कर्मवन्धनोंसे नहीं बधता ॥७॥

भगवद्गीता। नैव किञ्चित्करोमीतियुक्तोमन्येत तत्वयित्। पश्यनशृण्वन्शनिघन्नन्नन्गच्छन्सप्रश्वशन प्रलपन्विसृजन गृह्णन्नुन्मिपन्निमिषन्नपि ।: इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।। योगकरके युक्त तत्त्वज्ञानी पुरूप देखशा,सुनता, स्पर्श करता, सूंघता, भोजन करता, चलता, शयन करता और श्वास लेता हुआ तथा वोलता, त्यागता, ग्रहण करता, नेत्रोंको खोलता और बंद करता हुआ भी, इन्द्रियें अपने२ विषयों में प्रवृत्त रहती हैं, ऐसा निश्चयकरके मैं कुछ भी नहीं करता ऐसा निश्चय कर लेता है।॥८॥९॥ ब्रह्मण्याधाय काणि सत्यक्त्वाकरोतियः लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रामिवाम्भसा १० जो पुरुष कोंके फलकी कामनाको त्यागकर उन(कर्मों)को ब्रह्मके अर्पण करके कर्म करता है, भापाटाकी अ० ५। वह प्राणी पापसे इसप्रकार लिप्त नहीं होता जैसे हमलका पत्र जलसे लिश नहीं होता ॥१०॥ कायेन मनसा दुखमा केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्मशुधये हे अर्जुन ! योगी पुरुप कर्मफलकी कामनाको त्यागकर श्रात्मशुद्धिके अर्थ मन बुद्धि अथवा . केवल इन्द्रियोंही से कर्म करते हैं ॥ ११ ॥ ताकर्मफलत्यक्त्वाशान्तिमाशीतितष्ठिकीस युक्तःकामकारेण फले सत्तोनिबध्यते ॥ योगनिष्ठ पुरुष कर्मफलकी कामनाको त्यागकर कर्म करनेसे) मोक्षकप शान्तिको माप्त होता है और योगरहित पुरुप फलकी कामनामें आसक्त होने के कारण कामनाकरके बंधन में पड़जाता है। सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। स्वबारे पुरे देही नैव कुर्वन्नकारयन् ॥ १३॥ ..

मंगवीता। जितेन्द्रिय पुरुप मनसे समस्त क्रौंको त्याग कर नौ द्वारवाले इस देहम्पी नगरमें न तो कुछ स्वयं करता और न किसीसे कुछ कराता हुआ सुखसे निवास करता है ॥ १३ ॥ न कातत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोग खभावस्तु प्रवर्तते ॥१४॥ परमेश्वर किसीके कत्व, कर्म और कर्मके फलोंको उत्पन्न नहीं करता,किन्तु स्वभाव(अज्ञान) ही कर्तृत्व आदि रूपसे प्रवृत्त होता है ॥१॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः१५ सर्वव्यापक परमेश्वर किसी जीवके पाप और पुण्यको ग्रहगा नहीं करता, अजानके द्वारा ज्ञान ढका रहता है, इसी कारण माणी मोहित हुएं रहते हैं ।। १५ ॥

भापासीका--अ०५। ९५ ज्ञानेन तु तदज्ञानं येा नाशितमात्मनः । लेपामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् १६ जिन पुरुपों का यह अज्ञान आत्मज्ञानके द्वारा नाशको प्राप्त होगया है, उनको वह आत्मज्ञान सूर्यकी समान प्रकाश करता है ॥ १६ ॥ तवुडयस्तदात्मानस्तनिष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिकृतकल्लषा:१७ जिन माणियोंने अपनी बुद्धि और आत्माको परमेश्वर में लगा रक्खा है, जिनकी परमेश्वरमें निष्ठा है और जो ब्रह्मपरायण हैं, वे ज्ञानके द्वारा संपूर्ण पापोंको धोकर प्रकृतिके सम्बन्धरहित मोक्षको प्राप्त होजाते हैं । १७ ।। विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मयो गवि हस्तिनि । शुनिचैवश्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः१८ ज्ञानी पुरुष विद्या और विनयसे अलंकृत हुए

भगवद्गीता। .
ब्राह्मण, गौ, हस्ती और श्वान तथा चाण्डाल
इन सबको समान दृष्टिसे देखते हैं, अर्थात्-तत्व.
ज्ञानी पुरुष सबको ब्रह्मरूप ही देखते हैं ॥ १८ ॥
इहैव तैर्जितः सर्गोयेषां साम्ये स्थितं मनः ।
निदोषहि समंब्रह्म तस्माद्ब्रह्माणि ते स्थिताः
जिन ज्ञानियोंका चित्त सम्पूर्ण आत्माओं में
समानतासे स्थित है, उन्होंने इसी लोकमें संसार
का जय करलिया और वे ही ज्ञानी पुरुप, ब्रह्म
के विषं स्थित हैं, क्योंकि ब्रह्म निर्दीप और
सवमै समान है ।। १९॥
ननदृष्येत्मियं प्राप्य नोदिजेलाय चांप्रिया
स्थिरबुद्धिरसमूढोब्रह्मविद्रमणि स्थितः ॥
जो ज्ञानीजन प्रिय वस्तुको पाकर प्रसन्न और
अप्रिय वस्तुको पाकर उद्विग्न नहीं होते, वेही
निश्चल वुद्धिवाले और मोहरहित ब्रह्मज्ञानी व्रह्म
में स्थित हैं ॥ २०॥

९ भाषाटीका-अ०५. स्यस्पर्शेष्वसत्तात्माविन्द्रयात्सनियत्नुख ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखसक्षय्यमश्नुते २१॥ जो पुरुष. आत्माको वाह्यविषयों से रोककर मात्मामें सुख पाता है, ब्रह्मज्ञान के द्वारा जिसका चेत्त-- परमात्मामें लगरहा है वही. ज्ञानी पुरुष अक्षयसुख. (मोक्ष .) को प्राप्त होता है, अर्थात एकान्तमें विचार करने से मोक्षकी प्राप्ति होती है। थे हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनयएव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते वुधः२२. हे कुन्तीनन्दन ! तत्त्वज्ञानी पुरुप इन्द्रियजनित भोगोंमें. आसक्त नहीं होता, क्योंकि थे. भोग दुःखदायी और नाशवान् हैं ॥२२॥ शक्तोताहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात कामक्रोधोद्भव वेग सयुक्तः ससुखी नरः २३ शरीर त्यागनेसे प्रथम जो. पुरुष इसी लोक में काम क्रोधादिकके उद्वेगसे उत्पन्न हुए वेगको भगवद्गीता। रोकनेके अर्थ समर्थ है, वही पुरुप योगकरके युक्त और सुखी है ॥ २३ ॥ योऽन्तःसुखोन्तरारामस्तथान्तोतिरेव या सयोगीप्रनिर्वाणं व्रत्मभूतोऽधिगच्छति। जो पुरुष आत्मा ही में सुखी है,और श्रात्मा ही में रमण करता है, तथा जिसका आत्माही में प्रकाश है, योगकरके युक्त वही ज्ञानी पुरुष ब्रम- स्वरूप होकर ब्रह्ममें लय होजाता है ॥ २४ ॥ लान्ते ब्रमनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नवैधायतात्मानः सर्वभूतहिते रताः २५ जिनके पाप और सन्देह नाश होगये हैं ऐसे, तथा सब प्राणियोंके हित में लगे हुए श्रात्मज्ञानी पुरूप ब्रहमें लीन होजाते हैं ॥ २५ ॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितोब्रह्मानिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।। जिनके काम और क्रोध दूर होगये हैं ऐसे . .

मापाटीका-१०१०१ १६३ हे योगिराज! सदा चिन्तवन करता हुआ मैं प्रापको किस प्रकार जानूँ ? हे भगवन् ! कौनर से पदार्थों में मुझे आपका चिन्तवन करना चाहिये।। विस्तरेणात्मनोयोग विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतोनास्ति मेऽमृतम् हे दुष्टसंहारी ! अपने योग और ऐश्वर्यको फिर विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन करो, क्योंकि अमृत की समान आपके चरित्रों को सुनतेर मेरी तृप्ति नहीं होती है ॥ १६ ॥ श्रीभगवानुवाच । हन्त ते कथयिष्यामि दिव्याख्यात्मावतयः। माधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्ताविस्तरस्य मे। श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! मैं अपनी मुख्य२ विभूतियोंका तुमसे वर्णन करता हूं क्योंकि मेरी अत्यन्त विस्था 'विभूतियों का अन्त नहीं है ।। १९ ॥

भगवद्गीता अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । ग्रहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एंव च२०॥ हे गुंडाकेश ! मैं समस्तं माणियोंके मध्य में स्थित रहने वाला आत्मा हूं, तथा मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि, मध्य और : अवसान अर्थात्-उत्पत्ति, पालन और विनाश करने वाला हूं ॥ २०॥ आदित्यांनामहविष्णुज्योतिषारविरंशुमान मरीविसरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ।। हे अर्जुन ! मैं वारहों आदित्यों में विष्णु,प्रकाश करने वाले पदार्थों के बीच में सहस्रकिरणधारी सूर्य, उणञ्चास पचनों के मध्य में मरीचि और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूं ॥ २१॥ वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामास्मिवासवः इन्द्रियाणां मनश्चास्ति भूतानामस्मि चेतन चारों वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र १-निद्राको जय करने वाले ! अर्थात हे निरालस्य !

भाषाटीका-अ.१०। इन्द्रियों के मध्य में मन और संपूर्ण प्राणियों में चैतन्यता ( सत्ता ) मैं ही हूं ॥ २२ ॥ रुद्राणांशङ्करश्चास्मि वित्तशोयक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् एकादश रुद्रोंमें शङ्कर, यो और राक्षसोंमें कुत्रर, वसुओंके बीचमें अग्नि, तथा पर्वतों में सुमेरु पर्वत मैं ही हूं।॥ २३॥ पुरोधसां च मुख्य मां विद्धि पार्थ वृहस्पतिम् सेनानीनामहं स्कन्द सरसामस्मि सागरः२४ है पार्थ ! पुरेहितों के मध्य में मुख्य ( पुरो- हित) वृहस्पतिरूप मुंझे ही जानो,सेनापतियों में स्वामिकार्तिकेय और संपूर्ण जलाशयों में सागर मैं ही हूं ॥२४॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानांजपयज्ञोऽस्मिस्थावराणां हिमालयः सब ऋषियोंमें भृगु, (सार्थक )शब्दों में एक भगवद्गीता। अक्षर (ओम् )यज्ञोंमें जपरूप यज्ञ,तथा स्थावरों में हिमालय पर्वत मैं ही हूं ॥ २५ ॥ अश्वत्यः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथ सिद्धानांकपिलोमुनिः। मैं सम्पूर्ण वृक्षों में अश्वत्थ (पीपल), देव- पियों में नारद, गन्धों में चित्ररथ और सिद्धा: में कपिल मुनि हूं ॥ २६ ॥ उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।। ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्२७ हे अर्जुन ! मुझे अश्यों के बीचमें अमृतके अर्थ सागर मथने के समय उत्पन्न हुआ उच्च- श्रवा, हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा- रूप मुझेही नानो ॥२७॥ आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुकु। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पःसाणामस्मि वासुकि: आयुधों में वज्ररूप, गौओं में कामधेनु, मजा भाषाटीका-अ०१७ उत्पन्न करने वाला कामदेव, तथा सोंमें वासुकि मैं ही हूं ॥ २९॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणोयादसामहम्। पितॄणामर्थमा चास्मियमः संयमतामहम्२९ नागों में शेषरूप, जलचरोंमें वरुणस्वरूप, पितरों में : अर्थमा और दण्ड देनेवालों में यमरूप मैं ही हूं ॥ २९ ॥ प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काला कलयतामहमा गाणांच मृगेन्द्रोहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।। मैं दैत्यों में प्रहलाद, गणना करनेवालों में काल, मृगोंमें मृगेन्द्र (सिंह), और पक्षियों के मध्यमें गरुड़ हूं ॥ ३०॥ पवनः पवतामास्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणांमकरश्वासि स्रोतसामस्मि जाह्नवी १-श्रीतारानाथ तर्कवाचस्पति भयंचायेने 'नाग' शब्दका नराफारसर्प' अर्थ लिखा है और ब्रह्मावधूत श्रीसुखानन्दनाथने 'बहुतफणवाले सर्प' अर्थ किया है।

१६८ भगवीता। पवित्र करनेवालोम ( वा निरन्तर वेग चलनेवालाम ) पवन, शस्त्रधारियों में रामचन्द्र, मत्स्यों में मकर, तया नदियोंमें जंझुकन्या गङ्गाजी मैं ही हूं ।। ३१.॥ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विधानां वादःप्रवदतामहम् हे अर्जुन ! सृष्टिका उत्पन्न, पालन और संहार करने वाला मैं ही हूं, सब विद्यामि वेदान्तविद्या, और वादकरने वालों में तक भी मैं ही हूं ॥ ३२॥ अक्षराणानकारोलिन्छःप्तामासिकस्यर अहमेवाक्षयः कालोधाताहंविश्वतोमुखा मैं ही अक्षरों में अकार,समासोंमें टून्दू समास १-विन्ही २ टीकाकारोंने 'रामः का 'परशुराम' अर्थ लिखा है। • २-'धाताविश्वनमुखः' का कर्मफल देनेवाला, और ' का रचयिता' भी अर्थ किसी ने किया है।

भापाटीका-१०.1 नाशरहित काल ( समय ) और चतुर्मुख ब्रह्मा हूं ॥ ३३ ॥ मृत्युः सर्वहरश्वाहमुद्भवश्व भविष्यताम् ।.. कति श्रीक्चिनारीणांस्मृतिमेधाधृतिःक्षमा संवका प्राण हरनेवाला मृत्यु, उत्पन्न होने वाले पदार्थों का उत्पत्ति स्थान, स्त्रियों में कीर्ति, लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, वुद्धि, धारणाशक्ति और क्षमा मैं ही हूं ॥३४॥ बृहत्साम तथासाम्नां गायत्रीछन्दसामहम् मासानां मागशीर्षोहमृतूनां कुसुमाकरः॥ मैं सामगायनों में वृहत्सामरूप, छन्दों ( वेद मन्त्रों ) में गायत्रीरूपे, मासोंमें मार्गशीर्प, और ऋतुओं में वसन्त ऋतु हूं ॥३५॥ द्यूतं छलयताममि तेजस्तेजखितामहम् । जयोस्मि व्यवसायोस्मि सत्त्वंसत्त्ववतामहम् छल_करनेवालों में धूत, तेजस्वियोंमें साक्षात् १७० भगवद्गीता। तेजःस्वरूप, ( जयमाप्त करनेवालों में ) जय, ( उद्योगियों में उद्योग तथा पराक्रमियों में परा. क्रमस्वरूप भी मैं ही हूं ॥३६ ॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानांधनंजयः मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।। यदुवंशियों में वासुदेव,पाण्डुवंशियों में अर्जुन, मुनियों के बीच में व्यासजी और कवियों के मध्य में शुक्र भी मैं ही हूं ॥ ७ ॥ दण्डोदमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।। . 'दमन करने वालों में दण्डरूप, शत्रुओं के जयकी कामना करनेवालों में नीति, गोप्य (छिपाने के योग्य ) पदार्थों में मौन और ज्ञानी पुरुषों में ज्ञानरूप मैं ही हूं ॥८॥ यचापि सर्वभूतानां बीज तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् हे अर्जुन ! संपूर्ण प्राणियों का वीज (कारण) भाषाटीका अ० १०॥ १४१ जो है वह मैं ही हूं, चर और अचरों के बीच में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो सुझसे भिन्न हो ।। नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनांपरंतप। एषलूद्देशतः प्रोक्तोविभूतेर्विस्तरोमया ॥४०॥ हे परमतपस्वी ! मेरी अलौकिक विभूतियों का अन्त नहीं है, उन विभूतियों का जो यह विस्तार वर्णन करा है यह भी संक्षेप ही से कहा है ॥४०॥ यद्यद्रिभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम्॥ जो २ ऐश्वर्यवान्, श्रीमान् , अथवा किसी प्रकार के चमत्कार से युक्त हैं, हे अर्जुन ! उन सवको तुम मेरेही अंश से उत्पन्न हुआ जानो।। अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातनं तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितोजगत्।। इतिश्रीमद्भगवहीतासुपनिषत्सु ब्रह्मविद्याया योगश.ने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगोनाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ Aud १-ज्ञानेनेत्यपि पाठभेदः॥

