Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Sushrutsahinta
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प्रस्तावना। प्रायः ऐसा अनुमानमें आता है कि समस्त काँका मृल केवल शरीर है जबतक यह नीरुज, निरुपाधि और पुष्ट रहताहै तभीतक सब कर्तव्य ठीक है। नीतिमें भी ऐसा लेख है कि धन, पुत्र, कलत्रादिकले बढकर शरीरकी रक्षा करनी चाहिये इसके लिये भगवान् धन्वंतरिजीने पूर्वहीसे लोकहित विचार वैद्यक शास्त्र तथा अनेक औषधियां निर्मित की। यद्यपि वैद्यकविषयके अनेक अन्य मी बृहत् ग्रंथ हैं जिनमें प्रत्येक रोग निदान व रोगातुकूल उपयोगी औषधियां तथा और २ उपाय कथन किये गये हैं पर तब भी महात्मा सुश्रुतजीकी रचीहुई यह "सुश्रुतसंहिता" सब ग्रन्थोंसे बढ़ कर विचित्र और उपयोगी है जिसने इस ग्रंथको दृष्टिगत नहीं किया उसका वैद्य बनना निरर्थक है क्योंकि "सुश्रुतो न श्रुतो येन वाग्भटेन च वाग्भटः॥चरको नालोकितो येन स वेद्यो यमकिंकरः॥१॥" ऐसा कोई रोग नहीं जिसके दमनार्थ लाभकारी चिकित्सा इसमें न कहीगई हो तिसमेंभी विचित्रता यह कि धनी, कंगाल सबके योग्य सहजमें सिद्ध होनेवाली औषधियें कथित हैं। इस ग्रंयके संस्कृतमें होनेसे संस्कृतभाषाऽनभिज्ञ संसारीजीवोंको विशेष लाभ इससे नहीं होता था ऐसा विचारकर सबके सुलभार्थ इस ग्रंथकी परमाद्वितीय श्रेष्ठ भाषाटीका श्रीपंडितवर मुरलीधरशर्मा राजवैद्य द्वारा कराकर भाषाटीका समेत यह ग्रन्थ मुद्रित किया गया है ॥ ४ ॥ ग्रंथकी बाहुल्यतासे इसके चार विभाग भिन्न २ मुद्रित हुए हैं जिन- मेंसे यह दूसरा विभाग है। इसमें निदान और शारीरक दो स्थान हैं ।। निदानस्थान में तो वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातसे उत्पन्न हुए भीष्मरोगोंके निदान कहे गये हैं। शरीरस्थानमें शरीरसंबधी सर्वांगोंके शुद्धाशुद्ध लक्षण सविस्तर वर्णितहैं विशेष प्रशंसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है अवलोकन करनेसे गुण, अवगुण आपही प्रकट हो जाते हैं तब भी इतना तो हम अवश्यही कह सकते हैं कि वैद्यकविद्याविशारद जन इस ग्रंथको देखकर एकवार तो अवश्यही फड़क उठेंगे और इसके द्वारा अनेकानेक लाभ उठाकर हमारे परिश्रमको सफल करेंगे । इत्यलम् ॥ विद्धजनकृपाभिलापी- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेड्वटेश्वर" मुद्रणालयाध्यक्ष-मुंबई.
॥ श्रीः ॥ अथ सुश्रुतसंहितानिदानस्थान- विषयाऽनुक्रमणिका। पृष्टांक. ५११ ५११ टलेष्माके ल. .. 19 " ... ५१५ . :: " ५२८ , " : . विषय, पृष्टाक. विपय. अध्याय १. पित्ताशके ल. यातन्याधिनिदान रक्तार्गके ल. संपूर्ण वातव्याधिके विषय में सुश्रुतमुनि और धन्वंतरिजीका परस्पर प्रश्नोचर मनिपात और सहजाशके ल. साध्यासाध्य अर्श शुद्धवायुके कर्म ४९८ वायुके प्राणाटि पाचनाम मेट्रगतअर्श कान, नेत्र, नाक, मुख इनकी अर्श प्राणवायु ४९९ चर्मशीलके लक्षण उदानवायु द्वंद्वजादि अर्श समानवायु ५०० व्यानवायु अध्याय ३. अपानवायु अश्मरीनिदान भामाशयादिस्थानोंमें स्थित वायुके उपद्रव ५०१ चार प्रकारकी अश्मरीके हेतु आमाशयादि स्थानों में पित्तादिमे मिले हुए वायु- अश्मरीके सामान्य लक्षण के विकार कफारमरी पित्ताश्मरी वातरक ... वातरक्त लक्षण वात इमरी ५०५ वातरक्तके पूर्वल्प शुक्राइमरी शरादिकोंके पृथक् २ लक्षण साध्यासाध्यता ५०६ आक्षेपकवायु अध्याय ४. अपतानक और दंडापताना वायु भगन्दरनिदान अपतानक वायुमें धनुस्तंभादि भेदोंका वर्णन... ५०७ भगन्दरके जातिभेद आक्षेपक वायुमें चारप्रसारके भेदोका कथन ... ५०८ भगन्दरकी निरुक्ति और पूर्वरूप गृतमी ५१० शतपोनक... विश्वाची • . ५११/ उष्ट्रग्रीव क्रोष्टुनीर्ष परिस्रावी. खंजरादिरोगोंका पृथक् २ वर्णन... शंकावर्त उन्मार्गी भगन्दरके लक्षण अध्याय २., अ निदान ५१४ अध्याय ५. छ. प्रकारके अर्श और उनके रूपोंका वर्णन... कुष्टनिदान वातार्शके लक्षण ५०६ ५०४ . . ... ... ५२४६ ५२५५ " १ १२ ... ५२८ . . ... 0.. ५१६ कुष्टरोगके हेतु . है *- (२) सुश्रुतसंहिता- पृटाका. . ५३३ / जलोदर . ... ... . ... . . ५५८ . . ... . विषय. पृष्ठांक. विषय. कुष्टका पूर्वम्प ५३२) आगन्तुक क्षतादर ( पग्विाव्यर) अठारह कुष्टोका वर्णन महाकुटोंके स्वरूप और लक्षण ०३५ सब उदररोगों के मामान्य चित्र क्षुद्रकृष्टॉका कयन ५३५ अध्याय८. किलास रोगका वर्णन ५३० मूढगर्भनिदान कुष्टॉक उपद्रव मूढगर्भके हेतु और लक्षण घातुगत कुष्टलक्षण ५३८ कालादि चार प्रकारके मृटगर्भ २३प मातृन पितृज कुष्ठ *३९ मूढगर्भको आठ प्रकारको गनिका वर्णन कुष्टकी साध्यासाध्यता नर्मशावादिकांका वर्णन कुंटानिकी मक्रामकल अध्याय ९. अध्याय ६. विनिदान प्रमेहनिदान ५८० विद्रधिकी समाप्ति और भेट प्रमेहके हेतु और पूर्वरप ५४१ / विधियांके लक्षण ऋफवात पित्तजनित प्रमेहकि मायासाध्यत्वका अन्तविधि वर्णन... ... ५.२ अन्तर्विद्रधिके म्यान ... कफनिमित्त प्रमेहोंके लक्षण ... ५४३ विद्रधियोंके विशेष लक्षण पित्तनिमित्त प्रमेहोंके लक्षण विधियांनी मान्यानाध्यता वातानिमित्त प्रमेहाके लक्षण अध्याय १०. कफ प्रमेहके उपद्रव ... विसर्पनीम्तनरोगनिदान पित्तग्रमेहके उपद्रव विसर्पकी समामि वातप्रमेहके उपद्रव प्रमेह पिडका ५४५ नाही तणको निति और भेद. प्रमेहपिढकाओंके लक्षण पिडकाकी असाध्यता ५४६ स्तनरोगके हेतु ... वातग्रमेहकी असाध्यता दूषितस्तन्यके लक्षण प्रमेहका परिवान शुद्धस्तन्यके लक्षण मधुममेहका वर्णन अध्याय ११. अध्याय ७. ग्रंथी-भपची अर्बुद-नालगण्टनिदान उदररोगनिदान ५४७ ग्रथिनिदान उदरगंगोत्री संख्या और हेतु ५४८ वातादि प्रथियोंके लक्षण उटररोगोका पूर्वम्प . अपचौनिदान बातोदर ...५४९ अर्बुदनिदान पितोटर रकार्बुदके लक्षण ऋफोदर मांसाद... सुनिपातोदर गलगण्डनिदान सहोदर .. ... ५५० वातजगलगण्डक पदगुदोदर ... ५५१) अफज गलगण्डके लक्षण . . . " . . ... विसर्पके लक्षण :: ५६४ ... नाडीत्रण लक्षण :: . ५६५ " " ५६७ ... ... " " ५७० ५७१ विषयाऽनुक्रमणिका। . ५७३ मपंपिकादि लक्षण . . ५७५ विषय. पृष्टांक विषय. पृष्टांका मेटोज गलगण्डके लक्षण ५७२ शकदोषके हेतु और उससे मर्षपिकाविपीर गलगण्डकी असाध्यना न्याधियोंकी उत्पत्ति १८८ परिशिष्ट (गण्डमालाके लक्षण) ५८१ अध्याय १२. अध्याय १५. वृद्धि ( अंडवृद्धि) उपदंग-लीपद-निदान भंडदि... भमनिदान वृद्धिका पूर्वरूप संघिमुक्क.. ५७४ कांडमन वायु आदिसे उत्पन्न अंटवृद्धिका पृथक् २ वर्णन ५९३ असाध्य अंडवृद्धिके लक्षण अध्याय १६. उपदंगनिदान मुखरोगनिदान वातादि उपदके पृथक् २ लक्षण ... ५७६ ओष्ट रोग परिशिष्ट (फिरगरोगोत्पत्ति) ५७७ | दतमूल ( मसूढों) के रोग ५९८ तीन प्रकारके फिरंगरोगके पृथक् २ लक्षण ... दतरोग ६०० लोपदनिदान ५७८ जिहारोग ६०१ वातादिलीपदके लक्षण जिबारोगोंके लक्षण अध्याय १३. तालुरोग क्षुद्ररोगनिदान अजगल्लिकादि ४४ क्षुटरोगोंके नाम सर्वमुखके रोग ४४ क्षुदरोगांके पृथक् २ लक्षण ५८. पूर्ति ६०० अध्याय १४. इति सुश्रुतसंहितानिदानस्थानविष- शकदोपनिदान ५८८ याऽनुक्रमणिका समाप्ता। " . " . ५७९ /कंठरोग .
॥ श्रीः ॥ अथ सुश्रुतसंहिताशारिरस्थान- विषयाऽनुक्रमणिका । . मनके गुण " ... ... " विषय. पृष्टाक. विपन. पृष्टाक अध्याय १. गर्म रहनेका तात्सालिक लक्षण गर्भवती के रक्षण सर्वभूतचिताशारीर ६०९ गर्भवतीका फल संपूर्ण भूतादिकांकी उत्पत्तिके हेतुअदिका वर्णन प्रथमादि मामॉमें गर्भका रूप प्रकृति और पुरुपके साधर्म्य तया धर्मस दोहद न मिलने मिलने हानिलाभ कथन... ६१८ दोहद के फल पुस्पके गुण ६१८ ६३ गर्भकी पुष्टि मात्विक, राजस और तामस (जीवोंके गर्भका कान अग पहले हो इसका विवेचन ... ...६१९ गर्भके पितृन मातृज आदि पच महाभूतोंके गुण ... गर्भ में पुत्र पुत्री आदिकी परीक्षा ६४५ अध्याय २. गर्मके अग प्रत्यगांकी मुटग्ना मुन्दरता ६४८ शुकशोणितशुद्धि शारीर अध्याय ४. दूपितशुरुलक्षण दृपित शुक्र और शोणितकी शुद्धिका उपाय ६२. गर्भव्याकरणशारीर शुद्धशुक्रके लक्षण अग्न्यादिकांनी प्रागसता ६२५ शुद्ध आतंत्रके लक्षण त्वचाओका वर्णन ६४९ अमरदर (रक्तप्रदर) परिगिट ६५० कलाओंका वर्णन अमृग्दरा यत्न यत् शीहा फुप्फुम और उडकरी उत्पत्ति . ६५५ रजस्वलारी मतव्यता अत्री (अतटियों) की उत्तति ल्ब्धगावा कृत्य ६३१ जिहाकी उपत्ति गर्भके चार हेतु लोनों (द्वारों) और पगियों की उत्पत्ति गरीरके वर्णका कारण ६३२ मादिकी उत्पत्ति नेत्रांका वर्ण यासस्यादिकी उत्पत्ति ६३४ | तामसी निद्रा गर्ममें वालरके मलमूत्रादि न करने और न साभाविकी निद्रा ....६:६ वकारिती निद्रा बालक गर्ममें श्वासादि से लेता है दिनमै मोनेसी विवि और निषेध , अध्याय ३. दिन सोनेसे हानि गर्मावकान्तिशारीर ६१७ रातमे अधिक जागनेमे हानि गत्पित्तिा वर्गन ६६० निद्रानाशका हेतु और यत्न प्रस्तुमती नाके लक्षण ६३९/ अतिनिद्रामा प्रतीकार ६: " नष्टार्तव . . " . ... ६३३ निद्रा :" ... रोनेका कारण . . .. ... . ... rar विषयानुक्रमणिका। (१ पृष्ठांक. विषय. पृधाक विषय. रातमें जागना तथा दिनमें सोना किनको पेशियोंकी पृथक् २ गणना हित है ६६१ त्रियोंके अधिक पेशी... . ૬૮૩ ६८४ ६८५ तंद्राके लक्षण पेशियोंके स्वरूप " ... ... ६८६ ८ .. :: ... " ६८७ ૬૮૮ ... .. .. ... . ६९० मुंभा म आलस्य उन्लेश ग्लानि गौरव प्रकृति वातप्रकृति पित्तप्रकृति कफप्रकृति त्रिदोषप्रकृति प्रकारातर ब्रह्मकायादिके लक्षण.. अध्याय ५. शरीरसंख्याव्याकरणशारीर शरीरका वर्णन प्रत्यंग शरीरके अवयवोंका संक्षिप्त वर्णन विस्तारसे वर्णन आशय अंत्रप्रमाण ... .. ६९१ प . ६६२/ गर्भशय्याका वर्णन मृतशरीर चौरकर देखनेकी विधि अध्याय ६. प्रत्येकमर्मनिर्देशशारीर मर्मसंख्या ६६३ममाके स्थानोकी संख्या ६६४ मर्मस्थानोंके नाम मांसादि भेदसे मर्म .. ६६५/पाच प्रकारके मर्म ६६६ सद्य.प्रणहर मर्म ६६७ कालान्तर प्राणहर और विशल्यन्न मर्म ६६८ वैक्ल्यकर मर्म रुजाकर मर्म मर्मस्थानोंमें प्राणोंकी स्थिति ६७१ मोके निकट वेधनका प्रभाव पेट और छातीके मर्मस्थानका वर्णन ६७२ पीठके मर्मस्थान कंठके जोतोंसे ऊपरके ममाका वर्णन ६७३ मर्मस्थानोंका प्रमाण ... ६७४ अध्याय ५. शिरावर्णनविभक्तिशारीर सपूर्ण शिराओंका सविस्तर वर्णन ६७५ शिराओंका सर्वदोषवहत्व शिरामोंके रग आदि... वेधनके अयोग्य शिराओका वर्णन ६७६ अध्याय ८. शिरावेधनविधिशारीर शिराओके वेधनका प्रकार पावकी शिरावेधन विधि हाथकी शिरावेधन ६७९ अंगविशेषको शिरावेधन ६८१ | शिरावेधनमें शस्त्रका प्रमाण ६८० शिरावधनका समय.. ६८३ ठीक शिरा विधाके लक्षण ६९ ६९८ ६९९ ७०१ ... " स्रोत (द्वार) ७०५ " . • • 2 " ७०९ :: ... ... ७१. कंडरा जाल कूर्च मांसरज्ज सेवनी अस्थिसघात सीमंत अस्थिसंख्या पृथक् पृथक् अस्थिगणना सवि स्नायु परिशिष्ट पेशी . ६७७ . .. ७१५ . . " . . . . . ... .
(६) सुश्रुतसंहिता- पृष्टांक. '७५७ . विषय. पृष्टाक. डाक्टरीमतसे शारीरक परिशिष्ट भाग १ डाक्टरी मतसे सक्षिप्त शारीरक ७२० शिर-(ब्रेन) ७२२ दिमागका अन्य शारीरक अवयवोंसे संबंध एलीमिंटरी कनाल (आहार नलका ) इमाफेगस ७२३ इस्टमक इसमाल इटी स्टाइम... ७२४ लार्ज टेम्टाइस ७२५ श्वाससवधी अवयव .. ७२६ लाम ७२८ | हार्ट दिल लिवर प्लेडर गाल ७११ स्पिलीन . , विषय दूषित रक्त पहले निकलता है व्यावि विशेपपर शिरावेधन अयोग्य शिरावेधके (२०) दूषण दुर्विद्वादिके लक्षण शिरावेधनकी प्रधानता अध्याय ९. धमनाव्याकरणशारीर धमनियोंका वर्णन अर्द्धगामिनी धमनियाका कथन . अवोगामिनी धमनियोका वर्णन तिय॑ग्गामिनी आदि धमनियोंका वर्णन बोताके मलविद्धलक्षणोंका वर्णन अध्याय १०. गर्भिणीव्याकरणशारीर गर्मिणीके वर्ताओंका वर्णन सृत्तिकागारविधि अकालप्रवाहणके दोष... प्रसवमें विलम्ब हो तो उपचार जन्मोत्तरविधि प्रसूताके नियम अपरापातन . " पैके आस ७३३ ७३५ यूरेनरी आरगेंस " " . मस्कालरोगके लक्षण ... मक्कारका यत्न ... ७६७ .. ७६८ ७७० . ७४४ यूरेटर हालवा युरेनरी ब्लैडर पैनिम રેક ७३८ टिसटी क्रिस ७३९ यूटरस ७४० अस्थियोंकी सख्या ७४१ शरीरकी त्वचा डाक्टरी मतसे संक्षिप्त रोगगणना ७४२ यूनानी मतमे संक्षिप्त शारीरक परिशिष्ट भाग २ शिर ७४५ नेत्र (चश्म) नेत्ररोग पलकोंके रोग कान (गंश) ७४९ / कानके रोग • • नाक (वीनी) ७५० नाकके रोग मुह, जवान और दांत ७०७ मुंह आदिके रोग " . ! नामकरण चोग्य धात्री धाय) के लक्षण प्रथमस्तनपानविधि भावमित्रोक्त दुष्ट दुग्धके लक्षण बालकके रोग जाननेकी रीति वालकोंकी औषधोंकी मात्रा काक छटकनेका यत्न नाभिपाक और गुदापाक बालकोंका बर्ताव अन्नप्राशन वालग्रहपीडितके सामान्य लक्षण छोटी अवस्थामें गर्भाधानका निषेध गर्मघाव आदिकी चिकित्सा पारशिष्ट ७७१ ७४६ ... + .. ७४७ ... ... . " . " . ... ७७३ - विषयाऽनुक्रमाणिका। (७) 1 ७८१ . " . " . . " - , . १ विषय होठोंके रोग दंतरोग ... मसूढोंके रोग हलकका बयान हलकके रोग मीना और फेफडे माना फेफडे और पसलियाके रोग कलव-दिल दिलके रोग जिगर-कृत् जिगरमें होनेवाले रोग तिहाल तित्रोके रोग मेद-आमाशय मेदेके रोग " " .. पृष्टाक विपय पृष्टाक ७७३ मसाना मसानेके रोग कुजेव लिंगके रोग ૭૭૨ ७७४ खुमिये खुसियोंके रोग रहम रहमके रोग ७७५ यूनानी प्रकीर्ण रोगोंका संक्षेप वर्णन रक्तमवधी रोग ७८३ ७७६ वालोंके रोग ७७७ अन्य रोग तपके भेद चूनानीकी प्रकीर्ण बातें सबका साराश और ऐक्य ७८५ ७७९ परिशिष्ट भाग ३ ७८० गरीरके मुख्य २ अवयवोंके नामाका भाषान्तर मवके मतका साराश और ऐक्य इति सुश्रुतसंहिताशारीरस्थान- विषयानुक्रमणिका समाप्ता । " " " . " ... ७८८ .. ७७८ " ... KA " अमा अंतडियोंके रोग मिकअद. ... ७८७ .. ... गुदाके रोग . " " वृक ... ... गुरदोंके रोग
इति
सुश्रुतसंहिता निदानस्थान-शारीरस्थान
विषयानुक्रमणिका
समाप्त।
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॥ श्रीः॥ अथ सुश्रुतसंहिता। सान्वयभाषाटीकासहिता। निदानस्थानम् २. प्रथमोऽध्यायः १. अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः। अब यहांसे ( सूत्रस्थानके ) अगाडी (निदानस्थानमें ) (प्रथम) वातव्याधि- योंके निदानका व्याख्यान करतेहैं । धन्वंतरि धर्मभृतां वरिष्ठममृतोद्भवम् ॥ चरणावुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपृच्छति १॥ वायोः प्रकृतिभूतस्य व्यापन्नस्य च कोफ्नैः ॥ स्थान कर्म च रोगाश्च वर्दै में वदतांवर ॥२॥ ' धार्मिकोंमें श्रेष्ठ अमृतके साथ उत्पन्न हुए एसे धन्वंतरि भगवान्के दोनों चरण पकडकर महर्षि सुश्रुत पूँछते भये ॥ १ ॥ हे व्याख्याताओंमें श्रेष्ठ भगवन् ! प्रकृ- तिभूत ( स्वाभाविक ) वायुका तथा कोपन पदार्थों करके कोपको प्राप्त हुए वायुका स्थान, कर्म और गुण (विस्तारपूर्वक ) मेरे प्रति वर्णन करो ॥ २ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राब्रवीद्भिषजांवरः ॥ स्वयंभूरेष भगवान् वायुरित्यभिर्शब्दितः॥३॥ स्वातंत्र्यान्नित्यभावाच सर्वगत्वात- * हेतुलिंगौषधज्ञानबीनभूतेन सूत्रस्थानेन संक्षिप्तोद्दिष्टस्य हेतुलिंगोषवस्य विवरणे सर्वाण्येव स्थानानि प्रस्तुतानि तेषु च प्रस्तुतेषुस्वाधिकाराणां शल्यतंत्रव्याधीना हेतुलक्षणप्रतिपादकतया निदानस्थानस्य प्रारभः, तत्रापि दोषाणा वातस्य प्रधानत्वात्तद्याधिःतुलक्षणाम्या प्राक् प्रतिपादन युज्यते ॥ (श्लो०१) अमू- तोद्भवमिति अमृतेन सार्द्धम् उद्भवो यस्य तम् ।। (ला० २) वायो: "प्रकृतिभूतस्य" स्वभावस्थितस्य "व्यापमस्य" विकृतस्य " कोपनः" द्रव्यगुणकभिः ।। ३२ 4 (४९८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। थैव च ॥ सर्वेषामेव सर्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ॥४॥ स्थित्युत्प- त्तिविनाशेषु भूतानामष कारणम् ॥ अध्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः॥ ५॥ तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोवहुल एव च ॥ अचिंत्यवीर्यो दोषाणां नेता रोगसमूहराट्॥६॥आशुकारी मुहुश्वारी पक्काधानगुदालयः॥ देहे विचरंतस्तस्य लक्षणानिनिवोध में ॥७॥ इस प्रकार सुश्रुतके वचन सुनकरके वैद्योंमें श्रेष्ठ श्रीधन्वंतरिजी बोलते भये कि यह वायु स्वयंभू है ( परमाणुरूप है) और भगवान् ( ऐश्वर्यवान् ) है ऐसे कहा जाता है ॥ ३ ॥ यह वायु स्वतंत्रता होनेसे और नित्यभाव (नित्यता) होनेसे और सर्वत्र गमनशक्ति होनेसे सब जगत्के जीवोंका सर्वात्मा है और सब लोकों- करके नमस्कार किया हुआ है ॥४॥ प्राणियोंकी उत्पत्ति और स्थिति तथाविनाशका यह वायुही कारण है स्वयं वायु अव्यक्त (अप्रकट) है और प्रकट कर्मोंका करने वाला है, रूक्ष है, शीतल है, हलका है, खरखराहै ॥ ५ ॥ तिर्यग्गामी ( तिरछा चलनेवाला) है, दो गुणवाला (शब्द और स्पर्श गुणवाला ) है और (गुणत्रया- स्मक होकर ) रजोगुणप्रधान है और अचिंत्य पराकमवाला है और सब दोषों (कफ, पित्त, रक्तादि) का प्रेरण करनेवाला है और रोगोंके समूहका राजा है ॥६॥ शीघ्र प्रभाव करनेवाला है और वारंवार विचरनेवाला है विशेष करके पक्काशय और गुदामे वास करता है ( यह प्रकृतिस्थ वायुके गुण स्थानादि कहेह) सम्पूर्ण देहमें विचरनवाले इस वायुके लक्षण (विस्तारपूर्वक ) मेरेसे श्रवण करो ॥ ७ ॥ शुद्ध वायुके कर्म। दोषधात्वग्निसमता संप्राप्तिं विषयेषु च ॥ क्रियाणामानुलोम्यं च करोत्यकुपितोऽनिलः॥ ८॥ विना कुपित हुआ अर्थात् शुद्ध निर्विकार वायु सब दोष, धातु और जठराग्निकी समानता करता है ( अर्थात् क्षय, वृद्धि किसीको नहीं होने देता जिससे शरीर स्व- स्थ और प्रसन्न रहता है )तथा सब विषयों में ठीक २ संप्राप्ति होती है और संपूर्ण क्रियाओमे संप्राप्ति (करणशक्ति, उत्साह और प्रीति ) होती है तथा अनुलोमता ( मल, मूत्र स्वेदादिकोकी ठीक २ प्रवृत्ति) होती है ॥ ८ ॥ यथोग्निः पञ्चधा भिन्नो नामस्थानात्मकभिः ॥ भिन्नोऽनिल- स्ता खैको नामस्थानक्रियामयैः ॥९॥ प्राणोदानौ समानश्च (श्लो० ५ ) रूक्षलघुशीतदारुणखर्रावशदाः पहिमे वातगुणाः भवति (चरक: (श्लो०९) यया पाचकरजकालोचकनाजकमाधकमेदेन पंचधा पिच विभक्त तयव वायुरपि !!
३ - निदानस्थान-अ० १. (४९९) व्यानश्चापान एव च ॥ स्थानस्था मारुताः पंचे यापयन्ति शरी- रिणम् ॥१०॥ जैसे नाम और स्थान तथा काँकरके अग्नि (पित्त ) पांच प्रकारसे विभक्त हुआ है उसी भांति एक वायु भी नाम, स्थान, क्रिया और रोगोंकरके पांच प्रकारसे विभक्त है ॥ ९ ॥ प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान ऐसे पांच प्रकारका पांच स्थानों में स्थित हुआ वायु जीवोंके शरीरोंको धारण करताहै ॥ १० ॥ प्राणवायु। वायुयों वसंचारी सँ प्राणो नाम देहधृक् ॥ सोन्नं प्रवेशयत्यंतः प्राणांश्चाप्यवलंबते॥ प्रायशः कुरुते दुष्टोहिकाश्वासादिकान्गदान ११ जो वायु मुखद्वारा बाहर और भीतर गमन करता है वह प्राणनामक वायु देहका धारण करनेवाला है और वही प्राणवायु अन्नको भीतर प्रवेश करता है और वही प्राणोंको अवलम्बन करता है यहां प्राण शब्दसे जीव, बल, ओज तथा अग्नि आदिका ग्रहण करना चाहिये । और यदि यह प्राणवायु दुष्ट हो (बिगड जाय ) तो हिचकी, श्वास आदि रोग उत्पन्न करता है ॥ ११ ॥ उदानवायु। उदानो नाम यस्तूर्द्धमुपैति पवनोत्तमः।तेन भाषितगीतादिविशे- पोऽभिप्रवर्तते ।। ऊर्द्धजत्रुगतान्रोगान्करोति, विशेषतः ॥ १२ ॥ जो पवनों में श्रेष्ठ ऊपरको गमन करता है वह उदाननामक वायु है उस करके मनुष्य संभाषण तथा गीतादिकके विषयमें प्रवृत्त होता है और यही दुष्ट हो तो ऊर्द्धजत्रुगत रोग, नयन, प्राण, कर्ण और शिरके रोग विशेष करके करता है च" शब्दसे कास स्वरभेदादिभी करता है ॥ १२ ॥ (श्लो० ११) वायुर्यो वसंचारी इत्यत्र वनं सचारस्योपलमणं तेन मूोर:कण्ठनासिका अपि पाणस्य स्थानमिति डल्लनः । वाग्भटस्तु इत्याह-प्राणो मूर्धन्यवस्थितः कंठोरश्वरो बुद्धीन्द्रियहृदयमनोधमनीधारण- ठीवनशवथद्गारश्वासोच्छ्वासान्नप्रवेशादिक्रिय इति । केचिदित्याहुः-प्राणस्य स्थान हृदयमेवेति । केचित्प्राणस्य स्थानं नाभिरिति ग्दति यथा नाभिस्थः प्राणपवन इति शार्ङ्गधरः । प्राणश्चाप्यवल्यते इति प्राणान् अग्न्यादीन् अवलबते स्वक्रियासु योजयति।गयदासार्यस्तु एवं मन्यते प्राणानामग्निसोमादीनामधिष्ठानमवलं. वनवचनेन चाधारभूतहृदयाध एवोच्यते । अतएव प्राणानवलंबनेन मरणमूलत्वमुच्यते यदुक्त श्रुनी यथा सेवबोधः शंकुमुत्पाट्य धावति तद्वत् प्राणो रुद्धः सर्वान्वायूनुत्पाटय प्रयाण काले धावति ।। (श्लो० १२) ऊर्ध्वमुपैति ऊर्ध्वं गच्छति । उदानस्य स्थान पुनरनुक्तमपि-"अनाभ्युरःकंठानि"इति डल्लनः वाग्मटस्ति- त्याह-उदान उरस्यवस्थितः कण्ठनासिकानाभिचर:वाक्प्रवृत्तिप्रयलोबिलवर्णस्रोतःप्रीणनधीधृतिस्मृतिमनो- विवोधनादिक्रिय इति । उदानस्य स्थानं कण्ठमेवेति केचित् । क्रुद्ध उर्दूजन गवान् रोगान् करोति । . “ ४ (९००) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। समानवायु। आमपक्काशेयचरः ससानो वह्निसंगतमासोन्नं पर्चति तज्जींश्च विशे- पान्विविनक्ति हि ॥गुल्मानिसंगातीसारंप्रभृतीन्कुरुते गदौन्॥१३॥ आमाशय और पक्वाशयमें विचरनेवाला अथवा आमके पाकका जो आशय उसमें विचरनेवाला अर्थात् पक्वाशयमें रहनेवाला समाननामक वायु जठराग्निका सहायक है वही अन्नको पचाता है और वही (दुष्ट हो तो)जठराग्निजन्य रोगोंको विशेष करके उत्पन्न करताहै तथा गुल्म और अग्निसंग ( मंदाग्नि ) अतिसार आदि रोगोंको करताहै। यहां " तज्जान विविनक्ति" के कई यह अर्थ करतेहैं कि अन्न- परिपाकजन्य जो कार्यविशेष हैं उनका विवेचन करताहै अर्थात् रस, दोष, मूत्र, पुरीप आदिको पृथक् २ करताहै ॥ १३ ॥ व्यानवायु। कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहनोद्यतः ॥ स्वेदासृनावणो वापि पंच( चेष्टयत्यपि॥क्रुद्धश्च कुरुते रोगान् प्रायशःसर्वदेहान्॥१४॥ समस्त शरीरमें विचरनेवाला और रसादिकके प्रेरणका उद्यम करनेवाला ऐसा व्याननामक वायु है वही पसीना और रुधिरादिका निकालनेवाला है तथा वही पांच प्रकारके प्रसारण ( पसारना ) आकुंचन (सिकोडना) विनमन (नीचाकरना) उन्नमन (ऊंचा करना) तिर्यग्गमन (तिरछाकरना ) ये शरीरके कर्म कराताहै और वही क्रुद्ध होजावे तव प्रायः सर्व शरीरवर्ती रोगों (ज्वर, वात, रक्त, कुष्ठादि) को उत्पन्न करताहै ॥ १४ ॥ अपानवायु। पक्वाधानालयोऽपानः काले कर्षति चाप्ययम्॥समीरणः सकन्सूत्र- (श्लो०१३) आमपक्काशयचर इति आमस्य पक्का आमपकं तस्याशयः पच्यमानाहाराशय इत्यर्थः तत्र चरतीति ( डल्लन:)। वह्निसंगतः अमिसहायवानिति अग्निसंधुक्षण इत्यर्थः । तजान् अन्नपाकजान् रसदो- पमूत्रपुरीपाणि विविनक्ति करोति । तस्य स्थानम् । नाभिीरति केचित् । वाग्भटस्तु हत्याह-समानो. न्तरगिसमीपस्थितस्तत्संधुक्षणः पक्कामाशयदोषमलशुक्रातवाबुबहुस्रोतोविचारी तदवलंबनान धारणपाचन- विवेचनीकहाघोनयनक्रियः ।। (लो०१४) रससंवहनोद्यतः रसादिप्रेरणोद्यतः । कृत्स्नदेहचरः सर्वशरीरगः। पंचधा चेष्टयति प्रसारणाकुननविनिमनोन्नमनतिर्यग्गमनानि पच चेष्टाः । अन्ये तु गतिप्रसारणाकुंचनोत्क्षेपणापक्षेपणानि पच चेष्टाप्रकाराः । सर्वदेहगान् ज्वरकुष्ठादीन् । वाग्भटस्तु इत्याह-व्यानो हृयवस्थितः कृत्तदेहचरः शीघ्रतर- गतिर्गतिप्रसारणाकुचनोत्क्षेपापक्षेपनिमिपोन्मेपणजभणानस्वादनस्रोतोविशोधनस्वेदासक्लावणादिक्रिय इति । पृयक् H . निदानस्थान-अ० १. (५०१) शुक्रगर्भार्त्तवान्येधः॥ क्रुद्धस्तुं कुरुते रोगान्धोरॊन्वस्तिगुंदाश्रयान ॥१५॥ शुक्रदोषप्रमेहास्तु व्यानापानप्रकोपजाः ॥ युगपत्कुँपिता- चापि देहं भिंद्युरसंशयम् ॥१६॥ अपाननामक वायु पक्काशयमें रहताहै और यही वायु समयके ऊपर विष्टा, मूत्र, वीर्य और स्त्रियोंके गर्भ तथा आर्तवको नीचेको आकर्षण करताहै अर्थात् बाहर निकालताहै और यदि यह कुपित होजाय तो बस्तिस्थानके रोग पथरी आदि तथा गुदाके रोग भगंदर आदि घोर २ रोग उत्पन्न करताहै ॥ १५ ॥वीर्यके विकार और प्रमेह ये व्यान और अपान दोनोंके कोपसे होतेहैं और यदि सब एक समय कुपित होजायँ तो निःसंदेह शरीरका नाश कर देते हैं ॥ १६ ॥ अतं ऊँई प्रवक्ष्यामि नानास्थानांतर्राश्रितः।वहुँशः कुपितोवायुर्विका- राँन्कुरुते हि यान् ॥ १७॥ वायुरामाशये क्रुद्धैश्छादीन्कुरुते गदान ॥ मोह मूछा पिपासांचं हृद्रह पार्श्ववेदनाम् ॥ १८॥ अब यहांसे अगाडी नाना स्थानोंमें आश्रित हुआ कुपित वायु बहुधा जिन जिन विकारोंको करता है मैं उनका वर्णन करता हूं॥ १७॥ आमाशयमें कुपित हुआ चायु छर्दि आदिक रोगोंको करताहै तथा मोह (चित्तकी अस्थिरता), मूर्छा, पिपासा (तृपा ), हृदयका स्तंभित होना और पार्श्ववेदना ( पसलीका दरद ) इत्यादि व्याधियोंको उत्पन्न करता है ॥ १८ ॥ पक्काशयस्थोन्त्रकुंजं शूलं नाभौ करोति च ॥कृच्छ्रमूत्रपुरीषत्वमा- नाहं त्रिकवेदनाम् ॥ १९ ॥ श्रोत्रादिष्विन्द्रियवधं कुर्य्याक्रुद्धः समीरणः ॥ वैवयं स्फुरणं रौक्ष्यं सुप्तिं चुमुचुमायनम् ॥ २० ॥ स्वस्थो निस्तोदनं कुर्यात्त्वग्भेदं परिपोनम् ॥ व्रणांश्च रक्तंगो ग्रंथीन् सर्लान्मांससंश्रितः ॥ २१॥ तथा मैदःश्रितः कुर्या- Tथीन्मदरजो व्रणा ॥ कु-च्छिरागतः शूल शिराकुंचनपू- रणम् ॥ २२ ॥ (श्लो० १५) पक्काधानालयः पक्वाशयस्थानम् । वाग्भटस्तु इत्याह-अपानोऽपानेवस्थितो बस्तिश्रोणि- -मेढ़वृपणवंक्षणोरुचरः विण्मूत्रशुक्रातवगर्भनिष्क्रमणादिक्रियः ( इति वृद्धवाग्भट:)। अपानस्थानं गुह्यं चेति केचित् ।।(श्लो० २०) श्रोत्रादिषु ऋद्धः सन् दर्शनरसनस्पर्शश्रवणगधग्रहणेष्वशक्ति कुर्यात् । वैदिक स्वस्थ कुर्यादिति वा मन्यते ।। 1 ६ कुर्यो- (५०२) म्हुश्रुतसंहिता-भा० टी० पक्वाशयमें यदि वायु कुपित हुआ हो तो अंत्रकूजन (आतीका गुलगुलाना अर्थात् पेट में गुडगुड आदि शब्द होना) और नाभिमें दरद तथा मल और मूत्रकी प्रवृत्तिमें कष्ट ( या अवरोध ) तथा अफारा और त्रिकस्थानमें पीडा करता है ।। ॥ १९ ॥ कर्ण आदि इंद्रियोंमें कुद्ध हुआ वायु उस इन्द्रियको नष्ट करता है और वर्ण बिगाड़ देता है तथा फरकाव पैदा करता है तथा रूक्षता, सुप्ति (शून्यता) और चुमचमाट उत्पन्न करता है ॥ २० ॥ त्वचामें कुपित हुआ वायु त्वचामें पीडा करता है तथा त्वचाका भेदन और परिपोटन (त्वचाका परिपुटन ) करताहै और रुधिरमें कुपित हुआ वायु व्रण ( फोडे फुसी) आदि करता है और मांसमें कुपित हुआ वायु शूलसहित गांठ पैदा करता है ॥ २१ ॥ मदमें स्थित हुआ कुपित वायु मन्द वंदनावाली व्रणराहत गांठें पैदा करता है तथा शिरा (बारीक रगों) में प्राप्त हुआ वायु शूल और रगका सुकडजाना अथवा रगका फूलजाना ऐसी व्याधि उत्पन्न करदेता है ॥ २२॥ स्नायुप्रातः स्तंभकंपो शूलमाक्षेपणं तांति संधिगतः संधीश- लशोफौ करोति च ॥ २३॥ अस्थिशोषं च भेदं चं च्छूलं च तस्थितः॥ तथा मज्जगते रुक् च नं कदाचित्प्रशा- म्यति ॥ २४ ॥ अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिा विकृतिः शुक्रगेऽनिले ॥ हस्तपादशिरोधातूंस्तथा सञ्चरति क्रमात् ॥ २५॥ व्याप्नु पाँ- द्वाखिलं देहं वायुः सर्वगतो लूणाम् ॥ स्तंभनाक्षेपणस्वापशो- फशूलानि सर्वगः ॥२६॥ स्नायु ( नसों) में प्राप्त हुआ वायु स्तंभ ( नसका अकडजाना) तथा कांपना और शूल और आक्षेप (चलायमान होना) इत्यादिरोग करता है और संधियों में प्राप्त हुआ वायु संधियोंको मार देता है तथा संधियों में शूल और सूजन पैदा करता है ॥ २३ ॥ अस्थियोंमें प्राप्त हुआ वायु हाडोंको सुखा देता है हडफूटनसी करता है तथा हाडोंमें शूल (चीस) पैदा करता है, मज्जामें स्थित यदि कुपित वायु हो तो उसमें ऐसी पीडा हो जो कभी शांत न हो ॥२४॥ वीर्यप्राप्त ( कुपित ) वायु हो तो वीर्यकी प्रवृत्ति नहीं हो अथवा अतिप्रवृत्ति हो अथवा वीर्यमें विकार हो और (श्लो० २३ ) पूर्वार्द्ध पूर्वोक्तश्लोकपाठे न कुर्यादिति क्रियापदेनान्वयः ॥ (लो० २४) तस्थितः अस्थिस्थित॥ (शो० २५) हस्तपादशिरोधातून् क्रमात् वायुस्तथा सचरति यथा अखिल देहं व्याप्नुयात् तथा अधिकृतात् क्रमात् संचरति यथा च सर्वगतो वा भवति सर्वधातुगश्च भवतीत्यर्थः ( इति डल्लनः) ।।
निदानस्थान-अ० १. (५०३) सारे शरीरमें वायु कुपित हो तब हाथों, पावों, शिर तथा रक्तादि सब धातुओंमें क्रमसे विचरता है अथवा सारे शरीरमें व्याप्त होता है और यह सब शरीरमें कुपित हुआ वायु मनुष्योंको स्तंभन (शरीर जकडजाना ) तथा आक्षेपण ( उठ उठकर गिरजाना ), शरीर सुन्न पडजाना या शरीर सूजजाना या शरीरमें दरद होना ये रोग पैदा करता है ।। २५ ।। २६ ।। स्थानेषूक्तेषु मिश्रश्च संमिश्राः कुरुते रुजः ॥ कुर्यादवयवप्राप्तो मारुतस्त्वभि तान्गदान ॥२७॥ उपर्युक्त स्थानों में यदि मिश्र (कफ पित्तादिसे मिला) वायु हो तो मिलीहुई व्याधियां उत्पन्न करता है तथा अवयवों ( अंग, प्रत्यंग ) में प्राप्त हुआ वायु वहां वहां उस उस प्रकारकी व्याधियोंको करता है ॥ २७ ॥ दाहसंतापमूर्छाः स्युायौ पित्तसमन्विते ॥ शैत्यशोफगुरुत्वानि तस्मिन्नेव कफाँवृते ॥ २८॥ सूचीभिरिव निस्तोदः स्पर्शद्वेषः प्रसुप्तता ॥ शेषाः पित्तविकाराः स्युरुिते शोणितान्विते ॥ २९ ॥ यदि वायु पित्तसे मिला हो तो दाह, संताप और मूछी आदिरोग होतेहैं और जो वायु कफ करके संयुक्त हो तो शीतता, शोथ, तथा गुरुता (भारीपन) आदि रोग होते हैं ॥ २८ ॥ यदि वायु रक्तप्ते मिश्रित हो तो सुई चुभोनेकीसी पीडा होती है और स्पर्श बुरा लगता है ( अर्थात् हाथ नहीं लगाया जाता)अथवा प्रसु- प्तता ( शरीरका सुन्न पडजाना या सो जाना ) तथा और पित्तके विकार दाह आदिभी होते हैं ।। २९ ॥ प्राणे पित्तावृते छदिहश्चैवोपजायते ॥ दौर्बल्यं सैदनं तंद्रा वैव- पयं च कफाँवृते ॥३०॥ उदाने पित्तसंयुक्ते सूर्छादाहभ्रमलमाः॥ अस्त्रेदहाँ मन्दाग्निः शीतस्तंभौ कफावृते ॥ ३१ ॥ प्राणवायु पित्तसे आच्छादित होजानेसे छर्दि तथा दाह आदि होते हैं और यदि प्राणवायु कफसे आच्छादित हो तो दुर्बलता तथा थकान तंद्रा और विवर्णता (रूप बिगडजाना ) आदि होते हैं ॥ ३० ॥ उदान वायु पित्तसे युक्त हो तो मूर्छा, दाह, भ्रम तथा क्कम (घुमेरसा) होता है और जो उदान वायु कफसे संयुक्त हो तो पसीना न आना और हर्ष न होना अथवा हर्ष (रोमहर्ष) तथा मंदाग्नि और शीत तथा स्तंभ (अकडाव) होता है ॥ ३१ ॥ (श्लो० २७ ) मिश्रः पित्तदाहादिकार्यलिगदर्शनाच्च पित्तावावरणं जेय केवलस्य वायोः शीतस्वमावत्वा- हाहः पित्त विना नोपपद्यते इनि ॥ (श्लो० २८) वायोर्योगवाहित्वात् पित्तसमन्विते दाहसंतापादयो भवति तथा च कफान्विते शत्यगौरवादयश्च ।।
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(५०४) लुश्रुतसंहिता-भा० टी०
संसाने पित्तसंयुक्ते स्वेददाहोण्यसूच॑नम्॥कफाधिकं च विषसूत्रं
रोमहर्षः कफावत॥३२॥अपाने पित्तसंयुक्त दाहोब्धयं स्यादसृग्द-
रम् ॥ अधःकाये गुरुत्वं चतस्मिन्नेव कफांवृते ॥ ३३॥ व्याने पि-
तावृते दाँहो गानविक्षेपणं क्लसः॥ गुरूणि सर्वगात्राणि स्तंसलं
चास्थिपर्वणाम् ॥ लिङ्ग कफावृते व्याने चेष्टास्तंभस्तथैव च ३४॥
जो समान वायु पित्तकरके संयुक्त हो तो पसीना अधिक आवे, दाह हो, गरमी
हो और सूर्छन (बेहोशी) हो और यदि यही समान वायु कफयुक्त हो तो कफकी
अधिकता और मलमूत्र (तथा स्त्रियोंके आर्तव) की प्रवृत्ति हो और रोमहर्प हो
॥ ३२ ॥ अपान वायु पित्तसे संयुक्त हो तो दाह, गरमी और रक्तकी प्रवृत्ति हो
(अधोमार्गसे रक्तागम हो) और जो अपान कफयुक्त हो तो नीचेके अंगोमभारी-
पना हो ॥ ३३ ॥ व्यानवायु पित्तसे युक्त हो तो दाह और अंगोंका देदेमारना
और क्लम (बेचैनी) हो और यदि व्यानवायुकफयुक्त हो तो सब गात्र भारी हों और
अस्थि तथा जोडोंमें अकडाव हो तथा चेष्टाओंमें रुकाव होना ये लक्षण होते हैं ॥३४॥
वातरक्त।
प्रायशः सुकुमाराणां मिथ्याहारविहारिणाम् ॥ शाकाञ्चं प्रमदान-
द्यव्यायामैश्चातिपाडनात् ॥३५॥ऋतुसात्स्यविपर्यालास्तेहादीनां
च विभ्रमात् ॥ अव्ययाये तथा स्थूले वातरक्तं प्रॉप्यति ॥३६॥
प्रायः विपरीत आहार, विहार करनेवाले कोमल मनुष्यों के शोकसे, अति स्त्रीसंगसे,
अति मदिरा पानसे, अतिपरिश्रमसे तथा ऋतुविरुद्ध आहार, विहारके सेवनसे तथा
स्नेहपानादि (स्नेहपान, वमन, विरेचन, वस्ति आदि) में अनुचित व्यवहार होने-
से तथा (गृहस्थी होकर) स्त्रीसंग न करनेवाले और स्थूल शरीरवाले मनुष्योंके
वायु और रुधिर (मिलकर ) कुपित होजातेहैं ॥ ३५ ॥ ३६॥
हस्त्यश्वोष्टैर्गच्छतोऽन्यैश्च वायुः कोपें यातः कारणैः सेवित स्वैः॥
तीक्ष्णोष्णाम्लैः क्षारशाकादिभोज्यैः संतापाद्यैर्भूयसा सवितैश्च३७
सिं रक्त दुष्टिमायाँति त ञ्च वायोमार्ग संरुणझ्याशुं यातः ॥
क्रुद्धोत्यर्थं मार्गरोधी स वायुरत्युद्रिक्त दूंषयेद्र्क्तमाशुं ॥३८॥ तै-
संपृक्तं वायुना दूषितेन तत्प्रावल्यादुच्यते वातरक्तम् ॥ तद्वंत्पित्तं
दृपिर्तनासृजाक्तं श्लेष्मा दुष्टो दूषितेनासृजांक्तः ॥ ३९ ॥
निदानस्थान-अ० १. (५०५) हाथी, घोडे, ऊंट आदिकी सवारीपर अधिक चलनेस अथवा अन्य वातकारक कारणों के सेवन करनेस वायु कोपको प्राप्त होता है और तीक्ष्ण, गरम, खट्टे, खारे, शाकादि तथा भोजनोंके खानेसे और वारंवार संताप आदिके सेवन करनेसे शीघ्रही रुधिर दुष्टताको प्राप्त होताहै और वह कुपित हुआ दुष्टरक्त शीवचारी वायुके मार्ग- को रोक लेता है और फिर मार्ग रुक जानेसे अत्यंत कुपित हुआ वायु अति बढे दुष्ट रक्तको और भी दूपित कर देता है ॥ ३७॥ ३८॥ दूषित वायु करके मिला हुआ दूषित जो रक्त उसमें यदि वायुकी भवलता है तो वह वाताधिक वातरक्त कहलाताह और यदि दूषित रक्तमें पित्त कुपित होकर मिलगया है तो पैत्तिक वात- रक्त कहलाता है और यदि उस दूपित रक्तके संग दुष्ट हुआ कफ मिला है तो वह सैप्मिक वातरक्त कहलाता है ॥ ३९ ॥ वातरक्तलक्षण । स्पोंद्विग्नौ तोदभेदप्रशोपस्वापोपेतौ वातरक्तेन पादौ ।पित्तास- ग्भ्यामुग्रदाही भवेतामत्यर्थोष्णौ रक्तशोफौ दू चं ॥४०॥ कंड- मंतौ श्वेतशीतो संशोफी पीनस्तब्धौ श्लेष्मंदुष्टे तु रक्त ।। लवर्दु टे शोणिले चापि दोषाः स्वं स्वं रुपं पादयोदर्शयन्ति ॥४१॥ वातिक वातरक्त हो तो दोनों पावों में स्पर्शसे उद्विग्न हो, दरद हो, भेद (भद- दनकीसी पीडा अर्थात् कटेसे जायँ)औरशुष्कता हो तथा स्वापयुक्त हों (पैर- सोयेसे होजायँ) और यदि पैत्तिक तथा रक्ताधिक्य वातरक्त हो तो पैरोंमें उग्र दाह हो और अत्यंत गरम हों, रक्तता और सूजन हो ॥४०॥ तथा कफदुष्ट (कफा- धिक वातरक्त) हो तो दोनों पैरोंमें खाज हो, श्वेत रंग हो, शीतल और शोथयुक्त हों, पुष्ट और कठिन हों और यदि सब दोपोंसे दूषित रक्तवाला वातरक्त हो तो अर्थात् स- निपातज वातरक्त हो तो पैरोंमेंसबही वातादि दोष अपना अपना रूप दिखावें॥४१॥ पूर्वरूप। प्राग्रूपे शिथिलौ खिन्नौ शीतलौ सविपर्ययौ । वैवर्ण्यतोदसुप्तत्वगुरुवौषसमन्वितौ ॥ ४२ ॥ यदि दोनों पांव शिथिल हों, पसीना बहुत आवे, शीतल हों अथवा इसके विप- रीत गरम रहें, पसीना नहीं आवे और विवर्णता होजाय, दरद रहे,पैर सोवें पैरोंमें बहुत भारीपन हो तथा दाह हो तो वातरक्तका पूर्वरूप जानना ( अर्थात् ये लक्षण हों तो जानिये कि वातरक्तका रोग होगा) ॥ ४२ ॥ . ।
सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। १० पादयोसूलमास्थाय कदाचिद्धस्तयोरपि । आँखोषिमिर्व क्रुद्धं तदेहमर्नु सर्पति ॥ ४३ ॥ यह वातरक्त पैरोंसे और कभी हाथोंसे आरंभ होकर विपले मूपिकके विपके समान कुद्ध होकर सारे शरीरमें फैल जाता है ॥ ४३ ॥ साध्यासाध्यता । आजानुस्फुटितं यच्च प्रभिन्न प्रस्तुतञ्च यत् ॥ उपद्रवैश्च यज्र्जुष्टं प्राणलांलक्षयादिभिः ॥ शोणितं तदसाध्यं स्याद्याप्यं संवत्सरो- त्थितम् ॥४४॥ जानुपर्यंत जो फूट निकला हो, फटगया हो, झिरने लगा हो, बल, मांसक्षयादि उपद्रवोंसे युक्त हो वह वातरक्त असाध्य हुआ जानो और एकवर्ष पहलेका याप्य होता है ॥ ४ ॥ आक्षेपकवायु । यदी तु धर्मनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः ॥ तदा क्षिरत्याशें मुहुर्मुहु दे ह सुहुँश्चरः। मुँहुर्मुहुस्तैदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः४५॥ जब कुपित हुआ वायु सब नाडियोंमें प्राप्त होता है तब शीत्र वारंवार शरीरको गिराता है और वारंवार संचार करता है। वारंवार आक्षेपण करनेसेही इसे आक्षे- पक कहते हैं ।। ४५॥ अपतानक और दंडापतानक वायु । सोपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तंरान्तरां ॥ ४६॥ कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेवं गदि तिष्ठति।सं दंडेवस्तंभयति कुच्छो दंडापतानका ॥४७॥ हनुग्रहस्तदात्यर्थं सोन्नं कृच्छ्रान्निषेवते॥४८॥ जो आक्षेपक नजीक २ गिरावे वह अपतानक वायु है ॥ ४ ॥ यदि नाडियोंमें कफयुक्त वायु हो तो मनुष्यको दंडकी तुल्य स्तंभित करके गिराता है इसे दंडाप- तानक कहते हैं यह कष्टसाध्य है ॥ ४७ ॥ अपतानकरोगमें ठोडी अत्यंत स्तंभित हो जाती है जिससे मनुष्य बड़े कष्टसे अन्न आदि खा सकता है (और कभी तो ( सो० ४३) वातरक्तस्योपद्रवा -'अस्वप्नारोचकवासमासकोयशिरोग्रहाः । मूछीयां मदरुक्तृष्णा- ज्वरमोहप्रवेपकाः॥हिकाया गुल्मवीसर्पपाकतोदभ्रमल्लमाः । अंगुलीवक्रतास्कोटदाहमर्मग्रहार्बुदा.॥'(भा.मि.) (श्लो० ४६-४७) यः आक्षेपकोऽन्तरान्तरा पातयति सोपतानक इत्यर्थः । तास्वेव सर्वासु वमनीषु भृश गयुस्तिष्टतीति कृच्छ्रः कष्टसाध्यः स एवापतानकः । अपतानकस्त्रिधा दडापतानकः, अतरायाम:, वहिरायामय (इति उलनः) (लो०४८) हनुग्रहस्तु दद्वापतानके अन्यत्रापि वायोः स्यादिति (निस) निदानस्थान-अ० १. (५०७) मुख खुलाही रह जाता है और कभी मिचा रह जाताहै और कभी अधमिंचा कई इसका यह अर्थ करतेहैं कि जो बहुतही कष्टसे अन्नादि खा सके (अर्थात् मुख खुले मूंदे नही ऐसी ठोडीकी नसें अकड़ जायँ) तो उसे हनुग्रह (या हनुस्तंभ) रोग कहते हैं ( सारांश यहहै कि कई तो अपतानकके अन्तर्गत इसे मानते हैं और कई पृथक् अपतालकके तीन भेद इसप्रकार मानते हैं १ दंडापतानक, २ अंतरा- याम, ३ बहिरायाम ॥४८)॥ धनुस्तुल्यं नैमेद्यस्तुं स धर्नुस्तंभसंज्ञकः ॥ अंगुलीगुल्फजठरहृव- क्षोगलसंश्रितः॥४९॥ स्नायुप्रतानमनिलो यदी क्षिपति वेगवानं ॥ विष्टब्धाक्षःस्तब्धहँनुर्भन्नपार्श्वः कर्फ वमन्॥५०॥ अभ्यंतरं धनुरिव यदी नर्मति मानवः॥ तदा सोभ्यंतरायाम कुरुते मारुतो वली ॥५१॥ जब यह अपतानक वायु धनुषकी भाँति शरीरको नवा दे (टेढा करदेवे) तव्य इसे धनुस्तंभ (धनुषवायु) कहते हैं (इस धनुस्तंभके दो भेद हे १ अंतरायाम, २ बहिरायाम) अंगुली, टकन, पेट, हृदय. छाती, गल इन सब स्थानोंमें आश्रित हुआ वायु (भीतरकी) नसकि विस्तारमें प्राप्त होकर जब वेगपूर्वक शरीरको कंपावे या गिरावे तव नेत्र स्तंभित ( पथरायेसे ) हो जायँ, ठोडी; अकडजाय, (अर्थात् मुह खुला या मिंचा रह जाय ) पसलियां टूटने लगें मुहसे झाग आवे या कफ गिरे ॥ फिर यदि मनुष्य भीतरको (मुख नाभिकी ओर ) धनुषके आकार नवे (टेढा हो) और वलवान् वायु भीतरको शीर नवावे तो उसे अंतरायाम कहते हैं । यह अंत- रायाम वायु शिरस पैरतक भीतर (मुख, छाती, नाभि, पांवके पंजेकी तरफ) की नसोंमें व्याप्त होनेसे होता है ॥ ४९ ॥ ५० ॥ ५१ ॥ बाह्यस्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामै करोति च ॥ तमसाध्यं वुधाः प्राहुर्वक्षःकटयूँरुभंजनम् ॥ ५२ ॥ यदि वही वायु (पिडली, टकने, पृष्ठ, वंश और ग्रीवा) की बाहरकी ओर नसोंके विस्तारमें प्राप्त हो तो मनुष्यको बाहरकी तरफ (पीठकी तरफ.) धनुषाकार नवा देता है इसे बाह्यायाम या बहिरायाम कहते हैं इसे वैद्य असाध्य कहते हैं क्योंकि इससे छाती, कमर, ऊरु आदि टूट जाते हैं (यदि ये भन्न नहीं हुए हों तो कुछ यत्लके योग्य होता भी है ) और ऊपर लिखे नेत्र पथराना, हनुस्तंभ, पसली टूटना आदि अंतरायामके चिह्न तो प्रायः होतेही हैं ॥ ५२ ॥ (श्लो० ५२ ) स्नायुप्रतानं स्नायुविस्तारम् । बाह्यस्नायुप्रनानस्थ इति बाह्यस्नायवः पादमूलपिंडिकाकटी- पृष्ठग्रीवापश्चिमभागाश्रयाः॥
(५०८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १२ कायित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः ॥ कुर्य्यादाक्षेपैक वन्यं चतुर्थसभिघातजम् ॥ ५३॥ अभिघातनिमित्तश्च शोणितातिस्त्र- वाच्च यः।। गर्भपातनिमित्तश्च न सिध्यत्यपतानकः ॥ ५४॥ यह आक्षेपक वायु चार प्रकारका है-कफान्वित आक्षेपक, पित्तान्वित आक्षेपक, केवल वायुसे, चौथा अभिघात ( चोट आदिसे ) उत्पन्न (ये भेद कई तो यों कहते हैं कि कफान्वित तो दंडापतानक और पित्तान्वित अन्तरायाम तथा केवल वातिक बाह्यायाम है ) (और कई उन्हें पृथक् भेद बतलाते हैं और इन्हें पृथक) ॥ ५३ ॥ अभिघातसे उपजा अपतानक वायु तथा अधिक रक्त निकलनेसे जो हो और स्त्रियोंके गर्भपातसे हो ये अपतानक सिद्ध नहीं होते ( वास्तवमें आक्षेपक- काही भेद अपतानक वायु है देखो श्लोक ४६ वां डाक्टरीमें इस अपतानक (धनु- पवायु ) भेदको “ टिटनिस्' कहते हैं और यूनानीवाले “तमदुद" और कजाज कहते हैं) ॥ ५४॥ अधोगमाः सतियग्गा धनीरूद्धदेहँगाः ॥ यदा प्रकुपितोत्यर्थ मातरिश्वां प्रपद्यते ॥ ५५॥ तदान्यतरपक्षस्य संधिवन्धान्विमो. क्षयन् ॥ हन्ति पंक्षं तमाहुहि पक्षाघातं भिषग्वैराः ॥ ५६ ॥ यस्य कृत्तं शरीराईमकर्मण्यमचेतनम् ॥ ततः पतत्यसून वापि जहाँत्यनिलंपीडितः॥ ५७ ॥ शुद्धवातहतं पक्ष कृछ्रसाध्यतमं विदुः ॥ साध्यमन्येन संसृष्टं न साध्यं श्रयहेतुकम् ॥ ५८ ॥ अधोगामिनी ( नीचेकी) तिर्यक् (तिरछी और ऊर्द्धदेहग ) ऊपरकी ( आधे शरीरकी ) नसोंमें कुपितहुआ वायु प्राप्त होजावे तो दूसरे पक्ष (आधे शरीर ) के संधिबंधोंको छोडकर एकपक्ष (आधे शरीर ) को मार (सुन्नकर) देता है उसे वैद्य पक्षाघात कहते हैं ॥ ५५ ॥ ५६ ॥ जिसका पूरा आधा शरीर निकर्मा (हलचल न सके) और अचेतन ( स्पर्शज्ञानसे रहित ) होजाय वह मनुष्य गिर जाता है (उठ बैठे नहीं सकता) अथवा प्राण त्याग देता है ( अर्थात् निकर्मा शरीर होनेसे पड़ा रहता है) और अचेतनभा हो तो मर जाता है ॥५७ ॥ केवल वायु करके मारा हुआ अईशरीर कष्टसाध्य होता है और जो उसमें पित्त आदि दूसरा दोष मिला हो तो साध्य है और क्षयीके कारण जो पक्षाघात हो तो असाध्य होता है ॥ ५८ ॥ ( डाक्टरीमें इसे " हेमप्लीजिया.” और यूनानी हकीम “फालिज" कहते हैं) - १३ निदानस्थान-अ० १. (५०९) वायुरूद्धं व्रजेत्स्थानात्कुपितो हृदयं शिरः ॥ शंखौ च पीयत्वं- गान्याक्षिपन्न मयेच सः ॥ ५९॥ निमीलिताक्षो निश्चेष्टः स्त- व्धाक्षो वापि कूजति ॥ निरुच्छ्वांसोऽथवा कृच्छांदुच्चस्यान्नष्ट, चेतनः ॥६०॥ स्वस्थः स्यादये सुक्त आवृते च प्रमुखैति॥ कफां- वितेन वातेन य एषोऽपतंत्रकः ॥ ६१॥ अपने स्थानसे कुपित हुआ वायु ऊपरको गमन करे हृदय, शिर और कनपटी इन्हें पीडित कर अंगोंको कॅपावे तथा नवादे, (धनुषवत्. कुछ मोडदे) एक नेत्र मुँदासा रहे, चेष्टा नष्ट हो, नेत्र ठिठरा जाय, कपोतकासा शब्द (कूल्हे) करे, निरुच्छास हो (श्वास न आवे ) या कष्टसे श्वास ले, चेतना जाती रहे ( इसे अप- तंत्रकवायु कहते हैं ) ॥ ५९॥ ६० ॥ इसमें जब हृदय कफयुक्त वायुसे छुट जाता- है तब स्वस्थ ( होशमें ) होजाता है और जब कफ सहित वायु हृदयको आच्छा- दित करलेता है तब मोह (बेहोशी ) को प्राप्त हो जाता है । यह अपतंत्रक वायु कहलाता है ( और कई इसे और अपतानकको एकही मानते हैं ) (डाक्टरीमें इसका कोई खास नाम नहीं और यूनानीमें भी नहीं है कुछ टिट- निस ( तमदुद और कजाज ) से मिलता है) ॥ ६१ ॥ दिवास्वप्नासमस्थानविकृतोर्द्धनिरीक्षणैः ॥ मन्यास्तंभं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणावृतः ॥ ६२ ।। दिनकें सोने, असमस्थान ( ऊँचे नीचे स्थानपर बैठने सोने) के विकारसे तथा ऊपरको बहुत देरतक देखने (सोते समय पसीना आयेमें ग्रीवामें ठंढी वायु लगने) से कफ युक्त वायु मन्यास्तंभ रोग पैदा करता है (ग्रीवाके पीछे जो दो जोते होते. हैं उन्हें मन्या कहते हैं और मन्यास्तम्भ उसे कहते हैं जिसमें वे दोनों जोते या उनमेंसे १ जोता अकड़ जाय) यूनानी हकीम इसे 'इस्तरखा' कहते हैं ॥ ६२ ॥ गर्भिणीसूतिकावालवृद्धक्षीणेष्वसृक्क्षये ॥ उच्चै व्याहरतोत्यर्थं खादतः कठिनानि च ॥६३ ॥ हसतो ज़ुभतो भाराद्विवमा- च्छयनादपि ॥ शिरोनासौष्ठचिवुकललाटेक्षणसंधिगः ॥६४ ॥ अर्दयित्वानिलौं वक्त्रमर्दितं जनयत्यतः ॥ वक्रीभवति बनाई ग्रीवा चाप्यपवर्त्तते ॥६५॥ शिरश्चलति वाक्संगो नेत्रादीनां च (श्लो० ६२ ) मन्या ग्रीवायाः पश्चाद्देशस्था शिरा (इति वाचस्पतिः) दिवास्वप्नासमस्थानमित्यत्र दिवास्वप्नासनस्थानामिति वा पाठातरम् । मन्यास्तंभ केचिदपतानकपूर्वरूपं मन्यते (इति डल्लनः)॥ ॥
- १४ (५१०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। वैकृतम् ।। ग्रीवाचिवुकदंतानां तस्मिन् पाश्वे तु वेदना ॥ ६६ ॥ यस्याग्रजो रोमहर्षी वेपथुनॆत्रमाविलम् ॥ वायुरूर्द्ध त्वचि स्वाप- स्तोदो मन्या हनुग्रहः ॥ ६७ ॥ तमर्दितमिति प्राधि व्याधिविशारदाः ॥ ६८॥ क्षीणस्यानिमियाक्षस्य प्रसक्ताध्यक्त- भाषिणः॥ न सिध्यत्यर्दितं वाढं त्रिवर्ष वेपनस्य च ॥ ६९ ॥ गर्भवती स्त्री, प्रसूता, वालक, वृद्ध तथा क्षीण मनुष्योंको, रक्तक्षयमें उच्च स्वरस बोलनेवालोंको, अति कडा पदार्थ खानेवालोंको ॥६३॥ हसने तथा दमाही लेनेसे, दोझ उठानेसे, विषम शयन करनेसे, शिर, नाक, होठ, चिवुक (ठोडी ), ललाट और नेत्रसंधि इनमें प्राप्त हुआ वायु मुख आदि स्थानोंको पीडितकर अदितनामक वायुरोग उत्पन्न करता है । इसमें ग्रीवा (गरदन ) का आधाभाग टेढा होजाता- है (अर्थात् दाहिनी या बाँयी किसी एक तरफका आधा चेहरा वाँका होजाताहै) और ग्रीवा ( गरदन) भी टेढी होजातीहै ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ शिर चलायमान होता- है, वाणी शिथिल होजाती है, नेत्र आदि विकृत होजातेह (ओढापन होताहै),ग्रीवा (गरदन ), ठोडी, दांत येभी टेढे (वेडौल) होजाते हैं और जिस तरफ चेहरेमें टेढापन हो उसी तरफके पार्थ ( पसवाडे, हाथ, कंधे, ग्रीवाके जोते ) आदिम पीडा होतीहै ॥ ६६ ॥ इसका पूर्वरूप यह है कि, रोमहर्प हो, कंप हो (शरीर कांपने लगे ), नेत्रों में समल जल आवे, वायुका ऊर्द्धगमन हो, त्वचा शून्यसी हो, कुछ २ पीडा हो, मन्यास्तंभ तथा हनुस्तंभ हो ॥ ६७ ॥ इसे व्याधियोंके जानने- वाले वैद्य अर्दितरोग कहते हैं ॥ ६८ ॥ क्षीण मनुष्यके तथा जिसकी पलक झि4 नही तथा जो कष्टसे बोले और स्पष्ट शब्द न बोलसके तथा तीनवर्ष रोगको बीत- जायँ अथवा जिसके मुख, नासिका और नेत्र ये तीनों बहने लगें और जिसके शरीरमें कंप हो उसका अर्दित वायु अतिशय करके सिद्ध नहीं होता है डाक्टर लोग इसे " फेशियल पेरालेसिस और यूनानीवाले "लकवा" कहतेहैं ॥ ६९ ॥ वक्तव्य-हम जो रोगोंके प्रति हरेक रोगका डाक्टरी और यूनानीसे यथासंभव नाम आदि लिखते हैं यदि इनमेंसे किसी के कारणों अथवा लक्षणों में कुछ अंतरभी हो तो वह देशांतरके भेदसे या देशांतरीयविद्वानोंके विचारका फरक जानना चाहिये ।। पाणी प्रत्यंगुलीनां तु कंडरा योनिलार्दिता ॥ सक्थ्नोः क्षेपं निग्रहीयात् गृधेसीति हि" सा स्मृतौ ॥ ७० ॥ (शो० ६९)त्रिवर्ष सवत्सरत्रयानीतम् । अन्य च नासक क्षिमुग्वस्त्राविणं त्रिवर्षमाहुः (इति निबंध:) (सो० ७०) रभसीविवेचनं तंत्रांतरात्-"स्फिक्तवारुकटीपृष्ठ जानुजंघापदं क्रमात् । गृध्रसी स्तंभ- निदानस्थान-अ० १. टाकणे ( टखने) और अंगुलियोंकी कण्डरा ( मोटी नसें ) वायुसे व्याप्त हों और साथलोंके फरकनेको बंद कर दें तो उसे गृध्रसी वायु कहते हैं इसमें पाव टेटे पडते हैं ठीक पदक्षेपणका अवरोध हो जाता है और साथलों में बाँकापन होनेसे देहमें भी बाँकापन हो जाता है ॥ ७० ॥ तलं प्रत्यंगुलीनां तु कंडरा बाहुपृष्ठतः॥ वाहोः कर्मक्षयकरी विश्वाँचीति"ह सा स्मृता ॥ ७१॥ अंगुलियोंके नीचे बाहुके पृष्ठकी तरफ जो मोटी नसें हैं उनमें प्राप्त हुवा वायु जो बाहुओंके कार्य ( वस्तु पकडना, उठना, मोडना आदि) को नष्ट कर दे वह विश्वाची नाम वातव्याधि कहलाती है ॥ ७१ ॥ वातशोणितजः शोफो जानुमंध्ये महारुजः ॥ शिरः क्रोष्टकपूर्व तु स्थूलं को टुकमूर्द्धवत् ॥ ७२ ।। वात और रुधिरसे उत्पन्न हुआ महाशूलवाला गोडे में जो शोथ हे और कोष्टु (शृगालके ) शिरके समान जिसमें स्थूलता हो उसे कोष्टुशिर (कोष्टुशीर्ष ) रोग कहते हैं ।। ७२ ॥ वायुः कैटयां स्थितः सक्नेः कैंडरामांक्षिपेद्यदा ॥ खंजस्तदा भवेजन्तुः पंगुः सक्थ्नोई योर्वात् ॥ ७३ ॥ प्रक्रॉमन्ते यस्तु खंजनिवच गच्छति॥ कायखं तं विद्यान्मुक्तसंधिप्रबंधनम् ७४ जब कटिमें स्थित हुआ वायु साथलकी नसोंको शिथिल करदेताहै (मारदे) तव उससे मनुष्य खंज (विकलगति ) हो जाता है (इसको खंजरोग) कहते हैं और यदि दोनों सायलों (कूलेके जोडों) की नसें शिथिल कर देवे तो मनुष्य पंगु ( पांगला) होजाता है ( इसे पंगुरोग कहते हैं)( इसमें खड़ा होकर मनुष्य नहीं चल सकता बैठा २ पावोंको पीसता चलता है ) ॥ ७३ ॥ और जो पांव रखते हुए काँपे झोंके खाता हुआ चले उसे कलायखंज व्याधि कहतेहैं इसमें संधियों के बंध ढोल हो जाते हैं ॥ ७ ॥ न्यस्ते तु विषमे पांदे रुजः कुर्यात्समीरणः ॥ वातकंटक इत्येष विज्ञेयः खुडकाश्रितः ॥७५ ॥ -रुक्तोदेहाति स्पदते मुहु ॥ १ ॥ वाताद्वातकफाभ्यां सा विज्ञेया द्विविधा पुनः । वातजायां भवेत्तोदो देवस्यातीववक्रता || २ |॥ नानुजचोरसधीनां स्फुरण स्तभता भृशम् । वातश्लेष्मोद्भवायां तु गौरवं वहि मार्दवम् ॥ तदा मुखप्रसेक च भकद्वेषस्तथैव च" इति । (श्लो० ७५) खुडक श्रितः इति पादजघासंधिसभय इत्यर्थः पाणीस्थितश्चेत्यन्ये ।। ११ .
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१७
निदानस्थान-अ० १.
( वक्तव्य ) बाधिर्य और कर्णशूलके यूनानी, डाक्टरी नामादि कर्णरोगके प्रकर
णमें कहेजावेंगे और मकादिकको जिह्वारागके प्रकरणमें देख लेना इसीप्रकार और
व्याधियोंके भी नाम आदि उनके मुख्य प्रकरणमें लिखे जावेंगे ॥
अधो या वेदना याति वर्चीमूत्राशयोत्थिता ॥ भिन्दतीव गुदो.
पस्थं सौ तूंणीत्युपदिश्यते॥ ८२ ॥ गुदोपस्थोत्थिता सैव प्रतिलो-
मविसर्पिणी॥ वेगैः पक्वाशयं याँति प्रतितूणी तु सा स्मृती ॥३॥
मलाशय और मूत्राशयसे उठी हुई वेदना (शूल) गुदा और लिंगको भेदन
करती हुईसी जो नीचेको गमन करे वह तूणीनामक वातव्याधि कहलातीहै ॥४२॥
और गुदा तथा उपस्थ (लिंग) से उठी हुई पीडा प्रतिलोम ( उलटी ऊपरको)
गमन करनेवाली अपने वेगोंसे पक्काशयमें पहुंचे तो उसे प्रतितॄणी कहते हैं ॥८३॥
आटोपैमत्युग्ररुजमाध्मौतमुदरं भृशम् ॥ आध्मानमिति जानी-
याद्वोरं वातनिरोधजम् ॥ ८४ ॥ विभुग्नपार्श्वहृदयं तदेवामा-
शयोत्थितम् ॥ प्रत्याध्मानं विजानीयात्कफव्याकुलतानिलम् ॥५॥
आटोप करके सहित बहुत उग्र पीडा करनेवाला जिसमें उदर (पक्काशय)
मशककी भांति फूल जाय उसे आध्मान रोग जानना चाहिये । यह घोर व्याधि
(प्रायः) (अधो) वायुके रोकनेसे होती है ॥ ८४ ॥ और इसी प्रकारकी व्याधि
आमाशयमें (नालिसे ऊपर) हो पेट फूले तथा पँसवाड़े और हृदय फटजाय तो.
उसे प्रत्याध्माननामक व्याधि कहतेहैं इसमें कफमें मिला हुआ वायु होताहै ।। ८५ ।।
(वक्तव्य ) आध्मानका अफारा पक्वाशय ( नाभीके नीचे) के स्थानमें होता है
जो केवल वायुकृत होता है और प्रत्याध्मानका आमाशयमें होताहै (नाभिसे ऊपर)
और इसमें कफयुक्त वायुकृत होताहै इनको यूनानीमें नफख कहते हैं ।
अष्ठीलोवर्द्धनं ग्रन्थिमूर्द्धमार्यंतमुन्नतम् ॥ वाताष्ठीलां विजानी-
याइहिर्मार्गावरोधिनाम् ॥ ८६ ॥ एतामेव रुजायुक्तों वातविण्मू-
त्ररोधिनीम ॥ प्रत्यष्ठीलामिति देजठरे तिर्यगुंत्थिताम् ॥ ८७॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
पाषाणके तुल्य कडी ग्रंथी ऊपरको फैली हुई ऊंची हो और बाहरके मार्गों
(मलके मार्ग और मूत्रके मार्ग इन ) कोरोकनेवाली हो उसे (वाताष्ठीला) जानना
चाहिये ॥८६॥ और यही जो पीडायुक्त हो और अधोवायु, विष्ठा व मूत्रको रोकने-
वाली हो और पेटमें तिरछी और उठी हुई हो उसे प्रत्यष्ठीला कहतेहैं ॥ ८७ ॥
इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा०टी० निदानस्थावे प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
२८ नुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (५१४) द्वितीयोऽध्यायः २. अथातोऽर्शसां निदानं व्याख्यास्यामः । अव यहांसे अगाडी अर्श (बवासीर ) के निदानकी व्याख्या करते हैं। घडशॉसि . अवंति वातपित्तकैफशोणितसन्निपातैः सहजानि चेति ॥१॥ तत्रानात्मवतां यथोक्तः प्रकोपणैविरुद्धाध्यशनस्त्री- प्रसंगोत्कटकासनपृष्टयानवेगविधारणादिविशेषैः प्रकुपिता दोषा एकशो द्विशः समस्ताः शोणितसहिता वा यथोक्तप्रसृताः प्रधानधमनीरनुप्रपद्याऽधो गत्वा गुदमागम्य प्रदूप्यं वलीमा सप्ररोहाजनयंति ॥ २ ॥ अर्श (बवासीर) छः (६) प्रकारका होताहै वातसे, पित्तसे, कफसे, सन्नि- पातसे, रक्तसे और सहज (जन्मसे ) ॥ १॥ तहां जो मनुष्य जितेंद्रिय नहीं हैं उनके यथोक्त (हिताहितीय अध्यायोक्त ) अपथ्य भोजन जो दोपोंको प्रकुपित करे उसस (अर्थात् दोषांके कोप करनेवाले आहार, विहारसे), विरुद्ध भोजनसे, भोजन- पर भोजन करनेसे और अति स्त्रीसेवनसे, उत्कटकासन ( बहुत जोरसे खांसने से अथवा उत्कटक आसन (बहुत कठोर आसनमें बैठे रहने)से, पृष्टयान ( अश्व वृपादि की पीठपर अयुक्त सवारी करने से, वेगोंके रोकनेसे इत्यादि विशेष कुपथ्योस कुपित हुए दोप एक २ (अकेले) तथा दोदो मिलकर तथा तीनों दोप तथा रक्तसहित यथोक्त प्रसरित हुए प्रधान धमनी (पुरीपवाहिनी धमनी ) में अनुसरण कर नीचे गमन करके गुदास्थानमें प्राप्त होकर और गुदाकी त्रिवलीको दूषित करके मांसप्र- रोह अर्थात् मस्से उत्पन्न कर देते ॥ २॥ विशेषतो मंदाग्नेस्तथा तृणकाप्टोपललोप्टवस्त्रादिभिः शीतोदक- संस्पर्शनाद्वा कंदाः परिवृद्धिमालादयन्ति तान्यासीत्याचक्षते॥३॥ वे मस्से विशेषकर मंदाग्नि मनुष्योंके तथा तृण,काठ,पत्थर, लोहादि धातु और वस्त्र आदिके रगडाव आदिसे अथवा अति ठंढे (और अति गरम ) जलके स्पर्शसे वृद्धिको प्राप्त हो जाते हैं उन गुदाके मस्सोको अर्श अर्थात् बवासीर कहते हैं॥३॥ (गद्य १) पडीसीत्यत्र तानि द्विविधानि शुष्काण्याणि तत्र वातश्लेग्मोत्तराणि शुप्काणि रक्तपि- तोत्तराणि चाद्रीणि तथाचोक्त चरके-“वात मोल्बणान्याहुः शुष्काण्यासि तद्विदुः।। प्रस्रावीण तथाद्रीणि रक्तपित्तावणानि च ॥ १ ॥” (गद्य २) यथोक्तप्रस्ताः पूर्वोक्तपचदशका प्रस्ताः ।।
६
निदानस्थान-अ० २.
(५१५)
तत्र स्थूलान्त्रप्रतिवद्धमपंचांगुलं गुदमाहुस्तस्मिन्वलयस्ति-
स्रोऽर्ध्य गुलांतरभूता प्रवाहिणी विसर्जनी संवरणी चेति ॥४॥
चतुरंगुलायंताः सर्वास्तिर्यगेकाँगुलोच्छ्रिता॥शंखावर्तनिश्चिापि
उपर्युपरि संस्थिताः ॥ ५ ॥ ॥ गजतालुनिभाश्चपि वर्णतः
संप्रकीर्तिताः॥ रोमांतेभ्यो यवाध्यो गुदौष्ठः परिकीर्तितः ॥६॥
तहां मोटी अंतडी (जिसमेंसे विष्ठा आती है उस ) से प्रतिबद्ध (मिला हुआ)
साढे पाँच अंगुल प्रमाणका गुदास्थान है उसमें डेढ डेढ अंगुलकी तीन वली(छल्ले)
हैं (वे छल्ले डेट डेढ अंगुलके अंतरसे एकके परे दूसराइस प्रकारसे हैं उन तीनोंको
त्रिवली कहते हैं) उनमेसे पहिली वली प्रवाहिणी दूसरी विसर्जनी तीसरी संवरणी
है॥४॥ये सब वली चार अंगुल चौडी (मोटी)और तिरछी हुई एक अंगुल उभरी
हुई शंखकी आवृत्ति (आंटी) की तरह एकके ऊपर एक (एकसे परे दूसरी) ऐसी
हैं । ५ ॥ और आकारमें हाथीके तालुके समान हैं तथा जौ (आधे अंगुल)
प्रमाणका गुदाका ओष्ठ ( किनारा) रोमांतसे (अर्थात् जहाँ रोमका अंत हैवहांसे)
है (सारांश यह है कि बाहर जहांतक रोम हैं वहांसे अगाडी भीतरको आध अंगुल
तो गुदाका किनारा है फिर तीन वली भीतरकी हैं)॥६॥
प्रथमा तु गुदौष्ठादंगुलमात्रे ॥७॥ तेषां तु भविष्यती पूर्वरूपाणि
॥८॥ अन्ने न श्रद्धा कृच्छात्पक्तिरम्लीका सक्थिसदनमाटोपः का-
र्थमुद्गारवाहुल्यमक्ष्णोश्च श्वयथुरन्त्रकूजनं गुदपरिकर्तनमाशंका
पांडुरोगग्रहणीदोषाणां - कासश्वासौ भ्रमस्तंद्रानिद्रेन्द्रियदौर्बल्यं
च जातेष्वेतानि रूपाणि प्रव्यक्तकराणि भवंति ॥९॥
प्रथम वली तो गुदाके किनारेसे अनुमान एक अंगुल मात्र अन्दर है ( इसमें
विशेष करके अर्श होता है )॥७॥ अर्शके मस्सोंके पैदा होनेका पूर्वरूप यह है॥८॥
कि, अनमें श्रद्धा न होना, कष्टसे पचना, खट्टी डकारें आना, साथलोंका थकना,
पेटमें अफरासा होना, कृशता होना, डकारें बहुत आना, नेत्रोंके किनारोंपर शोथ
होना, पेट में आंतोंका (गुडगुड) शब्द होना, गुदामें कतरनीसी रहना, पांडुरोग
तथा ग्रहणी दोषकी शंका होना, खांसी और श्वास, श्रम, तंद्रा, निद्रा अधिक और
इंद्रियोंमें दुर्बलता होजाना ये लक्षण बवासीरके होनेसे प्रथम प्रगट होजाते हैं (ये
सब लक्षण या इनमेंसे थोडेसे लक्षण होते हैं) अथवा मस्से होजानेपर ये रूप सब
प्रग: होजाते हैं ॥९॥
(५१६) सुश्रुतसंहिता--भा० टी०। वातार्श। तत्र मारुतात्परिशुष्कारुणवर्णानि विपसमध्यानि कदंबपुष्पतुण्डि केरीनाडीमुकुलसूचीसुखाकृतीनि च भवंति तेम्पहतः सगृलं संहतमुपवेझ्यते कटीपृष्टपार्श्वमेद्गुदनाभिप्रदेशेषु चास्य वेदना। गुल्माष्ठीलाप्लीहोदराणि चास्य तन्निमित्तान्येव भवन्ति । कृष्णा- वनखलयनरदनवदनमूत्रपुरीपश्च पुरुपो भवति ॥ १० ॥ तिसमें वायुसे उपजे अर्शमें सूखे, लालवर्णके, बीचस टंडे, कवक पुष्प और तुंडकेरी (निरमावणके पुष्प) के समान तथा नाडी ( नाली) के पुष्पके समान तथा सूईके समान पैने मुखकी आकृतिवाले मम्स होतेहैं । इन करके पीडित मनु- प्य शूल (दरद मरोड़े ) सहित कडा (और देरसे ) दस्त जाता है। इसके कमर, पीठ, पसली, लिंग, गुदा और नाभि इन प्रदेशो पीडा रहती है और गुल्म, वाताष्ठीला, प्लीहावृद्धि, उदररोग ये सब वाताशानिमित्त उपद्रव होजातहैं । इस वातार्शरोगी मनुष्यके त्वचा, नख, नेत्र, दांत, मुख तथा मूत्र और पुरीप ये सब काले पड़ जाते हैं ॥ १० ॥ पित्तानीलाग्राणि तनूनि विसपीणि पीतावभासानि यकृत्यका- शानि शुकजिह्वासंस्थानानि यवसध्यानि जलौकोवसदृशानि प्रक्लिन्नानि च भवंति । तैरुपहतः सदाहं सरुधिरमतिसार्यते । ज्वरदाहपिपासामूश्चिोपद्रवा भवंति । पीतत्वङ्नखनयनदश- नवदनमूत्रपुरीषश्च पुरुपो भवति ॥ ११ ॥ पित्तसे उपजी बवासीरके मस्से अग्रभागमेसे नील होत है यकृतके तुल्य प्रका- शवाले (चमकील) और पीलापन लिये होते हैं छोटे छोटे होते हैं शीत्र फैल- नेवाले होत हैं तातेकी जिह्वाके आकार होते हैं और बीचसे जौकी तरह मोटे होते हैं तथा जलौका (जोख) के मुखके समान होते हैं और गीले तथा झिरनेवाले होते है । इनसे पीडित मनुष्य दाहयुक्त और रुधिरसे मिला दस्त जाते हैं तथा ज्वर, दाह, तृपा और मूछी ये इसमें उपद्रव होते हैं। इस पित्तकी बवासीरके रोगीके त्वचा, नख, नेत्र, दांत, मुख एवं मूत्र और विष्ठा पीले (पिलोहे) होतेहैं ११॥ (गद्य १०) उदावर्तकर्णशब्दशखशूलादयोन्ये चात्युपद्रवाः वातार्शसश्वरकादिभिलिखिताः ॥ गद्य ११) तथा च पित्तार्शस उपद्रवा अरत्यादयो ज्ञेयाः ।। ।
निदानस्थान-अ० २. (५१७) श्लेष्मज़ानि श्वेतानि महामूलानि स्थिराणि वृत्तानि निग्धानि पांडूनि करीरपनसास्थिगोस्तनाकाराणि न भिद्यन्ते न स्रवन्ति कंडूबहुलानि च भवंति । तैरुपहतः सश्लेष्माणमनल्पं मांस- धावनप्रकाशमतिसार्यते शोफशीतज्वरारोचकाविपाकशिरोगौ- रवाणि चास्य तन्निमितान्येव भवति । शुक्लत्वलनयनरदनव- दनमूत्रपुरीषश्च पुरुषो भवति ॥ १२ ॥ कफसे उपजीबवासीरके मस्से सुपेद,जडमें मोटे,स्थिर,गोल,चिकने, धुंधले होतेहें तथा टेंट और बढलके बीज तथा द्राक्षाके आकारके होते हैं। न वे फटे होते हैं, न झिरते हैं, उनमें विशेषकर खाज होती है। इससे पीडित मनुष्य कफयुक्त बहुतसा तथा मांस धोवनसा दस्त जाते हैं और शोथ, शीतज्वर, अरुचि, पचाव न होना, शिर भारी रहना, ये इसके उपद्रव हैं तथा कफार्शवाले रोगीके त्वचा, नख, नेत्र, दांत, मुख एवं मूत्र और मल प्रायः सुपेद होते हैं ॥ १२ ॥ रक्तजानि न्यग्रोधप्ररोहविद्रुमकाकणंतिकाफलसदृशानि पित्त- लक्षणानि च। यदावगाढपुरीषप्रपीडितानि भवंति तदात्यर्थं दुष्टमनल्पमसृक् सहसा विसृजति । तस्यैवातिप्रवृत्तौ शोणिता- तियोगोपद्वाणि भवंति ॥ १३ ॥ रक्तकी बवासीरके मस्से वडकी कोंपलके रंग या मूंगे तथा चिरभटीके सदृश होते हैं उनमें प्रायः पित्तकैसे लक्षण होते हैं और जब गाढा मल हो उससे रग- इखावे (या और भांति जोर पड़े या अति गरम भोजनादि हो) तब प्रायः बहु- तसा दुष्ट रक्त दस्तके राहसे आता है ( मस्सोंसे निकलता है) और जब इसकी ( रुधिरकी) अधिक प्रवृत्ति होती है ( अर्थात् अधिक खून निकलता है ) तब अति रक्त निकलनेसे (बेहोशी, गिरपडना, आंखोंके आगे अंधेरा आना आदि) उपद्रव होते हैं ॥ १३ ॥ सन्निपातजानि सर्वदोषलक्षणयुक्तानि अवंति ॥१४॥ सहजानि दुष्टशोणितशुक्रनिमित्तानि तेषां दोषत एव प्रसाधनं कर्तव्यम् ॥ १५॥ विशेषतश्चात्र दुर्दर्शनानि परुषाणि पांडूनि दारुणान्य- (गद्य १२) कफार्शस उपद्रवा नाभिपरिकर्तिकाहृल्लासच्छर्दिप्रतिश्यायमूत्रकृच्छ्रशर्कराश्मरीगौरवा- दयो बोद्धव्याः ॥ (गद्य १३ ) काकतिका गुजा काकादनीत्यपरे । पित्तलक्षणानि च इत्यत्र पित्तलक्षण- युक्तीन चकारोनुबधभूतवातकफरूपमुक्तमपि समुच्चिनोति (इति डल्लन:)॥
२२. (५१८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । तर्मुखानि तैरुपहतः कृशोल्पभुक् शिरासंततगात्राल्पप्रजः क्षीण- रेताःक्षामस्वरः क्रोधनोल्पाग्निर्घाणशिरोऽक्षिश्रवणरागवान् सत- तमंत्रकूजनाटोपहृदयोपलेपारोचकप्रभृतिभिः पीड्यते ॥ १६ ॥ भवन्ति चात्र-- सन्निपातकी बवासीरके मस्सों में सब दोपा (वायु, पित्त, कफ, रत्त. ) के लक्षण मिले हुए (लौर सवक उपद्रव) होतेहैं ॥१४॥ और जन्मस हुई बवासीर मातापिताक रज और वीर्यकी दुष्टताक कारणसे होतीहै, उसका साधन दोपकी प्रधानतांक अनु- सारही करना चाहिये ॥ १५ ॥ विशेप करके इसमें मस्से दुर्दर्शन (बुंग रुपवालं), कठोर, धूंधले और दारुण, भीतरको मुखवाले होते है तिनसे पीडित मनुष्य कृश होता है, थोड़ा भोजन करता है उसका शरीर नसोंसे (स्फुट) व्याप्त रहता है संता- नभी कम होते हैं क्षीणवीर्य होताहै फूटी कांसी जैसा स्वर होता है क्रोधयुक्त और अल्प अग्नि होती है तथा नासिका, शिर, नेत्र और कर्णके रोगोंसे व्याप्त होताहै सदा पेटमें आतें गुडगुड शब्द करती हैं अफरासाभी रहा करता है हृदयमें लिपा- वसा रहता है तथा अरुचि आदि रोगोंसे पीडित रहता है।॥ १६ ॥ यहां शोक है- (वक्तव्य ) यूनानी हकीम इस बवासीरही कहते हैं इसके दो भेद लिखतेहें एक वह जिसमें मस्से स्पष्ट जाहिर हों दूसरा वह जिसमें मस्से जाहिर न हो इसीको "रियाह बवासीर कहते हैं मस्सेवाली बवासीरमें दरद होना, खाज या खून आना आदि सब लक्षण होतेही हैं परंतु रियाह बवासीरमं कवजीयत, गुदा, वस्ति आदिम दरद, मलका जलदी न उतरना, कभी मूत्रबंध होना, कभी बंधा पड़ना आदि उप- द्रव होते हैं इसका कारण गलीजरिह बताते हैं जो गुरदमे पैदा हो या और जगहस वहां आवे डाक्टरी में इस हिमोरइडस् (Hemorrhaids) कहते हैं जिसे यूनानीवाले रियाह बवासीर कहते हैं वैद्यकसे अंतर्वलीगत वातार्श है और शेष उसके उपदव है । साधारण लोगामें बवासीरके दो भेद मानेजाते है १वादी, २ खूनी जिसमें रुधिर गिरताहै उसे खूनी और जिसमें खून नही गिरता उसे वादी कहतेहैं।। साध्य असाध्य अर्श। वाह्यमध्यवलिंस्थानां प्रतिकुर्याद्भिषग्वरः ॥ अंतर्वलिसमुत्थानां प्रत्याख्यायाचरेक्रियाम् ॥ १७ ॥ (गद्य १६) अर्शसा विशेपोपद्रव:-"मुद्गकोद्रवर्णाहकरीरचणकादिभि. || रूः संग्रादिभिर्वायुः स्वस्थान कुपितो बली ॥ १ ॥ अधोवहानि स्रोतांसि सहध्यायः प्रशोषयन् ॥ पुरीपं वातविण्मूत्रसग कुर्वीत दारुणम् ॥ २ ॥ दुन्नानामित्वुदावर्तः परमायमुपद्रवः ।" (इति वाग्भटः )॥(श्लो. १७) प्रत्याख्याय असाध्यान्येतान्यशीसीति निराकृत्य क्रियाम् आचरेदित्यर्थः ॥ .
२३ निदानस्थान-अ० २. (५१९) वाहरकी त्रिवली तथा मध्यकी त्रिवली में होनेवाली बवासीरकी वैद्यको चिकि- सा करनी चाहिये और तीसरी भीतरकी त्रिवलीमें बवासीरके मस्से हों तो यह असाध्य हैं ऐसा कहकर यदि (क्रिया) चिकित्साका आचरण करे तो करे (नहीं तो चिकित्साही नहीं करे)॥ १७ ॥ मेढ़गत अर्श। प्रकुपितास्तु दोषा मेटमभिप्रपन्ना मांसशोणिते प्रदूष्य कंडूं जन- यंति ततः कंडूयनात्क्षतं समुपजायते तस्मिंश्च क्षते दुष्टमांसजाः प्ररोहाः पिच्छिलरुधिरस्राविणो जायते कूर्चकिनोभ्यंतरमुपरि- ष्टाद्वा ते तु शेफो विनाशयत्युपन्नंति च पुंस्त्वम् ॥ १८ ॥ जब कुपित हुए वातादि दोष मेटू (लिंग इंद्रिय) में प्राप्त हों तव मांस और रुधिरको दूषित करके वहां खाज पैदा कर देतेहैं तब खुजानेसे क्षत घाव पड़ जाता है उस घावमें दुष्ट मांसके अंकुर (मस्से) हो जातेहैं उनमेंसे गाढी पीपसी तथा रुधिर झिरने लगता है ये खरधरे अंकुर भीतर तथा वाहर होतेहैं वे लिंग इंद्रियको गिरा देते हैं तथा पुरुषत्वका नाश कर देते हैं ॥ १८ ॥ योनिमभिप्रपन्नाः सुकुमारान्दुर्गंधान्पिच्छलरुधिरस्राविणश्छत्रा- कारान्करीराजनयति ॥ १९ ॥ स्त्रियोंकी योनिमें प्राप्त हुए वातादि दोष (मांस और शोणितको दूषित करके) कोमल दुर्गधित छत्रके आकार करीर अर्थात् मस्से पैदा करते हैं उन मस्सोंमेंसे गाढा रुधिर झिरता रहताहै ॥ १९ ॥ कान, नेत्र, नाक और मुखका अर्श । त एवोर्द्धमागताःश्रोत्राक्षिघाणवदनेष्वास्युपनिवर्तयन्ति॥२०॥ तत्र कर्णजेषु वाधियं शूलं पूतिकर्णता च ॥२१॥ नेत्रजेषु वर्मा: वरोधो वेदनास्रावो दर्शननाशश्च ॥ २२ ॥ प्राणजेषु प्रतिश्या- योतिमात्रं क्षवथुः कृच्छ्रोच्छासता पूतिनस्यं सानुनासिकवाक्य- त्वं शिरोदुःखं च ॥२३॥ वक्रजेषु कंठौष्ठतालूनामन्यतमस्मिस्तै- र्गदद्वाक्यता रसाज्ञानं मुखरोगाश्च भवंति ॥ २४ ॥ (गद्य १८) कूर्चकिनः सूक्ष्मदीर्घाकुरसंतानवतः उपरिष्टात् बाह्यचर्माणि ( इति निबंधसं० ) ॥ (गद्य २४) वक्रजेषु कठौष्ठादीनामन्यतमस्मिन् मांसांकुरा भवंतीत्यर्थः । तैर्गद्गदवाक्यतादयो भवति ॥ ..
२४ (५२०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०॥ वेही पात आदि दोप ऊपरके द्वारोंम प्राप्त हों तो कर्ण, नेत्र, नासिका, मुख इन स्थानों में (मांस और रुधिरको दूपित करके) बवासीर अर्थात् मस्से पैदा करते हैं ॥ २०॥ उनमेंसे कानमें मस्से हों तो बधिरता, शूल और दुर्गध होजाती है ॥२१॥ नेत्रमें मस्सा हो जानेसे पलक झिरना बंद होजाताहै दरद होताह पानीसा वहताहै और दृष्टिका नाश होजाताहै ॥२२॥ नासिकामें मस्सा हो तो बहुत जुखाम हो और छींके आवे कष्टसे सांस लिया जाय नाकस दुर्गंध आवे गुणगुणी आवाज होजाय और शिरमें दरद रहे ॥ २३ ॥ मुखमै मस्से हों तो कंठम तालमें या और जगह हों उनके होनेसे गद्गदवाणी हो या रसका ज्ञान नहीं रहे तथा मुखके अनेक रोग होजावें ॥ २४ ॥ व्यानस्तु प्रकुपितः श्लेष्माणं परिगृह्य वहिः स्थिराणि कीलवद- शासि निवर्तयति तानि चर्मकीलान्यासीत्याचक्षते ॥ २५ ॥ भवंति चात्र- सार शरीरमें व्याप्त व्यान वाय कुपित हो तो कफको ग्रहण करके बाहर शरी- की त्वचा में स्थिररूप कीलके तुल्य मस्से उत्पन्न कर देता है उन चर्मकीलोंको भी अर्श (त्वग्गतार्श) ऐसा कहते है ॥ २५ ॥ इसमें श्लोक हैं- तेषु कीले निस्तोदो मस्तिनोपजायते ॥ श्लेष्मणा तु सवर्णत्वं ग्रंथित्वं च विनिर्दिशेत् ॥ २६॥ पित्तशोणितज रोक्ष्यं कृष्णत्वं रक्तता तथा ॥ समुदीर्णखरत्वं च चर्मकीलस्य लक्षणम् ॥२७॥ वायुके दोपसे उन चर्मकीलोंमें निस्ताद (दरद ) होता है और कफसे शरीरके तुल्य वर्ण और गाठेसी होती हैं ॥ २६ ॥ पित्त और रुधिरसे रूखापन, कालापन, तथा लाली होतीहै और कठिनता खरदरापन यदि इनमें हो तो सन्निपातज हैं (चकारसे सन्निपातका ग्रहण होता है)ये चमकीलके लक्षण हैं ॥ २७ ॥ द्वंद्वजादि अर्श। अर्शसां लक्षणं व्यासांदुक्तं सामान्यतस्तुं यत् ॥ तंत्र्स प्रान्दि- निर्दिष्टात्साधयेद्भिषजांवरः ॥२८॥अशःलु दृश्यते रूपं यदा दोष- ट्रयस्य तु॥ संसँग तँ विजानीयात्संसर्गःसै च पैड्विधः ॥ २९ ॥ (श्लो० २७) चकारादत्र सान्निपातिकस्य लक्षणं बोद्धव्यम् ॥ (मो० २८) प्राविनिर्दिष्टात पूर्वोक्तवातादेर्लक्षणनिर्देशात् ( इति गयदासाचार्यः)। अन्ये तु सामान्यतस्तु पोढा व्यासात्तु प्राग्विनिर्दिष्टार पंचाधा प्रसरात ( इति डल्लनः) ।
२५ , निदानस्थान-अ०३. (५२१) अर्श (बवासीरक) लक्षण सामान्यतासे विस्तारपूर्वक जैसे वर्णन किये उन सबको पूर्व निर्देशके अनुसार वैद्य साधना करे ॥ २८ ॥ और जो अर्शमें दो दोषोंका रूप दिखाई देवे तो उसे संसर्गज ( बंदज ) जानो। यह संसर्ग छः प्रकारका होता है जैसे १ वातपित्त, २ वातकफ, ३ कफपित्त, ४ वातशोणित, ५ पित्त- शोणित, ६ श्लेष्मशोणित ॥ २९ ॥ त्रिदोषाण्यल्पलिंगानि याप्यानि तु विनिर्दिशेत् ॥ द्वंद्वंजाँनि द्विती- यायों वलौ योन्याश्रितानि च॥३०॥ कृछ्रसाध्यानि तान्याहुँः परिसं- वत्सरोणि चै॥सन्निपातसमुत्थानि सहजानि तु वर्जयेत्॥३१॥सर्वाः स्युलियो यो दुर्नामभिरुपद्रुताः।तस्तु प्रतिहतो वायुरपानः सन्निव- तते ॥ ततोव्याने. संगम्य ज्योति मृद्गति देहिनाम् ॥ ३२ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ तीन दोषोंके जिसमें थोडे लक्षण हों वह बवासीर याप्य है तथा द्वंद्वज (दो दो- पोंकी) और दूसरी वलीमें हो वहभी याप्यही जानो ॥ ३०॥ और यदियेही एक वर्षसे ऊपरकी होजाय तो कष्टसाध्य होजातीहै और सन्निपात ( सब दोषों) की हो तथा जन्मसे पैदाहुई हो वह (असाध्यहै) त्यागने योग्यहै ॥ ३१॥ जिस मनुष्यके सारी तीनों गुदाकी वली बवासीरके मस्सोंसे व्याप्त होजाय तव उन मस्सों करके अवरोधित हुई अपानवायु ठीक नहीं सरती फिर वह रुकी हुई अपानवायु व्यानमें मिलजाती है और ज्योति (शारीरिक अग्नि) को नाश करदेतीहै ॥ ३२ ॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः३. अथातोऽश्मरीणां निदानं व्याख्यास्यामः। अब यहांसे अश्मरी ( पथरी और शर्करा) के निदानका व्याख्यान करतेहैं। चतस्रोऽइमर्यो भवंति श्लेष्माधिष्ठानास्तद्यथा । श्लेष्मणा वातेन पित्तेन शुक्रेण चेति ॥१॥तथा संशोधनशीलस्यापथ्यकारिणः प्रकु- पितः श्लेष्मा मूत्रसंपृक्तोऽनुप्रविश्य वैस्तिमश्मरी जनयति ॥ २ ॥ कफके मुख्य कारणसे अश्मरी (पथरी) चार प्रकारकी होतीहै १ कफसे, २ वायुसे, ३ पित्तसे और ४ शुक्रसे ॥१॥ अश्मरीकी संप्राप्तिमें शोधन नहीं करने घालोंके (जो वमन विरेचनादि करके कफका शोधन नहीं करते उनके ) तथा (गद्य १) अत्राश्मरीतुल्यहेतुका शर्करापि बोद्धव्या । श्लेष्माधिष्टाना श्लेष्मोपादानकारणा।
(५२२) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। २६ कुपथ्य करनेवालोंक कुपित हुआ कफ मूत्रम मिलकर वस्ति (मूत्राशयम) अर्थात मसानेमें प्रविष्ट होकर ( पथरी) पैदा करताह ॥ २ ॥ तासां पूर्वरूपाणि वस्तिपीडाऽरोचको मूत्रकृच्छ्रे वस्तिशिरोमुष्क- शेफसां वेदना कृच्छ्राज्ज्वरावसादी वस्तंगधित्वं मत्रस्येति ॥३॥ यथास्वं वेदनावर्ण दुष्टं सांद्रमथाविलम् ॥ पूर्वरूपेझ्मनः कृच्छा- न्मत्रं सृजति मानवः ॥४॥ अश्मरीक पूर्वरूप ये है कि वस्तिस्थानमे पीडा हो, अरुचि, हा मूत्र कम हो, वस्ति, मुख, लिग, वृषण इनमें वेदना हो और कृच्छक कारणमे ज्वर और ग्लानि हो, मूत्रमें छगलकेसी गंध हो ॥ ३ ॥ तथा जिस दापोल्वणकी अमरी होनेवाली हो उसके अनुसार वेदना हो और वैसाही मूत्रका रंग हो तथा मूत्र दृषित गाढा, आविल ( तारटे मैला ) हो और मनुष्य कष्टस मूत्रोत्सग करे ॥ ४ ॥ अश्मरीक सामान्य लक्षण । अथ जातासु नाभिवस्तिसेवनीमेहनेतन्यतमस्मिन्महतो वेदना सूत्रधारासंगः सरुधिरसूत्रता मूत्रविकिरणं च गोमेदप्रकाशमना- विलं ससिकतं विसृजति थावनलंघनप्लवनपृष्टयानाध्वगमनेश्रा- स्य वेदना भवति ॥५॥ जब अश्मरी ( पथरी ) पैदा हो जाय तव नाभि, वस्ति, सीवन, लिग इनमें कही मूत्र करते समय पीडा हो, मत्रकी धारा रुक ( कभी२) रुधिरयुक्त मूत्र हो, मूत्र टपक टपक आवे और गोमेद के रंगका ( शरवती), तार छुटनेसे रहित बल्कि रेतसेकी फुटकसे मिला मूत्र (पेशाब) करे और भागन, उलांघन, कूद से तथा पीट- पर सवारी करनेसे, मार्ग चलनसे मनुष्यको पीड़ा हो ॥ ५ ॥ कफाश्मरी । तत्र श्लेष्माइमरी श्लेष्मलमन्नमभ्यवहरतोऽत्यर्थमुपलिप्याधः परि वृद्धि प्राप्य वस्तिमुखमधिष्ठाय स्रोतो विरुणद्धि तस्य मूत्रप्रति- घातादाल्यते भिद्यते निस्तुद्यत इव च वस्तिर्गुरुः शीतश्च भवति अश्मरी चात्र श्वेता स्निग्धा महती कुक्कुटांडप्रतीकाशा मधूः कपुष्पवर्णा वा भवति तां श्लैष्मिकीमिति विद्यात् ॥ ६॥ (गद्य ३) वस्तगन्वित्वं बृहत्तमलालगंबित्वम् ॥ (सो०४) यथास्त्रं दोषाननतिक्रमेण वेदनावर्णे च यस्मिन्मूत्रे तत्तथा दुष्टम् ॥ .
निदानस्थान-अ० ३, (५२३) कफकी पथरी कफकारक भोजन अधिक करनेसे शरीर कफसे लिपायमान हो नीचे वस्ति स्थानमें पहुँच वृद्धिको प्राप्त होकर वस्तिके मुखको आच्छादन करके मूत्र- मार्गको रोक देती है तब मनुष्यके मूत्र रुकजानेसे उसका वस्तिस्थान फूटासा जाय, भदनसा हो, सुईसी चुभे और वस्तिस्थान भारी हो और शीतल हो । इसमें पथरी सुपद हो, चिकनी हो, वडी मुरंगके अंडेके वर्णकी अथवा महुवेके फूल जैसी हो तो इसे कफकी पथरी जाने ॥६॥ पित्ताश्मरी। पित्तयुक्तस्तु श्लेष्मा संघातमुपगम्य यथोक्तां परिवृद्धि प्राप्य वस्तिमुखमधिष्ठाय स्रोतो निरुणद्धि तस्य मूत्रप्रतिघातादृष्यते चूष्यते दह्यते पच्यत इव वस्तिरुष्णवातश्च भवति अश्मरी चान सरक्का पीतावभासा कृष्णा भल्लातकास्थिप्रतिमा मधुवर्णा वा भवति तां पैत्तिकीमिति विद्यात् ॥७॥ पित्तसे युक्तहुआ कफ कठिनताको प्राप्त होकर यथोक्त वृद्धिको प्राप्त हो वस्तिक मुखको अच्छादन करके मूत्रके मार्गको रोक देता है तब उसके मूत्र रुक जानेसे वस्ति ( मूत्राशय ) तपायमानसा हो चूसासा जाता हो, आगसी लगे पकतासा हो, तथा उष्णवात (जो उत्तरतंत्रमें मूत्ररोगोंमें कहा है ) हो, ( और वस्तिस्थान गरम हो) इसमें पथरी रक्तता लिये हो, पीलापन भी हो, काली हो, भिलावेंकी गुठली जैसी हो अथवा शहतके रंगकी हो, उसे पित्तकी पथरी जाने ॥ ७ ॥ वाताश्मरी। वातयुक्तस्तु श्लेष्मा संघातमुपगम्य यथोक्तां परिवृद्धि प्राप्य वस्ति- मुखमधिष्ठाय स्रोतो निरुणद्धि तस्य मूत्रप्रतीघातात्तीवा वेदना भवति तथात्यर्थं पीडयमानो दंतान्खादति नाभिं पीडयति मेढूं मृगाति वायुं स्पृशति विशीते विदहति वातमूत्रपुरीषाणि कृच्छ्रेण वास्य मेहतो निःसरंति । अश्मरी चात्र श्यामा परुषा विषमा खरा कदंवपुष्पवत्कंटकाचिता भवति तां वातिकीमिति विद्यात्॥८॥ वायुसे युक्तहुआ कफ कठिन होकर यथोक्त वृद्धिको प्राप्त हो वस्तिके मुखपर स्थित होके मूत्रके मार्गको रोक देता है, मनुष्यके मूत्र रुकनसे इसमें तीक्ष्ण पीडा होती है और तीक्ष्ण पीडासे पीडित हुआ मनुष्य दांतोंको पीसता है, नाभिको दबाता है, लिंगको (गद्य ८) विशढ़ते अपान विसजति ।। .
(५२४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। मसलता है, वायु (पवन) का स्पर्श करता है अर्थात् पवन कराना है, या हवाको चाह- ताहै "विशद्धत' अर्थात् गुदासे शब्द करता है तपायमान होता है कभी कभी बहुत किनछेन्नेसे थोड़ा मूत्र या विष्ठा आता है। इसमें पथरी सांवली, कड़ी, बढ़ा और खरदरी होतीहै तथा कदंबके पुष्पक तुल्य कोटवाली होतीहै, इसे वायुकी पथरी जाने ॥ ८ ॥ प्रायेणेतास्तिस्रोऽश्मयों दिवाखानसमदानाध्यशनशीतस्निग्धगु- रुमधुराहारप्रिंयत्वाद्विशेषेण वालानां भवंतितेपासेवाल्पवस्तिका- यत्वादनुपचितमांसत्वाच्च वस्तेः सुखग्रहणाहरणा भवंति ॥ ९॥ प्रायः ये तीनों प्रकारकी पथरी दिनके सोनसे, अधिक भोजन करनेमे, भोजनपर आजन करनेस, शीतल, स्निग्ध, गरिष्ठ और मधुर आहार प्यारा लगनस विशेष करके ये बालकोंके हातीहै क्योंकि वालकाका वस्तिस्थान छोटा होता है और दृट- मांस नहीं होता है इससे बालकोंका वस्तिस्थान पथरीको ग्रहण भी सुखस (सह- जहीमें ) कर लेता है और उसका आहरण (निकल जाना क्षय हो जाना) भी महजहीमें सुखस होसकता है ॥ ९ ॥ शुक्राश्मरी। महतां तु शुक्राईमरी शनिमित्ता भवति ॥ १० ॥ मेथुना- भिघातादतिमैथुनाद्वा शुक्रश्चलितमनिर्गच्छद्विमार्गगमनादनि- लोऽसितः संगृह्य मेवृषणयोरन्तरे संहरति संहृत्य चोपशोपयति सा मूत्रमार्गमावृणोति सूत्रकृच्छ्रे वस्तिवेदनां वृषणयोश्च श्वयथु- सापादयति पीडितमात्रे च तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रविलयमापद्यते तां शुक्राइमरीमिति विद्यात् ॥ ११॥ भवति चात्र- बड़े मनुष्यों के प्रायः शुक्रजन्य शुक्राइमरी होता है ॥१०॥यह शुक्राइमरी (वीर्य की पथरी) जब मैथुनके रोकनेसे और अत्यंत मैथुनसे शुक्र अपने स्थानस छुट जाय और वाहर नहीं निकले और विपरीत मार्ग (उलटा)में गमन करे तब उसे वायु इकट्ठा करके लिंग और वृषण( पोतरों) के मध्य (वस्तिके द्वारपर ) स्थित कर देती है और वहां स्थित करके सुखाकर कडा कर देती है (जिससे अमरी बन जाती) है, फिर यह पथरी बनकर मूत्रके मार्गको रोक देती है और मूत्रकृच्छ, वस्तिमें दरद, पातरोंपर शोथ ये उपद्रव पैदा करती है और जब उस स्थानको दवावे या मलं तर विलाय जाती है उसे शुक्रकी पथरी जान ॥ ११ ॥ इसमें श्लोक है- २९ निदानस्थान-अ० ३. (५२५) शर्करा सिकतामेहो भस्माख्योइमरिवैकृतम् ॥ अमर्याः शर्करा ज्ञेयाँ तुल्यव्यजनवेदना ॥ १२ ॥ शर्करा (रेता) और सिकताप्रमेह तथा भस्माख्य रोग (मूत्र, शुक्ररोग उत्तर- तंत्रोक्त) ये सब पथरीहीके विकार हैं और पथरीही घुलकर शर्करा होती है क्योंकि इनके लक्षण और वेदना समान हैं (यूनानी हकीम भी पथरी और शर्कराको एकही किस्मसे बतातेहैं देखो तिब्बते अकबर ) ॥ १२ ॥ पवनेऽनुगुणे सौतु निरत्यल्पा विशेषतः॥सा भिन्नमूर्तिर्वातेनं शक- रेत्यभिधीयते ॥ १३॥ हृत्पीडा सक्थिसदनं कुक्षिशूलः सवेपथुः॥ तृष्णोर्ध्वगोऽनिलः कायं दौर्बल्यं पांडुगात्रता ॥१४॥ अरोचका- विपाको तुशर्कराते भवंति हि ॥ मूत्रमार्गप्रवृत्ता सासक्ता कुर्यादुप- द्रवान् ॥ १५॥ दौर्बल्यं सदनं कार्यं कुक्षिशूलमरोचकम् ॥ पांडुत्वमुष्णयातं च तृष्णां हृत्पीडनं वमिम् ॥ १६ ॥ और यदि पथरी छोटी हो और वायुके अनुकूल हो जाय तब तो प्रायः निकल पड़ती है । और जो वाय करके टुकडे २ से ( नन्हे २ दानेसे) हो जायँ तो उन्हें शर्करा कहते हैं ।। १३ । जिस मनुष्यको शर्करा हो उसके हृदय में पीडा, साथलों- का थकना, कूखमें शूल और शोथ, तृषा और वायुका ऊर्द्धगमन, कृशता (काला- पन) और दुबलापन तथा देहका पीला पडना ॥१४ ॥ अरुचि, भोजन ठीक नहीं पचना, ये लक्षण होते हैं और जब मूत्रके मार्गमें प्रवृत्त हो और वहाँ स्थित हो जाय तब ये उपद्रव होते हैं।॥१५॥दुवलापन, थकान, कृशता, कोखमें शूल, अरुचि, शरीर, नेत्रादि पीले पडना तथा उष्णवात, तृषा, हृदयमें पीडा और वमन (या जी मिचलाना) ॥ १६ ॥ नाभिपृष्ठकटीमुष्कगुदवंक्षणशेफसाम् ॥ एकद्वारस्तनुत्वको मध्ये वस्तिरधोमुखः ॥ अलाव्वा इव रूपेणं शिरास्नायुंपारिग्रहः ॥ १७ ॥ नाभि, पीठ, कमर, पोतरे, गुद, नले और लिंग इनके बीचमें एक मुखवाला, कोमल झिल्लीवाला, नीचे, इंद्रियकी जडमें मुखवाला ऐसा वस्तिस्थान (मूत्राशय अर्थात् प्रसारण), है इसका आकार तूंबीके तुल्य है रगों और नसोंसे बँधा हुआ है और लिपटा हुआ है ॥ १७॥ वस्तिर्वस्तिाशरैश्चैर्वे पौरुषं वृषणौ गुदम्॥एकैसंबंधिनो ह्येते गुदा- स्थिविवरस्थिताः ॥१८॥मूत्राशयो मलाधारःप्राणायंतनमुत्तमम् ॥
३० सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (५२६) पक्वाशयगतास्तत्र नाडयो सूत्रवहाँस्तु याः॥१९॥तर्पयंति सदा मुत्रं सरितः सागरं यौँ। समत्वान्नोपलभ्यते सुखान्यासी सहस्रशः ॥ २०॥ नाडीभिरुपैनीतस्य मूत्रस्यामाशयांतरात् ॥ जागृतः स्व- पंतश्चैव सं निष्पंदेन पूर्यते॥२१॥ आमुखात्सलिले न्यस्तैः पाव- भ्यः पूर्यते नवः॥ घटो यथा तथा विद्वि वस्तिर्मुत्रेण पूर्यते॥२२॥ वस्ति और वस्तिका शिर, पौरुष (मढ़), पोतरे और गुदा ये सब परस्पर सम्बन्ध रखते हैं और गुदाका जो अस्थि है उसके विवर ( फटाव ) पर स्थित हैं ॥ १८ ॥ मूत्राशय ( मसाना ) मलका आधार है और प्राण (अग्निसाम) का उत्तम स्थान है पक्वाशयमें प्राप्त हुई जो मूत्रको वहानेवाली नाही हैं वे सदा सब कालमें मूत्रकी तृप्ति और वृद्धि करती रहती हैं जैस नदियां समुद्र में सदा जल भरती रहती हैं और उन नाडियोंके हजारों मुख हैं (जिनसे मूत्र टपकता है) वे सुक्ष्म होके विदित नहीं हो सकते ॥ १९ ॥ २० ॥ नाडियों करकं आमाशयादि- कसे सब कालम (दिनरात ) जागते सोते दपक टपक करके मूत्र वस्तिस्थान ( मूत्राशय या मसाने ) में आकर इकट्ठा होता है ।। २१ ॥ ( इसीको दृष्टांतसे सिद्ध करते हैं ) जैसे जलमें ( या कीच में ) मुँहतलक नवीन घडेको गाइ द तो वह अपने पार्श्वस्य जलसे भर जाता है इसी भांति वस्ति मूत्रस भर जाती है (ऐसा समझना चाहिये ) ॥ २२ ॥ एवमेवं प्रवेशेनं वातः पित्त कफोपि वा ॥ मूत्रयुक्त उपस्ने हात्प्रवि- इय कुरुतेऽश्मरीम् ॥ २३ ॥ अप्सु स्वच्छास्वपि यथा निर्षिक्तासु नवे घटे । कालांतरेण पॅकः स्यांदश्मरीसंभवस्तथा ॥ २४ ॥ इसी प्रकार जिसमेंस मूत्र टपकता है यदि वहां ( उस क्वेदित पदार्थमें) वायु, पित्त, कफ हों तो वे भी मूत्रमें मिलकर मूत्राशयमें जाते हैं और पथरी पैदा कर देते हैं ॥ २३ ॥ जैसे गॅदला पानी नये घडेमें रखदेनेसे थोडे कालमें नीचे कीच जमजाता है ऐसेही पथरीको उत्पत्ति समझो (कई ऐसा भी कहते हैं कि साफ पानी भी नये घडेमें रक्खो तो कालान्तरमें कुछ गॅदलापन नीचे जमही जाता है एसे पथरी है यह “अप्सु स्वच्छासु पाठ मानते हैं) और पहला अर्थ करने- वाले “ अप्स्वस्वच्छासु" ऐसाही पाट मानते हैं और यही ठीक भी है ॥ २४ ॥ (शो० २३) उपम्नेहात् समापोदकात् न तु द्रवरूपत्वात् । (इति डल्लनः) ।।
-३ । निदानस्थान-अ०४. (५२७) संहन्त्यपो यथा दिव्यां मारुतोग्निश्च वैद्युतः ॥ तद्वद्वलांस वस्ति- स्थैमूष्मा संहन्ति साँनिलः ॥ २५॥ मारुते प्रगुणे वस्तौ मूत्रं सम्यक् प्रवर्तते ॥ विकारा विविधाश्चापि प्रतिलोमें भवन्ति हि ॥ २६ ॥ मूत्राघाताः प्रमेहाश्च शुक्रदोषास्तथैव च ॥ मूत्रदो- पाचं ये केचिद्वस्तांवे भवंति हिं॥२७॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने तृतीयोध्यायः॥ ३ ॥ जैसे आकाशमें जलको वायु और बिजलीकी अग्नि बाँधकर ओले बना देती है वैसेही वस्तिस्थानमें प्राप्त हुए कफको भी वायुसे मिली हुई उष्मा (गरमी) जमा- कर पथरी बना देती है ॥ २५ ॥ यदि वस्तिस्थानमें वायु अनुलोम (सीधासानु- कूल) रहे तब ठीक २ मूत्रकी प्रवृत्ति होकर कोई विकार नहीं होता और जो वहां वायु प्रतिलोम ( उलटा सविकार ) हो तब अनेक प्रकारके विकार होते हैं। ॥ २६ ॥ मूत्राघात (मूत्र बंद होना), प्रमेह, वीर्यदोपके रोग (क्कैव्यादि) तथा मूत्रदोषके जो रोग (मूत्रकृच्छादि.) है वे वस्तिस्थानमेंही होते हैं (डाक्टरी में पथरीको “ स्टोन " ( Stone ) कहते है और यूनानी हकीम "हिसात" कहते हैं इनके मतसे पथरी, मूत्राशय ( मसाने ) के सिवाय गुरदे तथा जिगरमें भी हो सकती है परंतु वास्तवमें गुरदे और जिगरमें पथरीकी गुंजायश कहां है परन्तु शर्कराका इन स्थानों में भी होना संभव है) ॥ २७ ॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० निदानस्थाने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ४. अथातो भगंदराणां निदानं व्याख्यास्यामः। अब यहांसे अगाडी भगंदरके निदानकी व्याख्या करते हैं । भगंदरके जातिभेद । वातपित्तश्लेष्मसन्निपातागंतुनिमित्ताः शतपोनकोष्ट्रगीवपरित्रा- विशंबूकावतॊन्मार्गिणो यथासंख्यं पंच भगंदरा भवंति ॥१॥ वायु, पित्त, कफ, सन्निपात और आगंतुक इन हेतुओंसे शतपोनक, उष्ट्रग्रीव, परिस्रावी, शंबूकावर्त तथा उन्मार्गी ये पांच भगंदर यथासंख्यसे होते हैं अर्थात वायुसे शतपोनक (जिसमें चालनीकी भांति सकडो छिद्र हों), पित्तसे उष्ट्रग्रीव और कफसे परिस्रावी, सन्निपातसे शंबूकावर्त तथा आगन्तु अर्थात् शस्त्रादिके लग- नेके क्षतसे उन्मार्गी नामक भगंदर होता है ॥ १ ॥ 1 1 (५२८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ३२ भगंदरकी निरुक्ति और पूर्वरूप। ते तु भगगुदद्वस्तिप्रदेशदारणाच्च भगंदरा इत्युच्यते॥२॥अपक्काः पिडिकाः पक्कास्तु भगंदरास्तेषां तु पूर्वरूपाणि कटीकपालवेदना गुदकंडूर्दाहः शोफैश्च गुदस्य भवति ॥३॥ ये भग, गुदा और वस्ति प्रदेशके विदारण करनेसे भगंदर कहलातेहें ॥२॥ ये जबतक विनापके फूटे होते हैं तबतक पिडिका (गुमडी) कहलातेहैं और पके. फूटे पीछे भगंदर कहेजाते हैं इनके पूर्वरूप ये हैं कि कमरके हाडमें दरद हो, गुदा- में खाज हो और दाह तथा शोथभी गुदामें हो ॥ ३ ॥ शतपोनक। तत्रापथ्यसेविनां वायुः प्रकुपितः सन्निवृत्तः स्थिरीभूतो गुदमाभ- तोऽगुले द्वधंगुले वा मांसशोणिते प्रदूष्यारुणवर्णा पिडिको जन- यति ॥४॥सास्य तोदादीत्वेदनाविशेषाञ्जनयत्यप्रतिक्रियमाणा च पाकमुपैति ॥५॥ सूत्राशयाभ्यासगतत्वाच्च बणः प्रक्लिन्नः शत- पोनकवदणुमुखैश्छिनैरापूर्यते तानि छिद्राण्यजस्रं फेलानुविद्धम- धिकमास्त्रावं स्त्रवति ॥६॥ (इनमेंसे ) अपथ्य सेवन करनेवालोंके वायु कुपित होकर रुककरके गुदाके आसपास प्राप्त होकर गुदासे एक अंगुल या दो अंगुलपर मांस और रुधिरको दूपित करके लाल वर्णकी फुन्सी उत्पन्न करताहै ॥ ४॥ वह फुन्सी शूल और विशेष वेदना उत्पन्न करतीहै और जो उसका प्रतीकार ठीक २ नहीं हो तो पकजातीहै ।। ॥५॥ और मूत्राशयके समीप प्राप्त होनेसे (सदा) गीलाहुआ व्रण चलनीकी भांति छोटे २ मुखवाले छिद्रोंसे भरजाताहै उन छिद्रों से सदैव झागोंसे मिलाहुआ पीव, आदि अधिक निकलताहै ॥ ६ ॥ व्रणश्च ताडयते भिद्यते छिद्यते सूचीभिरिव निस्तुद्यते गुदं च विदीर्यते वातमूत्रपुरीषरेतसामप्यागमश्चं तैरेवं छिद्वैभवति तं भगंदरं शतपोनकमित्याचक्षते ॥७॥ व्रणमें ताडनेकीसी, भेदन करनेकीसी, छेदन करनेकीसी पीडा हो सूईचुभोने कीसी पीडा हो और गुदा विदीर्णसी होती हो तथा उन छिद्रों से वायु, मूत्र, विष्ठा वीर्य निकलने लगे तो इस प्रकारके भगंदरको शतपोनक कहतेहैं ॥ ७ ॥ (गद्य ३) कीकपाल: कटीफलकः । (गद्य ४) सन्निवृत्तः व्याधुटितः । (गद्य ६) अभ्यासः समीपम् (नि० स०) । (गद्य७) शतपोनकं चालनिकेति जैबटः । शतपोनकवतु शतपोनको भगंदरः ॥
-
३३
निदानस्थान-अ० ४.
