Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Sanskrit Vyakaran Aur Rachana Prakashan
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संस्कृत-व्याकरण एवं रचना-प्रकाश
कक्षा ९, १० व ११ के लिए
लेखक
विद्यावाचस्पति नन्दकुमार शास्त्री एम. ए. (हिन्दी-संस्कृत)
पूर्व-प्राचार्य
श्री ऋषिकुल विद्यापीठ, लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
विश्वनाथ मिश्र साहित्यशास्त्री, साहित्यरत्न'
संस्कृत-शिक्षक
बगड़िया बाल निकेतन सी. उ. मा. विद्यालय, लक्ष्मणगढ़ (सीकर)
१९९६
अजमेरा बुक कम्पनी
त्रिपोलिया बाजार, जयपुर ३०२ ००२
सर्वाधिकार सुरक्षित
.
7PM
mammer
New
BA
संस्करण,.१९९६
पानीSETOP
मूल्य : १९.७० रु. (उन्नीस रुपये सत्तर पैसे)
लेवी: ०.६० रु. (साठ पैसे)
(1) मारक की
इस पुस्तक में प्रयुक्तः
मानार
कागज : हिन्दुस्तान पेपर कार्पोरेशन लि.
This शिरसाट
५८ जी.एस.एम.; साइज ५६४९१; १४.८ किलो
: बलारपुर इण्डस्ट्रीजालि लामाका INT
२०० जी.एस.एम. माणे-
(लगोपमणमा IP: गीता
कवर
मुद्रित प्रतियाँ : ६,०००
लेजर टाइप सैटिंग:
कम्प्यूटर
वर्ल्ड
चमेलीवाला मार्केट, जयपुर
जिक TARIES
मुद्रक:
800 80%ESE सामान
मनोहर आर्ट प्रिन्टर्स, जयपुर
C
... किञ्चिन्निवेदनम् . 1 म . m व्याकरण-ज्ञान के बिना किसी भी भाषा का अध्ययन पूर्ण नहीं कहा. जा.सकता । व्याकरण शिक्षण के लिए, अनेक पुस्तकें प्रकाशित एवं प्रचलित हैं। व्याकरण की तक, ऐसी होनी चाहिए जिसके द्वारा सहज रूप से भाषा के अध्ययन में प्रवेश किया सके। प्राय: ऐसा देखा गया है कि शब्द एवं धातुओं के रूप एकत्र कर दिये जाते तथा कुछ प्रकरणों को एक स्थान पर संकलित कर दिया जाता है। आज छात्रों की मान्य प्रवृत्ति है कि कम से कम भार हो और सामग्री रुचिपूर्ण हो। कण्ठस्थीकरण की त्ति को आज न विद्यार्थी ही स्वीकारता है और न ही शिक्षाशास्त्री। विद्यार्थी व्याकरण “पुस्तक की ओर आँख उठाना भी नहीं चाहता है। इसका मुख्य कारण. दुरूह शैली है। व्याकरण एवं रचना अभ्यास के द्वारा ही सम्भव है। अब तक जो कुछ कहा गया सीखा गया, उसका अभ्यास आवश्यक है। एक साथ धातु एवं रूप ज्ञान की क्रिया य-रचना की ओर प्रेरित करती है। छात्र में रचना के प्रति सहज आकर्षण होता है। क अध्याय में व्याकरण की विधि एवं ज्ञान-वस्तु अपेक्षित है। यह सम्भव नहीं है प्रत्येक छात्र गुरु के सान्निध्य में व्याकरण की शिक्षा ग्रहण कर सके। आजकल विद्यालयों की अध्यापक व्याकरण-शिक्षा के प्रति विशेष आग्रहशील नहीं दिखाई देते; इसका कारण यह भी हो सकता है कि न्यूनतम कालांश निर्धारित हैं। स्वयंपाठी छात्र के तो व्याकरण एक सहज़ क्रिया के रूप में प्रस्तुत होना चाहिए, जिससे वह स्वयं अर्जित कर सके। अर्थात् ऐसी विधि से वर्णन हो, जो स्वयं शिक्षक की भूमिका कर सके। इसी दृष्टि से यह पुस्तक लिखी गई है। विद्यार्थी कण्ठस्थीकरण के भय . क्त होकर भाषा-शिक्षण की ओर प्रेरित हो सकें, इस उद्देश्य को प्राथमिक स्थान गया है। अष्टम कक्षा तक अध्ययन करने के बाद विद्यार्थी अनेक संस्कृत शब्दों का ज्ञान ता है। अनेक विद्यार्थी शब्द-रूपों को कण्ठस्थ भी कर लेते हैं, किन्तु अधिकांशत: थीकरण के भय से दूर भागने लगते हैं। यहाँ उन्हें शब्द रूप निर्माण के अभ्यास र प्रेरित किया गया है। इसी प्रकार संख्यात्मक शब्दों को सीखने के लिए अभ्यास 'को माध्यम बनाया गया है। । धातुरूप निर्माण के लिए प्रचलित सहज विधि को स्वीकार किया गया है। प्रयोगों " (भ्वादि गण के-धातु) (४२) हल सन्धि (जश्त्व, णत्व, षत्व) (४३) बहुव्रीहि समास (४३-४४) अध्याय १३. वणिक् शब्द (४५) भूभृत् शब्द (४६) दृश् धातु (४६-४७) पी धातुा(४७) हल् सन्धि-अनुनासिक, अनुस्वार (४८) अलुक्समास (४८) कारकज्ञान-पंचमी विभक्ति (४८-४९) अध्याय १४. स्त्री शब्द(५०) श्री शब्द (५१) अधातु (५१) या धातु (५१८५२) विसर्ग:सन्धि-सत्व, रुत्व, विसर्ग: लोप (५२-५३) कारक ज्ञान (षष्ठी विभक्ति) (५३-५४) अध्याय १५. गतवत् शब्दा(५५)गच्छंत् शब्दा(५५हन्धातु (५५-१६) विद् धातु (५६) विसर्ग सन्धि (ओत्व) (५६-५७) कारक ज्ञान- सप्तमी विभक्तिः (५७) का अध्याय १६. वारि शब्द (५८-५९) मधु व दधि शब्द (५९) स्वप् धातु (५९६०.) दुह धातु (६०) संख्यावाची शब्द (एक से दस अरबातक) (६१-६२) कारकीज्ञान-शी, स्था, आस्-धातु के योग में (६२) अध्याय १७. संख्यावाची शब्द रूपएक शब्द (६४)द्वि शब्दा (६४) त्रि शब्द (६४८६५)दा-धातुंः(६५) प्रत्ययः ज्ञान-कृदन्त; तद्धित (६५-६६) वाच्य परिवर्तन (६६) अध्याय १८. संख्यावाची शब्दरूप-चतुर् शब्द (६७) पञ्चन शब्द (६७) षष्ःशब्द (६७)-सप्तन् अष्टन्ः शब्द (६७) नवन्ःशब्द (६७) दशन् (६८) नधातुः(६४) कुप् धातु (६८-६९) प्रत्यय ज्ञान -(क्त और क्तवतु) (७०) क्त प्रत्यय के प्रयोग (७०-७१) वाच्य परिवर्तन (कर्तृवाच्य) (५१-७२).. अध्याय १९. पूर्व शब्द (७३) जन् धातु (७३-७४) प्रत्यय ज्ञान (क्तवतु) (७४-७६) वाच्य परिवर्तन :(कर्मवाच्य): (७६) कर्तृवाच्य से.कर्मवाच्य में परिवर्तन (७६-७७) .. अध्याय २०. भवत् शब्द (पुं०) (७८) स्त्रीलिङ्ग (७८) राजन्ःशब्द (७८) चि धातुः (७९) शक् धातुः (७९-८१) प्रत्यय ज्ञान (कचा एवं: ल्यप् प्रत्यय) (८१-८४)(वाच्य-परिवर्तन (कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य): (८४-८५) ......... अध्याय २१. जगत् शब्द:(८६) चक्षुष् शब्द (८६-८७) संख्यावाची शब्द (एकोनविंशति से अर्बुदम् तक) :(८७) प्रच्छ, धातुः(१७) लिख् धातु (८८-८९) प्रत्यय ज्ञान (शतृ प्रत्यय) (८९....) वाच्य-परिवर्तन (कर्तृवाच्य से भाववाच्य में) (९२-९३) अध्याय २२. वधू शाब्दः (९४); गिर्: (९४) गरीयस्ःशब्द (९४) कृ धातु (९५) नीधातु (९५) प्रत्यय ज्ञान (शानच्प्रत्यय) (९६:९९) संख्यावाचक शब्द (पूरणी संख्याएँ)-(९९-१००) . - प F ६६ ... ज ध्याय २३. दातृशब्द (१०१) गोशब्द (१०१) बन्ध्धातु (१०१-१०२) १०१-१०९ ज्ञा धातु (१०२-१०३) की धातु (१.३.१०६) प्रत्यय ज्ञान (तुमुन् प्रत्यय) (१०६-५४) ला लामा ध्याय २४. सूक्ति प्रकरण- परिभाषा एवं उदाहरण (१९०चुर् धातुं ११०-११५ (११०-१११) कथ् धातु (१११-११३.) प्रत्यय ज्ञान तिव्यत् 1-... प्रत्यय) (११३-११३) ल्युट् प्रत्यय (११३-११) अपठित पद्य-गद्य (गोगा TITTS (*XXX) TIETIT ध्याय २५. सूक्ति प्रकरण (११६) भक्ष् धातु (११६-११७) प्रत्येय ज्ञान ११६-१२५ (अनीयर् प्रत्यय) (११७-११८) अपठित पद्य-गद्य (११८-११९) कहानी लेखन (११९) पठित आधार पर (दशमस्त्वमसि) (१२०) ljuADHESIE TUIFIET याय २६. सूक्ति प्रकरण (१२१) पाल् धातु १९३३-४३)- अपठित १२१-५२८ पद्य (१३३) अपठित गद्य (१२३) प्रत्यय ज्ञान (यत् प्रत्यय (१२४) कहानी लेखन-विद्यया बुद्धिरुत्तमा (१२५) जीवनी के आधार पर (महात्मा गाँधी) एश्य) पत्र लेखन . :TETSITE (१२५-१२७) पित्रे पत्रम् (१२७) मात्रे पत्रम् (१२७) मित्राय पत्रम् (१२८) गय २७. सूक्ति प्रकरण (१२९) अपठित पद्य (१३०) अपठित गद्य १२९-१३५ (१३१) प्रत्यय ज्ञान (मतु प्रत्यय) (१३) इनि प्रत्यय (१३२) क्तिन् प्रत्यय (१३२) पत्र-लेखन (विद्यालय सम्बन्धी) (१३२) अवकाश प्रार्थना-पत्र (१३३) शुल्क-मुक्ति प्रार्थना-पत्र (१३३) निबन्ध-लेखेन (१३४) अस्माकं देश: (१३४) अस्माकं विद्यालय: (१३५) अपठित गद्य (१३५) (Scान य २८. सूक्ति प्रकरण (१३६-१३७) अपठित पद्य (१३७-१८) १३६-१४४ अपठित गद्य (१३८) पत्र-लेखन (पुस्तकप्रेषणाय पत्रम्) (१३८) निमन्त्रणपत्रम् (१३९) केथों लेखन (१३९) निबन्ध . ना. लेखन (१४०) . 97:17 परोपकारः (१४०) -- YTT;IF विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् (१४०-१४१) सत्सङ्गतिः (१४१) भावनात्मकमैक्यम् (१४२) प्रत्यय ज्ञान (अण् प्रत्यय) (१४२) प्यञ् प्रत्यय (१४३) तृच् प्रत्यय (१४३) य २९. सूक्ति प्रकरण (१४४) प्रत्यय ज्ञान (तरप् व तमप् प्रत्यय (१४५) कथा-लेखन (१४६) जवाहरलाल: नेहरू: (१४६) निबन्ध लेखन (१४७) .. १४४-१५० घ - संस्कृत-भाषा (१४७) अस्माकं भारतराष्ट्रम् (१४७) वर्षर्तुः (१४८) समाज-सेवा (१४८) जनसंख्या-समस्या (१४८-१४९) परिवार नियोजनम् (१४९-१५०) अपठित गद्य (१५०) अध्याय ३०. शब्द प्रयोग (१५१-१५४) व्यावहारिक शब्द (१५४-१५५) अपठित पद्य (१५५) अनुवाद (अभ्यासार्थ) (१५६-१५८) निबन्ध लेखन पर्यावरणसंरक्षणम् (१५८) गणतन्त्र-दिवस: (१५९) श्रीमती इन्दिरा गांधी (१५९) राष्ट्रियमेकीकरणम (१५९-१६०) अध्याय ३१. निबन्धानां रूपरेखा अस्माकं ग्राम: (१६१) सत्यमेव जयते (१६१) अतिथि-सत्कारः (१६१) विज्ञानस्य प्रगति: (१६१-१६२) विद्यार्थि-जीवनम् (१६२) स्त्री-शिक्षा (१६२) दीपमालिका (१६२) होलिका (१६२) विजया-दशमी (१६२) स्वप्रेयान् कविः (कालिदासः) (१६३) स्वप्रियपुस्तकम् (श्रीमद्भगवद्गीता) (१६३) अध्याय ३२. छन्द परिचय (१६४-१६८) परिशिष्ट १. धातु रूप परिशिष्ट २. ܐܢ ?? " 1 प्रत्यय-परिचय भाषा के दर -- आ, व्यञ्जन मपूर्वज्ञान अमित सानो के मध्य) परित चारो, संस्कृत भाषा का अर्थ है शुद्ध एवं परिमार्जित भाषा।' प्रमुख म हैं---- ध्वनि या वर्ण, शब्द और वाक्य। वर्ण दो प्रकार के होते हैं. स्वर एवं जन। इन दोनों की कुल संख्या छियालीस है। स्वर तेरह और व्यञ्जन तेतीस हैं। जिन, ध्वनियों में उच्चारण में सांस बेरोक बाहर निकल जाती है, उन्हें स्वर कहते त रविना लो मारी विभागी अग अग यता का कारण पोषाक को नती) - of...) । अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ल, ए, ऐ, ओ, औये स्वर हैं। अ, इ, उ, ऋ, ल- हस्व स्वर हैं | महारही ई, ऊ, ऋ- दीर्घ स्वर हैं । बिना किन मे पता है ए, ऐ, ओ, औ- मिश्रित स्वर हैं जिन वर्णों का उच्चारण दूसरे वर्ण की सहायता से होता है, व्यञ्जन कहलाते स्वर वर्णों की सहायता से वर्णों का उच्चारण होता है। व्यञ्जन इस प्रकार लेके जोग गे राम सा 21 ञ्जन मा जास्ति हो -योगको क्, ख, ग, घ, हकवर्गाली न. विधा शी च, छ, ज, झ, ञ्चवर्ग शानी का द, द, इ, द, ण्–टवर्ग को होती ति त्, थ, द, ध, न्–तवर्ग परी प, फ, ब्, भ, म्--पवर्ग-7 हिमा य, र, ल, व्-अन्तःस्थल ने श्, ष, स्, ह-ऊष्म वर्णपुरा हो नुनासिक मेला में GP--: -- ङ्, अ, ण, न, म्, (वर्ग के अन्तिम अक्षर) अनुनासिक कहलाते हैं। नुस्वार-(२) अनुस्वार कहलाता है, जिसका उच्चारण म् अथवा न जैसा होता है। में-अहं पठामि, एवं, यशांसि। भव प्रत्येक वर्ण के उच्चारण में आभ्यन्तर और बाह्य, ये स्वाभाविक दो प्रयत्न होते हरे ग .. २ उदान .. - आभ्यन्तर प्रयत के पाँच भेद हैं-स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, विवृत, ईषद्-विवृत : संवृत। पाँचों वर्ग के अक्षरों का स्पृष्ट प्रयत्न होता है। अन्त:स्थ (य् र् त् व्) का ईषत्-स्स: प्रयत्न होता है। स्वर वर्ण का विवृत प्रयत्न होता है। ऊप्म (श् ष् स् ह) का ईपद्-वि प्रयत्न होता है। ह्रस्व अ वर्ण का संवृत प्रयत्न होता है। बाह्य प्रयत्न ग्यारह होते हैं -विवार, श्वास, अघोष, संवार, नाद, घोप, अनुदात्त, स्वरित, अल्पप्राण और महाप्राण । ir वर्ग के पहले, दूसरे वर्ण, तथा श् ष् स् वर्ण'को विवार, श्वास, अघोष कर प्रयत्न होता है। प्रत्येक वर्ग के ३, ४, वें वर्गों और य र ल व ह का संवार, न घोष प्रयत्न होता है। स्वर वर्णो का उदात्त, अनुदात्त, स्वरित प्रयत्न होता है। वर्ग के १, ३, ५, वें वर्णों तथा य र ल व् और स्वर वर्णों का अल्पप्राण प्रयत्न होता है। प्रो वर्ग के दूसरे व चौथे वर्णों तथा श् ष स ह वर्णों का महाप्राण प्रयत्न होता है। विसर्ग ................: (:) विसर्ग कहलाता है। -राम: और अन्त स्थापना - ....: |ग :.:.:... सुबन्त (पद) प्रथमा विभक्ति में 'सु' से लेकर सप्तमी विभक्ति के सुप्' तक शब्द के सर जोड़े जाने वाले प्रत्यय सुप कहलाते हैं। ये जिन शब्दों के अन्त में आते हैं, उन्हें सुधन (पद) कहते हैं। TIGET PATI TA: संस्कृत भाषा के कारक छह हैं—कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, और अधिकरण। सम्बन्ध एवं संबोधन को मिलाकर आठ कारक होते हैं। संबोधन सहित विभलित भी आठ हैं। इनके चिह्न इस प्रकार हैं- Faurant Sher चिह्न (हिन्दी) कर्ता ने द्वितीया कर्म को तृतीया से, द्वारा, ने चतुर्थी को, के लिए पंचमी पष्ठी का, के, की, रा, रे, री, ना, ने, नी सप्तमी अधिकरण सम्बोधन हे, अरे, अये कारक । प्रथमा करण सम्प्रदान अपादान से (पृथक्) सम्बन्ध . म, पर नचन संस्कृत में तीन वंचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन और बहुवचन।
-- + : 7. डे. सुप् विभक्ति का स्वरूप - T;:..1...' विभक्ति एकवचन "; द्विवचन बहुवचन प्रथमा सु और ज़स्...-1 द्वितीया अम् औट:::::शस् तृतीया टा ने भ्याम् .. भिस्:--- चतुर्थी :: :: ::: ?भ्याम् भ्यस्। पंचमी ङसि भ्याम् भ्यस् .....- 11: Hष्ठी:: :.1:.1 ङस् , --1777, ; ओस् न । आम्मा सप्तमी * : -डि:: ' -.--:: ओस् :: :: सुप्... ::: सम्बोधन के लिए प्रथमा विभक्ति का स्वरूप ही रहता है। हा.' लिङ्ग संस्कृत भाषा में तीन लिङ्ग होते हैं। पुंल्लिज, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग। पुरुष-जाति का सूचक पुंल्लिङ्ग कहलाता है। स्त्री-जाति सूचक स्त्रीलिङ्ग तथा ज दोनों जातियों से पृथक् का सूचक हो वह नपुंसकलिङ्ग कहलाता है। जैसे--- राम: (पुं० रमा (स्त्री०), फलम् (नपुं०)। शोभन:, शोभना, शोभनम्। अनेक शब्द उभयलिङ्ग भ होते हैं। धातु संस्कृत में क्रिया को धातु कहते हैं। ये धातु देस भागों में विभक्त हैं- भ्वादिगण अदादिगण, जुहोत्यादिगण, दिवादिगण, स्वादिगण, तुदादिगण, रुधादिगण, तनादिगण क्यादिगण एवं चुरादिगण। TE , लकार .. काल और अवस्था का जिनसे ज्ञान हो, उनको लकार कहा जाता है। लक दस होते हैं। लट्-वर्तमान काल। लिट्-परोक्षभूत। लुट-अनंद्यतन भविष्यत् । सामान्य भविष्यत्। ...... लोट-आज्ञा। लङअनद्यतनभूत। विधिलिङ्प्रेरणा या शिक्षा (चाहिए अर्थ में)। .:....आशीर्लिभ आशीर्वादार्थको लुइसामान्य भूत। लुड-हेतुहेतुमद्भाव। -- :
-- प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण के लिए पांच लकार ही पर्याप्त हैं- लट्-वर्तमान काल की क्रिया के लिए। लोट-आज्ञार्थक क्रिया के लिए। लङ्-भूतकाल की क्रिया के लिए। लट्-भविष्यत् काल की क्रिया के लिए। विधिलिङ्-प्रेरणा, शिक्षा, सुझाव आदि की क्रिया के लिए। जैसे- राम: पठति-(वर्तमान काल), राम: अपठत्-(भूतकाल), राम: पठतु (आज्ञा) राम: पठिष्यति- (भविष्यत् काल), रामः पठेत् (प्रेरणार्थक)। धातुएँ तीन प्रकार की होती हैं- परस्मैपदी, आत्मनेपदी और उभयपदी। -- 000 अध्याय-१ रामम् (को) राम शब्द (पुंल्लिङ्ग) विभक्ति कारक एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा कर्ता रामः (ने) रामौ (दो ने) रामा: (अनेक ने) द्वितीया कर्म रामो (दो को) रामान (अनेक को) तृतीया करण रामेण (से, द्वारा) रामाभ्याम् रामैः चतुर्थी सम्प्रदान रामाय (को, लिए) रामाभ्याम् रामेभ्यः पंचमी अपादान रामात् (से-पृथक्) रामाभ्याम् रामेभ्यः पप्ठी सम्बन्ध रामस्य (का, के, रामयोः रामाणाम की) सप्तमी अधिकरण रामे (में, पर) रामयोः रामेयु सम्बोधन सम्बोधन हे राम (ओ)! हे रामो! अन्य अकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्द राम शब्द की तरह ही बनते हैं। 2- पालक (लड़का), समुद्रः (सागर), जनक: (पिता), मोहनः (नाम) आदि। पट् धातु- पठ = पदना, लट् लकार (वर्तमान काल) प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष = पठति प्र० पु० म० पु० होना, रक्ष् हँसना, %3D एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप पठति पठतः पठन्ति पठसि पठथः पठथ पठामि पठावः पठामः भ्वादिगण (परस्मैपदी) के किसी धातु के लट्लकार (वर्तमान) के रूप. इस प्रकार बनाए जा सकते हैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन पठ्+अति पठ्+अत: = पठत: पठ्+अन्ति = पठन्ति पठ्+असि = पठसि पठ्+अथ: = पठथ: पठ्+अथ = पठथ उ० पु० पठ्+आमि = पठामि पठ्+आव: = पठाव: पठ्+आम: = पठाम: भू (भव) = रक्षा करना, वद् = बोलना, हस् चर् चलना, त्यज् = छोड़ना, चल् = हिलना, अट्”- घूमना, पच् = पकाना, नम् = नमस्कार करना, गम् (गच्छ) = जाना, दृश् (पश्य) = देखना, आदि धातु के वर्तमान काल (लट् लकार) के रूप पठ् की तरह चलते हैं। अनुवाद कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है। (ii) जिस वचन में कर्ता होगा, उसी वचन की क्रिया होगी। कर्ता के विशेषण भी उसी वचन के होंगे। जैसे- राम पढ़ता है = राम: पठति। राम एवं केशव पढ़ते हैं रामकेशवौ पटतः। (यहाँ राम और केशव दो व्यक्ति कर्ता हैं, अत: द्विवचन होगा।) राम, केशव और मोहन पढ़ते हैं-रामकेशवमोहना: पठन्ति। (यहाँ दो से अधिक हैं, अत: बहुवचन होगा)। राम: पठति, रामौ पठत:, रामा: पठन्ति। अभ्यास अन्तस्थ-वर्ण हैं (क) क् च् ट् त्। (ख) इञ् ण् न्। (ग) य्रल् व्। (घ) श् ष् स् । 'कवर्ग' के लिए वर्णमाला में निर्धारित नासिक्य वर्ण है (क) ण (ख) म् २. (घ) -- ३. का ) THIT शाल -35 ( ५. "हिमालयांत् गंगा प्रभवति।" रेखाकित शब्द में कौन सी विभक्ति है? (क) षष्ठी (ख) पंचमी (ग) द्वितीयां (घ) सप्तमी (ङ) तृतीया पश्यामः" को पुरुष और वचन निम्नांकित में से है : (क) प्रथम पुरुष, द्विवचन (ख) उत्तम पुरुष, बहुवचन (ग) मध्यम पुरुष, एकवचन (घ) उत्तम पुरुष, एकवचन ङ) प्रथम पुरुष, एकवचन कृष्ण शब्द के रूप लिखो। ६. जनकाय, मल्लात्, कृष्णे, बालकेषु, मनुष्याणाम्, मार्गम्, मोहनेन, हे सोहना:-इन शब्दों की विभक्ति एवं वचन बंताओ। वद् धातु के लट् लकार के रूप लिखो। ८. चलन्ति, त्यजसि, गच्छामि, पचतः, अटामि, नमसि, चराम:, गच्छाव: पश्यर्थ, रक्ष—इनके पुरुष एवं वचन बताओ। कर्ता के सामने सही क्रिया लिखो- कर्ता राम:, बालको, मनुष्याः। क्रिया पठति, गच्छत:, हसन्ति। १०. हिन्दी से संस्कृत में अनुवाद करो- tis गणेश हँसता है। राम और मोहन रक्षा करते हैं। मनुष्य बोलते हैं। बालक देखते हैं। पिता पढ़ता है। पुत्र नमस्कार करता है। सुन्दर लड़का आता है। (आगच्छु) । में जाता हूँ। ... 15 : ----- १६. रिक्त स्थानों की पूर्ति करो- साला सा... .-पठति। -(वद्)। सत्य: ओदनं- -(पंच्)। रामश्यामौ -(रक्ष)। छात्रा:-TE:-(गच्छ)। वयं ७. ९. . मानव:- हस्। . ) 13EBO0 IFIET) {FREE IPPIR) पानी TIES Ir (5) (3) --- ७ प्रथमा कर्ता . T नार अध्याय-राका मलाल जी, " : SEPT, जगा . "F) ... ... ... :) :: NE; लता शब्द (स्त्रीलिङ्ग), " ...) हा विभक्ति कारक एकवचन 'द्विवंचन बहुवचन लता लते लता: द्वितीया कर्म लताम् लते लता: तृतीया करण लतया लताभ्याम् लताभिः चतुर्थी सम्प्रदान लंतायै लताभ्याम् लंताभ्य: पंचमी अपादान लतायाः लताभ्याम् लताभ्यः षष्ठी सम्बन्ध लतायाः लतयोः लतानाम्. सप्तमी अधिकरण लतायाम् लतयोः लतासु सम्बोधन सम्बोधन हे लते! हे लते! हे लता:! अन्य आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द लता की तरह ही चलते हैं। जैसे - रमा, बाला, माला, कन्या, माया, प्रभा, शीला आदि। सर्वनाम एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० पु० सः (वह) पु० सा (वह) स्त्री ते (वे दोनों) स्त्री० ता: (वे सब) स्त्री० त्वम् (तुम) युवाम् (तुम दोनों) यूयम् (तुम सेब) अहम् (मैं) आवाम् (हम दोनों) वयम् (हम सब) लोट् लकार (आंज्ञार्थक) पनि गने एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप पठतु पठन्तु पट पठतम् पठत मध्यम पुरुष पठानि पंठांव पठाम भ्वादिगण के अन्य परस्मैपदी धातु के लोट् लकार (आज्ञार्थक) के रूप इस प्रका- बनाये जा सकते हैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन TEE पट+अतु = पठतु पठ+अताम् = पठताम् पठ्+अन्तु : पठन्तु म० पु० पटपठ पठ+अंतम् = पठतम् पढ़+अत पटत उ. पु० पठ्+आनि = पठानि पठं आवे पठीव पा आम = पठा .. तौ (वे दोनों) पु. ते (वे सब) पु० P० पु० उ० पु० 7 : : पठताम् प्रथम पुरुष 6 उत्तम पुरुष -- प्र० पु० १० अध्याय-३ फल शब्द (नपुंसकलिङ्ग) विभक्ति कारक एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा कर्ता फलम् फले फलानि द्वितीया कर्म फलम् फले फलानि तृतीया करण फलेन फलाभ्याम् फलैः चतुर्थी सम्प्रदान फलाय फलाभ्याम् फलेभ्यः पंचमी अपादान फलात् फलाभ्याम् फलेभ्य: षष्ठी सम्बन्ध फलस्य फलयोः फलानाम् सप्तमी अधिकरण फले फलयोः फलेषु सम्बोधन सम्बोधन हे फल हे फले हे फलानि इसी प्रकार मित्र (दोस्त), ज्ञान, पुस्तक, भवन, गृह, पुष्प, जल आदि के रूप चलते हैं। लङ् लकार (भूतकाल) एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप अपठत् अपठताम् अपठन् अपठः अपठतम् अपठत मध्यम पुरुष अपठम् अपठाव अपठाम भ्वादिगण के अन्य परस्मैपदी धातु के लङ्लकार (भूतकाल) के रूप इस प्रकार बनाये जाते हैं- एकवचन द्विवचन बहुवचन धातु के आगे [पूर्व में] 'अ' लगाना होता है अ+पठ्+अत्+ अ+पद+अताम् = अपठताम् अ+पठ्+अन् - अपटन (वह पढ़ा, उसने पढ़ा) (उन दोनों ने पढ़ा) (उन सबने पढ़ा) अ+पठ्+अ: = अपठः अ+पठ्+अतम् = अपठतम् अ+पठ+ अत = अपटत (तुमने पढ़ा) (तुम दोनों ने पढ़ा) (तुम सबने पढ़ा) अ+पठ्+अम् = अपठम् अ+पठ्+आव = अपठाव अ+पठ्+आम = अपठाम (हम दोनों ने पढ़ा) (हम सबने पढ़ा) अव्यय सह - साथ तृष्णीम् = चुर चिरात् - बहुत समय तक सदा = हमेशा ननु = निश्चय करके चिरेण = बहुत समन्त्र प्रथम पुरुष उत्तम पुरुप अपठत् मैंने पढ़ा) तत: 3 उसके बाद यत: 3 यत् = कि शनैः = धीरे नमः 3 नमस्कार चिराय = बहुत समय तक शीघ्रम् = जल्दी नाना अनेक झटिति = झट से विना = बिना नीचे: नीचे श्व: = कल (आगामी) उच्चैः = जोर से, ऊपर अत: - इसके बाद ह्यः = कल (बीता हुआ) उपरि 3 ऊपर ध्रुवम् = निश्चय करके क्योंकि उभयत: = दोनों ओर धिक् = धिक्कार वा = अथवा अहर्निशम् = रात-दिन क्व कहाँ यदि = अगर आरात् = समीप, दूर केवलम् = केवल यदा = जब प्रात: 3 सुबह प्रयोग सदा शीघ्रं गच्छ। श्व: पठतु। ह्य: अपठत् । राम: सीवा वा आगच्छतु। तूष्णीम् भव। अहर्निशम् पठ। प्रात: चलतु । अनुवाद (i) क्रिया की सिद्धि में सहायक को करण कहते हैं। करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- राम कलम से लिखता है--- राम: कलमेन लिखति। सह अव्यय के रहने पर तृतीया विभक्ति होती है। च (और) अव्यय बाद में (पीछे-एक शब्द को छोड़कर) लिखा जाता है। जैसे—राम: सीता च अगच्छताम्। अभ्यास १. -1 ) २. अहम्- रिक्त स्थान की पूर्ति “धाव् धातु" लङ् लकार से करें तो निम्नांकित में सही विकल्प होगा- (क) अधावत् (ख) धावत: (ग) अधावम् (घ) अधावताम् (ङ) अधावन्। स: लतां पुष्पाणि चिनोति। रेखांकित शब्द में कौनसी विभक्ति एवं वचन है ? प्रथमा, एकवचन (स) प्रथमा, बहुवचन (ग) द्वितीया, द्विवचन (घ) तृतीया, एकवचन (ङ) द्वितीया, बहुवचन। जल शब्द के रूप लिखिए। वद् धातु के लङ् लकार (भूतकाल) के रूप लिखिए। -- ) ३. ४.
१२ ५. ६. ७ . अभवताम्, अचल:, अरक्षतम्, अत्यजम्, अगच्छाम-रूपों का पुरुष एवं वचन लिखिए। श्वः, आरात्, उभयत:, ध्रुवम्, चिरेण, यत्-अव्यय शब्दों के अर्थ प्रयोग सहित लिखिए। अनुवाद कीजिए- रमेश गया। वह दोस्त के साथ आया। तुमने तलवार से रक्षा की। मैं प्रात: घूमा। तुम दोनों कल आए। हम दोनों ने झट से खाना पकाया। वे दोनों निश्चय करके वहाँ नहीं रहे। उन सभी ने केवल नमस्कार किया। मैं धीरे-धीरे गया और आया। निम्न वाक्यों में रेखाङ्कित पदों की विभक्ति का कारण लिखिए- (क) भूपतिना सह सेनापति: गच्छति। (ख) महेश: सुरेशाय क्रुध्यति। (ग) स चौराद् बिभेति। (घ) छात्राणां राम: पटुतमः। ८. 000 अध्याय-४ कवि शब्द (इकारान्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन प्रथमा कविः, कवी द्वितीया कविम् कवी तृतीया कविना कविभ्याम् चतुर्थी कवये कविभ्याम् पंचमी कवेः कविभ्याम् षष्ठी कवेः कव्योः सप्तमी कवी कव्योः सम्बोधन हे कवे हे कवी इसी प्रकार हरि, मुनि, रवि, ऋषि आदि के रूप चलते हैं। बहुवचन कवयः कवीन् कविभिः कविभ्यः कविभ्यः कवीनाम् कविषु के कवयः .