भगवद्गीता! अथवा हे अर्जुन ! तुम्हें बहुत ज्ञानों के उप- देश करने से क्या है ? तुम इतना समझलो कि-मैं इस सम्पूर्ण संसारको एक अंश से व्याप्त करके स्थित होरहा हूं ।-४२ ।।::: इतिश्रीमापाटीकायां दशमोऽध्यायः ।।:१० ॥ एकादशोऽध्यायः अर्जुनउवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतोमम १ अर्जुन बोले कि- हे भगवन् ! मेरे ऊपर कपाकरके आपने जो अध्यात्म नामक परमगोपनीय वचन कहे उनसे भेरा (आत्मविषयक ) अज्ञान दूर होगया ॥२॥ भवाप्ययौ हिभूतानां श्रुतौ विस्तरशोमया। त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपिचाव्ययम् भापाटीमा-०११ १७३ है कमलनयन ! माणियोंका जन्म और विनाश श्रापट्टी से होता है, यह बात मैंने विस्तारपूर्वक सुनी, और आपका अविनाशी माहात्म्य भी मैंने सुना ॥२॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥२॥ हे परमेश्वर ! आपने अपने श्रात्मा को जिस प्रकार का वर्णन करा वास्तव में वैसा ही है,परंतु हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके उस ईश्वरीयरूपको देखने की इच्छा करता हूं ।। ३ ।। मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो योगेश्वर ततोमे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ४ हे प्रभो ! यदि आप मुझे उस श्रेष्ठ स्वरूप के देखने के योग्य समझे तो हे योगिराज ! उस नाशरहित अपनी आत्मा का दर्शन कराओ ।।४। श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।

-- १७४ भगवद्गीता। नाना विधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च श्रीभगवान् वोले कि- हे पार्थ! अनेक प्रकार के वर्ण और आकृति, (सुरत) काले,अलौकिक मेरे सैंकड़ों और हजारों रूपोंको तुम देखो ॥५॥ पश्यादित्यान्वसन्चद्रानश्विनौ मरुतस्तथा। वहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारता॥६॥ हे भारत ! सूर्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, तथा मरुद्गण और प्रयम कभी न देखहुए बहुत. से आश्चयों को तुम देखो ॥६॥ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् मम देहे गुडाकेश यच्चान्यदृष्टुमिच्छसि ७ हे गुडाकेश ! इस मेरे शरीर के एक स्थान, में स्थितहुए चराचर (स्थावर, जंगम ) सहित सम्पूर्ण संसार को देखो,और भी जो कुछ देखने की तुम्हारी कामना हो सो सब देखो ।।७।।

भाषाटीका-१० ११!. न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चतुःपश्य मे योगमैश्वरम् परनु हे अर्जुन ! तुम इन नेत्रोंसे मेरे स्वरूप- को नहीं देखसक्ते हो,इसकारण मैं तुमको दिव्य- दृष्टि देता हूं उनमें तुम मेरे ऐश्वर्ययोगको देखना सञ्जयउवाच। एवमुक्त्वा ततोराजन्महायोगेश्वरोहरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ संजय बोले कि- हे महाराज धृतराष्ट्र ! इसमकार कहनेके अन- स्तर महायोगिराज श्रीकृष्ण भगवान्ने अर्जुनको अपना उत्कृष्ट ईश्वररूप (विराटप) दिखाया अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ।। दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । . सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ११.

१५६ 1 भगवीता। अनेकों मुख, बहुत से नेत्र और अनेक प्रकार के अद्भुत दर्शनों करके युक्त, तथा विविध प्रकार के अलौकिक ग्राभूपणोंसे समन्वित और उद्या हुए अनेकों दिव्य आयुधों सहित, दिव्य पुषी की. माला और श्रेष्ठ वस्त्र धारण करे,दिव्य सुगन्धियों से लिप्त संपूर्ण प्रकार के आश्चर्यों का सम्प,अन्त- रहित, देवस्वरूप और चारों ओर मुखवाला (अपना दिव्यरूप)दिखाया ॥ १० ॥ ११ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगपदुत्थिता । यदि भासदृशीसा स्थानासस्तस्यमहात्मनः यदि आकाश में एक साथही सहस्र सूर्योका उदय होजाय तो उन महात्मा भगवान् की कान्ति की समान (तेज) होसक्ता है ॥ १२ ॥ तवैकस्यं जगत्कृत्ल प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यदेवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।॥ १३ ॥ इस समय अर्जुनने देवाधिदेव श्रीकृष्णचन्द्र के .

भाषाटीका-अ०.११॥ १७७ १ शरीर के एक भागही में अनेक प्रकारसे स्थित हुए सम्पूर्ण संसारको देखा ॥ १३ ॥ . . ततः सविस्मयाविष्टोदृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४॥ तव पाचर्ययुक्त और. पुलकायमान् होकर अर्जुन ने श्रीकृष्णको प्रणामकर हाथ जोड़के कहा।। अर्जुनउवाच । V पश्यामि देवास्तव देव देहे, सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अर्जुन वोले कि- हे देव ! मैं तुम्हारे शरीर में सम्पूर्ण देवता और समस्त प्राणीमात्र के समूह को, तथा कम- लासन के ऊपर स्थित हुए ब्रह्माजी, महादेव, सम्पूर्ण ऋषि मुनि और दिव्य सौको देखताहूं।

भगवद्रीता। अनेकवाहदरवक्त्रनेत्रं, पश्यामित्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादि, पश्यामि विश्वेश्वर विश्वल्प ॥ १६ ॥ हे विश्वनाथ ! मैं आपके अनेक वाहु, अनेक उदर,अनेक मुख और अनेक नेत्र इसप्रकार चारों ओर से अनन्तरूप देखरहा हूं, हे विश्वकप ! मैं आपकी आदि, मध्य और अन्त नहीं देखता। किरीटिन गदिनं चक्रिणं च, तेजोराशिं सर्वतोदीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुनिरीक्ष्यं समन्ता- हीसाऽनलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥१७॥ मैं आपको किरीटयुक्त, गदा और सुदर्शन- चक्र धारण करे, तेजके पुज, चारों ओर से प्रकाशमान्, चारों ओर से प्रदीप्त हुई अग्नि और सूर्यकी समान कान्तिमान् अतएव देखने के भाषाटीका-अ०११॥ अयोग्य और अममेय (ममाण करने के अयोग्य) देखता हूं ॥१७॥ त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं, त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातनस्त्वं पुरुषोमतोमे ॥१८॥ हे नाथ ! मेरी समझ में आप अविनाशी, परब्रह्म, जानने के योग्य और इस संसार के परम आधार, सदा एकरूप, सनातनधर्म के रक्षक,अतएव सनातन पुरुष माने गये हो ॥१८॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहृताशवक्त्रं, स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ।। १६॥ हे विश्वेश्वर ! में आपको आदि, मध्य और अन्तरहित, अनन्त पराक्रमी, अनन्त भुजाओं सहित, सूर्य, चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं ऐसा, मज्व- : १४० भगवाहोता लिन अग्निकी समान चमकीले मुखवाला और अपने तेजके द्वारा सम्पूर्ण संसार को तपाते हुए देखता हूं ॥ १९ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि, व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं,. लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ हे महात्मन् ! आकाश और भूमी के मध्य में अद्वितीय आपने सम्पूर्ण संसार और दिशाओं को व्याप्त कर रखा है, आपके अद्भुत और उग्र इस रूपको देखकर त्रिलोकी व्यथित होरही है ।। अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति, केचिद्रीताः प्राञ्जलयोगृणन्ति । ; स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः, स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः २१ १.रूपमुग्रं तवेदमित्यपि पाठान्तरम् । ..

मापाटीका 12191 १८१ हे भगवन् ! यह देवसमुदाय भयभीत होकर श्रापकी शरण में प्राप्त होरहे हैं उन में से कोई२ हाथ जोडकर आपकी स्तुति करते हैं, महीप और सिद्धगण स्वस्ति ववन कहकर सुन्दर २ स्तुतियों करके आपकी स्तुति करते हैं ।। २१ ।। रुद्रादित्या वसवोये च साध्या- विश्वेऽश्विनी मम्नश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा- वीक्षन्ते त्वां विरिमताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रुद्र, सूर्य,वसु और साध्य,विश्वेदेव अश्विनी- कुमार, मरुद्गण, पितर, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धसमुदाय यह सब विस्मयको प्राप्त होकर आपको देखते हैं ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं, महाबाहो वहुवाहरुपादम्। वहदरं बहुदंष्ट्राकरालं, दृष्ट्रवा.लोकाः प्रन्यथितास्तथाहुम् ,२३ १८१ भगवीता। हे महाबाहो ! अनेक मुख, अनेक नेत्र, अनेक भुना, अनेक जम, तथा अनेक चरणचाले एवं मभूतउदर और अनेक दन्तों से कराल ऐसे आपके इस महारूप को देखकर सवलोक व्यथा को प्राप्त होरहे हैं, और ऐसे ही मैं भी भयभीत होरहा हूं ॥ २३॥ नभाशं दीसमनेकवर्ण, व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वांप्रव्यथितान्तरात्मा, धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४॥ हे विष्णो ! श्राकाश का स्पर्श करने वाले (अर्थात् ) अत्यन्त उन्नत, मकाशमान्, अनेक वर्णवाले और जिसका मुख फैल रहा है ऐसे, उज्ज्वल विशाल नेत्र वाले आपके इस स्वरूपको देखकर मेरा अन्तरात्मा:अधिक दुःखी होरहा है, अंतएव मुझे धैर्य और शान्ति माप्त नहीं होती २४ मापारीका-अ.११. दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि, दृष्ट्बैच कालानलसन्निभानि। दिशोन जाने न लभे च शर्म, प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥२५॥ दंष्ट्रा (करालदाढों) से अति भयानक मनय- काल की समान अापके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं पहिचानता और सुख को प्राप्त नहीं होता, अतएव हे देवाधिदेव ! हे जगन्निवास ! ! आप मेरेऊपर मसन्न होमो २५ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा, सर्व सहैवावनिपालसंधः। भीष्मोद्रोणः सूतपुत्रस्तथासी, सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्ताणि ते त्वरमाणा विशान्त, दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिदिलग्ना दशनान्तरेषु, संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाः ॥२७॥ -- १८४ 1. भगवद्गीताः। सम्पूर्ण राजाओं करके सहित राजा धृतराष्ट्र के दुर्योधनादिक पुत्र एवं हमारे मुख्य २ योधाओं करके समन्वित भीष्म, द्रोण और कर्ण:-यह सब वीरपुरुप दाडों से विकराल और भयानक आप के मुखों में अत्यन्त शीघ्रतासे प्रवेश कररहे हैं, और बहुत से वीर आपके दांतों में उलझ रहे हैं, अतएवं जिनके शिर भग्न' होगये हैं ऐसे दीखते हैं । यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा, समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा- विशन्ति वक्तायभितोयलन्ति ॥२८॥ जैसे नदियों के बड़े २ जननवाई समुद्र ही में जाके गिरते हैं, ऐसेही यह शावीर राजा लोग चारों ओर से प्रकाशमान आपके मुखों में प्रवेश करते हैं ।। २८ ॥ 9-'अभिविज्वलन्ति' इत्यापपाठः ॥. .

भाषा-1 १८५ यया प्रदीसं ज्वलनं पतङ्गा- विशन्ति नाशाय समूहवेगाः। तयैव नाशाय विशन्ति लोका- स्वापि वकागि समृद्धवेगाः ।। २६ ॥ जिस प्रकार पतंगे (शन भ)अपनी मृत्यु के अर्थ प्रचण्ड हुई अग्निमें अत्यन्त वेगसे मवेश करते हैं ऐसही यह सर वीरजन नाराके लिये वेगपूर्वक आपके मुखमें मवेश कर रहें है ॥ २९ ॥ लेलिससे असमानः समन्ता- ल्लोकान्समयान्वदनै लद्धिः। तेजोभिरापूर्य जगत्सम, भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥३०॥ हे विष्णो ! आप भी चारों ओरसे प्रकाशमान मुखों करके संपूर्ण वारीको निगलते हुए वारंवार श्रास्वादन कर रहे हैं, और आपकी प्रचण्ड प्रभा सारे संसारको व्याप्त करके अपने तेजसे तपारही हैं।।

भगवद्गीता ! . प्राख्याहि मे को भवानुग्ररूपो-, नमोस्तु ते देववर प्रसीद। विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमायं, नहि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ आप ऐसे उग्ररूप कौन हैं ? यह मुझसे कहो, हे देवराज ! मैं आपको नमस्कार करता हूं, आप मेरे ऊपर प्रसन्न होजाइये, संसारके श्रादि कारण- रूप आपको मैं जाननेकी इच्छा करता हूं, क्योंके श्रापकी इस चेष्टा को नहीं जानता ॥ ११ ॥ श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्मवृद्धो. लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे, पेऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ।। ३.२ ।। श्रीमगवान वोले कि- मैं संसारका विनाश करनेवाला उत्कट काल भाषाठीका-भ.११॥ हूं, लोकोंका क्षय करने के लिये यहां प्रवृत्त हुआ हूं यदि तुम युद्ध न करोगे तोभी यह जितने योधा सेना में हैं, इनमें से कोई भी नहीं रहेगा ॥१२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशोलभस्व जित्वा शत्रून्झुक्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३॥ इसकारण ( इनको स्वयमेव नष्टहुआ जानकर, तुम उठो और यशको प्राप्तकरो, इन शत्रुओं को जीतकर संपन्न राज्यको भोगो, हे सव्यसाचिन् । अर्जुन ! मैंने इन योधाओं को प्रथमही हननकर रक्खा है, तुम केवल इनके मारने में निमित्तमात्र बननाओ ।। ३३ ।।.. द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण तथान्यानपि योधवीरान् । १-जो वाये हाथसे भली प्रकार वाण चलासक्ता हो उसे सन्य. साची कहते हैं।

ace भगवद्गीता। मया हतास्त्वं जहिमाव्यथिष्टा, युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥३४॥ मेरे मारेहुए द्रोणाचार्य, भीष्म जयद्रथ और कर्ण एवं औरर भी योधाओंको तुम मारो, तथा खेद मत करो, ( मेरी अाज्ञाको मानकर) युद्ध करो, रणमें नुम शत्रुओंका जय करोगे ३४ सञ्जय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य, कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी। 'नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्ण, सगद्गदं भीतभीतः प्रगाम्य ॥ ३९ ॥ संजय कहने लगे कि- श्रीकृष्ण भगवान् के ऐसे वचन सुनकर मुकुट- धारी अर्जुन हाथ जोडकर कंपित होने लगे फिर . प्रणाम कर भयभीत होके श्रीकृष्णसे गद्गद होकर कहने लेग ।। ३५ ॥

भाषांटीका-अ०११॥ १८९ . अर्जुनउवाच । स्थाने हपोकेश तव प्रकीयां, जगत्मदृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भातानि दिशो द्रवन्ति, सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः॥ ३६॥ अर्जुनने कहा कि- हे हपीकेश । आपकी कीर्ति से संपूर्ण संसार प्रसन्न और प्रेम में मग्न होता है और राक्षस भयभीत होकर चारों ओर को भाग रहे हैं एवं संपूर्ण सिद्धोंके समुदाय नमस्कार कर रहे हैं यह योग्य ही है ॥१६॥ कस्माच्च तेन नमेरन्महात्मन्, गरीयसे. ब्रह्मणोऽप्यादिकर्ने । अनन्त देवेश जगन्निवास, त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ १७ ॥ हे महात्मन् ! हे अपरिच्छिन्नरूप! हे देवराज !

