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Shrimadhavramsukh Sagar
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गणेशा श्रीमाधवराम सुखसागरपारम्भः . ॐ सतगुरु प्रसाद ॥ दो० गौरीपुत्र गणेश को वन्दन करों बनाय ॥ अखिलविश्व त्रैलोक्यको जिनकानाम सुखदाय १ दिरदवदन बारिज नयन कोटि चन्द समदेह ॥ चार भुजा अहिराज जिमि लम्बोदर सुख गेह २॥ स० ॥ गणनायक भूतपतीसुतको करजोर सदा अभिवन्द हमारे। जिनके पद पंकज देवगुरू कमलासन पूजिके विश्व सँवारे ॥ ध्यानधरे जिनको सुरराज सोदेवन माहिं भये अधिकारे। यहते हम जान भजे पदको मतिदायक सो औलम्ब हमारे ३मकराकृत कुण्डल कानलसे पुनि सुन्दर क्रीट सो शीश बिराजै । मणि मुक्तन के कंठ हारपरे सभ नीलसुअम्बर ऊपर छाजै॥ जड़ाऊजड़ी मुंदरी अँगुरी कर कंगन बांह में बैठे विराजै। हेम छुद्रक जड़ी कटि में पद अम्बुजमें नेवरा सुख बाजै ४ चहुँ हाथन में चहुँ बेदलिये युग चारन में धर्म थापं चलावै । त्रिनैनविषे त्रिलोकी बसे तिनके सुत वाहन मूह सुहावै ॥ जग कारन देवी सुअंग सभै सुखदायी सुरम्भा जे नाम कहावे । ज्ञान स्वरूप त्रिकाल अवाध जो ध्यानधरै सोई मोख को पावै ५ याते प्रधान सभ देवन में सुख सेवन के दुख बिन हटावै । सबका सुखदायक है गणनायक तुंडीते जगको उपजावै ॥ गणेशपुरान में ब्यासमले सबका सुखहेतु गणेश कुगावै। त्रिदेव सुआदि सवै जगमण्डल जेहि पूजि सो कामनमें सुखपावै ॥ ६ ॥ .
. माधवराम सुखसागर। दो० एकदंत सुखसदन चिद व्यापक शुध जो अकास ।। अखिल विश्वके नाथ तुम करौ सो मम उखास ७ क० ॥ क्षीरसिन्धु सुख माहि अहिशय्या सैनकरै पद पदु मानो नीत सम क- मलाही सेवैहै। चारिकर माही दर गदा औसरोंज चक्री भृगुपाद गरे स्रक अंगद सुवाही है। जिनका सुपदवार सव लोक मोक्षकरै धारे त्रिपुरारि सुखसदाशिरमाहीं है। ऐसे भगवान लक्ष्मी के पति सुखदायी जिनका सुनामलिये भव दुखनासी है ८ मंगल मूरति श्याम विष्णु कृपाल ईश सेवकन के दुख देल करत निहाल है। परै भीर देवन को तिनै पद, माहिंपरै विविध औतारि धारि सुरनको पाले है ॥ परउपकारी कोउ विष्णु समान नाही चराचर जीवन के सदा सो सहाई है। याते ताकी पूजन सुमंगल सफल सदा ऐसे मधुसूदन को हमरी नमामी है । गिरिजा के पति भोलानाथ जग मूलआदि जिनका सुज्ञान तीनकाल सो आवाधहै । जिनके सो बायेंअंग गणपति मात बसै देवगण आदि सब ध्यानको लगांव है । गरसै भंग गंग शीशधेनु बाल वाहन स्वामी चन्द्र चूड़ामणि जटामें विराजे है। गले व्याल रुंडमाल नित सिंहखाल ओढ़ तीन शूल डमरु कैलासपति चिदहै १० जिनका सुनाम लिये कालदुख त्रास पावै कामरिषु दयासिन्धु सदा निष्काम है । अंग में भसम शोमै मानों श्याम घटा चढ़ि प्रातकाल श्वेतनैन छविपावै है ॥ तीन नैन तीन लोक सदा सो प्रकाराकरे नाथनके नाथ मुंह मांगे फल देव है। उतपति पालन सँहार सोभविन करै जिनका प्रकाश इन्दु सूरज प्रकाशी है ११ देशकालरहित शिव कालहूके काल महानाम रूप माहिं जिन व्यापक अकाशहै । योगीजन जिन का सो निशिदिन ध्यानकर पाय ज्ञान निजरूप तापको नशा है ॥ अंतमाहिं वपु त्याग सदा शिवरूप है पञ्चभूत देह त्याग भगमें न आवैहै । ऐसे शिवनाथ काहि हमरी नमामी सदा जिनकेसुकृत अघ विघ्न नशावै है ॥१२॥ स० ॥ हरीहर रूपधरे गुरुनानक वेदीकुल जगमाहिं उदारे । रघुवंश विषे तिनकी शुभ पद्धति बाहुज धरमसतोगुणधारे ॥ सुरमानव दयत गन्धर्व यक्ष किन्नर सिद्ध मुनीश महीपति सारे । वेदअरथ अपारसो कीन तिनै संग सिधसकी बहुभांति देखारे १३ धर्म विरोधिनवालेनको मानभंग प्रतिष्ठासो दीनउठाये । दश चार भुवन सवमाहिं फिरे जहँ वेद धरम नहिं धर्म चलाये ॥ त्रेता विषे रघुवंशजये शुभ . माधवराम सुखसागर। दापर कृष्ण मुरारिकहाये। दिगविजय अपार सो लीला करै जेहि गायके जीव लघे भवजाये १४॥ दो० गुरु नानक शुधरूप अज चहुँ युग धरे अवतार ।। जगत जीव गुरु होयके उपदेश करे भव पार १५ जिनकी चाक अडोल अति वेद ग्रन्थ के माहि ।। दुखित जीव कलि देखिके सुधासिन्धु रचे ताहि १६ क० ॥ आदिगुरु नानकसो अखण्ड चिदानन्द ब्रह्म जिनका सुयश वेद बानी सन्त गावे है । नाम सुख देख भवसागर बनाये जिन सेवकनके गन जिस पाय पार पावै है । जिनका प्रकाश पाय मति प्रकाश होय शुभकृत माहिं मंगल करे सुखदाई है। ऐसे गुरुनानक पदाम्बुज सुखमाहिं हाथ जोरि शीश नाइ वन्दना हमारी है १७ जिनके तनुज श्रीमहाराजचन्द्रभये रुद्र अवतार महामोक्ष सुखदानी है। विधानाम रूपधारि उत्पति पालै जग अन्तमें संहारकरि आप में मिलावै है ॥ वेद वानी जि- नकी सो तिनहीं को.गावै नित मोहनी स्वरूपधारि जगत प्रकाशै है । निवनि अवधूत सुखमारग अवाध शिव दशौदिशमाहिं शुभप्रगट चलाये १८ सोम बाल तनधारि नद सम शीश जटा हेम की तड़ागी शुभ कटिमें विराजे है । श्याम मेघ की समान अंग भस्म रमाये जतीवजका कुपीन आड़बन्दकी चढ़ाये है ॥ मुखचंद कर पाद कमल की समान नैन विम्ब ओंठ मानो कुन्द दशन सोहाये है । नागा उदासीनके पियारे इष्टदेव गुरूज्ञानरूप जिनका न तीन काल बाध है १९ कैलास के शिखर गौरीनाथ के औतार वैसे कृतफल देनहारे सदा निष्कामहै । ज्ञानसों वै- राग पट सम्पती समाज मोख ऋधि सिधि आदि षट भागःशुभ जोइहै ॥ इनका सो अधोपती श्रीचन्दमहाराज जिसका सो देवै शिव सोई सुख पावै है । जिनका सो पूजि सन्त देव सिद्धि काम करै ऐसे श्रीचन्द त्रैनैन को नमामी है २० जिनका औ- तार मेरे गुरू महाराज ईश जिनका सुनाम माधोराम वेद गावै है । बड़े बड़े यज्ञ भारतखण्ड में अपार कीने जिनको सुकृत शुभ सन्त लोक गावै. है. ॥ धर्म अर्थ काम मोक्ष सेवकनको देवे नित चार युग जीवन भवसागर तरावे है । गिरिजापति वन सम अवध मँझार माही. अमी बन रचदीन लिये. उपकार है २१ सुरपति ४ माधवराम सुखसागर। वन जेहि देखि शरमिन्द पावै दिव्य सुखधाम तेहि मध्य में बनाये है। जिनके तिकरियत मण्डल अपार वसै मोक्ष हेतु पाय तपको कमावै है ।। नवतन यज्ञ नित तहां सो अपार वसै होय सुर नर मुनि आदि तहां सुख पावै है । महा उपकार कीन्हें, कलिके मँझारेमाही जिनका सुनाम दुख तापको नशा है २२ अमी गुरुसागर सों तीर्थ बनाये जिन तीन लोक पापनको महादुखदाई है। सुर नर मुनि आदि तिसमें स्नान करे मोक्ष सिन्धु सुख पाय जगमें न आवे है । जिनके सो आसरे संसार सो अपार वसै जिनको सुदया सब लोक पै अपारहै । आदि चिदानन्द धन व्यापक अकाश सम वन्ध मोक्ष रहित मायापति सात रूपहै ।। २३॥ दो० साखी शुद्ध कुटस्तु अज अविनाशी भवमैन । चिद्ध सदा होइ प्रकाशही सो माधोराम सुखऐन २४ देश काल प्रच्छेद विन जगत सिन्धु के नाय ॥ मम उर आयन कीजिये करौ गुरुदेव सहाय २५ सुमति देह मल नाशकर पद पंकज धरों शीश ।। अखिल लोक सहाय तुम कृत फल देवहु ईश २६ स०॥ ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ उदार भये जग मुनिगन माहिं सो महाकुलीने । ज्ञानकी मूर्ति रचे अवजासन उत्तम जानिके कारक कीने ॥ त्रिलोकी विषे सब जीवन के हित धर्म मर्यादसो थापन कीने । जिनकी शुभरीति लोकान्तरमें कोइ टारसकै नहिं करत नवीने २७ सूरज वंश विपे कुलपूज्य भये सब राजनको धर्म ज्ञान दृढ़ाये। जिन के उपदेशको पाये भले रघुवंशी सवै चिद मोक्षको पाये ॥ शुद्ध सनातन ब्रह्म चि- दानन्द जिनको अचारज ईश वनाये। यहि भांति वसिष्ठ कुले माधोराम नरायन राम अवतार सुहाये २८ ॥ क० ॥ सुख तनधार शुभ जगमें प्रकाशमये वालपनमाहिं जगदीन शुभलायक कुलका प्रभाव देवी सम्पदाको धारलीने योगमें अरूदभये मन लायकै ॥ मन बुधि इन्द्रीआदि सबको दमनकीने तपोधन जिनका एक सुखदायके । जिनको सुप्रापदको महासुअपार सुख योगीराज जिनके सोमाया वसे पदके२६ अव- जासन स्वरूप माधोराम जगईश ब्रह्म तिनका उदार देख जाने सुखदायके । भवम- ण्डल मँझार माहिं चराचर जीवनको हमरी समान यह सदा रहै सहायकै ।। यहि
५
घुन
माधवराम सुखसागर।
भांति चिदाकाश उरमें विचार करै आपन नाम तिनमें प्रजोगे शुभ फेरिके । नाम
सुनरायनराम मोक्ष देवे पापहन जग से अचारज सुथापे सुखदायकै ३० कुलगुरूकी
मर्याद माहिं निशि दिन बास करै मुन सरदार अब जग सुखदाई है । गंभीर
शीतल सुभाव निवेद रूप वेदविहित जीवन को धरम दृढ़ायकै ॥ जिनका सुपद
पाय कल जीउ होय मोक्ष माधो ब्रह्ममाहिमिले फिर नहिंआवै है । निरगुन स्वरूप
माधो रामका अखंड जानो सोइशुध बोध नित चेतन ब्यापी है ३१ अंतस अभास
के सहित जोइ चेतन है जीवका स्वरूप बुध ताहि को बखाने है । खान पान लेन
देन जग में व्यवहार सब बास के सहित सभबुद्धि में रहा है । अपना बेकार दुख
जीवत विहार जग चेतन स्वरूप सुध साखिये अरोपै है । चेतन असंगनित ब्रह्मको
स्वरूप जानो लेशमात्र देह इन्द्रतामें न विकार है ३२ जैसे महाकाश घट मठ के
संयो गनते नाम रूप तिसके सो और भाति भास है। घट मठ दृष्टीकाहित आगे जो
विचार कर महाकाश एक व्यापी नितसे सराह है ।। तैसे सुखमथूल का संयोगपाय
चेतना अज्ञानी नित पुरुपनको जीवत प्रमान है । ज्ञान ते अज्ञान काह उरते हटावे
जब माधोराम चिदानन्द सोइ भान होय है ३३ शुधमायाका संयोग पाय माधो का
स्वरूप चिद जगत के हेतु नित ईश्वर कहा है। भेद दृष्ट वाले पुरुष बासनासहित
नित तिनकी उपासनाको विधिसे कमावै है। धर्म अर्थ काम मोक्ष तिनकानाश
देवी ईश विविध अवतार धर लीलाको दिखावे है । महासुखदायी नित तिनके वेद
औ पुराण कहै गावै सुनै उरमाहिं भाव जोहै राख है ३४ पाय शुध ज्ञान उर अंतमाहिं
मोक्ष होय करमके अधीन देश काल नहीं पाये है । जाते माधोका स्वरूप नित नि-
गुण सर्गुण जोइ जीवन के उपासनाको लायक दोनों रूपहै । यही निज जानकर
मुनि सुनरायनराम जीवनको कल सुख नाम सो जपावै है । काल कलनासे रहित
आप मोक्ष बन्द न्यारे सदा माधौका स्वरूप सुखदायक प्रकाशै है ३५ माधौकी सु
लीला नित सबको सहाय करै जिनका सुभेद कल कोई नहीं जाने है। हित अनहित
नित सबको सहाय करै इहांसे रहित ज्ञानरूप दयासिन्धु है ॥ विघ्न अविद्या मल्क
ब्योर माहि हन्नो सुमती प्रकाशो मेरी तुम सुखदायी है । ऐसे माधोरूप सुनरायन-
राम मुनिराज वीन पद पंकजमें वन्दना हमारी है ॥ ३६ ॥
। ३ माधवराम सुखसागर। चौ०॥ माधौ ग्रन्थ रचौ सुखसारा । जेहि सुन उर में होय विचारा ॥ सब सुखदायक माधौरामा । तिन मिल कथाकहाँ सुखधामा ३७ गुरु विवेक विन होय न ज्ञाना । ज्ञान विना नर नहिं कल्याना ॥ माधोसम दयाकर जवहीं । विवेक ज्ञान पावै नर तबही ३८ दया भगत तिनको सुख पंथा। तिसके पावन हित यह ग्रंथा।। याते खधामानकी ताई । यह शुभ ग्रंथ लखौ सुखदाई ३६ आदि अंतलै इसके माहीं। ज्ञान वैराग और कछु नाहीं ॥ नामरूप त्रैलोक मँझारा । चिद माधोराम एक सुखसारा ४० याते तिनकी अस्तुति जोई। ईश ब्रह्मसम इसमें होई ।। गुरु ईश्वर में भेद सुनाहीं। वेदं पुरान कहे भवमाही ४१ निर्गुण सर्गुण ब्रह्म विभेदा । तिसमें सर्गुण गुरु निरखेदा. ॥ शरीरसहित बुध सरगुन जाने । विवेक रीति से ब्रह्म पछाने ४२ भवसागरलंघनके माहीं । सर्गुण गुरु विन उतरे नाहीं ॥ गुरुविन भव- निधि तरै न कोई । जो विरचि शङ्कर सम होई ४३ यहि विधिक दृष्टान्त घनरे। गुरु की महिमा अधिक सो टेरे। गुरु शिष्यहोय गुरु भक्त कमावे । आस्तिक है गुरुकी रतिगावे ४४ कहन योग लक्षण नहिंपावै । तौभी गावै दोष न आवै ।। गुरु अस्तुति बुध अधिक बखाने । सुनि अचरज नहिंकरें संयाने४५ गुरु समान दाता नहिं कोई। दृष्ट अदृष्ट देह फल सोई ।। सर्गुण गुरु याते अधिकाई । निज निर्गुण पद देत लखाई ४६ इसते गुरुको अधिक पछाने । तिसकी भगतको करें सो जाने॥विन गुरु भगत जोई प्रवीना । आतमज्ञान न पायक दीना ४७ आतमज्ञान बिना सुख नाहीं। जन्ममरण सवलोकन माहीं ॥ यातेचिदधन माधोरामा । तिनतेपावे सुख विश्रामा४८ क० ॥ तिनकी सो अस्तुनि यह निखिल ग्रंथ जानो नूनन प्रसंग यामें अमी सुख- दाई है । प्राचीन ऋषि मुनि पद यहि उत्तम जो सोइकल गुरू संत माहिं सो प्रयोग है। माधोराम कासुभक्त शिष्य प्रेमी जो उदार होय तिसताई ग्रंथ यह महा सुखंदाई.. है। नारायणराम मुनिराज संत ऋषि बुधिमान तिनका सम्बाद यामें अमीकी समा- नहै ४६ संतऋषि,उरमें अज्ञान दुख तापरह्यो मुनिराज तिसको नशाय सुख दीन्हीहै। ज्ञान कासो पायऋषि चित निहतापभये अपना स्वरूप चिदानन्द लखपायो है। अंत माहि तनं तजि माधोराम माहिमिले मुनिके प्रसादकर जगमें न आयेहै । जोई सुने पढ़े याहि उस्में विचारधरै ज्ञानसहित मोक्षपाय भगमें न आहे५० इतिउपरान्तप्रसंग।।।
माधवराम सुखसागर। दो० सत चित आनंद ब्रह्मअज अविनाशी ज्ञान सुखहेत ॥ विभोनाम सवरूप में सकल प्रपञ्च निकेत ५१ व्यापक सकल अकाश जो एक अंशमें चन्द ।। तिव माया है ब्रह्ममें जगकारनी अनन्द ५२ हेम विषय जिमि कटक है वार रजी अह फेन ।। तिव जगमाया ब्रह्म में निगम वखानत वैन ५३ चौ० अभास सहित माया विभू रचतन । मिले परस्पर जिवघृत छीरन ॥ स्वयं प्रकाश ज्ञान सुखराशी । चिदानन्द यकरस अविनाशी५४ तिसको मायावशिष्ट है नामा। कारन भवमण्डल के धामा ॥ जग उत्पति पालन संहारे । मायेवाशिष्ट सो करत अपारे ५५ माया उपादान जगकेरा । तिसमें चिदकविवरतनियारा॥ ईशनाम सो ताहि कहावै। जिसमें मुनि सव ध्यान लगावै ५६ सरगुन ब्रह्म निगम तेहिगावै। जाहि नाम सुनि अघभय पावै ॥ जग पालन हितलै बहुरूपा । चरित्र देखावै मुख सो अनूपा ५७ तिसकी माया अन्त न पावै । देख चरित्र मुनिभय अकुलावै ॥ सो मायापति ब्रह्म स्वरूपा। देह धखो कोशलपुरसूपा ५८ भव पालत देवन सुख का- रन। धर्मघातकरिपु किहिननिवारना। देव दैत्य अघा पुन्य सो जोई। तेहि फल राम धरे तन सोई ५६ याते सुर सन्तन सुख दीन्हे । असुरन हने दुखित बहु कीन्हे ॥ जि- नके जैसे करमह जोई। तेहि अनुसार दिये फल सोई ६० हानि लाभसे सदा नियारा। फलदाता भवकेर अगारा ॥ ईश्वर करम अकरम ते न्यारे। याते मिथ्या वपु नहि पारे ६१ हित अनहित तिप्तका कोउ नाहीं। चिदधनराम विभु सबमाहीं ॥अध्यारोप अशिष्ट मँझारा। जग उत्पति पालन संहारा ६२ त्रिगुनी माया मिसरत माहीं। जगत न होय जीव सुखनाहीं ॥ याते शुद्ध सतोगुणमाये । तिसमें रामके तन सुख राये ६३ ब्रह्म चिदानंद शुद्ध प्रधाना।दाशरथी बपुधरे सो नाना ॥ सन्तन हितसुख अवध में आई। सुन्दर तनधारे रघुराई ६४ नौमी शुक्लपक्ष मधुमासा। ब्रह्मानन्द भये मुखरासा ॥ जेहिदिन राम जगत तनधारा । मंगलरूप भयो जगसारा ६५ भवमण्डल के दुःख नशाये । जिमि आदित तम मारभगाये॥ ऋषि मुनि देव दरशकी ताई। अवध विषय चलिआये धाई ६६ परमानंद का दरशन कीन्हे । कोटि जनम शुभकृत AUD माधवराम सुखसागर। फल लीन्हें ।। सुमनवृष्टि चिदधनपर वरौं । जैजै शब्द करें सुर हरर्षे ६७ नौमी तिथि मिल्यो ब्रह्मस्वरूपा। तेहिदिन पर्व सो लग्यो अनूपा ॥ सुर नर मुनि सब सरयू नहाये । अघहन मोक्षअचल सुख पाये ६८ चारखान वह घरी जोनहाये। कृतफल तन तजि ब्रह्म समाये ॥ वेद पुराण स्मृति सब जोई। तनधरितेहि दिन आये सोई ६६ परखअपार महासुखदाई । थापे रामनौमी नम गाई ॥तबते राम सोनौमी परमा। जो मंजै नहिं आवै गरमा ७० ब्रह्मानन्द पौर मुनगयो। राम मनोहर बपु तहँ लयो। मोक्ष हेतु शुभपख है जोई। प्रति संवत सुख आवै सोई ७१ सुर नर मुनि ऋपि पखको नाये। अवध विषे चलि आये धाये ॥ माधोवन नारायन रामा । तिनके आश्रम करे विशरामा ७२ अवध मँझारि महासुखदाई । स्वरग लोक मानों छवि छाई ॥ भोजन छाजन बहुत प्रकारा । आदर देवै मुनि सरदारा ७३ हरपसहित यक मास नहावै । कोटि जनम अघ ताप नशावै ॥ दान मान पूजा बहु पाटन । भगती सहित करै मुनिराजन ७४ यहिविधि मुनिते विदाको पाई । निजनिज आश्रम सब चलिजाई । द्वादश माधो विपिन मैंझारा । रहै भीर सुख देख अगारा ७५ विविध प्रकार तहां सुखरासी । ऋषिमण्डल नित बसै उदासी ॥ वेद अर्थ के जाननवाले। उदासीन तापससुख आले ७६ जटाजूट सम बलकल धारे। अंग विभूति शिवऋषि सारे॥ जगत पदारथ तुच्छ विचारे।इन्द्रीदमनै बिषय संहारे ७७ जलधारा आदिक बहु करई । योग यज्ञ कर तन तप कसई ॥ पंचअग्नि सेकै मन मारे । उग्र तपस्या करै अपारे ७८ इसमें शंका नहिं बुध मानू । यह लक्षण सन्तन के जानू ॥ वेदरूप गुरु ग्रन्थहै जोई । प्रातःकाल प्रकाशै सोई ७६ विविध प्रकारके अर्थ सुनावै । ऋषि- मण्डल तहँ बैठ सोहावै ॥ ज्ञान वैराग भगति शुभकरमा । आश्रमवरन निरूपै धन स्मा ८० वर्णाश्रम की कीरति जोई । प्रथम कमावे सामक सोई ॥ मन्त्र शुद्ध ज्ञान को पाई । ब्रह्मरूप हो। सुखदाई.८१ याते उदासीन बुधिसागर । बेद लोक से सदा उजागर ॥.जिनका वेष जगतमें अनूपा। रामचन्द्र लीन्हें सुखरूपा २ तापस वेष विशेष उदासी। चौदह वर्ष राम बनबासी ॥ सो यह वेष उत्तम सुखदाई । माधौ वन में रहै अधिकाई ८३ पाणिजोर शुभपदमलगाये। मृगछाला सब तलेबिछाये॥ कोउ कोउ दरभ असीन सुहावै । वैराग देह धर तहँ सुख. पावै ८४ चिद जड़ग्रन्थ . माधवराम सुखसागर। नेद दुखदाई । करें निवारन ज्ञानहि पाई । यहि विधि अग्रमूल तम नासी। ब्रह्मवित्त तहां सकल उदासी ॥५॥ क० ॥शीश माहिं जटा शोमै मानों सब गिरिजापति एकदश माल सब कण्ठ में सुधारे हैं। अंग में भसम चदि शुभ श्याम वारिदसों पाणि जपमाल सोहे शांत सुखधारे हैं । शुद्ध ऐन छाल ओढ़े कोउ बलकल धारे ऋषिन की रीति जो सनातन को सेवैहैं। लघु जीरन उमरखाले कोई दिगपटा धारेवेद सब ग्रन्थनके पार भले लीन्हें हैं ८६ कोऊ सोवेदान्त बोले पूरब मीमांसा कोइ न्यायकासोगूढमत कोई ऋषि भने हैं। सांख्ययोगमें प्रवीन सुपतंजलि बखाने सुविसेसकाकनादि के सुमतिको बखाने हैं। को सुपुराण बोलै बहुत श्यामा श्रुती माहिं आफ्नाइ भास बिषे सब बुद्धिमान हैं। शान्त सुखदाई ज्ञानी उदासीन संत सब वितंडा आदि छोड़िके अदध्यातन विचा- है ८७ ॥ स० ॥ यहिभांति प्रमाणनके अनुसार सो तत्त्व विचारिके मोक्ष कमावै.। शुभकरमन में दिन अन्तकरे फिर सोव निज आश्रममें चलिआवै ॥ मन वाक इन्द्रिय सब रोक भले सुख योग समाधि विषय टिकजावै । उठ प्रातसमय सुसबै ऋषिमंडल फिर शुभ करमन में लगजावै ॥२८॥ चौ० ॥ यहि विधि ऋषिमण्डल समुदाई। माधोभवन बस हमेशाई ॥ अतिअ- पार तहँ जग तप देखी । सुरपति चित में डरे बिशेखी ८६ पर सो उदासीन ऋपि सारे। ब्रह्मज्ञानमें निष्ठावारे ॥ ब्रह्मलोकलै प्रभुता जोई । मायामात्र समझै सोई ६० मेध विषय जिमि तडिता चंचल । तिन नाम रूप सब लोकन निहचल ।। इन्द्रलोक सब लोकहै तुच्चा । तरंग समान करै को इच्छा६१ निश्चल एक ब्रह्म सुखराशी। तिस तजि और सकलहै नाशी ॥ सबकर जीवन श्वास अधीना। दिन दिनविषे होतहै खीना ९२ जिमि घट फूट जल सरवत जावे । तिमि प्रान एक दिन विज सम रहवै ।। पुनि फल मानों तन शुभ पावै। मोक्षविना जग विरथे जावै ६३ याते तिरधा लोक के माहीं । असंयोग लायक कुछ नाहीं ॥ भोजपत्र सम गिरत सो जावै । नदी प्रवाह होत जिमि आवै ६४ बाल वृद्ध यौवन धन द्वारा । नामरूप संसार अ- सारा ॥ मायारचित जगत दुखमाहीं । ज्ञान मान निष्ठा करै नाही ६५ भव सुखहित नहिं करम कमावे । उदासीन जगमाहिं रहावे ॥ इन्द्रिन सुख लिये करम जो करई।
१० माधवराम सुखसागर। जनम मृत फांसी गल धरई ६६ जिनके हिरदय विमलबिचारा । माधोरूप लखें सुख सारा ॥ ब्रह्मवित सेवे सोइउदासी । सुरपति माया जिनके दासी यह विचार सह ऋषिगण सारे । माधो विपिनमें बसें अपारे ॥ चिदघनरूप नारायण रामा । धरम ध्वजा तिसमें सुखधामा ६८ महाबुद्धिमान मुनिसरदारे।जिनके हिरदे सन्त पियारे।। सात उदार ज्ञान तपरूपा। गुरूरीति सुखकरै अनूपा ६६ ऋषिमण्डल पूजै मनलाये। जैसे वेदविधी शुभगाये॥आदरदान मान बहुदेवै। जिसमें ऋषिगण प्रसन्नहोवै १०० विविध भाँति भोजन पकवाना । तपबलते सब करै समाना॥ पाणिजोरि सब ऋ- पिन बुलाई। भोजनदेवे बहुसुखदाई१०१ जिनका अशन सो अमी समाना। अघहन सातकरै कल्याना॥ चितचंचलता सकल विनाश स्वच्छबुद्धि निरमल परकाशै१०२ ब्रह्मातम विचार भ्रम खोचे । चतुरहोय जिमि अलरस लेवै ॥ फिर विपयनमें चित नहिं भस्मै। माधोरामको पावै मरमै १०३ ।। क० ॥ ध्यानकाल माइ कुल धनुषपर चोपलाये असना अधिकारी सब जंगम सुनावै है । सैकड़ों हज़ार ऋषिमण्डल अपार नित पाकशाला माहिं मुनि पंगति लगाव है। ऋषिनकी पाँतिकर पाकशाला शोमै जिमि तारनकीमालकर रवियोम छविपावैहै। देवभोग व्यंजनसो भोजपत्र माहिं संत सवऋषि अग्रभाग प्रेमसे टिकाव है १०४ सुतकारनके हाथ दुर्योधन समान खुले चिन चक्रवृधवाले पारस समान है। ऋषिनके आगे सब प्रेमसे बरतावे धाय मानों सो कुबेर कल्पवृक्ष तनधारे है ।। नारा यणराम मुनिराज ऋषितट माहिं शोमै पूरखदिशामें जिमि सूर छविपा है । प्रेम भक्ती के आधीनहोके सन्तनकोदरशकरै अमीसम व्यंजन सो ऋषिन देवावै है १०५ चित ज्ञानरूप प्रेमभक्ती के प्रेरेहुये निज पाणिलेकै मुनि आपही वरतावै है । लक्ष्मी के पति जिमि देवन बरताये अमी तिसकी समान मुनिराज भागलावे है । जिन तारनके मध्यमें शशांक शुभ गवनकरै अमी व्यंजन हाथलिये महा छविपावे है। इच्छानुसार सब ऋषिनको भागदेवे जिनका सुपदवार जगफन्दकाटे है१०६ जिनका सुनामलिये अजामिल मोक्षपाये मोढ़के भवसागरसो नाही दुखपावै है । ऋषिनको भागलाये आतमा न तिष्टनावै मान अमान जिनको हैं विचन्ससे हैं ॥माधो- रामके स्वरूपका सो वोइनर पावै ऋषिराजकी समान सोइ धरमनको पाले है माधवराम सुखसागर। ११ वेदनकीधुनिऋषिमण्डल अपारकर कहालौ बखानै कवि छबिसो अपार, १०७मानो देवऋषि सनकादिक सो नारद आदि अजके सो ओकमें निगम जिमि गावे है। जिनकी सो धुनिसुन पाप महा भयपावै माधौ वन त्यागकर तहाँ न रहा है । भो- नपत्र माहिं संच अमी सुखदाई भोज मुनिराज आगे सुरकारसो टिकावै है । पिनसमान सो नारायणराम मानहारीमाधोरामकाप्रसाद मान अशनको पावै है१०८ यहिभाँति सन्तन की नित्यप्रति सेवाकर अन्तमाहिं वेद श्रति बोलके पधारे है। फिर निज निज शुभकर्मनमें लागजावे योग तप तन कसे माधो बनसेवे है ॥ मा. धोराम भवनमाहिं सतयुग बासकर कलिका सो नामरूप लेस कहुं नाहीं है । दश चार भुवनमें भारतखण्ड उत्तमहै तिसमाहिं माधोचन महासुखदाई है १०६ जहाँ तहाँ देख अति वन्दनके हेतु सब माधोभवन बन्दनाको नाश मोक्षकर है । धनसो पुरुष पुण्य मानों तनपाय जग जगत् संन्यासका सन्तरूप धारे है। माधोराम भ- वनवस माधौकेसो गुणगावै तिनका सो पुण्य सुख शारद न जाने है । तहका प्रभाव सुधासिन्धु सो अपार महासुखदायी कलिकोट कहा सो बखाने हैं ११० ऐसे बन के सहित सो नारायण माधोराम काहि तिन पदपंकज में कबिकी नमामी है। नित ऋपिनके सेवनसो मुनिराज ईशकरै ज्ञानसों वैराग मोक्षभोग सुखदेवे है ॥ देवी सम्प्रदाके सहित माया इसरज पुण्यफल मुनिकी समान जग औरनको दूरहै । तहाँ पुण्यके प्रभावनते धन धाम राजपावै देवी विना मोक्षहित सुखनाही पावै है १११ निसका सो भोग बारवधूकी समान जानो अन्त अधोगती दैवी विदबिन जावे है। अथवा सो धन धाम सन्तनके हेतुलावे लोक परलोकनकी खियाती उरचाही है। सन्तनकी दयाकर कामनाका फलपावै मोक्ष सुखधाम कदाचित नहीं पा है । जगदान आदि करै मनमें गुमानराखै निष्फल जावे जिमि गजका सनान है ११२ स०॥ याते विचार विना धनत्यागन मोक्षमें हेतु नहीं दुखपावै । विचारविना पशऊ धनत्यागत सो निरवेद नहीं कोउ गावै ॥जो कछु कर्म विचारते सिद्धहै नाहीं विवेक बिना भयपावै । शुभाशुभ करमन माहिं भ्रमै अँग आपगले दुख फाँसीलगावै ११३ याते मोक्षचहै शुभ सन्तन सेवै लोक परलोककी आश हटावै । शुभ शास्त्रविचारे संगकरे शतमव दुख संगल याते नशावै ।। प्रेमभक्ती अपार महासुखदायक सन्तनके १२ माधवराम सुखसागर। पदकी सो कमावे। पुण्य अपार फलीवित होय नरायणराम मुनीसम लावे ११४ चौ०॥ जिनके इष्टदेव हैं सन्तन । तिनकी प्रभुता क्या कहै कवितन ॥ सन्तन हित तन मन धन वानी। किहननिछावर मुनिवर ज्ञानी ११५ जिनकी रीति जगत चलिआई। सन्त भगत जानै सुखदाई ॥ नाना वस्त्र भूषण वृन्दा । कर उपाय लै बहुत योगिन्दा ११६ सब ऋषिजनके करै निवेदन । जिनके इष्ट सुसन्त विसेसन । हे गैवाहन करवसिअन्दन।जोसुखदै दुखकरै निकन्दन १९७ हीरा मोती. कञ्चननारी। हेमथालधरि पूरसँवारी ॥ माधोवन ऋषिमण्ड उदारे। तिनको अस्पै मुनि सरदारे ११८ पाणि जोर फिर करै निवेदन । भगवत इच्छा लेव विसेसन॥ यहि इसरज माधो कर सारा । सन्तनहित मुख रचे अगारा ११६ आप चिदानंद शुद्ध प्रधाना । जीवन दुख हनि करे कल्याना ॥ याते यह इसरज शुभ जोई। अपने समझो ऋषिगन सोई १२० मुझको भी अपनी सेवकाई । जानो उरमें है सुखदाई ॥ माधोराम जो ईश हमारे। चिदघन व्यापक जगत मँझारे १२१ तिनकी आज्ञा लख सुखदाई । मैं उरधार करों सेवकाई । याते सव माधोकी माया । लेहु ऋषी हमपर करदाया ॥ १२२ ॥ सवैया ॥ यहि भांति मुनिराजन लैकै उपायन सन्तनके पदमाहिं निवेदै । मान अपमानको त्यागै सदा जिनके उर नाही अज्ञान सुखदै ।। दीन सुभाव सुसन्तनके ढिग भक्त के रूप दिखावै निरखेदै । भवमण्डल को उपदेश करै चिद आपसो ज्ञान स्वरूप अभेदै।। १२३॥ चौ०॥ यहिविधि मनिकी रीति सो देखी । ऋषिगन प्रथमहिं हर्ष विशेखी ।। मुनिराजनको मनमें सराहै। जिनके बनबस सब सुखलाहै १२४ माधोवनमें ऋषिगन सारे। उदासीन तरकरे अगारे ॥ संसार पदारथ हेतु सो जानी । तिसमें दृष्टि करें नहिं ज्ञानी १२५ माधोराम एकशुभसारा । तिनको पाय तजै संसारा ॥ जे माधो के सुख नहिं जाने।तेई भवदुखमें लपटाने १-६॥ है गजमोती नाहिं सो लेवें। राजऋषी पर परसन होवै ॥ भगवन तुम्हरा दरशन जोई । हम सबको दुर्लभ है सोई १२७ तौं पद.पंकजकी शरनाई । हम अपार पावै सुखदाई ।हम परं दया यही मुनि कीजै। हमरे हृदय निवास करीजै १२८ सुधासिन्धु नारायण रामा । यह प्रसाद दीजै सुख धामा ।। संसार रोग दुख मोह निवारहु। अचल ब्रह्म सुखसिन्धु मिलांबड्डः १.२६ चिद माधवराम सुखसागर। १.३ घन माधो मोक्ष सुखपाई । भवनिधि दुख हम नहीं भ्रमाई। माधोराम विष्णुभगवाना। तिनके तुमही रूपनिधाना १३० कसन करो मुनिवर सनमाना। वेद पुराण सकल तुम जाना। तुम्हरी रीति सदा चलिआये । धरम मसंद करत सबआये १३१ जगमें धरम स्थापन जोई। हे प्रभु सकल कहो तुम सोई । तुम विन फोन सो जगमें सहाई । सोतन धन सब संतमें लाई १३२ तुम्हरे धाम महासुखपावै । हम निर्भय सब हरिगुण गावै ।। क्या हमको दुर्लभ जग रहई । जिनपर तुम दयाल मुनिराई १३३ यह बन सुखनिधि जो चलिआथे । चारपदारथ करतलपावै ।। तुम हमको दुख कहां प्रतिकूला। जो हमरे हित तुमअनुकूला १३४ याते तुमको हमरी जोहारे।हमरे हिरदय बसौउदारे॥ यहिावधि ऋषिगन करै सन्माना । मुनिशरदूल बहुत बुधिमाना १३५ हर्ष सोगते रहे अतीता। ब्रह्मानन्द मगन मनजीता ॥ मान पान जगमें दुखदाई । माधौ एक लखे सुखदाई १३६ और देशान्तर ऋषि मुनि जोई। माधौवन चलिआवै कोई ॥ तिनकी पूजनकरै अपारे । कवि वरणत नहिंपावै पारे १३७ बड़े बड़े यज्ञनको कीने । तिनकी कथा बहुत कवि कीने ॥ महाअपार न पावैपारे। जे कवि जग उदारखुधिभारे १३८ प्रेम मगन होय फिर कविगावै । थाह न पावै मन पछितावै ॥ कबि बरणत भे ल.. ज्जित मारी । निजबुधि लखि रहिजाय विचारी १३६ माधोरामकी कीरति व्यवहारा। शेष गणेश कहत नहिं पारा ॥ याते तिनकी लीला जोई । महाअपार सिन्धुअमी होई १४० ताते कहामैं पायो पारा । जो पिपील नहिं सागर पारा ।। अपार यज्ञ माधौ जो ठाने । तिनकी कथा नहिं हाथ वखाने १४१ तिनकी प्रभुता किमि कहिजाई इस विभूति वेद जोगाई तिनके घरमें रही लोभाये। जोजीव चराचरकोसुखदाये १४२ माधों भवन नरायण रामा । कामधेनु कल्पवृक्ष समाना॥जो कोई आश्रयमें चलि आवै । मुहमांगे सुख फल सोइ पावै १४३ इसमें शङ्काकरै न कोई । तप प्रभावते क्या नहिं होई ॥ तपबल शेषधरे महिमारा । तपबल शभु करहिं संहारा १४४ जप तप ज्ञान वैराग समाना। सुखदाई कोउ नहिं बलवाना ।। याते नारायण राम मुनीशा। तप बल कारज करै हमेशा॥१४५ ॥ क० ॥ माधोबन माहिं निज कुटी के मँझारि शोमै विष्णुस्वरूप शान्त सुखतन धारिया। शीशमें जटा कलापै मानों श्याम बारिधि सुतपोक्रान्त भारी पिख पावक माधवराम सुखसागर। लजाइया । माधोराम की समान उर दया सो अपार धारे. धरमके पालनमें दृष्टि है अपारिया। जिनकासो पद पाय अघमूल नाश होय जैसे मारतण्ड जगकरैतमहा: निया १४६ माधोराम गुरू विषय निशिदिन ध्यानकरै जिनका स्वरूप चिदानन्द सुख- दाइया । जल थल तीनलोक कीनहुपसार जिमि अनादिसो पुरुप अवगति अविना- शिया॥ लोकचतुरदश में जिनका प्रकाश अति हस्त कीटबीच माधोराम सो समा. निया। राव रक सवनोंका एकसर जाने सदाअचल अन्यतअलख अवगामिया १४७ सब घट अन्त्रमेयामी साखीरूप नित अक्षरूप रहित आश्रम जातते नियारिया। राग रंग रेख नाहीं देशकाल न्यारे चिद जीवनको मोक्ष करें आप अबकारिया ॥ शत्रु मित्र जिनका सो तात मात कोइ नहीं नीर दूररहित ज्ञानमान विभू जानिया । जिन आत्मास्वरूप जाने ज्ञानीकी नजीक सदा अगजग दुखमुल तिनमें सुहानिया १४८ यहि भांति जिनके सो ज्ञान भयो हिये माहिं साखी शुधब्रह्म माधोराम कासो जानि के । संसार दुख सिंधुमहा तिनके नजीक नाहीं माधोके स्वरूप माहिं मिले भवत्याग के॥ तिनको विछोड़कर मातकुख नाहीं आवै सरी नहीं डोले जिमि सिन्धुमें समाय के । नामरूप माहिं तिन चेतन स्वरूप ढके सबको प्रकाशकरै विभू सुखदायके१४६ याते माधोके स्वरूप काहिं योगी नित ध्यान करें वेद औ पुराण तिनकहै सो वखान के। नाम रूपरहित अज सदा सो अदिष्टभने अदयतसो अखण्ड ब्रह्म आत्मा सुख- दायके । सूक्ष्मस्थूल नाही मूलसो अज्ञान नाही समसृष्टि वृष्टीपनोरहित राखै प्रकाश के । ईश पुनि सुतबाट प्राग तेजस विश्वभोग योगबन्ध मोक्षरहित सवलायकै १५० जाग्रत अवस्था माहि नाना परपंच भाषै बुद्धिका बिलास नामरूप सब जगहै । सूक्ष्मस्थूलका सुबुद्धी उपादानहोय विवरण चेतनका तिसमें प्रकाशहै ॥ जो स्वप्ने में भोगनाहीं भोगनसों हार नाहीं तोभी एक चित्र सुचित्र बुद्धीजने हैं । सुषुप्ति अविद्या में मनीषा जब होय लीन नाम रूप भेद दुख तहाँ न रहावे है १५१ याते बुद्धिसों अविद्यारूप जग उपादान होय सुख दुख निश्चयरूप बुद्धिको बि- कारहै । अपने दृष्टांतका बुद्धिका जो बोध होय कारन सहित बुद्धि आप नाश पात्र है। जिमि आरन मँझार माहीं दवा का प्रचण्ड होय आरन दगध कर आप शांत होवहै । अविद्यामूलसहित बुद्धि ज्ञान कर नहिं बाधै तबतक जगत अज्ञानी को 4 माधवराम सुखसागर। १५ अपारहै १५२ अनादि सो अविद्या नित चेतनमें वासकर तिसका प्रकाशै चिद आप सो असंगहै। संसार के सहित सो अविद्याका स्वरूप मिथ्या ज्ञानी के विचार माहिं तीनि काल नाहीं है ॥ मनोराजकी समान बुद्धिरचित सोपन जग हानि नित प्रती होय माधो एकरसहैं । तिनका स्वरूप ज्ञान बिन नापछान सकै जोई लख लेवे कहन योग न रहावैहै १५३ मूक जिमि मिष्ट खाय पूंछे से बतावे नाहीं माधोका स्वरूप ज्ञानी लखे ज्ञानी जानेहे । मन बुधि वानी आदि तिनको न जान सके कारण अविद्या के अविद्या मिथ्यारूपहै । चेतनासों ज्ञानरूप ये न ते न्यारे विभु जैसे म- हाकाश घटमटमाहिं न्यारे हैं । तैसे माधो का स्वरूप सूक्षम स्थूल ते न्यारे बीच ति- नहीं के ज्ञानकर मोक्ष सुख पावेहे १५४॥ स० ॥ जाके हिये यह ज्ञान प्रकाशित अ- ज्ञान तिमिर सव देत नशावै। ब्रह्मस्वरूप स्वयं परकाश असंगन ते कर शांत न पावै ॥ तिसमहि जगभूतभविष्य नहीं बतमान देखै सब मिथ्या जनावै । आतम- नन्दको पाइ भले ज्ञानी जगत् विषे नहिं आशकोलावै १५५ मनोरथमात्र जगत विलाससो ताकी प्राप्ती निविरती नवहन्दे । देखे सुने न सुने सब देखत सब रस लेतहै लेतनस्वादे ॥ नशपर सुगन्धसों बोले नहीं पुनि सूंघे स्पर्शकरत विवादै । न त्यागै न संग्रहतजै मलत्यागै नधोवैन हरिअर्ध्यावत पादै १५६ ॥ १० ॥यहिभाँति ब्रह्मवत इन्द्री ते युक्तहोयके भोगनको भोगै नितभोगे निसंगहै । मैंतो इन्द्रिय से नहीं इन्दिय सो मेरी नहीं साखी सो कुटस्त मैंने तिनका प्रकाशी है ॥ जिभि सूरका प्रकाशपाय लोक सब कृतकरै सूरज असंग तीनकाल नित रहे है । वैसे मन बुद्धी दश इन्द्रिय पंचप्राणमिल आतम ब्रह्मभूप आगे नृत्यको दिखावे है १५७ आत्मा असंग नित सुख निर्विकार रहै सतो अंशभूतनते अन्तःकरण जनहै । सतो रजोअंशनते ज्ञान कर्म इन्दी प्राण देहनाश रूप पंचभूतनका पूतहै ।। त्यागे विषय भोगै इन्द्री आतम सुखी दुखी नहीं जैसे मृगवारों मास्थलनभी गावे है । याही निश्चय ज्ञानी केसो हियेमाहिं बासकरै करता सो दीखै कृत करता सो नाहीं है १५८ जनकसो आदि सब भूतनमें राजकीने जगत पदारथको संग्रह सब कीनथे । वि. विधप्रकार सव राजनको सुखलीने अन्तरमें शांत सुध कौल जिमि वारथे ।। अन्तके समयमें देह प्रालब्ध डार फल संशयरहित जनक विदेह मोक्ष पायेथे । शुकदेव माधवराम सुखसागर। आदि सब भोगते निराशभये जगतमें दोषदृष्टी नेकभाँति कीनेथे १५६ दत्तात्रेय शुकदेव जड़भरत आदि विर्कत विदेहकी समान सो निर्वाण सब हुयेथे । प्रालब्ध के अधीन सब ज्ञानिनके चेष्टान्यारे जीवनमुकत माही भेद सदा रहेथे ॥ ज्ञानकासु- फल जनकादि शुकदेव सब एकसम पायके निसंश मोक्षहये थे। यहि भाँति जगमें अनेक बुद्धि ज्ञानवान त्याग संग्रहकर अन्त माधोमें समाने थे १६०॥ स० ॥ जिस माधोरामके माहिं विषे सब ज्ञानी विदेह सो अन्तमें होवै । सोई नारायणराम मुनी- राजन माधो स्वरूपहे माधोको सेवै ।। अन्त शुद्ध सो शान्तमहा जगजीवनके हित करम कमावै । सृष्टी अचारजको मत यही सो जीवनको मोक्ष हेतुमें लावै १६१ आप असंगरहे जगमें फल इच्छा नहीं भव भोगमें लावै । जैसी अवस्थामें आपरहै सुख तैसे जीवन काहि बतावै ॥ कर्म उपासन ज्ञान त्रिखण्ड कल्याणके हेतु सुगाय सुनावै । याते सुखदायक नारायणराम उपायकहे जाते माधोको पावै ।। १६२ ।। चौ०॥ वेदविहित मुनि करम जो करई । जीवन हितकार कहाँ में सोई ।। एक समय नारायणरामा । सृष्टि विचार किहिन सुखधामा १६३ भवमण्डल में जीव अपारा। सहजे उतरे भवसिंधुपारा॥सो विचार मुनि कहिन सुमनरें। कोउ उपहारी मुनिसम जगमें १६४ द्वादश राशि वेद जो गाई । तिसही में कुम्भराशि सुख- दाई ॥ कुम्भसे मकरलै गंगमझारा । पर्वमहा सप्तलगै अपारा १६५ एकमास जो जन्तु नहावै । विन प्रयास सुख अचल को पावै ॥ माधो बन ऋषिगण बुधसारे। तिस हित मुनिवर लहन हकारे १६६ अशंकऋषी तहँ आय सुहाये। मानो देव उतरनम आये। मुनिको नमस्कार सबकीने । महाउत्साह आनन्द सभाभीने १६७ आइरसह सब ऋषि बैठाये। शुभकृत सबके कान सुनाये।। कुम्भराशि तीरथ नृपनाई। सवकोई चलो जगत सुखदाई १६८ गंगनहावै प्रयाग जोराजा। होय ब्रह्मभवका शिरताजा।। जन्म कर्म अघ मृत्युहै जोई । फिर नहिं व्यापिसकै तेहि सोई १६६ तुमहिं देख सब जीवन जगमें । सुरसरि मज्जकरै शुभकरमें । जगवत दान निमती लखकार है। धोय पाप भवसागर तरि है १७० यहि तुम्हराहै पर उपकारे। निष्काम चिदानंद तुम ऋपिसारे ॥ पर उपकार जगतमें जोई। सन्त बिना नहिं करै सो कोई १७१ जगत जीव स्वास्थ में लागी । जातिकुजाति विषै अनुरागी । नरक स्वर्ग सुख दुखके माधवराम सुखसागर। १७ माहीं । सन्तसहाय करें कोउ नाही १७२ सन्तबिटप सरिता गिरि धरणी । परहित हेतु इनहिंकी करणी ॥ और सुबन्धनको कर्म जाने । मुक्त उपाय सन्त एक जानै १७३ याते सन्तसंग सुखदाई।जो नहिं करै महाजड़ताई। सन्त गंगसम नहिं कोउ दाता । चहुँयुग मोक्षकरै विख्याता १७४ ब्रह्मकमण्डलु मुरमरि बसई । नृप- गण देव दरश सुखकरई ॥ मज्जन पूजनकर बहु देवा । अक्षय स्वर्ग भोगै सुखदेवा ।। १७५ अधिक सतोगुण स्वर्ग रहावै । गंगप्रताप ज्ञान सुरपावै ॥ तहें मोक्षसुख लहै अपारा । कोई इक सुर आवै संसारा १७६ याते सुरसरिकेर प्रतापा । आखिल सुख ब्रह्माण्डकी दाता ॥ जीवनहित भागीरथ जोई। सुवासरी लाये इहाँ सोई १७७ ।। स०॥ ब्रह्मकमण्डलु मध्य विषे सोई भागीरथी तपको फलल्याये । भवमण्डल में सब जीवनके हित मोक्ष निसेनी सो दीन लगाये । त्रिलोकीनाथ लोभाये सदा शिवधारे जटा जनवी सुखदाये। विष खाय हलाहल शान्तकरै सुख शान्त स्वरूप गिरिजापति पाये १७८ त्रियनयन जटामहँ गंगशुभै मानों नील अकाशमें सूरसुहाये । तिसकी शुभ किरण कैलासगिरे जिमि बिन्दुतउडुगण टूटके आये॥ गिरिराजसे आये धरापै चले तिसको पुनि सिंधुलै आनंद पाये । नृप सागरके सुते साठि हजार सुशाप अधीन महादुख पाये १७६ क्षणमाहिंविषे तिन मोक्ष किये यह गंग सुधा जग में सुखदाये । अनेक जन्मान्तर पुन होय शुभ सोइ सो गंग पियै जल नाये ॥ पुनि फल मानुष पाय भले तन जो नहिं गंग सुधाको नहाये । भव मण्डल माहिं नरा वह मंदहै झूठे मानुष जन्म कहाये१८० तन बारुनके घटके समहै नर शुद्ध नहीं बिन गंग नहाये । अनेक जन्मांतर पाप अपार सो जाके प्रभाव सो मुने नशिजाये । जिसका महातम ग्रन्थनसे ऋषि देव मुनी सबही तुम गाये । प्राम तमरूप सुगंग अमी जग जीवन को मोक्ष सिन्धु सुहाये ॥ १८१ ॥ दो० गंग तरंग अब हरनको. बरनौ किमि प्रकार । रघुवंशतिलक जग पावनो कीनों बहु उपकार १८२ चौ० ॥ गंग शब्द धुनि वेद सुहावै । जेहि सुन उरमें ताप नशावै ॥ गंग यमुन वेनी परभाऊ । वरनत शारद अतिसकुचाऊ १८३ जाके तट योगीधरै ध्याना। ताप विष त्यागै अज्ञाना ॥ बीतराग निर्भय नित रहई । विवेक. सहित मन्जन शुभ - १८ माधवराम सुखसागर। काई १८४ जग.ब्रत दान अनिक विध करमा । तेहि तटमें शुभ करै सुधरमा ॥ तहां मृत फल सुख होइ अपाग। जिमि एकईश ते जग विस्तारा १८५ विन प्रयास्त्र तहां होवै ज्ञाना । जो भवबन्ध हने दुखनाना ॥ शान्त निजातम अचल अनामे । ब्रह्म रूप सुख भेद न जामे १८६ ऐसे आतमनन्दको पाई। गंगप्रसाद शान्त सुखलहई ।। देवी करम निगन रहै अबरे। असुरी तहां नहीं दुख झगरे १८७ अन्तसमै तन मात्र त्यागी । ब्रह्मरूप होवै बड़भागी ॥ पंचभूत बपु नहिं फिर पावै । माधौ राम विषय विलसावै १८८॥ दो० ऐसे तीरथराज की कविको सदा प्रणाम ॥ . जाहि विषे तन त्यागिकै पावै सुख विश्राम १५६ स० ॥ वेद विधी जग में जोइ बरतत हे ऋषिमण्डल तू प्रगटाये । तुम्हरे उपदशे में जोई चले सुख सो भवसिन्धुसे जात पलाये ॥ दादशवर्प विषे कुम्भराशि बहु संत समागम यामें सुखदाये । प्रगट गुप्त सो आवै तहां सब जो भवमण्डलमाहि रहाये १६०सप्तपुरी चहुँ धाम सुआदिक सबका पती यह तीरथराये। सबका महातम याके अस्नान में सुर नर पावै सो वेदन गाये ॥ अक्षयवटका जोइ दरश करै नर सो तनु त्याग अक्षयपद पाये । दश यज्ञ सो आयके ब्रह्मा करै तहां दरशन ताको महासु- खदाये ॥ भरद्वाज सो आदिक लैके महामुनि तहां निवास करै तप ताये ॥१६१ ॥ क० ॥ तीरथ परागराज लोक में प्रधान सब मोक्ष सुखधाम. देवै पापनको आरी है सुर नर मुनि सुख तहां नित बास करे अंग मल धोय करम योग को कमावे है।। जीवनमुक्त होवै बिदेको सुपाये लेबै जिसका सो यश सन्त बेद नित गावै है । गंम रजधानीकी सो लीला सो अपार महालक्ष्मी सो पती लोक देखके लजावै है १९२ यहि भांति मुनिराज सुरसरिकी कीरति गाय जिसका प्रमाण सब ग्रन्थनमें थानिया। सुनके सो ऋषिगण जितने को माधोवन चितमें प्रसन्न सब भये सोअपारिया ।। मुनि शरदूल की सो कीरती सब लागे गाने तीरथ महातम सुन जग सुखदाइया । धन मुनिराज कलि जीवन भवतारन को माधोचिदानन्दका अवतार तुम धारिया १६३ हमरे उपकार लिये अमी के समान बाक दयारूप मुझको सुनायो तुव उचा- रिया। तुम्हरी सुवाक जग गंग की समान धार पापन को काट कर देवै सुखदानि- माधवराम सुखसागर। १६ या । माधोराम ब्रह्मानन्द तिनको मिलाने हित में उपदेश कीनो तुमका नमा- मिया ॥ माधो बन ऋषिगण सव बुद्धिमान तपी कुम्भराशि मज्जन को करै सो तयारिया ॥१६॥ चौ०॥ यह विधि मुनिनायकसरदारा। ऋषिमण्डल संग लिहिन अपारा॥ माधो नाम सुमिर उर लीन्हें। सुदिनसहित मुनि गमन सो कीने १६५ तंप प्रभाव ऋषि चले समोहे । मानों दिवा झुंड मन मोहे ॥ बलकल जटाजूट तन धारे। अंग विभूतिचढ़ी ऋषि सारे १६६ पण छाल सब बगल दवाये । छरी कमण्डलु हाथ में लाये ।। मानों गिरिजापति रघुराई । बहुत रूप धारे तहँ आई १६७ दैवी संपति तजि सब देशा। सब ऋषि उरमें करें प्रवेशा॥ मानों असुरी कर परिवारा । भवमण्डल ते चहत निकारा १६८ माधोवन में ऋषिगण जोई । तिनको प्रेरि चलाये सोई ॥ भवमण्डल र पाप अपारा । तीरथराज विष संहारा १६६ और नहीं होवै कहुं हाना । प्रबल दुःखकर पाप निदाना ॥ तहँ ऋषि सब देवी तनधारे। भव सुख हित सबःचले पधारे २०० नेम निमित यम नियमहै जोई। प्रथमै करत जाय सब कोई ।। एक योजन चलि मग ठहरानै । निशि, विताय शुभ कृत कर जावै २०१॥ क० ॥ धर्मकी मूर्ती मुनिराज सूनरायणराम ऋषि मध्ये चले जावै जग सुखदा- निया। जितने ऋपीश संग वेद में प्रवीन सब तिनकी सुसेक मुनिराज सब कीनि- या ॥ तीरथ पराग पहुँचे गंगातट माहिं शुभ एकान्त देश. सुख माहिं डेरा मुनि गनिया । सब ऋषिमण्डल सो जहां तहां डेरा लीने जपतप तन कसै गंग नित नहाइया २०२ मुनि शरदूल माधोरामका स्वरूप ईश वेद श्रुति अनुसार जगतहाँठा- निया। मखकी सो सामग्री सो तहां सो अपार रचे सांगोपांग भलीविधि तपसे सवारिया ।। सैकड़ों हजारों मन समिधा समूह कर घृत अन्न मिष्टान देव सुखदाइया। मोदन वनावन हितकारक बहुत भये जिनका मुसुपकार भली भांति जानिया २०३ स०॥ देव सो भोग अटूट अमीसम व्यञ्जन नाना प्रकार बनाये। जिसकी खसबोय सो छायरही सब तीरथमाहिं सो देव लुभाये । स्वर्गलोक के सुख सो भूलगये भारतखण्ड के भोगन माहिं रमाये । मानों कुबेर भंडार सो लायकै मुनिकी सो यज्ञमें देत लगाये २०४ सब व्यञ्जन नाना तयार करै जिनकी जगमें चिदमाधो सहाये । - ४ .२० माधवराम सुखसागर। जगमूल सो कारण ईश्वर माधो सव जीवनकृती फल देवै नचाये।। चतुरानन आदि सो देव सवै जिनकी नित कीरति नारद गाये। यहि भांति विभू चिदनन्द प्रमातम तिसईश विषे मख अस्पै मुनिराये । २०५ ॥ दो तीरथवासिन सबन को बहु भोजन दक्षिणा दीन सुर नर मुनि सब जंगमा सक्कों आनंद कीन २०६ के० ।। यहि भांति मुनिराज मख सो अपार कीने गजदान अश्वदान देवै सो अपारिया । सुनि ऋषि दिज माहिं प्रीति सो विशेष राक्ष मुँह मांगे फल देवै करैसन- मानिया ॥ राजा बलिकी समान मुनिराज सुउदार भये प्रालब्ध जीवन की मन तन धारिया। जिनका सुदान पाय होवत अचल सब और आश तृष्णा न जंग में रहाइया२०७मानों धनपति मुनिराजका अवतारधार अपना सुसवैधन देत लुटवाइयां। जिनका भँडार सो अतुट सो अपार भरा जिनका सहायक माधोराम सुखदाइया ।। कर सरोज महा सुभग पवित्र अतिकल्प सुचूप मानों देह निज धारिया । जिनका सुनाम चिन्तामणिकी समान फले बारिज पदारथविन्द कारे दुखहानिया २०८ कमल रविकी समान सवकहींको प्रकाश करै करमनके फल सुख दुख नाते नियारिया। संसारको विकार पुनि तिनमें सुलेश नाही अज्ञान यज्ञ दुखमूल तिनमें सुहानिया ॥ जगजीवन के हित वितमाया को व्यवहार माहिं लोभ क्षोभरहित निजानन्द सुख जानिया। जिमि सागरमें मच्छ कच्छ सब पर नाचे कूदे तिनका सो देख सिन्धु हरष शोक नाहिया ॥ २०६ ॥ ज्ञानरूप मुनिराज तपके प्रभाव कर मोदक अपार कुम्भराशिमें लुठारिया । इन्द्र मेघकी समान यथा सबको प्रसन्नकीने जैसी विधिचाही तैसे किह मुनिराइया । वेद विहितकृतन में विघ्न जो नाही परे वही करम जगमें सो- होवै सुखदाइया। नातो वे विचार करै माधो के निमित्त नाहीं सुखपावै जिमादच्छ सिवन जानिया २१०॥ स ॥ चहुँ कुम्भन माहिं यही विधिसो यकमास निवास करै सुवनावै । और देशान्तर के सगले मुनि कुम्भनमाहिं सवै चलिआवै ॥ विधिपू- र्वक स्नान करे सवही पुनि मुनिशरफूल के दर्शन आवै । नारायणराम मुनी मति मान संयोग यथा सबको बैठावै २११ चरणपखार मुनिमण्डल के निज मस्तक माहिं भली विधि लावै । पटहु सन सबको पहिराय भले शुभ अक्षत फूल सुगन्ध २१ माधवराम सुखसागर। चढ़ावै ।। नानाप्रकारके श्रीकमले निज हाथनसे सवको पहिरावै । अनेक सुभांतिनके अमी व्यञ्जन हेमके थारन में मँगवावै २१२ आदर भक्ति विवेककी मूरति मंडल आगे सो धरके जिवावै । प्रीति महा उत्साह भरे मुनिराजन ठाढ़ सो चमर फेरावै ॥ मुनि मण्डल वेदकी धुनि करै जेहिको सुनिकै अघ मृत्यु नशावै । मुनिराजनके सुपकारसमै सुकुवेर समान सुधाये वीवै २१३ मुनिराज खड़े मुनिमण्डलमें मानों देवन में सुरराज सुहावै । भोजन सन्तन माहिं फिरै मानो अमृतकी वरषा बरसावै ॥ सुवरणपात्र में बारि भले मुनिमण्डल के अन्त हाथ धुवावै। शुभ आसन माहिं बैठाय भलीविधि वेद विधी शुभ पान दिवावै २१४ जहुरादिक नाना सुमंगरी अपार सो हेमके थारन संच उपावै । पान मिलाय के पूजि सबै मुनिमण्डल को सुखदेत विदावै ॥ शुभ द्रव्य अपार सो लेइ सबै जिनकी जगमें मुनि जो चलिआवै । मनवा- ञ्छित सो फल पावै भले फिर इच्छा नहीं धनमाहि रहावै २१५ मुनिराजनते शुभ भोजनदान सुमानो को पाय महा हरपावै । मुनिके सुखदायक दर्शन पाय सुगावत सो मगमें गुणजावै ॥ लक्ष्मीपति माधोराम जिनके उर तिनका भव दुर्लभ क्या सुरहावै । देवी सम्पति वेदविधी सब जिनके घर मूर्ति सुधारि सुहावै २१६ तहां चारिपदारथ आदिक सुसव तोट नहीं नितपूर रहावै । इनके सुख ओकनकी महिमा सब हार परे कबि पार न पावै॥ भवमण्डल में मख बहुत होयपर इनकी समान नहीं कोउ पावै । नितेक मुनिमण्डल आयूदश यज्ञशालामें दान समान खेलावै २१७ माधो अरनके माहिं विषय मुनिमण्डल आयरहावै । हजारे तहां असुरी सम्पति लेश नहीं दुख आपन प्रकाश मुनिराज इटारे ।। इक माधोरामका ध्यान करै सब जो दुख द्वन्दको देतनिवार । तिनका प्रभाव महासुखदायक खेलरहा जगमाहिं अपारे २१८ तिनहींके स्वरूप जोहै मुनिराजन भेद नहीं यक रूप उदारे। सीतापती जिमि दा- शरथीसुत मायापती सुखरूप अपारे ॥ जैसे नारायणराम मुनि चिदानन्दसो माधोका वपुधारे। माधवकी रीति बनायकरै सब जाते लिखो वही रूप चिदारे २१६ ॥ चौ० ॥ यहिविधि निजमुख मुनी उदारे । निवतम गावै ऋषनापारे ॥ भोजन दान मान सेवकाई । दैक विदाकरे मुनिराई २२० निज निज आश्रम मुनि नि शिधावै । गुणगावत मगमें सब जावै ॥ जनकी अस्तुति सन्त वखाने । ताके माधवराम सुखसागर। ईश्वररूप पछाने २२१ यहिविधि एक मास मुनिराई । धर्म मर्याद करे सुख दाई । जीवनके कल्याण निमित्ता। आप चिदानन्द सुनित्ता २२२ मायागुणते सदा नियारे । व्यापक सव जीवन हितकारे। जिनका नाम रूप सुखदाई । जो नहिं जानै करत ढिठाई २२३ तिनकी माया उन भरमावै । तिनका गुण स्वभाव नहिं पावै । जिस पर आप दया सुखधारे। जगवन्धनते होय नियारे २२४ पाय ज्ञान होवै ब्रह्मरूपा । फिर नहिं गिरे दूख भवकूपा ॥ सब जीवन उपदेश जनावै । जग तप आदिक कर्म कमावै २२५ या मगमें परहै जनकोई। भवसागर उतरै जीवसोई॥ ज्ञानको साधन करमको जानी । याते करमकरै मुनिज्ञानी २२६ बिना करम नहिं ज्ञान सोहावै । ज्ञानविना सुख मोक्ष न लेवे।। मोक्षबिना कहुँ आनंद नाहीं । दुख जन्म मरण सब लोकनमाही २२७ बहुते सुख जीवनकी ताई । नाना करम निगम बहु गाई ॥ याते नरायणराम मुनीशै। निशिकाम करम सबको उपदेशै २२८ ॥ क० ॥ शुभमाद जोइ जगके मँझारमाही ऋषिमुनि सबहूने बांध्यो है विचा- रकै। संसार सो अपार सिन्धु दुःखको न पारावार जीवहित कृतपुल दीन्यो है ब- नायकै ॥ याते सब कारकों दशचार भुवनमाहिं वेदविधि ईश आज्ञापाले मन लायकै । अभास करमकरै सब लोकसे उदासहोय सकाम कत चित सदासो ह- टायकै २२६ सकाम करम वनीसम जानंतततग सब बारम्बार जन्मक हेतु दुखदा- यक। अन्तसकी शुद्धीमाहिं कामको बखान करै शुद्ध अन्तसहोय चार साधनाक लायकै ॥ श्रवणआदिक निदिध्यासन मिलायकर ज्ञान के सहायकहै जोई मोक्षदा- यकै । मोक्षके सहायकमें कृतको विचारकरै अन्तरंग बहिरंग ज्ञानके सहायकै २३० श्रवणआद्रिक सोज्ञानकैसो पीछेरहै साधन चार श्रवण के पीछे सुखदायकै। यज्ञआदि कर्मचारि साधनाके वहन है अन्तसकी शुद्धीकरै भले सो बनायकै । जैसा अधि- कार देखे तैसे उपदेश करै मोक्षपर जो जन सब करमनमें राखकै । चार साधना सहित जव श्रवण बहुतकरै मनन निदिध्यासनको करै सो बनायकै २३१ वाहजकी वृत्ती -फिर-अन्त ब्रह्माकारहोय करम दुख छूटजावै होवे सुखदायकै । करम औ उपासना सो ज्ञानके सो साधनहैं वासनाको त्याग जब करै मनलायक ।। बासना सहित करे मोक्ष ज्ञान पावै नहीं करम जाल जगमाहिं राखै भरमायके । यावे वेद माधवराम सुखसागर। २३ विधि करम जग में विचार करै जिसका अभीष्ट नहीं होवे दुखदायकै २३२ ईशकृत करमनको त्यागना करावे मुनि जबतक हृदय मान ज्ञान ना प्रकाशिया। ज्ञान जब होय तव ज्ञान का विरोधी जान करमनको त्यागिकै अभ्यास करै ठनिया॥ सत औ असत ते बिलख न परपंव सब झूउ जड़ दुख जानकरै नभ मानिया। बैठके एकांत निज आत्गा जो परमानन्द तिसको विचारै विभू चिद सुखदाइया॥२३३॥ चौ०॥ मोक्षमें हेतु ज्ञान को मानी । ज्ञानमें हेतु करमको जानी ॥ याते मुनी नरायणरामा । मख व्रत आदि करै सुखधामा २३४ भक्ती नाम दान की महि- मा। ऋषिमण्डलमें वरनै घरमा ॥ भगवतसम्बन्धी शुभ ग्रन्था । अगम निगमके सुनावै अर्था २३५ अज्ञान तिमिर दुख द्वन्द्व नशा । मुनिमण्डल में अनँद उप- जावै ॥ यक दिन मुनि विचार उर ठाना । नेम निमित मख व्रत असनाना २३६ निरविघ्न समाप्त भयो हमारा । माधोराम किहिन सब पारा ॥ तीरथराज महातम जोई । वेद पुराण कहै सबकोई २३७ सो एक मास हम मज्जन कीन्हे । आ- नन्द अपार महासुख लीन्हे ॥ सुर अस्थान जो तीरथमाही । तिनका दरश करन अब चाही २३८ सब जीवन कृत फलके दाता। सुर तीन लोक पाले विख्याता॥ अज शिव हरी विना चिद माधो । भवनिधि जीवन तरे अगाधो २३६ यह विचार कर मुनि सरदारे। ऋपिगण साथमें लिहिन अपारे ॥ विविधप्रकार उपायन भेटा । बहु हेम थालन रचे समेटा २४० प्रीतिसहित सुर पूजन गयऊ । ऋषिगण संग में कारक भयऊ ॥ जैसी जहाँ विधि वेद बताई । सब देवन पूजे मनलाई २४१ दान अपार याचकन काहीं । मुनिवर दिहिन जो तीरथ माहीं ॥ भये प्रसन्न देव सब ईशा। मुनि लखि प्रीति सो देहिं अशीशा २४२ जिमि लक्ष्मीपति को सुर सारे। पाय कामना करें जोहारे ॥ तिमि मुनिकी धर्म कीर्तिविधि देखी । सुर प्रसन्न सो भये विशेखी २४३ इसमें बुधजन शंका नाहीं । सन्त को दुर्लभ क्या भवमाहीं ॥ विधि सन्त अधीन सो देव रहावै । जो कछु सन्त करें बनिआवै २४४ महाअगाध सो जलधि अपारे । कुम्भज सोखे गण्डक धारे ॥ भयो मधुर नहिं रह्यो सुखारी । सन्तकी इच्छा सकै को टारी २४५ देव दनुज सब सन्तन केरे । सदा रहें सुखचरण के चेरे । सन्त की महिमा वेद न जाने । जेता सुन ते ताहि बखानै २४६ चिदी.
