Adarsh Library, Jaipur
Saleeb Par
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सलीव पर
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सलीब पर दीप्ति खण्डेलवाल
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अपने पिताथी वाबूजी श्री मदनगोपाल जी को
जिनसे मिली 'सत्यं गिवं सुन्दरम्' की चेतना मेरी
शिराओं में रक्त वनकर संघर्ष-रत है। उनकी
गोद की अशेष स्मृति सहित~
-दीप्ति
श्रेय
भाई श्री कृष्णस्वरूप जी को
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सलीव पर 'सलीव पर' के 'बाबूजी'- 'पीपंकहीन' व 'विघटन' के आज के ग्राम प्रादमी का प्रतिनिधित्व करते कथानायक कोशिश में' का प्याज बेचता, जाहिल, गवार 'करीमवख्य..' 'अभिशप्ता' की प्रति सुधी नारी 'मानो दी...' 'बीच का प्रादमी' के अपने छोटे कद से ऊपर उठते 'जोशी जी...' 'एकात्म' के प्रत्यक्ष मे होश खो बैठे, किन्तु अप्रत्यक्ष में बहुत होश के कारण ही प्रात्म- घात-सा करते 'ननदोई जी...' अगो की उमरकंद झेलते 'चार दिन और' के पचास वर्षीय 'लाला बाबू' से लेकर 'कैद' के आठ वर्षीय अनूप तक या फिर--'स्वयंवर' के प्रति स्पन्दित प्रेमी युगल, 'राधा पौर मोहन-' जो 'मृत्यु' के 'प्रालिंगन-पाश' मे ही जीवन की सीमानो के परे एक हो सके मे लेकर- जिन्दगी की चटकती धूप मे, निस्पन्द हो उठे, 'दो पल की छाहे ढूढते 'एन्योनी एवं अनामा'.."तक" और अन्त में 'प्रात्मरचना' की 'मैं'-- सभी तो किसी न किसी 'सूली पर टंगे हैं- ईसा के समान रक्त-रजित, लहूलुहान, कीलो से ढके, पत्थर खाते अपनी-अपनी परिधि में अकेले जलते... --
अपने-अपने अन्धकार से अकेले जूझते"
अपने-अपने हिस्से का जहर अकेले पीते...
अपनी-अपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, स्थूल या सूक्ष्म'
किसी न किसी 'त्रासदी' के 'सलीव पर'
स्वयं चढ़े या चढ़ा दिए गए।
न्यू रोडसं क्वार्टर नं० १६
उस्मानिया यूनिवर्सिटी
हैदरावाद-७ (मा० प्र०)
-दीप्ति खण्डेलवाल
क्रम
प्रारम-रचना
विघटन
२६
शीर्षकहीन
याधुनिक
अभिशप्ता
कोशिश में ७४
चार दिन भोर
८५
स्वयंवर ६०
कंद १०२
डूबने में पहले ११०
बीच का प्रादमी १२५
सलीव पर
१३१
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प्रात्म-रचना . - कहानी बहुत बडी है, बहुत छोटी भी, जैसी कि जिन्दगी होती है । लम्हों, क्षणों में जी जाती जिन्दगी फैलकर दिनों, वों का विस्तार पाती है। और फिर मिमटकर शून्य-भर रह जाती है । याद आता है, एक अयोध लड़की थी। सरे गोरे रंग । बड़ी उज्ज्वल प्रांखों और रेशमी, काले बालों वाली । उम अवोध लडकी को दो प्रादतें पड़ गई थी--एक, अगूठा चूसने की, दो-प्राकारा देखने की ! पौर. जब वह अंगूठा चूमते-चूसते, प्राकारा को देखते, चलने लगती, तो गिर पडती यो । गिर पड़ती, तो चोट लगती थी। चोट लगती, तो दर्द होता था । आकाश को देखने की परिणति में उसे ददं मिलता था। लेकिन वह थी कि आकाग को देखते-देखते चतना छोड नहीं सकती थी। और चोट थी कि वार-वार लगती थी। और दर्द था कि बार-बार मिलता था । वह अबोय लडकी प्राज चोटो और दर्द से भरपूर है । किन्तु प्राकारा को देखना वह आज भी नहीं छोड़ सकी है। प्राकाम उसके लिए पर्याय है विस्तार का-उन्मुक्त विस्तार का" जिममै उड जाने के लिए वह होश सभालने के बाद से सदा पातुर रही है । प्राकारा को नीलाभ उज्ज्वलता उसके लिए पर्याय रही है उस सौंदर्य का, जिसे उसने मासो में उतार लेना चाहा है. 'प्राकारा पर क्षण-क्षण विसरते रग उसकी चेतना में रंग भरते रहे है"और धरती पर जकड़ी सड़ी वह पाकाम में उड़ जाने के लिए संघर्ष करती रह गई है. क्योकि वह पखहीन है । पंसहीनता उसकी नियति है "माकारा उसकी कामना- इम नियति और कामना के बीच झूलती उसको जिन्दगी शायद एक शून्य है. शायद यह शून्य वैसा ही है, जैसा प्राकाश होता है--बहुत कुछ प्रारम-रचना / ११ भी नहीं। । और श्राज प्राकाम को देखने के साथ एका अादत और जुड़ गई है। अंगूठा चूराना बह छोड़ चुकी है, तो नाकारा को देखने के साथ कुछ और भी होना चाहिए न ! ऐसा कुछ, जो उसके पार्थिव अस्तित्व को धरती से जोड़े रख सके । तो वह अगरबत्ती से जुड़ गई है, अंगूठा चूसने की वह अयोधता, प्राज जीयन पोर जगत् के बोधों से, और उससे भी अधिक दर्द पार चोटों के यथार्थ से इतनी बोभिल हो गई है कि यदि अब पंख मिल भी जाएं तो भी उड़ नहीं सकेगी, श्राका को देखते देखते थयापार पंखहीनता के क्षण-क्षण सालते यथार्थ को झेलती वह बोधगयी प्रय अपने कमरे के एकांत में अगरबत्ती जला लेती है ..फिर उरा घुटते एकांत को देर तक बारवे घूटों की तरह पीती वह उस धीरे-धीरे जलती, सुगंध विरोरती अगरबत्ती को एपाटक देखती रहती है। अगरबत्ती उसे अपने अस्तित्व का पर्याय लगती है। जलना दीप्ति की नियति रही है, प्राग को पालोक बनाना उरावी प्राति "पोर इन दोनों का द्वंद्व उराकी जिन्दगी। उसे याद नहीं, पाव से उरो अपने भीतर कुछ 'उज्ज्वल' होने की चेतना रही है । यह 'उज्ज्वल' उराका जीवन-दर्शन रहा है। यह 'उज्ज्वल' उराकी विडंबना भी सूरज में प्राग है तो यह एक प्रकाशपुंज बन गया है, जो ऊप्मा देता है, जीवन देता है, मालोक देता है । दीपक उस प्राग को अपने लघु परि- पेक्ष में प्रात्मसात् कर लेता है, तो निविड़ अंधकार से जूझता, जलता, 'तमसोमा ज्योतिर्गमय'. 'को जीने लगता है। सूरज का तपना और दीपन का जलना सार्थक होता है। किन्तु अगरबत्ती का तपना या जलना एक सुगंध की क्षणिक परिणति के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। जलती अगरबत्ती भी है 'जलने की दाह को भेलती राख होती जाती है. "वितु एगा हलकी-सी सुगंध के अतिरिक्त अपनी दाह का कोई प्रमाण उसको पास नहीं होता । और यह सुगंध भी क्षणिक होती है । और सुगंध को न छुग्रा जा रागता है, न देशा, पेचल महसूस किया जा सकता है। वह भी तय, जव बहुत पास से उसे सांसों में भरा जा सके । किन्तु पिसीका पार्थिव १२ / सलीय पर अस्तित्व यदि अगरवत्ती-सा हो उठे, तो सूरज और दीपक की तुलना वह नगण्य होकर रह जाता है । सुगंध अपने-आपमें एक सूक्ष्म उपलब्धि हो मकती है, किन्तु प्राग और पालोक को तुलना मे वह कही नही ठहरती। उसने मूरज-सा प्रकारापुंज वनना चाहा था कि जीवन दे सके, मालोक दे सके । उसने दीपक-सा जलना चाहा था कि अंधकार से जूझमके''. माग को उसने आत्मसात् कर लिया था-'तमसोमा ज्योतिर्गमय' उमका जीवन-दर्शन बन गया था, किन्तु इनकी परिणति मे वह केवल एक अगर- वत्ती बनकर रह गई है । हा, उसके भीतर वह प्राग अभी भी भड़क रही है, जिसे वह गोलोक बनाना चाहती है और इस आग को पालोक बनाने के प्रयास में वह जलने की शर्त भी पूरी कर रही है। पिता उमके संदर्भ मे दो घटनाग्रो का जिक्र करते हैं। पहली घटना उसकी देह की है । बहुत छोटी थी वह, शायद पूरे एक वर्ष की भी नहीं । किसी धार्मिक उपलक्ष्य में पिता नदी में स्नान कर रहे थे, तो सोचा, एक गोता उस नन्ही जान को भी लगवा दें। पिता ने उसे एक बार डुबोकर निकाला ही था कि वह न रोई, न चीखी, बस नीली पड़ गई। पिता दुखी और चकित, एक साथ थे । न पानी इतना ठंडा था कि एक वर्ष की बच्ची की देह नीली पड़ जाए, न वह बच्ची ही देखने में इतनी दुवंल थी। लेकिन नीली वह पड़ गई थी। और फिर उसका नीला पडना चलता रहा । तीन वर्ष की आयु तक उमे सात बार चेचक निकल चुकी थी। छह वर्ष की उम्र मे उसे डिपथी- रिया हुअा था । नौ वर्ष की अवस्था में वह खूनी पेचिश के कारण मरते. मरते बची थी । और सोलह वर्ष का कैलेंडर अभी बदला नहीं गया था कि वह टॉयफॉयड के प्राकमण से जो शय्या पर गिरी, तो आज तक नहीं उठ सकी है। टॉयफायड ने उसे ऐसा क्षत-विक्षत किया कि उसका प्रग- अंग पंगु-सा होकर रह गया । सोलहवें वर्ष के वसंत के बीच खडी वह देखती रह गई कि उसके चारो ओर पतझड को हवा चलने लगी है." उसकी देह का वसत पथरा गया था। माज अभी जब उसकी पथराई देह तीन हजार से भी अधिक इंजे. आत्म-रचना/१३ वशनों से कोंपी जा चुकी है और वह अनगिन दवा-प्रयोगों की पारादी से गुजर चुकी है, उसकी देह का नीला पड़ना जारी है । दोप उन हवानों का नहीं, जिनमें वह सांस लेती है, दोप शायद उन पंचतत्वों का है, जिनसे उसका निर्माण हुआ है । और देह की यह अस्वस्थता इतनी दीर्घ हो गई है कि अब मन भी रोगी हो उठा है । देह की यातना मन की यातना बनी जा रही है। जिस देह में उसे रहना है, वह देह उससे पग- पग पर विद्रोह किए रहती है और उसका सब कुछ विरूप होकर रह जाता है । उगकी आत्मा के रंग उसके जीवन में केवल इसलिए नहीं उतर सके कि बीच में उसकी चिर-अस्वस्थता की दीवार खड़ी हो गई थी 'अाज भी जब वह लहूलुहान है, पराजित है, ग्रांसुरों से अधिक अपने ही रक्त से भीगी हुई है, तो भी वह इस दीवार पर अपनी कोमल दुर्बल हथेलियों से निरंतर प्रहार कर रही है. 'पीर, और अधिक लहू- लुहान हुई जा रही है । यह दीवार शायद नहीं, निश्चित रूप से उसकी नियति है।''और नियति से कोई जूम भले ही ले, जीत नहीं सकता। अगरबत्ती जलकर बुझ जाती है और उसकी सुगंध भी विलीन हो जाती है तो वह उठकर फिर खिड़की खोल लेती है और देखने लगती है-आकाश के उस अंतहीन विस्तार को, उस नीलाभ उज्ज्वलता को, उन विसरते-मिटते रंगों को, जिन्हें पंखों रो तोल लेने का सपना कभी उराका था ''प्राज पंखहीनता उसका यथार्थ है ! दूसरी घटना उराकी चेतना की है । पिता बताते हैं, उसके मामा का विवाह था। बारात निकल रही थी। उस बारात में रेशमी फ्रॉफ बने, मोटर में बैठी और शायद अंगूठा चूराती वह भी थी कि दूसरी र से एक अर्थी गुजरी । शहनाइयों के स्वरों से 'राम नाम सत्य है' बोल टकरा गए। उसके मुंह से अंगूठा निगाल गया- 'एक तरफ चारात रही है, दूसरी तरफ कोई मरकर जा रहा है, शायद यही जिन्दगी ' उसने साफ-साफ कहा । उसकी प्रबोध प्रारों किसी दार्शनिक बोध ल गई थीं। पिता ने उसे खीचकर सटा लिया था। वह उसे फिर 7 दिखाने लगे थे कि दार्शनिक बोध रोपन गई उसकी प्रांखें त्व में सिमट जाएं । वह डर गए थे कि इतनी छोटी लड़की ऐसी . १४ / सलीब पर बड़ी बात क्यों कर रही है ! वह जानते थे कि बड़ी बातें करने वाले छोटे बच्चे मंसार के लिए चुनौती बन जाते हैं और संसार चुनौती बनने वालों के धुत पीछे बनाता है, पहले उन्हें मूली पर चढाता है। शायद पिता समझ गए थे कि उनकी बेटी को भी सूली पर चढाया जाएगा। पिता का अनुमान गलत नहीं निकला, उनकी बेटी को सूली ही मिली है। तीसरी बात जो पिता को नहीं, लड़की को याद है, वह है, पिता का उसे कहानिया सुनाना । पिता उसे अनेक कहानिया सुनाते, उसे केवल एक याद रह जाती-झांसी की रानी की। दातों से घोड़े की लगाम पकडे, दोनो हाथों से तलवार चलाती, रक्त से नहाती, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करती, वह झांसी की रानी उस कहानी मुनने वाली लड़की को पाखों में इतनी मूर्त हो उठती कि वह चीख पडती-मैं भी झांसी की रानी धनूगी । अनेक कहानियों के अनेक पात्रों में से उसने झासी की रानी को ही क्यों अपना मादर्श चुना, यह वह तब नहीं बता सकती थी, अब बता सकती है-अव जब वह एक लेखिका बन चुकी है, उसके हाथ में तलवार नही, लेखनी है, तो इस लेखनी से वह तलवार का ही काम लेना चाहती है । यानी वह, वह मव काट फेंकना चाहती है जो अन्याय है, गुलामी है, गलत है ! अर्थात् वह सत्य को बदलते संदर्भो के व्यापक परिवेश में प्राक लेना चाहती है, फिर चाहे वह लेखन मे हो, चाहे जीवन मे । सत्य को वह रूढ प्रयों में नहो, चेतना के जीवंत धरातल पर, मूक्ष्म और स्थूल दोनो स्तरो पर, जी लेना चाहती है। प्राज भी प्रय भी 'किन्तु लेखन मे चाहे वह किसी सत्य को पा भी सकी हो, जीवन में सब कुछ झूठ हो. कर रह गया है । और जिस सत्य की चेतना और झूठ का धरातल एक साथ मिला हो, उसकी सासें एक साथ जीती-मरती रह जाती हैं । सत्रहवें वर्ष में एक और उसकी क्वारी, कोमल, सुदर देह में वसंत पथरा रहा था, दूसरी और उसके प्रागन में शहनाइया वजी थी। उसके मेहदी-लगे, लाल हाथो किन्तु रक्तहीनता से सफेद पट्टी कलाइयो को किमीने थाम लिया था। उसे थाम लेने वाले हाथ जिस राम के थे, वह निश्चय ही अभिराम थे-बिल्कुल सपनो के राजकुमार जैसे ! एक पोर वह थरथरा रही थी कि उमे सपनो का राजकुमार मिला था। दूसरी मात्म-रचना /१५ - प्रोर वह कांप भी रही थी कि सपनों के राजकुमार जिस महल में रहते थे, वह जीर्ण-शीर्ण था, पुराना था, भुतहा था। उसे फिर दो विरोधी तत्त्व एक साथ मिल गए थे। सपनों के राजकुमार का चिर इच्छित, चिर काम्य साथ और साथ-साथ रहने के लिए भुतहा महल । स्पष्ट कर दूं, वह मुतहा महल रूढ़ियों का था, अंधविश्वासों का 'सत्य वहां बंदी था । उस कोमल और दुर्बल देह वाली युवती को, जिसके मन में प्रतिपल किसी सत्य और सुन्दर की चेतना फड़फड़ाया करती थी, उस मुतहे महल के भूत हांट करने लगे । सपनों के राजकुमार उन भूतों के प्रादी थे, वह उन्हें सहज स्वीकार कर चुके थे, किन्तु वह युवती धीरे-धीरे उन प्रेत- छायाओं के बीच होश खोने लगी थी । यदि उसके पैरों में शक्ति होती तो वह निश्चय ही उस महल से भाग निकलती "उस महल में सत्य के साथ वह युवती भी वंदिनी बना दी गई थी। सीता का प्रादर्श भी उस युवती का चिर इच्छित, चिर काम्य श्रादर्श था । तन-मन में उजले कमलों की शुभ्रता और सुगंध लिए सीता एका- मान राम की थी.. किन्तु इतिहास की वह कोमल, उज्ज्वल सीता दुर्वल नहीं थी। उसे कर्तव्य के नाम पर राम के साथ वन के कंटीले-कंकरीले रास्ते पर चलना पाता था। उसे राम के रामत्व के साथ रावण के राक्षसत्व का सामना करना भी प्राता था। उसे अग्नि-परीक्षा देना भी आता था "किन्तु इन सबके पश्चात् भी जो अस्वीकार की दुर्वह त्रासदी से खंड-खंड होती भूमि में समा गयी थी 'पीर भूमि में समा जाना भी हर सीता की नियति होती है। उस युवती को राम मिल गए थे और वह सीता बन जाना चाहती थी। एक स्वतंत्र अस्तित्व वाली सीता, जो सत्य को उसकी जड़ता में नहीं, चेतना में जीना चाहती थी। और फिर, एक ओर उसकी सत्य की चेतना थी, दूसरी ओर रोगी-देह में अचेत होता उसका पार्थिव अस्तित्व था''वह राम की अनुगामिनी नहीं, सहगामिनी बनना चाहती थी, किन्तु फेवल बोझ बनकर रह गई थी। फिर राम को प्रशस्ति में कसीदे पढ़े गए और निर्दोप सीता बोझ बनकर जीने के कारण अपराधिनी बनकर रह गई। - १६ / सलीव पर और, यद्यपि अग्नि-परीक्षाओं का साहस उसमें भी या"वह पग्नि- परीक्षाएं देती भी रही."फिर भी उसके राम भी शत-प्रतिशत राम ये ! सीता के लिए रावण से युद्ध करने वाले योद्धा राम, लोकापवाद जमी हलकी बातों के डर से सीता का परित्याग करने वाले कायर राम भी थे। दो विरोधी राम मोर थे और बीच में अग्नि-परीक्षा देती वह मीता थी, अर्थात् वह युवती थी, जो केवल नियति के कारण अवश हो- कर रह गई थी, अन्यथा कदाचित् जीवन मे वह एक नई रामायण लिख देती। तब वह कदाचित् राम के रामस्व को एक नई परिभाषा देसी, अपने सीतात्व को भी । किन्तु, ऐसा नहीं हुमा, हो नहीं समा, हुप्रा केवल यह है कि राम का अभिराम साहचर्य पाकर भी एक दुर्वह त्रासदी उमकी नियति रही है. वह खंड-संड भी हो चुकी है "कदाचित् अब केवल भूमि में समा जाना शेप है । आज भी वह सोचती है कि सत्य को जीने को, सुंदर को पाने की अपनी जिद वह छोड़ क्यों नहीं देती ? क्यो नही वाहर और भीतर दो स्तरों पर जीना सीख लेती ? क्यो नही हार मान लेती? किन्तु सारी स्थूल पराजयो के नेपथ्य में वही कोई संभावित जय का सूक्ष्म स्वर है, जिसे अपने बहुत भीतर केवल वह सुन पाती है"यह स्वर बहुत क्षीण हो चुका है, फिर भी कही शेप है''जिस क्षण यह स्वर नहीं होगा, वह भी नही होगी। न, आप गलत न समझे । न इस सीता का परित्याग हुमा है, न होगा । स्थूल स्तर पर वे सदा साथ रहेगे-किन्तु नियति के क्रूर वाण से विद्ध क्रौंच-युगल के समान मृत्यु के पलो में भी मिलन की चिर कामना चंचु मै लिए"हा, रस से भरे पात्र और कांप-कांप जाने वाले हाथ भी एक साथ मिले हैं"रम की तृप्ति केवल रस की प्राप्ति नहीं होती ""उस रम का मोठो से प्राणों तक उतर जाना होती है..! मौर इम अर्थ में उस रस कहा मिला है"मिले हैं सूसते मोठ मोर चटखते प्राण "जीवन-भर अतृप्ति का भभिशाप झेला है उसने "पल-पल रस का विद्रूप सहा है उसने""और कदाचित् उसने रम के पात्र बांटे भी हैं, किन्तु स्वयं प्यासी रही भाई है । स्थूल स्तर पर साहचर्य मिला है उसे, मात्मरचना/१७ --- किन्तु सूक्ष्म स्तर पर वह एकाकिनी है.~पंखहीन और एकाकिनी । यह एकाकपीन जैसे एक अन्तहीन भटकन -भटकन, जो किसी भी तलाश की शर्त होती है । यह पंखहीनता जैसे एक चिरंतन दर्द है-दर्द, जो किसी भी रचनात्मकता की शर्त होता है। हां, दर्द का भी एक दर्शन होता है 'दर्द प्रात्मा का संस्कार कर देता है और वह अपने दर्द के दर्शन में जीना सीख चुकी है-~~-दर्द उसकी आत्मा का संस्कार भी कर चुका है । तो सत्य और सुन्दर की चेतना से स्पंदित रोम-रोम लिए उसका यथार्थ यह है कि वह भयानक अनिद्रा की रोगिणी है..“बीस वर्षों से सेडेटिव्स ले रही है. 'नारी-देह के रोग उस घेरे रहे हैं."उसका अंग- अंग कष्टों से जकड़ा रहा है। 'घोर रक्ताल्पता के कारण जीना उसके लिए कठिन रहा है और वह इतना कम खा-पी पाती है कि उसे फल सूंघने वाली राजकुमारी की संज्ञा दी जा सकती है और सब कुछ तो वह झेल लेती है, किन्तु अनिद्रा के कारण अंतहीन बनी रातें उससे काटे नहीं कटती करवटें बदलती वह तड़पती होती होती है...फिर कोई दिन उसके लिए नया नहीं होता. केवल वह उस निरर्थक छटपटाहट की पुनरावृत्ति- मात्र होता है, जिसे जाने कव से वह झेल रही है और जाने कब तक झेलती रहेगी.'थकी रात का सहारा लेकर खड़ा होता उसका दिन लड़खड़ाता होता है. और लड़खड़ाते दिन से गुजरकर उसकी रात और थक जाती है। रात के सन्नाटों में शय्या पर अकेली करवटें बदलती वह केवल सोचती होती है- किसी की शवे वस्ल सोते कटे है किसी को शवे हिज रोते कटे है ये कैसी शव है या इलाही न सोते कटे है न रोते कटे है ! कितनी सच हो गई हैं ये पंक्तियां उसके संदर्भ में ! उसकी अपनी देह ही उसका 'वाटरलू' बन गई। एक दुर्वल देह में वन्दी एक प्रबल मन हारता रहा। बार-बार याद आता है, उसके अंग्रेज़ी के ट्यूटर, जो उसकी उड़ान भरने की क्षमता से बहुत प्राशा रखते थे, कहते रह गए थे---सांग - १८/ सलीव पर वंडं ! ह्वाई हैस्ट दाउ ए पोकन विंग ! अपने प्रात्मपरिचय में उसने लिया है : एक पराजित नारी देह में बंदी एक अपराजेय मन है, जिमके संघर्ष भी इसलिए अमूर्त रहे कि उमकी प्रात्मा के रंग उसके जीवन में नहीं उतर सके 'दीप्ति केवल इमलिए दो टुकड़ों में बंटकर रह गई कि बीच मे उसको चिर ग्णता की दीवार खड़ी हो गयी थी फिर नियति से दो टुकड़ों में बंटा यह पंखहीन अस्तित्व जिन्दगी की दीवारो पर मिर पटकता रहा पिन्तु खंडित प्राकारा को झेल जाने का माहम उनमें था, काटो-भरी घरती पर चलकर लहू-लुहान होने का भी और खडित स्तरों पर चलती वह वाहर मे भीतर की पोर लौटती गई... दीप्ति की कहानिया इमी बाहर से भीतर को प्रोर की यात्रा की कथाएं - और संडित स्तरो पर चलती, बाहर से भीतर की और की यह यात्रा दीप्ति का प्रति त्रासद भोगा हुमा यथायं रहा है । स्थूल स्तर पर वह निरन्तर हार रही थी.""मूक्ष्म स्तर पर निरन्तर मर रही थी."उसका पथार्थ इतना विद्रूप था कि चेतना के स्तर पर सुदर एक विद्रूप वनकर रह गया फिर इमी हार, इमी मृत्यु, इसी विद्रूप के बीच उमके लेखन ने जन्म लिया. जैसे उसे लडखडाते परो पर खड़े होने के लिए एक अपनी जमीन मिल गई.."जैसे उसे सारे अस्वीकारो के बीच एक स्वीकार मिल गया। मानवीय संवेदनानी के प्रति व्यापक धरातल पर खडी वह कहती है -लेखक केवल इस अर्थ में एक प्रमामान्य प्राणी होता है कि वह मानमिक धरातल पर, विभिन्न कोणो से, अनेक रूपों में जी मकता है । ये रूप, ये कोण, उसके अपने व्यक्तिगत जीवन के ही हों, ऐमा कहा प्रावश्यक है ? हर भोगा हुग्रा ययायं म्यूल स्तर पर उसका हो, न हो, मंवेदना के स्तर पर उनका प्रपना होता है । मृत्यु को जानने के लिए मरना जरूरी नहीं होता। मंवेदनाघों के धरातल पर खड़ी वह अपने पात्रों के साथ जीती. मरती होती है"यथार्थ को हर कोण से चित्रित करती होती है." प्रात्मरचना/१६ किन्तु उन क्षणों वह लेखिका नहीं, स्वयं पात्र होती है, चित्रकार नहीं, स्वयं चित्र होती है। किसी भी मानवीय स्थिति से, किसी भी दर्द से उसका तादात्म्य इतना गहरा है कि वह तादात्म्य किसी भी कहानी को 'उसका भोगा हुआ यथार्थ वना जाता है." अपने लेखकीय वक्तव्य में उसने कहा है-~आदमी कुत्ता हो सकता 'है, लेकिन प्रादमी केवल कुत्ता ही नहीं है । उसका यह कथन उसके समस्त लेखन में प्रतिध्वनित एक सूक्ष्म स्वर है। आदमी से बहुत प्यार है उसे । उसने साफ-साफ देखा है-यदि देवत्व एक भ्रम है, तो प्रभुत्व भी सच नहीं। आदमी तो इन दोनों के बीच कहीं होता है। अपनी कहानियों में वह इसी बीच के प्रादमी को तलाश करती होती है. इस वीच के आदमी से अतिशय प्यार है उसे ! पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक की कोई रूढ़िगत मान्यता को वह नहीं मानती, किन्तु प्रकाश में उसकी आस्था है और प्रकाश और अन्धकार के भेद को वह दृढ़ता से स्वीकारती है--जिद की हद तक । काला के संदर्भ में किसी पश्चिमी कलाविद् का यह कथन उसकी कला- चेतना पर अंकित होकर रह गया है-सेव के चित्रण में सेव के चित्रण के साथ कुछ और भी होना चाहिए-~यही 'कुछ और' कला है। इस कथन में वह अपना लेखकीय अनुभव और जोड़ देती है-~~यही कुछ और तो वह कुछ है जो संवेदनानों के माध्यम से कला की सृष्टि करता है । वस्तु की प्रामाणिकता और शिल्प के सौष्ठव को 'यही कुछ और' जीवन्तता, व्यापकता और अर्थ देता है। संवेदनाओं की तादात्म्य में परिणति जितनी तीव्र और व्यापक होगी, रचना उतनी ही सार्थक होगी। प्रयोग के लिए प्रयोग में उसका विश्वास नहीं है । प्रयोग कला के लिए और काला जीवन के लिए-~-उसका विश्वास भी है, उसका प्रयास भी। उसके अनुसार रचनाकार को प्रतिबद्ध होना चाहिए-~-युग के प्रति, शाश्वत मूल्यों के प्रति, एवं अपनी कला-चेतना के प्रति । उसकी पसलियों रो एका प्रश्न बार-बार टकराता है...क्या इन प्रतिवद्धताओं के प्रति मैं ईमानदार हूं? या मैंने भी रचनाधर्मिता के धर्म को झुठलाया है ? गया दिशा की खोज में में भी दिग्भ्रमित हूं ? . - २० / सलीव पर - - कागज़ पर कलम से, कुछ सिलसिले से, लिखना वह सन् ७० के भासपास ही शुरू कर सकी। 'क्षितिज', 'मूल्य', 'विषपायो', 'हवा', 'एक पारो पुरवैया', 'परिणति', एवं 'शेप-प्रशेप' उसकी चचित रचनाएं रही हैं । 'क्षितिज' में दंपती की चिर ट्रेजेडी को दीप्ति ने अपने समकालीन 'अन्दाजे वयां' में वह दिया था। उसने वार-वार सुना है-यपाथ की बेझिझक एवं ईमानदार अभिव्यक्ति के साथ मानवीय संवेदनानों को गहरे स्पर्श करने तथा भंवृत करने की अप्रतिम सामध्यं प्रापमे है... किन्तु यदि इस अप्रतिम सामर्थ्य की चर्चा में आप दीप्ति से जानना चाहे कि उस सामथ्र्य का कितना गर्व है उसे ? तो वह अचकचा जाएगी, फिर धीरे से कहेगी-सामने अनन्त पारावार है और मेरी अंजुलि मे केवल कुछ बूदें"इन बूदों का गवं मुझे क्या होगा। 'हव्वा' एवं 'विषपायो' उसकी सेक्स-स्नात रचनाए हैं, यह स्वीकार करती है। फिर सेक्म को लेकर पाठकों के प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न ही और कर देती है---'हव्वा' एवं 'विपपायी' सेक्स-स्नात रचनाएं हैं "किन्तु क्या इन रचनामों में सुगन्ध एवं उजालो का वह सस्पर्श नही, जो इनमें वर्णित निर्मम, नग्न यथार्थ के सामयिक सत्य को सत्य की शाश्वतता से सपृक्त कर दे? 'विपपायी' के संदर्भ में उसने अपने एक जबरदस्त प्रशंसक को बधाइयों के उत्तर में लिसा था--रचना इसलिए बधाई के योग्य नहीं है कि इसमें एक लेसिका ने 'होमोसेक्सुएलिटी' पर कलम चलाई है, वरन् इसलिए कि विपपायी मुगन्ध मोर उजालो के लिए छटपटाती मानवीय चेतना की संघर्ष-कथा है ! ये सुगन्ध मोर उजाले दीप्ति की रामग्र लेखकीय चेतना एव रचनाधर्मिता के लक्ष्य हैं । चेतना के स्तर पर दीप्ति में गौतम की करुणा यरथराया करती है, कि वह चाहे पसारकर सारी पीड़ित मानवता को अपनी करुणा में समेट ले"सुकरात की तरह वह जहर का प्याला पीकर मरने को तत्पर रहती है, कि कुछ ममर दे मके ! और ईसा की तरह वह ग्रामदियो की मूली पर चढा ही करती है"वह बहुत माहत है, बहुत क्षत-विक्षत भी "पता नहीं, उसका वुत बनाया जाएगा या समय अपनी निर्मम ठोकरें मारकर उसे किसी अतल गर्त में ढकेल देगा' 'किन्तु क्या एक ईमान- दार संघर्ष अपने-आपमें एक उपलब्धि भी नहीं होता ? तो, दीप्ति का संघर्ष ही उसकी एकमात्र उपलब्धि है। हां, लेखकीय संदर्भ में एक बात बताना वह भूली जा रही है कि उसका मूल स्वर कवि का था."यह कवि वर्षों दीप्ति की चेतना को झंकृत करता रहा । उसके काव्य के विपय होते थे-प्रेम और सौन्दर्य एवं प्रकृति और दर्शन । एक समय था कि उसकी कविताएं प्रकाशित हुई थीं, सराही भी गई थीं। किन्तु फिर, जीवन की उठा- पटक ने उसकी लेखनी को कल्पना के कोमल अाकाश से उतारकर यथार्थ की कांटों-भरी धरती पर ला खड़ा किया । और फिर कहानी घावों के रिसते आंसू पोंछने लगी । अव, कविता दीप्ति को एकदम छद्म लगती है । प्रेम और सौन्दर्य के अर्थ उसके निकट बदल गए हैं। प्रेम और सौन्दर्य के स्थान पर जव यथार्थ का कटु और कुरुप उसके रूबरू खड़ा हो गया तो उसने धवराकर आंखें नहीं बन्द की, उस स्वरू खड़े यथार्थ को भी अपना लिया."फिर वह प्रेम और सौन्दर्य के कैनवस पर कटु और कुरूप के चित्र खींचने लगी। वह केवल दो सौ के लगभग कविताएं और साठ के लगभग कहा- नियां लिख सकी है। कविताएं दराज में बन्द हैं । कहानियां लगभग सभी प्रकाशित हो चुकी हैं । और अव वह चाहे भी तो कविता नहीं लिख पाती, कहानियां न चाहने पर भी लिखती चली जाती है 'शायद इसलिए कि जिन्दगी कविता नहीं होती, कहानी होती है । अपने कथाकार- रूप से दीप्ति को बहुत मोह है। शायद इसलिए कि यह रूप उसकी ज़ल्म खाती जिजीविपा का एकमात्र प्रमाण है। लेखन उसके सिर पर एक जुनून की तरह सवार होता है एक ज्वार की तरह सारे वांध तोड़कर वह निकलता है "एक आग की तरह भड़क उठता है"उसकी हर कहानी केवल एक या दो सिटिंग का परि- णाम है। और जब वह लिखती होती है, तब उसे अपना भी होश नहीं होता "रचना-क्षण उसके लिए प्रात्म-विस्मृति के तन्मय क्षण होते हैं । । २२ / सलीव पर वह मून्य होती है कि कोई सामने प्राता है, कोई घटना घटती है, कोई स्थिति करवट लेती है"कोई चोट लगती है"कोई दर्द होता है ""फिर यह 'कोई उमके भीतर दफन मुरदो को जिन्दा कर देता है." पौर कोई कहानी जन्म लेती है । उमके भीतर मुरदों का इतना विशाल अजायबघर है कि कभी-कभी जब वह अकेली उस अजायबघर में घूमती है तो चलते-चलते थक जाती है, लेक्नि प्रजाययपर है कि सत्म नहीं होता"इस प्रजायवघर का दगमांग भी तो न वह देख पाई है, न दिखा पाई है। वह स्वयं भी तो इम अजायबघर में जाने कितने रूपों में दफन है। इस मामलेस मे पापके सम्मुख दीप्ति बाहर मे भीतर यो और गई थी, अय फिर बाहर माती है"नही, लीजिए, वह भीतर और बाहर की मंधि-रेगा पर खड़ी हो गई है। जन्म और मृत्यु के जिस फासले को जिन्दगी कहते हैं, दीप्ति का यह फाराला गतिहीन रहा है । प्रकृति से कमवादिनी वह नियति से अकर्मण्य होकर रह गई है-निर्दोप, किन्तु अकर्मण्यता की अपराधिनी। पौर उम्र उसपर से नहीं गुजरी है, वह उम्र पर से गुजर गई है- मळूनी, अतृप्त, मनजियी ! उसके पास न कोई उल्लेखनीय डिग्री है, न कोई स्पृहणीय पद । उसकी सारी भौतिक स्थितियां उसके साथी को ही दी हुई हैं । इन भौतिक स्थितियों को लेकर केवल एक तीव्र दा है उसके मन में कि क्यो सारी मानसिक क्षमतामों के बावजूद वह देह की क्षमता के कारण निरन्सर लेने पर मजबूर हो गई ? .. कुछ दे नही सकी । कारा । अपनी भौतिक स्थितियों का निर्माण वह स्वय कर पाती "काश ! यह एक लेखिका होने के साथ एक सफल व्यक्ति भी होती । किन्तु यहा न, उसकी अपनी ही देह उसका 'वाटरल' बन गई है."एक दुर्बल देह में बंदी एक प्रवल मन निरतर हारता रहा है । माज भी प्रतिदिन, जव एक थके, उदाम दिन के कंधों पर दहती पौर भी थकी, उदास शाम को झेलती वह घर की घुटन से हटकर कुछ देर मुक्ति की सास लेने के लिए बाहर निकलती है, तो प्रायः मुनती है - प्रारमरचना / २३ ----हाट ए कपल एंड व्हाट ए लाइफ ! श्लाघा से कहे गए ये शब्द उसे भीतर तक वेध जाते हैं "एक विद्रूप को झेलते उसके प्रोठ टेढ़े हो जाते हैं और वह अपने-आपसे दुहराकर कहती है-येस, ह्वाट ए कपल एंड हाट ए लाइफ इनडीड ! उन क्षणों वह उस साथी के प्रति नत होकर रह जाती है, जिसने अपनी सतत संभाल से उसके शरीर और प्राणों का संयोग बनाए रखा यदि जीवन ही नहीं होता तो.लेखन कहां होता! अत: उसका जीवन ही नहीं, उसका लेखन भी इस सतत संभाल के प्रति नत है। उसकी मात्मा के दो अंग उसके निकट हैं । पहला अंश एक सुकु- मार वेटी है, जिसने पथ्य बनाकर, रस पिलाकर, अपनी छोटी-छोटी कामनाओं का त्याग कर और किन्हीं अर्थों में अपने नन्हे-से जीवन की भी बाज़ी लगाकर अपनी ममी को जीवनदान दिया है। वह बेटी जब एक स्वीकार-सी सामने खड़ी होती है, तो उसकी ममी की मन की अांखें छलछलाती होती हैं... क्या दे सकेगी वह अकिंचन मां इस बेटी को ? इस बेटी को वह अपनी मां कहती है। उसकी आत्मा का दूसरा अंश एक तेज, धूमधाम करने वाला बेटा है जो एक दिन कुछ छिपाए उसके सामने आ खड़ा हुआ था । -~-ममी, आप आंखें बन्द कीजिए, एक चीज़ है। उसने प्रांखें बंद की, खोलीं, तो उसके हाथों में नन्हे हाथों से लिखी अंग्रेजी की एक कविता थी। शीर्षक था---'माई मदर' । कविता की कुछ पंक्तियां थीं.-- प्रोह ! लुक एट माई मदर सो प्रेटी एंड फेयर लुक एट हर डार्क ब्यूटीफुल हेपर लुक एट हर बाइट लवली प्राइज़ एज वाइड एज द ओपन स्काइज़ ...तो उसकी आंखों से आकाश के तादात्म्य को उसकी ही कोख से जन्मे उस नन्हे कवि ने पढ़ लिया था "एक तृप्ति-सा वह वेटा जव सामने खड़ा होता है, तो उस अकिंचन ममी को प्रांखें फिर छलछलाती हैं--- क्या दे सकेगी वह अपने इस बेटे को भी ? इस बेटे को वह अपना 'साक्षी' कहती है । - - २४ / सलीव पर .. वह बार-बार सुनती है-पया कमी है मापने ? ऐमा जीवन सायी, ऐसे बच्चे, और ऐमी माप स्वयं...! मोर मब तो यह ढेर-सा यश भी ! तब उसके भीतर कुछ सिर पटरने लगता है-पौर देह की एक उमर-कंद नही...? उसे यदि कोई सहसा देसे तो एक मंपूर्णता का प्राभास होना निश्चित है । प्राय: उसने भी सुना है-ए परफेक्ट वूमन नौवली प्लांड "लेकिन यह मंपूर्णता कितनी संहित, कितनी जर्जर हैयह कौन - जानता है ? उसकी बाहरी सज्जा साधारण होती है। किन्तु भीतर की कोई सग्ना उसके व्यक्तित्व में प्रतिभासित होती-सी उसे कुछ ममाधारण वना जाती है । बाहरी सज्जामों पर तो उसका वश नही रहा, किन्तु भीतर की सज्जा को वह पल-पल मंवारती-महेजती रही है." इस संपूर्णता को संडित स्तरों पर भैलती, घुटन को मुक्ति देने, कुछ देर जीने, वह कभी-कभी ही लिखती है और फिर सुनती है-- इतना अधिक पैसे लिख लेती हैं ? पता नहीं, यह सब कमेक्यो...? इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर उसके पाम नहीं है.' "और उसने कमलेश्वर जी को एक पत्र में लिखा है-नितान्त व्यक्तिगत संदों में मेरा व्यक्ति बहुत धका, यहुत लडसहाया हुमा है .."पौर मेरा लेखक थको, निस्पंद होती उंगलियों में लेखनी थामे भीतर और बाहर के विरोधो से जूझ रहा है. ऐसे में किमी रचना का स्वीकार जैसे उस मस्तित्व का स्वीकार बन जाता है, जो मृत्यु के दम- घोट क्षणों में सांस के लिए संघर्ष कर रहा हो.""मेरा लेखन मेरे लिए ऐसी ही सासें हैं "लिखती हूं कि इन दमघोंट क्षणो में कुछ मासें और से मा"कुछ देर मौर जी सक..."और यम.. -प्राप विघटन हो रहा । गिल के भोंपू की ककंप, तीखी अावाज उरो नींद से जगा देती है । रात-भर सोने बाद भी उसे लगता है जग उसे कच्ची नींद से जगा दिया गया हो । कच्ची नींद से जगा दिए जाने का यह अहसास उसे प्राजकल दिन-भर धेरै रहता है। बार-बार उसे लगता है, जैसे जो कुछ है या बह कर रहा है, राब अधूरा है। पूर्णता की तुष्टि कहीं भी तो नहीं । वैसे वह जानता है कि पूर्णत्व एक कल्पना ही हो सकती है, दादानियों के अनुसार तो राब गुछ अधूरा है । लेकिन नहीं, दार्शनिकों की बातें दार्शनिक जानें-उरा जैसे मामूली प्रादमी के लिए तो खाने, पीने, सोने और जिन्दगी की छोटी-छोटी बातों में जी लेने की कोई पूर्णता होनी ही चाहिए । नोंद-गर सोना तो हर प्रादगी का जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन यह मिल का भोंपू रोज उराया यह अधिकार छीन लेता है । अखि गुलते ही एक खीम-भरा अवसाद उसे घेर लेता है । यह चिढचिढ़ाता उठता है, फिर दिन-भर चिडचिता रहता है। नींद गुलने के पहले वह एक सपना देख रहा था। कितना अच्छा सपना था--जैसे वह एग बन्धनहीन अस्तित्व था, वह स्वप्नों में तैर रहा था, उसने चारों ओर फूल ही फूल थे, रोशनी थी "वह उन फूलों को छू रहा था. 'उरा रोशनी को महगूरा कर रहा था'धरती पर टिक जाता था, कभी हवानों में उछन्न जाता था, लेकिन धरती पर टिकने या हवायों में उछलने में एक परितृप्ति का अहसास था और परितृप्ति थे. उस अहसारा को जगे यह उस सपने में रोम-रोग से पी रहा था। लेकिन तभी गिल मे भोंपू की यारा तीली प्रायाज़ ने उसे जगा दिया जाने गयों यह बार-बार ऐसा सपना देखता है जब कि जागते हुए । :
वह उस सपने को सोच भी नहीं पाता । वह जिस माहौल में जीता है वह तो धूल, धुएं और पसीने से भरा होता है। रात को मोते-मोते उसकी नीद खुल जाती है तो वह पाता है कि उसकी मंली बनियाइन पसीने मे भीगकर उसके बदन मे चिपक गई है। पसीना उने तय भी माता होता है जब वह दफ्तर में फाइलों पर झुका कलम घिसा करता है और दिन एक-सो गति में वीतते होते हैं और वह ठीक एक बंधी लीक पर कोल्ह के बैल की तरह निरर्थक चक्कर लगाता होता है । वह जिन सडकों से गुजरता है वे प्रायः घूल से भरी होती हैं-उसको जिन्दगी की राहो तरह जिनपर चलते वह धूल ही फांकता रहा है-वह मोपता है । भोर धुप्रां, धुप्रा तो उसके अन्दर-बाहर सब जगह है । वातावरण में मिल का घुग्रा, घर की गीली लकड़ियों का, और मन में उस सुलगते 'कुछ' का, जो न जलता है, न बुझता है, बस रह-रहकर धुएं के गुबार उठते हैं और वह घुटता रह जाता है। जागने पर वह अपने को १६४१२ के एक कोठरीनुमा कमरे में, मैले-कुचले बिस्तर पर पाता है। उसका तन-मन कडमा जाता है । बदन तोडता वह उठता है । एक सिगरेट सुलगाकर प्रोटो से लगाते बुद- बुदाता है--'माले सोने भी नहीं देते।' सहसा उमे ध्यान माता है किमे दे रहा है वह यह गाली ? मिल के भोंपू को या सारी व्यवस्था को जिसके खिलाफ एक प्राक्रोश लगातार उसके मन में घुमहता रहता है ? उसका बस चो तो प्राग लगा दे वह मिल के इस भोपू को या उम सारी व्यवस्था को जिसकी मशीन में वह महज एक पुर्जे-मा फिट होकर रह गया है । मशीन का पुर्जा-खट-खट खटासट ऊपर-नीचे या दायें- बायें-निरन्तर चलता है, लेकिन क्या यह चलना, चलना है ? उसे लगता है तिल-भर भी न हिल पाने की गुजाइन के बीच वह ठीक किसी मशीन के एक पुर्जे-सा फिट है, विवश है, जड़ है। सिगरेट इतनी जल चुकी है कि उंगलियों पर जलने का महसाम होते ही वह सिगरेट के वचे टुकड़े को फेवता झल्लाता है-'पौर में क्या कम साला ह...?' कल हो तो महेश ने उससे कुछ रुपये उधार मागे थे। उसकी पत्नी बीमार थी । महेदा यहाना नही बना रहा है, वह जानना था। लेकिन विघटन / २७ में वे एक and- रुपये होते हुए भी रुपये न होने का बहाना उसने बनाया-'दे तो देता यार अगर होते।' महेश का चेहरा उसका उत्तर सुनते ही फक पड़ गया था। कहीं महेश चकराकर गिर न पड़े, वाकई उसकी पत्नी सख्त बीमार थी। महेश उसका दोस्त था, एक तरह से अभिन्न । शुरू-शुरू दूसरे से उधार लेकर भूल जाया करते थे। वह एक सहज स्नेह की स्थिति थी। धीरे-धीरे वह असहज होता गया है । महेश से उसे अब भी प्यार है, लेकिन अब कुछ रुपये वह सिर्फ अपने लिए बचाकर रखता है--होश भुलाने के लिए। शाम को घर लौटते वह प्रायः एक अद्धा चढ़ा लेता है । कल श्रद्धा चढ़ाने के बाद वह अपने-श्रापको गाली देने लगा था- साले ! महेश की बीवी मर गई तो "तो क्या क्या सारी दुनिया को जिलाने का मैंने ठेका लिया है"हवा में ठेंगा उछालता वह देर तक इधर-उधर भटकता रहा था। फिर एक श्रद्धा और चढ़ाकर नशे में धुत घर लौटा था। महेश की बीवी का ध्यान और महेश का फी का मुख उसे इतना कोंचता रहा था कि उसे ज़्यादा पीनी पड़ी थी । यदि वह महेश को रुपये दे देता तो उसे एक आत्मिक संतोष अवश्य होता । कभी- कभी उसने ऐसे आत्मिक संतोप के प्रयास किए भी हैं, लेकिन जब ऐसे भात्मिक संतोप के बदले में उसे कई दिन शारीरिक अभाव झेलने पड़े हैं तो वह भात्मिक संतोपों को हाथ जोड़ बैठा है। और अब तो जिस स्थिति में वह है, यहां होश खोने के लिए उसे पीने को ज़रूर चाहिए । वह अब भी बहुत कुछ सह सकता है, सहता है, लेकिन सदा होश में रहने को नहीं सह पाता। पत्नी गिलास में चाय लिए पाती है। गिलास तिपाई पर रखते उसे तिरछी नजरों से देखती है-'पी ली सिगरेट ? और तुम मानोगे थोड़े ही ? तुम्हें मेरा खून जो पीना है। डाक्टर ने मना किया है तुम्हें सिगरेट के लिए, लेकिन तुम"तुम...' पत्नी वाक्य पूरा किए बिना चली जाती है । लो देवी जी का गुड-मानिग हो गया-एक खिसियाई हंसी हंसकर वह चाय पीने लगता है। ऑफिस के लिए तैयार होने में उसे जो समय लगता है वह उसके चिन्तन का होता है। यह चिन्तन वह रोज़ करता है। रोज वह सोचता है, २८/ सलीव पर माज का दिन कुछ नया होगा या माज के दिन वह कुछ नया करेगा। "कुछ होने की' या 'कुछ करने की एक एटपटाहट रोज सबेरे उसके भीतर उठती है । इस छटपटाहट से बेचन होता वह शेव करता है, नहाता है, कपड़े पहनता है, लेकिन जब खाने बैठता है तो प्रतिदिन की भाति पतली- सी दाल में रोटी डुबाकर मुंह में रखते उसे लगता है इस दाल-रोटी के लिए एक निरर्थक संघर्ष ही उसकी नियति है। उमे याद माता है, बचपन से बी० ए० पास करने तक उसकी प्रांखों मे भावी जिन्दगी का एक चित्र बार-बार उभरता या---एक छोटा-सा घर, हंसमुख पत्नी, प्यारे-प्यारे बच्चे ! वह सोचता था कि वी० ए० पाग करने के बाद वह जीने लायक हो जाएगा। जीने लायक ? जिन्दगी? इस प्रश्न पर उसने जव भी सोचा वह सपनो में सोकर रह गया था । फिर उसने वी० ए० पास भी किया, विवाह भी किया, बच्चे भी हुए और वह जी भी रहा है."क्या जी रहा है वह–एक जिन्दगी या निरर्थकता का एक दगघोटू प्रहसास...? दाल-रोटी का गले में प्रटकता कोर पानी से उतारते वह पत्नी से कहता है-'रोज वही दाल-रोटी, कभी तो कुछ प्रोर बना लिया करो।' 'क्या बनाऊं अपने हाड ?' पत्नी चीख पडतो है, 'देखते नहीं चीजो मे प्राग लगी हुई है, कीमतें प्रासमान को टू रही हैं ।' वह पत्नी को देखता है । पत्नी रोटिया सेंक रही है । परनी के मुख पर तनाव का भाव जमे स्थायी होकर रह गया है। तनी भौहे, युद्ध दृष्टि, खिचे होठ-पत्नी क्रुद्ध पिणी-सी फुकारती रहती है । उसे याद माता है, जब पहली बार उमने पत्नी को देसा था तो वह लजाकर हंस पड़ी थी। उसके मावले कपोलो पर गडे पड गए थे । उन गढ़ो में उगलियां चुभाते उमने कहा था-'कितने अच्छे लगते हैं हमते समय तुम्हारे गालो के ये गढे !' पत्नी ने प्रांत मिलाई यो और फिर हम दी थी। पत्नी के वे हंसती पासे उमे सदा याद रही माई"कहा खो गई वह हंगी? पत्नी पिछली बार कब हंसी थी वह सोचता रह जाता है । 'बच्चे स्कूल गए ?' वह एक प्रश्न और करता है । वच्चे स्कूल गए ही होंगे, वह जानता है । सपने प्रश्न की निरर्थकता उसे मालूम है, विघटन /२६ फिर भी वह पत्नी से किसी और उत्तर की प्राशा में प्रश्न कर ही बैठता है-शायद पत्नी ही उसके घिसटते प्रश्न के उत्तर में कोई दौड़ता उत्तर दे । कुछ तो ऐसा हो कि दाल-रोटी, पत्नी, बच्चे, वह सब एक जीवन्त एकसूत्रता में बंध जाए.''