भगवद्रीता। हे जगन्निवास ! आप सबसे महान् और ब्रह्मा के भी आदि कारण हैं एवं सत् तथा असत् से भी जो परे है वह भी आपही अविनाशी हैं, तो फिर वो सिद्धादिक आपको नमस्कार क्यों न करें १॥ ३६॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यंच परं च धाम, त्वयाततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८॥ हे अनन्तरूप ! आपही आदिदेव हैं। पुराण पुरुष और इस संसार के लयस्थान भी आप ही हैं, सब के ज्ञाता, जानने के योग्य उत्तम वस्तु और परम तेजःस्वरूप भी आप ही हैं, आपने इस संसारको व्याप्त कर रक्खा है ॥ ३८॥ वायुयसोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।

भानाटीका-१०००। १९१ नमोनमरतेऽस्तु सहस्रकृत्वः, पुनश्च भूयोऽपि नमोनमस्ते ॥ ३६॥ आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, ब्रह्मा. और ब्रह्माके मपितामहरूप है, अतएवं श्रापको सहस्रों नमस्कार है और फिर भी वारं- पार नमस्कार है ॥ १९॥ नमः पुरस्तादथ पृष्टतस्ते, नमोस्तु ते सर्वतएव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं, सर्व समामोषि ततोऽसि सर्वः । १० ॥ हे नाथ ! आपका वीर्य और पराक्रम अनन्त है, आपने सम्पूर्ण संसार को व्याप्त कर रक्खा है, इसकारण सर्वात्मक हो, अतएव आपके सन्मुख तथा पीछे एवं चारों ओर से आपको नमस्कारहै।। सखतिमत्वा प्रसनं यदुक्तं, हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।

१९२ भगवद्गीता । अजानता माहमानं तवेदं, मयाप्रमादात्मणयेन वापि ॥४१॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोसि, विहारशय्यासनशोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं, तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।। ४२ ।।. हे स्वामिन् ! आपकी महिमा को न. जानकर मैंने आपको अपना मित्र मान कर ' हे कृष्ण! हे यादव ! और हे सखे । इस प्रकार प्रमाद वा प्रीतिसे जो कहा, तथा हे अच्युत ! मैंने जो परिहाससे विहार, शय्या, प्रासन और भोजन के समय अकेले वा मित्रों के सन्मुख आपक अपमान किया हो तिसकी मैं क्षमा मांगता हूँ । पितासि लोकस्य चराचरस्य, त्वमस्य पूज्यश्च गुरुगरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ।।४३ ॥

भाषाटीका-१०१११ आप स्थावर जंगमरूप इस समस्त संसारके पिता, पूज्य और अत्यन्त उत्कृष्ट गुरु हैं, आपका प्रमाव अनुपम है, अतएव त्रिलोकीभर में आप के समान कोई नहीं है, तो फिर आपसे अधिक कहां से होगा ॥ ४३।। तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय काय, प्रसादये त्वामहमीशमीडयम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः, पियाप्रियायाहसि देव सोदुम् ॥४४॥ हे परमेश्वर ! स्तुति करने के योग्य आपको मैं शिर नवाकर प्रणाम करके यह प्रार्थना करता हूं कि जिस प्रकार पुत्रके अपराधोंको पिता और जैसे प्यारा मित्र हित करने की कामना से मित्रके अपराधीको सहता है, ऐसेही पापभी १.-सखेव सख्युः+++प्रिया प्रियायाहसि, इसका किन्हीं। ने इसप्रकार खोला है कि-प्रिय ( पति ) प्रिया (प्यारीबी) के अपराधों को सहन करता है परन्तु-श्रीदुर्गाप्रसादजी लिखते भगवट्टीता। मेरे अपराधों को सहन करो ॥ ४ ॥ अदृष्टपूर्व हृपितोऽस्मि दृष्ट्वा, भयेन.च प्रव्यथितं मनोमे । तदेव में दर्शय देव रूपं, प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥४५॥ प्रथम कभी न देखे हुए ऐसे आपके रूप को देखकर तो मैं प्रसन्न हूँ, और भयसे मेरा मन प्राप्त होरहा है, इस कारण हे देवोंके स्वामी हे जगनिवास ! मुझे वही अपनारूप दिखानी और मेरे ऊपर मसन्न होजाओ ॥४५ किरीटिनं गदिन चकहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमह तथैव । तेनेव रूपेश रूपेण चतुर्भुजन, सहस्रवाहो भव विश्वमूत॥ ४६॥ है कि देवादिकोंन श्रीधरस्वामीकी व्याख्यानमार प्रिय की प्रसन्नता ऐसा व्यायान दिया है। व्यथा को - भाषाटीका- अ. 191 हे सहस्रवाहो ! मैं आपको उसी प्रकार मुकुट गदा और हाथमें चक्र धारण करे देखने की इच्छा करता हूं, हे विश्वमूर्ते ! (विराट्रप) आप उसी चतुर्भुजीरूप को धारण करो ॥४६॥ श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं, रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाय, यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन ! मैंने मसन्न होकर अपने योगवलसे तुम्हें यह तेजःस्वरूप, अनन्त और आद्य, परम अद्भुत विश्वरूप दिखाया इस मेरेरूपको तुम्हारे अतिरिक्त और किसी ने नहीं देखा ॥ ४७ ॥ न चेदयज्ञाध्ययनैन दान-

भगवद्गीता ।।
न च क्रियाभिने तपोशिप्रैः।
एवं रूपः शक्य अहं नृलोके,
द्रष्टुं त्वदन्येन कुस्प्रवीर ॥ ४८ ॥
हे कौरवों में श्रेष्ट ! इस मनुष्यलोक में मेरे इस
विराझपको तुम्हारे विना और कोई भी पुरुप
वेदपाठ, यज्ञों के अनुष्ठान, दान, और अग्निहो-
त्रादिक श्रेष्ट क्रिया एवं घोर तप करकेभी देखने
को समर्थ नहीं है ।। ४८॥
मा ते व्यथामा च चिन्हलावो-
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतमी: प्रीतमनाः पुनस्त्वं,
तदेय मे स्पमिदं प्रपश्य ॥४६॥
मेरे ऐसे उग्ररूपको देखकर तुम व्यथाको प्राप्त
मत होश्रो, और तुम्हारी बुद्धिभी मन्द न होय,
तुम भयको दूरकर मनमें प्रसन्न होके फिर मेने
उसी सौम्यप के दर्शन करो ॥ १९ ॥

गापाटीका--अ०११॥ ५९४ . संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा, स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं, भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ १० ॥ संजय बोले कि- श्रीकृष्ण भगवान् ने अर्जुन से इस प्रकार कह कर अपना सौम्य ) रूप दिखाया, भगवान् ने सौम्यरूप धारण करके ( और विश्वरूपके दे- ने से भयभीतहुए)अर्जुन को सावधान किया। अर्जुनउवाच । ष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । : दानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः५१ अर्जुन वोले कि- हे जनार्दन ! मैं आपके सौम्य (देखने में .

भगवाहोता। मुन्दर ) इस नरदेह को देखकर चित्त प्रसन्न प्रकृति को प्राप्त हुआ हूं ॥ ११॥ श्रीभगवानुवाच । - सुदुर्दशामिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवाअप्यस्यरूपस्य नित्यं दर्शनकाक्षिणः । श्रीभगवान बोले कि- हे अर्जुन ! तुमने मेरे जिस झपके दर्शन करे वह परम दुर्लभ है, इस मेरे रूप को देवता : देखनेकी नित्य इच्छा करते रहते हैं ।। ५२ ।। नाहं वेदैन तपसा न दानेनन ज्यया। शक्यएवंविधोद्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा जैसे मेरे रूपके सुमन दर्शन किये हैं, ऐस मेरारूप वेदपाठ, तप दान, और यज्ञ के द्वारा देखनको कोई समर्थ नहीं है ॥५५॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्यअहमेवं विधोर्जु ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्रवेन प्रवेष्टुंध परंतप ।। ५१ भापाटीका-अ०१२॥ हे परंतप अर्जुन ! विश्वरूप मैं अनन्यभक्ति और शास्त्रों के तत्वों से जानने देखने और मिलने के गोग्य हूं ॥ ५४॥ पत्कर्मकृन्मत्परमोमद्भक्तः सङ्गवर्जितः । नेवैः सर्वभूतेषु यः समामेति पाण्डव ५५ इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णाजुनसंवादे विश्वरूपदर्शनंनामका- दशोऽध्यायः॥ ११॥ हे पाण्डवा जो पुम्प मेरे ही अर्थ शुभकर्म करता, मुझे ही परमगति मानता, और सत्र को आ- सक्तिरहित है एवं किसी से वैर नहीं करता ऐसा मेरा भक्त मुझेही माप्त होता है ॥ ५५ ॥ इति श्रीमाषाटीकायामेकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः अर्जुनउवाच । एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

भगवद्गीता। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः? अर्जुनने कहा कि- हे श्रीकृष्ण ! जो पुरुष इस प्रकार निरन्तर भक्तियुक्त होकर आपके साकाररूपकी उपासना करते हैं, तथा जो विनाशरहित निर्गुणरूपकी उपा: सना करते हैं इन दोनों में से अधिक श्रेष्ठ कौनसे भक्त हैं ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । मय्यावेभ्य मनोये मां नित्ययुक्ताउपासते। श्रद्धया परोपेतास्ते मे युक्ततमा मता॥२|| श्रीभगवान् बोले कि- हे अर्जुन ! जो पुरुष अपने चित्तको मेरे विष लगाकर श्रद्धापूर्वक एकाग्रचित्तसे नित्य मेरी उपा सनाकरते हैं, वेही भक्त हमारे मतमें श्रेष्ठ मानेगये। ये त्वक्षरमनिर्देश्यमत्र्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यञ्च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।५॥ ..

सापाटीसा-अ. १२ सनियम्यन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्रामुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४॥ समस्त इन्द्रियों के समुदाय को स्वाधीन करके सरको अभेददृष्टि से देखनेवाले और सम्पूर्ण प्राणियों के हित करने में निरत होकर जो पुरुष विनाशरोहित. अनिर्देश्य(अर्थात् मनुष्यादिशब्दक निर्देश करने के अयोग्य ) अव्यक्त ( चक्षु आदि इन्द्रियों से अग्रास) सर्वव्यापक,चिन्तवन करने को अंशस्य, कूटस्थ ( अर्थात् सत्र काल में एकहीरूप से स्थित ), निश्चल और सदा एकरस ऐसे मेरे रूपकी उपासना करते हैं, वे उपासक भी मुझको प्राप्त होते हैं ॥३॥४॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ताहि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५॥ परन्तु मेरे अव्यक्तरूपमें आसक्तचित्त वाले उपा. सकों को (अनुष्ठानादि करने में ) अधिक क्लेश भगवीता - होताहै, कारण कि-देहधारियों ( दहात्माभिमा- नियों) को आत्मस्वरूपविषयक चित्ताने दुःख प्राप्त होती है ॥ ५ ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि मन्यस्यमत्पराम अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्तउपासते ॥६॥ तेषामहं समुद्धा मृत्युसंसारसागरात्। । भवामिन चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।। हे पार्थ ! (लौकिक और वैदिक ) सम्पूर्ण कम्माँको मेरे विप अर्पण करके मेरी भक्ति में तत्पर हुए अनन्यभाक्तिरूप उपाय करके जो भक्त मेरी उपासना और ध्यान करते हैं,जिन्होंने मेरे विषे चित्त लगा रक्खा है ऐसे उन अपने भक्तोंकों मैं मृत्युरूप संसारसागरसे शीघ्र ही उद्धार करताहूं। मय्यवे मनाधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अतऊर्ध्व न संशयः॥ हे अर्जुन तुम अपनेमन और बुद्धिको केवल भाषाटीका-१०१ । उझे परमेश्वर ही में लगाओ, तो फिर शरीर यागने के अनन्नर निश्चय मेरे ही विष निवास करोगे ॥ ८॥ अथ' चित्तंममाधातुं नशक्नोषिमयिस्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततोमामिच्छाप्तुं धनन्जयः हे धनञ्जय ! और यदि तुम मेरे वि स्वकीय चित्तवृत्तिको स्थिर करनेको समर्थ नहीं होती गाभ्यासके द्वारा मेरे माप्त होनेकी इच्छा करो!! अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमोभव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिडिमवाप्स्यसि। यदि योगाभ्यास करने में भी असमर्थ होओ गौ मेरे आराधनम्प श्रेष्ठकर्म करने में तत्पर रहा। मेरे अर्थ कर्म करने से भी तुम परम सिद्धिको माप्त होयोगे ॥१०॥ 'अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुमद्योगमाश्रितः ।

२०४ भगवद्गीता सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ११ हे अर्जुन ! यदि मेरे अर्थ कर्म करने में भी तुम अशक्य होओ तो चित्तवृत्तिको रोककर अनन्य भाव से मेरा आश्रय लेकर और कर्मों के फ़लको सर्वथा त्यागके कर्मका आचरण करो ॥११॥ श्रेयोहिज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाड्यानविशिष्यते ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छाान्तरनन्तरम् क्योंकि-मेरे स्मृतिरूप-अभ्यास से बान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान और ध्यानसे कर्मफलका त्याग उत्तम है नथा त्यागसे शीघ्रही शान्ति प्राप्त होती है। अद्वेष्टासर्वभूतानां मैत्रः करुणएव च । निर्ममोनिरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी १३ सन्तुष्टः सततंयोगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्योमद्भक्तः स मे प्रियः१४ किसीसे द्वेप न करने वाला, सब प्राणियोंका मित्र,सबके ऊपर दयावान ( देहादिकों में ममता मातारीफा--अ.१३ राहेत अहंकारशून्य, सुख और दुःखको समान मानने वान्ना,शान्तचित्त, निरन्तर सन्तोपी, योगी (स्थिर चित्तवाला), चित्तको अपने अधीन परखने वाला, ( वेदान्नादि शास्त्रों में ) दृढ निश्चयवाला, गवं मेरे ही विपै मन और बुद्धिको अपंगा करने वाला जो मेरा भक्त है वही मुझे प्यारा है।॥ १३ ॥१४॥ यस्मान्नोद्विजतेलोकोलोकान्नोहिजते च यः हपामर्षभयोगैर्मुक्तो या सचमे प्रियः।।१५। जिस कर्मनिष्ठ पुरुपसे कोई उद्वेगको प्राप्त न हो, और जो स्वयंभी किसी अन्यसे उद्विग्न न होय तथा जिसने हर्प, विपाद भय तथा उद्वेग (चित्तके क्षोभ)को त्यागदिया है वही भक्त मुझे प्यारा है ॥ १५॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्षउदासीनोगतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यामद्भक्तःसमे प्रियः१६ भगवद्गीता । किसी भी वस्तु में इच्छान करने वाला, पवित्र और चतुर, उदासीन, व्यथारहित, तथा पलकी कामनाको त्यागकर कर्म करनेवाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे मिय लगता है ।। १६ ।। योन हृष्यति नदेष्टि न शोचति न कांक्षति शुभाशुभपरित्यागीभक्तिमान्य समे प्रियः जो (मियवस्तुके प्राप्त होनेपर) प्रसन्न न हो, अप्रिय वस्तुको पाकर) द्वेष न करे, (इष्ट वस्तु के नाशका) शोक नहीं करता, और किसी भी वस्तु के प्राप्त होनेकी इच्छा नहीं करता शुभ और अशुभको त्यागकरके केवल मेरीही भक्ति करने वाला जो मेरा भक्त है वोही मेरा प्यारा है॥१७॥ समाशत्रौ च मित्रच तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः'८ तुल्यनिन्दास्तुतिौनी सन्तुष्टोयेन केनचित् ।

भाषाटीका-*-१२॥ अनिता स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियानरः । शत्रु और मित्र तथा मान और अपमान शीत और उमण एवं सुख और दुःखमें समानभाव- मानने वाला,सम्पूर्णपदार्थों में श्रासक्तिरहित,निन्दा और स्तुति को समान माननेवाला, मौनी (अ. र्थात् सत्यवोलनेकी कामनासे स्वल्प संभाषण करनेवाला) जो कुछभी प्राप्त होजाय उसी में सन्तुष्ट, नियमसे एकही स्थानमें निवास न करने वाला, और स्थिरबुद्धि वाला जो मेरा भक्त है, सब मनुष्यों में वही मुझे प्यारा है।। १८॥१९ ।। ये तुधामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। अंधानामत्परमाभक्तास्तेतीव मे प्रियाः२० इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्याथायोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसवादे भक्तियोगोनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ . जो मुझहीको सर्वस्व माननेवाले मेरे भक्त इस पूर्वोक्त अमृतकी सामान धर्मका उपदेशकाश्रद्धा- २०८ भगवडीता। पूर्वक आचरण करते हैं, अर्जुन ! ! वा मुझे अत्यन्तही प्यारे हैं ।। २० ॥ इति श्रीमापाटोकायांद्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ त्रयोदशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्योवेत्तितंप्राहुःक्षेत्रज्ञइति तद्विदः? श्रीभगवान् बोले कि- हे कुन्तीनन्दन ! इस शरीरको क्षेत्र कहते हैं, और जो इस शरीरम्प क्षेत्र को जानता है उसीको क्षेत्रज्ञ कहते हैं, ऐसा क्षेत्रज्ञ पुरुनिहीं कहा है।।१।। क्षेत्रज्ञं चापिमां विद्धिसर्वक्षेपुभारत । क्षेत्रक्षेत्रज़योर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतमम २ हे भारत ! सम्पूर्ण शरीरमें तुम मुझको क्षेत्रज्ञ भाषा-1011 २०९. जानो, (क्षेत्र) और क्षेत्रज्ञके यथार्थ ज्ञानही को मेरा सम्मत (ज्ञान ) जानो ॥२॥ तत्क्षेत्र घच याक्च यद्विकारि यतश्च यत् । सच योयत्प्रभावश्चतत्समासेन मे शृणु ३ वह शरीरयुक्त क्षेत्र जिसप्रकार का, जिन विकारों से युक्त, जिससे उत्पन्न होनेवाला है, और जैसा है, तथा वद क्षेत्रज्ञ जिन मभाओं करके. युक्त है वह सव संक्षेप से कहनाहूं तुम सुनो । ऋपिपिहुधागतिं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् प्रभसून्नपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४॥ इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके रूपको ऋषि मुनियोंने विविध प्रकारके छन्दों करके तथा युक्तिसहित और सन्देहरहित ब्रह्ममतिपादक सूत्रों करके भिन्न २ प्रकारसे वर्णन किया है ॥ ४॥ महाभूतान्यहङ्कारोवुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकञ्च पञ्च चेन्द्रियगोचरा ५ २१० भगवदगीता। 14 इच्छा द्वेषः सुखं दुःख संघातश्चेतनावृतिः एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।। ६ ।। पञ्चमहाभूत, अहंकार, बुद्धि, मूलप्रकृति, दर्श इन्द्रिये, मन और इन्द्रियों के पांच विषय, इच्छा, देष, मुख, दुःख संघात अर्थात् शरीर, चेतना और धैर्य यह सब संक्षेप से क्षेत्रके विकार कहे: गये हैं ॥५॥६॥ अमानित्वमदम्भित्वमहिंसाक्षान्तिराजवम्। आचार्योपासनं शौच स्थैर्यमात्मविनिग्रहः इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् । असक्तिरननिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं चसमचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिा मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।। १ ।। अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्

