Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Shri Tandul Vaicharik-prakirnam

Ojha, Ambikadutt · 2010/07

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मुद्रक श्री रामकृष्ण प्रिंटिंग प्रेस, नसीराबाद रोड भजमेर ।

श्री तन्दुल तन्दुल वेयालिय पइण्णं वैचारिक-प्रकीर्णकम् (शुद्ध मूल पाठ, संस्कृत छाया और भावार्थ) निजरिय जरामरणं, वंदित्ता जिणवरं महावीरं । वुच्छं पयएणयमिणं, तंदुल वेयालियं नाम ॥१॥ छाया-निर्जरित जरा मरणं, वन्दित्वा जिनवरं महावीरें । वक्ष्ये प्रकीर्णक मिदं, तन्दुल वैचारिक नाम ॥१॥ भावार्थ-जिन्होने बुढापा और मृत्यु को सर्वथा क्षय कर दिया है तथा जो राग द्वेष का विजय करने वाले सामान्य केवलियों में प्रधान हैं ऐसे श्री भगवान महावीर स्वामी को मन, वचन और काया से धन्दना करके तन्दुल वैचारिक नामक इस प्रकीर्णक को मैं कहूँगा ॥१॥ सुणह गणिए दह दसा वास सयाउस्स जह विभजंति । संकलिए वोगसिए जं चाउं सेसयं होई ॥२॥ छाया-शृणुत गणिते दश दशा, वर्ष शतायुषो यथा विभज्यन्ते । संकलिते व्युत्कृष्टे, यच्चायुष शेषक भवति ॥२॥ भावार्थ-जिसकी आयु सौ वर्ष की है, हिसाब करने पर उस मनुष्य की जिस तरह दश अवस्थाएँ होती है तथा उन दश ही

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अवस्थाओ को एकत्रित करके निकाल देने पर उस मनुष्य की जितनी आयु शेष बच जाती है उसका मैं वर्णन करूँगा, आप उसे सुने ॥२॥
जत्तिय मिचे दिवसे, जत्तिय राई मुहुत्त मुस्सासे । गभमि वसइ जीवो, आहारविहिं य बुच्छामि ॥३॥
छाया-यावन्मात्रान् दिवसान्, यावद्रात्री मुहूर्तोच्छवासान् । गर्भ वसति जीव, श्राहार विधिञ्च वक्ष्यामि ॥३॥
भावार्थ-यह जीव जितने दिन, रात, मुहूर्त और उच्छ्वास तक गर्भ मे निवास करता है तथा वहाँ वह जो आहार
करता है यह सब विषय में बतलाऊँगा ॥३॥
दुषिण अहोरत्त सए संपुगणे, सत्तसत्तरि चेव । गम्भंमि वसइ जीवो, अद्ध महोरत्त मरणं च ॥४॥
छाया--द्वेऽ होरात्रशते सम्पूर्णे, सप्तसप्ततिञ्चैव । गर्म वसति जीवो ऽ द्ध महोरात्र मन्यच्च ॥४॥
भावार्थ-यह जीव २७७॥ दो सौ साढे सतहत्तर दिन रात तक गर्भ मे निवास करता है ॥४॥
ए ए उ अहोरत्ता, णियमा जीवस्स गम्भवासंमि । हीणाहिया उ इत्तो उवघायवसेण जायंति ॥५॥
छाया-एते त्वहोरात्रा , नियमतो जीवस्य गर्भवासे । हीनाधिकास्त्वित उपघात वशेन जायन्ते ॥५॥
भावार्थ-२०७|| दो सौ साढ़े सतहत्तर दिन रात तो निश्चय ही गर्भवास मे लग जाते हैं परन्तु वात पित्तादि दोपो के उत्पन्न
होने पर इन से कम या अधिक अहोरात्र भी कभी कभी गर्भवास मे गुजर जाते हैं ॥५॥
अट्ठ सहस्सा तिरिण उ, सया मुहुत्ताण पएणवीसा य । गभगो वसइ जीओ, णियमा हीणाहिया इत्तो ॥६॥

छाया-अष्टौ सहस्राणि त्रीणि तु, शतानि मुहूर्तानां पञ्चविंशतिं च । गर्भगतो वसति जीवः, नियमाद् हीनाधिकानीत ॥६॥ भावार्थ-जीव आठ हजार तीन सौ पचीस मुहूत तक निश्चय ही गर्भ मे निवास करता है, परन्तु वात आदि के प्रकोप से कम या ज्यादा भी हो सकता है। पहले २७७|| दो सौ साढे सत्तहतर अहोरात्र तक गर्भ में निवास का काल कहा गया है। एक अहोरात्र के ३० मुहूर्त होते हैं, इसलिये २७७॥ अहोरात्र को ३० से गुणन करने पर ८३२५ संख्या होती है, यही मुहूत्तों की संख्या जाननी चाहिये ॥६॥ तिएणेव य कोडीओ, चउदस हवंति सयसहस्साइं । दस चेव सहस्साई, दुरिण सया पएणवीसा य ॥७॥ उस्सासा निस्सासा, इत्तियमित्ता हवंति संकलिया । जीवस्स गम्भवासे, णियमा हीणाहिया इत्तो ॥८॥ छाया-तिस्रश्च कोटयश्चतुर्दश भवन्ति शतसहस्राणि । दश चैव सहस्राणि, वं शते पञ्चविंशतिञ्च ॥७॥ उच्छवासा नि श्वासा, एतावन्मात्रा भवन्ति सङ्कलिता । जीवस्य गर्भवासे, नियमाद् हीनाधिका इतः ॥८॥ भावार्थ-तीन कोटि चौदह लाख दश हजार दो सौ पचीस ३१४१०२२५ उच्छवास निःश्वास तक निश्चय जीव गर्भ में निवास करता है परन्तु वात आदि के दोष से कम ज्यादा होना भी सम्भव है। आशय यह है कि-एक मुहूर्त मे ३७७३ उच्छ्वास निःश्वास होते हैं। इसलिये गर्भवास काल के ८३२५ मुहूतों का ३७७३ से गुणन करने पर ३१४१०२२५ उच्छवास नि श्वासों की संख्या होती है। इसलिये ३१४१०२२५ उच्छवास निःश्वास तक जीव का गर्भ में निवास कहा गया है ||७||

४
पाउसो ! इत्थीए नाभिहिट्ठा, सिरादुगं पुष्फणालियागारं । तस्स य हिट्ठा जोणी, अहोमुहा संठिया कोसा ॥६॥
छाया -आयुष्मन् ! स्त्रिया नाभेरधः, शिराविकं पुष्पनालिकाकारम् । तस्य चाधो योनि , अधोमुखा संस्थिता कोशा ॥३॥
भावार्थ-हे आयुष्मन् गौतम ! स्त्री की नाभि के नीचे फूल की डंडी के समान आकार वाली दो नाडियाँ होती हैं। उन नाडियों के
नीचले भाग में योनि होती है। उस योनि का मुख नीचे की ओर होता है और वह तलवार के म्यान के समान होती है ।।६।।
तस्स य हिट्ठा चूयस्स, मंजरी ( जारिसी ) वारिसा उ मंसस्स । ते रिउकाले फुडिया, सोणियलवया विमोयंति ॥१०॥
छाया-तस्याश्चाधः चूतस्य, मार्यो (यादृश्यः) तादृश्यस्तु मासस्य । ता ऋतुकाले स्फुटिताः, शोणित लवकान् विमुञ्चन्ति ॥१०॥
भावार्थ--उस योनि के नीचे आम की मञ्जरी के समान मांस की मञ्जरी होती है, वह मञ्जरी ऋतुकाल मे फट जाती है, इसलिये
उससे रक्त बिन्दु का पतन होता है ।।१०।।
कोसायारं जोणिं संपत्ता, सुकमीसिया जइया । तइया जीवुववाए, जुग्गा भणिया जिणिंदेहिं ॥११॥
छाया-कोशाकारी योनि सम्प्राप्ताः शुक्रमिश्रिताः यदा । तदा जीवोत्पादे, योग्या भणिता जिनेन्द्रैः ॥११॥
भावार्थ-वे रुधिरबिन्दु पुरुष के संयोग से शुक्रमिश्रित होकर जब कोश के समान आकार वाली स्त्री की योनि में प्रवेश करते हैं,
तब वह स्त्री जीव के उत्पन्न करने योग्य होती है, यह जिनवरों ने कहा है ॥११।।
बारस चेव मुहुत्ता, उवरिं विद्धंस गच्छई, सा उ । जीवाणं परिसंखा, लक्खपुहुत्त य उक्कोसं ॥१२॥

. - १६००००० निव्वत्तइ विणा केसमंसुणा, सहकेसमंसुणा अट्ठाओ रोम क्वकोडीओ.३५०००००० निव्वत्तेइ । अट्ठमे मासे वित्तीकप्पो इवइ ॥ सूत्रं ॥२॥ छाया-तत्प्रथमे मासे कर्पोन पल जायते । द्वितीये मासे पेशी सञ्जायते घना। तृतीये मासे मातुर्दोहदं जनयति । चतुर्थे मासे मातुरङ्गानि प्रीणयति । पञ्च पिण्डिका पाणी पादौ शिरश्चैव निवर्तयति । षष्ठे मासे पित्तशोणित मुपचिनोति । सप्तमे मासे सप्तशिराशतानि पञ्च पेशीशतानि नव धमनीः नवनवतिञ्च रोमकूपशत सहस्राणि निर्वतयति विना केश श्मभिः । सह केशश्मश्रुभि साद्यः रोमकूपकोटीः निर्वर्तयति, अष्टमे मासे निष्पन्नप्रागो भवति । -- . भावार्थ-वह शुक्र और शोणित दिनोदिन बदलता हुआ प्रथम मास में एक कर्प कम एक पल का होजाता है । पाँच गुञ्जा का एक मासा होता है और सोलह मासा का एक कर्प होता है एवं चार कर्प का एक पल होता है। इस प्रकार वह शुक्र शोणित प्रथम मास मे तीन कर्ष का होता है यह जानना चाहिये। दूसरे मास मे वह मांसपिण्ड बन कर घन और समचतुरस्त्र हो जाता है। तीसरे मास में वह माता को दोहद उत्पन्न करता है। चौथे मास मे वह माता के अगों को पुष्ट करता है। पाचवें मास मे दो हाथ दो पैर और शिर उत्पन्न होते हैं। छठे मास मे पित्त और रक्त पुष्ट होता है। सातवें मास में १०० नसे, ५०० पेशी और नौं धमनी उत्पन्न होती हैं तथा शिर के बाल और दाढी मूंछ के रोम कूपो को छोड़कर ६६००००० रोम कूप उत्पन्न होते हैं। यदि शिर के बाल और दाढी मूंछ के कूपों को शामिल करलें तो साढे तीन कोटि रोमकूप उत्पन्न होते हैं। आठवें मांस मे वह गर्भ प्रायः पूर्ण होजाता है । ॥ सूत्र २ ॥ REMEERINEET FELEMERRENER छाया-दादश चैव मुहूर्तान् , उपरि विध्वसं गच्छति सा तु। जीवानी परिसंख्या, लक्षपृथरत्वं चोत्कृष्टम ॥१२॥ भावार्थ-पुरुष के वीर्य से संयुक्त स्त्री की योनि बारह मुहूर्त तक ही अध्वस्त यानी गर्भ धारण करने योग्य रहती है, उसके बाद यानी बारह मुहुर्त के पश्चात् उसको गर्भ धारण की योग्यता नष्ट हो जाती है। स्त्री के गर्भ मे गर्भन जन्तुओ की संख्या दो लाख से लेकर नौ लाख तक की कहीं गई है ॥१२॥ पएणाय परेणं, जोणी पमिलायए महिलियाणं । पणसत्तरिइ परओ, पाएण पुमं भवेऽवीओ ॥१३॥ छाया–पञ्चपञ्चाशयः, परेण योनिः प्रम्लायते महिलानाम् । पञ्चसप्ततिभ्य परतः, प्रायेण पुमान् भवदेवीर्यः ॥१३॥ भावार्थ-५५ वर्ष के बाद स्त्री की योनि गर्भधारण करने योग्य नहीं रहती है तथा ७५ वर्ष के बाद पुरुष भी वीर्य हीन हो जाता है ॥१३॥ वास सयाउय मेयं, परेण जा होइ पुन्चकोडीओ । तस्सद्धे अमिलाया, सब्याउय वीसभागो य ॥१४॥ छाया-वर्पशतायुष्क मेतद्, परेण या भवति पूर्व कोटिः । तस्याद्धे अम्लाना, सर्वायुविंशति भागश्च ॥१४॥ भावार्थ-पूर्व की गाथा मे जो कहा गया है कि-५५ वर्ष के बाद स्त्री की योनि गर्भ धारण करने के योग्य नहीं रहती है और पुरुप भी ७५ वर्ष के बाद वीर्य हीन हो जाता है यह बात आजकल के सौ वर्ष की आयु के हिसाब से समझनी चाहिये । सौं वर्ष से अधिक जिनकी आयु है उन प्राणियों के विषय मे पूर्वोक्त नियम नहीं है किन्तु उनकी आयु के अाधे समय तक स्त्री की योनि गर्भ धारण करने योग्य रहती हैं और पुरुप अपनी आयु के बीसवे भाग में वीर्य हीन होता है यह जानना चाहिये ॥१४॥' tataatatataaHEREITIEHET 1 13633313

१२
छाया-जीवो गर्भगतः सन् किमाहार माहारयति ? गोतम ! या तस्य माता नानाविधा नवरसविकृतीः तिक्तकटु कषायाम्ल मधुराणि
द्रव्याणि आहारयति तत एक देशेन प्रोज आहारयति । तस्य फलन्वृत सदृशी उत्पलनालोपमा भवति नाभिरसहरणी जनन्याः सदा नाभ्या
प्रतिबद्धा नाभ्या तया गर्भ. भोज पादत्रो । भुजानाया ओजसा तस्यां गर्भो विवर्धते यावाज्जात इति ॥ ५ ॥
भावार्थ-हे भगवान् । गर्भ का जीव क्या आहार खाता हैं ? हे गौतम ! गर्भधारण करनेवाली माता जो दूध आदि रसीले
पदार्थ तथा तिक्त, कटु, कसैले, खट्टे और मोठे पदार्थों का आहार करती है उसके अंशभूत शुक्र और शोणित समूह को अथवा माता
के आहार से मिले हुए शोणित को वह गर्भ भक्षण करता है। उस गर्भ का नाभिनाल फल की डंडी और कमल की नाल के समान
होता है। वह नाभि नाल माता की नाभि से सदा ही जुडा हुआ रहता है । उस नाल के द्वारा ही वह गर्भ अोज आहार को ग्रहण करता
है । जब उसकी माता आहार खाने लगती है तब वह गर्भ भी माता के आहार से मिले हुए शुक्र और शोणित रूप अोज आहार को
प्रहण करके वृद्धि को प्राप्त होता है और वृद्धि को प्राप्त होकर जन्म लेता है ॥ ५॥
कइणं भंते ! माउअंगा पएणता ? गोयमा ! तो माउअंगा पएणत्ता, तं जहा-मंसे, सोणिए, मत्थुलुगे। कइणं
भंते पिउभंगा पएणत्ता ? गोयमा ! तो पिउनंगा पएणता, तं जहा–अट्ठि अट्टि मिंजा, केस मंसुरोम नहा ॥ सूत्रं ६ ॥
--
छाया-कत्ति भदन्ता ! मातुरङ्गानि प्रज्ञप्तानि ? गौतम | त्रीणि मातुरङ्गानि प्रज्ञप्तानि तद्यथा मसिं, शोणितं मस्तुलु ग । कति भदन्त
पितुरङ्गानि प्रज्ञप्तानि ? गौतम ! त्रीणि पितुरङ्गानि प्रहप्तानि तद्यथा-अस्थि, अस्थिमिजा, केशश्मत्रु रोमनखा ॥६॥

CINE
ENTERED
जीवस्सणं भंते ! गभगयस्स समाणस्स अस्थि उच्चारेइ बा पासवणेइ वा खेलेइ वा सिंघाणेइ वा वंतेइ वा पिनेइ वा
सुक्कैइ वा सोणिएइ वा ? णो इणढे 'समझे । से केणटुणं भंते ! एवं वुच्चइ जीवस्स णं गभगयस्स समाणस्स नत्थि उच्चारेइ
'बा जाव सोणिएइ वा । गोयमा ! जीवेणं गभगए समाणे जे आहारं आहारेइ तं चिणाइ सोइंदियत्ताए चक्खुरिदियत्ताए
घाणिदियत्ताए जिभिदियत्ताए फासिदियत्ताए अद्विअद्विमिंजकेसमंसुरोमनहत्ताए । से एएणं अटेणं गोयमा ! एवं
बुच्चइ जीवस्स णं गभगयस्स समाणस्स नत्थि उच्चारेड् वा जाव सोणि एइ वा ॥ सूत्रं ३ ॥
+
छाया-जीवस्य भदन्त! गर्भगतस्य सतोऽस्ति उच्चारो वा प्रश्रवणं वा खेलो वा सिघानो का वान्तं वा पित्त वा शुक्र वा शोणितं वा ? नायमर्थः
समर्थः । तत्केनार्थेन भदन्त एव ! मुच्यते जीवस्य गर्भगतस्य सतो नास्ति उच्चारो वा यावत् प्रक्यवणं वा ? गौतम ! जीवः गर्भगत सन् यमाहार-
माहारयति स चिनोति श्रोत्रेन्द्रियतया चक्षुरिन्द्रियतया प्राणेन्द्रियतया जिव्हेन्द्रियतया स्पर्शन्द्रियतया अस्थ्यस्थि मज्जा केशश्मश्रुरोमनख
तया । तद् एतेनार्थेन गौतम ! एव मुच्यते जीवस्य गर्भगतस्य सतो नास्ति उच्चारो यावत्शोणितं वा ॥३॥
SEETTETREPREETTERESER
I
भावार्थ:-हे भगवन् ! गर्भवासी जीव मल मूत्र करता है या नहीं ? तथा उसके खंखार, नाक का मल, वमन, पित्त, वीर्य और
रक्त होते हैं या नहीं ? हे गौतम 'ये सब गर्भवासी जीव के नहीं होते। हे भगवन् ! क्यों नहीं होते ? हे गौतम | गर्भगत जीव जो
आहार करता है वह आहार श्रोत्र,चक्षु, घाण, रसन, स्पर्शेन्द्रिय तथा हड्डी, मजा, केश, दाढ़ी, मूछ, रोम और नखरूप में परिणत हो
जाता है। इसलिए गर्भगत जीव के पूर्वोक्त विष्ठा आदि नहीं होते हैं ॥ ३ ॥

१६ पर्याप्तः पूर्वभविक बैंक्रियलब्धिकः पूर्वभविकावधिज्ञान लब्धिकस्तथारूपस्य श्रमणस्य माहनस्य वा अन्तिक एकमपि आर्य धार्मिकं सुवचन श्रुत्वा निशम्य ततः स भवति तीवसंवेगसजातश्रद्धः तीवधर्मानुरागरक्तः। स जीवो धर्मकामुकः पुण्यकामुकः स्वर्गकामुकः मोक्षकामुकः धर्मकांक्षितः पुण्यकाङ क्षितः स्वर्गकाङक्षित मोक्षकाड क्षितः धर्मपिपासितःपुण्यपिपासितःस्वर्गपिपासितः, मोक्षपिपासितःतचित्तः तन्मनाः तल्लेश्यः तदध्यवसितः तत्तीवाध्यवसायः तदपितकरणः तदर्थोपयुक्तः, तद्भावनाभावितः एतस्मिन्नन्तरे कालं कुर्यात् तदा देवलोकेषत्पदयते । अथैतेनार्थेन हे गौतम ! एवमुच्यते अस्त्येकक उत्पदयते, अस्त्येकको नोत्पद्यते । भावार्थ-हे भगवन् ! क्या गर्भवासी जीव मर कर देवलोक में उत्पन्न होता है ? हे गौतम | कोई उत्पन्न होता है और कोई नहीं होता है। हे भगवन् ! इसका क्या कारण है कि कोई उत्पन्न होता है और कोई नहीं होता है ? हे गौतम | जो जीव संशी पञ्चन्द्रिय है और समस्त पर्यामियों से पूर्ण हो गया है वह पूर्व भव की वैक्रियल ब्धि तथा अवधिज्ञानल ब्धि के द्वारा तथारूप के श्रमण माहन के निकट एक भी आर्य धार्मिक सुन्दर वचन को सुनकर उसके प्रभाव से धर्म का श्रद्धालु हो जाता है और सांसारिक लाखो दुःखो को जानकर उनसे विरक्त हो जाता है। धर्म में तीव्र अनुराग होने से वह उस रङ्ग में रञ्जित हो जाता है। वह जीव धर्म की इच्छा करता है, वह पुण्य की इच्छा करता है। वह स्वर्ग तथा मोक्ष की इच्छा करता है। वह धर्म, पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष मे आसक्त हो जाता है एव धर्म, पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष में उसकी तृप्ति नहीं होती है। उसका मन धर्म पुण्य स्वर्ग और मोक्ष में लगा रहता है एवं इन्हीं विषयों का वह विशेप उपयोग रखता है तथा इन्हीं विषयो के सम्पादन करने का उसका अध्यवसाय होता है। वह तीव्र रूप से इनके लिये प्रयत्न करता है वह इन्हीं विषयों में सदा उपयोग रखता है, वह इन्हीं में अपनी इन्द्रियों को अर्पण कर देता है एवं इनकी भावना से ही वह सदा रञ्जित रहता EVENTERTER 3 TEREsan भावार्थ-हे भगवन् । बालक के कितने अङ्ग माता के अंश से उत्पन्न माने जाते है ? हे गौतम ! बालक के तीन अङ्ग माता के अंश से उत्पन्न माने जाते है जैसे कि-मांस, रक्त और मस्तिष्क । कोई कोई मेद और फिल्फिस आदि को मस्तुलुग कहते हैं, मस्तिष्क को नहीं। हे भगवन । बालक के कितने अन पिता के अंश शुक्र से उत्पन्न माने जाते है ? हे गौतम । तीन अङ्ग पिता के अंश से उत्पन्न माने जाते हैं। जैसे कि-इद्री और हड्डी के मध्य मे रहने वाली मज्जा एव शिर के बाल, दाढी, मूछ, रोम और नख । बाकी के श्राङ्ग सब माता और पिता दोनो के अश से मिश्रित माने जाते है ।।६।। जीवेणं भंते ! गभगए समाणे नेरइएसु उवव अिज्जा ? गोयमा! अत्थेगइए उववजिजा अत्थेगइए णो उववजिजा।से केणद्वेणं भंते एवं बुचइ-जीवेणं गभगए समाणे नेरइएसु अत्थेगइए उबवजिजा, अत्थेगइए णो उववज्जिज्जा । गोयमा ! जेणं जीवे गभगए समाणे सरणी पंचिदिए सव्वाहिं पज्जत्तीहिं पज्जत्तए चीरियलद्धीए विभंगणाणलद्धीए विउब्वियलद्धीए विउ- वियलद्धीपचे पराणीयं आगयं सुच्चा णिसम्म पएसे निच्छुहइ निच्छुहित्ता विउब्वियसमुग्धाएणं समोहणइ समोहणित्ता चाउरंगिणी सिएणं सरणाहेइ सरणाहित्ता पराणीएणं सद्धिं संगाम संगामेइ, सेणं जीवे अत्थकामए रज्जकामए भोगकामए कामकामए, अत्थकखिए रज्जकंखिए भोगकंखिए कामकंखिए अत्थपिवासिए भोग रज्जकाम पिबासिए तच्चिचे तम्मणे तल्लेस्से तयज्झवसिए तत्तियज्झवसाणे तयट्ठोवउत्ते तदप्पियकरणे तव्भावणा भाविए एयंसि च णं (चे ) अंतरंसि कालं करिज्जा णेरइएसु उववज्जिज्जा । से एएणं अद्वेणं एवं बुच्चइ जीवेणं गभगए समाणे णेरइएसु अत्थेगइए उववज्जिज्जा अत्थेगइए णो उववज्जिज्जा गोयमा ! ॥ सूत्रम् ७ ॥ TRIES SETTE १७ है। ऐसे समय में मृत्यु को प्राप्त हो कर वह जीव देवलोक में उत्पन्न होता है इसी कारण मैंने यह कहा है कि-हे गौतम.! कोई गर्भगत जीव स्वर्गलोक में उत्पन्न होता है और कोई नहीं होता है ॥८॥ जीवेणं भंते ! गभगए समाणे उत्ताणए वा पासिल्लए वा अंबखुज्जएवा अच्छिज्ज वा चिट्ठिज्ज वा निसीज्ज वा तुयट्टिज्ज वा श्रासइज्ज वा माउए सुयमाणीए सुयइ जागरमाणीए जागरइ सुहियाए सुहिनो हवइ दुहियाए दुहिओ (दुक्खिो) हवइ ? हंता गोयमा ! जीवेणं गभगए समाणे उताणए वा जाव दुहिश्रो (दुक्खिो) हवइ ॥ सूत्र ६ ॥ छाया-जीवो मदन्त ! गर्भगतः सन् उत्तानको वा पार्श्वशायी वा आम्रकुन्जको वा आसीत वा तिष्ठेद्वा निपीदेवा त्वग्वर्तयेद्वा श्राश्रयति वा शयीत वा मातरि शयानात्या शेते जाग्रयां जागर्ति वा सुखितायां सुखितो भवति दुखितायां दुखितो भवति ? हन्त ! गौतम ! जीवो गर्भगतः सन् उत्तानको वा यावत् दु खितो भवति ॥ ६॥ भावार्थ-हे भगवान् । गर्भ मे रहा हुआ जीव कभी उत्तान होकर रहता है या नहीं तथा वह कभी बगल से सोकर रहता नहीं एव वह कभी आम्रफल की तरह झुककर रहता है या नहीं ? वह कभी बैठता है या नहीं ? कभी लेटता है या नहीं तथा वह कभी करवटें बदलता है या नहीं ? वह गर्भ के मध्यप्रदेश मे आता है या नहीं ? वह कभी सोता है या नहीं ? वह माता के शयन करने पर सोता है या नहीं तथा उसके जागने पर जागता है या नहीं ? वह माता के सुख से सुखी और दुःख से दुःखी होता है या नहीं ? उत्तर- हाँ, गौतम | गर्भगत जीव ये पूर्वोक्त सभी बातें करता है। थिरजाय विहु रक्खइ, सम्म सारक्खई तो जणणी । संवाहई तुयदृइ, रक्खा अप्पय गम्भं यः॥१८॥ या PERTERESTERNET

१८
छाया-स्थिरजातमपि रक्षति, सम्यक संरक्षति ततो जननी । संवहति त्वग्वर्तयति रक्षत्यात्मानञ्च गर्भञ्च ॥१८॥
भावार्थ-जब गर्भ स्थिर होजाता है तब माता उसकी रक्षा करती है। वह उसकी रक्षा के लिये विशेष प्रयत्न करती है। वह उसे लेकर
जाती आती है, उसे सुलाती है और आहार खिलाकर अपनी तथा गर्भ की भी रक्षा करती है।
अणुसुयह सुयंतीए, जागरमाणीए जागरइ गब्भो । सुहियाए होइ सुहिओ, दुहियाए दुहिरो होइ ॥१६॥
छाया-अनुशेते शयानायो, जाग्रत्या जागर्ति गर्मः । सुखितायो भवति सुखितः, दु खितायो दुःखितो भवति ॥१६॥
भावार्थ-जब माता सोती है तब गर्भ भी सोता है और माता के जागने पर वह भी जागता रहता है। जब माता दुःखित होती है
तब गर्भ भी दुःखित होता है और जब वह सुखी होती है तब गर्भ भी सुखी रहता है ॥१६॥
उच्चारे पासवणे खेलं, सिंघाणो वि से पत्थि । अट्ठीट्ठी मिज्जणह, केस मंसु रोमेसु परिणामो ॥२०॥
छाया-उच्चारः प्रश्नवणं खेलो, सिंघानकोऽपि तस्य नास्ति । अस्थ्यस्थि मज्जा नखकेशश्मश्रु रोमसु परिणाम. ॥२०॥
भावार्थ-उस गर्भ के जीव मे मल मूत्र थूक नाक का मल नहीं होते हैं। वह जो आहार करता है वह हड़ी, हड्डी की मजा, नख,
केश, दाढी मूंछ और रोम के रूप मे परिणत हो जाता है ।।२०।।
HERERERENTERTIES
एवं बुदिमइगो, गम्भे संचसइ दुक्खिनो जीवो । परम तमिसंधयारे, अमिज्झभरिए पएसम्मि ॥२१॥