लेकिन पत्नी उसकी ओर जलती प्रांतों से देखती है-'बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे तो क्या भाड़ में जाएंगे ? अव तुम भी अपने धन्धे पर जायो । और मुझे छोड़ जानो रोने के लिए।' पत्नी रोटियां सेंकना बन्द कर चुकी है । चूल्हे की आग बुझ गई है । वह भी खाना खत्म कर चुका है । हाथ धोने के लिए वह लोटा उठाता है तो पत्नी फिर चीखती है--'अरे पानी कम लो, कितनी बार कहा कि इस पानी के लिए मुझे मरना पड़ता है। वह चार कुल्लों की जगह दो ही कुल्ले करता है । हवा और पानी "प्रकृति की देन है और अभी तो हवा पर टैक्स नहीं लगा है, लेकिन सांस लेते समय उसे बार-बार लगता है जैसे वह इस सांस की भी कीमत दे रहा हो । चार कुल्लों की जगह दो कुल्ले करते उसे पत्नी की एक बात और याद आती है। वह कहा करती थी-'देखो, हम ऐसा घर लेंगे कि चाहे कोठरी एक ही हो लेकिन कहीं एक नल घर में ज़रूर हो । पानी की किल्लत हो तो जीना मुश्किल हो जाता है।' संसार में इतना पानी है, मनुष्य ने इतने घर वनाए हैं तो क्या उसे एक नल वाला छोटा-सा घर नहीं मिलेगा ? आखिर उसने वी० ए० पास किया है, वह विश्वास से भरकर सोचता था। लेकिन हताशा की स्थिति में जब उसे घर मिला तो उसमें नल नहीं था। घर में पैर रखते ही पत्नी थककर बैठ गई थी-'पानी तो गली के सरकारी नल से ही लाना पड़ेगा । वस्ती भी कितनी धनी है, जीना मुश्किल हो जाएगा।' तव ते कुल्ला-भर पानी के लिए चिड़- चिड़ाती पत्नी को झेलता वह अपने पास-पास उस तृप्ति को ढूंढता रह गया है जो उसे मिलनी चाहिए, पर नहीं मिलती। तृप्ति की यह चाह उसे बार-बार पत्नी के निकट ले जाती है । लेकिन अानन्द की खोज में जव वह पत्नी के साथ होता है तो उसे लगता है कि वह महज एक शारीरिक प्रक्रिया को दुहरा है । पत्नी का ही नहीं, अपना जिस्म भी उसे खाली लगने लगता है। दिन-भर की ३० सलीव पर थकान और हताशा को वह रात में पली में हूबकर मला देता है, लेकिन टूबने के क्षणों में भी अपना घऔर पत्नी का जिस्म उमे रन मुर्दो-सा लगता है जो जीने का नाटक मर कर रहे हों। वह पत्नी के कपोलो पर उंगलियां चुभाता है---'जरा मो न !' पत्नी हम भी देती है, गर्द भी पड जाते हैं लेरिन पत्नी को हमी और अपना प्यार-मव उमें खोखला लगता है। बचपन में वह मानी परछाई के पीछे दौड़ने लगता था । परछाई के पीछे दौड़ने का वह मेल उमे बहुत अच्छा लगता या । अब जब अपनी परछाई को देखता है तो उमे यह खेल याद मा जाता है। उसे लगता है अब भी वह परछाई पो पकड़ने का कोई अन्तहीन मेल खेल रहा है, और यह सेल धोरे-धीरे एक ऋर यया में परिपत होता गया है। पत्नी के सोपलेपन को मलाने के लिए कभी-कभी वह उस बाजार या चक्कर लगा लेता है जहा 'मानन्द' विकता है । कुछ देर के लिए पांच-दम रुपयों में वह एक जिस्म खरीदता है । उमका जिस्म कुछ देर के लिए गर्म होता भी है, लेकिन भीतर ही भीतर वह और ठडा हो जाता है। कभी-कभी उसका जिस्म भी गर्म नहीं हो पाता तो वह कोई टहोका मारती है-'अरे बाबू पैसा दिया है तो मजा लूटो। ये मन्दिर नहीं, जहा तुम ध्यान लगा रहे हो. ये चकला है चकला !' मौर वह छुटपुटाकर वहा में भागा पाता है। उस दरवाजे से निकलते वह थूकता है, एक कामम-मी साता है कि मव वह वहा फिर नहीं पाएगा। लेकिन परछाई को पकड़ने या क्रूर ययापं जब उसे चारों ओर से जकड़ लेता है तो वह ऐमें ही रिमी धानन्द डूबकर उबरने का एक प्रमफल प्रयाम फिर करता है और हर वार उसे लगता है जैसे वह पहले से अधिक हार गया है, टूट गया है, पक गया है। क्या करें वह ? वहां जाए ? पत्नी के साहचर्य में पा तो एक सोसालापन है या एक तनाव । और इम खरीदे हुए मानन्द में एक ऊब या एक दंदा। वह बार-बार सोखलेपन प्रौर ऊब बी, इम तनाव प्रोर दंग की तुलना करता है और पाता है कि इन दोनो के बीच यह एरपटाता रह गया है। कभी उसके मन में एक कल्पना पी, एक छोटी-मी सीधी-मादी विघटन ३१ कल्पना---एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढ़ने की बार-बार कोशिश की है और वार-बार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्ष नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है। मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता । धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर बैठते अपनी घिसटती जिन्दगी को सोचने लगता है । दफ्तर के कमरे में भी शकर के वोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है । लेकिन शकर के बोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने प्राप को अकेला पाता है। चेहरे-~और चेहरे थके, उदास चेहरे परेशान, खोखले चेहरे "एक-दूसरे से अजनबी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, विनय, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी ज़रा रौनक है । व्हरो बेटा, तुम भी कहां वचोगे ? 'चलती चाकी देखि के दिया कवीरा रोय, दुइ पट भीतर नाइ के सावित बचा न कोय'-कवीर ने इससे सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता है । कभी वह भी सुधीर जैसा था और अब ? अव वह चलती चाकी के निर्मम सत्य को मर-मरकर जो चुका है। सुधीर से उसे ईर्ष्या भी होती है, उसपर प्यार भी प्राता है-काश, सुधीर के चेहरे की रौनक बनी रह सके ! इस भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और बड़ी-बड़ी आंखों के बावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की जिन्दगी को नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर आई है। इस चेहरे को एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं। - -- - । ३२ / सलीव पर प्रय दोव करते समय माईन में इस चेहरे को देखते वह तिक्त हो उठता है -माले, वृत्त बिल्लियों की भी कोई पहचान होती हैं क्या ! रह-रहकर मिल से दुर्गन्ध उठती है-प्रसा घिनौनी दुर्गन्ध । शुरु में इस दुर्गन्ध से उसे मितली मा जाया करती थी, पर जैसे यह इम दुर्गन्ध का भी प्रादी हो गया है । ददं का हद से गुज़र जाना दवा हो जाना है."वह दायराना अन्दाज़ में मोचता है। यह मिसरा उसे बहुत अच्छा लगता है । कभी वह अधखुली पाखो से प्राकार को घोर देखते यह मिमरा गुनगुनाया करता था"यव यह मिमरा मिल को दुर्गन्ध के संदर्भ में उसके पोठो पर पाता है तो उसे लगता है ददं, दुर्गन्ध के दर्द को भी क्या किमी शायर ने रियलाइज किया होगा ! हर गयेरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है। दम परिवारो के बोध केवल दो गौचगृह हैं । वहा भी 'क्यू'-सी लगी रहती है । दुर्गन्ध के भभक उठते रहते हैं। बाहर धीरे-धीरे मरे का उजास फूटता होता है, सबेरे को ताजगी विसरती होती है, एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार सिगरेट पीता हाजत को दबाता गालियो दुहराता होता है। प्राकृतिक जरूरतो के लिए भी यह मुस्किल "उमका जी चाहता है वह मात्रामक हो जाए''दो-चार के सिर फोड दे, कुछ तो भीड कम हो ! पत्नी चाहती है, घर में नल हो । वह चाहता है, घर में एक अपना शौचाह भी हो, साफ-सुथरा, जहा से दुर्गन्ध के भभके न उठते हों, जहा इन्सानो की तरह 'लेकिन न पली को नल मिना न उसे ऐसा गौचगह मिलेगा। हाजत दयाते-दवाते उसे फरज रहने लगा है। दफ्तर में पानी कुर्सी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रयत्न करना पड़ता है । किसी-किसी दिन भीतर का विद्रोह इतना प्रबल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से महर निकल भागना चाहता है। वह उठता है, तेजी से बाहर जाता है, फिर पेशाब करके शिपिल-सा लौट पाता है। कहा जाएगा वह ? जा ही वहां सकता है ? फाइलों पर झुकी उसकी मांखों के मागे अक्षर पन्चे बनकर फैलने लगते हैं। धम्ब बड़े होने लगते हैं या उसकी पांसें ही घुघलाने लगती हैं ! यह बार-बार परमा पोंछता है । बी. ए. की डिग्री उसको घुपलाती मांगों विघटन | ३३ - - कल्पना-एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढ़ने की वार-बार कोशिश की है और वार-वार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्ष नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है। मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता। धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर बैठते अपनी घिसटती ज़िन्दगी को सोचने लगता है। दफ्तर के कमरे में भी शकर के बोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है। लेकिन शकर के बोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने प्राप को अकेला पाता है। चेहरे और चेहरे''यके, उदास चेहरे परेशान, खोखले चेहरे"एक-दूसरे से अजनबी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, विनय, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी ज़रा रौनक है । व्हरो वेटा, तुम भी कहां बचोगे ? 'चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय, दुइ पट भीतर पाई के सावित बचा न कोय'-कबीर ने इससे सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता है । कभी वह भी सुधीर जैसा था ''और अव ? अब वह चलती चाकी के निर्मम सत्य को मर-मरकर जी चुका है । सुधीर से उसे ईर्ष्या भी होती है, उसपर प्यार भी आता है-~-काश, सुधीर के चेहरे की रौनक वनी रह सके ! इस भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और बड़ी-बड़ी अांखों के बावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की ज़िन्दगी की नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर पाई है। इस चेहरे को एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं। - ३२ / सलीब पर - प्रव शेव करते समय माईने में इम चेहरे को देखते वह तिक्त हो उठता है -माले, कुत्त-विल्लियों की भी कोई पहचान होती हैं क्या ! रह-रहकर मिल से दुर्गन्ध उठती है-प्रमह्य पिनीनी दुर्गन्ध । गुरू में इस दुर्गन्ध से उसे मितली पा जाया करती थी, मय जैसे यह इग दुर्गन्ध का भी प्रादी हो गया है । ददं का हद से गुजर जाना दवा हो जाना है' 'वह गायराना मन्दाज में सोचता है । यह मिमरा उगे बहुत अच्छा लगता है । कभी वह अधखुली प्रासों से प्राकार की पोर देसते यह मिगरा गुनगुनाया करता था "अब यह मिमरा मिल की दुर्गन्ध के संदर्भ में उसके प्रोठो पर प्राता है तो उसे लगता है ददं, दुर्गन्ध के दर्द को भी क्या क्सिी शायर ने रियलाइज किया होगा ! हर गरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है। दम परिवारो के चोच केवल दो गौचगृह हैं । वहा भी 'क्यूसी लगी रहती है । दुर्गन्ध के भभके उटते रहते हैं। बाहर धीरे-धीरे मबेरे का उजाम फूटता होता है, सबेरे ताजगी विसरती होती है. एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार सिगरेट पीता हाजत को दबाता गालियां दुहराता होता है । प्राकृतिक जरूरतों के लिए भी यह मुस्किल'." जी चाहता है वह माक्रामक हो जाए""दो-चार के सिर फोड दे, कुछ तो भीड कम हो ! पली चाहती है, घर में नल हो । वह चाहता है, घर में एक अपना शौचगृह भी हो, माफ-सुथरा, जहा से दुर्गन्ध के भभके न उठते हों, जहां इन्सानो की तरह "लेकिन न पत्नी को नल मिला न उसे ऐमा शौचगृह मिलेगा। हाजत दबाते-दवाते उसे करन रहने लगा है। दफ्तर में पानी कुर्सी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। किसी-किसी दिन भीतर का विद्रोह इतना प्रवल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से गहर निकल भागना चाहता है। यह उठता है, तेजी से बाहर जाता है, फिर पेशाब करके शिपिल-मा लौट पाता है। कहा जाएगा वह ? जा ही कहीं सकता है ? फाइलों पर झुकी उमकी मासों के मार्ग प्रार पम्बे बनकर फैलने लगते हैं। धन्ये यह होने लगते हैं या उसकी मास ही घुघलाने लगती हैं ! वह बार-बार चश्मा पोरता है । बी. ए. की डिग्री उमको पुपलाती मांसों विघटन / ३३ "उमरा - कल्पना-~-एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढने की बार-बार कोशिश की है और बार-बार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्प नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है। मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता । धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर बैठते अपनी घिसटती ज़िन्दगी को सोचने लगता है। दफ्तर के कमरे में भी शकर के बोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है । लेकिन शकर के वोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने आप को अकेला पाता है । चेहरे-~~~और चेहरे 'थके, उदास चेहरे परेशान, खोखले चेहरे एक-दूसरे से अजनवी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, विनय, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी ज़रा रौनक है । व्हरो बेटा, तुम भी कहां बचोगे ? 'चलती चाकी देखि के दिया कवीरा रोय, दुइ पट भीतर आइ के सावित बचा न कोय'--कवीर ने इससे सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता है । कभी वह भी सुधीर जैसा था और अब ? अव वह चलती चाकी के निर्मम सत्य को मर-मरकर जो चुका है। सुधीर से उसे ईर्ष्या भी होती है, उसपर प्यार भी आता है-काश, सुधीर के चेहरे की रौनक बनी रह सके! इस भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और बड़ी-बड़ी आंखों के बावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की ज़िन्दगी की नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर आई है । इस चेहरे को एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं। ३२ / सलीव पर अव शेष करते समय माईन में इम चेहरे को देखते वह तिक्त हो उठता है --साले, कुत्त-विल्लियों की भी कोई पहचान होती हैं मया ! रह-रहकर मिस से दुर्गन्ध उठती है-प्रमा घिनौनी दुर्गन्य । गुरू में इस दुर्गन्ध मे उसे मितलो मा जाया करती थी, अव जैसे वह इस दुर्गन्ध का भी प्रादी हो गया है । ददं का हद से गुजर जाना दवा हो जाना है."वह गायराना अन्दाज़ में सोचता है । यह मिसरा उसे बहुत अच्छा लगता है । कभी वह अधखुली पाखों से प्राकाग की प्रोर देसते यह मिरारा गुनगुनाया करता या 'अव यह मिसरा मिल की दुर्गन्ध के मंदर्भ में उसके मोठी पर पाता है तो उसे लगता है दर्द, दुर्गन्ध के दर्द को भी क्या किसी शायर ने रियलाइज किया होगा ! हर सबेरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है। दम परिवारों के बोच केवल दो शौचगह हैं । वहा भी 'क्यू'-सी लगी रहती है । दुर्गन्ध के भभके उठते रहते हैं । वाहर धीरे-धीरे सवेरे का उजाम फूटता होता है, सवेरे की ताजगी बिखरती होती है. एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार सिगरेट पीता हाजत को दबाता गालियाँ दुहराता होता है । प्राकृतिक जरूरतों के लिए भी यह मुश्किल जी चाहता है वह मात्रामक हो जाए''दो-चार के सिर फोड दे, कुछ ती भीड कम हो ! पत्नी चाहती है, घर में नल हो । वह चाहता है, घर में एक अपना शौचगृह भी हो, साफ-सुथरा, जहा से दुर्गन्ध के भभके न उठते हों, जहां इन्सानों की तरह" लेकिन न पत्नी को नल मिलान उसे ऐसा शौवगृह मिलेगा। हाजत दबाते-दवाते उसे कर रहने लगा है। दफ्तर में पानी कुर्सी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रयत्न करना पड़ता है । किसी-किसी दिन भीतर का विद्रोह इतना प्रवल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से बाहर निकल भागना चाहता है। यह उठता है, तेजी से बाहर जाता है, फिर पेशाब करके शिथिल-सा लौट भाता है। कहा जाएगा वह ? जा ही कहा मकता है ? फाइलों पर झुकी उसकी मांसों के मार्ग प्रक्षर पन्चे बनकर फैलने लगते हैं। पम्य बड़े होने लगते हैं या उसकी पाते ही घुघलाने लगती हैं ! वह यार-बार चश्मा पोंरता है। बी. ए. की डिग्री उमको धुघलाती भांखों "उमा विघटन | ३३ कल्पना---एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढने की वार-बार कोशिश की है और बार-बार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्प नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है। मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता। धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर बैठते अपनी घिसटती जिन्दगी को सोचने लगता है। दफ्तर के कमरे में भी शकर के बोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है । लेकिन शकर के वोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने पाप को अकेला पाता है। चेहरे---और चेहरे 'थके, उदास चेहरे परेशान, खोखले चेहरे एक-दूसरे से अजनबी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, विनय, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी जरा रोनक है । व्हरो बेटा, तुम भी कहां बचोगे ? 'चलती चाकी देखि के दिया कवीरा रोय, दुइ पट भीतर आइ के सावित बचा न कोय'कबीर ने इससे सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता है । कभी वह भी सुधीर जैसा था और अब ? अब वह चलती चाकी के निर्मम सत्य को मर-मरकर जी चुका है । सुधीर से उसे ईर्ष्या भी होती है, उसपर प्यार भी आता है--काश, सुधीर के चेहरे की रौनक बनी रह सके! इस भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और बड़ी-बड़ी आंखों के बावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की जिन्दगी की नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर आई है। इस चेहरे को एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं। ३२ / सलीब पर स-२ प्रब गेय करते ममय माईन में इस चेहरे को देखते वह तिमत हो उठता है -माले, कुत्ते-बिल्लियों की भी कोई पहचान होती हैं या ! रह-रहकर मिल से दुर्गन्ध उठती है-प्रमह पिनीनी दुर्गन्ध । गुरू में इम दुर्गन्ध से उमे मितली पा जाया करती थी, अब से यह इम दुर्गन्ध का भी प्रादी हो गया है । दर्द का हर मे गुजर जाना दवा हो जाना है.''वह शायराना भन्दाज़ में सोचता है । यह मिमरा उमे बहुत अच्छा लगता है । कभी वह अघखुली मासो से प्राकाग की पोर देसते यह मिगरा गुनगुनाया करता था "अब यह मिमरा मिन की दुर्गन्ध के मंदर्भ में उमके पौठो पर माता है तो उसे लगता है दर्द, दुर्गन्य के दर्द को भी क्या किमी शायर ने रियलाइज किया होगा ! हर मयेरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है। दम परिवारों के बीच वेवल दो शौचगह हैं । वहां भी 'क्यू'-मी लगी रहती है । दुर्गन्य के भभके उटते रहते हैं। बाहर धीरे-धीरे ममेरे का उजाम फूटता होता है, सबेरे को ताजगी विसरती होती है. एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार मिगरेट पीता हाजत को दयाता गालियां दुहराता होता है । प्राकृतिक जरूरतों के लिए भी यह मुस्किल "उमरा जी चाहता है वह मात्रामक हो जाए''दो-चार के मिर फोड़ दे, बुए तो भीड कम हो ! पत्नी चाहती है, घर में नल हो। वह चाहता है, पर मे एक प्रपना गौचगृह भी हो, माफ-मुपरा, जहा से दुर्गन्ध के भमकेन उठते हों, जहा इन्सानों की तरह ''लेकिन न पत्नी को नल मिला न उमे ऐमा गौचगृह मिलेगा । हाजत दवाते-दयाते उमे कब्ज रहने लगा है। दफ्तर में पानी पुर्सी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रपत्न करना पड़ता है। किसी-किसी दिन भीतर का विद्रोह इतना प्रवल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से शहर निकल भागना चाहता है। वह उठता है, तेजी से बाहर जाता है, फिर पेशाब करके शिथिल-मा लोट माता है । कहां जाएगा वह ? जा ही कहा सकता है ? फाइलों पर झुकी उमकी मासों के मार्ग मार पन्चे बनकर फैलने लगते हैं । पम्चे बड़े होने सगते हैं या उसको मासे ही घुघलाने लगती हैं ! वह बार-बार पपमा पोछता है । बी० ए० की डिग्री उमकी घुघलाती मांगों विघटन | ३३ Jautamtd-med .. कल्पना-एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढ़ने की बार-बार कोशिश की है और बार-बार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्प नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है । मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता । धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर बैठते अपनी घिसटती ज़िन्दगी को सोचने लगता है । दफ्तर के कमरे में भी शकर के बोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है । लेकिन शकर के बोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने आप को अकेला पाता है। चेहरे -और चेहरे थके, उदास चेहरे परेशान, खोखले चेहरे "एक-दूसरे से अजनबी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, वनय, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी ज़रा निक है । ठहरो वेटा, तुम भी कहां वचोगे ? 'चलती चाकी देखि के या कवीरा रोय, दुइ पट भीतर आइ के सावित बचा न कोय'-कवीर इससे सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता कभी वह भी सुधीर जैसा था और अब ? अब वह चलती चाकी निर्मम सत्य को मर-मरकर जी चुका है । सुधीर से उसे ईर्ष्या भी है, उसपर प्यार भी आता है-काश, सुधीर के चेहरे की रौनक . - रह सके ! स भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और डी यांखों के वावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की की नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर आई है। को एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं ३२ / सलीब पर अब व करते समय माईन में इम चेहरे को देखते वह विस्त हो उठना है -माले, कुन विल्नियों की भी कोई पह्मान होती हैं या ! रह-रहकर मिल में दुर्गन्ध उठती है-ममा पिनौनी दुर्गन्य । में इम दुर्गन्ध मे उमे मिवली प्रा जाया करती थी, अव जमे यह इम दुर्गन्ध का भी प्रादी हो गया है । ददं का हर से गुदर जाना दवा हो जाना है"वह गायराना भन्दाज़ में मोचता है । यह मिमरा उने बहन अच्छा लगता है। कभी वह अपनी मासों में पाराम की मार देखने यह मिगरा गुनगुनाया करता था."प्रब यह मिमरा मिल श्री दुर्गन्ध के मंदर्भ में उसके मोठों पर प्राता है तो उसे लगता है ददं, दुगंध के दर्द को भी क्या किमी पायर ने रियलाइज किया होगा ! हर मोरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है। दम परिवारों के बीच येवल दो गौचगृह हैं । वहा भी 'क्यू'-गो लगी रहती है । दुर्गन्ध के भभके उटने रहते हैं। बाहर धीरे-धीरे मवेरे का उजाम फूटता होता है, मबर की ताजगी विखरती होती है. एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार मिगरेट पीता हालत को दबाता गालियां दुहराता होता है । प्राकृतिक जरूरतो के लिए भी यह मुक्ति''उमरा जी चाहता है वह मात्रामा हो जाए "दो-चार के मिर फोड़ दें, कुछ तो भीड बम हो ! परनी चाहती है, घर में नल हो । वह चाहता है, घर में एक अपना शौचगृह भी हो, माफ-सुपरा, जहाँ में दुर्गन्ध के भभके न उटते हों, जहां इन्सानों की तरह "लेकिन न पत्नी को नल मिला न उमे ऐमा शौचगृह मिलेगा। हाजत दबाते-दयाते उने बज रहने लगा है। दफ्तर में पानी कुर्मी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रपल भरना पड़ता है । किमी-किमी दिन भीतर मा विद्रोह इतना प्रवल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से गहर निकल भागना चाहता है। यह उठता है, तेडी में बाहर जाता है, फिर पंगार करके शिपिल-मा नोट माता है। यहां जाएगा वह ? जा ही नहीं सकता है ? फाइलों पर झवी उमकी मासी के मागे अक्षर पन्चे मनकर फलने लगते हैं। धम्ब बड़े होने लगते हैं या उमको मांसें ही धूपलाने लगती हैं ! वह बार-बार पश्मा पोसता है । बी० ए० करो रिसी उममी पपलाती पायों विघटन / ३३ . कल्पना-एक साफ-सुथरे जीवन की, एक ऐसे जीवन की जिसे जीते वह अपने को इन्सान कह सके, जहां पेट भरने में कोई सार्थकता हो, पत्नी के साथ होने का कोई स्तर हो, जीवन का कोई अर्थ हो। ऐसे तो पशु भी शरीर के स्तर पर जी लेते हैं । उसने पशु से उठने की, एक स्तर को पाने की, एक अर्थ ढूंढ़ने की बार-बार कोशिश की है और वार-वार पाया है कि वह एक ऐसी व्यवस्था का शिकार है जहां दाल- रोटी का संघर्प नियति बन जाता है, जहां पानी की समस्या तनाव की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति किन्हीं अदृश्य-अनाम चोटों से निरन्तर विघटित होता रह जाता है । मिल उसके घर से कुछ ही दूरी पर है जिसके दफ्तर में वह काम करता है । काम पर जाने का कोई उत्साह उसमें नहीं रहता। धीरे-धीरे कदम घसीटता वह दफ्तर पहुंचता है और कुर्सी घसीटकर उसपर वैठते पपनी घिसटती ज़िन्दगी को सोचने लगता है। दफ्तर के कमरे में भी कर के बोरे भरे रहते हैं और कमरा कुछ चेहरों से भी भरा होता है । किन शकर के बोरों और चेहरों से घिरे होने पर भी वह अपने आप अकेला पाता है। चेहरे-और चेहरे 'थके, उदास चेहरे परेशान, बले चेहरे 'एक-दूसरे से अजनबी, कटे चेहरे । शर्माजी, महेश, य, सक्सेना और यह नया मुर्गा सुधीर, नया-नया है न, तभी ज़रा । है । व्हरो बेटा, तुम भी कहां बचोगे ? 'चलती चाकी देखि के कवीरा रोय, दुइ पट भीतर आइ के साबित बचा न कोय'-कवीर में सार्थक और कुछ नहीं कहा, वह गहरी ठण्डी सांस लेकर सोचता भी वह भी सुधीर जैसा था और अब ? अब वह चलती चाकी म सत्य को मर-मरकर जी चुका है । सुधीर से उसे ईर्ष्या भी उसपर प्यार भी प्राता है-काश, सुधीर के चेहरे की रौनक सके! भीड़ में एक चेहरा उसका अपना भी है। तीखी नाक और यांखों के वावजूद यह चेहरा प्रभावहीन है। छत्तीस वर्ष की -नोच-खसोट इस चेहरे पर गहरी लकीरों में उभर आई है । ने एक अस्तित्व देने की उसने अनेक असफल कोशिशें की हैं। ३२ / सलीव पर पब गेय करते समय पाईने में इस चेहरे को देखते वह तिक्त हो उठता हैं -माले, कुत्ते-बिल्लियों की भी कोई पहचान होती है क्या ! रह-रहकर मिल से दुर्गन्ध उठती है-असह्य घिनौनी दुर्गन्ध । शुरू में इस दुर्गन्य से उसे मितली मा जाया करती थी, अब जैसे वह इस दुर्गन्ध का भी पादी हो गया है । दर्द का हद से गुज़र जाना दवा हो जाना है वह शायराना अन्दाज़ में सोचता है । यह मिसरा उसे बहुत अच्छा लगता है । कभी वह अघखुली प्रांसो से प्राकास की प्रोर देखते यह मिरारा गुनगुनाया करता था "प्रय यह मिसरा मिल को दुर्गन्ध के संदर्भ में उसके मोठों पर पाता है तो उसे लगता है दर्द, दुर्गन्ध के दर्द को भी क्या किसी शायर ने रियलाइज किया होगा ! हर सवेरे वह एक मुश्किल में पड़ जाता है । इस परिवारो के वीच केवल दो शौचगृह हैं । वहां भी 'क्यू'-सी लगी रहती है । दुर्गन्ध के भभके उठते रहते हैं। वाहर धीरे-धीरे सवेरे का उजास फूटता होता है, सबेरे की ताजगी विसरती होती है. एक नया दिन जागता होता है । भीतर वह बार-बार सिगरेट पीता हाजत को दवाता गालियां दुहराता होता है । प्राकृतिक जरूरतों के लिए भी यह मुश्किल''उसका जी चाहता है वह मात्रामक हो जाए "दो-चार के सिर फोड दे, कुछ तो भीड कम हो ! पत्नी चाहती है, पर मे नल हो। वह चाहता है, घर में एक अपना शौचगृह भी हो, साफ-सुथरा, जहां से दुर्गन्ध के भभके न उठते हो, जहा इन्सानों की तरह 'लेकिन न पत्नी को नल मिला न उसे ऐमा शौचगृह मिलेगा । हाजत दबाते-दबाते उसे कब्ज रहने लगा है। दफ्तर में पानी कुर्सी से चिपके रहने के लिए उसे लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। किसी-किसी दिन भीतर का विद्रोह इतना प्रवल हो उठता है कि वह बार-बार दरवाजे से बाहर निकल भागना चाहता है। यह उठता है, तेजी से बाहर जाता है, फिर पेशाव करके शिपिल-सा लोट माता है । कहां जाएगा वह ? जा ही कहीं सकता है ? फाइलों पर भकी उमको मांसों के मागे अक्षर पन्चे बनकर फैलने लगते हैं । पम्चे बड़े होने लगते हैं या उसकी मांखें ही धूपलाने लगती हैं ! वह बार-बार चश्मा पाएता है । बी० ए० को डिग्री उसकी घुधलाती मांसो विपटन / ३३ .. में कौंधने लगती है। कैसा भोला विश्वास था उसकाः। बी० ए० करते वह सोचा करता था कि एक तिलस्म को चावी उसके हाथ लगी जा रही है। वी० ए० की डिग्री उसे एक.अच्छा जीवन निश्चय ही देगी। लेकिन उसका वह भोला विश्वास कितना ठगा गया है । यह नौकरी दिला सकी वी० ० ए० की डिग्नी उसे । केवल एक नौकरी, और कुछ नहीं । एक भीड़ की धकाल में वह जैसे डिग्री के आधार को पकड़कर लटक गया है ..'और वस, यही लटक जाना मिल पाया है उसे । खैर, प्राज तो तनख्वाह का दिन है। तनख्वाह उसे मिल चुकी है। आज वह कम थका है । आज मिल से दुर्गन्ध भी कम उड़ी है। कच्ची नीद से जगाए जाने का अहसास अभी भी उसकी आंखों में है, लेकिन आज इस अहसास को वह एक फिलॉसफी से जीत लेगा। चलो जो है सब ठीक है 'तत्त्व-चिन्तक और विचारक कहते हैं-सन्तोप में सुख है .."उसे भी सन्तोप करना चाहिए कि चलो पेट तो भर रहा है, घर है, पत्नी है, बच्चे हैं। घर, पत्नी, वच्चे ? उसके दिमाग में हथोड़े से वजने लगते हैं। घर ? दो कोठरियों वाला सीलन-भरा माहौल, जहां गीली लकड़ियों का धुआं उठा ही करता है, जहां न अपना नल है, न अपना शौचगृह । पत्नी ? मैली साड़ी में लिपटी, वाल विखराए एक नारी-शरीर, जिससे एकात्मता के प्रयास में वह टकराता रह गया है। पत्नी उसके लिए दाल- रोटी का पर्याय बन गई है जिसे पेट भरने के लिए खाना तो पड़ता है है लेकिन जिसमें कोई तृप्ति नहीं होती। और बच्चे ? हर दूसरे वर्ष प्रकट होने वाला एक जीव । तीन मर गए, तीन हैं । हर वार गर्भ ठहर जाने पर पत्नी गर्म की सूचना देते उसे जलती प्रांखों से घूरती रही है । और अपराधी-सा वह सोचता रहा है कि नये बच्चे के आने पर और किस खर्च में कटौती करनी पड़ेगी। बच्चे खर्च में कटौती के पर्याय बनते रहे हैं। लेकिन नहीं, आज यह सब नहीं शाम हो गई है । वह घर लौट रहा है। जेव.में रखी तनखाह की, गर्मी से उसके खून में रवानगी है। - । ३४ / सलीब पर यह तरल होने लगा है। उसके बदम हल्के पड रहे हैं । उगे मच्छा- अच्छा-मा लग रहा है । वह देवता है, पश्चिम का माका माझ के रंगों में रंगीन हो उठा है । पक्षियों के भुड उड़े जा रहे हैं । रास्ते में राव था टेका पा रहा है--आज वह पतई नहीं पिएगा, हो ससा तो भान से पिएगा ही नहीं । वह ठेके के मामने में विजयो नाव गुजर जाता है। वह पत्नी के लिए फूलों की बैंगो सरीदता है। बच्चों के लिए चार लेट नेता है । कब से उमने पली को साफ माड़ी पहने, देणी लगाए नहीं देता। बच्ची को प्यार किए भी कितना गमप बीन गया । कोई भूला गीत गुनगुनाता यह पर पहुंचता है । वाहर में ही मुनता है, पत्नी कर्कमा स्वर में चीय रही है। शायद बेटी को पीट रही है । 'कम्बग्त पहा से फाड़ नाई काक ? एक ही तो फाक पहनने लायक था, उमा भी सत्यानाश करके ग्य दिया।' पली का वकंग स्वर गूज रहा है । इम कम्बस्त को तो महाभारत मचाने के लिए कोई न कोई बहाना चाहिए--यह वेचन होकर पत्नी के लिए मोचना है । उमके उत्माहित कदम मिबिल पडने लगते हैं । यह कोटरी में प्रवेश करता है । पत्नी चडिका बनी बेटी को पीट चुकी है। दोनो लडके कोनो मे दुवके हुए हैं। यड़ा बिना कमीज़ के नेकर पहने गहा है। छोटे की नाक वह रही है। मोठरी मे यही उजाम नहीं, लगता है जैसे कोठरी मैले प्रधेरे में घुट रही हो। नहीं, माज यह इस माहौल को बदलकर रख देगा- क्या हो गया फाक फट गया तो, हम अपनी बेटी के लिए नया मा ला देंगे।' वह बच्चो को चाकलेट देने लगता है। 'मोर तुम भी जरा नहाकर मच्छी-सी साड़ी पहन लो, चलो तुम्हे पमा लाएं । में जरा हाय पो लू ।' वह पत्नी से बढ़ता है। उसके हाय में चापलेट लग गई है, गायद गर्मी मे रिपन गई थी। 'नहाने यो पानी वहा है ?' पमीना पोछती पत्नी धप मे पर्व पर चंठ जाती है। मभी मर ठीक हो जाएगा–सोचता वह हाप धोने लगता है कि -विघटन / ३५ । में कौंधने लगती है। कैसा भोला विश्वास था उसकाः। वी० ए० करते वह सोचा करता था कि एक तिलस्म की चावी उसके हाथ लगी जा रही है। वी० ए० की डिग्नी उसे एक.अच्छा जीवन निश्चय ही देगी। लेकिन उसका वह भोला विश्वास कितना ठगा गया है । यह नौकरी दिला सकी वी० ० ए० की डिग्री उसे । केवल एक नौकरी, और कुछ नहीं। एक भीड़ की धकापेल में वह जैसे डिग्री के आधार को पकड़कर लटक गया है "और वस, यही लटक जाना मिल पाया है उसे । खैर, प्राज तो तनख्वाह का दिन है। तनख्वाह उसे मिल चुकी है। आज वह कम थका है । अाज मिल से दुर्गन्ध भी कम उड़ी है। कच्ची नीद से जगाए जाने का अहसास अभी भी उसकी आंखों में है, लेकिन आज इस अहसास को वह एक फिलॉसफी से जीत लेगा । चलो जो है सब ठीक है ''तत्त्व-चिन्तक और विचारक कहते हैं-सन्तोप में सुख है .."उसे भी सन्तोप करना चाहिए कि चलो पेट तो भर रहा है, घर है, पत्नी है, बच्चे हैं... घर, पत्नी, बच्चे ? उसके दिमाग में हथौड़े से बजने लगते हैं। घर ? दो कोठरियों वाला सीलन-भरा माहौल, जहां गीली लकड़ियों का धुआं उठा ही करता है, जहां न अपना नल है, न अपना शौचगृह । पत्नी? मैली साड़ी में लिपटी, बाल विखराए एक नारी-शरीर, जिससे एकात्मता के प्रयास में वह टकराता रह गया है। पत्नी उसके लिए दाल- रोटी का पर्याय बन गई है जिसे पेट भरने के लिए खाना तो पड़ता है लेकिन जिसमें कोई तृप्ति नहीं होती। और बच्चे ? हर दूसरे वर्ष प्रकट होने वाला एक जीव । तीन मर गए, तीन हैं । हर वार गर्भ ठहर जाने पर पत्नी गर्भ की सूचना देते उसे जलती प्रांखों से धूरती रही है । और अपराधी-सा वह सोचता रहा है कि नये बच्चे के पाने पर और किस खर्च में कटौती करनी पड़ेगी। बच्चे खर्च में कटौती के पर्याय बनते रहे हैं। लेकिन नहीं, आज यह सब नहीं शाम हो गई है । वह घर लौट रहा है । जेव. में रखी तनखाह की गर्मी से उसके खून में रवानगी है। , --- ... ३४ । सलीय. पर यह तरल होने लगा है। उसके रक्षम हो पा रहे है । उसे पगा. मच्या-मा सग रहा है। वह देगता है, पश्चिममा मागो गे रंगीन हो उठा है । पक्षियो यो झुड उडे जा रहे है । रासे पराय मा ठेका पा रहा है-आज यह कतई नहीं पिएगा, हो सातो पार से पिएगा ही नहीं । यह ठेके के सामने गे विजयी भाव से गुगर जाता है। यह पत्नी के लिए फूलो यी येणो गरीदता है। यलो के लिए पारोट रोता है । कब से उसने पली मो साफ सारी पहले, येणी मगाए देगा। बच्चों को प्यार किए भी सितना समय बीत गया । कोई भूला गीत गुनगुनाता वह पर पहुंचता है। वाहर से ही गुनता है, पत्नी कयंस स्वर में पीती है । गापर येटी को पीट रही है । 'कम्यरत यहा से फार माई माफ ? एकीको माक पहनने लायक था, उसका भी गत्यानाश करपे रग दिया। पानी या ककंग स्वर गूज रहा है। इस कम्बस्त को तो महाभारत मचाने के लिए मो. नगोई याना चाहिए---यह बेचैन होकर पत्नी के लिए सोचता है । उग. माग यदम गियिल पड़ने लगते हैं । यह पोटरी में प्रवेश करता है ती चडिया बनी बेटी को पोट चुकी है। दोनो लटके कोनों में योग। यहा बिना कमीज के मेकर पहन महा है। छोटे पी नाम यह नही। कोटरी में कही उजाग नहीं, लगता है जग कोठी से बंधेग पुट रही हो। नहीं, प्राज वह दम माहौल को बदलपर दंगा--'यया हो गया झाक. पट गया तो, हम अपनी वरी के लिए नपा मार मा दंगामा यच्चों को चाकलेट देने लगता है। 'पोर तुम भी जरा नहाकर अन्टी-मी मारी पहन माँ, पसीना पमा लाए । मैं जरा हाय पी लू ।' वर पन्नी में रहता है। पर मे चाकलेट लग गई है, शायद गर्मी में पिर 'नहाने को पानी वहा है ?' पसीना पांच दी पापा बैठ जाती है। अभी मय टीक हो जाएगा-मोचता वह हार गर विघटन / ३५ भरा लोटा उसके हाथ से फिसल जाता है.---'लुढ़का दिया न पानी, अरे, कितना नोचोगे तुम सब मुझे।' पत्ली चीख पड़ती है बाल विखेरे चीखती पत्नी, कोठरी का घुटता अंधेरा, गन्दे-बिसूरते बच्चेवह फिर लड़खड़ा जाता है। एक पागल पावेश उसके भीतर उछलता है । वह एकदम हिंस्र हो उठता है-खून कर दे वह साले इन सवका और चढ़ जाए फांसी, छुट्टी मिले। तेजी से घूमकर वह पत्नी की पीठ पर एक लात जड़ता है । पत्नी फर्श पर लुढ़क जाती है और ऊंचे स्वर में रोने लगती है । चाकलेट खाते बच्चे सहम जाते हैं । छोटा मां पर गिरकर रोने लगता है। उसके प्रांसू बहती नाक में मिलकर एक हुए जा रहे हैं । 'साला कहीं भी चैन नहीं,' कहता वह जाने लगता है । पत्नी वढ़- कर उसके पैर पकड लेती है.---'न, मत जाओ, मत जायो।' 'जाऊंगा, ज़रूर जाऊंगा, तेरे बाप का क्या इजारा है ?' पत्नी को. ढकेलता वह बढ़ जाता है। अब वह रात गए लौटेगा, जब नशा उतरने लगेगा, पत्नी जानती है, और फिर माफी मांगेगा । लेकिन वह यह भी जानती है कि वह वार-बार माफी मांगेगा, बार-बार पीएगा। ३६ / सलीव पर शीर्षकहीन वह किमी भोर देयता है तो लगता है वह कुछ पोर देय रहा है। चलता है तो लहराहाता, बोलता है तो हकलाता 1 पोर हंमता है तो लगता है. रो रहा है। इम समय वह घर से बाहर जाने के लिए निकला है । दरवाजे तक पहुंचता है तो सुनता है-'जरा सुनो ।' यह उनकी पत्नी की पावाज है। पावाज विलघुल उसकी पत्नी की है और यह 'जरा मुनो' उमकी पत्नी जव-तव उमपर फेंक्ती भी रहती है। फेंकती इमलिए कि उसे परनी के ऋद्ध पदद प्रहारो जमे लगते हैं । गोली जैसे नहीं, तीरी में भी नहीं, जूतो जमे। तब वह बिलकुल बेवकूफ जैसा महमूम करने लगता है । येवकूफ या मृतप्राय । जाने क्यो, बेवकूफ पौर मृतप्राय नितान्त विभिन्न पर्थों वाले शब्द होने पर भी उसे एकः अर्थ वाले लगते हैं । मृतप्राय महसूम करते वह हर बार अपनेको ममझाता है, यह चैयाफ हो सकता है, मरा नहीं है। लेकिन वह स्वय को रितना ही गमभाए ये दोनो पारद उसके निकट एक ही अयं मे गड्डमड्ड होते रह जाते हैं । पत्नी का 'जरा मुनो' मुनता वह राहा हो जाता है । मुख्य र नहीं देसता, मामने देखता महा रहता है । भव पता नहीं, परनी क्या महेंगी, वह एक भय से कापने-गा लगता है । जैसे 'वैवकूफ' गद उमे स्वयं का पर्याप लगता है; वैसे ही 'भय' शब्द पत्नी का पयांय लगता है। 'देखो, मगर ला सको तो गेहूं लेते माना। मादा विलयुन नुक गया है।' पत्लो उसके हाथ में बना पाडा देती है । 'कसे लाऊँ ?' वह कलाता है। 'मुझे चेचकर"." पत्नी तेज हो जाती है।
'अच्छा'अच्छा...' वह जल्दी-जल्दी चलने लगता है । पेंट खिसकने लगती है । कब सिलवाई थी ? दो साल पहले । शायद वह अब दुवला हो गया है । यह पैंट बहुत ढीली हो गई है। पैंट ढीली हो गई है या वह ढीला हो गया है। दुबला या ढीला'..? वह फिर एक प्रश्न में उलझ जाता है। वह सड़क पर आ गया है और सधे कदम रखने की कोशिश करता चलने लगता है । अब इन कदमों को भी ज़िद है। वह जितना चाहेगा कि ठीक से चले, ये कदम उसे उतना ही बेठीक चलाएंगे। पता नहीं क्यों---उसकी हर क्रिया, चाहे शारीरिक हो या मानसिक, कहीं गलत-सी होकर रह जाती है। धीरे-धीरे यह 'गलत' उसपर इतना हावी हो गया है कि अब उसकी एकमात्र अभिलापा रह गई है कि कहीं क्षण-भर के लिए तो वह सही सिद्ध हो । इस 'गलत' को लेकर वह जमीन-ग्रासमान के कुलाचे मिलाया करता है। कभी-कभी वहुत धीरे से कोई उसके कान में कहता है-'नहीं, तुम गलत नहीं हो।' किन्तु जब तक वह उस पुलक-भरे अहसास को पकड़ना चाहे, वह 'कोई' गायब हो जाता है और वह शून्य में टटोलता रह जाता है। भरी सड़क पर चलते यह शून्यता का वोध उसे सबसे अधिक होता है। विशाल जनसमूह के वीच स्वयं को बहुत अधिक अकेला महसूस करता है। ऐसा क्यों होता है, वह सोचता है । हैं तो ये सब इंसान ही, उसके जैसे, फिर ये वेगानापन क्यों ?क्यों 'सोचता वह पीछे से याती कार के नीचे पाता-आता बचता है। कार सर्र से गुज़र जाती है। उधर से पुलिस- मैन चिल्लाता है.---'अवे, अन्धा है क्या -या मरना है।' वह पाता है कि वह सड़क के बीचोंबीच खड़ा है। पुलिसमैन ठीक कह रहा है, यां तो वह अन्धा है या मरना चाहता है। सड़क के बीचोंबीच अपने प्रा खड़े होने को कोई कारण देता वह सड़क पार करता है और फुटपाथ पर चलने लगता है । चलो, आज कुछ तो हुआ, पुलिसमैन ही उसे देख- कर चिल्लाया ! वह मुस्कराने की कोशिश करता है, कि पाता है, कहीं कुछ कचोटने लगा है। उसकी हर हंसी एक कचोट क्यों बन जाती है ? वह फिर एक चक्कर में उलझ जाता है। । ३८ / सलीब पर . चक्कर पति, उमा ध्यान अपने जूतों पर पेन्द्रित हो जाता है। कर लिए थे ये जूते ? शायद एक माल में ज्यादा ही हुमा । पानग्न जूते मजबूत नहीं बनते, वरना क्या इतनी जल्दी फट जाते ! दीवार तो यह नया तल्ला नगवा चुका । जमाना ही बेईमान हो गया है । जते वाले तक अपना काम ठीक में नहीं करते । अब यदि जूते मजबूत बनाए जाए तो दो साल चलें, परों को स्तिना मुग रहे और पंगे भी बितने कम सचं हो। अच्छा"क्या सचमुच ऐमा नहीं हो माता कि सारा जमाना बदल जाए "मवक परी में एक-से जूते हो, गानदार ! वह मामने पड़ने हर पैर को देखने लगता है-इसके पर मैं मंण्डिल हैं, ये टाट जूते पहने हैं, ये चप्पल फटफटाते दोड रहे हैं"यह महिला ऊची एड़ी गट- पटाती चल रही है. ये पर नगे है, विवाइयो से भरे। परे, ये मे विचित्र पर हैं ? वह रुक जाता है। मा मिचमिचाना है । ये पजीव-गे पर, ये लोहे के जूते लेकिन ये पर भी तो अजीब हैं ! वह पंग से ऊपर दृष्टि उठाता है-'मरे, यह तो पोडा है...! मैं भी कंगा गधा हूँ !' वह हंस पड़ता है । उसे लगता है, वह स्वय पोडे मे गधा बन गया है । उमरी हंसी को फिर कोई डक लगता है। एक बार उगे विच्छू ने काटा था, विलकुल उमके देश जैसा । यह कराना चाहता है, पराहना नही, पसीना पोटता बढ जाता है । बारिश के महीने भी कितने गर्म हो जाते हैं। कभी इतना पानी कि ठंड लगने लगे। कभी ऐमी चिलचिलाती धूप कि योपडी चिटरने लगे। माज तो उमको मोपडी चिटकने लगी है. वह जल्दी-जल्दी चलने लगता है । जिम मेंठ के पास वह साता लिखता है, उसकी पोपटी मात्र वह चिटका देगा। यह मैट्रिक के मागे नही पट सका, पढ़ना चाहा भी नहीं । टीक यही वह जिन्दगी के बारे में मोचता है कि वह नहीं जी सका है, जीना चाहा भी नही"फिर क्यो जिए जा रहा है...? गायद इसलिए कि जिन्दा न रहना उसके वा में नहीं है। कई बार उगने मर जाना पाहा है। कल्पना की है कि वह कुएं में कूद पड़ा है, माग लगा ली है या पहे मारने वाली दवा खा ली है। पौर वह मर गया हैानेकिन जैसे निन्दा धीर्षकहीन!