भाषार्टीका-भ.१३
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।
अभिमानरहित होना, निष्कपट रहना, अहिंसा,
शान्ति, आर्जव (सूधापन ) गुरुकी सेवा करना,
पवित्रता, स्थिरता और अपने मनका निग्रह
करना, (श्रोत्रादि ) इन्द्रियों के (शब्दादिक)
विषयों में वैराग्य, निरहंकार होना, जन्म, मृत्यु,
जरा (वृद्धभाव ) व्याधि और दुःख इन में दोष
देखना, ( स्त्री पुत्रादिकों में ) आसक्ति न करना
और (उनके सुख दुःखादि में ) सुखी दुःखी न
होना,इष्ट और अनिष्ट वस्तुकै लाभसे सदा एकाकार
रहना, मेरेही विष अनन्यभाव से अव्यभिचारिणी
भक्ति करना, एकान्त स्थान में निवास करना
प्राकृत) मनुष्यों की सभामें अरुचि करना,
आत्मज्ञान में नित्य निष्ठा करना और सत्त्वज्ञान
के प्रयोजन अर्थात्-मोक्षका अवलोकन करना इन
सबको ज्ञान कहते हैं और इसके अतिरिक्त और

भगवद्राता। सब अज्ञान है ॥ ७॥८॥॥१०॥ ११॥ ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परंबा न सत्तन्नासदुच्यते॥१२॥ अब जो कुछ जानने के योग्य आत्मस्वरूप है तिसको तुमसे वर्णन करता हूं, जिसको जानकर पाणी मोक्षको प्राप्त होता है, उस अनादि परब्रह्म को सत् (विद्यमान ) और असत्( अविद्यमान) कुछ भी नहीं कहा जासक्ता है॥ १२ ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति १३ उसके चारोंओर हाथ, चरण, नेत्र,शिर, मुख और कान हैं, और वह ब्रह्म संसार में सबको व्याप्त करके स्थित होरहा है ॥ १३ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृञ्चैत्र निर्गुणं गुणभोक्तृच १४ यद्यपि वह सम्पूर्ण इन्द्रियों का आभास अर्थात् गापाटीका-१० १३ -- प्रकाशक भी है, तयापि सब इन्द्रियोंके संवन्ध से रहित है, [ पुनादिकों में ] आसक्तिरहित और सकल ब्रह्माण्डोंका धारण तथा पालन करने वाला है, सत्त्व,रज और तम इन गुणों से रहित होकर भी इनका भोक्ता है ।। १५ ।। वहिरन्तश्च भूतानामचंर चरमेवे च । सूक्ष्मत्वात्तदाविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।। वह समस्त प्राणियों के वाहर और भीतर विद्यमान तथा जंगम और स्थावररूप है, सूक्ष्म मे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण जाना नहीं जासत्ता, और (अज्ञानियों से ) अतिदूर तथा (ज्ञानियों के ) अतिनिकट है ॥ १५ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं असिष्णुप्रभविष्णुच१६ वह आत्मा यद्यपि एकही है, तथापि सब प्राणियों में भिन्नरूपसे स्थितहुआ दीखता है, और उसको समस्त प्राणियोंका उत्पन्न, पालन २१४ भगवदीना। एवं विनाश करने वाला जानो ॥ १३ ॥ ज्योतिषामपितज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञान ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदिसर्वस्पधिष्ठितम् १७ वह सूर्यादि प्रकाशकोंका भी प्रकाशक और अज्ञानसे परे (अर्थात्-प्रधान ज्ञानस्वरूप ) है, हे अर्जुन ! बान, ज्ञान करनेके योग्य और ज्ञान के द्वारा जानने के योग्य भी वोही है,तथा वोही बुद्धि- रूपसे सबकेहृदयमें स्थित है ॥ १७॥ इतिक्षेत्र तथाज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्रक्तएतद्विजाय मदाबायोपपद्यते॥१८॥ • हे भारत ! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और शेयका संक्षेपसे हमने वर्णन करा है, इस सब भेद को जान कर मेरा भक्त मेरे पदको प्राप्त होजाता है ।।१८॥ प्रकृति पुरुपं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विहि प्रकृतिसम्भवान् प्रकृति और पुरुष इन दोनोंको अनादि जानो '- भाषाटांका-अ० १३॥ । औराविकार अर्थात्-शरीरादिकांको तथा सत्यादि गुणों को प्रकृति से उत्पन्न हुआ जानो ॥१६॥ कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुपः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते२० कार्य (शरीर) कारण (सु- दुःख और मोहादि के साधन इन्द्रिय ) इनका उत्पन्न करने में सबका मकृतिही कारण कही जाती है । और सुख दुःख के भोगने में पुरुप हेतु है,ऐसा कहा जाना है।। पुरुष प्रकृतिस्थोहि भुक्ते प्रकृतिजान्गुणान्। कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु२१ मकृतिके (कार्य) शरीरमें स्थित हुमा यह जीवात्मा प्रकृतिजनित सत्त्वादि गुणोंको (अर्थात् सत्व,रज और तम इन गुणोंके सुख दुःख को) भोगता है, तथा गुणोंमें आसक्त रहनाही इसके उच्च और नीच योनिमें जन्मलेनेका कारण है। उपद्रष्टानुमन्ता च भर्सा भोक्ता महेश्वरः ।

२१६ भगपाता। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः।। इस देहमें वही जीवात्मा उपद्रष्टा (समीपसे देखनेवाला) अनुमोदन करनेवाला, धारण और 'पोपण करनेवाला, भोगनेहारा, महेश्वर, परमा स्मा और परमपुरुप है ॥ २२ ॥ यएवं वेत्ति पुरुषं प्रकृति चगुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते ॥ जो इस प्रकारके स्वरूप वाले पुरुपको और ( विकारादि ) गुणों सहित प्रकृतिको जानता है वह सर्वथा व्यवहार में प्रवृत्त रहकरभी फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता ॥ २३ ॥ ध्यानेनात्मनिपश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना अन्ये सांख्येनं योगेन कर्मयोगेन चापरे २४ कोई पुरुप ध्यान योग द्वारा अपने देहमें स्थित हुए आत्माका मनसे ध्यान करते हैं, कोई सांख्ययोग और कोई कर्मयोगके द्वारा उस भावीका-१० १३० परमेश्वरका दर्शन करते हैं ॥ २४ ॥ अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्यउपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्यु श्रुतिपरायणाः ।। और कोई पुरुप आत्माको मुक्तस्वरूप न जान- कर अन्यान्य पुरुपों से (ज्ञानी और गुरुओंसे) श्रवण करके आत्माकी उपासना करते हैं वेभी श्रवणनिष्ट होकर मृत्यु ( जन्म मरणरूप संसार- सागरसे) तरजाते हैं ।। १५ ॥ यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्। क्षेत्रक्षेत्रजसंयोगात्तद्रिद्धि भरतर्षभ २६ हे भरतवांशियों में श्रेष्ठ ! स्थावर और जंगम जो कुछ भी उत्पन्न होता है, यह सब क्षेत्र और क्षेत्र के संयोगसे उत्पन्न होता है,ऐसा तुमजानो। समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यतिसपश्यति ।। हे अर्जुन ! जो पुरुष समस्त माणियों में . भगवद्गीता। समानभावसे स्थित हुए और शरीरोंका नाश होने परभी अविनाशी ऐसे परमेश्वरको देखता है वास्तव में यथार्थ देखने वाला (तत्त्वज्ञानी)वहीं है।। संमंपश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततोयातिपरांगतिम् जो पुरुष सर्वत्र एकभावसे स्थित हुए परमेश्वर को समानही देखकर मनके द्वारा आत्माको हनन नहीं करता ( अर्थात्-अबान से सचि. दानन्दस्वरूप प्रात्माका निरादर नहीं करता ) वह परमगति मोक्षको प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकतारं सपश्यति२६ जो मनुष्य समस्त कर्मोंको प्रकृतिके द्वाराकरे हुए और आत्माको सवका अकत रूप देखता है, वास्तव में वही यथार्थ देखता है ॥ २९ ॥ यदाभूतपृथग्भावमकस्थमनुपश्यति ।

भापाका-अ.१३॥
२१९
नाएवच विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ३०
जव ज्ञानी पुरुप भिन्न २ प्राणियों को एक
परमात्मा में स्थित हुए देखता है, तब वह ब्रह्म-
को प्राप्त होजाता है ॥ ३० ॥
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः
शरीरस्थोपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते३०
हे कुन्तीकुमार ! यह श्रात्मा अविनाशी और
निर्गुण होने के कारण विकाररहित है,यह आत्मा
शरीरम स्थित रहकर भी कुछ कम नहीं करता और
करे हुए कर्मों करके लिप्तभी नहीं होता ॥३१॥
यथासर्वगतं सौक्षम्यादाकाशं नोपलिप्यते।
मर्वत्रावस्थितोदेहे तथात्मा नोपलिप्यते ३२
जिस प्रकार कि-सर्वव्यापक आकाश अत्यन्त
सूक्ष्म होने के कारण (जिन २ वस्तुओं में व्यास
उन २ वस्तुओंसे ) लिप्त नहीं होता, इसीमकार
वह आत्मा संपूर्ण देहोंमें स्थित रहकरभी (किसी
दोपसे ) लिप्त नहीं होता ॥ १२ ॥

१२०
भगवद्गीता।
यथाप्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमरविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथाकृत्स्नं प्रकाशयति भारत३३
जैसे एकही सूर्य इस संपूर्ण संसारको प्रकाशित
करताहै, ऐमही हे अर्जुन ! एकही अात्मा संपूर्ण
देहोंको प्रकाशित करता है ।। ३३ ।।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुयन्ति ते परम्३१
इतिश्रीमद्भगवद्गीतानुपानिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाने श्रे'कृष्णा-
र्जुनसंवादे क्षत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगोनाम
त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
जो ब्रह्मज्ञानी पुरुप ज्ञानदृष्टिसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
के अन्तरको प्राणियोंकी प्रकृति ( अर्थात्-अवि-
याम्प मायासे.) मुक्त होने के उपायको जानतेहैं,
व परमपद मोक्षको प्राप्त होते हैं ।। ३४॥
इतिथीभापाटीकायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

मापाटीका-०१४ । ॐ चतुर्दशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच । रिं यः प्रवक्ष्यामिजानानां जानमुत्तमम् । उज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे पर सिद्धिमितोगता। 'श्रीभगवान् वोले कि- हे अर्जुन!अब मैं फिरभी संपूर्ण ज्ञानों में उत्तम का ज्ञान है तिसका वर्णन तुमसे करता हूं, जिस आन को जानकर सब ऋषि[मोक्ष] को प्राप्त हुए हैं दं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । जर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।। । इस श्रेष्ठ ज्ञानकी उपासना करके मेरे साधर्म्य अर्थात्-सामप्यताको प्राप्त हुए सिद्ध पुरुष सृष्टि ही आदिमें उत्पन्न और मलयके समय विनाश हा माप्त नहीं होते हैं ॥२॥ मम योनिमहङ्का तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।

भगवदगीता ।
.
सम्भवः सर्वभूतानां ततोभवति भारत
हे भारत ! मेरी प्रकृति समस्त संसारकी उत्पा
का स्थान है, उसीके विष संकल्पम्प गर्भ
धारण करता हूं उसी गर्भाधानसे समस्त प्राणि
की उत्पत्ति होती है ॥३॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्तियां
तासां ब्रह्ममहद्योनिरहं वीजप्रदः पिता।।
हे कुन्तीके पुत्र ! सम्पूर्ण योनियों में जो
शरीर उत्पन्न होते हैं,उनसकी प्रकृति ही मास
और मैं उनका गर्भाधान करनेवाला पितारूप
सत्त्वं रजस्तमइति गुणाः प्रकृतिसंभवा:
निवघ्नन्ति महावाहो देहे देहिनमव्ययर
.हे दीर्घबाहो ! सत्व, रज, तम,. अंका
उत्पन्न होने वाले यह तीनोंगुण विकारर
और इस.. देहमें विद्यमान हुए जीवात्मा
बन्धन में ढालदेते हैं ॥५॥

भाषाटीसा-अ० १४। तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ।। ६ ॥ हे निष्पाप ! इनतीनों गुणों में सत्त्वगुण तमल है, इस कारण प्रकाशमान और विकार- रहित जीवात्मा को सुख और ज्ञानके संगसे बांध लेता है।॥ ६ ॥ रजोरागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम्। तं निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ७ हे अर्जुन ! वृष्णा (अप्राप्य वस्तुकी इच्छा और आसक्ति ( प्राप्त वस्तु में अनुराग ) से उत्पन्न होने वाले रनोगुणको रागात्मक जानो, यह रजोगुण प्रागीको कर्मोंके संगसे बांधता है ।। तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहन सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत भारत ! सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करने वाले तमोगुणको अज्ञानजनित जानो, वह तमो..

! मायनीता। गुण प्रमाद (असावधानी) बालस्य और निद्राओंके द्वारा जीवात्माको बन्धन में डालदेगादी! सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्माग भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमाद संजयन्युताः॥ हे अर्जुन ! सत्त्वगुण जीवात्माको सुखमें, रजोगुण कर्ममें और नमोगुण ज्ञानका प्रा- वरण करके प्राणीको प्रमाद में गिगता है ॥२॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ! रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः लवं रजस्तथा? हे भारत ! रजोगुण और तमोगुग को दवाकर सत्वगुण उद्य होता है,रजोगुण और सत्वगुण को दवाकर तमोगुण, एवं तमोगुण और सत्त्व- गुणको दवाकर रजोगुण उदय होता है ॥१०॥ सर्वद्वारपु देहेस्मिन् प्रकाशउपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत??

भाषाटीका-अ० १४॥
२२५
जब इस संसार में समस्त इन्द्रियों के द्वारोंमें
ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होजाता है, उस समय
सत्त्वगुणकी विशेष वृद्धि जानो ।॥ ११ ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामरामःस्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्ध भरतर्षभ ॥१२॥
हे भरतवंशियों में -श्रेष्ठ ! जब रजोगुणकी
शरीर में वृद्धि होती है, तब लोभकर्म करने में
प्रवृत्ति, कमौका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा,
विषयोंकी वासना यह सब उत्पन्न होते हैं ॥१॥
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादोमोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुनन्दन ॥१३
: हे कुरुनन्दन ! तमोगुणकी वृद्धि होनेपर
विवेकका नाश कर्म करने में अप्रवृत्ति(निरुद्यमता)
ममाद (उन्मत्तता) और मोह यह सब उत्पन्न
होते हैं ॥१३॥

भगवद्गीता। यदा सत्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । लोतमविदां लोकानमलान् प्रतिपद्यते॥१ जव सत्त्वगुणकी वृद्धि हो और उस समय प्राणी मृत्युको प्राप्त होजाय तो उत्तम जनों के निर्मल लोकोंको प्राप्त होता है ॥१४॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमलि मूढयोनिघु जायते १५ यदि रजोगुणकी वृद्धि होनेपर मृत्युको प्राप्त होजाय तो कर्म करने वाले जनोंमें जन्म होता है और तमोगुणकी वृद्धि होनेके समय प्राण तो वह मृतक पुरुष पशुआदि कों की मूढ़ योनियों में उत्पन्न होता है ।। १५ ॥ कर्मणःमुकृतस्याहुःसात्त्विकं निर्मलं फलम् रज वस्तु फलं दुःखमज्ञान तमसःफलम् ।। ..