२४ माधवराम सुखसागर। नन्दघन माधोरामा । तिनका रूप नरायणरामा ।। प्रतख दरश सुर को सुखदाई । तिनका दुर्लभ कछु न रहाई २४७ ॥ क० ॥ सव देव मिलि मुनिराजकी कीरति गावें चहुं युग धर्ममूर्ति तुम सुखदाइ- या। हमरी प्रतिष्ठाविधि करो तू बनाये भले याते सब जीव हमैं माने जगमाहिया। जौन करमकारक सो जग में प्रगट करै सोई करम जग में सो करै परजागनिया । नित सुख मोक्ष लिये जीवन को करम कहै करमकर इच्छा तजि होवै भवपारिया ।। २४८ उभय लोक मायाकर चित जो पदारथ है तिन्हें लिये जीवनको कहै जो उ- चारिया । इच्छा धार करम करै भोग भोगै मोक्ष नाहीं तुम्हरी सो दया विन होवै न भवपारिया ॥ तुम्हरे उपदेश विन हमको भुलाये देवै जग बुद्धि भ्रष्ट होवै पावै दुख भारिया । यावे सो महान पुरुष बुद्धिमान जगमाहिं हमरी सो पूज मान करे नाही हानिया २४६ धर्म अर्थ काम मोक्ष सर्व सुख नित भोगै भवसिन्धु घोर दुख तिनका सो नाहीं है । संसार भोग भोगै सब सदा निर्लेप रहै जैसे वारि विषे कमल सदा वास करे है । देवनकी सेवकर बुद्धि स्वच्छ ज्ञान पाय अचल सुमेरु की समान नित रही है । अज्ञान जग दुख मूल तिनके सो और नाहीं ब्रह्मवेता सुख जान तिन्हें हम सेवै है ॥ २५०॥ चौ० ॥ उभय लोक सुख हित बुधिमाना । हमको सेवै लिये कल्याना । जो जो चाह कर्मन फल होवै। निरविघ्न आनन्द तिन्हैं हम देवै २५१ परकलिऊ के जीव हैं जेते । महा पाप उनके वेते ॥ ते सब हमरी यजन है जोई । करै त्याग सगले शुभ सोई २५२ अशुभ करम जगमाहिं अपारा । करे गिरे दुखसिन्धु मँझारा ॥ विवेकहीन खर चरे समाना । बन्ध मोक्ष नहिं लखै कल्याना २५३ जौन करम ते वेद हटावै । तिसई को सरहठ ते कमावै ॥ याते जीव भ्रष्ट बुधि पावै । संसार सिन्धु दुख में वहिजावै २५४ नाना भांति के दण्ड घनेरे । तिनपै मन्द जान हम गरे । वारंवार अवर बन करई । अन्नादिक भूमें नहिं जमई २५५ सुख सम्पति इसरज प्रभु- ताई। करमहीन नहिं पावै राई ॥ याते कष्ट जीव बहु पावै । देह धरे दुख अन्त नः आवै २५६ अधर्म का फल दण्ड सो पाई । अन्त देह तजि रौरव जाई ॥ मख तप दान आदि शुभकरमा। जेहि आश्रम नित होवै धरमा,२५७ तहँ नित जीव मोक्ष -- ॥ माधवराम सुखसागर। २५ गति पावै । कलिंके धर्म तहां न रहावै ॥ जप तप मख आदिक है जोई । तिसका सुख फल हम सब देई २५८ जेहि आश्रम अधर्म बहु हो । कलि तहां बसै महादुख देवै ॥ जप तप संयम वहाँ हटावै । जीवन को अधर्म बर्तावै २५६ अशुभकरम जहँ करै सो डेरा । तहँ कलियुग नित करै बसेरा ॥ जहँ शुभकर्म करै जीव उत्तम । त्रियुग तहां कृत होय न मध्यम २६०॥ स०॥ व्रतमान विपे तनके सहि सुन्दर जीव अपार तहां सुख पावै । स्वर्गादिक मोक्ष अक्षय सुख जेतिक तिनके नजीक सदीवरहावै ॥ जग दान सुर संत जो से- वतहे तिनका भव कलियुग नाहिं दिखावै । यहिते बुद्धिमान सबै जग में नेम व्रत शुभ सन्तनको नित सेवे २६१ यह पूरख लक्षण नाहिं जिनके उर राक्षस तुल्य सो जग में रहाये । तंग हीन अज्ञानिनको जगमाहिं सो कलियुग होय सदा दुखदाये ॥ अथवा जग दान अनेक करै सुर पिटन में नहिं श्रद्धा लगाये । शुभकरमनके फल बाधक को उर में अभिमान अज्ञान वधाये २६२ मोक्षके साधन द्वार जो पालक देव सहाय विना नहिं पाये। अनेक कल्पान्तर देहधरे शुभ नानाप्रकारके कृत्य कमाये । जब पावैगो मोक्ष सुदेवै दयाकर नाहीं भवसागर माहि रहाये । महाइन्द्री विषे तिनको भरमावै मन बुद्धि चंचल नित्य रहाये २६३ ।। चौ०॥ याते मोक्ष होन नहिं पावै । मन अधीन मर्कटसम रहवै ॥ जबतक मन अन्तरमुख नाहीं। तवतक जीव परा भवमाही २६४ मोक्षसिन्धु सुख अमीकीधारा। कहां पावै मन अस्ते अपारा ॥ देवदया जिस नरपे जूटे । मन इन्द्रीन विषयनते छूटै २६५ तवहीं होय मोक्ष ततकाला। भवनिधि उतरे तजि जंजाला ॥ यहिते बुध जन जगमें जोई। सुरको यजै न त्यागै कोई २६६ याते हे मुनि पर्व उदारे । क- ल्यानरूप तुम ईश हमारे ॥ प्रभु अकृत सुर पूज्य मनायो । कल्यान विधि भवमाहि जनायो २६७ चिदानन्द नित ज्ञान अजनमा । वेदविधी तुम नहीं करना । ज्ञानहीन जगमें नर जोई। करमदण्ड तिन परि है सोई २६८ तुम त्रिकालदरशी मुनिनायक। जगतजीव सबके सुखदायक ॥ परउपकारी कोउ कलिमाहीं । तुमसम हम मुनि देखे नाही २६६ नित सुध परमातम माधोरामा । जिनमें मुनीकरैः विनामा ॥ तिनके शिष्य तुम परमउदारा । कस न करो जीवन उपकारा २७०॥
२६ माधवराम सुखसागर। के ॥ धनसों पुरुष निज भवके मँझारमाही पर उपकार विषे दृष्टी जिन धारिया। जननी जनक जग सबका कल्यानकरै शत्रु मित्र बन्धुआदि करै भव पारिया ॥ जैसे बनपरे तैसे मोक्ष सिन्धु सुखदेव तिसकी समान दान पुण्य और नाहिया देव गुरु ईशआदि उसमें प्रसन्न सब ईश्वरंकी सृष्टी जो करै प्रतिपालिया २७१ शेप भगवान तीनलोकका उठाये भार चन्द्रमा दिनेश नित जगको प्रकाशै है । निशि दिन गमनकरै राहु केतु दुखदेवै जगतके पालनाको तजै कदै, नाहीं है । दशरथसुत दशचारवर्ष बनबसे मारके निशाचरको उपकार ठान्यो है । वैकुण्ठ जो अपार सुखं मात पितु राजतन धर्म के पालनको महासुख जाने है २७२ दधीचि हरीचन्द्र निज देहदुख भारलीने हृषीकेश भारतमें पाण्डव स्थहाँके हैं । कुन्तीजी के सुतनको दुख काट सुखदीनो घरमबिरोधिनको पलमें खपाये हैं। प्रह्लादका सो पोता सो विरोचनको सुतजोई दैत्य सरदार वलिदेहको न पायोहै । तन धन राजगयो तिसका न शोच कीनो धरमके पालनको एक दृष्टि राख्यो है २७३ बड़े बड़े धर्मध्वजा जग में- झारमाही पर उपकार सृष्टिकरते नितआये हैं। याते सब जीवनको भला जो मनावे नित विष्णुसमान जग महासुखदाईहै ।। धनि सोइ मात पितु जिनके सो कोखमाहि नर मानों तनपाय पुण्य जो कमावै है । तिनके उपासनाको हम मुनिराजकरै पर उपकारी के अधीन सब विश्वहै २७४ माधो ब्रह्मकेअधीन सुर नर मुनि सुखलीन्हे जिन मखभारी जगकीनो है अपारिया । जिनकी सो मखमाहिं देवन अपार आये कारक स्वरूपधारि जगको समारिया ॥ जिमि विष्णु स्वरूप राम गाधिसुत मख माहिं विविधप्रकार बहु सेवनको अनिया । तैसे माधौकी सो सब जगमाहिं सवदेव मिल निज इष्टदेव जान सेवा सब कीनिया २७५ निज निज भागपाये भये सो प्र- सन्न सुर और किसी मखनको इच्छा नहीं धारिया । तीनलोक जीवनको सुख सो अपार दीनो तिनकी अनुपकृत सकेको वखानिया । तबते ना कोऊ मखखेत माहि करै नाहीं जबते हमारे इष्ट धामको पधारिया। माधोराम विष्णुका सर्व यशगावै जग हम सुरमिलगावै नाकके मँझारिया २७६ त्रेताके मँझार दशरथसुत महाराज तिनकी समान कोऊ जगमें न आयो है । अजकी सो सृष्टीमाही तिनकी समान करम कवनकर सके नर जोइ तनधारी है। द्वापरके अन्त चितानन्दके कुमारभये बंशीके. .
२७ माधवराम सुखसागर। चजाइया कहा देखने में आवै है। जिनके अधीन तीनलोक सो अपारवसे तिनके सो करम सुखदायीको न जानेहे २७७ कलिमें सो महाराज माधोराम चिदानन्द तिनकी समान अब ईशहोना दूरहै । नेकही औतार सुख विष्णुके भये जग तिसमाहिं मुख्य माधोरामका अवतारहै ।। अनेक भाँति तिनके प्रभावका सो वेदगावै नित सुखदायी माधौराम सो वियन्तहै । जिनकी सो आदि गौरी सुर नर मुनिकरै भवसिन्धु दुख माही परे परितातहै २७८ हम सुखपाये अब फिरत जगतमाही पारको लगावै सो अनाथ दुखी जानके । माधोराम दरशविन ग अवजीवन है कैसे निज दुखकहै सुनै मनलायके । संगमें न गये अब प्राण सो उड़त नाही हमका सो छोड़ आपगयो सुखधामको । भवमण्डल अपार सिन्धु दुखका सो थाहनाही हमको निकारो नाथ जगमें सो आयके २७६ जिस कालमाहिं राम अवधको त्यागदीने भई सूनपुरी सवको न वसाये हैं। तैसे महाराज माधोराम भव त्यागदीन्यो सम सतसून जग अब कोऊना दिखायो है। मोहरूपी शरलागे शोच उर मांझमाही माधोराम विना अब कौन पारलावै है । जिमि सूरका प्रकाशपाय जग मँझारमाही विविधप्रकार सब कृतको कमावै है २८० निशिमाहि जगत भयानक स्वरूप भासै करमभूलै अन्धकार सूरविन होते है। तैसे जबतक माधो चिद सगुन स्वरूपधारे तबतक सब करम ज- गमाहिं गाजे हैं ॥ लीला सुखदायी कर निर्गुण सो होये जव सुख भवमण्डलके करम लोपहुये हैं । कर सब मीजै सो अभागीजान आपनेको सदा परताव विधि कछुनावसाये हैं २८१॥स०॥यहिभाँति शोचकरै सुरमण्डल बैठखिती मनमें पछतावै। अबको सुखदायी सोहै विन माधौकीरति गाय सर शोकमनावै ॥ मानुषकी गति कौनकहै सुखरूप सो देव तिन्हें नितध्यावै । शोकके सहि गुरु कीरति सो मुनरायण राम मुनी पछितावै २८२ नित शुद्ध प्रमातम हे गुरुदेव भव उत्पति पालन तुहीं खपावै । तुम्हरी सुर कीरति गावतहै भवसागरका जोइ दुःखहटावै ॥ निज सन्मानही रमाय दीन्हो मुही लाजमरी तव हाथ रहावै । सुखदायी तुहीं भवमण्डलके निज भक्तन के नित टेक रखावै २८३ ॥ दो यहि विध माधो रामको चितवन मुनिवर कीन । जाहि नाम भज नरनको सब दुख होवै खीन २८४ २८ माधवराम सुखसागर। सं० ॥ सुरमंडलको अनुशासन देवै सुरमध्यमें वैठ महाकवि पावै । तपका प्रभाव मुनिराज धरे मानों विश्वपती सुरमाहिं मुंहावै ॥ श्याम घटा सो जटा शिरमें मानों गिरिजापती उपदेश बतावे । जिनका तप कल्प सो वृक्ष सदा जोइ ध्यानकर सुख वांछित पावै २८५ देव प्रसन्न समूह भये सुख माधोरूप मुनीको विचारे। हाथ विपय बहु फूलन ले मुनिनायकपै बरपा वरपाये । माधौरूप तुहीं मुनिराजन तू सुखदायक ईश मुरारे । यज्ञादिक करम सो देवन के हित वेद माद भव करिहौ पसारे २८६ तुम्हरे शुभ ओकन माहिं भले संतसेवन नित महासुखदाये। यहिते सब देव प्रसन्न रहे तुम संतन के हित सुरके सहाये ।। धर्मावतार चराचर के मुखदायक रूप धखो जग आये। अब जग सोआदि मिलेसुरको कलिमाहिं निराश हम धीरजपाये२८७ चिद माधौके सुख भवन विषे शुभ यज्ञ निताप्रति होत सोआये । यहिते सुर आश करें नितही तुमही मुनिराज महासुखदाये । तुम्हरे घरकी मर्याद यही शुभ करम सबै नितकरत सो आये । तुम ईशनरायण विश्व अधीन सो मायापती जग नाथ कहाये २८८ क्षीरसिन्धु विषे विभूतिलगे तुम्हरी हम ध्यानकरें नितनाये । जगपालन के हित देहधखो हमरे तुमइष्ट सदा सुखदाये । सुर नरआदि सबै जगमें तुम्हरोनित आशकरें मनलाये। जो जगजीव अनाथ फिरै भवमण्डल के दुखमाहिं रहाये २८६ माधोपुरी वह जाय चले तिनके तुमनाथ होत सहाये । दुःख अपारसो काटिमले चहुँ सुख पदारथ देत मिलाये ॥ मन वाञ्चित माधोराम दिये फल तिनके असीन केतु मुनिराये। माधो अस्नमें वासकरो सुख धर्म मदिकरो शुभजाये २६० ॥ चौ० ॥ यहिविधि मुनि शरदूल पैसोई । भये प्रसन्न देव सब कोई ।। जै जै शब्द सो मोक्ष अलाये। मुनिनायककी कीरति गाये २६१ आशीर्वाद सब सुरमिल दीने । मुनिराजन आनन्द में भीने ॥ आशीर्वाद सुखदायक पाई । बोले बचन हृदय सुख- दाई २६२ धन्यआजु हमें जगमें सुहाये । तौ दुर्लभ हम दर्शनपाये ॥ जिसपर दया सो होय तुम्हारी । सो होवत जगमें अधिकारी २६३ कोटि जनम जग तप करें कोई । देव दयाविन सिद्ध न होई ॥ दशइन्द्री आदिक वपुधारी । तो सत लैकृतकरै संसारी २६४ तुम सहाय बिन होत न कामा। अखिललोक राउर सुखधामा ॥ चार खानि ब्रह्मांडमें जोई । सुख दुख तिनका जोकछु होई २६५ कृत फल जीवन देख माधवराम सुखसागर। २६ संसारा । निज भक्तन सुख देहु अपारा ।। इमिकहि मुनिनायक बुधि ज्ञानी । देवन की फिर अस्तुति ठानी २६६॥ छ ॥ चिदानन्द विभूवं प्रकाशं स्वरूपं । दिकालविच्छिन्ना आकृति शुद्धरूपं ।। भवकृतानुलेपं अरूपं अवित्तम् । मेरी नमस्तंतुम्हनाथ नित्तम् २६७ तुहीं जगत ईशं मनीपाप्रकाशं। अखिलविश्वरूपं तुम्हींमैनमामिम् ॥संसारंपयोधि तुम्हें सूअधार। चहुँखानीप्रकाशोजूनेकंप्रकार २६८ संसारंअसारं महायुःखरूपं । सबजीवनपैगेरे तब मायाअनूपं ॥ तूजापरकृपालं भवानाथभूपं । भवजीवनं तूभाईकरौशुद्धरूपं २६६ नामरूपंअतीतं अडोलेचितज्ञानं। सनीधानमाया तवरचितीत्रिभुवनं ।।अप्रमानंअज- नम निराकारबोधं । मनइन्द्रीअगोचरं भवातूविभूतं ३०० तुम्हजगतकारकं परपंचाधी- नं। ओंकारखाचं तूभूमाअच्युतं ॥ शुभाशुभधरमं परमाताकामायं । तिनकेफलदाय क सदातूसहायं ३०१ वेदविहितंसुकृतं प्रमातासुखालं । प्रमायाबहुविधनातव करती दयालं ।। तुम्हेंईशनाथ महाउग्ररूपं । सवअंतरप्रकाशी सुखशुद्धंअनूपं ३०२ तूमाया केनाहिं चराचरनायकं । भवजीवनपैहोउ यदातूसहायकं ॥ तवैशुभकरमं भवजीवन करें। होवैसुखदायकं लगेनहींदेरं ३०३ भवउत्पतिवाधं सदाकृतपालं । अनाशीअ- च्युतं अजन्मानिरालं ॥ मनवाकंअतीतं तूभवकेअगारं । षटउरमीरहितं सदानिरवि कारं ३०४ यजनतुम्हारी सुखनामस्वरूपं । मेउरमाहिबसो तूअनूपं ॥ ब्रह्मांडं सुकूप आहपरेदुःखं । करौनाथपारं तुम्हींमैंनमस्तं ३०५ जगफाहीतेजीवं नकरौनितउवारं। दयासिंधुतुमको सदामैंजुहारं ॥ अहंलघुतमनीपा जगतपालईशं । अलखअपार वारिधं तुमहोउप्रसीदं ३०६ ॥ चौ० ॥ यहविधि मुनिवर करीबड़ाई। भये प्रसन्नदेव सुखदाई । सुरनर मुनि जिस जनपर सोई । होयप्रसन्न आनँद लखजोई ३०७ वड़भागी तेहि इससरूपा । तिसके दरश मिटै भवकूपा ॥ नारायणराम की बुद्धिअपारा । महासिन्धु को पावैपारा ३०८ अचल सुमेरु सुसम गंभीरा । भवनिर्लेप कमल जिमिनीरा ॥ मान अपमान विध्वं- सन कीन्हें । सुरतिपुरान सकल जिनचीन्हें ३०६ जगव्यवहार कुसंग दुखखानी । तिनते बचै चतुर मुनिज्ञानी ॥ और सोजीव करम जगलागी। बंधमोक्ष नहिं लखै अभागी ३१० इन्द्रीविषयन माहिं रहावै । तिसते जनम मृत्यु दुखपावै ।। दशन मध्य ३० माधवराम सुखसागर। जिमिरसना होई । तैसे रहै मुनीवर सोई ३११ याते चतुर नरायनरामा। शुभ करमन के हैं सुखधामा ॥ दैवीसम्पति जिमि मिलआई । मुनि तनुधरे मनों.सुखदाई ३१२ स० ॥ यहिभांति सुदेवन हृदयविषे मुनिराजनकी सुख कीरतिगाये। शुभ मूरति उरविलोकि भले मनमध्य अपार महाहरषाये ॥ हेप्रभु देवन कीर्तिकखो तुमही बुधि- मान महासुखदाये। तौ महिमा अपार वगेसुरन जानै लघुबुद्धि नरा जग क्यालिख पाये ३१३ यहि अस्तुति आपकखो मुनिराजन देवनकी जगमहिमा वधाये। याहिपढ़े नर जो जगमें पुनि जोइसुने गुरुके ढिगजाये ॥ शिष्यभाव सो रीतिरक्खे मनमें गुरु की नित सेवकरै मनलाये। मन बुधि इन्द्री जोआदिकहैं भव विषयन माहि जोनित्य लोभाये ३१४ तिनको बुधि अन्तर मुखकरे भवदुःखन ते उरमाहिं डेराये । नितवै- राग्यकी टेकरक्दै जेहिते सुखमायाकी इच्छा नशाये ॥ नितही यह अस्तुति पाठकरै अथवा जहाँ होय सुनें मनलाये। तममूल अज्ञान भवकारन जो दुख सिंधुअपार सो जात पलाये ३१५॥ दो० नित्य मोक्ष सुखरूप जो माधौ ब्रह्मअपार ॥ तिनको पावै त्याग दुख नहिं आवे संसार ३१६ स०॥ ज्ञानविना न मिलै माधोरामहि वेदकहै नित योगी बजाये । यह अस्तुति पदैनर जोफल पावत अवर वेदपढ़े नित प्रेम लगाये॥ सो नरज्ञान वैरागको पायके भव दुखबंधन देत मिटाये । अन्तसमय माधोराम बिषे वह जाय मिले जहँ योगी समाये ३१७ अज्ञान अधीन सोमायाविषे फिर नाहींपरै चिदब्रह्म हाये । तुम्हरे पद- पंकज वाकसुधा कल्पवृक्ष समान सदा सुखदाये ॥जोनर ध्यानकर नितही जगवां- छित सुफलसिघर पाये । यहिते तुम्हरी प्रभुता जगमें सो अपार अलख भवतात नशाये ३१८ कलिमें पदाम्बुज जीवनको दै माधो परमानन्द कातु मिलाये। ब्रतः मान सो भूत भविष्य विषे सब जीवनको मोक्षहेतु सुहाये ॥भरम तूरकीवार तूजीवन के भवसागर छिनमें तृदेत लँघाये । अज्ञान अधीन संसार अहै सो अविद्या नशैनहीं देत दिखाये ३१९ जिमिरज्जु अज्ञानते सर्पदिखे फिर जिवरी के ज्ञानते जातनशाये तिमि माधोराम जो आतम, तिनके सुखबोध विनजगत भयदाये ॥ जब माधोचिद - 1 -- माधवराम सुखसागर। ३१ ब्रह्मको ज्ञानहोय तब भरमको तोरिक माधोको पाये । जिस माधोको पाय भवनहीं आवे तिसमें मुनि जीवन तू उदीम लाये. ३२० ॥ चौ० ॥ भूत भविष्य वरतहै जोई । तिसको तुम प्रभु जानत सोई ।। त्रिधाकाल का लखिकर भेऊ । तस उपदेश जिवनका देऊ ३२१ नामरूप जग सब विभुचारा । तुम साखी तिसमाहिं अधारा । लिङ्ग शरीर सँयोगहि पाई । जीव कुटस्तु तुमैं सुरति कहाई ३२२ जाग्रत स्त्रम सुखोपति माहीं। मन गन विभू सूतजिमि आहीं ॥कारन सूखमथूल विनाशी। सदा एकरस चित अविनाशी ३२३ बैराट विश्व तैजसहिर- न गर्मा । यह ईशनाम तुम धरेअगर्भा ॥ परगनाम कारन तनधारे। तुम त्रिकाल . व्यापक मुनि अपारे ३२४ प्रनोब्रह्म जीव सुखरूपा । द्वादशपद सुरति इसमें नि- रूपा ॥ लखरूप तिनमें सुखदाई । वेदपुरान धंस दैगाई ३२५ सोलखरूप अमीसिंधु अपारा । तुमही मुनि मनवाक ते न्यारा ॥अष्टांग जोकर जोगीसारे। मुख,नितध्यान करै वो अपारे ३२६ बाचक बाच तुमहिं मुनिराजा । उपादान कारण जिमिकाजा ।। अज्ञान दृष्टि रज्जू जिमिसरपै । तैसे जगमुनि तुममें कलपै ३२७ सजाति विजाति सुगत है जोई । तिनसे सदा अतिरिन्तक होसोई ॥ इकरस देशकालते न्यारे । चिद- धन व्यापक तू मुनिसारे ३२८ जड़ान अपान पिंगहे श्वासे । तब सतले सक्करम प्रकास ॥ जिमिभानु प्रकाशते जगत मँझारा । सर्वकरम जीवकर पसारा ३२६ तैसे सूखमथूल जो कारन । तिसहि प्रकाशिक तुम मुनिराजन ॥ निराकार निर्लम्ब अद- यत । तव दरशन ते मम अघ दहित ३३० हमरे इष्ट जो माधौरामा । तेहि चिदरूप धखो सुखधामा॥सुख अवधपुरी अब जाहुपधारे। धरम मर्याद राखहु शुभसारे३३१ वेद विहितकृत जगत मँझारा । तुम बिन कोनसो करे पसारा ॥-अशुभ करम ते जीव न हटाई । करो मोक्ष मुनि तुम सुखदाई ३३२ माधोवन सुख करहु निवासा। हमपर कृपा रख्यो लिखदासा ॥ यहि विधि सुरसब वचन अलाये । मुनिराजन हिरदय शुभ पाये ३३३ देव मुनी युग परम प्रवीने । मिले परस्पर आनंद भीने ॥ तब मुनि पाणि जोर निज दीने । सुरउत्तम जानि दण्डवत कीने ३३४ मृतलोक मानों तन पाई । तहां की मर्याद करै मुनिराई । याते सुरनको किहिन जुहारा । नातो चिद घन आप अपारा ३३५ आशीर्वाद सब सुर मिल दीना। मुनिवर दै भे ६ माधवराम सुखसागर। अन्तरधाना ॥ रवि शशि जिमि अकाश छपि जाई । तैसे छपै देव सुखंदाई ३३६ ॥ क० ॥ यहि अमी कथा अतिपावन पवित्र महा जोई मुनै नर नित चित में वि- चारे है । अज्ञाच पट तुरी मोक्ष ज्ञान सहित सुख पावै चतुर पदारथ सो करतल आवे है। माधौ सू नरायणराम नित सुसहायकरै जिनका सुनाम अघतापको नशावे है । तिनहीं की कथा यह जग सिन्धुपार करै जोइ सन्तजान पढ़े शंका जो न लावे ३३७ नरायणराम मुनिराज विष्णु अवतार जग जिनका सुयश सुरनर सन्तगावे है। जिनका सुनाम दरश कोटि जन्म अघदहँ त्याग भवसिन्ध ब्रह्म माधोका सोपावे है। जिनका सम्बाद सब देवनके साथभयो वारी पद जिनका भवसागरमें सेतहै। जिनका उपदेश जोइ भजे मनलाय उर ज्ञानसहित मोक्ष तीनलोक मुखपावे है ३३८ ऐसे मुनिराजनके अमीपाद वार सुख कवि उरमाहि वसो नित शुभ आयकै । नाराय- पराम यहभाँति मख सुर पूज सब निमती काम वेदरीति की है सु बनायकै । तीरथ परागराज एकमास वासकर मकर सो कुम्भराशि मनजै हरपायकै । अवधपुरी मो- क्षधाम जामें सुखहै अपार जानेका विचार तहां करें मुनिनायकै ३३६ ॥ चौ०॥ माधोराम नाम उर लीने । ऋषिगण सँगमें लिहिन प्रवीने ।। ऋपिमुख मगदेते मुनिराये। आनंदसहित अवधपुर आये ३४० शुभ अस्थान महा सुखदाई । माधो विपिन वस मुनिराई ।। ऋषिमण्डल अपार सँगभ्राजै । निज निज आश्रम सकल विराजै ३४१ तहाँ की मुख शोभा व्यवहारा। अमीसिन्धु जगमाहिं अपारा ।। सुर नर मुनि जेहि देख लोभावै । कवि वरनत चितमें शरमावै ३४२ शुभमंगल सुख अवध मँझारा । बहुत उत्साह शुभभयो अपार ॥ जात वरन आश्रम नर नारी । सुनिदरशन आये सब झारी ३४३ अवधपुरी कोलाहल छाये। मानों रघुकुल तिलक सुहाये ॥ विविधप्रकार वाद्य बहु वाजै । सुर समान नर नारी छाजै ३४४ ॥ क० ॥ महामंगल अपारभयो अमीसिन्धु माधोवन नर नारी तरंग समान छवि पाव है । नाना सुखदायक शुभ माधोकी सुकृत गावै मानों सावन भादों घनशब्द सुहावै है ।। गुरु सागर नहावै मुनिराजनको दरशकरै कोटिजन्म शुभकृत सुख फल पावै हैं । उदासीन ऋषिगण सो करै हजार जहाँ तिनका दरश सो अधिक लाभ होते है ३४५ जितनेकु तनधारी दरशनको आये सव तिनका सो दान मान दिहेन .
