Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shri Ratnakar Suri Krit Panchvisi Gatha-i

Suri,ratnakar · 2011/02

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KKKEKAXKXAM श्री रत्नाकरमरिजी कृन पचवीसी श्री जिनप्रनसरिजी वृत्त आत्मनिंदा अष्टक तथा श्री हेगरजाचार्य कृत आत्मगम्तिव जुटा शटोना थर्ग, गाथा, शागिरे साये लानित सा माना नाई T/ TARIदाम-

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॥ श्री रत्नाकरसूरिजी कृत पचीसी ॥ गाथा र आप एटा-गब्दोना ॥ बमोहनी बिर्यालयीन ममनजनुना नागानाग সশিপ নিলাম - मार-माग । निगमत गणे अपना पर्चा महान मनाया। का-m विन नगर श्रेय श्रियां मंगवकसिमग्र, नरंदेड- नमोनियामक मानिगयप्रधान, चिरं जय ज्ञानम्मानिधान॥

(३)
शब्दार्थः-मोद लक्ष्मीना कल्याण क्रीमागृह,
चक्रवर्ती अने देवघोए जेमनाचरण कमलने वांद्या
ने एवा हे सर्वज्ञ ! सर्वातिशय प्रधान, हे ज्ञान कला
निधान ! तमे घणा काल पर्यंत जयवंता वों ॥१॥
रत्नाकर पचीसीनो विस्तारार्थे.
व्याख्याःहें नरें देवेंश्नतांघ्रिपद्म, नरेंड के चक्रवर्त्यादिक
अने देवे के अमरेशदिक एटले मनुष्यना इंश ते नरें अने
देवोना इंश ते देवेश, तेनुए जेनां चरणकमलने वंदन कयाँ , एवा
हे नरें देवेश्नतांत्रिपन ! अने समस्त वस्तुना जाणनारा माटे हे
सर्वा ! अने संपूर्ण जे निरोगादिक अतिशय-तेणे करी प्रधान,
ए माटे हे सर्वातिशय प्रधान ! अने ज्ञान के कवलझान ' अने
कला के बहोतेर कला, तेना निधान के निधि एवा हे ज्ञान-
कला निधान ! अने श्रेयसः के मोदनी जे श्रीके लक्ष्मी तेना
मंगल के कल्याणर्नु, केलिसम के क्रीमानुं गृह, एवा ह मंगल
केलिसम के मोक्ष लक्ष्मी कल्याण क्रीमाना मंदिर ! जक्त लो-
कना समस्त संकटना उर करनार तुं चिरं के घणा काल पर्यंत
जय के सर्वोत्कर्षे करीने वर्तो. ॥१॥

॥ गाथा २ जीना बुटा शब्दोना अर्थ. ॥ जगत्रय-त्रणलोक; स्वर्ग, मृत्यु श्री (स्वगुण) सदमीवत अने पातालने वीतराग-रागद्वेष गया ले जेना आधार आधारभूत त्वयि-तमारी आगल कृपा-दया, मेहेरवानी मुग्ध जाचात्-नोले नावे अवतार-प्रवेश वि-विशेष जाण चार-खे करीने वारवा योग्य प्रमोटोप्रभु ससार विकार जन्म जरा मर मिश्पयामि-विनति कर तु एरूप रोग (मटामवा) किचित् काइ, सगार वैद्य समान जगत्रयाधार कृपावतार, दुर्वारससार वि- कारवैद्य, श्रीवीतराग त्वयि मुग्धनावा, विज्ञ- प्रनो विझपयामि किचित् ॥२॥ शब्दार्थ-दे त्रण जगतना थाधार । दे कृ- पावतार | दुखे वारवा योग्य एवोजन्म जरा मरा रूप ससार तेना विकारने दूर करवाने वैद्य समान एवा हे श्री वीतराग! हे विशेष जाण ! ९ नमारी (४) श्रागल नोलेजावे कांइक विनंती करुंतुं. ॥ २ ॥ व्याख्याः-जगद, त्रय के स्वर्ग मृत्यु अने पातालम्प, त्रण भुवन तेना आधार के स्थानमृत एवा हे जगवाधार ! कृपा के दया तेने विपे अवतार के नुपदेशद्वारे करी जेनो प्रवेश ठे एवा हे कृपावतार, उार के पुखेन वारयतीति ऽरवार एटले निवा- रण करवा माटे अशक्य एवो जे संमाररूप विकार के रोग, वि- योग, जरा मरणादि लक्षण-तेने विपे चिकित्साकारीपणाए करीने वैद्य सरखा हे उार संसार विकार वैध; बोन के गयेली वे राग के रागदशा जेनी, अने श्री के मोह लक्ष्मी तेणे सहित एवा हे श्री वीतराग ! विज्ञ के हे चतुर, हे प्रनो ! त्वयि के तारे विपे अर्थात् तारी पासे हुं मुग्ध नावाद के विशेष झान विकल- पणाने लीधे मुग्ध छ, ते हुँ किंचित् के कांइक विपयामि के विज्ञप्ति करूं छु.॥॥ १ । वाल:-बालक ॥ गाथा ३ जीना बुटा शब्दोना अर्थ, किं | वासलीला कलिता बालकनी पित्रो:-मावापनी क्रीमाए सहित पुरः आगल न-नधी जल्पति बोलेले (५) निर्विकल्प: जेमतेम, विकल्प र निनाशय-पोतानो आशय, पो- तानो अजिप्राय तया-तेम; तेवी रीते सानुशया पश्चाताप सहित ययाय जेवो तेवो, साचेसाचो तव तमारी कथयामि हु कहु तु अग्रे-आगल नाय हे नाय। किं बाललीलाकलितो न वालः, पित्रोः पुरो जल्पति निर्विकल्पः, तथा यथार्थ कथ- यामि नाथ, निजागयं सानुशयस्तवाये ॥ ३ ॥ शब्दार्थ --शु बालकनी क्रीमायुक्त एवो वा- लक मावापनी भागल जेमतेम नथी वोलतो, (वोलेठेज ) तेवी रीते हे नाथ ! हु मारो श्राशय जेवो तेवो पश्चाताप सहित तारी पागल कहुंठं ॥३ व्यारया -दे पन्नो जेम वाललीला कलितः के पालकनी जे लीला के धुलने रिपे येला इत्यादिक, नेणे कलित के युक्त अने निर्विकल्प के जेयी नापण अनापणम्प नेद गयो ठे, एवो जे बाल ते पित्रो पुर के मातपितानी पासे किनजस्पति के शु । (६) नथी वोलतो ? अर्थात् न वोलवानुं पण ते सर्व वोले ठे, तेम हे नाथ केण्हे कल्याणकारक, सानुशयः कण्वहु पातक संपादन कयाँ ए माटे पश्चाताप युक्त एवो हुँ, तवाग्रे के तारा अग्रजागने विषे, निजाशयं के पोताना अनिमायने, यथार्थ कथयामि के यथार्य- पणे कथन करुं छ. अर्थात् हुँ मारो अलिमाय तारी पासे प्रगट करुंर्छ ॥ ३ ॥ ॥ गाथा ४ थीना बुटा शब्दोना अर्थ. ॥ दत्-आप्यु दीधुं अपि पण न नहि अन्नवत्-थयो दान-दान जवे लवमां परिशीलितं पाल्यु अस्मिन्-आ (मां) च-बली; अने विलो हे प्रभु! शालि सुंदर; मनोहर मया मारावडे शीलं-शील बांतम्-लमायु तप: तप अहो अहो; अरे अन्जितता तप्यो शुजा सारो एव-ज जावाजाव मुधा-फोकट

दत्तं न दानं परिशीलितं च, न शालि
शील न तपोनितप्तम्, शुनोन नावोऽप्यन्नव
नवेस्मिन्, विनो मया ब्रांतमहो मुधैव॥४॥
शब्दार्थ-हे प्रजु । में दान दीधुं नही, में
सुंदर शील पाइयु नहीं,म तप कर्यो नदी, मने सारो
नाच पण थयो नहीं, माटे अहो । में व्यर्थज आ सं-
सारमा ब्रमण कयु ॥४॥
व्यारया'-ह विनो का ह स्वापिन् ! मया दान न दत्त के
में कृपणपणाए करी सत्पात्रने विपे धननो विनियोग कयों नहि,
अन शालिशील के मनाइ एवा ब्रह्मचयन न परिशीलित के
पालन कर्यु नहि तेमज तप. न अनितम के वाह्य अने अतरंग
रुप वार भकारनु तप कयु नहि तेमज गुनः नाचोपि के कल्या-
एकारक एवो लावपण नालवत् केरा मने प्राप्त थयो नहि ए माटे
अहो इति खद ! में मुधव के व्यर्थज अस्मिन्लवे के आ ससा-
रने विषेत्रांत के ब्रमण कर्यु मारा हाथथी काश्ज सत्कर्म धन्यु
नहि एवो अर्थ ॥४॥

(6)
॥ गाथा ५ मीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥
दग्धा ताप पामेलो; दाफेलो. अभिमानाजगरेण अहंकार-
अग्निना अग्निवडे
रूपी अजगरे
क्रोधमयेन-क्रोधरूप
मायाजालेन-कपटम्प जालवडे
दष्टः डशेलो
बद्धः बंधन पामेलो
प्टेन-दुष्ट (वमे); निर्दय अस्मि ९ बु
लोलाख्य-लोल नाम
कथम् केवी रीते
महा-मोटा
नजे हुं लजु
जरगेण सर्पवमे
त्वां तने
ग्रस्तः गलेलो.
दग्धोऽग्निना क्रोधमयेन दष्टो, दुष्टेन लो-
नाव्यमहोरगेणमस्तोऽनिमानाजगरेण माया,
जालेन बद्धोस्मि कथं नजे त्वां ॥५॥
शब्दार्थः-क्रोधरूपी श्रग्निश्री ताप पामेलो,
लोनरूपी मोटा निर्दय सापबके मशेलो, अनिमान
रूपीथजगरवसे गलेलो, कपटरूप जालबमे बंधाएलो
हुँ केवी रीते तने नजुं ? ॥ ५ ॥