भाषाटीका-अ० १४॥ जिसमें सत्वगुण प्रधान हो तिस कर्मका निर्मल सुख, रजोगुण मधान कर्म का फल दुःख और तमोगुण प्रधान कर्मका फल अज्ञान कहाजाता है१६ सत्त्वात्संजायते ज्ञान रजसोलोभएव च । प्रमादमोहौ तमसोभवतोऽज्ञानमेवं च १७ सत्वगुणसे ज्ञान, रजोगुण से लोभ, एवं तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं ॥ १७ ॥ जय गच्छन्तिसत्त्वस्थामध्येतिष्ठन्तिराजसाः जधन्यगुणवृत्तिस्था अधोगच्छन्ति तामसा। सतोगुणी पुरुष अप्रलोकों (अर्थात्-मोक्ष ) को माप्त होते हैं, रजोगुण वाले पुरुष मध्यलोक और अधमगुण की वृत्ति (निद्रापालस्यादिक) में स्थित हुए तमोगुणी पुरुष अधोगतिको माप्त होते हैं ।। १८॥

भगवनीता। ૨૨૮ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुगोभ्यश्च परं वेत्ति भद्भावं सोधिगच्छति ।।. जो देखनेवाला पुरुप कर्चा को सच, रन,तम, इन तीनों गुणों से अलग नहीं देखना, और मात्माको उन गुणों से भिन्न अर्थात् निर्गुण साक्षी मात्र जानता है, वहीं मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है ।। गुणानेतानतीत्य जीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःग्वैविमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ शीरधारी पुरुप देह से उत्पन्न हुये सत्व, रज और नम इन तीनों गुग्गों को जीराकर जन्म मृत्यु और वृद्धावस्था तथा दुःख इनसे मुक्त होक अमृतरूप मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ २० ॥ अर्जुन उवाच । कैलिखीन्गुमानेतानतीतोभवति प्रभो। किलाधार कार्य चनांन्नीन्गुणाननिवर्न।

माषादीका--अ.१४॥ २२१ अर्जुनने पूछा कि- हे प्रभो ! वे कौनसे चिह्न हैं कि-जिन करके यह पुरुष सत्त्वादि उक्त तीनोंको उल्लंघन करनेवाला समझा जाता है ? और उसका क्या आचार है, तथा शरीरधारी पुरुष इन तीनों गुणों को किस प्रकार उल्लंघन करसक्ता है ? ॥२१॥ श्रीभगवानुवाच। । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । नदेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तालिकाक्षति।। उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते२३॥ समदुःखसुखास्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चन तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतःस उच्यते२६

भगवाया।
श्रीभगवान् बोले कि-
हे पाण्डुनन्दन! सत्त्वगुणका मकाश, रजोगुण :
की प्रत्ति और तमोगुणका मोह येही एक२. गुणके
भिन्नरपरिणाम है जिनके प्रवृत्त होनेपर जोकिसीसे
इंप नहीं करता और उनके निवृत्त होजानेपर उनकी
कामना नहीं करता । तथा जो पुरुष उदासीनकी
समान स्थित रहकर सवादिगुणों करके चलायमान
नहीं होता,सत्वादिगुण अपने कार्यों में प्रवृत्त रहते हैं
ऐसा जानकर जो सावधानीसे बैठारहकर किसी
प्रकारकी चेष्टा नहीं करता । जो पुरुप मुख और
दुःखको समान मानता
स्वस्थ (अर्थात किसी
प्रकारके दुःखको न प्राप्त होनेवाला) जो मिट्टी
पत्थर और मुवर्णको समान जानता है, प्रिय
और अमिय ( भले बुरे )कोसमान माननेवाला,
'धैर्यवान् , अपनी निन्दा और स्तुति इन दोनोंके
वि चित्तकी वृत्तिको समान रखनेवाला- मान

भापाटीका-अ०१४॥ २३१ और अपमानमें समान, मिन और शत्रुओंके पक्ष में समान दृष्टि रखनेवाला, सांसारिक समस्त कोंके श्रारम्भको त्यागनेवाला, अर्थात् कर्मों के फलकी कामना न करनेवाला, ऐसा जो पुरुष है उसीको गुणातीत कहते हैं ।।१९।।२३।। २४॥२५॥ मांचयोऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। सगुणासमतीत्यैतान् ब्रह्मभूयायकल्पते२६ जो पुरुष अनन्यभक्तिसे मेरी उपासना करता है, वह इन तीनों गुणोंका उल्लंघन करके ब्रह्मभाव को प्राप्त होने के योग्य होता है ।।२।। ब्रह्मणोहि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। इतिश्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगोनाम चतुर्दशोऽध्यायः॥१४॥ क्योंकि-ब्रह्म, विकाररहित, अमृत अर्थात्- भगवीता मोक्ष और सनातनधर्म एवं अखण्ड सुख इन सब की ठीक २ प्रतिष्ठा अर्थात्-शाश्रय में दी हूं २७ इतिश्रीभापाटीकागां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ * पञ्चदशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच। ऊर्ध्व मूलमधः शाखसश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानियस्तं वेद संवेदवित् श्रीभगवान् वोले कि- इस संसाररूप अश्वत्य (पापलके वृक्ष ) के ऊपर [पुरुपोत्तम ] मूल, नीचे [हिरण्य गर्भ] शाखा, और कर्मकाण्डरूप वेद इसके पत्ते हैं, इस -अश्वत्थ अर्थात्.-'अ' (नहीं) श्वः 'स्था' स्थित रहने वाला, तात्पर्य यह है कि जो नाश. नान् होने के कारण प्रातःकाल पर्यन्त भी स्थितन रहसके उस अनित्य को] 'अश्वत्थ' कहते हैं.1 . : , प्रभातकाल भापाटीका-अ० १४ प्रकार संसाररूप वृक्षको जो जानता है, वही वेदका जाननेवाला है ॥ १ ॥ अधश्चोर्ध्व प्रस्तास्तस्य शाखा- गुणवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि, कमीनुवन्धोनि मनुष्यलोके ।। २ ।। उस संसाररूप वृक्षकी अधः अथात् नीचयोनि और ऊर्ध्व अर्थात् उत्तम योनियोमें उत्पन्न होने वाले शाखा हैं।सत्त्व,रज और तम इन तीनों गुणों करके वृद्धिको पास हुए शब्दादिक विषय उसके पत्ते हैं, और उसकी वासनारूप जड़ें नीचे तथा ऊपर फैली हुई हैं, वह वासनाही संसारमें पुण्य और पापको उत्पन्न करती है ॥ २॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते, नान्तोन चादिन च सम्प्रतिष्ठा ।

भगवद्गीता। 1 अश्वत्थमेन सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥३॥ ततः . पदं तत्परिमार्गितव्यं, यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।। तमेव चाद्यं । पुरुपं प्रपद्ये, यतः प्रवृत्तिः प्रमृता पुराणी ॥४॥ इस संसारम्प वृक्षका रूप, अन्त, आदि और स्थिति कुछभी विदित नहीं होती, इस दृढ मूलवाले वृक्षको तीव्र वैराग्यरूप शस्त्र से छेदन करके इसके आदिकारण उस परमपद (ब्रह्म) का अन्वेषण करना चाहिये,जिस स्थान में पहुँच कर फिर लौटके नहीं आते, जिन परमेश्वर से इस सम्पूर्ण संसारका विस्तार होरहा है,उन ही आदि पुरुषकी मैं शरणागत हूं ॥३४॥ निर्मानमोहाजितसङ्गादोषा- अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।

भाषाका-अ० १५॥ २३५ द्वन्द्वविमुक्ताःसुखदुःखस- गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥ ५ ॥ जो पुरुष मान और मोहरहित हैं जिन्होंने श्रासक्तिरूप दोपको जीत लिया है, वेदान्तविधा के विचारमें निरत, और संपूर्ण कामनाओं से निवृत्त हुए, सुख और दुःख नामक द्वन्द्व पदार्थों मुक्त हैं, ऐसे ज्ञानी पुरुप अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं ॥ ५॥ न तदासयते सूर्योन शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वाननिवर्तन्ते तडाम परममम ॥ ६ ॥ जिस परमपद को माप्त होकर योगी जन फिर नहीं लौटते वही मेरा परम उत्कृष्ट धाम है, उस धाम को (स्वयं प्रकाशमान् होनेके कारण)सर्य, चन्द्रमा और अग्नि प्रकाशित नहीं करसक्त हैं। ममैवांशोजीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणिप्रकृतिस्थानि कर्षति भगवतीता। इस संसारमें सनातन जीव मेरा ही अंश है, वह प्रकृति में स्थित हुए पांच इन्द्रियों और छठे मनको आकर्पण करता है ।। ७ ।। शरीरं यदवामोति यचाप्युत्कामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संवातिवायुर्गन्धानिवाशयात्। जिस प्रकार पत्रन पुप्पासे मुगन्धिको ग्रहण करके दूसरे स्थान में प्राप्त करता है, ऐसेही यह जीवात्मा जिन२ शरीरोंको त्यागकर जिन २ शरीरोम प्राप्त होता है, तो उन इन्द्रियों और मनको भी साथही लेजाता है ।। ८ ।। श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं चरसनं घाणमेव च । अधिष्ठायमनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९॥ यह जीवात्मा श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, जिह्वा, नामिका और मनका आश्रय करके शब्दादिक विषयों को भोगता है ।।९।। उत्क्रामन्तस्थितवापिभुजानवागुगणान्वितम् भाषाटीका-अ०१५ विमूढानानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः१० एक देहसे दूसरे देहमें जानेवाले, अथवा एकही देहमें स्थित हुए, अथवा सत्त्वादि गुणयुक्त होकर विपयोंको भोगते हुए इस जीवात्माको अज्ञानी पुरुप नहीं देखते, किन्तु ज्ञानरूप नेत्रवाले अर्थात् ज्ञानी पुरुष देखते हैं ॥१०॥ यतन्तोयोगिनश्चनपश्यन्त्यात्मन्यवस्थितस् यतन्तोऽप्यकृतात्मानोनैनं पश्यन्त्यचेतसः।। योगनिष्ठ ज्ञानी पुरुप ध्यान आदिके द्वारा अपने शरीरमें स्थितहुए इस जीवात्माको देखते हैं,परन्तु जिनके चित्तम ज्ञानका संस्कार नहीं है ऐसे मज्ञानी पुरुष यत्न करनेपर भी उसको नहीं देखसक्ते ॥११॥ यदादित्यगतंतेजोजगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजोविधिमामकम् जो तेज सूर्य-चन्द्रमा और अग्निमें व्याप्त २३८ भगवद्रीता। हुआ संपूर्ण संसारको प्रकाशमान कर रहा है उसः सवको तुम मेरा ही तेज जानो ॥१२ गामाविश्य च श्रुतानि धारयाम्यहमोजसा। पुष्णामि चौपधीःसर्वाःसोमोभूत्वारसात्मक मैं भूमीमें प्रवेश करके अपने अतुलवीर्यस समस्त प्राणियोंको धारण करता हूं, और रसात्मक चन्द्रमा होकर संपूर्ण गोपधियाँको पोपण करताहूं। अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। भागापानसमायुक्तापचाम्यन्नं चतुर्विधम्१४ मैंही जठराग्नि होकर प्राणियों के देहमें स्थित रहता हूं और प्राण तथा अपान वायुसे युक्त होकर चारमकारके अन्नको पचाता हूं ॥१४॥ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो- मत्ता स्मृतिर्ज्ञानमपोहन च । १-मक्ष्य (चावनके योग्य अन्न), भोज्य ( भोजन करने के योग्य अर्थात सामान्य अम), लेख (चाटने के योग्य ) और चोप्य (चूसने के योग्य। ..

मापारीका-अ०१५ २३९ वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो- वेदान्तकृवेदविदेव चाहम् ॥१५॥ मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयकमलमें स्थित रहता हूं,मुझसे स्मृति, ज्ञान और तर्क उत्पन्न होते हैं, सब वेदोंकेद्वारा जानने के योग्य मैं ही हूं,वेदान्तका निर्माण करसेवाला और वेदोंका जाननेवाला भी मैं ही हूं ॥ १५ ॥ दाविमौ पुरुषो लोके क्षरश्चाक्षर एवाच । क्षरःसर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षरउच्यते१६ इस संसारमें क्षर (नाशवान् ) और अक्षर (अवि- नाशी ) यह दो पुरुष हैं, तिनमें सम्पूर्ण माणीमात्र क्षर और कूटस्थ (अर्थात् परब्रह्म अक्षर कहाताहै।। उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। योलोकत्रयमाविश्य विभयव्ययईश्वरः१७। इसके अतिरिक्त उत्तम एक सूक्ष्म पुरुष है,जिस को परमात्मा कहा जाता है वही अविनाशी पर-

भगवद्गीता
मेश्वर त्रिलोकीको व्याप्त करके पालन पपण
करता है।॥ १७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोतमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुम्योत्तमः।
जिस कारण से कि मैं क्षर (नाशवम् ) से परे
और अक्षरसे भी उत्तम हूं. इसीकारण मैं लोक
और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे मसिद्ध हूं।॥ १८ ॥
यो मामेवमसंसूतो जानाति पुरुपोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मांसर्वभावेन भारत १६
हे भारत ! जो मोहरहित पुरुप इसमकार मुझ
को पुरुपोनम जानता है वही सर्वज्ञ है, अतएव
सम भावोंसे वह मेराही भजन करता है ।।१९॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
एतद्ध्वा युन्द्रिमान्स्यात्कृतकृत्यश्वभारत॥
इतिश्रीमद्भगवद्गीतासुपनियत्स ब्रह्मविद्यायां योगशान्ने
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुनपोत्तमयोगानाम-
प्रश्दशोऽध्यायः॥ १५॥

भापायीका-अ० १६। २४1 हे निष्पाप ! मैंने अत्यन्त गोपनीय शास्त्र. तुम स वर्णन करा है, इस शास्त्रको जानकर पुरुष बुद्धिमान् ( ज्ञानी) और कृतकृत्य होजाताहै२० इति श्रीमापोटीकायां पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५॥ *षोडशोऽध्यायः श्रीभगवानुवाच। अभयं सत्त्वसंशहिनियोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तपआर्जवम् १ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागःशान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम्र तेजःक्षमा धृतिःशौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्तिसम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥३॥ १-कोई न तिमानिता' का यह नी अर्थ करते हैं कि संसार में अपना अधिक मान न चाहना !

भगवद्गीता।
श्रीभगवान बोले कि-
हे अर्जुन ! अभय, चित्तकी शुद्धि, ज्ञानयोग
में स्थिति, दान करना, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ,
वेदाध्ययन, तप और ऋजुना । अहिंसा, सत्य
वोलना, क्रोधका नाश, त्याग अर्थात-उदारता,
शान्ति, पिशुनता (चुगली ) न करना, सब
प्राणियों के ऊपर दयाकरना,विषयों में लोलुप न
होना,कोमलता,लज्जा और चपलताका त्याग।
तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न
करना,अन्यन्त मान न करना यह सब गुण देवी
( सत्त्वगुणमयी ; प्रकृतिका आश्रय लेकर जन्म
धारण करनेवाले पुरुषोंको प्राप्त होते हैं ||१||२||३॥
दम्भोदोभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्
हे पार्थ ! दम्म, गर्व,मान, क्रोध,कठोरता, और
१-धार्मिकता दिखांन के लिये धर्माचरण करना इसको
दम्भ कहते हैं। महात्माओं को उद्विग्न - करने वाली वृत्ति
को पाध्य कहते है

भापाटीका-स.१६॥ अज्ञान, यह सव ( अवगुण) श्रामुरी सम्पत्ति भोगनेवालों को होते हैं ॥४॥ दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरीमता। माशुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसिपाण्डव।। हे पाण्डुनन्दन ! दवी सम्पत्ति मोक्ष करती है, और आसुरी सम्पत्ति बन्धन में डालती है,हे अर्जुन! तुम शोक मतकरो,क्योंकि-दैवी सम्पत्ति भोगनेके लिये उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए हो ॥ ५ ॥ द्वौ भूतसौं लोकेऽस्मिन्दैवासुर एवच । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मेशृणु६ हे अर्जुन ! इस संसार में प्राणियों की दैवी : और आसुरी दो प्रकारकी सृष्टि है, तिनमें से दैवी सृष्टिका तो मैंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया, अब है पार्थ ! आसुरी सृष्टिका वर्णन मुझ से सुनो। प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। । न शौचं नापि चाचारोन सत्यं तेषु विद्यते।।

