Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Sohan Kvya Katha Manjari [ Part - 5 ]
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श्री श्वे. स्था० जैन स्वाध्यायी संघ, गुलाबपुरा का ४६वां पुष्प
सोहन कान्य कथा-मंजरी
भाग ५
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रचनाकार:
प्रकाशक:
श्रो श्वे० स्था० जैन स्वाध्यायी संघ
गुलाबपुरा (राज.)
स्वाध्याय शिरोमरिण, प्रवर्तक
श्री. सोहनलालजी म. सा.
सोहन काव्य कथा मंजरी
भाग ५
.
रचनाकार
प्रवर्तक श्री सोहनलालजी म० सा०
सम्पादक
प्रवचन प्रभाकर श्री वल्लभमुनिजी म. सा.
प्रथम संस्करण
जनवरी, १९९१
मूल्य : दस रुपये
.
मुद्रक :
मंगल मुद्रणालय,
३/९, गंज, महावीर सकिल, अजमेर
फोन : २३६२६ / ३२६२६
:
द्रव्य सहायक
श्री प्राज्ञ जैन शिक्षण समिति थांवला का नाम समाज-साहित्य
सेवा के लिए सुपरिचित है। यह समिति गुरुदेव श्री के आज्ञा-
नुवर्ती शिष्य-शिष्याओं एवं विरक्तात्माओं के अध्ययन का सभी
व्यय वहन करती है और जब अध्ययन आदि का कार्य नहीं होता
है तब श्री श्वे० स्था० जैन स्वाध्यायी संघ के साहित्य प्रकाशन में
सहयोग देती है। उसी क्रम में इस समिति ने पूर्व में सामायिक
सूत्र मूल की ३००० प्रति छपवायी थीं और इस सोहन काव्य
कथा-मंजरी के पांचवें भाग के प्रकाशन का दायित्व भी इसी
समिति ने वहन किया है एतदर्थ समिति के सभी पदाधिकारी
सज्जनों का श्री जैन स्वाध्यायी संघ साभार. धन्यवाद ज्ञापित
करता है एवं भविष्य में भी इसी प्रकार के सहयोग की प्राशा है।
प्रकाशकीय साहित्य की विधाओं में कथा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि स्वयं मानव की सृष्टि । जब दो व्यक्ति मिलते हैं एवं परस्पर कुशल क्षेम के समाचार पूछते हैं, तब वे अपनी ही कहानी कहते हैं या सुनाते हैं । यह कहानी का उद्गम स्रोत है । तब से अब तक इस कहानी ने एक लम्बी दूरी की यात्रा तय की है । कथा से कहानी, फिर लघु कथा व बोधकथा के रूप में विकसित होकर अब वह अ-कहानी की सीमा को स्पर्श करने लगी है। किसी भी आयु के व्यक्ति के लिए कहानी सुनना या पढ़ना आनन्ददायक होता है। विविध घटनाक्रम के साथ संजोए गए पात्रों के गतिमान जीवन के माध्यम से मानो पाठक अपनी ही कहानी पढ़ता है। वह घटनाक्रम भी अपनी बात कहकर पाठक के मन में निराकार रूप से पैठकर उसे प्रान्दोलित करता रहता है अंतः उसकी अनुगूज तो लम्बे समय तक सुनाई पड़ती रहती है। इस प्रकारं कहानी जीवन से एवं जीवन मूल्यों से जुड़ जाती है तथा मानवीय मूल्यों की समृद्धि का माध्यम बनती है । कथा का मूल आधार घटना का चमत्कार होता है तथा घटना-चमत्कार किसी धार्मिक, नैतिक या साहसिक मूल्य की स्थापना करता है। अति प्राचीनकाल में लिखी गई पंचतंत्र, हितोपदेश, बैताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी आदि की कथाएँ नीति की शिक्षा प्रदान करने वाली रही हैं जिनसे व्यक्ति व समाज के जीवन को एक दिशा मिली है। उनमें वरिणत व्यक्ति एकाकी न होकर सम्पूर्ण समाज के एक प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित होता है इसलिए पाठक उसके जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर पाते हैं। यद्यपि कथा का प्रस्थान बिन्दु व्यक्ति है किन्तु गन्तव्य तो समाज ही होता है । इस कथा-शिल्प के साथ यदि काव्यात्मकता का भी मधुर मेल हो जाय तो सोने में सुगंध आ जाती है । ज्ञेयतत्व का मेल होने के कारण, माधुर्य में अभिवृद्धि होने से उसकी प्रभावशीलता द्विगुणित होकर पाठक के मन पर स्थायी असर कर जाती है । प्रस्तुत काव्यात्मक कथा-संकलन के कथा-शिल्पी विद्वद्वरेण्य, परमश्रेष्ठ, मधुरवक्ता, आशुकवि गुरुवर्य श्री सोहनलालजी म. सा. एक ऐसे ही अमर कथाकार हैं जिन्होंने अपनी कथाओं के माध्यम से तर्क जालं की भांति उलझे हुए मनुष्य के मन की समस्याओं को सुलझाया है, सांसारिक व्यामोह से उसे मुक्त कर मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति से उसे सम्पन्न बनाया है और इस प्रकार स्वस्थ अनासक्त एवं समर्पित व्यक्ति का तथा शुद्ध आचार वाले समाज का निर्माण किया है।
वि० सं० २०४४ का वर्ष श्री स्वाध्यायी संघ के प्राद्य-संस्थापक, सुदीर्घ विचारक, राजस्थान केसरी, श्रद्धेय गुरुवर्य श्री पन्नालालजी म० सा० का जन्मशती वर्ष था। इसी समय हमारी आस्था के केन्द्र स्वाध्याय-शिरोमणि श्रद्धेय गुरुवर्य श्री सोहनलालजी म. सा. ने अपने जीवन के.७८वें बसन्त में प्रवेश कर अपने महिमा-मंडित जीवन से हमें गौरवान्वित किया है। पूज्य गुरुदेव के अनुयायी भक्तों की यह हार्दिक अभिलाषा थी कि उनके अब तक के प्रकाशित व अप्रकाशित काव्यात्मक कथानकों को-जो लगभग ३०० से भी अधिक हैं- क्रमश: प्रकाशित कराया जाय ताकि पाठक उनसे समुचित लाभ उठा सकें एवं साहित्य के अनुसंधित्सुओं के लिए भी पथचिह्न बन सकें। वर्तमान दूषित वातावरण में युवकों को सत्साहित्य उपलब्ध नहीं होने से वे घटिया व चरित्रहन्ता साहित्य पढ़कर अपना समय नष्ट करते हैं उन्हें भी व्यवहार व धर्मनीति परक साहित्य सुलभ कराना भी इसका एक उद्देश्य रहा है। इसी भावना के अनुसार पूज्य गुरुदेव श्री द्वारा रचित कथानकों को क्रमशः प्रकाशित करने की योजना बनी । सोहन-काव्य कथा मंजरी के दो भाग वि० सं० २०४४-४५ में तथा भाग ३, ४ सं० २०४६-४७ में प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें पाठकों ने काफी सराहा है। इसका यह पांचवा पुष्प पाठकों को समर्पित करते हुए परम हर्ष है। इस संकलन को तैयार करने में वि० सं० २०४७ का चातुर्मास हमारे लिए स्मरणीय है । स्वाध्याय शिरोमणि आशुकवि, मरुधर छवि, मधुर प्रवक्ता पं० रत्न श्रद्धेय प्रवर प्रवर्तक पूज्य गुरुदेव श्री सोहनलालजी म. सा. ठाणा ६ का चातुर्मास योग अजमेर क्षेत्र को सौभाग्य से प्राप्त हुआ । उसी चातुर्मास में इस काव्य-कृति का संकलन किया गया था। इस.संकलन को तैयार करने में हमें प्रोजस्वी वक्ता, प्रखर प्रतिभा के धनी, प्रवचन प्रभाकर श्रद्धेय वल्लभ मुनिजी म. सा० का हार्दिक सहयोग मिला जिन्होंने आद्योपान्त सभी कथानकों को पढ़कर आवश्यकीय सुझावों से लाभान्वित किया है, साथ ही श्री स्वाध्यायी संघ के कार्यालय मंत्री श्रीमान् धर्मचन्दजी सा० मेहता ने इसके मुद्रण कार्य की व्यवस्था के लिए परिश्रम कर सहयोग प्रदान किया है, तदर्थ हम हृदय से आभारी हैं। आशा है पाठकगरण इस काव्य कथामाला से लाभ प्राप्त कर जीवन में नैतिकता विकसित कर सकेंगे, इसी विश्वास से- -नेमीचन्द खाबिया गुलाबपुरा मन्त्री पौष पूर्णिमा सं०:२०४७ श्री श्वे० स्था० जैन स्वाध्यायी संघ, गुलाबपुरा । (iv)....
-: भूमिका प्राचीन आचार्यों ने रसात्मकं वाक्यं काव्यम्-रसपूर्ण वाक्य को काव्य कहकर काव्य में रस को प्रमुखता दी है तो कतिपय आचार्यों ने 'रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्' कहकर प्रत्येक उस शब्द को ही काव्य की संज्ञा दे डाली है जो रमणीय अर्थ का प्रतिपादक हो । इस प्रकार चित्त को रमणीय लगने की विशेषता को काव्य में स्थापित किया है। काव्य प्रकाशकार आचार्य मम्मट ने काव्य के जिन षट् प्रयोजनों का उल्लेख किया है उनमें काव्य की रचना यशःप्राप्ति के लिए व धन सम्पत्ति के अर्जन के लिए मानकर उसके लौकिक स्वरूप को उजागर किया है तो वहीं काव्य का प्रयोजन लोक व्यवहार के ज्ञान के लिए व अमंगल के विनाश के लिए मानकर उसे लोकोत्तर स्वरूप में भी प्रतिष्ठित किया है । ये चारों प्रयोजन रचनाकार के पक्ष से स्थापित किए गए हैं, वहीं काव्यानुशीलन से आनन्द की अनुभूति व कांता सम्मित उपदेशों की सम्प्राप्ति मानकर काव्य का रसास्वादन करनेवाले पाठक या श्रोता को भी महत्व दिया है। आनन्द की प्राप्ति काव्य का परम प्रयोजन है, भले ही उसे एकमात्र प्रयोजन न भी मानें। इसमें उपदेश का स्थान भी महत्व- पूर्ण है इसीलिए शास्त्रकारों ने - अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः कहकर रचनाकार को महत्वपूर्ण स्थान पर आसीन माना है । यदि यह काव्य कथामय हो तो पाठकों के लिए सरलतापूर्वक उपभोग्य बन जाता है । आनंद की प्राप्ति एवं उपदेश ग्रहण-दोनों ही पक्ष अनायास ही सध जाते हैं । परमश्रद्धेय, स्वाध्याय-शिरोमणि, आशुकवि, पूज्य प्रवर्तक गुरुवर्य श्री सोहनलालजी म० सा० जैन समाज की अपूर्व निधि हैं, संत-समाज में शिरोमणि हैं, जिनके काव्य में नीति का ज्ञान व अमंगल का विनाश-ये प्रयोजन तो समाहित हैं ही, पाठक व श्रोता भी सहज ही उपदेशों से सजग होकर न्याय-नीति सम्मत मार्ग पर चलने को उद्यत होता है। आपके काव्य में न शब्द का महत्व है, न अर्थ का; इसमें तो केवल आनंद की वर्णना ही प्रमुख है । आपके काव्य में यह विलक्षणता इसलिए भी है कि यह शुद्ध हृदय की उपज है, उसके पीछे सात्विक व्यवहारयुक्त, त्यागमय जीवन का बल रहा हुआ है । उनकी कविता का जन्म सायास न होकर अनायास होता है । पूज्य गुरुदेव की काव्य-कथा का हेतु निरन्तर अभ्यास की अपेक्षा, उनकी कवित्व की प्रतिभा है, इसलिए वे न उक्ति पटु हैं और न शब्द पटु या अर्थ पटु । जो कुछ भी उन्होंने कहा, वह सब उन्होंने शुद्ध हृदय से समाज की कल्याण-कामना से कहा। इसीलिए सारी (v) -- कथाएँ सादी शैली में कही जाने पर भी प्रभविष्णु हैं, उन्हें आलंकारिकता द्वारा बोझिल नहीं बनाया है। उनमें सत्कवि के संस्कार विद्यमान हैं अतः उन्हें न इतिहास देखना पड़ा है और न काव्य-नियमों का ही अनुशीलन करना पड़ा है । सहज-स्फूर्त काव्य प्रतिभा द्वारा जो कुछ भी हृदय से फूट पड़ा उसे लिपिबद्ध कर पाठकों को समर्पित कर दिया। जिस प्रकार के जीवन का वर्णन उनकी कथाओं में हुआ है वैसा जीवन उन्होंने स्वयं जिया है एवं जी रहे हैं इसलिए पाठक के हृदय को प्रभावित करने में वे अन्यतम हैं। किसी..भी कथा का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता । उसमें घटनाओं व क्रियाओं की एक शृङ्खला होती है और वे घटनाएँ एक या अनेक व्यक्तियों से जुड़ी होती हैं। कथाओं के वे पात्र एक वर्ग या समूह का प्रतिनिधित्व तो करते हैं फिर भी उनमें निजीपन होता है जो उनकी जीवन-शैली को उद्घाटित करता है। यहाँ कथन इतना स्वाभाविक होता है कि ऐसा लगने लगता है कि मानो लेखक हमारे ही जीवन के अच्छे और बुरे निजी प्रसंगों को खोल कर देख-परख रहा है । पूज्य गुरुवर्य ने भी अपनी समस्त काव्य कथाओं में मानव-मन की कमजोरी को खूब समझा है किन्तु उसे संयम के उपदेश के द्वारा सुदृढ़ भी किया है। जब वे आवेश, लोभ, कलह, तृष्णा आदि दुर्गुणों से घिरे मानव-मन का चित्रण करते हैं तो इन दुर्गुणों से आविष्ट व्यक्ति में हमें अपना ही स्वरूप दृष्टिगत होने लगता है तथा समता, क्षमा, दया, निष्कपटता आदि सद्गुणों से हम उसे शुद्ध व पुष्ट करने लगते हैं। पात्रों का ऐसा साधारणीकरण कथाकार की अद्भुत सफलता है। गुरुदेवं श्री की प्रत्येक कथा में चित्रित पात्र पूर्णतः निजी परिवेश से घिरा हुआ है जिस पर उसकी छाप अंकित है । भारतीय संत कवियों तथा भक्त उपदेशकों ने नारी-जीवन को सदा ही विकृतियों से भरा हुआ देखा है । उसे साधना के मार्ग का रोड़ा मानकर 'काली नागिन' व 'नरक-कुण्ड' तक कहा है। कामनाओं व वासनाओं से लिपटी हुई वह एक ऐसी विषबेल है, जिसे देखने मात्र से ही प्राणी अंधा हो जाता है । वह सदा दीन, दलित, अपयश की भागी मानी जाकर उपेक्षिता के रूप में चित्रित की गई है। इन कवियों ने उसके उज्ज्वल रूप एवं सौम्य स्वरूप को नहीं देखा, पुरुष के लिए उसका सह धर्मिणी रूप चित्रित नहीं हो सका। पूज्य गुरुदेव ने इस कलंक को धोने का प्रयास किया है। नारी-विषयक उनकी धारणाएँ पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं । उन्होंने उसे आध्यात्मिक जीवन का आदर्श माना है तथा उनकी दृष्टि में वह पुरुष को वैराग्य की ओर आकर्षित करने वाली रही है । वह आज्ञाकारिणी पुत्री, शीलवती नारी, धर्मशीला-पुण्यवती पत्नी एवं संतान का जीवन निर्माण करने वाली माँ के रूप में चित्रित की गई है । वह स्वयं गिरकर भी उठती है एवं पुरुष को भी उठाने का साहस दिखाती है। 'धर्म बिन जीवन कैसा' में लालचंद को सेठाणी ने ही धर्मोन्मुख किया है तो 'धीरज काम बनाए' में नारी ने ही सेठ को हत्या करने के पाप से बचाया है। इसी प्रकार 'पुण्य को पहेली नी खण्ड की हवेली' की पुण्यवती लक्ष्मी, यथा नाम तथा गुण की कहावत की (vi) चरितार्थ करती हुई सुपात्रदान द्वारा सभी परिजनों के भाग्य को बदलने में सहायक होती है । जब गुरुदेव कहते हैं- 'तारी तो सब कुछ कर देती, उस बिन क्या संसारजी।' 'नारी से नर अड़ा वहीं पर, खाई उसने हार जी।' तो नारी का अबला स्वरूप नहीं, उसका महतो महीयान् स्वरूप ही उभरता है। पूज्य गुरुदेव ने नारी जीवन की कमजोरियों को भी देखा है किन्तु उनका उद्देश्य वहीं रुककर उसकी विकृतियों को ही देखते रहने का या उसे धिक्कारते रहने का ही नहीं रहा, वरन् वहाँ भी नारी-हृदय की पश्चातापजनित विगलित वेदना से निकले आँसुओं से उसके धुले, उजले स्वरूप को ही लक्षित किया है । कथाकार ने अपनी कथाओं में मानव-चरित्र के सामान्य और विशेष-दोनों प्रकार के पहलुओं को लिया है । उनका सामान्य भी विशेषोन्मुख ही रहा है। उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली और जैसा भी मानव का स्वरूप दिखाई पड़ा, उसका चित्रणकर उसे विशेष बनने की प्रेरणा देकर उच्च धरातल पर ला छोड़ा है । आषाढाचार्य संयम से गिरते हुए ऐसे मुनि का प्रतिनिधि चरित्र है जो सुखाभिलाषी बनकर संयम त्यागने का विचार करता है किन्तु कवि ने उसे नीचे की भूमिका पर ही नहीं छोड़ा वरन् पुनः संयमारूढ़ कर पूज्य बना दिया । 'कर्ज चुकाना होगा' में प्रमुख पात्र दोनों ठाकुर पहले धोखेबाज की भूमिका पर खड़े दीखते हैं किन्तु उन्हें भी गाय और भैंसे की बातें सुनाकर- "ना जाने किस भव में जाकर, होवेगा छुटकार, अतः नया ऋण नहीं करेंगे, सीख हिये में धार ।" गुरुवर ने सजग किया है और शुद्ध हृदयी बना दिया है। धर्मदत्त सेठ को भी 'निन्यानवें के चक्कर' से निकाला है तो रोहा चोर को धर्म की ओर उन्मुखकर उसका हृदय ही बदल डाला । गुरुवर्य को मानव के हृदय-परिवर्तन पर पूर्ण विश्वास है। योग्य निमित्त पाकर उसमें अघटित परिवर्तन घटित हो सकता है जैसा कि 'धर्म विन जीवन है कैसा ?' में सेठ को मुनिवर ने स्वर्ग में चिट्ठी लेकर पाने की कहकर बदल डाला । गुरुदेव ने परिवेश से प्रभावित मानव के मनोविज्ञान को बड़ी खूबी से परखा है और उसका सूक्ष्म चित्रण किया है। कथाकार का हृदय सामान्यवर्ग के प्रति भी संवेदनशील रहा है । उच्च अभिजात्यवर्ग या राजन्यकुल के पात्रों को ही नायक-नायिका बनाकर चित्रण नहीं किया वरन् भोलू सदृश सामान्य मजदूर को लकड़ियां काटकर बेचनेवाले सामान्य भारवाहक कठियारे को भी मुख्य पात्र की भूमिका दी है । यह उनके हृदय की विशालता, करुणासिक्तता व निष्पक्षता को सूचित करती है । द्रवित हृदय की करुणा ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, अमीर-गरीव पढ़े-लिखे या (vii) निरक्षर का भदभाव नहीं जानती । कत्र्तव्य-परायणता ही जीवन की सौरभ है जो भोल के चरित्र में परिव्याप्त है । इसीलिए वह-'किन्तु कहीं प्रतिशोध भाव में, लाभ होय नाहीं।' सोचकर अपने पुत्र की बीमारी की उपेक्षा करनेवाले. डॉक्टर के पुत्र को भी सर्पदंश के विष को उतारकर बचा लेता है । यही मानव चरित्र का शाश्वत सौन्दर्य है. जिसके आधार पर सृष्टि का संचालन हो रहा है । इसे गुरुवर्य ने खूब-खूब पहचाना। इसीलिए उनकी प्रत्येक काव्य कथा प्रादर्शोन्मुखी है। इतना ही नहीं, मानवेतर पशु-पक्षी-जगत के प्रति भी उनके हृदय की करुणा 'धोखा बनाम मौत' कथा में प्रकट हुई है तथा कपटी शृगाल को दण्ड देकर सरल हृदयी हिरन को बचाया । ऐसा चित्रित करते हुए वे मानव से ऊपर की भूमिका पर अधिष्ठित दीखते हैं । गुरुदेव की कथाओं का फलक व्यापक है। उनमें ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भो का चित्रण तो है ही आपके कथा साहित्य में सामाजिक परिवेश का भी व्यापक रूप से चित्रण हुआ है । समाज का प्रत्येक घटक आदर्श श्रावक और श्राविका होने के साथ-साथ गृहस्थी की धुरा वहन करनेवाले आदर्श पति-पत्नी व स्नेही भाई-बहिन भी हैं। इन संबंधों में यदि प्रेम, समर्पण, त्याग व सहयोग आदि का अभाव है तो वह घर नहीं नरक वासा है। उसे स्वर्ग बनाने का अमोघ मंत्र है समताभाव, सन्तोष व धर्ममय आचरण जो गुरुदेव की प्रत्येक कथा का सार है । यह तत्व उनकी सभी कथाओं में माला के मरिणयों में सूत के समान अनु- स्यूत है । पिता-पुत्र व माता-पुत्री के संबंधों की पवित्रता व सुन्दरता पर भी आपने लिखा है। संतान यदि आज्ञाकारिणी नहीं है तो माता-पिता का जीवन नारकीय बन जाता है; कलि- युगी सन्तान का परिचय देकर आपने इस सत्य को प्रकट किया है । हिन्दी भाषा की प्रारंभिक कथाओं में कथानक का विकास दैवी घटनाओं या संयोगों से हुआ करता था। मनो-विश्लेषण की बात तो बहुत बाद में आकर जुड़ी। पूज्य गुरुदेव की कथाओं में भी संयोग-आधारित घटनाओं का समावेश रहा है तो देवी-घटनाओं की भी संयोजना है । इन घटनाओं में असाधारणता है । संभव है आश्चर्योत्पादन एक कारण रहा हो । प्रासादाचार्य का छः महीनों तक नाटक देखते रहना, गाय व भैंसे का मानवी बोली में वातचीत करना, कालू सेठ के कान व हाथों का भींत से चिपक जाना, बकरी का स्वर्ण मींगणी करना आदि इसी प्रकार की घटनाएँ हैं जिन्हें पढ-सुनकर पाठक अवाक रह जाता है । अनेक कथाओं में धर्मघोष अरणगार का आकर पात्रों के जीवन में परिवर्तन उपस्थित करना भी संयोग पर आधारित घटनाएँ हैं । इन संयोगों को जातिस्मरण-ज्ञान या पूर्वजन्मा- धारित रूप प्रदान कर कथाकार ने शास्त्र सम्मत बनाने का प्रयास किया है। अपनी कथाओं में कवि ने नवीन व प्राचीन शैलियों का समन्वय करते हुए क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्रोह, मोह आदि से ग्रसित व्यक्ति की जीवन-दशा का वैसा ही चित्रण किया है जैसा कि प्रत्यक्ष में हम अनुभव करते हैं। कवि अतीत के प्रति सजग है तो वर्तमान के प्रति भी सावधान है। (viii) .
पूज्य गुरुदेव ने लोक-परम्परा से चली आ रही श्रुतियों को भी आधार बनाकर कथाओं का निर्माण किया है तो शास्त्रीय पक्ष को भी अनदेखा नहीं किया है । देवताओं के गले की माला के कुम्हलाने पर छः महिनों में उनकी आयु पूर्ण हो जाती है, सिद्धांत के इस कथन का पाँचवीं कथा में पूर्ण परिपाक हुआ है तो- जाति जन्म से नहीं होती है, कर्म-प्रधान कहलाय, जैसे काम करे वह वैसी, जाति का बन जाय । कहकर उत्तराध्ययन सूत्र में व्यक्त प्रभु की वाणी से अपनी सहमति जताकर अपने प्रगतिशील विचारों का परिचय दिया है। 'जैसी हूंकणी वैसी लौटणी' की जनश्रुति में 'भले भलाई बुरे बुराई' के दर्शन होते हैं । इस प्रकार पूज्य गुरुदेव की प्रत्येक काव्यकथा का उद्देश्य है-पाठकों-श्रोताओं के जीवन को आनन्द से भर देना, जो उनके जीवन की समस्त विकृतियों के विनाश से ही संभव है । आप इस ओर पूर्ण सचेष्ट रहे हैं । प्रत्येक कथा की भाषा में प्रवाह है। तत्सम शब्दावली के प्रयोग से लालित्य बढ़ा है तो अनेक देशज शब्दों के प्रयोग से स्थानिकता लाकर भाषा को सरस बना दिया है। निर- भागी, पेमाल, असराल, जान, भूगड़े, छोतरे, हासल आदि शब्द-प्रयोगों में कवि-कौशल तो द्रष्टव्य है ही, इनसे भाषा की अर्थवत्ता भी बढ़ गई है। 'पिताजी दोष नहीं थांरो, दोष सब म्हारा कर्मी रो' आदि राजस्थानी प्रयोग भाषा की गौरव-वृद्धि ही कर रहे हैं। नए-नए उपमानों का भी यथास्थान प्रयोग हुआ है । 'सुयश के फैलने' को जल में तेल के फैलने के समान कहकर कवि ने भाषा-प्रयोग में प्रौढ़ता ही प्रदर्शित की है । अनेक स्थानों पर सुन्दर उक्तियों का प्रयोग करने से भाषा में लाक्षणिकता आ गई है। बादल-छाया सम माया, आदि कथन, कथन की संक्षिप्तता किन्तु प्रभावपूर्णता का द्योतक है। वस्तुतः यह संग्रह बोधप्रद चरित्रों का आकर है। जैसे रत्न से स्वतः ही किरणें फूटती हैं वैसे ही इसकी प्रत्येक कथा तमसावृत मानस में सदाचार की रश्मियां विकीर्ण करती हैं। मेरा विश्वास है कि यह काव्य कथा संग्रह दिग्मूढ़ मानवता को परमार्थ की ओर बढ़ने में सहायक होगा। आज के युग का, अनेक कुण्ठानों से ग्रसित मानव, अपने त्रासपूर्ण क्षणों में कुछ विश्राम पा सकेगा, ऐसा विश्वास है । गुरुदेव की वाणी हमें सदाचार की ओर उन्मुख करेगी एवं हम उपकारी, साहसी, दृढ़ निश्चयी, साथ ही विनयी बनने की प्रेरणा इन कथानकों से ग्रहण कर सकेंगे, ऐसी आशा करते हैं । -रतनलाल जैन गुलाबपुरा सहायक प्रधानाध्यापक श्री गांधी शिक्षण संस्थान दिनाङ्क ३१-१२-९० गुलाबपुरा (राज.) (ix) । पौष पूर्णिमा २०४७ सोहन काव्य कथा मंजरी भाग-५ अनुक्रमणिका क्या कहाँ १ ३ or १० १२ २५ २८ ८ ३३ ३८ ४३ -- ४६ ४८ १. ऐसी होती राम दुहाई २. लाज सुधारे काज ३. शान्ति का अमोघ मन्त्र ४. जैसी 'करणी वैसी भरणी ५. दयावीर मैतार्य मुनि ६. क्षमा धार ले : विनसे वैर ७. धर्म बिन जीवन है कैसा ? ८. जैसा करेगा, वैसा भरेगा ९. यद् भावि : तद् भावि १०. अपकार के बदले में उपकार ११. शीश झुकेगा एक को १२. धीरज काम बनाये १३. लोभ विनाशे ज्ञान को १४. :पुण्य की पहेली: नौ खण्ड की हवेली.. १५. कर्ज चुकाना होगा १६. निन्याण का चक्कर १७. कलियुगी सन्तान : एक परिचय १८. विवेक पायो : कष्ट मिटायो! १९. धोखा बनाम मौत २०. . लालच बुरी बलाय २१. बुद्धि की विजय २२. रोहा चोर : धर्म की ओर २३: । अपने सम सब जीव को लखे वही विद्वान २४. स्वार्थ भरा संसार २५. चार चीजें मंगवाई : बुद्धि से भिजवाई ५२ ܀ ६३ ६७ ७० ७२ ७९ : ६२ ८९ ९२ . ९४ ९७ १ ऐसी होती राम दुहाई तर्ज-परिणहारी दोहा-सोगन लेकर किस तरह, दृढ़ रहा मन माँय । भक्त और भगवान की, सुनो कथा चित्त लाय ।। एक समय श्री कृष्णजी, सुनो श्रोताजी, अर्जुन को फरमाय, श्रोताजी। दे तुझ कर की मुद्रिका, सुनो श्रोताजी, तब अर्जुन दरसाय, श्रोताजी ।१। नहीं हूँ किसको मूदड़ी, सुनों श्रोताजी, देऊँ तो राम दुहाय, श्रोताजी। कृष्ण सुनी मुस्का गये, सुनो श्रोताजी, सोचे दूं समझाय, श्रोताजी ।२। अर्जुन नदी पर जायके, सुनो श्रोताजी, दीने वस्त्र उतार, श्रोताजी । मुद्रिका बांध जनेऊ के, सुनो श्रोताजी, जल में डुबकी लगाय, श्रोताजी।३। पुनः निकलते ही लखा, सुनो श्रोताजी, सिंह खड़ा तट पाय, श्रोताजी। शस्त्र नहीं है पास में, सुनो श्रोताजी, जनेऊ मन्त्र चलाय, श्रोताजी ।४। सिंह भस्म हुआ तत्क्षणे, सुनो श्रोताजी, अर्जुन जा रहे स्थान, श्रोताजी। देख मार्ग में कृष्ण को, सुनो श्रोताजी, कर जोड़ी दिया ध्यान, श्रोताजी ।। देख मुद्रिका हाथ में, सुनो श्रोताजी, विस्मय अर्जुन लाय, श्रोताजी। कृष्ण कहे चल साथ में, सुनो श्रोताजी, प्रण कैसे पलटाय, श्रोताजी ।६। साधु वेश दोनों धरी, सुनो श्रोताजी, जा रहे दूसरे ग्राम, श्रोताजी । सेठ हाठ पर हो खड़े, सुनो श्रोताजी, सुनो हमारा काम, श्रोताजी ।७। भोजन हित तुम द्वार पे, सुनो श्रोताजी, आये हैं हम चाल. श्रोताजी। घर लाकर बैठा गया, सुनो श्रोताजी, नारी से कहा हाल, श्रोताजी ।। भोजन भाणे आ गयो, सुनो श्रोताजी, तब यों सन्त सुनाय, श्रोताजी । दानी भी हम साथ में, सुनो श्रोताजी, बैठ के खाना खाय, श्रोताजी ।९। सेठ आय ऐसे कहे, सुनो श्रोताजी, जीमें आप महाराय, श्रोताजी । तुम बिन हम जीमें नहीं, सुनो श्रोताजी, हम प्रण लीना ठाय, श्रोताजी ।१०। १ '- --- से सुनकर वहाँ से सेठजी, सुनो श्रोताजी, गया भवन के माँय, श्रोताजी। पुनः लौट आया नहीं, सुनो श्रोताजी, नार बुलाने जाय, श्रोताजी ।११॥ वह भी पुनः आई नहीं, सुनो श्रोताजी, दूजी नार वहाँ जाय, श्रोताजी। जावे सो आवे नहीं, सुनो श्रोताजी, सन्त लखे वहाँ आय, श्रोताजी ।१२ तीनों गल फांसी लही, सुनो श्रोताजी, लटक रहे घर मांय, श्रोताजी। अर्जुन लख विस्मित हुआ,सुनो श्रोताजी, यह क्या खेल दिखाय, श्रोताजी ॥१३ कृष्ण अमृत जल छांट के, सुनो श्रोताजी, कीने पुनः सचेत, श्रोताजी। किस कारण फाँसी लही, सुनो श्रोताजी, क्यों सब हुए अचेत, श्रोताजी ।१४। सेठ कहे सब जानते, सुनो श्रोताजी; फिर भी पूछो बात, श्रोताजी। कृष्ण कहे दिल खोल के, सुनो श्रोताजी, कह दो निज अवदात, श्रोताजी ।१५। इतना सुन कहे सेठ यों, सुनो श्रोताजी, एक दिन गया ससुराल, श्रोताजी। मारग में नारी खड़ी, सुनो श्रोताजी, कर रही थी इन्तजार, श्रोताजी ।१६। कोई, मानव अाय. के, सुनो श्रोताजी, देवे भार उठाय, श्रोताजी। देख मुझे आवाज दी, सुनो श्रोताजी, देवो वजन उठाय, श्रोताजी ।१७। पास गया जब नार ने, सुनो श्रोताजी, कही. ये मुझ बात, श्रोताजी। वजन उठा सिर पर धरो, सुनो श्रोताजी, नहीं और कुछ च्हात, श्रोताज़ी ।१८। देह छुई तो आपको, सुनो श्रोताजी, देऊँ राम दुहाय, श्रोताजी । वजन उठा मैं चल दिया, सुनो श्रोताजी, ठहरा सासरे आय, श्रोताजी ।१९। देखी उन्हें ससुराल में, सुनो श्रोताजी, है मेरी वह नार, श्रोताजी । तन छूने की शपथ दी, सुनो श्रोताजी, सम्बन्ध हुया सब छार, श्रोताजी. ।२०। सुसरे को मालूम हुई, सुनो श्रोताजी, लघु कन्या परणाय, श्रोताजी । कर दोनों को साथ में, सुनो श्रोताजी, सेठजी यों दरसाय, श्रोताजी ।२१। दोनों से ही एकसा, सुनो श्रोताजी, रखज्यो आप व्यवहार, श्रोताजी। भेद भाव कुंछ भी किया, सुनो श्रोताजी, राम दुहाई हर बार, श्रोताजी ।२२। तब से इसके हाथ का, सुनो श्रोताजी, भोजन कीना नांय, श्रोताजी। देख आग्रह आपका, सुनो श्रोताजी, लीनी फाँसी खाय, श्रोताजी ।२३। शपथ कभी बिगड़े नहीं, सुनो श्रोताजी, रक्खू पूरा ध्यान, श्रोताजी । कृष्ण कहे अर्जुन सुनो, सुनो श्रोताजी, लेग्रो शपथं का ज्ञान , श्रोताजी ।२४। "प्राज्ञ" कृपा सोहन मुनि, सुनो श्रोताजी, कहे यों वारम्वार, श्रोताजी । प्रण लेकर जो दृढ़ रहे, सुनो श्रोताजी, होते भव जल पार, श्रोताजी ॥२५॥ दो हजार चोंतीस का, सुनो श्रोताजी, भारणगढ़ चोमास, श्रोताजी । धर्म ध्यान हुआ ठाठ से, सुनो श्रोताजी, सभी चित्त हुल्लास, श्रोताजी ।२६। २
लाज
सुधारे
२
काज
( तर्ज-लावणी)
जिन वाणी पर श्रद्धा रक्खो, भव सागर तिर जावोगे ।
भटक गये तो मित्रों ! गोता, भव भव माँही खावोगे । टेर ।
असाढ़ाचार्य निज शिष्यों को ले, उज्जैनी माँही आये,
श्रोतागण का ठाठ लगा है, वाणी सुनकर हरसाये ।
उस समय भयंकर बीमारी से, . शिष्य संत पर भव . जाये,
अन्त सँलेखणा करा गुरुवर, सबको ऐसे दरसाये ।
देवलोक से आकर मुझको, वहाँ का हाल सुनायोगे ।।१।।
तभी शांति होगी मुझ दिल में, गुरु ने सबको फरमाया,
चले गये निन्या चेले, किन्तु एक भी नहीं आया।
विनोद शिष्य रहा एक अन्त में, उसको भी यम ने घेरा,
प्राणों से प्रिय शिष्य रत्न, 'तू वचन पाल लेना मेरा ।
जाकरं आना वापिस जल्दी, पूरण वचन निभाओगे ।।२।।
वह भी गया पर लौट न आया, गुरु मन में यों करें विचार,
'नाहक 'संयम पाल कष्ट को, · भोग रहा हूँ मैं बेकार ।
नहीं स्वर्ग, नहीं नर्क कहीं भी, व्यर्थ त्याग दीना संसार,
वापिस जाऊं अपने घर पर, मौज करूँगा अपरम्पार ।
पहले ही समझाया ' 'मुझको, ' कहा 'फेर पछताओगे ।।३।।
नहीं मानकर · आया · गुरु पे, संयम - लेकर दुख पाया,
क्यों भोगू ये कष्ट, संयम तज, सम्भालू घर की माया ।
: चले वहां से आते पथ · में, · संकल्प कई · मन में लाया,
उधर देव ने ज्ञान लगा कर; गुरु चर्या को लख पाया।
मारग में एक नाटक करके, रोका गुरु कहां जानोगे ।।४।।
-1
.