'अच्छा''अच्छा...' वह जल्दी-जल्दी चलने लगता है। पैट खिसकने लगती है । कब सिलवाई थी ? दो साल पहले । शायद वह अब दुवला हो गया है । यह पैंट बहुत ढीली हो गई है । पैंट ढीली हो गई है या वह ढीला हो गया है। दुवला या ढीला...? वह फिर एक प्रश्न में उलझ जाता है। वह सड़क पर आ गया है और सधे कदम रखने की कोशिश करता चलने लगता है। अब इन कदमों को भी ज़िद है। वह जितना चाहेगा कि ठीक से चले, ये कदम उसे उतना ही बेठीक चलाएंगे। पता नहीं क्यों-~-उसकी हर क्रिया, चाहे शारीरिक हो या मानसिक, कहीं गलत-सी होकर रह जाती है। धीरे-धीरे यह 'गलत' उसपर इतना हावी हो गया है कि अब उसकी एकमात्र अभिलापा रह गई है कि कहीं क्षण-भर के लिए तो वह सही सिद्ध हो । इस 'गलत' को लेकर वह ज़मीन-पासमान के कुलावे मिलाया करता है। कभी-कभी बहुत धीरे से कोई उसके कान में कहता है---'नहीं, तुम गलत नहीं हो।' किन्तु जब तक वह उस पुलक-भरे अहसास को पकड़ना चाहे, वह 'कोई' गायब हो जाता है और वह शून्य में टटोलता रह जाता है। भरी सड़क पर चलते यह शून्यता का वोध उसे सबसे अधिक होता है । विशाल जनसमूह के बीच स्वयं को वहुत अधिक अकेला महसूस करता है। ऐसा क्यों होता है, वह सोचता है । हैं तो ये सब इंसान ही, उसके जैसे, फिर ये वेगानापन क्यों ?क्यों सोचता वह पीछे से आती कार के नीचे आता-आता वचता है। कार सर्र से गुज़र जाती है। उधर से पुलिस- मैन चिल्लाता है---'अवे, अन्या है क्या -या मरना है।' वह पाता है कि वह सड़क के बीचोंबीच खड़ा है । पुलिसमैन ठीक कह रहा है, यां तो वह अन्धा है या मरना चाहता है। सड़क के बीचोंबीच अपने प्रा खड़े होने को कोई कारण देता वह सड़क पार करता है और फुटपाथ पर चलने लगता है । चलो, आज कुछ तो हुआ, पुलिसमैन ही उसे देख- कर चिल्लाया ! वह मुस्कराने की कोशिश करता है, कि पाता है, कहीं कुछ कचोटने लगा है । उसकी हर हंसी एक कचोट क्यों बन जाती है ? वह फिर एक चक्कर में उलझ जाता है। है - - ३८ / सलीव पर चक्कर साते, उसका ध्यान अपने जूतो पर बेन्दिन हो जाना है। कर लिए पे ये जूते ? शायद एक साल से ज्यादा ही हुमा । पाजरन जूते मजबूत नहीं बनते, वरना क्या इतनी जल्दी पट जाते ! दो बार तो यह नया तल्ला लगवा चुका । जमाना ही बेईमान हो गया है । जते वाले तक अपना काम ठीक में नहीं करते । प्रव यदि जूते मजयून बनाए जाएं तो दो साल चलें, परों को कितना मुग रहे और में भी क्तिने कम राचं हों। मच्छा.. क्या सचमुच ऐमा नही हो गकता कि मारा जमाना यदल जाए. सयके पैरो में एक-गे जूते हो, गानदार ! वह मामने पढते हर पर को देखने लगता है--इमके पर में मंण्डिल हैं, ये टाठ पे जूते पहने हैं, ये धप्पल फटफटाते दौड रहे हैं "यह महिला कंची एडी गट- बटाती चल रही है. ये पर नगे हैं, वियाइयो मे भरे। परे, ये कंगे विचित्र पर है ? वह रुक जाता है। मा मिचमिचाता है । ये प्रजीव-गे पर, ये लोहे के जूते लेकिन ये पर भी तो मनीय है । वह परों मे ऊपर दृष्टि उठाता है-'मरे, यह तो घोडा है ! मैं भी पंगा गया हूँ !' वह हस पडता है । उसे लगता है, वह स्वयं घोडे से गधा यन गया है । उमकी हसी को फिर कोई हक लगता है। एक बार उसे विट्र ने काटा था, बिलकुल उसके दा जमा । यह कराहना चाहता है, सराहना नही, पसीना पोछता बढ जाता है । बारिश के महीने भी कितने गर्म हो जाते हैं। कभी इतना पानी कि ठंड लगने लगे। कभी ऐमी चिलचिलाती धूप कि सोपड़ो पिटरने लगे। माज तो उसकी खोपडी चिटकने लगी है, वह जल्दी-जल्दी पलने लगता है । जिम मेठ के पास वह माता लिसता है, उसकी गोपड़ी पान वह चिटका देगा। वह मैट्रिक के प्रागे नही पढ़ सका, पढ़ना चाहा भी नहीं । टीक पही वह जिन्दगी के बारे में सोचता है कि वह नहीं जी सरा है, जीना पाहा भी नही."फिर क्यों लिए जा रहा है...? शायद इमलिए कि जिन्दा न रहना उसके वश में नहीं है। कई बार उगने मर जाना पाहा है। कल्पना की है कि वह कुएं में कूद पड़ा है, प्राग लगाती है या हे मारने वाली दवा खा ली है। पौर वह मर गया है अमेरिन मे जिन्दा गीर्षकहीन । ।
- - रहने की कोई अनुभूति उसके पास नहीं है, वैसे ही मृत्यु भी एक काल्प- निक शगल बनकर रह जाती है। हां, मृत्यु की कल्पनामों को वह अपना 'शगल' कहता है और कम से कम 'शगल' शब्द का अर्थ वह ठीक-ठीक जानता है। उसका दूसरा शगल है, यह सोचते रहना कि आखिर वह जिन्दा क्यों है ? अरे, बाल-बच्चों के लिए है, पत्नी के लिए है और क्यों ...। और ये हजारों क्यों जिन्दा रहते हैं...? वह किंचित् गवित हो उठता है कि आखिर उसकी ज़िन्दगी का कोई अर्थ तो है । लेकिन यह अर्थ उसके अासपास बहुत कम टिक पाता है। प्राधा महीना बीतते न बीतते पहले दाल बनना वन्द होती है, फिर रोटियां। पत्नी का मुंह सूजा रहने लगता है। चारों बच्चे रोटी पर लड़ने-झगड़ने लगते हैं। दो कोठ- रियों वाला घर और अंधेरा हो जाता है । जव ऐसे और खिंचना असम्भव हो जाता है तो वह चुपचाप अपने सेठ के गोदाम में घुसता है और एक सिद्धहस्त चोर के समान इतना गेहूं-चावल हथिया लेता है कि फिर कुछ दिन काम चल सके। बच्चों में रोटियों पर लड़ना-झगड़ना बन्द हो जाता है । घर में चूल्हे की आग का उजाला हो जाता है और पेट भरा होने से सबको नींद भी अच्छी पाती है । लेकिन, ऐसी रोटियां जब वह खाता होता है तो पत्नी की तरफ नहीं देखता । वह भी उसकी तरफ नहीं देखती..! बस, कभी-कभी 'हे राम' इतने उच्च स्वर में कहती है कि वह 'हे राम' उसके भीतर छुरी-सा धंस जाता है । इस छुरी को वह धंसा रहने देता है और मन ही मन एक अनकहे दर्द से कराहता रहता है। चलते-चलते एक गली में जरा-सा मुड़कर वह पेशाव करने लगता । ऐसे गलियों में खड़ा होकर पेशाब करना उसे इतना बुरा लगता है कि वह चाहने लगता है कि अपने ही तमाचों से अपना मुंह लाल कर ले। यह तमाचों वाली बात भी उसके अन्दर धीरे-धीरे भरती गई है। उसे लगता है अब उसने 'एडजस्ट' करना सीख लिया है जिन्दगी से। जो जिन्दगी से 'एडजस्ट' नहीं कर पाते हैं, वे पागल हो जाते हैं, उसने सुना है । 'दुनिया की रीत' को निभाना सीखते वह गरदन झुकाता गया . ४० / सलीब पर . है और अब तो उसकी गरदन इतनी भा चुकी है कि यह मारामको नही, पाताल को ही देस पाता है। माज उमका मेठ का खाता लिसने जाने का विनान मन नहीं है। पपा कर लेगा माला मेठ भी? दो-चार गालियां हो तो देगा। पर इतनी कम तनखाह में प्रोर कोई तो उमे मिल भी नहीं माता । गहमा वह मर हो उठता है कि अब बिना नाम के एक पूरा दिन टमके मामने है। क्या करेगा वह ? मिनेमा देगा ? नहीं, उनने पैमें नहीं हैं । चाट साएगा ? नहीं, यह भी नहीं, अकेले चाट माते पत्नी और बच्चे याद माएंगे। तो फिर यह उम मैदान की मोर बढने लगता है जहा रिले मप्ताह गांधीजी की प्रतिमा स्थापित की गई थी और उसका जलमा हमा या। उमका ध्यान हाय में लटके डाली थले पर जाता है । पत्नी ने पहा पा, गेहूं लेने पाना"।वहा परे"प्रच माज तो साली ला लटवाए वह गाधी की प्रतिमा के मामने महा हो जाता है। इस समय मैदान मूना है। गाधी का चुत चूपचार पडा है। धूप इतनी तेज है कि उसे लगता है उसकी गोपटी के गाय चुत की सोपडी भी चिटकने लगेगी... विमरती पंट को ऊपर करते वह मावाग की पोर देखता है। फिर युन की भोर, फिर अपनी मोर। उमे जाने क्या-क्या याद माता जा रहा है." दो वर्ष पहले उमने नमबन्दी कराई थी। मरवार की तरफ में इन. आम था तो वह भी पट्टच गया था। डाक्टर के मामने पंट उतारते वह जरा घबराने लगा था, तो मुना था, 'बयो, परेशान क्यों हो? मोई बीमारी है क्या? 'में बाजारू मौरतो के पास नहीं जाता।' उमने बरा तनार पहा कुछ नहीं करेगा। 'कितने बच्चे हैं ?' डॉक्टर अपना काम करने लगा था। 'चार ।' यह तना हुमा था। "मोर पहले नहीं रुक सकते पे ? सिना नहीं मरते, पंवारते पने शीर्षकहीन/४१ 1 जाते हैं ।' डॉक्टर ने हिकारत से कहा था। और उसने पाया था कि वह एकदम ढीला हो गया है । ढीला और वेदम, दम निकले मुर्गे-सा'। हवा में उलटा लटका हुआ है। उसकी कलंगी उलटी हो गई है। पौर उसकी टांगें धरती पर नहीं; हवा में उठी रह गई हैं." ऑपरेशन टेबुल से उतरते वह वेदम हो गया था। हां, खिला नहीं सकता, वस पैदा करता चला गया है। कितना वेगरत है वह ! उसे लगा था, वह डॉक्टर के सामने ही नहीं, सारे ज़माने के सामने नंगा हो गया है। फिर वह जाने कसे घर पहुंचा। रात को सोते चारों बच्चों को प्रांखें गड़ा-गड़ाकर देखता रहा...। अब कोई पांचवां नहीं पाएगा । उसका वश चले तो वह पूरे बारह पैदा करे और उन्हें पालकर भी दिखा दे...! वह चीख पड़ना चाहता है। किन्तु हाथ में पकड़ा खाली थैला हिलकर उसे सन्तुलित कर देता है। गांधी का चुत वैसा ही खड़ा है। उसे याद आता है, सग्रह-अठारह का रहा होगा । मैट्रिक का रिजल्ट पाने वाला था और वह निश्चिन्त था, पास हो या फेल, उसे पागे पढ़ना ही नहीं है । मां-बाप उसे जी भरकर गालियां देते, वह सिर झुकाए. सुनता, बाहर निकल जाता। उस शाम, मां पड़ोस के कीर्तन में गई थी। वह घर में अकेला था। वह भाई ! सोलह वर्ष की वह लड़की, एकदम काली थी। पड़ोस में रहती थी। उसकी मां से आटा मांगने आई थी । लड़की ने पूछा था -'चाची नहीं हैं ?' उसने सिर हिला दिया था नहीं हैं। उस लड़की ने भीतर प्राकर सिटवानी लगा दी थी और उसका हाथ पकड़कर उसे कोठरी में ले गई थी। लड़की ने ही उसे खाट पर खींच लिया था। वह एकदम काली थी, किन्तु किसी रस से भरी-सी ! कुछ देर बाद जब वह उस लड़की से अलग हुआ तो होश में नहीं था। 'चाची पा जाएगी 'मैं फिर पाऊंगी।' कहती वह लड़की भाग गई थी। रात उसने मां से कहा था-'मो, पैर दबा दूं?' असल में वह मां के ४२ Y सलीब पर परं दधात हुए चांद को देखना चाह रहा था 1 मां धागन में मोती पी। वह कोठरी में सुलाया जाता था। पान वह जाने क्यों चांद को देगना चाहने लगा था। मा चोली-'अरे वाह रे श्रवणकुमार! चल जा, सो जा, मुझे नहीं दववाने हैं पैर-बर। वह कोटरी में चला गया था, लेकिन उस रात मो नहीं सका था। सोचता रह गया था, क्या वह काली लड़की उसके साथ इस पोटरी में रहने मा मकेगी ? समीकी बिरादरी की तो है। धीरे में बात चलाएगा। उसने मोती वह्न को हिलाया--'देव री श्यामा, बाहर क्तिनी चांदनी है माज ।' 'तू ही देख, मुझे सोने दे।' वहन भनभनाती सो गई थी। उसकी देह में कुछ तृप्त हो गया था। देह मे परे कोई प्यास जाग गई थी। - घर के पड़ोस में ही रहने वाले दोस्त को उसने अपना इरादा बताया कि वह उस काली लड़की में व्याह करना चाहता है। दोस्त हसा-- 'मरे, उस मोहिनी में । वह तो कई बार मेरे माप...' वह स्तब्ध रह गया। कोई योय उसके भीतर जागा था और जैसे तुरन्त उम बोध का दम घुट गया हो...! वह पाली लड़की मोहिनी ! वह किसी रम से भरी-सी."। वह उसे अपनी कोठरी में अपनी साट पर लाने के सपने देखने लगा था। क्यों.. क्यो...? उस पाली सड़की के साथ वृक्षण बिताने के बाद उसे चाद मौर उजला लगने लगा या...। उसने दो-चार दिन मे अपने उन मपनी को चाद के साथ तोड़-मरोहकर, पूरे में फेंक दिया। अब वह पूरे के पाम से गुजरता बार- बार यूपने लगा था। उसका जी चाहता था, यह उम पाली सस्यीका न कर दें। उसके बाद यह बीड़ी पीने लगा था। एक वर्ष बाद उगा म्याह हो गया । ब्याह क्या, मां ने एक माना किया था। दोहार नार पौर तीन हजार का मामान लेकर एक लड़को पाई । इम बन्दोबस्त से उसकी यहन स्यामा का ध्याह भी हो गपा मोर श्यामा पती गई । मा- बाप ने बनवी मांग सी। । शीपरहीन /४६ -- अंधेरी कोठरी में उसके साथ एक खाट पर सोने वाली वह लड़की उस काली लड़की जैसी रसीली नहीं थी, किन्तु उसकी एकदम अपनी थी। वह उसके साथ खुश होने की कोशिश कर रहा था। यद्यपि 'खुशी' का कोई ठीक-ठीक अहसास भी उसके निकट स्पष्ट नहीं था। वह सोता- जागता खुश होने का एक नाकाम प्रयास कर रहा था । अव उसे नौकरी भी चाहिए थी, जीने का कोई प्राधार । बच्चे पैदा होने लगे थे । वह जूतियां चटखाता चक्कर लगाने लगा । अक्सर सुनता ~~वी० ए० पास को तो काम मिलता नहीं, इन्हें कैसे मिलेगा ! केवल मैट्रिक पास कर पाना उसका दोप बन गया था। लेकिन बी० ए० पास को ही कौन-सा काम मिल जाता है ? अरे, जिन्हें मिलना है, उन्हें ही मिलता है। वह महलों से झोंपड़ियों तक नज़रें धुमाता नियतिवादी बनने लगा था । ऊपर से वह शान्त रहता, मन में वेशुमार गालियां वकता होता। तभी सेठ से मेंट हुई। सेठ ने उससे पहला सवाल पूछा-'इतनी कम तनख्वाह पर काम कर सकोगे ?' 'कर सकूँगा' । और कुछ कहना चाहते अपने होंठ भीच लिए। सेठ ने दूसरा सवाल किया, 'वेईमानी कर सकोगे ?' 'कर सकूँगा।' उसने फिर कहा। 'वेरी गुड !' सेठ ने कहा, 'तुम्हें सिर्फ इतनी वेईमानी करनी है कि हमारे मामलों में अपने ईमान की टांग नहीं अडानी है.''और अगर टांग अड़ाई तो याद रखना "टांग तोड़ दी जाएगी !' अांखें लाल करते सेठ चुप हो गया । एक प्राह दवाते वह भी चुप हो गया था । नौकरी मिल गई थी । खाता लिखते-लिखते अक्सर वह अपनी टांग और आटे के रिश्ते को जोड़ता-तोड़ता रहता और एकदम खामोश बना रहता । धीरे-धीरे मां-बाप मर गए । और एक के बाद एक चार बच्चे उसके उसी प्रांगन में खेलने लगे, जहां कभी उसने मां का पैर दबाते चांद को देखना चाहा था! अव दह वारहों महीने कोठरी में घुसा सोता था। पत्नी कभी खुले में सोने को कहती तो सहसा चीख पड़ता--'मुझे अंधेरे में नींद अच्छी आती है !' ४४ / सलीव पर एक वार उस काली लड़की जैसी कोई सोजने यह उम यदनाम मुहल्ले में पहुंचा, जहा लड़किया सरीदी जाती हैं । एक जीना चढ़ा भी, फिर सहसा लोट पडा । जीना उतरते उसने सुना--'याह रे मरदुए ! फिर क्यो माया था? मरी देख कैसा दुम दवाकर भाग रहा है।' उम दिन के बाद किसी भी दुम दबाये कुत्ते को देखकर वह पत्थर फेरने लगता। पाज सूने मैदान में, साली थला लटकाए, गाधी के युत के मामने सहा वह सोच रहा है-कारा | उमे कोई 'अपनी जिन्दगी मिली होती। जिसके पहलू में वह पहा है, वह तो हरजाई जैमी है-युमित, घृणित, म्वार्थी, मौदेवाज। यस कहानी इतनी-सी ही है । सरम हो गई। शायद मेरे कोई सुधी पाठक पूछना चाहे-'लेनिन, मापके इन कपा-नायक का नाम क्या है पौर मैं सोचती रह जाऊंगी-'इस में जाने कितने हैं ! फिर मया नाम दू इमे?' सोपंपहीन / आधुनिक चौधरी हरभजन का प्राज हुक्का पीने में भी मन रम नहीं रहा। कभी चिलम ठीक से भरी नहीं लगती. 'कभी लगता यह तम्बाकू ही वेस्वाद है "कभी लगता वे कश ही ठीक से खींच नहीं पा रहे है। मन आकाश में मंडराते पंछी-सा हो रहा है और धूप है कि सामने खड़े नीम के वृक्ष की फुनगी पर चढ़ पाई है: बारह वजने को आए'डाकिये का पता नहीं..'कमबख्त ये डाकिया ससुरा भी बड़ा इन्तज़ार करवाता है । लाख कहा ''हमारे नाम की चिट्ठी हो तो पहले दे जाया कर । कई चार इनाम-इकराम भी दिया लेकिन ये कमबख्त देर लगाकर ही श्राएगा'''कुछ कहो तो कहेगा-~~-'हलफ से चौधरी हुजूर''पापका खत देखते ही सीधा आरके पास दौड़ता हूं...' फिर हांफ-हांफकर सांस लेता पसीना पोंछने लगेगा । 'सच ही तो वेचारा दौड़ता पाता है !' चौधरी पिघल जाते हैं-~-'चौधराइन, ज़रा इस डाकिये के लिए शरवत भेज देना...' भीतर से उत्तर पाता है-~-'शरबत लाय रही हूं, सुधीर की चीठी पाई है का?' लेकिन कहां पाती है सुधीर की चिट्ठी-? महीने में एक-दो वार से अधिक नहीं"वस, इन्तज़ार रोज़ बना रहता है । कभी-कभी तो महीने से भी ऊपर हो जाते हैं । तव बूढ़ा डाकिया भी अपराधी-सा हो उठता है----'चिट्ठी तो है हजूर, लेकिन भैया की नाहीं..." और वह बिना चौधरी से नजर मिलाए, चिट्ठी चौधरी के सामने चौकी पर रखकर, चुपचाप चला जाता है। चौधरी हरभजन और डाकिया फखरुद्दीन साथ-साथ जवान और बूढ़े हुए । चौधरी को याद हैं-~बच्चे थे, तो चौधरी पतंग उड़ाते थे, फखरू उनफी होरयासी चरणी पकड़ता था। मगर दूसरे की पतंग पटती तो चोपरी और फखरू एक साप चीपते-'वो काटा'!'सेमिन पगर वानर चौधरी की पनंग बट जाती, तो वह उलटकर पगह की पीट पर एर घोल जह देता-'माले, पतंग कटवा दी, जरा-गी घरगीरीक में पानी नही जाती !' घो-दूध खाने से पुष्ट, हरभजन फे हाय का एक घोल गाते दुरले पतले मरियल फपत की पोट चरमरा जाती..."टोक मे तो पर रहे मैया तीन पतग तो तुम काट चुके, चौथी बेर तुम्हारी पट गई तो हमया पीट रहे हो...' खा मैले पुरी की भारतीन से प्राय पोछने लगता। हरभजन को जमे सहसा कुछ याद या जाता--'मरे पर, घल प्राज तुझे जलेबी मिला गरमा-गरम मेरा भी यहा मन पर रहा है।' फरममझ जाता, 'हरभजन मैया धौल वा प्रायश्चित जलेबी मिला- पार करना चाह रहे है एक, धौल की तुलना में पंट-भर गरमा-गरम 'जलधिया...? तो धौल रोज लगा लिया मरो भया।' फपरूबरना चाहता ."किन्तु अप्रकट में घोल मोर जलेबियो का रिश्ता, प्रबट में अनकहा रहा प्राया। कभी-कभी, म्वयं मे दो-तीन साल छोटे फखरद्दीन डाकिये को देगा. घौधरी हरभजन की प्रासो में जीवन के मारे प्रहर चित्रो-मे स्पष्ट हो उठते हैं-नई सुहानी भोर-मा बचपन, सपन्न पिता को एकमात्र सन्तान होने के कारण किसी भी विपन्नता से मुक्त ! फिर धीरे-धीरे जाटे की दोपहर-मी चढती युवावस्था "शिरामों में प्रवाहित ग्यत गुनगुनी अमा में मधुर पांच-मा तपने लगा था.. विलकुल आहे को गुनगुनी, सुनहरी धूप-मा यौवन हरभजन को गिरानी में उतर भाया था! मसा में बुरशी लहते, मलाईदार माघ सेर दूध दो चार पीते, युवक हरभजन की मजापो में मछलिया उभर माई थी। पिता देखते तो गर्व मे तन जाते, मी छाती से चिपटाकर चलाए लेती-'मेरे साल को ही रिसीकी नबर न लग जाए...!' किन्तु हरभजन का यौवन, बचपन-गाही निरोप पागाव की लड्कियो पो यह माप उठाकर न देखना, रिकभी शेती- दीवाली पर घिर जाता, तो ये छोरियां नहीं पती, हरभजन में जाता, भाग गम होता । रिस्ते की एक भाभी ने एक बार होनी पर, मगरह। मापनिरु/४० - A वर्षीय हरभजन को कोठरी में घेरकर साकल चढ़ा दी थी, दरवाजे से पीठ सटाकर ढिठाई से बोली थी-'ए देवरजी ! इत्ते तगड़े हो, पूरे जवान हुए.'और छोकरियों से ऐसे घबराते हो जैसे तुम छोकरी हो... काहे ? प्रायो, तुम्हें जवानी का मतलब समझाएं, अरे, होली पर सब माफ है !' 'न, न...' कहते हरभजन को, उस भौजाई ने बांहों में जकड़ लिया था "हरभजन की शिरायों का रक्त भी उबाल खा गया' "किन्तु, उसने विवेक नहीं छोड़ा-~-'हटो भीजी, छोड़ो, भौजो मां के बराबर होती है मेरी मर्दानगी देखना चाहती हो तो देवरानी ला दो, सच्चई भौजी, ला दोन, कोई अपनी जैसी...।' हरभजन की अवहेलना में प्रशंसा भी थी। भौजाई गद्गद हो गई- 'मान गई लाला तुम्हें ! नहीं तो भला इस कलयुग में कोई हाथ पाया मौका छोड़ता है । करोगे मेरी वहन से व्याह ? छुटकी मुझसे भी है । परन्तु, एक वचन दो, व्याह हो जाए तो भी कभी छुटकी से प्राज की बात कहोगे नहीं । भौजाई की मांखें पनीली हो पाई थीं."हरभजन ने वे प्रांसू पोंछ दिए-'वचन देता हूं भौजी, कोई नहीं जानेगा कभी भी यह बात । अब हंसो एक बार तुम्हें हंसती देखने को जी चाह रहा है. 'हंसो.. हेसो...।' हरभजन भोजाई को गुदगुदाने लगा था, पीठ पर, बांहों पर ''उन्नत वक्ष को छुए बिना और वह सब कुछ 'गुनाह' बनते- बनते गुदगुदी बनकर रह गया था" हरभजन ने बाद में सुना था कि वह भौजाई अपनी चंचलता और अन्य पुरुषों से सम्पर्क के कारण काफी 'सरनाम' थी! --~-बंकिम कटाक्षों पी मोहिनी का वशीकरण लिए, जब वह स्वयं सामने प्रा खड़ी होती, तो पुरुषों के लिए उसे नकारना असंभव ही था. भला कोई पकवानों से भरी परोसी पत्तल छोड़ता है ! किन्तु, उस घटना के वर्ष-भर बाद, जब उसकी छोटी बहन से सचमुन हरभजन का व्याह भी हो गया था, वह मिली तो सचमुच बदली हुई थी-कटाक्षों में बंकिमता नहीं, नारी-सुलभ पाकर्षण का सहज सम्मोहन था। उन कटोरे जैसी बड़ी-बड़ी ग्रीवा पर, - ४८ / सलीब पर मांसों का मद मधु बन गया था"वह उन्ना वा पर पाना मंभालना सीय गई थी, लाज मे पल मुबाना भो! हामवन ने उमंग एकान में कहा-'जाननी हो भौजी, प्रय तुम मचमुन मिली गुन्दर लगती हो, अपनी बहन में भी जियादा!' तो उसने पर उटाई, गिरा, बनम मोती भर पाए पे-'तुम्हारे ही धारण माला । नहीं तो मैं मुहरनी जाने रिते पाप करती"।' धीरे-धीरे समय की धूप पड़ी, दलने लगी। पिता की मृत्य के बाद हरभजन 'चोपरी हरभजन' कहलाने लगे, हक्का गुरगुहाना सीस गए-गाव की पंचायत के सरपच बना दिए गए लेकिन वोधराइन को छोडकर, उम भौजाई को छुटको को छोडकर, उनकी निगाह पर कोई औरत कभी नहीं पढी। वैभव था, बलिष्ठ परीर था, गारे साधन घे."होली-दीवाली पर यार-दोस्तों की महफिल जुहती, तो प्रथा के अनुमार धुपरू भी सनस्ते कोई चम्पावाई या चमेनी जान पपरू एन. काती, पतली कमर लचकाती, भरावी भासो के जाम भर-भरपर चौपरी पर सुटका देती 'यार-दोस्त चुन-चुनकर 'चीज' साते, किन्तु चौपरी नीचे नजर किए गाना सुनते, उहती नजर से विरक्ती परी को एबाप बार देख भी लेते-'इनका पूरा नेग दे देना मुनीमजी, मेरी तरफ में और एक गिन्नी भी। बहते मोघे अपने पायनशा में पहनकर चौधरा. इन को हर भालिगन में कम लेते। फिर मारी रात नहीं छोड़ते... 'मजीव मरदुमा है । पिमियाती, पम्पावाई या घमेली जान परती चली जाती । यार-दोस्ती के मुह पर पापड-मा पडता--'सचमुच पत्रीय है यह शरम ।' वे मापस में रहते जैसे अपने थप्पड़ रसाए गाल गहनाने मगते'ममा पार, अगर हमरो इत्ता सब मिना होता न, इतनी जमीन- जायदाद, ऐसी जवानी तो हम तो जिन्दगी मा यो सुत्फ उठाते कि' प्रायः ऐसे वार मधूरे रह जाते । चौपरी के कानों तक यह राय कुछ पहुँच जाता "ऐमे क्षणों में वह भौजाई चीपरीको प्रवस्य पाद पातो"और वे भौजाई की छुटवी बह्न को ऐमे आगो में इतना यमने, इतना चूमते कि चौधराइन परेशान हो जादी-'ये तुम्हें भी सभी पागलपन का दौरा पड़ता है क्या जी, जो परेसान कर देने हो। मैं नही भागी जा रही हूं क्या?' चौधराइन कृष्णा सचमुच सुन्दर श्री---अंगों में लुनाई, आंखों में रस, अधरों में मधु । चौधरी ने जव पहली रात उन्हें देखा, तो एकदम देखते रहे "बिना छुए"हां, उठकर दीपक की बाती उकसा दी, और दीपक ऐसे स्थान पर रख दिया कि उसका प्रकाश नववधू के मुख पर भरपूर पड़ता रहे और वे भरपूर दृष्टि, लाज से झुकी जाती वधू को एकटक देखते रहे फिर बस, चिवुक पकड़कर वह अनछुमा मुख उठाया और एक अछूता चुम्बन वधू के अधरों पर अंकित कर दिया''यदि कृष्णा के अधर अछूते थे तो हरभजन के होंठ भी "तभी, कदाचित् वह 'चुम्बन' इतना मुग्ध, इतना विभोर, इतना तन्मय हो सका था-~-'निर्दोप' होने के कारण ही। दूसरे दिन दोस्तों ने छेड़ा-~-'क्यों गुरु, वात्स्यायन के कौन-कौन-से नुस्खे आजमाए कल रात ? सुना भौजी गज़ब की सुन्दर है ।' युवक हरभजन हंसे-सामने खड़े हरसिंगार के वृक्ष की ओर इशारा किया, रात-भर वे फूल झरते रहे थे वृक्ष के नीचे उन फूलों की सेज-सी विछ गई थी-'यार, तुम्हारी भौजाई गजव की सुन्दर भी है और गुरु वात्स्यायन से भी मैंने गुरु-दीक्षा ले ली है. लेकिन उधर देखो, उन फूलों की सेज को देखो' 'अभी तो उन्हें अंजलि से भर लिया है मैंने, रौंदा नहीं लेकिन, यारो, तुम फूलों का अर्थ ही कहां समझते हो, जो उन्हें अंजलि में भरने या रौंदने का फर्क समझोगे...?' युवक हरभजन की आंखों में खुमार अवश्य था--किन्तु किसी नशे का नहीं, किसी पूजा- का-सा । 'लगता है भाई में कहीं कुछ गड़बड़ है।...' यार-दोस्त आपस में फुसफुसाते, जोर से कहने की हिम्मत उनमें नहीं थी । जानते थे,हरभजन अखाड़े में अच्छे-अच्छों को पछाड़ चुका है 'हरभजन की भुजाओं में मछलियां उभरी हुई हैं, हरभजन का मस्तक दप्-दप् दमकता रहता है । 'अमां यार, यह साला हरभजन भी बिल्कुल अहमक है'सारी जवानी घर की जोरू पर लुटा रहा है ऐसी जवानी, ऐसी ज़िन्दगी क्या बार- वार मिलती है ?' ५० / सलीव पर किन्तु हरमनन पर भी जोरूमे हो मगन रहे, रेवम कृष्णा की पार्टी या रग, अपरों या मयु, एकर पोते रहे: "अंग-पंग यी सुनाई में भाउ बने रहे" मोर उम 'एकमात्रता' के मागर में जितना गहरा उतरते गए.. उतने ही मोती बटोरते गए...! एक बार होली पर यारों में भंग पिला दी, मोषा 'माज तो बेटा हमेगाही, गहरी पिता ..." हरभजन यहक भी, भूमार यौने''यारो, पान तो यग स्वर्ग का मानन्द पा रहा है, पागे मोर प्रणराएं ही भामरागं नजर पा रही है, मेनका, रंभा, उवंगी यारो ने एक-दूसरे को कोहनी मारी-'पागिर बंटा मादी गए रंग पर।' हरभजन भूमने लगे ये "मोतीयाई मनमुच प्रागरा पी, गया नाचनी भी थी'तबला टनक रहा पा, पपरू एनर रहे थे, मोतीयाई का नमोला ग्वर गज रहा था. "झुमका गिरा रे, बरेली के बाजार में"।' पारी की महफिल भूम रही थीहरभजन भी भूम तो उठे ."पिन्तु, नो में यही उनकी पायों में मोतीयाई मा मुग वय कृष्णा के मुग में गड्डमगइरहमा जा रहा था... मोतीवाई समपर थम गई.."मादार फरनी पड़ती हरभजनके निकट पाई, गले मे वाहै डाल दो "माज हरभजन ने ये बाह गी हटाई, मोतीबाई को भरपूर देयते उसकी यमर को हाथ मे पेरते निष्ट गीच लिया।... दोस्त उछल पडे-'मान'मापिर भाई पा ही गया रंग पर। हरभजन नो ग लाल धागो मे मोतीयाई को देग रहे थे- 'दोरतो, मोती बाई को दान में किमी वेगाफ गापर का एक और प्रनं करता: कमी पाग जिगर में सगी ता उस रहे रोज नया ब्याह हो, मगर दुलहन एक हो...' फिर मोतीबाई गो एक प्रयम भटके से दूर करते चोगे, 'मुनीमजी, इस रंही यो माग एक नहीं पाच मिन्निया दे देना और प्रान ये याद कभी इस हवेली में रंगोमा नाय नही होगा."मैं यह राम चन्द परता प्राधुनिक १ 'ऐसा कैसे हो सकता है वाप-दादों के ज़माने से चली आई रस्म को तुम कैसे वन्द कर सकते हो ?' मुंह लगे दोस्त श्यामलाल ने उठकर जाते हरभजन की बांह पकड़ ली। सारे यार-दोस्तों के चेहरे फक पड़ गए थे, मोतीबाई के चेहरे पर स्याही-सी पुत गई थी। हरभजन ने श्यामलाल को भी एक प्रबल झटका दिया-'मैं मन्दिर के चढ़ावे की रस्म तो नहीं बन्द कर रहा "रंडी के नाच की रस्म बन्द कर रहा हूं...।..'अपमानित मोतीवाई और अवाक् दोस्तों को हतप्रभ्र छोड़कर हरभजन अपने शयन-कक्ष में जा घुसे और चौधराइन को सेज पर खींचकर जो द्वार बन्द किया तो दूसरे दिन सवेरे ही खोला। कृष्णा चिलमन की अोट से वह सारे दृश्य देखती रही थी । जब -सवेर' होने लगा, और हरभजन होश में आने लगे तो धीमे से बोली -'सुनो जी, मैं तो मूरख हूं, पढ़ी-लिखी भी नहीं, ऐसा कोई गुन भी नहीं मुझमें फिर पता नहीं क्यों, सारी सामर्थ रखते तुम मुझपर ही मरे जाते हो । चौधरी खानदान के मर्द हो, एकाध शोक कर भी लो तो क्या ..'मर्द को कोई दोप नहीं लगता 'न मैं बुरा मानूंगी क्यों मारते हो अपना मन ..?' कृष्णा अपना कथन पूरा कर भी नहीं पाई थी कि हरभजन ने तड़ से एक थप्पड़ उनके कपोल पर जड़ दिया, पांचों उंग- लियां साफ उभर आई. कृष्णा सिसकने लगी थीहरभजन कुछ देर क्रोध से थरथर कांपते रहे, फिर उसी थप्पड़ वाले कपोल को बेतहाशा चूमने लगे 'माफ करना चौधराइन । तीन बेटे जनकर भी तुम पगली ही हो''मुझे समझ नहीं पाई."समझोगी भी नहीं"शायद समझ सकती भी नहीं लेकिन, आइन्दा ऐसी बात की तो इतने थप्पड़ लगाऊंगा कि...' और 'कृष्णा को अचानक सब कुछ समझ में आ गया .''थप्पड़ से चुम्बनों तक का वह अद्भुत 'अर्थ' सचमुच कृष्णा की समझ में पा गया। हरभजन उनके सात भांवर वाले पति परमेश्वर तो थे ही "उस घटना के बाद जन्म-जन्मान्तर की कामना वाले अपूर्व हो गए। भोर की किरनों के साथ कृष्णा की सिसकियां तेज हो गई...'क्या ज्यादा चोट लग गई चौधराइन । मैं भी कैसा कसाई हूं.'कितने । । ५२ / सलीव पर घोर मा थप्पड़ सगा दिया इन फलो गातों पर "माफ कर दो मुम, माफ कर दोहरभजन, कृष्णा के मामू माने होठी में पोंछ रहे थे--- 'तुम कम मूरण योड़े ही हो जो, जो इतना भी नहीं समझते कि ये दुग के नही, गुग के प्रांमू है"इस दूमरे गाल पर भी एक पापड़ जोन जी।' महतो कृष्णा भोगुनी से नहाई हंसी हंस रही यो" हरभजन भी हंस पठे-~~-'मरे बाप रे ! मेरी भोली चौधराइन को इतनी भाल है, मच- मुच में भी पहा जानता था।' मोर भोर के फूटते उमारा में पीपरी दम्पति के तन-मन भी एक भपूर्व 'उजास' से नहा गए। वह 'उजाग' ऐकान्तिक प्रणय की थी, तन-मन की एकमात्रता की.. समपंग मोर स्वीकार की, मतेपन की। । किन्नु, पौधरी की नियति में भी एक मभिशाप पषित पा। बच्चे होते, मर जाते । चौधराइन चार पुत्री को जन्म दे चुकी थी। ये गोरे, स्वस्थ, हंसते-गेतते शिशु तीन वर्ष के होते न होते, पपृत रोग से प्रस्त होते. पोले पहते-पडतं भा भूद लेते । मी धार शिशु-देही को मफेद कफन में लपेटकर गाव की नदी में प्रवाहित करते पौधरी प्रार्थना करने लगे थे~~ हे विधाता यदि छीन ही लेना है तो देते क्यों हो। इसमें मो मुझे निम्मन्तान ही रहने दो। ये पार गिरा-मुर, जिनके नाम चौधरी-चोपराइन ने मिलकर राम, सहमण, भरत, नुन रगे थे, उनकी मांगों में पपराकर रह गए । बोपरी गे सिपरपर वृष्णा मिसरती, तो पौधरी उन्हें दादों से मास्यस्त भी नहीं कर पाते, यल एक निन्द प्रालिंगन में बस लेते । ये पुरुष थे, मागू पो साने पे, पी भी मते थे, रिन्तु उनके ये पिए गए मामू उनकी नगी में जहर बनकर धुलते उन्हें मारने लगे थे। पौधराइन पाचयी बार गर्भवती हु तो घोपरी के होठों पर न यो प्रार्थना शेष थी, न भागों में कोई कामना । वे मौन, पप, पापर- से प्रतीक्षा करने सगे मिफिर मिग-मुग पोपराइन की गोद में चाद-मा चमकेगा, नन्द-नन्हे हाथ-पाव उपलता रिसोगा, पोपरी में लिपटेगा, तोतली बोली में गरमी को मपने प्रपं दंग माधुनिक/५३ •"पानी' को 'मम्मम्' कहता था, लक्ष्मण 'दूध' को 'ताता"। एक दिन शायद दूध कुछ गरम था और लक्ष्मण के होंठ जल गए थे.''वह देर तक रोता रहा था 'चौधरी उसे गले से लगाए, पुचकारते, वहलाते कहते रहे थे-'तत्ता था वेटा तुम्हारा दूध, हम दूध को मारेंगे।' फिर उन्होंने वाकी बचे दूध का गिलास उठाकर पटक दिया---'लो दूध को मार दिया ।' लक्ष्मण हंसने लगा था-~'तत्ता को माल दिया।' उस दिन से 'ताता' का अर्थ लक्ष्मण के शब्द-कोश में दूध बन गया था। ऐसी जाने कितनी भोली, निर्दोप, शिशु-स्मृतियां चौधरी-चौधराइन की आंखों में कौंध-कौंध जातीं। चौधराइन की आंखों में उस विद्युत् के साथ वादल भी उमड़ते बरसने लगते । चौधरी उस विद्युत् की तड़प को कलेजे में उतार लेते, जहां ऐसी विजली गिरकर सब कुछ राख हुआ । जाता पांचवां शिशु भी पुत्र था । कंजी अांखें, सुनहरे बाल, झक् गोरा रंग, किन्तु गोरा गदवदा नहीं, दुबला-पतला शिशु सतमासा ही जनम गया था। 'चलो इसके जाने की अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।' चौधरी ने अपने पथराये मन से कहा। किन्तु "जाने किस विचित्र विधान के अनुसार जहां चार-चार स्वस्थ गदबदे शिशु चले गए थे, वह मरियल सतमासा टिक गया। चौधरी ने पांच वर्ष तक उसका नाम भी नहीं रखा । पांचवें वर्ष में मुंडन-संस्कार के साथ नामकरण भी किया- ‘सुवीर। एक आधुनिक नाम । चौधरी के विवाह से सुधीर के पांच वर्ष का होते तक, समय द्रुतगति से आगे बढ गया था, संसार बहुत बदल चुका था, 'आधुनिक' हो उठा था। चौधरी ने इसीलिए अपने टिक गए पुत्र को एक प्राधुनिक नाम दिया~~'सुधीर' । प्रतिदिन, हिन्दी का श्रेष्ठ समाचारपत्र ध्यान से पढ़ते चौधरी संसार की मारी गतिविधियों की यथाशक्ति जानकारी रखते । पढ़ते-पढ़ते चश्मा उतारकर रख देते, मसनद से टिककर अांखें मूंद लेते, सपने देखने लगते ..."कि उनका बेटा सुधीर अग्रेजी पढ़ने-बोलने लगा है ऊंचा अफसर बन गया है. फिर शहनाइयां बज रही है, और एक सुधीर के जोड़ की ही प्राधुनिक सुन्दरी युवती वधू वनी उनके प्रांगन में, डोली से नहीं, मोटर से उतरी है । मुधोर पो ये मोटर शरुर देंगे। पय ग उभा घंटा, उनरी तरह सागे में पमेगा...? पीपरी ने गात वर्ष के गुधीर को पार थे. परिणः गगन भरती करवा दिया, जहा यः माभान्त, ऊमे प्यक्तियों की माने। फिन्तु सात वर्ष के गुपौर यी मनी प्रती गं जिन गानों में प्रतिविम्य झलकने लगे थे, ये निषि नही थे । गुपीर गुमे गाल पर बैठी पहाती चिडिया को निशाना बनाता, उमका निशाना सकता। चहकती मिडिया, रका मे लथपथ होकर गिर पटनी, पानी, जाती। 'यो मारा' यस्ता सुधीर रक्षारा सगाना । चौधरी की प्राण गम हो पाती-'नही बेटे, निषि जीको पोल्या मी माता है।' गौधरी ने यचपन मे फेयर मिनीव पनगा वो बाटो पाnि पेल गेला पा""यो वाटा''यालक पौधी पानं । बटा गुधार, राजीय पक्षियों के प्राण सेंते, पोगना मी रहा --'यो मारा...' गुधीर फिर में निगाना गाने पूछना---' पर मगता है. मारता है, मारगा।' दो बार एंगी पटनापो पोर गुधीर के उदंड उपग के परमात पाप ने तड गे मुधीर वो तमाना जरने गुगम सारका फेक दी। गमापा 'पार, उन्हें जलनी दृष्टि में दंगता गुधीर पर पटपमा घना गया। नगर नि उमये हापों मे नई गुमेन थी, उगने मा की पूजा वागी गुण पंग मुराए थे, नई गुग में पापा पा-भीगार पर पा--- भी मेरी विनी गुलेमें मोल है पाप ?' पोपरी पगान ग मगनद पर मुक गए 4.-'भसा जा पाया, मेरी पांगी मामले में, पौर मिपा मार।' गुधीर विपी-गा और गया था। पोषणमा परी पं. गमान गर्ने गरी ६ पटपटार। पानी पोट कोमा रहे, पं.."गुधीर नो पा...दिनु पोपर्गमा गत भीमाने मांगन ने प्रोपरगनीमाता- 'गोरगी होगभी मामा भीर, बराहमा, न पीनी प्रामा- समान माग -- देगा। पायनिय | ५, से पैसे चुराए बेटा है। राम का बेटा रावण नहीं हो सकता जी। बात मानो। दिल छोटा मत करो। पाने दो कमवखत को, पूजा की गुल्लक हैं न, आज मैं भी पीढूंगी।' किन्तु थप्पड़ मारने के लिए उठी मां की कलाई को सुधीर ने पकड़ लिया-'तुम मुझे क्या मारोगी मां, पहले हाथ छुड़ाकर तो देखो।' कृष्णा सचमुच सुवीर की पकड़ से हाथ नहीं छुड़ा सकी थीं । दुबले-पतले सुधीर की हड्डियों में शायद वज्र की-सी शक्ति थी। 