(५२९)
1
उष्टग्रीव ।
'पित्तं तु प्रकुपितमनिलेनाधः प्रेरितं पूर्ववदवस्थितं रक्तां तन्वीमु-
च्छ्रितामुष्ट्रग्रीवाकारां पिडिकां जनयति ॥८॥ सास्य चोषादीन्वेद-
नाविशेषाञ्जनयत्यप्रतिक्रियमाणा च पाकमुपैति ॥९॥त्रणश्चा-
ग्निक्षाराभ्यामिव दह्यते दुर्गंधमुष्णमास्त्राव स्रवत्युपोक्षतश्च वात-
मूत्रपुरीषरेतांसि विसृजति तं भगंदरमुष्ट्रग्रीवमित्याचक्षते ॥१०॥
कुपित हुआ पित्त जब अपानवायु करके नाचेको प्रेरण किया हो तब पहलेकी
तरह (गुदाके आसपास ) स्थित होकर लाल वर्णकी छोटी ऊपरको उठी हुई ऊंट-
की ग्रीवाके आकार फुन्सी पैदा करता है ।।८॥वह फुन्सी मनुष्यके (गुदास्थानमें)
चूसनेकीसी, जलानेकीसी अनेक वेदना उत्पन्न करती है और उसका उपाय ठीक
नहीं किया जाय तो पक जातीहै ॥ ९ ॥ और उसका घाव सदा अग्निसे या
क्षारसे जलतासा रहता है दुर्गध युक्त गरम पीब निकलता है और उपेक्षित (विना
ठीक चिकित्सा किये ) उस घावमेंसे वायु, मूत्र, विष्ठा और शुक्रभी निकलने लग;
जातेहैं और इस भगंदरको उष्ट्रग्रीव कहतेहैं ॥ १० ॥
परिस्रावी।
श्लेष्मा तु प्रकुपितः समीरणेनाधः प्रेरितः पूर्ववदवस्थितः शुक्लाव-
भासां स्थिरों कंडूमतीपिडिकां जनयति ॥११॥सास्य कंड्वादीन्वेद-
नाविशेषाञ्जनयत्यप्रतिक्रियमाणा च पाकमुपैति ॥ १२ ॥ व्रणश्च
कठिनः संरम्भी कंडूप्रायः पिच्छलमजस्रमास्त्राव स्रवत्युपेक्षितश्च
वातमूत्रपुरीषरेतांसि विसृजतितं भगंदरंपरिस्राविणमित्याचक्षते१३
कोपको प्राप्त हुआ कफ अपान वायु करके प्रेरण किया हुआ नीचे प्राप्त होकर
गुदाके आसपास सुपेद वर्णकी स्थिर (कडी) खाजयुक्त फुन्सी पैदा करता है
॥ ११ ॥ वह फुन्सी मनुष्यके गुदास्थानमें खाज आदि अनेक पीडा उत्पन्न
करती है और जो उसका ठीक उपाय नहीं किया जाय तो पाकको प्राप्त हो जाती
है ॥ १२ ॥ और इसका घाव कडा, टीलसे बहनेवाला और अधिक खाजवाला
होता है और घावमेंसे गाठी राध निरंतर निकलती रहती है । यदि ठीक चिकि-
त्सा न हो तो उसमेंसे वायु, मूत्र, विष्ठा और वीर्य निकलने लगते हैं इस भगंद-
रको परिस्रावी कहते हैं ॥ १३ ॥
(५६०) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। शंबूकावर्त। आयुः प्रकुपितः प्रकुपितौ पित्तश्लेष्माणो परिगृह्याधोगत्वा पूर्वव- दवस्थितः पादांगुष्ठप्रमाणां सर्वालंगां पिडिकां जनयति ॥ १४ ॥ सास्य तोददाहकंडादीन्वेदनाविशेषाञ्जनयत्यप्रतिक्रियमाणापाक- मुपैति ॥ १५ ॥ व्रणश्च नानाविधवर्णमास्त्राव स्रवति पूर्णनदीश- स्चूंकावर्तवच्चांत्रं समुत्तिष्ठति वेदनाविशेषास्तं भगंदरं शंबूकाव- तसित्याचक्षते ॥ १६ ॥ कुपित हुआ ( अपान ) वायु कोप हुए पित्त और कफको ग्रहण करके नीचे ( गुदाके पास ) गमन करके पहलेकी भांति (गुदाके एक या दो अंगुल दूर) स्थित होकर पैरके अँगूठेके तुल्य सव दोषोंके लक्षणवाली फुन्सी उत्पन्न करता है ॥१४॥ वह फुन्सी चीस, दाह और खाज आदिक अनेक वेदना पैदा करती है और जो उसका ठीक प्रतीकार न हो तो पकजाती है ॥ १५ ॥ और इसका घाव अनेक प्रकारके पीब आदि झिराता है और भरीहुई नदी तथा शंखके आवर्त (भँवर अथवा आंटी) के तुल्य जिसमें वेदना उठे उस भगंदरको “ शंबूकावत' कहते हैं यह सानिपातिक है ॥ १६॥ सूढेने मांसलुब्धेन यदस्थिशल्यमन्नेनं सहाँभ्यवहृतं यदावगाढ- पुरीपोसिश्रमपानेनाधारितमलम्यगागतं गुदं क्षिणोति तत्र क्षतनिमित्तः कोथ उपजायते तस्मिश्च क्षते पूयरुधिरावकर्णिमांस- कोथे भूमाविव जलेप्रक्लिन्नायां मियः संजायते ॥ १७ ॥ ते भयंतो गुदमनेकधा पार्श्वतो दारयति तस्य तैर्गि: कृर्मिकृतै- तिसूत्रपुरीषरेतासि निःसरन्ति तं भगंदरमुन्मार्गिणमित्याच- क्षते ॥ १८॥ भवन्ति चात्र- सांस खानेवाले मूट लोग जो हड्डीको भोजनके संग खाजाते हैं वह गाढे पुरी- पम मिलकर अपानवायुकरके नीचे (दरतमें ) प्रेरणकरी हुई (आडी, टेढी या) बडी होनेसे गुदामें घाव कर देती है फिर घावमें पकाव होनाता है और उस जख- ममें राध और रुधिरयुक्त मांसके होजानेसे जैसे जलसे गीली पृथ्वीमें कृमि पड- जाते हैं वैसेही उसमें भी क्रिमि उत्पन्न होनाते हैं ॥ १७ ॥ वे क्रिमि गुदाके (गद्य १८) पार्श्वनो दारयति अस्याग्ने अशी भगदरमिति केचित् पठति (नि० स० ) ॥ - 14 निदानस्थान-अ० ५. (५३१) १० -मांसको खाकर अनेक भांतिसे बराबरकी तरफ विदारण कर देते हैं तव मनुष्यके 'उन कृमिकृत मागोंसे वायु, मूत्र, विष्ठा तथा वीर्य निकलने लग जाता है उस भर्ग- दरको उन्मार्गी कहते हैं (तथा बवासीरके मस्सं काटनेके जखमसे अथवा और भांति चोट लगजानेसे, छिल जाने, कटजाने, रगड लगजाने आदिसे घाव होकर जो भगंदर हो वह भी उन्मार्गी ही समझो)॥ १८ ॥ यहाँपर श्लोक हैं- उत्पद्यतेऽल्परक्शोफा क्षिप्रं चॉप्युपशाम्यति ॥ पायवर्तदेशे पिडिको साँझयोन्या भगंदरांत् ॥ १९ ॥ जो थोड़े दरद और थोडे शोथवाली फुन्सी गुदाके पास हो और शीव शांत होजाय वह भगंदरसे पृथक् ( सादी फुन्सी) होती है ॥ १९ ॥ भगंदरी तु विज्ञेया पिडिकाँतो विपर्ययात् ॥ पायोः स्याड्यंगुले देशैं गूढमूला सरुग्ज्वरा ॥२०॥ यानयानान्मलोलात्कंडूरुग्दा- हशोफवान् ॥ पायुभवेद्रुजः कटयों पूर्वरूपं भगंदरे ॥ २१ ॥ तथा इसके विपरीत गुदासे दो अंगुल दूर गूट मूलवाली और चीस और ज्वर- -युक्त जो फुन्सी होती है वह भगंदरी कहलाती है ॥ २० ॥ सवारीपर चलनेसे मलोत्सर्ग करनेसे जो गुदामें खाज, दरद, जलन और शोथ हो तथा कमरमें पीडा हो तो भगंदरका पूर्वरूप जानना चाहिये ।। २१ ॥ घोराः साधयितुं दुःखाः सर्व एव भगंदराः ॥ तेष्वसाध्यस्त्रिदोषोत्थः क्षतजश्च भगंदरः॥ २२ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ सवही भगंदर घोर और दुःखसे साधनयोग्य होते हैं तिनमें भी त्रिदोषका ( शंकावर्त नामक) भगंदर तथा क्षतसे उपजा (उन्मार्गी) भगंदर ये दोनों असाध्य होते हैं (यूनानीमें इसे नासूरामिकअद कहते हैं और डाक्टरीमें इसी प्रकार गुदाके पासका जखम (Fistula) कहते हैं इनके यहां इसकी कुछ विशेषता नहीं) ॥ २२ ॥ इति पण्डितमुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० निदानस्थाने चतुर्थोऽध्यायः ॥ २९ ॥ पंचमोऽध्यायः ५. अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः। अब यहाँसे अगाडी कुष्ठ के निदानकी व्याख्या करते हैं । (श्लो० १९) पावतदेशे गुदस्यांते ॥ , F . (५३२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ३६ सिथ्याहाराचारस्य विशेषाद्गुरुविरुद्धासात्म्याजीर्णाहिताशिनः स्नेह- पीतस्य वान्तस्य वाव्यायामग्राम्यधर्मसेविनो ग्राम्यानूपौदकमां- सानि वा पयसाभीक्ष्णमनतो यों वा मज्जत्यसैष्माभितप्तः सहसाँ छईि वाँ प्रतिहति तस्य पित्तश्लेष्माणी प्रकुपिती परि]- ह्यानिलः प्रवृद्धस्तिर्यग्गाः शिरः संप्रतिबद्य समुद्भूय बाह्य मार्ग प्रति समन्ताद्विक्षिपति ॥१॥ अनुचित आहार तथा अनुचित आचार ( अगम्यागमनादि ) करनेसे, विशेष कर गरिष्ठ भोजन करनेसे, विरुद्ध भोजन करनेसे अर्थात् रसविरुद्ध संयोगविरुद्धादि खाने पीनेसे तथा देश, काल, प्रकृति, आदिके प्रतिकूल भोजन करनेसे, अजीर्णमें भोजन करनेसे और अहिंत वस्तु खानेसे, (अयुक्त) स्नेहपान करने तथा वमन करने- के पीछे व्यायाम या मैथुन करनेसे और ग्राम्यपशु तथा जलके किनारेके जीव और जलजंतुवोंके मांसको दूधके साथ खानेसे अथवा जो मनुष्य गरमी (धूप, अनि आदि ) से संतप्त हुआ तत्काल जलमें स्नान करे तथा जो आतेहुए वमन- को रोके उसके कुपित हुए कफ और पित्तको बढाहुआ वायु ग्रहणकरके तिर्यग्- गामिनी शिराओंमें गमन करके और बाह्यमार्गकी ओर प्राप्तहोकर समस्त शरी- रमें फैला देता है ॥ १॥ यत्र यत्रं च दोषों विक्षिप्तो निःसरति तत्र तंत्र मंडलानि प्रादु- भवन्त्येवमुत्पन्नस्त्वचि दोषस्तत्र चे परिवृद्धिं प्रौप्याप्रतिक्रिय- माणोऽभ्यंतर प्रतिपद्यते धातूंन्दूषयन् ॥ २॥ फिर जहां जहां प्राप्तहुआ दोष बाहरनिकल प्रगट होताहै वहांही वहां मंडल (चकद्दे ) पैदा होजातेहैं और फिर त्वचामें उत्पन्न हुआदोष ठीकर प्रतिकार न होने पर वृद्धिको प्राप्तहोकर धातुओंको दूषित करता हुआ भीतरको प्रवेश करजाताहै॥२॥ कुष्ठका पूर्वरूप। तस्य पूर्वरूपाणि त्वक्पारुष्यमकस्माद्रोमहर्षः कंडूः स्वेदबाहुल्य- मस्वेदनं वाङ्गप्रदेशानां स्वापः क्षतविसर्पणमसृजः कृष्णता चेति॥ (गद्य) स्नेहपोतस्य वातस्य इति स्नेहपानानंतरं वमनानन्तरं वा । व्यायामग्राम्यधर्मसेविनः समुद्भूय आक्षिप्य समंतात् सर्वत्र सर्वशरीरे । मिथ्याहाराचारस्य "मामानि वा पयसाऽभीक्ष्णमनतः" इत्याग्रुप युक्तस्य प्रवृदोऽनिलः प्रकुपितौ पित्तकफी परिगृह्य एवमेवान्वयः ।।
- निदानस्थान-अ० ५. (५३३) इस कुष्ठरोगके पूर्वरूप ये हैं त्वचामें कठोरता हो, अकस्मात् रोम खडे होजाय, खाज होने लगे, अधिक पसीना आवे अथवा बिलकुल पसीना नहीं आवे और अंग प्रत्यंग सोजाया करें (अर्थात् झनझनाट करनेलगें, स्पर्शज्ञान न रहे) और घाव यदि किसी कारणसे होजाय तो वह फैलने लगे (शीव्र अच्छा न हो) और रुधिरमें कालापन होजाय ( तो जाने कि इस मनुष्यके कुष्ठरोग होगा)॥३॥ तत्र सप्त महाकुष्ठान्येकादश क्षुद्रकुष्ठान्येवमष्टादश कुष्ठानि भवन्ति जिनमें से सात महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ हैं ऐसे सब मिलकर अठारह प्रकारके कुष्ठ हैं ॥ ४ ॥ तत्र महाकुष्टान्यरुणोदुम्वरय॑जिह्वकपालकाकणकपुंडरीकद्रुकु- ष्ठानीति ॥५॥ क्षुद्रकुष्ठान्यपि स्थूलारुष्कं महाकुष्ठमेककुष्ठं चर्मदलं विसर्पः परिसर्पः सिध्म विचर्चिका किटिभं पामा रकसा चेति ॥६॥ इनमेंसे महाकुष्ट ये हैं १ अरुण, २ औदुंबर, ३ ऋष्यजिद्द, ४ कपाल, ५ काकणक, ६ पुंडरीक, ७ दगु ॥५॥ और क्षुद्रकुष्ठ ये हैं १ स्थूलारुष्क, २ महा- कुष्ठ, ३ एककुष्ठ, ४ चर्मदल, ५ विसर्प ६, परिसर्प, ७ सिध्म, ८ विचर्चिका, किटिभ, १० पामा, ११ रकसा । इसप्रकार सात महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्रकुष्ठ मिलकर १८ हुए ॥६॥ बहुतसे आचार्य दद्रुको क्षुद्रकुष्ठोंमें मानतेहैं और महाकुष्ठको महाकुष्ठोंमें और कई ग्रंथों में कुष्ठोंमें नामभेद और क्षुद्रत्व और महत्वमेंभी अंतर है जैसे देखो चाग्भट में और तरह लिखाहै और भावप्रकाशमें औरहीतरह देखो टिप्पणी ।। सर्वाणि कुष्ठानि सवातानि सपित्तानि सश्लेष्माणि सक्रिमीणि च भवंत्युत्सन्नतस्तु दोषग्रहणमभिभवात् ॥ ७ ॥ सभी कुष्ठ वायुयुक्त होते हैं और सभी पित्तयुक्त तथा कफयुक्तभी होते हैं और सभी सूक्ष्म क्रिमियोंसे व्याप्त होते हैं परंतु जहां जिस दोषको उत्कर्षता होती है -वहां प्रधानतासे उसी दोषका ग्रहण किया जाता है ।। ७ ।। (गद्य ५-६ ) वाग्भटे महाकुष्ठानि यथा-"पूर्वत्रिकं दद्रु सकाकणम् ॥ पुडरीकय॑जिह्वे च महा. कुष्ठानि सप्त तु" इति पूर्वत्रिक कपालौटुंवरमडलाख्यम् । शेषाणि क्षुद्रकुष्ठानि ॥ भावप्रकाशे महाकुष्ठानि -"पूर्वत्रिकं तथा सिध्म तत: काकणकं तथा ॥ पुडरीकय॑जिह्वे तु महाकुष्ठानि सप्त च" इति । तथैव क्षुद्रकुष्ठानि “एककुष्ठं स्मृतं पूर्व गजचर्म तत: स्मृतम् । ततश्चमैदल प्रोक्तं तथा चापि विचर्चिका ॥ विपादिकाभिधा सैव पामा कच्छ्रस्ततः परम् । ततो दद्रुश्च विस्फोटः किटिभं च ततः परम् ।। ततश्वालसक प्रोक्त शतारुश्च ततः परम् ॥" तथाच कुष्ठाना सप्तविधत्वमष्टादश्वविधत्वमपरिसंख्यविधत्वमेव । अष्टादश कुष्ठानि भवतीति दिड्मानं दर्शितम् ( इति डल्लनः ) ॥ यथा---
मुश्रुतसंहिता-मा० टी०
तत्र वान्नारुणं पित्तनादुम्वरय॑जिह्वकपालकाकणकानि । श्लेष्मणा
पाडगकं दद्रुकुष्टं चेति ॥८॥ तेषां तु महत्वं क्रियागुरुत्वमुत्तरोत्तरं
धास्वनुप्रवेशादसाध्यत्वं चेति ॥९॥
उनमसं वायुम ( वायुकी प्रधानतास) अरुण कुछ होता है और पित्त औदुंबर,
'ऋग्यजित, कपाल और कारुणक ये 2 कुन्ठ होते हैं और कफसे पौंडरीक तथा
दुट्ट होते है ॥ ८ ॥ इनम महब ( महाकुष्ठपन) यही है कि इनकी ज़ियामें भारीपन
है और उत्तरोत्तर धातुओंम प्रवेश होजानस असाध्यता है ॥९॥
महाकुष्टके लक्षण ।
तत्र वातनामणभानि तनूनि विसपीणि तोदभेदस्वापयुक्तान्यरु-
णानि ॥१०॥ पित्तन पकोदुवरफलाकृतिवर्णान्यौदुम्बराणि ॥११॥
ऋष्यजिवाप्रकाशखरत्वानि ऋप्यजिह्वानि॥१२॥ कृष्णकपालि-
काप्रकागानि कपालकुष्टानि ॥१३॥ काकणंतिकाफलसदृशान्यती-
वरलगानि काकणकानि ॥१४॥ तेषां चतुर्णामप्योपचोपपरि-
दाहधृमायमानानि क्षिप्रोत्थानप्रपाकभेदित्वानि कृमिजन्म च-
सामान्यानि लिंगानि ॥१५॥
१ ३९ निदानस्थान-अ० ५. (५३५) तयोर्द्वयोरप्युत्सन्नता परिमंडलता कंडूश्चिरोस्थानत्वं चेति सामा- न्यरूपाणि ॥ १८॥ जो कमलपत्रके समान हो वह पौंडरीक कुष्ठ है ॥ १६ ॥ अतसीके पुष्पके समान (ऊदे ) या तांबेके वर्ण फैलनेवाले और छोटी फुन्सीवाले चकद्दे हों वे दद्रुकुष्ठ ( दाद ) कहलातेहैं इन ( कफन कुष्ठों) में कुछ २ उभार ( ऊंचापन) परिमंडलता (चकटे होना), खाज होना और बहुत समयतक होना ये सामान्य लक्षण होतेहैं ॥ १७ ॥ १८ ॥ क्षुद्रकुष्ठान्यत ऊर्द्ध वक्ष्यामः ॥ १९ ॥ इससे अगाडी क्षुदकुष्ठोंके ( लक्षणों) को वर्णन करते हैं ॥ १९ ॥ स्थूलानि संधिष्वतिदारुणानि गुरुणि च स्युः कठिनान्यरुषि ॥ त्वकोचभेदस्वपनांगसादाः कुठे महत्पूर्वयुते भवंति ॥ २०॥ कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं तदेकर्कुष्ठं प्रदत्याध्यम् ॥ युन कंडूव्यथनौषचोषास्तलेषु तच्चर्मदलं वदति ॥ २१ ॥ जिसमें संधियांमें मोटापन युक्त, अतिदारुण बडे और कठोर व्रण हों उसे स्थूला- रुष्क कुष्ठ कहते हैं । और जिसमें स्वचामें संकोच भेद और स्वाप ( स्पर्शाज्ञान) हो तथा अंगमें ग्लानि हो तो वह महाकुष्ठ नामक (क्षुद्र) कुष्ठ है ॥ २० ॥ जिसमें काला और लाल शरीर पडजाय उसे एककुष्ठ कहतेहैं और यह एककुष्ठ असाध्य है। जिसमें हाथ पावोंके चर्ममें ( मोटापन हो) और खाज, व्यथन (दर्द) और दाह तथा चोष हो वह चर्मदल कुष्ठ कहलाता है ॥ २१ ॥ विसर्पवत्सर्पति सर्वतो यस्त्वयैक्तमांसान्यभिभूय शीघ्रम् ॥ मूर्छा- विदाहारतितोदपाकान्कृत्वा विसर्पः स भवेद्विकारः ॥ २२ ॥ जो विसर्पकी भांति त्वचा रक्त और मांसमें प्राप्त होकर शीत्र सारे शरीरमें फैल जाय और मूर्छा, दाह, अरति तथा तोद (दर्द) और पाक (पक जाना) इन उपद्रवोंको करके फैले तो उसे विसर्प नामक कुष्ठ कहते हैं ॥ २२ ॥ (श्लो० २०) गुरूणि च इत्यत्र स्थूलारषि इति वा पाठः । अरूषि व्रणाः स्थूलानि स्थूलमूलानि त्वक्शब्दोत्र कोचभेदस्वपनशब्दैः सह प्रत्येकं सवध्यते यथा त्वक्कोचः त्वम्भेदः त्वक्स्वापः इति महत्पूर्वयुते महाकुष्ठाख्ये ॥ (श्लो० २१) तलेषु इस्तपादतलेषु । (ो. २२) विसर्पवदिति-अत्रोक्तविसारख्य- प्रस्य वक्ष्यमाणविसर्परोगस्य विचिरविसर्पणं गीप्रविसर्पणं ततो भेदः ( इति डल्लनः)। - ४० (५३६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। शनै: शरीरे पिडंकाः स्रवत्यः सर्पति यास्तं परिसँर्पमाहुः ॥ कंड्डन्वित श्वेतॆमपायि सिध्मं विद्यात्त प्रायश ऊर्द्धकाये॥२३॥ रोज्योतिकंडतिरुजः सुरक्षा भवंति गात्रेषु विचिकायाम् ॥ कंडमती दाहरुजोप॑जन्मा विपादिका पांदगतेयमेवे ॥ २४॥ जो स्त्रावयुक्त फुन्सी धीरे धीरे शरीरमें फैलने लगे उसे परिसर्पनामक कुष्ठ कहते हैं। जिसमें खाजयुक्त सुपेद और कष्टरहित चकद्दे प्रायः ऊपरके शरीर (छाती, ग्रीवा, मुखादि) पर हों उसे सिध्मनामक कुष्ठ कहते हैं ॥ २३ ॥ जो गात्र ( हाथ, पांव आदि) में खाज और दर्दयुक्त रूखी रेखासी ( तरेडेंसी) हो जाय उसे विचचिका नामक कुष्ठ कहते हैं और यदि ये रेखा दाह और पीडायुक्त केवल पैरोंहीमें हों तो उसेही विपादिका (विवाई) कहतेहैं (वास्तवमें विचर्चिका और विपादिका एकही हैं)॥ २४ ॥ येत्स्रावि वृत्तं धनमुग्रंकंडु तस्निग्धकृष्णं किटिभंवदंति॥स्रावा- वकंपरिदावद्भिः पामाणुकोभिः पिडकौभिरूंह्या॥२५॥स्फोटैं: सदाहेरैति से व कच्छू:स्फिक्पाणिपादप्रभवैर्निरूप्या॥ कंडन्विता यो पिडका शरीरे संस्स्रावहीना रकसोच्यते सा ॥ २६ ॥ जो नावयुक्त चकद्दा गाढा हो और जिसमें उग्र खाज हो तथा चिकना और काला हो उसे किटिभ कुष्ठ कहते हैं । तथा जिसमें स्त्राव और खाज तथा दाह युक्त छोटी २ फुन्सियां उठे उसे पामा (पांव खारिश या खुजली ) कहते ॥ २५ ॥ और जिसमें अतिदाहयुक्त फालक (फोडे) कूले और हाथ पैरोंमें हों उसे कच्छू कहते हैं ( यहभी पामाका भेद है इसमें खाज कम होती है और दाह अधिक ) तथा जो शरीरपर नन्ही २ अलाईसी खाजयुक्त और स्त्रावरहित हों उसे रकसा (सूखी खाज) नामक कुष्ठ कहतेहैं ॥ २६ ॥ अरुः ससिध्म रकसा महच्च यच्चैककुष्ठं कफजान्यमूनि ॥ वायोः प्रकोपात्परिसर्पमेकं शेषाणि पित्तप्रभवाणि विद्यात् ॥ २७॥ स्थूलारुष्क, सिध्म,रकसा महत्कुष्ठ तथा एककुष्ठये कफकी उत्कृष्टतासे होतेहैं और वायुकी उत्कृष्टतासे एकपरिसर्प होताहै और शेष सब पित्तकी उत्कृष्टतासे होतेहैं॥२७॥ (श्लो० २३) अपायि अकप्टकारि । सिध्मकुष्ठ द्विविध सिध्म पुष्पिका च सिध्मस्य सुखसाध्यत्वात सुश्रुते क्षुद्रकृष्ठे पठितः पुष्यिकासिध्मस्य दुःसाध्यत्वाच्चरके महाकुष्ठे पठितः इत्यदोषः ( इति डल्लनः)। (श्लो० २४) राज्यो रेखाः इयमेवं पादगता विपादिका ॥ (श्लो० २६) स्किक नितवः कन्छु पामाभेदः ॥ (श्लो० २७ ) श्लोकोय कल्पितः इति गयदासाचार्यः यस्मादेककुष्ठं महाकुष्ठं च वातादि- मिर्भवति न कफात् इत्यादि ।
निदानस्थान-अ० ५. (५३७) किलासमपि कुष्ठविकल्प एव तात्रविधं वातेन पित्तेन श्लेष्मणा चेति। कुष्ठकिलोसयोरंतर त्वगतमेव किलाँसमपरिस्रावि च॥२८॥ तद्वातेन मंडलमरुणं परुषं परिध्वंसि च पित्तेन पद्मपत्रप्रतीकाशं सपरिदाहं च श्लेष्मणापि श्वेतं स्निग्धं वहीं कंडूमञ्च ॥२९॥ तेषु संवद्धमंडलमंतर्जातं रक्तरोम चासाध्यमग्निदग्धं च ॥ ३०॥ किलासभी कुष्ठहीका एक भेद है वह किलास तीन प्रकारका होता है वायुसे, पित्तसे, कफसे । कुष्ठ और किलासमें अंतर यही है कि जो त्वचाहीमें प्राप्त हो और नहीं स्रवता हो वह किलास और जो अन्य धातुओंमें व्याप्त हो तथास्त्रावयुक्त हो तो किलास कुष्ठही है ॥ २८ ॥ वायुसे हो तो चकद्दे लाल और खरदरे और दुष्टं होतेहैं, पित्तसे हो तो कमलपत्रके तुल्य और दाहयुक्त होतेहैं तथा कफसे हो तो श्वेत, चिकने, मोटे और खाजयुक्त चकदे होतेहैं ।। २९॥इनमेंसे जो बहुतसे चकद्दे आपसमें मिलेहुए हों और चकद्दोंके भीतर लाल रोम(रूँगटे) हों तो वह किलास (वित्रकुष्ठ ) असाध्य होताहै तथा जो अग्निसे जलकर सुपेद चकद्दा स्थिर होजाय वहभी असाध्यही होजाताहै ॥ ३० ॥ कुष्टेषु रुक्त्वक्संकोचस्वापस्वेदशोफभेदकौण्यस्वरोपघाताः वातेन। पाकावदरणांगुलिपतनकर्णनासाभंगाक्षिरागसत्त्वोत्पत्तयः पित्तेन। कंडूवर्णभेदशोफास्रावगौरवाणि श्लेष्मणा ॥३१॥ कुष्ठोंमें चीस, त्वचाका सुकड़ जाना, स्पर्शज्ञान न रहना, पसीना होना, शोथ, भेदन हो जाना, कौण्य ( नष्टकारिता) तथा स्वर विगडजानाये उपद्रव वायसे होते- हैं और पक जाना, फट जाना, अंगुली गलकर गिर जाना, कान और नाक गल जाना, नेत्र अति लाल होना ये पित्तसे होतेहैं । तथा खाज, वर्णमें भेद, सूजन और स्राव बंद होना और भारीपन ये कफसे होते हैं ॥ ३१ ॥ तत्रादिवलप्रवृत्तं पौंडरीकं काकणं चासाध्यम् ॥३२॥भवंति चात्र- (गद्य २८) किलासश्चित्रसंज: कुष्ठविकल्प: विकल्पात् कुष्ठः ॥ (गद्य २९) परिध्वंसि दुष्टं बहलं स्थूलम् ॥ (गद्य ३०) सबद्धमहलमित्यत्र सभिन्नमंडलमिति वा पाठांतरम् । अंतर्जातं रक्तरोम चेति- अंत: मध्ये जातानि रक्तानि लोमानि यस्मिन् तदसाध्यमिति ।। (गद्य ३१) कोण्य नष्टकारिता । वाते खेदस्तु अस्वेदनिषेधार्थः व्याधिस्वभावात् स्वेदः स्यादित्यपरे।सत्त्वोत्पचयः कृमीणां जन्मानि(इति डल्लनः)।। (गद्य ३२) आदिवलप्रवृत्तमिति पूर्वोक्तसूत्रस्थानस्य चतुर्विंशाध्याये वर्णितम्। यथा-तत्रादिवलप्रवृत्ता ये शुक्रशोणितदोषान्वयाः कुष्ठार्श:प्रभृतयस्तोपि द्विधा मातृजाः पितृजाश्च ।।
॥ सुश्रुतसंहिता भा० टो। (५३८) ४२ इनमेंसे आदिवलप्रवृत्त कुष्ठ (शुक्र शोणितदोपज अर्थात् जो माता पिताके शो- णित,शुक्रके दोषसे हों)तथा पौंडरीक और काकण ये असाध्य हैं॥३२॥यहां श्लोकहैं- यथा वनस्पतिर्जातः प्राप्यं काल!कर्षणम् ॥ अंतर्भूमि विगाहेत मूलवृष्टिविद्धितैः ॥ ३३ ॥ एवं कुठं समुत्पन्नं त्वचि कालक- पतः॥ क्रमेण धातून व्याप्नोति नरस्याप्रतिकारिणः ॥३४॥ जैसे उत्पन्न हुआ वृक्ष समयकी अधिकता पाकर वर्षासे उसकी जड़ बढ२ कर भीतरही भीतर पृथ्वीमें फैल (कर बलवान् हो) जाता है ॥ ३३ ॥ इसी प्रकारसे त्वचामें उत्पन्न हुआ कुष्ठभी प्रतीकार न करनेवाले मनुष्योंके कालकी अधिकताके कारण क्रमसे धातुओंमें व्याप्त होजाता है ॥ ३४ ॥ धातुगत कुष्ठलक्षण । स्पर्शहाँनिः स्वेदनत्वमीषत्कंडूंच जायते ॥ वैवयं रूक्षभावश्चै कुष्ठे वंचि समांचिते ॥ ३५ ॥ त्वस्वापो रोमहर्षश्च स्वेदस्याऽ- भिप्रवर्तनम् ॥ कडूविपूयकश्चैवं कुष्ठे शोणितसंश्रिते ॥ ३६ ॥ वाहुल्यं वक्रशोपश्चं कार्कइयं पिडकोद्गमः॥ तोदः स्फोटः स्थिर- खं च कुष्टे मांससमाश्रिते ॥ ३७ ॥ त्वचा (चर्म) में कुष्ट प्राप्त हो तो स्पर्श न सुहावे, पसीना हो, कुछ २ खाजही, त्वचाका वर्ण पलट जाय तथा रूखापन होजावे ॥ ३५ ॥ यदि रुधिरमें प्राप्त हुआ कुष्ठ हो तो त्वचा में स्वाप हो, रोम खडे होजायँ, पसीना बहुत आवे, खाज हो और दुर्गंधता होजाय ॥ ३६ ॥ कुष्ट मांसमें प्राप्त हो तो मोटे २ चकसे होजाय मुँह सूखासा रहे, ( त्वचामें ) कडापन होजाय, फुन्सी पैदा होने लगें, दरद हो, त्वचा फटने लगे और चकदे स्थिर ( कठोर ) पड़ जाय ॥ ३७ ॥ दौगंध्यमुपदेहच पूयो) क्रिमयस्तथा ॥ गात्राणां भेदनं चौपि कुष्टे मेदैःसमाश्रिते ॥ ३८॥ नासाभगोऽक्षिरांगच क्षतजे कृमि- संभवः ॥ भवेत्स्वरोपांतश्च ह्यस्थिमजसमाश्रिते ॥३९॥ कोपयं गतिमयोगांनां सं.दः क्षतसर्पणम् ॥ शुक्रस्थानगते लिंग प्रागु- तोनि तथैव च ॥४०॥ १० (सो०३३) कालप्रकर्षणकालाविश्यम् ॥ (श्लो०३६) विपूयको दुर्गघता ॥ (श्लो०३७) बाहुल्यं स्थलमंडलता कोटः त्वचः सुटनम् । स्थिरत्य कटिनमंडलता ॥(मो०३८ ) उपदेहः उष्णगाचता।।
निदानस्थान-म०५. (५३९) मेदमें प्राप्त हुआ कुष्ठ हो तब दुर्गधता हो, देह गरम रहे, पीब निकलने लगे और कृमि होजायँ तथा अंगोंका भेदन हो (शरीर फटने लगे) ॥ ३८ ॥ अस्थि और मन्नामें प्राप्त हुआ कुष्ट हो तव नासिका गलकर भंग होजाय, नेत्र अतिलाल. रहें, जहां छोटाभी घाव हो वहां कृमि पैदा हो और स्वर बिगड जाय ॥ ३९ ॥ वीर्यमें प्राप्त हुआ कुष्ठ हो तब कौण्य ( नष्टकारिता) हो, चलने फिरनेका सामर्थ्य न रहे, अंग फटने लगे और जो घाव हो वही फैलने लगे तथा पहले जो त्वचासे लेकर मज्जापर्यत धातुओंमें प्राप्त कुष्ठके लक्षण कहे वेभी हों ॥ १० ॥ मातृज पितृज कुष्ठ। स्त्रीपुंसंयोः कुष्ठदोषा दुष्टशोणितशुक्रयोः॥ यदर्पत्यं तयोर्जातं ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ ११ ॥ जिन स्त्री तथा पुरुषोंके कुष्ठ होता है उनका शोणित और वीर्य कुष्ठदोषस दूषित होता है इससे उनसे उत्पन्न हुए संतानकोभी कुष्ठयुक्तही समझना चाहिये (प्रायः कुष्ठियोंकी संतानकोभी काल पाकर कुष्ठ होही जाता है)।। ४१ ॥ कुष्ठकी साध्यासाध्यता। कुष्ठमात्मवतः साध्यं त्वग्रक्तपिशिताश्रितम् ॥ मेदोगतं भवेद्याप्यमसाध्यमत उत्तरम् ॥ ४२ ॥ जितेंद्रिय और हित पथ्य करनेवाले मनुष्यका त्वचा, रक्त और मांसगत कुष्ठभी साध्य होता है और मैदोगत कुष्ट याप्य होता है और इससे ऊपर अर्थात् अस्थि, मज्जा और शुक्रगत कुष्ठ सर्वथा असाध्यही होता है ॥ ४२ ॥ ब्रह्मस्त्रीसजनवधपरस्वहरणादिभिः ॥ कर्मभिः पापरोगस्य प्राः कुष्ठस्य संभवम् ॥ ४३ ॥ म्रियते यदि कुष्ठेन पुनर्जात.पि' गच्छ- ति ॥ नातः कप्टतरो रोगों याँ कुष्टं प्रकीर्तितम् ॥४४॥ ब्राह्मण, स्त्री, सज्जन (महात्मा) ऐसे मनुष्योंके मारने तथा पराया द्रव्य हरलेना इत्यादि पापोंसे तथा अन्य पापरोगोंके कर्मों करके शरीरमें कुष्ठरोग उत्पन्न होता- है ऐसे ऋषि वर्णन करते हैं ॥ ४३ ॥ यदि कोई मनुष्य कुष्ठरोगसे मर जाता है • तो दूसरे जन्म लेनेपरभी उसके संग जाता है और उसके शरीर में होजाता है इस कारण जैसा कठिन ( दुःसाध्य अतिकष्टदायक बुरा) कुष्ठका रोग है उससे अधिक कोई रोगभी कष्टतर ( अति कष्टदायक बुरा) नहीं है (अर्थात् कुष्ठ रोगके (श्लो० ४४) कुठिनः पापकर्मणोऽक्षीणत्वात् जन्मान्तरेपि गच्छतीति निश्चीयते अतोयं दीर्घरोगाणां प्रधानतमो रोगः ॥ . १ - १७ 1 (५४०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। 'परमाणु ऐसे स्थिर हो जाते हैं कि आत्मासे संबद्ध हो दूसरे जन्ममेंभी पापपुण्यकी बांति संग जाते हैं क्योंकि यह व्याधि प्रायः उग्र पापोंसे होतीहै इससे जन्मान्तर तक संग रहती है)॥४४॥ आहाराचारयोः प्रोक्तामास्थाय महती क्रियाम् ॥औषधीनां विशि- ष्टानां तपसा निषेवणात् ॥ येस्तेन मुच्यते जन्तुः स पुण्या गतिमाप्नुयात् ॥४५॥ आहार, विहार और आचार तथा विशेष औपधोंकी यथोक्त महती क्रियाओंको धारण करके ( अर्थात् यथोक्त बडी २ चिकित्साकी क्रिया और पथ्यादि करके) तथा तप ( दान पुण्य, ईश्वराराधन आदि ) के सेवन करनेसे जो इस कुष्ठरोगसे छूट जाय वह पुण्यगतिको प्राप्त होता है ॥ ४५ ॥ कुष्ठादिका संक्रामकत्व। प्रसंगागात्रसंस्पर्शान्निश्वासात्सहभोजनात्॥ सहशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ॥ ४६ ॥ कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च ॥ औपसर्गिकरोगाश्च संक्रोमंति नरोन्नरम् ॥१७॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने पंचमोऽध्यायः॥५॥ प्रसंग करनेसे, शरीरका स्पर्श करनेसे, रोगीके श्वासकी वायु लग जानेसे, साथ भोजन करनेसे, एक खाट तथा विछोनेपर सोनेसे, एक आसनपर बैठनेसे, रोगीके पहनेहुए वस्त्र, माला आदिके पहरनेसे तथा रोगीका उच्छिष्ट चंदनादि लगानेसे कुष्ठका रोग तथा एक प्रकारका ज्वर और शोष (शरीर सूखनेका रोग), नेत्रका अभिप्पंद रोग और औपसर्गिक रोग ( शीतलारोग, मसूरिका आदि) ये एक मनुष्यसे दूसरे मनुष्यमें प्रवेश कर जाते हैं(अर्थात् दूसरों के भी होजातेहैं) ४६/४७॥ कुष्ठको सामान्यतासे डाक्टरीमें लेपरा (Leprosy) और यूनानीमें जुजाम कहते हैं उनके यहां और २ प्रकारसे उनके भेद हैं विसर्पको डाक्टरीमें एरीसिफल और यूनानीमें सुर्खवाद कहते हैं दादको डा. हरपीज और यूनानीमें कोवा तथा पामाको डा० में बेज और यू० हसफ कहतेहैं तथा किलास श्वित्र (श्वेत ) कुष्ठको कहतेहैं और यू० बरस कहतेहैं इत्यादि ॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने पञ्चमोऽध्यायः ।। ५ ॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथातःप्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः । अब यहाँसे प्रमेहके निदानकी व्याख्या करते हैं। .
निदानस्थान-अ० ६. (५४१) दिवास्वप्नाव्यायामालस्यप्रसक्तं शीतस्निग्धमधुरमद्यद्रवान्नपान- सेविनं पुरुषं जानीयात्प्रमेही भविष्यतीति॥ १॥ तस्य चैवं प्रवृ- त्तस्यापरिपक्का एव वातपित्तश्लेष्माणो यदा मेदसा सहैकत्वमुपेत्य मूत्रवाहिस्रोतांस्यनुसृत्याधो गत्वा वस्तेर्मुखमाश्रित्य निर्भिद्यते तदा प्रमेहाञ्जनयंति ॥२॥ दिनको सोनेवाले, परिश्रम ( शारीरक मेहनत ) न करनेवाले, अत्यंत आलस्यमें आसक्त होनेवाले तथा शीतल, चिकना, मधुर पदार्थ अत्यंत खानेवाले, अधिक मद्य (तथा नशेकी वस्तु खाने) पीने वाले और अधिक पतले पदार्थही विशेष भोजन करनेवाले तथा पतले शरबत दुग्ध तकादि अधिक नित्य पान करनेवाले पुरुषको जान लेना चाहिये कि यह प्रमेहरोगसेरोगी होगा॥१॥ऊपर लिखेजैसे आहारविहा- रमें प्रवृत्त मनुष्यके विना परिपाके हुएही वायु, पित्त, कफ जब मेद धातुके संग मिल जाते तब मूत्रवाही स्रोतों (मूत्र उतारनेवाली शिराओं) में अनुसरण करके नीचे जाकर वस्तिके मुखमें समाश्रित होकर बाहर निकलने लगते हैं तब प्रमेह रोग उत्पन्न करते हैं ॥ २॥ तेषां तु पूर्वरूपाणि हस्तपादतलदाहः स्निग्धपिच्छलगुरुता गात्राणां मधुरशुक्रमूत्रता तन्द्रा सादः पिपासा दुर्गन्धश्च श्वासस्तालुग- लजिह्वादन्तेषु मलोत्पत्तिर्जटिलीभावः केशांनां वृद्धिश्च नखा- नाम् ॥ ३॥ तत्राविलप्रभूतमूत्रलक्षणाः सर्व एव प्रमेहाः। सर्व एव सर्वदोषसमुत्थाः सह पिडकाभिः॥४॥ प्रमेहोंके पूर्वरूप ये होतेहैं हथेली और तलवे गरम रहें और शरीरमें चिकनापन, गाढापन, भारीपन हो मूत्र मधुर और सुपेद हो, तंद्रा (आंखें झपीसी रहें) और साद (थकानसी रहे) तथा तृषा विशेष हो और श्वास दुर्गंधयुक्त हो तथा तालु, गला, जीभ, दांत इनमें मैल अधिक पैदा हो और बाल (मैल और उलझसे हों) तथा नाखून बहुत बढें ॥ ३ ॥ और मलिन (गॅदला) तथा अतिमूत्र होना सब प्रमेहोंका मुख्य लक्षण है और सारेही प्रमेह सब दोषोंसे उत्पन्न हुए तथा पिडिकाओंसे युक्त होतेहैं (जैसे कुष्ठ सभी सर्वदोषज होकरजिसकी उकर्षता होती- है वह उसीके नामसे प्रसिद्ध होता है वैसेही इसेभी समझा)॥४॥ (गय३) निर्भिद्यते निःसरतीत्यर्थः अपरे तु अतिद्रवतं यांतीत्याहुः (इति डलनः) ॥
(५४२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० ४६ लन कफादुदकेक्षुसुरासिनाशनैर्लवणपिष्टसांद्रशुक्रफेनसेहाः दश साध्या दोषदृष्याणां समक्रियत्वात् ॥५॥ पित्तान्नीलहरिद्रा- स्लक्षारमंजिष्ठाशोणितमेहाः षट् याप्या दोपदृष्याणां विषम- क्रियत्वात् ॥६॥ वातात्सर्विसाक्षीद्रहस्तिमेहाश्चत्वारो साध्य- तमा महात्ययिकत्वात् ॥ ७ ॥ तहाँ कफसे उत्पन्न हुए उद्कप्रमेह, इक्षुप्रमेह, सुराप्रमह, सिकताप्रमेह, गन:- प्रमह, लवगप्रमेह पिष्टप्रमेह, सांदप्रमेह, शुक्रप्रमेह, और फेनप्रमेह, ये दश साध्य हैं क्योंकि इनमें दोप ( कफ) और दूष्य ( वसादि) की क्रिया (चिकित्सा)सम अर्थात् सीधी है (कफप्रमेहमें कफनाशक रूक्षक्रिया ठीक वसा आदिको नाशक होती है)॥५॥पित्तसे उत्पन्न हुए नीलप्रमेह,हारिद्रप्रमेह,अम्लममेह,क्षारप्रमेह,मंजिष्ठा- प्रमेह और शोणितप्रमेह ये छः याप्य हैं क्योंकि दोप ( पित्त ) और दूष्य (वसा- आदि) की क्रिया में विषमता है अर्थात् जो क्रिया (शीतक्रिया) पित्तको शांत करनेवाली हो वह वसा आदिको बढानेवाली होतीहै ॥ ६ ॥ वायुसे उत्पन्न हुए सर्पिःप्रमेह, वसाप्रमेह, क्षौदप्रमेह और हस्तिप्रमेह य चार अत्यंत असाध्य हैं क्योंकि इनकी क्रिया अत्यंत कठिनता है अर्थात् प्रधान दोप ( वायु ) के नाशकी स्निग्ध- क्रिया प्रमेहवर्धिनी स्वभावहीसे होती है तथा प्रमेहनाशक रूक्षक्रिया वायुको बढा- नेवाली होतीहै इसीसे ये असाध्य हैं ॥ ७ ॥ तत्र वातपित्तदोभिरन्वितः श्लेष्मा श्लेष्तप्रसेहाञ्जलयति वात- कफशोणितमेदोभिरन्वितं पित्तं पित्तप्रमेहान्कफपित्तवसाम- उजसेदोभिरवितो वायुर्वातप्रमेहान् ॥ ८॥ इनमेंसे वायु, पित्त और मेदसे मिलाहुआ कफ (प्रधान होकर) कफके प्रमेहा- को उत्पन्न करता है । और वायु, कफ, रुविर और मेदसे मिला हुआ पित्त (प्रधान होकर ) पित्तके प्रमेहोंको उत्पन्न करता है तथा कफ, पित्त, वसा, मजा और मेदसे मिला हुआ वायु (प्रधान होकर) वायुके प्रमेहोंको उत्पन्न करता है ॥ ८ ॥ (गद्य ५। ६१७) प्रमेहेष्वपि कुष्टवत् ग्रंथातरे कुत्रचिन्नामांतरम् । तयाह चरक:-उदकमेहश्रे- सुवालिकारसमेहश्च साद्रमेहश्च सांद्रप्रसादमेहश्च शुक्लमेहश्च शुक्रमेहश्च शीतमेहश्च सिकतामेइश्व शनेहम लालामेश्वेति दश कफजाः । पित्तजास्तु क्षारमेहः कालमेहः नीलमेहः लोहितमेहः मजिठामेहः हारिद्रमे- इश्चेति पट् । वातनास्तु वसाहो मजमेहो इस्तिमेहो मधुमेहश्चेति चत्वारः ।। दोपप्याणामिति प्रमेहे कफ, पित्तवायवो दोपाः रसमांसमेदोमनशुक्रीजाप्रमृतयो दूष्याः ॥
निदानस्थान-अ० ६. (५४३) तत्र श्वेतमवेदनमुदकलशमुदकमेही मेहति । इक्षुरसतुल्यमि- क्षुमेही सुरामेही सुरातुल्यम् । सरुजं सिकतानुविद्धं सिकतामेही। शनैः सकर्फ मृत्त्रं शनैर्मेही । विशदं लवणतुल्यं लवणमेही । हृष्टरोमा पिष्टरसतुल्यं पिष्टमेही । आविलं सांद्रं सांद्रमेही । शुक्रतुल्यं शुक्रमेही। स्तोक स्तोकं सफेनं फेनमेही मेहति ॥९॥ (कफके जो १० प्रमेह हैं ) उनमेंसे सुपेद, विना पीडाके जलतुल्य मूत्र होनेसे १ उदकप्रमेह होता है । २ इक्षुप्रमेहवालेका मूत्र इक्षु (ऊख ) के रसके तुल्य होता है। ३ सुराप्रमेहके रोगीका मूत्र सुरा (मदिरा) के समान होता है। ४ सि- कताप्रमेहवालेका मूत्र पीडा सहित और छोटी २ सिकतासे मिला हुआ टतरता है।५शनैः प्रमेहवालेका मूत्र थोडारकई वार और गेंदला उतरता है।६लवण प्रमेहवालेका मूत्र लवणके जलके तुल्य और उज्ज्वल होता है । ७ पिष्टप्रमेहवालेके शरीरपर रोमांच होते हैं और उसका सूत्र पिट्ठीके जलके समान होता है । ८सांद्र- प्रमेहवालेका गॅदला और गाढा मूत्र होता है । ९ शुक्र प्रमेहवालेके मूत्रमें शुक्रके तुल्य पदार्थ होता है। १० फेनप्रमेहवालेका मूत्र फेन ( झागयुक्त) होता है और थोडा २ उतरता है ॥ ९ ॥ अत ऊर्द्ध पित्तनिमित्तान्वक्ष्यामः॥ १०॥ यहांसे अगाडी पित्तजनित प्रमेहोंके लक्षण कहते हैं ॥ १० ॥ सफेनमच्छ नीलं नीलमेही मेहति । सदाहं हरिद्राभं हरिद्रामेही। अम्लरसगन्धमम्लमेही । युतक्षारप्रतिम क्षारमेही । मञ्जिष्ठो- दकप्रकाशं माञ्जिष्ठमेही। शोणितप्रकाशं शोणितमेही मेहति॥११॥ नीलप्रमेहवालेका मूत्र झागयुक्त, स्वच्छ, नील वर्ण होता है। और हरिद्राप्रमेह वालेका मूत्र हलदीके तुल्य (पीला) होता है और उसमें दाह भी होता है अर्थात् मूत्र जलनयुक्त होता है । अम्लप्रमेहवालेके मूत्रमें अम्लरस (खट्टापन ) होता है और खटाईकेसी गंध होती है। क्षारप्रमेहवालेका मूत्र धुलेहुए क्षारके तुल्य होता है और मांजिष्ठप्रमेहवालेका मूत्र मँजीठके काथके तुल्य लाल होता है। और शोणित प्रमेहवालेका मूत्र रुधिरके तुल्य अति लाल होता है (अथवा शोणितही मूत्रमें आता है)॥ ११ ॥ अत ऊर्द्ध वातनिमित्तान्वक्ष्यामः॥ १२॥ यहांसे अगाडी वातजनित प्रमेहोंके लक्षण कहते हैं ।। १२ ॥
४८
(५४४)
मुश्रुतसंहिता-भा० टी०!
सर्पिःप्रकाशं सर्पिही मेहति । वसाप्रकाशं वसामेही । क्षौद्रर-
सवर्णं क्षौद्रमेही । मत्तमातंगवदनुप्रवृद्धं हस्तिमेही मेहति ॥१३॥
घृतके तुल्य सर्पिःप्रमेहवालेका मूत्र होता है । और वसाप्रमेहवालेका वसा (चर
बीका स्नेह ) जैसा मूत्र होता है । और क्षौदप्रमेहवालेका मूत्र शहतके वर्णका
होता है और उसमें शहततुल्यही रस (माधुर्य) होता है । हस्तिप्रमेहवालेका मूत्र
मदोन्मत्त हाथोके मदके समान होता है ॥ १३ ॥
कफप्रमेहके उपद्रव ।
मक्षिकोपसर्पणमालस्यं मांसोपचयः प्रतिश्यायःशैथिल्यारोचका-
विपाकाः कफप्रसेकच्छर्दिनिद्राकासश्वासाश्चेति श्लेष्मजाना-
मुपद्रवाः॥१४॥
मूत्रपर मक्षिका ( मक्खियां ) आकर बैठना, आलस्य, मांसकी वृद्धि, प्रति-
श्याय, शिथिलता, अरुचि, भोजनका परिपाक न होना, मुंहसे राल वहना, वमन
होना, निद्रा अधिक आना, खाँसी होना, श्वास होना ये कफप्रमेहके उपद्रव हैं ॥१४॥
पित्तप्रमेहके उपद्रव ।
वृषणयोरवदरणं वस्तिभेदो मेदूतोदो हृदि शूलमम्लीकाज्वराती-
सारारोचकाः वमथुः परिधूमायनं दाहो मूर्छा पिपासा निद्रा-
नाशः पांडुरोगः पीतविण्सूत्रत्वं चेति पैत्तिकानाम् ॥१५॥
वृषणोंमें फूटन, वस्तिस्थानमें भेदनकीसी पीडा, मेटू इंद्रियमें दरद, हृदयमें
शूल, खट्टी डकारें आना, तप, अतिसार, अरुचि, वमन, भीतर धूवांसा उठना,
दाह, मूछा, तृषा, निद्रा नहीं आना, पांडुरोग तथा मलमूत्रका पीला होना ये
पित्तप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ १५ ॥
वातप्रमेहके उपद्रव ।
हृदहो लौल्यमनिद्रा स्तंभः कपः शूलं वपुरीषत्वं चेति वात-
जानाम् ॥ १६ ॥
हृदय जकडासा रहना, चपलता, निद्रा न आना, शरीर अकड़जाना, शरीर
कांपना, शूल होना और मलका बद्ध होजाना ये वातप्रमेहके उपदव हैं ॥ १६ ॥
एवमेते विंशतिः प्रमेहाः सोपद्रवा व्याख्याताः ॥ १७॥
इस प्रकार ये बीस प्रमेह उपद्रवोंसहित वर्णन किये गये हैं ॥ १७ ॥
: ४९ निदानस्थान-अ०६. (५४५) प्रमेहपिडका। तत्र वसामेदोभ्यामभिपन्नशरीरस्य त्रिभिदों पैश्चानुगतधातोः प्रमेहिणो दर्श पिकाः जायते । तद्यथा शराविका सर्षपिका कच्छपिका जालिनी विनता पुत्रिणी मसूरिका अलजी विदारिका विद्रधिका चेति ॥ १८॥ इन प्रमेहवालोंमेंसे जिनका शरीर वसा और चरबीसे व्याप्त (व्यापन्न) है और जिनकी धातु तीनों दोषोंके अनुगत होरही हो उनके दश प्रकारकी प्रमेहपिडका उत्पन्न होजाती हैं जैसे १ शराविका, २ सर्पपिका, ३ कच्छपिका, ४ जालिनी, ५विनता, ६ पुत्रिणी, ७ मसूरिका, ८ अलजी, ९विदारिका, १० विद्रधिका ॥१८॥ प्रमेहपिडकाके लक्षण । शरावमात्रा तद्रूपा निम्नमध्या शराविका ॥ गौरसर्षपसंस्थाना तत्प्रमाणा च सर्षपी ॥ १९ ॥ सदाहा कूर्मसंस्थाना शेयो कच्छे- पिका बुधैः । जालिनी तीव्रदाहा तु मांसजालसमावृता ॥२०॥ महती पिडका नीला पिडका विनता स्मृता ॥ महत्यल्पान्विता ज्ञेया पिडका सा तु पुत्रिणी ॥ २१॥ मसूरसमसंस्थाना ज्ञेया सा तु मसूरिका ॥ रक्ता सिता स्फोटवती दारणा त्वलजी भवेत्॥२२॥ विदारीकंदवद्वृत्ता कठिना च विदारिका ॥ विद्रधेर्लक्षणयुक्ता ज्ञेया विद्रधिका बुधैः ॥ २३ ॥ शरावके समान और शरावके आकार वीचमेंसे नीची ऐसी पिडकाको शरा- विका कहते हैं, सुपेद सरसोंके आकार और उसके प्रमाग सर्षपिका होती है ।। ॥ १९ ॥ जो दाहयुक्त हो और फछवके समान हो उसे कच्छपिका कहते हैं, और जिसमें तीक्ष्ण दाह हो और मांसक जालसे आच्छादित हो उसे जालिनी कहते हैं ॥ २० ॥ जो पिडका बडी हो, नीलवर्ण हो वह विनता नाम पिडका होती- है । तथा जो एक बडी पिडका हो और उसके आस पास छोटी छोटी अनेक हों तो वह पुत्रिणी कहलाती है ॥ २१ ॥ जो मसूरके समान हो वह मसूरिका कह- लाती है । तथा जो लाल सुपेद फालकेवाली दारुण पिडका हो उसे अलजी कहते- है ॥ २२ ॥ जो विदारीकंदके समान फैली हुई गोल हो, कडी हो वह विदारिका है। तथा जिसमें विद्रधिके लक्षण हों वह वैद्योंन विद्रधिका नामपिडका कहींहै २३॥ ३५ . (५४६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। 40 'ये यन्मयाः स्मृता महास्तेपामेतास्तु तन्मयाः ॥ २४ ॥ जिनको जिस २ प्रधान दोपका प्रमेह होता है उनको उसही दोपकी ये प्रमह- पिडका होती हैं जैसे कफप्रमेहमें कफपिडका और पित्तप्रमहमें पित्तपिडका ऐसेही वातप्रमेहमें वातपिडका होती हैं ॥ २४ ॥ पिडकाकी असाध्यता । गुदे हदि शिरस्यले पृष्टे ममणि चोत्थिताः॥ सोपेद्रवा दुर्वलस्य पिकाः परिवर्जयेत् ॥ २५ ॥ गुदा, हृदय, शिर, बाहुमूल, पीठ तथा अन्य मर्मस्थानोंमें उठी हुई प्रमेहपिडका और उपद्रवासहित दुर्बल मनुष्यकी पिडका त्यागने योग्य (असाध्य ) हैं ॥ २५ ॥ वातप्रमेहकी असाध्यता । कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जवसायुतः॥ अर्धः प्रक्रमँते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥ २६ ॥ समस्त शरीरको निचोडकर मेद, मज्जा और वसासहित वायु नीचे (मंत्रमार्गकी और) संक्रमण करता है इस कारण वातजनितप्रमेह असाध्य होते हैं ॥ २६ ॥ प्रमेहका परिज्ञान । प्रमेहपूर्वरूपाणासाकृतियंत्र दृश्यते ॥ किंचिंच्चाप्यधिक मूत्रं त प्रमेहिणमादिशेत् ॥ २७॥ कृस्लान्य नि वा यस्मिन् पूर्वरू- पाणि मानवे ॥ प्रवृत्तसूत्रमत्यर्थं तें प्रमेहिणमादिशेत् ॥ २८ ॥ जिस मनुष्यके प्रमहके पूर्वरूपोंकी आकृति (दतादिपर मल, हथेली, तलवे जलना आदि) दीखें और कुछभी अधिक मूत्र उतरने लगे तो उस मनुष्यको प्रमेहका रोगी जानलेना चाहिये ॥२७॥ जिस मनुष्यमें समस्त पूर्वरूपके लक्षण हों अथवा आधे ही लक्षण हों परन्तु अधिक मूत्र आवे तो उस मनुप्पको प्रमहका रोगी जानना चाहिये ॥ २८ ॥ पिडकॉपीडितं गाढमुपसृष्टमुपद्रवैः॥ मधुमेहिनमार्चष्टे स चासा- ध्येः प्रकीर्तितः ॥ २९ ॥ स चापि गमनात्स्थानं स्थानादासन- मिच्छति ॥ आसनाद्रुणुते शयां शयनात्स्वप्नमिच्छति ॥ ३० ॥ (दशी ०२४) "विना प्रमहमप्यता नायने दुष्टमदसाताञ्चता न लभ्यते यावद्वस्तुपरिग्रहः" (हात माधव.)। (शो० २५ ) सोपद्रवा इति-"विट्कासमांससकोचमोदहिकामदादयः । विसर्पमर्मसरोवाः पिडका- नानुपद्रवाः ॥" (डीत डल्लन:)॥ ॥
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५१
निदानस्थान-अ०७.
(५४७)
नो पुरुष पिडकासे अतिपीडित हो और प्रमेहके उपद्रवोंसे व्याप्त हो उसे मधु-
प्रमेह होगा ऐसा जानना और यह मधुप्रमेह असाध्य होता है ॥ २९ ॥ प्रमेहका
रोगी चलनेकी अपेक्षा ठहरनेकी इच्छा किया करता है और ठहरने (खडे होने )
से बैठजानेकी वांछा किया करता है और बैठे रहनेसे लेटना चाहता है और
लेटनेसे फिर सो जानेकी इच्छा रखता है ॥ ३० ॥
यथा हि वर्णानी पंचानामुत्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेणं शब-
लवभ्रुकपिलकपोतमेचकादीनां वर्णानामनेकेषांमुपैतिर्भवति
एवमेवे दोपर्धातुमलाहारविशेषेणोत्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशे-
पेण प्रमेहाणी नानाकारणं भवति ॥ ३१॥ भवति चात्र-
जैसे पांच मुख्य रंगों (सुपेद, हरे, काले, पीले और लाल ) के बहुत और
थोडे मिलानेसे शबल (चितकबरा), बभ्रु (नकुलई), कपिल (सुनहरा), कपोत
(फाकतई ) और मेचक (सुरमई ) इत्यादि अनेक प्रकारके रंगोंकी उत्पत्ति हो-
जातीहै इसी भांति दोष ( वायु, पित्त, कफ) धातु ( रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि,
मन्ना, शुक्र) और मल तथा आहारविशेषके अधिक न्यूनादिके संयोग होनेसे प्रमे
होकं भी अनेक प्रकारके कारण (रूप और भेद आदि) होजाते हैं ॥ ३१ ॥ इस
विषयमें श्लोक है-
सर्व एव प्रमेहास्तुं कालेनाप्रतिकारिणः॥
मधुमेहत्वमायाँति तदासाध्या भवंति हि ॥ ३२॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने षष्ठोऽध्यायः॥६॥
सबही प्रमेह प्रतिक्रिया ( उपाय) नहीं करनेवाले पुरुषोंके बहुत समयतक
रहनेसे मधुप्रमेह होजाते हैं और उस अवस्थामें वे असाध्य होजाते हैं। (यूनानी
हकीम इसे "जिरयान' कहतेहैं और डाक्टर "इस्पमीटोरिया कहते हैं)॥३२॥
इति पं० मुरलीधरशर्मवैद्यवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः ७.
अथात उदराणां निदानं व्याख्यास्यामः ।
अब यहांसे अगाडी उदररोगोंके निदानकी व्याख्या करतेहैं।
धन्वंतरिर्धर्मभृतां वरिष्ठो राजपिरिन्द्रप्रतिमो बभूव ॥
ब्रह्मर्षिपुत्रं विनयोपपन्न
'नद्रुतमन्वशासत् ॥ १॥
(५४८) सुश्रुतसंहिना-भा० टी०। राजर्षि, धार्मिकों में श्रेष्ट ऐसे श्रीभगवान धन्वंतरिजी जो इन्द्रक ममान प्रतापी हुए वे विनयसे प्राप्त हुए ब्रह्मर्पि ( विश्वामित्रके ) पुत्र अपने शिष्य सुश्रुतको (इम- प्रकारके उदररांगोंक विषयमें) शिक्षा देत भय ॥ १ ॥ उदररोगोंकी संख्या और हेतु । पृथक्समस्तैरपि चहें दो : प्लीहादरं व_गुदं तथैवं ।। औगं- तुकं सप्तमसप्टमं च दकोदरं चेति वदति तानि ॥ २ ॥ सुदुर्व- लाग्नेरहिताशनस्य संशुष्कत्यन्ननिपेवणाः ॥ स्नेहादिमिथ्या. चरणार्द्धि जतोर्वृद्धिं गताः कोटमभिप्रेपन्नाः ॥ गुल्माकृतिव्यंजि- तलक्षणानि कुर्वति बोराण्युराणि दोपाः ॥ ३ ॥ उदररांग ८ प्रकारका होता है जैसे पृथक् २ दापोंस (यथा १ वातादर, २ पित्तोंदिर, ३ कफोदर, तथा समस्त दोषो (सन्निपात ) से ४ सन्निपातादर, ५प्लीहोदर, ६ वगुदादर, ७ आगंतुक (क्षतोदर परिस्राव्युदर ) और ८ आठवा दकोदर ( जलोदर ) इसप्रकार इनको उदररोग (अथवा जठररोग) कहतह।।२।। अत्यंत दुर्बल जठरानिवाला मनुष्य जो अहित भोजन कर अथवा सूखा बासी, सड़ा अन्न भोजन करे अथवा अयोग्य रीतिसं स्नेहपान, वमन, रचनादिका आव- रण करे तो उससे मनुष्यके कोष्ठ ( उदर ) में वात आदि दाप बढकर गुल्मक आकार और प्रगट लक्षणवाले ऐसे घोर उदयोगों ( वातोदर. 'लीहोदर, जलो- दरादि) को उत्पन्न करतेहैं ॥ ३ ॥ कोष्टादुपस्नेहवदन्नसारो निःसृत्य दुष्टोऽनिलवेगनुन्नः॥ त्वचः समुन्नम्य शनैः समंताद्विवर्द्धमानो जठर करोति ॥ ४ ॥ उपस्नेहकी भांति (जैस नय घडेमेंस चिकनाई बाहरकी तरफ झिर आतीहै तैस) कोष्ठ (आमाशय ) से निकला हुआ दुष्ट अन्नका सार वायुकरके प्रेरित हुआ बाहरकी त्वचाको नम्र करके धीरे धीरे सब ओरसे बढकर उदररोग उत्पन्न करताहै ॥१॥ उदररोगोंका पूर्वरूप। तत्पूर्वरूपं बलवर्णकांक्षा वलीविनाशो जठरे हि राज्यः॥ जीर्णा- परिज्ञानविदाहवत्यो वस्तो रुजः पादर्गतश्च शोफैः॥५॥ (भो०४) उपन्हवदिति नवघटायुपन्देहत्य यथा नूतनन्दोतोभिवाहः स्रावो दृश्यते तद्वत् कोठादन्न सारो दुष्टः सन् त्वचः समुन्नम्य आनम्रीकृत्वा समंतादिवर्द्धमानः शनर्जठररोगं करोति (इति डल्लनः) ।
निदानस्थान-अ०७. (५४९) उदररोगोका पूर्वरूप यह है कि, बल और वर्णकी कांक्षा ( अर्थात् नाश) हो और उदरपरसे त्रिवली ( सलवटें) जाती रहें अर्थात् पेट तनजाय और रोमोंकी पक्ति उभर आवे.और भोजन पचा या नहीं पचा इसका ज्ञान जाता रहे और विदाह हो तथा वस्तिस्थानमें पीडा हो और पावोंपर शोथ होजाय ॥ ५ ॥ वातोदर। संगृह्य पार्योदरपृष्ठनाभीविवर्द्धते कृष्णशिरावनद्धम् ॥ सशूलमानांहबदुपँशब्दं सतोदभेदं पवनात्मकं तत् ॥ ६॥ जिसमें पँसवाडे, पेट, पीठ और नाभि जकडेसे रहें और पेट फूले हुएपर काली -नसें चमके और शूल, अफरा हो, पेटमें शव्द (गुड २ ) बहुत हो और दरद तथा भेदनकीसी पीडाके साथ बढे उसे वातोदर कहतेहैं ॥ ६ ॥ पित्तोदर । यच्चोपतृष्णाज्वरंदाहयुक्तं पीत शिरां यत्र भवंति पीताः । पीताक्षिविणमूत्रनखाननस्य पित्तोदरं तत्त्वचिराभिवृद्धि ॥७॥ जो चीप, तृपा, ज्वर और दाहसे युक्त हो पेटकी फुलावटमें पीलापन हो और उसमें नसेंभी पाली पीलीही चमकें तथा नेत्र, विष्ठा, मूत्र, नाखून और सुख पीले हो और शीबही बढ जाय उसे पित्तोदर कहतेहैं ॥ ७ ॥ कफोदर । - यच्छीतलं शुक्लशिरावनद्धं स्थिरं सिंत शुक्लनखाननस्य ॥ स्निग्धं महच्छोफैयुतं ससादं कफोदरं तच चिरीभिवृद्धि ॥८॥ जिसका उदर शीतल हो और उसके फुलावपर सुपद नसें चमकें, कडा हो, सुपेद रंग हो, उसके नख तथा मुखभी सुपदही हों तथा स्निग्ध हों और अति शोफयुक्त हो, अंगोंमें ग्लानि हो और जो बहुत दिनोंमें वृद्धिको प्राप्त हो उसे कफोदर कहतेहैं ॥ ८ ॥ सन्निपातोदर। स्त्रियोन्नपानं नखरोममूत्रविडार्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः ॥ यस्मै प्रय- च्छंत्यरयो गराँच दुष्टांबुदूषीविषसेवनाः ॥९॥ तेनाशुं रक्त कुपिताश्र्चे दोषाः कुति घोरं जठरं त्रिलिंगम् ॥ तच्छीतवाता- भ्रसमुद्भवेषु विशेषतः कुंप्यति दह्यते ॥ १० ॥ स चौतुरो (श्लो०८) ससाटम् अगग्लानियुतम् ।। (श्लो०९ । १०। ११) बीग्रहणमत्रोपलक्षण तेनान्येपि- सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। सूर्च्छति संप्रसक्तं पांडुः कुशः शुष्यति तृष्णंया च ॥ प्रकीर्तितं दृष्युदरं तु घोरं प्लीहोदरं कीर्तयतो निवोध ॥११॥ मूर्ख स्त्री अथवा खोटे पुरुप या शत्रु किसीका भोजनादिमें मिलाकर नाबून या किसी जीवका रोम या मूत्र या विष्ठा या आर्तवरक्त आदि खिलादें टसस अथवा शत्रु गर( कृत्रिमविष ) खिलादें उससे अथवानिकम्मा जल पीनसे तथा दूपाविप संवन करनेसे ॥ ९ ॥ शीत्रही रक्त तथा वातादि दोप कुपित हो जाते हैं ये तीनों दोपाकः लक्षणवाला घोर जठररोग उत्पन्न करते हैं । वह शीत, वायु और बादलोंक होने- पर विशेष कोप करता है और विदाहको प्राप्त होता है ॥ १० ॥ यह रोगी निरंतर मूर्छाको प्राप्त होता है, शरीर पीला पडजाता है और दुबला होजाता है तथा तृपाके मारे ( कंठ) सूखने लग जाता है । इसे घोर दूप्युदर तथा सन्निपातोदर कहते हैं । अब इसके अगाडी प्लीहादरका कीर्तन किया जाता है उसे सुनो. और समझो ॥ ११ ॥ प्लीहादर। विदाह्यभिष्यंदिरतस्य जंतोः प्रर्दुष्टमत्यर्थमदृक् कफैश्च ॥ प्लीहा- भिद्धिं सततं करोति प्ली होदरं तत्प्रवदति तज्ज्ञाः ॥१२॥वामे च पाश्वे परिवृद्धिमेति विशेषतः सीदति चातुरोत्र ॥ मंदज्वराग्निः कफपित्तलिंगैरुपद्रुतः क्षीणवलोतिपांडुः ॥ १३ ॥ सव्यतरस्मिन् यकृति प्रदुष्टे ज्ञेय यकृदाल्युदरं नदेव ॥ १४ ॥ जो मनुष्य विदाही ( दाहजनक ) तथा अभिष्यन्दी (रमवहा शिगओंकारांक. कर गुरुता करनेवाल) भोजन अधिक करते हैं उनका रुधिर तथा कफ अत्यन्त दूपित होकर प्लीहा (तिल्ली ) को अन्यन्त बढा देते हैं इसे विद्वान् वैद्य प्लीहादर कहते हैं ॥ १२ ॥ यह (तिल्ली) वांये पसवाडमें बढती है और इस रोगमें रागी विशेष कर कुम्हलायासा रहता है तथा मन्दज्वरभी रहता है और जठरासि भी मन्द पडजाता है। इसमें विशेषतासे कफपित्तके उपदव रहते हैं, वल क्षीण हो- जाता है और शरीर अत्यन्त पीला पडजाता है ॥ १३ ॥ जैसे बांई ओर प्लीहा बढजाती है उसी तरह दाहिनी तरफ यकृत् (जिगर ) दूषित होकर बढनाता है इसे यकृदाली उदर अर्थात् यकृत्वृद्धि कहते हैं ।। १४ ।। -सन्निहिता अविवकिनो ग्राह्या: । गरान् कृत्रिमविपाणि। दृप्युदरमिति-सान्निपातिकोदर तदेव दुष्युदरं एतेन मुख्यातिरेकः (दति निवथमग्रह ) ॥ (गो० १३ । १४) मध्येतस्मिन् दलिणे ।।
1 ५५ निदानस्थान-अ०७. (५५१) बद्धगुदोदर १४ यस्यान्त्रमनैरुपलेपिभिर्वी बालाश्मभिवा सहितः पृथग् वा ॥ सञ्चीयते यंत्र मेलः सदोषः क्रमेण नायामि संकरोहि ॥१५॥ निरुध्यते चास्य गुर्दे पुरीषं निरे ति कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् ।। हृन्नाभिमध्ये परिद्धिमेति यचोदरं विट्समगधिकं च ॥ प्रच्छईयन् वैद्धगुदी विभाव्यस्ततः परिस्राव्युदरं निबोध ॥ १६ ॥ जिस मनुष्यकी अंत्र ( आंत ) पिच्छल अन्नादिसे लिपायमान होजाय अथवा वाल, मिट्टी, राख आदिसे मिले अन्नका मल अथवा पृथक् दोष (वातादि ) युक्त मलही संचय होकर नालीमें इकट्ठा हो ॥ १५ ॥ और वह गुदामें पुरीष (मल) को रोकदे तव बहुत कष्ट करनेसे भी थोडा थोडासा मल उतरे और हृदय, नाभिके वीचमें वृद्धिको प्राप्त हो और उदरमें मलकीसी दुर्गंध आवे तथा कभी वमन भी हो तो उसे बद्धगुदोदर रोग कहते हैं। अब इससे अगाडी परिस्राव्युदर अर्थात आगंतुक क्षतोदरके लक्षण सुनो ॥ १६ ॥ आगन्तुक क्षतोदर ( परिस्राव्युदर)। शल्यं यदन्नोपहितं तदनं भिनत्ति यस्यागतमन्य॑था वा ॥ त- स्मात्सुतान्त्रीत्सलिलप्रकाशः स्रावः स्रवेढे गुंदतस्तु भूयः ॥ १७ ॥ नाभैरधश्चोदरमेति वृद्धिं निस्तुर्यतेऽ तीव विदह्यते चे ॥ऐतत्परिस्राव्युदरं प्रदिप्टं दकोदरं कीर्तयतो निबोध ॥१८॥ अन्नम मिलाहुआ शल्य (सूई आदि ) अथवा और तरहसे पेटमें घुसजाय और आंतको चीरदे या छेद करदे जिससे उस आंतमेंसे पानीके तुल्य स्राव होकर बार बार गुदाद्वारा निकले ॥ १७ ॥ और नाभिके नीचे पेट बढजाय ( फूलजाय) और पीडा हो तथा दाह हो उसे परिस्रावी उदररोग अर्थात् आगंतुक क्षतोदर कहते हैं । इससे अगाडी जलोदरका वर्णन किया जाता है उसे सुनो ॥ १८ ॥ जलोदर। यः स्नेहपीतोप्यनुवासितो वाँ वांतो विरिक्तोप्यथवाँ निरूढः ॥ पि वजल शीतलमा चम्य स्रोतासि दुष्यंति हि तवहाँनि ॥ १९ ॥ स्नेहोपैलिप्तेष्वथापि तेषु दकोदरं पूर्ववदभ्युपैति ॥ (सो० १५) उपलेपिभिः पिच्छल, ॥ नाडयां नालिकायाम् ॥ .
५६ धृतिः (५५२) सुश्रुतसंहिता--भा० दी। स्निग्धं महत्संपारवृत्तनाभि शोन्नत पूर्णमिवांव॒ना चं ॥ यां क्षुभ्यति कंपते च शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२०॥ जो मनुष्य न्नेहपान करनेके पछेि तथा अनुवासनवस्तिकर्मके पीछे, वमन करनेके पीछे, विरेचनके पीछे और निरूहणवस्तिके पीछे तत्कालही ठंढा जल पीले (अथवा क्षुधित जल पीले) तो उदकवाहिनी नाडियां दूपित होजातीहैं ॥ १९ ॥ अथवा वे उदकवाहिनी नाडी चिकनाईसे लिपायमान हो तब भी शीतल जल पीनेसे (दूपित होजातीहैं) और पहलेकी भांति जलोदर उत्पन्न होजाताहै। (जलोदरके लक्षण ये हैं कि ) नाभिके चारोंतरफ पेट फूलजाय और चिकनापन मालूम हो और पेट पानीसे भरासा मालूम हो । जैसे पानीसे भरी मशक थलथलाती और हिलतीहे और पानीका शब्द होताहै ( वैसे जलोदरीके पेट में होताहै ) इसे दकोदर अर्थात् जलोदर कहते हैं ॥ २० ॥ सब उदररांगोंके सामान्य चिह्न । आध्मानं गमनेऽशक्तिविल्यं दुर्वलासिता ॥ शोफः सदनसंगानां संगों वातपुरीषयोः॥ दाहस्तृष्णा च सर्वेषु जठरेपु भवंति हि॥२१॥ पेट फूलना, चलनेकी शक्तिन रहना, दुर्बलतातथा जठराग्नि मंद पड़जाना, शोथ झोना और अंग शिथिल होजाना, अधोवायु और दस्त खुलकर न होना, दाह होना, तृपा अधिक लगना ये लक्षण प्रायः सभी उदररोगोंमें हुआ करतेहैं ॥ २१ ॥ अंते सलिलभावं तु भजते जठराणि च । सर्वाण्येवै परीपांकात्तदा तानि विवर्जयेत् ॥ २२ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥ सब उदररोग अंत (परिपाक ) दशामें जलभावको प्राप्त होजातेहैं और उस अवस्थामें त्यागने योग्य अर्थात् असाध्य होजातेहैं (चिकित्साके योग्य नहीं रहते) २२ इनमेंसे प्लीहोदरको डाक्टरीमें "इन्लारजिमेंट ऑफदी इस्पीलीन" कहते हैं और यूनानीमें "तिहाल" कहतेहैं और यकृतको डा० "इन्लारजिमेंट ऑफदीलिवर" तथा "हेपटिकडिजीज" और यूनानीमें “अमरात जिगर" कहतेह इनके यहां इसके बहुत भेद है। जलोदरको डाक्टरीमें “एसाइटिस' कहतेहैं और किसी एक अंतडीमें पानी भराहो तो उसे "ड्रापसी" कहते हैं तथा यूनानीमें "इसतिसका" कहतेहैं इत्यादि । ( वक्तव्य ) हमने वैद्यक और यूनानी तथा डाक्टरीके अनुसार रोगोंके नाम लक्षणादिमें एकता करनका बहुत कुछ परिश्रम किया तोभी अनेक विद्वानोंकी रीति (नो० २० ) वेहोपलिप्तेषु इति-स्नेहादिपानादिना पित्तेषु शीतल जलं पिवेत्तदापीत्यर्थः! पूर्ववदिति क्षतोदरपत् सलि रत्याधोगामित्वांदयो नाभे. उदंगत्पत्तिः । ( इति इलनः ) ।
- निदानस्थान-अ०८. ( ५५३) और क्रममें वडाही अन्तर है इससे हरेक रोगका निदान और उत्पत्तिका कारण प्राय: एक दूसरेसे नहीं मिलता, हांजोजो मोटी मोटी बातें और जिस रोगमें जितना उचित प्रतीत हुआ वह थोड़ा २ लिखा जाता है, विशेष देखना हो तो उन २ विद्याओंकी पुस्तकें देखो जैसे यूनानियोंने जिगरके बहुत रोग लिखेहैं, जैसे जिगरमें गरमी, सरदी आदि तथा जिगरकी निर्बलता, जिगरका सुदा, जिगरका शोथ, जिगरकी शर्करा इत्यादि ये वैद्यकमें इसभांति नहीं मिलते और वातादर, पित्तोदर, क्षतोदरादि जैसे वैद्यकमें कहेहैं वैसे यूनानी आदिमें नहीं मिलते ॥ इति प० मुरलीधर शर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थान सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः ८. अथातो मूढगर्भनिदानं व्याख्यास्यामः । यहांसे अगाडी मूढगर्भके निदानकी व्याख्या करते हैं । ग्राम्यधर्मयानवाहनाध्वगमनप्रस्खलनप्रपतनप्रपीडनधावनाभि. घातविषमशयनासनोपवासवेगाभिघातातिरूक्षकटुतिक्तभोजन- शाकातिक्षारसेवनातिसारवमनविरेचननेखोलनाजीर्णगर्भशात- नप्रभृतिभिर्विशेषैधनान्मुच्यते गर्भः फलमिव वृतबंधनादभि- घातविशेषैः ॥ १॥ ग्राम्पधर्म (मैथुन ) करनेसे, घोडे आदिपर चढन और गाडी आदिमें बैठकर चलनेसे, पैरोंसे सफर करने, प्रस्खलन (औंधा होकर चलने, नीचा झुककर चलने), ऊपरसे गिरने, मिचजाने, भागने, चोट लगने, विषम सोने तथा विषम आसन बैठने, ( या विषम भोजन करने ), लंघन करने, वेग ( दस्त, मूत्रादि) को रोकने, अति रूखा भोजन करने, कटु ( चरपरा), तिक्त (कडवा) भोजन करने, अति शाक खाने, खारी वस्तु अति खानेसे तथा दस्त लगजानेसे, वमन होनेसे, विरेचन लेनेसे, खोलन ( हिंडोले आदि झूलने ) से, अजीर्णसे, गर्भशातन ( गर्भपातकी क्रिया करने ) इत्यादिसे गर्भ अपने बंधनसे छूट जाताहै जैसे चोट आदिके प्रहारसे वृन्त (नाकू) के बंधनसे फल छूट जाताहै ॥ १ ॥ से विमुक्तंबंधनो गर्भाशयमतिक्रम्य यकृत्प्लीहान्नविवरैरवस्रंसमान: कोष्टसंक्षाभमापादयति तस्या. जठरसंक्षोभाद्वायुरपानो मूढः पार्श्व- (गद्य १) मूढगर्भ इति-मूढो निरुद्धगतिर्गर्भः मूढगर्भः तदुक्तम्-"सर्वावयवसपूर्णी मनोबुद्धया. दिसयुतः । विगुणापानसमूढो मूढग भिधीयते"( इति डल्लनः) । प्रसवलन रिंगणादि । खोलनं हिंदो- लनम् । गर्मशातन भेषजेन गर्भपातन" । बधन-गर्भाशयप्रतिबद्धशिराः ।।
(५५४)
मुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
वस्तिशीर्षोदरयोनिशूलानाहमूत्रसंगानामन्यतममापाद्य गर्भ व्या-
पादयति ॥ २॥
वह गर्भाशयक बंधसे छुटा हुआ गर्भ गर्भाशयंस निकलकर यकृत, प्लाहा और
आंतोंके द्वारोंसे झिरता हुआसा होजाता है और समान वायु उसके उदरको क्षुभित
करदेता है फिर उसके उदरके संक्षोभसे अपानवायु विरुद्ध गति होकर पॅसवाई और
वस्तिका शिर, उदर और योनिमें शूल तथा अफरा, मूत्रावरांध इत्यादि व्याधियोंमेंस
किसी एक या अधिकको उत्पन्न करके गर्भको व्यापादित अर्थात् पीडित करता है ॥२॥
तरुणं शोणितस्रावेण तमेव कदाचिद्विवृद्धमसम्यगागतमपत्य-
पर्थमनुप्राप्तमनिरस्यमानमपानवैगुण्यसंमोहितं गर्भ मूढगर्भमि-
त्याचक्षते ॥३॥
अति रक्तस्रावहीसे कभी अधिक बढकर अयोग्य रीतिस आकर संतानके मार्ग
(भगद्वार ) पर प्राप्त हो और बाहर नहीं निकले अपानवायुकी विगुणतास निरुद्ध
गति हो जाय ऐसे गर्भको मूढगर्भ कहते हैं ॥ ३ ॥
ततः स कीलः प्रतिखुरो वीजकः परिघ इति। तत्र उर्द्धवाहु-
शिरःपादो यो योनिमुख निरुणद्धि कील इवे से कीलः। निःसृ-
तहस्तपादशिराः कारासंगी प्रतिखुरः। यस्तुं निर्गच्छत्येकशिरो-
भुजः सं वीजकः । परिघ
इव
योनिमुखमावृत्य
तिष्ठेस परिघः।
इति चतुर्विधो भवतीत्येके भाषते ॥४॥
वह मूढगर्भ १ कील,२ अतिखर,३ बीजक और ४ परिघ ऐसे (चार प्रकारका)
होताहै । जिसमें हाथ, शिर और पैर ऊपरको होकर योनिके मार्गको कीलकी
भांति रोक दें वह "कील' संज्ञक है । जिसमें हाथ या पांव या शिर निकलआवें
और शरीर रुक जाय वह "प्रतिर" है । जिसका एक शिर और हाथही निकले
वह “बीजक' है । जो वनके समान योनिके मुखको रोककर स्थित होजाय वह
"परिष" है । ऐसे चार प्रकारका मूढगर्भ होता है यह कई आचार्य कहते हैं॥४॥
तत्तुं न सम्यक् कस्मात् स यदा विगुणानिलप्रपीडितोऽपत्यपर्थ-
मनेकधा प्रतिपद्यते ती संख्या हीयते ॥५॥
ऊपर कहा हुआ चारही प्रकारका मूढगर्भ होताहै ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि
जब वह विगुण अपानवायु करके पीडित हुआ गर्भ अनेक प्रकारसे अपत्यमार्ग
(योनि) को प्राप्त हो जाता है तब इसमें संख्याका नियम नहीं रह सकता ॥५॥
५९ निदानस्थान-अ०८. (५५५) तत्र कश्चित् द्वाभ्यां सक्थिभ्यां योनिमुखं प्रतिपद्यते। कश्चिदा. भुग्नैकसक्थिरेकेन । कश्चिदाभुग्नसक्थिशिरःस्फिग्देशेन तिर्य- गागतः । कश्चिदुरःपार्श्वपृष्ठानामन्यतमेन योनिद्वारं पिधायाव- तिष्ठते । अंतःपावीपवृत्तशिराः कश्चिदेकेन वाहुना । कश्चिदाभुग्न- शिरा वाहुद्वयेन । कश्चिदाभुग्नमध्यो हस्तपादशिरोभिः। कश्चि- देकेन सक्थ्ना योनिमुखमभिप्रतिपद्यतेऽपरेण पायुमित्यष्टविधा मूढगर्भगतिरुद्दिष्टा समासेन ॥६॥ १ तिनमें कोई मूढगर्भ तो दोनो साथलोंस योनिके मुखमें प्राप्त होता है । २ कोई एक साथल संकुचितकर एकही साथलसे प्राप्त होताहै । ३ कोई साथल और शिरको सकुंचित करके कूलोंसे योनिद्वार में प्राप्त होताहै और टेढा होताहै । ४ कोई पेट, पसली, पीट इनमेंसे किसीके बल योनिद्वारको रोक स्थित होताहै । ५ कोई शिरको पँसवाडमें झुकाकर एक साथही निकाल देताहै । ६ कोई शिरको सकुंचित करके दोनों हाथ निकालताहै । ७ कोई मध्यभागको संकुचित. करके हाथ, पांव तथा शिरसे योनिद्वारपर प्राप्त होताहै । ८ कोई एक साथलसे योनिद्वारपर प्राप्त होताहै और दूसरी साथल गुदाकी तरफ प्रवृत्त होतीहै । ऐसे संक्षेपसे मूढगर्भकी गति आठ प्रकारकी वर्णन कीगई ॥ ६ ॥ तत्रं द्वावत्यांवसांध्यौ मूढगर्भी शेषानपि विपरीतेंद्रियाक्षेपक- योनिभ्रंशसंवरणमल्ल श्वासकासभ्रमनिपीडितान्परिहरेत् ॥७॥ भवति. चात्र- इनमेंस अंतके दो महगर्भ असाध्य होतेहै और शेषभी जिनमें इंद्रियोंका ज्ञान विपरीत होजाय अथवा आक्षेपक वायुरोग हो अथवा योनि बाहर निकल आवे या योनि बहुतही सुकड़जाय तथा मक्कल्लक नाम प्रसूतशूल तीक्ष्ण हो, श्वास, खांसी और भ्रम इन करके निपीडित हो अर्थात् जिन्हें ये उपद्रव हों उन्हेंभी त्यागदे ॥ ७ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- कालस्यं परिणामेन मुक्तं वृतांद्यथा फलम् ॥प्रपद्येत स्वभावेन नान्यथां पतितुं फैलम् ॥८॥ एवं कालप्रकर्षेण मुक्तो नाडी- विबंधनात् ॥ गर्भाशयस्थो यो गर्भो जननाय प्रपद्यते ॥९॥ जैसे कालके परिणामसे वृन्त -----) से छूटकर स्वभावसे फल गिरपडता (५५६) सुश्रुतसंहिना-भा० टी०। ६० है अन्यथा नहीं गिर पड़ता ॥ ८॥ ऐसेही समय पूरा होनेपर गर्भाशयका गर्भभी नाडियोंके धसे छुटकर जन्म लेनेके लिये प्रवृत्त होताहै ॥ ९ ॥ कृमिवाताभिघातस्तु तदेवोपद्रुतं फलम् ॥ पत्यकालेपि यथा तथा स्याँद्गर्भविच्युतिः ॥ १०॥ आचतुर्थात्ततो सालात्प्रत्रवेद्गर्भ- विच्युतिः। ततः स्थिरशरीरस्य पातः पंचसषष्ठयोः ॥ ११ ॥ जैसे कोडेके खाने, वायु लगने, चोट लगने आदि उपद्रवोंसे फल अकालमें (वे समय) भी गिरजाताहै वैसेही उपद्रवोंसे गर्भभी वे समय गिर पड़ताहै ॥ १० ॥ चार महीनेतक गर्भ गिरे तो उसे गर्भस्राव कहतेहैं, उससे पीछे शरीर स्थिर हो- जाताहै इससे पांचवें और छठे महीने में गिरे तो गर्भपात कहलाताहै ॥ ११ ॥ प्रविध्यति शिरो यो तुं शीतांगी निरपनपा ॥ लीलोद्धतशिरा हति सौ गर्भ से च ती तथा ॥१२॥ गर्भास्पंदनमावीनांप्रणांशः इविपांडुता ॥ भवत्युच्छालपूतित्वं शूलं चौतर्मृते शिशौ ॥ १३ ॥ मानलागंतुभिर्मातुरुपतापैः प्रपीडितः ॥ गर्भो व्याप॑यते कुक्षौ व्याधिभिश्च पीडितः ॥ १४ ॥ वस्तमारविपन्नायाः कुक्षिः प्रस्पं- दते यदि ॥ तत्क्षणीजन्मकाले त पाटॅयित्वोद्धरेद्भिषक् ॥१५॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थानेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ जो स्त्री शिरको धुने और देह ठंडी पडजाय, लज्जा जाती रहे, नीली नसें चमके तो वह गर्भक बालकको मार देतीहै तथा मरा वालक उसे मार देताहै।॥१२॥ जिसके गर्भमें बालक फिर नहीं और आवी (प्रसववेदना ) जाती रहें, शरीर, काला, पीला पडजाय और श्वासमें मुरदेके समान दुर्गंध आव और शूल हो तो जानो कि वालक पेटमें मरगया ॥ १३ ॥ माताके मानसिक और आगन्तुक उप- तापोंसे पीडित हुआ तथा व्याधियोंसे पीडित हुआ बालक कुक्षिमें मरजाताहै१४॥ गर्भगत बालकको शीघ्र मारनेवाली मृतास्त्रीकी कुक्षि यदि फरके ( तो बालक अभी जीताहै ऐसा जाने)और शीवही मृत स्त्रीकी कूखको फाडकर जीते बालकको सुज्ञ वेद्य निकालले ॥ १५ ॥ इति पं० मुग्लीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० निदानस्थानेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः ९. अथातो विद्धीणां निदान व्याख्यास्यामः । इसके अगाडी अब विद्रधि (फोडों) के निदानकी व्याख्या करते है ।
३ ६१ निदानस्थान-अ० ९. (५५७॥ सर्वामरगुरुः श्रीमान्निमित्तान्तरभूमिपः ॥ शिष्यायोवाच निखि- लैमिदं विद्रधिलक्षणम् ॥१॥ त्वयक्तमांसंमेदांसि प्रदूंष्यास्थिस- माश्रिताः ॥ दोषाः शोफ शनैघोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥२॥ महाशूलं रुजावंतं वत्तं चाप्य/वार्यतम् ॥ तमाढविधि धीरा विज्ञेयः पड्विधः स च ॥३॥ सम्पूर्ण देवताओंके गुरु निमित्तांतरसे काशीके भूपति (राजा) श्रीमान् धन्व- न्तरि महाराज अपने शिष्य सुश्रुत महर्पिके प्रति विधियों के सम्पूर्ण लक्षण वर्णन करते भये ॥ १॥ त्वचा, रक्त, मांस, मेद इन्हें दूपितकर अस्थि ( हड्डी) में प्राप्त हुए वात आदि दोष धीरे २ घोररूप ऊंचे ( विद्रधिके कारणभूत ) शोथको उत्पन्न करते हैं ॥ २॥ फिर अतिशल और दरदवाला, गोल अथवा फैला हुआ (फोडा) हो उसे विद्रधि कहते हैं, वह छःप्रकारका होता है ॥ ३ ॥ विद्रधिकी संप्राप्ति और भेद । पृथग्दोषैः . समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा ॥ घण्णापि हि तेषां तु लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥४॥ पृथक् २ एक एक दोष अर्थात् वायुसे, पित्तसे, कफसे और चौथे समस्त दोष अर्थात् सन्निपातसे, पांचवें क्षत (चोट लगने ) से, छठे रक्तसे इस भांति छ: ६ प्रकारसे विधि होताहै इन छहों प्रकारके विद्राधियोंके लक्षण वर्णन किये जातेहैं ॥४॥ विद्रधियोंके लक्षण। कृष्णोरुणो वा परुषो भृशमत्यर्थवेदनः॥चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधि- तिसंभवः॥५॥पक्कोदुंबरसंकाशः इयावो वा ज्वरदाहवान्॥क्षिप्रो- स्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसंभवः॥६॥शरावसदृशः पांडुःशीतः स्तब्धोल्पवेदनः॥चिरोत्थानप्रपाकश्च संकंडुश्च कफोत्थितः ॥७॥ जो काला तथा लाल हो, खरदरा हो, जिसमें चीस अधिक हो तथा जिसके उठने और पकनेमें चित्र विचित्रता हो वह वायुका विद्रधि है ॥ ५॥ जो पके गूलरफलके तुल्य हो, ऊदा हो, जिसमें कभी ज्वर और दाह भी हों तथा शीघ्रही उठे और शीवही पकजाय वह पित्तका विद्रधि है ॥ ६॥ जो सराईके आकार हो, पीला (श्लो० १) सर्वामरगुरुरिति-अमृतदानेन सर्वे देवा अमराः कृताः तेनासी सर्वेषा देवानां गुरुरित्यर्थः। निमित्तातरभूमिप इति-निमित्तांतरेण कारणातरेण भूपालता गतः।अपुत्रस्य काशिराजस्य पुत्रत्वमापन्न इति कारणातरं ब्याख्यानयंति । ( इति डल्लनः)॥
६२ (५५८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। हो, टंटा हो, कडा हो, जिसमें पीडः भी स्वल्प हा तथा देरस उंट और दरहीसे पके तथा खाजभी हो तो वह कफका विद्राधि है ।। ७ ॥ तनुपीतसिताश्चैषांमास्त्रावाः क्रमशः स्म॑ताः॥ नानारूपरुजास्रावो घटालो विषमो महान् ॥ विषम पच्यते वापि विद्रधिः सान्निपा- तिकः ॥ तैस्त भीवैरभिहते क्षते चौपथ्यसेविनः॥क्षतोष्मा वायुनिसृतः सरक्तं पित्तमीरयेत् ॥ ९॥ ज्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः ॥ एष विद्रधिरागंतुः पित्तविद्रधिलक्षणः ॥ १०॥ कृष्णस्फोटावृतः श्यावस्तीवदाहरुजाज्वरः ॥ पित्तविद्र- धिलिंगस्तु रक्तविद्रधिरुच्यते ॥ ११ ॥ वायुमें थोडा, पित्तमें पीला, कफमें सुपेद इसक्रमस स्त्राव होता है तथा नाना प्रकारके रूप, पीडा और स्त्राव हों, जिसके ऊपर गांठसी पडजाय अति विषम हो और विषमताहीसे पके वह सन्निपातका विद्रधि होता है ॥ ८॥ और उनही भावों (पतन, प्रहारादि) करके अभिहत जो घाव हो उसमें अपथ्य आहार विहार कर तब वायु करके प्रेरित घावकी गरमी रक्तसहित पित्तको दूपित कर देती है ॥ ९ ॥ ज्वर, तृपा तथा दाह उत्पन्न होजाते हैं ऐसा फोडा आगंतुक कहलाता है और इसमें पित्तविद्रधिके लक्षण होते हैं ॥ १० ॥ जो ऊदे रंगका तीव्र दाह और पीडावाला विद्रधि हो और उसके आसपास काली फुन्सियां हों तथा ज्वर हो आवे और उसमें पित्तविधिके लक्षण हो तो वह रक्तविधि कहलाता है ।। ११ ॥ उक्ता विद्रधयो ह्येते तध्वसाध्यस्तु सर्वजः ॥ आभ्यंतरानतस्तूई विद्रधीन्पारचक्षते ॥ १२ ॥ ये ऊपर छ: ६ प्रकारके विद्रधि (फोडे ) वर्णन किये तिनमें सन्निपातका विधि असाध्य होता है । इनके अगाडी अब अन्तर्विदधियोंको वर्णन करते हैं ॥ १२ ॥ अंतर्विद्रधि । गुर्वसाम्यविरुद्धानशुष्कसंक्लिन्नभोजनात् ॥ अतिव्यवायव्याया- मवेगाघातविदाहिभिः ॥ १३॥ पृथक् संभूयं वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् ॥ वल्मीकवत्समुन्नईमतः कुर्वति विद्वैधिम् ॥१४॥ - (श्लो० ८) घटाल इति-ऊर्ध्वमागो महान् यस्य स घटालः ।। (श्लो०९) तैस्तैर्मावरिति-पत. नगूढप्रदारादिमिः अमिहते । ( इति नि० सं०) । प . ६३ निदानस्थान-अ० ९. (५५९) गरिष्ठ भोजनसे, प्रतिकूल तथा विरुद्ध भोजनसे, सूखे तथा क्वेदित भोजन कर- नेस, भति मैथुन करनेसे, शारीरक श्रम न करनेसे, मलमूत्रादि वेगोंके रोकनेसे, विदाही वस्तुके खानेसे ॥ १३ ॥ वातादि दोष पृथक् २ अथवा समस्त कुपित: होकर गुल्मके रूपवाले तथा बमईके समान ऊपरको उठे हुए अंतर्विदधि (भीतरी फोडे ) पैदा करदेते हैं ॥ १४ ॥ अंतर्विद्रधिक स्थान । गुदे वस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वंक्षणयोस्तथा ॥ वृकयोः प्लीह्नि यकृति हृदये क्लोम्नि वा तथा ॥ १५॥ तेषां लिंगौनि जॉनीया- बाह्यविद्रधिलक्षणैः ॥ आमपक्वैषणीयेन पक्कापक्वं विनिर्दिशेत्॥१६॥ गुदा, वस्तिका मुख, नाभि, कूख, वंक्षण (जंघाकी संधि) तथा वृक्क (गुरदों), प्लीहा (तिल्ली), यकृत् (जिगर) तथा हृदय और क्लोम इन स्थानों में प्रायः अंतर्विदधि होते हैं ॥ १५ ॥ इनके चिह्न वाह्यविद्रधिके लक्षणोंसे जान लेने चाहिये तथा आमपक्कैषणीय नामक अध्यायमें कहेहुए लक्षणोंसे पका या बिन पका है ऐसा देख लेना चाहिये ॥ १६ ॥ अधिष्टानविशेपेणं लिंग शृणु विशेषतः ॥ गुदे वातनिरोधस्तु वस्तौ कृच्छ्राल्पमूत्रता ॥ १७ ॥ नाभ्यां हिक्का तथाटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् ॥ कटीपृष्टंग्रहस्तीवो वंक्षणोत्थे तु विद्रधौ ॥१८॥ वृक्कयोः पार्श्वसंकोचः प्लीगुच्छ्वासावरोधनम् ॥ सर्वांगप्रग्रह- • स्तीवो हृदि शूलश्र्चे दारुणः ॥ १९ ॥ श्वांसो यकृति तृष्णाँ चं पिपासा क्लोमंजेधिकां ॥ २० ॥ अब स्थानविशेषकरके विद्रधियों के विशेष लक्षण सुनो । गुदामें भीतर विधि हो तो खुलकर वायु नहीं निकले और वस्तिमें हो तो कष्टसे थोडा २ मूत्र उतरे॥१७॥ नाभिमें अंतर्विद्रधि हो तो हिचकी आवे और पेट फूल जाय तथा कूखके भीतर विद्रधि हो तो वायुका कोप हो और वंक्षण( नलों) में हो तो कमर और पीठ अत्यंत जकड जाय ॥ १८ ॥ वृक्क (गुरदों) में फोडा हो तो पँसवाडा सुकड जाय और प्लीहा में हो तो रुककर श्वास आवें और हृदय में हो तो सब शरीर जकड जाय और हृदयमें दारुण शूल हो ॥ १९ ॥ यकृत् (जिगर ) पर फोडा हो तो श्वास और तृषा हो तथा कोमस्थानमें हो तो बहुत अधिक प्यास हो ॥ २० ॥ (मो० १५) वस्तिमुखे वस्ती वक्षणम् ऊरुमूलाश्रयः (नले इति लोके) । वृक्की मांसपिंडद्वयम् एकोवामपा स्थितः द्वितीयो दक्षिणपाइँ स्थितः । ( इति डल्लनः ) लोके तु गुरद इति वदति ।।
12
॥
(५६०)
६४
सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
आमों वा यदि वा पक्को मन्विा यदि चैतरः। संवों ममों"त्थित-
चापि विधिः कष्ट उच्यते ॥२१॥ नाभेरुपरिजाः पक्का यांत्यूर्द्ध-
मितरे त्वधः ॥ जीवत्यधों नितेषु नुपूर्व नै जीवति ॥ २२ ॥
हृन्नाभिवस्तिवा ये तेषु भिन्ने' वाह्यतः ॥ जीवेत्कदाँचित्पुरुयो
नेतरेपु कदाचन ॥ २३॥
कच्चा हो चाहे पका हो, बडा हो या छोटा सब विद्रधि ममस्थानमें हुआ कष्ट-
साध्य होता है ॥ २१ ॥ नाभिसे ऊपरके विधि पककर ऊपरको गमन करते हैं
और अन्य नीचको गमन करते (झिरते ) हैं । नीचेको झिरनेवाले नीचेहीको झिरें
तो मनुष्य जीवे और जा ( नीचेको झिरनेवाले) कदाचित् ऊपरको झिरने लगे तो
मनुष्य जीवे नहीं ॥ २२ ॥ हृदय, नाभि और वस्तिके सिवायका अंतर्विद्रधि
बाहरको फूट निकले तो शायद मनुष्य जीवभी परंतु इतर (हृदय, नाभि, वस्ति)का
अंतर्विदधि बाहरको फूट निकले तो मनुष्य कदाचित् नहीं जीवे ।। २३ ॥
स्त्रीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहि तैः ॥ ज्वरदाहकरा
घों रो जायते. रक्तविद्रधिः ॥२४॥ अपि सम्यक्प्रजातानामसंका-
यादैनिःसृतम् ॥रक्त विधिं कुर्यात्कुक्षौ मलसंज्ञितम् ॥सती-
हान्नोपशांतश्च सेतो सौ संप्रपच्यते ॥ २५ ॥
जिनके गर्भपात होजाताहै उनके तथा जिनके पूरा बालक होताहै उन स्त्रियोंके
कुपथ्य करनेसे ज्वर और दाह करनेवाला घोर रक्तका विद्रधि होजाताहै ॥ २४ ॥
तथा जिन स्त्रियोंके अच्छे प्रकार प्रसूत (बालक) हो लेताहै परंतु शरीरसे रुधिर
ठीक २ नहीं निकलता तो उनकी कुक्षिमें मक्कल्ल संज्ञक रक्तका विधि होजाता-
है और जो वह मक्कल सात दिनमें शांत नहीं हो तो फिर पकजाताहै ॥ २५ ॥
विशेषमर्थ वक्ष्यामि स्पष्टं विद्रधिगुल्मयोः ॥ तुल्यदोषसमुत्थाना-
द्विधेगुल्मस्य च ॥ २६ ॥ कस्मान्न पच्यते गुल्मो विद्रविः पाक-
मेति च ॥ गुल्मांकाराः स्वयं दोषां विद्रधिमांसशोणिते ॥२७॥
विवरानुचरो ग्रंथिरप्सु वुहुँदको यथा ॥ एवं प्रकारो गुल्मस्तु
तस्मात्पाकै नै गच्छति॥२८॥ मांसशोणितवाहुल्यात्पांकं गच्छति
विद्रधिः ॥ मांसशोणितहीनत्वाद्गुल्मः पाकं न गच्छति ॥ २९ ॥
६५ -- । निदानस्थान-अ० ९. (५६१) गुल्मस्तिष्टंति दोषे स्वे विद्रधिर्मासशोणिते ॥ विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥३०॥ इसके अगाडी विद्रधि और गुल्मका विशेष स्पष्ट भेद कहतेहैं, कि समान दोषोंसे उत्पन्न हुए विद्रधि और गुल्ममेंसे गुल्म क्यों नहीं पकताहै और विद्रधिक्यों पकजाता- है (इस प्रश्नका उत्तर ) यह है कि, गुल्ममें स्वयं वातादि दोषही गुल्मके आकार होजाते है और विद्रधि मांस और रुधिरमें होताहै ॥२६॥ २७ ॥ जैसे जलमें बुल- तुला, ऐसे खाली स्थानमें विचरनेवाला गुल्म होताहै इसलिये नहीं पकता ॥२८॥ अथवा मांस और रुधिरकी अधिकतासे विद्रधि पकजाताहै और मांस, रक्त करके हीन होनेसे गुल्म नहीं पकता॥२९॥गुल्म अपने दोषों (वायु, पित्त, कफादि ) में स्थित रहता है और विद्रवि मांस और रुधिरमें रहताहै इसलिये विद्रधि पकजाता- है और गुल्म नहीं पकता है ॥ ३० ॥ हृन्नाभिवस्तिजा पक्को बज्यों यश्च त्रिदोषजः॥ अथ मज्जपरी- पाको घोरैः समुपजायते॥३१॥लोस्थिमांतनिरोधेन द्वारं न लभते यदा ॥ ततः स व्याधिनों तेन ज्वलनेने दह्यते ॥३२॥अस्थि- मज्जोष्मणा तेने शी यते दह्यमानवत्॥ विकारःशल्यंभूतोयं क्लेश, येदातुर चिरम् ॥३३॥अथास्य कर्मणा ध्याधिद्वारं तु लभते यदा॥ तेतो मेदैःप्रभं स्निग्धं शुक्लं शीतमथो गुरु ॥ ३४ ॥ भिन्नेस्थिन निःस्रवे!यमेतदस्थिंगतं विदुः ॥ विधि शास्त्रकुशलाः सर्वदोष- रुजावहम् ॥३५॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने नवमोध्यायः॥९॥ हृदय, नाभि और वस्ति इनका अंतर्विदधि जो पक जाय तो वह त्याज्य है तथा सनिपातका विद्रधि भी वयं ( असाध्य) होताहै । और यदि मज्जामें परिपाक हो तो घोर होताहै यदि वह अस्थि और मांसके अवरोधसे द्वार न पावे तो पीडासे अनिके समान जला करताहै ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ फिर वह अस्थि और मज्जाकी गरमीसे जले हुए ( अमिदग्ध) की तरह खिल जाताहै । मज्जागत शल्यभूत यह विकार रोगीको बहुत क्लेश देताहै (बहुत दिन दुःख देताहै) ॥ ३३ ॥ और जो कर्म ( शस्त्रकर्म ) करके व्यारिद्वारभी पावे तो उसमेंसे मेद (चरची) के समान चिकना, सुपेद, शीतल और भारी (राध निकलताहै ॥ ३४ ॥ अस्थिके भेदन होनेपर जिससे पूय निकले उसे अस्थिगत विद्रधि शास्त्रकुशल वैद्य जानें । यह सब ३६ (५६२) ६६ सुश्रुतसंहिता-भा० टी० दोषों और सब प्रकारकी पीडाका करनेवाला होताहै । (विद्रधि ( फोडों) को डाक्टरी में एनसस' या "वाइलस" कहतेहैं और यूनानीवाले 'दवीले' कहते हैं)॥३५॥ इति १० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० निदानस्थान नबमोन्यायः ॥ ९ ॥ दशमोऽध्यायः १० अथातो विसर्पनाडीस्तनरोगनिदानं व्याख्यास्यामः । इससे अगाडी विसर्प, नाडी, स्तनरोग इनके निदानकी व्याख्या करते हैं ।। विसर्पकी संप्राप्ति । स्वङ्मांसशोणितगतः कुपितास्तु दोपाः सर्वांगसारिणमिहास्थि. तमात्मलिंगम् ॥ कुर्वतिय विसृतसुन्नतमांशु शोफ तं सर्वतो विसरणाच विसपमाहुः ॥ १॥ त्वचा, मांस और रुधिरमें प्राप्त हुए कुपित वातादि दोष समस्त शरीरमें फैलने- वाला, एक जगह स्थित न होनेवाला, वातादिके लक्षणोंवाला, विस्तारयुक्त कुछ २ ऊप- रको उठा हुआऐसाशोथ उत्पन्न करतेहैं जिसे सारे शरीरमें फैलनेसे विसर्प कहतेहैं।।१।। विसर्पके लक्षण । वातात्मकोऽसितमृदुः परुषोंगमर्दसंभेदतोदपवनज्वरलिंगयुक्तः ॥ गर्यौ तु विषमैरतिदूपितत्वायुक्तः स एव कथितः खलु वर्ज- नीयः ॥ २॥ पित्तात्मको द्रुतगतिवरदाहपाकस्फोटप्रभेदबहुल:. क्षतजप्रकाशः॥ दोपप्रवृद्धिहतमांसशिरो यदा स्यात्स्रोतोजकर्दम- निभो न तदा से सिंध्येत् ॥३॥ वायुका विसर्प काला, पतला, खरदरा होता है, अंगडाई बहुत आती हैं, भेद- नकेसी पीडा और दर्द होता है तथा वातज्वरकेसे चिह्न होते हैं और जिसमें दग्ध- केसे गंडे विषम पडजायँ ऐसे दूषित होनेसे वह विसर्प (वातविसर्प) त्यागने योग्य (असाध्य ) होता है ॥ २ ॥ पित्तका विसर्प शीब फैलनेवाला होता है और उसमें ज्वर तथा दाह होता है और पक जाता है तथा फुसियोंमें विदीर्णता अधिक होती- है तथा क्षतज धावकासा रूप होता है और जिसमें दोपोंकी वृद्धिता और मांस तथा रगोंका नाश हो जाय तथा अंजनकी कीचडके समान जो हो जाय वह पित्त- विसर्प सिद्ध नहीं होता (असाध्य है ) ॥ ३ ॥ (मो० २) गड. अमिमहशः स्फोटः । तपितत्वात् द्वाम्यां वातपित्ताभ्या दूपितत्वात् अथवा अनिवातेनैव दृपिनत्वात् (नि० स०)। (शो० ३) स्रोतोजकर्दमनिम: अंजनसदृशकदमद्रवतुल्य: (इनि घलन.) ॥
निदानस्थान-अ० १०. (५६३) श्लेष्मात्मकः सरति मंदमशीघ्रपाकः स्निग्धः सितक्षवथुरल्प- गुरूग्रकंडूः॥ सर्वात्मकस्त्रिविधवर्णरुजोवगाढेः पक्को नै सिध्यति चं मांसशिराप्रणाशात् ॥ ४॥ सद्यः क्षतत्रणमुपेत्य नरस्य पित्तं रकं च दोषबहुलेस्य करोति शोफम् ॥ श्यावं सलोहितमतिज्व- रदाहेपाकं स्फो टैः कुलत्थसंदृशैरसि तैश्च कीर्णम् ॥ ५॥ कफका विसर्प मन्दगतिसे फैलता है, बहुत दिनमें पकता है, चिकना, सुपेद शोथ होताहै और थोडा मोटा होताहै तथा अधिक खाज होती है । और सन्निपातका विसर्प तीनों भांतिके रंग और स्वेदोंवाला होताहै और अवगाढ (जडवाला)होताहै। यह पके पीछे सिद्ध नहीं होता क्योंकि मांस और रगोंको नाश कर देताहै ॥ ४ ॥ पांचवां क्षतज (चोट लगेमें ) विसर्प होजाताहै वह इस भांति कि सद्यः घावमें पित्त और रक्त अतिदोषयुक्त मनुष्यके कुपित होजाते हैं और चोटके घावमें ऊदा, -लाल शोथ उत्पन्न करते हैं, अत्यन्त ज्वर औरदाह पैदा होजाताहै, घाव पक जाताहै तथा घावके आसपास कुलथी जैसी काली २ फुसियां बहुतसी होजाती हैं॥५॥ सिंध्यंति वातकफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः क्षतकृतचं न सिद्धिमेति ॥ पैत्तानिलावैपि च दर्शितपूर्वलिंगी सर्वे च मर्मसु भवंति हि कृच्छ्रसाध्याः ॥६॥ वायु और कफ तथा अकेले पित्तके विसर्प सिद्ध होजाते हैं परंच सन्निपातका, क्षतज (घाव ) का विसर्प सिद्ध नहीं होता तथा केवल पित्तका और वायुकाभी जो पहले असाध्य कह दिये वे सिद्ध नहीं होते (जैसे वातविसर्प दग्धकेसे गंडों- वाला और पित्तका मांसशिरा नष्ट करनेवाला, कन्नलकी कीचसा ये पहलेही असाध्य कहदिये) तथा मर्मस्थानों में हुए सभी प्रकारके विसर्प कष्टसाध्य हैं विसर्पको डाक्टरीमें ‘एरीसिफलिस' और यूनानीमें 'सुरखवादा' कहतेहैं ॥ ६ ॥ (वक्तव्य) इस विसर्प रोग और कुष्ठांतर्गत विसर्पका भेद कुष्ठाध्यायगत विस- पंकी टिप्पणीमें देखो ॥ अथ नाडी। शोफै नै पक्कमतिपक्वमुपेक्षते यो यो वा बॅणं प्रचुर!यमसाधुवृत्तः॥ अभ्यंतरं प्रविशति प्रविदार्य तस्य स्थानोंनि पूर्वविहितानि ततः से पूर्यः ॥ ७ ॥ तस्यातिमात्रगमनातिरित्यतश्च नाडीव 33 (५६४) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। यद्वहति तेन मैता तु नाडी॥ दोपस्त्रिंभिर्भवति सा पृथगेकार्थ संमूच्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥ ८॥ जो फाँडका शोथ बहुत दिनतक पकेही नहीं और कच्चा विदीर्ण करदे अथवा बहुत दिनतक पके पीछेभी नहीं पूंट ( और उस चीराभी लगाकर न निकाले) अथवा अत्यंत राधवाले कुटिल व्रणमें कुपथ्य करे तो वह पावसहित घाव पूर्वोक्त (त्वचादि ) स्थानोंको विदीर्ण करके भीतरको प्रविष्ट होजाताहै ॥ ७ ॥ वह व्रण अत्यंत बहनसे इधर उधर गतिवाला होकर नाडी ( नाली ) की तरह बहता रहताहै इसस इसे नाडी (नाडीव्रण अर्थात् नासूर ) कहते हैं । यह नाडी ८ प्रकारकी होताहै, तीनों पृथक २ दापोंसे जैस १ वायुस, २ पित्तस, ३ कफसे और संमूच्छित अर्थात् दो दो दोषांस जैस ४ वातपित्त, ५ पित्तकफ, ६ कफवातसे, ७ सन्निपातसे और ८ शल्यसे ॥ ८॥ नाडीव्रणके लक्षण । तत्रानिलात्परुषसूक्ष्ममुखी सशूला फेनानुविद्धमधिक स्रवत्ति क्षपायाम् ॥ तृट्तापतोदसदनज्वरभेदहेतु पीत स्रवत्यधिकमुष्ण- महःसु पित्तात् ॥ ९॥ ज्ञेया कोहहुधनार्जुनपिच्छलांना रात्रि- नुतिःस्तिसितस्कठिना सकंडूः ॥ दोषद्वयाभिहितलक्षणदर्शनेन तिस्रो गतीर्व्यतिकरप्रभवास्तु विद्यात् ॥ १० ॥ उनमें वायुकी नाडीखरदरी, छोट मुहवाली, शुलयुक्त होतीहै, झागस मिला मल- विशेष रात्रिका सावताहै। पित्तकी नाडी तृपा, ताप (जलन), दर्द,सदन (ग्लानि),ज्वर और भेदन इनका हेतु होतीहै और पीला तथा गरम मल दिनको अधिक स्रवताहै।।९।। कफकी नाडीसे बहुत गाढा सुपेद मलिन मल रात्रिमें अधिक स्रवताहै तथा धीमी २ पीडा होतीहै कठिनता और खाज होतीहै। और जिनमेंदी दोषोंके लक्षण हों वे इंजनाडी जाननी । ये गतिके व्यतिकर(भेद)से इंजभी तीन प्रकारसे होती हैं १ वातपित्त, २ वातकफ, ३ कफपित्त ॥ १० ॥ दाहज्वर श्वसनमूछेलवक्रशोपा यस्यां भवत्यभिहितानि च लक्ष- णानि ॥ तामादिशेपवनपित्तकैफप्रकोपाद्वोरामसुक्षयकरीमिव (०८) समूच्छितः मिश्रीकृतद्वरित्यर्थः इति । डल्लनाचार्योऽविधा नाटी वदति । गयदासा- चार्यस्तु पञ्चैव नाट्य इति व्य ख्यानयति यथा-त्रिीमपिः पृथक् तिन एकशश्च समूच्छितः सांनिपाति. कीजियन्या शल्यनिमित्ता चेति । (सो० ११) घोरायसुश्चयरीमित्यत्र घोरा दारुणाम, असुक्षयकरी प्रागातिनी अथवा असुक्षयकरीम्, अरतिकारिणीम् ॥
1 ६९ निदानस्थान-अ० १०. (५६५) कालरात्रिम् ॥ ११ ॥ नष्टं कथंचिदणुमात्रमुदीरितेषु स्थानेषु शल्यमचिरेणं गतिं करोति ॥ सा फेनिले मथितेमच्छमसृग्वि- मिश्रऍष्णं करोति सहसा सँरुजा च पित्तम् ॥ १२ ॥ सन्निपातकी नाडीमें दाह, ज्वर, श्वास और मूर्छा तथा मुँहमें शुष्कता ये लक्षण होतेहैं यह कालरात्रिकी भांति प्राण हरनेवाली और दारुण दुःख देनेवाली होती- है। इसे वायु, पित्त और कफ इन तीनोंके कोपसे जानों ॥११॥ उदीरित जो त्वचा आदि स्थान उनमें कदाचित् अणुमात्रभी शल्य(कांटा, लोहा, पत्थर, शिला आदि) हो तो शीघ्रही व्रणमें गति उत्पन्न करताहै और उसमेंसे फनयुक्त, मथितसा, स्वच्छ, रुधिरसे मिला हुआ, गरम मल तथा पित्त कष्टके साथ निकलताहै ॥ १२ ॥ स्तनरोग। यावत्यो गतयो यैश्च कारणः संभवंति हितावन्तः स्तनरोगाः स्युः स्त्रीणां तैरेवं हेतुभिः ॥ १३ ॥ धमन्यः संवृतद्वाराः कन्यानां स्तनसंश्रिताः ॥ दोषावितरात्तासां न भवति स्तनामयाः ॥ १४ ॥ तासासेव प्रजातानां गर्भिणीतां तु ताः पुनः ॥- स्वभा- वादेव विवृता जायंते संभवत्यतः॥१५॥ जितने हेतुओंस जितनी गति होतीहैं (अर्थात् १ वायु, २ पित्त, ३ कफ, ४ सन्निपात, ५ अभिवातसे ) उतनेही प्रकारके स्तनरोग स्त्रियोंकी उन्ही उन्हीं कार- णोंसे होते हैं ।। १३ ॥ कन्याओं (लडकियों) के स्तनोंकी नाडियों के द्वार बंद होतेहैं इससे उनमें दोषोंकावितरण न होनेसे उनके स्तनोंमें रोग नहीं होते ॥१४॥ और जब स्त्री युवा होतीहैं तब गर्भवती होनेकी दशामें अथवा प्रसूता होनेकी दशामें वे स्तनकी नाडियोंके द्वार स्वभावहीसे खुले होतेहैं इस हेतु तव स्तनके रोगभी होतेहै ॥ १५ ॥ सप्रसादो मधुरः पक्काहारंनिमित्तजः ॥ कृत्स्नदेहस्तिनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते ॥ १६ ॥ विशस्तेष्वपि देहेषु यथा शुक्रं न दृश्यते ॥ सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्रलक्षणमुच्यते ॥ १७ ॥ तदेव चेप्टयुक्तेर्दर्शनात्स्मरणादपि ॥शब्दसंश्रवणास्पर्शात्संघर्षाच्च प्रव- (श्लो० १२) लावमित्यध्याहारः । (श्नो० १३ ) यैरेव वातपित्तकफसन्निपाताभिघातैः कारण स्तरेव हेतुभिः स्तनरोगाः स्युः । (श्लो० १७) विशस्तेषु मारितेपु । विशस्त: नाशिते मारिते ( इति शब्दस्तोस.)। विशस्तेषु इत्यत्र केचित् विस्तेषु इति वा पाठं पठति । विस्तेषु विस्तीर्णेषु ॥ ।
. (५६६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। तते ॥१८॥ सुप्रसन्नं मनस्तत्र हैर्षणे हेतुरुच्यते ॥ आहाररसयो- नित्वादेव स्तन्यमपि स्त्रियाः ॥ १९॥ तदेवापत्यसंस्पर्शादर्श- नात्स्मरणादपि ॥ ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्सप्रवर्तते ॥ स्नेही निरंतरस्तत्र प्रस्रवे हेतुरुच्यते ॥२०॥ आहारके परिपाकसे उत्पन्न हुआ जो शुद्ध और मधुर समस्त शरीरव्यापी रसका सार है वह जब सम्पूर्ण शरीरसे स्तनों (चुचियों) में प्राप्त होता है तब ( श्वेत- भावको प्राप्त हुआ) दुग्ध कहलाता है ॥ १६॥ विशस्तदेह अर्थात् मृतशरीरमें जैसे शुक्र नही दीखता है ( इसी प्रकार मृतशरीरके चीरनेस दुग्धभी किसी एक जगह स्तन आदिमें नहीं पाया जाता) इसीसे दुग्धभी समरत शरीरके आश्रय होनेसे शुक्रके लक्षणवाला (शुक्रकी भांति ) कहा जाता है अथवा कई विशस्त'की जगह 'विसृत' ऐसा पाठांतर मानते हैं कि,जैसे सर्वत्र फैले हुए शरीरमें शुक्र नहीं दीखता वैसही दुग्धभीइत्यादि परन्तु पहिलाअर्थ ठीक है ॥ १७॥ वह सर्व शरीरवर्ती शुक्र प्यारी स्त्रीके दर्शनसे, ध्यानसे, शब्द सुननेसे, स्पर्शसे हर्षित होकर प्रवृत्त होता. है (शुक्रधरा कलामें आता है ) ॥ १८॥ हर्षित होनमें प्रसन्नमनही कारण होता- है (जैसे अभीष्ट स्त्रीके दर्शन स्पर्शादिसे पुरुषके सब शरीरसे निचुडकर शुक्र शुक्रधरा कलामें प्राप्त होता है तब पुरुषको चैतन्यता, मेट्रमें स्थूलता और कठोरता आजाती है (ऐसेही आहारके रससे उत्पन्न होनेके कारणसे स्त्रियोंका दुग्धभी सब शरीरसे निबुड २ कर स्तनोंमें आता है (तब स्तन स्थूल और भारी होजाते हैं)। ॥ १९ ॥ वह (स्त्रियोंका दुग्ध ) संतान के स्पर्शस, दर्शनसे, स्मरणसे, शरीरके ग्रह- णसे, शुक्रकी भांति (जैस शुक्र वीर्यधराकलामें आजाता है वैसे ) स्तनोमें दुग्ध आजाता है और निरंतर अधिक जो स्नेह है वही इसके झिरने, टपकने या निक- लनेका कारण होता है ॥ २० ॥ दूषित स्तन्यके लक्षण। तत्कषायं भवेद्वातात् क्षितं च प्लवंतेम्भसि ॥ पित्तादम्लं च कर्टकं राज्योम्भसि च पीतिकाः॥ २१॥ कफाद्धनं पिच्छलं च जले वाप्यवसीदति ॥ सर्वैर्दुष्टैः सर्वलिंगमभिघाताच्च दुष्यति ॥ २२ ॥ जो स्त्रीका दुग्ध कसला हो और पानीमें बूंद डालनेसे ऊपरही तिरता फिरे उसे वायुसे दूषित जानो तथा जो स्वादमें अम्लता लिये हो या चरपराट युक्त हो और जलमें डालनेसे पीली लहरेंसी दीखें तो उस दुग्धको पित्तदूषित जानों ॥२१॥ कफसे दूषित दुग्ध भारी और गाढा होता है तथा जलमें बूंद डालनेसे डूब जाता- । । ११ ७१ निदानस्थान-अ० ११. (५६७) है और जिसमें सब लक्षण हों वह तीनों दोषोंसे दूषित होता है और अभिघात (चोट लगने ) या मर्दन करने आदिसे भी दुग्ध दूषित होजाता है ।। २२ ॥ शुद्ध स्तन्यके लक्षण। यत्क्षीरमुदके क्षितमेकीभवति पांडुरम् ॥ मधुर चाँविवर्णं चैं प्रसन्नं तद्विनि दिशेत् ॥ २३ ॥ जो दुग्ध जलमें डालनेसे एक जगह होजावे और कुछ २ पीलापन लिये हो तथा स्वादसे मीठा हो और दूषित वर्णवाला ( नीला, पीला, गुलाबी आदि) न हो उसे निदोष जानों ॥ २३ ॥ संक्षीरौ वाप्यदुग्धौ वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः ॥ रक्तं मांस चे संदूष्य स्तनरोगाय कल्पते ॥२४॥ पंचानामपि तेषां तु हित्वा शोणितविद्रधिम्॥ लक्षणांनि समानांनि बाह्यविधिलक्षणः॥२५॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने दशमोऽध्यायः ॥१०॥ दुग्धयुक्त या विना दुग्धके स्त्रीके स्तनोंमें जब वातादि कोई दोष प्राप्त हो तब रुधिर तथा मांसको दूषित करके स्तनरोगका कारण होजाता है ॥ २४ ॥ रक्तकी विद्रधिको छोडकर उन पांचोंके लक्षण बाह्यविद्रधिके लक्षणोंके तुल्य होते हैं (नाडी- व्रणको यूनानीमें 'कुरह' या ' नासूर कहते हैं और डाक्टरीमें 'सेनसयाकानिक अलसर' कहते हैं)॥ २५ ॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा०टी० निदानस्थाने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ एकादशोऽध्यायः ११. अथातो ग्रन्थ्यपच्यर्बुदगलगंडानां निदानं व्याख्यास्यामः । अब यहांसे अगाडी ग्रंथि, अपची, अर्बुद और गलगंड इन रोगोंके निदानका व्याख्यान करते हैं। ग्रंथिनिदान । वातांदयो मांसमसृक् प्रदुष्टाः संदूंष्य मेदैश्च कफाँनुविद्धम् ॥ वृत्तोन्नतं वियथितं तु शो फं कुर्वत्यैतो 'ग्रंथिरित प्रदिष्टं॥१॥ दुष्ट हुए वातादिक दोष मांसको तथा रुधिरको और कफसे मिश्रित मेदकों दूषित करके फैला हुआ तथा ऊँचा और गांठके तुल्य शोथ ( ऊँचाई ) पैदा कर- देते हैं इससे इसे ग्रंथिरोग (गांठ) कहते हैं ॥ १ ॥ (श्लो० १) कफानुविद्ध कफससृष्टम् । चकारादत्र शिराग्रथिह्यः ( इति बलनमतम् ) ॥
(५६८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । आयम्यते व्यथ्यत ऐति तोदं प्रत्यस्यते कृत्यत ऐति भेदम् ॥ कृष्णो मृदुर्वस्तिरिवाततश्च भिन्नः स्रवेच्चानिलजोत्रमच्छम् ॥२॥ दंदह्यते धूप्यति चार्तिमानं पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ॥ रक्तः सपीतोप्यथवापि पित्ताद्भिन्नः स्त्रवेंदुष्णमतीव चास्त्रम् ॥ ३ ॥ शीतो विवर्णोल्परुजोतिकडुः पाषाणवत्संहननोपपन्नः॥ चिराभि- वृद्धिश्च कफप्रकोपाद्भिन्नः स्रवेच्छुक्लपनं च पूयम् ॥ ४॥ जो ग्रंथि (गांठ) फूले, व्यथितसी हो, जिसमें चीस हो तथा चमचमाट हो, विदीर्णसी होती हो, फटीसी जाती हो, सांवला रंग हो, कर्कश हो, मशकसी फैली हो और टूटनेपर ( या नश्तर लगानेपर ) स्वच्छ, सुरख रुधिर निकले वह वात- ग्रंथि है ॥ २ ॥ जिसमें दाह हो, संताप अधिक हो, पकाईसी जाती हो, अति प्रज्वलित ( गरम) सी हो और लाल, पीला रंग हो, फूटनेपर गरम और अधिक रक्त निकले वह पित्तग्रंथि है ॥ ३ ॥ जो छूनेमें शीतल हो, जिसका वर्ण अन्यथा न हो (त्वचाके रंग हो), जिसमें स्वल्प पीडा हो, खाज अधिक हो और पत्थर जैसी कडी हो, मलने या दवानेसे चैन मालूम हो, बहुत समयमें बढे और फूटनेपर सुपेद, गाढी राध निकले वह कफकी ग्रंथि है ॥ ४ ॥ शरीवृद्धिक्षयवृद्धिहानिः स्निग्धो महाँनल्परुंजोतिकंडुः ॥ मेदैः- कृतो गच्छति चाँतिर्सिन्ने पिण्याकसर्पिः प्रतिमं तु मेदैः॥५॥ व्यायामजातैरवलस्य तैस्तैराक्षिप्य वायुर्हि शिराँप्रतानम् ॥ संपीड्य संकोच्य विशोष्य वा पिथि करोत्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ जो ग्रंथि शरीरकी वृद्धि और क्षयके अनुसार बढती घटती रहे, बहुत स्निग्ध हो, जिसमें पीडा अल्प हो, खाज अधिक हो और जिसको अधिक भेदन करनेसे तिलकी पिट्ठी, वृत इनके समान मेदसा निकले तो वह मेदकी ग्रंथि है ।। ५ ॥ यदि दुर्बल मनुष्य अति व्यायाम (परिश्रम) करे तो उन्हीं व्यायामोंसे कुपित (लो० २) आयम्बते वायोराकर्षणेन दीर्घ इव क्रियते । प्रत्यस्यते कुप्यते। (श्लो० ३) अति- मात्रं धूति अतिशयेन संताप करोति ( इति डल्लनः)। (भो०४) पाषाणवत् कठिन इति शेषः । संहननोपपन्नः सहननायोपपन्नः पाडनप्रिय इत्यर्थः । (सो०६) वृद्धवाग्भटे तु विशेषः-अस्थिग्रंथि: मगनथिश्च यथा-"अस्थिभगाभिघाताभ्यामुन्नतावनतं तु यत् । सोस्थिप्रथि:-" इतिव्रणग्रंथियथा-"आपदे रूदमा वा व्रणे सर्वरसाशिनः । साढे वा बधरहिते गात्रेश्माभिहतेथवा ।। वातोत्रमनुतं दुष्टं संशोध्य अथित प्रणम । स्यात्तदाहः कहमान्त्रणग्रथिरय स्मृतः ॥" (इति वृद्धवा मटः) ।