१६ छाया-एवं शरीर मतिगतो, गर्भे संवसति दुःखितो जीवः परमतमिस्रान्धकारे अमेध्यभृते प्रदेशे ॥२१॥ भावार्थ-इस प्रकार शरीर को प्राप्त होकर जीव गर्भ मे बहुत कष्ट के साथ निवास करता है। गर्भ में घोर अन्धकार रहता है और वह अपवित्र पदार्थों से भरा हुआ होता है। पाउसो ! तो नवमे मासे तीए वा पडुपएणे वा अणागए वा चउएहं माया अएणयरं पयायइ । तंजहा-इत्थिं वा इत्थिरवेणं । पुरिसं वा पुरिसरूवेणं । नपुंसर्ग वा नपुंसगरूवेणं । विवं वा विवस्त्रेणं ॥ सूत्रं १०॥ छाया-आयुष्मन् ! ततो नवमे मासेऽतीते वा प्रत्युत्पन्ने वा अनागते वा चतुर्णा माता अन्यतरं प्रजायते तद् यथा-स्त्रियं वा स्त्रीरूपेण, पुरुष वा पुरुष रूपेण, नपुंसकं वा नपुंसक रूपेण, बिम्ब वा बिम्बरूपेण । भावार्थ-हे आयुष्मन् । आठ मास के पश्चात् जब नवम मास व्यतीत होजाता है अथवा जब वर्तमान रहता है अथवा जब आने वाला होता है तब माता चार मे से किसी एक को उत्पन्न करती है। जैसे कि स्त्री के रूप मे स्त्री को, अथवा पुरुष के रूप में पुरुप को अथवा नपुसक के रूप मे नपुंसक को अथवा मास पिण्ड के रूप में मांस पिण्ड को। 国家图 अप्पं सुक बहु उउयं, इत्थी तत्थ जायइ । अप्पं उयं बहुसुक्क पुरिसो तत्थ जायइ ॥२२॥ छाया-अल्पं शुक्रं बहु आर्तवं, स्त्री तत्र जायते । अल्पमार्तवं वहु शुक्रं पुरुषस्तत्र जायते ॥२२॥ भावार्थ-जब स्त्री का आर्तव यानी रक्त अधिक और पुरुष का वीर्य अल्प होता है तब स्त्री की उत्पत्ति होती है और जब TREEEETTEER

२०
स्त्री का रक्त अल्प और पुरुष का वीर्य अधिक होता है तब पुरुप की उत्पत्ति होती है।
दुण्डं वि रत्तसुक्काणं, तुल्लभावे नपुंसगो । इत्थिउयसमाओगे, विधं तत्थ जायइ ॥२३॥
छाया-द्वयोरपि रक्त शुक्रयोः, तुल्यभावे नपुसकः । स्त्र्योजः समायोगे बिम्बं तत्र जायते ।
भाथ-जब शुक्र और शोणित दोनों ही बरावर होते हैं तब नपुंसक उत्पन्न होता है तथा जब स्त्री का रक्त वायु के कारण
जम जाता है तब विम्ब यानी' मां सके पिण्ड की तरह बिम्ब उत्पन्न होता है।
अह णं पसवणकाल समयरिम सीसेण वा पाएहिं वा आगच्छइ समागच्छइ तिरियमागच्छइ विणिग्याय
मावजइ ॥सूत्रं ११॥
छाया-अथ प्रसवकालसमये शीर्षण वा पादाभ्यो वा आगच्छति समागच्छति तिर्यगागच्छति विनिघात मापदयते ।
भावार्थ-जो जीव प्रसव के समय शिर से या पैरों से निकलता है वह बिना बाधा के निकल जाता है परन्तु जो तिरछा,
होकर निकलता है वह मर जाता है।
HRESTER
JETER
कोई पुण पावकारी, वारस संवच्छराई उक्कोसं । अच्छइ उ गभवासे, असुइप्पभवे असुइयम्मि ॥२४॥
छाया-कोऽपि पुन पापकारी, द्वादशसवत्सराणि उत्कृष्ट । तिष्ठति तु गर्भवासे, अशचिप्रभवेऽशुचिके ॥२४॥

BETEJEETE भावार्थ-जिसमें अगुचि उत्पन्न होती है और जो अशुचिरूप है ऐसे गर्भ में कोई पापी जीव उत्कृष्ठ बारह वर्ष तक निवास करता है। जायमाणस्स जं दुक्खं, मरमाणस्स वा पुणो । तेण दुक्खेण संमूढो, जाइं सरइ णाप्पणो ॥२५॥ छाया-जायमानस्य यदुःख, म्रियमाणस्य वा पुनः । तेन दु खेन संमूढो, जातिं स्मरति नात्मनः ॥२५॥ भावार्थ-गर्भ से बाहर निकलते समय तथा मरण के समय प्राणी को जो दुःख होता है उससे मूढ बना हुआ प्राणी अपने पूर्व जन्म को स्मरण नहीं कर सकता है। वीसरसरं रसंतो जो सो, जोणी मुहाश्रो निप्फिडइ । माऊए अप्पणोऽवि य वेयणमउलं जणेमाणो ॥२६॥ छाया–विस्वरस्वरं रसन् यः स, योनिमुखानिष्कामति । मातुरात्मनश्च वेदनामतुला जनयन् ॥२६॥ भावार्थ-करुणाजनक शब्दों मे रुदन करता हुआ जीव योनिद्वार से बाहर निकलता है । वह माता को अत्यन्त पीड़ा उत्पन्न करता है तथा स्वयं भी पीडा अनुभव करता है। गभधरयम्मि जीवो, कुंभीपागम्मि णरयसंकासे । वुत्थो अमिज्झमज्झे, असुइप्पभवे असुइयम्मि ॥२७॥ छाया-गर्भगृहे जीवः, कुम्भीपाके नरकसकाशे । स्थितोऽमेध्यमध्ये, अशुचिप्रभवे अशचिके ॥२७॥ भावार्थ-गर्भ रूप गृह कुम्भीपाक नरक के समान है। वह स्वयं अशुचि है और अशुचि को ही उत्पन्न करता है। उममें जीव अपवित्र पदार्थों के मध्य में निवास करता है। ITTE FREE २२ पित्तस्स य सिंभस्स य, सुक्कस्स य सोणियस्स चि य मज्झे । मुत्तस्स पुरीसस्स य, जायइ जह बच्चकिमिउव्य ॥२८॥ छाया-पित्तस्य च श्लेष्मणश्च, शुक्ररय च शोणितस्य च मध्ये । मूत्रस्य च पुरीपस्य च, जायते वर्चस्वकृमिरिव ॥२८॥ भावार्थ-जैसे उदर में स्थित विष्ठा में कीड़े उत्पन्न होते हैं उसी तरह यह जीव पित्त, कफ, शुक्र, शोणित, मूत्र और विष्ठा के मध्य मे उत्पन्न होता है। तं दाणिं सोयकरणं, केरिसर्य होइ तस्स जीवस्स । सुकरुहिरागराओ जस्सुप्पत्ती सरीरस्स ॥२६॥ छाया-तदिदानी शौच करणं, कीदृश भवति तस्य जीवस्य । शुक्र रुधिराकरात् यस्योत्पत्ति शरीरस्य ॥२६॥ भावार्थ -जिसकी उत्पत्ति शुक्र और रक्त के भण्डार से हुई है उस शरीर की शुद्धि किस तरह की जा सकती है ? एयारिसे सरीरे, कलमलभरिए अमिझ संभूए । णिययं विगणिजंतं, सोयमयं केरिसं तस्स ॥३०॥ छाया-एतादृशे शरीरे, कलमलभृते अमेध्य संभूते । निजके जुगुप्सनीये शौचमदं कीदृश तस्य ॥३०॥ भावार्थ —यह शरीर मल से परिपूर्ण है और अपवित्र पदार्थों से उत्पन्न हुआ है। इसमे खुद अपने को और दूसरे को भी घृणा उत्पन्न होती है फिर इसके शुद्ध होने का गर्व करना कैसा ? । पाउसो! एवं जायस्स जंतुस्स कमेण दस दसा एवमाहिजंति । तंजहा- चाला, किड्डा, मंदा, बला य पण्णा य हायणि पवंचा । पन्भारा मुम्मुही, सायणी दसमा य कालदसा ॥३१॥ SHETTE REATERTERESE २३ छाया-पायुप्मन् ! एवं जातस्य जन्तोः क्रमेण दश दशाः एवमारव्यायन्ते । तद्यथाः- वाला, क्रीडा, मन्दा, चला च प्रज्ञा, हापनी, प्रपञ्चा । प्रारभारा, मुन्मुखी, शायिनी दशमी च कालदशा ॥३१॥ भावार्थ हे आयुष्मन् । पहले कहे अनुसार गर्भ से उत्पन्न जीव की क्रमश दश दशाएं होती है उनके नाम ये हैं- (१) बाला (२) क्रीडा (३) मन्दा (४) बला (५) प्रज्ञा (६) हापनी (७) प्रपञ्चा (८) प्राग्भारा (६) मुन्मुखी (१०) और शायिनी । ये प्रत्येक दशाएं दश दश वर्ष की होती हैं। जायमित्तस्स जंतुस्य, जा सा पढमिया दसा । न तत्थ सुहं दुक्खं वा, न हु जाणंति बालया ॥ ३२ ॥ छाया-जातमात्रस्य जन्तोर्यासा प्राथमिकी दशा । न तत्र सुखं दुःख वा, न हि जानन्ति बालकाः ॥३२॥ भावार्थ-उत्पन्न होने के समय से लेकर दश वर्ष पर्यन्त जो जीव की पहली दशा होती है उसमे बालक अपने तथा दसरे के सुख दुःख को नहीं जानते हैं । परन्तु जातिस्मरण ज्ञान जिनको होता है वे जानते हैं। बीईयं य दसं पत्तो, णाणा कीलाहिं कीडइ । ण य से काम भोगेसु, तिव्या उप्पज्जई रई ॥३३॥ छाया-द्वितीयाञ्च दशा प्राप्तो, नानाक्रीडाभिः क्रीडति । न च तस्य काम भोगेषु, तीनोत्पद्यते रतिः ॥३३॥ भावार्थ-जीव जब दूसरी अवस्था को प्राप्त होता है तब नाना प्रकार की क्रीड़ाओ मे आसक्त होकर क्रीड़ा करता है। उस समय रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द रूप विषयों के भोग की इच्छा उसकी तीव्र नहीं होती है।

२४ तइयं य दस पत्तो, पंच काम गुणे णरो । समत्थो भुजिउं भोए, जइ से अत्थि घरे धुवा ॥३४॥. छाया-तृतीयाञ्च दशा प्राप्तः, पञ्च कामगुणन्निरः । समर्थो भोक्तु भोगान् , यदि तस्यास्ति गृहे ध्रुवा ॥३४॥ भावार्थ-तृतीय अवस्था को प्राप्त होकर जीव रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द इन पॉच ही विपयों में आसक्त होता है और वह इन्हें भोग सकता है यदि उसके घर में समृद्धि विद्यमान हो। चउत्थी उ बला णाम, जं णरो दसमस्सिओ । समत्थो बलं दरिसेउं, जइ भवे निरुववो ॥३॥ छाया-चतुर्थी तु बला नाम, यो नरो दशा माश्रित । समर्थो बलं दर्शयितु, यदि भवेनिरुपद्रवः ॥३५॥ भावार्थ-चौथी दशा का का नाम बला है, उसको प्राप्त होकर जीव अपना बल दूसरे को दिखा सकता है, यदि वह नीरोग हो । पंचमी उ दसं पत्तो, आणुपुबीए जो णरो । समत्थोऽत्थं विचिंतेउं, कुडुबं चाभिगच्छइ ॥३६॥ छाया–पञ्चमी तु दशा प्राप्तः, भानुपूर्व्या यो नरः । समर्थोऽर्थे विचिन्तयितु, कुटुम्बञ्चाभिगच्छति ॥३६॥ भावार्थ-मनुष्य पाचवी दशा को प्राप्त होकर द्रव्य की चिन्ता करता है और कुटुम्ब की चिन्ता मे निमग्न होता है। छट्ठी उ हापणी णामा, जं णरो दसमस्सियो । विरज्जइ उ कामेसु, इंदिएसु य हायइ ॥३७॥ छाया-षष्ठी तु हापनी नाम्नी, यो नरो दशामाश्रित । विरज्यते च कामेपु, इन्द्रियेषु च हीयते । भावार्थ-छठी दशा का नाम हापनी है। इस दशा को प्राप्त होकर मनुष्य विषय भोग से विरक्त हो जाता है और उसकी इन्द्रियाँ भी बलहीन हो जाती हैं। TECRETERTERE २५ । सत्तमी य पवंचा उ, जं नरो दसमस्सिओ। निच्छुभइ चिक्कणं खेल, खासई य खणे खणे ॥३८॥ छाया-सप्तमी च प्रपञ्चा तु, यो नरो दशा माश्रितः । निक्षिपति चिक्वण श्लेष्माणं, कासते च क्षणे क्षणे ॥३८॥ भावार्थ-सातवीं दशा प्रपश्चा कहलाती है । इसके आने पर मनुष्य चिकना कफ मुख से बाहर फेंकता रहता है और क्षण क्षण मे खासता रहता है। संकुइयवली चम्मो, संपत्तो अट्ठमी दसं । नारीणं य अणिट्ठो य, जराए परिणामित्रो ॥३६॥ छाया-सङ्क,चित वलिचर्मा, सम्प्राप्तोऽष्टमी दशा । नारीणाञ्चानिष्टश्च, जरया परिणामितः ॥३६॥ भावार्थ-यह मनुष्य जब आठवीं दशा को प्राप्त होता है तब उसके शरीर का चमड़ा सकुचित हो जाता है और अत्यन्त वृद्धता को प्राप्त होकर स्त्रियो का अप्रिय होजाता है नवमी मुम्मुही नाम, जं नरो दसमस्सियो । जराघरे विणस्सते, जीवो वसइ अकामओ ॥४०॥ छाया-नवमी मुन्मुखी नाम्नी, या नरो दशा माश्रितः । जरागृहे विनश्यति, जीवो वसत्यकामतः ॥४०॥ भावार्थ-नवमी दशा का नाम मुन्मुखी है। इस दशा को प्राप्त होकर जीव विषय की इच्छा से रहित हो जाता है और शरीर वृद्धता का घर होकर नष्ट प्राय हो जाता है। -- + REETENER । हीण भिएणसरो दीणो, चिवरीओ विचित्तो । दुबलो दुक्खिओ सुयई, संपत्तो दसमी दसं ॥४१॥ ' छाया-हीन मिनस्वरो दीनो, विपरीतो विचित्तकः । दुर्बलो दुःखितः स्वपिति, सम्प्रातो दशमी दशाम् ॥४१॥ - २६ REFERENEREFERENERENET भावार्थ-दशवी दशा के आने पर मनुष्य का स्वर, हीन और दूसरी तरह का हो जाता है । वह दीन बन जाता है तथा उसका चित्त भी पहले के समान नहीं रहता। वह दुर्बल और दुःखी होकर सोता रहता है। दसगस्स उवक्खेवो, वीसइवरिसो उ गिण्हई विज्ज । भोगा य तीसगस्स य, चत्तालीसस्स विएणाणं ॥४२॥ छाया-दशकत्यौपत्तेपः, विंशतिवर्षस्तु गृह्णाति विदाँ । भोगाश्च शिशक्तस्य, चत्वारिंशकस्य विज्ञानम् ॥४२॥ भावार्थ-मनुष्य जब दश वर्ष का होता है तब उसका मुण्डन एवं उस अवस्था के योग्य दूसरे उत्सव आदि किये जाते हैं। जब वह वीस वर्ष का होता है तब विद्या का ग्रहण करता है एवं तीस वर्ष का होने पर भोगों को भोगता है और चालीस वर्ष का होकर विज्ञान से युक्त होता है। पएणासगस्स चक्खू हायइ, सट्टिक्यस्स बाहुबलं । भोगा य सत्तरिस्स य, असीइगस्स य विएणायं ॥४३॥ छाया-पञ्चाशत्कस्य चतहीयते, षष्टिकस्य बाहुबलं । भोगाश्च सप्ततिकस्य, अशीतिकस्य च विज्ञानम् ॥४३॥ भावार्थ-मनुष्य जब पचास वर्ष का होता है तब उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है और जब साठ वर्ष का होता है तब उसका बाहुबल घट जाता है। जब वह सत्तर वर्ष का होता है तब भोग भोगने की शक्ति जाती रहती है और अस्मी वर्ष का होने पर ज्ञान शक्ति अल्प हो जाती है। नई नमइ सरीरं, बाससए जीविरं चयइ । कित्तिो ऽत्थ सुहो भागो, दुहो भागो य कित्तिश्रो ॥४४॥ छाया-नवतिकस्य नमति शरीरं, वर्ष शते जीवितं त्यजति । कीर्तितोऽत्र सुखभागः, दुःखभागश्च कीर्तितः ॥४४॥ भावार्थ-यह मनुष्य जब नव्वे वर्ष का होता है तब उसका शरीर नम जाता है यानी झुक जाता है और सौ वर्ष का होकर मर FREERREREST SHEREREDETERENCENE SHERE जाता है । इस सौ वर्ष की आयु में कितना भाग सुख का है और कितना दुःख का है यह यतला दिया गया है जो वाससयं जीवड, सुही भोगे पभुजइ । तस्सावि सेविङ सेमो, धम्मो य जिणदेसिलो ॥४॥ छाया-यः वर्षशतं जीवति, सुखी भोगान् भुड ते । तस्यापि सेवितु श्रेयः, धर्मश्च जिनदेशितः ॥ भावार्थ-जो मनुष्य सौ वर्ष तक जीता है और सुखी है तथा भोगों को भोगता है उसको भी जिनभाषित धर्म का सेवन करना ही कल्याणकारक है। किं पुण सपच्चवाए, जो नरो निच्चदुक्खियो। सुदु यरं तेण कायब्बो, धम्मो य जिणदेसिओ ॥४६॥ छाया-किं पुनः सप्रत्यवाये, यो नरो नित्य दुःखितः । सुष्ठुतरस्तेन कर्त्तव्यः, धर्मश्च जिनदेशितः ॥४६॥ भावार्थ-जिनकी आयु कष्ट से पूर्ण है तथा जो सदा दुःखी रहता है उसके लिये तो कहना ही क्या है ? उसको तो भलीभाँति जिनभाषित धर्म का आचरण करना ही चाहिये। णंदमाणो चरे धम्म, वरं मे लट्ठतरं भवे । अणंदमाणो वि चरे धम्म, मा मे पावयरं भवे ॥४७॥ छाया-नन्दमानश्चरेद्धर्म, वरं मे लष्टतरं भवेत् । अनन्दनपि चरेद्धर्म, मा मे पापतरं भवेत् ॥४७॥ भावार्थ-सांसारिक सुख का उपभोग करता हुआ भी मनुष्य कल्याणकारी जिनभाषित धर्म का आरचण करे। वह यह विचार करे कि यह धर्म आचरण मुझको इस भव में तथा परभव मे सुख देगा। एवं दुःख भोगने समय भी मनुष्य धर्म का आचरण करे । वह यह विचार करे कि-मैंने धर्म का आचरण नहीं किया था इसलिये मुझको यह दुःख भोगना पड़ता है। अब यदि धर्म नहीं करूँगा तो 333333333333 आगे चलकर फिर वहाँ दुःख भोगना पडेगा। णवि जाई कुलं वावि, विजा वावि सुसिक्खिया । तारे नरं व नारी वा, सव्वं पुराणेहि वड्ढई ॥४८॥ छाया-नापि जातिः कुलं वापि, विद्या वापि सुशिक्षिता । तारयेनरं वा नारौं वा, सर्व पुण्येन वर्धते ॥४८॥ भावार्थ-जाति, कुल तथा परिश्रम के साथ सीखी हुई विद्या ये कोई भी नर और नारी को संसार से पार करने में समर्थ नहीं होते किन्तु सब प्रकार का सुख पुण्य से प्राप्त होता है। पुण्णेहिं हीयमाणेहिं, पुरिसागारो वि हायई । पुराणेहिं वड्डमाणेहिं पुरिसागारो वि चड्ढई॥४६॥ छाया-पुण्यहीयमानैः, पुरुषकारोऽपि हीयते । पुण्यैर्वर्धमानः, पुरुषकारोऽपि वर्धते ।।४६!! भावार्थ-पुण्य के क्षय होने पर यश, कीर्ति, लक्ष्मी और पुरुष का अभिमान ये सभी नष्ट हो जाते हैं और पुण्य की वृद्धि होने पर इन सब की वृद्धि होती है। पुण्णाई खलु आउसो ! किच्चाई करणिज्जाई पीइकराई वएणकराई धरणकराइ कित्तिकराई, णो य खलु अाउसो ! एवं चिंतियव्य-एस्संति खलु बहवे समया, आवलिया, खणा, प्राणपाण , थोवा, लवा, मुहत्ता, दिवसा, अहोरत्ता, पक्खा, मासा, रिऊ, अयणा, संवच्छरा, जुग्गा, वाससया, वाससहस्सा, वाससयसहस्मा, वामकोडीओ, वासकोडाकोडीओ। जत्थ णं अम्हे बहूइ सीलाई वयाई गुणाई' वेरमणाई पचक्खाणाई पोसहोववासाई पडिबज्जिस्सामो, पट्टविस्सामो HEREREREREGERMEREGERMEREREDGEETEE 1 HERE करिस्सामो ता किमत्थं श्राउसो! नो एवं चिंतेयव्वं भवड ? अंतरायबहुले खलु अयं जीविए इमे बढे वाइयपित्तिय सिभिय संनिवाइया विविहा रोगायंका फुसंति जीवियं ॥ सूत्र १३ ॥ -- STERESTERNETREETERERNETTERTREERRIERREETERNET छाया-पण्यानि खल-अायुष्मन् । कृत्यानि करणीयानि प्रीतिकराणि वर्णकराणि धनकराणि कीर्तिकराणि । न च खल आयुष्मन् । एवं चिन्तितव्यं-एष्यन्ति खलु · बहवः समया श्रावलिकाः क्षणाः आणप्राणां स्तोकाः लवा मुहूर्ताः दिवसाः अहोरात्राः पक्षा' मासा ऋतवः अयनाः संवत्सरा युगाः वर्षशतं वर्षसहस्र वर्षशतसहस्र वर्षकोटिः वर्पकोटिकोटि । यत्र वयं बहूनि शीलानि ब्रतानि गुणान् विरमणानि 'प्रत्याख्यानानि - पौषघोपवासान् प्रतिपत्स्यामहे प्रस्थापयिष्यामः करिष्यामः । तत् किमर्थ मायुष्मन् । नो एव चिन्तितव्यं भवति ? अन्तरायवहुलं खल्वेतज्जीवितं इमे बहवः वातिक पैतिक श्लैष्मिक सानिपातिकाः विविधाः रोगातका स्पृशन्ति जीवितम् । भावार्थ-हे आयुष्मन् । पुण्य कार्य करना चाहिये, वह करने योग्य है। पुण्य करने से मित्र आदि के साथ प्रेम की वृद्धि होती है। जगत् में प्रशंसा होती है, धन की वृद्धि होती है, कीर्ति होती है। यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि-बहुत समय, आवलिका, क्षण, श्वासोच्छवास, स्तोक, लव, मुहूर्त. दिन, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, सौ वर्प, हजार वर्ष, लाख वर्ष, कोटि वर्ष, कोटि-कोटि वर्प आने वाले हैं, उनमे हम बहुत शील, व्रत, गुण, विरमण, प्रत्याख्यान और पौषधोपवास अंगीकार कर लेंगे और आचरण कर लेंगे। हे आयुष्मन् । ऐसा नहीं सोचने का कारण यह है कि यह जीवन विघ्नों से भरा हुआ है। ये वात, पित्त, कफ और सेन्निपात से उत्पन्न होने वाले रोग सभी मनुष्यों को उत्पन्न होते रहते हैं।

Kama ३० ETEENER आसीय खलु आउसो ! पुन्नि मणुया ववगयरोगायंका बहुवाससयसहस्सजीविणो, तंजहा-जुयलधम्मिया, अरिहंता वा चकवट्टी वा बलदेवा वा वासुदेवा वा चारणा विज्जाहरा। तेणं मणुया अणइवरसोमचारुरुवा भोगुत्तमा भोगलक्षण- धरा सुजायसव्वंगसुंदरा रतु प्पलपउम कर चरण कोमलंगुलितला नगनगरमगर सागरचक्कंकधरंकलक्खणकियतला सुप्पइट्ठियकुम्मचारुचलणा श्राणुपुचि सुजायपीवरंगुलिया उन्नयतणुसंवनिद्धनहा संठियसुसिलिट्ठगूढगुप्फा एणी कुरुषि- दावत्त वडाणुपुत्वजंघा समुग्गनिमग्ग गूढजाण गयस सण सुजायसंन्निभोरू वरवारणमत्ततुल्लविकमविलासियगई सुजाय- वरतुरय गुज्झ देमा श्राइण्ण हयन्व निरुवलेवा पमुइयवरतुरय सीह अइरेगवट्टियकडी साहय सोणंद मुसलदप्पण निगरिय- वरकणगच्छरु सरिसवरवडरवलिय मझा गंगावत पयाहिणावा तरंगभंगुर रविकिरण तरुणबोहियविकोसायंत पउमगंभी- रवियडनाभी उजुयसमसहिय सुजायजायजच्च तणुकसिण निद्ध आइज्जलडह सुकुमाल मउयरमणिजरोमराई झमविहग- सुजायपीण कुच्छीझसोयरा पउमवियडनाभी संगयपासा सन्नयपासा सुंदरपासा सुजायपासा मियमाईयपीणरईयपासा अकरंडुयकणय रुयगनिम्मल सुजायनिरुवहयदेहधारी पसत्थवचीसलक्खणधरा कणगसिलायलुञ्जल पसत्य समतल उव- चियविच्छिन्नपिहुलवच्छा सिरिवच्छं कियवच्छा पुरवरफलिहवट्टिय भुया भुयगीसरउिउल भोग आयाणफलिह उच्छूढदीवाहू जुगसंनिम पीणरइय पीवरपउद्या संठियउवचिय घणथिरसुबद्ध सुवट्टसुसिलिट्ठ लट्ठपव्वसंधी रचतलोवचिय मउय मंसल सुजाय लक्खणपसत्थ अच्छिद्दजालपाणी पीवरवट्टियसुजाय कोमलवरंगुलिया तंवतलिण सुइरुइरनिद्धनक्खा चंदपाणिलेहा सूरपाणिलेहा संखपाणिलेहा चक्कपाणिलेहा सुत्थियपाणिलेहा ससिरविसंखचकसुत्थियसुविभत्तसुविरइयपाणिलेहा NEERENERREREMETEREST वरमहिसवराह सीह सद्दल उसभनागवर विउल उन्नय मउपक्खंधा चउरंगुल सुप्पमाण कंबुवर सरिस गीवा अवट्टिय- सुविभत्तचित्त मंसू मंसल संठियपसत्य सद्दल विउल हणुया ओयविय सिलप्पवाल विवफल सन्निभाधरुट्ठा पंडुर ससिसगल- विमल निम्मल संखगोक्खीर कुद दगरयमणालियाधवलदंतसेढी अखंड दंता अफुडियदंता अविरलदंता सुणिद्धदंता सुजायदंता एगदंता सेढीविच अणेगर्दता हुयवहनिद्रुतधोय तत्त तवणिज्ज रत्ततलतालुजीहा सारसनवथणिय महुगभीर कुचनिग्धोसदु'दुहिसरा गरुलायय उज्जुतु'गनासा अवदारियडरीयवयणा कोकासियधवलपुंडरीयपचलच्छा आनामिय- चावरुइल किएह चिहुरराई सुसंठिय संगय आयय सुजाय भुमया अल्लीणपमाण जुत्तसवणा सुसवणां पीणमंसल कवोल- देसभागा अडरुग्गाय समग्गसुनिद्ध चंदद्ध संठियनिडाला उडुवइपडिपुन्नसोमवयणा छत्लागारुत्तमंगदेसा घणनिचिय सुवद्धलक्खणुन्नयकूडागारनिभ निरुवमपिडियग्गसिरा हुयवहनितधोयतत्ततवणिज्ज केसंतकेसभूमी सामली बोंडघण- निचियच्छोडिय मिउविसय सुहुमलक्खण पसत्थ सुगंधि सुदरभुयमोयगभिंगनीलकज्जल पहट्ठभमरगणनिद्धनिउरंबनिचिय- कुंचिय पयाहिणावत्तमुद्धसिरया लक्खणवंजण गुणोववेया माणुम्माणपमाण पडिपुन सुजायसव्वंगसुदररंगा ससिसोमागार- कंतपियदसणा सब्भावसिंगारचारुरुवा पासाईया दरिस णिज्जा अभिरूवा पडिरूवा, तेणं मणुया श्रोहस्सरा मेहस्सरा हंसस्सरा कोंचस्सरा णंदिस्सरा एंदिघोसा सीहस्सरा सीह घोसा मंजुस्सरा मंजुघोसा सुस्सरा सुस्सर घोसा अणुलोमवाउ वेगा कंकग्गहणी कवोयपरिणामा सउणीप्फोसपिटुतरोरुपरिणया पउमुप्पल सुगंधिसरिसनीसास सुरभिवयणा छवी निरायंका उत्तमपसत्था अइसेसनिरुवमतणू जल्लमल्लकलंक सेयरयदोसवज्जियसरीरनिरुवलेवा, छायाउज्जोवियंगमंगा, वज्जरिसह- 5.