हे भानू बहुवचन प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष भानु शब्द (उकारान्त पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा भानुः भानू भानवः द्वितीया भानुम् भानू भानून् तृतीया भानुना भानुभ्याम् भानुभिः चतुर्थी भानवे भानुभ्याम् भानुभ्यः पंचमी भानोः भानुभ्याम् भानुभ्यः षष्ठी भानो: भान्वोः भानूनाम् सप्तमी भानौ भान्वोः भानुषु सम्बोधन हे भानो हे भानव: इसी प्रकार गुरु, पशु, ऋतु, विधु आदि के रूप चलते हैं। लृट् लकार (भविष्यत् काल) एकवचन द्विवचन पुरुप पठिप्यति पठिप्यत: पठिष्यन्ति पठिप्यसि पठिप्यथः पठिप्यथ पठिप्यामि पठिप्याव: पठिप्यामः भ्वादिगण के कुछ धातुओं के लृट् लकार (भविष्यत् काल) के रूप इस प्रकार चलेंगे- एकवचन द्विवचन बहुवचन पठ्+इष्यति = पठिप्यति पठ्+इप्यत: = पठिप्यत: पठ्+इप्यन्ति = पठिप्यन्ति (वह पढ़ेगा) (वे दोनों पढ़ेंगे) (वे सब पढ़ेंगे) पठ्+इप्यसि = पठिप्यसि पठ्+इप्यथ: = पठिप्यथ: पठ्+इप्यथ = पटिप्यथ (तुम पढ़ोगे) (तुम दोनों पढ़ोगे) (तुम सब पढ़ोगे) पठ्+इप्यामि = पठिप्यामि पठ्+इप्याव: = पठिप्याव: पठ्+इप्याम: = पठिप्याम: (मैं पढूंगा) (हम दोनों पढ़ेंगे) (हम सब पढ़ेंगे) कुछ धातुओं के अन्त में स्यति आदि रूप जुड़ेंगे। जैसे—पा धातु। पा+स्यति= पास्यति, पा+स्यत: = पास्यत:, पा+स्यन्ति = पास्यन्ति। गम्, पा, स्था, दृश्, घ्रा आदि धातुओं के मूल रूप में (लट् लकार में) परिवर्तन नहीं होता है। अव्यय शब्द सकृत् = एक बार हि = निश्चय करके पुनः = फिर समम् = साथ हे - अरे पुरा पहले स्वयम् % खुद हन्त%3 सहसा = अचानक मृषा = झूठ मुहुः . हर्ष, दुःख प्रत्युत = बल्कि = फिर १४ भूयः = फिर सम्यक् = ठीक तरह भृशम् = बहुत मा - मत % अच्छा मिथ्या = झूठ सम्प्रति - अभी पृथक् 3 अलग अभितः = दोनों के मध्य साम्प्रतम् = अभी परितः चारों ओर अन्तरा = दोनों के मध्य एव%3 ही किल = अवश्य ही अहो = आश्चर्य यथा-3 जैसे चिरम् = देर तक ‘खलु = निश्चय ही सन्धि सन्धि की परिभाषा पर: सन्निकर्ष: संहिता। अर्थात् वर्णों की अत्यधिक निकटता या वर्णों का एक ही श्वास में बोलना उनकी सन्धि है। जब हम बोलते हैं तो शीघ्रतावश ध्वनियों का उच्चारण पृथक्-पृथक् रूप से नहीं होता है। सहज रूप से मिल-जुलकर एक नया उच्चारण होता है। इस मिले-जुले रूप को सन्धि रूप कहा जाता है। दो या दो से अधिक स्वर अथवा व्यंजन मिलकर एक रूप धारण करते हैं। वह सन्धि का ही परिणाम है। यथा- विद्या+अर्थी - विद्यार्थी। अति+उत्तम: अत्युत्तमः। सत्+जनः - सज्जनः। 'मनस्+रथ: = मनोरथः। मुख्यत: सन्धि के तीन भेद हैं- १. स्वर सन्धि। २. व्यञ्जन सन्धि या हल सन्धि! ३. विसर्ग सन्धि। स्वर सन्धि- दो या दो से अधिक स्वरों के बीच होने वाली सन्धि का नाम है। व्यञ्जन (हल्) सन्धि- दो या दो से अधिक व्यञ्जनों अथवा हलों के मध्य होने वाली सन्धि का नाम है। विसर्ग:सन्धि- विसर्ग (:) के कारण जो परिवर्तन होता है, उसे विसर्ग सन्धि कहा जाता है। स्वर सन्धि में आवश्यक सन्धियाँ ये होती हैं। । २. गुण। ३. यण! ४. वृद्धि। ५. अयादि। ६. पूर्वरूप। ७. पररूप। अनुवाद कोई क्रिया या कर्म (दानादिक) जिसके लिए किया जाता है, उसे सम्प्रदान कहते. हैं। सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-ज्ञानाय पठति। अभ्यास १. निम्नलिखित शब्दों के रूप उनके सामने दी गई विभक्ति में लिखिए- - १. दीर्घ। / (१) ऋषि (पष्ठी) - अन्यो: ... अन् चित (२) गुरु (पंचमी) पुरी:---गुरू याम गुरु-श्य: (३) रवि (द्वितीया) रतिम... रवी... रवीन_ (४) विधु (सप्तमी) -विधी ----वियों, विधुषु "अगच्छत" शब्द में प्रयुक्त धातु को लृट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन में लिखिए। हरि शब्द के रूप लिखिए। गमिहयातच गुरु शब्द के रूप लिखिए। हस् धातु के लृट् लकार के रूप लिखिए। भूयः, हन्त, सकृत, अन्तरा, मृषा, सम्यक् शब्दों के अर्थ लिखिए। स्वर एवं व्यञ्जन सन्धि में क्या अन्तर है ? सम्प्रदान किसे कहते हैं? अनुवाद कीजिए- वह पढ़ेगा। वह कल गांव जाएगी। तुम राम के लिए बोलोगे। हम ज्ञान के लिए पुस्तक पढ़ेंगे। वे शीतल जल पीयेंगे। हम एक बार दूध पीएँगे। वह इस समय नहीं आयेगा। चारों ओर शोर हो जायगा। वे यज्ञ के लिए हव्य पकाएँगे। तुम ही नहीं, बल्कि हम सब चलेंगे। बीमार के लिए खुली हवा ठीक है। हम अभी अलग-अलग घूमेंगे। सः पठिष्यति। स: रण: ग्रामम गमिष्यति 100 त्वम् शमात् पदिष्यसि वयम् लानाय पुस्तकं पठिज्याम: : अध्याय-५ मति (बुद्धि) शब्द (इकारान्त स्त्रीलिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा मति: मती मतयः द्वितीया मतिम् मती मती: तृतीया मत्या मतिभ्याम् मतिभिः चतुर्थी मत्यै, मतये मतिभ्याम् मतिभ्यः पंचमी मते: मतिभ्याम् मतिभ्यः मत्याः, १६ मत्याम्, मतौ हे मतयः हे नद्य: षष्ठी मत्याः, मते: मत्योः मतीनाम् सप्तमी मत्योः मतिसु सम्बोधन हे मते हे मती इसी प्रकार रुचि, भूमि, गति, रात्रि, भक्ति आदि के रूप चलते हैं। नदी शब्द (इकारान्त स्त्रीलिङ्ग) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा नदी नद्यौ नद्यः द्वितीया नदीम् नद्यौ नदी: तृतीया नद्या नदीभ्याम् नदीभिः चतुर्थी नद्यै नदीभ्याम् नदीभ्यः पंचमी. नद्या: नदीभ्याम् नदीभ्य: षष्ठी नद्याः नद्योः नदीनाम् सप्तमी नद्याम् नद्यो: नदीपु सम्बोधन हे नदि हे नद्यौ इसी प्रकार कुमारी, देवी, भवती, यादृशी, तादृशी आदि के रूप चलते हैं। विधिलिङ् (प्रेरणार्थक) पढ़ना चाहिए, लिखना चाहिए आदि में सुझाव, प्रेरणा, सीख आदि की भाव है। ऐसी क्रियाओं के लिए विधिलिङ् का प्रयोग किया जाता है। एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप पठेत् पठेताम् पठेयुः प्रथम पुरुप पठे: पठेतम् पठेत मध्यम पुरुष पठेयम् पठेव पठेम भ्वादिगण के अन्य धातुओं के विधिलिङ् लकार के रूप इस प्रकार बनाए सकते हैं एकवचन द्विवचन बहुवचन पठ+ एत् = पठेत् पठ+एयुः = पठेयुः (उसे पढ़ना चाहिए) (उन दोनों को पढ़ना (उन्हें पढ़ना चाहिए) चाहिए), पठ्+ एतम् = पठेतम् (तुम्हें पढ़ना चाहिए) (तुम दोनों को पढ़ना (तुम सभी को पढ़ना चाहिए) चाहिए) पठ्+ एयम् = पठेयम् (मुझे पढ़ना चाहिए) (हम दोनों को पढ़ना (हम सभी को पढ़ना चाहिए) चाहिए) उत्तम पुरुष पठ्+ एताम् = पठेताम् पठ+ए: = पठे: पठ्+एत = पठेत पठ्+एव = पठेव पद+एम - पटेम १७ दूर, विरोध बाहर, बाहर, . उपसर्ग उपसर्ग अव्यय का एक भेद है। ये संज्ञा, विशेषण और क्रियापदों के पूर्व में जुड़ते हैं तथा उनके अर्थ में कुछ परिवर्तन करते है। कहीं कहीं स्वतन्त्र अर्थ भी रखते हैं। जैसे- प्र+भाव = प्रभाव = असर। प्र+माण = प्रमाण - सबूत। कुछ उपसर्ग अर्थ एवं प्रयोगों सहित दिए जा रहे हैं- उपसर्ग अर्थ उदाहरण विशेष रूप से प्रभाव, प्रणाम, प्रमाण, प्राचार्य, प्रभूत। परा पीछे, विपरीत पराभव, पराजय। अप अपमान, अपकर्ष, अपभ्रंश। सम् साथ, समान समर्पण, समागत, समधिक। अनु पीछे, साथ-साथ अनुगमन, अनुकरण, अनुकूल, अनुचर। अव् दूर, अनादर अवगुण, अवमान, अवनति, अवधि। निस् बिना निष्काम, निष्फल, निप्पाप, निष्कपट । निर् बिना निरक्षर, निरादर, निरन्तर, निरंकुश। दुस् बुरा, कठिन, हीन दुरशासन, दुस्सह, दुस्साध्य, दुष्कर। दुर बुरा, कठिन, हीन दुराचार, दुर्गन्ध, दुराग्रह, दुर्दिन। दीर्घ सन्धि (अक: सवर्णे दीर्घः) अर्थात् सवर्ण अक्षरों में दीर्घ सन्धि होती है। यदि अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, के सामने समान स्वर आए तो उन दोनों के स्थान पर उनका दीर्घ स्वर हो जायेगा। अर्थात्- अ+अ आ इ+इ अ+आ = आ इ+ई = ई आ+अ = आ आ+आ = आ ई+ई = ई दैत्य+अरिः = दैत्यारिः। अति+इव = अतीव। हिम+आलय: - हिमालयः। रवि+इन्द्रः= रवीन्द्रः। विद्या+आलय: 3 विद्यालयः। परि+ईक्षा = परीक्षा। विद्या+अर्थी विद्यार्थी। गिरि+ईश: = गिरीश:। भुवन+ -अन्तराले भुवनान्तराले। गौरी+ईश: = गौरीश:। रत्न+आकरः = रत्नाकरः। कवि+इन्द्रः = कवीन्द्रः। रचिता+अद्वितीया = रचिताद्वितीया। महती+इच्छा = महतीच्छा। विष्णु+उदय: - विष्णूदयः। नदी+ईश: नदीश:। भानु+ऊप्मा = भानूप्मा। पितृ ऋणम् = पितृणम्।
१८ +ऋणम् - १. पञ्चमी ( ) २ . वधू+उत्सव: 3 वधूत्सवः। होतृ+ऋकार: = होतृकारः। गुरु+उपदेश: = गुरूपदेश:। मातृ+ मातृणम्। अनुवादः (i) जिसरो कोई वस्तु आदि अलग या दूर हो, उसे अपादान कहते हैं। (ii) अपादान में पंचमी विभक्ति होती है। (iii) दो की तुलना में भी पंचमी विभक्ति होती है। अभ्यास असज्जनात् कस्य भयं न जायते ? रेखांकित पद में विभक्ति है- (क) प्रथमा (ख) तृतीया (ग) (घ) द्वितीया (ङ) सप्तमी। “धनात् ज्ञानं गुरुतरम्" रेखांकित में पंचमी विभक्ति का कारण है-- (क) दो पदों में दूरी (ख) अर्थ वैभिन्य (ग) तुलना (घ) अन्तर (ङ) अला होना। ( ) ३. भूमि शब्द के रूप लिखो। ४. देवी शब्द के रूप लिखो। वद् धातु के विधिलिङ् लकार के रूप लिखिए। ६. निर्मक्षिकम्, दुःख, दुर्योग, अनुभव, दुस्त्यज, अपकार-शब्दों में उपसर्ग बताइए। भानूदयः, पुस्तकालयः, गुणाकरः, होतृकारः, शब्दों में विच्छेद करते हुए सन्धि का कारण बताइए। अनुवाद कीजिए- राम को घर से जाना चाहिए। उन्हें वृक्ष से नहीं गिरना चाहिए। कुमारी को पढ़ना चाहिए। नदी में जल होना चाहिए। अभी रात्रि का प्रथम प्रहर होना चाहिए। आपको पढ़ना चाहिए। तुम सभी को बगीचे से चलना चाहिए। ९. अपादान किसे कहते हैं तथा अपादान में कौनसी विभक्ति होती है? ५. ७. ।
अध्याय-६ बिहे पति: पितृ (पिता) शब्द (ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पिता पितरो पितरः द्वितीया पितरम् पितरौ पितॄन् तृतीया पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः चतुर्थी पित्रे पितृभ्याम् पितृभ्यः पंचमी पितुः पितृभ्याम् पितृभ्यः षष्ठी पितुः पित्रोः पितॄणाम् सप्तमी पितरि पित्रोः पितृपु सम्बोधन हे पित: हे पितरौ हे पितरः भ्रातृ(भाई), जामातृ (जॅवाई), देव (देवर) आदि के रूप पितृ की तरह चलेंगे। पति (स्वामी) शब्द (इकारान्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पती पतयः द्वितीया पतिम् पती पतीन् दृतीया पत्या पतिभ्याम् पतिभि: चतुर्थी पत्ये पतिभ्याम् पतिभ्यः पंचमी पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः षष्ठी पत्युः पतीनाम् सप्तमी पत्यौ पतिषु सम्बोधन हे पते हे पती नरपति, श्रीपति आदि शब्द पति की तरह न चलकर कवि की तरह चलेंगे। लभ् (पाना) आत्मनेपदी (लट् लकार) एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप लभते लभेते लभन्ते लभसे "लभेथे लभध्वे लभे लभावहे लभामहे इस प्रकार सेव् (सेवा करना), वृध् (बढ़ाना), मुद् (प्रसन्न होना), सह (सहना), वृत् (होना) व ईक्ष् (देखना) आदि के रूप बनेंगे। पत्योः पत्योः हे पतयः प्रथम पुरुष मध्यम पुरुप उत्तम पुरुष २० एकवचन द्विवचन बहुवचन सेव्+अते = सेवते सेव् एते - सेवेते से+अन्ते - सेवन्ते (वह सेवा करता है) (वे दोनों सेवा करते हैं) (वे सब सेवा करते हैं) सेव+असे = सेवसे सेव्+एथे = सेवेथे से+अध्वे - सेवध्वे (तुम सेवा करते हो) (तुम दोनों सेवा करते हो) (तुम सब सेवा करते हो) सेव्+ ए = सेवे सेन्+आवहे - सेवावहे सेव्+आमहे = सेवामहे (मैं सेवा करता हूँ) (हम दोनों सेवा करते हैं) (हम सब सेवा करते हैं) उपसर्ग- वि-अलग-अलग, विपरीत-विकल, विगत, विभिन्न, विक्रय। आ-(आङ्)-कुछ-आख्यान, आचमन, आकर्षण, आक्रमण। नि-नीचापन, निश्चय, समूह-निकट, नियत, निकृष्ट, निगम। अधि-प्रधान, ऊपर, विषय से-अधिपति, अधिकार, अध्याय, अधीन। अपि-निकट-अपिव्रत, अपिधान। अति--अधिक, बाहर, अयोग्य-अतिमात्र, अतिरिक्त, अतीन्द्रिय। सु-अच्छा, बिना श्रम के-सुकर, सुजन, सुग्रीव, सुलभ। उत्-ऊपर-उत्तम, उत्तर, उत्कर्ष, उत्सव। अभि-ओर, पक्ष, अधिक-अभिमान, अभिनन्दन, अभिनय, अभिज्ञान। लौ प्रति-ओर, विपक्ष, विरोध में प्रतिकूल, प्रतिनायक, प्रतिशब्द, प्रतिलिपि। परि-चारों ओर, विरोध में परिचय, परिग्रह, परीक्षा। उप-निकट, गौण-उपकार, उपरत, उपनयन, उपकरण। उपसर्गयुक्त धातुएँ उप+ I+अ = उपार्जति। प्र+इष् = प्रेषति, प्रेषते। वि+कस् - विकसति। अव्+लुक् - अवलोकयति, अवलोकयते। नि+विद् = निवेदयते। आ+वे (वय) = आह्वयति, आह्वयते। उत्+डी = उड्डीयते। सन्धि-ज्ञान गुण सन्धि (आद्गुण:) (i) अ अथवा आ के पश्चात् इ या ई हो तो दोनों (अ+इ) (आ+इ) को 'ए' होगा। (ii) अ अथवा आ के बाद उ या ऊ हो तो दोनों (अ+उ) (आ+3) को 'ओं होगा।
२१ (iii) इसी प्रकार अ या आ के बाद ऋ या M हो तो दोनों (अ+क) (आ+ऋ) (अ+लू) (आ+लु) को क्रमश: अर व अल् होगा। अर्थात् अ+इ=ए अ+उ = ओ आ+इ = ए आ+उ ओ अ+ई = ए अ+ऊ3 ओ आ+ई = ए आ+ऊ = ओ अ+ऋ= अर् अ+लु = अल जैसे- उप+इन्द्रः%D उपेन्द्रः सह+उदरः = सहोदरः एक+ऊनम् = एकोनम् नर+ईश: = नरेशः अवसर+उचितम् गहा+उदकम् = गहोदकम् महा+ईश: = महेश: अवसरोचितम् राजा+ऋषिः = राजर्षिः देव+ऋषिः = देवर्षिः हित+उपदेश: = हितोपदेश: . तव+लकारः = तवल्कार: महा+उत्सव: 3 महोत्सवः अभ्यास १. निम्नांकित विच्छेदयुक्त पदों में से गुणसन्धि हो सकती है- (क) बीजस्य+ बीजस्य+अंकुरः (ख) तदा+एव (ग) हरे+अत्र (ब) गंगा+उदकम्। ( ) धातु के साथ उपसर्गों के प्रयोग से अर्थ में जो परिवर्तन आया है, उसे लिखिए- (क) सम्+भवति (ख) अनु+भवति (ग) वंदति (घ) अनु+वदति (ङ) गच्छति :- (च): आ+गच्छति -1 ३. श्रीपति शब्द के रूप लिखिए जामातृ शब्द के रूप लिखिए मुद् (मोद्) धातु के लट् लकार के रूप लिखिए। निकट. अध्याय, अतिरिक्त, उपकार, सुग्रीव शब्दों में उपसर्ग बताइए। ७. श्वासोच्छ्वास:, ब्रह्मर्षिः, देवेन्द्रः, परोपकार: इनमें विग्रह सहित सन्धि बताइये। अनुवाद कीजिए राम सेवा करता है। वे देखते हैं (ईक्ष)। हम आगे बढ़ते हैं। तुम पुस्तकें प्राप्त करते हो। हम दोनों बहुत कष्ट सहते हैं। छात्र पुरस्कार पाते हैं। निम्नांकित उपसर्गों से शब्द निर्माण कीजिए अति, प्रति, उप, उत्, परि। 000 २. - --- -- ५. ६. । ९.
२२ अध्याय-७ हे मात: मातृ (माता) शब्द (ऋकारान्त स्त्रीलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा माता मातरौ मातरः द्वितीया मातरम् मातरौ मातृः तृतीया मात्रा मातृभ्याम् मातृभिः चतुर्थी मात्रे मातृभ्याम् मातृभ्यः पंचमी मातुः मातृभ्याम् मातृभ्यः षष्ठी मातुः मात्रो: मातृणाम् सप्तमी मातरि मात्रोः मातृषु सम्बोधन हे मातरौ हे मातरः इसी प्रकार यातृ (देवरानी), ननान्दृ (ननद), दुहित (लड़की) आदि के रूप बनेंगे। स्वसृ (बहिन) शब्द (ऋकारान्त स्त्रीलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा स्वसा स्वसारी स्वसार: द्वितीया स्वसारम् स्वसारी स्वसृ: तृतीया स्वम्रा स्वसृभ्याम् स्वसृभिः चतुर्थी स्वरो स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः पंचमी स्वसुः स्वसृभ्याम् स्वसृभ्य: षष्ठी स्वसुः स्वस्रो: स्वसृणाम् सप्तमी स्वसरि स्वस्रो: स्वसृषु सम्बोधन हे स्वस: हे स्वसारौ सेव् धातु (आत्मनेपदी) लोट् लकार (आज्ञार्थक) एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप सेवताम् सेवेताम् सेवन्ताम् प्रथम पुरुप सेवस्त्र सेवेथाम् सेवध्वम् मध्यम पुरुप सेवै सेवावहै सेवामहै उत्तम पुरुप इसी प्रकार अन्य आत्मनेपदी धातुओं के रूप भी चलेंगे। लोट्लकार के रूप इस तरह बनाये जा सकते हैं--(लभ् = पाना) एकवचन द्विवचन बहुवचन लभ्+अताम् - लभताम् लभ+एताम् = लभेताम् लभ्+अन्ताम् = लभन्ताम (वह पाए) (वे दोनों पाएँ) (वे सब पाएँ) हे स्वसार: - २३ -- लभेथाम् .. " on लभू+अस्व = लभस्व लभ्+एथाम् % लभ्+अध्वम् = लभध्वम् (तुम पाओ) (तुम दोनों पाओ) (तुम सभी पाओ) लभ्+ऐ = लभै लभ्+आवहै = लभावहै लभ+आमहै = लभामहै (मैं पाऊँ) (हम दोनों पाएँ) (हम सभी पाएँ) सन्धि-ज्ञान (वृद्धि सन्धि) वृद्धिरेचि 'अ' से परे एच् (अर्थात् ए अथवा ओ व ऐ तथा औ) हो तो वृद्धि सन्धि होती tho . . ऐ . ऐ । अर्थात् अ या आ से परे ए, ऐ होने पर ऐ होगा। अ या आ से परे ओ अथवा औ होने पर औ होगा। अ+ए अ+ओ = औ आ+ए % आ+ओ = औ अ+ऐ = ऐ अ+औ = औ आ+ऐ = ऐ आ+औ = औ यथा- अत्र+एक: 3 अत्रैक: जन+एकता = जनैकता महा+औदार्यम् =महौदार्यम् सा+एषा = सैषा दिव्य+ओषधिः दिव्य+औषधम् = दिव्यौषधम् दिव्यौपधिः का+एषा = कैपा महा+ओजस्वी = महौजस्वी एका+एव = एकैव सदा+एव = सदैव तण्डुल+ओदनम् : जन+औचित्यम् = जनौचित्यम् तण्डुलौदनम् समास की परिभाषा . -- एक से अधिक पदों के मिलकर एक होने को समास कहते हैं। समास में दो या दो से अधिक पदों का मेल होता है। प्रत्येक पद का स्वतन्त्र अर्थ होता है, किन्तु पदों का सामूहिक रूप अर्थ रखता है। समास वाला पद समस्त पद कहलाता है। समस्त पद को विभक्ति सहित पृथक्-पृथक् करने को विग्रह कहा जाता है। समास के भेद ये छह होते हैं-अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, बहुव्रीहि एवं द्वन्द्व। अव्ययीभाव समास जिस समास का पूर्व पद अव्यय रहता है, उसे अव्ययीभाव कहते हैं। अव्यय के साथ जो समास बनता है, वह भी अव्ययीभाव होता है। अव्ययीभाव समास का पहला पद अव्यय और दूसरा संज्ञा रहता है। जैसे- समस्तपद विग्रह अव्यय शब्द प्रतिदिनम् दिन-दिन प्रति (प्रत्येक का अर्थ) अनुरूपम् रूप अनुसार अनु (रूप के योग्य) ह २४ कूल के समीप शक्ति के अनुसार समुद्र तक उपकूलम् उप (सामीप्य) यथाशक्ति यथा (अनुसार) आसमुद्रम् आङ् (आ) (पर्यन्त) अतिवसन्तम् वसन्त के बीत जाने पर, अति (बीतने पर) निर्जनम् जन का अभाव निर् (अभाव) अनुवाद (i) सम्बन्ध कारक में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे- राम का पुत्र = रामस्य पुत्रः। दो नदियों का जल = नद्यो: जलम्। माताओं का सम्मेलन = मातृणां सम्मेलनम्। १. अभ्यास "गङ्गैषा" का सन्धि विच्छेद होगा- (क) गङ्गा+एषा । (ख)- गङ्ग+ऐषा (ग) गहे+षा (घ) गजे+ऐषा प(ङ)- गंग+ईषा। : २. वृद्धिसन्धि का उदाहरण है (क) सुध्युपास्यः। (ख) परोपकारः। (ग) कपीशः। (घ) सदैव। ( ) ३. दुहितृ शब्द के रूप लिखिए। ४. वर्धन्ताम्, मोदामहै, लभेथाम्, सेवस्व, वर्ते-इनके मूल धातु, लकार, पुरुष एवं वचन बताइए। एकदा+एव, मानव+ऐक्यम्, मधुर+ओषधिः, तथा+एव-इनमें सन्धि कीजिए। ६. अनु, यथा, अति, निर् अव्ययों को प्रयुक्त कर शब्द बनाइए। ७. · प्रतिवासरम्, उपकूपम्, अतिग्रीष्मः, निर्मक्षिकम्- पदों का हिन्दी में विग्रह कीजिए। अनुवाद कीजिए- वह समुद्र तक हो। हम राम के पुत्र प्रसन्न हों। तुम अपनी माता की सेवा करो। वे मधुर औषधि का सेवन करें। तुम दोनों संस्कृत की पुस्तकें पढ़ो। सीता अपनी ननद की सेवा करे। ९.. सम्बन्ध कारक किसे कहते हैं? सोदाहरण लिखिए। ८. 000 अध्याय-८ सखि (मित्र) शब्द (पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचम द्विवचन बहुवचन प्रथमा सखा सखायौ सखायः द्वितीया संखायम् सखायौ सखीन् तृतीया सख्या सखिभ्याम् सखिभिः चतुर्थी सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः पंचमी सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः षष्ठी सख्युः सख्योः सखीनाम् सप्तमी सख्यौ सख्योः सखिषु सम्बोधन हे सखे हे सखायौ हे सखायः सुधी (विद्वान्) शब्द (पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सुधी: सुधियो सुधिय: द्वितीया सुधियम् सुधियौ सुधिय: तृतीया सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः चतुर्थी सुधिये सुधीभ्याम् सुधिभ्यः पंचमी सुधिय: सुधीभ्याम् सुधिभ्य: षष्ठी सुधियः सुधियोः सुधियाम् सप्तमी सुधियि सुधियोः सुधीषु सम्बोधन हे सुधियो हे सुधिय: सेव् धातु (आत्मनेपदी) लङ् लकार एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष असेवत असेवेताम् असेवन्त मध्यम पुरुष असेवथा: असेवेथाम् असेवध्वम् असेवे असेवावहि असेवामहि इस प्रकार अन्य आत्मनेपदी धातुओं के लङ् लकार के रूप बनाए जा सकते हैं। जैसे- शुभ = शोभा पाना (लङ् लकार में धातु के पूर्व 'अ' लगाना होगा।) एकवचन द्विवचन बहुवचन अ+शोभ्+अत = अशोभ्+एताम् = अशोभेताम् अशोभ्+अन्त = अशोभन्त अशोभत (वह शोभित हुए) (वे दो शोभित हुए) हे सुधी: उत्तम पुरुष (वे शोभित हुए) २६ अशोभ्+अथा: - अशोभ+ एथाम् = अशोभेथाम् अशोभ्+अध्वम् = अशोभध्वम् अशोभथा: (तुम शोभित हुए) (तुम दो शोभित हुए) (तुम सभी शोभित हुए) अशोभ+ ए = अशोभे अशोभ्+आवहि = अशोभावहि अशोभ्+आमहि अशोभामहि (मैं शोभित हुआ) (हम दो शोभित हुए) (हम सभी शोभित हुए) . Shermelina यण् सन्धि (इको यणचि) इक् के स्थान पर यण् होता है, यदि अच् परे हो। अर्थात् इक् (इ, उ, ऋ, तथा लु) के स्थान पर क्रमश: यण् (य, व्, र तथा ल्) होता है, आगे अच् (स्वर) के होने पर। के रहने पर इ% य् अच उ% व् अ, आ, इ, ई, उ, ऊ दीर्घ सन्धि के = र् ऋ, ल, ए, ऐ, ओ, औ क्षेत्र को छोड़कर लु = जैसे- इति+अत्र = इत्यत्र अनु+अय: - अन्वयः पितृ+ए = पित्रे इति+आदि = इत्यादि सु+आगतम् = स्वागतम् धातृ+अंश = धात्रंशः इति+अलम् = इत्यलम् मधु+अरि: = मध्वरिः मातृ+आदेश: = मात्रादेश: यदि+अपि = यद्यपि चमू+अध्यक्ष: - चम्वध्यक्षः M+आकृतिः = लाकृतिः तत्पुरुष समास जिस समास में दूसरा पद प्रधान हो और पहले पद के बाद कारक के चिह्न का लोप हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। प्रथम पद द्वितीया, तृतीया आदि विभक्ति वालः होता है, जबकि उत्तर पद प्रथमा विभक्ति से युक्त होता है। जैसे- कूपम्+पतितः : कूपपतित:। यहाँ पूर्वपद 'कूपम्' में द्वितीया विभक्ति है और उत्तर पद प्रथमा विभन्नि से युक्त है। तत्पुरुष के भेद । द्वितीया तत्पुरुष, तृतीया तत्पुरुष, चतुर्थी तत्पुरुष, पंचमी तत्पुरुष, पष्ठी तत्युग्ध और सप्तमी तत्पुरुष-इस प्रकार छह भेद होते हैं। समास में जिस विभक्ति के चिह्न का लोप होता है, वह उसी विभक्ति से युक्त समास कहलाता है। जैसे- द्वितीया तत्पुरुष- ग्रामगत: - ग्रामं गत: = ग्राम को गया हुआ। कृष्णश्रित: - कृष्णं श्रित: = कृष्ण को चाहता हुआ। सुखापत्र:--सुखं आपन: - सुख को प्राप्त हुआ।
२७ पंचमी तत्पुरुप- - तृतीया तत्पुरुष प्रकाशयुक्त:-प्रकाशेन युक्त: = प्रकाश से युक्त। व्याघ्रहत:--व्याघेण हत: = व्याघ्र से हत (मारा हुआ)। भासरचित:-भासेन रचित: = भास के द्वारा रचा हुआ। चतुर्थी तत्पुरुष विप्रदानम्-विप्राय दानम् = विप्र को दान। अलंकारस्वर्णम्-अलंकाराय स्वर्णम् = अलंकार के लिए स्वर्ण। हस्तलेप:--हस्ताय लेप: = हस्त (हाथ) के लिए लेप। वृक्षपतित:-वृक्षात् पतित: = वृक्ष से गिरा हुआ। भयभीत:-भयात् भीत: = भय से डरा हुआ। संसारमुक्तः -संसारात् मुक्त: = संसार से मुक्त। पष्ठी तत्पुरुष- ऋषिकन्या-ऋषे: कन्या = ऋषेः कन्या = ऋषि की कन्या। दासीपुत्रः-दास्या: पुत्रः = दासी का पुत्र । नन्दगृहम् नन्दस्य गृहम् = नन्द का घर। सप्तमी तत्पुरुप- आनन्दमग्नः-आनन्दे मग्न: = आनन्द में मग्न। युद्धवीर:-युद्धे वीरः = युद्ध में वीर। मुनिश्रेष्ठ:--मुनिषु श्रेष्ठः मुनियों में श्रेष्ठ।. अनुवाद (i) किसी क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं। (ii) अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे--- उद्याने वृक्षाः। कक्षायां छात्राः। स्थाल्यां ओदनम्। अभ्यास यण् सन्धियुक्त पद है: (क) स्वानुभवः। (ख) स्वादिष्टम्। (ग) स्वागतम्। (घ) स्वाधीनम्। ( ) २. "देवमन्दिरम्" पद का विग्रह होगा- (क) देव मन्दिरम् (ख) देवात् मन्दिरम् (ग) देवस्य मन्दिरम् (घ) देवम् मन्दिरम् (ङ) देव: मन्दिरम्। ( ) ३. वृक्षपतित: में समास है- (क) (ख) पञ्चमी तत्पुरुष (ग) द्वितीया तत्पुरुष (घ) तृतीया तत्पुरुष (ङ) चतुर्थी तत्पुरुष। ( ) मुद् धातु लङ्लकार के रूप लिखो। ५. सन्धि-विच्छेद कीजिए-इत्यहंकारः, वध्वागमनम्, पित्रंशः, इत्यपि। ६. विग्रह कीजिए एवं विभक्ति का नाम लिखिये-(हिन्दी में) हरित्रातः, कालिदासरचितः, भूतबलिः, दानवीर:, सुखापत्रः । १ . षष्ठी तत्पुरुष --- ४.