(ए) व्यारया:-हे नायक्रोधमयेन अग्निना दग्धः के क्रोधरूप अग्निए अत्यत ताप पमामेलो अने उऐन तोलाख्य महोरगण दष्टः के0 निर्दय एवा लोल नामे महा सर्प डश करेलो, अने अ- निमानाजगरण ग्रस्त के अहकाररूपी अजगरे गलेलो, अने मायाजालेन बद्धः अस्मि के कपटम्प जे जाल के मत्सरधन जाल सरखु वधन हेतु, तेणे वध पामेलो हु छु, ए माटे वा कथ लजे के तारु केम सेवन करु ? तो हे मनो तारी कृपाए क्रोध, लोल, अनिमान अने माया, एननो नाश थश्ने तारु सेवन कर- वानो मारो हेतु क्यारे पूर्ण यशे? एवो लावार्थ ॥५॥ ॥ गाथा ६ छीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ कृत-करेलु अपि-पण मया में लोकेश-हे लोकना नाथ' अमुत्र-परलोकने विपे सुख-सुख हित-हितकारी काम, पुण्यनु मे मने काम अनूत-ययु न नहीं अस्मादृशा-अमारा सरखाना च-बली, अने केवल फक्त इहलोके-आ लोकमा एवज जन्म-अवतार करवा माटे (२०) जझे-ययो जिनेश हे जिनेश्वर हे केवलि जवपूरणाय जन्मनी गणत्री पूरी पति! कृतं मयाऽमुत्र हितं न चेह, लोकेऽपि लोकेश सुखं न मेऽनूत्; अस्मादृशां केवलमेव जन्म, जिनेश जझे नवपूरणाय ॥ ६॥ शब्दार्थः-में परलोकमां एवं कांश हितकारी काम करेलु नहि अने (तेथी ) हे लोकेश ! आलो- कने विष पण मने सुख मन्यु नहि (माटे ) हे जि- नेश ! अमारा सरखानो जन्म फक्त जन्मनी गणत्री करवा माटेज थयो. ॥ ६ ॥ व्याख्या:-मया अमुत्रहितं न कृतं के में परलोकने विषे एबुं पुण्य कृत्य कर्यु नहि, अने हे लोकेश ! के० पद् कायना स्वामि एवा हे लोकेश ! इहलोकेपि मे मुखं ना नूतू के आ लोकने विषे पण मने मुख प्राप्त थयु नहि. ए माटे ह जिनेश के हे केवलिपते ! अस्मादृशां जन्म के अमारा सरखाना अवतार ते, केवलं नव पूरणायैवजरे के केवल अवतार गणनाना पूरणने (११) माटे एटसे जेम पूर्व अमारा घणा अवतार थया तेमज आ पण. एक अवतार, जन्म गणनाना पूरण माटेज थयो ॥ ६ ॥ -- मन:-मन कठोर कठण ॥ गाथा ७ मीना बुटा शब्दोना अर्थ ।। मन्ये डु मातु 7 कुत-पीगष्य; द्रवीत थयु महानद रम-मोटो आणदरूपी: यत्-ज न नहीं मनोइ-मुदर अस्माशा-अमारा सरखानु वृत्त-शील; चर्तुल देव हे देव । हे नाथ! त्वदास्य-तारु मुग्व पीयूप-अमृत अश्मत पाषाणथी मयूख-किरण अपि पण साना-सानधी मन्ये मनो यन्न मनोझवृत्तं, त्वदास्य पी- यूषमयूखलानात्, सुतं महानंदरसं कगरे, मस्मादृशां देव तदश्मतोऽपि ॥७॥ तत् ते

(१३)
शब्दार्थः-हे देव ! हुं (एम).मानुंडं के
अमारा सरखार्नु मन सुंदर वर्तुल (जेवा) तारा
मुखरुप अमृत किरणना लाजथी मोटा आनंदरूप र.
सने अवीनूत थयुं नहीं तेथी ते पथरथी पण कठण
जागवू ॥७॥
व्याख्या:-हे देव के हे नाथ ! हुं एबुं मार्नु छ के, यदस्मा-
दृशां मनः के जे अमारा सरखार्नु मन, मनोज्ञ के खुदर, वृत
के वर्तुल एवं जे त्वदास्य के तारुं मुख, तेज कोइ एक, पीयूष
मयूख के अमृतकिरण चं, तेना लाने करीने अथवा मनोई
के सारं जे वृत्त के शील जेनु, एवा हे मनोवृत्त, हे वीतराग !
तारा मुख चंना लाने करीने महानंदरसं के सद्यारसा स्वादथी
नत्पन्न थएली जे परम प्रीति तेज को एक रस के उदक तेने
न फुतं के इवीनूत थयुं नथो; तदश्मतोपि कठोर के ते पापाण
करतां पण कठण जाणवू. कारण, चंना दर्शने करीने जीवरहित
एवो पण चंकांत पाषाण वीजूत थाय बे, अने मनने तो तारा
मुखरुप चंना दर्शने करी श्व के पिंगलवु प्राप्त थयु नहि. ते
कारण माटे ते मन, पाषाण करतां पण कठोर जाणवं. एवो ना-
वार्थ. ॥ ७॥

वशत =वशथी (१३) । गाथा - मीना बुटा शब्दोना अर्थ ।। त्वतः ताराथी प्रमाद-प्रमाद,नूस, वेदरकारी मुड'पापम् घणा .खे मेल- निशा-नुष (ना) वीशकाय पशु द-आ गत-गयु मया में मारावडे आप्त-मेलव्यु कस्य-कोनी रत्नत्रय-रत्नत्रिक, झान दर्शन अग्रत-आगल चारित्र नायक हे स्वामिन् । जूरि-धणा पृत्कगेमि-पोकार कर जवनमेण-जव नमवावकरी त्वतः सुक्षु प्रापमिदं मयाप्त, रत्नत्रयं नू- रिनवन्त्रमण, प्रमादनिद्रावगतो गतं तत्क- स्याग्रतो नायक पूत्करोमि ॥ ७ ॥ शब्दार्थ-~घणा इखे मेलवी शकाय एवं आ रत्नत्रय (त्रण रत्न )हुँ ताराथी पाम्यो, पण ते घणा नव जमवावमे करीने तथा प्रमाद श्रने निडाना

वशी तो मासिन्कोनी श्रागत ९
पकार का
fat ::-
Mar
पानमा nix
अनजान IE eी
करी Arfasries मानेन
पानी -नाम गरेर
गर्ग पर तीन . ए मारे दो पायागतः ।
से गई पो मोना TT पोरा : ए मा नारी पापन
माम नायता माग एकी मामाने
पर
॥गाया । मीना
छुटा शब्दाना अर्थ ॥
वैराग्य गंगा-गायनो अंग
गादाय वाद करवाने प्रणे
परवंचनाय-वीजाने उगवाने प्र। विपाध्ययनं विधानो अन्याम
भोपदेशः धर्मनो उपदेश च अने, पती
बन रंजनाप-लोकोने गुशी मे-मागे
करवाने अर्थ
अजून-थयो