भगवद्गीता आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात्-अभ्युदयसाधक तथा मोक्षमाधक वैदिक कर्मों को नहीं जानने, इसीकारण उनमें शौच, सदाचार और सत्य यह कुछभी नहीं होता ॥ ७॥ असत्यमप्रतिष्ठं ते.जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहेतुकम् ।। वहानुरी प्रकृतिवाने मनुष्य संसारको असत्य, अप्रतिष्ट्र और अनीश्वर कहते हैं, उनका यह सिद्धान्त है कि-परस्पर काम से प्रेरणा करहुए न विद्यते (वेद (सत्य प्रमाण) यस्मिन्तद. सत्यम् , अर्थात् जिसमें वेदहा सत्यका प्रमाण नहीं । तापर्य यह है कि-आतुरी प्रकृतिकाले पुमय संसारके विषयमें वेदका प्रमाण नहीं मानते और जिसमें वेदका प्रमाण न माना जाय उसको 'असत्य कहते हैं।रजिसमें धर्माधर्मकी व्यवस्था नोट 'अप्रतिष्टत' कहा जाताहः३-जिसका कोई कर्ता न हो वह अनवर नहाता है ।। १ भावाटी-अ.१६॥ घीपुरुषों के संयोग से यह संसार उत्पन्न होता ई और कोई कारण नहीं है ॥ ८ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पवुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्मागाः क्षयायजगतोऽहिताः ९ ऐसी दृष्टि रखनेवाले,मलिन चित्त और अल्पबुद्धि बया उग्रकर्म करनेवाले वह पुरुप संसारका नाश करने के लिये अहितकों में मत्त हुए उत्पन्न होते हैं ।।९॥ काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्गृहीत्वासग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः वह पुरुप दुःखसे पूर्ण होनेके योग्य अभिला. पाओंको अंगीकार कर दम्भ,मान और मदसे युक्त हुए अपवित्र व्रतोंको धारण कर दुराग्रही होके सर्वत्र ( अशुभ कर्म करने में ) प्रवृत्त रहते हैं १०॥ ! चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:११ . -- २४६ भगवद्गीता . वह मरणपर्यन्त अतुल चिन्तासे व्यस्त रहते है,और उनका येही निश्चय रहता है कि-कामनाओं का भोगनाही परम पुरुषार्थहै, अन्य कुछ नहीं । आशापाशशर्वद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥ सैकड़ों श्रोशाम्प बन्धनों से बंधेहुए, काम और क्रोध में तत्पर वह पुरुष कामोपभोग के लिये अन्यायसे धन उपार्जन करने की इच्छा करते हैं। इदमद्य मया लब्धाममंप्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३॥ असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहशोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्तिसह शोमया यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्मज्ञान विमोहिताः ॥१५॥ आज मैंने यह (धनादिक) पाया, मेरा य भाषाटीका-अ०१६॥ मनोरथ शीध्र पूर्ण होगा, यह वस्तु मेरे पास है और यह भी धन फिर मुझको ही मिलेगा। यह शत्रु मुझसे मारागया, अन्यान्य शत्रुओं को भी माझंगा, मैं ईश्वर अर्थात्-सब कुछ करने में समर्थ और भोगी (सब का भोगनेवाला) हूं तथा मैं सिद्ध (कृतकृत्य ) बलवान् और मुखी हूं। मैं धनाढ्य और कुलीन हूं, मेरी समान भला और कौन है ? अर्थात्-कोई नहीं, मैं यज्ञ करूंगा,दान दूंगा और आनन्दको प्राप्त होऊँगा, वे पुरुष इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहते हैं ॥१२॥१४ ॥ १५ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । प्रसक्ताःकामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ१६ .' अनेकों विकारों करके चित्त में भ्रमको प्रार हुए और मोह। अज्ञान )रूप जालसे बँधे एवं विषय भोगों में अत्यन्त आसक्त हुए वह पुरुष अप वित्र नरकमें गिरते हैं ।।.१६ ॥

भगयीता।
प्रात्मसंभाविता:स्तब्धाधनमानमदान्विती
यजन्ते नामयज्ञेस्त दम्भेनाविधिपूर्वकम् १७
अपने आप अपनी स्तुति करनेवाले स्तब्ध
अर्थाव-पूज्यों की पूजाका व्यनिकम करने वाला
धनवान और अहंकार से युक्त, वह पुरुप यथोक्त
विधिको त्यागकर पाखण्ड करके यब करते हैं१७
अहंकार बलं दर्प काम क्रोधं च मश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषुप्रदिपन्तोऽभ्यर यका. १८
अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध इन के
श्राधीन रहनेवाले वे पुरूप अपने तथा दूसरों के
देहों में मुझ स्थित हुए के साथ द्वेष करते और
निन्दाफरने में प्रदत्त रहत है ।। १८॥
नानहं द्विषतः क्रूरान्संसारपु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजत्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु?
हे अर्जुन ! ट्रेप करनेवाले, क्रूर, नित्य अशुः
कर्म करनेवाले ऐसे उन नीच पुरुषों को मैं संसा
के बीच वारंवार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ

भागाका-अ.१६ प्रासुरी योनिमापन्ना महाजन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततोयान्त्यधमां गतिम् दे कुन्नीनन्दन ! वह अज्ञानी पुरुप प्रति जन्म में आसुरी योनियों ही में उत्पन्न हुये अतएव मुझ को प्राप्त न होकर अधमगति को प्राप्त होते है ।। त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथालोभस्तस्मादेतत्रयंत्यजेत् काम, क्रोध तया लोभ, यह तीनों आत्म- स्वरूप के नाश करनेवाले नरकंक द्वार हैं, इस कारण इन तीनों का परित्यागकरदेना नाहिये ।। एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोडान्त्रिभिनरः। याचरत्यात्मनः श्रेयस्ततोयाति परांगतिम् हे कुन्तीनन्दन ! इन तीनों नरकके द्वारों करके मुक्त हुआ पुरुप अपने कल्याण के लिये (भक्ति- योग का) आचरण करता है, तिस (भक्तियोग) के द्वारा परमगति मोक्षको माप्त होता है ।। २२॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

:
२५०
भगवदाता।
न ससिडिमवाप्नोतिन सुख न परांगतिम् २३
जो पुरुष शास्त्रोक्त विधिको छोड़कर अपनी इच्छा
के अनुसार कर्मों का आचरण करता है, वहः,
(स्वर्गादि प्राप्तिरूप) सिद्धि, सुख और परमगति
(मोक्ष) को प्राप्त नहीं होता ॥ २३ ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थिती
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्मकर्तुमिहार्हसि
इतिश्रीमद्भगवदीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसवादे देवासुरसम्पद्विभागयोगो-
नाम पोडशोऽध्यायः ॥१६॥
हे अर्जुन ! इस कारण कार्य और अकार्यका :
व्यवस्था में शास्त्र को प्रमाण मानकर और -
शास्त्रोक्त विधिको जानकर तुम कर्म करने के
योग्य हो ॥ २४॥
इतिश्रीभापाटीकायां पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

भाषाटीका-अ० १७} : * सप्तदशोऽध्यायः * अर्जुनउवाच । शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः तेषां निष्ठातु का कृष्ण सत्त्वमाहोरजस्तमः अर्जुन ने कहा कि हे श्रीकृष्ण भगवन् ! जो पुरुप शास्त्रोक्त विधि को त्यागकर और श्रद्धापूर्वक यज्ञादिकका आच- रण करते हैं उनकी श्रद्धा सात्विक, राजस, वा मस इनमें से किस प्रकारकी है ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । विधाभवति श्रद्धादेहिनांसा स्वभावजा त्त्विकी राजसीचैव तामसी चेति तांशृणु श्रीभगवान् बोले कि- हे अर्जुन ! समस्त प्राणियोंकी स्वाभाविक ही एक सतोगुणी, दूसरी रजोगुणी और तीसरी २५३ भगवीता। तमोगुणी यह तीन प्रकारकी श्रद्धा होती है उसको तुम सुनो ।। २॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषोयोयच्छ्रद्धः सएकसा हे भारत ! समस्त प्राणियोंकी अपने अन्त:- करणके अनुसार ही श्रद्धा होती है, क्योंकि यह पुरुप श्रद्धामय अर्थात् श्रद्धाझप परिणाम वाला है, क्योंकि जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही होता है ।। ३ ।। यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसिराजसाः प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्तामसाजना. सात्विक महतिवाले(सतोगुणी) पुरुष देवताओं की, रजोगुणी पुरुष यक्ष और राक्षसों की तयाँ अन्य अर्थात् तमोगुणी पुरुष भून प्रेतादिकों की पूजा करते हैं ॥४॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते येत्तपोजनाः।

मापाटीका-अ० १७१ -- इम्साहङ्गारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः ५ कर्पयन्तः शरीरस्थं श्रुतग्राममचेतसः । मांचैवान्तःशरीरस्थतान्विद्ध्यासुरनिश्चयान दम्भ और अहंकारकरके युक्त, काम और अनुरागसे समन्वित तथा शीरमें स्थितहुए पञ्च महाभत और देह में व्याप्तहुए मुझको भी क्लेश देते हुए वह अज्ञानी पुरूप शास्त्रविरुद्ध घोर कर्म करने हैं, उनको तुम आसुरों की समान बुद्धिवाला जानो ||५॥६॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधोभवति प्रिया यज्ञप्तपरतथा दानं तेषां भेदाभलं शृणु।।७।। सम्पूर्ण प्राणियों के आहार, यज्ञ, तप और दान यह सब तीन २ प्रकार के होते हैं, अब तुम उनके भेदको सुनो ॥७॥ आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। 'रस्याः स्निग्धाः स्थिराहृया ग्राहाराः सा.

भगवहीता) स्विकप्रियाः॥८॥ • श्रायु, उत्साह, बल, आरोग्यता, सुख और प्रीतिको बूढानेवाले, रसयुक्त, स्निग्ध (चिकने । स्थिर अर्थात्-चिरकाल पर्यन्त शरीरमें बल बढाने वाले, एवं हृदयको प्रिय लगनेवाले (अर्थात्-स्वा- दिष्ट)रेसे आहार सतोगुणी पुरुषों को प्रिय होते हैं।। कट्वाललवणात्युष्गातीक्ष्णरुक्षविदाहिनः । आहाराराजसस्येष्टा दुःखमोकामयप्रदाः९ कटु ( तीरेख ),अम्ल ( ख )लवण(खारी), अत्यन्त उप्ण, तीक्ष्ण, रूखे और उदरमें दाद करने वाले तथा दुःख शोक और रोगोंको उत्पन्न करने वाले श्राहार रजोगुणी पुरुषों को प्रिय लगते है ॥ ९॥ यातयामंगतरस पूति पर्युपितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसाप्रियम्।। यातयाम अर्थात् पहरभरका धराहुया, नीरस, .

भाषाटीका अ० १७॥ दुर्गन्धियुक्त, पर्युषित (वासी ), उच्छिष्ट (जूठा), और अपवित्र ऐसा भोजन तमोगुणी पुरुषों को मिय लगता है ॥ १० ॥ अफलाकातिभिर्यज्ञोविधिदृष्टो यइज्यते। यष्टव्यमेवेति भनः समाधाय ससात्त्विकः११ अवश्य कर्तव्य जानकर और उसके फल की कामना न करके एकाग्रचित्तसे जो यज्ञ किया जाता है वह सात्विकयज्ञ है ।। ११ ॥ अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् १२ हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ! फलमाप्तिकी कामना से दम्भ अर्थात-अपनी प्रसिद्धि के अर्थ जो यज्ञ किया जाता है उस यज्ञकोराजस यज्ञ जानो १२ विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदाक्षणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते १३ ॥ शास्त्रोक्त विधिसे रहित अन्नदानसे शन्य,मन्त्र भगवाता। 1 M और दक्षिणारहित, तश श्रद्धारहिन जो यह किया जाता है उस यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं। देवद्विजगुरुपाज्ञयूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीर तपउच्यते॥१४॥ देवता, ब्राह्मण, गुरु और बुद्धिमान् (विद्वान वा तत्वज्ञानी ) इनका पूजन, पवित्रता, ऋजुता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा,इसको शारीरक तय कहते हैं। अनुद्वेगकर वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तपउच्यते१५ किसीके वित्तको उद्देन न पहुंचानेवाला,सत्य, भिय और हितकारी, ऐमा वचन बोलना, स्वा. ध्याय अर्थात्-वेदाभ्यास करना, यह वाधिक तर कहा जाता है ।। १५ ॥ मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपोमानसमुच्यते॥१६ मनकी प्रसन्नता, सौम्यता, मौन रहना, मा भावाटीका--१.१७॥ हो स्वाधीन रखना और अन्तःकरण की शुद्धि वह सब मानसिक तप कहलाता है ।। १६ ॥ श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्तिविध नरैः ।। अफलाकाक्षिभियुक्तः सात्त्विकं परिचक्षते फलकी इच्छा न करनेवाले एकाग्रचित्तंयुक्त पुरुषोंकरके परम श्रद्धापूर्वक तीन प्रकारका किया हुआ तप सात्विक तप कहलाता है॥१७॥ सत्कारमानबूजार्थ तपोदम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमधुवम् १८ अपने सत्कार, मान और पूजनके लिये दम्भ करके जो तप कियाजाता है वह चंचल और अस्थिर राजस तप कहा जाता है ॥ १८ ॥ सूडबाहेणात्मनोयत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहृतम् १६ जो दुराग्रह से आत्माको पीहा देकर अथवा दूसरों का विनाश करनेके लिये तप कियाजागा १r- कायिक, वाचक और मानसिक ।

५४ भगवदगीता । है.उसको तामस तप कहते है ॥ १० ॥ दातव्यमिति यदान दीयतेऽनुपकारिगो । देश काले च पात्र च तदान सात्विकंस्कृतम्।। दान अवश्य करना चाहिये ऐमा विचारके देश (काशी, प्रयाग श्रादि पवित्र स्थान ) में, ( संक्रान्ति आदि) पुण्यकाल और सुपात्र पुरुप को उपकारकी कामना न करके जो दान दिया जाता है उसको सात्विक दान कहते है ॥२०॥ यनु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयतेच परिल्लितहान राजसं स्मृतम् ॥ जो दान मत्युपकारकी इच्छासे अथवा किसी मकार के फलकी कामनासे क्लेश करके दिया जाता है उसको राजस दान कहते हैं ।। २१ ।। प्रदेशकाले महानगपात्रभ्यश्च दीयते । असत्कृतमयज्ञातं तत्तामसमुदामृतम् ।। और जो दान अयोग्यदेश, अयोग्य समय में २५६ माशाटीका -अ० १७१ कुपात्र को असत्कार और अनादरपूर्वक दिया जाता है उसको तामस दान कहते हैं ।। २२॥ ऑनत्मदिनि निर्देशोन्नह्मणन्त्रिविधः स्मृतः। ब्राहमणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।। ओम् नन् और सन् यह तीन प्रकारके ब्रह्मके नाम कहें हैं,और इन्हीं के द्वारा प्रथम ब्रह्माजीने ब्राह्मण, वैद और यज्ञाको निर्माण किया था ।। २३ ॥ तस्मादोमित्युदात्य यज्ञदानतपक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताःसततं ब्रह्मवादिनाम्।। इसकारण मोकार का उच्चारण करके ब्रह्म- वादी पुरुष शास्त्रोक्त यज्ञ, दान और तपररूप किया करने में प्रवृत्त रहते हैं।॥ २४॥ तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।. दानक्रियाश्च विविधाःक्रियन्तेमोक्षकांक्षितिः मोक्षकी इच्छा करनेवाले मनुष्य सब प्रकार के फलकी कामनाको त्यागकर तत् शब्दका

भगवत
उच्चारण करके यज्ञ, तप और दानरूप विविध
प्रकारकी क्रियायें करते हैं।॥ २५ ॥
सदावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्त कर्मगि तथा सच्छन्दःपार्थ युज्यते२६
हे अर्जुन ! सदभाव अर्थात् "है" इस अर्थम
और साधुभाव अर्थात् उत्तमता नया शुभकर्म में
सत् शब्दका प्रयोग कियाजाता है ॥२६॥
यज्ञ तपसि दानेच स्थितिःसदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदीयं सदित्येवाभिधीयता२७॥
यज्ञ, तप और दान इनमें स्थिति को सन्
अर्थात् सत् स्थिशि कहते है, और परमेश्वर के
अर्थ किये हुएको भी सत् ( सत्कर्म ) कहते हैं२७
अश्रद्रया हुतं दत्त तपस्तसं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्त्य नो इहा
इति श्रीमद्भगवीतासुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्ने
श्रीकृष्णार्जुनसंबादे श्रद्धात्रयविभाग-
वांगीनामसनदशोऽध्याय:॥१७॥

भाप टांक-. १८
हे पार्थ । श्रदारहित जो यज्ञ, दान और
तप तथा और भी जो कर्म कियाजाता है उसको
असन् कहते हैं, तथा वह असन् कर्म इस लोक
और परलोकमें कुछ फल नहीं देता ॥ २८ ॥
इतिश्र भाषाटीकायां सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७॥
अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच ।
संन्यासस्य महावाहो तत्त्वमिच्छामि
वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्के.
शिनिषूदन ॥१॥
अर्जुनने पूछा-
हे महाबाहो ! हे हपीकेश !! हे केशिनिकन्दन!!
अव संन्यास और दान इन दोनोंका भिन्नर भेद,
सुनने की मेरी इच्छा है ॥ १॥

२६२ भगवद्गीता , श्रीभगवानुवाच। काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यास कवयो- विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥२॥ श्रीभगवान् बोले कि- सम्पूर्ण काम्य कर्मोके त्यागको तत्त्वज्ञानी पुरुष सन्न्यास कहते हैं, और सम्पूर्ण कर्मोंके फलके परित्यागको चतुर पुरुष त्याग कहते हैं ॥२॥ त्यागं दोषवदित्येके कर्म माहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपाकर्म न त्याज्यमितिचापरे ।।३।। कोई २ बुद्धिमान् पुरुष कहते हैं कि कर्म सदोष हैं अतएव उनको त्याग देना चाहिये, तथा अन्य विद्वान् पुरुष कहते हैं कि-यज्ञदान और तप, सम्बन्धी कर्मको नहीं त्यागना चाहिये ॥३॥ निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।