२८ . ७. अनुवाद कीजिए- वृक्ष पर फूल शोभित हो रहे थे। घर में सभी प्रसन्न थे। गिलास में जल था। पाप से डरा हुआ कभी नहीं आता है। वह कक्षा में पुस्तक माँगता था। मैंने शहर में उन दोनों की सेवा की। तुम घोड़े पर शोभित हो रहे थे। तत्पुरुष समास की परिभाषा भेदपूर्वक लिखिए। 000 अध्याय-९ विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन 1. धेनु (गाय) शब्द (उकारान्त स्त्रीलिंग) एकवचन द्विवचन बहुवचन धेनुः धेनू धेनवः धेनुम् धेनू धेनू: धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः धेनवे, धेन्वै धेनुभ्याम् धेनुभ्य: धेनोः, धेन्वा: धेनुभ्याम् धेनुभ्य: धेनोः, धेन्वाः धेन्वोः धेनूनाम् धेनौ, धेन्वाम् धेन्वोः धेनुपु हे धेनो हे धेनू हे धेनवः आत्मन् (आत्म) शब्द (अन्नन्त पुंल्लिङ्ग) एकवचन द्विवचन बहुवचन आत्मा आत्मानौ आत्मानः आत्मानम् आत्मानौ आत्मनः आत्मना आत्मभ्याम् आत्मभिः आत्मने आत्मभ्याम् आत्मभ्यः आत्मनः आत्मभ्याम् आत्मभ्यः आत्मनः आत्मनो: आत्मनाम् आत्मनि आत्मनो: आत्मसु हे आत्मन् हे आत्मानौ हे आत्मानः विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन २९ == -- सेव् धातु (आत्मनेपदी) लृट् लकार एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष सेविप्यते सेवियेते सेविप्यन्ते मध्यम पुरुष सेविप्यसे सेविप्येथे सेविप्यध्वे उत्तम पुरुष सेविप्ये सेविष्यावहे सेविप्यामहे इस प्रकार आत्मनेपदी धातुओं के लृट्लकार के रूप बनाए जा सकते हैं- शिक्ष् = शिक्षा पाना एकवचन द्विवचन बहुवचन शिक्ष्+इप्यते = शिक्षिप्यते शिक्ष+इप्येते = शिक्षिप्येते शिक्ष+इप्यन्ते - शिक्षिप्यन्ते (वह शिक्षा पाएगा) (वे दोनों शिक्षा पाएँगे) (वे सब शिक्षा पाएँगे) शिक्ष+इप्यसे = शिक्षिप्यसे शिक्ष+इप्येथे = शिक्षिप्येथे शिक्ष+इप्यध्वे = शिक्षिप्यध्वे (तुम शिक्षा पाओगे) (तुम दोनों शिक्षा पाओगे) (तुम सब शिक्षा पाओगे) शिक्ष्+इप्ये = शिक्षिप्ये शिक्ष+इप्यावहे = शिक्षिप्यावहे शिक्ष+इप्यामहे = शिक्षिप्यामहे (मैं शिक्षा पाऊँगा) (हम दो शिक्षा पायेंगे) (हम सब शिक्षा पायेंगे) सन्धि ज्ञान अयादि सन्धि (एचोऽयवायावः) एच् के स्थान पर क्रमश: अयादि होते हैं अच् परे हो तो। अर्थात्- अय् अच् परे रहने पर एको ऐ को आय् ओ को अव् औ को आव् - यथा- ने+अनम् = नयनम् पो+अन: - पवनः कवे+ए = कवये भो+अनम् = भवनम् ने+अक: = नायक: गै+अक: - गायक: पौ+अनः = पावनः नौ+इक: - नाविक: समास-ज्ञान कर्मधारय समास जिस समास में समस्त शब्द के खण्ड (पद) विशेष्य-विशेषण या उपमान-उपमेय होते हैं, उसे कर्मधारय समास कहते हैं। इसमें पूर्वपद विशेषण रहता है। कभी-कभी दोनों पद विशेषण या संज्ञा रहते हैं, तो कभी उत्तर पद भी विशेषण होता है। जैसे- नीलकमलम्- नीलं कमलम् (नीला कमल),पूर्वपद विशेषण । सुन्दरनरः-सुन्दर: नर: = सुन्दरनरः (सुन्दर नर) ३० (वह युवा बाल पके - - युवापलित:---युवा पलितः इति युवापलितः जिसके हैं) पूर्वपद विशेष्य। नीलपीत:--नीलश्चासौ पीतश्च इति नीलपीतः (कुछ नीला कुछ पीला) दो पद विशेषण। घनश्याम:--धन इव श्यामः-घनश्यामः (घन की तरह श्याम) पूर्वपद उपमान मुखकमलम्- मुखकमलम् इव (मुख कमल सा) उत्तरपद उपमान । तत्पुरुष (नञ्तत्पुरुष) पूर्व अध्याय में तत्पुरुष समास के बारे में विभक्ति-समास को समझा। इसका नञ् तत्पु भी एक भेद है। इसमें समस्त पद का पूर्वपद न होता है। यह 'न' नञ् का संक्षिप्त रूप समास होने पर 'न' का संक्षिप्त रूप 'अ' रहता है। जैसे-न+समर्थः, न+समर्थ: असमर्थः। अप्रियम्-न+प्रियम् = अप्रियम् (न+प्रिय) = प्रिय नहीं। अशान्ति: न+शान्तिः = अशान्ति: (न+शान्ति) - शांति नहीं। अनुपस्थिति:-न+उपस्थिति: = अनुपस्थिति: अनुपस्थिति: (न+उपस्थिति) उपस्थिति नहीं। असत्यम्न+सत्यम् = असत्यम् (न+सत्य) - सत्य नहीं। अस्वस्थ:-न+स्वस्थ: - अस्वस्थ: (न+स्वस्थ) = स्वस्थ नहीं। अशक्तः न+शक्त: = अशक्त: (न+शक्त) = शक्त नहीं। असुन्दर:-न+सुन्दर: = असुन्दर: - (न+सुन्दर) सुन्दर नहीं। । (सम्बोधन) सम्बोधन में सम्बोधन विभक्ति होती है। जैसे-अरे राम = (हे राम!) अरे कृ (हे कृष्ण!) हे, भो, रे आदि सम्बोधन सूचक शब्दों के रहने पर सम्बोधन होता है। हे रा हे रामौ! हे रामा:! अभ्यास १. अयादि सन्धि कीजिए. 11 गा, गै+अक:, हरे+ए, विष्णो+ए. पौ+अकः। २. विग्रह कीजिए (समास के नाम के साथ)- अनुत्तीर्णः, अहितम्, अनौचित्यम्, अन्याय:, अलौकिकम्। समस्त पद बनाइए-- उत्तमा+विद्या, गम्भीर:+कूपः, दुःखम् इव सागर:, सुन्दरी+नारी। ४. . अनुवाद कीजिए--- वह सेवा करेगा। वे दोनों शोभित होंगे। वे सब शिक्षा पायेंगे। तुम धन की या करोगे। तुम दोनों माता की सेवा करोगे। वे गाँव आज ही जायेंगे। वे व्यर्थ घूमेंगे। हम दोनों कहानी की पुस्तक पढ़ेंगे। वह क्रिकेट का मैच देखेगा। 7 ३. - mr अध्याय-१० । 11111 शशिनम् विद्वस् (विद्वान्) शब्द (असन्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा विद्वान् विद्वांसी विद्वांसः द्वितीया विद्वांसम् विद्वांसौ विदुषः तृतीया विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः चतुर्थी विदुषे विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः पंचमी विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः पष्ठी विदुषः विदुषोः विदुषाम् सप्तमी विदुषि विदुषोः विद्वत्सु सम्बोधन हे विद्वन् हे विद्वांसौ हे विद्वांसः शशिन् (चन्द्रमा) शब्द (असन्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा शशी शशिनौ शशिनः द्वितीया शशिनौ शशिनः तृतीया शशिना शशिभ्याम् शशिभिः शशिनं शशिभ्याम् शशिभ्यः पंचमी शशिनः शशिभ्याम् शशिभ्यः षष्ठी शशिनः शशिनीः शशिनाम् सप्तमी शशिनि शिना: शशिषु सम्बोधन हे शशिन् हे शशिनौ हे शशिनः शशिन् शब्द की तरह, विद्यार्थिन्, योगिन्, गुणिन्, करिन् आदि के रूप चलते हैं। भूधातु (लुइ) परस्मैपदी पुरुप एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अभूत् अभूताम् अभूवन् मध्यम पुरुष अभूः अभूतम् अभृत उत्तम पुरुष अभूवम् अभूव अभूम इसी प्रकार अन्य धातुओं के लड् लकार के रूप बनाये जा सकते हैं। पठ् = पढ़ना। धातु के पूर्व 'अ' जुड़ता है। पठ्+ईत् = अपठीत् पठ+इष्टाम् : अपठिष्टाम् पठ्+ इषु = अपठिपु: (उसने पढ़ा) (उन दोनों ने पढ़ा) (उन्होंने पढ़ा) चतुर्थी युवापलित:-युवा पलित: इति युवापलित: (वह युवा जिसके बाल पके हुए हैं) पूर्वपद विशेष्य। नीलपीत:---नीलश्चासौ पीतश्च इति नीलपीत: (कुछ नीला कुछ पीला) दोनों पद विशेषण। घनश्यामः-घन इव श्यामः---धनश्यामः (घन की तरह श्याम) पूर्वपद उपमान। मुखकमलम्- मुखकमलम् इव (मुख कमल सा) उत्तरपद उपमान । तत्पुरुष (नञ् तत्पुरुष) पूर्व अध्याय में तत्पुरुष समास के बारे में विभक्ति-समास को समझा। इसका नञ् तत्पुरुष भी एक भेद है। इसमें समस्त पद का पूर्वपद न होता है। यह 'न' नञ् का संक्षिप्त रूप है। समास होने पर 'न' का संक्षिप्त रूप 'अ' रहता है। जैसे-न+समर्थः, न+समर्थः असमर्थः। अप्रियम्-न+प्रियम् = अप्रियम् (न+प्रिय) = प्रिय नहीं। अशान्ति:-न+शान्तिः = अशान्ति: (न+शान्ति) = शांति नहीं। अनुपस्थिति:-न+उपस्थिति: अनुपस्थिति: (न+उपस्थिति) उपस्थिति नहीं। असत्यम्-न+सत्यम् = असत्यम् (न+सत्य) = सत्य नहीं। अस्वस्थ:- न+स्वस्थ: = अस्वस्थ: (न+स्वस्थ) = स्वस्थ नहीं। अशक्त: न+शक्त: = अशक्त: (न+शक्त) = शक्त नहीं। असुन्दर:-~-न+सुन्दरः = असुन्दर: = (न+सुन्दर) सुन्दर नहीं। अ. (सम्बोधन) सम्बोधन में सम्बोधन विभक्ति होती है। जैसे-~-अरे राम = (हे राम!) अरे कृष्ण (हे कृष्ण!) हे, भो, रे आदि सम्बोधन सूचक शब्दों के रहने पर सम्बोधन होता है। हे राम! हे रामौ! हे रामा:! अभ्यास १. अयादि सन्धि कीजिए - पात गा, गै+अकः, हरे+ए, विष्णो+ए. पौ+अकः । २. विग्रह कीजिए (समास के नाम के साथ)- अनुत्तीर्णः, अहितम्, अनौचित्यम्, अन्याय:, अलौकिकम्। ३. समस्त पद बनाइए- उत्तमा विद्या, गम्भीर:+कूपः, दुःखम् इव सागरः, सुन्दरी+नारी। ४. . अनुवाद कीजिए- वह सेवा करेगा। वे दोनों शोभित होंगे। वे सब शिक्षा पायेंगे। तुम धन की याचना करोगे। तुम दोनों माता की सेवा करोगे। वे गाँव आज ही जायेंगे। वे व्यर्थ नहीं घूमेंगे। हम दोनों कहानी की पुस्तक पढ़ेंगे। वह क्रिकेट का मैच देखेगा। 000 हा अध्याय-१० ar *- विद्वस् (विद्वान्) शब्द (असन्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा विद्वान् विद्वांसी विद्वांसः द्वितीया विद्वांसम् विद्वांसौ विदुप: तृतीया विदुषा विद्वद्भ्याम् विद्वद्भिः चतुर्थी विदुषे विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः पंचमी विदुपः विद्वद्भ्याम् विद्वद्भ्यः षष्ठी विदुषः विदुषोः विदुषाम् सप्तमी विदुषि विदुषोः विद्वत्सु सम्बोधन हे विद्वन् है विद्वांसौ हे विद्वांसः शशिन् (चन्द्रमा) शब्द (असन्त पुंल्लिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा शशी शशिनौ शशिन: द्वितीया शशिनम् शशिनौ शशिनः तृतीया शशिना शशिभ्याम् शशिभिः चतुर्थी शशिने शशिभ्याम् शशिभ्यः पंचमी शशिनः शशिभ्याम् शशिभ्यः पाठी शशिनः शशिनी: शशिनाम् सप्तमी शशिनि शशिनी: शशिषु सम्बोधन हे शशिन् हे शशिनी हे शशिनः शशिन् शब्द की तरह, विद्यार्थिन्, योगिन्, गुणिन्, करिन् आदि के रूप चलते हैं। भूधातु (लुङ्) परस्मैपदी पुरुप एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अभूतु अभूताम अभूवन् मध्यम पुरुष अभूः अभूतम् अभूत अभूवम् अभूव अभृम इसी प्रकार अन्य धातुओं के लड् लकार के रूप बनाये जा सकते हैं। पठ् = पढ़ना। धातु के पूर्व 'अ' जुड़ता है। पढ़+ईत् - अपठीत् पठ्+इटम् = अपठिष्टाम् पठ्+इयु अपठिपुः (उसने पढ़ा) (उन दोनों ने पढ़ा) (उन्होंने पदा) इस न उत्तम पुरुष 15 प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष . पठ्+ई: = अपठी: पठ्+इष्टम् = अपठिष्टम् पठ+इष्ट - अपठिष्ट (तूने पढ़ा) (तुम दोनों ने पढ़ा) (तुमने पढ़ा) पठ+इषम् = अपठिषम् पठ्+इप्व %3D अपठिप्व पठ्+इम = अपठिष्म (मैंने पढ़ा) (हम दोनों ने पढ़ा) (हमने पढ़ा) सेव् धातु (विधिलिङ्) आत्मनेपदी पुरुप एकवचन द्विवचन बहुवचन सेवेत सेवेयाताम् सेवेरन् मध्यम पुरुष सेवेथा: सेवेयाथाम् सेवेध्वम् . सेवेय सेवेवहि सेवेमहि इसी प्रकार अन्य आत्मनेपदी धातुओं के विधिलिङ् लकार के रूप बनाए जा हैं। लभ = पाना लभ्+एत = लभेत लभ्+एयाताम् = लभेयाताम् लभ+एरन् - लभेरन् (उसे पाना चाहिए) (उन दोनों को पाना चाहिए) (उन्हें पाना चाहिए) लभ्+ एथा: = लभेथाः लभ्+एयाथाम् = लभेयाथाम् लभ्+एध्वम् = लभेध्वम् (तुम्हें पाना चाहिए) (तुम दोनों को पाना चाहिए) (तुम सभी को पाना चाहिए) लभ्+एय- लभेय लभ+एवहि = लभेवाहे लभ+एमहि = लभेमहि (मुझे पाना चाहिए) (हम दोनों को पाना चाहिए) (हमें पाना चाहिए) लुङ् लकार (सामान्यभूत) का सामान्य ज्ञान ऐसा कार्य जो बहुत ही हाल में (जैसे आज ही) हुआ हो अथवा अनिश्चित अतीतकाल का बोध कराने के अतिरिक्त नैरन्तर्य (Continuousness) का भी बोध कराता है। यथा-- याचकेभ्ये यावज्जीवमन्नमदात् (न कि अददात्) । उसने जिन्दगी भर याचकों को भोजन दिया अर्थाद भोजन देना जिन्दगी भर जारी रखा। सेव् (सेवा करना) लुङ् लकार एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष असेविष्ट असेविषाताम् असेविषत मध्यम पुरुष असेविष्टाः असेविष्ठाथाम् असेविध्वम् उत्तम पुरुष असेविषि असेविष्वहि असेविप्महि पूर्वरूप (एङः पदान्तादति) पद के अन्त में एक [ए, ओ] हो और एक [ए, ओ] से 'अ' परे हो तो पूर्वरूप एकादेश होता है। अर्थात् पद (सुबन्त या तिङन्त) के अन्तिम ए या ओ के बाद 'अ' हो तो उसको पूर्वरूप (अर्थात् ए या ओ जैसा रूप) हो जाता है। यथा : लोके+अस्मिन् = लोकेऽस्मिन् लोको+अयम् = लोकोऽयम् - सरि गृहे+अस्ति = गृहेऽस्ति विष्णो+अत्र = विष्णोऽत्र यज्ञे+अग्निः = यज्ञेऽग्निः संसारे+अस्मिन् संसारेऽस्मिन् संदिर पररूप (एङि पररूपम्) उपसर्ग के परे एङादि धातु होने से पररूप एकादेश होता है। अर्थात् अकारान्त उपसर्ग के पश्चात् धातु का प्रथम अक्षर ए या ओ हो तो दोनों स्थानों पर पररूप ए या ओ जैसा रूप हो जाता है। जैसे- प्र+एजते प्रेजते उप+ओषति = उपोषति -- समासज्ञान i द्विगु समास जिस समस्त पद में पूर्व पद संख्यावाचक शब्द होता है-वह द्विगु समास कहलाता है। (द्विगु: संख्यावाचक:) समाहार (समूह) बताने, उत्तरपद के संयोजन करने तथा तद्धित प्रत्यय जोड़ने के लिए द्विगु समास किया जाता है। जैसे- सप्तर्षिः—सप्तानां ऋषीणां समाहार:-सप्तर्षिः (सात ऋषियों का समूह)। पञ्चग्रामम्-पञ्चानां ग्रामाणां समाहार: -पञ्चग्रामम् (पाँच ग्रामों का समूह)। त्रिदिनम्-त्रयाणाम् दिनानां समाहार: -त्रिदिनमू (तीनों दिनों का समूह)। चतुर:-चतुर्णाम् द्वाराणां समाहार:-चतुरिः (चार दरवाजों का समूह)। द्वैमातुरः-द्वयो: मात्रो अपत्यम् पुमान्–द्वैमातुरः (दो माताओं का पुत्र) (यहाँ अण् (तद्धित) प्रत्यय है।) त्रैमातुर:-तिसृणां मातॄणां अपत्यं पुमान्–त्रैमातुरः (तीन माताओं का पुत्र)। यहाँ अण् (तद्धित) प्रत्यय है। कारक ज्ञान (कर्म) (i) कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है। (ii) अभितः, परितः, सर्वत: के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (iii) समया, निकषा, हा, प्रति, धिक्, उपर्युपरि, अधोऽध: के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (iv) गत्यर्थक धातुओं के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (v) अन्तरा, अन्तरेण, विना के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (vi) अनु, उप, अति, अभि- उपसर्गो के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (vii) समयवाचक, मार्ग के दूरवाचक शब्दों के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। (viii) दुह (दुहना), याच् (मांगना), पच् (पकाना), दण्ड (सजा देना), कम् (रोकना), प्रच्छ (पूछना), चि (चुनना), जि (जीतना), मय् (मधना), ३४ ६ . . ७. । मुष् (चुराना), ब्रू (बोलना), शास् (शासन करना), नी (ले जाना), ह (छीनना), कृष् (खेती करना), वह् (ढोना),—इन धातुओं के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। उदाहरण नगरं अभित: परिखा। सरोवरं परित: भवनानि । प्रासादंसर्वत: उद्यानानि। ग्रामं समया निकषा वापी। हा दुःखम्। अर्थातुरं न प्रतिभाति किञ्चित्। राममुभयतो वानराः। धिक् पापिनम् । गत्यर्थक धातु- उद्यानं विचरति। नगरं गच्छति। निद्रां ययौ। ज्ञानमन्तरेण सर्व शून्यम् । धनम् विना शून्यं जीवनम् । कौशल्यां सुमित्रां अन्तरा कैकयी। मासं पठति। क्रोशं गच्छति। गोप: गां दोग्धि। पुत्रः पितरम् धनं याचते। तण्डुलान् ओदनं पचति। न्यायाधीश: शतं दण्डयति। कृषक: पन्थानं पृच्छति। लतां पुष्पाणि चिनोति। मोहनं धर्मम् ब्रूते। राजा प्रजा: शास्ति। शतं जयति देवदत्तम्। राधा दधि मनाति। श्रेष्ठिनं धनं मुष्णाति। अजां ग्रामं नयति, हरति, वहति। कृषक: क्षेत्रं कर्पति। अभ्यास "त्रिभुवनम्" शब्द का विग्रह है- (क) त्रि भुवनानां समाहारः। (ख) त्रिभुवनानां समाहारः। (ग) त्रयः भुवनानां समाहारः। (घ) त्रयाणां भुवनानां समाहारः । (ङ) त्रीणि भुवनानां समाहारः। ( ) योगिन् शब्द के रूप निखो। सेवेध्वम्, लभेमहि, शोभेय, मोदेरन्-~-इनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए। पूर्वरूप एवं पररूप सन्धि का अन्तर बताइए। पञ्चवटी, पञ्चपात्रम्, नवग्रहम्, त्रिपुत्रम्-का विग्रह सहित समास वताइए। 1 ३५ ७. ६. निम्नलिखित वाक्यों में द्वितीया विभक्ति का कारण बताइए- नेतारं सर्वतो जनाः। बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्। ग्रामं समया विद्यालयः। धिक् कृपणम्। श्रमं विना न सिद्धिः। अध्यापक: छात्रान् दण्डयति। अनुवाद कीजिए- उसे पिता की सेवा करनी चाहिए। उन दोनों को शिक्षा पानी चाहिए। उन्हें इनाम पाना चाहिए। तुम्हें अपना हक माँगना चाहिए। तुम सभी को यहाँ होना चाहिए। मुझे यह पुस्तक देखनी चाहिए। शहर के दोनों ओर नदी है। स्कूल के चारों ओर बगीचा है। वैज्ञानिक आकाश की ओर देखता है। वह उसके पीछे दौड़ता है। 0 अध्याय-११ विभक्ति प्रथमा a बहुवचन सर्वे सर्वान् सर्वे: सर्वेभ्य: द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सर्वनाम शब्द सर्व (सब) शब्द पुंल्लिङ्ग एकवचन द्विवचन सर्वः सर्वो सर्वम् सर्वी सर्वेण सर्वाभ्यां सर्वस्मै सर्वाभ्यां सर्वस्मात् सर्वाभ्यां सर्वस्य सर्वयोः सर्वस्मिन् सर्वयोः सर्वा (सब) शव्द स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन सर्वा सर्वे सर्वाम् सर्वे सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वस्यै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः सर्वेषाम् सर्वेषु विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी वहुवचन सर्वाः सर्वा: सर्वाभिः सर्वाभ्यः ३६ . ते पञ्चमी सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः षष्ठी सर्वस्याः सर्वयोः सर्वासाम्. सप्तमी सर्वस्याम् सर्वयोः सर्वासु सर्व (सब) शब्द नपुंसकलिङ्ग प्रथमा सर्वम् सर्वे सर्वाणि द्वितीया सर्वम् सर्वे सर्वाणि शेष रूप पुंल्लिज़ के तुल्य तत् (वह) शब्द पुंल्लिङ्ग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सः तौ द्वितीया तम् तो तान् तृतीया तेन ताभ्याम् तैः चतुर्थी तस्मै ताभ्याम् तेभ्य: पंचमी तस्मात् ताभ्याम् तेभ्य: षष्ठी तस्य तयोः तेपाम् सप्तमी तस्मिन् तयोः तेषु तत् (वह) शब्द तत् (वह) शब्द नपुंसकलिंग स्त्रीलिंग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सा ते ता: तत् तानि द्वितीया ताम् ते ता: तत् तानि तृतीया तया ताभ्याम् ताभिः (शेष पुंल्लिंग की तरह) चतुर्थी तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः (तीनों लिंगों में सम्बोधन पंचमी तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः विभक्ति नहीं होती है।) षष्ठी तस्याः तयोः तासाम् सप्तमी तस्याम् तयोः तासु इस प्रकार यत् (जो) शब्द के रूप चलते हैं। किम् (कौन) शब्द पुंल्लिंग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा कः को के द्वितीया कम् को कान् तृतीया केन काभ्याम् के. ते ते चतुर्थी कस्मै पंचमी कस्मात् षष्ठी कस्य सप्तमी कस्मिन् किम् (कौन) शब्द स्त्रीलिंग 'काभ्याम् केभ्यः काभ्याम् केभ्यः कयो: केषाम् कयोः केषु किम् (कौन) शब्द नपुंसकलिंग किम् विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा का के का: किम् के कानि द्वितीया काम् के काः के कानि तृतीया कया काभ्याम् काभिः (शेष पुंल्लिंग की तरह) चतुर्थी कस्यै काभ्याम् काभ्यः (तीनों लिहों में सम्बोधन पंचमी कस्याः काभ्याम् काभ्यः विभक्ति नहीं होती है।) षष्ठी कस्याः कयोः कासाम् सप्तमी कस्याम् कयोः -- कासु एतद् (यह) शब्द पुल्लिङ्ग 'विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा एषः एतौ एते द्वितीया एतम् एतौ एतान् तृतीया एतेन एताभ्याम् एतैः एतस्मै एताभ्याम् एतेभ्यः पंचमी एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः षष्ठी एतस्य एतयो: एतेषाम् सप्तमी एतस्मिन् एतयो: एतेषु एतद् शब्द (स्त्रीलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा एषा एते एता: द्वितीया एताम् एते एताः तृतीया एतया एताभ्याम् एताभिः चतुर्थी एतस्यै एताभ्याम् एताभ्यः पंचमी एतस्याः एताभ्याम् एताभ्यः षष्ठी एतस्याः एतयोः एतासाम् सप्तमी एतस्याम् एतयोः एतासु चतुर्थी ३८ एतद् शब्द (नपुंसकलिङ्ग) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा एतद् एते एतानि द्वितीया एतद् एते एतानि (शेष पुंल्लिङ्ग की तरह) इदम् (यह) शब्द पुंल्लिङ्ग स्त्रीलिंग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अयम् इमो इमे इयम् इमे इमाः द्वितीया इमम् इमो इमान् इमाम् इमे इमाः तृतीया अनेन आभ्याम् एभिः अनया आभ्याम् आभि: चतुर्थी अस्मै आभ्याम् एभ्यः अस्यै आभ्याम् आभ्यः पंचमी अस्मात् आभ्याम् एभ्यः अस्याः आभ्याम् आभ्यः षष्ठी अस्य अनयोः एषाम् अस्याः अनयो: आसाम् सप्तमी अस्मिन् अनयो: अस्याम् अनयो: आसु (नपुंसकलिङ्ग) एकवचन द्विवचन बहुवचन इदम् इमे इमानि इदम् इमे इमानि (शेष पुंल्लिङ्ग की तरह) धातु ज्ञान (भ्वादिगण) परस्मैपदी धातु लट् लङ् लुट् विधिलिङ् वदति वदतु अवदत् वदिप्यति वदेत् रक्ष्-रक्षा करना रक्षति रक्षतु अरक्षत् रक्षिष्यति रक्षेत् हसति हसतु अहसत् हसिष्यति हसेत् भू (भव्) होना- भवति भवतु अभवत् भविष्यति भवेत् चर-चरना- चरति चरतु अचरत् चरिष्यति चरेत् चल-चलना चलति चलतु अचलत् चलिष्यति चलेत् तरति तरतु अतरत् तरिष्यति तरेत् अट्:-घूमना-- अटति अटतु आटत् अटिष्यति अटेत् खन्-खोदना- खनति खनतु अखनत् खनिप्यति खनेत् खादति खाद्तु अखादत् खादिष्यति खादेत् इन धातुओं के रूप पठ् धातु की तरह चलेंगे। आप अपनी उत्तर-पुस्तिका में पृथव से इनके रूप लिखने का अभ्यास कर सकते हैं। लोट वद्-बोलना- हस्-हंसना- तृ-तैरना- - खाद्--खाना- ३९ - लिट् लकार (परोक्ष भूत) का सामान्य ज्ञान “परोक्षे लिट्' अर्थात् लिट् लक आज से पहले हुए या किये हुए ऐसे कार्य का बोध कराता है जिसे वक्ता ने नहीं देर हो। जब सुदूरवर्ती भूतकाल दिखाना हो तब केवल परोक्ष भूत का ही प्रयोग करना चाहिप यथा- 'कंसं जघान कृष्ण: श्रीकृष्ण ने कंस को मार डाला। व्यञ्जन या हल् सन्धि क से ह तक के सभी वर्ण हल कहे जाते हैं। इन्हें व्यञ्जन भी कहा जाता दो या दो से अधिक हलों या व्यञ्जनों के बीच में जो सन्धि होती है, उसे व्य या हल सन्धि कहा जाता है। हलू अथवा व्यंजन-सन्धि के अनेक नियम हैं। जिनमें से प्रमुख ये हैं- श्चुत्व, टुत्व, जश्त्व, षत्व, णत्व अनुनासिक एवं अनुस्वार । श्चुत्व (स्तो: श्चुना श्चुः) स् या तवर्ग (त् थ् द् ध् न्) से पहले या बाद में श् या चवर्ग (च छ ज् ज्) हो तो स् को श् और तवर्ग को चवर्ग होगा। अर्थात् स् के आगे या पीछे श् हो तो स् की जगह श् होगा। इसी प्रकार थ् द् ध् न् को क्रमश: च छ ज् झ् ञ् होगा। जैसे- कस्+चित् = कश्चित्। रामस्+च = रामश्च। सत्+चित् = सच्चित्। उत्+चारणम् = उच्चारणम्। सद्+जन: = सज्जनः। शान्+िजय: = शाजियः। उद्+ज्वल: = उज्ज्वल:। ष्टुत्व (प्टुना प्टुः) स् अथवा तवर्ग से पहले या बाद में प् या टवर्ग (ट् ठ् ड् द ) कोई भी तो स् को ष् और त् थ् द्धन् को क्रमश: ट्राइ द ण होता है। जैसे- दुस्+ट: - दुष्टः इस+ट: - इट: पेस्+टा = पेष्टा तत्+टीका = तट्टीका समास-ज्ञान द्वन्द्व समास जिस समास में दोनों खण्ड प्रधान होते हैं और विग्रह में, बीच में 'च' (ओ लगता है, उसे द्वन्द्व समास कहते हैं। अर्थात् दो या दो से अधिक प्रथमान्त पदों में ट्र समास होता है, इस समास में सभी पदों का अर्थ प्रधान रहता है। यह समास तीन त का होता है- इतरेतर द्वन्द्व, समाहार द्वन्द्व व एकशेष द्वन्द्व। इतरेतर द्वन्द्व-प्रत्येक शब्द के बीच में 'च' (और) प्रकट होता है। जैसे-~-राम- कृष्णश्च = रामकृष्णी (राम और कृष्ण)। दो शब्द होने पर द्विवचन तथा दो से अधि होने पर बहुवचन होता है। C ४० समाहार द्वन्द्व-अनेक पदों का समाहार का ज्ञान हो, समस्त पद नपुंसकलिङ्ग व एकवचन में रहता है। जैसे- हस्तौ च पादौ च = हस्तपादम् (हस्त और पाद)। एकशेष द्वन्द्व-दो पदों के स्थान पर एक पद ही शेष रह जाता है। जैसे माता च पिता च = पितरौ (माता और पिता)। फलपुष्पे-फलं च पुष्पं च = फलपुष्पे (फल और पुप्प) श्याममोहनौ-श्यामश्च मोहनश्च = श्याममोहनौ (श्याम और मोहन) ऋक्सामे-ऋक् च साम च = ऋक्सामे (ऋक् और साम)। पाणिपादम्-पाणी च पादौ च = पाणिपादम् (पाणि और पाद)। आसनपाद्यम् -आसनं च पाद्यं च = आसनपाद्यम् (आसन और पाद्य)। सर्पमयूरम् सर्पश्च मयूरश्च = सर्पमयूरम् (सर्प और मयूर)। हंसौ-हंसी च हंसश्च = हंसौ (हंसी और हंस) दम्पती-जाया च पति: च = दम्पती (पति-पत्नी) कारक ज्ञान (i) करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। (ii) साकम्, सार्धम्, समम्, सह (साथ) के होने पर तृतीया विभक्ति होती है। (iii) अलम् एवं किम् के योग मे तृतीया विभक्ति होती है। (iv) अङ्गविकार के कारण उस अगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है। (v) । जिस चिह्न से किसी पदार्थ का ज्ञान हो, उसमें तृतीया विभक्ति होती है। उदाहरण- कृष्णेन साकम् राधा। रामेण समं सीता। रामेण सह लक्ष्मण: । गोविन्देन सार्ध मोहनः। अलंगमनेन। कलहेन किम् ? शिरसा खल्वाट: । नेत्रेण काण: । कर्णेन बधिरः। पादेन खञ्जः। अयं जटाभिःतापसः । अभ्यास १. निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो:- (क) अहं उद्यानस्य प्रति गच्छामि। (ख) माम् मोदका: रोचन्ते। (ग) बाल: चौरेण बिभेति। (घ) मातॄणाम् स्वस्ति अस्तु। (च) तव सार्धं अहं न गच्छामि। (छ) स: पादात् खञ्जः अस्ति। (ज) स मां द्रुह्यति।
४१ . यत् शब्द के तीनों लिहों के रूप लिखिए। सन्धि कीजिए- कृष्ण:+च। रामः+चिनोति। विपत्+ज्वाला। एतद्+जन्म। तत्+चक्रम्। समास करो- कृष्ण: च बलदेव: च। दधि च घृतं च। अनुवाद कीजिए- राम के साथ लक्ष्मण वन को गया। वह कानों से बहरा है। विवाद से क्या? यात्रा पर्याप्त है। राम और कृष्ण नदी में तैर रहे हैं। भाई-बहिन मिठाई खा रहे थे। हम खान खोदेंगे। उन्हें सुबह घूमना चाहिए। झगड़ा बन्द करो। वह पैर से लंगड़ा है। सूरदास आँखों से अन्धा था। ये आत्मनः साहाय्यं कुर्वन्ति .. ईशोऽपि सफलतां ददाति। इस वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए पद है- (क) तेन (ख) तस्यै (ग) तस्मात् (घ) तस्मिन् (ङ)-तेभ्यः। ( ) . अध्याय-१२ सर्वनाम शब्द विभक्ति प्रथमा त्वाम्, त्वा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पाठी युप्मद् (तुम) पुंल्लिङ्ग एकवचन द्विवचन त्वम् युवाम् युवाम्, वाम् त्वया' युवाभ्याम् तुभ्यम्, ते युवाभ्याम्, वाम् त्वत् युवाभ्याम् युक्यो:, वाम् त्वयि युवयोः बहुवचन यूयम् युष्मान, व: युप्माभिः युप्मभ्यम्, व: युप्मत् युप्माकम्, व: युप्मासु तव, ते सप्तमी ४२ आवाम्, नौ . मे मम, प्र.पु. उ. पु. अस्मद् (हम) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अहम् आवाम् वयम् द्वितीया माम, मा अस्मान, नः तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी मह्यम्, आवाभ्याम, नौ अस्मभ्यम्, नः पंचमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् षष्ठी मे आवयोः, नौ अस्माकम्, नः सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु धातु ज्ञान पच् (पकाना) लट् लोट एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन पचति पचत: पचन्ति पचतु पचताम् पचन्तु पचसि पचथ: पचथ म. पु. पच पचतम् पचत 'पचामि पचाव: पचामः पचानि पचाव पचाम लङ् लुट् द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन अपचत् अपचताम् अपचन् पक्ष्यति पक्ष्यतः पक्ष्यन्ति अपच: अपचतम् अपचत म. पु. पक्ष्यसि पक्ष्यथः पक्ष्यथ अपचम् अपचाव अपचाम पक्ष्यामि पक्ष्याव: पक्ष्यामः विधिलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष पचेत् पचेताम् पचेयु: मध्यम पुरुष पचे: पचेतम् पचेत उत्तम पुरुष पचेयम् पचेव पचेम लुङ् अपाक्षीत् अपाक्ताम् अपाक्षुः अपाक्षी: अपाक्तम् अपाक्त अपाक्षम् अपाक्ष्व अपाक्ष्म नन्द् (प्रसन्न होना). नन्दति नन्दतु अनन्दत् नन्दिप्यति नन्देत्। धावति धावतु अधावत् धाविष्यति धावेत्। जीवति जीवतु जीव (जीना) अजीवत् जीविष्यति जीयेत! प्र. पु. उ. पु. धाव (दौड़ना) ४३ MP444 थ ज्ञान (हलू सन्धि) त्व (झलां जशोऽन्ते, १. पद के अन्त में विद्यमान झल् के स्थान पर जश् होता है। झल् जश क् ख् ग् घ् ह च् छ् ज् झ् श् ट्ठ् ड् ष् त् थ् द्धस् प् फ् ब् भ् से- दिक्+अम्बर: = दिगम्बरः। चित्+आनन्दः = चिदानन्दः। पट्+आननः = पडाननः। दिक्+गजः दिग्गजः। अच्+अन्तः = अजन्तः। सुप्+अन्तः = सुबन्तः। उत्+देश्यम् उद्देश्यम्। २. झल् के स्थान पर जश् हो जाता है, यदि झल् के आगे 'झश्' हो। जैसे-झश् = झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द। सिध्+धि = सिद्धिः दु+धम् - दुग्धम्। लभू+ध: - लब्धः। क्षुभ्+ध: = क्षुब्धः। त्व (रपाभ्यां नो ण: समानपदे) र, या ऋके बाद न को ण हो जाता है। जैसे- पूर+न: = पूर्ण: कीर+न: पितृ+नाम् = पितृणाम् कर्तृ+नाम् कर्तृणाम्। %D कीर्ण:। त्व नदी+सु अ, आ को छोड़कर भी स्वर, इ, अन्तःस्थ और कवर्ग के बाद के स् को ए हो जाता है, यदि वह किसी स्थान पर आदेश अथवा प्रत्यय का न हो। से- हरि+सु हरिषु। रामे+सु = रामेषु। मति+सु = मतिषु। नदीषु। बहुव्रीहि जिस समास में अन्य पद का अर्थ प्रधान हो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। अर्थात् ई पदार्थ एवं उत्तर पदार्थ दोनों मिलकर अन्य पदार्थ की विशेषता प्रकट करते हैं। जैसे- दशानन:--दश आननानि यस्य सः–दशाननः (रावण) दश आनन हैं जिसके वह -
पीताम्बर:-पीतम् अम्बरम् यस्य सः-पीताम्बरः (विष्णु)
(पीत अम्बर है जिसके वह)
महाशोभ:-महती-शोभा यस्य सः-महाशोभ: (पुरुष)
(महती शोभा है जिसकी वह)
कृतकर्मा:- कृतं कर्म येन स:-कृतकर्मा (पुरुष)
(किया गया है कर्म जिसके द्वारा वह)
वीणापाणि:-वीणा पाणौ यस्य सः -वीणापाणि: (नारद)
(वीणा हाथ में है जिसके वह-पुरुष)
सपुत्र:-पुत्रेण सह इतिसपुत्रः
(पुत्र के साथ-वह पिता)
शान्तिप्रिय:---शांति: प्रिया यस्य सः-शान्तिप्रियः
(शान्ति है प्रिय जिसे-वह)
कारक ज्ञान (विभक्ति सहित)
(i) सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है।
नम:, स्वस्ति शब्द के साथ चतुर्थी विभक्ति होती है।
(iii) नि+वेद, उपदिश्, स्पृह, क्रियापदों के साथ चतुर्थी विभक्ति होती है
(iv) क्रुध, द्रुह, व ईर्घ्य धातु (क्रियापद) के साथ चतुर्थी विभक्ति होती है
(v) दा धातु का योग होने पर चतुर्थी विभक्ति होती है।
(vi) रुच् धातु के प्रयोग होने पर चतुर्थी विभक्ति होती है।
(vii) अलम् (समर्थवाचक) शब्द के प्रयोग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण
गुरवे नमः । रामाय स्वस्ति।
आचार्याय निवेदयते। शिघ्याय उपदिशति । राधा सुमनेभ्य: स्पृहयति।
दुर्जनाय क्रुध्यति। सज्जनाय द्रुह्यति। मित्राय असूयति।
विप्राय धनं ददाति। मह्यं मोदकानि रोचन्ते। स: दुष्टेभ्य: अलम्।
अभ्यास
१. युष्मद् एवं अस्मद् शब्द की द्वितीया, चतुर्थी व षष्ठी विभक्ति के रूप लिखो।
२. विग्रह करो-भोजनप्रियः, नीलाम्बरः, महाशयः, चक्रपाणिः, चतुर्भुजः, शुद्धमान
षडाननः।
- चतुर्थी विभक्ति होने के कारण बताइए- श्रीगणेशाय नमः । शिप्याय स्वस्ति। विप्राय दानम्। तुभ्यं दुग्धं न रोचते। मल्ल: मल्लाय अलम्। पुत्रः पित्रे निवेदयति। धर्मगुरु: भक्तेभ्य: उपदिशति। अनुवाद कीजिए- वह प्रति मास कमाता है। उसे बड़े भाई को नमस्कार करना चाहिए। तुम दोनों यह गाँव क्यों छोड़ते हो? हम इस नगर में रह रहे थे। तुम सड़क पर दौड़ो। वीणा रसोई घर में खाना पकाती है। वे औरों के लिए जीते हैं। हम दोनों कल विद्यालय नहीं जायेंगे। कल तुम्हें क्या हुआ? हमारा कल्याण हो। तुझे धर्मवार्ता कहूँगा। गुरु शिष्य पर क्रोध करता है। वह भिखारी को रोटी देता है। मुझे मीठा अच्छा नहीं लगता है। निम्नलिखित पदों का संस्कृत में विग्रह करते हुए समास का नामोल्लेख कीजिए- (i) सुवर्णकङ्कणम् (ii) लुब्धकत्रासित: (iii) श्लाघ्यगुण: (iv) गृहस्थधर्म: (v) शक्तिहीन: (vi) दूतीवचनम् १ . 000 अध्याय-१३ विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पाठी शब्द रूप वणिक् (व्यापारी) शब्द (पुंल्लिंग) एकवचन द्विवचन बहुवचन वणिक् वणिजौ वणिजः वणिजम् वणिजौ वणिजः वणिजा वणिग्भ्याम् वणिभिः वणिजे वणिग्भ्याम् वणिग्भ्य: वणिजः वणिग्भ्याम् वणिभ्यः वणिजः वणिजोः वणिजाम् ४६ सप्तमी सम्बोधन विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन वणिजि वणिजोः वणिक्षु हे वणिक् हे वणिजौ हे वणिजः भूभृत् (राजा, पर्वत) शब्द (पुंल्लिंग) एकवचन द्विवचन बहुवचन भूभृत् भूभृतौ भूभृतः भूभृतम् भूभृतौ भूभृतः भूभृता भूभृद्भ्याम् भूभृद्भिः भूभृते भूभृद्भ्याम् भूभृद्भ्यः भूभृतः भूभृद्भ्याम् भूभृद्भ्यः भूभृतः भूभृतो: भूभृताम् भूभृति भूभृतो: भूभृत्सु हे भूभृतौ हे भूभृत् हे भूभृतः धातु रूप दृश् (पश्य) देखना द्विवचन लट् बहुवचन पश्यन्ति पश्यतः एकवचन पश्यति पश्यसि पश्यामि पुरुष प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष पश्यथ: पश्यथ पश्याव: पश्यामः लोट पश्यन्तु पश्यत पश्यताम् पश्यतु पश्य पश्यानि पश्यतम् प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष पश्याव. पश्याम लङ् अपश्यन् अपश्यत् अपश्यताम् अपश्यः अपश्यत अपश्यतम् अपश्याव प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष अपश्यम् अपश्याम लूटू द्रक्ष्यन्ति द्रक्ष्यत: द्रक्ष्यति द्रक्ष्यसि द्रक्ष्यामि द्रक्ष्यथ: द्रक्ष्यथ प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष · द्रक्ष्याव: द्रक्ष्यामः -- पश्येत् पश्ये: पश्येयम् प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष 7 विधिलिङ् पश्येताम् पश्येयु: पश्येतम् पश्येत पश्येव पश्येम लुङ् अदर्शताम् अदर्शन् अदर्शतम् अदर्शत अदर्शाव अदर्शाम पा (पिब्) पीना अदर्शत् अदर्श: अदर्शम् प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्र. पु. पिबति पिबसि पिबामि लट् पिबत: पिबथ: पिबावः पिबन्ति पिबथ पिबतु पिब लोट पिबताम् पिबन्तु पिबतम् पिबत पिबाव पिवाम म. पु. पिबाम: उ. पु. पिबानि लुट् प्र. पु. पास्यतः पास्यन्ति अपिबत् अपिब: अपिबम् लङ् अपिबताम् अपिबन् अपिबतम् अपिबत अपिबाव अपिबाम पास्यथः पास्यथ पास्यावः पास्यामः पास्यति म. पु. पास्यसि उ. पु. पास्यामि विधिलिङ् बहुवचन पिबेयु: पिबेत पिवेम पुरुप एकवचन पिबेत् पिबे: पिबेयम् द्विवचन पिबेताम् पिबेतम् पिबेव प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष अपात् अपाताम् अपातम् लुङ् अपुः अपात अपा: प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष अपाम् अपाव अपाम स्था (तिछ) गै (गाय) लट् तिष्ठति गायति अर्हति कर्पति लोट् तिष्तु गायतु अर्हतु कर्पतु लङ् अतिष्ठत् अगायत् आर्हत् लुट् विधिलिङ स्थास्यति तिष्ठेत् गास्यति अर्हिप्यति अर्हेत् कर्त्यति कत् गायेत् अई (योग्य होना) कृष् (जोतना) अकर्षत् ४८ धृ (धारण करना धरति धरतु अधरत् धरिष्यति धरेत् या रखना) वृषं (बरसना) वर्षति वर्षतु अवर्षत् वर्षिष्यति वर्षेत् सन्धि-ज्ञान (हल् सन्धि) अनुनासिक (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा) (१) कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग के किसी भी वर्ण के आगे अनुनासि- (ङ् ञ् ण् न म्) रहने पर पूर्व वर्ण को अनुनासिक होगा। जैसे- दिक्+नाग: = दिङ्नाग: सद्+मति: = सन्मतिः। षड्+मुख: षण्मुखः। वाक्+मयम् = वाङ्मयम्। अनुस्वार (मोऽनुस्वारः) मान्त पद के स्थान पर अनुस्वार होता है, यदि बाद में व्यञ्जन वर्ण हो- हरिम् वन्दे = हरि वन्दे सत्यम्+वद सत्यं वद। अहम्+पठामि = अहं पठामि। यूयम्+वदथ = यूयं वदथ। त्वम् गच्छसि = त्वं गच्छसि। वयम्+हसाम: = वयं हसामः। (२) अपदान्त म् और न को भी अनुस्वार होता है, यदि बाद में झल् प्रत्याहा का वर्ण हो। जैसे- यशान्+सि = यशांसि। नम्+स्यसि - नस्यसि। मास ज्ञान अलुक्समास जिसमें (शब्द) पूर्व विभक्ति का लुक् (लोप) नहीं होता है, इस प्रकार के समार को ‘अलुक् समास कहते हैं। अर्थात् प्रथम पद की विभक्ति का लोप नहीं होता है। रह तत्पुरुष समास का ही एक भेद है। जैसे-युधि+स्थिरः = युधिष्ठिरः देवानां+प्रिय: = देवानांप्रिय:। आत्मने+पदम् = आत्मनेपदम्। दूराद्+आगत: = दूरादाग़त:। पश्यत:+हर: = पश्यतोहरः। वाच:+पति = वाचस्पतिः। अन्ते+वासी = अन्तेवासी। कारक-ज्ञान (विभक्ति) (i) अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है। -:- ४९ (ii) है। -- भय और रक्षा अर्थ की धातुओं के साथ पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे—सिंहात् बिभेति। चौरात् त्रायते। यहाँ 'विभेति' भय अर्थ में और 'त्रायते' रक्षा अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। (iii) प्रश्न और उत्तर आदि में गुप्त क्रिया के कारण पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे—कुत: श्रीमान् ? (श्रीमान् कहाँ से आ रहे हैं) यहाँ क्रिया गुप्त है। इसी प्रकार उत्तर में 'अजयमेरुत:' (अजमेर से आ रहा हूँ) यहाँ भी क्रिया गुप्त (iv) दिशावाची शब्दों के रहने पर भी पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे- ग्रामात् पूर्व विद्यालयः। (v) तुलना करने पर भी पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे- रामात श्रेष्ठतर: कृष्णः। (vi) पृथक्, विना एवं नाना शब्दों के साथ पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे- कृष्णः रामात् पृथक् नास्ति। (vii) आरात् एवं बहि: शब्द के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे- विद्यालयात् आरात् कश्चिदपि नास्ति। (viii) जन् (जन्म लेना) धातु के कर्ता का मूलकारण अपादान होता है। यथा- 'गोमयाद् वृश्चिको जायते' गोवर से विच्छू पैदा होता है। इसी प्रकार 'कामात् क्रोधोऽभिजायते' काम से क्रोध उत्पत्र होता है, इत्यादि। उदाहरण वृक्षात् पत्राणि पतन्ति। व्याघ्रात् बिभेति। पापात् त्रायते। कुतो भवान् ? उदयपुरतः । नगरात् दक्षिणा चित्रशाला। केशवात् गोपाल: पटुतरः । जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। रामात् पृथक् किमपि न । नानादेशादागत:। नगरात् बहिः देवालयः । अभ्यास १. निम्नलिखित मन्धिवियुक्त पदों को सन्धियुक्त करके लिखिए : (क) गतिम्+चकार। (ख) वृधा+उद्यतम्। (ग) प्रति+अर्पणीयम्। (घ) हितेच्छु:+अस्य। २. निम्नलिखित रूपों में लकार पुरुप एवं वचन की पहचान कीजिए- आहेत. वर्षेयुः, स्थास्पन्ति, अकर्षत, अधरः, जायन्ते, अहिंप्यन्ति। अनुस्वार कहाँ होता है?