हुवे कह (१५) किया-केटलु सब पोतानु ईश-द स्वामिन् ! हास्पकर-हास्पकारक वैराग्यरंगः परवंचनाय, धर्मोपदेशो जन- रंजनाय; वादाय विद्याध्ययनं च मेऽनूत्, कि- य हवे हास्यकरं स्वमीश ॥ ५॥ शब्दार्थ--बैराग्यनो रंग चीजाने गवाने भय थयो, धर्मनो उपदेश खोकोने खुशी करवाने अर्थ चयो, थने विद्यानो श्रन्यास वाद करवाने श्रये थयो तो हे स्वामिन् । मारु हास्यकारक एवं (स्वरूप) हु केटयुं कहूं ॥ए। प्पाग्या' शकेल हे सामिन ! सहास्पकार फिपदमुने मारा हास्यारत पा पने फेला यह जो थे मर्ग कहा मारे गाय नयी, तणापि माइक पहछु में पैगम्प रग. पररंननापान से माग रापनो ने रग ते, परपचनाप के अन्मना प्रनारण पाने उगा माटे पो, प्रने में पर्मोपदेश जन रबनाया ये करेनु दानादि सपन ते सोकोना रंगनने माटे थयु, अने मे विद्याध्ययनं के मार विद्यापठन, ते पण वादा- याभूत् के परवादना जयने माटे धरे ॥ ए॥ ॥ गाथा १० मीना वुटा शब्दोना अर्थ ॥ परापवादेन पारकी निंदावमे; पर बीजाने पारका अवर्णवाद वोलवावडे अपाय-अनर्थ मुखं म्होर्यु विचिंतनेन विचारवे करीने सदोपं पापवालं, दोपयुक्त कृनं कर्य नेत्र आंखने नविष्यामि यश परस्त्रीजनवीक्षणेन-परस्त्री जो कथ केमधुं वाव चेत:-चित्त अहं ईं; (महार) परापवादेन मुखं सदोष, नेत्रं परस्त्रीज- नवीक्षणेन; चेतः परापायविचिन्तनेन, कृतं नविष्यामि कथं विनोऽहं॥ १० ॥ शब्दार्थः--पारकी निंदावमे में (मारु) मों दोषयुक्त कर्यु, पारकी स्त्री जोवावमे मारी आंख विनो-हे प्रभु! , ( १७ वगछय ज्ञान मन्दिर, जयपुर सदोष करी, वीजाने अनर्थ चितरवावडे करी मा भन दोपवायु कयु (ए माटे) हे प्रजु । मारु शु थशे ॥ १०॥ व्याख्या हे पिनो मया परापत्रादेन मुख सदोष कृत के में वीमाना द्वेषादिके करीने सत्य अने अमत्यरूप दृपणनी ने अत्यत्ति, ते रूप अपवाद-तेणे करी पोतानु पुस दोषयुक्त कर्य, तेमज पोताना नेत्र, परवीजनबीनणेन के परनारीना अवलो- कने करी दोप महित एवा कयी, तेमन पोतानु चित्त, परापाय विचिंतनेन के वीजाना जे अपाय के अनर्य, तेना विचारे क- रीने दोप महित कयु, ए माटे हे मनो, अह कथ नपिप्यामि के एवा पाप कर्माचरणे करी आगत मारी शी गती थशे ? एकोना- वार्थ ॥ १०॥ ॥ गाथा ११ मीना वुटा शब्दोना अर्थ ॥ बिडवित-विकन्यु, निधता भने घस्मरन्जदाण करनार पमामय आर्वि-पीमा पद-जे देगा अवस्था स्मर-कामदेव शान-वशयी यएला में , (20) म्य पोनान स्वरूप हिया सजाए विषयांघलेन-विपयोबके अंध गर्व हे नक: प्रकाशिनं अगट करेलु मत्र-वधुः सर्वे तन्ने स्वयमेर-पोनाना मलेन जवतः नमारी बेमि-तुं नाणे विमंबितं यस्मरघस्मरार्ति, दशावशास्वं विषयांधलेन; प्रकाशितं तन्मवतो हयव, सर्वज्ञ सर्व स्वयमेव वेसि ॥११॥ शब्दार्थ:--विषयोवमे अंध थएला में नक्षण करनारः कामदेवनी पीनाना वशथी पोतानुं स्वरूर जे विभव्युं ते हे सर्वज्ञ ! में लजाए करीने सहितज तारी आगल प्रकाश्युं बे. (वधारे शुं कहूं) तुं पोतेज. सर्व जाणे ॥ ११ ॥ व्याख्या: हे नाथ ! यत् के जे, विषयांवलेन के शद्रा- दिक विपये करी विवेकाप नेत्रो जेणे निमीलन का ठे एवो हुँ तेणे-स्सरवस्मरानिदशावशात् स्पर फे कामदेव-तेज को एक (१५) यमर फे नक्षण करनारो, तेनी जे आति के पीमा-तेनी जे दगा के प्रास्ग, तेना पापीनपणा माटे स्त्र के पोतान स्वरूप विभक्ति के निधना मत्ये पमाङयु ते हमणा हिया के कथनम्प सझाए जातः एक प्रकाशित के तनेज निश्चये करी प्राट करेलु वे एटले लला युस्त एवो जे हु, ते पत्ये अवलोकन करी तेंमारा मर्व आचरण जाण्या ठे एगो अर्य ने कारण माटे हे म! तु सर्व जगतने स्वयमेव वन्मि के पोताना झारे करी जाणे ठे ॥१॥ ॥ गाथा १२ मीना तुटा शव्दना अर्थः ॥ यस्ता-अनाटा क्यों घ्या-फोकट, निफल अन्यमने-पीना मोबडे कर्मपाप कर्म रमेष्टिमन नरकार मन फुटेव-रागी देपी देर कुगारवाश्यकुमाखना - सगान-मोनयी, मेनायो ग्योरमे प्रवाहिम श्उयु निहता-नागपमामी, न मा. नाय हे नाथ' जली मगि भुद्धि प्रागपाक्ति-भिक्षान पाणी चमचमी जाने, विपर्याय क-करमाने मे-पागे .

(२०) ध्वस्तोऽन्यमंत्रैः परमेष्टिमंत्रः, कुशास्त्रवा कैय निहतागमोक्तिः, कर्तुं वृथाकर्म कुदेवसंगा- द वांनिदि नाथ मतिन्त्रमो मे ॥१॥ शब्दार्थः–में वोजा मंत्रोवमे नवकार मंत्रनो अनादर कयों, कुशास्त्रनां वाक्योवमे सिहांतनी वाणी न सांगली, कुदेवना संगथी में पापकर्म निष्फल क- रखाने इच्च्यूं. हे नाथ ! खरेखर मारी बुझिनो कि, पर्यास थयो ॥ १२ ॥ व्याख्याः-हे नाथ ! मे हि मतिचमोऽनून के खरेखर माहरो शो आ बुझिविपर्यास थयो !! तेज कहे ठे. मया के हुँ जे तणे-परमेष्ठिमंत्रः के परमपदने विपे रहे वे माटे परमेष्ठी-तेनो जे नमस्काररूप नमो अरिहंताणं इत्यादिक नवपदात्मक मंत्र, ते अन्य मंत्रैध्वस्त के वीजा मंत्रोए आदररहित कर्यो. तेप्रज आगमोक्तिः के आगमनी सिध्दांत वाणी, ते कुशास्त्र वाक्यैः के वात्स्यायनादि वाक्योए करीने, अथवा कुत्सित एवां जे शास्त्रो- तेना वाक्ये करीने निहता के नाश पमामी एटले श्रवण करी नहि. एषो अर्थ. तेमज में कुदेव संगात् के हरिहरादिक कुत्सित (२१) देवोनी मेवनाए करीने कर्म वृथा कर्तुं के ज्ञानावरणीयादिक पाप आकरय कसा माटे माठि के शत्रु ॥ १५ ॥ ॥ गाथा १३ मीना वुटा शव्दना अर्थ ॥ विमुन्य-मुकीदेईन, बोमोदईने वक्षोज स्तन दृगजयगत विगोचर भूत गजीरगनीर आवेता नानी-नानी, पुटी जवत आपने कटी के भ्याता-चितव्या, पान कयु तटीया' हलता शरीरना अप- मपा-में यावाला मुदपिया द युधिवालाए सुशा-मुदर दृष्टिलाली स्त्रीनना हटत-मृदयमा पिलासा बिलामी, हारनाव- कदाद-नेत्रना कटाद ना मुख विमुच्य दृगलक्ष्यगतं नवतं, ध्याता मया मूढविया हृदंतः, कटावदोजगन्नीर नानी, कटीतटीया सुदृशा विलासा ॥ १३ ॥ शब्दार्थ -दृष्टिगोचरनूत पावेला थापने जोमी देईने में मूढ चुद्भिवालाए कटाक, स्तन, गनोर (२) नानी, केक, श्रने ढलतां श्रवयववाला स्त्रीजना विलास चिंतव्या ॥ १३॥ व्याख्याः-हे जगदीस ! मुढधिया के जेनी बुद्धि मुह ले एवो हुँ, तेणे दृग्लक्ष्यगतं के दृष्टि गोचर भूत एवो नवतं के - चि- तामणि सरखो जे तुं-तेने विमुच्य के परित्याग करीने हृदंतः के० पोताना हृदयने विपे मुशां विलासाः के चंचलते करी जेन्नी दृष्टि सुंदर ते एवी हरिणादि स्त्रीनना हावनाबादिक विनमज, ध्याताः के चिंतन कर्या. ते विलास केवा ? तो के-कटावदोज गजीर नानी कटी तटीयाः के नेत्र कटाद, स्तन, गंजीर एवो नाली, अने कटी प्रदेश-इत्यादिक अवयवोए मोहनशील. चिंता- मणि रत्न सरखो एवो जे तु-तेनो न्याग करीने हुं पापमय विष- योने विषे आसक्त थयो. ॥ १३ ॥ ॥ गाथा १४ मीना बुटा शब्दोना अर्थ.॥ लोलेक्षणा-चपल नेत्रवाली यजे स्त्रीननां मानसेमनमा चित्तमा वक्रमों रागलकारागनो अंश; राता निरीक्षणेन निहालीने जो शनो अंश वाथी विलमा लाग्यो चोंट्यो - (२३) अपिम्पण शुद्ध सिद्धात पवित्र आगम अगात गयो (रूप) तारक हे तारनार । पयोधिन्ममुह कारण-कारण मयेमा, विपे कि- धौताम्योयो लोलेक्षणावक्रनिरीदाणेन, यो मानसे रागलयो विलग्न ॥ न शुक्षप्तिधांतपयोधिमध्ये, धोतोप्यगात्तारक कारण कि ।। १४॥ शब्दार्थ.-चपल नेत्रवासी स्त्रीउना मों नि- हाप्लीने जोवाथो मारा चित्तमा जे रागनो श्रश चो. ट्यो ते हे तारनार | पवित्र थागमरूपी समुनमा धोए ठते पण न गयो तेनु कारण शु ? ॥१४॥ व्यारया'-दे त्रिकाल दिन् । मारा, मानसे केचिनने रिपे, लोलणावकत्र निरीक्षणेन के जेना नेगो चार वे एती जे र- मणी, तेनु जे मुख, तेना अवलोकने करीने य गगलप, के ने राताशनो अश, विसग्न' के विशेपे करी गलग्न ययो, ते रागनव, ? (२०) तारक के हे संसार पार प्रापक ? शुक्ष सिद्धांत पयोधि मध्ये के निष जे सिद्धांत के आगम, तेज कोश्क समुश्-तेना मध्य जागने विषे धौतोपि के दालन कयु बनां पण नागात् के नी- कली गयो नहि. तत्र किं कारणं के ते विपे कारण शुं हशे? जे हशे ते हुँ जाणतो नथी; परंतु माहारी विषयाने विये दृढासक्तता- एज एनुं कारण हशे. एQ मने लागे ॥ १४ ॥ ॥ गाथा १५ मीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ अंग-शरीर स्फुरत्-देदीप्यमान न-नयी चंगं सुंदर साहू प्रधान-मोटी, अधिकारीनी न-नथी प्रभुता-मोटाई ऐश्वर्यता गण-समूह च चली गुणानां-गुणोनो कापिकोईपण नन्नथी तथापितोयपणा निर्मल-पलरहित; शृद्ध अहंकार अजिमानगर्व कोपि-कोपण कथित परालव पामेलो कलाविलासकलानो विलासः कदर्थना पामेलो कला, उद्दीपन अहं-हुँ अंगं न चंगं नगणो गुणानां, न निर्मल कोपि मन्ना कांति ,