३३ माधवराम सुखसागर। मुनिराइया । मुंहमांगे फल दीनो जैसे कोऊ मांगलीनो बलिकीसमान सब आशको पुराइया ॥ यहिभाँति नर नारी आनंद को पायमले मुनिकृत कहते सो नन्ते गये हरपाइया । ऋषिमण्डल सहित सु निवासकीने माधोवन जगमें सु मुनिराज महा . सुखदाइया ३४६॥ दो० ॥ नित नवीन सुखमंगल कृत दानकर सो अपार। सब माधो धरम निवाही कलिमें मुनि सरदार ३४७॥ क० ॥ नरायणराम अगमन अवध प्रवेश जोई इहांका प्रसंग अतिभारी है अ. पारिया । कथाका लंकार बांधे ग्रन्थकी प्रबन्धी होती चितमें संकोचकर लीनो उर धारिया ।। आलस विचार उर दोनोंको सँयोगकर ताते कवि इहां नाहीं कीना सो विथारिया । श्रोताजन बुद्धिमान तिनका सो भयराख्यो वहुत प्रसंग सुखदीनों मैंने हाकिया ३४८ यहिभाँति मुनिराज तीरथ विविधकर माधो वन बसे जहाँ सुखहै अ- पारिया। तहांकी सो लीला अतिअगम अगाधमहा चितमें न आवै कबकरत विचा- रिया। चारसो पदारथ नहँ लक्षमी निवासकरै सुरगसमान माधो बन सुखखानिया। भववारिधअपार दुख तहांगये नाशहोय भ्राता सो कलेश अगमूलहोवै हानिया ३४६ दश चार भवन विरश्चि सो बनाये भले तिसमाहिं अवधपुरी मुख सो सवारिया। मन वाक्यते अतीत सुख सुध जो सनातन है ऐसो ब्रह्मा आये तहाँ मानो तनधारिया॥ तहां के निवासी सव विष्णुसमान शो) निकट सलोक मोक्षमोगै सुख प्रानिया । मनुरजधानीकी सु शोभा सुअपारमहा तिसके सो मध्य सुख माधो बन ठानिया३५०।। चौ० ।। नन्दनवन सम विपिन सोहावै । कबिन्दमनै सव थाह न पावै ॥ इक योजनभर चारिउ ओरा । अतिउतंग परकार सो घेरा ३५१ तापर वश सरकंड सो लाये । वनझार वैर चहुँदिशि छाये ॥ नानापलों सहित महिरे मानो । नमको घन बहुघेरे जानो ३५२ निमन प्रखा जलका फिरई । दुश्मन आय तहाँ भय करई ॥ धर्म जगत कल लखं परभावै । तहैं वसै निरमय सुखपावै ३५३ तिसके मध्य अमर बनवागा। वापीकूप थड़ बने विभागा । जहाँ तहाँ प्रणकुटी सोहै । चहुँदिशि रौसवनी मनमोहे ३५४ पनसा कदली वकुल सोहाये। सिरफल इंगुद निम्बु सो- लाये ॥ कोविदार कचनार कदम्बा । अपार वृक्ष तहँ लगे हैं सर्वा ३५५ भोजपत्र माधवराम सुखसागर। तर जामू अशोका । परमल लागे जिमि सुरलोका ।। नाना पंख लसे चहुँओराना- दकरै मानों घनघोरा ३५६ विविध प्रकार वेल अमराई । वृक्षनचढ़ीं महा छबिछाई ।। सरयू सुरत निकट अनुकूले । जहँ तहँ कुन्द विटप बहु फूले ३५७ गुञ्जत चंचरीक मनलाये। माधोक्न सवका सुखदाये॥ द्रोमनको जुलताहै घरे । जिमि माया सुख ब्रह्मको अवरे ३५८ सब महीर मे लगे कियारे। जिनको घन सींचनहै हारे । फल सो फूल रहा चहुँ कानन । दुःवरूप जहँ नहिं पंचानन ३५६ फलके भारनकर सब तरुवर । भूमिलटे जिनमें रस अमवर ॥ जिमि नर शुभगुण ज्ञानहि पाई । तिमि वन सब शोमै सुखदाई ३६० हर्प गयेनके नकर सोहावे । वैररहित विचरै किलकावे । हरीघास लागी हे सुखदाई। शशा कुरंग चुनै मनलाई ३६१.कीर मोर कोकिल पक रहावै । शब्दकरें मानों कोउ गावै ॥ चकोर कपोत त्रष्टकहो मैना | माधोवन पिषसर मै मैना ३६२ बादशमास हरा चहुँ ओरे । मानों चतुर मास घनघेरे ।। माधोराम का विपिन सो भागा। तिसके मध्यमें वना तड़ागा ३६३ मानों मान- सरोवर आई। तेहि बनलगा अमी सुखदाई ॥ नीलप्रमान सो चारोंओरा । सुन्दर घाट सो बना कठोरा ३६४ सीढ़ी अपारलगी सुखदाये । गऊघाट चहुँदिशि में सुहाये ॥ अजस्वरूप चिद माधोरामा । तेहि वनरचे जगत सुखधामा ३६५ जहाँ तहाँ बुरज लगे बहुसोहै । सुमेरु शृङ्ग मानों मनमोहै ॥ सरमें आय मिलै वन नारा । अति अगाध जल भरा अपारा ३६६ मोति समान प्रकाशै पानी । जिमि देह इन्द्री सहि उज्ज्वलज्ञानी । सुन्दर बहुत सेवार सुहाये । पुरइन सघन चहूदिशि छाये ३६७ विविधप्रकार कमल सर फूलै । अलगुंजै बहु जिमि घन बोले ॥ नाना जाती पक्षी जोई। जल में वासकरैं वहुसोई ३६८ विविधभाँति की बोली बोलें। सुनि मुनि मगन मोह मनडोलैं ।। खंजन स्वाडिल जल तटपाई । कौड़ करे विचरै मनलाई ३६९ युग युग़ जहँ तहँ सारस जोई । सुख अपार लै बैठे सोई ॥ वग ध्यान करे मनकिहे अकागर । जिमि कपटी नर जगमें उजागर ३७० पुरइन ओट सघन जल छाये । कमल संयोग सुगन्धी आवे ॥ माधोवनके ऋषिगन जोई । सांझ सुवे बैठे तहँ सोई ३७१ वेदपुरान की कथा जो पावन । कहैं सुनें ऋषि दुःख नसावन ।। माधोराम विष्णु भगवाना। तिनकी कीरति लक्ष कल्याना ३७२ यह प्रसंगसुन नर - माधवराम सुखसागर। ३५ बुध जोई। नहिं शंकालावै उर सोई । गुरुकी कीरति महिमा गावै । शिष्यको धरम है दोष न आवै ३७३॥ क० ॥ विविधप्रकार मीन जलमें सो बासकरै बधिक सो अघरूप तहाँ नहीं आवे हैं। सरके सो चारिउ ओर सड़क सो नीकलागी बट पाकड़ पीपर आम गुलर सुहाये हैं ॥ नाना शुभ वृक्षनके तहाँ सो तारेखड़े कदमकी डार बहु तालमें झुकाये हैं।सोमरेल सोविमान तहाँ शुभ नितआवै खड़े माधोका सो सर देख चितमें लोभावे हैं ३७४ तिसके दरश हित मानुष अपार आवै सरपर निशिदिन भीड़ सुरहावे हैं । सैकड़ों हजारों मानों रेल से उतर जावै. अघनाशी सागरपै वास नि- शिकरे हैं। तीरथ सो पावन में माधोजी की कीरति गावे जिन सब करमन के फल देनेहारे हैं। उज्ज्वल सो.मिष्टसो सुगन्ध शीत वारि नीक अमी मोक्ष सिन्धु माधोराम ईशलाये हैं ३७५ यहिभाँति नरनारी निशिमें विचारकरें प्रातःकाल उठके सोबत सर्व राखे हैं। मनजै पान करै सर सुर नर मुनि आदि नेक जन अघहानि माधौ मोक्षपावे हैं । पुत्र परिवार हित उज्ज्वल सो बारि अमीघट माहिं पथिक सुभर सब लेवे हैं। घने पंच पलो छाया माहिं सो निवास करै पान फूल लैके आदि सागर को पूजे हैं ३७६ विधि सहित मज्जनकरै रेल सो विमान बैठे सैकड़ों हजारों कोस पलमें सो जाते है। सुमनकी वाटिका सो चारिउ ओर सागरपै तिसके सो बीच सेवानाथ का शिवालाहै ।। 'ब्रह्म सुखरूप जागहेतु सो कृपाल व्यापी तिसमें बिराजै शंभु निवसो अकालहै। पशु पतिगौरी सहित शिव स्वरूपध्यानकरै तीनलोक जिनकी सो मायाका प्रभावहै ३७७ माधोबनवास करै जगकृत फलदेवदार सहित देव जाके दर्शन को आवे हैं। कल्यान देनहारी शुभ अस्तुती बनाये सुर भूतपती. अग्रकर बांधे गढ़े गावे हैं ।। जैसे शब्द सुर मुखते उचारकरें स्वर्ग के फूल लेके शम्भु पै बरषावे हैं । विष्णु विरंचि गणनाथ आदि शोमैं भले देवनसो आये सो अपार सुखपावे हैं ३७८ नारद सों आदि लेके देवऋषी जितने को शम्भुजी के आस पास बैठे सुखपावे हैं। देवन सहित तहां इन्द्र सो विराजमान शिवका प्रभाव सुख अधिक विचारे हैं ॥ गण गंधर्व सव आदि तहां शिव आगे शो) मले साजको टंकारै मुनि जितको चुरावे हैं। सुरराजकी सो आज्ञा पाय गंधर्व गावे सब सुरको उचार तूर तालको वजावे हैं ३७६ विविधप्रकार से अप- ३६ माधवराम सुखसागर। सरा सो नाचकरें मुनिनके चित्त तहां देख ध्यान छूटे हैं। अपसरन वीच देके गंधर्व नाचे सब वाद्यको बजाय सो शरमको उचारे हैं । यहि भाँति देवगण देखें बैठ चक्र बांध बीचमें शशांक सम गिरिजापती शोभे हैं। हाथजोरे देवी बैठी शम्भू बांये अंग भले तारन के बीच सोमसूर शोभे हैं ३८० ताल गंगकी अवाजसन देव सव मोह फँसै विष्णु सो लोयनते बनवान को बगावे हैं । शिवकी सो कीरति सो तीनलोक सुखदेवे जिनकासो ध्यान मधुसूदन लगावे हैं। सोई वारि पावन पवित्र अति शुद्ध महा अमी मोक्ष हेतु माधो सागर में पूरहें । फागुन मास कृष्णपक्ष जनकसुता नौमी आवे तादिन सो पर्व तहां लागे सो अपार, ३८१ साल पीछे सुरनर मुनि सव जि. तने को माधो सर मज्जनको देश चलि आवे हैं । होय भीर भारी प्रति संवत अपार महा जग व्रत दान नरनारी सो कमाते हैं ॥ अवधपुरी जावे जो ना सागर अस्नान करै तिसका करम निष्फल सब जावै हैं। सब तीरथ महातम सो अश्वमेध फल सम माधोसर मज्जनसे नर सुखपावै हैं ३८२ ब्रह्महत्या आदि लैके पाप जो अपार होय ताहि दरश मज्जनते सकल नशावे है । जो कामना को धरनावै ततकाल फल पावे चार सुपदारथ सों करतल आवे है।वेद विधि नानाकरम जौन पाप दूखनको किसी तरह दुख बांध सुख जौन देवे है । माधौ वन आवै नर माधौसर मज्जने ते दुख पाप डारके अपार सुखपावे है ३८३ पुण्य फल मानों तन भारतमें पाय जोई माधो सर ज्जन सो कदै नाहीं कीनहै । ज्ञान मोक्ष सुरनर कदै पावै नहीं ज्ञान मोक्ष सुख नर- कदै नहीं पावै भला तन भांडे मद सम अशुद्ध रहावे है । एकवार सागरके मज्जनको फल जोई शारद सो शेष सुख कहे सकै नाहीं है। ऐसा फलपावै नर जोइ माधो सर नावे तीनलोक माहीं सो अपारशोभा पावे है ३८४ जीबजेइ तनधारे सागर अस्नान करे पाप धोय तन त्याग मोक्षों समावै है । फिर भवसागर सों तन धार नहीं आवे एक सो अद्वैतचिद ब्रह्मलों रहावै है ॥ ऐसे गुरुसागर पै देव सब बासकर भोलाकी सुकृती सुख निताप्रति गावै है । विन शिवभक्ती सुख जगके मँझार माहीं देव नर आदि होवै सुख नाही पावै है ३८५ शिव अविनाशी चिदरूप सो असंग सदा आ- पने स्वरूप माहिं नित गलतानहैं । देवनकी भक्ती सो देखके अपार महा प्रेमके अ- धीन शिव निताप्रति पाले हैं ॥ देवभक्त लायक जान सदाशिव प्रसन्न भये अपनी . . माधवराम सुखसागर। :३७ विभूती जगकारक दै बनाये हैं। जगपालनके हित शिव देवनको आज्ञादीनो डमरू वजाये वेद सूतको सुनाये हैं ३८६ याते शंभुजी के चरणोंका निशिदिन ध्यावे देव शिवनाम भजि सब निर्भय सो रहावै है । विष्णु सो आदि लैके देव सो प्रसन्न रहे अगतके पालनमें सदा सो समरथहै । तीनलोक जीवनको. कारन एक नित एक शम्भु सबको प्रकाशै सो अधार अविनाशी है। ऐसे सेवानाथजी को भजे सब देव मिल जिनकी विभूती त्रिधालोक सो अपारहै ३८७ हिमाल जास हित नित सागर अस्नान करै माधो वनवस सुख शैल नितकरे है । महाकाल रूप रुद्र भैरों सो अकार महा तीनलोक जिनके सो तीन नयन माहिं है ।। महाकाल अग्नि सो जिनके सो नयन माहिं अंतके समयमा तीनलोक को नशावे है । हिमसुता देवी जगकारण अकाल महा कालरूप रूदपाय सदा सो प्रसन्न ३८८ जिसका सोसत सो वैराट सो अपार महा लोकालोक जिसके सो घटमें बसतहै। चाँद औ सूरज जाके नेत्र प्रकाश करै दशोदिशा हाथ विषय चराचर बस्ते है ॥ तलातल महातल दीप जाके वस सदा महा सो अकाश शीश सागर पिशावहै । रोम सो बनासपती असती सो समूह शैल नदी रूप नाड़ी सब देशमें अपारहै ३८६ तारागण आदि जाके माथे में सुहावे बिन्दी मारुत वन जाह कोटि जाके श्वास चले हैं । देव कारकादवली जितने को जगपाल जाकी लम्बी भुजा निज देहको समारे हैं ॥ ब्रह्मांड सो अपार मनियत शब्दहोवै सो ओंकार धुनि मूल सो बैराट केर बोलहें । काली रूप रुद्र रानी भैरवी अकार महा करम वैराट सुत नित सुख लावे हैं ३६० कल्प के अन्त माहिं सुधाके सँयोग होयकर खपर धर जग निजपूत खावे है । क्षुधाकी निवृत्तिकर हो सो प्रसन्न महा रूप सो विराट धार हाहाकार हँस है ॥ अट आट शब्द अपार सो कराल करें काररूप भैरोंजीका निरत सो देखावै है । कालकाली दोनों फिर सूक्षम स्वरूप धारि आप में तदातम होइके रहै सो अबाध है ३६१ जैसे वृक्ष रूप निज वीज में समाय जावे तैसे जगकारण अकाल नित रहे हैं । जीवकृत फल के सो सन्मुख होवे जब विविधप्रकार जग रचिके फैलाये हैं ।। चारखानी जीवन को निताप्रति पालकर जैसे जाके करम होवे तैसे फल देवे हैं । जीव करम फल जब देने से विमुख भये आपस में दो हाँसीकर जगनासे हैं ३६२ याते जीवन के करम सब जगत का मूल जानों ७ . ३८ माधवराम सुखसागर। उत्पति पालन सहारन में हेतु है । और नाही कारण भवमंडल के होने माहिं नादी कालका प्रवाह जग होत करम आये है। गिरिजापती चिदाका जो ज्ञान होय भली विधि जन्म मृत्यु करम फल जग छूट जाते है । ऐसे भोलानाथ जग कारण काल ज्ञान माधो बन बसे जीव करम फल देवे है ३६३ नरायन राम मुनि माधो वनके नि- वासी नित माधोराम शम्भु विषे भेद नहीं माने है। एक रूप जान मुनिराज ध्यान करे नित सत चित आनंद अवाध विभुजाने है । जिस गिरिजापती माधोराम के उपासी मुनि तिनके सो ध्यान विन जगत नशा है । जैसे रज्जू के सज्ञान कर सरप नशाय जावे तैसे आतमरूप लखि माधो सुखपावे है ३६४ माधो भवन से निकस पहिले प्रातःकाल उठ नित मुनिराज माधोरूप शम्भुको मनाते हैं । मुनि बुद्धिमान ब्रह्म विद्यामें प्रवीन अति जिन सव वेदन को पार भले लीने हैं। जिनका उपदेश चले गंगाकेरी धार जग तीनलोक पाप काट जीवन तरावे हैं। ऐसे मुनिराज माधो रूप शंभु आगे नित प्रेम अचल स्वरूप बहु अस्तुति वखाने हैं ३६५ ।। छन्द ॥ गिरिजापती भगवानं दामं । नाथं पदाम्बुज सदा मैं भजेहम् ।। तुम्हारी सु दया विना जग दूखं । नहीं बाध होवै मिले नहीं सूखं३६६ याते नमामी तुम्हें त्रिपुरारी। सदा सुखदायकं भव कष्टं के आरं। पद वारिजं तुम्हारे जो भगती सुखदायकं । देवहु सुधा सिन्धु लोकं के नायकं ३६७ तुम्हरी जो भगती ते वेमुखं मनुसं । जनम मृत भाव दुख नरपावै विनासं ॥ भव उत्पति पालं के कर्ता संहारं। तुमको नमामी जग ईशं अपारं ३६८ शुद्ध साखी कुतष्टं अजनं अनाशिं । मायाधत्र सुखं चित गोयं प्रकाशिं ।। जिमि अदितं प्रकाशी संसारं अपारं। तिमि प्रकाशं तूत्रधा शरीरं अधार ३६६ नाम रूपं अपारं वैराटं तु रूपं । गिरिजा के नाथं त्रिनेनं अनूपं ॥ संसारं दुख निधानं परे जो । अज्ञानं तिनके अघनाशी करो तू कल्यानं ४०० शिवनाम के- वलं सुख बोध हेतुं । पंचकोसं प्रकाशी तुरी तू अतीतं ॥ मन बाकं परेशं अपरमें अपारं । सर्गुन अनेकं धरे तू अवतार ४०१ तुमको नमामी जगत पाल ईशं । नित्यं समाधी धरे ध्यावै योगीशं ॥ सुख शांतं स्वरूपं त्रिलोचनाय वारिदं । शिवनाथं प्रकाशी विभूतू अनादं ४०२ उत्पत्ति पालं भवाभाव हेतुम् । समुरारी विरषकेतुं सदा दयालम् ॥ निज तुम विभूती हरी दै मागम् । भस्मांग धरियं वैरागमतुलीनम्।।
na . माधवराम सुखसागर। ३६ ४०३ नगनागरहितं सब जीवन कथितम् । नाहं वैरागिम समं सुख कोयम् ॥ सम- सानन रहितं सदा तू दयालम् । भव मिथ्या जनावै तू जीवन कृपालम् ४०४ चरम कपालं धरे त्रिपुरारं । उत्तम मध्यम समं तू विचारं ॥ काशीपुरा सदा बरतम तू धारे । सजो जन्तु मुकती भवजीवं दै पारे ४०५ जठरा गगरभ नहीं कष्टु आवं । शिवं समानं नरनारी तन पावं ।। अदयतं उपदेशं तु तिनको जनावै । तजि तन लिंघम . तुमहिं में समावै ४०६ ऊंचं सु नीचं नहीं नाथ देखें । मुक्ती सवनाको तू देवे एक लेखं ।। यहां भव बंधनते रहिता अकालं । अनाथं पर होवे सदा तू कृपालं ४०७नाम रूपं त्रिलोकी तुम्हारे है आशं । तिनके सुखदाई करो दुःख नाशं ॥ भजेहं सुखदाते सदा तू अलेख । भक्तन अभगतं तुहीं जग राखं ४०८ सुरनर आदि करै तोहिं ध्या- नं। तिनके दुख बाधी अभय देवहु दानं ॥सुखदायक स्वरूपं धर माधो रामं । मेरी नमामी तुमहिं सुखधामं ४०६॥ दो० ॥ त्रिपुरारी सुख सिन्धु तू तुम्हरे रूप अनेक । तौ पद अम्बुज बार को मैं धारत हौं टेक ४१० ॥ क० ॥ त्रिपुराके आरी जटाधारी गंगा शीश माहिं वज्रकोपीन अंग भस्म रमाये हैं। आस पास भूत वैठे भालमें शशांक धरे डमरू त्रिशूल सिंगी हाथमें विराजे हैं।। गणपति मातुपति नन्दी के सवार भले नागन के कटक सो अंगनमें धारे हैं । केहरी 'के छाल बैठे रुण्डन की माला शोभे गौरी से पिसाय भांग पिये हरषाये हैं ४११ साकामके आरसू भूतपती तुमही कमलासन विश्व उपावै । भवपालन नित्यकरें तुमहीं लक्ष्मीपति होय के विष्णु कहावै ॥ अंतसमय ब्रह्माण्ड भस्मकरि आप विषय सब लेत मिलावै । मन बुद्धि सों बानी न जान सके श्रुति वाक सदैव तुम्हें नित गावै ४१२ कैलास के नाथ अडोल अभै तू शचीपति आदि तव सेव कमावै ।अमैं पद दान सो देहु तिन्हें सु आराति रिपुहन मार मिटावै ॥ तव जट पाइके गंग सोहै मानो इन्द्र शरासन खेह सुहावै । तुव पद पाइ प्रभावन ते भवसागर में सब जीव तरावै ४१३॥ चौ०॥ त्रिपुर दैत्य को दाहन कीना। मारि जलन्धर को गति दीना ॥ भस्मा- सुरको दै बरदाना । आप पलाय चल्यो भगवाना ४१४ पर उपकार सदा तुम कीन्हा।
माधवराम सुखसागर। हित अनहित सबको सुखदीन्हा । जब जब देवन भये दुखारें । तुम्हरे शरणहिं चले पधारे ४१५ तव तव नाथं तुम्हें सुख दीन्हा । असुरमारि निर्भय शिव कीन्हा ॥ भूपर पाप होय जब भारे। तक्तुम नाथधरे अवतारे ४१६ मारि अधर्मी जगत #झारी । धर्म स्थापन करो पुरारी ।। मथतसिन्धु निकस्यो विषमारी। लगा जरन सब विश्व दुखारी ४१७ लक्ष्मीपति सुर दानव जेते । भये परस्पर दुखी सु तेते ॥ तव सब मिलिके कीन पुकारा । तुम बिन कौन सो नाथ हमारा ४१८ नामरूप विश्वकर जोई। तिनके तुम साखी प्रभु सोई॥ जग इस्थिति उपजावन हारे। पाल्यो बहुरि करौ संहारे ४१६ केचित अब आकृत मंझारा । नामरूप जगकहै अपारा ॥ तदपि सुतन्तर मायानाथा । भव रचने महँ नहिं समराथा ४२० ज्यों चुम्बक जड़ लोहा पाई। चेष्टाकर प्रतक्ष दिखाई ।। तव माया जग चेतन पाई। कर नेकवार जग देह मिटाई ४२१ सतचित आनंदरूप तुमारा। मायाको नहिं लेश विकारा ॥ व्यापक सबघट अन्तरयामी । निज भक्तन दुख नाशत स्वामी ४२२ इच्छारहित सदा निष्कामा। तीनलोकके तुम सुखधामा।। तुमरी आज्ञा धरि उर देवा । करें जगतकी हम सब सेवा ४२३ विषकर जरत जात संसारा । तुमरी दयाते होत उवारा ॥ औरण समरथ को जगमाहीं। भवदुख वधि सुखदेवे ताही ४२४ ताते हमपर होहु दयाला । करौ अभय भवसीव कृपाला । मन वानीते सदा नियारा । अस्तुति केहिविधि भने अपारा ४२५ तुमविन कौन सो होत सहाये । सवपर कृपाकरत नित आधे ॥ ऐसे सुर जब कीन्ह वखाना । भयो कृपाल शम्भु भगवाना ४२६ अनूपरूप प्रगट्यो विहिकाला। भव भयहरण जो करै नि- हाला ।। तौ पद दरशि अनँद सुर पावा। अभय भये भरोसही आवा ४२७ विषकर जरत विश्व जो सारी। खायो हलाहल शम्भु खरारी ।। तब तुम सबको कीन सहाये। अभयभये जग सुर सुखपाये ४२८ ।। दो०॥ भयहारी त्रिनेन तू खाय हलाहल लीन । जयजयकार सो जगकखो देवन मंगलकीन ४२६ ।। स० ॥ शम्भुकृपाल सो को जगमें जिनके गुणको कमलासन गावै । देवपती अहिनाथ मजै लक्ष्मीपति नारद ध्यान लगावै ॥ शिवसिंघर प्रसन्न तो हुये भले तुम्ह पद माहिं जोई मनलावै । मायक नाना उपचार जोई त्रैलोक विषय सुर भोग ४१ माधवराम सुखसागर। सुहावै.४३० तिसके सहजीव भजे तुमको परहेतु मनीसा अशुद्ध रहावै। तेहिते तुम नाहीं प्रसन्नहोय चाहे भोग असंख अनेक लगावै ॥ अशुद्ध त्रिलोकी सो मायक मिथ्या यह जान भले तू उदासी रहावै । अनेक जनमात्र जो जीवघातक तो पद सुधहोत नाम जो गावै ४३१ व्रतमान बिष सुखदेव तिनहिं अंतमाहिं गिरिजापति आनंदपावै । याते प्रधान सव देवनमें भवसिन्धु चराचर शम्भु तरावै ॥ एक सीव सो नाम कल्यान अभै तिसकी तुल्य और न नाम सुहावै । यह नाम भजे भवसिन्धु लँधै तन धार नहीं भवमण्डल आवै ४३२ यह जानि भजों पदपंकजको गिरिजा- पति नाथ हमेंना विसरायो । हमको भवसागर माहि भले तो दयासिन्धु नाथ सो थाहमिलायो॥ विघुना हमरे शुभ काजनमें तो मायाके प्रेरे बहु जीवन पायो। हमरी सहाय तू नाथकियो हमरे शुभकारज नेक सवाँखो ४३३ ॥ दो०॥ गिरिजापति आनन्द बन मोक्ष ठौर सुखधाम । विसके सहि सुरनाथ जो तुमको सदा प्रणाम ४३४ ॥ स० ॥ यह अस्तुति जो नर नित्य पढ़े उठ प्रातसमय कर प्रेम बढ़ाये। चार पदा- स्थ आदिक सो तिसके घर आयके नित्य रहाये ॥ सुखदायक जो गिरिजापति हैं तिसके दुख काटिके होय सहाये । सुख आनँदके सहि ज्ञानको पायके अन्तसमय चिद मोक्ष सो पाये ४३५ ॥ क० ॥ यहि भाँति केरी स्तुति सोबहुत बखाने मुनि फेरि माधोवनकी सो नित सो लगावै है। जिसमें सो बड़े बड़े भवन सो अपार बने मानो विधि आप निज हाथसे बना है। बहु विस्तार में सो दीर्घ सो पवरबने मध चारित ओरमें सो खान बहु सोहावे है । निकेतनके माहिं शुभ खम्भा सो अपारलगे चित्र सो विचित्र मानो चित्तको चुरावे है ४३६ पौरनके आगे बहुं दीरघ सथन डलाय तटमाहिं नानाविधि पुष्प लगाये हैं। निवेसनके दरमाहिं लोहेकेसो सींकलाय राज- ऋषि मण्डल सो तिसमें रहावे है।। मानो शिवलोक बसे मृतलोक माहिं भली शिव की समान ऋषिमण्डल सोहावे है। पवनको समध माहिं शुद्ध सोमवेडा शोभे तिस माहिं उपवन सुन्दर सुहाये है ४३७ पहिन रचित शुभ चारिउओर रोसफिरे जलके फुहारे मेहँदी दूव फूललाये हैं । मानो नीलकाश माहिं नानारंग घने शोमै तिसकी समान मध्य चौक छविपावे हैं ॥ भाँति भाँति वृक्षनके तहाँसो कतारेखड़े मौलश्री . - ४२ माधवराम सुखसागर। कटहल अनेकन लगाये हैं। फल फूल भारकर तरडार भूमिलागी रम्भनकी पांति मानो श्यामघटा छाये हैं. ४३८ वापी कूपकहुँलाये वेदिकासोकहुँ शोभै जहाँ तहाँ सुन्दर प्रसाद सो बनाये हैं । चम्पक अशोक सव भवन आगे छाये सुन्दर अगस्त वृक्षक- तहूँ फूललाये हैं। सैकड़ों हजारों राजऋषी सायं प्रातःकाल अशोकछाया वेदिनपै बैठे सुखपावे हैं । माधोभवन की सो लीला कवि कहत लजावे सब सुरपति भवन विश्वकरमा शरमावे हैं ४३६ ॥ चौगामध्यचौक गुरुभवन सुहावै। वेदरचित अपार छविपावै ॥ निखिल सोसंकमार वरम्राजै। अन्धकार तहँ कहूँन लाजै ४४० जिमि ब्रह्मविद्या अंगको नाशै । तेहि- सम माधो भवन प्रकारौ ॥ रतनसमान खम्भ चितकारे । मणि मुकता बहु जड़ित सहारे ४४१ हेमबिन्द तन खड़े चौफेरे । चिंकत हरै गवाख घनेरे ॥ नानाविधि चि- तकारी जोई । देवालन महिं खचितहैं सोई ४४२ सुर मूरति तहँ बहुत विराजे । झाड़ फनूस लाट वहु छाने । उडुगन मानो नमके मँझारा । झलमलाय चौफेर अपारा ४४३ चतुरभवन शोभै चहुंओरा. हेमशृंग जिमि शोमै सुमेस।। सदन अग्र में वृषहि सो- हाये। धन पल्लव जिमि तम्बुतनाये ४४४ सांझ सुवे बन्दीजन आई । शब्द उचार करें सुखदाई । माधोरामके गुण सुख गावे । झांझ मृदंग तमूर वजावे ४४५ शुभ गुण पूरण भवन है सोई । जेहि पिप दुखनाशै सुखहोई ॥ रवि समान झलकै चहुँ फेरा। श्रीपति सदन समान उँजेरा ४४६ संगमरमर विविधप्रकारा । कृसना सकुल वरन नहिं पारा॥ चितकारी सहि फरश विछाई । चहुँदिशि सदन बीथ छबिपाई ४४७ तिसपर सुन्दर पट सो विधाये। ऊपर बहुत चँदोवा लाये । अति दीरघ अकाश मै सोहै। सुमेर सीघ मानो मनमोहै ४४८ किंगुरसमूह लगे चहुँ सारे । हेमजड़ित झ- मके जिमि तारे अतिशोभित गुरु कलशहै जोई। मध्य शिखर झलके चहुँ सोई १४६ बीच खेहमें सोम सुहावै । मानो मारतण्ड छवि पावै ॥ ऋषिन की मूरति चहुँदिशि छाजै । कैलास शिखर जिमि शम्भु विराजै ४५० विचित्र सीक चहुँ कोने ठगढ़े । जिम हेम थंभ चितकर सहि गाढ़े ॥ ऊरध भवन की छवि सो अपारा । कवि गण कहैं ने पावें पारा ४५१॥ क० ॥ बीच महि भवनकी सुशोभा सो अपार छवि तिसमें न आवे याते वानी माधवराम सुखसागर। न प्रकाशे हैं। हाटक समान चारिउ ओर से दिवाल छाजे बेल बूटा पती पुंडरीक तामें लाये हैं ।। श्रुत सभीर तहां विविधप्रकार लाये मनको चुरावै मानो वानी को उचारे हैं । अनल समान उरघ चाँदनी मुभगलाई मोतिन के भब्बे चारिउओरसे झुलाये हैं ४५२ नानाचित्रकारी हेमसत्र खचित सभ रूपनके कुण्डन में चारिउओर कोन बाँये है। सुवर्ण छन तामें भारी विस्तार शोमै हेमडंडी हीरा मोती जड़ित सो- हावे है।। मीनके अकार तामें वज्रदि जड़े सभ प्रातःकाल सरवत महाकविपावै है। पदुमसमान तामें तरी सो अपार लाय मारतण्ड कृष्णपत सो मानो नशावै है ४५३ माधो सो मच्छ तरकासो और सो दृष्टान्त नाही एक रमापती कान कुण्डल सुहाये हैं। नरायनराम मुनिमत मानसो प्रवीन महा सोइ मानो लाय माधो रामशीश शोमै हैं। स्मापति माधोराम सदा सो अभेदरूप ईश्वरको बाचक सो माधोराम पदहें । वाचक सो वाचमाहिं भेद कदाचिंत नाहीं जैसे घटरूप देखो सदा सो अभेदहै ४५४ रमापति माधोराम युगपद सुखदाई बाचलखको जनावे चिदानन्द व्यापी शुद्धहै । याते ईश शुद्ध माधोराम जगत गुरु ब्रह्म त्रिधालोक मूल माया तिनकी विभूती है ॥ याते माधो भवनकी सु लीला सो अपार महा जहाँ माधो आपईश तनधार बसे है । हेमका सिंहासन सो कनक जड़ित शुभ सोई सोम छतुर सो उरधमें प्रकाशै है ४५५ भ- वनके मँझार माहिं सदा सो अडोल सुरराजका असीन तेहि देखि लाज खावे है । भाँति भाँति पटशुभ तिसपै विछाय शोमै हेमनकी सूतनकी मीनाकारी लाव है। वींचबीच रजित कि कुन्दनकी जरलाई मानोहरे बारिधमें तड़ता सो फिरै है। हीरा मोती मूंगकर जड़ित सिंहासनहै जरद अकाश मानो उडुगन छाये है ४५६ भाँति भाँति रंगवाले नगके समूह जड़े जहाँ तहाँ रतनसो मनमान लावै हैं। नानारंगवाले शुभ- तको आस चारिउओर जिस ओर देखै मन तहँ फँसजावै हैं । जड़ाव सो जड़ित सोने चांदीके सो पंखधरे सूरज शशांकसम महाछवि पावे हैं। अनेक फलकंद सब ता- खनमें विष्ठ शोभे जहाँ तहाँ फूलनके गजरे मुकावे हे ४५७ खसवोइकी सुलाट कर भवन सो अपार भरा सारीसमग्री सुगन्धी होके भासै हैं । मेवा मिष्ठान्न सुर भोग पकवान नाना हेमथाल संचबहु जहाँ तहाँ धरे हैं ॥ रसना अधीन सुरभवन फेर माहिं बैठे गंधीप्रसाद लेवे माधो गुणगावे हैं। हाटक रचित महा सुभग सो पौरखना :४४ माधवराम सुखसागर। हेमसूतमुक्तावल जाली तहाँ लावै हैं ४५८ रजतकी फुल्ली बहुतकनं में लाई नीक तारनकी पंगती सुमानो चित्रकारी है । चांद औ सूरज दोऊ वैठे दोऊ तासमाहिं मानो हरेबादर महिकृष्ण फैलाव है। त्रिलोकी के सुनाथ माधोराम महाराज चिद तिनका सोनाम अमी उरमें लगाव है। नदसे जड़त पट सोमपौर माहिं शोभै मानो रमानाथका पितम्बर सुहावै है ४५६ विष्णु विभूति सव माधोभवन माहिं शुभ चारिउ ओर भरा सुख महासो अपारहै। कनक सिंहासनाजो वरणन कोने पीछे मध्यसो भवन धरा शोमित अपारहै ।। मायाके स्वपति माधोराम शुद्ध ब्रह्मचिद शीशमाहिं छत्रभूले तापर विराजैहै। जिनके सोतनकी सो प्रभासो अपार महाकन्दर्पकोटि सोमदेखके ल. जावैहै४६०कलिराजका वजीर काम असुरी सो चमूलेके तीनलोक चारखानी मारवश करे हैं। माधोका स्वरूपदेख शम्भू अरजाने नित पाणिजोर माधोकी सुकृत नितगाव हैं। जिनकी सुलीला सुखसिन्धु सो अपार महा बड़े कविहंस फिरै पारनहीं पावै हैं । मैं तो मतिमन्द निज अक्षर सो वोधनाही गुरुसागर कथा हम कहा पारपावै हैं ४६१॥ चौ० ॥ जिनके दरशन जगदुख नाहीं । वैठे हेमसिंहासन माहीं ॥ कुन्द छत्र शिर उरधभराजै। वैकुण्ठनाथ तनुधरे विराजै ४६२ द्वादश आदि प्रभा रवि जोई । माधोराम प्रकाशै सोई॥ हेमवदन मुख चन्द सुहावै । नीलजटा मानो घन छावै ४६३ अथवा स्वयति सुभग शिरसोहै। सूर्यकिरणि मानो मनमोहै। तनकी युतिकर भवन सोहावै । वनी तहाँ अभावको पावै ४६४ वारिजनयन जगत सुखदाई । कुन्ददशन छवि किमि कहिजाई॥ भवट मानो भृङ्ग सोहावै । इक दश बात कंठ छविपावै ४६५ मस्तकमें शुम परमल लाये । सुधा शशांक द्वयुत जिमि छाये॥सुन्दर जिनके लागे सखन । हेमरूप जिमि शोमै कवलन ४६६ पदमासन बैठे मनमोहै। मानो गण- नायक सुखसोहै । लम्बोदर जिसमें ब्रह्मण्डा। सतचित आनंद शुद्ध अखण्डा ४६७ पद वारिज जगमें सुखदाई। नखकी प्रभा सिंहासन छाई ॥ शेषनाग सम भुजा वि- राजै । कर जग पोखन पदम सो छाजै ४६८ रनवसन सुन्दर तनुधारे । इन्द्रधनुप जिमि चकरडारे ॥ ब्रह्म कमण्डलु बगल मुहावै ।जगकृत फल जिन हाथ रहावै ४६६ हाथ विषय शुभ वेदहे जोई । माधौ के गुण गावै सोई ॥ परमानन्द विषय नहिं माधोरामा। त्रिधालोक के हैं सुखधामा ४७० ।। " ४५ माधवराम सुखसागर। क०॥ अधरसो बिम्बकीर चोंचकी समान नास तीनदेव मिल छवि माधौरूप धारे हैं। हेमके असीन चिद मध्यभवन माहिं शोभै जिन कासोपेख क्षुधा प्यास दुखनाशै हैं। कल्याण शांत सुखरूप जीवनपै दयाधारि सुखसो बैकुण्ठ तजि बेत भवन राजे हैं। विष्णूकृपाल माधौराम जगईश मोक्ष तव पद वारिजको कबिनित ध्यावेहैं ४७१ संसार सिन्धु दुखभारी तिसमें उधास्योनाथ नेकजनम हारि आयो थाह नहींपायो है। करमके अधीन सव लोकनके माहिं फिरयो शुभाशुभ फल भोग अंतपात पायो है ॥ अज्ञान दुखमूल शाप उरमें निवासकरै असुरीकुटुम्ब दुख तिसके अपारहै । दैवी सुख सम्पदाको मूलसे उड़ायखाय घटीयन्त्र जीयन में वियन्त में भरमाये है ४७२ तुम विन नाथ भवसागर लँघाचे कौन महासो अनाथन को दुखकाट मोख्यो है । क्षणमें दयालु तुम जीवनपै होयनाथ नेकजन्म अघकाटि निजपद दीनो है ॥त्रेतायुग माहि तुम दशरथ भवन भये नामरूप रामधारि तुही जगपाल्यो है । मधुपुरी माहिं तुमनंद जीके लालभये नख गिरिधारी तुम गोपसुख दीनो है ४७३ मन्दरचल भूधर सूतुमहीं उठायकर क्षीरसिन्धु महिरख तुमहीं मथायो है । सुधाको निकार तुम देवन को सुख दीनो तुम्हरे प्रभावलेके सुर अरघाये है ॥ अरातिन से छीनराज सुरनको सुखदीनो माधोतू कृपाल फिर दोनों मोख कीनो है। गजराजके सो फंदकाट्यो फूलके अधीन होके सेवरीके वेर लोभमहासुख दीनो है ४७४ वसनको छोड़ तुम नंगे पावँ नाथदौरे द्रौपदी अनाथभई लाज सभा राख्यो है । सुग्रीव सो विभीपण प्रह्लाद हनुमान आदि सवनो को दुन्दुभी वजाय मोक्ष दीनो है । बड़े बड़े पतित जटायू आदि गति दीने हमरी सुवेरनाथ काहे देरलायो है। शम्भु सुरनाथ बिधि लक्षमी के पति चिद नामरूप करम तुम्हारे विविध प्रकारहै ४७५ नारायणराम कृत भवन बैव्यो सुधानाम धारे कवि की सो गतिकरौ तुम्हरी नमामी है। जिनके सो पारखद नरायनराम हरीशरण नन्द सुनन्द दसम माधौपद सेवे है ॥ धन्य उनकी कृतशुभ तनको सुधारजग माधौभवन वस पुन माधौ यशगावे है । माधौ जीकी प्रजासुख विविधप्रकार करे जैसे वेद विधि कहे तैसे नितकरे है ४७६ रूपनकी चौकी पेले तहासो बिछाय देव मज्जनस्थान जो अकान्त सुखदाई है । पाहिन रचित भुमसुध शुभायमान दुख देनहारी पंकनित सो अभाव है ॥ दातुनी सो आदि लैके मञ्जनकी विधि सब सांगोपांगो शुद्धरच पहले ४६. माधवराम सुखसागर। सो तहां लेराखे है। शुद्ध चिदानन्द बिभु माघोप्रत्यक्ष नित हाटक असीनतज चौकी पै बिराजे है ४७७ नरायनराम हरीशरण हेमनके भांडनमें भागीरथी वारिलेके मंजन करावे हैं। सुमनके साथ प्रेमबपुको सँभारे भले सोमसुध पटसाथ जलको उतारे हैं। रतन खराऊँ पदपंकज में पायँ देवे हेमके असीन आये तजिके बिराने हैं। विविध- प्रकार राज ऋषयनके पट जोई हरीशरण मुनि रायरचके पहिनावे हैं ४७८ सुगन्ध वाले नेक भाँति चन्दनसा उतार शुभ माधो सुखभार माहिं विधिसे चढ़ावे हैं। फूल पत्ती अक्षत सुगन्ध नई वेद शुभ फूलनके हार शुद्ध कंठ में पहिरावे हैं ॥ यथा योग अंगन सँभार भलीविधि सब हेम धूपदानी बनी गंधीको जगावे हैं । तिसकी सुगंध उठि साराभवन भरजावे देव तहां देख सूंघनाक सुख भूले हैं ४७६ नानारंगवाले झाड़ तोरन फनूसलादू तिसमें सनेह पाय बनीको प्रकाशे हैं । मेवा मिष्ठान्न आदि देवनको भोगजोई हेमनके थालन बनाय संचराखे हैं ॥ विश्वधारी जगपाल हृषी- केश माधोराम उरमी सुखट नित जिनमें सुबाघहैं। भक्त प्रेमके अधीन नित सुख फल देनेहारे तिनका निवेद मुनिराय नित लावै हैं ४८० नदथाल घृत वाती से सँवार बहु हरिशरण तिसमें हुताशन प्रकाशै है । हरीशरण महाराज पानेसे उठाय लेवे मानो प्रातःकाल उरध सूर छालमारे है।वायेहाथ घनट धुनै दहीने माहिं धूपदानी माधोजी की आरती वेदमन्त्र उतारे हैं । नरायणराम मुनिराज चौरडोलावे विधि मानो सन- कादिक शम्भुपै डोलावे हैं ४८१ और ऋषिमण्डल अपार माधोभवन बसै घंटा शंख मेरी नेक बादको बजावे हैं । गोमुख सो तूर विधि छैनै सो अपार वाजै बिजयघंट नागफनी दूर शब्दजावे हैं। धूसनपै चोवलागे मानो महा मेघगाजे भैरों सो शब्द सत्र नभपूरजावे हैं । करवायू आले बाजै नानाभाँति करखाने निरपछमू बीचवाले माधो आगे बाजे हे ४८२ आगे आगे हरीशरण आरती उठाय फिरै मानो मारतण्ड फिरै महा छरिपावे है । जटाधारी ऋषिगण पाछे सो अपार फिरै विविध प्रकार सब वाजेको वजावे हैं ॥ अडोल सोकुपीनलाय अंगमें भसम शोभै मानो निर्वेद बहु रूपनको धारे हैं । माधो सुत सुतकर आरती सो छविपावै जैसे श्याम बारिध में चन्द्र छविपास हैं ४८३ सुन्दर शब्द ऋषिमुखते उचारे सब जैसे बालखिल सुर आगे. श्रुतिगावे । यहिमाँति आरती उतार सव देवनको शुभ अस्थान पुनि लायके दिकावे माधवराम सुखसागर। ४७ है । अरघ पाद्यमाहिं शुभ गंगाबारि लेके कर वेदमन्त्र साथ विधि आचमन फेरे है। ब्रह्मवेत्ता बुद्धिमान हरीशरण हरीरूप कर कमल माहिं सो उठाय फिर लेवे है ४८४ भवनके समीप ऋषि मण्डल उदार खड़े अंग तम नाशिनी सो आरती दरशावै हैं। ऋषिगण तहां सुख आरती को लेवे विधि शब्द जैकार सो उचार धुनिकरै हैं ।। नमामी शुद्ध आपस में करत वनाय सब यथा योग्य जिनका सो तैसे नितकरे हैं। पदुम असीन माहिं माधो भवन आगे शुभ चक्र बाँध ऋषिगण बैठ सबजावैहे ४८५ तम्बूरको बजावे कोइ तन्दरी बजावे ऋषिछैने को बजावे सुख माधो गुनगावे हैं। जिसके सो ज्ञानकर जग सिन्धु तुच्छ जाने जिसमें अज्ञानी पर थाह नहीं पाये हैं। रामदास आदिलैके ऋषि सो अपार बसे सैकड़ों जिज्ञासु को उधार नितकरे हैं । वेद को पढाये मुल अघ कु विश्वंसकरे ब्रह्म विद्यादान देके महा यश लेवे हैं १८६ ॥ दो० ॥ यहिविधि माधवरामकी ऋषिन सहित मुनिराय । पूजनकरि फिर अस्तुतिकरै पाद पद्म शिस्नाय ४८७ छन्द ।। नमामी नमामी मेरी नाथ नित्यमनाथं । पदाम्बुज केरे में मातम् ॥ जना कोटि पुण्यं जो प्रकटे उदार। तौ पदरेणु का होवे अधिकार ४८८ जगतपाल इसमतू जापर कृपालं। जन्म मृति दाही तू करता निहालं ॥ निगमागम अधीनं करै कोइ क- रमं। तपादि विधायक करै बहुजनमें ४८९ तो पदभक्ती ते होवै विहीनी नहीं सुखपाचे नरावे मलीनं ।। संसारं पयोधि गिरेवे दुखारं । घाटीयन्त्र जो इनं दुखभरमै अपारं॥ कोमल शील कृपाल तुरूपं । दुःखारत भवजीवा तुकरता निरलेपं ॥ मेरी तू रक्षाकरे सर्वकालं । चहुंखानी भवमंडल करो प्रतिपालं ४६० निरीहं निराकार ओंकाररूपं । नामरूपं विराटं घरे तू अनूपं ॥ खटं परनामंते रहता निरालं । गनबाकं अतीतं सदा तू अकालं. ४६१ कारण सुखं स्थूलं अधारं । शुद्ध बुद्ध साखी चिदानंद न्यारं । अ- कृतम् अनाशी विभू मायानाथं । मेरी नमस्ते अनाथ के नाथं ४६२ विघोना अनेक तु मेरी खपायं । निज असीन माहीं तुमोकुरमायं ॥ निज भगतजानं करौ प्रतिपा- लं। तो विननाथं को जगमें दयालं. ४६३ वेद विहितं सुखदायक धरमा, अवतारं । धरम थापि यह आश्रम करौ प्रतिपारं ॥ भवजीवन अधीनं नहीं कच्छनाथ । जसा जस तुही दै करता सनाथं ४६४ नाथं परत्यागी अहं करतामानं । वह तुमारी माया माधवराम सुखसागरः। विषय अज्ञानं । जठराग्नि गरभ खपैहौ अपारं। गुरुभक्ती बिहीनं करै को उबार ४६५ तू जापर कृपालं होयौ भवनासं। तव पद वारिजं सुखे विश्वपांसं ॥माधोरामं ये नाम सो धायं। करै ध्यान उरमें नराजे मदियायं ४६६ भवसिन्धु काहीकरै वह निवारं। महा मोक्षपावै नरावे उदारं ॥ याते यह नामं महाउग्ररूपं । मेरेउ माहिं बसौ तू अनूपं४६७ त्रिगुणसहितं त्रिदेवं अका। भव उत्पत्ति पालं तू करता संहारं॥ लोके दिगपालं तुही है दयालं । ब्रह्माण्डं अपार के धामं अकालं ४६८ इच्छापर यतनं तू रहिता निष्काम। शुद्ध ज्ञानरूपं गुरंमतीरामं ॥ जगजीवनअचारजं धरमपालकारकं । अखंडं अद्धयाँ तुहीहैअनेक ४६६. वाकपाणिपादं उपायूउपस्थं । लोमंतुचारसना प्राणस्रोतं चित्त प्रमानं ॥ मनीसामनानाहंकारं सूखमकारं । अस्थूजकोशंअधार ५०० शुद्धसाखीस्व- रूपं सदानिर्विकारं ! चिदानन्दंगुरखंकृपालंअपारं ॥ यहिमाँतिइसं तुमहिजोनाजानं । जीवनस्वरूपं दुखासहमान ५०१ वहनरम्रष्टं महापापरूपं । संसारंपयोधिंदुःखपावेअ- नूपं ॥ जवहोबहुकृपालं करौ ताहिपारं । ईशमाधवरामं तुमहिं नित्यजोहार ५०२ ॥ दो० यह अस्तुति माधौराम की मनीनरायणराम । जोनर गावें सुनेंनित लहैं मोक्ष सुखधाम ५०३ क० ॥ यहि भाँति मुनिराज हरीशरण सुखदाई जिनका सुमाधवराम धनद बनाये हैं। तिनकी जनन नितनई सो अपारकरै कहांलौं वखानै कवि अन्त नहीं पाये हैं। चतुर प्रकार मोक्ष माधोलोक माहिं लीने संतसेव गुरुरीति नित्य प्रतिपाले हैं। मेवा मिष्ठान्न आदि माधोका प्रसाद सब ऋषिगण सबहीको प्रेमसाथ बाँटे हैं ॥ रविमास माधौवन ऋषि समुदाय वा पावसके माहीं पुण्यबस्तु अपार, ५०४ मुनिराज दान मान ऋपिनको पटदेवे संतसुख माधोवन नितसो बसावे हैं । देशकाल आदि कवि चितमें विचारक धर्माकी वृत्ति रहना कलिमें अपार ॥ नरायनराम मुनिकी समान ऋपि राजनको कहै कवि हाथ जोरि हमरी नमामी हैं.। धन्य सो पुरुष जोई जगमें सो तनुधारी माधोवन वसि सुख आयुको वितावे हैं ५०५ तिनकी समान पुण्यवाले और ओई नाही जगसिन्धु मोह तजि माधौपद सेवे है । कालकाप्रभाव दुख तिनके नजीक नाहीं ऊमेलोक आश तजि ज्ञानसहित होते है ।। ताते बुद्धिमानों सब मा- चौवन गाहिं बसौ जगसिन्धु दुखभारी तहां अंत पावे है। वैरागसो विवेक पटसम्पति - माधवराम सुखसागर। ४६ वसाय उर गुरुकी सुसेवा तहाँकरै बुद्धि जोई है ५०६ जाति कुलकाभिमान तजि गुरु की शरण रहे तीनलोक भोग मिथ्या जाने सब मायके । संसार सुअपार तामें दुखको न पारावार तिसकी निवृत्ती पूछे कर कु मिलायके॥निज अधिकार जान गुरु उपदेश करै तिसको कमावे सो सु मानो तनुपायके। अंतके समय माह पंच भूतनको त्यागि वनु जगदुख नाहीं फिर पावेभग आयके ५०७ विष्णु विरश्चि शम्भु इन्दकी समान होवे गुरुविन भवनिधि तरे नाहीं कोई है।नामरूप चारखानी जीव जेइ तनुधारी जग में सो गुरु विन किन सुख पायो है ॥ गुरु मोख देनेहारे तिनहिं सुख जानि त्यागे तिसकी समान मन्दमागी कोई नाहीं है। जन्म जन्मांत्र सो जगदुख देनेहारीमाधो पद त्यागि मन्दमाया ध्यान लावे है ५०८ कल्याण हेतु मानो तनु दुर्लभ पाय जग मोख साधन त्यागि विषय बासनामें खोवे है । वेदगुरु ज्ञान विन अगहोसून फिरे चोप देशमान जग समाको बितावे है। संसारकी सो माया माहिं जन्मै अनेकवार घटीयन्त्र जूनभरमैं महादुख पावे है । वासनाको धारमन्द कृतकू कमावे विधि जन्म मृति फांसी निज गलमें सोपावे है ५०६ करममें अभिनिवेश रहित सदीउत्र अपनी खुआरी अघज्ञान बिनकरे है। माधोराम दयाबिन सुख नाहींपावे जग किसकी समान तिनै मायास भरमावे है । जाग्रती स्वप्न में स्वतन्त्र नाहीं होनपावे मायाके गुलाम जग महादुख पावे है। तन इन्द्रीसुख लिये मायाको व्यापारकरै तिनकी समान जड़ कौन जगमाही है ५१० मलमूत्र नाड़ी त्वचा श्वेतपित्त कफरेत मांस लोह अस्थी- कर पूरित शरीरहै । चूंक राल आतीमेद रोम मीड बुरीबास अंतनासी महादुख नरक भंडार है। ऐसे तन पालनको मूरुख उपावकरै अहवं जगमें सो अधिक मचावे है। महा ऐसे पामरनको वेद धिग धिग करै कालमुख परैसुख जगमें मनावे है ५११ अस जड़दुख मिथ्यातन दुर्गन्धि पाये कोबिद गलानि करै आश नहीं लावे है। जबतक 'अहंदेह उरमें अध्यास प्राप्त तबतक जीव सो कल्याण नहीं पाते है ।। अहंदेह बुद्धी यहिनाम सूं अविद्या कहै सकल कलेशन को मूल दुखदाई है । सत चित आनन्द व्यापी अविनाशी अजशांत सुखदाई ज्ञान तिसको अडादै है ५१२ नामरूप तीन काल सकल प्रपञ्चमिथ्या जिमि रज्जू सीप माहिं अहिरूप जोइ है। चारखानी जी- वनको तिसमें भरमायाकरै जिमि मारंवार पेखिमृग दुःख पावे है। अजचीटी आदि है ५० माधवराम सुखसागर। लग कालके कलेवा सब ऐसेजग तनुधारि किन सुख पायो है । संसार सिन्धु दुख माहिं मायारूपी खारजल चारखानी जीव तामें मच्छ कच्छ बसे है ५१३ ब्रत- मान माहीं नित मायाजाल माहिं फिर मोहरूपी भँवरपर मुक्ति नहिं पावै है । मनके तरङ्गनमें डिगकर धक्काखाय दुख सुख संचितको थाह नाही पावै है । जठरा अगिनि कर सदासुत पायमान त्रिसुना धिकाये बनी विषयवार पीवे है । विपतारूपी बायूदुख नितसू सहाय करे लघु मच्छी कामी क्रोधी नीच तामें जरे है ५१४ पांच सुकलेश सिन्धु झाडी भागलावे मन पुत्र परिवार सहित भोगमलखावे है । मन बुद्धि चित्त लाय इन्दके व्यापार माहिं निशिदिन भरमै उरशांत नाही लावे है। जन्म मृत्युकुंडी लागि आमिख संसार भोग हीन सो विवेक भक्दै गालजनम मृतुफारे है । पुत्र परि- वार सब दृष्टि आगे नाशपावे भोगमें रतवन्त रहे सार नाहीं पाये है ५१५ कालमीवर कठोर दुख करमरूपी जाल लैके चारखानी जीव लैके फैलायके फसावे है । वासना सुरसी माहिं जीवन को बांधिलवे निजती अकाल काकोलाय करदेवे हैं ॥ जगहेतु सापनीय सुमोक्ष माय पाय लेवे अहवं दसनहै छुराको चलावे है । काली नारि नागिनी के मुख माहिं परे रोवे झोग माखन को धावे झिझकोर दुख देवे है ५१६. जीरन अवस्थाकर जीवन बिदमकरै हीन पुरषारथ अवाच दुख गावे है । अधिकन जूनकाल देके प्राणकूनिकारलेवे फिरकर जीवनको भोजन बनावे है ॥ कालकाली दोनों मिल निखिल ब्रह्मण्डखाय जैसे सांप साँपिनी कुटुम्ब निज खावे है । नामरूप चारखानी वेदसहित पंचभूत चिरकाल पाय मनोराज फिर करे है ५१७ मिथ्या मनो- राजगज अग्निके उरमा सुमेरुकी समान सृष्टि ज्ञानको दवाये है। जाते सुख कृतांत के अधीन होय बारम्बार माधो दयाविन दुख अंत नहीं पाये है। माधौ के पदाम्बुज माहिं कवि जोरि हाथ खड़ो हरोदुख नाथ तुम बिन मेरो कोनहै । निष्काम दयारूप जीवन के प्यारे आप संकट हरण तुम्हारे नामका प्रभावहै ५१८ भवकष्ट सब जीवन को नाथ पद नाहीं बांधे विसै तीनदेव आदि कोईना सहाई है। याते गुरू जिसपर अधि तू दयाकरो जग माह बदनते सोई छुट जावे है । अज्ञान मूल तम फिर तिसै उरनाही आवै साखी तु कुष्ठ मुध तुही उरभास है। चिदधन-तुमरे सरूपका सोज्ञान कर आडसे रहित जग मोख सुखपावै है ५१६ ॥ स ॥ माधोराम नरायणराम अमी ५१ माधवराम सुखसागर। सुख सिन्धुजुग नामसुहोई । जीवनके कल्याणलिये भवसागरमें शुभसेतहै दोई ।। अजामिल आदिसे लेके महा जड़ पारभये क्षणमें बहु सोई । माधो नरायणनाम सुधा कविके उरमाहिं वसौ सुखदाई ५२० पद वांचलिये सुख लक्ष जनावत बुद्धि विचारकरै मनलाई । जगकारन मायाको नाथ अधार जो सर्व स्वतन्तर धारत जोई।। फिर क्षीरसमुदहि ऐनवनायके शैनकरै कमला अज दोई। सब अन्तरयामी सो प्रेरक में जिसमें पुनशक्ती अपार सो होई ५२१ जगत उत्पति पाल संहारकरै षट लक्षणं केसहि व्यापक जोई । माधव नरायण पादनमें यह बाँच सो अर्थकहे बुध सोई ।। और सो अर्थ अपारहै वाचक भय विस्तार वखानो न जाई । लक्षअर्थ दोहूं शुभपा- दनमें निततग विचारभने सुखदाई ५२२ एक अखण्ड अद्वैत चिदानन्द देश सो कालं उपाधि बिहीने । नाम स्वरूप अधार सदा घन नित्त प्रकाश जेहि बेदवखाने । ज्ञानस्वरूप निरपेछक व्यापक कूटस्थ अजंना परमानै। नाम न रूप नहीं जिसमें पुन मायाविकार नहीं सब जाने ५२३. त्रिपुसे बिना अजरा सो परे जेहि योंगीसमाधि लगायके जाने । माधो नरायन पादनमें श्रुति लक्ष सुखास्थ रोही वखाने ॥ यह गोप सो अर्थ अनूप महा ऋषिमण्डलं माधो अरण्यमें जाने। नरायनराम तहाँ ऋषिराज अष्टांग सो योगकीरीति वखानै ५२४ समधि विषय परत बन्धक जुरसा स्वबादक खाय विषेप नशावे। बिसीआ सकारज वृत्ती सुवाहिज अन्तर लायके ताहि दवावे ॥ गिया अकार सो बृत्ती भले सहे विकलप होत ब्रह्माकार ठहरावे ॥ निश विकलप असंग प्रति ज्ञात विषे पद माधो सुखलख विषे टिकजावे. ५२५ दुखमूल अविद्या सबै हनिके मुनिनायकराज सो योगकमावे । यह माधोरामका लख स्वरूप समाधि विगर नहिं जान्यो जावै ॥ माधो अरनके माहिं भले अधिकारी ऋषीबहु आय ठहरावे । नरायनराम तहाँ मनिजी उस समाधिकी रीति विशेष बतावे ५२६ प्रतिपाल करे सबकी कलिमें कलिका प्रभाव तहाँ से बिडारे । जो कोउ आयपरै पदमें शीघर शब्द सुनायके पार उतारे ॥ऋधी सुसिद्धी मुज्ञान वैराग मिलाय किये सदा व्रत सो जारे। माधोपुरीकी सुरीति यही मनवांछित सो फल पावत सारे ५२७ ॥ चौ०॥ माधोराम विष्णु भगवाना। जिनकी महिमा सब जगजाना ॥ सवलोकन सुखदिहिन अपारा । जेहि जप नामहोय भवपारा ५२८ अवधपुरी प्रकटे ब्रह्मरूपा।