'अच्छा वावा, जाने दे, तू जीता, मैं हारी, अब हाथ तो छोड़।' सुधीर ने हाथ छोड़ दिया- 'याद रखना मां, मुझमें तुमसे ज़्यादा ताकत है । हां, अभी पिताजी मुझे पीट सकते हैं, ज़रा बड़ा हो जाने दो फिर उन्हें भी देख लूंगा।' वेटे के शारीरिक बल पर कृष्णा को गर्व नहीं हुआ, लज्जा हो पाई। वे सारा प्रसंग, प्रांसुओं के साथ, चौधरी से छिपा गई । सुधीर तो 'जी' गया था किन्तु चौधरी और चौधराइन के सन्तान से सम्बन्धित सपने फिर भी मरने लगे थे और उन 'सपनों की मृत्यु को चौधरी दम्पति एक-दूसरे की आंखों में देखते भी, शब्दों में छिपाने लगे थे। सात वर्ष का सुधीर शहर के पब्लिक स्कूल में पढ़ने भेज दिया गया था। माता- पिता से अलग होते वह एक बार भी तो नहीं विचलित हुअा था। अकड़ता तांगे में बैठने बढ़ा तो चौधराइन ने प्रार्द्र कंठ से आवाज़ दी-'सुधीर, वप्पा के पैर तो छूता जा ।' यन्त्रचालित-सा सुधीर लोटा, चौधरी के पैर छूए, 'लो तुम्हारे भी छू लेता हूं ।' कहता मां के पैर भी अनछुना-सा छूता, बढ़कर उछलकर तांगे में बैठ गया''वह कंजी अांखें झपकाता, विदा देने खड़े चौधरी-चौधराइन को देखता एक निर्मम हंसी हंस रहा था- विलकुल वैसी जैसी वह चहकती चिड़िया को गुलेल का निशाना बनाकर, रक्त-रंजित तड़पती देखकर हंसता था."चौधरी-चौधराइन के सपनों के विहग भी तो रक्त-रंजित हो उठे थे "उनका अपना खून ही, उनकी भावनाओं पर पत्थर फेंकता, उन्हें खून से लथपथ किए दे रहा था । -- सामने खड़े छतनार नीम पर दृष्टि निवद्ध किए चौधरी हरभजन की प्रांखों में पुत्र सुधीर के अनेक रूप वन-मिट रहे हैं-यद्यपि उन रूपों ५६ / सलीव पर में बालक युवा होते मुधीर पी भवम्या मोर स्पिनियों का पता रहा है किन्तु मुधीर की पंजी मांगों का पूर रंग उनमें गरमा भग रहा माया है। निम वर्ष भुपीर हमा था, चमी वर्ष घोपरी नै होली रे महाने में यह नीम ठीक अपनी बैटक के मामने रोजा पा । मुपीर मोर नोम दोनों पच्चीम यों के हो गए । उ नौम अपनी जगह गा-गहा पोपरीके दुःस-दो, उतार-चढ़ाव का मूक साक्षी बना रहा । चेतन गुधीर, मति मानवीय चेतना या एक स्पन्दित रूप मुपीर उनका अपने रक्त भोर मांस का एक प्रतिरूप, उनरा एकमात्र पुत्र पिता के सारे संघर्ष गौ, माग्थानों यो, नकारता रहा। चौधरी को अपने बेटे मे यह नीम पादा सपना लगता है । घंटों चुपचाप बंटे चे उमे निहारा करते हैं। नीम पर पूप 'घनती है, उत्तरती है। नीम की छाया सम्बी-छोटी होती है. "पंत में मोम मलता है तो कई सोधी गन्य मे चौधरी की मां भर उठनी है। पोपराइन नीम के फूलों को सुखाकर तलती हैं, पूरियों के साय पीपरी को सिलाती हैं। हाथ के कोर में पूरी के टुर में नीम के पून मरे चौधरी उस कौर को निहारने लगते हैं तो पृष्या हम पाती हैं-'मजी गाभो न । उसे देख पा रहे होमपना नीम तो ऐमा फूलता है जमे गाव-भर में और कोई नौम नहीं.. पोर तुम भी तो मत्रीच हो, तुम्हें इसके ये बड़ए फल मिठाई में स्यादा भाते हैं, पों" पौयरी पुछ कहते नहीं, चुपचाप खाने सगते हैं, फिर दुका पोते, ममनद में टिके उम नीम को एक्दम तब तक निहारते रही है जर तक पना ही न झापा जाए। मार्ग गलती है तो फिर नीम मामन होता है "पाय । सुधौर के स्थान पर यह नौम उनका पुत्र होता" पोपरी इस मसमय पल्पना पर हम पहते हैं...फिर वह हंगी एर दीपं निवास बन जाती है। मुधीर दो वर्ष पूर्व इंजीनियरिंग पी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिता पना गया था। पौधरी वा सपना एक सीमा तर मम हो परापा। कंत्री पासो, सुनहरे बालों वाला उनरा मति गौरय पुन, पूरा माहर चन पुरा पा! एमी फरटिदार अंग्रेजी बोसता पा रिपोरे पर पाए मापनिर/५७ कलेक्टर और मिनिस्टर तक चौधरी को बधाई देने लगे थे.---'पापका बेटा जल्दी ही किसी ऊंचे पद पर होगा।' ऊंचा पद..? चहकती चिड़िया पर गुलेल से निशाना लगाता, उसे तड़पता देखकर अट्टहास करता सुधीर चौधरी को याद आ जाता। उन्हें लगता, गुलेल के स्थान पर सुधीर के हाथों में उन्होंने भरा रिवाल्वर ही पकड़ा दिया है। क्या सुधीर अपनी सामर्थ्य का उपयोग ठीक से कर पाएगा'कहां? सुधीर के 'उचित' चौधरी के 'उचित' से एकदम अलग हैं-एकदम विपरीत । सुधीर अपने हर 'उचित' को, कार्य को 'अाधुनिक' अर्थात् 'द माडर्न वे ऑफ लाइफ' कहता है । बीच-बीच में जब भी वह अल्प समय के लिए गांव पाता, चौधरी को नये घाव दे जाता-'पापा ! • "वप्पा नहीं कहूंगा, इट्स जस्ट फुलिश. ''पापको मालूम है, ज़माना कितनी तरक्की कर चुका है। आज आदमी चांद पर पहुंच गया है। 'स्पेस में चक्कर काट रहा है। हो सकता है तीसरा विश्वयुद्ध स्पेस अर्थात् अन्तरिक्ष में हो । आह, मज़ा आ जाएगा।' युद्ध 'युद्ध'युद्ध"रक्तपात "विनाश की कल्पना करते सुधीर का अट्टहास चौधरी के कलेजे में गुलेल के पत्थर-सा धंस जाता''"उनके स्पन्दनों का विहग रक्त से लथपथ हो जाता । पिता के पाहत मुख को चुनौती-भरी प्रांखों से ताकता सुधीर तीर पर तीर छोड़े जाता-'क्या हो गया आपको ? तबियत तो ठीक है ? कैसे कमजोर दिल के आदमी हैं पापा प्राप, कि लड़ाई के नाम से ही कांपने लगे। आप तो वस गांव के सरपंच बने हुक्का गुड़गुड़ाया कीजिए' सुवह-शाम मन्दिर में जाकर घंटा हिला लिया कीजिए और इस 'राकेट एज' में भी बैलगाड़ी पर ही सवारी कीजिए । सुना, आपके दोनों बूढ़े बैल अभी मरे नहीं ? जितना दाना-पानी उन्हें खिलाते हैं, उतने पेट्रोल के खर्च में एक कार प्रासानी से चलाई जा सकती है। कभी कार में बैठकर देखा है। कार में बैठने का अर्थ समझते हैं ?' 'चुप रहो सुधीर । तुम्हें मोटर ले दूंगा, लेकिन मेरे वैलों को कुछ त वोलो।' चौधरी सह नहीं सके, डांट बैठे । 'अच्छा साहब, नहीं बोलते, अपने को क्या आप बूढ़े अपाहिज ५८ / सलीव पर बसों का ध्या, भादमियों का भी एक पूरा 'जू' बना मीजिए, भाप ग्य उसके मब अच्छे नमूने हॉग ।' मुधीर ने गिगरेट का एक महरा कर सोचकर हिलारन से रहा। 'सुधीर, तू इता पढ़-लिरा गया, तुझे याप में यात करने का मनीरा नहीं पाया। प्रासिर वे तेरे पिता है, उनमें ऐमे बोला जाता है ?'कृष्णा पाहत स्वरी मे डाटती, फिर मिमकने लगती"चोयरी के गिर में सेल मलती गत के नीरय प्रहर में जैसे स्वयं सेवरती-'हे भगवान, यह सच्चई के पर रावण के जनम गया ? विम पाप की गजा दी प्रम्।' राम अमेरिया में मुधीर का पत्र गत माम माया पा""सुना, पापने कोई दृम्ट बनाकर प्रापर्टी की प्रामदनी वा 'वन-पई' दान-पुन के लिए रिज कर दिया है । मुभमें पूछा तक नहीं । मापरी इन येवापियों में चेंज करना होगा। मा रहा हू, पापमे भी अच्छी तरह निपटूगा। पापरे राब युध का उत्तराधिकारी में है, पेयन में। "पौर मुझ मधिगार है कि मैं पपने अधिकारों की रक्षा करू । याद रखिएगा, मुधीर मे पाप जीत नही मग । पापरी दकियानूमी, यपियों के लिए मैं अपने अधिकार, अपने मुग नहीं छोड़ सकता"पाप सीधे मे नहीं देंगे, तो छीन लूगा।' उम पत्र की पूरी वान पौधरी कृष्णा से हिमा गए । गचमुच, उनका पुत्र प्रति भाधुनिक हो उठा था-पुवा मिह-मा हिगर । का सिंह में पाराहारी होने की प्राशा की जा मरती है ? उमे तो प्रवृति ही मामाहारी बनाती है । किन्नु मुधीर पर नहीं मनुष्य है । शाकाहारी या मामाहारी होने या विवेकः उसमे होना चाहिए । घोपरी शिक्षा के नाम पर मपिराधिर शिक्षित होने पुत्र को देग रहे घेरि कंगे यह स्यापों को 'अधिकार' बना मीय गया या 'मानवीय संवेदनामी को मूगंवा वह भारी वैज्ञानिर विजयो को जहना को स्वीपरता छोटे-छोटे पतन जीवन-मूल्यों को नकारना मीग गया पा“उम के पापनिर मुगगी परि- भाषा केवल एक पद पर मेन्द्रित हो गई थी-'स्वर' पर । क्या मुधीर की तुलना में ये बूढे बनो जैसे ही हो गए थे? पापुनिक | ५९ पर परम्परामों का जुना रखे, सारे जीवन एक नियमबद्ध परिधि में घूमते चौधरी क्या सचमुच बैल की ही स्थिति रखते थे? चौधरी को याद आता---'रंडी के नाच की रस्म तो उन्होंने भी बन्द करवाई थी। यह सुधीर तो जैसे मन्दिर के चढ़ावे की रस्म बन्द करने बढ़ रहा है।' चौधरी के सुख की एक परिभाषा बूढ़े अपाहिज हो चुके बैलों की प्राण- रक्षा थी जिसे सुधीर स्पष्ट शब्दों में, जूते मारता-सा उनकी 'मूर्खता' कहने लगा था। अपने दोनों बूढ़े बैलों को सहलाते, चौधरी कल्पना में स्वयं को तीसरे बूढ़े बैल-सा देखने लगते.."जिन्हें मार दिया जाना चाहिए कि व्यर्थ दाना- 'पानी के खर्च के स्थान पर कार ली जा सके। चौधराइन कहती- 'सब ठीक हो जाएगा जी । मैंने सुधीर के लिए ऐसी सुन्दर दुलहन देख रखी है कि, सुधीर उसे देखते ही कावू में प्रा जाएगा. मैंने तो बात भी पक्की कर ली है।''वस, उस बन्दर की नाक में नकेल पड़नी ही चाहिए''अरे, औरत का वसीकरन तो अच्छे-अच्छों को बांध लेता है । अरे, लड़की क्या है, चांद का टुकड़ा है। हंसती है तो फूल झरते हैं."विलकुल मेम जैसी गोरी...! दसवीं तक पढ़ी भी है। सुधीर को ज़रूर पसन्द आ जाएगी।' हां, अव यह अन्तिम 'अस्त्र' ही तो है, चौधरी-चौधराइन के हाथों में कि वे अपने बेटे को जीत सकें । 'ठीक कहती है चौधराइन, औरत का बसीकरन अच्छे-अच्छों को वांध लेता है।' वृद्ध चौधरी की प्रांखों में चौध- राइन का तरुण मुख उभरता."जिसे एकटक देखते वे दीये की बाती उकसा दिया करते थे। और जैसे रात भी विना पलक झपकाए वीत जाती थी। 'सरकार भैया की चिट्ठी आई है। आपको बहुत इन्तजार था न ? 'मिठाई खिलाइए, अाज तो वन्दा मुंह मीठा करवाकर ही जाएगा।' फख- रुद्दीन, उत्साह से हांफता-सा पसीना पोंछने लगा था-'जल्दी पढ़कर बताइए हुजूर, भैया कब प्राय रहे हैं ? एक छोटी-सी मन्नत इस गुलाम ने भी मान रखी है। ६०/ सलीव पर चोपरीने तो हापो में पर ~RRIN निगा या- ससाइनो सार मे एस पोर मार हर मन माइएगा. मैंगुरपार मागा--- ॥१॥ मेरे माप परिसन वाइफ, पापलीहोगी ।। --मुधीर। चौधरी के पापने हापो से पा : गश"uri RR ME नीम पर निराश हो गईजिस जाता मे गुपीर पनि । चौधरी के सतहीन हो उठे पेहरे को देखते पिया सहम गा4m कोई बुरी सार है हजूर?' 'नहीं, ऐसा युछ नहीं...' पोपरी के होड पर IT मसनद से टिक गए थे। पौधरी के मुख पर उभा 20 faital पोडा को स्पष्ट देराता फरारहीन सपने-सा सगा था। 'मच्छा हजूर, पलता है. फिर पाउंगा।' गरिमा गया। चौधरी निश्चल पड़े रहे। 'आज योस है, रविवार गाईगरी सुधीर AREAK माज के दिन ।' उन्होंने पोपरान को तो दरमा पमनाना। चौधराइन के मुग पर पाती पुरको किरण भी माt ऐग टो-टोक्यो योल रहे हो । पेटा जगामार पा .. रहा है तो गुश होना पाहिएन । गो, गो, सम प्राamu सय टीम ही जागा देगा' टीम प. गगन घड़ाने बा भी इलाम पर एक या भागा।' चौधराइन अपने ही ममा पानी पीनाम पर बाप रही पी."मरावती, Trimum | जानी "नही पौषगान, गुपी Mgarfi wifey ..."ट पिन माना। पोरगी पानीr tiwari पर.टी या गraneRITrut माटhvaran man vmgarh .
- था'चौधरी-चौधराइन जाने कितनी देर अचेत-से रहे 'फिर चौधराइन ही उठी. "अभी आती हूं।' कहती चली गई. 'जाते-जाते चौधरी का आंसुमों से भीगा मुख अांचल से पोंछती गई थीं। तुलसी के चौरे पर दीया जलाती चौधराइन ने नहा-धोकर प्रारती उतारी-सीताराम की एक प्रतिमा आंगन में स्थापित थी। फिर सारे 'घर को महरी की सहायता से दीया-बाती से आलोकित किया ढेर से दीपक जला दिए.."घर जगमगा उठा। आरती का थाल लिए वे 'चौधरी के निकट पाई.. "सुनो जी, लो पारती लो, प्रसाद लो । क्यों हलकान होते हो । अव अंग्रेजी पढ़ा-लिखा बेटा मेम ही तो लाएगा। चलो, अच्छा हुग्रा । सुधीर ने ये जिम्मेदारी खुद ही पूरी कर ली । और लोकापवाद से काहे डरते हो। पंचायत और पूरी बिरादरी को भेज देंगे। प्रायश्चित्त हो जाएगा बस । फिर आंगन में मेम बहू के गोरे-गोरे वेटी-बेटे खेलेंगे 'देस की न सही, सात समुद्र पार की सही, सुधीर को दुलहन इस घर की बहू ही तो है।' चौधरी अवाक थे । चौधराइन''यह भोली-भाली कृष्णा, मांग में ढेर-सा सिन्दूर भरने वाली, वर्ष में जाने कितने निर्जल व्रत-उपवास विना उनके अर्थ समझे-जाने रखनेवाली, परम्पराओं और रूढ़ियों को चुपचाप गरदन झुकाए निभाती जानेवाली, चौधरी के अंगूठे को छुआकर प्रति प्रातः जल का नियमपूर्वक प्राचमन ग्रहण करनेवाली, सहसा इतनी साहसी, इतनी विवेकशील, इतनी अाधुनिक हो उठेगी,'''चौधरी अवाक् थे, स्तब्ध' 'किन्तु प्रसन्न भी। चौधराइन ने उनके अंधेरों में भी दिये जला दिए थे । सच में जमाना कितना बदल चुका है, आदमी धरती से चांद पर पहुंच चुका है क्या हुअा जो सुधीर मेम बहू ले आया । वे सम्पन्न हैं 'प्रायश्चित कर लेंगे 'वस । चौधरी हलके होकर उठे, चौध- राइन को गले से लगा लिया---'अरे बाप रे ! मेरी भोली चौधराइन को इतनी अकल है, सचमुच मैं भी कहां जानता था।' वर्षों पूर्व का वह वाक्य दुहराते वृद्ध दम्पति, जैसे एक अग्निपरीक्षा की लपटों के बीच फिर एक हो उठे थे । एअरपोर्ट पर चौधरी, हाथ में छड़ी पकड़े एक कोने के खड़े, आकाश ... समृद्ध हैं, ६२ / सलीव पर के विस्तार को निनिमेय देख रहे थे । अभी इसी विस्तार में से उनका बेटा उतरेगा, उनका उच्च शिक्षित पढा-लिखा सभ्य, सुसंस्कृत, सुयोग्य पुत्र सुधीर ! -'देखिएगा चौधरी साहब, प्रापका वेटा, जल्दी ही किमी ऊचे 'पद पर पहुंचेगा।' उनके कानो में गूंज रहा था। " आकाग के नीलाभ विस्तार में एक हवाई जहाजविन्दु-सा उभरा ..."वह विन्दु धरती के निकट प्राता बडा होता गया. "घरती पर तीन गडगडाहट के साथ उतरकर स्थिर हो गया। यात्री उतरने लगे थे। चौधरी ने जल्दी-जल्दी जेव से निकालकर चश्मा लगाया । शिराओं 'मे कापते पावेग को नियन्त्रित करते यात्रियों को देखने लगे-'वह''वह रहा सुधीर । सचमुच गजव का हो गया है। अब तो दुवला-पतला भी न रहा । खूब हृष्ट-पुष्ट हो गया है। काले मूट में कैसा फच रहा है--बिलकुल अफसर जैसा । और वह 'शायद उसकी अमेरिकन दुल्हन है ।' चौधरी ने संकोच से नजरें झुका ली। प्रागे बढे, रक गए'' 'सुधीर स्वयं उनकी अोर पा रहा था। 'मैंने प्रापसे मना किया या न यहा पाने के लिए, फिर क्यो पाए उनका साह्य वेटा प्रा तरेरता पूछ रहा था, सुधीर की एक माह मेम बहू की कमर को घेरे थी। दाहिने हाथ की उंगलियो मे पाइप दवा था। मेम बहू ने शायद अग्रेजी में पूछा था-'यह कौन है ?' मुधीर उससे मह रहा था-'जस्ट ऐन प्रोल्ड सर्वेण्ट प्रॉफ पावर हाउसहोल्ड ।' 'सर्वेण्ट'.. नौकर...। चौधरी इतनी अग्रेजी जानते थे उनके कापते हाथ से छड़ी गिर गई थी । 'सुधीर बेटा।' उनके कापते कठ से निकला "उनकी प्रासुप्रो से धुधली हो उठी माखो में धरती-पाकाश कापने लगे थे। 'तुम चले जानो, मैं जल्दी ही गाय पाऊगा।' कहता सुधीर बिना मुडे देवे, पाइप के करा लेता, मेम बहू को लचकती कमर को बांह से “धेरे, बढ़ गया था। बापते चौधरी स्थिर हो गए थे । वर्षों बाद एक जकड़न से मक्ति माधुनिक / ६३ का अहसास उन्हें एकदम हलका कर गया था-उनकी बूढ़ी, असभ्य परम्परावादिनी अांखों में तो अब भी किसी 'सत्य' का सामना करने का साहस था ! किन्तु उनके युवा, सुसंस्कृत, शिक्षा की ऊंची डिग्री प्राप्त कर लौटे आधुनिक पुन में उन्हें मुड़कर एक नज़र देखने का साहस भी कहां था? ६४ / सलीव पर अभिशप्ता खिड़की की राह पूनम की चांदनी कव कमरे में उतर आई, मानो पता भी न चला। वह उत्तर-पुस्तकों पर मनोयोग से जुटी हुई है। इस बार परीक्षा का खासा काम मिल गया है उसे । करीव पाच सौ इन कापियों के मिल जाएंगे और पार्ट टाइम के भी पांच सो मिलेंगे। पिताजी कह रहे थे कि इन हजार रुपयों से मानो के लिए एक कमरा ऊपर बनवा दिया जाए तो मानो को सुविधा रहेगी। ऊपर के एकान्त में एक कमरा .."पिता कमरे की बात करते ऐसे तृप्त थे जैसे मानो के लिए भी किसी विशेप तृप्ति की बात कर रहे हों। किन्तु मानो सहसा चुप हो गई थी। ऊपर एकान्त कमरे में वह क्या करेगी, एकान्तवास ? भीतर का पालोड़न मांखों से न झांक उठे, इसलिए मानो ने मांखें झुका ली थी पिता ने इसे मानो की मौन तृप्ति-सहमति समझा होगा"मानो उस पालोड़न को छिपाती उठ पाई थी। मानो'मानो दी ! स्कूल में लड़कियां उसे 'मानो दो' कहती हैं, घर पर बहनें । यहां तक कि पिता भी उसे 'मानो दो' कह बैठते हैं । कल ही जब वह स्कूल से लौटी थी तब पिता लेटे अखबार पढ रहे थे। उसे देखते ही झटके से उठ बैठे, 'मा गई मानो दी ! क्या बहुत थक गई भाज ?' 'मानो दी'.."मानो को लगा उसका अस्तित्व 'मानो दी' का ही रह गया है । वह दीदी है--स्कूल में लडकियों की, घर मे चार-चार बहनों की, पिता की, मां की! कितना सम्मान है उसका ! पिता तक उसके सम्मान में उठ बैठते हैं । मा उसका बखान करते नहीं थकती और उसकी बहनों के रिस्ते उसके इसी सम्मान के कारण मनायास हुए जा - रहे हैं। पिछले वर्ष ही तो उसकी तीसरी बहन का रिश्ता मांगने जो सज्जन पाए थे, गद्गद होकर कह रहे थे-'लड़की मानो दी की बहन है, फिर क्या पूछना! मेरी लड़की मानो दी की छात्रा है, बता रही थी कि मानो दी की जैसी न कोई टीचर है, न हो सकती है ! फिर वहन को लिए मानो सामने आई थी तो सब उसकी अभ्यर्थना में उठ खड़े हुए थे । एक टीस-सी उठी थी मानो के मन में । बहनों का विवाह करती, एक प्रकलुप चरित्र का यश अजित करती, माता-पिता के बुढ़ापे को सुखी करती, वह स्वयं कितनी अकेली हुई जा रही थी इसे कौन समझता है...? मानो ने आखिरी कापी जांचकर बन्द कर दी। बिजली का चौंधि- याता प्रकाश उसे असह्य लगने लगा । कभी-कभी आंखों पर चश्मा चढ़ाए जब वह घंटों लिखती-पढ़ती रहती है तब उसे चश्मे का वोझ भी असह्य लगने लगता है। उसका जी चाहता है चश्मा उतारकर तोड़ दे और अपनी नैसर्गिक बड़ी-बड़ी प्रांखों से संसार को देखे, छुए'''और इन्हीं बड़ी आंखों के माध्यम से किसीकी प्रांखों में खो जाए.'' चार वर्ष पूर्व मानो ऐसे ही खो गई थी''वह वस-स्टाप पर रोज मिलते थे, फिर वस में निकट बैठने लगे और फिर' 'जव भी मानो को वे क्षण याद पाते हैं मानो एक असह्य दर्द से छटपटाने लगती है. कोई नहीं जानता कि यह दर्द उसके पोर-पोर में भिद चुका है"कैसी यन्त्रणा है यह, जो 'दे पाने' की इतनी तुष्टि के बाद भी उसे निरर्थकता के दंश से क्षत-विक्षत किए देती है और अब मानो को प्रांखों में प्रांगू नहीं पाते, केवल उन बड़ी प्रांखों में क्षितिज तक फैला शून्य झलकता रह जाता है। मानो ने वी० ए० किया ही था कि पिता लकवे से ग्रस्त हुए। वह ठीक तो हो गए, किन्तु काम-काज के अयोग्य होकर । मां, चार बहनों और असमर्थ पिता ने मानो की ओर जीवन-दान मांगती याचना-भरी दृष्टि से देखा "मानो को वे दृष्टियां याद हैं-मां फूट-फूटकर रोई थी, पिता की प्रांखों में प्रांसू नहीं थे, किन्तु दृष्टि इतनी करण थी कि स्वयं मानो की प्रांस में प्रांसू आ गए थे । सुपमा और सरिता ने मानो की ६६ / सलीब पर गोद में मुख छिपा लिए थे। मानो ने तुरन्त मर्विस भर ली । यी० एड० भी किया और इतना कमाने लगी कि परिवार जी मके। मानी का रिश्ता तय हो चुका था । गजातीय वन्धु ने अपने इंजी. नियरिंग पढ़ते लड़के के लिए मानो को मागा था । लड़के को गाने मानो की सुकोमल अंगयप्टि, स्निग्ध मुख और बड़ी-बड़ी प्रांसी की बलाएं ली थी। मानो को मा से मानो की भावी सास ने कहा था-' और कुछ नहीं चाहिए । वस. यह लक्ष्मी-सी बेटी दे दीजिए.." अपनी मां के पार्श्व में बैठा मानो का भावी इंजीनियर वर उगे कनखियों से छुए ले रहा था। मानो के कपोल इतने पारवत हो उठे थे कि घर मी वहन कह बैठी थी-'पाप गालों पर रंग बहुत अच्छा लगाती हैं !" मानो और मकुचा गई थी. किन्तु उसने लक्ष्य कर लिया था कि भावी वर की आखो में उसके पारका कपोलो का रंग मिलमिला उटा है ! वे पाखें मानो के मन में ग्राम तक कौंधती हैं ! अपने उम इजीनियर पर को वहन मुपमा के लिए त्यागले मानी एक बलिदान के गौरव में तृप्त हो रटी थी। अब उमका व्याह तो इतनी जल्दी हो नहीं सकता, परिवार की एकमात्र अनिंग मेम्बर' वही वो थी । किमके भरोसे हॉड दे दन याचना-भरे मुवो को ? कर्तव्य पालन के गौरव से मानो इतना उठ गई थी कि कन्यादान के समय उगने उस इंजीनियर वर के मस्तक पर प्राचीर्वाद का हाथ एक्दम महज होकर रख दिया था। मुपमा रो विदा के दाद मा ने मानी को अपने वक्ष में कमकर नीच लिया था-'मानी, नुने उनकर मैं धन्य हुदै ! भला कौन ऐसी लहकी होगी बेटी, जो मुना-मुमो इतना त्याग करे !' और मानो को लगा या उस त्याग की कीमत मिल गई है। फिर मरिता और मीरा के व्याह हुए, पद वो केवल प्रनिता वत्री है." चची दो मानी भी है"किन्नु मानो के सम्दय में सोचने की प्रावधाना शायद कोई नहीं महसूस करता "मोरा के विवाह के बाद पिता एकदम ने गद्गद हो ॐ --मानों टीनू द्रो मचमुच देवी है। देवी..? हा देवी ही दो "मानी ने प्रानी नरल होती प्रादे ना ली थी। देवी ! प्रस्तर-प्रतिमा! दी दान देती ही रहती है, तो नहीं लेकिन का वह प्रनिगया।
वाकई प्रस्तर-प्रतिमा ही है ? अपने हाड़-मांस के अस्तित्व से उठते चीत्कार को झेलती मानो रातों में देर तक विस्तर पर करवटें बदलती रह जाती... सवेरे उठती तो देखती मां ने उसके लिए अलग से ज्यादा दूध डाल- कर चाय बनाई है। अनिता दौड़कर गुसलखाने में उसके कपड़े और गरम पानी रख पाती है । पिता बार-बार कहते हैं-'मानो, मानो वेटी, अाज कब तक प्रायोगी? बहुत काम न किया करो, मुझे दुख होता है।' मानी ने कई बार इस 'दुख' को परखना चाहा, फिर अपने आपको डांट दिया-अच्छी लड़कियां मां-बाप में दोप नहीं देखा करतीं। मानो देखती है, मां उससे अतिरिक्त ही स्नेह करती है। पिता उसके लिए विशेष रूप में चिन्तित रहते हैं और बहनें उसे उस देवी-सा पूजती हैं जिसने उन्हें जीवन-दान दिया हो । देवी...? हां, देवी ही तो। मानो का त्याग, मानो की गरिमा, किसी देवी से कम नहीं लेकिन मानो अब इस देवीत्व को झेल नहीं पा रही.."उसे लगता है उसके धड़कते हृदय को यह देवीत्व अपने पापाणी बोझ से रौंद देगा'"उसके होंठ कांपने लगते हैं, लगता है इन होंठों से वह चीत्कार फूट पड़ेगा, जो उसके हृदय में घुट रहा है. 'देवीत्व का गौरव और अभिशप्ता की नियति "वह एक विद्रूप का द्वन्द्व झेलती टूटने लगी है। चार वर्ष पूर्व प्रशान्त को अपनी उन बड़ी-बड़ी आंखों में भरती मानो को लगा था, वह भी अपने जीने का सहज अधिकार मांग रही है । इस मानवीय मांग और उसकी अपेक्षित तृप्ति के सपने देखती मानो उन स्पन्दनों से भर गई थी, जो उसके तन-मन में फूल बनकर खिल उठे थे । मानो को लगता था उसकी सांसें महक उठी हैं, ऐसी गन्ध से, जिसके विना किसी नारी का अस्तित्व सार्थक नहीं होता''वे फूल''वह गन्ध ...! मानो उस गन्ध में वेसुध होती इसके पूर्व ही वह गन्ध उससे छिन गई थी। उस सांझ गोमती किनारे के एकान्त में प्रशान्त ने उसे निकट खींच लिया था-'अब मुझसे और प्रतीक्षा नहीं होती मानो ! हमें एक हो जाना चाहिए...' मानो के तीस वर्षीय अछूते अंगों में प्रशान्त की छुअन ६८ / सलीब पर से प्रादिम पाग जाग उठी थी, मानो ने प्रशान्त के वक्ष पर सिर टेकते अांखें मूंद ली थी." "तुम जव चाहो हमारा विवाह हो सकता है...' मानो का सिर प्रशान्त के वक्ष पर टिका ही रहा और वे भावी जीवन की योजनाएं बनाने लगे। प्रशान्त कह रहा था -'तुम्हारे चार सौ और मेरे भी चार सौ, काफी होगे एक सुखी जीवन के लिए, अय देर किस बात की।' मानो को झटका-सा लगा । चार सौ तो उसको पूरी तनखाह है । चार सौ पूरे वे ही खर्च कर लेंगे तो पिता, मा और वे दो बहनें कैसे रहेंगी? T-'लुक मानो ने प्रशान्त के वक्ष से मिर हटा लिया, नासकर उसके हाथ पकड़ लिए, मानो का स्वर लड़खड़ाने लगा था-'न प्रशान्त, प्राखिर मेरी फैमिली के लिए भी तो मुझे कुछ देना होगा । तुम जानते हो मुझपर ही निर्भर हैं। प्रशान्त मानो की उन बड़ी आँखों में सीधा ही देख रहा हियर मानो, मैं तुम्हारे साथ तुम्हारा सव कुछ चाहता हूं। एक अच्छी जिन्दगी भी जीना चाहता हूं, और एक अच्छी जिन्दगी जीने के लिए पैसा जरूरी है। सिर्फ मेरी तनखाह से क्या होगा? हम ठीक से जी भी न सकेंगे।' मानो जानती थी, प्रशान्त प्रैक्टिकल है। प्रशान्त के व्यक्तित्व की सुलझी दृढ़ता ने ही उसे अपनी ओर खीचा था। मानो ऐसी ही दृढता चाहती थी जो उसकी गरिमा को वाध सके । प्रशान्त जब लम्बे कदम रखता अपनी सोधी चाल से चलता तब उससे कदम मिलाती मानो मुग्य होती रहती "काश ! इन लम्बे-सीघे कदमों से अपनी गरिमामयी चाल मिलाती वह जीवन-भर ऐसे ही चलती रहे 'मानो ने चाहा था। 'प्रशान्त, प्लीज़ अपने प्रेम को इस जरा-सो वात के लिए न तोडो, मानो याचना करने लगी थी। 'तुम इसे जरा-सी बात कहती हो मानो? जानती हो आजकल चार-पांच सौ में क्या होता है ? हम दो बच्चे भी पैदा नहीं कर सकते। और जो बच्चे पैदा हो ही जाएंगे, उन्हें सरकारी स्कूल में पढा-पढ़ाकर अभिशप्ता/६६ - जिन्दगी भी चौपट करेंगे। मैंने कहा न, एक अच्छी ज़िन्दगी लिए आज के युग में काफी पैसा ज़रूरी है।' प्रशान्त का स्वर इतना कटु हो गया था कि मानो रो पड़ी... उसने उस रात मां से सब कुछ कहा और रोती रही थी। मां ने सर कुछ सुना था और विना कुछ कहे उठ गई थी। जो मां मानो का बखान करते नहीं थकती थी, उसी मां ने मानो के आंसू नहीं पोंछे थे- एक अव्यक्त छटपटाहट से मानो देर तक कांपती रही। रात की नीरवता में मानो ने सुनीं, घुटी-घुटी आवाजें । हां मां और पिता ही तो थे- 'मानो के बाबू अव क्या होगा? अभी तो मीरा और अनिता व्याहने को हैं. 'तुम्हारी पेंशन के साठ रुपयों से क्या होगा ?' पिता की आवाज़ और भी घुटी हुई थी-'पता नहीं, इस देवी-सी लड़की का दिमाग कसे खराब हो गया. 'अरे, सारे शहर में तो इसके 'करेक्टर' की चर्चा है।' तो मानो का दिमाग खराब हो गया है...? मानो ने इतने कसकर अपने होंठ पर दांत भींचे कि छलक पाए खून का नमकीन स्वाद उसके होंठों से हृदय तक फैल गया''वह जीने के अधिकार देती रही है, किन्तु शायद उसे जीने का कोई अधिकार नहीं..'। 'देवी-सी लड़की का दिमाग कसे खराब हो गया'..?' देवी''देवी' 'मानो पलंग की पाटी पर मुट्ठियां पटकने लगी थी 'कुछ देर पहले मां के सामने वह आए आंसू अव चाहने पर भी नहीं पा रहे थे. "वह शायद कभी किसीके लिए - केवल 'मानो' नहीं बन पाएगी. वह तो मानो दी है, 'मानो दी' ही रहेगी! दूसरे दिन प्रशान्त को अपने निर्णय की सूचना देती मानो गोमती के जल को अपलक दृष्टि से देखती रही थी''तो यही तुम्हारा निर्णय हैं मानो ! और तुम कहती थीं कि तुम्हें मुझसे प्यार है ।' प्रशान्त के ख पर घिरती रात की-सी स्याही घिर पाई थी। स्वर में व्यंग्य के साथ टने का दर्द भी था। 'अब तुम कुछ भी समझो प्रशान्त, मैं तो तुम्हारी ही हूं, लेकिन और को मंझधार में कैसे छोड़ दूं...?' मानो की दृष्टि नदी के उसं भंवर ७०./ सलीव पर पर स्थिर हो गई थी जिसमें कंकड़ फेंकती, खेलती वह प्रति सांझ प्रशान्त के साथ बैठी रहती थी आज वही मंवर उसे डुबाने लगा था."टीक है, वह तो किसीको मंझधार में नहीं छोड़ेगी, चाहे स्वयं मंवर मे डूब जाए! प्रशान्त ने उसी वर्ष विवाह कर लिया था, मानो के ही स्कूल की एक पौर अध्यापिका मिस कौत से। विवाह के बाद प्रशान्त एक दिन जान- बूझकर उससे एकान्त में मिला था-~'मानो दी, अब तो खुश हैं पाप ? आपने किसीको मंझधार मे नहीं छोड़ा और मुझे भी पार लगा दिया।' मिस कोल से प्रशान्त का विवाह मानो ने ही 'अरेंज' किया था। प्रशान्त का व्यंग्य झलती मानो खिड़की के पार उस क्षितिज को देखती रह गई थी जिसे देखते रहने की नियति शायद उसने स्वयं ही अपने लिए चुन ली थी। केवल प्रशान्त ने ही उसे 'मानो' कहा था और अब वह भी उसे 'मानो दी' कह रहा है"मानो को लगा वह सच ही प्रस्तर-प्रतिमा है, प्रतिमा-जिसे सब पूजते हैं किन्तु जिसे जीने का अधिकार कोई नही देता ! वरदायिनी देवी की अभिशप्त नियति-मानो फिर अपने होंठ कसकर भीच लेती." मानो जान गई है कि किसी शापग्रस्त वरदायिनी-सी वह मंच पर खड़ी रहेगी, और जयघोप के साथ उसपर फूल बरसते रहेगे किन्तु कमरे के निविड़ एकान्त में दो मुजापो का हार उसे कभी नहीं मिलेगा "कभी नही । इस जयघोष के सारे शोर से अधिक मर्मभेदी एक शोर मानो के भीतर भी उठता रहा है । अब वह शोर इतना प्रचण्ड हो उठा है कि मानो चाहने लगी है वह बहरी हो जाए । अपने ही स्वर को न झेल पाने की इस नियति को मानो आखिर कैसे झेले...? लाइट बुझाकर कमरे के एकान्त मे चांदनी के फूलों को अपलक देखती मानो खण्ड-खण्ड होने लगती है."कितने सुन्दर हैं चादनी के ये फूल, जो उसके अंग-अग पर बिछे जा रहे हैं. किन्तु जगाने के लिए हैं, उस कामना की तृप्ति के लिए क्या इन्हें अंजलि में भरा जा सकता है? नही न । ये तो केवल अजलि में भरे जाने की कामना नहीं "कामना अभिशप्ता/७१ तृप्ति 'कर्तव्य' गौरव''मानो कराह कर आंखें मूंद लेती है 'नहीं, नहीं "उसकी इन बड़ी-बड़ी आंखों की नियति धूप ही है'चांदनी नहीं! पड़ोस के शर्माजी के घर से उठता शहनाई का स्वर तेज होने लगा । ग्यारह बजे के फेरे हैं शर्माजी की लड़की मालती के। दोनों बहनें और मां वहां ही गई हैं। मानो भी गई थी। पाशीर्वाद देकर पांच-सात मिनट में ही लौट आई। उसे कापियां निवटानी थीं। और अब कापियां निवट भी गई। मानो ने चाहा एक काम समाप्त हो जाने के हल्केपन के अहसास को वह मन में भर ले लेकिन मन था कि और भारी हो उठा था। मानो प्रांखें मूंदे चुपचाप लेटी है । मुंदी आंखों में वधू वेश में सजी मालती का सलज्ज मुख बार-बार उभर रहा है। बहुत सुन्दर है मालती! क्या मानो कम सुन्दर है ? प्रशान्त ने बार-बार कहा था-'भाग्यवान हूं मैं ! वरना क्या तुम्हारा-सा सुन्दर मुख हर किसीके नसीब में होता फिर प्रशान्त पीर फिर वही दर्द, जो उसके पोर-पोर में झनझनाने लगता है। मां पाती है-~-'अंधेरे में क्यों पड़ी है बेटी ! ले दूध पी ले । आखिर कापियां निवटा ही डालीं।' मानो देखती है, उसके काम निवट जाने से मां कितनी हल्की हो उठी है। काम समाप्त हो जाने की तृप्ति उसको न हो, मां को तो है। ऐसी तृप्तियों को पीती, मानो स्वयं कितनी प्यास से दग्ध हुई जा रही है. कौन समझता है ? मां लाइट जलाती मानो के सिरहाने बैठ जाती है-'सिर दर्द कर रहा होगा, ला तेल लगा दूं।' एका सांस में दूध पीकर मानो फिर लेट जाती है। मां उसके सिर में तेल मलने लगी है। मां चट से एक बाल खींचती है.---'मला! ये भी कोई बाल पकने की उमर है !' ७२/सलीव पर
'हमारे बाल तो मर पो, अम हम पपास की होगhine
को भी नहीं।' मानो को मां को सहानुभूति का
पता
है। अब ऐसे स्वर उमसे सहे नहीं गारो...
मानो मा का हाथ हटा देती है-रहने को गागुभोग पा रही
नीद का अभिनम करती गानो को पगता है, पर ती गई।
कि कल स्कूल भी नहीं जा सयेगी।
• . कोशिश में - - 'गुलबदन प्याज पाठ पाने किलो! नये-नये प्याज पाठ पाने किलो!' अप्रैल की उस गर्म, शोले भड़काती दोपहर को चीरता एक फटा स्वर चीख रहा था । दोपहर के ढाई बजे होंगे। मैं और मित्रा कॉलेज 'टेण्ड' करके निकल रहे थे। कॉलेज से कुछ हटकर, सड़क के एक ओर खड़ा वह ठेले पर रखे प्याज बेच रहा था। 'लीजिए सुनिए मिसेज़ गुप्ता, गुलबदन प्याज पाठ पाने किलो। ये कौन शायर मा गया जो प्याज पर शायरी कर रहा है।' मिमा हंसे- 'और जनाव का हुलिया तो देखिए जैसे 'जू' से छूटकर पाए हों। न, न, आप उसे न देखिए, डर जाएंगी।' मैंने देखा, नाटा कद, बेढंगे हाथ-पैर, भयावह काला रंग, पीले निकले दांत, साही के कांटों-सी बढ़ी दाढ़ी और वे आखें जिनमें वहशियत और अवोधता का विचित्र खेल था। मैंने और ध्यान से देखा। कभी वे अांखें ऐसी वहशी हो उठतीं कि राह चलतों को खा जाएंगी। फिर 'गुलवदन प्याज़' कहती ऐसी मासूम हो उठती जैसे वह प्याज नहीं, फूल वेच रहा हो। हमें देखते ही वह वढ़ा-'प्याज़ लेंगी हुजूर ? गुलबदन प्याज पाठ पाने किलो।' फिर शायद मेरे माथे पर लगी कुमकुम की विन्दी को उसने देख लिया। उस विन्दी को देखते ही धीरे से बोला-'रामजी के लड्डू प्याज़ पाठ प्राने किलो।' मैं समझ गई, वह मुसलमान था और मेरे हिन्दुत्व के प्रागे सिर झुका रहा था-'रामजी के लड्डू प्याज़ आठ आने किलो...।' शायद रामजी के नाम पर ही में प्याज खरीद लूं। उन - क्षणों उसकी वहशी प्रांखो में झांकता धर्म का अहसास कितना मासूम हो माया था । 'नहीं, नहीं हमें नहीं चाहिए।' मित्रा सख्ती से कहते बढ़ने लगे थे। वह बढकर मेरे सामने आ गया-~'ले लीजिए मेम साहब, नये-नये प्याज पाठ माने किलो । आज हो मण्डी से खरीदकर लाया हूं। ऐसे प्याज प्रापको शहर में कही नहीं मिलेंगे। गुलबदन प्याज पाठ माने किलो । सिर्फ आठ प्राने किलो। ले लीजिए न माजी। वोहनी कर दो हजूर । कम्बख्त सवेरे से एक किलो प्याज भी नहीं विका।' वह कहते-कहते दयनीय हो उठा । मैंने देखा, वह साफ झूठ बोल रहा था । प्याज तो कई किलो विक चुका होगा । लेकिन झूठ भी कभी-कभी कितने निर्दोष होते हैं । उसके काले-कुरूप चेहरे पर चिपकी यह दयनीयता इतनी त्रासद हो उठी थी कि मैंने कहा, 'अच्छा दे दो एक किलो। उधर कार मे दे जाना।' मैं स्टियरिंग पर बैठ गई । मिना मेरे बगल में बैठ गए । वह दौड़ता- सा प्याज ले माया था । हाफता-सा प्याज का पैकेट पिछली सीट पर रखता खुदा हो रहा था-'हुजूर, मैंने प्याज़ कागज मे बाध दिए हैं। आपका मोटर खराब नहीं होगा। और घर जाकर ये प्याज प्राप पकाएगी तो इस नाचीज़ को याद करेंगी। और बडी इनायत की सरकार, वोहनी कर दी। सलाम साब, सलाम मा ।' वह एक सांस मे कहे जा रहा था 'सलाम मा' कहती उसको वहशी पास फिर अवोध हो उठी थी। 'अब चलिए', मित्रा हिकारत से उसे देख रहे थे। मैं कार चलाने लगी थी। अब मिश्रा मुझे देख रहे थे--'आपके पास सडा वह ऐसा लग रहा था कि जी चाहा एक स्नंप ले शीपंक दूं, 'ब्यूटी एण्ड द बीस्ट'..' जानवर !' 'जानवर' कहते मिश्रा की लोलुप दृष्टि मेरी नारी-देह के मोहक उभारो पर लार टपकाने लगी थी। 'जानवर''हा, जानवर ही तो, मैंने वक्ष पर नाचल और ठीक करते मित्रा की ओर देखते कहा । 'जानवर' का अर्थ मित्रा कहा समझे ! 3 .. मित्रा सोशियालॉजी मे रीडर हैं, मैं हिस्ट्री में । घर लौटते वे अक्सर कोशिश में/७५.