" निदानस्थान-अ० ११. (५६९) वायु नसोंके जालको इकट्ठा करके अथवा दबाकर या सकोडकर या शोषित करके ऊँची, फैली हुई, ग्रंथि शीव उत्पन्न करता है (वह शिरा अर्थात् नसोंकी ग्रंथि है)॥६॥ ग्रंथिः शिरांजः स तु कृच्छ्रसाध्यो भैवेद्यदि स्यात्सरूँजश्चर्ला । अरुक् स एवाप्यंचलों महांचं मोत्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥७॥ वह शिराकी ग्रंथि ( नसोंकी गांठ ) यदि पीडायुक्त हो तथा सरकती हो तो कष्टसाध्य होती है और यदि उसमें कुछ भी दर्द न हो और स्थिर हो, बडी हो, तथा मर्मस्थान में हो तो वह ग्रंथि त्याग करने योग्य (असाध्य ) है ॥ ७ ॥ अपचीनिदान। हन्वस्थिकक्षाक्षकबाहुसंधिमन्यागलेषूपचित तु मेदैः ॥ ग्रंथि स्थिरं वृत्तमायत" वा स्निग्धं कैफचाल्परुज करोति ॥ ८ ॥ ते ग्रंथिभिश्चामलकास्थिमात्रैर्मत्स्यांडजॉलप्रतिमैस्तथान्यैः ॥ अनं- न्यवरुपचीयमानं चयकर्षादपची वेदति ॥९॥ ठोढीके अस्थि, काख, नेत्रके कोये, भुजाकी संधि, कनपटी और गला इन स्था- नोंमें मेद और कफ ( दूषित हो) स्थिर, गोल, चौडी, फैली, चिकनी, अल्प पीडा- वाली ग्रंथि उत्पन्न करते हैं ।। ८ । आमलेकी गुठली जैसी गांठों करके तथा मछ- लीके अंडोंके जाल जैसी त्वचाके वर्णकी अन्य गांठों करके उपचीयमान (संचित) होती है इससे चय ( संचय) की उत्कर्षतासे इसे अपची कहते हैं ॥ ९ ॥ कंडूयुतैस्तेल्परुजः प्रभिन्नाः स्रवति नश्यति भवंति चान्ये । मेदःकफाभ्यां खलु रोग एष सुदुस्तरो वर्षगणांनुबंधः ॥ १० ॥ यह अपची रोग खाजयुक्त होता है और अल्पपीडा होती है इनमेंसे कोई तो 'फूटकर बहने लगजाते हैं और कोई स्वयं नाश होजाते हैं यह रोग मेद और कफसे होता है यदि यह कई वर्षोंका होजाय तो नही जाता ॥ १० ॥ अर्बुद । गात्रप्रदेशे क्वचिदेव दोषाः संमूच्छिा मांसमभिप्रदूष्य ॥ वृत्तं स्थैिरं मंदसैंजं महांतमनल्पमूलं चिरवृद्धयपाकम् ॥ कुर्वति मांसोपंचयं च शोफ तदैर्बुदं शास्त्रविदो वैदति ॥ ११ ॥ (श्लो० १०) वर्षगणानुबंधः सुदुस्तरः इति-बहुवर्षानुबंधो दुस्साध्यः । (श्लो० ११) समृच्छिताः स्थिताः । महात ग्रयः सकाशाद्दीर्घम् । ( इति भावमिश्रः) ।
७४ r (५७०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। शरीरकं किसी प्रदेशमें मूच्छित हुए वातादि दोष मांसको दूषित करकं गोल, स्थिर, अल्प पीडावाले, बडे और फैली जडवाले तथा बहुत दिनमें कुछ २ बर्टन- वाले, परकर नहीं फूटनेवाल ऐसे मांसक पिंडेसे तथा शोथ उत्पन्न करतेहैं उन्हें शास्त्रज्ञ अर्बुद अर्थात् रसोली कहतेहैं ॥ ११ ॥ वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मांसेन च मेदसा वा ॥ तज्जायते तस्य च लक्षणांनि ग्रंथेः समानानि संदा भवंति॥१२॥ वायुसे, पित्तसे, रुधिरसे, कफसे तथा मांससे अथवा मेदसे यह जो अदरोग, होता है उसके लक्षण सदैव ग्रंथिक समान होतेहैं ॥ १२ ॥ दोषः प्रदुष्टो रुधिरं शिरास्तु संपीय संकोच्य गतस्तु पाकम् ॥ सास्त्रविमुन्नह्यति मांसपिंडं मांसांकुरैराचितमांसंवृद्धिम् ॥१३॥ स्रवत्यजत्रं रुधिरं प्रदुष्टमसाध्यमेतद्रुधिरात्मकं स्यात् ॥ रक्तक्षयो; पद्रवपीडितत्वात्पीडुर्भवेवुदैपीडितस्तु ॥ १४ ॥ दूषित हुआ (पित्त ) दोष रुधिर और शिराओंको पीडित करके तथा संकुचित करके जब कभी पाकको प्राप्त हो तब स्त्रावयुक्त-मांसपिंडको तथा मांसोंके अंकुर- युक्त मांसवृद्धिको उत्पन्न करताहै ॥१३॥ उससे दूषित हुआ रुधिर बहुत निकलता- है। यह रक्ताद असाध्य है क्योंकि इसमें रक्तक्षयके उपद्रवोंसे पीडित होनेके कारण रक्तार्बुद रोगवाला पीला पडजाताहै (या उसे पांडुरोग होजाताहै) ॥ १४ ॥ मांसावंद। मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेंगें मांसं प्रर्दुष्टं प्रकरोति शोफैम् ॥ आवे- दन स्निग्धमनन्यवर्णमपाकममोपैममप्रचाल्यम् ॥ १५॥ प्रदुष्ट- मांसस्य नरस्य वाढमेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ मांसार्बुदे वेतंद- सांध्यमुक्तं सांध्येष्वपीमॉन्युपवर्जयेत्तु ॥१६॥ संप्रचुत मर्मणि यच्च जांत स्रोतःसु वाँ यच्च॑ भवेदील्यम् ॥ यज्जायतेऽन्यत्खलु पूर्व- ( लो० १२ ) ग्रथे. समानानि वातिकपैत्तिक श्लैष्मिकमेदोजानामधंदाना लक्षणानि भवंतीति ।। (ो० १३३१४) दोषोऽत्र पित्तम् । उन्नति उद्गतं करोति 'गतस्तु पाकम्' इत्यत्र ततस्त्वपाकमिति वा पाट । अपाक यथास्यात्तथा कोर्य. पूयमभृत्वा अजस्रं रुधिरमेव सवति । (श्लो० १५) मुष्टिप्रहारा- दिभिरिवत्र आदिशब्दन अन्योपि हेतुर्बोद्धव्य. । (श्लो० १६) बाढम् अतिशयेनेति (२० स्तो०); मासपरायणस्य मामभक्षणशीलस्य ( इति डल्लन.)। अत्य चतुर्थपादमग्रिमेनाईलोकेनान्वेतव्यम् ।।
७५ निदानस्थान-अ० ११. (५७१) जाते ज्ञेयं तदध्यर्बुदमर्बुदज्ञैः॥ यद्वंद्वजातं युगपत्प्रकामाद्विरर्बुद तंचं भवेदाध्यम् ॥ १७॥ . पीडित शरीरमें मुष्टि अथवा काष्ठादिकं प्रहार आदिसे दूषित हुआ मांस ऐसे शोथको पैदा करता है जिसमें वेदना नरहे, स्निग्ध हो,त्वचाके वर्णकाही हो, पककर फूटे नहीं, कडा पत्थरसा हो तथा चलायमान नहीं हो ( उसे मांसार्बुद कहते हैं) (यहां आदि शब्दके कथनसे प्रहारके सिवाय दबजाने कुचला जाने इत्यादि कारणों तथा अन्य कारणोंसेभी मांसाचंद हो सकता है ) ॥ १५॥ प्रायःमांसार्बुद मांसभोजी मनुष्योंके जब मांस दूषित होता है तब विशेष करके होता है । और यह मांसार्बुद असाध्य कहा है तथा साध्य वातादिके अर्बुदोंमेंसेभी आगे कहे हुए अर्बुदोंको (असाध्य जानके ) त्याग देना चाहिये ॥ १६ ॥ जो सदा झिरता हो अथवा जो मर्मस्थानों में हो अथवा जो स्त्रोत अर्थात् द्वारों में हो तथा चलायमान न हो और जो पहले अर्बुद हो उसीके समीप और अन्य अर्बुद उत्पन्न हो जाय तो उसे वैद्य अध्यर्बुद कहते हैं । अथवा दो दोषोंस एकही वार पास पास दो अर्बुद पैदा हों तो वे द्विरर्बुद होते हैं और येभी असाध्य हैं ॥ १७ ॥ ने पार्कमायोति कफाधिकत्वान्मेदोधिकत्वाचं विशेषतस्तु । दोषस्थिरत्वाद्रर्थनांच्च तेषां सर्वाबुदीन्येवं निसर्गतस्तु ॥ १८ ॥ ये अर्बुद इस हेतुसे पाकको प्राप्त नहीं होते कि इनमें ग्रंथिकी अपेक्षा कफका भाग बहुत अधिक होता है और विशेष करके मेदका भाग तो बहुतही अधिक होताह तथा दोषकी स्थिरता हो जाती है और गांठसी बँध जाती है जिससे स्व- भावहीसे सब अर्बुद प्रायः नही पकते ॥ १८ ॥ गलगंड। वातः कफश्चैवं गले प्रवृद्धौ मध्ये तु संसृत्य तथैवं मेदः ॥कुर्वन्ति गंडं क्रमशः स्वलिंगैः समन्वितं "तंगलगण्डमाहुः॥१९॥तोदा- न्वितः कृष्णशिरावनद्धः कृष्णोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु ॥ मेदो- न्वितश्चोपचितश्च कालाद्भवेत्प्रदिग्धे चं गले रुंजश्च ॥ २०॥ यदि बढेहुए वायु और कफ गले ( की त्वचादि) में स्थित होकर तथा मेदमें स्थित होकर अपने अपने लक्षणों सहित यथाक्रम गंड अर्थात् फोडा पैदा करें तो १३ (श्लो० १८) निसर्गतः स्वभावत एवेति । (मो०१९) गडः स्फोटकः । स्वलिंगीतादिलक्षणैः। (भो०२०) प्रदिग्धे प्रकर्षण लिप्ते । . . - सुश्रुतसंहिता-भा० टी० (५७२) ७६ उसको गलगंड रांग कहतेहैं ॥ १९ ॥ जो गलगंड पीडायुक्त हो, काली नसोंसे 'पूरित हो, रंग काला अथवा रक्त हो वह वायुका गलगंड होता है और इसमें देरसे भेदका संचय होता है, गलेके लिप्त होनेपर पीडा होती है ॥ २० ॥ वातजगलगंडके लक्षण । पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्धैयपाको यदृच्छया पाकर्मियात्कदाचित् ॥ वैरैस्यमास्यस्य च तस्य जंतोर्मवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥२१॥ जो कठोरतायुक्त हो बहुत दिनमें बढे और पककर फूटे नहीं तथा कदाचित् अपनी इच्छासे पक (फूट ) भी जाय और उस मनुष्यके मुँहमें विरसता हो तथा ताल और गलेमें खुश्की हो (तो वायुका गलगंड हो) ॥ २१ ॥ कफजगलगंडके लक्षण । स्थिरः सवर्णोल्परुगुणकंडुः शीतो महांश्चापि कफात्मकस्तु॥चिराभि- वृद्धिं कुरुते चिराद्वा प्रपच्यते मंदरुज कदाचित् ॥ माधुर्यमास्य- स्य च तस्य जन्तोर्भवेत्ता तालुगलप्रलेपः ।। २२ ॥ जो स्थिर हो, पके वर्णका हो, जिसमें थोडी पीडा हो, खान अधिक हो, (स्प- शमें ) शीतल हो, स्थूल हो,बहुत दिनों में बढे और बहुतही दिनीम पके भी और मंद २ पीडा हो और उस मनुष्यके मुखमें मीठापन हो तथा तालु और गले में लेपसा हो तो कफका गलगंड है ।। २२ ।। मेदोजगलगंडके लक्षण । स्निग्धो मृदुः पांडुरनिष्टगंधः मेदाकृतो नीरुगथातिकंडुः ॥ प्रलं- यतेलावुरिवाल्पमूलो देहानुरूपक्षयवृद्धियुक्तः ॥ स्निग्धास्यता तस्य भवेच्च जैतोर्ग लेन शब्दं कुरुते च नित्यम् ॥ २३ ॥ जो चिकना हो, पीला हो, जिसमें बुरी बास आवे, पीडा नहीं हो, खाज विशेष हो और जो धीया तोंबीके तुल्य लटके और जड से कुछ पतला हो तथा शरी- रकी वृद्धि और क्षयके अनुसार छोटा बडा हो और उस मनुष्यका मुँह चिकना हो तथा नित्य गलेसे शब्द कर तो उसे मेदकी प्रधानताका गलगंड जानों ॥ २३ ॥ गलगंडकी असाध्यता। कृच्छ्रांच्छंसंतं मृदु सर्वगात्रं संवत्सँरातीतमरो,कार्तम् ॥ क्षीणं तु वैद्यो गलगंडिनं ते भिन्नस्वरं "चै विवर्जयेत्तु ॥२६॥ (शो० २२ ) वातगलगडानतर श्लेष्मगलगंडस्यैव लक्षणमुक्त पैत्तिकगलगडाभावात् ॥
७७ निदानस्थान-अ० १२. (५७३) -- जो गलगंडका रोगी मनुष्य कष्टसे श्वास लेवे और सब गात्र कोमल होजायें तथा एक वर्षसे अधिकका गलगंड हो, अरुचि हो, क्षीण होजाय तथा जिसका स्वर भंग होजाय ऐसे गलगंडके रोगीको वैद्य त्याग देवे ॥ २४ ॥ निबद्धः श्वयंथुर्यस्य मुष्कवल्लंबते गले ॥ महान्वाँ यदि वा हस्वस्त गडमिति निर्दिोत॥ २५ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थान एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ जिसके गले में नियमित शीथ हो और वह वृषणकी तरह लटके, बड़ा हो या छोटा हो उसको गलगंड कहते हैं ॥ २५ ॥ परिशिष्ट । भावप्रकाशोक्त-गंडमालालक्षण । श्लोक-कर्कधुकोलामलकममाणौ कक्षांसमन्यागलवंक्षणेषु ॥ मेदःकफाभ्यां चिरमंदपाकैः स्याद्डमाला बहुभिश्च गंडैः॥ १॥ अर्थ-छोटे या बडे बेर तथा आंवलेके प्रमाण कांख, कांध और गलेसे पीछेकी मोटी नसें तथा गलेके वंक्षण अर्थात् हाथोंकी संधि (हँसलीके नीचे ) में यदि मेद और कफसे उत्पन्न हुए बहुत दिनोंमें मन्द मन्द पकनेवाले बहुतसे गंड होजाय तो उन्हें गंडमाला कहते हैं ॥ १ ॥ गंडमालाको डाक्टरीमें 'इस्काफ्यूला' कहते हैं और यूनानी हकीम अर्बुदको 'सलआ'कहतेहैं और ग्रंथिको अकद' कहतेहैं और गलगंडको भी इसीका भेद कहतेहैं।। इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा०टी० निदानस्थान एकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः १२. अथातो वृद्धथुपदंशश्लीपदानां निदान व्याख्यास्यामः । यहांसे अगाडी वृद्धि ( अंडवृद्धि), उपदंश, श्लीपद इन रोगोंके निदानकी व्याख्या करते हैं। अंडवृद्धि। वातपित्तश्लेष्मशोणितमेदोसूत्रांत्रनिमित्ताः सप्त वृद्धयः। तासां मूत्रांत्रनिमित्ते वृद्धी वातसमुत्थे केवलसुत्पत्तिहेतुरन्यतमः ॥१॥ (गद्य १) वृद्धिः अडवृद्धिः । मूत्रात्रनिमित्ते वृद्धी वातसमुत्थे केवलमुत्पत्तिहेतुरन्यतमः । अस्य स्पष्टोथ: मूत्रनिमित्ता वृद्धिः अंत्रनिमित्ता वृद्धिश्च द्वे वातसमुद्भवे एव केवलमुत्पत्तिहेतुरन्यः यथा मूत्रवृद्ध उत्पत्ति- हेतुर्मूत्रम् अत्रवृद्धरत्रम् । अथवा अनयोाध्योः निमित्त तु वायुरेव केवलमुत्पत्तिहेतुरन्यतमः यथा मूत्रवृद्ध रुत्पत्तिहेतुर्मूत्रसंधारणम् अत्रवृद्धेः भारदरणमिति ॥ - (५७४) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। अधः प्रकुपितोऽन्यतमो हि दोपः फलकोशवाहिनीरभिप्रपद्य धमनीः फलकोशयोवृद्धिं जनयति तां वृद्धिमित्याचक्षते ॥२॥ वायु, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, मूत्र तथा अंत्र ( अंतडी ) इन कारणोंसे वृद्धि (अंडवृद्धि) रोग सात प्रकारका होताहै। इनमेंसे मूत्रन और अंत्रज वृद्धिकानि- मित्तभी वायुहीसे उत्पन्न होताहै, केवल उत्पत्तिका हेतुमात्र और होताहै (अर्थात् मूत्रवृद्धि और अन्त्रवृद्धिकी उत्पत्तिके हेतु क्रमसे मूत्र और अन्त्र हैं अथवा मूत्र- संधारण मूत्रजवृद्धिका अन्य हेतु और भारहरण (बोझ उठाना ) अंत्रजवृद्धिका अन्य हेतु होजाताहै)॥ १॥ नीचे वस्तिस्थानमें कुपित हुआ कोईसा ( वातादि) दोष अंडकोशवाहिनी धमनीमें प्राप्त होकर अंडकोशोंमें वृद्धि उत्पन्न करदेताहै उसे वृद्धिरोग कहतेहैं ॥२॥ वृद्धिका पूर्वरूप । तासां भविष्यतीनां पूर्वरूपाणि वस्तिकटीमुष्कमेटेषु वेदना । मारुतनिग्रहः । फलकोशयोः शोफश्चेति ॥३॥ जब अंडवृद्धि होनेवाली होतीहै तब उसके ये पूर्वरूप होते हैं। वस्ति, कमर,कृपण, लिग इनमें पीडा हो, अधोवायुका निरोर हो तथा अंडकोशमें सूजन होनेलगे॥३॥ तत्रानिलपरिपूर्णां वस्तिमिवाततां परुषामनिमित्तानिलरुज वातवृद्धिमाचक्षते। पक्वोदुंवरसंकाशां ज्वरदाहोमवती चाशुसमु- स्थानपाकां पित्तवृद्धिम् । कठिनामल्पवेदनां शीतां कंडूमती श्लेष्मवृद्धिम् । कृष्णस्फोटावृतां पित्तवृद्धिलिंगां रक्तवृद्धिम् । मृदुस्निग्धां कंडूमतीमल्पवेदनां तालफलप्रकाशां मेदोवृद्धिम् ॥४॥ सूत्रसंधारणशीलस्य मूत्रवृद्धिर्भवति सा गच्छतोवुपूर्णातिरिव क्षुभ्यति मूत्रकृच्छ्रवेदनां वृषणयोः श्वयधु कोशयोश्चापादयति तां मूत्रवृद्धि विद्यात् ॥ ५॥ उनमेंसे जो वायुसे भरी मशककी तरह फूली हो, खरदरी हो, विना कारण वायुकी पीडा हो तो उसे वायुकी अंडवृद्धि कहतहैं । जिसमें वृषण पके गूलरके वर्ण हो, मनुष्यको ज्वर, दाह और गरमीकी व्याधि हो तथा शीव्रही वठें और पकजायें उसे पित्तकी अंडवृद्धि कहते हैं । जिसमें कठिनता हो, अल्प पीडा हो, वृषण ठंडे (गद्य २) फलम् अहम् ॥
७९ निदानस्थान-अ० १२. (५७५) हों, खाज विशेष हो वह कफकी अंडवृद्धि है । जिसमें वृषणोंपर काली २ बहुतसी फुन्सियां हों और प्रायः पित्तवृद्धिके लक्षण हों वह रुधिरकी अंडवृद्धि है । जिसमें वृषण कोमल हों, चिकनाई हो, खाज हो,पीडा अल्प हो, तालफलके तुल्य दीखे उसे मेदकी अंडवृद्धि कहतेहैं ॥४॥ जो मनुष्य मूत्रको रोके प्रायः उसके.मूत्रज अंडवृद्धि होती है वह चलते हुए पानीसे भरी मशककी तरह थलथलाती है और मूत्र कठिन- तासे आता है तथा वृषणों और वृषणकोश (थैलियों) में शोथे पैदा कर देतीहै उसे मूत्रकी अंडवृद्धि जानना चाहिये ॥ ५ ॥ भारहरणवलवद्विग्रहवृक्षप्रपतनादिभिरायासविशेषर्वायुरतिप्र- वृद्धः प्रकुपितश्च स्थूलांत्रस्येतरस्य चैकदेशं द्विगुणमादायाधो गत्वा वंक्षणसंधिमुपेत्य ग्रंथिरूपेण स्थित्वाऽप्रतिक्रियमाणे च कालांतरेण फलकोशं प्रविश्य मुष्कशोफमापादयत्याध्मातो व- स्तिरिवाततः प्रदीर्घः शोफो भवति । सशब्दमवपीडितश्चोर्द्धमु- पैति विमुक्तश्च पुनराधमति तामंत्रवृद्धिमसाध्यामित्याचक्षते ॥६॥ वोझा उठानेसे, बलवान्के साथ लडने ( कुश्ती करने) से, वृक्षसे गिरने आदि विशेष कष्टोंसे वायु अत्यंत बढकर और कुपित होकर मोटी आतोंमेंसे अथवा अन्य पतली आंतों से किसीके एकदेशको दोहरा करके नीचेको पहुँचा वृषणोंकी संधिमें लाके ग्रंथिरूपसे स्थित होता है और यदि उसकी प्रतिक्रिया नहीं कीजाय तो वह समय पाकर अंडकोशमें प्रविष्ट होजाता है और वृषणों में सूजन उत्पन्न करता है और फूलीहुई मशककी तरह फैला हुआ बड़ा शोथ होता है और ऊपरको दवा- नेसे शब्दके साथ जारको चढ जाता है और छोड देनेसे फिर उतर आता है उसे अंत्रज (अंतडीकी ) अंडवृद्धि कहतेहैं और इसको असाध्य कहते हैं (अंडवृद्धिको डाक्टरीमें 'इन्फलमिशन औफदी टिसटीकिल्स' कहते हैं और यूनानीमें 'ताजीमुल अनीसैन' कहते हैं) ॥ ६ ॥ उपदंशनिदान । तत्रातिमैथुनादतिब्रह्मचर्याद्वा तथा ब्रह्मचारिणी चिरोत्सृष्टां रज- स्वलां दीर्घरोमां कर्कशरोमां संकीर्णरोमां निगूढरोमामल्पद्वारां महाद्वारामप्रियामकामामचौक्ष्यसलिलप्रक्षालितयोनिमक्षालित- योनि योनिरोगोपसृष्टां स्वभावतो वा दुष्टयोनि वियोनि वा नारी- मत्यर्थमुपसेवमानस्य तथा करजदशनविषशूकनिपातनादर्दनाद्ध- ८० १ (५७६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। स्ताभिघाताच्चतुष्पदीगरानादचौक्ष्यसलिलप्रक्षालनादवपीडनाच्छु- सूत्रवेगविधारणान्मैथुनाते वाप्रक्षालनादिभिर्मेद्रूमागम्य कुपि. ता दोषाः क्षतेऽक्षते वा श्वयथुसुपजनयंति तमुपदंशमित्याचक्षते ॥७॥ स पंचविधस्त्रिभिदोपैः पृथक्समस्तैरसृजा चैकः ॥८॥ अतिमैथुनसे, अति ब्रह्मचर्यसे तथा ब्रह्मचारिणी, बहुतदिनकी छुटी हुई, रजस्वला, बडे रोमोवाली, कडे रोमांवाली, संकीर्ण रोमोवाली स्त्रीके साथ संग करनेस तथा जिसके भीतरको वाल घुसे हों उस स्त्रीक संगसे तथा जिसकी योनि तंग हो या जिसकी बडी हो उसके संगसे तथा जो अप्रिय हो, जो मैथुनकी इच्छा न करे या जिसने मलिन जलसे योनि धाई हो या जिसने (बहुत दिनस) योनि धाई नहीं हो या जिसकी योनिमें कोई व्रणादि रोग हो या स्वभावहीसे जिसकी योनि दूपित (अस्थ्यादि युक्त) हो या जिसके योनि होही नहीं (अर्थात् हीजड़ी हो जिसके. छोटासा मूत्रमार्ग होताहै ) ऐसी स्त्रियोंके साथ संग करनसे या विशेष स्त्रियोंक पास रहनेसे तथा नाखून, दांत लगनेस, विप, तिनका गिरनेस, दवानेस, हाथके मदनसे, पशुगमनसे, मैले जलसे लिंग धोनेसे, मसलनस, वीर्य और मूत्रके वेग रोकनसे, मैथुनांतमें न धोने इत्यादिसे कुपित हुए वातादि दोप लिंगमें प्राप्त होकर घावमें या विना घावही शोथ पैदा करते हैं इसे उपदंश कहते हैं ॥७॥ यह उपदंश पांच प्रकारका होता है १ वातसे, २ पित्तसे, ३ कफसे, ४ सन्निपातसे और ५ पाँचवां रक्तदोषसे होता है ॥ ८॥ तत्र वातिके पारुष्यं त्वक्परिपुटनं स्तब्धमेद्रता परुषशोफता विवि- धाश्च वातवेदना पैत्तिके ज्वरः श्वयथुः पक्वोंदुवरसंकाशस्तीवदाहः क्षिप्रपाकः पित्तवेदनाश्च । श्लैष्मिके श्वयथुः कंडूमान् कठिनः स्निग्धः श्लेष्मवेदनश्च । रक्तजे कृष्णस्फोटप्रादुर्भावोत्यर्थलसृक्- प्रवृत्तिः पित्तलिंगानि चात्यर्थ ज्वरदाहौशोषश्च याप्यश्च कदाचित् । सर्वजेसलिंगदर्शनमवदरणं शेफसः क्रिमिप्रादुर्भावो मरणं चेति ९ इनमेंसे वायुके उपदंशमें खरदरापन होताहै, लिगकी चमडीमें तर. होजाती हैं, इंद्रिय कड़ी होजातीहै और खरदरा सोजा होताहै तथा अनेक प्रकारकी वायुजनित वेदना होतीहैं । पित्तके उपदंशमें ज्वर हो, शोथ हो, पके गूलरके समान लाल वर्ण हो, बहुत जलन हो, शीव पके तथा पित्तकी वेदना हो । कफके उपदंशमें खाजसे (गद्य ९) कटकैरुपचितं मांसाकुरैः उपचितम् ।।
1 निदानस्थान-अ० १२ परिशिष्ट (५७७) युक्त, कडा, चिकना और कफको वेदनावाला सोजन (शोथ ) हो । रक्तके उपदंशमें काली २ फुन्सियां पैदा हों, अधिक रुधिर निकले, पित्तकेसे लक्षण हों, विशेष कर ज्वर हो, दाह हो, शोष (खुश्की) हो, कभी कभी यह रक्तोपदंश याप्य होजाताहै सन्निपातके उपदंशमें सबके लक्षण होतेहैं, लिंगमें दारुण जखम पड़जातेहैं, उनमें कीड़े पड़जातेहैं तथा मृत्यु होजातीहै ॥ ९ ॥ अथ परिशिष्ट। फिरंगरोगोत्पत्ति । यद्यपि चरक, सुश्रुत, वाग्भट, हारीत आदि सनातन संहिताओंमें फिरंगरोग नहीं लिखा केवल उपदंशही लिखाहै परंतु इस समय जो रोग आतशक ( गरमी) के नामसे विख्यात है और बहुत फैला है वह पूर्वलिखित उपदंशसे विलक्षणही प्रतीत होताहै। चरक, सुश्रुतादिमें जो इसे पृथक् नहीं लिखा इससे जाना जाताहै कि उस समय भारतभूमिमें यह दारुण रोग फिरंग नहीं था परंतु प्रकृतिविरुद्ध अन्यदे- शीय मनुष्योंका यहीं अधिक समागम हुआ तो उनके संगसे इसका प्रादुर्भाव हुआ और भावमिश्रके समयमें इस फिरंगरोगका यहां प्रादुर्भाव होगयाथा इसीसे अपने भावप्रकाश ग्रंथमें भावमिश्रने इस रोगको उपदंशसे पृथक् लिखाहै देखो भाव- प्रकाशमें लिखाहै कि. श्लोक-फिरंगसंज्ञके देश बाहुल्येनैव यद्भवेत् ॥ तस्मात्फिरंग इत्युक्तो व्याधियाधि- विशारदैः ॥ १ ॥ फिरंगिनोङ्गसंसर्गाफिरंगिण्याः प्रसंगतः ॥ व्याधिरागंतुजो ह्येष दोषाणामत्र संक्रमः ॥२॥ अर्थ-फिरंग आदि ठंडे देशों में यह रोग विशेषतासे होताहै इस कारणसे इसका नाम वैद्योंने फिरंगरोगही कहाहै॥१॥ फिरंगी (फिरंगरोगवाले) के अंगके संसर्गसे अथवा फिरंगिणी (फिरंगरोगवाली) स्त्रीके प्रसंगसे यह आगंतुक व्याधि पैदा हुई और) होतीहै इसमें दोषोंकी संक्रामकता प्रसंगसे होतीहै ॥२॥ श्लोक-फिरंगस्त्रिविधो ज्ञेयो बाह्य आभ्यंतरस्तथा ॥ बहिरंतर्भवश्चापि तेषा लिंगानि च ब्रुवे ॥ ३ ॥ तत्र बाह्यफिरमः स्याद्विस्फोटसदृशोल्परुक् ॥ स्फुटितो व्रणवद्वैद्यैः सुखसायोपि स स्मृतः ॥ ४ ॥ संधिष्वाभ्यंतरः स स्यादामवात इव व्यथाम् ॥ शोथं च जनयेदेष कष्टसाध्यो बुधैः स्मृतः ॥५॥ काश्य बलक्षयो नासा- भंगो वृद्धेश्च मंदता ॥ रक्तदोषोस्थिवक्रत्वं फिरंगोपद्वा अमी ॥ ६ ॥ अर्थ-फिरंगरोग तीन प्रकारका होताहै। १'वाह्य, २आभ्यंतर, ३ बाह्याभ्यंतर उनके लक्षण कहतेहैं ॥ ३ ॥ इनमेंसे बाह्य (बाहरी) फिरंगमें फुन्सियासी होतीहैं, कष्टभी अल्प होताहै, फूट जानेपर व्रणकी भांति वैद्योंने सुखसाध्य कहाहै ॥ ४ ॥ आभ्यंतर (भीतरी) फिरंग आमवातरोगकी तरह संधियों में व्यथा और शोथ पैदा १ ३७ (५७८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ८२ करता है यह वैद्योंने कष्टसाध्य कहा है ॥ ५ ॥ इस रोगके ये उपद्रव हैं-कृशता, बलको क्षीणता, नाक भंग होजाना, अग्निकी मंदता, रक्तदोष (खून बिगडजाना), अस्थियोंका टेढा होना । (कई 'रक्तदोष ' की जगह 'अस्थिशाप एसा पाठांतर मानते हैं) ॥ ६ ॥ (वक्तव्य) सुश्रुतपाठी वैद्य “योनिरोगोपसृष्टामुपसेवमानस्य, इस सुश्रुत- वचनानुसार फिरंगरोगका भी उपदंशमेंही अंतर्भाव करते हैं इसी कारण फिरंगयोनि रोगवाली स्त्रीके साथ संग करनसे इसकी उत्पत्ति भी मानत हैं और वहींपर" शुक्रमूत्रवेगविधारणात् । ऐसा भी लिखा है जिससे वर्तमान समयके सुजाकरोग (कृच्छ्र) का भी अंतर्भाव होसकता है परंच भावप्रकाशके अनुसार उपदंश और फिरंगकी औषध और चिकित्सामें अन्तर होनेसे तथा फिरं- गमें आमवातकेसी व्यथा और नासाभंगादि उपद्रवोंके अन्तरसे अवश्य यह पृथ- कही सिद्ध होता है । डाक्टरी) इसे "सिफलिस" और यूनानी हकीम "वादफरंग" या " आतशक" कहते हैं । इति परिशिष्टम् । श्लीपदनिदान । कुपितास्तु दोषाः वातपित्तश्लेष्माणोऽधःप्रपन्ना बक्षणोरुजानुजंघा- स्ववतिष्ठमानाः कालांतरेण पादमाश्रित्य शनैः शोफंजनयंति तत् श्लीपदमित्याचक्षते॥१०॥तत्रिविधं वातपित्तकफनिमित्तमिति ॥११॥ कुपित हुए वायु, पित्त, कफ दोष नीचेको प्राप्त होकर वंक्षण (पावोंकी ऊपरली संधि ), साथल, जानु और जंघा इन स्थानोंमें स्थित हुए समय पाकर पैरों (पिङ- लियों) में प्राप्त होकर धीरे धीरे शोय उत्पन्न करते हैं (पैरको मोटा स्थूल कर- देते हैं ) इसे श्लीपद (पीलपाव रोग ) कहते हैं ॥१०॥ यह तीन प्रकारका होता- है वायुका, पित्तका और कफका ॥ ११ ॥ तत्र वातजं खरं कृष्णं परुषमनिमित्तानिलरुजं, परिस्फुटति च बहुशः। पित्तजंतु पीतावभासमीषन्मृदु ज्वरदाहप्रायश्च । श्लेष्मजं तु श्वेतं स्निग्धावभासं मंदवेदनं भारिकमिति महाग्रंथिक कंटके- रुपचितं च ॥१२॥ तत्र संवत्सरातीतमतिमहद्वल्मीकजातं प्रसुत- मिति वर्जनीयम् ॥ १३॥ भवन्ति चात्र- (गद्य १२) कटकैपचित मासांकुरैः उपचितम् ।। - - - निदानस्थान-अ० १३. (५७९) वायुके श्लोपदमें पांव खरदरा, साँवला, कडा होता है तथा विना हेतु वायुके विकार होते हैं और विशेष करके पॉवका शोथ फटने लगता है (लकीरेंसी होतीहैं) पित्तका श्लीपद हो तो पाँवके शोथमें पीली चमक मालूम हो, कुछ २ कोमल हो तथा प्रायः ज्वर और दाह हो । कफके श्लीपदमें सोजा सुपेद हो, चिकनी चमक हो, मंद पीडा हो,भारीपन अधिक हो,बडी गाँठेंसी हों तथा मांसके अंकुरोंसे व्याप्त हो ॥१२॥ इनमेंसे जो एक वर्षसे अधिक पुराना से, जो साँपोंकी बँबईके समान होगया हो तथा जो नित्य झिरता हो तो (असाध्य जान) त्यागने योग्य है ॥१३॥ इस विषयमें श्लोक हैं- त्रीण्येतानि विजांनीयाच्छीपदानि कफोच्छ्रयात् ॥ गुरुत्वं च मेहत्त्वं च यस्मान्नास्ति विनों कात् ॥ १४ ॥ ये तीनाही प्रकारके श्लीपद कफकी उल्वणतासे होते हैं क्योंकि कफके विना भारीपन और मोटापन नही हो सकता(इससे इस रोगमें प्रधान कफही है)॥१४॥ पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु चे शीतलाः ॥ ये देशास्तेषु जायते श्लीपदानि विशेषतः॥१५॥पादयोर्हस्तयोश्चापि श्लीपदं जायते नृणाम् ॥ कर्णाक्षिनासिकौष्ठेषु केचिदिच्छति तद्विदः ॥ १६ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ जिन देशों में बहुत करके पुराना ( कई वर्षाका भरा)जल हो और वे देश सब ऋतुवों में शीतलही हों ऐसे देशोंमें विशेष करके श्लीपद रोग अधिक होताहै (जैसे विहार, अवध, बंगाल प्रांत के अनूपदेशोंमें यह अधिक होताहै) ॥ १५॥ मनुष्यों के पैरोंमें तथा किसीके हायोंमेंभी यह श्लीपद रोग होताहीहै परंतु कई आचार्य ऐसाभी कहते हैं कि यह श्लीपद कान, नेत्र, नासिका और होठ (तथालिंग) मेंभी हो सकताहै (श्लीपदको डाक्टरीमें "इन्प्लीमेशन औफदीलेग" कहतेहैं और यूनानी- वाले “पीलपाँव " कहतेहैं) ॥ १६ ॥ इति पण्डितमुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥ त्रयोदशोऽध्यायः १३. अथातः क्षुद्ररोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः। अब यहाँसे अगाडी क्षुद्ररोगोंके निदानकी व्याख्या करते हैं। समासेन चतुश्चत्वारिंशत् क्षुद्ररोगा भवंति तद्यथा ॥ १॥ अज- गल्लिका यवप्रख्याऽन्धालजी विवृता कच्छपिका वल्मीकमिंद्रवृद्धा - ८१ .. J ~ (५८०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। पनसिका पाषाणगर्दभो जालगर्दभः कक्षा विस्फोटकोऽग्निरो- हिणी चिप्पं कुनखोऽनुशयी विदारिका शर्कराव॒दं पामा विचार्च- का रकसा पाददारिका कदरमलसेंद्रलुप्तौ दारुणकोऽपिका पलितं मसूरिका यौवनपिडका पद्मिनीकंटको जतुमणिर्मशकश्चर्मकील- स्तिलकालको न्यच्छं व्यंगः परिवर्तिकाऽवपाटिका निरुद्धप्रकाशः निरुद्धगुदोऽहिपूतनं वृषणकच्छ्रगुदभ्रंशश्चेति ॥ २॥ संक्षपतासे चवालीस ४४ क्षुद्ररांग होत हैं जैसे ॥ १ ॥ १ अजगल्लिका, २ यव- प्रख्या, ३ अंधालजी, ४ विवृता, ५ कच्छपिका, ६ वल्मीक, ७ इन्द्रवृद्धा, ८ पन- सिका, ९ पाषाणगर्दभ, १० जालगर्दभ, ११ कक्षा, १२ विस्फोटक, १३ अग्निरा. हिणी, १४ चिप्प, १५ कुनख, १६ अनुशयी, १७ विदारिका, १८ शर्करावंद, १९ पामा, २० विचर्चिका, २१ रकसा, २२ पाददारिका, २३ कदर, २२ अलस, २५ इंद्रलुप्त, २६ दारुणक, २७ अरुषिका, २८ पलित, २९ मसरिका३० यौवनपि डिका, ३१ पद्मिनीकंटक, ३२ जतुमणि, ३३ मशक, ३४ चर्मकील, ३५ तिलका- लक, ३६ न्यच्छ, ३७ व्यंग, ३८ परिवर्तिका, ३९ अवपाटिका, ४० निरुद्धम- काश, ४१ निरुद्धगुद, ४२ अहिपृतन, ४३ वृपणकच्छ तथा ४४ गुदभ्रंश ऐसे ये ४४ हुए इनके लक्षण चिह्नादि अगाडी लिखते हैं ॥२॥ क्षुद्ररोगोंके लक्षण । स्निग्धा सवर्णाग्रथिता नीरुजा मुद्गसन्निभा ।। कफवातोत्थिता ज्ञेयो वालानामजंगल्लिका ॥३॥ जो चिकनी, त्वचाके वर्णकी ग्रथित मूंगके समान, पीडारहित बालकोंके फुन्सी होती है उस “ अजगल्लिका" कहते हैं यह कफ और वायुसे होती है ॥ ३॥ यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंसृता ॥ पिडका श्लेष्मवाताभ्यां यवख्येति सोच्यते ॥ ४॥धनामवक्रां पिडकामुन्नतां परिमंड- लाम् ॥ अंधालजीमल्पपूया तो विद्यात्कफवातजाम् ॥५॥ विवृता- स्यां महादाहां पक्वोदुवरसन्निभाम् ॥ विवृतामिति तो विद्यारिप- तोत्था परिमंडलाम्॥६॥ ग्रंथयः पंच वा षडु वा दारुणाः कच्छ- पोन्नताः॥ कैफानिलाभ्यामुद्भूता विद्यात्तों कैच्छपीमिति ॥ ७ ॥ (गद्य २) शाङ्गघरेण तु पष्टिक्षुद्ररोगाः पठिताः ।।
. निदानस्थान-अ० १३. (५८१) जो फुन्सी यव (जौ) के आकार हो, बहुत कठिन हो, गांठसी पडगई हो, जिसपर मांस आच्छादित हो उसे “यवप्रख्या ” कहते हैं यह कफ और वायुसे उत्पन्न होती है ॥ ४॥जो फुन्सी कडी हो, जिसमें मुख न हो, ऊपरको उठी हुई हो या नीचे फैली हो, उसमें अल्प पीब हो उसे "अंधालजी" कहते हैं यह भी कफ, वायुसेही उत्पन्न होतीहै ॥५॥ जिसका मुँह फैला हुआ हो, अत्यंत दाह हो तथा जो पके गूलरके समान हो, फैली हो वह "विवृता" है यह पित्तसे उत्पन्न होती है ॥ ६॥ जिसमें पांच या छः ग्रंथि दारुण हों और कछवेके भांति ऊपरको उठी हो वह "कच्छपी है, यह कफ और वायुसे होती है ॥ ७ ॥ पाणिपादतले संधौ ग्रीवायामूर्द्धजत्रुणि॥ग्रंथिर्वल्मीकवास्तु शनैः समुंपचीयते ॥ ८॥ तोदक्लेदपरीदाहकंडूंमद्भिर्बणैर्वृतः ॥ व्याधि- वल्मीक इत्येष कफपित्तानिलोद्भवः ॥९॥ जो हाथकी हथेली, पावोंके तलवे, संधि, ग्रीवा (गरदन ) तथा ऊर्द्धजत्रु (ऊप- रके जोते ) इन स्थानों में धीरे धीरे बढकर बंबईके आकार होजाय, दरद और केदना तथा दाह और खाजवाले व्रणोंसे व्याप्त हो तो वह “वल्मीक " नामक रोग है यह कफ, पित्त और वायुसे होता है ॥ ८ ॥९॥ पद्मपुष्करवन्मध्ये पिडकाभिः समाचिताम् ॥' इंद्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थिता भिषक् ॥१०॥ कणोंपरि समंताद्वा पृष्ठे वा पिउँकोपॅरुक् ॥ शालूंकवत्पनसिकां तां विद्यात्कफवातजाम् ॥ ११ ॥ जो वीचमें कमलकी कर्णिकाकी भांति फुन्सियोंसे व्याप्त हो वह फुन्सी " इंद्र- वृद्धा" है, इसे वैद्य वात, पित्तसे उत्पन्न जाने ॥ १० ॥ जो कानपर आस पास या पीठपर शालककी तरह उग्रपीडावाली फुन्सी हो उसे “ पनसिका" जाने यह कफ, वायुसे होती है ॥ ११ ॥ हनुसंधौ समुद्भूतं शोफैमल्परूँजं स्थिरम् ॥ पाषाणगर्दभं विद्या- इलासपवनात्मकम् ॥१२॥ विसर्पवत्सर्पति यो' दाहज्वरकर- स्तनुः॥ अपार्कः श्वर्यथुः पित्तात्सं ज्ञेयो जालँगर्दभः॥ १३ ॥ जो हनु ( ठोडी) की संधिमें उत्पन्न हुआ, अल्प पीडावाला और स्थिर सोजा हो उसे “ पाषाणगर्दभ " जाने (इसे देशभाषामें “ कनफेड” और डाक्टरीमें (मो० ११) शालूक कुमुदादिमूलं जातीफलं च ( इति शब्दस्तोमः ) ॥ - 1 सुश्रुतसंहिता-भा० टी० ॥ ८६ "पराटा इटिस' कहते हैं) यह भी कफ और वायुमं होता है ॥१२॥ जो विम- पंकी भांति फैले, दाह और ज्वर पैदा करे, हलका हो और पके नहीं ऐमा सोना पित्तसे उपजा “ जालगर्दभ " कहलाता है ॥ १३ ॥ बाहुपालिकक्षासु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् ॥ पित्तप्रकोपासंभूतां कक्षामिति विनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥ अग्निदग्धनिभाः स्फोटाः सज्वरा रक्तपित्ततः ॥ क्वचित्सर्वत्र वाँ देहे स्मृता विस्फोटका इति ॥ १५ ॥ कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायते मांसदारुणाः ॥ अंतर्दाहज्वरकरा दीप्ताः पावकसन्निभाः ॥ ॥ १६ ॥ सप्ताहाबादशाहाद्वा पक्षांद्वा नंति मानवम् ॥ ताम- निरोहिणी विद्यादसांध्यां सन्निपाततः ॥ १७ ॥ जो भुजा, पँसवाडा, स्कन्ध और काखके स्थानमें वेदनायुक्त काली फन्सी हो उसे "कक्षा" (कॅखलाई ) कहते हैं यह पित्तके कोपसे होती है ॥ १४ ॥ जो अग्निस जलेक समान स्फोट (पालकैस) किसी शरीरके एक भागमें या सारे शरीर में ही, ज्वरभी हो तो उन्हें "विस्फोटक" कहने, ये रक्त और पित्तसे होतेहैं ॥ १५ ॥ जो काखक प्रदेशमें मांसको दारुण करनेवाले, अंतर्दाह और ज्वर करनेवाले, अग्निके समान जलनेवाले ऐसे फोडे हों उन्हें "अग्निरोहिणी" कहतेहैं ये सन्निपातसे होते हैं और असाध्य होते हैं तथा सात दिनमें अथवा दश दिनमें अथवा पंद्रह दिनमें मनुष्यको मारदेते हैं ॥ १६ ॥ १७ ॥ नखमांसमधिष्ठाय वातः पित्तं च वेदनाम् ॥ करोति दाहपाको च तं व्याधि चिप्पमादिशेत् ।। तदेव क्षतरोगाख्यं तथोपनखमित्यपि ॥ १८ ॥ जो नखूनके मांसमें वायु और पित्त प्राप्त होकर वेदना तथा दाह और पाक उत्पन्न करे तो उसे "चिप्प" कहते हैं और इसेही “क्षतरोग" तथा भी कहत हैं ॥ १८ ॥ अभिघातात्पंदुष्टो यो नखो रुक्षो सिंतः खरः॥ भवेत्तु कुँनखं विद्योत्कुलीनमिति संज्ञितम्॥ १९॥ गंभीरामल्पसंरंभां सवर्णा- (श्लो० १६।१७ ) वाताविक: सप्ताहात् पित्ताधिकर्दशाहात् कप्ताधिक पक्षात् मति ( इतिडल्लनः)! .. .- उपनख H '८७ " निदानस्थान-अ० १३ (५८३) मुपरिस्थिताम् ॥ कफादंतःप्रपाकांती विद्यादतुंशयीं भिषक् ॥२०॥ विदारीकंदवद्वृत्तां कक्षावंक्षणसधिषु॥ रक्तां विदारिका विद्यास- र्वजां सर्वलक्षणाम् ॥२१॥ चोट आदि लगनेसे दूषित हुआ जो नख रूक्ष और काला तथा खरदरा हो- जाय तो उसे “कुनख" कहते हैं और इसेही "कुलीन" संज्ञकभी जानो ॥ १९ ॥ जो फोडा गहरा हो, आरंभमें थोडासा दीखे, ऊपरसे त्वचाके रंगहीका हो (भीतर चक्कलदार हो) और भीतरहीसे पकता आवे उसे वैद्य “ अनुशयी " कहतेहैं यह कफसे उत्पन्न जानो ॥ २० ॥ जो विदारीकंदके समान गोल, फैला हुआ, कांख तथा नलोंके ऊपर लाल रंगका फोड़ा हो उसे "विदारिका' कहतेहैं यह विदारिका संनिपातसे होतीहै और इसमें सब दोषोंके लक्षण होतेहैं ॥ २१ ॥ प्राप्य मांसशिरास्नायुं श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलाग्रंथि कुर्वति भिन्नो- ऽसौ मधुसर्विसौनिभम् ॥ २२ ॥ स्वत्यास्रीवमत्यर्थं तंत्र वृद्धिं- गतोऽनिलः॥मांसं विशोष्य ग्रथितां शकरां जनयेत्पुनः॥ २३ ॥ दुर्गंधं क्लिन्नमत्यर्थं नानावणं ततः शिराः॥ स्रवंति सहसा रक्तं तद्विद्याच्छर्करार्बुदम् ॥२४॥ मांस और शिरा तथा स्नायुमें कफ, मेद तथा वायु प्राप्त होकर ग्रंथि पैदा करते- हैं । वह जब फूटे या चीरीजाय तब उसमेंसे शहत, घृत, चरबी जैसा मल अधिक झिरताहै फिर वृद्धिको प्राप्त हुआ वायु उसमें मांसको शुष्क करके ग्रंथियुक्त शर्करा (रेतासा) उत्पन्न करदेताहै। फिर दुर्गधयुक्त क्लिन्न (केदित) नाना प्रकारके वर्णका रक्त अत्यंत शिराओं में से एकाएक निकलने लगजाताहै तो इसे “ शर्करा- बुंद" कहतेहैं ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ ॥ पामाविचच्यौँ कुष्ठेषुरकसाचे प्रकीर्तिता॥२५॥परिक्रमणशीलस्य वायुंरत्यर्थरूक्षयोः॥पादयोः कुरुते दारी सरुजां तलसंस्थिताम्२६॥ “पामा" (गीली खुजली), " विचर्ची " (व्योंची) तथा “रकसा" (सूखी खाज) इनके लक्षण कुष्ठोंके लक्षणों में वर्णन होचुके हैं ॥ २५ ॥ बहुत फिरनेवाले मनुष्योंके आतिरूखे पांवोंके नीचे पीडावाली दारी (विवाई ) रोगको वायु उत्पन्न करता है उसे “पाददारी" कहतेहैं ॥ २६ ॥ है । ११ सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कंटकादिभिः॥मेदोरक्तानुगैश्चैव दोपै- वो जायते नृणाम् ॥ २७ ॥ सकीलः कठिनो ग्रंथिनिम्नमध्यो- नतोपि वा ॥ कोलमात्रः सरुक् स्रावी जायते कदरस्तु सः॥२८॥ क्लिंन्नांगुल्यंतरी पादौ कंड्दाहरुंगन्वितौ ॥दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलंसं तं विनिर्दिशेत् ॥ २९॥ जब छोटी २ कंकरियोंसे कुचले हुए पांवोंमें या काटे आदिसे घाव हुएमें मेद और रुधिरके अनुगत दोष हो जाते हैं तब मनुष्योंके पांवोंमें कीलयुक्त कडी, नीची, मध्यम, अथवा ऊपरको उठी हुई बडे वेरके समान पीडावाली, गाँठ पडजाती है यह " कदर" नामक क्षुद्ररोग कहलाता है (इसे भाषामें डील कहते हैं)॥ २७ ॥ २८ ॥ जो भीगे हुए पैरोंकी अंगुलियोंके बीचमें खाज, दाह, 'चीसयुक्त पीडा, दुष्ट कीचडके स्पर्शसे होती है उसे " अलस" ( वा खार) कहते हैं । २९ ।। रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूच्छितम्॥प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ॥ ३० ॥ रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोन्येषाम- संभवः ॥ तदिदैलुतं खालित्य ज्येति च विभाव्यते ॥ ३१ ॥ जब रोमकूपके अनुगत पित्त होता है और वायुसे मिलकर मूच्छित होजाता है तब रामों (बालों) को गिरा देता है फिर रक्तसे मिला कफ रोमकूप (रोमोंके छिद्रों) को रोक देता है जिससे फिर और बाल नहीं आते इस रोगको " इंद्र- लुप्त ” और “ खालित्य" रोग कहते हैं ( इसे भाषामें 'कुरा' या 'गंज' कहते हैं ) ॥ ३० ॥ ३१॥ दारुणा कंडुरां रूक्षा केशभूमिः प्रजायते ॥ कफेवातप्रकोपेण विद्यादारुणकं तु तम् ॥ ३२ ॥ अरूंषि वहुवाणि वहुक्लेदानि मूर्द्धनि ॥ कफास्रकृमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ॥ ३३ ॥ जिसमें वालोंकी जमीनमें दारुण खाज चले, रूक्षता हो उसे “दारुणक कहते हैं यह कफ और वायुके कोपसे होता है ॥ ३२ ॥ जिसमें अनेक मुखवाली बहुत गीली शिरमें फुसियां हों से "असंपिका' रोग कहते हैं। यह कफ, रक्त और कृमि (जू) के विकारसे होता है ॥ ३३ ॥ क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः ॥ पित्तं च केशान् पंचनि पलितं तेन जायते ॥३॥ दाहज्वररुजावतस्ताम्राः स्फो.
तथा कहते हैं ये निदानस्थान-अ० १३. (५८५) 'टाः सपीतकाः ॥ गात्रेषु वदने चांतर्विज्ञेयास्ता मसूरिकाः ॥३५॥ शाल्मलीकंटकप्रख्याः कफमारुतंशोणितैः ॥ जायते पिडका यूनां वक्के या मुखदूषिकाः॥ ३६॥ कटकैराचितं वृत्तं कंडूमत्पांडुमंड- लम् ॥ पद्मिनीकंटकप्रख्यैस्तदाख्यं कर्फवातजम् ॥३७॥ जवक्रोध, शोक और परिश्रम करनेसे शरीरकी गरमी और पित्त शिरमें प्राप्त होकर बालोंको सुपेद करते हैं तब “ पलित" नामक रोग होजाता है ॥ ३४ ॥ जो दाह, स्वर और पीडावाली सुरख, पीलापन युक्त शरीरमें तथा मुँहके भीतर (मरक समान) फुन्सियां हों उन्हें ' मसूरिका" कहते हैं । (हिन्दी भाषामें इसे 'शीतला ' और उरदूमें ' चेचक ' कहते हैं) यह रुधिर और पित्तकी प्रधा- नतासे होती है ॥ ३५ ॥ जो सम्भलके कांटेके तुल्य तरुण मनुष्यों के मुँहपर छोटी २ फुसियां होती हैं उन्हें “ मुखदूषिका ".यौवनपिडका कफ, वायु और रुधिरसे होती हैं ( भाषामें इन्हें 'मुहांसा' कहते हैं ) ॥३६॥ जो अंकुरोसे व्याप्त, गोल, खाजवाली, पीली जडवाली, कमलिनीके कांटोंकी भांति फुन्सियां हों उन्हें “पद्मिनीकंटक" कहते हैं यह कफ और वायुसे उत्पन्न होतीहैं॥३७॥ नीरुजं समर्मुत्पन्न मंडलं कर्फरक्तजम्॥संहजं रक्तमीषच्च श्लक्ष्णं जतुमणि विदुः ॥३८॥ अवेदन स्थिर चैव यस्यं गात्रेषु दृश्यते। माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मर्शकं दिशेत॥३९॥कृष्णानि तिलमा- त्राणि नीरुंजानि समानि च ॥वातपित्तकफोद्रेकातान्विद्यात्तिल- कालकान् ॥ ४० ॥ जो चकदा पीडारहित, समान हो, मण्डलसा हो, कुछ लाल (ऊदा) हो, खर- दरा न हो, जन्मसेही हो वह कफरक्तज “जतुमाणि" (लशुन) कहाता है ॥३८॥ जो वेदनारहित, स्थिर माषके 'तुल्य, उभरा हुआ, काला शरीरपर होउसे “मशक" ( मसा) कहते हैं। यह वायुसे होता है ॥ ३९ ॥ जो छोटे २ तिलके समान काले छोटेसे, वेदनारहित शरीरपर होते हैं उन्हें " तिलकालक" (तिल) कहतेहैं ये वात, पित्त, कफके उद्रेकसे होते हैं ॥ ४० ॥ मंडलं महद वी श्यामं वा यदि वा सितम्॥सहज नीरुज गोत्रे न्यच्छमित्यभिधीयते ॥४१॥ समुत्थाननिदानाभ्यां चर्मकीलः प्रकीर्तितः॥४२॥ क्रोधायातप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः॥ सहसा - ९० (५८६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । मुखमागम्य मंडलं विसृजेत्ततः ॥ नीरुजं तर्नुकं इयावं मुख व्यंग तैमादिशेत् ॥४३॥ जो शरीरपर छोटे या वंड, काले या सुपद. पीडारहित, जन्मस मंडल हों उन्हें "न्यच्छ" (चकहे ) कहते हैं (यह रक्त और पित्तसे होते हैं)॥ ४१॥ उत्थान और निदानस “ नर्मकील" रोग जानना चाहिये अर्थात् वात आदि दोषसे जैसा और जिस स्थानमें हो उसीसे जाने ॥ ४२ ॥ जब क्रोध तथा श्रमसे कुपित हुआ वायु पित्तसे मिलकर एकाएक मुखकी बहिर्गत त्वचा में प्राप्त होकर मण्डल (धब्बे) पैदा करता है तव पीडारहित कुछ २ काले चकसे मुखपर होजाते हैं उसे "व्यंग" अर्थात् झांई कहते हैं ॥ ४३ ॥ मर्दनात्पीडनाच्चापि तथैवात्यभिघाततः॥ मेंद्रचर्म यदा वायुभ- जते सर्वतश्चरः॥४४ातदो बातोपसृष्टं तु चर्म प्रतिनिवर्तते।मणैर- धस्तोत्कोशच ग्रंथिरूपेण लवते ॥४५॥ सवेदनः सदाहश्चं पकिं च जति क्वचित्॥मारुतागंतुसंभूतां विद्यात्तां परिवर्तिकाम् ॥सकडूः कठिना चंदे सैव श्लेष्मसमुत्थिता ॥ ४६॥ जब लिग इंद्वियको मसलने, अति दवानेसे तथा चौट आदिलगनेस मेढ़की चर्मका वायु चारोंतरफसे उस चर्मको नीचे करदेताहै ॥ १४ ॥ तव वायुसे नीचे उतराहुआ चर्म फिर ऊपरको नहीं चढता और अग्रभागके नीचे चर्मका खोलिया ग्रंथिरूपसे स्थित होजाताहै ॥ १५॥ उसमें पीडा होतीहै, दाह होताहै, कभी कभी पकभी जाताहै । यह आगंतुककारण और वायुसे होताहै इसे " परिवर्तिका" रोग जानो यदि इसमें अति खाज हो और कडापन हो तो इसे कफसे उपजा जानना चाहिये ॥ ४६॥ अल्पीयसी यदा हर्षाद्दाली गच्छेस्त्रियं नरः ॥ हस्ताभिघाताद- थवा चर्मण्युवर्तिते वलात् ॥४७॥ मर्दनात्पीडैनाद्वापि शुक्र- वेगविघाततः॥यस्यावपाटयते चर्मती विद्यादवपाटिकाम् ॥४८॥ जो पुरुप अत्यंत छोटी अवस्थावाली बालक स्त्रीक पास हर्षके कारण गमन करे अथवा किशोर अवस्थाका पुरुष वलसे चर्मको ऊपर चढावे ॥ ४७ ॥ अथवा (श्लोक ४७) अल्पायसीम् अस्पतरयोनिछिद्रं यस्यास्ताम् ( इति भावमिश्रः) ॥ 1 ९१ निदानस्थान-अ० १३. (५८७) लिंगके चर्मको बहुत मले अथवा दवाव या वीर्यका वेग रुक जाय इन कार- णोंसे यदि लिंगके ऊपरका चर्म फट जाय तो उसे “अवपाटिका' कहते हैं।॥४८॥ वातोपसृष्टमेवं तु चर्म संश्रयते मणिमामणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्र- स्रो तो रुणद्धि च॥ ४९ ॥निरुद्धप्रकशे तस्मिन् मंदधारमवेदै- नम् ॥ मत्रं प्रवर्तते जंतोमणि नच विदीर्यते ॥ निरुद्धप्रैकशं विद्यादरूटी चावपीटिकाम् ॥ ५० ॥ जिसके वायुसे उपसृष्ट चर्म लिंगके अग्रभागको आच्छादन करले तब मणि अर्थात् लिंगका अग्रभाग ( सुपारी) चर्मसे ढक जाय और मूत्रकेद्वारको रोक दे ॥ ४९ ॥ फिर उस निरुद्धप्रकाशवाले स्थानमेंसे वेदना रहित पतली धारसे मूत्र आवे और अग्रभाग उघडेही नहीं तो इसे "निरुद्धप्रकाश' कहते हैं यह अवपाटि- काके नही उघडनसेभी होता है (या इसे अरूढ अवपाटिकाभी कहते है) ॥५०॥ वेगसंधारणाद्वायुर्विहतो गुर्दैमाश्रितः ॥ निरुणद्धि महत्स्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ॥ ५१ ॥ मार्गस्य सौक्ष्म्यात्कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति ॥ संनिरुद्धंगुदं व्याधिमेनं विद्यात्सुदुस्तरम् ॥५२॥ जव मलका वेग रोकनेसे रुका हुआ वायु गुदामें प्राप्त होकर मलके निकलनेके बड़े द्वारको निरोध करके मार्गको तंग करदेता है ॥ ५१ ॥ तब मल निकलनेका रास्ता तंग होनेसे मल कष्टसे निकलता है इसे “संनिरुद्धगुद" रोग कहते हैं यह दुस्तर ( कष्टसाध्य ) रोग है ॥ ५२ ॥ शकृन्मत्रसमायुक्तेऽधौ तेऽपाने शिशोर्भवेत् ॥ स्विन्नस्यास्नाप्य- मानस्य कंडूरक्तकफोद्भवः ॥ ५३ ॥ कंडूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते ॥ एकीभूतं श्रेणघोरै त विद्यादहिपूतनम् ॥५४॥ जब बालकको विष्ठामूत्रसे भरे हुए, विनाधोये अपान वायु होताहै तथा पसीना नित्य आया करे और स्नान नहीं कराया जाय तो उस बालकके रक्त और कफसे उपजी खाज होतीहै ॥ ५३ ॥ फिर विशेष खुजानेसे शीघही फुन्सियां होकर झिरने लगतीहैं और व्रणोंसे एकरूप घोर छत्तडासा होजाताहै इसे “अहि-- पूतन" जानो ॥ ५४॥ (श्लो० ४९।५०)वातोपसृष्टमिति-एवमतिमर्दनपीडनाभिघातादिना इत्यर्थः सश्रयते समग्र श्रयते । अरूढामित्यत्र दुरूढामिति वा पाठःनिरुद्धप्रकाशाख्यं दुरूढा अवपाटिकां विद्यादित्यर्थः । (इति डल्लन:) प्रकश इत्यार्षः ॥ - 2 (५८८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृषणसंश्रितः॥ प्रतिद्यते यदा स्वे- दास कई जैनयेत्तदा ॥ ५५ ॥ तत्र कंडूयनाक्षिप्रं स्फोटः स्रावश्च जायते ॥प्राहुर्वृषणकच्छू तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ॥५६॥ जो मनुष्य न्हाने धोने और मैल उतारनेसे हीन हों उनके वृषणों में आश्रित हुआ मैल जवे पसीने आकर क्वेदित होताहै तब खाज पैदा करताहै ॥ ५५ ॥ फिर वहाँ सुजानेसे शीघ्रही फुन्सियां होतीहैं, पसीना निकलने लगताहै इसे " वृषणकच्छू" कहतेहैं यह कफ और रुधिरके कोपसे होताहै ॥ ५६ ॥ प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं वहिः॥ रुक्षंदुर्बलदेहस्य तं गुदभ्रंशमादिशेत् ॥ ५७॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ अतिप्रवाहण (किनछने ) से तथा अतिसारसे जब रूक्ष और दुर्वल मनुष्यकी गुदा (कांच) बाहर निकले तो उस "गुदभ्रंश" रोग कहतेहैं (यह वायुसे होताहै)५७ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने त्रयोदशोऽध्यायः ॥१२॥ चतुर्दशोऽध्यायः ११. अथातः शूकदोपनिदानं व्याख्यास्यामः । अब यहाँस अगाडी शुकदोपकै निदानकी व्याख्या करतेहैं । लिंगवृद्धिमिच्छतामक्रमप्रवृत्तानां शूकदोपनिमित्ता दश चाष्टौ च व्याधयो जायते तद्यथा सर्पपिका अष्टोलिका प्रथितं कुम्भी- का अलजी मृदितं संमूढपिडका अवमन्थः पुष्करिका स्पर्श- हानिः उत्तमा शतपोनकः त्वक्पाकः शोणिताव॒दं मांसावुदं मांसपाकः विद्रधिः तिलकालकश्चेति ॥१॥ (गय १) र मीवरल जनुविशेष. यन्य प्रयोगेन पुरा लिगवृद्धि कुर्वति कामिनो जनाः तथाच पच्या गोनावोग था- 'महातकान्यि जलशकमयाजानमंतर्विदाह्य मतिमान्सह संघवेन । एतद्विल्द- गुली मेरिटमालीयन मदिपविविमलीलेंगे | स्थल महद्वग्रगमालगनुल्यं शेफ: करोचभिमतं नहि म. !! 2 ||" तत्व कन्यानुचित प्रयोगेन चाष्टादा व्याधो भवति । इति भावमिश्रः) ढल्लना- पकअत्र दिगो हुने दृश्न. तेन "यूकाटिदोपानीमना व्याय, इत्यत्रादिग्रडेन तीष्णा- पादो नामः । दाद -जन, कीट ॥
९३ निदानस्थान-अ० १४. (५८९) ~ जो पुरुष अयोग्य क्रमसे लिंगकी वृद्धि ( तथा स्थूलता, कठोरता आदि) की इच्छामें प्रवृत्त होते हैं (अर्थात् अयोग्य मूढ लोगोंकी बताई औषध तिले, पट्टी, लेप आदिस लिंगकी वृद्धि आदिके लिये यत्न करते हैं) उनको शूकदोषके कारणसे अठारह प्रकारकी व्याधियां होतीहैं वे ये हैं-१ सर्पपिका, २ अष्ठीलिका, ३ग्रथित,४ कुंभिका, ५ अलजी, ६ मृदित, ७ संमूढपिडका, ८ अवमंथ, ९ पुष्करिका, १० स्पर्शहानि, ११ उत्तमा, १२ शतपोनक, १३ स्वक्पाक, १४ शोणितार्बुद १५ मांसार्बुद, १६ मांसपाक, १७ विधि, १८ तिलकालक॥ १॥ सर्षपिकादिलक्षण । गौरसर्षपतुल्या तुं शूकदुर्भग्नहेतुका ॥ पिडका कफर्रक्ताभ्यां ज्ञेया सर्षेपिका वुधैः ॥२॥ कठिना विषमैरतैर्मारुतस्य प्रकोपतः ॥ शूकैस्तु विषसंयुक्तैः पिडकाष्ठीलिका भवेत् ॥३॥ जो सुपेद सरसों के तुल्य छोटी २ फुन्सियां कफ और रक्तसे हों उन्हें "सर्ष- पिका" कहते हैं ये शुक ( नामक लिंगवृद्धिकारक कृमि) क दुर्भन होने (ठीक न होने) के दोषसे होती हैं।।२॥ जो कडी और भीतरसे विषम ऐसी वायुके कोपसे पिडिका हो वह “अष्ठीलिका" है यह विषयुक्त शूकोंसे होतीहै ॥३॥ शूकैर्यत्पूरितं शश्वद्रथितं तत्कफोत्थितम् ॥ कुंभीका रक्तपित्तो- स्था जांबवास्थिनिभा सिता ॥ ४ ॥ अलजीलक्षणैर्युक्तामल- जी च वितर्कयेत् ॥५॥ मृदितं पीडितं यत्तु संरब्धं वायुकोपतः ॥ पाणिभ्यां भृशसंमूढे संमूढपिडका भवेत् ॥६॥ दीर्घा बह्वयश्च पिडका दीयतें मध्यंतस्तु याः ॥ सोवमथः कफासुग्भ्यां वेदना- रोमहर्षकृत् ॥७॥ जो बहुतसे शकोंसे निरंतर पूरित रहे उसे कफसे उपजा "ग्रथित" रोग जाने तथा रक्त और पित्तसे उपजी जामुनकी गुठली जैसी-काली कुंभीफल सदृश जो (श्लो० २) दुर्भनाः शूका यत्र योगे तद्धेतुका ॥ (श्लो०३) अतैः पतिः ( इति नि० सं० ) (श्लो० ४) शूकैर्यत्पूरितमिति-बहुभिः शूकैः शश्वत् यत् पूरित तद्ग्रथितं भवति । एकदिनांतर- पूरण प्रशस्तमिच्छति कामतत्राचार्यः नित्याधिकशूकपूरणाग्रथितनाम्नो रोगस्योत्पत्तिः । "कुभीकेति" कुंभीफलमिव अयमपि दुष्टशूकावचारणात् भवति । ( इति डल्लनः) ॥ (श्लो० ६) शूकदोषे जाते मीडित स यतु सरब्धं सशोथ भंवीत तत् मृदितम् । शूकदोषे पाणिभ्यां भृशसंमूढे पिशिते लिगेसमूढपिडका भवति अत्रापि वातकोपत इत्यनुवर्तते ( इति भावमिश्रः)॥ (श्लो० ७) अवमंधोपि स्थूलीकर्म शूका कर्मोपचारेण शेयः ॥ 1 ..
(५९०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। फुसी लिंगपर होती है उसे "कुंभीका " या कुंभिका कहते हैं यहभी दुष्ट शकके अवचारणसे होतीहै ॥ ४ ॥ जो अलजी प्रमेहपिडिका वर्णन होचुकी है उसके लक्षणोंसे युक्त फुन्सी हो तो उसे "अलजी" जानना चाहिये ॥५॥ ( शूककी पीडा होनेपर) जो लिङ्ग मसला या दवाया जाय तो वायुके कापस "मृदित" नाम रोग होता है तथा (शूकदोष होनेपर) बारवार हाथ लगानेसे “ संमूढपिडिका" रोग हो जाता है ॥ ६॥ जिसमें बड़ी २ बहुतसी फुसियां बीचसे फटीसी होजायँ उसे " अवमंथ" कहते हैं यह कफ और रक्तसे होता है । यह रोग वेदना तथा रोमहर्ष करनेवाला होता है ॥ ७ ॥ पित्तशोणितसंभूता पिडका पिडकाचिता ॥ पद्मपुंष्करसंस्थाना तेंया पुष्करिति सौ ॥८॥ जनयेपर्शहानि तु शोणितं शूकैदू- षितम् ॥९॥ मुद्गमाषोपमा रक्तो पिडका रक्तपित्तजाँ॥ उत्तमैषां तु विज्ञेयाँ शूकॉजीर्णनिमित्तजा ॥ १० ॥ जिसमें पित्त और रक्तसे उपजी हुई फुन्सीसे फुन्सी मिलकर कमलकी कर्णिकाके तुल्य हों उसे “पुष्करिका" जानो ॥ ८॥ जिसके शूकदोपसे दूपित हुआ रुधिर स्पर्शकी हानि उत्पन्न कर दे उसे "स्पर्शहानि" रोग जानो ॥ ९ ॥ जो मूंग और उड़दके वरावर लाल फुसी रक्त, पित्तसे उपजी हो उसे " कहते हैं, यह शूकके जीर्ण नहीं होनेसे होताहै ॥ १० ॥ छिद्रेरणुमुखैर्यत्तुचितं मे समंततावातशोणितजोयाधिविज्ञेयः शतपोनकः॥११॥पित्तरक्तकृतो ज्ञेयस्त्वपाको ज्वरदाहवान् ॥१२॥ कृष्णस्फो टैः सरक्तैश्च पिडकाभिश्च पीडितम् ॥ यस्य वस्तिरुज- श्चोग्रो ज्ञेयं तच्छोणितादम् ॥ १३॥ मांसदोषेण जानीयाँदर्बुद मांससंभवम् ॥१४॥ छोटेर मुखवाले छिद्रोंसे लिंग इंद्विय चारोंतरफसे व्याप्त हो तो इसे "शतपोनक" नाम शूकरोग कहतेहैं यह व्याधि वायु और रक्तसे होतीहै ॥ ११ ॥ यदि लिंगकी उत्तमा नाम रोग, (नो०८) पद्मपुष्कर कमलकर्णिका एषापि स्वकर्मापचारजा ज्ञेया ॥ (श्लो०९) शूकदूषितं शूकेन दुष्टता नीतं शोणितम् ॥ (श्लो० १० ) शूका न जीणीभूता यत्र तनिमित्तजा रक्तपित्तकृता उत्तमा जेया॥(सो० ११) शतपोनकः शूकदूषितवातशोणितजः॥ (श्लो० १२) त्वक्पाकः शूकदूषितीपचर- तकृतः ॥ (श्लो० १३) शोणिताव॒दं शूकदूषितरतेन मवति ।। (शो० १४ ) मांसाव॒दं झूकदूषित मासेन भाति ।।
९५ निदानस्थान-अ० १४. (५९१) . ११ त्वचा पित्त और रक्तके विकारसे पकजाय और ज्वर तथा दाह हो तो इसे “त्वक्पाक" कहतेहैं ॥ १२ ॥ जिसके काली और लाल अथवा रक्तसहित पिडकाओंसे इंदिय पीडित हो तथा वस्तिमें दारुण पीडा हो तो उसके “शोणितार्बुद रोग जानो॥१३॥ और मांसके दोषसे इसी भांति "मांसाबुंद' होताहै ॥ १४ ॥ शीयते यस्य मांसांनि यस्यं सर्वाश्च वेदनाः॥ विद्योत मांसपाक तु सर्वदोषकृतं भिषक ॥ १५॥विद्रधि सन्निपातेन यथोक्तमभि- नि दिशेत् ॥१६॥ कृष्णांनि चित्राण्यथवा शूकानि सविर्षाणि च ॥ पातितानि पंचंत्याशु मेंद्र निरवशेषतः॥ १७ ॥ कालानि भूत्वा सांसानि शीर्यते यस्य देहिनः ॥ सन्निपातसमुत्थानं तै विद्यात्तिलकालकम् ।। १८॥ जिसका मांस गलकर विखरने लगे तथा सब दोषोंकी वेदना हो उसे संनि- पातसे उपजा "मांसपाक' वैद्यको जानना चाहिये ॥ १५ ॥ "विद्रधि” को सन्नि- पातसे उपजी यथोक्त लक्षगोंसे जाने (विद्रधिके लक्षण पहले कह आये हैं ) उसी भांति लक्षण सब दोषोंके जाने ॥ १६ ॥ जो काले और कबरे विषयुक्त शूकोंको योगमें डालते हैं तो वे शीघ्रही समस्त मेढ़को पका देते हैं और मांस काला होकर विखर जाता है इसे सन्निपातसे उपजा "तिलकालक" रोग जानो ॥ १७ ॥ १८ ॥ तत्र मांसार्बुदं यच्च मांसपाकश्च यः स्मृतः॥ विद्रधिश्च न सिध्यति ये च स्युस्तिलकालकाः ॥ १९ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ इनमेंसे जो मांसार्बुद हो तथा मांसपाक हो तथा विधि और जो तिलकालक रोग होजाय तो ये सिद्ध नहीं होते अर्थात् असाध्य हैं तथा इनके सिवाय साध्य॥१९॥ (वक्तव्य ) इस समय लिंगवृद्धि और पुष्टि आदिके लिये शूकनामक कृमिके वरतावका प्रचार नहीं है इससे ऐसे शूकदोष नहीं होते परंतु हां, इस समय भी कई मूढ तीक्ष्ण तिलेपट्टी आदिका वर्ताव अयोग्य करते हैं उससे अनेक उपद्रव होतेही हैं ॥ १९॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ (श्लो० १५) मासपाक; शूकदूषितदोषत्रयेण । (श्लो• १६) विद्रधिरयमपि पूर्वोक्त- सन्निपातविद्रधितुल्यः ॥ (श्लो० १७ । १८) सविषकृष्णचित्रशूकदूषितसर्वदोषेण तिलकालकः ।।
- (५९२) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ९६ पंचदशोऽध्यायः १५. अथातो भग्नानां निदानं व्याख्यास्यामः । अब यहांसे अगाडी भन्न (शरीरका अवयवभंग होने) कनिदानकी व्याख्या करतेहैं । पतनपीडनप्रहाराक्षेपणव्यालमृगदशनप्रभृतिभिरभिघातविशेपेरने कविधमस्यां भंगमुपदिशति तत्तु भंगजातमनुसार्यमाणं द्विविध- मेवोत्पद्यते संधिमुक्तं कांडभन्नं च ॥ १॥ ऊपरसे गिरने, दवजाने, चोट लगने तथा कूदन (फलाँकन) से तथा व्याल (हिंसक पशु) और मृग (पशुमात्र) के काटने (मुंहसे पकड़कर खींचने चबाने) आदिके अभिघातोंसे अनेक प्रकारसे अस्थि आदिका भंग होना वर्णन करतेहैं। वह भंग हुआ स्थान अनुसरणके योग्य दोही प्रकारसे प्रतिपादन किया जासकताहै १ संधिमुक्त (किसी जोड परसे अलग होगयाहो), २ कांडभम (बीचसे अस्थि- भंग होगयाहो)॥ १॥ संधिमुक्त। तत्र संधिमुक्तमुत्पिष्टं विश्लिष्टं विवर्तितमवक्षितमतिक्षिप्तं तिर्यक् क्षिप्तमिति षड्विधम् ॥२॥ इनमेंसे संधिमुक्त ६ छःप्रकारका होताहै १ उत्पिष्ट (जो दोनों भाग रगडे या पोसे गयेहों), २ विश्लिष्ट (जो टहलगयाहो-अलग होगयाहो), ३ विवर्तित (संधि बराबर हटजाय ), ४ अवक्षिप्त ( दोनों और संधि हटजाय), ५ अतिक्षिप्त (संधि और अस्थि दोनों हटजा), ६ तिर्यक्षिप्त ( संधिअस्थि टेढा होजावे) तत्र प्रसारणाकुंचन विवर्तनाक्षेपणाऽशक्तिस्यरुजस्वं स्पर्शासहत्वं चेति सामान्य संधिमुक्तलक्षणमुक्तम् ॥ ३॥ तिसमें पसारने, सिकोडने, हिलाने ( उठाने), रखने (टिकान) की शक्ति न रहे और दारुण पीडा हो तथा स्पर्श सहा नहीं जाय ये संधिमुक्तके सामान्य लक्षण वर्णन किये गये हैं ॥३॥ विशेषेणों पिष्टै संघावुभयतः शोफो वेदना प्रादुर्भावो विशेषता नानाप्रकारा वेदना रात्री प्रादुर्भवति ॥ ४॥ विश्लिष्टेऽल्पशोफो (गद्य १) मममित्यत्र भावे क्त: मंगल यत्र विश्लेषोऽभिप्रेतः (भा० मि.)। व्यालो हिंसकपशः दुष्टराजश्च । मृगः पशुमात्रः (इति शब्दस्तोमः) ।
निदानस्थान-अ० १५.
(५९३)
वेदनासातत्यं संधिविक्रिया च ॥५॥ विवर्तिते तु संधि-
पापिगमनाद्विषमांगता वेदना च ॥६॥ अवक्षिप्ते संधिविश्ले-
षस्तीवरुजत्वं च ॥७॥ अतिक्षिप्ते द्वयोः संध्यस्थ्नोरतिक्रांतता
वेदना च ॥८॥ तिर्यकाक्षिप्ते त्वेज्ञास्थिपावपिगमनमत्यर्थं वेदना
चेति ॥९॥
विशेष करके " उत्पिष्ट " में दोनों तरफ संधिमें शोथ होता है और पीडा
होती है और रात्रिमें अधिक पीडा उत्पन्न होती है ॥ ४ ॥ “विश्लिष्ट " में थोडा
शोथ होता है और निरंतर वेदना होती है और संधिमें विक्रिया हो अर्थात् संधि
काम न दे ॥ ५॥ "विवार्तत " में संधि पार्श्वकी तरफ चली जानेसे अंग टेढा
होजाता है और पीडा होती है ॥ ६ ॥ “ अवक्षिप्त ' में संधि दूर टहल जाती है
और तीव्र वेदना होती है ॥ ७ ॥ “ अतिक्षिप्त " में दोनों संधियों और अस्थि-
योंमें अन्तराय होजाता है और पीडा होती है ॥ ८॥ तथा “ तिर्यकक्षिप्त " में
एकतरफका अस्थि टेढा होकर पार्श्वकी तरफ चला जाता है इससे अधिक वेदना
होती है ॥ ९ ॥
कांडभग्नमत ऊर्द्ध वक्ष्यामः ।
यहांसे अगाडी कांडभग्न (वीचसे अस्थिभंग) को कहते हैं।
कर्कटकमश्वकर्ण चूर्णितं पिच्चितमस्थिच्छलितं कांडभग्नं मज्जा-
नुगतमतिपातितं वक्र छिन्नं पाटितं स्फुटितमिति द्वादशविधम्॥१०॥
कांडभग्न बारह प्रकारका होता है १ कर्कटक, २ अश्वकर्ण, ३ चूर्णित, ४
पिच्चित, ५ अस्थिच्छलित, ६ कांडभन्न, ७ मज्जानुगत, ८अतिपातित, ९ वक्र, १०
छिन्न, ११ पाटित, १२ स्फटित ॥ १०॥
श्वयथुवाहुल्यं स्पंदनविवर्तनस्पर्शासहिष्णुत्वमवपीड्यमाने शब्दः
स्रस्तांगता विविधवेदनाप्रादुर्भावः सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभ
इति समासेन कांडभग्नलक्षणमुक्तम् ॥ ११॥
शोथ अधिक हो, दहलाने, हिलाने और स्पर्श (छ्ने) की सहिष्णुता (बर-
दाश्त ) नही हो, रगडनेसे शब्द हो, अंग शिथिल होनाय, नाना प्रकारकी वेदना
उत्पन्न हो, सब प्रकार चैन नहीं पड़े। संक्षेपतासे ये कांडभमकं लक्षण कहे हैं ॥११॥
९८ (५९४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। विशेषतस्तु संमूढमुभयतोऽस्थिमध्यभग्नं ग्रंथि रिवोन्नतं कर्कटकम् ॥ १२ ॥ अश्वकर्णवदुद्गतमश्वकर्णम् ॥ १३॥ चूर्णितमस्थि तत्तु शब्दस्पर्शाभ्यां वोद्धव्यम् ॥१४॥ पिच्चितं पृथुतां गतमनल्प- शोफम् ॥ १५॥ पार्श्वयोरस्थि हीनोद्गतमस्थिच्छलितम् ॥ १६ ॥ खल्लेतप्रकंपमानं कांडभन्नत्वम् ॥१७॥ अस्थ्यवयवोस्थिमध्यम- नुप्रविश्य मज्जानमुन्नह्यतीति मज्जानुगतम् ॥ १८ ॥ अस्थि निःशेषतश्छिन्नमतिपातितम् ॥१९॥आभुग्नमविमुक्तास्थि वक्रम ॥ २०॥ अन्यतरपार्वावशिष्टं छिन्नम् ॥ २१॥ पाटितमणु बहु- विदारितं वेदनावच ॥ २२ ॥ शूकपूर्णमिवाध्मातं विपुलं विस्फु- टीकृतं स्फुटितमिति ॥ २३॥ इनके विशेषतासे लक्षण कहते हैं-जो दोनों तरफसे अस्थि उठा हुआ बीचसे भंग हो, गांठकी भांति उभरा हो इसे “ कर्कटक' कहते हैं इसका आकार कर्कट (ककेडे) कासा होनेसे कर्कटक कहलाता है ॥ १२॥ जो दूना अस्थि घोडके कानकी भांति ऊँचा होजाय उसे “ अश्वकर्ण" कहते हैं ॥ १३ ॥ जो अस्थिका चूर्ण होगया हो तो उसे " चूर्णित" कहते हैं इसको शब्द और स्पर्श (छूने ) से जान सकते हैं ॥ १४ ।। जो चौडा होजाय और बहुत शोथवाला हो उसे "पिच्चित" कहते हैं ॥ १५ ॥ जो अस्थि एकतरफ नीचा होजाय और दूसरा टूटा भाग ऊँचा हो तो उसे “अस्थिच्छालित" कहते हैं ॥ १६ ॥ जो हिलानेसे चलायमान हो (टूटा मालूम दे) उसे कांडभन्न (हड्डीका डंडा टूटा ऐसा) जाने ॥ १७ ॥ जो अस्थिका भाग दूसरे अस्थिमें प्रवेश होजाय और अस्थिके भीतरकी मज्जाको बाहर निकाले तो उसे मन्नानुगत कहते हैं ॥ १८ ॥ जो निःशेष अस्थि कटजाय तो उसे “अनिपातित" कहतेहैं ॥१९॥ जो अस्थि टेढा होजाय परंतु टूटे नहीं उसे “वक्र" कहते हैं ।। २० ॥ जो एक ओरसे कट जाय या टूट जाय और एक तरफसे शेष रहे अर्थात् एक पार्श्वमेंसे कुछ बाकी रहे उसे "छिन्न' कहतेहैं ॥ २१ ॥ जो थोडा या बहुत विदारित (फटा) हो और उसमें वेदना हो उसे “ पाटित" कहतेहैं ॥ २२ ॥ जोधान्यसे भराहुआसा बहुत फूला हो, स्फुट न हो उसे "स्फुटित” कहते हैं ॥ २३ ॥ तेषु चूर्णितछिन्नातिपातितमजानुगतानि कृच्छ्रसाध्यानि कृशव- द्ववालानांक्षतक्षीणकुष्टश्वासिनां संध्युपगतं च॥२४॥भवंति चात्र- " " 1
-
निदानस्थान-अ० १५.
(५९५)
इनमेंस चूर्णित, छिन्न और अतिपातित तथा मन्नानुगत नामक काण्डभन्न कृच्छु-
साध्य होते हैं और दुबले, वृद्ध, बालक तथा क्षतक्षीण मनुष्योंके तथा कुष्ठरोगवालों
और श्वासरोगवालोंके भी कांडभन्न कष्टसाध्य होताहै तथा जो कांडभन संधिके
समीप या संधि हो वहभी कष्टसाध्यही होताहै ( अथवा कृशादिकोंके संधिगत
असभी असाध्य होताहै ) ॥ २४ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं-
भिन्नं कपालं कटयां तु संधिमुक्तं तथा च्युतम् ॥ जघनं प्रतिपि-
पञ्च वर्जयेत्तचिकित्सकः ॥२५॥ असंश्लिष्टं कपालं तु ललाटे
चूर्णितं च यत् ॥ भन्नं स्तनांतरे शंखे पृष्ठे सूर्ध्नि चं वर्जयेत् ॥२६॥
कपालका अस्थि टूट गयाहो (तथा कमरका वास टूट गयाहो ) अथवा कमरकी
संधि अलग होगई हो या छूट गईहो तथा जांच पिसगई हो तो इन्हें चिकित्सक
त्यागदे ( क्योंकि ये असाध्य हैं)॥ २५ ॥ कपालके अस्थि अलग होजायें तथा
मस्तकका चूर्ण होजाय तथा चूंचियोंका बीच (छाती) फटजाय अथवा कनपटी फटजायँ
तथा पृष्ठवंश भन्न होजाय, मी ( दिमाग ) भग्न होजाय तो इन्हें भी त्यागदे॥२६॥
आदितो यच्चै दुर्जातमस्थिं संधिरापि वा ॥ सम्यक् संहित-
मप्यस्थि दुासादुर्निबंधनात् ॥ २७ ॥ संक्षोभ द्वापि यद्गच्छे-
द्विक्रिया तत्तु र्जयेत् ॥ २८ ॥
जो आरंभहीसे अयोग्य पैदा हुएहों, अस्थि और संधि तथा ठीक ठीक जोडे हुए
अस्थिभी अनुचित रखनेसे या अनुचित बंधनसे अथवा क्षोभसे जो विक्रिया (विकार
और खराबी) को प्राप्त होजायँ तो इन्हेंभी त्यागदे ॥ २७ ॥ २८ ॥
मध्यस्य वयसोवस्थास्तिस्रो यौः परिकीर्तिताः॥
त स्थिरो भवेजंतुरुपक्रांतो विजानता ॥ २९॥
मध्यम आयुवाले (१६ से ४० वर्षतक) मनुष्यकी तीन अवस्था वृद्धि, यौवन,
संपूर्णता वर्णन की हैं इन अवस्थाओंमें मनुष्य स्थिर होताहै, इन्ही अवस्थाओं में
भनकी चिकित्सा के योग्य ठीक होता है ॥ २९ ॥
तरुणास्थीनि नम्यते भज्यंते नलकानि तु ।।
कपालांनि विभिचंते स्फुटंति रुचकानि च ॥ ३० ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने पंचदशोऽध्यायः॥ १५ ॥
- - १०० (५९६) सुश्रुतसंहिता-मा० टी० । तरुण अस्थि अर्थात् नासिका, कर्ण, नत्र इनके अस्थि तो नवजाया करते हैं (नीचे होजाते हैं) तथा नलका ( शाखाके अस्थि) टूट जाया करते हैं तथा कपाल (नितंब, कनपटी, तालु, ललाटके अस्थि) सदजाया करते हैं और रुचक संज्ञक अस्थि ( दांत ) उखड या टूट या झड जाया करते हैं और श्लोकम 'च' शब्दके ग्रहणसे वलय संज्ञक अस्थि भी टूटतही हैं । यह अस्थियोंकी जातिके अनुसार भन्न वर्णन किया है। अस्थि पांचही प्रकारके होते हैं-तरुण, नलक, कपाल, रुचक और वलय ( इन्हें शारीरकस्थानमें देखो) ॥ ३० ॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० निदानस्थाने पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ षोडशोऽध्यायः १६. अथातो मुखरोगाणांनिदानं व्याख्यास्यामः । अब यहाँसे अगाडी मुखरोगोंक निदानकी व्याख्या करते हैं । मुखरोगाः पंचषष्टिः सप्तस्वायतनेषु। तत्रायतनानि ओष्ठो दन्त- मूलानि दंताः जिह्वा तालु कंठः सर्वाणि चेति । तत्राप्टावोष्टयोः। पंचदश दंतमूलेषु । अष्टौ दन्तेषु।पञ्च जिह्वायाम् । नव तालुनि। सप्तदश कंठे। त्रयः सर्वेष्वायतनेषु ॥१॥ मुखके सातों स्थानों में सब पैंसठ ६५ प्रकारके रोग होते हैं । व सात स्थान ये हैं ? होट, २ दंतमूल (मसूढे ), ३ दांत, ४ जिह्वा, ५ ताल, ६ कंठ, ७ सम्पू- मुख इनमेंसे होठोंमें आठ रोग होते हैं और दांतोंकी जड ( मसूढोंमें) पन्द्रह तथा दांतोंमें आठ और जिह्वामें पांच, ताल में नव तथा कंठमें सत्रह और सम्पूर्ण मुखमें तीन प्रकारके रोग होतेहैं ऐसे सब मिलकर ६५हुए इनके लक्षण कहतेहैं ॥१॥ ओष्ठरोग। तत्रौष्ठप्रकोपा वातपित्तश्लेष्मसन्निपातरक्तमांसदोऽभिघातनि- मित्ताः ॥ २ ॥ इनमें ओष्ठप्रकोप (होठके रोग) वायु, पित्त, कफ, सन्निपात, रुधिर, मांस, मेद और अभिघात निमित्तवाले होते हैं ॥२॥ कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुगन्वितौ ॥ दाल्येते परिपु- ट्येते ओष्ठौ मारुतकोपतः॥३॥ ऑचितौ पिडकाभिस्तु सर्षपा- (गद्य १) वृद्धवाग्भटे ओष्ठरोगेपु खण्डोष्ठोपि लिखितः यथा-"तत्र खडौष्ठ इत्युक्तो वातेनोठो द्विधा कृतः" इति ॥ .
निदानस्थान-अ० १६. (५९७) कृतिभिर्भृशम् ॥ सदाहयाकसंस्रावौ नीलौ पीतौ च पित्ततः ॥ सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडकाभिरवेदनौ ॥ कंडूमंतौ कफाच्छूनौ पिच्छलो शीतलौ गुरू ॥५॥ खरदरे हो, कडे हों, ठिठरायेसे हों, काले हों, तीव्र पीडा हो, विदीर्णसे होते हों फूटनसी हो तो जाने कि वातसे ओष्ठरोग है ॥ ३ ॥ बहुतसी सरसों जैसी फुन्सि- योंसे व्याप्त हों, दाह, पाक और नाव युक्त हों, नीले या पीले हों तो पित्तकाओष्ठ- रोग जानों ॥४॥ त्वचाके वर्णकी फुन्सियोंसे व्याप्त हों, वेदना अति न हो,खाज हो, शोथ हो, मोटे हों, शीतल और भारी होठ हो तो कफकी व्याधि है ॥ ५ ॥ संकृत् कृष्णौ सकृत् पीतौ संवच्छेतौ तथैवं च ॥ सन्निपातेन विजयावनेकपिडकाचितौ ॥ ६॥ वर्जूरफलवर्णाभिः पिडकाभिः समाचितौ ॥ रक्तोपसृष्टौ रुधिरै संवतः शोणितप्रभौ ॥ ७॥ सांसदुष्टौ गुरू रथूलौ मांसपिंडवदुद्गतौ ॥ जंतर्वश्चीत्र सूच्छति सृकस्योभयंतो मुंखात् ॥ ८॥ कभी एकवार काले होठ होजायँ, कभी पीले और कभी सुपेद तथा अनेक भां- तिकी फुन्सियोंसे व्याप्त हों तो सन्निपातका ओष्ठरोग जानो ॥ ६ ॥ खजूरके फलके रंगकी फुन्सियोंसे व्याप्त हो और जिनमें रक्तकी चमक हो तथा रुधिर झिरे तो रुधिरका ओष्ठरोग है ॥ ७ ॥ जो होठ भारी हों और मोटे हों तथा मांसके पिंडेकी भांति ऊपरको उठे हों और मुखसे दोनों तरफके ओष्ठभागोंपर (बैठनसे) जंतु मच्छित होजातेहैं तो उस मांसदुष्टजनित आष्ठरोग जानो ॥८॥ मेदसा घृतमंडाभौ कंडूमंलो स्थिरौ मृदू ॥ अच्छस्फटिकसंकाश- मास्त्राव स्रवतो गुरू ॥९॥क्षतजाँभौ विदीयते पार्टथेते चाभि- घांततः॥ ग्रथितौ च समाख्यातावोष्टौ कंडूससन्वितौ ॥ १० ॥ जो घृत तथा मंडके वर्णके हों, खाज हो, स्थिर हों,कोमल हों और उनमेंसे सुपेद स्फटिक जैसा पीव झिरे और भारी हों तो मेदो दुष्टजनित ओष्ठरोग होताहै ॥ ९ ॥ चोट लगीसी मालूम हो, विदारणसे होगयेहों, फटगयेसे हों, गांठसी पडगई हो तथा खाजयुक्त हों तो यह अभिघात ( चोट आदिके लगने ) से ओष्ठरोग कहाहै ॥१०॥ (मो०८) सूकम् ओष्ठयोः प्रातभागः ( इति वाचस्पतिः) ।
(५९८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० दंतमूल ( मसूढों) के रोग । दंतमूलगतास्तु शीतादो दंतपुप्पुटको दंतवेष्टकः शौपिरो महाशो- पिरः परिदर उपकुशोदंतवैदर्भो वर्द्धनोऽधिमांसोनाड्या पंचेति ११॥ दंतमूलगत १५ रोग इस प्रकार हैं-१ शीताद, २ दंतपुप्पुट, ३ दंतवेष्टक, ४ शौषिर, ५ महाशौषिर, ६ परिदर,७ उपकुश, ८ दंतवैदर्भ,९वईन,१०अधिमांस और इनके सिवाय ५ नाडी हैं ( नाडीरोगोंकी उत्पत्ति जैसे पहले दशवं अध्यायमें वात, पित्त, कफ, सन्निपात और शल्यसे कह चुकेहैं वैसेही यहां दंतमूल भी ५ प्रकारके नाडीरोग जानों इसको दन्तनाडी अर्थात् नासूर कहतेहैं)॥ ११ ॥ शोणित दंतवेष्टेभ्यो यस्याकस्मात्प्रवर्तते ॥ दुर्गंधी नि सकृष्णानि प्रक्ले दीनि मृदूनि च ॥१२॥ दंतमाँसानि शीर्यते पचंति , पर- स्परम् ॥ शीतादो नाम से व्याधिः कफशोणितसंभवः ॥ १३ ॥ जिसके मसूढोंमें अकस्मात् रुधिर निकले और मसूढे दुर्गध युक्त हों, काले पड़ जायँ, क्लेदित रहें और नरम हो जायें ॥ १२ ॥ तथा दांतोंकी जडका मांस गिरने लगे तथा परस्पर मसूढे पकने लगें तो यह कफ और रक्तसे उपजा " शीताद 1 नाम रोग कहलाता है ॥ १३ ॥ देतयोस्त्रिषु वा यस्य श्वयुथुः सरुंजो महान् ॥ दंतपुप्पुटको ज्ञेयः कफरक्तनिमित्तजः ॥ १४ ॥ स्वति पूर्यरुधिरं चला दंता भवंति च ॥ दंतवेष्टः सँ विज्ञेयो दुष्टशोणितसंभवः ॥ १५ ॥ श्वर्यथु- दंतमूलेषु रुजावान् कफरक्ततः॥ लालास्रावी सं विज्ञेयः कडू- माञ्च्छौषिरी गेदः ॥ १६ ॥ जिसके दांतों, मसूढों अथवा तालु सहित तीनों स्थानों में पीडा सहित महाशोथ हो उसके कफ और रक्तसे उपजा “दंतपुप्पुट"रोग जानना ॥ १४॥ यदि मसूढोंसे पीव और रुधिर झिरे और सब दाँत हिलजायँ तो वह दुष्ट रुधिरसे उपना दंतवेष्टक" रोग जानना चाहिये ॥१५॥ मसूढोंमें पीडा युक्त शोथ हो, खाजभी हो तथा मुँहसे लार गिरे तो कफ और रुधिरसे उपजा " शौषिर" नाम रोग जानने योग्य है ॥ १६ ॥ दंताश्चलति वेप्टेभ्यस्तालु चाप्यवदार्यते ॥ दंतमांसानि पच्यते मुंखं च परिपीड्यते॥ यस्मिन्स सर्वजो व्याँधिर्महाशौषिरसंज्ञकः॥ " निदानस्थान-अ० १६. (५९९) ॥ १७ ॥ दंतमांसानि शीर्यते यस्मिन्ष्ठीवति चाँप्यसृक् ॥ पित्ता- सृकंफजो व्याधिज्ञेयः परिदरो हि सः ॥ १८ ॥ जिसके दांत मसूटोंमेंसे हिलकर गिरने लगे और ताल विदीर्ण हो( फट) जाय और मसूढें पक जायँ तथा मुखमें अतिपीडा हो तो यह संन्निपातसे उपजी "महा- शौपिर" नाम व्याधि कहलाती है ॥ १७ ॥ जिसके मसूढे विदीर्ण होजाय और थूकने में खून आवे तो पित्त, कफ और रुधिरसे उपजी हुई “परिदर" नाम व्याधि जाननी चाहिये ॥ १८ ॥ वेष्टेषु दाहः पाकश्च तेभ्यो दंताश्चलंति च ॥आघट्टिताः प्रस्रवंति शोणित मंदवेदनाः ॥ १९॥ आध्मायंते नुते रक्त मुखं पूति प्रजायते ॥ यस्मिन्नुपकुशः से स्यास्पित्तरंक्तकृतो गर्दैः ॥२०॥ घृष्टेषु दंतमूलेषु सरभो जायते नृणाम् ॥ भवंति र्च चला दताः स वैदर्भोऽभिधीतजः ॥२१॥ मसूटोंमें दाह हो पकजायँ और दांत हिलकर मसूढोंसे गिरने लगे और विना दवाये रगडे उनमेंसे रक्त निकले और मंद २ वेदना हो ॥ १९ ॥ और यदि रक्त नहीं निकले तो मसूढ़े फूल जाय और मुखमें दुर्गंध आवे यह पित्त और रुधिरसे उपजा "उपकुश' रोग है ॥ २० ॥ दांतोंकी जडको रगडनेसे संरंभ (शोथ) उत्पन्न होजावे और दांत हिलजावें तो अभिवात ( रगडने) से उपजा "वैदर्भ' रोग जानो ॥२१॥ मारुतेनाधिको देतो जायते तीनवेदनः॥वर्द्धनः स मैतो व्याधि- जर्जात रुक् च प्रशाम्यति ॥ २२॥ हानव्ये पश्चिमे दंते महाशोथो महारुजः॥ लालास्रावी कफकृतो विज्ञेयः सोधिमांसकः॥२३॥ दंतमूलगता नाड्यः पञ्च ज्ञेयो यरिताः॥२४॥ यदि वायुसे तीव्र वेदना युक्त और अधिक दांत (मसढोंमें ) पैदा होजाय तो उसे "वर्द्धन" कहतेहैं इसमें अधिक दांत उत्पन्न होने में तो वेदना होतीहै और निकल आये पीछे वेदना शांत हो जाती है ॥ २२ ॥ हनु (ठोढी) के पिछली तरफके दंत (मूल) में भारी शोथ और पीडा होय, मुँहसे लार गिरे तो कफका (श्लो० २१) सरंभोऽत्र स्वयथुः ( इति डल्लन;) (श्लो० २३) हानव्ये इनुभवे । -- (६००) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १०४ किया हुआ यह “अधिमांस" जानना चाहिये ॥ २३ ॥ मसूढोंकी जडमें पाँच प्रकारकी नाडी (नासूर ) होती हैं जैसे दशमाध्यायमें नाडीरोग कहा है-वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और शल्यज वैसेही यहांभी जानों (देशभाषामें इस नाडीको जाडिया कहते हैं)॥ २४ ॥ दंतरोग। दंतगतास्तु दालनः क्रिसिदंतको दंतहर्षों संजनक शर्करा कपा- लिका श्यावदंतको हनुमोक्षश्चेति ॥ २५॥ दंतगत ( दांतोंके ) ८ रोग इस प्रकार होते हैं-१ दालन, २ किमिदंत, ३ दंत- हर्ष, ४ भंजनक, ५ शर्करा, ६ कपालिक, ७ श्यावदंतक, ८ हनुमोक्ष ॥ २५ ॥ दाल्यंते बहुधा देता यस्मिस्तीव्ररुगन्विताः ॥ दालनः सं इति ज्ञेयः सदागतिनिमित्तः॥२६॥कृष्णश्छिद्री चलः स्त्रावी तसंरंभो महारुजः ॥ अनिमित्तरुजो वाताद्विज्ञेयः कृमिदंतकः ॥ २७ ॥ दशनाः शीतमुष्णं च सहते स्पर्शनं न च॥ यस्य तं दन्तहर्प तु व्याधि विद्यात्समीरणात् ॥ २८॥ वक्त्रं वक्रं भवेद्यस्मिन् दतमें- गश्च तीव्ररुक् ॥ कफवातकृतो व्याधिः ल भजनकसंज्ञितः॥ २९ ॥ जिसमें दांत विदारणसे होतेहों और तीव्र पीडा युक्त हों वह “दालन' नामक दंतरोग जानना यह सदैव गतिक कारणसे होताहै ॥ २६ ॥ जो दांत काला पड जाय, इसमें छिद्र हो हिलने लगजाय, उससे मल निकले, शोथयुक्त हो और वेदना अधिक हो और विना कारणके पीडा होजाय तो वायुसे यह “कृमिदंत रोग जानना (अर्थात् दांतमें कीडा लगाहै ऐसा जानना) ॥ २७ ॥ जिसके दांत शीतल और गरम वस्तु तथा स्पर्शको नहीं सहसकें उसे वायुसे उपजी "दंतहर्ष' नाम व्याधि जानना ॥ २८ ॥ जिसमें मुँहका आकार टेटा होजाय और दांत टूटनेलगें तथा तीव्र वेदना हो वह कफ और वायुका किया हुआ “ भंजनक " होता है ॥ २९ ॥ शर्करेव स्थिरीभूतो मलो देतेषू यस्यं वै ॥ सा देतानां गुणती तुं विज्ञया दतशर्करा॥३०॥दलंति दंतवल्कानि यदा शर्करयां सह ॥ ज्ञेया कपालिका सैवं दशनानां विनाशिनी ॥३१॥यो ऽसम्मिश्रेण पित्तन दग्धोदतस्त्वंशेषतः॥श्यावतां नीलतांवापि गतः स श्यौव- नामरोग १०५ निदानस्थान-अ० १६. (६०१) दंतकः॥३२॥ वातेने 'तैस्तर्भावस्तु हनुसंधिविसंहँतः ॥ हनुमोक्ष इति यो व्याधिरर्दितलक्षणः ॥ ३३ ॥ जिसके दांतोंमें शर्करा (पथरी) की तरह मल जमकर स्थिर होजाय वह दांतोंके गुण नाश करनेवाली “ दंतशर्करा" होती है ॥ ३० ॥ यदि उस जमी हुई शर्क- राके साथ दांतोंकी फच्चटें गिरने लगे तो दांत नाश करनेवाली "पालिका" नाम व्याधि जाननी चाहिये ॥ ३१॥ जो रुधिरसे मिले हुए पित्त करके सारा दांत भस्मसा होकर काला या नीला होजाय तो उसे "श्यावदंत' कहते। हैं उन उन भावों ( कठिन चर्वण, अतिज़ंभा आदि ) करके वायुसे ठोडीकी संधि बिगड जाय तो उसे “ हनुमोक्ष" रोग कहते हैं इसमें अर्दित वायुकेसे लक्षण होते हैं (यह व्याधि दांतोंमें पीडा करनेवाली और दांतोंके समीप होनेसे दंतरोगमें कही है ) ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ जिह्वारोग। जिह्वागतास्तु कंटकास्त्रिविधात्रिभिदोषैरलास उपजिह्विका चेति३४॥ जिह्वाके ५ रोग इस प्रकार हैं-कंटक तीन प्रकारके तीनों दोषोंसे जैसे १ वात- कंटक, २ पित्तजकंटक, ३ कफजकंटक, ४ अलास, ५ उपजिाह्नका ॥ ३४ ॥ जिह्वनिलन स्फटिता प्रसुप्ता भवेच शाकच्छदनप्रकाशा ॥ पित्तन पीता परिदाते च चिंता संरक्तैरपि कंटकैश्च ॥३५॥ कफेनं गुर्वी बहुला चिंता चं मांसोद्गमैः शाल्मलिकंटकाभैः ॥ जिह्वांतले यः श्वयर्थैः प्रगाढः सोलालँसंज्ञः कर्फरक्तमूर्तिः॥ जिह्वां स तु स्तंभ- यति प्रवृद्धो मूले तु जिह्वा भृशमे ति पाकम् ॥३६॥ जिह्वाग्ररूपः श्वयथुर्हि जिह्वाँमुन्नम्य जातः कफरक्कँयोनिः॥प्रलेककं पारदाह- युक्ता प्रकथ्यतेऽसोवुपंजिबिकेति ॥ ३७ ॥ (लो० ३३) वाग्भटेन भावीमश्रेण च हनुमोक्षः दंतरोगेषु न पठित: किन्तु करालः दंतभेदश्चालश्व पठिता एव वाग्भटे दश दंतरोगाः सन्ति तेषा लक्षणानि यथा-"दतभेदे द्विजास्तोदभेदरुस्फुटनन्विताः । चालश्चलगिर्दशनर्भक्षणादधिकन्यथैः ॥" कराललक्षणन्तु भावप्रकाशात्-"शनैः शनैः प्रकुरुते यत्र दंताश्रितोनिलः । करालान्विकटान्दतान्स करालो न सिद्धयति" इति ।। (श्लो० ३५) शाकः वृक्षविशेषो महाखरपरलक्षणः । (श्लो० ३६) अलासरोगे जिह्वास्तंभेन तु वायुरप्यस्ति तथाच भृशं पाकेन पित्तमप्यस्ति अतएव सान्निपातिकत्वेनाऽसाध्यत्व दुरुपक्रमत्वात् इति निबंधसग्रहः) ।। ..
(६०२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १०६ वायुके दोपस (कंटक ) हों तो जिह्वा फटी हुई और सोई हुईसी अर्थात् सुन्नसी तथा शाकके पत्ते जैसी ( खरदरी और पतली) मालूम होती है । पित्तके दोपसे कंटक हों तो जिह्वा पीली होती है और उसमें दाह होता है और रक्त युक्त कंटकों (मांसांकुरों) से व्याप्त होती है ॥ ३५ ॥ कफके दोपसे कंटक हों तो जिह्वा भारी, मोटी और सिंभलके कांटों जैसे मांसांकुरोंसे व्याप्त होती है। और जो जिह्वाके नीचे मोटा सोजा हो तो कफ और रक्तकी मूर्ति अलास नामक जिह्वारोग जानों यह रोग बढकर जिह्वाको स्तंभित करदेता है और ज.मेंसे जिह्वा पाकको प्राप्त होजाती है ॥ ३६॥ जिसकं जिह्वाके अग्रभागमें सोजा हो और जिह्वाको ऊपरको नवादेवे, मुँहसे लार गिरे, खाज और दाहसे युक्त हो तो कफ और रुधिरसे उपजा इसे “ उपजिविका " नामक रोग कहते हैं ॥ ३७ ॥ तालुरोग। तालुगतास्तु गलगुंडिका तुंडकेय॑ऽध्रुषो मांसकच्छपोऽव॒दं मांस- संघातस्तालुपुप्पुटस्तालुशोषस्तालुपाक इति ॥३८॥ तालुके ९रोग इस भांति होते हैं-१ गलशुंडिका, २ तुंडिकेरी, ३ अध्रुप, ४ मांसकच्छप, ५ अर्बुद, ६ मांससंघात; ७ तालुपुप्पुट, ८ तालुशोष और ९ तालुपाक ॥ ३८॥ श्लेष्मासृग्भ्यां तालुसूलात्प्रवृद्धो दीर्घः शोफोमांतवस्तिप्रकाशः॥ तृष्णाकासश्वासकृत्संदिष्टो व्याधियॆ : कंठंशुंडीति नाम्ना ॥ ३९ ॥ शोः स्थुलस्तोददाहप्रपाकः प्रागुक्ताभ्यां तुंडिके रीमता तु ॥ शोफः स्तब्धो लोहितस्तालुदेशे रक्ताँज्ज्ञेयः सोध्रुषो सँग ज्वराढ्यः॥४०॥ जो कफ, रक्तसे उपजा हुआ तालुकी जडस लेकर दीर्घ सोजा होता है और भरी मशककी तरह तालु फूल जाता है, तृपा अधिक होती है तथा खांसी और श्वास पैदा कर देता है वैद्योंने उस व्याधिको कंठशुंठी' (गलशंडी) नामसे कहा है ॥ ३९ ॥ जिसके तालु में सोजा हो, ताल भारी हो, पीडा, दाह और पाक हो तो पूर्वोक्त कफ और रुधिरसे उपजा “ तुंडिकेरी" नाम रोग जानो ।। और जिसमें कडा सोजा हो और तालुप्रदेशमें रक्तता अधिक हो, दर्द और ज्वर करके. युक्त हो उसे रुधिरविकारसे उपजा “अध्रुप” नाम रोग जानना ॥ ४० ॥ कुम्मोत्सन्नोऽवेदनो शीघ्रजन्माऽरक्तो ज्ञेयः कच्छपः श्लेष्मणा स्यात् ॥ पद्माकारं तालुमध्ये तुं शोफ विद्याक्तांददै प्रोक्तलिं- ..
" १०७ निदानस्थान-अ० १६. गम्॥४॥दुष्टं मांस श्लेष्मणा नीरुजं च ताल्वंतस्थं मांसँसंघात- माहुँः॥ नारुक् स्थायी कोलमात्रः कफाँत्स्यान्मेदोयुक्तात्पुप्पुट- स्तालुंदेशे ॥ ४२ ॥ जो कछवेकी भांति ऊपरको उठा हो, वदना रहित हो, बहुत दिनोंमें पैदा हो, लाल वर्ण नहीं हो तो कफसे उपजा कच्छप" नाम रोग जानना । जो कमलके आकार तालुके मध्यमें सोजा हो और उसमें पूर्वोक्त ग्यारहवें अध्यायमें कहेहुए रक्ताबंदके लक्षण हों तो रक्तसे उपजा “ अर्बुद अर्बुद " रोग जानना ॥ ४१ ॥ और यदि तालुमें कफसे मांस दूषित हो, वेदना रहित हो तो "मांससंघात" कहते हैं। तथा बडे वेरके समान स्थिर और वेदना रहित ग्रंथिसी हो तो मेदयुक्त कफसे उपजा " तालुपुप्पुट " रोग जानना चाहिये ॥ ४२ ॥ शोषोत्यर्थं दी यते चापि तालुः श्वासो वातात्तालुशोषः सपित्तात् ॥ पित्तं कुर्यात्पकमत्यर्थघोरं तालुन्येनं तालुपाकं वदति ॥ ४३ ॥ जिसमें अत्यन्त शोष (तालुमें खुश्की) हो और तालु विदीर्णसा होता हो और श्वास हो तो पित्तयुक्त वायुसे उपजा " तालुशोष" रोग होता है । और यदि पित्त तालुप्रदेशमें अत्यन्त घोररूप पाक पैदा करे तो उसे " तालुपाक कहते हैं ! १३ ॥ कंठरोग। कंठगतास्तु रोहिण्यः पंच कंठशालूकमधिजिह्वो वलयो बलास एकवृंदो वृदः शतप्ती गिलायुगलविद्रधिर्गलौघःस्वरन्नो मांसतानो विदारी चेति ॥४४॥ कंठके १७ रोग इस प्रकारंस होते हैं-५ प्रकारको रोहिणी (१ वातरोहिणी, २ पित्तरोहिणी, ३ श्लेष्मरोहिणी, ४ सन्निपातरोहिणी, ५ रक्तरोहिणी), ६ कण्ठशालूक, ७ अधिजिह्व, ८ वलय, ९ वलास, १० एकवृंद, बंद ११ शतनी, १२ गिलाय,, १३ गलविद्रधि, १४ गलौष, १५ स्वरघ्न, १६ मांसतान और १७ विदारी ॥४४॥ गलेऽनिलः पित्तकैफौ चमूच्छितो पृथक् समस्ताश्च तथैवं शोणि- तम् ॥ दूष्य माँस गर्लेरोधिनोंकुरौन (जंति यान् साँशुहरा हुँ (गद्य ४४) पूर्वोटिष्टकठरोगास्तु सप्तदशैव कथमत्राष्टादश इत्याह डल्लन:-एकवृदो विशेषानुगमेना- वस्थातरं प्राप्तो वृदत्व प्रतिपद्यते अतो मूलोक्ता सप्तदशसख्या न विरुद्धा इति जैनटमतम् । भावमिश्रस्तु स्वग्रथे अष्टादश इत्येवमाह । (नो०४५) आशुहरा शीघमारका अथवा असुइरा प्राणहरा चेति ॥ - (६०४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । १०८ रोहिणी ॥४५॥ जिह्वां संमंताशवेदना ये मांसाकुराः कण्ठ- निरोधिनः स्युः॥ तो रोहिणी वातकृतां वदंति वातात्मकोपद्रव- गाढयुक्ताम् ॥ ४६॥ क्षिप्रोद्भवा क्षिप्रविदाहपाका तीबज्वरा पित्त- निमित्ततः स्यात् ॥ स्रोतोनिरोधिन्यपि मंदपाका गुर्वी स्थिरा सा कफसम्भवा वै॥४७॥ गलप्रदेशमें वायु अथवा पित्त अथवा कफ तथा तीनों दोप अथवा रक्त मूच्छित होकर मांसमें दूषण उत्पन्न करके गलके रोकनेवाले मांसके अंकुर पैदा कर देते- हैं उसे रोहिणी कहते हैं यह रोहिणी शीव मृत्युकारिणी है ॥४५॥जो जिह्वाके आस- पास दारुण वेदनावाले और कण्ठके रोक देनेवाल और वायके उपयोंसे युक्त मांसके अंकुर हों तो इसे वायुकी रोहिणी कहते हैं ॥ ४६॥ यदि शीघ्र उत्पन्न होने- वाले और शीघ्रही विदाह (जलन) को प्राप्त होने वाले तथा शीत्रही पकनवाल अंकुर हों और तीक्ष्ण ज्वर भी हो तो पित्तकी रोहिणी है । यदि गल आदि मार्ग रोकनेवाली, मंद पकनेवाली, भारी और स्थिर हो तो कफकी रोहिणीजानना ॥४७॥ गंभीरपाकाऽप्रतिवार्यवीर्या त्रिदोषलिंगा त्यसंभवा स्यात् ॥ स्फोटांचिता पित्तसमानलिंगोऽसाध्या प्रदिष्टा रुधिराँत्मकेयम्॥४८॥ जिसका पकाव गहरा हो तथा उसका बल निवारण करने योग्य न हो, (तीक्ष्ण पीडा हो) और तीनों दोषोंके लक्षण हों तो त्रिदोषसे उपजी रोहिणी होती है । -तथा जिसमें बहुतसी फुन्सियां हों और पित्तकी रोहिणीके समान लक्षण हों तो उसे रुधिरकी रोहिणी समझनी चाहिये और यह असाध्य होती है ॥ ४८ ॥ कोलास्थिमात्रः कर्फसंभवोयों ग्रंथिर्ग ले कंटकाकंभूतः॥ खरः स्थिरः शस्त्रनिपातसाध्यस्तं कंठशालूकमिति ढुवंति॥४९॥जिह्वा- ग्ररूपः वयथुः कफातं जिह्वाग्रंवंधोपरि रक्तमिश्रः ॥ ज्ञेयोधि- जिह्वः खलु रोग ऍष विर्जयेदागतपार्कमेनम् ॥५०॥बलास एवा- यतसुन्नतं चं-शोफ करोत्यन्नगति निवाय॥त सर्वथैवाऽप्रतिवार्थ- वीर्य विवर्जनीयं वलयं वदन्ति ॥ ५१ ॥ बड़े बेरकी गुठलीके बराबर कफसे उपजी ग्रंथि जो गलेमें हो और वह कांटे और तिनके जैसोंसे छाई हुईसी हो खरदरी या कडी और स्थिर हो तथा शस्त्र ( नन्तर आदि) के अवचारसे साध्य होने योग्य हो (अर्थात् इतनी कडी और निदानस्थान-अ० १६. (६०५) स्थिर हो कि शन्त्रक विना स्वयं नहीं फूट) उसे "कण्ठशालूक" कहते हैं ॥ ४९ ॥ जिसमें जिहाद अग्रमें कफसे सोजा हो और जिहाके प्रबंध (मूल ) पर रुधिरसे मिला हुआ रक्तवर्णका सोजा हो इसको अधिजिह्व" नाम रोग जाने और जब यह पकजाय तव त्यागने योग्य होता है ॥ ५० ॥ जव कफ (बढकर ) फैला हुआ और ऊँचा सोजा पैदा करे और अन्नके भीतर जानकी गतिको रोकदे तो. उसे सर्वथा प्रतिकारके योग्य नही और त्यागने योग्य ऐसा “वलयरोग"कहते हैं ॥५१॥ गेले च शोकुरुतः प्रवृद्धौ श्लेष्मानिलौ श्वासहजोपपन्नम्।मर्म- च्छिदं दुस्तरमनसाहुवलाससंझं निपुंणा विकारम् ॥ ५२ ॥वृत्तो- नंतो यः श्वयथुः सदाहः कँड्डन्वितोऽपामयदुर्गुरुंचानाम्नैकवृंदः परिकल्पितोलौ ध्याधिर्वलासक्षतजनलूतः॥ ५३ ॥ लसुनते वृत्तसमंददाहं तीबज्वरं बृदमुदीहरंति ॥ त चाँपि पित्तक्षतंज: प्रकोपाद्विद्यासतोदं पवनास्त्रज तम ॥ ५४॥ कफ और वायु बढकर गले में शोथ पैदा करें और श्वासयुक्त हो तथा मर्मका छेदन करनेवाला हो तो निपुण वैद्य दुस्तर "बलास"संज्ञक रोग उसे कहतेहैं ॥५२॥ जो गलेमें फैला हुआ और ऊंचा दाहयुक्त, खाजसहित, विना पकनेवाला, मृदु (कडा) और भारी ऐसा सोजा हो तो इस व्याधिको " एकवृंद" नाम रोग कहते हैं और यह कफ और क्षतज ( चोट लगने आदिके रक्त ) से उत्पन्न होता है ।। ५३ ॥ यदि उठा हुआ और फैला हुआ, तीक्ष्ण दाह युक्त हों और तीव्रज्वरभी हो तो उसे "बंद" कहते हैं इसे पित्त और क्षतज(चोट आदि) से उपजा जानना चाहिये और यदि इसमें चीस या दरद हो तो इसे वायु और रक्तसे उपजा जानना चाहिये ॥ ५४॥ वर्तिधना कंठनिरोधिनी यो चितातिमात्रं पिर्शितप्ररोहैः ॥ नानारुजोच्छ्रार्यकरी त्रिदोषाज्ञयाँ शतप्ती शतघ्न्यसाध्या ॥५५॥ थिर्गले वामलकास्थिमात्रः स्थिरोल्परूँक् स्यात्कफरक्तमूर्तिः॥ संलक्ष्यते सक्तमिवाशनं च स शस्त्रसाध्यस्तु गिलायुसंज्ञः ॥५६॥ सर्वं गेलं व्याप्य समुंस्थितो यः शोफो जो यत्रं वसति सर्वाः॥ से सर्वदोषो गैलविद्रधिस्तु तस्यैव तुल्यः खलु सर्वजस्य ॥ ५७॥ ( श्लो० ५६) अशनं सक्तमिवीत-भोजनमास स्थितमिवेत्यर्थः ॥
। ॥ ६६०६) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। जो कंठमें कंठरोकनेवाली गहरी बत्तीसी हो और मांसक अंकुरोंस अत्यंत आच्छा- "दित हो, नाना प्रकारकी वेदना और उभार करने वाली हो तो उसे “ शतनी कहते हैं यह शतनीकी भांति (जो लोहेकी तोप होती है उसके तुल्य ) होती है और त्रिदोषसे उपजती है तथा असाध्य होती है ।। ५५ ॥ गले में जो घाँवलेकी गुठलीके बरावर स्थिर और थोडी पीडा करनेवाली ग्रंथि हो और ऐसा मालूम हो जैसे गलेमें भोजनका ग्रास अटका हो तो उसे कफ और रक्तकी मूर्ति" गिलायु" रोग जानना और यह गिलायु शस्त्रसे साध्य होने योग्य होता है ॥ ५६ ॥ जो समस्त गलेमें फैलकर सोजा उपजे और वेदना उसमें तीनों दोषोंकी हो तो त्रिदोषसे उपजा “गलविद्रधि" नाम रोग होताहै यह गलविद्रधि पूर्वोक्त त्रिदोप- विद्रधिके तुल्य होता है ॥ ५७ ॥ शोफोमहानन्नजलावरोधी तीव्रज्वरोवातंगतेनिहताकिफेन जातो रुधिरान्वितेन गेले गलौघः परिकीत्यतेऽसौ॥५८॥योतिप्रेताम्यन् श्वसिति प्रसक्तं भिन्नस्वरः शुष्कविमुक्तकंठः ॥ कफोपदिग्धेष्व. निलायनेषु यः स रोगः श्वसनात्स्वरन्नः ॥ ५९॥ जो गलेमें अन्न और जलको रोकनेवाला बडा शोथ हो, ज्वर युक्त हो तथा उदान ) वायुकी गतिका अवरोध करे तो रुधिरसे मिले हुए ककसे उपजा यह गलौघ' नाम रोग वर्गन किया है ॥ ५८ ॥ जिसमें श्वास लेते समय अंधे- रासा आवे और निरंतर स्वर भिन्न हो तथा कंठ सूखजाय और विमुक्तकण्ठ अर्थात् कण्ठ खुलासा होजाय अथवा भोजन निगलनेमें स्वाधीन नहीं रहे और पवन के मार्गों में कफ उपलिप्त हो तो श्वास वायसे उपजा यह स्वरघ्न जानना चाहिये ॥ ५९ ॥ प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकैप्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण ॥ स मांसतानः कथितोऽवलंबी प्राणप्रंणुत्सर्वकृतो विकारः ॥ ६० ॥ साहतोद श्चर्यसरक्तमतर्गले प्रति विशीर्णमासम् ॥ पित्तेन विद्याद्वदने विदारी पाश्र्व विशेषात्स तु येन शे ते ॥६॥ (मो० ५८) वातगतेनिहता इति-उदानवातगतेरवरोधकः ( इति भावमिश्रः) । अन्ये च श्वास- वायोर्गातनिहन्तेति वदन्ति ।। (शो०५९) अतिताम्यन् तमपश्यन् । प्रसक्तं निरंतरम् ( इति डल्लनः)। शुकविमुक्तकठः शुष्को विमुक्तो अस्वाधीनः कंठो यस्य स ग्रास निगलितुमशक्क इत्यर्थः । अनिलायनेषु कफोपदिग्धेषु इति वायुवम॑पु कफोपलिप्तेषु । श्वसनात् वातात् ॥ L ' रोग ५ ११२ निदानस्थान-अ० १६. (६०७) जो फैला हुआ सोजा कष्टसाध्य रूप गलेमें होफर गलेको क्रमसे बंदकरे और अवलंबनशील हो तो त्रिदोपसे उपजा हुआ "मांसतान” नामक विकार कहाहै और यह प्राणोंका प्रेरक ( दूर करनेवाला ) है । ६० ॥ गलेके भीतर दाह और दर्दयुक्त तथा रक्तयुक्त सोजा हो और गलेमें दुर्गधियुक्त मांस विखरासा होजाय तो इसे पित्तसे उपजी मुखमें विदारी जानो और यह विदारीरोग जिस करवट मनुष्य अधिक सोताहै उस तरफ मुखमें विशेषतासे होतीहै ॥ ६१ ॥ सर्वमुखके रोग। सर्वसरास्तु वातपित्तकफशोणितनिमित्ताः॥६२ ॥ संपूर्ण मुखमें होनेवाले रोग वायु, पित्त, कफ और रक्त निमित्तवाले होते हैं ।। ६२ ॥ स्फोट: सतो देवदनं समंताद्यस्याचिंतं सर्वसरः स वातात् ॥ रक्तैः सदाहैस्तभिः स पीतैर्यस्याचितं चापि से पित्तकोपात् ॥ ६३ ॥ कंड्युतैरल्परुजैः सवर्णैर्यस्याचितं चापि स वै कफेन। रक्तेन पित्तोदित एक एवं कैश्चित्दिष्टो मुखपाकसंज्ञः॥६४ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ जिसका समस्त मुख पीडायुक्त फालकोंसे व्याप्त हो तो वह वायुका मुखरोग (मुखपाक ) है । यदि लाल वर्णके, दाहयुक्त, पतले, पाले वर्णवाले फालके हों तो पित्तका मुखपाक है ।। ६३ ॥ जो खाजयुक्त, थोडी पाडा वाले, सवर्ण (सुपेद) फालकोंसे व्याप्त हो तो कफका मुखपाक है । और किसीने रक्त का भी मुखपाक एक कहाहै उसमें पित्तहीके अनुसार सब जानना (धन्वंतरिजी वात, पित्त और कफका ही मुखपाक कहते हैं)॥६४ ॥ इन सबके डाक्टरी और यूनानीमें ठीक २ नाम प्रायः नहीं मिलते किसीका नाम मिलता या किसीका ठीक २ नहीं मिलता 'इसीसे नहीं लिखे उन हरएककी तजबीज और ढंग औरही प्रकारसे है ।। (वक्तव्य ) निदानस्थानमें जितने रोगोंका निदान वर्णन हुआ उससे यह नहीं समझना चाहिये कि सुश्रुतसंहितामें इतने थोडेहीसे रोगोंका निदान है क्योंकि जिन बहुतसे रोगोंका निदान यहां वर्णन नहीं हुआ है उन सबका निदान चिकित्सित स्थान तथा उत्तरतंत्रमें यथायोग्य वर्णन होगा। और हम जोरोगोंके निदान के साथ र प्रायः डाक्टरी तथा यूनानीके मतसे नाम आदि लिखतेहैं उसमें गडबड यह रहती- है कि उनके अपनी रीतिपर संख्या और रोगके लक्षणादि और ही और ढंगसे हैं ।
(६०८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०नि० स्था० ११२ इससे कहीं २ किसी किसी रोगका लक्षणसहित ठीक नाम मिलजाता है, किसीका किसी औरहीके साथ संबंध या अंतर्भाव समझा जाताहै तो जिसके लक्षणोंमसे कुछ मिलताहै कुछ नही या सभी नहीं मिलता या किसीके लक्षणों में बहुत भेद है या किसीके वर्णन करनेमें लेखवाहुल्य बहुतही होता है तो ऐसी अवस्था में उन्हें छोड दिया है यदि उनका ठीक २ वर्णन देखना हो तो उनकी पुस्तकों में देखा ।। इति प० मुरलीधरशमवि० सुश्रुतस० भा० टी० निदानस्थाने पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ पूर्तिः। श्लोक-श्रीमन्मालवभूमिपालतिलकः शैलाननाधीश्वरो विद्यामेमनिधिविनीति- निपुणः प्राज्ञो यशस्वी नृपः॥ नित्यं वृद्धिमियाद्यदाश्रितभिपग्वर्येण प्रति गतं टीकायां मुरलीधरेण विदुषा स्थानं निदानं शुभम् ॥१॥ अर्थ-श्रीयुक्त मालवप्रांतके राजाओंमें तिलकरूप शैलानन (सैलाना) के महा- राज जोकि विद्याप्रेमके निधि और नीतिमें निपुण तथा विद्धान हैं और यशस्वी अर्थात् जिनका नाम श्री १०८ यशवंतसिंह बहादुर है वे नित्य वृद्धिको प्राप्त हों कि जिनके समाश्रित राजवैद्य पं० मुरलीधरशासे यह सुश्रुतसंहिताकी टीकामें सुंदर निदानस्थान पूर्ण हुआ। इति सुश्रुतसहितायाः पं० मुरलीधरशर्मविरचितसान्वयसटिप्पणीकसपरिशिष्ट- भाषाटीकायां निदानस्थानं समाप्तम् ॥ २॥ ॥ समाप्तमिदं निदानस्थानम् ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम् प्रेस-बम्बई.