५२ माधवराम सुखसागर। जिनकी लीला जगत अनूपा ॥ पर उपकार जगतमें जोई । माधो समान कखो नहिं कोई ५२६ अश्वमेध आदिक शुभकरमा । वेदविहित पाले सुखधरमा॥ भाग- मान जगमें तनुधारी। माधोपद सेवे अधिकारी ५३० जगत मोह दुख जोइ भुलावै। कल्याणहेत माधोपद आवै ।। निज अधिकार देख प्रभुलेवै । भव दुखहरण अमीपद देवै ५३१ वेदअर्थ निज शिषन पढ़ाये । ऋषिमण्डल बहु जगत बढ़ाये ॥ वेदमर्याद धर्म सब जोई । प्रकटकीन जगमें सुख सोई ५३२ जामें लागि जीव सुखपावै । अन्तसमय माधोपद पावै ॥ जिनके शिष्य सखा बहु सोई । माधव वनरहै बिचरें कोई ५३३ धर्मविवेक विराग जनावै । जीवन को कल्याण बतावै ॥ सवलोकन विचरें निष्कामा। ज्ञान वपू लीने सुखधामा ५३४ रागदेष तजिकरै उपकारा । सदा शान्तसुखलिये अपारा ॥ माधो उपदेशैं ऋषिगण माहीं । नाम सुसन्तऋपी इक रहही ५३५ दिजतनु प्रेम विवेक सुधारे।गंगातट ऋषि वसे उदारे॥ तापस उदासीन जागिरहई । सुरसरि मंजै निर्भय रहई ५३६ इन्द्रिय दमनकरें मनमारे । जगत मोहते रहें नियारे । माधो गुरुपद वारिजमाँही । ध्यानकरै सुखभगत अथाही ५३७ गंगातट ऋषि यहिविधि रहई । काल बितावे तपतन कसई ॥ एक समय ऋषसन्त उदारे । गुरु दरशनहित करन विचारे ५३८ बहुदिन भयो न दरशन पायो । जिन केवल अज्ञान नशायो ॥ ज्यहिं द्वारा सुख ज्ञानको पावे । कृतघ्नहोवै बुद्धि सिखन भुलावे ५३६॥ क० ॥ यहभाँति ऋषिसृष्ट चितमें विचारकर सुन्दर संकल्प सू उरमाँहि धारिया । बड़ी अभिलाष गुर देखने की छाई उर अवध सूबेधाम कासू चलै सो पधारिया ।। मगमाँहि चितवत गुरु माँहि ध्यानलाये अनन्द जुगत आये पूरी के मझारिया। म- धुमास रामनौमी परखी अपारलगी तिसदिन ऋषि सरयूकीन अस्नानिया ५४० ॥ चौ०॥ प्रेम विधी भक्ती सुखदाई।तिस महि ऋषि मंजै मनलाई । जहँ तहँ सुरु अस्थानन गयऊ। दरश परश लै सुख उर भयऊ ५४१ गुरु आश्रम आये ऋषधाये। जेहि कारण सुरसरि तजि आये॥ नरायण राम मुनिवर राई । ऋषिगण सहित बसे सुखदाई ५४२ चहुँदिशि कानन सुभग सुहावे । स्वर्ग विपिन सम छवि बहुपावे ॥ अपिगण कर मण्डित बन सारा । कवि बस्ने पीछे विस्तारा ५४३ नरायण गुरू बपु माधवराम सुखसागरं। ५३ धारे । माधो भवन में बसै उदारे ॥ माधो नरायन यक सुखरूपा । भेद रहित जिमिनद कट रूपा ५४४॥ क० ॥ हेमके सिंहासनपै वैठे मुनिराज सुख मानों ब्रह्मलोक चतुरानन सुहावे हैं। सनकादिक समान ऋपिगण चहूंदिशि बैठे मानो चन्द्र माँहि परिवार छबिपावे हैं। वैराग सू विवेक ज्ञान जिमि तनुधारे बैठे तपोक्रांत भारी अघ तमको नशावे हैं । शांत सो उदार चित्त दयाहै अपार उर ब्रह्म विद्या ऋषिनको वैठे उपदेशे हैं ५४५ जीव ब्रह्म भेद टार अभेद सुख बोधकरै मुदरा कल्याण धारै बेतको नशावे है । शुद्ध शांत ऋषिगण तहां सुअपार बैठे श्रवण आदिक निध आसना कमाते है ॥ पान को मिलाये सब मनी अग्र माँहि सोमै शंका समाधान मुनि संशयको मिटावे है। कहै कवि हाथजोरि सुनो मुनिराज अब हमहूँ को पारकरो तुमहीं कू लाजहै ५४६ ॥ चौ०॥ मध्य सिंहासन मुनिवर छाजै। तपोकांत पिख पावक लाजै॥करम लाय निमरमन घेरे। कुश आसन शिप बैठ घनेरे ५४७ नारायन राम मुनीवर राई । निज गुरु भवन वसे सुखदाई ॥ज्ञानरूप मानों चतुरानन । संत खिती बहुकरै कल्यानन५४८ निष्काम शुद्ध शिष्य को करिके । संसार सिन्धु से राखै कसिकै ॥ कल्याण हेतु वै. दिक शुभ करमा । वीज संत महि बोवै धरमा ५४६ दया बहुत कर जल वरपावे। विचार विरख सिख भूम लगावै॥ पट सम्पति आदिक मुखदाई । शाखा तिनमें दिये लगाई ५५० भक्ती मैत्री करना दाया । पत्ते यही रचे सुख छाया ॥ बसंत ऋतु महा वाक्य सुनावै । श्रवणहिं मानों फूल लगावै ५५१ मोक्षरूप फल जो सुखदाई । शिष्य श्रवण में दिये लगाई । आरोक्त ज्ञान निसेनी रचिकै । सिक्खन हृदय सुराखै कसि- कै ५५२ समाधि रूप निदिध्यासन जोई । सने सने करवावै सोई ॥ मोक्षरूप फल अंत वतावे । सिक्खन को सुख सिन्धु लुटावे.५५३ सुख फल मोख असीचख भागे। अंत समय तनु छिलका त्यागे॥ माधोराम ब्रह्म सुखरूपा । तिनमें मिले त्यागि भव कूपा ५५४ जीव जल में जल आय खटाना । तिउ जोती संग जोति समाना॥ अनूप प्रमान गुरु नानकदेवा । वेद मंत्र भनेरखउनमेवा ५५५ याते मुनिनायक सु- खदाई । तिनके पद पंकज सिखपाई ॥ जन्म मरण नहिं जगमें आवे । चिदानन्द होवे कवि नहिंगावे ५५६॥
५४ माधवराम सुखसागर। दो० ॥ संतऋषी गुरदरशहित जो आये थे धाय । सो प्रसंग अब आयऊ संतसुनो सुखदाय५५७ ॥ स० ॥ संत ऋषी मतिमान महासुख माधोरामके सेवकं प्यारे । माधव सरोवरके तटआयकै मंजन कीनभली परकारे ॥ कलिमल नशावन तीर विषय ऋपिदरभसु आसनलीन सुडारे। सिद्धासनमारिकै बैठे भले चिदमाधौ इष्टको ध्यानसुधारे ५५८ नितनेम सो कीनभलीविधि सों गुरुदरशनको विधलीन उपाये । दरसेमाधो अरण्य विषयगुर पर्णकुटी शुभदीन दिखाये ॥ रीठसो जामूके वृक्षलगे तहाँ मौलशिरी पन- सा घनकाये । नानाप्रकार के फूलन की फुलवारी लगी चहुँओर सोहाये ५५६ शिशिपपरास अशोकलगे सुखआममहीरघनेत्रलाये । माधवराम कुटी सुखदायक पलउमाँहि दूरीछविपाये । मुनिनायकके सब शिष्यनकेत्रडारन में बहुचीर सुखाये। क्लकल ऐनसोबालसुके जेहिआश्रम पेखिसुदुःखपलाये ५६० संतऋषी बुधदूरन से गुरुआश्रमदेखि महाहरषाये । निमर भावधरे मनमें गुरुपर्णकुटी ढिगदौरि के आये। गुरु आश्रमपौरिसमीप भले ऋपिठाढ़भये युगपाणि मिलाये ॥ गुरुपरनकुटी के सो चारिउ ओर सथंडिलपै मुनीवाल सुहाये ५६१ मानोसनकादिक ब्रह्मपुरी महिरूपकोधारिकै बहुतरहाये । संतीऋषी एक विद्यारथीसो बोलाय के कान में वाक अलाये। शुम सुन्दरखालक जाह अभय गुरुकेढिग जो भवमें सुखदाये। जिनकेपद पंकज पाय बिना चिदमाधौ ब्रह्मते दूरिरहाये ५६२ मुनिराजनके पद पंकज में भले अगमनमोरात सुधजनाऊ । जस सुन्दर अज्ञामुनिराजनकी बुद्धिवालकपायकै मोटिगआयो। यह भाँति कह्यो ऋषजो तवहीं बालक बुद्धिमैं लीनसोधाखो । शब्द हीन मुताकसो खोल भलीविधि धाय गयो गुरकेढिगठाढ्यो ५६३ हाथसो जोरि नवाय शिरो मुनिराजनकी गतिबन्द सुनाये । भगवन धरम औतारमही अजनाथ चराचरतू सुखदाये ॥ कल्याण सरूप महामुनिजू तुमसंतऋषी तव चरणमें आये। राउरपदा- म्बुजदरशनके हित बाहरठाढ़े सो अञ्जलिकाये ५६४ नाथकी आज्ञाप्रतीखत है. ऋष गढ़भऐ चिरसेबहुआये । गुरु मायापतीशुधब्रह्मचिदा जिसमाधौ रामने जगत उ- पाये। जिसकी महिमा नित वेद पुरानसोगाये भले सश्लोक जनाये ५६५ सोई माधौ रूपभयो मुनजू तुमनाम सरूपहू फेरधराये। गुरु माधव नरायण पादशक्ती अर्थ माधवराम सुखसागर। ५५ एक समान दिखेसुखदाये। कविपूरब वेद कलायमते युगनामनके अर्थ एकजनाये। जो नाम सरूपमें भेदरखै वह मूरख में सरदार कहाये ५६६ जुगपाद अभेद सदा सुखदायक सन्तऋषी जिस सेवकआये । तुम्हरे पदके शुभ सेवकहें मतिमान शर- णागत चाहत पाये ॥ भवमण्डलमें बुद्धिमान वही. नर जो तुमरे पदमें मनलाये । अगमूलहनो तिसके उरमें चिद माधव सरूपमें देत मिलाये ५६७ जिनके तुम नाथ अचारजहो तुमरे पदको बुध क्यों विसराये। जगमाहिं सो मूरख वही फिरे तुमरे पद पाय त्वदीन भुलाये । जग सिन्धु गिरे सोवि अन्तसहै दुख तुमविन नाथ तिन कौन सहाये । सन्त ऋपीपद सेवकको अब नाथकृपा हम देहुली आये ५६८ ।। चौ०॥ यहिविधि गुरु प्रति वालक कहेऊ । सुन चित महँ मुनि हर्षित भयऊ । प्रेमगिरा अमृत शुभवानी। निज शिषके प्रतिकीन बखानी ५६६ बुध वालक तुमरी कल्याना । ऋपिवर लावो मम अस्थाना ।। धन्य आज दिन सुफल सुभयऊ । सन्त ऋषी मम आश्रम अयऊ ५७० धन्यदेश जहाँ सन्त सुहावे । जन्म मरण भय दुःख मिटावे ॥ भागमान शिष्यसू जगमाहीं । सन्तवसै जिनके घरमाही ५७१ जगमें कोन पदारथ होई । जो सन्त शरण नहिं पावै सोई॥ जेहि घर सन्त भगत नहि आवे । प्रेत मशान तिव जीव रहावे ५७२ राक्षस तुल्य न रहै वह देशा। जहँ सन्त निरादर पाय कलेशा ।। मुरख पशुवत जगमें रहई । सन्त निरादर पिषमै करई ५७३ सन्तसँग शास्त्र बुद्धिकर हीना । वेनहोय सन्तनमें लीना ॥ सन्त निरादर जहाँ सो पावै । धर्म विरोध राज गलिजावै ५७४ छपनकोटि यादौ नृपसागर । रावण कुम्भ- कर्ण सो उजागर ॥ जिनकी महिमा अगमन गावै । कुन्दभवन बसि बहु सुख पावै ५७५ तिन सन्तन दुखदै भरमाये । शाप अधीन नाश दुखपाये ॥ महान वेदवित जगमें जोई । सन्त निरादर करै न कोई ५७६ सन्तदरश. लखि होय निहाला । चार पदारथलिय ततकाला ॥ जो नहिं सन्तनके गुणजाने। दुख भव- निधि होय हैराने ५७७ माधोरामजु इष्ट हमारे । तिन सन्तनहित स्क्वै प्यारे । सन्तन के गुण लक्षण सेवा । यक माधोराम लखै सब भेवा ५७८ धर्मपालन की रीती जोई । तिन बिन जगमें लखा न कोई ॥ सन्त भगत गुरुरीति सदाई। यहि आश्रम होते चलि आई ५७६ गुरुकीरीति सदा सुखदाये । महापुरुष सब ५६ माधवराम सुखसागर। करत सुहाये ॥ यहिविधि मुनिनायक बुधजोई । धर्मविधी कहि बोले सोई ५८० ॥ क० ॥ जाहु बुध बालक सो सन्तऋषी पास बेग हाथको मिलाये प्रेम मोरेढिग लावोना । गुरुके निकेत जहाँ सुख सो अपारहोय आदरसहित तहाँ डेरा सो करा- उना ॥ चरणपखार भले माधवका प्रसाद अमी प्रेमसाथ हाथजोर ऋपीको खिला- वना । सन्त ऋषीआदि सन्त मेरिही सुरूप जानो माधव भक्त प्यारनको कहा जग पावना ५८१ माधव भगवन की सो रीति यहि आश्रम विषय सन्त ऋषि मु. निन से भेद नहीं लावना । जहांतक बने तहां सेवा मुअपार कर ईसर समान सब संवनको जानना ॥ गुरुकी सो बाकसिधि वेदकी समान जाने ब्रह्मरूप जान सुख दीहानको लगावना । अंचारजकी सिख जोईमानै सोउदास सिख ब्रह्मरूप पावै,भव- मंडल न आवना ५८२ ॥ स ॥नरायनराम महामुनिजू यहिभाँतिसू सिख सिखय सुनाये । गुरुभक्त महावुधबालकसुगुरुवाक्य हृदय धर धन्य मनाये ॥ हाथ से जोर नेवाय गिरी ऋषिके ढिग बहुतसेताबसे आये। माधव कुटी के सुचारिउ ओर सुर्थ- डिलपै मुनिशिष्य सुहाये ५८३ बुधबाल गायो सोसजातिन मैं सबकोपिन टेरकेलीन मिलाए । मुनिराजनके सब विद्यार्थी हंससंत ऋषीशको लीन उठाए। चलिए मह राज गुरु भवन विषय धन्य भागभई तव दरशन पाए । चहुँओर सों बालक आनंद से पनि बीचमें संत ऋषी कुम्हिलाए ५८४॥ चौ०॥ माधौ भवन सो सब मिलिआए। चहुँदिशि बालक सुभग सुहाए ॥ स्रो नित बसन कोपीन चढ़ाए। अखण्ड भस्म सब बाल रमाए ५८५ मानो श्याम घटा सो सोहावे । छटा समान बसन छबिपावे ॥सिद्ध जटा सो सुव्रण सम जोई। बालक शिरन कलापे सोई ५८६ ॥ क० ॥ रुद्र अवतार श्रीचन्द्र भगवान जोइ मानो बहुरूपधर मनको चुरावे हैं । माधौ भवन पतिके चौफेरे सव बाल आवे बीचमें सो संतऋषी महाकवि पावे हैं। नरायण राम मुनिराज गुरू निज आसन में हेमके सिंहासन पैमाधवरूप छाजैहैं। संतऋषि मतुवान दूरहीसे पाए दरश आपना सो जन्म धन्यकर लेखे हैं ५८७ यहिभाँति संत ऋषी वालकसो साथ लीने मुनिराज के समीप पहुँचे महा हरखावे हैं । हेमका सिंहा- सन सुचारिउओर घेर लीने बीच में नरायनराम महाकवि पाते हैं। ऐसे मुनिराजन माधवराम सुखसागर। को बलहारिजावे कवि सूरज में मानो सोममण्डल सोहावे हैं । माधौजीकी अस्तुती सो गावें सव वाल खड़े स्वरको मिलाए सोमराग मैं अलापै हैं ५८८ मानो देवऋषि गण शम्भुजी के आगे ठाढ़े विविधप्रकार तानतूर मनहरे हैं। संत ऋषी साथ मिलि वालकसमूह बुध गुरूकी सो पूजन विविध सब करे हैं ।। मुनिराजन के चरण पखार लीने संत ऋषी सजातिनको बाट निजमाथ पै चढ़ाए हैं। पान फूल अक्षत सुगन्ध को मिलाए विधि धूपदीप आरती बनाए सब पूजे हैं ५८९ ऋषि मतिमान सुखबिधि कर सवन मो कीन दंडेकी समान हरषाएके । गुरूभक्ती के अधीन महायुग पाणि जोर कर निमिर भाव चित में सुलीन सुख धारके ॥ यथायोग गुरुकी सो अस्तुती . वनाए लीने नरायनराम माधवरामका चित्तमें सुधारके । जिनकी सुलीला सववेदके मँझारमाहीं ऋषिमुनि समभने सुखदाएके ५६० ।। चौ० ॥ उठके हाथजोरि अनुरागे । गुरु अस्तुति ऋषि करन सो लागे ॥ हे गुरु तुमरे चरण मँझारा । मेरी नमस्कार बहुवारा ५६१ तुमप्रभु रतन ब्रह्म सुखसागर। नामरूप में व्याप उजागर ॥ मनके विषयसूत जिमिहोई । तिमि गुरु विभु न्यारे तुम सोई ५६२ नाम जगत ब्रह्माण्ड अपारा। ताके शिव तुम परम अधारा ॥ चार प्र- कार जीव बहु जेते । करम अपारकरें बहुतेते ५६३. तुम सहकारी तिनके नाथा । इच्छरहित तू सदा अनाथा ॥ जगत शुभाशुभ किरपाजोई । तिसके फलदाता गुरु सोई ५६४ इसरूप गुरुभव नित कारन । जगत जीव दुखकरो निवारन ॥ देशकाल उपाधि है जोई । तुम्हरे महँ कल्पित हैं सोई ५६५ निर्मल चिदघन यकरसरूपा। मनवाणी ते परे अनूपा ॥ माधव नरायण शब्द दुआरे । बुध सुख तुमको नित्य विचारे ५६६ ॥ क० ॥जगत चराचरके उरसो ब्रह्मांड माही साखी चिदरूप धार तुहीं वासकरैहै। निश्चल अखंड शुध व्यापी सुखदाई नित प्राणवाक इन्दिन को बोधिक कूटस्थहे ॥ विविध प्रकार देह इन्द्रिक विकार नाथ तुम्हरे सरूपका सो लेप नहीं करे है । जैसे रवि तोई ताराछटा वायूघन चांद नभ माहिं गवनकरे नम एकरसहै ५९७ ॥ दो० ॥ माधो नरायन शब्द जो वेद मंत्र सुखदाय ॥ ममउर आयन कीजिये अगहनो दुखदाय ५६८ माधवराम सुखसागर। ई० ॥ सदानन्दरूप नरायणं सो रामं । गुणातीत विभुवं आखिल विश्वनाथ ।। विना उपाधि व्यक्तं मनवाणी अगोचरं। चिदानंदं ब्रह्म अजानाशी गुरुवं ५६६ अमाया परेशं तू साखी अनाम । जगतमूल माया प्रकृति जेहि नामं । जडाभाव मिथ्यं तौ आसरे विभस्तं । तिसके तू प्रेरंसदा गुरु अकृतं ६०० प्रानं अपनिसह- कारी तु गुरुवं । गोये अभिनं तू भासे निलेपं ॥ अस्ती सोभाती प्रिया जगतरूपं । अलिख ब्रह्मवेतं तुमहि ध्यान धरतं ६०१ चितमायावसिष्टम् नाम माधो नरायणम् । शिव मायाप्रछिनम सदा मैं भजेहम् ॥ स्थूलं सो कारण सुकछ मत्स्यरूपं । इनको प्रकासी तुरीतो निर्लेप ६०२ भवाकार ग्रीहं अहं दुःखनाथं । करो मोहिं पारं गुरुवं भक्तवत्सलं । संसारं पयोधि जो होवे अनाथं । तिसके सुखदायी करो नित साथं ६०३ दयाशीलरूपं तू घरमा अवतारं । अनाथं के दुखन तू करता निवार । निरीहं अकृतं सदा शुद्धबोधं । चिताज्ञानं अपारंतू अचलापयो,६०४ उत्पतिपालं भवकृतासंहारं गुरूरूपधारी तू करता भवपारं॥नारायणं अच्युतं जीवनसुखधाम। हमारे तू इष्टम् सदा माधवरामं ६०५ माधव नरायणम् सुधानाम नित्यम् । अहंऊर तिष्ठेसदा मैभजेहम् ॥ संसारपयोधि सूगूढ अथाहं । गुरुषोतं अलम् तू देवेकर पारं ॥ नित जन संतन करौ प्रतिपालं । तुमविन नाथं को भवमें दयालं ६०६॥. ०॥ यहिविधि सन्तऋषी मतिमाना। गुरुकी अस्तुति कीन बखाना ॥ मुनि- नायक नारायणरामा । बहुत प्रसन्नभये सुखधामा ६०७ माधोबन ऋषिमण्डल जोई । तिनमें है सुखराशी सोई ॥ कुशआसन शुभ तुरत मँगाये । शिष्यन हाथ दिहिन बिछवाये ६०८ सन्त ऋषीले बालक जोई। दरभासन बैठे सब कोई ॥ भक्ती दीनदया उरधारे । गुरु सम्मुख शोभै करजोरे ६०६ मध्य सिंहासन मुनिवर छाजें । जिन्हें पेषि सब अघगण भाजै ॥ ऋषिगणकर सोहैं परिवारे । कैलासपती मानो तनधारे ६१० धरम मर्याद गुरूकी जोई। शिष्यनको दिखलावे सोई॥ जामें ज- गतजीव सुखपावे । जगत जन्म भयते छुटिजावे ६११ सन्तऋषी प्रीतमको पाई। बहुत प्रसन्नभये मुनिराई ॥ दुख भयहरण सुधासम बानी । क्षेमकुशल पूंछ मुनि ज्ञानी ६१२ सन्तऋषी गुरुरीति सो देखी । मनमें हरषित भयो विशेखी॥पाणि जोरि शुभ शीश झुकाई । निज गुरुसे बोले ऋषिराई ६१३ क्षेमकुशल आनंद . माधवराम सुखसागर। प्रभुजोई। देखि चरन प्रभुपायो सोई ॥ व्यापक सबघट अन्तरयामी । जीवनसम पूछौं तुम स्वामी ६१४ भगवन भूत भविष्य है जोई । वर्तमान जानौ सव सोई॥ जिस जगतन लै नहिं कुशलाई । जान बूझि मोहत मुनिराई ६१५ निजमायासे लेहु बताई । मैं पदसेवक तव शरणाई ॥जो तुम्हरे पद शरण मँझारा । सुखलौं उत्तरै भवनिधि पारा ६१६ दुख आपदा जीवनकर जोई। गुरु सुखदै बांधे भवसोई॥ माधोभवन सुखदायक देशू । धर्ममूरति तहाँ वसै हमेशू ६१७ ब्रह्मरूप चिदगुरु तप आले । जगत मोहते सदा निराले ॥ हमारि कुशल पूछौ सुखदाई । तुमबिन नाथ सो कौन सहाई ६१८ दयासिन्धु माधो चिदजोई । सो सुख वपुधाखो प्रभु सोई॥ कसना पूछौ भवजन हितकारे । तुम सुखदायक ईश हमारे ६१६ ॥ क० ॥ जीव सो चराचरके तुम सुख आयेन प्रभु माधोका सुयश गुरु तुम धर्मपालि- या।शील औ सन्तोष समदरशी क्षमा जगमें सदैवी सुखसम्पदा सो तुहीं उरधारिया॥ वेदरीति जगमें सु बहुत अस्थान देखे जहाँ वहाँ गुरु मैंने कान निज सुनिया। वेद की मर्याद धर्म करम प्रतिपाल जोइ माधोकी समान कहुं रीति नहीं जानिया ६२० अवर सो कलिका प्रभाव व्रत चारिउओर अशुद्ध करम जगमें सो करै सब ठानिया। कहुँकहुँ जगसे सों वेद अनुसार कृत सोमीसुन श्रद्धाहोके करै अभिमानिया ॥ देखा देखी करमकरै तातपर्यजानैनहीं सुरति से बिरोधचले मायाकी हंकारिया। वेदविहित सन्तसेव माधोपुरी माहिं व्रतै नातो और थान कलु लीनोहेत काइया ६२१ तुच्छ दुख मायापाय कलिमाहिं नर सब भये मतिमन्द सन्तसेव नहीं जाने हैं। अन्सके समय माहिं फिर कालके अधीनहोके मायाके प्रतापकर अधोगति जावें हैं । माधव नाम के प्रताप बिन कष्ट सो अपार पावे तनधारि जीवको सुकलेश नाहीं है । अज के प्रपंच में सो कुशल सो नाहीं नाथ तुमरे सो माया सब लोकन भरमावे है ६२२ ह- मारी कुशल तुम पूछौ दीनानाथ जोइ जानतही गुरु तद्यपि कहियो से सुनाय के। तुमरी.सो माया के भरमाये होय नाथ मेरे तुमरे चरण आयो सुखमें तकायकै ॥जन्म सृत पेखि प्रभु जगमें सो दुखी भयो हमरी सो लाज गुरु राखौ तू बनायकै । संसार दुखपार लिये तुमरी शरण आयो हमैं उपदेश करौ दुखी महा जानिकै ६२३ पंचभूत देह धारि जनमो अनेक बार घटी यंत्र जोय न भरमौ अंत नहीं पाइया । तीनलोक ६० माधवराम सुखसागर। आदि सब माया का प्रपंच दीखे सुखलेश नाही महादुखहै अपारिया। अंतके समय में सब तीनलोक नाश होय खाक होके गिरै ब्रह्मा सहित सृष्टि सारिया। आश ला- बने योग कोउ जगमें सोनाही नाथ अलम गुरुदेव नित सुख जो अपारिया ६२४ ॥ चौ०॥ यहि विधि संत ऋषी मतिमाना । निज गुरुपद महँ कीन वखाना ॥ न- रायण राम जगत गुरुज्ञानी । भवनिधि दुखनाशन सुखदानी ६२५ शुभजिज्ञासु ऋषी सुखदाई । सुनकरि प्रसन्न भये मुनिराई ।कह मुनि धन्य २ ऋषिवानी । जाकर पूछो दुख की हानी ६२६ तुम उपकार बड़ो यह ठाने । परहित प्रश्न सो करें सयाने। महापुरुष होवे भव जोई । पर उपकार करै बुध सोई. ६२७ ज्ञानवान तुम परम स- याना। जीवन हित पूछौ कल्याना॥ याते ऋषि तुम दया कि खानी। परहित प्रश्न करै कोउ ज्ञानी ६२८॥ क० ॥ सरिता बिटप गिरिधरणी अकाश संत पर उपकार करै दुख निज पायकै। तिनके समान ऋषि तुम मतिमान महा परहित जीवन को चाहो सुखदायकै ॥ वैराग सुखदाइ ऋषि तुमको सुनाओ जो संसार मोहजाल दुख जावें सो पलायकै । जन्म मृतु हरष शोक आपदाके बीच में बैराग एक सुखदाई और न उपायकै ६२६ ऐसे निखेद सुखदाइ जीव त्यागि देवे तिसके उपदेश विन नहीं मोखलायकै । इन्दैभोग दुखरूप सुखजान सेव नित मोक्षसुख नित सब दीन सो भुलायकै । जिस आत्मा को ज्ञानकर जगसिन्धु पार पावे तिसका उपाय नाहीं करै मन लायकै । संसार हेतु बिसह काह निशिदिन ध्यानकर होय न कल्याण बिनु दया माधौरामकै ६३० मोक्षमुख माहीं पुन जितनको साधनहै सबके सो बीचमें वैराग शुभ नायके । वैराग सो विवेक जिस अंतसमय आवे भले षटसम्पती समाज सव आवे सुखदायके ।। गुरुद्धारा मोक्षज्ञान सीघरसो आवै नर जिसउर साधन सो बसै सब आयके । चार साधना जुगुत जबतक नहीं होवै नरज्ञान मोक्ष नहीं पावे नित सुखदायके ६३१ ब्रह्मानन्दको जिज्ञासी कोई एक माधौवन आवे माधव पदपाए जग महासुख पावे है। नातो धन सुत भूमि लक्षिमी के भूखे आवै अनातमा पदारथ कुरंक स्वाल पावे है। निजगुरु आशरम सुखका अवध महा जैसे जीव वासना सो करै तैसे पावे है। नंगा भूखा रोगी फिर माधौपद पावै नाहीं गुरु अज्ञा छोड़ निज योगको नशावे - ६१ 'माधवराम सुखसागर। है ६३२ उपदेश गुरू देवनाही आत्माको पानाही अनआत्माको सेय के कंगाल सदा रहे है । मोक्ष सुखदानी अमी सुरसरि वारि जैसे तिसै त्याग अग जीवकूप जल पीवे है । तैसे मोक्ष सिन्धु मेरे गुरुका भवन सुधा यहां मोक्ष त्याग माया दुखमांगे है। ऐसे मूरखन समानसो दृष्टांत नाहीं जग कोई गुरुतत उपदेश तजि विष पीवेहे ६३३ रागदेष इरपाकर दुखी रहै जगमें सो गुरुज्ञान बिनु खरसूनवत फिरेउ है । संसार रोगभारी गुरूज्ञान विनु छूटे नाहीं इसवाक वेद नित डोगीदै बखाने हैं ॥ गुरू विन ज्ञान नाहीं गुरुबिन भ्यान नाहीं गुरुविन आत्मा संतोषन लहतहें। ऐसी ऐसी वाक बहुग्रंथ के मँझार माही तिसके सोज्ञान बिन भूल दुख पावे हैं ६३४ गुरूसो ग्रंथमाहिं देखो सो विचारकर गुरुपद गुरुसेव अधिक बखाने हैं। पाठकरतातपरज समुझे सु- धार नाहीं घर माहिं निधी दवी देखे बिन भागे हैं ॥ हर हर नाम पूजी सत गुरु हाथ कुंजी मनका सुतका गुरूबिन नहीं खुले हैं। यही निज कारनते वेदवानी पसभ गुरू की सो दयाबिन ज्ञान नहीं पावे है ६३५ यही भेद जानिके अचारजके सेवनमें ऋषि मुनि सबहुने प्रथम बखाने हैं । ऋषि मुनि बाक त्याग आत्माको ज्ञान चाहे तिसका उपावमानों बेतहीन कहें॥जैसे करमहीन सुरराजपद पावे नाहीं माया मिथ्याजाने जग नाहीं सतभासै हैं । तैसेनर जगमें सो गुरुभक्ती हीनहोके आत्माको ज्ञान सुख क- दे नहीं पावे हैं ६३६ सामराज महामोघ सुख कैसे पावै नर आतम बोध जिनका सो गुरू विन नाहीं हैं। माधौपद का जिज्ञासी ऋषि कलि में सो नाहीं अब मायाके सो भूखे जगमेरे पास आवे हैं॥ ब्रह्मविद्या को अधिकारी पुन तिनको न जानसके महान पुरुप जगमें सो तुसनी रहावे हैं ।। मोक्षज्ञान मारग सो तिनसे छिपाय लेवै प्रातविन भाखे नाही हवनको राखे हैं ६३७ संसारके पदारथके भूखे अधिकारी जान दयालाग गुरुदेवै बहेरमुख होवे हैं । ऐसे महामन्दन को कहा अधिकार ज्ञान मायाके गुलाम होके मंद कृतकरे हैं । बितके वेपार लिये देशनमें धावे सब तृष्णा अधीन निशि दिन कष्ट पावे हैं। मायाको अकरकरे मोक्षहू तूलावे नाहीं पुत्र परिवार खोटे मारगमें लावे हैं ६३८ दारामुत धनधाम मोक्षके प्रतिबंधी महाजगतमें दुख देके तिनहिं नित पाले हैं। देवद्विज गुरूमान शुभकरम त्यागि देवै पापको पहार निशिदिन सुकमावे है। विवेक सुखदायक सो तिनके नजीक नाही दारा एक जगमाहीं विनका सो इष्ट ११ - ६९ माधवराम सुखसागर है। अधोगती कुंड दुख वामसो अगाध महा तिस माहि अघजीव परे सुअपार, ६३६ विष्ठा जन्तुकी समान महामोहित गँवार अंध दुख सिन्धुतीया माहिं सुख नितमाने हैं। पुत्र परिवार उरग तिनको सो काटे नित दुसहि आदिष्ट ते महान दुखपावे है ।। पुण्यकर्म हीननर सुखनाही पावै जग गुरुदेव आगे सो अवाचं दुःखगावेहै। कन्दपा वसूचिका सूजीवनको घेरपाये तियाकुंड में सो पकर गिरावे है ६४० योषित अधीन होके हरवत नाचे नित राक्षस सरूप मांस मद दुखखावे है । तियाहाथपरै पिया देल के फिरै जग खानपान लिये तिनै रातदिन जोते है । धनधाम खानपान वसन कटक आदि नहीं पाये सारंग महान दुखदेवे है । लोक कुल लाज तजि वित्तहित पुरुषधाचे सभा शुभकृत कोटि निशंक फिरकरे है ६४१ आदिष्ट पुण्य उदयभये कोई एकलाभते दम्पती अनित्य सुखमाहिं सुखमाने है । नातोतिया पुरुपनको घुनकीस- मान खाये हीन सो वैराग नर महादुख पावे है । साँप औ बून्दरसमान घर त्यांग नाही जन्म जन्मांत्र सो तिया दुखदाई है। लोक परलोक शुभमूल से विगारदेवे नारीके ऐब जोई चितमें विचार है ६४२ कुशल सोवई नर जिन जग बाम त्यागे धारिक वैराग सुविवेक ईश भजे है । नातो तिया कागदकी पुतरी समान गजीमानो नेक गजमोह फंद दुख सहेहै ॥ जनमभै दुखकुंडा बामको सहारै शिर अंत माहि तनुः • त्यागे अधोगती देवे है । याते महामन्दनको लाजनाही आवे जग त्यागिकै बैराग दुख देनहारी सेवे है ६४३ नरक सुथैला बाम सिरेपै उठाये रहै अभरन आदि तामें लाये देव पूजे है। मानोमात्र संग या झूठ तिनको सुजानो सदा तियासेवे मूरखन को मेरी सो धिकार है। शूकर परिवार सम जगमें फैलावे कुल बेदके विरोधी होय आप नाशपावे है । जादो परिवार सब जादोको नाशकीने जरे वाँस बनसम महा दुखपाये है ६४४ ईश्वरको भगतहोय सूरकी समान कुल नातो सप्तधातू के सूमूतै प्रमान है। जैसे इकगैल माँहि सोमसूर जगपालै उडुगण सम परिवार किस काम है। ध्रुव प्रहलाद शुकदेवकी समान होय एक सुत जगमें सुजग सुखदाई है । ना- तौ कलिमाहीं माधोजीका प्यारा कोई एक खितभार देनेवाले मुखुत अपारहै ६४५ नालति उन पुरुपन को वृथा माता कुक्षिजने माधोनाम त्यागि जिननारी में लोभाये हैं। छल अरु कंपट की देवदार जगमें सो कामदास नरनारी भगत कमावे है।
६३ माधवराम सुखसागर। चिदानन्द रामचन्द्र नारीका अवाच्य दुख गुरू के समीप नानाभाँति से बखाने है। निन्दारूप नाहीं जग जीवनको ग्राहलगी जीते मुए मूरखनको नरक भोगावे है६४६।। चौ०॥ युवती नरकरूप है जोई। इनमें मोहकरे जो कोई ॥ ते मतिमन्द जगत में लागी। गैरवनरक में परें अभागी ६४७ परमानन्द सुखनपर त्यागे । सुत परिवार हितन अनुरागे ।। तिन पुरुषनको धिग धिग मोरा। मुनिगण यह सबदेत ढिंढोरा ६४८ सन्तगुरूसे करै दुरावै । श्रुती पुराणन दोष लगावै ॥ पतिवञ्चक स्त्री जगनाना। तिनमें मन्दकरें अभिमाना ६४६ नरकरूप स्त्रीको देखी । मूरख जाने हृदय वि: शेखी ॥ योषित अग्नीरूप समाना । अधम सुजरे पतंग समाना ६५० जीते देवे भय दुख जनका । अन्तसमय लैडारै नरका ॥ ताते तजै बामको संगा । स्वपने में दुखदेत अभंगा ६५.१ जिन मूरखन स्त्री शरमारा । ते कैसे उतरें भवपारा ॥ नरक अज्ञानमें जरै सो मन्दा। तिन पुरुपनको धिगहै निन्दा ६५२ नारि बुरी वेश्या अरु परकी। तीजी नरक निशानी घरकी ॥ ताते हे ऋषि बाम कू त्यागे । कालसमान पेखि दुरभागे ६५३ तबहीं होय हिये कुशलाता । नाती जन्म जन्म दुखदाता ॥ रावण कुम्भकरण ते भारी । तिनको स्त्री कीन्ह खुआरी ६५४ दुर्योधन पाण्डवसुर दानो। तिन संग्राम परस्पर ठानो॥ द्वादश योजन छत्र सो छुट्यो । देही जिनकी गृड्रन लूट्यो ६५५ सो सब जानो वाम प्रभाऊ । श्रुतिपुराण औ ऋषि सबगाऊ ।। कपट कूट छल दुख तियखानी । महाकठोर जानत जे ज्ञानी ६५६ ।। क० ॥ देव दैत्य सिन्धुतट सारंग अधीनभय सुधाको दिखाय जिन युद्धको करायो है । दशस्थ शिशुपाल सुन्दशुभसुन्द हने सुरपति शापभयो भगमें लोभाये हैं। परसपित जनमेजय तियाधीन भय तीन षट दिजमार शाप दुखपायो है। दाराप्रभाव जोई जान तज जगमाहिं कालरूप देख बुध माधोपद भागे हे ६५७ नातो विया मोहफंद जगसिन्धु माहिं पर घटीयन्त्र जोइनभरमैं अन्तनहीं पाये है। अजकीट आदि लग तनुधारे सुखनाही आत्माके ज्ञान बिन सून पबितावे है ।। नरायनराम मुनिराज जगके पदारथमें आत्माके ज्ञानलिये दशन दिखाये है। जगमें कनिष्ठ खानपान तिया माहिं फिर तिनहि वृकमारिकै वैराग सो जनावे है ६५८ ॥ स. ॥ सर्वससुख बैराग विषय नित ज्ञानबिना नर मोक्ष न पावै । भवमण्डल माहिं असूतर फिरै यहि तेजत ६४ माधवराम सुखसागर। पियाविना नहिं आवै ॥ प्रभुता धन धाम असव जंगनते सुरराजलिये जोइ भक्त कमावै। बुधिमान अहै नर जो जगमें सब त्याग बैरागलै मोक्ष कमावै ६५६ सन्तऋषी मतिमान भले गुरु बाक हृदय धरके हरषाये । संसार सो दुःख अपार महा तिसकी पुनि ओरसे चित्त हटाये। निर्वेद भयो ऋषिके उरमें गुरुकेटिग प्रसन्न कौन अलाये ॥ आतम ज्ञान में कारण जो गुरु आप कृपाकर देहु सुनाये ६६० भगवन ब्रह्मसरूप कृपानिधि तुम सर्वज्ञ महेश समाना। मैं मतिहीन अजान महा जन्मादिक संशयमे दुखमाना ॥ आप दयाकरिहौ जवहीं गुरु तवहीं हम पावव परम कल्याना । निज आतम वोध सो चाहतहाँ जन्मादिक दुःख हरौ अब नाना ६६१ ॥ चौ०॥ यहि विधि ऋषिके शुभ सुनि वानी । हर्ष सहित वोले मुनि ज्ञानी॥ आतम ज्ञान में कारण जोई। हे ऋषि तुमहिं बतैहाँ सोई ६६२ जगत जाल माया प्रभु- ताई। महा अपार अलंघ दुखदाई।कोटि ब्रह्माण्ड पंख जिमि जैसे।मायाजालमें फसा है तैसे ६६३ चेतन आतम अमल अनूपा । भूलि पखो माया भवकूपा॥ क्षार सिन्धु मायामें भस्मै । निजपद भूलगयो मरजन्म ६६४ करम अधीन लोक समजावे। देह धरै दुख अन्त न आवै ॥ सुख दुख आतम चिदके माहीं । भेद ज्ञान बिन पावै नाही ६६५ सुख दुख जन्म मरण सब करमा। मिथ्या देह इन्द्रिके धरमा । ज्ञान विना नर आतम माहीं। धरम परायो अरोपै ताही ६६६ सीप रजत गुनमें अहिजैसे। जनम मरण आतम में तैसे ॥ तदपि निवृत्ति आप नहिं पावै । गुरु विन अधिक जन्म फसि जावै ६६७ जिस अज्ञानते कल्पै जोई। ताके ज्ञान से बांधै सोई ॥ निज अज्ञानते जगत देखावै । आतम ज्ञानते भय छुटकावै ६६८ जिमि प्रभु बिन तम नहिं जाई । कोटि उपाय करै चतुराई । तिमि अघतम आतमको अवरे। आतम ज्ञान दहै दुख सगरे ६६६ गुरु देशकाल शुभ शास्त्र जोई । ईश दया वहु पुण्य जोहोई॥ यह संयोग जीव जव पावें । ज्ञान पाय भव दुःख मिटावे ६७० निज अनुभव आंतम सुखपाई । अवाध नित्यम आनन्द सो रहई ।अब ज्ञान विधी में कहौं वखानी।ऋषि मुनि सकल कहत जो ज्ञानी ६७१ जासों आतम सुख निज पायो। जन्म मरण भय- ले छुटकायो॥ जग मिथ्या कल्पत है जोई। फिर तुमको नहिं ब्यापै कोई ६७२ ॥ कः ॥ मायाकृत जगत अडम्बर अपार सिन्धु तिसमें वैरागकरै रागको मिटायकै । .
माधवराम सुखसागर। ६५ गुरुकी शरण आवे आत्माको ज्ञान लेवै गुरुपद माहिँ टिकै चित्तको लगायक ।। ब्रह्म श्रोती ब्रह्ममिष्टी वाणी जाकी वेदसम कीजै ताकी सेव दुखमानको हटायकै । ईश्वर की सेवाते अधिक गुरु सेवकरे दृष्टी सो अदिष्ट फल देह सुखदायकै ६७३ अ. चारजको देख सिख डंडे के समान धरि ढिग पद बन्दना सो करै मनलायकै । चरण सरोज ऋण तिसको उठाय कर उत्तम सो अंग माथे लावै हरपायकै ॥ तन मन धन वाणी गुरूको चढ़ाय देवै उत्तम यज्ञ आशा राखै चित्त में बढ़ायकैः । गुरू सेवा यहि माँति करै सो वनाय सिख आत्माका भेद तब पावै सुखदायकै ६७४ गुरू की सो आज्ञामाहिं निशिदिन वासकरै निजतन लाय सेवाकरे बिस्तारिया । ब्रह्मकी समान जानै मनमें सो प्रेमराखै गुरुकी प्रसन्नता को राखै अभिलाषिया॥ दोषदृष्टी मनमें सो कदाचित नाही राखे शिव हरी अज गंग रबि सम जानिया । एकान्तदेश बैठ ईश गुरूका ध्यानकरै ऋपि सिख जगमाहिं पावै कल्यांनिया ६७५ दारासुत भूमि पशू दासदासी व्यगृह दुखजानि त्यागदेवै मनको हटायके । नातो गृह करनेवाले गुरु को चढ़ाय देव उद्दालक जागवलकी समान गुरु जानिके ॥ त्यागी गुरुदेव धन धाम दुखनाहीं लिये तन वित जग नाशवन्त निज जानिके। महिमा अचारजकी शिष्य सो अपारकरै शुद्ध मन अस्तुति सो करै सुखदायके ६७६ जगमें कल्याण सिख आफ्ना जो चाहै सुख तन मन धन बच अस्पै यह भांतिसे। गुरु ढिग कष्टपरै त्याग नाहीं वासकरै तन लिये भिक्षाकरै शुभ सुखदायसे ॥ सोभी भिक्षालाये सुख गुरु निज आगे धेरै आपने सुखाने लिये माँग ना उतालसे । तिसकी परीक्षा लिये गुरु जवनाहीं दिये दूजीवार नगर में जावै ना विचारसे ६७७ भिक्षा शुद्ध अंगन जब गुरु निज हाथ दिये सिखदौर पान लिये खाये उत्साहसे । यहिभाँति बुद्धिवान गुरु सेवै निशिदिन गुरूमें गिलानी नहीं कर रहै त्यागसे ॥ आपने सो उपर जब गुरुको प्रसन्न देखै पानि जोरि ठाढ़ होय-सिख निजभक्तसे । अस्तुती अचारजकी करै सो अपार सुख भव के निवृत्ती फिर पूछ निरभावसे ६७८ मोक्ष कामना सो बाल निज अधिकारी जान भलीभाँति गुरू सिखलेवे सो निहारिया। मोक्षमाहिं साधन जो उ- कुत ज्ञान वेदन में सोइ उपदेशै शंकाकरै दुख हानिया ॥ परमानन्दले स्वरूप माहिं सिख कू मिलाय देवे जीव ब्रह्म भेद टारदेवे सुखदानिया। करम औउपासनाका शिष्य माधवराम सुखसागर। अधिकारी जान ब्रह्मविद्या तिसकाहि देवे नाही दानिया ६७६ वे विचार मन्दकाहि आत्माका बोधकरै बुद्धी सुमलीन माहिं ज्ञान ना प्रकाशिया। नभ प्रतिविम्ब जैसे पंक सहितवारि माहिं चंचल मलीन माहि कदे नाहीं भासिया॥ तिमिमन्द सिख उर ज्ञान मानहोय नाहीं करमन को त्यागदिये बुद्धी भ्रष्टपाइया। याते शान्त शुद्ध बुद्ध जबतक नाहीं होय करम उपासना करावे गुरु ठानिया ६८० शुद्धवुद्ध सिखहोय गुरू जब जान लेवे फिर उपदेशै ज्ञान फल सहित होइहै । गैनका अभास जिमि शान्त शुद्धवार परे सिघरसो ज्ञान तिमि सिख उर होइहै ॥ अज्ञान अंधकार दुःख उर माहिं छीनहोय वेद उक्त गुरू जव करे उपदेश है । बोधै गुरूसिख तुम व्यापी चिदरूप नित दुखलेश रहित ब्रह्म अज अविनाशी है ६८१ जन्ममृत्यु आदिबन्ध मोक्ष ते नियारे बोध मन इन्द्रीवाकनको सदा तू प्रकाशी है । मल औ विशेष जग बन्धक विकार जोई तुमरे सरूप माहिं लेश कहूँ नाहीं है ॥ नित्त शुद्ध ज्ञानरूप विभू सबलोक माहिं नामरूप रहित षट भावन विकारहै । वन्ध दुख तामहि होय मोक्षता की सम्भवे है बन्धमोक्ष तुम्हें नाहीं सदा तू अद्वैतहै ६८२ जन्ममृत्यु आदि जो संसारका विकार जोइ तिसकी निवृत्ती ऋषि उरमें तू चही है । नित्त परमानन्द जो अबाध सुख वेदकहै तिसकी प्राप्ती की इच्छा उरआई है। ऐसी शुभ बासनाको मूल सुअविद्या जानो सुखचहै दुख बाध भ्रान्त कर हुई है। जिसके सो लिये ऋषि करत उपाव विधि सोई नित प्रमानन्द तुमरा सरूप, ६८३ याते नित्त अपना सरूप जो प्राप्ती है तिसकी प्राप्तीकी विधि नहीं बने है। आगे जो अप्राप्ती वस्तू ताहीको विधान बने नितवस्तू प्राप्तकी बने न उपावहै । अपना सरूप चिद नितही प्राप्त है तिसकी प्राप्ती लिये प्रांति विना नाही हैं । जनम आदिलैके जो संसार सू अपारदीखै कहाँ सतहोय तो निवृत्ती ताकी बने है ६८४ स० सो संसार जन्मादिक जो दुख तेरे विषय ऋषि लेशन कोई । अनहोय जो दुःखनकी सुनिवृत्ती की इच्छा सूत्रान्तबिना नहि होई ॥ यावे जन्मादिक मासरहित ऋषितू शुद्ध ब्रह्म चिदानन्द सोई । याते जन्मा- दिक दुःख जोई चिद आप विष नहिं मानत कोई ६८५ ॥ दो० ऐसे जव तुम जानिहीं पैहौ अनँद अपार । जन्मादिक जो उरधरे गिरेदुःख संसार ६८६ ।
६७ माधवराम सुखसागर। स० ॥ संत ऋषी अतिमान महा गुरुकी यह वाक हृदय सुखधारे । हाथ सुजोरि नवाय शिरो गुरुकी शुभ अस्तुति कीन अपारे । मुख मोख महि साधन ज्ञानगुरू ऋपिजान भलीविधि लीन विचारे । निज आतमरूप जो आनंद है तिसमें ऋपि शङ्का सो कीन उदारे ६८७ भगवन आप कह्यो सुख आतम मैं भल जानलियो उर माँही । तदपि शङ्का मुआवत है तुमरे पदमें अब कहत सुताही ॥ जो चिदानन्द आत्मा होय गुरू विख्यात सम्बन्ध सुख भासन न चाही। संसार विषय सनबन्धन ते यहते मुख आतमहै तनमाही ६८८ भव भोगनके नित आनंद को प्रत्यक्ष गुरुजीव मानतसोई । यहिते भव भोगन माहिं भले वैराग न धारतहै नर कोई ॥ संसार सुभो- ग सखोपत में सम्बन्ध सु आतमका नहिं होई । सुखसून सुखोपति आतम है जड़ रूप समान सो भासत सोई ६८६ ।। चौ० ॥ यहविधि ऋपि की संसृति वानी। नरायनराम सुने सुनि ज्ञानी ॥ चितमें बहुत प्रसन्नता लाये । भवभय नाशक वचन अलाये ६६० कहमुनि सुन ऋषिमेरी पानी । जाते होय सकल दुखहानी ॥ अज्ञबत आतमहै जोई। तिसते जीव दुखमाने सोई ६९१ बहुत उपाव विषय मनलावै । विनाज्ञान अनर्थ नहिं जावै ॥ निष्काम करम उपासन जोई । मैल विशेष नशावै सोई ६९२ सकामकरै वन्धनको पावै । ति- ग्योनि जगमें भरमावे ।। यावे होय ममोख जोई । निष्काम करम उाने बल सोई ६९३ फिर ज्ञानहोय उर अंग नशावे । जिमि दिनेश तम मार भगावे ॥ सम्बन्ध विषय आतम सुखदाई । अब तुमसे भापों ऋपिराई ६६४ ॥ क० ॥ ब्रह्मविद्या भवनकर तिसके अभ्यास विन आत्माके नन्द काहि पुरुष नहिं जाने है। जन्मजन्मान्त्र र विपैमा अभ्यासकर विषैकार वृत्ती सुख दुख नितरहे है ।। रजो तमोकी बहुलतासे सतोगुन दवारहै ब्रह्माकारवृत्ती ज्ञान सुख ढपिजावे है । आ- तम सुख विषयमाहिं आप नाश नाहीं माने अज्ञानकी अधिकताते विषय माहिं माने है ६६५ आत्मा विमुख बुद्धी जेहि कालमाहिं होय भोगनकी इच्छा चित उठे उर आनिये । इच्छाका संयोगपाय चंचल सुहोय वृत्ती आत्माका मुखभास होवै तामें हानिये । जब अभिजापत पदास्थको पाये जीव अंत्रमुख वृत्ती होय चंचलको ना. शिये। क्षणमात्र विस्ती पुनि अन्तर माहिं टिकजावे चिदका अभास तामें परै सुख १२ त .