(२५)
कनाविज्ञाप्त ; स्फुरत्प्रना न (प्रधान) प्रजुता
च कापि, तथाप्यहंकारकथितोऽह ॥ १५ ॥
शब्दार्थ --मारु शरीर सुदर नथी, तेमज शुफ
गुणोनो समूह पण ( मारामा) नयी, (तेमज) कोड
पण कलानो विलास, श्रने कोई पण प्रकारनी देदो
प्यमान एवी काति के प्रधाननी ऐश्वर्यना (मारामा)
नथी तोपण हुश्रदकारे पराना पामेलोतु ।। १५ ।।
व्याख्या -हे जिनेश, मे अग चा न के मारु शरीर मुटर
नयी, तेपन निर्मल के मलरहित एवा गुणाना गणा न के0 मि.
नय, प्रादार्य, गालीर्य, धैर्य, स्थैर्य अने चातुर्य इ यानिक गुणो-
नो ममूह पण नयी तेमज कोपि के कोपण कनारिलास के
कलानु नदीपन
था
अने कापि के कोपण भकारनी स्फुरत्म-
धान प्रभुता के देदीप्यमान एवी जे राजाननी अजूना के चक्र
वर्तिपणु अथवा देदीप्यमान एत्री प्रधाननी के अधिकारी पुरु
पनी प्रभुना के ऐश्वर्यता ते पण नयी, तयापि हे मनो अह
अहकार कथित. अस्मि के हु अहकारे करीने पराला पामेनो
एवो अथा पाठातरे स्फुरत्मत्रा, न के० देदिप्यमान कानि
पण नयी ॥ १५॥

(२६) ॥ गाथा १६ मीना बुटा शब्दोना अर्थ.॥ आयु-आयुष्य यत्ना-आदर; प्रयत्न गलति-नाश पामेले चचली घटतुं जाय ब नेपज्यविधी-सड करवामां आशु-जलदीथी, शीत्र न-नयी धर्म धर्ममा पापबुद्धिा पापना परिणाम स्वामिन् हे स्वामि ! गत-नाश पामी महायवल मोटी वया जुवानो मोह विडंबना मोहनीकदर्थना नोन्नहि म-मारी विषयालिलापः विपयोनी श्ठा आयुर्गलत्याशु न पापबुद्धि,र्गतं वयो नो विषयानिलाषः; यत्नश्च नैषज्यविधौ न धर्म, स्वामिन्महा मोहविम्बनामे ॥१६॥ शब्दार्थ:-हे स्वामिन् ! मारो मोटो मोहनी कदर्थना ते केटलकहेवो ? मारूं थायुष्य जलदी- थी घटतुं जाय डे पण पापना परिणाम नथ नाश (२१) पामता, मारी जुवानी जती रही पण विपयनी श्र जिलाषा जती नथी, उसम करवा में यत्न कयों पण धर्मने विषे में श्रादर न कर्यो ।। १६ ।। हे स्वामिन् । मे के0 मारी महामोह विमवना के माल जे मोह तेनीले विमत्रना के कदर्थना ते केटली कहेवी ते केवी? तोके मारु आयुः के0 आयुप्य, ते आशु गलति के शीत नाश पामे ने परतु पापत्रुदिन के जे पापपरिणाम ते नाश पामता नयी तेमज मारु पय गत के तागण्य लक्षण जे वय, ते अति क्रात ययु, परतु विपयामिलाप न, के० शब्द, रूप, गध, रस, स्पर्शरूप ने विषय, तेननो अन्जिताप. के० श्चा, ते हजी पण नाश पामी नयी अने मारो यत्न. के आदर, ते जपज्यविधी केश- रीर निरोगी होउ, एतदर्थे ओपधादिकोना विधान विपे थयो, धर्मे न के मुकतने विपे थयो नहि ॥ १६ ।। ॥ गाथा १७ मीना चुटा शब्दाना अर्थ ॥ नम्नची पाप-पाप धारमा जी,नेनन न-नयी विटाना-नास्तिकोनी, उगलो पुण्य-पुण्य कोनी जब-अवतार कटु-कडवी, कर्कश . मया में (२), गी: वाणी अर्के मूर्य (बतें) अपि पण केवलार्के केवल ज्ञानरूप मूर्य- श्य एवी ठते अवारि चारहा करी परिस्फुटे अनि प्रगट कर्ण कानमां सति उनां अधारिकणे सांजली अपि-पण त्वयि-तुं उते देव हे देव ! केवल केवल धिक्-धिकार हो मां मने नात्मा न पुण्यं न नवो न पापं, मया विटानां कटुगीरपीय, अधारि कर्णे त्वयि के- वलार्के, परिस्फुटे सत्यपि देव घिङ्मां ॥ १७ ॥ शब्दार्थः-तुं केवलझानरूप सूथति प्रगट बता पण में नास्तिकोनी श्रावी वाग] सांनती के थात्मा नथी, पुण्य नथी, नव नथो, पाप नथी तो हे देव ! मने धिक्कार हो. ॥ १७ ॥ व्याख्याः-हे जगवन् ! केवला:त्वयि के केवलज्ञानना भ. काशक केवल मूर्यज, एवो तुं, परिस्फुटे सत्यपि के अति प्रगट - (ए) पण मया के हु जे-तेणे विटाना के नास्तिकादि विटपुरपानी, आत्मा न पुण्य न नवो न पाप न के जीव नयी; पुण्य नयी, अवतार नयी, कृत नयी; श्यकटुगीरपि के एवी कर्कश वा- णीज कणे अधारि के कर्णने विपे धारण करी एटले श्रवण करी ए माटे हे देव के हे केवलिपते ! मा धिक् के गुण अने अवगुण एननो विवेक न करनारो एवोजे हु-तेने धिक्कार हो । ॥ गाथा १७ मीना बुटा शब्दना अर्थ ॥ न-नहीं सवापामीने देवपूजा-प्रभुपूजा अपि-पण न-नही मानुप्य-मनुप्यपणु चम्पली इद प्रा पात्रपूजा-मुपाने दान समस्त वधु नम्नहि कृत-कर्य श्राधर्म-श्रावकधर्म मया में च-अने अरण्य-जगल नम्नहीं विलाप रदन माधुधर्म:-माधु महाराजनो धर्म | तुल्य-मरसु न देवपूजा न च पात्रपूजा, न श्राध- (३०) संश्च न साधुधर्मः, लब्ध्वापि मानुष्यमिदं स- मस्तं, कृतं मयाऽरण्यविलापतुव्यं ॥ १७ ॥ शब्दार्थः-में मनुष्यपणुं पामीने प्रनुपूजा न मारी, सुपात्रे दान न दोधु, श्रावक धर्मने न पायो तेमज साधु धर्म न पायो तेश्री में आ बधो म. नुष्य जन्म जंगलमां विलाप करवा सरखो कयों फोकट गुमाव्यो. ॥ हुए। व्याख्याः-हे परमेष्टिन, मया केण्डं जे-तेणे मानुप्यं लब्धा- पि के पूजादिक कृत्यो करवा माटे योग्य एवा मनुष्यपणाने पा- मीने पण देवपूजा न कृता के अरिहंत देवनी पूजा करी नहीं; अने पात्रपूजा न कृता के साधुने जे दान देवं ते . पात्रपूजा. ते पण करी नहि. उक्तंच ।। अत्रं पातं तथा वस्त्रमालयं शयनासन। शुश्रूषा वंदनं तुष्टिः, पूजा नवविधा गुरोः ॥