॥ श्रीः॥ अथ सुश्रुतसंहिता। सान्वयभापाटीकासहिता। H - शारीरस्थानम् ३. * प्रथमोऽध्यायः १. अथातः सर्वभूतचिंताशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ निदानस्थानके अनंतर अब शारीरस्थान वर्णन किया जाता है । इस शारीरक स्थानके आरंभमें सब भूतों (प्राणियों) (अथवा पृथिवी, जल, अग्नि, वाय और आकाश) की चिंता (चिंतन अर्थात् ये कैसे पैदा हुए, इनके क्या २ कार्य हैं इत्यादि ) शारीरकका प्रथम व्याख्यान करते हैं। सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपमखिल- स्य जगतः संभवहेतुरळक्तं नाम संदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामधि- टीनं समुंद्र इवोदकानां भावानाम् ॥ १ ॥ (गद्य १) सर्वभूतानामिति-पृथिव्यादीनाम् अथवा सर्वस्थावरजगमाना सत्त्वरजस्तमोलभण गुणत्रया- स्मकम् अष्टरूपम् अष्टधाप्रकृतिरूपमिति-प्रकृतिभावेनैवाव्यक्त महानहकारः पच तन्मात्राणीति अष्टौ रूपाणि यस्य तत्तथा । प्रकृतित्व चाप्टानामव्यक्तीदीना साख्ये प्रतिपादित शिलापुत्रकन्यायेन रूपत्वरूपित्व च । अव्यक्तस्याव्यक्तं महानहकारः पचभूतानीत्यष्टी रूपा'त्येके । अपरे तु मनोबुद्ध्यहकारमहाभूतानि इत्यष्टौ भाषते । अखिलस्य जगतः संभवहेतुः अभिव्यक्तिकारणम् । अत्र गयदासाचार्यस्त्वन्यथा व्याख्याति यथा-' अखिलस्य जगतः सभवहेतुरित्यनेनोपादानकारणत्वम् अव्यक्तस्य जगदुत्पत्ती प्रतिपादितम् । अकारणं ने कारण यस्य तत् अविकृतिरूपं न कस्यचित्कार्यमित्यर्थः । अन्यक्त प्रकृतिः प्रधान मुलप्रकृतिरिति यावत् (इति डल्लनः)। अपरे शून्य वाचस्पत्ये तु अव्यक्ताब्दः विष्णौ शिव च । साख्यमते सर्वकारणे प्रधाने रूपाद्यहीनतया चक्षुराधगोचरत्वात्तस्य तथात्वम् । वेदातमते सूक्ष्मशरीरे स्वप्नावस्थाया शब्दप्रवृत्तिनिमित्त- र्जातिगुणादिभिर्वर्जिते निराकारे ब्रह्मणि च त्रिज्ञाना जीवाना, क्षेत्र देहमात्मत्वेन जानातीति क्षेत्रज्ञः " क्षेत्रा ख्यानिशरीराणि तेषा चैव यथासुखम्। आत्मानं वोत्ति सयोगादतः क्षेत्रज्ञ उच्यते" इत्युक्तो जीवात्मा क्षेत्रज्ञः॥ ३९ २ (६१०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। सम्पूर्ण भूतों (पृथिवी,अप, तेज, वायु, आकाश अथवा प्राणियों) का कारण सत्त्व, रज, तम (गुणत्रय ) के लक्षणवाला तथा अष्टधा प्रकृतिरूप अव्यक्त नाम ( मूल प्रकृति) अथवा ( ब्रह्म ) समस्त जगत्की उत्पत्तिका हेतु है और वह अव्यक्त स्वयं अकारण है अर्थात् उसका कोई कारण नहीं है किन्तु वही सबका कारण है। वह एक अद्वितीय ब्रह्म असंख्य क्षेत्रज्ञों (जीवों) का आश्रय है जैसे असंख्य नदी तथा नालोंका अधिष्ठान समुद्र है अथवा " औदकानां भावानाम्" का अर्थ कई मत्स्य, शंख, पद्मादि ऐसा करते हैं अर्थात् जैसे मत्स्य, पद्मादिका अधिष्ठान समुद्र है तैसे जीवोंका अधिष्ठान अव्यक्त समुद्र है। तात्पर्य यह है कि "अद्वैतवादी" जो जीव और ब्रह्मको एक (सजातीय) मानतेहैं वे तो औदकभाव समुद्र के सजातीय नदी, नाले ऐसा अर्थ करतेहैं और “दैतवादी" जो जीव और ब्रह्मको पृथक (वि- जातीय) मानतेहैं वे मत्स्य, शंखादि ऐसा अर्थ करतेहैं ॥ १॥ तस्मादव्यक्तान्महानुत्पंद्यते तल्लिंग एंव तल्लिंगांचं महतस्तलिंग- एवाहंकार उत्पद्यते स च त्रिविधो वैकारिकस्तैजलो भूनादिरिति२॥ उस अव्यक्त (क्षेत्रज्ञोंके अधिष्ठान ) से उसीकेसे ( सत्वरजस्तमोमय) लक्षणों- वाला महत्तत्त्व (निश्चयात्मक बुद्धितत्त्व ) उत्पन्न हुआ और उस अव्यक्तलिंगमहत्तत्व (निश्चयात्मक बुद्धितत्त्वसे) अव्यक्तलिंग (सत्त्वरजस्तमःस्वभाववाला) अहंकार (अहमिति अर्थात् मैं हूं ऐसा अस्त्यात्मक ज्ञान) उत्पन्न हुआ वह तीन प्रकारका है। वैकारिक (प्रकृतिका विकृतरूप विकारवाला), २ तेजस (तेजोमय स्वयंप्रकाश), ३ भूतादि (भूतोंका आदिकारण ) और इसका यहभी अर्थ करते हैं कि वैकारि- कादि संज्ञा अहंकारकी पूर्व आचार्याने व्यवहारके अर्थ को हैं अर्थात् वह अहंकार साविक, राजस और तामस ऐसे तीन प्रकारका होताहै जहां वैकारिक (सात्विक), तैजस (राजस) और भूतादि (तामस ) ऐसे जानना ॥ २ ॥ तत्र वैकारिकादहंकारात्तैजससंहायातल्लक्षगांत्येवै काँदोद्रिची- ण्युत्पद्यते । तद्यों श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिबाघ्राणवाग्बस्नोपस्थ वायुपा- (गद्य २) तस्मादिति-उस्मात् क्षेत्रज्ञाविष्ठानात् अव्यक्तान् महानिति बुद्धि तत्तमत्त्व समुद्र नाम- लेस्फटिकोपलपख्य चिच्छायामक्रातिप्राप्तचैतन्य पुरुपवन्नानात्मकमध्यवयविषय निश्चित कारिगमित्वर्थ. ॥ रत्वद्यते व्यक्तीभवति । तलिंग इति-सत्त्वरजस्तमासभाव एव । तलिंगात् मत्वरजस्तम.स्वभावात् । महतः इति-बुद्वितत्त्वात् । तल्लक्षण: मत्त्वरजस्तमःस्वभाव एव अहंकारः अहनिति अभिमानव्यार रलक्षण. उत्पद्यता सोऽहकार: वकारिकादिमेदेन त्रिविय । तत्र वकारिकः प्रकृतेर्विकातरूनात्मक , नेजम: तजामरस्वत्र प्रकाश- रूपः, भूतादिः भूतानामादिकारणरूप इति शब्दार्थः । अथवा वैकारकादिमजान्नु पूर्व वार्य सम्धककाराय बैता. । तत्र वैकारिक: सात्त्विकः, तेजस: राजसः, भूतादिः तामस इति (नि० स० ) ॥
३ शारीरस्थान-अ० १. (६११) देमनासीति । तत्र पूर्वाणि पंच बुद्धीन्द्रियाणि इतराणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि उभयात्मकं मनः ॥ ३ ॥ तहां तैजसकी सहायता युक्त वैकारिक (सात्त्विक ) अहंकारसे सात्त्विकलक्षण- वाली या प्रकाशलक्षणवाली एकादश ११ इंद्रियां उत्पन्न हुईं वे ११ इंद्रिय इस प्रकार हैं कि श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण तथा वाणी, हाथ, लिंग, गुदा और पांव, तथा मन इनमें पहलेकी पांच ज्ञानेंद्रिय कहलाती हैं और उनके पिछाडीकी पांच कर्म इंद्रिय हैं और उभयात्मक (दोनोंका अधिष्ठाता) ग्यारहवां मन है ॥ ३ ॥ भूतादेरपि तैजससहायात् तल्लक्षणान्येव पंचतन्मात्राण्युत्पद्यते। तद्यथा-शव्दतन्मात्रं स्पर्शतन्मात्रं रूपतन्मानं रसतन्मात्रं गंधत- न्मात्रमिति तेषां विशेषाः शब्दस्पर्शरूपरलगंधास्तेभ्यो भूतानि व्योमानिलानलजलोळः। एवमेषां तत्त्वचतुर्विशतिर्व्याख्याता॥४॥ तैजस ( रजोगुण). युक्त भूतादि (तामस ) अहंकारसे तामसलक्षणवाली (मोहलक्षणवाली) पांच तन्मात्रा उत्पन्न हुई जैसे शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गंधतन्मात्रा और उनक विशेष (अनुभवयोग्य स्थल विषय ) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध यथाक्रम होते हैं (जैसे शब्दतन्मात्रासे शब्द और स्पर्शतन्मात्रासे स्पर्श इत्यादि) (तन्मात्रा अतिसूक्ष्म होते हैं और उनके विषय स्थूल होते हैं) और इन्ही तन्मात्राओंसे यथाक्रमसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी उत्पन्न हुए ( शब्दतन्मात्रासे आकाश तथा रपर्शतन्मात्रासे वायु, रूपतन्मात्रासे तेज, रसतन्मात्रासे जल और गंधतन्मात्रासे पृथ्वी ऐसे उत्पन्न हुर) इन्हीको चौवीस तत्त्व वर्णन किया है ( तन्मात्राओं में से एक एककी वृद्धिसे आका- शादिकी उत्पत्ति हुई ऐसा भाष्यकारका मत है जैसे-शब्दतन्मात्रासे शब्दगुणवाला आकाश उत्पन्न हुआ। और शब्दतन्मात्रा सहित स्पर्शतन्मात्रासे शब्द-स्पर्श गुग- (गद्य ३)तत्र वैकारिकादिति-सात्त्विकादहकाराद्राजससहायात् तमोमात्रा विद्यादेकादशद्रियाणि । उत्पद्यते । तल्लक्षणानि प्रकाशलक्षणानि सत्त्वस्य पकाशत्वात् । ( इति हल्लनः)। उभयात्ममिति- चुद्ध्यात्मक कर्मात्मकं च ॥ (गद्य ४) भूनादेरिति-नामसादहकारात् राजससहायात् सत्वमानानुविद्धात् पचतन्मात्राण्युत्पते । तल्लक्षणानि मोहलक्षणानि तमसो मोहत्वात् । तन्मात्राणि सा मात्रायेपु तानि शब्दादिपंचानां कारणीभूनानि अविशेषाणि तेभ्यः पचभ्यः शब्दतन्मात्रादिभ्यः एकोत्तरपरिवृद्ध्या व्योमादय उत्पद्यते यथा-शब्दतन्मात्रात् शब्दगुण पोम । शब्दतन्मात्रसहितात् स्पर्शतन्मात्रात् शब्दस्पर्शगुगो वायुः शब्दस्पर्शतन्मात्रनहितात् रूप- तन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपगुणं तेजः । शब्दस्पर्शरूपतन्मात्रमहितात् रसतन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपरसगुणा अप! शब्दस्पर्शरूपरतत्तन्मात्रसहितात् गंधतन्मात्रात् शब्दस्पर्शरूपरसगधगुगा पृथ्वी ( इति भाप्पमतेन डल्लन.)
४ (६१२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। वाला वायु । और शब्द-स्पर्श-तन्मात्रा सहिन रूपतन्मात्रास शब्द-स्पर्श-रुप गुण- वाला तंज ( अनि ) उम्पन्न हुआ। तथा गद-म्पर्श-पतन्मात्रा सहित रमतन्मा- त्रास शब्द-स्पर्श-रूप-रस गुणांवाला नलतत्त्व उत्पन्न हुआ। सही शब्द-स्पर्श- रुप-रस तन्मात्रा सहित गंधतन्मात्राम शब्द-पर्श-मप-रम-गन्ध गुणांवाली पृथ्वी उत्पन्न हुई ) ॥ ४ ॥ तत्र वुद्धीन्द्रियाणां शब्दादयो विपयाः। कर्मेन्द्रियाणां यथासं- ख्यं वचनायनानंदविसर्गविहरणानि ॥५॥अव्यक्तं महानहकारः पंच तन्मात्राणि चेत्यष्टो प्रकृतयः शंपाः पोडशविकागः ॥६॥ इनमें ज्ञानेंद्रियों क तो शन्दादिक विषय है (जैस आत्रका विषय शब्द । वि. चाका विषय स्पर्श । चक्षुका विषय रूप । जिह्वा (रसना) का विषय रस । वाणका विषय गंध है ) और कर्मेंद्रियोंके विषय क्रमस वचन. ग्रहण, आनन्द, मलत्याग और गमन ये हैं (जैसे वाणीका विषय बोलना । हाथोंका विपय पकडना । लिगका विषय मैथुन करना । गुदाका विषय मल और वायु त्यागना, तथा पैरोंका विषय चलना है) ॥५॥ अष्टधा प्रकृतिः " अव्यक्त, महत्तत्व और अहंकार तथा पांचों तन्मात्रा अर्थात् शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्राऔर गवतन्मात्रा ये आठ प्रकृति हैं ( अर्थात् कारणभूत है ) और शेप सोलह अर्थात् ग्यारह इंद्रिय और पांच पृथिव्यादि महाभूत ये विकार है (जैसे पूर्वोक्त श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, निहा और ब्राण तथा वाणी, हाय, लिग, गुदा और चरण तथा मन ये ग्यारह इंद्रिय और पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश ये पंचमहाभूत हैं सब मिल-- कर १६ सोलह विकार है ऐसे सब २४ तत्त्व हुए ) ॥ ६ ॥ स्वः स्वश्चैषां विषयोऽधिभूतं स्वयमयात्ममधिदेवंतं च यथा बुद्धे. ब्रह्मा । अहंकारस्येश्वरः। मनसश्चन्द्रमाः। दिशः श्रोत्रस्य । त्वचो वायुः । सूर्यश्चक्षुषोः। रसनस्यापः । पृथिवी घाणस्य । वचसोऽग्निः। हस्तयोरिद्रः। पादयोर्विष्णुः। पायोर्सित्रम्। प्रजापतिरुपस्थस्येति॥७॥ (गद्य ६ ) अव्यक्तीमत्यादिप्रकृतय अपग्पा कारणभूताः । अव्यक्तमिति विविधपाठात् केवलहेतुभा. वनाव्यक्तप्रकृतिरेवेति बोधनार्थम् ( इति उल्लनः )। अपरेत्वित्यत्राव्यनपदेन काल्त्य ग्रहण कुर्वन्ति । केचि. दव्यक्तपदेन शून्यस्य ग्रहणं कुर्वति । प्रकृतयस्तु कारणभूता विकारा: कार्यमित्यर्थः । षोडशविकारा यया पंचमहाभूतानि एकादशेंद्रियाणि चेति । (गद्य ७) स्वः स्वश्चैपामिति-एपा बुढ्यहंकारेन्द्रियमनसां स्व- स्वविषयोऽधिभूतसजकः । स्वयमतानि बुद्ध्यादीनि त्रयोदश अध्यात्मम् । ब्रह्मादयोऽधिदैवतम् । भूतानि . अधिकृत्य वर्तते तदधिभूतम् । आत्मान शरीरसबवेनाधिकृत्य वर्तते तदध्यात्मम् । दैवतमधिकृत्य वर्तते चदपिदैवतम् । अयं चाधिभूतादिभावो वेदातेपि वर्णितः ।। - ५ शाररिस्थान-अ० १. (६१३) इन बुद्धयादिकके अपने अपने विषय अधिभूत कहलाते हैं और ये बुद्धयादिक स्वयं अध्यात्म कहलाते हैं और इनके अधिदैवत ब्रह्माको आदि लेके इस प्रकार हैं- बुद्धि ( महत्तत्त्व ) का आधिदैवत ब्रह्मा है और अहंकारका शिव । मनका चन्द्रमा । श्रोत्र ( कर्ण ) का दिशा । त्वचाका वायु । चक्षुका सूर्य । जिहाका जल । ब्राण (नासिका)का पृथ्वी । वाणीका अग्नि। हाथोंका इंद्र । पैरोंका विष्णु । गुदाका मित्र और लिंगका-आधिदैवत प्रजापति है । (इन सबके अधिभूत और अध्यात्म तथा अधिदैवत इस भांति जानने चाहिये कि बुद्धि अध्यात्म, चोदव्य अधिभूत और ब्रह्मा अधिदै- वत । अहंकार अध्यात्म,अहंकर्तव्य अधिभूत, और शिव अधिदैवत । मन अध्यात्म संकल्पविकल्प कर्त्तव्य अधिभूत और चंद्रमा अधिदैवत । श्रोत्र अध्यात्म, श्रोतव्य अधि- भूत और दिशा अधिदैवतात्वचा अध्यात्म, स्पर्शनीय अधिभूत और वायु अधिदैवत । चक्षु अध्यात्म, दृश्य अधिभूत और सूर्य अविदैवत । रसन अध्यात्म, रसनीय अ- धिभूत और जल अधिदैवत । प्राण अध्यात्म प्रातव्य अधिभूत और पृथ्वी अधि- दैवत । वाणी अध्यात्म, वक्तव्य अधिभूत और अनि अधिदैवत । हाथ अध्यात्म, आदातव्य (ग्रहण करने योग्य) अधिभूत और इंद्र अधिदैवत । पैर अध्यात्म, गंत- व्य अधिभूत और विष्णु अधिदैवत । गुदा अध्यात्म, विसर्जन ( मलत्याग ) अधिभूत और मित्र नामक देवता आधिदैवत । लिंग अध्यात्म, आनंदनीय अधिभूत और प्रजापति नामक देवता अधिदैवत)॥ ७ ॥ तत्र सर्व एवाचेतन एष वर्गः पुरुषः पंचविंशतितमः स च कार्य- कारणसंयुक्तश्चेतयिता भवति सत्यप्यचैतन्ये प्रधानस्य पुरुषकै- वल्यार्थं प्रवृत्तिमुपदिशति क्षीरादींश्च हेतूनुदाहरंति ॥ ८॥ तहां समस्त यह वर्ग(अव्यक्तादि २४ तत्व)चेतनासे रहित है और चेतनावाला पच्चीसवाँ "पुरुष" (जीवात्मा) है वह पुरुष कार्य (पंचमहाभूत पृथिव्यादिक और एकादश इंद्रिय) तथा कारण ( अव्यक्तादिक अष्ट प्रकृति ) से संयुक्त होकर चेतन करनेवाला होता है और प्रकृति अचैतन्य है तोभी पुरुष (जीवात्मा) मोक्षके अर्थ उसकी ( अव्यक्त) की प्रवृत्ति होती है ऐसे आचार्य उपदेश करते हैं और अचैतन्यकी प्रवृत्ति क्योंकर होसकती है इसमें दुग्धादिककी प्रवृत्तिके हेतुका (गद्य ८) तत्र सर्व इत्यादि-सर्व एप वर्गोऽव्यक्तादिकोऽचेतनः कारणस्याव्यक्तस्याचेतनत्वेन तत्का- यस्व महदादेरचेतनत्वात् कार्यकारणसयुक्तः पुरुषश्वेतयिता भवति । तस्य पुरुपस्य कैवल्यार्थ प्रधानत्व - मूलप्रकृतरव्यक्तस्य प्रवृत्तिमुपदिशत्याचार्याः । एव चतुर्विशतिभिरिति-प्रकृतयोऽयी विकारा. पोडशेति चतुर्विशति. तत्त्वानि । तैः सिद्धे शरीरात्मके गृह नियतेनिनः शुभाशुभकर्मणस्समाधीनो जीवात्मा स्वा- -न्दूतवान् मनोरूपदूतवान् वसति ।।
६ - (६१४) तुश्रुतसंहिता-भा० टी०। उदाहरण देतेहैं कि जैसे दुग्ध चेतनारहित जडं होकर भी वत्सादिकके प्रेम संबंधसे प्रवृत्त होताहै (चलायमान हो टपकने लगताहै) इसी प्रकार शुक्र भी अचैतन्य होकर स्त्रीक संभाषणादिसे प्रवृत्त होताहै तथा जल अचैतन्य होकर अग्निके संयोग- से स्थालीगत वेगवान् होने लगताहै अर्थात् उफनने और शब्दकरनेमें उसकी प्रवृत्ति होती है इत्यादि ॥ ८ ॥ इस विषयमें भावमिश्र कहतेहैं- श्लोक-एवं चतुर्विंशतिभिस्तत्त्वे सिद्ध वपुहे । जीवात्मा नियतेनिनो वसति स्वांतदूतवान् ॥१॥ अर्थ-इस प्रकार चौबीस तत्त्वोंकरके सिद्ध किये (रचे हुए)शरीररूप घरमें नियति (कौं) के आधीन हुआ मनरूप दूतवाला जीवात्मा ( पुरुष ) वास करताहै ।।१॥ अत ऊर्द्ध प्रकृतिपुरुषयोः साधर्म्यवैधम्ये व्याख्यास्यामः ॥ यहांसे अगाडी हम प्रकृति और पुरुषके साधर्म्य और वैधHका व्याख्यान करतेहैं। साधर्म्य । तद्यथा उभावप्यनादी उभावप्यनंती उभावप्यलिंगी उभावपि नित्यौ उभावप्यपरौ उभौ च सर्वगताविति ॥९॥ वह इस प्रकार है कि दोनों प्रकृति और पुरुष अनादि हैं तथा दोनोंही अनंत हैं और दोनों ही अलिंग (चिह्नरहित ) हैं तथा दोनोंही नित्य ( अविनाशी) हैं और दोनों ही अपर हैं अर्थात् इनसे परे कोई और नहीं है तथा दोनोंही सर्वव्यापी हैं यह तो इनमें समानधर्मत्व है ॥९॥ वैधर्म्य । एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजर्मिणी प्रसवधर्मिणी अम- ध्यस्थधर्मिणी चेति । वहवस्तु पुरुषाश्चेतनावंतोऽअगुणा अवी- जधर्मिणोऽप्रसवधर्मिणो मध्यस्थधर्मिणश्चेति ॥ १०॥ (गद्य ९) उभी प्रकृतिपुरुपौ अलिगी न विद्यते लिंग ययोस्ती । नित्यो क्वचिदपि लयं नाशं न गच्छतः। अपरौ न परो याभ्या इति । सर्वगा सर्व व्याप्य स्थिती । (गद्य १०) प्रकृतिस्तु अव्यक्तापरपर्याया मूल- प्रकृतिरेका शून्यमवा । त्रिगुणा सत्त्वरजस्तमोगुणा । बीजधर्मिणी इति-सर्वेषा महदादिविकाराणा बीजभा. नावस्थिता बीजर्मिणीत्युच्यते । गयदासाचार्यस्तु संहारे भूर्तेद्रियतन्मात्राहकारमहदादीनामाधारभूतेति वीजर्मिणी सेव सिसक्षुणा विभुना पुरुषेण सार्द्ध क्षोभमाणा साम्यावस्थाने प्रच्युता महदहकारादिक्रमेग चराचरस्य जगतः प्रसवित्रीत्वात् प्रसवर्धामणीत्युच्यते ( नि, स.)। अमध्यस्थधर्मिणी सुखदु:खभोगमा- गिनी न तु सुखदुःखभोगादुदासीना (इति भावमिश्रः) । पुरुषा जीवात्मत्वेनासख्याता परमात्मत्वेन तु पुरुषोप्येक एवेति नैय्यायिकाः । पुरुषे अवीजघमित्वं महाप्रलये महदादिविकारणां प्रकृनाविव तस्मिन्ननवस्थानात् । मध्यस्थमित्वं सुखदुःखेच्छादिशून्यत्वात तथाचोक्त साख्यतत्त्वकौमुद्याम्-"तस्मात्तु विपर्यासात्सिद्धं साक्षित्वमस्यपुरुषस्य कैवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टुत्वम-- कतृभावाच" ( इति निवघसंग्रहः)। 1 शारीरस्थान-अ०१. (६१५) अव्यक्तात्मक मूलप्रकृति एक है, चेतनारहित है, सत्त्व, रज और तम ऐसे तीनों गुणोंवाली है । समस्त पदार्थ बीजरूप होकर प्रलयमें इसीमें स्थित होतेहैं इससे यह वीजधर्मवाली है । और इसीमेंसे सब उत्पन्न होते हैं इससे यह प्रसवधर्म- वाली है। यह सुखादिकभोगभागिनी है इससे मध्यस्थधर्मवाली ( उदासीन ) नहीं है किंतु अमध्यस्थ धर्मवाली है। पुरुष ( आत्मा ) जीवरूप होकर अनेक ( असंख्य ) हैं और चेतनावाले हैं सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंसे रहित हैं और अबीजधर्मी हैं ( अर्थात् वीजरूप होकर कोई पदार्थ जीवात्मामें नहीं रहते किन्तु प्रकृतिमें रहते हैं इससे यह पुरुष बीजधर्मी नहीं है किंतु अबीज- धर्मी है ) और पुरुष अप्रसवधर्मी हैं (अर्थात् आत्मामेंसे कुछ उत्पन्न नहीं होता इससे यह प्रसवधर्मी नही है किन्तु अप्रसवधर्मवाला है ) तथा मध्यस्थधर्मवाला है अर्थात् सुख दुःखादिमें उदासीनरूप मध्यस्थकी भांति है, सुख, दुःखादिको प्रकृति ही भोगतीहै, प्रकृति विना जीवको सुख दुःखादि नहीं होते ॥ १० ॥ तंत्र कारणांनुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्व एवैत विशेषाः सत्वरज- स्तमोमया भवति तदंजनैत्वात्तन्मयत्वाच तद्गुणा एव पुरुषा मवंती- त्येक भाषते ॥ ११ ॥ कई आचार्य ऐसा कहते हैं कि, कारणके अनुरूप कार्य होता है ऐसा मानकर ये समस्त विशेषरूप विकार ( महदादि, भूतादि) भी सत्त्व, रज और तमोगुणमय होते हैं तो “तदंजनत्वात्"अर्थात् सत्त्व,रज, तमो व्यक्तिवाले होनेसे और तन्मय होने- से पुरुष (आत्मा) भी तद्गुण अर्थात् तीनों गुणवाले (सत्त्वरज और तमोगुणवाले) होते हैं (जैसे तडागस्थ जलमें पडा हुआ चंद्रमाका प्रतिविच जलके कंपनविकारसे कंपायमान प्रतीत होता है वैसेही प्रकृति के संयोगसे आत्माभी तद्गुणवाला प्रतीत होता है अर्थात् सत्त्वादि गुणयुक्त प्रकृति ( महत्तत्त्व, अहंकार और महाभूत) इनके प्रतिविवरूप आत्माभी सत्त्वादि गुणयुक्त प्रतीत होता है और सुखी दुःखों मूढ ऐसा जाना जाता है) ॥ ११॥ वैद्यके तु-स्वभावमीश्वर कालें यदृच्छां नियंति तथा । परिणामं च मन्यन्ते प्रकृति पृथुर्शिनः ॥ १२ ॥ (गद्य ११) विशेषाः महदादिप्रकाराः । तदजनत्वात् इति-तेषा सत्त्वरजस्तमसाम् अंजनं व्यक्तिर्वा येषु तस्मात् । तन्मयत्वात् सत्वादिमयत्गत् पुरुषाः तद्गुणसत्त्वरजस्तमोगुणा भवतीत्येके यथा-तडागोदके प्रतिबिंबितो विस्तडागोदकप्रकपनेन प्रकंपात्मकः कथ्यते एवं सत्त्वादिरूपे महदादी प्रतिविबिताः पुरुषाः सत्त्वादिमया भवति न तु वास्तवसत्त्वादिमयत्वात् तादृश्याच तन्मयत्वात् तल्लक्षणानितिद्गुणाः सुखिनो दुःखिनो मूढाश्च युरुपा भवति (इति डल्लनः) । (गद्य १२) अत्रके स्वभाववादिनः स्वभावः सर्वस्य कारण ८ (६१६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (वैद्यक शास्त्रमें तो) रवभावकी, ईश्वरको, कालको, यदृच्छाको और नियतिक तथा परिणामको दीर्घदर्शी विद्वान् लोग ऐसे छः प्रकार प्रकृति मानते हैं अर्थात् कोई स्वभावहीको प्रकृति मानते हैं कि जो जिसका स्वभाव है वह वैसाही होता है । और कोई ईश्वरहीको मुख्य मानते हैं कि ईश्वरही सबका कारण है । और कोई कालहीको मानते हैं कि काल,पाकरही संसार पैदा होताहै और काल पाकरही नष्ट होता है । और कोई यदृच्छा (होनहार)हीको मानते हैं कि जैसा भवितव्य हो वैसाही होता है। और कोई नियति अर्थात् पूर्वजन्मार्जितादि शुभाशुभ कर्मोहीको मानते हैं कि जैसा कर्म होता है उसीक अनुसार सब कुछ होताहै तथा कोई परिणामहीको मुख्य मानतेहैं कि अव्यक्तादि सब परिणाम पाकरही जगत्कं कारणरूप होतेह॥१२॥ तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येवं चाँदिशेत॥ तेश्च तहक्षणः कृत्स्नो भूतग्रामो व्यजन्यत ॥१३॥ तस्योपयोगोऽभिहितश्चिकित्सा प्रति सर्वदा॥भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिन्ता चिकित्सिते ॥१४॥ भूत, आकाश आदि तन्मय अर्थात् प्रकृतिके परिणाम ( उष्ण, द्रव, शीत, घन, खर, मृदु आदि ) मय हैं और तद्गुण (उसीके गुणवाले) हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुणवाले हैं (जैसे सत्त्ववहुलमाकाशं तमोबहुला पृथ्वी इत्यादि ) इससे समस्त भूतग्राम (स्थावर-जंगम-रूप संपूर्ण जगत् ) उन (शीत, उष्ण, द्रव, धन आदि तथा सत्त्व, रज, तम ) लक्षणोंसे युक्तही उत्पन्न होता है ॥ १३ ॥ उस पंचमहा- भूतारब्ध भूतग्रामका उपयोग (प्रयोजन ) ही चिकित्साके प्रति ( इस चिकित्सा- -मित्यूचुः तथाहि-"कः कटकाना प्रकरोति तक्ष्ण्यं चित्र विचित्रं मृगपक्षिणां च । माधुर्यमिक्षोः कटुको मरीचेः स्वभावतः सर्वमिद प्रवृत्तम् ॥” इति । ईश्वरवादिन एमाहुः-ईश्वर एव उवीपर्वततवींदिजंतूनां स्वर्गनरकादेश्च कारणम् इति । केचिदित्याहु. कालवादिनः-काल एव जगत्सृष्टिस्थितिप्रलयनिमित्तमिति । यदृच्छावादिनश्चेत्याहुः-यो यतो भवति तत्तु तन्निमित्तमिति यथा-तृणाणिनिर्मितो वह्निः । नथाच पूर्व- जन्मार्जिती धर्माऽधर्मो नियति: सेव सर्वस्य कारणमिति नियतिवादिनः । केचिदित्याहुः-प्रधानमेवाक्षरादि- रूपतथा परिणत सर्वस्य निमित्तमिति परिणामवादिनः । वस्तुतस्तु ते च स्थभावादयोपि समुच्चयेन जगदुत्पत्ती कारणभूताः तत्रापि प्रकृतिपरिणामस्योपादानकारणत्वं स्वभावादीना पंचाना निमित्तकारणत्वमिति । ईश्वरश्च पचविंशतितमः पुरुषः प्रकृतेः क्षोभकतया कारणत्वेनोदाहृत एव ( इति निवधसग्रहः) । ( श्लो० १३ ) तन्मयान्येवेति-चलोष्णद्रवखरस्वभावादिधर्मविशेषाकातप्रकृतिपरिणाममयानि । भूतानीति-आकाशादीनि । तद्गुणानि चेति-पत्वरजस्तमोगुणानि यथा-सत्त्ववहुलमाकाश तमोबहुला पृथ्वीत्यादि । भूतग्रामः स्थावरजंगमात्मकः । तल्लक्षण: स्थिरगुरुकठिनादिलक्षणः। (नि. सं.)। (लो० १४) तस्य पंचमहाभूतारब्धस्य भूतग्रामस्य परस्परोपकार्योपकारणत्वेन व्यवस्थितस्य । उप- योगः प्रयोजनम् । अभिहित: कथितः । चिकित्सा प्रति रोगापनयन लक्षीकृत्य । चिकित्सा प्रति तस्य भूतग्रामम्य उपयोगः सर्वदा अभिहित इति यस्मात् भूतेभ्यः पर चिकित्मिते चिता नास्तीति सार्थः ।
१ शारीरस्थान-अ०१. (६१७) शास्त्र में रोगनाशके प्रति ) वर्णन कियागया है इसीसे चिकित्सित (चिकित्साविषय) में भूतों (पंचमहाभूत-पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश और इनके कार्यों )से परे अव्यक्त (अदृष्ट ) आदिकी चिंता (विचार और मीमांसा ) नहीं है अर्थात् नहीं हो सकती है ॥ १४ ॥ यतोऽभिहितं तत्संभवद्रव्यसमूहो भूतादिरुक्तः। भौतिकानि चेंद्रियाण्यायुर्वेदे वयँते तथेद्रियार्थाः ॥ १५॥ भवति चात्र-- उस अव्यक्तसे उत्पन्न हुआ द्रव्यसमूह ( महदादि-बुद्ध्यादि और व्योमादि) ही भूतादि वर्णन किया है इससे वैद्यकशास्त्रमें वही महदादिक ( महत्तत्त्व, अहंकार, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और सत्त्व, रज, तम ) ही अभिहित (वर्णित) है। तथा भौतिक इंदिय (श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, रसन और वाण) तथा इंद्रियार्थ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ) इनका वर्णन होता है॥१५॥इस विषयमें श्लोक है- इंद्रियेणेन्द्रियार्थं तु स्वस्वं गृह्णाति मानवः ॥ नियतं तुल्ययोनित्वान्नान्ये नान्यमि ति स्थितिः ॥ १६ ॥ मनुष्य इन्द्रियसे नियत उसी उसके अर्थको समानयोनि होनेसे ग्रहण करता है अर्थात् श्रोत्र इन्द्रियसे उसके तुल्ययोनित्व करके नियत शब्दको ग्रहण करता है और त्वचासे स्पर्शको चक्षसे रूपको, रसनासे रसको और माणसे गंधको ग्रहण करताहै क्योंकि आकाशकी इन्द्रिय श्रोत्र है और गुण शब्द है । इसी तरह वायुकी इंन्द्रिय त्वचा और गुण स्पर्श है तथा तेजकी इंद्रिय चक्षु और गुण रूप है तथा जलकी इन्द्रिय रसना और गुण रस है और पृथ्वीकी इंद्रिय ब्राण और गुण गंध है इसीसे सजातीय अपने सजातीयको ग्रहण करता है और अन्यसे अन्यको ग्रहण नहीं करता यही सिद्धांत है ॥ १६ ॥ न चायुर्वेदशास्त्रेषूपदिश्यन्ते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याचं असर्वग- तेषु च क्षेत्रक्षेषु नित्येषु पुरुषख्यापकान्हेतूनुदाहरंति ॥ १७ ॥ आयुर्वेदशास्त्रेष्वसर्वगतःक्षेत्रज्ञा नित्योश्च तिर्यग्योनिमानुषदेवेषु (गद्य १५) तत्सभवद्रव्यसमूहो महत्तत्त्वादि (बुद्ध्यादि ) आकाशादिक एवं भूतादिरुक्तः यतोऽ- मिहितमायुर्वेदे भौतिकानींद्रियाणि इन्द्रियार्थाश्च वर्ण्यन्ते । डल्लनस्त्वन्यथा व्याख्याति यथा-यतः तस्य पुरुषस्य सभवद्रव्याणि शुक्रशोणितादीनि तेषा समूहः सयोगविशेष: । भूतादिः भूतं पृथिव्यादिकम् आदि- मूलकारण यस्य सः तथा न परं पुरुषसभवं द्रव्यस्य भूतादिध्वभिधानात् भूतेभ्यः परं चिता नास्ति इति ॥ (श्लो० १६) तुल्ययोनित्वात् इति-एकभूतहेतुत्वात् भूतं हि स्वयोनिमेवाभिधावति ॥ (गद्य १७) असवर्गता इतिन सर्वव्यापिनः किंत्वेकशरीरव्यापिनः ।
(६१८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । १० संचति धर्माधर्मनि मित्तम्॥१८॥ एते ऽनुमानग्राह्याः परमसूक्ष्मा- श्वेतलावंतः शार्श्वता लोहितरेतँसोः संनिपातेवभिव्यंज्यंते ॥१९॥ यतो भिहितं पंचमहाभूतशरीरसमवायः पुरुप इति स एव कर्म- पुरुषश्चिकित्साधिकृतः ॥ २० ॥ आयुर्वेदके शास्त्रोंमें क्षेत्रज्ञों (जीवों) को सर्वगत ( सर्वव्यापी) नहीं कहते (क्योंकि जो जीव सर्वव्यापी होता तो एकका सुख, दुःख सबको होता ऐसा नहीं होनेसे जीव सर्वव्यापी नहीं है ) परन्तु नित्य कहते है असर्वगत (एकदेशी एक शरीरव्यापी ) जीवों में नित्य पुरुष ख्यापक ( कहानेवाले) हेतुओंको दिखाते हैं । ॥ १७ ।। आयुर्वेद शास्त्रके मतमें असर्वगत (एकदेशीय) जीव नित्य हैं वे धर्म और अधर्मका निमित्त पाकर तिर्यग्यानि (पशुकीटादि ) तथा मनुष्यदेह तथा देवशरीरोंमें विचरते हैं ॥ १८ ॥ ये परम सूक्ष्म जीवात्मा अनुमानसे ग्रहण किये जाते हैं ( प्रत्यक्षतासे ग्रहण नहीं किये जासकते ) ये चेतनावाले ( चैतन्य ) हैं, शाश्वत अर्थात् नित्य हैं और माता पिताके रजवीर्यके संयोगसे प्रगट होते हैं।॥१९॥ इसीसे पंचमहाभूत और शरीरी (आत्मा) के संयोगको पुरुष कहा गया है और यही कर्मपुरुष चिकित्सामें अधिकार किया गया है ( चिकित्सामें ग्रहण किया है)॥ २० ॥ तस्य सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नःप्राणापानावुन्मेपनिमेपो बुद्धि- मनः संकल्पो विचारणा स्मृतिविज्ञानमध्यवसायो विपयोपल- ब्धिश्च गुणाः ॥ २१॥ उस कर्मपुरुषके ये १६ गुण हैं १ सुख, २ दुःख, ३ इच्छा, देप, ५ प्रयत्न, ६ प्राण ( श्वासलेना), ७ अपान (अधोवायुनिःसारण), ८ उन्मेष निमेष (नेत्रोंको खोलना मीचना),९ बुद्धि, १० मन (इन्द्रियोंकी प्रेरणात्मकशक्ति), (गद्य१९) एते क्षेत्रज्ञाः जीवात्मानः परसूक्ष्मा अतएवानुमानग्राद्याः नतु प्रत्यक्षप्रमाणेन कयचिदपि ग्राह्या इत्यर्थः । शाश्वता नित्याः ।। (गद्य २०) पंचमहाभूताना गरीरितः समवायः सयोगः पुरुषः- इत्यभिहितम् । स एव कर्मपुरुपः कर्म फलभागीत्यर्थ. । चिकित्सायाम् अधिकृत: गृहीतः ।। (गद्य २१ ) इदानीं तस्यैव पुरुषस्य शरीरात्मनोः सयोगकारकेण मनसा सयोगे ये गुणा उत्पद्यते तानाह-तस्येत्यादि । सुख अनुकूलवेदनीयम् । दुःख प्रतिकूलवेदनीयम् । प्रयत्न. उद्योगः । उन्मेषनिमेषी नेत्रयोः उन्मीलन निमीलनं च । अध्यवसाय: बुद्धयवसायः । विपयोपलब्धिः शब्दादीना स्वःस्वैरेवेंद्रि- धर्महणम् । ननु पोडशगुणा. कथिता. कथमत्र सप्तदशसंख्या गुणानामित्यत्र केचित्तु उन्मेपनिमेषावित्येक पठति केनित्तु मनःसझल्पो विचारणा चेति मनसः सकल्यो मनसः कल्पना इत्यकं पठति मनसो गुणत्त्वाभा-- वान् ॥
११ (६१९) शारीरस्थान-अ० १. ११ संकल्प ( कल्पना ), १२ विचारणा ( सोचना), १३ स्मृति (याद रखना ), १४ विज्ञान (चातुर्य), १५ अध्यवसाय (व्यवसाय ), १६ विषयोपलब्धि ( शब्द, स्पर्श आदिको ग्रहण करना) ॥२१॥ सात्त्विक राजस और तामस ( जीवोंके) मनके गुण । सात्त्विकास्तु आनृशंस्य संविभागरुचिता तितिक्षा सत्यं धर्म आस्तिक्यं ज्ञानं वुद्धिर्मेधा स्मृतिधृतिरनभिषंगश्च ॥२२॥ राज- सास्तु दुःखवहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहंकार आनृतिकत्वमका- रुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च ॥२३॥ तामसास्तु विषा- दित्वं नास्तिक्यमधर्मशीलता बुद्धनिरोधोऽज्ञानं दुर्मेधस्त्वमकर्म- शीलता निद्रालुत्वं च ॥ २४ ॥ सात्त्विक ( सत्त्वगुणप्रधान जीवोंके ) मनके ये गुण हैं-आनृशंस्य (निर्दयता न होना) और संविभागरुचिता (औरोंको अवश्य देना चाहे आप पदार्थ ल या न ले), तितिक्षा (क्षमा ), सत्यता, धर्माचरण, आस्तिकता (ईश्वरादिका अस्तित्व मानना), ज्ञान (विचारशक्ति), बुद्धि, मेधा (धारणाशक्ति ), स्मृति (याद रखना), धृति (धैर्य ), अनभिपंग (निरपेक्ष शुभ कर्म करना)॥ २२ ॥ राजस ( रजो- गुणप्रधान जीवोंके ) मनके ये गुण हैं-विशेष दुःखी रहना, एक जगह स्थिरप्राय न होना अर्थात् फिरना, धैर्य न होना, अभिमान करना, झूठ बोलना, दया न रखना, पाखंड करना, मान (मद या घमंड रखना), हर्ष (:आनन्द बहुत मानना), काम (विशेष कामना राखना ), क्रोध (चट गुस्सा होजाना) ॥ २३ ॥ तामस ( तमोगुणप्रधान जीवोंके ) मनके ये गुण हैं-विषाद रखना, नास्तिकता (ईश्वरादिमें विश्वास न करना ), अधर्मशील होना, बुद्धिकी रुकावट रहना, अज्ञान तथा दुर्मेधस्त्व (धारणाशक्ति अच्छी न होना), अकर्मशीलता ( कोई काम करनेको चित्त न चाहना अर्थात् आलस्य ) और निदा अधिक आना ॥२४॥ पंचमहाभूतोंके गुण । आंतरिक्षास्तु शब्दः शब्देंद्रियं संर्वछिद्रसमूहो विविक्तता च । वायव्यास्तु स्पर्शः स्पशेंद्रियं सर्वचेष्टासमूहः सर्वशरीरस्पंदनं लघुता च । तैजसास्तु रूपं रूपेन्द्रियं वर्णः संतापो भ्राजि- (गद्य २२ ) संविभागचिता संविभज्य भोक्तुमभिलाषुकता । ज्ञान डल्लनमते तु आत्मज्ञानं वाच. स्पत्ये तु बुद्धिपरिणाम: केषाचिन्मते विचारशक्तिश्चेति । बुद्धिर्बोधनम् । मेधा धारणाशक्तिः । अनभिषग: फलनिरपेक्षया बुद्ध्या श्रेयस्कर्मकरणम् ॥ (गद्य २३) अहका। गर्वः । मानो मदः ।। 4. ।
r -- (६२०) हुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १२ ष्णुता पक्तिरमर्षस्तक्ष्ण्यं शौर्यं च । आप्यास्तु रसः रसनेंद्रिय सर्वद्रवसमूहो गुरुता शैत्यं स्नेहो रेतश्च । पार्थिवास्तु गंधो गंधे- द्रियं सर्वमूर्तिसमूहो गुरुता चेति ॥ २५॥ आकाशतत्त्वके गुण ये हैं-शब्द और शब्देंद्रिय अर्थात् आंत्र तथा सम्पूर्ण छिद्र (मुख, नासिका, कर्ण आदि ) तथा विविक्तता (न्यारा न्यारा होनी)। वायुत- त्वके गुण ये हैं-स्पर्श और स्पर्शद्रिय अर्थात् त्वचा और संपूर्ण चेष्टाओंका समूह ( हिलना, चलना आदि) और सारे शरीर में फैलान (सिकोडनेकी शक्ति) तथा हलकापन । अमितत्त्वके गुण ये हैं-रूप ( देखना) और रूपेंद्रिय अर्थात् चक्षु तथा वर्ण (सौंदर्य ), संताप ( गरमाई ), भ्राजिष्णुता ( दीप्ति ), पक्ति (आहा- रका पकना ), अमर्प (क्रोध ), तैक्ष्ण्य (तेजी) और शूरवीरता । जलतत्त्वके गुण ये हैं-रस और रसनेंद्रिय (जिह्वा ) तथा संपूर्ण वसमूह अर्थात् पतले पदार्थ और भारीपन, शीतलता, चिकनाई और वीर्य । पृथिवीतत्त्वके गुण ये हैं-गंध और गंधंद्रिय (ब्राण) तथा संपूर्ण मूर्तिसमूह (कठिन पदार्थ अस्थि आदि ) तथा गुरुता (भार्गपन ) ॥ २५ ॥ तत्र सत्यवहुलमाकाशम् । रजोवहुलो वायुः । सत्त्वरजोवहुलोऽग्निः। सत्वतमोबहुला आपातमोबहुला पृथिवीति॥२६॥श्लोको चात्र भवतः- इनमसे सत्त्वगुणकी विशेषतावाला आकाशतत्त्व है । और रजोगुणकी विशेषता- वाला वायु है । सत्त्वगुण और रजोगुण दोनोंकी विशेषतावाला अग्नि है। सत्त्वगुण और तमोगुण इन दोनों गुणोंकी विशेषतावाला जल है । और केवल तमोगुणकी विशेषतावाली पृथ्वी है ।। २६ ।। इस विषयमें दो श्लोक है- अन्योन्यानुप्रविष्टानि सर्वाण्येतानि निर्दिशेत् ॥ स्वं स्व द्रव्ये तुं सर्वेषां व्यक्तलक्षणमिप्यते ॥२७॥ अष्टौ प्रकृतयःप्रोक्ता विकाराः पोडशैव तु ॥क्षेत्रज्ञश्च समासेन स्वतंत्रपरंतत्रयोः ॥२८॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने प्रथमोऽध्यायः॥१॥ ये आकाशादि पांचो तत्व परस्पर संमिलित हैं अर्थात् एक दूसरे में सब प्रविष्ट हो रह हैं जैसे आकाशमें परमाणुरूपसे सब व्याप्त है और इसी प्रकार वायुमें पर- माणुरूपसे सब व्याप्त है तथा अग्निमें भी परमाणुरूपसे सब रहते हैं इसी प्रकार जल और पृथ्वीमें भी सभी परमाणुरूपसे व्याप्त हैं परंतु प्रगट नहीं दीखते किंतु अपने अपने स्यूलरूपमें उनके प्रगट लक्षण जाने जाते हैं ॥ २७ ॥ अव्यक्त (मूल- (गद्य २५) सर्वमूर्तिसमूहः दोपधातुमलेषु यः कश्चित् काटिन्यानवहः । ( इति नि० म०)॥
१३ शारीरस्थान-अ०२. (६२१) J प्रकृति या शून्य ), महत्तत्त्व, अहंकार तथा पंचतन्मात्रा (१शब्दतन्मात्रा,२ स्पर्श- तन्मात्रा, ३ रूपतन्मात्रा, ४ रसतन्मात्रा, ५ गंधतन्मात्रा) ये आठ प्रकृति ( कारणरूप) हैं। और श्रीत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, ब्राण तथा वाणी, हाथ, पांव लिग, गुदा और मन ये ग्यारह इंद्रिय और आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये पांचों महाभूत ऐसे ये श्रोत्रादि सोलह १६ विकार कार्यरूप हैं । ये २४ तत्त्व और पवीसवां चैतन्यस्वरूप क्षेत्रज्ञ (पुरुष) स्वतंत्र ( आयुर्वेद) और परतंत्र (सांख्यादि) में संक्षेपसे वर्णन किये हैं ॥ २८ ॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा०टी० शारीरस्थाने प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥ द्वितीयोऽध्यायः । अथातः शुक्रशोणितशुद्धिनाम शारीरं व्याख्यास्यामः । यहांसे अगाडी अब शुक्र और शोणितकी शुद्धि नामक शारीरककी व्याख्या करतहैं।। वातपित्तश्लेष्मशोणितकुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणमूत्रपुरीषरेतसः प्र- जोत्पादने न समर्था भवेति ॥१॥ जिनका वीर्य वायुसे, पित्तसे,कफसे,रक्तस दूपित हो तथा कुणप (जिसमें मुरदेके सी गंध हो), जिसमें गाँठे हों, दुर्गधयुक्त हो या राधके समान हो अथवा जिन पुरुषोंका मूत्र, विष्ठा, मल तथा वीर्य क्षीण होगया हो अथवा क्षीणवीर्य या वीर्यमें मूत्र, विष्ठा हो वे संतान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होते ( अर्थात् निरोग और दीर्घायु संतान उत्पन्न नही कर सकते)॥ १ ॥ दूषितशुक्रलक्षण। तेषु वातवर्णवेदनं वातेन । पित्तवर्णवेदनं पित्तेन । श्लेष्मवर्णवे- दनं श्लेष्मणा । शोणितवर्णवेदनं कुणपगंध्यनल्पं रक्तेन । ग्रंथिभूतं श्लेष्मवाताभ्याम्। पूतिपूयनिभं पित्तश्लेष्मभ्याम् ।क्षीणं प्रागुक्तं पित्तारुताभ्याम् ।मूत्रपुरीषगंधि सन्निपातेनेति ॥ २ ॥ इनमेंसे जिसके शुक्रमें वायुके वर्ण (लाल, कालापन ) हों और वायुकी वेदना (तोदभेदादिक) हो वह वायुसे दूषित शुक्र है । तथा पित्तके वर्ण ( पीत, नील) ( वाक्य० १) पूर्वाध्याये सर्वभूतचिंताशारीरे "शुक्रशोणितयोः सनिपातेष्वभिव्यज्यन्ते क्षेत्रज्ञाः इत्युक्त तस्मादस्मिन्नध्याये चादी शुक्रशोणितयोर्वर्णन क्रियते । कुणप शवः । क्षीणमूत्रपुरीषरेतस इति- क्षीणानि मूत्रपुरीषरेगासि येपाते अथवा क्षीणरेतसः तथा मूत्रपुरीषौ रेतसि येषाते मूत्रपुरीषावत्र गंधत्वेनैव।। (वाक्य० २) वातवर्णवदेनामति-वातवर्णाः अरुणकृष्णादयः । यद्यप्यव्यक्तस्य वायोः वर्णाः न भवंति तथापि वातदुष्टेऽरुणकृष्णवर्णी भवतः । वातवेदनास्तोदभेदादयः । एवमेव पित्तादिषु शेयः ।। - .
(६२२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । १४ और पित्तवेदना ( दाहादि) हों तो पित्तने दूषित । और कफका वर्ण (शुक्ल) और कफकी वेदना ( कंडू आदि ) हों तो कफसे दूपित जाने। और रुधिरका वर्ण (लाल) और रुधिरकी वेदना ( दाहादि ) और कुणपगंधि ( मुरदकेसी गंध) और अल्प न होना ये रुधिरदूपित शुक्रमें होतेहैं । और कफ, वायुसे शुक्रमें गांठे होजाती हैं । तथा दुर्गधि और राधके तुल्य शुक्र पित्त,कफसे होता है । क्षीणशुक्रके लक्षण पहले सूत्रस्थानके पंद्रहवें अध्यायमें कह चुके हैं यह पित्त और वातसे होता- है । तथा शुक्रमें मूत्रपुरीषता या मूत्रपुरीषगंवि सन्निपातसे होती है ॥ २ ॥ तेषु कुणपग्रंथिपूतिपूयक्षीणरेतसः कृच्छ्रसाध्या। सूत्रपुरीपरेतस- स्त्वसाध्याः। शेषाः साध्याश्चेति ॥३॥ इनमेंसे कुणप (मुरदेकेसी गंधवाला) और दुगंधित तथा राधसदृश और क्षीणवीर्यवाले पुरुष कष्टसाध्य होतेहैं और जिनके शुक्रमें मूत्र और विष्ठा हो वे असाध्य होते हैं और शेष साध्य हैं ॥ ३ ॥ आर्तवमपि त्रिभिदोषैः शोणितचतुर्थैः पृथग्द्वंद्वैः समस्तैश्वोपस- प्टमवीजं भवति। तदपि दोषवर्णवेदनाभिर्विज्ञेयम् । तेषु कुणपग्रं- थिपूतिपूयक्षीणसूत्रपुरीषप्रकाशनसाध्यं साध्यमन्यद्भवति ॥ ४ ॥ अवंति चात्र- यदि पुरुपके शुक्रकी भांति स्त्रियोंका आर्तवमी वायु, पित्त, कफ इन तीनों दोपों- से और चौथे रुधिर करके पित हो तथा न्यारे २ दोदो दोपोंसे तथा सन्निपातसे दूपित हो तो वहभी अबीज अर्यात् संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं होता, उसेभी वातादि दोपोंके वर्ण और वेदना आदिसे जानलेना चाहिये ( अर्थात् जिस एक या कई दोपोंका वर्ण और वेदना हों उन्होंस दूषित आर्तव जाने) उनमेंसे कुपण(मुरदे) के समान गंधवाला, गाँठोंसे युक्त, दुधित, राधसरीखा तथा क्षीण और मूत्र, पुरीष जैसा आतव असाध्य होताहै और शेष साध्य होते हैं ॥४॥ इस विषयमें श्लोक हैं- दूपित शुक्र और शोणितकी शुद्धिका उपाय । तेष्वायांञ्छु दोषास्त्रीने तेहस्त्रबादिमिर्जयेत् ॥ क्रियाविशेषैर्म- तितास्तथा चोत्तरवस्तिभिः ॥ ५॥ पार्ययेत्तं नरं सर्पि भिषक कुर्णपरेतसि ॥ धातकीपुप्पखदिरदाडिमार्जुनसाधितम् ॥६॥ (शा० ५) अत्रादिशब्देन रेचनवमनादीना ग्रहणम् ॥ (श्लो० ६) वातकीपुष्पखदिरदाडिमार्जु- कायाम्या साधितं घृतं यथा "कल्काञ्चनुगुर्णीकृत्य घृतं वा तैलमेव च ॥ चतुर्गुणे द्रवे सायं-- नत्वनाकत Pr - १५ शारीरस्थान-अ० २. (६२३) पाययेदथवा सर्पिः शालसारादिसाधितम् ॥ ग्रंथिभूते शठीसिद्ध पालाशे वापिभस्मनि ॥ ७ ॥ परूपकवटादिभ्यां पूयप्रख्ये तु सा- धितम् ॥ प्रांगुंक्तं वक्ष्यते यच्च तत्कार्यक्षीणरेतसि ॥८॥विट्प्रभे पाययेत्सिद्धं चित्रकोशीरहिंगुभिः ॥ ९ ॥ इन शुक्रदोपोंमेंसे आदिके तीन दोषोंको स्नेहपान, स्वेद और विरेचन, चमन तथा उत्तरवस्ति आदि क्रियाओंसे जीते अर्थात् वायुषित शुक्रमें हपान और स्वेद करावे । पित्तदूषितमें विरेचन तथा कफदूषितमें वमन करावे (यहां विरेचन और वमनका बोध आदि शब्दसे होताहै ) ॥ ५॥ और शुक्रमें कुणप (मुरदेकेसी गंव) हो तो धायके फूल, खदिर, अनार और कुहेकी छालसे सिद्ध किया घृत पिलावे ॥ ६ ॥ अथवा शालसारादिसे सिद्ध किया घृत पिलावे और जो शुक्रमें गांठे पड़गई हों तो कचूरसे सिद्ध किया घृत पिलावे अथवा पला- शकी भस्मका सिद्ध वृत पिलावे ( एक आठक पलाशकी भस्ममें छः आढक जल गेर औटावे जब चौथाई शेष रहे तव उतारे दृढ वस्त्रसे सातवार छाने फिर एक प्रस्थ घृत उस पलाशक्षारयुक्त जलमें मिलाकर अलिपर चढावे जब घृतमात्र शेष रहे तब उतार ले)॥ ७ ॥ जिसका वीर्य राधके सदृश हो उसे परूषक (फालसे) और मूत्रस्थानोक्त वटादि गण (न्यग्रोधादिगण ) में सिद्ध किया घृत पिलावे और जिसका वीर्य क्षीण हो उसे पूर्वोक्त स्वयोनिवर्द्धन द्रव्य तथा जो अगाडी वाजीकरण अधिकारमें कहेंगे व उपाय करने चाहिये ॥ ८॥ और जिसके शुक्रम विष्ठाकीसी गंध हो या विष्ठा हो तो चित्रक, खस और होगसे सिद्ध किया हुआ घृत पिलावे ( यद्यपि यह विट्प्रभ शुक्र असाध्य है तोभी कई इसे साध्य कहते हैं इससे उपर्युक्त औषध उचित है । और मूत्रगंधवाला या मूत्रयुक्त शुक्र तो सर्वथा असाध्यही है ) ॥ ९ ॥ लिंग्धं वांत विरिक्तं चं निरूढमनुवासितम् । योजयेच्छुक्रदोषात सम्यगुत्तरर्वस्तिना ॥ १० ॥ -तस्य मात्रा पलोन्मिना ॥ १ ॥ निक्षिप्य वाथयेतोय काथ्यद्रव्याच्चतुर्गुणम् ॥ पादशिष्टं गृहीत्वा तु स्नेह तेनैव साधयेत् ॥ २॥ चतुर्गुणं मृदुद्रव्ये कठिनेष्टगुणं जलम् ॥ मृद्रादिक्काथ्यसंघाते दद्यादष्टगुणं घय. ॥३॥ अत्यंतकठिने द्रव्ये नार षोडशिकं मतम् ।। कर्षादित: पल यावत् क्षिपेत्योडशिकं जलम् ।।४॥ तदूर्व कुडवं यावत् भवेदष्टगुण पयः ॥ प्रस्थादितः क्षिपेन्नीर खारी यावच्चतुर्गुणम् ॥५॥(इति भावमिश्रः)एव सर्वत्रज्ञेयम्।। (लो० १०) उत्तरवस्तिना इति-उत्तरवस्यत स्नेहादुत्तरवस्तिपर्यंत कृत्वा पश्चादीपधादिक योजये. दिति भावः ॥ - M (६२४) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०॥ १६ शुक्रदोष युक्त मनुष्यको पहले यथोचित न्नेहपान कराके या वमन कराके या विरेचन कराके या निरूहण और अनुवासन वस्तिकर्म करके या सम्यक् रीतिसे उत्तरवस्ति करके पछि अन्य औषधका उपयोग करे । ( न्नेहपान, वमन, विरेचन, निरहण वस्ति, अनुवासन वस्ति और उत्तरवस्ति इन सबकी विधि विस्तारपूर्वक अन्यत्र देखना)॥ १० ॥ विधिमुत्तरवस्त्यंतं कुर्यादातवशुद्धये ॥ स्त्रीणां स्नेहादियुक्तानां च- तसृष्वार्तवार्तिषु ॥ ११॥ कुर्यात्कल्कापिंश्चापि पान्याचम- नानि च ॥ ग्रंथिभूते पिवेत्पाठी त्र्यूषणं वृक्षकानि च ॥ १२ ॥ दुर्गन्धे पूर्वसंकाशे मज्जतुल्ये तथात वे ॥ पिवेद्भद्रश्रियः क्वॉथं चंदनाथमेव च ॥ १३॥ शुक्रदोषहराणां च यथास्वमवचार- णम् ॥ दोषाणां शुद्धिकरणं शेषास्वप्यार्त्तवातिषु ॥ १४ ॥ अन्नं शालियवं मद्यं हितं मांस च पित्तलम् ॥ १५॥ स्त्रियोंके वातज, पित्तज, कफज और रक्तज इन चार प्रकारके आर्तवदोषोमें स्नेहपान, वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन और उत्तरवस्ति पर्यंत क्रिया करे फिर आर्तवशादिके लिये यथायोग्य कल्कोंका उपचार करे ॥११॥ तथा दोषोंके अनुसार औपधोंमें पिचु अर्थात् वस्त्र भिगोकर बत्ती बनाकर रक्खे या रूईका फोहा औषधों- में भिगोकर रक्खे अथवा आचमन अर्थात् उचित द्रव्योंके काथसे पिचकारी द्वारा या वैसेही योनि धोवे और यथायोग्य पथ्य करे । और जो आर्तव में गांठें हों तो पाठा, ब्यूषण ( सोंठ, मिरच, पीपल), वृक्षक ( कुडा) इनका क्वाथ पीवे ॥१२॥ जो आर्तवमें दुर्गध हो या राध जैसा तथा मज्जा तुल्प आर्तव हो तो भद्राश्रिय (श्रीचंदन ) तथा चन्दन (सुपेद चंदन ) का क्वाथ पीवे ( गयदासाचार्य यहाँ गोरोचनका ग्रहण करते हैं ) ॥ १३ ॥ इन ऊपर लिखे दोषोंके सिवाय आर्तवमें और दोष हों तो शुक्रदोष दूर करनेके लिये जो जो क्रिया लिखी हैं उन्हीका उप- योग करे ॥ १४ ॥ इसमें शालि (चावल) और जवका भोजन तथा हितकारक यथोचित मदिरा-पीना और पित्तकारक मांस भोजन करना पथ्य है ॥ १५ ॥ (श्लो०११) नेहादियुक्तानां कृतस्नेहपानवमनविरेचनानाम् । चतसृष्वार्तवार्तिषु इति-वातपित्तश्लेष्म- योणितकृतार्तिषु ॥ (श्लो० १२) कल्कान् योनिव्यापयुक्तान् । पिचून् औषधयुक्तवर्तितूलादीन् आचमनं वातादिदोपहरद्रव्यकृतं योनिप्रक्षालनोदकम् । (इति डल्लनः) | (श्लो० १३) भद्रनियं श्रीचदनं गयदासाचार्यस्तु भद्रश्रिय ट्वेतचदनं, चदन गोशीपारखचंदनं पठीत तस्य रक्तचंदनस्य गंधहरणशकेरभावात् ॥
. 2 शारीरस्थान-अ०२. (६२५) शुद्धशुक्रके लक्षण। स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगंधि च ॥ शुक्रमिच्छंति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा ॥ १६ ॥ जो वीर्य (बिल्लौरके समान ) सुपेद हो, पतला, चिकना, मधुर ( मीठा ) हो तथा शहतकेसी सुगंधयुक्त हो तो उसे शुद्ध जानना।कई आचार्य तैल तथा शहतके समान वीर्य शुद्ध होता है ऐसा कहते हैं ॥ १६॥ शुद्ध आर्तवके लक्षण। शशालुक्प्रतिसं यत्तु या लाक्षारसोपमम् ॥ तेदात व प्रशंसति यहाँसो न विरंजयेत् ॥ १७ ॥ जो शश (खरगोश ) के रुधिरके समान हो अथवा लाखके रंगके सदृश हो और जिसमें रंगाहुवा वस्त्र सूखकर धोनेसे सुपेद हो जाय अथवा जिसका भराहुवा वस्त्र वदरंगा (पीला, काला आदि ) न हो किंतु सुरखही रहे तो वह आर्तव शुद्ध (गर्भ धारणके योग्य ) कहाता है ॥ १७ ॥ अमृग्दर ( रक्तप्रदर) तदेवातिप्रसंगेन प्रवृत्तम तावपि ॥ असंग्दरं विजानीयादतोऽ- न्यद्रक्तलक्षणांत् ॥ १८॥ असृग्दरो भवेत्सवः सांगमर्दः सवे- दैनः॥ तस्यातिवृत्तौ दौर्बल्यं भ्रमो मूर्छा तमस्तृषा ॥ दाहः प्रलापः पांडुत्वं तंद्रारोगाश्च वातजाः ॥ १९॥ वह आतव अधिक प्रवृत्त हो और मासिक समयसे अन्यथा प्रवृत्त होऔर उप- युक्त शुद्ध आर्तवसे विपरीत वर्णवाला हो तो उसे असृग्दर ( रक्तप्रदर ) जानना चाहिये ॥१८॥ सम्पूर्ण असग्दरोमें अंगमर्द ( अंग टूटनासा) और वेदना होती है और रक्तके अधिक जारी होनेमें दुबलापन, भ्रम, मूर्छा, तम (अँधेरीसी आना) और प्यास विशेष लगना तथा दाह और प्रलाप ( बकवाद ) तथा पांडुख (पीला- पन) और तंद्रा (धुमेर ) और वायुके रोग ( जैसे कमर दूखना आदि ) उप- द्रव होते हैं ॥ १९॥ (श्लों० १६) तेलक्षाद्गनिभं शुद्धशुकामति न वन्यतरेमतम् (श्लो० १७) यद्वासो न विरजये। इति-यत् वनं रक्तवर्णीदन्यथा विवर्ण न कुर्यात् अथवा आर्तवं वासस्थित शुष्फमुदकप्रक्षालितं वासः न विरजयेत् रागोयत न कुर्यात् तत्प्रशस्त गर्भ जननायात शेप. ॥ (श्लो० १९) तदेवेति-अतिप्रसगेन अतिमथुनेन अनृतावपि प्रवृत्तम् । अथवा अतिप्रसगेन बाहुल्येन अनृतावपि प्रवृत्तम् । रक्तलक्षगात् शुद्धा- विलक्षणादन्यत तात् असृग्दर विजानीयात् न तु रक्तपित्तम् ।।
१८ (६२६). सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। अमृग्दरका यत्न । तरुपयो हितसेविन्यास्तदल्पोपद्रवं भिषक् ।। रक्तपित्तविधानेन यथावत्समुपाचरेत् ॥२०॥ जो यह तरुण अवस्थावाली, हित पदार्थ सेवनवाली स्त्रोक हो और उसमें थोडे उपद्रव हों तो उसे वैद्य रक्तपित्तके विधानसे यथोचित उपचार करे ॥ २० ॥ नष्टार्तव । दोषैरावृतमार्गत्वादातवं नश्यति स्त्रियाः॥ तत्र मत्स्यकुलत्थाम्ल- तिलमाषसुरा हिताः ॥ पाने मूत्रमुंदश्विञ्च दर्षि शुक्तं च भोज- नम् ॥ २१॥ वातादि दोषों करके जब रजोधर्मका मार्ग रुक जाताहै तब स्त्रियोंका आर्तव नष्ट होजाताहै अर्थात् मासिक रजोधर्म नहीं आता (दोपोंसे प्रयोजन यहां वायु और कफप्ते है क्योकि पित्त और रक्तसे आर्तव नष्ट नहीं होताहै ) यदि आर्तव नष्ट होगया हो तो मछलीका मांस कुलथी, खट्टे पदार्य, तिल, उडद तथा सुरा(मदिरा) सेवन करना हित है और गोमूत्र पान करना तथा उदश्चित् (दविमें आधानल मिला हुआ मट्ठा) तथा दही और शुक्त (सिरका) ये खाने चाहिये ( डल्लन शुक्तका अर्थ चुक करतेहैं ) ॥२१॥ क्षीणं प्रागीरितं रक्तं सलक्षणचिकित्सितम् ॥ तथाप्यत्र विधातव्यं विधानं नष्टरक्तवत् ॥ १२ ॥ रक्त क्षीण होने के लक्षण और चिकित्सा पहले सूत्रस्थान के पन्द्रह १५वें अध्यायमें वर्णन करचुके हैं उसी प्रकार (स्वयोनिवर्द्धन पदार्थोसे ) यहांभी नष्ट रक्तकी विधिसे विधान करना चाहिये ।। २२ ॥ . एवमदुष्टशुक्रः शुद्धातवा च ऋतौ प्रथमदिवसात्प्रभृति ब्रह्मचा- रिणी दिवास्वप्नांजनाश्रुपातस्नानानुलेपनाभ्यंगनखच्छेदनप्रधा- वनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनानिलायासान्परिहरेत् ॥२३॥ ऐसे उपर्युक्त शुद्ध शुक्रवाला पुरुप और शुद्ध आर्तववारी स्त्री ( होनेसे सुन्दर गर्भ होताहै ) स्त्रीको चाहिये कि रजस्वला होनेके पहलेही दिनसे आदिलेकर (ला० २१ ) मूत्र ग मूत्रम् । उदश्वित् अोदक तक्रम् । तथा चोक्तम् “तक पादजलं प्रोक उदधिचर्द्धवारिकम्" (इति भावमिश्रः ) शुक्तं यथा-"कदमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च । यत्र द्रव्ये- मिपूर्यते तच्छुक्तभिधीयते ॥” इत्युक्तश्चक्षुविकारः सिरका इति लोके । डल्लनस्तु शुक्तं चुक्रमित्याह ।। ( गद्य २३) अवलेखन ककीतकादिना केशसमार्जन विलेखनं वा ।।
१९ शारीरस्थान-अ० २. (६२०) ई रजस्वलाकी अवधितक) ब्रह्मचारिणी रहे और दिनमें सोना, अंजन लगाना, अश्रुपात करना (रोना, स्नान करना, चन्दनादि लगाना या उबटन लगाना), तैला- भ्यंग करना,नखन काटना,दौडके चलना, हँसना, बहुत बोलना, तीक्ष्ण शब्द सुनना, अवलेखन अर्थात् कंघीसे वालपट्टी वनाना या जमीन खरेदना, तेज हवा खाना, परिश्रम करना इन सबको त्यागदे ॥ २३ ॥ किं कारणम् । दिवास्वपंत्या स्वापशीलोऽजनादधो रोदनाद्विक- तदृष्टिः स्नानानुलेपनादुःखशीलस्तैलाभ्यंगात्कुष्ठी नखापकर्त्तनात्कु- नखीप्रधावनाचंचलो हसनाच्छ्यावदंतौष्ठतालुजिह्वः प्रलापी चा- तिकथनादतिशब्दश्रवणाधिरोऽवलेखनात्खलतिर्मारुतायाससेवन नादुन्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान्परिहरेत् ॥ २४ ॥ उपर्युक्त पथ्याचरणका कारण क्या है कि यदि रजस्वला अवस्थाके तीन दिनोंमें दिनमें सोवे तो (जो उसी ऋतुमें गर्भ रहे तो) वालक स्वापशील (बहुत सोने वाला ) पैदा हो, और कज्जल लगानसे अंधा, रोनेसे नेत्रविकारवाला और स्नान तथा अनुलेपन करनेसे दुःखशील, तैलाभ्यंग करनेसे कुष्ठी, नखून कतरनेसे कुनखी (खराव नखनवाला), दौडकर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतोंवाला तथा काले होठ, तालु और जीभवाला हो, बहुत बोलनेसे प्रलापी ( वकवादी ), अति- शब्द सुननसे बहिरा होता है तथा अवलेखन (शिरके बालोंमें कंघी करने ) से गंजा और हवा अधिक खाने तथा कष्ट करनेसे मतवाला बालक पैदा होता है इससे इन कामोंको त्यागदे ॥ २४ ॥ दर्भसंस्तरशायिनी करतलशरावपान्यतमभोजनी हविष्यं यह भर्तुः संरक्षेत् ॥ २५ ॥ ततः शुद्धस्नातां चतुर्थेऽहन्यहतवासस- मलंकृतां कृतमंगलस्वस्तिवाचनां भर्तारं दर्शयेत् तत्कस्य हेतोः२६॥ रजस्वला स्त्रीको तीन दिन कुशाकी सज्जापर सोना और हथेली या मिट्टीके बर- तन या पत्तोंकी पातल इनमेंसे किसीमें रखकर हविष्यान्न (जौ, चावल आदि) अन्न खाना चाहिये और पुरुषसे बहुतही बचा रखना ( दर्शन तक भी नहीं करना (गद्य २४) खलतिः खत्वाटः । मीरतायाससेवनादिदि-मारुतसेवनात् आयाससेवनाद्वा अथवा मारुतस्यायाससेवनात् मत्तो भवीत आयास: कष्टम् ॥ (वाक्य २५) हविष्यं सघृतशाल्योदनादिक्षी- रसस्कृतं यवान्नमित्येके ( इति डल्लनः) भर्तुः संरक्षेदिति भर्तुदर्शनमात्रमापे न कारयेत् वैद्य इति शेषः ।। (वाक्य २६) चतुर्थेहनि शुद्धस्नातां भतार दर्शयदिति तत्कस्य हेतोः इत्वत्र तत् छंदासंबोधने तेनाहो कस्य हेतोः ॥
(६२८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। २० चाहिये ॥ २५ ॥ फिर चौथे दिन शुद्ध स्नान कराके अहत (नवीन) वस्त्र पहना कर आभूषण धारण कराके मंगलपाठ स्वस्तिवाचन कराके वैद्य भर्ताका दर्शन करावे इसका कारण क्या है (सो अगले श्लोकमें कहते है) ॥ २६ ॥ पूर्व पश्येतुनीता यादृशं नरसंगना ॥ ताँदृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥२७॥ ऋतुसे शुद्ध स्नानकरके स्त्री जैसे पुरुषके पहले दर्शन करे उसके (यदि उस ऋतुमें गर्भ रहे तो) वैसाही ( उसकीही आकृति) का पुत्र उत्पन्न होता है इससे भर्ताक दर्शन कराने चाहिये और कई “भरि दर्शयेदतः" इस पदकी जगह ततः पश्येत्पति प्रियम् " ऐसा पांठ मानते हैं इसका अभिप्राय यह है कि पतिके. दर्शन करे अथवा “प्रियम् ” जैसी आकृति, रूप आदि संतानका चाहिये वैसेही देवरादि या देवमूर्ति या सुन्दर पुरुषके प्रथम दर्शन करने चाहिये ( यूरोप और अमेरिकाके विद्वान भी इस बातको मानने लगे हैं और कईपर तजरुवा करनेसे सिद्ध पाया है कि दर्शनका प्रभाव अवश्य होता है इसपर अमेरिकाके एक डाक्टर साहिवने स्त्रीसमाजमें इसपर बडा गम्भीर व्याख्यान दिया था और उसे छपाकर भी प्रसिद्ध किया था जिसका हिंदी अनुवाद ( संतानके सुयोग्य करनेकी विधि ) इस नामसे वाबू काशिनाथ सिरसा निवासीने किया है)॥ २७ ॥ ततो विधान पुत्रीयमुपाध्यायः समाचरेत् ।। कमाते च मह्यनेमारसेत विचक्षणः॥ २८॥ तब उपाध्याय ( पंडित ) पुत्रकी कामनाके अर्थ विधान ( पुत्रेष्टि यज्ञ) करावे (नो०२७) भनीरं दर्शयेदत इत्यत्र भावमिश्रेण "ततः पश्येत् पति प्रियम्" इति पाठपरिवर्तन कृतम्।। (लौ० २८) तत उपाध्यायः पुत्रीयविधान समाचरेत् ( अनेन विधिना यथाह-गयी) तत्राचार्यो ब्राह्मणप्रयुक्तोऽनुाहत येतान्त्रण सवीतश्चार्षमे चर्मप्युपण्टिो राजन्यप्रयुक्तो वैव्याने जानुडुहे वा वैश्यप्रयु- को रिये शूद्रप्रयुत्तो वास्ते वा चतुर्हस्तस्योडलमुपलिप्योलिख्य दर्भरास्तीर्य वेणुयू दक्षिणेन ब्राह्मणे व्यवस्थाप्य शुरुकुसुमगधवीलभिर-पामि प्रणीय पालागामि समिद्भिरनिमुपसमाधाय मंत्रोदकपूर्णपात्र- ममेरग्रे स्थापयित्वा पुत्रजन्मायागाच जुहुयान्महाव्याहातभिः । योपिच पुत्रार्थिनी सह भत्री पश्चिमतोमे- ऋत्विजो दक्षिगतः समुपवियोत् । ननोऽस्या ब्राह्मणः प्रजापतिनुदिव यथाभिलषितं सपादनाय मनसा योनी काम्यामिटि निर्वरेत् । 'अनयोर्विगुत्रानि ब्यवन, त्वष्टा रूपाणि निर्विानु' इति । ततः श्वेतस्थाली- पाकमभिधार्य निर्नुहुयात् यथाम्नाय चोपमत्रितमुदपात्रमत्यै दद्यात् 'सर्वानुदकार्थी कुरुव' इति ततः कमणि पूर्व दक्षिण पद ममिन्नती प्रदनि गममिनुपक्रमेत् । ततः परिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा सह मत्री आरोप प्रानीवात् । पूर्व पुमान् जब यंत्रो नचेच्छिष्टमवोत्येदिति । पुत्रीय विधानकर्मति एवं कम वक्ष्यमाणं आरभेत शूदे मंत्रवर्जित कारयेत् पुत्रीयविधानम् (इति निबंवसग्रहः) । समाप्ते २१ शारीरस्थान-अ०२. + और उस पुत्रेष्टि-यज्ञके पीछे इस (वक्ष्यमाण) क्रयका (चतुर पुरुष ) आर- -म्भ करे ॥२८॥ ततोऽपराहे घुमान मासं ब्रह्मचारी सर्पिःस्निग्धः सर्पिःक्षीराभ्यां शाल्योदनं भुक्त्वा मासं ब्रह्मचारिणी तैलस्निग्धां तैलमाषोत्तरा- हारां नारीमुपेयाँद्रानौ लामादिभिर्विश्वास्य विकल्प्येवं चतुर्या पष्टयामष्टम्यां दशम्या द्वादश्यां चोपयोदिति पुत्रकामः ॥२९॥ पुत्रेष्टि यज्ञ करके अपराह कालमें महीने भरसे ब्रह्मचारी रहा हुआ पुरुष शरी- रमें पृतका मर्दन तथा घृत और दूध के संग शाली (चावलों) के भातका भोजन करके और महीने भरसे ब्रह्मचारिणी रही हुई तथा शरीरमें तैलका मर्दन करके तैल और माप (उड़द) प्रधान भोजन किया है जिसने ऐसी स्त्रीके समीप रात्रि में गमन करे ( अर्थात् ऊपरके अनुसार पुरुष और स्त्री दोनों पथ्य करके प्रसंग करें) और पुरुष प्रेमक वचनोंसे स्त्रीकी तसल्ली करके विचारके रजस्वला होनेके दिनसे चौथी, छठी, आठवी, दशवी और बारहवी रात्रि (पुत्रकी इच्छावाला पुरुष स्त्रीसंग करे ।। २९ ॥ (वक्तव्य ) पुरुष घृत मर्दन करे और धृतयुक्त आहार करे तथा स्त्री तैलमर्दन करे और तैलयुक्त आहार करे इसका अभिप्राय यह है कि वीर्यका पोषक सौम्य- पदार्थ वृत है जो पुरुषको उपयोग करना चाहिये और रजकी पुष्टि करनेवाला आग्नेय पदार्थ तैल है जिससे स्त्रीका शोणित पुष्ट होता है और सम तथा विषम रात्रियोंका हेतु यह है कि, विषम रात्रियों में स्त्रीका आर्तव बलिष्ठ होता है इससे कन्याहोतीहै और समरात्रियों में सम होताहै तो पुरुषके वीर्यकी उत्कर्षतासे पुत्र होताहै। एषूत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च ॥ प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलं च दिवसेषु वै ॥३०॥ इन चौथ, छठे, आठवें आदि दिनों में उत्तरोत्तर आयु, आरोग्य, सौभाग्य, ऐश्वर्य तथा बल संतानमें होता है ऐसा जानना चाहिये ( अर्थात् रजस्वला होनेके दिनसे जितना जितना पीछे गर्भ धारण होगा उतनाही उतना अधिक आयु, आरो; - ग्यता आदि संतानमें होगा)॥ ३० ॥ (गद्य २९) तत्र युग्मातु रात्रिष्वल्पीभवत्यार्तवमयुग्मासु आप्यायते तस्मात्तासु क्रमात्पुत्रस्य दुहितुश्च -जन्म अत एव चानुपरतार्तवदर्शना पुत्रार्थी विषमेप्वहःसु नोपेयात् । यदि त्वाहारानुरोधादयुग्मासु शुक्र- स्याधिकता युग्मासु च न्यूनता स्यात्ततः पुमान् ख्याकृतिदुर्बलो हीनांगो वा जायते स्त्री च पुरुषाकृति- दुर्वला होनागी वा ( इति वृद्धवाग्मटः) ।
(६३०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०१ अतः परं पंचस्यां सप्तभ्यां नवम्यामेकादश्यां च स्त्रीकामः । त्रयोदशीप्रभृतयो निंद्याः॥३१॥ इसके सिवाय जिसकी वांछा पुत्रीकी हो वह पांचवी, सातवी,नवी और ग्यारहवीं रात्रिमें गमन करे। और तेरहवीं रात्रिसे परे निंदित है (इनमें संग करना उचित नहीं) (कई ऐसाभी कहते हैं कि शुक्रकी अधिकतासे पुत्र हो और रजके आधिक्यसे पुत्री)३१ तत्र प्रथमे दिवसे ऋतुमत्यां मैथुनगमनादनायुष्यं पुंसां भवति यच्च तत्राँधीयते गर्भः स प्रसवमानो विमुच्यते। द्वितीयेप्येवं सूति- कागृहे वा । तृतीये प्येवमसंपूर्णागोऽल्पायुर्वा भवति । चतुर्थे तु संपूर्णांगो दीर्घायुश्च भवति ॥ ३२॥ स्त्री जिस दिन रजस्वला हो उसी (प्रथम) दिन रजस्वला स्त्रीसे मैथुन करनेमें पुरुषोंकी आयुका नाश होता है और यदि उस दिन गर्भ रहजावे तो जन्मतेही वालक प्राण छोड़ देता है । दूसरे दिन भी रजस्वलाके संग मैथुन करनेसे पूर्वोक्त हानि (भर्ताको आयुका नाश और जन्मतेही शिशुका मरण) हो अथवा सूतिका- गृहमें (दशही दिनके भीतर ) ही बालक मरजावे । तीसरे दिन रजस्वलाके साथ गमन करनेसे भी पूर्वोक्त हानि होती है तथा अधूरे अंगका और अल्पायु बालक होताहै । चौथे दिन गमन करनेसे पूर्ण अंगोंवाला और दीर्घ आयु बालक उत्पन्न होताहै ॥ ३२ ॥ ( वक्तव्य ) रजस्वलागमनमें भर्ताकी आयुका क्षय और संतानकी स्वल्पायुके सिवायं पतिको अनेक दारुण रोग भी होते हैं जैसे उपदंश ( देखो निदानस्थानके १२ वें अध्यायमें उपदंशका कारण) और रक्तविकार, मूत्रकृच्छादि । इसीलिये रजस्वलाके लिये धर्मशास्त्रमें यों लिखा है कि “प्रथमेहनि चांडाली द्वितीये ब्रह्म- घातिनी । तृतीये रजकी पुंसां यथा वा तथांगना ॥ न च प्रवर्तमाने रक्त वीजप्रविष्टं गुणकरं भवति या नद्यां प्रति- स्त्रोतःप्लाविद्रव्यं प्रक्षित प्रति निवर्तते नोद्ध गच्छति तद्वदेवे द्रव्यं तस्मानियसवती त्रिरात्रं परिहरेत् । अतः परं मालादुपेयात्३३ (वाक्य ३१) एकादशीत्रयोदश्योत्तु नपुंसकं स्यात् । शुक्रस्य बाहुल्यात् पुमान् आर्तवस्य बाहुल्या- त्री तयोः साम्येन नपुंसकमिति (वृ० वा० ) ॥ (गद्य ३२) दिवसकथनादहोरात्रग्रहणम् । मैथुन- गमनात् मैथुनाथै गमनात् मैथुनकरणादिति यावत् । विमुच्यते इति-प्राणविमुच्यते, प्राणैरिति शेषः ।। (गद्य ३३)शाविद्रव्यं प्रतरणशीलं प्रतिीनवर्तने व्याधुटति (इति डल्लन:)। मासादुपेयात् मासात् अत्र- - २३ शारीरस्थान-अ० २. (६३१) रजस्वलासमयमें रक्तका प्रवाह होताही है और रक्तके प्रवृत्त होने में प्रविष्ट हुआ बीज (वीर्य) गुणकारक (शुद्धगर्भस्थितिकारक) नहीं होता जैसे नदीके बहते- हुए जलमें पड़ा हुआ द्रव्य बहजाता है तथा व्याधुटित होजाता है ऊपरको नहीं आता (ऊगकर उसका अंकुर ऊपरको नहीं आता ) इसी तरह रजस्वलामें भी जानना चाहिये इस कारणसे नियमित तीन रात्रियों में रजस्वलाको त्याग दे. इसके पीछे १ मास तक यथोचित रात्रियों में गमन करे ॥ ३३ ॥ लब्धगर्भाका कृत्य। लव्धेगर्भायाँश्चैतेष्वहःसु लक्ष्मणाटशुंगासहदेवाविश्वदेवाना, मन्यतम क्षीरेणाभिषुत्य त्रीश्चतुरो वा बिंदूने दैद्यादक्षिणे नासा- पुटे पुत्रकामायै न च तान्निष्टीवेत् ॥ ३४ ॥ जब स्त्रीके गर्भ रहनावे तब इन दिनोंमें (तीन मास पहले) लक्ष्मगा और घडकी कोपल,सहदेवा (पीले फूलकी कंघी) और विश्वदेवा(गंगेरण) इनमें से किसीको (वछडेवाली ) गोके दूधमें घिसकर पुत्र चाहनेवाली स्त्रीकी नासिकाके दहिने नथनमें तीन या चार बूंदें डाले और उन्हें थूकने न दे ( अर्थात् स्त्रीसे कहदे कि थूकना नहीं )॥ ३४॥ गर्भके चार हेतु। ध्रुवं चतुण सौन्निध्यात् गर्भः स्याद्विधिपूर्वकः ॥ ऋतुक्षेत्रांबी- जानां सामय्यादंकुरो यथा ॥ ३५ ॥ एवं जाता रूपवंतो महा- सत्त्वाश्चिरायुषः ॥ भवंत्य॒णस्य मोक्तारः सत्पुत्राः पुत्रिणे हिताः३६॥ -अर्ध्वमिति शेपः । अर्वागमनन्तु गर्भद्वारविघट्टनेन स्थितमपि गर्भ च्यावयति इति । गर्भधारणकालतः परं मासादूर्ध्वमुपेयादित्यर्थः । धृतगर्भाया तु मासादुर्वमपि न गतव्यम् । याद तस्मिन्मासे गर्भस्थापन न भवे- तदा मासादूर्ध्व द्वितीये ऋती गतव्यमिति भावार्थः । केचिदित्याहुः अतःपर दिनत्रयादूर्ध्व मासात् मास- पर्यंत गच्छेत् उचितासु रात्रिपु इति ।। (गद्य ३४) लब्धगर्भाया एतेषु अहःसु स्थितगर्भाया मासत्रयाल्पांतरे पुत्रापत्यजननार्थ लक्ष्मणादिन- स्यदानम् ।अत्र चकारात् अलब्धगर्भास्तु सर्वथैव लक्ष्मणादिकाना नस्य देयमित्यर्थः। "लक्ष्मणाया लक्षणम', यथा-"पुत्रकारकरक्ताल्पबिंदुभिलाछिता यदा । लक्ष्मणा पुत्रजननी वस्तगधाकृतिर्भवेत् ॥” इति । विधि: शरत्काले पुष्पफलोपेतां दृष्ट्वा शनिदिने संव्याया तस्याश्चतुर्भागेषु खदिरकोलकान्विखायापरेछुहि मूलपुष्ययोग गते रविवारे मत्रवद्गृहीत्वा समानवर्णवत्साया गोः क्षीरेण यथाविधि नस्यं दद्यात् ( इति डल्लनः ) । वट. शुगा वटप्ररोहः । सहदेवा बलाभेदः । पीतपुष्पा कगही इति लोके । विश्वदेवा गागेरुकी पतदोषध सह- साभिहुत कृत्वा मागल्यदेशे गोक्षीरेण पेपयित्वा त्रीन् बिंदून् अलब्धगर्भाया दक्षिणे नासापुटे दद्यात्। कंठप्राप्तान् न निष्ठीवेत सा पंचदिनादि पयसादनमनीयात् तदूर्व माम्यधर्मसेवनम् (नि० सं०)॥
तुश्रुतसंहिता-माटी। निश्चय चार पदार्थोंके संयोगसे विधिपूर्वक गर्भ होता है । जैस ऋतु ( फसल) और क्षेत्र ( दोपरहित संस्कृत पृथ्वी) और जल (जितना और जैसा चाहिये) तथा वीज (निर्दोष बीज ) इन चारों सामग्रियोंके मिलनेस जैसे अंकुर उत्पन्न होजाता- है वैसेही ऋतु (गर्भका समय अर्थात् तरुण स्त्रीके रजस्वला होनेके दिनसे १६ दिनतक) और शुद्ध गर्भाशय तथा माताके भोजनका यथोचित रस और वीन (शुद्ध शुक्र ) इनके संयोगसे गर्भ होता है ॥ ३५॥ ऐसे ( यथायोग्य ) चारों पदायोंके संयोगसे रूपवान् गम्भीर सत्त्ववाले दीर्घायु माता पिताके ऋणक छुडाने- वाले सत्पुत्र उत्पन्न होते हैं ।। ३६ ॥ शरीरके वर्णका कारण। तत्र तेजाधातुः सर्ववर्णानां प्रभवः स यदा गर्मोत्पत्तावब्धातुमा- यो भवति तदा गर्भ गौरं करोति । पृथिवीधातुप्रायः कृष्णम् । पृथिव्याकाशप्रायः कृष्णश्यामम् । तोयाकाशधानुबायो गौरश्या- सम् ॥ ३७॥ यादृग्वर्णमाहारसुपरवते गर्भिणी ताग्वर्णप्रसवो भवत्येक भाषते ॥३८॥ तेज (अग्नि) धातु ही गौरादि सम्पूर्ण वर्णांका उत्पन्न करनेवाला है वह (शारी- रक अथवा आर्तव अग्नि ) यदि गर्भोत्पत्तिले समय जल धातुप्राय ( अर्थात् जलके अधिकांश युक्त ) हो तो गौरवर्ण सन्तान उत्पन्न करता है। और यदि वह तेज धातु पृथ्वी धातुप्राय ( पृथ्वीके अधिकांशयुक्त) हो तो गर्भस्थ वालकका वर्ण काला कर देता है। और यदि पृथ्वी और आकाशके अधिकांश युक्त हो तो कृष्ण-श्याम (कालापन लिये सांवला रंग) करता है और जो जल और आकाशके अधिकांश हो तो गौर-श्याम ( गोरापन लिये हुए सांवला रंग ) करता है ॥ ३७ ॥ कोई २ ऐसा भी कहते हैं कि गर्भिणी जैसे वर्णका आहार सेवन करे वैसेही वर्ण (रंग) की सन्तान होती है ॥ ३८ ॥ (वक्तव्य ) वायुधातुप्राय हो तो उसका वर्ण कैसा हो यह क्यों नहीं लिखा इसका उत्तर यह है कि जब गर्भस्थितिके समय तेज धातु वायुप्राय होता है तब वायुचलनात्मक होनेसे गर्भ स्थितही नहीं होता तो फिर उसका वर्ण क्या लिखें ॥ ( गद्य ३७) वर्णविषये वृद्धवाग्भट इत्याह-'शुक्रे शुले घृतमंडाभे वा गर्भस्य गीरत्वम्।तलामं कृष्णत्व मध्वाभे ठयामत्वचस्तथा ॥ क्षीरादिम राहारोपयोगान्मातुन्दकविहाराच्च गौरता । तिलान्नविदाहिनी कृष्णता व्यामिश्राणा श्यामता च ॥ इति ।। ।
. २५ शारीरस्थान-अ० २. (६३३) नेत्रोंका वर्ण। तत्र दृष्टिभागमप्रतिपन्नं तेजो जात्यंधं करोति तदेव रक्तानुगं रक्ताक्षं पित्तानुगं पिंगाक्षं श्लेष्मानुगं शुक्लाक्षं वातानुगं विकृता- क्षमिति ॥ ३९॥ गर्भगत बालकके दृष्टिभागमें यदि तेज धातु पहुँचही नहीं तो बालक जन्मांध होता है और यदि रुधिरके अनुगत (संग) होकर दृष्टिभागमें जाता है तो लाल नेत्रवाला (जिसमें सुरखी अधिक हो ) वालक होता है और पित्तके अनुगत होकर पहुँचे तो पीले नेत्रवाला हो और कफके अनुगत होकर पहुंचे तो सुपेद नेत्रवाला हो और वायुके अनुगत पहुँचे तो विकृताक्ष ( चंचलाक्ष या नेत्रविकारवाला ) होता है (गर्भके चतुर्थमासमें दृष्टिकी उत्पत्ति होती है इससे चतुर्थ मासमें रूपें- द्रिय ( दृष्टि ) का हेतु तेजतत्त्व जिस प्रकार दृष्टिमागमें प्राप्त होता है, वैसेही नेत्र होते हैं ) ॥ ३९ ॥ घृतपिंडो यथैवाग्निमाश्रितः प्रविलीयते ॥ विसर्पत्यतिवं नास्तिथा पुंसां समागमे ॥४॥ जैसे अग्निके आश्रित होनेसे ( आगपर या आगके पास रखनेसे) वृतकाजमा हुआ पिंड घुल जाता है वैसेही पुरुपोंके समागम होनेसे स्त्रियोंका आर्तव शोणित भी चलायमान होता है अर्थात् गर्भाशयमें प्राप्त होकर शुक्रसे मिलकर गर्भका कारण होता है ॥ ४०॥ (वक्तव्य ) स्त्रियों के मथुन समय श्वेत वीर्यरूप द्रव पदार्थ भी देवता है परंतु वह शुकसे मिलकर गर्भका हेतु नहीं होता इसपर वृद्धवाग्भटका यह श्लोक है- योपितोपि स्रवत्येव शुक्र पुंसां समागमे । तन्न गर्भस्य किंचित्तु करोतीति न चिंत्यते" ॥ वीजेऽन्तर्वायुना भन्ने द्वौं जीवौ कुक्षिमागतौ । यमावित्यै भिधीयेते धर्मेतरपुरःसरौ ॥ ११ ॥ गर्भाशयमें प्राप्त हुआ वीर्य जब भीतरके वायुसे भिन्न (दो आगोंमें विभक्त ) हो जाता है तब दो जीव (बालक) कुक्षिमें आजाते हैं (और उत्पन्न होते हैं) ( वाक्य ३९ ) चतुर्थे मासि कस्यचित् पूर्वकर्मवशात् दृष्टिभागं चक्षुरिंद्रियाधिष्ठानम् अप्रतिपन्नम् अव्याप्तं तेजी जात्यंध करोति ( नि० सं० ) (श्लो० ४०) पुसा समागमे नार्या आर्तव विसर्पतीति स्वा- भाविको धर्मः यथा घृतस्यामः सयोगात् द्रवत्वमिति ॥ (श्लो० ४१ ) शुक्रातवेऽनिलेन खडशो मिने यथाविभागमपत्यानामुत्पत्तिः ( इति वृद्धवाग्भटः )। " - , ॥ (६३४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । २६ उन्हें यम वा यमल अर्थात् जोड़ला कहते हैं और वे धर्मतर अर्थात् अधर्मपूर्वक होते हैं (यदि तीन या अधिक चार भागोमं शुक्र विभक्त हो तो कदाचित् तीन या चार गर्भभी इकट्ठे हो सकते हैं परन्तु पूर्णावकाशके अभावस वे जीत नहीं रह सकते) ॥४१॥ आसेक्यादिकी उत्पत्ति । पित्रोरत्यल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् ॥ से शुक्र प्राश्च लभते ध्वजोच्छ्रायमसंशयंम् ॥ ४२ ॥ यः पूतियोनौ जायेत स सौगं- धिकसंजितः ॥स योनिशेफसोगधर्माघ्राय लभते बलम् ॥४३॥ स्त्रे गुदेऽब्रीचर्याद्यस्त्रीपु पुंर्वत्प्रवर्तते ॥ कुंभीकः स च विज्ञेयः ईर्ण्यकं शृणु चापरम् ॥ ४४ ॥ दृष्टी व्यवायमन्येपी व्यवाये यः प्रवर्तते ॥ ईर्ण्यकः स च विज्ञेयः षण्ढकं शृणु पंचमम् ॥ ४५ ॥ यो भार्यायामृतौ मोहाँदंगनेव प्रवर्तते ॥ तस्यं स्त्रीचेष्टिताकारो जायते पण्ढसंज्ञितः ॥ ४६ ॥ ऋतौ पुरुषर्वहापि प्रतेतांगना यदि ॥ तस्य कन्या यदि भवेत् साँ भवेन्नरच्चेष्टिता ॥४७॥ पिताका बहुतही अल्पवीर्य हो तो उससे आसेक्य संज्ञक (अत्यल्पवीर्य ) पुरुष उत्पन्न होता है वह अन्यके शुक्रको पीनेसे निःसन्देह ध्वजोच्छ्राय (मदकी उत्थि. ति) को प्राप्त होता है। कई शुक्रसे यहां गन्धमाजारवीर्य जो सुगंधित द्रव्य है उसके खानसे पुरुपार्थी हो जाता है ऐसा समझते हैं और वास्तवमेंभी गन्धमार्जार- वीर्य वीर्यका करनेवाला है। बहुतसे लोग “अंबर" नामक सुगंध द्रव्यको गंधमा- जारवीर्य मानते हैं और यथार्थ में अंबर अति पुरुषार्थ , देनवाला है भी ।। १२ ॥ जो दुर्गधितयोनिस उत्पन्न होता है उसे सौगंधिकसंज्ञक (क्लीव ) कहते हैं यह योनि और मेट्टकी वास सूचनेसे पुरुषार्थी होता है (स्त्रीके योग्य होता है अर्थात् सूंघ- कर चैतन्यता होती है ) ॥ ४३ ॥ जो पुरुष अब्रह्मवर्यसे निज गुदामैथुन कराने पर स्त्रियोंके संग मैथुनमें प्रवृत्त होता है उसे "कुंभीक कहते हैं वह माताकी विपरीत रति और पिताकी वीर्यकी दुर्बलतासे होता है ॥ ४४ ॥ जो औरोंको मथुन करते देखकर मैथुन करने योग्य होता है उसे ईर्ण्यक कहते हैं (यह गो- त्पत्तिके समय ईपयुक्त स्त्री-पुरुपोंके संगसे होता है) ॥ ४५ ॥ जो ऋतुके समय मोहवश स्त्रीक नीचे हो विपरीत रति करे उसके स्त्रीकेसी चेष्टावाला (जनानियां जनखा) पुत्र होता है उसे पण्ड कहते हैं ।। ४६ ॥ और जो ऋतुके समय वलवती १ २७ शारीरस्थान-अ० २. (६३५) स्त्री पुरुषके तुल्य उपरिगामिनी हो जावे तो उसके पुरुषके (आकार दाढी, मूछों-- युक्त और पुरुषकसी) चेष्टावाली कन्या उत्पन्न होती है ॥ ४७ ॥ आसेक्यश्च सुगंधी च कुंभीकश्चयॆकस्तथा ॥ सरेतसस्त्वमी ज्ञेयों अशुक्रः षसंज्ञितः॥४८॥ अनया विप्रकृत्या तु तेषां शुक्रवहाः शिराः॥ हर्षात्स्फुटत्वमायांति ध्वजोच्छ्रीयस्ततो भवेत् ॥४९॥ आसेक्य, सौगंधिक, कुंभीक तथा ईपॅक ये तो वीर्य युक्त होते हैं परन्तु षण्ड सज्ञित (जनखे) वीर्य रहित होते हैं ॥ ४८ ॥ इन आसक्यादि चारोंमें वीर्य कुछ होता है तो भी इन इन विक्रियाओं ( वीर्यप्राशन, लिंग और भगका आवाण, गुद- मैथुन और परमैथुन देखना आदि) से उनकी शुक्रवहा शिरा हर्षके कारण जब स्फुटताको प्राप्त होतीहैं (फूलतीहैं ) तब लिंगेंद्रियमें चैतन्यता होती है यही नपुं- सकताहै ॥ ४९॥ आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितौ ॥ स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुत्रोपि तादृशः ॥५०॥ यदा ना-वुपेयातां वृषस्यत्यौ कथंचन ॥ मुंचंत्यौ शुक्रमन्योन्यमनस्थिस्तत्रं जायते ॥ ५१ ॥ जैसे जैसे आहार और विहार तथा चेष्टाओंसे युक्त स्त्रीपुरुष संगम करे वैसेही वैसे गुणोंवाला बालक उत्पन्न होताहै ॥ ५० ॥ यदि कदाचित् रतिकी इच्छा युक्त दोस्त्री आपसमें मैथुनकासा आचरण करें और परस्पर वीर्यपात करें (यदि उनमेंसे एकका श्वेत वीर्य और दूसरीका शोणित मिलकर किसी एक गर्भाशयमें प्रविष्ट होजाय तो) उनसे अनस्थि अर्थात् विना हड्डीका गर्भ होजाता है ( यह गर्भपैतृक अस्थि और वीर्यादिसे शून्य होनेके कारण सजीव नहीं होसकता । डल्लनके मतमें. अनस्थिका अर्थ कोमल हड्डीवाला होताहै )॥ ५१ ॥ ऋतुस्नातो तु यो नौरी स्वप्ने मैथुनमाचरेत् ॥ आर्तवं वायुरादाय कुक्षी गर्भ करोति च ॥५२॥ मासि माप्ति विवर्द्रत गर्भि- -ण्या गर्भलक्षणम् ॥ कलँलं जायते तस्यां वर्जितं पैतृकैर्गुणैः ॥ ५३ ॥ सर्पवृश्चिककूष्मांडविकृताकृतयश्चै ये ॥ गर्भारत्वे ते स्त्रियांश्चैव ज्ञेयाः पापकृता भृशम् ॥ ५४ ॥ (श्लो० ५१) यदा द्वे ना-वेव वृपस्यत्यौ सुरतार्थिन्यौ उपेयातां परस्पर योनिसघर्षण कुर्याता तदा अनस्थिर्जायते इति-अस्थिरहितो गर्भ: पिडाकारो जायते इति अन्थः पितृजत्वात् । अत्र तदभगवादनीस्थ. चैव जायते इति सौम्योर्थः हल्लनस्तु अनस्थिरित्यत्र ईषद” न तेन कोमलास्थि: इति,तन्नपैतृकांशाभागात् ।।
(६३६) सुश्रुतसंहिता-सा० टी०। रजस्वला स्त्री शुद्ध न्नान करक यदि स्वप्नमें मैथुन करे तो वायु उसके आर्तव शोणितका ग्रहण करके कूखमें गर्भसा कर देताहै ।। ५२ ॥ वह नर्भिणीक गर्भमें गर्मकस चिह्नोंस युक्त प्रति मासमें वृद्धिको प्राप्त होता है और फिर पिताके गुणों (अस्थिकशादि) से रहित कलल (पिडासा) उत्पन्न होता है ॥५३॥ इनके सिवाय किसी स्त्रीके सर्पके आकार, किसीके विच्छूके आकार, किसीके कुम्हडंक आकार पिंडासा), क्सिीके विकृत आकृतिवाले ( शिरहीन, दो शिरवाले, न्यूनाधिक अंगवाले) गर्भ उत्पन्न होते हैं वे स्त्रीक पाप (दुराचरण)के करनेसे प्रायः होतेहैं।॥५४॥ शों वातप्रकोषेण दोहदे चावमानित ॥ भवेत्कुजः कुणिः पंगु- संको सिन्लिन एंव च ॥ ५५ ॥ मातापित्रोस्तु नास्तिश्याद - जैश्च पुराईतैः ॥ वातादीनां च कोपेन गो विकृतिमाप्नुयात्॥५६॥ वायुके बोपसे तथा दोहृदके न मिलनेस गर्भ (गर्भगतबालक ) कुवडा, पंगुवा, झुणि (लूला अर्थात् हाथों में विकारवाला), गूंगा तया मिन्मिना होजाताहै ॥५५॥ माता पिताके नास्तिकत्व ( शास्त्रोक्त शुभाचरणपर श्रद्धा नहीं रखकर दुराचरण करनेस ) अथवा पूर्वकृत अशुभ काँसे तथा वातादिकके कोपसे गर्भगत वालक -विकृति (अगभंगता) को प्राप्त होता है ) ॥ ५६ ।। गर्भ में बालकके मलमूत्रादि न करने और न रोनेका हेतु । सलाल्पवादद्योगांचं बायोः पक्वाशयस्य च ॥ वातसूत्रपुरीघाणि नै गर्भस्थः करोति हि ॥ ५७ ॥ जरायुणां भुखे छन्ने कंठे चं झवेष्टिते ॥ बायोमार्गनिरोधांच ने गर्भस्थः प्ररोदिति ॥५८॥ भलके अति अल्प होनेसे तया पक्काशयके वायुका योग (अतियोग) न होनेसे गर्भस्थ बालक अधोवायु और मल मूत्र नहीं करता ॥ ५७ ॥ जराय (झिल्ली)से सह ढका हुआ रहनसे और कंठ कफाच्छादित होनेसे, वायुका अधिक आने जानेका मार्ग रुका होनेसे गर्भस्थ वालक नहीं रोसकता ।। ५८ ।। बालक गर्भ में श्वासादि कैसे लेता है। निश्वासोच्छौलसंक्षोभस्वप्नान्यभौधिगच्छति ।। मांतुनिवलितोच्छालसंक्षोभस्वप्नसंभवान् ।। ५९, ।। (मो०५५) कुणिः विकृतपाणिः !! (ो० ५६) नास्तिक्यमिति-न अस्ति परलोक इत्यादि- नदिया ते नातिका: तेपा मावो नास्तिक्यम् ( इति डल्लनः ) 1 वाचस्पत्ये तु मान्नोंक्तयु फलवकर्मसु- अग्रतावृद्धि स्तिमिनि ।। (लो० ५७ ) अयोगात् अल्पयोगात् अत्र नञ् ईपदर्थे ।। (श्लो०५८) वार्मागनिरोधान् इति-दोपजनकस्य वायोमार्गनिरोधात् इत्यर्थ. किंतु निवासादिरूरत्व वायोस्तु निःसर- जमार्ग अश्यति यतस्तदभाव जीविताभाव एव भवनि गर्मस्य ( इति डल्लनः ) ॥
२९ शारीरस्थान-अ० ३. (६३७) शास्त्रबुद्धयः गर्भमें बालक श्वासलेना और बाहरको श्वास छोडना तथा चलना फिरनाऔर सोना इन सब कार्याको माताके श्वास लेने और छोडने तथा चलने फिरने और सोने आदिके अन्तर्भावसे करताहै (अर्थात् जो शरीरोपयोगी आहार विहार तथा चेष्टा आदि माता करती है गर्भ भी उनको प्राप्त करता है ) ॥५९॥ सन्निवेशः शरीराणां दंतांनां पतनोद्भवौ। तलेष्वसंभवो यश्च रोम्णामेतत्वभावतः॥६०॥ शरीरोंका सन्निवेश अर्थात् अंग और प्रत्यंगोंकी रचना और दांतोंका टूटना और निकलना, हाथोंकी हथेली और पावोंके तलवोंमें रोमों (बालों) का न होना । यह सब स्वभावहीसे होजाताहै ॥६॥ भाविताः पूर्वदेहेषु सतत : ॥ भवंति सत्त्वभूयिष्ठा- पूर्वजाँतिस्मरा नराः ॥ ६१ ॥ कर्मणों चोदितो येन तदाप्नोति -पुनर्भवे ॥ अभ्यस्ताः पूर्वदेह ये तानेव भजते गुणान् ॥ ६२ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ जिन्होंने पूर्व जन्ममें निरंतर शास्त्रचिंतनम बुद्धिभावित रक्खीहै वे मनुष्य सत्त्व- गुण प्रधान होतेहैं और पूर्वजन्मकी स्मृतिवाले होतेहैं अर्थात् पूर्वाभ्यस्त विद्यादि उन्हें शीघ्रही थोडेसे पढाने मात्रसे आजाती है ।। ६१ ।। जैसे कर्म करके मनुष्य प्रेरण किया जाताहै ( अर्थात् जैसे शुभाशुभ कर्म मनुष्य करताहै उसीके अनुसार दूसरे जन्ममें प्राप्त होता है) और जो पूर्वजन्ममें अभ्यास किये हुए गुण होते हैं उन्हीं- को दूसरे जन्ममें धारण करता है ॥ ६२ ॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी० शारीरस्थाने द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥ तृतीयोऽध्यायः ३. अथातो गर्भावक्रांतिशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ यहांसे अगाडी अब हम गर्भावक्रांति अर्थात् गर्भका गर्भाशयमें आनाइस विष- यके शारीरकका व्याख्यान करतेहैं । सौम्यं शुक्रमातवसाग्नेयमितरेषामप्यत्र भूतानां सांनिध्यमस्य- णुना विशेषण परस्परोपकारात्परस्परानुग्रहात्परस्परॊनुप्रवेशा॥१॥ (वाक्य१) गर्भावकातिः गर्भावक्रमणम् उपगमनमवतरणमिति यावत् । इतरेषां पृथिवीवाय्वाकागाना भूतानामणुना विशेपेण च सानिध्यमस्ति कुतः परस्परोपकारात् । भूजलानलानिलाकाशाना धारणसंहनन, परिणामन्यूदावकाशदानरुपफारस्तस्मात् ।। 1 . (६३८) ३० सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। गोत्पत्तिमें वीर्य सौम्य और आर्तव आग्नेय है (क्योंकि अग्निसोमात्मक जगत् है ) और इनके सिवाय अन्य महाभूतों ( पृथ्वी, वायु और आकाश इन ) का भी थोडा बहुत सांनिध्य है क्योंकि ये सब आपसमें टपकारक हैं तथा दूसरेका अनुग्रह करतेहैं इससे तथा सब आपस ( एकदूसरे) में परमाणुरूपसे प्रविष्ट हैं इसकारण गर्मोत्पत्ति में अग्नि और सोम तो मुख्य (प्रधान ) हैं और शेप अणुरूपसे व्याप्त और संमिलित होतेहैं ॥ १ ॥ तत्र स्त्रीपुंसंयोः संयोग तेजः शरीराद्वायुरुदीरयति ततस्तेजोनिल- सन्निपातात् शुक्र च्युतं योनिसभिप्रतिपद्यते संसृज्यते चौतवेन ततोऽग्निसोमसंयोगात् सृज्यसानो गो गर्भाशयमनुप्रतिपचते २॥ तहां स्त्री और पुरुषका संयोग होनेपर जो गरमाई उत्पन्न होती है वह शरीरमें वायु- को उत्कट करती है फिर उस गरमाई और वायुके मिलनेसे पुरुषका वीर्य निकलकर स्त्रीको योनिमें प्राप्त होता है और आर्तवके संग मिलता है फिर अग्नि ( आर्तव) और सोम (वीर्य) का संयोग होनेसे उत्पन्न हुआ गर्भ गर्भाशयमें प्राप्त होता है:॥२॥ क्षेत्रको वेदयिता स्प्रष्टा घ्राता द्रष्टा श्रोता रसयिता पुरुषः स्रष्टा गंता साक्षी धाता वक्ता योसावित्येवमादिभिः पर्यायवाचक- नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादक्षयोऽध्ययोऽचिंत्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्त्वरजस्तमोभिर्देवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाऽभिप्रेर्य- माणो गर्भाशयमनुप्रविश्यावतिष्ठते ॥३॥ गर्भाशयमें शुक्र और शोणितका संयोग होनेपर वह क्षेत्रज्ञ जाननेवाला,(त्वगिंद्रि- यसे) स्पर्शका बोध करनेवाला,(वाणसे) सूबनेवाला,(चक्षुसे)दखनेवाला, (कर्णेद्रियसे) सुननेवाला, ( रसनासे ) स्वाद लेनेवाला पुरुष स्रष्टा, गमनशील, साक्षी, धारण करनेवाला, बोलनेवाला ( जीवात्मा) जो क्षेत्रज्ञादि पर्यायवाची नामोंसे वाला जाता है, दैवयोगसे वही अव्यय ( अविनाशी ), अचिंत्य (जो चितवनमें नहीं आसके ), भूतात्मा (सूक्ष्म लिंगशरीर ) के साथ सत्व, रज, तम इन गुणों करके और देवता, असुर आदि अनेक भावों करके युक्त तत्काल वायु करके प्रेरण किया हुआ गर्भाशयमें प्रविष्ट होकर स्थित होता है (अर्थात् कर्मवश वायुका प्रेरण किया हुआ गर्भभावको प्राप्त होता है)॥ ३ ॥ (गद्य ३) देवयोगात् इति-प्राक्तनजन्मकर्मणो धर्माधर्माभिधानस्य संबंधात् । भूतात्मना इति-भौति- कशरीरेण सूक्ष्मेन लिंगशरीरेणेत्ययः । अन्वक्षं तत्क्षणमेव (इति नि० स०) देवासुरैरपरैर्भावरिति कदाचित्सु- कर्मवसाद्देवो भूत्वा कदाचित्कुकर्मवशादसुरोभूत्वा कदाचित् कर्मवशात् मनुष्ययानिस्तिग्योनिश्चभूत्वेत्यर्थः।।
३१ शारीरस्थान-अ० ३. (६३९) तत्र शुक्रवाहुल्यात्पुमानार्तवबाहुल्यास्त्री साम्यांदुभयोर्नपुंसक- मिति ॥४॥ ऋतुस्तु द्वादशरात्रं भवति दृष्टार्तवः । अदृष्टार्तवोप्य- स्तीत्येके भाषते ॥ ५॥ भवंति चात्र- वहां (गर्भाशयमें)शुक्रकी बाहुल्यता होनेसे लडका होता है और आर्तव शोणित- की बाडैल्यतासे लडकी होती है तथा दोनों के बराबर होनेसे नपुंसक संतान होती है ॥ ४ ॥ जब रजस्वला होनेका दर्शन हो तभीसे बारह रात्रि ऋतु (गर्भस्थितिका समय) कहलाता है । रजस्वलादर्शनसे १६ रात्रि ऋतु कहाता है जिसमें आदिकी तीन और अंत्यकी एक त्याज्य है(तब बारह रहीं अथवा रजोदर्शनसे बारह रात्रिही ऋतु है क्योंकि पहले “ त्रयोदशीप्रभृतयो निंद्याः" ) ऐसा कह आये हैं और अदृष्टार्तवाकोभी कई ऋतुमती होती है ऐसा कहते हैं (अर्थात् कई ऐसा कहते हैं कि रजस्वला न होनेपरभी ऋतुकाल गर्भस्थितिका-समय कभी कभी हो जाता- है जैसे बालक दूध पीता हो वह दूध छोड दे या दूध पीते बालकको मृत्यु होजाय या बालक गोदमें हो और बहुत दिनसे पति के संगकी वांछा हो इत्यादि मौकोंपर विना रजस्वला हुएभी गर्भस्थिति हो जाती है देशभाषामें ऐसे गर्भका इनामका गर्भ कहते हैं)॥ ५ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- ऋतुमतीस्त्रीके लक्षण। पीनप्रसन्नवदनां प्रक्लिन्नात्ममुखद्विजाम् ॥ नरकामां प्रियकथां सस्तकुक्ष्यक्षिमूर्द्धजाम् ॥६॥ स्फुरद्भुजकुचश्रोणिनाभ्यूरुजघन- स्फिचम् ॥ हात्सुक्यपरां चापि विद्यौस्तुमतीमि ति ॥ ७ ॥ जिस स्त्रीका मुख पुष्ट और प्रसन्न हो तथा शरीर, मुख और दंतवेष्ट ( मसूढे) क्लदित (गलगलाये हुएसे ) हों और उसको पुरुषकी अभिलाषा हो तथा मीठी प्यारी बातें करे और कुक्षि, नेत्र और बाल ढीले होजायँ ॥ ६ ॥ तथा हाथ, कुच, कमर, नाभि, जानु, जंघा और चूतड़ फडकने लगजायँ तथा हर्ष और आनंदमें तत्पर हो तो उसको (विना रजोदर्शनके भी ) ऋतुमती जानना चाहिये ॥ ७ ॥ ( वाक्य ४) शुक्राहुल्यादिति-शुक्र प्रसूतिमात्रम् आर्तव चतुरंजलिप्रमाणं च नैव यावन्मात्रमार्तव गर्भाशयावस्थितं मलरहित गर्भजननं तावदेव ग्राह्यम् अथवा स्वमान,पेक्षया शुक्रोणितयो हुल्यमत्र चाभिप्रेतं शुक्र तु कदाचिदत्यत हर्षवशात् बहु स्रवति कदाचिद्वैमनस्यादल्पमिति । अन्ये त्वाचायां एवं ब्रुवति शुक्रातवयोन्यूनाधिकसमत्वं च वीर्येण भवति ( इति नि० सं० ) ॥ (श्लो० ६। ७) अदृष्टार्त- वाया ऋतुमत्या लक्षणमाह-पीनेत्यादि । प्रक्लिनत्ममुम्वद्विजामित्यत्र आत्मा देहः । द्विजशब्देन द्विजस- मीपवर्तिनो दंतवेष्टका अभिप्रेताः द्विजानां प्रक्लेदासंभवात् ( इति नि० सं० ) ॥ 1 .