. ६८ माधवराम सुखसागर। जानिये ६९६ तिस आत्मा सरूपके अनन्द प्रतिबिम्ब काहि अनुभवकर पुरुषन को प्रान्ती नितहोवे है। मेरीकाहि विषयका सुलाभभया जगमाहिँ तिसका सुमुख मैंने आज भले पायो है ॥ ऐसी ऐसी भ्रांती नित्य होयसू अविद्याकृत आतम सूख ज्ञानविन विष सुखमाने है । जिसपर गुरु ईशदया होय जगमाहिं आतममुख चिद नित वही नरजाने है ६९७ समाधी सुसुखोपती मैं ब्रह्मानन्द सुख जोई तहाँ ऋषि योगीका सुहोन वही चाई है । विषय सुखमान उत्तम विषयका अभाव तहां योगी सुअपार सुख तहाँ नितलेवे है।जामत अवस्था माहिं उठकर कहै नर आज मुखसोय मैंने कछु नहीं जान्यो है । सुखपूरस अनुभवकर आत्माका रूप जानो नहीं जाने कछू सुअविद्या तहाँ रहेहै ६६८ समान सुख चेतन अविद्याका विरोधी नाही त्रिधा सो अवस्था में अविद्या सिद्धकरे है । ब्रह्माकारवृत्ती जब उस्माहिं थिरपाव तिसमें अरूढ़होके अघको नशावे है ॥ जैसे बनीदारमें समान विसू चारिउओर मथनते अ- धिकहो अन्धकार नाशे है । तिमि योगीसू अभ्यासकर ब्रह्माकार वृत्तीकर अघतम नाश सुख आत्माको जाने है ६६६ सुखमस्थूल त्रिधालोकके मझार माहिं सबके अवात्र सुख आत्माका व्यापी है । यही निज कारनते आत्माका सुखलैके विषय भोग जगमें सो नन्द नित भास है ॥ विषय माहिं सुख कीपों आत्माका सुख मेरे गुरुते विवेकविना नर नहीं पाये है । यक विषयभोगै नित दूसरेकी इच्छाहोय चल वृत्तीमाहिं सुख भास न रहावै है ७०० विषय माहिं सुखहोवे एके विषय माहिं टिक विपय माहिं सुख नाहीं याते नित भरमै है । जिमि एण नाभि में कस्तूरि गन्ध वास करै मृग निज रूप जानै विन और न भरमै है ।। तिमि आतम सुख ज्ञान विन अग जग वन माहि माया कृत भ्रांति वस विषय माहिं धावै है। लोगनको सेवै नित होत सो अनित जाये निशिदिन उद्यम सो करत विहावे है ७०१॥ चौ०॥ मुरखन सुख माया में मान । ज्ञानवंत सब मिथ्या जाने ॥ सीपरूप गुण में जिमि भोगी। तिमि सम माया जानत योगी ७०२ सतचित आनंद आतम जोई । तिस्में माया कल्पित सोई॥ याते जगत रूप सब माया । आतम ते नहिं भिन्न जीउ छाया ७०३ जिस अद्धिष्टांट में कल्पित जोई। अदिष्टां रूप वह होवै सोई ॥ नाम रूप जग मायन दानौ । आतम में कल्पित ऋषि जानौ ७०४ याते माधवराम सुखसागर। ६६ ब्रह्मविदा जो देखें । अहं रूप सो सब जग लेखे ॥ जैसे जल में उठे तरंगा। जले रूप फिर होवें भंगा ७०५ तैसे जग आतम मैं जावै । विश्व अंतलै आत्म रहावै ।। आदि अंत जो वस्तू नाहीं।.संतन मध्य लखै मनमाही ७०६ जीउ मरन में अंत घटनाहीं। नामरूप कल्पित मनमाहीं ॥ घट नाम रूप मिथ्या बुधमाने । आदि अंत माटी मधुजाने ७०७ तैसे नाम रूप जग जोई । तीनकाल नहिं भया सो कोई ।। तद्यपि मनमें मधु जग भासै । मनुषै भये जगत सवनासै ७०८ ज्ञान वैराग ते ऋषि मन वाधो । जिसमें भवनिधि तरै अगाधो ॥ नामरूप संसार असारा । सखौपति माहिं न रहै पसारा ७०६ मन लै होय अविद्या माहीं। याते दुख जग मासै नाहीं॥ मन जगतीन अवस्था जोई । अविद्या रूप पछानो सोई ७१० अविद्या जड़ दुख मिथ्या जानो। आतममें कल्पित कर मानो। याते अविद्या कल्पित जोई। आतम को नहिं व्यापै सोई ७११ जैसे मास्थल जल होवै । भूमि गील कबहूं नहिं खोवै ।। तिमि अदिष्टांततक कल्पित जोई। बांध विगाड़ सकै नहिं सोई ७१२ याते तीन अ- वस्था माँही । एकरस आतम रहे सोताही॥ नाम रूप संसार अडम्बर। तीन अवस्था के है अन्दर ७१३ तीनों आपसमें व्यभिचारी। ज्ञानवंत सव ढूंढ विचारी ॥ याते तीन अवस्था भानै । आतमनन्द को न्यारे जाने ७१४ विषय सम्बंध न आतम होते उल्टा विषय में सुख निज देवै ॥ जिमिहरी अबध निज वपु देवै । बारभूमि सबरस गँध देवे ७१५ तिमि विपय संयोग आतमको पाई । सुख रूप भोग भासै गुरु भाई ॥ याते विषय सुख बुध देखें । अपने आनंद तिसमें लेखै ७१६ ।। क० ॥ ब्रह्मवेत ब्रह्मरूप देखत जगत जोई आपने स्वरूप ध्यानकरै मनलायके । मन बुधि इन्द्री आदि सवको प्रकाश कर साखी शुध सुख ब्रह्म आपने को मानके ॥ मृग वार हूंठ चोर खेह जिमिनील भासै तिमि मिथ्याजग भासै मेरे में सोआनिके । सत- चित आनंद अचल अविनाशी अज हमरे स्वरूप सब भजे मनलायके ७१७ ब्रह्मवेता पुरुपनको ऐसी निश्चय होवे ऋषिनामरूपमाहिव्यापी अहं नितमाने है ।देहजगधार सुखजीवन मुकुतिलेवै अक्षय सो विदेह मोक्ष अन्तसुख पावे है॥ मन बुधि बानी आदि तिनको न जानिसकै ज्ञानके प्रभावकर ब्रह्ममें समावे है । ज्ञानकी समान ऋषि कोइ नाहीं साधनहे जिसके प्रभाव माधौरामका सुपावे है ७१८ मोक्षरूप आत्म ॥ माधवराम सुखसागर। माधौ सदासो अकृत अहै वेदकृत आत्मा में नित सुनखेदे है। देशकाल नामरूप आत्मामें मय नहीं कहूं आप तेजवायु तामें पृथ्वी न अकाश है । राति नहीं दिन नहीं चन्द्र सूस्तारा नहीं खानी बानी तिसमें न आवन ना जावहै । खंडसू पतालनाहीं सागर सो नदी नाही अधोगति नाकसुख दुख तामें नाहीं है ७१९ अजशिव हरी नाहीं नारिसो पुरुष नाहीं जातसो जनम मिथ्या यती सती नाहीं है। साधक सिद्ध योगी जंगम वेष आश्रम कोऊ नाहीं जपतप संयम पूजा व्रत नहीं करें है । वेदवानी पढ़े नाहीं किसीको सुनावै नहीं आपने सरूप व्यापी आप चिदानन्द है । तुलसी माला पहिरे नाहीगोपीकानवाल नाही तंत्रमंत्र तिसमें न कुवंशी कुबजावैहै ७२० करम धरम माया नहीं ममता कलेश दुख काल जालरहित आपकिसे ना ध्यावे हैं। नादविन्द जीव नाही जिन्दोज्ञान ध्यान नाहीं देव देवल गात्री न जाप नाहीं करै हैं ॥ होम जगकरे नाही तीरथमें जावे नाही भावभक्ती शिवशक्ती चिह्न नाहीं धारे हैं । वेद सो कतेच नाहीं श्रुति सो पुराण नाही बोधरूप खटनको इच्छा नहीं करे हैं ७२१ कथै सुनहिं आपपुन आपसो अगोचरहै अलख अपार चिद सबको लखावै है। उदय अस्त रहित तीनों देवोंका उपावे फिर मायामोह जालरव जीवन फँसावे है। पंचभूत खंडदीप तीनलोक सागरसो दशचार भुवन सो मायामें बनावै है । अ- स्थूल सूक्ष्म चारखानी नामरूप गोपदृष्टि तीनलोक नामरूप न्यारे न्यारे थापैहै ७२२ अचल अखण्ड सो अच्युत अबिनाशी विभू भूतनकर आप उत्पति रहित है । कुलाल जिमि घटकरै घटनते न्यारेरहै उत्पति नाश घट साथ नाही पावे है ॥ तैसे चिद यज्ञ करै न्यारे तामें विभूहोय उत्पति नाहीं जिमि घट नभ व्यापी है । साखी शुद्धरूप होके सबको प्रकाशकरै आपने स्वरूप माहिं स्वयं प्रकाश नितहे ७२३ ऐसे निज आपने सो आत्माको जानो ऋषि तुही शुद्ध नित ब्रह्मजगत प्रकाशी है। तीनलोक सहित नामरूप जो बैराट दीखे तुमरे सो आत्माहै नानारूप धारे है ॥ जैसे एक मृत्तिका के नानारूप घट होवें तैसे नामरूप जग तुमरे तरंग है । जीवसाखी नाम धार सूक्षम स्वरूप होके सूत मन गणकी समान तुही व्यापी है ७२४ दैतबस्तु कोई नाहीं आदि अंत जाने नाहीं वेदवानी तुमरी हेतु महि को जनावै है । जाल मकरीसमान तीनलोक का बटोरतही आपने स्वरूपमा अभेद तुही करैहै ॥ बीज ७१ माधवराम सुखसागर। बृक्ष की समान जग तुमरे मा बनारहै काल पाय तुही सो वैराट फिर धारे है । पर- मारथ स्वरूप त्रिकाल सो अबाध व्यापी व्योमकी समान चारिउ ओर निरलेप है ७२५ अदयत सुखचेतन अखंड ज्ञानरूप नित त्रिपुटी से रहित ऋषि सदा तू अडोल है । ताते ऋपिदेवत त्याग सदा तू अद्वैत मानो यही ज्ञान मोक्ष माहिं कारण सुखदाई है ॥ अज्ञान दुख चिह्न तुम यही जानो उरमाहिं देवतकर आप ने में कृत जोई माने है । सोई ज्ञानी सुघर स्वरूप जग पूज योग अहंब्रह्म मानिके कर्तव्यता जो त्यागि है ७२६ अहंब्रह्म जबतक आपनेको नाहीं माने तबतक दीन सो दुखित पछितावे हैं। भेद सो प्रतीति याते महादुखदाई जानो कठोलीमाहिं धर्म- राज सो बखाने हैं। साते भेद वाद दुख जान चित त्यागै ऋषि योग अनुराग सो अदयत बाद सुख हैं। दुतियाको मतधारे भये ताको वेद कहै गेधे आपने ते जुदा जोई माने हैं ७२७ देवनके पशु बने करमन में लागेरहें सुखलेश नाही तिन्हें नित द्वखपावे है । कृतका जनावनवाली देतवानी दुखदानी ब्रह्मविद्या सुनी होय तिसको नशावे है ।। द्वयतवाक जबतक हिये माहिं बासकरै होय न साहात सुअवयत दुख पावे है । इयतवाणी जेहि घरी चितमें सो आदि होवै प्रत्यक्ष ज्ञान सहित पुरवस मस्तीको न नशावे है ७२८ ॥ स० ॥ यहिभाँति सो दयत सो बाक सुनै ऋषि को- मल ज्ञानको देत नशावै । परपक सो ज्ञान बिना उरमें करम सिद्ध विषय फिरके लगि जावै ॥ विघुनापरे वह करमन में सुसकाम सुजाल विषय फॅसिजावे । अ- धिक पंच क्लेश उठे चितमें फिर चंचलढे दुख शांत न पावै ७२६ शुद्ध बुद्धी सु. नाहि रहै उर में सुबैराग विवेक उभय न रहावै । नरहोय परबरती शुभाशुभ में पुन होय धर्माधर्म उरठहरावै ॥ जग सिन्धुअपार सुमाहिं गिरे पंचभूत का देहनको फिर पावै । अज्ञान अधीन चौरासीफिरे दुख योनिन में नहिं अन्तसुपावै७३० कल्पप्रयन्त जठरागिनमें दुख करम अधीन स्वतंत्रनआवे । ज्ञान बिना नरमोक्ष न पावत बहु- रोकल्पान्त प्रकृतिसमावे ॥ अनेक युगान्त माया विपय वृक्ष बीजसमानसू तहांस्- हावे । उदय संचितपुण्य जूहोय कवै सतसंगी कूले कहजन्मकूपावे .७३१ गुरुज्ञान वैरागको पायभले सुखभोक्ष गेती कहुँ जायके पाये । कुल उत्तम जाति सतसंग वि. षय तनपुण्य अपार होय नरपाये ॥ नहिंकरम अधीन सुनीचनके घर माया पंचभूत- ।
७२ माधवराम सुखसागर। कदेह उपाये । अंधकार अविद्या सुघेरलिये सुविवेक शुभाशुभको नहिं पाये ७३२ कुलनीच सम्बंधीनके संगमें नितनीच अपारसुकरम कमाये । राछ तूंलसूवृती रहे यज्ञ भक्ष अभक्षकरै दुखदाये॥भखभोजनके अनुसारनते बुद्धी भरिष्ट महासुकठोर रहाये। वासना मलीन अपारउठै मन आसुरी सम्पति चितमें छाये ७३३॥ क० ॥ वासना जमीनमें अशुभ करमनार चले मोहजलरूपी दुखतामें सुअपारहै। पटवार इन्द्री मीन जल में सुवासकरै चिन्तारूपी तटलौ लोभ वगुला लोभाई है। निन्दा हिरस चुगली सू माड़ी सुसघन वन राग द्वेष पाटभारी सदा सुअलंघहै । कामरूपी चोखसै वासना सुवायूचले इच्छारूपी कांटा दुख सदासू वखरे है ७३४ हिंसारूपी विच्छ जामें क्रोध सो पिशाच बसै आशा सिन्धु दुखदाई जगको चवावे है। हंकार दुखदाई सांपवसत सोझाड़ी माहि तृष्णा सूडाइन नित भक्षनेको धावैहै। सुरहारी पास्मरस मासअहारी विषयी सुराक्षस सरूप नार बनमें बसतहै । छल अरु कपट सूचूहा जहाँ बासकरै ज्ञानसू वैराग सू विवेक वेलकाटे है ७३५ चोरीयारी झूठ जहाँ किसनित वासकरे विपता महीरनपै वास नितकर है । हँसी मसखरी तहाँ वायस नीच रोलाकरे द्रोह सो कठोर बिल्ली झाड़ी में लुकान है । शब्दस्पर्श रूप रस गन्ध विषय जोइबनी तहाँ लागी दैवी सम्पदाकू जारै है । चंचलताई वितलिय नागिनी सूझाड़ीरहै ममता सुनाग दुख नित्यप्रति रहिहै ७३६ जगतके भोग तहाँ अमिष सुअस्तीपरै पुत्र परिवार सदा जम्बूसू पुकारे है । संसार के पदारथको देख सुनि जहाँ तहाँ मनरूपी इल्ल तहाँ वैठके तकाव है ॥ कुबद्धी विघाड़ी तहाँ निशि दिन वासकरै कुदया विघाड़ सब जीवन सतावे है । सिंहनी अस्मतासु तहाँ दुख- दानी बसें वंदी झूठ दम्पती सुक्ष टोलरही है ७३७ तमोगुण वलवान नृप तहाँ राजकरै काम क्रोध आदिलैके प्रजनकू पालैहै । रजो अहं भूपति के घरमें व्यवहार होय मूरख प्रमादसू वजीर अज्ञाकारहै ।। अज्ञान अन्धकार तहाँ झाड़ी मन्द खुशीरहै कालकूट हाथी तिनै छेद छेद खाने है। ऐसे वनमाहि जीव आयके वसेरालीनो ज्ञान सुवैराग दिन महादुखपावै है ७३८ मीन अलगज औ कुरंग औ शलम देखो एक एक वासना अधीनहोके नाशे है। जिनमें सुपांच विषय निशिदिन बासकरै तिन- का कुशल सुख कहां जगलाभहै ॥.व्रतमान माही टेढ़ी जोइनपाप पुण्यकरै तिस ७३ माधवराम सुखसागर। का सुफल शुभ भिस्त नाहीं पाते है । पंचविषयके अधीन जीव बारम्बार दुखपावे भव सिन्धु बलमाहिं रिपयमू भरमावे है ७३६ माधवराम दयाकरै जिसपर जगमाहिं सोई याते वनते निकर सुखपाये है । माधवपद मोक्षभजै ऐसा वन तुच्छ जाने जगसिन्धु दुखभारी मृगवार भास है ॥ माधवराम चिद जोई तिनकी उपासनाते अन्तमाहि तनवान तजि चिद होवै है । माधवराम इष्ट मेरा तिसपद पाये जीव जगसिन्धु नाही तरै ताको थाह नाहीं है ७१०॥ दो० हप शोक ऋषिवर भयो सुन उर माहिं विचार । उपदेश सुनै गुरुते हरषि असुरी सुन दुखभार७४१॥ चौ०॥ यहि विधि सन्त ऋषी मतिमाने । गुरुके वचन सुसुनि हरषाने ॥ पाणि जोरि ऋपि विनय सो कोने । गुरुभक्ती सुख उस्में लीने ७४२ कह ऋषि हे गुरु तुम्हें नमामी। तुम सब जीवन के सुखधामी । असुरी सम्पति कर व्यवहारा । आप कह्यो गुरु दुःख अपारा ७४३ याते छूटन की विधि जोई। आप कहाँ भगवन मोहिं सोई ।। यह असुरी सम्पति दुखदाई । सवजीवन के हृदय लुकाई ७४४ जननी जनक सो हिरद परिवारा । सब दुख लखि जीव तजै व्यवहारा ॥ पर असुरी सम्पति नहिं छुटै। ज्ञान वैराग विवेकहि लूटै ७४५ छूटन उपावकरे इक कोई । अधिक अधिक उरधारे सोई ।। राजस तमोहत दुखदाई । तिसमें विचरै मन चितलाई ७४६ छुटन उपाव कही गुरुदेवा। जिसमें होय सकल दुखछेवा ॥ तुम त्रिकालदरशी मुनिनायक । भवनिधि जीवनके सुखदायक ७४७ दुखमूल अज्ञान महा अँधकारे। तासों गुरुतुम राखनहारे। मुरु समान दाता नहिं कोई । वेद पुराण कहै ऋषि सोई७४८ यहि विधि ऋषिवर कीन वखाना । भये प्रसन्न मुनी भगवाना ॥ निष्कामरूप जग रहत उदासी । धरे ज्ञान तप तन परकासी.७४६ माधोरूप नरायनरामा । भय दुखहरण बोले सुख- धामा॥धन्यहौ ऋषी धन्य बुधनागर। तरन उपाव पूछौ भवसागर ७५० अमुरी दुख में तुम प्रतिगाये । तुम समझै ऋषि सत दुखदाये ॥ अज्ञान अधीन जीव जगमा- हीं। एक ज्ञान विध्वंसक जाने नाही ७५१ कामक्रोध आदिक हैं जेते । मोक्षपंथ के विघ्नहें तेते ॥ आशा नृप असुरी चमूलेके । वैराग आदिकोहने विवेके ॥ ७५२ ॥ क० ॥ जबतक असुरी सम्पति सू हिये माहिं तबतक ज्ञान स वैराग नहीं पावे है।
७४ माधवराम सुखसागर। ईश्वर की माया माँहि निशिदिन भरमा करै गुरु उपदेश विना सुख नहिं पावे है करम अधीन नर जहां तहां तनु धारै दारासुत धन धाम परिवार पावै है । मोहरूपी श्रृंखलसू पगसै सो पाए देवै भवनिधि दुखपार कोई नहीं करहै ७५३ ताते बुद्धीमान सब इनका सो त्याग करै उदासीनहोके सुख वनको तकावै है । एक तिया त्याग तो अपार सुख पावैनर इकदारा के संयोगते असंख्य दुख पावे है ॥ जैसे इक मन माहीं जग दुख है अपार मन नाश भए जगदुख सु नशावेहै। जनम भरका नरनको मोलसू लैलेवे दारा चरन गुलाम सो बनाए दुख देवे है ७५४ तिसके प्रताप करनर मोक्ष पावै नाही डडूकूप सम फेर फार जग रही है.। याते ऋपि गुरूकी समान दाता कोई नाही जग ग्राह मुख माहीं जीवनको छुड़ावे है ।। असुरी सुसम्पतिकी छुटनकी विधि जोई गुरु उपदेश सेवै सुखए उपावहै। जगमें प्रमादिनकोसंगतजै दुख जानि देश सुखाकान्त माहिं बसै मोक्ष हेतूहै :७५५. जग दुख देनेहारे दोषसू अभाव तहां जग मन उलट जोड़े आतम सुखदायकै । अद्यत बोधक ग्रंथनको नितसू विचार करे फिर आतम ज्ञानसू वैराग बसै आयकै ॥ काम क्रोध संगति सो दुरजनकी त्याग रहे साधना युगति होय दश इन्दै बाधिको सुख दुख सम मानै मान अपमान त्याग हरषि शोक चित उरराखे सो भुलाएकै ७५६ निन्दा अस्तुति त्याग करै माया सुख नेहतजै निर्भयं भर भजै हेम काचसम मानिकै । लोभ मोह अभिमान सब को त्याग देवे जगते निराश होवे मनआशा बांधिके । लोक परलोक के पदारथ में दोष दृष्टी वारम्बार करै मनराखै नितहटायके । अहिंसाधार सत्य बोले आस्तीक सो वुद्धी राखै ब्रह्मचरज त्याग जमकरै सो बनाएके ७५७ शोच औ संतोषतपईश्वरको ध्यानकरे सोय ध्यायन जमको सेवे मनलायके । अज चींटी तृण आदि सबका सो सेवमाने हित अनहित समजाने सो विचारके। वरन सो आश्रम कीकृतकहै वेद जोई तिसको कमावे नरमोक्ष हेतु जानिक। निज इष्टदेवकी उपासना को राखै विधु गुरु उपदेशजपै उर ध्यानधारिके ७५८ ॥४०॥ यहि विधि देशसुकाल मिले सतसंगति संतनकी गुरुसेवै । ईशकृपाल सो होय तबै असुरीदुख सम्पद फिर छुटकावे ॥ शुद्धअंतस कोमलपाये भले फिर दैवी सम्पति चितमें आवै । फिर आ- ज्ञानमहासुखदायक शिघरसू उरमें प्रगटावे ७५६ जगबन्दन हेत दहेसगले जिमि - ७५ - माधवराम सुखसागर। दावाअन्य विषय लगिजावे । जीवन मोक्ष निरसंशयहोय जगबंधन दुःख नजीक न आवै।। चिदानन्द सो माधवराम विषय अंतलीन होय भगमें नहिंआवै । वह सत्य त्रिकाल अवाध विभूतिसके सुख ते जग.आनंद पावै ७६० यह मोक्षमें कारण ज्ञान जोई तिसका ऋषि हेतु मैं पीछे सुनाए। और सुसाधनबोध लिए तुमरी प्रति आगे मैं देहुँ जनाए ॥ विधियोरेन में उर ज्ञानहोए परमारथरूप सुशीघरपाए । जग मूल अज्ञान सुभ्रांत सबै हनि पूरवरूप चिदा सो रहाए ७६१ ॥ चौ०॥ संतनकी संगति हैं जोई। तिसकोकरे नित्य प्रतिसोई॥छल अरु कपट मोह जगत्यागी । संत अचरन सिपय बड़भागी ७६२ भक्ती संतनकी सुखदाई। ताको करे सदा लवलाई ॥ शम्भु समान सुसन्त दयाला। थोरेन में होवें कृपाला ७६३ जीवन भक्ती के आधीना । साधन विन सिख संत में दीना ।। सिखजग दुःख लखि संत दयाला । आतम बोधकरै ततकाला ७६४ भवबंधन छिनमाहिं सो खोवे । निज सुखरूप तिसे करलेवे ॥'जाको कहुँ नहिं जंगमाहिं ठिकाना। ताको संत करें कल्याना ७६५ यद्यपि मल विषेप है जोई । सिख में संतजान लिए सोई ॥ मंदजान ब्रह्मविद्या पावन । नहिं उपदेशै दुःख जलावन ७६६ तद्यपि संत चरनकी भगती। तजै न बुद्धिकरै नित विनती ॥ मान अपमान असुर मति त्या: गी। संतते मोक्षचहें बड़भागी ७६७ ॥ स० ॥ ज्ञानके साधन जू सुखदायक संतनमें बहुपावें सोई। फिर ज्ञानकेसहिमिले माधो.विषय जिनको विरला जगपावत कोई ॥ नातो पूरब अदिष्टनके बलते करम ज्ञान जो मोक्षके साधन दोई। तद्यपि जीव अज्ञान अधीन है संतन माँहि परारहै सोई ७६८ अंत विषय वह माधवराम में संतप्रभावते जाय समावे । जिमि सरिता मु गंग में आए मिले वह गंगद्वै नहिं भिन्नरहावे ॥ पुन गंग सूसरितन संग लिए अचला सो पयोनिधि माहिं मिलावे । तिमि संतसो मन्दनको संगले चिदमाधौ ब्रह्म विषय मिलजावे ७६६ ॥ चौ०॥ कल्पवृक्ष संतन सुखदाई। जो जीवचहै सो लिएउपाई॥ ज्ञानमोक्षकी वागम कारन । संतमें ऋषि बसै असुरी धावन ७७० याते दैवीकर परिवारा। तुमहि लखाओ सन्त मझारा। जिनके पदपंकज लैवारा । सहजै उतरै भवनिधि पारा ७७१ उत्तम भूमि -~- ७६ माधवराम सुखसागर। संत जगमाहीं। मोह आश तहां भूपत नाहीं ।। विचाररूप तहँ बन्यो तड़ागा। जप तप संयम चहुँदिशि बागा ७७२ अन्त्र शांत शुद्ध गंभीरा । तेहि सरमें शुभ भरा सुनीरा ॥ वैराग विवेकसु शम दम जोई । घाट ज्ञान हेतू यह सोई ७७३ अदम्भ अ- हिंसा अचल सुहाए। अच्छल सोवुरज तहां सुखदाए ॥ धीरज धर्म अडोल अमो- है । ताप नशावन वट यह सोहै ७७४ सन्त संतोषशील जो पावन । मोर तहां असुरी अहिखावन ॥ मयन्त्री करुना खिमा सुदाया । तेहि सरमें सेवार सुलाया .७७५ भजन वाक शुभकर शुभवानी । मीन बसै यह जल सुखदानी ॥ सरपर समा- धान शुभ मन्दर। पूजा पाठ दान मूरति सुन्दर ७७६ शुभ वासना सुमन फुलवारी। श्रद्धानेकी प्रीति पुजारी ॥ गुरु अस्तुति ईश्वरकी करना । निकपट निर्लोभ अकाम सुधरनी ७७७ श्रद्धा मन जन गंग करावै । जेहते असुरी सम्पति जावै । कोमल उ- दारता ऋषिवर जोई। दीप तहां यह जाना सोई ७७८ आहुति यज्ञ आरती साजै। वेद ऋचा तहँ वाद सुवाजै । समदृष्टी सतसंगहै जोई । नेम निमित्त तहां कीरति होई ७७६ जम औ निजमत तिछा ऋषिवर । अमानिता पंछी विचरै सरवर ।। स- रल सुभाव भगती सुखदाई । पुरइन सघन तहां यह छाई ७८० निध्यासन मनन जु ज्ञान उपावै । सरवन पंकज यही सुहावै ॥ अधिक सतोगुण प्राणायामा । तरीतर पंकजमै सुखधामा ७८१ ब्रह्म विषय निशुध अलबुद्धी । वेद अर्थ रसलेत सुगन्धी। महावाक भानुको देखी । सखण पंकज खिलै विशेपी ७८२ ब्रह्मसरूप जगत हित- कारी । पर उपकार बरत जिन धारी ॥ हम अजान पर दीनदयाला । ऐसे संत सुवसै मराला ७८३ ज्ञानरूप दृष्टी है जिनके । मोक्ष सु मोती चुगै सुख तकिकै । जल पै परशि मिल्यो जड़ चेतन । सन्त मराल बैठ सर सज्जन ७८४ तत्त्वम पदमें वाच्य है जोई। जल सम अनस्थ त्यागै सोई ॥ पैसम लक्ष्य अर्थ सुखदाई । संत हंस चुनि लेहिं उठाई ७८५ चिदाकाश सुख माधवरामा। तिनके उर नित्य कर विश्रामा ।। कर समाधि नित तिनके धावै । अन्त समय तिनहीं पदपावै ७८६ ।। क० ॥ ऐसे सन्त मिले ऋषि ताकी सिख सेवाकरै दैवी अति सम्पदा जो कह्यो सोई पावे है। अविद्या का परिवार सब असुरी सो नाश होय मनदुख मरकट सुत- वैशान्त पावे है । मन शान्त भए फिर जग दुख भासै नाही आत्माको नन्द मन ७७ . माधवराम सुखसागर। उलटिके समावे है । जमवायू के संयोगनते सिन्धु में लहरिजावै वायू शान्त भए लोल सिन्धुरूप होवे है ७८७ तिमि बासना संयोगनते मन महादुख देवे बासनाके नाश भए चिदानन्द होवे है । ताते ऋषिनाम रूप विधिका परपंच सब मनरूपी वागा मांहि जगत परोयाहै। मलन संकल्परूपी तागा जब तूटिजावै मनके समान जग दुख खिड़जावे है । मनकर इन्द्री के व्यवहार मांहि आत्मा जो भरमकर भासै जु निशङ्क फिर होवे हैं ७८८ जैसे अभर कर ब्योम अदित मुड़कारहै धननाश भए व्योम सूरज प्रकाश है । तैसे निज अज्ञानकर आत्मा अव्रत दिखै ज्ञान भय अग- जाव आतमै प्रकाशै है ॥ याते बन्ध मोक्षरहित जीवमें विकार नाही स्थूल सुखम देह कारण मायाको विकारहै । सुख दुख आदि सब अन्तसके धरम जानो खानपान गौन कृपा मानके व्यवहार है ७८६ शब्द स्पर्श रूप रस गंध विषय जोई पांच ज्ञान इन्द्रीके व्यवहार नित्य जानिए । करमका सुचार सब करम इन्द्रीमांहि जानो अहं त्वं आदिस्वहंकार माहिं सानिए । शुभाशुभ निहवा होवे बुद्धीका धरम जानो चित- वन आदि गिरीचित माहिं ठानिए । संकलप विकल्प मनके धर्म जानो जन्ममृत्यु देहके सुभाव ऋषि मानिए ७६० दश चार त्रिपुटी में आत्मा असंग जानो दश प्राण पंचकोश आत्मा प्रकाश है । जैसे हंसके प्रकाश आगे जगमें व्यवहार होय तीन काल सूरज असंग नित्य रहे है । तैसे सूक्षम स्थूल कारण सारा मुसमाज जोई आतमके प्रकाश कर चेष्टा सब करे है। निरविकार आत्मा अखंडसू अद्धयत चिदनित मुख शान्तबोध एकरस रहिहै ७६१ याते जनममृत्यु आदिमाया का परपंच जानो मायामात्र झूठ सव माया माहि रही है । षटविकाररहित ऋषि अपना सरूप मानो व्यापक अकाश समं सदा तू अपारहै । घटमट मेघ आदि व्योम माहिं होवै जैसे उत्पति नाश होय वेत एक रसहै । तैसे देहहन्दी जग आत्मामें रचै माया देहइन्दी जगनाशै आतम शेषरहिहै ७६२ ॥ स० ॥ सतत्रिकाल अबाधहै आतमवेद प्रमान सवलोक सुनावे। जो भूतजन्मात्र करमकरे वर्तमान विषय तिसका फलपावे ॥इतकी करणीजू शुभाशुभहै तिसका सो अभीष्ट परलोकमें पावे । इमि जीवमरै नहिं लोक- मते सुअनाशी चिदाऋषि याते कहावे ७६३ पंचभूतक देह अशोकनते यहते पुनि जीव सुनाम कहावे । जिमि कलश संयोगको पाय भले मुअकाश महाघट काश ७८ ॥ माधवराम सुखसागर। कहावे ॥ मन बुद्धीआदि जड़रूप सबै न सुतै जिनमें कछु ज्ञानहो आवे । एक चे- तनते सब चेतनहै यहते नित योगी सू ध्यानलगावे.७६४ सुखसागर ब्रह्म चिदातम है त्रिलोकी विषय नित व्यापकमाने । पटमें जिमि तन्तोसुहै सघनी तिमिही सबमें सुखचेतन जाने ॥ भवभोगन में सुख चेतनका तेहिते न कहूँ सुखलेश समाने। सुखमूरति आतमहै यहते नहिं नाश किते सु अबाधा पराने ७६५ अनन्त निजातम परिपूरणहै पंचभूत कमायके देहिनधारे। मनबुद्धी वेद नजानिसकै अजरातम मारुत बनीन जारै ॥ नहिं जन्नअनादि सुतै प्रकटै भव उत्पति-पालन हेतु संहारे। नहिं जाग्रत स्वप्नसुनींदपरे प्रकाश करें तुरीनामको धारै ७६६ त्रिपुटी.विन.एक चिदातम है थकि वेदहटे उपमा नितगाए। अनूप प्रनाम न क्षीर यथा सम एक रसातम वेदन गाए ॥ यह ज्ञान होय नरदेवनको कृत पुण्यवपुधरे चेतन पाए। फिर माधोराम में जाएमिले दुख देहि कुधारिन जीव कहाए ७६७ शुद्धसनातन ब्रह्म अनूपन इष्टहोय सबका सुखदाए। और चोपादजडातनहै जिनमें न शुभाशुभज्ञान सुखदाए । जन्माः न्तन लै सुखनाम नहीं नित दुःख अपारसहै तनपाएं । बुद्धिमान सुदेख वैरागकरे मन्दकरमनते पुनि नित्य डेराए ७६८ ॥ क० ॥ बुद्धीमानहोवै जगमानो तनपाए भलेतथी ततब्रह्ममाँहि जुड़े मनलाएकै। पुरुषारथको त्यागेनहीं माधौजी का ध्यानकरै जिस्में भवसागरको जावै दुखलाधिके भवभोगनको नाहींसेवै दुख सिन्धु उर जानियाउ वृथानाहीं खोवै मानो तनपाएके। बारम्बार यह तनदुर्लभनहिपावै यही तनमाँहि मोक्षपावै सुखजाएके ७६६ इसे चुक जावे फिर मोक्षहाथ आवै नाहीं भारखण्ड आवैनाहीं ऐसी भूमिकहूंनाहींपावे है। काम निष्कामकृत और लोक माँहिकरै ऋद्धी सिद्धीज्ञानमोक्ष नाही सुखलाभ है। भारत- खण्डका सुकरमकीया सब लोक माँहिफले ओरनमें शुभमन्दकृत वृथाजावेहे। याते बुद्धिमान भूमिकरम खेततनपाए उभय लोक भोग त्याग मोक्षकोतकावे है८०० माया का व्यवहार तजि जगतते निराशरहे खिनभंगुरत्रिधालोक सबनाशरूपहे। अस्थूल सुक्षम कारण सो बाल वृद्ध युवामाहिं तीन लोक सुखलेश तीनकाल नाहीहै। अज चींटी तृणऑदि दुखके जुगुत सभकोबिदसुदेख चितरहितं उदासहै। बैठके एकान्त निज आत्माको ध्यानकरे जिस्के प्रभावकर जगरोगजावेहे ८०१ प्रालब्ध के अधीन , ७६ माधवराम सुखसागर। सुख दुखको सहारे बुध हरपशोक मिथ्या जानि चितनाहीलावे है। हित अनहितनको संगदोपत्यागेरहै पथकी समानसब लोकनको जाने है। माधौराम उनकासो एक नित सुख भास और जगमोहजाने महादुखदाई है। और ऋषि मूरखनसो भारतमें तनपाये उभयलोक माया सुखभोगको तकावे है ८०२ तिनका सो देखिकर काल दुखहासीकरै ज्ञाननिर्वेदकर हीनतिनै माने है। तीनलोक भोग देह मेरासो अहारखना मूरखसो मेरे को न जान भोग सेवे है ।। चंगामेरीबनिआई मूरखनको खावसदाआत्माके ज्ञानविन मोते कहावचेहे ॥ ब्रह्मलोकलग पुन मेरे मारे बचेनाही सने ब्रह्मलोकखायो मेरायही कामहै ८०३ उत्पति पालकरो लोकनको खावसदा मेरा शुभकरम यामें दोपनाही आवेहै । ब्रह्मज्ञान के विवेकी सदा एक ब्रह्मरूप बचै तिनहीं चिद उपर सो मेराजोर नाहीं है ।। अथवा श्रीमाधौराम इष्टदेव जगमेरे जिनपर दयादृष्टी गुरू निजकीन है । ति- नका उपदेश लैके हृदयमें बसाय जोई माधौ ब्रह्मानन्दकाहि निशि दिन ध्यावे है ८०४ तिनकासो नितमाधव रूपमें अभेदकरो मोक्षपदपाय इष्टदेव मेराहोवे है। तिनकी सो पूजन सदातीनकालकरो चिदमेरा आत्माहै सदा सुखदाई है ॥ ज्ञानते विहीन जोई माधवके उपदेश बिन तथा शिष्यलैके धारण नाहीं मिथ्याकीन है । ऐसे अगनर नित मेरासो अहारवने तीनलोक भागे सन गेंद मेरा खेलहै ८०५ याते ज्ञान सो वैरागवाला जानतप्रताप मेरा जगसुखभोग मेरा कदैन तकावे है । आत्म सुख- ध्यान छोड़ भोगकोतकावे जोई महापाप उग्रवेते नित आतमघाती है । ताते भोग सेविछत्रधारी गुरूजगमाहिं नेक वेर ढीहि फिरकर अंतकरे हैं। आदि नेतमेरी भला कौनसो मिटायसकै नाम रूप अंतकरो अंतकमेरानाम है ८०६ सतचित आनन्द सरूप अविनाशी अज पाप पुण्य कृतरहितसदा में अबाधहै । हे उपाधीरहित पुण्य तीनलोक भोगोसदा निज आतम बोधकर सदा मैं अभोगहै ॥ निरगुण अखण्ड शुद्ध आत्मा चैतन्य नित्य विभु सुखदाई तामें मलन बिशेपहै । कोसन संयोगनते आतम तदाकार भासै सोमनसनिध जिम सफटकलाल है ८०७ याते पाप पुण्य सुख दुख सभकोश माहीं आतमके विरोधी अघ आतम माहिं माने हैं । अज्ञान तम मूल दुख अग्नि को ढापे जैसे तैसे मेरे आत्माकू मेरे कोन भान है ॥ अज्ञान को समूल माहिं आत्माकू साखी मानो निरविकार शुद्धसूअद्वैती ब्रह्मरूप है । याही ८० माधवराम सुखसागर। निज ज्ञानकर बन्धमोक्ष पाप पुण्य सुखदुख लोकहनो अहंयोग नाहीं है ८०८ याही भाँति ऋषिवरतगजोई करमकर करमनके फल सुख दुख तामें नाहीं है । जिमि अज्ञानी संयोगन में दारतुल्य ठहरे नाही तिमि विद्यवान विषय जगकृत नारी है ।। प्रालब्धके अधीन शुभ भोगनको भोगै नित सदा निर्लेप रहै आत्माको ध्यान है। और ऋषि भारतमें मानों तनपाय कर तज आतमबोध साधन भोगनकूधावे है ८०६ कृतान्त ऐसी दमक मारिलिये सो अचानक तिने उनकी समान ऋपि तुम नहीं हो- वना। मायासुख त्यागकर देश सोअकान्त माही आत्माकू ध्याकर मोक्षकू समार- ना ॥ ब्रह्मज्ञान के विवेकवाले पूरनेको संगकरौ परवृति वाले मूरखनको संग नहीं करना।शुभाशुभ सुख दुख तामें हेतु संग जानो संगतमें दूवजावे संगतमें तरना ८१ जिमि दारा पोतकर नर सरी पार जावें कागदकी बेड़ी माही पार नहीं होवना । तिमि भवसिन्धुमाहिं नर दुख पारलिये ब्रह्मवेत्ता पुरुषनको पाये पार पावना॥ कागद की वेड़ी की समान पुनि मूरखनको संगकरै नेकजन्म दुखपावै अंतनाही होवना । याते ऋषि संगति में सुख सो अपार पावे संगति में नर दुख थाह नहीं पावना८११॥ दो० तात मात सुत नारि वित कुसँग मोक्ष में जान। दुःखधाम बुध त्यागि इन करें भजन में ध्यान ८१२ चौ० ।। मोक्ष माहिं प्रतिबन्धक जोई । दुःख जानि बुध त्यागै सोई॥ जगतमोह छोड़े व्यवहारा । नामरूप संसार असारा ८१३ सतयुग दापर त्रेता माँही । ऋपि मुनि बसें सो कानन जाही॥ दारा सुत धन धाम सुत्यागी। ईश्वर भजनकरें सुख लागी ८१४ कृतफल पंचभूत तनत्यागी । मोक्ष सुख पावै बड़भागी ॥ मानुप तनु दुर्लभ जग माहीं। वारम्बार सुपावै नाही ८१५ ताते तुमहूं करौ उपाई। जाते छूटै भव दुखदाई ॥ अव ऋषितुमको कहूं उपाया। जाते छूटै भव दुख माया ८१६ ऋषिमुनि करम जो वेदन गाई। ताको करो भले मनलाई । असुरी सम्पति जग दुख त्यागी। दैवी धरो भजनमें लागी ८१७ मोक्षके साधनहें बहुसोई । पर ईश भजन समनहि ऋपि कोई ॥ सुख साधन कलि येही परमाना । ईश्वर भजनकरै कल्याना ८१८ नाम ब्रह्म में भेद सो नाहीं । जिमि घट नाम रूप इक माहीं ॥ तैसे ब्रह्मके नाम अनन्ता। ब्रह्मे रूप कहें सब संता ८१६ नाम विना कछु सिद्ध न मानो। संहन त्यागि । ង? माधवराम सुखसागर। नाम तेजानो। याते ईश नाम सुख सारा। नर भजि उतरे भवसिन्धु अपारा ८२० नाम रूप सुख ब्रह्म के माहीं। होय अभेद तिन्हें भय नाहीं ॥ जिमि गंग मिली नामें निधि जानी । हो नर भजि चिद नामहिं जानी ८२१ दुष्करम योग कलियुग सुखदानी । भविस्त रीत गुरुनानक जानी। आयू धन बल बुद्धि कलिमाहीं । बहुत थोर जीवन की आही ८२२ जप, तप दान निगम अधि नाहीं। करि नहिं सकै जीव कलि माहीं॥याते जन्मादिक दुख मरना। यासों कठिन जीवकोछुटना८२३॥ सवैया ।। दुखवाध लिये सुख जीवनको दयासिन्धु गुरुनानक कीन बिचारे । कलिमें सुखसिन्धु सुवेद सुधा गुरु ग्रन्थ सु प्रकट कीन्ह अपारे । नाम की महिमा विशेष बि- धी तिसमें चिदाकास सो कीन उचारे । दैवी सम्पति भोग सुयोग गमन मुक्ती जो चाहै सो लेह निकारे ८२४ मुख मोक्ष में साधन नाम सुधा भवसागर में सुख सेतु ब- नाये । यह नाम सुसेत जो सेवन गे कलि मोक्ष लिये नर पारसु पाये । और बिधी सुख पायो नहीं गुरुग्रंथ निगमागम में प्रगटाये । जिसकी सुधावानी सो मंत्रमहा यहि मोक्षकी दाता भजो सुखदाये ८२५ ॥ क०॥हरिका सुनाम कलि अमी सुखदाई ऋषि अजामिल गणिका शवरी गति पा- ईहै। पंचाली को राज दुख सभाके मँझार माही रामनाम दुख बाधे शुद्ध तहां आई ॥ताको दुख हरे पुन करुणा निधान चिद अपनी सुपैज भगत बल बढ़ाई है। जेहि नर जस कृपा सोनिध गायो जग ताको जहां तहां नित भये हैं सहाईहैं २६. आदिगुरुनानक देव नामका भरोसा कहै जगजाल त्यागि प्रभु गहै शरणाई को। ईश्वर को नाम जपध्यानको लगाइ विधि लिंगतन त्याग मोक्ष पावै माधोरामको। अधिक अचारज सूभये कलिमाहिं ऋषि न्यारे न्यारे मत वेष कीनेहें अडामको । सुखेन पुण्य साधन सो कोई नहीं कह्यो जग जिसमाहिं नर कलपावे शिघर मोक्ष को ८२७ याते कलिमाहिं गुरुनानक समान ब्रह्म पर उपकारी कोई भयो नहीं ला- यको । जनमपात दुख प्यास जीवन को देखि कलि नानक सू आदि ईश कीनो है उपावको । अमीनिधि प्रकट कीनो ग्रंथ को बनाय सु सुखेन घाट पाट चिदा कीनो उपकारको । कलिके सो जीव सब पाठरूपी सुधापी बुझाय जनमपात प्यास पावे निज रूपको ८२८॥
. माधवराम सुखसागर। चौ०॥ यहिविधि गुरुनानक सुखदानी। पर उपकार जीवन को ठगनी ॥ कलि में सुधा नाम सुखदाई । सब जीवनको दीन बताई ८२६ जिसमें लाग मोक्ष गति पावै । जनम मरण दुख नहिं भरमावै । और सो ऋषि मुनि हे गुरुभाई ।, नामकी महिमा सब मिलि गाई ८३० सब युग ईश भजन परधाना । इस समान सुख नहिं कछु आना ॥ जो कलिनाम न करै कल्याना। तिस नरको जग नहीं ठिकाना ८३१ हमरे इष्ट सुमाधवरामा। जिनके चरण बसैं हम धामा । तिनकी महिमा सिन्धु अपारा । शेश गनेश न पावत पारा ८३२ जग कारण मायाहै जोई । पदपंकज जिनके रहे सोई ॥ तिनकी प्रभुता किमि कहि जाई । बरणत शारद अतिसकुचाई ८३३ मैं अ- ल्पज्ञ थोरि मतिधारे। कवि बरणत मे लज्जित भारे॥ जिमि अकाश उड़े मक्षर टोले। अन्त राह नहिं पावै भूले ८३४ तिमि अकाशमें गुरु निज मेरे । कवि अस्तुतिको फिर घनेरे ॥ करें अंत नहिं फिरे दुहेले । मक्षरमत थकहट प्रतिकूले ८३५ ॥ क० ॥ याते ऋषि चिदानन्दमाधवराम गुरु मेरे जिनका प्रभाव नहीं कहूं मैं अपा- रिया। उनका सुनाम लेके सदा में अनन्द रहौं जगत को झूठ जान दीनों में बि- सारिया ॥ जुई इच्छा करौ.सोई मुंहमांगे फल मिलें जगमें सुमाधव नाम महामुख दानिया। जिनकासुनाम लिये नेक जन्म अघ दहै तन त्याग जग पद पावें निरखा- निया ८३६ कलपतरोवरसमान माधवराम मेरे मोक्ष ज्ञान नाहीं देवे माधोदेवेदानिया। याते कल्पतरोवर से अधिक सो गुरू मेरे जिनका चरण सब लायक में जानिया ॥ पुण्यफल मानो तन दुरलभ पाये जग माधोपद नाहीं सेवे गरधभ समानिया।जिन- का सुनाम लिये ज्ञानबिन मोक्षपावे अजामिलआदि गजकीन्यों भवपारिया ८३७॥ सवैया ॥ तिनहू ऋषिनामकी महिमा अपार कहे चिद माधौनाथ हमारे । अनन्त दुखी कलि जीवन को शुभ नाम सुनाय भवसागरतारे॥ जिनका यह धाम सुकाशी स- मानहै मोक्ष की कारण दीन सवारे । बे प्रयास भवसिन्धु लँधै है निरगुण ब्रह्म अ- खंड अपारे ८३८ याते माधवपुरी नर जोई बसें तिसके सब पुण्य नं जात बखाने। मुक्कीका हेतु महि जानि भले मुख ज्ञानकीखानि अघबांधे अज्ञाने ॥ जो मतिमन्द अजान महानर माधो अरण्य में बासको ठाने । तिसके सहायकमाधवरांम सो मोक्ष सो भोग लिये सुखदाने ८३६॥ ----- .
माधवराम सुखसागर। ८३ चो० ॥ सुमाधौराम से इष्ट हमारा । देवे मंत्र ब्रह्म ओंकारा ॥ सत्य नामका अर्थ सुनावै । चिद जड़ ग्रंथ भेद छुटकाये ८४० सतनाम प्रणोसहि जोई। महामंत्र ऋषि जानो सोई ॥ और विधी करमनकर न्यारा । यह नर उर धरि करें विचारा ॥ पाय ज्ञान जग होय असंगा। प्रणोलखे मम मिले अभंगा ८४१ त्रिलोक वेदकामूल सो. हाये । सो निज गुरुचिद मुझे सुनाये ।। ताते ऋषिवर तुम ते कहियो । ओं प्रभाव जान सुख लहियो ८४२ मुझको गुरु यह दै उपदेशा। निखिल दुःखमें हने कलेशा॥ काल मोक्ष कलियुग और उपाव सो नाहीं । ओं प्रभाव रहै उस्माहीं ॥ सुख विचार प्रणो में लागी। और भरम दुख दियो मैं त्यागी ८४५ कलिमें यह ऋषि करै कल्या- ना। और उपाव तजौ सब आना ॥ प्रणो बिचार भजो सुखईशा ।मोक्ष हेतु जुगलखौ ऋषीशा ८४६॥ क० ॥ हरके सोनाम बिन नर दुखपावै जग भक्तिसे बिहीन भ्रम दुख नहिं जावैहै। तीस्थ बरत जो जग निष्फल मानो दान जब तक रामकी शरण नहि आवैहै ॥ काम क्रोध परिहरि गोविन्दके गुणगावे जीवन बिदेह मोक्ष तब नर पावैहैं। याते ऋषि कलिमाहिं नाम मोक्ष देनहार ताको भेद माधोराम बिन नहीं पावैहै ८४७ जिस पर दया करै गुरू जग ईश मेरे नाम भेद अमीपाय सुख महापावैहै । गुरुबिन नाम लिये कूकस को कूट जानो निलघ अबाध सुखकदै नाहीं पा है। मिष्ठानकी सूपंड जिमि बाजि पीठ भारकरे स्वाद सुख तिसका सोअश्व नहीं जाने है । वे विचार ईश भजे परमानन्द पावे नाहिं अन्तमाहि निश्चय धंस त्यागि नाम देवे है ८४८॥ सवैया ॥जे नर राम भजन सुख त्यागत भगतिसुधा उर नाहिं सोहावे । धर्म अर्थ सो 'काम मोक्ष न पावत सो नर जन्म अकारथ खोवे ॥तापर तीरथ वरत विषय नितडोल कर जगदान सुदेह खपावे । वार विषय जिमि पाहिनहै जल शीतल भेद न अन्तर जावै ८४६ तिमि भक्ति बिहीन नरा जगमें हर नाम बिना मन शान्त न आवै। मन शान्त बिना सुबिवेक नहीं सुबिबेक बिना अगज्ञान न पावै ॥ ज्ञान विना सुख मोक्ष नहीं भावे अनेक जन्मांत्रकृतकमावे। याते मोक्ष. सुज्ञान के कारण कोहरनाम भजे नर भक्ति कमावे ८५०॥ दो० भक्ति कल्प शुभ वृक्षको सदा कमावे टेक । ज्ञान मोक्ष फल पायके तरे सो पतित अनेक ५१॥ .
८४ माधवराम सुखसागर। क० । भक्ती नाम का प्रभाव सुनि जरत सकल अघ जैसे मारतंडनाशकरे तम घेरि के अजामिल पापी सब जानत जगत माहिं देखो पार पत्यो अमीनामको पुकारि कै॥ पूतना सो अघासुर बकासुर नीच तरे कुब्जासो तरी प्रेम चन्दन लगायकै.। सु- ग्रीव जामवान सूमरीचहू से नीच तरे भीलसुता तरी बन बेर को खिलायकै ८५२ दुरयोधन सों आदिलैके पांडवसुत पारपरेव विदुर सों तरे सूखी भाजी को खिलायकै मंदोदरी सों आदि लैके राक्षस अनेक तरे शूर्पणखा तरी व्यभिचार उरधारिक । दुपदसुता कुन्ती गोतम तिया पारकीने गणिका सो तरी निज तोताको पढ़ायके जसुमति देवकी सो तिनहुको पारकीने गोपिनको पारकीनो बंसीको सुनायकै८५३ कंस शिशुपाल पापीतरे सो अनेक मन्द गजपति पारपस्यो फूलको चढ़ायके । ऊधौ सुआदिलके दिज महादुखी तरे दास सो सुदामा तखो चाउरको फकायकै नन्द वसुदेव पुनि दशरथ पारकीने पुत्र भाव ईश्वरको कीने मनलायके । रावण कुंभकान देख्यो अरी भावकर तरे बधिकसूतरे पाद बाणको लगायकै ८५४ जिमि पारसके साथ लोहा जानि भूल योग होय लोहे सरसाथ चहै करें परहारकै । तिमि उत्तम मध्यम चारखानी जीव जेई तनधारी शुभाशुभ करमन को सेवै जानि भूलिकै ॥ जवहींसो जीव ऋषि ईश सन्मुख होवें ईश भगत होवै चहै होय हर ईशकै। भूलचूक क्षमाकरी नेक जन्म अघ दहैं चिदानन्द आपमें मिलावै सुअभेदकै ८५५. याते ऋषिईश्वर की रीति यहि जानो हित अनहित सुख देवे प्रीति लायके । जटायू आदि लेके देखो महाशुभ नीच तरे कहांला सुनाओं ऋषि तुमको गनायकै ॥ वियन्त पुरुषोत्तम को 'अन्तनहीं गावै वेद जीवनको भोग मोक्ष देवे सुखदायके । सदासूअनीह कछजीवन ते चहै नाहीं मेरी सुनमानिदया धारी खट भागिकै ८५६ ॥ भगत करम अरु भावकर तरै सो पतित अपार । ऐसे माधवराम को भजो सो ऋषि उर धार ८५७ ॥ चौ० याते ऋषिवर और न जानो। नामते तरै सकल उर आनो ॥ऐसे प्रभुको जो विसरावै ।जन्ममरण बहुतै दुखपावै ८५८ ताते ऋषिवर जगभ्रम त्यागी। राम भजन में रहो सो लागी। जिसमें होय जन्म भय हानी। सो उपाय में कह्यों बखानी ८५६ नामते लैं शुभकरमहै जोई । बिधि प्रीति सहित से उत्तम सोई ।। पूरब मिमांसा केर -4-1 . दो० . .
८५ 1 माधवराम सुखसागर। प्रकारा । बहुत ग्रन्थन में विस्तारा ८६० तिनमें कस्म योग मुनि गाये। जीवन करम योगसुखदाये ८६१ नित्य निमित्त करम जग जोई। तिनको करै सदा बुध सोई॥ मोक्ष को साधन करम को जानी। ऋषि मुनि गण सब करो बखानी॥ ताते कर्म करै मनलाई । जाते छूटै भव दुखदाई ८६२ जो नर करम करत है वाधा । ताहि लगावै श्रुति अपराधा ॥ ताते आतम घाती जानो । ताते और न पाप पिछानो॥८६३.. संसार सिन्धुकी पीड़ा पावै। जन्म मरण दुख अन्त न आवै ॥ करत विषय जिनकी निहनिष्टा । ब्रह्मानन्द ते होवें भ्रष्टा ८६४ ॥ क० ॥ भ्रष्टहोके फिर सब लोकमहि विमुखकृत सदा दुख पावै सब तनको सुधारिकै । टेढ़ी योनि भरमै तहाँ दुख को न पावै अंत नित पबितावै सदा जगमें सो आयकै । कोल्हूविषे पेरेजावें अ- गिनी में जारेजावें हाहाकार रोवें परिपूर कुण्ड यमके ॥ तपे लोहे थम्भमाहिँ पापिन भिड़ायकर महाकष्टकिंकर सोदेवें धर्मराजके ८६५ अधोगतीकुंडमाहि लोह असतीरो मा पीवथुकरालककपित्त पूरत गलीजहै । अरधे उरध करमहीन जीव तामें भ्रमाकरें सांप क्रिमि नीचे खावे उरधबायसखावेहे ॥ कहीं युग दुख भोगै महा सो अवाच ऋषि विविधप्रकार अधोगती खात भ्रमैहै। गुरुदेव पितनको सवका सो द्रोहीहोय करमत्यागी पुरुषनको सुख नहीं देवे है ८६६ ।। स० ॥ यहिभाँति आपको नष्टकरे कृत हीनदया नहिं आपलावे । कोई सुसंचित पुण्य प्रभावन ते यमराजके घरते निकर फिरआवे ॥ मृत लोकतियाश अधोगतते वध तिन कुखि आयके डेरा जमावे । भवमंडलके दुख सिन्धु अपार सो जानतहो ऋपि वह फिरपावे ८६७॥ चौ०॥ कर्मकरै तो सुखगतिपावै।नहितो अधोगती फिरजावै ॥याते जोनर होय उदारा । विधिवत कर्म करे निजसारा ८६८ कायिक वाचिक मानसकर्मा । तिनको करे सो दृढ़कर धर्मा॥ज्ञान पाय संशय सब नासी।मोक्ष सोपा जगतन फाँसी८६६ बहुत अचारन ज्ञान विन आई। कृत फल मोक्ष कहै सुखदाई ॥ फल अभिलाष त्याग कृत जोई। संचित अशुभ करम हन सोई ८७० जन्मका हेतु जौन शुभकरमा । सो उनशावै कृत निष्करमा ॥ आगे जन्मका हेतू निरती । याते आतम होय नि- वरती ८७१ वर्तमान में सुख दुख जोई । कृत फल भोग लिये जिवसोई॥ ज्ञान बिना नर मोक्ष सो लेवे । याते बिहित करम जो सेवे ८७२ अबैत बादते यह प्रति ८६ माधवराम सुखसागर। कूला । मोक्ष में करमन जानों मूला ॥ परम पराते मोक्ष में हेतू । याते श्रुतिभाषे सुख सेतू ८७३ मोक्ष में हेतु ज्ञानको मानो । पीछे ऋषि में तुमहिं बखानो । अन्तसकरन की शुद्धी माहीं । हेतू कृतमल को निज दहहीं ८७४ ताते ऋषिवर तुमते कह्यो। सत्य जानि हिरदय में गह्यो॥ करेमोक्ष कृत हित जगमाहीं । फल इच्छाराखै कछु नाही ८७५ जो विधि बनिआ कृत जोई । ईश्वर निमित समरपे सोई ॥ अंत:- करण शुद्ध तब पावै । श्रवण मननको योग है आवै ८७६ कर निध्यासन ज्ञानको पाई। शीघ्र मोक्ष होवै दुख जाई ॥ कृतफल इच्छा दुखको मूला । मोक्षनकरै सदा प्रतिकूला ८७७ जगतमाहिं सुखदुःखहै जोई। करम बासनादेवै सोई ॥ इच्छा सहित कर्म नर सेवै । भूमि स्वर्ग सुख मिश्रत लेवै ८७८ क्षीण सो पुण्य होय फल जवहीं । स्वर्ग लोक से गिरे सो तवहीं ॥ शैलशिखर जिमि गिरै पाना । उरधपाउँ निम गिरै सिराना ८७६ याते ऋषि नर कृतमें भूले । खिन सुररहन न देहिं ढकेले ॥ मृत्यु लोक बहुरो दुख पावै । सुखी न होय बहुत पछितावै १८० कर्म बासना बहुरि करावे। घटीयन्त्र बहु योनि भ्रमावे ॥ताते जीव कष्ट बहु पाचै । ज्ञान मोक्ष विनु ठहर न आवै ८८१ सकाम करम याते ऋषि जोई । मोक्षन निमित पिछाने सोई ।। मोक्ष में ऋषिवर ज्ञानहि हेतू । बुधजन कहत जो भवनिधि सेतू ८८२ विनाज्ञान नर मोक्ष न पावै । व्यास बसिष्ठ ऋषी सब गावै ॥ वाल्मीक ऋषिगण सरदारे । योगवसिष्ठ में तिनहुँ पुकारे ८८३ मारतण्ड जिमि तमको नासै । तिमि अज्ञान को ज्ञानै धुन्सै ॥ यहि विधि सन्त ऋषी सुनिपाये । जोरि पाणि गुरुं शक सुनाये ८८४ ॥ सवैया ॥ भगवन अविद्या का भंजक ज्ञान सुआप कह्यो गुरुने उरधारयो । तद्यपि शङ्का सु आवत है तुम्हरे पदमें अब कहत सुनायो । अज्ञानको नाशक ज्ञान जोई तिसका पित आप सो ज्ञान बखान्यो । जनक अविद्या सुकरमन को बहु ग्रन्थन में बुधिमानन गायो ८८५ कृतसूज्ञान अविद्या भई वह कैसे अविद्या है मोक्षको देवै । मोक्ष में कारण ज्ञान नहीं सुखकरमन में करम बादी बतावै ।। कृत नित्य निमित्त अकाम करै नर ज्ञान बिना यहिते चिद पावै । भवमंडलमें बहुमा- जो जे यह वाकन धारिके कर्म कमावै ८८६ दो छदवंत विहंग जोई सु सुखेन सुव्योम विषय वहनावै । तिमि कर्म उपासन ज्ञान उभय मिल शीघ्र सुखाइनमोक्ष ८७. माधवराम सुखसागर। को पावै ॥ कर्मनते शुभ ज्ञान को पायकै ज्ञानका रक्षक कर्म नशावै। जो ज्ञान को पायकै कर्म तजे फिर बुद्धी मलीन हेकै भव पावै ८७ यह शंका सुनाश करी गुरु ईश्वर तो शरणागत को भय जावै। तुम विन नाथ सूको जगमें भवसागर दुःख जो मोहिं लँघावै ॥ जगबंधन की विधि को सब जानत सुख मोक्षको कारण सार न पावे। तुम्हरे पद नित्य जो ध्यान करै सोइ माधवराम विषय सुखपावै ८८८ ॥ चौ० ॥ यह शंका निकै मुनिराई । दुख भंजन वोले सुखदाई ॥ कहियो ऋषि ज्ञान अविद्या रूपा । अघहीन मोख न देह सरूपा ८८६ यह निश्चय तुम भूल न धासो। मोक्ष में कारण ज्ञानहि मान्यो ।शंकर बाल्मीक बासिष्ठा । राम अद्यत करा यह निष्ठा ८६० इनकी वाचाते जोइ विरुद्धा। सो मति जानो सकल अशु- दा॥ अविद्या ज्ञानका सदा विरोधा। अद्वयत बाद सब कहे सो शोधा ८६१ अगि- नीदार जन मूड़ सुनाश। तिमि अज्ञानको ज्ञानेनाशै ॥करम अविद्या नहीं नशावै । जीवातमको तमनाहि भगावै ८६२ तिमिर अविद्या कृतहि जमावै । आपस में वि- रोध ना पावै॥ आपुस माहिं विरोधी जोई। बाधिक तम प्रकाश निमि सोई ८६३ तैसे करम विरोध न ठाने । याते अविद्याको नहिं आने । उलट अविद्या कृतहि क- रावे । जन्म मरण दुखदै भरमावे ८६४ ब्रह्म अविद्या जब उर आवे । कृत अगहन सुख मोक्ष सुपावे ॥ परमपात्र करमको जानो । मोक्षमें कारण याते मानो ८९५ फल कारण फूली वनराये। फल लागा तो फूल बिलाये ॥ विमि कृत फल ब्रह्म विद्या देव । अज्ञान सहित दुख करमन खोवै ६६ ॥ दो ज्ञान कृत भल भेदहै एकसंग नहिं काल। अपेक्षा रहित सो ज्ञानहै मोक्ष करे ततकाल ८६७॥ स० ॥ अज्ञान सुकाल में करम होय सुखज्ञान नहीं उस काल रहावे । ज्ञान सो कालमें कर्म नहीं ब्रह्मविद्या सू कर्मन त्याग करावे॥ वेद विधी शुभ करमनको फल नाक संसार भयदायकपावे। ब्रह्मविद्या विषय सुख मोख फलै जिसके हित वेदविधी बहु गावे ८६८ समुचै बाद सो त्यागकरै बुधज्ञान अलम्बलिये यकसोई। कृत अकाम सो ज्ञानकर मुक्ति देने विषय बलवान न होई ॥मोक्षकरें ब्रह्मविद्याबली पुन गुरुविन सो क्षणज्ञान न होई । याते करमनते गुरुसेव करें निष्काम सदा उरमें रहै सोई हो - माधवराम सुखसागर। कृतमाहिं सहाय संघात समै मिलपापको नाशको करमपछानो । महावाकसबंध सु- काने विषय सोई ज्ञानको कारण ताहिकोमानो॥ मोखमें साधन ज्ञानलखौ ऋषि ऐसे परेनहिं और सुजानो । समुचे वाद जो कर्म वखाने अवान्तखाक सो ताहिकोमा- नो९०० ॥ क० ॥ मलका विरोधी विधि करमनको मानोभले ज्ञानका विरोधी मलकर- महीपछानी है । मूलातूला मूलकृत तिस्काविधीज्ञान ज्ञानका विरोधी चिद मोक्षही व- खानिये ॥मोखनिष्फल सब कहत ततगमिल सोतू ब्रह्मानन्द मेरो आतम सुखदाई है । भागत्याग लखनसे आपना स्वरूपलख मूलसो अज्ञान दुख करौऋषिहानिये १०१॥ स० ॥ लखज्ञानहि मोक्ष करै ततका सोपाके विषय नहिं संशयकोई । वेद शिरा नि- तयेही भने लखि ज्ञान विना नर मोक्ष न होई ॥ नित जीवसो ब्रह्मअभेद लखें यह निश्चयनाम सो ज्ञानहि सोई ।ब्रह्मकारसो वृत्तीकरौ अन्तरे फिर माधव विषय अग दह सुखहोई ६०२ ॥ दो० - यहिविधि ऋषिवरसंतजी मुनि उर शंकाकीन। जीव ब्रह्म अभेद मैं दोष न कहत मलीन ६०३ ॥ क० ॥ जीव ईश सुखदुख कृत सूअकृत सदा व्यापक. अव्यापक सो कैसे एक जानिये। प्रेरक अप्रेरक सूमाया सूअमायारहे ईशसूअनीश भेद होय नितभानिये ।। बन्ध मोक्ष ज्ञानता अज्ञानता अल्पज्ञ सर्व गुरुवेद इच्छाकिअनिच्छित प्रमानिये । जीव ईश एक नानाभेदसू बहुतभासै नहींसूअभेद वनै भेद बहु ठानिये ६०४॥स० ॥ भगवन आप यह शंकाहनो मोहिं बाचसूलख गुरुन्यारे जनाऊ । जीव ईश्वरमाहिंसू न्यून अधिकता यह भेदमहाउरको भयदाऊ॥दोनों अभेदनमें जुगती वह आपदया- निधि देहजनाऊ । जब आपकृपाकरिहौ भवतारन माधौराम चिदालखपाऊ ६०५ ॥ दो० नारायण राममुनीशबुध सुनि यह ऋषिकीवाक । जीवं ब्रह्म अभेद में युक्ती कहै महाबाक ६०६ ॥ क० ॥ जीव ईश भेद जोई मानत मलीन सदा चेतन सरूप ऋषि एक.तुम मानिये । बाच्य अर्थ दोहूमाहिं मिथ्या सो अविद्या कृत जैसे रज्जू सीपी अहिरजत पिछानिये ॥ ब्रह्म आत्मा अभेद चिद यामें जोई भेदमाने आत्माके ज्ञान बिन करत बखानिये । दैत दुखरूप सदा भने नित ज्ञानवान अद्वैत बोधकथनमें बाकये प्रमा- माधवराम सुखसागर। ह निये ६०७ कारज सुकारण में भेद नवखाने वेद जिमिहेममाई घटकटक.बखानिया। भेदाभेद दैत छोड़ अपने को ब्रह्मजाने व्यापक अनूप चिद एक रसमानिया ॥ सदासूअखंड चिदानन्द घन अचलसू अज अविनाशी ऋषि तूही है प्रमानिया अं- तकी सोश्रुती सब कहत यकत्र मिल कारन नितकारज को नेति नेति ठानिया ६०८॥ सवैया ॥जीव ब्रह्म विषय ऋषि भेद जू भास तूल मूला अंविद्या प्रभाव ते सोई। मूलते ईश्वरं व्यापक प्रेरक अन्तरयामी सर्व नितहोई ॥ तूला प्रभावते अविरत है जीवहि में नित चेतन रूपहै जोई । यहिते जन्म मृत्यु अल्पज्ञ असक्त अज्ञान अधीन दुखा- सहि सोई ६०६ जग उत्पति पाल लै ज्ञान जोई सर शुद्ध सतोगुण मायाते जानो। मलीन तमो प्रधान सुभावते चेतन जीवमें अनर्थहि मानो ॥ चेतन इकरस दोनों विषय अल्पज्ञ सर्वज्ञ ते न्यारे न सानो॥ तद्यपि जीव न आपको जानत कारण तमो जिसके है मलीनो ६१०॥ चौ० ॥ मलविशेषनाश के कारन । यहिते करम कहै बुधिमानन ॥ वेद विहित शुभकरमहै जोई । ताको करै भलीविधि सोई ९११ अंतरमल होवै जबनाशा । तब करमन को करें संन्यासा ॥ ब्रह्मलोक लौ भोग सो जोई । तिनको त्यागकरें बुधसोई ६१२ मूढ़ संसार में करे न रागा। हृदय गहे सो शठ बैरागा ॥षट सम्पती ऋषी उर आवै । शीघ्र सुज्ञान मोक्ष सहिपावै १३ वेद शिरा को अर्थ विचारै । जी- व ब्रह्म विच भेद सो टारै ॥ तत्त्वमसी महावाक्य उदारे । शोधै ताहि भली विधि प्यारे ६१४ तत्त्वं पद का अर्थ वखानो । ब्रह्मजीव सो ताहि पिछानो ॥ सर्वशक्ति समरस्थ स्वतन्तर । सारी वस्तु को जाने अन्तर ६१५ व्यापक प्रेरक करम अधीने । परोख सो मायारहै अधीने ॥ उत्पति पाल हने जो जगाता । ज्ञान सर्वज्ञ सकल फल दाता ६१६ तत पद बाच्य अर्थ यह जानो। त्वंपद अर्थ सुसुकृति वखानो॥अ- ल्पसक्न अल्पग परवीना । अनीश अविद्या करम अधीना ६१७ हरष शोक उत्पति है मृत्यू । बन्ध मोक्ष भव में करै चिन्तू ॥ वंपदवाचक है यह स्थाना । वहुतविरोध दोहुन में साना ६१८॥ 'क० ॥ जेहिपद माहि जेहिअर्थ की शक्ति होय तेहि पदका.सो अर्थ ऋषिसकसु पछानिये । सक अर्थ उर में जो भानहोय भली विधि वाच्य अर्थ तिसही को कहै .