५० ४. । ६. - अलुक् समास किसे कहते हैं? ५. निम्नलिखित वाक्यों में पञ्चमी विभक्ति का कारण लिखिए- कुतो भगवन् ? नगरात् बहि: उद्यानम्। शीलाया: राधा पटुतरा। पितुः विना स: दुःर नगरात् पूर्वतः । दुष्टात् त्रायते। अनुवाद कीजिए- शहर से बाहर सरोवर है। गाँव के दक्षिण में शिव मन्दिर है। वह पाप से ड है। तुम ऊँचे स्थान पर रहोगे। वे चित्रपट गीत नहीं गायेंगे। आज वर्षा हो है। वे अपने पास किताबें रखेंगे। राम से मोहन पढ़ने में कुशल है। यात्री र से डरता है। घर के उत्तर में पीपल का पेड़ है। पानी से अलग होने पर मछ मर जाती है। 00 अध्याय-१४ शब्द रूप विभक्ति प्रथमा स्त्रियः, द्वितीया तृतीया स्त्री शब्द (स्त्रीलिंग) एकवचन द्विवचन स्त्री स्त्रियौ स्त्रियम्, स्त्रीम् स्त्रियो स्त्रिया स्त्रीभ्याम् स्त्रियै स्त्रीभ्याम् स्त्रिया: स्त्रीभ्याम् स्त्रिया: स्त्रियोः स्त्रियाम् स्त्रियोः हे स्त्रि! हे स्त्रियो चतुर्थी बहुवचन स्त्रियः स्त्री: स्त्रीभिः स्त्रीभ्यः स्त्रीभ्यः स्त्रीणाम् स्त्रीपु हे स्त्रियः .. पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी बहुवचन श्रियः श्रियः श्रीभिः श्रीभ्यः श्री (लक्ष्मी) शब्द (स्त्रीलिंग) एकवचन द्विवचन श्री: थियो श्रियम् थियौ थ्रिया श्रीभ्याम् श्रियै । श्रीभ्याम् श्रिये। श्रिया: श्रीभ्याम् श्रियः श्रियः श्रियोः श्रियाम् श्रियोः शियि हे श्री: हे थियौ पञ्चमी श्रीभ्यः पप्ठी सप्तमी धियाम् श्रीषु सम्बोधन हे श्रियः धातु रूप (अदादिगण) अस् (होना) लट् स्तः सन्ति अस्ति असि अस्मि सन्तु लोट स्ताम् स्तम् प्र.पु. म. पु. उ. पु. स्थः अस्तु एधि असानि असाव असाम आसन् आसीत् आसी: आसम् लङ् आस्ताम् आस्तम् आस्व आस्त म.पु. आस्म एकवचन स्यात् प्रथम पुरुष द्विवचन स्याताम् स्यातम् स्याव लूट प्र. पु. भविष्यति भविष्यत: भविप्यन्ति भविष्यसि भविष्यथः भविष्यथ उ. पु. भविष्यामि भविष्याव: भविष्याम: विधिलिङ्ग बहुवचन पुरुष स्युः स्यात मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष या (जाना) लोट प्र.पु. यातु याताम् यान्तु याहि यातम् यात यानि याव याम स्याम् लट् यातः यान्ति याति यासि यामि याथः याथ म. पु. 3. पु. पावः यामः -- लुट् अयात् लङ् अयाताम् अयान् अयुः प्र. पु. यास्यति यास्यतः यास्यन्ति अया: अयातम् अयात म. पु. उ. पु. अयाम् अयाव अयाम द्विवचन एकवचन यायात् यास्यसि यास्यथ: यास्यथ यास्यामि यास्यावः यास्यामः विधिलिङ् बहुवचन पुरुष ययुः प्रथम पुरुष यायात मध्यम पुरुष यायाम उत्तम पुरुष यायाताम् यायातम् यायाः यायाव यायाम् सन्धि ज्ञान विसर्ग सन्धि किसी पद अथवा शब्द के पीछे (:) को विसर्ग कहा जाता है। विसर्ग में जं परिवर्तन होता है, वह विसर्ग सन्धि में आता है। स् को विसर्ग (:) होता है। (विसर्जनीयस्य सः) विसर्ग (:) को स् होता है, खर् परे रहने पर। खर् = क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स। जैसे- राम:+तिष्ठति = रामस्तिष्ठति। यहाँ राम: के (:) को स् हो गया, क्योंकि 'तिष्ठति' का 'त्' खर है। २. विसर्ग के बाद शर् (श् स् ष्) हो तो विसर्ग (:) को स् होता है। (यह ऐच्छिक है।) जैसे-- बाल:+स्वपिति = बालस्स्वपिति। रुत्व पद के अन्तिम स को रु (२) होता है। यदि विसर्ग (:) के पूर्व अ और आ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तथा विसर्ग के बाद में कोई स्वर या वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर हो तो विसर्ग (:) को र हो जाता है। जैसे- नि:+मक्षिकम् = निर्मक्षिकम् नि:+धनम् = निर्धनम्। कवि:+जयति = कविर्जयति मुनिः +गच्छति = मुनिर्गच्छति। विसर्ग लोप १. यदि विसर्ग (:) के पहले 'अ हो और उसके आगे 'अ' के अतिरिक्त दूसरा कोई स्वर वर्ण हो तो विसर्ग (:) का लोप हो जाता है। जैसे - ५३ लोप) राम:+आगत: राम आगतः। (विसर्ग लोप) मनुज:+इह = मनुज इह। (विसर्ग चन्द्रः+उदगात् = चन्द्र उदगात्। (विसर्ग लोप) २. यदि विसर्ग (:) के पहले 'आ' हो उसके आगे स्वर वर्ण हो अथवा व्यञ्जन (वर्ग) का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर या य र ल व् ह हो तो विसर्ग (:) का लोप हो जाता है। जैसे- मनुजा:+यान्ति = मनुजा यान्ति (विसर्ग लोप) (पूर्व में आ है और विसर्ग (:) के बाद य है) देवा:+इह - देवा इह (विसर्ग लोप) (पूर्व में आ है और विसर्ग (:) के बाद 'ई' स्वर है) मानवा:+हसन्ति = मानवा हसन्ति (विसर्ग लोप) पूर्व में आ है और विसर्ग (:) के बाद ह है) ३. सः और एपः के विसर्ग के आगे 'अ' स्वर के अतिरिक्त अन्य कोई स्वर या व्यञ्जन हो तो स: और एष: के विसर्ग (:) का लोप हो जाता है। जैसे- स:+आप्नोति = स आप्नोति। स:+उत्तिष्ठति स उत्तिष्ठति। स:+पठति - स पठति। एप:+आगच्छति एप आगच्छति। एष:+हसति एष हसति। एष:+इच्छति एष इच्छति। कारक ज्ञान (विभक्ति) सम्बन्ध (षष्ठी) सम्बन्ध का बोध कराने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है। (ii) हेतु शब्द के रहने पर पप्ठी विभक्ति होती है। जैसे- धन के लिए रहता है- धनस्य हेतो: वसति। (iii) स्मृ धातु के योग में खेदपूर्वक स्मरण में पष्ठी विभक्ति होती है- मातुः स्मरति। (iv) उपरि, पुरः, अध:, अग्रे, पश्चात् तथा दक्षिणत:, पूर्वत: आदि दिशावाचक्र, शब्दों के रहने पर पप्ठी विभक्ति होती है।
५४ उदाहरण रामस्य पुत्रः । गृहस्य हेतो: अत्रागच्छत् । भ्रातुः स्मरामि। गृहस्य उपरि कपोता: । गृहस्य पुरः प्राङ्गणम् । गृहस्य पश्चात् वापी। नगरस्य दक्षिणत: यज्ञशाला। अभ्यास १. विसर्गसन्धि का उदाहरण है (क) कर्मजा (ख) वर्धमानः . ( ) . (ग) सिद्धिर्भवति (घ) गर्हणा (ङ) प्रार्थना। २. सन्धि करो। अत्या intens तथा+अपि। अति+उत्तमः। यदा+एषा। वाक्+दानम्। एष:+इच्छति। विग्रह करो (समस्त पदों में) त्रिलोकी, चतुष्पथः, यथाशक्ति, राजपुत्रः, अकृत:, गजपतिः। बालका:+पठन्ति। ३. अनुवाद करो यह यहां है। तुम वहाँ हो। वे घर में नहीं थे। वह आज नहीं होगा। वे उत्तम हो। उन्हें सच्चरित्र होना चाहिए। मैं कल विद्यालय में नहीं था। हिमालय उत्तर में है। गंगा हिमालय से बहती है। यात्री शेर से डरते हैं। रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-(अस् धातु के रूप वर्तमान) स:- --------1 छात्रा कक्षायां- -1 अहं अध्यापक: -- वयं मानवा:- -----1 तौ- ५५ अध्याय-१५ हे गतवन् शब्द रूप गतवत् (गया हुआ) शब्द (पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गतवान् गतवन्तौ गतवन्त: द्वितीया गतवन्तम् गतवन्तौ गतवत: तृतीया गतवता गतवद्भ्याम् गतवभिः चतुर्थी गतवते गतवद्भ्याम् गतवद्भ्यः पंचमी गतवतः गतवद्भ्याम् गतवद्भ्यः षष्ठी गतवत: गतवतो: गतवताम् सप्तमी गतवति गतवतो: गतवत्सु सम्बोधन हे गतवन्तौ हे गतवन्तः 1 इस तरह धनवत्, बुद्धिमत् आदि शब्दों के रूप चलते हैं। गच्छत् (गया हुआ) शब्द (पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गच्छन् गच्छन्ती गच्छन्त: द्वितीया गच्छन्तम् गच्छन्तौ गच्छतः है। तृतीया गच्छता गच्छद्भ्याम् गच्छद्भिः है। चतुर्थी गच्छते गच्छद्भ्याम् गच्छद्भ्यः पंचमी गच्छतः गच्छद्भ्याम् गच्छद्भ्यः पप्ठी गच्छत: गच्छतो: गच्छताम् सप्तमी गच्छति गच्छतो: गच्छत्सु सम्बोधन हे गच्छन्तौ हे गच्छन्त: इसी प्रकार पठत्, लिखत्, खेलत्, कुर्वत् आदि सभी शतृ प्रत्ययान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप चलते हैं। धातु ज्ञान हन् (मारना) लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन हन्ति हतः नन्ति प्र. पु. हन्तु हताम् जन्तु हंसि हथ म. पु. जहि हतम् हत हन्मि उ.पु. हनानि हनाव हनाम . हे गच्छन् O ५६ अहन् अहः लङ् अहताम् अहतम् अहन्व अघ्नन् अहत प्र. पु. म. पु. उ. पु. अहनम् अहन्म लुट् हनिष्यति हनिष्यत: हनिष्यन्ति हनिष्यसि हनिष्यथ: हनिष्यथ हनिष्यामि हनिष्याव: हनिष्याम: विधिलिङ् बहुवचन पुरुष हन्युः प्रथम पुरुष हन्यात मध्यम पुरुष हन्याम एकवचन हन्यात् हन्या: द्विवचन हन्याताम् हन्यातम् हन्याव हन्याम् उत्तम पुरुष प्र.पु. म. पु. उ. पु. प्र. पु. प्रथम पुरुष विद् (जानना) लट् लोट एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन वेत्ति वित्त: विदन्ति वेत्तु वित्ताम् विदन्तु वेत्सि वित्थः वित्थ विद्धि वित्तम् वित्त वेद्मि विद्वः विद्मः वेदानि वेदाव वेदाम लङ् लुट् अवेत् अवित्ताम् अविदुः वेदिष्यति वेदिप्यत: वेदिप्यन्ति अवे: अवित्तम् अवित्त म. पु. वेदिप्यसि वेदिप्यथ: वेदिप्यथ अवेदम् अविद्व अविद्म उ. पु. वेदिष्यामि वेदिप्याव: वेदिप्याम: 'एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष विद्यात् विद्याताम् विद्युः विद्या: विद्यातम्. विद्यात मध्यम पुरुप विद्याम् विद्याव विद्याम उत्तम पुरुष सन्धि ज्ञान (विसर्ग सन्धि) (ओत्व) १. यदि विसर्ग (:) के पहले 'अ' हो और विसर्ग के आगे वर्ग का तीसरा ( ३ इद् ब्), चौथा (घ् झ् द ध् भ), पाँचवाँ (ङ् ञ् ण न म्) अथवा य र ल व ह में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग के पूर्व अकार एवं विसर्ग (:) दोनों के स्थान पर 'ओ हो जाता है। राम:+हसति = रामो हसति। (अ+: = ओ) बालक:+याचते = बालको याचते। मन:+रथः = मनोरथः। मन:+हर - मनोहरः। यश:+धन: 3 यशोधनः।
५७ २. यदि विसर्ग (:) के पहले अ हो और विसर्ग (:) के परे 'अ' हो तो पूर्व वाले अकार और विसर्ग (:) दोनों को ओ' हो जाता है। जैसे (वाल:+अयम् = बालोऽयम् (अ+: - ओ) यहाँ अयम् के अ का लोप हो जाता है और इस प्रकार के स्थान पर अवग्रह का चिन्ह (5) बनाया जाता है। जैसे-बाल:+अयम् = अ+: 3 (s)। राम:+अपि = रामोऽपि। अन्य:+अन्य: - अन्योऽन्यः। कृष्ण:+अस्ति = कृष्णोऽस्ति। अध:+अधः = अधोऽधः। कारक ज्ञान (विभक्ति) अधिकरण (सप्तमी) (i) आधार या अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। समय बोधक शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे--मध्याह्ने कार्य करोति। प्रात:काले सूर्य: उदेति, सायंकाले अस्तमेति। शैशवे चञ्चलता, यौवने उत्कर्षः, वार्धक्ये शैथिल्यम्। (iii) अनेक में एक को छांटने अथवा तमप् प्रत्यय के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे--कविषु कालिदास:। छात्रेपु राम: पटुतमः (तमप्प्रत्यय के रहने पर षष्ठी विभक्ति भी होती है, तुलना करने में)। (iv) कुशल, निपुण, पटु, दक्ष, चतुर अर्थ वाले शब्दों के साथ सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे- कर्मणि कुशलः। कार्येषु दक्ष: । शास्त्रेषु निपुणः । (v) स्निह् (प्रेमार्थक) धातु के योग में सप्तमी विभक्ति होती है। यथा- माता पुत्रे स्निह्यति। (vi) अनादर अर्थ में षष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियाँ होती हैं। मदति प्रावाजीत, रुदत: प्राब्राजीत्। सति सप्तमी (विशिष्ट प्रयोग) अपराधे कृतेऽप्यन्यैः कृतेऽप्यन्यैः सत्यसारे तदाश्रमे। स्वीकृत्य दोषसर्वस्वमुपवासैस्तपस्यति ।। उपर्युक्त श्लोक के रेखांकित पद में सति के योग में (अपराध कर लेने पर) सप्तमी विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार पठिते सति, गते सति, लिखिते सति, आदि उदाहरणों द्वारा “सति सप्तमी" का अभ्यास कीजिए। उदाहरण गृहे आसनम्। शैशवे सुन्दरः। शास्त्रे प्रवीण:। पिता पुत्रे स्निह्यति। मनुष्येषु रामो वीरतमः। अभ्यास १. 'यशोऽभिलाषी" सन्धिका विग्रह होगा-- (क) यशि+अभिलाषी (ख) यशो:+अभिलाषी (ग) यश:+अभिलापी (घ) यशस:+अभिलाषी (ड) यशसि+अभिलाषी। .
५८ २ . ...... ४. ५. मानवा: श्रेष्ठाः।" रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए उपयुक्त पद है (क) जीवा: (ख) जीवेषु (ग) जीवानि (घ) जीवेभ्य: (ङ) जीवोः। ( ) ३. लिखत् शब्द (पुंल्लिंग) के रूप लिखिए। धनवत् शब्द (पुंल्लिंग) के रूप लिखिए। विग्रह कीजिए- रामोऽपि। केशवोऽहसत्। कोऽपि। मनोरम: । कोऽयम्। ६. मोक्षे इच्छाऽस्ति। यौवने पराक्रमी। विद्वत्सु श्रेष्ठतमः। मध्याह्ने सवितरि तपति इन शब्दों में सप्तमी विभक्ति का कारण बताइए। अनुवाद कीजिए- उसने मुझे मारा। वह उसे जानता था। राम जाता हुआ गिर पड़ा। बुद्धिमान् से विवाद करना उचित नहीं है। आश्रम के वृक्षों पर धूल गिर रही है। वह रणनीति में दक्ष है। माता अपने पुत्रों से स्नेह करती है। केशव कक्षा के सभी छात्रों में श्रेष्ठ है। अधिकरण में कौन सी विभक्ति होती है? सोदाहरण लिखिए। सन्धि विच्छेद कर सन्धि का नामोल्लेख कीजिए- (i) कस्त्वम् (ii) चिन्तयन्नेव (iii) इत्युक्त्वा (iv) हिरण्यकेनोक्तम् ८. ९. 000 अध्याय-१६ ra विभक्ति 'प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी शब्द रूप वारि (जल) शब्द (नपुंसकलिंग) एकवचन द्विवचन वारि वारिणी वारि वारिणी वारिणा वारिभ्याम् वारिणे बारिभ्याम् बहुवचन वारीणि वारीणि वारिभिः वाशियः हे पंचमी वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः पप्ठी वारिण: वारिणोः वारीणाम् सप्तमी वारिणि वारिणो: वारिषु सम्बोधन हे वारि, वारे हे वारिणी हे वारीणि मधु (शहद) शब्द (नपुंसकलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा मधु मधुनी मधूनि द्वितीया मधु मधुनी मधुनि तृतीया मधुना मधुभ्याम् मधुभिः चतुर्थी मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः पंचमी मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः पप्ठी मधुन: मधुनोः मधूनाम् सप्तमी मधुनि मधुनोः मधुपु सम्बोधन मधु, मधो हे मधुनी हे मधूनि दधि (दही) शब्द (नपुंसकलिङ्ग) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा दधि दधिनी दधीनि द्वितीया दधि दधिनी दधीनि तृतीया दध्मा दधिभ्याम् दधिभिः चतुर्थी दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः पंचमी दध्मः दधिभ्याम् दधिभ्यः षष्ठी दनः दनोः दनाम् सप्तमी दनि दध्नो: दधिषु सम्बोधन हे दधि, दधे हे दधिनी हे दधीनि तु रूप (अदादिगण) स्वप् (सोना) लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुप एकवचन द्विवचन वा स्वपिति स्वपित: स्वपन्ति स्वपितु स्वपिताम् स्व स्वपिषि स्वपिधः स्वपिथ स्वपिहि स्वपितम् स्व न स्वपिमि स्वपिवः स्वपिम: स्वपानि स्वपाव दधनि, प्र. पु. म. पु. उ.पु.
. ६० प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष लङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन अस्वपीत् अस्वपिताम् अस्वपन् अस्वपत् अस्वपी: अस्वपितम् अस्वपित अस्वपः अस्वपम् अस्वपिव अस्वपिम लुट् स्वप्स्यति स्वप्स्यतः स्वप्स्यन्ति मध्यम पुरुष स्वप्स्यसि स्वप्स्यथः स्वप्स्यथ स्वप्स्यामि स्वप्स्यावः स्वप्स्यामः विधिलिङ् प्रथम पुरुष स्वप्यात् स्वप्याताम् स्वप्युः मध्यम पुरुष स्वप्या: स्वप्यातम् स्वप्यात उत्तम पुरुष स्वप्याम् स्वप्याव स्वप्याम दुह् (दुहना) लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन दोन्धि : दुग्धः दुहन्ति दोग्धु दुग्धाम् दुहन्तु दोक्षि दुग्धः दुग्ध दुधि दुग्धम् दुग्ध दोहि दुवः दुह्मः दोहानि दोहाव दोहाम लङ् लुट् अधोक् अदुग्धाम् अदुहन् धोक्ष्यति धोक्ष्यतः धोक्ष्यनि अधोक् अदुग्धम् अदुग्ध म. पु. धोक्ष्यसि धोक्ष्यथ: धोक्ष्यथ अदोहम् अदुह्व अदुह्म पु. धोक्ष्यामि धोक्ष्याव: धोक्ष्याम प्र. पु. म. पु. उ. पु. प्र. पु. 3. पुरुष प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष एकवचन दुह्यात् दुह्याः दुह्याम् विधिलिङ् द्विवचन दुह्याताम् दुह्यातम् दुह्याव बहुवचन दुहाः दुह्यात दुह्याम . १. एकः, एकम्, एका २. द्वौ, द्वे, द्वे ३. त्रयः, त्रीणि, तिम्रः ४. चत्वारः, चत्वारि, चतम्र: ५. पञ्च ६.षट् ७. सप्त ८. अष्ट, अष्टौ ६१ संख्यावाचकशब्दाः (एक से दस अरब तक) ३६. षट्त्रिंशत् ३७. सप्तत्रिंशत् ३८. अप्टात्रिंशत् ३९. एकोनचत्वारिंशत् ४०. चत्वारिंशत् ४१. एकचत्वारिंशत् ४२. द्विचत्वारिंशत् ४३. त्रिचत्वारिंशत् ४४. चतुश्चत्वारिंशत् ४५. पञ्चचत्वारिंशत् ४६. षट्चत्वारिंशत् ४७. सप्तचत्वारिंशत् ४८. अप्टचत्वारिंशत् ४९. एकोनपञ्चाशत् ५०. पञ्चाशत् ५१. एकपञ्चाशत् ५२. द्विपञ्चाशत् ५३. त्रिपञ्चाशत् ५४. चतुः पञ्चाशत् ९. नव १०. दश ११. एकादश ५२. द्वादश १३. त्रयोदश १४. चतुर्दश १५. पञ्चदश १६. षोडश १७. सप्तदश १८. अष्टादश १९. एकोनविंशतिः ७१. एकसप्ततिः ७२. द्विसप्ततिः ७३. त्रिसप्ततिः ७४. चतुःसप्ततिः ७५. पञ्चसप्ततिः ७६. षट् सप्ततिः ७७. सप्तसप्ततिः ७८. अप्टसप्ततिः ७९. एकोनाशीतिः ८०. अशीतिः ८१. एकाशीतिः ८२. दुयशीतिः ८३.त्र्यशीतिः ८५. चतुरशीतिः ८५. पञ्चाशीतिः ८६. षडशीतिः ८७. सप्ताशीतिः ८८. अप्टाशीतिः ८९. नवाशीतिः. (एकोननवतिः) ९०. नवतिः ९१. एकनवतिः ९२. द्विनवतिः ९३. विनवतिः ९४. चतुर्नवतिः ९५. पञ्चनवतिः ९६. षण्णवतिः ९७. सप्तनवतिः ९८. अप्टनवतिः ९९. नवनवतिः २०. विंशतिः २१. एकविंशतिः २२. द्वाविंशतिः २३. त्रयोविंशतिः २४. चतुर्विशतिः २५. पञ्चविंशतिः २६. षइविंशति २७. सप्तविंशतिः २८. अष्टाविंशतिः २९. एकोनत्रिंशत् ३०. त्रिंशत् ३१. एकत्रिंशत् ३२. द्वात्रिंशत् ३३. जयसिंशत ३४. चतुरिंशत् ३५. पञ्चत्रिंशत् ५५. पञ्चपञ्चाशत् ५६. षट्पञ्चाशत् ५७. सप्तपञ्चाशत् ५८. अप्टपञ्चाशत् ५९. एकोनषष्टिः ६०. षष्टिः ६१. एकषष्टिः ६२. द्विषष्टिः ६३. त्रिषष्टिः ६४. चतुःषष्टिः ६५. पञ्चषष्टिः ६६. षट्पष्टिः ६७. सप्तषष्टिः ६८. अष्टषष्टिः ६९. एकोनसप्ततिः ७०. सप्ततिः १००. शतम् ६२ ५ १०१ आदि संख्याओं के लिए अधिक शब्द लगाकर संख्या शब्द बनाये हैं। यथा- १०१ (एकाधिकं शतम्)। २०० आदि के लिए दो आदि संख्यावाचक शब्द पूर्व में रखकर बाद रखें, अथवा शत पहले रखकर द्वयम् आदि रखें। यथा-२०० द्विशती अथवा शतद्वयम् ३०० त्रिशती अथवा शतत्रयम् एक हजार (१०००) सहसम्। दस हजार (१००००) अयुतम्। एक लाख (१०००००) लक्षम्। दस लाख (१००००००) नियुतम्। एक करोड़ (१०००००००) कोटिः। दस करोड़ (१००००००००) दशकोटिः। एक अरब (१०००००००००) अर्चदम्। दस अरब (१००००००००००) दशानुदम्। कारक ज्ञान (विभक्ति) (शी, स्था, आस्) शीङ्(सोना-बसना), स्था (बैठना), आस् (रहना) ये धातुएँ अकर्मक हैं। पूर्व में अधि उपसर्ग लगा हुआ हो तो इन क्रियाओं का आधार कर्म हो जाता है। अधि+शी 'अधि+स्था। अधि+आस्। इन धातुओं के साथ द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे- अधि+शी लोहकार: ग्राममधिशेते (लुहार गाँव में रहता है)। ग्रामसेवक: ग्राममधिशेते (ग्राम-सेवक गाँव में सोता है)। अधि+स्था कुलपति: आसनमधितिष्ठति (कुलपति आसन पर बैठता है)। 4 अधि+आस् - ऋषि: तपस्थलीमध्यास्ते (ऋपि तपस्थली में रहता है)। तादर्थ्य (प्रयोजन) जिस प्रयोजन या प्राप्ति के लिए जो वस्तु या क्रिया होती है, उनमें चतुर्थी विभरि होती है। जैसे--मोक्षाय देवं भजति (मोक्ष के लिए देव को भजता है)। ज्ञानाय अध्ययन (ज्ञान के लिए अध्ययन)। अभ्यास १. निम्नांकित वाक्यों में रेखांकित शब्दों की विभक्ति वताओ और उसका कारण लिखो :- (क) अहं त्वाम् धिक् करोमि ६३ . - । (ख) धनिकः याचकेभ्य: भोजनं प्रयच्छति।दे के यौठा में भी वि.नी (ग) अत्र श्रवणाभ्यां बधिरा: भ्रमन्ति। अंग विकार में तृतीया (घ) दुर्जनेभ्य: नमः। -11 में - विलानि (ङ) लोभात् क्रोधः प्रभवति। कोई वस्तु उत्पन हो उसमें 4 (च) सात् बिभेति बालकः । सिंही........ सुपुत्रेण निर्भयं स्वपिति। (क) एकम् (ख) एकस्य (ग) एकेन (घ) एक: (ङ) एकस्मात्। ६७, ८०, ४५, १८, २९, ६, ९१- इनके संस्कृत शब्द बनाओ। दो सौ पांच। तीन सौ। दस हजार। दो लाख। एक अरब। इनके संस्कृत शब्द बनाओ। १. अयुतम्-नियुतम्। कोटि-अर्बुदम्। एकाधिकं-शतम्-शतद्वयम्- इनके अन्तर बताइये। अर्थाय श्रमः । पुण्याय दानम्। आचार्य: आसनमधितिष्ठति। ब्रह्मचारी वनस्थलीमध्यास्ते। श्रमिक: यन्त्रशालामधिशेते। यहाँ द्वितीया विभक्ति का आधार बतलाइये। अनुवाद कीजिए- वह दो कोस जाता है। मैं गाय का दूध दुहता हूँ। उसे जल्दी सोना चाहिए। हम आज रात नहीं सोयेंगे। पृथ्वी धन दुहती है। वे भूमि पर ही सो गए। वह सफलता के लिए पढ़ रहा है। एक लाख जनसंख्या है। पाँच अरव रुपये की योजना है। वह दो सौ रुपये देता है। इस वर्ष का बजट दस अरब का है। यह भवन दस लाख का है। यह वर्ष १९९६ है। . i. १. 000 ६४ अध्याय-१७ a स्त्रीलिङ्ग एका एकाम् एकया एकस्यै एकस्याः एकस्याः एकस्याम् -- शब्द रूप (संख्यावाची) एक (एक) शब्द. (एकवचन में ही रूप चलते हैं) पुंल्लिङ्ग प्रथमा एक: प्रथमा द्वितीया एकम् द्वितीया तृतीया एकेन तृतीया चतुर्थी एकस्मै चतुर्थी पञ्चमी एकस्मात् पञ्चमी षष्ठी एकस्य षष्ठी सप्तमी एकस्मिन् सप्तमी नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकम् द्वितीया एकम् द्वि (दो) शब्द पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग (द्विवचन में ही रूप चलते हैं) प्रथमा द्वौ द्वितीया द्वौ तृतीया द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् चतुर्थी द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् पञ्चमी द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् षष्ठी द्वयोः द्वयोः सप्तमी द्वयोः द्वयोः त्रि (तीन) शब्द (तीन से अठारह तक की संख्याओं के रूप केवल बहुवचन में ही चलते हैं) पुंल्लिंग स्त्रीलिंग प्रथमा त्रयः तिम्रः द्वितीया त्रीन् तिम्र: तृतीया त्रिभिः तिसृभिः नपुंसकलिङ्ग to his to to द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वयोः द्वयोः नपुंसकलिंग त्रीणि त्रीणि त्रिभिः ६५ प्र. पु. चतुर्थी त्रिभ्यः तिसृभ्यः त्रिभ्यः पञ्चमी त्रिभ्यः तिसृभ्यः त्रिभ्यः षष्ठी त्रयाणाम् तिसृणाम् त्रयाणाम् सप्तमी त्रिषु तिसृषु त्रिषु धातु रूप (जुहोत्यादिगण) दा (देना) धातु लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन ददाति दत्तः ददति ददातु दत्ताम् ददतु ददासि दत्थः दत्थ म. पु. देहि दत्तम् दत्त ददामि दद्वः दद्यः उ. पु. ददानि ददाव ददाम लङ् लुट् अददात् अदत्ताम् अददुः प्र. पु. दास्यति दास्यत: दास्यन्ति अददा: अदत्तम् अदत्त म. पु. दास्यसि दास्यथ: दास्यथ अददाम् अदद अदद्य उ.पु. दास्यामि दास्याव: दास्यामः विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष दद्यात् दद्याताम् दद्युः प्रथम पुरुष दद्या: दद्यातम् दद्यात मध्यम पुरुष दद्याम् दद्याव दद्याम उत्तम पुरुष लुङ् अदात् अदाताम् अदुः अदा: अदातम् अदात अदाम् अदाव अदाम प्रत्यय ज्ञान किसी धातु के अन्त में या बाद में जिसे जोड़ा जाता है, उसे प्रत्यय कहते हैं। जैसे- नी+क्त्वा (त्वा) नीत्वा। यहाँ 'नी' धातु और क्त्वा प्रत्यय है; नी धातु के बाद में इसे जोड़ा गया है। प्रत्यय के अनेक भेद हैं, जैसे-कृत् प्रत्यय, कृत्य प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय एवं स्त्री प्रत्यय आदि। एक से अधिक शब्द बनाने के लिए प्रत्यय को जोड़ा जाता है। धातु, संज्ञा, सर्वनाम एवं विशेषणों के अन्त में या बाद में प्रत्यय जोड़ने से असंख्य शब्द बन जाते हैं। प्रमुख प्रत्यय ये हैं- कृदन्त (कृत्) प्रत्ययकत्वा, ल्यप, तुमुन्, तव्य, शत, तृन्, शानच्, क्त और अनीयर् आदि।
६६ तद्धित प्रत्यय-मतुप, इनि, ष्यञ्, तर, अण्, यत्, ण्यत् आदि। वाच्य-परिवर्तन वाच्य का अर्थ है-'बताया जाने वाला। वाच्य तीन प्रकार के होते हैं- १. कर्तृवाच्य। २. कर्मवाच्य। ३. भाववाच्या कर्तृवाच्य-जिस धातु का वाच्य कर्ता हो, उसे कर्तृवाच्य कहा जाता है। कर्मवाच्य-जिसका वाच्य कर्म हो, उसे कर्मवाच्य कहा जाता है। भाववाच्य-कर्ता और कर्म दोनों के अनुसार न हो, उसे भाववाच्य कहा जात है। जैसे- १. कर्तृवाच्य- अहं वेदं पठामि। कर्मवाच्य-मया वेदः पठ्यते। २. कर्तृवाच्य--अहं तिष्ठामि। भाववाच्य-मया स्थीयते। अभ्यास १. निम्नलिखित रूपों में मूल शब्द एवं विभक्ति बतलाइए- (क) धाम्नि (ख) हरे: (ग) भूमौ (घ) गौः (ङ) सर्वे: । २. द्वयोः फलयोः। तिसृभिः कन्याभिः। त्रीणि फलानि। एकस्मिन् ग्रामे। एकस्य नद्याः। द्वाभ्यां नेत्राभ्याम् । रेखांकित (मोटे अक्षरों वाले) शब्दों के लिंग बताइये। प्रत्यय किसे कहते हैं? ४.. वाच्य कितने प्रकार के होते हैं? अनुवाद कीजिए- वे दो फल खाते हैं। सीता दोनों हाथों से घड़ा उठाती है। एक विद्यालय में तीन सौ छात्र हैं। एक स्त्री के एक ही पुत्र है। तुम्हें मुझे पाँच रुपये देने चाहिए। हमें सभी को कितावें दीं। तुम विद्यालय में चन्दा दो। तीन स्त्रियाँ, दो पुरुष और एक बालिका इस भवन में हैं। DOE ६७ अध्याय-१८ शब्द रूप (संख्यावाची) चतुर् (चार) शब्द बहुवचनान्त चतुर शब्द पुंल्लिंग स्त्रीलिंग विभक्ति चत्वारः चतम्रः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पष्ठी सप्तमी नपुंसकलिंग चत्वारि चत्वारि चतुर्भि: चतुर्थ्य: चतुर्थ्य: चतुर्णाम् चतुर्यु सप्तन् शब्द बहुवचन सप्त सप्त सप्तभिः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी सप्तभ्यः सप्तभ्यः चतुरः चतम्रः चतुर्भि: चतसृभिः चतुर्थ्य: चतसृभ्य: चतुर्थ्य: चतसृभ्यः चतुर्णाम् चतसृणाम् चतुर्यु चतसृषु पञ्चन् शब्द षष् शब्द बहुवचन बहुवचन पञ्च षट्, पडू पञ्च पद, पड़ पञ्चभिः षभिः पञ्चभ्यः पड़भ्यः पञ्चभ्यः पड्भ्यः पञ्चानाम् पण्णाम् पञ्चसु पट्सु (तीनों लिगों में समान रूप होते हैं) अष्टन् शब्द बहुवचन अष्टौ प्रथमा द्वितीया अष्टाभिः, अष्टभिः तृतीया अष्टभ्य:, अष्टाभ्य: चतुर्थी अभ्यः, अटाभ्यः पञ्चमी अष्टानाम् पप्ठी आष्टसु, अष्टासु सप्तमी (तीनों लिमों में समान रूप होते हैं) सप्तानाम् सप्तसु नवन् शब्द बहुवचन नव अष्ट, अष्ट, अष्टौ नव नवभिः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पाठी सप्तमी नवभ्यः नवभ्यः নানামু नवम् ६८ प्र..पु. म. पु. उ. पु. .. दशन् शब्द (तीनों लिङ्गों में समान रूप चलते हैं) प्रथमा दश द्वितीया दश तृतीया दशभिः (इसी प्रकार एकादशन्, द्वादशन, दर चतुर्थी दशभ्यः चतुर्दशन्, पञ्चदशन्, षोडशन्, . i५५॥ पंचमी दशभ्यः और अष्टादशन् शब्दों के रूप चलते हैं) षष्ठी दशानाम् सप्तमी दशसु धातु-रूप (दिवादिगण) नश् (नष्ट होना) लट् लोट एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नश्यति नश्यत: नश्यन्ति नश्यतु नश्यताम् नश्यन्तु नश्यसि नश्यथः नश्यथ नश्य नश्यतम् नश्यत नश्यामि नश्याव: नश्यामः नश्यानि नश्याव नश्याम लङ् लूट अनश्यत् अनश्यताम् अनश्यन् प्र. पु. नक्ष्यति नक्ष्यत: नक्ष्यन्ति अनश्य: अनश्यतम् अनश्यत पु. नक्ष्यसि नक्ष्यथ अनश्यम् अनश्याव अनश्याम अनश्याम उ. पु. नक्ष्यामि नझ्याव: नझ्याम: : अथवा (लु) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष नशिष्यति नशिप्यत: नशिप्यन्ति मध्यम पुरुष नशिप्यसि नशिष्यथ: नशिप्यथ नशिष्यामि नशिष्याव: नशिप्यामः विधिलिङ् प्रथम पुरुष नश्येत् नश्येताम् नश्येयुः मध्यम पुरुष नश्ये: नश्येतम् नश्येत उत्तम पुरुष नश्येयम् नश्येव नश्येम दिवादिगण के अन्य धातुओं के रूप इस प्रकार बनाये जा सकते हैं- कुम् (कुद्ध होना) लट् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र. पु. कुप्+यति = कुप्यति कुप्+यत: - कुप्यतः (क्रोध करता है) (वे दो क्रोध करते हैं) A. नक्ष्यथ: उत्तम पुरुष - - कुप्+यन्ति = कुप्यन्दि (वे क्रोध करते हैं।
६९ । म. पु. उ.पु. स प्र. पु. म. पु. उ.पु. प्र. पु. कुप्+यसि = कुप्यसि कुप्+यथ: = कुप्यथः कुप्+यथ = कुप्यथ (तुम क्रोध करते हो) (तुम दो क्रोध करते हो) (तुम सब क्रोध करते हो) कुप्+यामि = कुप्यामि कुप्+याव: - कुप्याव: कुप्+यामः = कुप्यामः (मैं क्रोध करता हूँ) (हम दोनों क्रोध करते हैं) (हम सब क्रोध करते हैं) लोट कुप्+यतु = कुप्यतु कुप्+यताम् = कुप्यताम् कुप्+यन्तु = कुप्यन्तु (वह क्रोध करे) (वे दोनों क्रोध करें) (वे सव क्रोध करें) कुप्+य: - कुप्य: कुप्+यतम् - कुप्यतम् कुप्+यत = कुप्यत (तुम क्रोध करो) (तुम दोनों क्रोध करो) (तुम सब क्रोध करो) कुप्+यानि = कुप्यानि कुप्+याव % कुप्याव कुप्+याम = कुप्याम (मैं क्रोध करूँ) (हम दोनों क्रोध करें) (हम सब क्रोध करें) ल (पूर्व में अ जुड़ेगा) एकवचन द्विवचन बहुवचन अ+कुप्+यत् = अकुप्यत् अकुप्+यताम् अकुप्+यन् = अकुप्यन् अकुप्यताम् (उसने क्रोध किया) (उन दोनों ने क्रोध किया) (उन्होंने क्रोध किया) अ+कुप्+य: = अकुप्य: अकुप्+यतम् = अ+कुप्+यत = अकुप्यत अकुप्यतम् (तुमने क्रोध किया) (तुम दोनों ने क्रोध किया) (तुम सबने क्रोध किया) अ+कुप्+यम् = अकुप्यम् अकुप्+याव = अकुप्याव अकुप्+याम = अकुप्याम (मैंने क्रोध किया) (हम दोनों ने क्रोध किया) (हम सबने क्रोध किया). लुट् (कुप् का कोप हो जाएगा) एकवचन द्विवचन बहुवचन कोप्+इप्यति = कोपिष्यतिकोप्+इप्यत: = कोप्+इप्यन्ति = कोपिष्यत: कोपिप्यन्ति (वह क्रोध करेगा) (वे दोनों क्रोध करेंगे) (वे सब क्रोध करेंगे). कोप+इप्यसि कोप+इप्यथ: 3 कोप+इप्यथ - कोपिप्यथ कोपिप्यसि कोपिप्यथः (तुम क्रोध करोगे) (तुम दोनों क्रोध करोगे) (तुम सब क्रोध करोगे) कोप्+प्यामि कोप्+इप्याव: = कोप+इयाम: = कोपिप्यामि कोपिप्यावः कोपिप्पाम: (मैं क्रोध करूँगा) (हम दोनों क्रोध करेंगे) (हम सब क्रोध करेंगे) म. पु. --- उ. पु. प्र. पु. म. पु. उ. पु. ।
७० विधिलिङ् प्र. पु. उ. पु. भ्राम्यतः एकवचन द्विवचन बहुवचन कुप्+येत् = कुप्येत् कुप्+येताम् = कुप्येताम् कुप्+येयुः = कुप्येयुः (उसे क्रोध करना चाहिए) (उन दोनों को क्रोध करना (उन्हें क्रोध करना चाहिए चाहिए) म. पु. कुप्+ये: कुप्+ये: = कुप्ये: कुप्+येतम् = कुप्येतम् कुप्+येत = कुप्येत (तुम्हें क्रोध करना चाहिए)(तुम दोनों को क्रोध करना (तुम सबको क्रोध करना चाहिए) चाहिए) कुप्+येयम् = कुप्येयम् कुप्+येव = कुप्येव कुप्+येम = कुप्येम (मुझे क्रोध करना चाहिए) (हम दोनों को क्रोध करना (हमें क्रोध करना चाहिए) चाहिए) इस प्रकार भ्रम् धातु के रूप भी चलते हैं- लट् भ्राम्यति भ्राम्यन्ति लोट भ्राम्यतु भ्राम्यताम् भ्राम्यन्तु लङ् अभ्राम्यत् अभ्राम्यताम् अभ्राम्यन् लुट् भ्रमिष्यति भ्रमिष्यत: भ्रमिष्यन्ति विधिलिङ् भ्राम्येत् भ्राम्येताम् भ्राम्येयु: (भ्रम् धातु के रूप भू धातु की तरह भी चलते हैं।) इसी प्रकार लुभ् (लोभ करना) धातु के रूप भी चलेंगे प्रत्यय ज्ञान (क्त और क्तवतु) भूतकाल में क्त और क्तवतु प्रत्यय होते हैं। क्त का 'त' शेष रहता है। क्तवतु का 'वत्' शेष रहता है। क्त प्रत्ययान्त को वत् जोड़कर क्तवतु प्रत्ययान्त बनाया जा सकता है। जैसे—कृ (करना), कृ+क्त (त) = कृत: (किया हुआ) कृ+क्तवतु (तवत्) = कृतवत्। कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में 'क्त' प्रत्यय होता है। कर्तृवाच्य में क्तवतु' प्रत्यय होता है। क्त प्रत्यय धातु प्रत्यय रूपं धातु अर्जित: चर् चरित: इतः चल चलितः ईक्ष ईक्षित: क्री क्रीत: प्रत्यय रूप अ . क्त क्त क्त क्त क्त क्त ७१ कुप भाष 12 गण क्रीड् कथितः क्त कथ् क्रीडित: क्त कम्पू क्त कम्पित: खन् क्त खात: क्त कुपित: क्रुध क्त क्रुद्धः कूर्द क्त कूर्दित: खाद् खादित: क्त घ्रा क्त प्रातः गम् क्त गतः क्षिप् क्त 'क्षिप्तः नी क्त नीत: क्त क्षु क्षुब्धः क्त पत् पतित: गर्छ क्त गर्जितः पठ् क्त पठितः क्त ग्रह गृहीत: क्त भाषित: क्त गणित: पाल क्त पालितः स्पृश् क्त स्पृष्टः भिद् भिन्न: क्त मुच् क्त मुक्तः याच क्त याचित: रुच् क्त मचित: शिक्ष क्त शिक्षित: लभ क्त लब्धः शुभ क्त शोभित: चिन्त क्त चिन्तितः हस् क्त हसित: चुर क्त चोरित: हन् क्त हतः जि क्त जित: ह क्त हतः जीव क्त जीवितः स्ना क्त स्नात: जन् क्त जनित: स्निह् क्त स्निग्ध: छिद् क्त छिन्नः शुष् क्त शुष्कः ज्ञा क्त ज्ञातः शी क्त शयित: तप् क्त तप्तः युध क्त युद्धः दण्ड क्त दण्डित: शक् क्त शक्तः दा क्त दत्तः मृज् क्त मृष्ट: दीप क्त दीप्त: सिन् क्त सिक्तः दुह क्त दुग्धः क्त श्रुतः दृश् क्त दृष्टः वस् क्त उपित: धाव क्त पावितः लिख क्त लिखितः धु क्त धृतः यातः नम् क्त नत: रक्ष क्त रक्षित: ना नप्टः क्त मिलितः वाच्य परिवर्तन कर्तृवाच्य जब कर्ता धिमा विभक्ति में, कर्म द्वितीया विभक्ति में एवं क्रिया के लिए धातु थु या क्त मिल .