1 1 (६४०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ३२ नियतं दिवलेऽतीते संकुचत्यंबुजो यथा ॥ ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संवियते तथा ॥८॥ जैसे दिनके व्यतीत होनेपर अवश्य कमल बंद होजाता है उसी तरह ऋतु (सोलह रात्रि ) व्यतीत होजानेपर स्त्रीकी योनि ( गर्भाशयका मुख ) वन्द होजाता है॥ ८॥ मालेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदातवम् ॥ ईपत्कृष्णं विगंध चें वायुयोनिमुखं नयेत् ॥ ९॥ तद्वर्याद्वादशात्काले वर्तमानम- सृक् पुनः॥ जरापक्कशरीराणां याति पंचाशतः क्षयम् ॥ १० ॥ वह आर्तव जब एक महीने भरसे इकट्ठा होजाता है तब कुछ काला और दुर्गध युक्त हुआ धमनियों करके योनिके मुखपर बाहर आजाता है ( इसीको रजो- दर्शन कहते हैं)॥ ९॥ वह अनुमान १२ वर्षकी अवस्थासे पीछे स्त्रियोंके वर्त- मान होता है और जब बुढापेसे शरीर पक जाता है तब पचास वर्षकी अवस्था होजानेपर क्षय होजाता है ॥ १० ॥ युग्मेषु तु पुमान् प्रोक्तो दिवसेष्वन्यथाऽवला ॥ पुष्पकाले झुचिस्तस्मादपत्यार्थी स्त्रियं ब्रजेत् ॥११॥ सम दिनोंमें ( रजकी प्रबलता न होनेसे) पुत्र होता है और अन्यथा अर्थात् विषम दिनों में ( रजकी प्रबलता होनेसे) कन्या होती है इससे पुष्पकाल (ऋतु काल) में सन्तानकी इच्छावाला पुरुष पवित्र होकर स्त्रीगमन करे ॥ ११ ॥ गर्भरहनेका तात्कालिक लक्षण । तत्र सद्योगृहीतगर्भाया लिंगानिाश्रमो ग्लानिः पिपासा सक्थि: सदनं शुक्रशोणितयोरववंधः स्फुरणं च यो नेः॥१२॥ तत्कालही गर्भधारण की हुई स्त्रीके ये चिह्न होते हैं-श्रम ( थकान ) और ग्लानि प्यास तथा साथले थकी हुईसी होना और शुक्र, शोणितकी प्रवृत्ति न होना तथा योनिका फरकना ॥ १२ ॥ गर्भवती स्त्रीके लक्षण । स्तनयोः कृष्णमुखता रोमराज्युद्गमस्तों ॥ अक्षिपक्षमाणि चाप्यस्याः संमल्यिते विशेषतः ॥१३॥ अकामताछर्दयति गंधा- दुद्विजते शुओत् ॥ सेकः सदनं चापि गर्भिण्या लिंगमुच्यते॥१४॥ (वाक्य १४) प्रसेकः थत्करणम् ।।
. ३३ शारीरस्थान-अ० ३. (६४१) दोनों चूचियोंके मुखपर कालापन हो, रोमराजि (पेटपर बालोंकी सेली) उठीसी दीखे और नेत्रोंकी पलकें विशेष मिचें ॥ १३ ॥ तथा बिना कारण वमन हो, और सुगंधभी बुरीलगे, मुँहमें थूक अधिक आवे और थकान हो तो जानना चाहिये कि यह स्त्री गर्भवती है ॥ १४ ॥ तदाप्रभृत्येव व्यायाम व्यवायमतर्पणमतिकर्षणं दिवास्वप्नं रात्रिजागरणं शोकं यानावरोहणं भयमुत्कटकासनं चैकांततः स्नेहादिक्रियां शोणितमोक्षणं चाकाले वेगविधारण च न सेवेत१५॥ जबसे गर्भवती मालूम हो तभीसे आदि ले प्रसव पर्यंत व्यायाम (अति परि- श्रम बोझ उठाना आदि), मैथुन और अतर्पण (जो तृप्तिकारक न हो किंतु दाहा- दिजनक पदार्थ) और अतिकर्षण (तेज वमन, विरेचन तथा कृश करनेवाले आहार विहार ), दिनको सोना, रात्रिको जागना, शोक (फिकर ), सवारी पर बैठना, डरना और उत्कटकासन अर्थात् जोरसे खांसना अथवा उत्कटक आसन (ऊँचे नीचे विशेष अंग करके या बहुत मोड तोडके या विषम आसनमें बैठना) तथा अकालमें नियमसे तैलाभ्यंगादि करना तथा रक्त निकलवाना और वेगोंको रोकना इन सब बातोंको स्त्री न करे (अकालमें तैलाभ्यंगादि न करे किंतु अष्टम और नवम मासमें तो तैलाभ्यंग योग्यही है) ॥ १५ ॥ दोषाभिघातैर्गभिण्या यो यो भार्गः प्रपीयते ॥ सँस भागः शिशोस्तस्यै गर्भस्थस्य प्रपीडयते ॥१६॥ वातादि दोषों करके अथवा अभिघात आदिसे गर्भिणी स्त्रीके जिस २ भागको पीडा पहुँचे उससे गर्भगत बालकके भी उसी उस भागको पीडा पहुँचती है ॥ १६ ॥ तत्र प्रथमे मासि कललं जायते ॥ १७॥ द्वितीये शीतोष्णानि- लैरभिप्रपच्यमानानां महाभूतानां संघातो धनः संजायते यदि पिंडः पुमान् स्त्री चपेशी नपुंसकं चेदर्बुदमिति ॥ १८॥ तृतीये हस्तपादशिरसां पंच पिण्डका निर्वर्तते अगप्रत्यंगविभागश्च सक्षमो भवति ॥ १९ ॥ चतुर्थे सर्वांगप्रत्यंगविभागः प्रव्यक्ततरो भति गर्भहृदयप्रव्यक्तभावाच्चेतना धातुरभिव्यक्तो भति I (वाक्य १५) अत्र अकालशब्दः एतज्ज्ञापयति काले अष्टमे मासि तु गर्भिण्या अपि नेहादिक्रि- यातर्गते आस्थापनानुवासनीये कार्ये ( इति डल्लन) ॥ ४१ (६४२) तुश्रुतसंहिता-भा० टी०। कस्मात्तत्स्थानत्वात्तस्माद्गर्भश्चतुर्थे मास्यभिप्रायमिंद्रियार्थषु करो- ति द्विहृदयां च नारी दौहृदि नीमाचक्षते ॥ २० ॥ उस गर्भका आकार पहले महीने में कलल (द्रवरूप शिंषाणकसा) होताहै। ॥ १७ ॥ फिर दूसरे महीनेमें शीत और उष्ण तथा वायुसे परिपाक हुए पृथिव्या- दिक महाभूतोंका कडा संघात होकर पिंडासा हो जाता है तब यदि वह गोल पिण्डासा हो तो पुत्रका गर्भ समझना चाहिये और जो कन्या हो तो पेशी लंबी मुष्टीसी होती है और जो नपुंसक हो तो अर्बुद (रसोलीसा जैसे गालफल आधा किया हुआ हो ऐसा) होता है ॥१८॥ तीसरे महीनेमें हाथ, पाँव और शिर इन पांचोंकी पांच शाखासी निकलने लगती हैं और थोडा २ अंग, प्रत्यंगका विभागसा प्रगट होने लगता है ॥ १९ ॥ चौथे महीने में सारे अंग, प्रत्यंगोंके विभाग प्रगट होते हैं और गर्भस्थका हृदय प्रगट हो जानसे चैतन्य धातु (क्षेत्रज्ञ जीव) भी प्रगट प्रतीत होजाता है क्योंकि हृदय चेतनाका स्थान है। चेतना धातुके उत्पन्न होजानसे चौथे महीने में गर्भस्थ जीव इंद्रियोंके अर्थो (भोगों)में रुचि करने लगताहै चौथे मासमें गर्भवती स्त्रीके दोहदय होते हैं एक उस स्त्रीका हृदय और दूसरा गर्भस्थ बालकका इससे उसे दौहदिनी अर्थात् दो हृदयवाली कहते हैं ॥ २० ॥ दौहद न मिलने और मिलनेके हानिलाभ । दौहृदविमाननात्कुब्जं कुणि खंजं जडं वामनं विकृताक्षं वा नारी सुतं जनयति तस्मात्सा यद्यदिच्छेत्तत्तस्यै दापयेत् । लब्धदौहृदा हि वीर्यवतं चिरायुषं च पुत्रं जनयति ॥ २१ ॥ दौहद (द्विहृदया स्त्रीका वांछित पदार्थ ) उसे प्राप्त न होनेसे कूबडा, टूटा, पाँ- गला,मूर्ख या बौना तथा विकारयुक्त नेत्रोंवाला बालक स्त्रीके पैदा होताहै इससे वह स्त्री जिस पदार्थकी इच्छा करे उस वही वह पदार्थ अवश्य दिलवाना चाहिये (इस कारणसे कि ) दौहृद प्राप्त होनेसे पराक्रमवाला, दीर्घायु, अच्छा वालक पैदा होताहै ।। २१ ॥ इंद्रियार्थास्तु यान यान्सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी । गर्भावधिभ- यात्तीस्तान भिषगाहृत्य दापयेत् ॥ २२ ॥ सौ प्राप्तदौहृदा पत्रं जनयेत गुणान्वितम् ॥ अलव्धदोहृदा गर्भ लभेतात्मनि - यम् ॥ २३ ॥ येषु ये विद्रियार्थेषु दोहदेव विमानता ॥प्रजात सुतस्यौर्तिस्तस्मिंस्तस्मिंस्तथेद्रिये ॥२४॥ ।
३५ शारीरस्थान-अ० ३. (६४३) जिन जिन इन्द्रियोंके अर्थों ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि भोगों ) को गर्भिणी स्त्री भोगनेकी इच्छा करे उन २ के न मिलनेसे गर्भमें बाधा होती है इस -भयसे उन उन सब भोगोंको वैद्य दिलावे॥२२॥ (क्योंकि) जब स्त्रीको दौहद मिल जाता है तो गुणयुक्त पुत्र (या पुत्री) पैदा करती है और उसे दौहद न मिले तो गर्भगत बालकको अथवा आप गर्भिणीको भय रहता है (कि कुछ उपाधि न हो जाय) ॥ २३ ॥ जिन जिन इंद्रियोंके भोगोंकी दौहृदमें प्राप्ति न हो उससे बाल- कके उन्हीं उन भोगोंको ग्रहण करनेवाली इंद्रियों में हानि होती है ॥ २४ ॥ दौहृदके फल। राजसंदर्शने यस्या दौहृदं जायते स्त्रियाः ॥ अर्थवंतं महाभागं कुमार साँप्रसूयते ॥२५॥ दूकूलपट्टकौशेयभूषणोदिषु दोहृदात्॥ अलंकारैषिण पुत्रं ललितं सा प्रसूर्यते ॥ २६ ॥ जिस स्त्रीका दौहृद (मन) राजाके दर्शनमें होता है उसके द्रव्यवान् बडे भाग- वाला लड़का पैदा होता है ॥ २५ ॥ रेशमी पाटके और टसरके अच्छे २ वनों तथा आभूषणोंमें दौहद (मन) होनेसे अलंकार ( शृंगार ) चाहनेवाला, ललित (शौकीन) पुत्र पैदा होता है ॥ २६ ॥ आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते ॥ देवताप्रतिमायां तुप्र- सूते पार्षदोपमम् ॥ २७॥ देर्शने व्यालजातीनां हिंसाशीलं प्र . यते ॥ गोधामांसाशने पुत्रं सुषुप्सुं धारणात्मकम् ॥ २८ ॥ जिस स्त्रीका मन महात्माओंके आश्रम (और तीर्थादि) में हो उसके धर्मशील बालक होवे जौर जिसका चित्त देवताओंकी प्रतिमा (मंदिर आदिमें हो) उसके सत्पात्र पार्षद जैसा पुत्र होवे ॥ २७ ॥ तथा जिसका चित्त सादि हिंसकजीवोंके देखनेका चाहे उसके हिसक बालक पैदा होवे और जिसका मन गोहका मांस खानेमें हो उसके निदालु, धारणशील (दीर्घसूत्री) बालक होवे ॥ २८॥ गवां मांसे च बलिनं सर्वक्लेशसहं तथा ॥ माहिषे दौहृदाच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् ॥ २९ ॥ वाराहमांसात्स्वप्नालुं शूरं संजनये- सुतम् ॥ मार्गाद्विक्रांतजंघालं सदा वनचरं सुतम् ॥ सृमरादुद्वि- नमनसं नित्यभीतं च तैत्तिरात् ॥ ३०॥ गोमांसका दौहद हो तो बलवान् और सब क्लेशोंका सहनेवाला बालकहो और महिषमांस पर दौहद हो तो शूरवीर लाल नेत्रवाला, रोमोंयुक्त बालक होवे ॥२९॥ 3
३६
(६४४)
सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
वाराह (शूकर) के मांसपर दौहद हां तो सोनवाला और शूरवीर वालक पैदा होने
तथा मार्ग चल्नपर मन हो तो बड़ी बड़ी जाँघोंवाला और सदैव वनका विचरन-
वाला वालक हाव(अथवा " मार्गात् ॥ मृगमांसपर दोहद होनेसे बड़ी जंघा-
वाला, सदा वनचारी वालक होवे ) तथा समर ( सावर ) के मांसपर चित्त होतो
उद्विग्न मनवाला बालक हो और तीतरके मांसपर चित्त होनस सदा डरनेवाला
वालक होव ( कई "नित्यभीत की जगह नित्यशील पाठ मानकर तीतरके मांस
पर मन होनेस निन्य शीलवान हो ऐसा अर्थ करतेहैं ) ॥ ३० ॥
अतोनुक्तेयु या नारी समभिध्याति दौहृदम् ॥ शरीराचारशीले
सां समानं जनयिष्यति ॥ ३१॥ कर्मणा चोदितं तो वित-
व्यं पुनर्भवेत् ॥ या तथा देवयोगाँहोहदं जनयेगुवम् ॥ ३२ ॥
इनके सिवाय जो अन्य वहुत दौर्हद नहीं कह, यदि उनपर दोहद हॉव तो उनके
शरीर, आचार और शीलके समान बालक पैदा होवे ऐसा जानना ( पहले मांसा-
शी, वनवासी मनुष्य अधिक थे इसकारण उनके अनुसारही सुश्रुतजीने दोहद कह
दिये परन्तु अनेक व्यंजन और फलादि, धान्यादि नहीं कह इससे उनके गुण और
प्रकृति आदिको देखकर अबके वैद्योंको विचार लेना चाहिये ) ॥ ३१ ॥ कर्मका
प्रेरण किया हुआ और भवितव्य जैसा होताहै दैवयोगस वैसा वैसाही दौहद
होताहै अर्थात् उसीके अनुसार स्त्रीका मन चलताहै ॥३२॥
पंचमे मनः प्रतिवुद्धत्तरं भवति पष्टे वुद्धिः। सप्तमे सर्वांगप्रत्यं-
गविभागः प्रव्यक्ततरः ॥ ३३ ॥ अष्टमेऽस्थिरीभवत्योजस्तंत्र
जातश्चेन्न 'जीवेन्निरोजस्त्वान्नतभागत्वाञ्च ततो वलिं मांसौ.
दैनमस्मै दापयेत् ॥३४॥ नवमदशमैकादशद्वादशानामन्यतम-
सिमञ्जायते अतोन्यथा विकारी भवति ॥३५॥
पांचवें महीने में मनमें अधिक चैतन्यता हो जाती है और छठे महीनमें बुद्धि
उत्पन्न होती है। तथा सातवम सम्पूर्ण अंग और सब प्रत्यंग स्पष्टरूपसेः स्फुट
होजाते हैं ॥ ३३ ॥ आठवें महीने में आज स्थिर नहीं होता इससे आठवें महीनेका
पैदा हुआ बालक ओज रहित होने के कारण और इन दिनों यह राक्षसोंका भाग
होनसे नहीं जीवता है इसलिय मांस और चावल राक्षसांको बलिदान करना॥३४॥
और नवं तथा दशवेमें और कभी कभी ग्यारहवं, बारहवं महीनेमेंभी बालक
जन्मताह और कदाचित् वारहवें महीनेसेभी अधिक व्यतीत होजाय तो इसे गर्भ न
समझे किन्तु एकप्रकारका विकार है ऐसा जाने ॥ ३५ ॥
शारीरस्थान-अ०३. (६४५) गर्भकी पुष्टि। मातुस्तु खलुं रसंवहायां नाड्यां गर्भनामिनाडी प्रतिबद्धा सांस्य मातुराहाररसवीर्यमभिवहति तेनोपस्नेहेनास्याभिवृद्धिर्भवति॥३६॥ माताके रस (भोजनके रस ) की वहनेवाली नाडीमें गर्भस्थ बालककी नाभि- नाडी(नाल)बंधी हुई अर्थात् लगी हुई है वह माताके किये हुए आहारके रस और वीर्यको प्राप्तकरलेती है उसके सारभूत स्नेहसे गर्भस्थवालककी वृद्धि होतीहै ।। ३६ ।। असंजातांगप्रत्यंगविभागमानिषेकात्प्रभृति सर्वशरीरावयवानुसा- रिणीनां रसंवहानां तियंग्गतानां धमनीनामुपस्नेहो जीवयति॥३७॥ और जबतक, अंगप्रत्यंग नहीं पैदा होते हैं केवल कलल पिंडरूपही गर्भ होता- है तथा गर्भके नाभिनाडी भी नहीं होती तबसे अर्थात् गर्भस्थितिके समयहीसे लेकर उस अवस्थामें गर्भिणीके सारे शरीरमें अनुसरण करनेवाली, रस बहाने- वाली और तिर्यग्गमन करनेवाली धमनियोंका उपस्नेह (सारभूत द्रव) गर्भको जीवन ( पोषण वईनादि) करता है ॥ ३७॥ गर्भका कौन अंग पहले हो इसका विवेचन । गर्भस्यं हि संभवतः पूर्वं शिरः सम्भवतीत्याह शौनकः शिरो- मूलत्वाद्देहेन्द्रियाणाम् ॥३८॥ हृदयमिति कृतवीर्यो बुद्धेर्मनसश्च स्थानत्वात् ॥ ३९ ॥ नाभिरिति पाराशर्यस्ततो हि वर्द्धते देहो देहिनः॥ ४० ॥; पाणिपादमिति मार्कंडेयस्तन्मूलत्वाचेष्टायाः गर्भस्य ॥४१॥ मध्यशरीरमिति सुभूतिगौतमस्तन्निबद्धत्वात् सर्वगात्रसंभवस्य ॥ ४२ ॥ गर्भस्थ बालकके पहले शिर पैदा होता है ऐसे शौनक कहते हैं क्योंकि देह इंदि- योंका मूल शिर है ॥ ३८ ॥ और कृतवार्य ऐसा कहते हैं कि हृदय बुद्धि और मनका स्थान है इस कारणसे हृदयही पहले होता है ॥ ३९ ॥ और पराशरका ऐसा मत है कि नाभिसे प्राणियोंका देह बढता है ( उसमेंही रसवहाशिरा द्वारा रस पहुँच कर शरीर बढता है) इससे नाभिही पहले होती है ॥ ४० ॥ मार्कडेय ऋषि, ऐसा कहतेहैं कि चेष्टाके मूल हाथ, पाँव हैं और गर्भमें चेष्टा प्रगटही होतीहै इससे हाथ, पांव पहले होतेहैं। ४१ ॥ सुभूति गौतम ऐसा कहतेहैं कि मध्य शेरीरसेही सब गात्र सन्निबद्ध हैं इससे मध्य शरीर (मंदला अर्थात् धड) ही पहले होताहै ॥४२॥ ( वाक्य,३६) अस्य बालत्य नामिनाही मातु: रसवहाया नाडया प्रतिबद्वा मा मातगहाररसवीर्य- मभिवतीत्यन्वयः ।।
(६४६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। तत्तुन सम्यक् । सर्वांगप्रत्यंगानि युगंपत्संभवतीत्याहँ धन्वंतरि- गर्भस्य सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यते वंशांकुरवच्चूतफैलवच्चै । तद्यथा चूत- फले परिपक्के केशरमांसास्थिमज्जा न पृथग् दृश्यते कालप्रकर्षा- त्तान्येव तरुणेनोपलभ्यते सूक्ष्मत्वात्तेषां सूक्ष्माणां केशरादीनां कालः प्रव्यक्ततां करोति । एतेनैव वंशांकुरोपि व्याख्यातः । एवं गर्भस्य तारुण्ये सर्वेष्वंगप्रत्यंगेषु सत्स्वपि सौक्ष्म्यादनुपल- ब्धिः तान्येव कालप्रकर्षात् प्रव्यक्तानि भवंति ॥ ४३ ॥ अङ्गोंकी उत्पत्तिमें शौनकादिका कथन यथार्थ नहीं है ऐसा धन्वंतरिजी कहत- है। श्री धन्वंतरिजीका मत इस विषय में यह है कि वालकके सब अंग,प्रत्यंग एक- साथही पैदा होतेहैं वे गर्भके सूक्ष्म होने के कारणसं जाने नहीं जातेहैं जैसे बांसकी कोपल अथवा जैसे आँवका फल । वह यूँ हैं कि कच्चे (बहुत छोटे ) आंबके फलमें कसरें (सूत ) और मांस अर्थात् गूदा और अस्थि अर्थात् गुठली तथा मजा उस- की गिरी ये सूक्ष्म होनेसे न्यारे न्यारे नहीं मालूम होते और फिर कालके वढनपर वही पकावमें आनेसे प्रगट मालूम होने लगतेहैं इससे सिद्ध हुआ कि सूक्ष्म केसर आदिकी समयही प्रगटता कर देता है इसी तरह बांसके अंकुरमें भी समय पाकर ही पोरी आदि सब स्फुट होती हैं इसी प्रकारसे छोटेपनमें गर्भके संपूर्ण अंग,प्रत्यंग. उसमें हैं तो भी सूक्ष्मताके कारण दिखाई नहीं देते और वही फिर समयके बढने स्फुट ( प्रगट) हो जातेहैं ॥ १३ ॥ गर्भके पितृज मातृज आदि अंश । तत्र गर्भस्य पितृजमातृजरसजात्मजसत्त्वजसात्म्यजानि शरीर- लक्षणानि व्याख्यास्यामः॥४४॥ उस गर्भस्थमें पितृज (पैतृक भाग)कौन २ हैं तथा मातृज क्या क्या है,रसज क्या हैं, आत्मज क्या हैं, सत्त्वज क्या हैं और सात्म्यज क्या २ भाग शरीरमें हैं. इनके लक्षणोंकी व्याख्या करत है ॥ ४४ ॥ गर्भस्य केशश्मश्रुलोमास्थिनखदंतशिरास्नायुधमनीरेतःप्रभृतीनि स्थिराणि पितृजानि ॥ ४५ ॥ संतानके वाल, डाढी, मूछे, रोम, हाड, नखून, दांत, शिरा ( बारीक रगें ), स्नायु (वाक्य ४३ ) केगरास्थिमजा न पृथग् दृश्यते इत्यत्र मजाशब्द आकारातन्त्रीलिंग. तथा चोक्त शब्दस्नोममहानियो-मजा स्त्री० मस्ज्-अच् आप् । अस्थिमारे । तानि केरादीनि ।।
३९ शारीरस्थान-अ०३. (६४७) ( नसें ) और धमनी (नाडी) तथा वीर्य आदि स्थिर पदार्थ पितृज हैं (पितासे उत्पन्न होते हैं अर्थात् इनमें पैतृक अंश होता है)॥ ४५ ॥ मांसशोणितमेदोमजहन्नाभियकृत्प्लीहान्त्रगुदप्रभृतीनि मृदूनि मातृजानि ॥४६॥ मांस, रुविर, मेद, मना,हृदय, नाभि, यकृत् (जिगर), प्लीहा (तिल्ली) और अंत्र ( अंतडी) तथा गुदा आदि कोमल पदार्थ माताके अंशसे होते हैं॥ ४६॥ शरीरोपचयो वलं वर्णः स्थितिहा॑निश्च रसजानि । इंद्रियाणि ज्ञानं विज्ञानमायुः सुखदुःखादिकं चात्मजानि । सत्त्वजान्युत्तरं वक्ष्यामः। वीर्यमारोग्यं वलवों मेधा च सात्म्यजानि ॥४७॥ शरीरका मुटापा, बल, वर्ण, स्थिति और हानि (क्षीणता) ये रससे (गर्भिणीके भोजनके रससे ) होते हैं अर्थात् जैसा गर्भिणी भोजन करती है और जैसा उसका रस गर्भ में पहुंचता है वैसे होते हैं। इंद्रिय ( ज्ञानेंद्रिय) तथा ज्ञान और विज्ञान, आयु, सुख, दुःख इत्यादिक आत्मज हैं (अर्थात् जीव जैसे शुभाशुभ कर्म पूर्व- जन्ममें करता है उसके अनुसार आत्माके सान्निध्यसे होते हैं) । सत्त्वसे होनेवाले भाग अगाडी कहेंगे।और वीर्य, आरोग्यता,बल, वर्ण और मेधा ये सात्म्यज अर्थात अपनी अनुकूलतासे होते हैं यदि इसमें यह शंका हो कि, वीर्य और बल, वर्ण ये दो दो वार वर्णन क्यों किये तो उत्तर यह है कि, वीर्य पैतृकभागसे तो होताही है पर सात्म्यसेभी होता है इसी तरह वल और वर्णभी गर्भिणीके भोजनके रससे तो होतेही हैं पर सात्म्यसेभी होते हैं)॥ ४७ ॥ गर्भमें पुत्रपुत्री आदिकी परीक्षा। तत्र यस्या दक्षिणे स्तने प्राक् पयोदर्शनं भवति दक्षिणाक्षिमह- त्वं च पूर्वं च दक्षिणसक्थ्युत्कर्षति बाहुल्याच्च पुन्नामधेयेषु द्रव्येषु दौहृदमभिध्यायति स्वप्नेषु चोपलभते पद्मोत्पलकुमुदाम्रातका- दीनि पुन्नीमान्ये प्रसन्नमुखैवर्णा च भवंति तो ब्रूयात् पुत्रमि- यं जनयिष्यतीति तद्विपर्यये कन्याम् ॥४८॥ जिस गर्भवतीके दाहिने स्तनमें पहले दूध दिखलाई देवे और दाहिनी आँख कुछ२ भारी जान पड़े तथा पहले दाहिनी सांथलमें भारीपन हो और विशेषतासे पुरुषवाचक द्रव्योंको दोहदमें चाहे तथा स्वममें कमल,कुमुद, आमडा आदि पुरुषनामवाले पदा. र्थीको प्राप्त करे और मुख तथा रूप सुंदर हों तो कहना चाहिये कि इसके पुत्र उत्पन्न होगा और जो इसके विपरीत हो तोकन्या होगी ऐसे कहना चाहिये ॥४८॥ १२ . - (६४८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। यस्याः पार्श्वद्वयमुन्नतं पुरस्तानिर्गतमुदरं प्रागभिहितलक्षणं च तस्य नपुंसकमिति विद्यात् ॥ १९॥ यस्या मध्ये निम्नं द्रोणीप्र- भूतमुदरं सा युग्मं प्रसूत इति ॥ ५० ॥ भवन्ति चात्र- जिसके दोनों पँसवाडे ऊँचे हों और पट आर्गको निकलासा हो तथा पूर्वोक्त दोनों के मिले हुएसे लक्षणहों तो उसकनपुंसकवालक होगा ऐमा जानना चाहिये।।४९|| और जिसके उदरके वीचमें नीचापन और गोणकी भांति उदर दोनों तरफसे उभरा हो उस स्त्रीके दो बालक होंगे एसा जानना चाहिय ॥५०॥ इस विषयमं श्लोक है- गर्भक अंगप्रत्यंगोंकी सुंदरता, असुंदरता । देवताब्राह्मणपरा शौचाचारहिते रता॥ महागुणान् प्रसूर्यते विपरी- तांस्तु निर्गुणान् ॥५१॥ अंगप्रत्यंगनिवृत्तिः स्वभावादेव जायते।। अंगप्रत्यंगनिवृत्तौ ये भवंति गुणांगुणाः ॥ ते ते गर्भस्य वि. ज्ञेया धर्माधर्मनिमित्तजाः॥ ५२ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने ततायोऽध्यायः॥ ३॥ जो गर्भिणी स्त्री गर्भके समय देवता तथा ब्राह्मणादिके सेवनादिमें तत्पर हो तथा शौच, आचार और परोपकारमें रत हो तो अच्छे गुणवाला सन्तान उत्पन्न होवे और इसके विपरीत हो अर्थात् देवता आदिकी निदा कर, शौच न रक्खे तो गुणांस रहित सन्तान पैदा होवे ॥ ५१ ।। अंग, प्रत्यंगोंका उत्पन्न होना यह स्व- भावहीसे होता है परंतु तो भी अंग, प्रत्यगके उत्पन्न होते समय जो जो गुण और दोप गर्भिणी स्त्रीके होते हैं वही वे धर्माधर्मके अनुकूल वालकके भी होतेही हैं अर्थात् जैसा धर्माधर्म जीवका होता है उसके अनुसारही गर्भिणी स्त्री गर्भके अंग, प्रत्यंग होते समय गुण, अगुण करती है और उसीके अनुकूल वालकके पूर्ण अंग, प्रत्यंग सुंदर होते हैं या पंगु, कूबडा आदि होता है । गर्भिणी शुभ गुणोंका आचरण करे तो सुंदर अंग, प्रत्यंग हों और अयोग्य आचरणोंसे विकारयुक्त अंग, प्रत्यंग होते हैं.॥५२॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा० टी०शारीरस्थाने तृतीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ४. अथातो गर्भव्याकरणं नाम शारीरं व्याख्यास्यामः । अब यहांसे अगाडी गर्भके व्याकरण अर्थात् विवेचन नामक शारीरकका व्या ख्यान करते हैं। (वाक्य) गर्मव्याकरण गर्भविवरणमित्यर्थः । , ४१. शारीरस्थान-अ०४. (६४९) अग्निःसोमो वायुःसत्त्वं रजस्तमः पंचेंद्रियाणि भूतात्मेति प्राणाः१॥ अग्नि (पाचकादिरूप शारीरोष्मा), सोम (कफ, रस, शुक्रादि द्रवत्वविशिष्टादि शीत), वायु (प्राणोदानादि भेदसे जो पांच प्रकारका है ) तथा सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण और पांच इंद्रिय ( श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, प्राण) और भूता- स्मा (पंचभूतात्मक जीवात्मा जो शुभाशुभ कर्मों करके ग्रहण किया हुआ कर्म- पुरुष कहलाता है ) ये सब प्राण अर्थात् जीव कहलाते हैं (अर्थात् प्राणोंको पोषण करते हैं इससे ये प्राणही हैं) ॥ १ ॥ त्वचाओंका वर्णन । तस्य खल्वेवें प्रवृत्तस्य शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य क्षीरस्येव संतानिकाः सप्त त्वचो भवंति ॥२॥ इस प्रकार ( अग्नि, सोमादिके संयोगसे ) प्रवृत्त (भूतात्माधिष्ठित ) शीतोष्ण वातादि करके पचायमान शुक्र, शोणित ( संयोगरूपगर्भ) के सात त्वचा (चर्म) होते हैं जैसे दूधके पकनेपर मलाई होती है ॥२॥ तासां प्रथमावभासिनी नाम या सर्ववर्णानवमासयति पंचविधा च छायां प्रकाशयति सा ब्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा सिमपद्मकं- टकाधिष्ठाना ॥३॥ द्वितीया लोहिता नाम षोडशभागप्रमाणा तिलकालकन्यच्छव्यंगाधिष्ठाना॥४॥ इनमेंसे प्रथम (सबसे ऊपरकी त्वचा) अवभासिनी नामक है यह समस्त वों ( कृष्णता, गौरतादि) को प्रकाश करती है और वही पांच प्रकारकी पांच- भौतिक छाया तथा चकारके ग्रहणसे प्रभाको प्रकाश करती है यह त्वचा ब्रीहि अर्थात् जौके ( जो बीस भाग हैं उनमें ) अठारह भागके समान मोटी है यही सीप ( वा० १) तत्रानिस्तावदाहारपाकादिकर्मणा प्राणयति । सोमश्च सौम्यधातोरोजःप्रभृतेः पोपणेन । वायुश्च दोघधातुमलादीना संचारणोच्छासनिश्वासाभ्यां च । सत्त्वं रजस्तमश्च मनोरूपतया परिणत भूतात्मनः शरीरातरग्रहणमोक्षणे हेतुरिति तदपि प्राणयति । पंचेंद्रियाणि चक्षुरादीनि रूपादिग्रहणकर्मणा प्राणयति । एव भूतात्मा पचभूतात्मा कर्मपुरुषोप्यशेषस्यैवं कर्मराशेराहतश्चेतनैरिति प्रणियति । एते चागिसोमादयः प्राणयति जीवयतीति प्राणाः । (इति डल्लनः) ।। (वाक्य २) एव प्रवृत्तस्य भूतात्माधिष्ठितस्य ।। (वाक्य ३) सर्ववर्णान् गौरादीन् । अवभासयति प्राजकनामिनेति शेषः । छाया पंचविधां पंचात्मिकां पंचभूतकृतत्वात् चशब्दात् प्रभापि ग्राह्या या आसन्ना लक्ष्यते सा छाया, प्रभा तु दूरात्प्रकाशते इति तयोर्भेदः । तस्या त्वचः प्रमाण ब्रीहिविस्तारस्य विशति- भीगाः तेषु व्रीहिपरिणाहविशतिभागेष्वष्टादशभागप्रमाणमवभासिन्याः प्रीहिरत्र यवः(इति डल्लनो भावमिश्रश्च) (६५०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ४२ और पद्मकंटकनामक चर्म रोगोंके होनेका स्थान है अर्थात् सीप, पद्मकंटक इसी ऊपरकी त्वचामें होतें हैं॥२॥ दूसरी लोहितानामक त्वचा है यह जौके सोलह भागके- समान मोटी है और तिल, न्यच्छ (चकद्दे) और व्यंग (झाँई) इनके होनेका स्थान है अर्थात् तिल, चकद्दे और झाई ये दूसरी त्वचामें होते हैं ॥ ४ ॥ तृतीया श्वेता नाम द्वादशभागप्रमाणा चर्मदलाजगल्लिकामश. काधिष्ठाना ॥ ५॥ चतुर्थी ताम्रा नामाष्टभागप्रमाणा विविधकि- लासकुष्टाधिष्ठाना ॥६॥ पंचमी वेदिनी नामव्रीहिपंचभागप्रमाणा कुष्टविसाधिष्टाना ॥७॥ षष्ठी रोहिणी नाम ब्रीहिप्रमाणा ग्रंथ्य- पच्यर्बुदश्लीपदगलगंडाधिष्ठाना ॥ ८॥ सप्तमी मांसधरा नाम व्रीहिद्वयप्रमाणा भगंदरविद्रध्यशोऽधिष्टाना ॥९॥ यदेतत्प्रमाणं निर्दिष्टं तन्मांसलेष्ववकाशेषु नै ललाटे सूक्ष्मांगुल्यादिषु यतो वक्ष्यत्युदरेषू ब्रीहिमुखेनांगुष्ठाँदरप्रमाणमवंगाढं विध्येहि ति॥१०॥ तीसरी श्वेता नाम (श्वेत) त्वचा है यह जौके बारह भागके समान मोटी है और यही चर्मदल, अजगल्लिका तथा मशक (मस्से) पैदा होनेका स्थान है ॥५|| चौथी ताम्रा नाम (तविजैसी वर्णकी) त्वचा है यह जौके आठ भागके बराबर मोटी है और इसमें अनेक प्रकारके किलास और कुष्ठ होते हैं ॥ ६ ॥ पाँचवीं वेदिनीनामक त्वचा जौक पांच भागके बराबर है इसीमें कुष्ठ और विसर्प होते. हैं ॥ ७॥ छठी रोहिणीनामक त्वचा यवकी मुदाईके समान है ग्रंथि (गाँठे) और अपची तथा अर्बुद ( रसोली) और श्लीपद (पीलपाव ) तथा गलगंड ये इस छठी त्वचामें होते हैं ॥ ८ ॥ सातवीं मांसधंगनामक त्वचा है यह दो जौकी मुदाईके समान है इसीमें भगंदर और विधि तथा बवासीरक मस्से होते हैं ॥९॥ यह जो प्रमाण कहा सो अति मांसवाले शरीरके स्थूलभागकी त्वचाओंमें होता है जैसे (जंघा, नितंबादि) और ललाट तथा छोटी अंगुली आदिमें नहीं होता क्योंकि अगाडी उदररोगोंकी शस्त्रचिकित्सामें ऐसा कहा है कि, त्रीहिमुखनामक शस्त्रसे अँगूठेके उदर प्रमाण गहरा वेध करे ॥ १० ॥ अथ परिशिष्टम् । त्वचाके विषयमें मतान्तर। लोक-त्वचायमखिलः कायः संवृता विश्वकर्मणा ॥ वाह्यापवसंघातादाक्षित:- साधु तिष्ठति ॥ १ ॥ स्तरद्वयवतीयं त्वक् तदाह्यश्चर्म कथ्यते ॥ स्तरो नामोच्यतें- ४३ शारीरस्थान-अ० ४. (६५१) . - तस्त्वक् भूमिस्पशद्रियस्य सा ॥२॥ उपर्युपरिविस्तीर्णस्तरसप्तकसंहते ॥ एषा स्वगखिला जाता कैश्चिदिति चे मन्यते ॥ ३ ॥ तोयानिलादिसंकर्षः स्वेदस्य च विनिर्गमः ॥ दैहिकस्योष्मणो रक्षा त्वचा संपाद्यते ध्रुवम् ॥ ४॥ अर्थ-विश्वकर्मा परमेश्वरने यह सम्पूर्ण शरीर त्वचासे इस लिये आच्छादित किया है कि जिसमें वाहरके उपद्रवों और आघातोंसे रक्षित हुआ यह शरीर सुख पूर्वक रहे ॥ १ ॥ यह त्वचा दो पुडतवाली है जिसमें बाहरके पुडतको चर्म (चमडी) कहते हैं और भीतरके पुडतको स्तर (अस्तर) कहते हैं यह त्वचा स्पर्श इंद्रियका स्थान है ॥२॥ कइयों का ऐसा मत है कि इस त्वचामें ऊपर नीचे ऐसे सब मिलकर सात अस्तर हैं और उन सात पुडतोंसेही यह सारी मोटी त्वचा बनी है। ॥३॥ इस त्वचासे जल वायु आदिके परमाणु भीतरको आकर्षण होते हैं और पसीना बाहर निकलता है और शारीरक अग्निकी रक्षा यही त्वचा ठीक ठीक करतीहै ॥४॥ ( वक्तव्य ) डाक्टरी मतसे त्वचाके दोही भाग हैं उनमेंसे ऊपरले भागको एपीडर मिस' या 'क्यूटि किल'-(Epidermis or Cuticle) कहते हैं और नीचेके भागको 'डरमिस'-(Dermis) कहते हैं और इन दोनोंमेंसे भी प्रत्येकके दो दो भाग हैं इनमेंसे क्यूनिकिलकी मुटाई कहीं एक इंचका २४ वां भाग है और कहीं कहीं चौबीसवां और कही बारहवां भागही है। स्वेद- जनक छिद्र सब शरीरपर प्रायः तीस लाखके अनुमान होते हैं इन्हें एक इंचमें प्राय:- तीन हजारके लगभग समझो, देखो ईश्वरकी विचित्रता ।। इति परिशिष्टम् । कलाओंका वर्णन। कलाः खल्वपि सप्त भवंति धात्वाशयांतरमर्यादाः॥११॥अवतश्चात्र- कला भी सातही हैं और धातुओंके आशयोंके बीचमें इनकी मर्यादा है ॥११॥ इस विषयमें दो श्लोक हैं- यथा हि सारः काष्ठेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ॥ तथा धातुर्हि मां- सेषु छिद्यमानेषु दृश्यते ॥ १२ ॥स्नायुभिश्च प्रतिच्छन्नां संतताच जरायुंणा ॥ श्लेष्मणा वेष्टितांश्चापि कलाभागांस्तु तान्विदुः॥१३॥ ( वाक्य ११) धात्वाशयातरमयांदा इति-धातुशब्देनाप्र रक्तमासमेद:शुक्रकफेपित्तपुरीया भेया.. तेषामाशयाः अवस्थानप्रदेशाः तेषामतरेषु मर्यादा: सीमाभूताः ( इति डल्लनः) । कलारूपे वृद्धवाग्भट इत्याह--"यस्तु वात्वाशयांतरेषु क्लेदोऽवतिष्ठते स यथास्वमूष्माभिः विपक्कः लायुश्लेष्मजरायुच्छन्न. काष्ठ इव सारो वातुरसोपाल्पत्वात् कलासंजः" इति । भावमिश्रोत्रेत्याह " धात्वाशयांतरे वातोय. हेदस्त्वधि- तिष्ठति ॥ देहोष्मणानिपश्च सा कलेत्यभिधीयते ॥ ॥ इति ।।
४४ (६५२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। जैसे गील काठको काटनेसे उसका सार द्रव नह दिखाई देता है वैसेही मौसके छेदन करनेसे धातु (रक्त आदि) दीखते हैं ॥ १२ ॥ स्नायु (नसों) से व्याप्त और जरायु ( पतली झिल्ली) से आच्छादित तथा कफ करके वेष्टित कला (भाग) होते हैं ( इन्हें कलाभाग जानों ) ॥ १३ ॥ तासांप्रथमा मांसधरा नाम यस्यां मांसे शिरास्नायुधमनीस्रोतसां प्रताना भवंति ॥ १४॥ भवति चात्र- इनमें प्रथम मांसधरा कला है जिसमें मांसमें शिरा (रग), स्नायु ( नसें ),धमनी • (नाडी) और स्रोत (छिद्र ) इनका जालसा फैला हुआहै ॥१॥ इसमें श्लोक है- याँ विसणालानि विवर्द्धन्ते समंततः॥ भूमौ पंकोदकस्थाने तथा माँले शिरादयः ॥१५॥ कीचडवाली पृथ्वीमें जैसे कमलकी जड़ और नाली व्याप्त हुए (फैले हुए) बढते हैं तैसेही ( मांसधरा कलाके ) मांसमें रगें और नसें आदि होतीहें ॥१५॥ द्वितीया रक्तधरा नाम मांसस्थाभ्यंतरतस्तस्यां शोणितं विशेष- तश्च शिरासु यकृत्प्लीह्रोश्च भवति ॥१६॥ भवति चात्र- दूसरी रक्तधरा नाम (रुधिरको धारण करनेवाली) कला है यह मांसके भीतर है इसमें विशेष करके शिरा ( रगों ) में तथा यकृत् और प्लीहाम रक्त रहता है॥१६॥ यहाँ दृष्टांत रूप श्लोक है- वृक्षाद्याभिप्रहतात्क्षीरिणः क्षीरमावहेत् ॥ मांसावं क्षतत् क्षिप्रं शोणितं संप्रसिच्यते ॥ १७ ॥ जैसे दूधवाले ( अर्कादि ) वृक्षके तोडनेसे दूध टपकने लगताहै वैसेही मांसके -कटनेपर तुरंत ( रगोंसे ) रुधिर टपकने लगताहै ॥ १७ ॥ तृतीया मेदोधरा नाम मेदो हि सर्वभूतानामुदरस्थमण्वस्थिषु च महत्सु च मज्जा भवति ॥ १८॥ भवति चात्र- तीसरी मेदोधरा नामक (मेदको धारण करनेवाली) कला है । मेद सब जीवोंके प्रायः उदरमें होता है और छोटे २ अस्थियों में भी मेद होता है और बड़े अस्थि- योंमें मज्जा होती है ॥ १८॥ इसमें श्लोक है- स्थूलोस्थिषु विशेषेण मज्जो त्वभ्यंतराश्रितः ॥ इतरेषु च सर्वेषु सरक्तं मे उच्यते॥शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता१९॥ (वाक्य १८ । १९) तृतीया मेदोधरा मेदो हि तस्यामुदरेऽण्वस्थिषु च सरक्त भवति तदेव च शिरसि कपाले प्रतिच्छन्न मस्तिष्काख्य मस्तुलुगाख्य च स्थलास्थिषु तु मजा ( इति वृद्धवाग्भटः ) ॥
४५ शारीरस्थान-अ० ४. (६५३) मोटे अस्थियोंके भीतर विशेष करके मज्जा होती है तथा इतर सबमें रुधिर सहित मेदही होता है । शुद्ध मांसका जो स्नेह (चिकनाई ) है उसे वसा (चरवी). कहते हैं ॥ १९ ॥ चतुर्थी श्लेष्मधरा नाम सर्वसंधिषुप्राणभृतां भवति॥२०॥भवति चात्र- चौथी श्लेष्मधरा नाम (कफको धारण करनेवाली) कला है यह सब प्राणियोंके संधि (जोडों) में होती है ॥ २० ॥ इसपर दृष्टांतरूप एक श्लोक है- स्नेहाभ्यक्ते यथा त्वक्षे चक्र सार्धं प्रवर्तते। संधयः साधु वर्तन्ते संश्लिष्टीः श्लेष्मणा तां ॥ २१ ॥ जैसे रथके पहियेके धुरेपर चिकनाई लगी होनेसे पहिया ठीक २ फिरतारहता- है उसी तरह, कफसे लिपी हुई संधियां (हाथ, पांव आदिके जोड़) अच्छीतरह फैल और सुकड़ जाती हैं ॥ २१ ॥ पंचमी पुरीषधेरा नाम यान्तःकोष्टे मलमाभिविभजते पक्वाशय- स्था ॥ २२ ॥ भवति चात्र- पांचवी पुरीषधरा नामक (मलको धारण करनेवाली) कला होतीहै यह पक्काशयमें रहती है और भीतर कोठेमें मलको जुदा जुदा करती है ।। २२ ॥ यहां श्लोक है- यकृत्समंतात् कोष्टं च तथांत्राणि समाश्रिता ॥ उंडुकस्थं विभजते मैलं मलधरा कलाँ ॥ २३ ॥ यह मलधरा कला यकृतके आसपास कोष्ठ और अंत्र ( आंतडों ) के आश्रय होकर (अर्थात् यकृत्के पास प्लीहा, वस्ति, पक्काशय, अन्याशय, हृदय और आमा- शय आदि कोष्ठ और मलमूत्रको बहानेवाले मोटे अंत्र इन स्थानोंमें होकर) उडुकस्थ ( मोटे बड़े मलाधार अंतडेमें स्थित) मल और मूत्रको पृथक् २ करती है ॥२३॥ षष्ठी पित्तधरा नाम या चतुर्विधमन्नपानमुपयुक्तमामाशयात्प्र- च्युतं पक्वाशयोपस्थितं धारयति ॥ २४ ॥ भवति चात्र- (वाक्य० २०१२१) अक्ष चक्रमव्यस्थं केंद्रस्थानम् ॥ (वाक्य २२ । २३) यकृत्समतादिति समंतात् सर्वतः यकृदादिकं यकृत्समीपाना हृदयादीना चाप्यत्र ग्रहणम् । उडुकग्रहणेन सानिध्यात् गुर्द गृह्यते तेनोव॑ यकृदादिव्यवस्थितम् अधस्ताद्दपर्यंत कोष्ठम् । उडुकस्थ मल विभजतीति-उडुकः पोटलक इति लोके, चरके तु पुरीषोंडुकः प्रतिपादितः । मल विभजते इति-मूत्रपुरीषरूपतया विभागं करोतीत्यर्थः । गयी तु विभजते इति-कोष्ठात्पृथक् करोति इति व्याख्याति ॥ (श्लो०२४) षष्ठी पित्तधरा नाम कलैव अहणी “षष्ठी पित्तघरा नाम या कला परिकीर्तिता । पक्कामाशयमध्यस्था ग्रहणी सा प्रकीर्तिता ॥" इत्युक्त वात् । पित्तं चात्रातरमिसंज्ञकम् । पक्काशयोपस्थितं पक्काशयगमनायोपस्थितम् ।धारयति पाका मति शेषः।। . - , (६५४) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ४६ छठी पित्तथरा नाम (पित्तको धारण करनेवाली) कला है (यही ग्रहणी है) यह चारों प्रकारके (चगये, खाय, पीये और चाटे हुए ) पदार्थ जो आमाशयम द्रवरूप नीचेको जातेहैं और पक्काशयके ऊपर पकनके लिये उपस्थित होतेहैं उन्हें धारण करती है ॥ २४ ॥ इसपर एक शोक है- अशितं खादित पीत लीढं कोप्टगतं नृणाम् ॥ तज्जी'यति यथाकालं शोपित पित्ततेजसा ॥ २५ ॥ चवाया, खाया, पिया और चाटा हुआ जो आहार मनुष्योंके कोष्टमें प्राप्त होता- है उस यही यथाकाल पित्तकी गरमाईसे शोणित करके पकाती है ॥ २५ ॥ सप्तमी शुक्रधरा नाम या सर्वप्राणिनां सर्वशरीरव्यापिनी ॥२६॥ भवंति चात्र- सातवीं शुक्रवरा नाम (वीर्यको धारण करनेवाली) कला है यह प्राणियोंके समस्त शरीर में व्याप्त रहती है ।। २६ ।। इसमें तीन श्लोक हैं- यथा पयति सपिस्तु गूढश्चक्षी रसो यथाँ।शरीरे पुं तथा शुक्रं नृणां विद्याद्भिपग्वरः ॥ २७ ॥ यंगुले दक्षिणे पावें वस्तिद्वारस्य चाप्यधः ॥ सूत्रस्रोतःपथाच्छु– पुरुपस्य प्रवर्तते ॥ २८ ॥ कृत्स्न- देहाँश्रितं शुक्रं प्रसन्नसनसस्तथा ॥ स्त्रीपु व्यायच्छतश्चापि हात्तत्संप्रवर्तते ॥ २९॥ जैसे दूध वृत और इक्षु (ऊख) में रस व्याप्त रहता है ऐसेही पुरुपोंके शरी- रमें वैद्य वीर्यको जाने ॥ २७ ॥ वस्तिके द्वारसे नीचे दो अंगुल दाहिनी तरफ होकर मूत्रके मार्ग (मूत्र निकलनेके छिद) हीसे पुरुपोंका वीर्य निकलता है । ॥ २८ ॥ सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त रहनेवाला शुक्र प्रसन्न चित्त तथा स्त्रीसंगकी इच्छावाले पुरुषको हर्षके कारण प्रवृत्त होता है ॥ २९ ॥ मभवतियोंके रजस्वला नहोने और स्तनोंमें दूध होने का हेतु। गृहीतगर्भाणामार्तववहानां स्रोतसां वन्यिवरुध्य ते गर्भेण तस्मादृहीतगर्भाणामार्तवं न दृश्यते॥३०॥ततस्तदधः प्रतिहतमू- (सा० २५) यशितमित्य दि-चतुर्विधमाहारं आमागयस्थलेप्मणा क्लेदितं यथाकालं तीक्ष्णमध्य- मंदामिक्रमेण अथवा मात्राद्रव्यगुरुलघुचितकालानतिक्रमेण च पित्ततेजसा शोपितमन्तरामिना परिपाचितं जीर्यतीति । पक्कं च पक्वाशयाय विमुञ्चतीति ।। (वाक्य २६ से २९) सप्तमी शुक्रधरा नाम द्यगुले दक्षिणे पार्थे वस्तिद्वारस्य चाघोमूत्रमार्गमाश्रिवा सकलशरीरव्यापिनी शुक्र प्रवर्तवतीति (वृद्धवाग्मटः)। 3 शारीरस्थान-अ० ४. (६५५) र्द्धमागतमपरं चोपचीयमानमपरेत्यभिधीयते शेषं चोर्द्धतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते तस्मादर्भिण्यः पीनोन्नतपयोधरा भवंति३१॥ गर्भवती स्त्रियोंके आर्तवरक्तको बहानेवाले छिद्रोंका मार्ग गर्भसे रुक जाता है इससे गर्भवतियोंका आर्तव (रजस्वलाभाव ) नहीं दीखता अथात् गर्भ में जबतक बालक हो रजस्वला नहीं होती ॥ ३० ॥ (जरायुकी उत्पत्ति ) गर्भवती स्त्रियोंका आर्तव रक्त जब नीचेको प्रवृत्त नहीं होता और रुक जाता है तब ऊपरको (गर्भा- शयमें) प्राप्त होजाता है फिर उसमें और कफादिक संचित होकर मिल जाते हैं वही अपरा (जरायु) अर्थात् जेर कहलाती है तथा उस आर्तवकाही शेष (व) भाग अत्यन्त ऊपर गमन करके स्तनों (चूंचियों) में प्राप्त होता है जिससे गर्भिणी स्त्री पुष्ट ऊँचे दूधवाले स्तनोंको धारण करनेवाली होती हैं (अर्थात् इसीसे गर्भ- वती स्त्रियोंकी चूचियां पुष्ट ऊँची और दूधवाली होजाती है ) ॥ ३१ ॥ यकृत, प्लीहा, फुप्फुस और उंडुककी उत्पत्ति। गर्भस्य यकृतल्लीहानी शोणितजौ । शोणितफेनप्रभवः फुप्फुसः। शोणितकिट्टप्रभवः उंडुकः ॥३२॥ गर्भगत बालकके शरीरमें यकृत् (जिगर) और प्लीहा (तिल्ली) ये दोनों रुधि- रसे बनते हैं और फुप्फुस (फेफडा) रुधिर झागोंसे बनता है तथा उडंक (पुरी- षांत्र अर्थात् मलको धारण करनेवाला मोटा अंतडा) रुधिरकिट्टसे बनता है (इनके आकार आदि अगाडी परिशिष्टमें लिखेंगे) ॥ ३२ ॥ अंत्रों (अंतड़ियों) की उत्पत्ति । असृजः श्लेष्मणश्चापि यः प्रसादः परो मतः ॥ तं पच्यमान पित्तनें वायुश्चाप्य नै धाति ॥ ततोऽस्यांत्राणि जायंते गुदं वस्तिश्च देहिनः ॥३३॥ रक्त और कफका जो परम सार (प्रसाद) है जब वह पित्त करके पकता है और उसके अनुगत वायु गमन करताहै तब उससे गर्भमें मनुष्य के अंत्र (आंतडी) और गुदा तथा वस्ति ( मसाना) ये बनते हैं अर्थात् रक्त और कफके प्रसादको जब पित्त पकाताहै तब उससे ये बनते हैं और वायु अनुगत होनेसे ये पोले अर्थात् थोथे होजाते हैं (जैसे पिघले हुए काचेमें वायु प्रविष्ट होनेसे नली आदि पोले पदार्थ बनजातेहैं)॥ ३३ ॥ (गद्य ३१) अपराममला इत्याहुः स्त्रियः (हति डल्लनः) अपराजरायुर्नालसंज्ञ इत्यन्ये ॥ (गद्य३२) यकृप्लीहानावित्युपलक्षणं तेन लोमापि शोणितजः । उडुकः पोट्टलकः ।।
४८ (६५६) सुश्रुतसंहिता--भा० टी० । जिहाकी उत्पत्ति । उदरे पच्यमानानामाध्मानाद्रुक्मसारवत् ॥ कफशोणितमांसानां सारो जिह्वा प्रजायते ॥ ३४ ॥ जैस सुवर्णके तपायमान होनेसे कुन्दन बनता है वैसेही उदरमें पचायमान दुर कफ, रुधिर और मांसके सारसे जिह्वा उत्पन्न होती है ।। ३४ ॥ स्रोतों (द्वारों) और पेशियोंकी उत्पत्ति । यथार्थसूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् ॥ अनुप्रविश्य पिशितं पेशीविर्भजते ती ॥ ३५ ॥ यथार्थ उष्णतासे जव वायु मिलता है तब स्रोतों (मल मूत्रादिके वहानवाले द्वारों ) को खोलता है अर्थात् बनाता है और उसी भांति मांसमें अनुप्रवेश करके पेशी (मांसकी गिलटियां) बना देता है ॥ ३५ ॥ मेदसः स्नेहमादाय शिरास्नायुत्वमाप्नुयात् ॥ शिराणां च मृदुः पाकः स्नायूनां च ततः खरः॥ आशय्याभ्यासयोगेन करोत्याश- यसंभवम् ॥ ३६ ॥ मेद (चरबी) का स्नेह लेकर वायु सिरा ( रग) और स्नायु ( नसें ) बनाताहै उनमें सिरा ( रगों) द्वारा नरम परिपाक होताहै और उससे तीक्ष्ण परिपाक स्नाय (नसों) द्वारा होताहै (बारीक रगोंको शिरा कहतेहैं और मोटी नसों तथा पट्टोको स्नायु कहतहैं ) और स्थितिका योग करके वायु आशयों ( वाताशय आदि) की उत्पत्ति करताहै ॥ ३६ ॥ वृक्कादिकी उत्पत्ति। रक्तमेदःप्रसादाढुक्कौ मांसासृक् कफमेदःप्रसादादृषणौ शोणित- कफप्रसादजं हृदयं यदाश्रया हि धमन्यः प्राणवहाः तस्याधो वामतः प्लीहा फुप्फुसश्च दक्षिणतो यकृत् क्लोम च ॥३७॥ रक्त और मेदके प्रसाद (सार) से वृक्क (दोनों गुरदे) पैदा होते हैं । मांस, रुधिर, कफ और मेदके सारसे वृषण ( अंडकोश) वनतेहैं तथा रुधिर और कफके (श्लो० ३४) 'उदरे' इत्यत्र हृदये इति वा पाठः ( इति गयः ) ॥ (श्लो० ३५ ) यथार्थ यथाप्रयोजनमित्यर्थः। ऊष्मणा पित्तेन सह युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् दारणं कुर्यात् । पेशी मांसखंडम् ।। (श्लो० ३६) सिरानायुत्वमाप्नुयात् इति-सिराः स्नायूंश्च वायुः कुर्यादित्यर्थः । आशय्याभ्यास- योगेन वायुः स्थितिं कृत्वेत्यर्थः ( इति निबंधसंग्रहः ) ॥ (वा० ३७) प्रसादः सारः । वृकौ कुक्षिगोलको ( इति डल्लनः) ॥ ।
४९ शारीरस्थान-अ० ४. (६५७) प्रसादसे हृदय (दिल) बनताहै और उस हृदयके आश्रय प्राणको बहानेवाली धमनी (नाडियां ) हैं उनके नीचे बायीं तरफ प्लीहा (तिल्ली) होतीहै और फुफ्फुस (फेफडा) तथा दाहिने तरफ यकृत् (जिगर ) और क्लोम (पित्ता) होताहै ॥ ३७ ॥ निद्रा। तबृदयं विशेषेण चेतनास्थानमतस्तस्मिंस्तमसावृते सर्वप्राणिनः स्वपंति ॥ ३८ ॥ भवति चात्र- वह हृदय विशेष करके चेतनाका स्थान है इसस जब वह तमोगुणसे आच्छा. दित होता है तब प्राणी सोते हैं ॥ ३८ ॥ इसपर श्लोक है- पुंडरीकेण सदृशं हृदयं स्याँदधोमुखम् ॥ जाँग्रतस्तद्विकसति स्वतश्च निमीलति ॥ ३९॥ हृदयका आकार कमलके सदृश नीचेको मुखवाला है, जागनेकी अवस्थामें वह प्रायः खिला हुआसा रहता है और सोनेकी अवस्थामें मिचा हुआ (वंद सा) हो जाता है ॥ ३९ ॥ निद्रां तु वैष्णवीं पाप्मानमुपदिशति सा स्वभावत एव सर्वप्रा- णिनोऽभिस्पृशति ॥४०॥ निद्राको सर्वव्यापी विष्णुकी माया और पापमय वर्णन करते हैं वह स्वभावहीसे सब प्राणियोंको स्पर्श करती है (अर्थात् सब प्राणिमात्रको यह निद्रा आती है)॥४०॥ तामसी निद्रा। तत्रं यदा संज्ञावहानि स्रोतांसि तमोभूयिष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यते तदा तामसी नाम निद्रा सम्भवत्यनवंबोधिनी सांप्रलयकाले॥४॥ (वा० ३८ । ३९) हृदयस्य वर्णन तत्रातरात्-"उरोमव्यगत. कोष्ठः लवलीफलवर्तुलः । रक्ताधार- श्चतुर्गर्भ आवरण्या समावृतः ॥ १ ॥ तिर्यस्थो धमनीभूमिः पुफ्फुसद्वयशीर्षकः । स्फीत्याकुचनशीलोसी हकोष्ठ इति कीर्तितः ॥ २ ॥ अनिश स्कायते कोष्ठः प्रकृत्या संकुचत्यपि । आभूमिस्पर्शनाद्यावन्मृत्युः सर्वस्य देहिनः ।।३।। तदाकुंचनतो रक्त महता खलु रंहसा । प्रविशेद्धमनीमूलं ततो भ्रमति विग्रहम्॥४॥ फायनाकुचने तस्य विरमेता क्षणं यादि । सहसैव भवेन्मृत्युनर्नास्ति कोप्यत्र संशयः ॥ ५॥ ननु सर्वस्मि- काले स्कायनाकुंचन तदा कथ जाग्रतस्तद्विकसति स्वपतश्च निमौलतीति तत्राह-विकासनिमीलनावस्थानेपि सायनाकुंचनक्रिया समवतीति सिद्धांत: ॥ (वा० ४०) कृत्स्नशुभाशुभन्यापारनिरोधात् पाप्मानमिति वदति । यद्यपि तत्रातरे सप्तविधा निद्रा पठिता तत्रापि त्रिविधैव-तामसी स्वाभाविकी वैकारिकी चेति (नि० सं०) ॥ (वा० ४१) अनवबोधिनी बोधप्रणाशिनी सुषुप्तिश्च सा प्रलयकाले, प्रलयशब्देनात्र केचित् सुषुप्ति व्याख्यानयति केचित् मृत्यु केचित संसतेनाशकालं चेति ॥
-- मुश्रुतसंहिता- (६५८) -भा० ५० ०टी०। जब संज्ञाको प्राप्तकरनेवाले नाडियोंके छिद्रोंको तमोगुणकी वाहुल्यतावाला कफ प्राप्त होजाता है तब बोधका नाश करनेवाली तामसी नाम निद्रा होती है, यह प्रलयकालमें होती है ॥४१॥ स्वाभाविकी निद्रा। तमोभूयिष्ठानामहःसु निशासु च भवति रजोभूयिष्ठानामनिमित्तं सत्त्वभूयिष्ठानामर्द्धरात्रे ॥४२॥ तमोगुणकी वाहुल्यतावाले मनुष्यों को दिन में भी निद्रा आती है और रात्रिमें भी अति निद्रा आती है तथा रजोगुणकी वाहुल्यतावालोंको वे नियम कभी २ दिनमें और कभी २ रात्रिमें निद्रा आती है तथा सत्त्वगुणकी बाहुल्यतावालोंको अद्वरा- त्रिके समय (थोडीसी निद्रा) आया करती है ॥ ४२ ॥ वैकारिकी निद्रा। क्षीणश्लेष्मणामनिलबहुलानां मनःशरीराभितापवतां च नैव सा वैकारिकी भवति ॥४३॥ भवन्ति चात्र- जिनका कफ क्षीण हो जावे, वायु बढ जावे अथवा मन या शरीरमें संताप हो उन मनुष्योंको प्रायः निद्रा नहीं आती यदि आवे तो उसे वैकारिकी कहतेहैं ।।४३ ॥ इस विषयमै श्लोक हैं- हृदयं चेतनास्थानमुक्तं सुश्रुत देहिनाम् ॥ तमोभिभूते तस्मि- स्तु निद्रो विशति देहिनाम् ॥ ४४॥ निद्राहेतुस्तमः सत्त्व बोधने हेतुरुच्यते ॥ स्वभाव एवं वाँ हेतुर्गरीयान् परि कीर्तितः॥ ४५ ॥ पूर्वदेहानुभूतांस्तु भूतात्मा स्वपतः प्रभुः ॥ रजोयुक्तेन मनसा गृहीत्यर्थान् शुभाँशुभान् ॥ ४६॥ करणांनां तु वैकल्ये तमसाभि- प्रवद्धिते ॥ अस्व॑पन्नपि भूतात्मा प्रसुप्त इव चोच्यते ॥४७॥ (वा० ४२ ) यद्यपि सर्वासां निद्राणा तभोहेतुस्तथापि प्रकृष्टतमस्त्वात् तामसीरूपा अतिनिद्रा कथ्यते । अनिमित्त अनियतकालं चलत्वाद्रजस: कदाचिद्दिवा कदाचिद्रात्रावित्यर्थः ॥ (वा० ४३) क्षीणकका- दिकानां मनुजानां निद्रा नैव भवति यदि कदाचिद्वति ता सा वैकारिको नाम । ननु यदा लंघनश्रमा- दिभिवायुर्वर्द्धते श्लेप्मा च क्षीयते तदा कयं निद्रा समुगति अत्रोच्यते-मनसः प्रागिन: स्वपति तदुक्त चरके-"यदा तु मनसि हाते कर्म.त्मान: क्लमान्विताः ॥ विषयेम्पो.निवर्तते तदा श्रातत्वाद्भूतात्मविषयनिवृत्ती स्वपिात मानवः" ।। (इति निघसं० ) (वा० ४६) पूर्वदेहानुभूनास्त्विति-एतच्चोपलक्षणमतोऽनेनापि देहेनानुभूतान् । स्वापयुक्तस्य देहस्य प्रनुः क्षेत्रन, रजोयुक्तेन मनसा अथवास्थतान् शुभाशुमानान् गृहातीति भावः ।।
शारीरस्थान-अ०४. (६५९) धन्वंतरिजी कहते हैं कि हे सुश्रुत ! सब प्राणियोंका चतनास्थान. हृदय ही है जब उसमें तमोगुण व्याप्त होता है तब प्राणियोंको निद्रा आती है ॥ ४४ ॥ निद्रा अवस्थाका हेतु तमोगुण है और वोध (जाग्रत ) अवस्थाका हेतु सत्त्वगुण कहा है अथवा स्वभावही इन दोनोंका उत्कृष्ट हेतु कहा जाता है ॥ ४५ ॥ पूर्वजन्मवा इसी जन्मके जो दृष्टश्रुत शुभाशुभ अर्थ हैं उनको रजोगुण युक्त मनसे सोता हुआजो क्षेत्रज्ञ जीव ग्रहण करता है ( उसे स्वप्न कहते हैं, इसका हेतु रजोगुण है ॥ ४६ ॥ जब तमोगुण बढकर इंद्रियों में विकलता ( यथोचित ज्ञानकी अशक्ति) हो तब जागता हुआ भी जीवात्मा सोता हुआसा प्रतीत होता है ।। ४७ ।। दिनमें सोनेकी विधि और निषेध । सर्वतुषु दिवास्वापः प्रतिषिद्धोऽन्यत्र ग्रीष्मात् ॥ ४८ ॥प्रतिषि- द्वेष्वपि तु वालवृद्धस्त्रीकर्षितक्षतक्षीणमद्यनित्ययानवाहनाध्वकर्म- परिश्रांतानामभुक्तवतां मेदःस्वेदकफरसरक्तक्षीणानामजीणिनां च मुहूर्त दिवास्वपनमप्रतिपिद्धम् ॥ ४९ ॥ रात्रावपि जागरि- तवतां जागरितकालादमिष्यते दिवास्वप्नः॥ ५० ॥ दिनमें सोना ग्रीष्म ऋतु (गरमी) के सिवाय सब ऋतुओंमें निषिद्ध है ॥४८॥ परंच निषिद्ध ऋतुओंमें भी बालक, वृद्ध, मैथुनसे थके हुए, उरःक्षत रोगवाले, क्षीण, नित्य मद्य पीनेवाले, सवारी, मार्ग और कामसे थके हुए, भोजन न करनेवाले तथा जिनके मेद, पसीना, कफ, रस और रुधिर ये क्षीण होगये हों तथा अजीर्णवाले ऐसे मनुष्योंको दो घडी दिनमें सोना निषिद्ध नहीं है ॥ १९ ॥ और जो रातको जागे हों तो जितने समय रातको जागे हों उसले आधे समय दिनमें सो लेना चाहिये ॥ ५० ॥ दिनमें सोनेसे हानि। विकृतिहि दिवास्वप्नो नाम। तत्र स्वपतामधर्मः सर्वदोषप्रकोपश्च तत्प्रकोपाच्च कासश्वासप्रतिश्यायशिरोगौरवांगमर्दा रोचकज्वरा- निदौर्बल्यानि भवंति ॥ ५१ ॥ दिनका सोना विकृति (विकार ) है (अर्थात् ईश्वरके नियमसे विरुद्ध है) इससे दिनमें सोनेवालोंको अधर्भ होता है तथा सब दोषों ( वात, पित्त, कफ, (गद्य १९) प्रतिषिद्वेषु ऋषु । 'मद्यनित्ययान' इत्यत्र नित्यमययन इवि वा पाटः ।। (गद्य ५१) सर्वदोष इत्यत्र सर्वशब्देन रक्कमपि गृह्यते ।
(६६०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। रक्त) का प्रकोप भी होजाता है उस प्रकोपसे खांसी, श्वास, जुखाम, शिरका भारीपन, अंगोंका टूटनासा, अरुचि, ज्वर और मंदाग्नि ये विकार होते हैं ॥ ५१ ॥ रातमें अधिक जागनेसे हानि । रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तनिमित्तास्त एवोपद्रवाः भवं- ति॥ ५२ ॥ भवन्ति चात्र-- रात्रिमें अति जागनेवालोंको भी वायु, पित्त के रोग और उनके उपद्रव होजात- हैं ।। ५२ ॥ इस विषय में श्लोक हैं- तस्मान्न जागृयांद्रानौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ॥ ज्ञात्वी दोपैकरा. वेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ॥५३॥ अरोर्गः सुमना | वं वल. वर्णान्वित्तो वृपः ॥ नातिस्थूलकृशः श्रीमान्नरो जीवेत् लमाः शतम् ॥ ५४॥ निद्रा लात्मीकृता यै स्तुं रात्रौ च यदि वा दिवा ॥ ने तेषां स्वपती दोषो जाग्रता वा विधीयते ॥ ५५॥ दिनमें सोने और रातमें अधिक जागनेसे विकार होता है इस कारण बुद्धिमान न रात्रिमें जागे और न दिनों सोवे इन दोनोंको विकारकारक जानके यथोचित सोंने (और जागने ) का आचरण करे ॥ ५३ ॥ ऐसा करनेसे निरोग प्रसन्नचित्त वल- वर्ण (रूप) युक्त पुरुषार्थी होते हैं न अधिक मोटे होते हैं न बहुत दुबले किंतु शोभा- यमान होकर सौ वर्ष मनुष्य जीते हैं ॥ ५४ ॥ जिन्होंने इच्छापूर्वक निद्राका अभ्यास किया हो (या जिनको जैसा माफकत हो ) उनको रात्रि या दिनमें कभी सोने तथा जागनेका दोष नहीं ॥ ५५ ॥ निद्रानाशका हेतु और यत्न । निद्रानाशोऽनिलोपित्तामनस्तापरिक्षयादपि ॥ संभवेत्यभि- घातार्च प्रत्यनीकैश्च शाम्यति ॥५६॥ निद्रानाशेऽभ्यंगयोगो मूर्ध्नि तैलनिषेवणम् ॥ गात्रस्योद्वर्तनं चैव हितं संवाहनानि च ॥५७॥ शालिगोधूमपिष्टान्नभक्ष्यरेक्षवसंस्कृतैः ॥ भोजनं मधुर स्निग्धं क्षीरमांसरसादिभिः॥ ५८ ॥ रैसर्विलेशयानां च विष्किराणां त- थैव च ॥ द्राक्षासितक्षुद्रव्याणामुपयोगो भवे निशॆि ॥५९॥ शय- नासनयानानि मनोज्ञानि मृदूनि च ॥ निद्रानाशे तु कुर्वीत तान्यान्यपि बुद्धिमान् ॥६०॥ (लो० ५७ ) संवाहनं मृदुमर्दनम् ॥ (श्लो० ६० ) अन्यानि प्रावरणपुष्पमालादीनि ।। ए , ५३ शारीरस्थान-अ० ४. (६६१) वायु और पित्तसे, मनके संतापसे तथा क्षयसे और चोट आदिकी पीडासे निद्राका नाश होजाता है और इनके विपरीत भावोंसे निद्रानाशकी शांति होती- है ॥ ५६ ॥ यदि निद्रानाश हो तो शरीरपर तेल मलके उबटन करना और स्नान करना चाहिये तथा शिरपर तैलका मर्दन करना और धीरे धीरे हाथ, पांव और शरीर दववाना चाहिये ॥ ५७ ॥ शालि चावल, गेहूँ पिष्ट अन्न (पिट्ठीके पदार्थ), और शर्करा ( खांड) के वने मधुर, विकने, दूध या मांसरस (शोरवे ) के साथ में उत्तम भोजन करने चाहिये ॥ ५८ ॥ विलमें रहनेवाले जीवों (शल्लकी, मूषक आदि ) तथा विष्किरों (मुरगे) आदिके रस (शोरवे ) के संग तथा दाख, मिश्री और ईख (गन्ने ) आदिका उपयोग रातको करे ॥ ५९ ॥ उत्तम नरम शय्या, साफ विछोना या मुलायम गद्दी तथा सुन्दर मृदु पालकी जैसी सारी इत्यादि पदार्थाका उपयोग बुद्धिमान्को निद्रानाश होनेकी व्याधिमें करना हितकारक होता है ।। ६० ॥ अतिनिद्राका प्रतिकार । देमेन्निद्रातियोगे तुं कुर्य्यात्संशोधनानि च ॥ लघुनं रक्तमोक्षं च मनोध्याकुलनानि च ॥ ६१ ॥ यदि निद्रा अधिक आती हो तो वमन करावे तथा विरेचनादि द्वारा शोधन करे, लंघन करावे और रक्तमोक्ष (फस्त) करावे तथा मनके व्याकुल करनेवाले आचरण करावे ॥६१॥ रातमें जागना तथा दिनमें सोना किनको हित है। कफमेदोविषार्तानां रात्री जागरणं हितम् ॥ दिवास्वप्नश्च तृट्शूलहिक्काजीर्णातिसारिणाम् ॥२॥ जिनके शरीरमें कफ तथा मेद बढगये हों अथवा जो विषसे व्याप्त हों ऐसे मनु- ग्योंको रातमें भी जागना हित है । और जिन्हें तृषा, शूल, हिचकी, अजीर्ण और अतिसार ये रोग हों उन्हें दिनमें भी सोना अच्छा है ।। ६२ ।। तन्द्राके लक्षण। इंद्रियार्थेष्वसंप्राप्ति गौरवं जूंभणं क्लमः ॥ निद्रौतस्य यस्येहाँ तस्य तन्द्रा विनिर्दिशेत् ॥६३॥ इंद्रियां अपने २ अर्थीमें ठीक प्राप्त न हों, शरीर भारी हो, जमाही आवे, थका- नसी हो और निद्रायुक्तकेसी जिसकी चेष्टा हो उसे “तदा" कहते हैं ॥ ६३ ॥ (श्लो०६१) संगोवनादेव वमने लव्धे यद्वमनस्य पृयशुपादानं तद्विशेषेण ।।
(३६२)
सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
मुंभा।
पीत्वैकमनिलोच्यासमुद्वेष्टन विवृताननः ।।
यन्मुंचति सनेत्राझं से जृम इति संज्ञितः ॥६॥
जब मनुष्य ऊपरको मुँह पसार कर एक लंबी सांस खींचता है और फिर
मुख मिचते २ कभी आखों में आँसू भरकर सांस छोडता है तो उस अवस्थाको
मुंभ" (जमाही) कहते हैं ॥ ६४॥
क्लम।
योऽनायासः श्रमो दे हे प्रवृद्धः श्वासवर्जितः॥
क्लमः सँ इति विज्ञेय इन्द्रियार्थप्रवाधकः॥६५॥
जिसमें अनायास (बपरिश्रम किये) ही शरीरमें थकानसी हो और श्वास
न बढे तथा इन्द्रियोंकी अपने अपने विषयोंमें कुछ २ अज्ञानता हो उसे "कम"
कहते हैं ॥६५॥
आलस्य।
सुखस्पर्शप्रसंज्ञित्वं दुःखद्वेषणलोलता ॥
शक्तस्य चाप्यनुत्साहः कर्मस्वालस्यमुच्यते ॥ ६६ ॥
जिस अवस्थामें सुखके स्पर्शकी लालसा रहे और दुःख (श्रमादि) दूर रह-
नकी इच्छा हो तथा शक्ति होनेपर भी कार्यों में उत्साह न हो तो उसे "आलस्य
कहते हैं ॥ ६६॥
उत्क्लेश।
उक्लिश्यान्नं न निर्गच्छेत्प्रसेकष्ठीवनेरितम् ॥
हृदयं पीड्यते चास्य तमुलेशं विनि दिशेत् ॥ ६७ ॥
पेटका अन्न ऊपर ऊपरको आवे (जी मिचलावे ) और अन्नादि वाहर न निकल
(वमन हो नही) तथा हृदयमें दुःख हो तो उसे “उत्क्लेश' (हुड्डीक) कहते है।। ६७॥
ग्लानि।
वक्के मधुरता तन्द्रा हृदयोद्वेष्टनं भ्रमः ॥
नै चान्नमर्भिकांक्षत तस्य ग्लानिं विनिर्दिशेत् ॥६८ ॥
मुहमें मीठापन हो, तंदा हो, हृदयमें उचेडमी हो, भ्रम हो, अन्नपर रुचि न हो
तो उसको "ग्लानि" कहते हैं ॥ ६८ ॥
शारीरस्थान-अ०४. (६६३) गौरव। आर्द्रचर्मावनद्धं हि यो गात्रमभिमन्यते॥ तथा गरु शिरोऽत्यर्थं गौरवं तद्विनिर्दिशेत् ॥६९॥ जब मनुष्य अपने शरीरको गीले चर्मसे ढका हुआसा (गलगलायासा) जाने तथा शरीर भारी और शिर अति भारी हो तो उसे “गौरव." कहते हैं। ६९ ॥ मूर्छा पित्ततमःप्राया रजःपित्तानिलाद्मः ॥ तमोवातकफात्तन्द्रा निद्रा श्लेष्मतमोभवा ॥७॥ मूर्छा (बेहोश दंडाकारसा गिरे और जैसेहो वैसेही पड़ा रहे यह ) पित्त और तमोगुणकी प्रधानतासे हो और भ्रम (अचेतहो कभी अस्त व्यस्त कहना या करना यह) रजोगुण और पित्त, वायुकी प्रधानतासे होता है तथा तंद्रा (घुमेर) तमोगुण और वायु, कफसे होती है तथा निद्रा कफ और तमोगुणसे होती है ॥ ७० ॥ गर्भस्य खलु रसनिमित्तामारुताध्माननिमित्ता चै परिवृद्धिभवति ॥ ७१॥ भवन्ति चात्र- गर्भकी वृद्धि माताके रससभी होतीहे और पवनके आध्मान (धमने) सेभी होता है ॥ ७१॥ इसी विषयपर श्लोक है- तस्यांतरेण नाभेस्त ज्योतिःस्थानं ध्रुवं स्मृतम्।तदा धर्मति वातस्तु देहस्तेनास्य वद्धते ॥ ७२ ॥ ऊष्मणां सहितश्चापि दारयत्यस्य मारुतः॥ ऊर्दू तिर्यगधंस्तार्च स्रोतास्यपि यों तथा ॥ ७३ ॥ दृष्टिश्च रोमकूपाश्च न वर्द्धते कदाचन ॥ ध्रुवापयेतानि मत्यांना- मिति धन्वंतरेर्मतम् ॥७॥ शरीरे क्षीयमाणेपि वद्धत द्वाविमौं सदा ॥ स्वभावं प्रकृतिं कृत्वा नखकेशाावति स्थितिः ॥७५॥ नाभिस्थानमें ध्रुव (निश्चल), ज्योतिःप्रकाशक अग्निका स्थान है वहां वायु धमन करता है उससे शरीर बढता है ।।७२॥ जब वह वायु गरमीसे मिलता है तब बल (श्लो० ६९ ) 'हि' स्थाने वा इति पाठातरम् ॥ (वा० ७१) रसनिमित्ता मातुराहारजन्यरसकृता। मारुताध्माननिमित्ता आध्मान स्रोतसा पूरण तदेव निमित्तं यस्याः । (श्लो० ७२) नाभेरतरेण नििभमध्ये अतरेण मध्यायें ( इति डल्लनः ), । ज्योतिस्थानम् अमिस्थानम् । ध्रुव निश्चलम् तच वायुराधमति ।। (श्लो० ७३) ज्योतिःस्थानाध्मानेन मध्यस्रोतोवृद्धी कथं सर्वतोवृद्धिरित्याह-ऊष्मणेति-यथातथाशब्दो अत्रातर्भूतवीप्सा तेनोष्मणा सहितोऽनिलः यथा याऊ तिर्यक् अधस्ताच लोतासि दारयति तथातथा देहो वर्द्धते इति पूर्ववाक्यात संबधनीयः ( इति नि० सं०) (श्लो० ७४) दृष्टिः नेत्रातर्गततिलमात्रम्॥ (श्लो० ७५) स्वभाव प्रकृति कृत्वा स्वभावं कारण कृत्वेत्यर्थ. ।। म - (६६५) सुक्षुतलहिता-मा० टी०। ५६ करके ऊपर, तिरछा और नीचेको जहाँजहाँ यथायोग्य है वहाँर स्रोतों(धमनीद्वारों) को खोलता है वैसेही शरीर बढता जाता है ॥७३॥ मनुष्योंके दृष्टि ( नेत्रोंके तिल) और रोमकूप (रोमछिद्र ) ये शरीरवृद्धिके साथ २ कभीभी नहीं बढते क्योंकि ये स्थिर हैं यह धन्वंतरिजीका मत है॥७॥ और शरीर क्षीण होनेपर ( बुढापेमें )भी स्वभावकी प्रकृतिसे नाखून और बाल ये दो वस्तु सदा वढतेहीहैं ॥ ७५ ॥ प्रकृति। सप्त प्रकृतयो अवंति दोषैः पृथक् द्विशः समस्तैश्च ॥७६ ॥ शुक्र- शोणितसंयोगे यो भवेदोष उत्कटः॥ प्रकृतिर्जायते तेन तस्या में लक्षणं शृणुं ॥७॥ प्रकृति (तासीर मिजाज या खासियत ) सात प्रकारकी होतीहै तीनों दोषोंसे पृथक् २ तीनजैसे वातप्रकृति,पित्तप्रकृति और कफप्रकृति तथा दो दो दोपोंकी तीन जैसे वात-पित्त प्रकृति, वात-कफ प्रकृति और कफ-पित्त प्रकृति । तथा एक तीनोंसे मिलकर त्रिदोष प्रकृति ऐसे ७ प्रकारकी प्रकृति होतीहैं ॥७६॥ गर्भाधानके समय पिताके शुक्र और माताके शोणितके संयोगमें जौनसा दोष प्रधान उत्कट होताहै उसीसे वही प्रकृति मनुष्यकी होतीहै उसके पृथक २ लक्षण सुनों । ७७॥ वातप्रकृति। तत्र जागरूकः शीतद्वेषी दुर्भगः स्तेनो मत्सर्यनार्यों गांधर्वचित्तः स्फुटितकरचरणोऽतिरूक्षश्मश्रुनखकेशः क्रोधी दंतनखखादी च भवति ॥ ७८ ॥ अधृतिरदृढसौहृदः कृतन्नः कृशपरुषो धमनी- ततः प्रलापी ॥ द्रुतगतिरटनोनवस्थितात्मा वियदपि गच्छति संभ्रमेणं सुप्तः ॥ ७९ ॥ अव्यवस्थितमतिश्चलदृष्टिमंदरत्नधनसं- चयमित्रः ॥ किंचिदेव विलपत्यनिवद्धं मारुतप्रकृतिरेष मनुष्यः ॥८०॥ वातिकाश्चाजगोमायुंशशाखूष्ट्रशुनां तां ॥ गृध्रकाकखरा- दीनामनुकैः कीर्तिता नराः ॥ ८१ ॥ (लो०७६) हीनमध्याधिकभेदेन प्रकृतीनामनेकप्रकारत्वेपि मुख्यतया सप्तव ॥ (श्लो० ७७) वातादिषु गर्भावाने व उत्कट: तेन सा एव प्रकृतिर्भवति । उत्कटस्तु स्वभावस्थितो न तु प्रकुपितः । वातादयो द्विविधा युक्टा: प्राकृता वैश्ताश्च । तत्र प्राकृतोत्कटः सप्तविधा प्रकृतिः वैकृतैस्तु गर्भव्यापत्तिरिति सिद्धात । वाग्भटरित्वत्याह-"शुमाइग्गर्भिणीभोज्यचेष्टागीशर्यतुषु ।। यत्माद्दोपोविकस्तेन प्रकृतिः सप्तधो. दिता ॥ १ ॥" ( मो० ७९ ) दुर्भग, अमनोहराकारः कुचेष्टश्च । स्तेनः चौरः । मत्सरी परशुमासहनशीलः । अनार्यः असत्पुरुषः (नि० स० )॥ (श्लो० ८१) अनुक इति–अनुकशब्दः गतजन्मनि कुलेशाले च (इति शब्दस्तोमः) शारीरस्थान-अ० ४. (६६५) - वहुत जागनेवाला, शीतका द्वेषी और दुर्भग(बुरी चेष्टावाला), जिसमें चोरीकी लत हो, मत्सरता युक्त हो, अनार्य हो, गंधर्वोकेसा जिसका चित्त हो अर्थात गानेका प्रेमी हो, हाथ, पैर बहुत फटते हों, जिसके डाढी, मूछ, नखून और बाल अति रूखे हों, क्रोधी हो और दांतों तथा नखोंको चबानेवाला हो ।। ७८ ॥ धैर्य रहित हो, दृढ प्रेम न करे, कृतन (किये हुए उपकारका न माननेवाला) हो, दुवला हो, शरीर खुरदरा हो, शीव २ श्वास लेनेवाला हो ( अथवा जिसके शीब सांस चढ- आवे ), बहुत बोले, जलदा २ चले, बहुत फिरे, चलचित्त हो, सोते हुए स्वप्न में आकाशचारी हो ॥ ७९ ॥ वुद्धि स्थिर न हो, चंचलदृष्टि हो, रत्नादि धनसंचय और मित्र जिसके अधिक न हों, कभी कभी कोई २ वात अस्तव्यस्तभी कह उठे ऐसे मनुष्यको वातप्रकृति ( सौदायी) जानना ॥ ८० ॥ बकरा, गीदड, सुसा, चूहा, ऊँट और कुत्ता, गीध, काक और गधा ये जंतुभी वातप्रधान होतेहैं इससे वातप्रकृति मनुप्प भी कुछ २ इनके स्वभावसे मिलते हुए होतेहैं ॥८१॥ पित्तप्रकृति। स्वेदनो दुर्गन्धः पीतशिथिलांगस्ताननखनयनतालुजिह्वौष्ठपा- णिपादतलो दुर्भगो वलीपलितखालित्यजष्टो बहुभुगुष्णद्वेषी क्षिप्रकोपप्रसादो मध्यमवलो मध्यमायुश्च भवति ॥८२॥ मेधावी निपुर्णमतिर्विगरवक्ता तेजस्वी समितिषु दुर्निवारवीर्यः ॥ सुतः सन् कन पलाशर्णिकारान् संपश्येदपि च हुताशविद्युदुल्काः ॥ ८३॥ नं भयात्प्रणमेदनतेष्वदुः प्रणसेष्वपि सान्त्वनदा- नरुचिः॥ भैवतीहं सदी व्यथितास्य गतिः स भवेदि है पित्त- तप्रकृतिः॥ ८४ ॥सुजंगोलूकगंधर्वयक्षमार्जारवानरैः। व्याघ्रक्षन- कुलोनूकैः पैत्तिकांस्तु नरो मर्ताः ॥ ८५॥ (वा० ८२) ताम्र: अरुणवर्णः (इति शब्दस्तोमः) । (नो० ८३१८४ ) मेधावीति-मेधा विद्यते यस्य सा मेधा धारणावतीवुद्धिः । निपुणा क्रियासु दक्षा मतिर्यस्य । विगृह्य वक्ता अवधार्य वक्ता अथवा परवाक्यमुच्छिा वचन शीलः ( इति डल्लनः) समितिषु संग्रामेषु । साल्वन मुपशमः । व्यथितास्यगतिः व्यथितमुख: मुखपाकत्वात् ( इति डल्लनः) । अन्ये तु व्य- थितास्यतिरित्यत्र अस्य गीतळथिता गमने व्यथा भवतीति समर्थयन्ति ॥ (श्लो० ८५) भुजगोलूक- गर्व इत्यत्र गर्वः पठितः तथा च वातप्रकृतावपि गांधर्वचित इति पठितस्तयोःत्रको भेद इत्याह-गानादी तु वातप्रकृतिकः क्रोघे पित्तप्रकृतिका संयोज्य गधषु क्रोधाधिक्यमपि ।।
-- (६६६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। जिसके पसीना बहुत आवे, (देहमें या पसीनेमें ) दुर्गध हो, शरीर पीला और शिथिल हो, नखन, नेत्र, तालु वा जिह्वा, हथेली और तलवे विशेष लाल हों, लावण्यसे रहित हों, शरीरमें थोडी अवस्थाहीमें झरी पडजाय, और बाल सुपद हो जायँ, शिरके बाल उडजाय, बहुत भोजन करे, उष्णताका द्वेपी हो (धूप गरमी नहीं सुहावे ), शीघ्रही क्रोध हो जाय और शीवही प्रसन्न हो जाय, बल और आयु मध्यम हो ॥ ८२ ॥ बुद्धिमान हो, चतुराई युक्त हो, बातको सोच समझकर कहे, तेजस्वी हो, संग्राममें रुके नहीं (शूरवीर हो), सोते हुए स्वप्नमें सुवर्ण, केसूके फूल, सुरख कनेरके फूल, आग, विजली, प्रकाश इत्यादिविशेष देखे ॥ ८३॥ भय दिखानेपरभी नरम न हो और जो अपनेसे नहीं नवे उससे आपभी कडा रहे और जो आपसे नवे उससे शांति करे और उसे कुछ दे देनेकी रुचि करे, मुहकी गति सदाही प्रायः व्यथित रहे ( मुँह आया रहे ) ऐसा मनुष्य पित्तप्रकृति (सफ- रावी गरम तासीरवाला) होता है ॥ ८४ ॥ सर्प, उल्लू, गंधर्व, यक्ष, मार्जार, वानर, व्याव, रीछ, नकुल ये भी पित्तप्रधान होते हैं इससे पित्तप्रकृति मनुष्योंका स्वभाव (आदत ) प्रायः इनके सदृश होता है ।। ८५ ॥ कफप्रकृति। दूर्वेदीवरनिस्त्रिंशाारिष्टशरकांडानामन्यतमवर्णः सुभगः प्रिय- दर्शनो मधुरप्रियः कृतज्ञो धृतिमान् सहिष्णुरलोलुपो बलवांश्चि- रग्राही दृढवैरश्च भवति ॥ ८६ ॥ शुक्लाक्षः स्थिरकुटिलातिनील- केशो लक्ष्मीवान जलदमृदंगसिंहघोषः॥ सुप्तः सन् सकमलहं- सचक्रवाकान् संपश्येदपि च जलाशयान्मनोज्ञान् ॥ ८७ ।। रक्तांतनेत्रः सुविभक्तगात्रः स्निग्धच्छविः सत्त्वगुणोपपन्नः ॥ क्लेशक्षमो मानयिता गुरूंणां ज्ञेयो बलासँप्रकृतिमनुष्यः ॥ ८८ ॥ दृढशास्त्रमतिः स्थिरमित्रधनः परिगण्य चिरात्प्रददाति बहुँ । परिनिश्चितवाक्यपदः सततं गुरुमानकरश्च भवेत्स सदा ।। ८९॥ (वा० ८६) इंदीवरं नीलोत्पलम् । निस्त्रिंशः निर्गतस्त्रिशद्भयोऽगुलीभ्य इति निस्त्रिशः खड्गः त्रि- शुदगुल्यविकस्यैव खद्गत्वात् । ततो न्यूनत्वे तु छुरिका (इति वाचस्पतिः) । अरिष्टः निवः अथवा फेनि- लवृक्षः लोके रीठा इति प्रसिद्ध.॥ (श्लो० ८७ ) कुटिलो वक्रः ।। (श्लो०८९ ) पदशब्देनात्र सुप्तिड- तरूपत्य वर्णसमुदायस्थ वा चरणस्य ग्रहणम् । केचित्तु वातादिप्रकृतिषु वातिकाश्चाजगोमायुरिति तथा भुजगो ट्रक्गधर्व इति तथा दृढमात्रमतिरिति तथा ब्रह्मेन्द्ररुद्रवरुणरितिचतुस्सख्यकाः श्लोकाः न पठनीयाः .. रकन्वादिति वदति ॥ -- शारीरस्थान-अ० ४. (६६७) ब्रह्मरुद्रेद्रवरुणैः सिंहा_गजगोवृषैः ॥ तार्क्ष्यहंसैः सानूकाः श्लेष्मप्रकृतयो नरः॥ ९०॥ जिसका वर्ण दूर्वा, इंदीवर ( नील कमल ), निस्त्रिंश (खग), आरिष्ट (स्निग्ध नींवके पत्ते ) अथवा (ताजे रीठे) तथा शरकांड (सरकंडा) इनमेंसे किसीके समान (सांवला) हो, सुभग( सुंदर) और दीखने में मनोहर हो, मीठा भोजन जिसे अच्छा लगे, कृतज्ञ हो ( किसीके गुण भूले नहीं ), धैर्यवान् हो, शीत, उष्ण,सुख, दुःख और परिश्रमादिका सहनेवाला हो, जितेंद्रिय हो, बलवान् हो, देरसे हरेक वातको स्वीकार करे तथा दृढ वैर रखनेवाला हो अर्थात् किसी वैरीसे शीघ्र प्रसन्न न हो ।। ८६ ॥ आंखे सुपेद हों, गहरे घुघराले तथा अत्यंत काले बाल हों, धनवान् हो ( अर्थात् फिजूल खर्च न हो) और मेघ, मृदंग तथा सिहके समान गंभीर शब्द बोले, सोतेमै कमल, हंस और चक्रवाकों सहित मनोहर जलाशयों ( तालाब, न- दियों) को देख ॥ ८७ ॥ जिसकी आंखोंके कोने लाल हों, सब शरीर सुडौल हो, शरीरपर स्निग्ध कांति हो (स्निग्ध शरीर हो) और सत्त्वगुणसे संयुक्त हो, क्लेश सहनेकी शक्ति हो, बड़े लोगोंका सत्कार करनेवाला हो ऐसा मनुष्य कफप्रकृति जानना चाहिये ॥ ८८ ॥ जिसकी बुद्धि शास्त्र में स्थिर हो और मित्रों और धनको स्थिर रखनवाला हो, देरसे सांच, सँभाल कर बहुत देनेवाला हो, बातको निश्चय विचार कर कहे और पांवको जमा जमा कर धीरे धीरे धरे और प्रायः गुमान विशेष करनेवाला हो ॥ ८९ ॥ ब्रह्मा, शिव, इंद्र, वरुण, सिंह, अश्व, हाथी, गौ और वृषभ तथा गरुड और हंस ये कफप्रकृति हैं इससे इनके स्वभावके समान प्रायः कफप्रकृतियोंका स्वभाव होताहै ॥ ९० ॥ द्वयोवा तिसृणां वापि प्रकृतीनां तु लक्षणैः ॥ ज्ञात्वा संसर्गजा वैद्यः प्रकृतीरभिनिदिशेत् ॥ ९१ ॥ यदि दो अथवा तीन प्रकृतियों के कुछ कुछ लक्षण मिले हुए जान पडें तो वैद्य उन्हें विचार कर संसर्गज प्रकृति कह ( जैसे किसीमें कुछ वातप्रकृतिके लक्षण पाये जाय और कुछ पित्तप्रकृतिके तो उसे वात-पित्त प्रकृति जानना और जिसमें वात और कफके कुछ २ लक्षण हों उस वात-कफ प्रकृति और जिस किसीमें कफ और पित्तके लक्षण हों उसे कफ-पित्त प्रकृति जानना) औरजिसमें तीनोंके कुछ २ लक्षण हों उसे त्रिदोष प्रकृति जानना चाहिये ॥ ९१ ॥ प्रकोपो वान्याभावः क्षयो वा नोपजायते ॥ प्रकृतीनां स्वभा- वेन जायते तु गतायुषः ॥ ९२ ॥ विषजीतो यथा कीटो नै वि. (श्लो० ९० ) ताय॑हसैः समानूका' इत्यत्र तामंहससमानुका इति वा समस्तः पाठः ॥ .