१० माधवराम सुखसागर। बुध मानिये ॥ अंगार अर्थकी सो सकत जिमि बही पद माहि रहे सिक्खी पदका अंगार सक बाच अर्थ जानिये ॥बाच्य अर्थ बोधकजू बरन कर पाद जोई बाचक सो पदकाहि करत बखानिये ६१६ ॥ दो० जहताआदिक लक्षणा तासु कहत में भेद । चित एकान्त कर सुनहु ऋषि जाते हो निरखेद ६२०॥ सवैया ॥ इंसुक बाचहि अर्थ सम्बन्ध जोई वह लखना सरूप सो ताहि पचानों । पद सक्तीसे जेहि अर्थ को ज्ञान सो नाही होवे किसी रीतसे भानो ॥ पुन लखना सुदारे जो भान होय वह पदका सो लखहि अर्थ सो जानो। भाग त्याग जोजेहिती आज हिती आहे लक्षनामहि भेद सू कहत सयानो ६२१ ।। चौ०॥ बाच्यअर्थ सम्पूरण जोई । करै त्याग जग यासू सोई । बाच्य अर्थ काजो सम्बन्धी। प्रतीति होय जहां नहिं प्रतिवन्धी ६२२ ॥ कं. गंगा में गराम कोइ कहै सुपुकार कर गंगपाद जेहिती करतीर में जनावे हैं। गंगापद का सुवाच्य अर्थ वार वेगधार चले अस्थित नगरको तहांसू अम्भवहै ।। याते बाच्य अर्थ ऋषिसारासू जिज्ञासू त्यागै गंगपादकी मूतीर माहि लखनसू जहित है । वाचके सम्बन्धी काहि लखना सुनाम कहे गंगपाद वाच्य देव नंदीका प्रबाहहे ६२३।। . स० ॥ यावे गंगा सुपादके बाचहिकलछना सम्वन्ध सोतीरे सोहावे । ताका तटीतसे जानो ऋषी सनबन्ध संयोग सो नित्त रहावे ॥ वाच्य सुअर्थको त्यागि इहां जहती लखना ऋषि याते कहावे । वाच्य अर्थ संगतहि वाच सम्बन्धी का जापतदेह निज ज्ञान होज वे ६२४ ॥ ० ॥ लक्षणा अहिती सुगति सपंगमाहिं माने जैसे कोऊकहे सो न धावनको करहै । तहाँ शोणपादकीसों लालरंगवाले अश्व लखना अजहित ऋषि तिसमें प्रमानहै ॥ लालरंगकाहि पुनि शोण नामकहे बुध. याते शोणपदका सुवाच्य लालरंगहै। केवल लालरंग माहीं धावन असम्भव होय शोष पदका सुवाच्य अर्थ लालरंग जोई है ६२५ लालरंग सहित होय अश्वके मझार माहीं शोणपादकी अजहित पुनि लक्षणा रहा है। गुण गुणीका संयोग सुत दातम सम्बन्धकहै लालरूपका सुभेदहोय गुने परमानहै ॥ याते शोणपदका मुबाच्य जोई लालगुण ताका गुणी अश्वंके सुसाथमें संयोगहै ।। संयोगहित दांतम सम्बन्ध पुनि माधवराम सुखसागर। ६१ लक्षणाहै वाच्यअर्थ सारा ऋषि यहां त्याग नाहीं है ९२६ अधिक ग्रहण यहि अस्थल माहिं होय लक्षणा अजहत बुद्धि याहीको बखाने है ।जहांपादनके अवाच्य अर्थ मध्य एकभाग त्यागहोय एकभाग ग्रहणहोय त्याग ऋषिनाहीं है ॥ तहां भाग त्याग लक्षणा सुकहै सुविचाखान भाग त्यागहीका नाम पुनि जहत सुअजहतहै । जैसे देवदत्तका सुआनदेशकाल माँही कोई पुरुषजाये ताको देखि घर आवे है ६२७ वही देवदत्तका सुऔर देशकाल माँही वही पुरुष देखि कहै सोई देव यही है । भाग़ त्याग लक्षणा सो इहां तुम जानो सो अतीत अन देशकाल सहित वस्तु सोई है ।। याते सो अतीतकाल अन्देशसहित वस्तु सोई पुनि पदका सो वाच्य अर्थ होई है। काल वर्तमान औ समीप देश माहिं ऋपि देख देवदत्तका सुयह पुरुपकहोई है ।२८ देश औ समीप वर्तमानकालसहित यह पदका सुदेवदत्त वाच्य अर्थहोई है । अ- तोतकाल सहित अन्देशके सहित वस्तु सोई काल व्रत औ समीप देश माँहि है। यह समुदायक सुवाच्य अर्थ होय ऋषि उसमें विचार देखो सम्भवै सुनाहीं है। बत औ अतीत काल दोनों का विरोध जानो देश औ समीप अनुदेशका विरोधहै: २६ याते दोनों पदनमें देशकाल बाच्यभाग जानसुबिरोध बुद्धिमान सत्यागै है । देहि मात्र देवदत्त दोनों पदमाहि रहै भगतयाग लक्षणा सुयाहीको वखानेहै। याते तत्त्व- मसी महावाक्य माँहि ऋपिवर लक्षणा सो तीनों हम तुमको दिखावै है। ततत्वं पदका मुवाच्य अर्थ भली विधि पीछे हम तुमको दिखाये ऋषिआये है ६३० ॥ चौ०॥ अब ऋषि तुमको फेरि देखाऊँ । जाते उरमें समुझ सुखपाऊँ॥ सर्वशक्ति सर्वग सो व्यापी । सुतन्त्र परोप आसर जेहमापी ६३१ बन्ध मोक्ष जामें नहिं कोई । सर्व वस्तुको जाने सोई॥ करमरहित प्रेरे सबकाही । परतख विशय जीव ज्ञानके नाही ९३२ इतने धर्म सहिआदिहे ईशा । ततपद बाच्यहि लखौ ऋषीशा ।। कहै धर्म जोईसके जोई । होय विप्र जै तिसते सोई ९३३ अल्पसक्त अलपग प्रछिना। असीन अविद्या कर्म अधीना ।।बन्ध मोक्षवाला प्रत्यक्ष । तनधर जगमें चाहै रक्ष९३४ त्वमपद वाच्य अर्थ यह जानो। चेतन जीव सबका होय भानो ॥ यद्यपि ईशको रूप अनूपा । परतख सो जाने अपन स्वरूपा ६३५ तथापि ईशका रूपहै जोई। जीव ज्ञानके विषै न होई ॥ याते ईश परोक्ष अभाने । जीव ईश स्वरूप जीवको १६ .
६२ माधवराम सुखसागर। जाने १३६ यतने धर्मवाल जो चेतन । तुमपद वाच्यकहै ऋषि सज्जनः॥ याते महावाक्य में दोई । एकता भेद भानहोय सोई ६३७ सो न वनै ऋपि देख विचारो। लक्ष्य लक्षणा ते उरधारो॥ सर्वशक्ति विभुअर अलपगा। अल्पशक्ति परछिन सर्वगा ९३८ परतख सोतंत्र करम अधीना। पररोख अविद्या मोहित दीना ॥ माया जाके रहे अधीना। याते युगएक में नहिं लीना ९३६ पदकी सकत वृतहै जोई । वाच्य अर्थ सहिबोधे सोई॥ याते ऋषिवर कहै वुधिमानो । लक्ष्यरूप लक्षणा ते जानो ९४० स०॥ दोऊ पदमाहीवाच्यअर्थ का विरोध परा यही निजहेतुते अभेद नहीं होवेहै। जहताजहत लक्षणा जो महावाक्य माँहि मानै सोभी सो विरोध महासम्भवै सोनाहीं है।भागत्याग लक्षणाने लक्ष्य अर्थ जानो ऋषि होतहै विरोध नाशपावैकुशलातहै। महावाक्य माँहि जहताजहतका असम्भव अब तुमरी सो प्रति हम विधिसे दिखावे ६४१०॥शुद्ध साखी चेतन ब्रह्मजोचेतन निलखवेदान्तका गेय सोजानो।ब्रह्मसाखी चेतन शुद्ध दोऊ पुनि ततपद त्वमपद वाच्यमें सानो ॥ लक्षना सो.जहती जहां हो- य तहां वाच्य सम्पूर्ण वाहोतहे हानो । अर्थ वाच सुबन्ध गेआन होय महावाक्य- विषय जहती लक्षना जो मानो ६४२ ० ॥ वाचमें जो आया शुद्ध साखी ब्रह्मवेतन जो बाचही के साथ पुनि त्यागन सो होवेहै । चेतन के लिए मुनि नाना सो उपाव करै लक्षना जो जहत मानै हाथ नहीं आवै है ॥ चेतन से भिन्न सो असत जड़ दु- ख मिथ्या ताके ऋषि जानो ते पुरस्वारथ सिद्ध नाहीं है । याते महावाक्यं माही जहती जैसे नाही वनै लक्षना अजहत तैसे एमी नाहीं बनैहै ६४३ स० ॥ लक्षना अजहती सो जहां होय तहां बाच्यहि अर्थ सो सारा रहावे । ततपद त्वंपद वाच्य जोइ संग्रह पुनि तिस्ते अधिकता सुपावे ॥ लक्षणा अजहती महावाक्य विषे अंगी- कार करे उरमें जब ल्यावै । वाच अर्थ जोई जग पादन में बुधहे ऋषिजू वह सारा रहावै ६४४ क० ॥ वाच्यहि अर्थ महावाक्य के मंझार माहीं एकतामें यही सुबिरोध महाभारी है। याते वाचं सो अर्थ के विरोध के हटाने लिए लक्षणा सूअंगीकार बु- दीवानो करी है ॥ लक्षणा अजहत माने ऋषि महावाक्यन में धर्म विरोध पुनि दूर नहीं होवेहे । याते महावाक्य मा अजहतहुकी रीति तजो भाग त्याग लक्षणा सो अंगीकार योगहै ४५ स० ॥ ततपदबाच्य जो ईश्वर है पुनि तुम पद वाच्य जो माधवराम सुखसागर। ६३ जीव कहावे । तिनके पुनि धर्म सो आपुसमैं ऋषि बहुत विरोध सो दूर बहावे ॥शुद्ध साखी ब्रह्म असंग जो चेतन लक्षणा द्वारनते लखिपावे । यह को भाग त्यागसो लक्षणा कहे जेहिते जीव ईश अभेद द्वै जावे ४६ क० ॥ माया मायामै अभास अरु माया का दृष्टान्त चिद सर्वशक्ती सर्वज्ञ जो ईश्वरव्यापी है। उत्पति पालन संहार करे जगतको ततपदवाच्यं यह पीछे बहु बखान्यो है ॥ अविद्या बिस्टी मै अभास पुनि चेतना दृष्टान जाको अल्पशक्ती अल्पज्ञई यह वंपद वाच्यहे । तत्त्वमसी महावाक्य दोऊ पद वाच्यनकी यकतो जनावै पुन सम्भवै सो नाही है ६१७ याते भासके सहित माया मायाकृत ईश्वर जो सर्वशक्ती सर्वज्ञ सो विभूसभ प्रेरिके । इत्यादिक सुधरमन को वाच्य भागत्याग करै मिथ्याजान्यो रमाहि राखै सो भुलायके। चेतन भाग विषय ततपदकी सुभाग त्याग लक्षणा है ऋषिवर कहै मुनिनायके । तैसे भास के सहित जो अविद्या अंशनिऊ शक्ती अल्पज्ञाद धर्मसो अविद्या अंश.जीवके ६४८ स० ॥ त्वंपद वाच्य जो भाग बिरुद्धहै ताको ऋषी पुनि त्याग सुदेवै । चेतन भागमें त्वं पदकीभागत्याग सो लक्षणा विरुद्ध को खोवे ॥ याते ईश्वर जीव स्वरूप विपय शुध चेतन भाग जो लक्ष सोहावै । तिनका ऋषि आपसमाहिं भले एक तासु बनै न विरोध रहावै ६४६ तत्त्वमसी महावाक्य जोई यह लख चिंदारथ अभेद जनावे । महावाकत्रिधा पुनि और जोई जीव ईश्वररूप को वह जनावे ॥ ऐसे अर्थ लखो तिनहुके विषे जीव ब्रह्महिलक्ष्य अभेद लखावै ।ताते ऋषी यह गोप महा जो विवेककर सोइ आनंद पावे ६५०० ॥ जीव ईश.पादमांहि वाच का विरोध भारी कर यह भात त्याग लख रूप जानिया । जीव ईश लख दोई दुनों का अभेद कर सोई नित चिदानन्द अहंलेए मानिया ॥ बन्ध मोक्ष मोमें नाहीं नेति नेति से निषेधे सब सदा सो असंग अजरेक को प्रकाशिया । अहं अगम अपार माया वृष्टी को विकार नहीं नित में अदयत निररूप विभूसारिया ६५१ अहं सब को अधार शिवानन्द नित अचल सो साखी शुद्ध रूप सब जग को प्रकाशिया । नाम रूप जोई त्रिधा लोक में सरूप मेरा जैसे हेम मारूबार भूषन सो भासिया ॥ कल्प के अन्त माहीं सबको संहार कर आप में अभेद करो अहं अवनासिया। निगम सो वाक मेरी अहं को प्रमान कर अपनी सरूप काहि अहं नमामिया ६५२ व्यवहारक माधवराम सुखसागर। प्रमारथ यह माधौ का सरूप जानो याही जान ज्ञानवान तिनहिं ध्यान करै हैं । ज्ञान से विहीन जोई करमवेत्ता जग माहिं सो भी माधवरामही को निशि दिन ध्यावहै ।। अंतरशुद्ध ज्ञान पाय मोक्षका अधिकारीहोय माधव लख रूप काहि गुरुद्वारा पावै है । जिस लखरूप जानजीव लख रूप होय सोई निज जानो ऋषि तुमरासरूपहै ६५३ स०॥ देश जो काल उपाधि विना ऋपि तेरो सरूप मैं तोहिं बतायो। याही विषय मन ठौर करो अब याते परै नहिं और सो जान्यो। बेदशिरा सब वेदान्तन के मत ऋषि मुनि यथारथ पूरख गायो। सोई माधव दयासिन्धुके प्रभावते तिनका प्रसाद मैं तोहिं जनायो ९५४ यह सुख हेत धरौ उरमें भवमण्डल ते उपराम सो होऊ । श्र. वण वेदान्तन करमनते जब आतमज्ञान अखंड सोहोऊ ॥ कर अंत्रवृति उपराम होय विन उपशम आनंदना ऋषि जोऊ । अंत्र मुख विन शान्त नहीं यह विदित सना- तनवेदन गायो ५५ करम वेदान्तअनेकजन्म वहु श्रवण अधीन करै विधि कोई । चिद जड़ ग्रंथ प्रभेदन वाली मनीपा भई न तो क्या फिर होई ॥धारन पिना सब वृथा होय जिमि आरतबादखी।कुन्द सोई । ताते ऋषी यहि धारोभले उर आतमज्ञान कह्यो सुख जोई ९५६ आतम के सुख ज्ञान विना नर भवनिधि हेतु भव भोगन से।। यहि ते दुख जीव अपार सहै जिमि मारू के वारि में मृगालोभावे ॥ सुत मात पिता तिया बन्धु कुटुम्ब को तन मन लाय भली विधि सेवे । तिनके तन बारम्बार धरे चि- दमोक्ष विनाजगमाहि रहावे ६५७ याते भव हेतु सम्बन्धनात्यांग एकान्त विषय ऋषि ध्यान लगावो । भव भोगनको दुख रूप सो जानिके याके निमित्त न करम कमावो। सुख दुख आयपरै तन पै प्रालब्ध सुजानि सुख खेद न मान्यो । कृत पूरब संचित नाश भये तिनका प्रसाद दुख मूल अव देह नहीं फिर पाऊं ६५८ ॥ दो० वेद अर्थ अनुसार में हे ऋषि कह्यो बखान । तात्पर्य यहि समुझि के कहि बैठ कह्यो हरि ध्यान ६५६ ॥ जब तक रहै कलेवर करम करो शुभ तात। लोक विषय अपयश नहीं अंत विषय सुख शांत ६६०॥ चौ०॥जो कुछ कहन योग्य था जोई। ऋपिवर तुमप्रति कह्यों में सोई ॥ तदपि त्र द्वारे-भवताई। और उपाय कहो सुखदाई ६६१ जिस कृत लागि जीव सुख पावे । धो- - माधवराम सुखसागर। ६५ य पाप हर माहिं समावे ॥ को दुखरहित दुःख सहिकोई । जग सम्बन्ध सुसंगते होई ६६२ जन्म मरण तजि बैसुख लेवे । तजि कुसंग सतसंग जो सेवे ॥ सतसंग करे जग में तजि रागा। शरीर सुखन में कर बैरागा६६३ पत्नी पुत्र गृह पशु जोदासा। द्रव्य भूमिले जो कछु पासा ॥ इनसहि होइ जगत में जोई । इनमें रागकर नहिं सोई९६४इसकी माया यह सब जाने । इसे इनको करै सन्माने॥ दिवस चारकेहैं सब संगी। अंत जगत सहिहै क्षणभंगी ६६५ मृति लोक जो करम ते आवे । बटाउस मरहि के चलि जावे ॥ यह विचार उरमें ठहरावे । विहितकर्म निष्काम कमावे ६६६ ब्राह्मण संत ऋषी मुनि जोई। आश्रम आय परै जे कोई ॥ यथायोग्य सबको सन्मा- नै । पर विशेप सन्तनको जानै ६६७ ईशरूप सुखदै दुखनाशन । आदरसहि राखे निज आसन ॥जो अशन बसन ईश्वर घर देवे । सो कपटरहित दै संतन सेवे ९६८ भक्ती दीनदया उरधारी। सरलसुभाव मानको मारी। यह शुभलक्षणसहित ऋषीशा। सन्त भगतकर होउ जो ईशा ६६६ पाणि जोर सुदीन अनुरागे । विनय कसो सन्तनके आगे ॥ भवनिधि घोररूप दुखभारो । आप शरणगत मुझे उबारो ६७० जगमें बहुत दुःख अतिपाये । हे प्रभु अवतो उनहिं छुड़ाये॥जो संत सेवते गतिनहिं पावे। और उपाय न तिसे रहावे ६७१ ॥ फ० ॥ पायउ दुखभारी जग बहुत कलेश नाथ कीजे उपाय ईश हमको उवारिये। पुनि पापके अधीन भयो माया विपय गलतान महादुख फांसी काट मुझे अपनाइये।। पंचमत देहधार जन्मो अनेक बार मृत्युलोक बनमाँहि मुझको निकालिये । जगमें विचार देख्यो कोऊ न अलम्ब पायउ तुमरे चरण सामलीन्यों है तकाये ९७२।। स० ॥ ब्रह्म अव्याकृत चिदानन्दको नित वेद पुराणहि करत बखाना । सोई संत स्वरूपको धार फिरो भवजीव कल्याणके संत निदाना ॥ भवसागरमें सोई पारभयो तुम्हरे पद को जो कियो कोई ध्याना । भवमंडलके सब दुःखहरयो शुभधर्म को विरधकरौ नित नाना ६७३ दीनदयालु सदा जगमें जहां जाहु सुजीवन देहु कल्याना । संत अ- पार अगाध महा जिनके गुण गावत वेद पुराना ॥ करुणानिधि संत विना जगमें अब कौन सुने हमरे दुखनानां । यहिते हम जानि भजे पदपंकज आज हरो हमरे दुखनाना.६७४॥
. . ६६ माधवराम सुखसागर। दो० ॥ माधवराम सुख ब्रह्मको चरण देहु मोहिं दान। दुखभव सिन्धु छुड़ायके बेगिकरौ कल्यान १७५ चौ०॥ ऐसे भगतकरोगे जवहीं । संत दयाल होगे तवहीं । वेदमंत्र ब्रह्मविद्या जोई। फिर उपदेश करेंगे सोई ६७६ अज्ञानसहित संशय जंजाला । संत नशा गे ततकाला॥ पाये ज्ञान निःसंशय हो । भंवमें रहि निर्लेप रहैहो ६७७ प्रालब्ध जो सुख दुखभोगी। तनको त्याग जात जहँ योगी॥तहां जाय ऋषिप्राप्त सुबेहो। संशयरहित मोक्षगति पैहो ६७८ ॥ ।। अव्रत विषय जवतकहै कलेवर ऋषिवरभवहित पुण्य कमाओ। यह ज्ञान वैरागको धारि हृदय भव भोगनते उदासीन रहाओ।संसारसू सिन्धु अपार दिखाय समय मूड़ि आय नहीं भयपावे । जो कछु योगथा सोई कहेउँ अब और जू संशय हे देह सुनायो १७ ॥ चौ०॥ यहि विधि मुनिराजनकी वानी । संत ऋषी सुनि अतिसुखदानी ।। हरप अपार अनँद उरभीनो। अस्तुतिसहित प्रसन्न ऋषिकीनो ९८० हे प्रभु चिदानन्द गुरु मेरे । तुम सुखंदाई जीवनकरे। माधौराम मोक्ष सुखरूपा। सो बपु लीनो जगमें अनूपा ६८१ कसना पूछौ दुख संस हमारे । भव जीवनहित . सुखतन धारे॥ तो पदपंकज दरशको पाई। भव दुख जीवन जात विलाई ४८२.॥ क० ॥ नाथ मुख अम्बुज ते वेदवाक अमीझरै सुरमानो किरण अज्ञानतम हने है। आपका उपदेश सुन तृप्ति ना पावे उर सरिताको पाय जिमि सिन्धु ना अघावे है ।। माधवराम का सुयश सुनि उरमें अघावे जोई तिनका विशेष चिदमुख नहीं पावेहै। याते माधवका स्वरूप चिदानन्द जो अखंड जोई मुझको सुनाओ और जोई सुख- दाई है ८३ प्रणवकी उपासना सो मुझको सुनाओ गुरू जिन पदपंकजको मन्द मृत्य जानिके । समाधी में अखंड योगी ब्रह्मका सो लेवे सुख सो भी सो सुनायो मुझे जग सुखदायके । थोरे में जनायो मुझे जिसमें सो लखि पायो मेरी सो कल्याण लिये तुही मुनिनायके । तुमरी समान जग और न देखाई देत- जिस आगे दुख शंका कहों में सुनायके. १८४ जगमें सो गुरु विना कौन सो.सहाई होत जगमाँहि जीव सब रहे हैं मलायके । तिनका संयोग पाय दुख भ्रमनाही जावे स्कनके ओक ६७ माधवराम सुखसागर। जिमि नहीं सुखदायके । अनाथन के नाथ उपकारी दयासिन्धु गुरु सदी सोअनी- हरहै सबके सहायके। नाथ पदपंकजको पाय दुखनाही जाय तिसका सो जगमाँहि कोई ना सहायके ६८५ ॥ स ॥ यहि विधि संत ऋषी मतिमान जो गुरुपद माँहि सो कीन वखाने । नरायनराम महामुनिनायक वाक सुने ऋषिकी सुखमाने ॥ कहा मुनिधन्य ऋपी मतिमान तुम्हीं धौ ईशको चाहतपाने । उपासन प्रणोकी सुखदाई समाधीकी रीति सुनायो तोहिकाने १८६ समाधी विना ऋषिवाक इन्द्री मननेक उपायते जीत्यो ना जाये। मन इन्दी सो जीते बिना जगमें सुख माधवराम कौन नरपाये ॥ मनवाक इन्द्रीके अधीन फिरे सुख लेश नहीं जगमें दुखपाये । यहिते मन इन्द्रिन वाधनके हित उपासन प्रणो किये देह सुनाये १८७॥ चौ०॥ प्रणवरूप ओंकारहै जोई । संग्रह ध्यान करौ तेहि सोई॥मांडक प्रशना- दिक श्रुतिसारे । बहुत उपखेदन करत उचारे ८८ ऋषि मुनिआदिक जे बुधिमा- ना।तिन प्रभाव से किहिन वखाना॥ तेहिकी रीति में तुमहिं जनायो। जेहि सुन जग ते जे आनंद पायो SEE प्रणव अक्षर ब्रह्मस्वरूपा । सो ब्रह्मरूप में चिदाअनूपा॥ऐसे निजमतकी गतिधारे। अस्थिरकरौ इन्द्री मनमारे ६० याके समान ध्यान नहिं औरा। वेद ग्रंथ सव देत ढंढोरा ॥ दुइप्रकार प्रणवका चिंतन। गायसुनावे सकल उपखंदन ? एकतौ पारब्रह्मकर रूपा । प्रणवक चिंतनकहै अनूपा ॥ दुसरा अपर ब्रह्मते जानो। मांडुक आदिक करत बखानो ६६२ निर्गुण ब्रह्मसदा सुख जोई । पारब्रह्म कहै ताको सोई ॥ सगुण ब्रह्मको अपर बखाने । जे ऋषिमुनि जगमाहिं सपाने ६६३ पारब्रह्म रूपते मनोकाचिंतन । जो करै मोक्षको पावै सज्जन ॥ सर्गुण निर्गुण यह भेदते सोई । प्रनोका चिन्तन दुइविधि होई ६६४ अपर ब्रह्मकर प्रनोको ध्यावे। ब्रह्मलोक वह तनवजि जावे॥ पंचभूत तनधरि जगमाहीं। सगुन उपासक आवे नाही ६९५॥ क० ॥ याते निर्गुण उपासना विधि में लखाऊं तोहिं जाते ज्ञान मोक्ष यह तनमें सो पावेहै। सगुण उपासनकी विधि न बखानकरो जामें ज्ञान मोक्ष नर चिरमें सो पावेहै ॥ जाको ब्रह्मलोककी सो कामना सो होवै उर निर्गुण उपासनाते कामना प्रतिबन्धहै । ज्ञानद्वारा ततकाल मोक्ष सुखपावे नाहीं किन्तु ब्रह्मलोकहीको प्राप्त सो होवे है ६६६ हिरण्यगर्भकी समान तहाँ भोगनको भोगै भले वेद गुरुविन अन्त १७ १८ माधवराम सुखसागर। ज्ञानं मोक्षपावे है । याको ब्रह्मलोककी सो कामना सो नाहीं होय इसी लोकमाँहि ज्ञानढके मोक्षपावे है । यहिभाँति सर्गुण उपासनाका फल जोई निर्गुण उपासनाके अन्त सुभतहै । याते निर्गुण उपासनाको उत्तम विचारो ऋपि इसकी समान कोई नहीं सुखदाई है १६७॥ चौ०॥ जो कछ कारण कारज होई । प्रणवरूप पहिचानो सोई ॥ याते सर्वरूप अंकारा । भेद नहीं मुनिकहै बिचारा EEE सर्वपदारथ केरे माहीं । नामरूप द्वैभाग दिखाहीं ॥ तहाँ रूप भाग नामनमें जोई। नामै रूप पिछानो सोई ६६६ रूप भाग नामहि कर रूपा । यह विचारि ऋपिलखौ अनूपा ॥ सर्वपदारथ केर अकारा । ताको नामते होग विचारा १००० ग्रहन त्याग वा नमनते होई। यह प्रसिद्ध जगमें है सोई ।। केवल आकारनते व्यवहारा। नहीं सिद्धहोवे जगतमँझारा याते नामहि सार मुहावे। अकार नाशभय नाम रहावे ॥ निमि वाधहोय खित कुम्भय जोई । मृतिका शेप रहै तहँ सोई २॥ क० ॥ तहाँ घटिक मृतिकासे प्रतख स्वरूप नहीं माटीका स्वरूप ऋषि घटही पछा- निये । तिमि सो अकारणके बाधमय माटीनाई नाम शेष भाग जोई पीछे रहिजाये। तासे सो अकार भाग प्रत्यक्ष सो नाहीरहै नामही सरूप सो अकार भाग जानिये । जिमि घटआदिक में मृतिका सो व्यापीरहे घटआदि परस्पै सब व्यभिचारी है ३ याते घट औ शराव आदि मिथ्यहि सरूप जानो तिनमाहिं अनगत मृतिका सुसत है। वैसे सब घटन की नाना सो अकारखने तिन सब घटमाही अछरदुई एकहै ॥ घटके अकारन सो परस्पै व्यभिचारी सबघट माहीं एक नामही प्रमान, । याते मि- थ्यासो अकार सतनाम ते पृथक नाही इन्द्रीदारे ऋषिवर जोईभान होयहै ४ यहि भाँति सर्वपदारथ अकार जोई आपने के नामनते भिन्न कछु नाही है। किन्तु नामहिं सरूप अकारन के रूप जानो सारेनाम ओं गतिसो भिन्न कछु नाहीं है ॥ ॐकार सरूप याते नामका सरूपलखो बाचक सो पदनको नाम बुध गावे है। लोक सब वेदन के शब्द अपार जोई ओते प्रगट होवे श्रुति नित गावे है ५ निखिल सुकारज मुकारन सरूप होय भूतनको कारज जिमि भूतही सरूपहै । याते ॐका सुकारज सुवाचक शब्द ॐका सरूप नित वेदसू वखानेहै ।। यहिभांति सबै पदारथ अकार ६६ ६ माधवराम सुखसागर जोई नामका सरूप सब प्रत्यक्ष सुनाही है । याते सर्व नामसुॐकारका सरूप जाने ऋपिसर्वरूपही ॐकारका सरूपहै ६ जैसे सर्वरूपसू ॐकारका सरूप जाने तैसे सर्व रूप नितब्रह्मसू अखण्डहै । याते प्रणो ब्रह्मका सरूप ऋषि जानो भले किम्बा बरमही को बाचकसू प्रयोका सरूपहै ।। ॐका सुवाच्य अर्थ ब्रह्मचिदानन्द नित याने बाच वाचक अभेदही रहावे है । याते भी ॐकार नित ब्रह्मका सरूपवने कोविदसू ज्ञान- वान सकल वखाने है ७ बिचारकर देखिये जो ॐ अक्षर ब्रह्ममांही जिमि अहि रज्जू की समान सो अध्यासहै। याते तिसका धिष्ठान ब्रह्म ध्यासका सरूप जोई कल्पित धिष्ठानरूप होय न्यारा नाहीं है । याते भी ॐकार ब्रह्मरूपही पछाने भले चिंतन सो करै ब्रह्मरूपही ॐकारहै । रूप ब्रह्मकाहि आतमते अभेदकरै युगनको चिंतन सूकरै एकरूपहै ॥ चौ०॥ याते आतम ब्रह्महै जोई। आपसमें अभेद है सोई॥चारपाद ऋषि ब्रह्मके जानो । तैसे जीवके माँहि पिछानो पाद नाम भागनको जानै । कोई ताको अंश वखाने । हिरणगर्भ बैराट जो ईशा। ततपद साखी लखो ऋषीशा १० चारपाद यहि ब्रह्म मझारा । मुनिवरगन यहि करत विचारा ॥ प्रागविश्व तेजसहै जोई। त्वंपद साखी तामें होई ११ चारपाद यहि जीव में जानो । जीव साखी के तुरी पिछानो। स्थूल परपंचसहित जो चेतन । विराट कहै ताको मुनि बेदन १२ ॥ स० ॥ विष्टस्थूल अभिमानी जोई विसुनामसुजीव कहै बुधिमानो। स्थूल उपाधी बिराट विपय पुनि तैसे विश्वके माँहि पिछानो ॥ युगमाँहि उपाधी समान भये सो अभेद सरूप दोहू एक मानो। याते बिराटही विश्वहै रूपको न्यारा नहीं कहूँ लेश समानो १३ विश्वरूप बिराटके अंगसू सात है सरगहि लोकसु मसतका जानो। वायू पानहै सूरज नेत्र महा अपारहि व्योम धड़ानो ॥ पृथ्वीपद मोड़ सिन्धु भेये अ- गिनी मुख जामें होम पिछानो । यह सातहि अंग विराटके हैं सो विराटके अंग में विश्वहै सानो १४ ॥ क- ॥ यावे सो बिराटकरे अंगसू बखाने ऋषि विश्वरूप वैराट केसो मोख खोड तीनहै। पंचप्राण ज्ञानकर्म इन्द्री चार अन्तसहै भोगनके साधन यह मुखकी समान है। स्थूल शब्दादिकको वाहिजवृत्तिकर भोगे जाग्रत अवस्था में विराट विश्वरहिहै।
१०० माधवराम सुखसागर। स्थूलकास भोगता सो विश्व औ विराट याते जाग्रत अवस्थावाला वाहिजवृत्ती जावे है १५ प्राणआदि ओनईस मुख भोगनके साधन जो ज्ञानइन्द्री करमइन्द्री अन्तःक- रण जोई है । दशचार आपने यह विषयके मझाररहै आपनी सहायलिय देवनको चहैहै ॥ देव विषयकी सहायबिन भोगनको भोगै. नाहीं जड़की समान प्राणइन्द्री सतोरहितहै । दशचार त्रिपुटीय पंचप्राण ऋषिवार विश्वरूप वैराट केसो मुखीये बखानहे १६ ॥ चौ० ॥ मन बुधि चित हंकारहै जोई । ज्ञानइन्द्री करमन जो होई ॥ अध्यातम रूप सो इसको जानो । अद्भुत तिनके विषय पिछानो १७ तिनके सहायक सूरज़ कहावे । अन्धदैविक मुनिवर तेहि.गावै ।।दश चौ त्रिपुटी प्राण खंचावै। विश्व बैराट के मुख बुधगावै १८॥ क० ॥ विश्व औ विराटका सो सदा सो अभेद जैसे प्रनोकी सो मात्रा में प्रथम अकारहै। ताका सो विराटरूप विश्वते अभेदजाने चारपाद ब्रह्मकामें प्रथम विराटहें ।। चारपाद आत्माके प्रथम सो विश्वअहै तीनों में समान धर्म प्रथम सोऋषिहैं। विश्व औ बिराट औं अकार जोई मात्राहै तीनोंका अभेद मुनि चिन्तन सो करै है १९ ।। चौ०॥सात अंग मुखं जो ऊनीसा। विश्वविराटके कह्यो ऋषीशा ॥ तैसे सात अंग अठग्यारा । तैजसके मुख लखे विचारा २० पर तू इतना भेद पिछाने । विश्वके अंग मुखजु मैं बखाने । सो तो ईशरचितहै सोई। वेद उपनिषद कहै मुनि जोई २१ तैजसके इन्द्री जो देवता । त्रिपुटी विषय भोग जो करता ॥ मूर्धादिक अंगहि ऋषि जोई। मनोमाहिं सुखमहै सोई २२ स्थूलका भोक्ता विश्वपछानो । तैजसका पुन सूक्षम जानो ॥ तेजसके सभदादिक जोई । मानस भोगकहै बुध सोई २३ याते सूक्षम ताहि बखाने । जो स्वपने में भोगको ठाने । तिनकी अपेक्षा करके सोई। विश्वभोग शब्दादि जो होई २४ सो स्थूल वाहिज विश्वजावै । अन्तर प्रज्ञानहिं ठहरावे । तैजसकी ऋषिवर सुधजोई । अन्तरतजि नहिं बाहरहोई २५ जैसे विश्व विराट यक जानै। तैजस हिरण्यगर्भ तिमि मानै । यामें दोष नहीं ऋषि कोई। दोनों अभेदरूप इक सोई २६ ॥ सः ॥ हिरण्यगर्भ सो तैजसमाहिं भले पुनि सूक्षम उपाधी दोहू में समानो।
- । माधवराम सुखसागर। १०१ दोनोंको धर्म समान भये ऋषिव्यति अभेदहि रूप एक जानो ॥ दूसर कारकी मात्र ॐकार जोतिस्ते अभेदहि चिन्तन ठानो । आतमके चहुँ पादनमें ऋषि दूसर पाद सुतैजस जानो २७ चहुँ पादन ब्रह्मके माहिं बिषय हिरण्यगर्भ सो दूसर पाद सुहावे । कारकी मात्र कार दुती पुनि तीनों के धर्म समान रहावे ॥ यहते तीनों कायकतासू चिन्तकरै पुनि प्रागको ईश्वररूप ठहरावे । उपाधी सुकारन ईश्वर माहिहै वैसे प्रागके माहिं रहावे २८ दूनों के धर्मसमान भये यहिते यकरूप अभेद सोहावे । तीसरपाद है ईश्वर प्रागमें तीसरमात्र ओंकारकी आवे ॥ तीसर तीनों में धर्मसमान है तीनोंका यकताहि रूप बनावे । जाग्रत स्वप्नको ज्ञान जोई सुखोपति माहिं अविद्या होजावे २६ क० ॥ याते सुप्रज्ञानघन याहीको वखाने मुनि आनन्द शुभक यहिमाग श्रुति गावे है। अविद्याकर आवृत चिदका आनन्द जोई ताको यहिमाग भोगै आनन्दमुक कही है । जैसे तैजसो विश्वकासू भोग त्रिपुटी ते होय तैसे भोगनको त्रिपुटीसू पागमें रहावे है । चेतनके प्रतिबिम्ब सहित अविद्यावृत ताकोस् अधि आतमरूप भेदसू वखाने है ३० अज्ञानकर आवृत आनंद स्वरूप जोई अद्भुत अधदइउइसर कहावे है । यहि भाँति विश्वकी सोबाहरप्राग जानो ऋषि तेजसकी बुद्धी नित अन्तर रहावे है ॥ प्रागस प्रग आनधन पीछे में बखान आये तीनोंका सुभेद सु उपाधीकर पावे है । सूक्षम अस्थूल अग विश्व में उपाधी जानो सूक्षम अज्ञान युग तैजसके माहीं है ३१ उपाधीकी सो न्यूनताते बहु- लताते भेदहोय प्रागके मँझार माही एकम् अज्ञानहै । परमारथ स्वरूप ऋषि देखिये विचारकर तीनों के विचार माही भेद कछु नाहीं है । प्राग विश्व तेजप्समें अनुगति चिद जोई सुखम स्थूल पुनि कारणते रहितहै। तीनों में धिष्ठान ऋषि तुरिया स्वरूप रहै वाहिज अंत्र प्रागनाहीं व्यापक अखण्डहै ३२ प्रज्ञानघन नहीं पुनि करम इन्दी ज्ञान इन्दी मनबुधि बानीकेसू विषय ऋषि नाहीं है । ऐसा तुरियास्वरूप परमात्मा कारपूजाने चतुस्थपाद ईश साखी शुद्ध ब्रह्महे ॥ यहि भाँति आत्मा दोप्रकार रूप जाने एकतो परमारथ है दूसरा व्यवहारहै । चारिपाद माहीं पुनि तीनसो परमारथ वाहि एकपाद तुरिया सुसाखी शुद्धरूपहै ३३॥ चौ०॥ युगस्वरूप जिमि आतमकेरे । तैसे मनो माहिं सुहेरे । अकार उकार - .
१०२ माधवराम सुखसागर। मकारहै जोई। तीनोंमात्रा जो ऋषि होई ३४ सो परमारथ नाहिं सरूपा । सुनिवर. कोविद कहै जो भूपा॥ तीनों मात्रा केरे माँही। अस्ति भाँति प्रियरूप जो आही ३५ अधिष्ठान चेतन सुखरूपा । सो परमारथ लखौ अनूपा ॥ परमारथ वपु प्रनो केरे ताको श्रुति अमात्रहै टेरे ३६ ता परमारथ रूपके माहीं। मात्राविकार कहाँ ऋपि नाहीं ॥ याते अमात्रा वेद उचारा । युग सरूपवाला ॐकारा ३७ ॥ क० ॥ताकोदोष रूपवाले आतमते अभेद जानै जिमि हेम कटनके नदहि सरूप है। स्थूल प्रपंचसहित बिष्टी औ समष्टी सव विश्व औ विराटहि अकारका अभेद है ।। आत्माके पादमाहीं विश्वका सुआदि जाने प्रणवकेरी मात्रामें प्रथम अकारहै । याते दोनोंका सरूप ऋषि इकता पिछाने भले जैसे घट मठ आदि माटीका सरूपहै ३८ तैजस हिरण्यगर्भ सुखम परपंचसहित ताको सुउकार रूप जानेसु अभेदहै। तेजसभी दूसराहै दुतिआ उकार जाने दोनोंका सरूप नित जानेसु अभेदहै । ईश्वर माग दोऊ कारन उपाधीसहित ताकोसुमकाररूप श्रुतिसू वखाने है । ब्रह्म आत्माके पादन में तीसरा प्राग ईश प्रनोकेरी मात्रामें तीसरी मकारहै ३६ याते ईश्वर प्रागका मकारते अभेद जानै तीनों माहिं व्यापक जोतुरिया सरूपहै । ताको प्रनोकी सुमात्रामें व्या- पक अमात्र जोई ताहीसू अभिन्नरूप जानै सुखदाई है। विश्व तेजस पागमाहीं तुरी ऋषि व्यापकहै जैसे घटाकाश मठाकाश ओतप्रोतहै । तैसे प्रणोकी जूमात्राहै तिनों के मझार माँही व्यापक अमात्रहै चिदानन्दरूपहै ४० याते प्रनोकी अमात्रको तुरिया सरूपकाहि एकता अभेद जाने जैसे महाकाशये।आत्माके पादमें ॐकारजो अमात्र है.लै चिन्तहै इकतासु जानकर कीजिये ॥ विश्वरूप अकार जोई तैजस उकाररूप तिसका अभेदकर एकरूप जानिये । ऐसा जो विचार करै ताकोले चिंतकहै और ऋपिमात्रामें यहीरीति मानिये ४१ जा उकार माहीं सो अकारका अभेद कीने तैजस सरूप सू उकार जोई भानिये । प्रागजू मकाररूप ताही में अभेद करैतुरी में मकाररूप प्रागहीको सानिये ॥ स्थूलकी सो उत्पति सूक्षमते होय ऋषि ताही के मझार सानै बने उर.जानिये । याते.विश्वं.जो अकाररूप तैजस उकारमाही ताको लेकरै जोई महामनि ज्ञानिये ४२॥ चौ०॥ सूक्षम के उत्पति है जोई । कारणते होवे ऋषि सोई आयाते-तैजसरूप . . ! माधवराम सुखसागर। १०३ उकारा । कारण प्राग मकार मझारा ४३ याते लै तामें बिन जावे । होय अभेद दोष नहिं आवे॥ विश्व प्राग तैजसहै जोई। ईश बिराट सूत्रले सोई ४४ आत्म ब्रह्मकी विष्टिसमष्टी। अपनी अपनी सारी त्रिपुटी । तिन सबनको ग्रीहनजानो। नहिं कछु चाकी रह्या हिरानो ४५ प्रागहि रूप मकार मझारा । लीन समगरमै उकारा ॥ ताम: कारका तुरिया जोई । प्रणोका परमारथ होई ४६ अमात्र ताको कहै मुनीशा । लेम- कार तहँ करो ऋषीशा ।। प्रणोका परमारथ जोई। तुरी से अभेद रहे नित सोई ४७ सो तुरिया शुद्ध ब्रह्म अनामें । ईश प्राग युग कल्पित तामें ॥ जाके विपे जो क- ल्पित होई । ताको रूप होय ऋषि सोई ४८ याते ईश्वर प्राग मकारा। तुरी में अभेद बनै संसारा ॥ जिमि बीजते वृषहोय लैजामें । तासे भव उत्पति लै तामें ४६ ॥ स०॥ प्रणव पमारथ अमात्रमें यहि भाँति सों लीन किया अपि सोई । सोहब्रह्म चिदानन्दहो मुझमें नहीं जकतकहु दुख सोई ॥ ऐसा एकाग्र चिन्तनकरै यहि उत्तम चिन्तन ठाने सोई । स्थावर जंगमरूप असंग अदयता संसारी नित मुक्तविभोई ५०॥ चौ०॥ प्रणोका परमारथ जोई । निर्भय ब्रह्म सुमेहीं सोई ॥ ऐसा चिंतन जे करें कोई । ज्ञान उदय ताके उर होई ५१ ॥ क० ॥ याते ज्ञानद्वारा मुक्ति सुख फल देनेवाला प्रयोकी उपासनासू निर्गुण याही जानिये । पूरब प्रकारते ॐकारका सुब्रह्म जाने ध्यान किये ज्ञानद्वारा मोक्षपावे दा- निये ॥ इसलोक ब्रह्मलोक भोगनकी इच्छा जाको तीन वैराग जाके उर नहीं पाइ- ये। हटके अधीन बैंक कामनाको रोकिकर धन पुत्र आदिनको त्यागन जो कीजि- ये ५२ ब्रह्मवेत्ता गुरूते उपदेश लैके ऋषिवर प्रणव ब्रह्मरूप कर ध्यान जू कमावेहै । ताको भोगनकी कामना सुअज्ञान में प्रतिवन्ध जानों ज्ञानद्वारा ततकाल मोक्ष नहीं पाये है। किंतु ध्यान करतही सो पंचभूत देही त्याग अन्न नई देहको सोधार फिर लेवे है । इसलोक भोमनकी कामना सु रोककर प्रणवब्रह्म रूपकर ध्यानकू कमावे है ५३ याते इसलोकमें अनन्तसो विभूतिवाले सतसंगी कुलमें सुस्वच्छ तन पाहै। पू- ख कामनाका फलभोग तहां सारापावे ऋषि पुरखजनम विषयध्यानप्रणवकी जो कीन है। तिसके संस्कारनते फेरिकै विचारकरै अथवा शुद्ध आनविषय फिरि लगजावे है। ताते ज्ञानके इसलोक के मँझारमाहीं मिले माधवराममें विदेह मोक्ष पावे है ५२॥ - - : माधवराम सुखसागर। चौ०॥ ब्रह्मलोक के भोग हैं जोई। तिनकी कामना रोकिके होई ।। ब्रह्मरूप कर प्रणो सुकाही। ध्यानकर ऋषिवर मनमाही ५५ तो पंचभूत तन इहां त्यागी । ब्रह्म- लोक जावे बड़भागी ॥ तहँ मानुष पितर देवनको जोई । दुर्लभ भोग स्वतन्त्रहि होई ५६ तहाँ उपासक आनंद पावे । जो चाहे सोई रसखावे ॥ जितनी हिरनगर्भ की विभूती। सतसंकल्पते इसको होती ५७॥ स०॥ज्यहिमाग ब्रह्मलोक कोजावे सुमारग कर्मते वेद बतावै ।जो पुरुष सो ब्रह्मकी करत उपासन मन बुद्धी बाँधिक ध्यान लगावे। ताकी देह विषय दशइन्द्री जू अन्तस यदपि सारे सु मुरछि रहावे । कहिजाने विषय समरथ नहीं यमदूत नहीं तेहि नेरे में आवे ५८ ताके लिंग शरीर लैजावे नहीं पुन बनीभीमानीका देवसो आवे । स्थूल शरीरते सूक्षम निकास्योपासकको निज लोक लैजावे ॥ तहाँ अगिनी के लोकते दिनका अभिमानी सू देव सुआयके ताको लैजावे। शुक्लपक्षका देवसू तहां आवे सो उपासक को निजलोक लैजावे ५६ ।। चौ०॥ताते उत्तरइन पटमासा। तिनका सुर आवै तेहिपासा ॥ अपने लोक ताहि लैजावै । सम्बतसरका सुर तहँ आवै ६० अपने लोकन लै सिधराई । सूरज निज अपने लैजाई ।। ताते चन्द्रदेव लैजावै । विजुलीका अभिमानी आवै ६१ ॥. क० ॥ अपने सुलोकलैके तिसको सिधारे ऋषि आदर अनन्द सब देवनते पावे है । दिबसू पुरुष हिरण्यगर्भ की सुअज्ञापाय उपासक ढिग हिरण्यगर्भ लोक विषे आवै है। हिरण्यगर्भकी-समान शुभ सूरतीको धारै सब बरुणलेोक दामिनी के लोक ते लैजावे है। बिजूका अभिमानी सुर वरुणलोक तक आवे बरुण ते लैके इन्दलोंक में लैजावै है ६२ हिरण्यगर्भलोक बासी पुरुष औ उपासक साथ इन्द्रलोक तोड़ी बरुण देवसूर जावे है। तिस आगे इन्द्रदेव प्रजापतिलोक तोड़ी युगन के साथ माहि जावे वेद गावे है।तेहि आगे प्रजापति दोहुनको साथलीने ब्रह्मलोक जाने विषय समस्य नाहीं है। याते ब्रह्मलोकमें सुदिवसू पुरुष साथ प्रणोका उपासक प्राप्तसो होवे हे६३॥ चौ० ॥ ब्रह्मलोककर अधिपति जोई। हिरण्यगर्भ को जाने सोई ॥ सूक्षमसमष्टी का अभिमानी। चेतन हिरण्यगर्भ है ज्ञानी ६४ कारज ब्रह्मताहि मुनि गावे । वेद उपनिषद सकल सुनावे ॥ ताके निवासक जो अस्थानी । ब्रह्मलोक ताको कहे माधवराम सुखसागर। १०५. ज्ञानी ६५ जो ब्रह्मलोक उपासक जावे । हिरनगर्भ समान विभुतको पावे ॥ जो शरीरकी इच्छा होई। सतसंकल्पते होवे सोई ६६ जिस भोगनकी इच्छालावे। सत- संकल्पते प्रापत पावे ॥ सहस शरीरनते ऋषि जोई। जुदे जुदे भोगन चहें सोई ६७ सहस शरीर धरे तेहिकाला जुदा जुदा रस लेहि विशाला।। और सो ऋषिवर क्या बहु कहिये। जो संकल्पकरे सिधि पइये ३८ जग उत्पति पालन-लय जोई। इसको छोड़ करे सब सोई । और विभूती ईश समाने । याहीको सजूजी बखाने ६६ ॥ क ॥ ऐसे हिरण्यगर्भकी समान बहुतकाल लगि कामना अनुसार दिव्य भोगन को भोगे है। प्रलयकाल माहीं जब हिरण्यगर्भ-लोक नाशै तब ऋषिज्ञान सो उपा- सकको होवे है ।। चिदानन्द माधौराम तिनके मँझारमाही देहीको सुछोड़िके विदेह मोक्ष पावे है। औरसो उपनिषद में यहीभाँति ऋषिवर ब्रह्म की उपासनाते किये फलः पावे हे ७० हंग्रहिं उपांसनाते औरजू उपासनाहै तिनसे तो ब्रह्मलोक प्राप्तीसो नाही है। यहीवात भासकार-सूत्रपे व्याख्यान कीन हंग्रहि ध्यानविना ब्रह्मलोक नहीं पावे. है ॥सर्गुण निर्गुणब्रह्म आपते अभेद जानै मन बुद्धि वानी रोक चिन्तन जोकरे हैं। इंग्रहीध्यान ऋषिवर ताहीको बखान बेद ताहीकर ब्रह्मलोक प्राप्ति सुहोवे है ७१||स०॥ पूर्व मारग जोई कह्यो ऋषि ताको उतरायन माग गावैः। देव सुमारग ताको भने ब्रह्मलोक उपासी त्यहि राहते जावें ॥ तिनको भवफेरि नहीं होय किन्तु ज्ञानको पा- यकै मोक्षकहावै। तहँ ज्ञानके साधन वेदगुरू तिनकी सुःअपेक्षा कौन उरलावैः ७२ ब्रह्मलोक में वेद गुरू बिन साधन श्रवणआदि विना सँगहोवे । ब्रह्मलोक विषय नरजोतम, जड़, क्रोधसो आदिकन अलसावे॥ सतोगुण केवल प्रधान वहाँ असुरी दुख सम्पति न वहाँ जावे । याते सतोगुण कारण ज्ञानका लोक विषय प्रधान रहावे७३।१० ॥ प्रणोके उपासनाते पूख मझारमाही ब्रह्मरूप करके जो चिन्तन सो कीन है । पूरब संस्कारनते ब्रह्मलोक माहिं ऋषिप्रणोकेरी मात्राको चिन्तन सो करे है। स्थूल उपाधी सहित चेतन विराट विश्व ॐकी जो मात्रा अकारकेर वाच्यहै । सूक्षम उपाधीसहित चेतन हिरण्यगर्भ तेजस उकारकाहि वाच्यसो कहावे हैं.७१ कारण उपाधीसहित चेतन प्राग जोई ईश्वर मकारकेर वाच्य वेदगावे हैं। ऐसा अर्थ पुरव माहिं चिन्तन जों कीने ऋषि ताकी ब्रह्ममें सिमरती भलेहोवे है ॥ स्थूत उ.