IM ३२ नाराय संघयणा समचउरंस संठाण संठिया छधणुसहस्साई उड्डे उच्चतेणं पण्णत्ता, तेणं मणुया दो छप्पएणगपिट्टिक- रंडयसया पएणत्ता । समणाउसो ! तेणं मणुया पगइभद्दया पगइविणीया पगइउवसंता पगइपयणुकोह माणमायालोमा मिउमद्दवसंपन्ना अल्लीणा भद्दया विणीया अप्पिच्छा असंनिहिसंचया अचंडा असिमसिकिसि वाणिज्जविवज्जिया विडिमंतरनिवासिणो इच्छियकामकामिणो गेहागार रुक्खकयनिलया पुढविपुप्फफलाहारा तेणं मणुयगणा पएणत्ता ॥ ( सूत्र १४) WEEEEEEEEEEE111111111111111111111 छाया-प्रासश्च खल्वायुप्मन् ! पूर्व मनुजा व्यपगतरोगातङ्काः बहुवर्षशतसहस्रजीविन तद्यथा-युगलधार्मिका -अर्हन्तो वा चक्रवर्तिनो वा बलदेवा वा वासुदेवा वा चारणाः विद्याधराः। ते मनुजाः अनतिवरसौम्यचारुरूपाः भोगोत्तमा भोगलक्षणधरा सुजातसर्वाङ्गसुन्दरा रक्तो- त्पलपद्म कर चरणकोमलाङ्ग लितलाः नगनगरचक्रधराकलक्षणाङ्किततलाः सुप्रतिष्ठित कूर्मचारुचरणाः आनुपूर्व्या सुजातपीवराङ्ग लिकाः उन्नततनुताम्रस्निग्धनखाः संस्थितसुश्लिष्टगूढगुल्फा एणी कुरुविन्दवत्त वृत्तानुपूर्वजचा समुद्गनिमग्न गुढजानवः गजश्वसन सुजात सन्निभोरवः वरवारणमत्ततुल्यविक्रमविलासितगतयः सुजातवरतुरगगुह्यदेशाः पाकीर्णहया इव निरुपलेपाः प्रमुदितवरतुरगसिंहातिरेक वर्तितकटय संहृत सोनन्दमुशलदर्पण निगीर्णवरकनकत्सरुसदृश वरवजवलितमध्या गङ्गावर्त प्रदक्षिणावर्त तरङ्गभङ्ग र रवि किरण तरुण बोधित विकोशायत पद्मगम्भीर विकट नाभयः ऋजुकसम संहित सुजात जात्य तनु कृष्णस्निग्धदेयलटह सकुमारमृदुक रमणीय रोमराजयः झष विहग सुजातपीन- कक्षयः झषोदराः पद्म विकटनाभय सङ्गतपार्खा सन्नत पााः सुन्दरपावाः सुजातपार्खाः मित मातृकपीन रतिदपाछः अकरण्डुक कनकरुचक निर्मल सुजातनिरुपहत देहधारिणः प्रशस्तद्वात्रिशल्लक्षणधरा कनकशिलातलोज्ज्वल समतलोपचितविच्छिन्न पृथुलवक्षसः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः --- - ३३ पुरवरपरिधावर्तितभुजाः -भुजगेश्वरविपुल- 'भोगादानपरिघावक्षिप्तदीर्घवाहवः युगसन्निर्मपीनरतिद पीवर प्रकोष्ठा सस्थितोपचितं धनस्थिर सुबद्ध सुवृत्तसुश्लिष्ट' लप्टपर्वसन्धयः रक्ततलोपचित मृदुकासल सुजातलक्षणप्रशस्ताचिछद्रजालपाणयः पीवरवर्तितसुजात कोमल वराङ्ग लिकाः ताम्रतलिनशचिरुचिर स्निग्धनखाः - चन्द्रपारिगरेखाः सूर्य्यपाणिरेखाः शंखपाणिरेखाः चक्रपाणिरेखाः सुस्थितपाणिरेखाः शशिरविशंखचक्र सुस्थित सुविभक्त सुविरचितपाणिरेखा:' वरमहिषवराहसिंह शार्दूल वृषभ- नागवरविपुलोचत मृदुकस्कन्धाः चतुरङ्ग ल सुप्रमाणकंबुवरसदृशग्रीवाः अवस्थितसुविभक्तचित्रश्मश्रव मसिलसंस्थित- प्रशस्त शार्दूल- हनवः- परिकर्मितशिलाप्रवाल विम्लफल सदृशाधरोप्ठा पाण्डुरशशिकलविमल निर्मलशंख , गोक्षौरकुन्द दकरजोऽनाविल धवलदन्तश्रेणयः अखण्डदन्ताः अस्फटितदन्ताः सुस्निग्धदन्ताः सुजातदन्ता एकदन्ताः श्रेण्य इव अनेकदन्ताः हुतवहनिर्मात धौत तपनीयरक्त तलताले जिव्हाः सारसनव स्तनित मधुर गम्भीर क्रौञ्च निर्घोषदुन्दुभिस्वराः गरुडायतर्जतुङ्गनासिकाः अवदारित पुण्डरीकंवदनाः, विकसितघवलपुण्डरीक पत्रलाक्षाः अवनामित चापरुचिरकृष्णाचिकुरराजि सुसंस्थितसङ्गतायत सुजात ध्रुवः बालीन- प्रमाणयुक्तश्रवणा. -सुश्रवणाः पीनसमसिल कपोलभागाः अचिरोद्गत · समग्र' सुस्निग्धचन्द्रार्धसैस्थितललाटा उडुपति प्रतिपूर्णसौम्यवंदनाः छत्राकारोरामाङ्गदेशाः धननिचितसुक्द्ध लक्षणोनतकुटागारनिभनिरुपमपिण्डिकाप्रशिरसः- हुतवहनिर्मात धौत तप्ततपनीय केशान्तकेशभूमयः शाल्मलीघोण्ड घननिचितच्छोटितमृदुविशदप्रशस्त सूक्ष्मलक्षण सुगन्धि सुन्दरभुजमोचकभृङ्गनील कज्जल प्रहृष्टभ्रमरगणस्निग्धनिकरम्य निचितप्रदक्षिणावर्तमुर्घ शिरोजाः लक्षणव्यञ्जनगुणोपपेताः मानोन्मानप्रमाण प्रतिपूर्ण सुजातसर्वाङ्गसुन्दराङ्गाः शशिसौम्याकार कान्तप्रियदर्शनाः स्वभावशृङ्गारचारुरूपाः, प्रासादीयाः दर्शनीयाः अभिरूपाः प्रतिरूपा ते मनुजा ओघस्वराः मेघस्वराः हंसस्वराः क्रौञ्चस्वराः नन्दिस्वराः नन्दिघोषाः सिंहस्वराः सिंहघोषाः मञ्ज स्वराः मञ्ज घोषाः सुस्वराः सुस्वरघोषाः अनुलोमायुवेगाः कसमहणयः कपोतपरिणामाः शकुनिष्फोस पृष्ठान्तरोरु परिणताः पद्मोत्पलसुगन्ध सदृशेनिश्वास सुरभिवंदनाः छविमन्त निरातकोः उत्रोमप्रशस्ता अतिशेषनिरुपमतनवः-जल्लमलकलङ्कस्वेद रजोदोष- ।

३४ । ते - । 12321323232 वजिंतनिरुलेपाः छोयोद्योतिताङ्गाङ्गाः वज्रऋषभनाराचसंहननाः समचतुरस्र संस्थान संस्थिताः षडधनुः सहस्राण्यूर्ध्वमुञ्चत्वेन प्रज्ञप्ताः ते मनुजाः द्विषट्पञ्चाशत् पृष्टकरण्डकशताः प्रज्ञप्ताः श्रमणायुष्मन् ! ते मनुजाः प्रकृतिभद्रकाः प्रकृतिविनीताः प्रकृत्युपशान्ताः प्रकृतिप्रतनुक्रो- धमानमायालोभाः मृदुमार्दव सम्पन्नाः बालीनाः भद्रकाः विनीताः अल्पेच्छाः असनिधि सञ्चयाः अचण्डाः असिमषिकृषिवाणिज्य विवर्जिताः विडिमान्तरनिवासिनः ईप्सितकामकामिनः गेहाकारवृक्ष कृतनिलयाः पृथिवीपुष्पफलाहाराः ते मनुजगणाः प्रज्ञप्ताः ॥ भावार्थ-हे आयुष्मन श्रमण | प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ आरा में मनुष्य नीरोग होते थे । उनको न तो- कभी ज्वर भादि व्याधियाँ उत्पन्न होती थीं और न कभी तत्काल प्राणों को हरण करने वाले शूल आदि आतङ्क ही उत्पन्न होते थे। वे कई लाख वर्ष तक जीते रहते थे। जैसे कि जुगलिये, तीर्थङ्कर, चक्रवर्ती, बलदेव वासुदेव, चारण और विद्याधर । इन मनुष्यों का रूप बहुत ही मनोहर तथा दृष्टि को लोभित करने वाला था। ये लोग उत्तमोत्तम भोगों को भोगने वाले होते थे। इनके अङ्गों मे भोगो की सूचना देने वाले स्वस्तिक आदि शुभ लक्षण विद्यमान होते थे। इनके सभी अङ्ग सुन्दरता से उत्पन्न और परम सुन्दर होते थे। इनके हाथ और पैर की अङ्ग लियाँ लाल कमल की तरह रक्तवर्ण और कोमल होती थीं। इनके हाथ और पैर के तलवे कमल के समान कोमल और पर्वत, नगर, मछली, समुद्र, चक्र, चन्द्रमा और मृग के समान आकार वाली रेखाओं से युक्त होते थे। इनके चरण कछुए की तरह बराबर और' क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होते थे। इनके पैर की अङ्ग लियाँ सुन्दर और स्थूल होती थीं इनके नख रक्तवर्ण उमत सूक्ष्म और चमकीले होते थे। इनके पैर के गुल्फ छिपे हुए, उत्तम आकृति वाले और सुन्दरता पूर्ण जमे हुए होते थे। जैसे हरिणी की जङ्घा और कुरूपिन्द नामक तृण क्रमशः स्थूल और गोल होते हैं उसी तरह इसकी जद्धायें गोल और क्रमशः स्थूल 333333333333333333 । ENTER ३५ होती थीं। इनके घुटने समुद्गक पक्षी के घुटनों की तरह'पुष्ट और अन्दर घुसे हुए होने के कारण लक्षित नहीं होते थे। इनके उस हाथी की सूंड की तरह सुन्दर और स्थूल होते थे। ये लोग गजराज की तरह पराक्रम के सहित सविलास गमन करते थे। इनकी शिश्न इन्द्रिय सुन्दर घोड़े की इन्द्रिय के समान होती थी। जैसे आतिवान् अश्व मल से उपलिप्त नहीं होता है उसी तरह ये लोग मल के लेप से रहित होते थे। प्रसन्न घोड़ा एवं सिंह की कटि से भी बढ़कर इनकी कटि वर्तुल होती थी। जैसे त्रिकाष्टिका' का मध्य भाग तथा मुशल, दर्पण और सोने की बनी हुई तलवार की मुष्टि पतली होती है उसी तरह इनका उदरप्रदेश पतला होता था और उसमें तीन रेखाएं होती थीं। इनकी नाभि गङ्गा के आवर्त की तरह दक्षिणावर्त और तरङ्ग की तरह रेखाओं से युक्त एवं सूर्य की किरणों द्वारा तत्काल विकसित कमल की तरह सुन्दर और गम्भीर होती थी। इनके शरीर की रोम श्रेणी समान, घन, सुन्दर, सूक्ष्म, काली, सुकुमार और मनोहर होती थी। इनका उदर मछली और पक्षी के उदर की तरह सुन्दर और पुष्ट होता था। इनकी नाभि कमल के समान गहरी होती थी। इनके पार्श्वभाग' युक्त, नम्र, सुन्दर, परिमाणयुक्त पुष्ट और आनन्द दायक होते थे। इनका शरीर मांस से पूर्ण होने के कारण पीठ की हड्डी से रहित सा प्रतीत होता था । और सुवर्ण के समान गौर एवं मलरहित तथा रोग आदि के कारण उत्पन्न विकारो से रहित सुन्दर होता था। इनके शरीर में बत्तीस प्रकार के उत्तम लक्षण विद्यमान होते थे। इनकी छाती सोने की शिला के समान प्रशस्त समतल पुष्ट और चौड़ी होती थी तथा उसके ऊपर श्रीवत्स का चिह्न होता था। नगर की अर्गला के समान लम्बी और वर्तुल इनकी भुजाएँ होती. 'थीं। वह सर्पराज के शरीर की तरह दीर्घ तथा अपने स्थान.से निकाल कर रखे हुए परिघ दण्ड के समान विशाल और सुन्दर होती थीं। इनके हाथ की कलाई युप की तरह मोटी, बड़ी और सुन्दर होती थी। इनकी भुजाओं की सन्धियाँ मनोहर आकृति वाली स्नायुओं से दृढ बॅधी हुई गोल घन और मनोज्ञ होती थीं। इनके हाथ के तलवे रक्त वर्ण पुष्ट, - - ३६ -- RETIREMEDIEEEEEEEEEEEEEEEEERREDI कोमल और शुभ लक्षणों को धारण करने वाले छिद्ररहित और जाल के समान तथा सुन्दर होते थे। इनकी अङ्ग लियाँ मोटी, वर्तुल, कोमल उत्तम और सुन्दर होती थीं। इनके नख रक्तवर्ण चमकीले समतल निर्मल और सुन्दर होते थे। इनके हाथ में चन्द्रमा के आकार वाली रेखा होती थी। तथा उसमें सूर्य, शंख, स्वस्तिक और चक्र के आकार की रेखा भी होती थी। एवं उसमें चन्द्रमा, सूर्य, शंख स्वस्तिक और चक्र की रेखायें होती थीं। इनके हाथ की सभी रेखायें अलग अलग स्पष्ट बनी हुई होती थीं। इनके स्कन्ध, उत्तम भैंसा, सूअर, सिंह, व्याघ्र, साँड, श्रेष्ठ हाथी के कन्धे के समान'उन्नत और कोमल होते थे। इन के करठ में तीन रेखाएं होती थीं। और वह कण्ठ' अपनी अङ्ग ली के प्रमाण से चार अङ्गल का होता था तथा उत्तम शंख के समान उसकी आकृति होती थी। उनकी मूंछ, न तो बड़ी और न छोटी ही होती थी। किन्तु उचित प्रमाण युक्त सुन्दर और- अलग अलग रहने वाले केशों से भरी हुई होती थी। उनकी ठुड्डी' सिंह की ठुड्डी के समान सुन्दर आकृति वाली और पुष्ट होती थी। उनका अधरोष्ठ साफ किये हुए मूंगे की तरह रक्त होता था । इनके दाँतों की श्रेणी चन्द्रमा के खण्ड की तरह निर्मल एवं मल रहित शंख, गाय के दूध का फेन, कुन्द पुष्प और, कमलिनी के मूल के समान शुक्ल होती थीं। इनके दॉत खण्ड रहित और रेखा हीन धन और अरूक्ष तथा सुन्दर होते थे। इनके दाँतों की श्रेणी एक एक दॉतों की होती थी। दांत के पीछे दूसरा दांत नहीं होता था। इनके दांत पूरे बत्तीस होते थे। इनके दांतों की श्रेणी एक आकार की होती थी। और दांतो का सङ्गठन इतना धन होता था कि उनका परस्पर पार्थक्य लक्षित नहीं होता था। इनकी जीभ और तालु अग्नि में तपाकर निर्मल किये हुए उष्ण सुवर्ण की तरह रक्त वर्ण होते थे। इनके कण्ठ का शब्द सारस पक्षी के शब्द की तरह मधुर और नवीन मेघ के शब्द की तरह गम्भीर एवं क्रोश्च पक्षी तथा दुन्दुभि के शब्द की तरह गम्भीर और मधुर होता था। इनकी नासिका गरुड की नासिका के समान सीधी और ऊँची होती थी। इनका मुख सूर्य की किरणों 3233343536373833333333333 . - पी ३ ३७ व - - द्वारा विकसित श्वेत कमल के समान सुन्दर और रोमावली से युक्त होता था। इनकी भौहें नम्र धनुष के 'श्रा कार की होती थीं और उनके केश काले और सुन्दर श्रेणी में स्थित होते थे। वे दीर्ध और सुनिष्पन्न होते थे। इनके कान उचित प्रमाण वाले यानी न तो बहुत बड़े और न बहुत छोटे होते थे । वे कानों के ताग भली भाँति शब्दों को सुन सकते थे। इनके गाल - मोटे होते थे। इनका ललाट अष्टमी के चन्द्रमा के समान विस्तृत और सुन्दर होता था। इनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान पूर्ण और सुन्दर होता था । इनका शिर छत्ता के समान वतुल होता था। इनके शिर का अंग्रभाग लोहे के मुद्गर की' तरह घन और म्नायुप्रों में मजबूत बँधा हुआ शुभलक्षणों से पूर्ण कूटागार के तुल्य उपमारहित और वर्तुल होता था। इनके मस्तक का चर्म, अग्नि में नपाये हुए सुवर्ण की तरह रक्त वर्ण होता था। इनके शिर के केश शामली वृक्ष के फल की तरह छोटे और धन होते थे तथा कोमल, निर्मल, सूक्ष्म, चिकने, अत्यन्त सुगन्ध; सुन्दर और लक्षण युक्त होते थे। एवं भुजमोचक रत्न, भृङ्ग, नीलमणि, कजल और प्रसन्न भ्रमर की तरह वे काले होते थे। वे परस्पर जुडे हुए कुछ वक और दाहिनी ओर" फिरे हुए होते थे। वे पुरुष' 'स्वस्तिक 'आदि शुभ लक्षण तथा ‘माष तिल आदि व्यञ्जन एवं क्षमा आदि गुणों से युक्त होते थे। उनके शरीर तथा अङ्गों के मान और उन्मान पूर्ण रूप में होते थे। तथा वे जन्म सम्बन्धी दोषों से वर्जित होते थे। उनकी आकृति सौम्य होती थी और उनके दर्शन से प्रेम पुत्पन्न होता था। उनका वेष स्वभाव से ही उत्तम होता था। उनके दर्शन से चित्त में प्रसन्नता होती थी। तथा नेत्र देखने में परिश्रम अनुभव नहीं करते थे। वे अत्यन्त कमनीय होते थे। उनका रूप असाधारण होता था। उनका- रूप देखने वाले को प्रतिक्षण नया नया प्रतीत होता था। उनके कण्ठ का- स्वर नदी के प्रवाह के समान गम्भीर और मेघ की तरह दीर्घ होता था। वह हंस के स्वर की तरह मधुर और क्रौञ्च पक्षी के स्वर की तरह दीर्घदेश व्यापी होता था। तथा नन्दी यानी वीणा समूह के शब्द की तरह मधुर होती - 1 - 333333333333333333333 funny ३८ था। उनका स्वर सिंह के शब्द के समान दूर तक जाने वाला और मधुर होता था। उनके शरीर में विचरने वाले वायु का नेग शरीर के अनुकूल होता था इसलिए उनके उदर में वायु के वेग से उत्पन्न होने वाला गुल्म रोग उत्पन्न नहीं होता था। उनका गुदाशय कपक्षी के गुदाशय के समान नीरोग होता था। उनकी नाठराग्नि कबूतर की जाठराग्नि के समान भोजन किये हुए आहार को शीघ्र पचाने वाली अतितीव्र होती थी। अतः उनको अजीर्ण रोग फभी उत्पन्न नहीं होता था । जैसे पक्षी की गुदा में मल का लेप नहीं लगता ई उमी तरह उनकी गुदा में भी मल विसर्जन करते समय उसका लेप नहीं लगता था। उनकी पीठ, योनी पारव भाग और उस उचित परिमाण वाले होते थे। उनके मुख से निकलने वाला वायु कमन, पग और कुष्ट नामक गन्ध द्रव्य के मगान सुन्दर गन्धयुक होता था। उनके शरीर को छवि मनोहर होती थी तथा चमड़ी कोमल होती थी। ये नीरोग तथा दत्तम ननणों से युक्त एवं अनुपम शरीर वाव दाते थे। उनके शरीर मे शीघ्र निवृत्त होन वाला मल तया विलम्ब से मिटने वाला गल, प्रस्खेद, कनाक भूलि पा मलिनता पक्ष हरने पानी मेष्टा गे सय नहीं होते थे । तथा मन्त्र और विष्ठा का लेप भी उनमे नही लगता था। ग मा प्रत्यक उनक शरीर का शोभा स चमकने रहते थे। उनका सहनन वन पभ नाराच होता था। उनका सस्थान सगरम होता या। वैमा हजार पनुप कावे होते थे। ये मनुष्य स्वभाव से ही भद्र, स्वभाव से ही विनीत, स्वभाव से ही उपशान्त होते थे। उनके क्रोध मान गाया मार लाम समावसदी पतले होते थे। वे मनोहर और परिणाम में सुख देने वाली मृदुता से सम्पन्न होते । मम हपट पूर्ण मृदुता नही होती थी। वे समस्त क्रियाप्रो में शान्ति पूर्वक चेष्टा करने वाले हाते थे। वे उस क्षेत्र के नाम समस्त ल्याणों के पास पार या सोnt or विनय करने वाले और अल्प इच्छा वाले होते थे। वे धन धान्य आदि का सहारा नहीं करता था ना मान नही करते थे। वे तलवार नका कर तथा लेसन कक्षा बारा तथा हर्षि कम में एवं वाग्नि में से जीविका का साधन दी करते थे। वे 103030303382809235213030700200060 3ERE की शाखाएं जो कि प्रासाद की तरह आकृति वाली होती थीं, उनमें निवास करते थे। वे इच्छानुसार विषयों को कामना करने वाले होते थे। वे घर की तरह आकार वाले' वृक्षो के अन्दर निवास करते थे। वे पृथिवी और कल्प वृक्षो के फूल और ' फल का आहार करते थे। वे मनुष्य इस प्रकार के कहे गये हैं। सूत्र १४ ।। ३६ 1 , । 1 । . श्रासी य समणाउसो ! पुब्धि मणुयाण छबिहे संघयणे, तंजहा (१) वज्जरिसह नाराय संघयणे, (२) रिसह नारायसंघयणे, (३) नारायसंघयणे, (४) अद्ध नारायसंघयणे, (५) कीलियसंघयणे, (६), छेवट्ट संघयणे । संपइ खलु पाउसो ! मणुयाणं छेचट्ट संघयणे वट्टइ। आसी य आउसो! पुब्धि मणुयाणं छविहे संठाणे, तंजहा (१) समचउरंसे, (२) णग्गोह परिमण्डले, (३) साइ, (४) कुज्जे, (५) बामणे, (६) हुडे । संपइ खलु पाउसो ! मणुयाणं हुडे संठाणे वइ ।। सूत्र १५ ॥ संघयणं संठाण, उच्चच. . पाउयं य मणुयाणं । अणुसमयं परिहायइ, श्रोसप्पिणी काल दोसेणं ॥ ५० ॥ कोह मय माय लोहा, उस्सरणं वहए य मणुयाणं । कूड तुल कूडमाणा, तेणाणुमाणेण · सव्वंति ॥ ५१ ॥ विसमा अज्ज तुलाओ, विसमाणि य जणवएसु माणाणि । विसमा राजकुलाई, तेण उ विसमाई वासाई ॥ ५२ ॥ विसमेसु य बासेसु, हुति असाराई' ओसहिबलाइ । योसहिदुबल्लेण य, आउं परिहायइ णराणं ॥ ५३॥ एवं परिहायमाणे, लोए चंदुव्व काल . पक्खम्मि । जे धम्मिया मणुस्सा, सुजीवियं जीवियं तेसिं ॥५४ ॥ ECHEREMETERESTER 2. - ४० ETREETERE H - - । छाया-आसश्च श्रमणायुष्मन् ! पूर्व मनुजाना षड़ विधानि संहननानि । तद्यथा यज्रर्षभनाराचं, ऋषभनाराचं, नाराचं, अर्धनाराचं, कीलिका, सेवार्शम् । सम्प्रति खलु आयुष्मन् ! मनुजाना सेवा संहननं वर्तते । पासँश्न अायुप्मन् ! पूर्व मनुजाना पडविधानानि संस्थानानि, तद्यथा--समचतुरस्र', न्यग्रोधपरिमण्डलं , सादि, कुब्ज, वामनं, हुण्डम् । सम्प्रति खल्वायुष्मन् ! मनुजाना हुण्ड सस्थानं वर्तते ॥ १५ ॥ संहननं संस्थान मुञ्चत्वमायुश्च मनुजानाम् । अनुसमयं परिहीयते, अवसर्पिणीकाल दोषेण ॥ ५० ॥ कोध मद माया लोभाश्चोत्सन्नं वर्धन्ते च मनुजानाम । कूटतुला कूटमानानि, तेनानुमानेन सर्वमिति ॥ ५१ ॥ विषमा अद्य तुला, विपमाणि च जनपदेषु मानानि । विपमाणि राजकुलानि, तेन तु विषमाणि वर्षाणि ।। ५२ ॥ विपमेषु च वर्षेष, भवन्त्यसाराण्यौषधिवलानि । श्रीपधिदुर्वलत्वेन च, श्रायुः परिहीयते नराणाम् ॥ ५३ ॥ एवं परिहीयमाने लोके, चन्द्र इव कृष्ण पक्षे । ये धार्मिकाः मनुष्याः, सुजीवितं जीवितं तेपाम् ॥ ५४॥ हे ,आयुष्मन् श्रमण ! पूर्व काल में मनुष्यों का संहनन छः प्रकार का होता था। जैसे कि-वचऋपभनाराच, ऋपभनाराच, नाराच, अर्धनाराच, कीलिका और सेवार्त । परन्तु हे आयुष्मन् ! आज फल मनुष्यों का सेवात संहनन है । हे श्रायुप्मन् ! पूर्व समय में मनुष्यों का संस्थान छः प्रकार का होता था। जैसे कि-समचतुरस्र, न्यग्रोधपरिमण्डल, सादि, कुञ्ज वामन 'पौर हुएडक । परन्तु आज कल मनुष्यों का एक मात्र हुएडक सस्थान होता है। सूत्र १५ ॥ अवसर्पिणी काल के प्रभाव से आज कल प्रतिक्षण मनुष्यों का संहनन संस्थान, उशता और आयु घटते जा रहे हैं। क्रोध मान माया और लोभ की अविच्छिन्न वृद्धि होती जा रही है । कूट तुला और कूटमान भी बढ़ता जाता है तथा उमी के अनुसार -- H22233133233333333333333333333333 - - - ENTERTREETER - - - - ४१ सभी बुराइयाँ बढ़ती जा रही हैं । आज कज लिये दूसरी और देने के लिये दूसरा तुला यांनी बोट (तौलने को परिमाण) बनाया जाता है तथा लेने के लिए दूसरों और देने के लिए दूसरा माप भी निर्माण किया जाता है, एवं राजकुल भी विविध प्रकार का अन्यायकारी होगया है इस इस कारण वर्ष भी दुःखद हो गये हैं। वर्ष दुःखद हो जाते औषधि यांनी गेहूं आदि अन्न भी बल हीन होजाते हैं और अन्न के बलहीन होने से प्राणियों की आयु शीघ्र ही क्षीण हो जाती है । इस प्रकारे कृष्ण समान निरन्तर क्षीण होते हुए प्राणि-समाज में धार्मिक मनुष्यो का ही जीवन सफल समझना चाहिये ।। ५०-५४ । अउिसो ! सें जहाँ नामए केई. पुरिसे एदाए कयवलिकम्मे कयकोऊयं मंगलेपयिच्छित्त सिरसिराहाए कंठे मालाकडे आविंद्धमणिं सुवरणे आहेय सुमंहग्यवत्थ परिहिए चंदणोकिएणगायसरीरें। संरससुरहिगंध गोसीस चंदणाणुलित्तंगचे सुइमालाबएणगविलेवणे कप्पियंहारहार "तिसरयपालंब पलंघमाणे. कडिसुत्तयसुकयसोहे पिणद्धंगेविज्जअंगुलिज्ज गैललियंगयललियकयाभरणे-गाणामणि कर्णगरयणकंडंगतुडियथंमियमुंए 'अहियरूवसस्सिरीएं.. कुंडलुज्जीवियांणणे- मउड़ दिगण सिरए हारुत्थंयसुकयरइयवच्छे--पालब' 'पलबमाण सुकयपङउत्तरिज्जे मुद्दियापिंगलंगुलिए हाणामणिकणगरयणं बिमल महरिहनिउगोविय - मिसिमिसंत -विरइयंसुसिलिट्ट विसिट्टलह आबिद्ध्वीर : बलए । किं। बहुणी ? कप्परुक्खोविव अलेकिय विभूसिए, सुइपयए' भविती अम्मापियरों अभिवायपिज्जा। तएर्ण तं -पुरिसं अम्मापियरी एवं बइज्जा जीव पुत्ता ! वाससंयं ति, तंपियाई . तस्स. नो बहुय', हर्वइ । कम्हार वाससय जीवतो 'वीसं 'जुगाई जीवइ, वीसई. जुगाई जीवेतो दो अयणसयाई जीवइ, 'दों अयणसियाई जीवंतो छ उउसयाई जीवई, छ--उउसयाई जीवंतों- वारसं' मास सयाई ४२ + जीवइ, वारस मास सयाई जीवंतो - चउवीसं पक्ख सयाई जीवइ, चउवीसं पक्खसयाई जीवतो छत्तीसं राइंदियसहस्साई जीवइ, छत्तीसं राईदियसहस्साई जीवंतो दस असीयाई मुहुत्त सयसहस्साई जीवइ, दस असीयाई महुत्त सय सहस्साई जीवंतो चत्तारि उस्सासकोडीसए सत्त य' कोडीओ अडयालीसं य सयसहस्साई चत्तालीसं य सहस्साई जीवइ । चत्तारि उस्सासकोडीसए. जाव' चत्तालीसं य उस्साससयसहस्साई जीवंतो श्रद्धतेवीसं तंडुलवाहे भुजइ । कहमाउसो ! अद्धतेवीसं तंडुलपाहे भुंजइ १ गोयमा ! दुव्वलाए' खंडियाणं बलियाए छडियाणं खयरमुसलपच्चाहयाणं ववगयतुसकणियाणं अखंडाणं अफुडियाणं फलगसरियाणं एक कवीयाणं अद्धतेरसपलियाणं पत्थएणं, सेवियणं पत्थए मागहए कल्लं पत्थो सायं पत्थो चउसट्ठी तंडुलसाहस्सीओ मागहो पत्थो । विसाहस्सिएणं कवलेणं बत्तीसा कवला पुरिसस्स आहारो, अट्ठावीसं इत्थीयाए, चउवीसं पएणगस्स । एवामेव आउसो ! एयाए गणणाए दो असइयो पसई, दो पसईओ सेइया होइ, चत्तारि सेइया कुलश्रो, चचारि कुलया पत्थो, चचारि पत्था पाढगं, सट्ठीए श्राढयाणं जहएणए कुभे, असीइए आढयाणं मज्झिमे कुभे, अाढयसयं उक्कोसए कुभे, अटेव आढग सयाई वाहो । एएणं माहप्पमाणेणं अद्धतेवीसं तंडुलवाहे मुंजइ । आयुष्मन् ! स यथानामकः कश्चित् पुरुषः स्नातः कृतवलिकर्मा कृतकौतुकमङ्गलप्रायश्चित्तः शिरसि स्नात. कण्ठे मालाकृतः आविद्धमणिसुवर्णः अहतसुमहाघवत्रपरिहितः चन्दनोत्विलंत्र गात्रशरीरः सरससुरभिगन्धः गोशीर्षचन्दनानुलिप्तगात्रः शुचिमालावर्णकविलेपनः कल्पितहाराद्ध हार त्रिसरक प्रालम्ब प्रलम्बमानः कटिसूत्रकसुकृतशोभः पिनद्ध गौवेयकाङ्ग लीयक ललिताङ्गदललितशताभरणः नानामणिकनकरत्न- कटकत्रुटितस्तम्भितभुजः अधिकरूपसश्रीकः कुण्डलोद्योतिताननः मुकुटदाशिराः हारावस्तृतसुकृतरतिद वचाः प्रालम्ब प्रलम्बमानसुकृतपटोरारीयः - ४३ मुद्रिकापिङ्गलाग लिकनानामणिकनक रत्न विमलमहार्ह निपुणपरिकर्मित देदीप्यमानविरचित सुश्लिष्ट विशिष्ट लप्टाबिद्धवीरवलयः। किंबहुना ? कल्पवृक्षइव अलङ्क तविभूषितः शुचिपदं भूत्वा मातापितरावभिवादयेन । ततस्तं पुरुषं मातापितरावेवं वदेता, जीवपुत्र ! वर्षशत मिति । तदपि च तस्य नो बहुकं भवति। वर्षशतं जीवन् विंशति युगानि जीवति । विंशति युगानि जीवन्तु अयनशते जीवति । दे अयनशते जीवन षड् ऋतुशतानि जीवति । षड ऋतुशतानि जीवन् द्वादशमासशतानि जीवति, द्वादशमासशतानि जीवन् चतुर्विंशतिपक्षशतानि जीवति, चतुर्विंशतिपक्षशतानि जीवन् पत्रिंशत् रात्रिन्दिवससहस्राणि जीवति । षट्त्रिंशत्ररात्रिंदिवससहस्राणि जीवन् दशाशीति मुहूर्तशतसहस्राणि जीवति, दशाशीति मुहूर्ग- शतसहस्राणि जीवन चत्वार्युच्छवासकोटिशतानि सप्त च कोटीः अष्टचत्वारिंशश्च शतसहस्राणि चत्वारिंशच सहसाणि जीवति । चत्वार्युच्छचा- सकोटिशतानि यावत् चत्वारिंशष उच्छवास सहसाणि जीवन सार्द्ध द्वाविंशति तन्दुलवाहान भङक्त । कथमायुष्मन् ! अदत्रयोविंशति तन्दुलवाहान् भुङक्त ? गौतम ! दुर्वलया खण्डिताना बलवत्या छटिताना खदिरमुसलप्रत्याहताना व्यपगततुषकणिकाना अखण्डानां अस्फुटिताना पृथक् सारिताना मेकैकवीजाना मर्दत्रयोदशपलाना प्रस्थकः । सोऽपि प्रस्थकः मागधः। कल्ये प्रस्थः सायं प्रस्थः चतुः षष्टि तन्दुल साहसिको मागधः प्रस्थकः, द्विसाहसिकेण कवलेन द्वात्रिंशत् कबलाः पुरुषस्याहारः, अष्टाविशतिः स्त्रियाः, चतुर्विंशतिः पण्डकस्य । एवमेवायुष्मन ! एतया गणनया, द्वे असत्यौ प्रसृतिः, द्वे प्रसृती सेतिका भवति । चतसः सेतिकाः कुडवः । चत्वारः कुडवाः प्रस्थः । चत्वारः प्रस्थाः पाढकं, षष्ट्या आठकानां जघन्यकुम्भः, अशोत्या आढकानों मध्यमः कुम्भः, आढकशत मुत्कृष्टः कुम्भः । अष्टावाढकशतानि वाहः । एतेन वाहप्रमाणेन अर्धत्रयोविंशति तन्दुलवाहान् भुक्त। ? अर्थ-जैसे कोई पुरुष स्नान करके गृहदेवतामों की पूजा करता है और दुःस्वप्न का नाश करने के लिये तिलक धारण और ४४ 32323333333333 33333333333333333333 - मङ्गल कार्य करता है। उसके पश्चात् संशीर्षस्नान करके कण्ठ में फूलों की माला धारण करता है। उसके पश्चात् मणि और सुवर्ण के भूषणों को धारण करके.निर्मल और.बहुमूल्य वस्त्र पहनता है तथा अगों में चन्दन का लेपन एवं उत्तम गन्धयुक्त गोशीर्षचन्दन का तिलक लगा कर पवित्र पुष्पों की माला धारण करता है एव शरीर की शोभा वृद्धि के लिए केशर का भी लेपन करता है। उसके : पश्चात् आठ लड़ और तीन लड़ वाले हारों को पहन कर उनके ऊपर एक लम्बा हार पहनता है तथा कमर में कटिसूत्र को धारण कर गोप तथा अंगुठियों को धारण करता है। इसी तरह हाथ और भुजाओं में भूपणों को धारण करके भुजाओं को भर देता है और कानों में कुण्डल धारण करके मुख की शोभा को बढ़ाता है, शिर के ऊपर मुकुट धारण करके शिर को दीप्त करता हुआ छाती को हारों से ढंक कर, उसको अत्यधिक शोभनीय कर देता है। लम्बे वस्त्र की चादर धारण करके अँगुठियों द्वारा अपनी अगलियों को । पीतवर्ण कर देता देता है। वह अपने हाथ में वीरकंटक धारण करता है। वह वीरकटक निर्मल और श्रेष्ठ शिल्पी द्वारा रचित तथा स्वच्छ किया हुओं चमकदार, मनोहर और उत्तम सन्धिमागे वाला होता और अधिक कहाँ तक वर्णन किया जाय ' जैसे कल्पवृक्ष पत्र पुष्प और फलों द्वारा विभूषित होता है, उसी तरह वह सब प्रकार से पवित्र होकर अपने माता पिता के पास जाकर उनके चरणों में प्रणाम करता है। उसको माता पिता आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि हे पुत्र 'तुम सौ वर्ष तके जीवन धारण करो। परन्तु उसकी आयु यदि सौ वर्ष आयु यदि सौ वर्ष की होती है तो वह सौ वर्ष तक जीता है, नहीं तो नहीं जीता है। वह सौ वर्ष की आयु भी कोई अधिक नहीं है। क्योकि जो सौ वर्ष जीता है वह भी बीस युग ही जीता है। युगे ५ वर्ष का माना जाता है, इसलिये सौ वर्ष में २० युग होते हैं। जो पुरुष वीसे युग जीता है वह दो सौं अयन तक जीता है। छः मास का एक अयने होता है। जो दो सौ अयने तक जीता है वह छः ऋतु तक जीता है और छ: सौ ऋतु तक जीने वाला मनुष्य बारह सौ- मास तक- जीता है। जो बारह सौ - HEREFERENERE EGE ४५ TERRENEFTEREDERSEE मास तक जीता है वह चौवीस सौ पक्ष तक जीता है। जो चौवीस सौ पक्ष तक जीता है वह ३६००० छत्तीस हजार अहोरात्र तक जीता है। जो छत्तीस हजार अहोरात्र तक जीता है वह दस लाख और अस्सी हजार मुहर्त तक जीता है। जो दस लाख और अस्सी हजार मुहूत्त तक जीता है वह चार अरब सात कोटि अड़तालीस लाख और चालीस हजार उच्छवास तक जीता । जो मनुष्य इतने समय तक जीता है वह साढे बाईस तन्दुनवाह जो आगे कहा जाने वाला अन्न का प्रमाण है उतना अन्न खा जाता है। -हे भगवन् । सौ वर्ष तक जीने वाला संसारी मनुष्य सौ वर्ष मे साढे बाईस तन्दुलवाह अन्न किस तरह खा जाता है ? सो बतलाइये । उत्तर-हे गौतम । दुर्बल स्त्री ने जिसे खण्डन किया है और बलवती स्त्री ने सूप के द्वारा जिमको साफ किया है तथा जो खदिर ( खैर) के मूसल से कूट कर बिना तुप का कर दिया गया है एवं जिसके दाने टूटे हुए नहीं हैं तथा जिसमें से कक्कर आदि चुन कर बाहर निकाल दिये गये हैं ऐसे साढे बारह पल चावलों का एक प्रस्थक होता है। पल का प्रमाण इस प्रकार समझना चाहिये-- पाँच गुजा का एक माप होता है और सोलह माषों का एक कर्प होता और चार कर्प का एक पल होता है। इस प्रकार ३२० गुञ्जा के प्रमाण को एक पल कहते हैं। ऐसे साढे बारह पलों का एक प्रस्थक होता है जो मागध भी कहा जाता है । उम प्रस्थक या मागध के प्रमाण से प्रतिदिन प्रातः काल के भोजन के लिये एक प्रस्थक तथा सार्यकाल के भोजन के लिए एक प्रस्थक अन्न की आवश्यकता होती है। एक प्रस्थक में ६४ हजार चावल के दाने होते हैं । दो हजार चावल के दानो का एक ४६ ENER फवल होता है। ऐसे बत्तीस कवलों में एक पुरुष का थाहार पूर्ण होता है और अठाईस कवलों में स्त्री का शाहार पर्याप्त होता है। तथा चौवीस फचलों में नपुसफ का आहार पूर्ण होता है। धान्य से पूर्ण और नीचे की ओर किया हुआ मनुष्य का हाथ ( मुट्ठी ) असती कहलाता है। ऐसे दो असती का एक प्रमृति प्रमाण होता है और दो प्रमृति प्रमाण का एक सेतिका प्रमाण होता है और चार सेतिका प्रमाण का कुडव होता है। चार कुडव का एक प्रस्थक होता है और चार प्रस्था का एक प्राढ होता है। साठ आढक का एक जघन्य कुम्भ और अस्सी आढक का मध्यम कुम्भ एवं सौ आठक का उत्कृष्ट कुम्भ होता है और आठ सौ पाढकों का एक वाह प्रमाण होता है । इस वाह प्रमाण से मनुष्य सौ वर्ष में साढ़े बाईस वाह अन्न खा जाता है। - - 62238522382102632323233233333 ते य गणिय निद्दिट्ठा- चत्वारि य कोडीसया, सर्द्वि चेव य हवंति कोडीओ। असीई य तंदुलसयसहस्सा (४६०८०००००१), हवंति त्ति मक्खाय।। ५५ ॥ तं एवं अद्धतेवीसं तंदुलवाहे मुंजतो अद्धछ? मुग्गा भुजइ, अद्वछठे गुग्गभे भुजंतो चउवीसं नेहाढग सयाई मुंजइ, चउवीसं नेहाढगसयाई मुंजतो छत्तीसं लवण पलसहस्साई भुंजइ । छत्तीसं लवण पलसहस्साह, भुजंतो छापडग साडगसयाई नियंसेइ दो मासिएण परियट्टएणं, मासिएण वा परियट्टएण वारसपड साडग सयाई नियंसेइ । एवामेव आउसो ! वास सयाउयस्स सव्वं गणियं तुलियं मवियं , नेह लवण भोयण छायणं वि ॥. एयं गणियप्पमाणं दुविहं भणियं महरिसीहि जस्सस्थि तस्स गुणिजइ जस्स नत्थि तस्स किं गणिजइ ?