(६६८) ६० स्नुअलसंहिता-भा. टी०। घेणं विपद्यते ॥ तद्वत्प्रकृतयो मर्यं शक्नुवंति नै बाधितुम् ॥१३॥ स्वभावहीसे प्रकृतियोंका प्रकोप और अन्यथाभाव ( पलट जाना) तथा क्षय नही होताहै यदि किसीको होजाय तो उसे गतायु(आसन्न मृत्यु) समझना चाहिये (जैसे वातप्रकृति मनुष्योंको वायुका कोप या पित्तप्रकृति, कफप्रकृति होजाना या वायुका विशेष क्षय होजाय तो उसे मृत्युकारक जानों) क्योंकि प्रकृतिके दोषका कोप तथा पलटा अथवा क्षय मृत्यु के समीपही होताहै ॥९२॥ विषका पैदा हुआ कीडा जैसे विषसे व्याधित नही होता वैसेही प्रकृतिक वातादि दोष भी मनुष्यको विशेष बाधा नहीं करते ॥ ९३ ॥ प्रकारांतर । प्रकृतिसिंह नरोणां भौतिकी केचिदाहुः पवनदेहनतोयैः की- तितास्तांस्तु तिस्त्रः ॥ स्थिरविपुलंशरीरः पार्थिवश्च क्षमावान् शुचिरथ चिरजीवी नाभंसः खैमहद्भिः॥ ९४॥ कोई ऐसा कहतेहैं कि मनुष्योंकी प्रकृति पांचभौतिकी अर्थात् पृथिवीप्रधान, जल- प्रधान, तेज प्रधान, वायुप्रधान तथा आकाशप्रधान होती हैं उनमें वातप्रकृति वायु- प्रधान, पित्तप्रकृति तेज प्रधान और कफप्रकृति जलप्रधान जाननी चाहिये । इन तीनोंके लक्षण हम कहचुके ( शेष रहीं दो) उनसे जिसका शरीर स्थिर हो,बड़ा (विशाल ) हो, क्षमायुक्त हो उसे पार्थिव ( पृथ्वीप्रधान प्रकृति ) जानों और जो वहुत पवित्र रहे, चिरजीवी हो जि.के नाक, कान आदिके छिद्र बडे चौडे हो(और हलका हो )वह आकाशमधान जानना चाहिये ॥ ९४ ॥ ब्रह्मकायादिके लक्षण । शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुरुपूजनम् ॥ प्रियातिथित्वमि- ज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ॥ ९५॥ माहात्म्यं शौर्यमाज्ञा च सततं शास्त्रवुद्धिता ॥भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ॥ ९६ ॥ शीतसेवासहिष्णुत्त्रं पैंगल्यं हरिकेशता ॥ प्रियवादित्व- मित्येतद्वारुणं कायलक्षणम् ॥ ९७ ॥ जिसमें पवित्रता हो, आस्तिकता हो, वेदादि शास्त्रोमें अभ्यास हो, गुरुके पूज- नमें निष्ठा हो, आये हुए अतिथि (अभ्यागत तथा महिमान) प्यारे लगें, यज्ञा- (शो०१३) शक्नुवात न बाधितुमित्यत्र नन् ईषदर्थे तेन किचित् बाधितुं शक्नुवंति न तु भृशम्। इति उल्लन: ) ॥ (मो० ९६ ) माहात्म्य महागयत्वम् ॥ (श्लो० ९७ ) पैगल्य पिंगाक्षता । दरिफेशना कपिलकेशता ।।
६२ शारीरस्थान-अ० ४. (६६९) दिमें प्रीति हो वह ब्रह्मसत्त्व शरीर होता है ॥ ९५ ॥ जिसमें माहात्म्य ( महाश- यत्व ) हो, शुरता हो, आजाशक्ति हो, निरंतर शास्त्र में बुद्धि हो, भृत्योंका भरण करे वह महेंदकाय अर्थात् महेंदसत्व शरीर होता है ॥ ९६ ॥ शीतल पदार्थाका विशेष सेवन करे, सुखदुःखादिको सहसके, नेत्र पीले हों तथा बालभी भूरे हों, प्यारे वचन बोले वह वरुणसत्वशरीर मनुष्य होता है ॥ ९७ ॥ मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयौ ॥ महाप्रसवशक्तित्वं कौवेरं कायलक्षणम् ॥ ९८॥ गंधमाल्यप्रियत्वं च नृत्यवादित्रका- मिता ॥ विहारशीलता चैव गांधर्व कायलक्षणम् ॥ ९९ ॥ प्राप्त- कारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाशुचिः ॥ रागमोहभयद्वैषैर्व- र्जितो याम्यसत्त्ववान् ॥ १०० ॥ जपत्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेवि- नम् ॥ ज्ञानविज्ञानसंपन्नमृषिसत्त्वं नरं विदुः ॥१०१॥ सप्तैते सात्त्विकाः कायाँ राजसांस्तुं निवोध में ॥ १०२ ॥ जिसका स्वभाव मध्यस्थ होनेका हो (हरेकके बीचमें पड उनका झगडा मिटावे, सहनशीलता हो, जिसके धनका आगमभी बहुत हो और संचयभी हो, बहुत सन्तान पैदा करनेकी शक्ति हो यह कुबेरसत्त्व शरीरके लक्षण हैं ।। ९८ ॥ जिसे सुगंध माला प्रिय हो, नाच और गानेका शौक हो, विहार (सैल तमाशे ) का शौकीन हो यह गंधर्वसत्त्व कायके लक्षण हैं ॥ ९९ ॥ कागोंको युक्तिसे करे और दृढतासे कामका आरंभ करे, भय रहित हो, स्मृति बहुत हो अर्थात् भूले नहीं, पवित्र रहे तथा प्रेम, मोह, भय और द्वेष इनसे वर्जित हो उसे यमसत्व शरीरके लक्षणोंसेयुक्त जाने ॥ १०० ।। जो प्रायः जप, व्रत, ब्रह्मचर्य, होम और पठन पाठनमें विशेष प्रवृत्त रहे, ज्ञान और विज्ञानसे युक्त हो उसे ऋषिसत्त्व मनुष्य जानो ॥ १०१ ॥ ये पूर्वोक्त सात प्रकृति सात्त्विक ( सत्त्वगुण प्रधान ) शरीरोंकी होतीहैं इसके अगाडी रजोगुणप्रधान प्रकृति शरीरोंके लक्षण सुनो ॥ १०२ ।। ऐश्वर्यवंतं रौद्रं च शूरं चंडमसूयकम् ॥ एकाशिनं चौदरिकमा- सुरं सैत्वमीदृशम् ॥ १८३॥ तीक्ष्णमायासिनं भीर चंडं माया- (श्लो०९९)नृत्यवादित्रकामिता नृत्यवाद्यप्रियत्वम् ।। (श्लो०१००) प्राप्तकारी युक्तकारी । दृढो. त्यानः दृढारंमः । ( इति डल्लनः )॥ (श्लो० १०३) रौद्रं भयानकम् । चंडं तीव्रकोपम् । असूयकं परगुणेषु मत्सरिणम् । एकाशिनं एकाकी एव चाभातीत्यर्थः औदरिकं घस्मरं गयदासस्तु औदरिकमित्यत्र आपीषिकामिति पठात आपधिक छद्मपरामिति च व्याख्याति ॥
६२ सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (६७०) न्वितं तथा ॥ विहाराहारचा सर्पसत्त्वं विदुनरम् ॥ १०४ ॥ प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजनाहार एव च ॥ अमर्षणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् ॥ १०५ ।। जो ऐश्वर्यवाला हो, भयानक हो, शूरवीर हो, प्रचण्ड ( अतिकोपवान्) हो, पराई निंदा करे, आप अकेलाही अकेला खावे और औदारिक (पेटभरा अर्थात् बहुत खानेवाला) हो उसे असुरसत्त्व मनुष्य कहतेहैं ॥ १०३ ॥ जो तीवस्वभाव- वाला हो, परिश्रमी हो तथा डरपोक ( या क्रोधरहित) हो, चंड (कोपयुक्त) हो, मायावी हो, विहार और आचारमें चपल हो उस मनुष्यको सर्पसत्त्व जानो॥१०॥ जो अतिकामी हो तथा सदा खाताही रहे, क्रोधी हो और एक जगह जिसका चित्त न लगे अर्थात् भ्रमणशील हो वह शाकुनसत्त्व होताहै ॥ १०५ ॥ एकांतग्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाह्यता ॥ भृशमात्रं तमश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ॥ १०६ ॥ उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रि- यता तथा ॥ स्त्रीलोलुपत्वं नैवल्यं पैशाचं कायलक्षणम् ॥१०७ ।। असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् ॥ लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुरम् ॥ १०८ ॥ पडेते राजसाः कायास्तामसांस्तु निवोर्धं में ॥ १०९॥ जो प्रायः एकांत रहना ग्रहण करे, भयानक हो, परनिंदा करें और धर्मविरुद्ध हो, अति तमोगुणी हो तो यह राक्षससत्त्वकायके लक्षण हैं ॥ १०६ ॥ जो उच्छिष्ट भोजन करे, तीक्ष्ण हो, साहसके साथ काम करे, स्वीका लोलुप हो ( स्त्रीसंगकी अति इच्छा करे ) और निर्बल हो ये पिशाचसत्त्वके लक्षण हैं ॥१०७॥ जो ठीकर विभाग न करे (या जिसके शरीरके अंगोंके ठीक भाग न हों ), आलसी हो, दुःखशील हो, निंदक हो, लोलुपहो, दानशील न हो उस मनुष्यको प्रेतसत्व कहते- हैं ॥ १०८ ॥ ये छाप्रकारके राजस ( रजोगुण प्रधान ) प्रकृतिके मनुष्य होतेहैं इसके अगाडी तामस (तमोगुण प्रधान प्रकृति ) मनुष्योंके लक्षण सुनो ॥१०९॥ दुर्मेधस्त्वं मंदता च स्वप्ने मैथुननित्यता ॥ निराकारष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः॥ ११० ॥ अनवस्थितता मौख्यं भीरुत्वं ( श्लो० १०४ ) "विहाराहारचालम्" इत्यत्र विहाराचारचपलम् इति वा पाठः । भार चंडमिति परस्पर विरोधोस्ति तत्राह-अक्रोघे भीरु क्रोधे चंडमित्यर्थः ॥ ( श्लो० १०५) अजसाहारः अनारताहारः । ( इति नि० सं० ) अमर्पणः क्रोधने असहने च ( इति शब्दस्तोमः) ॥
शारीरस्थान-अ०५. (६७१) सलिलार्थिता ॥ परस्पराभिमर्षश्च मत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम् ॥१११॥ एकस्थानरतिनित्यमाहारे कैवले रतः॥ वानस्पत्यो नरः सत्त्वध- मर्कामार्थवर्जितः ॥ ११२॥ इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा॥ कायानां प्रकृतीख़त्वा त्वनुरूपां क्रियां चरेत॥११३॥ दुष्टबुद्धिता और मंदता हो, नित्य स्वप्नमें मैथुन करे, किसी कार्यके करनेकी बुद्धि न हो ये पशुसत्त्व मनुष्योंके गुण हैं ॥ ११० ॥ किसी कार्यमें चित्त स्थिर न होना, मूर्खता, डरपोकपना, जलकी विशेष अभिलाषा रहना और आपसमें एक दूसरेसे द्वेष रखना ये मत्स्यसत्त्व मनुष्योंके लक्षण हैं ॥ १११ ॥ जो विशेष एकही जगह सदा पडा रहे और केवल भोजनहीं करनेम रुचि रक्खे वह सत्त्वगुण धर्म,अर्थ और कामसे वर्जित वानस्पत्य (वनस्पतिसत्व) मनुष्य होता है ॥११२॥ इस प्रकार ये तीन भांतिके तमोगुणप्रधान प्रकृतिके मनुष्यदेह वर्णन किये अब इसमें वैद्योंको चाहिये कि शरीरोंकी प्रकृतिको विचारकर उसके अनुसारही क्रिया करें ॥ ११३ ॥ महाप्रकृतयस्त्वेता रजःसत्त्वतमःकृताः॥ प्रोक्ता लक्षणतः सम्यग् भिषक् ताँश्च विभावयेत् ॥ ११४ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण करके की हुई ये महामकृति लक्षण पूर्वक वर्णन की हैं इनको ( और वातादि प्रकृतियोंको) वैद्य लक्षणोंसे भले प्रकार विचारकर फिर चिकित्सादि विधान करें ॥ ११४ ॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० शारीरस्थाने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पंचमोऽध्यायः ५. अथातः शरीरसंख्याव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ गर्भकी विवेचनाके पीछे अब शरीरके अंग, प्रत्यंगके विवरणविषयक शारीर- कको व्याख्यान करते हैं। शुक्रशोणितं गर्भाशयंस्थमात्मप्रकृतिविकारसंछितं इत्युच्यते ॥१॥ तं चं चेतनांवस्थितं वायुविभजति । तेज एनं पचति । आपः क्लेदयन्ति । पृथिवी संहति। आकाशं विवर्द्ध- (वा० १) शरीरसंख्याव्याकरणमिति-गर्मव्याकरणानंतरमुत्सनस्य संजातागप्रत्यंगतया शरीरसंज्ञस्य गरीरावयवानां संख्यां कर्तुं युज्यते । पंचमहाभूतशरीरिस पवायः शरीर वस्य संख्या अवयवसंख्या तस्या व्याकरण विवरणम् ॥
(६७२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ६॥ यति । एवं विद्धितः स यदा हस्तपादजिह्वाघाणकर्णनितंवा- दिभिरंगरुपेतस्तदा शरीरमिति संज्ञां लभते । तच्च षडंगं शाखा- श्चत्तस्रो सध्यं पंचमं षष्टं शिर इति ॥२॥ माताके गर्भाशयमें क्षेत्रज्ञ (जीव) और प्रकृति (प्रधानादि) तथा विकार (पंचमहाभूत और एकादश इंद्रिय) इनसे मिश्रित शुक्र और शोणितका जो धनी- भूत आकार हो वह गर्भ कहलाता है ॥ १ ॥ उस चेतनायुक्त गर्भको वायु विभाग करता है अर्थात् दोष, धातु, मल और अंग, प्रत्यंगोंको जुदा जुदा यथावस्थित करता है और तेज (अग्नितत्त्व ) उसे पकाता है तथा जलतत्त्व क्लेदन (आर्द्रता) करता है और पृथिवीतत्त्व उसे कडा (मूर्तिमान् ) कर देता है तथा आकाश उसे बढाता है । जब इस प्रकारसे बढा हुआ गर्भ हाथ, पांव, जिह्वा, नासिका, कर्ण और नितंब (चूतड) आदि अंगोंसे उपयुक्त होजाता है तब यह शरीरसंज्ञाको प्राप्त होता है वह शरीर छ; अंगोंवाला होता है, जिनमें चार अंगतो चारों शाखा अर्थात् दो हाथ और दो पांव और पांचवां अंग मध्यभाग अर्थात् धड़ और छठा अंग शिर कहलाता है (यूनानीवाले अंडकोश और लिंगको सातवां अंग मानते हैं इससे शरीरको “हफ्त अंदाम" अर्थात् सात अंगवाला शरीर कहते हैं)॥२॥ अतः परं प्रत्यंगानि वक्ष्यंते ॥ इससे अगाडी प्रत्यंगोंको कहते हैं। मस्तकोदरपृष्ठनाभिललाटनासाचिवुकवस्तिग्रीवा इत्येता एकैकाः कर्णनेत्रनासाभ्रूशंखांसगंडकक्षस्तनवृषणपार्श्वस्फिग्जानुबाहरु- प्रभृतयो द्वे द्वे विंशतिरंगुलयः स्रोतांसि च वक्ष्यमाणानि एष प्रत्यंगविभाग उक्तः ॥३॥ मस्तक, पेट, पीठ, नाभि, ललाट, नाक, ठोडी, वस्ति और ग्रीवा (गरदन) ये एक एक होते हैं और कान, आंख, नाकके नथने, भृकुटी, शंख (कनपटी), अंस ( खौदे), गंड (गाल), काख, चूंची, वृषण (अंड), पँसवाडे, स्फिक् (कूले), घुटने, हाथ और साथल (और प्रभृति शब्दसे होठ तथा सृक्किणी आदि ) ये दो दो होते हैं और बीस अंगुली तथा स्रोत (मुख, लिंग, गुदादि) जो अगाडी कहे जावेंगे यह सब प्रत्यंगविभाग कहा है (अर्थात् ऊपर छ: अंग कहे और ये प्रत्यंग कहे हैं)॥३॥ शरीरके अवयवोंका संक्षिप्त वर्णन। तस्य पुनः संख्यानम् । त्वचः कला धातवो मला दोषा यकृत्प्ली- ६५ शारीरस्थान-अ० ५. (६७३) हानौ फुप्फुस उंडुको हृदयमाशया अंत्राणि वृक्को स्रोतांसि कंडरा जालानि कूर्चा रजकः सेवन्यः संघाताः सीमंता अस्थीनि संधयः स्नायवः पेश्यो मर्माणि सिरा धमन्यो योगवहानि स्रोतांसि च॥४॥ शरीरके अवयव संक्षिप्ततासे इसप्रकार हैं कि त्वचा (चर्म ), कला (झिल्लिका), धातु ( रस, रक्त, मांस, मेद आदि), मल (विष्ठा, मूत्रादि), दोष ( वात,पित्त, कफ), यकृत् (जिगर ), प्लीहा (तिल्ली), फुप्फुस (फेफडा), उंडुक (मलाधार मोटा अंतडा ), हृदय (हृत्कमल या दिल ), आशय (आमाशय अर्थात् भोजन जाकर ठहरने और पकनेकी जगह जिसे यूनानी हकीम मेदा कहतेहैं इत्यादि ) अंक (अंतडिया), वृक्क (गुरदे), स्रोत (द्वार), कंडरा ( मोटी नसें ),जाल (मांसादिका जाल), कूर्च(कुँचले), रज्जु (वंधनी मांसरज्जु), सेवनी (सीवन), संघात(अस्थिशृंगा- टक), सीमंत(केश), अस्थि (हाड), संधि (जोड), स्नायु, (नसें), पेशी(गिलटियां), मर्म (मर्मस्थान), सिरा (वारीक रगे),धमनी( नाडी) और योगवाही स्रोतस (अन्न उदकादिको वहानेवाले स्रोत) और चकारशब्दसे अन्यभी जानने ॥ ४ ॥ त्वचः सप्त । कलाः सप्त। आशयाः सप्त। धातवः सप्त। सप्त सिरा- शतानि। पंच पेशीशतानि । नव स्नायुशतानि । त्रीण्यस्थिशतानि। द्वे दशोत्तरे संधिशते । सप्तोत्तरं मर्मशतम्। चतुर्विंशतिधमन्यः । त्रयो दोषाः। त्रयो मलाः। नव स्रोतांसीति समासः॥५॥ त्वचा सात हैं (इनका वर्णन पहले कर चुके हैं), कलाभी सात हैं (इन्हेंभी कह चुके हैं ) और आशय (वाताशय, आमाशयादि) येभी सात हैं और धातु(रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र ये) भी सात हैं तथा सिरा ( रगें) सातसौ ७०० हैं और पेशी (गिलटियां ) पांचसौ५०० हैं और स्नायु नौसौ९०० हैं और हड्डियां तीनसौ ३०० हैं और दोसौ दश २१० संधि हैं और एकसौ सात १०७ मर्म हैं तथा चौबीस धमनी हैं और दोष तीन हैं और मल तीन हैं तथा नौ स्रोत (द्वार) हैं यह संक्षिप्त वर्णन है ॥ ५ ॥ विस्तारोऽत ऊर्द्धम् । त्वचोभिहिताः फला धातवो मला दोषा यकृत्प्लीहानौ फुप्फुस उंडुको हृदयं वृक्तौ च ॥ ६ ॥ इससे अगाडी विस्तार कहते है । जिसमेंस त्वचा, कला,धातु,मल, दोष, यकृत, प्लीहा,फुप्फस, उंडुक, हृदय और वृक्कं इनको बता चुके हैं (निदर्शनमात्र कहचके हैं। इनका विस्तृत वर्णन हम ग्रंथांतर और मतांतरसे अन्यत्र करेंगे)॥ ६ ॥ - (६७४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। मूत्राशयः आशय । आशयास्नु वाताशयः पित्ताशयः श्लेष्माशयो रक्ताशय आमाशयः पक्काशयो स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति ॥७॥ आशय इस प्रकारसे हैं कि १ वाताशय (नाभिसे दो अंगुल नीचे), २ पित्ता- शय (यही आमाशय है यह नाभिसे कुछ ऊपर है इसेही पित्ता कहते हैं), ३ कफाशय (यह छातीके नीचे आमाशयके ऊपर है ), ४ रक्ताशय (छातीमें हृदय- के पास है ), ५ आमाशय (यह नाभिसे स्तनपर्यंत है इसेमंदा कहते हैं),६ पक्का- शय (यह वाताशयके नीचे है इसीका अधोभाग मलाशय कहाता है), ७ मूत्राशय ( यही वस्ति अर्थात् मसाना कहाता है यह नाभिसे नीचे लिंगके मूलतक है ) और स्त्रियोंके आठवां गर्भाशय होताहै (यह पक्वाशय और पित्ताशयके मध्य में होताहै)७॥ अंत्रप्रमाण । साद्धत्रिव्योमान्यत्राणि पुंसां स्त्रीणामर्द्धव्यांमहीनानि ॥८॥ पुरुषोंकी अंत्र (आंतें ) साढे तीन व्याम लंबी होतीहैं और स्त्रियोंकी आंतें उससे आधा व्याम कम अर्थात् तीन व्याम लंबी होती हैं (पसवाडोंके तरफ तिरछे दोनों हाथ फैलानेसे जो उनका अंतर होताहै वह व्याम कहलाताहै) ॥ ८॥ स्रोत (द्वार) श्रवणनयनवदनघाणगुदमेदाणि नव स्रोतांसि नराणां बहिर्मु- खोन्येतान्येवं स्त्रीणामपरीणि चं त्रीणि द्वे स्तनयोरधस्तौद्र- क्तवह च ॥९॥ दो कर्ण, दो नेत्र, एक मुख, दो नासिकाके छिद, एक गुदा, एक लिंग इस प्रकार वाहरको मुखवाले ये नौ द्वार पुरुषोंके शरीरमें होते हैं और स्त्रियोंके इनसे अधिक तीन और द्वार होते हैं, दो स्तन (चूंची) और एक आर्तवका मार्ग गर्भाशय होताहै ॥ ९ ॥ (वा० ७) आशयक्रमो भावमिश्रेणवमुक्त: “उरो रक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमा- यस्तु तदधस्तल्लिंग चरकोवदत् ॥ १ ॥ नाभिस्तनातरे जतोराहुरामाशयं चुधाः ।। आमाशयादधः पक्का- शयादूर्घ तु या कला ॥ ग्रहणीनामिका सैव कथितः पाचकाशयः॥२॥ऊर्ध्वमग्न्याशयो नाभेमध्यभागेन्यव- स्थितः ॥ तस्योपरि तिल जेय तदधः पवनारायः ॥३॥ पक्काशयस्तु तदधः स एव तु मलाशयः ॥ तदधः कथितो वस्तिः स हि मूत्राशयो मतः ॥४॥” इति आगयाः वाग्भटेनोकाः। रक्तस्याधः क्रमात्परे-"कफा- मपित्तवातानामाशयो मलमूत्रयोः ।। स्त्रीणा गर्भाशयः प्रोक्तः पित्तपक्काशयातर" इति ॥ १ ॥ रक्ताशयो यहाटीदानाविति केचित् ॥ (वा० ८) व्यामः तिर्यपार्वतो विस्तृतयोबाहोरंतरालपरिमाणम् ( इति अन्दरतोमः ) ॥ (वा० ९) "दशमं मस्तके प्रोक रंध्राणीति नृणां विदुः ॥" ( इति भावमिश्रः) ॥
शारीरस्थान-अ०५. (६७५) 4 कंडरा। षोडश कंडराः । तासां चतस्रः पादयोस्तावत्यो हस्तग्रीवापृष्ठेषु तत्र हस्तपादगतानां कंडराणां नखाः प्ररोहाः ग्रीवाहृदयनिबं- धिनीनामधोभागगतानां मेह्न श्रोणिपृष्ठनिबंधिनीनामधोभागग- तानां विवः मझेरुवक्षोक्षिपिंडादीनां च ॥ १०॥ कंडरा ( मोटी नसें ) सोलह होती हैं उनमेंसे ४ दोनों पावोंमें तथा चारही दोनों हाथोंमें और ४ ग्रीवामें और चारही पीठमें होती हैं जिनमें हाथ और पावोंकी कंडरा नीचेबो जाती हैं और उनके अग्रभाग ( अंगुलियोंके ) नख होते हैं (अर्थात नख पर्यंत जाकर हाथ, पावोंकी कंडरा समाप्त होती हैं)। ग्रीवा और हृदयको बाँधनेवाली जो चार कंडरा हैं नीचे जाकर उनका अग्रभाग मेढ़ होता है (अर्थात् येमेट्रपर समाप्त होती हैं) और पीठको कमरसे बांधनेवाली जो चार कंडरा हैं नीचे जाकर उनका अग्रभाग नितंबविंव (चूतड ) हैं ( अर्थात् ये चूतडों पर्यंत जाकर समाप्त होती हैं ) इसी प्रकार मूर्दा, उर, वक्षस्थल, नेत्र, पिंडादिके मंडल भी ( इन्हीं कंडराओंके उपरिगत अग्रभाग हैं ऐसा) जानना ॥ १० ॥ मांसशिरास्नास्वस्थिजालानि प्रत्येकं चत्वारि चत्वारि तानि म- णिवंधगुल्फसंश्रितानि परस्परनिबद्धानि परस्परसंश्लिष्टानि परस्परगवाक्षितानि चोत यैर्गर्वोक्षितमिदं शरीरम् ॥ ११ ॥ मांस, शिमा ( रग), स्नायु (नस) तथा हड्डियां इनमेंसे प्रत्येकके चार चार जाल हैं वे जाल दोनों मणिबंधों (पहुचों) में और दोनों गुल्फ (पावकेटकनों.) मैं ऐसे इन चारों स्थानोंमें चारों प्रकारके जाल हैं वे परस्पर बँधे हुए और परस्पर मिले (लिपटे) हुए तथा परस्पर जालीके समान हैं इसीसे इस शरीरको गवाक्षित अर्थात् झरोखे युक्त कहते हैं ॥ ११ ॥ कूर्च। षट् कूर्चास्ते हस्तपादग्रीवामेद्वेषु । हस्तयोौं । पादयोः । ग्री- वामेढ़योरेकैकः ॥ १२॥ ( वा० १०) कंडराप्रयोजनमाह भावमिश्रः-"महत्यः स्नायवः प्रोक्ताः कंडरास्तास्तु षोडश । प्रसा- रणाकुचनयो, ताभ्या प्रयोजनम् ।। (वा० ११) मणिबंधः मणिबध्यतेऽत्र इति मणिबंधः प्रकोष्ठ- पाण्योर्मध्यस्थे करपथौ (इति शब्दस्तोम:)गुल्फः पादग्रंयौ ॥(वा०१२) कूर्चाः इति-कूर्चः ध्रुवोर्मव्यस्थिते लोमोच्चये श्मश्रूणि(इति शब्दस्तो०) भावमिश्नस्तु-"कूर्चा अपि चिरास्नायुमासास्थिप्रमवाः स्मृताः" इति। जाल।
(६७६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । ६८ कूर्च अर्थात् फॅचले जो कूँचीके तुल्य होते हैं छः हैं वे हाथों, पावा, ग्रीवा और लिंग इनके मूलमें हें। हाथोंके मूलमें दो (दो जगह) इसी भांति पावोंके मूलमें भी दो तथा ग्रीवामें एक और मेट्रके मूलमें भी एक है (कूर्चेके तुल्य छोटे और कडे केशोंको कूर्च कहते हैं और कई मांस, सिराऔर स्नायु आदिके अंकुरित पदार्थको कूर्च बतलाते हैं) ॥ १२ ॥ मांसरज्जु । महत्यो मांसरज्जवश्चतस्त्रः । पृष्ठवंशमुभयतः पेशीनिवंधनार्थं दे. बाह्ये आभ्यंतरे च द्वे ॥ १३ ॥ बडी मोटी मांसकी रज्जु ( रस्से सदृश) चार हैं वे पीठके बांसके दोनों तरफ पेशियोंके बांधनेके निमित्त हैं जिनमेंसे दो वाहरकी तरफ दोनों ओर हैं और दो भीतरको दोनों तरफ हैं ॥ १३ ॥ सेवनी। सप्त सेवन्यः। शिरसि विभक्ताः पंच जिह्वाशेफसोरेकैका ताः परि- हर्तव्याः शस्त्रेणं ॥१४॥ सेवनी (सीवन ) शरीरमें सात हैं, पांच जगह तो शिरमें हैं और एक जिह्वामें और एक लिंगेंद्रियके नीचे ये सीवनें शस्त्रसे बचानी चाहिये ( यदि नश्तर लगानेका काम पडे तो इन्हें बचाकर लगाना चाहिये) ॥ १४ ॥ अस्थिसंघात। चतुर्दशास्थ्नां संघाताः । तेषां त्रयो गुल्फजानुवंक्षणेषु। एतेनेतर; सक्थिवाहू च व्याख्यातौ । त्रिकशिरसोरेकैकः ॥१५॥ आस्थिसंघात (हड्डीके शृंगाटक ) चौदह इस शरीरमें हैं उनमेंसे तीन एक पांवमें ऐसे हैं कि एक तो टकनमें, एक घुटनेमें और एक जंघाके मूलमें । इसीप्रकार तीन दूसरे पांवमें और तीन एक हाथमें । इसी भांतिके एक पहुँचेमें, एक कोहनीमें, एक खोदमें । ऐसेही तीन दूसरे हाथमें ये बारह १२ हुए और एकत्रिकस्थानमें और एक शिरमें ऐसे सब १४ हुए (किसी किसीके मतसे ये अस्थिसंघात १८ होते हैं जो १४ तो उपर्युक्त और १ छातीमें जिसे कौडी कहते हैं तथा १ दोनों नितंबोंके बीचमें जिसे टूढी कहते हैं और दो दोनों अंसकूटोंपर ऐसे १८ हुए)॥ १५ ॥ (वा० १३) गयो तु-महत्यो मासरजवश्चततः पृष्टवशमुभयत इत्यष्टौ प्रतिपादयति (इति निबंध- संग्रहः) ॥ (वा० १५) अत्र तु त्रिकपदेन वाहुग्रीवास्यिसंघात उच्यते ॥
(६७७) शारीरस्थान-अ०५. ६९ for सीमंत । चतुर्दशैव सीमंतास्ते चास्थिसंघातवद्णनीयाः यतस्तैर्युक्ता अस्थि- संघाताः। ये युक्ताः संघातास्तु खल्वींदशैकेषाम् ॥ १६ ॥ सीमंत मनुष्यशरीरमें १४ हैं वे अस्थिसंघातके भांतिही गिनने चाहिये क्योंकि अस्थिसंघात सीमंतोंसे मिले हुए हैं ( सीमन्त अवयवकी सीमाके अन्तको कहतेहैं) और जो पहले १४ अस्थिसंघात कहहैं किसीके मतसे वे १८ होते हैं (उनको १५ वें वाक्यकी टीकामें हम गिनाचुके हैं) ॥१६॥ अस्थिसंख्या। त्रीणि सपष्टीन्यस्थिशतानि वेवादिनो आषते। शल्यतंत्रे त्रीण्येव शतानि । तेषां सविंशमस्थिशतं शाखासु । सप्तदशोचरं शतं श्रोणिपार्श्वपृष्ठोदरोरःसु। ग्रीवां प्रत्यूर्द्धं त्रिषष्टिः । एवम- स्थां त्रीणि शतानि पूर्यते ॥ १७ ॥ इस मनुष्यशरीरमें वेदवादी विद्वान् तीनसौ साठ ३६० हड्डियां कहतेहैं परन्तु शल्य- तत्र (चीरफाड़की विद्या) से केवल तीनसौ ३०० ही प्रतीत होतेहैं जिनमेंसे एक- सौ वीस १२० हड्डियां तो चारों हाथों, पैरों में हैं और एकसौ सत्रह ११७ कमर पँसवाडे, पीठ, उदर और छातीमें हैं तथा तिरसठ ६३ हड्डियां ग्रीवासे ऊपर चेह- रेमें हैं ऐसे सब मिलकर पूरीतीनसौ ३०० हुई ॥१७॥ पृथक् पृथक् अस्थिगणना। एकैकस्यां तु पादांगुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पंचदश । तलकूर्च- गुल्फसंश्रितानि दश । पाामेकम् । जंघायां द्वे । जानुन्येकम्। एकमूराविति । त्रिंशदेवमेकस्मिन् सविन भवंति । एतेनेतरस- क्थिवाहू च व्याख्यातौ।श्रोण्यां पंच तेषां गुदभगनितंवेषु चत्वा- रि। त्रिकसंश्रितमेकम् । पार्श्वे षट्त्रिंशदेवमेकस्मिन् । द्वितीयेप्ये- वम् । पृष्ठे त्रिंशत् । अष्टावुरसि। द्वे अक्षकसंज्ञे। ग्रीवायां नवकम् । कंठनाइयां चत्वारि । द्वे हन्वोः। दंता द्वात्रिंशत् । नासायां त्रीणि। एक तालुनि । गंडकर्णशंखेष्वेकैकम् । षट् शिरसि ॥ १८ ॥ (वा०१६) "चतुर्दशैव सीमंता: कथिता मुनिपुगवैः । सधाताः सीविता यैस्तु सीमतास्ते प्रकीर्तिताः॥" (भा० प्र०)॥
, ७० (६७८) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। एक एक पांवकी अंगुलीमें तीन तीन हड्डियां हैं ऐसे पांच अंगुलियोंमें १५ हुई और तलवे, पंजे और टकनेमें १० (इस भांति कि अंगुलियोंकी सीधौ ५, इनके जोडमें १, कचौ २ और टकनेमें दो ऐसे १० हुई ), एडीमें १, जंघामें २, जानु (घुटने ) में १ और साथलमें १ ऐसे सब एक पाँवमें तीस हड्डी हुई इसी हिसा- वसे दूसरे पांवमें ३० और दोनों हाथों में ६० बस चारों हाथ पावोंमें १२० हो- गई । और कमरमें ५ उनमें गुदापर एक, भग या लिंगके ऊपर १, दोनों चूतडोंमें २ और त्रिकसंधिमें १ (ऐसे ५ हुई ), एक पसवाडेमें ३६ और दूसरे पसवाड़े मेंभी ३६ तथा पीठमें ३० और उर (छाती) में ८ और अक्षकसंज्ञ (हंसली) की २ ऐसे धड़में सब ११७ हुई ग्रीवामें ९ और कंठनाडीमें ४ और ठोडीमें २ और दांत ३२, नासिकामें ३, तालुमें १, गलोथे, कान और कनपटीमें एक एक दोनों तरफ ६ हुई, और शिरमें ६ हड्डियां हैं ऐसे चेहरेकी सब ६३ हुई ( इन सबको मिलाया तो हाथ, पांवोंकी १२०, धड़की ११७ और चेहरेकी ६३ सब ३०० पूरी हुई)॥१८॥ एतानि पंचविधानि भवंति । तद्यथा कपालरुचकतरुणवलयन- लकसंज्ञानि । तेषां जानुनितंबांसगंडतालुशंखशिरःसु कपालानि । दशनास्तु रुचकानि । घाणकर्णग्रीवाक्षिकोषेषु तरुणानि । पाणि- पादपार्श्वपृष्ठोदरोरस्सु वलयानि । शेषाणि नलकतंज्ञानि॥ १९॥ भवन्ति चात्र- ये पूर्वोक्त सब अस्थि पांच प्रकारके हैं। यथा कपालसंज्ञक, रुचक सं०, तरुण- सं०, वलय सं० और नलकसंज्ञक । इनमेंसे घुटने, चूतड़, खौदे, गलोथे, तालु, कनपटी और शिरमें कपालसंज्ञक (शरावाकृति) अस्थि हैं । और दांत रुचक (कीलसरीखे) हैं। और नाक, कान, ग्रीवा, नेत्र, कोष इनमें तरुण (कोमल) अस्थि हैं । और हाथ, पांव, पँसवाडे, पीठ, पेट, वक्षस्थल (छाती) इनमें वलयसंज्ञक (गुंफित और खमदारसे )अस्थि हैं शेष अंगुलियों, वाहु, जंघा आदिमें नलकसंज्ञक (नलिकाके आकार वाचसे खाली) अस्थियां हैं ॥ १९॥ इस विषयमें श्लोक है- अभ्यंतरंगतैः सारैर्यथा तिष्ठति सूहाः ॥ अस्थिसारैस्ता देहां धियते देहिनां ध्रुवम् ॥ २०॥ तस्मांचिरविनप्टेषु त्वङ्गांसेषु शरी- रिणाम् ॥ अस्थीनि नं विनश्यति सासण्येतानि देहिनाम् ॥२१॥ मांसान्यत्र निर्वद्धानि शिरांभिः स्नायुभिस्तथा ॥ अस्थीन्यालंबनं कृत्वा न शीर्यन्ते पतंति वा ॥२२॥ 1 J ७१ शारीरस्थान-अ०५. (६७९) जैसे भीतरके सार पदार्थसे वृक्षादि स्थित रहते हैं उसी प्रकार अस्थिके सारसे मनुष्योंके शरीर धारण किये हुए स्थित रहते हैं ॥ २० ॥ इसी कारणसे यदि कभी त्वचा, मांसादि चिरविनष्ट होजायँ ( अर्थात् घटजायँ, सूखजायँ, क्षय होजाय) तो भी अस्थि नष्ट नहीं होते नहीं घटते इसीसे ये देहीके सार हैं ॥ २१ ॥ इन अस्थियों में शिरा और स्नायुवोंसे मांस बँधा हुआ है और अस्थियोंको आलं- वन करके मजबूत किये हुए हैं इस कारणसे ये अस्थि न तो विखरतेहैं और न गिरतेहैं ॥ २२ ॥ संधि । संधयस्तु द्विविधाश्चेष्टावंतः स्थिराश्च ॥ २३ ॥ शाखांसु हन्वोः कटयां च चेष्टीवंतस्तु संधयः ॥ शेषाँस्तु संघयः सर्वे विज्ञेयाँ हि स्थिरा बुधैः ॥ २४ ॥ मनुष्यशरीरमें संधि दो प्रकारकी होती हैं १ चेष्टावाली (जिनमें पसारने, सुको- ड़ने या मुडनेकी शक्ति हो), दूसरे स्थिर जो पसारी,सकोडी न जावें ॥२३॥जिनमें शाखा (हाथ, पैरों) और हनु (ठोडी) तथा कमर इन स्थानोंमें चेष्टावाली (चलाय; मान ) संधियां होती हैं और शेष सब स्थिर संधियां हैं ॥ २४ ॥ संख्यातस्तु दशोत्तरे द्वे शते । तेषां शाखाखष्टषष्टिरेकोनषष्टिः कोठे । ग्रीवां प्रत्यूई व्यशीतिः ॥ २५ ॥ एकैकस्यां पादांगुल्यां त्रयस्त्रयो द्वावंगुष्ठे ते चतुर्दश । जानुगुल्फवंक्षणेष्वेकैकः । एवं सप्तदशैकस्मिन् सनि भवंति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्या- ख्यातौ ॥ २६ ॥ त्रयः कटीकपालेषु । चतुर्विंशतिः पृष्ठवंशे । तावंत एव पार्श्वयोः । उरस्यष्टौ । तावंत एव ग्रीवायाम् । त्रयः कंठे। नाडीषु हृदयक्लोमनिवद्धास्वष्टादश । दतपरिमाणा दंतमू- लेषु । एकः काकलके नासायां च । द्वौ वर्त्ममंडलजौ नेत्राश्रयों गंडकर्णशंखेष्वेकैकः। द्वौ हनुसंधी । द्वावुपारीष्टाद्भुवोः शंखयोश्च । पंच शिरःकपालेषु । एको मूर्ति ॥२७॥ संख्यामें सब संधि दोसौ दश २१० हैं उनमेंसे हाथ, पावोंमें ६८ और धडमें ५९ और ग्रीवासे ऊपर ८३ संधियां हैं ॥ २५ ॥ एक एक पाँवकी अंगुलीमें तीन तीन और अंगुठेमें २ ये सब १४ हुई और टकनेमें १, घुटनेमें १ और कूलमें १ ऐसे एक पांवमें सब १७ संधियां हुई फिर इसी हिसाबसे दूसरे पाँवमें १७ और (६८०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०॥ ७२ हाथमें १७ फिर दूसरे हाथमें१७ऐसे चारों हाथ, पैरोंमें सब६८संधियां हुई॥२६॥ कमर और कपालिकास्थिके वीचमें ३ संधि हैं और पीठके बांसमें २४ और पँसवाड़ोंमेंभी२४छातीमें ८ और ग्रीवामेंभी ८और कंठमें ३ तथा हृदय और क्लोमसे वधीहुई नाडी (नलिका) में १८ और दांतोंके मूलमें ३२ औरघटिकामें १, नासिका- मेंभी १, नेत्रोंके वनमंडल में २, गलोंथा, कर्ण और कनपटियोंमें एक एक ये ६, ठोडीमें २, अकुटीके ऊपर और शंखमें दोदो, शिर कपालमें ५ और मूमें ? इस प्रकार सब संधि २१० हुई ॥ २७ ॥ त एते संधयोऽष्टविधाः । कोरोदूखलसामुद्गप्रतरतुन्नसेवनीवाय- सतुंडमंडलशंखावर्ताः । तेषामंगुलिमणिबंधजानुगुल्फकर्परेषु कोराः संधयः। कक्षवेक्षणदशनेषूदूखलाः। अंसपीठगुदपादनि- तंवेषु सामुगाः । ग्रीवापृष्ठवंशयोः प्रतराः । शिरःकटिकपालेषु नुन्नसेवनी । हन्वोरुभयतस्तु वायसतुंडाः। कंठहृदयनेत्रक्लोमना- डीषु मंडलाः । श्रोत्रशृंगाटकेषु शंखावर्ताः॥ २८ ॥ ये उक्त सव संधियां आठ प्रकारकी हैं १ कोर ( कलिकावत् ), २ उदूखल । ऊखल जैसी), ३ सामुद्ग ( संपुटवत् ), ४ प्रतर (डोंगे सदृश ), ५ नुन्नसेवनी (सीवनके सदृश), ६ वायसतुंड ( काककी चोंचके सदृश ), ७ मंडल (गोल), ८ शंखावर्त (शंखकी आँटीके सदृश ) इनमेंसे अँगुली, पहुँचा, घुटना, टकना और कोहनी इनमें कोरसंज्ञक संधि हैं। कांख, वंक्षण (कूले) और दाँतोंमें उदूखल सदृश संधियां हैं। अंस ( खोदे), पीठ, गुदा, पैर और चूतड इनमें सामुद्गसंज्ञक संधि हैं। ग्रीवा और पीठके वांसमें प्रतरसंज्ञक संधि हैं। शिर, कमर और कपा- लमें नुन्नसेवनी संधि हैं। ठोडीके दोनों तरफवायसतुंड संज्ञक संधि हैं । कंठ, हृदय, नेत्र और क्लोम नाडी (नलिका) इनमें मण्डलाकार सधि हैं। और कान, श्रृंगाट- कोंमें शंखावर्तके तुल्य संधि हैं ॥ २८ ॥ अस्थनां तु संधयोह्येते केवलाः परिकीर्तिताः॥ पेशीस्नायुशिराणां तु संधिसंख्या न विद्यते ॥ २९ ॥ । (वा० २८) कोरो नाम गर्भस्तदाकृतयः कोराः। कोरः कलिका तदाकृतय इत्यन्ये । उदूखला वडुलखहनोपयोगी तदाकृतय उदूखलाः । समुद्गः संपुटस्तदाकृतयः सामुद्गाः प्रतरः प्रतरत्यनेनेति प्रतरः मेलकस्तदाकृतयः प्रतराः । नुन्नसेवनी नुन्ना क्षिप्ता सेवनी यत्र वस्त्रसेवनीवदित्यर्थः । वायसतुंडाः काक- तुहाकृतयः । मंटलाकृतयो मडलाः। शखस्यावर्तवत् शंखावर्ता इति ।
७३ शारीरस्थान-अ०५. (६८१) ये जो पूर्व वर्णन की गई हैं वे केवल हड्डियोंकी संधियां हैं और पेशी, स्नायु और शिरा इनकी संधियोंकी संख्या नहीं होसकती अर्थात् पेशी (गिलटी पट्टे) और नसों और शिरा (रगों) की संधियां अनंत हैं ॥ २९ ॥ स्नायु। नव स्नायुशतानि । तासां शाखासु षट्शतानि । द्वे शते त्रिंशच्च कोष्ठे । ग्रीवां प्रत्यूर्ट्स सप्ततिः ॥३०॥ एकैकस्यां तु पादांगुल्यां षट् निचितास्तास्त्रिंशत् । तावत्य एव तलकूर्चगुल्फेषु । तावत्य एव जंघायाम् ।दश जानुनि । चत्वारिंशदूरौ । दश वंक्षणे । शत- मध्यर्द्धमेवसेकस्मिन्सविश्न भवंति । एते नेतरसक्थिवाहू च व्याख्यातौ ॥ ३१ ॥ षष्टिः कट्याम् । अशीतिः पृष्टे । पार्श्वयोः षष्टिः । उरसि त्रिंशत् । षट्त्रिंशद् ग्रविायाम् । मूर्ध्नि चतुस्त्रिंशत्। एवं नव स्नायुशतानि व्याख्यातानि ॥ ३२॥ भवंति चात्र- मनुष्यके शरीरमें नौसौ ९०० - स्नायु अर्थात् नसें हैं जिनमेंसे ६०० तो शाखा अर्थात् चारों हाथ, पैरोंमें हैं और २३० धडमें हैं। और ग्रीवासे ऊपर चेहरे में ७० नसें हैं ॥ ३० ॥ एक एक पांवकी अँगुलीमें छः छः नसें हैं पांचों अंगुलियोंकी मिल- कर ३० हुई । और ३० ही तलवे, पंजे और टकनेमें हैं । और ३० ही जंघा अर्थात् पिडलीमें हैं । तथा दुश घुटनेमें हैं। और ४० साथलमें हैं। और १० वंक्षण (कूले ) में ऐसे एक पाँवमें सब १५० नसें हुई । इसी हिसाबसे दूसरे पांवमें १५० तथा एक हाथमें १५० और दूसरे हाथमें भी १५० इस भांति चारों हाथ, पैरोंमें सब ६०० नसें हैं॥ ३१॥ कमरमें ६० नसें हैं और पीठमें ८० पसवालोंमें ६० और वक्षस्थलमें ३० हैं ऐसे सब धडकी २३० नसें हुई । फिर ग्रीवामें ३६ और मूर्हो (चेहरे ) में ३४ ऐसे ग्रीवासे ऊपर ७० नसें होगई और सब मिलकर ९०० होगईं ॥ ३२ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- स्नायुश्चतुर्विधा विद्यातास्तु सर्वी निबोध में ॥ प्रतानवत्यो वृत्ता- श्च पृथुलाः सुषिरास्तथा ॥ ३३॥ प्रतानवत्यः शांखासु सर्वसंधि- षु चाप्य॑थ ॥ वृत्तास्तु कंडरीः सर्वाः ज्ञेयास्ताः कुशलैरिहँ ॥ ३४ ॥ आमपक्वाशयांतेषु वस्तो च सुषिराः खलुं ॥ पाोरसि तथा पृष्टे पृथुलाचं शिरैस्यर्थ ॥ ३५ ॥ स्नायु चार प्रकारकी होती हैं जिन्हें मुझसे सुनो १ प्रतानवती, २ वृत्त, ३ पृथुल, ४ सुषिर ॥ ३३ ॥ हाथ, पैरोंमें प्रतानवती (बेलकी तरह फैली हुइ ) नसें A
(६८२)
सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
हैं और संधियोंमें भी प्रतानवतीही नसें हैं तथा जो नसें गोल हैं उन्हेंही कंडरा
जानना, इन्हें पहले बता चुके हैं ( मोटे स्नायु जो गोल हों वे कंडरा कहाती हैं)
॥ ३४ ॥ आमाशय और पक्वाशयमें तथा वस्तिमें सुषिर (छिद्रयुक्त) स्नायु हैं
और पँसवाडे, छाती, पीठ तथा शिर इनमें पृथुला चौडी फैलवां नसें हैं ॥ ३५ ॥
नौर्या फलकांस्तीर्णा बंधनबहुभिर्युता ॥ भारक्षमा भवेदप्सु नृ-
युक्ता सुसमाहिता ॥ ३६॥ ऎवमेवे शरीरेस्मिन् यावंतः संधयः
स्मृतः ॥ स्नायुभिर्व हुँभिवृद्धास्तेने भारसहा नरौः ॥ ३७॥ नै
ह्यस्थीलि न वा पेइयो न शिरा ने चं संधैंयः ॥व्यापादितास्तथा
हँन्युर्यों स्नायुः शरीरिणम् ॥३८॥ यः स्नायूः प्रविजानाति बाह्या-
श्चाभ्यंतरास्ताँ ॥ गूढं शैल्यमाहर्तुं देहाच्छन्नोति देहिनाम्॥३९॥
जैसे नौका अनेक काष्ठफलकोंसे व्याप्त, बहुत बंधनोंसे बँधी हुई बोझा सहनेको
समर्थ होती है और मनुष्योंसमेत जलमें तरनेका साधन होती है उसी प्रकार इस
शरीरमें जितनी संधियां हैं वे सब बहुतसी नसोंसे बँधी हुई हैं इसीसे मनुष्य
वोझेको सहता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ अस्थि अथवा पेशी अथवा शिरा अथवा
संधि विदीर्ण होजावें तो इतना शरीरका नाश नहीं करें जितना स्नायुके विदीर्ण
होने (कटने ) से मनुष्यका नाश होता है ॥ ३८ ॥ इससे जो वैद्य बाहरकी तथा
भीतरकी सम्पूर्ण स्नायुवोंको भले प्रकार जानता है वही शरीरके गूट शल्यको ठीक
ठीक निकाल सकता है अन्यथा नहीं ॥ ३९ ॥
अथ परिशिष्टम् ।
श्लोक-स्नायवः सूत्रवत्सूक्ष्माः शुभ्रा निखिलदेहगाः ॥ कारणानि चेतनानां सदा
चैतन्यसाधने ॥ १ ॥ सुखदुःखावबोधे च प्रवृत्तौ च निवर्तने ॥ रूपगंधरसस्पर्श-
शब्दज्ञाने च हेतवः ॥ २ ॥ निखिलास्ताश्च संजाता मस्तिष्कास्पृष्ठमन्जतः ॥ शिरो-
मंडलमेवाद्याः शेषाः शेषांगमाश्रिताः ॥ ३ ॥ तेषुतेषु चभावेषु देहमाप्तेषु वस्नसाः ।।
कंपमानाः कंपयंत मस्तुलुंग च तत्क्षणात् ॥ ४ ॥ तस्य प्रकंपभेदेन ज्ञानभेदो भवे-
हुः । अतो मस्तिष्कमेवैको ज्ञानहेतुः प्रकीर्तितः॥ ५॥ स्नायुनाशों, भवेद्यस्मि,
नंगे तत्स्यान्मृतोपमम् ॥ पक्षाघातादिरोगेषु कारणं तद्विधं मतम् ॥ ६ ॥
अर्थ-स्नायु सूत्रके तुल्य बारीक और सुपेद सब देहमें व्याप्त हैं और सदैव
चेतनप्राणियोंकी चैतन्यताके साधन हैं ( सर्वत्र रक्तकी गति इन्हींसे है)॥१॥
सुख, दुःखके ज्ञानमें तथा सुख दुःखकी निवृत्ति और प्रवृत्तिमें येही कारण हैं और
रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द इनके ग्रहणमें और ज्ञानमें यही हेतु हैं ॥ २ ॥
शारीरस्थान-अ० ५. (६८३) ये सब मस्तिष्क (दिमाग) से तथा पृष्ठवंशकी मज्जासे उपजती हैं जिनमेंसे जो मस्तिष्कसे उपजी हैं वे तो मस्तिष्कमेंही गमन करती हैं और शेष सब अंगमें व्याप्त होती हैं ॥३॥ जो भाव शरीरमें उत्पन्न होते हैं उनसे उनके संबंध रखने- वाली स्नायु कंपायमान होती हैं फिर उस कम्पसे मस्तिष्कको सूक्ष्म कंप पहुँचाती- है उसी कम्पसे मस्तिष्कको सब ज्ञान होता है इससे मस्तिष्क (दिमाग) ही ज्ञानका हेतु है जैसे किसी वस्तुके प्रतिबिबसे नेत्रगतरूप वहां स्नायु लम्बायमान होकर उस प्रभावको मस्तिष्कमें पहुंचावे जिससे रूपका ज्ञान हो ऐसेही रसा- दिकका ज्ञानभी जानो ॥ ४ ॥ ५ ॥ जिस अंगकी स्नायु नाश होजाय या निक- म्मी होजाय वह अंग मृतके तुल्य होजाता है इसस पक्षाघातादि रोगोंका भी यही कारण है ॥ ६॥ ( आ. वि.) इति परिशिष्टम् । पेशी। पंच पेशीशतानि भवन्ति । तासां चत्वारि शतानि शाखासु । कोष्टे षट्षष्टिः । ग्रीवां प्रत्युद्ध चतुस्त्रिंशत् ॥ ४० ॥ मनुष्यके शरीरमें पांचसौ ५०० पेशी ( मांसकी गिलटियां ) हैं उनमेंसे शाखा ( चारों हाथ, पैरों) में ४०० पेशी हैं और धडमें ६६ तथा ग्रीवासे ऊपर ३४ पेशियां हैं ॥ ४० ॥ पेशियाकी पृथक पृथक् गणना। एकैकस्यां तु पादांगुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पंचदश । दश प्रपदे। पादोपरि कूर्चसन्निविष्टास्तावत्य एव । दश गुल्फतलयोः । गुल्फ- जान्वंतरे विंशतिः। पंच जानुनि । विंशतिरूरौ । दश वंक्षणाशतमे- वमेकस्मिन् सविन भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ४१॥ एक एक पांवकी अंगुलियोंमें तीन तीन पेशी होतीहैं सब पांचों अंगुलियोंकी १५ हुई । दश पंजे और पंजेके ऊपर कूर्चसे मिली हुईभी १०। तथा टकने और तलवेमें दश । तथा टकने और घुटनेके बीच में २० । तथा घुटनेमें ५। और साथलमें २० । और वंक्षण (साथलक ऊपरले जोड़) में१० इस प्रकार एक पांवमें१००पेशियां हैं। फिर इसी हिसाबसे दूसरे पांवमें भी १००। और एक हाथमें १०० और दूसरे हाथमें भी १०० ऐसे चारों हाथ पैरोंकी सब ४०० पेशियां हुई ॥ ४१ ॥ तिस्रः पायौ । एका मेढ़े । सेवन्यां चापरा। वे वृषणयोः। स्फिचोः पंच पंच । द्वे वस्तिशिरसि । पंचोदरे। नाभ्यामेका । पृष्ठोद्धसं- - ७६ (६८४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। निविष्टाः पंच पंच दीर्घाः। पट् पार्श्वयोः । दश वक्षसि । अक्ष- कांसौ प्रति समंतात् सप्त। द्वे हृदयामाशययोः। पट् यकृत्प्लीहों. डुकेषु ॥ ४२ ॥ ग्रीवायां चतस्त्रः। अष्टौ हन्वोः । एकैका काकल- कगलयोः। तालुनि । एका जिह्वायाम् । ओष्ठयो₹ । नासायां द्वे। वे नेत्रयोः। गंडयोश्चतस्रः । कर्णयोढ़े। चतस्रो ललाटे । एका शिरसीत्येवलेतानि पंच पेशीशतानि ॥४३॥ गुदामें ३ पेशी हैं (यही त्रिवली कहलातीहैं ), लिंगमें १ पेशी है, सीवनमें १, वृषणोंमें २, दोनों चूतडोंमें पांच पांच अर्थात् १० हैं, वस्तिके शिरेपर २, और उद- रमें ५, नाभिमें १, पाठके ऊपर संन्निविष्ट पांच पांच वडी पेशियां हैं, पँसवाडोंमें६, छातीमें १०, खोदे और हँसलीके आसपास ७, हृदय और आमाशयमें २, यकृत् , प्लीहा और उंडुक इनमें ६ ये सब मिलाके मध्यभागकी ६६ पेशियां हुई ॥ ४२ ॥ ग्रीवामें ४, ठोडी (जबडों) में ८, काकलक, (काक ) में १, और गलमें १, तालुमें २, जिह्वामें १, होठोंमें २, नासिकामें २, नेत्रों में २, गलोथोंमें ४, कानों में २, ललाटमें ४, शिरमें १ ऐसे ये ग्रीवासे ऊपरकी सब ३४ पेशियां हुई और तीनों जगहकी सब मिलकर ५०० पेशियां हुई ( परंतु गयदासाचार्य वाग्भटके मतसे मध्यभागमें ६० और ग्रीवासे ऊपर ४० पेशी मानतेहैं)॥ ४३ ।। शिरास्नायवस्थिपर्वाणि संधयश्च शरीरिणाम् ।। पेशीभिः संवृतान्यत्र वलवन्ति भवंत्यतः॥४४॥ शिरा,स्नायु और अस्थियोंके जोड़ तथा,देहकी संधियां ये सब पेशियोंसे आच्छा, दित ( मटेहुए ) हैं इसीसे बलवान् ( मजबूत ) रहतेहैं ॥ १४ ॥ स्त्रियों के अधिक पेशी। स्त्रीणां तु विंशतिरधिकाः। दर्श तासां स्तनयोरेकैकस्मिन् पंच पंच यौवने तासां परिवृद्धिः।अपत्यपथे चतस्रस्तासां प्रसृतेऽभ्यंतरतो- (वा० ४३) वाग्भटस्तु पेशीसख्यामित्याह यथा-पच पेगीशतानि तासा चत्वारि शतानि शाखा पष्टिरतराधी चत्वारिंगदूर्ध्वम् । तत्र शाखासु विरोधो नास्ति कोष्ठे पष्टियथा-एकैका मेढ़सेवन्योः । द्वे वृष- णयोः। दश स्किचोः। तिस्रो गुदे ।तास्तु वलीसंजाः। द्वे वस्तिगिरसि। चतन्त्र उदरे । नाभ्यामेका । द्वेदि आमाशये च । पट यकृत्ष्टीहोंडुकेषु । पृष्ठे पचोर्ध्वसनिविष्टाः । दश दीर्घाः पार्श्वयोः । दश वक्षसि । नियासालयोपरितः । एवं मध्यभागे ६० पष्टिः । ऊर्य चत्वारिशत् यथा-दश ग्रीवायाम् । अष्टी गडयोः । अटी इन्वोः । एकैका गलकाकलजिह्वामूर्द्धसु। द्वे द्वे तालुललाटयोः नासौष्ठकर्णेषु च (इति वृ०वाग्भटः)।
७७ शारीरस्थान-अ०५ (६८५) द्वे मुखाश्रिते बाह्ये च प्रवृत्ते द्वे । गर्भच्छिद्रसंश्रितास्तिस्त्रः। शुक्रातवप्रवेशिन्यस्तिस्र एव । पित्तपक्वाशयमध्ये गर्भाशयो यत्र गर्भस्तिष्ठति ॥४५॥ स्त्रियोंके देहमें २० पेशी अधिक होतीहैं जिनमें पांच पांच दोनों चचियोंमें ऐसे १० तो ये हुई ये चूचियोंकी पेशी तरुण (युवा) अवस्थामें बढतीहैं। और योनिमें पेशी हैं इनमेंसे २ पेशी तो योनिके अंतर्गत बलीमें और २ योनिके मुखपर बाहर होती हैं और गर्भछिद्रके आश्रयमें ३, और वीर्य तथाआर्तव ( शोणित ) के गर्भा- शयमें प्रवेश करनेवालीभी ३ ही हैं (ऐसे सब २० हुई) पित्ताशय और पक्काश- यके मध्य में गर्भाशय है यहां ही गर्भ स्थित होताहै ॥ ४५ ॥ पेशियोंके स्वरूप । तासां वहुलपलवस्थूलाणुपृथवृत्तहस्वदीर्घस्थिरमृदुश्लक्ष्णकर्कश- भावाः संध्यस्थिशिरास्नायुप्रच्छादका यथादेशं स्वभावत एव भवंति ॥४६॥ उन पेशियोंमेंसे कोई बहुल (जादा), कोई पेलव(थोडी), कोई स्थूल (मोटी), कोई अणु ( पतली); कोई पृथु (फैली हुई ), कोई वृत्त (गोल),कोई ह्रस्व(छोटी), कोई दीर्घ (लंबी), कोई स्थिर, कोई मृदु (कोमल), कोई श्लक्ष्ण (लजलजी),कोई कर्कश (कठोर ) हैं ये पेशी संधि, अस्थि, शिरा और स्नायुको उस स्थानके अनुसार स्वभावहीसे आच्छादन किये रहतीहैं ॥ ४६ ॥ पुंसी पेश्यः पुरस्तांद्याः प्रोक्ता लक्षणमुष्कजाः॥ स्त्रीणामात्य तिष्ठति फलेमंतर्गतं हि ताः॥४७॥ पुरुषोंके शरीरम जो पेशियां पहले वर्णन करचुकेहैं उनमेंसे तीन पेशी (१लिगमें और २ वृषणों में ) स्त्रियोंकी योनिमें भीतर आच्छादित रहती हैं (गयदासाचार्य इस श्लोकको क्षेपक मानकर प्रमाण नहीं करते वे कहतेहैं कि "पुंसां" अर्थात् पुरुषोंके ५०० पेशी हैं स्त्रियोंके नहीं किंतु स्त्रियोंके तीन न्यून पांचसौ तो ये और बीस अधिक सब ५१७ होती हैं)॥४७॥ मर्मशिराधमनीस्रोतसामन्यत्र प्रविभागः॥४८॥ मर्म, शिरा, धमनी और स्रोतोंका वर्णन और जगहपर किया है ॥ ४८ ॥ गर्भशय्याका वर्णन। शंखनाभ्याकृतियोनिरुयावर्त्ता सा प्रकीर्तिता॥ तस्यास्तृतीये त्वा- .
(६८६) सुश्रुतसंहिता--भा० टी०। वर्ते गर्भशय्या प्रतिष्टिता ॥ ११ ॥ यथा रोहितमत्स्यस्य भुखं भवति रूपतः॥ तत्संस्थानों तारूपां गर्भशय्यां विदुवुर्धाः ॥ ॥ ५० ॥ आ नोसिमुखः शेत गर्भो गर्भाशये स्त्रियाः॥स यो नि शिरसा यौति स्वभावात्प्रंसवं प्रेति ॥ ५१ ॥ स्त्रियोंकी योनि शंखकी नाभिके आकार तीन आंटेवाली होती है उसके तीसरे ऑटेमें गर्भशय्या होतीहै ॥ ४९॥ जैसे रोहित मछलीके मुखका स्वरूप होताहै वैसाही स्थान और रूप गर्भशय्याकाभी होता है ऐसा वैद्य कहतेहैं ॥५० ॥ आभुम (सुकड़ा हुवा) और सम्मुख गर्भशय्या(गर्भाशय)में गर्भ शयन करताहै अर्थात् बालक रहताहै वह प्रसवके समय स्वभावहीसे शिरके बल योनिद्वारपर प्राम होताहै ॥५१॥ मृत शरीर चीरकर देखनेकी विधि । स्वपर्यंतस्य देहस्य योयमंगविनिश्चयः ॥ शल्यज्ञानाते नै व वर्ण्यतेंगेषु केषुचित् ॥ ५२ ॥ तस्मन्निःसंशयज्ञानं ही शल्य- स्य वांच्छता ॥ शोधयित्वा सृतं सम्यक् द्रष्टव्योंगविनिश्चयः॥ ॥ ५३ ॥ प्रत्यक्षतो हि यदृष्ट शास्त्रष्टं च यद्भवेत् ॥ समासत- स्तदुभयं भूयो ज्ञान विवर्द्धनम् ॥ ५४॥ त्वचापर्यंत जो जो शरीरके अंगविभाग हैं उनका ठीकर निश्चय कहीं कहीं शल्य- ज्ञान (चीर फाड कर देखने ) के विना नहीं कहा जासकता ॥ ५२ ॥ इसलिये निस्संदेह ज्ञानकी वांच्छा करनेवाले वैद्य (सर्जन ) को चाहिये कि मृत (मुरदे) की लाशको अच्छे प्रकारसे शोधनकर (चीर फाडकर) अंगोको निश्चय देखे।।५३।। क्योंकि जो जो प्रत्यक्ष देखा जाता है और शास्त्रमेंभी देखा जाता है फिर दोनों वार २ मिलानेसे ज्ञानकी वृद्धि होती है ॥ ५४ ॥ तस्मात्समस्तगात्रसविबोपहतमदीर्घव्याधिपीडितमवर्षशतकंनिः सृष्टांत्रपुरीष पुरुषमावहत्यामापगायां निबद्धं पंजरस्थं मुंजवल्कल- कुशशणादीनामन्यतमेनावेष्टितांगमप्रकाशे देशे कोथयेत् । स- म्यक् प्रकुथितं चोद्धृत्य ततो देहं सप्तरात्रादुशीरवालवेणुवल्कल- कूर्चानामन्यतमेन शनैःशनैरवघर्षयंस्त्वगादीन् सर्वानेव बाह्या- भ्यंतरांगप्रत्यंगविशेषान् यथोक्तान लक्षयेच्चक्षुषा॥५५॥भवतश्चात्र- चीरकर देखनेके वास्ते ऐसे मुरदेको लेवे जिसके सब अंग पूरे हों और जो ७९ शारीरस्थान-अ० ६. (६८७) विषसे (जहरसे)न मरा हो तथा जो लंबी व्याधिसे पीडित न रहा हो तथा जो सौ वर्षका अर्थात् बहुत वृद्ध न हो ऐसे ताजे मुरदेको लेकर उसके आंतडे और विष्ठा, मूत्रादि मल निकालकर उसके सब अंगोंको मूंज या वक्कल या कुशा या शण इनमेंसे किसीसे लपेटकर झरोखेदार संदूक या पिंजरेमें रखकर कम बहनेवाली नदीके गुप्त स्थानमें (जलमें) डालदे और फूलकर गलगला होने दे और जब ठीक २ गल- कर फूलजावे तब उस मृत शरीरको जलसे निकालकर खस, बाल, वाँस या वक्क- लकी कूची या फरचटसे धीरे धीरे त्वचादिको कुरेद २ (हटा २) कर सब बाहर भीतरके अंग, प्रत्यंग, हड्डी, पॅसली, स्नायु, शिरा आदि जैसेके तैसे अपने नेत्रोंसे देख लेवे ॥ ५५ ॥ इस विषय में दो श्लोक हैं- न शक्यश्चर्षा द्रष्टुं देहे सूक्ष्मतमो विभुः ॥ दृश्यते ज्ञानचक्षु- मिस्तपश्चक्षुभिरेव च ॥ ५६ ॥ शरीरे चैव शास्त्रे च दृष्टार्थः स्या- द्विशारदः॥दृष्टश्रुताभ्यां संदेहेमापोह्याचरे"क्रियाः ॥ ५७ ॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने पञ्चमोऽध्यायः॥५॥ इस शरीरमें व्याप्त परम सूक्ष्म जो जीवात्मा है वह नेत्रोंसे नहीं दीख सकता किंतु वह ज्ञानके नेत्रोंसे तथा तपके नेत्रोंसे दीखताहै ॥ ५६ ॥ शरीरमें (चीरकर) और शास्त्र में लिखे हुएको देखनेसे मनुष्य विशारद हो जाता है इससे शरीरमें देखने और शास्त्रमें सुननेसे संदेह निवृत्त करके चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५७ ।। इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा०टी० शारीरस्थाने पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ षष्ठोऽध्यायः ६. अथातः प्रत्येकमर्मनिर्देशं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ यहांसे अगाडी मत्येक मर्मके निर्देशविषयक शारीरका व्याख्यान करते हैं । सप्तोत्तरं मर्मशतम् । तानि मर्माणि पंचात्मकानि । तद्यथा मांस- मर्माणि । शिरामर्माणि। स्नायुमर्माणि । अस्थिमर्माणि । संधिम- माणि चेति । न खलु मांसशिरास्नायवस्थिसंधिव्यतिरेकेणान्या- नि मर्माणि भवंति यस्मन्निोपलभ्यते ॥१॥ मनुष्यके शरीरमें १०७ मर्म हैं वे मर्म पांच भांतिके हैं यथा मांसमर्म, शिरा- मर्म, स्नायुमर्म, अस्थिमर्म और संधिमर्म तथा मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और संधि इनके सिवाय अन्यत्र मर्म नहीं होते क्योंकि और जगह नहीं पाये जाते इससे उन पांचोंहीमें सब १०७ मर्म हैं ॥ १ ॥ (वा० १) मारयतीति मर्माणि मृधातोः मनिन् ।
(६८८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । मर्मसंख्या। तत्रैकादश सांसमर्माणि । एकचत्वारिंशत् शिरामर्माणि । सप्त- विंशतिः स्नायुमर्माणि । अष्टावस्थिमर्माणि । विंशतिः संधि- मर्माणि । तदेतत् सप्तोत्तरं सर्मशतम् ॥ २॥ इन उक्त ममा ११ मांसमर्म हैं, ४१ शिरामर्म, २७ स्नायुमर्म, ८ अस्थि- मर्म और २० संधिमर्म हैं ऐसे सब एकसौ सात १०७ मर्म हुए ॥ २ ॥ माँके स्थानोंकी संख्या । तेषामेकादशैकस्मिन् सक्थिन भवंति । एतेनेतरसक्थिवाहू च व्याख्यातौ। उदरोरसोदशं । चतुर्दश पृष्टे । ग्रीवायां प्रत्यूर्व सप्तत्रिंशत् ॥ ३॥ इनमेंसे ११ मर्मस्थान एक पांवमें होते हैं फिर इसी प्रकार दूसरे पांवमें और हाथोंमें भी ग्यारह २ हुए इस प्रकार सब चारों हाथ, पांवोंके ४४ मर्मस्थान हुए पेट और छातीमें १२ मर्मस्थान हैं तथा १४ पीठमें मर्मस्थान हैं और ग्रीवासे ऊपर चेहरे और शिरमें ३७ मर्मस्थान हैं ॥ ३ ॥ मर्मस्थानोंके नाम। तत्र सक्थिमर्माणि क्षिप्रतलहृदयकूर्चकूर्चशिरोगुल्फेंद्रवस्तिजा- न्वापयूर्वी लोहिताक्षाणि विटपं चेति एतेनेतरं सक्थि व्याख्यातम् इन १०७ मर्मोंमेंसे ११ एक पांवमें जो मर्म हैं उनके नाम इस प्रकारसे हैं- १ क्षिप्रे, २ तलहृदय, ३ कूर्च, ४ कूर्चशिर, ५ गुल्फ, ६ इंद्रवस्ति, ७ जानु, ८ आणि, ९ ऊौं, १० लोहिताक्ष,११ विटप इनके स्थान और लक्षणादि अगाडी स्वयं ग्रंथकार वर्णन करग इससे इनका यहां विशेष विवेचन नहीं किया ॥ ४ ॥ उदरोरसोस्तु गुदवस्तिनाभिहृदयस्तनरोहितापलापान्यपस्तम्भों चेति ॥ ५॥ पृष्ठमर्माणि तु कटीकतरुणकुकुंदरनितम्वपार्श्वसंधि वृहत्यंसफलकान्यसौ चेति ॥ ६॥ वाहुमर्माणि तु क्षिप्रतलह: -दयकूर्चकूर्चशिरोमणिबंधेन्द्रवस्तिकूपराण्यूर्वीलोहिताक्षाणि कक्ष- धरं चेति एतेनेतरो वाहुाख्यातः॥ ७॥ पेट और छातीके मर्म ( अर्थात् धडके मर्म ) ये हैं गुदा, वस्ति, नाभि, हृदय, स्तनमूल २, स्तनरोहित ५, अपलाप २ और अपस्तंभ भी २ (ऐसे १२ हुए)॥ ॥५॥पीठकेमर्म-कटीक, तरुण, कुकुंदर, नितंब, पार्श्वसंधि, बृहती, अंसफलक, - शारीरस्थान-अ० ६. (६८९) और अंस ये सब दो दो हैं ऐसे ये पीठके मर्म १४ हुए ॥ ६ ॥ भुजाके मर्म-क्षिप, तलहृदय, कूर्च, कूर्चशिर, मणिबंध, इंद्रवस्ति, कूपर, आणि, उर्वी, लोहिताक्ष और कक्षधर ये ११ भुजा ( एक हाथ ) के मर्म हैं इसी प्रकार दूसरे हाथमें ११ समझे ॥ ७॥ जत्रू मर्माणि चतस्रो धमन्योऽष्टी मातृका द्वे कृकाटिके द्वे वि- धुरे द्वौ फणो द्वावपांगौ द्वावावत्तौं द्वावुरक्षेपौ द्वौ शंखावेका स्थ- पनी पंच सीमंताश्चत्वारि शृंगाटकानि एकोऽधिपतिरिति ॥८॥ ग्रीवासे ऊपरके मर्म चार धमनी, आठ मात्रिका, दो कृकाटिका, दो विधुर, दो फणा, दो अपांग, दो आवर्त, दो उत्क्षेप, दो शंख, एक स्थपनी, पांच सीमन्त, चार शृंगाटक और एक अधिपति ऐसे ये ग्रीवासे ऊपर ३७ मर्म हुए ( इन सबका वर्णन अगाडी होगा)॥८॥ मांसादिभेदसे मर्म । तत्र तलहृदयेंद्रवस्तिगुदस्तनरोहितानि मांसमर्माणि ॥ ९॥नी- लधमनीमातृकाशृंगाटकापांगस्थपनीफणस्तनमूलापलापापस्तंभ- हृदयनाभिपार्श्वसंधिबृहतीलोहिताक्षोwः शिरामर्माणि ॥१०॥ आणिविटपकक्षधरकूर्चकूर्चशिरोवस्तिक्षिप्रांसविधुरोरक्षेपाः स्ना- युमर्माणि ॥ ११ ॥ कटीकतरुणनितंवांसफलकशंखास्त्वस्थिम- मर्माणि ॥ १२ ॥ जानुकूर्परसीमंताधिपतिगुल्फमणिबंधकुकुंदराव तकृकाटिकाश्चेति संधिमर्माणि ॥ १३ ॥ इन १०७ मर्मी से तल, हृदय, इंद्रवस्ति, गुदा, स्तनरोहित ये मांसमर्म हैं ( अर्थात् इतनी जगह मांसगत मर्म जानना) ॥९॥ नीलधमनी, मातृका,शृंगा- टक, अपांग, स्थपनी, फण, स्तनमूल, अपलाप, अपस्तंभ, हृदय, नाभि, पार्श्वसंधि, बृहती, लोहिताक्ष और ऊर्वी ये शिरामर्म हैं ॥१०॥ आणि, विटप, कक्षधर, कूर्च, कूर्चशिर, वस्ति, क्षिप्र, अंस, विधुर, उक्षेप पे स्नायुमर्म हैं ॥ ११ ॥ कटीक तरुण नितंब, असफलक और शंख ये अस्थिमर्म हैं ॥ १२॥ जानु, कूर्पर, सीमंत, अधिपति, गुल्फ, मणिबंध, कुकुंदर, आवर्त और कृकाटिका ये संधिमर्म हैं ॥१३॥ पांच प्रकारके मर्म। तान्येतानि पंचविकल्पानि मर्माणि भवंति। तद्यथा सद्यःप्राणह- - - . " f मर्म। (६९०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। राणि कालांतरप्राणहराणि विशल्यनानि वैकल्यकराणि रुजाक- राणीति ॥ १४ ॥ तत्र सबःप्राणहराण्येकोनविंशतिः । कालांत. रप्राणहराणि त्रयस्त्रिंशत्। त्रीणि विशल्यप्नानि। चतुश्चत्वारिंशद्वै- कल्यकराणि । अष्टौ रुजाकराणीति ॥१५॥ भवंति चात्र- • ये समस्त १०७ मर्म फिर पांच प्रकारके होते हैं जैसे कोई तत्काल प्राण हरन- वाले (अर्थात् उनपर चोट लगनेसे तत्काल मृत्यु हो), और कोई कालांतरमें प्राण हरनेवाले होते हैं, कोई विशल्यन्न अर्थात् शल्य निकालतेही प्राण हरनेवाले होतेहैं, कोई विकलता करनेवाले होतेहैं और कोई अतिपीडा करनेवाले होतेहैं ॥ १४ ॥ जिनमें १९ सद्य प्राणहर हैं, तथा ३३ कालांतर में प्राणनाशक हैं, तीन विशल्यन हैं, ४४ विकलता करनेवालहैं, और ८ अति केशदायक हैं ॥ १५ ॥ इस विष- यमें श्लोक हैं- सद्य:प्राणहर श्रृंगाटकान्यविपतिः शंसो कंठशिरा गुदम् ॥ हृदयं वस्तिनाभी च नंति सद्यो हतानि तु ॥१६॥ • शृंगाटक ४, अधिपति १, शंख २ कंठकी शिरा ८, गुदा १, हृदय १, वस्तिर और नाभि १ये १९ मर्म सद्यःप्राणनाशक हैं अर्थात् इनपर विशेष जरव आनेसे मनुष्य तत्काल मरजाताहै ॥ १६ ॥ कालांतरप्राणहर और विशल्यन्न मर्म । वक्षोमर्माणि लीसंततलक्षिपेंद्रवस्तयः ॥ कटीकतरुणे संधी पा- वजौ वृहती च या ॥ १७॥ नितंबाविति चैतानि कालांतरह- राणि तु ॥ उत्क्षेपौ सपनी चैव विशल्यनानि निर्दिशेत् ॥ १८ ॥ वक्षस्थलके मर्म ८, सीमंत ५ तलहृदय ४, क्षिन १, इंदवस्ति ४, कटीकतरुण २, पार्श्वसंधि २,बृहती२, नितंब २ ऐसे ये ३३ मर्म कालांतरसे प्रागनाशक हैं।॥१७॥ उक्षेप २ और स्थपनी १ ये ३ मर्म विशल्यन्न हैं अर्थात् इनमें जबतक शल्य रहे तब तक तो मनुष्य जीवे और शल्य निकालही मरजावे ॥ १८ ॥ वैकल्यकर मर्म। लोहिताक्षणि जानींकूर्चाक्टिरपराः ॥ कुसुन्दरे कक्षधरे (वा० १४) विशल्यनानि हात-यग शल्यत्वेन मरकाणीत्ययः ॥ (ले०.६ ) कंठाशग ८ मातृकाः।। ( लो० १७ ) वक्षोमर्माणााते-रतनबूल २ । स्तनोहिते २१ अपलपी २ । अपस्तम्मी २ इत्यष्टी वयोमर्माणोति ॥
r शारीरस्थान-अ० ६. (६९१) विधुरे सकृकाटिके ॥ १९ ॥ अंसांलफलकापांगा नीले मन्ये फणौ तथा ॥ वैकल्यकरणान्याहुरावत्तौ द्वौ तथैव च ॥ २० ॥ वैकल्पकर ४४ मर्म इस प्रकार हैं कि लोहिताक्ष ४,आणि ४, जानु २, ऊर्वी४, कूर्च ४, विटप २, कूपर २, कुकुंदर २, कक्षधर २, विधुर २, कृकाटिका २, अंस २, असफलक २, अपांग २, नीलधमनी २, मन्या-२, फण २, तथा आवर्त २ ऐसे ये ४४ विकलताकारक मर्म हैं ॥ १९ ॥ २० ॥ रुजाकर मर्म। गुल्फो द्वौ मणिबंधौ द्वौ द्वे द्वे कूर्चशिरांसि च ॥ रुजॉकराणि जाँनीयादृष्टावेतानि बुद्धिमान् ॥ २१॥ क्षिप्राणि विद्धमात्राणि नंति कालांतरेण च ॥ २२॥ दो गुल्फ, दो मणिबंध, हाथ पांवोंके दो दो कूर्चशिर ऐसे ये ८ मर्म रुजाकर (अतिकष्टदायक ) हैं इन्हें बुद्धिमान् जान लेवे ॥ २१ ॥ क्षिप्रनामक मर्म विद्ध- मात्रही कालांतरमें प्राणनाशक होते हैं इससे प्रयोजन यह है कि अन्य मर्म तो छैदन होनेसे प्राणहर होते हैं और ये क्षिम विधनानेमात्रसे कालांतरमें प्राणहर हो जाते हैं अथवाये मर्म जो सद्या माणहर हैं वे थोड़ेसे विद्धमात्र हों तो कालांतरसे मृत्युकारक होते हैं ॥ २२ ॥ मर्मस्थानों में प्राणोंकी स्थिति । मर्माणि नाम मांसशिरांताबस्थिसंनिपातास्तेषु स्वभावत एवंविशेषे- ण प्राणाँस्तिष्ठति तस्मान्मर्मस्वमिहतस्तांस्तान्भावानापद्यन्ते ॥२३॥ मर्मस्थानों में प्रायः मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और संधि इनका सन्निपात (मेल) होता है तो उस जगह स्वभावहीसे विशेष करके प्राण रहते हैं इसी हेतुसे मममें चोट लगनेसे उनही उपरोक्त (सद्यःप्राणहरव आदि) भावोंको मनुष्य प्राप्त होते हैं ( अथवा मोह प्रलापादिको प्राप्त होता है ) ॥ २३ ॥ तत्र सद्यःप्राणहराण्याग्नेयान्यग्निगुणेष्वाशु क्षीणेषु क्षपयंति ॥ ॥ २४ ॥ कालांतरप्राणहराणि सौम्याग्नेयान्यग्निगुणेष्वाशु क्षी- णेषु क्रमेण च सोसगुणेषु कालांतरेण क्षग्यति ॥ २५ ॥ विश- (वा. २३ ) सोनपातः सश्लेष: अत्यतमिश्रीभाव इति । प्राणा. अग्न्यादयः । नास्तानिति-"इद्रि- यायेंष्वसंप्राप्तिमनोबुद्धिविपर्यय." इत्मादिकानवोक्तान् । अन्ये तु भ्रम. प्रलापः परनं प्रमोद इत्यादिकान् सूत्रस्थानोक्तानाहुः ( इति हल्लनः ) केचित्त तास्तान भावानिाते-अशःप्राणहरत्वकालान्तरमाणहरत्वद्रि- शल्यनत्वर्वकल्यकरत्वरुजाकरत्वान्भावानापद्यते इति भाषते ।।
" (६९२) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ल्यप्राणहराणि वायव्यानि शल्यमुखनिरुद्धो यावदतर्वायुस्तिष्ठति तावज्जीवत्युद्धृतमात्रे नु शल्ये मर्मस्थानाश्रितो वायुनिष्कामति तस्मात्लशल्यो जीवत्युद्धृतशल्यो म्रियते ॥ २६ ॥ वैकल्यकराणि सौम्यानि सोमो हि स्थिरत्वाच्छेत्याच्च प्राणावलंबनं करोति॥२७॥ रुजाकराण्यग्निवायुगुणभूयिष्ठानि विशेषतश्च तौ रुजाकरौ पांच- भौतिकी च रुजामाहुरेके ॥ २८ ॥ उनमेंसे 'सद्यःप्राणहर ' मर्म अमिगुग प्रधान होते है और अग्नि तीक्ष्ण है इसंस शीव नष्ट होता है उसके क्षीण होनस शीव मृत्युकारक होते हैं ॥ २४ ॥ कालांतरप्राणहर" ममें सोम और अग्नि दोनों प्रधान होते हैं यहां अग्नि- गुण तो तत्काल नष्ट होही जाता है पर सामगुण क्रमसे धीरे धीरे नष्ट होता है इससे सोमगुण नष्ट होनेपर कालांतरमें मृत्युकारक होते हैं ॥ २५ ॥ "विशल्यन्न" मर्म वायुगुण प्रधान होते हैं उनमें शल्यके मुखस जबतक भीतरका वायु रुका रहता है तबतक मनुष्य जीता है और शल्य निकलतेही उस मर्मस्थानका वायु निकल जाता है इस कारण शल्ययुक्त जवतक रहे तबतक जीता है और फिर शल्य निकलतही मरजाता है ॥ २६ ॥ "वैकल्यकर" मर्म सोमगुण प्रधान होते हैं और सोम स्थिर और शीतल है इससे प्राणोंको अवलंबन करता है ( इसीसे मूर्छादिकारक तो होते हैं पर मृत्युकारक नहीं होते) ॥ २०॥"रुजाकर " मर्म अग्नि-वायु गुण प्रधान होते हैं और ये दोनों विशेष करके पीडाकारक होते हैं इसीसे इनमें अति पीडा होती है और पीडाको कई पंचभूतात्मक कहते हैं ॥२८॥ केचिदाहुर्मासादीनां पंचानामपि समस्तानां विवृद्धानां च सम- वायात्सद्यःप्राणहराणि । एकहीनानामल्पानां वा कालांतरप्राण- हराणि । द्विहीनानां विशल्यप्राणहराणि । त्रिहीनानां वैकल्य- कराणि। एकस्मिन्नेव रुजाकराणीति। यतश्चैवमतोऽस्थिमर्मस्वप्य- भिहतेषु शोणितागमनं भवति ॥ २९ ॥ कई आचार्य ऐसा कहते है कि मांसादिक पांचों ( मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि ओरसंधि) की वृद्धि होकर ( मुख्यतासे जहांपर समवाय संबंध हो वेमर्म तत्काल प्राणहर हैं । और जहाँपर एक नहीं है या कम हैं वे कालांतरसे प्राणनाशक हैं। और जहां दोका अभाव है व विशल्यन्न हैं। तथा जहाँपर तीनोंका अभाव है (केवल दोही है ) व विकलताकारक हैं। और जहां (चारोंका अभाव है ) एकही - ८५ शारीरस्थान-अ० ६. (६९३) है वे रुजाकर हैं। इन पांचोंका कहींपर स्थूलरूपसे समवाय है और कहींपर सूक्ष्मरूपसे क्योंकि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि अस्थिमर्ममें रुधिर नहीं दीख- ताहै तो भी छेदन करनेसे रुधिरका आगमन होता है इससे सबका सबमें संयोग जानना चाहिये ( और जहांपर सबकी उत्कृष्टता है वह सद्यःमारक तथा जहां एक हीन अर्थात् एककी अनुत्कृष्टता और चारोंकी उत्कृष्टता हो वह कालांतरमारक हैं इत्यादि । स्तनमूल, अपलाप, अपस्तंभ और सीमंत आदि:मर्म मांसहीन है स्तन रोहित, तलहृदय, क्षिप आदि अस्थिहीन हैं, उत्क्षेप मांस और संधिहीन हैं स्थ- पनी मांस, शिरा, स्नायुहीन हैं तथा गुल्फ और , मणिबंध ये मांस, शिरा, स्नायु और अस्थिहीन हैं इत्यादि और भी जानो) ॥ २९ ॥ चतुर्विधा यांस्तु शिराः शरीरे प्रायेण ता मर्मसु संनि विष्टाः ।। स्नायवस्थिमांसानि तथैवं संधीन् सतर्घ्य देह प्रतिपालयति ॥ ॥३०॥ ततः क्षते मर्माण ताः प्रवृद्धः संमंततो वायुरभिस्तूं- णोति ॥ विवर्द्धमानस्तु से मातरिश्वा रुजः सुतीनाः प्रतनोति काये ॥३१॥ रुजाभिभूतं तु पुनः शरीरं प्रलीयते नईयति चास्य संज्ञा ॥अौ हि शैल्यं विनिहर्तुमिच्छन्माणि यलेन परीक्ष्य करेत् ॥ ३२॥ एतेन शेषं व्याख्यातम् ॥ ३३॥ चारों प्रकारकी (वात, पित्त, कफ, रक्तकी) शिरा प्रायः मर्मस्थानमें स्थित होती हैं और स्नायु, अस्थि और संधियोंको तृप्तकर शरीरको पालती है ॥३०॥ इसी कारण मर्ममें चोट लगनेसे आसपासका वायु बढकर उन शिराओंमें व्याप्त होजाता- है और फिर वह बढाहुआ वायु (शिराओं द्वारा शरीरमें फैलकर) देहमें तीव्र पीडा करता है ॥ ३१ ॥ और फिर जब शरीरमें अत्यन्त पीडा होती है तोया तो संज्ञा- नाश (बेहोशी) होजाती है या मृत्यु होजाती है इस हेतु शल्य निकालनेवाले (चीर फाड करनेवाले ) वैद्यको चाहिये कि यत्नपूर्वक मर्मीकी परीक्षा करके शल्य निकाले ॥ ३२ ॥ जिस प्रकार वायुको बहानेवाली शिराओंके छेदनसे पीड़ा और मृत्यु वर्णन किया है इसी प्रकार पित्तको बहानेवाली शिरामें छेदन होनेसे शरीरमें दाहादि बढकर और कफवहा शिराके छेदनसे स्रोतोंका निरोधादि होकर विकलता और मृत्यु हो जाती है इसी प्रकार रक्तवहा शिरासे अतिरक्तागम हो- कर संज्ञानाशादि हो जाता है ॥ ३३ ॥ मौके निकट वेधनका प्रभाव । तत्र सद्यःप्राणहरमंते विद्धं कालांतरेण मारयति । कालांतरप्रा- ८६ सुश्रुतसंहिता-भा. टी०। (६९४) गहरमंते विद्धं वैकल्यमापादयति । विशल्यप्राणहरमंते विद्धं कालांतरेण क्लेशयति रुजां च करोति । रुजाकरमतीनवेदनं भवति ॥३४॥ इनमेंसे सद्याप्राणहर मर्मके अंतप्रदेश (निकट) क्षत होवे तो तत्काल मृत्यु न हो कालांतरमें हो । और कालांतरमारक मर्मके समीप विद्ध हो (चोट लगे) तो विकलताकारक हो । और विशल्पन्न मर्मके निकट वेध हो तो कालांतरमें क्लेश करे अथवा उसी समय पीडा करे और रुजाकर मर्मके समीप विधे तो अल्प पीड़ा होवे ॥ ३४ ॥ तत्र सद्यःप्राणहराणि सप्तरात्राभ्यंतरान्मारयति । कालांतर- प्राणहराणि पक्षान्मासाद्वा । तेष्वपि तु क्षिप्राणि कदाचिदाशु मारयति । विशल्यप्राणहराणि वैकल्यकराणि च कदाचिदत्य- भिहतानि मारयति ॥३५॥ इनमें सद्यप्राणहर सात दिनके भीतर मृत्युकारक होते हैं । और कालांतर- मारक पक्षभरमें या महीनेमें (या इससे भी अधिक समयमें) मृत्युकारक होते हैं उनमें भी क्षिप्र मर्म कभी कभी तत्काल मृत्यु करते हैं। और विशल्यन तथा वैक- ल्यकारक मर्मों में कभी २ अधिक चोट लगे तो मृत्युकारक हो जाते हैं ॥ ३५ ॥ अत उर्दू प्रत्येकशो मर्मस्थानान्यनुव्याख्यास्यामः ॥ ३६ ॥ इसस अगाड़ी प्रत्येक मर्मका स्थान और उसके विवेचनका व्याख्यान करते है ॥ ३६॥ तन्त्र पादांगुष्ठांगुल्योर्मध्ये क्षिप्रं नाम मर्म तत्र विद्धस्याक्षेपकेण मरणम् ॥ ३७ ॥ मध्यमांगुलीमनुपूर्वेण मध्ये पादतलस्य तल- हृदयं नाम तत्रापि रुजासिमरणम् ॥३८॥ क्षिप्रस्योपरिष्टादुभ- यतः कूओं नाम तत्र पादस्य भ्रमणवेपने भवतः ॥३९ ॥ गुल्फ- संधेरध उभयतः कृर्चशिरो नाम तत्र रुजाशोफौ ॥ ४० ॥ इनमें पांवके अँगूठे और अँगुलीके बीचमें "क्षिप्र"नामक मर्मका स्थान है वहां विधनसे आक्षेपक वातव्याधि होकर (कालांतरमें) मृत्यु होतीहै ॥ ३७ ॥ मध्यमा (वा०३४ ) अते विद्धं समीपे विद्वम् । रुजाकरमतीव्रवेदन भवतीत्यत्रापि अते विद्वमित्यस्याध्याहारः ।। (वा० ३७) स्नायुममेंदमागुल कालातरप्राणहरम् ॥ (वा० ३८) मध्यमाशुलिमनुलक्ष्यीकृत्य मांस- ममदमीगुल कालातरघ्नम् ॥ (वा०३९) क्षिप्रस्योपरिष्टादिति-द्यगुले म्नायुमर्मेदं चतुरंगुल वैकल्यकरम्।। ( वा० ४०) कुर्चशिरोपि स्नायुमर्म वैकत्यकरम् ॥ 1 एकागुल ८७ शारीरस्थान-अ०६. (६९५) अँगुलीकी संधिमें पांवके तलवेके बीच में “तलहृदय" नाम मर्म है यहां पिंधनेसे पीड़ा होकर मृत्यु होती है ॥ ३८॥ क्षिप्रसे ऊपर पंजेकी तरफ दोनों ओर "कूर्च नाम मर्म है वहांके वेधसे पांवमें भ्रमण और कंपन होताहै ॥ ३९ ॥ गुल्फ(टकने) की संधिसे नीचे दोनों तरफ “ कूर्चशिर " नाम मर्म है वहां विंधनेसे पीड़ा और साजन होता है ॥ ४० ॥ पदजंघयोः संधाने गुल्फो नाम तत्र रुजः स्तब्धपादता खंजता वा ॥४१॥ पाणि प्रति जंघामध्ये इंद्रवस्तिर्नाम तत्र शोणित- क्षये मरणम् ॥ ४२ ॥ जंघोळः संधाने जानु नाम तत्र खंजता ॥४३॥ जानुन ऊर्द्धमुभयतख्यंगुलमाणिर्नाम तत्र शोफाभिवृद्धिः स्तब्धसक्थिता च ॥४४॥ पांच और पिंडलियोंकी संधिमें "गुल्फ" नामक मर्म है.वहां चोट लगनेसे पीडा, पांवका जकड़ जाना और लँगडापन होता है ॥ ४१ ॥ एडीकी संधिमें जंघाके मध्यमें "इंद्रवस्ति" नाम मर्म है वहां विंधनेसे रक्तक्षय होकर मृत्यु हो॥४२॥ पिंडली और साथलकी संधिमें "जानु" (घुटना) नाम मर्म है वहां चोट लगे तो लंगडापन होताहै ।। ४३ ॥ और घुटनेसे ऊपर दोनों तरफ तीन अंगुल “आणि" नाम मर्म है वहां विंधनेसे शोथकी वृद्धि और साथल अकड जातीहै ॥ ४४ ॥ ऊरुमध्ये ऊर्वी नाम तत्र शोणितक्षयात् सक्थिशोषः ॥ ४५ ॥ ऊर्ध्या ऊर्द्धमधो वंक्षणसंधेरूरुसूले लोहिताक्षं नाम तत्र लोहि- तक्षयेण पक्षाघातः॥४६॥ वक्षणवृषणयोरंतरे विटप नाम तत्र पांड्यमल्पशुक्रता वा भवति-॥४७॥ एवमेतान्येकादश सक्थि- मर्माणि व्याख्यातानि एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ ॥४८॥ साथलमें "ऊर्वी" नाम मर्मस्थान है वहां क्षत होनेसे रुधिर क्षय होकर साथल सूख जाती है ॥ ४५ ॥ ऊर्वीसे ऊपर वंक्षणसंधिसे नीचे साथलके मूलमें “लोहि- ताक्ष' नाम मर्म है वहां क्षत होकर रुधिर निकलनेसे पक्षाघात होजाता है॥४६॥ (वा० ४१) गुल्फः सधिमर्म द्यगुल वैकल्यकरम् ।। (वा० ४२ ) इन्द्रवस्तिः मासमर्मेदमागुलं कालांतरप्राणहरं तत् पाणि प्रति त्रयोदशागुले स्थितं भोजस्तु घगुलमाह गयदातोपि तन्मतेन ह्यगुलमेव व्याख्याति ॥ (वा० ४३ ) जानुसंधिमर्मेद वैकल्यकरम् ॥ ( वा० ४४) आणिश्च स्नायुमर्म कल्य- करमर्दोगुलम् ॥ ( वा० ४५) अर्वी नाम गिरामर्स अर्दोगुलं वैकल्यकरम् ॥ ( वा० ४६) लोहिता- क्षमपि शिरामर्म वैकल्यकरमर्दोगुलम् ॥ (वा०४७ ) विटपं नाम लायुमर्म वैकल्यकरमेकांगुलप्रमाणम् ॥ ..
M T &c. (६९६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। और वंक्षण (नले) और वृषणोंके बीचमें "विटप' नाम मर्म है यहां चोट लगनेसे नपुंसकता अथवा शुक्रकी अल्पता होती है ॥ ४७ ॥ इसप्रकार एक पांवके ११ मर्म वर्णन किये हैं इसी भौति दूसरे पांव और दोनों हाथोंका व्याख्यान समझना चाहिये ॥ ४८॥ विशेषतस्तु यानि सक्थिन गुल्फजानुविटपानि तानि वाही मणि- बंधकूपरकक्षधराणि । यथा वंक्षणवृषणयोरतरे विटपमेवं वक्षः- कक्षयोर्मध्ये कक्षधरं तस्मिन्विद्धे त एवोपद्रवाः। विशेषतस्तु मणि- बंधे कुंठता । कूपराख्ये कुणिः । कक्षधरे पक्षाघातः॥४९॥ एवंमे- तानि चतुश्चत्वारिंशच्छाखासु मर्माणि व्याया॑तानि ॥ ५० ॥ हाथ, पांवोंके मोमें विशेष इतना है कि जैसे पांवमें गुल्फ (टकने ), जानु (घुटने) और विटप (नलों और वृषणोंके मध्य )हैं पैसे हाथों में टकनोंकी जगह पहुँचे और घुटनोंकी जगह कूपर ( कोहनी) और विटपकी जगह कक्षधर जानना जैसे नलों और अंडकोशके वीचमें विटप है इसी भांति वक्षस्थल और कांखके मध्यमें कक्षधर होते हैं और उनके विधनेसे वेही पांवोंकेसे उपद्रव होते हैं इतना विशेष है कि मणिबंध (पहुंचा) विधनेसे हाथ निकम्मा हो जावे और कोहनीपर चोट लग- नेसे हाथका न मुडमा तथा कक्षधरपर चोट लगे तो पक्षाघात हो जावे ॥ ४९ ॥ ऐसे ये शाखा अर्थात् हाथ, पांवों में स्व ४४ मर्म वर्णन किये गये हैं ॥ ५० ॥ अत ऊर्ध्वमुदरोरसोमर्मस्थानान्यनुव्याख्यास्यामः॥ ५१॥ इसके अगाड़ी अब पेट और छातीके मर्मस्थानका व्याख्यान करतेहैं ॥ ५१ ॥ तत्र वातवचोनिरसनं स्थूलांत्रप्रतिवद्धं गुदं नाम मर्म तत्र सद्यो- मरणम् ॥ ५२ ॥ अल्पमांसशोणितोऽभ्यंतरतः कट्यां मूत्राशयो वस्तिर्नाम तत्रापिं सद्योमरणमईमरीत्रणाते तत्राप्युभर्यंतो भिन्न न जीवत्येकतो भिन्ने मूत्रस्रावी वणो भवति स तु यत्नेनोपक्रा- तो रोहति ॥ ५३॥ तहां अधोवायु और विष्ठाके निकलनेका द्वार बडे आंतड़ेसे मिला हुवा “गुद" नाम मर्मस्थान है वहां क्षत होनेसे सद्यः मृत्यु होवे ॥ ५२ ॥ जिसमें मांस और रक्त अस्प है और कमरके भीतर मूत्रका स्थान ऐसा "वस्ति" नाम मर्म है वहां (वा० ५२) गुद नाम चतुरंगुल मांवमर्मेदमू ।। ( वा० ५३) वस्तिनीम स्नायुमर्म चतुरं. गुलं मन्य पाणदरम् ॥ १६ .. शारीरस्थान-अ०६. (६९७) बिंधनेसे सद्यः मृत्यु होतीहै इसमें पथरीके एक पावसे मृत्यु नहीं होती यदि दो घाव होजावें तो मृत्यु हो और एक छिद्रसे मूत्र बहनेवाला घाव होजाताहै वह यत्नसे चिकित्सा किया हुवा भरभी जाताहै ॥ ५३ ।। पक्कामाशययोर्मध्ये शिराप्रभवा नाभिर्नाम तत्रापि सद्य एव मर- णम् ॥ ५४॥ स्तनयोर्मध्यमधिष्ठायोरस्यामाशयद्वारं सत्त्वरजस्त- मसामधिष्ठानं हृदय नाम तत्र सद्य एव मरणम् ॥ ५५॥ स्त- नयोरधस्ताद्दयंगुलमुभयतः स्तनमूले नाम मर्मणी तत्र कफपूर्ण- कोष्ठतया कासश्वासाभ्यां म्रियते ॥ ५६ ॥ पक्वाशय और आमाशयके बीच में शिराओं उत्पन्न ऐसा "नाभि' नाम मर्म- स्थान है वहां छेदन हो तो सधाही मृत्यु होवे ॥ ५४ ॥ दोनों चूंचियोंके बीच छातीमें आमाशयके ऊपरके द्वारके समीप सत्त्व, रज और तमोगुण इनका मुख्य स्थान "हृदय" नाम मर्मस्थान है यहां क्षत होनेसे तत्काल मृत्यु होतीहै ॥ ५५ ॥ दोनों चूचियोंफे नीचे दो अंगुल दोनों तरफ दो “स्तनमूल' नाम मर्म हैं यहां क्षत हो तो कफसे कोष्ठ पूर्ण होकर खाँसी, श्वाससे मृत्यु होवे ॥ ५६ ॥ स्तनचूचकयोरूर्व द्वयंगुलमुभयतः स्तनरोहितौ नाम तत्र शोणि- तपूर्णकोष्टतया कासश्वासाभ्यां म्रियते ॥५७ ॥ अंलकूटयोरध- स्तात्पाश्वोपरिभागयोरपलापो नाम तत्र रक्तेन पूयभावं गतेन मरणम् ॥ ५८॥ उभयत्रोरसो नाड्यौ वातवहे अपस्तंभौ नाम सत्र वातपूर्णकोष्ठतया कासश्वासाभ्यां चमरणम् ॥५९॥ एवमेता- न्युदरोरसोर्टादश मर्माणि व्याख्यातानि ॥६॥ स्तन (चूंचियों) के ऊपर दो दो अंगुळ दोनों तरफ “स्तनरोहित” नाम दो मर्म हैं वहां विध जानेसे रुधिरसे कोष्ठ परिपूर्ण होकर खाँसी, श्वाससे मृत्यु होवे ॥५७ ॥ अंसकूट ( कंधों) से नीचे पँसवाडोंके ऊपर "अपलाप" नाम दोनों तरफ दो मर्म- स्थान हैं यहां विंधनेसे रुधिरका पीव होकर मृत्यु होवे ॥ ५८ ॥ उर (हृदय) के दोनों तरफ वायुको बहानेवाली दो नाडियां अपस्तंभ " नामक दो मर्म हैं (वा० ५४) नाभि म शिरामर्म चतुरगुलप्रमाणम् । हृदय चतुरगुलं कमलमूकुलसदृश सिरामर्मे- दम् ॥ (वा० ५६) स्तनमूल मंगल शिरामर्मणी कालांतरप्राणहरे ।। ( वा० ५७ ) स्तनरोहिती नाम भासममणी अौगुलप्रमाणे कालांतरप्राणहरे ॥ (वा० ५८ ) अपलापी नाम शिराममणी चा गुले कालानरमाणहरे ॥ (वा० ५९) अपस्तंमी शिराममणी कालातरप्राणहरे अद्धाणुले ॥ -- .
६९८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। ९० हां विधनसे कोष्टमं वायु भरजावे और खांसी, श्वाससे मृत्यु हो । ५९ ॥ ऐसे ये दर और छातीके १२ मर्म कहे ॥ ६० ॥ अत ऊर्द्ध पृष्ठमाण्यनुव्याख्यास्यामः ॥६१ ॥ इससे अगाडी पीठके मौका वर्णन करते हैं ॥ ६१ ॥ तत्र पृष्ठवंशसुभयतः प्रतिश्रोणीकांडमस्थिनी कटीकलरुणे नाम मर्मणी तत्र शोणितक्षयात् पांडुविवों हीनरूपश्च म्रियते॥६॥ पार्श्वजधनवहिर्भागे पृष्ठवंशमुभयतो नातिनिन्ने कुकुंदरे नामम- मणी तत्र स्पर्शाज्ञानमधःकाये चेष्टोपघातश्च ॥६॥ जिनमें पीठके वांसके दोनों तरफ कमरके दोनों हाड "कटीक तरुण" नाम मर्म हैं यहांपर शस्त्र लगे तो रुधिरके क्षयसे पांडरोगी तथा विवर्ण और कुरूप होकर मृत्यु हो ॥ ६२॥ पँसवाडों और साथलोंसे बाहर (अर्थात् पँस- वाडोंके पीछे और साथलोंके ऊपर) पीठके वांससे दोनों तरफ बहुत नीचे नहीं (कुछ रे नीचे )" कुकुंदर' नाम दो मर्म हैं वहां चोट लगे तो शरीर सु पड , जावे और नीचेके अंगोंकी चेष्टा नाश होजाय ॥ ६३ ॥ श्रोणीकांडयोरुपर्याशयाच्छादनी पावन्तिरप्रतिवद्धौ नितंवौ नाम तत्राधःकायशोषो दौर्बल्याच मरणम् ॥ ६४॥अधःपावा- तरप्रतिवद्धौ जघनपार्श्वयोस्तिर्यगंधं च जघनात्याचसंधी नाम तत्र लोहितपूर्णकोष्टतया म्रियते ॥६५॥ स्तनमूलादुभयतः पृष्ठवं- शस्य वृहती नाम तत्र शोणितातिप्रवृत्तिनिमित्तैरुपद्रवम्रियते॥६६॥ श्रोणीकांड ( पूर्वोक्त कटीकतरुण) स ऊपरके आशय (स्थान) के आच्छादन करनेवाले पँसवाडोंसे बँधे हुए ऐसे " नितंव" नामक दो मर्मस्थान हैं यहां चोट कटीकतरुणे अस्थिमर्मणी अर्धागुले कालातरप्राणहरे । “प्रतिश्रोणीकांडम्" इत्यत्र प्रतिश्रोणीकर्णी इति वा पठति तत्र श्रोणीको लक्ष्यीकृत्य त्रिकसन्निधानौ श्रोण्या परि ( इति डल्लनः) । ( वा० ६३ ) कुकुदरे सविमर्मणी अर्धागुले वैकल्यकरे च । पायोरित्यत्र वामदक्षिणसंज्ञकयोः । जघनवहिर्भागे इति-कट्याः पश्चान्नागे । गयी तु" पार्वजघनभागे-" इति पठित्वा पार्श्वयोर्जघमभागे अघोभागे नितंबसधी कुकुदरे मर्मणी भवत इति । नातिनिने ईपन्निने ॥ (वा० ६४ ) नितबो अर्धी गुलप्रमाणास्थिमर्मणी । “काइयोः" इत्यत्र श्रोणीकर्णवोरिति वा पाठ. । श्रोणीकर्णी त्रिकसन्निधानी नाम्या- मुपरि । २ शयाच्छादनाविति-आगाशयाच्छादनी (इति डल्लन) तन्न नितबयोरामाशयाच्छादनाभावात् ॥ वा० ६ १) पासवी अर्कीगुलगिराममणी कालांतरप्राणहरे । तिर्यगूमिति-उपरिउपरि पार्श्वकानां ऋमहे संवेरपि क्रमवृद्धत्वम् (नि०सं०) ॥(वा०६६) वृहती शिराममणी अौगुले कालातरप्राणहरे च।। वा 44 d शारीरस्थान-अ०६. (६९९) लगनेसे नीचेके शरीर सूख जाते हैं फिर दुबलापन होनेसे मृत्यु होती है ॥६५॥ नीचेके भागमें पैंसवाडेसे बँधे हुए साथल और पसलियोंसे तिरछे ऊपरको साथ- लोंसे ऊपर " पार्श्वसंधि” नामक मर्म हैं यहां क्षत हो तो कोठा रुधिरसे भर मृत्यु हो ॥ ६५ ।। स्तनमूलोंसे दोनों तरफ पीठके वांसके समीपतक " बृहती" नाम २ मर्म हैं यहां आषात हो तो रुधिरकी अतिप्रवृत्तिनिमित्तजन्य उप- दवोंसे मृत्यु हो ॥ ६६ ॥ (वक्तव्य ) निबंधसंग्रहमें डल्लनमिश्रने यहां आशय शब्दसे आमाशयका ग्रहण किया और उसीका आश्रय लेकर इस समयके अनुवादकोंने भी वैसाही लिख मारा । भला विचारिये तो आमाशयका आच्छादन कहां और नितंब कहां-देखो वाचस्पत्यकोश वहां भी नितंबका अर्थ कटिका अधोभागही है और आमाशय नाभि और स्तनोंके वीवमें है इससे हम यहां आशय शब्दसे आमाशय क्योंकर मान लें ॥ पृष्ठोपरि पृष्ठवंशमुभयतस्त्रिकसंबद्धे अंसफलके नाम तत्र बाह्वोः स्वापः शोषो वा॥६७॥ बाहुमूर्द्धग्रीवामध्येसपीठस्कंधनिबंधना- वसौ नाम तत्र स्तब्धबाहुता ॥६८॥ एवमेतानि चतुदर्श पृष्ठस- आणि व्याख्यातानि ॥ ६९ ।। पीठके ऊपरके भागमें पीठ वांसके दोनो तरफ त्रिकस्थानसे बँधे हुए “ अंस- नाम मर्म हैं वहां चोट लगनेसे हाथ सुन्न पड़ जाते हैं अथवा सूख जाते हैं ( यहां पृष्ठोपरि शब्द पृष्ठका ऊपरला ग्रीवाके त्रिकके समीपका भाग सूचनार्थ दिया है ) ॥ ६७ ॥ बाहुओंके ऊपर ग्रीवाके मध्य खचे और खौदेके बधन करनेवाले ऐसे “ अंस" नामक मर्म हैं यहां चोट लगनेसे हाथ स्तंभित रह जाते हैं ।। ६८ ॥ ऐसे ये १४ मर्मस्थान पीठके वर्णन किये हैं ॥ ६९ ॥ अत ऊर्व जत्रुगतानि व्याख्यास्यामः ॥ ७०॥ इससे अगाडी जत्रु (कंठके जोतोसे ऊपर) के मौका व्याख्यान करते हैं।७०॥ तत्र कंठनाडीमुभयतश्चतस्रो धमन्यो । नीले द्वेचं मन्ये व्य. त्यासेन तत्र सूकता स्वरवैकृतमरसग्राहिता च ॥७१॥ ग्रीवाया- मुभयतश्चतस्रः शिरा मातृकास्तत्र सद्योमरणम् ॥ ७२ ॥ शिरो- (वा० ६७ ) असफलके अस्थिमर्मणी चा गुले वैकल्यकरे ॥ (वा०६८) असी लायुमर्मा- गुली वैकल्यफराविति ।। (वा० ७१ ) व्यत्यासेन वैपरीत्येन । नीले मन्ये द्वे द्वे एवं चत्वारि मर्माणि चतुरंगुलप्रमाणानि वैकल्यफाराणि शिरामर्माणि ॥ (वाक्य ७२ ) मातृकाः शिरामर्माणि नतुरगुलानि ताप्राणहराणि ।।
(७००) लुश्रुतसंहिता-भा० टी० । ९२ ग्रीवयोः संघाने कृकाटिके नाम तत्र चलमूर्द्धता ॥ ७३ ॥ कर्ण- पृष्ठतोऽधःसंश्रिते विधुरे नाम तत्र वाधिर्यम् ॥ ७४ ॥ इनमेंसे कंठनाडीके दोनों तरफ चार धमनी हैं उनमेंसे दा" नीला" और दो " मन्या" हैं (कंठनाडीके पास नीला हैं और इससे पिछाडी मन्या हैं) इनमें आघात होनेसे गँगापना, स्वरविकार और रसका अज्ञान होता है ॥ ७१ ॥ ग्रीवाके दोनों तरफ चार चार शिरा “मातृका." नामक मर्म हैं उनमें शस्त्र लगनेसे तत्काल मृत्यु होवे ॥ ७२ ॥ शिर और ग्रीवाकी संधि " कृकाटिफा" नामक २ मर्म- स्थान हैं उनमें चोट लगनेसे शिर कांपने लग जाता है ॥ ७३ ।। कानके पीछे नीचेको “ विथुर" नाम २ मर्म हैं उनमें चोट लगनसे बहरापन होजाताहै ॥७४॥ प्राणमार्गमुभयतः स्रोतोमार्गप्रतिवद्धेऽभ्यंतरतः फणो नाम तत्र गंधाज्ञानम् ॥ ७५ ॥ ध्रपुच्छांतयोरधोऽक्षणोर्वाह्यतोऽपांगा नाम तत्रान्ध्यं दृष्ट्युपघातो वा ॥ ७६ ॥ध्रुवोरुपरि निम्नयोरावत्तों नाम तत्रान्ध्यं दृष्टयुपघातश्च ॥ ७७ ॥ भ्रुवोः पुच्छांतयोरुपरि कर्णललाटयोर्मध्ये शंखौ नाम तत्र सयोमरणम् ॥ ७८ ॥ नाकके मार्गम दोनों तरफ छिद्रमार्गसे प्रतिबद्ध भीतरको "फण" नाम २ मर्म हैं उनपर आघात पहुँचने या विकार होनेसे गंधका ज्ञान नष्ट होजाता है।।७५॥ चुकुटीकी पुच्छसे नीचेको नेवोंसे वाहरकी तरफ " अपांग" नामक दो मर्मस्थान हैं इनम आघात होनेसे अंधापन अथवा दृष्टिका नाश होजाता है ॥ ७६ ॥ भृकुटीसे ऊपर नीचे “ आवर्त " नामक दो मर्म हैं यहां भी आघात होनेसे अंधा- पन और दृष्टिका नाश होजाता है । ७७ ॥ भ्रुकुटीकी पुच्छके अंतमें ऊपरको कान और शिरके वीचमें “ शंख" ( कनपटी ) नामक दो मर्मस्थान हैं यहां आघात होनेसे तत्काल मृत्यु होजाती है ।। ७८ ॥ शंखयोरुपरि केशांत उत्क्षेपौ नाम तत्र सशल्यो जीवति पाका- त्पतितशल्यो वा नोवृतशल्यः ॥७९॥ भ्रुवोर्मध्ये स्थपनी नाम तत्रोतक्षेपवत् ॥ ८०॥ पंच संधयः शिरसि विभक्ताः सीमंता ( वाक्य ७३ ) कृकाटिके सधिमर्मणी अौगुले वैकल्यकरे च ॥ (वा०७४ ) विधुरे स्नायुमर्मणी अौगुले वैकल्यकरे च ॥ (वा० ७५) फणे नाम अ गुलशिराममणी वैकल्यकरे ॥ (वा० ७६) अपागी अौगुलशिराममणी वैकल्यकरे ॥ (वा० ७७ ) आवर्ती अ‘गुलसन्धिमर्मणी वैकल्यकरे ।। (वा०७८) शंखी चास्थिमर्मणी अर्धागुले सद्यःप्राणहरे ॥ (वा०७९) उत्क्षेवी स्नायुमर्मणी अद्धीगुले विशन्यने ।। (वा० ८०) स्थपनी नाम शिरामर्मेदमागुलं विशल्यन्नम् ।।
- ९३ शारीरस्थान-अ०६. (७०१) नाम तत्रोन्मादभयचित्तनाशैर्मरणम् ॥ ८१॥ प्राणश्रोत्राक्षिजि- बासंतर्पणीनां शिराणां मध्ये शिरासन्निपातः श्रृंगाटकानि तानि चत्वारि मर्माणि तत्रापि सद्योमरणम् ॥ ८२ । मस्तकाभ्यंतरो- परिष्टात् शिरासंधिसन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रापि सद्योम- रणम् ॥ ८३॥ एवमेतानि सप्तत्रिंशदूर्ध्वजत्रुगतानि मर्माणि व्याख्यातानि ॥ ८४॥ भवन्ति चात्र- 'शंखों ( कनपटियों) के ऊपर बालोंकी सीमामें "उत्क्षेपक" नाम दो मर्मस्थान हैं इनमें शल्य (तीर आदि) लगे तो जबतक उनमें वह शल्य घसा रहे तबतक मनुष्य जीवे अथवा स्वयं पककर वह शल्य आपही गिरजावे तो भी जीवे परंतु वह शल्य खींचकर निकाला जावे तो उसी समय मृत्यु होवे ॥ ७९ ॥ दोनों भ्रुकु- टियोंके मध्यमें "स्थपनी" नामक मर्मस्थान है इसे भी उत्क्षेपककी भांतिही जानना चाहिये ॥ ८० ॥ शिरमें जुदी जुदी पांचसंधि हैं वे " सीमंत " नामक मर्म हैं इनमें आघात होनेसे उन्मादभय और चित्तका नाश होकर मृत्यु होवे ॥ ८१ ॥ नासिका, कर्ण, नेत्र और जिह्वा इनको तृप्त करनेवाली शिराओंमें शिराओंका संनि- पात (मिलाहुआ गुच्छा ) है ये गुच्छे चारों "शृंगाटक " नामक मर्म हैं इनमें) आघात होनेसे तत्काल मृत्यु होवे ॥ ८२ ॥ मस्तकके भीतर ऊपरको जहांपर वालोंका आवर्त (भंवर) होता है वहां शिरा और संधिका सन्निपात ( मिलाप है यह "अधिपति" नाम मर्मस्थान है यहांपर चोट लगनेसे तत्काल मृत्यु होती है ॥ ८३ ॥ इस प्रकारसे ग्रीवासे शिरतकके ये ३७ मर्म वर्णन किये गये ॥ ८४ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- मर्मस्थानोंका प्रमाण । ऊयः शिरांसि विटपेच सकक्षपाधैं एकैकमंगुलमितं स्तनमू- लपूर्वम् ।। विद्धयंगुलद्वयमितं मणिबंधगुल्फें त्रीण्येव जानु सपर संह कूपराभ्याम् ॥ ८५॥ हृद्वस्तिकूर्चगुदनाभि वदंति मूर्ध्नि चत्वारि पंच च गले दर्श योनि द्वे ॥ तानि स्वपाणितलकुं- चितसंमितानि शेढुण्यवे"हि परिविस्तरतोऽगुलार्द्धम् ॥ ८६ ॥ (वा० ८१) सीमंताः संधिमर्माणि चतुरंगुलानि कालातरम्नानि ॥ ( वा० ८२) शृंगाटकानि शिरामर्माणि चतुरंगुलानि सद्य:प्राणहराणि तत्राह-वृद्धवाग्भट:-जिह्वाघ्राणाक्षिश्रोत्रतर्पणीनां शिराणा तालुनि संनिपातः तासां मुखानि चत्वारि शृगाटकसंज्ञानीति ॥ (वा० ८३) अधिपतिः सधिमर्मेदमागुलप्रमाण सद्योमारकमिति ॥ (श्लो०८५।८६) शिरासि कूर्चशिरांसि । कक्षपार्श्वे कक्षसमीपे । स्तनमूलपूर्वम्"- - ९४ (७०२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। जर्वी, कूर्वशीर्ष, विटप और कक्षधर ये मर्म एक एक अंगुल प्रमाणके हैं और स्तनमूल, मणिबंध और गुल्फ इन्हें दो दो अंगुल प्रमाणके जानो । तथा जानु और कूपर तीन तीन अंगुल हैं ॥ ८५ ॥ हृदय, वस्ति, कूर्च, मुदा, नाभि और शिर (ताल) के चार मर्म तो शृंगाटक और कपालके पांच मर्म सीमंत तथा गलेके दश मर्म ८ मातृका और दो नीला और दो मन्या ये सब चार चार अंगु- लके हैं और जो ५६ शेष रहे वे सब आधे आधे अंगुल जानों ॥ ८६ ॥ एतत्प्रमागमभिवीक्ष्य वदंति तज्ज्ञाः गस्त्रेण कर्मकरणं परिहत्य मर्म ॥ पाभिधातितमपी है लिहति मर्म तस्माद्धि मर्ससंदन परिवर्जनीयम् ॥ ८७॥ यह प्रमाण मोका जो पूर्व कहा इसे विचार कर मर्मको बचाकर सुज्ञ वैद्य- को शस्त्रकर्म करना चाहिये क्योंकि मर्मस्थान आसपासमें कटजावे तो भी मृत्यु- कारक हो जाता है इस लिये निश्चय मर्मस्थानको तो छोड़करही चीरा लगाना चाहिये ॥ ८७ ॥ छिन्नेषु पाणिचरणेषु शिरी नराणां संकोचमीयुरसृगल्पमतो निरति ॥ प्राप्यामितव्यसनमुनमतो" मनुष्याः संच्छिन्नशाखत- सवन्निधनं ने याति ॥ ८८ ॥ क्षिप्रेथु तर्ने लतलेषु हतेषु रक्तं गच्छत्यतीव पवनच रुजं करोति ॥ एवं विनशिपयांति हि तत्र विद्रो वृक्षा इवायुधविघाँतनिकृत्तमूलाः ॥ तम्मात्तयोरभि- हतस्य तु पाणिपादं छत्तव्यमाशुं मणिबंधनेगुल्फदेशे ॥८९॥ यदि किसी मनुष्यका हाथ या पांव कटभी जावे तो वहाँकी रगें सुझड़ जावें और रुधिर कम बहता है यद्यपि बहुत उग्र पीडाको मनुष्य प्राप्त होता है तो भी शाखा कटे हुए जैसे वृक्ष नष्ट नहीं होते ऐसेही हाथ, पांव कट जानेपर मनुष्य नहीं मरता है ॥ ८८॥ परंतु हाथ, पावोंके क्षिप्रसंज्ञक और तलसंज्ञक मर्ममें शस्त्रं लगे -इत्यत्र स्तनपूर्वमूलमिति वा पाठः । सपरमिति द्वितीयजानुसहितम् । मूर्ति चत्वारि पच चेति चत्वारि शृगाटकानि तथा तत्रैव पंच सोमनाः । गले दश यानि च द्वे इति-अष्टौ मातृका द्वे द्वे नीले मन्ये च । स्वपाणितलकुचितमपितानि चतुरंगुलप्रमाणानीत्यर्थ. । शेषाणि पट्पंचाशन्माणि विस्तरत: अगिल• मिल्यवेदि (इति डल्लन.)॥ ॥ इत्यत्र गयो तु किंजल्कात्रमगनादिव ५२. (सोक ८५)" वृक्षा इवायुवविधातनिहत्तमूला: जननिति पठति ॥
शारीरस्थान-अ० ६. (७०३) तो रुधिर बहुतही वहता है और वायुभी बहुत पीडा करता है इससे क्षिप्र, तल इनमें विध जानेसे जैसे शस्त्रसे जड़ कटा वृक्ष गिरजाता है वैसे मनुष्य मरजाता है इस कारण यदि इन क्षिप, तलमें शस्त्र लगे (घाव हो जावे) तो उस मनुष्यके उसी हाथ या पांवको मणिबंध या गुल्फकी जगहसे शीघ्र काट देना चाहिये ॥ ८९ ॥ मर्माणि शल्यविषयार्द्धमुदाहरति यस्माचं मर्मसु हता ने भवंति साः ॥ जीवति तत्र यदि वैद्युगुणेन किंचि ते प्राप्नुवंति वि. कलत्वमसंशयं हि ॥ ९० ॥ संभिन्नजरितकोष्ठशिरःकपाला जीवंति शस्त्रविहतैश्च शरीरदेशः॥छिन्नश्च सक्थिभुजंपादकरै- रशेषैर्येषां ने मर्मपतिता विविधाः प्रहाराः ॥ ९१ ॥ माँको शल्यविषयाई कहतेहैं इस हेतुसे कि कभी मर्मीमें आघात होनेसे तत्काल मृत्यु होतीहै और कदाचित् कोई कोई वैद्यकी कुशलतासे जीते भी रहजाते हैं परंतु वे विकलताको तो अवश्यही प्राप्त होते हैं ॥ ९० ॥ कई मनुष्य जिनके धड़, शिर, चेहरे (चोटोंसे ) जर्जरीभूत होगये हैं तथा शरीरके प्रदेश साथल, भुजा, पांघ, हाथ, आदि शस्त्रोंसे कट गये हैं वेभी जीते रहजाते हैं जिनके मर्मों में विविध प्रकारके प्रहार नह हुए हों (अर्थात् मम आघात होनेसे बचना असंभव है और शिर, धड जर्जर हुए हाथ, पाँव कटे मनुष्य बच जातेहैं ) ॥ ९१ ।। सोममारुततेजांसि रजःलवतमांसि च ॥ मर्मसु प्रायशः पुंसा भूतात्मा चाँवतिष्ठतभिर्मस्वभिहतास्तस्मान्न जी वंति शरीरिणः९२ सोम, वायु और तेज तथा रजोगुण,सत्त्वगुण,तमोगुण और प्रायः भूतात्मा(जीव) ये सब मर्मस्थानों में स्थित रहते हैं इसी हेतु मर्मों में अभिघात होने (छेद भेदन होने, कुचले जाने, चोट लगने आदि ) से मनुष्य नहीं जीते हैं ॥ ९२ ॥ इंद्रियार्थेष्वसंप्रॉतिर्मनोबुद्धिविपर्यायः ॥ रुंजच विविधास्तीत्रा भवंत्याशुहरे हते ॥.९३ ॥ हेते कालांतरने तु ध्रुवो धातुक्षयो नृणाम् ॥ ततो धातुक्षयाज्जतुर्वेदनाभिश्च नश्यति ॥ ९४ ॥ हैते वैकल्यजैनने केवलं वैद्यनैपुणात् ॥ शरीरं क्रियया युक्तं विकल- खैमवाप्नुयात् ॥१५॥ विशल्यनेषु विज्ञेयं पूर्वोक्तं यच्च कारणम् ।। (श्लोक ९०) मर्माणि शल्यविषयार्द्धमिात-शल्यमानविषयस्यार्द्ध मर्मागि एव, यस्मात् मर्मसु हताः सद्यो न भवति सद्यः एव मृत्यु प्रामुवति इति भव । डल्लनस्तु सद्यो न भवतीति सद्यो न म्रियते इति व्याख्याति तन्न"जीवतितत्र यदि वैद्यगुणेन केचित्" इत्यादि कथनासंगतत्वात् मर्मजा शत्यविण्याद्धत्वाच॥ ॥
(७०४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० ।
॥ ९६ ॥ सैजाकराणि मर्माणि क्षतानि विविर्धा रुजः ॥ कुर्वत्यते
च वैकल्यं कुवैद्यवंशगो यदि ॥ ९७ ॥
सद्य:प्राणहर मर्मामें आघात होनेसे इंद्रियोंकी अर्थाने संप्राप्ति न होमा ( इंद्रियोंका
ज्ञान और कर्म नष्ट होना), मन और बुद्धिका विपरीत होना और अनेक भांतिकी
दारुण पीडा होना ये लक्षण होतेहैं ॥ ९३ ॥ कालांतरमारक मामें आघात होनेसे
मनुष्यका धातु क्षय ( नष्ट ) होजाता है फिर वेदनाओंसे मृत्यु होती है ।। ९४ ॥
और वैकल्यकारक मामें आघात हो तो केवल वैद्यकी निपुणतासे विकल शरीर
क्रियायुक्त होसकता है ॥ ९५ ॥ और विशल्पन्न मर्मी में पूर्वोक्त कारण (शल्ययुक्त
जीवे या स्वयं शल्य पककर गिरे तो जीवे, शल्य निकालनेसे मृत्यु हो इत्यादि)
जानने ॥ ९६ ॥ और रुजाकर मर्मामें आघात हो तो वे अनेक प्रकारकी पीड़ा
करते हैं और यदि कुवैद्य चिचित्सा करे तो अंतमें विकलता होजाती है ॥ ९७ ॥
छेदभेदाभिघातेभ्यो दहनादारणादपि ।
उपांतं विजानीयान्मर्मणां तुल्यलक्षणम् ॥ ९८॥
मर्मों में छेद (बिंधने ), भेद (भेदन होने ), अभिघात (चोट लगने, दव जाने
पिस जाने ) से और जलजाने या दाग देने और चीरा लगाने इन सब कारणोंको
उपघातही समझना चाहिये । और पूर्वके तुल्य पीडा आदि लक्षण जानने चाहिये
(डल्लनमिश्र उपघातका अर्थ समीपमें घात ऐसा करते हैं अर्थात् मर्मोके समीपमें
छेद, भेदादि होनेसे भी मौंके तुल्यही प्रायः लक्षण समझने चाहिये) ॥ ९८ ।।
मर्माभिधातश्च न कश्चिदस्ति योल्पात्ययो वापि निरत्ययो वा॥
प्रायण मर्मस्वभिताडितास्तु वैकल्यमच्छंत्यथा नियंते ॥९९ ॥
मर्मापयधिष्टायं हि ये विकारा मूच्छंति काये विविधा नराणाम् ॥
प्रायेण तकृच्छ्रतमा भवंति नरस्य यत्नैरपि साध्यमानाः ॥१०॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥
मर्मकी चोट लगा हुआ ऐसा कोई भी नहीं होसकता कि जिसे थोडी भी पीडा
न हो या पीडा होही नही किंतु प्रायः मर्मकी चोट लगेहुए मनुष्य तो विकलताको
प्राप्त होते है या मर जाते हैं ॥ ९९ ॥ मर्मस्थानमें हुए विकार तो मनुष्यों के शरीर में
अनेक प्रकारसे फैल जाते है और स्थित होजाते हैं इससे यत्नपूर्वक साधन करनेपर
भी प्रायः अति कठिन होहोजात हैं।
इति ५० मुरलीधरशमवि० सुश्रुतसं० भा० टी० शारीरस्थाने षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
शारीरस्थान-अ०७. (७०५) सप्तमोऽध्यायः ७. अथातः शिरावर्णनविभक्तिनाम शारीरं व्याख्यास्यामः । यहांसे अगाडी शिराओंके वर्णन और उनके विभाग विषयक शारीरकका व्या- ख्यान करते हैं । सप्त शिराशतानि भवन्ति यौमिरिदै शरीरमाराम इवं जलहाँ- रिणीभिः केदार इवं कुल्याँभिरुपस्निह्यतेऽनुगृह्यते चाकुंचनप्रसार- णादिभिर्विशे षैः । द्रुमपत्रसेवनीनामिव चं तासां प्रतीनास्तासां नाभिमूल ततश्च प्रसरन्त्यूवमधस्तिर्यक् च ॥ १॥ भवतश्चात्र- इस मनुष्य शरीरमें सातसौ ७०० शिरा (प्रधान) हैं इन शिराओं (रगों) करके शरीर इस प्रकार सींचा (पालन पोषण किया) जाताहै जैसे बागीचा जल- की नालियों करके सींचा जाताहै तथा केदार (क्षेत्र) कुल्या (नहरों) करके सीचा जाता है और इस शिराओंसे ही आकुंचन (सकोड़), प्रसारण (फैलाव), (तथा जागना सोना इंद्रियोंका ज्ञान) इत्यादि द्वारा शरीरका अनुग्रह होता है शिराओंका फैलाव शरीरके अंग, प्रत्यंगोंमें इस प्रकारसे है जैसे वृक्षोंके पत्तोंमें तंतु- जाल फैले रहतेहैं और इन सब शिराओंका मल नाभि है इस नाभिस्थानसेही ये ऊपरको, नीचेको, टेढी तिरछी फैली हुई हैं ॥ १॥ इस विषयमें दो श्लोक हैं- यावत्यस्तु शिराः काये संभवन्ति शरीरिणाम् ॥ नाभ्यां सर्वी- निबद्धास्ताः प्रतन्वंति समन्ततः॥२ ॥ नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः प्राणान्नांभिर्युपाश्रिता ॥ शिराभिरावृता नाभिश्चक्रना- भिरिवारकैः ॥३॥ इस शरीरमें जितनी शिरा हैं सब नाभिसे संवर्द्धित हुई समस्त शरीरमें फैल रही हैं ॥ २ ॥ मनुष्योंके प्राण नाभिमें स्थित रहते हैं और नाभि प्राणोके आश्रयमें यह नाभि शिराओंसे ऐसी घिरी हुई है जैसे चक्रनाभि (रथके पहियेका मध्य ) आरक नामक काष्ठोंसे घिरा होताहै ॥ ३ ॥ तासां मूलशिराश्चत्वारिंशत् । तासां वातवाहिन्यो दश । पित्त- वाहिन्यो दश । कफवाहिन्यो दश। दश रक्तवाहिन्यः। तासांतु (वा० १) वर्णन विवेचन 'वर्ण' इति पाठे तु वर्ण: श्वेतादिवर्णः। जलहारिणीभिः प्रणालीभि. केदारः क्षेत्र: विशेषः ।कुल्या कृत्रिमाल्पसरित् । एनष्टातद्वय सुक्ष्मस्थलशिराप्रापणार्थम् । उपस्रियते स्निग्वीक्रियते पुष्टि नीयते च ॥ (श्लो० ३) प्राणाः नाभिस्थाः इत्यनेन गाभ्यावरकासु शिरासु अवस्थिताः ( इति डलनः ।। - (७०६) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। वातवाहिनीनां वातस्थानगतानां पंचसप्ततिशतं भवति । तावत्य एव पित्तवाहिन्यः पित्तस्थाने कफवाहिन्यश्च कफस्थाने । रक्त- वाहिन्यश्च यकृत्प्लीहोरेवसेतानि सप्त शिराशतानि ॥४॥ इन ७०० शिराओंकी मूलशिरा ४० हैं जिनमें दश वात (वायु) को बहाने- वाली और दश पित्तको वहानेवाली, दश कफको बहानेवाली और दशही रुधिरको बहानेवाली हैं। फिर वे वातवाहिनी वाताशयमें प्राप्त होनेवाली शिरायें १७५ होती हैं और इतनी १७५ ही पित्तवाहिनी पित्तस्थानमें प्राप्त होनेवाली हैं तथा १७५ कफवाहिनी कफस्थानमें प्राप्त होनेवाली हैं तथा १७५ रुधिरवाहिनी यकृत् और प्लीहामें प्राप्त होनेवाली हैं इस प्रकार ये सब ७०० शिरायें हुई ॥ ४ ॥ तत्र वातवाहिन्यः शिरा एकस्मिन्सनि पंचविंशतिः । एते- नेतरसक्थिवाहू च व्याख्यातौ ॥ ५॥ विशेषतस्तु कोष्टे चतुस्त्रि- शत् । तासां गुदसेदाश्रिताः भोण्यामष्टौ । द्वे द्वे पार्श्वयोः। पट् पृष्ठे। तावत्य एव चोदरे । दश वक्षसि ॥६॥ तहां वायुवाहिनी शिरा एक पांवमें २५ हैं और इसी भांति दूसरे पांवमें २५ तथा दोनों हाथों में पच्चीस पच्चीस ऐसे ये सब सौ १०० हुई ॥ ५ ॥ और कोष्ठ (धड़) में विशेष करके ३४ हैं उनमें गुदा और लिंगके आश्रयसूत कटिमें ८ और दो दो दोनों पँसवाडोंमें ऐसे ४ ये और ६ पीठमें और ६ ही पेटमें और१० छातीमें हैं ॥ ६ ॥ एकचत्वारिंशजत्रुण ऊर्द्धम् । तासां चतुर्दशग्रीवायाम्। कर्णयोश्च- तस्त्रः । नव जिह्वायाम् । षट् नासिकायाम् । अष्टौ नेत्रयोः॥७॥ एवमेतत्पंचसप्तत्यधिकशतं वातवहानां शिराणां व्याख्यातमेष एव विभागः शेषाणामपि ॥ ८ ॥ विशेषतस्तु पित्तवाहिन्यो नेत्रयोर्दश । कर्णयोढे । एवं रक्तवहाः कफवहाश्च। एवमेतानि सप्त शिराशतानि सविसागानि व्याख्यातानि ॥९॥ भवंति चात्र- इकतालीस ४१ शिरा वातवहा जोतोंसे ऊपर (ग्रीवा और शिरमें ) हैं जिनमें १४ ग्रीवा (नाड) में, और ४ दोनों कानों में, ९ जिह्वामें, ६ नाकमें और ८ नेत्रों में हैं ॥ ७ ॥ ऐसे ये १७५ वातवहा शिराओंका व्याख्यान किया गया यही हिसाब शेष रहीं पित्तवहा, कफवहा और रक्तवहा शिराओंकाभी है ॥ ८॥ विशेष १२ ९९ शारीरस्थान-अ० ७. (७०७) इनाही है कि पित्तवाहिनियोंमेंसे नेत्रों में १० और कानों में २ शिरा हैं इसीप्रकार कफवहा और रक्तवहा भी समझ लेनी चाहिय ऐसे ये सब७०० शिरायें विभागपू- र्थक व्याख्यान कीगई ॥ ९ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- क्रियाणामप्रतीतिममोहं बुद्धिंकर्मणाम् ॥ करोत्यन्यान् गुणां- चौषि स्वाः शिरीः पवनश्चरन् ॥ १० ॥ यदा तु कुपितो वायुः स्वाः शिराः प्रतिपयते ॥ तदास्ये विविधा रोगा जायते वातसं- सवाः ॥ ११॥ भ्राजिष्णुंतामन्नरुचिमग्निंदीप्तिमरोगताम् ॥ संसपत्स्याः शिरीः पित्त कुर्य्याच्चान्यान् गुणीनपि ॥१२॥ यदा प्रकुपितं पित्तं सेवते स्ववहाँः शिराः॥ तदास्य विविधा रोगों जायते पित्तसंभवाः ॥ १३ ॥ लेहमंगेषु लंधीनां स्थैर्य बलंसुदी- र्णताम् ॥ करोत्यन्यान् गणांश्चापि" वलासः स्वाः शिरॊश्चरन ॥ १४ ॥ यदा तु कुपितः श्लेष्मा स्वाः शिराः प्रतिपद्यते ॥ तदा- स्य विविधा रोगां जायते श्लेष्मसंभवाः ॥१५॥ धातूंनां पूरणं वर्ण स्पर्शज्ञानमसंशयम् ॥ स्वाः शिराः संचरद्रक्त कुँच्चिान्यान गुणीलपि ॥ १६ ॥ यदा तुं कुपितं र तं संवते स्वबहाः शिराः। लदाय विविधा रोगी जायते रक्तसंभवाः ॥१७॥ शुद्ध वायु अपनी शिराओंमें ठीक संचार करे तो समस्त किया (प्रसारण, आकुंचनादि) यथायोग्य होती हैं और बुद्धि तथा कर्मों में मोह नहीं होता अर्थात् बुद्धींद्रिय और कर्मेंद्रिय सब अपने कार्यों में निपुण होती हैं तथा अन्य स्पंदनादि गुणभी ठीक ठीक होते हैं ॥१०॥ और यदि कुपित वायु अपनी शिराओं में संचार करे तो अनेक कारके वायुरोग उससे उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ११ ॥ शुद्र पित्त अपनी शिराओं में संचार करे तो प्राजिष्णुता (कांति), अनपर रुचि, जठरामिकी दीप्ति और नैरोग्यता तथा अन्य गुण ( रागादिभी) ठीक करता है ॥ १२ ॥ और यदि कुपित पित्त अपनी शिराओं में गमन करे तो उससे अनेक प्रकारके पित्तरोग (दाहादि) उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १३ ॥ शुद्ध कफ अपनी शिराओंमें संचार करे तो अंगोंमें स्निग्धता और संधियों में स्थिरता (योग्यता) और बल तथा उदीर्णता (महत्वता) और अन्य दृढता आदि गुण करता है ! १४ ॥ और यदि कुपित कफ अपनी शिराओंमें गमन करे तो उससे अनेक प्रकारके हफके रोग (ग्लानि, १०० (७०८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। गौरवादि) हो जाते हैं ॥ १५ ॥ शुद्ध रुधिर अपनी शिराआमें संचार (गमन ) करे तो सब धातुवों (मांस, मेदा, अस्थि, मन्ना और वीर्य इन ) की पूर्णता और सुंदररूप तथा निःसंशय स्पर्शका ज्ञान तथा अन्य (प्रसन्नता आदि) गुणभी करता है ॥ १६ ॥ और यदि कुपित रुधिर अपनी शिराओंमें गमन कर तो उससे अनेक प्रकारके रुधिरविकार (विस्फोटक, विसपादि) हो जाते हैं ॥ १७ ॥ शिराओंका सर्वदोषवहत्व । न हि वातं शिरः काश्चिन्नं पित्तं केवल तां ॥ श्लोमाणं वा वहत्येताः अतः सर्ववहींः स्मृताः ॥१८॥ प्रदुष्टानां हि दोपाणामुं- च्छ्रितानां प्रधावताम्॥ध्रुवमुन्मार्गगमनमतः सर्ववहाः स्मृताः॥१९॥ कोईभी ऐसी शिरा नहीं हैं जिनमे केवल वायुही या केवल पित्तही या केवल कफही वहतहों कितु सबमें सबके अंशांश होतेहैं और एक मुख्य होताहै जैसे वात- वहा शिराओंमें वायु तो मुख्य और पित्तादिके अंशांश होतेहें इसी भांति पित्तवहा शिराओंमें पित्त मुख्य और वातकफादिके अंशांश, ऐसे औरभी जानो इसीसे ये शिरा सर्ववहा कहलाती हैं ॥१८॥ और जब दोष दुष्ट होते हैं और उच्छित(उफानयुक्त) होतेहैं और प्रधावतह (दौड़तेहैं ) तो अवश्य उन्मार्गगमन करत, अर्थात् अपने प्राकृत मार्गसे अन्यमार्गमें गमन करतेहैं ( और गमन शिराओंद्वारा होताहै) इस: सभी शिरा सर्ववहा कही जाती हैं ॥ १९ ॥ शिराआके रंगआदि। तंत्रारुणा वातवहाः पूँर्यंते वायुंना शिराः॥ पित्तांदुष्णाश्र्थं नीलाच शीता गौ यः स्थुिराः कौत् ॥ असृग्वहास्तु रोहिण्यः शिराँ ना- त्यृष्णशीतलाः ॥२०॥ तिनमें वायुवहा शिरा कालापन लिये लाल रंगकी होती हैं और वायुसे फूली रहती हैं तथा पित्तवहा शिरा गरम और नीले रंगकी होती हैं तथा कफवहा शिरा शीतल सुपेद रंगकी और स्थिर होती हैं एवं रक्तवहा शिरा लाल और न बहुत गरम न शीतल होती हैं ॥ २० ॥ (श्लो० १८ । १९) प्राकृतव.तादिवहानामपि शिराणा सर्वत्र सर्वकार्योपलंभात् सर्ववइत्वं दर्शय- नाह-'न हि वात' इत्यादि । 'उच्छूितानाम्' इत्यत्र मूच्छितानामिति वा पाठः मूच्छितानां परस्पर मिश्रि- ननाम् (इति डल्लन्ः) (को० २०) अरुणशब्देनात्र कृष्णमिश्रितरतवणों गृह्यते अव्यकरागवर्णो वा । अक्षण: संघारागे अध्यक्तरागे कृष्णमित्रितरक्तवणे च (इति श० स्तो०) रोहिणी रक्तवर्णन्ती । रोदितशब्दात् त्रिया हे तत्व नावे णत्वम् ( इति वाचस्पतिः) ॥
32 १०१ शारीरस्थान-अं० ७. (७०९) अत ऊर्द्ध प्रवक्ष्यामि न विध्येद्यौः शिरा भिषक् ॥ वैकल्यं मरणं चापि” व्यधात्तांसां ध्रुवं भवेत् ॥ २१ ॥ शिराशतानि चत्वारि विद्यांच्छांखासु बुद्धिमान् ॥ षट्त्रिंशञ्च शतं कोष्टे चतुःषष्टिं च मू- ईनि ॥ २२ ॥ शाखासु षोडश शिराः कोष्ठे द्वाविंशदेव तु॥ पंचा- शज्जत्रुणश्चोर्द्धमवेध्याः परिकीर्तिताः ॥ २३ ॥ इससे अगाडी उन शिराओंका वर्णन करते हैं जिहें वैद्य वेतन नहीं कर जिनके विध जानेसे विकलता या मृत्यु अवश्य होती है ॥ २१ ॥ चारसौ ४०० शिरा तो चारों प्रकारकी चारों हाथ पैरोंमें हैं और १३६ धडमें है तथा १६४ ग्रीवासे ऊपर हैं ॥ २२ ॥ उनमेंसे हाथ, पैरोंमें १६ शिरा अवेध्य ( वेधनके योग्य नहीं ) हैं और धड़में ३२ वेधन योग्य नहीं तथा ५० गलेसे ऊपर अवेध्य हैं ॥ २३ ॥ तत्र शिराशतमेकस्मिन्सक्थिन भवति । तासां जालधरा त्वेका तिस्रश्चाभ्यंतरास्तत्रोवीसंज्ञे द्वे लोहिताक्षसंज्ञा चैका एतास्त्ववे. ध्या एतेनेतरसक्थिवाहू च व्याख्यातादेवमशस्त्रकृत्याः पोडश शाखासु ॥ २४ ॥ ये जो एक पांवमें १०० शिरा हैं उनमेंसे एक तो जालधरा (जो जालको धारण करनेवाली कुर्चशीर्षके पास है) और तीन भीतरको जिनमें दो ऊर्वी संज्ञक है (ये ऊर्वी नाम मर्मके निकट हैं) और १ लोहिताक्षसंज्ञक (यह लोहिताक्ष मर्मस्थानपर है) ऐसे एक पैरमें ये ४ शिरा छेदन करनी वर्जित हैं इसी प्रकार दूसरे पांव और दोनों हाथोंमें १६ शिरा अवेध्य हैं ॥ २४ ॥ द्वात्रिंशच्छोण्या तासामष्टावशस्त्रकृत्या द्वे द्वे विटपयोः कटीक- तरुणयोश्च ॥ २५॥ अष्टावष्टावेकैकस्मिन्पार्श्वे तासासेकैकामू- ईगां परिहरेत् पार्श्वसंधिगते च द्वे ॥ २६ ॥ चतस्रो विंशतिश्च पृष्टंवंशभुभयतस्तासामृर्द्धगामिन्यो द्वे द्वे परिहरेहतीशिरे॥२७॥ तावत्य एवोदरे तासां मेट्रोपरि रोमराजीमुभयतो वे द्वे परिहरेत्२८॥ ओणी ( कमर ) में ३२ शिरा हैं उनमें आठ शिरा अवेध्य हैं दो दो विटपोंमें और दोही दो कटीकतरुणोंमें ॥ २५ ॥ और आठ आठ एक एक पँसवाडेमें शिरा हैं उनमें दोनों तरफ एक एक ऊपरको जानेवाली और दो दोनों पँसवाडोंके संधिकी अवेध्य हैं ॥ २६ ॥ पीठके वांसके दोनों तरफ २४ शिरा हैं उनमेसे ऊपर ( ७१०) सुश्रुतसंहिता-मा० टी० जानवाली बृहतीनामक दो दो शिरा अवैध्य हैं ॥ २७ ॥ और चौवीसही शिरा पटमें हैं उनमें लिंगके ऊपर रोमांक दोनों तरफकी दो दो शिरा वेधन योग्य नहीं हैं ॥ २८ ॥ चत्वारिंशद्वक्षसि तासां चतुर्दशाशस्त्रकृत्या हृदये द्वे द्वे द्वे स्तनमूले स्तनरोहितापलापापस्तम्भेषभयतोऽष्टौ ॥ २९॥ एवं द्वात्रिंशदर्श- स्त्रकृत्याः पृष्टोदोरःखं भवंति ॥ ३०॥ वक्षःस्थल में ४० शिरा है जिनमें १४ शिरा शस्त्रस बचाने योग्य हैं, हृदयमें २ और स्तनमूलमें दानों और दो दो (ऐसे ४ ) और स्तनरोहितमें दो दो(४) तथा अपलाप और अपस्तंभों में दो दो (४ ये सब १४ हुई) ॥ २९ ॥ ऐस सब ३२ शिरा, पीठ, पेट और छातीमें अवेध्य हैं।॥ ३० ॥ चतुःषष्टिशिराशतं जत्रुण ऊई भवति । तत्र षट्पंचाशच्छिरो- धरायां तासामष्टौ चतस्त्रश्च मर्मसंज्ञाः परिहरेवे कृकाटिकयोद्धे विधुरयोः । एवं ग्रीवायां षोडशावेध्याः॥३१॥ हन्बोरुभयतोष्टावष्टौ तासां तु संधिधमन्यौ रे द्वे परिहरेत् ॥ ३२॥ ग्रीवासे ऊपर १६४ शिरा हैं तिनमें ५६ शिरोधरा (ग्रीवा ) में हैं उनमेंस आठ मातृका, चार नीला और मन्यासंज्ञक मर्मशिरा और दो कृकाटिकाकी और दो विधुर एस ग्रीवामें १६ शिरा अवध्य हैं ॥ ३१॥ हनु (टोडी) के दोनों तरफ आठ आठ शिरा हैं उनमेंस संधिकी और धमनी संज्ञक दो दोको बचाना चाहिये ॥३२॥ पटिनशजिह्वायां तालामधः पोडश शस्त्रकृत्या रसबहे देवाग्वहें च द्वे ॥३३॥ द्विादश नासागं तासामोपनासिक्यश्चतस्रः परि- हरेत् तासामेव च तालुन्येकां मृदावुद्देशे ॥ ३४॥ अष्टात्रिंशदु- भयोर्नेत्रयोस्तालासेकैकामपांगयोः परिहरेत् ॥ ३५ ॥ (८ २९) उभयतोष्टाविति-उभयत्रत्वर्थ तेनस्तनरोहितयोः द्व द्रे अपलापयोरेकैका अपस्तंभयोर- प्येका एवमष्टावित्यः । तथाच हृदये ह्र द्वे लन्मूल च इति चतुर्हग (इति डल्लनः) । ( वा० ३१ ) गिगेबग बीना ! तत्राटी मातृका द्वे नीले द्वे मन्ये ।। (वा० ३३) तारा जिहा. गन्पत्रिंटिगणा मये अयो निहायाः पोटा चिग भगति विंशनिश्च जिह्वाया ऊर्द्ध भवतीत्यर्थः । तत्र अगम्मकृत्या द्वे रसद द्वं वाग्यह चेत्यन्वयः (वाक्य ३४) ओपनासिक्यः नासासमीपवर्तिन्यः मृदाबुद्दे घोणामी वर्ष( नि नि गु०) || ॥ १०३ शारीरस्थान-अ०७. (७११) जिह्वामें ३६ शिरा हैं जिनमें १६ नीचेको हैं (और २० ऊपरको) उनमेंसे रसको वहानेवाली दो और वाणीको बहानेवाली दो अवेध्य हैं ॥ ३३ ॥ नासिकामें 'द्विादश' अर्थात् चौबीस शिरा हैं जिनमेंसे नासिकाके समीपवाली ४ शिरा बचानी चाहिये और एक तालमें 'मृदावुद्देशे' अर्थात् घोणाके समीप अवध्य है ॥ ३४॥ दोनों नेत्रों में ३८ शिरा हैं उनमेंसे दोनों अपांगोंकी एकएक शिरा बचानी चाहिये३५॥ कर्णयोर्दश तासां शब्दवाहिनीनामेकैकां परिहरेत् ॥ ३६ ॥नासा- नेत्रगतास्तु ललाटे षष्टिस्तासां केशांतानुगताश्चतस्त्रः आवर्तयो- रेकैका स्थपन्यां चैका परिहर्तव्या ॥३७॥ शंखयोर्दश तासां शंखसंधिगतानेकैकां परिहरेत् ॥ ३८॥ द्वादश मूर्ध्नि तासामु- रक्षेपयोः वे परिहरेत्सीमंतेष्वकैकामेकामाधिपताविति ॥ ३९॥ एवमशस्त्रकृत्याः पंचाशज्जत्रुण ऊर्द्धसिति॥ ४० ॥ भवति चात्र- कानों में दश शिरा हैं उन शब्दवाहिनी शिराओंमेंसे एक एक दोनों तरफ (मुख्य शब्दवहा) को वचावे ।। ३६ ॥ नाक और नेत्रों में गमन करनेवाली ऐसी ललाटमें ६०शिरा हैं (२४ नासिकाकी और ३६ नेत्रोंकी) इनमेंसे केशांतके समीपकी ४ और आवर्तकी एक एक करके २ और स्थपनीकी १ एसे ७ शिरा अवेध्य हैं ॥ ३७ ॥ शंखो ( कनपटियों) में दश शिरा हैं उनमेंसे कनपटीकी संधि प्राप्त हुई एक एक दोनों तरफ बचाने योग्य है ॥ ३८ ॥ मूर्दा (दिमाग)में १२ शिरा हैं उनमेंसे उत्क्षेपनामक मों में दो और पांच सीमंतोंकी एक एक ऐसे ५ ये और अधिपति- नामक मर्मस्थानकी १ ऐसे ये मूर्दा ८ शिरा अवेध्य हैं ।। ३९ ॥ इस हिसाबसे ग्रीवासे ऊपर सब मिलकर ५० शिरा हैं जिन्हें शस्त्र ( नश्तर ) से छेदन या वेधन नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥ इस विषयमें श्लोक है- व्याप्नुवंत्यभितो देह नाभिंतः प्रसृताः शिराः॥ प्रतीनाः पद्मिनीकन्दाद्विसादीनां यथाँ जलम् ॥४१॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने सप्तमोऽध्यायः॥७॥ नाभिसे उत्पन्न हुई शिरायें समस्त शरीरमें फैली हुई हैं जैसे कमलके मूलसे निकली हुई कमलकी नालियोंका जाल जलमें फैला रहता है ( इससे यह भी प्रतीत होता है कि शिरायें अपने स्थानमें, कभी कभी कोई डिग भी जासकती हैं अर्थात् हटी हुई भी होसकती हैं और कुछ न्यूनाधिक होना भी संभव है) ॥४१॥ इति पं० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतसं० भा० टी० शारीरस्थाने सप्तमोऽध्यायः ।। ७ ।।
(७१२) सुश्रुतसंहिता-मा० टी० २०४ , अष्टमोऽध्यायः ८. अथातः शिराव्यधविधिशारीरं व्याख्यास्यामः। यहांसे अगाडी शिराव्यधविधि (शिरावेधनविधि अर्थात् फस्त खोलनेकी विधि) नामक शारीरकका व्याख्यान करते हैं । वालस्थविररूक्षक्षतक्षीणभीरुपरिश्रांतस्त्रीमद्याध्वकर्षितमत्तवांत- विरिक्तास्थापितानुवासितजागरितक्लीवकृशगर्भिणीनां कासश्वास- शोषप्रवृद्धज्वराक्षेपकपक्षाघातोपवासपिपासामप्रिपीडितानां च शिरा न विध्येद्याश्चाव्यध्या व्यध्याश्चादृष्टा दृष्टाश्चायंत्रिता यंत्रि- ताश्चानुत्थिता इति ॥१॥ बालक, वृद्ध, रूक्ष, क्षीण, भीरु (डरपोक), परिश्रांत (थकाहुआ), तथा स्त्री, मदिरा, मार्ग इनसे जो दुबला होगया हो, मदोन्मत्त, जिसे वमन होचुका हो, जिसे विरेचन होचुका हो, तथा जिसको आस्थापन और अनुवासन वस्तिप्रगोग हुआ हो, और रात्रिको जिसे निद्रा न आती हो, तथा क्लीव ( नपुंसक), दुर्बल और गर्भवती स्त्री इनकी शिरा वय नहीं करनी चाहिये अर्थात् इतनोंकी फस्त खोलनी नहीं चाहिये तथा खांसी और श्वासके रोगी, और शोषरोगवाले, तथा बढे हुए ज्वर, आक्षेपक और पक्षाघात रोगवाले, तथा उपवास (व्रत या लंघन ) किये हुए, तृषा घुक्त, तथा मूछासे पीडित ऐसे मनुष्योंकी भी शिरा वेधन नहीं करनी चाहिये और जो शिरा अवध्य है उनको न वैधे और जो वेध्य तो हैं परंतु अदृष्ट हैं उन्हें भी न वेधे और जो दीखती भी हैं पर यन्त्रसाध्य नहीं हैं उन्हें भी नहीं वेधे और जो यंत्रसाध्य भी हैं पर उठी हुई या ऊपरको उठती नही हैं उन्हें भी नहीं वेधे ( अर्थात् जो शिरा वेधन करने योग्य हैं और दीखती भी हैं और यंत्रसाध्य भी हैं और ऊपरको उठी भी हों उनका वेधन करे)॥ १ ॥ शोणितावसेकसाध्याश्च विकाराः प्रागभिहितास्तेषु चापक्केष्व- ( वाक्य१) वालस्थविरयोरसपूर्णक्षीण धातुत्वात् । क्षक्षतक्षीणानामनिलव्याविभयात् क्षतेन क्षीणस्य वा । मारोश्च तमोबहुलत्वाल्लोहितदर्शनेन मूभियान्न विव्येत् । अन्यत्रापि कस्यचिद्दोपभयो बोद्धव्यः । यथा मद्यपत्यातिमूच्छीकरत्वात् । अव्वस्त्रीकर्पितस्य वातकोपभयात् । वातविरिक्तयोरपि वातप्रकोपभया- दतिनैवल्यपरत्वाच्च । अनुवासितस्यामिमाद्यमयात् । लीवस्य प्रधानधातोरभावादल्पसत्त्वेन च मृत्योर्भयात् । कृयाय गर्भिणीना चोपश्चीणधातुत्वाद्देहसदेहभयात् 1 कासश्वासगोषिणामपि अपचीयमानधातुत्वेन देहसंदेह- नयात् । वृद्चरस्य प्रलापादिभयात् गिरा न विध्येत् ( इति नि० स०) - १०५ शारीरस्थान-अ०८. (७१३) न्येषु चानुक्तेषु यथाभ्यासं यथान्यायं च शिरां विध्येत्प्रतिषि- द्धानामपि च विषोपसर्ग आत्ययिकेषु शिराव्यधनमप्रतिषिद्धम्॥ रुधिर निकालनेसे साध्य होनेवाले रोग पहले (सूत्रस्थानोक्त शोणितवर्णनीया- ध्यायमें) कहे गये हैं (जैसे त्वग्दोष, विधि आदि) उनमें जबतक पकाव न हुआ हो अर्थात् राध न पडगई हो और अन्य जो नहीं कहे गये हैं और रुधिर निका- लनेसे साध्य हो सकते हों ऐसे विकारोंमें अभ्यासपूर्वक और निर्णयपूर्वक शिरा- वेधन करना चाहिये और जिनको शिरावेधन (फस्त खोलना) वर्जित भी कहा है उनमेंसे किसीको विषका संसर्ग हो या अत्यन्त आवश्यक हो अर्थात् शिरावेधन विना आराम नहीं होसके तो उनके भी शिरावेधन करना निषिद्ध नहीं है ॥२॥ तत्र स्निग्धखिन्नमातुरं यथादोषप्रत्यनीकद्रवप्रायमन्नं भुक्तवंत यवागू पीतवंतं वा यथाकालमुपस्थाप्यासीनं स्थितं वा प्राणान- वाधमानो वस्त्रपट्टचौतर्वल्कललतानामन्यतमेन यंत्रयित्वा नातिगाढं नातिशिथिलं शरीरप्रदेशमासाद्य यथोक्तं शस्त्रं गृही- स्वा शिरां विध्येत॥३॥ जब शिरावेधन करना (फस्त खोलना ) हो तब रोगीको यथाचत स्नेहन, स्वे- दन कराकर दोषोंके अनुसार शांतिकारक पतला पदार्थ अन्नका खिलाकर, यवागू पिलाकर समयके अनुसार खडा करके या विटला कर प्रियवाक्योंस आश्वासन करके कपडेके या रेशमके फीतेसे अथवा चमडे या वृक्षकी छाल ( सणस ) या लता, (वेल) इनमेंसे किसी एकसे अंगको ( नस उठाने आदिके लिये ) न वहुत कडा और न बहुत ढीला बांधकर और हाथस सूतकर ( मर्म आदि तथा युक्त शिराको विचारकर ) यथायोग्य शस्त्र (नश्तर )लेकर शिरावेधन करे अर्थात् फस्त खोलदे ॥३॥ नैवातिशीते नात्युष्णे न प्रवाते न चाभ्रिते॥ शिराणां व्यधनं कार्यमरोगे वा कदाचन ॥४॥ (वाक्य २) प्रागभिहितेषु शोणितावसेकसाध्येषु अपक्केतृ सिरा विध्येत् पक्काना रक्ताभावाद्रक्तनुतिर्न क्रियते इति । अन्येषु चानुक्तेष्विति-विपाकाभिमुखेषु शोणितावसेकसाध्येषु अनभिहितेषु इत्यर्थः । ( इति नि० सं०) यथाभ्यासम् अभ्यासपूर्वकं यथासमीपं वा । यथान्याय स्नेहस्वेदादिपूर्वकम् । प्रतिषिद्धानामपि चात्ययिकेषु सिराव्यधनमप्रतिपिद्धम् । अत्ययो विनागो भवत्यस्मादिति आत्यायिकस्तेपु॥(वाक्य३ ) तत्र इति वाक्योपक्रमे । आतुरमित्यत्र आतुरग्रहणेन स्वस्थस्य रक्त न स्त्रावयेदिति राद्धातः । द्रवप्राय रतो- वेदनार्थम् ( इति डल्लनः ) ॥
(७१४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। अति शीत समयमें फस्त नहीं खोलनी और अति गरमीमें भी नहीं खोलनी, हवामें भी नहीं खोलनी और वादल हो तव भी नहीं खोलनी चाहिये और कोई रोग नहीं हो तब तो कदाचित् फस्त खोलनीही नहीं चाहिये ॥ ४ ॥ तत्र व्यध्यशिरं पुरुषं प्रत्यादित्यलुखमरनिमात्रोच्छ्रिते उपवेश्या- सने सबैथ्नोराकुंचिंतयोनिवेश्य कूपरे संधिद्वर्यस्योपरि हस्तावं. तगूढांगुष्ठकृतसुष्टी मन्ययोः स्थापयित्वा यंत्रणशाटके ग्रीवामुं- ध्योपरि परिक्षिप्यान्येन पुरुषेण पश्चात् स्थितेन वामहस्तेनो- त्तानेन शाटकांतर्द्वयं ग्राहयित्वा ततो बैद्यो" ब्रूयादक्षिणहस्तेन शिरोत्थापनार्थ नात्यार्यतशिथिलं यंत्रणमौवेष्टयेत्यसृक्स्रावणार्थं यं पृष्ठमध्ये चे पीयेति कर्मपुरुषं च वायुपूर्णसुखं स्थापयेदेष उत्तमांगगानामंतर्मुखवानां शिराणां व्यधने यंत्रणविधिः॥५॥ जिस मनुष्यकी फस्त खोलनी हो उसे सूर्यके सम्मुख अरलिमात्र ( चटली,अंगुली पर्यत एक हाथ ) ऊँचे स्थान (चौकी वगैरह )पर विठलादे ( दोनों पांव नीचे रखा दे) और दोनों साथल संकुचित कराकर उनकी संधि ( घुटनों) पर दोनों कोह- नियां रखवादे और हाथोंके दोनों अंगूठे मुडियोसें बंद कराकर मुट्ठियोंको सन्याः स्थानके (ग्रीवाके जोतोंके ) पास रखवाद फिर बंध बांधनके फीतेको ग्रीवा और मुट्ठियोंक ऊपरसे ले जाकर एक अन्य मनुष्यको पिछाडीकी तरफ खडा करके जिसका बायां हाथ कुछ ऊँचा रहे उसे फीतके दोनों शिरे पकड़वी देवे और वैद्य उससे कहे कि, नस उठानके लिये दाहिने हाथसे न बहुत कड़ा न बहुत टीला ऐसा रोगीके बंध लगा और रुधिर निकलने के लिये ग्रीवामें जो फीता पड़ा है उसे दवा (इलत ठीक नरस उठती है और ठीक रुधिर निकलता है ) और जिसकी फस्त खोल उसे वायुसे मुह भरा बैठा रहने दे। यह विधि मुखके भीतरकी शिराओंको छोडकर उत्तमांग (चहरे )में प्राप्त अन्य शिराओंके वैधनमें (अर्थात् सरेरु फस्तके लिये ) बहुत ठीक है अथवा मुखके भीतरकी शिराओंको छोडकर ग्रीवासे ऊपरकी शिराओके वेधनमें यह यंत्रणविधि है ॥ ५ ॥ (वा० ५) अलिमात्रोच्छ्तेि इति-कनिष्ठांगुलिप्रमितहस्तमात्रोच्छिते इत्यर्थः । सक्थ्नोराकुंचितयोः मविद्ववत्योपरि कारे निवेदयेत्यन्ययः।अनगुंडागुष्ठकृतमुष्टी हस्ती मन्ययोः स्थापयित्वा चेत्यन्वयः । पश्चात स्थित गद्दीनशाटकं पुनष वैव इनि ब्रूयात्-"गिरोत्थापनार्थ यत्र आवेष्टव तथा रक्तस्रावणार्थ च यंत्र पृष्ठ- मध्ये पी" दनि । कर्मपुत्पमिति-यस्य गिराव्यवनं क्रियते त कर्मपुरुर । अतर्मुखवानामिति-मु- स्थानगतवजितानाम् ( इति टल्लनः)।
शारीरस्थान-अ० ८.