१॥ तेमज मे श्राधमः न के सम्यक्त पूर्वक द्वादश व्रत लदाण धर्म, ते पण स्वीकार्यो नहि. अने सावुधर्मः न के साधुनो जे पंच महाव्रत सदाण धर्म, ते पण स्वीकार्यो नहि. ए माटे इदं स्पस्तं के ए अर्हतपूजा न करवी इत्यादिक सर्व, अरण्य विलापतुल्यं कृतं के अरण्यने विपे जे विलाप एटले रुदन तेना सरखं कयु. एटले मने मनुष्यपणुं (३१) प्राप्त थयु बता में भत्कर्म कयु नहि ए व्यय ययु उक्त च ॥ अर- एयरदित कृत शवशरीर मुइतित वपुलमवनामित अधिर कर्ण जाप' कृत, स्यले कमलरोपण मुचिर मुपरे वर्पण यदव मुखमम्न यद बुये जने लापित ॥ इति ॥ १७ ॥ ॥ गाथा २ए मीना तुटा शब्दना अर्थ ॥ चक्रेकरी जैनधर्म जैन धर्ममा भया में स्फुट-प्रगट असमुअता शर्मदे मुख देनारामा अपि-पण अपि-पण कामधेनु कामऽघा गाय जिनेग-डे केलिपति कल्प-कल्परदा मे-मारी चितामणिपु-चिंतामणीमा पश्य- स्पृहा-श्वारूप चिन्ह-विशेप मुर्स आत्ति -पीमा न-नहीं चक्रे मया ऽसत्स्वपि कामधेनु, कल्प चिंतामणिपु स्पृहार्ति, न जैनधर्मे रफुटगर्मदे- ऽपि, जिनेश मे पश्य विमूढनाव ॥ २० ॥ जार स्थिति, हालत शब्दार्थः-में अता एवा कामधेनु, कटाक्ष अने चिंतामणि रत्लनी हारूर पीमा उपज वो पण प्रगट सुख श्रापनार जैनधर्मने विषे (धर्मव्याननी इछा) न करी, माटे हे जिनेश ! मार विशेष मुर्व हालत तो जून ॥ १५॥ व्याख्या:-हे जिनेश के हे केवलिपने ! मया के हुँ जे तेणे अतत्स्वपि के अविद्यमान एवां पण, कामधेनु, कल्प चिंताम- णि के मनोरथ पूर्ण करनारी एवी कामधेनु, कल्पना पूर्ण क- रनारूं कल्पद, अने चिंतित फल देनारं चिंतामणि रत्न, एनने विषे स्पृहार्तिः के इलारूप चिंता, निश्चय के प्राप्त थवानो चक्र के कर्यो; परंतु स्फुटशर्मदेपि के स्पष्टपणे करीने सुख देनारा पण, जैनधर्म के जिनमोक्त एवा धर्मने विषे धर्माकरणरूप चिंता करी नहि. ते कारण माटे हे जिनश! मे विमूहन्नावं के मारुं वि- शेष करीने जे मंदपणुं, ते प्रत्ये-पश्य के अवलोकन कर. ॥१॥ ॥ गाथा २० मीना बुटा शब्दना अर्थ ॥ सद्भोगलीला सारानोगनी क्रीमा रोगकीला-रोगरूप लोहाना खोला न नहि धनागमः धननु आवद्यु, धन मे- च-चनी, अने लव . " (३३) नो नहीं नरकम्य-नरकनी निधनागमा मति आवद्यु चित्ते-चित्तमा च-बली व्यचिति-विचारी दारा-बी नित्य-हमेशा न-नहीं मरका में, हु जे तणे कारा-वेमी; ख अपयेन-नीच एका सनोगलीला न च रोगकोला, धनागमो नो निधनागमध, दारा न कारा नरकस्य चित्ते, व्यचिति नित्य मयका ऽधमेन ॥२०॥ शब्दार्थ-नीच एवा मे हमेशा मनने विरे सारा नोगनी क्रीमानो विचार कों पण तेयी थता रोगरूप खीलानो विचार न कों, धन मेलवानो विचार कयों, पण मोंत यावशे एवो विचार न कयों, स्त्रीनो विचार को पण नरकना फुसनो विचार न कों ॥२०॥ च्यारया-हे पुरुपोत्तम धमेन के प्रथम एवो मयका के हजे-तेणे, नित्य के निरतर, सदनोगतीला उत्तम प्रकारना जोगोनी जीना ते चित्ते चित्तने विपे यांची (३४) चिंतन करी; परंतु रोगकीला न च के रोगरूप लोहना खीला ते चिंतन कर्या नहींज; तेमज धनागमः के धननी प्राप्ति चिंतन करी, परंतु निधनागमो नो के मरण प्राप्ति चिंतन करी नहि तेमज में दाराः के स्त्रीचें चिंतन कयु, परंतु नरकस्य कारा के नरक सं- बंधी कारागृहनुं चिंतन कर्यु नहि ॥ ७ ॥ ॥ गाथा १ मीना बुटा शब्दना अर्थः ॥ स्थित रह्यो कृतं कयों न नहीं नम्नहि साधो साधुना तीर्थोघणादि-जीर्णोद्वार बि- हृदि-हृदयमां; मनमा गेरे साधु-सारां; शुज कृत्यं काम वृत्तात वृत्तथी याचारवमे मया में परोपकारात्-परोपकारवके मुधा-व्यर्थः फोकट अहारितं-गुमाव्यो यशाजा एवम्ज अडित मेलव्यो. जन्म-जन्म; जींदगी चचली अने स्थितं न साधोर्हदि साधुटत्तात्, परोप- कारान्न यशोऽर्जितं च; कृतं न तीर्थोद्धरणादि (३५) कृत्यं मया मुधा हारितमेव जन्म ॥२१॥ शब्दार्थ -सारा वृत (पासवा) बमे हु सा धुना हृदयना रयो नहीं, परोपकारथी में यश पेदा कों नहीं, जीर्णोद्धारादि (सारा) काम न कयां, में तो व्यर्थज जन्म गमाव्यो ॥२१॥ व्यापा-हे जगत्मलो में माधुटत्तात् के० उत्तम प्रकारना मापारे करीने माधो हदि न स्थित के माधुना हृदयने प्रिपे रदेवगणा रयु नहि पाने जे माचार युक्त होय, ने माधुने मिय पाय ठे, नेगो हुपयो नामि यो लामा-तेमज में परोपकागन योनित 70 परोपकारे करीने मायातिरूप यश संपादन स्या नहि, तेमन में तीविरणादि यस न मन के पतन पामे सां जिनमनिरोन पुरा प्रनिटान म्प झरण ते जमा यादिवे, गरि, तेरणा माटे में मारो नाम, गुधैव अ. नारि पान गुमायो॥ ॥ गाना २२ मीना छुटा शब्दना अर्थ ॥ *गम्यगनी माना | गुरुदिने-गुET उप 77 (4) (गर)मा न नाना-ना .