કર १. रूप प्रयुक्त होता है, उसे 'कर्तृवाच्य' कहा जाता है। इसमें कर्ता के अनुसार क्रिय पुरुष और वचन का प्रयोग होता है। मोहनः पुस्तकं पठति। यहाँ मोहन: कर्ता है। पुस्तकं कर्म एवं पठति क्रिया है। कर्ता मोहन: प्रथमा विभ का एकवचन है। अत: क्रिया (पठति) भी प्रथम पुरुष एकवचन की है। तौ पुस्तके पठतः। यहाँ कर्ता (तो) प्रथमा विभक्ति का द्विवचन है। अत: क्रिया (पठत:) प्रथम का द्विवचन है। इस प्रकार अन्य पुरुषों में भी क्रिया उस पुरुष एवं वचन की होती जिसं पुरुष का व जिस वचन का कर्ता होता है। अभ्यास नद्यः । रिक्त स्थान पूर्ति के लिए उपयुक्त पद है- (क) चत्वारः (ख) चतम्र: (ग) चत्वारि (घ) चतुर्भि: (ङ) चतुरः। २. द्वादशन् एवं त्रयोदशन् शब्द के रूप लिखिए। ३. भ्राम्यथः, भ्राम्येयुः, कुप्येम:, अकुप्यः, नश्यन्ति इन शब्दों में लकार, पुरुष. वचन बताइए। क्त और क्तवतु प्रत्यय में अन्तर स्पष्ट कीजिए। पच्, मुद्, आप, कृष्, वर्ण, स्वप्, अर्च, गै, वृ, विद् एवं नन्द धातुओं के ' प्रत्यय जोड़कर रूप बनाइये। ६. अनुवाद कीजिए- वसु आठ आदमियों पर क्रोध करता है। उस शहर में दस घर नष्ट हो गये। ५ का नाश होना चाहिए। वह कभी क्रोध नहीं करेगा। तुम कहाँ कहाँ घूमोगे? लोभ नहीं करना चाहिए। हम अठारह पुराणों का अध्ययन करेंगे। आठ और ॐ सोलह होते हैं। उसने कहा- वह गया। उसने पुस्तक नहीं लिखी। किन्हीं दो के प्रकृति-प्रत्यय लिखिए- (i) गत्वा (ii) जातम् (iii) चिन्तयन् (iv) कर्तव्यम् A ५. .. - ७. OOL ७३ अध्याय-१९ (सुला ब चतुर्थी पुरुष शब्द रूप पूर्व (शब्द) प्रथम पुल्लिंग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पूर्वः पूर्वी पूर्वे द्वितीया पूर्वम् पूर्वी पूर्वान् की हैं तृतीया पूर्वेण पूर्वाभ्याम् पूर्वैः पूर्वस्मै पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्य: पंचमी पूर्वस्मात् पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्य: षष्ठी पूर्वस्य पूर्वयोः पूर्वेषाम् सप्तमी पूर्वस्मिन् पूर्वयोः पूर्वेषु स्त्रीलिंग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पूर्वा पूर्वे पूर्वा: द्वितीया पूर्वाभ् पूर्वे पूर्वा: तृतीया पूर्वया पूर्वाभ्याम् पूर्वाभिः चतुर्थी पूर्वस्यै पूर्वाभ्याम् पूर्वाभ्यः पंचमी पूर्वस्याः पूर्वाभ्याम् पूर्वाभ्यः षष्ठी पूर्वस्याः पूर्वयोः पूर्वासाम् सप्तमी पूर्वस्याम् पूर्वयोः पूर्वासु नपुंसकलिङ्ग विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पूर्वम् पूर्वे पूर्वाणि द्वितीया पूर्वम् पूर्वे पूर्वाणि शेष विभक्तियों के रूप पुंल्लिा की तरह चलते हैं।) धातु-रूप--(दिवादिगण) जन् (उत्पन्न होना) आत्मनेपदी लट् लोट । एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन जायते जायेते जायन्ते प्र. पु. जायताम् जायेताम् जायन्ताम् जायसे जायेथे जायध्वे जायस्व जायेथाम् जायध्वम् जाये जायावहे जायामहे उ. पु. जाये जायावहै जायामहै के के गर्द 44 म.पु.
७४ " -- -- लङ् लुट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन अजायत अजायेताम् अजायन्त प्र. पु. जनिध्यते जनिध्येते जनिष्यन्ते अजायेथा: अजायेथाम् अजायध्वम् म. पु. जनिष्यसे जनियेथे जनिय अजाये अजायावहि अजायामहि उ. पु. निष्ये जनिष्यावहे जनि विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष जायेत जायेयाताम् जायेरन् मध्यम पुरुष जायेथाः जायेयाथाम् जायेध्वम् उत्तम पुरुष जायेय जायेवहि जायेमहि प्रत्यय-ज्ञान (क्तवतु) 'क्ववतु' प्रत्यय क्रिया की समाप्ति अथवा भूतकाल के लिए ही प्रयुक्त होत धातु के बाद क्तवतु' प्रत्यय जोड़ने पर 'क्तवतु' में से क् एवं उ का जाता है। 'तवत्' शेष रह जाता है- स्मृ+क्तवतु (तवत्) = स्मृतवत्। जि+क्तवतु (तवत्) = जितवत्। नी+क्तवतु (तवत्) - नीतवत्। क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द के रूप पुंल्लिङ्ग में भवत्' की तरह चलते हैं, र में नदी शब्द की तरह चलते हैं और नपुंसकलिङ्ग में जगत् शब्द की तरह चर क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द बनाने का यह भी तरीका है कि क्त प्रत्ययान्त शब्दों के में वत् जोड़ दें। जैसे गत+वत् = गतवत् आदि। क्त प्रत्ययान्त शब्द अर्चित: धातु अर्च भू पठ् रक्ष गम् भूतः पठित: रक्षितः गतः क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिंग शब्द अर्चितवत् अर्चितवान् भूतवत् भूतवान् पठितवत् पठितवान् रक्षितवत् रक्षितवान् गतवत् गतवान् ज्ञातवत् ज्ञातवान् दृष्टवत् दृष्टवान् चलितवत् चलितवान् हसितवत् हसितवान् उदितवत् उदितवान् ज्ञा ज्ञात: . दृश् चल हस् वद् दृष्टः चलितः हसितः उदित: .
७५ भक्तः खादित: भज् खाद् खन् चर खात: चरित: क्रीडित: आप आप्तः इष् कथ् कम्प कुप् इप्ट: ईक्षित: कथितः कम्पित: कुपित: कूर्दित: कृतः कृ नम् नतः नष्टः नश् पत् पतित: པ ཝཱ ཀྵ # ཤྩ བྷཱུ བྷྱཱ ཟླ་ ཟླ ༧ བློ ཙྪཱ བྷྱཱ ཀྵ ཟླ ཐ ཟླ # # # , ཡྻོ སྒྱུ གླུ # ཙྪ@ བློ # भक्तवान् खादितवान् खातवान् चरितवान् क्रीडितवान् आप्तवान् इप्टवान् ईक्षितवान् कथितवान् कम्पितवान् कुपितवान् कूदितवान् कृतवान् नतवान् नटवान् पतितवान् पीतवान् पालितवान् पूजितवान् पृष्टवान् भाषितवान् मिलितवान् मुक्तवान् रचितवान् लिखितवान् शंकितवान् शप्तवान् शिक्षितवान शोभितवान् सेवितवान स्नातवान् स्थितवान् पा भक्तवत् खादितवत् खातवत् चरितवत् क्रीडितवत् आप्तवत् इष्टवत् ईक्षितवत् कथितवत् कम्पितवत् कुपितवत् कूर्दितवत् कृतवत् नतवत् नप्टवत् पतितवत् पीतवत् पालितवत् पूजितवत् पृष्टवत् भाषितवत् मिलितवत् मुक्तवत् रचितवत् लिखितवत् शंकितवत् शप्तवत् शिक्षितवत् शोभितवत् सेवितवत् स्नातवत् स्थितवत् हतवत् पीत: पाल पूज् पालितः पूजितः पृष्टः भाषित: मिलितः भाष् मुच रच मुक्तः रचित: लिखित: शंकित: शंक् शप् शप्तः शिक्षित: शोभित: सेवित: शुभ सेव स्नातः 'स्था स्थित: ह हतः ७६ याचितवत् नतवन्तः नतवती शुच शुचितः शुचितवत् शुचितवान् याच् याचित: याचितवान् इसी प्रकार अन्य धातुओं से परे क्तवतु प्रत्यय जोड़कर शब्द रूप बनाए जा सकते हैं। इनके रूप इस प्रकार चलते हैं। (नम् = नमस्कार) पुल्लिंग स्त्रीलिंग एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नतवान् नतवन्तौ नतवती नतवत्यौ नतवत्यः [भवत् की तरह] [नदी की तरह] नपुंसकलिङ्ग . एकवचन द्विवचन बहुवचन नतवत् नतवन्ति [जगत् की तरह] वाच्य-परिवर्तन कर्मवाच्य कर्ता तृतीयान्त होता है तथा कर्म प्रथमान्त होता है। क्रिया कर्म के अनुसार होती अर्थात् कर्म जिस पुरुष एवं वचन का होता है, क्रिया भी उसी पुरुष एवं वचन की होती है। क्रिया आत्मनेपदी होती है। जैसे- मया पुस्तकं पठ्यते। यहाँ कर्ता (अहम्) तृतीयान्त है। पुस्तकम् कर्म है तथा प्रथमा का एकवचन है। पठ्यते क्रिया भी प्रथम पुरुष का एकवचन है। परिवर्तन (कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में) अहम् ग्रामं गच्छामि अहम् (कर्ता) अस्मद् शब्द का प्रथमा का एकवचन है। मया (कर्ता) अस्मद् शब्द का तृतीया का एकवचन होता है। ग्रामम् (कर्म) द्वितीया का एकवचन है। ग्राम: प्रथमा (प्रथमा विभक्ति) का एकवचन है। गच्छामि उत्तम पुरुष का एकवचन है। गम्यते कर्म के अनुसार प्रथम पुरुष का एकवचन होता है। कर्मवाच्य में परिवर्तन करने पर- मया ग्रामः गम्यते। कर्तृवाच्य कर्मवाच्य सोहन: वेदं पठति। सोहनेन वेद: पठ्यते।
राम: सूर्यं पश्यति। रामेण सूर्य: दृश्यते। रामकृष्णौ जलं पिबत: रामकृष्णाभ्यां जलं पीयते। वयं जलं पिबाम:। अस्माभि: जलं पीयते। त्वं नगरं गच्छसि। त्वया नगरं गम्यते। त्वं धनं प्राप्नोपि। त्वया धनं प्राप्यते। यूयम् चन्द्रं पश्यथ। युप्माभि: चन्द्रः दृश्यते। कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में वाच्य परिवर्तन की स्थिति में कर्ता के तृतीयान्त होने पर विशेष्य के साथ विशेषण भी तृतीयान्त होते हैं, जैसे-सुन्दर: बालक:-के स्थान पर सुन्दरेण बालकेन हो जाता है। इसी प्रकार कर्म का कर्ता में परिवर्तन होने पर कर्म प्रथमान्त होता है। इस परिवर्तन की स्थिति में कर्म (प्रथमान्त) के विशेषण भी प्रथमान्त ही होते हैं। जैसे—राम: एकं वेदं पठति के स्थान पर रामेण एक: वेद: पठ्यते हो जाता है। एक: वानर: मधुरं जलं पिबति। (कर्तृवाच्य) एकेन वानरेण मधुरं जलं पीयते। (कर्मवाच्य) एका स्त्री एकं बालकं पश्यति। (कर्तृवाच्य) एकया स्त्रिया एक: बालकः दृश्यते। (कर्मवाच्य) अभ्यास खन्, कुप्, क्रीड्, शिक्ष, याच्, सेव्, रच् धातुओं में क्तवतु प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग के शब्द रूप बनाइए। २. भू, गम्, प, पत्, पा, हस्, स्था—धातुओं के साथ क्तवतु प्रत्यय जोड़कर पुंल्लिङ्ग के तृतीया के एकवचन में रूप लिखिए। ३. वाच्य परिवर्तन कीजिए- (कर्मवाच्य में) (क) अहम् गुरुं नमामि। (ख) स: पुस्तकं नयति। (ग) ते ग्रामं गच्छन्ति। (घ) त्वं गगनं पश्यसि। (ङ) ते वेदं पठन्ति। (च) वयं देवम् अर्चामः। (छ) गोपाल: धेनुम् पश्यति। अनुवाद कीजिए- पूर्व में पर्वत मालाएँ हैं। पूर्व दिशा में सूर्य चमकता है। उत्तर में हिमालय शोभित होता है। समुद्र में मोती पैदा होते हैं। खेतों में बहुत धान्य पैदा होगा। दक्षिण में सागर तट है। पश्चिम में सूर्य अस्त होता है। हमें सूर्य को नमस्कार करना चाहिए। १. ne/ ७८ . - - अध्याय-२० बहुवचन भवन्तः विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन भवतः भवद्भिः भवद्भ्यः. भवद्भ्यः भवताम् भवत्सु हे भवन्त: भवतो: हे भवत् द्वितीया तृतीया. चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन शब्द रूप भवत् (आप) शब्द पुंल्लिंग एकवचन द्विवचन भवान् भवन्तौ. भवन्तम् भवन्तौ भवता भवद्भ्याम् भवते भवद्भ्याम् भवतः भवद्भ्याम् भवतः भवतो: भवति हे भवन्तौ स्त्रीलिंग एकवचन द्विवचन भवती भवत्यौ भवतीम् भवत्यौ भवत्या भवतीभ्याम् भवत्यै भवतीभ्याम् भवत्याः भवतीभ्याम् भवत्याः भवत्योः भवत्याम् भवत्योः हे भवति हे भवत्यौ राजन् (राजा) शब्द एकवचन द्विवचन राजा राजानौ राजानम् राजानौ राज्ञा राजभ्याम् राजे राजभ्याम् राज्ञः राजभ्याम् राज्ञः राज्ञोः राज्ञि, राजनि राज्ञोः हे राजानौ बहुवचन भवत्यः भवती: भवतीभिः भवतीभ्यः भवतीभ्यः भवतीनाम् भवतीषु हे भवत्य: विभक्ति बहुवचन राजानः राज्ञः राजभिः राजभ्यः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन राजभ्यः राज्ञाम् राजसु हे राजानः हे राजन् ७९ म ] . तु रूप (स्वादिगण). चि (चुनना या इकट्ठा करना) परस्मैपदी लट् लोट वचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नोति चिनुत: चिन्वन्ति प्र. पु. चिनोतु चिनुताम् चिन्वन्तु नोषि चिनुथ: चिनुथ म. पु. चिनु चिनुतम् चिनुत नोमि चिनुव: चिनुम:7 उ. पु. चिनवानि चिनवाव चिनवाम चिन्व: चिन्म: ल लूट वचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन चनोत् अचिनुताम् अचिन्वन् प्र. चेप्यति चेप्यत: चेप्यन्ति चिनोः अचिनुतम् अचिनुत चेप्यसि चेप्यथ: चेप्यथ चिनवम् अचिनुव अचिनुम उ. पु. चेप्यामि चेप्याव: चेप्याम: विधिलिङ् पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन चिनुयात् चिनुयाताम् चिनुयुः मध्यम पुरुप चिनुया: चिनुयातम् चिनुयात चिनुयाम् चिनुयाव चिनुयाम इसी प्रकार स्वादिगण की अन्य धातुओं के रूप भी बनाए जा सकते हैं। शक् (सकना) म. पु. प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष लट् एकवचन द्विवचन शक्नोति = शक्नोति शक्+नुत: = शक्नुतः पु . पु . (वह सकता है) (वे दो सकते हैं) शक्नोषि = शक्नोषि शक्+नुथ: शक्+नुथ: = शक्नुथ: (तुम सकते हो) (तुम दोनों सकते हो) शक्नोमि = शक्नोमि शक्नुव: = शक्नुव: (मैं सकता हूँ) (हम दो सकते हैं) बहुवचन शक्नुवन्ति शक्नुवन्ति। (वे सब सकते हैं) शक नुथ = शक्नुथ (तुम सब सकते हो) शक्+नुम: = शक्नुमः (हम सब सकते हैं) .