(७१५)
पांवकी शिरावेधनविधि ।
तत्र पादव्यध्यशिरस्य पादं समे स्थाने सुस्थिरं स्थापयित्वान्य
पादमीषत्संकुचितमुच्चैः कृत्वा व्यध्यपादं जानुसंधेरधः शाटने-
नावेष्टय हस्ताभ्यां प्रपीड्य गुल्फें व्यध्यप्रदेशस्योपरि चतुरंगुलं
प्लोतादीनामन्यतमेन वद्धां पादशिरां विध्येत् ॥ ६॥
जिसके पांवकी शिराका वेधन करना हो उसके पांवको समान भूमिमें निश्चल-
तासे रखवाकर अन्य दूसरे (जिसकी शिरा न वधनी हो) पांवको कुछ सिकोड़कर
ऊंचा रखवादे फिर शिरावधनेवाले समान भूमिस्थित पांवके घुटनेसे नीचे पट्टीसे
बांधकर टकनेको हाथोंसे मले (सूंते) फिर वेधनकी जगहसे चार अंगुल ऊपर सूत
या रेशम आदिसे बांधी हुई पांवकी शिराको वेधन करे ॥ ६ ॥
हाथका शिरावेधन ।
अथोपारष्टाँद्धस्तौ गूढांगुष्टंकृतसुष्टी सम्यगासने स्थापयित्वा
सुखोपविष्टस्य पूर्ववचंत्र वाँ हस्तशिरां विध्येत् ॥ ७ ॥
यदि हाथकी फस्त खोलनी हो तो थोड़ा हाथोंको ऊंचा कराकर अंगुठेको मुट्ठी में
दवाकर ठोक ( समान ) आसनपर बिठाकर सुखसे बैठे हुए मनुष्यके पहले कहे
अनुसार कोहनीके ऊपर पट्टी बांधकर हाथकी फस्त खोलनी चाहिये ॥ ७ ॥
अंगविशेषका शिरावधन ।
गृध्रसीविश्वाच्योः संकुचितजानुकूपरः स्यात् । श्रोणीपृष्ठस्कंधे-
नामितपृष्ठस्यावाशिरस्कस्योपविष्टस्य विस्फूर्जितपृष्ठस्य विध्येत् ८
गृध्रसी और विश्वाची नामक वातव्याधियोंमें फस्त खोले तो गृध्रसीमें घुटने
सिकोड़ कर और विश्वाचीमें कोहनी सिकोड़ कर शिरा वेधे । कमर, पीठ, कंधे
इनका रक्त निकालना हो तो पीठ ऊपरको और शिर नीचेको करके बैठावे और
पीठको नवाये रखकर सिरावेधन करे ॥ ८ ॥
उदरोरसोः प्रसारितोरस्कस्योन्नमितशिरस्कस्य विस्फूर्जितदेह-
स्य । बाहुभ्यामवलंब्यमानदेहस्य पार्श्वयोः । अवनासितमेस्थ्य
मेढ़े। उन्नामितविदष्टजिह्वाग्रस्याधो जिह्वायाम्।अतिव्यात्ताननस्य
तालुनि दंतमूलेषु च ॥ ९ ॥ एवं यंत्रोपायर्यानन्याश्च शिरोत्थोपन-
हेतून्बुद्धयोवेक्ष्य शरीरवशेन व्याधिवशेन – विदध्यात् ॥ १०॥
१०८
(७१६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
पेट और छातीकी शिरा वेधन करनी हो तो. हृदयको पसारकर शिरको ऊंचा
करके और शरीरको फैलाकर वेधन करे । पँसवाड़े की शिरा वेधन करनी हो तो
ऐसे विठावे कि दोनों हाथ टेककर देह उनके सहारे होजावे । लिंगकी फस्त खोलनी
हो तो स्तब्धीभूत होनपर खोले । जिह्वाकी शिरा वेधनी हो तो बाहरको निकली
हुई, ऊपरको उठी हुई, दांतोंसे अलग जिह्वाका अग्रभाग कराकर नीचेको शिरा
वेधन करे।तालु और दंतमूलमें फस्त खोलनी हो तो खूब मुँह फाड़ेहुएकी फस्त
खोले ॥ ९॥ इसी प्रकार अन्यत्र सब जगह शरीरके अनुकूल और व्याधिके अनु-
कूल शिराओंके उठानेके लिये बुद्धिसे यंत्रणा (पट्टी आदि बांधना या शरीरके अंग,
प्रत्यंगको फैलाना, सिकोडना आदि) कल्पना करलेना चाहिये ॥ १० ॥
शिरावेधनम शस्त्रका प्रमाण ।
मांसलेष्ववकाशेषु यवमानं शस्त्रं निदध्यादतोऽन्येष्वर्द्धयवमात्रं
व्रीहिमात्रं वा व्रीहिमुखेन अस्थ्नामुपरि कुठारिया विध्येदद्धय-
वमात्रम् ॥ ११॥ भवन्ति चात्र-
मांसयुक्त प्रदेशमें जो मात्र शस्त्र (नश्तर) घुसाना चाहिये और अन्यत्र (जहां
मांस अधिक न हो वहां ) आधे जौकी बराबर तथा चावलके बरावरही घुसानेसे
शिरावेधन हो जाता है । शिरावेधन कर्म व्रीहिमुख नामक शस्त्रसे करना चाहिये,
परंतु अस्थि (हड्डियों) के ऊपर कुठारिका नामक शस्त्रसे आधे जौके बराबर वेधन
करना चाहिये ॥ ११ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं-
शिरावेधनका समय।
व्यस्ने वर्षासु विध्येत ग्रीष्मकाले तु शीतले ॥
हेमंतकाले मध्याहे शस्त्रकालास्त्रयः स्मृताः ॥१२॥
वर्षा ऋतुमें जब बादल न हो तब और ग्रीष्म (गरमी) में ठंडके समय और
हेमंतऋतु (सरदी) में मध्याह्न के समय शस्त्रकर्म करे (शस्त्रकर्म करनेके इस भांति
ये तीन समय हैं ॥ १२ ॥
ठीक शिराविधाके लक्षण ।
सम्यक् शस्त्रनिपातेन धारया वाँ स्रवेदसृक् ॥
मुहुर्त रुद्धा तिठेच्च सुविद्धा ती विनि दिशेत् ॥ १३ ॥
ठीक ठीक शस्त्र (नश्तर) लगनेसे मुहर्तभरतक धारसे रुधिर निकले और जब
बंद करना चाहे उसी समय बंद होजावे तो जानो कि ठीक शिरावेधन हुवा ॥ १३॥
॥ १०९ शारीरस्थान-अ०८. (७१७) दूषित रक्त पहले निकलताहै। यथा कुसुभेपुष्पेषु पूर्व स्रवति पीतिका ॥ तां शिरासु विद्धासु दुष्टमने प्रवर्तते ॥ १४ ॥ जैसे करूंभेके फूलोंमेंसे पहले पीला रंग (डहल ) निकलताहै उसी प्रकार शिरा- वधन होनेपर दूषित रुधिर पहले निकलताहै ॥ १४ ॥ मुच्छितस्यातिभीतस्य श्रांतस्य तृषितस्य च ॥ मैं वह ति शिरा विद्धास्तथानुत्थितयंत्रिताः ॥ १५॥ जिसे मच्छी आजावे या जो अधिक डरजावे तथा थकेहुए, तृषायुक्त ऐसे मनु- प्योंकी शिरा वेधन की जानेपर रुधिर नही निकलताहै तथा जिसकी रगें उठी न हों तथा पट्टीसे बांधा न गया हो तोभी रुधिर नही निकलताहै ॥ १५ ॥ क्षीणस्य बहुदोषस्य मूर्च्छयाभिद्रुतस्य च ॥ भूयोऽपराले विस्राव्या सौंपरेमुख्यपि वा ।। १६ ।। जो मनुष्य क्षीण हो अथवा जिसके बहुत दोष बढा हो अथवा जिसे मूर्छा आगई हो ऐसे मनुष्यके फिर तीसरे पहर शिरा वेधन करनी चाहिये या दूसरे दिन या तीसरे दिन फिर वेधन करनी चाहिये ॥ १६ ॥ रक्तं सशेषदोष तु कुर्यादपि विचक्षणः॥ न चाँतिप्रस्तुतं कुर्याच्छे. संशमनैर्जयेत् ॥ १७॥ बलिनो बहुदोषस्य वयस्थस्य शरीरि- णः॥ परं प्रमाणमिच्छति प्रस्थं शोणितमोक्षणे ॥१८॥ जब थोडासा दूषित रुधिर वाकी रहे तभी छोडदेना चाहिये अति रुधिर नहीं निकाले किंतु दूषित थोडे बचे हुएको औषधोंसे शमन करे ॥ १७ ॥ बलवान्, बहुत बढे दोषवाले, जवान, पूरे शरीरवालेके रुधिर निकालनेका परम (जादेसे जादे) प्रमाण १ प्रस्थ (१६ पल) है इससे अधिक कदाचित् नही निकाले ॥ १८ ॥ व्याधिविशेषपर शिरावेधन । तत्र पाददोहपादहर्षापबाहुकचिप्पविसर्पवातशोणितवातकण्टक- विचर्चिकापाददारीप्रभृतिषु क्षिप्रमर्मण उपारष्टाड्यगुले नीहि- मुखेन शिरां विध्येत् ॥ १९॥ श्लीपदे तचिकित्सिते यथा वक्ष्यते। कोष्टकाशिरःखंजपंगुलवातवेदनासु जंघायां गुल्फस्योपरि चतुरं- (वा० १९) अत्र प्रभृतिग्रहणादन्यपि पादरोगा रक्तानुबधिदोषजाता गृह्यते । ११ । ११० (७१८) सुश्रुतसंहिता-मा० टी०। गुले ॥ २० ॥ अपच्यामिंद्रवस्तरधस्ताद्वधंगुले जानुसंधेरुपर्यो वा चतुरंगुले गृध्रस्याम् । ऊरुपलसंश्रितां तु गलगंडे । एतेने- तरसस्थिवाहू च व्याख्यातौ ॥२१॥ पाददाह, पादहर्ष (पांवों में झनझनाट होना ), अपवाहुक, चिपरोग, विसर्प, वातरक्त, वातकंटक, विचर्चिका और पाददारी (विंवाई) इत्यादि पैरों तथा हायोंके अन्य रक्तविकारोंमेंभी क्षिप्रसंज्ञक मर्मसे ऊपर दो अंगुल व्रीहिमुख शस्त्रसे शिरा वेधे ॥१९॥ श्वीपद रोगों जैसे उसकी चिकित्सा अगाडी वर्णन करेंगे वैसे करे । कोष्ट- कशीर्ष, खंज और पंगु वातरोगोंमें टकनेसे चार अंगुल ऊपर जंघा अर्थात् पिडलीमें शिरा वेधे ॥२०॥ अपची रोगमें इंद्रवस्ति नामक स्थानसे नीचे दो अंगुल पर और गृध्रसी रोगमें घुटनेकी संधिसे चार अंगुल ऊपर या नीचेको शिरा वेधे । तथा गलगंडरोगमें साथलकी संधिगत शिराको वैधन करना चाहिये । इसी हिसाबसे दूसरे पांव और दोनों हाथोंके शिरावेधनको समझना चाहिये अर्थात् जैसे पाददाह पांवोंमें होता है वैसेही हाथों में दाह हो तो हाथोंकी शिरा वेधे इसी भांति जोव्याधि उक्त व्याधियों से जिस हाथ या पांवमें हो उसीमें शिरावेधन करे ॥ २१ ॥ विशेषतस्तु वामवाही कूर्परसंधेरभ्यंतरतो वाहुमध्ये प्लीह्नि कनि- ष्ठिकानाविकयोमध्ये वा । एवं दक्षिणवाही यकृदाल्ये कफोदरे चैतामेव च कालवालयोरप्यादिशति ॥ २२ ॥ विशेष प्लीहरोगमें बायें हाथमें कोहनीकी संधिमें शिरा वेधनी चाहिये अथवा कनिष्ठिका और अनामिका अंगुलियोंके वीचमे वेधे । इसी भांति यकृद्दाली रोगमें तथा कफोदरमें, एवं खांसी और श्वासमें दाहिने हाथकी कोहनीकी संधि या उन्हीं दो अंगुलियों के मध्य में शिरा वेधे ॥ २२ ॥ गृध्रस्यामिव विश्वाच्याम् । श्रोणिप्रतिसमंताद्वयंगुले प्रवाहि- कायां शूलिन्याम् । परिकर्तिकोपदंशशूकदोषशुक्रव्यापत्सु मेढूम- ध्ये । वृषणयोः पाव सूत्रवृद्ध्याम् । नामेरधश्चतुरंगुले सेवन्या वामपार्श्वे दकोदरे। वासपाचे कक्षास्तनयोरंतरेऽतबिंद्रधौ पाश्र्व- शूले च । वाहुशोषापवाहुकयोरेप्यके वदत्यसयोरंतरे ॥ २३ ॥ (वा० २१) यस्माद्धस्तयोरपि दाहादयो रोगा भवंत्यतो बाहुग्रहणं कृतम् ( इति डल्लनः ) (वा०२२) उपरसधेरित्यनेन कूर्परसंधिसमीपदेश उच्यते संधी शस्त्रप्रणिधानस्य निपिद्धत्वात् । कासश्वासयोरिति अस्पयोर्मार्गविशुद्ध्यर्थ नतूद्रितयोत्तत्र शिराव्यवप्रतिषवत्वाच ( इति गय. ) ॥ भत्या जानुमधेरपर्यंघो वा चतुरगुले एवं विश्वाच्या कर्परसंघेरुपर्यवो वा चतुरंगुले इत्ययः ।। (वा० २३ ) यया -- शारीरस्थान-अ०८. (७१९) गृध्रसीके भांतिही विश्वाचीमें समझना (अर्थात् जैसे गृध्रसीमें घुटनेकी संधिक नांचे या ऊपर चार अंगुल शिरा वेधे वैसेही विश्वाचीमें कोहनीसे चार चार अंगुल नीचे या ऊपर वेधे)। शूलयुक्त प्रवाहिकामें कमरके पास दो अंगुलपर शिरावेधे परिकर्तिका, उपदंश, शूकरोग और वीर्यविकारमें लिंगके बीच शिरा वेधे । मूत्र- वृद्धि हो तो वृषणोंके पास शिरा वेधे। दकोदर ( जलोदर ) रोगमें नाभिसे चार अंगुल नीचे सीवनसे बांई तरफ शिरा वेधन करनी चाहिये । अंतर्विद्रधि और पार्श्वशूलमें बायें पँसवाडेमें कांख और चूँचीके वीचकी शिरा वेधन करे और कई आचार्य ऐसा भी कहते हैं कि बाहुशोष और अपवाहुक रोगमें कांधोंके बीचमें फस्त खोले ॥ २३ ॥ त्रिकसंधिमध्यगतां तृतीयके । अधःस्कंधसंधिगतामन्यतरपार्श्व- संस्थितां च चतुर्थके। हनुसंधिलध्यगतासपस्मारे । शंखकेशा- तसंधिगतामुरोपांगललाटेषु चोन्मादेऽपस्मारे च । जिह्वारोगे- वधोजिह्वायां दंतव्याधिषु च । तालुनि तालव्येषु । कर्णयोरु- परि लमंतात् कर्णशूले तद्रोगेषु च । गंधाग्रहणे नासारोगेषु च नासाये। तिमिराक्षिपाकप्रभृतिष्वामयेधूपनासिके लालाट्याम- पांग्यां चैता एव शिरोरोगाधिमंथप्रभृतिषु रोगेष्विति ॥ २४ ॥ तृतीयक ज्वरमें त्रिकसंधिकी शिरा वेधे । चातुर्थिकमें कंधेके नीचे कोईसे- पॅसवाडेकी संधिगत शिरा वेधे । अपस्मार ( मृगी) रोगमें ठोडीके बीचकी संधिमें शिरा वेधे । उन्माद तथा मृगीमें कनपटीकी केशांतसंधिगत तथा उर, अपांग और ललाटमें शिरा वेधन करे । जिह्वाके और दांतोंके रोगोंमें जिह्वाके नीचेको शिरा वेधे । तालके रोगों में तालुकी शिरा वेधना । कर्णशूल और कर्णरोगोंमें कानके पास ऊपरको शिरा वेधना । गंध न आवे या नासिकाके रोगोंमें नासिकाके अग्र- भागमें शिरा वेवे । तिमिररोग और आंखपकने ( दूखने ) आदिमें नाकके समीप शिरा वेधे अथवा ललाट या अपांगकी शिरा वेधे । तथा शिरके रोग और अधि- मंथ आदि ( अन्य क्षद्र रोग अरूंषिकादि ) में भी इन्हें ही वेधे ॥ २४ ॥ अत ऊध्र्व दुष्टव्यधनसनुव्याख्यास्यामः। इसके अगाडी अब हम दुष्टव्यधन अर्थात् शिराओंका जो अनुचित वेध होजाना है उसका वर्णन करते हैं। (वा० २४) हनुसंधिगतामपस्मारे इत्यत्र हनुसधी समुद्भतां शिरामित्यर्थः । उपनासिके नासासमी- पस्थे। शिरोरोगाधिमथप्रभृतिषु इत्यत्र प्रभृतिग्रहणात् क्षुद्ररोगे पठिता अरूषिकादेग्रहणम्(इति निवधसंग्रहः) ।।
(७२०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । तत्र दुर्विद्धातिविद्धा कुंचिता पिच्चिता कुहिताऽप्रत्रुता अत्यु- दीर्णा अन्तेऽभिहता परिशुष्का कूणिता वेपिता अनुत्थितविद्धा शस्त्रहता तिर्यग्विद्धा अपविद्धा अव्याध्या विद्रुता धेनुका पुनः- पुनर्विद्धा शिरास्नायवस्थिसंधिमर्मसु चेति विंशतिर्दुष्टव्यधाः॥२५॥ इनमें १ दुर्विद्धा, २ अतिविद्धा, ३ कुंचिता, ४ पिच्चिता, ५ कुट्टिता, ६ अप्र- त्रुता, ७ अत्युदीर्णा, ८ अंतभिहता, ९ परिशुष्का, १० कूणिता, ११ वेपिता, १२ अनुस्थितविद्धा, १३ शस्त्रहता, १४ तिर्यग्विद्धा, १५अपविद्धा, १६ अन्याध्या, १७ विद्वता, १८ धेनुका, १९ पुनःपुनर्विद्धा. २० शिरा, म्नायु, अस्थि और संधियोंके मर्मस्थानोंमें विधना ऐसे ये शिरावधनमें बीस २० प्रकारके दूपण होते हैं ( इनके लक्षण और अर्थ अभी अगाडी कहेंगे ) ॥ २५ ॥ दुर्विद्धादिक लक्षण । तत्र या सूक्ष्मशस्त्रविद्धा न व्यक्तमसक स्रवति रुजाशोफवती च सा दुर्विद्धा । प्रमाणातिरिक्तविद्धायामंतःप्रविशति शोणितं शोणितातिप्रवृत्तिर्वा साऽतिविद्धा । कुंचितायामप्येवम् । कुंठशस्त्र- प्रमथिता स्थलीभावमापन्ना पिच्चिता । अनासादिता पुनःपुनर- तयोश्च वहुशः शस्त्राभिहता कुट्टिता।शीतभयमूर्छाभिरप्रवृत्तशो- णिता अप्रत्रुता । तीक्ष्णमहामुखशस्त्रविद्धा अत्युदीर्णा । अल्पर क्तस्राविण्यंतेविद्धा । क्षीणशोणितस्यानिलपूर्णा परिशुष्का । चतु र्भागावसादिता किंचित्प्रवृत्तशोणिता कृणिता । दुःस्थानवंधनाद्वे पमानायाः शोणितसंमोहो भवति सा वेषिता । अनुत्थितवि- छायामप्यवम् । छिन्नातिप्रवृत्तशोणिता क्रियासंगकरी शस्त्रहता। तिथ्यप्राणहितशस्त्रा किंचिच्छेषा तिर्यग्विद्धा । वहुशः क्षता हीनशस्त्रप्रणिधानेनापविद्धा। अशस्त्रकृत्या अव्याध्या । अनव- स्थितविद्धा विद्रुता । प्रदेशस्य वहुशोऽवघट्टनादारोहव्यधा मुहुर्मुहुःशोणितस्रावा धेनुका । सूक्ष्मशस्त्रव्यधनाद्दहुशो विच्छि- न्ना पुनःपुनर्विद्धा । स्नायवस्थिशिरासंधिमर्मसु विद्धा वा रुजां शोषं वैकल्यं मरणं वापादयति ॥ २६ ॥ भवन्ति चात्र- - , ११३ शारीरस्थान-अ०८. (७२१) जो शिरा छोटे पतले शस्त्रसे विधे जिससे ठीक ठीक रुधिरराव न हो पीडा और सूजन होजावे वह १ दुर्विद्धा है । जो नस प्रमाणसे अधिक छेदन होजावे और खून भीतरको प्रवेश होजावे या बहुत अधिक खून निकले वह २ अतिविद्धा है।३ कुंचित (टेढी विधी ) केभी येही लक्षण होतेहैं । मोटी धारवाले शस्त्रसे वेधनेपर मथितसी होकर मोटी पडजावे, फैलजावे, कुचलनावे वह ४ पिच्चिता है। जो एकवार ठीक न विधे तव बार बार उसके आसपास शस्त्रसे छेदी जावे वह ५ कुट्टिता है । जो ठंढ या भय या मूर्छा आदिसे रक्त नहीं बहे तो ६ अप्रसुता है। बहुत तीक्ष्ण बडे मुँहके शस्त्रसे जो बहुत विस्तृत छेद होजावे तो वह ७ अतिउदी है। जिसके वेधनमें थोडासा रक्त निकले वह -८ अंतेऽभिहता या अंतेविद्धा है। क्षीणरुधिर होनेपर जो वायुसे भर ( सूख) जावे वह ९ परिशुष्का है । जो चौथा- ईसी विंधे और किचित् रक्त निकले वह १० कूणिता है । जिसमें ठीक स्थानमें बंध नहीं लगने आदिसे नस कंपायमान होतीरहे और रुधिर बंद बंदहोकर कुछरे निकले उसे ११ वेपिता कहतेहैं । जो नस विना उठी वीधी जावे वह १२ अनु- त्थितविद्धा कहातीहै उसमें भी वेपिताकी भांति रक्त कम निकलना आदि लक्षण जानो । जो छेदन होनेपर बहुत रक्त स्रवे और क्रियाको रोकदे ( नसका फरकार और गति बंद हो जावे) वह १३ शस्त्रहता है। जो तिरछे शस्त्रपात होनेसे तिरछी विधे, कुछ शेष रहजावे वह १४ तिर्यग्विद्धा कहातीहै ।जो हीनशस्त्रके कारण बहुत छेद कीगई है वह १५ अपविद्धा है। जो शिरा शस्त्रकर्म (छेदन, वेधन )से वर्जित है (उसका वेध होना) १६ अन्याध्या कहातीहै। जो असावधानीसे वींधी जावे वह १७ विद्वता है । स्थानको बारवार शस्त्रसे वेधेजानेपर बारबार रुधिर नवे वह १८ धेनुका कहातीहै । छोटे या वारीक नोकके शस्त्रसे कईवार छेदन करीजावे वह १९ पुनःपुनर्विद्धा कहातीहै । स्नायुमर्म, अस्थिमर्म, शिरामर्य और संधिमर्म इन स्थानों में विधी हुई शिरा पीडा, शोष और विकलता तथा मृत्युकारक हो जाती है ( यह २० वी मर्मविद्धा कहाती है) ॥ २६ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- शिरासु शिक्षितो नास्ति चलो ह्येताः स्वभावतः॥ मत्स्यवत्परि- वर्तते, तस्माद्यत्नेन ताडयेत् ॥ २७॥ अजानता गृहीते तुं शस्त्रे कायनिपातितेविंति व्यापर्दैश्चैता वह्वश्चाप्युपद्रवाः ॥ २८ ॥ शिराओंके पूर्ण ज्ञानमें कोई भी पूरा २ शिक्षित नहीं है (और नही हो सकता) क्योंकि ये स्वभावहीसे चलायमान होती हैं, मछलीकी भांति कभी ऊपरको उटती हैं और फिर कभी नीचेको हो जाती हैं और चलती रहती है इस कारणसे इनक ताडन (बांधना और वेधन करना आदि) यत्नपूर्वक करना चाहिये ॥ २७ ॥ यदि । A । (७२२) मुश्रुतसंहिता-भा. टी. ११४ अजान मनुष्य शस्त्र लेकर शिरावेधन करे (पूर्ण अभ्यासविना फस्त खोल) तो उससे अनेक व्याधियां और बहुतसे उपद्व उत्पन्न होजातहै ॥ २८ ॥ शिरावेधनकी प्रधानता । स्नेहादिभिः क्रियायोगैर्न तथा लेपनैरपि ॥ यांत्याशु व्याधयः शांति यथों सम्यक् शिराव्यधात् ॥ २९॥ शिराव्यधश्चिकित्साई शल्यतंत्रे प्रकीर्तितः॥ यर्थी प्रणिहितः सम्यग्वस्तिः कायचि- कित्सिते ॥३०॥ स्नेहन, वंदन आदि क्रियाओंसे तथा लेपोंस इतनी शीव व्याधि शांत नहीं होती है जितनी ठीक २ शिरावेधनसे शीव शांत हो जाती है ॥ २९ ॥ शल्यतंत्रमें आधा कर्म शिरावेधन और आधी सब क्रिया में ऐसेही कायचिकित्सा ठीक २ वस्तिकर्म आधी चिकित्सा है और अन्य सब आधी (इससे शल्यक्रियाम शिरावेधनकी बहुत मुख्यता है और कायचिकित्सामें वस्तिकर्मकी प्रधानता है ) ॥ ३० ॥ तत्रे स्निग्धस्विन्नवांतविरिक्तास्थापितानुवासितशिराविद्धः परि- हर्तव्यानि क्रोधायाससैथुनदिवास्वप्नवाव्यायामयानोत्थानासन- चंक्रमणशीतवातात्पविरुद्धालात्स्याजीर्णात्यावलेलाभात्मार्समे मन्यते एनेपा बिस्तरमुपरिटाद्वक्ष्यामः ॥ ३१ ॥ जिसने स्नेहपान किया हो या स्वेदक्रिया की हो या वमन, विरेचन आस्थापनवस्ति, अनुवासन वस्तिकर्म क्यिाहो या शेिरावेधन कराया हो उन रोगियोको क्रोध, परिश्रम, मैथुन, दिनमें सोना, बहुत बोलना, सवारी करना, उछलना, दूरतक फिरना, शीतवायु, धूप, विरुद्ध और प्रतिकूल भोजन करना, तथा अनीकारक पदार्थ इनसे क्वे रहना चाहिये जबतक पूरा बल ( ताकत ) न हो तबतक और कई एक मास पथ्य करना ऐसा मानते हैं इनका विस्तारसे वर्णन आगे करेंगे ॥ ३१ ॥ शिराविषाणतुवैस्तु जलोकोभिः परतरं ॥ अवगाढं यापूर्व निर्हरेढुष्टशाणितम् ॥ ३२ ॥ अवगा जलौका स्यात्प्रच्छन्नं पिडिते हितम् ॥ शिराव्यापके रक्त शृंगालावू त्वचि स्थिते॥३३॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थानेऽष्टमोऽध्यायः॥८॥ शिरांवधर्मेशृंग, तूंबी, जोख और पछने इनसे जितना २ नीचा दुष्टरक्त निकालना हो उसी भांति यथापूर्व(क्रमसोदूपित रुधिरको निकाले(जैसे फस्तसे पतला सर्वदेह- व्यापी रक्त निकाले, उससे भीतर गाढेको शृंगसे, उससेभी नीचे और गाटेको 1 ११५ शारीरस्थान-अ० ९. ( ७२३) तूंवेसे, तथा उससेभी नीचे और गाढेको जोखोंसे निकाले । अवगाढ शब्दका अर्थ कोई अभ्यंतर अर्थात् नीचा ऐसा करते हैं और कोई गाढा एसा करते हैं) ॥३२॥ नीचा और गाढा रुधिर हो तो उसमें जलौका (जोखें) काममें लानी चाहिये और जो रुधिरके पिंडे (गाँठेसी) बँध जावें तो उसमें पछने लगाना श्रेष्ठ है तथा शरीरंमें व्यापक रक्तमें शिरावेधन करना उचित है और त्वचामें दुष्ट रक्त हो तो उसमें शंग और तूंवा लगाकर रक्त निकालना श्रेष्ट है ॥ ३३ ॥ इति प० मुरलीधरशर्मवि० सुश्रुतस० भा०टी० शारीरस्थानेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ नवमोऽध्यायः ९. अथातो धमनीव्याकरणं शारीरं व्याख्यास्यामः। यहांसे अगाडी अब हम धमनियोंकी विवेचनाका शारीरक व्याख्यान करते हैं। चतुर्विशतिर्धमन्यो नाभिप्रभवा अभिहिताः॥१॥ तत्रं कॅचि- दाहुः शिराधमनीस्रोतसामविभागं शिराविकारा एव धमन्यः स्त्रोतांति चेति । तत्तु नं सम्यक् । अन्या एवं हि धमन्यः स्रोतांसि च शिराभ्यः॥२॥ चौबीस धमनी नाभिसे उत्पन्न हुई हैं ऐसे पहले शोणितवर्णनीय अध्यायमें कह आये हैं ॥ १ ॥ यहांपर कई ऐसा कहते हैं कि शिरा, धमनी और स्रोत इनमें भेद नहीं है कितु शिराहीका भेद धमनी हैं तथा स्रोतभी इसी भांति शिराहीका भेद हैं (अर्थात् येथी एक प्रकारकी मोटी शिराही समझिये ) परंतु धन्वंतरि भगवान् कहते हैं कि यह कहना उनका ठीक नहीं हैं वास्तवमें धमनी और स्रोत शिराओंसे पृथकही हैं ॥ २ ॥ कस्माद्वथंजनान्यत्वान्मूलसन्नियमात् कर्मवैशेष्यादागमाच्च॥३॥ केवलं तु परस्परसन्निकर्षात् सदृशागमकर्मत्वात् सौक्ष्म्याच्च विभक्तकर्मणामध्यविभाग इव कर्मसु भवति ॥४॥ (वाक्य २से३) ध्मानात् अनिलपूर्णात् धमन्यः । शिराभ्यस्ता अन्याः । व्यंजनान्यत्वात् लक्षणान्य- त्वात् । तत्र वातादिवहाना शिराणामरुणनीलशुललोहितवर्णत्व लक्षणम् । शब्दादिवहानां धमनीनां वर्णा- नुक्के स्वधातुसमवर्णत्व तदुक्त चरके-"स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थलान्यणूनि च । स्रोतासि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ।" इति। मूलसनियमात् मूलनियमात् यथा-मूलशिराश्चतुश्चत्वारिंशत् चतुर्विंशतिधमन्यः। द्वाविशतिः स्रोतासि इति । कर्मवैशेष्यात् कर्मविशेषत्वात् “कर्मणामप्रतिघातम्" इत्यादि प्रोक्तं शिराणां कर्मवशेष्य शब्दरूपरसगंधवह्त्वादिक धमनीना प्राणान्नवारिरसशोणितमासमेदोवाहित्वं स्रोतसां कर्मवैशे- ध्यम् । आगमोत्रायुर्वेदः तत्रापि पार्थक्य दर्शितं यथा-मर्मशिरास्तायुधमनीः परिहरन् इत्यादि (निबंधसंग्रहः) . -- 4 ११६ (७२४) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। इसमें प्रथम कारण " व्यंजनान्यत्वात्' है अर्थात् इनकी व्यंजना (व्यक्ति) भिन्न भिन्न है (अर्थात् वातवहा शिरा अरुण । पित्तवहा नील । कफवहा शुक्ल । रक्तवहा लोहित ) सो धमनियों और स्रोतोंमें इस प्रकार वर्ण नहीं होते किंतु उनके वर्ण जिन २ धातुओंकोव वहातीहैं उनके समान होते हैं किंतु शब्दादिवाहिनी धमनि- योंका कोई वर्णही नहीं। दूसरा कारण "मूलसनियमात्" है अर्थात् मूल के नियमसे भी ये जुदे जुदे हैं (जैसे मूलशिरा ४४ जिनस ७०० शिरा निकलीं और मूलभूत धमनी २४ हैं और स्रोत २२ । तीसरा कारण “ कर्मवैशष्यात्" है अर्थात् कर्मकी विशेषतासे भी ये जुदे २ ही हैं) जैसे अप्रतिघात वातादिवहन शिराओंक कर्म और शब्द-रूप-रस-गंधादि वहन धमनियोंके कर्म, और प्राण-अन्न-जल-रस- रक्त-मांस-मेद आदि वहन स्रोतोंका कर्म है। चौथा कारण आगमात्" है अर्थात् आयुर्वेद शास्त्रसे भी ये जुदेरही हैं क्योंकि शास्त्रमें ये पृथक् २ही लिखे हैं ।। ३ ।। किंतु इनका परस्पर संन्निकर्ष होनेसे और इनका आगम और कर्म समान होनेसे तथा अतिसूक्ष्मताकै कारणसे जुदे जुदे होनेपरभी ये मिले हुएसे (एकसे ) सब कामोंमें प्रतीत होते हैं ॥४॥ तासां तु नाभिभवाणां धसनीनामूर्द्धगों दर्श दशं चाधोगामि- न्यश्चतस्रस्तिर्यग्गाः ॥५॥ उन नाभिसे उत्पन्न हुई २४ धमनियोंमेंसे देश ऊर्द्धगामिनी अर्थात् ऊपरको गमन करनेवाली हैं और दश अधोगामिनी अर्थात् नीचेको गमन करनेवाली हैं तथा चार तिर्यग्गामिनी (तिरछा गमन करनेवाली ) हैं ॥५॥ ऊर्द्धगाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धप्रश्वासोच्छ्वासजूंभितक्षुद्धसितक- थितरुदितादीन्विशेषानभिवहंत्यः शरीरं धारयंति ॥ ६ ॥ तास्तु हृदयमभिप्रपन्नास्त्रिधा जायते तास्त्रिंशत्॥७॥ तासां तु वातपित्त- कफशोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश।शब्दरूपरसगंधानष्टाभिगु हीते।द्वाभ्यांभाषते च द्वाभ्यां घोषं करोति द्वाभ्यां स्वपितिद्वाभ्यां प्रतिवुध्यते । द्वे चाश्रुवाहिन्यौ । द्वे स्तन्यं स्त्रिया वहतः स्तनसं- श्रिते। ते एवं शुक्रं नरस्य स्तनाभ्यामभिवहतः॥८॥ तास्त्वे- तास्त्रिंशत्सविभागा व्याख्याताः। एताभिरूई नाभेरुदरपार्श्वपृ- छोरस्कंधग्रीवाबाहवो धार्यते याप्यते च ॥९॥ भवति चात्र- भ r T म - + ११७ शारीरस्थान-अ० ९. (७२५) ऊपरको गमन करनेवाली धमनी शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, प्रश्वास, उच्छास ( श्वास लेना छोड़ना), जंभाई लेना, छीकना, हँसना, बोलना, रुदन करना आदि कार्योंको वहन करती हुई शरीरको धारण करती हैं ॥ ६॥ ये १० ऊर्द्धगामिनी धमनी हृदयमें पहुँचकर तीनगुनी होकर तीस ३० होजाती हैं ॥ ७॥ उनमें २ वातवहा, २ पित्तवहा, २ कफवहा, २ रक्तवहा, २ रसवहा ऐसे ये १० हैं तथा शब्द, रूप, रस और गंधको प्राप्त करनेवाली दो दो ८ये। दोसे मनुष्य बोलता है, २से घोप करता है, २ से सोता है, २ से जागता है, दो धमनी अश्रवाहिनी हैं, और स्त्रियोंके स्तनों में स्थित दो धमनी दूधको प्रवृत्त करतीहैं. और वेही २ धमनी पुरुषोंके शुक्रको प्रवृत्त करती हैं ॥ ८ ॥ इस भांति ये ३० धमनियां विभागसहित वर्णन कीगई इन्हीसे नाभिका ऊपर, पेट, पँसवाडे, पीठ, छाती, कंधे, ग्रीवा और भुजा धारण तथा पोषण किये जाते हैं ॥ ९॥ इसविषयमें श्लोक है- ऊर्द्धं गतास्तु कुर्वति कर्माण्येतानि सँर्वशः ।। अधोगमास्तु वक्ष्यामि कर्म तासां यथायथम् ॥ १०॥ ऊपर गमन करनेवाली सब धमनियां इस प्रकार (जैसे पूर्व कहाहै ) कर्म करती- हैं अब अगाडी अधोगम (नीचे गमन करनेवाली) धमनियां और उनके जैसे २ कर्म हैं उन्हें वर्णन करते हैं ॥१०॥ अधोगमास्तु वातमूत्रपुरीषशुक्रातवादीन्यधो वहति । तास्तु पित्ताशयमभिप्रतिपन्नास्तत्रस्थमेवानपानरसं विपक्वमौष्ण्याद्वि- वेचयन्त्योभिवंहत्यः शरीरं तर्पयंत्यर्पयं ति चोर्द्धगतानां तिर्य- ग्गतानां रसस्थानं चाभिपूरयंति मूत्रपुरीषस्वेदांश्च विवेचयंति॥११॥ नीचेको गमन करनेवाली धमनियां अधोवायु, मत्र, पुरीष, वीर्य और स्त्रियोंका आर्तव इन्हें नीचेको प्रवृत्त करती हैं। ये अधोगामिनी धमनी पहले पित्ताशयमें प्राप्त होकर वहांके अन्नपानजनित रसको जो विपक्क है उसे उष्णतासे विवेचन (शुद्ध) करके शरीरमें पहुँचाती और शरीरको तृप्त करती हैं। ऊर्द्धगामिनी और तिरछा गमन करनेवाली धमनियोंको (सर्वत्र पहुँचानेके वास्ते) समर्पण करती हैं और मुख्य रसके स्थानको पूरण करती हैं तथा मूत्र, विष्ठा और स्वेद इन्हें विवेचन ई पृथक् पृथक् ) करती हैं ॥ ११ ॥ आमपक्वाशयांतरे च त्रिधा जायते तास्त्रिंशत् ॥ १२॥ तासां तु वातपित्तकफशोणितरसान् द्वे द्वे वहतस्ता दश । द्वे अन्नवाहि- - (७२६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । ११८ न्यावंत्राश्रिते। तोयवहे द्वे ।मूत्रवस्तिमभिप्रपन्ने मूत्रवहे द्वे। शुक्र- वहे द्वे । शुक्रप्रादुर्भावाय द्वे विसर्गाय ते एव रक्तमभिवहतो नारी- णामार्तवैसंज्ञम् । द्वे वच्चोंनिरसन्यौ स्थूलांत्रप्रतिबद्धे । अष्टाव- न्यास्तिर्यग्गानां धमनीनां स्वेदमर्पयति ॥ १३॥ ये धमनी आमाशय और पक्वाशयके मध्य ( अम्याशय ) में पहुँचकर तीन तीन भागमें विभक्त हो जाती हैं ऐसे यहाँपर ये ३० हो जाती हैं ॥ १२॥ इनमेंसे वायु,- पित्त, कफ, रक्त और रसको दो दो धैमनी बहाती हैं ( यह ऐसे १० हुई ), दो अंत्र (आंतों) में स्थित होकर अन्नको बहाती हैं, दो जलको बहाती हैं, तथा मूत्र-- वस्ति (मसाने ) में प्राप्त हुई दो मूत्रको प्रवृत्त करती हैं, तथा वीर्यकोभी दो धमनी प्रवृत्त करती हैं, और दो शुक्रको उत्पन्न करती हैं और जो शुक्रको प्रवृत्त करती हैं वहीं, शुक्रको निकालतीहैं और स्त्रियोंके वेही आर्तवसंज्ञक रक्तको प्रवृत्त करती हैं और मोटे आंतड़े ( उंडुक ) में प्राप्त हुई दो विष्ठाको बाहर निकालती हैं, तथा शेष आठ तिरछी गमन करनेवाली धमनियोंको पसीना समर्पण करती हैं ॥ १३ ॥ तास्त्वेतास्त्रंशत् सविभागा व्याख्याता एताभिरधोनाभेः पक्का- शयकटीमूत्रपुराषगुदवस्तिमेढ्सक्थीनि धार्यते याप्यते च ॥१४॥ . भवति चात्र- 3 इस प्रकारस ये ३० अधोगामिनी धमनी विभागपूर्वक वर्णन कीगईं इन्हीसे नाभिके नीचे पक्काशय, कमर, मूत्र, पुरीष, गुदा, वस्ति, लिंग और दोनों पांव धारण किये जातेहे और पोषण किये जातेहैं ॥ १४ ॥ यहां एक श्लोक है- अधोगमास्तु कुर्वति कर्माण्येतानि सर्वशः॥ तिर्यग्गाः संप्रवक्ष्यामि कर्म तासां यथायथम् ॥१५॥ अधोगामिनी धमनी सब इस प्रकारसे कर्म करती हैं अब अगाडी तिर्यग्गामिनी तिरछी गमन करनेवाली) धमनियोंका वर्णन करतेहें और जो जो उनके कर्म हैं उनको वर्णन करते हैं ॥ १५ ॥ तिर्यग्गानां तु चतसृणां धमनीनामेकैका शतधा सहस्रधा चोत्त- रोत्तरं विभज्यंते तास्त्वसंख्येयास्ताभिरिदं शरीरं गवाक्षित (बा१३) "शुपवई द्वे शुक्रप्रादुर्भावाय द्वे" इत्यत्र शुत्रप्रादुर्भावाय द्वे तद्विसीय द्वे इति वा पाठः ११९ शारीरस्थान-अ० ९. (७२७) विवद्धमाततं च॥१६॥तासां मुखानि रोमकूपप्रतिवद्धानि यैः स्वेद- मभिवहति रसं चापि संतर्पयंत्यंतहिश्च तैरव चाभ्यंगपरिषेकाव- गाहालेपनवीर्याप्यंत शरीरमभितिपद्यते त्वंचि विपक्कानि तैरेव स्पर्शसुखमसुखं वा गृह्णाति ॥१७॥ तास्त्वेताश्चतस्रो धमन्यः, सर्वागगताः सविभागा व्याख्याताः॥१८॥ भवतश्चात्र- तिर्यग्गामिनी जो ४ धमनी हैं उनमेंसे एक एकमेंसे सौ सौ, हजार हजार और फिर उनमेंसे सैंकडों, हजारों विभाग होजातेहैं इससे ये असंख्यात हो जातीहैं और इनसे यह शरीर झरोखोंकी भांति होरहा है और इन्हींसे सब शरीर बँधा हुआहै तथा आच्छादन किया हुआहै ॥ १६ ॥ इनके सूक्ष्म मुख रोमोंके छिद्रसे मिले हुए हैं इन मुखोंहीसे ये पसीनेको प्रवृत्त करतीहैं और रसको बाहर भीतर सर्वत्र पहुँचातीहैं और शरीरको पोषण करतीहैं और इन्हींसे मर्दनकी वस्तु और तरडे देनेकी वस्तु तथा स्नान और लेपका प्रभाव शरीरमें पहुँचताहै और ऊपरसे शुष्क होजाताहै। तथा इन्हीसे स्पर्शका सुख, दुःख ( शीत, उष्ण, मृदु, कठिनादि) जीव ग्रहण करताहे ॥ १७ ॥ ऐसे ये चार तिर्यग्गामिनी समस्त शरीरमें गमन करनेवाली धमनी विभागपूर्वक वर्णन की गई ॥ १८॥ इस विषयमें दो श्लोक हैं- याँ स्वभावतः खानि मृणालेषु बिसेषु च ॥ धमनीनां तथाँ खानि रसो यैरुपचीयते ॥ १९ ॥ जैसे कमलकी नालियो और जडोंमें स्वभावहीसे सूक्ष्म छिद्र होतेहैं वैसेही धमनियों मेंभी सूक्ष्म २ छिद्र हैं इन्ही छिद्रोंसे रस संचय होता है ( और शरी- रको पोषण करताहै ) ॥ १९ ॥ पंचादिभूतास्त्वर्थ पंचकृत्वः पंचेन्द्रियं पंचसु भाँवयंति ॥ पंचेंद्रिय पंचस भावयित्वा पंचत्वमायांति विनाशकाले ॥२०॥ ( वाक्य १७) ये रोमकृपप्रतिबद्धं मुख. स्वेदममिवहति ।। (श्लो० २० ) पचादिभूताः इति-पच पृथिव्यादय आदिभूता येषां ताः धमन्यः । "पंचादिभूताः' इत्यत्र पंचाभिभूताः इति पाठे तु पचभ्यः पृथिव्यादिभ्यो अभिभूताः धमन्यः पचकृत्व, पचधा भूत्व पचेंद्रिय कर्मपुरुषं पचसु पचेंद्रियेषु भावयति। विनाशकाले पचेंद्रिय पचसु पृथिव्यादिषु भावयित्वा लय कृत्वा ताः स्वयमपि पचत्वमायाति । अथवा पचाभिभूता धमन्य. पचकृत्वः पचेद्रिय इद्रियपचक पचमु तत्तद्विषयेषु भावयति प्रवर्तयति विनाशकाले पर्चेद्रिय देह पंचसु पृथिव्यादिषु भावयित्वा पचत्वमायांति ! केचित् श्लोकममुमत्र क्षेपक मन्यते ॥
- (७२८) शुश्रुतसंहिता-भा० टी०। पांच पृथिव्यादि (पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश ) हैं आदिभूत जिनक ऐसी जो पांच (गंधवाहिनी, रसवाहिनी, रूपवाहिनी, स्पर्शवाहिनी, शब्दवाहिनी) धमनियां हैं वे पंचधा प्रवृत्त होकर पंचेन्द्रिय कर्मपुरुषको पांचों इंद्रियों ( घ्राण, रसना, नेत्र, त्वचा, श्रोत्र ) की तरफ प्रवृत्त करती हैं और विनाशकाल ( मृत्युके समय) में पांचों इंद्रियोंको पृथिव्यादि पांचों तत्त्वोंमें लय करके स्वयंभी पंचत्वको प्राप्त होजाती हैं (अथवा “पंचादिभूताः" की जगह पंचाभिभूताः ऐसा पाठ है तो पांच तत्त्वोंसे अभिभूत अर्थात् उत्पन्न ऐसी जो धमनी ऐसा अर्थ करना)अथवा पंच तत्वोंसे अभिभूत जो गंधादिवाहिनी धमनी हैं वे पांच टोर विभक्त होकर पांचों इंद्रियोंको उनके पांचों विषयों में प्रवृत्त करती हैं और फिर मृत्युके समय पंचेंद्रिय ( कर्मपुरुष ) को पांचों तत्त्वोंमें लय करके स्वयं पंचत्वको प्राप्त होजाती- हैं ( नष्ट होजाती हैं)। यह श्लोक क्लिष्ट समझकर कूटमुद्गरमें लिखा है इसके और भी कई भौति कई अर्थ करतेहैं और कई इसे इस जगह क्षेपक मानते हैं और कहते हैं कि धमनियोंके संवन्धमें इस श्लोकका ठीक वास्तविक प्रयोजन नहीं जाना जाताहै केवल खीचकर "पंचाभिभूताः” इस पदसे धमनियोंका अर्थ लेते हैं ॥२०॥ अत ऊर्ध्वं स्रोतसां मूलविद्धलक्षणमुपदेक्ष्यामः ॥ २१ ॥ इसके अगाडी (धमनीव्याकरणके कथनांनतर ) अब हम स्रोतोंके मूलविद्धं लक्षणोंका उपदेश करते हैं ॥ २१ ॥ तानि तु प्राणान्नोदकरसरकमांसभेदोसूत्रपुरीषशुक्रार्तववहानि येष्वधिकार एकेषां बहूनि । एतेषां विशेषा बहवः ॥ २२॥ वे स्रोत प्राणवाही, अन्नवाही,जलवाही, रसवाही, रक्तवाही, मांसवाही, मेदोवाही, मूत्रवाही, तथा मलवाही, शुक्रवाही और स्त्रियोंके आर्तव रक्तवाही हैं स्रोतोंमें मुख्य अधिकार इन्हीका है अर्थात् ये ११ ही मुख्य स्रोत हैं किन्हीं २ आचार्योंके मतमें नांत बहुतसे हैं और उनमेंसे उनके भेद फिर बहुतसे हैं। जैसे स्वेदवाही, मन्न: वाही, अस्थिवाही आदि परन्तु धन्वंतरिजीके मतसे इनका मलविद्ध स्रोतोंमें अधिकार नहीं है क्योकि, अस्थिवाहियांका मूल मेदही है इसीप्रकार औरभी मुख्य नहीं है ॥ २२ ॥ तत्र प्राणवहे द्वे तयोर्मूलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यस्तत्र विद्ध- स्य कोशनविनमनमोहनभ्रमणवेपनानि मरणं वा भवति ॥२३॥ (वाक्य २२) एवधिकार इति-गत्यचिकित्सायामेष एकादशसु एवाधिकार:एकपा मते स्रोतांति दनि अस्थिमजस्वेदवहादीनि तेषा भेटाः बहवः परमत्र तेषामनधिकारः किं च तेषा कायचिकित्सायाम- विचारतत्रापि अतिसाम वात् न च सान्यादिजाननिश्चायकत्वात्तेपामनधिकार एव ।। ह
१२१
.
शारीरस्थान-अ० ९.
(७२९)
अन्नवहे द्वे तयोर्मूलमामाशयोऽन्नवाहिन्यश्च धमन्यस्तत्र विद्धस्या-
धमान शलान्नद्वेषौ छर्दिः पिपासान्ध्यं मरणं वा ॥ २४ ॥ उदक-
वहे द्वे तयोर्मूलं तालु क्लोम च तत्र विद्धस्य पिपासा सद्योमरणं
च ॥ २५ ॥ रसवहे द्वे तयोर्मुलं हृदयं रसवाहिन्यश्च धमन्यस्तत्र
विद्धस्य शोपः प्राणवह विद्धवञ्च मरणं तल्लिंगानि च ॥२६॥
उन स्रोतों से प्राणोंको वहानेवाले दो स्रोत हैं इनका मूल हृदय है और रस-
वाहिनी धमनी भी (इनका मूल ) हैं यहांपर बिंध जानेसे ( तीर, गोली, नश्तर
आदि लगजानेसे ) प्रलाप और शरीर नवजाना, मूर्छा, भ्रमण और कंप ये उप-
द्रव होते हैं अथवा मृत्यु होती है ॥ २३ ॥ अन्नवाही स्त्रोत दो हैं इनकी जड
आमाशय और अन्नवाहिनी धमनी हैं यहां विंधनेसे अफरा, शूल, अन्नद्वेष, वमन,
प्यास, अंधता अथवा मृत्यु होव ॥ २४ ॥ जलवाही स्रोत भी दो हैं इनका मूल
तालु तथा लोम हैं यहां विध जानेसे प्यास और तत्काल मृत्यु होती है ॥ २५ ॥
रसवाही स्रोत भी दो में इनकी जड़ हृदय तथा रसवाहिनी धमनी हैं यहांपरविंध
जानसे शोप ( शुष्कता) तथा प्राणवहाके बिंधनेके समान लक्षण और मृत्यु
होती है ।। २६ ॥
रक्तवहे हे तयोर्मूलं यकृत्प्लीहानौ रक्तवाहिन्यश्च धमन्यस्तत्र
विद्धस्य श्यावांगता ज्वरो दाहः पांडुता शोणितातिगमनं रक्तने-
त्रता चेति ॥२७॥ मांसबहे द्वे तयोर्मुलं स्नायुत्वचा रक्तवहाश्च धम-
न्यस्तत्र विद्धस्य श्वयथुर्मासशोषः शिराग्रंथयो मरणम् ॥ २८ ॥
मेदोवहे द्वे तयोर्मूलं कटी वृकौ च तत्र विद्धस्य स्वेदागमनं नि-
ग्धांगता तालुशोषः स्थूलशोफता पिपासा च ॥ १९ ॥
रक्तवाही स्रोत दो हैं इनका मूल यकृत् (जिगर), तिल्ली तथा रक्तवाहिनी
धमनी हैं यहां विध जानेसे शरीर काला पडना, ज्वर, दाह, शरीर पीला होना,
अति रुधिर निकलना, नेत्र लाल होना ये लक्षण होते हैं ॥ २७ ॥ मांसवाही स्रोत
भी दो हैं इनका मूलं स्नायुवोंकी त्वचा तथा रक्तवाहिनी धमनी हैं यह विधनेसे
सोजा, मांस सूखना, शिराओंमें गांठें पडना और मृत्यु ये लक्षण होते हैं ।। २८ ।।
मेदोवाही स्त्रोत दो हैं इनका मूल कमर और दोनों वृक्क (गुरदे) हैं यहां विध
जानेसे पसीना नहीं आता, स्निग्धता हो, ताल सूखे, मोटा शोथ हो, तथा
'प्यास अधिक हो ॥ २९ ॥
-
,
।
१२३
सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
(७३०)
मूत्रवहे द्वे तयोर्मुलं वस्तिसेंद्रं च तत्र विद्वस्थानद्धवस्तिता मूत्र.
निरोधः स्तव्धमेड़ता च ॥ ३० ॥ पुरीषवहे द्वे तयोर्मूलं पक्वाशयो
गुदं च तत्र विद्रस्यानाहो दुर्गन्धता ग्रथितांत्रता च ॥ ३१ ॥
शुक्रवहे के तयोमूलं स्तनौ वृषणौ च तत्र विद्धस्य क्लीवता चि-
रात्प्रसेको रक्तशुक्रता च ॥३२॥ आर्तववहे द्वे तयोर्मूलं गर्भा-
शय आर्तववाहिन्यश्च धमन्यस्तत्र विद्धाया वंध्यात्वं मैथुनाऽस-
हिष्णुत्वमार्तवनाशश्च ॥ ३३॥
मूत्रवाही दो स्रोत हैं इनका मूल वस्ति (मसाना) तथा लिंग है यहां विधनसे
वस्ति फूलना, मूत्र बंद होना, लिंग कडा होना ये लक्षण होते हैं ॥ ३० ॥ पुरीष
(विष्ठा) वाही भी दो स्रोत हैं इनका मूल पक्वाशय तथा गुदा है यहां विंधनेसे
पेट फूलना, दुर्गध होना, आतोंमें आंटे पडना ये लक्षण होते है ॥ ३१ ॥ वीर्य-
वाही स्रोत भी दो हैं इनका मूल दोनों चूचियां और दोनों अंड हैं यहां विधनसे
नपुंसकता, देरसे वीर्य गिरना, वीर्यपातमें रुधिर आना ये लक्षण होते हैं ॥ ३२॥
स्त्रियोंके आर्तववाही स्रोत भी दोही हैं इनका मूल गर्भाशय तथा आर्तववाहिनी
धमनी हैं यहां विधनेसे स्त्रियोंको वंध्यापन, मैथुनका असहन तथा रजोधर्मका
नाश ये लक्षण होते हैं ॥ ३३ ॥
सेवनीछेदानुजाप्रादुर्भावः वस्तिगुदविद्धलक्षणं प्रागुक्तमिति
॥ ३४॥ स्रोतोविद्धं तु प्रत्याख्यायोपचरेदुद्धृतशल्यं तु क्षतवि-
धानेनोपचरेत् ॥ ३५॥
संवनीके छेदन होनसे बहुत पीडाका प्रादुर्भाव होता है और वस्ति तथा गुदामें
विद्धक लक्षण पहले कहेही गये हैं ॥ ३४ ॥ जो मनुष्य स्रोतस्थान ( स्त्रोतोमूल )
में विद्ध हुआ हो उसे (असाध्य है वा कष्टसाध्य है ऐसा ) कहकर फिर चिकित्सा
करनी चाहिये और जिसका शल्य निकल गया हो उसकी क्षतविधिसे (जखमके
इलाजकी भांति ) चिकित्सा करनी ॥ ३५ ॥
मूलाखादतरं दे हे प्रसृतं त्वभिवाँहि यत् ॥
स्रोतस्तदिति विजेय शिराधमनिवर्जितम् ॥ ३६॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने नवमोऽध्यायः ॥९॥
५ १२३ 1 शारीरस्थान-अ० १०. (७३१) मूल ( हृदय )छिइसे लेकर शरीरके भीतर जो वहनशील छिद्र हैं उनको स्रोत कहते हैं परंतु शिरा और धमनी स्रोत नहीं हैं इन्हें छोडकर शेष जो वहनशील छिद्र हैं वे स्त्रोत कहलाते हैं ॥ ३६ ॥ इति पं० मुरलीधरशमवि० सुश्रुतस० भा० टी० शारीरस्थाने नवमोऽध्यायः ॥९॥ दशमोऽध्यायः १०. अथातो गर्भिणीच्याकरणशारीरं व्याख्यास्यामः। यहांसे अगाडी अब हम गर्भवतीके वरतावकी विवेचना नामके शारीरकी व्या- ख्या करते हैं। गर्भिणी प्रथमदिवसात्प्रभृति नित्यं प्रहृष्टां शुच्चलंकृता शुक्लवसना शांतिमंगलदेवताब्राह्मणगुरुपरा चं भवेत् ॥१॥मलिनविकृतहीन- गात्राणि नै स्पृशेदुर्गंधदुर्दर्शनानि परिहरेदुद्वेजनीयाचं कथा ॥२॥ शुष्कं पर्युषितं कुथितं क्लिन्नं चान्नं नोपभुजीत बहिनिष्क्रमणं शून्या- गारचैत्यश्मशानवृक्षाश्रयान् क्रोधभयसंकरांचं भारानुच्चै ध्या- दिकं परिहरेत् योनि चं गर्भ व्यापादयंति ॥३॥न चाभीक्ष्णं तैला- भ्यंगोत्सादनादीनि निषेवेत न ायांसयेच्छरीरं पूर्वोक्तीनि च परिहरेत् ॥ ४॥ शयनासनं मृदास्तरणं नात्युचमपाश्रयोपेतमसं- वधिं विदध्यात् । हृद्यं द्रवं मधुरप्रायं स्निग्धं दीपनीयसंस्कृतं च भोजनं भोजयेत् सामान्यमेतदाप्रसवात् ॥ ५॥ (गर्भवतीके लक्षणादि दौहृदादि पहले वर्णन होचुके हैं अब उसके वरतावोंका वर्णन होताहै) गर्भवतीको ऋतुस्नानके दिनहीसे नित्य प्रसन्न, पवित्र रहना, शृंगार करना, उज्ज्वल वस्त्र पहरना चाहिये और शांतिपाठ, मंगलाचार, तथा देवता, ब्राह्मण और गुरुवों में तत्पर रहना चाहिये ॥ १ ॥ मैले, विकारवाले, हीनांग मनु- ष्योंका स्पर्श न करे तथा दुगंध और जो खराव दीखें उन्होंसेभी दूर रहे और मनको बिगाडनेवाली कथाओंसे भी बचे ॥ २ ॥ सूखा, वासी, बुसा, सडा पदार्थ न खावे वाहर फिरना, सूने मकान में रहना, छतरियों तथा श्मशानोंमें जाना, वृक्षोंक नीचे (वा० १) प्रथमदिवसात् ऋतुस्नानदिवसादेव तदैव गर्भस्थिीतशकासत्त्वात् ।। (वा० ३)चितास्थान वैत्यम् ॥ ( वा०४) पूर्वोक्तानि गर्भव्यापत्तिकराणि ।। ( वा० ५ ), मृदास्तरणं मृत्तिका वास्तरणम् अपाश्रयोपेतं प्रतिवाइकसहितम् ॥ । + 1 १२४ (७३२) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०। रहना इनसेभी परहेज करे । क्रोध, भय इनसभी वच तथा क्रियासंकर न कर, बोझा न उठावे, चिल्लाकर न बोले और इनके सिवाय जो गर्भको खंडित करनेवाले आहार विहार हों उन्हेंभी न करे ॥ ३ ॥ अधिक तैलाभ्यंग, उबटन न करे, शारी- रक श्रम न करे, तथा पहले कहे हुए अनुचित वरताव न करे ॥ ४ ॥ अति सोनी, बैठेरहना तथा विना विछोने पृथ्वीमें बैठना या पडना इनका त्याग रक्खें। ऊपर उछलकर न बैठे, कष्टसे नहीं बैठे, मीठा, पतला, हृदयको आनंदकारी, चिकना,दीपन वस्तुवोंसे संस्कार किया हुआ भोजन करे इन आचरणोंको सामान्यतास गर्भारंभसे लेकर प्रसव होनेतक करना चाहिये ॥ ५ ॥ विशेषतस्तु गर्भिणी प्रथमद्वितीयतृतीयमासेषु सधुरशीतद्रव- प्रायमाहारसुपसेवेत॥६॥ विशेषतस्तु तृतीये षष्टिकौदनं पयसा भोजयेत् । चतुर्थे दला। पंचमे पयसा । पठे सर्पिषा चेत्येके ॥७॥ चतुर्थे पयोनवनीतसंसृष्टमाहारयेज्जांगलमांससहितं हृद्यमन्नं सोजयेत् । पंचमे क्षीरसर्पिःसंसृष्टम् । षष्ठे श्वदंष्ट्रासिंद्धस्य सर्पिषो सानां पार्ययेद्यवाणू वा । सप्तमे सर्पिः पृथपर्यादिसिद्धमे- वलाप्यायते गर्भः॥८॥ विशेप करके गर्भिणीको पहले, दूसरे और तीसरे महीने में मीठा, शीतल, पतला आहार सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥ कइयोंका यह भी मत है कि विशेषकर तीसरे महीने में षष्टिक (साठी चावलों) का भात दूधके संग खिलाना, चौथे महीने में दहीके संग, पांचवेंमें फिर दूधके संग और छठेमें घृतके साथ भात खिलाना ॥ ७ ॥ परंतु धन्वंतरिजीका मत यह है कि चौथे महीनेमें दूध मक्खनसे, मिला आहार तथा जांगल जीवोंके मांसके संग हृदयप्रिय अन्न खिलाना चाहिये । पांचवेंमें दूध पीसे मिला भोजन देवे और छठे महीने में गोखरूसे सिद्ध किए घृतको पानकी मात्रा दे अथवा यवागू पिलावे । सातवें महीने मैं पृथकपीसे सिद्ध किया हुआ वृत देवे इसप्रकार करनेसे गर्भ ठीक पूर्ण होताहै ॥ ८ ॥ अष्टमे वदरोदकेन बलातिबलाशतपुष्पपललपयोदधिमस्तुतैलल- वणमदनफलम घृतमिश्रेणास्थापयेत्पुराणपुरीषशुद्धयर्थमनुलो- मनार्थं च वायोः ॥ ९॥ ततः पयोमधुरकषायसिद्धेन तैलेनानु- वासयेद्नुलो मे हि वाँयौ सुखं प्रसूयते निरुपद्रवा च भवति॥१०॥ . - । . १२५ शारीरस्थान-अ०१०. (७३३) अष्टम मासमें पुराने मलकी निवृत्ति (शुद्धि) और वायुको अनुलोमन (सीधा) होनेके वास्ते बेरेक जल, बला (खरेटी,) अतिबला (कंघी नाम खरेटी भेद ), शतपुष्प (सोंफ), मांस, दूध, दहीका मस्तु (दहीका जल, ) तिलका तैल, नमक, मैनफल शहत और घृत ये सब मिलाकर इनसे आस्थापन ( वस्ति ) प्रयोग करे ॥९॥ फिर मधुर और कषाय द्रव्योंसे सिद्ध कियेहुए तैलसे अनुवासन (वस्ति) करे इससे वायु अनुलोमन होता है और वायु अनुलोमन होनेस सुखपूर्वक प्रसव होताहै और कुछ उपद्रव नहीं होता ॥ १० ॥ अतं ऊर्द्ध स्निग्धांभिर्यवागूभिजाँगर्लरसैश्चोपमेदाप्रसँवकाला- देवेमुपंक्रांता स्निग्धी बलवती सुखमनुपद्रवी प्रज्ञेयते ॥ ११ ॥ इसके पीछे चिकने यवागुवों और जांगलजीवोंके मांसरसको यथाक्रम आरंभ करावे । इस प्रकार यल करनेसे गर्भिणी स्निग्ध बलवती होती है और सुखपूर्वक उपद्रवरहित बालक उत्पन्न करती है ॥ ११ ॥ सूतिकागारविधि। नवमे मांसि सूतिकांगारमेनी प्रवेशयेत् प्रशस्ततिथ्यादौ तत्रा- रिष्टं ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणां श्वेतरक्तपीतकृष्णेषु भूमिप्रदेशेषु बिल्वन्यग्रोधतिंदुकभल्लातकनिर्मितं सर्वागारं यथासंख्यं तन्मयप- यकमुपलिप्तभित्ति सुविभक्तपरिच्छदं प्रारद्वारं दक्षिणद्वारं वाऽष्ट- हस्तायतं चतुर्हस्तविस्तृतं रक्षामंगलसंपन्नं विधेयम् ॥१२॥ गर्भिणीको नवें महीनेमें सूतिकागारमें (प्रसवके स्थानमें) शुभ तिथि, वार, नक्षत्रादि देखकर प्रवेश करे। वह प्रसवस्थान ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंको यथाक्रम श्वेत, पीत, रक्त और काली पृथ्वीमें बिल्व, गूलर, तेंदू और भिलावेंकी लकडीसे बनावे और उसमें फिर उसी क्रमसे उन्हीं वर्गों को उन्ही बिल्वादि वृक्षोंकी खवा बिछवावे तथा भीतोंको अच्छे प्रकार लिपवाकर, प्रसवोपयोगी सामग्रीस उपयुक्त, पूर्वाभिमुख अथवा दक्षिणाभिमुख, आठ हाथ लंबा और चार हाथ चौडा रक्षामंगल सपन्न ऐसा सूतिकागार वनाना चाहिये ॥ १२ ॥ जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्त हृदयंबंधने ॥ सशूले जघने नारी ज्ञेया सौ तु प्रजायिनी ॥ १३॥ तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटीपृष्ठं (वा० १२) वृद्धवाग्भटस्तु सूतिकागारविधिमाह यथा-नवमान्मासादपद्दतास्थिशर्कराकपाले प्रशस्ते देशे वास्तुविद्याप्रशस्तं सर्वतुसुखमुपद्दतसर्वोपकरणं सन्निहितज्वलन प्रारद्वारमुदग्द्वार वा सूतिकागारं कारयेत्। सुविभकपरिच्छदमिति-मुविभक्तानि परिच्छदानि उपकरणानि यस्मिन् ॥ (श्लो० १३) सशुले जघने इति-शुलयुक्तायां कटयाम् । ( इति डलनः ) अन्ये तु शुलयुके जवनप्रदेशे इति । - - (७३४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । प्रति ससंताद्वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिमूत्रं प्रसिध्यते योनिसुखात् श्लेष्मा च ॥ १४ ॥ जब दानों कूख ढीली पडजावें,हृदयका वैध छूटजाव और साथलाम पीडा होने लगे तव जानना कि, इसके शीत्र वालक होनेवाला है ॥ १३ ॥ और जब तुरत बालक होनेवाला होता है तब कमर और पीठके आसपास चारों तरफ बहुत पीडा होने लगती है, वारवार मल और मूत्रकी प्रवृत्ति होती है तथा योनिके मुखमेंसे कुछ कफसा (पानीसा ) भी आने लगता है ।। १४ ॥ प्रजनयिष्यसाणां कृतमंगलस्वस्तिवाचनां कुमारंपरिवृतां पुन्ना. मफलहस्तां स्वस्यक्तामुष्णोदकपरिविक्तामर्थनां संभृतां या- शूमाकण्ठात् पाययेत् ॥१५॥ ततः कृतोपंथाने मृदुविस्तीर्ण शयने स्थितासाभुग्नसक्थीमुत्तानासँशंकनीयाँश्चतस्त्रः स्त्रियः परिणतव- यसः प्रजननकुशलाः कर्तितनखोः परिचरेयुः ॥ १६ ॥ जिसके बालक होनेवाला हो उसे मंगलयुक्त स्वस्तिवाचन करावे और लडकोंसे आवृत करके ( अर्थात् उसके आसपास कुछ लड़के बिठाकर उन्हें कुछ फलादि दिलादे) फिर पुरुषनामवाले आम, अनार जैसे फल हाथमें दिलाकर और तैल- मर्दन कराके गरम जलसे अभिषेक (स्तान ) करावे इसके पीछे आसन्नप्रसवा स्त्रीको कंठतक पेट भरके यवागू पिला देवे ॥ १५ ॥ फिर ऊँची तकिया लगाकर मुलायम विछौना विछाकर उसपर लिटा दे और साथलोंको चौडी और ऊँची रहने देऔर जिनसे शंका (लज्जा) न हो ऐसी चार वुड्ढी (दाई ) स्त्रियां जो जनावनके काममें चतुर हों और जिनके नखून कटे हों वे परिचर्या में रहें॥ १६ ॥ अथास्या विशिखांतरमनुलोममनुसुखमभ्यज्याद्र्याँच्चैनामेका सुभगे. प्रवाहस्वेति ने चांप्राप्तीवी प्रवाहस्व । ततो विमुक्ते गर्भ- नाडीप्रवंधै सशलेषु श्रोणिवंक्षण_स्तिशिरःसु प्रवाहेथाः शनै: शलः । ततो गर्मनिर्गमे प्रगाढं ततो गर्भे योनिसुखं प्रपन्ने गाढ- तरमाविशल्यभावात् ॥ १७ ॥ ( वाक्य १७ ) विशिखातरम् अपत्यमार्गम् ( इति डल्लन.) । आवी प्रसववेदना (इति तु डल्लनः) अन्ये तु सनला जरायुरिति । आविशल्यभावात् इत्यत्र शल्यशब्दग्रहणं वेदनासहितगर्मप्राप्त्यर्थमागर्मज- ननादिन्ययं. ॥ .
१२७ , शारीरस्थान-अ० १०. उन दाइयोंको चाहिये कि आसन्नप्रसवा स्त्रीके अपत्यमार्गको रोमोंके अनुकूल और मुखकी तरफ चिकनाई लगावें फिर उनमेंसे एक दाई उस आसन्नप्रसवासे कहे कि हे सुभगे ! प्रवाहण कर अर्थात् किनछ परंतु जबतक जेर-नाल (पानीसा) न आवे तवतक न किनछे फिर जब गर्भनाडीका बंध हृदयसे छूट जावे और कमर, नले, वस्ति, शिर इन स्थानों में ज्यादा पीडा हो तब धीरे धीरे ज्यादा किनछना चाहिये फिर जब गर्भ निकलने लगे तब और ज्यादा किनछे और जिस समय गर्भका बालक योनिके मुखपर आजावे तब तो बहुतही जोरसे प्रवाहण करे और फिर एकवार अति पीडासी होकर बालक जन्मेगा ॥ १७ ॥ अकालप्रवाहणके दोष । अकालप्रवाहणाधिरं मूकं व्यस्तहर्नु मूर्धाभिघातिनं श्वासका- सशोषोपद्रुतं कुब्जं विकटं वा जनयति तत्र प्रतिलोसमनुलोमयेत्१८ बे समय प्रवाहण ( किनछने या जनावनेका उद्योग कराने ) से वहरा, गूंगा, टेढी ठोडीवाला, दवे शिरका, श्वास, खांसी, क्षयी रोगवाला, कुबडा अथवा विकट शरीरवाला बालक उत्पन्न होता है तहां यदि वायु प्रतिलोम हो तो उसे अनुलोम करना चाहिये ॥ १८ ॥ प्रसवमें विलंब हो तो उपचार । गर्भसंगे तु योनि धूपयेत् कृष्णसर्पनि केण पिंडीतकेन वाँ बनीयाद्धिरण्यपुष्पीमूलं हस्तपादयोद्धारयेत् सुवर्चलां विशल्यां वा ॥ १९ ॥ प्रसवमें अवरोव हो तो योनिमें काले सर्पकी कांचली तथा मदनफलकी धनी देना चाहिये अथवा हिरण्यपुष्पी (कंटकारी ) की जड़को हाथ और पैरोंमें बांधदे अथवा सुवर्चला (सूर्यभक्ता-अतसी) और विशल्या (पाटला) को धारण करे ( इन यत्नोंसे शीघ्र प्रसव होता है )॥ १९ ॥ जन्मोत्तराविधि। अथ जातस्योत्वं सुखं च सैन्धवसर्पिषा विशोध्य घृताक्तं मूर्ति पिचं दद्यात्ततो नाभिनाडीमष्टांगुलमायम्य सूत्रेण बद्धा छेदये- त्तत्सूत्रैकदेशं च कुमारस्य ग्रीवायां सम्यग्वनीयात् ॥ २० ॥ (वा० १९) पिडीतको मदनः । (शा० स्तो०) हिरण्यपुष्पी कण्टकारिका तस्या मूलम् । सुवर्चला सर्वभक्तां अतसी । विशल्या पाटला ( इति डल्लनः ) ॥ (वा० २०) अ,यम्य आकृष्य विशोध्य । ग्रीवायां सम्यग्वनीयात् स्रावपरिहारार्थम् ।।
(७३६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १२८ जन्मके पीछे जरायुको बालकके शरीरपरसे साफ करे तथा वालकके मुखको सेंधनमक और वृतसे शुद्ध करे फिर रुईका फोहा वृतमे भिगोकर तालूपर लगावे फिर नाभिनाडी ( नाल) को आठ अंगुल नापकर सूत्रसे बांध देवे और अगाडीसे कतर डाले और नालमें जो डोर बंधी है उसे बालकक गलेमें (ढीलीसी) बांध देवे ॥ २०॥ अथ कुमार शीताभिरद्भिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनं- ताब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णसंगुल्याऽनामिकया लेहयेत् ॥ २१ ॥ इसके अनंतर बालकको शीतल जलसे आश्वासन करके जातकर्म करे पीछे शहद, घृत, अनंतमूल, ब्राह्मीका रस इनमें ( एक रत्ती मात्र) सुवर्णका चूर्ण (मृगांक या सुवर्णक वरक) मिलाकर अनामिका अंगुलीसे वालको चटावे ॥२१॥ ततो बलातलेनास्यज्य क्षीरवृक्षकषायेण सर्वगंधोदकेन वा रूप्य- हेभप्रेततेल वा वारिणा स्नौपयेदेन कपित्थपत्रकषायेण वा को- णेन यथाकालं यादोष यथाविभव च ॥२२॥ वला (खरेंटी ) के तैलका बालककेशरीरपर मर्दन करके दूधवाले वृक्षोंके कायसे अथवा सर्वगंधोदक (एलादिके जल ) से चांदी और सुवणके तपाये हुए (जिसमें तप्त रूप्य वा हेम बुझा हो) जलसे अथवा कपित्थपत्र ( कैथके पत्तों ) के कुछ कुछ गरम क्वाथसे जैसा समय (ऋतु) हो,जैसा दोष हो,और जैसा विभव (समृद्धि) हो उसीके अनुसार स्नान कराना चाहिये ॥ २२ ॥ धर्मनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनंतरम् ॥ चतुरानात्रिराँत्राद्वा स्त्रीणी स्तन्यं प्रवर्तते ॥ २३॥ तस्मात्प्रथमेहि मधुसपिरनंता- मिश्रं मंत्रपूतं त्रिकालं पाययेत् । द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिस्तृ- तीये च । ततः प्राङ्निवारितस्तन्यं मधुसर्पिः स्वपाणितलसम्मितं द्विकालं पाययेत् ॥ २४॥ प्रसूता स्त्रीके हृदयकी धमनियोंके मुख खुल जातेहैं इससे जब चार रात्रि या तीन रात्रि व्यतीत होजातीहैं तब उस (सद्याप्रसूता) स्त्रीके स्तनोंमें दुग्ध उतरता है ॥२३॥ इस कारण प्रथम दिन शहत, घृतमें अनंतमूल मिलाकर मंत्रोंसे अभिमंत्रित (वा०२१)सुवर्णचूर्णमिति-चूर्णप्रमाण तु गुजामात्रमिति (नि० सं०) (वा०२२) क्षीरवृक्षा उदुंबरादयो आह्माः ॥ (वा०२४) अनता दूर्वा चेति केचित् । केचित्तु अनंतमूलमिति भाषते । स्वपाणितलसम्मिते मधुसर्पियोरसमा मात्रा प्रयोक्रव्या पाणितलं टंकचतुष्टयप्रमाणं तत्र टंकत्रयं मधु टकमक सर्पियोध्यम् ॥ ।
। शारीरस्थान-अ० १०. (७३७) करके तीन समय बालकको पिलावे । दूसरे दिन लक्ष्मणासे सिद्ध किया हुआ वृत ( मधु युक्त) पिलावे और तीसरे दिनभी यही करे । फिर( चौथे दिन ) स्तनों- मेंसे पहलेका कुछ दुग्ध निकाल डाले और दो समय थोडा थोडा दुग्ध प्रसूताके स्तनोंसे पिलावे तथा शहत और घृत पाणितलप्रमित (चार टंक ) (जिसमें ३ टंक मधु १ टंक वृत) दोनों समय चटावे ॥ २४ ॥ प्रसुताके नियम। अथ सूतिका बलातैलाभ्यक्तां वातहरौषधनिःक्वाथेनोपचरेत्॥२५॥ सशेषदोषां तु तदहः पिप्पलीपिप्पलीमूलहस्तिपिप्पलीचित्रक- गवेरचूर्णगुडोदकेनोष्णेन पाँययेत् । एवं द्विरात्रं त्रिरात्रं वा कु- ादादुष्टशोणितात् ॥२६॥ इसके अनंतर प्रसूताको बलातलका मर्दन करना और वातन (भदारु आदि) औषधोंके क्वाथसे उपचार करे ॥ २५ ॥ और जो रक्तका दोष शेष रहा हो तो उसी दिन पीपल, पीपलीमूल, गजपीपल, चित्रक और सोंठके चूर्णको गुडके उबालेहुए गरम गरम जलके संग पिलावे । इसी भांति जबतक दुष्ट रक्त रहे दो या तीन दिनतक करे ॥ २६ ॥ विशुद्ध ततो विदारिगंधादिसिद्धां लेहर्यवागू क्षीरयवागू वा पा- ययेत्रिरात्रम् । ततो यवकोलकुलत्थसिद्धेन जांगलरसेन शाल्यो- दनं भोजयेत् बलमग्निबलं चाँवेक्ष्य । अनेन विधिनाऽध्यर्द्धमासमु- पसंस्कृता विमुक्ताहाराचारा विगतसूतिकाभिधाना स्यात् पुनरा- तवदर्शनादित्येके॥२७॥ जब रक्तदोष शुद्ध होजावे तब विदारिगंधादिगणसे सिद्ध की हुई स्नेहयुक्त यवागू अथवा दुग्धयुक्त यवागू तीन दिन तक पिलावे इसके पीछे जौ, कोल और कुलथीसे संस्कार किये हुए शालीके भातको जांगलजीवोंके मांसरसके संग बल और अमिका बल विचारकर प्रसूताको खिलावे । इस विधिसे डेढ महीने तक उपचार करनेपर आहार तथा विहारका नियम नहीं रहना चाहिये क्योंकि डेढ महीने पीछे स्त्रीकी प्रसूता संज्ञा नहीं रहती है । और कई आचार्योंका यह मत है कि जबतक फिर रजस्वला न हो तबतक उसकी प्रसूता संज्ञा रहतीहै ( अर्थात् जबतक गोदमें बालक दूधपीतारहे तबतक प्रसूतासंज्ञा रहती है ऐसा कई मानते है) ।। २७ ।। ( वा० २५) वातहरीवधानि भद्रदादीनि ॥
मुश्रुतसंहिता-भा० टो। १३० धन्वभूमिजातां सूतिकां घृततैलयोरन्यतरस्य मात्रां पाययेत् पिप्पल्यादिकपायानुपानं स्नेहनित्या च स्यात्रिरात्रं पंचरात्रं वा बलवतीमवला यवागू पाययेत्रिरात्रं पंचसूत्रं वा ॥ २८ ॥ अतै ऊर्द्ध स्निग्धेनोन्नसंसर्गेणोपचरेत् प्रायश्चैिनां प्रभतेनोष्णोदकेन परिपिंचेत् क्रोधायासमैथुनादीन् परिहरेत् ॥ २९ ॥ भवतश्चात्र- धन्वभूमि (जांगल देश जैसे मारवाड) की प्रसूताको घृत या तैलकी मात्रा पिलार और पिप्पल्यादि कायका अनुपान देवे और नित्य तैलाभ्यंग करे ऐसे तीन या पांच दिनतक कर । बलवती प्रमताका तीन दिन और बलहीनको पाँचदिन तक यवागू पिलावे ॥ २८ ॥ इसके पीछे चिकने अन्नके संसर्गसे उपचार करे अर्थात् उमे चिकना अन्न (हलवा आदि) खिलाते रहे और कभी कभी उष्णज- लम मगरको साँच (तरंड दे तथा स्नान करावे ) और क्रोध, परिश्रम तथा मैथुन आदिको न्यागे रहे ॥ २९ । इस विषयमें दो श्लोक हैं- मिथ्याचारात्मृतिकाया यो व्याधिरुपजायते ॥ सँ कृच्छ्रसा- ध्योऽसाभ्यो वा भवेदन्यपतर्पणात्॥ ३० ॥ तस्मात्ती देशकालौ चे व्याधिसात्म्येन कर्मणा।परीक्ष्योपॅचरेदेव ने यसत्ययमाप्नुयात्३१॥ मिथ्या आचार (ऑपध, अन्न, विहार ) से प्रसूताको जो व्याधि होजावे तथा अपतर्पण (नृनिकारक वस्तु न मिलने )से जो सूतिकाका रोग होजावे तो वे कष्ट- माध्य भयया अमान्य होते है ॥ ३० ॥ इस कारण देश, काल और व्याधि तथा साम्य (उमे फेसा मानुकूल है ) इन बातोंको विचारकर और परीक्षा करके प्रसूताका रगर करना चाहियोगमा न हो कि टलटा रोग बहकर असाध्य होजावे ॥ ३१ ॥ अपगपातन । जधापरी पंतत्यानाहाध्माना कुंमत तस्मात् कंटमस्याः केशवेष्टितया- गल्या प्रेमृजेत् । कटकालावुनवधनसर्पपसर्पनिौका कटुतैलं. मित्रेयोनिमग्वं धूपयेत् । लांगली मृलकल्केन वास्याः पाणिपाद- A रीरस्थान-अ० १०. (७३९) बांधकर मलना चाहिये तथा कडवी तोंबी, कडुवी तुरई, सरसों, सर्पकी कांचली इनमें कडुवा तैल मिलाकर योनिके मुखपर धूनी देना चाहिये। अथवा कलिहारीके जडको पीसकर उसके हाथ, पांवों में लेपकरे ॥ ३२ ॥ मूर्ध्नि वाऽस्यां महावृक्षक्षीरमर्नुसेचयेत् कुष्ठलांगलीमूलकल्कं वा मद्यसूत्रयोरन्यतरेण पाययेत्। शालिमूलकैल्कं वो पिप्पल्यादि वाँ मद्येनं । सिद्धार्थककुष्टलांगलीमहावृक्षक्षीरमिश्रेण सुरामंडेन वास्थापयेत् । एतैरेव सिद्धेन सिद्धार्थकतैलेनेतरवस्ति दद्यात् । स्निग्धेन वा कुतनखहस्तेनापहरेत् ॥ ३३ ॥ अथवा शिरपर थूहरके दूधका आसेचन करे अथवा कूट, कलिहारीकी जडको मद्य या गोमूत्रमेंसे किसीके साथ थोडी पिलावे । अथवा चावलोंकी जडको जलमें पीसके या पिप्पली आदिको मद्यके साथ दे । अथवा सरसों, कूट, कलिहारी, थूह- रका दूध मिलाकर सुरामंडके संग आस्थापनवस्ति करना और इन्हीं औषधोंसे सिद्ध किये हुए सरसोंके तैलसे उत्तरवस्ति करे अथवा नखन कटे हाथों में तैल लगाकर ( हाथ योनिमें देकर ) नालको खीचके निकाले ।। ३३ ।। मकल्लरोगके लक्षण । प्रजातायाश्च नार्या रूक्षशरीरायास्तीक्ष्णैरविशोधितं रक्तं वायुनों तद्देशगेनातिसंरुद्ध नाभेरधः पार्श्वयोर्वस्तौ वस्तिशिरसि वा ग्रंथि करोति । ततश्च नाभिवस्त्युदरशूलानि भवति । सूचीभिरिव निस्तुद्यते भियंते दीर्यते इवं च पक्वाशयः। समंतांदाध्मानमुदरे मूत्रसंगश्च भवतीति मकल्ललक्षणम् ॥ ३४ ॥ जब स्त्रीके बालक हो चुके तब यदि रूक्ष शरीरवाली प्रसूता हो उसके अशुद्ध रक्त शेष रहा हो उस अवस्थामें उसे तीक्ष्ण वस्तुवोंका उपयोग किया जावे तो वह अशुद्ध रक्त उस स्थानमें प्राप्त हुए वायुसे अवरुद्ध होकर (रुक जावे तब) नाभिसे नीचे पँसवाडोंमें वस्तिमें या वस्तिके शिरके स्थानमें गांठसी उत्पन्न कर देता है उससे नाभि,वस्ति, उदर इन स्थानों में शूल होजाता है इससे सूईकीसी भांति चुभन होती हैं, भेदनसा होता है,और पक्वाशय विदारणसा होता है,और सारे पेटमें अफ- रासा हो आता है तथा मूत्र रुक रुककर आता है ये लक्षण मकल्लरोगके हैं॥३४॥ (वा० ३४) प्रजातायाः प्रजननशोणितसजनितशूलं मकलः । अवरुद्धरक्ताजनितो विद्रधिरति मकलः ( इति डल्लन:) । ।
(७४०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। मकल्लका यत्न। तत्र वीरतादिसिद्धं जलसूषकादिप्रतीवापं पाययेत् । यवक्षार- चूर्ण वा सर्पियों सुखोदकेन वा लवणचूर्ण वा पिप्पल्यादिक्वाथेल पिप्पल्यादिचूर्ण वा सुरामंडेन वरुणादिक्वाथं वा पंचकोलैला- प्रतीवार पृथपर्यादिकाथं वा भद्रदालमरिचसंसृष्टं पुराणगुडं वा त्रिकटुंचतुर्जातककुस्तुंवुरुमिश्रंखादेवच्छे वा पि वेदरिष्टम्॥३५॥ इस मकल्लरोगमें वीरतरु ( अर्जुनवृक्ष ) का क्वाथ, भारमृत्तिका (खारी मिट्टी रहकी जाति ) डालकर पिलावे अथवा जौखारद चूर्णको वृतके संग दे अथवा गरम जलके संग लवणके चूर्णको दे अथवा पिप्पल्यादि क्वाथके संग पिप्पल्यादि चूर्ण देवे अथवा मद्यके मंडके संग वरुणादियणका काथ देवे अथवा पंचकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सुंठी) और इलायची डालकर पृथक्पा- दिका क्वाथ देवे अथवा भद्दारु और मिरचयुक्त पुराना गुड देवे अथवा त्रिकटु और चातुर्जात ( तज, पत्रज, इलायची, नागकेशर ) और धनियां मिलाकर खावे अथवा अभयादिका अरिष्ट निर्मल करके पीवे (इन योगोंमेंसे जो योग प्रकृति और दोष तथा ऋतुके अनुकूल हो वही उपयोग करना चाहिये )॥३५ ॥ अथ वॉलं क्षौभपरिवृतं क्षौलवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत् । पीलुवदरीनिम्बपरूपकशाखाभिश्चैनं बीजयेत् । मूनि चास्याहर- हस्तैलपिचुमवचारयेत् । धूपयेच्चैनं रक्षोन्नधूपैः । रक्षोन्नानि चा- स्य पाणिपादशिरोग्रीवास्ववसृजेत् । तिलातसीतर्षपकणांश्चात्र प्रकिरेत् । अधिष्ठाने चाग्निं प्रज्वालयेत् । अणितोपासनीयं चावे- क्षेत ॥ ३६॥ इसके अनंतर वालकको क्षौम ( एकप्रकारके रेशमी कपड़ )से आच्छादित करके खाटपर रेशमी कपडा विछाकर लिटादे । और पीलूवृक्ष, बेरी, निव तथा फालसेकी टहनीसे हवा करे और वालकके शिरपर प्रतिदिन तैलका फोहा लगावे और रक्षोन धूप, वच आदिकी धूनी देतरहे तथा रक्षोनवस्तु (जैसे सुपेद (वा० ३२ ) ऊपका आरमृत्तिका । अच्छं केवलं त्वच्छं वा । अरिष्टं मभयारिष्टादिकम् (नि०सं०) (१० ३६ ) अधिष्ठाने सतिकागारे । त्रणितोणसनीयं चावेलेतेति-व्रणितोपासनीये यद्यदाचरणीयं तत्त: दत्रापि कार्यमिति भावार्थः ॥
शारीरस्थान-अ० १० (७५१) सरसों, गोरोचन आदि) बालकके हाथ, पैर, शिर, ग्रीवा आदिपर लगाया करे । तिल, अलसी, सरसों इनमेंसे कोई उसके आसपास विखेरे और बालकके स्थानके पास अग्नि जलती रक्खे तथा व्रणितोपासनीयाध्यायोक्त वरतावोंको देखे (और उसके अनुसार करे ) ॥ ३६॥ नामकरण। तलो दशमेऽहलि मातापितरौ कृतमंगलकौलुको स्वस्तिवाचन कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेत नक्षत्रनास वा ॥ ३७ ॥ इसके पीछे दशवें दिन माता पिता मंगल कौतुकपूर्वक स्वस्तिवाचन करके यथा- योग्य मनोज अथवा नक्षत्रके चरणाक्षरके अनुकूल (जैसे 'चूच-चोला'-अश्विनी इत्यादि ) नामाक्षर आदिमें रखकर नाम रक्खे (बामणोंको शर्मा, क्षत्रियों को वर्मा, वैश्योंको गुप्त और शूद्रोंको दास पद अंतमें रखना चाहिये अथवा इस समयके अनुसार ब्राह्मणोंको दत्त, आनंद आदि । क्षत्रियोंको सिंह, साल, पाल । वैश्योंको मल आदि शब्द अंतमें देने चाहिये इसका विशेषविधान धर्मशास्त्र और ज्योतिः- शास्त्रमें देखना चाहिये)॥ ३७ ॥ योग्य धात्री (धाय) के लक्षण । ततो यथावर्ण धात्रीसुपेयान्मध्यप्रमाणां मध्यमवयतमरोगांशी- लवतीलचपलामलोलुपालकशामस्थूलां प्रसन्नक्षीरामलंबो टीम- लंबोईस्तनीमव्यगासव्यसनिनी जीवत्सां दोग्धों वत्सलामक्षु- द्रकर्मिणी कुलेजातासतो सूविप्टेंच गुणैरन्बितां यामामारोग्य- वैलवृद्धये बॉलस्य ॥ ३८ ॥ तत्रोर्द्धस्तनी करालं कुर्यात् लंबस्तनी नासिकामुखं छादयित्वा मरणमापादयेत् ॥ ३९ ॥ इसके अनंतर अपने वर्णके अनुसार(जैसे ब्राह्मणको ब्राह्मणी, क्षत्रियको क्षत्रिया, वैश्यको वैश्या, शूद्रको शूद्रा)धाय (बालकको दूध पिलानेवाली) नियत करनी चाहिये ( अथवा अपनेर वर्ण 'अर्थात् रंगके समान अर्थात् प्रसूता गौर हो तो गौर, और (श्लो० ३७ ) अभिप्रेत मनोज नक्षरनाम वा नक्षत्रदेवताकृतम् ( इति डल्लनः ) अथवा नक्षत्रनाम ज्योतिःशास्त्रोक्तनभत्रचरणसकेतजनिताक्षरमादी कृत्वा नास कुर्याताम् ॥ (वा. ३८) यथावर्णमिति -ब्राहाणत्य ब्राह्मणी अत्रियस्य क्षत्रियामित्यादि (इति डल्न ) अन्ये यथावर्णा मातृवर्णसदृशा बालस्य वर्णसहशा वा इत्याहु. । श्यामा श्यामा प्रचुर जीरा प्राययो भवति (इति डल्लन) परत्वत्र श्यामाकथनेन गोभना रूपवतीत्यभिप्राय. न तु वर्णविशेपा दयामलामेति "रूपठा- वण्यसंयुक्ता ग श्यामेत्यभिधीयते" इति वाक्यात् ।। . toy १३४ सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (७४२) श्याम हो तो श्याम धाय नियत करे ) वह धाय मध्यप्रमाण अर्थात् न, बहुत लंबी हो, न बहुत गुट्टी हो, तथा मध्य अवस्थावली, रोगरहित, शील (स्वभाव ) वाली हो, बहुत चपल न हो, लोलुप अर्थात् जिसका चित्त रुक न सके ऐसी न हो, बहुत दुबली न हो, न बहुत मोटी हो, शुद्ध दुग्धवाली हो, जिसके होठ लंवे न हों, जिसके स्तन ऊंचे और लंबे न हों, जिसका शरीर हीनाधिक न हो, जिसमें कोई व्यसन (ऐब ) न हो, जिसके बालक जीते रहते हों (अथवा सवत्सा हो), दोग्धी (दूधवाली) हो, बालकपर प्रेम रखनेवाली हो, नीच कर्म करनेवालीन हो, अच्छ कुलकी जन्मी हो इत्यादि बहुतसे गुणोंसे युक्त हो और श्यामा अर्थात् सांवली हो अथवा सुंदर रूपवती हो ऐसी धाय बालकको निरोगता और बलकी वृद्धि करनेवाली होती है ॥ ३८॥ जो धाय ऊंचे स्तनोंवाली हो तो बालकको कराल ( कठोर) करनेवाली होती है तथा लंबे स्तनोंवालीके स्तनोंसे बालकके नाक, मुखका आच्छादन होजाताहै इससे वह कभी मृत्युकी संभावना उपजातीहै ॥३९॥ प्रथमस्तनपानविधि । ततः प्रशस्तायां तिथौ शिरःलातामहतवाससमुदङ्मुखं शिशुमुप- वेश्य धात्री प्राङ्मुखीमुपवेय दक्षिण स्तनं धौतमार्फत्परिझुत- मभिमंत्र्य मंत्रेणाने पार्ययेत् ॥ ४ ॥ फिर श्रेष्ठ तिथि ( नक्षत्रादि) में मा या धायको शिरसमेत स्नान कराके अच्छे वस्त्र पहनाके पूर्वाभिमुख बैठाकर उसकी गोदमें उत्तराभिमुख बालकको स्थापन करके धायके दहिने स्तनको जोथोड़ा धोया हुआहो और उसमेंसे थोडा दूध निकाल डाला हो उसे नीचे लिखे मंत्रसे अभिमंत्रित करके पिलावे ॥ ४० ॥ चत्वारः सागरास्तुभ्यं स्तनयोः क्षीरवाहिणः ॥ भवंतु सुभगे नि- त्यं वालस्य बलवृद्धये ॥पयोऽमृतरसं पीत्वा कुमारस्त शुभानने। दीर्घमायुरवाप्नोतु देवाः प्राश्याऽमृतं यौँ ॥४१॥ हे सुभगे !बालकके बलकी वृद्धिके लिये चारों समुद्र तेरे स्तनोंमे नित्य क्षीरवाही होकर रहें । हे शुभानने ! तेरे दूधरूपी अमृतरसको पान करके यह बालक दीर्घायुको प्राप्त हो जैसे देवता अमृत पीकर दीर्घायु होतेहैं ॥ ४१ ॥ अतोऽन्यथा नानास्तन्योपयोगस्याऽसात्म्यायाधिजन्म भवति । अपरिनुतेप्यंतिस्तब्धस्तन्यपूर्णस्तनपानादुत्स्नुहितस्रोतसः शि- शोः कासश्वासवमीप्रादुर्भावः तस्मादेवंविधानं स्तन्यं न पाययेत्४२ (वा०४२) उत्स्नुदितत्रोतस इति-अर्ध्व स्नुहितं उदीर्ण स्रोतो यस्मिन् तस्मात् पानात् ।।
१३५ शारीरस्थान-अ०१०. (७४३) इसके विपरीत यदि नाना स्तन्य ( अनेक स्त्रियोके दूध) का उपयोग हो अर्थात् कभी कोई पिला दे कभी कोई तो वह आत्माके अनुकूल न, होनेसे व्याधि पैदा करताहै। और जो पहले दूध नहीं निकाला जावे तो अति कड़े दूधसे भरे स्तन पान करनेसे वह जमा जाडा जोरकी धारका दूध बालकको खांसी,श्वास, वमन पैदा कर देताहै इस हेतु ऐसे स्तन न पिलाने चाहिये ॥ ४२ ॥ क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च स्त्रिया स्तन्यनाशो भवति । अथास्याः क्षीरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगोधूमशालिषष्टिकमांसरससुरा- सौवीरकपिण्याकलशुनमत्स्यकशेरुकशृंगाटकविसविदारीकंदमधु- कशतावरीनलकालाबूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ॥ ४३ ॥ क्रोध, शोक, प्रेम न रखना इत्यादि ( तामस व्यवहारों और अति तीक्ष्ण, उष्ण पदार्थ खाने आदि) से स्त्रियोंका दूध नष्ट होजाताहै (जिसका दूध नष्ट होगया हो या स्वल्प हो) उसे दूधकी वृद्धिके लिये सुमनसता (शीलता सौम्यता) उत्पन्न करानी चाहिये और जौ, गेहूं, शालि (चावल), षष्टिक (साठी) चावल, मांसका रस, सुरा ( मद्यभेद), सौवीर, तिलकुट, लशुन, मछली, कसेरू, सिंघाड़े, कमलकी जड, विदारीकंद, मुलहटी, शतावरी, नलिका (नालीका शाक,) अलाबू (घीया), कालशाक इत्यादि खिलाते रहे ॥ ४३ ॥ अथास्याः स्तन्यमप्सु परीक्षेत । तच्चेच्छीतलममलं तनु शंखाव- भासमप्सु न्यस्तमेकीभावं गच्छत्यफेनिलमतंतुमन्नोत्प्लवते न सीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति । न च क्षुधितशोकार्तश्रांतप्रदुष्टधातुर्भिणी ज्वरितातिक्षीणातिस्थूलविदग्धभक्ष्यभोज्यविरुद्धाहारतर्पितायाः स्तन्यं पाययेन्नाजीषधं च बालं दोषौषधमलानां तीनवेगोत्प- त्तिभयात् ॥ ४४ ॥ भवन्ति चात्र- दूध पिलानेवाली (माता या धाय )के दूधकी जलमें परीक्षा करे यदि यह शीतल, निर्मल, पतला, शंखसा सुपेद हो, जलमें डालनेसे एकत्र होजावे (फैले नहीं), झाग- दार न हो, और तारसे न छूटें, और न ऊपर तैरता रहे, न नीचे डूब जावे उसे शुद्ध दूध जाने उसके पीनेसे बालकको निरोगपन, शरीर मोटा होना और बल वृद्धि (वा०४३)नलका इत्यत्र नलिका वा। नालिका शाकविशेषः । नालिकेर इति वा कचित्पाठः (इति डल्लनः
(७४४) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०।
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होती है । और क्षुधायुक्त, शाकयुक्त, थकी हुई, जिसकी धातु पित होगई हो,
गर्भिणी हो, जिसे तप आता हो, अतिक्षीण या अतिस्थूल हो, जो विदग्ध (कचा
पक्का) खाती हो, जिसन विरुद्ध भोजन पेटभर खाया हो एसी स्त्रीका दूध बालकको
नही पिलाना चाहिये और यदि बालकको अजीर्ण भी हो तो (बहुत तेज ) औपध
न पिलावे क्योंकि दोष और औषध तथा मलका तीक्ष्ण वंग हानका भय होनेसे ।
( यदि दे तो सूक्ष्म और मृदु औषध देनी चाहिये) ॥४१॥ इस विषयमें श्लोक हैं-
भावमिश्रोक्त दुष्टदुग्धलक्षण (परिशिष्ट)
श्लोक-कपायसलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् ॥ पित्तादम्लं च कटुकं राज्यो-
म्भास तु पीतिका ॥ १ ॥ कफदुष्टं तु यत्तोये निमज्जति च पिच्छलम् ॥ द्वंद्वज तु
द्विलिगं स्यात्रिलिंगं सान्निपातिकम् ॥ २॥
अर्थ-जो कषायरस हो, जलमें डालनेसे तिरे वह दुग्ध वायुसे दूपित होता है।
और जो खट्टा या चरका हो तथा जलमें डालनेसे पीली धारीसी होजावे तो वह
दुग्ध पित्तसे दूपित है ।। १ ॥ तथा जो बहुत गाढा हो और जलमें डालनसे डूब
जावे वह कफसे दूषित दुग्ध है । इसी भांति जिसमें दो भांति लक्षण हों वह
दो दोषोंसे दूषित और जिसमें तीनों लक्षण हों वह त्रिदोपदूषित समझना ॥२॥
धात्र्यास्तु गुरुलिज्यिविषमैदोपलैस्तथा ॥ दोपा दे हे प्रकुंप्यंति
ततः स्तन्यं प्रदुष्यति ॥४५॥ मिथ्याहारविहारिण्या दुष्टी वाता-
दयः स्त्रियाः ॥ दूषयति पयस्तेन शरीरे व्याधयः शिशोः॥ भवंति
कुशलस्तीच भिषक सम्यग्विभावयेत् ॥ ४६ ॥
दूध पिलानेवाली धायके भारी भोजन करनेसे, विषम भोजन करनेसे तथा
दोषल आहार विहारसे शरीरमें दोष कुपित होकर दुग्धको दूषित कर देते हैं
॥ ४५ ॥ मिथ्या आहार, विहार करनेवाली स्त्रियोंके शरीरमें वातादि दोष दुष्ट
होकर दुग्धको दूषित करते हैं जिस . दूषित दूधके पीनेसे वालकके शरीरमें व्या-
धियां पैदा होजाती हैं इससे चतुर वैद्य बालकके रोगोंको ठीक विचार कर
यल करे ॥ ४६॥
बालकके रोग जाननेकी रीति ।
अंगप्रत्यंगदेशे तु रुजा यंत्रास्य॑ जायते॥मुहुर्मुहुँः स्पृशति तं स्पृ-
श्यमाने च रोदिति ॥४७॥ निमीलिताक्षो मूर्द्धस्थे शिरो रोगे
नं धारयेत् ॥ वस्तिस्थे मूत्रसंगा” रुजा तृष्यति मूंछेति ॥४८॥
१३७ शारीरस्थान-अ० १०. (७४५). विण्मूत्रसंगवैवर्ण्यछामानांत्रकूजनैः॥ कोष्टे दोषान् विजानी- यात्सर्वत्रस्थाश्च रोदनैः॥४९॥ बालकके जिस जिस अंग प्रत्यंगमें. पीडा होती है उसे वह बारवार छूता है और यदि कोई अन्य मनुष्य उस अंगको छवे तो बालक रोता है ॥ ४७ ॥ यदि मूमें शिरोरोग हो तो बालक आखें बंदकिये रहता है और शिरको धूनता टक- राता है तथा वस्तिस्थानमें रोग पीडा हो तो मूत्र रुकता है, तृषा अधिक लगती- है, मूछा होजाती है ॥ ४८ ॥ और यदि मल मूत्र दोनों रुक जावें, वर्ण अच्छा न रहे, वमन हो, अफारा हो, तथा आँतें गुड़गुड करें तो कोष्ठगत पीडा जानना और समस्त शरीरमें (अति आदि ) पीडा हो तो उसे रुदनमात्रसे जानलेना चाहिये (इसी भांति औरोंको भी जानना) ॥ ४९ ॥ तेषु च यथाभिहितं मुंवच्छेदनीयमौषधं मात्रया क्षीरपस्य क्षीरें- सर्पिषाधान्याचे विदध्यात्। क्षीरान्नादस्यात्मनि धायाश्च । अन्ना- दस्य कषायांदीनात्मन्ये न धान्याः॥ ५० ॥ बालकोंके रांगनाशक औषधों में जो यथायोग्य कोमल हो, और अच्छेदी अथात कफादिको छेदन करनेवाली ( तीक्ष्ण ) नहीं हो वह औषध दूध पीनेवाले बच्चके रोग हो तो उसकी धायको दूध और घृतके संग देनी चाहिये । और, जो दूधभी पीता हो कुछ अन्नभी खाता हो तो उस बच्चेको भी और उसकी धायको भी औषध देना चाहिये । और अन्नमात्र खानेवाला हो तो उस बच्चेहीको कायादि पिलावे धायको नहीं ॥ ५० ॥ बालकोंकी औषधोंकी मात्रा । तत्र भासादूर्द्ध क्षीरपायोंगुलिपर्वद्वयग्रहणसम्मितामौषधमात्रां विध्यात् । कोलास्थिसम्मितां कल्कमात्रां क्षीरान्नादाय कोलस- स्मितामन्नादायति ॥ ५१ ॥ एक महीनेसे अधिककी अवस्थावाले दूध पीते बच्चेको यदि औषध (हरीतकी, गुडूच्यादि) देना आवश्यक हो तो अंगुलीके दो पोरोंसे जितनी औषध लीजावे उतनी औषध ( काथादि) देना चाहिये । और जो दूधभी पीता हो, कुछ अन्नभी (वा० ५१) बालस्य भेषजमात्राप्रमाणं तत्रातरात् यथा-"प्रयमे मासि जातस्य शिशभिपजरक्तिका ॥ अवलेह्या तु कर्तव्या मधुक्षीरसितावृतैः ॥ १ ॥ एकका वर्द्धयेत्तावावत्सवत्सरो भवेत्।। तदृर्व मापवृद्धिः स्याद्यावलोडगवार्षिकः ।। २ ॥"
(७४६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १३८ खाता हो उसे बेरकी गुठली जितनी पिसी दवा देना चाहिये । और अन्न खाते बच्चेको कोलप्रमाण औषध देना । ५१ ॥ येषां गदानां ये योगाःप्रवक्ष्यतेऽगदंकराः॥ तेषु तत्कल्कसंलिप्तौ पाययत शिशुं स्तनौ ॥ ५२ ॥ एक द्वे त्रीणि चाहाँनि वातपि- त्तकर्फज्वरे ॥ स्तन्यपायाहित सपिरितभ्यां यथार्थतः॥ ५३ ॥ अथवा जिन जिन रोगोंके लिये जो जो आराम करनेवाले औषधोंके योग कहे हैं यदि वालकोंके रोग होवें तो उन्ही २ को पीसकर दूध पिलानेवालीके स्तनोंके ऊपर लेप करके दूध पिलाना चाहिये ॥५२॥ यदि दूध पीनेवाले बालकको वातज, ' पित्तज और कफज ज्वर हो तो एक दिन, दो दिन, तीन दिन इस क्रमसे घृत, आहित होता है ( अर्थात् दूध पीते बच्चेको वातज्वरमें १ दिन, पित्तज्वरमें २ दिन, कफवरमें ३ दिन वृत न देना ) और जो इतर (दूध पीते और अन्नभी कुछ खाते तथा केवल अन्न खाते) हों उन्हें यथायोग्य घृतका पथ्य उचित है ॥ ५३ ।। नं च तृष्णांभयादत्र पाययेत शिशु स्तनौ ॥ विरेकवस्तिवमनान्ते कुयाच नात्ययात् ॥ ५४॥ ज्वरके वगमें बालकको तृषाके भयसे स्तनपान कराना उचित नहीं तथा अत्या- वश्यकताके सिवाय बालकको विरेचन, वस्तिकर्म तथा वमन करनाभी उचित्त नहीं ॥ ५४ ॥ काकछटकनेका यत्न। मस्तुलुंगक्षयाद्यस्य वायुस्ताल्वस्थि नामयेत् ॥ तस्य तृड्दैन्ययु- क्तस्य सर्पिर्मधुरकैः श्रुतम् ॥ पानाभ्यंजनयोयोज्यं शीतींबूद्वेजनं तथा ॥ ५५॥ वालकके मस्तककी मज्जाका क्षय होनेसे वायु उसके तालुके अस्थिको नवा देता है ( काक छिटक जाता है ) इससे तृषा अधिक लगती है, बालक दीन (विकल) होजाता है इससे इसको मधुरगण ( काकोल्यादि ) से गरम किया हुआ वृत पान करावे और तालूपर मले तथा ठंढे जल और शीतल पंखेसे पवनका टपयोग करे ॥ ५५ ॥ (शो०५३) इतराभ्यां धीरानादानादाम्या द्वाभ्या यथार्थतः यथायोग्यतः सर्पिः हितमहित वावोद्धव्यम्।। (मो०५४) नत्र ज्वरे।प्रत्ययात् विनाशकारकविकारात् ऋते विरेकवस्तिवमनानिन कुर्यादित्यभिप्रायः।
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१३९
शारीरस्थान-अ० १०.