साथ हो लेते हैं । 'लिपट' की सुविधा से अधिक, उन्हें कोई और लोभ रहता है, मैं जानती हूं। यह लोभ उन अनेक पुरुप-प्रांखों में पशु-सा उछलता रहता है, जिनसे मैं घिरी रहती हूं। जव भी मैंने वोटी पर लार टपकाते किसी चार पैर वाले को देखा है, मुझे पाई दो पैर वाले भी याद हो पाए हैं। दूसरे दिन भी मैं दोपहर के उसी समय कॉलज से निकल रही थी। मित्रा भी साथ थे। 'गुलबदन प्याज...' वह फटा स्वर चीख रहा था। 'गुलवदन तो आप हैं सुमित्रा जी !' मित्रा जैसे अांखों से मेरे मुख की वोटियां करने लगे थे। सहसा वह फटा स्वर दब गया। कुछ शोर मचने लगा था। मित्रा बढ़े, ध्यान से देखा। लौटकर बोले-'लीजिए, आपके हीरो की पूजा हो रही है । साले की पिटाई हो रही है।' 'साला कम तौलता है । दे दो पुलिस में साले को। साला, नम्बरी हरामी है...' कई स्वर चीख रहे थे। धूल झाड़ता वह उठ खड़ा हुआ था-'हां, हां, दे दो पुलिस में! तुम्हारे बाप का राज है । कौन कहता है में कम तौलता हूं। खुदा की कसम, ईमान से...' उसके मुंह से खून के कुछ कतरे छलक आए थे, शायद दांतों पर चोट लग गई थी। पसीने और धूल से सने उस पिटे चहरे पर वे खून के कुछ कतरे एक विभीपिका से चमक रहे थे । वह काला चेहरा एक साथ दयनीय और भयावह हो पाया था । 'साला खुदा की कसम खाकर बेईमानी करता है। ईमान का नाम लेता है वेईमान !' किसीने एक झापड़ और जड़ा। 'जाने दीजिए । छोड़ दीजिए।' एक बुजुर्ग बीच-बचाव करने लगे। धूप इतनी कड़ी थी कि शायद उस घूप में मार-पीट करना अधिक देर तक सम्भव भी नहीं था । उसे खून और पसीना पोंछते छोड़कर भीड़ हट गई थी। तब तक उसने हमें देख लिया था-'सलाम साव, सलाम मा जी, गुलवदन प्याज पाठ पाने किलो, रामजी के लड्डू प्याज''।' धीरे-धीरे कहता उसका स्वर प्रांखों की छलछलाहट में डूब गया । वह रो रहा था। ७६ / सलीच पर 'प्याज तो नही चाहिए । यह एक रुपया वैसे ही ले लो।' मेरे भीतर भी कुछ उमड़ने लगा था। 'नही सरकार, भीख नहीं लूंगा ) प्याज खरीदेंगो तो पैसे से लूगा ।' उसने मैली, चीकट कमीज की माह से आखें पोछ ली। 'हा बेटा, भीख नही लोगे और वैईमानी करोगे । प्याज कम क्यों तौलते हो ?' मिश्रा ने हिकारत मे धुला व्यंग्य किया । टेरीकॉट के कीमती शर्ट-पेट पहने तनकर खड़े मिया और मैली, चौकट, फटी कमीज- पाजामा पहने खून और पसीना बहाता वह । दोनो दो टांगों पर आमने- सामने खडे थे...। और धरती चुपचाप अपनी गति से घूम रही थी। 'वो'यो तो ब्यापार है..." उसने हकलाकर कहा। उसकी आंखों में भय कापा । कही मित्रा भी दो-चार न जड़ 'सुन रही हैं मिसेज गुप्ता, भाई व्यापार की फिलॉसफी भी जानता है !' मिश्रा इतनी निर्ममता से हसे कि मेरे भीतर कुछ कटकर रह गया । उसने रक्त के वे कतरे पोछ लिए थे। लेकिन मुझे लग रहा था कि उसका काला, भयावह चेहरा रक्त से सन गया है, सना जा रहा है। मैं चुपचाप प्राकर कार मे बैठ गई, कार स्टार्ट कर दी। मित्रा मेरी वगल में प्रा बैठे थे। 'जानवर !' उन्होंने फिर कहा । मित्रा के चेहरे पर यह निर्मम, फर हंसी अभी भी चिपकी हुई थी। जो चाहा, मित्रा से पूछू-'सुसंस्कृत, सभ्य कहलाने वाले अपने नाखून और दात कहां छिपा रखते हैं ?' पूछा नही। मित्रा मेरे उस प्रश्न का अर्थ भी कहाँ समझ पाते! । अम रात राजेन्द्र ने मुझे खींचा, कस लिया। कान के पास झुककर वोले, 'डियर, फोर फाँर्टी एट नम्बर याद रखना। मित्रा से भी कह देना । पिछले साल बेचारा रह गया था।' 'कौन है यह ?' मैंने पूछा। 'अरे, अपने मेडिकल अफसर के साहबजादे हैं। और अगर ये मेडि. कल ऑफीसर मेहरबान हो जाएं तो गुप्ता मेडिकल स्टोर्स की तीसरी ब्रांच भी खुल जाए। कोशिश में / ७७ 'लेगिन गह गलत है। 'पाप भी गुमी जी, कभी-कभी बिलकुल नागमभी की बातें करने लगती है। इसमें सही-गलत क्या है ? श्रापको थोड़े-रो नम्बर ही तो ज्यादा दे देने हैं। इतना 'गिव ा टेक' तो चला ही मारता है। और पया अाप नहीं चाहती कि अापके इस गुलाम की तरयकी हो !' राजेन्द्र ने प्रालिगन और बारा लिया था। 'कर, मैं तो अपना फाग पर दूंगी, लेकिन मिश्रा से नहीं कहूंगी। यह अच्छा प्रादगी नहीं है। मैंने राजेन्द्र के वक्ष पर सिर टेक दिया था। if जानता हूं कि यह अच्छा प्रादमी नहीं है, लेकिन यह प्रापका क्या ले लेगा? ज्यादा से ज्यादा कुछ देर और ना सँगा लिया करेगा। तो चो बेचारा भी गया करे, पाप धीज ही ऐसी हैं !' राजेन्द्र मुझे चूम रहे थे। मिया गी लार टपकाती दृष्टि से समझौता कर लेने वाले अपने पति-पुगप की बांहों में मैं करामसागर रह गई। मैं उस उष्ण प्रालिंगन में पिघलने लगी थी और कुछ देर के लिए उस मालिंगा के सामने सारी पिलॉराफी बेमानी हो गई थी। 'माई लब यू सी गच सुगी । टू यू नॉट ?' राजेन्द्र नशे में ट्रय रहे थे। 'पाईपू...' काहती मैं भी उस नशे में धूब गई थी। कुछ देर बाद राजेन्द्र तृप्त होवार सो गए हैं। उनकी बांहें मेरे गिर्द लिपटी हुई थीं। मेरा भी तन तृप्त हो गया था। लेकिन मन उन गिर्द लिपटी बांहों पर गिर पटगाने लगा था । भने राजेन्द्र से समझौता कर लिया था, लेकिन स्वयं से समझौता करना कठिन हो रहा था। कभी-कभी सच भी कितने राड-गल जाते हैं निः सुगन्ध ये सारे छलावों के बावजूद उनकी दुर्गन्ध को स्वीकार करना पाठिन हो जाता है। राजेन्द्र याहते हैं.-'इरागें गलत और मही गया है।' पापा भी तो गहते थे-~~~-'एवरी थिग इज फेयर इन लव एण्ड वार', और बाई आंख वापर जोर देते थे-~~-'एण्ड इन विजनेस ।' वियर का गिलारा उठाए पापा , मांग में ढेर-सा सिन्दूर-भरे मां - ७८ / सलीव पर पूछनी थीं-'इसका मतलब क्या होता है जी, हमें भी बतायो।' पापा गिलास खाली कर देते थे। ज़ोर से हंसते पे। फिर मुझे पुकारकर कहते थे-~'सुमी वेटा, जरा अपनी मां को इसका मतलब समभादो।' पापा चले जाते थे। मैं मां को उन शब्दों के अर्थ समझाती थी। मां जाने क्या समझती थी कि उदास हो जाती थीं। एक दिन पापा ने चीखती मा को पकडकर कमरे में बन्द कर दिया था-'खबरदार जो किसीने सोला।' उन्होने ताला भी जड़ दिया था। भीतर मा चीख रही थी-'यह गलत है मुभी के पापा ! यह गलत है । वे तुम्हारे दोस्त हैं, पडोसी हैं। उन्होंने तुमपर भरोसा करके जेवर तुम्हारे पास रखे और तुम उन्हे खा जाना चाहते हो।' मा सिर पटकने लगी थी और शायद वेहोश हो गई थी। तीन दिन बाद मा कमरे से निकाली गई तो बदल चुकी थी। उनकी आखो मे कोई भाव नहीं था। वे एक शब्द भी नहीं बोल रही थी। मैं उनमे लिपट गई थी, रो रही थी-'क्या हुआ मा ?' मा ने मेरे सिर पर हाथ फेरा, मुझे चूम लिया-'कुछ नहीं बेटी, मेरी पूजा राडित हो गई। अब जोकर क्या करूगी। मैंने भी समझा, मां पागल हो गई हैं । पापा ने मुझे यही समझाया था कि मा पागल हो रात को दूध पिलाते घर के पुराने नौकर शीवू काका से मैंने पूछा- 'काका, क्या मां पागल हो गई है ?' शिबू काका की पाखें छलछला आई-'नही वेटा, मांजी नही, बाबूजी पागल हो गए हैं धन के लोभ मे। पडोस के वाचू राधाकृष्ण के घर कुडकी आई रही न, तो उन्होंने हजारों के जेवर दोस्त समझकर अपने बावूजी के पास छिपा दिए रहे। और हमारे बाबूजी सब डकार गए" तो है नाही."।' शिवू काका मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे थे। उस रात में टोक से सो नहीं सकी। मुझे सारी रात डरावने सपने आते रहे । जैसे पापा मां की हत्या कर रहे हों, उनका गला दबा रहे हों, उन्हे .. कोशिश में / ७६ मार रहे हों। दूसरे दिन करवा-चौथ थी। मां ने सदा की भांति व्रत नहीं रस तो मुझे पाश्चर्य हुग्रा-'पाज व्रत नहीं करोगी मां ? पापा के पैर नह छुप्रोगी?' मेरा मन पापा के पैर छूती मां और उनके सिर पर हाद रखते 'हो' 'हो' हंसते पापा को एक साथ देखने के लिए अधीर हों उठा था। लेकिन मां ने बेहद उदास स्वर में कहा था-'नहीं सुमी, अब मुझे स्वर्ग नहीं जाना है।' और उसके बाद, उसी वर्ष मां स्वर्ग चली गई थीं। उस रात मेरे गिर्द वाहें लपेटे, राजेन्द्र और 'एवरीथिंग इज फेअर इन लव एण्ड वॉर, एण्ड इन बिजनेस' कहते पापा के बीच, प्याज कम तौलकर पिटता, धूल-पसीना और रक्त पोंछता, 'भीख नहीं लूंगा' और 'यो तो व्योपार है...' कहता वह आ खड़ा हुआ था। एक भयावह और शायद मजदूर सच' 'किन्तु घिनौना ? नहीं, कदापि नहीं। उस रात मैं सचमुच नहीं सो सकी थी। . दूसरे दिन हम पिक्चर देखने जा रहे थे। मैं कार निकाल रही थी कि एक मिट्टी का घड़ा लिए वह प्रा खड़ा हुआ-'कदमबोसी करता हूं हुजूर ! एक घड़ा पानी ले लेने दें। बीवी बीमार है और मैं जब तक पर लौटता हूं सरकारी नल बंद हो जाता है "सिर्फ एक घड़ा पानी हुजूर ।' वह बेहद धका लग रहा था, भूखा-प्यासा भी। 'ले लो।' मैंने इजाजत दे दी। राजेन्द्र अपने नये सूट में मेरे पास' थे। 'ये तुम्हारा कौन-सा मुरीद पैदा हो गया है। साला कितना रिपल्सिव' है !' राजेन्द्र अपना 'सेंटेड' रूमाल निकालकर सूंघने लगे थे। 'कॉलेज के सामने प्याज़ वेचता है। शायद यहीं काहीं रहता है।' ने अनमने भाव से कहा था। उसे सामने देखते ही मेरे भीतर जो उठा-. एक गुरू हो जाती थी, उसे झेलना कठिन हो जाता था। राजेन्द्र मेरे थी थे, लेकिन मेरी इस सारी उठा-पटक से अनजान ही बने रहते थे। अनुसार मैं भी तो पागल हो जाती थी. वैसे जसे 'पापा के के ८० / सलीच पर अनुसार मां पागल हो गई थीं। घडा भरकर सलाम करता वह चलने लगा तो मैंने पूछा-~-'परे भाई, तुम्हारा नाम क्या है ?' उसने घूमकर पड़ा रख दिया। एकदम से उल्लसित हो उठा। हाथ जोड़कर कहने लगा-~-'करीमवस्य हुजूर । मेरा नाम करीमबरश है । बाप का नाम अल्लावरुसमा का नाम नूरी बैगम पहले हम गांव में रहते थे। कुछ सेती-बाड़ी थी। पानी नही वरसा तो सब चौपट हो गया। भूखों मरने लगे तो शहर या गए। पहीं आपके पिछवाड़े झोपडे में बस गया हूं हुजूर, आगे की खुदा जाने"' उसने अपनी प्रोखें पासमान की मोर उठा दी थी। मैंने देखा, मास- मान की ओर देखती उन भूखी-प्यासी लाखों में खुदा लडखड़ा रहा था।" मैं उसकी प्रांखों से पाखें बचा रही थी। उसकी उन भूखी-प्यासी वहशी प्रांखो को देखते मेरे भीतर प्रश्न सिर पटकने लगते थे-कौन गढता है ऐसी पाखें ? वह ऊपर वाला जो नियतिवाद के नाम पर निर्मम होकर पुतले गढ़ा करता है ? "या ये नीचे वारो जो समाज और शासन के नाम पर दो टाग वाले को चार टाग वाले में तब्दील कर देते वह पड़ा उठाकर चला गया था। राजेन्द्र कह रहे थे----'ठीक से सब लॉक कर दो सुमी, ये साले चोर होते हैं। मौके का फायदा उठाते हैं ।' मने कनखियों से राजेन्द्र को देखा । पिछली रात ही तो उन्होंने मुझे बार-बार चूमते, फोर फॉर्टी एट रोल नम्बर याद रखने को कहा था। और मुझे भी वह नम्बर याद हो गया था। पिक्चर से लौटकर हम सोने जा रहे थे तो कोई जोर-जोर से फटे, बेसुर स्वर में गाने लगा था: 'साको पीने दे शराब मसजिद में बैठकर या वो जगह बता दे जहां खुदा न हो अशुद्ध उच्चारण में गलत-सलत जोर-जोर से उस शेर को दुहराता कोशिश में १ वह फटा स्वर निश्चय ही करीम का था "खुदा न हो"खुदा न हो. हो"हो"हो" वह चीख रहा था। निश्चय ही वह पिए हुए था। राजेन्द्र चिढ़ गए-~-'यह साला कौन है कम्बख्त, सोने भी नहीं देता। पिक्चर का सारा मजा किरकिरा कर दिया। उन्होंने खीझकर खिड़की बन्द कर दी। वह फटा स्वर मेरे भीतर एक आर्तनाद में प्रतिध्वनित हो उठा था। सारी रात मुझे लगता रहा जैसे करीम रो रहा हो... दूसरा दिन इतवार था। राजेन्द्र कहीं चले गए थे। पिछली दो रातों का सब कुछ भूलकर मैं नहा-धोकर सबेरे की ताज़गी को पीती, अपने आपको देख रही थी-कितना कोमल, सुगन्धित, संवेदित अस्तित्व है मेरा ! अपने-आपमें डूबी ज़िन्दगी उन क्षणों कितनी कोमल, सुगन्धित हो पाई थी ! मैं कीट्स को पढ़ने लगी थी-'ए थिंग ग्राफ व्यूटी इज ए जॉय फॉर एवर' जैसे कीट्स ने मेरी ही अभ्यर्थना कर दी हो ! प्राया आई, 'मेमसाब, वही मुना फिर पाया है। मुत्रा फिर पाया है। आपको पूछ रहा है।' 'कौन ?' मैंने पूछा । मैं कीट्स की दुनिया में थी। 'वही जो कल शाम पानी लेने आया था। अब तो कम्बस्त ने घर देख लिया है।' आया बड़बड़ा रही थी। मैंने कोट्स को परे रख दिया । बाहर आई। एक और दुनिया मेरे सामने आ खड़ी हुई थी-धूल और पसीने में नहाती, रक्त के कतरे पोछती दुनिया..! कोमलता और सुगन्ध का अर्थ भी न समझने वाला अस्तित्व.."उसके साथ चार बच्चे भी थे। वे सब मुझे झुक-झुककर सलाम करने लगे। 'सलाम करो सालो मेमसाव को ! वह एक-एक के सिर पर हाथ रखकर परिचय करा रहा था-~~-'यह रहीम है, यह हमीद, यह बेटी अमीना और यह मेरा जहांगीर'!' उसने सबसे छोटे की वहती नाक अपनी चीकट कमीज़ से पोंछ दी। उसे गोद में उठा लिया। वह ऐसा तन्मय हो उठा था जैसे इबादत कर रहा हो। काले-कलूटे, नाक सुड़कते, गन्दे घिनौने वे चार"जैसे गटर में ! । ८२ / सलीब पर बिलबिलाते कीड़े हों । मैं उन्हें देखने से पाखें वचा रही थी। 'क्यो भई, क्या काम है', मैं रूखी हो उठी थी। मुझे कीट्स की दुनिया से निकल पाना बुरा लग रहा था । 'कदमबोसी करता हूं हुजूर ! गुलाम के लायक कोई काम ? कल आपने पानी ले लेने दिया नही तो हम प्यासे मर जाते।' कृतज्ञता प्रकट करती उसकी वहशी पासें फिर मासूम हो उठी थी। वह एक घड़ा पानी के लिए कृतकृत्य हुआ जा रहा था। कोट्स की दुनिया वाले तो दावत खाकर भी कृतज्ञ नही होते । 'कल रात तुमने हमे सोने नही दिया । तुम इतनी ज़ोर-ज़ोर से गा क्यों रहे थे ? जानते नहीं कि वह समय आराम का होता है ?' मैंने सख्ती से कहा। 'माफ कर दें हुजूर, गलती हो गई । कान पकड़ता हूं।' उसने सच- मुच कान पकड लिया। उसके बच्चे हंसने लगे थे। मैं सोचने लगी, इसका पितृत्व भी कितना मजबूर, कितना विरूप है। शायद व्यक्ति कुछ नहीं होता, उसकी स्थितियां ही सब कुछ होती हैं। रौद देने वाली, रक्त की आखिरी वूद तक चूस लेने वाली। विरूप कर देने वाली स्थितियों में प्रादमी पादमी कहा रह पाता है ? उसका कार्टून बन जाता है या वह कंकाल-मात्र रह जाता है । उसके बच्चे हंस रहे थे। वह कार्टून हो उठा था। 'तुम जो गा रहे थे उसका मतलब भी समझते हो ?' मेरा जी चाहा कि उसके दिल-दिमाग का कुछ अन्दाजा लगाऊ कि यह अपना दर्द भी समझता है। 'अरे हुजूर, हम मतलब क्या समझेगे ? उस शेर मे खुदा का नाम था, मसजिद का नाम था, कुछ पीने-पिलाने की बात थी तो बस गाने लगे थे। और हुजूर की नीद खराव कर दी। हम तो जीने का भी मतलब नहीं समझते, ज़िन्दगी का भी नहीं । बस पैदा हो गए हैं, लात- जूते खाते जीते रहेगे जब तक जीना है, फिर मर जाएगे जैसे हमारे मा- बाप मर गए"चार-चार बच्चे मर गए और अब बीवी भी मर जाएगी। कम्बख्त खून थूकने लगी है। साली के लिए बोरिया भी ढोनी पड़ रही कोशिश में/८३ । हैं कि कुछ दवादारू का इन्तजाम हो सके। मर भी जाए तो छुट्टी मिले । फिर जी भरकर पिएंगे। अभी तो साली बड़ा तुफान खड़ा करती हैं...।' उसकी आंखें दर्द के किसी अनकहे अहसास को कह रही थीं। उन प्रांखों में जैसे कुछ चमककर बुझ गया था और ढेर सारा धुम्रा भर गया था। अचानक वह अपनी मां को गाली देने लगा-'साली मेरी मां चोट्टी, कुतिया थी। आप तो छालियां कुतरती बैठी रहती और हम पांचों को भीख मांगने भगा देती। मैं भीख नहीं मांगता था, चोरी कर लेता था। मैं खाने की चीजें चुराता था और जो मिलता था उसे अकेले ही खा जाता था। साली भूख ही इतनी लगती थी। मैं वचपन में सोचा करता था कि बड़ा होकर एक रोटियों का पेड़ लगाऊंगा' 'फिर जी भर- कर रोटियां खाऊंगा । भूख तो साली अाज भी उतनी ही लगती है...।' वह होंठों पर जवान फेरता चुप हो गया था। इधर-उधर देखती उसकी लोलुप नज़र दुम हिलाने लगी थी। शायद वह किचन से उठती पकवानों की गंध सूंघने लगा था। कुछ क्षणों दाद मैंने सुना, जैसे वह अपने-आपसे कह रहा था- "अगर आप जैसी कोई हमारी मां होती तो हम भी इन्सान होते।' सहसा मेरी आंखों में इतिहास के शिवाजी घूम गए, जैसे वे गौहर वानू से कह रहे हों.-'अगर आप जैसी सुन्दर मेरी मां होती तो आज शिवा भी एक खूबसूरत सरदार होता...!' लेकिन कहां शिवाजी का देदीप्यमान, उज्ज्वल, ज्वलंत चरित्र और कहां यह वीभत्स, वहशी जान- वर जैसा करीम..! कैसी तुलना कर रही हूं मैं ? कहीं मेरा दिमाग सचमुच तो खराब नहीं हो गया ? फिर लगा, जैसे वह कहना चाह रहा हो-'मैं जानवर तो हूं, लेकिन इन्सान बनने की कोशिश करता रहा हूं...' किंतु, यह कहना भी उसे कहां पाता था ! ८४ / सलीव पर चार दिन और अपनी अधी पाखें भपकाते लाला बाबू लकड़ी के पुराने तस्त पर परसकर बैठ जाते । उनका तख्त भी उन-सा ही पुराना था। जैसे उनका जोड-जोड़ हिलता या वैसे ही उनके तख्त का भी। देखनेवालों को यही अचम्भा लगता कि लाला बाबू के लुज शरीर में प्राण प्राखिर कहा भटके हुए हैं। लेकिन लाला बाबू अपने 'अव टूटा तब टूटा' तख्त के समान ही कायम चले जा रहे थे। ठीकरे-सा खरखुरा चेचक के दागो-भरा मुख, जिसपर झरबेरी के काटो-सी दाढी उगी ही रहती । धसे कोटरो में अन्धी पुतलिया पर-कटे पंछी-मी फड़फडाया करती । आधा अंग तो हिलता ही रहता बाकी आधा स्वस्थ होने पर भी सीक-सलाई था। वे दो कदम चलने में तीन हिचकोले खाते, प्रत. अधिकतर बैठकर ही घिसट लिया करते। बारह वर्ष की आयु में चेचक के प्रकोप से पाखें गवाकर भी लाला बाबू अपनी विधवा मां की प्राखी के तारे रहे पाये। मा जब तक जीवित रही किसी भी प्रकार अपने अन्धे-असहाय इकलौते पुत्र को कलेने से लगाए रही । जब मा की मृत्यु हुई तो लाला वाबू पच्चीस वर्ष थे किन्तु उनका दाहिना हाथ और पैर बेकार हो चुका था। वे पर धमोटकर चलते और हिलते हाथ से बड़ी मुश्किल से कुरता पहन पाते। मां की मृत्यु के बाद अपने घिसटते पैर को घसीटते लाला बाबू शहर के अपने एक धनाढ्य सम्बन्धी के पहा पहुचे । अन्धो डांखों को झपका- कर हिलते हाथ जोड़कर किया गया उनका निरीह नमस्कार सेठ जुगल. किशोर को हिला गया । लाला बाबू के पड़े रहने के लिए एक कोठरी और दो जून खाने की व्यवस्था हो गई। ।
हैं कि कुछ दवादारू का इन्तजाम हो सके। मर भी जाए तो छुट्टी मिले । फिर जी भरकर पिएंगे। अभी तो साली बड़ा तुफान खड़ा करती हैं...।' उसकी अांखें दर्द के किसी अनकहे अहसास को कह रही थीं। उन अांखों में जैसे कुछ चमककर बुझ गया था और ढेर सारा धुग्रां भर गया था। अचानक वह अपनी मां को गाली देने लगा-~~~'साली मेरी मां चोट्टी, कुतिया थी। आप तो छालियां कुतरती बैठी रहती और हम पांचों को भीख मांगने भगा देती। मैं भीख नहीं मांगता था, चोरी कर लेता था। मैं खाने की चीजें चुराता था और जो मिलता था उसे अकेले ही खा जाता था। साली भूख ही इतनी लगती थी। मैं वचपन में सोचा करता था कि बड़ा होकर एक रोटियों का पेड़ लगाऊंगा."फिर जी भर- कर रोटियां खाऊंगा । भूख तो साली प्राज भी उतनी ही लगती है।' वह होंठों पर जवान फेरता चुप हो गया था। इधर-उधर देखती उसकी लोलुप नज़र दुम हिलाने लगी थी। शायद वह किचन से उठती पकवानों की गंध सूंघने लगा था। कुछ क्षणों बाद मैंने सुना, जैसे वह अपने श्रापसे कह रहा था- "अगर आप जैसी कोई हमारी मां होती तो हम भी इन्सान होते..।' सहसा मेरी प्रांखों में इतिहास के शिवाजी घूम गए, जैसे वे गौहर वातू से कह रहे हों.---'अगर श्राप जैसी सुन्दर मेरी मां होती तो आज शिवा भी एक खूबसूरत सरदार होता...!' लेकिन कहां शिवाजी का देदीप्यमान, उज्ज्वल, ज्वलंत चरित्र और कहां यह वीभत्स, वहशी जान- वर जैसा करीम...! कैसी तुलना कर रही हूं मैं ? कहीं मेरा दिमाग सचमुच तो खराब नहीं हो गया...? फिर लगा, जैसे वह कहना चाह रहा हो-'मैं जानवर तो हूं, लेकिन इन्सान बनने की कोशिश करता रहा हूं...' किंतु, यह कहना भी उसे कहां प्राता था ! ८४ / सलीव पर चार दिन और अपनी अंधी प्रांवें नपकाते लाला वावू लकड़ी के पुराने तख्त पर परसकर बैठ जाते । उनका तख्त भी उन-सा ही पुराना था । जैसे उनका जोड-जोड़ हिलता या वैसे ही उनके तस्त का भी। देखनेवालों को यही अचम्मा लगता कि लाला वादू के लुंज शारीर में प्राण माखिर कहां अटके हुए हैं । लेकिन लाला बाबू अपने 'अब टूटा तव टूटा' तख्त के समान ही कायम चले जा रहे थे। ठीकरे-सा खुरखुरा चेचक के दागो-भरा मुख, जिसपर झरबेरी के कांटों-सी दाढ़ी उगी ही रहती । धंसे कोटरो मे अन्धी पुतलिया पर-कटे पंछी-सी फड़फड़ाया करती । आधा अंग तो हिलता ही रहता बाकी आधा स्वस्थ होने पर भी सीक-सलाई था। वे दो कदम चलने में तीन हिचकोले खाते, अत: अधिकतर बैठकर ही घिसट लिया करते। वारह वर्ष की आयु मे चेचक के प्रकोप से प्रांखें गवाकर भी लाला बाबू अपनी विधवा मां की आखों के तारे रहे आये। मा जब तक जीवित रही किसी भी प्रकार अपने अन्धे-असहाय इकलौते पुत्र को कलेजे से लगाए रही। जब मा की मृत्यु हुई तो लाला चावू पच्चीस वर्ष थे किन्तु उनका दाहिना हाथ और पैर वेकार हो चुका था। वे पैर पसीटकर चलते और हिलते हाथ से बडी मुश्किल से कुरता पहन पाते । मां की मृत्यु के बाद अपने घिसटते पैर को घसीटते लाता या शहर के अपने एक धनाढ्य सम्बन्धी के यहा पहुचे । मन्धी पासी यो भापया. कर हिलते हाथ जोड़कर किया गया उनका निरीह नमस्कार सेठ शुगल. किशोर को हिला गया । लाला बाबू के पड़े रहने के लिए एका मोठरी और दो जून खाने की व्यवस्था हो गई।
, उसके बाद पच्चीस लम्बे वर्षों का इतिहास अन्धी प्रांखों और हिलते अंगों का अंधेरा, प्रांधियों में थरथराता इतिहास रहा पाया। देखने वाले करुणा से विगलित होकर लाला बाबू की मृत्यु की कामना किया करते पर लाला शबू ने अन्धी प्रांखों से देखना और अपंग अंगों से जीना सीख लिया था। सवेरे पड़ोस के रहमान मियां का मुर्गा वांग देता कि लाला बाबू उठ बैठते । शौचादि से निबटने का कार्यमाम उनके लिए बड़ा कष्टप्रद . था। काबू से बाहर अंगों से काम लेने में उन्हें बड़ा जोर लगाना पड़ता। लूली टांग मुड़ने में मुड़-मुड़ जाती और हिलता हाथ बड़ी देर में धोती बंधवा पाता । दूसरी दिक्कत यह थी कि सेठजी की हवेली में नौकरों की भीड़ थी किन्तु शौचालय एक ही था । अब यदि लाला बाबू किसी दिन समय पर चूक जाते तो उनका नम्बर पाने में सवेरा चीत जाता। इसके अतिरिक्त यदि उन्हें निबटने में अतिरिक्त देर लगती तो प्रतीक्षा में खड़े उन्हें खरी-खरी सुना देते, 'ससुरा साइत कौमा खाकर पावा है । न मरै न पिंड छूट।' इसके बाद लाला वावू को चाय की प्रतीक्षा रहती जो उन्हें कभी मिलती कभी न मिलती । सवेरे की ठंडी हवा उनके दुखते अंग सहलाती, स्नान की ताज़गी उनके वासी तन-मन को झकझोरती तो वे चाहते कि दो मिनट हरि-स्मरण कर लें लेकिन जब-जब वे ध्यान लगाना चाहते उनके सामने भोजन की थाली पा जाती और वे कोवल यही सोचते रह जाते कि देखें आज का दिन कैसे वीतता है अर्थात् प्राज क्या भोजन मिलता है ? आंखों की कमी को लाला बाबू के नाक-कान पूरी करने में लगे रहते । श्राज जीरे से अरहर की दाल छोंकी गई है या मेथी से बैंगन वघारा गया है इसकी खबर लाला वावू की नाक उन्हें विना चूके देती। हवेली के पिछवाड़े चौक के एक पोर रसोई थी और दूसरी ओर लाला वायू की कोठरी। रसोई में पकते भोज्य पदार्थों की उड़ती सुगन्ध से लाला घाबू के नथुने फड़कने लगते, जीभ गीली हो जाती और वे तख्त पर परारे बैठे या पड़े उस सुगन्धि के सागर में डुबकियां लगाया करते । ८६ / सलीब पर कान भी नाक से पीछे न रहते । सारे परिवार के सदस्यों को व नौकरों को लाला बाबू उनके स्वर से पहचान लेते थे। ये गूंजती प्रावाज सेठजी की है, ये पतली-तीखी अावाज मालकिन की। खनकती आवाज में सेठजी का खास नौकर हरीराम गुर्राता है और वैठे-से गले से महराजिन बकती हैं। इस सारी भीड में बैठे-से गले से बकनेवाली महराजिन का लाला बाबू से बकने झकने का नाता रहा पाया । लाला बाबू रसोई से उड़ती गन्ध को निकट से सूचने के लिए जब-तब रसोई तक पहुंच जाते और खीसें निपोरकर पूछते, 'का हो महराजिनजी, प्राज का बनाय रही हो ?' अपने चिड़चिड़ाने के लिए वदनाम महराजिन सुलग उठती, 'तोहार सिर, अउर का । अरे लाला, तोहका औरउ कछु फिकर है कि रात-दिन खावे में ही परान धरे रहत हैं । अरे हम कहा चार घडी भगवानउ का भज लिया करो। ई जनम मे तो ई सासत होय रही है अगले मे जाने का होई। सुनकर लाला बाबू देर तक ही ही खी खी' करते हसते पोर खडी बोली मै उत्तर देते, 'अरे भगवान और क्या करेगा इस जनम में एक हाथ और एक टाग दी है अगले मे वो भी नहीं देगा।' और जैसे अपने इस उत्तर से भगवान को चुनौती देते लाला वावू एक तृप्ति की सांस भरते। महराजिन ही दोनो समय लाला वाबू का भोजन उनको कोटरी में दे जाती और ऐसा कभी न हुया कि वह बिना दो-चार सुनाए रह जाती हो। फिर भी लाला बाबू कान खडे किए महराजिन के पर पटकते पाने की आहट का इन्तजार किया करते । फिर थाली को सामने रखे वे देर तक भोजन के एक-एक कौर का दिव्य प्रानन्द लिया करते । मोटे-मोटे चावल और खे-सूखे टिक्कड के साथ जरा-सी सुगन्धित दाल और चटपटी सब्जी के कुछ टुकडे उन्हे तृप्त कर देते । कभी-कभी मिठाई के एक टुकडे या दही या प्रचार की दुर्लभ प्राप्ति उन्हे गद्गद कर देती। सेठ परिवार में व्याह होता तो लाला वावू बार-बार उंगलियों पर चार दिन मौर/८७ । गिनकर उस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा केवल इसलिए करते कि उन्हें बढ़िया माल खाने को मिलेगा । वढ़िया तर माल की भेंट लिए ऐसी शुभ घड़ी उनकी स्मृति में अमर हो जाती। भोजन के इस लगाव के अतिरिक्त एक लगाव और कभी उनके मन में जागा था। वे बारह वर्ष की आयु में अन्धे हुए थे----प्रतः स्त्री क्या होती है यह जानते थे। पच्चीस वर्ष की आयु में जब वे हवेली में रहने प्राए तो शरीर की दयनीय दशा होने पर भी मन में कहीं कुछ जाग-जाग उठता था। हरिराम के लड़के छोटू से वे पूछते कि मह- राजिन देखने में कैसी है ? पाठ वर्ष का छोटू जवाब देता, 'चुडैल है चुडैल' और भाग जाता । लेकिन यही चुडैल लाला बाबू को अन्धी प्रांखों में परी बन गई। मह राजिन को नारी-देह की गन्ध से, जिसमें पसीने की भभक होती, लाला वायू का तन-मन गमक उठा । एक दिन भोजन की थाली सामने रखती महाजिन को उन्होंने अपने बायें हाथ से लपेट लेना चाहा । महराजिन छिटककर हटी तो थाली उलट गई । महराजिन लाला बाबू के मुंह पर दो तमाचे जड़कर चली गई। लाला वावू को तमाचों का तो अफसोस नहीं हया पर उस दिन उन्हें भूखे रहना पड़ा। वे मुड़कुदाती प्रांतों की व्यथा कदापि न सह पाते थे । महराजिन से बात बढ़ाने पर कहीं फिर भूखा न रहना पड़े इसीलिए उन्होंने फिर वात बढ़ाई ही नहीं। फिर भी इतना अवश्य था कि महराजिन से उन्हें लगाव लगता। वे अपनी सूनी कोठरी में पड़े-पड़े अपनी अन्धी अांखों में महाजिन के अनेक चित्र बनाया और मिटाया करते । लाला बाबू का आधा दिन भोजन के फेर में कटता और प्राधा दिन अपने दारीर की कोठरी और चीक की उलट-फेर में। वे कोठरी से चौक में पहुंचते फिर चौक से कोठरी में उतर पाते और इतने में ही उनके शरीर में इतनी पीड़ा होती कि वे कराहकर रह जाते। बच्चे चिढ़ाते, महरियां ताने कसती, नोकर गुर्राते; लेकिन लाला बाबू को उपेक्षा करना प्राता था । इसी सर्वजयी उपेक्षा के सहारे उनकी उपेक्षित जिन्दगी कटती रही। लाला वाबू के इस नाम की भी विशेषता थी। बचपन में मां उन्हें } ८८ / सलीय पर लल्लन कहती थी । लल्लन अन्धा होकर बेहद हठी हो गया। बात-बात पर जिद करता, रोता । मां मनाने के लिए कहती, 'यो मेरे लाला वादू, आ रे, अव तो मान जा।' 'लाला' और ऊपर से 'बाबू-लल्लन की निर्यात से अपमानित प्रात्मा सम्मानित हो जाती। धीरे-धीरे वह लल्लन कहलाने से इतना चिढने लगा कि पडोम के एक लड़के को लल्लन कहने पर दात काट वंठा । लल्लन नाम के प्रति यह हिमात्मक विद्रोह लल्लन को लाला बाबू बना गया । लाला वावू बारह ने बयालीस वर्ष के हो गए पर आज भी यदि कोई उन्हें लल्लन कहता तो वे निश्चय ही उसे दात काट बैठते । लाला वावू के संबोधन से युक्त पग-पग पर मिला अपमान उन्हें इतना न चुमता। "कुछ भी हो, लोग मुझे भख मारकर कहते तो लाला बाबू ही हैं, वे अपने-मापसे कहते भौर अकेले में सिर उठाकर तन जाते। मंतालीस वर्ष के होते-होते लाला वाबू के अपंग अंग गलने लगे। जितना उठ-वैठ पाते ये उतने में भी उन्हें और कष्ट होने लगा, शरीर घावों मे भर गया। दो बरस ऐसे भी बीते । कप्ट बढ़ता गया । साना-पीना छूट गया, घावो से मवाद रिसने लगा। यहां तक कि महराजिन का पत्थर कलेजा भी उनको तडपन से हिल गया। ऐमी दुर्दशा, हरे राम ! अब तो इनकी मिट्टी समेट लेहु प्रभु,' कहती महराजिन अपनी उमड़ती प्रांसें पोछ रही थी। लाला बाबू की चेतना धूमिल हो रही थी, असह्य क्प्ट मे वे कुछ वुद- चुदा रहे थे। महराजिन ने कान लगाए, 'तुम्हारी बिटिया का ब्याह फागुन मे है न महराजिन | चार दिन और जी लेता तो विटिया का ब्याह देख लेता..." लाला वावू डूबते स्वर में कह रहे थे। । चार दिन और/८९
स्वयंवर
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"मोहनलाल, अटेन्शन प्लीज !" मैंने कहा।
वह राकपकाकर खड़ा हो गया, "प्रेजेण्ट, मैदम !" मेरे साथ सारा
पलास हंस पड़ा।
"मैं हाजिरी नहीं ले रही थी, मोहनलाल, वह तो मैं ले चुकी हूं।
तुम प्रेजेण्ट हो, देख भी रही हूं। मैं तो कह रही थी, अटेन्शन प्लीज,
यानी कि ध्यान इधर दो ! मैं पढ़ा रही हूं और तुम कहीं और हो !"
उसने सिर झुका लिया। गोहनलाल एक सरल-सा, निर्दोप युवा मुख,
जो मुझे अपनी निदोपिता के कारण अलग-सा लगता था । अलग-सा,
अर्थात् अच्छा-सा ! फल में और मूंछे बढ़ाए, टेरेलिन की शर्ट-पेण्ट करो,
उद्दण्ड चेहरों और दिशाहीन प्रांखों की भीड़ में मोहनलाल की दिशा को
सोजती-सी प्रांगों वाला वह गुण मुझे प्रिय लगने लगा था। प्रायः मैं
देराती थी, वह सोया-सा रहता है."किस लक्ष्य की तलाश है इसे ?
मैं कवि पन्त को पढ़ा रही थी-
"और भोले प्रेम ! तुम क्या हो बने
वेदना के विकल हाथों रो ? जहां
गज से विचरते हो, वहीं
प्राह है, उन्माद है, उत्ताप है !
पर नहीं तुग पपल हो, प्रज्ञान हो,
हृदय है, मस्तिष्क रखते हो नहीं,
बस बिना सोचे हृदय को छीन कर
सौंप देते हो अपरिचित हाथ में"...
मैंने फिर देसा, मोहनलाल कहीं और था। मैंने उसकी दृष्टि की
-
!