८० प्र. पु. । उ.पु. ह प्र. पु. उ. पु. लोट् शक्+नोतु = शक्नोतु शक्नुताम् = शक्नुताम् शक+नुवन्तु = शक्नुवन्द्र (वह सके) (वे दोनों सकें) (वे सब सकें) म. पु. शक्+नु = शक्नु शक्+नुतम् = शक्नुतम् शक्+नुत = शक्नुत (तुम सको) (तुम दोनों सको) (तुम सब सको) शक्+नुवानि = शक्नुवानि शक+नुवाव = शक्नुवाव शक्+नुवाम - शक्नुवः (मैं सकूँ) (हम दोनों सकें) (हम सब सकें) तङ् (अ पूर्व में लगेगा) अशक्+नोत् = अशक्नोत् अशक्+नुताम् = अशक्नुवन् अशक्नुताम् अशक्नुवन् (वह सका) (वे दोनों सकें) (वे सब सकें) म. पु. अशक्+नो: - अशक्नोः अशक्+नुतम् = अशक्+नुत = अशा अशक्नुतम् (तुम सके) (तुम दोनों सके) (तुम सब सके) अशक्+नुवम् अशक्+नुव = अशक्नुव अशक्नुम = अशक्नु अशक्नुवम् (मैं सका) (हम दो सकें) (हम सब सकें) लुट् शक्ष्भ्यति = शक्ष्यति शक्ष्+यत: - शक्ष्यत: शक्ष+यन्ति = शक्ष्यन्ति (वह सकेगा) (वे दो सकेंगे) (वे सब सकेंगे) शक्ष+यसि = शक्ष्यसि शक्ष्यथ: शक्ष्यथ: शक्ष्यथ % शक्ष्यथ (तुम सकोगे) (तुम दोनों सकोगे) (तुम सब सकोगे) शक्ष+यामि = शक्ष्यामि शक्ष्याव: = शक्ष्याव: शक्ष्+यामः = शक्ष्यामः (मैं सकूँगा) (हम दोनों सकेंगे) (हम सब सकेंगे) विधिलिङ्ग शक्+नुयात् = शक्नुयात् शक्+नुयाताम् शक्+नुयुः - शक्नुयुः शक्नुयाताम् (उसे सकना चाहिए) (उन दोनों को सकना चाहिए) शक+नुया: = शक्नुयाः शक्+नुयातम् शक्नुयातम् .. प्र. पु. म. पु. उ.पु. प्र. पु. (उन्हें सकना चाहिए म. पु. शक्+नुयात - शक्त ८१ उ.पु. (तुम्हें सकना चाहिए) (तुम दोनों को सकना (तुम सभी को सकना चाहिए) चाहिए) शक्+नुयम् - शक्नुयम् शक+नुयाव = शवनुयाव शक्+नुयाम = शक्नुयाम (मुझे सकना चाहिए) (हम दोनों को सकना (हमें सकना चाहिए) चाहिए) इसी प्रकार स्वादिगण (परस्मैपदी) अन्य धातुओं के रूपों का निर्माण करना चाहिए प्रत्यय ज्ञान (क्त्वा एवं ल्यप्) पढ़कर, जाकर, लिखकर आदि 'कर' या 'करके अर्थ में 'क्त्वा' प्रत्यय होत । tho क्त्वा का 'त्वा' शेष रहता है, अर्थात् 'क्' का लोप हो जाता है। क्त्वा अव्यय है, अत: इसके रूप नहीं चलते हैं। भू (होना) + क्त्वा (त्वा) = भूत्वा (होकर) कृ (करना) + क्त्वा (त्वा) = कृत्वा (करके) जहाँ धातु के पूर्व में उपसर्ग हो वहाँ 'क्त्वा' नहीं रहता है, उसे ल्यप् आदेश है जाता है। ल्यप् का 'य' शेष रहता है। सं+भू+ ल्यप् (य) संभूय (एक होकर) वि+हस्+ल्यप् (य) = विहस्य (हँसकर) क्त्वा तथा ल्यप् प्रत्ययान्त रूप धातु क्वा प्रत्ययान्त ल्यप् प्रत्ययान्त अर्च अर्चित्वा समर्थ्य आप् आप्त्वा प्राप्य आस् आसित्वा उपास्य इ इत्वा प्रेत्य ईक्ष ईक्षित्वा समीक्ष्य कृष् कृष्टवा आकृप्य क्री क्रीत्वा विक्रीय क्रीड़ क्रीडित्वा प्रक्रीड्य क्रुध कुद्ध्वा संक्रुध्य क्षिप् क्षिप्त्वा प्रक्षिप्य गण गणयित्वा संगणय्य गम् गत्वा आगम्य ग्रह गृहीत्वा संग्रहा ८२ घ्रा चि आघ्राय संचित्य आचर्य चर् चल चिन्त् जि जीव घ्रात्वा चित्वा चरित्वा चलित्वा चिन्तयित्वा जित्वा जीवित्वा ज्ञा प्रचल्य संचिन्त्य विजित्य संजीव्य विज्ञाय संतप्य परित्यज्य उत्तीर्य ज्ञात्वा तप्त्वा तप् त्यज् तृ त्यक्त्वा तीर्वा दा दत्वा दिष्टवा दीपित्वा दीप आदाय संदिश्य संदीप्य संदृश्य विधाय दृश दृष्ट्वा हित्वा धा धृत्वा आधृत्य प्रणम्य नम् नत्वा नश् नी नष्ट्वा नीत्वा पच् पक्त्वा पठ् पत् पा पठित्वा पतित्वा पीत्वा पूजयित्वा पृष्टवा उक्त्वा भक्षयित्वा पूज् प्रच्छ ब्रू भक्ष् भज् भञ्ज् विनश्य आनीय संपच्य संपठ्य निपत्य निपीय संपूज्य संपृच्छ्य प्रोच्य संभक्ष्य विभज्य विभञ्ज्य संभृत्य प्रभ्रंश्य . भक्त्वा भृ भक्त्वा भृत्वा भ्रष्टवा ८३ परिभ्रम्य भ्रम् भ्रमित्वा मत्वा मिलित्वा मुक्त्वा यत्वा याचित्वा अनुमत्य संमिल्य विमुच्य अनुयम्य संयाच्य युक्त्वा रक्षित्वा रचित्वा प्रयुज्य संरक्ष्य संरच्य रब्ध्वा आरभ्य विरुध्य रुद्ध्वा रुदवा मन् मिल मुच यम् याच युज रक्ष् रच रभू रुध रुह लभ लिख लुभ वद् वन्द् वस् वृत् वृष् शप् शम् शास् लब्ध्वा आरुह्य परिलभ्य आलिख्य लिखित्वा लुब्ध्वा उदित्वा वन्दित्वा उपित्वा वर्तित्वा वर्षित्वा प्रलुभ्य अनूद्य अभिवन्द्य उपोप्य निवृत्य, परावृत्य प्रवृष्य अभिशप्य निशम्य अनुशिष्य परिशुष्य संशय्य आदित्य शप्त्वा शुष् शी थि शान्त्वा शिष्टवा शुष्टवा शयित्वा धित्वा : श्रु श्लिप सृज् से ह श्रुत्वा श्लिष्टवा सृष्टवा सेवित्वा अनुथुत्य आश्लिप्य विसृज्य निषेव्य संहत्य विस्मृत्य संस्तुत्य हत्वा स्मृ स्मृत्वा स्तुत्वा ८४ - इस प्रकार अन्य धातुओं के क्त्वा एवं ल्यप् प्रत्यय जोड़कर शब्द बनाये जा सकते हैं। वाच्य परिवर्तन (कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य) लोट्लकार में भी कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य में वाच्य परिवर्तन किया जाता है। परस्मैपदी लोट् लकार का आत्मनेपदी लोट् लकार में परिवर्तन हो जाता है। जैसे- स: वेदं पठतु (कर्तृवाच्य) तेन वेदः पठ्यताम्। (कर्मवाच्य) यहाँ स: प्रथमान्त का तृतीयान्त में परिवर्तन हो गया। वेद का प्रथमान्त में 'वेदः' परिवर्तन हो गया। पठतु (लोट्लकार) के प्रथम पुरुष का एकवचन आत्मनेपदी में (पठ्यताम्) वेद के कर्तृत्व में होने के कारण प्रथम पुरुष का एकवचन हुआ। अन्य उदाहरण सोहनः सूर्यं पश्यतु। (कर्तृवाच्य सोहनेन सूर्य: दृश्यताम्। (कर्मवाच्या कृष्ण: पुस्तकं पठतु। (कर्तृवाच्या कृष्णेन पुस्तकं पठ्यताम्। (कर्मवाच्या त्वं मां पश्य। (कर्तृवाच्य त्वया अहं दृश्यै। लङ् लकार में परिवर्तन सः तं अपश्यत्। तेन सः अदृश्यत। वयं चन्द्रम् अपश्याम। अस्माभिः चन्द्र: अदृश्यत। त्वं फलं प्राप्नोः। त्वया फलं प्राप्यत। त्वं माम् अपश्यः। त्वया अहं अदृश्ये। लट् लकार में परिवर्तन स: नगरं गमिष्यति। तेन नगरं गंस्यते। राम: धर्म ज्ञास्यति। रामेण धर्मः ज्ञास्यते। (कर्मवाच्च । 6. (कर्तृवाच (कर्मवाच (कर्तृवाच (कर्मवाच (कर्तृवात (कर्मवाल (कर्तृवान (कर्मय . (कर्तृवत्र (कार (कर्तृत (42 ८५ विप्रः वेदं पठिष्यति। विप्रेण वेद: पठिप्यते। सोहन: सूर्यं द्रक्ष्यति। सोहनेन सूर्य: द्रक्ष्यते। वयं जलं पास्यामः। अस्माभि: जलं पास्यते। इस तरह अन्य परिवर्तन भी किये जा सकते हैं। (कर्तृवाच्य) (कर्मवाच्य) (कर्तृवाच्य) (कर्मवाच्य) (कर्तृवाच्य) (कर्मवाच्य) अभ्यास क्त्वा "सौधं निर्जनं विधाय वत्सराजं अवदत्" रेखांकित में प्रत्यय है- (क) तुमुन् (ख) शत (ग) ल्यप् (घ) (ङ) शानन्। 'अहम् भवता सह मित्रताम् वाञ्छामि' रेखांकित पद है-- (क) पंचमी, एकवचन (ख) चतुर्थी, एकवचन (ग) तृतीया, एकवचन (घ) षष्ठी, एकवचन (ङ) सप्तमी एकवचन। ( ) भवते, भवत्यै, भवति, भवन्तौ, भवत्यौ, भवतीषु- इनमें लिङ्ग, विभक्ति एवं वचन की पहिचान कीजिए। वि+हा, अनु+भू, नि+पा, परि+गम, वि+हन्, सम्+चि, आ+नी इनकेल्यप्प्रत्ययान्त शब्द बनाइए। शक्त्वा, शान्त्वा, लब्ध्वा, स्पृष्टवा, उपित्वा, नत्वा, कृत्वा, भित्वा- इनकी मूल धातु बताइए। वाच्य परिवर्तन कीजिए- १. सीता भोजनं पक्ष्यति। २. राम: शिवं ध्यायति ३. स: तं प्रश्नं पृच्छति। ४. वयं कार्य करिष्यामः। ५. त्वं चन्द्रं पश्य। ६. मोहन: पुस्तकम् अपठत्। ७. अहं त्वां पश्यामि। - ७. अनुवाद कीजिए- आप फूल चुनते हैं। आप गीत गाती हैं। आप दोनों पढ़ सकती हैं। वे पर गए। तुम आकर क्या करोगे? उसने लिखकर क्या किया? वे हँसकर बोलते। तुम्हें इनकार नहीं करना चाहिए। 0 00 -- - अध्याय-२१ शब्द रूप विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी सम्बोधन जगतो: जगत् (संसार) शब्द (नपुंसकलिंग) एकवचन द्विवचन बहुवचन जगत् जगती जगन्ति जगत् जगती जगन्ति जगता जगद्भ्याम् जगद्भिः जगते जगद्भ्याम् जगद्भ्यः जगत: जगद्भ्याम् जगद्भ्यः जगत: जगताम् जगति जगतो: जगत्सु हे जगती हे जगन्ति चक्षुः (आँख) शब्द (नपुंसकलिङ्ग) एकवचन द्विवचन बहुवचन चक्षुः' चक्षुपी चक्षुपि चक्षुः चक्षुषी चक्षुपि चक्षुषा चक्षुाम् चक्षुर्भि: चक्षुषे चक्षुाम् चार्य: चक्षुषः चक्षुाम् चक्षुद्यः चक्षुषः चक्षुषोः चक्षुषाम हे जगत् विभक्ति प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी ८७ हे चक्षुः हे चक्षुषी सप्तमी चक्षुषि चक्षुषोः चक्षुःसु चक्षुप्यु सम्बोधन हे चभृषि संख्यावाची शब्द एकोनविंशति, विंशति, · एकविंशति, द्वाविंशति, त्रयोविंशति, चतुर्विशति, पञ्चविंशति, षड्विंशति, सप्तविंशति, अष्टाविंशति, ऊनषप्टि, एकपप्टि, द्विपप्टि, त्रिषप्टि, चतुःषष्टि, पंचषष्टि, षट्षष्टि, सप्तषप्टि, अष्टषप्टि, ऊनसप्तति के रूप मति शब्द की तरह चलते हैं सप्तति से नवनवति (७०-९९) तक के रूप मति की तरह ही चलते हैं। एकोनत्रिंशत् से अष्टपंचाशत् (२९-५८) तक के रूप भृभूत् शब्द की तरह चलते Pho शतम्, सहस्रम्, अयुतम्, लक्षम्, नियुतम्, एवं अर्बुदम्-शब्द फल शब्द के तरह चलते हैं। कोटि एवं दशकोटि-शब्द मति की तरह चलते हैं। धातु ज्ञान (तुदादिगण) म. पु. । प्रच्छ लट् लोट एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन पृच्छति पृच्छतः पृच्छन्ति प्र. पु. पृच्छतु पृच्छताम् पृच्छन्तु पृच्छसि पृच्छथः पृच्छथ पृच्छतम् पृच्छत पृच्छामि पृच्छाव: पृच्छामः उ: पु. पृच्छानि पृच्छाव पृच्छाम लङ् लुट् अपृच्छत् अपृच्छताम् अपृच्छन् प्र. पु. प्रक्ष्यति प्रक्ष्यतः प्रक्ष्यन्ति अपृच्छः अपृच्छतम् अपृच्छत म. पु. प्रक्ष्यसि प्रक्ष्यथ: प्रक्ष्यथ अपृच्छम् अपृच्छाव - अपृच्छाम उ. पु. प्रक्ष्यामि प्रक्ष्याव: प्रक्ष्याम: विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचर पृच्छेत् पृच्छेताम् पृच्छे: पृच्छेतम् पृच्छेत उत्तम पुरुष पृच्छेयम् पृच्छेव पृच्छेम इसी प्रकार तुदादिगण के अन्य परस्मैपदी धातुओं के रूप बनाए जा सकते हैं- प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष :' पृच्छेयुः ८८ लिख-लिखना लट् एकवचन द्विवचन बहुवचन लिख्+अति = लिखति लिख्+अत: - लिखत: लिख+अन्ति = लिखन्ति (वह लिखता है) (वे दोनों लिखते हैं) (वे सब लिखते हैं) लिख्+ असि = लिखसि लिख्+अथ: = लिखथ: लिख्+अथ = लिखथ (तुम लिखते हो) (तुम दोनों लिखते हो) (तुम सब लिखते हो) लिख्+आमि = लिख्+आव: = = लिखाव: लिख्+आम: = लिखामः लिखामि (मैं लिखता हूँ) (हम दोनों लिखते हैं) (हम सब लिखते हैं) लोट् लिख्+अतु = लिखतु लिख्+अताम् = लिखताम् लिख्+अन्तु = लिखन्तु (वह लिखे) (वे दोनों लिखें) (वे सब लिखें) लिख्+अ = लिख लिख्+अतम् = लिखतम् लिख्+अत = लिखत (तुम लिखो) (तुम दोनों लिखो) (तुम सब लिखो) लिख्+आनि लिख्+आव = लिखाव लिख्+आम = लिखाम लिखानि (मैं लिखू) (हम दोनों लिखें) (हम सब लिखें) लङ् (पूर्व में अ लगने पर) अलिख्+अत् = अलिख्+अताम् - अलिख्+अन् = अलिखन् अलिखत् अलिखताम् (उसने लिखा) (उन दोनों ने लिखा) (उन्होंने लिखा) अलिख्+अ: अलिख्+अतम् = अलिख्+अत = अलिखत अलिख: अलिखतम् (तुमने लिखा) (तुम दोनों ने लिखा) (तुम सब ने लिखा) अलिख्+अम् अलिख्+आव = अलिखावअलिख्+आम = अलिखम् अलिखाम (मैंने लिखा) (हम दोनों ने लिखा) (हम सबने लिखा) ८९ नि D म: लुट् (लिख् का लेख होगा) लेख्+इष्यति लेख्+इष्यत: = लेखिष्यत: लेख्+इध्यन्ति लेखिष्यति लेखिष्यन्ति (वह लिखेगा) (वे दोनों लिखेंगे) (वे सब लिखेंगे) लेख्+इष्यसि लेख्+इष्यथ: = लेखिष्यथ: लेख्+इप्यथ %D लेखिप्यथ लेखिष्यसि (तुम लिखोगे) (तुम दोनों लिखोगे) (तुम सब लिखोगे) लेख् इष्यामि = लेख्+इष्याव: = लेखिघ्याव:लेख+इप्यामः = लेखिष्यामि लेखिष्याम: (मैं लिखुंगा) (हम दोनों लिखेंगे) (हम सब लिखेंगे) विधिलिङ् लिख्+एत् = लिखेत् लिख्+एताम् = लिखेताम् लिख्+एंयुः = लिखेयुः (उसे लिखना चाहिए) (उन दोनों को लिखना (उन्हें लिखना चाहिए) चाहिए) लिख्+ए: = लिखे: लिख्+एतम् = लिखेतम् लिख्+एत = लिखेत (तुम्हें लिखना चाहिए) (तुम दोनों को लिखना (तुम सभी को लिखना चाहिए) चाहिए) लिख्+एयम् = लिखेयलिख्+एव = लिखेव लिख्+एम = लिखेम (मुझे लिखना चाहिए) (हम दोनों को लिखना (हम सभी को लिखना चाहिए) चाहिए) . इस प्रकार इष् (चाहना), स्पृश् (छूना), क्षिप् (फेंकना), मुच् (छोड़ना), दिश् । (कहना), मिल् (मिलना) आदि धातुओं के रूप बनाए जा सकते हैं। प्रत्यय ज्ञान (शत) जा रहा, जा. रही, जा रहे या पढ़ रहा, पढ़ रही—जैसी क्रियाओं को बनाने के लिए शतृ प्रत्यय प्रयुक्त होता है। शतृ प्रत्यय का 'अत्' शेष रहता है। तीनों लिङ्गों में रूप चलते हैं। शतृ प्रत्यय परस्मैपदी धातुओं के लट् के स्थान पर होता है। पुंल्लिंग स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग गच्छन् गच्छन्ती गच्छत् ९० शतृ प्रत्ययान्त रूप . : शब्द . अर्थ धातु अर्च अद् आ+हवे. पूजता हुआ : अदत् इष् क्रीडू कुप क्रन्द् कृ कथ् खाता हुआ बुलाता हुआ चाहता हुआ खेलता हुआ क्रोध करता हुआ चिल्लाता हुआ करता हुआ कहता हुआ खाता हुआ खोदता हुआ जाता हुआ गाता हुआ गरजता हुआ गिनता हुआ सूंघता हुआ खाद् खन गम् गै शतृ प्रत्ययान्त रूप.(पुंल्लिङ्ग) मूल अर्चत् अर्चन अदन आह्वयत् आहवयन् इच्छत् इच्छन् क्रीडत् क्रीडन् कुप्यत् कुप्यन् क्रन्दत् क्रन्दन कुर्वत् कुर्वन् कथयत् कथयन् खादत् खादन् खन खनन् गच्छत् गच्छन् गायत् गायन् गर्जत् गर्जन् गणयत् गणयन् जिघ्रत् जिघ्रन् चरत् चरन् . चलत् चलन् चिन्वत् चिन्वन् जपत् जपन् क्षिपत् क्षिपन् जीवत् जीवन् तपत् तपन् त्यजत्. त्यजन् तुष्यत् तुष्यन् तरत् तरन् दण्डयत् दण्डयन् पश्यत् पश्यन् गर्ज गण घ्रा चर् घूमता हुआ चल चि ज क्षिप् जीव चलता हुआ चुनता हुआ जपता हुआ फेंकता हुआ जीता हुआ तपता हुआ छोड़ता हुआ तुष्ट होता हुआ तैरता हुआ तप् त्य तुष् तृ दण्ड देता हुआ दण्ड देखता हुआ ९१ देता हुआ ददन् दा दहन् दह दुह धाव् दुहन् धावन् ददत् दहत् दुहत् धावत् धरत् नमत् नश्यत् निन्दत् धरन् धृ नम् नश निन्द् नमन् नश्यन् निन्दन जलता हुआ दुहता हुआ दौड़ता हुआ धारण करता हुआ नमस्कार करता हुआ नष्ट करता हुआ निन्दा करता हुआ नाचता हुआ पढ़ता हुआ नृत् पठ् नृत्यत् पठत् नृत्यन् पठन् पत् पतत् पिबत् गिरता हुआ पीता हुआ पतन् पिबन् पा पालयन् पाल् पालयत् पालता हुआ पूछता हुआ खाता हुआ पृच्छ पृच्छन् भक्षयन् पृच्छत् भक्षयत् भक्ष् होता हुआ मिलता हुआ भू मिल भवन् मिलन् भवत् मिलत् रक्षत् रचयत् रक्षन् रक्ष रक्षा करता हुआ रचता हुआ रचयन् रच् रोता हुआ रुद् लिख रुदत् लिखत् वदत रुदन् लिखन् वदन् वद् वसन् वस् वसत् वह लिखता हुआ बोलता हुआ रहता हुआ ढोता हुआ बरसता हुआ सकता हुआ शाप देता हुआ शान्त होता हुआ वहत् वर्षत् शक्नुवत् शपत् वृष् शक् वहन् वर्षन् शक्नुवन् शपन् शाम्यन् शप् शम् शाम्यत् सुनता हुआ श्रु सिंच शृण्वत् सिञ्चत् शृण्वन् सिञ्चन् सींचता हुआ सृजन् सृजन करता हुआ सृज् सृजत् ९२ स्तु स्तुवन् तिष्ठन् स्था स्तुवत् तिष्ठत् स्पृशत् स्मरत् स्वपत् स्पृश् स्मृ स्वप् हन् हस् स्पृशन् स्मरन् स्वपन् घ्नन् स्तुति करता हुआ ठहरता हुआ छूता हुआ याद करता हुआ सोता हुआ मारता हुआ हँसता हुआ छोड़ता हुआ हरता हुआ घ्नत् हसत् हसन् हा जहत् जहन् ह हरत् हरन् इस प्रकार अन्य धातुओं से शतृ प्रत्यय जोड़कर रूप बनाये जा सकते हैं। वाच्य परिवर्तन (भाववाच्य) भाववाच्य हमेशा अकर्मक धातुओं से होता है। भाववाच्य में कर्ता तृतीयान्त होता है। कर्म होता ही नहीं है। क्रिया हमेशा प्रथम पुरुष के एकवचन की होती है। भाववाच्य के रूप (धातु) आत्मनेपद में ही होते हैं। जैसे—राधया हस्यते। कर्तृवाच्य से भाववाच्य में परिवर्तन लट् अहं हसामि (कर्तृवाच्य) मया हस्यते (भाववाच्य) अहं तिष्ठामि (कर्तृवाच्य) मया स्थीयते (भाववाच्य) त्वं तिष्ठसि (कर्तृवाच्य) त्वया स्थीयते (भाववाच्य) लोट् त्वं तिष्ठ (कर्तृवाच्य) त्वया स्थीयताम् (भाववाच्य) अहं हसानि (कर्तृवाच्य) मया हस्यताम् (भाववाच्य) ९३ - लङ् स अभवत् (कर्तृवाच्य) तेन अभूयत (भाववाच्य) इस प्रकार कर्तृवाच्य से भाववाच्य में परिवर्तन किया जा सकता है। अभ्यास .छात्रेभ्य: इदं भोजनम् अस्ति।" रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए उपयुक्त शब्द है-- (क) नवविंशत्यै (ख) नवविंशति (ग) नवविंश (घ) नवविंशेभ्य: (ङ) नवविंशाः। ( ) क्षिप् धातु के लङ् लकार के रूप लिखिए। अर्जु, अर्ह, आगच्छ, चुर्, क्री, जीव् धातुओं के शतृ प्रत्ययान्त रूप लिखिए। पठत्, लिखत्, गच्छत्, त्यजत्, तपत्- शतृ प्रत्ययान्त शब्दों का स्त्रीलिंग में परिवर्तन कीजिए। अनुवाद कीजिए- मैं चलता हुआ गिर गया। वह लिखता हुआ सो गया। राधा पढ़ती हुई कहने लगी। वह अपने पिता से पूछेगा। तुम दोनों दीवार पर स्पर्श नहीं करोगे। हम मधुर फल चाहेंगे। उसे अपने भाई को पत्र लिखना चाहिए। भाववाच्य में परिवर्तन कीजिए- अहं लिखामि। ते हसन्ति। सा ओदनं पचति। यूयं ग्रामं गच्छथ। . D00 ९४ अध्याय-२२ बहुवचन वध्वः वधूः वधूभिः वधूभ्यः वधूभ्यः वधूनाम् वधूषु हे वध्वः शब्द रूप वधू (बहू) शब्द (स्त्रीलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन प्रथमा वधूः वध्वौ द्वितीया वधूम् वध्वौ तृतीया वध्व वधूभ्याम् चतुर्थी वध्वे वधूभ्याम् पंचमी वध्वाः वधूभ्याम् षष्ठी वध्वाः वध्वोः सप्तमी वध्वाम् वध्वोः सम्बोधन हे वधु हे वध्वौ गिर् (वाणी) शब्द (स्त्रीलिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन प्रथमा गी: गिरी द्वितीया गिरम् गिरी तृतीया गिरा गीर्ध्याम् चतुर्थी गिरे गीर्ध्याम् पञ्चमी गिरः गीर्ध्याम् षष्ठी गिर: गिरो: सप्तमी गिरि गिरो: सम्बोधन हेगी: हे गिरौ गरीयस् शब्द (पुंल्लिंग) विभक्ति एकवचन द्विवचन प्रथमा गरीयान् गरीयांसौ द्वितीया गरीयांसम् गरीयांसौ तृतीया गरीयसा गरीयोभ्याम् चतुर्थी गरीयसे गरीयोभ्याम् पञ्चमी गरीयसः गरीयोभ्याम् षष्ठी गरीयसः गरीयसो: सप्तमी गरीयसि गरीयसो: सम्बोधन हे गरीयन् हे गरीयांसौ इसी प्रकार लघीयस्, द्रढ़ीयस् आदि के रूप चलते हैं। बहुवचन गिरः गिरः गीर्भिः गीर्थ्य: गीर्थ्य: गिराम् गीर्षु हे गिरः बहुवचन गरीयांस: गरीयस: गरीयोभिः गरीयोभ्यः गरीयोभ्यः गरीयसाम् गरीयस्सु हे गरीयांस:
९५ .. लट् प्र. पु. मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष धातु रूप (तनादिगण) कृ (करना) (डुकृञ्) लौट एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन करोति कुरुतः कुर्वन्ति करोतु कुरुताम् कुर्वन्तु करोषि कुरुथ:. कुरुथ म. पु. कुरु कुरुतम् कुरुत करोमि कुर्व: कुर्मः उ. पु. करवाणि करवाव करवाम लङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अकरोत् अकुरुताम् अकुर्वन् अकरो: अकुरुतम् अकुरुत अकरवम् अकुर्व अकुर्म लुट् एकवचन द्विवचन बहुवचन करिष्यति करिष्यतः करिप्यन्ति करिष्यसि करिष्यथ: करिप्यथ करिष्यामि करिष्याव: करिप्यामः विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष कुर्यात् कुर्याताम् कुर्यु: मध्यम पुरुष कुर्याः कुर्यातम् कुर्यात कुर्याम् कुर्याव कुर्याम लुङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अकार्षीत् अकाम् अकार्प: अकार्षीः अकार्टम् अकार्ट अकार्षम् अकार्व अकार्म उभयपदी धातु (भ्वादिगण) नी (ले जाना) परस्मैपद लट् आत्मनेपद एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नयति नयन्ति नयत: नयन्ते नयते प्र. पु. नयेते नयसि नयथः नयथ म. पु. नयसे नयध्वे नयेधे नयामि नयावः नये नयामहे नयामः नयावहे प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष उत्तम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष उ. पु.
९६ प्र. पु. म. पु. नयै : । प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष परस्मैपद लोट आत्मनेपद नयतु नयताम् नयन्तु नयताम् नयेताम् नयन्ता नय नयतम् नयत नयस्व नयेथाम् नयध्वम् नयानि नयाव नयाम उ. पु. नयावहै नयामहै लङ् (परस्मैपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन अनयत् अनयताम् अनयन् मध्यम पुरुष अनयः अनयतम् अनयत अनयम् अनयाव अनयाम लङ् (आत्मनेपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अनयत अनयेताम् अनयन्त मध्यम पुरुष अनयथाः अनयेथाम् अनयध्वम् उत्तम पुरुष अनये अनयावहि अनयामहि परस्मैपद लुट् -आत्मनेपद एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नेष्यति नेष्यत: नेष्यन्ति नेष्यते नेष्येते नेष्यन्ते नेष्यसि नेष्यथ: नेष्यथ नेष्यसे नेष्येथे नेष्यध्वे नेप्यामि नेष्याव: नेष्यामः नेष्ये नेष्यावहे नेष्यामहे परस्मैपद लिङ् आत्मनेपद नयेत् नयेताम् नयेयुः प्र.पु. नयेत नयेयाताम् नयेरन् नयेतम् नयेत म. पु. नयेयाथाम् नयेध्वम् नयेव नयेम उ. पु. नयेय नयेवहि नयेमहि लुङ् (परस्मैपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अनैषीत्.. अनैष्टाम् अनेषुः मध्यम पुरुष अनैषी: अनेष्टम् अनेष्ट उत्तम पुरुष अनैषम् अनेष्व अनैम इस प्रकार ह (हरना), याच् (मांगना), वह (ढोना), खन् (खोदना), धाव (दौड़ना) श्रि (आश्रय लेना), वे (बुलाना) धातुओं के उभयपदी रूप चलते हैं। प्रत्यय ज्ञान (शानच् प्रत्यय). आत्मनेपदी धातुओं के लट् के स्थान पर शानच् प्रत्यय होता है। उभयपदी धातुओं के लट् के स्थान पर शानच् होता है। 'शान' का आन रह जाता है। प्र. पु. म. पु. उ. पु. नयेथा: .
९७ क देखता हुआ काँपता हुआ घर भ्वादिगण, चुरादिगण, तुदादिगण एवं दिवादिगण की आत्मनेपदी धातुओं के शानच् शेष रूप 'आन' को 'मान हो जाता है। शानच् प्रत्ययान्त रूप पुंल्लिंग में राम शब्द की तरह चलते हैं। स्त्रीलिंग में लता की तरह चलते हैं। नपुंसकलिङ्ग में फल की तरह चलते हैं। हुआ, हुई आदि अर्थ को बताने के लिए किसी भी धातु से शानच् प्रत्यय जोड़कर ब्द बनाए जा सकते हैं। जैसे- लभ्+शानच् (आन)= मान = लभमानः (पुं.) लभ्+शानच् (आन) = मान (टाप्) = लभमाना (स्त्री.) लभ्+शानच् (आन) = मान = लभमानम् (नपुं.) नजन्त शब्द (पुंल्लिङ्ग) अर्थ अर्थमान: माँगता हुआ ईक्ष ईक्षमाण: कम्प कम्पमानः कूर्दु कूर्दमानः कूदता हुआ ल लभमानः पाता हुआ से सेवमानः सेवा करता हुआ वृध वर्धमान: बढ़ता हुआ सह सहमान: सहता हुआ जन् जायमानः त्रै त्रायमाण: रक्षित होता हुआ दय् दयमानः दया करता हुआ मुद् मोदमान: खुश होता हुआ यत् यतमानः यत्न करता हुआ आस् आसीनः शी शयमानः मन् मन्यमान: मानता हुआ लज्ज लज्जमानः लजाता हुआ युध् युध्यमानः लड़ता हुआ मृ मियमाण: मरता हुआ भुज भुजानः खाता हुआ मन्त्र मन्त्र्यमाण: सलाह करता हुआ वञ्च वञ्च्यमानः धोखा करता हुआ पलाय् पलायमानः भागता हुआ -- पैदा होता हुआ बेठता हुआ सोता हुआ ९८ त्वरमाण: शीघ्रता करता हुआ याचमानः माँगता हुआ भाषमाणः वन्दमानः वर्तमानः त्वर याच् भाष् वन्द् वृत् व्यथ् शंक शुभ शुच कथ् कृ चि व्यथमानः शंकमानः शोभमान: शोचमानः भाषण करता हुआ वन्दना करता हुआ रहता हुआ व्यथित होता हुआ शंकित होता हुआ शोभित होता हुआ पवित्र होता हुआ कहता हुआ करता हुआ चुनता हुआ चुराता हुआ जानता हुआ कथ्यमानः कुर्वाण: चिन्वान: चोरयमाण: चुर ज्ञा जानानः दा ददान: देता हुआ धा दधानः रखता हुआ ले जाता हुआ पकाता हुआ बोलता हुआ छोड़ता हुआ रोकता हुआ नी नयमानः पच् पचमानः ब्रू ब्रुवाण: मुच मुञ्चमानः यज् यजमानः यजन करता हुआ स्मि स्मयमानः मुस्कराता हुआ रुध् रुन्धानः उत्+डी उड्डीयमानः उड़ता हुआ स्तु स्तुवानः स्तुति करता हुआ द्युत् द्योतमानः चमकता हुआ ध्वंस् ध्वंसमानः ध्वंस होता हुआ वि+राज् विराजमानः विराजमान होता हुआ तन् तन्वानः फैलता हुआ. ह हरमाणः छीनता हुआ श्लाघ् श्लाघमानः प्रशंसा करता हुआ व वहमानः युज युञ्जानः युक्त होता हुआ इस प्रकार अन्य धातुओं से भी शानच् प्रत्यय जोड़कर शब्द बनाये जा सकते हैं। ढोता हुआ ९९ प्रयोग सा लज्जमाना स्थिता। मोहन: मोदमान: आगच्छति। लभमानम् विनष्टम्। संख्यावाचक शब्द ज्ञानं (पूरणी संख्याएँ) पूरणी संख्याएँ इस प्रकार हैं- पुंल्लिङ्ग स्त्रीलिंग प्रथमः प्रथमा द्वितीय: द्वितीया तृतीय: तृतीया चतुर्थः चतुर्थी पंचमः पञ्चमी षष्ठः षष्ठी सप्तमः सप्तमी अष्टमः अष्टमी नवमः नवमी दशमः दशमी एकादशः एकादशी द्वादशः द्वादशी त्रयोदशः त्रयोदशी चतुर्दशः चतुर्दशी पञ्चदशः पञ्चदशी षोडशः पोडशी सप्तदशः सप्तदशी अष्टादशः अष्टादशी एकोनविंशतितमः एकोनविंशतितमा विंशतितमः विंशतितमा एकविंशतितमः एकविंशतितमा द्वाविंशतितमः द्वाविंशतितमा त्रयोविंशतितमः त्रयोविंशतितमा चतुर्विशतितमः चतुर्विशतितमा पंचविंशतितमः पंचविंशतितमा षड्विंशतितमः षड्विंशतितमा नपुंसकलिंग प्रथमम् द्वितीयम् तृतीयम् चतुर्थम् पञ्चमम् पष्ठम् सप्तमम् अप्टमम् नवमम् दशमम् एकादशम् द्वादशम् त्रयोदशम् चतुर्दशम् पञ्चदशम् षोडशम् सप्तदशम् अष्टादशम् एकोनविंशतितमम् विंशतितमम् एकविंशतितमम् द्वाविंशतितमम् त्रयोविंशतितमम् चतुर्विशतितमम् पंचविंशतितमम् पड्विंशतितमम् १०० ..- इस प्रकार सप्तविंशतितमम्, अष्टाविंशतितमम्, एकोनत्रिंश, त्रिंश, एकत्रिंश, द्वात्रिंश आदि रूप बनेंगे। अष्टापञ्चाशत् तक यह क्रम रहेगा। एकोनषष्टि (उनसठ) की तरह शेष शब्द बनेंगे। प्रयोग प्रथम: पाठ:--(पहला पाठ) द्वितीया कथा-(दूसरी कथा) तृतीयं फलम्-(तीसरा फल) पञ्चमः पुरुषः (पांचवाँ पुरुष) सप्तमी तिथि:--(सातवीं तिथि) षष्ठी विभक्ति:--(छठी विभक्ति) षोडशी कन्या--(सोलहवीं कन्या) विंशतितमः पाठ:--(बीसवाँ पाठ) त्रिंशत्तमम् गृहम्-(तीसवाँ घर) अभ्यास ३. ४. ५. १. लघीयस् शब्द के रूप लिखिये। २. करोमि, करवाम, कुर्युः, करिष्यन्ति, करवाणि— इन्हें वाक्यों में प्रयुक्त कीजिये। मुद्, युध्, सेव, ईक्ष, भुज्, पच्, शुच्- धातुओं से शानच् प्रत्ययान्त शन् बनाइये। सात, पन्द्रह, चालीस, साठ, पिच्चासी, नब्बे की- पूरणी संख्याएँ (स्त्रीलिंग) बनाइए। अनुवाद कीजिए- पांचवीं बहू ने नमस्कार किया। हम दिन भर काम करेंगे। तुम शीघ्र ही कार्यारम्भ करो। हमें आलस छोड़कर काम करना चाहिए। तुम इस घड़े को ले जाओ। वह इस कुर्सी को ले जायेगा। तुम सब एकादशी को जाओ। वह कूदता हुआ गिर पड़ा। वे सोते हुए कहने लगे। हम खाते हुए झूठ नहीं कहेंगे। 000 १०१ अध्याय-२३ शब्द रूप हे दात: दातृ (देने वाला) ऋकारान्त शब्द विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा दाता दातारी दातारः द्वितीया दातारम् दातारी दातृ तृतीया दात्रा दातृभ्याम् दातृभिः चतुर्थी दात्रे दातृभ्याम् दातृभ्यः पंचमी दातुः दातृभ्याम् दातृभ्यः षष्ठी दातुः दात्रो: दातॄणाम् सप्तमी दातरि दात्रोः दातृषु सम्बोधन हे दातारौ हे दातार: इसी प्रकार कर्तृ, नेतृ, धातृ, भर्तृ आदि शब्दों के रूप चलते हैं। गो शब्द (ओकारान्त) विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गौः गावौ गाव: द्वितीया गाम् गावौ गाः तृतीया गवा गोभ्याम् गोभिः चतुर्थी गवे गोभ्याम् गोभ्यः पंचमी गो: गोभ्याम् गोभ्य: षष्ठी गवो: गवाम् सप्तमी गवि गवो: गोषु सम्बोधन हे गौः हे गावी हे गाव: धातु रूप (क्यादिगण) बन्ध् (बाँधना) लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन बध्नाति बध्नन्ति बनातु बनीताम् वजन्तु बध्नासि बध्जीथः बध्नीथ वधान बध्नीतम् वनीत बध्नामि बध्नीव: बध्नीमः उ.पु. बध्नानि वनाव बनाम गो: बध्नीत: प्र.पु. म.पु.
. लङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अबध्नात् अबध्नीताम् अबध्नन् मध्यम पुरुष अबध्नाः अबध्नीतम् अबध्नीत उत्तम पुरुष अबध्नाम् अबध्नीव अबध्नीम लुट् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष भन्त्स्यति भन्त्स्यतः भन्त्स्यन्ति मध्यम पुरुष भन्स्यसि भन्स्यथ: भन्त्स्यथ उत्तम पुरुष भन्त्स्यामि भन्स्याव: भन्स्यामः विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष बध्नीयात् बनीयाताम् बध्नीयुः मध्यम पुरुष बध्नीया: बध्नीयातम् बध्नीयात उत्तम पुरुष बध्नीयाम् बध्नीयाव बध्नीयाम उभयपदी ज्ञा (जानना) परस्मैपद लट् आत्मनेपद एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुर जानाति जानीत: जानन्ति जानीते जानाते जान जानासि जानीथ: जानीथ पु. जानीषे जानाथे जानी जानामि जानीव: जानीमः जाने जानीवहे जानी परस्मैपद लोट आत्मनेपद एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुव जानातु जानीताम् जानन्तु जानीताम् जानाताम् जान- जानीहि जानीतम् जानीत जानीप्व जानाथाम् जानी जानानि जानाव जानाम जाने जानावहै जाना। लङ् (परस्मैपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अजानात् अजानीताम् अजानन मध्यम पुरुष अजानीत अजानाः अजानीतम् उत्तम पुरुष अजानाम् अजानीव अजानीम प्र. पु. म. उ. पु. प्र..पु. म. पु. उ. पु.