३
नाटक लखकर मुग्ध हो गये, छः महीने व्यतीत हुए, किन्तु भूख और प्यास न लागी, ऐसे वे तल्लीन हुए। नाटक देखकर आगे जाते, छः बालक . सम्मुख आये, क्रम से उनका नाम पूछकर, गुरु मन में विस्मय पाए । कितने गहने इनके तन पर, पूछे तुम कहां जाओगे ॥५॥ कहे खेलने आये वन में, घूम पुनः घर जावेंगे, गुरु सोचे नहीं द्रव्य बिना, कोई मुझे पूछने आवेंगे। अतः मार कर ले लू धन को, कोई नहीं लख पावेंगे, एक एक को मार सभी धन, रक्खा पात्र में जावेंगे। देव देख सब करणी गुरु. की, सोचे कहां पर जानोगे ॥६॥ यदि अब भी है लज्जा इनमें, तब तो राह लग जायेंगे, लज्जा से भी गिरे अगर तो, नहीं सम्भलने पायेंगे। एक परीक्षा कर लू और मैं, ऐसे देव ने सोच लिया, रास्ते में एक पड़ाव लगाकर, भोजन भी तैयार किया । गुरु आते लख दौड़े आये, सब कहे कहां सिधाओगे ॥७॥ आज दिवस है धन्य मुनीश्वर, जंगल में मंगल पाये, दर्शन पाकर पवित्र हुए हम, भाग्य बली सब कहलाये । एक प्रार्थना है हम सबकी, आहार पानी यहाँ से लीजे, वक्त हो गया आप हमारे, भावों को पूरण कीजे । गर्मी का है समय मार्ग भी, लम्बा है घबरानोगे ।।८।। गुरु बोले नहीं आहार करना, नहीं पानी भी है लेना, श्रावक बोले आहार पानी की, विनती नहीं ठुकरा देना। अतः पधारे विनय हमारा, स्वीकृत भी करना होगा, छोड़ हमें नहीं जा सकते हो, मन अपना करना होगा। झोली पकड़ एक श्रावक वोला, तजकर कैसे जावोगे ।।९।। . कर से छूट गई तब झोली, - गहने सबही - बिखराये, श्रावक बोले ये गहने तो, हम · बच्चों के दिखलाये । कैसे लाये बच्चों को भी, देखा वे - कहां पर पाये, सुनकर गुरुजी सन्न हो गये, दिल. में गहरे पछताये। लज्जा से गड़ गये यों सोचे, अव कैसे बच पावोगे ||१०॥
ज्ञान लगाकर देखा देव ने, लज्जा तो है इन माँही, उस ही क्षण सब समेट माया, आवाज दी गुरुवर ताँही । आँखें खोली कुछ नहीं दीखा, शिष्य कहे सब समझाई, यह सारी मेरी माया थी, मैं विनोद हूँ गुरुराई । गुरु कहे मैं भ्रष्ट होगया, कैसे मुझे कैसे मुझे बचायोगे ।।११॥ देव कहे सब स्वर्ग नरक है, फरक नहीं जिन वचनों में, कुछ ही क्षण में डिगे आप तो, श्रद्धा नहीं प्रभु कथनों में। देखा आपने छः महीने तक, भूख प्यास का पता नहीं, तो कैसे आवे यहां देवता, नाटक में रहे मस्त वहीं । जीवन सफल तभी होवेगा, संयम आप निभाओगे ।।१२।। उस ही क्षण ले संयम फिर से, शुद्ध साधना कीनी है, जिन वचनों पर श्रद्धा करके, राह मुक्ति की लीनी है । प्राज्ञ प्रसादे सोहन मुनि कहे, श्रद्धा बिन मुक्ति नाही, देव, गुरु अरु दया धर्म को, लो जीवन में अपनाई। जन्म मरण के दावानल से, सद्य मुक्त हो जावोगे ॥१३॥ ५ - शान्ति ३ का अमोघ मंत्र - -- ( तर्ज-लावणी) सुखमय जीवन जीना हो तो, अपने मन को पलटावो । बिना क्षमा गुण को अपनाये, जग में शान्ति नहीं पावो । टेर। शान्ति चन्द्र था सेठ नगर में, रमा रमण करती हर बार । सुन्दर नारी घर के अन्दर, मानो है अमरी अवतार ।। पुत्री कमला. यौवन वय में, आई सेठ. मन हुआ विचार । घर वर योग्य देख परणाऊँ, सुख पावे यह अपरम्पार ।। दोहा-कन्या एक ही लाडली, बड़ी हुई सुख माँय । जो चाहे सो मैं यहाँ, इच्छा पूरूं लाय ।। अतः कहीं ऐसा घर ढूँढूं, लेवे जीवन को *लावो ।१॥ विलासपुर का सेठ कुशलचन्द, घर में कुछ भी ना खामी। कई दुकानें चलती उसके, क्रोड़ों का वह स्वामी ।। पुत्र विनय था विनयवान, सब कहते हैं गुण का धामी। आया खोजता शान्ति चन्द्र वहां, सुनी बात साता पामी ।। दोहा—गया सेठ की ' हाट पे, बैठा करी जुहार । आपस में कर बारता, किया सम्बन्ध स्वीकार ।। परण गई ससुराल, किन्तु वह अंट संट बकती जावे ।।२।। कमला का यह स्वभाव देख, सब घर वाले चिन्ता लावे । मनमाने ढंग से रहती है, · कभी न सेवा कर पावे ।। लड़ती झगड़ती सदा सभी से, तंग होय यों मन लावे । कब पीहर से लेने पावे, घर का कलह सब मिट जावे ।। दोहा-छः महीने के बाद में, आये लेने नणदें बोली व्याइजी, अांखें खुली क्या आज ॥ भूल गये अपनी बेटी को, खूव किया अब ले जावो ।।३।। काज । *लाभ। ६ सास ससुर - - शान्ति चन्द्र कहे भूला नहीं पर, काम काज में उलझाया । फुरसत पाकर जल्दी ही, मैं लेने को यहाँ पर आया । अच्छा दिन लख ले जाऊँगा, तब नणदों ने दरसाया। अच्छा दिन है आज ब्याइजी, समय सामने शुभ आया ।। दोहा-बार भलो है आज को, करो अभी प्रस्थान । बाई पीयर आय के, करती प्रार्तध्यान ।। एक दिन बोला बेटी से, ससुराल हाल सब बतलामो ॥४॥ कैसे हैं तेरे, कहे यक्षिणी, यक्ष समान । और जंवाई कैसे ? जैसे, पूरे ही यमराज महान ।। नणदें देवर भूत भूतणी, खाती मुझको आठों याम । घर सारा ही नरकावासा, कहाँ तक अपना करूं बयान ।। दोहा-सारी बातें कर पिता, मन में करे विचार । सब खोटे होते नहीं, इसका दोष अपार ।। किन्तु ऊपरी मन से बोला, बेटी ऐसे दुख पावो ।।५।। मुझे पता नहीं यह घर ऐसा, शादी हरगिज नहीं करता। भूल करी हैं भारी. मैंने, अब सोचे से क्या सरता ।। तेरे दुख से दु:खी मेरा दिल, सुनकर मेरा जी भरता। हैं ये सारे कर्मों के फल, टारे से कैसे टरता ।। दोहा-बेटी एक तुमसे कहूं, स्मरण हुई है बात । सारे दुख क्षण में मिटें, मंत्र समझ साक्षात ।। करे पथ्य से सदा जाप तो, टले दुःख, साता पावो ॥६॥ सुनी तात की बात सुता भी, बोली झट दो बतलाई । कैसा भी हो पथ्य पालना, अवश्य करूंगी चित्तलाई ।। पिता कहे है मंत्र चमत्कृत, आ जावे सब वश माँही । अगर कहे अनुसार करे तो, दुःख जाय सब बिरलाई ।। दोहा-पुत्री कहे मैं शपथ खा, कहती हूँ इस बार । आप कहो वैसे करूँ, झूठ न कहूँ लिगार ।। मुझे आप यह मंत्र पथ्य युत, जल्दी से ही दरसायो ।।७।। कोई कितनी गाली देवे, देवे लकड़ी मार । फिर भी रख संतोष जीभ से, 'सिद्धा सिद्धा' करे पुकार ।। अपने काम से काम करे, -नहीं-सुने एक भी बात लिगार । मानस को मजबूत रखे तो, कोई न तेरा करे विगार ।। दोहा- दोय चार दिन में सभी, करसी तुझसे प्यार । देख सितारा बुलन्द हो, तेरी जय-जय कार ।। घर वालों से, पास पड़ोसी, सबसे ही यश पा जाओ ।।८।। अथवा - ७ . छः महीने पुत्री बोली यही करूंगी, जाकर के अब मैं ससुराल । आती है पीहर से कमला, बदल लिया है अपना हाल पूर्ण ध्यान से काम करे, नहीं बोले कोई देवे गाल । नणदें केई बात सुनावें, फिर भी कुछ नहीं करती ख्याल ।। दोहा—देख व्यवस्था सास भी, बहू की करती पक्ष । लड़की को फटकार के, कहे बनो क्यों दक्ष ।। वही बोलती बहू लाडली, तुम नाहक ही धमकाओ ।।९।। बहू सोचे यह प्रभाव मन्त्र का, हुई सास भी पक्ष मेरे । शनैः शनैः विश्वास मन्त्र पर, जमा बहू के दिल गहरे ।। सब में हो रही शोभा इसकी, कोई भी नहीं पा छेड़े। व्यवहार कुशलता देख सभी के, खिल रहे हैं मोहक चेहरे ।। दोहा-शोभा अपनी सुन रही, जाणे मन्त्र प्रभाव । पूज्य पिता ने कर कृपा, मिटा दिया दुख दाब ।। कहां तलक गुण गाऊँ आपका, संदा भला मेरा चावो ॥१०॥ महीने पश्चात सेठ के, दिल में ऐसे आया है। जाकर मिल लू पूत्री से, अब कैसे दिवस बिताया है ।। सास ससुर घर वालों से भी, कैसा प्रेम निभाया है। यही सोचकर सीधा घर से, पुत्री के घर आया है ।। दोहा—सास ससुर सब देखिया, ब्याइजी घर आय । जयजिनेन्द्र करके उन्हें, उच्चासन बिठलाय ।। कैसे पधारे इतने जल्दी, कारण क्या है दरसाओ ।।११।। सेठ । कहे मैं लेने आया, इसकी मांता बारम्बार। याद कर रही लामो जल्दी, कब देखू पुत्री दीदार ।। नणदें बोलीं अभी आई है, क्या है माँ का इतना प्यार । इनके बिन तो घर सूना है, लीला लक्ष्मी इनकी लार ।। दोहा-सुनकर मीठे वचन को, सेठ हृदय विकसाय । अब प्रसन्न होगी सुता, मिल लू अन्दर जाय ।। बोला सेठ है बात ठीक पर, अबके प्राज्ञा फरमाओ ।।१२।। अन्दर जाकर मिला पुत्री से, देख उसे मन हरषाया। खिला हुया है चेहरा उसका, दुख सभी अव बिरलाया ।। हँसी खुशी से बातें करके, बोला लेने को पाया। आज्ञा देंगे सास ससुर तो, ले जाऊंगा हे वाया ।। दोहा-सास ससुर से पा कही, ले जाऊँ इस बार । घर वाले सव ही कहें, छोड़ो आप विचार ।। अभी नहीं फिर कभी आप, प्राकर के इनको ले जाओ ।।१३।।
जामाता जानो।। देखो इनसे चहल पहल सब, घर में अभी हमारे है। खुशी रहे ये इनके पीछे, खुश रहते हम सारे हैं ।। पिता कहे है सही बात पर, पीहर इसको ले जाऊँ। आप हुक्म से रखकर कुछ दिन, वापिस जल्दी पहुँचाऊँ ।। दोहा - आज्ञा लेकर सेठजी, लाये लाये पुत्री लार । घर आकर मिल मात से, खुशी हुई अनपार ॥ एक दिन सेठ सुता से पूछे, कैसे रही वहां बतलाओ ॥१४॥ सास ससुर कैसे हैं ? तेरे, कहे देव, देवी मानो। कैसे हैं, वे तो प्राणाधार मेरे घर में काम होता है जो भी, रखते नहीं मुझसे छानो। सलाह पूछकर करते हैं सब, ऐसा घर मुश्किल पानो ।। दोहा-सब प्रताप है आपका, दिया मन्त्र बतलाय । उससे ही घर में मुझे, सौख्य मिला है आय ।। कहाँ तलक गुण गाऊँ मन्त्र का, जपते तत्क्षण फल पावो ॥१५।। सेठ कहे तू सच कहती है, मंत्र बड़ा ही गुणकारी। अष्ट पहर ही रक्खे ध्यान तो, सफल होय मन में धारी ।। पोषध, संवर, सामायिक कर, लेना लाभ इससे भारी। जीवन सफल बनेगा तेरा, समता गुण लीजे धारी ।। दोहा-सुता पिता की बात का, करती है सत्कार । समता धारी बन सदा, पाल रही आचार ।। कमला आई पुनः सासरे, सबके मन में हरसावो ।।१६।। सुनकर धारो सब मानवगण, जो घर में आनन्द चावो । क्रोध छोड़ समता में आवो, कलह द्वन्द्व से छुट जावो ।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन मुनि' कहे, क्षमा धर्म को अपनावो। जिससे दोनों लोकों माँही, सदा सर्वदा सुख दोहा-दो हजार चौतीस में, लघु पादु सुखकार । माघ सुदि द्वादश रवि, बरते मंगलाचार ।। धर्म ध्यान का ठाठ लगा है, छायो सबमें उगमावो ॥१७॥ पावो ॥ ९
४
जैसी करणी
वैसी भरणी
( तर्ज-लावण )
पूछ रहा है शिष्य गुरु से, कैसी यह संसार सराय।
भले भलाई बुरे बुराई, दीना गुरुवर .. ने दरसाय ।।टेर।।
सुनो लगाकर ध्यान सज्जनों, . जैसा करे वैसा फल पाय,
जंगल में एक शृगाल घूमता, हुआ वहाँ पर गया है प्राय ।
जहाँ. ऊँट चर रहा मजे से, लखकर उसको मन ललचाय,
किस तरह ये मारा जावे, फले मनोरथ अानन्द प्राय ।
कई दिनों तक मौज उड़ाऊँ, आमिष इसका रुच-रुच खाय ।१।
कोई ऐसा उपाय करके, ले जाऊँ मैं जंगल. माँय,
मेरी बात को टाल सके नहीं, ऐसा दूं विश्वास जमाय ।
बड़े मधुर शब्दों से बोला, नम्र भाव कर शीश नमाय,
धन्य हो गया आज दिवस मुझ, भाग्य योग से दर्शन पाय ।
किसको अपना मित्र बनाऊँ, सोच रहा था दिल के माँय ।।
ऐसे समय में दर्श आपके,
सुखद सुलभ मैंने लिये पाय,
ऊँट कहे मेरा भी भाग्य है, आप समा स्नेही को पाय ।
मन ही मन में प्रसन्न होकर, धूर्त धूर्तता दी फैलाय,
चलो मित्र अव चलें वहीं पर, अपना पेट जल्दी भर जाय ।
बात मानकर ऊँट चला संग, पका खेत दीना बतलाय ।३।
खाने लगे मजे से दोनों, सियाल पेट भर यों दरसाय,
मित्र हूकरणी मुझको आ रही, बोले बिना अव रहा न जाय ।
ऊँट कहे कुछ ठहरो मित्र, जव तक न पेट मेरा भर जाय,
किन्तु धूर्त ने एक न मानी, दीनी हूँकरणी त्वरित लगाय ।
आवाज सुनी प्रा खेत धरणी ने, ऊँट पकड़ लिया मौका पाय ।४।
१०
अधमरा कर छोड़ा ऊँट को, शृगाल दौड़ा मन हरसाय,
स्वामी ऊँट का आकर देखा, वाहन में उसको ले जाय ।
घर लाकर के देखा, गहरी चोटों से वह रहा घबराय,
कई दिनों तक करी हिफाजत, अच्छी-अच्छी दवा खिलाय ।
चलते फिरते देख उसे, मालिक के मन में शान्ति प्राय ।५।
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-
एक दिन चला ऊँट चरने को, मिला शृगाल वह जंगल माँय,
सोचा ऊँट ने धूर्त शिरोमणि दीना मुझको था मरवाय ।
शठे शाठ्यं समाचरेत् की, नीति इसने ली अपनाय,
चलो संग मेरे तुम भैया, निर्भय होकर बैठे खाय ।
कोई न देखें ऐसे स्थान पर, खांयें पीयें मोज उड़ाय ।६।
शृगाल हो गया साथ राह में, सलिला लखकर गया घबराय,
बोला आगे नहीं जा सकता, पानी मुझे बहा ले जाय ।
ऊँट कहे घबराता क्यों है, बैठ पीठ पर हूँ पहुंचाय,
खुशी खुशी शृंगाल बैठ गया, ऊँट नदी के अध बीच आय ।
सोचा मौका अच्छा सामने, भगकर अब ये कहीं न जाय ।७।
कहे भैया आ रही लोटगी, अब तो मुझसे. रहा न जाय,
क्या करते हो. सियाल बोला, मुझको नदी बीच में लाय ।
जैसी हूँकरणी वैसी लौटणी, दीनी ऊँट ने बात सुनाय,
यह कह कर के लौट लगाई, दीना पानी में डुबकाय ।
शृगाल जल में कभी डूबता, कभी तैरता प्राण गमाय ।।
जैसी करणी वैसी भरणी, यही कहावत है जग माँय,
अत: कपट से बचो सर्वदा, जो जीवन में शान्ति चाय ।
प्राज्ञ. प्रसादे 'सोहन मुनि' कहे, तज माया जीवन बन जाय,
चन्द समय के जीवन में क्यों, पातक इतना रहे कमाय ।
स्वाध्यायं करो, भगवान भजो,यदि उत्तम गति की मन में चाय ।९।
J
११
- ... दयावीर मैतार्य मुनि सुनकर मित्र . (तर्ज-एवन्ता मुनिवर, नाँव ) मैतार्य मुनीश्वर, संयम लेकर के तारी आतमा । टेर । अमर निवासी मित्र देव दो, करे परस्पर बात, तभी एक यों बोला मेरी, माला अब कुम्हलात जी ।१। छः महीने पश्चात सभी सुखं, तजकर मुझको जाना, अतः तुम्हें संकेत करू मैं, आकर के चेताना जी ।२। फंस जाऊँ यदि भोगों में तो, आकर मेरे पास, कहना इन भोगों का एक दिन, होगा निश्चय नाश जी ।। देव . यों बोला, देऊँगा चेताय, ना समझे तो समझाऊँगा, करके केई उपाय जी ।४। पूर्ण हुआ आयुष्य, देव, च्यव राजगृह में आया, राज भंगी की नारी सुन्दरी, सुन्दर सपना पाया जी।५। अच्छा सपना देख, त्वरित वह, पति पास में जाय, सुर विमान स्वप्ने में देखा, दीनी बात सुनाय जी ।६। प्रातः स्वप्न पाठकों के घर, · जाकर पूछा हाल, पाठक बोला भाग्यशाली, तुझ घर में होगा बाल जी।७। स्वपने का शुभ फल नारी को, कहा आय तत्काल, पुण्यशाली सुत होगा मेरे, सुधरेगा घर हाल जी ।। इसी शहर में सेठ एक, जुगमन्धर है धनवान, अड़चास करोड़ सौनेया घर में, नारी कमला जान जी ।९। सभी तरह का प्रानन्द घर में, किन्तु नहीं सन्तान, अतः रात दिन चिन्तित रहते, क्या होगा भगवान जी ॥१०॥ देवी देव अनेक मनाये, भाग्य दशा नहीं जागी, यन्त्र मन्त्र कई उपाय कीने, दवा एक नहीं लागी जी ॥११ १२ हताश हो गये सभी कार्य कर, नहीं टूटी अन्तराय, ऐसे समय में आई भंगण, झाड़ देने ताँय जी ।१२। सेठानी का चेहरा देखकर, भंगन के मन आई, अभी पूछकर निर्णय कर लू, क्या हुई कहीं लड़ाई जी ।१३। बोली भंगन बदन आपका, कैसे हुआ उदास, इस घर में भी चिन्ता है तो, कहाँ खुशी की आस जी ।१४। यदि कहने की बात होय तो, कृपा करी फरमावो, बात कही हल्का दिल करलो, मन में शान्ति पावो जी ।१५। सेठाणी कहे क्या कहूं तुमको, कहते हिया भराय, जोर जोर से सेठाणी ने, दीना अश्रु बहाय जी ।१६। पशु पक्षी से मेरा जीवन, बदतर जाणो रानी, वंश बढ़ाकर सुत सुख भोगे, मानो शुभ जिन्दगानी जी ।१७। मुझे नार क्यों रची विधि ने, कर रही यही विचार, बांझ रही जीवन को खोया, नहीं निकला कुछ सार जी ।१८। सुन भंगण कहे सेठानीजी, भूल गये भगवान, सात पुत्र हैं मेरे घर में, नहीं खाने का धान जी ।१९। नहीं चाहती जबरन ही, एक पुत्र उदर में आया, जोशी से पूछा तो उसने, भाग्यशाली बतलाया जी ।२०। अतः करूं अरदास आपको, बात ध्यान में लावे, होय मनोरथ सिद्ध आपका, मेरा मन ये चावे जी ।२१। गर्भस्थ पुत्र को आप लिरावें, पूरण करिये पास, मेरे तो आगे ही बहुत है, यह है गुण की राश जी ।२२। सुनते ही सेठाणी का दिल, हरा भरा हो पाया, बोली बात सब ठीक तुम्हारी,पर कारण यों दरसाया जी।२३। मालूम यदि हो जावे जग में, इज्जत सारी जावे, लोक सभी धुत्कारा देकर, जाति बाहर करावे जी ।२४। भंगण बोली नहीं कोई जाणे, रक्खो आप विश्वास, ऐसे ढंग से लाकर सुत को, रक्खूगी तुम पास जी ।२५। कर देसी यदि तू, खूब देऊँगी माल, समय-समय पर धन देकर के, कर दूं तुम्हें निहाल जी ।२६। महत्तराणी कर पक्की बातें, पति को दी बतलाय, उधर सेठाणी ने श्रेष्ठी को, दीना हाल सुनाय जी ।२७। कार्य सफल १३ अब अच्छे दिन आये अपने, फली मनोरथ माल, कमी होयगी पूरी अपनो, मिटे सभी जंजाल जी ।२८ सेठ कहे क्या पुत्र मोह में, धर्म भ्रष्ट सब करती, कहाँ हरिजन? कहाँ महाजन? समझ बिना क्या करती जी।२९। भक्त कहाते अरिहन्तों के, पर नहीं समझे धर्म, वीतराग वाणी क्या कहती, सुनलो सारा मर्म जी।३०। जाति जन्म से नहीं होती है, कर्म प्रधान कहलाय, जैसे काम करे वह वैसी, जाति का बन जाय जी ।३१॥ होय निरुत्तर सेठ कहे संब, करो ध्यान से काम, इज्जत रहे लोक नहीं जाणे, सुधरे काम तमाम जी ।३२। अब सेठाणी भंगण को नित, देती अच्छा माल, वस्त्राभूषण देकर कहती, रखना गर्भ सम्भाल जी ।३३। गर्भ काल पूर्ण होने पर, पुण्यशाली सुत. जाया, लपेट वस्त्र में सेठाणी को, लाकर के सम्भलाया जी ।३४। रात्री में सब काम हुआ है, कोई बात नहीं जाने, सेठाणी लख पुत्र बदन को, गहरा आनन्द माने जी ।३५॥ स्नानादिक करवा बालक को, माता स्तन चूखाय, अति स्नेह से माता स्तन में, सहज दूध पा जाय जी ।३६। सुत आगम सुन सेठ साहब के, मन में हर्ष भराय, अानन्द मंगल बरत्या घर में, चाह फली सुखदाय जी ।३७। पुत्र जन्म की बात फैल गई, महोत्सव सेठ मनावे, खुल्ले कर से याचक जन को, मन चाया दिलवावे जी ।३८। बड़े मौज से बाजा बाजे, सधवा मंगल गावे, बहन, भाणजी आदि सम्बन्धी, लेय बधाई आवे जी ।३९। लोग परस्पर करे बात यों, सुनी नहीं या कान, कैसे सुत हो गया सेठ घर, रहा नहीं आदान जी ।४०। इतने समय नहीं हुई सन्तति, इससे बात छिपाई, बड़े घरों में ऐसे होता, भय रहता दिल माँही जी।४१। कर आपस में समाधान यों, मन को लिया समझाय, बिना गर्भ सन्तान न होवे, शंका लीनी मिटाय जी ।४२॥ वालक के जो जात कर्म थे, सेठ सभी करवाय, द्वादशवें दिन माल बनाकर, जाति जन जीमाय जी ।४३। . १४ - सादर जीम खुशी हो. वहाँ पर, बैठे लोग तमाम, सेठ कहे मेरा कुल तारे, दो मेतारज नाम जी ।४४। स्वीकृति देकर सभी कहे ये, रक्खे घर का मान, ; हम सबकी आशीष यही है, बढ़े सदा तुम शान जी ।४५। सब का कर सम्मान सेठ ने, दीना घर पहुँचाय, लोक कहें अब इस घर माँही, हो गई मन की चाय जी ।४६। लाड प्यार से बड़ा हो रहा, चम्पा बेल समान, दम्पति का दिल लख बालक को, पा रहा हर्ष महान जी । ४७। आठ वर्ष का हुआ कंवर तब, कलाचार्य के पास, भेज दिया शाला में उसको, खूब करे अभ्यास जी ।४८। चन्द समय में पढ़ लिख करके, हो गया है हुशियार, कलाचार्य ला सौंपे सेठ को, दीना द्रव्य अपार जी ।४९। विवाह योग्य लख सेठ पुत्र को, ऐसे दिल में धारी, एक एक कर सात विदुषी, पररणा दी हैं नारी जी ।५०। राग रंग में रहे मस्त, नहीं कुछ भी सोच विचार, क्या हो रहा जगत में, इनको भान नहीं लिगार जी ।५१॥ अब सुनिये वह मित्र देव भी, देखे ज्ञान लगाय, भोगों में मशगूल हो रहा, देऊँ उसे जगाय जी ॥५२॥ अमर उसे आ मध्य रात में, स्वप्ने में दरसाय, उलझ रहा क्यों इन भोगों में, नश्वर जग के मांय जी ।५३। मैं तेरा हूँ मित्र मित्र देवता, तुझे जगाने आया, अब तो जागो मोह नींद से, मिथ्या है सब माया जी ।५४। बोला नींद में यों मेतारज, मात पिता परिवार, यदि त्याग हूँ इनको मैं तो, मर जावें इस वार जी ।५५ मेरे बिन तो क्षण भर भी, ये जिन्दे नहीं रहाय, अत: अभी नहीं छोड़ सकू मैं, सत्य कहूं जतलाय जी ।५६। देव कहे सब हैं स्वार्थ के, मात पिता और नार, मृत्यु प्राय पकड़ेगी तब तो, कोई न बचावन हार जी ।५७। वैभव भी है चंचल भाई, जाते लगे न देर, नाशवान साधन में फंसकर क्यों खाता तू जहर जी ।५८। सारी बातें सुन कर बोला, अभी न जंचती मेरे, कितने भी उपदेश सुना. पर, नहीं लगेंगे मेरे जी ।५९। - - १५ सोचा देव ने नहीं समझे यह, बिना दु:ख के पाये, अतः उपाय करू मैं ऐसा, सहज समझ में आये जी ।६०। भंगी का मन पलट देऊँ, वह पकड़ इसे ले जाय, फिर तो अक्ल ठिकाने होगी, कष्ट सामने प्राय जी ।६। सभी भंगीयों का मन फेरा, प्रातः सब मिल चाले, जुगमंधर घर पुत्र हमारा, जाकर उसे सम्भाले जी ।६२। हल्ला करते आये सेठ घर, पकड़ कंवर ले जाय, अंट शंट कह रहे सेठ को, यह झूठा हमारा खाय जी ।६३। ले जाते बाजार बीच में, जन जन आश्चर्य पाय, यह क्या हुआ है आज यहाँ पर, सभी रहे. शर्माय जी ।६४। भ्रष्ट किया जाति को इसने, खिला पिला कर माल, विश्वास किया हमने श्रेष्ठी का, जिसका है यह हाल जी।६५। कोई कहे ये लड़का जिसका, वही पकड़ ले जाय, हम को भ्रम में डाल सेठजी, अपना पुत्र बताय जी ।६६। नाना विध से बातें करते, क्रोध सेठ पर लावे, जुगमंधर को धोखा देते, जरा शर्म नहीं आवे जी ।६७। भंगी जन ला कंवर साहब को, अपने घर बैठाय, कंवर शोक सागर में डूबा, अन्न पानी नहीं खाय जी ।६८। कहां से यहाँ मुझे ले आये, भंगी घर के माँही, स्वप्ने में भी बात न जानी, कैसी सन्मुख आई जी ।६९। घर वालों को दुःख हुआ, सो जाने श्री भगवान्, मेरा भी हो गया है, कितना, जाति में अपमान जी ।७०। अगर विवर दे दे पृथ्वी तो, इसके मांय समाऊँ, अब कैमे जा लोक बीच में, अपना मुख दिखलाऊँ जी।७१। उधर सेठ को ज्ञात हुआ ये, भंगी ले गये साथ, लज्जा से गड़ गया जमी में, गुप्त रही ना वात जी ।७२। पाकर बोला सेठाणी से, गई आवरू सारी, तुमसे पहले कही बात मैं, सोचो मन में सारी जी ।७३। रहे नहीं मुख दिखाने लायक, कैसी कीनी भूल, न्याति जाति में मान घटा अरु, सिर पर पाई धूल जी ।७४। बात न मानी मेरी तूने, फल उसका ही पाया, नीति वचन को भूल गये हम, इससे धोखा खाया जी ७५॥ १६ - सेठानी कहे राज माँहि जा, यह फरियाद सुनावो, पुत्र हमारा भंगी ले गये, नरपति न्याय कराओ जी ७६। सेठ कहे किस तरह चलेगी, झूठी हमारी बात, भंगी का लड़का है इसको, जाने हम साक्षात जी ७७ फिर मिथ्या अरजी करके क्यों, भूपति को भरमावे, जैसा होना होगा वैसा, सहज सामने आवे जी ७८। सेठ कहे दोऊ माल माजना गया, रहा क्या पास, सभी मनोरथ सहसा क्षण में, हुए टूट कर नाश जी ।७९। आर्त ध्यान कर रहे दम्पति, पर नहीं चलता जोर, निन्दा हो रही सारे शहर में, लोग कर रहे शोर जी ।८०। कैसी नियत बिगड़ी सेठ की, भंगी सुत ले आया, गुप्त रखी पर बात पाप की, छिपे नहीं छिपाया जी।८१ पहले ही यह जान रहे थे, बन्ध्या इसकी नार, किन्तु बड़ों की गलती को भी, दबा देय संसार जी ।२। भंगी लोग समझावे कंवर को, तुम हो पुत्र हमारे, खाना खायो मौज उड़ावो, सब घर बार तुम्हारे जी ।८३। मेतारज नहीं खाना खावे, नहीं बोलना चावे, सारे दिन यों चिन्ता करते, अपना समय बितावे जी।८४। सोता रात में कहे देव श्रा, अपना हाल सुनायो, सुख में हो या दुख में हो, यह सारी बात बतायो जी ।८५। मेतारज कहे इस जगति पर, मुझसा दुःखी न कोय, क्या कहूँ तुझको इज्जत जीवन, दोनों दीना खोय जी ।८६। देव कहे तू अब भी चेतकर, बात मान ले मेरी, झूठे जग को त्यागेगा तो, इज्जत होगी तेरी जी ।८७। मेतारज कहे पहले मेरी, इज्जत सही बनायो, श्रेणिक नृप की पुत्री संग में, मेरा ब्याह कराओ जी ।८८। फिर मैं तेरी वात सुंगा, दुःख में दाय न आय, अभी बात मानू जो तेरी, दुनियां अपयश गाय जी ।८९। देव कहे मैं वही करूंगा, जिससे शान बढ़ाय, उसही क्षण एक बकरी दीनी, सुन्दर रही दिखाय जी ।९० स्वर्ण · मींगणी करके तेरी, शोभा यह बतलाय, देगी चरी भर दूध हमेशा, पीने में सुखदाय जी ।९१।