झूमते
दिशा की और देखा । सहसा 'कुछ' मेरी यांखों में स्पष्ट हो गया। लडकियों की बेंच पर सबसे अन्तिम बैठी वह लड़की, मोहन ही प्रांतों को केन्द्रित किए थी। वह राधा थी राधा श्रीवास्तव । क्लास की सब शान्त लड़की । वॉपल को सस्ती साडियां पहनने वाली सड़को । मुख पर पाउडर तो क्या, केशों में तेल भी नहीं होता था। कुछ भी तो नहीं था उसके पास, जिसे किसी कवि की उपमा से जोड़ा जा सके। किन्तु" मैंने उन क्षणो राधा को ध्यान से देखा किसी भी कवि-उपमा में न जुड़ने वाली उस लड़की के पास केवल एक जोड़ी ऐसी प्रांखें थी, जिनमें पन्त की वे मारी पक्तिया प्रतिच्छवित हो रही थी। न वे पास हिरनी जैसी थी, न कमल जसी, बस, उन ग्राखों में पन्त को केवल वे पक्तियां, या उनके स्वर ऐमे प्रतिच्छवित हो रहे थे, जैसे वे राधा के स्वयं के अन्तस् के स्वर हो । हा, राधा की पाखें स्वरमयी थी। और मोहन कदाचित उन प्रांखों के स्वर में ही डूब रहा था। रोगनदान से प्राती धूप को एक लकीर मोहन से गवा तक विछी हुई थी. "जैसे प्यार की रोशनी का एक सेतु उन्हें जोड रहा था। प्रेम के सारे यथार्थ को, यथायं को ही निर्मम माखों मे देख और परस चुकी मैं, उन क्षणो बरबस भावुक हो उठी. 'जी चाहा, उस सेतु को आशीर्वाद दूं कि वह सदा जुड़ा रहे, कभी न टूटे ! प्यार"प्रेम"मानव की सबसे कोमल और सबसे प्रवल संवेदना "होंठों से मात्मा तक फैली सबसे तीव्र प्यास.."मलों से प्राणों तक साया सबसे मोहक सम्मोहन ! किन्तु यही प्यार, जिन्दगी की निर्मम सच्चाइयों के वीच या तो जी नहीं पाता, या एक विद्रूप बन जाता है । और मैंने प्यार को छलना बनते देखा है, भ्रम भी "जीवन का सबसे बड़ा झूठ भी। जो प्रेम वाल्मीकि से पन्त तक काव्य का माधार रहा है, जो प्यार प्रादम और हवा के प्रथम निवां चुम्बन में लेकर प्राज तक के इस सभ्य युग के प्रति मुखर हो रठ नारी मोर पुरुष के होठों को वाधे रहा है, वही प्यार हत्याएं भी करता रहा है" प्रात्महत्याएं भी। कितना मोहक, किन्तु कितना भ्रामक ! कितना रससिक्त सत्य, किन्तु कितना निर्मम भूठ भी ! स्वयवर /११ - । फिर उस दिन, पन्त को पढ़ाते, सामने बैठे राधा और मोहन से मेरी दृष्टि बार-बार उलझती रही. ''क्या इनके ये नाम मात्र संयोग हैं, या ये नाम इनकी नियति होने जा रहे हैं ? मैंने यह भी देखा, मोहन टेरेलिन के कीमती कपड़े पहने था। जानती थी, शहर के धनी सेठ का बेटा है । किन्तु लगा, जैसे वह उन कपड़ों से जुड़ा नहीं था जैसे उन कपड़ों की कीमत मोहन के लिए अर्थहीन थी। फिर यह भी देखा, उस दिन राधा वॉयल की फूलों वाली एक सादी-सी साड़ी पहने थी। उन फूलों के रंग भी शायद बहुत धुलने के कारण फीके पड़ गए थे । किन्तु उन फीके फूलों की प्रतिच्छवि राधा की आंखों में गहरी हुई जा रही थी 'शायद राधा के भीतर कहीं वसन्त जाग उठा था। मोहनलाल और राधा के कपड़ों के अन्तर को देखती में उदास हो उठी थी। जाने कितनी बार देख चुकी थी, ये अन्तर मिटाए नहीं जा पाते, या मिटाए नहीं जा सकते। ये अन्तर जाने कैसी अभेद्य दीवार वन- कर बीच में खड़े हो जाते हैं कि उन्हें तोड़ पाना असम्भव हो जाता है 'और फिर ये अन्तर मिटते नहीं, मिटा देते हैं ! श्रोह, शायद मेरा ही दिमाग खराव हो गया है । पन्त को पढ़ाते- 'पढ़ाते मेरी ही कल्पना बहक गई है, वरना, को-एजुकेशन के इस युग में कॉलेज में हर मोहन किसी राधा के या हर राधा किसी मोहन के चक्कर में है। चक्कर में प्रेम के नाम पर खेल-सा रोलते आज के स्वतन्य युवक-युवतियों के बीच प्रचलित एक प्रैक्टिकल लफ्ज़ ! 'अरे मेरी जान ! डोण्ट मेक लाइफ ए टवू !' वे एक-दूसरे से कहते हैं । पूर्व ने संसार को प्रात्मा का दर्शन दिया था. दिया होगा"। अब तो पश्चिम पूर्व को देह का दर्शन दे रहा है और इस दर्शन के पास 'बी प्रेक्टिकल' का ऐसा अस्य है कि सारी उलझनों को एक ही झटके में काटकर फेंक देता है."यात्मा जाए चूल्हे में देह तो स्वतन्त्र है, मगन है, तृप्त है ! आत्मा को तुमने देखा है क्या ? फिर प्रात्मा के सत्य की बात क्यों करते हो ? देह के सत्य को केवल देह के स्तर पर जियो ईट, ड्रिक एण्ड बी मेरी एण्ड फॉरगेट द रेस्ट !' अव आज की युवा पीढ़ी के होंठों के बीच एक 'प्रेक्टिकल' समझौता है । - ... ६२ / सलीब पर x X X मैं लाइब्रेरी मे यो । मोहनलाल पाया, 'आपको डिस्टर्य कर सकता हूं, मैडम...? में व्यस्त थी, किन्तु मोहन को टालना मेरे लिए सम्भव नहीं था। युवा चेहरो की रोज़ देखी जाती भीड़ में मोहन का चेहरा अलग खड़ा था और कही उस चेहरे ने मुझ वाघ लिया था। 'प्रायो, बैठो! कोई कठिनाई है क्या..? पन्त समझ में नहीं पाए क्या ?' मैंने परिहास किया । 'नहीं, मैडम | पन्त तो इतने समझ में आ गए हैं कि उन्हें जीने के के लिए पातुर हो उठा हूं!' मोहनलाल को प्रातुरता उसके होठों पर काप रही थी। 'देखो मोहन, क्षमा करना यदि में कोई निर्मम बात कहू"सत्य निर्मम ही होता है । पन्त को केवल पढो, जीने की कोशिश मत करो... मुश्किल में पड जानोगे । वी प्रैक्टिकल !' यह 'बी प्रक्टिकल' मैं कह रही थी, या मुझ कहना पड़ रहा था...? कभी मैंने भी तो प्यार के किसी मोहक सत्य को जीना चाहा था. लेकिन सम्मोहन टूटा और इतनी चोट लगी थी कि प्रेम मेरे निकट केवल एक चोट का पर्याय बनकर रह गया था। मैं मोहन को उस चोट मे बचाना चाहती थी। 'मुश्किल में तो पड चुका हू, मैडम ! इसीलिए आपके पास पाया हूं कि कोई राह वताएं कि...' वह सहसा चुप हो गया। 'पहले तुम मुश्किल तो वतामो!' में देख रही थी, मोहन के होंठ अब भी काप रहे थे, कापे जा रहे थे, और सामें असन्तुलित हो उठी थी। 'मंडम'' मैं राधा से प्रेम करता हूं."राधा श्रीवास्तव से...!' मोहन की सांसें गहरी हो उठी "जानती हूं।' मैंने सस्ती से कहा । सोचा कि देर के लिए इतनी निर्मम हो उठू कि मोहन को पासो में उभरते सपनों का दम घोट दूं। ये सपने जी सकेंगे, मुझे कोई विश्वास नहीं था "मोहन के कपडे बहुत कीमती थे और राधा को साड़ी के फूलों के रंग बहुत फोके "भोर इस अन्तर को पाटना असम्भव या। स्वयंवर /६३ । 'राधा भी आई है.''वाहर खड़ी है...।' मोहन ने कहा, जैसे कह रहा हो, उसे बुला लीजिए। 'प्रोह, तो वाहर क्यों खड़ी है ? बुलानो न उसे !' मोहन राधा को बुलाने चला गया था और मैंने कालिदास के मेघदूत के अनुवाद की पुस्तक को बन्द करके रख दिया था। सामने आ खड़े हुए राधा और मोहन के सम्मुख कालिदास के यक्ष और यक्षप्रिया अर्थहीन हो उठते थे। प्यार को जीने का अधिकार, विश्वास या साहस मांगते राधा और मोहन 'हाड़- -मांस के दो सजीव पुतले "जो घुमड़ते बादलों से नहीं, मुझसे अपना सन्देश कह रहे थे। कैसा विद्रूप था कि वे मेरे सामने दो कुसियों पर पास-पास बैठे थे और उनके बीच इतनी दूरियां थी कि वे कालिदास के यक्ष और यक्षप्रिया से ही विरहाकुल थे" कातर" विह्वल "उन्मादी ! किन्हीं अदृश्य पर्वतों के शिखरों पर वे आलिंगन के लिए विभोर भुजाएं फैलाए प्रा खड़े हुए थे ! मैंने स्वयं को निर्मम बनाने की एक और चेप्टा की, यद्यपि भीतर ही भीतर मैं पिघलकर बहने लगी थी, 'पायो, राधा, कितनी वार देखी है 'बॉबी' तुमने ? सच कहना !' मैंने अति निर्मम व्यंग्य किया । 'यदि आप विश्वास कर सकें, दीदी, तो केवल एक वार और वह भी इसलिए कि सहेलियां खींच ले गई थीं!' राधा प्रांखें नीची किए साड़ी के पांचल को उमेठ रही थी। 'और मुझे तो एक बार भी नहीं देखने दिया ? कहती है, 'वॉवी' में प्यार का खेल, प्यार का अपमान है !' मोहन की प्रांखें चमक उठी थों, 'मैडम, राधा ने तो 'परिणीता' पाठ बार देखी है, पूरे आठ बार .."सात बार तो मेरे साथ !' मोहन हंस रहा था। मुझे लगा, 'परिणीता' को सात बार मोहन के साथ देखने वाली राधा सात भांवरें तो ले चुकी 'अपने हृदय में प्रज्वलित किसी अदृश्य अग्नि के सम्मुख ! और आधुनिक युग की एम० ए० की छात्रा इस राधा ने फिर 'बॉबी' के आलिंगन नहीं दुहराए, शायद गले में अांचल डालकर किसी 'परिणीता'-सी ही मोहन के पैर छूकर अपनी मांग भर ली है लेकिन नहीं, यह 'बॉबी' का युग है । 'बॉबी' ने देह की उन्मुक्तता के - -- - १४ / सलीब पर साथ प्रेम को उन्मुक्तता का सन्देश दिया है। बॉबी की इतनी मफलता क्या इस युग के द्वारा उसका स्वीकार नही ? 'परिणीता' की मश्रु-विग- लित भावुकता"पुरानी चीज हुई."। समानता और स्वतंत्रता के इस युग में अब 'परिणीता' या पन्त को जीने का प्रयास 'बेवकूफी' है । "बेवकूफी' शब्द मेरे होंठो से निकलते-निकलते रह गया। मोहन पाखों में कोई विश्वास लिये मेरी पोर देख रहा था । राधा को पाखें नीची थी और उनसे प्रांसू भर रहे थे. इन पासुनों को मोती कहूं."या खारा पानी ? मैं सोच रही थी। 'इन्हें समझाइए, दोदी, क्यो मेरे लिए अपनी जिन्दगी खराब करते हैं ? ये लखपती बाप के बेटे हैं और यदि इनके पिता इनके लिए लख. पती बाप की बेटी ही लाना चाहते हैं, तो गलत क्या है ? रिश्ता बराबर वालों का ही जुड़ सकता है ! मेरे पिता तो इनके लिए एक जोडी जूते तक नहीं खरीद सकते ! ...' राधा सिसकियों के बीच कह रही थी। "मैडम, मैं सच कहता हूं, मैं राधा के सिवाय किसीसे विवाह नहीं करूंगा ! इसे समझा दीजिए''पाप मुझपर वस इतना विश्वास कीजिए...!" मोहन उत्तेजित हो उठा था। क्या मोहन यह 'सच' निभा सकेगा? मुझे भी पूरा सन्देह था। क्या किसी लखपती बाप को बेटी की तुलना मे राधा कही ठहर सकेगी? यह केवल युवा रक्त की उत्तेजना है, कुछ दिनों का यौवन का उन्माद है ! राधा और मोहन भी क्या अपने परिवेश से कटकर जी पाते हैं ! प्रेम एक यथार्थ भी तो है, जिसे उडने के लिए प्राकाश ही नही, खडे होने के लिए जमीन भी चाहिए ठोस जमीन एक-सी समतल जमीन । ऊंची-नीची भूमि पर खड़े राधा और मोहन अलग-अलग ही खड़े रह जाते हैं। 'देखो, दिसम्बर बीत रहा है और मार्च में तुम्हारे फाइनल हैं। तब तक पढाई में मन लगानो, फिर प्रेम करना ! वैसे मैं तुम्हारे साथ हूं! मैंने ऊपर से तो संयत होकर कहा, किन्तु भीतर में भी बेहद असंयत हो उठी थी। लग रहा था, यह लैला-मजनूं का सेल प्रकृति स्वयंवर १५ बार-बार क्यों दुहराती है और इसकी नियति सदा निर्मम ही क्यों होती है...? लगभग एक मास बीता होगा, उस सांझ मन बड़ा अनमना था। बच्चों और पतिदेव को घर पर छोड़ कर मैं अकेली ही निकल पड़ी थी। जी चाह रहा था, कुछ क्षणों उस एकाकीपन को जियूं, जो मेरा विल्कुल अपना है। मेरे होंठ गुनगुना रहे थे : जलते दीपक से मत पूछो है रात अभी कितनी वाकी भीड़ घिरी रहती लेकिन हर जलना होता एकाकी ! हां, मेरे मन ! हर जलना एकाकी ही होता है। किसी न किसी विन्दु पर हम सब अकेले ही होते हैं और यह एकाकीपन, यह शून्य कदाचित् हर संवेदनशील मन का एक सत्य होता है। वर्षों बाद, एक ऐसी राधा मेरे सम्मुख पा खड़ी हुई थी, जिसने मेरे अपने भीतर को भी उस राधा की याद दिला दी थी, जो कभी उन्मा.. दिनी हो उठी थी 'किन्तु मैंने एक बिन्दु पर कवि पन्त को झुठला दिया था । मैं हृदय के साथ मस्तिष्क भी रखती थी। मेरी उन्मादिनी राधा बहुत जल्दी होश में आ गई थी और आज मैं अपनी उस राधा पर वैसे ही हंस सकती थी, जैसे किसी पगली पर हंसा जाता है। मुझे उम्मीद थी, एक हृदयहीन पाशा''कि पांच-सात वर्षों बाद जब यह राधा भी एक अदद पति और दो-तीन अदद बच्चों से घिरी मिलेगी तो प्राज' के अपने इस 'उन्माद' पर कल मेरी ही तरह हंस सकेगी। लैला-मजनूं या रोमियो-ज्यूलियट तो वस कथानों में ही अमर हो सकते हैं, जिन्दगी में नहीं । जीवन के यथार्थ या तो लैला-मजनूं को मार डालते हैं, या उन्हें ऐसा विपित व्यंग्य बना जाते हैं कि उन्माद उतर जाने पर ये लेला-- मजनूं स्वयं पर ही हंसने लगते हैं। . - मैं वैजनी फूलों से लदे एक पेड़ के नीचे बैठ गई थी। सामने एक ६६ / सलीब पर तालाब था--उस नदी के पानी को वांध दिया गया था, जो कभी-कभी उग्र होकर शहर को बहा ले जाती थी। नदी को तालाच दनाकर मयत कर दिया गया था । मानव ने प्रकृति को भी विनना जीत लिया है ! किन्तु नियति' को वह नहीं जीत सका है। विज्ञान निरन्तर जीत रहा है और प्रादमी फिर भी हारा जा रहा है क्यों ? मैं स्वयं से इमीलिए तंग पाई रहती हूं कि मेरे भीतर के ये क्यों चुप नही रहते । निस्सन्दता में ये और भोर करते हैं । वैजनी फूलों मे भरे उस पेड़ के नीचे, तालाब में प्रतिविम्बित होते उस सूर्यास्त को देखते तो इन 'क्यो' को चुप रहना चाहिए था। लेकिन नहीं, सौन्दर्य के बीच यह 'क्यो' कुरूपता से उनमने लगता है "जीवन के बीच मृत्यु के निकट जा सड़ा होता है। 'नमस्ते, दीदी !'-'प्रणाम, मंडम !' दो सम्मिलित स्वर गूजे । मैं चौंक गई। राधा और मोहन थे और वह एकान्त ध्वनित हो उठा था। 'पाओ, पामो ! बंटो मेरे पास !' मैंने राधा का हाथ पकड़कर खीच लिया । देखा, वह हाथ बहुत ठंडा था और वह मुख बहुत पोला । 'क्या बात है, राधा ? तवियत ठीक नहीं है क्या ?' मैं उम पोले मुख को चूम लेना चाहती थी, जिसने शायद अपना लाल रक्त जलाकर वह पीली प्राभा पा ली थी. 'पोली प्राभा' या इसे सुनहरा सोना वहूं ! संमार की, समाज को तराजू पर तोला जा सकने वाला माना नहीं, अंधेरे में दीपक की लो-मा जलने वाला वह सोना, जो जलकर प्रकाश दे जाता है ज्योति के फूल दिखैर जाता है ! किन्तु इन फूलो की क्षणिकता, इनको मृत्यु, इनको पराजय भी निश्चित होती है । विराट अंधेरी से ये नन्हें फूल वहां लड़ पाते हैं ! 'दीदी'!' हथेलियो में मुख छिपाकर राधा सिसकने लगी थी। मोहन बहुत शान्त था, बहुत गम्भीर । 'दीदी, राधा प्रेगनेण्ट है !' मोहन का स्वर इतना संमत पा कि मैं हिल गई"वह इतना शान्त क्यों है.. उसको शान्ति मुझे भाभोर रही थी। 'यह क्या किया तुमने ! तुम्हें होश रखना चाहिए था !'प्रकट स्वयंवर ६७ , ! में यह मेरा स्वर था-आक्रोश का। 'हां, दीदी, होश रखना चाहिए था, नहीं रहा ! मैं अपराधी मोहन राधा को एकटक देख रहा था। 'जो हो चुका, हो चुका दीदी, अव भी इन्हें समझाइए कि मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें ! अपना जीवन संभालें ! इन्हें बहुत मिल जाएंगी' और मेरा क्या''ये सुखी हों कि मैं शान्ति से मर सकू!' राधा का वह पीला मुख प्रांसुओं से नहा रहा था। सहसा मोहन ने राधा के हाथ खींचकर अपनी हथेलियों में भर लिए थे और उन्हें चूमने लगा था-~-बार-बार । 'हां, तुम शान्ति से ही मरोगी, लेकिन अकेली नहीं, मेरे साथ !' मैंने देखा, मोहन की आंखों में एक उन्माद था। डूबते सूरज की आभा मोहन की आंखों में प्रतिविम्बित थी'"रोशनी के एक सेतु पर राधा और मोहन आलिंगन-बद्ध या खड़े हुए थे किन्तु प्रवल ज्वार की लहरों को क्या यह सेतु झेल पाएगा? रोशनी के ऐसे सेतु बहुत कोमल होते हैं, और जिन्दगी की उठा-पटक के ज्वार बहुत प्रवल । राधा की प्रांखों से अविरल अथु झर रहे थे। मुख सूरजमुखी के सूर्यास्त के समय के मुरझाते फूल जैसा पीला हो उठा था । मोहन की अांखों का रंग गुलावी हो उठा था 'यह रंग उन्माद का था या अनुराग का ? मेरी प्रांसुओं से धुंधली हो उठी अांखें शायद ठीक-ठीक नहीं देख पा रही थीं । प्रेम के इतने निर्मम विद्रूप देखे थे मैंने कि उसकी निर्दो- पिता पर से मेरा विश्वास टूट चुका था. फिर भी लगा, जैसे उन क्षणों मोहन विश्वासों के उन खण्ड-खण्ड टुकड़ों को चुनकर फिर से एक मूर्ति गढ़ रहा हो..! हवा का एक झोंका पाया था और कुछ बैंजनी फूल राधा की हथेलियों को चूमते मोहन पर बरस गए थे। "पिताजी किसी तरह नहीं मानेंगे, दीदी, जानता हूं। राधा मेरे घर में बहू वनकर नहीं जा सकती। वह इसकी जान ले लेंगे। जानती हैं पाप, मेरे पिताजी कैसे हैं ? मेरी मां कभी राधा जैसी थीं. आज वह पागल हैं। पिताजी उनसे कहते हैं, मोती की चूड़ियां अच्छी नहीं लगती, तो हीरे को पहनो रेशम नहीं भाता, तो मखमल पहनो "तुम्हें किस - ६८/सलीव पर चीज की कमी है, मोहन की मां? लेकिन मैं तुम्हारे प्रांचल से बंधा नहीं रह सकता""मुझे जो चाहे, करने दो"!.."फिर वह धुंधरतो की झनकार और ह्विस्को में डूब जाते हैं"'मा तुलसी को दिया जलाते- जलाते पागल हो चुकी हैं । और. पिताजी ने जहां मेरा रिदता पक्का किया है, वहा से वह तीन लाख लेंगे"पूरे तीन लास । वह मेरा सौदा कर रहे हैं। लेकिन मुझे यह सौदा मंजूर नहीं !' चुम्बनो से मिक्त मोहन का स्वर दृढ था। किन्तु चुम्बनों से भीगती राधा कातर हो उठी थी। 'इमीलिए तो कहती हूं कि मेरी तुलना में तीन लाख और जिन्दगी के ये सारे मुख बहुत अधिक हैं, इन्हे स्वीकार करो, तुम्हे मेरी सौगन्ध, मुझे मेरे हाल पर छोड दो !' राधा के प्रासू मूख गए थे । उन पाखों में एक शून्य गहरा उठा था। 'इसलिए कि दुनिया एक बार फिर कहे कि पुरप निर्मम होता है." कि पुरुप को प्रेम निभाना नहीं पाता'"वह या तो खिलाडी होता है, या शिकारी.."नारी को फंसाकर मरने छोड जाता है"नहीं, मैं नहीं सह सकता कि प्यार का फिर एक बार अपमान हो कि एक राधा फिर मर जाए !' मोहन की तडप उसके स्वर मे उतर आई थी। मैं अवाक् थी "अभिभूत भी। 'अच्छा, दीदी, चलते है "जीते रहे, तो फिर मिलेंगे...।' मोहन राधा का हाथ थामे चलने लगा था । 'सुनो, बी प्रक्टिवल । एबॉर्शन क्यों नहीं करवा देते ?' मैंने बिल्कुल पत्थर से यथार्थवादी स्वर मे कहा । वे वैजनी फूल, वह सुनहरा मूर्यास्त, मोहन को पाखो का वह गुलाबी उन्माद, राधा का सूरजमुखी-सा पीला मुख"। सब एक पोर''और सारी उलझनो को एक ही झटके मे काट देने वाला 'बी प्रैक्टिकल' दूसरी पोर 'लामो, यह भटका मैं ही मार दू"उन क्षणों में किसी छुरी-सी ही निर्मम हो उठी थी। 'तो भी राधा तो मरेगी ही! वात का छुपना असम्भव है । मेरे घर में उसे मेरे पिताजी नहीं जीने देंगे, किसी और घर में समाज ! और मैं जानता हूं, राधा""राधा है ! लेकिन यह राधा अकेली नहीं मरेगी...!' स्वयंवर | ।
मोहन ने मुड़कर सहसा मेरे पैर छू लिए''राधा को खींचता-सा चला गया। यह एक खेल है। "एक उन्माद, या एक सत्य ? राधा और मोहन के नाम का वह संयोग एक सीमा तक सत्य हो उठा था। मेरे वक्ष में प्रवल पालोड्न उठ पाया । होंठ चुप थे। उस सारे पालोड़न को दवाते मैंने होंठ मौन में कस लिए थे। तीन दिनों से राधा और मोहन क्लास में अनुपस्थित थे। क्यों... क्यों.."क्यों...? मेरे पालोड़न व्यग्न हो उठे थे । मेरा रोम-रोम प्रार्थना कर रहा था कि यदि 'प्रमु' जैसी कोई शक्ति है, तो वह शक्ति उनकी रक्षा करे। तीसरे दिन मैं फिर पन्त को ही पढ़ा रही थी कि सहसा एक पुलिस इन्सपेक्टर पाया, 'मैडम, सुसाइड की एक वारदात हो गई है । आपको शिनाख्त के लिए चलना होगा।' मेरी हृदय-गति रुक-सी गई. 'कहीं राधा और मोहन ही तो नहीं...? पुलिस वैन की सीट पर बैठी में जैसे होश में नहीं रह गई थी। वैन रुकी। इन्स्पेक्टर उतरा। मैं भी उतरी। वही तालाव था." और उसके किनारे पर पड़े हुए आलिंगन-बद्ध दो शव "उन्होंने रस्सियों से अपने को ऐसे जकड़ लिया था कि लहरें उन्हें अलग न कर सकें। वे शव फूल कर विकृत हो गए थे और वे राधा और मोहन ही थे । मेरे स्तब्ध मन ने कहा, लहरों में समाने के पूर्व उनके होंठ एक अन्तिम चुम्बन में अवश्य जुड़े होंगे क्या विधाता उस अन्तिम चुम्बन से अधिक किसी और 'सुन्दर' की सृष्टि कभी कर सकेगा...? 'पहचानती हैं न आप इन्हें ? आपके स्टूडेण्ट्स थे न ? तो इसपर साइन कर दीजिए।' इन्सपेक्टर ने मेरे हस्ताक्षर ले लिए.. मैंने लिख दिया, वे राधा और मोहन ही थे । हां, वे राधा और मोहन ही थे। मेरे निकद अब उनके नाम महज़ संयोग नहीं रह गए थे. 'मृत्यु का वरण कर वे अमर हो उठे थे ! १०० / सलीव पर इन्स्पेक्टर ने कंप उतारी-शवों के अभिवादन के लिए, फिर कैप लगाकर एक तिक्त हमी हंसा, 'मैं नही जानता था कि प्राज के जमाने में भी लैला-मजनू हो सकते हैं !' इन्स्पेक्टर ने व्यंग्य करना चाहा था, किन्तु व्यंग्य में टेढे होते उसके अपने ही होठ उसकी ही पाखों यो अनकहा दर्द दे गए थे। उसने हंसना चाहा था, हंसा भी याविन्तु पेबल होंड हंसे थे, आखें नम हो गई थी। "चलो, उठायो लाशो को, अभी पोस्टमार्टम करवाना है और इनके वापी से शिनाख्त भी करवानी है सालो ने मार ही डाला...!' पुलिस चैन और लाशो को लिए एम्बुलेन्स चल पड़ी थी। ..और उन्मादिनी-सी खड़ी में सोच रही थी. "पृथ्वीराज अपनी संयोगिता को भरी सभा के बीच से उठाकर, किरनो के अश्व पर बैठा- कर ले जा चुका था "दूर बहुत दूर सारी दुनिया की पहुच मे परे... क्षितिज के उस पार ! एक मोर सूर्यास्त हो रहा था "तालाय का पानी ऐसा दान्त था, जैसे कुछ हुआ ही न हो और जुट पाई भीड़ में ऐसे चेमेगोइया हो रही थी, जैसे वे कोई फिल्म देख रहे हो!
कैद 'मां, भूख लगी है ।' अनूप चीखता है। 'लाती हूं बेटे, खाना लाती हूं, अभी, अभी...' मां का कोमल मधुर स्वर गूंजता है । अनूप इस स्वर को सुनना चाहता है बार-बार, निरन्तर । अनूप की चीखों के प्रत्युत्तर में मां का कोमल मधुर स्वर ऐसे ही गूंजता है और अनूप को लगता है मां अंगुलियों से ही नहीं, अपने स्वर से भी उसे सहलाती रहती है। मां थाली लिए पाती है । चमचमाती थाली में दो फुलके, कटोरियों. में दाल, पालू की सब्जी, खीर और अनूप का मनपसन्द, खीरे का रायता। मां थाली अनूप के सामने रख देती है । अनूप अंगुली दाल में डुबाकर मुंह में रखता है, 'तीती है।' फिर अंगुली रायते में डुवाता है, 'कडुमा - । . 'म कुछ तीता है, न कडुया है। वोल अव क्या है तेरे मन में ?' मां हंसकर पूछती है। 'तेरे हाथ से खाऊंगा।' अनूप ठुमककर कहता है । 'बस, इत्ती-सी वात, ले मैं खिलाती हूं अपने राजा वेटे को।' मां अनूप से सटकर बैठ जाती है। पहला कीर खीर खिलाती है, फिर दाल में फुलका भिगोकर खिलाती हुई हंसती है-'क्यों रे अव तो तीता- कडुवा नहीं है न !' अनूप और मां की हंसती दृष्टियां मिलती हैं। एक मूक समझौता है इन दृष्टियों में। अनूप ने कई वार देखा है, पाया है कि वे दोनों, मां उसकी और वह मां की, दृष्टि का अर्थ अनायास समझ लेते हैं। तभी न तीता, कडुवा की शिकायत करने पर मां खाना खिलाने लगती है। । - अनूप फिर ठुमकता है-'मां, कहानी 'अव कहानी भी? अच्छा सुन"" मां छोटे-छोटे कौर खिलाती यहानी बहने लगती है-'एक राज- कुमार था, वडा सुन्दर ! बड़ी-बड़ी प्रांखें, लाल-लाल होठ, घुघराले वाल, दूध-सा रंगटोक मेरे अनूप जैसा !' 'पौर उमके हाथ-पैर ?' अनूप दूधिया हंसी हंसता है । अनूप जानता है, उसके छोटे-छोटे सुन्दर दातों की मां बलायें लेती हैं- 'कमा राजकुमार-सा है मेरा लाल !' मा कहा करती है। मां कहानी की रौ में है-'हा-हां, उसके हाथ-पैर भी बड़े सुन्दर हैं। लम्बे-लम्बे हाथ में भगवान रामचन्द्रजी के थे । और पर' मां मह्मा चुप हो जाती है। अनूप मा को देख रहा है । मां रक जाती है, कहानी रक जाती है । अनूप जानता है मा अब शायद कहानी न कह सके । अनूप को याद है मां ने बहुत दिनों पहले यही कहानी एक बार शुरू की थी लेकिन कहानी राजकुमार के पैरों पर पाकर अटक गई थी। फिर मा शायद भूल गई हो, अनूप नहीं भूला कि मा वह कहानी नही वह मकी थी। आज न जाने कैसे मां फिर वही कहानी कर्ने लगी." अनूप खाना सरम कर चुका है । कहानी वारी है, लेकिन मां को जाने कौन-सा काम याद आ गया है-'अरे कहीं मैं सब्जी चूल्हे पर ही तो नहीं छोड़ पाई।' मां तत्परता से थाली उठाकर चली जाती है। अनूप ने देख लिया है थाली उठाती मा की दृष्टि कातर हो उठी है । मां की उसे देखती यह दृष्टि भी अनूप के मन पर इतनी अंकित है कि उस दृष्टि को वह सपने में भी नहीं भूल पाता । अनूप जव भी मा को मपने में देखता है, उसे देखती मा की यही कातर दृष्टि मां के मुख पर होती है''मां राजकुमार वाली यह कहानी कभी नहीं कह सकेगी, अनूप जान गया है । उस सुन्दर राजकुमार के पर हो, तव न । 'कंसा राजकुमार- सा है मेरा लाल !' अनूप का मुख चूमते मां जाने कितनी बार वह चुकी है। अभी भी तो कह रही थी-बड़ी-बड़ी मांखें, लाल-लान होट, घुघराले बाल, दूध-मा रग"ठीक मेरे अनूप जैसा !' लेकिन मुन्दर कंद/१०३ ।
राजकुमार की सुन्दर कहानी उसके पैरों तक जाकर अटक जाती है। अनूप अपने पैरों पर ढंकी रेशमी चादर हटा देता है। उसके सुन्दर हाथ उसके बदसूरत परों को सहलाने लगते हैं। मां बताती है जब वह वहुत छोटा था उसे 'पोलियो' हो गया था और उसकी दोनों टांगें रहते हुए भी नहीं रही थीं। अनूप को तो याद भी नहीं कि कभी उसके पैर थे भी ? पता नहीं पैरों पर खड़े होने का, अपने ही पैरों से चलने का अनुभव कैसा होता है...? अनूप रात-दिन सोचता है एक जोड़ी अांखें, एक जोड़ी हाथ, एक जोडी पर.. 'अनूप की अांखें बड़ी-बड़ी हैं, हाथ लम्बे-लम्वे सुन्दर हैं, जैसे भगवान रामचन्द्र जी के थे 'अनूप की प्रांखों में दर्पण में देखा उसका अपना चेहरा घूमता रहता है और फिर वह कमर के नीचे ढंकी रेशमी चादर को उघाड़ देता है लेकिन उसके एक जोड़ी पैरवेजान, निरर्थक, लकड़ी के दो टुकड़ों-सी टांगें, जो होकर भी नहीं हैं और अनूप सोचता है उस सुन्दर राजकुमार के पैर हों, तब न कहानी आगे चले । एक अव्यक्त चीत्कार अनूप के कण्ठ में घुटने लगता है 'अनूप अपने पैरों को देखता रह जाता है। सोते-जागते अनूप की प्रांखों में पैर ही पैर घूमते रहते हैं-चलते- फिरते पैर, उठती-बैठती टांगें टांगों पर दौड़ता जीवन, पैरों पर खड़ा जीवन ! अनूप से छोटा भाई अरुण इन्हीं टांगों पर दौड़ता रोज़ स्कूल जाता है । अनूप अपनी ह्वील-चेयर पर बैठा-बैठा देखता रहता है- अरुण नहाकर दौड़ता पाया है, नेकर और कमीज़ पहनकर दौड़ता रसोई में खाने गया है, और फिर बैग लेकर 'भैया''टाटा' कहता बाहर दौड़ गया है। अनूप ह्वील चेयर लुढ़काता दरवाजे तक जाता है। दरवाजे से बाहर गली का दृश्य साफ दिखाई पड़ता है। अरुण की दौड़ती टांगों के साथ कई जोड़ी और टांगें हैं. वे सब दौड़ते चले जाते हैं, वे सब स्कूल जाते हैं और अनूप'? अनूप सोचता रह जाता है कि काश ! वह भी अरुण की तरह दौड़ सकता''"अनूप का सर घूमने लगता है "उसकी अांखों में अंधेरा घिरने लगता है"उसे लगता है दिखाई पड़ने वाला - १०४ | सलीव पर कोई बन्धन न होने पर भी वह एक कंद में है। बर्ड नंमा ने एक बार बताया था कि एक कंद ऐसी भी होती है जिसे उमर-कंद कहते हैं । उमर-कंद उमें दी जाती है जो कोई भयानक अपराध करता है । लेकिन अनूप ने क्या अपराध किया है कि जाने विस ने उसे इतना भयानक दंड दे दिया है। अनूप सिसक- मिगकर गेने लगता है, रोता रहता है लेकिन मा के पाते ही पाखें मूंदकर सोने का अभिनय करने लगता है। अनूप जानता है कि बात-बात पर अरण को डाटने वाली मा उमे भी नहीं डाटती"मा को डांट, अरुण की तरह, खाने का अनूप का कितना मन करता है...! अनूप कितना चाहता है कि वह भी अरण की तरह रोज नहानर दौडता प्राए, नेकर और कमीज़ पहनकर दौडता रमोई में पाए और फिर बैग लेकर 'मा टाटा' बहता बाहर दौड जाए "ौर मा उमे भी बात-बात पर डोटे.. लेकिन मां तो उसे वम प्यार ही करती रहती है। जब पिताजी थे तो वे भी सबसे अधिक उमकाही नाह करते ये-- 'सबसे अधिक चिन्ता तो मुझे अपने इमी बेटे की है, मणी को मा।' वे मां से कहते थे। तब अनुप इतना ही समझ पाना या कि पिताजी उमे मवमै अधिक प्यार करते हैं । किन्तु अब वह समझ गया है कि पिता क्यों उमकी ही सबसे अधिक चिन्ता करते ये । प्ररण के पर हैं, मणीन्द्र भैया के भी पर है, वम वहीं विना पैरो का है न, इमीलिए उसे सब प्यार ही करते हैं । लेकिन इस केवल प्यार में क्तिनी घुटन है, कितनी चुभन ""इसे अनूप महमूस करता है, वह नहीं पाता । और अनूप के चीख-पुकार मचाने पर मां सच में समनती है कि अनूप को भूम लगी है और जब-तब उनके पास भूद लेने पर समनती है कि अनूप सो गया है। चार वर्ष पहले ही तो मणीन्द्र मंया वा विवाह हुना था । मात वर्ष का या अनूप त । विवाह को घूमधाम उसे बहुत अच्छी लगी थी। ह्वील चेयर पर बैठाया बिछोने पर लेटा वह इतना खुश था कि उसे खुग देखकर मा अपनी प्रासू पोछने लगती थी-'बहा सग है न रे मनूप । भगवान तुझे सुखी करें।' मां प्रासं पोछने लगी यो । मापद: कंद / १०५ ।
. ... खुशी में ही रोने लगी है, अनूप ने सोचा था और व्याह की धूमधाम में सो गया था। मां ने यह क्यों कहा, 'भगवान तुझे सुखी करें'. 'अनूप समझ नहीं पाया था । क्या खुश होना और सुखी होना दो अलग बातें हैं ? होगा .."ये बड़ों की बातें हैं। सात वर्ष के अनूप ने मुंह विचला दिया और उन जगमग करते रंगीन लट्टयों को देखने लगा जो चारों ओर सजाए गए थे। मैं अपने व्याह में इससे भी ज्यादा लटू लगाऊंगा''इससे भी ज्यादा रोशनी, धूमधाम, वाजे...1 अनूप तालियां बजा-बजाकर सोच रहा था मैया मोटर से उतर रहे थे। पीछे-पीछे लाल-लाल जगमग साड़ी में भाभी थी। भाभी के पीछे एक गोरी गुलाबी लड़की और थी । अरे ये लडकी तो मेरे बरावर होगी, इससे दोस्ती की जाए-कित्ती सुन्दर है ! अनूप ने सोचा । उस गोरी गुलावी लड़की मधु से अनूप की तुरन्त दोस्ती हो गई ! वे दोनों गेंद खेलने लगे थे। अनूप गेंद फेंकता, वह दौड़- कर उठा लाती, फिर वह गेंद फेंकती तो अनूप वैठे-बैठे कैच कर लेता। सहसा मधु ने कहा-'तुम बैठे-बैठे क्यों खेल रहे हो उठकर दौड़ो न, तव मजा पाएगा ।' अपनू ने कहा-'मैं दौड़ नहीं सकता।' मधु उसके पास पा खड़ी हुई.---'क्यों ?' अनूप ने चादर उठाकर अपनी टांगें दिखा दी। चीखती मधु भाग खड़ी हुई । मधु की उस चीख ने जैसे अनूप को कहीं ऊंचे से पटक दिया। उस क्षण सहसा अनूप को पहली बार लगा कि टांगों का न होना कुछ अनहोना था । वह कांपने लगा-कांपते-कांपते सिसकने लगा-मां पाई-~~~-'क्या हो गया रे, हंसते-हंसते रोने क्यों लगा?' मां हंस रही थी। मां भी कहीं सच में रोने न लगे, वह इतना ही सोच पाया । 'कुछ नहीं' कहता वह अपने-अापसे गेंद खेलने लगा। लाल-लाल साड़ी में गोरी-गोरी भाभी अनूप को बड़ी अच्छी लगी। उसका भी व्याह हो जाए तो उसकी भी ऐसी ही बहू आ जाए, फिर दोनों पाराम से दिन-भर गेंद खेलते रहें-उसने सोचा । क्यों न ही पूछा जाए-व्याह करेगी? दूसरे दिन सवेरे उसने मधु को वह फिर दौड़ती प्रा गई। - बुलाया तो १०६ / सलीव पर 'गेंद सेलोगी?' उसने पूछा । मधु शायद अपनी चीख भूल चुकी थी। अनूप नै देखा, गुलावी घेरदार फ्राक में मधु ऐसी लग रही थी जमे जापानी गुडिया हो । मधु अनूप से गेंद लेने बही तो अनूप ने उसका हाथ पकड लिया-'हमसे व्याह करोगी?' मधु को प्रांग फैल गई- अच्छा तो है यह दूल्हा ! जीजो के दूल्हा से तो ज्यादा मुन्दर है । 'टहरी जीजी से पूछ पाऊ।' फिर मधु शाम तक नहीं लौटी । शाम को भीड़ में दिखाई दी तो अनूप चिरलाया--'मधु , मधु ने वहा से जवाब दिया- "जीजी कहती है बिना टागोवाले दूल्हे से शादी करेगी तो तेरी भी टांगें तोड दूंगी'- '-पास खड़ी मधु की जीजी दुलहन भाभी ने मधु का मुह होली से दबा दिया था। सब हंसने लगे थे । अनूप उदास गया था । मधु के वापस चले जाने पर उसने मां से कहा था-'मां, मुझे एक जापानी गुडिया मंगा दी। मां हंसी थी-'तू लड़की है रे जो गुडिया खेलेगा?' लेकिन गुड़िया मंगा दी थी । गुडिया अब भी अनूप के सिरहाने माल- मारी में रखी है। अनूप जब अकेले में उसमें बात करता है तो उसे 'मधु' कहता है । मधु फिर नहीं पाई और अब ग्यारह वर्ष का अनूप जान भी गया है कि दो टागों वाली मधु उसमे कभी ब्याह नहीं करेगी। मणी भैया रोज जाते समय उसके पास पाते हैं-'अनूप, हम प्रॉफिम हो पाएं ।' वे उसके गाल थपथपाकर कहते हैं । अनूप उनकी हथेली पकडकर छोड़ देता है.--'हां भैया, टा-टा' -भैया मुस्कराते चले जाते हैं--अनूप बैठा रह जाता है-टोक मां के पूजाघर में रखी भगवान की मूर्ति की तरह । लेकिन मूर्ति तो पत्थर की होती है, क्या वह भी पत्थर का है ? सोचते अनूप का मन जाने कसा होने लगता है-उमडले प्रांमुत्रों को रोकता वह जोर-जोर से हील-पेपर लुढकाने लगता है । अनूप के भैया-भाभी कितने अच्छे हैं ! कितना खयाल रखते हैं उसका ! मणी भैया और भाभी जब भी बाहर जाते हैं तो उसके लिए जरूर कुछ न कुछ लाते है । प्ररण जिद करता है कि उसके लिए भी कुछ क्यों न प्राया, तो मणी मैया डाटते हैं-'तुझे रोज-रोज क्या चाहिए ?' भरण गुस्सा करता है, बड़बड़ाता है, लेकिन अनूप के हाथ से बह चीज छीनता नहीं। यदि अरुण उसकी चीज़ छीनकर भाग जाए तो अनूप उसे पकड़ तो कंद [ १०७ की नहीं सकता । लेकिन अरुण ऐसा कुछ नहीं करता। एक रात अनूप ने सपना देखा था कि अरुण ने अनूप की चीज़ छीन ली है और भाग गया है और अनूप भी उसके पीछे दौड़ रहा है"दौड़ रहा है। प्रांख खुलने पर अनूप बहुत देर तक थरथराता रहा था 'क्या वह कभी अरुण के पीछे दौड़ सकेगा...? अकेले में अपनी टांगों को देखते वह उस सपने को सोचता रह जाता है। भाभी कहती है-'अनूप भैया, लामो तुम्हारे सिर में तेल लगा दूं।' भाभी के कोमल हाथों का स्पर्श अनूप को मधु याद दिला देता है। भाभी सजकर पाती है तो भाभी को देखने के बाद अनूप उस जापानी गुड़िया को देर तक देखता रहता है। कुछ दिन पहले एक भिखारी बच्चा अनूप के घर भीख मांगता या गया था। ह्वील-चेयर पर बैठे अनूप ने देखा था कि उस लड़के की भी टांगें नहीं थीं. 'टांगें थी तो-लेकिन वैसी ही वेजान, निरर्थक, लकड़ी के दो टुकड़ों-सी, जो होकर भी नहीं होती हैं और उस लड़के की बे टांगें रेशमी चादर से ढंकी भी नहीं थीं. दोनों हथेलियों पर जोर देकर घिसटता वह लड़का फिर नहीं आया। मां ने उसे कुछ दूर ले जाकर उससे कुछ कहा था, शायद यहां आने को मना किया हो । अनूप ने इतना तो सुना था 'तू पीछे के दरवाजे से आकर भीख ले जाया करना, समझा.... यह मां भी समझती है कि वह अनूप की रक्षा कर नेगी ? लेकिन मां यह कहां जानती है कि जैसे-जैसे अनूप वड़ा हो रहा - होश में पा रहा है, अनूप को भीतर की जाने कितनी चोटें लगने गी हैं कौन कर सकेगा अनूप की रक्षा इन चोटों से ? अाजकल अनूप को अाकाश की ओर देखना बहुत अच्छा लगता है ह्वील-चेयर लुढ़काता वरामदे में आ जाता है और दीवार से सिर कर पासमान को निहारता रहता है। अन्तहीन नीला आकाश उन्मुक्त पवन के झोंके कभी धूप, कभी चांदनी' 'कभी तारों जड़ी । बड़ा अच्छा लगता है अनूप को यह सव ! लेकिन सबसे अच्छे है अनूप को नीले आकाश के विस्तार में पंख फैलाए उड़ते पक्षी। कसा लगता होगा इन पक्षियों को प्राकाश में उड़ते ? शायद वैसा १०८ / सलीव पर - ही जैसा अनूप को सपने में प्ररण के पोछे दौड़ने से लगा था। पंस फैलाये उडते पक्षियों को देखता अनूप परथराता रहता है । 'मा, मुझे तोता मंगा दो। 'क्या करेगा अब फिर तोते का ?' मा अनूप का माथा सहलाकर पूछती है। 'उसे बात करना सिखलाऊंगा, फिर उससे बात किया करूंगा, मकेला नहीं लगेगा।' अनूप मों की गोद में मुख छिपाकर कहता है । 'अच्छा, अच्छा', मा का स्वर कातर-सा लगता है। मां की दृष्टि, मा का स्वर,अनूप को क्या मा सदा हो ऐसा कातर प्यार देती रहेगी, कभी झिड केगी नहीं ? कैसी हमरत है अनूप के मन मे मा की डाट साने को या अरण के द्वारा कोई चीज़ छीन लिए जाने की...? मा पडोस के माधो काका से कहकर तोता मगवा देती है। पहले भी दो धार मंगा चुकी है । लेकिन इस अनूप को जाने क्या पागलपन चढता है कि दिन-भर उस तोते से सेलने के बाद शाम को उसे पिंजरा खोलकर उड़ा देता है। दो यार तोते उडा चुका है भनूप ऐसे । मा ने तीसरी बार फिर तोता मंगा दिया है। दिन भर अनूप तोते से उलझा रहा है-~'बोलो मिठू मिया रघुपति राघव राजाराम" राम राम "सताम'टाटाशाम हो गई है । तोता पिंजरे में फड- फड़ा रहा है । अनूप बरामदे मे ह्रोल-चेयर पर बैठा है । पास स्टूल पर पिंजरा है, पिंजरे में तोता है । अनुप प्राकार की भोर देखता है। प्राकारा के नोले विस्तार में पक्षियों के झड के झुड उडे जा रहे हैं-~~-उन्मुक्त ! मनूर पाकाम को देखता है, पिजरे को देखता है, और धीरे से पिजरा सोल देता है । तोता पस फड फडाता है, फुदकता है और पिंजरे से उड़ जाता है। मा भनूप के लिए दूध लिए पाती है। साती पिंजरा देखती है-~'तो फिर उड़ा दिया न तोता। क्य हो गया है रे अनूप तुझे ? जब उड़ा ही देना है तो तोता बार-बार मगाता ही क्यों है । ले अब दूध को पो।' मां का स्वर काफी तिक्त है । दूध पीता भनूप कहना चाहता है, कि यदि उसका बस चले तो वह पिजरे मे बन्द हर पक्षी को माजाद कर दे। लेकिन कहता कुछ नहीं कह पाता नहीं" छोटी-सी नीली झील के किनारे चुपचाप बैठ जाती है. 'ग्राफिस में डूबने से पहले यूरोप की तीन महीने की शानदार यात्रा के बाद मिस शैला कपूर अब शहर के उस एकान्त स्थान पर बार-बार आने लगी है और उस टाइपराइटर पर अंगुलियां दौड़ाते भी, अब उसकी आंखों में नीली झील का नीरव एकान्त बार-बार उभरता है । और वह प्राय: प्रात्म-विस्मृत-सी हो उठती है। इधर उससे उसी नीली झील के कारण, टाइपिंग में इतनी अशुद्धियां होने लगी हैं कि प्राय: वास कठोर स्वर में डांट देते हैं, 'ह्वाइट्स रांग विद यू मिस कपूर? इतने एक्सपिरियेन्स के बाद कमिटिंग सिली ब्लण्डर्स !' वह अपराधिनी-सी बास की कविन से लौटती है और अंगुलियों से दर्द करते सिर को सहलाकर, एक कप चाय से सिर-दर्द की गोली गटक जाती है । यथाशक्ति दिमांग और अंगुलियों को सन्तुलित कर पेपर फिर टाइप करती है. इस बार कायदे से, विना एक भी गलती के । फिर बाथरूम में जाकर मेकअप ठीक करती है. 'साड़ी की चुन्नटें और प्रांचल सम्भा- लती है, पाउडर का पफ फेरती है, लिपस्टिक से होंठों को और गुलावी करती है और मसकरा की धार से पलकों की कोरों के बंकिम कटाक्ष पने करती,,दुबारा बास के केविन में पहुंचती है, तो बिल्कुल सधी हुई, सन्तुलित स्टेनो मिस शैला कपूर होती है-विदेशी फर्म की खूबसूरत, स्मार्ट मिस शला कपूर, जिसके लिए इतनी प्रसिद्ध फर्म में नौकरी पाना किसी सौन्दर्य- प्रतियोगिता में विजयी होने के समान ही था ! हां, उसने अपने खूबसूरत चेहरे के सम्मोहन एवं अनुपात में ढले नारी-अंगों के मोहक कोणों के बल पर यह नौकरी प्राप्त कर ली थी और पहले दिन ड्यूटी ज्याइन करते हो सोचा था कि अब यह सब कुछ पा सकती है, हामिल कर सकती है, जो वह चाहती थी। अब वह नितान्त निद्वेन्द्र जिन्दगी जी सकती है, अपने बल पर, सिर्फ अपने लिए! सिर्फ अपने लिए"हां"कोरो के बंकिम कटाक्ष ने करती, अपने लिए ! देह से परे को न वह सोचना चाहती है, न देह की सीमानों में बंधना । 'ग्राई कीप नो इनहिविशन्स' इसे न वह केवल स्वीकार चुकी है, बल्कि व्यवहार में भी जीना सोख चुकी है और उसे विश्वास है कि विज्ञान के इस युग में वैज्ञानिक तरीकों से जीना चाहिए 'इम 'राकेट एज' में राकेट के समान उड़ान भरनी चाहिए, न कि रविवादी परम्परा- गत दलदल में फंसकर, जीवन-यौवन व्यर्थ कर देना चाहिए । है. वह चोली कसती मुह बिचका देती है। अब, अपने एक कमरे के फ्लैट में, जब वह वालकनी मे बैठी चाय सिप करती होती है, तय नीले प्राकाश का अनन्त विस्तार, पता नहीं कैसे एक भील-सा प्रतीत होने लगता है-नीलो झील-मा ! इम विस्तार को पंखो से तौलने के स्थान पर वह, पता नहीं क्यो इसमे डूब जाना चाहती है। प्राय: उसकी आखो को झावती पुरप-पासे अभ्यर्थना में कहती हैं- 'पापको पाखे बहुत खूबसूरत हैं मिस कपूर! विल्कुल नीली झोल जैसी ..."कि इनमे डूब जाने को जी चाहता है...!" हो, सचमुच उसकी मांखें नीली हैं। केराशि सुनहरी और वर्ण एका- दम उज्ज्वल । साथी बलक प्रायः ठण्डी प्राह भरकर कुछ न कुछ कहते रहते हैं उसकी सराहना मे- 'हाय ! चादनी लग जाएगी, मैला वदन • हो जाएगा...!" प्रशोक पाण्डे साहित्यिक रचि रखता है । उसकी मेज दाला के विल- 'कुल करीव है "शेला प्राय उसे भी प्रस्फुट स्वरो में गुनगुनाते सुनती है, 'तुम्हारे नील झील-से नैन, नीर निझर से लहरे केश !' गंजी खोपड़ी वाले बास मिस्टर मेहरोत्रा सम्माननीय अधिकारी हैं। इतनी प्रमुम विदेशी कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर अपने कार्य में इतने दक्ष कि एक प्रोर वह कम्पनी का विस्तार करते गए, दूसरी भोर अपनी "स्टेटस' का भी । सबसे समझदारी का काम उन्होंने यह किया कि स्वयं डूबने से पहले / १११ .