३६) वचनेषु-बचनो ( सांजली र अपि पण हेवा) मां देव हे देव ! शांतिपक्षम तार्या तरवा योग्य कथंकारं कोण प्रकारे करीने अध्यात्मलेशः अध्यात्मनोलव अयं-आ मम मारे लवाब्धिालवलमुह का कोई वैराग्यरंगो ल गुरूदितेपु, न छुर्जनानां वचनेषु शांतिःलाच्यात्मलेशो मम कोऽपि देव, तार्थः कयं कारस्यं दवाधिः ॥ १५ ॥ शब्दार्थ:-गुरुए कहेला उपदेशामा लने वैरा- श्यनी दालना न थई, पुर्जनानां वचनो सांजली र. हेवामां नरशम थयो नहीं, मने काई अध्यात्मनो लन पण प्राप्त भयो नहीं तो हे देव ! हुं कोण - कारे करीने या परसमुद्र तरवा चोग्य लुं. ॥ २५ ॥ व्याख्याः हे देव, यया केछ हुं अयं समाधि के मान- बमा, कर्यकारं तार्थः ते कोरा प्रकारे करीने तरवाने माटे योग्य वं? जे पुरुष कर्म दिला, तरवा लाटे अ.क्य, ते पुण्य धर्म (३७) तो में समान नहि ने बताउ 3, गने गुरूदित के गुरण तापण करेला व्यार पान श्रम करवा निये पराग्यरग' के वरागी वामना नाजनि के नत्पन यइ नति यऽक्त ॥ धर्मा- रूपाने श्मशाने च रोगिणा यागनिनन् । यदि सा निश्चलाधि को न मुन्धावानात् ॥१॥ तैमग उर्जनाना के0 छानझनोना, बचने के पायो पि, शातिभृित के उपशम पास ययो ननि मज मन कोपि अयात्मनेश, न के मो कोपा आन्म- सुधिर पश्नपाठनादिक अाग योगनो लर पण मास थयो नहि ॥ ३२॥ ॥ गाया २३ मीना तुटा गव्दना अर्थ ॥ नियनिगमा, पाउल करिष्य करीश मारि-तु मान्ने दृश -गाना प्रकारनो, आग गुणगालो S7-11 भागानिजागा यनारा मनन्याग जन्मन.जमाना तेन ने कागा माटे मटा-नाग पाम्या गरना नामा यपि=71 (३८) जूत गयेलो जवत्रयी जवनुत्रिका वण जव उद्भवत्-चालतो श-हे इश; हे प्रभु! जावि-यावतो पूर्वे नवे ऽकारि मया न पुण्य, मागामि जन्मन्यपि नो करिष्ये; यदीदृशोदं मम तेन नष्टा, नूतोद्भव वनावि नवनयीश ॥ २३ ॥ शब्दार्थः-~पूर्व जन्ममां में सुकृत न कयु, बागल थनारा जन्ममां पण नहीं करीश; जो श्रावा प्रकारनो हुं हुं तो हे प्रजु ! ते कारण माटे मारा त्रण नव, गयेलो चालतो अने श्रावतो नाश पाम्या ॥२३॥ व्याख्याः-हे नेताः मया पूर्वेनवे पुण्यं नाकारि केस में पूर्व जन्मने विपे सुकृत संपादन कयु नहि. ए केम समनवामां आव्यु ? तो के तेवु सौख्य प्राप्त थयुं नयी ए उपरथी समजाय ठे. तेमज आगामिजन्मन्यपि के पागल प्राप्त थनारा जन्मने विपे पण, नो- करिये के पुख्य संपादन करनार नथी. ए केन समजवामां आ- न्यु ? तो के, दर्तमान जन्मना अनुमाने करीने. वर्तमान जन्मने विषे तो दत्तं न दानं इत्यादिके करीने पुण्य संपादन कयु नहि, ए स्पष्टज प्रतिपादन कर्यु ले. या जन्मने विषे पुण्य कर्यु नहि, (३) तेमज आगल पण करनार नयी; एतु सिह थाय ठे पुण्येन व. धते पुण्य पाप पापेन बर्धत इति वचनात् ।। यदीहशोर के जे कारण माटे, पुण्योपार्जन विचजित एत्रो हु हु तेन के ते का- रणे है इश, मम नूतोदलबदलावि जवत्रयी नष्टा के मारा पूरे थएला, वर्तमान कालना अने आगल यनारा ए जन्मनी त्रयी नाश पामी एटले सुकृत सपादन पिना निरर्थक यश एवो नावार्थ ॥ २३ ॥ ॥ गाथा व मीना वुटा शब्दोना अर्थ. ॥ किंवा वाद यस्मात् जे कारण माटे मुधाव्यर्थ, फोगट त्रिजगत्त्रण लोक अह हु स्मरूप-लक्षण निरुपका निरूपण करनारी मुधाभुरु-देवोने पूज्य-जवा योग्य किय-शा हिमावनु, कोण स्वदगे-तारी पागल गणतीमा चरित-चरितने एतवए; आ स्वकीय-मारा अत्र अहिंया जल्पामिकडु, कयन कर किंवा मुधाऽहं बहुधा सुधालुक्, पूज्य बहुधाचणामकारे ( 6 ) स्वदग्रे चरितं स्वकीय; जल्पामि यस्मात् त्रि जगत्स्वरूप निरूपकस्त्वं क्रियदेतदा ॥२४॥ शब्दार्थ:--हे देवताए पूज्य ! तारी पागल मारं चरित्र घणा प्रकारे फोगट शुं कहुँ; जे कारण माटे तुंत्रण लोकना स्वरूपनो निरूपण करनारोबे तेने ए शी गणतीमा !॥ २४ ॥ व्याख्या हे सुधाभु पूज्य के अतने नक्षण करनारा जे देवो-तेर पूजा करवाने योग्य एवा मनो! त्वाने के तारा अग्रलागने विषे स्त्रीमीयं के मारा चरितं के चरित्रने मुधा के व्यर्थ, बहुधा के नाना प्रकारे करी, अहं किया जल्या- मि केण हुं शुं वारू कयन कई ? यस्मात् के जे कार र माटे, वं त्रिजगत् स्वरूप निरुप के तुं त्रैलोक्यना लक्षाणोनुं निरुपण कर- नारो ठे, ते कारण माटे अत्र कियदेता के तारे चित्र ए मार्ग चरित्र कोण मणतीमा ? एटले त्रिभुवन जनोनुं स्वरूप जाए- नारो तुं ठे, ए माटे मारी पण सर्व स्थिति तने विदितन . ॥ya! ॥ गाथा ३५ मीना वुटा शब्दांना अर्ज ॥ दीनोहार-दीनोनो लार क धुरंधरः तत्पर त्वत्-ताराथी रवा माटे f (d) अपर'नीमो नम्नही नाम्ते-नयी इदम्मा म माराथी एज अन्य चीजो केरल-फक्त कृपापात्र-कृपा करवा योग्य अहो अरे नम्नथी महोधिरत्न उत्तम गोपि रत्न, अनजनेसा लोकमा सुदर सम्यरत रत्न जिने पर केवलीश शिव मोक्ष तापितोपण श्रीनमी एकामा (लोकनी) रत्नाकरमनमुश् नहीं मग नेकनिनवमानना एक याचेभागु श्रियम्पत्ति, दोनव श्रेयस्कर कल्याणकारी किंतु-पण मार्ययेन्माणु , याचुर अनजान दीनोहार धुरंधर स्त्वदपरो नास्ते मढ- न्य कृपा, पात्रनात्र जने जिनेश्वर तथाप्पेतां न याचे श्रिय, विवर्तनिदमेव केवलमहो स- सद्बोधिरत्न शिव, श्री रत्नाकर मंगलैकनि- (४२) लय श्रेयस्कर प्रार्थये ॥ २५॥ शब्दार्थः- केवलीश ! तारा बिना वीजो कोई दीनोनो नद्वार करवाने तत्पर नथी अने प्रा- लोकने विपेमाराथी वीजो कृपापात्रनथी, तोपण आ (लोकनी) संपत्ति हुँ मागतो नथी पण हे नगवन् ! हे मोदलदमीना समुड ! हे मंगलना एक स्थान! ए कल्याणकारक उत्तम वोधि रत्न, तेनीज केवल हुँ प्रार्थना करूंढुं॥ २५॥ व्याख्याः-हे जिनेश्वर के हे केवलीश! वदपरः के तारा विना बोजो पुरुष दीनोशर धुरंधरः के दीनोनो नार करवा माटे तत्पर एवो नाम्ने केप नयी. अने अनजने के आ लोकने विषे मदन्यः के मारायी बीजो पुरुष कृपापात्रं नास्ते के कृपार्नु स्थान नथी. अर्थात् कृपा करवाने अत्यंत योग्य एवं स्यान ते याराथी बीजं कोइ नथी. जो एबु तथापि एतां श्रियं न याचे के हाथी, घोमा कोशादिक सर्व जन मध्ये प्रमि जे ए संपत्ति, ते मलबा माटे हुं प्रार्थना करतो नयी. किंतु के मुं तो हे अर्हन के हे जगवन् ! हे शिवश्रीरत्नाकर के हे मोद लक्ष्मीना समुश्! ह मंगलकनिलव हे बईक मंदिर ! इदं श्रेयस्कर के ए कल्याण- (५३) कारक एचु, सद्बोधिरत्न के उत्तम प्रकारना जिनधर्म प्राप्ति माटे ने चिंतामणी सरसु रत्न, तेनीज केवल हु निश्चये करी प्रार्थना करू तु आ श्लोक मये स्तुति करनारे मनुने शिव श्री रत्नाकर एउ सपोधन आप्यु, तेमाज पोतानु नाम श्री रत्नाकरमूरि एच सूचवेलु ते ॥ २५॥ ॥श्रीजिनप्रनसूरि कृत आत्मनिंदा अष्टकम्॥ ॥ गाथा १ लीना बुटा शब्दना अर्थ ॥ श्रुत्ला-सानलीने बहुविर घणा कारना श्रद्धाय-श्रद्वा करीने तपसा-सपवमे सम्यक् परोपर रीते शोपयित्वा मुकातीने राजगुपचन-सारा गुरनु पचन शरीर-शरीरने वेश्म-घर धर्म यानाय धर्म यानने माटे वाम-बान, रहवाम यावत्-जेटलामा निरम्याग करीने मनपति-धाय ठे मारम्प-दीक्षा लेने ममय:-वरखत अयोपली तापत तेटखामा पचिता-जागीने आकस्मिकी चिंती 1 (a) इयं या विमा वमशी; याकरी माता-प्रावी पसी हा-अरे मोहस्त मोदनी हता-हमाया घाटी यान कुत्र-क्या तमिव-विजजी यामा मारे जईए श्व-पेठे श्रुत्वा श्रहाय सम्यक् शुलगुरुवचनं वेश्मवालं निरस्य, प्रनध्याथो परित्या बहुवि. धतपसा शोवयित्वा शरीरस्; धर्मध्यानाय था- बत्नजति समयस्तावदाकस्मिकीयं, प्राप्त मोहस्य घाटी तमिदिव विवमा हा हताः कुत्र यामः॥ १ ॥ शब्दार्थः-शुज गुरुतुं वचन सानशी तेनी लम्या प्रकारे श्रद्धा करोने गृड्वास बोकी देने, दिदा लेइ लगी, घणा प्रकारना तपनो शरीरने सुकात्रो, जेवो धर्मध्यान माटे समय आयो तेटला- (४५) मा विजजीनी पेठे वसनो नाविति या मोहनी धाम यात्री त्यारे (नन लाग्यो के) अरेरे मरी गया असे राजश्ए॥१॥ ॥ गाथा ए जीना छुटा शब्दोना अर्थ ॥ एकेन-पकडे रदितुम रक्षण करवाने अपि-पण हत्ता-हणीने महानतेन-महागा तानि पनिन,पतिने, मानीनु अपिनानिम्ममा योन-गमन करणार इटमनन-5 मापाता नन-नागारम मिहे-गीए जीप पा-प्रयवा गया-अनिमा स-अमे पान -पमनो तपा-मनो दम्प-निदा ननियनि- जगानामा पियागी, पेटती इटे-गपचार जातानि-नाणे नय-पोये पती-रेवती जगतान एकेनापि महानतेन यतिन खमेन जसे- प्रपि-पण (४६) न वा दुर्गत्यां पततोन सोऽपिनगवानीटे स्वयं रदितुम्; हत्वा तान्य खिलानि उष्टमनसो वर्ता- मदे ये वयं, तेषां दंझपदं नविष्यति कियजा- नाति तत्केवली॥२॥ शब्दार्थः-एक पण महाबत खंमीत वाथी अयश नागवाथी पूर्णतिमा पमता एवा यतिने ब. चावत्राने लगवान पोते पण समर्थ थता नथी तो ते वधाने इणीने अमे उष्ट मनवाला थया तेमनो केटलो दंग थशे ते केवली नगवान जाणे ॥२॥ ॥ गाया ३ जीना बुटा शब्दना अर्थ ॥ कट्यां केकमां रजोहरणकं रजोहरणा धो चोलपट-चोलपटो निक्षिप्य राखीने तनौ-शरीर नपर कदांतरे काखयां; वगलमा सितपट धोली चादर वके-मोटे कत्वा-करीने वस्त्रं-मुहपति शिरोलुंचन यांथानो लोच अथः बली स्कंधे-खने विधाप-करीने राखीने कंबलिकां कामलीने ददता-आपतो ..