देव गया भंगी बस्ती बस्ती में, मनसा दीनी फेर, पलटे भाव एक ही क्षण में, क्या लगती है देर जी ।९२। प्रातः काल सब भंगी मिल कहे, गलती करिये माफ, नशे मांय यह कार्य किया है, कहते हैं हम साफ जी ।९३। आप पधारो हम भी चलते, पूज्य सेठ के पास, भूल हो गई भारी हमसे, हमतो आपके दास जी ।९४। सुनकर साथ हुए मानवगण, आये सेठ के द्वार, गलती हो गई नशे बीच में, ले गये आप कुमार जी ।९५। हम सबको माफी माफी बक्षावें, आप बड़े कुलवान, ऐसा कहाँ जन्मेगा हम घर, कंवर महा पुण्यवान जी ।९६। नहीं खाया नहीं पिया हमारे, सोया नहीं लिंगार, जैसे गये वैसे ही आये, लेवो आप सम्भार जी ।९७। सभी लोक कहे बात सत्य है, इसमें क्या है दोष, नशे बीच जो कीनी ग़लती, उस पर क्या है रोष जी ।९८। लोक कहे क्या बिगड़ा इनका, कुछ भी वहां न खाया, हम लोगों की बुद्धि फेर दी, भंगी जन भरमाया जी ।९९। अतः आप जल जल्दी मंगवा, शुद्ध इन्हें करवायें। स्नानादिक करवा कर इनको, वस्त्राभरण पहनायें जी ।१००। वास्तव में है कँवर सेठ के, महा गुणी पुण्यवान, सेठ सामने माफी मांगकर, लोक गये निज स्थान जी ।१०१॥ क्षण भर में ही पलट दिया, सब पासा देव ने पाय, पुत्र सेठ घर आया वापिस, दम्पत्ति दिल हरसाय जी ।१०२। पुनः नगर में ख्याति हो गई, लोक करे गुणगान, पहले से भी अधिक सेठ की, बढ़ गई जग में शान जी ।१०३। शनैः शनैः यह बात फैल रही, बकरी सेठ घर माय, स्वर्ण मींगणी करे हमेशा, लोक देखने प्राय जी ।१०४। देख उसे जन विस्मित हो कहे, सेठ बड़ा पुण्यवान, ऐसी बकरी ना देखी हम, मिली भाग्य से प्रान जी ।१०५। बात फैलते श्रेणिक नृप के, नृप के, पहुंच गई है कान, अभयकंवर से पूछे भूप तव, कहे सुनो मतिमान जी ।१०६। यह बातें सब हो सकती हैं, नहिं शंका का काम, यंत्र मंत्र वा जादू से भी, सभी काम आसान जी ।१०७। १८ ऐसे कोई देव योग से, पा सकता है चीज, विस्मय की क्या बात पुण्य ही, है सारों का बीज जी।१०८। महाराजा श्रेणिक यों बोले, अभी इसे मंगवाऊँ, कैसे मींगणी करे स्वर्ण की, सन्मुख मैं लख पाऊँ जी ।१०९। भेजा सन्तरी महाराजा ने, कहो कुवर से जाकर, स्वर्ण मींगणी वाली बकरी, लाऊँ पुनः दिखा कर जी ।११०। वात सुनी मेतारज बोला, मेरी आज्ञा नाही, जिसे देखना वह खुद आवे, कहूँ बात मैं याही जी ।१११। गये सन्तरी कही भूप से, हो गया वह इनकार, क्रोध भाव ला आज्ञा दीनी, उसी समय सरकार जी ।११२। जबरन लेकर आयो बकरी, सुनो न किसकी बात, गये सिपाही बिन पूछे हो, ले आये निज साथ जी ।११३। महाराजा के महल बीच में, खड़ी करी है लाकर, देख उसे नृप सोचे मन में, अजा बहुत है सुन्दर जी ।११४। कैसे स्वर्ण मींगणी करती, रक्खू पूरा ध्यान, इतने में मल कीना उसने, दुर्गन्ध मय हुआ स्थान जी ।११५। वैठे रहना मुश्किल हो गया, उठकर लोक सिधावे, नृप सोचे जग तारीफें कर, मिथ्या मुझे भरमावे जी ।११६। बुला कंवर को महाराजा कहे, लोकों को भरमाय, स्वर्ण मींगणी करती बकरी, झूठी बात बनाय जी ।११७। मेतारज कहे बिना इजाजत, कैसे आप मंगाई, कर्तव्यों को भूल आपने, राजनीति विसराई जी ।११८ आज आपने यह मंगवाई, कल को अन्य मंगावो, क्या यह करना ठीक आपको, पहले यह समझावो जी ।११९ कहे भूपति ठीक कहा पर, मुझको यह बतलायो, क्या यह बकरी स्वर्ण मींगणी, करती है दरसायो जी ।१२० मेतारज कहे बात सत्य है, संशय इसमें नाय, यह कह बकरी ऊपर उसने, दीना हाथ फिराय जी ।१२१। उस ही क्षण की, स्वर्ण मींगणी, राजा विस्मय पाय, सोचे यह तो करामात है, कँवर हाथ के माँय जी १२२। नृप बोला गलती हुई मुझसे, विन पूछे मंगवाई, इसके बदले क्या चाहे सो, देवें आप बताई जी । १२३। - १९ कंवर कहे मैं यह चाहता हूँ, दें कन्या परणाय, इसका सच्चा यही फैसला, होवेगा नर राय जी ।१२४। सुनकर अभय कंवरजी बोले, ठीक कही है बात, नगर माँही सम्पन्न सेठ का, देव कंवर साक्षात जी ।१२५॥ भाग्यवान इनके सम हम भी, कहाँ ढूँढने जावें, बात यथार्थ कही इन्होंने, स्वीकृति सद्य दिरावें जी ।१२६। महाराजा ने हाँ भर कर के, दी. पुत्री परणाय, खूब ठाठ से गहरा धन दे, पुनः स्थान पहुँचाय जी ।१२७। दो गंधक सम भोगे, भोग, वहाँ नहीं दुःख का काम, पुण्य साथ में लेकर आया, माने जगत तमाम जी ।१२८। दिन दिन इज्जत बढ़े चौगुणी, बस गया सब दिल मांय, पहले की सब बात बिसर गये, लोक रहे गुण गाय जी ।१२९। राजगृह में जुगमंधर सम, नहीं कोई पुण्यवान, मेतारज सा पुत्र जिन्होंके, होनहार गुणवान जी ।१३०। मस्त हो गया भोगों माँही, दीनी बात बिसार, धर्म ध्यान को भूल गया है, श्री मैतार्यकुमार जी ।१३१॥ देव मित्र ने ज्ञान लगा कर, देखा सारा. हाल, पहले से भी ज्यादा उलझा, पाकर गहरा माल जी ।१३२। का पता नहीं है, भोगों में है मस्त, अभी जाय चेताऊँ उसको, जीवन हो रहा अस्त जी ।१३३। आ कर बोला मित्र चेत जा, अब तो वाणी पाल, तेरे कहे मुसाफिक कीना, सुन्दर सारा हाल जी ।१३४१ कंवर कहे सुन ली सब तेरी, कुछ सुस्तायो भाई, कैसे दीक्षा लेऊँ सुनलो, अभी वक्त है नांहीं जी ।१३५। सुन कर सोचा मित्र देव ने, मेरी यह नहीं माने, इतना गहरा उलझा जग में, प्रिय भोगों को जाने जी ।१३६। देव कहे सुन मित्र यहां पर, पावेंगे भगवान, वाणी सुनना वीर प्रभु की, खूब लगाकर ध्यान जी ।१३७। कह कर अमर वहां से वापिस, चला गया निज स्थान, देव विचारे निश्चय चेते, सुनकर प्रभु का ज्ञान जी ।१३८ । महा निर्यामक, महा योगीश्वर, जगज्जीव प्राधार, आये विचरते राजगृह में, शिप्य मण्डली लार जी ।१३९। उदय अस्त आज्ञा लेकर वनमाली की, ठहरे बाग मंझार, विद्युत के सम फैली बारता, हर्षे सब नर नार जी ।१४० वन्दन करने, वाणी सुनने, जा रहे लोक अपार, देख उन्हें मेतारज पूछे, कौन आज त्यौहार जी ।१४१ भृत्य कहे यहां श्रमण शिरोमणि, आये वीर भगवान, दर्शन करने जनता जा रही, लेकर हर्ष महान जी ।१४२। कंवर विचारे मित्र देव कही, भूल गया वह बात, भोगों में कुछ ध्यान रहा नहीं, यहाँ पधारे नाथ जी ।१४३। तत्क्षण हो तैयार वहाँ से, प्रभु वन्दन हित आया, विधिवत् वन्दन करके बैठा, मन में हर्ष भराया जी ।१४४। परिषद भारी भरी सामने, प्रभु वाणी फरमावे, अहो भव्यजन चेतो अवसर, ऐसा फिर नहीं आवे जी ।१४५ मानव भव सा रत्न मिला है, व्यर्थ चला नहीं जाय, सावधान हो लाभ कमालो, सुन्दर मौका पाय जी ।१४६५ नरवर भौतिक साधन पाकर फूलो मत मन माँय, बादल की छाया सम माया, क्षण क्षण में पलटाय जी ११४७) सुन कर के उपदेश हृदय में, पाया हर्ष अपार, मानों भूखा भोजन पाया, नीर तृषा आधार जी ११४८। इतना वक्त व्यर्थ में खोया, माना सुख जग मांय, आज हृदय की आँख खोल दी, सच्चा ज्ञान सुनाय जी ।१४९। खड़ा सभा में हाथ जोड़ कर, कंवर करे अरदास, सत्य तथ्य है वाणी आपकी, काटे जग की फाँस जी ।१५०॥ घर वालों से पूछ प्रभु की, चरण शरण में पाऊँ, दीक्षा धारण करू प्रभु से, जीवन शुद्ध बनाऊँ जी ।१५११ प्रभु फरमावें "अहा सुह', मत करो धर्म में ढील, प्राणी मात्र का आयु जग में, काल बली रहा पील जी ।१५२॥ विधिवत् वन्दन करके प्रभु को, अपने स्थान सिधाया, मात पिता को नमन करीने, अपने भाव बताया जी ।१५३। आज प्रभु की वाणी सुनकर, समझा जगत असार, इतने दिन में जान रहा था, भोग मेरा आधार जी ।१५४। फरमादें जल्दी, लेऊँ संयम धार, अच्छी तरह से जान लिया है, झूठा सब संसार जी ।१५५। . अव प्राज्ञा २१ . मात पिता नारी सब बोले, मत छोड़ो इस बार, कौन हमारा जगत बीच में, एक आप आधार जी ।१५६॥ कंवर कहे यदि मानू आपकी, काल बली प्रा. जाय, कौन आपमें शक्तिशाली, आकर मुझे छुड़ाय जी ।१५७ आपस मांही बात चीत से, इन निर्णय पर आवे, अब रखने से नहीं रहेंगे, ऐसी मन में लावे जी ।१५८॥ करके महोत्सव बड़े ठाठ से, प्रभु पास ले जाय, देख सवारी जनता मुख से, धन्यवाद सुनायजी ।१५९। भरे हुए भण्डार नार, धन, तज कर बने अरणंगार, संयम पालन कर आतम को, करसी भव जल पार जी ।१६०॥ अतिशय देख तजी असवारी, पैदल चलकर आय, पाँचों अभिगम धारण करके, वंदन सविधि कराय जी ।१६१। वस्त्राभूषण, · खोल लोच कर, लाये प्रभु के पास, अाज्ञा लीजे शरणा दीजे, है चरणों का दास जी ।१६२। हाथ जोड़ मेतारज कहता, यह अपार संसार, अनन्त काल तक रूला जगत में, अव करदे भवपार जी ।१६३ ॥ उच्च भाव से दीक्षा लेकर, किया ज्ञान अभ्यास, जप तप करके करे साधना. एक मोक्ष की प्रास जी ।१६४। मास खमण का आया पारणा, गये राजगृह मांय, स्वर्णकार लखकर मुनिवर को, सद्य सामने आय जी ।१६५॥ राज जंवाई सेठ पुत्र, पहचान यों अरज सुनाई, ग्राहार पाणी हित यहाँ पधारो, कृपा करो मुनिराई जी ।१६६॥ हुए साथ में सहज भाव से, लेना है शुद्ध आहार, बड़ी भक्ति से अन्दर लेजा, दीना शुद्ध पाहार जी ।१६७। वहराने जब चला स्वर्ण जौ, थाली में गया छोड़, पीछे से भूखा कुकुट सब, जौ को खा गया दौड़ जी ।१६८) जो घटना यहाँ घटी अांख से, देख लिवी मुनिराय, किन्तु पातम ध्यानी मुनिवर, ले पाहार सिधाय जी ।१६९। वापिस या जव देखा थाल में, सोने के जौ नाय, कौन आ गया, कौन ले गया, चिन्ता भारी छाय जी १७०। राज घराने के जी हैं ये, अभी मांगने पाय, क्या उत्तर देऊँगा उनको, ऐसे मन में लाय जी ।१७१॥ . २२ अभी यहां पर सिवा मुनि के, नहीं कोई भी पाया, स्वर्ण जवों को वेही ले गये, ऐसी शंका लाया जी ।१७२। अभी स्थान पर नहीं पहुंचे वे, शीघ्र बुलाकर लाऊँ, मेरी चिन्ता दूर हटे जौ, उन्हीं पास में पाऊँ जी ।१७३। करी बहाना वापिस मुनि को, अपने घर पर लाया, पूछे कह दो सत्य स्वर्ण जौ, कहाँ पर आप छिपाया जी ।१७४। आप सिवा यहाँ कोई न पाया, अतः पूछ रहा तुमको, दण्ड मिलेगा अगर स्वर्ण जौ, नहीं बताया हमको जी ॥१७५॥ मुनिवर सोचे सत्य कहूँ तो, कुर्कुट मारा जाय, मौन रहूँ सबसे अच्छा है, वह प्राणी बच जाय जी ।१७६। मेरा तो कुछ भी नहीं बिगड़े, होवेगा तन नाश, अजर अमर अात्म है मेरा, यह पूर्ण विश्वास जी ।१७७। मौन देख. सोनी यों सोचे, है इनके ही पास, दे दो जल्दी जीवन चाहो, नहीं तो पावो त्रास जी ।१७८ हुये ध्यान में मस्त मुनिवर, शब्द नहीं उच्चारे, सोनी क्रोध में लाल हो गया, कीना बिना विचारे जी ।१७९। गीली खाल मुनि मस्तक पर, बांधी ला तत्काल, धूप माँय कर खड़ा मुनि को, देख रहा सब हाल जी ।१८० ज्यों ज्यों खाल सूखती जावे, त्यों त्यों मस्तक जाल, नमें टूटती जावे तड़-तड़, मुनि क्षमा में लाल जी ।१८१॥ . समता रस में रम मेतारज, धाति कर्म क्षय कीना, नश्वर तन को त्याग मुनीश्वर, मुक्ति गढ़ जा लीना जी ।१८२। कुर्कुट छिपकर बैठा था, वहाँ पड़ी वस्तु कोई आय, मारे भय के बीट करी तब, सुवर्ण जौ निकलाय जी ।१८३। सोनी देख हृदय में अब तो, गहरा रहा पछताय, मुनि हत्या कर विरथा मैंने, लीना पाप कमाय जी ।१८४। अभी राज के आय संतरी, देखेंगे यह हाल, बिना मौत मारेंगे मुझको, करके बुरा हवाल जी ।१८५ बिना गुनाह ही क्रोधित होकर, राज जवाई मारा, छिपे नहीं यह राजा श्रेणिक, हाल सुनेगा सारा जी ।१८६। भूपति को मालूम होने पर, मेरी गति विगारे, कर उपाय कोई बच जाऊँ, ऐसी दिल में धारे जी १८७। मुनि वेश यदि धारण कर लू, तव तो नृप नहीं मारे, तभी मुनि का वेश पहन कर, समता दिल में धारे जी ।१८८ ... २३ संतरी आ आवाज लगाई, अन्दर से यों बोले, "धर्म लाभ" तब कहे सिपाही, शीघ्र द्वार को खोलें जी ।१८९ नहीं खोले तब जाकर नृप से, सभी हाल दरसावे, राजा सुनकर सोचे मन में, कैसे शब्द सुनावे जी ।१९०। स्वयं भूप वहाँ चलकर आया, देखे वहाँ का हाल, मैतार्य मुनि का शव लखकर के, नरपति हुअा बेहाल जी ।१९१ क्या कारण है 'कहो हकीकत, कैसे मुनिवर मारे, जो जो घटना घटी यहाँ पर, सत्य सुनादे प्यारे जी ।१९२१ मारे भय के सोनी बोला, हार बनाने काज, स्वर्ण जवों को थाल माँय रख, गया बहराने आज जी ।१९३१ वापिस आकर लखा थाल को, इक भी जौ नहीं पाया, शंका मेरे मन में आई, ले गये हैं मुनिराया जी ।१९४॥ पुनः बुलाकर सिर पर चमड़ा, बांध दिया तत्काल, समता रस में लीन हुए मुनि, षटकाया प्रतिपाल जी ।१९५॥ ज्यों ज्यों चमड़ा सूखा, सिर की नसें टूट गई सारी, आत्म ध्यान में रमें मुनीश्वर, देह की ममता मारी जी ।१९६। यह अकाज “सब मैंने कीना, भ्रम वश हे भूपाल, आँखों देखा मैंने सारा, सत्य कह दिया हाल जी ।१९७१ एक धमाका हुअा जोर से, कुर्कुट बाहर आया, भय वश बीट करी तब उसमें, सभी स्वर्ण जौ पाया जी ।१९८१ सारी घटना सुन महाराजा, दीनी यों फटकार, धर्म ध्वजी यह वेश पहनकर, क्यों ठगता संसार जी ।१९९) अगर वेश नहीं होता तन पर, देता अभी मरवाय, खैर कहूँ इस वेश मुग्राफिक, लेना जीवन बनाय जी ।२००} द्रव्य वेश ले गया प्रभु पे, लीनी दीक्षा धार, ज्ञान, ध्यान, जप, तप, संयम को, लीना हृदय उतार जी ।२०१। वन शृगाल धारण व्रत कीना, पाला सिंह समान, अन्त समय कर भाव विशुद्धि, पाया स्वर्ग विमान जी ।२०२। प्राज्ञ प्रसादे 'सोहन मुनि' कहे, धन्य-धन्य मुनिराय, क्षमा शांनि का मंत्र बताकर, बन गये शिवपुर राय जी ।२०३। कथा सुनी वैसी हो दीनी, ख्याल राग में गाय, कम ज्यादा का मिथ्या दुष्कृत, साक्षी इष्ट रखाय जी ।२०४॥ दो हजार पैतीस साल की, माधव कृष्णा सातम, पुप्कर म यह यह जोड़ बनाई, करलो वश में मातम जी ।२०५।
६
क्षमा धारले:
विनसे वैर
वीर जिनेश्वर बंदिये, कष्ट नष्ट हो जाय लाल रे ।। टेर ।।
एक समय प्रभु वीरजी, आये अस्थिक - ग्राम लाल रे ।
काली नदी के तीर पर, शूल पाणि का धाम लाल रे ॥१। वीर ।
इन्द्र पुजारी है वहाँ प्रभु, लख सन्मुख आय लाल रे ।
आज्ञा दें इस दास को, तब प्रभु यों फरमाय लाल रे ॥२। वीर ।
स्थान की आज्ञा दीजिये, रात रहूँ इण माय लाल रे ।
सुनी विप्र यों बोलियो, यह स्थान दुःखदाय लाल रे ।।३। वीर ।
यक्ष यहाँ का ऋ र है, निशा में वह प्राय लाल रे ।
जो प्राणी उसको मिले, उसे त्वरित खा जाय लाल रे ।।४। वीर ।
परिचय देऊँ यक्ष का, सुनिये स्वामी - नाथ लाल रे ।
कैसे यह घटना घटी, क्यों करता उत्पात लाल रे ॥५। वीर ।
व्यापारी धनदेवजी,
जाय विदेशों माँय लाल रे ।
गाड़ी पाँच सौ माल से, भरकर नदी में आय लाल रे ।।६। वीर ।
इण सरिता में सब फँसी, बैल गाड़ी उस बार लाल रे ।
चिन्तातुर हुआ सेठजी, आया मन में विचार लाल रे ॥७। वीर ।
म्हारो यो इक बैल है, घणो घणो बलवान लाल रे ।
जोत इसे इस वक्त ही, गाड्याँ निकालू तत्काल लाल रे ।।८। वीर ।
एक एक कर गाड़ियां, दीनी बैल निकाल लाल रे ।
अन्त में ठोकर खा गिरा, हो गया बैल बेहाल लाल रे ।।९। वीर ।
सेठ देख घबरा गया, दुखित हुआ अपार लाल रे ।
प्यारो बैल है माहरो, नहीं चले कुछ जोर लाल रे ।।१०।वीर।
२५
काम जरूरी सेठ के, माल आगे ले जाय लाल रे ।
सोचा गांव में जाय के, देऊं किसी को भुलाय लाल रे ॥११वी।
बात करी सब गाँव से, माँगे सो दीना दाम लाल रे ।
खाने पीने की सार तुम, कीज्यो पूरो काम लाल रे ।।१२।वीर।
सेठ बैल के पास आ, दीने आँसू डाल लाल रे ।
बैल ने अपने स्वामी को, नमन किया तत्काल लाल रे ॥१३॥वीर।
कुछ दिन तो उस वैल की, कीनी सार सम्भार लाल रे ।
किन्तु वाद में भूलकर, दीना कर्तव्य विसार लाल रे ॥१४ावीर।
तड़फ - तड़फ के मर गया, गर्मी सर्दी दुःख पाय लाल रे
विश्वासघात की गाँव ने, व्यंतर हुआ है जाय लाल रे ॥१५॥वीर।
केई ||गा बहरा हुआ, केई चलता गिर जाय लाल रे ।
हाहाकार सव जन करे, फिर भी कष्ट नहीं जाय लाल रे ॥१६।वीर।
गाँव छोड़ केई भागिया, कोई मुवा गस खाय लाल रे ।
खुश करने उस देव को, *प्रोटा दिया वनाय लाल रे ।।१७।वीर।
फिर भी नहीं राजी हुआ, पूजा हमेशं कराय लाल रे ।
बात - वात में रुष्ट हो, रात रहे खा जाय लाल रे ।।१८।वीर।
सब घटना सुन वीर जी, कहे आज्ञा दिलवाय लाल रे ।
पंडा कहे भय स्थान है, अभय वीर फरमाय लाल रे ।।१९।वीर।
आज्ञा ले प्रभु ध्यान में, लीन हुए तिणमाँय लाल रे ।
यक्ष भयंकर रूप धर, दंती रूप बनाय लाल रे ॥२०॥वीर।
नभ में प्रभु को फेंक के, दन्त शूल पर लेय लाल रे ।
रूप पलट कई रूप कर, कष्ट वीर को देय लाल रे ॥२१॥वीर।
पिशाच रूप धर चीरिया, विप धर डंक लगाय लाल रे ।
कई तरह से कष्ट दे, किन्तु न वीर डिगाय लाल रे ।।२२शवीर।
ज्ञान लगा चरणों गिरा, क्षमा करो मुझ नाथ लाल रे ।
मुस्का कर कहे वीर यों, सुन ले मेरी वात लाल रे ॥२३॥वीर।
तू तो मेरा मित्र है, ली परीक्षा इस बार लाल रे ।
फिर क्षमा की वात क्या, निर्भय रहो भय छार लाल रे ॥२४॥वीर।
चबुतरा ।
२६
.
वैरी नहीं कोई माहरे, मैं न किसी के विरुद्ध लाल रे ।
तू भी समझ सब मित्र हैं, कर ले जीवन शुद्ध लाल रे ।।२५।वीर।
यक्ष कहे मैं मित्र हूँ, शत्रु कौन जग माँय लाल रे ।
जग सारा ही मित्र है, क्षमा जो दिल में आय लाल रे ॥२६।वीर।
वीर कहे सुन बात यह, वैरं से वैर न जाय लाल रे ।
वैर का बदला प्रेम से, देकर के सुख पाय लाल रे ।।२७।वीर।
शिक्षा पाई यक्ष ने, त्याग दियां सब वैर लाल रे ।
आज से माफी • सही, सब जन पावे खैर लाल रे ॥२८वीर।
क्षमा याचना कर यहां, यक्ष गंया निज ठाम लाल रे ।
यह प्रभाव प्रभु का सही, विनंसी दुःख तमाम लाल रे ।।२९।वीर।
वीर प्रभु सानन्द हैं, देखें सब नर नार लाल रे । ..
एक साथ बोले सदां, होवे जयं - जय कार लाल रे ।।३०वीरा
उस दिन के पश्चात् ही, हुओं शांत सब क्लेश लाल रे ।
गुण गावें प्रभु वीर के, संकट रहा नहीं लेश लाल रे ।।३१।वीर।
प्राज्ञ कृपा 'सोहन' मुनि, कहे रखो यह ध्यान लाल रे । .
वैर से वैर न शांत हो; यही वीर फरमान लाल रे ॥३२॥वीर
दो हजार पैतीस की, वीर जयन्ती सारं लाल रे।
ग्राम थाँवला में रहे, बरते मंगलाचार लाल रे ॥३३।वीर।
२७
.
धर्म बिन
जीवन है कैसा?