भाषाटीका--अ० १८॥ त्यागोहि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः। परन्तु हे अर्जुन ! त्यागके विषयमें जो मेरा निश्चय है, उसे तुम सुनो । हे नरशार्दूल ! त्याग तीन प्रकारका कहा गया है ।।४।। यज्ञदानतपाकर्म नत्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञोदानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ५ यज्ञ, दान और तपसम्बन्धी जो कर्म हैं उनको त्यागना न चाहिये, वह कर्म अवश्यही कर्तव्य हैं क्योंकि-यज्ञ, दान और तप यह कर्म विवेकी पुरुपोंके मनको पवित्र करते हैं ।।५।। एतान्यपि तु कर्माणिसंगत्यक्त्वा फलानिच कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चित मतमुत्तमम् परन्तु हे पार्थ! यह सव कर्मभी फल और आसक्तिको त्यागकर करने चाहिये, ऐसा मेरा सर्वोत्तम निश्चय है ॥६॥ नियंतस्य तु संन्यासः कर्मणोनोपपद्यते ।

भगदाता।
माहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः
क्योंकि हे अर्जुन ! नित्यकर्माका सन्यास नहीं
करना चाहिये और यदि मोहसे नित्यकाका
त्याग करदिया जाय तो उसको तामस त्याग
कहते हैं ॥ ७॥
दुःखमियेय यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
सकृत्याराजसत्याग नैव त्यागफलं लभेत्।
क्रमानुष्ठान को कष्टसाध्य समझकर शरीर
को क्लेश होनेके भयसे जो नित्यकर्मोंकात्याग
किया जाता है उसका राजस त्याग कहते हैं,
और रानस त्यागसे त्यागका फल नहीं मिलता।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
संगत्यक्त्वा फलंचव सत्यागःसात्त्विकोमतः
नियमित कर्म अवश्य कर्तव्य है, पेसा निश्चय
करके उन काँके फल और उनमें आसक्तिको
त्यागके जो कर्म कियेजाते हैं, उनको साविक
स्याग कहते है ॥ ९॥

मागाटीका-अ.१८॥ नदेष्ट्यकुशलं कर्म कुशलेनानुपज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टोमेधावी छिन्नसंशयः।। साविक त्यागवाला, सतोगुणी तथा बुद्धिमान् (गत्वज्ञानी) और जिसके सम्पूर्ण सन्देह दूर होगये हैं ऐसा पुरुप कष्टसाध्य कर्मों में देष और नुसाध्य कमोंमें अनुराग नहीं करता ॥ १० ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुंकर्माण्यशेषतः। यस्तु तुकर्मफलत्यागी सत्यागीत्याभिधीयते११ शरीरधारी ( पुरुप ) सम्पूर्ण कर्मों के त्यागने को असमर्थ है, इस कारण जिसने कमोंके फल को त्याग दिया है वही त्यागी कहाजाता है। अनिष्टमिष्टं मिश्रंच त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनांप्रेत्य नतुसन्यासिनां कचित् अनिष्ट ( नरकादिकी प्राप्तिरूप ) इष्ट (स्वर्गा- दिककी प्राप्तिरूप ) और मिश्र (अर्थात्-सुख दुःख समन्वित मनुष्यादि देहप्राप्तिरूप ) यह भगवनीता। सीन प्रकारके कर्मोंके फल है, त्यागन करनेवाले पुरुषों को यह फल शरीर त्याग करने के अननगर प्राप्त होते हैं, और संन्यासियोंको प्राप्त नहीं होते अर्थात्-संन्यासियों की मोक्ष होजाती है ।।१२।। पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निवोध मे। सांख्यकृतांतेप्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् हे महावाहो ! समस्तकोंकी सिद्धिके लिये तत्वज्ञान को उत्पन्न कराने वाले सांख्यशास्त्र में यह पांच कारण वर्णन किये हैं उनको तुम मुझसे सुनो ॥ १३ ॥ अधिष्ठानं तथा कर्त्ता करणंच पृथाविधम् । विविधाश्च पृथक्चष्टादैवं चैवात्र पञ्चमम्१४ अधिष्ठान ( सुख दुःखादिका आश्रय शरीर) कर्ता (अहंकार ), अनेक प्रकारके करण अर्थात् श्रोत्रादिक, विविधभांतिकी चेष्टा (माण, अपान श्रादिकों के व्यापार ) बार यह और पांचवाँ २६७ मापारीका-40101 देव अर्थान--सवका प्रेरक, कोंके यह पांच कारण हैं ॥४॥ शरीरवाशनोभिर्यकर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पचते तस्यहेतवः१५ यह मनुष्य शरीर वाणी अथवा मन इनके द्वारा उत्तम वा अधम जो कुछभी कम करता है, उस सबके यह उपरोक्त पांच कारण है ॥ १५ ॥ तत्रवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृनबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।। ऐसा होनेपर भी संस्काररहित जो अज्ञानी पुरुप( सब से भिन्न रहनेवाले भी) आत्माको कतीरूप से देखता है, वह मन्दमति पुरुष कुछ भी नहीं देखता अर्थात् अज्ञानी है ॥ १६ ॥ यस्य नाहंकृतोभावोबुद्धिर्यस्य न लिप्यते । हत्वापिस इमाँल्लोकानहन्ति न निबद्ध्यते।। जिस पुरुषको ( मैं यह करता हूं ऐसा ) अहं- २६८ ज्ञान, भगवद्वाना। कार नहीं है, और जिसकी बुद्धि कर्मों में प्रासक्त नहीं है, वह इन लोकोंको मारकर भी उन्हें नहीं मारता और किसी प्रकारके कर्मोंसे लिप्त नहींहोता! ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥ ज्ञेय और ज्ञाता यह तीन प्रकारके कर्मके प्रवर्तक हैं। तथा कारण, कम और कर्ता यह तीन कर्मके आश्रय हैं ॥ १८॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि।। हे अर्जुन ! सांख्यशास्त्रमें ज्ञान, कर्म और कर्ता इनको सत्व, रज और तम इन तीन प्रकार के गुणोंके मेद से तीन प्रकारको कहा है, उनको मैं कहता हूं तुम मुनो ।। १९॥ सर्वभूतेषु धेनैकै भावमव्ययमीक्षते । अवि.

भाषाटीमा--१.१८ पविभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ।। जिन ज्ञान करके समम्स माणियों में भेदरहित निर्विकार और एकही आत्मस्वरूप को पुरुष देखता है,उस ज्ञानको सात्त्विक ज्ञान कहते हैं।॥२०॥ पृथक्त्वेन तुयज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान वत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धिराजसम्२१ और जिस ज्ञान करके पुरुष भिन्न २ समस्त मारिणयों में अनेक प्रकार के असंख्य भावोंको देखताह,हे अर्जुन!उस ज्ञानको राजस ज्ञान जानो। यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । अतत्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम् २२ तथा जिस ज्ञानकरके एकही किसी देहादिक में ईश्वर वा श्रात्मा इतना ही है इस मकारके आग्रहयुक्त, प्रमाणरहित, असत्य और तुच्छ ज्ञानको तामम झान कहते हैं ।। २२॥

भगवद्गीता। नियतंसंगरहितमरागद्वेषतः कृतम् । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते २३ आसक्ति और राग द्वेष छोड़कर फलमाप्तिकी कामना न करके जो नित्य कर्म कियाजाता है उस कर्मको सात्त्विक कर्म कहते हैं ॥ २३॥ यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारण वा पुनः । क्रियते वहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४॥ किसी कामना से, अथवा अहंकारसे अत्यन्त क्लेशपूर्वक जो कर्म कियाजाता है उसको राजस कर्म कहते हैं ॥२४॥ अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते २५॥ परिणाम में होनेवाले धनके नाश, शुभ और अशुभ दूसरोंको पीडा. एवं अपने पुरुषार्थ इनको : न समझकर अज्ञानसे जिस कर्म का मारम्भ किया १-- तत्तामसमुदाहंतमित्यपि पाठः ॥

भापाटीमा-अ. 10 २७॥ जाना , उसको तामस कर्म कहते हैं ॥ २५ ॥ मुक्तसंगोऽनवादीधृत्युत्साहसमन्वितः सिद्धयमिद्धयोनिर्विकारः कर्ता सात्त्विक- उच्यते । २६ ॥ आसत्तिरहित, अहंकारवर्जित, धैर्य और उत्साह से युक, कर्मफलकी सिद्धि और असिद्धि में निर्विकार अर्थात्-हर्प-शोकरादित ऐसा जो की है उसको सात्तिक कर्ता कहते हैं।। २६ ।। रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धोहिंसात्मकोशुचिः हर्षशोकान्वितः कर्ती राजलापरिकीर्तितः। अनुगग करनेवाला. कोंके फलकी कामना करने वाला, लोभी, हिंसक, अपवित्र, हर्ष और शोक करके युक्त जो कर्ता है उसको राजस का कहते हैं ॥ २७ ॥ अयुक्तःप्राकृतः स्तब्धःशठोनैष्कृतिकोऽलस विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामसउच्यते ॥

भगवद्गीता २५२ असावधान, विवेकरहित, स्तब्ध भयो पूच्या की पूजाका व्यतिक्रम करने वाना, शर अन्य पुरुषोंका निरादर करनेवाला, आलसी/विपाद- युक्त और दीर्घसूत्री( अर्थान् स्वल्पकाली को भी महीनों में करनेवाला ) ऐसे कर्माको तामस कहते हैं ।। २८ ॥ बुद्धभेदं धृतेश्चैव गुणतन्त्रिविधं शृणु । प्रोच्यमानमशेपेण पृथक्त्वेन धनञ्जय २९ हे धनञ्जय ! बुद्धि और धृनि इनके भेदभी सत्व, रज और तम इन गुणों करके तीन प्रकारके होते हैं, अब उन सबको मैं सम्पूर्णता से वर्णन करताहूं तुम सुनो ॥ १९॥ प्रवृत्तिंच निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्य माक्षश्च या घेत्ति वुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥३०॥ हे पार्थ ! कार्य और अकार्य तथा भय और !

२७३ भाषाटीका-१० १८॥ अभय इनके विय वृत्ति और निवृत्ति, तथा बन्ध और मोक्ष को जो भलीमकार समझती है, वह साविकी वृद्धि कही जाती है ॥ ३० ॥ यया धर्ममधर्म च काय चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति युद्धिःसा पार्थ राजसी।। डे अर्जुन ! जिसके द्वारा धर्म और अधर्म तथा कार्य और कार्य को यथार्थ न समझसके वह राजसी बुद्धि कही जाती है ॥ ३१ ॥ अधर्मधर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थाविपरीतांश्च वुद्धिःसापार्थ तामसी और जो बुद्धि अज्ञानसे आच्छादित होकर धर्मको अधर्म अथवा अधर्मको धर्म जानती है, तथा सम्पूर्ण अर्थोंको विपरीत मानती है, है अर्जुन ! उस वुद्धिको तामसी बुद्धि कहते हैं ३२ धृत्या ययाधारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रिया:

भंगवाता । योगेनाऽव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ।। ३३ ॥ जिस अनन्य धृतिकरके योगके द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों के क्रियाओं को धारण किया. जाता है, वह सात्विक की धृति कहाती है ३३ यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन । प्रमंगेन फलाकांक्षीधृतिः सापार्थ राजसी। हे अर्जुन ! जिस धृति करके पुरुष धर्म, काम और अोंको धारण करता है, और प्रसंग अनुसार जिस करके फलकी कामना करता है, वह राजसी धृति कहनाती है ॥ ३४ ॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । न विमुञ्चति दुर्मधाधृतिः सा पार्थ तामसी हे अर्जुन ! जिस धृतिके द्वारा दुर्बुद्धि पुरुप. स्वम, भय, शोक, विषाद और मदको नहीं त्यागता उसको तामसी धृति कहत हैं ।। ३५ ।।

मावाटीका--0001 २७५ सुग्न त्विदानी त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ । अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! सुखभी ( उक्त सत्वादि गुणों करके ) तीन प्रकारका होता हैं, उसका वर्णन तुम मुझसे सुनो, जिसमें अत्यन्त अभ्यास होने के कारण रमण करता है और जिसके माप्त होनेसे दुःखका नाश होजाता है।। यत्तदनेविपमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुख सात्त्विकंप्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् जो मारम्भमें विष और अन्तमें अमृतकी समान हो । अपनी वुद्धिको निर्मल करनेवाले उस सुखको सात्विक सुख कहा है ॥३७॥ विषयोन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्। और जो सुख शब्दादि अपने २ विषयों में भगवद्गीता आसक्त हुई इन्द्रियों के संयोगसे प्रथम तो अमृत की समान तथा अन्तमें विषकी समान हो उस को राजस सुख कहते हैं ॥३८॥ यइग्रे चानुबन्धे च सुख मोहनमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् १९ जो प्रथम भी और अन्त में भी आत्माका मो. हित करनेवाला हो तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न हुआ हो ऐसे सुख को तामस सुख कहागया है ॥ ३९ ॥ न तदस्ति पृथिव्यां वादिविदेवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजमुक्तं यदभिःस्यात् त्रिभिर्गुणैः हे अर्जुन ! पृथ्वी, स्वर्ग वा देवताओं के बीच ऐसा कोई भी जीव नहीं है, जो प्रकृतिजनित सत्व, रज और तम इन गुणों करके मुक्त अर्थात्- भिन्न हो ॥४०॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।

भाषाटीका-अ.१८ २७७ कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रावगुणैः ।। हे परन्तप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्षों के कर्म स्वभाव अर्थात्- प्रकृनिजनित गुणों करके भिन्नर विभक्त होरहे हैं ॥ ४१ ॥ शमोदमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।। शम (चित्तकी शान्ति ) दम(बाह्यइन्द्रियोंका दमन ) तप, शौच (वाहर और भीतरकी शुद्धि) क्षमा (शान्ति अर्थात्-सहनशीलता), ऋजुना ( सरलता) ज्ञान और विज्ञान अर्थात्-शास्त्रीय और लौकिक ज्ञान, तथा आस्तिकता ( परलोक के विषय में श्रद्धा ) यह ब्राह्मणोंके स्वाभाविक कर्म हैं ॥ ४२ ॥ शौर्य तेजोधृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।

१७८
भगवद्गीता!
शूरता, तेज, धैर्य, चतुराई, युद्ध में स्थिर रहना,
दानकरने में रुचिका होना, और स्वामित्व अर्थात्
सामर्थ्यका होना,क्षत्रियों के यह स्वाभाविक कर्म है।।
कृपिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्मस्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शुद्रस्यापिस्वभावजम्।।
कृपि ( खेती करना ), गौओंकी रक्षाकरना,
वाणिज्य अर्थात्-व्यापार करना, यह वैश्यों के
स्वाभाविक कर्म है और(उपराक्त तीनों वणीकी)
सेवाकरना यह शूद्रोंका स्वाभाविक कर्म है।४४॥
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतःसिडिं. यथा विन्दति तच्छृणु।।
हे अर्जुन ! पुरुष जो है अपने २ कर्मोहीमें
तत्पर रहकर उत्तम सिद्धि (अर्थात्-मोक्ष ) को
माप्त होता है, अपने कर्मम निरत रहकर जिस
प्रकार उत्तमगतिकी प्राप्ति होती है, सो तुम
सुनो ॥ ४५ ॥

भाषारीका-अ०१61
२७९
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दतिमानवः
जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण माणियों की उत्पत्ति
होती है, और जिसने इस संपूर्ण संसारको व्याप्त
कर रक्खा है, उसी परमेश्वर को मनुष्य अपने
कर्मद्वारा पूजन करके उत्तम सिद्धिको प्राप्त होता है।
श्रेयान्स्वधर्मोविगुण परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्
भली प्रकार आचरण करे हुए दूसरों के धर्म
से, अपना धर्म थोड़ाभी होसके नौ श्रेष्ठ है क्यों-
कि-अपने स्वाभाविक कर्मोंके करने से पुरुष पापों
का भागी नहीं होना ।। ४७ ॥
सहज कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भाहिदोषेण वूमेनाग्निरिवावृताः।।
हे अर्जुन ! स्वाभाविक कर्म यदि दोषयुक्त हों
सौ भी उनका परित्याग न करे, क्योंकि-सामा-
.