RETEE छाया-तानि च गणितनिर्दिष्टानि "चत्वारि च कोटिशतानि' षष्टिश्च व भवन्ति कोटयः । अशीतिश्च तन्दुलशत सहस्राणि, भवन्तीत्या स्थातम्" ॥ तदेय मर्धपटक मुद्गकुम्भान् भुत । अर्धपट मुद्गकुम्भान् भुजानः चतुविशति स्नेहाढकशतानि मुडक्त । चतुर्विंशति स्नेहाढंक शतानि भुञ्जानः पत्रिंशत् लवणपल सहस्राणि भुङ क्त । पट्त्रिंशत् लवणपल सहस्राणि मुजानः पट् पट्टक शाटकशतानि परिदधाति । द्विमासिकेन परिवर्तनेन, मासिकेन का परिवर्तनेन द्वादश पटशाटकशतानि परिदधाति । एव मेव आयुप्मन् ! वर्षशतायुपः सर्व गणित तुलित मक्ति स्नेह लवण भोजनाच्छादनानामपि ।। एतद्गणितप्रमाण द्विविध भणित महपिभिः । यस्यास्ति तस्य 'गुण्यते यत्त्य नास्ति तस्य किं गण्यते। " भावार्थ.-पूर्वपाठ मे कहा गया कि-सौ वर्ष जीवन धारण करने वाला मनुष्य साढे वाईस वाह तन्दुल का भोजन करता है। अब इस पाठ मे यह बताया जाता है कि-एक वाह तन्दुल में कितने तन्दुल के दाने होते हैं। गणित करने से एक वाह तन्दुल के ४६०८०००००० चार अरब साठ करोड़ और अस्सी लास दाने होते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सौ वर्ष के जीवन काल में साढे बाईस बाह तन्दुनों का भोजन करता है वह साढे पाँच मूग का घड़ा अर्थात् साढे पाँच घड़ा मग भी खा जाता है तथा चौवीस सौ आढक स्नेह-यानी घृत और तेल खा जाता है एवं छत्तीस हजार पल नमक खा जाता है, तथा वह, सौ वर्प मे ६०० कपडे पहिनता है। यदि दो मास पर नूतन' कपड़ा पहिनता है तो सो वर्ष में ६०० कपड़े पहनता है और यदि प्रतिमास । नूतन वस्त्र धारण करता है तब तो वह सौ वर्ष में १२०० कपड़े पहनता है। हे आयुष्मन सौ वर्ष तक जीवन धारण करने वाले मनुष्यो के उपभोग में आने वाले तन्दुल, वस्त्र, नमक तेल और घृत का हिसाव पूर्वोक्त प्रकार से महर्पियों ने बतलाया है। यह - REETEHENERRREEEE . PRER ४८ हिसाब उस मनुष्य की अपेक्षा से कहा गया है जिसके निकट खाने पहनने के लिये सामग्री विद्यमान है किन्तु जिसके निफ्ट वह सामग्री है ही नहीं उसका हिसाच ही क्या हो सकता है ? ववहारगणियदिडं, सुहुमं निच्छयगय मुणेयव्वं । जइ एवं ण चि एयं, विसमा गणणा मुणेयव्या ॥५६॥ छाया-व्यवहारगणितहट, सूक्ष्म निश्चयगतं ज्ञातव्यम् । यदय तनाप्येतद् । विपमा गणना ज्ञातव्या ॥ ५६ ॥ भावाथ -पर्वोक्त पाठ में जिस गणित के द्वारा सौ वर्ष जीवन धारण करने वाले पुरुप के भोजन और वस्त्र का हिसाब बतलाया गया है वह व्यवहार गणित समझना चाहिये। इससे भिन्न एक सूक्ष्म गणित होता है जिसको निश्चय गणित कहते हैं। जब निश्चय गणित के अनुसार गणना की जाती है तब व्यवहार गणित का हिसाब नहीं रहता है। अतः इन दोनो गणितो की गणना परस्पर भिन्न समझनी चाहिये ॥५६ ।। ។ 過國遊 कालो परमणिरुद्धो, अविभज्जो तं तु जाण समयं तु । समया य असंखिज्जा, हवंति उस्सासनिस्सासे ॥ ५७ ॥ छाया-कालः परमनिरुद्धः अविभाज्यः तं तु जानीहि समयं तु । समयाश्चासख्येयाः, भवन्ति उच्छनासनिःश्वासे ॥ ५७ ॥ भावार्थ:-जिसका विभाग नहीं किया जा सकता है ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म काल को समय समझो । इस प्रकार एक उच्छ्वास निःश्वास में असंख्यात'सगय व्यतीत होते हैं ।। ५७ ।। FEREATREnEAREER ज ।

४६ BEATERERTERSNETHEREFERESTEREDERERFERENEVERENTERNET हट्ठस्स अणवगलस्स, निरुवकिट्ठस्स जंतुणो। एगे उस्सासनिस्सासे, एस पाणुत्ति बुचह ॥ ५८ ।। छाया-हृएस्यानवगलस्य, निरुपक्लिष्टस्य जन्तोः । एक उच्छ्वासनिःश्वासः, एष प्राण इत्युच्यते ॥ ५८ ।। भावार्थ:-जो पुरुष पुष्ट है तथा रोग और लश से रहित है उसके एक उच्छ्वास नि श्वास को प्राण कहते हैं ॥ ५ ॥ सत्त पाणूणि से थोवे, सत्त थोवाणि से लवे । लवाणं सत्तहत्तरीए, एस मुहत्ते वियाहिये ॥ १६ ॥ छाया-सप्त प्राणाः स स्तोकः, सप्त स्तोकाः स लवः। लवानां सप्त सप्तत्या, एष मुहूत्तों व्याख्यातः ॥ १६ ॥ भावार्थ:-पूर्वोक्त सात प्राणों का एक स्तोक काल कहा जाता है और सात स्तोकों का एक लव और ७७ सत्तहत्तर नवो का एक मुहूर्त काल कहा गया है ॥ ५६ || एग मेगस्स णं भंते ! मुहूतस्स केवइया उस्सासा वियाहिया ? गोयमा ! तिरिण सहस्सा सत्त य, सयाण तेवत्तरि य उस्सासा । एस मुहूत्तो भणिो, सोहि अणंत नाणीहि ॥ ६०॥ छाया-एककस्य हे भदन्त ! मुहूर्चस्य कियन्त उच्छ्वासा व्याख्याताः ? गौतम ! प्रीणि सहसाणि, सप्त च शतानि त्रिसप्ततिञ्च उच्छ्वासाः । एष मुहूर्तो भणितः, सर्वैरनन्तज्ञानिमिः ॥ ६० ॥ भावार्थ:-(प्रश्न ) हे भवगन् । एक मुहूर्त में कितने उच्छ्वास कहे गये हैं ? हे गौतम | एक मुहूर्त में तीन हजार सात सौ और ७३ उच्छ्वास कहे गये हैं । सभी अनन्तज्ञानियों ने यही मुहूर्त का प्रमाण बतलाया है ॥ ६० ॥ HEHEREHERERENERENEL ५० ENTEREDEE दो नालिया मुहूत्तो, सहिं पुण नालिया अहोरत्तो। पनरस अहोरत्ता पक्खो, पक्खा दुवे मासो ॥ ६१ ॥ छाया-द्वे नालिके मुहूर्सः, षष्टिः पुनर्नालिकाः अहोरात्रः । पञ्च दशाहोरात्राः पक्षः, पक्षौ द्वौ मासः॥ ६१ ॥ भावार्थः-दो घड़ी का एक मुहूर्त होता है और साठ घड़ी का दिन रात होता है। पन्द्रह दिन रात का एक पक्ष और दो पक्षों का एक मास होता है ॥ ६१ ॥ दाडिमपुप्फागारा लोहमई, नालिया उ कारव्या । तीसे तलम्मि छिदं, छिद्दप्पमाणं पुणो वुच्छं ॥ १२ ॥ छाया-दाडिमपुप्पाकारा लोहमयी, नालिका तु कारयितव्या । तस्यास्तले छिद्र, छिद्रप्रमाणं पुनर्वक्ष्ये ॥१२॥ भावार्थ:-दाहिम के फूल के समान आकार वाली एक घड़ी बनवानी चाहिये और उसके तल मे एक छिद्र बनवाना चाहिये । उस छिद्र का प्रमाण मैं आगे बताऊंगा ॥६२ ।। छन्नउइ पुच्छवाला, तिवासजायाए गोतिहाणीए । असंवलिया उज्जाय, णायन्वं नालिया छिदं ॥ ६३ ॥ छाया-पण्णवतिः पुच्छबालाः, त्रिवर्षजातायाः गोवत्सायाः। असंवलिताः ऋतुकाः, ज्ञातव्यं नालिकाच्छिद्रम् ॥ १३ ॥ भावार्थ:-तीन वर्ष की बछड़ी के पूछ के ६६ छयानवे बाल, जो सीधे और मुड़े हुए नहीं है उनके समान घड़ी का छिद्र होना चाहिये ॥ ६३ ।। अहवा उ पुच्छवाला, दुवासजायाए गयकरेणूए । दो वाला अब्भग्गा, णायव्वं नालियाच्छिदं ॥६॥ SECRETRIEREATREENERRETREENAETERTESE REENER SARI ETTE ५१ छाया-अथवा तु पुच्छबालाः, द्विवर्ष जातायाः गज करेणोः। द्वौ चालावभग्नौ, ज्ञातव्यं नालिकाच्छिद्रम ॥ ६४ ॥ भावार्थ:-दो वर्ष के हाथी के बच्चे के पूँछ के दो बाल जो टूटे हुए नहीं हैं उनके समान घड़ी का छिद्र होना चाहिये ॥ ६४ ।। अहवा सुवरण मासा, चत्तारि सुवट्टिया घणा यई । चउरंगुलप्पमाणा, णायचं नालियाच्छिदं ॥६५॥ छाया-अथवा सुवर्णमाषाश्चत्वारः सुवर्तिता घना सूचिः । चतुरङ गुलप्रमाणा, ज्ञातव्यं नालिकाच्छिद्रम् ॥ ६५ ।। भावार्थ:-अथवा चार मासा सोना के बराबर एक वतु नाकर (गोल) और धन सुई होती है । उस सुई का प्रमाण चार अङ्ग ल का होता है। उसके समान घड़ी का छिद्र होना चाहिये । ६५ ।। - । उदगस्स नालियाए, हवंति दो आढयाओ पमाणं । उदगं य भाणियन्वं, जारिसयं तं पुणो वुच्छं ॥ ६६ ॥ छाया-उदकस्य नालिकायाः, भवतो द्वावाढको प्रमाणम् । उदकञ्च भणितव्यं, यादृशकं तत्पुनर्वक्ष्ये ॥६६॥ भावार्थ-घड़ी के अन्दर दो आढक जल भरना चाहिये । वह जल जिस तरह का होना चाहिये वह बताया जाता है ।। ६६ ।। उदगं खलु णायव्यं, कायब्वं दूसपट्टपरिपूर्य । मेहोदगं पसरणं, सारहयं वा गिरिणईए ॥ ६७ ॥ छाया-उदकं खलु ज्ञातव्यं, कन्यं दृष्यपट्टपरिपूतम् । मेघोदकं प्रसन्नं, शारदिकं वा गिरिनद्याः ।। ६७ ।। IERREEMETETTEERTENTERTEREER

५२
EIRENER
भावार्थ:-घड़ी में भरने के लिये जल को वस्त्र द्वारा छान लेना चाहिये । पह जन या तो मेघ का निर्मल जल हो भगवा
शरतकाल की पर्वतीय नदी का हो।। ६७ ॥
बारस मासा संवच्छरो य, पक्खा उ ते उ चउवीसं । तिएणेव य सहिसया, हवंति राइंदियाणं य ॥ ६८ ॥
छाया-द्वादशभिर्मासैः संवत्सरश्व, पक्षास्तु ते तु चतुर्विंशतिः। त्रीण्येव च पटिशतानि, भवन्ति रात्रिन्दिवानि ॥ ६८।।
भावार्थ:-बारह मास का एफ वर्ष होता और एक वर्ष के चौवीस पक्ष होते हैं। चौवीस पक्षो के तीन सौ साठ
दिन रात होते हैं ॥ ६८॥
एर्ग य सयसहस्सं, तेरस चेव य भवे सहस्साई । एर्ग य सयं नउयं, हुति अहोरत्त उस्सासा ॥६६॥
छाया-एकञ्च शत सहस्र, प्रयोदश चैव च भवेयुः सहस्राणि । एकञ्च शतं नवति भवन्ति अहोरात्रे उच्छवासाः॥६६॥
भावार्थ:-एक दिन रात में एक लाख तेरह हजार और एक सौ नव्वे उच्छ्वास होते हैं ।। ६६ ॥
वित्तीस सय सहस्सा, पंचाणउई भवे सहस्साई । सत्त य सया अणूणा, हवंति मासेण उस्सासा ॥ ७० ॥
छाया-त्रयत्रिंशच्छत सहस्राणि, पञ्चनवतिश्च भवेयुः सहस्राणि । सप्तशतान्यनूनानि, गवन्ति मासेनोच्छ्वासा ॥७॥
भावार्थ:--एक मास मे ३३ लाख ६५ हजार और पूरे सात सौ उच्छ्वास होते हैं ॥ ७० ॥