( तर्ज-नेमजी की जान बरणी)
पूर्व भव सुकृत कर आवे, वही मनवाँछित फल पावे ।
सदा यह ज्ञानी फरमावे, किये बिन आगे नहीं पावे ॥टेर।।
दोहा-बिना धर्म क्या लाभ है, नरतन पाया जीव ।
पाप कर्म कर भारी होवे, देवे नर्क की नींव ।।
ज्ञान. रख अघ से बच जावे ।। १ ।। पूर्व ।
जन्म लिया श्रावक कुल माँहीं, ऋद्धि भरपूर कोष माँहीं ।
नाम है लाभचन्द भाई, लाभ भी हो रहा घर माँही ।।
दोहा-किन्तु लोभ अति बढ़ रहा, करे नहीं धर्म ध्यान ।
रात दिवस मन रहता धन में, और सुने नहीं कान ॥
समय पर भोजन नहीं खावे ।। २ ।। पूर्व ।
सेठ के सेठाणी पुण्यवान्, करे वह सदा धर्म और ध्यान ।
पति का करके प्रति सम्मान, कहे कुछ लीजे प्रभु का नाम ।।
दोहा-समय एक सा ना रहे, पलट जाय क्षण माय ।
अतः धर्म की करो साधना, पूजी संग ले जाय ।।
नित ऐसे दरसावे ।। ३ ।। पूर्व ।
सेठ सुन ऐसे फरमावे, मुझे. यह वात नहीं भावे ।
अभी तो धन ही धन चावे, करूगा धर्म जरा' यावे ।।
दोहा-ऐसी बात कह टालता, कभी न ले प्रभु नाम ।
संत सती के करे न दर्शन, एक हाट का काम ।।
भान नहीं, आयु नित जावे ।। ४ ।। पूर्व ।
वात
बुढ़ापा ।
पति का लख करके व्यवहार, सेठाणी सोचे हृदय मँझार । पाया है उत्तम कुल आचार, द्रव्य से भरा खूब भण्डार ।। दोहा-पुण्यवानी ले साथ में, आये हैं जग माँय । खर्च इसे जायेंगे आगे, कैसे काम चलाय ।। उदासी आनन पर छावे ॥५॥ पूर्व । सेठाण्यां लखकर यों कहतीं, उदासी क्यों मुख पर रहती । कहो क्या कारण दुःख सहती, बात सुन उनको यों कहती ।। दोहा-और न चिन्ता है मुझे, पूरण पति का प्यार । जो भी चाहूँ वही मिलता मुझको, नहीं होवे इन्कार ।। कष्ट नहीं घर माँहीं आवे ।। ६ ।। पूर्व । कहो फिर चिन्ता क्यों छाई, तभी यों उसने दरसाई । करे पति धर्म ध्यान नाही, इसीसे चिन्ता चित्त आई ।। दोहा-पतिव्रता धन का नहीं, धर्म का करे विचार । अतः अहोनिश सोचू मन में, कैसे होय सुधार ।। यही मुझ सोच सदा आवे ।। ७ ।। पूर्व । जाऊँ जब स्थानक के माँही, लखू मैं बाल वृद्ध ताँही । करे सब मिलकर सामाई, तभी मैं सोचू मन माँही ।। दोहा-पति देव आवे नहीं, धर्मः साधना अतः खेद मन माँही आवे, कहूँ तुम्हें क्या आज ।। नाथ मन धर्म नहीं भावे ।। ८ ।। पूर्व । वात कर गई, वे अपने स्थान, खड़े हैं पति सामने आन । नमन कर बोली दीजे ध्यान, बात अब लेप्रो मेरी मान ।। दोहा-स्थानक माँही सन्त के, दर्शन करिये जाय । एक बार व्याख्यान सुनो तो, धर्म ध्यान मन भाय ।। और कुछ संग नहीं जावे ।। ९ ।। पूर्व । सेठ कहे फुरसत है नाहीं, करूं क्या वहाँ पर मैं जाई । काम है इतना हाट माँही, मौत भी आवे पास नांहीं ।। दोहा--सेठाणी कहे सेठजी, . लक्ष्मी संग ना जाय । हाट हवेली नौकर चाकर, सभी यहाँ रह जाय ।। मृत्यु जब आकर ले जावे ।।१०।। पूर्व । काज । २९
सेठ तो मद माँही छाया, नार से उसने दरसाया ।
द्रव्य से सव वस में आया, करूँ मैं मेरा मन चायां ।।
दोहा-बार - बार तुम यह कहो, जागो स्थानक माय ।
वहाँ जाकर मैं बैठू तो फिर, धन को कौन कमाय ।।
न्यात में कैसे यश पावे ||११|| पर्व ।
लोक सब धन से करे सम्मान, बनावे जाति में अगवान ।
ढंके सब दुर्गुरंग उसके आन, सामने खोले नहीं जबान ।।
दोहा-पण्डित ज्ञानी समझू तथा, भला है इज्जतदार ।
जग में भी उत्तम वही होता, बोले सब नरनारं ।।
दाम बिन दास बन जावे ॥१२।। पूर्व ।
यही लो मेरा हीरक हार, पहिन तुम जानो सभा मंझार ।
देखकर सारे ही नर नार, गावेंगे गुण होवे जयकार ।।
दोहा-नारी कहे नहीं चाहिये, मुझको ऐसा हार ।
धर्म ध्यान विन जीवन कैसा, सुनों आप भरतार ।।
नहीं यह भूषण मुझे भावे ॥१३।। पूर्व ।
मुझे नहीं सुन्दर पट चावे, नहीं ये दागीने भावे ।
चाहे हम लूखा अन्न खावें, धर्म विन धन भी नहीं चावे ।।
दोहा-किन्तु दाम ही जम रहा, सेठ हृदय के माँय ।
धर्म के सन्मुख नहीं होने दे, अन्धकार रहा छाय ।।
पीलिया रोग . नेत्र छावे ।।१४।। पूर्व ।
सेठाणी सोचे मन मांही, पुण्य विनं जोड़ मिले नाही ।
पूर्व भव पुण्य किया नांहीं, धर्म से रहित पति पाई ।।
दोहा-नाथ धर्म माँही लगे, तब जीवन सुखकार ।
पशु पक्षी सम भोग भोगकर, कीना नर भव छार ।
सोच यों चिन्ता मन लावे ॥१५॥ पूर्व ।
अर्धागी धर्मनिष्ठ पावे, पति को हरदम समभावे ।
धर्म के मारग में लावे, उपाय वह ऐसा दिल ठावे ।।
दोहा-जो संसारी नारियाँ, कर दे जग में लीन ।
कोठी बंगले जेवर माही, फंसी रहे बन दीन ||
जन्म दोनों ही खो जावे ।।१६।। पूर्व।
एक दिन सन्त वहाँ आवे, दर्शन हित सेठाणी जावे ।
वन्दन कर नयन नीर लावे, मुनि लख विस्मय अति पावे ।।
दोहा-कहो बहिन ! क्या बात है, क्यों नयनों में नीर ।
ऐसा दुःख क्या तेरे ऊपर, आये आँसू पट चीर ।।
बात वह
अपनी दरसावे ।।१७।। पूर्व ।
कमी नहीं कुछ भी घर माँही, पति मुझ धर्म करे नाँही ।
चिन्ता यह चित्त माँही आई, आप गुरु देवें समझाई ॥
दोहा-सुनकर सारी बात को, बोले यों मुनिराय ।
जाकर कहना याद करे मुनि, स्थानक माँही आय ।।
करूँगा बात यहाँ आवे ॥१८॥ पूर्व ।
वन्दन कर सेठाणी जावे, पति को ऐसे दरसावे ।
मुनिवर याद फरमावे, दर्शन हित आप वहाँ जावें ॥
दोहा-सुनकर सोचे सेठजी, याद करे मुनि राय ।
दर्शन करके वापिस आऊँ, कारण क्या दरसाय ।।
त्वरित चल स्थानक में आवे ।।१९।। पूर्व ।
वन्दन कर खड़ा सामने आय, काम हो सत्वर दे दरसाय ।
मुनि कहे ये *चिट्टी ले जाय, संग में लेना पर भव माँय ॥
दोहा-आऊँ मैं परलोक में, देना वही सम्भलाय ।
इतना सा है काम तेरे से, और न मुझको चाय ।।
हिफाजत. से लेते पावें ।।२०।। पूर्व ।
सेठ सुन विस्मय मन लाया, कैसे ये मुनिवर फरमाया ।
सेठ कहे समझ नहीं पाया, आपने कैसे दरसाया ।।
दोहा-कैसे लकड़ी साथ में, लाऊँ पर भव मांय ।
ऐसी बात ना सुनी कभी मैं, कैसे आप फरमाय ।।
मुनि तब उसको . दरसावे ।।२१।। पूर्व ।
--
* लकड़ी ।
३१
१
जैसे तू हीरे पन्ने ले जाय, उसी सम लकड़ी संग में लाय ।
सेठ कहे कोड़ी संग नहीं जाय,छोड़ गये बाप दादा घर मांय ।।
दोहा-तब मुनिवर कहे सेठजी इसके बदले पाप ।
बांध गांठ ले जाओ संग में, भोगोगे खुद आप ॥
हेतु दे उसको समझावे ॥२२।। पूर्व ।
सेठ कहे सेठारणी हर बार, दुखी बन कहती बात हितकार ।
जमी है आज हृदय मंझार, करूंगा धर्म ध्यान हर बार ॥
दोहा-मोह माया में फंस गया, युक्ति से समझाय ।
अव श्रावक व्रत दे दें मुझको, पालू मन वचकाय ।।
व्रती बन निज घर को जावे ॥२३।। पूर्व ।
पति अब धर्म राह आवे, सेठाणी सुनकर हरसावे ।
आज ही सच्चा धन पावे, सफल हुआ जीवन मन भावे ।।
दोहा-प्राज्ञ कृपा 'सोहन' मुनि कहते बारम्बार ।
धर्म बिना क्या जीवन जगमें, सुनलो सब नरनार ।।
भविक ही धर्म भाव लावे ॥२४।। पूर्व ।
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८
जैसा करेगा:
वैसा भरेगा
( तर्ज—यह प्रजन कंवर की कथा सुनो० )
कभी किसी पर झूठा कलंक लगावे, महाराज - प्रतिफल निश्चय पावे जी।
किये कर्म नहीं छुटे हरगिज बचना चावे जी । टेर ।
भारत भूमि पर थी कोशाम्बी नगरी, महाराज-सभी जन की मन हारी जी।
भूप वहाँ का अरिमर्दन सबको सुखकारी जी ।
महाराणी रंभा रंभा सम है उनके, महाराज - पतिव्रत धर्म को पाले जी ।
करे सदा शुभ काम, रेख निज कुल की चाले जी ।
दीन दुखी का ध्यान रखे वह पूरा-महाराज-सहायता कर हर्षावे जी ।१। किये०
सचिव ज्ञानचन्द ज्ञानी सरल स्वभावी-महाराज-धर्म का मर्म समझता जी ।
कभी न गलती होय ध्यान वह पूरा रखता जी ।
देख रेख करता है राज्य की अच्छी-महाराज-प्रजागरण सब है राजी जी।
चोर जार नहीं रहे, वहाँ से सब गये भांजी जी।
इससे राज्य का यश फैला जग माही-महाराज-सभी जन गुण मुख गावे जी।२। किये
रक्खा दूसरा मन्त्री राज्य में नृप ने-महाराज-उसे भी काम बताया जी।
करो काम हुशियारी से नृप यों दरसाया जी।
शनैः शनैः वह महिपति के मुंह लागा, महाराज-चाटुकारी नित करता जी।
इधर उधर की बात कही विश्वास जमाता जी ।
एक दिवस इस मन्त्री के मन माँही, महाराज-भावना ऐसी आवे जी ।३। किये०
मुख्य मन्त्री वन जाऊँ राज्य का मैं भी, महाराज-ज्ञान की चुगली खाता जी।
उलटी सुलटी बात कही, नृप को भरमाता जी।
मिथ्या बात कह नृप का मन दिया फेरी, महाराज-भूप आदेश सुनाया
ज्ञान मन्त्री का माल जप्त कर, कोष भराया जी।
सब गया माल अब मन्त्री मन में सोचे, महाराज-भूप किस मौत मरावे जी ।४।किये।
०
जी।
अतः यहाँ से छोड़ नगर कहीं जाऊँ, महाराज-रात में हुआ रवाना जी। चलते-फिरते हुआ एक दिन सुरपुर आना जी। फिरते फिरते वीच बाजार में आया, महाराज-हाट पर बोर्ड दिखाया जी। यहाँ मिलती अक्ल मन चाही ले लो यों दरसाया जी। गया उसी क्षण दुकानदार के पासे, महाराज-हाट सब भरी दिखावे जी ॥५॥ किये० देख मन्त्री को आदर अच्छा दीना, महाराज-मन्त्री तब यों दरसावे जी। यहाँ मिलती कौनसी, अक्ल आप मुझको फरमावे जी । सभी तरह की अक्ल यहाँ मिलती है, महाराज-कीमत भी तुम सुन लेना जी। एक अक्ल के पच्चीस रुपये, पहले देना जी। सारे रुपये गिने सवा सौ निकले, महाराज-मन्त्री कहे एक दिलावें जी।६। किये० पहले देो दाम त्वरित दे दीना, महाराज - अक्ल पहली बतलावे जी। रस्ते में एक से दोय रहे, ऐसे दरसावे जी। फिर लीनी दूसरी अक्ल दाम दे दीना, महाराज-पंच कहे उनकी माने जी । लीनी तीसरी अक्ल दाम दे, हित की जाने जी । स्नान करो एकान्त होय सुखकारी, महाराज-अक्ल तीजी बतलावे जी ७ किये। सोचे लेलू - चौथी अक्ल भी इनसे, महाराज - दाम देकर हरषाया जी। दे दो चौथी अक्ल मुझे तब यों बतलाया जी। गुप्त बात नारी से कभी ना कहनी, महाराज - चाहे वह अपनी होवे जी। रखना पूरा ध्यान नहीं तो इज्जत खोवे जी। अब रहे दाम पच्चीस पास में अपने, महाराज-इन्हीं से काम चलावे जी 14 किये। दुकानदार कहे मेरी बात एक सुन लो, महाराज-याद में अब वह पाई जी। चमत्कारी हूँ चीज आपको होय भलाई जी। शक्कर टेटी के बीज चीज है भारी, महाराज - भूमि में उनको डाले जी। पानो पिलाकर त्वरित पाप फल उनसे पाले जी। सुनकर अद्भुत बात मन्त्री यो सोचे, महाराज-वस्तु ऐसे नहीं पावे जी ।९। किये० जैसे होगा मैं अपना काम चलाऊँ, महाराज - रुपै पच्चीस दिलावे जी । दे दो मुझको बीज चीज, मेरे मन भावे जी । ले साथ बीज को हुया रवाना वहाँ मे, महाराज-सोच रहा मार्ग माही जी। यह बैठी गेवनी लेलू, इसको मन में पाई जी। उका उमे ले चला रात जहाँ ठहरा, महाराज-बांध पग के सो जाये जी 1801 किये।
अर्ध रात में सर्प भयंकर काला, महाराज - मन्त्री के पासे आवे जी । उस समय सेवली पकड़ पूछ,कन्दुक हो जावे जी। फरण मार फरणीधर उसी समय मर जावे, महाराज-सबेरे जब वह जागे जी। देख भयंकर सर्प पास मन, माँही लागे जी। प्रथम अक्ल से प्राण बचे हैं मेरे, महाराज-हृदय में श्रद्धा आवे जी ।११। किये० वला वहाँ से चम्पा नगरी अाया, महाराज - धर्मशाला में जावे जी। श वहीं पर रात बात ऐसी हो जावे जी। एक मरा आदमी कोई न उसका वारिस, महाराज - देखकर सब दरसावे जी। कहा ज्ञान से आप इसे शमशान ले जावें जी। सुन अक्ल याद कर उसने हाँ भर लीनो,महाराज-उठा मरघट ले जावेजी ।१२।किये० वहाँ ले जा उसके, वस्त्र सम्भाले तन के - महाराज - न्योली में हीरे पावे जी। देख कीमती रकम, अक्ल दूजी मन भावे जी । करी कार्य शमशान भूमि से चलता, महाराज-सरोवर तट पर आवे जी । स्नान करन हित याद करी, एकान्त में जावे जी। सद्य स्नान कर धर्मशाला में पाया, महाराज-बैठ वहाँ खाना खावे जो ।१३। किये उस वक्त याद में नोली उसको पाई, महाराज-भूल करके चल पाया जी। त्वरित वहाँ से हुआ रवाना सर तट पाया जी। पड़ी मिली है ज्यों की त्यों ही न्योली, महाराज-अक्ल तीजी सुखदाई जी अब जाऊँ अपने स्थान, भावना ऐसी आई जी। कर विचार चल सीधा घर पर आया, महाराज-नार लख हर्ष मनावे जी ।१४।किये० कहाँ २ पर आप सिधाये स्वामिन्, महाराज-काम वहाँ क्या-क्या कोना जी। सरल भाव से ज्ञानचन्द ने सब कह दीना जी । फिर गया सभा में नृप ने पास विठाया, महाराज-सभी बीतक. बतलावे जी। मन्त्री अपनी बात नाथ से सभी सुनावे जी । है ऐसी वस्तु एक पास में मेरे, महाराज-त्वरित फल उनसे पावे जी ।१५। किये ले बीज खेत में जाकर वोये सत्वर, महाराज-उदक उस पर जो डाले जी। पौधा हो तैयार उसी क्षण, फल भी खाले जी । मन्त्री बात यह झूठी, महाराज-परीक्षा यहाँ करवावे जी। किन्तु बीच में आप रहें, यह शर्त लगावे जी । जो निकले झूठा उसके घर जा सच्चा,महाराज-प्रथम जिसको छू जावेजी।१६।किये. कहे दूसरा ३५ उसका ही वह होगा मालि क राजन्-महाराज-भूप के यह अँच जावे जी। कल ही सभा के सन्मुख लाकर उन्हें उगावे जी । ज्ञान पत्नि से नया मन्त्री - संध्या में - महाराज - मिली सब बीज सिकाया जी। वापिस उनको उसी तरह से, फिर बंधवाया जी। प्रीतम को उसने भेद नहीं कुछ दीना, महाराज-चरित कुलटा उलटावे जी ।१७।किये। सुवह मन्त्री बीजों को लेकर आया, महाराज - सभा में लोक भरावे जी। देखें यहाँ पर आज त्वरित फल कैसे आवे जी। सभी सभा के सन्मुख गठरी खोली, महाराज - बीज भूमि में डाले जी। अव लगे यहां फल सभी ध्यान से उधर निहाले जी। पानी डाला फिर भी वीज नहीं ऊगे, महाराज-मन्त्री विस्मय मन लावे जी ।१८।किये। क्या कारण है कैसे काम नहीं देवे, महाराज - दूसरा मन्त्री बोले जी। मिथ्या करता बात, पोल यह अपनी खोले जी। अतः हार स्वीकार करे यह यहाँ पर, महाराज - शर्त भी अभी निभावे जी । चलकर मेरे साथ वहाँ इच्छित सम्भलावे जी । भूप प्रजा सब कहे बात है सच्ची, महाराज-शर्त अनुसार दिलावे जी ।१९। किये० ज्ञान समझकर भेद शीघ्र घर पाया, महाराज-नार को छत पे बिठाई जी। एक निस्सरणी रख दीनी है, चढ़ने ताँई जी। नृप, मन्त्री सब मिलकर घर पे आये, महाराज लखे मन्त्री मनचाही जी। ऊपर बैठी देख नार, दिया हाथ चलाइ जी । लगा हाथ दी काट निसरणी उसको, महाराज-भूप निर्णय दरसावे जी ।२० किये। कहे भूप से ज्ञानचन्द कर जोड़ी, महाराज - मुझे कुछ समय दिलावे जी । पन्द्रह दिन में कही वात, करके दिखलावे जी । भूपति ने उसको वही मोहल्लत दीनी, महाराज-रवाना हो वहाँ जावे जी ! लेकर सच्चे वीज पुनः चल करके आवे जी । सुन लोग हजारों सभा भवन में पाये,महाराज-त्वरित फल भी लगजावे जी ।२१।किये. लख ज्ञानचन्द का ऐसा, महाराज-लोग सब विस्मय पावे जी । वाह २ कर सभा बीच जय घोप सुनावे जी । भप हृदय में सोच रहा है ऐने, महाराज-ज्ञान सब गत्र दरगावे जी। पहले क्यों नहीं उगे, भेद मय इसका पाये जी । कहो मन्त्री क्या कारण इसके माही,महाराज-रहस्य मुभको बनला जी ।२शक्रिये० ज्ञानचन्द कहे अक्ल भूल गया चौथी, महाराज - इसी से धोखा खाया जी। कहदी सारी बात नार को, अति दुःख पाया जी। सुनकर सारी बात भूप यों सोचे, महाराज- मुझे मन्त्री भरमाया जी। सरल स्वभावी ज्ञान मन्त्री से दूर कराया जी। समझ धूर्तता उसको सीमा बाहिर, महाराज-राज्य से शीघ्र कढ़ावे जी ।२३।किये० ज्ञानचन्द को पुनः राज्य में रक्खा, महाराज भूप ने भूल स्वीकारी जी। करके उसने कपट जाल, दी मुझपे डारी जी। किया बुरा वह बुरा जगत में पावे, महाराज - सन्तजन सच दरसाई जी। नहीं देगी कोई काम, धूर्तता पर भव माँही जी। ज्ञान मन्त्री सब काम न्याय से करते, महाराज-एक दिन मन में श्रावे जी ।२४।किये० संसार वीच सब स्वारथ का है नाता, महाराज - पलटते देर न लागे जी। त्रिया चरित्र कर याद भाव मन्त्री के जागे जी। धर्म घोष महाराज विचरते पाये, महाराज - वचन सुन दीक्षा धारे जी। ज्ञान मुनीश्वर जप तप करके, आतम तारे जी। गये स्वर्ग में पुनः मनुष्य भव पावे, महाराज संयम ले शिवपुर जावे जी ।२५।किये. प्राज्ञ प्रसादे “सोहन' मुनि यों कहता, महाराज - धर्म पाराधन कीज्यो जी। मिला हुआ शुभ योग, भाव से लावो लीज्यो जी। विक्रम सम्वत दो हजार पैताली, महाराज - पीसांगन आनन्द छाया जी। चातुर्मास हित छः ठाणों से विचरत आया जी। संत समागम पाकर श्रावक मण्डल, महाराज-खूब ही लाभ उठावे जी ।२६। किये० ३७ यद् भावि : तद् भावि ( तर्ज-खड़ी लावणी) कोई कितना यत्न करे, पर कर्मों का फल मिले सही। होनहार होकर के रहता, इसमें किंचित फर्क नहीं ॥टेर।। चन्द्रावती नगरी का भूपति, चन्द्रसैन है अति बलवान । राजनीति से प्रजाजनों को, पहुँचाता पहुँचाता है शान्ति महान ।। रानी चन्द्रा बड़ी विदूषी, दीन हीन का रखती ध्यान । कन्या नन्दिनी पढ़ लिख होगई, चौसठ कला में चतुर सुजान । शेर-बालपन से शौक इसके, बाग में नित जाय जी। सुगन्धित हो पुष्प उसका, चयन करके लाय जी । भृत्य गोविन्दराम को भी, साथ में ले जाय जी । रजत की है छाव जिसको, भर हमेशा लाय जी ॥ छोटी कड़ी- एक दिन देखे भीड़ बाग के बाहर, दौड़ दौड़ केई लोग मके वहां प्राकर । आश्चर्य चकित हो, कहती सुनलो चाकर, खबर करो तुम जल्दी वहां पे जाकर } दौड़-किस कारण से लोक, जमा यहाँ पे है थोक । कौन रहा इन्हें रोक, जा के निगाह करो ॥१॥ नोकर बोला यों तत्काल, होगी कोई यहाँ पर चाल । यह तो संसार का जाल, हर जगह बिछा ॥२॥ क्या है लेना देना अपने, चलो स्थान पर बात कही । होना है। मुनकर यो प्रावेश दोग में, बोनी गुछ तो कागे विचार, नौकर होकर वान टालते, पाती नहीं गर्म लिगार। गहनी हूँ मो करना होगा, प्रायी गयर बागवार, का प्राय शिकायत करो, निगला दुगी राजा बहार शेर-सुन कहे गोविन्द जा, लाऊँ खबर इस बार जी, यों कही झट चल दिया, देखे वहाँ पर आर जी। ज्योतिषी वहां बात कहता, भूत भावि वर्तमान जी, पुनः पाकर कह दिया सव, कंवरी को उस स्थान जी। छोटी कड़ी- फिर बोली कंवरी एक काम कर आना, जो कहूँ पूछ कर सद्य सूचना लाना । कब होगा मेरा विवाह मिती ले आना, पति होगा मेरा कौन, पूछ आ जाना ॥ दौड़-गया भृत्य वहाँ चाल, पूछा उससे सारा हाल । जोशी सुनके तत्काल, सभी बात कही-कही ।। १ ।। होगा तू ही वर राज, नहीं संशय का काज । कहदी सच्ची मैंने आज, जाकर कह देना ॥ २ ॥ वापिस आते सोचे मन में, कैसे कहूँ मैं बात सही । होन० ।२। पूछे कंवरी क्या ले अाया, समाचार सब साफ कहो । बोला वह तो पेटू जोशी, सत्वर अपना मार्ग गहो । व्यर्थ बात करता है यह तो, किस कहने में आप बहो । पैसे ऐंठना काम है उसका, चाहे मरो या कुशल रहो । शेर- जो कही. है बात तुमसे, सत्य दो दरसाय जी । . अन्य बातें छोड़कर जो, साफ हो बतलाय जी । बहुत अाग्रह देख कहता, वह तो यही दरसाय जी । इसका पति तु ही बनेगा, कंवरी गयी कोपाय जी । छोटी कड़ी उठा छाबड़ी ऊपर डाली, हुई रवाना सुना उसे केई गाली । खून निकल गया भीगी अंगरखी सारी, चला वहाँ से छाब हाथ में धारी ॥ दौड़-सोचे गोविन्दा मन माँय, अव यहाँ पे रहना नाय । रहूँ अन्य स्थान जाय, ऐसा निश्चय किया २ ॥ चलकर भद्रपुर आय, लख शहर को हरषाय । रहूँ ऐसे मन लाय, वहाँ रह गया २ ॥ लख लोगों के उदास चेहरे, एक पुरुष से वात कही । होन० ।३। - मस्तक ३९ राज काज उस क्या कारण है सबके आनन, फीके मुझको दिखलावे । वह वोला यहाँ आज भूपति, विना पुत्र के मर जावे ॥ अतः अभी पट हस्ती पाकर, जिसको माला पहनावे । वही हमारा राजा होगा, प्रजाजनों के मन भावे ॥ शेर-इन्तजारी में खड़े हैं लोग लाइन माय जी। आशा लगाई चित्त में, इक भाग्य हम खुल जाय जी ॥ उधर दन्ती छोड़ सबको, गोविन्द के तट आय जी। प्रदक्षिणा, गोविन्द की कर, पुष्प माल पहनाय जी । छोटी कड़ी- जय हो, जय हो, करते सब नर नारी, हस्ती के होदे चढ़ा गोविन्द उस वारी । खूब ठाठ से लाये राज्य मंझारी, दिया राज सम्भलाय खुशी हुई भारी ॥ दौड़-किया दाह संस्कार, लिया काम संभार । वार, सव हरसाये-२ ॥१॥ दान देता हर बार, लेता सब की सम्भार ! गुण गावे नर नार, धन्य धन्य कहे ॥२॥ सेवा करता दीन दुखी की कीर्ति सब दिशि फैल रही । होन०१४। चन्द्रावती की राजकुमारी, यौवन वय में जव आई, देश देश के राजकुमारों की, तसवीरें मंगवाई। भद्रपुर के राजकुवर की, छवि सभी के मन भाई, मन्त्री पाकर तय कर लीना, सम्बन्ध प्रापस के माही । शेर-विवाह कीना ठाठ से, ससुराल कंवरी जाय जी । समय बीता जा रहा, भौतिक सुखों के माय जी ।। नंदिनी नहीं जानती, है यही गोविन्द राय जी । भेद पति ने ना दिया अपने दिया ये तांय जी ॥ छोटी कड़ी-- ए दिया कर जोड़, कहे महानानी, कैसे आपके सिर में हुई निशानी । कर फगाम मुनः जागर अापकी जानो, ही मेरी गंगा दर महिना प्रानी !
सुन बोला दौड़-आग्रह कर रही नार, पाप कहदें इस बार । भरतार, मुझे पहचानो-२ ॥ बोली दोनों जोड़ी हाथ, अभी आई मैं तो साथ । मेरे प्राणनाथ, कैसे फरमाई-२ ॥ अच्छी तरह से देखो मुझको, पूर्ण ध्यान के साथ सही ।। ५ ।। प्राप . शेर- कैसे मैं पहचानें आपको, प्रथम बार दर्शन पाया। कैसा प्रश्न यह किया आपने, सुन मुझको विस्मय आया ।। मैं तो जान सकी न आपको, कभी न मुझको बतलाया। थोड़ा सा संकेत मिले तो, लूगी परिचय को पाया ।। :-उस समय को याद करिये, पुष्प लाने जायजी। ज्योतिषी की बात सुनकर, रोश मन में आयजी ।। छाव दीनी फेंक सिर पर, रक्त तब बह जायजी। गोविन्द हूँ मैं तो वही, तू देख दृष्टि लगायजी ।। छोटी कड़ी-सुनकर देखे कंवरी, ध्यान लगाई । जो कही नजूमी, सांच मिली वह आई ।। कर जोड़ कहे हे नाथ ! क्षमा दिल लाई। गलती की मुझको, माफी दो बक्षाई ।। दौड़-छोड़ो मन के विचार, नहीं गलती है लिगार । जैसा हुआ होनहार, नही पछताना-२ ।। पूर्व जीवन का संयोग, साथ कर्मों का रोग । कहै सदा ज्ञानी लोग, भोगे कर्ता सही-२ ।। किसी जन्म का बदला होगा, अभी उदय में आया वही ।। ६ ।। क्या माफी मांगो तुम मुझसे, सभी तुम्हारा पुण्य प्रताप । नहीं करती यह कार्य कदापि, भूप न होता कहूँ मैं साफ ।। गुलाम रहता जीवन भर, मैं दु:ख उठाता सुनो अमाप । अब आनन्द से मौज करो, मत दुख पावो तुम सुन लो साफ ।। शेर-मोद में दिन जा रहे हैं, दुःख का नही कामजी । चित्त को एकाग्र करके, लेय भगवन्नामजी। दीन दुर्बल दुःखी जन, आते यहां तमामजी। मनोवांछित वस्तु पाते, नहीं कमी का कामजी। ४१ छोटी कड़ी- प्राज्ञ प्रसादे “सोहन" मुनि दरसावे । लेलो सुकृत साथ भला यदि चावे ।। नरभव सा जीवन बार-2 नहीं पावे। ज्ञानी गुरु की सीख ध्यान में लावे ।। दौड़-शहर मदनगंज मांय, किया चौमासा सुखदाय । ठाणा पांच आनन्द पाय, सुख विलस रहे--२ ।। सम्बत वीस सौ पेंतीस, भाई बहिन झुका शीश । महामन्त्र अहो नीश, सवा लक्ष जपे-२ ।। शुद्ध भाव रक्खो जीवन में, दु:ख मिटे, सुख पावे सही ॥ ७ ॥ --
नहीं कट काटा दामन.
अपकार के बका
१०
में उपकार
( तर्ज-तावड़ा धीमो तो पड़जा रे )
अमर सम वह नर जग माही जी २,
अपकारी पर उपकार किया, गुण गाथा जग छाई है।
दीन हीन परिवार भोलू का, जीवन दुखदाई-(i)
छोटा था परिवार तथापि, पेट गरे माही ।। भाग.