१०६ माधवराम सुखसागर। पाधीकर विश्व औं विराटपना चेतनके माहीं सो विचारबिन होवेहै । स्थूलसमष्टीकी. सो दृष्टीते विराटपना स्थूला सो विष्टीकी सो दृष्टीकर विश्वहै ७५ स्थूल सो विष्टी औ समष्टीकी सो दृष्टीविन चेतनमें विश्व औ विराटपना नाहीं है । किन्तु चेतन . स्वरूप माधोरामका अखण्ड जोई ब्रह्मलोक माहीं सो उपासकको भासैहै ॥ तैसे सू- क्षम उपाधिसहित हिरण्यगर्भ तैजस जो चेतन उकारका सो बाच्य अर्थ होय है । तहाँ विष्टी औ समष्टीकी उपाधीको हटावे जब चेतन मैं हिरण्यगर्भ तैजस सु नाहीं है ७६ विष्टी औ समष्टी के अज्ञानके प्रभावकर चेतनामें ईश्वर प्रागभान होइहै । ईश्वर प्राग सो मकारका सो वाच्य अर्थ वेद औ.मुनीशगण सकल वखाने है ।। विष्टी औ समष्टी सो अज्ञानकी सो दृष्टीत्यागै चेतनामें ईश प्रागभाव कछु नाहीं है। जोई वस्तु जाके विषयनकी सो दृष्टी कर होवै परतीति परमारथसे नाहीं है ७७जाको सो स्वरूप अनदृष्टिकी प्रतीतिविना होत प्रतीति सो परमारथ कहावे है। जैसे एक पुरुषमाहिं पित औ पितामहँकर सुत पोताभाव सो स्वरूप भानहोइहै । पुरुषका सो पिण्डही स्वरूप परमारथहै सुत पोताभाव सो परमारथसे नाहीं है। तैसे सूक्षम स्थूल पुनि कारण उपाधीकर विश्व विश्व हिरण्यगर्भ तैजस पागईशहै ७८ सुचेतन स्व- रूप माधोरामका अखण्ड जाने भेदरहित तामें सु बिराटआदि कूरहै । विश्व औ वि. राटकाज आपुस में भेदभासै विष्टी औ समष्टी अस्थूलकी उपाधी है । स्थूलकी उपाधी त्यागे चेतना स्वरूप माहिं दोनों सोअभेदरूप भेद कछु नाहीं है। हिरण्यगर्भ तैजसकी आपुसमें भेद जोई विष्टी औ समष्टीको सो सूक्षम उपाधी है ७६ परमारथ . स्वरूप माहिं भेद कदाचित नाहीं जैसे घटाकाश मठाकाशही स्वरूप है । तैसे ईश्वर प्रागकाहि भेद सो प्रतीति होय कारण उपाधी तामें विष्टी औ समष्टी है ॥ चेतना स्वरूप माहिं सदा सो अभेदरहै जैसे मठाकाश महाकाशते अभेदहै । यहिभाँति हिरण्यगर्भ तैजस प्रागईश विश्व औ.विराटलैके सकल अभेदहै ८० स्थूल सूक्षम कारण उपाधीकी सो दृष्टीत्यागे चेतनाके माहीं किसीरीति से न भेदहै । अनात्मा पदास्थ ब्रह्माण्डनाम रूप जोई चेतनते भिन्न सो परमारथसे नाहीं है। अविद्याकाल माही सो अनात्मा सो देहआदि होतहै प्रतीति ज्ञानभय नहीं भासे है । एक चेतन स्वरूप भेदरहित सो असंग नित्य निर्विकार ब्रह्मरूप आत्मा जो मुक्तहै ८१ ॥
१०७ माधवराम सुखसागर। चौ० ॥ आतम कालक सरूपा । सोयं प्रकाश ज्ञान चिदभूपा ॥ ब्रह्मलोक उ- पासक जोई। ताको भान होय यह सोई ८२ जो हिरण्यगर्भ लोककोबासी। तिनको भौ निधि दुख नहिं फाँसी । यद्यपि महावाक्य है जोई। तिसके विवेक विना चहै कोई ८३ ज्ञानमोक्ष सुख नर नहिं पावे । अद्वैत वाद डोगी दै गावे ॥ तथापि प्रणो केर विवेका । महावाक्य सब जाने एका ८४ स्थूल उपाधि सहित जो चेतन । अ- कारका बाचक है मुनि सज्जन ॥ स्थूल उपाधिको त्यागि जो देवे । चिद अकार को लख जो हो ८५ सूक्षम उपाधी सहि विचजोई। उकारका बाच्य अर्थ यहहोई ॥ सूक्षम उपाधीको मुनहाने । चेतनमात्र लख पछाने ८६ कारण उपाधिसहित जो चेतन । अकारका वाच सो करै विवेचन ॥ कारण उपाधि जो देवे त्यागी। चे- तनमात्र लखै अदागी ८७॥ स० ॥ यहिभाँति उपाधी के सहि विश्वआदिक अकारहिं मात्रके अर्थ कहावे। उपाधिरहित विभू चेतनमात्र सब मात्रन के शुभ लख सुहावे ॥ सकल उपाधि जो नाम सरूपसहि चेतन प्रणोका बाच्य रहावे । नामरूप उपाधीते रहित जोचे- तन प्रणो वरनको लख चिदावे ८८॥०॥ प्रणो महावाक्यनको एकही अर्थ याते प्रणोके विवेकते अद्यत ज्ञानहोवै है । ज्ञानका सो पाय बुध त्रिपुटीको त्यागिदेवे . इन्द्रीके व्यवहार ऋषि जोई दुखदाई है ॥ करे सो समाधि सूक्षम बुध इन्द्रीवाद जीवनमुकुति सो विदेह अन्तपावे है। किंचित व्यवहार चहै भिक्षा जलपानकर जिसमें समाधीका सो सुरुनहीं भूलेहै ८६ त्रिपुटीको दुखजानि कर सूगिलानी नित लेवे प्रयन्त न समाधी सुख जोई है । ज्ञानका सुपाय सो समाधी सुख तजि प्रमै ताको मन श्वानकी समान सो भस्मावेहे ॥ याते सु समाधीहीन पुरुषनको मनभरमै कीनेते समाधि मनबस सुखपावे है। ज्ञानवान कामनाको तजिके समाधी करे याते ज्ञानवानकी परवृत नहीं होवेहे ६० ॥ चौ० ॥ सो अष्टअंगते होय समाधी । जाते जाय सकल दुख व्याधी ।। अष्ट अंग अबकरौ उचारी । जो समाधिके हैं सहकारी :१ यम औ नियम धारणा ध्याना । प्राणायाम प्रतिहार असीना ॥ सब कल्प समाधी जोई । निर्विकल्प यह अष्ट्रते होई ६२ -- १०८ माधवराम सुखसागर। दो० आहंसा सति अस्तेय ऋषि ब्रह्मचर्य पहिचान । अपरीग्रह पुनि जानिये यमयह पाँचाजान ६३ ॥ शोच और सन्तोष सुख तप सोय ध्यान बखान । ईश्वरको नितध्यान यह नियम सो पाँचोजान ६४|| क० ॥ और सो ग्रन्थके मझारमाही ऋषिवर नियम सो दशमप्रकार यमगावे हैं। पुराणकीसो रीतिजानो ग्रन्थ सो वेदान्तमाहीं यम औ नियमके पाँचही सो भेदहैं । आसनके भेद सो अनन्त जो ग्रन्थन में तिनमाहिं सब सतकरो मुख बी- रभदहें । क्रूरम पद्ममोर सबसद्य सिधम कोरमको धनम पछातान सो उतान, ६५ तसहि कुंकुट इत्यादिक चौरासीऋषि आसनके भेद जो ग्रन्थमें विस्तारहै । सिद्ध सिंहभद्र पदुम तिनमें प्रधानजानो तिनहके माही सिध आसन प्रधानहै ।। ताका यह लक्षण सो कहों में विचारिकर जाते ध्यान योगी जी समाधी में लगाये है । बा- मपादकी सु एड़ी गुदामें ढाके सो मध्यमाहीं सीवन के विषय ऋषि योगी दाबधरै है १६ दक्षिणपाद एड़ीमेंद्र ऊपर लगाय दावै मृकुटी के अन्तर सो राखै दृष्टी जोई है। सरल निश्चल शरीर स्थानकी समानरहै बज्र गुप्त मुक्त मुनि याहीकू बखाने है ॥आसन सिद्धते अनन्त पुन प्राणायामकर ऋष प्राणायामग्रन्थमें बहुतसे प्रकार है। तद्यपि संक्षेपकर तुमको जनाऊँ भले योगग्रन्थमाहीं जो पतंजलि बखाने है ९७ नासिकाके बामछिद्दारा इड़ानाम नाड़ी ताते बायूरोके ताको पूरुषसों कहि । दक्षिणते त्यागै ताका रेचक सो कहै माने मुलमन स ताको कुंभक सो मन है ।। यहिभाँति रेचकको पूरुकको कुम्भकहे प्राणायाम रे सो तो विविध प्रकारहै । एक तो अगर्भजानो दूसरा सगर्भकहे सावधान के ऋषि सुनो में बतावे हे ९८ प्रणोके उचारणसहित प्राणायाम करै जोई ताहीको अगर्भ मुनि वेद नितगावे है । प्रणोके उचारण सहित प्राणायाम सुना ऋषि ताहीको सगर्भ सो पतंजलि बखाने है। शब्दस्पर्श रूप रसगंध विषयनते इन्द्रियको निरोधै ताको प्रतिहार कहे हैं। अ- न्तराई रहित अन्तःकरणकी सू इस्थितीको ताको सू महकमाही धारना सुभन है | अन्तराइ सहित मु.अदेत चिदमधी माहीं अन्नसको प्रवाह ताको ध्यानसू बखाने है। विऊथान संस्कार तिसको त्रसकार करे प्रगटकरे जू निरोध संस्कारहै ।
1 - १०६ - माधवराम सुखसागर। अन्तःकरणकी इकाग्रताको रूप परिनाम जोई तिसको समाधी ऋषि मुनि वेद गावेहै । दिविधा प्रकार सो समाधी की सुरीति निरविकल्प एक सहि विकल स- माधी है १०० ज्ञाता ज्ञानकेरूप त्रिपुटीसहित भान अद्वैत ब्रह्म चिदानन्द व्यापक सु जोईहै। अन्तसकीवृत्ती ऋषि तिसमें अरूढ़करे विकल्प सहितको समाधीताको कही है ॥ सहि विकल्प समाधी ऋषि दुविधा प्रकार जानो इक शब्दान विध मुनिन वखाने है । नुविध शब्दान पुनि दूसरीको जानो भले दुविधप्रकार ते स- माधीनकै सुभेदहै १०१ अहंब्रह्म अस्मीयहि शब्दके सहितहोय शब्दान विध बुद्धि वाहीको वखाने है । शब्दरहित कासुविध सब दानकहे ज्ञाता ज्ञानज्ञेय जामें त्रिपुटी सुनाहीं है। अखण्ड ब्रह्माकार अन्तःकरणकी सो वृत्तीकर रूढ निरविकल्प समाधी ताकी गावे है । यहभाँति विविध प्रकारकी समाधी जानो विकल्प एक निरविकल्प गावे है १०२ तिनमें सहि विकल्प साधनाका रूपजानो अचल स- माधी पुनि ताहीको सुफलहै । सहि विकल्प समाधी जोई साधना स्वरूप कहे ताके विषय त्रिपुइसुद्धयत भानहोयहै । तथापि दैत त्रिपुटी जो ज्ञाताज्ञान ज्ञेय जोई ब्रह्मरूप है । केसुप्रतीति सबहोवे है जैसे माटीके विकारनको मृत्तिका स्वरूप जानै माटीका विकार घटआदिभानहोवे है १०३ तद्यपि विवेकवाले पुरुषन की दृष्टी माहिं बाहर भीतर घटके सुमृत्तिका प्रमानहैं । तैसे योगीको सहि विकल्प स- माधीके मँझार माहिं त्रिपुटी जो द्धयत ब्रह्मरूप भान होते हैं। सविकल्प समाधी निरविकल्प समाधी माहिं दयतरूप त्रिपुटी सो ऋषि विद्यमानहें । तौभी त्रिपुटी सो देवतरूप नहीं भानहोवै भले जैसे लोन जलमें सो मिलै विद्यमान, १०४ किंतु नेत्रसे लोनका स्वरूप कछु देखें नाहीं अंतसकी बृत्ती तैसे ब्रह्ममें रहावे है । यहि भाँति विकल्प निरविकल्प समाधनका दुविध प्रकार यह भेद वेदगावे है ।। सवि- कल्प समाधी माहिं ब्रह्मरूपकरके सो देवतरूप त्रिपुटी सो योगी निश्चयकरे है। अचल समाधी माहिं देवतरूप त्रिपुटीकी लेशमात्र नाही मासै ब्रह्म एकमासै है१०५ स० ॥ निरविकल्प समाधी सुखोपतिका ऋषि आपस माहिं सो भेद जनावे । अं- तसकी ब्रह्मकारज वृत्ती सुखोपति माहिं अभाव कु पावे ॥ अचल समाधी विषय व- झाकार सो अंतस केर सो वृती रहावे। तिसका ऋषिभान सो होय नहीं याते योगी १६ । ११० माधवराम सुखसागर। समाधि विषय सुखपावे १०६ यहिभाँति सुखोपति माहि विषय वृत्ती अंतसकी सो अविद्या भै जावे। अंतःकरण सो वृत्ती के सहित भले निरविकल्प समाधी विपय सो रहावे । ताकी प्रतीति सो होवे नहीं चिद माधौराम विपय विलसावै । निरविकल्प समाधी विषे अंतःकरणकी वृत्ती जोई ब्रह्माकार रहावे १०७॥ चौ०॥ विकल्प समाधी कर अभ्यासाताको होत लखै जगआसा॥ अष्टअंग में साधनरूपा । निरविकल्प समाधि निरूपा १०८ अचल समाधी ऋपिवर जोई। विविध प्रकार पिछाना सोई॥ एक अद्धयत भावनारूपा। दुसरी अदयतावसथनरूपा १०६ ।। क० ॥ अद्यत ब्रह्माकार अंतःकरणकी अज्ञात वृत्ती सहित होय लेश जाको भान नहीं होते है। अद्यत भावना स्वरूप निरविकल्प समाधी कहें योगीजन याहीको अभ्यास दृढ़करे है। समाधी माहिं जो अभ्यासकर अधिकतासे ब्रह्माकार वृत्ती ऋषि सोभी शांतिपावे है । याते वृत्ती रहितको अदेवता व स्थानरूप अचल समाधी मुनि याहीको वखाने है १९० जैसे तपत लोहे विषय जलकी सो वूद गे जरत लोहे माहिं सो प्रवेशकर जावेहै । तैसे अदेव भावना समाधी के अभ्यास दृढ़ महाप्रकाश वृत्ति ब्रह्ममाहिं मिले हैं। अदेवता व स्थानरूप अचल समाधी जोई याही को सो मुख्यफल वेद नितगावे है।अदेव भावनास्वरूप निरविकल्प समाधी सो देव- ता व स्थानका सो साधना सो होवे है १११ ॥ स०॥ अदेवता व स्थान स्वरूप समाधि सुखोपति माहिं यह भेद रहावे । अंतःकरणकी वृत्ती सुखोपति में सो अज्ञान विषय वह जाये समावे॥ अदेवता व स्थान समाधी विषय वृत्ती अंतसकी ब्रह्ममाहिं सोहा- वे । सुखोपति माहिं जो आनन्द है सो अज्ञान विषय वह ढाँपा रहावे १९२ समाधी विषय निरावरन भले ब्रह्मानन्द प्रकाशका भान सो होवे। किन्तु अचल समाधी अ: रम्भन मैं ऋषि चार सो विधुन अदिष्ट रहावे ॥ याते निषेदनके सोलिये पर जतनकरै जेहिते सुखपावे ।लइयो विषेपकखाये त्रिधास स्वाद यहिचार सो विधुन रहावे ११३ आलसते चहिनिद्रा परभावते व्रती अभावको लै मुनिगावे । याते अन्तष्करण की वृत्तीको लै सुखोपति समान अवस्था सोहोवै ॥ ब्रह्मानन्दका भान सो होवे नहीं सो अविद्या तमोगुण मैं ढपजावे । याते आलस निद्रा परभावनते योगी विघुननते सवाधा न रहावे ११४ ॥ क० ।। जब वृती अपने सो उपादान अन्तसमय दीदै सो वि- माधवराम सुखसागर। चारकरलैता होतजातहै । तबही सो योगी सावधान होय भली विधि निन्दाआदि दोप रोष वृत्तीको जगावै है।लै स्वरूप बिघुनका बाधिक सो नींद आदि निरोध स- हित वृत्ती परवाह योगी जागे है। समवोधन चित याको सुपतंजलि मुनीश कहै अर्थ सो विक्षेप अब सुनै मैं जनावे है ११५ जैसे बाज बिल्लीकर चटकास डरजावे भागकर गेहमें प्रवेशकर जावे है। तहांमै व्याकुलते गेहके सो अंतरमें ततकाल आफ्ना सो थान नहीं दीखे है।याते फेर बाहर आये खेदियत भैपावे. अवस्थालो मृतुको प्राप्ति . सो होवैहै । तैसेही अनात्मा पदारथ को दुख हेतु जानकर योगीसो समाधोको अरम्भ है ११६ अदेवतानन्दकाहि विषय करनेवास्ते अन्तर मुखवृत्ती योगी हठबाँध अन्तर सोलावे है। तहां वृत्तीकोसो विषय सुख चेतन स्वरूप सूक्षम कारण स्थूलपरै अति सूक्षमरूपहै। याते किञ्चित सो कालऋषिवृत्तीके अरूढ़ बिना चेतन अनन्द ततकाल सोअलामहै। समाधी के अरम्भ माहिं बहिरमुख होवै वृत्ती बहिरमुख वृत्तीको विक्षेप ऋषि गावे है ११७ याते वृत्ती के निरोध विन चेत नस्वरूपानन्द महा सुअपार सुख योगी नहीं पावे है । अन्तरमुख ऋषि होय जितने को कालवृत्ती ब्रह्मा कारनही सो भडोलवृत्ती होवे है ।। उतनेको कालपुन कहिज के पदारथमें बारम्बार दोष दृष्टिमुनि को दिखावे है । बहिरमुख वृत्ती काहि योगी होने देवे नाहीं अन्तरमुख वृत्तीका सो थापना सो करे है ११८ विक्षेपरूप विघन समाधी के मैंझार माहिं योगी के परयतन को सममुनि गावे है । रागआदि दोपनको कोविदिकखायकहै यद्यपि सो रागदेव सविविध प्रकारहै । एक रागदेवसआदि वाहज बासकर दूसरा सो अन्तरमें डेरा सो जमावे है। दारा सुत धन आदि विषय बतमान जेते तिनमें सो रागदेवसवाहिय कहावेहे ११६ भूत वा भविष्य के पदारथको चिन्ताकरै मनोराज दुखदाई अन्तर रहावे है । सो दुनहूं प्रकारके सो रागदेवस आदिक समाधी में प्रवृत्ती योगी विपण नाहिं बने है ॥ चितकी सुभमकासो पांच सु वखानै वेद तिनमें सो एक छेप भूमिका सो नाम है । मूढ़ता सो दूजीभने तीजी सो विक्षेप कहै चौथी सो एकाग्रता सो पंचमी निरोध है १२०॥ चौ० ॥ देहलोक शास्त्रहै जोई। इनते आदिसो लेह वहुसोई ॥ इनके विषय वा- सना जाकी । नहिं उपराम होय सुखताकी १२१ रजोगुणकापरिणाम जो आही।
११२ माधवराम सुखसागर। दृढ़ बासना अनातम माँही ॥ ताको मुनि क्षेपक नितगावै । इनते नहीं समाधि सुख पावै १२२ निद्रा आलस आदिक जोई।तमगुणके परिणाम हैं जोई ।। ताको गुणता कहै मुनीशा । यह उरमें तुम लखो ऋषीशा १२३ ध्यानमें प्रवृति कभी चित होवै। कबहुँक वृत्ती वाहर जोवै ॥ यहको क्षेप सुवेद बतावे । योगीको भै दुख उपजावे १२४ अन्तस कर अतीत प्रनामा । औरसो व्रतमान परनामा ॥ समान अकारहोय पुनि दोई । कहै इकागरताको सोई १२५ ॥ स० ॥ योग सुसूत्र माहिं पतंजलि एकागरका यह लक्षण गाये। तिसका यह भाव सुनो ऋषिजू जेहिते उरते दुःखजाल विलाये॥योगीको अन्तष्करण के माहिंइकागर समाधी सो कालमें पाये । सो इकागर बृत्तिका भाव नहीं सो समाधि विषय ब्रह्म आकार रहाये १२६ ॥ ५० ॥ जितने का अन्तसके परनाम सो समाधी माहिं सारी वृत्ती ब्रह्महीको विषय ऋषि करेहै । याते अन्तसके अतीत वर्तमानको परिणाम सब ब्रह्माकार होनेते समानाकार होवे है ॥ एकाग्रताकी वृधीक सो भनत मिरोध मुनी अन्तसकी भूमिका सो पाँच ऋषी औरहै । भूमिका सुनाम सो अवस्था को बखाने मुनी पाँच भूमि सहित ऋषी अन्तसके नामहै १२७ छिपत सोमूढ़ औ विछपत अ. कागर निरोध मिल अन्तसकी भूमिका ये पाँचहै । तिनमें सुछिपत सो मूढ़ अन्तः- करण काहि ताको सो समाधीका सुनही अधिकारहै । विछपत अन्तःकरणकी समाधी में अधिकार अहै यह योग ग्रन्थन में प्रगट वखाने है । एकागर निरोध अन्तःकरणका प्रभाव जो समाधीकाल माहिं ऋषि योगीका मुहोवे है १२८ रागआदि दोष सहित अन्तसछिपत रहै छिपत अन्तःकरनका अधिकार युगनाहीं है । कखाइ राग देष जो समाधी के विघ्न अहैं इनका सुनाम लेना सम्भवे सो नाहीं है ॥ तदपि सुवाहे जस अन्तमें रागद्वेष छिपत सो अन्तष्करण माहिं होते है । अचल समाधी का सुताको अधिकार नाही जिसका सो पायके अकण्टक योगी होवे है १२६ तोभी तो अनेक जन्म पूरबके विषय माहिं अन्तौभी कीने रागद्वेष अन्तर बाहिर जोई है । संस्कार तिनके सो सूक्षम विक्षेपत आदि अन्तष्करण के मँझार माहिं होवे है।। याते राग . देष कोकखाय नाम नहीं कहै किन्तु संस्कार रागद्वेष का खाये है । जितने कुकाल अन्तःकरण सो रहै ऋषि संस्कार बने रहै दर नहीं होवे है १३० समाधीकाल महि .
माधवराम सुखसागर। १९३ याते योगी कैसो अन्तस में रागआदि दोषन में संस्कार रहै है परन्तु रागदेषन के संस्कार रहै है । अचल समाधी सुख तिसके मैंझार माहीं अनभूद संस्कार सोविरोधी नाही है ॥ समाधी में परवृत्ती योगी जिसकाल माहिं होय रागदेषन के संस्कार प्रकट जोहोवे है। बाहिर विषयकार वृत्ती ताहिको विक्षेपकरे तिसका सुबाधकर योगी सुखलेवे है। योगी के प्रयत्नते जहाँ बृत्ती बाहिजा होय तिसका हटायकर अन्तर मुख करे है १३१ परन्तु राग आदिनके अद्भुत संस्कारन ते अन्तरमुख होई वृत्ती फिर रुकजावे है । अन्तःकरणकी वृत्ती विषय ब्रह्मका सुकरै नाहीं ताही कोकखाइ मुनीशन वखाने है ॥ विषय माहिं दोष दृष्टी योगी के उपावकर विघ्नकखाइ कीन बृत्ती फिर होवे है । रस स्वादका सु अर्थ यह तुम जानो भले ऋषि योगीका सु ब्रह्मानन्द भले आनभयो होवे है १३२ और सो विक्षेप रूप दुख जो अपारहोय तिसकी निवृत्ती काहि अनुभव सो करे है। कहूँ दुखके अभावनका आनन्द समान लेवे नित्यानन्द तिनका मुलाभ ऋषि नाहीं है ॥ जैसे भारवाही पुरुष मारकर दुखपावे भारके उतरजाने आनँदको माने है । तहाँ आनन्द में और कोई विषय मुखहेतु नाहीं भारजन दुखके अभावते यह कहे है १३३ मेरेका सुआनंद सुहुआ यहकाल माहीं याते दुखकी निवृत्ती भी आनँदका सुहेतुहै । तैसे योगीका समाधी में विक्षेपजन दुख जोई तिसकी निवृत्ती परयतन ते करै है । विक्षेपजन दुख के अभावते-जो आनन्दहै तिसै अनुभवकरै रस स्वाद मुनि गावे है। जो दुखकी नि- बृत्तीजन आनन्दके अनुभव तेही योगी जो अलम्बबुध तिसमें जो करे है १३४ तो सकल उपाधि रहित ब्रह्मानन्दकारवृत्ती विसका अभाव जब ऋपि वर होवे है। महासो अपार सुख चिदानन्द माधवराम तिनका समाधी माहिं योगी नहीं पावे है ॥ याते दुखकी निवृत्तीजन आनन्दका लाभ जोई रसास्वाद विघन समाधी के मँझार है । वचता अर्थ के प्राप्त बिनाबाध जो विरोधी काहि आनन्द के उत्पति माहि दृष्टान्तहै १३५ जैसे पृथ्वी के मँझार माहीको सनदी दवीरहै अति अंत वि- षधर स्रपराखी करे है। तहां निधीके प्राप्तसे प्रथमकाल माहिं ऋषि निधी के प्राप्त उर जग विरोधी है ॥ तहां किसीकाल सप औरदेश माहिं जावे तिनकी निवृत्ती कर आनन्द सो होवे है । तहां सपकी निवृत्ती माहिं आनन्द जानिलेवे तिस माधवराम सुखसागर। माहिं अलम्बवुध कर जबलेवे है १३६ उद्यम जो खोदनेको तिसका जो त्यागंदेवे निद्धि के प्राप्तको नहीं सुख पावे है । तिमसूअदेवत ब्रह्ममुख निध जानो भले तिसकी प्राप्त अवाधसुख लाम है ॥ अनात्मा पदारथ जो धन धाम देह आदि ति- नकी प्राप्त विक्षेपरूप सापहै। विखेएरूप संपकी निवृत्ती जिन आनन्द जो तिसका अवात्र सुख मुनिन वखाने है १३७ रसास्वाद के मैंझार माहिं योगीजन भूलजावे रसकाहि अनुभव अनुस्वादन खरूप है । निधीरूप अदेव ब्रह्मअचल अखण्ड अन तिसकी प्राप्त जिन महाजो अनन्द है । ताकी सुप्राप्त में व्रत बन्ध होनेकर याते सो समाधी माहि विघन खाने है। अथवा जो रसास्वाद विधन समाधी माहिं तिसका सो और अर्थ कोविद वखाने है १३८ सविकल्प समाधी ऋषि पहिले काल माहिं होय उतरकाल माही निरविकल्प होवे है । सो विकल्प समाधी माहिं ज्ञाता ज्ञानज्ञेय जोई ब्रह्मरूप भानहै के त्रिपुटी जो होवे है ॥ सविकल्प समाधी का सो आनन्द त्रिपुटी रूप होनेते उपाधी सहित उपाधिक ताको कहिहै । निरविकल्प समाधी विषय ब्रह्मानन्द एकरहै देवतरूप त्रिपुटी सो भान नहीं होते है.१३६ याते निरूपाधिक अखंड नित्यानन्द भले अचल समाधी माहिं योगी सुखलेवे हैं। सो विकल्प समाधी ते उतर ऋषिकाल माहिं अचल समाधीका अरम्भ जबकरे हैं। स- विकल्प समाधी के उपाधिक अनन्दका विक्षेपके अभाव जिन सुखं त्यांगै नाहीं हैं। किन्तु वाहीके मैंझार रहै वाहीका सो अनुभवकरै रसास्वाद ताको सो योगीसन वखाने हैं १४० याते विक्षेपकी निवृत्ती जिन आनन्द जोतिसे अनुभव होवै रसास्वाद ताको मन हैं। अयालो विकल्प समाधी के अनन्दकाहि तिसै अनुभवकरै रसा- स्वाद ताको गावे हैं ॥ निरविकल्प समाधी परमानन्दके सुअनुभवकाहि रसास्वाद दोन प्रकार के विरोधी हैं। याते सो विघन जान तिनका सो त्यागि देवे अचल समाधी के विरोधी यह चार १४१ ॥ चौ०॥ याते चार बिघन यह जोई। समाधि अरम्भ में होवै सोई॥ स्वाधान- ता योगीह के। चारि विघनको रोकें कसके १४२ समाधि में परमानन्द अखंडा । ज्ञा- नवान तेहिलखैप्रचंडाः। ताको जीवनमुक्त उचारे । निरमै सुख मिले ब्रह्मअपारे १४३ यहि विधि चितज्ञाली करजोरी । निरालम्ब भरमै नहिं थोरी ॥ प्रालब्ध जब आवै माधवराम सुखसागर। अयोगी। होय उथान समाधिते योगी १४४ तौभी समाधिमें परमानन्दा। अनुभव किया जो है निरद्धन्दा ॥ ताको स्मृती ज्ञान है जोई। योगी के उरहोवै सोई १४५ याते उथान कालके माहीं । निरालम्ब चितज्ञानी के नाहीं ॥ और सो ज्ञानवान ऋपिज़गमें। परवृतहोय जो जल भोजनमें १४६ केवल प्रालब्धते होवै । पुरषास्थ न जग नहिं जोवे ।। परन्तु भोजन आदि व्यवहारा। तिसमें ज्ञानी फिर संसारा १४७ तामें खेद दुःख बहु माने । ज्ञानीकर चित ज्ञानी जाने । और सो मूरख जगमें जेते। तितमें दोष अरोपे केते १४८ ॥ स ॥ याते.भोजन आदिक माँहि परवृत्ती पराल- ब्धिते ऋपि ज्ञानी जो हो । समाधी विषय परमानन्द अपार जो तिसका विरोधी व्यवहारको जोवे ॥जाको भोजन आदिक शरीर निरबाहक तामें परवृत्ती है खेदको लेवे । भवमण्डल हेतु पदारथ माँहि सो आदिक प्रवृत्ती सो ज्ञानिनहोवै १४६ ॥ ब० ॥ यहभाँति बहुत अचारज जगतमाही रीति जो समाधी की है ताको सुखगावे है । याते जीवनमुक्त सो समावीका अनन्दपाय तिसकी परवृत्ती वाहिर जगमें न होवेहे ॥ सदा सो निवृत्तरहै जगमें न लावे आस कीही अजतकले परवृत्ती दुखदाई है। सुखअर्थी ज्ञानवान जीवनमुक्तकेर तिसको परवृत्ती याते कहूं नाहीं वनेहे १५० तथापि ज्ञानवानके निवृत्तीको निज मनहीं जिन बन्धकरमते निवृत्त शुद्धरूपहै । प्रवृत्ती माँहि अथवा निवृत्तीरूप ज्ञानी काहि वेदकी सो अज्ञादण्ड विधि कळू नाहीं है। याते ज्ञानवानके व्यवहारका नियम नाहीं जोते विद्यावान निरदण्ड मोश्वरूप है। खान पान वसन व्यवहार जो शरीर काहि इच्छाते रहित प्रालब्ध करहोबेहे १५१ जिस ज्ञानी कासो प्रालब्ध भिक्षा भोजन मात्राका फल कासो हेत वर्तमान माहि होवे है। ताकी भिक्षा भोजन में ऋषि सो प्रवृत्ती होय अधिक प्रवृत्ती ताकी सम्भवे सो नाहीं है ॥ जाकी प्रालब्ध बहु भोगन की हेतु होवे ताकी सुप्रवृत्ती सो अधिक जंग होवैहै। और जो ऐसे कहै जाकी प्रालब्ध ऋषि भिक्षा भोजनमात्रका हेतु जोई होवैहै.१५२ ताहीका सज्ञान होवे बुद्धी के मझार माँही अधिक प्रवृत्तीवाला ज्ञानी नहीं होते हैं। याते भिक्षा भोजनते अधिक व्यवहार जोई दुखहेतु विद्धान कदे नाही बाहै हैं ।।अनात्मा पदारथमें अधिक प्रवृत्ती जाकी ब्रह्मश्रोती ब्रह्मनिहटी ज्ञानी पुरुष नाही हैं। ऐसी शङ्काकरे कोई ताको कहे नाहीं बने जनका याज्ञवल्क्य ज्ञानी वह + . १ . माधवराम सुखसागर। कहाये हैं १५३ समाविजय करि धुन संग्रह सोअपारकरि अधिक व्यवहार याज्ञवल्क्य मुनिकीनहै। तथा सृष्टी कासो पालन सो राज मिथिलेश कीन, जिनका प्रसंगऋषि पीछे मैं बखाने हैं। योग सो वसिष्ठ परवन्ध के मँझार माही नाना व्यवहार ज्ञानी पुरुषन के कहे हैं। याते ज्ञानी के निवृत्ती प्रवृत्ती का निज मनाही संग्रह त्यागताका पालन्धके अधीन है १५४॥ चौ०॥ यद्यपि याज्ञवल्क्य थे जोई। सभा विजयकीने मुनिसोई ॥ भूमिपाल सम जगत मँझारा। सकलभोग कीने व्यवहारा १५५ उतर विदित सन्यासन वृत्ती। धारे मुनिनिहि करी प्रवृत्ती। भव भोगनमें गिलानकी ताई। नानादोष कहे वहगाई १५६ तौभी याज्ञवल्क्यके उरमें । विदित संन्यासते पूरब घरमें ॥ आतम वोधतनिक नंहिं रहई । यह कहना उनपर नहिं वनई १५७ किन्तु ज्ञान सो परथम काला । रह्यो सो तिन्हें हने जंजाला ।। परन्तु विदित संन्यास ते पूरख । जीवनमुक्त अनन्द अपूख १५८ सो तिनका नहिं प्राप्ती भयऊ । जग व्यवहार खेद उर ठयऊ । याते जीवन मुक्तकी वाई । तिसकी इच्छा मुनि उर आई १५६ संग्रह सर्व वित्त व्यवहारा । सर्व तजे जो दुःख अपारा॥ जीवनमुक्त अपार अनन्दातिसको पायेमे निरद्धन्दा १६० । करे ॥ याते याज्ञवल्क्यकी सो प्रालब्ध ऋषिवर भोगनकी हेतु कछु काल सो रहाई है। उतरकाल माही न्यून भोगनकी हेतु भई याते सो गलानी कर भोगनको त्यागे है ॥ प्रथम सो काल जगबलको गलानी बिन अधिक व्यवहार सब भोगन को कीन है । और सो विलक्षन मिथिलेशकी सो प्राबन्धमरण प्रयन्त राजपालन सो कीन? १६१ दिन प्रतिभोगनकी अधिक समृद्धी भई याते सदा त्यागका अब वाही सो हुआहै। याज्ञवल्क्यकी समान जग भोगन व्यवहार माहीं लेशमात्र ताको सो गलानी नाहीं आई है ।। वामदेव आदिक लै बहु ज्ञानी पुरुषभये प्रालब्ध भोग हेतु ताकी न्यूनभई है। तिनका सो भोगन मैं सदा सो गलानी भई तिनकी प्रवृत्ती का अभाव सो वखाने हैं १६२ ॥ चौ०॥ वाल्मीकि कृत वसिष्ठ है जोई । तामें असप्रसंग है सोई ॥ शिखरध्वजा को प्रथमहिं काला । वैराग विवेक सो भयो.विशाला १६३ भोगन माहिं गलानी आई.। राजत्यागि नृप कानन जाई ॥ निजपत्नी सों ज्ञान सोपाये । तजि अरण्य -- ११७ माधवराम सुखसागर। नृप घरमें आये १६४ ज्ञानते पीछे अधिक प्रवृत्ती । शिखरध्वजा कीन्हें सहिचत्ती ।। यह विधि नानाभांतिके सोई । व्यवहार विलक्षण ज्ञानी के होई १६५ तिन सबनको ज्ञान समाना । घट बढ़ता मैं लेशन आना ॥ ज्ञानका फल सुख मोक्षहै जोई । एक समान लिहनि सव कोई १६६ माधवराम चिदानंद माँही । तिनमें मिले सकल दुख दाही।। दुख भवसागर फिर नहिं आये। यह ऋषिवर मैं तुमहिं जनाये १६७ ज्ञान- वान को ऋपिवर जानो। सदा समाधी जगमें मानो ॥ रज्जु सर्प सम जग व्यव- हारा । मिथ्या जानि रहै संसारा १६८ जिनका माधवराम सहाई । तिनका भय दुख रहै न काई । अब यकगाथा ऋषवर जोई। जो पूरव सुखदायक होई १६६ सो शुभ कथा मैं तुमहिं सुनावों । जेहि सुनि उरमें आनंदपावों ॥ अमीपद पंकज माधौकेरे। तिसका ध्यान हने दुखडेरे १७० जो जो नर माधवपद पाये। ते ते भवनिधि दुखनहि आये ॥ जो दुखमें रहि सुख निधिपाये । तिनकी कथा सुनो मनलाये १७१ हरबुध नाम एक बुधिमाना । भयो जगतमें धर्म निधाना ॥ देवी सम्पति सहित मुनीशा। परमारथ जानै सब ईशा :७२ जन्म कर्म प्रथमै मुनिकेरे । हे ऋषि तुमहिं सुनाओं टेरे ॥शुभाशुभ करमनकर फल जोई। मुनि दिजकुल तनधाखो सोई १७३ वसु संवतकी उमिर जो पाये। अज्ञान अधीनज्ञात नहिं आये॥असक्ति महादुख जड़ता माहीं। सदा क्लेश भोग सुखनाही १७४ वाल्मीकिऋषि वसिष्ठ मँझारा । शिष्यनके दुखकहे अपारा॥ सो सब दुख मुनिवर पायो । बालक तनधरि जो जगआयो १७५ मात पिता उपनन सो कीन्हें । द्विजकुल धर्म आज बहु चीन्हें। साथै ब्याह संगल- पद दीना । जिसमें सब जीव परे आधीना १७६ गृहरक्षक नाना व्यवहारा । करै सो मुनि जिनके न विचारा।। बिनु विवेक व्यवहारहै जोई। जन्म मृत्यु दुख फाँसीहोई१७७॥ स० ॥ अज्ञानकृती भवबन्धन जो दुख पूरवकाल सो मुनिको छायो । पंचभूतक देह अनातमकेहित नानाप्रकार की कृत्य कमायो ॥ अज्ञान अधीन भवभोगन में मुख शान्त कदाचित मुनि नहिं पायो । गृह आश्रम विषय सहे दुख अपार सो अ- नन्दलेश नहीं कहुँ आयो १७८ ॥ चौ० ॥ पूरख पुण्य उदय कछु भयऊ । शुभ वैराग सो मुनि उर अयऊ॥ जननी जनक भवन परिखारा । धनक्षिति आदिक जो व्यवहारा १७६ तिनमें मुनिवर कि- , M ११८ माधवराम सुखसागर। हिंन गलानी। जगव्यवहार लखे दुखदानी ॥ माधोराम एक सुखरूपा । तिनको नित सुख लखो अनूपा १८० तिनके पद पावनकी ताई । हर मुनिके हिरदय में आई॥ तिनविन मो काके सुखदाई । गोगोचरलग सब दुखदाई १८१ द्वादशवर्ष उमिरि जब पायो । माधो गुरुपद मैं चलिआयो । माधोराम चिदा सुखसागर। वेदलोकमें सदा उजागर १८२ जिनका योगी करै सो ध्याना । तनतजि पावे पद निरवाना ॥ दीनदयालु सन्तहितकारे । जगत चराचरकेर अगारे १८३ ॥ क० ॥ तिन मुनिका सो दुखीदेख जगत मँझारमाही दयासिन्धु महाराज लीन तेहि उवारिया । निज सुखचरन सरोजसे उतार शुद्ध वेद मन्त्र साथ ताको देहना अचवाइया । तीनताप मुनिकेरे दुखसू अपार नाशे सुख शान्त ब्रह्मानन्द पायो जो अपारिया । पूख सनेहिनको जगमेलातुटगयो जिनका कुसंगपाय रहै बैं दुखारिया १८४ ॥ चौ०॥ यहिविधि माधो गुरुपद पाई। सुखीभयो सो तुम्हरी नाई ॥ आतमबोध मुनी उरभास्यो । जिमि अभरफटी सर परकास्यो १८५ शेष अविद्या जो दुखमूला। मृगवारी सम-भई निरमूला ॥ज्ञान विराग देखको पाई। फिर सुरसरितट वसै सो जाई १८६ ऐसे माधो ईश हमारे । अनेक दुखिन सुखदीन अंपारे । उदासीन तापस मुनिज्ञानी । तेहि तटवसैं मोक्षके दानी १८७ शुभकृत फल सुरसरि तटपाई । नित मुनि आनद रहै भुलाई ॥ माधोराम दयाते ऋषिवर । नहिं जानै भवकहँ दुख- सागर १८८ यहिविधि दशपँच संवत जोई। भयो व्यतीत दुःखसहि सोई ॥ यकदिन मुनि विचार उर ठयऊ । को अदिष्ट यक उदय सो भयऊ १८६ जननी जनकभवन परिवारा । तिनहि में त्याग्यो वाल मँझारा ॥ दिन बहुगयो न दरशन कीनो। यह इच्छा मुनिभयो नवीनो १६० धर्मरूप मुनिवर बुधिमाने । विवेकज्ञानमें परम सयाने ॥ गृहआश्रमी गृही जोई । तिन घर सन्तजाय चलिकोई १९१ भागमान तेहि गृही समाना । नहिं ऋषिवरको जगमें आना॥ सन्तबिना भवजीवन काहीं। सुखदायक कोउ जगमें नाही १९२ जिसमें भवबन्धन होवै भारी । सो सवविधि जानै संसारी । निज निज स्वास्थको लै सवहीं। यकसन एकसाथ मिलि जवहीं १६३ विना प्रयोजन सन्तदयाला । मोक्षकरें सवको ततकाला॥ याते है सन्तकी महिमा -- माधवराम सुखसागर। ११६ जोई । महाअपार लखै नहिं कोई १६४ याते हर मुनिवर मुखदाई । महतको करन कल्यानकी ताई ॥ यह विचार शुभ मुनि उरधारी । सन्तविना को है उपकारी १६५ मात पिता गुरु दरशन माहीं। वेदपुराण दोष कहै नाहीं ॥ असुमकृत करै जग व्यवहारे । तिसमें दोप कहै बुधिसारे १६६ हे अतीत जगवन्धनहाने । सन्तपरे नहिं तिसमें स्याने ॥ जननी जनक दरशको लेके । फिर यह आश्रम आयो च- लके १६७ यह विचार मुनिवर उरधारे । जनम देशमें गये पधारे॥दिजके नगर निकट मुनिगयऊ । देश लोक सब घेरिसो लयऊ १६८ आदरभाव मुनीकह सोई। बहुत प्रीति कीन्हे सव कोई ॥ जननी जनक देखि मुनिकाहीं । हरष अपारकीन मनमाही १६६ मुनि पर मोहधार उर दीनो । दिज दम्पती सुरोदन कीनो ॥ अ- धिक प्रलाप बहुत पछितावै । भवमण्डलके दुःख जनावै २०० तिनहिं देखि मुनि करुणाआयो । कुशलक्षेम मुनि पूछन लायो । केहि कारणते दुखित उठाये । हे दिजवर मोहिं देहु सुनाये २०१ यहिविधि सुनि मुनिवरकी बानी । वहुत हर्ष द्वि- जवर उरठानी॥ निज अपना कल्याणहै जोई । निश्चय किय सो ब्राह्मण सोई २०२ हाथजोरि भक्ती रससाने । मुनिके आगे लगे बखाने ॥ तुम त्रिकालदरशन सुख- दाये । सव उरजानो विनहिं जनाये २०३ हमसे मन्द जगत जो लागे । तिनका फिरहु करन बड़भागे॥ याते हमरे शुभकृत हैं जोई। तिसका सुखफल मिल्यो तमोई २०४ भवसागर में गिरा अंभागा। आयो मोहिं करन बड़भागा ॥ हमारि कुशल पूछयो सुखदाई । मैं कह्यो तुम्हारापद पाई २०५ ॥ क० ॥ यद्यपि सो विधालोक माहिं चारखानी जोई शुभाशुभ सब उरजानो च- रावरके । तद्यपि सुनाथपदपंकज मैंमार माहीं अपना अपार दुख कहों में सुनायकै ।। बुरी भली साँची खोटी गुरूसे दुरावे नाहीं गुरू सन्त सिख आगे कहै सब खोलके। जिसमाहि मल औ विषय दुखनाशहोय माधो चिदानन्द उर मेरे वश आयके २०६॥ जिसपर दुखजाय मेरा सो कल्याणहोय सोई सुख उपाय कहौ मोको तू बनायकै । भव जीवनको दुख बाध सन्तन कल्याण करै तिसका सु. जगमें न कोई सुखदा- यके ॥ अन्धकूप समान भवसागर अपारमहा तिसमाहि थाह नाही पावे तनधारके। जिसमाहिं सुख सपने में नहिं पावे नर जन्म मृत्यु के अधीन रहे किसी न ठिकाने ૧૨૦ माधवराम सुखसागर। के २०७ जन्म मृत्यु त्यागजग ओईनर सुखपावे तुम्हरी शरण जोई लीनो है तकाय के सुख दुख-आयपरे तिसका सो समजाने माधवराम तिनका सो एक सुखदायके। भवमंडल अपारसिद्ध तिसका सुतछजाने जैसे-सीपमाहिं चाँदीजल मारुवारके। ति- नकी समानहिचै मुझको कराओभले दुख सिन्धुलांघि पदपाओमाधवरामके २०८।। चौ०॥ यहिविधि हर मुनिवर बुधज्ञानी । निवेद समेत सुनै द्विज वानी ॥ धर्म वाक माधवकी गाई। बहुविधि दिजको मुनि समझाई २०६ तामें जगत मोह दुख जाये । सो वैराग मुनि दिनहिं सुनाये ॥ विनु विवेक वैराग न आवे । वैराग बिना भव मोह न जावे २१०॥ स० ॥ माधवरामके हे परमसेवक हरमुनि विचार भले उरलाना । भवमोह तजे विन नींद नहीं सुखज्ञान विनादुख होय न हाना ॥ भवसिन्धु सु लाँघन के हित में द्विज मुनि प्रति पूछे कल्यान निदाना। दुखदीन सो देख दयामुनि लाग सो धर्मके वाक्य सो ताहि वखाना २११ धर्मशास्त्र वाक सो माधवकी सब जीवनको उपदेश तयेही। परमातम अर्थी जो होय. कोई बुधिमान उपदेशैन त्यागै ओहीमाधवराम का नामसो मंत्र महामुख ध्यानकरै बुधिवर रहै मोही। भवसागर के लाँघने के लिये कोऊ आयडिगे उनके पद जोई २१२ तिसको उपदेश करै ततकाल सो त्यागकरे नहिं दोपको मानी। माधवनाम जपाय तिसै भवमाहि करे ऋपि ताहि सोज्ञानी॥ सम साधनका फल मोक्ष जोई कलिकोटिन में कोउ पावत ध्यानी। ऐसा फल मा- धवराम विषय तेहिकासो अभेदकरै जिमि पानी २१३ ॥ चौ० ॥ यहिविधि हरमुनि बुद्धि उदारे । द्विजको हित कल्यान विचारे ॥ गुरु मंत्रहीन लखे मुनिनायक । अशुद्ध अहै उपदेश न लायक २१४ जो-मानुष गुरुमंत्र विहीना । महाअशुद्ध सुरहै अलीना ।। जिनका स्पर्शकिया जो पानी। नहिं मंजन लायककहे ज्ञानी २१५ गुरु उपदेश विना जग माहीं। मोक्षअपार तिन्हें सुखनाहीं॥ भवसागर में दुःख अपारा । जन्म मृत्यु पावै बहुबारा २१६ नानाभाँति योनि बहु- धारे। अपार दुख सहै मिलै न पारे ॥ यह विचार हर मुनिवर ठाने । दिज-हितको कल्याण बखाने २१७ माधवराम ईश जगपालके । तिनकें पदपंकज दुख शालक ॥ तिनके अमीपद पावनवाई। मोक्षहेतु मुनि दिजहिं बताई.२१८ मोक्ष कल्पतरु निज माधवराम सुखसागर। १२१ गुरु आश्रम । भक्तीसहित जाहु तहँ बेश्रम ॥ पदाम्बुज माधवके सुखदाई । कोटि जन्म अघदेत खपाई २१६ गुरु उपदेश लिहौसुखदाये । भवसंकट तुम्हरा सबजाये। यथायोग गुरु पूजि मनावे । जो तुमसे भूसुर बनि आवे२२० जोजो वचन कहे गुरु ईशा। तिसका सेयो उरले अशीशा॥माधव चिदानन्दव्यापी के । तिनके अमीपद- पंकजपीके २२१ ब्रह्मरूपकर तिनको भजिहो।जनममरण भव दुखते छुटिहो। दिज कुलके शुभ धर्म है जोई। निशि दिनकरों जानि मुख सोई २२२ गुरु मर्याद लखौ सुखखानी। और व्यवहार तजो दुखजानी ॥ द्विज तन दुर्लभ मानुष पावै । अधिक पुण्य फल कबहुँक आवे २२३ यह तनपाय के जगत मँझारा । द्विज आपहि न करें भवपारा । औसर चूके फिर पछितावै । भवनिधि को दुख हाथ न आवै २२४ याते गुरुभक्ती सुखधामा । दिजवर करो ईश भजनामा । पाँच यज्ञ गेही के करमा। तिस को करे सो सुख लख धरमा २२५ इसमें दिन पैही कल्याना । माधोरामका करो सो ध्याना । जिसका भवनहीको सुखदाये ॥ तिसको माधोहोत सहाये २२६ हानि लाभ सुख दुःखहै जोई। ईशकी मायो जानो सोई ॥ यामें नर नहिं भूलि लोभावे । जो मनलावे सो भय पावे २२७ जगत मोहते वह दिजत्यागा। हृदय गहो सो दृढ़ वैरागा॥ नामरूप मिथ्या जगमाया। याके हित नहिं करो उपाया २२८ वृक्षकीछाया शिव मनलावे । वह विनशे बहु मन पछितावे ॥ तैसे सकल जगत यह जानो । लेस सत ताको नहिं मानो २२६ ।। क० ॥ पुण्यफल मानो तन दुर्लभ धन धाम दीरघ अरोग आयू शितिराज जोई है। जिस यहु देवे ईश कीजै नेकनामी जग शुभकृत कर मोक्षलेवे सुखदाई है ।। तिसही के पानेलिये वेद औ पुराणजिते विविधप्रकार शुभ करमनको गाई है। भव भोगनको त्यागकरें माधोजीका ध्यानधरै जिसहेत पुण्यफल मानो तनपाई है. २३० नातो अज चीटीआदि कालके कलेवा सब ऐसे जगमाही सन्त आसन लगावे हैं। बड़े बड़े भूप तिस जगमें सरदार भये जिनकी दोहाई तीनलोक माहि फिरी है । विधिआदि देवदैत्य सिन्धु धरावीच जोई सबका सो अपने अधीन कर लीनेहें । दशचार भुवन क्षिति जिनके सो डरकाँपे बड़े बड़े शैलनको चूरकर डारे है २३१ विधु रवि तारागण पौन पानीआदि सब जिनकी सो अज्ञामाहिं निशि २१ १२२ । माधवराम सुखसागर। दिन चले हैं। दहिने बाँयें अंग जाके मन्त्री के समूहचलें जाकी सभामाहिं एक राजै वैठे पाये हैं ।। चतुरप्रकार सैना जिनके अपार सोहे सुरपति आदि जाके नजर को पेखे हैं। जिनके सो सुत सो विचित्रवीर सुरमेंथे वन्दीजन जाकी सो वंशावली को उचारे हैं २३२ मुखचन्दकी समान जाके तिया सो अनेकर, नख शिख भूषणा. लंकारते सोहायेहैं। जिनके कटाक्षदेखि गन्धख लाजकर यतीजन जिनका सो देखि चित्तहारे हैं ॥ धन धाम कोप खजाना जाके अन्तनहीं नदभावन वैठके अकंटराज करे हैं। जिनकी सो कथा महाभारत सो आदि माहिं ऋषिमुनि कबि सब ग्रन्थन में गावेहें २३३ अन्तके समय माहिं सब कालके अधीनभये राजत्याग जगमें सो नाँगे पाँव गये हैं। जैसे गजकाहिं मृगराज सो संहारकरे तैसे भवमण्डलको कालवधे जाव है। ऐसे राजन की कथा वहु ग्रन्थन मँझार माही नाममात्र जिनका सु कोई एक जाने हैं। नातो त्रिधालोक माही नेकही भूपालभयेाजनका सु नाम रूप रेख कहुँ नाहीं है २३४ नाम रूप तीनलोक कालके सो चोगबन माधोराम चिदानन्द एक नित अवाधे हैं। आश लउने लायक एक तिनहीं को नाम जानो लोक पर- लोक माहिं नित सुखदाये हैं। मातु पितु बन्धु दारांजो सोहिरद मित्र माया जो रचित भूमि वित्त आदि जोई है। यहु आश लाउनै योग कोई दिजनाही जगनदी पखाह सम होते जाते नीतहे २३५ याते मिथ्याजान जगनाता सो व्यवहार तजो जन्म मृत्यु हेत मोह फाँसी दुखदाई है। लोक वेद करम जोई जगके मँझारमें अनादि पखाह जोई होत चलिआई है ॥ अन्तरते उदासहेके करमनको कीने जाव कृतफल उभयलोक मायक अनीतहै । मोक्षको सम्हारो दिज भारतमें तनपाय जिसहेत पुण्य फल मानो तनपाई है २३६ ॥ चौ० ॥ सन्तभक्ति ईश्वरकी करना। सुखपैहौ छूटै भवमरना ॥ दयारूप सन्तन सुखदाई । तव आश्रमकवही चलिआई २३७ हरषसहित द्विज तिनको मिलिहौ। धन्यभाग अपनेको जनिहीं ॥ यथाशक्ति जो घरमें होई । हाथजोरि लै मिलिहौ सोई २३८ कपटरहित भक्ती सुखदाई । सन्तन की करिहौ द्विजराई ॥ सरल स्वभाव सन्त हितकारे । दीनदयालु जगतते न्यारे २३६ सबको चिदलखै अन्तरयामी। राग देषते रहित अकामी । कपटरहित दुख तुम्हरा देखी। सन्तदयालू होय विशेखी २४० दुख .