(७४७)
नाभिपाक और गुदपाक ।
वातेनामांपितां नाभिं सरुजां तुडिसंज्ञिताम् ॥ मारुतनैः प्रशम-
येत्नेहस्वेदोपनाहनैः॥ ५६ ॥ गुदपाके तु बालानां पित्तनी
कारयेत्नियाम् ॥ रसांजनं विशेषेण पानालेपनयोहितम् ॥ ५७ ॥
यदि वायुसे नाभि फूल जावे और उसमें पीडा हो, अगाडीको चोंचसी निकल
आव तो इस व्याधि वायुनाशक स्नेहकर्म करना ( वायुनाशक घृत लगाना)
तथा स्वेदन, उपनाहनादि करना॥ ५६ ॥ यदि बालकोंकी गुदा पक जावे तो पित्त-
नाशक क्रिया करनी चाहिये, विशेष करके रसोत ( रसवंती) का पान कराना और
लेप करना हित है ॥ ५७ ॥
क्षीराहारीय सर्पिः पाययेत् सिद्धार्थकवचामांसीपयस्यापामार्गश-
तावरीसारिवाब्राह्मीपिप्पलीहरिद्रांकुष्टसैंधवसिद्धं क्षीरान्नादाय
मधुकवचापिप्पलीचित्रकत्रिफलासिद्धं अन्नादाय द्विपंचमूलीक्षी-
रतंगरभद्रदारुमरिचमधुविडंगद्राक्षाद्विब्राह्मीसिद्धम् । तेनारोग्यब-
लमेधायूंषि शिशोभवंति ॥ ५८॥
केवल दूध पीनेवाले बच्चेको सुपेद सरसों, वच, जटामांसी, क्षीरकाकोली (अथवा
दुद्धी), ओंगा, शतावरी, सारिवा, ब्राह्मी, पिप्पली, हलदी, कूट, सेंधानमक इनसे
सिद्ध किया घृत नित्य पिलाना चाहिये । और दूधभी पीने तथा कुछ अन्नभी खाने-
वाले बालकको मुलहटी, वच, पिप्पली, चित्रक और त्रिफला इनसे सिद्ध किये
घृतका पान कराना । तथा अन्न खानेवाले बालकको दोनों पञ्चमूल ( अर्थात् दश-
मूल), क्षीर (दुग्ध ) अथवा 'क्षीरि ' ऐसाभी पाठांतर है जिससे क्षीरवृक्ष, तगर,
देवदारु, कालीमिर्च, मधु, (शहत ) अथवा 'मधुक' पाठांतर होनेसे मुलहटी, वाय--
विडंग, द्राक्षा दोनों ब्राह्मी (ब्राह्मी और ब्रह्ममांडूकी) इनका सिद्ध किया वृत पान
कराना चाहिये इससे बालक निरोगी, वलवान्, बुद्धिमान् और दीर्घायु होता है५८॥
बालकोंका बरताव ।
बॉलं पुनात्रसुखं गृह्णीयान्न चैनें तजयत् । सहसा ने प्रतिवोध-
येदवित्रासभयात् । सहसा नापहरेदुक्षिपेद्वाँ वातादिविघातभ-
यानोपवेशयेत् कोज्यभयात् । नित्यं चैनमनुवर्तेत प्रियशतैर-
जिघांसुः॥ ५९॥
(१८) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०। १४० और वालकको जैसे उसका शरीर सुख पावे वैस गोदमें रक्ख तथा वालकको त्रास नहीं देना यदि सोता हो तो उसे झटपट न जगावे क्योंकि इससे वह डर जा- ताहै और झट ऊपरको न उठावे, और झटसे न नाचेको करे इससे वायुके विधा तका भय होताहै और अतिछोटे बच्चेको बिठावेभी नहीं क्योंकि बिठानेस बच्चा कुबडा न होजाव यह भय होताहै तथा वालकके चिरजीवनकी वांच्छावाले माता पिता नित्य बालकके अनुकूल और प्रिय सैंकडों यत्न करें ॥ ५९ ॥ एवसनसिहतमनास्त्वलिवद्धते। नित्यमुदग्रसत्त्वसंपन्नो नीरोगः सुप्रसन्नमनाश्च भवति ॥ ६०॥ वातातपविद्युत्प्रभापादपलताशू- न्यागारनिम्नस्थानगृहच्छायादिभ्यो दुग्रहोपसर्गतश्च वालं रक्षेत् ॥ ६१॥ ऐसे पृवाक्त वरताव करनेस चालक अरुद्धचित्त रहकर दिन प्रति दिन वृद्धिको प्राप्त होताहै तथा सत्त्वसंपन्न निरोगी और प्रसन्नचित रहताह ॥ ६० ॥ तथा वालकको तीक्ष्ण पवन, धूप, विजलीके चमके, वृक्ष, बेल, शूने स्थान, नीचे स्थान (गंढे आदि) और गृहछाया ( दीवालीकी पडछाही) इनसे रक्षा करे अर्थात् इनसे बचाये रखे तथा खोटे ग्रहोंके घात और उपसर्गो (उपद्रवों) से भी बचाये रक्खे ॥ ६१॥ लांशुचौ विसृजेदालं नाकाशे विषमे न च ॥ नोममारुतवर्येषु रजोधूमोदकेषु च ॥ ६२ ॥ बालकको अशुद्ध जगह ( पाखान मोरी आदिके पास)में नहीं छोडे, तथा ऊपर खुली छतोपरभी न छोडे, तथा जहां ऊँची नीची जगह हो वहांभी न छोडे, तथा. गरम हवा (लूह ) अथवा गरम हवा तथा वरसते मेहमें,धूल उडतेमें और तालाव, नदी आर्दिक पामभी नहीं जानेदेवे ॥ ६२ ।। क्षीरसात्स्यतया क्षीरसाज गव्यथापि वा। दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्वालानां वीक्ष्य मात्रया ॥६३ ॥ बालकोंको दूधही सानुकूल होता है इससे यदि दूध पिलानेवालीके स्तनोंमें तृप्तिके योग्य दूध न हो तो बकरी अथवा गौका दूधजो उचित हो मात्रा अनुसार बालकांको पिलाना चाहिये ।। ६३ ।। (मो०६३ ) जालन्यपतिरिति-बावत् तन्यत्य पर्याप्तिर्भवति । अथवा यावत् त्तन्यमनस्य योग्यता का (मीनिक म०) || शारीरस्थान-अ० १०. (७४९) अन्नप्राशन। षण्मासं चैनेमन्नं प्राशयेलघु हितं च। नित्यमवरोधरतश्च स्यात्कृत- रक्ष उपसर्गभयाताप्रयत्नतश्च ग्रहोपसर्गेभ्यो रक्ष्यां वाला भवंति६॥ छठे महीनमें बालकको अन्नप्राशन करावे जो अन्न बालकको दे वह हलका, पतला और हित होना चाहिये तथा सदैव बालकके पास कोई न कोई मनुष्य रहना चाहिये तथा उपसर्ग ( उपद्रवों) के भयसे सदा रक्षित रखना चाहिये क्योंकि बालक यत्नपूर्वक ग्रह और उपद्रवोंसे रक्षा करने योग्य होते हैं ॥ ६४ ॥ बालग्रहपीडितके सामान्य लक्षण । अथ कुमार उद्विजते त्र्यस्यति रोदिति नष्टसंज्ञो भवति नखदश- नैर्धात्रीमात्मानं च. परिणुदति दंतान् खादति कूजति जुंभते भ्रुवौ विक्षिपत्यूई निरीक्षते फेनमुद्रमति संदष्टौष्ठः क्रूरो भिन्नाम- वर्चा दीनार्तस्वरो निशिजागर्ति दुर्बलो म्लानांगो मत्स्यच्छुछुदार- मत्कुणगंधो यथा पुराधान्याः स्तन्यमभिलषति तथा नाभिलपती- ति सामान्येन ग्रहोपसृष्टलक्षणमुक्तं विस्तरेणोत्तरे वक्ष्यामः ॥६५॥ जब बालकको वालग्रहों ( पूतना आदि) की छायाजनित पीडा होती है तो उसके सामान्यतासे ये लक्षण होते है जैसे-बालक उदास रहता हो, भयभीतसा रहता हो, अधिक रोया करता हो, कभी नष्टसंज्ञ (गाफिल ) हो जाता हो, अपने देह अथवा दूध पिलानेवालीको नखों या दाँतोंसे नोचता हो, दांत चबाता हो, पीडासे दुःशब्द करता हो, जमाही जादा लेता हो, भृकुटी टेटी रखता हो, ऊपरको देखता हो, मुँहसे झाग आता हो, होठ काटता हो, कठोर होजाता हो, मल और आमके फटे दस्त आते हों, दीन दुःखीकेसी वाणी हो, रातको जागता हो, दुबला और ढीला शरीर हो जाता हो, मछली, छडूंदर और खटमल जैसी गंध आती हो, पहलेके समान दूध न पाता हो ये सामान्यतासे बालग्रहोंसे पीडितके लक्षण कहे हैं, विस्तारसे उत्तरतंत्रमें ( पूतना, अंधपूतना, शकुनी आदि) सबके लक्षण, यत्न आदि कहेंगे (देशभाषामें ग्रहजनित पीडाको मसाणियां रोग कहते हैं)॥६५॥ शक्तिमंतं चैनं ज्ञात्वा यथावर्ण विद्यां ग्राहयेताअथास्मै पंचविंशति- वर्षाय द्वादशवर्षां पत्नीमावहेत्पित्र्यधर्मार्थकामप्रजाःप्राप्स्यतीति ६६ (वा०६६) यथावर्ण ब्राह्मणास्त्रयी राजन्यो दडनीति वैश्यो वार्ताम् (इतिडल्लनः) शूद्रः शिल्पादि- कमित्यन्ये । द्वादशवर्षी पत्नीमित्यत्र मनु:-'त्रिंशद्वर्षोद्हेत्कन्या हृया द्वादशवार्षिकीम्' इति ॥
1 १४२ (७५०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। जब बालककी अवस्था छः वर्षकी हो जाय तब इस शक्तिमान् जानकर (अर्थात् निर्बल रुग्ण तो नहीं है ऐमा विचार कर )वर्णके अनुसार ब्राह्मण हो तो ब्रह्मविद्या, क्षत्रिय हो तो धनुर्विद्या, वैश्य हो तो व्यापारविद्या, शुद्र हो तो शिल्प अथवा सम- यानुकूल जैसी विद्या उनके कुल में प्रवृत्त हो वैसी विद्या पढाना आरंभ करे । फिर जब पुरुषकी अवस्था २५ पच्चीस वर्षकी हो तब इसका १२ वर्षकी स्त्रीसे विवाह करना चाहिय ऐसा करनसे पित्र्य (पितरोंको जो हित हो श्राद्धादिकी योग्यता) तथा धर्म (श्रुतिस्मृतिविहित यज्ञादिका अनुष्ठान)और अर्थ (द्रव्य), काम (मनो- स्थादि इंद्रियानुकूल सुख ) और प्रजा ( संतान ) इन सबको प्राप्त होता है ॥६६॥ छोटी अवस्थामें गर्भाधानका निषेध । उनषोर्डशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम्॥ यद्याधत्ते पुमान् गर्भ कुक्षिं. स्थः स विद्यते ॥६७ ॥जातो वा नै चिरै जीवे जीवेद्वाँ दुर्वलें- द्रियः ॥ तस्मादत्यंतवालायां गर्भाधान न कारयेत् ॥ ६८ ॥ सोलह वर्षकी अवस्थासे छोटी स्त्रीके पच्चीस वर्षकी अवस्थासे छोटा पुरुष गर्भाधान कर तो वह गर्भ कुक्षिहीमें विकारको प्राप्त होकर खंडित होजावे और यदि पूरा होकर बालक जन्मभी लेवे तो दीर्घायु नहीं होवे (बहुत दिन न जीवे) और जो जीवे भी तो दुर्बल इंद्रियाँवाला (कमजार) हीरहता है इस कारण अत्यन्त छोटी अवस्थावाली स्त्रीमें गर्भाधान नहीं करना चाहिये ।। ६७ ॥ ६८ ॥ अतिवृद्धायां दीर्घरोगिण्यासन्येन वा विकारेणोपसृष्टायां गर्भाधानं नैव कुर्वन्ति पुरुषस्याप्येवंविधस्य त एवं दोपः संभवति ॥६९॥ अतिवृद्धा (बूढी ) और दीर्घरोग (क्षयी, श्वासादि) से पीड़ित तथा अन्य विकारसे युक्त स्त्रीमें भी गर्भाधान नहीं करना (क्योंकि वृद्धाकी सन्तान सत्त्वहीन और रोगवतीकी रोगूयुक्त होतीही हैं ) तथा ऐसे अतिवृद्ध और दीर्घरोगी आदि निद्य पुरुपोंकोभी गर्भाधान करनेका निषेध है क्योंकि उनमेंभी वेही दोष होते हैं।।६९॥ गर्भस्राव आदिकी चिकित्सा । तत्र पूर्वोक्तकारणैः पतिप्यति गर्भे गर्भाशयकटीवंक्षणवस्तिशू- लानि रक्तदर्शनं च तत्र शीतैः परिषेकावगाहप्रदेहादिभिरुपचरे- ज्जीवनीयशृतक्षीरपानश्च ॥ ७० ॥ गर्भस्फुरणे मुहुर्मुहुस्तरसंधार- णार्थ क्षीरसुत्पलादिसिद्धं पाययेत् ॥ ७१ ॥ पूर्वोक्त कारणोंसे यदि गर्भ गिरने लगे तो उसके पूर्व गर्भाशय, कमर, नले, बस्ति इन स्थानों में पीड़ा होने लगती है, और रुधिर आता दिखाई देता है, इस १४३ शारीरस्थान-अ०१०. (७५१) अवस्थामें शीतल तरडे देना, स्नान करना और लेपका उपचार करे, और जीव- नीयगणसे सिद्ध किया दुग्ध पान करावे ॥ ७० ॥ बारबार गर्भ चलायमान होवे तो उसकी स्थिति के लिये उत्पलादिगण ( यह पहले कह चुके हैं) से सिद्ध किया हुआ दुग्ध पिलावे ॥ ७१ ॥ प्रस्रंसमाने सदाहपार्श्वपृष्ठशूलासृग्दरानाहमूत्रसंगाः स्थाना- स्थानं चोपक्रामति गर्भ कोष्ठे संरंभंस्तत्र स्निग्धशीताः क्रियाः ॥७२॥ वेदनायां महासहाक्षुद्रसहामधुकश्वदंष्ट्राकंटकारिकासिद्धं पयः शर्कराक्षौद्रमिभं पाययेत् । मूत्रसंगे दर्भादिसिद्धम् । आनाहे हिंगुसौवर्चललशुनवचासिद्धम् ॥ ७३ ॥ जब गर्भ झिरने लगे तब दाहयुक्त पसलियोंमें और पीठमें शूल होता है, और रुधिर बहने लगताहै, अफरा होजाता है और मूत्र बंद होजाता है । जब गर्भ एक स्थानसे छूटकर अन्य स्थानमें चलायमान होने लगता है तब उदरमें अति पीडा होती है इस अवस्थामें चिकनी और शीतल क्रिया करनी चाहिये ॥ ७२ ॥ गर्भा- शयमें पीडा हो तो महासहा (माषपर्णी), क्षुद्रसहा (मुद्गपर्णी), मुलहटी, गोखरू, कटेली इनसे सिद्ध किया हुआ दुग्ध, खांड और शहत मिलाकर पिलावे । यदि मूत्र रुकजावे तो दर्भा आदिका सिद्ध किया दुग्ध (या जलमें कल्क करके) पिलावे । यदि अफराहो तो हींग, सौंचरनमक, लहसन और वच इनका उपयोग करे ।। ७३।। अत्यर्थं स्रवति रक्त कोष्ठागारिकागारमृपिंडसमंगाधातकीकुसुम- नवमालिकागैरिकसर्जरसरलाञ्जनचूर्ण मधुनावलिह्याद्यथालाभं न्यग्रोधादित्वक्प्रवालकल्क वा पयसा पाययेदुत्पलाहिकल्कं वा । कशेरुशृंगाटकशालूककल्कं वा शतेन पयसोदुंबरफलौदककन्द, क्वाथेन वा शर्करामधुमधुरेण शालिपिष्टम्।न्यग्रोधादिस्वरसपरि- पीतं च वस्त्रावयवं योन्यां धारयेत् ॥७४ ॥ जो रुधिर अत्यन्त वहता हो तो कोष्ठागारिका (मुंगी नामक परंद क्रीडा जो मट्टीका घर बनाता है) उसके घरकी मिट्टी, लज्जालू, धायके फूल, नवमालिका पुष्पवृक्ष, गेरू, राल और रसोत इनका चर्ण शहतसे चटावे । अथवा न्यग्रोधादि- (वा०७२) तत्र उभयत्र । ( वाक्य ७३) महासहा माषपर्णी । क्षुद्रसहा मुद्रपर्णी ( इति श. स्तो.) । (वा० ७४) कोष्ठागारिकागारमृत्लिडमिति-कोष्ठागारी कृमिविशेषः तदागारमृचिकापिंडम् । औदककंदा: कशेरुशालूकादयः।
१९४ सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । (७५२) गणमस जो मिलसकें उनकी छाल और कोमल पत्तोंका कल्क दूधकं संग पिलावे अथवा उत्पलादिगण (कमल आदि) का कल्फ दूधके संग पिलावे । अथवा कसेरू, सिंघाडे और शालूक ( कमलकी जड) इनका कल्क गरम दुग्धके संग पिलावे । अथवा गूलरके फल और जलके कंद इनके क्वाथको खांड, शहतसे मीठा करके पिसे चावलोंके संग पिलावे । अथवा गूलर आदिका रस निचोडकर उसमें कप. डेका टुकडा खूब तर करके योनिमें धारण करे ॥ ७४ ॥ अथादृष्टशोणितवेदनायां मधुकदेवदारुपयस्यासिद्धं पयः पाययेत्। तदेवाश्मंतकशतावरीपयस्यासिद्धं विदारिगंधादिसिद्धं वा वृहती- द्वयोत्पलशतावरीसारिवापयस्यामधुकसिद्धं वैवं क्षिप्रमुपक्रांतायाँ उपाँवर्तन्ते रुजो गर्भश्चाप्यायते ॥ ७५॥ जो रुधिर नहीं दीखे और वेदना होवे तो मुलहटी, देवदारु, पयस्या, अर्कपुष्पी इनसे सिद्ध किये हुए दुग्धको पिलावे। अथवा अश्मंतक, शतावरी और अर्कपुष्पीसे सिद्ध किया दूध पिलावे । अथवा विदारीगंधा आदिस सिद्ध किया दूध पिलावे । अथवा दोनों कटेहली, कमल, शतावरी, सारिवा, अर्कपुष्पी और मुलहटी इनसे सिद्ध किया हुआ दूध पिलावे इस प्रकार जिसकी शीघ्र चिकित्सा कीजाय उसके रोग निवृत्त होजातेहैं और गर्भ परिपूर्ण होता है ॥ ७५ ॥ व्यवस्थिते च गर्भ गव्येनोद्वरशलाटसिद्धेन पया भोजयेत् ॥७६॥ अतीते लवणस्नेहवाभिर्यवाभिरुदालंकादीनां पाचनी- योपसंस्कृताभिरुपक्रमेत यावंतो मासी गर्भस्यं तावत्यहाँनि॥७॥ यदि गर्भ ठहर जावे तो गौके दूधमें कच्चे गूलरके फल सिद्ध करके खिलाते रहे ॥ ७६ ॥ और यदि नहीं ठहरे (गिरपड़े) तो लवण और चिकनाईसे वर्जित उद्दालक धान्यकी यवागूको पाचनीय द्रव्योंसे संस्कार करके जितने महीनेका गर्भ गिरे उतने दिनतक पिलावे ॥ ७७ ।। वस्त्युदरशूलेषु पुराणगुडं दीपनीयसंयुक्तं पाययेदरिष्टं वा ॥ ७८ ॥ वातोपद्रवगृहीतत्वात्स्रोतसांलीयते गर्भः सोतिकार्लसवतिष्ठमानो (वा० ७५ ) अश्मंतक: कोविदारः । पयस्या अर्कपुष्पी ।। (वा० ७६ ) व्यवस्थिते लावादिविका- रानंतरं स्थिते गर्ने । क्षीरपाकवियि तत्रातरात् ज्ञेयं यथा-"द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीरातोयं चतुर्गुणम् । क्षीरावशेषो कर्तव्यः क्षीरपाके स्वयं विधिः॥" (वा० ७७) अतीते पतिते । उद्दाल्कः भरण्यकोद्रवः ( इति डल्लनः ) । यवागूदानं लंघनपूर्व कार्यम् ।। पंचकोलचूर्णसंयुक्तम् । औरष्टम् अभयारिष्टादिकम् ।। (वा० ७८) दीपनीयसंयुक्तं (वा० ७९) वातोपद्रवं. शुष्कत्वात् ।- १४५ - शारीरस्थान-अ० १०. (७५३) ध्यापद्यते तं दुना लेहादिक्रमेणोपचरेत् । उत्क्रोशरससं- सिद्धामनल्पलेहां यवागं पाययेत् भापतिलबिल्नशलाटुलिद्धान् वा कुल्मायान् भक्षेयेन्मधुमाध्वीकं चानुपिवेत्सतरात्रम् ॥७९॥ वस्तिस्थान और पेट में शूल हो तो पुराने गुड़को दीपनीय द्रव्योंसे युक्त करके पिलावे । अथवा अभयादिकका अरिष्ट पिलावे (कोई २ अरिष्ट शब्दका अर्थ मघभी करतेहैं ) ॥७८ ॥ जब गर्भ में नाव आदि उपद्व होतेहैं तो वायुके उपद्रवोंसे संगृहीत गर्भ सुकड़कर स्रोतोंने लय होजाताहै ( बढता नहीं दीखता) फिर बहुत समयतक कुक्षिमें पड़ा रहनसे नष्टभी होजाताहै तब इसे कोमल २ स्नेहादिकसे उपचार करे और उत्क्रोश (कुरर) पक्षीके मौसके रसमें सिद्ध की हुई यवागू जिसमें कम चिकनाई न हो उसे पिलाया करे । तथा उड़द तिल और कब बिल्व इनसे सिद्ध की हुई कुल्माष (वाकली) खिलावे और ऊपरसे सात दिनतक महुएका मथु पिलावे ॥ ७९ ॥ कालातीतस्थायिनि गर्ने विशेषतः सधान्यसुदूखलं सूशलेनासि- हन्याद्विपमे का यानासने सेवेत ॥ ८०॥ वाताभिपन्न एवं शुष्य- तिमः स मातुः कुक्षि न पूरयति संदं स्पंदते च तं बृहणीयैः पयोनिलिरलेश्वोपक्रमेत् ॥ ८१ ॥ जो प्रसबके दिनोंसे अधिक गर्भ कुक्षिमें रहे अर्थात् दशम मास पूर्ण होनेपरभी प्रसव न हो तो विशेष करके यह यत्न करावे कि ऊसलमें धान्य भरकर मशलासे गर्भवतीले कुटवावे । अथवा जंट या गाडीकी सवारीमें बिठाकर टहलावे (वृद्धवा- ग्भट इसको विरुद्ध कहते हैं-देखी टिप्पणी) ॥ ८० ॥ वायुसे व्यापन्न हुआ गर्भ सुख जाता है वह माताकी छुक्षिको पूर्ण नहीं करता है, मंद गतिसे फरकता है उसे बृहणीय (पुष्टिकारक) दूध, मांसके रस इत्यादिसे उपचार करनाचाहिये।।८१॥ शुक्रशोणित वायुनाभिप्रपन्ननवशांतजीवशाध्यापयत्युदर तकदी- चिंघाच्छयोपशात नैगमेयापहृतमिति आपते तमेव कदाधि- प्रलीयमानं नामोदरमित्यास्तत्रापि लीलवत् प्रतीकारः ।। ८२ -मृदुना अतीक्ष्णेन स्नेहेनोपचरेत् तीक्ष्णस्य गोपघातकरत्गत् उत्कोशः कुररभेद' पनिविशेतः । अनल्पस्नेहां प्रचुरस्नेहाम् (नि, सं.)। (वा० ८०) मुशलेनो रूल वान्यपूर्णमाहनीवनिति तत्तु न सम्पर बागव्यायामवर्जन हिमर्निर, सततमुपदिशते विशेषतश्च प्रसवकाले प्रचलि सर्वचातुदोपाया. सीकुग वयान्नाः नुसत्यानासनेरित वायुरंतरं लम्वा प्राणान् हिस्यात् ( अतः शंकामयतो न कुर्यात् ) ( इति वृ. वा.)। + ४८
(७५४)
सुश्रुतसहिता-भा० टी० ।
कभी ऐसाभी होता है कि शुक्र, शोणित वायुसे दूषित हो जाते हैं तो गर्भमें
जीव नहीं पड़ता है वह पेटको फुला देता है, कभी यह आपही शांतभी हो जाताहै
इसे नैगमेय ग्रह करके अपहृत है ऐसा कहतेहैं, कभी ऐसे प्रलीयमान गर्भको नागो-
दर भी कहते हैं यहांपरभी लीनके सदृश यल करना चाहिये ॥ ८२ ॥
अत ऊर्दू मासानुमासिके वक्ष्यामः ।
इसके अगाड़ी प्रतिमासके गर्भविकार अर्थात् गर्भस्रावका यत्न लिखते हैं ।
मधुकं शाकबीजं च पयस्यासुरदारु च ॥अश्मंतकस्तिलाः कृष्णा
स्ताम्मवल्ली शतावरी ॥ ८३॥ वृक्षादनी पयस्या च लता चोत्पल-
सारिवा ॥ अनंता सारिवा रास्ता पद्मा मधुकमेव च ॥ ८४ ॥
बृहत्यौ काश्मरी चापि क्षीरिशुंगास्त्वचो घृतम् ॥ पृश्निपर्णी बला
शिग्रुः श्वदंष्ट्रा मधुपर्णिका ॥ ८५ ॥ श्रृंगाटको विसं द्राक्षा
कशेरुसंधुकं सिता ॥ ८६ ॥ वरसैते सप्त योगाः स्युरर्द्धश्लोकस-
मापनाः ॥ यथासंख्यं प्रयोक्तव्या गर्भस्रावे पयोयुताः॥ ८७ ॥
प्रथम महीने ही रक्तदर्शन होतो मुलहटी,शाकवृक्षके बीज, पयस्या, क्षीरकाकाली
'अथवा अर्कपुष्पी और देवदारु, दूसरे महीनेमें गर्भस्रावकी शंका हो तो अश्मंतक
(अम्लाक जिसके कोविदारकेसे अम्ल पत्ते होते हैं ), काले तिल, ताम्रवल्ली
(मॅजीठ), शतावरी । तथा तीसरे महीनेमें बंदा, अर्कपुष्पी लता, कमल और सा-
रिवा । तथा चौथे महीनेमें अनंता (अनंतमूल या दूर्वा), सारिवा, रास्ना, पद्मा
(पद्मचारिणी या भाङ्गी) और मुलहटी। पांचवें महीने में दोनों कटेली, खंभारी,
क्षीरशुंगा (धवाले वृक्ष वदादिकी कोंपल), तज और वृत । छठे महीने में पृश्निपर्णी,
खटी, सोहंजन, गोखरु और मधुपर्णी । सातवें महीनेमें सिंघाडे, कमलकी नाल,
दाख, कसेरु, मुलहटी और मिश्री, इस प्रकार जो आधे आधे श्लोकमें कहे हुए
योग हैं उन्हें हे शिष्य ! यथासंख्य मासमासके प्रति गर्भस्रावकी शंकामें दूधके संग
पिलावे ।। ८३ ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ ८७ ॥
कपित्थवृहतीविल्वपटोलेक्षुनिदिग्धिकाः॥ मूलानि क्षीरसिद्धानि
पाययेद्भिपगप्टंमे ॥ ८८ ॥ नवमे मधुकानंतापयस्यासारिवाः
पिवेत् ॥ क्षीरं शुंठीपयस्याभ्यां सिंद्धं स्यादशमे हितम् ॥ ८९॥
सक्षीरा वा हिता झुठी मधुकै सुरदारू च ॥ एवमाप्यायते गर्भ-
स्तीनां रक् चोपशाम्यति ॥ ९० ॥
। शारीरस्थान-अ० १०. (७५५) आठवें महीने में गर्भकी नैराग्यताके लिये कपित्थ (कैथ), बड़ी कटेली, बिल्व, - पटोल, ईख और छोटी कटेली इनकी जडको दूधमें सिद्ध करके वैद्य पिलादे ॥ ८८ ॥ नवम मासमें गर्भकी नैरोग्यताके लिये मुलहटी, अनंतमूल, क्षीरकाकोली (या अर्कपुष्पी) और सारिवा इनसे सिद्ध दुग्ध पिलावे । तथा दशवें महीने में सोंठ और अर्कपुष्पीसे सिद्ध किया दुग्ध पिलावे ।। ८९ ॥ अथवा सोंठ और मुल- 'हटी तथा देवदारु ये दुग्धके संग पिलाना हित हैं इस प्रकार उपचार करनेसे गर्भ 'परिपूर्ण होता है और पीडाभी शांत हो जाती है ॥ ९० ॥ निवृत्तप्रसवायास्तु पुनः पड्भ्यो वर्षेभ्य ऊर्दू प्रसवमानाया नार्याः कुमारोऽल्पायुर्भवति ॥ ९१ ॥ जिसके पहली संतान होनेसे छह ६ वर्ष उपरांत प्रसव होवे ऐसी स्त्रियों की संतान स्वल्पायु होती है ॥ ९१ ॥ अथै गर्भिणी व्याध्युत्पत्तावत्यये छंईयेन्मधुराम्लेनान्नोपहितेनानु- लोमयेच संशमनीयञ्च मुटुं विदध्यादन्नपानयोरश्नीयाँच्चे मृदुवी- र्य मधुप्रायं गर्भाविरुद्धं च गाविसैद्धाश्च क्रिया यथायोगं वि- दधीत समायोः ॥ ९२ ॥ भवंति चात्र- यदि गर्भिणी स्त्रीको अत्यंत दारुणे व्याधि होजावे और वमनकी अत्यंत आवश्य- कता हो तो मधुर अम्ल अनके योगसे मृदु वमन करावे और इसी प्रकार अनुलो- मन (कुछ मृदु रेचनादि) भी करे तो इसी भांति करे तथा संशमन क्रिया करनेकी आवश्यकता हो तो वहभी मृदुही करे और खाने पीनेमें मृदुवीर्य और थोडा मिष्ट तथा गर्भके अनुकूल खानपान रक्खे और यथायोग्य गर्भके अनुकूल और मृदुक्रिया करतेरहे ॥ ९२ ॥ इस विषयमें श्लोक हैं- सौवर्ण सुकृतं चूर्णं कुष्टं मधु घृतं वचा ॥ मत्स्याक्षकः शंखपुष्पी मधुर्सर्पिः सकांचनम् ॥ ९३ ॥ अर्कपुष्पी मधुघृतं चर्णित कैन (वाक्य ९१ ) निवृत्तप्रसवा इति-एतेन षड्भ्यो वर्षेभ्य ऊर्च निवृत्तप्रसवेत्युच्यते तस्याः कुमा- रोऽल्पायुर्भवति गर्भाशययोन्यादिदोपेण हि निवर्तते प्रसवः ( इति डल्लनः) । ( वा०९२) अत्यये विनाशहेतौ । अत्ययकारिणि व्याधी मृदुना द्रव्येण वमनादि कामिति । अनु- लोमयेच इति-मधुराम्लेनान्नोपहितेनेति संबंधः ॥ (श्लो० ९३) सुवर्णचूर्ण सुकृतमियनेन मारिदं प्रती यते । मत्स्याक्षकः ब्राह्मी अन्ये तु रक्तपुष्पमानूपं, मस्याक्षकमाहुः।।
१४८ (७५६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। वचा॥हेमंचूर्णानि कैटयः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥९॥ चत्वारोऽभि. हिताः प्राशाः श्लोकाग्द्वेषु चतुर्वपि ॥ कुमाराणां वपुर्मेधावलवु.. द्धिविवर्धनाः॥ ९५॥ इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने दशमोऽध्यायः ॥१०॥ पहिला योग सुवर्णका चूर्ण ( मृगांक ), कूट, शहत, वृत और बत्र हैं। दूसरा योग नल्याक्ष ( मछछी ), शंखाहुली, शहत, घृत और सुवर्ण है ॥ ९३ ॥ तीसरा योग अर्कपुष्पी, शहत, घृत सुवर्णचूर्ण और वच है । चौथा योग सुवर्णचूर्ण, फैटर्य ( पृतिकरंज ), सुपेद दूब, वृत और शहत है ॥ ९४ ॥ ये आधे आध शोकम चार योग कहे हैं इनमे किसी एकको प्राशन कराना ( चटाना )वालकोंकी दह और धारणा शक्ति तथा बल और बुद्धिको बढाता है ॥ १५ ॥ इति सुश्रुनसहिताया. राजवैद्य पं० मुरली बरशर्मविरचितसान्ययसटिप्पणीकस गरिगिट- भायाटीकाया शारीरस्थाने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ शैलाननाधीशसमाश्रितेन वैद्येन नाम्ना मुरलीधरण || दोकाकृतौ सुश्रुतसंहितायाः शारीरकं पूर्तिमगाच्छुभाय ॥ १ ॥ त्रिपंचोकेन्दु १९५३ मिते संवत्सरे चैत्रस्यासितपक्ष त्रयोदश्यां समंगलायामिदं सुश्रुतसंहितायाः शारीरकं सान्बयसटिप्पणीकासपरिशिष्टभाषाटीकासहितं समाप्ति- मगमत् ।। शुभमस्तु ।। ॥ समाप्तमिदं शारीरकं स्थानम् ॥ ३॥ (श्लो०९४) केटर्य, पर्वनिय ( इति डल्लनः) अन्ये पूतिकरजमाहुः। निववसंग्रहे भेवजमात्रानापनार्थ विश्वामित्रोक्त वाक्यमभिदधाति यथा-"विडगफलमात्रं तु जातमात्रत्व भेषजम् ॥ एतेनैव प्रमाणेन मासि मासि प्रबनिन् ॥ १ ॥ कोलास्थिमात्र क्षीगच यापज्यकोविदः ॥ श्रीरान्नादे मोलमात्रमन्नाबो- बगेपमम् ॥ नुभुनहिताका गारीरक म्यान मसाप्त हुआ इयन अगाडी पारगिटस्पमे डाक्टरी और यूनानी मतले जुदा शारीरक लिया जाता है तथा गरीरनवी अनेक उपयोगी चित्रभी दिये हैं जिनमें गरीरके भीतरी भागोंका ठीक २ बोर हो सकेगा जिन आगा है कि इस समयले वैद्य विचारसिक सननगग भरे परिध्रमको सफल मान मुझे पता करेंगे तथा इसके प्रकाशक त्रियांद्वारक श्रीयुत संठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीको भी अनेक धन्यवाद ढगे ।। निवेदक- सुरलीधरशी टीकाकार. N . ॥ श्रीः॥ 1 डाक्टरीमतसे शारीरक। परिशिष्ट साग १. प्रगट हो कि, हमारे शास्त्रकारोंने भी शारीरकका अच्छे प्रकार वर्गन किया है परंतु भारतवर्ष में इस समय यूनानी और डाक्टरीका अधिक प्रचार होनस बहुवा लोगों- की तृप्ति उनके मतानुसार विवेचन किये विना नहीं होती यद्यपि हमारे शास्त्रों में शारी- रककी उत्पत्ति और शल्यक्रियाके उपयोगी मर्मादिका विशेष व्यौरा लिखा है तथापि आंतरिक अवयव यकृत्, प्लीहा, वृक्क, फुप्फुस आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन कि अमुक अवयव इस प्रकारका है, यह कार्य करता है इत्यादि बहुत नहीं लिखा किंतु सूचना मात्र थोडासा लिखा है परंतु समयके अनुसार हरेक बातमें सरकार होताही रहता है अस्तु, यूनानी लोगोंने शारीरककी विवेचना में बहुत कुछ उन्नति की है और अपने विज्ञानके अनुसार उसमें बहुत बारीकियां निकाली हैं जिनका परिज्ञान इस समयके चिकित्सकोंको अवश्य होना चाहिये यद्यपि इस समय डाक्टरीशी प्रधानता सबसे अधिक है परंतु उसका शारीरक युनानीके शारीरकसे बहुत मिलता जुलता है इसका कारण यही प्रतीत होता है कि ग्रीक अर्थात् यूनानी भाषाके चिकित्साग्रन्थोंका अनुवाद इधर तो अोंने अपनी अरवी भाषामें कर लिया है और उपर इन्हीका अनुवाद लैटिनमे किया गया है पर मूल इस विधाके दोही हैं या तो भारतके प्राचीन महर्षि वैद्य अत्रि, भरद्वाज, चरक, धन्वंतरि, सुश्रुत आदि या ग्रीक देश यूनानके विद्वान् हकीम, डाक्टर, सुकरात, वकरात, जालीनूस, अरस्तातालीस, लुकमान वगैरह । कालांतर, मतांतर, देशांतर और प्रतिमांतरसे चाहे १ व्याधिकी औपत्र सैकडों, हजारों भिन्न भिन्न रीतिपर हों पर शारीरक अर्थात् अवयवोंका सविस्तर सत्य विज्ञान निस्संदेह सर्वत्र एकसाही होना चाहिये खैर कुछसी हो, हम अपने पाठकोंको अन्यमतीय शारीरकके संक्षिप्त परिज्ञान हानेके लिये उनके मतका सारा- सार अवश्य लिखना उचित जानते हैं जिनका वैद्योंको विशेष काम पडता है मुख्य उन अवयवोंका संक्षिप्त वर्णन करते है । डाक्टरीमतले संक्षिप्त शारीरक । शिर- (वेन Bian खोपरी यह दो हिस्सोमें बँटी हुई है १ का नाम करनियम है ' दूसरेका नाम अक्सीफीटल बोन" (गुद्दीकी हड्डी) यह टेढी शकलकी हड्डी खोपरीके . tܐ܇ .
. . (७५८) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०। २५० नीचले और पीछले हिस्समें है इसके नीचले और अगले हिम्सके छेदको “फोरमिन मैंगनम" कहते हैं जो खापरीको “इम पाईनल कनाल.' से मिलाता है । "प्राइ- टल बोन" ये दाहिनी और बाई दो हड्डियां हैं इनसे खापरीकी छतका मुकदम हिस्सा बनता है।" प्रांटल बौन " यह खापरीके सामनेकी दीवार बनाती हैं यह माथकी हड्डी है । नेत्रगोलकके किनारेका नाम " आरवीटल आरच" है इसके भीतरी तिहाईकं सूराखको “ फोरमन" कहते हैं । “टिमपारल बोन्स' अर्थात् कनपटीकी हड्डी इसी में कानका छिद्र रहता है। " नोजल, वान्स " (नाककी २ हड्डियां ) ये दोनों मिलकर नाक बनाती हैं। इथमाइड बोन ” यह चलनीकी सकलकी हड्डी है खोपरीके नेत्रमूलक भीतरी भौंके और नाकके गटोंके बनाने में शामिल है। " सुपीरीयर मगजलरी वोन '' (चेहरकी हड्डियां ) ये दो हड्डियां मिलकर चहरेका बड़ा हिस्सा बनाती हैं और ऊपरके कुल दांतोंको सहारती हैं। और सखंततालू और नत्रोंके सहन और नाकके सनिकृष्टका भाग बनाती हैं । “इन- फीरीयर मैगलज बोन" (ठोडीकी हड्डी ) यह चेहरेकी सब हड्डियोंसे मोटी है और मजबूत है इसकी दो शाखें हैं इनमें नीचके दांत लगे हुए हैं सैन्स' या 'नेरास' की हड्डियोंके गार जो तंग सूराखोंके वसीलस नाकके जोफसे मिलत- हैं " मगजिलरी सैन्स" के सूराख वचपनमें छोटे रहते हैं बड़े होनेपर वढ जाते हैं बुढापेमें बहुतही चौडे हाजाते हैं इसीसे बुढापेमें बलगम बहुत गिरता है । भीतर दिमागके दो हिस्से हैं १ बड़ादिमागका हिस्सा, दूसरा छोटा । दिमागका वडा हिस्सा अगली तरफ होता है और छोटा पिछली तरफ इनमें खास्त्रीरंगकी और सुपेद रतूवत रहती है। असपाइनल कार्ड' (तुखा) इसका आकार घोडेकी. दुमकासा है, रंग सुपेद चांदीके तारोंकासा है इसमेंसे सब पट्ठोंकी जडें निकलकर नीचेको जाती हैं यह प्रायः १५ से १८ इंचतक लंबा होता है यह दिमागके पिछले हिस्सेस मिला हुआ होता है शिरमें बहुतस हड्डियोंके जोड, बहुतसे परत और वहुतस पटे, सिराय, कई विभाग, और कई उभार, कई गढे, कई जगेकी कई प्रकारकी द्रव रतूवत हैं सबका समझना बहुत कठिन है इससे कुछ २ सार संक्षिमतासे लिखा गया है । दिमागका अन्य शारीरक अवयवोंसे संबंध । "सरिवरम" (दिमागका अगला हिस्सा) अकल और होश हवाससे संबंध रखता है और इनका मूल है क्योंकि जो अधिक बुद्धिमान् हैं उनका दिमागका यह हिस्सा बड़ा होता है और उनके दिमागके भीतरी गढे गहरे होते हैं, और उनकी "कान वालोशंस (दिमागके भीतरी उमारे ) बडी होती हैं। - 7 १५१ परिशिष्ट-शारीरक भाग १. (७५९) सरिवरमके जरख पहुँचनेस, दव जानसे या इसमें बीमारी होनस प्रथम होश हवासमें फरक आता है " सरिवरममें चोट लगनसे एक या जादा दिमागी कुवतें नष्ट होजाती हैं दिमागकी खाखी रंगकी वस्तुके रोगग्रस्त होनेसे किसी प्रकारका उन्माद होताहै। दिमागको एक दोहरा अवयव समझो जो भाग शरीरके छाती पट आदिसे संबंध रखते हैं दिमागमेंभी पासही पास इकटे रहते हैं और जो अलेहदा हिस्सोंसे संबंध रखते हैं जैसे हाथ पांव तो वे दिमागमेंभी हरतरफ जुदेही रहते हैं। बाई तरफकी तीसरी “कानवालोशन" के पिछले भागमें बोलनेकी शक्ति रह- तीहै इसमें बीमारी हो तो बोलने में तकलीफ हो और दाहिनी रुखका हमेन्मीजिया' (पट्टोंमें रोग) होगा अगर उसमें दोनों तरफ खराबी होजावे तो बोलनेका फालिज होवे सरिवरममें एक हलका संचालन शक्तिका मूल है उसमें खरावी होनेसे फालिन होता है इस हलकेमें तीनं "फ्रांटिल कानवो लोशंसकी जड़ें हैं "ऐसिंडिंग फ्रांटिल" कानवालोशनका ऊपरी तिहाई हिस्सा बाजूसे संबंध रखता है और इसका ऊपरी पैराइटल कानवालोशन हाथ और करजेसे तथा “पोस्टीरो पैराइटल लान्यूल पिंडली और पावसे "ऐसिंडिंग फ्रांटिल" की बीचकी तिहाई और तीसरी"फ्रांटिल" की जड़ चेहरेके पट्ठोंसे “एसिडिंग फ्रांटिल' की नीचली तिहाई मुँह और जवानसे तथा ऊपरी" मांदिल कानवालोशन " और दूसरे फ्रांटिल कानवालोशनकी पिछली तिहाई शिर और नेत्रोंसे संबंध रखती हैं इससे उक्त जगहों में खराबी होनसे उनके संबंधी अवयवोंकी संचालनशक्ति नष्ट होजाती है, जानना चाहिये कि दिमा- गके भीतरी भागकी अगली दो तिहाई शरीरकी संचालनशक्तिसे संबंध रखती हैं और दिमागके भीतरी हिस्सेकी पिछली एक तिहाई स्पर्शशक्तिसे संबंध रखतीहै और पिछले भागका प्रभाव हाथकी अपेक्षा टांगोंपर विशेष हुआ करता है । ऊपर जो संचालनशक्तिका मूल अगली दो तिहाई और स्पर्शशक्तिका मूल पिछली तिहाई कहा उनमें विकार होनसे दूसरी तरफके अवयवोंकी संचालनशक्ति तथा स्पर्शशक्ति नष्ट होती हैं। " मिडल्ला आंवलांगेटा" यह दिमागके अगले भाग और नुखाके बीच में है इससे बड़े २ काम मुंतल्लिक हैं इससे इसमें विकार होना जादा हानिकारक है नुखाके ऊपरीभाग और मिडल्लासे श्वासका संबंध पाया जाता है यदि यह विकृत हो जावे या नष्ट हो जावे तो तत्काल श्वास बंद होकर मृत्यु हो जावे दिलका स्फाय- नाकुंचनसे संबंध रखनेवालेभी दो स्थान हैं एक दिलकी गतिको कम करता है दूसरा गतिको तेज करता है। - “ (७६०) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। सरिवरमका वजन अनुमान मदोंके ४४ औंस होता है और स्त्रियोंके ३९ औंस तथा सरिक्लम ( क्षुद्र मस्तिष्क) का वजन अनुसान मदोंमें ५ औंस ४ ड्राम और स्त्रियों में ४ औंस १२ ड्राम होता है तथा पांस" " और "मिडल्ला आवलोंगेटा" भागका वजन अनुमान पुरुपोंस १५ ड्राम और स्त्रिया में पौने सोलाह ड्राम होता- है दिमागमें खाखी रंगकी जिसे १.३४ और सुपेद रंगकी जिन्स १.१० तथा मनुष्यों के दिमागकी नुखाका वनन अनुमान १ ऑससे पौने दो औसतक होता है हाथी के दिमागका वजन अनुमान ८ स १० पौंडतक पाया गया है और बैलके दिमागका वजन अवमान ५ पाँइके होता है। परलीमिंटरी कनाल (आहार नलका ) Alimentary Canal यह एक लंबी नली है जो मुंहम शुरू होकर “म्यूटीरज" में खतम होती है खाया हुआ भोजन इसीमें जाता है, इसी में पकता है, इसीसे मल होकर निकल जाता- है, भोजनका परिपाक इसीपर सनहसर है या उन गद्दोंपर जिसकी रतूबत इस नाली में गिरती है मरी (कंठनलका) और येदा ( आमाशय) तथा अमआ ( अंतड़ियां ) ये सब इमीक भाग हैं यह सब ३० फुटके अनुमान लंबी होती है । इसाफेगल (मरी या कंठनलका ) (Esophagus. कंठनलकाको अंग्रेनीम " इसाफेगस्त" कहते हैं यह गरदन के पांचवें मोहरे के मुकाबिल नरम लालू के नीचे गुरू होती है और छातीके बीचकी हड्डी (कौडी) के पास भेदेके जुहस ना मिली है इसकी लंबाई ९ । १० इंच है यह एलीमिटरी कनालके भागोंमेले तंग भाग है यह ठीक सीधी नीचेको नहीं उतरती है किंतु इसमें थोडे २ तीन खम पाये जाते है इसके आसपाल “यूमोगास्टिक " आसाव ( पट्टे ) फैले रहते हैं और नीचे सिरेके पास “ प्लूरा" है भोजन इसी नली में होकर मैदमें जाता है। इल्टमक (मेदा या आनाशय) Stomach आमाशय अर्थान् मैदको अंग्रेजीमें “ इस्टमक" कहते हैं यह इसाफेगस अर्थात् ठनल से नीच "एलीमंटरी कनाल का चौडा भाग है भोजन इसमें कुछ ठहरता- है और इस जगेकी रतूवत "गैस्ट्रकजृम्स में से मिलकर पतला द्रव पदार्थ बन जाता है यह मेला दासवर्स कोलन'अंतडीस ऊपर पेटकी अगली दीवारके पछि जिगरसे नीचे है आकारमं मुराहीके समान नीचे चौडा है इसका वायाँ शिरा बडा और नीचको झुका हुआ है मेदेकी लंबाई अनुमान १०।१२इंच है और चौडाई साडे चार इंच है साली मैदका वजन अनुमान ४॥ ऑसके होता है जिस झिल्लीसे यह मॅा है वह चार परतवाली है सबसे भीतरी परत जसकोट (एक नरम हमवार- - + १५३ परिशिष्ट शारीरक-भाग १. (७६१) मोटी झिल्ली) है यह झिल्ली बुढापेमें पतली पड़जाती है जब मेदा खाली होता इस में शिकन (सलवटें ) पडजाती हैं मेदेके दो मुँह होते हैं एक ऊपरको जिसमें कंठनलका खुलती है और भोजन मेदमें आता है । दूसरा दाहिनी तरफ नीचेको जिसके राहसे भोजन अथ पकासा अंतडियों में जाता है। इसमालइंटीस्टाइंस ( पतली अंतडियां) Small Intestines ये पतली पेंचीदा अंतड़ियां हैं मेदेके नीचले मुँहसे शुरू होकर पेटके डीचले भागमें रहती हैं इनकी लंबाई अनुमान २० फुटकी है ये लच्छासा बनाये हुए हैं यह लच्छा एक बडी मोटी आंतसे घिरा है यह लच्छोंकी आंतें तीन भागमें बँटी हैं जिसमें सबसे ऊपरी भागको जो १० । १२ इंच है डिओडिमन कहते हैं वाकीका दो वटे पांच भाग: जिन्यूनम कहलाता है और नीचेवाले तीन बटे पांच भाग: को एलीअम कहते हैं। लार्ज इंटिस्टाइंस (मोटी आंतें) Larg's Intestines ये एलीअनसे शुरू होती हैं इसके बडे तीन भाग हैं प्रथम “सीकम' दूसरा कोलन" तीसरा “रिकटम" इसकी मुटाई २॥ इंचसे १॥ इंचतक पाई जाती- है इसमें लंबे देशोंके तीन बंधसे पाये जाते हैं तथा बहुतसे फुलाव और तंगियां हैं जिससे ऐसा मालूम होता है जैसे कई थैलियाँ जुड़ी हों। सीकम" यह एलीअमसे नीच है और सबसे चौडा भाग है जिसकी चौडाई २॥ इंच है और पेटकी अगली दीवार के पीछे रहता है इसके नीचले पीछेके सिरेसे १ तंग गोल लंबी आंतडी निकली है जिसे “एपिडक्स सीसाई ” कहते हैं यह छोटी अंगुलीसा गोल है और तीनसे छः इंचतक लंबा होता है खास सीकय और एसिडिंग कोलनके मिलापपर एक किवाडीसी है जो मलको फिर अंदरकी तरफ (एलीअमकी तरफ) नहीं जाने देती। एसिंडिंग कोलन '' यह दाहिनी तरफ है खास सीकमसे शुरू होकर सीधी ऊपरको चढ़कर जिगरके सिरेतक पहुँचती है फिर सामने और वाई तरफ दाहिने गुरदेके पास झक जाती है यह खास सीकमसे कुछ पतली है पर "ट्रांसवर्सकोलन" से चौडी है इसके सामने एलिअमके लच्छे हैं। "ट्रांसवर्स कोलन" यह भाग दाहिने गुरदेके पाससे शुरू है पेटकी पिछली दीवारके पास आड़ा रहता है बायें गुरदेतक महराक्सा बनकर आता है इसके ऊपर जिगरका नीचला शिरा गालल्वाडर मेदा और तिल्लीका नीचला हिरसा रहता है इसके नीचे एलिआमके पेंचदार लच्छे हैं।
(७६२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १५४ "डिसंडिंग कोलन" यह ट्रांसवर्सकोलनसे शुरू होकर यकायक नीचेको झुक आती है यह बाई तरफ रहती है। "रिकटम' रोदामुस्तकीम यह सबसे नीचे का भाग है यह पहले बाईं तरफते जरा दाहिनी तरफ झुककर टेढा होकर फिर अनुमान सीधासा नीचे उतर आताहै और गुदातक पहुँचता है इसमेंभी थोडे २तीन खम पाये जाते हैं इसके बीचके खमके मुकाविल भोंके मसाना और स्त्रियोंके " यूट्रस" योनि गर्भाशयद्वार होता है इसमें मल भर जाता है तब दस्तकी हाजत होती है । श्वाससंबंधी अवयव लेरिंक्स (हंजरा) यह श्वासके रास्तोंका ऊपरी भाग है इसकी लंबाई १॥ इंच और चौडाई १ इंच है मुँह और नाकसे इसमें हवा पहुँचती है और आवाज (शब्द) पैदा करती है यह गरदनके ऊपरी भागके अगली तरफ है. यह नरम तालूके नीचेसे आहार नलकासे पृथक् होतीहै इसके नीचे एक और खम है जो इससे कुछ चौडा है इसके नीचे कई कुर्रियां सीधी खमदार हैं और कई गदुद हैं इसके नीचे ट्रेकिया है । ट्रेकिया यह दोनों फेफडोंमें हवा जानेका रास्ता है और लेरिंक्स (हजरे ) से शुरू होकर दो भागोंमें दाहिने और बाँयें वरांकसमें वटजाता है इसकी लंबाई साढे चार इंच और चौडाई पौन इंच है इसके पिछली तरफ इसाफेगस आहारनलका. अर्थात् मरी अलेहदा है। लंग्स (फेफडे Langs) फेफड़े दो हैं और दिल ( हत्कमल) के और बड़े अरूकके दाहिनी और बाई तरफ सीनेके अंदर रहते हैं और ऊपरसे दोनों जुड़े हुए हैं पर नीचे जुदे जुदे होगयेहैं ऊपरको जहां ये जुडे हैं वहां "प्लूरा" नामक दो बंधसरिस (थैलियां) सीनेके दाहिनी और बांई पहलुओंके अंदर रहतीहैं हरेक फेफडा सूरतमें मक्खीके छतेकी तरहका ऊपरसे चौडा नीचे तंग होता गयाहै इसका वजन अनुमान ३० से ४८ औसतक पाया जाताहै दोनों फेफडोंमेंसे दाहिना कुछ बडा होताहै अगर दोनों ४२ औस हों तो दाहिना २२ और बांयां २० औंस समझिये फेफडे रिपज जैसे फोफलेहैं इनमें फैलाव सुकडाव बहुत है वचपनमें फेफडे हलके सुर्ख गुलाबी खूनके झागसे होतेहै पर ज्यों २ उमर वतीहै इनमें स्याही आती जाती है श्वासकी हवा इनमें दाखिल होकर दिलको लताफत पहुंचातीहै और जब वह अंदरकी हवा गरम और गलीज होजातीहै तब बाहर निकलनेपर तगाजा करतीहै और उसकी जगह और ताजी हवाकी जरूरत पडतीहै इसी प्रकार वायुका आना और जाना लगातार बना रहताहै और यही जिंदगीका मूल है ।
१५५ L परिशिष्ट शारीरक-भाग १. (७६३) (हार्ट दिल) Ileart यह दोनों फेफडोंके बीच सीनमें रहता है "प्रीका डियम" नामक गशा ( झिल्ली) से ढका हुआ है यह झिल्ली दिलसे २॥ २॥ इंचके फासले तक दिलक वंड अरूकको ढके हुए है दिल सीनेके बीच जरा बांई तरफ झुकाहुआ यूं रहता- है कि वाई तरफ ३ इंच और दाहिनी तरफ १॥ इंच । दिलके गिरद वहुतसी नालियां हैं जिनमें इसके परवरश करनेवाले आसाव (पढे) आदि हैं। इनके सिवाय और बहुत शिरायें इसमें शामिल होती हैं दिलके “विंट्रीकल में दो सुराख पाये जाते है और इनपर किवाडियांसी पाई जाती हैं ये किवाडियां. दम बदम खुलती मिचती रहती हैं इनके राह दिलमें खून आता जाता है जिगरसे ताजा खून दिलमें पहुँचकर और अवयवोंमें यहांहीसे पहुँचता है दिल एक लंबी. लकीरसे दो भागमें वटा है एक दाहिना भाग दूसरा बायां फिर एक आडी लकीरसे इसके दो हिस्से हुए हैं इनमेंसे ऊपरवालेको “आरीकल" और नीचेवाले खानेको विंट्रीकल " कहते हैं । दिलका वेस खूनी अरूकसे जुड़ा हुआ है बाकी "प्रीका- डियम" में लटका हुआसा है । स्वस्थ मनुष्यका दिल ५ इंच लंबा और ३॥ साढे तीन इंच चौड़ा और ढाई इंच मोटा होता है । वजन अनुमान १० औस और स्त्रीका ९ औंस होता है यह शरीरके १६० वें भागके समान होता है " रायट आरीक्युलो विट्री क्यूलर आरी फस " यह सूराख " सटरनम सटरनम "के पीछे उस लकीरपर है जोकि चौथी पस-- लियोंकी कुरियों और सटरनमके जोडके नीचले किनारेपर खिचती है पलमोनरी शिरयानकी किवाडियां संटरनमके पास दूसरी और तीसरी चांई पसलियोंकी कुरि- योंके मध्यके पीछे हैं-"आया " की किवाडियां सबरनम और उसके बाय: किनारेके पीछे तीसरी पसलीकी कुरीको मिलायके मुकाबिल हैं। पलमोनरी सूराख दिलके कुल दरवाजोसे ऊँचा और सामने है-“ आयार्टिक " सूराख पलमोनरी शिरयानके सूराखके पीछे और जरा नीचे है। लिवर (जिगर) Liver, इसमें “ वाइल" ( पित्त ) पैदा होता है और यह खनको, बनाता और साफ करता है जिगरकी लंबाई दाहिनेसे बायें सिरेतक १० या १२ इंच और चौडाई पिछले किनारसे अगलेतक ६ । ७ इंच और मुटाई अनुमान साढे तीन इंचके होती- है इसका घनात्मक अनुमान कुल १०० इंच धनके होताहै वजन ५० से ६० औंसं तक पाया जाता है यह वास्तवमें कुल देहके ३६ छत्तीसवें भागके बराबर होता है यह ठोस है इसका रंग भूरा सुरखी लिये होता है इसका ऊपरला भाग चिकना और लजलजासा होता है और “प्रोटोनियम" झिल्लीसे ढका हुआ है " फालसी (७६४) हुश्रुतसंहिता-भा. टी०। १५६ 'फारम " नामक झिल्लीसे इसके दो विभाग जुडे हुए होते हैं नीचेकी तरफ इसमें ५ " लीव" और फिशर ( अंकुर ) होते हैं जिगरका स्थान मेदेके ऊपर दाहिनी तरफ छठी सातवीं बसलीके मुकाबिल है जब मनुष्य सीधा बैठता या खड़ा होता- है तो जिगरका कुछ भाग पॅसलियोंसे नीचे भी आजाता है पर लेटनेके समय, अनुमान एक इंच ऊपरही रहता है। गाल ब्लेडर (पित्ता मरारा) Gall bladder, यह नासपाती नुमा थैली तीन चार इंच लंबी और डेढ इंच चौडी होती है इसमें आठसे १२ ड्रामतक सफरा जमा रहता है यह जिगरके दाहिने लोथडेके नीचेवाली जगहपर तिरछी रहती है इसके नीचेकी भूमिपर “ प्रोटोनियम," ठका हुआ है जिस जगह गालव्लेडर रहता है उस गढेको " फारसा सिसटिक फिली" कहते हैं इसका स्थान दशवी दाहिनी पँसलीकी नोकके मुकाबिलसे शुरू होता है और एटकी भीतरी त्वचासे आ मिलता है इसके नीचे "द्रासवर्स कोलन" नामक आंत है इसकी गरदन दुहरा सम खाकर नीचेको झुककर “सिप्साटिक डैक्ट " में मिलती है यह "सिसटिक डैक्ट अनुमान डेढ इंच लम्बी है नीचे वांई तरफ जाकर "हियादिक डैक्ट " से मिलकर “ कामन वाइल डेक्ट " बनाता है यह तीन लाइन चौडा और तीन इंच लंबा है यही सफरा (पित्त) को " डियोडा- मनमें पहुँचाता है और जब आंतोंमें लारकी जरूरत नहीं होती तब सफा हियाटक डैक्ट" से " सिसटिक डैक्ट" में जाकर “ गाल ब्लेडर" में पहुँच कर वहांही जमा रहता है और जब हाजमेके समय आंतोमें सफरा (पित्त) की जरूरत होती है तो "सिसटिक डेक्ट ' की राहसे निकलकर वहां दाखिल होताहै। हिपलीन (तिल्ली) Spleen. यह नरल लजलना अवयव है इसका रंग नीला बैगनी खाखीला है यह खूनके दुरुस्त करने और " कारपसफिल्स " के बनानेमें काम आती है इसका आकार अंडाकृति है यह पेट में वाई तरफ मेदके पास खडीसी रहती है स्थान इसका नवीं, दशवी, ग्यारहवी पँसलियोंके सुकाबिल है इसका प्रमाण सबके एकसा नहीं होता पर सामान्यतः पांच इंच लम्बी, चार इंच चौडी और डेढ इंच मोटी होती है जन पांचस सात औसतक होता है पर किसी किसीके इतनी बढ़ जाती है कि १८ १२० पौंइतक होजाती है । पोशास (लवलवा) Pancreas यह एक पतली लंबी विपरी गद पेमें मेदेके पीछे पहले लंवरके मोहरेके सामागिल आही पड़ी रहती है इसका वायां तंग सिंग तिल्ली मिलाहुआ रहता है . परिशिष्ट शारीरक-भाग १ (७६२) इसकी लंबाई छहसे ८ इंवतक होती है और चौडाई डेढ इंच तथा मुटाई - एक इंवके अनुमान होती है और वजन इसका ढाईसे साढे तीन औंसतक होता है इसमें जो रतृवत होती है उसे “पैनकिरयाटक जूस " कहते हैं यह रतूवत साफ होती है और इसमें सारकी तंजावी कैफियत होतीहै यह हाजमेको ठीक और तेज करतीहै । यूरेनरी आरगंस (मृत्रसंबंधी अवयव) किडनी (गुरदे) Kilney. गुरदोंमे पेशाय पैदा होताहै और "यूरेटर" की राह मसाने आकर जमा रहता- है और उसमें 'स्थरा' के जरिये निकलताहै ॥ गुरदे दो हैं एक दाहिनी तरफ दूसरा बांई तरफ है हरएक " वर्टिवर्लकालम के एक तरफ “प्रोटोनियम के पीछे पेट में गहरा रहताहै यद्यपि गुरदोंका प्रमाण सबके बराबर नहीं होता परंतु अनुमानले हरेक गुरदा, चार इंच लंबा, ढाई इंच, चौड़ा और सवा डेढ इंच मोटा होताहै। बांयां गुरदाजरा लंबा और पतला होताहै और दाहिना जरा छोटा और चौडा होताहै । हरेक गुरदेका वजन मकि साढे चार औंसक अनुमान होताहै और स्त्रियोंके इससे कुछ कम । दाहिना गुरदा जिग- रकी नजदीकीके सवव बॉयेसे कुछेक नीचे है गुरदोंका रंग गहरा सुरख होताहै और आकार जरा उभरा हुवासा चिपटाहै दाहिने तरफ गुरदेके सामने "डिओडियम ।' और " एसिडिगोलन" है और वॉर्ड तरफके गुरदेके पास “डीसिंडिगकोलन" है और दाहिन गुरदेका ऊपरी अगला भाग जिगरके नीचले भागके निकट है और बॉयेंका ऊपरी अगला हिस्सा तिल्लीके पास है ॥ यूरेटर हालवां (मूत्रकी २ नालियां) ये दो नालियां चौदहसे सोलह इंचतक लंधी और परकी कलमजैसी मोटी होतीह ये गुरदास मूत्रको मसाने में पहुँचातीहैं और तिरछे तौरसे मसानेकी दिवारों में थोडी दूर जाकर उसके पिछले और नीचले हिरसेमें खुलती हैं । यूरेनरी ब्लेडर (मसाना) Bladder. यह एक खोखली झिल्लीकी थैलीसी है इसके अंदर सूत्र जमा होताहे यह बच- पनमें गावदुम होताहै और पेटम नाफके नीचे रहताहै । मसानेकी शकल खाली तथा भरे होने आदिमें एकसी नहीं होती यह खाली तिकोनासा होताहै और जब मूत्रसे भरताहै तो गोल होजाताहै और जब खूब जादा भर जाताहै तब अंडेकी सूरत होजाता और तन जाताहै और पेटमें ऊपरको चढताहै और इसका वडा सिरा स्त्रियोंके "वैजाइना" और सरदोके "रेकटस" अंतडीपर ठहरताहै । सामा न्यतासे सूत्रका अनुमान २४ घंटेमें ४० से ५० औंसतक होताहै पर गरमीकी ऋतु में (७६६) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० ॥ १५८ पसीना अधिक आनेस मूत्र कुछ कम होताहै। मूत्रके रासायनिक भाग यूं हैं कि एक हजारमें ९३३ भाग पानी और ६७ भाग सकील चीजें, और उन सकील चीजोंके सौ १०० भागोंमेंसे यूरिया ४९.६८ यूरकएसिड १.६१ एमो नायाकल साल्टस (एक नमक ) और कलाएइड सोडियमसजी .२८.९५ एलके लायन सलफेट ११.५८ एलकेलायन पासफेट ५.९५ मासफेटलाइम (चूना) और मेगनेशिया १.५० भाग होतेहैं। पैनिस (लिंग) और मूत्रनलका यूरेथरा Pncis. मूत्रनाली (यूरेथरा) यह मसानेकी गरदनसे शुरू होकर लिंगके सिरेतक पहुँ- चतीहै इसकी लंबाई अनुमान साढे आठ इंचके होतीहै मोकेके अनुसार इसके तीन भाग हैं १ “प्रासटेटिक ” यह हिस्सा इस नालीका सबसे चौडा भाग है यह सवा इंच लंबा और चार पांच लकीरके बरावर चौडा है इसमें एकथोडासा निचाव है जिसे " प्रासटोटिक साइस" कहतेहैं जिसमें “ परासटेटिकडेकटस" के बहुतसे छेद खुलतेहैं । २ भाग "पोरशन' यह हिस्सा "प्रासटोटिक" से पीछे स्पंजी पोर- शनके बीच में है इसकी अगली दीवार पौन इंच और पिछली आध इंच लंबी है यह हिस्सा कुछ यूरेथरासे तंग है इसकी गोलाई सिरफ आध इंचके लगभग है । ३ माग " स्पंजी पोरशन '' यह भाग अनुमान ६ इंच लंबा है यूरेथराका मुँह एक खडा फटाव है, २॥ से तीन लकीर चौडाऔर स्पंजी हिस्सेका सबसे तंग मुकाम है। टिसटीकिल्स (अंडकोश खुसिया) Testicles. दोनों दिसटीकिल्स ( अंड)" इस करोटम" थैलियोंमें तिरछेसे लटकते हैं बायाँ दाहिनेकी अपेक्षा कुछ नीचा होताहै इनकी सूरत अंडेकीसी है हरेक अनुमान डेढ इंच लंबा और चौडा सवा इंच और मोटा १इंच होताहै वजन अनुमान हरेकका पौन औंससे १ औसतक होताहै खुसियेका गद नरम जरद सुरखी मायल है बहुतसे छोटे २ गावदुम लोथडोंसे बना है ये लोथडे संख्यामें ढाई सौसे चारसौ तक होतेहैं इनमें मनी पैदा होतीहै और याद रहे कि खुसिये स्त्रियोंके भी होतेहैं. पर अंदरको होते हैं । यूटरस (गर्भाशय रहम ) Uteurs. यह एक खोखला नासपातीनुमा अवयव है यह सामनेसे पीछेको चपटा है इसके आगे मसाना और पीछे "रेकटम" अंतडी है हमल (गर्भ ) के समय यह पेटके तरफ चढ जाताहै इसके दो हिस्से हैं जिसमें पिछले चौडेको “वोडी" अगले तंग हिस्सेको इसकी गरदन कहते हैं हमलके विना जवान औरतका यूटरस अनुमान इंच लंबा २ इंच चौडा और १ इंच मोटा होताहै यह एक झिल्लीसे बना है जिसमें १ फैलने और सुकडनेकी शक्ति है। .
. L- १५९ परिशिष्ट शारीरक-नाग १. (७६७) अरिथमोंकी संख्या। यद्यपि डाक्टरी मतसे मनुष्योंकी भिन्नभिन्न अवस्थाओंमें अस्थियोंकी संख्या भिन्न भिन्न होतीहै आरंभमें कई हड्डियां भिन्न २ होतीहैं और पीछे जुडकर एक हो- जातीहै परंतु मध्यम अवस्थामें हड्डियों की संख्या इस प्रकार है "इस्पाइनेलकालिम" ( पृष्ठवंश) में २४ हड्डियां मोहरेहैं एक "सेक्रम" (वंशाधः) और एक "काक- सिक्स' (उससेभी नीचे ) कुल २६ ये हुई और खोपरीमें ८ और चेहरेमें १४ हड्डियाँ हैं पसलियां बारह जोडे अर्थात् २४ हैं और एक “सटरनम" (छातीकी हड्डी ) एक “हाय आयडबोन" ये कुल २६ हुई और "सुपिरीयर एक्स दीमिटीज" ( दोनों हाथों) में ६४ हड्डिया हैं और इनसीरियर एक्सट्रीमिटीज" (नीचे दोनों पावों) में ६२ हडियां हैं ये सब मिलकर २०० हड्डियां हुई इनके सिवाय ३२ दांत और तीन २ छोटी हड्डियां हरेक कानमेंसे ६ ये और ८ "सिस्माइड" (अंगूठे . आदिके मूल) में छोटी मटरसी हड्डियां हैं तो ४६ ये हुई इनको मिलानसे मनुष्यके शरीरमें सब हड्डियां २४६ पाई जातीहैं ।। (वक्तव्य) इसमें यह है कि हड्डियोंकी संख्या जो ऊपर लिखी है वह पूर्ण नहीं क्योंकि जैसे ऊपरकी संख्या में “सेक्रम" और "काकसक्स" और "सटरनम" में एक एक हड्डी कही परंतु सेक्रममें ५ काकसक्समें ४ और सटरनममें ६ हडियां जुड़ी हैं इससे शरीरमें हड्डियां अधिक मालूम देती हैं जैसे वैद्यकमें हड्डियां लिखी, वे अयोग्य नही सिद्ध होती। शरीरकी त्वचा। डाक्टरी मतसे त्वचा (चर्म) के मुख्य दो भाग हैं उनमें नीचेवाले भागको "डर- मिस' कहतेहैं और ऊपरवालेको 'एपीडरमिस' अथवा "क्यूटिकिल" कहतेहें फिर इनमें प्रत्येकके दो दो भाग हैं क्यूटीकिलमें नीचेके भागमें छोटे २ मृदुकोष्ठोंकी परत है जो रुधिरसे बनताहै और ऊपरके भागमें वेही पुराने होकर ऊपर आजाते हैं और कडे होजातेहैं और झडजातेहैं और डरमिसके दो भागोंमेंसे ऊपरके परतमें नसें फैली हैं तथा नीचेके परतभी नसोंका जाल है क्यूटीकिलकी मुटाई नरम स्थानमें एक इंचका २४० वांभाग और दृढस्थानोंमें २४वा तथा १२ वांभाग है पसीनेके निकल- नेके छेद सब देहपर अनुमान तीस लाखके हैं । "सेकरम्" पृष्ठवंशसे नीचेके भागको कहते हैं वास्तवमें इसमे ५ हड्डिया (मोहरे) जुड़े हुए होते हैं इन्हें डाक्टर एक मानते हैं । “काकसिक्स" यह त्रिकके पास पृष्टवंशका सबसे नीचला भाग है इसमें वास्तवमें ४ हडिया परस्पर जुड़ी हैं "सटरनम" यह छातीके बीचकी हड्डी है वास्तवमें इसमें ६ जोड है जो प्रथम अवस्याम जुदे २ होते हैं और अवस्था बढनेपर जुडकर एक प्रतीत होता है (देखो अनाटमी और फोजिलोजी) "क्यूटोकिल" मुख्य बाह्य चर्म है यह इपीथीलीयमके चपटे कीसोंके कई एक परतोंके चाहम मिलनेसे बनाई (देखो अनाटमी) ॥
डाक्टरीमतसे संक्षिप्त रोग गणना। TAIN T करटन फीवर- इंटरमेटिंट फीवर-वारीका शीतज्वर. संफेलिलजिया-शिरका दर्द, कलडसहिस्ट्री-मूका मस्तकाल. कोटी डेइन-नित्य वढनेवाला. हेमेक्रीमिया-आधाशीशी. टरशन फीवर-तीसरे दिनका तप. चौथे दिनका तप. वरटीगी-शिरोरोग. (चातुर्थिक) दिमागके परदोंमें संतत ज्वर जो वरा- इनक फलाइटिस र सुजन, गरमीरे रीमीटें फीवर शिर दद. वर चढाही रहे. न्यूरेलजिया-पट्टोका दर्द. कंटीन्यूड फीवर-गरमीका तप. साईटीका-रांगन वायु. टेंगोफीवर-एक मांतिका वातज्वर. यह योरपका तप है. पेरालसिस-शून्य वायु. यालोफीवर एक भांतिका सन्निपात. हेमेप्लेजिया-अर्धागवायु. पेरा प्लेजिया-ऊरुस्तंभ. टाइफस कीवर-संधिक. यह जांतविक फेशियल ऐरालिसेल-अर्दितवायु. टाइफाइड फीवर-दुर्गधसे होताहै. कोरिया-कंपवायु. यह कहतमें खराब अन्न टिटनिल-धनुषवायु. फीमन फीवर खान आदिसे होताहै. इनसानिटी-उन्माद. हेकटिक फीवर-जीर्णज्वर तपेदिक. | एड्यूसी-मंदबुद्धिता. इनफनटाइल फीवर-आमज्वर. डेमनशिया-कमी २ वेसुध होना. पाइए निया-दुष्टरक्तवर. मेलन छोलिया-वहन. प्योरपेलर कीवर-प्रसूतज्वर. मेनिया-पूर्ण उन्माद. आस्मालपाक्स-शीतला-चेचक. डिलीरयनस्ट्रीमत-सिड, मलाप. चिकनपाक्ल-सरा. पलपेटीशन-रूफगान. रोव्योला-बहीन सतरा. प्पेलेपली-मृगी. स्कारलेटीना-मोतीज्वर. केलेपली-लूछी. किंठमाला, ग्रंथी, इस्कर रामूला लेरंजा इटिज-यातपित्तवर. मलूटोस खून आना. केटार-बातकावर. इस्करबी-मुंहमें वरक्तदोप. रोमाटेजम-गठिया, अंश्विात. इनसलो इंसा-झपावर, जुखाम. आइना तलकावास मारवयोलर रोमाटे) एक भांतिकी इमाईती-था. जम. गठिया. होपिंगकाश-जुली खांसी.
हवा भरनेसे
परिशिष्ट शारीरक-भाग १.
न्यूमोनिया-उरक्षित.
किडनी-क रोग ( गुरदेकी) व्याधि.
थाइसिसपिल-
क्षयी-राजयक्ष्मा.
हेमाटोरिया-पित्तकृच्छ्र (सोजाक ).
मेरा नेलस-
जायावेटियर-बहुमूत्र.
मापटेसिस-मुँहसे खून आना. इस्परमीटोरिया-प्रमेह.
प्लोराइटिस(प्लूरिसी)-पांसूका दद डिसमेनोरिया-नष्टार्तव स्त्रीरोग.
हाइटरोथीरेक्स-छाती दुखे तप शोथ. एपेथीलेडोमा-प्रदर.
पेरोरिलजिया-रक्तप्रदर.
प्लारामें
न्यूमो थोरिक्स-
श्वास हो और दर्द. ल्यूकोरिया-श्वेतप्रदर.
स्टोमेटाइटिस-मुखपाक बालरोग.
इनपोटंस-नपुंसकता.
पेरोटाइटिस-कनफेड.
हिमरोइड-बवासीर.
ट्रांसीलाइटिस-जिह्वक.
पेलेयोरा-रक्तवृद्धिविकार.
केजशचन औफदीइस्टमक-रक्तपित्त
एनेमिया-रक्तक्षयविकार.
इनफलामेशन-शोथ (सूजन)
मेलेना-अधोगत रक्तपित्त.
एरीसिफलिस-विसर्प.
हेमाटेमेसस-ऊर्ध्वगत रक्तपित्त.
सिफलिस-उपदंश आतशक.
गैसट्राइटस-पेटका दर्द मेदेमें हो.
प्रोराईगी-सूखी खाज.
इलसर औफदीस्टमक-परिणामशूल स्कवेज-गीली खुजली.
वर्मस-कृमि पेटमें हो.
वाइटीलेगो-श्वेतकष्ठ.
कालरा-विसूची ( हैजा).
हरपीज-दाद (ददु)
डिसेंटरी-मोडें निवाही.
लेपरा-कुष्ठ.
डायारया-अतिसार.
एलोपीसिया-गंज.
कान्सटीपेशन-करजीयत.
औटोलजिया-कानका दर्द.
डिसपेपसिया-अजीर्ण.
व्यूबो-बद.
कालक-कुलंजका दर्द.
कलवलशन-ऐंठन (तशनुज).
पेरेटोनाइटिस-बंध पडजाना. यहांपर संक्षेपसे रोगोंके कुछ नाम
टवोवर क्योलर-
मात्र लिखे हैं विशेष वर्णन थोडा २ उन
परीटोनाइटिस-
उदररोग.
रोगोंके प्रकरणमें देखिये । अथवा इन रो-
आसाइटिस (ड्राप्सी) जलोदर.
गोका निदान, लक्षण, उपाय आदि विशेष
हेमेटाईटिस-यकृत् रोग.
वर्णन हमारे डाक्टरी चिकित्सासार
एकटेरिस-पांडु (पीलिया). नामक पुस्तकमें देखिये जिसमें डाक्टरी
इनलार्जमेंट ऑफ
दीस्पिलीन
प्लीहवृद्धि(तिल्ली) और देशी दोनो भांतिसे रोगोंके नामादि हैं।
॥ इति परिशिष्ट शारीरक भाग ॥१॥
॥ श्रीः॥ यूनानीमतसे संक्षिप्त शारीरक । परिशिष्ट भाग २. शिर। यह त्वचा, अस्थि, मांस और तिल्ली तथा मस्तिष्क मन्ना और उसके ऊपरका वष्टन और शिराओं और पेशियों पट्ठसि वनाहुआ है इसमें सात हड्डियां हैं इसमें मुख्य मस्तिष्क मन्ना जो नरम सुपेद लजलजा है यह सब पट्टों और रहनफसा- नीका (इंद्रियज्ञानका ) मूल है इससे रगें और पट्ट निकलकर शाखाओंकी तरह फैल हैं इसके तीन भाग है उनमें नीचेका भाग चौड़ा और बीचका उससे कम और ऊपरका छोटा है इनमें नीचे का भाग नरम है इस हेतुस कि यह ज्ञानेंद्रियोंकी म्नायु- वोंका मूल है और ऊपरका माग कठिन इस हेतुसे है कि वह आकुंचन, प्रसारण आदि क्रियाजनक पट्ठोंका मूल है। इसके भाग इस भांति समझिये कि, जुटी तालूके ऊपरका भाग प्रथम और शिखाके स्थानके नीचे तृतीय भाग और वीचमें मध्यभाग,मध्यभागके नीचे झरनासा है जिसे "यासरा" कहते हैं मूर्दाका मल वहांसे एकत्र होकर तालमें आताहै ।। "नुखा" अर्थात् मस्तिष्क मजाका मूल है जिसे मगजहराम कहते हैं इससे ईश्वरने दो मुहरे तो इस प्रकारके निकाले हैं कि उनसे दो पट्टे निकले हैं जिनमें एक दाहिने मुहरेसे और एक बायें मुहरेसे परंतु "अस अस' नामी मुहरेसे जो नीचे है उससे १ अकेला पट्ठा निकला है और इन पट्टोंमेंसे शाखायें होकर हरेक अंग, प्रत्यंगमें जा मिले हैं "असव' (पट्ट) दो प्रकारके हैं प्रथमवे जो दिमाग (मस्तिष्क) से उगे हैं वे सात जोड हैं चेहरेसे ऊपरकी ज्ञानेंद्रियोंकी प्रवृत्ति और धारणाशक्ति प्रतिभा आदिक इन्हीसे प्राप्त होती हैं। दूसरे प्रकारके पढे वे जो "नुखा" से उगे हैं जो २१ जोड हैं और १ अकेला है ग्रीवासे नीचेके शरीरमें आकुंचन, प्रसारणादि और स्पर्शशक्ति इन्हीसे प्राप्त होती है । गशा" (झिल्ली) एक नरम वेष्टन (त्वचा) सी होती है इसका प्रयोजन यह है कि आंतर्य अवयवकी रक्षा करे और जिन अवयवोंमें स्पर्शशक्ति नहीं होती उनमें स्पर्शशक्ति पहुँचावे । सिरमें ५ गशा हैं जिनमें १ कहफ (दिमागकी छत्त) के वाहर है और दूसरी उसके अंदर है तीसरी जोहरदिमाग मस्तिष्क मज्जाकेगिरद है यह सलवटदार है और दो गशा दिमागके नीचे पीछेको है ॥ " - १६३ परिशिष्ट शारीरक-भाग २. (७७१) यूनानी मतसे शिरसे पैदा होनेवाले रोग इस प्रकार हैं-१ शिरका दर्द, २ सर- साम (जिसमें दिमागके परदोंमें शोथ होता है और प्रलाप, भ्रमादि अनेक उपद होते हैं), ३ माशरा (वाहर मस्तककी तरफ शोथ होना), ४ चक्कर और आंखों अगाडी अँधेरी आना, ५ अतिनिद्रा, ६ निद्रानाश, ७ निद्रा उछट उछटकर आना, ८ जमूद (मीका भेद ), ९ भूल, १० वहम, सिड, ११ अत्युन्माद, १२ प्रलाप, १३ मूर्खता, १४ धत (किसी बातकी घत लगजाना) या जिद, १५ सोतेमें चमकना दवजाना, १६ अपस्मार-मृगी, १७ मूछी, १८ फालज (स्पर्शशक्तिका नाश होना) सुन्न पडजाना अंगका, १९ तशें नुज (ऐंठाव), २० तमहुद (हनुग्रह), २१ राशा (कंप), २२ सुस्ती, २३ लकवा (मुँहकाए या आधा शरीर सुन्न पड़जाना टेढ़ा हो जाना), २४ स्फुरण, २५ आंखें लाल रहना जादा अंगडाइयां आना, २६ नजला (जुकाम ), २७ भौंका दर्द, २८ सर खुजलाना ॥ (देखो तिब्ब अकबर) नेत्र ( चशम) यह आजाय शरीफामेंसे है नेत्रोंमें ७ परदे अर्थात् ७ पटल हैं और तीन रतूबत हैं आंखकी प्रकृति गरम तर है इसमें पट्टे और फरकनेवाली तथा स्थिर शिरायें हैं पहले तबकेका नाम "मुलतमा' है यह सबसे बाहरकी तरफ है । दूसरा “करः निया है इसमें वास्तविक काई रंग नहीं है वही रंग नजर आता है जो इसके नीचेके तरकोंमें है। तीसरा तबका “ अंविया " है और यह किसीकी आंखमें स्याह रंगका है किसीकी आंखमें जरदी मापल है और इसीके बाद रतूबत बैजिया है जो तीन रतूबतोंमेंसे १ है और यह अंडे के तुल्य सुपेद है । चौथा तबका “अंक- बुतिया है यह मकडीके जालेसा है और इसके पीछे दूसरी रतूबत जलीदपा है जो साफ वरफ जैसी है और इसके बाद रतूबत जनाजी है जो आवगीनेसी है। पांचवां तवका “शवकिया" है इसमें जालसा पुरा है । छठा तबका “मशीमिया" है यह बच्च दानसा है और सारी आंखपर छाया रहता है। सातवां तवका “सल- विया है जो सखत झिल्लीसा है ॥ नेत्ररोग । १ सातों तवकोंकी व्याधियां, २ आंखोंसे पानी टपकना ( टलका ),३ कभी आसू बहना कभी बन्द होना, ४ धुंधलासा दीखना, ५ आंखोंमें तुनकासा गिरना, आंखमें चोट लगना, ७ आंखमें कुरा पड़ना, ८ क्यान काली पुतलीपर ( सुपेदी आजाना), ९ आंखोंमें दराइसी हो जाना, १० हिवल (भैंगापन ), ११ रतोंशा, १२ दिनको न सूझना, १३ आंखें छोटी पड़जाना, १४ आंखों में पानी इतर आना (८७२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १६४ (नजटलमा ), १५ भूरी आंखें होना, १६ जाफवसर (निगाहकी कमजोरी), १७ आंखें दुबली पड़जाना, १८ आंखें मोटी और निकलीसी होना, १९ रोशनी बुरी लगना॥ पलकोंके रोग। १ पलकें भारीसी होना, २ पलकोंमें गांठेंसी पडजाना, ३ पडवाल, ४ पलकोंके बाल गिरजाना, ५ पलकें सुपेद होजाना, ६ पलकें मोटी और गलीज होना, ७ पलकों में खाज आना ॥ काल (गोश) यह एक अवयव मांस त्वचा और रगोंसे बना हुआ है इसमें एक छेद होता है उसके राहसे हवामें जो शब्द लहराता है वह उस छेदकी राहसे. भीतरकी स्व- चामें टकराकर रगोंके जरियेसे मू के शब्दाववोधक स्थानमें पहुँचता है जिससे जीवको शब्दोंका ज्ञान होता है ।। कानके रोग। १ कानका दर्द, २ कम सुनाई देना, ३ कानमें आवाजसी होना, ४ कानसे रुधिर निकलना, ५ कानकी जड़ उखडना, ६ कानकी जडमें बरम होना, ७ जड़में जखम होना, ८ कानमें खारश होना, ९ कानमें जखम होना ॥ नाक (बीनी) यह दो छेदवाला अवयव मुँहके ऊपर है इसका मार्ग तालूके पास नाचेको खुला है जिसमेंस श्वास आता जाता है और आमाशय मैदेकी रतूबत भी ऊपर चढकर इससे निकलती है और दिमागकी तरफ इसमें एक नालीसी है सुगंध दुर्गध उसी राहसे दिमागमें पहुँचती है और दिमागका मल भी कुछ इसी राहसें टपकता है दो छेद जो अगाडी हैं पीछे ये मिलकर एक होजाते हैं। नाकके रोग। १ गंध नही आना, २ ठीक गंधका ज्ञान न होना, ३ नाकमें जखम होना, ४ नकसीर, ५ नाकसे दुगंध आना, ६ छीकें बहुत आना, ७ नाकम खाज आना, ८ नाकमें क्रिमि पडजाना आदि कई व्याधियां होती हैं । मुँह, जवान और दाँत । कई चीजें मिलनेसे इसका नाम मुँह होता है पर यहां विशेषकर दोनों होठोंहासे मुँह समझना चाहिये ये होठ केवल त्वचा, मांस, शिराओं और खूनसे चने हैं जवानभी मांस और शिराओंहीसे बनी हुई है। दांत हड्डीके छोटे २ टुकड़े दांत भोजनको चबाते हैं जवान उसका स्वाद लेकर भीतरको धकेलती है इनके आकार और काम प्रत्यक्षही दीखते हैं।
परिशिष्ट शारीरक-भाग २. (७७३) मुँह आदिके रोग। १ जवानका वरम, २ स्वाद न आना (रसाज्ञान), ३ जवान भारी होना, ४ जवान वहजाना, ५ जवान सुस्त होना, ६ जवानके नीचे और जवान होना ( अधिजिह), ७ जवान फट जाना, ८ जवान सूखना, ९ जवानमें जलन होना, १० जवानमें खारश होना, ११ जवानसे छिलकेसे उतरना, १२ मुंह आजाना, १३ मुंह और जवानमें करा पड़ना, १४ मुँहसे दुर्गध आना, १५ मुंहमें बहुत लुआव आना ( लालास्त्राव ), १६ तालूका वरम ॥ होठोंके रोग। १ होठ सुपेद होना, २ होठ फटना, ३ होठ फरकना, ४ दोनों होठ खिंचना, होठोंमें मसा होना, ६ होठ सूजना, ७ होठोंका जखम ॥ दंतरोग। १ दांतोंका दर्द, २ दांत अवलना, ३ दांतोंकी आव जाती रहना, ४ दांत भुर- मुंरे हाना, ५ दांतोंका रंग बदलना, ६ दांत हिलना और गिरजाना, ७ अधिक दांत निकलना, ८ नीदमें दांत चवाना ॥ मसूढोंके रोग। १ मसूटोंका वरम, २ इनमें खून आना, ३ मसूढोंमें कुरा पड़ना, ४ मसूढे कटने लगजाना, ५ मसूटोंमें मांस बढजाना, ६ ममूढे पकना ॥ हलकका बयान। मुँहके भीतर कव्वेके पाससे हलक शुरू होता है हसमें दो रास्ते हैं पहलारास्ता वह है जिस राहस भोजन मेदेमें पहुंचता है इसको "मरी"कहते हैं और दूसरा रास्ता वह है जिस राहसे श्वासका वायु भीतर फेफडोंमें पहुँचताहै और मनुष्य बोलता है इसे "हजरा" कहते हैं यह हँजरेकी नली अगाडीको है और मरी इसके पिछाडी- को। मरी तालूके पाससे शुरू होकर मेदेके मुँहतक है जिसे “फम मेदा" कहते हैं और जो कौडीके मुकाबिल है वहांतक गई है और भेदेमें जाकर मिली है इसी तरह हँजरेकी नली “कसवेरीया " तक जो फेफड़ोंका शिरा है वहांतक जाकर फेफडोंमें जा मिली है। हँजरेकी नली बहुत कोमल है उसमें शुद्ध हवाके सिवाय यदि जरासा गरद -गुवारभी चला जावे तो उसी वखत खांसी आकर उसे बाहर निकाल देगी इसी आंति जरासा तुनका, जरासा भोजन या पानका भाग चला जावे तो उसे कभी कबूल न करे किन्तु धांससे बाहर निकाल दे परंतु मरीकी नाली सख्त कड़ी है, कड़ेसे कड़ी वस्तु इसमें होकर मेमें जाती है।
( ७४) श्रुतसंहिता-भा. टी. हलकके रोग। १ कव्वका वरम, २ कव्वा ढीला पडजाना (काग छिटकना), ३ हलकमें खर- खराहट होना, कोई चीज निगलने में दिक्कत होना, हलकमें गरम फुन्मियां होना,. ५ मरीका वरम, ६ हंजरे में सुस्ती आना, ७ आवाजमें फरक आना ॥ सीना और फेफडे। फेफडोंको अरबी में "रीया" या "शुश' कहते हैं यह नरम पापला अवयव है और मांस शिराओंसे तथा झिल्लीस वनाहुआ है गशा (झिल्ली) तमामपर है इस फेफड़में स्पर्शज्ञान नहीं है पर उसपर जो गशा है उसमें कुछ स्पर्शनान है फेफड़ा ऊपर हसलीके पाससे शुरू होकर नीचको लटकता हुआ है और इसके दो भाग हैं एक दाहिना दूसरा चायाँ। दाहिने में तीन शाव (लोथड़े) हैं और बायमें २और ऊपर-- से ये दोनों भाग जुड़े हुए हैं और यह दिल के गिरद आरहा है और इसमें वे शिरायें हैं जो दिलसे उगी हैं यह बाहरकी हवाको दिलके लायक बनाकर दिलमें पहुँचाती हे इसका जिसम मक्खीके छत्त जैसा पोला है रंग हलका सुरख है यह सीनेके अंदर बीचमें कुछ ऊँचा और दोनों तरफ नीचा लटका हुआसा है ऊपरको हंजरेकी नलीसे मिला हुआ है मरीकी नाली इसके पीछे होकर मेदेमें गई है। सीनामें सात हड्डियां हैं और २४ पसलियां हैं१२ बाई तरफ और १२ दाहिनी तरफको उनके बीचमें, उजले हैं और वह गशा है जो पसलियांको ढके हुए है। छः छः पसलियां कौड़ीसे नीचे. और छः छः ऊपर सीनेमें दोनों तरफ हैं । सीना फेफडे और पसलियोंक रोग। १ सांसका ठीक न चलना,२ दमा, ३ खाँसी, ४ मुँहसे खून आना ( यह मदेसे भी आ सकता है और फेफड़ेसेभी),५ मुंहसे पीव आना,६ फेफडोंपर नजूल गिरना (जातुलरिया), ७ सिल फेफडोंमें जखम पडजाना, ८ सीनेमें पीव पड़कर बंध हो जाना, ९ पसलियोंमें वरम व दर्द, १० जातुलजंब (पँसलियों में वरम होकर दर्द होना), ११जातुल जंब गैर खालिस पँसलियोंके बीच जो उजले और झिल्ली हैं उनमें वरम और दर्द होना, १२ जातुल सदर और जातुल अर्ज (सीनेके अगले हिजाबमें वरम दर्द हो तो जातुल सदर है, पिछलेमें जातुल अर्ज ), १३ पँसलियोंके हिजाबमें वरम हो, १४ सीनेमें वरम और दर्द (वरसाम), १५ जहमूदडल्सदर (सीनेमें शरदीसे दर्द होना)॥ कलव-दिल। यह मांस और असब ( पट्ठों) और झिल्लीसे बना हुआ सीनेके बीच में जरा वाई तरफ झुका हुआ रहता है और बहुतसी शिरायें इसमेंसे निकली हैं इसक ४ L १६७ पारीशिष्टं शारीरक-भाग २. (७७) मांस कडा है और जो झिल्ली इसपर है वहभी कडी है और इसकी गशा (गिलाफ) इससे चिपकी हुई नहीं है यह गाजरकी सूरतका बना है इसका मोटा रुख ऊपर को तिरछा है शिरायें यहांहीसे पैदा हुई है और गजरूफ ( नरम हड्डियां भी इसी तरफ हैं दिलंक दो वतन (हिस्से) हैं एक दाहिनी तरफ और दूसरा उसका वायां रुख जिसमें दाहिना रुख बहुतसे खून और थोडीसी रुहसे भरा है यह वायें रुखसे चौडा है और बायें रुखमें रुह बहुत है और खून कम है इस रुखका खून बहुत पतला है इस लिये कि हमें मिला हुआ है दोनों रुखोंके बीचमें तजवीफ (हद ) है दिलमें रास्तेभी हैं जिनमेंसे खून फेफड़ेकी तरफ पहुंचे और फेफड़ेसे हवा दिलमें पहुँचे और ये मोटे शिरेकी तरफ हैं और इधरही मांसके दो टुकड़ेसे जमकर खिड़- कीकी सूरत हो गये हैं इन्हें अजनी उलकलव" कहते हैं जिस समय दिल सुकड़ता है तो ये इकडेसे हो जाते हैं और जब फैलता है तब ये खुल जाते हैं और दमबदम मिंचते खलते रहते हैं जोकि दिल “ अजु रईस " ( उत्तमांग ) है और हरारत गरीजी (मुख्य शारीरक अग्नि) का स्थान है और रूह हैवानी (जीवन नीय शक्ति) का उत्पत्तिस्थान है इस लिये इसको छातीमें ईश्वरने स्थित किया है इसका रंग सुरख है जिन जीवोंका दिल बडा और मजबूत जादा होताहै वे दिलेर और वहादुर होते हैं ।। दिलके रोग। १ सूयमिजा ( दिलपर गरमी खुशकी तथा सरदी या तरी हिसाबसे जादा हो), २ दिल धड़कना व कगान ) एक प्रकारका उन्माद, ३ दिलमें धुवांसा उठना, ४ दिलकी किवाड़ियोंका वरम (दिलमारीसा हो), ५ दिलामचासा रहे कभी बेहो- शीभी हो जावे, ६ जैस कोई दिलको छीलता हो और गश आजावे (तकश्शुर उलकलव), ७ जैसे दिल सीनसे बाहरसा निकलता हो, ८दिलपर रतूवत छाजावे ९ जैसे दिल नीचेको खिचतासा हो । जिगर-यकृत। जिगर " अजूरईस' (उत्तमांग ) है इसमें रूहतवई पैदा होतीहै और जो कूदनेवाली रगें हैं जिन्हें “आउरदा "कहतेहैं वे इसमेंसे निकलतीहैं और "कैलूस" (जो मेदेमें द्रवरूप परिपाक बनाहै उस ) का खून जिगरमें बनताहै परंतु कैलूसमें पलटा रगें मासारीकामेभी आती हैं ( रगें मासारीका जिगरके पास हैं ) कैलूसका खन बनकर तो जिगरकी रगोंसे सारे शरीरमे पहुँचताहै और उसका द्रवरूप मल अर्थात् पेशाब यहाँसे गुरदोंकी तरफ चलाजाताहै जिगरका रंग सुरख है जैसे जमाहुआ खून, और यह खून मांस और रगोंसे बना है इसमें स्पर्शज्ञान (हस } 1 ८.. (७७६ सुश्रुतसंहिता-भा०टी० । नहीं है पर जो गशा ( झिल्ली ) इसपर छाई हुई है उसमें हस जादा है जिगरमें अंगुलियोंकी तरहके अंकुरसे हैं कईयोंमें ये अंकुर ५ होतहें कइयों में '१ कइया में ३ ही इन्हीसे मंदके गिरद लगा हुआहै जैसे कोई अंगुलियोंस किसी चीजको पकड़े हुए रहताहै ऐसे यह मैसे लगाहै । जिगर सीनेके हिजाब के मुकाविल दाहिनी तरफ रहताहै और पिछली तरफ पँसलियोंस बँधाहै और नीचेका शिरा मेदेके करके पास है। जिगरकी तलीसे १ रग निकली है उस वार" कहतेहैं उसमेंसे कई रंगे निकली हैं जिनमेंसे कुछ तो जिगरमें फैलगई हैं और कुछ बाहर आकर मंद और अंतडिया में मिलगई है और इन्हीको “ मासारीका' कहते हैं जिगर कैलुसको इसतरह खींचताहै जैस स्पंज पानीको खीचताह जिगरके मोहद्दवसे.१ औरं रग निकलतीहै जिस “ अनफ" कहतेहै उसकी बाजी शाखें तो जिगरहीम फैलगई हैं और बाकी बाहर निकलकर दो शाखा होकर उनसे १ ऊपरका जाकर फैलगई है और दूसरी नीचे उतरकर नीचके बदन में फैलगई है। उन इन्हीसे तमाम बदनमें पहुँचतौहै और ये “ अजूफ " ही " आउरदे" वदनमें रगोंकी असल जड़ हैं और इन्हींमे दो और शाखें गरदनी तरफ पानी निकलनको निकली हैं इन्हें तालईन" कहतेहैं और कैर (तली ) की तरफ वावके ऊपर एक रास्ता है जो पित्तेकी तरफ आताहै जिससे सफरा अर्थात् खनका आग पित्तम आवे "मरारा (पित्ते ) की थैली १ बड़े अंकुरके ऊपर है और तलीकी तरफ जिगरमें १ और भी रास्ता है जो तिल्लीकी तरफ जाताहै इस राहसे "सौदा" अर्थात् रखूनका तलछल तिल्लोकी तरफ चलाजाव इसीभांति जिगरसे एक रन दिलमे आतीहै जिससे जिगर और दिलमें परस्पर संबंध हो और एक दूसरेका उपकार करे ।। जिगरमें होनेवाले रोग। १ सूयमिजाज जिगर (जिगरमें गरमी सरदी की तरी अंदाजस जादा हो, २ जोफ जिगर ( इसमें दस्त मांसधोवनसा थोड़ा २ हो भूख कम लगे जिगरमें धीमा दुरद हो), ३ सुदेकवद (जिगरमं सुदा पड़जावें जिससे जिगर भारीसा हो दस्त और उबकाई हो कभी तपभी आवे), ४ सुई मासारीका ( मासारीका सुद्दे पड़जावे और भारीपन हो हाजमा विगड़े दुबलापन हा ), ५ नफख तुलकवंद (जिगरमें अफरा हो दाहिनी पहलूम दरंदभी हो ), ६ बजेउलकवद (जिगरका दर्द या यकृत् शल), ७ निहार या श्रमके बाद जादे ठंडे पानीसे जिगरमें दर्द हो, ८ बरम कवद (बरम जिगर जिगरपर वरम होना), इसमें तप प्यास और दर्द और जलन हो थूक बंद होव खुश्क खांसी और वढे तव हिचकी भी, ९ वरम उजलात शिकम (पेटके उजलोंमें वरम होना ) यह जिगरके बरमके मानिन्दही होता है इससे यहां लिखा है, १० दबीले कबद (जिगरमें कही पकजावे और पीव १६९ परिशिष्ट शारीरक-भाग २. (७७७) 'पड़ जावे ) इसमें तप हो दर्द हो प्यास हो सीधा न लेटसके, ११ जिगरमें छोटीर अलाइयांसी होजावें ( इसमें जलन और कभी कंपभी होवे ), १२ हिसातुल कबद (जिगरमें रेता छोटी २ पथरीसी पैदा हों) इसके खनमें रेता जम जाता है, १३ इसहाल जिगरी (खूनके या पीबके दस्त आवें), १४ फिसादमिजाज व जोफ- जिगर इसमें पेट में कुरकुराहट रहे कभी अफरा हो कभी मसूड़ों और होठोंमें सुरखी और फुन्सियां हों, १५ इसतिसका (जलोदर )। तिहाल ( तिल्ली) यह अवयव मांस और शिराओंसे बना है यह पोपला है इसका रंग कुछ स्याही लिये है यह मेदके बाईं तरफको रहता है इसमें स्वयं हस नहीं है इसपर जो गशा है उसमें हस जाता है इसके शिरसे १ रास्ता निकलकर जिगरकी तलीमें खलरहा है इसे तिहालकी गरदन कहतेहैं इसी राहसे जिगरसे सौदा खिंचकर तिल्लीमें आताहै तिल्ली कच्चे सौदाके रहनेकी जगह है तिल्लीमेंसे १ राह मेदेमें भी खुला है इस लिये कि थोड़ा सौदा मेदेमें आवे और मेदेके मुँहपर खुजलावे और तुरशी पैदा करे जिससे भूख लगे। तिल्लीके रोग। १ यरकान (पांडु पीला प्रायः जिगर और भरोरेसे होता है और स्याह तिल्लीस जिसे हलीमक कहते हैं), २ सूय मिजाज तिहाल (तिल्लीमें गरमी सरदी वगैरह जादा पहुँचना), ३ वरमतिहाल तिल्लीका बरम, ४ जोफतिहाल (तिल्लीका जौफ), ५तिल्लीका अफरा, ६ तिल्ली बढ़जाना, ७ तिल्ली में सुदा पडजावे ॥ मेदा (आमाशय) यह एक गोल अवयव थैलीकी सूरतका मांस और पट्ठों और शिराओं और झिल्लीसे बनाहै इसके तीन भाग हैं १ "मरी" (आहार नलका ), २ “फम मेदा" (मेदेका मुँह ), ३ "कैरमेदा" (मेदकी तली) "मेरी जो मुँह के भीतरसे शुरू होकर छातीकी कौड़ीतक है इसका वर्णन पहले होचुका है “फम मेदा" यह मरीके नीचे है और "कैरमेदा" यह भाग नाभिसे ऊपर है "मेदे" में हस (स्प- शज्ञान ) बहुत है इससे जो इसे बुरी लगे उसे झट वमनके राह निकाल देता है मेदेमें दो तबकें हैं भीतरका तवका असवानी है जिससे स्पर्शशक्ति उत्पन्न हो और वाहरका परत लहमानी (मांसल ) है ताकि हाजमे में सहायता करे और औदर्य अग्नि यथोचित पैदा हो भीतरी परतमें लैफ बाजी तो तिरछी है और बाजी -लंबी इस वास्ते कि आहारको रोकसके और बाहरके परतमें लैफें चौड़ी हैं ताकि पके आहारको यहांसे निकालदे और मरीम कोई लैफ तिरछी नहीं है क्योंकि यहां पर आहारके ठहरनेका कामही नहीं है और "कैलूस" भोजनका द्रवपाक (आस) - है (७७८) सुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १७० यहांही बनता है फिर यहांहीसे उसका सार भाग द्रव वारीक रगोंक वसीलेसे जो मदेस जिगरकी तलीमें मिलरही है जिगरकी तरफ खिंच जाता है और फोकस "असना अशरी"आंतकी तरफ जा मंदकी तली में है चलाजाता है भोजनकी इच्छा और प्रथम परिपाक मैदेहीसे पूर्ण संबंध रखता है और सब अवयवोंको इसकी तरफही वांछा रहती है और मेदेमें विकार होनस सब अवयवों में विकार हो जाता- है इस वास्ते हरेक व्याधिके इलाजमें मंदकी रियायत जरूर रखनी चाहिये ।। मेदेके रोग । १ सूयमिजाज मदा (मेदमें गरमी मुश्की सरदी तरी अंदाजेस जादा हो), २ बजे उल्लेदा ( मेदेका दर्द), ३ जाफे हज्म (जोफेमंदा)(क) मेदकी कुव्वत जाजिवामें जोफ, (ख) मंदके कुन्वत मासकेमें जोफ, ( ग ) मेदेकी कुव्वत हाजममें जोफ, (घ) मेदेकी कुव्वत दाफेमें जोफ, ४ हैजा (विसूची ), ५ नुकसान शहवततुआम (क्षुधानाश होना), ६ बहुत ज्यादे भूख लगना, ७ जूउल- वकर भूख तो हो पर मेदा न चाहे ( अरुचि), ८ जुटलगसी ( भुखकी वरदाश्त न होना), ९ प्यास जियादा लगना ( तृपा), १० वरममेदा ( मेदेमें वरम और दर्द व जलन व हरवक्त तप रहना), ११ मदमें किसी जगे पीव पड़जाना और जखम होना इसमें तप जोरका दर्द, १२ मेदेमें फुन्सियां और जखम हो,१३ नफख (अफरा), १४ डकारे जादा आवें (अत्युद्गार),१५जमाही जादा आना (अतिघ्रभा), १६ कै (उलटी करना वमन), १७ जी मिचलाना ( उत्क्लंद), १८ तहूअ (उबकाई हल्लास), १९ तकल्लुव (जी मिचलाया रहना), २० कै उलदम (खूनका वमन होना) २१ सदमें खून या दूध जमजाना, २२ हिचकी जादा आना २३ इन कलाव मेदा (कुछ ही जमा होतेही कै होजाना ), २४ कलक ( वेचैनी ), २५ इखतिलात मैदा वैचैनी और जी मिचलानेके साथ कफगानसा हो, २६ बजे उल्फबाद ( मंदेके मुहपर जोरका दर्द हो ), दिलके नजदीक होनेसे इसे दर्द दिल कहते हैं, २७ मेदेमें सोजिश और जलन हो, २८ मेदमें खारिश होना और भीतर छोटी फुन्सियां होना तेज चीज खानसे या नजूल मेदमें गिरनेसे होती है, २९ इस्तर खाप मेदा (मंदा टीला पडजाना ), ३० तशन्नुज मेदा ( मेदमें किसी जगह ऐंठ- नसी होना और अकड़ावासा होना जिससे बिना हजम हुई चीज दश्तमें आवे); (क) कुञ्चत जाजिया वह है जिससे भोजनको अपनी तरफ जजब करे ( खींचे) (ख) कुम्बन मासका वह है जिसमे मोजन टहरा रहे (ग) बुब्बत हाजमा वह है जिससे हजम हो (घ) कुवत दाफे वह है निमने पचा हुआ दर हो निकल जावे ! १ (७७९), -- १७२ परिशिष्ट शारीरक-भाग २. ३१ हिसारत मेदा ( मेदा कडा पडजाना), ३२ इस हालमेदा ( मैदकी गिजा कभी पची कभी विना पची दस्तके राह निकला करे या खातेही गिजा अंतडि- योंमें उतर आवे और दस्त होवे )॥ अमआ (अंतड़ियाँ) यह अवयव मुलायम थोथा दो तहका झिल्ली और चरबी और शिराऔसे बना हुआ होता है। आंतोंमें हस (स्पर्शशक्ति) होती है ये आंतें पेटमें छः हैं अर्थात आंत तो वास्तवमें एकही है उसीके छः भाग हैं प्रथमका नाम "असना अशरी' है दूसरी “ सायम" तीसरी “ दकीक " ये तीन आंतें ऊपरको रहती हैं और बारीक हैं चौथी " अझर" पांचवीं " कौलून "छठी “मुस्तकीम" ये पिछली तीनों नीचेको रहती हैं और गलीज रहती हैं पहली आंत “ असना अशरी" मेदकी तलीसे शुरू होती है यह १२ अंगुल लम्बी है इसका मुह तब खुलता है कि जब मेदासे निकली गिजा तगाजा करे । इसके पीछे दूसरी आंत सायम "है यह प्रायः खाली रहती है क्योंकि यह जिगरके पास है और पित्तका रास्ता इसमें खुला है जो पित्ता (सफरा) मरेह आतोंके धानको आता है वह पहले सायम- परही आता है और जल्द इसे साफ करदेता है इसके पीछे तीसरी आंत "दकीक" है यह सबसे वारीक और लम्बी और पेंचदार है जिससे गिजा इसमें देरतकटहरे और उसमें जो कुल सत्त्व हो उसे "मासारीका" खीचले । इसके पीछे चौथी आंत अझूर" है इसमें एकही रास्ता है यह थैलीसी है इसमें गिजा पकी हुई भरी रहे और हरघडी दस्तकी हाजत न हो और जो कुछ मेदेमें हाजमा न हुआ हो वह इसमें हाजमा होजाय इसमें एक हरारत इसी लिये रहती है और "फितक ' ( अंडवृद्धि) में इसीका भाग फोतोंमें उतर आता है इसमें एक और छोटीसी आंत लगी है यही फोतोंमें उतरती है । इसके पीछे पांचवी “कौलून" है यह अझूरसे पीछे है यह दाहिनी तरफसे ऊपरको होकर बाई तरफ आई है यह हलकेकी तरह- पर है इसमें मल रहता है और दर्द कुलंज इसीमें होता है । इसके पीछे छठी आंत मुस्तकीम है " यह कुलंजके हलकेके बाद सीधी चलीगई है और गुदाकी त्रिव- लीतक पहुंची है यह लगभग मेदेके वरावर चौडी है और “ कुवतजाजवा इसमें है इस लिये कि मलको और आंतोंस अपनी तरफ खीचले और चौडाई इस लिये है कि, यह मलका खजाना है जब यह मलसे प्रायः भरजाती है तब दस्तकी हाजत होती है और जब गिजा अझूर और मुस्तकीममें पहुंचता है तब विष्ठाकी सूरत बनजाती है। - - ८ - ८ (७८०) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०। १७२ अंतडियोंके रोग। १ जलकुल अमआ ( गिजा आंतोंमें न ठहरे कच्चे पक्के दस्त लगना ), २ इस ४ हाल खून ( खूनके दस्त आना ), ३ पीब और पीला पानीसा दस्त लगना, जहीर राध लडका थोडा थोडा दस्त लगना, ५ मरोड़ आँतोंका दर्द, ६ नफख व कराकुर ( आँतोंमें अफारा और कुरकुरी होना), ७ कुलंज ऐंठनका दर्द रहना, ८ इसर कवजीयत होना, ९ किरम आतोंमें कृमि पडजानी । मिकअद (गुदा) यह फुजला ( मल) निकलनेका रास्ता है इसमें कुवत इनकबाज संकोचन शक्ति है जिससे हर समय मल नहीं टपकता बल्कि जब मुस्तकीस अंतडी मलको बाहर निकालना चाहती है तब इसका मुह खुलता है। गुदाके रोग। १ बवासीर (अर्श ) मस्से, २ नासूरे मिकअद ( भगंदर ), ३ औराममिकअद (गुदाका वरम), ४ शकाक मिकअद (गुदा तडक जाना दराड होजाना ), ५ इस तरखाय मिकअद (गुदा सुस्त होजाना), ६ खरूजमिकअद ( कांच निक- लना या गुदभ्रंश ), ७ कुरुहमिकअद (गुदामें जखम होजाना), ८ खारिशमि- कअद (गुदामें खाज होना)॥ वृक्क (गुरुदे) गुरदे दी हैं एक दाहिना दूसरा बायां और ये दोनों अपनी जगह पुश्तके नीचे पहलुओंके पास जमे हुए हैं ये मांस, चरवी और रंगोंसे बने हैं स्वयं इनमें हस ( स्पर्शशक्ति) नही है पर जो गशा इनपर है उसमें हस जादा है और हरेक गुरदा जिगरसे उन रगोंके वसीलेसे संबंध रखता है जो जिगरसे गुरदोंमें आई हैं। उन दोनों रगोंको कई “ तालईन" कहते हैं और जो गिजाके द्रवभागमें खून और पानी मिला हुआ जिगरमें रहता है उसमेंसे पानी (मूत्र ) का भाग इन रगोंहीके जरियेसे गुरदोंमें आता है और खून और पानीको येही रगें जुदा करती हैं अर्थात् पानीको खीच लेती हैं और खनको जिगरसे नहीं खींचती और गुरदोंसे दो रगें नीचेको और निकली हैं जो असानेमें गई हैं इस लिये कि गुरदोंमें ज्योंही सूत्रका भाग आवे त्योंही उसे मसाने में पहुँचा देंगुरदोंका आकार ऐसा है जैसे आधा खोपरा गूंधा रक्खा हो रंग हलका सुरख है इनको अरवीमें कुलया कहते हैं । गुरदोंके रोग। १ सूयमिजाज कुलया (गुरदोम सरदी गरमी तरी खुशकीजादा हो) २ गुरदमै बीला" ( फोडा होना ), ३ जोफ गुरदा (दोनों गुरदोंमें जोफ हो पेशाबमें , + 71 १७३ परिशिष्ट शारीरक-भाग २. (७८१) तलछट हो कभी दरदभी हो), ४ रीडुलकुलया (गुरदोंमें रीह अर्थात् गलीज हवा हो जिससे गुरदों और कमरमें दर्द हो), ५ बजेउलकुलया (दर्द गुरदा), ६ वरम गुरदा (गुरदोमं वरम होना जिससे तप, प्यास, दर्द सर, निद्रानाश और गुरदामें दर्द और जलन, कैमें सफरा आवे, दस्त पेशाब कम हो), ७ गुरदोंमें वरम हो फुन्सियां होजायं, कुरा पडजाय इसमें पेशाबमें खून और कुरंडसे आवें, ८ गुरदोंमें अलाइयांसी हो जावं, जयावेतश पेशाब बारवार या जादा आवे प्रायः पानी पीतेही पेशाब आवे, १० गुरदोमें रेत शरकरा पडजावे या छोटी पथरीसी पडजावे ॥ मसाना (वस्ति) मसाना एक थैली है जिसके दो तबके हैं तबका भीतरी तो असवी है ताकि मूत्रकी तेजी मालूम हो और बाहरी तबका ( परत ) कडी झिल्लीका है कि भीत- रलेकी रक्षा करे मूत्रसे भरनेपर फट न जाय और मसानेमें एक नाली है अगली. तरफ यही मूत्र बाहर निकलनेका मार्ग है जो मसानेसे लिंगेंद्रियमें होकर गुजरी है यह मूत्रनाली पुरुषोंके तीन खम रखती है और स्त्रियोंके एक खम मसानेमें दोनों गुरदासे दो रगे आई हैं जिनसे गुरदोमेंसे मूत्र मसानेमें आवे और मूत्र मसानेमें गुरदोंसे कतरे २ टपक कर आता है और मसानमें जमा होता है । मसानेके रोग। १ औराममसाना (मसानेका वरम जिसमें मूत्र रुक २ आवे तप हो), २ कुरुह मसाना (मसानेमें कुरा पडजावे दर्द हो पीव आवे), ३ ममानेसे पेशाबमें खन मिला आवे और खुराँसे आवें, ४ मसानेमे खून जमना यह खूनी पेशाबके बाद प्रायः होताहै इसमें शरीर कांपे ठंढा पसीना होवे,५ दर्दमसाना (यह कई सबवसे होता- है वरमसे कुरेसे पथरीसे ), ६ मसानेका अफरा, ७ हिस्सात मसान, मसानेकी प्रथरी या रेत या शर्करा), ८ पेशाबमें जलन होना, ९ एहतवासुलबोल (पेशाब बंद होना) (चाहे वरमसे चाहे गुरदोंके वरमसे चाहे पथरीसे ), १० तकतीर- लबोस (पेशाब करते २ टपकके आना ), ११ फराशुलवोल (नीदमें पेशाद निकल जाना और मालूम न होना, १२ वोलुदम (खनका पेशाब आना ) ॥ कुजेबा (लिंग) यह अवयव थोडेसे मांस और बहुतसी शिराओं और पट्ठों और नसोस वनाहै जब मैथुनादि करनेकी वांछा चित्तमें होतीहै तब मनीके प्रवृत्त होनेके साथ रोहग- लीज नसोंमें भरजातीहै और लिंगको लंवाव और मुटाईमें फुला देतीहै और जब मनी निकलजाती है तब वह रीह गलीजभी खारिज होजातीहै हस(स्पर्शशक्ति) इसमें बहुतहै।
+ (७८२) सुश्रुतसंहिता-भा० टी० । १७४ लिंगके रोग। १ आतशक, २ सूजाक, ३ नुकसानवाह (क्लैब्य ), ४ जिरयान (प्रमेह ), ५ कसरत एहतलाम ( स्वप्नमें वीर्य गिरना या शीव्र वीर्य गिरना ) ॥ खुसिये (वृषण) दोनों खुसियोमसे हरेक मांस और मेदा तथा शिराओंस वनाहै और जब मनी शरीरसे टपककर इनमें आती है तो यहांकी हरारतमे गाठी और सुपेद हो जाती है। खुसियोंके रोग। १ खुसियोंका वरम, २ खुसिये बढजाना ( अंडवृद्धि ), ३ खुसियोंका दरद, ४ खुसियों में खाज होना ॥ रहम (स्त्रियोंका गर्भाशय ) यह एक असवानी (झिल्लीका) अवयव है इसका स्थान मसाने और अमआय मुस्तकीम और नाभिके दरम्यान है और इसकी गरदन भगतक गई है और इसकी जडमें भीतरको दोनों खुसियेभी होते हैं “ रहम" के दो तबके होते हैं अंदरके तबकेमें रंगें और नशव बहुत हैं। गोया यह चुनवटदार थैली है और बाहरका तबका अंदरके तबकेका गिलाफमा है रहम की लंबाई नाभिसे योनिके भीतरी द्वार तक है ( यह रहमकी गरदन है ) यह योनि अनुमान छः अंगुल होती है जादासे जादा ११ अंगुल होती है । रहमका मुँह अंदरूनी हरवखत खुला नही रहता है सिरफ हैजके कुछ दिन बादतक खुला रहता है फिर “ नुतफा' कबूल करनेपर या हैजसे जादा दिन होनेपर बंद हो जाता है । रहमके रोग। १ बच्चा न होना ( वंध्यापन ),२ कसरतसे हैज आना, ३ रहमसे रतूबत बहना (प्रदर), ९ एहतवासतमस ( हैज बंद होजाना ), ५ रहम निकल आना, ६ औराम रहम (रहममें वरम होना जिसमें नाभिमें दरद, तप, जवान स्याह होना और पुस्तमें दर्द होना), ७ सरतान रहम (रहममें खोलरी पड़ना),८ इखतनाकरहम ( रहममें सुशकी होना जिससे गशी बेहोशी होना और तशत्रुज होना)। यहां स्थानसंबंधसे कुछ रोग दिखाये हैं बहुतसे रोगोंकी संख्या और भेद और जगह उत्तरतंत्र में वा चिकित्सितस्थानमें उन उन रोगोंकी चिकित्साके मौकेपर यथा- संभव यूनानी तथा डाक्टरी सतसेभी कहगे वहां देखना ।। यूनानी प्रकीर्ण रोगोंका संक्षेप (पृष्ठ और शाखाओंके रोग) १ वजे उल जुहर (पीठका दर्द), २ बजे मुफासिल (जोड़ोंका दर्द गठिया), ३ पिडलियोंमें मोटी नसें होना और गाँठे पड़ना, ४ पीलपाव (श्लीपद), बजे उल अकब (पडीका दर्द), ६ नुकरस (टाकनेसे अँगूठेतक पीडा), ७ बजे उलवरक (चूतड़का दर्द), ८ अरकुन्निसा पावमें झनझनाहटका दर्द अर्थात् राँगन बाय ॥ ५ परिशिष्ट शारीरक-भाग २. (७८३) 1 - 1 रक्तसंबंधी रोग। १ गलीज खूनसे सुर्ख वर्म, २ सुर्खवादा (विसर्प ), ३ आतशक, ४ दबीला (एक भांतिका फोड़ा), ५ सलआ ( रसोली), ६ टकद ( गाँठन ग्रंथी),७ सरतान (कछवे जैसा शोथ और पाक ), ८ रिश्ता नारू (स्नायुक), ९गंज, १० अलाइयाँ, ११ खुश्क खारश (सूखी खाज), १२ गीली खारश (तर खुजली, पामा), १३ कोवा ( दाद), १४ मुहासे (मुखपिडिका), १५ तोतह झांई, १६ विसकटा, १७ आवले फिरंग (फिरंग रोग एक भांतिका आतशक), १८ चेचक व खसरा, १९ वरस (श्वेतकुष्ट), २० वरस असवद (स्याह दाग), २१ खाल (तिल), २२सालील ( मसा), २३ फसाद लौन (रंग बिगड़ जाना), २४ हाथ पाँव फटना, २५ तक- शीर जिल्द (त्वचापरसे छिलकेसे उतरना), २६ जुजाम (कुष्ठ अंगुलिये गलना), २७ नाखून पटला ॥ बालोंके रोग। १ तसाकुत शेर ( वाल उड़ना वालोंकी जड गलना),२तशकीक शेर (बालोंकी नोक फटना), ३ शेव (वे समय बाल सुपेद होना (पलित ) अन्यरोग। १ अरकुद्दम (पसीनेमें सुरखी, खन आना ), २ वदनसे दुर्गध आना, ३फरवहीं (बहुत मोटा होजाना-स्थौल्य ), ४ लागरी (बहुत दुबला होना कार्य), ५ जूं । तथा लीखें जादा पडना ॥ तपके भेद । १ तप हमीयम ( एक दिनमें एकवार उतरनेवाला और जरा फुरफुरी देकर चढे, २ तप खिलतिया बलगमी फिसाद जादा हो तो रोज तप रहे जो सफराके फिसादसे हो तो एकदिन छोडकर हो और जो सौदाके फिसादसे हो तो दो रोज बीचमें छोडकर चौथे दिन होवे और तप खूनी फिसादसे हो तोरोज जोरसे चढे पर बना हरसमय रहे ॥ और ये खिलतीतप यदि उस खिलतका मादा कम हो तो ऊपर लिखे मूजिव दौरेके तरीकपर आतेहैं और यदि मादा अधिक हो तोजल्दी२ दौरा करे या स्थिर होजावे ।। (क) बलगमी तपमें शरीर भारी हो आलस्य हो अर्थात् कफवरके लक्षण हों (ख) संफरावी तपमें वेचैनी, गरमी, प्यास, उबकाई (पित्तज्वरके लक्षण हो ), (ग) सौदावी तपमें शरीरमें दर्द,हडफूटन,जमाही जादा हों,बढनेपर कंप और ऐंठन हो तथा उठउठकर भगना, वाय. वातज्वरके लक्षण हों), (घ) तप, चेहरा लाल, सिरमें दर्द, हलकमें फुन्सी वगैरह इसमें बढनेसे सरसाम हो प्रलाप तथा बचैनी विशेष हो ( रक्तज्वरके लक्षण हों), ३ हमीयात मुरक्कव दो या जादा भडकना १ (७८४) मुश्रुतसंहिता-भा० टी०। १७६ खिलत जिसमें बिगड़ें और उन्ही खिलतोंकी अलामत (लक्षण) मिलें (द्वंद्वज तथा त्रिदोषज या सन्निपातज), ४ वे तप जो आमाससे होवें ॥ ५ हमीगशिया (वे तप जो बेहोशी और जौफ पैदा करें ये कच्चे बलगमसे प्रायः होतेहैं ),६ हमीदिक तपेदिक(बारीक तप जिसमें मीठी जुरी सदा बनी रहे अर्थात् जीर्णज्वर ठहर जाना)॥ यूनानीकी प्रकीर्ण बातें। शारीरकका सारांश संक्षेप लिखनेसे पीछे कुछ २ प्रकीर्ण बातें जो बहुत आव- श्यक हैं और जिनका जानना वैद्योंको बहुत जरूरी है वे लिखते हैं १ "खिलत" खिलत उस द्रवपदार्थको कहते हैं जो बहुत शीव शरीरमें फैलकर सब अंगोंमें पहुँच सके या यूँ कहो कि जो गिजा हम खाते हैं उससे पहले जो वस्तुद्रव हमारे शरीरके पोषणके लिये बनता है उसे खिलत कहते हैं । ये खिलत चार हैं १ खून यह गरम तर है, २ सफरा (पित्त) गरम खुश्क, ३ बलगम (कफ) सरद तर है, ४ सौदा सरद खुश्क । फिर इन हरेकके दो २ भेद होते हैं १ तबई स्वच्छ, २ गैरतवई विकारयुक्त ॥ (आजाय रईसा )आजाय रईसा तीन हैं (प्रथम दिल, दूसरे दिमाग, तीसरे जिगर) दिल कूबत हयातका मवदा है अर्थात् जीवनी शक्तिका मूल है दिमाग हस ( स्पर्श ज्ञान और ज्ञानेंद्रियों ) तथा हरकत-चलनशक्ति कमद्रियोंका मूल है जिगर गिजाद ही तमाम वदनु ( पोषणशक्ति) का मूल है जिगरमें कुव्वत तबई रहती है और दिलमें कुव्वत हैवानी रहती है तथा दिमागमें कुव्वत नफसानी रहती है ॥ जैसे चार खिलत हैं वैसेही मनुष्यों की प्रकृति ) खासियत भी चारही हैं ? खूनी, २ सफरावी, ३ बलगमी, ४ सौदावी ॥ ( वदनका रंग ) बलगमकी प्रधानतासे शरीरका रंग सुपेद होता है और रक्त (खन )की प्रधानतासे रंगमें सुरखी विशेष होती है तथा सफराकी प्रधानतासे पीला रंग होता है और सौदाफी प्रधानतासे स्याह ॥ खून रुधिरको कहते हैं यह जिगरमें बनता है सफरा खूनके पकांवके ऊपरके फेनसे बनता है और यह बनता तो जिगरहीमें है पर रहता है मुख्यतासे मरारे अर्थात् पित्तेकी थैलीमें सौदा यह खूनके पकावका तलछट है इसका नियत स्थान तिल्ली है । बलगम यह वह कच्चा मादा (रस) है जिससे खून बनता है यह यूनानी हिसाबसे कुल शरीरमें २४२ हड्डियाँ होती हैं इन बातोंका विशेष वर्णन देखना हो तोदेखो कानूनचा बुकराती या तिब्ब अकबर या अकसीर आजम ॥ इति परिशिष्ट शारीरक भाग ॥ २॥ १ मैदैम रहता है । वगैरह।
- ॥ श्रीः॥ सबका सारांश और ऐक्य। ५. आई -- परिशिष्ट भाग ३. शरीरके मुख्य २ अवयवोंके नामोंका भाषांतर । संस्कृतनाम- अंग्रेजी (डाक्टरी) नाम-यूनानी या फारसी अरवी नाम-देशभाषा ब्रेन दिमाग दिमाग बृहत्मस्तिष्क सरेबरम [दिमागका अगला बड़ा हिस्सा- क्षुद्रमस्तिष्क सरेबलम दिमागका पिछला छोटा हिस्सा नेत्र एन (चश्म) आँख कर्ण ईरं अजन (गोश) कान नासिका नोज अनफ (वीनी) नाक मौथ मुख मुह दहन दंत दंदान दांत आहारनलकाका ईसा फेगस मरी नाली उपरिभाग हजरा लेरिक्स श्वासनलका श्वासनलीका अधो- ट्राकिया फेफड़ लंग्स मेदा आमाशय स्टमक अमआय दकीक वारीफ अंतड़ियाँ स्मालइंटस्टाइंस तन्वंत्र डिओडिमन ( १) असना अशरी जिज्यूनम (२) साइम एलीअम (३) दफीक टूथ श्वासनलीका अधो- शुशु(रिया) 1 -- 7 १७८. स्तुश्रुतसंहिता-भा० टी०। (७८६) मंांटीअंतडियां " । " कबद जिगर स्थलांत्र लाइटस्टाइंस अमआय गलीज ३ (१) सीकम अझूर (२) कोलन कोलन (क) एसिडिंग कोलन (ख) ट्रांसबर्सकोलन (ग) डिसडिंग कोलन मलाशय रेकटम मुस्तकीम यकृत लिवर पित्ताशय गालब्लाडर मरारा हृत्कमल हाट कलव दिल प्लीहा स्पिलीन तिहाल वृक किडनी कुलया गुग्दे मूत्राशय व्लाडर मसाना अंडकोश टैस्टीकिल्स खसिये लिंग पैनिस कुजैव गर्भाशय यूटरस रहम नाभि नैविल नाफ पृष्ठवंश स्पाइन जुहर हस्तक्ष्य सुपीरियरएक्सट्रमीटीज पादद्वय इनफीरियर एक्सट्रमीटीज यक्तूनाडी मासारीका रुधिर दम खून पित्त वाइल म्यूकस वलगम कापालिक शिरामूल स्पाइनलकार्ड नुखा लोयार पित्ता दिल तिल्ली गुरदे पेडू फोते मरदी बच्चेदानी सूंडी पीठ खन पित्त कफ १ मीकम अर्थात् अस्रके मूलमेंसे एक छोटी अंतडी निकली है उसे दंग्रेजीमें एपिडक्ससीसाई कई और यह अंडकोगम उतर आया करती है। - । t १९७९ परिशिष्ट शारीरक-भाग३. (७८७) -- सबके मतका सारांश और ऐक्य ! यदि वैद्यक यूनानी और डाक्टरी मतके शारीरकको विचारकर देखें तो ऐसा मालूम होता है कि, यूनानी और डाक्टरीका शारीरक तो मिलताही है परंतु वैद्य- कके शारीरकमें कुछ न्यूनाधिक पाया जाता है इसका कारण यह जान पडता है कि, वैद्याने गर्भके समय जैसे शरीर बनता है उसके ही अनुसार उत्पत्ति लिखी है और वीजमात्र वर्णन कियाहै फिर यूनानीवालोंने उसका अधिक विवेचन किया जैसे वीजसे वृक्ष बनता है उसके पीछे डाक्टरोंने और भी खोजकरके उसमें बढाया है।। देखो वैद्योंने ३०० हड्डियां लिखी वह कुछ अयोग्य नहीं क्योंकि बहुतसी हड्डियाँ छोटी अवस्थामें जुदी होती हैं पर अवस्था बढनेपर मिलकर एक होजाती हैं (जैसे सेकरम पृष्ठवंशके नीचेकी हड्डी जिसमें आद्य अवस्थामें पांच जोड होते हैं पर जवानीमें एकही प्रतीत होती है ) इत्यादिको वैद्योंने भिन्न लिखा और डाक्टरों आदिने एक लिखा बल्कि खुद डाक्टर लोगही लिखते हैं कि, पहले ये५ भिन्न भिन्न होते हैं बस डाक्टर २४६ हड्डियां मानते हैं और यूनानी २४२ तो हड्डियोंमें इसी प्रकार कुछ अंतर है सो हो पर वास्तवमें अंतर नहीं । आमाशय ( मेदे) में प्रथम आहार जाना सब मानते हैं सो प्रत्यक्षही है तथा यकृत् (जिगर) रसको लेकर रुधिर बनाने में प्रवृत्त होता है इसे भी सब एकस्वर होकर मानतेही हैं प्लीहाको वैद्य और डाक्टर रक्तशोधन करनेवाला कहते हैं यूनानी इसे सोदा (रुधिरकी तलछट जलन ) का स्थान बताते हैं सो भी कुछ अंतर नहीं क्योंकि जब यह रक्तकी तलछटको छांटता है तो रक्तशोधनेवाला हुआही । हृत्कमल (दिल) सबके मतमें जीवका आधार और सर्वत्र जीवनी शक्ति पहुं- चानेवाला रक्तकोश है सो ठीकही है ।। अंतडियां किसीके मतमें ६ हैं, किसीके मतमें २, किसीके मतमें ७, किसीके मतमें कितनी यह बात यू है कि, वास्तवमें परिपाककी अंतडी मेदेसे गुदातक एकही कई पेंच खाये हुए है कहीसे मोटी कहीं पतली कही लंबी कहीं गुच्छेदार इसे किसीने (यूनानीवालोंने) ६ भाग मान लिये, वैद्योंने दोही भाग माने (तन्वंत्र और स्थूलांत्र ) इसीप्रकार डाक्टरोंने भी पहले दो भाग (पतली अंतडियां और मोदी अंतडियां) माने हैं फिर इन्हीके कई भेद यू माने हैं कि, पतलीके तीन भाग जुदे और मोटी (कोलन ) के भाग जुदे ।। फुप्फुस (फेफडा) वैद्योंने उत्पत्तिके समय हृदयसे बाई तरफ उत्पन्न होता है ऐसा माना है फिर हृत्कमलके दाहिनी और बाई तरफ फैल जाता है ) और प्राण- वायु श्वासका मुख्यस्थान हृदय अर्थात छातीही माना है सो यह भी विशेष विरुद्ध JT १८० (७८८) सुश्रुतसंहिता-भा०टी०। नहीं है यूनानीवाल और डाक्टर श्वासका स्थान मुख्य फेफड़ा कहते हैं सी उर अर्थात् छातीका भीतरी भागही तो फेफडोका स्थान है। पित्ता जिसे यूनानीवाले मरारा और डाक्टर गाल ब्लाडर कहते हैं यह निग- रसे लगा हुआ ऊपरको है सो वैद्योंके मतसे भी पित्ताशय दाहिनी तरफ़ यकृतके समीपही माना है कई क्लाम इसही मानते हैं। वृक्क (गुरदे ) डाक्टर इसे मूत्रका बनानवाला मानते हैं और यूनानी कहते है कि, ये गुरंद जिगरसे मूत्रका भाग लेते हैं अर्थात् जिगर जब रसका रुधिर बनाता. है तो सारभाग रुधिरको तो शिराओं द्वारा शरीर में पहुँचाता है और उसका जल- रूप मल अर्थात् मूत्र गुरदीकी तरफ दाखिल करता है वहांस मसानेमें जाता है पर वैद्यकमें कहीं ऐसा नहीं पायागया वैद्यकमें ऐसाही लिखा है कि, वम्ति अर्थात मसाना कोरे कलशके समान उदरक अधाभागमें है जब यकृत् रसका रुधिर बनाता है तथा आमाशयके मलका भाग आंतों में आता है तब उक्त स्थानोंमेसे सहस्रों सूक्ष्म नालियोंद्वारा झिर झिरकर मूत्र स्वयं मसानेमें इकट्ठा होजाता है देखो निदानस्थानका तृतीय अध्याय जहाँ वस्तिका विवचन है ॥ वस्ति ( मसाना) सूत्रका स्थान है इसे सब मानतेही हैं परंतु यूनानीवाले और डाक्टर ऐसा मानते हैं कि, इसमें दोनों गुरदोंसे दो नालियोंद्वारा मूत्र आता है और वैद्योंके मतसे अनेक नालियोंद्वारा आमाशय यकृत् वृक्क और अंत्रादिसे इसमें मूत्र झिर झिरकर आता है अस्तु यह भी कुछ विरुद्ध नहीं क्योंकि और अन्य मूक्ष्म नालियां ठीक २ दिखाई नहीं देती और उन्हींमसे ये दो नाली स्थूल होंगी जो दिखाई देती हैं। मूर्धा ( दिमाग ) वैज्ञानिक शक्ति और शिराओं तथा पट्ठोंका मूल है इसे सब मानतेही हैं परंतु वैद्य हकमलको बुद्धिका स्थान सर्वोत्कृष्ट मानते है और यूनानी- वाले और डाक्टर दिमागको सर्वोत्कृष्ट बुद्धिका स्थान मानते हैं यह भी कुछ विशेष विरुद्धता नहीं क्योंकि सबके मतमें दोनोंही बुद्धि और विज्ञानके मुख्य स्थान हैं कि बहुना विज्ञषु इति ॥ इति परिशिष्ट शारीरक भाग।। ३॥ ॥ इति शारीरस्थान परिशिष्ट समाप्त । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बम्बई. - .
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