(४५) श्री-मगलकारी कृते-माटे, अयें धर्मनान-धर्मलालम्प विम' अमे जाणीए ठी आशिप-आशिप गति गति नेपामरिण बेपनो आइपर न-नहीं रामनार यात्मनः पोतानी स्वजीवन-पोतानी आजीकिाना कट्या चोलपट तनौ सितपट कृत्वा शिरो लुचनं, स्कंधे कंबलिका रजोदरणकं नि- विप्य कदातरे, वक्के वस्त्रमयो विधाय ददत. श्रीधर्मलानाशिप, वेषामंवरिण स्वजीवन कृते विद्मो गतिं नात्मनः ॥३॥ शब्दार्थ-केमे चोलपटो, शरीरे धोलो नत्तर पटो (चादर) उंढी, माथे लोच करावी, सने का- मल मुकी, वगलमा योघो तथा मोढे सुहपति राखी, धर्मलानी कल्याणकारी याशिप देता, पोतानी थाजिविका चलाना साटे श्रावो वेरनो घामवर ( ) राखता, एवा अमारी शी गतिथशे ते अमेजा पता नथी ॥३॥ अपि-पण ॥ गाथा ४ श्रीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ जिक्षा जिख, याचना. सकल मनोयोगनी नियति पुस्तक चोपडी; पोथी तथा नेमज बन्द अपहुं काणं-पलवार पान-पा बसनि-रहवातुं स्थान मोज्य त्याग करीने भावार-मालुं बन अमाद-प्रमाद, आलस लुब्धा (मेलबवामां) लोजी द्विपं उपने यथा जेस स्वार्थाय आत्म साधन माटे नित्यं रोज प्रयतामहे-अमेयत करीए बीए भुग्धजन-लोला माणसने यदि-जो मतारणकरो-उगवा माटे तदा-त्यारे कटेन कष्टकने सर्वार्थ सिक्षित अर्यनीसिद्धि लियामहे खेद पामीए ठी नदेव होय थाल्नारामतया आत्मारामपणे विदा पुस्तक वल्ल पान वसति प्रावार- 7 (Un) खुब्धा यथा, नित्यं मुग्धजनप्रतारण कृते कटे- न खिद्यामहे, आत्मारामतया तथा क्षणमपि प्रोज्ज्य प्रमादछिप, स्वार्थाय प्रयतामहे यदि तदा सर्वार्थ सिनिवेत् ॥ ४ ॥ शब्दार्थ.-निक्षा, पुस्तक, चोलपट, पात्रु रहेवानुं मकान अने नत्तरपट मेलवामा लोनी एवा अमे, जेम नोला माणसनु गाव श्राय तेम नित्य आचरण करता कष्टवमे खेद पामोए वीए (पए)। बारमारामपणे क्षणमात्र पण प्रमाद रूपी वेरीनो त्याग करोने यात्म साधन अर्थे जो श्रमे प्रयत्न कयों होततो ते वखत अमारा सर्व अर्थनी सिद्धि थात ॥४॥ ॥ गाथा ५ मीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ पाखमानि-पासमो प्रयाग्रथो पुस्तको अा-असमन सहस्रशः हजारोगमे भृशघणा वशावशयी जगृहिरे-ग्रहण क- पेठीरे-लणाया तपासिअप राया लोन-नाल वहुधा-घणामकारना, । वमे) (ए) मुहै। मुर्ख (अमारा कथंचन कोइप्रकारे विनाश नाश अपि-पणा; बली मंजन मुखानि-- चिरं-लांबा व वन गुरुनिः-गुरुन (वमे) जवे तेवा काम विगरे मृधी भूत्वा-यईने अद्यापि-हजु मुंधी मुदो दरख 'तेपिरे तणाया लेजिरे पाम्या नो-नही कापि-कोई कोई कर्मक्लेश-कम्प के-/ लेजिरेमात.थयाँ वेकाणे शनो पाखमानि सहस्रशो जगृहिरे ग्रंथानुशं पेठिरे, लोनाज्ञानवशात्तपांसि बहुधा मुश्चिरं तेपिरे; क्वापि क्वापि कचनापि गुरुन्नित्या मुदोनेजिरे, कर्मक्केशविनाश संनव मुखान्य- यापि नो लेनिरे॥५॥ शब्दार्थः हजारो पाखंम गृहण करायां, घणा ग्रंथो जणाया, लोन थने अज्ञानना वशथी घणा प्रकारना तप लांबा वखत सुधी मुर्खपणे तपाया कोई कोई ठेकाणे तो गुरू. थई कोई कोई प्रकारे इ. रखने पाम्या परंतु कर्मरूप क्लेशनो नाश जेनाथ संचवे तेवां काम विगैरे हजु सुधी प्राप्त थयां नहि.५ अर्थ ॥ धार जेवा मिथ्यात्व गुगठा- (१) ॥ गाया ६वीना छुटा गव्दना चरम-ठेल्ला खड्गगरानरसारनी जातियश गुणम्यानक गुण नारक नाकी गणावालो तपस्या-तपस्या अहम् कर्मटोपात्-कर्म टो-या याय मजाय- पिं पय यान,जणगण नन-अपवा चम्म गुणस्यानक कर्णशचि कानमा बएनवीबह जब गत नागे पागलो यम् =जम रजन्य रनवी चन्दियाना-अग्निनी श-पठे ननव्य-अनन्य रिया-अवमा पसी कास पिम जनमो, मु. घर केन पी-शिवाचन शिक्षा नत भयम =मनम,चारित्र पड़ी। यपि पाण । यद-ने किमु प्रयो विपत-के नेगा । पिनाति-नागेठे फिनावी नारकोऽदं किमुत बहुनवी उर- जव्यो ननन्ध, फिवाह कृष्णपकी किमु चरम गुणस्थानक कर्मटोपात, वन्हिज्बालेव शि. कावतमपि विपवन् खम्गवारा तपस्या, स्वा- स-पेठे (५३) ध्यायः कणशूची यम इव विषमः संयमो यबिनाति ॥६॥ शब्दार्थः-कर्म दोपथी शुं हुं ते नारकी थ- श, अथवा हुं शुं बहु नब करनारो यश, पुरनवी के अजव्य थश्श, अथवा तो ढुं शुं कृष्ण रदी अथवा हुं शुं ठेला (मिथ्यात्व) गुणगणावालो तुं शिक्षाबत पण थनिती ज्यान्नानी पेठे केर जेवां (लागे ), तपस्या तरवारनी धार जेवी, सज्काय ध्यानतो कानमां शूज जेवू, संजम तो जम जेवू वसमुं लागे . (माटे हुं ते कर जातीनो जीव हश्श.) ६ ॥ गाथा ७ मीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ वस्त्रं वस्त्र, लुगमा उपयं-खावानु,आहार शिष्य शिष्य पात्रं पात्र शय्या-पाट विगेरे च-अने उपाश्रयं-अपाशरो शिक्षाम-जणतर बहुविध घणाप्रकारना पुस्तक पुस्तक नेह-निदामालावेलु उपकरणं साधन गृहीमा-अमे लइए चतुर्थी चार मकारनुं (रुमाल विगो) बीए शयया अपि-पष (५३) परकीययेव पारकुज । वय-अमे तपसा जपत्रमे मुतगम-अतिशय यास्थाम, तेपा-नेमनो प्राजन्म-दिदाम्प पामी दहा-अरेरे जन्मयी माडीन कर-केची गते निष्करम्-मदलो ₹ा-यामा, मोटा होन-आवा वस्त्र पात्र मुपाश्रयं वहुविध नेदं च. तुपिध, गय्या पुस्तक पुस्तकोपकरण शि- प्य च गिटामपि ॥ गृहीम परकीयमेव सु- तरामा जन्म रवा वय, यास्यामः कथमीदृशेन तपमा तेपा दहा निष्क्रयम् ॥ ७॥ शब्दार्थ-घशा प्रकारना वन पात्र थपाशरा घणी जातनो जीक्षा, चार प्रकारनो निक्षामा ला. बेलो थाहार (१लक्ष्य २ नोज्य ३ सय ४ चोप्य), गया, पुस्तक, पुम्नकोना उपकरण, शिप अने शिक्षाना प्रय पण (दिक्षारूप) जन्मयो मामीने श्रमे (भाज) यया त्या सुधी पारका सामने गीएवीप नो यात्रा प्रमारना तपको तेमनो वक्षाबंधाएलो वाला नाश करनारा (प) वदलो अरेरे शी रीते वालीशुं (एटले श्रमारीशो गति थशे.)॥७॥ ॥ गाथा ७ मीना बुटा शब्दोना अर्थ. ॥ अन्तर मनमा मद्यप-मधुपान करनार इदृशां आवानना अंतःकरणमा वणिक-वाणीयो म.मरिणाम-द्रेप चाम-इष्टवासना अहंन्दु नाशात्मिनां बहारथी' धुरि-पहेला; आ- बहिः बदारया | गलथी शमवताम्-शांतिवाला पावएम-कपट तावदेव पहेलेथीजा एटलंज नहींपण पापात्मनाम् पापी धारिणाम धारण चरितः चरित्रोवडे आत्मावाला तम् तेथी नम्नानदीना घकशामगलाना मे भारी पाणी (2) कुननि करीठे मिय्यादृशाम-मिथ्या कानगी बिजमाणे दृष्टिवाला । गतिमानि यो अन्तर्मत्सरिणां वदिः शमवतां प्रवन्न पापात्मनां, नद्यम्नः कृतशुद्धि मद्यपवर्णि ग्- वासनाशात्मिनाम् : पारवत्रतधारिणां वकढ़- मचन्न-नाना नन-ग्रन करनारा जेवी नजरवाला दहा-अरे (५५) शो मिथ्यादृगामीदृशां, वरोऽहं धुरि तावदेव चरितैस्तन्मे हहा का गतिः ॥७॥ शब्दार्थ -थत करणमा हेरवाला, बहारथी शातिवाला, गना पाप करवाथो पापारमा, नदीना जलथी करी ठे शुद्धि जेणे एवो मद्यपान करनार वाणी जेवो, इष्ट वासनानो वहारथी नाश कर- नारा, बगलाना जेवी दृष्टी राखो करटो बनधारी थई । फरता मिय्याउष्टीरूप वा प्रकारना थमेवीए एटलुज नहीं पण (खरार) थाचरणमा अग्रेसर थई हु धधाएलो बु, ते मारो अरेरे हे देव । शो गति थशे॥७॥ ॥ गाथा ए मीना वुटा शब्दोना अर्थ ॥ 'येपा-जेमना प्रशसारिना-मशमा। निशा रानी दर्शन-दर्शन विगेरेथी श-पत्रे वन्दन-नमस्कार मुन्यन्ते मुकाय ठे सिते-शुला, अनवरा- प्रणमन-प्रणाम तमसा-अहानरूपी तीया सर्ग-अ ते पके पखवाडीमामा (५६) मजा लोको मुनयः मुनी आत्मनिन्दनम् पो- तत्दणात् तेज वखते तेषां तेमने तानी निंदाने, तादा-तेवा नमः नमस्कार इदं आ अपि-पए कुर्महे अमे करिये वुम करीए बीए सन्ति होय निए पुनः बली के-कोश संविग्ना संवेगी बोधये वोधिवीज माते अपि-पण वयम् अमे येषां दर्शन वन्दन प्रणमन स्पर्श.प्रशं- सादिना, मुच्यन्ते तपसा निशा श्व सिते पड़े प्रजास्तदणात्; तादृदा अपि सन्ति केऽपि मुनयस्तेषां नमस्कुर्महे, संविना वयमात्मनि- न्दनमिदं कुर्मः पुनर्बोधये ॥ ५ ॥ शब्दार्थः-जेम अजवालीश्रा पखवामीयामां अं- धाराथी रात्री मुक्त थाय ने तेम जेमना दर्शन, नमस्कार, प्रणाम, स्पर्श तथा प्रशंसादिवसे लोको तेज वखते थझान अंधकारयो मुक्त थाय ले तेवा पण केटलाक मुनी ले तेमने अमे नमस्कार करीए