HERERED HEREENERETEEEEEEEEEEEE चत्तारि य कोडीओ, सचेव य हुति सय सहस्साई । अडयालीस सहस्सा, चत्तारि सया य वरिसेण ॥ ७१॥ छाया-चतसः कोटयः, सप्त च भवन्ति शतसहसाणि । अष्टचत्वारिंशत्सहस्राणि, चत्वारि शतानि च वर्षेण ॥ ७१ ॥ भावार्थः-एक वर्ष में चार कोटि सात लाख अड़तालीस हजार और चार सौ उच्छ्वास होते हैं ।। ७१ ॥ चत्वारि य कोडिसया, सच य कोडिओ हुति अवराओ । अडयाल सयसहस्सा, चत्तालीसं सहस्साई ।। ७२ ॥ छाया-चत्वारि कोटिशतानि, सप्त च कोटयः भवन्ति अपराः । अष्टचत्वारिंशच्छतसहसाणि, चत्वारिंशत्सहसाणि ।। ७२ ॥ भावार्थः-४०७४८४०००० चार अर्बुद सात कोटि अड़तालीस लाख और चालीस हजार उच्छ्वास सौ वर्ष की आयु वाले प्राणी के होते है ।। ७२ ।। वांससयाउस्सेए उस्सासा, इत्तिया मुणेयव्या । पिच्छह आउस्स खयं, अहोणिसं झिज्झमाणस्स ॥ ७३ ।। छाया-वर्षशतायुष्कस्योच्छवासा इयन्तो ज्ञातव्याः। पश्यतायुषः क्षय, महर्निश क्षीयमाणस्य ।। ७३ ॥ भावार्थ:-हे भव्य जीवो । सौ वर्ष की आयु वाले पुरुष के इतने ही उच्छवास होते हैं। रात दिन क्षय होते हुए आयु के क्षय की ओर दृष्टि पात करो ।। ७३ ।। राइदिएण तीसं तु मुहत्ता, नव सयाई मासेणं । हायंति पमत्ताणं, न य णं अबुहा वियाणंति ॥ ७४ ॥ छाया-रात्रिन्दिवेन त्रिंशन्मुहूर्ताः, नव शतानि मासेन । हीयन्ते प्रमशाना, न चाबुधाः विजानन्ति ॥ ७४ ॥ STERDEREILLETERTRENERTISTEREREFEREERTREER ។ ५४ RTERTRE THEREFERLETERELIEREFERREETEENETEREFEREHERERE भावार्थ ---दिन रात मे तीस और एक मास मे नौ सौ मुहत प्रमादी के नष्ट होते हैं परन्तु अज्ञानी जीवों को इसका ज्ञान नहीं होता है ।। ७४॥ तिषिण सहस्से सगले, छच्च सए उडुवरो हरइ आउं । हिमंते गिम्हासु य, वासासु य होइ णायव्वं ॥ ७५ ॥ छाया-त्रीणि सहस्राणि सकलानि, पटशतानि उडुवरो हरत्यायुः । हेमन्ते ग्रीष्मासु च, वर्षासु च भवति ज्ञातव्यम् ।। ७५ ॥ भावार्थ:--हेमन्त ऋतु मे सूर्य छः सौ तीन हजार मुहूर्त श्रायु को हरण करता है। इसी तरह प्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु मे जानना चाहिये ॥ ७५ ।। वाससयं परमाऊ, इत्तो पण्णास हरह निदाए । इत्तो बीसइ हावइ, बालते बुड्ढभावे य ।। ७६ ।। छाया-वर्पशतं परमायुः, इतो पञ्चाशत हरति निद्रया । इतो विंशतिहीयते, बालत्वे वृद्धभावे च ।। ७६ ॥ भावार्थ:-मनुष्यों की परम आयु सौ वर्ष की होती है, उसमें से पचास वर्ष तो वह सोने मे नष्ट कर देता है । बाकी ५० वर्ष मे से १० वर्प बाल्यकाल मे और दस वर्ष वृद्धावस्था नष्ट करता है । इस प्रकार ५० मे से २० वर्ष निकल कर शेप ३० वर्ष ही श्रायु के बचते है ।। ७६ ॥ सीउगह पंथ गमणे, खुहापिवासा भयं य सोगे य । णाणा विहा य रोगा, हवंति तीसाए पच्छद्धे ॥ ७७ ॥ छाया-शीतोष्ण पथिगमनानि, क्षुत्पिपासे भयञ्च शोकश्च । नानाविधाश्च रोगाः, भनन्ति त्रिशतः पश्चादधं ॥ ७७ ॥ 感强强强强强强强强强强强 में

HERE
भावार्थः-शीत, उष्ण, मार्गगमन, क्षुधा, पिपासा, भय, शोक और नाना प्रकार के रोग इनके द्वारा तीस वर्ष में से आधे
१५ वर्ष व्यर्थ नष्ट होजाते हैं ॥ ७७ ॥
एवं पंचासीई णट्ठा, पएणरसमेव जीवंति । जे हुँति वाससइया, न य सुलहा वास सयजीवा ॥ ७८ ॥
छाया:-एव पञ्चाशीतिर्नष्टानि, पञ्चदश एव जीवन्ति । ये भवन्ति वर्षशतिकाः, न च सुलभाः वर्षशतजीवाः ॥ ७८ ॥
भावार्थः-पूर्वोक्त प्रकार से पचासी वर्ष तो व्यर्थ ही व्यतीत होजाते हैं, इसलिये जो सौ वर्ष तक जीता है वह वस्तुतः
१५ ही वर्प जीता है और सौ वर्ष तक जीने वाला पुरुष भी विरला ही होता है ।। ७८ ॥
एवं णिस्सारे माणुसत्तणे, जीविए अहिवडते । न करेह धम्मचरणं, पच्छा पच्छाणुताहे हा ।। ७६ ॥
छायाः-एवं निस्सारे मानुषत्वे, जीवितेऽधिपतति । न कुरुत धर्मचरण, पश्चात् पश्चादनुतप्स्यथ हा ! ॥ ७९ ॥
भावार्थ:-पूर्वोक्त प्रकार से यह मानुष जीवन साररहित है और जीवन व्यतीत होता हुआ चला जा रहा है तो भी आप लोग
धर्म का आचरण नहीं करते हैं यह दुःख का विषय है। आपको अन्त मे पश्चात्ताप करना पड़ेगा ।। ७६ ||
TERRIARRRRRRRRRRRENTERTREET
घुटुंमि सयं मोहे, जिणेहिं वरधम्मतित्थमग्गस्स । अत्ताणं य न जाणह, इह जाया कम्मभूमीए ॥ ८० ॥
छायाः-घुष्टे स्वयं मोहे, जिनैर्वरधर्मतीर्थमार्गे । श्रात्मान च न जानीत, इह जाता कर्मभूमौ ॥ ८० ॥

५ भावार्थः- श्री तीर्थङ्करों ने स्वयं यह घोषित किया है कि-ज्ञान दर्शन और चारित्र मोक्ष के मार्ग हैं, ये ही मनुष्य को पवित्र करने वाले हैं तो भी आप लोग मोहवशीभूत होकर इस धर्म को अङ्गीकार नहीं करते हैं और आत्मज्ञान मे प्रवृत्त नहीं होते हैं । आप लोग कर्मभूमि में उत्पन्न हुए हैं। अतः आपको यह अवश्य करना चाहिये ॥८॥ नईवेगसमं चंचलं, जीवियं जुव्वणं य कुसुमसमं । सुक्खं य जमनियत्तं, तिएिणवि तुरमाणभुजाई ॥१॥ छायाः-नदीवेगसमं चञ्चल जीवितं, यौवनञ्च कुसुमसमम । सौख्यञ्च यदनियतं त्रीण्यपि त्वरमाणभोग्यानि ॥८१ ॥ भावार्थ:-यह जीवन नदी के वेग के समान चञ्चल है और यौवन फूल के समान शीघ्र विनाशी है तथा सुख भी स्थिर नहीं है। ये तीनों ही अतिशीघ्र भोगे जाकर क्षय होजाते हैं। एयं खु जरामरणं, परिक्खिवह वग्गुरा व मयजुहं । न य णं पिच्छह पत्त, सम्मूढा मोहजालेणं ॥ ८२ ॥ छाया-एतत्खलु जरामरणं, परिक्षिपति वागरा इव मृगयूथम । न च पश्यथ प्राप्त, सम्मूढा मोहजालन ।। ८३ ।। भावार्थः-जैसे मृगयूथ को जाल वेटित कर लेता है। उसी तरह प्राणिवर्ग को जगमरण वेष्टित कर रहा है तथापि मोहजाल से मोहित होकर आप लोग इसे नहीं देख रहे हैं ॥ ८२ ।। आउसो ! जं पि य इमं सरीरं इट्ठ' कंतं पियं मणुएणं मणाम मणभिरामं थिज्ज ( धिज्ज ) विसासियं संमयं बहुमयं अणुमयं भंडकरंडगसमाणं रयण करंडओविव सुसंगोवियं चेलपेडाविव सुसंपरिबुडं तिल्लपेडाविव सुसंगोवियं ETEENEMIEREREERENERGREENERENERRIERTIER GET HEREENER THEREEREFEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE मा णं उएहं मा णं मीयं मा णं वाला मा णं खुहा मा णं पिवासा मा णं चोरा मा णं दंसा मा णं मसगा माणं वाहि य पित्तिय संभिय संनिवाइय विविहा रोगायंका फुसंतु तिकट्ट एवं पियाई अधुवं अणिययं असामयं चयावचइयं विप्पणास- धम्म पच्छा व पुरा व अवस्म विपञ्चइयव्वं । छाया-आयुष्मन यदपि च इदं शरीरं इष्ट कान्तं प्रियं मनोज्ञ मनोऽमं मनोऽभिरामं स्थिरं वैश्वासिक सम्मतं बहुमतं अनुमतं भाण्डकरण्डकसमानं रत्नकरण्डकमिव ससङ्गोपितं चेलपेटेव संपरिवतं तैलपेटेव ससंगोपितं मा उष्णं, मा शीतं, मा व्यालाः, मा क्षधा, मा पिपासा, मा चौराः, मा दंशाः, मा मशकाः, मा व्याधिः, पैत्तिक श्लैष्मिक सानिपातिक विविधा रोगातकाः स्पृशन्तु इति कृत्वा, एवमप्यध्रुव- मनियतमशाश्वतं चयापचयिकं विप्रणाशधर्मकं पश्चाद् वा पूर्व वा अवश्यं विप्रत्यक्तव्यम् । भावार्थ:-हे आयुष्मन् । यह जो शरीर है, यह बहुत ही इष्ट है, यह बहुत ही कमनीय है। यह बहुत ही प्रिय है, यह मन को बहुत ही प्रिय है। मन इसमें सदा लगा रहता है। यह मन को बहुत ही रमणीय मालूम होता है, यह स्थिर है, विश्वसनीय है। इसके समस्त कार्य अच्छे मालूम होते हैं । यह बहुत ही माननीय है। इसका कभी भी अप्रिय नहीं किया जाता है। जैसे जेवर के भाण्ड की यत्नपूर्वक रक्षा की जाती है। जैसे रत्न की पेटी की बहुत हिफाजत के साथ रक्षा की जाती है उसी तरह इस शरीर की रक्षा की जाती है। जैसे कपड़े से भरी हुई पेटी जाब्ते के साथ रखी जाती है एव जिस तरह तेल और घी के भाजन गोपनपूर्वक रखे जाते हैं उसी तरह इस शरीर की हिफाजत की जाती है। सर्दी, गर्मी, सर्प आदि जानवर, क्षुधा, पिपासा, चोर, दंश, मशक, व्याधि तथा वात, पित्त, कफ और सन्निपात से उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के रोग और आतङ्क से इस शरीर की रक्षा की जाती wtari ५ है तो भी यह शरीर स्थिर नहीं रहता है किन्तु क्षण क्षण में नष्ट होता रहता है । इष्ट आहार आदि के लाभ होने से वृद्धि को प्राप्त होता है और नहीं प्राप्त होने से क्षीण होजाता है । यह स्वभावतः विनाशशील है। पहले या पीछे यह अवश्य ही जीव के द्वारा छोड़ दिया जाता है। एअस्स वियाई आउसो ! आणुपुटवेणं अट्ठारस्सा य पिट्ठकरण्डगसंधिो वारस पंसलिया करंडा छप्पंसुलिए कडाहे विहत्थिया कुच्छी चउरंगुलिया गीवा चउ पलिया जिब्भा दुपलियाणि अच्छीणि चउ कवालं सिरं बत्तीसं दंता सत्तंगुलिया जीहा अधुट्टपलियं हिययं पणवीसं पलाई कालिज्जं दो अंता पंच वामा पएणत्ता, तं जहा-थूलंते य, तणुयंते य, तत्थणं जे से थूलते तेण उच्चारे परिणमइ । तत्थ णं जे से तणुयंते तेणं पासवणे परिणमइ, दो पासा पएणत्ता तं जहा-वामे पासे दाहिणपासे य । तत्थ णं जे से वामे पासे से सुहपरिणामे, तत्थ णं जे से दाहिणे पास से दुहपरिणामे । HERETRIERRETRIERRRREETA छाया-एतस्यापि आयुष्मन् ! आनुपा अष्टादश च पृष्टि कर ण्डक सन्धयः, द्वादश पाशुलिकाः करण्डकाः, पट् पाशुलिकाः कटाहाः, वितस्तिका कुक्षिः, चतुरङ्ग लिका ग्रीवा, चतुष्पलिका जिव्हा, द्विपलिके अक्षिणी, चतुष्कपाल शिरः, द्वात्रिंशदन्ताः, सप्ताङ्ग लिका जिव्हा, सात्रिपल हृदय, पञ्चविंशतिपलानि कालिज्ज, द्वे अन्त्रे, पञ्च वामे प्रज्ञप्ते, तद्यथा स्थूलान्त्रञ्च तन्वन्त्रञ्च । तत्र यत् स्थूलान्त्र तेनोच्चारः परिणमति । तत्र यत् तन्वन्त्रं तेन प्रसवणा परिणमति । द्वे पार्वे प्रज्ञप्त तद्यथा वाम पार्श्व, दणिपार्श्वञ्च । तत्र यत् वाम पार्श्व तत् सुखपरिणाम, तत्र यत् दक्षिणं पार्वं तत दुःखपरिणामम ।

५६ भावार्थ:-हे आयुष्मन् । इस शरीर मे पीठ की हड्डी में क्रमशः अठारह सन्धियाँ हैं। उनका आकार बॉस की गाँठ के समान है। उन अठारह सन्धियो मे से बारह हड्डियाँ निकली हुई हैं जो पसली कहलाती हैं। वे पसलियाँ छाती क मध्य में ऊपर की ओर जाने वाली हड्डी मे लगकर स्थित हैं। पीठ की हड्डी मे जो छः सन्धियॉ शेष हैं, उनमे से छ. हड्डियाँ निकल कर दोनो पार्श्वभागों को घेर कर स्थित हैं। वे हृदय के दोनो तरफ छाती से नीचे रहती हैं। जिन लोगों का कुक्षि (पेट ) ढीली होती है उनकी ये हडियाँ परस्पर मिली हुई नहीं होती है। इन हड्डियों को कडाह कहते हैं। मनुष्यो की कुक्षि दो वितस्ती का होती है और गर्दन चार अङ्गल की एवं जीभ चार पल की होती है । नेत्र के दोनो गोलक दो पल के होते हैं। हडियाँ के चार खडा से शिर बना होता है। मुख मे बत्तीस दॉत होते हैं। जोभ अपनी अपनी अङ्ग लि के प्रमाण से सात अङ्गु ल की हाता है। हृदय का मास खण्ड साढे तीन पल का होता है । छाती के भीतर का मास खण्ड जिसे कलेजा कहते हैं वह पचीस पल का होता है । अतडियाँ दो होती हैं। वे दोनो पाँच पाँच वाम प्रमाण की होती हैं। उनमे से एक स्थूल होता है और दूसरी सूक्ष्म होती है। जो स्थूल अतडी होती है उसके द्वारा मल बनता है और जो सूक्ष्म है उसके द्वारा मूत्र बनता है । पार्श्व दो होते है एक वाम ओर दूसग दक्षिण। इनमे से वाम पार्श्व सुख से अन्न पचाता है और दक्षिण पार्श्व दुःख से पचाता है। HEREFERENTIREL 182.3.2..3...2383E7838232188662 आउसो ! इमम्मि सरीरए सहि संधिसयं सत्तु त्तरं मम्मसयं तिषिण अद्विदामसयाई नव रहारुसयाई सत्त सिरा सयाई पंच पेसी सयाई नव धमणीओ नवनउई य रोमकूब सयसहस्साई विणा केस मंसुणा, सह केसमंसुणा अद्भुआहो रोमकूवकोडीअो। पाउसो! इमम्मि सरीरए सहि सिसियं नाभिप्पभवाणं उड्ढगामिणीणं सिरमुवगयाणं जाओ रसहरणीओ त्ति । THE ६० REPRENER बुचंति जाणंसि निरुवरधाएणं चक्खुसोयघाणजीहाबलं य भवइ, जाणंसि उवग्याएणं चक्खुसोयघाणजीहावलं उवहम्मइ ॥ छाया-आयुष्मन् ! अस्मिन शरीरे षष्टिः सन्धिशतं, सप्तोरारं मर्मशतं भवति । त्रीण्यस्थिदामशतानि, नव स्नायु शतानि, सप्तशिराशतानि, पश्च पेशीशतानि नव धमन्यः, नवगतिश्च रोमकूपशतसहस्राणि बिनाकेशश्मभिः, सह केशश्मश्रु मिः सास्तिसी रोमकू- पकोटयः । आयुष्मन । अस्मिन शरीरे पष्टि शिराणा, शतं नाभिप्रभवाण। अर्ध्वगामिनीना शिरस्युपगताना याः रसहरण्य इत्युच्यन्ते । यामा निरुपघातेन चक्षुः श्रोत्रघ्राण जिह्वावलञ्च भवति । यासाञ्चोपघातेन चत्त श्रोत्रवाणजिह्वावलमपहन्यते । भावार्य-हे आयुष्मन् । इग्म शरीर में १६० सन्धिस्थान होते हैं। अंगुलि आदि हड़ियों के मिलने का जो स्थान है उसे सन्धिस्थान कहते हैं । एवं १०७ मर्मस्थान होते हैं । तथा हड्डियों की ३०० मालायें होती हैं। हड्डियों को बन्धन करने वाली शिरायें जो स्नायु कहलाती हैं वे १०० होती हैं। तथा सात सौ नसें होती हैं। पांच सौ पेशी होती हैं । जिन मे रस बहता रहता है ऐसी नाड़ियाँ नौ होती हैं। दाढी मुंछ के केशों के बिना निन्नाणवे लाख रोम कूप होते हैं। और दाढी मूछ के केशों को मिला कर साढे तीन कोटि रोमकूप होते हैं। पुरुष के इस शरीर में नाभि से उत्पन्न होने वाली सात सौ शिरायें (नसें ) होती है उनमे से एक सौ साठ शिरायें नाभि से निकल कर शिर में जाकर मिलती हैं । उनको रसहरणी कहते हैं। ऊपर जाने वाली उन नाड़ियों की सहायता नेत्र, श्रोन, घ्राण और जिह्वा का चल वृद्धि को प्राप्त होता है । तथा उन नाडिगों के नष्ट होने से नेत्र, श्रोत्र, प्राण और जिल्ला का चल नष्ट हो जाता है। 2393233333333 से मनुष्य के NEETIRETRIEVERENES पाउसो ! इमम्मि सरीरए सहि सिरासयं नाभिप्पभाणं अहोगामिणीणं पायतलमुवगयाणं जाणंसि निरुबग्घाएणं III ६१ HEREMIEREHEREHEERENETERREETEREMETEREHEEREHERE जंघाबलं भवइ । ताणं चेव से उवग्याएणं सीसवेयणा अद्धसीसवेयणा मत्थयसूले अच्छीणि अधिज्जति । छाया-श्रायुष्मन् ! अस्मिन् शरीरे षष्टिःशिराशतं नाभिप्रभवाणा मधोगामिनीनी पादतलमुपगताना, यासा निरुपघातेन जघाबल भवति । तासाञ्च तस्योपघातेन शिरोवेदना अद्ध शिरोवेदना मस्तकशूल अक्षिणी अन्धी भवतः । भावार्थ-हे आयुष्मन् । इस शरीर मे १६० शिराय नाभि से निकल कर नीचे की ओर जाती हुई पैर के तल में मिलती हैं। उन शिराओं की सहायता से जंघा का बल उत्पन्न होता है। उन शिराओं मे जब किसी प्रकार का विकार पैदा हो जाता है तब शिर में पीड़ा होती है। आधे शिर में पीड़ा होती है, मस्तक मे शूल रोग हो जाता है और नेत्र अन्धे हो जाते हैं। पाउसो ! इममि सरीरए सद्विसिरासयं नाभिप्पभवाणं तिरियगामिणीणं हत्थतलमुवगयाणं जाणंसि निरुवग्याएणं बाहुबलं हवइ, ताणं चेव से उवग्धाएणं पासवेयणा पुद्विवेयणा कुच्छिवे यणा कुच्छिमूले हवइ । छाया-आयुष्मन ! अस्मिन् शरीरे षष्टिः शिराणां शतं नाभिप्रभवाणां तिर्यग्गामिनीनी हस्ततलमुपगतानां यास निरुपघातेन बाहुबलं भवति । तासाञ्चैव तस्योपघातेन पार्श्ववेदना पृष्ठवेदना कुक्षिवेदना कुक्षिशूलं भवति । भावार्थ-हे आयुष्मन् । इस शरीर में १६० नाड़ियाँ नाभि से निकल कर तिर्की जाती हैं और वे हाथ के तल मे जाकर मिल जाती हैं उनके ठीक रहने पर भुजा का बल बढ़ता है और उनमें विकार उत्पन्न होने पर पार्श्व पीड़ा, पृष्ठ पीड़ा, उदर पीड़ा और तदर मे शूल रोग उत्पन्न होता है।

६२ EHEREFERENERREDEEMEFERENENEREETTERESEREESE आउसो ! इमस्स जंतुस्स सट्ठिसिरासयं नाभिप्पभवाणं अहो गामिणीणं गुदप्पविट्ठाणं जाणंसि निरुवग्याएणं मृत्तपुरीसवाउ कम्मं पवत्तइ । ताणं चेव उवग्याएणं मुत्त पुरीसवाउनिरोहेणं अरिसा खुभंति पंडु रोगो हवइ । छाया-आयुष्मन् ! अस्य जन्तो. पष्टिः शिराणां शत नाभिप्रभवाणा मधोगामिनीना गुदप्रविष्टाना यासा निरुपघातेन मूत्रपुरीष वायुकर्म प्रवर्तते । तासाञ्चोपघातेन मूत्रपुरीषवायु निरोधेन अशीसि क्षुभ्यन्ति पाण्डुरोगश्च भवति । भावार्थ-हे आयुष्मन् ! इस जन्तु की नाभि से उत्पन्न होकर नीचे की ओर जाकर गुदा मे मिलने वाली १६० नाड़ियाँ होती हैं। जिनके ठीक रहने पर मूत्र, मल और वायु का निकलना उचित रूप मे होता है और इनके विकृत होने पर मूत्र मल और वायु के निरोध हो जाने से बवासीर की व्याधि और पाण्डुरोग उत्पन्न होता है। आउसो ! इमस्स जंतुस्स पणवीसं सिराओ पित्तवारिणीअो पणवीसं सिरानो सिंभधारिणीयो दस सिराओ सुक्कधारिणीअो सत्तसिरासयाई पुरीसस्स तीसूणाई इथियाए वीसूणाई पंडगस्स । आउसो! इमस्स जंतुस्स सहिरस्स आढयं बसाए श्रद्धाढयं मत्थुलुगस्स पत्थो मुत्तस्स आढयं पुरीसस्स पत्थो पित्तस्स कुडवो सिंभस्स कुडवो सुक्कस्स अद्धकुडवो, जं जाहे दुई भवइ तं ताहे अइप्पमाणं भवइ, पंचकोट्टे पुरिसे, छ कोट्ठो इत्थिया, नवसोए पुरिसे, इकारस सोया इत्थिया, पंच पेसीसयाई पुरिसस्स, तीसणाई इत्थियाए वीमणाई पंडगस्स । (सूत्र १६) छाया-आयुष्मन् ! अस्य जन्तोः पंचविशतिः शिराः पिराधारिण्यः पचविंशतिः शिराः श्लेष्मधारिण्यः दशशिराः शुक्रधारिण्यः सप्त शिराशतानि पुरुषस्य, त्रिंशदूनाः स्त्रिया , विशत्यूनाःपडकस्य । श्रायुप्मन् ! अस्य जन्तोः रुधिरस्थाढक, वसाया अढके, मस्तलङ्गस्य प्रस्थः, मूत्र- 园國原區區區區區區區區图图图图原图 ..