भगवदाता ।
न्यता से सम्पूर्णही कर्म दोपोंसे इस प्रकार
आच्छादित होरहे हैं,जैसे अग्नि धूमस आच्छादित
रहती है ।। ४८ ॥
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिपरमां संन्यासेनाधिगच्छति।।
जिसकी बुद्धि सर्वत्र आसक्त नहीं है ऐसा तथा
जितेन्द्रिय, और इच्छारहित पुरुष संन्यास
अर्थात्-निष्काम कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त
होता है ।। ४६॥
सिद्धिं प्राप्तोयथाब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैय कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
हे कुन्तीनन्दन ! इस सिद्धिको प्राप्त हुआ पुरुष
जिसमकार ब्रह्मको प्राप्त होता है, उस प्रकारका
तया उस ज्ञानकी उत्तम मर्यादाको मैं संक्षपसे
वर्णन करता हूं तुम मुनो ॥५० ।।
बुद्धयाविशुद्धया युक्तोधृत्यात्मानं नियम्य च

भाषाटीका-अ०१८
२८१
शब्दादीविषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्यच
विविक्तसेवी लध्वाशीयतवासायमानसः।
ध्यानयोगपरोनित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः५२
अहंकारं बलं दर्प कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममःशान्तोब्रह्मभूयाय कल्पते॥
धैर्य के द्वारा अपने मनको रोककर,शब्द, स्पर्श,
रूप, रस और गन्ध, इन विषयोंको छोड़, राग
द्वेषका परित्याग कर, तथा अहंकार, वल, दर्प,
काम, क्रोध और उपभोग इन सबको त्यागकर
अत्यन्त शुद्ध बुद्धि करके युक्त, एकान्त स्थानका
सेवन करनेवाला, स्वल्पाहारी, वाणी,शरीर और
मनको जीतनेवाला, ध्यान (आत्मचिन्तन) तथा
योग (आत्मस्वरूपमें चित्तकी एकाग्रतामें तत्पर)
एवं नित्य वैराग्यको प्राप्त हुआ,ममतारहित और
शान्त ऐसा पुरुष ब्रह्ममाप्तिके योग्य होता है।५११
॥५२॥५३॥

मगवडीता।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मान शोचतिन कांक्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्५४
ब्रह्ममें स्थित हुआ, प्रसन्नचित्त वाला, पुरुष
सम्पूर्ण प्राणियों में समानभाव से देखता है, और
किसी प्रकारके शोक वा अभिलापाको नहीं करना
तथा मेरी परम भक्तिको माप्त होता है ।। ५४ ।।
भक्त्यामामभिजानातियावान्यश्चास्मितत्त्वतः
ततोमा तत्वतोज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्५५
तिसके अनन्तर उस भक्तिके प्रभावसे ही मुझ
को सर्वव्यापी और सच्चिदानन्दस्वरूप तत्त्वसे
जानता है, तदनन्तर मुझे तत्त्वेस जानकर मुझसे
प्रवेश करता अर्थात् मेराही स्वरूप होजाता है ५५
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणोमद्यपाश्रयः ।
मत्मसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्५६
निरन्तर संपूर्ण कर्मोंको करता हुआभी मेरी
शरणमें आया हुआ पुरुष मेरी कृपा से अवि.

मापाटीका-५-१८1 २८३ नाशी और अनादि परम पदको माप्त होता है५६ चेतसा सर्वकागि मयि सन्यस्य मत्परः । बुद्धियोगमुपाश्रित्य मञ्चित्तः सततं भव५७/ हे अर्जुन ! मनसे संपूण कौंको मेरे विर्षे अर्पण करके मेरी भक्तिमें तत्पर हो बुद्धि के द्वारा एकाग्रताको प्राप्त होकर सदा मेरे वि. चित्तको लगाओ ॥१७॥ मचित्तः सर्वदुणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चत्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंत्यसि।। हे पार्थ ! तुम मेरे विर्षे चित्त लगाकर मेरे अनुग्रहसे संपूर्ण दुःखोंके पार होजाओगे, और यदि तुम अहंकार से मेरे वचनोंको नहीं सुनोगे तो नाशको प्राप्त होजाओगे ॥५६॥ यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्यइति मन्यसे । मिथ्यैषव्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति यदि तुम अहंकारको प्राप्त होकर ऐसा मानते युद्ध नहीं करता, तुम्हारा यह हो कि मैं तो

१८४
भगधाता।
विचार मिथ्या है, क्योंकि प्रकृति ( जातीय-
स्वभाव) अवश्य ही युद्धमें प्रवृत्त करेगी ।। ५९ ।।
स्वभावजेन कौन्तेय निवडः स्वेन कर्मणा।
कर्तु नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत्
कुन्तीनन्दन ! तुम जिन कर्मोंको अज्ञानसे
करनेकी इच्छा नहीं करते हो, स्वाभाविक कर्मों
से वन्धनको प्राप्त टुप तुम उन्हीं कम्मोंको परवश
होकर करोगे ।। ६०॥
ईश्वरः सर्वभूतानां दृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया६१
हे अर्जुन! परमेश्वर अपनी माया करके संपूर्ण
माणियों के
हृदय में स्थित होकर यन्त्रमें वधी-
हुई कठपुतलियों की समान समस्त माणियों
को भ्रमाते हैं । ६२ ।।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
सत्प्रसादात्परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि
शाश्वतम् ॥ ६ ॥

भावा-. १८॥ , है भारत ! तुम सब प्रकार से उन परमेश्वर शरगा में जायो, और उन्हीकी कृपाले परम शान्ति और नित्य (अचल) स्थानको माग होओगे। ति ते ज्ञानमाख्यातं गुयाद् गुह्यतरं मया । वेश्यैतदशेपेण यथेच्छसि तथा कुम।।६३॥ है अर्जुन ! इसमकार मैंने परम गोपनीय ज्ञान तुमसे वर्णन किया, इस सम्पूर्ण ( भगवद्गीता कप परम गोपनीय) ज्ञानको आद्योपान्न विचार कर जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो ॥६३ ॥ बर्वगुष्यतमं यः शृणु मे परमं वचः । टोऽसिनेढमतिस्ततोवक्ष्यामितेहितम् ।। हे मित्र ! फिर भी सम्पूर्ण गोपनीयों से भी प्रतिगोपनीय मेरं परम [ श्रेष्ठ ] वचनों को सुनो तुम मेरे परम मित्र हो, इस कारण तुम्हारे हितको कहता हूं ॥ ६४॥ मन्मनाभव सद्भक्तोमद्याजी माननस्कुरु । समेवेष्यास सत्यंते प्रतिजाने नियोऽसि ।।

८ मगीता। हे अर्जुन ! तुम चित्त की वृत्तिको मेरे विप लगाओ,मेरे भक्त होकर मेरी ही पूजा करो, और मुझेही नमस्कार करो, मैं सत्य कहता हूं कि.. तुम ऐसा करने से निश्चय मुझे प्राप्त होओगे, क्योंकि-तुम मुझे परम प्रिय हो।। ६५ ।। सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहंत्वांसर्वपापेभ्योमोक्षयिष्यामि माशुचः।। अर्जुन ! तुम संपूर्ण धम्मोको त्याग कर केवल मेरी ही शरण में बाजायो, तुम किसी मकारका शोक मत करो मैं तुम्हें संपूर्ण पापों से। मुक्त करदूंगा ॥६६॥ इदंते नातपस्काय नायताय कदाचन । नचाशुश्रूपवेवाच्यं न च मांयोऽभ्यसूयति ।। हे अर्जुन ! यह (गातारूप) ज्ञान तुम्हारे ही अर्थ वर्णन किया है, तपश्चर्याहीन, भक्ति भाव रहित, और जिसकी सुनने की इच्छानो अथवा जो मेरी निन्दा करता हो ऐसे पुरुषों ..

भावाटीका-१८ पद्द ज्ञान कभी भी कहना न चाहिये ॥ ६७ ॥ यदं परमं गुधं मक्तेप्यभिधास्यति । भक्तिं मयि परांकृत्वा मामवष्यत्यसंशयः।। जो पुरुप मरी भक्ति करके इस परम गोपनीय ज्ञानको मेरे भक्तजनों से कहेगा, वहभी निःसन्देह मुझ को प्राप्त होगा ॥६॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । सविता न च से तस्मादन्यः प्रियतरामुवि ।। क्योंकि-(गीताशास्त्ररूप) उस ज्ञानोपदेश करने वाले भक्तसे अधिक और कोई मेरा प्रिय करनेवाला मनुष्योंके मध्य में नहीं है और न उसकी समान प्यारा कोई इस लोक में उत्पन्न होगा !! ६९॥ अध्येप्यते च यइमं धा सम्वादमावयोः । ज्ञानयजेन तेनाहामिष्टा स्यामिति मे मतिः।। जो पुरुप धर्मयुक्त हमारे तुम्हारे इस सम्वाद (गीता ) को पड़ेगा, निःसन्देह वह पुरुष ज्ञानयज्ञ २८८ . भगवदगीता । के द्वारा मेरा पूजन करनेवाला होगा पसी मेरी मति है ।। ७० ॥ श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः । सोऽपि मुक्तःशुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्य- कर्मणाम् ।। ७१ ॥ श्रद्धायुक्त जो पुरुष दोपदृष्टिको छोड़कर इस गीताशास्त्रका केवन श्रवणही करेगा वह भी समस्त पापों से मुक्त होकर पुण्यात्मा पुरुषोंके उत्तम लोकोंको प्राप्त होगा ॥ ७१ ।। कञ्चदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । कच्चिदज्ञानजं मोहः प्रनष्ठस्ते धनञ्जय॥७२॥ हे पार्थ ! तुमने हमारे कहेहुए इस ज्ञान को एकाग्रचित्तसे सुना या नहीं ? और हें धनञ्जय ! तुम्हारा अज्ञानजनित मोह नाशको प्राप्त होगया वा नहीं ॥७२॥ अर्जुनउवाच । नष्टोमोहःस्मृतिलब्धात्वत्प्रसादान्मया- ...

भापाटीका-अ
२८९
च्युत । स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये
वचनं तव ।। ७३ ॥
अर्जुनने कहा कि-
हे अच्युत ! आपकी कपासे मेरा मोह नष्ट हो.
गया, और आत्मज्ञानरूप स्मृति प्राप्त हुई, मेरे
सम्पूर्ण सन्देह दूर होगये और मैं निश्चल हूं
(अर्थान्-आपके उपदेश किये हुए जान से चला-
यमान नहीं होसक्ता ). और जो वचन आपने
कहे हैं उन्हें करूंगा ।१७३॥
सञ्जयउवाच ।
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
सम्वादमिममनीषमद्भुतं रोमहर्षणम् ७४
सञ्जय बोलें कि-
हे राजन् ! (धृतराष्ट्र !) इस प्रकार शरीर
को रोमाञ्चित करनेवाले महाभाग श्रीकृष्णचन्द्र
और अर्जुनके परम अद्भुत सम्वाद को मैंने सुना।।

२९. भगवद्गीता। व्यासप्रसादात् श्रुतवानिम गुह्यतमं परम् । योग योगेश्वरात् कृष्णात्साक्षात्कलयतः स्वयम् ॥ ७५॥ श्रीव्यासजीकी कृपासे मैंने इस परमगोपनीय ज्ञानको योगेश्वर साक्षात् श्रीकृष्ण भगवान्के मुख से सुना ॥ ७५ ॥ राजल संस्मृत्य संस्मृत्य सम्वादमिममद्भुतम् केशवानयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः७६ हे महाराज ! श्रीकृष्ण और अर्जुनके परम पवित्र और अद्भुत इस सम्बादको स्मरण करके मैं वारम्बार अत्यन्त प्रसन्न होता हूँ॥ ७६ ।। तच्च संस्कृत्य संस्मृत्व रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयोले महान राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः।। ७७॥ और हे राजन् ! श्रीकृष्ण के उस विश्वरूपका जैतनी बार स्मरण होता है तव तवहीं मुझको भाषाटीका-अ. १८! चार वार आश्चर्य होता है, तथा परमानन्दको प्राप्त होता हूं ॥ ७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णोयन्त्र पार्योधनुर्धरः । तत्र श्रीविजयोभूति वा नीतिमतिर्ममा॥७॥ इतिश्रीमनगवद्गीतासूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सन्यासयोगोनामा- टादशोऽध्यायः ॥१८॥ हे राजाधिराज ! जहां योगिराज श्रीकृष्ण विद्यमान हैं और जहां गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं यहां ही राज्यलक्ष्मी,विजय, ऐश्वर्य और निश्चल नीति है ऐसा मेरा निश्चय है ।। ७८.॥ इतिश्रीमुरादाबादनिवासिवेदशास्त्रसम्पन्नश्रीज्वालानाथ- शास्त्रितत्पन्नवजरत्नभट्टाचार्यकृती रत्नप्रभाभि- धानायां भाषाटीकायामष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ ॥गीताशास्त्रं समाप्तम्।

श्री।
*विक्रयार्थ पुस्तकें
-
श्रीमद्भागवत ।
सान्वया,विस्तारके साथ भाषाटीका,टिप्पणी
माहात्म्य, चित्र और सूचीसहित अत्युत्तम
दो जिल्दोंमें । पृष्ठसंख्या २१७६ मूल्य ५) रु०,
डाकव्यय १)
श्री१०८स्वामिशङ्कराचार्यरचित
प्रबोधसुधाकर
वेदान्तग्रन्थ ।
सूल और भाषानुवादसहित, यह ग्रन्थ अभी
तक कहीं नहीं छपा, इसके देखने से विद्वान्से
लेकर भाषामात्र पढ़े गृहस्थियों पर्यन्तका बहुत
उपकार होगा. कपड़ेकी जिलदका मूल्य ॥) पुढे
की जिल्द ) डाकव्ययसाहित ।

(रा)
योगवासिष्ठसार
भाषाटीकासहित।
यह भी वेदान्तका अपूर्व ग्रन्थ है, इसमें
नेदान्तविद्या के साधनोंका भलीभांति वर्णन
किया गया है। स्थूलाक्षर,उत्तम सुनहरी गुटकाकार
जिल्दंवधीका मूल्य ) डा० पृथक् ।
प्रात्मरामायण।
श्री१०८स्वामिशङ्करानन्दप्रणीत ।
भगवद्भक्तो ! यह वेदान्तविषयकी अद्भुत
पुस्तक तयार है । भगवान्की भक्ति, प्रात्मशान
का साधन भौर रामायणकी सम्पूर्ण लीलाभों
का वर्णन देखना है तो इसे अवश्य देखिये।
मन्दर मनहरी गुटकाकारजिल्दबंधीका मूल्य ॥ )
टाकव्यय पृषका
..

विज्ञाननाटक।
श्री१०८स्वामिशङ्करानन्दप्रणीत ।
यह भी वेदान्तका अपूर्व पुस्तक है, प्रशंसा
करना व्यर्थ है, पुस्तक देखने से ही विदित होगा
सुन्दर सुनहरी गुटकाकार जिल्द बंधीका मूल्य :
1) डा पृथक् ।
वेदान्तस्तोत्रसंग्रह।
इसमें वेदान्तके उत्तम २ बत्तीस १२ स्तोत्रों
का संग्रह है । स्थूलाक्षरों में पुष्ट कागजपर छपा
है। उत्तम रेशमी जिल्द बंधी है, मूल्य।)डा.
अनुभवानन्दलहरी।
श्री १०८स्वामिकेशवानन्दकृत ।
अन्धय, पदार्थ और मापातीकांसहित । या
भापने वेदान्त के अनेकों अन्य देखे होंगे,परन्तु या
अन्य भाजतक कहीं नहीं छपा । मूरप)

(घ) श्रीगोपालसहस्रनाम स्तोत्र सापाटीकासहित। जो भगवद्भक्त मूनमात्र पाठकर अर्थों का श्रानन्द नहीं माप्त करसकते उन्हीकी सुगमताके लिये यह पदार्थ भापाटीका सहित उत्तमता से छापा है, इसका टीका ऐसा उत्तम है कि जिससे सर्वसाधा- रण लाभ उठासकें। और दूसरा लाभ यह है कि श्रीगोपालजी महाराजका अत्युत्तम रंगीनचित्र भी मयम लगा है, तया उत्तम सुनहरी जिल्द बंधीहुई है मूल्य १) डाकव्यय पृथक् । अर्जुनगीता। जिसमें कलिमलग्रसित मनुष्यों के हितार्थ नाना प्रकारके गृहस्थधर्म सम्बंधी, कर्म अर्जुन प्रति मान- न्दकन्द, परब्रह्म साक्षात् श्रीकृष्ण भगवान्ने वर्णन किये हैं, मूल्य ॥

(3)
नारायणीय।
(श्रीमद्भागवतार्थसारसंग्रह)
महाकवीश्वर श्रीमन्नारायणभट्ट निर्मित।
यदि आपको संस्कृतकी अनुपम भक्तिरसपूर्गा
कविता का आनन्द लेना है और सम्पूर्ण१२स्कर
श्रीमद्भागवत का सार अपूर्वरछन्दों में देखना है
तो इसे अवश्य देखिये । यह पुस्तक. अभी है
कही नही छपी, इसे हमने अत्यन्त परिश्रम से मार
कर छपाया है । ग्रन्थ २००० श्लोक के अनुमान
६, तिसपर भी मूल्य केवल 11) मात्र है ।।
पुस्तके मिलनेका पता-
गणेशीलाल लक्ष्मीनारायण
अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण यन्त्रालय
मुरादाबाद.

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श्रीमद्गगवदी्ता

Author
गणेशीलाल
Title
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File name
श्रीमद्गगवदी्ता
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2009
Publisher
लक्ष्मीनारायण
Language
Sanskrit
Pages
314
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322424
Barcode
99999990252899.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
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श्रीमद्गगवदी्ता