एक पुत्र छोटू था छोटा, नारी घर गाही - राजनी
आमद जितना खर्च होय, नहीं बन पान मा ।।।
पूर्व अशुभ के योग पुत्र, नन बीगारी भा - (ii,
बुखार एक सौ पाँच हो रहा, नुगः सा माही ।।
आश्वासन दे चला पुत्र को, गजपूरी न .. Jiii),
दिन भर करके काम माम मी, तर था । । ।
वेहोशी में पड़ा पुत्र चन्द्र, गया की प.. frifi,
डाक्टर पास ना गदगट 7 it, inा । ।
कृपा करी मुझ पत्र देना, मो0% - 3जी,
एकाकी लड़का है , न ५ ॥ी । ।
तास देश में मन ही द्राBhayitf18 : {f
देने को कहां और 11 । 14 |
दह बोला कर ., . ,१२१ 54 , 2. Arti,
एक व दो मार ग, मriti 7,
और
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घर आकर है , ! भद्र
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अर्ध रात में पुत्र पिता के, गले में लिपटाई - सज्जनों, बोला जाऊँ पर भव को मैं, समय गया आई । ११ । कहते कहते प्राण पखेरू, उड़ गये क्षण माही - सज्जनों, मात पिता रह गये देखते, खड़े खड़े व्हाँ ही । १२ । अपने घर का दीपक बुझ गया, सोचे मन माँही-सज्जनों, रोते रोते कठिनाई से, निशि को बीताई । १३ । एक वक्त भी डाक्टर इसको, लख लेता आई - सज्जनों, हो जाता सन्तोष हमें यों, मुख से दरसाई । १४ । जला उसे श्मशान भूमि में, गये वापिस आई - सज्जनों, मजदूरी का काम करे अव, पेट भरण ताँई । १५ ! एक दिन डाक्टर के घर में ही, सर्प गया आई - सज्जनों, सोते पुत्र के डंक लगाकर, गया. किधर माँही । १६ । कई इन्जेक्शन दवा मंगाकर, उसको दिलवाई - सज्जनों, किन्तु कुछ भी उसके तन पर, अंसर हुआ नाही । १७ । कहा किसी ने भोलू को, ला देवो दिखलाई - सज्जनों, उस ही क्षरण वहाँ डाक्टर, जाकर बोला उस ताँई । १८ । सर्प खा गया मेरे पुत्र को, सुन भोलू भाई - सज्जनों, भोजन छोड़ कर उस क्षण, वह तो हुआ संग माहीं । १९ । यह डाक्टर है वही कि, मैंने आजीजी खाई - सज्जनों, किन्तु कहीं प्रतिशोध भाव में, लाभ होय नाही । २० । तत्क्षण बोल मन्त्र से उसको, दीना बैठाई - सज्जनों, पुत्र स्वस्थ लख डाक्टर, दिल में हर्प रहा छाई । २१ । भोलू तेरा इल्म जबर है. दीना दिखलाई - सज्जनों, धन्यवाद टू फितना तुमको, शब्द पास नाही । २२ । मेरा वंश रखता है तुने, ले लो भेंट माही - सज्जनों, गोगो में. बाई नौट माथ में, यस्य से लाई । २३ । डावदर माहब मैं कुछ नहीं लगा, वेल्म नाही सज्जनों, पुन प्रापका 2. मो मंग, ग दरमाई । २४ । भोल की मुन बाने पर, अति चिन्मय पाई-गजनी, दाद का में देखन मो. नान देवन मो. नान याद माई २ w-
एक दिन मेरे पास भोलू ने, प्राजीजी खाई - सज्जनों,
किन्तु मैंने ध्यान दिया नहीं, दीना टरकाई । २६ ।
मरं गया इसका पुत्र, बात यह दीनी बिसराई-सज्जनों,
किया आज उपकार खूब, अपकार भूल भाई । २७ ।
चरण माँही गिर गया है डाक्टर, कहे तुमसा नाँहीं-सज्जनों,
'शिक्षा आज मैं लेऊँ तुमसे, सुन लो भाई । २८ ॥
सभी काम को छोड़ सेवा मैं, करस्यूँ अब भाई-सज्जनों,
कभी किसी से फीस रूप में, नहीं लूगा पाई । २९ ।
:- तूने मेरी आँख खोल दी, दीना चेताई- सज्जनों,
उपकार तुम्हारा याद रक्खूगा, जीवन भर ताँई । ३० ।
समय निकल गया वात रह गई, कहावत जम माँही-सज्जनों,
पछताये फिर क्या होता है, शिक्षा लो भाई । ३१ ।
प्राज्ञ प्रसादे सोहन' मुनि कहे, करता भलाई - सज्जनों,
उस मानव का यश छा जाता, सब जग के माँही । ३२ ।
'दो हजार पेंतीस पौस बदि, तेरस सुखदाई - सज्जनों,
पाँच ठारणों से आये विचरते, नसीराबाद माँही । ३३ ।
卐
पप्रम्परोपटाहो त्रीवादाम
४५
शीश झुकेगा
..
११
एक को
।
( तर्ज आज रंग बरसे रे )
श्रोता सुरणज्यो रे, शुद्ध समकित माँही रमण करीज्यो रे ।टेर।
देव गुरु अरु धर्म मर्म थे, अच्छी तरह समझीज्यो रे,
द्वार-द्वार पर जाकर के मत, शीश झुकाईज्यो रे । १ ।
एक वक्त मिर बेच दियो,जिन चरण माँही सुगज्यो रे,
फिर बेचोला, पेठं रहे नहीं, सच मानीज्यो रे । २ ।
सुनो ध्यान से महाभारत में, एक प्रसंग इम आयो रे,
हरि समझायो पिरण दुर्योधनं, समझ न पायो रे । ३ ।
बिना युद्ध के भूमि न देऊँ, दुर्योधन दरसायो रे,
वापिस पा हरि ने पाण्डव से, भाव सुरणायो रे । ४ ।
निर्णय हुआ युद्ध का तव तो, अपनो दूत पठायो रे,
स्थान स्थान पर जाय भूपगरण, को दरसायो रे । ५।
आमंत्रण पा चले पक्ष में, मन में हर्प सवायो रे,
भीष्म पुत्र रुक्मिया सुनी तब, आनन्द पायो रे । ६ ।
सोचे पाण्डव सत्य पक्ष पर, मोको बाछो पायो रे,
श्री कृपा में बैर निकालू, अब मन चायो रे।७।
लेकर सेना चलानाथ में, धर्म पाग में प्रायो,
धमपुर लग का कंबर को, मान बढायो रे।
गुगल वार्ता करो बोला, पत्र प्रापको पायो रे,
पर कार उसको हर्षित हो, मैं नल पार पायो रे । १ ।
इतने में ही वहां धनुधर, नायर चलकर पायो रे,
मन को लग कम नकर, मन आनन्द पायो रे । १०
प्रेम में मन मा. मिष्टाचार दियायोरे,
मिलनी, मन में प्रायोरे 221
यदि पक्ष में रखना चाहो, रुक्म भाव दरसायो रे, कह दो मुख से डर कर तेरे, शरणे आयो रे ।१२। मेरे पैरों में रख सिर को, बोलो रक्षा कीज्यो रे, कहते ही कौरव *किरीट को, तुम ले लीज्यो रे ।१३। सुनकर अर्जुन कहे शीश यह,कृष्ण चरण में धरियो रे, पतिव्रता सम एक जन्म में, एक ही वरियो रे ।१४। अन्य चरण में झुके नहीं यह,जबतक देह पर परियो रे, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसो ही करियो रे ।१५॥ धन्य वीर धन्य माता तेरी, वंश उजागर करियो रे, स्वार्थ तज मजबूत रह्यो, नहीं शीश झुकायो रे ।१६। इसी तरह समकित धारी भी,जिन चरणे सिर नायो रे, प्राण जाय पर प्रण नहीं टूटे, निश्चय ठायो रे ।१७। कर्म रेख को टालण वालो, कोई नजर नहीं आयो रे, मन्त्र तन्त्र और देवी देव में, क्यों उलझायो रे ।१८। समकित में मजबूत रहो, श्री वीर प्रभु फरमायो रे, देवों से भी अरणक श्रावक, डिग्यो न डिग़ायो रे ।१९। सूत्र उपासक में भी देखो, ऐसो जिक्कर आयो रे, उपसर्ग सहे मजबूत रहे, नहीं मन पलटायो रे ।२०। प्राज्ञ प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे, धर्म वीर को पायो रे, जिन चरणों में ध्यान रखो, जहाँ शीश नमायो रे ।२१५ दो हजार पैंतीस फागुण सुदी दशमी,दिन शुभ आयो रे, गाँव सरेरी वांध माँही यह, जोड़ सुनायो रे ॥२२॥ - मुकुट 10000 .. ४७
१२
धीरज
काम बनाये
(तर्ज-नेमजी की जान बरणी भारी)
आतुरता दुःख ही दुःख लावे, धैर्य रख जीवन सुख पावे ।टेरा
नगर एक सज्जनपुर सुखकार, नायक जहाँ सज्जनसिंह भूपाल ।
प्रजा की करे सार सम्भार, दीन हित खोल दिया भण्डार ।।
दोहा-तिण शहर में विप्र इक, महासेन गुणवान ।
चन्द्र पुत्र काशी पढ़ पाया, हो पूरा विद्वान् ।।
नगर में आदर अति पावे ।। धैर्य० ।
चन्द्र का सुयश सब माँही, फैल रहा जल में तैल सा ही ।
करे नहीं पिता कदर काँई, इसीसे मन रहा अकुलाई ।।
दोहा-अादर से बोले नहीं, रखे न मेरा मान ।
अतः पिता की हत्या करदू,घुस गया दिल शैतान ॥
धार यों कुठार एक लावे ।२। धैर्य० ।
रात में गया शस्त्र कर घार, मात पितु वैठे हैं उसवार ।
मोका लख दूंगा इनको मार, छिपा वह कर नंगी तलवार ।।
दोहा-~उस समय मा जनक से, कह रही ऐसी बात ।
कैसी उज्ज्वल हुई चांदनी, दिन कर मम माक्षात् ।।
मेसी क्या नीति कोई पावे ।। धैर्य ।
जनप रहे तेरे पुत्र माही, कीति है इनो
इगो अधिकाई।
नार महे माने गदर नाही, पति जब उसको दरमाई ॥
दोहा- यदि कदर उनकी कार, शान हृदय में प्राय ।
किया बदलामा, नमो मन माय
पग ४० ।
- अधम मैं कितना निरभागी, भावना क्यों दिल में जागी। पिता को मारू लव लागी, आया मैं यहाँ तक दुर्भागी । दोहा-कैसे छूटू पाप से, मन में करे विचार ऐसे सोचते उसके कर से, छूट गई तलवार ।। त्वरित वह पुनः स्थान जावे ॥ धैर्य ।।५।। प्रातः वह पिता पास आया, वंदन कर चरणे शिर नाया । हृदय के भाव दरसाया, निर्णय हित चल करके आया ।। दोहा-पिता घात की भावना, पुत्र हृदय में आय । प्रायश्चित क्या भोगे उसका, देवें आप बताय ।। पिता सुन ऐसे दरसावे ।। धैर्य ॥६॥ पीपल की सूखी लकड़ी लाय, बैठकर उसमें आग लगाय । अथवा देशान्तर को जाय, वर्ष वहाँ बारह रहे बिताय ।। दोहा-घरवालों के वास्ते, व्यवस्था कर जाय । तब वह छूटे ऐसे पाप से, शास्त्र में दरसाय ।। पुत्र सुन दिल में दुख पावे ।। धैर्य ।।७।। सेठ एक सुन्दर साहूकार, चन्द्र ने पत्र लिखा उसवार, । चाहे मुझ रुपये बारह हजार, उत्तर भी देना कृपा विचार ।। दोहा-उकताये काम नसाइये, धीरज काम बनाय, प्रत्येक कार्य में रखो धैर्यता, जीवन आनन्द पाय । पत्र दे रुपये मंगवावे ।। धैर्य ।।८।। सेठ लख पत्र दाम दीना, भरोसा कागज पर कीना, । पेटी पर पत्र लगा दीना, प्रतिक्षण देखे रंग भीना । दोहा-कितना अच्छा लिख दिया, दोहा विप्र बनाय । बार २ लख सेठ हृदय में, गहरा आनन्द पाय ।। श्रद्धा मन मांही वो लावे ।। धैर्य ।।९।। द्रव्य. ला चन्द्र स्थान पर प्राय, रकम दी आधी पिता कर मांय । नमन कर पुत्र विदेश में जाय, वहीं पर वारह वर्ष विताय ।। दोहा-इधर सेठ भी काम से गया विदेश के माँय । तीन माह की पुत्री पीछे, नारी को संभलाय ।। पुनः झट आऊँ कह जावे ।।१०।। धैर्य ।। पुत्री का पालन माँ करती, ध्यान सब घर का भी रखती। काम की देख रेख करती, पति की आज्ञा सिर धरती ।। ४९
सुन्दर दिखलावे
दोहा-चाले कुल की पान में, रक्खे पूरी शान,
रंच न खण्डित होने पावे, रखती इसका ध्यान ।
पुत्री को शिक्षा दिलवावे ।। धैर्य ।।११।।
नगर में नाटकिये आवे, खेल वे
पुत्री सुन मां से दरसावे, देखन की इच्छा मुझ थावे ।।
दोहा-मात कहे पुत्री सुनो, है यह कुल की लीक ।
घर वाहर नही जावे रात में, है पुरखों की सीख ।
अतः तू मत मन ललचावे ।। धैर्य ।।१२।।
सहेल्या जा रही हैं इस वार, जाने दे मत कर तू इन्कार ।
कहे तो पुरुप वेश लू धार, प्यार से हाँ भरली इस बार ।।
दोहा-पुरुप वेश में जा रही, नहीं सके पहचान ।
अर्ध रात तक देख खेल वह, वापिस पा गई स्थान ।।
मात के पास सो जावे ।। धैर्य ।।१३।।
नींद से वेश सकी ना त्याग, बंधी है ज्यों की त्यों ही पाग, ।
मात भी देख सकी नहीं जाग, पुत्री पर पूरा है अनुराग ।।
दोहा-- उस ही वक्त मध्य रात में, आये सेठ जी चाल ।
आकर देखे भवन बीच में, कैसा वहाँ का हाल ।।
क्रोध झट मन में छा जावे ।। धैर्य ||१४ ।।
नार मुझ पतिव्रत कहलावे,
गुप्त में पर से यह खावे ।
चोर भी रंगे हाथ पावे, भाग अब कहाँ पर ये जावे ।।
दोहा-मैं भी इतने वक्त तक, करता था विश्वास ।
आज प्रत्यक्ष में जान गया हूँ, है व्यभिचारणा ग्रास ।।
नला हुरी कि मरजावे ।। धैर्य ।।१५।।
पड़ी तलवान उठा लीनी, मान से बाहर कर दीनी ।
पटी पर निगाह भी पीनी, अधार लगा मन गांही चीनी ।।
दोहा-पहने ता कर इन्हें फिर मान तलवार।
पिता सुन देखे सुता प्यारी, आज तो होता पाप भारी । अभी मर जाती पुत्री नारी, जगत में होती मुझ ख्वारी ।। दोहा-इन कर्मों से छटना, होता अति दुष्वार । किस योनी में या किस गति में, पाता दुःख अपार ।। किये का पश्चात्ताप लावे ॥ धैर्य ॥१८॥ शिक्षा यह अघ से छुड़वाये, आतुर नर पापी बन जावे । धैर्य से काम सुधर जावे, शान यह जग में बचवावे ।। दोहा-मिले परस्पर प्रेम से, आपस माँही खमाय । निज निज की गलती बतलाकर दीना भरम मिटाय।। रुपये विप्र तभी लावे || धैर्य ।।१९।। सेठ ने कही शिक्षा सुखकार, नहीं है रुपयों की दरकार । शिक्षा से रहा मेरा घर बार, चन्द्र को विदा किया उसवार ।। दोहा-सेठ सेठाणी पुत्री पर, हुआ असर इस बार । यदि मौत आ जाती अपनी, होता व्यर्थ अवतार ।। अतः हम धर्म शरण जावे ।। धैर्य ।।२०।। विचरते धर्म गुरु आये, वाणी सुन संयम मनभाये । अर्थ सुकृत में लगवाये, दीक्षा में लगवाये, दीक्षा ली उज्ज्वल चितचाये ।। दोहा-ज्ञान क्रिया में रमण कर, कीना भव जल पार । पुनः लौट नहीं आवे जग में, लिया सिद्ध अवतार ।। आत्मा अजर अमर थावे ।। धैर्य ।।२१।। प्राज्ञ गुरु पूर्ण उपकारी, तास रज “सोहन' दिलधारी । कथा कही सबको हितकारी, धारज्यो शिक्षा सुखकारी ।। दोहा-दर्शन की दीक्षा . बड़ी, शहर मसूदा माँय । दो हजार तेतीस मगसर, सुद, ग्यारस गुरु दिन प्राय।। चतुर्विध संघ हर्ष पावे ।। धैर्य ॥२२॥ ५१ लोभ विनाशे १३ ज्ञान को (तर्जनेमजी की जान वणी भारी ) ध्यान से सुनो समझ पावे, बुद्धि बिन गोता नर खावे ।।टे।। एक दिन भोज सभा मांही, बहेलिया पाकर दरसाई। तोता है मेरे पास माँही, खरीदो आप इसे यहाँ ही ।। दोहा-मानव की भापा कहे, ज्ञान युक्त गम्भीर । चतुर पुरुप हो अर्थ बतावे, मूरख पावे पीर ।। भूप सुनि ऐसे दरसावे ॥१॥ कहो क्या कीमत है भाई, है भाई, दाम ले रखो यहाँ लाई । कहे सो सो दीने दीने दिलवाई, दिलवाई, दाम ले तोता संभलाई ।। दोहा-जाते वक्त यह कह गया. सुन लेना नरनाथ । ये शुक अद्भुत ज्ञानी है, जो कहे लाखिरणी वात ।। विदा हो अपने घर जावे ॥२॥ पान में तोता रख लीना, विनोद में भूपति कह दीना। करो कोई प्रश्न रंग भीना, तोते ने यही प्रश्न कीना ।। दोहा-सबसे बुरी क्या चीज है, इस जगती के मांस । अर्थ बताये वही चतुर नर, वागी मूग्रं नहाय ।। लोन दिलवावे ||३|| भूप गुन गयको दरमाये, सभासद् गुनलो चित लावे। नक्ष धन वह नर ही पाये, नहीं जो उतर बतलाये ।। दोहा ----पथित जन सुन लो ममी, यदि न उगर माय । गीप बाट नारयाद मन को, धन पर को लुटवाय ।। दिन बनाये प्रश्न साधारण दरसावे उत्तर नहीं इसका तुम पावे । पण्डित कहे क्या है बतलावे, तभी कठिहारा दरसावे ।। दोहा—यहाँ नहीं नृप पास में, कह दूगा सब सार । इनाम चाहे तुम ले लेना, मुझको नहीं बिचार ।। पण्डित सुन करके हरसावे ।।६।। दिये चल दोनों संग माहीं, गये कठियारा घर आई। डालकर भारी दरसाई, श्वान को लीना बुलवाई ।। दोहा-कुत्ते बिन में नहीं चलू, अतः उठालो लार । पण्डित झट गोदी में लीना, चला संग दरबार ।। सभासद लख विस्मय पावे ॥७॥ भोज नृप लखकर फरमाये, अरे ? क्यों श्वान साथ लाये । तभी कठियारा कठियारा दरसावे, बात पर ध्यान भूप लावे ।। दोहा-सबसे खोटी बात है, लालच बुरी बलाय । इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखलो, पण्डित श्वान उठाय ।। साथ में मेरे चल आवे ।।८।। बीतक सब नृप को बतलावे, लोभवश पण्डित संग आवे । लेना यह लक्ष दाम चावे, श्वान को उठा गोद लावे ।। दोहा—सब पापों का बाप यह, अनहोनी करवाय । विद्वान पुरुष भी आज यहाँ, गये कर्तव्य भुलाय ।। लालच से मति बिगड़ जावे ।।९।। सभासद सुनकर हरसावे, सत्य है मुख से दरसावे । लालचवश सब जन दुख पावे, मृत्यु भी अपनी बुलवावे ।। दोहा-बुद्धि लखकर भूपने, दीना लक्ष इनाम । बड़े २ पण्डित नहीं कीना, वैसा कीना काम ।। लोक में इज्जत बढ़ जावे ॥१०॥ सभासद सुन लेना सव हाल, लोभ तज बनिये आप निहाल । लोभ कर देता है पेमाल, बात सच मान बचालो माल ।। दोहा-प्राज्ञ कृपा "सोहन" मुनि, कहे यों बारम्बार । लालच तज संतोष धार लो, होवे बेड़ा पार ।। सार सुख शिवपुर का पावे ॥११॥ D ५३ १४ पुण्य की पहेली नौ रखण्ड की हवेली ( तर्ज-नेमजी की जान बरणी भारी) साथ में सुकृत ले आवे, वही नर सुख सम्पति पावे ॥टेर॥ सुकृत से आर्य क्षेत्र पावे, सुकृत से नरभवः मिल जावे । सुकृत से तन निरोग पावे, सुकृत से सब सुख प्रकटावे ॥ दोहा-भोगे यहाँ सब साहिबी, पावेः भोग. रसाल । सेवा में नर रहे. अनेकों, मिले सदा तरमाल । राग रंग नूतन नित पावे ॥१॥ मनोहरपुर. भू पर शुभ स्थान, भानुसिंह वहाँ का है सुलतान । प्रजा का रखना पूरा ध्यान, राणी भी विमला है पुण्यवान ।। दोहा-उसी शहर में सेठ एक, कोटि पति सुजान । अमीचन्द अभिधान से उसकी, ख्याति हुई महान । ध्यान जिनवर का नित ध्यावे ॥२॥ सेठाणी सुर सुन्दर प्यारी, पतिव्रत धर्म लिया धारी। पुत्र हैं चार सुखकारी, पुत्री एक . लक्ष्मी यश वारी ।। दोहा-दास दासी परिवार है, पूरा घर के माँय । कमी नहीं है कुछ भी यहाँ पर, आनन्द में दिन जाय।। नित्य मन इच्छित फल पावे. ॥३॥ एक दिन बुला भृत्य ताँई, वात लक्ष्मी ने दरसाई। बिस्तर मुझ नौ खण्ड पर जाई, लगा तुम देना फरमाई ।। दोहा-सुनकर नौकर ने कहा, क्यों इतने इतरात । आगे का भी ख्याल करो, यह कहता हूँ सच वात ।। में जरा लावें. ॥४॥ ससुर गृह ऐसा नहीं पावे, वात फिर मन में रह जावे । प्राजा तब किस पर फरमावे, वाई मन वात वैठ जावे ।। ध्यान प्राप ५४.
पावे ॥६॥ दे मुझे तो दोहा--माता पिता से कह दिया, नौ खण्ड वाला होय । उसके घर में मुझे ब्याहना, और न चाहूँ कोय ।। पिता कहे खोज करवावें ॥५॥ सेठ ने सेवक बुलवाया, बात कह उसको समझाया मिले जहाँ जाकर के भाया, खण्ड नौ देखो फरमाया ।। दोहा-सम्बन्ध तय कर भावना, विवाह विधि भी लार । आज्ञा लेकर चला वहाँ से, घूमे देश मंझार ।। हवेली वैसी नहीं पावे मास छः ऐसे बीताया, खिन्न हो पुनः गांव आया। सेठ को पाकर दरसाया, मिले नहीं खूब घूम आया । दोहा- सेठ कहे कँवरी भणी, दे तू हठ को त्याग । अच्छा घर वर देख ब्याह दूं, खुल जावे तुझ भाग ।। तो नौखण्ड ही चावे ॥७॥ चाहे मैं कंवारी रह जाऊँ, अन्य के साथ नहीं ब्याऊँ । कही सो बात वही चाहूँ, हृदय से सच्ची दरसाऊँ ।। दोहा-सुनकर के सब सेठजी, क्रोधित हुए अपार । सेवक को यों आज्ञा दीनी, जाओ तुम इस वार ।। कहीं भी कोई मिल जावे ॥८॥ देखना नौ खण्ड वाला स्थान, दीन हो चाहे हो धनवान । चतुर हो चाहे मूर्ख नादान, भला हो चाहे बुरा इन्सान ।। दोहा-सेवक आज्ञा ले चला, उज्जैनी में प्राय । फिरते फिरते नौ खण्डवाली, दी हेली दिखलाय ।। उसी के चल आवे ॥९॥ ध्यान से गिने खण्ड हरसाय, खण्डहर पूरी यह दिखलाय । रहे नहीं कोई इसके माँय, तथापि नौ खण्ड पूरे पाय ।। दोहा- देख अवस्था हेली की, पूछ रहा सब हाल । कैसे इसकी विगड़ी हालत. कौन करे सम्भाल ।। कर मुझको दरसावें ॥१०॥ पड़ोसी बोला कहूँ क्या हाल, सेठ के घर में गहरा माल । अचानक पाकर ले गया काल, शेष रहे छोटे-छोटे वाल । पास कृपा ..५५ देख कर सार। दोहा-मुनीम गुमास्ता खा गये, सारे घर का माल । सभी दुकानें बन्द हो गई, बिगड़ गया सब हाल । पलक में रंग पलट जावे ॥११॥ बालक दो माणक मोतीलाल, मामा आ ले गया है ननिहाल । पता नहीं उनका क्या है हाल, सुनाते दुःख होता असराल ।। दोहा-सुनकर सेवक चल दिया, आया उस ही ग्राम । पूछताछ कर पता लगावे, क्या करते वे काम ।। राह. में . पटेल मिल जावे ॥१२॥ पटेल कहे क्या है उनसे काम, सेवक ने कह दी बात तमाम । बात सुन ले पाया निज धाम, भोजन का कर दीना इन्तजाम ॥ दोहा-मामा को दी सूचना, श्रावो है यहाँ काम। आये सगाई करने दूर से, सुनलो बात तमाम ।। मामा इन्कारी कर जावे ॥१३॥ खेत पर काम करन जावे, शाम को बालक घर आवे। सेवक हरसावे, पुण्यशाली ये दिखलावे ।। दोहा-माणक का दस्तूर कर, दीना श्री फल पटेल ने "झट कर में लीना, नहीं कीना इन्कार ।। विवाह तिथि तय करके जावे ॥१४।। वापिस चल अपने स्थान आया, सेठ को हाल दरसाया। सगाई तय करके आया, सेठ सुन अति आनन्द पाया । दोहा-विवाह तिथि भी पा रही, अक्षय तीज महान। काम करो जल्दी से सारा, करके पूरा ध्यान । वस्तुएं सारी मंगवावे ॥१५॥ निमंत्रण सेठ भेज दीने, बड़े-बड़े भूप बुला लीने । सभी संकेत उन्हें कीने, चूकना मत यों लिख दीने ॥ दोहा तिथि वार भी लिख दिया, संवको ही उस वार । जोर शोर से काम हो रहा, देख रहे नर नार ॥ बरात अव कैसी यहाँ प्रावे ॥१६॥ विवाह का समय पास में प्राय, पटेल भी मामा को बुलवाय । कहो अब काम करो मन चाय, वात सुन मामाजी दरसाय ॥ दोहा-कोड़ी नहीं मुझ पास में, नहीं जाऊँ मैं लार । ऐसी बात सुनाकर वापिस चला गया तत्कार ।। पटेल सुन मन में यों लावे ॥१७॥ ५६ . काम तो करना है इस बार, वस्त्र सब करवाये उसवार । सजाकर बोंद किया तैयार, नकासी कीनी है तत्कार ।। दोहा-बाजे गाजे · साथ में, फिरा गांव के मांय । अति हर्ष से सब मिल करके बहनें मंगल गाय ।। जान में गाड़ी जुतवावे ॥१८॥ गाड़ी में दोनों भ्रात जावें, साथ में कोई नहीं पावे । पटेल तब उनको समझावे, खर्च हित पैसा दिलवावे ।। दोहा-जा रहे हैं मोद से, ब्याहने माणक लाल । समय-२ की बात देखलो, कैसी जग की चाल ।। बिगड़ी में दूरा हो जावे ॥१९॥ सेठ कहे सेवक से हरवार, आई नहीं जान लगाई बार । सेवक कहे दूरे का है कार, अतः कुछ धैर्य धरो इस बार ॥ दोहा-इतने में ही आ गई, जिनको रहे निहार । पटेल सेवक मिलकर उनसे, कीनी बात सब सार ।। सेठ को सेवक बुलवाये बुलवाये ॥२०॥ बारात अब आ गई अपने द्वार, सेठ कहे कहाँ बराती लार । बींद अरू भाई है इस वार, और नहीं कोई इनकी लार ।। दोहा-देख सेठ उस वक्त में, बोला यों तत्काल । मेरी सारी इज्जत खो दी, नालायक बदचाल । सेठ उठ निज घर को -जावे ।।२१।। क्रोध कर कंवरी से बोला, मचाया नौ खण्ड का रोला । हृदय. में कुछ भी नहीं तोला, मुख से व्यर्थ बचन खोला ।। दोहा-उसका फल अब भोगले, जीवन भर दुख पाय । तेरे साथ में मेरी इज्जत, दीनी सभी गंवाय ।। आई सो. मुख से फरमावे ॥२२।। जल्दी में फेरा कर दीना, गाड़ी में बिठा विदा कीना । दहेज में पैसा नहीं दीना, कहे तू भोग कर्म कीना ।। दोहा—पति पत्नि अरु मोती है, तीनों गाड़ी माँय । भौजाई से देवर पूछे, पूछे, दीजे नाम बताय ।। नाम मुझ लक्ष्मी बतलावे ॥२३॥ नाम सुन बोला अरे भाई, लक्ष्मीजी अपने घर पाई। दरिद्र अब गया समझ भाई, फलेगी इच्छा मन चाही ।।