१०३ - प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष म. पु. उ.पु. प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष -- लङ् (आत्मनेपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन अजानीत अजानाताम् अजानत मध्यम पुरुष अजानीथाः अजानाशाम् अजानीध्वम् अजानि अजानीवहि अजानीमहि परस्मैपद- लुट् आत्मनेपद एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन ज्ञास्यति ज्ञास्यतः ज्ञास्यन्ति प्र. पु. ज्ञास्यते ज्ञास्येते ज्ञास्यन्ते । ज्ञास्यसि ज्ञास्यथः ज्ञास्यथ ज्ञास्यसे ज्ञास्येथे ज्ञास्यध्वे र: ज्ञास्यामि ज्ञास्याव: ज्ञास्यामः ज्ञास्ये ज्ञास्यावहे ज्ञास्यामहे विधिलिङ् (परस्मैपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन जानीयात् जानीयाताम् जानीयुः जानीया: जानीयातम् जानीयात जानीयाम् जानीयाव जानीयाम विधिलिङ् (आत्मनेपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन जानीत जानीयाताम् जानीरन् जानीथा: जानीयाथाम् जानीध्वम् जानीय जानीवहि जानीमहि लुङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन अज्ञासीत् अज्ञासिष्टाम् अज्ञासिपुः अज्ञासी: अज्ञासिष्टम् अज्ञासिष्ट अज्ञासिषम् अज्ञासिव अज्ञासिम इस प्रकार क्यादिगण की अन्य धातुओं के रूप बनाये जा सकते हैं। क्री (मोल लेना, खरीदना) उभयपदी लट् (परस्मैपद) (न को ण हो जाता है) एकवचन द्विवचन बहुवचन क्री+नाति = क्रीणाति क्री+नीत: = क्रीणीत: क्री+नन्ति = क्रीणन्ति (वह खरीदता है) (वे दो खरीदते हैं) (वे सब खरीदते हैं) की+नासि - क्रीणासि क्री+नीध: = क्रीणीथ: क्री+नीय = क्रीगीय (तुम खरीदते हो) (तुम दोनों खरीदते हो) (तुम सब खरीदते हो) प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष -- क्री+नामि = क्रीणामि क्री+नीवः = क्रीणीव: क्री+नीमः = क्रीणीमः (मैं खरीदता हूँ) (हम दो खरीदते हैं) (हम सब खरीदते हैं) लट् (आत्मनेपदी) क्री+नीते = क्रीणीते क्री+नाते क्रीणाते क्री+नते = क्रीणते क्री+नीषे = क्रीणीषे क्री+नाथे - क्रीणाथे क्री+नीध्वे = क्रीणीध्वे क्री+ने- क्रीणे क्री+नीवहे = क्रीणीवहे क्री+नीमहे = क्रीणीमहे लोट् (परस्मैपद) क्री+नातु = क्रीणातु क्री+नीताम् = क्रीणीताम् क्री+नन्तु = क्रीणन्तु (वह खरीदे) (वे दो खरीदें) (वे सब खरीदें) क्री+नीहि = क्रीणीहि क्री+नीतम् = क्रीणीतम् क्री+नीत = क्रीणीत (तुम खरीदो) (तुम दो खरीदो) (तुम सब खरीदो) क्री+नानि = क्रीणानि क्री+नाव = क्रीणाव क्री+नाम = क्रीणाम (मैं खरीदूँ) (हम दोनों खरीदें) (हम सब खरीदें) लोट् (आत्मनेपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष क्रीणीताम् क्रीणाताम् क्रीणन्ताम् मध्यम पुरुष क्रीणीष्व क्रीणाथाम् क्रीणीध्वम् क्रीण क्रीणावहै क्रीणामहै लङ् (परस्मैपद) (धातु से पूर्व अ जुड़ेगा) एकवचन द्विवचन बहुवचन अ+की+नात् = अ+क्री+नीताम् = अ+की+नन् = अक्रीणन् अक्रीणात् अक्रीणीताम् (उसने खरीदा) (उन दोनों ने खरीदा) (उन्होंने खरीदा) अ+क्री+ना: = अक्रीणा: अ+क्री+नीतम् = अक्रीणीतम् अ+की+नीत = अक्रीणीत (तुमने खरीदा) (तुम दोनों ने खरीदा) (तुम सबने खरीदा) अ+क्री+नाम् = अ+की+नीव = अक्रीणीव अ+क्री+नीम = अक्रीणीम अक्रीणाम् (मैने खरीदा) (हम दोनों ने खरीदा) (हम सबने खरीदा) लङ् (आत्मनेपद) एकवचनं द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष अक्रीणीत अक्रीणाताम् अक्रीणत मध्यम पुरुष अक्रीणीथाः अक्रीणाथाम् अक्रीणीध्वम् अक्रीणि उत्तम गुरुष अक्रीणीवहि अक्रीणीमहि उत्तम पुरुष १०५ लृट् (परस्मैपद) क्रेष्यति क्रेप्यतः क्रेप्यन्ति क्रेप्यसि क्रेप्यथ: क्रेप्यथ क्रेप्यामि क्रेप्याव: क्रेप्याम: लृट् (आत्मनेपद) क्रेष्यते क्रेप्येते क्रेप्यन्ते क्रेष्यसे क्रेप्येथे क्रेप्यध्वे क्रेप्ये क्रेप्यावहे क्रेप्यामहे विधिलिङ् (परस्मैपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन की+नीयात् = क्रीणीयात् क्री+नीयाताम् = क्रीणीयाताम् क्री+नीयुः = क्रीणीयु: उसे खरीदना चाहिए) (उन दोनों को खरीदना चाहिए) (उन्हें खरीदना चाहिए) की+नीयाः = क्रीणीयाः क्री+नीयातम् = क्रीणीयातम् क्री+नीयात = क्रीणीयात तुम्हें खरीदना चाहिए) (तुम दोनों को खरीदना चाहिए) (तुम सब को खरीदना चाहिए) की+नीयाम् = क्रीणीयाम् क्री+नीयाव = क्रीणीयाव क्री+नीयाम - क्रीणीयाम मुझे खरीदना चाहिए) (हम दोनों को खरीदना चाहिए) (हम सबको खरीदना चाहिए) विधिलिङ् (आत्मनेपद) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष क्रीणीत क्रीणीयाताम् क्रीणीरन् क्रीणीथाः क्रीणीयाथाम् क्रीणीध्वम् क्रीणीय क्रीणीवहि क्रीणीमहि लुङ (परस्मैपद) अक्रैषीत् अक्रैष्टाम् अक्रेषु: अद्वैषी: अक्रैप्टम् अक्रैप्ट अक्रैषम् अक्रैप्व अक्रैप्म इस गण के आत्मनेपदी धातुओं के रूप निर्माण के लिए धातु के अन्त में इस ग्कार जोड़ना होगा- लट् लोट् एकवचन द्विवचन बहुवचन पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन नीते नाते नते नीताम् नाताम् ताम् नीपे नाथे नीध्वे नीप्व नाथाम् नीध्वम् नीवहे नीमहे नावहै नामहै मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्र. पु. म.पु. उ.पु. to १०६ प्र.पु. म.पु. उ. पु. सा (धातु से पूर्व अ) लङ् नीत नाताम् नत नीत नीयाताम् नीरन् नीथा: नाथाम् नीध्वम् नीथाः नीयाथाम् नीध्वम् नि नीवहि नीमहि नीय नीवहि नीमहि प्रत्यय-ज्ञान (तुमुन्) 'को' अथवा 'के लिए' अर्थ में तुमुन् प्रत्यय होता है। जैसे-खाने को, खाने के लिए आदि। तुमुन् प्रत्यय का तुम् शेष रहता है। जैसे-घ्रा+तुमुन् (तुम्) = घ्राप्तुम् (सूंघने के लिए)। तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय होते हैं। अत: किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है। सदा एक सा रूप रहता है। जैसे- स: पठितुम् इच्छति। पठितुम् इच्छति। तो पठितुम् इच्छतः। ते पठितुम् इच्छन्ति। पठितुम् इच्छन्ति। अयं गन्तुम् इच्छति। इयं गन्तुम् इच्छति। एतद् गन्तुम् इच्छति। लिङ्ग या वचन के कारण तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों में किसी प्रकार का परिवर्तन नई होता है। धातु को गुण होता है। जैसे- क्रुध्+तुमुन् (तुम्) - क्रोद्धुम् (क्रोध के लिए) भुज्+तुमुन् (तुम्) = भोक्तुम् (खाने के लिए) स्तु+तुमुन् (तुम्) = स्तोतुम् (स्तुति करने को) जि+तुमुन् (तुम्) = जेतुम् (जीतने के लिए) उपसर्ग सहित धातुओं के साथ भी तुमुन् प्रत्यय जुड़ते हैं, किसी प्रकार का प नहीं होता है। जैसे- उप+लभ्+तुमुन् (तुम्) = उपलब्धुम्। वि+ज्ञा+तुमुन् (तुम्) = विज्ञातुम्। ताः तुमुन् प्रत्ययान्त शब्द अद् (तुमुन्) अत्तुम् भवितुम् खाने के लिए होने के लिए अस् (भव) १०७ इ ईक्ष कथ् कुप कृ क्री क्षिप् गम् आ+गम् ग्रह घ्रा चि चिन्त् चुर जन् त्य एषितुम् ईक्षितुम् कथयितुम् कोपितुम् कर्तुम् क्रेतुम् क्षेप्तुम् गन्तुम् आगन्तुम् गृहीतुम् घ्रातुम् चेतुम् चिन्तयितुम् चोरयितुम् जनितुम् दा चाहने के लिए देखने के लिए कहने के लिए क्रोध करने के लिए करने के लिए खरीदने के लिए फेंकने के लिए जाने के लिए आने के लिए लेने के लिए सूंघने के लिए चुनने के लिए सोचने के लिए चोरने के लिए पैदा होने के लिए छोड़ने के लिए देने के लिए तपने के लिए दुहने के लिए देखने के लिए धारण करने के लिए झुकने के लिए ले जाने के लिए नष्ट होने के लिए नाचने के लिए पकाने के लिए पढ़ने के लिए पीने के लिए पूछने के लिए बोलने के लिए खाने के लिए घूमने के लिए छोड़ने के लिए त दुह दृश् धा ཡྻ # # ཨ གློ ཐ ཐ ཟླ ༧ ཟླ * ཐ ཀྐ ཀྐ ཀྐ ཝ ཟླ # % ཟླ ཝའོ F नम् नी त्यक्तुम् दातुम् तप्तुम् दोग्धुम् द्रम् धातुम् नन्तुम् नेतुम् नशितुम् नर्तितुम् पक्तुम् पठितुम् पातुम् মু वक्तुम् भक्षयितुम् भ्रमितुम् मोक्तुम् नश् नृत् पच् पट पा प्रच्छ ब्रू भक्ष् भम् मुन् १०८ मुद् मोदितुम् प्रसन्न होने के लिए या यातुम् जाने के लिए याच याचितुम् । मांगने के लिए रक्ष् रक्षितुम् रक्षा करने के लिए रोदितुम् रोने के लिए रुध् रोद्धम् रोकने के लिए लभू लन्धुम् पाने के लिए लेखितुम् लिखने के लिए वद् वदितुम् बोलने के लिए वस् वस्तुम् रहने के लिए वह वोढुम् ढोने के लिए वेदितुम् जानने के लिए वृत् वर्तितुम् होने के लिए वृध् वर्धितुम् बढ़ने के लिए शक् शक्तुम् सकने के लिए शी शयितुम् सोने के लिए शु श्रोतुम् सुनने के लिए सह सोढुम् सहने के लिए स्था स्थातुम् रुकने के लिए स्पृश् स्पष्टुम् छूने के लिए स्मृ स्मर्तुम् स्मरण के लिए हन् हन्तुम् मारने के लिए हस् हसितुम् हँसने के लिए ह हर्तुम् छीनने के लिए इस प्रकार अन्य धातुओं से भी तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों का निर्माण किया जा सकत है। उपसर्गपूर्वक शब्द भी सरलता से बन जाते हैं, अनु+भू (भव) तुमुन् = अनुभवितुम् (अनुभव के लिए) उत्+भू (भव) तुमुन् = उद्भवितुम् (पैदा होने के लिए) अनु+गम् तुमुन् = अनुगन्तुम् (पीछे आने के लिए) प्रति गम् तुमुन् = प्रतिगन्तुम् (लौटने के लिए) नि+गम् तुमुन् = निर्गन्तुम् (निकलने के लिए) आ+कृष् तुमुन् = आकर्टम् (आकर्षित करने के लिए) उप+कृ तुमुन् = उपकर्तुम् (भला करने के लिए) 职即啊阿阿阿丽丽丽丽丽和现预对照研哪可到既 पymund १०९ विक्रिी तुमुन् = विक्रेतुम् (बेचने के लिए) उत्+खन् तुमुन् = उत्खनितुम् (उखाड़ने के लिए) सम्+ग्रह तुमुन् = संग्रहीतुम् (संग्रह करने के लिए) उत्+तु तुमुन् = उत्तरितुम् (उत्तीर्ण होने के लिए) वि+धा तुमुन् = विधातुम् (करने के लिए) वि+भज् तुमुन् = विभक्तुम् (बांटने के लिए) आ+रभू तुमुन् = आरब्धुम् (आरम्भ करने के लिए) अभ्यास १. "कृष्णां द्रष्टुं गमनं वरमस्ति" रेखांकित में प्रत्यय है-- (क) शत (ख) शानच् (ग) ल्यप् (घ) तुमुन् (ङ) क्त। ( ) २. भर्तृ शब्द के रूप लिखिए। ३. बध्नीयात्, भन्त्स्यसि, बधान, अबध्ना:, बध्नीयु:- इनके लकार, पुरुष एवं वचन बताइये। ४. तुमुन् प्रत्ययान्त शब्द बनाइए- प्र+कृ, अनु+या, परि+दृश, आ+गम्, वि+हा। अनुवाद कीजिए... गोविन्द बाजार से वस्तुएँ खरीदेगा। वह अपना घर नहीं बेचेगा। हम फल खाने बगीचे में जायेंगे। तुम दोनों नहर नहीं बाँधते हो। हम दोनों पास होने के लिए परिश्रम करेंगे। तुम कहानी सुनने कहाँ जाओगे? वे सब कष्ट सहने के लिए पैदा हुए हैं। उन्हें पढ़ने के लिए विद्यालय जाना चाहिए। खेलने के लिए गांव के बाहर मैदान है। ५. 000 अध्याय-२४ सूक्ति-प्रकरण सूक्ति का अर्थ है- अच्छी उक्लि। सूक्ति एवं लोकोक्तियों की विशेष उपयोगिता है। इनके कारण भाषा में लालित्य आ जाता है। संस्कृत साहित्य में सूक्ति एवं लोकोक्तियों का भण्डार भरा हुआ है। कुछ चुनी हुई सूक्तियों को यहाँ अर्थ सहित दिया जा रहा है- अति सर्वत्र वर्जयेत्। (ज्यादती हर स्थान पर बुरी होती है) अति का हर स्थान पर त्याग करना चाहिए। अजीर्णे भोजनं विषम्। (अजीर्ण होने पर भोजन जहर हो जाता है) अ? घटो घोपमुपैति नूनम् । (अध जल गगरी छलकत जाय) धातु-रूप (चुरादिगण) चुर् (चुराना) (परस्मैपद) लट् प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष एकवचन चोरयति चोरयसि चोरयामि बहुवचन चोरयन्ति चोरयथ चोरयामः प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष एकवचन चोरयतु चोरय चोरयाणि द्विवचन चोरयत: चोरयथ: चोरयाव: लोट द्विवचन चोरयताम् चोरयतम् चोरयाव लङ् द्विवचन अचोरयताम् अचोरयतम् अचोरयाव बहुवचन चोरयन्तु चोरयत चोरयाम प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष एकवचन अचोरयत् अचोरय अचोरयम् बहुवचन अचोरयन् अचोरयत अचोरयाम . प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष लुट् एकवचन द्विवचन बहुवचन चोरयिप्यति चोरयिष्यत: चोरयिष्यन्ति मध्यम पुरुष चोरयिष्यसि चोरयिष्यथ: चोरयिष्यथ चोरयिष्यामि चोरयिष्याव: चोरयिष्याम: विधिलिङ् एकवचन द्विवचन बहुवचन चोरयेत् चोरयेताम् चोरयेयु: मध्यम पुरुष चोरये: चोरयेतम् चोरयेत चोरयेयम् चोरयेव चोरयेम इस प्रकार चुरादिगण की अन्य परस्मैपदी धातुओं व लकारों के रूप बनाये जा प्रथम पुरुष उत्तम पुरुष सकते हैं। कथ् (कहना) प्र. पु. म. पु. उ.पु. लट् एकवचन द्विवचन बहुवचन कथ+यति = कथयति कथ+यत: - कथयत: कथ+यन्ति = कथयन्ति (वह कहता है) (वे दो कहते हैं) (वे सब कहते हैं) कथ+यसि = कथयसि कथ+यथ: = कथयथ: कथ+यथ = कथयथ (तुम कहते हो) (तुम दोनों कहते हो) (तुम सब कहते हो) कथ+यामि = कथयामि कथ+यावः = कथयाव: कथ+यामः कथयामः (मैं कहता हूँ) (हम दोनों कहते हैं) (हम सब कहते हैं) लोट् कथ+यतु = कथयतु कथ+यताम् = कथयताम् कथ+यन्तु = कथयन्तु (वह कहे) (वे दोनों कहें) (वे सब कहें) कथ+य = कथय कथ+यतम् = कथयतम् कथ+यत = कथयत (तुम कहो) (तुम दोनों कहो) (तुम सब कहो) कथ+यानि = कथयानि कथयानि कथ+याव = कथयाव कथ+याम = कथयाम (मैं कहूँ) (हम दोनों कहें) (हम सब कहें) ल (धातु के पूर्व 'अ' लगेगः) अ+कथ+यत् %3D अकथ+यताम् अक+यन अक्वयन अकधयत् अकथयताम् (उसने कहा) (उन दोनों ने कहा) (उन सबने कहा) म.पु. उ.पु. प्र.पु. = ११२ म. पु. उ. म. पु. उ. पु. - अ+कथ+यः = अकथय: अकथ+यतम् = अकथ+यत - अकथयत अकथयतम् (तुमने कहा) (तुम दोनों ने कहा) (तुम सबने कहा) पु. अकथ+यम् = अकथयम् अकथ+याव = अकथ+याम = अकथया, अकथयाव (मैंने कहा) (हम दोनों ने कहा) (हम सबने कहा) लुट् प्र. पु. कथ+यिष्यति कथ+यिष्यत: कथ+यिष्यन्ति कथयिष्यति कथयिष्यत: कथयिष्यन्ति (वह कहेगा) (वे दोनों कहेंगे) (वे सब कहेंगे) कथ+यिष्यसि कथ+यिष्यथ: = कथ+यिष्यथ = कथयिष्यसि कथयिष्यथ: कथयिष्यथ (तुम कहोगे) (तुम दोनों कहोगे) (तुम सब कहोगे) कथ+यिष्यामि कथ+यिष्याव: = कथ+यिष्यामः कथयिष्यामि कथयिष्याव: कथयिष्याम: (मैं कहूंगा) (हम दोनों कहेंगे) (हम सब कहेंगे) विधिलिङ्ग कथ+येत् = कथयेत् कथ+येताम् = कथयेताम् कथ+येयु: - कथयेयु: (उसे कहना चाहिए) (उन दोनों को कहना (उन्हें कहना चाहिए) चाहिए) म. पु. कथ+ये: - कथये: कथ+ +येतम् = कथयेतम् कथ+येत = कथयेत (तुम्हें कहना चाहिए) (तुम दोनों को कहना (तुम सब को कहना चाहिए) चाहिए) उ. पु. कथ+येयम् = कथयेयम् कथ+येव कथ+येम = कथयेम (मुझे कहना चाहिए) (हम दोनों को कहना (हमें कहना चाहिए) चाहिए) प्रत्यय ज्ञान (तव्यत्) 'चाहिए' अर्थ के लिए 'तव्यत्' प्रत्यय होता है। 'तव्यत्' का तव्य' शेष रहता है। धातु से तव्यत् प्रत्यय लगाने का सरल उपाय यह है कि तुमुन् प्रत्यय बाले र से 'तुम्' हटाकर 'तव्य' लगा दीजिए। जैसे- 'पठितुम् । यहाँ 'तुम्' के स्थान पर तव्य लगा दीजिए--पठितव्यः । इसके तीनों लिगों के रूप चलते हैं। (कर्मवाच्य में) पुल्लिंग-पठितव्यः-(राम शब्द की तरह) प्र. पु.
११३ 1 - स्त्रीलिंग-पठितव्या-(रमा शब्द की तरह) (भाववाच्य में केवल नपुंसकलिङ्ग तथा एकवचन ही होगा) ल्युट् (अन्) प्रत्यय इस प्रत्यय से नपुंसकलिंग के संज्ञा शब्द बनते हैं (कभी-कभी जब शब्द से कत्त का बोध होता है तब स्त्रीलिङ्ग और पुंल्लिङ्ग शब्द भी बनते हैं) गम् = ल्युट् (अन्) गमनम् पा = ल्युट् (अन्) पानम् गै ल्युट् (अन्) गायनम् आस् = ल्युट् (अन्) आसनम् यहाँ नपुंसकलिग के रूप दिये जा रहे हैं- धातु रूप अर्थ अस् भवितव्यम् होना चाहिए ईक्ष ईक्षितव्यम् देखना चाहिए कथ कथयितव्यम् कहना चाहिए कुप कोपितव्यम् क्रोधित होना चाहिए कृ कर्तव्यम् करना चाहिए गम् गन्तव्यम् जाना चाहिए चि चेतव्यम् जन् जनितव्यम् पैदा होना चाहिए ज्ञा ज्ञातव्यम् जानना चाहिए त्य त्यक्तव्यम् छोड़ना चाहिए दा दातव्यम् देना चाहिए दृश् द्रष्टव्यम् देखना चाहिए नम् नन्तव्यम् पच् पक्तव्यम् पकाना चाहिए पट पठितव्यम् पढ़ना चाहिए प्रष्टव्यम् भू भवितव्यम् होना चाहिए मुच् मोक्तव्यम् छोड़ना चाहिए मुद् मोदितव्यम् प्रसन्न होना चाहिए रक्षितव्यम् रक्षा करनी चाहिए लब्धव्यम् प्राप्त करना चाहिए लिख लेखितव्यम् लिखना चाहिए चुनना चाहिए झुकना चाहिए पूछना चाहिए लभ सुनना चाहिए विधीयते।। श्रु श्रोतव्यम् सेव सेवितव्यम् सेवा करना चाहिए स्था स्थातव्यम् ठहरना चाहिए स्वप् स्वप्तव्यम् सोना चाहिए हस् हसितव्यम् हँसना चाहिए हन् हन्तव्यम् मारना चाहिए अपठित पद्य पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परमं तपः । पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥ अर्थात्-जन्म देने वाला पिता ही श्रेष्ठ धर्म है, पिता ही स्वर्ग है, पिता ही परम तप है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी प्रसन्न हो जाते हैं। पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभापितम्। मूढः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा अर्थात्-इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं जल, अन्न और अच्छी वाणी। मूर्ख लोग पत्थर के रंग-बिरंगे टुकड़ों को रत्न कहते हैं। गगनमिव नष्टतारं शुष्कमिव सरः श्मशानमिव रौद्रम् । प्रियदर्शनमपि रूक्षं रूक्षं भवति गृहं धनविहीनस्य। अर्थात्-धनहीन व्यक्ति का अत्यन्त सुन्दर घर धन के अभाव में तारा रहित आकाश मल की तरह सूना, सूखे हुए तालाब के समान रूखा और भयानक मरघट के समान लगता है। जीर्यन्ते जीर्यतः केशा: दन्ताः जीर्यन्ति जीर्यतः। चक्षुः श्रोत्रे जीर्येते तृष्णका तरुणायते॥ अर्थात्-वृद्ध होने पर मनुष्य के केश पक जाते हैं। दांत जीर्ण होकर गिर जाते हैं। आँखें और कान भी शिथिल हो जाते हैं, लेकिन लालसा सदा युवती ही बनी रहती है। सभी इन्द्रियों के शिथिल हो जाने पर भी मनुष्य की लालसा कम नहीं होती, बढ़ती जाती है। अपठित गद्य भागीरथ्या: उत्तरे तीरे कपिलवस्तु नाम किमपि नगरमासीत्। तत्र शुद्धोदनो नाम नृपतिरभवत्। तस्य सिद्धार्थो नाम पुत्र: अजायत। स: राजसूनुः आसीत्। यदा सिद्धार्थ, तरुण: अभवत् तदा तस्य विवाहः सञ्जातः। तस्य भार्या यशोधरा सुरूपा सुशीला च आसीत्। तयोरेकः पुत्रः अजायत। महानासीत्तस्य जन्मोत्सवः, सन्तुष्टाश्च सर्वे प्रजाजना: तेन। अधिक - ११५ ४. प . प्रश्न १. "भागीरथ्या:.......तीरे कपिलवस्तु नगरम् आसीत्।" रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु उचित पद है- (क) पूर्वे (ख) दक्षिणे (ग) पश्चिमे (घ) उत्तरे। (. ) २. शुद्धोदनस्य पुत्र: क: आसीत् ? ३. सिद्धार्थस्य विवाह: कदा अभवत् ? सिद्धार्थस्य भार्या का आसीत् ? प्रजाजना: केन सन्तुष्टा: आसन् ? अभ्यास १. चिन्त् धातु के रूप लिखिए (परस्मैपदी)। २. वस्, वद्, या, शुभ्, चिन्त्, घ्रा, क्री-धातुओं से तव्यत् प्रत्ययान्त शब्द बनाइए। ३. हन्तव्यम्, श्रोतव्यम्, प्रष्टव्यम्, पक्तव्यम्, चेतव्यम्-के रूप स्त्रीलिङ्ग में परिवर्तित कीजिए। ४. अनुवाद कीजिए- उसे पढ़ना चाहिए। तुम्हें प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए। प्रत्येक भारतीय को संस्कृत पढ़ना चाहिए। तुम्हें कक्षा प्रतिनिधि बनना चाहिए। राम ने अपने घर में ही चोरी की। राधा विवाह के बारे में विचार करेगी। तुम सभी को अपने-अपने गांव जाना चाहिए। प्रजातन्त्र में विचार-स्वतन्त्रता होनी चाहिए। स्कूल में सफाई होनी चाहिए। सीता को आज भात पकाना चाहिए। रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए- .......विद्या ..विद्या परं दैवतम् (विदेशगमन), सर्वे भवन्तु .........(सुखी)। परोपकार:.. (पुण्य)। भारतवर्षस्य पराधीनतां.. (दृश), स: परं F -- -- खिनोऽभवत्। 000 अध्याय-२५ सूक्ति-प्रकरण अविवेकः परमापदां पदम् । अर्थात्- "विवेकहीन कार्य आपत्तियों का स्थान है।" (जल्दी का काम शैतान का)। आज्ञा गुरूणां विचारणीया। अर्थात्-गुरुजनों (बड़ों) की आज्ञा-पालन में कुछ भी विचार नहीं करना चाहिए। जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। अर्थात्-एक-एक बूँद से घड़ा भर जाता है। (बूंद-बूंद सों घट भरे)। दीर्घसूत्री विनश्यति। अर्थात्-आलसी नष्ट होता है। धातुरूप प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष बहुवचन भक्षयन्ते भक्षयध्वे भक्षयामहे भक्ष् (खाना) उभयपदी (आत्मनेपदी) लट् एकवचन द्विवचन भक्षयते भक्षयेते भक्षयसे भक्षयेथे भक्षये भक्षयावहे लोट एकवचन द्विवचन भक्षयताम् भक्षयेताम् भक्षयस्व भक्षयेथाम् भक्षयै भक्षयावहै लङ् एकवचन द्विवचन अभक्षयत अभक्षयेताम् अभक्षयेथा: अभक्षयेथाम् अभक्षये अभक्षयावहि बहुवचन प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष भक्षयन्ताम् भक्षयध्वम् भक्षयामहै बहुवचन अभक्षयन्त प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष अभक्षयध्यम् अभक्षयामहि मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष एकवचन प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष लुट् एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथम पुरुष भक्षयिष्यते भक्षयिष्येते भक्षयिष्यन्ते भक्षयिष्यसे भक्षयिष्येथे भक्षयिष्यध्वे भक्षयिष्ये भक्षयिष्यावहे भक्षयिष्यामहे विधिलिङ् द्विवचन बहुवचन भक्षयेत भक्षयेयाताम् भक्षयेरन् भक्षयेथाः भक्षयेयाथाम् भक्षयेध्वम् भक्षयेय भक्षयेवहि भक्षयेमहि इस प्रकार चुरादिगण आत्मनेपदी अन्य धातुओं के रूप भी बनाये जा सकते हैं। प्रत्यय-ज्ञान (अनीयर) 'चाहिए' अर्थ के लिए 'अनीयर' प्रत्यय होता है। 'अनीयर् का 'अनीय' शेष रहता है। जैसे- पठ्+अनीयर् [अनीय] = पठनीय: [पढ़ना चाहिए। तीनों लिङ्गों में रूप बनते हैं। पुंल्लिङ्ग में 'राम' की तरह रूप चलते हैं। स्त्रीलिङ्ग में 'रमा' की तरह रूप चलते हैं। नपुंसकलिङ्ग में 'फल' की तरह रूप चलते हैं। अनीयर् प्रत्ययान्त शब्द (नपुंसकलिंग) धातु पद धातु पद पठ् पठनीयम् हस् हसनीयम् भू भवनीयम् वद् वदनीयम् अर्च अर्चनीयम् रक्ष रक्षणीयम् गम् गमनीयम् दृश् दर्शनीयम् पच पचनीयम् पा पानीयम् नम् नमनीयम् स्था स्थानीयम् जि जयनीयम् क्रीडनीयम् त्य त्यजनीयम् चर् चरणीयम् भक्ष् भक्षणीयम् भज् भजनीयम् नी नयनीयम् क्रन्द् क्रन्दनीयम् गै गानीयम् त तरणीयम् वस् वसनीयम् ह हरणीयम् NAA ११८ श्रु स्वप् སྤྱི སྤྱི @ # # ཀློ # # # # ༧ @ ཀླུ ཀླུ श्रवणीयम् स्वपनीयम् लभ् लभनीयम् हन् हननीयम् से सेवनीयम् दुह दोहनीयम् सह् सहनीयम् दा दानीयम् वृध वर्धनीयम् नृत् नर्तनीयम् मुद् मोदनीयम् सेवनीयम् यत् यतनीयम् जन् जननीयम् चि चयनीयम् शक् शकनीयम् प्रच्छ प्रच्छनीयम् लेखनीयम् स्पृश् स्पर्शनीयम् सृज् सर्जनीयम् मुच मोचनीयम् रुध रोधनीयम् भुज भोजनीयम् कृ करणीयम् ज्ञा ज्ञानीयम् चुर चोरणीयम् कथ् कथनीयम् चिन्तनीयम् गण गणनीयम् पाल पालनीयम् इस प्रकार अन्य धातुओं से भी अनीयर् प्रत्यय जोड़कर शब्द रूप बनाए जा सकते हैं। अपठित पद्य गौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य संचयात् । स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः॥ अर्थात्--दान से गरिमा बढ़ती है, न कि धन संचय करने से। दान से प्रसिद्धि प्राप्त होती है। बादलों का दान के कारण उच्च स्थान है और संचय-वृत्ति के कारण समुद का स्थान नीचे की ओर है। वाचयति नान्यलिखितम् लिखितमनेनापि वाचयति नान्यः । अयमपरोऽत्र विशेषः स्वं लिखितं स्वयं वाचयति।। अर्थात्-अन्य व्यक्ति का लिखा हुआ नहीं वांच सकता है और न इसके द्वार लिखा हुआ दूसरा ही बांच सकता है। यह और भी बढ़कर बात है कि स्वयं का लिए हुआ ही स्वयं नहीं बांच पाता है (यह हास्य श्लोक है) हा हा नाधीतं सुगततासु रात्रिपु । तेन त्वं विदुषां मध्ये पङ्के गौरिव सीदसि। न पुत्रक!
११९ अर्थात् -- (कोई पिता अपने पुत्र से कहता है) हे पुत्र! सुख से व्यतीत होने वाली रातों में तुमने पढ़ाई नहीं की। जिसके फलस्वरूप तुम विद्वानों की सभा में दुःखित होते हो, जिस तरह गाय कीचड़ में फंसकर दुःखी होती है। अपठित गद्य प्रजातन्त्रं लोकतन्त्रं वा प्रजाभि: प्रजानां शासनं निरूपयति। आधुनिकयुगे प्रजातन्त्रस्य बहु-विकसितं स्वरूपं निर्मितमेव। प्रजातन्त्र-विधानस्य विकास: प्रधानत: इंगलैण्डदेशवासिभिः मध्ययुगे सम्पादितः । प्रजातन्त्रे बहुगुणा: सन्ति। तथा हि प्रत्येकं जनः सर्वोच्चं पदं प्राप्तुमर्हति, यदि केवलं स योग्यो भवति। अत एव स्वस्मिन् योग्यता आधेया इति विचार: सर्वेषामभ्युदयाय प्रवर्तते। वयमेव स्वकीये देशे सुशासनस्य व्यवस्थापका इति भवति आनन्दकारणम्। भारतमेव स एक देशो, यत्र विश्वस्य समधिका जना: प्रजातन्त्र-शासनसूत्रेण निबद्धाः सन्ति। प्रश्न 1. प्रजातन्त्र से क्या तात्पर्य है ? 2. प्रजातन्त्र का आरम्भ कहाँ से हुआ? 3. प्रजातन्त्र के कौन से गुण हैं ? 4. किस देश में सर्वाधिक जन प्रजातन्त्र शासन में हैं? हीयते हि मतिस्तात! हीन: सह समागमात्। समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम् ।। अर्थात्-नीच व्यक्ति के साथ रहने से बुद्धि नीच हो जाती है। बराबर वाले की संगति से बुद्धि बराबर होती है और स्वयं से अधिक बुद्धि वाले के साथ रहने से बुद्धि उत्तम हो जाती है। (जैसी संगति वैसा प्रभाव)। गुणा: गुणज्ञेषु गुणा: भवन्ति ते निर्गुणं भवन्ति आस्वाद्यतोयाः प्रभवन्ति नद्यः समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः।। अर्थात् -गुणियों में गुण, गुण ही रहते हैं, परन्तु वे ही गुण गुणहीन के पास पहुँच कर दोष हो जाते हैं। नदियाँ मीठे जल वाली होती हैं, पर वे ही समुद्र में पहुँचकर पीने योग्य नहीं रह जाती हैं। कहानी-लेखन कहानी-लेखन भाषा-शिक्षण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण विधा है। सामान्यत: कहानी सुनने व पढ़ने की ओर बालक की सहज प्रवृत्ति होती है। वः सुनी हुई कहानियों को अपने घर व साथियों के बीच दुहराने की लालसा रखता है। हिन्दी में सुनी या पढ़ी हुई कहानियों को वह लिखने की ओर प्रवृत्त होता है तथा इनके आधार पर अन्य कहानियों की रचना भी चाहता है। प्राप्य दोषाः।
१५८ श्रु श्रवणीयम् स्वप् स्वपनीयम् लभू लभनीयम् हन हननीयम् सेव् सेवनीयम् दुह दोहनीयम् सह सहनीयम् दा दानीयम् वृधु वर्धनीयम् नृत् नर्तनीयम् मुद् मोदनीयम् से सेवनीयम् यत् यतनीयम् जन् जननीयम् चि चयनीयम् शक् शकनीयम् प्रच्छ प्रच्छनीयम् लिख लेखनीयम् स्पृश् स्पर्शनीयम् सृज् सर्जनीयम् मुच मोचनीयम् रुधु रोधनीयम् भुज् भोजनीयम् कृ करणीयम् ज्ञा ज्ञानीयम् चुर चोरणीयम् कथ् कथनीयम् चिन्त् चिन्तनीयम् गण गणनीयम् पाल पालनीयम् इस प्रकार अन्य धातुओं से भी अनीयर् प्रत्यय जोड़कर शब्द रूप बनाए जा सकते अपठित पद्य गौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य संचयात्। स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामध: स्थितिः।। अर्थात्-दान से गरिमा बढ़ती है, न कि धन संचय करने से। दान से प्रसिद्धि प्राप्त होती है। बादलों का दान के कारण उच्च स्थान है और संचय-वृत्ति के कारण समुद्र का स्थान नीचे की ओर है। वाचयति नान्यलिखितम् लिखितमनेनापि वाचयति अयमपरोऽत्र विशेषः स्वं लिखितं स्वयं वाचयति।। अर्थात्-अन्य व्यक्ति का लिखा हुआ नहीं बांच सकता है और न इसके द्वारा लिखा हुआ दूसरा ही बांच सकता है। यह और भी बढ़कर बात है कि स्वयं का लिया हुआ ही स्वयं नहीं बांच पाता है (यह हास्य श्लोक है) हा हा नाधीतं सुगतैतासु रात्रिपु। तेन त्वं विदुषां मध्ये पङ्के गौरिव सीदसि॥ नान्यः। पुत्रक!