माधवराम सुखसागर। १२३ संशय तुमरा जंजाला। सन्त नशावहिंगे ततकाला ॥ सुखनिधि माधोराम अपारा। तिनको पइहौ नहिं संसारा २४१॥ स०॥ यहिभाँति सो सन्तनकी महिमा सब माधोराम चिदानन्द जाने । शुद्ध अशुद्ध सोजो जगमें त्रिकालदरशी तिनते न छिपाने।।अथवा तिनका निज सेवक है सो लगावत होय तिनही नितध्याने। पदवारिज माधो के प्रभावते वह सो सन्तन की गतिजाने २४२ नतो और सो जीव कलीके दिजातिग बुधिभ्रष्ट, अज्ञान अधीने। गुण जो सुभावको जाने नहीं सब सन्त विषय नित दोष बखाने ॥ जिमि हाटक म- हलमें कीड़ीघुसै वह छिद्रहुँदै कुंदधाम न जानै । तैसे मूरख पाप अपारलिये जोइ सन्तनकी उपहासको ठगने २१३ ।। क० ॥ जगमाहिं अघमन्द विषयी जो पामर हैं तिसै हितकरे सन्त जंगदुखी जानिके । तिसका सो फल मन्द सन्तनको दुख देवे सांपसाथ जैसे कोऊ प्रीतिकरै जायके ॥ नित्य सुधाको पिलावे दिन बिष शान्त करे नाही अन्तमाहिं डंकमार करे अस्नासके । तिमि सन्तन की भक्तिकर सदा जो विहीन मन्द संतनको निन्दा काहि करै सो तकायके २४४ तदपि सो संतजन जानि बुझि चुप्परहै आपना. सुभाव सुख शान्त नाही त्यागे हैं। जिमि मलयागिरिसों सांपन सँयोगनते आपनी शीतलताई गन्धीको न त्यागे हैं।उलटा सो सांपनको सुख शांत नित देवे तैसे संत जगमें सो सदा सुखदायेहैं। याते आसु. री परिवार जव उरते हटावे दिज संतनकी दयाकर माधवका सो पावे हैं २४५ ॥ दो० नातो इनके मध्यपर पावे दुःख अपार । माधौरामके दास चिन नहिं होवै भवपार २४६ चौ०॥ यहिविधि हरमुनिवरखुधिमाने। निज पितुको कल्याण बखाने ॥ मात पिताके दुःख हटाये । माधौ पदको दिहिन बताये २४७ जिनका नाम लिये जग माहीं। भवसागर दुखपावै नाहीं॥ सोई सुख नित दिजको भाखै । नहिं मुनिवर कडू अन्तर राखै २४८ यहविधि हरमुनि कीन बखाने । सुनि दम्पती महा हरषाने ॥ आ- नन्द अपार अधिक उरछाये । पाणि जोरकर बैन अलाये २४६ ॥ स०॥धन्यआजु भयों मुनि में जगमें यह पावन अमी म्वहिं वाक सुनाये। भव- सागर माहिं गिरा दुख पावत आज मुझे सुख थाह मिलाये ॥ माधौरामका नाम १२४ माधवराम सुखसागर। सुधा हमरे उरमाहिं तू दीन बसाये। दुख मूल अज्ञान हन्यो हमरे नित माधौ आनँदको हम लखपाये २५० मुनि पूस्ख पुण्य प्रभावनते हमरे रंकके तुम आश्रम आये। मोहि दीन अनाथ सो मन्दन को चिद माधौरामकों दास बनाये ॥ कहा मुनि अगमको यहलाभ जिना भवसागरमाहिं लोभाये। धन दारागृह दुःखमाहिं भ्रमै तिनका विन संत सो कौन सहाये २५१ हमरे कुखमाहिं भयो तदवा शुभ करमनके फल तू प्रक- टाये । यहिते हमको अतिआनन्दहै तुम माधौरामके पारखदभाये ॥ जेहिकुल माधों की भगति होय नहीं सो कुल ढाक पलास मंदाये।हमको भवपार कियो सुतजी सव पुण्यन के फल देव सुखदाये २५२ भवसंकटते अवनाहिं डरों त्रिलोकी के नाथ मोहि माधौ सहाये। जिन गजराजके फन्दकटे पुनि माधौ भरदूलके अण्ड वचाये । मैं- झारके बालक आव विषय सो बचाये प्रहलाद को दीन दिखाये। ऐसे बहु आरत दुःखनको सुखदायक पैज सो राखत आये २५३ ॥ चौ० ॥ अव मोहिं मेख आनन्द भयो । आशीर्वाद सुख अव मोहिं दयो । य- हिविधि हरमुनि सुन हरषाये । द्विजको वर दीन्हें सुखदाये २५४ ज्ञान वैराग मोक्ष सुख सवही । आनन्द सहित तुम पैहो घरही। माधौरामकी दयाहै जोई । तुमपर सदा रहेगी सोई २५५ हम तुमसे लै जगत अपारे। सबहिं सहायक प्रभू हमारे। ताते दिजवर भगती धारी । माधौपुरी तू जाहु पधारी २५६ माधौ पद पंकजकी आसा । धरो हृदयमें करि विश्वासा ।। सो भव सिन्धुकरै तोहिं पारा । फिर नहि पायो यहिसंसारा २५७ यहि विधि हरमुनि कीन वखानी । फिर चलने को मनमें ठानी ॥ यह मति माधौको सुखदाई । दुखितजानि मुनि द्विजहि सुनाई २५८ दिज मुनिको ईश्वर करि जान्यो । सुतका भाव जोरह्यो भुलान्यो । माधौपदके पं- कज जोई। निश्चल एक सदा सुखहोई २५६ सुत पितु मातु जगत परिवारा । पर- मास्थ ते सकल असारा ॥ याते दिन मुनि परम उदारे । लखे प्रमारथ तजिव्यव- हारे २६० परमारथ रूप जो माधौरामा। तिनको पाय न पावै जामा ॥ सबका गुरु माघो यकईशा। येलखदिज को कहो मुनीशा २६१ ॥ सः ॥ यहिभाँति ऋषी दिजके पुरमें सुख हरमुनि काहि वितेदिन दोई। भवमं- डल का दुखदेखि महामुनि हृदय वैराग धरयो शुभसोई ॥ उदासीन भयो चितमाहि १२५ माधवराम सुखसागर। महा कर दंड कमंडलु हौ मुनिसोई । चलन उपाव. मुनीशरचे पुरलोकहिवासी जुरेबहु सोई २६२ मुनिकोसव मोह अपारकरे नरनारी बालयुवा बिरषाये । बारम्बार प्रणाम करें सब मोह अधीन जलनैनबहाये॥सवको मुनि सृष्टि सो बोधकरैजेहिलायक जो जेहि औसर आये । सब माधौराम का ध्यानकरो सुखपाबहुगे तुम्हरादुखजाये २६३ गृह आश्रम के शुभ कर्मकरै विधि संतनकी शुभसेवा कमावे। जपतप आदिःमखा व्रतध्यान सो गृहसत विषयन कछु बनिआवे । यथाशक्ति आश्रम आय पर तिसका जल भोजन देके वनावे । यहिते गृहके सब पापनशै बैदिकमोक्ष सुशीघरपावे २६४॥ चौ० ॥ यहि विधि हरमुनि सबहिं बताये । पुरवासिन सब सुनि सुख पाये ॥ कमर बांधि मनरह्यौ तियारे । सब सिखदै सुखचल्यो पधारे ॥ जननी जनक नगर सब वासी मोह त्यागि उरभये उदासी २६५ बहुत दूरलगि पीछेआये । तिनको मुनिसमुझाय हटाये ॥ माधौ नाम रूप उरधारयो । गंगातट को मुनिहिंषधाखो २६६ याते सोतकरै उपकारा । नित निर्लेप फिर संसारा ॥ मुकतजिवनसुखलहैं अपारे । हरप-शोक ते रहें सो न्यारे २६७ सुख दुख प्रालब्ध फल जोई । देहके धर्म लखै सब सोई ।। सूक्षम थूल संघातके माँही । सत चित आप अनन्दलखाही २६८ यातेऋषि हरमुनवरज्ञानी । जीवन मुक्त जगत सुखखानी॥.सुरसरि सुखतट लखै अपारा । जिसकेदरशनही संसारा २६९ अनछित हि तट पहुँच्योजाई । लोकनहित मंजे -सुखदाई २७० ॥ स० ॥ पुरवस बंधन त्याग भले मुनि सुरसरिके तटमें चलिआये । अमी गंगसु- बारिपियो कर मंजन शुद्ध भये उर कलिमष खाये ॥ बेनी संगम के तटमाहिं भले मुनिस्सी अरण्य में जाय समाये । अमरदास मुनीसुसलैके तहां मुनिभूमी अरण्य में बहुत सुहाये २७१ मन बुधि बाक इन्द्री दुखदायक-ताको संसारते नित्य हटावे । मख अत जपतप देह कसे नित गंग स्नान सब कृत्य कमावे॥ नित योग समाधी अखंड विषय चिद माधौरामको ध्यान लगावे। बहुरूप संसार भयदायक है तिनकी कहुँ दृष्टि, तुच्छ न आवे २७२ ॥ ॥ तिनमें सरदार अमरदास ब्रह्मवेत्ता मुनि जिन सब वेदनको पार भले लीने हैं । वेदनको तातपर्य सकल सुधारे उर जिते मोक्ष तपरूप शान्त सुखदाई है ॥ निगमके सदावत कीने जिन जारी भले सैकरों हजारों १२६ माधवराम सुखसागर। नित ऋषिनको बाँटे है । ज्ञान दुख मूल सव संशयको विध्वंसकरै मृगवारि सम नाम रूपको बतावे है २७३ अपने सो आत्माको ब्रह्मकर भूलिजावे तवहीं सो जगत नानारूपहोके भासे है । आत्माको जीव भावतजि ब्रह्मरूप जाने तब सब दुःख जाल जगत विलावे है ।। याते नामरूप तजि अपनेको ब्रह्मजाने यही उपदेश अमरदास मुनिगावे है। जिनका सुदरश कोटि जनमके अघनाशै दूरका पहार जिमि बनी दाहकरे है २७४ ॥ दो० हरमुनि माधौरामके सेवक परम उदार। ऐसे वनमें वसतमे जहँ नित मोद अपार २७५ स० ॥ ऋषि मंडलके सुखदरश लिये अमरदास मुनीशके निकट में आये। तिनं के पदपंकज माहिं बसै सुख आनन्द पूर्वक मुनिवर पाये ॥ वेद अर्थ सुनै तिनके मुखते सतो आनन्दते मुनिकाल बिताये। नित माधौरामको ध्यानधरै जिनका प्र- भाव सुनै अभिजाये २७६ यहिविधि बहुत सो काल वितायके अन्तसमय मुनि देहको त्याग। सुखसागर ब्रह्म अखंड चिदानन्द व्यापक शुद्ध अपार अदागै ।। ज्ञान स्वरूप अजन्म अवाध प्रकाशक योगीकरै अनुरागै । ऐसे सुख माधौराम विषय ऋषि हरमुनि जाये मिले बड़भागै २७७ पंचभूतक देह अनातम जो दुख मूलनहीं मुनि फेरके पाये । मातु पिता मुनिके जोरहें ऋषि सो भी सुमाधौके पद आये॥ति- नके पद वारिज माहिं गिरे भवसागर के बहु दुःख सुनाये । त्रिलोकीके सुखदायक तव शरणागत में चलि आये २७८ मैं दीन अनाथ मंतिमन्द महा मुझ को जगमाहिं न कोउ सहाये । तुम दीनदयाल अनाथनको शरणागतको प्रभु थाह मिलाये ॥ भवमंडल माया पदारथ में तिनमें प्रभुलाग महादुखपाये । दुखबाध लिये सुख पावनके हित सामिल होत मरे पद आये २७६ ॥ चौ० ॥ जननी जनकदार सुतभाये। तुम विनु कौन सुनाथ सहाये ॥ तवपद तजि जो जगमें लोभावे । पश्चात्तापकरै दुखपावे २८० शुभाशुभ करमन कर फल जोई । दुःख अपार लिहौ भव सोई ॥ तव पदशरण में आयलुकानो। हमरा सुख दुख तुमप्रभुजानो २८१ शुद्ध अशुद्ध जो मो उरहोई । सो सबके उरजानो सोई ॥ जि- नका कहुँ नहिं जग विश्रामा।दुखित जीवन केतुम सुखधामा २८२ में सुख लखि तव माधवराम सुखसागर। १२७ शरण में आयो। अब मैं मन्दको बन्यो छुड़ायो ॥ यहि विधि दिजवर किहिन उचारे । भये प्रसन्न सो प्रभूहमारे २८३ ॥ क० ॥ निवेदके सहित सुने द्विजकी सो वानी नाथ भये सो दयाल तेहि क्षणसुख दाइया । जैसे गिरिजापती ऋपि थोरे में प्रसन्नहोय दुख बाधि भवनको देवे सुखदा- निया॥ तैसे दीनानाथ कोटि जन्म के अघदहें चारखानी जीवनको भवमें जो अ. पारिया। दुखतम अज्ञान मूल सूरकी समानहन आप में मिलावे महादेवै सुखदा- निया २८४ ॥ स ॥ याते ऋषी दिजके दुख देखि शरणागत को प्रभु शिष्यब- नाये । ब्रह्म विद्याको दानदिये द्विजका ऋषि जो तुमको हमपीछे बताये ॥ तिन के उपदेश सुने सुख ब्राह्मण दुःख हटे महानंद सोपाये । ज्ञानकोपायसुऔदेशगये तिनके उरते भै संशय लाये २८५ गृहआश्रम के शुभकरम जोई ऋषि तनके अत्यागले दिजवोइ कमाये।माधौराम को ध्यानकर नित भवनिधि माहिं निरलेपर- हाये ॥ मुनिवर के परभावनते दिज ज्ञान बैराग सहि गृहमें रहाये । फिर अंतसमय तनत्याग पंचभूतक करमनको फल जो दुखदाये २८६ माधौ ब्रह्म विषय दिजजाइ मिले दुखदम्पति फेर नहीं तनपाये । नितशुद्धअपार अखण्ड हुये जिसके हित योगी समाधिलगाये॥ यहि भाँतिचिदानन्द माधौराम अनेकन को भव सिन्धुल- घाये । जिनके पद पंकजके अमीबारिको कानकरै जोई ध्यान लगाये २८७ गोप- दतुल्य भवसिन्धुलँधै सव माधौराम बिषय वे समाये । अज्ञान भवबन्ध में नहिंमरे सुखसागर माधौ विपय वे समाये ॥ याते ऋषी तिनके तुमसेवकजाको मुनी सब ध्यानलगाये। जिनका महामंत्र उपदेश शोधा तिनके पदपंकज जो सुखदाये २८८ तिनका परयत्नते ध्यानकरो सुखपावहुगे भव दुःखविलाये । भव भोगनमाहिं वैराग करो दुखजानभले उरदेहुभुलाये ॥ सुख दुखआयेपरै तनपै सब देहको धरम लखो जो दिखाये। सूक्षम थूल औकारण ते चिद ज्ञान सरूप तो न्यारे रहाये २८६ ॥ चौ०॥ यहि विधि ऋषिवस्तू सुखरासी। संशय सकल तजौ दुखफाँसी ॥ पाल- ब्धकर फल तनजोई। जबतक रहे जगत में सोई २९० भव मर्याद हेतु शुभकर्मा। करते जाहु जो संतके धर्मा ॥जड़चेतन माया जगफाँसी। तिनका तजै जानि दुखरासी २६१ तिनमें एक द्रव्य जड़ताई । दूजी स्त्रीहै दुखदाई ॥ तामें प्रबल जो- २२ १२८ माधवराम सुखसागर। बती दोषन । तजे. विवेकी लखि दुखभूषन २६२ कपटकूट दुखकी तियखानी । नरकदेन जीवनकी निशानी ।। कुसमय बहुत जिवनपर होवै । परतिय सम नहि कोउ दुखदेवे २६३ लोक परलोकहेत शुभकर्मा । सकल नशायदेय सुखधर्मा । याते अपरतिया दुखखानी । पीछे ऋषि मैं तुम्हें वखानी २६४ सत्यवाक ऋषि तुमहिं सुनाये । तिय समान नहिं कोउ दुखदाये ॥ पतिबंचक स्त्री परभावा । प्रतक्ष सो भवमें रहा ऋषिछावा २६५ ॥ क० ॥ कलिका प्रभाव ऋषि कुसमय सो जानो उर लोक वेद लाजनको करै सब हानिया। गुरुमन्त मात-पितु देव द्विज वेदनको धर्मका अभाव शुभहोवै कलि मा- हिया ॥ जोई करम मन आवे सोई सो निशंककरै श्रुति सो विरोध चले सब नर ना- रिया । संकरवरन होय कलिके मैंझार सब धर्म शुभलोकहोय पावे दुख अपारिया २६६ बारम्बार कलिमाहिं महादुहकाल परे अन्नके वियोग सब जीव तलफाइया । कामी क्रोधी चोरी यार जगमें अपारधे सुरी परखार सव रहै उरछाइया ।। मात सुता भगिनी पतोहु परतिय सेवे महा सो अनीति घोरकरै सब प्रानिया । मर्कटसमान, संब तिय के गुलामहोय मीठी वाक बिष लाड मोक्षमाहिं आरिया २६७ श्वान. श्वानीकी समान सबहोय नर नारि ऋषि माधौका सो पावे नाही देवे दुखमारिया। महा पछितावे सो विचारते विहीन है के मन्द क्रम फलनको होवे अधिकारिया ।। याते ऋषि कलिमाही फिरनेकी आशतजो देश सो यकान्त वसो करो तू विचा- रिया । इन्दीके समूह काहि भले तू दमनकरो माधोजीका ध्यानकरो येही सुखदा- निया २६८ स. ॥ कलिमाहिं ऋषी मुनि जे मंतिमान सो पखत कन्दर जाइ व- साये । हमरे प्रभु माधौराम: चिदानंद देखो प्रत्यक्ष स्वरूप छिपाये ॥ सब सन्तन को उपदेश कर कलि घोरसो आयगये दुखदाये। कलिके प्रभावते. ओइवचे सुख जो भवमण्डल त्यागि भुलाये. २६६ हमरे सुखरूपको पावे भले. नर जो गिरिकानन माहि रहाये । नतो भवमण्डल माहिरहे जो अनात्म पदास्थमें लपटाये । कलिकाल सो कलमखरूप महा धरमकापद एक सो. थिर न रहाये । जड़ चेतन माया सो सन्तन के दिग आइके करमसों देह ढिगाये ३०० याते योंग लिये माधौराम भजे जड़ चेतन माहि न नेहको लावै । योगीरूप लिये जड़ दारा भजे वह अनेक . माधवराम सुखसागर। १२६ कलपान्तरं नरक में जावै ॥ जिसकी विगरी किरिया यहि लोक में सो परलोकही पहिले नशावे । यह लोक बने परलोक बने माधौराम विषय मिलिके सुख पावे ३०१ याते योगी के लिये सो पाप अपार है योग नशाय तियां जड़ सेवे । व्यास वसिष्ठ अगस्त पराशर गौतम आदि सबै तिय सेवे ।। बाल्मीकि उद्दालक देव- लले तिनके संतानभे वेदन गावै । याते व्यवहारकरै जगमें यहरीति सनातनकी चलिआवै ३०२ तिनकी नित रीति तजै कलिमें देशकाल सो मानुष वे न रहाये। कलिमें व्यभिचारिन.तिया होय व्यभिचारी सो पुरुष होय नितनाये। तिनका दुख दायक संग तजै अब देश इकान्त बसे सुखदाये । नित माधौरामको ध्यानकरो ऋषि 'जो भवसागर देत लँघाये ३०३.तिनके पद वारिजके परभावते कलिका प्रभावनहीं उर आवै । सदा सुख पाबहुगे तनमें गिरिकन्दर कानन जहां रहावे ॥ अन्तमें माधौ को पावहुगे जहँ योगी व पूत.जिजाय समावे। फिर भवसागर नाहिंआवै पियामें संशय नहीं उरला ३०४ ॥०॥ और ऋषि संशय होय मुझको सुनाओ भले तिसका मैं नाशकरो जोई दुखदाई है । शुभाशुभ करम जोई जगमें सो बनिजावे गुरुपद माहिं जोई शिष्यनं जनावे है । यही निजकारणते दुःख सो अपारपावे क- पटकी घुटीसूधी बुद्धीको नशावेहै । वेद औ पुराणआदि दोषनित लावे तिनै गुरू को सुनायके निवृत्ती नाहीं करहै ३०५ याते मन्द शुभंकृत जान भूल संशयहोय गुरु आगे सिखकहे वेदंविधि पावहै । कलमख आदि गुरुभ्रान्तीको नशायदेवे ब्रह्म मोक्ष रूप माधौराम में मिलावे हे ॥ याते. वेद गुरुते विरुद्ध सू अशुद्ध महा जिस नीच करमनको सुन सन्तभागे है । ऐसी मन्दकृत अधोगती दुखदाई ऋषि गुरुने विमुखमानो शिष्य सो कमावे है ३०६ संसारोंग दुखभारी शिष्यउर संशयहोय 'मुखहित बाधलिय गुरूटिंग आवेहै । शिष्यभाव रीतिकर गुरुसे कल्यान पूंछ जनम 'मृतिआदि दुख गुरूना बिनासे है। वह पुरुष गुरुके सो पदका सो अर्थ नाही शिष्य ओहनाहीं जोई गुरुतै लुकावे है। याते मेरीप्रति ऋषि पूंछतू निशंकहै लेश शंका उरनाही राखि दुखजावे है ३०७ माधौरामके प्रभावकर दुख भ्रमजालहनों आतमसुख ज्ञानका जो करे ऋषिहानिया । माधौ चिदरूप कांहिं तुझे और बोधकरों जिनका तू जानकर होवे सुखदाझ्या ॥ तुम्हरी समान ऋषि कोई मेरा प्यारा नाहीं जिन मा- १३० माधवराम सुखसागर। धौराम काहि करे ध्यान ठानिया । ऐसे माधौरूप मुनिराजनके पदमाहिं हाथजोरि निशिदिन कविकी नमामिया ३०८ ॥ स० ॥ यहिभाँति नरायनराम मुनीश्वर सन्त ऋषी प्रतिज्ञान सुनाये। भवबन्धन दुख अज्ञानजमूल ऋषी उरते अन्धकार पलाये। अन्तर शुद्ध सुशान्तभये निज पूरवरूप चिदा लखिपाये । अनेक जन्मांत्रके दुख पापनपाय गुरूपददीन नशाये ३०६ ॥ • चौ०॥ यहिविधि मुनि मुखते सुनि ज्ञाना । ऋषी प्रसन्नभये भगवाना ॥ पानि जोरि बोले बुधिमाने । गदगदगिरा प्रेम रससाने ३१० धनि सो आजभयो जंग- माही। उरग्रन्थि सन्देह छुट्यो अघदाही.॥ धन्य आज दिनभयो हमारे । नवं वेद- वाक महिमिले अधारे ३११ जिसहित गुरुपद दरशन आयो । भवबन्धन गुरमें छुटकायोः॥ भवसागरमें गिरा सो रहेऊ। आज निकार मोहिं मुनिलयऊ. ३१२ गुर जगईश धन्य शुभवानी । जाकर हन्यो अघ दुखखानी ॥ आज कृतास्थ में फल पायो। अब कछु संशय उर न रहायो ३९३ करमवासना फाँसी जोई। दीनदयाल हन्यो सब सोई॥ अब गुरु मोको भयो भरोसा । दुख कलेश मो छुट्यो अंदेसा ३१४ निज सुरूप मोहिं अनुभव भयऊ । भवसागर अब नाही लयऊ ।। अज्ञान सांप.मुख रह्यो अधीने । वेदमन्त्र ताहिन सुखदीने ३१५ ॥ दो० पूरबकाल सो दुःखमें सदा रहो लवलीन । सदा-चिन्तमें उरबस्यो कब दुखहोवै खीन ३१६ ॥ स०॥ अज्ञानकृती भवबन्धनमें गुरु पूरबकाल महा दुखपाये । चभूतक देह अ- नातम माहिं सो आतमबुद्धि कखो मुनिराये ॥ अज्ञान अधीन अछादा गयो तनके हित नाना में कीर्ति कमाये । भवभोगन माहिं सुभरमाकरो सुख शान्त कदाचित में नहिं पाये ३१७ पूरखकालका दुःख हटायके आनंदमोहिं दिही सुखदाये । शुभा- शुभ कस्मनके फल जो दुख तुमबिन नाथ सो कवन हटाये ॥ जबतक करमकी फाँ- सीकटी नहिं तबतक जीव कहा सुखपाये । करम अधीन चौरासी फिरे दुखयोनिन का नहिं अन्तमुपाये ३९८ बालक देहधरै सब योनि में जड़ता असकत महा दुख दावे । शुभाशुभ करमको ज्ञातनहीं पुनि देखतही तरुणापन पावे ॥ संसारके आ- पद जो दुखदायक असुरी सम्पति आय दबाते । तिसके परभाव में ढाँपारहै सुख . - .
१३१ माधवराम सुखसागर। माधौरामकोन लखिपावे ३१६ वृद्धअवस्था सो आय घिरै दुख कालके चिह्न असाध रहावा पुरुष विवेक नहीं मतिमन्द असक्त महाजड़तापन पावे ॥सब इन्द्री सो त्याग करै तिसको एक आशा सो इच्छावधी नित जावे । भव भोगन माहिं सुडोला कर सब देश विपयसू निरादर पावे ३२० ॥०॥ अन्त माहिं तनतजि शुभग तिनहिं पावे नाना योनि भरमैसूअवाच्य दुख गावे है। याते गुरू दयादृष्टि जिसपर करै आप ज्ञान निवेद ताके उसमें समावे है । सोई निरदोष भव दुखते छुटिजावै सुख ब्रह्मानन्द माधौराम में समावे है ।याते मोहिं अनाथनको दुख बांधि मोक्षकीन्हों शुभाशुभ क- रसफाँसी मेरी तू नशावेहै ३२१ यश अपयश सुख दुख जन्म मृत्यु आदि पूरख करम सब जीवन भोगावे है । वर्तमान माहिं भोगै भावीका उपाय करै वे विचार इच्छा धारि कृतको कमावे है । करमनके मूलसो अज्ञान दुख सिन्धु काट्यो जग दुख भों- गते वैराग मोको आये है । निरभय ढके आनन्दसुरहौ अब जगमाहिं संशय मोह जाल गुरू आप भव नशायेहै ३२२ नाथ पद वारिजको जगकें मँझार माही पूरब काल पाये मैंने अभय सुरहाये है। वर्तमान माहिं सो अज्ञानके प्रभावकर जन्म मृत्यु, सांप रजोसम समै पाये है। भये अति खेद मानि चितमें सो दुखपाये ताके सो बाध हित नाथ पद आये है। सोई गुरू आप चिद दयासिन्धु रूप माधौ ज्ञानदै अज्ञान दुख मूल तू नशाये है ३२३॥ दो० तीन काल सब अन्तरे तुम जानो गुरुदेव । सुख दुख साखी शुद्ध अज चेतन अलख अमेव ३२४ ॥ चौ०॥ तुम गुरु ईश जगत सुखदाये । जापर दया करो मैंनिराये । सो जगव- न्धन ते छुटिजावे। तव पदपंकजमें सुखपावे ३२५ गुरुबिन जगमें जो सम्बन्धी। मेख विखए सवहै प्रतिवन्धी ॥मात पिता भाई सुत दारा । घर वित आदि पशू व्यवहारा ३२६ इनकी मोहमें सब जगबन्धे । बन्ध मोक्ष विधि लबै न अन्धे ॥ ज्ञान वैराग वि- वेक न आवै । याते कष्ट अधिक भय पावै ३२७ जन्म मरण भवसागर माहीं। नाथ कृपा बिन छूटैनाहीं ॥शब्दादिक दुख विषय मँझारा । इन्द्रीकर चञ्चल संसारा ३२८ योते थिरता मन नहिं आवै । माधौ केर कहा सुख पावै ॥ सदा रहै अज्ञान अधीना। इन्द्री भोगनमें लवलीना ३२६ सदाकलेश दीनता माहीं। तियंग योनिन माहिं भ्र- माधवराम सुखसागर। माहीं। माधौरामके सुख निधि पादन। जिसे देहसो लिये मुनिराजन ३३० यहिविधि सन्त ऋषी मति माने । गुरुभक्ती में परम सयाने॥ अनुभव ज्ञान विवेक है जोई।गुरु पदपंकज में भनै सोई ३३१ जापर माधौराम दयाला । मोक्ष ज्ञान पावै ततकाला ।। याते मुनि राजन अनुकूले । ऋषिको भे अगही.प्रतिकूले ३३२ ज्ञान वैराग गुरुते पाई। आनन्द भयो दुख दीन भुलाई ॥माधौ रूप नरायनरामा। जिन पद पाये ऋषि मुखधामा ३३३ पाणि जोरि ऋषि तिनके आगे । ठाढ़ भये भक्तीरस. पागे।चिदा:- नन्द विभु गुरुको जानें । ऋषिवर अस्तुति करनको ठाने ३३४ हे गुरु तव पदपंकज पाई। नमस्कार मेरी सुखदाई ॥ ब्रह्मविभू अजनित अविनासी । सोउ तखो चिद गुरु सुखरासी ३३५ अज्ञानमूल दुखमें भ्रमजाला । तुम गुरुनाशकही ततकाला ॥ परमानन्द तुमहिं मैं जानी । सुनि करो निज दुखकी हानी ३३६ पट लक्षण सह तुम भगवाना । नामरूप सब जग तुमठाना ॥ जिनके हिरदय विमल विचारा। वै-जानत हैं रूप तुम्हारा ३३७ और सो जीव जगत में जेते । तव प्रभाव न जानत तेते.॥ दोषारोपण करे सो मन्दा। मैपावें भवमें दुखद्धन्दा ३३८ तुम्हरीमाया करै सो दीना। जीवन के कछु नाहिं अधीना ।। जीव चराचरको भरमावै । कोई स्वतन्त्र होन नहिं पावै ३३६ जापर किरपा होय तुम्हारी । निज मायाते लेहु उवारी ॥ तिस. अपना- इतसे सुखदेऊ । माधौराममें अन्त मिलेऊ ३४० ॥ क ।। हम मन्दभागी अति नीच लघुमति महा गिखो भवसागर तू नाथ मोहि उबारिया । माधौसनरायनराम नेक मन्द मोखकीने अजामिल कीनो तुम जगमें उधारिया ॥ द्रौपदीकी लाजराची सभाके मँझार माही ध्रुवको अडोल करदीनो सु. खदानिया। दुःख सो निवारतू सुदामाजीको मुखदीने गंज़पति मोक्षनाथ मोको तुव वारिया ३४१ नित्य शुद्धहे सनातन जो सुखब्रह्म माधौराम सोई पापधार उत्तममें नेउर जानिया । वसिष्ठकुल उत्तमतू रघुवंशी छुलपूज्य अज़के परपंचकातू देवे सुखदा निया ॥ अवध मुनीश तुम जीव ब्रह्मभद टरि शिष्यनको उपदेश करै भवपारिया। धरम अर्थ काम मोक्ष सबकात देनहार चारखानी जीवनको करो दुःखहानिया ३४२ सदा निसरेही कुछ जीवनते चही नहीं मोक्षका किंवाड़ तुम दीनोहे उघारिया । सं- तहितकारी गुरु,अनी सुख देनहारे साखी चिदरूप सब उरमोहिं व्यापिया। सूक्षम माधवराम सुखसागर। १३३ कारणस्थूल विश्व तेजस प्राग जोई ईश हिरण्यगर्भ विराट तू अपारिया। सबवे नि- राले चिद कोविद न पावेपार नाथ पद वारिजको हमरी नमामिया ३४३॥ छ० ॥ मङ्गलं मङ्गलं सदा गुरुवन्त तेरी । हखो दुःख विघ्ना रख्यो लाज मेरी॥ दशकन्धर भ्रातं तुम्हें सुक्खकारी । प्रह्लाद उवाखो तुम्हें नेकवारी ३४४ गोवर्द्धन उ- ठाई तुम्हीं गोपपाले । मुरगजन्तु आदी के मानं हटाले ॥ कारागृहते वसुदेवं तू देवकी छुटाये । कंसाभिमानी के मान मथाये ३४५ चागर तू मुष्टी हन्यो नेकआरी । संह जमला विखं कव्यो शाप भारी ॥ पीड़ कुठला तो हाथी हनि नागं गहिलायो। उतना ले आदि बहु राक्षस सुखपायो ३४६ पाण्डव सुतं महाभारत बचाये। दशअठ क्षो- हिनी तू सैना विताये ॥ जब जब भूमं होय पाप भारे। तब तब अरातीहननाथं उ- तारे ३४७निज जन भगतं करो प्रतिपालय । चराचर सबकेतगुरुवं सुखालय॥ लक्ष्मी जो नाहिं भगवानं सो जोये । वह माधोरामं चिदानन्द होये ३४८ सो अवतारं न- रायणंतु रामं । नरा सुख हेतंतु माधौ जगधामं ॥ दशरथ पुत्र रघुवंशी कोतारे। तिमं भवा जीवं तु मोक्षं दैपारे ३४६ गोप बछड़े पटमासे तन लीनो तु सुरब्धी । बजबा- सिन सुख दीयो अज कीनो अगरमी ॥ मथि क्षीरं पयोधि राक्षस सुर पाल्यो। बूड़त गजराजंतु लीनो उवास्यो ३५० जीवं स्वरूपं तुमे जे पछाने।ते मतिमन्दं तब माया भुलाने ॥ नहीं मुखपावे। दुखादै भ्रमावे॥तव कृपाहोएमाधौरामको पावे ३५१ चिदा- नन्द रूपं वे नित्यं अवाधं। ताके पदाम्बुज करे ध्यान साधं ॥ बहुता उपायं ते पावै को एकं जगतजि माधौको लेवे जो टेकं ३५२ महासुक्खपावे भवं नाहिं आवे।चिदानंद माधौ विपय वे रहावे ।। याते तु नार्थ सदा सुक्खदाए। चराचर सबके तू अन्तर समाए ३५३ भुजङ्गप्रयातछन्द ।। नारायणं अच्युतं सदा आनन्द रूपं। सुमाया अतीतं भजेहं स्वरूपं ॥ परेशंपरानंद व्यापी अनूपं । भजेहं पदाम्बुज गुणातीत रूपं ३५४ अखिल विश्वनाथं अनाथं के नाथं । तुमहिं माधौरूपं भजेहं मै नार्थ ।। नाम स्वरूपं संसार असारं अहं भ्रान्ति विसमें पखो में दुखारं ३५५ नहीं थाह पायं तव नाथं धियायं । जनम मृति आदि अंतंतु मेरी खपायं ॥ दयासिन्धु गुरखंतु महिमै नमामी । अज्ञानं दुखमूलं हनिदीनो सुखस्वामी ३५६ गुरु विन जगमें को दुखमें सहायं। सब जीवभर में परे हैं अथायं ॥ पद माधौरामं को दीनो मोहिंदानं । जो नित शुद्धं अच्युतं क- . २३ . माधवराम सुखसागर। ल्यानं ३५७ वेदं पुराणं तिन्हीं नित्यगावे । तिन पद ध्यान करै मोक्ष पावे ॥माधौ- रामं यनामं सुखदानी । तिसको लखायो मैं तुमको नमामी ३५८ ।। दो० तुमरे चरणको त्यागके जे इन्द्री सुख माहिं ते नर अति दुख पावहीं भ्रमें जगतके माहिं ३५६ स० ।। माधौ नरायण नामन को जोई टेक सो लेव न जे मनलाये । ताहि प्रभाव ते छूटनगे फिरके भवसागर ना वहआये ॥ माधौनरायण नाम चिदानन्द में उखासा करो सुखदाये। मोहिं अनाथको मूल्योन नाथ भवसागरमें तन जबतक रहाये३६०।। चौ०॥ यहि विधि सन्त ऋषी मतिमाना । गुरुकी अस्तुति कीन वखाना ॥ न- रायणराम जो मुनि सरदारे। ऋषिपर प्रसन्न सो भयो उदारे ३६१मेरी अस्तुति तुम जो गायो। मैं प्रसन्न बहुतै मुखपायो॥ आशीर्वाद मेरी है तुमको । ऋपिवर तुम सुख- दाई जनको ३६२ यह अस्तुति नर जो पढ़ि लिखिहै। विन प्रयास भवसागर तरिहै। यहि पुण्यनते सब लोकन माहीं। सुख पैही दुख प्रीतम नाही ३६३ माधौराम जो जगत अधोरे । हमरे इष्टको पइहै प्यारे॥ माधौपद संशय नहिं जामें । ज्ञानवान तन तजिरहै तामें ३६४ तहँ ऋषि जाके प्राप्ती हौ । सुख अपारलै भवनहिं ऐहौ। ताते परालब्धि जवनाई । तेहि अनुसार रही सुखदाई ३६५ बाजीगरकी माया जोई। सब मूठ जानि कर वेदं सोई ॥ तैसे करो जगत व्यवहारा । उरते ऋषिवर रहौ सुन्यारा '३६६ जगबन्धन येही तुम जानो। विषय अनातम कर अभिमानो ॥ नरक स्वर्ग दुख सुख छुटकावे । योग माहिं अभिमान मिटावे ३६७ क० ॥ याते ऋपि माधौका प्रसाद कयो ज्ञान जोई तिसको विचारो ऋषि भले मनलायकै। निर्गुण स्वरूप निज गुरूका अखण्ड जोई निज आतम पेखि ध्यान कस्यो मनलायकै ॥ जगमें सो मूरखन को संग दुख त्यागे रहना पूरबकी नाई तुमहिं अगना भदायक। एकान्त देश माहीं ऋषि आत्माको ध्यानकरो नित्य शुद्ध बुद्ध सो अखण्ड चितलायकै ३६८ स० ॥ सन्त ऋषी गुरुभक्त महा गुरुते यहि भांति सो वोधको पाये । आशिस्वाद सो लीन चि- दानन्दको करजोरि गुरू का सो माथ झुकाये ॥ पर देखिना बनाये सोकीन भले उर आनंद भक्ति अपार सो छाये। सहयं सो डंड समान ऋषी नमस्कार गुरू कहँ कीन बनाये ३६६ ऋषिमण्डल जो मुनिराजन के ढिग सबको नमो कर आनंद पाये । बस १३५ माधवराम मुखसागर। विद्यार्थी मुनिनायक के शुभसन्त ऋषीशके कीरति गाये॥धन्य धन्य ऋषी बुधिमान सहा तुमहो भवमण्डलमें मुखदाये। तुम्हरे परसादते आजु भले भवसागरमें हम आनंद पाये ३७० हमरे उरमें अभिमान अज्ञान जो आज गये सब दुःख पलाये । ज्यों सूर हने अन्धकार प्रकाशित त्यों हमरे उर ज्ञान सोहाये ॥ तम मोह अविद्या सो दुरि भई अव माधौराम चिदा लखिपाये। हमरे भव दुःख छुटावनको तुम माधौपुरी सुखमें चलि आये ६७१ ० ॥ मेघनकी वरपा जिमि भूमिके मैंझार होय तिस दारे सकल वनस्पतीति पाये हैं। तिमि मुनिराज तुमहिं ज्ञान सुधा वरषा कीने अघजग दुख मूल हमरे नशाये हैं। आज भवसागर को पार हम पाय लीनो वातमा भीमानदुखसगल पलाये हैं । चूड़त अज्ञान दुख मुझको निकार लीनो जिमि बालखिल्य मुनिराजको निकारे हैं ३७२ वड़ो उपकार कीनो मुनिराज पाद आये माधौराम ब्रह्मरूपतिसे हम पावेंगे। तिनमें अभेदलैक चिदानन्द होवे हम मूढ़के भवसागर सो काहे हम आयेंगे। सतचिद आनंद अखण्ड अविनाशी अज ज्ञान विभु शुद्ध नित्यवन्त सो रहावेंगे। तुम्हरे प्रसाद ऋपि हम सब ब्रह्महोवे जगतको साखीरूप हमहीं कहावेंगे ३७३ याते ऋषि बुधवान हमरे तू गुरुभाई तिनहीं समान इष्टदेवको हमारिया । ताते तुम्हरे प- दाम्बुज माँहि सुखदाय निव हम सब भृत्यनकी सदाहै नमामिया ॥ मुनिराजके सो विद्यार्थी यहिभाँति जितनेको सन्तऋषि बुधके सो कीन सन्मानिया । जिनके अ- चारज सो ईश्वर स्वरूप जग तिनके सो शिख क्यों न होओ बुधमानिया ३७४ कारण जो शुद्धहोय कारज सो सबस्वच्छ पावे कारण कारज मलीनहोय सिधि क- छुनाही है । ताते मुनिराजनके सेवक सो जितनेको कारण संयोगपाय सभी बुधि- मानी है ॥ ऋषिमण्डल उदार देख सन्त ऋपि बुद्धिमान मनमाहिं सवनोका भले सो सराही है। इनके सो बुध सनकादिक समाध सब ज्ञान सो वैराग उरह्यो शुभ छाई है ३७५ महा उत्साहकरै माधौकी सो गीतगावे मानो ब्रह्मलोक सुरमण्डली सो आई है। मुनिराजनके शीश सब फूलनकी बरषाकरे जिमि देवमिलि सो मुरारी पै वरपाई है। अज्ञान मुनि ऋषिनके उस्माहिं दुखभारी नाशकीने मुनि सो मुरारी सुखदाई है। ऐसे मुनिराजनको नित सेव दरशपावे इनकी समान कौन सृष्टि भा- गमानी है ३७६ यहिविधि सन्त ऋषी गुरुते सो ज्ञानपाय कछदिन ऋषि गुरु आ- -- १३६ - म माधवराम सुखसागर। श्रम रहाये हैं। गुरुके समीप बुध निशिदिन वासकरें शिष्यनि महँ भावधर सेवाको कमायेहैं। गुरुके सो पदमें सो आनंद बितावै दिन निशिमाहिं माधौका सो ध्यान सुख लाये हैं। गुरुके प्रसादकर सन्त ऋषि विषय सब माधौ बनबासी ऋषिगण प्रेम लाये हैं ३७७ स० ॥ यहिविधि सन्त ऋषी गुरुके दिग आनन्द के सहि काल बि- ताने। फिर चलन उपाय ऋषीशकरे सब देशके पन्थ विषय मनदीने। नरायणराम मुनीश्वर जो शुभ अम्बर नवीन मँगाय सो लीने । आदर प्रीति मिलाय महा मुनि सन्तऋषी का सो अरपण कीने ३७८ युग पाणि मिलाय प्रसादलिये महाभाग भई गुरुहाथसे पाये । पुनि गुरुका सो मोह अपारकरै ऋषि जिन जगलाजते दीन छ- ड़ाये ॥माधौराम नरायणराम सदा भवमण्डलके सुखदाये। तिनकी शुभ नाम स्वरूप सुधा चिद सन्तऋषी उरलीन टिकाये ३७६ ॥ चौ० ॥ ऋषिसमूहको हाथ मिलाये । बिदाभये ऋषिवर सुखदाये ॥ मुनिराजन: के शिष्यहें जोई । अधिक मोहकीन्हे सब कोई. ३८० ऋषिको ऋषिगण पठवन- ताहीं। बहुत दूरलगि मगमें आहीं॥ सन्तऋषी लखि ऋषि समुदाई । बिदाकिहिन शुभ मस्तकनाई ३८१ मुनिराजनके शिष्य जोहारे । माधौ वन-चलिआये सारे ॥ चित्रकूट निज गुरु अस्थाना । तहाँ ऋषि चलेगयें भगवाना ३८२-मन्दाकिनि गं- गातट माहीं। माधौभवन तहाँ दुखनाहीं॥ बाल्मीकिऋषि अत्र उदारे। मुनिमण्डल तहँ बसें अपारे ३८३ ऋषि मुनिकर गिरिकानन सरिता । स्वर्गलोग समसोहें त्व- रिता ॥ योग यज्ञकर तप मुनिसारे। माधौरामको भजिहँ प्यारे ३८४ ।। स०॥ चित्रकूट की महिमा अपार महा कवि कोटि कविन्द भने नहिं पाये । दा- शरथी सुत ब्रह्मभव कारण त्यागि वैकुण्ठ भवमण्डल आये॥ हजार यकादश भूमि विषे सुर मानव केहितकीन सहाये। जिनके शुभकीरति लोक त्रिधा ऋषिमण्डल औ सब बेदनगाये ॥ भवके दुखदेखि उदास भये पुनि तेऊ चिदानन्द तहाँ. रहाये ३८५ दादश संवत वासकरै भवके शुभकरम सो तहाँ कमाये । और लोकान्तर माहिं बि- पयं नर जप तपआदिक पुण्य कमाये ॥जो फलपावे महा दुखते वह चित्र सो कूटके दरशते पाये । याते चित्रसुकूटकी महिमा अपारहै मैं मतिमन्द कहा लखिपाये ३८६ चो० ॥ तहँ ऋषि जाय वसे मनलाये । सर्व सौख्य तहँ नूतन छाये ॥ चिदानन्द माधवराम सुखसागर। १३७ घन माधौरामा। तिनमें ऋषिके, विश्रामा ३८७ माधौ गुरु सुखसिन्धु मझारा। यह कथा तरंगभइ अमीकीधारा ॥ तिनमें मिलि अधपुंज नशावन । याते सुखदायक यह पावन ३८० गुरुका यश कीरति जो गावे । मोक्षदेय भवसिन्धु लखावे ॥ सुर नर असुर आदिहैं जोई। जो प्रभुता पाइनहै सोई ३८६ सो सब गुरु उपदेशते पावै। वेदपुराण ऋषी सरगावै ॥ याते माधौ गुरु जगनाये । तिनकी कीरति यह सुख- दाये ३६० जो नर पढ़ि लिखि सुनि उरघरहीं । और यतन बिन भवनिध तरहीं। माधौराम मोक्ष सुखधामा। तिनमें मिले न पावै जामा ३६१ ॥ दो० छन्द अर्थ वृत अंको जहँ न मिले अँगहोय । तहँ बुधिवंत सुधारिहौ में सर्वज्ञ न होय ३६२॥ क० ॥ निगम अगम मोहिं कोई ग्रन्थ ज्ञातनाहीं छन्द अर्थ वृत्ती अंक कल्छनाहीं भानहै । केवल प्रेमके अधीन यह कथन सो कीन मैंने माधौ चिद सागरको अन्त नहीं पारहै । याते कवि बुद्धिमान सब भगवान मेरे निगम अगम सब तुही जाने- हारहै । मेरी प्रती क्षमाकखो ग्रन्थ यह सुधारलीजो मैंतो मतिमन्द नाही ज्ञातम अ- भ्यासहै ३६३ स० ॥ गिरिजापती भगवान त्रिनैन सब भूत चराचरके मुखआले । जिनको नित योगी सो ध्यानकरै तिनके उरमाहिं बसे हरदयालै ॥ असुरी सम्पति जो दुखदायक ताको हनै पशुपति चन्द्रभाले । सुर नर गन्धर्व दैत्य यक्षादिक जिनके प्रकाशको लै करमपाले ३६४ जिनकी शुभ शक्ती अनेक ब्रह्मांड सो उत्पति नाश करे नितपालै । आप सुसाखी रहेतिसके शुधज्ञान स्वरूप गलेरुंडमाले॥दयानिधि भक्त वच्छल निष्काम सदाशिव ईश ओढ़े मृगछाले । नित्य चिदातम व्यापकहे जटाजूटते गंगचलै परनालै ३६५ हिमके जमाई बिभूति रमायके भांगधतूरा छके सो अकालै । संतके पालक कामके आर हने त्रिपुरा करलै त्रिसाले । भर्म नाशन कालकी काल होय नगनाग वैरागधरे बहुब्याले। चूडामणी गिरनाथ सोहै शिरडम रूहन बेद सुनावे हिमालै ३६६॥ दो गिरिजापति चिदानन्दको हमरी सदा जुहार। जाहि विषे भवहोतहै.उत्पति लै व्यवहार ३६७ क० ॥शान्त अकार सुखभुजग सुशैन करै पदुम सोनाभिमें सुरेश्वरके राई हैं। । A १३८ माधवराम सुखसागर। सारीविश्वक आधार व्यापी दुगन समान नित गरुड़सो बाहन सुभांग सुखदाई हैं। 'वारिज सुनैन ईश लश्चिमीकेनाथ सात योगी जिनहिं निशिदिन ध्यानको लगावे हैं। जिनका सो नामलिये कालदुख बायपावे मोक्षमोक्ष देनेहारे सव लोकनकेनाथ हैं ३६८ दर गदा औ सरोज चक्रचारी भुजमाहिं भवमण्डलको पालेनित सदा अरि नाशीहै । नन्दमुनन्दसनकादिक सो आदि सब जिनके सो गुण नित नारद सोगावे है। सुर नर असुरन देहधारी चारखानी सबके सहाई होय सुख उपजावे है । जिमि मात पित सवसुतनपै मोह रावै घाटवांध चित्तमाहिं कदा नाहिं लावै है ३६६ अशन सु सवका सुजैसा देखै तैसादे सबका सो सुखनित उरमें मनावै है। तैसे जलशायी सब जीवनपै दयाराखै जिनके सो आसरे त्रिलोक सुखपावै है । नाभी पदुमसे है के विधि विश्वको सम्हारे सब जिनकी सु ओट सुरराज सुकहावै है । सुर संत हितकारी अवनी अधभार हारी ऐसे जलशायी सुरआरी को नमामी है. ४०० स० ॥ गुरू नानक ब्रह्मस्वरूप अखंड भवमंडल जीवनकर सहाये। जिनके गुणको सव लोकनमें शुभगाये तरैभव आनंदपाये ॥ नामभक्ति ज्ञान वैरागलिये सवको जगमें अधिकार वनाये । जेहि देशमें मानुष दुष्ट महा खल नीच महासुमलीन रहाये ४०१ नित राक्षस तुल्यरह जगमें मन्दभक्ष्य अभक्ष्य भत्रुचिलाये। तिनको उपदेशकर गुरुनानक क- बनते शुभ हंस बनाये। भवसागरलंघनके सोलिये सव जीवनको सुखसेत सोहाये। गुरु नानक ईशको कवीकीन माजिनके सुत रुद्र अवतार सुखदाये १०२ जग उ- पति पालन हेतुज इन्द्री नित वाला अकाल सुदेव निवारे। आप सो शुद्ध स्वरूप सदा जिनकी महिमा नित वेद पुकारे ॥ उदासीन अवधूत स्वरूप धरे जटाजूट सो अंग विधूति सँवारे। जिमि श्यामघटा महि इन्द्र शरासन रक्त कोपीन अरूढ़ सुधारे ४९३ कान विषय मणिमुद्रा शोमैं मानो खेह विषय शुभचन्द उजारे । ब्रह्मकमण्डलु हाथ लिये पुनि केहरिकी छाल वैठे जिमि दिवारे। उदासीन अवधूत निर्वाण अखण्ड दशौ दिशा में रचे दैके नगारे। दैवी सम्पति जो सुखदाइक पंथ विषय जिनके याहि प्यारे ४०४ जिनकी प्रभुता अति फैलि रही नित जगत गुरू सबका सुखदाये। और सो वेप छिप जगमें जिमि उडुगण आदित देखि लुकाये॥ सिध शक्ती सो आनश्री चन्द्रके घर औरनके घर सून दिखाये । दशोदिशा धामन कुम्भनमें जिनका प्रताप VINI मधिवराम सुखसागर। १३६ सो एक लेखाये ४०५ पट दरशनलै बहु वेष जिते जिनकी प्रभुता लेखिके सुखदाये। वित मोह रहै सगरे जगमें चहू बरनसो आश्रम करत सराये॥ चारि पदारथ आदिक ले जिनके घर छायरहीं मनलाये । नित गिरिजापती श्रीचन्द औतारको हाथ जोरे कवि आनंद पाये ४०६ त्रिकालकू ज्ञान तूई सच्चिदानन्द में उरं माहिं वसो जगप्यारे। मांधीराम भयो तुमही भवमण्डल जीवन कीन उधारे। तुम्हरी महिमा अति सिन्धु अपार सो मैं मतिमन्द महीं बगुलारे । थहि सुपायो यहि तुम्हरी सब कोविद हारिपरे विस्मारे ४०७॥ क० ॥ माधौराम माधौरूप संकटहरणमारी तो पदं बारिजको बन्दना हमारिया। तुही शुद्ध बुद्ध चिद व्यापक जगत नित नाम रूपमाहिं साखी तुही सुख दानिया॥जीवईश ब्रह्मतही त्रिगुण अतीत सदा एकरस धन खट भावन विकारिया। सरगुण औतार लैके कलिके मझार माही नेक नहिं जड़ जीव करे भवपारिया ४०८ जोइ पदमाहिं डिगे तिसहीको पारकरे अघमूल भ्रम दुखतरके किवारिया। जिनके सो गुननित सुरनरमुनि गावे माधौ की समान कोई न भवमें हितकारिया॥ क्लेश तीन ताप कोटि जनमका पाप होय जिनका सरूप देख होवै दुख हानिया। जिनके सरूपका सोवेद औ पुराण गावे नानाभाँति जगमें सो करत बखानिया ४०८ उदासीन आश्रम विषय विष्णु औतार भये जीवन कल्याणहित कलिके मझारिया । दापरमें मधुपुरी माहि सर्व लीलाकीने त्रेताके मझार भये मनो राजधानिया ॥ नर औ नरायण लेके चौबीस औतारधारे चारयुग जीवनको करे प्रतिपालिया । ऐसे बुखहारी संख- दानी माधौराम काहि तिनपद वारिजमें कविकी नमामिया ४१० स० ॥ अवधपुरी भवमण्डल माहिं सो माधौ त्रिदेवन रूप धराई । जिनके गुण गावतहैं कविता अति लाजधरे मनमें पचिताई ॥ ब्रह्मसनातन माधौराम नरायणराम भयो अब आई । भवमें चिद मोक्षके हेतु भये सब जीव चराचरके सुखदाई ४११ ॥ ० ॥ शीशमें जटा कलाप हेमकी समान तन मुखचन्दवनी अमी भवदुःखहारी है । भाजभंग समान पानि वारिज समान सोहें भोग मोक्ष लक्षमी सो नित वामें वसी है । पद पदुमसमान सब जीवन भवनिधि तारे मान अपमान जिन असुरी संहारी है।लालपट तनमाहि बिजुली समान सोहै.रतन खराऊँ शुभ पादमाहिँ धारी है ४१२ शाम सुवह माधौवन ; चारिउओर गवनकरें ऋषिनको दरश होवै जोई सुखदाई है। जहाँ जहाँ पादपरै जी. २४ १४९ 2- माधवराम सुखसागर। वन कल्याण करे टेढ़ी योनि आदिक जोजगमें पपील है।लक्षिमीपति जिमि देवन के बीचवसै तिमि ऋषिगण माहिं वसै मुनराई है। शान्त सुखदाई सव देवी परिवार दयाजिनके सो उरमाहिं नित सोरहाई है ४१३ कैसे भवदुख पावेकबि जिमि पदपाये विघ्न अज्ञान दुखहन्यो तूं हमारिया । सारी संशयको संहार कीना कामनाको फल दीनो मेरी उरमाहिं वसौ आय सुखदाइया ॥ माधौरामकी मर्याद सब करत बनाये मुनिसियापतिपाल्यो जिमि मनोराजधानिया । जिनकी सो निश्चय निशि दिन माधौराम माहि जिमि रामभ्रात भरत करै रामध्यानिया ४१४ ॥ दो० रामभ्रात जिमि भरतजी पाले अयोध्याधाम । आपनिमाना हो रहे भने करै संव राम ४१५ तिमि माधौवनपालही महन्त नरायणराम । आप अहंवधि त्यागिके करें सो माधौरांम ४१६ ऐसे निश्चय गुरू मैं करै सो शिष्य उदार । नातो शिष्य मलीनहै गुरत्यागकरें हंकार ४१७ स० ॥ निखिलं असीनके तू मुनराजन माधौको ले जगईश उदारे। तुम्हरे पदम- जुल माहिं भले हम ध्यानलगाये भये सुखीआरे ॥ धर्म छेतरूप धरयो कलि में तुम मायापती जगनाथ मुरारे । यह जानि भजे कवि नित्त पदाम्बुज अंत विषय तुम्हरी है जोहारे ४१८॥ दो तीरथ नीरप मधलोक में गंगयमुन मधुमाहि । सुर नर मुनि सुख तहँ वसै जन्म कोटि अघदाहि ४१६ मोक्षहेत अमी अम्बुको पान करै नितताय । वेद विहित कर ज्ञान लै अन्त मोक्ष में जाय ४२० धर्मराज भगिनी सुभग लक्ष्मीपति पद वार । श्याम सुकुल गम्भीरतन करै सोख संसार ४२१ दोनों आपस में मिली मानों नभ में चन्द । तेहि तटपर कवि बैठके माधौराम गुरुवन्द ४२२ माधौ ग्रन्थ सुखसार को कवि रचना तहँ कीन ।
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१४१
माधवराम सुखसागर।
बुधिमान जन हे कवि उनहि करिये शुद्ध नवीन ४२३
अधशत कमदुइ सहस में सन ऊपर पंचास ।
कृष्णपक्ष हरजन्म सुख दुइ पट भादोंमास ४२४
निरविघुनइति परबन्ध शुभ महातेज रविवार ।
तेहि दिनचिदघनश्याम में कवि आनंद जैकार ४२५
श्रीमाधवरामायनमः॥
दो० देश तिलंग मन्दराज जो दक्खिन देशकहै।
धीर ईसापटन नगर एक बसै सिन्धु के तीर ॥
जग साखी माधौरामके शिखथे यमुनादास ।
तहां लिखा यह बैठके पठि लहै सरख सुखरास ॥
इति ॥
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। छ कठवल्लीउपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत ॥ पञ्चोली यमुनाशङ्कर नागर ब्राह्मणकी भाषा टीका सहित-इसमें भी ऊपर लिखे हुये के अनुसार भावार्थ स्पष्ट कियागया और समझने की सुगमताके लिये गुरु शिष्य संवाद पूर्वक पूर्ण ज्ञान लखाया है। मुंडकउपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत) पञ्चोली यमुनाशङ्कर नागर ब्राह्मणकी भापाटीका सहित-जिस में वादी प्र- तिवादी के प्रश्नोत्तर से ब्रह्मका निर्णय व जगदुत्पत्ति व प्रत्येक अन्नादि का संभव व अग्निहोत्रादि क्रियाओंका विधान मन्त्रों द्वारा वर्णित है। तैत्तिरीयोपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत।-) पञ्चोली यमुनाशङ्कर नागर ब्राह्मणकी भाषा टीकासहित-जिस में तैत्तिरीय शाखा के प्रकट होनेका उदाहरण और स्वरमात्रा व वर्षों के उच्चारणको शिक्षाका नियम व वर्षों के संवन्धरूप संहिताकी उपासना व बुद्धि व लक्ष्मीकी कामनावाले पुरुपोंके अर्थ साधन जप और हवनादि की क्रियायें वर्णित हैं। ऐतरेयोपनिषद् भाषाटीका सहित, कीमत)। पश्चोली यमुनाशकर नागर ब्राह्मणकी भाषाटीका सहित-जिसमें आत्मा व ब्रह्मका निरूपण और प्राण व प्रणवकी उपासना की व्याख्या व संन्यासादि आ- श्रमों के लक्षण व धर्म अच्छे प्रकार वर्णित हैं । उपनिषद्सार, कीमत - ॥ पु० मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वर, ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, छां- दोग्य, बृहदारण्यक, कौपीतकि, ब्राह्मण और मैत्री की भापा टीका राजा शिवप्रसाद सितारहिन्दने रचनाकर अपने पुत्र पौत्र मित्र बान्धव योग्य अधिकारियोंके निमित्त - छपवाया है।
छान्दोग्य उपनिषद् भाषाटीका,कीमत ॥॥ पंडित यमुनाशङ्करजी कृत टीका झापा ॥ ब्राह्मधर्म दोखंड में, गैरमतवा कीमत १.) पु० तथा प्रथमखंड गैरमतवा कीमत ॥४) पु० तथा द्वितीयखंड गैरमतवा क्रीमत।) पु. यह अत्युत्तम उपनिपद् है इसको पंडित लक्ष्मणप्रसादजी ने बंगाली भाषा से । हिन्दी भाषा में उल्थाकिया है मूलश्लोक और भाषा टीका समेत है ।। (वेदान्त) योगवाशिष्ठ दोभागों में, कीमत ५॥) पु० श्रीमद्भागवत भाषाटीका संयुक्त ७) रु. पु० इस ग्रन्थ के उत्तम होने में कदापि सन्देह नहीं है-इसका भापा तिलक ब्रज बोली में बहुतही प्याराहै आशय प्रत्येक श्लोकोंका है क्यों न हो इसके तिलककार महात्मा ब्रजवासी अङ्गदजी शास्त्रीह-यह तिलक ऐसा सरलहै कि इसकेंद्धारा अल्प संस्कृतज्ञपुरुषों का पूराकार्य निकल सक्ताहै-संस्कृत पाठकभी इससें श्लोकोंका पूरा आशय समझ सक्के हैं इसवार यह ग्रन्थ टैपके अक्षरों में उम्दा काग़ज़ सफेद चिकना में छापागयाहै और विशेष विद्वान् शास्त्रियों के द्वारा शुद्ध कराया गया है जिससे बम्बई की छपीहुई पुस्तकसे किसी काम में न्यून नहीं हैं उम्दा तसावीरभी प्रत्येक स्कन्धमें युक्त हैं-आशाहै कि इसअमूल्य रत्न के लेने में महाशयलोग विलम्ब न करेंगे।
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