दोहा-ज्येष्ठ. भ्रात सुन लीजिये, करिये नहीं विचार । दहेज माँही मिला हमें यह, लक्ष्मी का अवतार ॥ कमी नहीं अपने घर -पावे ॥२४॥ राह में भूख लगी भारी, कहे यों माणक इस बारी। भूगड़े लावो गुणकारी, करो तुम जल्दी .. तैयारी ।। दोहा-सुन तुम भाभी के लिये, पूड़िये लेते. आय । तभी लक्ष्मी ने कहा पति से, ऐसा मत फरमाय । सभी को पुड़िये खिलवावे ॥२५॥ अंगूठी मेरी ले जावें; वेचकर पुड़िये ले पावें। तभी यों प्रीतम दरसावे, बने नहीं वापिस समझावें ।। : दोहा-नारी बोली नाथ जी, नहीं है मुझको चाह । गहणों से नहीं कीमत मेरी, मिले आपसे नाह ।। कमी नहीं मेरे पास प्रावे ॥२६॥ सानन्द सब भोजन कर पावें, गांव मामा के ग्रा जावें । ठाठ से पटेल घर लावे, वादित्र भी खूब बजवायें ।। दोहा-मामा के घर भेजकर, कहे रहो उस स्थान । मामा, मामी के चरणों में नमें दम्पत्ति पान ।। देखकर लावे ॥२७॥ खर्च यह मुझ घर में आया, तभी मामी ने फरमाया। पानी भर लामो दरसाया, बात सुन बहू के मन आया ।। दोहा-आज तलक कीना नहीं, ऐसा घर में काम । अवसर लख कर विन वोले ही,गई पनघट पर वाम ।। कौन यहाँ पानी खिचवावे ॥२८॥ देवर या नीर भरवावे, उठा घट सिर पर वह लावे । ऐसे बीतावे, बीतावे, एक दिन ' भाभी फरमावे ।। दोहा--नौ खण्ड की हेली कहाँ, देवो वह दिखलाय । देवर बोला उज्जैनी में, चलेंगे अवसर पाय ।। वहीं पर हेली दिखलावें ॥२९॥ एक दिन तीनों ही चलकर, ग्रा गये उज्जैनी शहर । हवेली नो खण्ड की लखकर, बोली यो लक्ष्मी हकिर ।। मामा मन मास त्रय दोहा-साफ सफाई कर यहाँ, रहे मोद के माँय । ले लो मेरे भूषण सारे, लेवो हाट चलाय ।। बात दोनों के जम जावे ॥३०॥ बेचकर सभी वस्तु लावे, काम अब अच्छा चल जावे । कमाई लखकर हरसावे, उत्साह भी बढ़ता ही जावे ।। दोहा-एक दिन देवर से कहे, आगे भीत रही आय । लकड़ी का कुछ ठोसा मारो, तब देवर दरसाय । पुरानी भीति गिर जावे ॥३१॥ भाभी इक लकड़ी उठा लाई, भींत के देना वह चाही। देवर कहे ऐसा करो नाँही, पड़ेगी यह ऊपर आई ।। दोहा-लक्ष्मी ने ठोसा दिया, खुल गयां धन भण्डार । हीरे पन्ने माणक मोती, क्रोड़ों के उस बार ॥ भूमि पर ढेरी हो जावे ॥३२।। देखकरं देवर दरसावे, भाभी के चरणों गिर जावे। लक्ष्मीजी लक्ष्मी ले आवे, दरिद्र अब यहाँ का सब जावे ।। दोहा-इतने में बड़े भ्रात भी, आये हवेली माँय । पड़ा देख धन बोला ऐसे, गया कहाँ से आय ।। भेद सब मोती बतलावे ॥३३॥ भ्रात सुन आश्चर्य अंति पाया, लक्ष्मीजी मेरे घर आया । भाग्य हम सबका खुलवाया, अखूट धन घर माँही आया । दोहा-धन से निज व्यापार को, दीना खूब बढाय । पहले से भी अधिक हो रहा, नाम जगत के माँय ।। गया द्रव्य पावे ॥३४।। बकाया कर्ज लोग लावे, कराकर जमा पुनः जावे । गड़ा हुआ धन भी मिल जावे, दिनों दिन धन बढता जावे ।। दोहा-वृद्ध मुनीम एक आय के, देखे हाट का काम । खुश होकर के बोला ऐसे, लख पाया आराम ।। बात वह अपनी दरसावे ॥३५॥ रहा मैं मुनीम पूर्व के मांय, भेद सव दीना वह बतलाय । दुकान में गड़ा द्रव्य दिखलाय, हर्ष धर वहाँ से भी निकलाय ।। - पुण्य से ५९ सदा बात सुन दोहा-मुनीम वापिस रख लिया, दीना बहुत इनाम । बैठे ध्यान रखो यहाँ सारा, नहीं करना कुछ काम ॥ सम्मान बढवावे. ॥३६॥ मामा अरु मामी चल आवे, हजारों रुपये दिलवावें। किया उपकार याद लावे, समय पर कर्जा भुगतावें ।। दोहा-पटेल को भी याद कर, दिया खूब धन माल । ससम्मान स्थान पहुंचाया, करके उसे निहाल।। भले का भला ही फल पावे ॥३०॥ बालद एक यहाँ पर है आई, केसर और कस्तूरी लाई । कीमत सुन बात करे नाही, माणक को बातें दरसाई ।। दोहा-लेने वाला है नहीं, रहा मालिक घबराय । उस ही क्षण माणक जा बोला,बालद हम घर लाय॥ कीमत हो उतनी ले जावे ॥३८।। मुनीम हरषाया, सेठः को पत्र भिजवाया ।' मनोहरपुर से चल पाया, माल का सौदा करवाया ।। दोहा--दोनों भ्राता. सेठ को, ले आये निज धाम । में पहचान सके नहीं, करे काम से काम ।। भोजन हित बात दरसावे ॥३९॥ मान से हेली में लावे, देखकर शाहजी चकरावे । पार नहीं धन का यहाँ पावे, द्रव्य बिन माल कौन लावे॥ दोहा-हेली में घुसते लखा, लक्ष्मी ने उस बार । आज पिताजी आये घर में, छाई खुशी अपार ।। भावना ऐसी लावे ॥४०॥ पहन लू पीहर का ही बेश, पिताजी समझ जाय सब रेश । शंका नहीं आवे मनमें लेश, बना लिया मन चाया ही भेप ।। दोहा-स्वयं लक्ष्मी थाल ले, आई पिता के पास । देख उसे यों सोचे मनमें, यह पुत्री मम खास ।। यहाँ पर कैसे प्रा जावे ? ||४१।। पाई, वात सब देयो दरसाई । कौन ये इस हेलो मांही, बतायो शंका रहे नांहीं ॥ दोहा--जिनके संग में आपने, कोनी मुझको लार । यही अापके जामाता हैं, देखो नयन पसार ॥ शंका सव दिल की मिट जावे ।।४।। प्रापस मन कहा तू यहाँ कैसे
पाली ।
तू
हवेली नौ
खण्डों वाली, चाह थी मैने वह
प्रतिज्ञा पूरी
कर डाली, देखलें इसको नीहाली ॥
दोहा-यह कह कर पितु चरण में, झुका दिया है शीश ।
उठा पिता पुत्री से बोले, देऊँ मैं आशीष ।।
द्रव्य लख बुद्धि चकरावे ॥४३॥
लक्ष्मी लक्ष्मी का अवतार, भाग्य से मिले तुझे भरतार ।
नम्र अरु है उत्तम दातार, देख लिया अच्छी तरह इस बार ।।
दोहा-मैं तुझको समझा नहीं, कीना कोप अपार ।
उसके लिये क्षमा कर देना, कहता बारम्बार ।।
हुआ सो उसे भूल जावे ॥४४।।
पिताजी दोष नहीं थारों, दोष सब म्हारा कर्मी रो।
आप तो चाहो हित म्हारो, मिला सुख सब प्रताप थारो॥
दोहा-बातें कर बाहर गया, बोला सेठ तत्काल ।
ये सारे ही वालद मैंने, दिये दहेज में माल ।
उठालो कीमत नहीं चावे ॥४५॥
विवाह के वक्त नहीं दीना, काम में अच्छा नहीं कीना।
भूल का प्रायश्चित्त लीना, जामाता लख फूला सीना ।।
दोहा --अपना २ भाग्य है, ना देखा कोई खोल ।
आप कर्मी कन्या होती है, सेठ कहे यों बोल ।।
क्षमा अब सबसे ही चावे ॥४६।।
पुण्य
सब सुलटा हो जाय, पुण्य से मिले सम्बन्धी प्राय ।
अचिंतित लक्ष्मी भी मिल जाय, पुण्य से मानव मौज मनाय ।।
दोहा-आनन्द में दिन जा रहे, दिया भ्रात परणाय ।
कमी नहीं कुछ भी घर अन्दर, नूतन सुख प्रकटाय ।।
भावना सुन्दर बन जावे
खव ही दान गुप्त देवे, मिली पूजी से लाभ लेवे ।
भावना बढ़ती ही जावे, चीज सब मन चाही पावे ।।
दोहा-ऐसे वक्त में आ गये, धर्म घोष अरणगार ।
शिष्य मण्डली सभी साथ में, ठहरे बाग मंझार ।।
आज्ञा वनमाली से
पावे
राजा अरु प्रजा वहाँ आये, वंदन कर मन में हरषाये ।
मुनिवर वारणी फरमा, भेद कर्मों का समझावें ॥
॥४७॥
॥४८॥
दोहा-माणक सुन वाणी तदा, कीनी यों अरदास । कैसे दुख में दिवस बितायें, कैसे मिली सुखरास ।। भेद सब मुनिवर दरसावें ॥४९॥ पूर्व भव तीनों बहन भाई, एक दिन मुनिवर गये आई। बहिन दिया आहार बहराईं, खिन्नं हुए तुम दोनों भाई ॥ दोहा-कुछ दिनों पश्चात ही, पाया सुन्दर ज्ञान । तब से ही तुम दोनों भाई, करने लगे धर्म ध्यान ।। भविष्य जब सुलटा आ जावे ।।५।। दान से अलूट रिद्धि, पाई, कोटि पति घर में यह आई। खिन्न हो भाव शुद्ध लाई, विपत्ति सह फिर सम्पत्ति पाई ॥ दोहा-सुनकर के वृतान्त संव, लिये श्रावक व्रत धार । सुपात्र दान से पावे मानव, जल्दी भव जलपार ।। यह ज्ञानी फरमावे ॥५१॥ मुक्ति का मार्ग चार गावे, आगम में रहस्य बतलावे । करो धारण यदि सुख चावे, मनुष्य भव मुश्किल से पावे । दोहा - अच्छा अवसर पाय के, सजग रहो हर बार । दान, शील, तप, भाव पाराधो, सफल करो अवतार ।। पुनः यह मौका नहीं आवे ॥५२॥ विचरते उपरेड़ा आये, पैंतीस मन भाये। होली चोमासी यहाँ ठाये, सभी जन मन आनन्द पाये ।। दोहा-प्राज्ञ कृपा "सोहन" मुनि कहे यों वारम्वार । त्याग तपस्या करके करलो, जग से जीवन पार ।। मुक्ति का स्थान मिल जावे ॥५३।। सार साल 0:50 पार ६२ कर्ज चुकाना १५ ........... होगा ) ....... •. ( तर्ज-एवन्ता मुनिवर, नाव ऋण वैर चुकाना, निश्चय होगा, जो कीना जीव ने ।।टेर॥ पाँच भूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश । इनके योग से देह बने तव, पाता जीव विकास जी ॥१॥ जिस दिन ये पांचों बिखरेंगे, उस दिन जीव विनाश । अत: खूब तुम खाओ पीओ, मौज करो धर आश जी ॥२॥ ना कोई स्वर्ग नरक है जग में, ना कोई शाश्वत जीव । जब तक जीनो सुख से जीओ, कर्ज करो घृत पीव जी ॥३॥ ना कोई कर्जा देने वाला, ना कोई लेने वाला। जीव और जड़ नश्वर माने, नास्तिक का मत काला जी ॥४॥ किन्तु यह चार्वाक व्यर्थ में, लोगों को भरमाता। सही बात को बिरला नर ही, समझ हिये अपनाता जी ।।५।। किया कर्ज ना कभी टलेगा निश्चय मानो मानो बात। एक कथा के माध्यम से हम, समझेगे साक्षात जी ।।६।। संभव पुर में भूपति "संभव" प्रजा पाल हितकार । चन्दन सम राणी जी चंदना, भूपति को सुखकार जी ।।७।। में सेठ बसे, श्री अजितसेन धनवान । सेठाणी कमला है घर में, पतिव्रता पुण्यवान जी ॥८॥ मिली सम्पदा से यश लेता, दान करे धर प्यार । जो भी आये धन ले जाये, नहीं कभी इन्कार जी ।।९।। यदि उधार भी लेना चाहे, तो पैसा तैयार । पुन: नहीं दे सकता हो तो, लिख दे लेख मंझार जी ।।१०।। इस. भव में मैं दे न सकूगा परभव दूंगा दाम । चाहे जितनी रकम लीजिये, रुके न कोई काम जी ।।११।। उसी शहर - . w प्रातः काल यों सेवा करने से करने से उसका, नाम हुआ चहुँ ओर । सब नर नारी अजित सैन के, गुण गावे उठ भोर जी ॥१२॥ एक समय दो ठाकुर साब ने, मिलकर किया विचार । सेठ साहब से दोनों लायें, रुपये बीस हजार जी ॥१३॥ आगे कौन है देने वाला, वाला, कौन मांगने आता। मौज करेंगे मुफ्त माल से, लिखने में क्या जाता जी ॥१४॥ दोनों करके बात परस्पर, आये सम्भव ग्राम । सेठ साहव से बातचीत की, तब तक हो गई शाम जी ।।१५।। रुपैये लेंगे, रात रहेंगे आज । नोहरे में सब करी व्यवस्था, खान पान सुख साज जी ।।१६।। अर्ध रात में नींद खुली तब, देखा अनुपम काम । गाय और भैंसा आपस में, कर रहे बात तमाम जी ।।१७।। भैंसा पूछ रहा है गौ से, सुनले मेरी बहिना । सेठ साहब का कर्ज तेरे में, कितना है अब देना जी ।।१८।। प्रातः काल का दूध चुकाना, केवल रहा बकाया । उसके बाद उऋण होऊँगी, सुनले मेरे भाया जी ।।१९।। तेरे में कितना है कर्जा, दे तू साफ सुनाई। सौ रुपिया है और चुकाना, बोला भैंसा भाई जी ।।२०।। उसका भी है एक तरीका, चूके जल्दी दाम । सेठ साहब को कह दे कोई, तो बन जावे काम जी ।।२१।। पट हस्ती में सौ रुपिया मैं, मांग रहा इस वार । अगर लड़ादे अभी मुझे तो, हस्ती जावे हार जी ।।२२।। निश्चय जीत मेरी ही होगी, सौ की शर्त लगावे । करे भूप से बात सेठ तो, काम मेरा बन जावे जी ।।२३।। पशु भाषा के ज्ञाता ठाकुर, सुनकर करे विचार । क्या ये दोनों सत्य कह रहे, करें परीक्षा सार जी ।।२४।। प्रात: काल दोनों ही ठाकुर, गये सेठ के द्वार । कहा सेठ ने कितनी रकम की, है तुमको दरकार जी ।।२५!! ठाकुर बोले एक हमारी, अर्ज सुनो चित्त लाय ।' रकम बाद में लेंगे. पहले, काम करो सुखदाय जी ॥२६॥ राजाजी के पट हस्ती से, भंसा दो भिड़वाय । तो रुपयों की हार जीत की, शर्त माथ लगवाय जी ॥२७॥ ६४ भैसा आपका ही जीतेगा, शंका नहीं लिगार। सौ रुपये हम दोनों देंगे, अगर गया वह हार जी ॥२८।। बात हमारी सत्य मानकर, करो आप यह काम । हस्ती हार से सेठ साहब का, होगा यश और नाम जी ॥२९॥ सत्वर जा नृप पास सेठ ने, अपनी बात सुनाई। सौ रुपयों की शर्त श्रवणकर, नृप ने हाँ फरमाई जी ॥३०॥ विद्युत सम ये बात शहर में, फैल गई चहुँ ओर । लोग हजारों हुए इकट्ठ, खाली रही ना ठौर जी ॥३१॥ कोई कहते गज जीतेगा, कोई कहते भैंसा। भूपति की जय जय होवेगी, सेठ खोयेगा पैसा जी ।।३२।। खड़ा किया मैदान बीच में, गज भैंसा को लाकर । तिलक लगा माला पहनाई, बहारु ढोल बजाकर जी ॥३३॥ दोनों लड़ने लगे परस्पर, कौतुक बहुत दिखावे । देख-देख दाँतों के नीचे, अंगुली सभी दबावे जी ।।३४।। भैंसे ने खा जोश जोर की, टक्कर गज के मारी। तत्क्षण पैर उखड़ गये उसके, भगा हार खा भारी जी ।।३।। दर्शक सारे बोल रहे यों, भैंसा पा गया जीत । सबके सन्मुख आज दन्ती की, हो गई पूर्ण फजीत जी ।।३६।। शर्त मुग्राफिक नृप ने रुपिया, सेठ साहब को दीना । कर्ज चुकाकर भैसे ने, परलोक गमन कर लीना जी ॥३७।। चन्द समय पश्चात् ग्वाल ने, कहा सेठ से आई। घास फूस चरती गैया भी, परभव गई सिधाई जी ।।३८।। यह सब हाल देखकर सुनकर, ठाकुर करे विचार । कर्ज नहीं लेंगे हम दोनों, कठिन चुकाना धार जी ।।३९।। ना जाने किस भव में जाकर, होवेगा छुटकार । अत: नया ऋण नहीं करेंगे, सीख हिये में धार जी ॥४०।। ऋण और बैर किसी के संग में, बांध जीव जब जाय । भव भवान्तर पड़े चुकाना, किसी रूप के माँय जी ॥४१।। इसी तरह कर्मों का कर्जा, कठिन चुकाना होता। जिस दिन उदय आयगा, उस दिन जीव रहेगा रोता जी ।।४२।।
अतः कर्म का कर्ज कभी भी, भूल करो मत कोय ।
सीख मान लो सद् गुरुवर की, आनन्द मंगल होय जी ॥४३।।
जैसी देखी कथा उसे, वैसी ही रची इस बार ।
सुनकर पढकर चिन्तन करिये, सफल बने अवतार जी ।।४४।।
प्राज्ञ प्रसादे 'सोहन मुनि' कहे, कर्म कर्ज से डरना ।
जहाँ पाप की वृद्धि होवे, वैसा काम मत करना जी.॥४५॥
भीलवाड़ा भोपालगंज का, करके चातुर्मास ।
उप नगरों में विचरत विचरत, आये 'पुर' में ख़ास जी ॥४६॥
दो हजार तैयालीस मृगसर, कृष्णा नवमी खास ।
तीन दिनों तक धर्म ध्यान का, खूब रहा उल्लास जी ॥४७॥
निन्याणवें का १६ चक्कर (तर्ज—राधेश्याम रामायण ) कैलाशपुरी के भूप मान ने, यह आदेश सुनाया है । अपने घर पर ध्वजा लगाये, जो कोटिपति बन पाया है ॥१॥ धनवानों की नारी भी, हाथों से अपना काम करे । पनघट पर कोटि पतियों के, लखपति की. नारी नीर भरे ।।२।। उसी नगर में धर्मदत्त एक, सेठ धर्म. का धारक है। सामायिक पौषध व्रत करता, अनीति आय का टारक है ।।३।। पहली नारी मरी दूसरी, परण भवन में लाया है। आजादी से रही पीहर में, यहाँ का नियम बताया है ।।४।। करो काम सब हाथों से, नौकर कोई न आवेगा। भूपति का आदेश यही है, श्रम करके नर खावेगा ।।५।। ज्यों ही जल भरने को पहुँची, तब कोटिपति नारी आई। परिचय लीना लखपति की लख, उसे बात यों दरसाई ।।६।। शुद्ध मिट्टी से पहले घट को, निज हाथों से साफ करो। फिर कूएँ से जल निकालकर, इस घट को तुम सद्य भरो ।।७।। इन्कार हुई तब अन्य नारियें, उसको पाकर समझाई । महीपति की आज्ञा है सो, इन्कारी करनी नाँही ।।८।। जल भर वापिस आई घर पे, चेहरे पर रंजिश छाई। धर्मदत्त ने पूछी बात तब, भेद दिया सब बतलाई ।।९।। मुझसे नहीं यह हो सकता है, अपनी सम्पत्ति गिन डालो। कोटिपति की ध्वजा लगादो, संकट मेरा अब टालो ॥१०॥ गिनी सम्पत्ति कोटिपति में, एक रुपया कम पाया । नारी बोली धर्म ध्यान तज, पूरी करदो अव माया ।।११।। ६७
सागर
धर्म साधना छोड़, दौड़ अब माया खातिर लगा रहा।
पुत्र हुअा तब खर्च किया पर, जोश बीच नहीं होश रहा ॥१२॥
तीन वर्ष के बाद सम्पत्ति, गिनी तभी उतनी पाई।
तब नारी ने कहा यहा से, विदेश चलना सुखदाई ॥१३॥
कहा सेठ ने यही ठीक है, पर सेठाणी नहीं मानी।
आखिर सम्पत्ति लेय सेठ ने, विदेश जाने की ठानी ॥१४॥
दोहा-जाने की सुन आ गया, सारा ही परिवार ।
कहते उतना पायगा, जो है लिखा लिलार ।।
( तर्ज-मारवाडी मॉड )
हो, मन क्यों ललचावे, उतना ही पावे, जितना लाया संग ।।टेर।।
नारी कथन से एक न मानी, लेकर सब सामान ।
रक्खा जहाज में लाकर जल्दी, बैठे तीनों आन हो ॥१॥
बीच में चलते-चलते,
आया है तूफान ।
चालक बोला डूब रहा है, याद करो भगवान हो ॥२॥
डूब गया तब सेठ रहा एक, आया पाटिया हाथ ।
भाग्य योग से वेनातट पर, निकला टल गई घात हो ॥३॥
गया शहर में कोई न पूछे, बैठा हाट पर आय ।
सोच रहा क्या गति कर्मों की, दीना सभी गमाय हो ॥४॥
एक रुपया पाने के
हित, छोड़ के
छोड़ के पाया देश ।
किन्तु मूल ही गँवा दिया है, सव कर्मों की रेश हो ||५||
उस ही क्षण आ हाट का मालिक, पूछे सब ही हाल
स्वधर्मी लख रखा पास में, दु:ख दिया सव टाल हो ।।६।।
धर्मदत्त यों सोचे दिल में, कर दिया धर्म का त्याग ।
भाव जो बदला भावी पलटा, था मुझ खोटा भाग हो ॥७॥
धर्म ध्यान अब करने लागा, सुलटा हो गया भाव ।
शुभदिन श्रावे तब मानव का, वढे धर्म पर चाव हो ॥८॥
देख कुशलता सेठ ने अपनी, दी कन्या परणाय ।
सांझा कर व्यापार में लीना, दिन दिन लाभ कमाय हो ॥९॥
एक दिन सुदत्त पाड़ोसी को, देख बुलाया पास ।
काय पाये ? यहाँ से श्राये, करता नुन प्ररदास हो ॥१०॥
गया देख गरीवी कमाने, लीना माल कमाय । वापिस आते सब ही खोया, गयो दीनता छाय हो ॥११॥ धर्मदत्त से पूछे पड़ोसी, कैसे आप गये आय । धन की घर में कमी नहीं थी, दो मुझको बतलाय हो ॥१२॥ घर में ले जा बात सुनाई, ऐसा हो गया हाल । सेठ साहब का योग मिला यहाँ, हो गया मालोमाल हो ।।१३।। सम्पत्ति सारी गिनने बैठा, क्रोड़ में फिर कम एक । सोचा सारी उम्र ही खोई, कैसा है विधि लेख हो ॥१४॥ प्रारम्भ सारम्भ करके मैंने, करके मैंने, लीना पाप कमाय । क्या मेरे संग में जायेगा, यों मन में पछिताय हो ॥१५॥ विचरत आये धर्म घोष मुनि, वाणी सुन हरसाय । तज कर सारी जग माया को, संयम लीना ठाय हो ॥१६॥ जप तप करणी करके मुनिवर, पहुंचे स्वर्ग मंझार । प्राज्ञ कृपा 'सोहन मुनि' कहता, शिक्षा लेो धार हो ॥१७॥ ६९ ԳՆ कलियुगी सन्तान : एक परिचय! (तर्ज--लावणी) - ॥ इस कलियुग की यह कथा, सुनो नर नारी, है कैसी संतति, देती स्नेह विसारी ।।टेर।। एक भूप रात में, सोता आनन्द माँही, अर्ध नींद में स्वपना, दिया दिखाई । एक बड़ा कूप है, भरा खूब जल माँही, हैं छोटे कूप भी, पास चहूँतरफा ही ॥ चारों कूपों को भर रहा, वह हर बारी ।।१।। है कैसी ....... || इक वक्त सूख गया, बड़े कूप का पानी, चारों मिल उसमें, भर न सके कुछ पानी । यह घटना देख नृप मन में, लाया ग्लानी, यह कैसा स्वप्न है, छाई दिल हैरानी ।। कोई मिले जो ज्ञानी संत, पूछ लू सारी ॥२।। है कैसी उस समय वहाँ पर, ज्ञानी महात्मा प्राये, यह सुन करके भूपाल, अति हरसाये । निर्णय लेने को, भूपति वहाँ पर आये, कर दर्शन वन्दन, अपनी बात सुनाये ।। आदि से अन्त तक, कही हकीकत सारी ॥३॥ है कैसी....।। सुनकर बोले संत, सुनो महाराया, यह स्वप्न तुझे कलियुग, छाया का आया । जब होगा पुत्र तव, पिता हृदय हरसेगा, और खान पान मन चाया, उनको देगा ।। पढ़ने लिखने में खर्च, करेगा भारी ॥४॥ है कैसी...... || पूज्य पिता तो गहरा कष्ट उठावे, कर दौड़ धूप वह उसको योग्य वनावे । कइयों के पास जा, अपनी जबाँ हिलावे, ज्यों त्यों करके सर्विस उसे दिलावे ।। मिलते ही पद के, दी सव बात विसारी ॥५।। है कैसी जब पिता पास, पैसों की तंगी पाई, पुत्रों से वोला सुनलो ध्यान लगाई । घर की परिस्थिति देखो, गई वदलाई, नहीं रही पास अब, बची एक भी पाई ।। करो मदद मैं कहूँ, तुम्हें हर वारी ।।६।। है कैसी....... || वेतन अच्छा पा रहे, हो तुम सारे, अब जरा अवस्था, आ गई तन में म्हारे । नावी प्राशा से, खर्च किया तुम लारे, क्यों नहीं देते ध्यान, जंची क्या थारे ।। कह दो मुखसे गया, मन के माही धारी ॥७॥ है कैसी........!
॥
।
॥
तव आँखें लाल कर, कहे पुत्र फटकारी, क्या नई बात कर दी है, आपने सारी ।
पढ़ा लिखा पुत्रों को दी हुशियारी, क्या विशेषता इसमें आप कर डारी ।।
यह मात पिता की होती, जिम्मेवारी ।।८।। है कैसी
जब खर्च हमारा भी, चलता है नाँही, तव देवें आपको पैसे, कहाँ से लाई।
अन्ट सन्ट दिया खर्चा, केई बतलोई, क्या करें पास में, बचती नहीं एक पाई ।।
हो गया खिन्न सुन, पिता वात पुत्राँ री ॥९॥ है कैसी
बैंकों मे जाकर, धन को जमा कराते, निज और निज परिवार, मजे से खाते ।
मात पिता को देना कुछ नहीं चाहते, आना जाना छोड़ के, मुख को छिपाते ।।
भूल गये उपक्तार, सभी इस वारी ॥१०॥ है कैसो
यदि देवे कदाचित् खच, तो मुखसै वोले, मैं देता हूँ यों, सबके आगे खोले ।
बैठे खा रहे, अन्दर में यों बोले, देना क्या
बोले, देना क्या है उनके छोतरे छोले ।
वोझ समझता, देता जब माहवारी ॥११॥ है कैसी
ऐसे पुत्रों से, सेवा की क्या प्राशा, ज्ञानी वचन है सत्य झूठ नहीं मासा ।
फिर क्यों तुम उलझो, देखो जगत तमाशा, घर घर में होंगे कलियुग में यह रासा ।।
कृतघ्न होंगे कपूत पूत 'दुःखकारी ।।१२।। है कैसी.
स्वप्ने का सव हाल, मुनि दरसाया, होंगे इस कलियुग में, पुत्र महा दुःखदाया ।
नृप कहे धन्य है, सत्य सत्य फरमाया, मेरी आँख दी खोल पाप मुनिराया ।
सोहन मुनि कहे, सुन चेतो नर नारी ।।१३।। है कैसी
..
॥
.
७१
विवेक पाओ:
१८
कष्ट मिटाओ!