333333333333333333333333333333333 स्याढक, पुरीषस्य प्रस्थः, पिरास्य कुडवः । श्लेष्मणः कुडव., शुक्रस्याद्ध कुडवः। यद् यदा दुष्ट भवति तत तदा अतिप्रमाण भवति । पञ्चकोष्ठः पुरुषः, षट्कोष्ठा स्त्रियः, नवस्रोताः पुरुषः, एकादशस्रोतसः स्त्रियः, पञ्च पेशीशतानि पुरुपस्य, त्रिंशदूनानि स्त्रियाः, विंशत्यूनानि पडगस्य॥१६॥ भावार्थ-हे आयुष्मन् । इस जन्तु के शरीर मे पित्त को धारण करने वाली नाड़ियाँ २५ होती हैं । २५ ही कफ को धारण करने वाली होती हैं, शुक्रधारिणी नाड़ियाँ दश होती हैं । ७०० शिरायें पुरुषों के शरीर मे और ३० कम ७०० स्त्रियो के शरीर मे और २० कम सात सौ नपुंसक के शरीर में होती हैं । हे आयुष्मन् इस मनुष्य के शरीर मे रक्त एक आढक होता है । चर्बी आधा आढक होती है। फिप्फिस एक प्रस्थ होता है। मूत्र एक आढक होता है । पुरीष एक प्रस्थ होता है । पित्त एक कुडव होता है। श्लेष्म एक कुडव होता है। शुक्र आधा कुडव होता है। इनमें से जो जब विकृत होता है तब उनके प्रमाण में न्यूनाधिकता होती है । पुरुष के शरीर में पाच कोष्ठक और स्त्री के शरीर मे छः कोष्ठक होते हैं । पुरुष के शरीर मे नौ छिद्र और स्त्री के शरीर मे ११ छिद्र होते हैं। पुरुप के शरीर मे ५०० पेशियाँ होती हैं और स्त्री के शरीर मे ३० कम ५०० एवं नपुसक के शरीर में २० कम ५०० पेशियाँ होती हैं। अभिंतरंसि कुणिमं जो, परिअलेउ बाहिरं कुजा । तं असुई दहणं, सयावि जणणी दुगुछिया ॥८३॥ छाया-अभ्यन्तरे कुणिमं यत्, परावर्त्य बहिः कुर्यात् । तमशुचिं दृष्ट्वा, स्वकापि जननी जुगुप्सेत ॥८३।। भावार्थ-इस शरीर मे जो अपवित्र मांस है उसको यदि शरीर मे से बाहर निकाला जाय तो अपनी माता भी उसे देख कर घृणा करेगी, दूसरे की तो बात ही क्या है ? ॥३॥ माणुस्सयं सरीरं, पूइयम मंससुकह?णं । परिसंडवियं सोहइ, अच्छायणगंधमल्लेणं ॥८४ ॥ + 1 ६४ छाया-मानुप्यकं शरीरं, पूतिमद् मासश कास्थिभिः । परिसंस्थापित शोभते, श्राच्छादन गन्धमाल्येन ॥८४॥ भावार्थ-यह मनुष्य का शरीर अपवित्र है। मास, शुक और हड्डी से बना हुआ है। यह वस्त्र, गन्ध और माला धारण करने से सुशोभित होता है ॥४॥ इमं चेव य सरीरं सीसघडीमेय मजमंसडियमत्थुलुग सोणियवालुडयचम्मकोसनासियसिंघाणयधीमलालयं अमणुएणगं सीसघडीमंजियं गलंतणयणं करणोडगंडतालुयं अबालुयाखिल्ल चिकणं चिलिचिलियं दंतमलमइलं वीभच्छ- दरिसणिज्ज अंसलगबाहुलगअंगुली अंगुट्ठगनहसंधि संघाय संधियमिणं बहुरसियागारं नालखंधच्छिरा अणेग एहारु बहुधमणिसंधिनद्धं पागडउदरकवालं कक्खनिक्खुडं कक्खगकलियं दुरंतं अद्विधमणि संताण संतयं सव्वो समंता परिसवंतं य रोमकूवेहि सयं असुई सभावो परमदुग्गंधि कालिजय अंतपित्तजरहियं य फोप्फसफेफसपिलिहोदरगुज्झकुणिम नवछिड्डधिविधिवंतहिययं दुरहिपित्तसिंभमुत्तोसहाययणं सब्यो दुरंतं गुज्झोरुजाणुजंघापाय संघाय संधियं असुइ कुणिम गंधि, एवं चिंतिजमाणं बीभच्छदरिसणिजं अधुवं अनिययं असासयं सडण पडणविद्धंसणधम्म पच्छा व पुरा च अवस्स चइयव्वं निच्छयत्रो सुदुजाण एवं श्राइनिहणं एरिसं सन्चमणुयाणं देहं एस परमत्थश्रो सम्भानो । ( सूत्रम् १७) छाया-इदञ्चैव शरीर शीर्पघटी मेदोमज्जा मांसमस्तुलुङ्गशोणितवालुण्डक चर्मकोश नासिकामलपिङ मलालयं अमनोज्ञकं शीर्षघटीभजितं गलनयनं कर्णौष्ठगण्डतालुकं अवालुखिल्लचिक्कणं चिगचिगायमानं दन्तमलमलिन वीभत्सदर्शनीयं अंसवाहङ गुल्य- ङ गुष्ठनखसन्धिसद्धातसन्धितमिदं बहुरसिकागारं बालस्कन्धशिराऽनेक स्नायु बहुधमनि सन्धिनद्ध प्रकटोदरकपालं कक्षनिप्फुटं कक्षागकलित 2018.06.1831838238783636363636363636 FREETEREETETEREDETERELETEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE दुरन्त अस्थिधमनि सन्तानः सन्तत सर्वतः समस्तात् परिस्रवच्च रोमकूपैः स्वयमशचि स्वमावतः परमदुर्गन्धि कालिज्जकान्त्रपित्त ज्वरहृदय फोप्फस फिप्फिम सीहोदरगृह्य कणिमा नवच्छिद्र द्रिग द्रिगाय मान हृदयं दुर्गन्ध पिरासिभमूत्रौषधायतनं सर्वतो दुरन्त गुह्योरुजानुजधापाद सङ्घातसन्धितम अशुचिकुणिमगन्धि एवं चिन्त्यमानं बीभत्सदर्शनीयं अध्र व मनियतमशाश्वतं शटनपटनविध्वसनधर्म पश्चाद्वा पूर्व वा अवश्य त्यक्तव्यं निश्चयतः सुष्ठु जानीहि एतद् आदिनिधनम् । इदृशः सर्वमनुजाना देहः । एष परमार्थतः स्वभावः ॥ सूत्र १७ ॥ भावार्थ-यह मनुष्य का शरीर शिर की खोपड़ी, मेद, मजा, मांस, शिर का स्नेह, रक्त, वालुण्डक (शरीर के भीतर का एक अवयव) चर्मकोश, नाक का मल और विष्ठा आदि दूपित मलों का घर है। यह सुन्दरता से वर्जित है। यह शिर की खोपड़ी के मल तथा नेत्र, कान, ओष्ठ, कपोल और तालु के मलो से परिपूर्ण है इसलिये यह अभ्यन्तर प्रदेश में अत्यन्त पिच्छिल है तथा धूप आदि लगनेपर बाहर भी पसीना होजाने से पिच्छिल होजाता है। दातों के मल से यह और अधिक मलिन है। जब रोग आदि के द्वारा मनुष्य कृश हो जाता है उस समय इस शरीर का दृश्य और अधिक बीभत्स (घृणास्पद ) हो जाता है। मुजा, अङ्ग लियाँ, अङ्ग ष्ठ और नखो की सन्धियो से यह शरीर जोडा हुआ है। अनेक प्रकार के तरल रसों से यह परिपूर्ण है । तथा कंधे की नसें और हड्डियों को बॉध रखने वाली अनेक शिराये एव हड्डियो की सन्धियों से यह शरीर बंधा हुआ है। इस शरीर का उदर कडाह के समान है, जिसे सभी लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। जैसे पुराने सूखे वृक्ष मे कोटर होता है उसी तरह दोनों भुजाओं के मूल मे कक्ष प्रदेश है। उस कक्ष प्रदेश में बुरे लगने वाले बाल भरे होते हैं। इसका विनाश बहुत बुरी तरह होता है। यह हड्डियो और शिराओं के समूह से भरा हुआ है। जिस तरह सच्छिद्र घडे से जल सदा निकलता रहता है इसी तरह इस शरीर के रोम कूपो से हमेशा पसीने का जल - EFERRIERETREETEREETERTRETENT RERTERE ६६ निकलता रहता है । इसके सिवाय नाक आदि छिद्रों से भी मल निकलता रहता है। यह शरीर स्वभाव से ही अपवित्र और दुर्गन्धि से परिपूर्ण है। इसमे कलेजा, आँतड़ी, पित्त, हृदय, फेफड़ा, सीहा और उदर ये गुप्त मांस पिण्ड होते हैं एवं नव छिद्र होते हैं। इस शरीर में हृदय बराबर धड़कता रहता है। यह पित्त, श्लेष्म और मूत्र आदि दुर्गन्ध वाले पदार्थों से तथा खाये हुए औषधों से परिपूर्ण होता है । इस शरीर के सभी भागों में अन्त का भाग बुरा होता है तथा इस का विनाश बहुत ही बुरी तरह होता है। गुदा, उरू, जानु, जङ्घा और पैरो के समूह से यह शरीर जुडा हुआ है। यह अशुचि तथा मास के गन्ध से युक्त है। यद्यपि यह अज्ञानवश अच्छा दीखता है तथापि विचार करने पर भयङ्कर रूप युक्त है। यह अध्रुव, अशाश्वत और अनियत है यानी विनाशी है। कुष्ट आदि व्याधि उत्पन्न होने पर इसकी अंगुलियाँ गल कर गिर जाती हैं तथा तलवार आदि का घात होने पर भुजा आदि अङ्ग कट जाते हैं एवं क्षय होजाना इसका स्वभावतः सिद्ध है । यह कुछ दिन के पश्चात् या पूर्व किसी दिन अवश्य ही नष्ट हो जाता है। यह मनुष्य शरीर आदि और अन्त वाला है। जैसा पहले वर्णन किया गया है वैसा ही इसका स्वभाव है। सुक्क म्मि सोणियमि य, संभूओ जणणि कुच्छि मज्झमि । तं चेव अमिज्झरसं, नवमासे घुटियं संतो ॥८॥ शुक्रे शोणिते च सम्भूतः जननी कुक्षिमध्ये । तञ्चैवामध्यरस, नवसु मासेषु पिवन सन ॥ ८५ ॥ भावार्थ-माता के उदर में शुक्र और शोणित के संयोग से यह उत्पन्न होकर उसी अपवित्र रस का पान करता हुआ नव मास तक गर्भ मे स्थिर रहता है।८५॥ जोगीमुहनिफिडिओ, थणगच्छीरेण बद्धिो जायो । पगई अमिज्झमइओ, कह देहो धोइउं सको ॥८६॥ SHEERENERMERENERREETEEEEEEEETERMIRE BENERERENERH HREETTER ६७ 386338233668382383383333333333333333 छाया-योनिमुखनिष्फिटितः, स्तनकक्षीरेण वर्धितो जातः । प्रकृत्या मेध्यमयः कथ देहो धावितुं शक्यः॥८६॥ भावार्थ-यह माता की योनि से निकल कर बाहर आया है और स्तन पान के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुआ है। यह स्वभाव से ही अपवित्रतामय है, इसे धोकर शुद्ध करना शक्य नहीं है ।। ८६ ।। हा असुइसमुप्पण्णा य, निग्गया य जेण चेव दारेणं । सत्ता मोह पसत्ता, रमंति तत्थेव असुइ दारंमि ॥८७॥ छाया-हा अशुचि समुत्पन्नाश्च, निर्गताश्च येन चैव द्वारेण । सत्त्वाः, मोहप्रसक्ताः रमन्ते तत्रैवाशुचिद्वारे ।। ८७ ॥ भावार्थ--हा, शोक ? यह प्राणो अपवित्रतामय स्थान मे उत्पन्न होकर जिस द्वार से निकल कर बाहर आया है, मोहवश युवा अवस्था में उसी अशुचि द्वार में रमण करता है । ८७ ॥ किह ताव घर कुडीरी, कविसहस्सहिं अपरिततेहिं । बरिणजइ असुइबिलं, जघणंति सकञ्जमूढेहिं ॥८॥ छाया--कथन्तावत् गृहकुड्याः, कविसहसू रैपरितान्तैः । वय॑ते ऽशुचि बिलं, जघनमिति स्वकार्यमूढैः ॥ ८८ ॥ भावार्थ:-जो अपवित्रता से परिपूर्ण बिल (योनि) से संयुक्त है ऐसे स्त्री के जघन को कविजन अश्रान्त भाव से क्यों कर वर्णन करते हैं ? वस्तुतः वे अपने स्वार्थवश मूढ हो रहे है ।। ८८ ॥ रागेण न जाणंति, वराया कलमलस्स निद्धमणं । ताणं परिणदंता, फुल्लं नीलुप्पलवणं व ॥८६॥ छाया-रागेण न जानन्ति, वराकाः कलमलस्य निर्धमनम् । तत् परिनन्दन्ति, फुल्ल नीलोत्पलवनमिव ॥ ८६ ॥ भावार्थः-विचारे कवि रागवशीभूत होकर नहीं जानते हैं कि- यह स्त्री का जघन अपवित्र मल की थैली है। इसीलिये अत्यन्त ६८ JERPREETEREITHEREFEREFERENEFERENETELEGEETETTER विषयासक्त वे इसका वर्णन करते हैं और प्रफुल्लित नील कमल के समान इसको मनोहर बतलाते हैं॥८६॥ कित्तियमिचं वरणे, अमिज्झमइयंमि वच्चसंघाए । रागो हु न कायव्यो, विरागमूले सरीरंमि ॥१०॥ छाया-कियन्मानं वर्णये, अमेध्यमये वर्चस्कसङ्घाते । रागो हि न कर्त्तव्यः, विरागमले शरीरे ॥ १० ॥ भावार्थः- कहा तक वर्णन किया जाय, यह शरीर आपवित्रता से भरा है, यह विष्ठा की राशि है तथा घृणा के योग्य है । अतः बुद्धिमान् पुरुप को इसमें राग नहीं करना चाहिये ॥१०॥ किमिकुलसय संकिरणे, असुइमचुक्खे असासयमसारे । सेय मल पुन्बर्धामी, निव्धेयं वचह सरीरे ॥६१॥ छाया-कृमिकलशतसङ्कीर्णे, अशुच्यचक्षे अशाश्वतासारे । स्वेदमलपूर्वके, निर्वेद मजत शरीरे ॥ ६ ॥ भावार्थ:-यह शरीर सैकड़ो कृमिकुल यानी कीडो से भरा हुआ है तथा अपवित्र मल से परिपूर्ण परग अशुद्ध है। एवं विनाशी और साररहित है। दुर्गन्धपूर्ण स्वेद मे भीगा हुआ है। अतः मनुष्य को इससे विरक्त रहना चाहिये ।। ६१ ।। दंत मल-कएणगृहगसिंघाण मले य, लालमलबहुले । एयारिसे वीमच्छे, दुगुंछणिज्जंमि को रागो ॥१२॥ छाया-दन्तमलकर्णगृथक सिंघाण मले च, लालमलबहुले । एतादृशे वीभत्से, जुगुप्सनीये को रागः ॥ १२ ॥ भावार्थ:-यह शरीर दांतों के मल, कान के मल, नाक के मल और विष्ठा के मल से परिपूर्ण है। तथा लाला यानी मुख के मलसे भरा हुआ है। अतः इस प्रकार बीभत्स (घृणास्पद ) और निन्दनीय शरीर में क्या प्रेम किया जाय ? को सडण पडण विद्ध किरिण, विसण चयण मरण धम्ममि । देहमि अहिलासो, कुहिय कडिण कट्ठभूमि।।६।। 33366386136823282381130331313111111 । ६६ REMETERNETEREFERREDEREDETERNETETTE छाया-कः शटन पतन विकिरण विध्वंसन च्यवन मरणधर्म । देहेऽभिलाष , कुथित कठिन काष्ठ भूते ॥६३ ॥ भावार्थ:-यह शरीर कुष्ट आदि व्याधि होने पर गल कर गिर जाता है। तलवार आदि के प्रहार होने पर फट कर गिर जाता है। यह स्वभाव से ही नश्वर है। रोग मादि होने पर क्षीण हो जाता है। इसके हाथ पैर आदि अवयव नष्ट हो जाते हैं तथा एक दिन पूर्ण रूपेण यह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सड़े हुए कठिन काष्ठ की तरह इस शरीर में अभिलाप रखना क्या है ? ॥ ६३ ॥ कागसुणगाण भक्खे, किमिकुलभचे य वाहिभत्ते य । देहमि मच्छभत्ते, सुसाणभत्तम्मि को रागो ॥१४॥ छाया-काकश्वानयोर्भक्ष्ये, कृमिंकुल भक्तेच व्याधिभक्ते च । देहे मत्स्यभक्ते, श्मशानभवने च को रागः ॥६४ ॥ भावार्थ -यह शरीर काक और कुत्तों का भक्ष्य है तथा कीडे, व्याधि और मछलियों का भी भोजन है तथा श्मशान मे रहने वाले गीध आदि का भक्ष्य है ऐसे शरीर में राग रखना क्या है ? ॥१४॥ असुइ अमिज्म पुगणं कुणिमकलेवर कुडि परिसवति । आगंतुयसंठवियं, नवछिड्डमसासयं जाणे । ॥६॥ छाया--अशुचि अमेध्यपूर्ण, कुणिम कलेवर कुटी परिस्रवदिति । आगन्तुकसंस्थापितं, नवच्छिद्रमशाश्वतं जानीहि ॥६५॥ भावार्थ:-यह शरीर अपवित्र है, अपवित्र वस्तुओं से पूर्ण है । मांस और हड्डी का घर है। चारों ओर इस शरीर मे मल निकलता रहता है। माता पिता के रज वीर्य से उत्पन्न हुआ है। नव छिद्रों से यह युक्त है। यह स्थिर नहीं हैं ऐसा जानो ।। ६५ ।। पिच्छसि मुहं सतिलयं, सविसेसं रायएण अहरेणं । सकडक्खं सवियारं, तरलच्छिं जुव्वणित्थीए ॥६६॥ छाया-पश्यसि मुखं सतिलकं, सविशेष रागवताधरेण । सकटाक्षं सविकारं, तरलाक्ष युवस्त्रियाः ॥६६॥ 11 HERE ७० FERREEEEERESERRERESTREETEE भावार्थ-तुम तिलक और कुकुम आदि के लेपन से सुशोभित तथा पान की लालिमा से रञ्जित पोष्ठ से मनोहर युवती की के मुख को काम विकार के साथ सकटाक्ष और चञ्चल नेत्रो द्वारा देखते हो ।। ६६ ।। पिच्छसि बाहिरमट्ट, न पिच्छसि 'उजरं कलिमलस्स । मोहेण नच्चयंतो, सीसघडी कंजियं पियसि ॥१७॥ छाया-पश्यसि बाह्यमर्थ, न पश्यसि मध्यगत कलिमलस्य | मोहेन नृत्यन शीर्पघटी काञ्जिक पिबसि ॥ ७ ॥ भावार्थ-हे भाई । तुम बाहर के पदार्थ को देखते हो, परन्तु अन्दर अपवित्र मल भरा हुआ है उसे नहीं देखते। विषय के मोहवश नाचने लगते हो और अपवित्र मस्तक के रस को चुम्बनादि द्वारा पान करते हो ॥ ६७ ।। सीसघडी निग्गालं, जं निहसि दुगुंछसि जं य । तं चेव रागरत्तो मूढो, अइमुच्छिओ पियसि ॥१८॥ छाया-शीर्पघटी निर्गाल, यनिष्ठीवसि जुगुप्ससे यच्च । तन व रागरक्तो, मूढोऽतिमूछितः पिबसि ॥ ६८ ॥ भावार्थ-जिस मुख के थूक को तुम स्वय बाहर यूक देते हो और जिससे घृणा करते हो उसी निन्दित पदार्थ को कामासक्त तथा अत्यन्त मोहित होकर तीव्र आसक्ति क साथ पान करते हो॥१८॥ पूइय सीसकवालं, पूइयनासं य पूइदेहं य । पुइयछिडविछिड, पुइयचम्मेण य पिणद्धं ॥ ६ ॥ छाया-पूतिकशीर्षकपालं, पूतिकनासञ्च पूतिदेहश्च । पूतिकच्छिद्रविवृद्ध, पूतिकचर्मणा च पिनद्धम् ॥ ६ ॥ भावार्थ-शिर की खोपड़ी अपवित्र है, नासिका अपवित्र है, सभी अङ्ग प्रत्यग अपवित्र है तथा छोटे छोटे चिन्द्र भी अपवित्र हैं तथा अपवित्र चमड़े मे यह समस्त शरीर ढका हुआ है ।। ६६ ॥ HERSITIENTERTAINMENTERNERAGE HTTERTEREST ७१ R अंजण गुण सुविसुद्धं, रहाणुन्बट्टणगुणेहि सुकुमालं, पुप्फुम्मीसियकेस, जणेइ बालस्स तं रागं ॥१०॥ छाया-अञ्जनगुणसुविशुद्ध', स्नानोदर्तनगुणैः सुकुमार | पुप्पोन्मिश्रितकेश, जनयति वालस्य तद्रागम् ॥ १०० ।। भावार्थ:-ऑखें अञ्जन लगाने से तथा अङ्ग प्रत्यङ्गो मे भूपण धारण करने से एव स्नान उवर्तन आदि शरीर के संस्कारों से तथा केशो में पुष्प धारण करने से कृत्रिम सुन्दरता से पूर्ण नायिका का मुख अज्ञानी जीव को राग उत्पन्न करता है ॥ १०० ॥ जं सीसपूरउत्ति य, पुप्फाई भणंति मंदविनाणा। पुष्फाई चिय ताई, सीसस्स य पूरयं सुणह ॥१०१॥ छाया-यानि शीर्षपूरकानीति च, पुष्पाणि भणन्ति मन्दविज्ञानाः। पुष्पाण्येव तानि, शीर्षस्य च पूरकं शृणुत ॥ १०१ ॥ भावार्थः-कामासक्त पुरुष जिन पुष्पो को मस्तक का पूरक यानी भूषण बतलाते हैं वे पुष्प वस्तुतः मस्तक के पूरक नहीं हैं वे तो पुष्प ही है । मस्तक के पूरक यानी पूर्ण करने वाले क्या पदार्थ हैं ? सों में बतलाता हूँ आप सुनें ।। १०१ ।। मेश्रो वसा य रसिया, खेल सिंघाण ए य छुभ एयं । अह सीस पूरओ भे, नियग सरीरंमि साहीणो ॥१०२ ।। छाया--मेदो वसा च रसिका, खेल सिंघानकश्च क्षिपैतान् । अथ शीर्षपूरको मवता, निजक शरीरे स्वाधीनः ॥१०२॥ भावार्थः-मेद, चर्बी, रसिका (पीव), खंखार और नाक का मल ये सब आपके शिर को पूरण करने वाले हैं, ये सब आपके आधीन हैं अतः अपने शरीर के ऊपर इन्हें उठा उठा कर आप डाल लीजिये । बस इससे अपन शिर को भूपित हुआ समझ लीजिये ॥ १०२॥ सा किर दुप्पडिपूरा, वच्चकुटी दुप्पया नवच्छिदा। उक्कडगंधविलित्ता, बालजणो अइमुच्छियं गिद्धो ॥१०॥ - TRE ७२ छाया-सा खलु दुष्प्रतिपूरा, वर्चस्कुटी द्विपदा नवच्छिद्रा । उत्कटगन्धविलिप्ता, बालजनोऽतिमूर्च्छितं गृद्धः ॥१०३॥ भावार्थ-यह शरीर विष्ठा की कुटी है। इसका पूरण करना अशक्य है। यह दो पैर और नव छिद्रों से युक्त है। इसमें असह्य दुर्गन्ध भरा हुआ है तथापि अज्ञानी जन इस कुत्सित शरीर में अत्यन्त आसक्त हो रहे हैं ॥१०३।। जं पेमरागरचो, अवयासेऊण गूढमुत्तोलि । दंतमलचिक्कणंगं, सीसघड़ीकंजियं पियसि ॥१०४॥ छाया-यस्मात् प्रेमरागरक्तः, अवकाश्य पुनः गूढ मुत्तोलिम् । दन्तमलचिक्कणाङ्ग, शीर्षघटीका जिकं पिवसि ॥ १०४ ॥ भावार्थ-अज्ञानी जीव कामराग .से, अनुरञ्जित होकर नायिका की योनि और अपने लिंग को उघाड़ कर दाँत तथा शरीर के मल से चिकण शरीर का आलिंगन करते हैं। तथा शिर के खट्टे अपवित्र रस को पान करते हैं ॥ १०४ ॥ दंतमुसलेसु गहणं, गयाण मंसे य ससयमीयाणं । बालेसु चमरीणं, चम्मणहे दीवियाणं य ॥१०५ ॥ छाया-दन्तमुशलेषु ग्रहण, गजाना मांसे च शशकमृगाण।। वालेषु च चमरीणा, चर्मनखे दीपिकानाञ्च ॥१०५॥ भावार्थ-मनुष्य गण दाँतों के लिये हाथी को और मांस के लिये शशक और मग को तथा बाल के लिये चमरी गाय को और चर्म नख के लिये व्याघ्र को ग्रहण करते हैं। अतः इनके अंग तो सर्वसाधारण के भोग के काम में आते हैं परन्तु मनुष्य के अङ्ग प्रत्यङ्ग भोग में नहीं आते हैं। इसलिए मनुष्य को इस शरीर में आदर न रखते हुए धर्म का आचरण करना चाहिये ॥ १०५ ।। पूइयकाए य इहं, चवणमुहे निचकालावीसत्थो । अाइक्खसु सम्भावं, किम्मिसि गिद्धो तुमं मूढ ॥१०६॥ छाया-पूतिक काये चेह, च्यवनमुखे नित्यकालविश्वस्त । आख्याहि सद्भावं, किमसि गृद्धस्त्वं मूढ ! ॥१०॥ - FERHIREERESERTRENEREFEREE ७३ भावार्थ-हे मुर्ख । यह शरीर अपवित्र पदार्थों का घर है तथा मरणशील है। इसमें सदा विश्वास करते हुए तुम क्यों आसक्त हो रहे हो ?इसका सत्य कारण बताओ ॥ १०६ ॥ दंतावि अकज्जकरा, बाला वि य वड्ढमाण वीभच्छा । चम्मवि य वीभच्छं, भण किं तंसि तं गो रागं ॥१०७॥ छाया-दन्ता अप्यकार्यकराः, वाला अपि वर्धमानाः बीभत्साः। चर्माऽपि बीभत्सं, भरण किं तस्मिन् त्वं गतो रागम् ॥१०७॥ भावार्थ:-दॉत भी किसी काम के नहीं हैं यानी अपवित्र हैं तथा बाल भी बढे हुए घृणा के योग्य ही हैं एवं चर्म भी घृणास्पद है फिर बतलाओ तुम इस शरीर में क्यों राग रखते हो ? ॥ १०७ ॥ सिंभे पित्त मुत्ते, गृहमि य बसाइ दंत कुंडीसु । भणसु किमत्थं तुझ, असुइमि विवढिओ रागो ॥ १०८ ॥ छाया-सिम्भे पित्त, मूत्रे, गूथे च वसायाँ दन्तकुड्यासु । भण किमर्थं तवाशुचौ, विवर्धितः रागः ॥१०८ ॥ भावार्थः--यह शरीर कफ, पित्त, मूत्र, विष्टा, चर्बी और हडियो का घर है । बतलाओ इस अपवित्र वस्तु में तुम्हारा राग क्यो अधिक हुआ है ॥ १०८ ।। जंघट्ठियासु ऊरू, पइट्ठिया तट्ठिया कडी पिट्ठी । कडियट्टिवेढियाई, अट्ठारसपिट्टि अट्ठीणि ॥ १०६ ॥ छाया-जङ घास्थिकयोरूरू, प्रतिष्ठितौ तत्स्थिता कटिपृष्ठिः । कटयस्थि वेष्ठितान्यष्टादश पृष्ठ्यस्थीनि ॥ १०६ ।। भावार्थः-जड घा की हड्डियों के ऊपर ऊरु स्थित है और ऊरु के ऊपर कटिंभाग स्थित है तथा कटि के ऊपर पृष्ठभाग स्थित है और पृष्ठ मे अंठारह हदियाँ वेष्ठित हैं। शरीर का यही स्वरूप है ।। १०६ ।। । EETET ७४ D3300222303030397035 2 दो अच्छि अट्टियाई, सोलस गीवडिया मुणेयया । पिट्ठी पइट्ठियाओ, वारस किल पंसुली हुँति ॥ ११० ॥ छागा- 'प्रक्षास्थिनी, पोडशमीवास्थीनि ज्ञातव्यानि । पृष्ठिप्रतिष्ठिताः द्वादश, किल पंशुल्यो भवन्ति ॥ ११० ॥ भावार्थ:-- दो नेत्र की हलियाँ होती है और सोलह ग्रीवा की हालियाँ होती हैं। एवं पीठ में स्थित बारह पसलियाँ होती हैं। अट्ठिय कहिणे, सिरहारुबंधणे मंस चम्मलेवमि । विट्ठाकोट्ठागारे, को वच्च घरोवमे रागो ॥ १११ ।। छाया-अस्थिकठिने. शिरास्नायुबन्धने मां चर्मलपे । विष्ठाकोप्ठागारे, को व!गृहोपमे राग १ ॥ १११ ॥ भानार्थः-हनियो के होने से जो कठिन है यथा शिरा और नसों के द्वारा जो बँधा हुआ है एवं चमड़ा और मांस से जो लिप्त है, तथा विष्ठा का जो कोष्ठागार है ऐसे पाखाने के घर के तुल्य इस शरीर मे राग करना क्या है ? ।। १११ ॥ जह नाम वचकूवो, णिचं भिणिभिणिभणंतकायकली। किमिएहि सुलुसुलायइ, सोएहिं य पूइयं वहइ ॥ ११२ ॥ छाया-यथानाम वर्चःकूपो, नित्य गिणिभिणिभणकाकलि । कृमिभिः सुलुसुलायते, सोतोभिश्च पूतिकं वहति ॥ ११२ ॥ भावार्थ:-जैसे विष्ठा से भरा हुआ कुओं होता है, उसके पास कॉव कॉव करते हुए कौए परस्पर लड़ते रहते हैं और विष्ठा के कीडे उसके अन्दर चलते रहते हैं जिससे सुल सुल शब्द होता रहता है तथा बदबूदार स्रोत बहते रहते हैं । उस कूप के समान ही इस शरीर की दशा रोगी अवस्था में और मरने पर होती है ।। ११२ ।। उद्वियणयणं खगमुहविकट्टियं, विपइण्णबाहुलयं । अंत विकट्टयमालं, सीस घडी पागडी घोरं ॥ ११३ ॥ छाया-उद्वतनयनं , खगमुखविकरितं विप्रकीर्णचाहुलतम् । अन्तर्षिकर्षितमाल , शीर्षघटी प्रकटघोरम् ॥ ११३ ।। 32032133133232336436532323232 M - भावार्थ:-मरने के बाद इस शरीर के नेत्र को निकाल कर पक्षी अपनी चोंच से नोच लेते हैं। लता की तरह भुजा पृथिवी पर पड़ी रहती है। गीदड़ अतडी निकाल लेते हैं। खोपड़ी घड़े के समान पड़ी रहती है । उस समय यह शरीर बहुत ही भयङ्कर दिखाई देता है ।। ११३ ।। भिणिभिणिभणंतसई, विसप्पियं सुलुसुलित ममोडं । मिसिमिसिमिसंतकिमियं, थिविथिविथिवियंतबीभच्छं ॥ ११४ ॥ छाया-भिणिमिणिभणच्छवं, विसर्पित सुलुसुलत्मासपुटम् । मिसिमिसिमिसत्कमिकं, थिविथिविथिवदन्त्रबीभत्सम् ॥ ११४॥ भावार्थ:-जब यह प्राणी मर जाता है तब इसके मृत कलेवर के ऊपर मक्खियाँ भिन् भिन् करती हैं, और अङ्ग प्रत्यक्ष ढीले होकर सूज जाते है। मास समूह सड़ कर सल सल करता है और उसमें कीड़े उत्पन्न होकर चलते हैं जिससे मिसमिस का शब्द होता है और अतड़ी सड़ कर सलसल करती है। इस कारण वह कलेवर बहुत ही घृणितरूप मे दीखता है ॥ ११५ ।। पागडियपंसुलीयं, विगरालं सुक्कसंधिसंघायं । पडियं निचेयणयं, सरीर मेयारिसं जाण ।। ११५ ॥ छाया-प्रकटित पाशुलिक, विकराल शुष्कसन्धिसड घातम् । पतितं निश्चेतनकं, शरीर मेतादृशं जानीहि ॥ ११५ ॥ भावार्थ:-मरण के पश्चात् यह शरीर किसी स्थान मे अचेतन होकर पड़ा रहता है, इसकी सारी पसलियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। सन्धियों सूखी हुई होती है इसलिये यह बहुत ही भयङ्कर दिखाई देता है। हे भाई । तुम शरीर को इसी तरह का समझो ।। ११५ ।। वचाउ असुइयरं, नवहिं सोएहिं परिगलंतेहिं । आमगमल्लगरूवे, निब्बेयं वचह सरीरे ॥ ११६ ॥ छाया--वर्चर कादशुचितरं, नवभिः सोतोभिः परिगलद्भिः। प्रामक मल्लकरूपे, निर्वेदं व्रजत शरीरे ॥ ११६ ॥ FRERTERTERSTERESENT ७६ भावार्थ:-यह शरीर विष्ठा के संसर्ग से तथा नव द्वारों से मल के निकलते रहने से महा अशुद्ध है। यह कच्चे घड़े के समान शीघ्र नष्ट होने वाला है, इसलिये इससे विरक्त होजाना चाहिये ॥ ११६॥. दो हत्था दो पाया, सीसं उचंपियं कबंधमि । कलमल कोट्ठागारं, परिवहसि दुयादुयं वचं ॥ ११७ ॥ छाया-दौ हस्ती द्वौ पादौ, शीर्ष उच्चम्पितः कबन्धे । कलमलकोष्ठागारं, परिवहसि द्रतं द्रतं वर्चः॥१७॥ भावार्थ -दो हाथ दो पैर और शिर इस घड़ में जोडा हुआ है। यह मल का कोष्ठागार है। तुम विष्टा को लिये हुए क्यों शीघ्रता पूर्वक विचरते हो? ॥ ११७ ।। तं य किर रूववंतं, वचंतं रायमग्गमोइगणं । परगधेहिं सुगंधयं, मगणतो अप्पणो गंधं ॥ ११८ ॥ छाया-तच किल रूपवद्, बजद्राजमार्ग प्राप्तम् । परगन्धैः सुगन्धकं, मन्यमान आत्मनो गन्धम् ॥ ११८॥ भावार्थ:-जिसका स्वरूप बताया गया है ऐसे इस शरीर को राजमार्ग के ऊपर जाते हुए देख कर तुम इसे रूपवान् मानते हो तथा अन्य पदार्थों के गन्ध से सुगन्धित बने हुए इसके गन्ध को निज का गन्ध मानते हो ॥११॥ पाडलचंपयमल्लिय अगरुयचंदणतुरुकवामीसं । गंध समोयरन्तं, मगणतो अप्पणो गंधं ॥ ११६ ॥ छाया-पाटलचम्पकमल्लिकागुरुकचन्दनतुरुष्क व्यामिश्रम् । गन्धं समास्तरन्त, मन्वान प्रात्मनो गन्धम ॥ ११६ ॥ भावार्थ:-गुलाब, चम्पा, चमेली, अगर, चन्दन और कस्तुरी के संयोग से उत्पन्न गन्ध चारों तरफ फैल रहा है, उसे तुम अपना गन्ध मान कर प्रसन्न होते-हो ॥ ११६ ॥ FREETERESTERRIERENEFERENER -- i1 ७७ . FREEDERERENERERENEFTERE सुहवाससुरहिगंध, वायसुहं अगरुगंधियं अंगं । केसा रहाणसुगंधा, कयरो ते अप्पणो गंधो ॥ १२० ॥ छाया-शुभवाससुरभिगन्ध, वातसुखमगुरुगन्धितमङ्गम् । केशाः स्नानसुगन्धाः, कतरस्ते श्रात्मनो गन्धः ॥१२० ।। भावार्थः-तुम्हारा अङ्ग सुगन्धित चूर्ण लगाने से तथा अगर के धूप से धूपित होने से पर-निमित्तवश उत्तम गन्ध युक्त प्रतीत होता है। पवन के सयोग से वह शीतल सुखदायी प्रतीत होता है एवं तुम्हारे केश स्नान करने के पश्चात् सुगन्ध तैलादि-के लेपन से सुगन्धित हो रहे हैं। बताओ इन में तुम्हारा कौनसा अपना गन्धं है ? ।। १२० ।। अच्छिमलो कएणमलो, खेलो सिंघाणश्रो य पूत्रो य । असुई मुत्त पुरीसो, एसो ते अप्पणो गंधो ।। १२१ ।। छाया-अक्षिमलः कर्णमलः, खेलः सिंहानकश्च पूतिकश्च । अशुची मूत्रपुरीषौ, एष ते आत्मनो गन्धः ।। १२१ ॥ भावार्थः-आँखों का मल, कानो का मल, खखार, नाक का मल, पीव ( रस्सी ) और अशुचि मूत्र और विष्ठा ये ही सब तुम्हारे अपने गन्ध हैं ।। १२१ ।। जाओ चिय इमाओ इत्थियात्री अणेगेहिं कइवर सहस्सेहिं विविहपासपडिबद्ध हिं कामरागमोहेहिं चरिणयात्री ताओ विएरिसाओ, तंजहा, १ पगइविसमाश्रो, २ पियवयणवल्लरीओ, ३ कइयवपेमगिरितडीओ, ४ अवराहसहस्स घरणीओ, ५ पभवो सोगस्स, ६ विणासो बलस्स, ७ खूणा पुरिसाणं, ८ णासो लजाए, ६ संकरो अविणयस्स, १० णिलयो णियडीणं, ११ खणी चइरस्स, १२ सरीरं सोगस्स, १३ भेो मज्जायाणं, १४ आसानो रागस्स, १५ णिलओ दुच्चरियाणं, १६ माईए .