- फम्पनी के बंगले में रहने लगे और सात मंजिली इमारत खड़ी कर ली ----'यू नो फार माई बोल्ड एज, आई मस्ट हैव सम सपोर्ट ।' मिस्टर मेहरोत्रा प्राय: डिक्टेशन देते समय ला की चौवीस इंच की कमर को वांह से कस लेते हैं । खींचकर उसकी पतली नाजुक अंगुलियों को चूम लेते हैं, 'यू पोजेस वण्डरफुल प्राइज़ !' कहते हुए छोटी-छोटी लोलुप अांखों से देखते हैं। फिर डिक्टेशन देने लगते हैं. केविन में इससे अधिक सम्भव नहीं हो पाता। वैसे, शंला, उन्हें सब कुछ समर्पित कर चुकी है -रात्रि के अन्धकार में, किन्तु रात्रि की बात को मेहरोत्रा और शला रात के साथ भूल जाते हैं, मुला देते हैं । दूसरे दिन जब आफिस में होते हैं तो मिस्टर मेहरोत्रा कम्पनी के वास और शैला कपूर सिर्फ कम्पनी की स्टेनो टाइपिस्ट । एक बार मिसेज मेहरोया ने, शैला को घर पर चाय के लिए बुला-. कर हंगामा खड़ा कर दिया था, 'याद रखो, मिस कपूर, मैं ऐसी-वैसी श्रीरत नहीं । तुम्हें रास्ते से हटा सकती हूं। अच्छा हो कि तुम अपनी सीमाओं में रहो, वरना तुम्हें मिटा दूंगी।' मिसेज मेहरोमा शेरनी-सी विफर उठी थीं और मिस्टर मेहरोत्रा ने कसम खाई थी, 'पाई स्वेनर बाई गाड ! शैला मेरी बेटी के समान है, मेरे लिए । बिलीव मी माई डियर !' और वह मिसेज़ मेहरोत्रा के कादमों में झुक गए थे। 'प्राई स्वेअर वाई गाड...' मेहरोत्रा ने ईश्वर के नाम पर कसम खाई थी और फिर शैम्पेन में डूबकर दूसरे ही दिन इसे झुठला भी दिया था, 'टेक इट इज़ी माई डियर !' शैला के स्निग्ध कपोलों को सहलाते हुए उन्होंने माफी मांगी थी, 'आई एम सारी फार बाट माई मिसेज़ हैज' । - । शैला को लगा कि मिसेज़ मेहरोत्रा ने नहीं, मिस्टर मेहरोत्रा ने ही उसे जरमी किया है। उसकी नीली झील-सी प्रांखों में, लाख रोकने पर भी प्रांनू छलक पाए थे। जाने क्यों, तब वह फूट-फूटकर रोई थी और फिर चुपचाप नीद को गोलियां निगलकर वेहोशी में डूब गई थी, किन्तु उस सारी रात उसे भयावह दुःस्वप्न आते रहे थे. सबेरे होश पाने पर देखा--पास ही एक हजार का चेक पड़ा हुआ ११२ / सलीव पर है-मिस्टर मेहरोत्रा का। चेक को उलट-पुलटकर देसतोहता बिल्कुल होश में आ गई,"टेक इट ईजी माई डियर !' उस पार भाषा मोर मचमुच ही वह महल हो गई । अपनी उठती किसी निसनीको उसने रिकार्ड-प्लेयर पर एक तेज विदेशो धुन का रेकार्ड लगाकर, उम गोर में हुवा दिया । हो, उन दिन एक बार बहस गौर से उसने मानो नौली भोल-मी प्रांखों में दर्पण के सामने, स्वयं भी भास्कर देखापादन! उस दिन कुछ क्षणों के लिए वह अपनी ही आंखों का सामना नहीं कर सकी थी। फिर मारे दिन ग्राफिन में वह सुली, वैवारः मासो में, कारे स्टाफ का मामना करती रही थी। उसके बाद उसने अपनी नीलीभीत- मी ग्राखो में स्वयं झांकना बन्द कर दिया था, 'ये भीती मोरों के ड्रयने के लिए है उन सबके डूब मरने के लिए। दौला को दपित चितवन, दर्पण मैं उससे कहती, 'मैं स्वयं को हलू इनमे?' बोला को जाव मिले, सचिम करते, सिर्फ अपने लिए जीते. तीन वर्ष हो चुके हैं. तीन वर्ष ! मोह, माई गुडनेस मला इन तीनो वर्षों की सोचने एक दीपं नि.दवास लेती है । इन तीन वर्षों को पंस लगारर उड जाना चाहिए था-'राकेट एज' मे राकेट के समान । शंला में 'राट एज' के सारे सिद्धान्त सीख लिए थे, अपना लिए थे, किसी हद तर, 'जी भी लिए थे। किन्तु अपनी नीलो झोल-मी मासी को भोर मोहक बनाने के लिए मसकारा की धार से वकिम कटाक्ष और पैने कर देने के लिए कि कोई चितवन का तीर व्यधं न जाए। यदि तीर चले तो शिकार कदमों में ही जा गिरे। तो..तो भव कभी-कभी उसे ही लगता है कि उसके तीर उसे ही माहत करने लगे हैं। उसकी नीली भील मी प्रायो की नीली भाभा मे स्याह अंधेरे घिरने लगे हैं। वह सोचती-~'हे, माई एम जस्ट ट्वण्टी फोर 'अभी तो पूरी जिन्दगी मामने है। चलो, पहले जी भरकर गुनाह कर लें. फिर फुरसत में प्रायश्चित कर लेगे।' ला विदेशी धुनी पर नृत्य करने का अभ्याम भी करने लगी है हा, यदि वह केवरे-डान्सर हो सके तो फिर उसे अपनी चौगुनी कीमन डूबने में पहले (११३ - मिलेगी, शोहरत भी । नशे में थिरकती-झूमती ज़िन्दगी भी "नशा" नशा'"नशा ! रूप का "यौवन का! मुक्तभोग का-देह के स्थूल स्तर पर हर प्रानन्द की प्राप्ति का ! काफी की चुस्कियों से लेकर शैम्पेन के चूंटों का और चाहिए भी क्या ? और यह सब शैला हासिल कर सकती है. किती हद तक कर भी चुकी है ! गैला को लगता है, जैसे वह सितारों के बीच पा खड़ी हुई है। सितारों की बुलन्दी. सितारों की जगमगाहट "सितारों का माया-लोक ! किन्तु ये सितारे अंधेरों से घिरे क्यों होते हैं ? दिन के उजाले में इनका पता क्यों नहीं लगता ? अच्छा है कि सितारे अंधेरे में ही चमकते दिन का उजाला तो तपाने वाला होता है -झुलसाने वाला। सब कुछ साफ-साफ दिखाने वाला । शैला तो अपनी स्निग्ध त्वचा को भी सूर्य की प्रखर किरणों से बचाए रखना चाहती है कि कहीं स्याह न पड़ जाए। दिन के प्रकाश से हटती है शैला, रात के अंधेरों में निर्द्वन्द्व हो उठती है, उसे रोशनी नहीं, अंधेरे साए अच्छे लगते हैं। शैला, स्नान-गृह में 'शावर' के नीचे बैठी अपने अनावृत अंगों को जी भरकर निहारती है-नारी-अंग के उन मोहक उभारों को जो उसके सम्मोहन हैं ! इतिहास बताता है-क्लियोपेट्रा के सान्निध्य के लिए विश्व के विशिष्टतम, श्रेष्ठतम पुरुप, लालायित रहते थे...! और उसी क्लियोपेट्रा ने, जो जीवन-भर अपनी त्वचा का सौन्दर्य निखरा रखने के लिए दूध से नहाती थी, अपना अन्तिम चुम्बन काले विपधर को दिया था कि वह चुम्बन उसके प्राण ले ले । सौन्दर्य की सम्राज्ञी ही नहीं, मिस्र की सम्राजी क्लियोपेट्रा ने अन्तिम चुम्बन विपधर का क्यों चाहा था ? क्या प्राप्त किया था? जल की फुहारों के नीचे बैठी, क्लियोपेट्रा के बारे में सोचती, शैला समय की गति भूल जाती है। उसे लगता है- समय का दीर्घ अन्तराल पार कर कोई क्लियोपेट्रा ही फिर जनम गई है.-शेला कपूर के रूप में ! तो क्या शैला को भी किसी विपधर का अन्तिम चुम्बन चाहना होगा? वरण करना होगा? तीन, केवल तीन ही वों के छोटे-से सुदीर्घ अन्तराल को पार करते हुए दौला के कदम शिथिल होने लगे हैं। उसे लगता है कि उत्तरों के ११४ | सलीव पर बीच वह एक प्रश्न बन गई है--एक प्रश्न ! या फिर अंकरहित शुन्य-सी हो उठी है । शून्यो की संख्या बढ़ती जा रही है । अंक नहीं मिल पा रहे हैं। एक प्रश्न ? एक अंक ? सानुपातिक कोणों पर सही मोहक नारी- देह ! अशोक पाण्डे से लेकर मिस्टर मेहरोत्रा तक की अभ्यर्थना । बढ़ता वैक-बलेंस । शरीर के हर गुरस की तुष्टि । और क्या चाहिए? रा! ह्वाट ए टेमेटस राइज़ | यू पार रियली फारचुनैट ! शंना कपूर, स्वयं को बधाई देने बढती है तो सिर्फ दौला झिझक्कर पीछे हट जाती है ''हथेलियों से मह छिपा लेती है"शायद कराहने लगती है किन्तु शेला कपूर, उस "सिर्फ शेला' पर हावी हो उठती है । उस कराह को एक मादक मुस्कान में डुवा देती है । लिपस्टिक से गुलाबी होठो को इतना सुखं रंग लेती है कि उसे स्वयं लगता है, उसके होट रग-रजित नहीं रक्त-रजित हैं । 'ग्रोह, दो फुलिया मी ।' विजयिनी शंला यपूर, पराजित शैला करे एक प्ररल धक्कर और देती है, और प्लेटफार्म हील' की मैडिल को सटखट वरती एडियो से उस शैला को स्वय रौंदकर बढ़ जाती है। कभी-कभी शुरू में वह मुडकर देखती भी थी कि उस शला का यया हाल है, जिसे धक्का देकर, गिराकर, वह प्रागे बड़ पाई है । तब कही शुरू-शुरू मे कुछ दर्द जैसा भी होता था । लगता था----उस अप्रकट शैला को, मिस शैता कपूर ने कही सचमुच रौंदा है, माहत किया है, किन्तु धोरे-धीरे प्रप्रस्ट की वह वायवी दौला अधिकाधिक ठोस हो उठी- शंला कपूर के सम्मुख हार गई। मौन होती गई। उसकी उठती कराही का, विसी प्रतिवाद का क्षीण स्वर, उसके स्वय की उन्मुक्त हमी मे, मुक्त खिलखिलाहट मे डूब गया, 'ह्वाट ए वण्डरफुल सेट ग्राफ टीथ यू पोजेस ! मिस कपूर, पापको तो किसी टूथपेस्ट के विज्ञापन के लिए लिया जाना चाहिए । मैं दातं लगाता है कि प्रापको इस जगमगाती हंसी, इन मोती जैसे दांतों के सामने पौर सारे टूथपेस्ट 'डब्बा' हो जाएगे। च.''च''कही वेचारे टूथपेस्ट बनाने वाले प्रात्महत्या न कर लें ! जैसे कि मापको इस मुस्कराती अदा पर हम चुपचाप खुदकशी करते रहे हैं।' चोपड़ा पजावी है न, वैवाक बात कहता है, सीधी तोलती नजर से देखता डूबने से पहले / ११५ - है, और जिस शाम शला उसके साथ सिनेमा देखती है, या काफी हाउस जाती है, उस शाम का खर्च वह उठाता है । शहर का नामी गुण्डा 'बबन' जाने कितनी बार सीने पर हाथ मारकर कह चुका था, "जियो, जियो छमिया ! किसी दिन इधर भी नजरे- इनायत होगी या हम इन्तजार ही करते रह जाएंगे ?' फिर एक दिन घेर ही लिया था. शैला को घबराकर पुलिस में रिपोर्ट करनी पड़ी थी और पुलिस ने, मिस्टर मेहरोत्रा के कारण, खास तौर पर शैला की सुरक्षा का इन्तजाम कर दिया था "बबन ने शैला का पीछा छोड़ दिया था। 'अव तुम्हें कोई डर नहीं है मिस कपूर !' मिस्टर मेहरोत्रा ने शैला को आफिस के कैविन में ही खींचकर कस लिया था, 'अरे भई, शुक्रिया अदा भी नहीं करोगी?' मेहरोत्रा की छोटी-छोटी अांखें चमकने लगी थीं। 'बैंक यू सर, थेंक यू वेरी मच इण्डीड ! शैला को मेहरोत्रा ने उस दिन पहली बार कहा था और बच्चन की वहगी अांखों से छुटकारा दिलाने की कीमत मेहरोत्रा ने अवसर मिलने पर कसकर वसूल कर ली थी। इतनी बड़ी कम्पनी के चीफ वास मेहरोत्रा ने शैला को अपनी सुरक्षा में ले लिया था, 'नाऊ यू आर एण्टायरली सेफ, माई डियर ! कम धान ! फील इजी !' शंला से मेहरोत्रा बार-बार कहते रहे थे। और जो-जो प्रादेश वह देते रहे, शैला उनका पालन करती रही। 'देह- सुख को, देह से परे न जोड़ना, शैला की जिन्दगी की फिलासफी बन चुकी .."फिर भी "उस रात बब्बन की वहशी प्रांखों से छुटकारा पाने की कीमत चुकाती शैला इतनी 'शीतल' होने लगी थी कि तब उसने पहली चार शैम्पेन भी पी थी. और एकदम चैतन्य हो उठी थी ! फिर पता नहीं वह गम्पेन का नगा था या कोई और वेहोशी कि शैला को लगता रहा, मेहरोया नहीं, बब्बन ही उसे नोंच-खसोट रहा है"। 'ट्रेण्ड कुत्तों' और जंगली भेड़ियों का फर्क, गैला को साफ-साफ समझ में पा गया था ...और वस, इस 'फल' के अतिरिक्त शैला ने भी सवेरे तक और सब कुछ भुला दिया था "वस वह 'फर्क' उसे 'याद' रह गया था। x . - 'ईगल' में फिल्म देखते हुए विनोद चोपड़ा ने सहसा लागी हथेली दबाद, मै प्राई प्रपोज टू यू?' वह दोला के कपील पर भूर पाया था। 'प्रपोज ह्वाट ?'गंला ने न विनोद के हाय से मपनी हथेली मींची न "स्त्रीन' पर से अपनी प्रास हाई । वह जैमी सहजता से पिसवर देख रही थी, देखती रही। 'प्रपोज मैरिज' यानी कि मैं तुमसे मादी करना चाहता हूं।' विनोद ने शैला के कन्धे बांह में घेर लिए । उमको सांमें गर्म हो उठी थी। म्पद में शोले भडक उठे थे। गला ने वे 'मोले' महमूम किए, धीरे में हंसी, 'लगता है पिक्चर देसन-देखते तुम भी भडक उठे हो !' विनोद उत्तजित हो उठा, 'तुम्हारा मतलव है मैं भी कोई मिनेमा का सीन कर रहा हू"नो, जो मैं कह रहा हूँ, पाई मौन इट, मानो कि मैं वास्तव में तुममे शादी करना चाहता हू !' 'अच्छा पिक्चर के बाद बात करेंगे..!'शंता सहज थी, महज रही माई। 'पिक्चर के बाद नही, इण्टरवल के बाद, मुझे माज अभी जवाब चाहिएफिल्म में तुम्हें फिर दिया दूगा--प्राई प्रामिस ।' 'प्रामिस बाट 'गला फिर हंसी, 'अच्छा मममी, इण्टरवल के बाद को पिपचर तुम मुझे फिर दिखा दोगे, यही न ।' विनोद नापा खो बैठा । मेला का हाथ सीरते उठा, 'न, अब तो एक मान के लिए भी नहीं रक सकता "गंला कम पान, नेट पम गो टू काफी हाउस। विनोद ला को सोचता-मा ले गया-टेक्यो मे । काफी हाउम की मौदियां चढ़ते दाला के अगों से जितना मट सकता था, सटा रहा और कैबिन का पर्दा खीचने, दो त्रीम काफी कामाईर देते, विनोद की पासो के डोरे मुसं हो उटे वे ग्राखें पायद गला के मादक अंगो से फूटते नशे को पीती, लाल हो उठी थी, शिन्तु गेला की नीली मा, नीलाम हो रही माई। उनमे कोई लाल डोरे नहीं उभरे, वह भाराम से काफी सिप कर रही थी। 'जवाव दो शैला, अभी इसी वक्त !' डूबने से पहले / ११५ - 'सोचूंगी, अभी शादी की जल्दी क्या है ?' शैला ने एक बंकिम कटाक्ष फेंका। अपनी उस दिलकश अदा के असर को वह जानती थी। चितवन के ऐसे तीर उसने साध लिए थे। विनोद ने प्राधी पी हुई सिगरेट फर्श पर फेंकते, जूते से रगड़कर वुझा दी । वह लगभग चीख पड़ा, 'नहीं, तुम्हें जवाब अभी देना होगा -अभी इसी वक्त-दिस वेरी मोमेंट!" 'क्यों, चीख क्यों रहे हो? क्या अधिकार है तुम्हें मुझपर'? डोण्ट लूज योर वैलेन्स विनोद !' शैला का स्वर सपाट था। गोरे मुंह पर 'मेकअप' के अतिरिक्त कोई और रंग नहीं था। 'अधिकार नहीं प्यार"'आई लव यू ! मैं तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूं। तुम बिल्कुल वैसी हो जैसी लड़की के सपने में देखता रहा हूं'"यू पार जस्ट द गर्ल श्राफ माई ड्रीम्स ! और जानती हो, यदि हम- तुम एक हो जाएं तो ज़िन्दगी में क्या कुछ नहीं पा सकते, हासिल कर सकते...? आई हैव वीन विशिंग फार ए गर्ल विद नो टेवूज एण्ड यू पार जस्ट द परफेक्ट टाइप फार मी!' 'बट प्राई बिलीव इन टयूज़ ! अगर शादी-वादी की बात हो तो फिर कुछ हट कर सोचना होगा।' शैला गम्भीर हो उठी। 'सत्तर चूहे खाकर !' विनोद आपा खो बैठा, 'बड़ी सती-सावित्री हो न ।' 'मैंने कर कहा कि मैं सती-सावित्री हूं!' शैला बिलकुल संयत - धी। 'तो फिर तुम्हें इन्कार क्यों है ? लुक हियर शैला, हम दोनों मिल- कर बहुत ऊंचे उड़ सकते हैं, जिन्दगी के सारे सुख हासिल कर सकते हैं ...फिर शादी तो एक नार्मल चीज़ है' औरत और मर्द को एक-दूसरे की जरूरत होती ही है।' विनोद ने माथे का पसीना रूमाल से पोंछते, पूरा एक गिलास पानी पीकर दूसरी सिगरेट सुलगा ली 'चीज़' "ज़रूरत''हां, अब तुमने विल्कुल ठीक लपज़ इस्तेमाल किए हैं और यह भी बिल्कुल ठीक कह रहे हो कि अगर हम शादी का नाटक कर लें, तो सारे सुख हासिल कर सकते हैं, जिन्दगी में ऊंचे उठ । ११८ / सलीब पर ही नहीं, उह भी सकते हैं, क्यों ?" ला के होठी पर, मासों में व्यंग्य उमर पाया था, 'मोर नुम्हे मेरा जवाब चाहिए न, इसी वक्त "तो मेरा जवाब 'ना' है"नो एण्ड नेवर!' शैला की नीली मां अल-सी उठी पी."विनोद की मांसी में भी भंगारे-से दहक उठे थे। उन जलती प्राप्ती से एक-दूसरे को देते, पे कुछ देर तक बैठे रहे.."रा दिल ले माया था, 'प्राज विल मैं करूंगी, एण्ड लेट्स गो नाउ !'शेला उठ सड़ी हुई। फाफी-हाउस की सीदिया साथ-साथ उतरकर विनोद पोर शंसा दो विपरीत दिशामों में मुह गए थे। 'मिस्टर पाहे, माज मन बहुत उदास है, शाम को कम्पनी दंग?" शला टाइपराइटर पर दौड़ती अंगुलिया रोककर अशोक पाई में पूछ रही थी। अशोक प्रचकचा गया, 'लेकिन मिस शंसा, मेरी कम्पनी भापती अच्छी लगेगी?' 'हां, अच्छी लगेगी, तभी तो पूछ रही हूँ ! पीला का स्वर कातर हो प्राया था-अप्रत्याशित रूप में कातर! अशोक हतप्रभ हो उठा, 'यदि माप चाहेंगी तो क्यों नहीं? पापा साय तो इस नाचीज का मौभाग्य होगा।' दोला ने कुछ देर और टाइप करने का प्रपल किया, रितु नगरी अंगुलियां टाइपराइटर पर चलने में भी इन्कार कर रही थी। ये पंगु- लियां जो चलती नहीं दौड़ती थीं, जिनमें सवमूरती और गति दोनों यो। पीला को तेजी से टाइप करते देखकर वर्मा प्रायः रिमाधमदा था, 'मिम शंला कपूर की नाजुक अंगुलिया और ते पोर पोरेग होती रहती है यार, काम ! हम टाइपराइटर ही हो !' घेला ने हाय रोक दिए। बाहर माकाग पर अचानक वाइन पिर माए मे, पुछारें पड़ने लगी थी। भयानक पी के दार बह रम वर्ग की वर्या की पहली हार यो । हल्ली फुहार पोरे-धीरे रहो दी। दर्ग पनपौर हो उठी। मेप गररते रहे। बिरनी पती रही। बाहर हवन के पहा | मेघों के कारण और भीतर विजली गुल हो जाने के कारणं इतना अंधेरा- सा हो गया था कि ग्राफिस-रूम में सभीको अपना-अपना काम रोक देना पड़ा । और पता नहीं क्यों, उस दिन शैला को लेकर, निरन्तर बक-बक करने वाला वर्मा तक खामोश हो उठा था। धीरे-धीरे वर्षा का वेग घटा । हल्की-हल्की धूप निकल आई। मिट्टी से सोंधी गन्ध उठने लगी थी। शैला ने पहली बार उस सोंधी गन्ध को महसूस किया, वरना तो वह इतना सेण्ट लगाती थी कि कोई भी और सुगन्ध या दुर्गन्ध उस तक पहुंच ही नहीं पाती थी। शैला को याद आया--आज वह सेंट लगाना भूल गई थी शायद । तभी न मिट्टी से उठती इस सोंधी गन्ध को महसूस कर सकी। मिट्टी में भी इतनी सोंधी गन्ध हो सकती है-~शला ने कभी ध्यान नहीं दिया था। वह तो मिट्टी से नफरत करती थी, नंगे पैर कमरे के फर्श पर भी पर नहीं रखती थी। उसकी प्राया को सख्त हिदायत थी कि वह भी शैला का काम स्लीपर पहनकर किया करे। एक बार आया कीचड़ लगे पैरों से कमरे में आ गई थी, तो शैला चीखी थी, 'पूरे पांच रुपये फाइन करूंगी कम्बस्त, जो आइन्दा कमरे में कीचड़ लगे पैर रखे...।' फिर * अपने बाथरूम स्लीपर उठाकर प्राया पर दनादन दे मारे थे। प्राया की मांखों में प्रांसू छलक गए थे। जिन्हें शायद स्लीपर पाने की खुशी ने तुरन्त सुखा दिया था, 'सारी मिस साव ! बैंक्यू मिस साब !' पाया विशेष तत्परता से काम करने लगी थी। शैला को ही चक्कर पा गया था। दनादन फेंके गए स्लीपरों का अपमान, याया के काले कुरूप चेहरे पर, स्लीपरों की प्राप्ति की खुशी बनकर चमकने लगा था। पाया के काले होंठों पर एकाध बूंद खून भी चमकने लगा था। शायद चोट लग गई थी, 'ले ये प्राइण्टमेंट लगा ले, होंठ से खून निकल रहा है ।' शैला ने प्राइण्टमेंट की ट्यूब भी उठाकर दे मारी थी। 'नहीं तो मिस साव, हमको चोट-वोट कुछ नहीं लगा कभी नहीं लगता"हम बहुत सख्त जान हैं मिस साब !' पाया ने दवा की ट्यूब उठाकर ययास्थान रख दिया, प्रांचल से होंठ पोंछ लिए और अपने काम में खुशखुश लग गई। - १२० / सलीय पर लेकिन माया की मस्ती सर्फर माड़ी के प्रांचल पर रक्त की वह एक बूद, गला को कई दिन तक हाट' करती दी थी। कापी ममय बीत गया था टम घटना को! माज प्रवानर, पापा के काले, कुरूप चेहरे पर स्लीपर की चोट के माय, स्लीपर प्राप्ति की वह तृप्ति, इसके मैले, मफेद भाचल पर चमकती रत बी वह एक यूद ..."ला को फिर याद मा गई थी। मिट्टी के प्रति गला की तौर पृषा, माज अचानक, अनायास मिट्टी की मोधी गन्ध के पहसाम वो तौलने लगी थी। 'चली मनोक, पब तो माफिम का समय हो गया , बेट मम गो नाउ ।' दोला पनं संभालकर उठ खड़ी हुई। वस पर मापन भी मंभाला प्रदा मे "फिर प्रदा से नपे-नुले मधे कदम रपती चलने लगी। किन्तु प्राज दे कदम गियिल हो उठे थे-दिनी हार का-मा महमाम भी सिर्फ मंला को म्वय ही हो रहा था। प्रकट में शेला का जीत का भाव वैमा ही पा-दपित भंगिमा, पकिम मुद्रा, मोहक भारों के मधे कोण...! "मिम कपूर, जमीन पर कदम पहा रखती हैं ! वह तो हमारे मीनो पर चलती हैं-हमारी धड़कनी को ठोकरें मारती...।' विनोद चोपडा ने प्रतिशोध के स्वर में जोर मे कहा । वर्मा ने भी उन्मुक्त व्हावा लगाया, इतने जोर से कि शेला अवश्य मुन ले, 'माज साले पाडे को तकदीर चेती है यार ! देयो अपना नम्बर कय माता है. 'हाय 'कहा चलेंगे?'ला ने प्रशोक में पूछा। 'जहा प्राप चाहें, काफी हाउस, मिनमा या कहीं भी प्रापकी शामें तो इन्ही जगही में दीतती है न !' अशोक के म्दर में कोई व्यग्म नहीं था। मीधा-सादा सरल स्वर, कवियों जैमी यही-वडी भावपूर्ण भालें और चेहरे पर एक मामूमियत""न वह सिगरेट पीता था, न व्हाके. लगाता था'वस, कभी-कभी ला को देखकर मुनाता-मा गुनगुनाता या, 'तुम्हारे नील झील-से नैन, नीर निझर में तहरे कैग !' 'एफ नीलो झील है यहा, बाहर से दूर वहा चलेंगे ?'ला ने टक्सो मैं बंटने कहा था। 'नीली झील तो मापको भांखो में भी है । गुस्ताखी माफ कोजिएगा, डूबने से पहले / १२१ -- धापने कभी अपनी ही नीली भील-सी आंखों में झांककर देखा है ?" अशोक निनिमेप गला को देखता कह रहा था । 'मैं खुद, अपनी प्रांखों में झांकने की देवकूफी नहीं करती "ये झीलें तो आप लोगों के डूब मरने के लिए हैं !' शैला का दर्प मुखर हो उठा। वे उस नीली झील के किनारे या वैठे थे.. शैला झील के शांत' जल में छोटे-छोटे कंकड़-पत्यर उठाकर फेंके जा रही थी- लगातार फेंके जा रही थी। अशोक ने देखा-नीली झील में फेंके जाते पत्थरों के कारण उठती हलचल, हलचल के वे ग्रावर्त्त, शैला की नीली झील-सी आंखों में भी प्रतिबिम्बित हो रहे थे। 'क्या बात है शैलाजी ? आज आप कुछ परेशान हैं ?' 'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं। शायद आपको मालूम नहीं कि मैं मिस्टर मेहरोत्रा के साथ अगले हफ्ते यूरोप जा रही हूं--पूरे तीन महीने के लिए कंपनी की तरफ से । अव तो मैं खुश हूं, वेहद खुश । सव कुछ तो हासिल कर चुकी मैं, जो पाना चाहती थी। बस, एक हसरत थी कि सारी दुनिया देख डालूं, वह भी पूरी हो रही है । अब तो मिस शैला कपूर जमीन पर नहीं आसमान पर, हवानों में कदम रखेगी। और जमीन ही नहीं, प्रासमान भी उसके खूबसूरत पैर चूमेगा।' शैला ने सैंडिल उतारकर अपने कबूतरों-से उज्ज्वल, कोमल पर प्रशोक के सामने कर दिए, 'शुरुग्रात पाप ही क्यों नहीं करते ? पहला मौका आपको देती हूं।' 'गुस्ताखी माफ मिस शंला ! मैं 'मेरीड' हूं यानी कि शादीशुदा, दो बच्चों का बाप भी। मेरी पत्नी आपके इन खूबसूरत पैरों की धूल भी नहीं है और यह भी सच है कि मैं आपके सौंदर्य पर मुग्ध हूं। कितनी बार तो सुना चुका, तुम्हारे नील झील-से नैन"पूरा गीत - सुनेंगी ?' - 'हां !' कहती शैला ने पलकें झपकाई, सरककर अशोक की गोद में अपनी सुनहरी केशराशि वाला सिर रख दिया, अशोक के गले में बांहें डालकर अपने होंठों पर झुकाया, एका चुम्बन ले लिया, 'वस, घबराइए नहीं, आपसे इससे ज्यादा कुछ नहीं मांगूंगी। आप देना भी चाहेंगे तो १२२ / सलीव पर भी नहीं । बस, वह गोत मुना दीजिए।' शेला ने प्रांखें मूंद ली। अशोक को गोद में सिर रमे, पलकें मूंद, पीला का वह मोहक चेहरा मासुमों से भीगने लगा था। ममीक ने वै मांसू पोछने चाहे । 'न, इन्हें बहने दीजिए, वस, प्राज वह गीत पूरा सुना दीजिए.".!' सांझ को छाया गहरा उठी थी। नोले मेघो के कारण सांझ के रंग भी नोले हो उठे थे और प्राकारा को गहराती नीली प्रामा की छाया के कारण नीली झील का दर्पण-सा पानी और भी गहरा नीला हो उठा था."अशोक मुग्ध स्वरों में गीत गाने लगा था- 'तुम्हारे नील झील-से नैन नीर निझर-से लहरे देश ! .. गीत की समाप्ति पर प्रमोक ने झुककर दांला के होठ नहीं, मासे धूम ली, 'माफ कीजिएगा, लाजी, इतना गुनाह तो मुझमे हो ही गया।' भोला ने पलकें खोली। निनिमेष प्रसोक को देखने लगी-देखती रही ! 'क्षमा कीजिएगा शलाजी, घर पर पत्नी इंतजार कर रही होगी। जब तक नही लौटूंगा, भूखी बैठी रहेगी। ऐमी वेवकूफ मौरत से पाला पड़ा है कि क्या मताऊ ! अव हमे चलना चाहिए।' मशोक की चला को देखती रष्टि मुग्ध भी थी, संयत भी। गहरे नीले भाकारा पर, वर्षा के कारण धुले-निसरे वातावरण में, सितारो को जगमगाहट विशेप उज्ज्वल हो उठी थी। 'वस चलता तो सितारों के दो फूल मापकी इस सुनहरो केशराशि में सजा देता। लेकिन मैं बहुत अकिंचन हूं लाजी !' असोक के स्वर में केवल एक सुगन्धित निर्दोप अभ्यर्थना थी-उस मिट्टी की सौंपी गन्ध- जैसी, जिसे प्राज शेला ने पहली बार महसूस किया था, किन्तु, जो पांला के भीतर कही गहरे में उतर गई थी दौला को टक्सी से उसके फ्लेट पर छोडते प्रशोक ने कहा, 'मैं यम से चला जाऊंगा और मापको यूरोप-यात्रा के लिए बहुत शुभकामनाएं। बधाई !' नमस्कार करता मसीक चला गया, 'प्रापको तो नही, भिन्नु दूबने से पहले / १२३ मुझ अाज की सांझ सदा याद रहेगी।' अशोक के स्वर की दूर होती प्रतिध्वनि शैला के निकट ध्वनित हो रही थी। पलट के दरवाजे पर मेहरोत्रा का शोफर इन्तजार कर रहा था, 'साहब आज रात को पाने को मांगता है।' शैला चीख पड़ी, 'टु हैल दि योर साहव ।' दूसरे ही क्षण शैला को अपनी गलती समझ में आ गई, 'पोह ! मेरी तबीयत ठीक नहीं है आज, इसलिए गुस्सा आ गया''साहब से कुछ मत महना, बस यह चिट दे देना कि प्राज माफी चाहती हूं।' गंला ने पूरे पांच रुपये का नोट शोफर को एक चिट के साथ दिया था, 'आई एम वेरी सारी मिस्टर मेहरोत्रा । नाट फीलिंग वेल टुनाइट । यू पार मोस्ट वेलकम टुमारो।' सलाम ठोकता शोफर चला गया। गेला ने कमरे का दरवाजा वन्द किया, खिड़कियों के पर्दे खींच दिए, बैड लैंप पान किया, हल्के नीले प्रकाश में दर्पण के सम्मुख खड़ी, अपने हाथों स्वयं को अनावृत्त करने लगी. फिर मेज़ की ड्रायर से मदिरा निकाली-वर सोडा या पानी मिलाए एक पैग लिया। दर्पण के सम्मुख खड़ी जाने वाव तक स्वयं को देखती रही-अपने तराशे हुए नख-शिख को, मोहक उभारों को! सहसा याद अाया--अशोक ने क्या कहा था? हां कहा था, 'आपने कभी अपनी ही नीली झील-सी अांखों में झांककर देखा है ?' ग्रौर शैला ने क्या उत्तर दिया था..? हां, उत्तर दिया था, 'मैं खुद अपनी प्रांखों में झांकने की बेवकूफी नहीं करती ''ये झीलें तो श्राप लोगों के डूब मरने के लिए हैं।' और "उन क्षणों, पहली बार अपनी नीली झील-सी प्रांखों को गहराई में झांकते, शैला का जी चाहा था, 'वह स्वयं इनमें टूब मरे !' १२४ / सलीव पर वीच का आदमी 'सावार ऊपर मानुप मत्य, ताहार पर नाई रे'-बपि चंडीदाम का यह तन्मय स्वर जाने कब मे मेरी चेतना में प्रतिध्वनित होता रहा है. कदाचित् उसी क्षण से जव स्वयं मुझमे भी अपनी मानवीय मस्तित्व- चेतना की प्रतीति हुई थी। ऐमे मानवीय अस्तित्व की परिभाषा को साकार देसने के लिए मैंने अपने चारो ओर देखना शुरू किया तभी न भरी भीड़ के बीच मुझे अकेलापन लगता है "भौतिक स्तर पर मनेक स्थूल उपलब्धियों के बीच भी किसी अन्य के विराटतर होते जाने का मामास सघन होता जाता है"म्यून स्तर पर जयघोषो के बीच, लगता है मैं बहरी हो गई हू" भौतिक धरातल पर प्राकारा में जिन्ना उठती जाती है, सूक्ष्म स्तर पर पैरो के नीचे जमीन उतनी ही धमकती प्रतीत होती है । चिकित्सक कहते हैं-'देह के स्तर पर ये इतनी 'एनीमिक' क्यों हैं ? काफी कुछ तो प्राप्त है इन्हें, फिर ये सुखी क्यों नहीं ? इनमें जीने की कामना क्यों नहीं ? देखिए, ऐसा कीजिए, इन्हें जरा 'चेंज' के लिए ले जाइए ।' चिकित्सक मेरे अभिभावकों से कहते हैं। फिर मुझे समझाते है.-'देखिए, माप अपने अन्दर जीने की इच्छा पंदा कीजिए, सब कुछ तो मिला हुमा है मापको-सब कुछ।' हा, निस्मदेह सब कुछ तो मिला हुप्रा है मुझे विद्रूप का एक नदतर में स्वयं अपने वक्ष में उतार लेडी हूँ, मवमुच मेरे अभिन्न ठीक कहते हैं-'यू मार रियती ए जीनियम !' गोल्डस्मिथ ने कहा है, 'जीनियस वही है जो बातें मालमंदो-मी करे मोर हरकत सेवकूफों-मी,' इमलिए मैं अक्लमंद बेवकूफ हूँ। निस्संदेह हूं- लीजिए, मैं इसे स्वीकार किए लेती हूँ।
गुनी रेशमी हां, तो उस दिन एक ऐसे ही स्वीकार के बाद मैं सिनेमा जाने लिए तैयार हुई । 'चेंज' मुझे 'चेंज' चाहिए। सिनेमा देखना चाहिए, लोगों से मिलना-जुलना चाहिए, भीतर से बाहर की ओर पाना चाहिए, 'प्रैक्टिकल' होना चाहिए। देर तक गरम पानी से स्नान के वाद, सारे बदन पर टेलकम पाउडर छिड़कते, रेशमी साड़ी लपेटते, दर्पण में अपनी ही छवि को आंखों में भरे जनवरी के अाकाश को देखा। निरभ्र, नीला, अंतहीन विस्तार गुन- धूप के स्पर्श विखेर रहा था "हवाओं में फूलों से लदे खड़े वृक्षों से विखरती मादक मधुर सुगंध थी 'यह स्पर्श । यह सुगंध । यह सब भी तो एक 'सच' है। ग्रामो मेरे मन, इस सच को भी जी लो... यदि ये प्रांखें न मिली होती, तो कैसे तुम आकाश के इस निरभ्र नीले विस्तार को देखतीं । अगर ये सांसें न मिली होती, तो कैसे तुम फूलों की इस मादक मधुर गंध को प्राणों में उतारती...? देह के इन खूबसूरत सचों को भी स्वीकार करो पगली। अपने खूबसूरत सच' को भी चलिए ज़रा यह कहानी टाइप होने को देती चलूं । जोशीजी का घर रास्ते में ही तो पड़ेगा, देते चलेंगे 'याज शनिवार है, कल तक वे कहानी टाइप कर ही देंगे। इधर कई वार पूछ चुके हैं-आप कुछ लिख नहीं रहीं, मैं टाइप के लिए प्रतीक्षा करता रहता हूं।' मैं कहानी की पांडुलिपि दोहराने लगी थी । पतिदेव ने एक बैंजनी फूलों-लदे पेड़ के नीचे स्कूटर रोक दिया, पूछ रहे थे-'अाज तबियत कैसी है ?' 'अाज तो एक दीर्घ अंतराल के पश्चात मैं इतनी ठीक हूं। देख नहीं है, विलकुल आपके अनुसार प्रैक्टिकल हो रही हूं। मैं मुस्कराने का पास कर रही थी, सचमुच मुसकराने भी लगी थी। हवा का एक झोंका प्राया, कुछ बैंजनी फूल हमपर बरस गए। लिपि पर दृष्टि दौड़ाते मैंने कहा, 'जरा यह गुच्छा मेरे केगों में अपने से टांक दीजिए, वाई-चांस आज मैंने बैंजनी साड़ी भी पहनी है... ए, मैच करती चूड़ियां भी पहनी हैं, विंदी भी बंजनी है'अब यह के हाथों से केशों में टंका गुच्छा मेरे मेकअप को परफेक्ट कर देगा। - १२६ / सलीव पर परिसने रे रुप मेरे केशो रेशन कर मनार ? रा इस बार फिर सिपोरा भर नहोला कुछ भी नहीं है." ""हार टास नहीं हो सकती।' प ३३३ मुझे निनिय देस । 'कने? रहानी लिसी ! चुकी है। आरोपी को निक उनका घर रास्ते में हो तो पता है" 'बात यह है कि कि...' पतिदेव ने मेरोहली पाम सी. मोसोको नहीं रहे मपानक सोडियो से पिसतकर परसो उनको भा हो गई... सिर फट गया था।' लेफिन, पेकिन, परसो समेरे हो तो उन गिनी भी 56 पुरा कविताए दी थी टाहा होने को, मेने गई तो ये व मुगल भाई रहे थे'माप डॉक्टर के पारा मोटत हानीfal, १ किए देता हूँ। और गुर्भ वधी भुशी है . It afi [Unit लिखती है. देखिए म, कितना गुन गीत 4 II ARTH काग सखी...' जोशीजी गगन मह रह । मुझे शरारत गुमी-किन जापपीजी, गत् ॥ Autism है"पद तो पागती पयार ही में जा पा जान दीजिए, प्रायवे लिए, यागंनी वधारहीमही सविन बनेगा का मंरी प्रगली पहानी कमायण वागे।' देवरा गए, बगदमी अप्रत्यापित पये में 11-11 हो, या हनन हो It-tan tanga मामी aint सुभारम पानी लिखें धार ? Finfinititanim'. ने दी मनमानीश्य' 'दि ममि "छानी छोरी मागी मनsuffull होती. भान में हिना- मामाया । वाण दिन था, 174141 प्रप, मादीमा दारा ध्यान 71, 7-47 नियती काम पादमी, का शोर। कुछ अलग-अलग खंड थे, क्षणों के, स्थितियों के, एक ही व्यक्ति के बदलते हुए चेहरे-से ! पर जब सब अनायास जुड़ गए थे, तव एक चित्र संपूर्ण हो उठा था। "याद पा रहा था---एक दिन वे सब्जियों का थैला थामे, उसके भार से झुके-से चल रहे थे, साथ में धर्मपत्नी थीं, एक साधारण-सी महिला। हां, भारतीय पत्नीत्व और मातृत्व की अदृश्य रेखाएं उस साधारण नारी-मुख पर भी स्पप्ट थीं "एक तुष्टि में भीगी- सी पतिदेव ने स्कूटर रोका, मुझे कहानी टाइप के लिए देनी थी। मैं पांडुलिपि देती, जोशीजी को टाइप के कुछ विशेप संकेत दे रही थी कि उनकी पत्नी एक और थैला भर लाई । 'अब गेहूं और दाल भी लेती चलूं, तो दोबारा पाना नहीं होगा, वे कह रही थी 'अच्छा फिया, लामो वो थैला मुझे दो । तुमसे नहीं संभलेगा। तुम केवल वहनजी की यह नोटबुक पकड़ लो, संभालकर । देखो गिरा मत देना,' जोशीजी बोले। 'ग्रजी, एक थेला तो मुझे उठाने दो। तुम दोनों कैसे उठायोगे ?" वे यह रही थीं। 'नहीं, मैं दो क्या, चार थैले उठा सकता हूं.''तुम दो भी। अभी घर चलकर तुम्हें रोटी बनानी है, बरतन धोने हैं। मुझे क्या करना है चलो ,चलो'.. जोशीजी ने थैला छीनकर उठा लिया, सिर झुकाकर हमें अभिवादन करते वे बढ़ गए थे। मैं एक गाम उनकी कोठरी में पहुंची थी। पतिदेव ने कहा था, 'तुम्हें चक्ति चाहिए न, तो चलो, जोशीजी को उनके परिवेश में देखो" तुम्हारी सनकी दृष्टि, जहां कुछ नहीं होता, वहां जाने क्या-क्या देख लेती है !' हम जोशीजी की कोठरी में पहुंचे तो नंगे बदन टाइपराइटर पर उंगलियां दौड़ाते वे हमें देखकर सकपका गए, 'जी' 'जी''आपका ही काम कर रहा था। 'अरे, मेरा चुरता दो भाई.."कहां रख दिया... ये कुरता इंढने लगे थे. मैंने देखा, उस दुर्बल वक्ष की एक-एक पसली १२८ /सलीव पर ... - गिनी जा सकती थो"कोठरी का वातावरण दमघोंटू या, विजली का वन्य इतना मदिम कि इतने प्रकार में वे टाइप कमे कर रहे हैं, मैं चकित थी! वे कुरता पहनकर बैठ गए थे। मैंने देता, जल्दी में उन्होंने दुरता उलटा पहन लिया था और बटन दृढते झेपे जा रहे थे, 'मापने पुरता उलटा पहन लिया है.'' मुझे हंसी मा गई यो"पतिदेव भी हम पढ़े "जोशीजी स्वयं भी हंसने लगे थे "भाजक्ल बेटी के माह की तैयारी में कुछ मुष नहीं रहती "प्ररी मुपमा- इधर माना तो।' उनकी सोलह वर्षीया तीसरी पुत्री, सामने मा सही हुई। मांयना रंग, साधारण नाक-नक्श । विवाह के पूर्व को तेल-हल्दी चढ़ने के शरण, पीतामा से घिरी-सी। ऐमी लडकिया भारत के हर मध्यवर्गीय परिवार में होती हैं, विन्नु जोगीजी की ममत्व-भरी दृष्टि में जैसे उनकी मुपमा कुछ 'मपूर्व' थी '-'यह मेरी लाडली डोटी बिटिग है, बस इराके हाय पीते कर दूं, फिर कोई चिन्ता नहीं।' 'कितना खर्च कर रहे हैं ?' मैंने एक दुनियादारी का प्रश्न किया। 'जी, सुपमा मेरी मंतिम संतान है, इसके लिए जो करू मो थोड़ा, सुपमा को अच्छा वर मिला है, तो खर्च करना ही पड़ेगा"कुछ रपया कर्ज भी लिया है, किस्तों में चुका दूगा। यस, भाशीर्वाद दौजिए, सुपमा सुखी हो।' मैंने देखा, वह मद्धिम प्रकाश प्रतिभासित-सा हो उटा पा" मान भी मौसत भारतीय पिता पुत्री के विवाह के लिए कर्ज लेता ही है." मेरा दरजी, मेरा धोबी और ये जोगीजी "सब जह-संस्कारो के गुलाम, ऐसे ही रूढियों में बंधे, दुर्बल, देवकूफ पिता है, जो वेटी को माग मे सिंदूर- भरा देखने के लिए अपने रक्त को बूदो वा चुपचाप तपंण करने लगते हैं। सह्मा मुझे अपनी एक मान्यता, भपना एक लेखकीय वस्तव्य याद माया, 'यदि देवत्व एक भ्रम है, तो पशुत्व भी सच नहीं"मादमी तो इन दोनों के बीच कही होता है-वही 'बीच का मादमी,' उस दमपोटू कोठरी के मध्यम प्रकाश में उलटा कुरता पहने चंठा था। . वीच का मादमी / १२६ . 'सव चलो,' पतिदेव कह रहे थे । जानते थे, ऐसी कोठरी में मैं तो एक घंटे भी सांस नहीं ले सकती। मैंने चुपचाप पड़ा उठा लिया, खाया नहीं । पतिदेव ने पेड़ा मुंह में रखते मेरा हाथ थामा, 'वाह पकड़ लो, सीढ़ियों पर अंधेरा है, गिर पड़ोगी।' .."और उन्हीं अंधेरी सीढ़ियों से फिसलकर जोशीजी का सिर फट गया था"सुना, उस दिन बिजली फेल हो गई थी और फिरॉसिन पर मेंथा नहीं कि लालटेन जलाई जा सकती। जोशीजी मोमबत्ती लाने सीढ़ियां उतर रहे थे कि... सुना, मृत्यु के समय वे चावी के गुच्छे को पाराकार पपड़े हुए थे.. कालेज के प्रॉफिरा की चाची के गुच्छे फो. वे कालेज के एकाउंटेंट थे। हजारों रुपये कालेज की सेफ में रखे थे."उस दिन तीस तारीख थी और पहली को कालेज के स्टाफ का 'पे-डे' था''ये होरा में पाए ही नहीं... अन्यथा गादाचित् कालेज के प्रिंसिपल महोदय को सौंपकर ही मरते... कायाचित् अचेतावस्था में अंतिम क्षणों में उनका अंतिम कर्तव्यबोध या मार्म-बोध यही था। पतिदेव, बैंजनी पूलों से लदे पेड़ के नीचे, मेरी हथेली थामे, जोशीजी की मृत्यु के ये साधारण 'डिटेल्स' गुना रहे थे "रह-रहकर बैंजनी फूलों के गुच्छे टपक रहे थे, किन्तु मैं फिर बहक गई थी-पतिदेव ने कंधा हिलाया, 'सवा तीन हो रहे हैं मैटम, फिर मैटिनी का समय नहीं रहेगा... चलो, अव जोशीजी की प्रात्मा के लिए प्रार्थना करती रहना, उनकी देह तो शांत हो हो चुकी है.. भले प्रादमी थे बेचारे...' मेरे मन-मस्तिष्क में, आंखों में, जोशीजी की स्मृति के इधर-उघर विरारे टुकड़े भी जुड़कर मूर्ति गढ़ चुने थे। गने पलक मूंद ली.''