( तर्ज-लावणी अष्टपदी )
वचन का मर्म समझ जावे, उसी का जन्म सुधर जावे ।।टेर।।
कौशाम्बी नगरी सुखकारी, जगतसिंह नरपति हितकारी।
प्रजा को है वल्लभकारी, दीन हित सदा दया
हित सदा दया धारी॥
दोहा- महारानी कमलावती,
पतिव्रता गुरगधार,
दुखी जनों की सेवा करती, पाले कुल आचार ।
सदा जिनवर के गुण गावे ॥१॥ उसी... ||
पुत्र एक महेन्द्र गुरण धामी, शस्त्र अरु शास्त्र कला पामी।
हुआ है वीरों में नामी, युवा पद दीना नर स्वामी ।।
दोहा-देख विदूषी कन्यका, परणा. दिया कुमार,
समय मोद में निकल रहा है, बरते मंगलाचार ।
नित्य वह नूतन सुख पावे ।।२।। उसी .. ।
नृप की कुमारी, रूप लख देवी भी हारी।
पढी वह चौसठ कला सारी, यौवन वय आई उस वारी ।।
दोहा-कंवरी मन में सोचती, सुन्दर वर मिल जाय,
सुख पाऊँ संसार में, आनन्द में दिन जाय ।
सोच में यों दिन वीतावे ||३॥उसी . ॥
किन्तु नहीं भूप ध्यान जावे, कभी नहीं मन माही लाये।
विवाह की बात विसरावे समय यों बीता ही जावे ।।
दोहा--मंत्री पुत्र है राज का रूपवान गुरगवान,
पपरी के वह नजर अा गया, कैसा है पुण्यवान ।
उसी का ध्यान हृदय लावे ॥४|| उनी
शारदा
-- पता नहीं कोई भी पावे, द्रव्य अति साथे ले जावे । रात में दौड़ निकल जावें, कहीं जा दूरे बस जावें ।। दोहा—ऐसे लिखकर पत्र को, भेज दिया उस पास, आज रात में पाऊँगी तुम रखना पूर्ण विश्वास । देवी के मन्दिर आ जावे ॥५॥ उसी ... || वात युवराज हृदय लावे, राज्य कब मेरे हाथ आवे। भूप यदि मरण शरण जावे, तभी अधिकार मेरा थावे ।। दोहा-यों विचार करते हुए, कई वर्ष बीताय, एक दिन ऐसी मन में आई, हूँ इनको मरवाय । शस्त्र को तीक्षण करवावे ॥६॥ उसी उसी दिन नाटकिये ग्रावे, भूप के सन्मुख दरसावे। खेल हम करना यहाँ चावें, राज अब आज्ञा फरमावें ।। दोहा-सुनकर भूपति ने तदा किया हुक्म तत्काल, आज रात में खेल दिखाओ, बोला यों महिपाल । नगर में पड़ह बजवावे ।।७।। उसी ... ।। उसी दिन एक संत आवे, साधना से वे घबरावे । परीषह देख दुःख पावे, भावना नित प्रति पलटावे । दोहा-घर पर जाने के लिये, तजकर आये साथ, आगे पीछे कुछ नहीं सोचा, बस गई दिल में बात । रात में वहीं पर रुक जावे ।।८।। उसी ...।। नाटकिये खेल दिखलावे, राजा अरु प्रजा वहां आवे। देखकर मस्त हो जावें, समय पता नहीं पावे ॥ दोहा-देवे नहीं नप दक्षिणा, मुट्ठी बड़ी कठोर, समय निकलते होने आया , दिन कर पहले भोर । तथापि कोई न उठ जावे ।।९।। उसी ...।। नाचते निशि भी बीतावें, थकित हो ऐसे दरसावे । चढ़ जावे, भूप नहीं दान दिलवावे ।। T-रात घड़ी भर रह गई, पीजर थाके आय, नटनी कहे तू सुन री नायिका, मधुरी ताल बजाय । नटनी तब ऐसे दरसावे ।।१०।। उसी....।। दोहा-घणी गई थोड़ी रही, थोड़ी भी अब जाय । थोड़ी देर के कारण, ताल में भंग न थाय ॥१॥ का खेलते थकान ७३ ।। दोहा सुन मुनिवर मन माँही, सोचे यह सच्ची दरसाई। भावना सत्वर पलटाई, आयु भी अल्प रहीं भाई ।। दोहा-बहुत वर्ष तक पाल के, संयम को रहा त्याग, थोड़े दिन के कारण क्यों तू, रहा त्याग से भाग । बात मुझ मन की दरसावे ॥११॥ उसी... ।। साधु ने रत्न कम्बल लीनी, नाटकिये कर में दे दीनी । हर्षित हो नट ने ले लीनी, अनेकों आशीर्षे दीनी ।। दोहा-राजकुवर ने जब सुना, सोचे यों मन मांय , इस दोहे ने आँख खोल दी, करता क्यों अन्याय । आयु रही थोड़ी वह जावे ॥१२।। उसी... पिता अव निब्बे में आये, रही सही उमर भी जाये । चन्द दिन वाद राज पाये, व्यर्थ क्यों खोटे भाव लाये ॥ दोहा--पितृ घात के पाप से, बचा दिया इस बार, उसही क्षण कुन्डल दे दीने, कीना नहीं विचार । लाखों की कीमत में आवे ।।१३।। उसी .. ।। ध्यान में कँवरी के आवे, दोहा यह मेरे मन भावे । सुनाकर मुझको दरसावे, शांति रख जीवन सुख पावे ॥ दोहा-घणी गई थोड़ी रही, थोड़ी भी रही जाय, अव तो नृप निश्चय चेतेगा, देगा मुझे पररणाय । नाहक क्यों भग करके जावे ॥१४॥ उसी ॥ नीलम का कंठा गल माँही, खोलकर दीना नट ताही। देख नृप विस्मय मन लाई, रहे क्यों चीजें वक्षाई ।। दोहा-तीनों को निज पास में, बुला कहे भूपाल, नाटकिये को कैसे दीना, इतना कीमती माल । वात सब साफ बतलावें ॥१५॥ उसी....॥ संत अव अपनी दरसावे, वर्प बहु संयम में जावे । भावना मेरी पलटावे, संयम से भगना मन नावे ।। दोहा---गुनकर दोहे को अभी, सजग हा तत्काल, यहुत गई अब थोड़ी रह गई, सन्मुख पा रहा काल । कम्बल दे मन यह हरमाई ।।१६। उसी... !! पंबर भी करना अपना हाल, ध्यान दें मुनलो है मसान। माग को लिला गे माल हुदा में आ गई मोटी चाल ।।
के साथ, दोहा-चन्द समय में आपको, पहुँचाता यम पास, दोहा सुनकर पलट गया मन, बात यही है खास । कुण्डल दे शांति चित्त पावे ।।१७।। उसी .. ।। कंवरी कहे सुनलो हे दाता ! बड़ी हुई जीवन यों जाता। आप दिल ध्यान नहीं पाता, अतः दिल मेरा पलटाता ।। दोहा-आज यहाँ से रात में, मंत्री पुत्र जाने का निश्चय कर लीना, कहती हूँ सच बात । दोहा सुन ज्ञान हिये आवे ।।१८। उसी... ।। आतुर क्यों होवे इस बारी, घणी गई बात हिये धारी । जगत में अपयश हो भारी, अमिट हो जाती यह ख्वारी ।। दोहा-इसीलिये इसको यहाँ, दीना मैंने हार, और न कोई कारण दूजा, शिक्षा थी हितकार । दोहे से शान बच जावे ।।१९।। उसी...॥ भूप सुन मन माँही धारी, दोहे से जान बची म्हारी । दान में धन दीना भारी, नाटकिये धन-२ उच्चारी ॥ दोहा-सम्मानित कर सन्त को, पहुँचाया निज स्थान, पुनः संयम में स्थिर होकर के, किया आत्म कल्याण। उत्तम नित भावे ॥२०॥ उसी....।। भूपति मंत्री सुत तांई, पुत्री को दीनी परणाई । पुत्र को पासे बुलवाई, राज्य का भार सम्भलाई ॥ दोहा-राजा राज्य को त्याग के, लीना संयम भार , जप तप करणी करके भाव से, पहुँचे स्वर्ग मँझार । भविष्य में शिवपुर को पावे ॥२१॥ उसी...॥ शब्द का अर्थ हिये धारो, ज्ञान से उतरो भव पारो । श्रद्धा रख दुःख सभी टारो, मिल्यो भव मानव सुखकारो ॥ दोहा-प्राज्ञ कृपा “सोहन' मुनि, कहे यों बारम्बार , सच्ची श्रद्धा लामो मन में, निश्चय भव जलपार । तजो शंका आनन्द चावे ॥२२।। उसी... । - भावना . 00 ७५ ୨୧ धोरवा बनाम मौत ( तर्ज-लावणी खड़ी) करे किसी के साथ कपट, फल निश्चय उसका पावेगा। करने वाला राजी हो पर, अन्त समय पछतावेगा ॥टेर।। ? वन में लखकर पुष्ट हरिण को, सियार मन में ललचाया। किसी तरह से फंस जावे तो, होवे मेरा मनचाया ।। आकर पास में कर विनम्रता, मीठे शब्द से बतलाया। अहो ? आज लख तुम्हें चित्त में, अति आनन्द मेरे छाया॥ शेर-स्वागत करूँ मैं आपका, मुजरा मेरा अब मानिये । आज ही से आप मुझको, मित्र सच्चा जानिये ॥ मित्रता की बात सुन, मृग धन्य दिन माना सही। आप जैसा मित्र पाकर, हर्प मन पाया सही ।। - छोटी कड़ी- तब से ही दोनों बात, प्रेम से करते, अब कभी किसी से आपस में नहीं डरते. इक कोना उनको देखे बातें करते, इन्हें बनालू" मित्र, मुझे सुख बरते। शनैः शनैः या काग पास में, अपनी बात सुनावेगा ॥१॥ देख प्रापनी घनिष्ट मित्रता, मेरे मन में भी पाया। सुखद समय के लिये आपसे, कर मित्रता मनवाया। मुनकर के उन दोनों ने भी दी मंजूरी हरवाया। तीनों मित्र जंगल में फिरते, बंट गयं तम्बर छाया । मेर---अधर उधर की बात करते, मग हा बहलाय जी, दिनों के बाद गों, श्रृगान मन में नायजी ।।
काम ऐसा मैं करूं यह हरिण मारा जायजी। मांस खाने को मिलेगा, मोद भर मन चायजी ।। छोटी कड़ी- सुनोमित्र अब चलो, पेट भर खावें, हरा भरा है खेत, कोई नहीं आवे । मनमाने ढंग से गहरी मौज उड़ावें, हम रात आज की, चलकर वहीं बितावें ।। चिकनी चुपड़ी करके बातें, अपना काम बनावेगा ॥२॥ खेतीहर था तंग सदा ही, आकर करता है नुकसान । उस रात्रि में जाल विछादी, फंस जावेगा कोई प्रान ।। ज्ञात सभी था उस शृगाल को, ले आया मृग को उस स्थान । जाते ही फंस गया जाल में, पाया दिल में दुःख महान ॥ शेर-आवाज दी हे मित्र मुझको, जाल से छुड़वाईये । फंस गया हूँ देख लो अब, मुक्ति पथ वतलाइये ।। आप में है शक्ति इसको, काट मुक्त कराइये। आपत्ति में जो काम आवे, मित्र वह दरसाइये ।। छोटी कड़ी- अन्दर से राजी बाहर से, खिन्न हो बोला, सेवा का अवसर मुझे, मिला अनमोला। पर एकादशी का व्रत है मेरे भोला, तब कैसे काटू जाल जम्बूक यों बोला ॥ समझ गया मृग, आपत्ति से, मुझको नहीं छुड़ावेगा ॥३॥ सूर्योदय होते . ही , काग वहाँ, देखे मित्र को आफत माँय । व्यथित हृदय हो कहे मित्र से, कैसे फँस गये इस में प्राय ॥ मग ने अपनी बात सुनाई, सुनकर बोला दुख मत लाय । जैसे बोलू करता जा तू दुःख सभी पल में टल जाय ।। शेर--मृतक सम सोजा यहाँ मैं बैठू नयन पर प्रायजी। क्षेत्रपति जब फेंक दे, तब शीघ्र उठ भग जाय जी ।। कहे मुताबिक किया त्यों ही, क्षेत्रपति वहाँ आयजी। मृत मान कर मृग को पकड़ कर, क्षेत्र बाहर लायजी।। ७७ छोटी कड़ी- उड़कर के काग झट, तरु डाली पर आया, फेंका ज्यों ही मृग उठकर के धाया कृषक देखकर गहरा रोष भराया, उठा कुल्हाड़ी फेंकी जोर लगाया। वोला धोखा देकर मुझको, कहाँ भाग कर जावेगा ॥४॥ श्रृगाल पड़ा था झाड़ी बीच में, लगी कुल्हाड़ी सिर के माँय। लगते ही प्राणान्त हो गया, किया उसी का फल वह पाय ॥ मित्र साथ में धोखा कीना, फँसा दिया उसको यहाँ लाय। आमिष इसका खाऊँगा मैं, रह गई मन की मन के मांय ।। शेर-बुरे बुराई भले भलाई, देख लो जग माँयजी। बचिये सदा इस जाल से, गुरुदेव यों फरमायजी॥ एक नाई ने पुरोहित, भूप को वहका दिया। चिट्ठी पुरोहित को मिली, पर नाई नाक कटा लिया। छोटी कड़ी- इसी तरह दे धोखा, किसी को भाया , उसका फल वह, निश्चय में ही पाया प्राज्ञ प्रसादे 'सोहन', मुनि दरसाया। देकर के दृष्टान्त, भाव समझाया । सुनकर कपट जो छोड़ेगा वह, भव २ में सुख पावेगा ।।५।। दोहा-सियार की कव एकादशी, काटी थी नहीं नाडी। मित्र साथ में धोखा कीना, सिर पर पडी कुल्हाडी ॥१॥ दोहा-दो हजार छत्तीस का सुद दशमी रविवार रची मास वैशाख में देवलिया सुखकार ॥२॥ 卐 २० लालच बुरी बलाय ( तर्जतावड़ा धीमो ) । to समझ लो तृष्णा दुःखदाईजी-२। कथा कहूँ मैं तृष्णा ऊपर, सुरगज्यो सब भाई ॥टेर।। पर की सम्पति देख कभी तू, मन में मत ललचाय, सज्जनों। जानी जन यह सदा सुनाले, लालच बुरी बलाय ॥१॥ किसी गाँव में कालू सेठ था, पर धन पर ललचाय, सज्जनों खावे न खर्चे पैसा हाथ से, धन को संग ले जाय ॥२॥ दो लड़के थे विदेश माँही, भेजे द्रव्य कमाय, सज्जनों। दूणा चोगुणा देण लेण कर, यहाँ पर सेठ बणाय ॥३॥ वही विप्र भूदत्त एक रहे, दीन हीन दुख माँय, सज्जनों। जो.भी माँग कर लावे उनको, रोजाना खा जाय ॥४॥ विप्र नार बीमार हो गई, पर भव गई सिधाय, सज्जनों। पीछे बेटी बाप रह गये, दुःख से दिन बीताय ॥५॥ गाँव बाहर था गणपति मन्दिर, वहाँ पर पण्डित जाय, सज्जनों । प्रति दिन माला जपे भाव से, प्रोम् नमो शिवाय ॥६॥ एक दिन ऊमा शंकर दोनों, गणपति पासे आय, सज्जनों । उमा देख विप्र की हालत, शिवजी को दरसाय ।।७।। सदा आपका नाम जपे यह, क्यों नहीं कष्ट मिटाय, सज्जनों । अभी कहेंगे गणेश को यह, सुखी सद्य हो जाय ॥८॥ मात पिता को लख गणेशजी, चरणों शीश नमाय, सज्जनों। शिव बोले यह मुझे जपे नित, क्यों नहीं दुःख मिटाय ।।९।। उसी समय वहाँ कालू सेठ भी, फिरता-२ आय, सज्जनों । बातें करते लख गणपति को, मन में विस्मय लाय ॥१०॥ - ७९ वात, लगा भीत के कान सुन रहा, पिता पुत्र की सज्जनों। गणेश कहे इस सप्ताह में ही, लखपति वह हो जात ॥११॥ करके बातें शिव उमा तो, सत्वर गये सिधाय, सज्जनों। सोचे सेठ जो मिले विप्र को, सब मेरा हो जाय ॥१२॥ आय विप्र के पास सेठ यों, मीठी बात सुरणाय, सज्जनों। आज निमंत्रण देता हूं मैं, जीमण मुझ घर आय ।।१३।। पण्डित खुश हो वोला सेठजी, अच्छी बात सुनाय, सज्जनों । आप कहो तो मुझ पुत्री को, ले आऊँ संग माय ॥१४॥ सेठ कहे हाँ जरूर लायो, मन से शंक मिटाय, सज्जनों । सुनकर सीधा घर पर आया, पुत्री को दरसाय ।।१५।। पुत्री बोली सुनो पिताजी, सेठ कभी ना बुलाय, सज्जनों । कंजूसों का शिरोमणि है, कुछ रहस्य दिखलाय ।।१६।। पुत्री कहे यदि कोई वात हो, लीज्यो मौन कराय, सज्जनों । इसका उत्तर मैं दे दूंगी, सुनी पिता हरसाय ॥१७।। गये जीमने दोनों ही वहाँ, दीने माल जीमाय, सज्जनों । सेठ कहे पण्डित जी मेरी, वातें मान लिराय ।।१८।। मन्दिर पर जो सात दिनों में, मिले मुझे दिलवाय, सज्जनों । उसके बदले हजार रुपये, मुझसे अभी लिराय ।।१९।। पंडित सुनकर राजी हो गया, किन्तु कुछ न सुनाय, सज्जनों। क्यों कि शर्त कर पाया घर से, तभी पुत्री दरसाय ॥२०॥ सेठ साहिब ! नहीं बेचे भाग्य को, मिले वही हम पाय, सज्जनों। सेठ कहे चाहे तुम ले लो, दस हजार बतलाय ॥२१॥ पचास हजार में आखिर सेठ ने, सौदा लिया पटाय, सज्जनों । दिये सेठ ने दाम उसी क्षण, ले निज स्थान सिधाय ।।२२।। मंदिर में जा जाग जपे गिव, किन्तु पूर्ववत् पाय, सज्जनों । छः दिन तो यों निकल गये प्रव, सोचे सेठ मन माय ।।२।। दिवस मातवें लाख रुपये, निश्चय ब्राहारण पाय, मजनों । गणेग काथन नहीं मिथ्या होवे, निर्णय मन में ठाय 11:४|| दिवनमान उमा गॅगर, जमी समय पर ग्राम, उसी तरह ही बैठा ब्राहाग, माला रहा फिराय ।।
सेठ वहां पर बड़े ध्यान से, सुन रहा कान लगाय, सज्जनों । शिवजी बोले नहीं इसको तू, लाख रुपये दिलवाय ।।२६।। कहे विनायक पचास हजार तो, इसको दिये दिलाय, सज्जनों । वाकी इसी सेठ से इसको, अभी यहाँ मिल जाय ।।२।। सुनकर चमक गया श्रेष्ठीवर, भींत से कान हटाय, सज्जनों । किन्तु कान तो चिपक गया वहाँ, देख देख घबराय ॥२८॥ कान छुडाने जोर लगाया, भींत के हाथ लगाय, सज्जनों । किन्तु सेठ के दोनों हाथ ही, गये वहाँ चिपकाय ।।३९।। इतने में आवाज हुई वहाँ, यदि छूटना च्हाय, पचास हजार रुपैये विप्र को, सत्वर दे मंगवाय ॥३०॥ उस ही क्षण मंगवाकर रुपये, दीने विप्र को लाय, सेठने । वापिस लिये तो यही दशा हो, सुनले ध्यान लगाय ॥३१॥ लोभी नर की यही दशा हो, अंत समय पछताय, सज्जनों । प्राज्ञ सादे "सोहन" मुनि कहे, लालच बुरी बलाय ।।३२॥ च्हाय, सेठजी। ८१ .. २१ बुद्धि की विजय -- .... [ तर्ज-एवंता मुनिवर नाव तिरायो] , श्रोतागण सुनिये, जग में महिमा है बुद्धिमान की ।।टेर।। वसन्तपुरी नगरी का स्वामी, वसूसेन भूपाल। महाराणी मन मोहन गारी मोहनवती गुणमाल जी ॥१॥ राजा अहोनिश प्रजा. गणों की, करता सार सम्भाल । पुत्र पिता सम सम्बन्ध इनमें, बरते मंगल माल जी ।।२।। इसी नगर में रहे व्यापारी, रतनदत्त साहूकार । परमविदुषी सद्गुण राशि, कमला नामा नार जी ॥३॥ व्यापार करने बाहर जावे, इससे इसका नाम । बणजारा, बणजारी, मानव, कहते इन्हें तमाम जी ।।४।। एक वक्त ले बालद संग में, लाद चला सामान । निज नारी अरु भृत्य जनों का, हो गया समूह महान जी ।।५।। जाते मार्ग में अच्छा स्थान लख, बोला यों बणजार । इस जंगल में पड़ाव करदो, स्थान वहुत सुखकार जी ।।६।। सरिता पास में बह रही अच्छी, पानी यहाँ पिलायो । हरा घास है आस पास, बैलों को यहां चरानो जी॥७॥ हुक्म मुताबिक ठहर गये सब, लखकर सुन्दर स्थान । बैल छोड़कर सभी भृत्य जन, करते भोजन पान जो ।।८।। छायादार लख बड़ को वैठे, या दम्पत्ति बणजार । बातें करते आपस माँही, वन छबि रहे निहार जी ।।९।। इस गर्मी में भी तुम देखो, कैसा शीत समीर । हरी भरी है यहां की भूमि, वहे पास में नीर जी ।।१०।। ८२ . .
- - -- इतने में चलकरं के आया, छाया लख कठियार । गर्मी से व्याकुल है तन पर, बह रहा स्वेद अपार जी ॥११॥ शुष्क देह अरु फटे वस्त्रं है, चेहरा हो रहा श्याम । देख पास में बणजारे ने, पूछा हाल तमाम जी ॥१२॥ कहता है कठियारा यहाँ पर, भारी लेने काज । आता हूँ में भरी दोपहरी, और न कोई सांज जी ॥१३॥ बणजारा कहे निज नारी से, कितना यह दुख पाय । मानव भव में आकर के भी, कैसा कष्ट उठाय जी ।।१४॥ नारी बोली मालूम होता, अंयोग्य है घर नारं । वरना इसको चुस्त बनाती, नहीं होता बेजार जी ॥१५।। नारी इसमें क्या कर सकती, कहता हों बरणजार । नारी तो सब कुछ कर देती, उस विन क्या संसार जी ।।१६।। योग्य होय नारी घर इनकी, संकट नहीं यह पाय । मेरे सम यदि होबे नार तो, क्षणं में दु:ख मिटाय जी ॥१७।। सुनते ही छा गया क्रोध, और बोला सुन मुझ वात । कहता हूँ इसके संग रह तू, कैसे यह सुख पात जी ।।१८।। सुनकर बोली नाथ ! बात को, आगे नहीं बढ़ावें । आप समझ गये उलटी इसको, मन का भेद मिटावे जी ।।१९।। यदि अपने को योग्य मानती, मुझ को कर दिखलाय । कैसे सुखी बनाती इसको, देखू इस तन माँय जी ॥२०॥ नाथ ! बात को तजो आप, अब नहीं है इसमें सार । . नारी से नर अड़ा वहीं पर, खाई उसने हार जी ॥२१॥ अब तो पारा गर्म हो गया, बोला यो वणजार । देखू तेरी करामातं क्या, करती अवला नार जी ।।२२।। ऐसी ही है बात नाथ ! तो, सुनलो देकर कान । आज प्रतिज्ञा करके जाऊँ, रखना पूरा ध्यान जी ।।२३।। आप हाथ से पहनूं पगरखी, 'जी हजूर' कहलाय । करामात दिखलाऊँ आपको, इनको सुखी बनाय जी ।।२४।। इतना काम करेगी तव ही, समझं बाप की जाई । नहीं तो मानूगा मैं तुमको, माता कहीं से लाई जी ।।२५।। ८३ कहे मुसाफिक करू तभी मैं, असली बाप की लाली । नहीं तो आप समझना मुझको, बातें करती खाली जी ॥२६॥ इसी तरह तू कर दिखलावे, तभी तुम्हें अपनाऊँ। नहीं तो जीवन भर तेरे को, वापिस घर नहीं लाऊँ जी ॥२७॥ कठियारे को भ्रात बनाकर, हो गई उसके साथ । कैसे हो सम्मान मेरे घर, कठियारा शरमात जी ।।२८॥ नारी बोली कौन साथ में, देवें भेद बताय । रमा रूप सम बहिन मेरी यह, अपने घर पर प्राय जी ॥२९॥ अपने घर का दरिद्र गया सब, जो यह हुक्म दिलाय । उसी मुआफिक करना है यह, रखना ध्यान के माँय जी ॥३०॥ कमला बोली भ्रात आज की, भारी कहाँ बेचाय । कहे कठियारा एक जगह ही, डालू हाट पर जाय जी ॥३१॥ सुनकर वहाँ से आई सेठ दर, बोली यों तत्काल । जल्दी करिये हिसाब अपना, गया काष्ठ जो डाल जी ॥३२॥ नहीं तो ले लो आज तलक के, माँगो जितने दाम । चंदन लकड़ी जितनी दी है, देवो हमें तमाम जी ॥३३॥ सुनकर चौंका दुकानदार यह, कैसे चन्दन जाने । मैं तो लेता काष्ठ भाव में, यह बेचे अनजाने जी ॥३४॥ अब नहीं होगा हजम मेरे से, दे दूं पूरे दाम । बोला आपका हिसाब करके, देऊ दाम तमाम जी ॥३५॥ ये ले जाओ मोहरें पाँच सौ, आज तलक की सारी । देख हिसाब ले आई मोहरें, खुशी खुशी उस वारी जी ॥३६॥ बढ़िया वस्त्र मंगाकर उनको, सिलवाये उस बार । नापित बुला क्षौर करवा कर, पहनाये तत्काल जी ॥३७।। अच्छा भोजन बना जिमाया, दी शिक्षा हितकार । मीठी बोली बोल सभी से, करो नम्र व्यवहार जी ॥३८॥ एक दिन अश्व बेचने वाला, आया नगर के बाहिर । सुन्दर लक्षण वाला अश्व लख, कीमत दीनी जाहिर जी ।।३९।। बैठे अश्व पर इसे घुमायो, सुन्दर चाल सिखाय । एक दिन भाई से यों बोली, सुन लो ध्यान लगाय जी ॥४०॥ ८४ - मैं देऊँ मोदक ये तुमको, और पानी की झारी। चढकर अश्व इन्हें ले जाओ, जाओ भूप के लारी जी ॥४१॥ जहाँ जावे वहाँ पीछे पीछे, रहना उनके साथ । काम पड़े तब हाजिर करना, समझा दी सब बात जी ।।४२।। चला भूप तव हुग्रा साथ में, निकल गये अति दूर । महा भयंकर अटवी में नृप, थक कर हो गया चूर जी ।।४३।। चारों तरफ नजर दौड़ाई, जल बिन हुअा अधीर । प्राण पखेरु उड़ जावेंगे, वन माँही बिन नीर जी ॥४४।। पीछे से आकर कठियारा, हाजिर की जल झारी । मोदक भी रख दिये सामने, भूपति के उसवारी जी ॥४५॥ भूख प्यास शामन की वस्तु, अमूल्य समय पर पाई । रुचि पूर्वक खा पीकर उसने, अपनी प्यास मिटाई जी ।।४६।। सोचे भूपति प्राण पंखेरू, उड़ जाते इस वार । किन्तु इसने बचा लिया मुझ, देकर के आधार जी ॥४७॥ प्रसन्न होकर कहे महीपति, वर मांगो मन चाय । वही तुम्हें मैं खुश हो दूंगा, संशय दूर हटाय जी ॥४८॥ अभी नहीं मैं फर लेऊँगा, सुन्दर अवसर पाय । आप पधारो राजमहल में, सब मन शांति प्राय जी ॥४९।। वापिस घर आ कठियारा ने, कही बहिन से वात । राजा आज प्रसन्न होय के, वर देता साक्षात जी ।।५।। बहिन कहे माँगो नरपति से, माल बेचने प्राय । बिन मेरे हस्ताक्षर के यहाँ विक्रय नहीं कर पाय जी ।।५१।। सभा बीच में करी प्रशंसा, कठियारे की भूप । प्राण बचाये मेरे इसने, कीना काम अनूप जी ।।२।। क्या हूँ इसको जो माँगे यह, थोड़ा मुझे लखाय । सभा बीच में कहे भूप यों, माँगो जो मन चाय जी ।।५३।। वह बोला इस नगरी माँही, माल कोई भी लाय । पहले हस्ताक्षर मेरे हों, फिर वह माल विकाय जी ॥५४॥ भूपति ने सहर्ष बात सुन, दी आज्ञा तत्काल । स्वीकृत मुझको वही होयगा, जो लावेगा माल जी ।।५।।
- सारे शहर में करी घोषणा सुनो. सभी नरनार । इनकी आज्ञा बिन बेचे वह, होगा गुनाहगार जी ॥५६।। अब तो माल बिके है। इनके हस्ताक्षर को पाय । ऐसे करते साल बाद में, वहीं बणजारा प्राय जी ॥५७।। सीमा पर सब पोत पड़े हैं, बसन्त पुर में जाय । हस्ताक्षर लेने बणजारा, उनके द्वार पर प्राय जी ॥५८|| लख बणजारी सोचे मन में, पति देवे गये आय । अच्छा अवसर मेरे सामने, लेॐ शर्त मनाय जी ॥५९।। कठियारे को पासं बिठाकर, कहती सुनलो भाई । यह व्यापारी आया है यहाँ, करो न तुम सुनवाई जी ॥६०॥ जब मैं कह दूं तब कर देना; अक्षर माल बिकाय । कहे कठियारा तभी करूंगा, आज्ञा तेरी थाय जी ॥६३।। कभी मिले घर कभी मिले नहीं, आता नित प्रति द्वार । छः महीने यों बीत गये पर, नहीं निकला कुछ सार जी ।।६२।। बिना दस्तखत तंग हो गया; खर्चा हुआ अपार । माल विके बिन सम्पति मेरी हो रही है बेकार जी ॥६३।। किसी तरह इनकी घर वाली; राजी हो इस बारं । काम मेरा जल्दी बन जावे, बैठा करे विचार जी ॥६४।। एक दिन अच्छा अवसर लखकर; कमला करे विचार । तंग हो गये अब तो पूरे, बैठे खिन्न घर द्वार जी ॥६५॥ अभी यहाँ पर कोई नहीं है, कर लू अपना काम । आवाज लगाई कौन भृत्य यहाँ; जल्दी बोले नाम जी ।।६६।। बणजारा सुन दौड़ा · पाया; हाजिर सेवा माय । जी हजूर क्या सेवा मुझसे, जल्दी दें फरमाय जी ॥६७।। वह बोली नहीं और काम · है, जूती मेरी लाय । पहना दें जल्दी मुझ पग में, यह आदेश सुनाय जी ॥६८।। कृतज्ञ भाव से उठा जूतियाँ; हाथों में ले आय । पग में कष्ट नहीं. होवे यों, शनैः शनैः पहनाय जी ।।६९।। नीची गरदन करके कह रहा, इतनी किरपा कीजे । सीमापति से कहकर आज्ञा, जल्दी करवा दीजे जी ॥७०।। - . ८६ - बात कहते, कहते गद् गद् हो गया, वह गई अश्रुधार । आगे बोल सका नहीं कुछ भी, मुख से वह बणजार ।।७१॥ देख अवस्था कमला बोली, ऐसे क्यों घबरायें । नहीं आपके घरवाली क्या, पूछू साफ सुनायें जी ।।७२।। २ में मैने उसको, की कठियारे लार । भूल हो गई मुझसे वहाँ पर, कीना नहीं विचार जी ॥७३।। क्षण, क्षण मुझको याद आ रही, पता कहीं नहीं पाय । नाम धाम है कैसा उसका, हूँढू कहाँ पर जाय जी ।।७४।। उसके विन तो जीवन मेरा, हो रहा है बेकार । समय-समय पर लेती रहती, मेरी सार सम्भार जी ।।७।। जोश बीच नहीं सोच सका, कुछ कह दी ऐसी बात । भोग रहा हूं फल उसका ही, मन मेरा अकुलात जी ।।७६।। सुनकर सारी बातें बोली, मुजरा लेवो मान । मैं कमला हूँ नार आपकी, मुझको लो पहचान जी ॥७७॥ वचन आपसे जो कर आई, पूरण आज दिखाया। कठियारा भी उच्च स्थान पा,सुख साधन सब पाया जी ।।७८|| चौंक गया सुनकर के बातें, देखे आँख पसार । आश्चर्य चकित हो सोचे मनमें, यह तो मेरी नार जी ।।७९।। कठियारे को कैसे इसने, ऊँचा पद दिलवाया। इतना ठाठ पाट यहाँ आकर, कैसे रंग जमाया जी ।।८०॥ वह तो था कृश देही पूरा, महा दरिद्र दुख पाय । देख यहाँ की शान निराली, शंका दिल में प्राय जी ।।१।। पति आनन को लखकर कमला, समझ गई. सव वात । ग्रादि से ले अंत तलक सव, कह दीना अवदात जी ।।२।। सुनकर संशय गया हृदय से, असली बात पर आया। मिटा गरीबी इसकी इसने, कितना काम बनाया जी ।।३।। तत्क्षण कमला गिर चरणों में, कहे क्षमा कर दीजे । आज तलक अपराध किया जो, सारे विस्मृत कीजे जी ।।४।। सभी किया है माफ तुम्हें, और मुझे माफ कर देना । विना विचारे शब्द कहे हैं, उन पर ध्यान न देना जी ।।८।। ८७ शर्त तुम्हारी सत्य दुई मैं, बात मान गया सारी। अबला नहीं सबला हो, मुझको मिली पुण्य से नारी जी ॥८६॥ आते ही कठियारे को भी, सब वृतान्त सुनाया। उसने भी बहनोईजी का, खूब ही मान बढाया जी ॥७॥ पकवान बनाकर कई भाँति के, भोजन उन्हें जिमाया। हस्ताक्षर करके फिर उनका, सारा कष्ट मिटाया जी ।।८।। क्रय विक्रय कर यहाँ माल का, कीना जब प्रस्थान । कमला को संग में लेकर के, पाया सुख महान जी ॥८९॥ कठिहारा भी नत मस्तक ले, दीनी बहिन को सीख । तुम प्रताप से सुख पाया मैं, हाल हुआ सब ठीक जी ।।९।। सीमा तक पहुँचाने आया, बहन बहनोई लार । गुण नहीं भूलू बहन तुम्हारा, मुझ घर दिया सुधार जी ।।९१।। उदास चित्त हो मिल दोनों से, लौट गया उसवार । बणजार दम्पति सत्वर चलकर, पहुँचे निज आगार जी ।।९२।। सोचे दम्पत्ति मिली सम्पति, ले ले इसका लाभ । ज्ञानी कहे चंचला इसको, ज्यों विद्युत की आभ जी ।।९३।। स्थान स्थान पर दान शालाएं, दीनी तुरन्त खुलाय । नहीं मनाई है किसको भी, चाहे सो ले जाय जी ।।९४।। एक वक्त यहाँ आये विचरते, धर्म घोष अरणगार । बणजार दम्पति वाणी सुनकर, पाये हर्ष अपार जी ॥९५।। दोनों ने श्रावक व्रत लीने, पाले धर कर प्यार । अन्त समय में शुभगति पाये, करके करके शुद्ध विचार जी ।।९६॥ कथा सुनी और देखी वैसी, तर्ज ख्याल में गायी। कम ज्यादा का मिथ्या दुष्कृत, साक्षी है जिनरायी जी ॥९७।। "प्राज्ञ" प्रसादे “सोहन" मुनि कहे, धरो हृदय के माँय । सम्मान करो नारी का पूरा, घर में शांति चहाय जी ।।९८।। हो हजार पेंतीस पोष सुद, पूनम दिन शनिवार । ठाणा ५ से आये विचरते, व्यावर शहर मँझार जी ।।९९।। सभी संघ ने प्राज्ञ गुरु का, स्वर्ग दिवस मनाया। प्रायम्विल और उपवास करीने, श्रद्धा पुष्प चढ़ाया जी ॥१००। 00
२२
रोहा चोर:
धर्म की ओर
( तर्ज-अष्टपदी लावणी)
सुनो जिन वाणी देकर ध्यान, इसी से पावोगे शिव स्थान ॥टेर।।
वचन एक लेवे हृदय में धार, उसी का होवे बेड़ा पार ।
जन्म अरु मृत्यु देवे टार, सफल हो मानव भव अवतार ।।
दोहा-बिन इच्छा के श्रवण कर-पाया पद निरिण ।
रोहा चोर की कथा अनुपम सुनो लगाकर ध्यान ।।
आलस तज मन एकाग्न ही आन ।इसी से . १॥
राजगृह नगर अनुपम जान, राज तिहां करे श्रेणिक गुणवान ।
प्रजा का रखता पूरा ध्यान-मंत्री है जिनके अभय सुजान ।।
दोहा-चार बुद्धि के हैं धनी-राज काज में दक्ष ।
न्याय नीति के पूरे ज्ञाता-नहीं रखते हैं पक्ष ।।
लक्ष रख भजते नित भगवान ॥इसी से . २।।
नगर जन मिलकर के आवे, बात निज दुख की दरसावे ।
नगर में तस्कर नित आवे-माल वह हर कर ले जावे ।।
दोहा-सुन कर भूपति मंत्री को-दीना यह आदेश ।
सद्य पकड़ कर लाओ चोर को-करो राज में पेश ।।
अगर तुम रखना चाहो शान ।।इसी से ३।।
चोर एक लोहखुरा नामी, चोर पल्ली का वह स्वामी।
रोहा सुत सब विद्या पामी-चुरा ले धन लखते स्वामी ।।
दोहा-एक दिवस निज पुत्र को-कहे. बुला कर पास ।
अब मैं तो मरने वाला हूँ-तेरी ही दिल पाश ।।
वात कहूं सुन ले देकर कान ।।इसी से · ४||
८९
.