संमोहो, १७ खलणा णाणस्स, १८ चलणं सीलस्स, १६ विग्धो धम्मस्स, २० अरी साहूर्ण, २१ दूसणं आयारपत्ताणं, २२ भारामो कम्मरयस्स, २३ फलिहो सुखमग्गस्स, २४ भवणं दरिदस्स, २५ अवि याओ इमाश्रो आसीविसो विव कुवियाओ, २६ मत्तगो विव मयणपरवसाओ, २७ वाग्धीव दुहृहिययाओ २८ तणच्छन्न कूवो विव अप्पगासहिययाओ, २६ मायाकारो विव उवयारसयवंधण पउत्तीओ, ३० आयरियसविहि विच बहुगिज्झ सब्भावाओ, ३१ फुफुया विव अंतोदहण सीलाओ, ३२ नग्गयमग्गो विव अणववियचित्ताओ, ३३ अंतो दुट्ठवणो विर कुहियहिययाओ, ३४ किएहसप्पो विव अविस्ससणिजाओ, ३५ संघारो विव छण्णमायायो, ३६ संज्मभरागो विच मुहुत्तरागाओ, ३७ समुद्द वीचि विव चलस्सब्भावामओ, ३८ मच्छो विव दुप्परियत्तण सीलाओ, ३६ वाणरो विव चलचित्ताओ, ४० मच्चू विव निब्बिसेसाओ, ४१ कालो विच णिरणुकंपाओ, ४२ वरुणो विव पास हत्थाओ, ४३ सलिल मिव णिएणगामिणीश्रो, ४४ किवणो विव उत्ताण हत्थाओ, ४५ णरो विव उत्तासणिजाओ, ४६ खरो विव दुस्सीलाओ, ४७ दुहस्सो विव दुद्दमाओ, ४८ बालो विव मुहुत्तहिययाओ, ४६ अंधयारमिव दुप्पवेसायो, ५० विसवल्ली विव अणल्लियणिजाओ, ५१ दुट्ठगाहा विव वावी अणवगाहाओ, ५२ ठाणभट्ठो विव इस्सरो अप्पसंसणिजाओ, ५३ किंपागफलमिव मुहमहुराओ, ५४ रित्त मुट्ठी विव बाललोभणिजाओ, ५५ मंस पेसी गहणमिव सोबद्दवाओ, ५६ जलियचुडिली विव अमुच्चमाण दहण सीलाओ, ५७ अरिद्वमिव दुल्ल घणिजाओ, ५८ कूड करिसावणो विव काल विसंवायण सीलाओ, ५६ चंडसीलो विव दुक्खरक्खियाओ, ६० अइविसाश्रो, ६१ दुगु'च्छियाओ, ६२ दुरुवचाराओ, ६३ अगंभीरायो, ६४ अविस्ससणिजाश्रो, ६५ अणवत्थियाओ, ६६ दुक्ख RITERRRRRRRRRENERETERRENERE 4 313623633BE ७६ रक्खियाओ, ६७ दुक्खपालियाभो, ६८ अरइकराओ, ६६ ककसाओ, ७० दड्ढवेराओ, ७१ रूव सोहग्गमोमचाओ, ७२ भुयगगइकुडिलहिययाओ, ७३ कतारगइट्ठाण भूयाओ, ७४ कुलसयणमित्तभेयणकारियामओ, ७५ परदोस पर- गासियानो, ७६ कयग्घाओ, ७७ बलसोहियाश्रो, ७८ एगतहरणकोलाओ, ७६ चंचलाओ, ८० जोइ भंडोवरागो विव मुहराग विरागाओ, ८१ अवि याई ताओ अंतरंग भंगसयं, ८२ अरज्जुश्रो पासो, ८३ अदारुया अडवी, ८४ अणलस्स णिलश्रो, ८५ अइक्खा वेयरणी, ८६ अण्णामिया वाही, ८७ अवियोगो विप्पलाश्रो, ८८ अरूव उवसग्गो, ८६ रइवंतो चित्त विभभो, ६० सव्वंगो दाहो, ६१ अणमया बजासणी, ६२ असलिल पवाहो, ६३ समुदरओ। छाया-या एव इमाः स्त्रियः अनेक कविवर सहस्रः विविधपाश प्रतिबद्ध : कामरागमोहै। वर्णिताः । ता अपि ईदृश्यः तद् यथा- प्रकृतिविषमाः, प्रियवचनवल्लर्म्यः, कतवप्रेमगिरितटयः, अपराधसहस्रगृहाणि, प्रभवः शोकस्य, विनाशो बलस्य, शूना पुरुषाणाम् , नाशो लज्जायाः, संकरोऽविनयस्य, निलयो निकृतीनाम , खनिर्वैरस्य, शरीर शोकस्य, भेदो मादायाः, श्राश्वासो रागस्य, निलयो दुश्चरितानाम् , मातृकायाः समूहः, स्खलना ज्ञानस्य, चलन शीलस्य, विनो धर्मस्य, अरिः साधूनाम , दूषणमाचारोपपन्नानाम , पारामः कर्मरजसः, परिधो मोक्षमार्गस्य, भवनं दारिद्रयस्य, अपि चेमाः आशीविष इव कुपिताः, मरागज इव मदनपरवशाः, व्याघ्रीव दुष्टहृदयाः, तृणच्छन्नकूप इवाप्रकाशहृदयाः, मायाकारक इवोपचारशतबन्धनप्रयोकत्र्य , आचार्य सविधमिव बहु ग्राह्यसद्भावाः, फुफक इवान्तर्दहनशीलाः, नगमार्ग इवानवस्थितचिताः, अन्तर्दुष्टत्रण इव कुथितहृदयाः, कृष्णसर्प इवाविश्वसनीया , सहार इव छन्नमायाः, सन्ध्याभराग इव मुहूर्च रागाः, समुद्र- धीचीव चलस्वभावा , मत्स्य इय दृष्परिवर्तनशीलाः, वानर इव चलचिताः, मृत्युरिव निर्विशेषाः, काल इव निरनुकम्पाः, वरुण इव पाशहस्ताः, - ८० ENTERNETERTERE RELTSTARRERESENTREENETERETER सलिलमिवं निम्नंगामिन्यः, कृपण इवोत्तान हस्ताः, नरक इव उल्लासनीयाः, खरं इव दुःशीलाः दुष्टाश्व इव दुर्दमा , बाल इव मुहूर्गहृदया, अन्धकार इव दुष्प्रवेशाः, विषवल्लीव अनाश्रयणीयाः, दुष्टग्राहा वापी इंव अनवगाह्याः, स्थानम्रप्ट ईश्वर इव अप्रशसनीयाः, किंपाकफलमिव मुखमधुराः, रिक्तमुष्टिरिव बाललोभनीयाः, मांसपेशीग्रहण मिव सौपद्रवाः, ज्वलितचुटिलीव अमुच्यमान दहनशीलाः, अरिष्टमिव दुर्लछनीयाः, कूटकार्षापण इंव काल विसवादनशीलाः, चण्डशील इव दुःखरक्षिताः, अतिविपादाः, जुगुप्सनीयाः, दुरुपचाराः, अगम्भीराः, अविश्वसनीयाः, अनवस्थिताः, दुःखरक्षिता, दुःखपालिता , अरतिकराः, कर्कशा, दृढवैराः, रूपसौभाग्यमदोन्मताः, भुजगगतिकुटिलहृदयाः, कान्तारगति- स्थानभूताः, कुलस्वजन मित्र भेदनकारिकाः, परदोपप्रकाशिंकाः, कृतघ्नाः, बलशोधिकाः, एकान्तहरणकोलाः, चञ्चला', ज्योतिर्भाण्डोपराग इव मुखरागविरागाः, अपि च ताः अन्तरङ्गभङ्गशतं, अरज्जुकः पाशः, अदारुका अंटवी, अनलस्य निलयः, अनीक्ष्या वैतरणी, अनामिको व्याधिः, अवियोगो विप्रलापः, अरूप उपसर्गः, रतिमान् चित्तविभ्रम., सर्वाङ्गको दाह', अनभ्रका वज्राशनिः, असलिलप्रवाहः, समुद्ररयः । मावार्थ-अनेक प्रकार के सासारिक बन्धनों के द्वारा जो बँधे हुए थे तथा कामानुराग से जो अत्यन्त मोहित थे ऐसे हजारो कवियो ने अपने अपने काव्यों मे स्त्रियो का वर्णन विस्तार के साथ किया है परन्तु उनका वर्णन सत्य नहीं है। अतः स्त्रियों का यथार्थ स्वरूप बतलाया जाता है- स्त्रियो का हृदय स्वभाव से ही वक्र ( कुटिल ) होता है । वे मधुर वचन बोलती हैं परन्तु उनका हृदय मधुर नहीं होता, जैसे वर्षा ऋतु में पहाड़ी नदियाँ बड़ी तेजी के साथ वहती हैं उसी तरह इनमे कपटमय प्रेम का प्रवाह बड़ी तेजी के साथ बहता रहता है। स्त्रियाँ शोक की उत्पत्ति का क्षेत्र है । खियाँ पुरुषों के बल को नाश करने वाली हैं और पुरुषों को वध करने के लिये वध्यशाला के समान हैं। 36363335336363636393 - ८१ EEEEEEEEEETTERRIERRIER विद्वानो ने कहा है कि स्रियाँ दर्शन मात्र से चित्त को हर लेती हैं भौर स्पर्श करने से बलः कोहरण करती हैं तथा सजा करने से वीर्य का-हरण करती हैं। अतः खियाँ प्रत्यक्ष ही राक्षसी हैं । खियाँ लज्जा का नाश कर देती हैं। खियाँ अविनय की राशि और कपट तथा पाखण्ड के घर हैं। स्त्रियों के कारण जगत में वैर होता हुआ देखा जाता है इसलिये स्त्रियाँ वैर की खान है त्रियाँ.शोक का तो शरीर ही हैं। स्त्रियों के कारण मनुष्य कुल; की मर्यादा का नाश कर देता है। एक स्त्री के कारण मनुष्य अपनी संयम मादा का भी नाश कर देता है। खियाँ राग और दूध के आधार हैं इनके कारण ही मनुष्यो में राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं। स्त्रियाँ दुश्चरित्र के घर हैं। इनके कारण मनुष्य का चरित्र भ्रष्ट होजाता है। ये साक्षात् कपट की राशि हैं। इनले साथ अधिक संसर्ग होने से ज्ञान, दर्शत और चारित्र का ध्वस हो जाता है। जो ब्रह्मचारी पुरुष इन स्त्रियो के साथ अधिक संसर्ग रखता है उसका ब्रह्मचर्य व्रत अवश्य ही नष्ट होजाता है। अतः स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य को नष्ट करने वाली हैं। स्त्रियां श्रत और चारित्र धर्म के विघ्न, स्वरूप हैं । जो महापुरुष मोक्षमार्ग के पथिक हैं. स्त्रियाँ उनके लिये 'तो' महान् शत्रु हैं क्योंकि उनके चारित्र का नाश करने वाली हैं- तथा उन्हें नरक आदि गतियो मे गिराने वाली हैं । जो नोग ब्रह्मचर्य आदि उत्तम आचारों से सम्पन्न हैं, उन्हें स्त्रियों कलङ्कित कर देती हैं। जैसे , बगीचे में पुष्पों का पराग अधिक होता है उसी तरह सियों के संसर्ग से पुरुषो में कर्मरूपी पराग अधिक होता है। इसलिये स्त्रियाँ कर्म रूपी पराग के लिये बगीचे के समान हैं । जैसे भर्गला लगा देने से द्वार बन्द हो जाता है। इसी तरह स्त्री मे आसक्त होने से 'मोक्ष का द्वार बन्द हो जाता है। इसलिये खियाँ मोक्ष मार्ग के लिये अर्गला स्वरूप हैं। जैसे सर्प महान् क्रोधी होता है इसी तरह खियाँ भी अत्यन्त क्रोधिनी होती हैं। जैसे पागल हाथी अपने वश में नहीं होता है उसी तरह स्त्रियाँ काम के वशीभूत होती हैं। जैसे - बाघिन का हृदय दुष्ट- होता है, उसी तरह - PRESEEMENT -- JENEETE SAREEREMEETE ८२ - स्त्रियों का हृदय भी दुष्ट होता है। जैसे तृणों से ढका हुआ कूप अप्रकाश युक्त होता है उसी तरह माया से ढका हुआ इन का हृदय पुरुषों के द्वारा जाना नहीं जाता है। जैसे मृग को पकड़ने वाला व्याध अनेक कपटो का प्रयोग करके मृग को पकड़ लेता है उसी तरह विविध प्रकार के कपटो का प्रयोग करके स्त्रियाँ पुरुषों को फंसा लेती हैं। स्त्रियों का हृदय किसी भी प्रकार से जाना नहीं जा सकता है। जैसे फण्डे की अग्नि दाहक होती है उसी तरह स्त्रियाँ भी पुरुष के अन्तः करण को दुःखाग्नि द्वारा जलाने वाली होती हैं। जैसे पर्वत का विषम मार्ग समतल नहीं होता है उसी तरह इनका हृदय भी सम नहीं होता है किन्तु विषम यानी अत्यन्त चञ्चल होता है। जैसे भूतो से प्रस्त पुरुष का आचरण चञ्चल होता है, कहीं भी वह ठहरता नहीं है। इसी तरह इन स्त्रियों का चित्त भी किसी एक वस्तु पर स्थिर नहीं रहता है। जैसे दुष्ट व्रण के अन्दर का प्रदेश दूषित होता है उसी तरह इनका भी हृदय दुषित होता है । कृष्ण सर्प के तुल्य ही स्त्रियाँ भी विश्वास के योग्य नहीं हैं। स्त्रियाँ अपने कपट को छिपा कर रखती हैं जैसे महामारी अपनी मारकशक्ति को छिपाये रखती है। सन्ध्याकाल में जैसे थोड़ी देर तक मेघों मे रक्त वर्ण उत्पन्न होता है, उसी तरह इनमें भी थोड़ी देर के लिये राग उत्पन्न होता। जैसे समुद्र की तरंगे स्वभावतः चञ्चल होती हैं इसी तरह स्त्रियो का चित्त भी स्वभावतः चञ्चल होता है। जैसे मछली को. पीछे की ओर लौटाना सरल नहीं होता उसी तरह स्त्रियो को भी उनके हठ से निवृत्त करना सरल नहीं होता है । वानर के समान स्त्रियो का चित्त चञ्चल होता है । मृत्यु में और स्त्री मे कोई भेद नहीं है। जैसे दुर्भिक्षकाल दया से शन्य होता है अथवा सर्प जैसे निर्दय होता है उसी तरह स्त्रियाँ भी निर्दय होती हैं। जैसे वरुणदेव अपने हाथ मे पाश लिये रहता है, उसी तरह स्त्रियाँ पुरुषों को फंसाने के लिए सदा ही काम का पाश लिये रहती हैं। जल जिस तरह स्वभाव से ही नीचगामी होता है उसी तरह स्त्रियाँ भी नीचानुरागिणी होती हैं। PRENERRENETEET ८३ जैसे दीन जन सदा ही द्रव्य के लाभ से हाथ पसारे रखते हैं उसी तरह स्त्रियाँ भी सदा ही लोभ वश हाथ पसारे रहती है। दुष्ट कर्म करने वाली स्त्रियाँ सदा ही नरकवत् भय उत्पन्न करती रहती हैं। विष्ठा भक्षण करने वाले गर्दभ के समान त्रियों का आचरण दुष्ट होता है। दुष्ट घोड़ा जैसे वश मे नहीं किया जा सकता है उसी तरह स्त्रियाँ भी वश नहीं की जा सकती हैं। बालक की तरह इनका राग क्षणिक होता है। अन्धकार में प्रवेश करना जैसे कठिन होता है उसी तरह स्त्रियो के कपट पूर्ण व्यवहार को जानना कठिन होता है। विष की लता के समान ही स्त्रियाँ आश्रय लेने योग्य नहीं हैं । दुष्ट माह से सेवित बावड़ी जैसे प्रवेश के योग्य नहीं होती है उसी तरह खियाँ भी सेवन करने के योग्य नहीं हैं। अपने पद से भ्रष्ट ग्राम तथा नगर का स्वामी अथवा चारित्र से भ्रष्ट साधु अथवा उत्सूत्र प्ररूपया करने वाला आचार्य, जैसे प्रशंसा के योग्य नहीं होता है उसी तरह स्त्रियाँ प्रशंसा के योग्य नहीं होती हैं । जैसे किंपाक वृक्ष का फल, खाते समय मधुर प्रतीत होता है परन्तु शीघ्र ही प्राण. को हरण कर लेता है उसी तरह स्त्रियाँ विषय भोग करते समय मधुर प्रतीत होती है परन्तु परिणाम मे दुःख उत्पन्न करती हैं। जैसे खाली मुठ्ठी को देख कर बालक को लोभ उत्पन्न होता है उसी तरह खियो को देख कर अज्ञानी जीव ही लुब्ध होते हैं। जैसे किसी पक्षी ने कहीं मांस का टुकड़ा पाया हो तो दूसरे दुष्ट पक्षी उस मांस खण्ड को ले लेने के लिये बहुत उपद्रव करते हैं उसी तरह सुन्दर स्त्री के कारण नाना प्रकार के उपद्रव हुआ करते हैं। जैसे मछलियो के लिये मांस का ग्रहण उपद्रव युक्त होता है उसी तरह स्त्रियो का ग्रहण उपद्रव युक्त होता है । जैसे जलती हुई तृण की पूली जलाने वाली होती है उसी तरह स्त्रियाँ स्वभाव से ही जलाने वाली होती हैं। घोर पाप जैसे उलङ्घन करने योग्य नहीं होता है किन्तु उसका फल दुःख भोग करना ही पड़ता है उसी तरह स्त्री में भासक्त पुरुष को स्त्री द्वारा उत्पादित दुःख भोग करना ही पड़ता है। जैसे नकली पैसा समय पर धोखा देता है उसी - EVETERRRREERSITE 4 तरह स्त्रियाँ घोखा देती हैं। जैसे तीन क्रोधी को पास में रखना कठिन है उसी तरह स्त्रियों का रक्षण कठिन है। नियों दारुण विषाद के कारण हैं, अथवा अकार्य करने में खियों को जरा भी खेद नहीं होता है। कोई कोई अपने पति को विषादेरक मार डालती हैं। जो पुरुष स्त्री मे अनुरक्त होता है उसकी दूसरे विषयों में भी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। ल में अत्यन्त आसक्ति होने से जीव की छठी नरक भूमि तक गति होती है। स्त्रियों को जब अपनी इन्द्रियो की तृप्ति के लिये विषय की प्राप्ति नहीं होती है तब उन्हें विषाद उत्पन्न होता है। कोई कोई स्त्रियाँ क्रोधित होकर स्वयं विपभक्षण कर लेती हैं। तीव्र पुण्य वाले मुनियों की दृष्टि मे लियाँ यमराज की तरह प्रतीत होती हैं। मुनिजन त्रियो से घृणा करते हैं। स्त्रियों की सेवा कठिन होती है। इनमें गम्भीरता नहीं होती है। स्त्रियाँ विश्वास के योग्य नहीं होती हैं। स्त्रियों एक पुरुष मे चित्त नहीं रखती हैं। युवावस्था मे इनका रक्षण करना कठिन है। बाल्यावस्था में इनका पालन भी कठिन है। इस लोक और परलोक में स्त्रियाँ दुःख उत्पन्न करती हैं। स्त्रियों के कारण संसार मे दारुण वैर की उत्पत्ति होती है। स्त्रियाँ रूप और सौभाग्य के गर्व से मत्त रहती हैं। सर्प की गति की तरह इनका हृदय कुटिल होता है। जहाँ व्याघ्र, सिंह और सर्प आदि हिंसक प्राणी निवास करते हैं ऐसे घोर जङ्गल में अकेले जाना और वहाँ निवास करना जैसे महान भय को उत्पन्न करता है। उसी तरह. स्त्रियों के साथ अकेले जाना या निवास करना दारुण भय का कारण होता है खियाँ स्वजन तथा मित्रादि वर्ग में फूट उत्पन्न कर देती हैं। अन्य के दोष को झटपट-प्रकट करती हैं। उपकार को नहीं मानती हैं। पुरुष के वीर्य का विनाश कर देती हैं। दुराचारिणी स्त्रियाँ जार पुरुष को विषय सेवन करने के लिये एकान्त में ले जाती हैं। जैसे अगली सूभर किसी कन्द आदि भक्ष्य पदार्थ को पाकर उसे एकान्त में ले जाकर खाता है उसी तरह स्त्रियाँ भी एकान्त में पुरुषों का उपभोग करती हैं। इन स्त्रियों में अत्यन्त चिञ्चलता होती है। जैसे अग्नि का पात्र भग्नि के संसर्ग से रक्त वर्ण होता है उसी तरह NEETERDRENERENE - है 1 अपने वश में कर लेती हैं.एक कितनी ही स्त्रियों वशीकरण विद्या-वास पुरुषो को अपने अधीन कर लेती हैं. इसलिये चे योषित' कहलाती हैं। वे अनेक प्रकार की चेष्टायो द्वारा पुरुषों के मन मे कामाग्नि को-प्रदीप्त करती हैं इसलिये वनिता' कहलाती हैं। कोई -स्त्री-पुरुषो के पतन के लिये उन्मत्त की तरह व्यवहार करती है। कोई पुरुषों को अपने पाश में फंसाने के लिये विलास के साथ प्रवृत्ति करती है और कामीजन को झुका लेती है। कोई शब्द पूर्वक श्वासरोगी की तरह अपनी चेष्टा दिखलाती है और इसके चारा पुरुषों को.स्नेहयुक्त करना चाहती है। कोई अपने पति को भयभीत करने के लिये शत्र की तरह प्रवृत्ति करती है। जैसे दरिद्र पुरुष दुसरे के पैरों पर पड़ता है उसी तरह कोई स्त्री कामातुर होकर पुरुषों के पैरों में गिर जाती है। कोई हास्य सत्पन्न करने के लिए वाति और नेत्र को विकृत करती है। कोई कटाक्ष द्वारा अवलोकन करती हुई मूखों को पतित करती है। कोई विलास 'के 'साँध मधुर वचन बोल कर पुरुषों को मोहित करती है। कोई हास्यजनक 'चेष्टा द्वारा पुरुषो को हास्य उत्पन्न करती है। कोई पानिजन और लिङ्गमहरण द्वारा पुरुष में अपना प्रेम दिखलाती है। कोई सुरतकाल में अत्यन्त मधुरध्वनि करती हुई कामियों के कामरांग की वृद्धि करती है। कोई स्त्री अपने मोटे स्तन और विशाल नितम्ब आदि दिखा कर दूर रहने वाले पुरुष को भी वश में कर लेती है। त्रियों अपने गुरु जन को भी-धोखा देकर अकर्तव्य में प्रवृत्त कर देती हैं। वे रुदन द्वाग पुरुष में स्नेह नत्पन्न करती हैं तथा अपने पिता के घर में जाने के अवसर पर पुरुष का राग अत्यन्त बढाती हैं। वे अपने दाँतो को दिखा कर पुरुषों को वशीभूत कर लेती हैं। वे रतिकलह द्वारा पुरुषो को रमण फगती हैं। वे शृङ्गार प्रधान गीत गाकर साधुओ को भी वश में कर लेती हैं। वे कज्जन, विकार तथा सजल नेत्रो द्वारा कामी पुरुष को मोहित कर लेती हैं। वह मोहित पुरुष उन त्रियों की गुलामी करने लगता है और इसके लिये अपसंध का पात्र भी बनता है। लियाँ पैरो द्वारा पृथ्वी पर अक्षर' लिखती हैं और स्वस्तिक आदि चिन्ह बनाती हैं। उनके द्वारा वे पुरुषो को अपने गोपनीय विषयों की IERRE STEP - PERHERERNER भासीव व्यवहरन्ति । काश्चित, शरिच, रोर इव काश्चित् पादयोः प्रणमन्ति, काश्चित् उपनतेषु नमन्ति, काश्चित कौतुकं नमन्ति, काश्चित सुकटाक्षनिरीक्षितैः सथिलासमधुरैः उपहसितैः उपगृहीतै उपशब्दैः गुरुकदर्शनः भूमिलेखनविलखनैश्च आरोहणनर्तनैश्च चाल कोपगृहनैश्च श्रङ्ग लि- स्फोटनस्तनपीडन कटितटयातनाभिः तर्जनाभिश्य, अपि च ताः पाशवत् व्यवसितु, याः पङ्कवत् क्षेप्तुः, याः मृत्युरिव मारितु', याः 'अग्निरिव दग्ध मसिरिवच्छेत्तु याः॥ १७ ॥ भावार्थ:-जिनका स्वरूप पहले कहा गया है और आगे भी कहा जाने वाला है उन खियो मे जो अत्यन्त अधम दासी और दुराचारिणी स्त्रियाँ हैं उनके नामो की व्याख्या अनेक प्रकार से की जाती है। अधम स्त्रियाँ पुरुषो को, जो उनमे .आसक्त हैं, हजारों उपायो द्वारा वध और बन्धन का भाजन बनाती हैं, इसलिये उनके बराबर पुरुषो का दूसरा शत्रु न होने से वे 'नारी' कहलाती हैं। पुरुषो का खियो के तुल्य दूसरा शत्रु नहीं है इसलिये वे नारी कहलाती है। खियाँ विविध प्रकार के फर्म तथा शिल्प के द्वारा पुरुषो को मोहित कर लेती हैं इसलिये उन्हें 'महिला' कहते है। स्त्रियाँ पुरुष को पागल की तरह बना देती है इसलिये वे 'प्रमदा' कहलाती है। खियाँ महान् कलह उत्पन्न करती हैं इसलिये वे महिलिका' कही जाती हैं। वे हाव भाव आदि लीलाओ द्वारा पुरुषो को रमण कराती हैं इसलिये 'रामा' कही जाती है। वे अपने अङ्ग प्रत्यङ्गों में पुरुषो को आसक्त करती हैं इसलिये 'अङ्गना' कही आती हैं। पुरुषगण स्त्रियो के कारण परस्पर मार पीट करते हैं, गालागाली करते हैं, परस्पर शस्त्र का प्रहार करते हैं, घोर जङ्गलों मे भ्रमण फरते हैं, बिना प्रयोजन ऋण लेते है, सर्दी और गर्मी का कष्ट सहन करते हैं। इसी तरह वे भनेक प्रकार के क्लेशो का अनुभव करते हैं । त्रियाँ पुरुषों को उक्त कार्यों मे प्रवृत्त करती है इसलिये वे 'ललना' कहलाती हैं। ललनाएँ कामातुर करके पुरुष को अपने पश में कर लेती हैं। वे अपने वचन, शरीर, हास्य और अङ्गविक्षेप आदि द्वारा तथा मन मे कामविकार उत्पादन द्वारा पुरुषों को JERREETERINTERE .