धदफन जोशीजी की प्रारमा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगी थी और फिर लग रहा था, मैं कोई भारती का दिया जला रही हूं, पुष्पों से भरी अंजली किसी देव-प्रतिमा के चरणों पर चढ़ा रही हूं''पोर मनुच्चरित मंत्रों को ध्यान से दिशाएं ध्वनित हो उठी हैं। 'न"प्रय भाज नहीं घर लौट चलिए''मुझे पहानी लिख लेने दीजिए...' में पलक मूंदे पतिदेय से कह रही थी। - १३० / सलीब पर 'अरे भई, कहानी कल लिख लेना । तुम्हें मिनेमा ले चलने की फरमत तो मुझे पान ही है, फिर पूरा सप्ताह बिजी है, जानती तो हो।' 'हा जानती हू"मय पूरे सप्ताह में भी विजी रहूंगी."यहानी तो वर एक दिन में लिख जाएगी--किन्तु जोगीजी, क्या एक मास तक भी पीछा छोड़ेगे?' पोर, जोगीजी की मृत्यु को पूरा एक मास बीत गया है. उन्होंने मेरा पीछा पाज भी नहीं छोड़ा है." "जब नव प्रा घेरते है-बदलते चेहरे सेकर। योच का भादमी / १३१ सलीब पर 'वाबूजी' 'वावूजी हैं 55.",' एक गम्भीर स्वर गूंजा । छतवाली कोठरी में आरामकुर्सी पर अघलेटे पड़े वावूजी चोंके । छाती पर रखा अखवार सरककर नीचे गिर पड़ा। शायद अखवार पढ़ते-पढ़ते वे ऊंघ गए थे। तन्द्रा से होश में आते बाबूजी लड़खड़ा गए। खड़े-खड़े लड़खड़ाने की स्थिति कोई भी समझ सकता है। किन्तु बैठे या लेटे होने की मुद्रा में लड़खड़ाने की अनुभूति का अर्थ समझाया नहीं जा सकता । ऐसा लड़खड़ाना एक त्रासदी होता है----अदृश्य, अनकही। कभी-कभी झंझावातों को समेटे हवा कितनी चुप होती है। कभी ज्वारों को समेटे सागर कितना खामोश होता है। कभी ऊपर से सब कुछ कितना शान्त रहता है और भीतर कहीं कुछ खंड-खंड हो जाता है। बाबूजी ने ऐसी ही झंझावातों को समेटे खामोशी झेली है। फिर ऐसे टूट गए हैं, जैसे प्रासमान से कोई सितारा टूट जाता है। और कोई आवाज़ नहीं होती। बरसों पहले विशन छोटा था और सुमित्रा फिर गर्भवती थीं, तो गर्मी की एक रात वावूजी खुले में लेटे थे। बड़ी प्रशान्त थी वह रात । रात के वक्ष में ही नहीं, बाबूजी के वक्ष में भी भारी तपन थी । जैसे सारे दिन वे भी प्रचंड आग झेलते रहे हों । बेचैनी से करवटें बदलते वे प्राकारा के तारों-जड़े शून्य को निहार रहे थे । तभी एक सितारा टूटा था । वाबूजी एकदम से कांप गए थे। पास लेटी सुमित्रा से बोले थे----'सुमित्रा, तुमने देखा अभी एक तारा टूट गया..' सुमित्रा भी बेचैन थी, शायद गर्भ के भार से । 'तारे तो टूटते ही रहते हैं, तुम जरा-जरा-सी बात को लेकर परेशान क्यों होते हो ? पांव - दवा दूं? नीद मा जाएगी। उटती सुमित्रा को रोक्ते वायूनी ने कसकर मांगे मूंद ली थी। हा, तारे तो टूटते ही रहते हैं "एक मोर भी टूट गया तो क्या ! चुपचाप टूटकर शून्य में समा गए उस मितारे-मा वाबूजी का भी भविष्य निश्चित था। तव वाबूजी पच्चीस-छन्बीन के रहे होंगे। देश में गूजते 'इन्क- लाब जिन्दाबाद' के म्वर ने उनकी गिरामी में भी भाग फूलः दी थी । वे स्वतन्त्रता-पान्दोलन में भाग लेना चाहते थे, जेल जाना चाहते थे, या में अपनी पाहुति देना चाहते थे। एक रात वे देर में नौटे तो मुमिना विशन यो जाती से चिपराए सो गई थी। पास रसा खाना चाली से ढंका पारामटोरी में ढके गिलास में पानी पा और सुमित्रा के कपोलो पर यहकर मूग गए मामुपों निशान थे। माथे पर बड़ी-मी लाल बिन्दी पौर माग मे दर मारा सिंदूर "। बाबूजी चुपचाप उन प्रांमुमों के निशान, उस विन्दी भोर उम मिदूर को देखते रहे। सुमित्रा का मुम इतना निर्दोप था कि बाबूजी को मार्ग नम हो गई। सभी मुमित्रा चौकी, उठ बैठी। वायूजी के पैरों से लिपट गई- "मा गए तुम "मैं तो ममनी कि तुम पकड लिए गए"मब तुम्हें जेल होगी 'पौर में और विगन "तुम जानते हो मेरे तो मायके में भी कोई नहीं है ।' सुमित्रा फूट-फूटकर रोने लगी थी। बाबूजी ने सुमित्रा को गले में लगा लिया था। 'नहीं, ऐना नहीं होगा, मैं तुम्हें वेसहारा नहीं छोड़ गा । देश के साथ मेरा तुम्हारे प्रति भी तो पर्तव्य है।' सुमित्रा ने मामू पोछ लिए--'तो तुम मुरानियों का साथ छोड़ दोगे न, हमारी सातिर मैरी मोर विशन को सातिर...' बाबूजी कुछ क्षण चुप रहे-'हां, तुम्हारी मौर विशन की सातिर.. साना उठा दो, मव भूस नहीं है।' उम क्षण की याद माते माज भी बाबूजी के गले में कोर फंसने लगते हैं । मोर बाबूरी को लगता रहा है जसे उन्होंने प्रारमघात कर लिया हो । उनको गिरामों में पधरती माग सलीब पर/१३३ सलीव पर हवा कितनी 'वाबूजी 'वाबूजी हैं 55,' एक गम्भीर स्वर गूंजा। छतवाली कोठरी में आरामकुर्सी पर अधलेटे पड़े वावूजी चौंके । छाती पर रखा अखवार सरककर नीचे गिर पड़ा। शायद अखवार पढ़ते-पढ़ते वे ऊंघ गए थे। तन्द्रा से होश में आते वावूजी लड़खड़ा गए। खड़े-खड़े लड़खड़ाने की स्थिति कोई भी समझ सकता है। किन्तु बैठे या लेटे होने की मुद्रा में लड़खड़ाने की अनुभूति का अर्थ समझाया नहीं जा सकता। ऐसा लड़खड़ाना एक त्रासदी होता है-अदृश्य, अनकही। कभी-कभी झंझावातों को समेटे चुप होती है...। कभी ज्वारों को समेटे सागर कितना खामोश होता है। कभी ऊपर से सब कुछ कितना शान्त रहता है और भीतर कहीं कुछ खंड-खंड हो जाता है । वाबूजी ने ऐसी ही झंझावातों को समेटे खामोशी झेली है। फिर ऐसे टूट गए हैं, जैसे प्रासमान से कोई सितारा टूट जाता है। और कोई आवाज़ नहीं होती। वरसों पहले विशन छोटा था और सुमित्रा फिर गर्भवती थीं, तो गर्मी की एक रात वावूजी खुले में लेटे थे । बड़ी प्रशान्त थी वह रात । रात के वक्ष में ही नहीं, वावूजी के वक्ष में भी भारी तपन थी। जैसे रे दिन वे भी प्रचंड प्राग झेलते रहे हों। वेचनी से करवटें बदलते आकाश के तारों-जड़े शुन्य को निहार रहे थे। तभी एक सितारा टा था । बाबूजी एकदम से कांप गए थे। पास लेटी सुमित्रा से बोले -'सुमित्रा, तुमने देखा अभी एक तारा टूट गया" सुमित्रा भी वेचैन थी, शायद गर्म के भार से । 'तारे तो टूटते ही । हैं, तुम जरा-जरा-सी बात को लेकर परेशान क्यों होते हो ? पांव । ।
दवा दूं? नौद मा जाएगी।' उठती मुमित्रा को रोरते वादूनी ने कसकर मांमें मूंद ली थी। हा, तारे तो टूटते ही रहते हैं। एक मौर भी टूट गया तो क्या..! पवाप टूटकर शून्य में समा गए उम मितारे-सा वाबूजी का भी भविष्य निदिचत था। तब बाबूजी पच्चीस-उन्नीस के रहे होंगे। देश में गूंजते 'इन- लाव जिन्दावाद' के स्वर ने उनकी शिरापो में भी भाग फूत दी थी। वे स्वतन्त्रता-सान्दोलन में भाग लेना चाहते थे, जेल जाना चाहते थे, यश में अपनी माहुति देना चाहते थे। एक रात वे देर से लौटे तो मुमित्रा विगन को छाती से चिपाए मो गई थी। पास रखा साना पाली से ढंका था।पटोरी में तक गिलास मे पानी था और सुमित्रा के कपोलो पर वहकर मूष गए प्रामुमो के निशान थे । माथे पर बडी-मी लाल चिन्दी पौर माग में ढेर मारा मिदूर "। बाबूजी चुपचाप उन प्रांमुग्री के निशान, उम विन्दी और उग सिन्दूर को देखते रहे । मुमित्रा का मुष इतना निर्दोप था कि बाबूजी की मारों नम हो गई। तभी सुमित्रा चौंरी, उठ घंटी। याबूजी ये परों से लिपट गई- 'मा गए तुम "मैं तो समनी कि तुम पकड लिए गए'पब तुम्हें जेल होगी. "पौर मैं और विगन'"तुम जानते हो मेरे तो मायने में भी कोई नहीं है ।' सुमित्रा फूट-फूटकर रोने लगी थी। यावूजी ने सुमित्रा को गले मे लगा लिया था । 'नहीं, ऐमा नहीं होगा, मैं तुम्हें बेमहारा नहीं छोड़ गा। देश के माय मेरा तुम्हारे प्रति भी तो वर्तव्य है। सुमित्रा ने मामू पोछ लिए-'तो तुम मुराजियों का गाय सोड तोगेन, हमारी सातिर. मेरी मोर विशन को खानिर...' बाबूजी कुछ क्षण चुप रहे-'हां, तुम्हारी पोर विगन की सातिर.. साना उठा दो, मव भूस नहीं है।' टग क्षण की याद माने पाज भी वायूजी के गले में कोर पंमने लगते हैं । मौर बाबूजी को लगता रहा है जैसे उन्होंने पारमपात कर लिया हो। उनकी गिरामों में पपरती माग सतौर पर /१३३
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दवा दू? नोंद मा जाएगी। उनी मुनिया को रोकते वापूजी ने सरर मा भू सी थी।हा, तारे तो टूटते ही रहते हैं"एस मोर भी टूट गया तो क्या चुपचाप टूटकर शून्य में समा गए उम मितारे-मा बाबूजी का भी भविष्य निश्चित या। तव बाबूजी पच्चीम न्यौस के रहे होंगे । देश में गूजते "न- साब जिन्दावाद' के म्वर ने उनकी सिरामो में भी भाग पूर दो पो। ये स्वतन्त्रता-पदोलन में भाग लेना चाहते थे, जेल जाना पाहते थे, पर में अपनी माहुति देना चाहते थे। एक रात वे देर से नोट तो मुमित्रा विशन पो छाती से विपराए सो गई थी। पास रखा साना पाली से लंका पा पटोरी सदमे गिलारा में पानी था और सुमित्रा के कपोलो पर बहकर मूरा गए प्रामुमो के निशान थे। माथे पर बड़ी-मी लाल बिन्दी पौर माग में हर गारा सिंदूर "। बाबूजी चुपचाप उन प्रामुमों के निशान, उस चिन्दी पौर उग सिन्दूर फो देखते रहे। मुमित्रा का मुष इतना निदोष था कि यायजी को मार्ग नम हो गई। तभी मुमित्रा चौकी, उठ बैठी। वायूजो पे पैरों से लिपट गई- "मा गए तुम "मैं तो समझो कि तुम पकड लिए गए मम तुम जैन होगी.. और मैं और विशन "तुम जानते हो मेरे ती मायरे में भी कोई नहीं है ।' मुमित्रा फूट-फूटरर रोने लगी थी। यापूजी ने सुमित्रा को गले में लगा लिया था। 'नहीं, ऐगा नहीं होगा, मैं तुम्हें बैमहारा नहीं छोड़ गा। देश के गाय मेरा मुम्हारे प्रति भी तो पर्तव्य है।' मुमित्रा ने मामू पोट लिए--'तो तुम मुराजियो पा गाय चोर दोगेन, हमारी खातिर" मेरी मौर विशन पीसातिर..' बाबूजी कुछ क्षण चुप रहे-'हां, तुम्हारो मोर विसन पी गातिर.. साना उठा दो, मय भूस नहीं है।' उम ाण की याद प्राप्त प्राज भी चावूजी के गले में कोर फंमने मगते हैं । पोर याबूजी को सगता रहा है जैसे उन्होंने प्रारमपात कर लिया हो। उनको भिरामों में पथरती पाग सतीद पर /१३३ भीतर ही भीतर धधककर उन्हें राख करती रही." 'वाबूजी''अजी जनाव नीचे तो आइए।' वह गम्भीर स्वर फिर गूंजा। 'हरिकिशन हैं ! पा रहा हूं जी।' वावूनी ने खूटी से कुरता उतारना चाहा । कुरता अटका, फट गया, पुराना हो चुका था। वाबूजी अपराधी-से खड़े रहे अव! नया कुरता बनवाना ही पड़ेगा। कुछ दिन पहले जब सुमित्रा की साड़ी अांचल खींचते समय फट गई थी, तो बाबूजी ने मजाक किया था-'अरे भई, विशन की मां, अब इस साड़ी को रिटायर कर दो, हमारी-तुम्हारी तरह बूढ़ी हो गई।' सुमित्रा ने एक भरपूर नज़र से उन्हें देखा---'पहले तुम अपने कुरते को रिटायर करो न ।' 'हां, हां, कुरते और साड़ी दोनों को रिटायर कर देंगे' और बाबूजी हिसाब लगाने लगे थे । ढंग के दो कुरते और दो साड़ियों के लिए सौ रुपये तो चाहिए ही. 'अभी तो हो नहीं सकता, फिर देखा जाएगा। सोचते सोचते थककर वावजी विवेकानन्द को पढ़ने लगे थे। विवेकानन्द को पढ़ते वावूजी जैसे सारे त्रासों से मुक्त हो जाते हैं। यज्ञ में आहुति न दे सकने का क्षोभ, किसी मौन प्रार्थना में रत हो जाता है। शिराओं में राख हो उठी आग में किसी ज्योति को चिनगारियां जागने लगती हैं। और फिर सब कुछ ऐसे चुप हो जाता है जैसे फिर कोई सितारा टूट गया हो। बाबूजी की कसकर मुंदी प्रांखों में सितारे टूटते ही - बाबूजी ने फटे कुरते पर स्वेटर पहन लिया। मई के महीने में स्वेटर? हरिकिशन ज़रूर हंसेंगे । तो कह देंगे, जाड़ा-सा लग रहा था, शायद जूड़ी चढ़ेगी। सीढ़ी उतरते वावूजी का गरीर संचमुच वर्फ-सा ठंटा हो गया था। बैठक में वकील हरिकिशन तख्त पर बैठ गए थे. "माइए वाबूजी, ऊपर क्या साधना कर रहे थे ? आप भी कमाल करते हैं। इतनी गर्मी में ऊपर क्या किया करते हैं ? और यह स्वेटर'।' हरिकिशन ठठाकर १३४ / सलीव पर हंस पड़े, धोरे में बोले- क्या पुरता फटा है ?' बाबूजी भर गए। विन्नु मामने बंटे मित्र के सम्मुग हल्के भी हो गए। जी चाहा म्वेटर उतार दें, मित्र गै लिपट जाए, बह-'दोस, मर तो सब कुछ फट चुका है, लेकिन घंटर में कोई भी प्रा मरना है। भावूजी स्वेटर पहने ही तख्त पर बंद गए-'हां, वकील माहब, मापने मुजरिम यो टीव पहा, कुरता ही फटा है।' बाबूजी हमने लगे थे। हरिस्मिन की भावों ने पल भर के लिए रग यदला, मोईननी-मी उनमे भसकी, फिर किमी अदृश्य समनौते के अन्तर्गत वे अप हो गए। 'कहिए, पिनी नतीजे पर पहचे माप विगन के बारे मे ?' हरिमिशन पूछ रहे थे। यायूजी ने एक दीर्घ निदवान ली-'विम नतीजे पर पढ़या जा सकता है भाई, भगर हमारे जीवन के मयं ही अलग-अलग हो ?' 'लेकिन बावजी, आप दवते क्यो हैं । मागिर विशन मापा बेटा है मोर ये सारा पापा ममाया हुआ है । भाप मममते हैं, विगन की ममन मे पापकी बात मा जाएगी? माप उमे टेन पहुंचाने में डरते हैं और वो मापको जूते मार रहा है। हरिकिशन उत्तेजित हो उठे। वाबूजी ने प्राय झका सी। 'मेरे साहबजादे ने गड़बड़ की थी, तो माले को चुप कर दिया मैंने कि सिर्फ इतना मिलेगा "मोर ज्यादा गहबढ़ को तो इतना भी नहीं। सालो को पंदा करो, पालो-पोसी, इनपर जान मोरो, इसलिए कि में हमारी जान के गाहक हो जाएं । वाचूजी, भापको भी जरा प्रक्टिरल' होना चाहिए । माप हरएक के साप न्याय क्यों करना चाहते हैं ?' 'पता नहीं, प्रैक्टिकल होना क्या होता है माई, मेरी सो पुछ समस में नहीं माना, सिवाय इसके कि 'न सदा ही मिना न विमाने सनम' न इधर के रहे न उघर के रहे"' चाबूजी का म्वर जमे रिली मतल गहराई मे मा रहा था। हरिकिशन बाबूजी के 'डूबने' या प्रपं समझते थे। 'लेग्नि, वाई फैसला तो होना ही चाहिए। विसन रोड मेरी जान खाता है । हरिरिशन एक्टक बादूनो को देख रहे थे। ससीद पर /११ 'तुम्हीं बतायो क्या फैसला हो सकता है यादमी-आदमी के बीच अगर आदमियत की ही लड़ाई होने लगे तो क्या फैसला हो सकता है...?' वावूजी ने अांखें मूंद ली थीं। उन आंखों में कोई सितारा टूट रहा था। हरिकिशन ने वाबूजी के कन्धे पर हाथ रखा था-'वाबूजी' 'मेरे भाई,' वावूजी ने हरिकिशन का दूसरा हाथ अपने हाथों में ले लिया-'मेरे बारे में चिन्ता न करो भाई.. मेरी ज़िन्दगी का कोई अर्थ नहीं है । और लोग गृहस्थी तो चला लेते हैं "दुनिया के ढंग से कुछ हासिल भी कर लेते हैं, बाल-बच्चों को कुछ देते भी हैं लेकिन मैं...' बाबूजी ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया था। हरिकिशन एकटक वावूजी को देखते जा रहे थे। वर्षों पूर्व के युवा वावूजी उनकी अांखों में सजीव हो उठे थे 'प्रभुदयाल गुप्ता ! एक कर्मठ युवक जो कुश्ती भी लड़ता था और अपनी पत्नी के प्रति समर्पित भी था...! 'इन्कलाब जिन्दावाद !' के नाम पर जिसकी आंखों में चिन- गारियां भड़कने लगती थीं। जो खादी का कुरता-धोती पहनता घर बनवा रहा था कि वीवी-बच्चों को सुरक्षा दी जा सके । धीरे-धीरे वह सारी लड़ाई कव पराजय में बदल गई.. धीरे-धीरे वे सारी चिनगारियां कर राख हो गई."। आज तो यह सामने बैठे बाबूजी किसी वियावान में खड़े स्तूप-से दिखाई देते हैं, जिसके चारों ओर कोवल धूल उड़ रही 'बाबूजी याद है ? उस दिन श्राखाड़े में मैं बेईमानी पर उतर आया था। मेरा और आपका जोड़ हो रहा था और सच बताऊं मैं समझता था, आप मुझे क्या पटकेंगे? लेकिन वाप रे! जब मैं आपके पेट में सिर अड़ाकर आपको गलत तरीके से चित करना चाह रहा था, आपने मेरी दोनों बांहें पकड़कर मुझे ऐसा चित किया था कि 'वाह गुरु, मान गए' मुझे कहना पड़ा था। मैं तो अंडा-गोस्त सब खाता था, आप सिर्फ दूध पीते थे। तो फिर वह शायद सुमित्रा भाभी के प्रति आपके प्रेम का प्रताप था कि पाप अखाड़े में अच्छे-अच्छों को पटक देते थे। एक नारी सदा ब्रह्मचारी...' हरिकिशन शरारत में हंसने लगे थे। १३६ / सलीव पर पटकी, चीखती-मी बोली-'यह तुम क्यो नि 'मन्छा'' यावूजी चूल्हे मे जलती भाग को निरी बाबूजी के भरियों पड़े मुख पर भी एक मुस्कान चियर गई, एक दंगित मुसकान "जिमका प्रयं वायूजी बता न पाते हो, हरिविशन ममा लेते थे। 'तो चलं, कोर्ट का समय हो गया।' हरिकिशन उठ पड़े हुए । एक भरपूर नउर मे वाबूजी को देना, चले गए । दरवाजे पर देर तक बहे बाबूजी उम रास्ते को देखते रहे जिधर मे हरिकिशन गए थे। वर्षों पूर्व वा युवा हरिरिंगन उन्हें भी याद पा गए थे.."। प्रसाडे में चित प? 'मय छोटो भी पार, मान गए. कहते, होली और दीवाली पर मालिगन-बर होने...। बाबूजी की सारी लडाई के एकमात्र साक्षी। अगर ये हरिरिसन न होते तो कोई साक्षी भी न होता...! बाबूजी ने बैटक या दरवाजा बन्द कर दिया । वे बहुत मिथिल हो गए थे, जैसे नये मिरे मे हार गए हों। बंटक में अंधेरामा हो जाता है यदि दरवाजा बन्द कर दिया जाए तो उम मंधेरे में तस्त पर लेटे बाबूजी जाने कब तक उन टूटे मितारों को गिनते रहे जो एक-एक कर टूटते रहे थे."टूटते रहे हैं." "तुम यहां हो, चलो, रोटी खा लो। मुमित्रा चुना रही थी। 'चलो, चाबूजी उठ सड़े हुए-'विनोद मा गया ?' 'हां चलो, थाली पर बंटा है, भन्ना रहा है।' मुमित्रा गेटिया रोकने वावूजी पटरे पर बंट गए, देवा, विनोद उत्तेजित था-~ हुमा ?' उन्होंने पूछा। 'होना क्या है "पापको तो एज तक से परहेज है और मैं पात खाकर डाक्टरी की पहाई नहीं कर माता । मा रोज बहोत रोटी बनाकर रख देती है...। रपये दीजिए, आज से सच गरेर में ले लिया करूंगा।' लगी। --- -'कुरते की जेब में पाच रुपये हैं, ले लो।' विनोद पर पटवता चला गया। सुमित्रा ने परे - सलीव पर/१२.
। प डाक्टरी पढ़ रहा है तो क्या अहसान कर रहा है ?' 'हां, अहसान ही कर रहा है। शायद विशन पा गया है, उसे बुला लो, गरम रोटी खा लेगा।' बाबूजी की प्रांखें चूल्हे पर जलती आग पर निवद्ध थीं.. शायद कुछ नये सिरे से जल रहा था। 'विशन, या वेटा, तेरे बाबूजी बुला रहे हैं ।' सुमित्रा का स्वर पाहत था। बावूजी ने देखा, सुमित्रा के मुख पर चमकती पसीने की बूंदों में अनेक प्रांसू थे। सुमित्रा ऐसे ही वावूजी की चोटों पर से रो पड़ती हैं..। बाबूजी की लड़ाई का अर्थ उनकी समझ में नहीं आता। बाबूजी ने अपनी थाली से गरम रोटी उठाकर विशन की थाली में डाल दी थी । 'मुझे दूसरी दे देना।' विशन ने दो-चार कौर खाए, हाथ रोक लिया-'देखिए वाबूजी, अब ऐसे नहीं चलेगा । फैसला हो ही जाना चाहिए। आप कब तक वलिदान के नाम पर हमें मारते रहेंगे ?' विशन को शिकायत है कि बाबूजी ने उसका जीवन खराव कर दिया है। बाबूजी ने प्रागरे वाला मकान गायत्री वुग्रा को लिख दिया। माना कि वे विधवा हो गई थीं, तो बाबूजी के परिवार के साथ रह सकती थी। अब वे वहां स्कूल चलाती हैं। क्या फायदा इस देश-सेवा से ? आजकल मकानों के किराये इतने बढ़े हुए हैं कि वह मकान अधिकार में होता तो दो-ढाई सौ किराया पाता। फिर जब सुचित्रा के लिए मिनिस्टर के यहां से रिश्ता प्राया तो बाबूजी अड़ गए. ''मेरी बेटी वहां सुखी नहीं होगी"वे लोग मेरी बेटी को समझ नहीं सकेंगे माना कि उनके पास बहुत पैसा है। लेकिन उनके पास सिर्फ पैसा ही है सुची वहां सुखी नहीं होगी...।' फिर उन्होंने सुचित्रा का विवाह अपनी मरजी से एक साधारण घर में किया। हां, लड़का इंजीनियर था। कौन-सा विशेष मुख मिला भई सुचित्रा को ? मिनिस्टर के घराने से जुड़ने का जो एक दुर्लभ अवसर आया था, वह सदा के लिए समाप्त हो गया । यदि अाज सुचित्रा का सम्बन्ध उस घर से हो जाता तो उसका भाई विशनस्वरूप जरा-जरा से परमिट के लिए जूतियां चटकाता न घूमता। और उसपर से बाबूजी कहते हैं 'अरे भई, तुम्हारे पास इतना तो है।" . १३८ / सलीव पर इनको दिवाई नहीं देता-~'पोरों के पाग क्तिना है ?' बाबूजी को वेवरूफियों का अन्त नहीं"। विगन दात पोगने लगता है । जब विपन ऐमें बकता-माता है, वावजी की पापों में यहन गायत्री पापड़ी होती है। हो, गायत्री उनके परिवार के माप रह गवती पी, एक अस्तित्व-हीनता की वामदी को ढोने। तब गायत्री के मुग पर सार्थकता की ज्योति न होती "निरपंरता के पंधेरे होते. वैधव्य में अधिक वह अपनी मृत्यु को होती होती. मेरिन, माज या छोटे-छोटे बच्ची की अध्यापिका गायत्री उनके सन्मुम होती है तो गायत्री अधिक मार्थकता का वोध बाबूजी को होता है। छोटे-छोटे बच्चों के निर्दोष मुखो पर उभरते ज्ञान-बोध के साथ उनके मन में वही छोटे-छोट साल-पीले फूल खिल जाते हैं । "ये लाल-पीने फूल चिरजीवी हो !.." बाबूजी के हाय एक प्रार्थना में जुड़ जाते हैं । फिर बेटी मुचित्रा आ खड़ी होती है। बाबूजी के गले में भूलती भुची "उनको गोद मे पलकर बडी हुई सुची। मुचो उग इंजीनियर पर के साथ सुखी है, पद्यपि अभी उनके पास स्कूटर भी नहीं है। विशन सर पीटता है, सुचित्रा को इतना कुछ देने की क्या प्रावश्यकता थी ! यीम हजार रुपयो मे तो कोई नया बिजनेस शुरू किया जा सकता था। मुभी की प्रायों में इन्द्रधनुप देखते वाबूजी के हाथ फिर प्रार्थना में जुड़ जाते हैं-'सुची मुखी हो !' 'प्राज शाम तक कुछ तय हो जाना चाहिए, वरना में भी पमम खाता हूं कि मैं खाना-पीना छोड दूंगा।' 'तो छोड दे, हमारा खून तो पी ही रहा है।' मुमिना चीसो। "हमने पापका खून नहीं पिया, पापन हमारा पिया है...' विजन वैसे ही पर पटकता चला गया जैसे कुछ देर पहले विनोद गया था। बाबूजी या नहीं रहे थे । थाली में माघी रोटी बैंगे ही पड़ी थी। सुमित्रा ने पानी का लोटा उठाकर चूल्हे मे भोंक दिया, प्रानल मागो पर रखकर रोने लगी। लेकिन माज बाबूजी के पास उन्हें सान्वना देने के लिए कुछ नहीं पा... बाबूजी प्रकियन हो उदे थे। "रोमो मत विशन की मा। पलो, हम सब कुछ छोड-छाइकर नीषं ससीद पर ! १३६ ? करने निकल जाएं।' बाबूजी सुमित्रा को अपलक देख रहे थे। 'हां, हां, इन कपूतों को राजगद्दी देकर संन्यास ले लें। 'काहे तुम्हें दो बार तो दिल का दौरा पड़ चुका है, सूखकर ठठरी रह गए हो .."। अव दर-दर भटकोगे 'काहे ? यह घर तुमने बनवाया है. यह जाय- दाद तुमने जोड़ी है. और ये कमबख्त सगे वाप के लिए कहते घूम रहे हैं, बुड्ढा घाघ है। अरे काहे जने मैंने ये राक्षस...' सुमित्रा फूट-फूट- कर रोने लगी थीं। 'बच्चों को गाली मत दो विशन की मां, अाखिर वे मेरे बेटे हैं...!' ऐसे ही वावूजी ने एक दिन किसीको तमाचा मारकर कहा था--'देश को गाली मत दो, यह मेरा देश है !' वाबूजी को याद आया, देश की मिट्टी से उनका सम्वन्ध जैसे एक पूजा था। किन्तु यह पूजा वे पूरी कर नहीं सके थे.'अव ये वेटे "विशन, किशन और विनोद "उन्हींके अंश.."उनकी आत्मा के अंश..। वे तो वेटों से भी अपने सम्बन्ध को पूजा की तरह ही लेते रहे । फिर यह पूजा भी खंडित क्यों हो गई. "कैसे हो गई...? वावूजी के सीने में दर्द की इतनी तेज़ लहर उठी कि प्राण ही निकल जाएंगे 'सामने चूल्हे में वुझी आग से घुयां उठ रहा था। और सुमित्रा घुटनों में सिर छिपाए रो रही थीं। वाबूजी ने चौक में खड़ होकर ज़ोर से कहा-'विशन, शाम को वकील चाचा को बुलाते लाना''मैं कागज तैयार कर लूंगा''आज फैसला हो ही जाएगा...' . 'हां-हां, ज़रूर बुलाता लाऊंगा''आखिर वकील चाचा के बगैर फैसला कैसे हो सकता है ? आपके जोड़ीदार हैं न ?' विशन ने भी चिल्लाकर ज़ोर से कहा । विशन का वच्चा सुदीप दौड़ता पाया और बाबूजी के घुटनों से लिपट गया । 'वावा, कहानी सुनाओ पहले पैसा दोकुलफी वाला आया है।' वाबूजी ने सुदीप को गोद में लेकर चिपटा लिया। उनका कण्ठ रुंध गया था। वक्ष में एक ऐसा आलोड़न था, जिसे वे कभी शब्द नहीं दे सके थे। किन्तु जो पालोड़न जीवन-भर उनके वक्ष में, पथरीले तट पर टक्कर मारती लहरों-सा हाहाकार करता रहा था। उन्होंने मुदीप I १४० / सलीव पर को उतार दिया, दो रुपया देते गोरे, 'सामो, नुम पर दुमपीमा मेना।' पोते मुदोष या प्रदीप को गोने से चिपटाए यात्री को होटे विशन पौर विहान याद पा जाते हैं । विगन तो यषपन में मार मगर रह लता या, उनके वगर नहीं रह पाता पा"।ननाय मिन्दामा' के या में उठ पाए वायूजी, विगन को गीने गे पिटाए रिगी पानि की मायकता ढूंदा करते थे । 'मैं न मही, मेरे बेटे यश को पूरा करेंगे..." वे रोमाचित हो उटते थे। प्राज जब उनके बेटे पिगी यायो पानि देने लायक हो गए हैं, तो मन्त्रोच्चार के स्थान पर पानी में पागपाग गालिया गजने लगी हैं। वर्षों गजोये ये रोमार पथरार रह गए। पुषती प्रांगी में घण्टी दीवारों को देते याबूजी गोवा करते है. उग रोमाच का क्या अर्थ पा...? उनी जिन्दगी का भया पथं है,...? सुदीप दौरता चला गया। याबूजी सहमति ग गई रहे...फिर धीरे-धीरे चलते बंटक पाए, तान पर मेट गए। ब्रूजी, पाव दवाय ६।' मिविया पूछ रहा था। शिरिया, था- तेरह माल का अनाय छोकरा, यात्री के परिवार में ही पल रहा था। उसका बाप भी बाबूजी के पास काम करता था। रघुनाथ ने मर्ग समय कहा था-'यागी, पर मार ही गके माई-बाप है।' 'तो का हमा। मरने ममय कोई पूछ बह गया सो मा जीवन-मर उमे निभाएग, मम की तरह जानते हैं, पान एर मादमीमागिन में कितना मर्च पाता है? निकाल बाहर मर्ग माने यो।बिन भीगा करता है। 'वाबूजी, पाव दवारह?' मिविया ने फिर पा। 'क्यो रे. तूने गैटी गा.?' बापूत्री ने पूछा। मिथिला भागही स्टा~'अभी नहीं, मापनमा, विजन नेपा ने गायन..." बापूजी नासर टे-'पा बमवरत पनी गंटी नीमो पोगा। कबूजी का पटा घर र दीयं दागा गार गयामी गौचर प्रा. दिन, मिन, विरार चले गए थे। इनरी बा लेने कमरों में दो पृष्ठ बदायन-पन्न बच्चों मार प्रम बांटेगानं गीति, मर्ग पर किशन अभी मां के चौके में ही खाते थे। बीच के बड़े कमरे में विशन और किशन के सात बच्चे उछल-कूद रहे थे। सुमित्रा रसोई के पास वाली कोठरी में मुंह ढापे पड़ी थीं। वाबूजी ने असह्य थकान से अांखें मूंद लीं । वियावान में खड़े स्तूप-सा वावूजी का अकेलापन बहुत दीर्घ हो उठा था। चारों ओर धूल ही धूल उड़ रही थी। उदास, बोझिल कादमों से बहुत धीरे-धीरे शाम पाई। छ: बजे के लगभग सव बैठक में जमा हो गए । बाबूजी और विशन की मां। विशन, किशन और विनोद । चूंघट काढ़े दोनों बहुएं । और वकील हरि- किशन। 'विशन को शिकायत है कि मैंने जो चाहा किया है.''मैंने काफी रुपया छिपाकर किशन को दे दिया है. मैंने गायत्री को मकान दिया है मैंने सुची की शादी अपनी मर्जी से की है। मैंने शिविया को पाला है .."और किशन को शिकायत है कि मैंने पैसा दवा लिया है.. हिसाब में गोलमाल किया है. विशन मुझे घाघ कहता है किशन मुझे 'फॉड' कहता है और विनोद, उसे भी शिकायत है कि मैं उसके साथ न्याय नहीं कर रहा। सच क्या है ? ''यह तो ईश्वर ही जाने "मुझे कोई दावा नहीं है कि मैं ठीक हूं, या अच्छा हूं. लेकिन जब विशन और किशन कुत्तों की तरह लड़ने लगते हैं. 'जव घर की इज्जत सड़कों पर फेंक दी जाती है.''जव पैसे लेकर सारे सम्बन्धों पर थूका जाता है तो मेरी समझ में नहीं पाता मैं क्या करूं. 'क्या करूं...' बाबूजी का कण्ठ भर्रा रहा था, किन्तु शब्द स्पष्ट थे। 'पाप 'फ्रॉड' नहीं, 'हिपॉट' हैं. 'वलिदान के नाम पर हमारी हत्या करने वाले । क्या दिया है आपने हमें ? आप कहीं ज्यादा दे सकते थे। खैर, पापको न सही, मुझे तो अपने बच्चों का ख्याल है । मैं उनका भविष्य नहीं विगाड़ सकता । सीधे-सीधे बंटवारा कर दीजिए कि हम अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जी सकें।' विशन का स्वर पड़ोस तक जा रहा था। 'जी हां, भाई साहब ठीक कह रहे हैं।' किान के स्वर में भाई के स्वर की प्रतिध्वनि थी। प्रांसों में भी भाई के भावों की प्रतिच्छवि। - 1 - .१४२ / सलीब पर विनोद दोनों के पीछे पहा होंठ चबा रहा था। विगन ने वी० ए० रिया है । गिगन बी० याम है । यिनोद डाक्टरी पढ़ रहा है । यादूजी को ध्यान पाया, वे तो मिर्फ मंदिर पाम फरक रह गए थे। 'ये लीजिए ववील मैया, मेरे पाम जो कुछ था, मैंने उगे तीन भागों मे बराबर बांट दिया है "हा, एक भाग मुषी को दे दिया है, एक विद्वान की मां को भी."ताकि मैं न रहूं तो...' यावृजी गहमा लेट गए। 'मोने में दर्द तो नहीं उठ पाया ?' हरिकिशन व्यग्र हो उठे। 'मोने में ददं उटना नही, उठाया जाता है, हम चुप कराने के लिए। किसान ने बटोरता में कहा । चावूजी ने कुरते के बटन खोल लिए-'जग पंगा तेज कर दो भाई। मुमित्रा उनके पैरो के पाम पाकर बैठ गई थी, उना गारा मुग प्रामुषों से तरवनर था.. हरिकिशन यापूजी का मीना मलाने लगे थे। "अम्मा को एक भाग मयों ? क्या वो भी हमारे माप नहीं रह मकती ? पोर मुची को भोर या गादी कर देना काफी नहीं है...? मैंने कहा न, पाबूजी अपनी मारी ने वाउ नहीं पाएगे...' विशन चीवने लगा था। हरिकिशन की पावों में सून उतर पाया । ये तहप उठे कि उटकर विशन को दो-चार तमाचे जड दें... किन्तु वापूजी के रवनहीन मुग को देखकर वे किमी प्रदत्य ममझौते के पन्नगंन चुप रह गए। महमा उन्हें लगा, तस्त पर बापूजी नहीं, कोई ईमा मलीव पर...। उनकी प्रांग नम हो पाई थी।
- मिशन अभी मां के चौके में ही खाते थे। बीच के बड़े कमरे में विशन और किरान के सात बच्चे उछल-कूद रहे थे। सुमिया रसोई के पास वाली कोठरी में मुंह ढांपे पड़ी थी । बाबूजी ने असह्य थकान से प्रांखें मद ली। बियावान में खड़े स्तूप-सा वावूजी का अकेलापन बहुत दीर्घ हो उठा था। चारों ओर धूल ही धूल उड़ रही थी। उदाम, बोझिल कदमों से बहुत धीरे-धीरे गाम पाई। छ: बजे के लगभग गय बैठक में जमा हो गए। बाबूजी पीर विशन को मां । विशन, किशन और विनोद । चूंघट काढ़े दोनों बहुएं । और वकील हरि- किगन । 'विशन को गिकायत है कि मैंने जो चाहा किया है। मैंने काफी रूपया छिपाकर किशन को दे दिया है.. मैंने गायत्री को मकान दिया है .. मैंने सुची की शादी अपनी मर्जी से की है.. मैंने शिविया को पाला है .''और किगन को शिकायत है कि मैंने पैसा दवा लिया है. हिसाब में गोलमाल किया है. विशन मुझे घाघ कहता है किशन मुझे 'फ्रॉड' कहता है। और विनोद, उसे भी शिकायत है कि मैं उसके साथ न्याय नहीं कर रहा। सच क्या है ? ''यह तो ईश्वर ही जाने "मुझे कोई दावा नहीं है कि मैं ठीक हूं, या अच्छा हूं लेकिन जव विशन और किशन कुत्तों की तरह लड़ने लगते हैं.''जब घर की इज्जत सड़कों पर फेंक दी जाती है"जब पैसे लेकर सारे सम्बन्धों पर थूका जाता है तो मेरी समझ में नहीं पाता मैं क्या करूं 'क्या करूं...' यापूजी का काण्ठ भर्रा रहा था, किन्तु शब्द स्पष्ट थे। 'पाप 'फॉड' नहीं, 'हिपॉट' हैं 'बलिदान के नाम पर हमारी हत्या करने वाले । क्या दिया है आपने हमें ? आप कहीं ज्यादा दे सकते थे । खैर, पापको न सही, मुझे तो अपने बच्चों का ख्याल है । मैं उनका भविष्य नहीं बिगाड़ सकता । सीधे-सीधे बंटवारा कर दीजिए कि हम अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जी सकें।' विशन का स्वर पड़ोस तक जा रहा था। 'जी हां, भाई साहब ठीक कह रहे हैं।' किशन के स्वर में भाई के स्वर की प्रतिध्वनि थी। आंखों में भी भाई के भावों की प्रतिच्छवि। ? . । । १४२ / सलीव पर विनोद दोनों के पीछे पड़ा होठ चबा रहा था। विगन ने वी० ए० किया है। किमन बी० काम है। विनोद टापटरी पड़ रहा है । बापूजी को ध्यान माया, ये तो गिपं. मंदिर पाम करके रह गए पे । मेलीजिए यकीन नया, मेरे पाग जो छ था, मैंने उमे तीन भागों में बराबर बांट दिया है."हां, एक भाग गुची वो दे दिया है, एक विगन की मां को भी "तापि में न रहूं तो...' यावजी गह्मा सेट गए। 'मीने में दर्द तो नही उद पाया?' रिविगन म्यग्र हो उटै । 'मोने मे ददं उटना नहीं, उठाया जाता है, हमें चुप कराने के लिए।' किशन ने बटोरता में यहा । बाबूजी ने पुरते के बटन गोल लिए-'जग पंगा लेउ फर दो भाई। मुमित्रा उनके परी के पाम पाकर बंट गई थी, उनरा नारा मुप पामुषों से तरबतर पा. हरिफिदान बाबूजी का सीना महलाने लगे थे। 'अम्मा को एक भाग पयो? क्या वो भी हमारे साप नहीं रह गपती ? पौर मुची को प्रौर क्यों ? दादी कर देना वाफी नहीं है...? मैंने कहा न, पाबूजी अपनी मकरारी मे बाज नहीं पाएंगे..." विगन चीसने लगा था। हरिकिसान की भागों में गन उतर पाया । वे तदप उठे कि उठकर विशन को दो-चार तमाचे जड़ दें...। रिन्तु वायूजी ने रक्तहीन मुग को देखकर वे किमी प्रदत्य समझौते के अनर्गन चुप रह गए । "महमा उन्हें लगा, तस्त पर पाबूजी नहीं, कोई ईमा मलीब पर...। उनको माग नम हो पाई पी।
। किशन अभी मां के चौके में ही खाते थे। वीच के बड़े कमरे में विशन और किशन के सात वच्चे उछल-कृद रहे थे। सुमित्रा रसोई के पास वाली कोठरी में मुंह ढांपे पड़ी थीं। वावूजी ने असह्य थकान से प्रांखें मूंद लीं। वियावान में खड़े स्तूप-सा वावूजी का अकेलापन बहुत दीर्घ हो उठा था। चारों ओर धूल ही धूल उड़ रही थी। उदास, बोझिल कदमों से बहुत धीरे-धीरे शाम पाई । छ: बजे के लगभग सब बैठक में जमा हो गए । वावूजी और विशन की मां । विशन, किशन और विनोद । चूंघट काढ़े दोनों बहुएं । और वकील हरि- किशन। 'विशन को शिकायत है कि मैंने जो चाहा किया है। मैंने काफी रुपया छिपाकर किशन को दे दिया है. मैंने गायत्री को मकान दिया है ''मैंने सुची की शादी अपनी मर्जी से की है। मैंने शिविया को पाला है ''और किशन को शिकायत है कि मैंने पैसा दवा लिया है. हिसाव में गोलमाल किया है. विशन मुझे घाघ कहता है किशन मुझे 'फ्रॉड' कहता है और विनोद, उसे भी शिकायत है कि मैं उसके साथ न्याय नहीं कर रहा। सच क्या है ? 'यह तो ईश्वर ही जाने 'मुझे कोई दावा नहीं है कि मैं ठीक हूं, या अच्छा हूं. लेकिन जव विशन और किशन कुत्तों की तरह लड़ने लगते हैं "जय घर की इज्ज़त सड़कों पर फेंक दी जाती है.''जव पैसे लेकर सारे सम्बन्धों पर थूका जाता है तो मेरी समझ में नहीं पाता में क्या करूं. "क्या करूं...' बाबूजी का कण्ठ भर्रा रहा था, किन्तु शब्द स्पष्ट थे। 'पाप 'फ्रॉड' नहीं, 'हिपॉट' हैं। 'बलिदान के नाम पर हमारी हत्या करने वाले । क्या दिया है आपने हमें ? आप कहीं ज्यादा दे सकते थे। खैर, श्रापको न सही, मुझे तो अपने बच्चों का ख्याल है । मैं उनका भविप्य नहीं बिगाड़ सकता । सीधे-सीधे बंटवारा कर दीजिए कि हम अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से जी सके ।' विशन का स्वर पड़ोस तक जा रहा था। 'जी हां, भाई साहब ठीक कह रहे हैं।' किशन के स्वर में भाई के स्वर की प्रतिध्वनि थी। आंखों में भी भाई के भावों की प्रतिच्छवि। - .१४२ / सलीव पर विनोद दोनों के पीछे पहा होंठ चया रहा था। विगन ने बी० ए० रिया है। विमान बी० काम है। विनीर डाक्टरी पड़ रहा है । बाबूजी को ध्यान माया, वे तो मिपं. मंदिर पाग परके रह मे मीजिए वकील भंपा, मेरे पाम जो कुछ था, मैंने उगे नीन भागों मे बराबर बार दिया है."हां, एक भाग मुची को दिया है, एक विगन की मा को भी.. ताकि मैं न रहूं तो...' वायुजी महमा पेट गए। 'मीने में दर्द तो नही उठ पाया ?' रिमन प्यप हो उठे। 'मोने में दर्द उठना नहीं, उठाया जाता है. हमे चुप कराने के लिए।' किसान ने कटोरता में कहा । बाबूजी ने पुरते के बटन खोल लिए-~'जग पंगा तेज पर दो भाई। गुमित्रा उनके पैरों के पास पावर बंट गई पी, उनका गारा मुग प्रामुपों से तरबतर पा... हरिकिशन यावृजी का मीना महलाने लगे थे। 'मम्मा को एक भाग भयो ? क्या वो भी हमारे गाप नही रह गकती? मोर मुची फो पोर क्यों गादी कर देना पापी नहीं है...? मैंने पहा न, पाबूजी अपनी मारी मे बाज नहीं पाएग...'विरान चीसने सगा था। हरिविजन को मायो मे गन उतर पाया । वे तदप उठे कि उटकर विशन को दो-चार तमाचे जह। बिन्तु बाबूजी के सतहीन मुग को देखकर वे विमो प्रदृश्य ममझौते के अन्तर्गत चुप रह गए। महगा उन्हें लगा, तम्त पर बाबूजी नहीं, कोई ईमा मलीव पर...। उनरी माय नम हो पाई थी।
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