. बिचरते वीर यहाँ आवे, यदि कोई उनके पास जावे ! वाणी में जादू बतलावे-बात सुन उनका हो जावे ।। दोहा-यदि दुःख है हृदय में - कहीं न तज दे काम । कुल कर्म यह चलता आया चलता रहे तमाम ।। वचन दे कहना मेरा मान ।।इसी से"५।। पुत्र कहे सुनून जिनवाणी, दर्श मैं करू न मन आणी। वचन दू तुमको सच जानी, करो मन शान्त भाव आनी ।। दोहा—सुन रोहे की बात को- मन में अति हरसाय । चन्द समय के बाद काल कर-पहुँचा पर भव माँय ।। पाय वह दुर्गति दु:ख की खान ।। इसी से ...६।। रोहा नित. चोरी हित जावे - एक दिन वह मारग आवे । वीर जहाँ वाणी फरमावे - चोर यों मन माँही लावे ।। दोहा-जिन वाणी मैं नहीं सुनें- दीनी अंगुली डाल । चलते कंटक भगा पैर में सोचे देऊं निकाल ।। बैठ गया अच्छा लख कर स्थान ।। इसी से.... ७ ।। प्रभु निज वाणी में फरमाय, देव के चिन्ह रहे बतलाय । फूल की माला नहीं कुम्हलाय, भूमि से ऊंचे वे ठहराय ।। दोहा-नेत्र कभी मींचे नहीं - छाया हो न लिगार । चार कारण से देवी देव का लक्षण हिये बिचार ।। बात सब पड़ रही रोहा कान ।। इसी से.... ८ ।। ज्यों ज्यों उन्हें भूलना चाय, त्योंहि वह गहरी हिये जमाय । गया वह राजगृह के माँय - अभय ने लिखा उसे पकड़ाय ।। दोहा- खड़ा किया ला सामने तस्कर यह तैयार। भाँति - भाँति से पृच्छा की पर खुला नहीं लिगार ।। बुला गणिका को कहे प्रधान ।। इसी से ..९ ॥ वृतान्त वैश्या को समझाया - भवन वहां सुन्दर सजवाया । चोर को नशा जो करवाया - निशा में गणिका दरसाया ।। दोहा-अमर भवन में आप आ - जन्मे हैं इस बार । किस करनी से नाथ वने हो - कह दो खोल विचार ।। वात सुन रोहा लगावे ज्ञान ।। इसी से १० ।। मिलें नहीं चारों लक्षण हाल, दिखती मंत्री की है चाल । यहाँ तो फैल रही है जाल अतः ये फन्द न देवे डाल ।। ९० .... १३ ॥ दोहा-तस्कर कहे मैंने किया - अभय सुपात्तर दान । जिससे मुझको मिला यहाँ पर, सुन्दर देव विमान ।। वात कहूँ सच्ची सुन लो कान ।। इसी से ११ ।। अनेकों दांव पेच कीना, किन्तु नहीं उत्तर वह दीना। वैश्या ने मन माँही चीना, अभय से आकर कह दीना ।। दोहा-करी परीक्षा पूर्ण मैं - बुद्धि बल अजमाय । किन्तु चोर के लक्षण इसमें नहीं मुझको दिखलाय।। सुनाकर गणिका गई निज स्थान :। इसी से... १२॥ मंत्री ने उसे छोड़ दीना, चोर ने मन में ध्यान कीना । इच्छा विन वाणी रस लीना, उसी ने मुझे मुक्त कीना ।। दोहा-इच्छा से जाकर सुन वीर वचन इस बार। प्रभु चरणों में वंदन करके दीनी अर्ज गुजार ।। वोध मैं चाहूँ हे भगवान ।। इसी से सुनाया प्रभु ने प्रातम ज्ञान, रोहे को हो गया अपना भान । खड़ा हो कहे सत्य फरमान, साधु वन करू अात्म कल्याण ।। दोहा- अहासुहं प्रभु ने कहा रोहा करे विचार। जिनका धन है मेरे पास में, लेवें वे संभार । मंत्री से कह दी तत्क्षण भान ।।इसी से ... १४ ।। मन्त्री ने विस्मय अति कीना-जुला था सबको दे दीना । सभी ने गुरणानुवाद कीना--ठाठ संयम ले लीना ।। दोहा-प्रभु समीप दीक्षा ग्रही - बन रोहा अरणगार । जप तप करणी करके अन्त में पाया शिवपुर द्वार ।। वाणी सुन किया आत्म कल्याण ।। इसी से.."१५।। सदा स्वाध्याय ध्यान सारो-करो यह निश्चय सुखकारो। प्राज्ञ कृपा सोहन मुनि धारो-सफल हो मानव अवतारो।। दोहा-साल बीस सौ तीस की अक्षय तृतीया जान । 'कुन्दन' गुरु पद पाये प्रवर्तक, चारों संघ महान ।। मिली 'बर्धनपुर' के दरम्यान |इसी से "१६।। ९१
२३
अपने सम सब जीव को,
लखे वही विद्वान्
[ तर्ज--यह सुपना सम संसार० ]
श्रद्धा रख जो ईश शरण में आया ।
वह बचे मृत्यु से मरे नहीं मरवाया ।।टेर।।
एक वक्त यूनानी बादशाह घबराया । जब रोग ग्रसित हो गई है उसकी काया।
जो हकीम था नामी वहाँ बुलवाया। लख देह रोग को उसने यों दरसाया ।।
यह महा भयंकर रोग शाह तन छाया ।।वह बचे
१॥
यदि किसी व्यक्ति का आमाशय मिल जावे । तब तो समझो शाह प्राण बच जावे ।
भेजे सन्तरी नर खरीद कर लावें।
परवाह नहीं धन चाहे सो लग जावे ।।
गये संतरी शाह संदेश सुनाया । वह बचे २॥
एक दरिद्र पिता ने निज संतान दिखाई। उसके बदले में मोहरें सहस्र गिनाई ।
शाह पास में लेकर आये सिपाही। काजी के पास में दीना उसे भिजाई ।।
काजी ने उस क्षण ऐमा न्याय सुनाया ।। वह बचे । ३।।
शाह प्राण हित मरे यदि कोई प्राणी । कुछ पाप नहीं है बोला ऐसे वाणी ।
उस समय बन्धक ने खड़ग हाथ में तानी । समझ गया वह मौत सामने मानी।।
ऊपर देखकर बालक मुख मुस्काया ।। वह बचे ४॥
यह देख शाह ने वालक को बुलवाया। क्यों हँसा कहो क्या तेरे दिल में आया ।
संसार व्यवस्था लखकर मन में आया । पालक हैं मां बाप लोभ में छाया ।।
यह न्यायी काजी भी न्याय धर्म भुलाया ।। वह बचे ५।।
१२
प्रजानाथ हो प्रजा दुःख विसराया। निज तन रक्षा हित पर का प्राण मंगाया सभी स्थान अन्याय युक्त दरसाया । अव रक्षक मेरा कौन हृदय में लाया। रक्षक को भक्षक बने देख मुस्काया ।। वह बचे ६।। ऊपर देखू ईश्वर न्याय भुलाया। विन गुनाह मरे एक बालक नृप की छाया सारे ही बदले क्यों तू मुझे बिसराया । यह सुनी बादशाह चित्त माँही शरमाया मुक्त करो वालक को शाह ने सुनाया ।। वह बचे "७।। दीनी है तलवार फैक उसवारी - क्षमा मांगकर शाह मुख से उच्चारी। भूल गया कर्त्तव्य बुद्धि गई मारी याद दिलाकर दीना पथ पर डारी ।। उपकार मान वालक को घर पहुंचाया ॥ वह बचे""८।। श्रद्धा रखकर जो परमातम ध्यावे - उसके सारे ही कष्ट नष्ट हो जावे । जिसे जीव सब अपने सम ही लखावे - वे निश्चय ही संसार पार हो जावे ।। प्राज्ञ प्रसादे “सोहन मुनि" रच गाया । वह बचे " ९।। ( 230 :९३ २४ स्वार्थ भरा संसार [ तर्ज-यह सुपना सम संसार० ] यह स्वारथ का संसार गुरु फरमावे । क्यों मोह माया में फंस कर जन्म गंमावे।।टेर।। मणिपुर का है इक वणिक मणीधर नामी । है भरा कोष धन माल नहीं है खामी।। सुन्दर घर में नार पुण्य से पामी। है पतिव्रता गुणवती 'गुणावली' नामी ।। पुत्र सुदर्शन मात पिता मन भावे ।। क्यों... १।। पुत्र सदा जाता है सत्संग माँही। यह देख पिता के मन में ऐसी आई ।। देगा यह संसारं कभी छिटकाई। अंतः इसे मैं जल्दी हूँ परणाई ।। अच्छी लखकर कन्या उसे परणावे ।। क्यों.. २॥ सत्संग के माँही तदपि सुदर्शन जावे। संत समागम इसके मन में भावे ॥ पुत्र वधू को सास ससुर समझावे। कर ऐसा तू इक काम वहाँ नहीं जावे ॥ अब पति को नारी स्नेह अति बतलावे ॥ क्यों .३।। कहाँ जाते हैं आप देर से आवें । अत : मेरा मन यहाँ नहीं लग पावे ॥ देरी आने से मेरे दिल भय आवे। कहूँ कहाँ तक दर्शन बिन दुःख पावे ।। फंस गया मोह में कहीं, नहीं अब जावे ।। क्यों...४।। हो गई भावना सफल देख हरसावे । और मात पिता के दिल में शांति पावे ॥ घर धन्धे में गहरा वह उलझावे । पर भव को दिया विसार काम मन भावे ।। कुछ समय बाद माँ पितु परलोक सिधावे ॥ क्यों....५॥ एक दिवस मिले हैं सन्त मार्ग के माँही। बोले क्या हुई बात देवो दरसाई ।। नहीं मिलती टाइम कहूँ सत्य गुरुराई । घर धन्धे से फुरसत मिलती नाहीं।। मिले वक्त तो पाना संत दरसावे ।। क्यों ६॥ ९४ गया एक दिन दर्शन करने ताँई । नमन करी यों कहे सुनों गुरुराई ।। नारी स्नेह की वात दिवी दरसाई। नहीं देखे मुझे तो देवे प्राण गँवाई ।। अतः वहीं स्त्री संगम मुझको भावे ।। क्यों"७॥ सुन करके सारी वात सन्त समझावे । सव स्वार्थ का संसार व्यर्थ उलझावे ।। तू करे परीक्षा ज्ञात सभी हो जावे । घट में छाया यह मिथ्या मोह नसावे ।। वह बोला मुझको विधी पाप वतलावें ।। क्यों...८।। गुरुवर ने कर के कृपा क्रिया बतलाई । घर आकर बोला सुनो प्रिये ! चित्तलाई।। मालपुवे और खीर करो दरसाई । नारी भी उस क्षरण सब सामग्री लाई ।। करने लगी तैयार पति दरसावे ।। क्यों ...९।। हुई उदर में पीड़ा चित्त घबरावे । यों कह करके वह ऊँचा श्वांस चढ़ावे ।। दोनों खंभों के बीच पैर फंसावे । और चन्द समय पश्चात् श्वांस रुक जावे ।। आकर देखे नार चित्त घबरावे ।। क्यों " १०।। सोचे मन में बनी वनाई त्यारी । हो जावेगी सब नष्ट कीमती सारी ।। पहले मैं खालू यही हृदय में धारी । कर भोजन लीनी वस्तु पास में सारी ।। अब बैठी रोने जोर लगा चिल्लावे ।। क्यों. ११॥ सुनकर सारे मनुष्य दौड़ कर आवे । क्या हुआ ? नार सब हाल उन्हें दरसावे ।। फंसा देख पग लोग उन्हें बतलावे । तुडवा दो यह स्तम्भ फेर बन जावे ।। नारी कहे नहीं खंभ आप तुड़वावें ।। क्यों.१२।। कटवादो इनका पैर जलेगा सारा । यह खंभा नहीं बनने का कहती दारा ।। सुदर्शन सुनकर हाल हिए में धारा । करती मिथ्या बात देख लिया सारा ।। आलस मोड़ उठ गया यों शब्द सुनावे ।। क्यों " १३॥ हो गया ठीक मैं सुनकर सभी सिधावे । नारी भी पाकर ऐसे अरज सुनावे ।। प्रसन्न हुआ भगवान् सौभाग्य बढ़ावें । अमर रहो प्राणेश मेरे मन भावें ।। त्रिया चरित्र को देख पति दरसावे । क्यों “१४।। ९५ मुख से केवल शब्द जाल फैलावे । हो मोह में अंधा पुरुष प्राय फंस जावे ।। देख लिया संसार सार नहीं पावे । झूठा है जग जाल व्यर्थ उलझावे ।। कोई किसी के साथ न आवे जावे ।। क्यों" १५।। मैं समझ गया अब मिथ्या जगत लखावे । करू आत्म कल्याण मेरे मन भावे ॥ नहीं भौतिक सुख में मुझको आनन्द आवे । उठ चला गुरु के पास साधु बन जावे ।। जप तप करणी करके समय खपावे ।। क्यों " १६॥ . सुनी बात तुम जग को स्वार्थ का जानो। नहीं आवे कोई काम समय पहचानो॥ प्राज्ञ कृपा मुनि सोहन कहे यह मानो। सदा करो शुभ काम ईश को ध्यानो ।। करो आप स्वाध्याय मोक्ष सुख चावें ॥ क्यों. १७॥ दो हजार तीस के ज्येष्ठ मास के माँही। कृष्णा तेरस बुद्धवार सुखदाई ॥ ठाणा पाँच से आये फतहगढ़ माँही । जहाँ धर्म ध्यान का दीना ठाठ लगाई। शुभ ज्ञान क्रिया से मुक्ति आत्मा पावे ।। क्यों :- १८॥ .. ९६ २५ चार चीजें मंगवाई: बुद्धि से भिजवाई। ( तर्ज-एवंता मुनिवर, नाव ) सुकृत धन संचो, पग पग जो चाहो अपनी जीत को ।।टेर।। जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में है कौशाम्बी नगरी । देश-देश से आकर बिकती चीजें यहाँ पर सगरी जी ॥१॥ भूपति यहां के जित शत्रु हैं शूरवीर रणधीर । राणी कमला रम्भा के सम सोहे गुण गंभीर जी ॥२॥ मन्त्री है जयचन्द्र राज की करता सार संभार। लगा लगा हाँसल जनता पर भर लिया कोष अपार ।।३।। किन्तु भूप के तृष्णा दिल में दिन-दिन बढ़ती जाय । न्याय अन्याय गिने नहीं कुछ भी किसी तरह हो आय जी ॥४॥ मोहन पुर है सीम पास में मोहन सिंह भूपाल । नीतिवान् गुणवान् साहसी रैयत का रखवाल जी ।।५।। मन्त्री बुद्धिपाल राज्य में राजनीति का ज्ञाता । करे खूब संभाल प्रजा की दीन दुखी का त्राता जी ॥६॥ एक समय नृप कौशाम्बी के दिल में ऐसी आई। करके युद्ध इस मोहनपुर को करलें कब्जे माँही जी ॥७॥ सोच रहा था भूप उसी क्षण मन्त्री पास में पाया । देख महीपति के चेहरे को मन्त्री ने दरसाया जी ।।८।। क्या विचार है पृथ्वीनाथ के देवें झट दरसाय । सुन कर भूपति ने मन्त्री को दीनी बात सुनाय जी ॥९॥ मन्त्री ने कहा बिना गुनाह नहीं, निकले रण में सार। उसके वल को देख लीजिये कितने नृप तैयार जी ॥१०॥ ९७ अत: आप कोई दोष लगा कर पीछे करो तैयारी। सबके सम्मुख बोल सकें हम नहीं होवे कुछ रव्वारी जी ॥११॥ भूप कहे यह सलाह ठीक है अभी दूत भिजवावें । निम्नलिखित चारों चीजों को उस नृप से मंगवावें जी ।।१२॥ (१) असल का कमअसल (२) कमअसल का असल । (३) बाजार का कुत्ता और (४) गादी का गधा । अगर नहीं भेजो चीजें तो करो युद्ध तैयारी। ऐसा लिखकर दूत भेज दो आशा सफल हो सारी जी ॥१३॥ उस ही क्षण लिख दूत भेज दिया आया नृप के पास । मोहनपुर नृप पढ़ के पत्र को चित्त में हुआ उदास जी ॥१४॥ बुद्धिपाल मन्त्री लख बोला ऐसी क्या हैं बात । देख पत्र को चेहरा आपको क्यों उदास है नाथ जी ॥१५॥ मन्त्री हाथ में दिया पत्र में चारों चीज मंगवाय। नहीं देने पर रण करने की लिखी बांत महाराय जी ॥१६॥ पत्र देख मन्त्री यों बोला चिन्ता देवें त्याग। भेज रहा हूँ एक वर्ष की अवधि लेवें माँग जी ॥१७॥ लिखा पत्र दे दिया दूत' को सीमा तक पहुँचाय । दिया भूप कर पत्र दूत ने पढ़कर मनः हरसाय जी ॥१८॥ अवधि ली है बारह मास की फिर देगा संभलाय । समय निकलते क्या लगता है वह दिन भी आ जाय जी ॥१९॥ अब ‘सुनिये मोहनपुर मन्त्री मन में करे विचार। ऐसा काम दिखा दू करके ले वह शिक्षा धार जी ॥२०॥ भूप पास आकर के वोला देवें रुपये लाख काम बनाकर रखू राज की सब जग माँही साख जी.॥२१॥ लाख रुपै ले हुआ रवाना कोशाम्वी में आया । सेठं बनी बाजार बीच में निज व्यापार चलाया जी ॥२२॥ मित्र बनाया कोतवाल को नित ही मॉल खिलाय । बाग बगीचे में जाकर के गोठे खूब कराय जी ॥२३॥ इक दिन वोला' कोतवाल यों मित्र विवाह कर लीजे। सेठ कहे हो कुलीन कन्या निगाह आप कर दीजे जी ॥२४॥ .. ९८ कोतवाल ने खोज शहर में अच्छे घर की बाल । पाणिग्रहण करवाया सेठ से मिटा सभी जंजाल जी ॥२५॥ बड़े मोद से परण पुनः वह निजी स्थान पर आया। आनन्द में अब समय निकलता हो गया मन का चाया जी ॥२६॥ किन्तु मन्त्री ने नियम बनाया निज नारी के साथ । सात कोवड़े रोज लगा कर करता मुख से बात जी ॥२७॥ यह चर्चा मत करना कहीं भी नहीं तो बुरा हवाल । करके तुम को निकाल दूगा सुन लेना यह हाल जी ॥२८॥ सदा मार से तंग हो गई मन में करे विचार । फंस गई इनके फंद वीच में कैसे हो छुटकार जी २९।। एक दिन कोतवाल ले आया गणिका कंवरी लार । कहे सेठ से नृत्य गान में है यह खूब हुशियार जी ।।३०।। कला दिखाई वैश्या कंवरी सब का चित्त लुभाया । करे प्रशंसा नर नारी दे धन्यवाद हरसाया जी ।।३१।। नाटक लख कर दिया सेठ ने उसको गहरा माल ! गणिका सोचे सेठ हृदय का कितना बड़ा विशाल जी ।।३२।। इस जीवन के साथी हैं ये निश्चय लीना धार । और सभी से पिता भ्रात सम रखना है व्यवहार जी ।।३३।। समय पाय उस कन्या ने भी कही सेठ से बात : इस जीवन के चुन लिए मैंने एक आपको नाथ जी ।।३४।। अभी नहीं मन्त्री यों बोला जाऊंगा निज देश । तुम्हें संग ले जाऊंगा मैं झूठ न समझो लेश जी ॥३॥ मन्त्री से कर वात स्थान या कह दी माँ को वात । मैंने इस जीवन में दिल से एक बनाया नाथ जी ||३६।। सुन करके समझाती गणिका नहीं एक से काम । अपने यहाँ तो देवे अर्थ वे बनते नाथ तमाम जी ॥३७।। खावो पीवो मोज करो नित नये करो भरतार । एक संग में रहकर नाहक क्यों तू वनी गँवार जी ॥३८॥ पुत्री कहती सुन ले माता भ्रष्ट काम नहीं भावे । प्रण कर लीना एक साथ में और न मुझको चावे जी ||३९।। ९९ समझ गयी माँ पुत्री प्रण यह कभी नहीं टलने का। खान पान रस रंगों से भी नहीं है मन चलने का जी ॥४०॥ मंत्री एक दिन अपने हाथ में गठरी ले घर आया । रख कर अपनी निज पेटी में ताला सद्य लगाया जी ।।४।। गठरी से चू रहा लाल रंग नार देख दिल लावे । ऐसी क्या वस्तु ले . आये नहीं भेद बतलावे जी ।।४२।। इतने में आ मन्त्री बोला राजकंवर सिर लाया। बात किसी को मत कहना तू यही तुझे बतलाया जी ।।४३।। लगा कोवड़े घर से निकला नारी करें विचार । यह अवसर अच्छा आया है कर दूंबात प्रसार जी ॥४४॥ आती जाती नारी से मिल करे परस्पर बात । राजकंवर का शीश काट कर पति ने कर दी घात जी ।।४।। बात फैल गई सारे शहर में पहुँची नृप के कान । कोतवाल को बुला भूप कहे पकड़ो सेठ शैतान जी ।।४६।। है प्राज्ञा मेरी यह तुमको शूली उसे चढ़ावो। काला मुंह नीला पग करके नगर मांही घूमावो जी ॥४७।। कोतवाल प्रा. सेठ द्वार पर बोला यों ललकार । कर पग में जंजीरें पहनो हो जावो तैयार जी ॥४८॥ सेठ कहे हो मित्र बिगाड़ो मेरी सारी शान । अहो निशि रहते संग संग में कुछ तो करलो ध्यान जी ॥४९।। लाल नेत्र कर · बोला ऐसे . कैसा मित्राचार । अभी बिगाडू शान तुम्हारी कीना अत्याचार जी ।।५।। वेड़ी डाल दी कर पग मांही दीना खर बैठाय । फूटा ढोल बजाकर उसको नगर बीच धूमाय जी ।।५१।। रस्ते में जब निज घर आया नारी से कहलाया। उपाय करके मुझे वचाले तब उसने दरसाया जी ।।५२॥ जाकर कह दो उनको मैं तो तंग आ गई तुमसे । उपाय नहीं करती मैं कुछ भी नाता टूटा हमसे जी ।।५३।। अागे जाते जाते मार्गः बीच में पाया गणिका स्थान । सुनते ही कंवरी प्रा देखे खूब लगाकर ध्यान जी ।।५४।। १०० के पास। जाय। विस्मय करके बोली ऐसे क्या हो गई यह बात । ऐसा कैसे ढंग बनाया कहो कृपा कर नाथ जी ॥५५॥ सेठ कहे हो गई है गलती शूली मुझे चढ़ाय । किसी तरह भी उपाय करके देवो शीघ्र बचाय जी ॥५६।। वैश्या कंवरी ने बीटी दी कोतवाल के हाथ । घंटे भर को देर करो तुम मानो मेरी बात जी ।।५७।। हां भर लीनी कोतवाल ने गई भूप नृत्य गान से राजी हो नृप कहे मांग वर खास जी ।।५।। वैश्या बोली नहीं चाहिये धरा धाम प्रावास । किन्तु जीवन दान उन्हें दें यही माँग है खास जी ॥५९।। जिनको शूली चढ़ा रहे वे जीन्दे घर आ यह आदेश सद्य फरमा दें और न मेरे चाय जी ॥६०।। उस ही क्षण आदेश दे दिया नहीं हुई यदि शूली । मुक्त करो यह बात श्रवण कर कंवरी मन में फूली जी ॥६१॥ शूली से हो गया मुक्त मन आनन्द का नहीं पार । वापिस अपने नगर आय के नमा भूप चरणार जी ॥६२।। कृपा राज की गहरी मुझ पर काम सिद्ध कर आया। चारों चीजें वहीं पड़ी हैं यहाँ साथ नहीं लाया जी ॥६३।। आदि से ले अन्त तलक की दीनी बात सुनाय । सुनकर सारी बात मंत्री की विस्मय मन में लाय जी ॥६४।। मंत्री बोला अवधि आ रही पत्र आप लिखवावें । चारों चीजें लेकर आ रहा राजन् ! श्राप लिरावे ॥६५।। पत्र लिखा कर दिया मंत्री कर, ले अपने घर पाय । कुछ समय वहां ठहर मौज से अब कोशाम्बी जाय जी ॥६६।। हाथी घोड़े रथ पैदल ले मंत्री सद्य सिधाया। शहर बाहर आ कोशाम्बी के बाग माँय ठहराया जी ।।६७।। चारों चीजें ले मंत्रीश्वर आये हैं इस वारं । भेजी सूचना भूप पास में करके दूत तैयार जी ।।६।। सुनी दूत की बात भूप दिल छाया हर्ष अपार । सभी नगर के देख सकें यों नृप ने किया विचार जी ।।६९।। १०१ .
अतः नगर में करी घोषणा सुन आये नरनार । रंग बिरंगे वस्त्राभूषण सज कर हो तैय्यार जी ॥७॥ आज अनूपम सभा भवन में सुन्दर बन गया ढंग । आपस में सब जन यों कहते नहीं देखा यह रंग जी ॥७१॥ निज मन्त्री को भेज को भेज बुलाया बुद्धिपाल मन्त्रीश । राज्योचित सामग्री संग में सभी नमावे शीश ।।७२।। ठाठ सहित पा रहा मन्त्री संग लीनी दोनों नार । सभा बीच में आ भूपति को कीना नमस्कार जी ॥७३॥ उच्चासन पर बैठ पूछ रहा कुशल क्षेम की बात । शिष्टाचार युत क़री परस्पर कहे भूप अवदात जी ।।७४।। चारों चीजें ले आये क्या ? देवो तुम बतलाय । मन्त्री बोला . सभी पास हैं इसी सभा के माँय जी ।।७।। पहली वस्तु है मुझ नारी, दूजी गणिका जान । कोतवाल है तीजा सुनिये चौथा आप राजान जी ॥७६॥ भूप कहे ऐसे क्या बोले दे भेद बताय। सभी सभासद् भी यों बोले देवो शंक मिटाय जी ॥७७।। सारी बातों का हम सब को मर्म देवो समझाय । कैसे हम चारों का तूने दीना नाम सुनाय जी ।।७।। इन बातों से तेरा स्वामी. है बचने का नाही । स.भी. व्यर्थ. हैं कहना. तेरा कहूँ साफ समझायी जी ।।७९।। मंत्री बोला आज्ञा आप की देऊँ रहस्य बतायः । ध्यान लगाकर. सुनना मेरी बात समझ में आय जी ॥८०॥ असल से कमअसल · वस्तु यह मेरी है निज. नार । असल घराने में जन्मी पर किया कमअसल व्यवहार जी..८१ घर की बात जाहिर नहीं करनी दी इसको समझाय.। राजकंवर शिर काट लिया पति दीनी बात फैलाय. जी ॥२॥ शूली का जब हुक्म हुआ तब बोली मुख से. नार । मैं नहीं करती उपाय कुछ भी चाहे मरे भरतार जी ।।३।। वस्तु दूसरी गणिका पुत्री. कैसा किया व्यवहार । कमग्रसल से यही असल है किया खूव उपकार जी ।।४।। तू iic १०२ अपने आप को भूल उसी क्षण कीना सद्य उपाय ! अपनी दक्षता दिखा राज को लीना मुझे बचाय जी ॥८॥ कोतवाल है वस्तु तीसरी, खूब खिलाया माल । किन्तु समय पर बदल गया यह सुना न कुछ भी हाल जी ।।८६।। लालन पालन किये श्वान सम ले स्वामी को काट । यह बाजारू कुत्ता इसको खूब चटाई चाट जी ॥७॥ किन्तु समय पर बदल गया यह खराब कीनी शान । करी प्रार्थना इनसे मैंने सुनी नहीं कुछ कान जी ॥८॥ चौथी वस्तु आप स्वयं हैं मन में करों विचार । सोच समझ बिन अाज्ञा दीनी देवो इसको मार जी ॥८९॥ किसके सिर को मैने काटा यह कैसा है न्याय । हुक्म लगाया तत्क्षण इसको देवो शूली चढ़ाय जी ।।९०। राज धर्म को . भूल आपने कीना महा अन्याय । सुनी सुनाई वातों पर ही ऐसा हुक्म लगाय जी ॥९१॥ मुझे बुलाकर बुलाकर आप पूछते कैसे तभी आपको मालूम होती सुनते सारा हाल जी ॥९२।। गादी के हैं गधे आप यह दीनी सच चारों चीजें माँगी आपने दी मैंने संभलाय जी ॥९३।। सुनकर सव वृतान्त मंत्री से भूप रहा शरमाय । विन अपराध सजा शूली की मैंने दी फरमाय जी ।।१४।। सभी सद् जनता वहाँ की दे नृप को धिक्कार । कीना है अन्याय भूप ने, दीना न्याय विसार जी ।।९।। भरी सभा में जितशत्रु ने दीने भाव दरसाय । तृष्णा बस मैंने गलती की जिसका फल यह पाय जी ।।९६।। नरपति सोचे जिस राजा के हों ऐसे मन्त्रीश । उस राजा को कौन पराजय कर सकता है ईश जी ।।९७।। करके प्रति सम्मान मन्त्री को दीना खूव उपहार । माफी मांगी किये कार्य की गलती की स्वीकार जी ।।९।। मन्त्री वहां से हुआ रवाना लेकर के दो नार । वैश्या कंवरी संग विवाह कर पाया हर्ष अपार जी ।।९९।। मारा बाल । दरसाय। १०३ '.
जय पा करके वापिस आया मन्त्री अपने देश । सारी बात कही भूपति से द्वेष रहा नहीं लेश जी ।।१००।। सारा कष्ट भी नष्ट हो गया रहा न किंचित् क्लेश । वढ़ा प्रेम आपस में गहरा सुखी बना है देश जी ।।१०१।। समय-समय पर मिल आपस में हर्षित हो भूपाल । एक दूसरे के गुण लेकर रहे प्रजा को पाल जी ॥१०२।। एक समय गुरुदेव पधारे धर्मघोष अरणगार । सुनी सूचना सभी नगर में छाया हर्ष अपार जी ॥१०३॥ मोहनपुर का भूप एकदा कौशाम्बी में आया। दोनों भूप मिले आपस में अति हर्षानन्द छाया जी ॥१०४॥ दोनों नृप व प्रजा सभी मिल पाये दर्शन काज । विधिवत् वंदन करके बैठी सन्मुख सकल समाज जी ॥१०५।। भरी सभा में धर्मघोष मुनि धर्म देशना दीनी । आगार धर्म अरणगार धर्म की व्याख्या सुन्दर कीनी जी ॥१०६।। यह अवसर मिल गया पुण्य से मानव तन अवतार । ले लो सम्बल संग धर्म का भव भव में सुखकार जी ।।१०७॥ दोनों ही नृप ले श्रावक व्रत शुद्ध भाव रहे पाल । जप तप करणी करके अन्त में लिया स्वर्ग कर काल जी ।।१०।। दीक्षा लीनी धर्मघोष मुनि पास । अष्ट कर्म कर नष्ट अन्त में पाया शिवपुर वास जी ।।१०९।। प्राज्ञ प्रसादे 'सोहन मुनि' कहे धर्म साधना कोजे । नर भव रत्न अमूल्य प्राप्त कर अजर अमर पद लीजे जी ।।११०॥ पाकर गुरुदेव की भिलवाड़े चौमास । कई वर्षों के धड़े मिट गये छाया अति उल्लास जी ॥१११।। दो हजार उगणीस साल में तीन सन्त सुखकार । श्रावक श्राविका धर्म ध्यान कर पाया लाभ अपार जी ।।११२॥ वुद्धिपाल ने ग्राज्ञा Y. 10001 १०४
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