(५७)
बीए, वली श्रमे संवेगी बोधी बीजने माटे या प्रा.
स्मनिंदा करिये बीए॥ ए॥
॥ गाथा १० मीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥
रागो-राग
मा-मो
म-मारो
देण-पसकमा वाधते-पीमा करे
स्फुरति फुरे ने अयो-वती कापेय-माकमा जेवा
क्षण-क्षणवार, पल- मैत्री मंत्री नारना
अटकचाला
कमा
समालिङ्गति याय ने कृपणा-नीप
अयोवली दैन्य दीनता, रकपणु अकृपा-निर्दय
वैराग्य-वराग्य पीमयनि-पीते परिवृते-घेराएला
उम्लते यह आवे दए। थोमी वारमा (कर्मों)
अयो-बली
कार्य-सयु
द्वेपो-टेप, अदेसाई । हर्ष हर्प
मा-मने
अपि-पण कर्मनि' कोवमे
रागो मे स्फुरति क्षण क्षण मथो वैराग्य
मुम्जते, पो मा नजति क्षण कण मथो
मैत्री समालिङ्गति, दैन्य पीमयति क्षणं क्षण
मथो दोऽपि मां वाधते, कापेय कृपणाऽकृपा
हहा-अरेरे

- परिटतैः कार्य हहा कर्ममिः ॥१०॥ शब्दार्थः-पलवारमा तो मारोराग फुरे , वली क्षणवारमा तो वैराग्य थ आवे , क्षणवारमा तो मने न थ जाय बे वल थोमीवारमा मने मैत्री. नाव उपजे बे, क्षणवारमा रंकपणुं पुःख देबे, क्षण वारमा हरख पण मने पोमा करे ले (उत्पन्न थाय बे.) तेथो मांकमा जेवा अटकचालां, नीच अने निर्दय, घेराएला कर्मोवमे सयुः ॥ १० ॥ श्री हेमचंद्र आचार्य कृत श्रात्मगर्दास्तव. ॥ गाथा १ लीना बुटा शब्दना अर्थ ॥ ईत =आय की अहींथी| नाथ हे नाथ ! मत-मतरूपा शनरस:-शांतरसना परमानंद -नत्कृष्ट अमृतपानोबा-अ. नर्मचः तरंगो आनंदनी मृतपानथी उत्पन्न पराणयंतिधमाकेजे संपदं संपत्ति मां मने त्वन्मतामृतपानोबा, इतः शमरसोर्मयः; पराणयंति मां नाथ, परमानंद संपदम् ॥१॥ त्वत्-तमारा थिएला

(ए)
शब्दार्थ.-नाय | तमारा मतरुपी अमृत
पानथकी नत्पन्न थता तरंगो ते नहींथी मने परमा-
नंदनी सपत्ति पमामे वे ॥१॥
॥ गाथा २ जीना तुम शब्दोना अर्थ ॥
इता-अहीयी आ पामेला
आवेगवेचेनी
वेकाणेयी मूठयति मूळपमाडेठे हत-हणाएल)
चम्बली
अलमम्प्रत्यत आशाशा
अनादि समार मूर्चि- राग-राग; विषय करवाणि-हु करु
ताम् अनादि ममा- उरग-साप किम्
रनी वासनाएक्षि। विप-फेर
श्तश्चानादि संसार, मूहितो मूर्वय
त्यलम्, रागो रग विषावेगो, हताश करवाणि
किम् ॥२॥
शब्दार्थ -बली श्रही अनादि ससारनी वा-
सनाए वन्दि पामेला रागरुपी सर्पना पिनी बेचेनी
मने थत्यंत मू; पमामे ठे माटे श्राशालग थएलो
हुशुरु ॥२॥

(६०) ॥ गाथा ३ जीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ राग-राग | कर्मकर्म अशक्ता-अशक्त अहि-सर्प वैशसम्=5ष्ट, उःख- अस्नि=हुँ ढुं गरल-गल, फेर दायक घि धिक्कार पमो अत्रात'=पूर्ग पामेलो| तत्ते मेमने अका की वक्तुम कहेवाने प्रचन-गुप्त यजे अपि-पण पापिनः पापी रागादि गरलाऽघ्रातो, ऽकार्ष यत्कर्मवैशसम्; तत्त्कुमप्यशक्तोस्मि, धिङ्मे प्रवन्न पापिनः३॥ शब्दार्थः-~रागरूपी साना फेरथी मूळ पा. मेला में जे इष्ट कर्म कर्या ते कहेवाने पण हुं अस. मर्थ ढुं, मने गुप्त पापोने विकार पमो ॥३॥ ॥ गाथा ४ थीना बुटा शब्दोना अर्थ ॥ कणकणमात्र; थो-| हमी दयावान कारित:-करायो मीवारमा मोहाद्यै-मोहादिए कपि चापलम् वानर- सक्ता-लुब्धा आसक्त क्रीमया-क्रीमावले चेष्टाः बांदराना मुक्ता मुक्त छुटो श्व-जेम जेवी चपलता क्रुद्धः क्रोधी क्षणं सक्तः दाणं मुक्तः,दणं क्रुः दणंदमी, --- अहं हुं - वाक याणी अपि-पण (६१) मोहाद्य क्रीमयेवाह,कारितः कपि चापलम्॥ शब्दार्थ -क्षणवारमा थासक, क्षणमा मुक्त, कणमा क्रोधी, क्षणमा कमानान, एम मोद्दादिए कीमामा मारी पासे वानर चेष्टा करावी ॥४॥ ॥ गाथा ५ मोना तुटा शब्दोना अर्थ ॥ माप्य पामीने नाय- मामि। शाय-गरीर निगगि मापार वज पथ्यीयएला नि यो माधि मम्गम धर्मने इगेट्रिन पुष्पमा अनन -अगि मना-मन प्राप्पापि तव संगोधि,मनो वाकाय कर्मजे उष्टितर्मया नाथ, गिरसि ज्वालितो ऽनल ॥७॥ मटा दे नाय । तारा सम्यक धर्मने पामीने पण मन, वचन थन कायाना व्यापारयी एमा उस्कोरम में (मारा) माघे अन मसगाव्यो ॥५॥ ॥ गाथा ६ ठीना उटा शब्दोना अर्थ ।। गदि नये प्रातरि हाना पनाने पण प्रात पहारग्नार पोदादिपोती मया-म नाश पामीले (६२) ""तिम्लुचैः चोरोवडे | हताशा जेनी आशा हतः हणालो रत्नत्रयंत्रण रत्लने मे मारा अस्मि हुँ छं हियत =हरण कराय ठे. हा अफसोस तत् ते कारण माटे त्वय्यपि त्रातरि त्रात, र्यन्मोहादि म- लिम्लुचैः; रत्न त्रयं मे ह्रियते, हताशोदा दतो- स्मि तत् ॥६॥ शब्दार्थः-हे रक्षक ! तमे रक्षण करनारा बतां मोहादिक चोरोए मारा ज्ञान दर्शन चारित्र रूप रत्न त्रण चोर्या बे. अफसोत ! ते कारण माटे हु निराश थएलो अने हणायेलो तुं ॥ ६ ॥ ॥गाथा उ मीना छुटा शब्दना अर्थ ॥ वांत: जम्यो एक-एक अंधौ-चरण कमलमां तीर्थानि-तीयों तेपु-लेयने विपे विलग्नालीन इंट: जोयो अस्मि-हूं सं-नने तन्ने माटे नाथ हे नाथ! मया में तारय-तारो ब्रांतस्तीर्थानि दृष्टस्त्वं, मयैकरतेषु तारकः । तारका-तारनार तव-तमारा '(33) तत्तवांघ्रो विलमोस्मि, नाथ तारय तारय॥७॥ शब्दार्थ-हे नाथ हु तीर्थोने विप नम्यो (पण) तेमा तारनारा एक नमेनेज में जोया माटे तमारा चरण कमामा हु लीन थयो तु, (तेथी) हे नाथ । तारो, तारो ||3|| ॥गाथा जमीना छुटा गन्दना अर्थ ।। जगत्-तमारी प्रापित =पाम्यो तु नम्नदि प्रसादेन मेटेरवानीवमे नुप-मनुष्य जन्म इदानीम्याने तरम्तमारे, तमने भूमिकाने मौदामीन्येन-नु- उपेक्षितम्-नपदा इयतीम्या दामीन धर्मे करीने करवा माटे जवत्प्रसादेनेवाद, मियती प्रापितो नुव. औदासीन्येन नेटानी, तव युक्त मुपेक्षितुम्॥G॥ शब्दार्थ-तमा मेहेरनानीवमे करी हया मनुष्य जन्म जुमिका प्रत्ये पाम्यो ते माटे हमणा नदासीन धर्म करीने 1 उपेक्षा करनी यो ग्य नची ॥७॥ युक्त-योग्य अदन लायक तत्पर अन्यः बीजो ( ६४ ) ॥ गाथा ए मीना छुटा शब्दना अर्थ ॥ झाता-निपुण, शानो | अन्या-पाजा कोई । कृपापात्रं कृपा करवा तात हे तात कृपापरः दया करवा स्वं-तु एधि-तुंथा एक-ज न-नथी यत्=ने कारण माटे ए एक कृत्यकर्मठ: करवा त्वत्ता-सारथी प्रत्तः मारायी; मारा योग्य काममां च- न-जयी करतां तुर झाता तात त्वमेवैक, स्त्वत्तो नान्यः कृपापरः; नान्योभत्तः कृपापात्र, मेधियत् कृत्य कर्मन, ए॥ शब्दार्थ:-हे तात ! तमेज एक निपुण बो, तमाराथी बोजो कोई दयापर नयी श्रने मारा करता बोजु कोर कृपा करवाने लायक नथी, ते माटे तमे जे कृत्य करवा योग्य होते कृत्य करवामां निपुण था . ॥ ए॥ श्री प्रात्मगस्त्विः समातः

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Shri Ratnakar Suri Krit Panchvisi Gatha-i

Author
Suri,ratnakar
Title
Shri Ratnakar Suri Krit Panchvisi Gatha-i
File name
Shri Ratnakar Suri Krit Panchvisi Gatha-i
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/02
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
68
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
549792
Barcode
99999990030644.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
ehFLU7yiOGT
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