REFERENERH ८६ णारीश्री, णाणाविहेहिं कम्मेहिं सिप्पियाईहिं पुरिसे मोहंतित्ति महिलाओ, पुरिसे मत्ते करंतित्ति पमयाओ, महंत कलिं जणयंतित्ति महिलियाओ, पुरिसे हावभावमाईहिं रमंतित्ति रामाओ, पुरिसे अंगाणुराए करंतित्ति अंगणामो, णाणाविहेसु जुद्धभंडण संगामाडवीसु मुहाण गिएहणसीउएह दुक्खकिलेसमाईएसु पुरिसे लालंतित्ति ललणाओ, पुरिसे जोगणिोएहि वसे ठावतित्ति जोसियामो, पुरिसे णाणाविहहिं भावेहिं वएणतित्ति वणियाओ, काई पमत्तभावं, काई पणयं सविन्भम, - काई ससई सासिव्व ववहरंति, काई सत्तु ब्व, रो रो इव काई पयएसु पणमंति, काई उवणएसु उवणमंति, काई कोउयणमंति, काई सुकडक्खणिरिक्खिएहिं सविलासमहुरेहिं उवहसिएहिं उवग्गहिएहिं उपसद्देहि गुरुगदरिसणेहिं भूमिलिहण विलिहणेहिं य आरुहण णत्तणेहि य पालय उवगृहणेहि य अंगुलिफोडणथणपीलणकडितड- जायणाहि तज्जणाहिं य भवि याई ताओ पासो व ववसिउं, जे पंकुब्ब खुप्पिउं, जे मच्चु ब्व मरिउ, जे अगणिव डहिलं, जे असिव्य छिज्जिउं जे ॥ सूत्र १६ ॥ छाया-अपि च तासा स्त्रीण अनेकानि नामनिरुक्तानि, पुरुष कामराग प्रतिबद्ध नानाविधैरुपायसहस्र : वध बन्धनमानयन्ति, पुरुषाणा नान्य ईहशोऽरिरस्तीति नार्यः । नारी समाः न नराणा मरयः सन्तीति नार्यः । नानाविधैः कर्मभिः शिल्पकादिभिश्च पुरुषान् मोहयन्तीति महिला । पुरुषान् मत्तान कुर्वन्तीति प्रमदाः । महान्त कलिं जनयन्तीति महिलिकाः। पुरुषान् हावभावादिभी रमयन्तीति रामा। पुरुषान् अङ्गानुरागान् कुर्वन्तीति अङ्गनाः । नानाविधेषु युद्धभण्डनसग्रामाटवीष मुधार्णग्रहणशीतोष्ण दुःखवलेशादिषु पुरुषान् लालयन्तीति ललनाः । पुरुषान् योमनियोगः वशे स्थापयन्तीति योषितः। पुरुषान नानाविधैर्भावैः वर्णयन्तीति वनिताः। काश्चित प्रमत्तभाव, काश्चित् प्रणत' सविभ्रम, काश्चित् सशब्द HETTEERTREEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEETTER 1 301 - खिया वर HERESEREE और भूपण आदि के संयोग से गग उत्पन्न करने वालो यानी सुन्दरी प्रतीत होती हैं। त्रियों पुरुषों में परस्पर की मैत्री को विविध प्रकार से नष्ट कर देती हैं अथवा पुरुषों में प्राचर्य तथा धारित्र के प्रति जोराग होता है उसे अनेक प्रकार से नष्ट करती है। खियों बिना रस्सी का बन्धन हे तथा वृक्ष आदि से शून्य घोर कान्तार यानी अटवीस्वरूप में अथवा'काष्ठ रहित अटवी जैसे मृग- कृष्णा का कारण होती है उसी तरह स्त्रियां भ्रान्ति का कारण होती हैं अथवा जैसे काष्ठ र हिन अटवी कभी जलती नहीं है उसी तरह त्रियों पाप करके पश्चाताप नहीं करती है । खियाँ पुरुष को अकर्तव्य करने में प्रवृत्त कर देती हैं। स्त्रियां अदृश्य यानी जो देखने में नहीं आती है ऐसी वैतरणी नदी हैं । खियाँ असाध्य रोग के समान पीड़ा देने वाली हैं। स्त्रियाँ माता पिता आदि के वियोग हुए विना ही रुदन के समान हैं। स्त्रियाँ रूप रहित उपसर्ग हैं। स्रियाँ काम भोग में सुख बुद्धि, उत्पन्न करती हैं जो वस्तुतः भ्रान्ति है। त्रियों समस्त शरीर को जलाने वाली दाहनामक व्याधि है। स्त्रियाँ विना मेघ के वज्रपात हैं। स्त्रियाँ चाहे विवाहित हों या अविवाहित हों, अलङ्कत हो या अलवार रहित हो, मुण्डित हों या अमुण्डित हों, किसी भी अवस्था मे हो, मोक्ष की इच्छा करने वाले ब्रह्मचारी मुनियों को सदा वर्जित करने योग्य हैं । नियों जलशुन्य प्रवाह, हैं। अतएव कामी जन बिना ही जल के इन में डूब मरते हैं। जैसे समुद्र के वेग को कोई भी सहन नहीं कर सकता, इसी तरह इनके उपद्रव को भी कोई सहन नहीं कर सकता है स्त्रियों परमस्नेहियो को भी जुदा करा देती हैं। अवि याई तासि इत्थियाणं अणेगाणि नामनिरुत्ताणि पुरिसे कामरागपडिबद्धे णाणाविहेहिः उवायसयमहस्सेहि वह बंधणमाणयंति, पुरिसाणं नो अएणो एरिसो भरी अस्थित्ति णारीओ, तंजहा णारीसमा न णराणं परीश्रो' JECTETERTREE ८६ 386161616BE8EEEEEEEEEE3653666 सूचना करती है। कोई बॉस पर चढ़ कर नाचती हैं, कोई पृथ्वी पर नृत्य करती हैं और इनके द्वारा पुरुषो में आश्चर्य उत्पन्न करती हैं। बिगड़ी हुई-स्त्रियाँ गुप्त रूप से कामियों के साथ दोस्ती करके अपनी कामपिपासा को शान्त करती हैं। अथवा वे अपने केशों को विभूषित करके तथा स्वच्छ वस्त्रोको पहिन करके काम के गुलाम अधम पुरुषों को वश में करके उनके द्वारा बैल की तरह अपना कार्य कराती है तथा अन्दर की तरह कामियों को नचाती हैं। कोई कोई नियाँ स्वार्थ की पूर्ति न होने पर अपने प्राणों का भी त्याग कर देती है। स्त्रियाँ अपने अङ्ग और अङ्ग लियो का स्फोटन तथा स्तनो का पीदन एवं नितम्ब का पीदन, अपने हाथो से अक्षवा वक्रगति के द्वारा करती हैं और इनके द्वारा कामियो के चित्त को कम्पित करती हैं। कोई अपनी अङ्ग लियो को, -मस्तक को तथा तृण आदि को घञ्चल करती हुई उनके द्वारा पुरुषो में काम पीड़ा उत्पन्न करती हैं। कोई वस्त्र भूषण आदि के द्वारा उज्ज्वल वेष बना कर तथा भूषणो का शब्द उत्पन्न करके एवं मार्ग में विलास के साथ गमन द्वारा तथा दूसरे भी विविध उपायो द्वारा पुरुषो को आकर्पित कर लेती हैं। इसलिये संयमधारियो को इनका सङ्ग सर्वथा त्याग देना चाहिये । इस ससार में बहुत बिगड़ी हुई खियाँ हैं, जो पुरुषों को नागपाश की तरह बन्धन में डालने के लिए प्रवृत्ति करती हैं। वे इस भव मे तथा परभव में पुरुषो के बन्धन का कारण बनती हैं। एवं पुरुषो.को -घोर कीचड में फंसा देती हैं। स्वच्छन्द आचरण करने वाली स्त्रियों मृत्यु की तरह अपने पति को मार डालने का प्रयत्न करती हैं। वेश्याएं अग्नि की तरह कामियों को जला देती हैं। युवती परित्राजिकाए भी कई ऐसी होती हैं जो कपट करने मे बड़ी निपुण होती हैं और तलवार के समान साधुओं को छिन्न भिन्न करने मे प्रवृत्त रहती है। असिमसि सारच्छीणं, कंतारकवाडचारय समाणं । घोर निउरंबकंदुरचलंत वीभच्छ भावार्थ ॥१२२ ॥ THERE EMEENETEREREHEREFERE छाया-असिमषिसहशाणा, कान्तारकपाट चारकसमानाम् । घोरनिकुरम्बकन्दर यलद् बीभत्स भावना ॥ १२२ ।। भावार्थ:-स्त्रियाँ तलवार के समान तीक्ष्ण और फज्जल के समान मलिन होती हैं ! जैसे तलवार निर्दयता के साथ मनुष्यो को छेदन करती है, इसी तरह स्त्रियाँ मनुष्यो के लिए इस लोक तथा परलोक में दारण दुःख उत्पन्न करती हैं। जैसे कन्जल श्वेत वस्तु को काला कर देता है, उसी तरह त्रियाँ कुलीन सदाचारी पुरुषों को फङ्कित कर देती हैं। खियाँ गहन वन, कपाट तथा कारागृह. केतु तुल्य होती हैं। जैसे गहन वन व्याघ्र आदि हिंसक प्राणियो का आश्रय होने से भयदायक होता है, उसी तरह स्त्रियाँ पुरुषों के धन जीवन आदि के विनाश के कारण होने से भयदायक होती है। जैसे किसी मकान या गली का फाटक बन्द कर देने से उसके भीतर कोई प्रवेश नहीं कर सकता है। इसी तरह स्त्रियाँ धर्म रूपी मार्ग को बन्द कर देती हैं। अतः स्त्री में आसक्त पुरुषों का धर्म मार्ग में प्रवेश करना अशक्य है। जैसे कारागृह (जेल ) में रहने वाले दुःख भोगते हैं। उसी तरह स्त्रियों में आसक्त जीव दुःख भोगते हैं। इसलिये स्त्रियों पुरुषों के लिए कारागृह के तुल्य हैं। स्त्रियो के हृदय का भाव कपट से परिपूर्ण होता है। वह इस प्रकार भयदायक है जैसे अगाधजल चलता हुआ भयङ्कर होता है। अतः बुद्धिमानों को इनका विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १२३ ।।. दोस सयगागरीणं, अजससय विसप्पमाण हिययाणं । कइयव पएणत्तीणं, ताणं अण्णायसीलाणं ॥ १२३॥ छाया-दोषशत गर्गरिकाणा, अयशः शतविसर्पहृदयाणाम् । कैतव प्रज्ञप्तीना, तासा मज्ञातशीलानाम् ॥ १२३ ॥ भावार्थ-स्त्रियाँ सैकड़ो प्रकार के दोषों का घड़ा है। इनके हृदय में सैकड़ो बुराइयाँ चलती रहती हैं। इनका पिचार कपट से पूर्ण होता है और बड़े बड़े विद्वान् भी इनके स्वभाव को नहीं जान सकते हैं ।। १२३ ।। NEERERETREEEEEEEEEETTERNETERESERVERSE -- ११ भएणं स्यंति भएणं रमंति, अएणस्स दिति उल्लावं । अण्णो कडअंतरिश्रो, अएणो पयर्डतरे ठविश्रो ॥ १२४ ॥ छाया-अन्य रजयन्ति अन्य रमयन्ति, अन्यस्य ददत्युल्लापं । अन्यः कटान्तरितः, अन्यः पटकान्तरे स्थापितः ॥ १२४ ॥ भावार्थ-कई स्त्रियाँ दो तीन या इससे भी अधिक पुरुषो के साथ प्रेम रखती हैं, एक को प्रेम के साथ देख कर काम उत्पन्न करती हैं और अन्य के साथ क्रीड़ा करती हैं एव तीसरे के साथ वार्तालाप करती हैं एव किसी को चटाई के पर्दे के अन्दर छिपा कर रखती है और किसी को कपड़े के पर्दे के अन्दर छिपा देती हैं। उनके दुराचार का ज्ञान जब होजाता है तब जानने वाले पति आदि को विष देकर मार डालती हैं। वे अपने भाव को समझाने के लिये अपने जार के सम्मुख पृथ्वी पर कुछ लिखती हैं अथवा तृण उखाड़ती हैं ॥ १२४॥ गंगाए वालुयाए, सायरे जलं हिमवओ य परिमाणं-। उग्गस्स तवस्स गई, गब्भुप्पत्तिं य विलयाए ॥. १२५ ॥ सीहे कुडंबुयारस्स, पुट्टलं कुकुहाईयं अस्से । जाणति बुद्धिमंता, महिला हिययं ण जाणंति ॥ १२५ ॥ छाया-गङ्गाया वालुका, सागरे जलं हिमवतः परिमाणम् । उग्रस्य तपसः गति, गर्मोत्पत्रिराञ्च वनितायाः ॥ १२६॥ सिंहे कुण्डबुकार, पुटलं कुक्कु हादिकमश्वे । जानन्ति बुद्धिमन्त, महिलाहृदयं न जानन्ति ॥ १२६ ॥ भावार्थ-गङ्गा नदी की बालुका को, समुद्र के जल को एवं हिमवान् पर्वत के परिमाण को बुद्धिमान् पुरुप जानते हैं, तथा तीव्र तपस्या का फल, स्त्री के गर्भ का बालक, सिंह के पीठ का बाल, अपने पेट के पदार्थ तथा गमन के समय अश्व का शन्द, इनको भी युद्धिमान् पुरुष जानते हैं परन्तु स्त्री के अन्तःकरण को नहीं जान सकते हैं। FERY ॥ । TR । म IESTERNETTER ६२ एरिस गुणजुत्ताणं, ताणं कइयच्चसंठियमणाणं । ण हु मे वीससियव्वं, महिलाणं जीवलोगम्मि ॥ १२७ ॥ छाया-दशगुणयुक्ताना, तासां कपिबदस्थितगनसाम । न हि भवद्भिर्विश्वासितव्यं, महिलाना जीवलोके ।। १२७ ।। भावार्थ--ऐसे गुणो वाली स्त्रियाँ होती हैं। उनकामन वानर-की तरह चश्चत होता है। इसलिये इस जीवलोक में आप लोगो को त्रियो का विश्वास कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १२७ ।। निद्वएणयं याखलयं, पुप्फेहि विवजियं वारामं । निदुद्धियं य घेणु, लोएंवि अंतिल्लिय पिंडं ॥१२८ ॥ छाया--निर्धान्यकञ्चालकं, पुष्पैर्विवर्जितन्चारामम् । मिदग्धिका च धेनुः, लोकेऽपि अतैलकं पिण्डम् ॥ १२८॥ भावार्थ- जैसे बिना अन्न का खल यानी अन्न के शोधन का स्थानावं बिना पुष्पा के बगीचा और विनादूध की गायातया बिना तेल. का पिएड शोभनीय नहीं होता है, इसी तरह स्त्रियाँ भी सुखहीन होने से अशोभनीय होती हैं ।। १२ ।। जेणंतरेणं निमिसंति, लोयणा तक्खणं य विगसंति । तेणंतरे चि हियर्य, चित्त-सहस्साउलं होई ॥१२६ ।। छाया-येनान्तरेण निमिषन्ति, लोचनानि तत्क्षणञ्च विकसन्ति । तेमान्तरेण हृदयं, चित्रासहस्राकुलं भवति ॥ १२६॥ भावार्थ-जो प्रियतम स्त्रियो का स्वार्थ प्राणपण से पूरा करता है उसके बिना उसके प्रफुल्लित नेत्र सङ्कुचित होजाते है परन्तु जब वह उनका स्वार्थ सम्पादन नहीं करता है तब उसके ग्रिता उसके नेत्र प्रफुल्लित होजाते हैं। जो स्त्रियाँ कुशीला होती हैं उनका चित्त अपने पति में कभी नहीं रहता है किन्तु हजारो अन्य पुरुषो।मे घूमता रहता है।। १२६ ।। नहाय वढाणं, निविण्णाणं निविसेसाणं ।। संसार एयराणं, कहियपि निरत्यय होइ ॥ १३० ॥ SHEREMETEREETTE FREERETEREHEREFEREFERENERIES FREE ।

पुस्तक मिलने का पता:-
श्री श्वेताम्बर साधुमार्गी जैन हितकारिणी संस्था,
रांगहरी चौक, नीकानेर (राजपूताना)
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श्री अगरचन्द भैरोदान सेठिया जैन पारमार्थिक संस्था,
ठंठारों की गवार, बीकानेर (राजपूताना)
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TERRIERRIEREFERRESTERRIEREERINEERIERaar भाहारो उच्छासो, संधि सिराओ य रोमकूवाई । पिचं रुहिरं सुक', गणियं गणियप्पहाणेहिं ।। १३७ ॥ छाया-आहार उच्छ्वासः सन्धिः, शिराश्च रोमकूपाः । पि रुधिर शुक्र, गणितं गणितप्रधानः ॥१३७ ।। भावार्थ-यह मनुष्य सौ वर्ष की आयु पाकर कितना अन्न खाता है तथा किलने श्वास लेता है और इसके शरीर में कितनी सन्धियों, कितनी नसें, कितने रोम कूप, तथा कितने पित्त, रक्त, और शुक्र होते हैं यह गणित करके पहले बता दिया गया है ।।१३७।। एयं सोउं सरीरस्स, वासाणं गणियप्पागडमहत्थं । मुक्खपउमस्स ईहह, समत्तसहस्स पत्तस्स ॥ १३८ ॥ छाया-एतत् श्रुत्वा शरीरस्य, वर्षाणां गणित प्रकट महार्थम । मोक्षपद्मस्य ईहध्व, सम्यक्त्वसहस्र पत्रत्य ।। १३८ । भावार्थ-गणित के हिसाब से जिसका कार्य प्रकट कर दिया है ऐसे शरीर की आयु क वर्षों को सुन कर मोक्षरूपी कमल पुष्य के लिये प्रयत्न करना चाहिये. उस मोक्षरूपी फमल के सम्यक्त्व ही सहस्र पत्त है ॥ १३८ ।। एयं सगड सरीरं, जाइ जरा मरण वेयणा बहुलं । तह पत्तह काउं, जे जह मुच्चह सव्वदुक्खाणं ॥ १३६ ॥ छाया-एतत् शकटशरीरं, जातिजरामरणवेदना बहुल । तथा गृहणीत कार्य, यदपथा मुञ्चत सर्वदुःखेभ्य ॥ १३६ ।। भावार्थ-यह शरीर जन्म, जरा, मरण और वेदनामो से भरा हुआ एक प्रकार का शकट (गाडी) है। इस को पाकर ऐसा कार्य करो जिससे समस्त दुःखों से मुक्ति मिले ।। १३६ ।। इति 'तन्दुलवेयालियं' समत्त । BE33236883233333333333333333 श्री रामकृष्ण प्रिंटिंग प्रेस, नसीराबाद रोड अजमेर । Calore -- " ६४ 图图图图岛 भावार्थ-धर्म ही अनर्थ को नाशक और अर्थ का सम्पादक है 1 धर्म ही रक्षक है। धर्म ही गति और आधार है। धर्म का भली- भाँति प्रोचरण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।। १३३ ।। पीइकरो वएणकरो, भासकरो जसकरो य अभयकरो । निव्वुइकरो य सययं, पारित बिइजो धम्मो ॥ १३४ ।। छायाप्रीतिकरो वर्णकरो, भाकरो (भाषाकरो) यशस्करस्वाभयकरः। निवृतिकरश्च सतत, परत्र द्वितीयो धर्मः ॥ १३४ ॥ भावार्थ-धर्म प्रीति को उत्पन्न करता है,एक दिशा मे फैलने वाली कीर्ति उत्पन्न करता है अथवा शरीर मे उत्तम वर्ण उत्पन्न करता है, कान्ति उत्पन्न करता है, वचन की पटुता तथा मधुरता आदि गुणों को उत्पन्न करता है, समस्त दिशाओ में फैलने वाली कीर्ति उत्पन्न करता है, निर्भयता एवं कर्मक्षय रूप परेमानंन्द को उत्पन्न करता है तथा मनुष्यों को परलोक मे सदा सहायता करता है ॥१३४ ।। अमरवरेसु अणोवमरूवं, भोगोवभोगरिद्धी य । विएणाणकाणमेव य, लन्भइ सुकरण धम्मेण ॥१३५ ॥ छाया-अमरवरेषु अनुपमरूप, भौगोपभोगऋद्धीश्च । विज्ञानज्ञानमेव च, लभ्यते सुकृतेन धर्मेण ॥१३५ ॥ भावार्थ-विधिपूर्वक धर्माचारण करने से मनुष्य महान ऋद्धि वाले देवताश्री मे जाकर सुन्दर रूप तथा भोग, उपभोग, ऋद्धि और ज्ञान विज्ञान को लाभे करता है देविंदचकवट्टित्तणाइ, रजाई इच्छिया भोगा । एयाई धम्मलाभा, फलाई जं चावि निव्वाणं ॥ १३६ ॥ छाया-देवेन्द्रचक्रवारीत्वानि, राज्यानि ईप्सिता भोगाः । एतानि धर्मलाभात् , फलानि यथापि निर्वाणम् ॥ १३६ ।। भावार्थ-देवेन्द्र पद, चक्रवर्ती पद, राज्य, ईसित भोग, ये सब धर्माचरण के फल हैं तथा निर्वाण भी इसी का फल है ॥ १३६ ।। NEE ENTREETEEEEEEEEEEEEEEEEEE छाया-जडाना वृद्धाना, निर्विज्ञानाना निर्विशेषाणाम् । संसारशूकराणा, कथितमपि निरर्थकं भवति ॥ १३०॥ भावार्थ-जो द्रव्य और भाव दोनों प्रकार से मूर्ख हैं, जो अत्यन्त वृद्ध है, जो विशिष्ट ज्ञान से हीन हैं, जो विशेष (भेद) को नहीं जानते है, ऐसे जो लोग सांसारिक विषयो में शूकर की तरह आसक्त हैं उनके प्रति अच्छी शिक्षा देना निरर्थक होजाता है ।। १३० ।। किं पुत्तेहिं पियाहिं वा, अत्थेणवि पिंडएण बहुएणं । जो मरणदेसकाले, न होइ आलंबणं किंचि ॥ १३१ ॥ छाया-किं पुत्रैः पितृभिर्वा, अर्थेनाऽपि पिण्डितेन बहुकेन । यद् मरण देशकाले, न भवत्यालम्बनं किञ्चित ॥ १३१ ॥ भावार्थ-पुन, पिता अथवा बहुत सग्रह किये हुए धन से ही क्या लाभ है ? जो मरण समय उपस्थित होने पर कोई भी सहायक नहीं होता है ।। १३१ ॥ पुत्ता चयंति मित्ता चयंति, भन्जा वि, णं मयं चयइ । तं-मरणदेसकाले, न चयइ सुविअजिनो धम्मो ॥ १३२ ॥ छाया-पुत्रास्त्यजन्ति मित्राणि त्यजन्ति, भार्यापि मृतं त्यजति । तस्मिन मरणदेशकाले, न त्यजति सुव्यर्जितो धर्मः ॥ १३२ ॥ भावार्थ-जब मरणकाल प्राजाता है तब प्राणी को पुत्र, मित्र और स्त्री सभी छोड़ देते हैं, एक धर्म ही ऐसा है जो भली भॉति आचरण किया हुआ नहीं छोड़ता है। धम्मो ताणं धम्मो सरणं, धम्मो गई पइट्ठा य । धम्मेण सुचरिएण य, गम्मइ अयरामरं ठाणं ॥ १३३ ।। छाया-धर्मस्त्राणं धर्मः शरणं, धर्मो गति प्रतिष्ठा च । धर्मण सुचरितेन च, गम्यतेऽजरामर स्थानम् ॥ १३३ ॥ 以國迎观望望望迎認 335 - - मूल्य =) ४) २) श्री श्वेताम्बर साधुमार्गी जैन हितकारिणी संस्था, बीकानेर द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ १. वृत्तबोध (संस्कृत छन्द शास्त्र विषयक प्रन्थ ) २. जैनागम तत्त्वदीपिका (प्रश्नोत्तर के ढंग से जैन सिद्धान्तों का ज्ञान कराने वाला ग्रन्थ ) 12) ३. श्रीलाल नाममाला (प्रारम्भिक संस्कृत के विद्याथियों के लिए जैन पद्धति से रचा हुआ सस्कृत कोष ) ४. आलोयणा (विस्तार सहित) (अप्राप्य) ५. श्रीमज्जैनाचार्य पूज्य श्री जवाहरलालजी म. सा० का जीवन चरित्र प्रथम भाग ६. जवाहर विचार सार ( श्रीमजवाहराचार्य के जीवन चरित्र का दूसरा भाग) ७. तन्दुल वयालीय पइएणा ( गर्भ विषयक विचार का विस्तृत वर्णन ) १॥) ८ श्री जिन जन्माभिपेक ( तीर्थङ्कर भगवान् के जन्म कल्याणक का विस्तृत वर्णन ) (छप रहा है) प्राप्तिस्थान श्री श्वेताम्बर साधुमार्गी जैन हितकारिणी संस्था, श्री अगरचन्द भैरोदान सोठया रांगड़ी चौक, बीकानेर जैन पारमार्थिक संस्था, बीकानेर

Shri Tandul Vaicharik-prakirnam

Author
Ojha, Ambikadutt
Title
Shri Tandul Vaicharik-prakirnam
File name
Shri Tandul Vaicharik-prakirnam
Text
OCR done
Citation
1949
Published
2010/07
Publisher
Bikaner, Sadhumargi Jain Hitkarini Sanstha
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327683
Barcode
99999990003267.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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efVLRqiB31O
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