अर्थात्- (कोई पिता अपने पुत्र से कहता है) हे पुत्र! सुख से व्यतीत होने वाली रातों में तुमने पढ़ाई नहीं की। जिसके फलस्वरूप तुम विद्वानों की सभा में दुःखित होते हो, जिस तरह गाय कीचड़ में फंसकर दुःखी होती है। अपठित गद्य प्रजातन्त्रं लोकतन्त्रं वा प्रजाभि: प्रजानां शासनं निरूपयति। आधुनिकयुगे प्रजातन्त्रस्य बहु-विकसितं स्वरूपं निर्मितमेव। प्रजातन्त्र-विधानस्य विकास: प्रधानत: इंगलैण्डदेशवासिभिः मध्ययुगे सम्पादितः । प्रजातन्त्रे बहुगुणा: सन्ति। तथा हि प्रत्येकं जन: सर्वोच्चं पदं प्राप्तुमर्हति, यदि केवलं स योग्यो भवति। अत एव स्वस्मिन् योग्यता आधेया इति विचार: सर्वेषामभ्युदयाय प्रवर्तते। वयमेव स्वकीये देशे सुशासनस्य व्यवस्थापका इति भवति आनन्दकारणम्। भारतमेव स एक देशो, यत्र विश्वस्य समधिका जना: प्रजातन्त्र-शासनसूत्रेण निबद्धा: सन्ति। प्रश्न 1. प्रजातन्त्र से क्या तात्पर्य है? 2. प्रजातन्त्र का आरम्भ कहाँ से हुआ? 3. प्रजातन्त्र के कौन से गुण हैं ? 4. किस देश में सर्वाधिक जन प्रजातन्त्र शासन में हैं ? हीयते हि मतिस्तात! हीनैः सह समागमात्। समैश्च समतामेति विशिष्टेश्च विशिष्टताम्।। अर्थात्-नीच व्यक्ति के साथ रहने से बुद्धि नीच हो जाती है। बराबर वाले की संगति से बुद्धि बराबर होती है और स्वयं से अधिक बुद्धि वाले के साथ रहने से बुद्धि उत्तम हो जाती है। (जैसी संगति वैसा प्रभाव)। गुणा: गुणज्ञेषु गुणाः भवन्ति ते निर्गुणं भवन्ति आस्वाद्यतोयाः प्रभवन्ति नद्यः समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥ अर्थात्-गुणियों में गुण, गुण ही रहते हैं, परन्तु वे ही गुण गुणहीन के पास पहुँच कर दोष हो जाते हैं। नदियाँ मीठे जल वाली होती हैं, पर वे ही समुद्र में पहुंचकर पीने प्राप्य दोषाः। योग्य नहीं रह जाती हैं। कहानी-लेखन कहानी-लेखन भाषा-शिक्षण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण विधा है। सामान्यत: कहानी सुनने व पढ़ने की ओर बालक की सहज प्रवृत्ति होती है। व सुनी हुई कहानियों को अपने घर व साथियों के बीच दुहराने की लालसा रखता है। हिन्दी में सुनी या पढ़ी हुई कहानियों को वह लिखने की और प्रवृत्त होता है तथा इनके आधार पर अन्य कहानियों की रचना भी चाहता है।
१२० संस्कृत साहित्य मनोरंजन एवं कुतूहल भरी कहानियों का भण्डार है। प्रारम्भिक शिक्षा से ही कथा-साहित्य का अध्ययन-अध्यापन कराया जाता रहा है। इन कहानियों को अपनी भाषा में लिखना ही कहानी-लेखन है। कहानियाँ लिखने की अनेक विधाएँ हैं- (क) सुनी या पढ़ी हुई कहानी अपने शब्दों में लिखना। (ख) बिन्दुओं के आधार पर कहानी लिखना। (ग) शीर्षक के आधार पर कहानी लिखना। । (घ) अन्य भाषा से संस्कृत में लिखना। (ङ) किसी की जीवनी को कहानी के रूप में लिखना। (च) सत्य घटनाओं को कहानी का रूप देना। (छ) कल्पना के आधार पर कहानी लिखना। (ज) अनुकरण की प्रवृत्ति से कहानी लिखना। कहानी का शीर्षक देने के लिए महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को ध्यान में रखना चाहिए- (i) किसी प्रमुख घटना के आधार पर। (ii) किसी प्रमुख पात्र के आधार पर। (iii) किसी प्रमुख वृत्ति के आधार पर। यह ध्यान रहे कि कौनसी वृत्ति, घटना या पात्र अधिक प्रभावित कर रहा है। दीजिए (i) अधूरे बिन्दुओं को एक से अधिक बार पढ़ें। (ii) प्रत्येक शब्द के अर्थ को पूरी तरह समझें। (iii) रिक्त स्थानों के लिए स्मरण या कल्पना करें। (iv) सरल भाषा का प्रयोग करें। (v) तारतम्य बना रहे। पठित आधार पर दशमस्त्वमसि एकदा दश यात्रिण: तीर्थयात्रायै अगच्छन्। मार्गे एकां नदी बाहुभ्यां तरन्तः परं तीर प्राप्तवन्तः। तत्र ते परस्परं गणयितुं प्रारभन्त, परं प्रत्येकं यात्री आत्मानं विस्मृत्य गणयामास-एकः,द्वौ, त्रयः, चत्वारः, पञ्च, षट्, सप्त, अष्टौ, नव इति। तैः परस्पर कथितम् इति विचार्य ते क्रन्दनं अकुर्वन् । एतदन्तरे तत्र कश्चित् साधु: सम्प्राप्तः। तेषां गणनाभ्रान्तिं ज्ञात्वा सोऽहसत्। साधु: अकथयत्-रे मूर्खा:! यूयं आत्मानं विस्मृत्य गणयथा अहंगणयामि- पश्य, एते नव, दशमस्त्वमसि। '40 १२१ ... अभ्यास "तव पितृव्यः........... नदी प्रयास्यति।" वाक्य में रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए सही विकल्प है- (क) स्नातुम् (ख) स्नात्वा (ग) स्नात: (घ) स्नातव्यम् (ङ) स्नातवान्। ( ) . पठ् धातु के रूप दुहराइए (पुनरावृत्ति)। . . पठ्, लिख, कृ, चिन्त, रक्ष्- धातुओं के साथ तव्यत्, अनीयर्, क्त्वा, तुमुन् वक्त प्रत्यय जोड़कर प्रत्ययान्त शब्दों की सारणी बनाइए। (पुनरावृत्ति) . अनुवाद कीजिए- दशरथ नाम का एक राजा था। उसके तीन रानियाँ थीं। उसके चार लड़के हुए। उन लड़कों में राम सबसे श्रेष्ठ था। राजा ने राम को वन में जाने को कहा। राम अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मण सहित दण्डकारण्य में गया। लंका का राजा रावण बड़ा दुष्ट था। वे तीन भाई थे, उनमें विभीषण धर्मात्मा था। राम ने वानरों की सहायता से रावण पर विजय प्राप्त की। रामचन्द्र के जीवन को कहानी के रूप में लिखिए (केवल दस पंक्तियाँ) - - 000 अध्याय-२६ सूक्ति प्रकरण । महान् महत्येव करोति विक्रमम् । (शेर बादल के गरजने पर ही गरजता है) (शक्तिशाली शक्तिशाली को देखकर पराक्रम दिखलाता है) १२२ युक्तिः शक्तेर्गरीयसी। (बल से बुद्धि बडी, भैंस बड़ी कि बुद्धि) लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पण: किं करिष्यति? (अन्धे को कांच दिखाना व्यर्थ है) छिद्रेष्वनाः बहुलीभवन्ति। (गरीबी में आटा गीला) (क्लेश में क्लेश बढ़ता ही जाता है) प्रत्यक्षे किं प्रमाणम् ? (हाथ कंगन को आरसी क्या) न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्। अर्थात्-“रत्न स्वयं किसी को ढूँढने नहीं जाता, उसी को सब खोजते फिरते हैं।" भवितव्यगनां द्वाराणि भवन्ति सर्वत्र। (होनी के द्वार सब जगह खुले रहते हैं।) धातु रूप बहुवचन पालयन्ति प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष पालयथ पाल् (पालना) उभयपदी लट् (पर.) एकवचन द्विवचन पालयति पालयत: पालयसि पालयथः पालयामि पालयाव: लट् (आ.) पालयते पालयेते पालयसे पालयेथे पालये पालयावहे लोट् (पर.) पालयामः प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष पालयन्ते पालयध्वे पालयामहे प्रथम पुरुष पालयतु पालयन्तु पालयताम् लोट् (आ.) पालयेताम् + पालयन्ताम् पालयताम् प्रथम पुरुष लङ् (पर.) प्रथम पुरुष अपालयन अपालयत् अपालयताम् लङ् (आ.) अपालयन्त अपालयेताम् अपालयत प्रथम पुरुष १२३ प्रथम पुरुष प्रथम पुरुष प्रथम पुरुष फि च च लृट् (पर.) प्रथम पुरुष पालयिष्यति पालयिष्यत: पालयिष्यन्ति लृट् (आ.) पालयिष्यते पालयिष्यते पालयिष्यन्ते विधिलिङ् (पर.) पालयेत् पालयेताम् पालयेयुः विधिलिङ् (आ.) पालयेत पालयेताम् पालयेरन् (चुर् धातु की तरह अन्य पुरुषों के रूप चलेंगे) अपठित पद्य सणां खलानां सर्वेषां दुष्टचेतसाम्। अभिप्राया न सिद्धयन्ति तेनेदं वर्तते जगत्।। अर्थात्-सर्प, नींच एवं दुष्ट व्यक्तियों के मनोरथ पूर्णत: सफल नहीं होते हैं, अन्यथा इस संसार का अस्तित्व ही नहीं रहता। इच्छति शती सहसं, सहस्री, लक्षमीहते। लक्षाधिपस्तथा राज्यं, राज्यस्थः स्वर्गमीहते। जिसके पास सौ रुपये हैं, वह हजार चाहता है और जिसके पास हजार हैं, वह लाख रुपया चाहता है और लखपति राज्य की इच्छा करता है। जिसके पास राज्य है, वह स्वर्ग की कामना करता है। मृषा वदति लोकोऽयं मुखभूषणम्। मुखस्य भूषणं पुंसः स्यादेकैव सरस्वती।। यह संसार पान की को मुख की शोभा असत्य ही कहता है, अर्थात् पान मुख शोभा नहीं है। पुरुषों के मुख की शोभा तो एक सरस्वती (वाणी) ही है। आरोग्यं परमो लाभ: सन्तुष्टिः परमं धनम्। विश्वास: परमा ज्ञातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ।। आरोग्य (नीरोग) परम लाभ है, सन्तोष परम धन है। विश्वास परम सम्बन्धी है पर ताम्बूलं तथा मोक्ष परम सुख है। . अपठित-गद्य आंग्लशासनस्य समय आसीत् । न जाने कियन्तो देशभवता: भारतीया: आंग्लशासके. शूलमारोपिता:, कियन्त: कारागारेषु निक्षिप्ताः। सत्याहिंसातिना महात्मना श्रीगान्धिना समुपदिष्टमार्गेण युदयमानान् भारतीयान् केवलं छलयितुं वा लोकलज्जया वा गोराले: भुभिः १२४ १. - प्रान्तीयस्वराज्यंभारतायप्रदत्तम्। “पलायितस्य चौरस्य कन्थैवं लाभ:।" इति आमाणकमनुस्त महात्मना तत्स्वीकृतमपि। प्रश्न "श्रीगान्धिना" पद का उचित विशेषण है-- (क) महात्मा (ख) महात्मनः (ग) महात्मभिः (घ) महात्मना। () २. देशभक्ता: कै: शूलम् आरोपिता? ३. गौरांगैः प्रान्तीयस्वराज्यं कस्मै प्रदत्तम् ? ४. भारतीयान् सैनिकान् क: उपदिष्टवान् ? ५. महात्मना किं स्वीकृतम् ? प्रत्यय ज्ञान (यत् प्रत्यय) 'चाहिए' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। 'यत्' प्रत्यय का 'य' शेष रहता है। 'यत् प्रत्यय' कर्मवाच्य एवं भाववाच्य में होता है। 'कर्मवाच्य में कर्म के समान लिङ्ग, विभक्ति एवं वचन होंगे। भाववाच्य में कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है तथा क्रिया नपुंसकलिङ्ग एकवचन की होती है। जैसे- दा+यत् = देयम् (न.) देना चाहिये (देने योग्य) पा+यत् = पेयम् (न.) पीना चाहिये या पीने योग्य यत् प्रत्ययान्त शब्द (नपुं.) चि+यत् (य) = चेयम्। क्षि+यत् (य) = क्षेयम्। स्था+यत् (य) = स्थेयम्। नी+यत् (य) = नेयम्। जि+यत् (य) = जेयम्। उप+मा+ यत् (य) = उपमेयम्। वि+धा+यत् (य) = विधेयम्। ध्यै+यत् (य) = ध्येयम्। मया जलं पेयम्। प्रयोग ण्यत् प्रत्यय यत् प्रत्यय के अर्थ में ही (चाहिए अर्थ में) ऋकारान्त तथा व्यञ्जनान्त धातु के अन्तिम च और से ण्यत् (य) प्रत्यय होता है। इसके पूर्व धातु ज् को क्रमश: और गं हो जाते हैं । अन्तिम स्वर तथा उपधा के अ को वृद्धि हो जाती है । उस १२५ ......" -- ......... के अन्य स्वरों को गुण होता है। यथा-- कृ होता है। यथा--- कृ = कार्यम्, धृ कार्यम्, धृ = धार्यम्, ग्रह धार्यम्, ग्रह = ग्राह्यम्, वच् = वाक्यम्, लू = लाव्यम्, भुज् = भोज्यम् इत्यादि । कहानी लेखन विद्यया बुद्धिरुत्तमा कस्मिंश्चिद्........... चत्वारो ब्राह्मणपुत्रा: 1.........त्रयः त्रय: शास्त्रपारंगता:, परन्तु एकस्तु बुद्धिमान् ...... ....... ते ते पूर्वदेशं कतिचिद् अस्थीनि .........। एकेन विद्याप्रभावेण.........। अस्थिसंचयम् करोति .........। ....... औत्सुक्याद्.........कृतः। द्वितीयेन चर्ममांसरुधिरं.. । तृतीयोऽपि......... जीवनम्।.........सुबुद्धिना एष सिंहो ........निषिद्ध: परं तेन...................प्रतीक्षस्व ....आरोहामि। तथाऽनुष्ठिते.........त्रयोऽपि .........व्यापादिताः। बिन्दुओं के आधार पर कस्मिंश्चिद् ग्रामे चत्वारो ब्राह्मणपुत्रा: वसन्ति स्म। तेषां त्रय: शास्त्रपारंगता: परन्तु न बुद्धिरहिताः। एकस्तु बुद्धिमान् केवलं शास्त्रविमुखः। एकदा ते उपार्जनार्थ पूर्वदेशं अगच्छन्। तै: मार्गाश्रितैः अटव्यां कतिचित् अस्थीनि दृष्टानि। एकेन अभिहितम्-एतानि मृतसत्त्वस्य अस्थीनि तिष्ठन्ति तत् विद्याप्रभावेणजीवनसहितंकुर्मः। अहं अस्थिसंचयम् करोमि।' इत्युक्त्वा तेन औत्सुक्यात् अस्थिसंचय: कृतः । द्वितीयेन चर्ममांसरुधिरं संयोजितम्। तृतीयोऽपि यावज्जीवनं संचारयति, तत: सुबुद्धिना कथितम्-एष सिंह: प्रतीयते। तेन जीवनाय निषिद्धः, परं तेन अभिहितम्-धिङ् मूर्ख ! नाहं विद्याया विफलां करोमि। तावत्प्रतीक्षस्व क्षणं, यावदहं वृक्षमारोहामि।' तथा अनुष्ठिते यावत्सजीव: कृत: तावत् ते त्रयोऽपि सिंहेन व्यापादिताः। जीवनी के आधार पर महात्मा गाँधी महात्मा गाँधी १८६९......... द्वितीये...... पोरबन्दर......... कर्मचन्द गाँधी.........। मोहनदास:...... । मोहनदास:......... माता परमासाध्वी......... विधानशास्त्रं........ । तत: अफ्रीकादेशं.........। तत्र गौराडा:......... अपीडयन्।. भृशमद्यत ।......... सत्याग्रहाख्यमान्दोलनं.........। कारागारे..... स्वतन्त्रताया: समर्थक:......... नवीनयुगं.........। अन्तत:... लन्दनदेशं.. पत्र लेखन . * व्यावहारिक ज्ञान के लिए पत्र-लेखन अनिवार्य है। रचना की दृष्टि से यह विधा १ उपयोगी है। पत्रों के माध्यम से ही विचार एवं समाचारों का आदान-प्रदान होता है। मुख्यत: पत्र तीन प्रकार के होते हैं- १२६ - (i) व्यावहारिक पत्र। (ii) निजी पत्र। (iii) सरकारी पत्र। पत्र-लेखन के आवश्यक नियम (क) पत्र लेखन में सरल भाषा होनी चाहिए। (ख) स्पष्ट भाव हों-जिसे सहज रूप से समझा जा सके। (ग) पाण्डित्य प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। (घ) संक्षिप्तता हो, किन्तु उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। निजी पत्र अपने रिश्तेदारों को जो पत्र लिखे जाते हैं, वे निजी पत्र कहलाते हैं। (क) पत्र के आरम्भ में ऊपर की ओर (दाहिने भाग में) अपना स्थान एवं तिथि (तारीख) अंकित करनी चाहिए। जैसे- उदयपुरतः दिनांक १७-५-९२ (ख) उसके नीचे सम्बोधन के साथ प्रणाम, नमस्कार अथवा आशीर्वाद आदि का उल्लेख होना चाहिए। जैसे- श्रीमत: पितृवर्यस्य चरणयो: सादरं प्रणतिः। बड़ों के लिए श्रीमत्या: मातुश्चरणयो: सांदरं प्रणति:। समादरणीयस्य भ्रातुश्चरणयो: सादरं प्रणतिः। श्रीमत् आचार्यस्य चरणयो: सादरं प्रणतिः । प्रिय मित्र हमीद! नमस्ते। समान के लिए प्रिय सखि रेणु ! नमस्ते। [चिरायुषे रामाय स्वस्ति। छोटे के लिए चिरञ्जीविने सलीमाय शुभाशी: । सौभाग्यकांक्षिण्यै रमायै शुभाशीर्वादः। अपरिचित के लिए श्रीमान् अथवा मान्यवर या महोदय नमस्ते, प्रणाम: आदि। पत्र के अन्त में नाम से पूर्व इस प्रकार लिखना चाहिए- बड़ों के लिए भवदाज्ञाकारी, भवत्कृपाकांक्षी, भवतां शिष्यः, भवतां पुत्रः, पुत्री, भ्राता व स्वसा आदि। भवबन्धुः, भवदीय:, छोटों के लिए शुभाकांक्षी, अपरिचित के लिए भवदीय: समान के लिए भवदीया आदि। शुभचिन्तक: आदि।
१२७
(घ) कुशलता प्रदर्शन
अत्र कुशलं तत्रास्तु' या 'अत्र शं तत्रास्तु।
(ङ) उसके बाद उद्देश्यात्मक समाचार लिखना चाहिए। जैसे-
पित्रे पत्रम्
.
जोधपुरत:
दिनांक ३०-३-९२
। श्रीमतः पितृवर्यस्य चरणयो:
नई
सादरं प्रणतिः।
तत्रास्तु। भवदीयं कृपापत्रं अधिगतम्। सम्प्रति स्वाध्याये दत्तचित्तोऽस्मि।
- संस्कृतस्याध्ययनं प्रति विशिष्टा प्रवृत्तिः। आशासे वार्षिकपरीक्षायां प्रथमश्रेण्यां सफलो
-११ भविष्यामि। मान्याया: मातुश्चरणयो: मे प्रणतिर्वाच्या।
अत्र
शं
भवदाज्ञाकारी पुत्रः
राकेश:
मात्रे-पत्रम्
सीकरत:
दिनांक ११-४-१९९२
श्रीमत्या: मातुश्चरणयोः
सादरं प्रणतिः।
अत्र कुशलं तत्रास्तु। भवदीयं कृपापत्रं समधिगतम्। अस्माकं छात्रावासाधीक्षिका
सरला, गम्भीरा कुशलिनी चाऽस्ति। सेयं छात्रासु स्निह्यति। यथासमयं हितान् संरक्षति।
अतो हि भवत्या काऽपि चिन्ता न विधेया, परीक्षाऽनन्तरमहमागमिष्यामि। श्रीमत: पितृवर्यस्य
चरणयोः प्रणतिर्वाच्या।
भवदानाकारी पुत्री
हमीदा
१२८ मित्राय पत्रम् रेवा नागोर... दिनांक ८-५-९२ प्रिय मित्र जोर्ज! सप्रणयं नमस्ते। अत्र शं तत्रास्तु। भवत्स्नेहपत्रं प्राप्य नितरामामोदे। आगामिनि ग्रीष्मावकाशे राजस्थानयात्रायै मतिर्विधेया। राजस्थाने जयपुर, अजमेर, उदयपुर, जोधपुर, बीकानेरादीनि गराणि दर्शनीयानि। अनेकानि ऐतिहासिकानि, रम्याणि स्थानानि सन्ति। अस्मिन् प्रान्ते महाराणाप्रताप-दुर्गादासप्रभृतयः वीराः स्वतन्त्रताप्रिया: अभवन्। अत्रैव बेहारी-रैदास-दादूसदृशाः कवय: संजाता:। भक्तिमूर्ति: मीरा अत्रत्यं निधिः। आशासे भत्रागमनेन मामनुग्रहीष्यति। कुशलमन्यत्। भवबन्धुः 'महीपाल गुप्तः सभील -- अभ्यास यत् प्रत्ययान्त शब्द बनाइए- क्री, ज्ञा, धा, श्रु, विधा, भू। अपनी प्रिय सखी राधा को पत्र लिखिए, जिसमें अजमेर आने का निमन्त्रण हो। (अजमेर के दर्शनीय स्थलों का संक्षिप्त विवरण)। अपठित गद्य का अर्थ लिखिए। न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणम्। न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः। स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते। यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः। अनुवाद कीजिए- वह घर आकर चला गया। राम पढ़ता हुआ सो गया। उसे राष्ट्र के प्रति समर्पित होना चाहिए। धातु में प्रत्यय जोड़ना चाहिए। स्त्री का गहना लज्जा है। जो संघर्ष से जूझते हैं, वे बहादुर कहे जाते हैं। ईश्वर सभी का पालन करता है। के अन्त १२९ अध्याय-२७ सूक्ति प्रकरण बुभुक्षितः किं न करोति पापम् ? (भूखा क्या नहीं करता?) विद्या धर्मेण शोभते। (विद्यां धर्म से शोभित होती है) संघे शक्तिः कलौ युगे। (कलियुग में संगठन में शक्ति है) प्रक्षालनाद् हि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्। (इलाज से बचाव बेहतर) अर्थात्-कीचड़ को धोने की अपेक्षा इससे दूर रहना अच्छा है। न कूपखननं युक्तं प्रदीप्ते वहिना गृहे। (आग लगने पर कुआ खोदने से क्या लाभ?) पयःपानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम् । (जो तू सींचे दूध से नीम न मीठा होय) अर्थात् सो को दूध पिलाने से केवल जहर ही बढ़ता है शठे शाठ्यं समाचरेत् . (जैसे को तैसा) अर्थात्-दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए। विनाशकाले विपरीतबुद्धिः। (चींटी के पर निकलना) वीरभोग्या वसुन्धरा। (जिसकी लाठी उसकी भैंस) निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते। (अन्धों में काना राजा) महीयांसः प्रकृत्या मितभाषिणः । (बड़े आदमी प्रकृति से मितभाषी होते हैं) सहसा विदधीत नं क्रियाम्। (बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय) वक्तारो दर्दुराः यत्र तत्र मौनं हि शोभते। (मूों में चुप्पी भली) १३० शरीरमाद्यं खलु धर्म-साधनम्। (पहला सुख नीरोगी काया) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः । (मीठी और रोगों को दूर करने वाली दवा का मिलना कठिन है।) अर्थात्-हितकारी भी हो और मनोहर भी हो, ऐसा वचन दुर्लभ है। न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते। (विशिष्ट धर्म वालों की उम्र नहीं देखी जाती है) अपठित पद्य गंगा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरुस्तथा। पापं सुतापं दैन्यं च घ्नन्ति सन्तो महाशयाः ।। प्रश्न काल (क) गङ्गा किं करोति? (ख) तापं को हरति? (ग) दैन्यं को हरति? (घ) सन्त: किं कुर्वन्ति? सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः। सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम्॥ अर्थात्-भली-भाँति पचा हुआ अन्न, बुद्धिमान् पुत्र, सुन्दर ढंग से शासित स्त्री (पत्नी), अच्छी प्रकार सेवा किया हुआ राजा, भली प्रकार सोचकर कहा हुआ वचन और अच्छी तरह किया हुआ कार्य बहुत में भी निरर्थक नहीं होते, अर्थात् किसी प्रकार से भी विकार को प्राप्त नहीं होते। प्रश्न (क) सुजीर्णं किं निरर्थकं न भवति? (ख) कीदृश: सुतो न याति विक्रियाम् ? (ग) सुशासिता का? (घ) सुदीर्घकालेऽपि किं न याति विक्रियाम् ? फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां पय: स्थान-स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम्। मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ।। अर्थात् प्रत्येक वन में वृक्षों से अपनी इच्छानुसार विना श्रम के फल प्राप्त १३१ हैं। स्थान-स्थान पर पवित्र नदियों में शीतल एवं मधुर जल बहता रहता है। लताओं के कोमल पत्तों की मुलायम सेज सर्वत्र सुलभ है, फिर भी कृपण (अनुदार) धनवानों की हवेलियों के दरवाजे पर खड़े होकर कर पाते रहते हैं। प्रश्न-(क) स्वेच्छालभ्यं किम् ? (ख) शिशिरमधुरं पय: कुत्र? (ग) सहजशय्या कथं लभ्यते? (घ) कृपणा: कथं सन्तापं सहन्ते? अपठित गद्य इदं हि विज्ञानप्रधानं युगम्। सम्प्रति मानव: प्रकृतिं वशीकृत्य तां स्वेच्छया कार्येषु नियुक्ते। प्रकृति: पुरुषस्य दासतामानीता इव प्रतिभाति। तथाहि वैज्ञानिकैरनेके आविष्कारा: विहिताः। मानवजाते. हिताहितम् अपश्यद्भिः वैज्ञानिकै: राजनीतिविज्ञैर्वा परमाणुशक्ते: अस्त्रनिर्माण एवं विशेषत: उपयोगो विहितः । तदुत्पादितं च लोकध्वंसकार्यम् अतिघोरं निघृणं च। अयं च न विज्ञानस्य दोषः न वा परमाणुशक्तेरपराधः । पुरुषापराध: खलु एषः। प्रश्न-(क) इदं युगं कीदृशम् ? (ख) कै: आविष्कारा: विहिता:? (ग) परमाणुशक्ते: कस्मिन् उपयोगो विहित: ? (घ) क: पुरुषापराध:? प्रत्यय-ज्ञान (मतुप्) 'वाला' अर्थ को व्यक्त करने के लिए 'मतुप्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'मतुप्' प्रत्यय प्रथमान्त में होता है। 'मतुप्' का 'मत्' शेष रहता है। यह 'मत्वर्थक' या 'मत्वर्थीय प्रत्यय' कहलाता है। पुंल्लिा में 'धीमत् शब्द की तरह रूप चलेंगे। मतुप् प्रत्ययान्त शब्द मति+मतुप् (मत्) = मतिमत् (बुद्धिवाला) श्री+मतुप् (मत) = श्रीमत् (लक्ष्मीवाला) धी+मतुएं (मत्) = धीमत् (बुद्धिवाला) आयुष्+मतुप् (मत्) - आयुप्मत् (आयुवाला) जिन शब्दों के अन्त में अथवा अन्तिम वर्ण के पूर्व में 'अ' या 'आ' या 'म्' होता है तो मतुप के 'म्' के स्थान पर 'व' हो जाता है। विद्या+मतुप् (मत् = वत्) विद्यावत् (विद्यावाला) लक्ष्मी+मतुप् (मत् = वत्) लक्ष्मीवत् (लक्ष्मीवाला) बल+मतुप (मत् = वत्) बलवत् (बलवाला) -..
- - । कुछ अपवाद भी हैं जैसे भूमि, कृमि, ऊर्मि, आदि। जिस शब्द के अन्त में वर्गों के प्रथम चार वर्णों में से पूर्व में कोई हो तो 'मतु'' के 'म' को 'व' हो जाता है जैसे- सुहृद्+मतुप् (मत् = वत) सुहद्वत् (सुहृदवाला) स्त्रीलिङ्ग में नदी की तरह रूप चलते हैं- मतिमती, श्रीमती, धीमती, आयुष्मती, विद्यावती व लक्ष्मीवती आदि। नपुंसकलिङ्ग में जगत् शब्द की तरह रूप चलते हैं। इनि प्रत्यय 'वाला' अर्थ को व्यक्त करने के लिए अकारान्त शब्दों के साथ 'इनि' प्रत्यय किया जाता है। 'इनि' का 'इन्' शेष रहता है। पुंल्लिंग में शशिन्' की तरह रूप चलते हैं। स्त्रीलिङ्ग में 'नदी' की तरह रूप चलते हैं। नपुंसकलिङ्ग में 'गुणिन्' की तरह रूप चलते हैं। इनि प्रत्ययान्त शब्द सुख इनि (इन्) = सुखिन् (सुखवाला) गुण+इनि (इन्) = गुणिन् (गुणवाला) पाप+इनि (इन्) = पापिन् (पाप वाला) माला इनि (इन्) = मालिन् (माला वाला) धन+इनि (इन्) = धनिन् (धन वाला) वीणा+इनि (इन्) = वीणिन् (वीणा वाला) क्तिन् प्रत्यय यह प्रत्यय स्त्रीलिंग का वाचक बन जाता है। इससे बनने वाले पद भाववाचक संज्ञा के बोधक भी होते हैं। गै क्तिन् (ति) गीति: कृ = क्तिन् (ति) कृति: स्तु+क्तिन् (ति) स्तुतिः चि+क्तिन् (ति) चितिः पत्र-लेखन (विद्यालय सम्बन्धी) विद्यालय के प्रधान को लिखे जाने वाले पत्रों की प्रणाली कुछ भित्र है। (क) आरम्भ में स्थान एवं दिनाङ्क नहीं लिखा जाता है। (ख) पत्र के अन्त में अपने नाम के नीचे पता आदि लिखना चाहिए।
(ग) नाम के बायीं ओर तिथि का उल्लेख करना चाहिए। (घ) आरम्भ में जिसे पत्र लिखा जा रहा हो---उस पद का उल्लेख किया जाता है। पद के नीचे संस्था का नाम होगा। (ङ) सम्बोधन के लिए—मान्यवर! सम्माननीय! महोदय ! आदि का उल्लेख किया जाता है। अवकाश-प्रार्थना-पत्रम् श्रीमन्त: प्रधानाध्यापका: महोदया: राजकीय-उच्च-माध्यमिक विद्यालय:, चूरू मान्यवर! सविनयं निवेदनमस्ति-अहं ज्वरेण पीडितोऽस्मि। अतो विद्यालयमागन्तुं न शक्नोमि। कृपया दिनत्रयस्यावकाशं स्वीकृत्य मामनुग्रहीप्यन्ति। भवतां शिप्य: राधागोविन्द: वैरवा (दशमकक्षा) दिनाङ्क: २६-७-९४ (२) श्रीमत्य: प्रधानाध्यापिका: महोदया:, श्रीपोद्दार-बालिका-विद्यालयः, फतेहपुरम्। सम्माननीया:, सविनयं विनिवेद्यते यद्ज्येष्ठभगिन्या: विवाहोत्सवे व्यस्तोऽस्मि। पाणिग्रहणसंस्कारस्य तिथि: २०-७-९४ अस्ति। अतो हि दशदिनस्यावकाशं स्वीकृत्य मामनुग्रहीप्यन्ति। भवतीनां शिष्या राधा (दशमकक्षा) दिनाः १३-७-९४ (३) श्रीमन्त: प्रधानाध्यापका: महोदया: राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय:, बीकानेरम्। माननीयाः! सविनयं निवेद्यते यदहं नवमकक्षायां प्रविष्टोऽस्मि। मम पिता सामान्य-कर्मकरः।
१३४ तेषां वेतनं प्रतिमासं शतत्रयमेव । वयं पञ्चभ्रातरः। अतो हि शिक्षणशुल्कं प्रदातुमशक्तोऽस्मि शिक्षणशुल्कमुक्ति-प्रार्थनामङ्गीकृत्य मामनुग्रहीष्यन्ति श्रीमन्तः। दिनांक: १०-८-९४ भवतां शिष्य अब्दुलसत्तार (नवमकक्षा 'ब' भाग: निबन्ध-लेखन रचना की दृष्टि से निबन्ध उपयोगी विधा है। निबन्ध, प्रबन्ध, रचना, लेख आणि सभी समानार्थक हैं। किसी विषय पर अपने विचारों एवं भावों को क्रमबद्ध सुन्दर भाष में लिखने को निबन्ध कहते हैं। मुख्यत: निबन्ध तीन प्रकार के होते हैं--- (i) वर्णनात्मक निबन्ध। कल्पनात्मक निबन्ध। (iii) विवरणात्मक निबन्ध। इनके अतिरिक्त आख्यान, आलोचना, विचार आदि अनेक भेद हैं। (क) निबन्ध के शीर्षक पर मनन करें। (ख) सम्बन्धित सामग्री का संकलन करें। (ग) निबन्ध को तीन भागों में बांटना चाहिए--(१) प्रस्तावना (२) विवेचन और (३) उपसंहार। (घ) प्रस्तावना में लक्षण व महत्त्व का प्रतिपादन कीजिए। (ङ) विवेचन में गुण, दोष, स्थिति आदि का विवरण दीजिए। (च) उपसंहार में उपयोगिता व प्रभाव का उल्लेख कीजिए। (छ) भाषा सरल हो। (ज) अनावश्यक विस्तार न हो। आरम्भ में दस पंक्तियों वाले निबन्ध से अभ्यास कीजिये। अस्माकं देश: अस्माकं देशस्य नाम 'भारतम् अस्ति। अस्मिन् देशे पुरा 'भरत' नामको राजा बभूव। तस्य सम्बन्धादस्य नाम 'भारतम् जातम्। उत्तरस्यां दिशि हिमालय: पर्वत: शोभते। अन्यासु दिक्षु समुद्रा: इमं रक्षन्ति। अयं बहुषु प्रान्तेषु विभक्तः। अत्र बहूनि नगराणि स्थानानि च सन्ति।
१३५ ते क्रीडने, अयं स्वतन्त्र-देश:, अत्र अनेकधर्मावलम्बिनो जना: सानन्दं वसन्ति। अत्रत्या: जना: सरला: धर्मप्रिया: वीरा: कर्मपरायणा: सन्ति। सर्वे देशमिमं स्वगौरवं मन्यन्ते। इस प्रकार छोटे-छोटे वाक्य लिखकर रचना के विकास की ओर अग्रसर होइए। अस्माकं विद्यालयः अस्माकं विद्यालयो नगरात् बहि: रमणीये स्थाने विद्यते। सर्वे जना: अस्य भवनस्य विशालतां रमणीयतां च प्रशंसन्ति। विद्यालयं परित: रम्यमुपवनमस्ति। विद्यालये विंशतिसंख्याका अध्यापका: सन्ति। ते सस्नेहं अस्मान् पाठयन्ति। विद्यालयस्य छात्रा: प्रतिभाशालिन: मर्यादाप्रियाश्च सन्ति। छात्रा: न केवलमध्ययने एव कुशला भवन्ति, प्रत्युत प्रतियोगितासु, भाषणे, लेखने च योग्यतां प्रदर्श्य पुरस्काराणि लभन्ते। छात्राणां स्वास्थ्य-संवर्धनाय व्यायामस्य सुन्दर: प्रबन्धोऽस्ति। अस्माकं विद्यालय: आदर्शप्रतीकोऽस्ति। अपठित गद्य एकदा राजा दुष्यन्तो मृगयायै वने भ्रमति स्म। तत्र कञ्चन मृगमनुसरन् स: कण्वर्षे: श्रमसमीपम् समायात्। यावत् राजा मृगे बाणं क्षिपति तावत् कश्चित् आश्रमवासी तं वारयत्-“अहो राजन् ! अयमाश्रममृगः, एनं हन्तुं भवान् नार्हसि। राजा रथादवतीर्य श्रमवासिनञ्च प्रणम्यावदत्, अयमाश्रममृगः इति अहं न जानामि। एनं न हनिप्यामि। प्रश्न "तावत् कश्चित् आश्रमवासी तं न्यवारयत्" इस वाक्य को लट् लकार में बदलने पर रेखांकित पद के स्थान पर लिखा जाने वाला उचित पद होगा- (क) निवारयेत् (ख) निवारयति (ग) निवारयिष्यति (घ) निवारयतु। ( ) राजा मृगमनुसरन् कस्य आश्रमसमीपं समायात् ? राजा रथादवतीर्य कं प्रणम्य अवदत् ? किं राजा एनं मृगं हनिष्यति? राजा रथात् किमर्थ अवातरत् ? अभ्यास - सूक्तियों के अर्थ बतलाइए- अल्पविद्या विनाशकारी। इतो नष्टस्ततो भष्टः । गतानुगतिको लोकः । देवो दुर्बलयातमः। नैका सर्वे गुणा: । द्रव्येण सर्वे वशाः ।
१३६ २. अपठित पद्य का भाव-विवेचन कीजिए- सत्यं परित्यजति मुञ्चति बन्धुवर्ग शीघ्रं विहाय जननीमपि जन्मभूमिम्। सन्त्यज्य गच्छति विदेशमभीष्टलोकं, चिन्ताकुलीकृतमति: पुरुषोऽत्र लोके॥ ३. अपने विद्यालय की प्रधानाध्यापिका को प्रार्थना पत्र लिखिए, जिसमें पुस्तकाल की व्यवस्था के बारे में निवेदन हो। दस पंक्तियों में निबन्ध लिखिए- (क) व्यायामः। (ख) उपयोगिन: पशवः। 00 अध्याय-२८ सूक्ति प्रकरण किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् । (सुन्दर आकृतियों के लिए कौन-सी वस्तु अलंकार नहीं।) पुराणमित्येव न साधु सर्वम्। (पुराना सब कुछ अच्छा ही हो, यह सम्भव नहीं है।) प्रदं ही सर्वत्र गुणैनिधीयते। (गुण सर्वत्र स्थान बनाते हैं।) भिन्नरुचिर्हि लोकः। (सबकी अपनी-अपनी रुचि।) प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते। (बिना प्रयोजन के मूर्ख भी कोई कार्य नहीं करता) अतिलोभो न कर्तव्यो लब्धं नैव परित्यजेत्। (अति लोभ नहीं करना चाहिए, प्राप्त का त्याग नहीं करना चाहिए) ।
१३७ उसने 0 भानुः एपः॥ सर्व: स्वार्थ समीहते। (सब मतलब के गरजी हैं) बिना पुरुषकारेण दैवमत्र न सिद्ध्यति। (बिना पुरुषार्थ के भाग्य भी सफल नहीं होता) सत्यमेव जयते नानृतम्। (सत्य की जय होती है, झूठ की नहीं) उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् । (उदार चरित्र वालों के पृथ्वी ही परिवार है) ननु प्रवातेऽपि निकम्पा: गिरयः। (साहसी विपदाओं में अडिग रहते हैं) तूफान के सामने पर्वत निष्कम्प रहते हैं। अपठित पद्य सकृद् युक्ततुरंग एव रात्रिन्दिवं गन्धवहः प्रयाति। शेपः सदैवाहित भूमिभारः, पष्ठांशवृत्तेरपि এম अर्थात्-सूर्य एक बार ही अश्वों को जोतता है, वायु रात-दिन चलता रहता है। शेषनाग सदैव पृथ्वी के भार को उठाये रहने वाला है। उपज के छठे भाग से निर्वाह करने वाले शासक का भी यही कर्तव्य होता है। प्रश्न (क) रात्रिन्दिवं क: प्रयाति? (ख) शेष: किं करोति? (ग) षष्ठांशभागी कः? मद्यपस्य कुतः सत्यं, दया मांसाशिनः कुतः । कामिनश्च कुतो विद्या, निर्धनस्य कुतः सुखम्।। अर्थात्-शराबी सत्य नहीं बोलता है, मांसभक्षी के मन में दया नहीं होती है। कामी विद्या नहीं प्राप्त करता है और निर्धन सुख नहीं पा सकता है। प्रश्न-(क) कस्य सत्यं नास्ति? (ख) कस्य दया नास्ति? (ग) को विद्यां न लभते? (घ) निर्धन: किं न प्राप्नोति ? स जीवति यशो यस्य, कीर्तिर्यस्य सः जीवति। अयशोऽकीर्ति-संयुक्तो जीवन्नपि मृतोपमः ।। यस्मिजीवति जीवन्ति बहवः सोऽत्र जीवतु । कुरुते किं न काकोऽपि चऽज्या स्वोदरपूरणम् ।।
१३८ ......... अर्थात्-संसार में वही जीता है, जिसका यश जीवित है, जिसकी कीर्ति सर्क व्याप्त है। जिसका अपयश और अकीर्ति है, वह जीता हुआ भी मरे हुए के समान है। जिसके जीने से बहुत से प्राणी अपना जीवन जी रहे हैं, उसी का जीवन सार्थक है. ऐसे तो कौआ भी अपनी चोंच से अपना पेट भरता ही है। प्रश्न-(क) संसारे को जीवति (ख) अकीर्तियुक्तस्य का गति: ? (ग) काकोऽपि किं कुरुते? अपठित- गद्य इदं अस्माकं गुरुकुलम् ! एतत् नगरात् निकटे एव वर्तते। अत्रातीव वर्तते रम्यम् उद्यानम्। अस्मिन् उद्याने नानाविधा: तरव: लताश्च सन्ति। तरुषु मधुराणि फलानि वर्तन्ते। छात्राः तरून् लता: च उदकेन सिञ्चन्ति। गुरुकुलस्य निकटे एक: सरोवर: वर्तते। सरोवरस्य उदवं अतिनिर्मलं अस्ति। अत्र शीतल: सुखदश्च वायु: वहति। सरोवरस्य तटे बालका: कन्दुरेन क्रीडन्ति। दुष्टा: बालका: जले पाषाणखण्डानि क्षिपन्ति। प्रश्न १. “अस्मिन्.. .....नानाविधा: तरव: लताश्च सन्ति" इस वाक्य के रिक्त स्थान वी पूर्ति के लिए उपयुक्त पद है- (क) उद्यानम् (ख) उद्यानस्य (ग) उद्याने (घ) उद्यानेषु। २. एक: सरोवर: कुत्र वर्तते? ३. बालकाः कुत्र क्रीडन्ति? ४. जले पाषाणखण्डानि के क्षिपन्ति ? छात्रा: तरून् लताश्च केन सिञ्चन्ति? पत्र-लेखन कुछ पत्र ऐसे भी लिखे जाते हैं जिनके द्वारा हम सामान आदि के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, तथा सामान मंगवा सकते हैं, या बेचने के सन्दर्भ में जानकारी पात्र कर सकते हैं। इस प्रकार के पत्र व्यावसायिक कहलाते हैं। जैसे- पुस्तकप्रेषणाय पत्रम् श्रीव्यवस्थापक-महोदय, अजमेरा बुक कानी त्रिपोलिया बाजार, जयम्। -. ५. महोदय, भवत्प्रकाशितं 'संस्कृत-व्याकरणम्' पुस्तकमवलोकितम्। कृपया एकादश-पुस्ता निम्नसंकेते वी० पी० पी० द्वारा शीघ्रमेव प्रेषणीयानि।
१३९ पूर्णसंकेत: भवदीयः ६५, नयापुरा इकरामुद्दीन: कोटा-नगरम् (राज.) दिनांक: २५-७-९२ निमन्त्रणपत्रम् म्मान्या:! एतद् विज्ञाय भवन्तो हर्प प्राप्स्यन्ति यत् भगवतो महत्यनुकम्पया मम कनिष्टाया: ताया: 'शोभादेव्या:' पाणिग्रहणसंस्कार: अलवरवास्तव्यस्य श्रीमत: महावीप्रसादशर्मण: श्रेण श्रीनलिनेन सह १८-२-९२ दिनांके भविष्यति। भवन्तः सुकुटुम्बं समागत्य शुभाशीवदिन वर-वधूयुगलमनुग्रहीप्यन्ति। उत्तरापेक्षी दर्शनाभिलाषी राधेश्याम: राममोहनः राधेश्यामः ५, नया बाजार, भरतपुरम् कथा-लेखन निम्न बिन्दुओं के आधार पर कथाएँ लिखने का अभ्यास कीजिए- (१) कस्मिंश्चिद्........ देवशर्मा........ ब्राह्मण:................. भार्या सुतमजनयत्। स्मिन्नेव दिने नकुली नकुलम्........ मृता। सा ब्राह्मणी तं नकुलं................. परञ्च ततमेवाशंकते ........1 एकदा. .....जलकुम्भमादाय........ ब्राह्मण! जलार्थम्. कुलाद्क्षणीयः। ब्राह्मणोऽपि........ निर्गतः। अत्रान्तरे निर्गतः। अत्रान्तरे कृष्णसर्पो........। भ्रातुः- सणार्थ........ खण्डश:........। रुधिरप्लावितवदन: मातुः........ आलोक्य.... रात्मना........। इति....... जलकुम्भं चिक्षेप। (२) एकदा चत्वारो ब्राह्मणा:........ देशान्तरं........ निर्गता: सर्ने स्त्रविशारदा:. । पुस्तकानि नीत्वा........। द्वौ पन्थानौ........ महाजनो येन गतः | पन्थाः। इति........। तत्र रासभः........। द्वितीयेन...... अस्मदीयो बान्धवः । तस्य वायां........ पादौः........ उष्ट्रमवलोक्य तृतीयेन.. ........ धर्मस्य त्वरिता गतिः। तुर्थेन........ “इष्टं धर्मेण योजयेत्।" रजकः........ समायात:...... ..., प्रणा:। सचिनदी. ... एकेन आगमिष्यति तत्पत्रं तारयिष्यति. इत्युम्त्या रश्चिच्छेद... कश्चन ग्राम:... ........ निमंत्रिता: । सूत्रिका........दीर्यमत्री वनश्यति। अपर:........ मण्डका........ अतिविस्तारवितीर्ण तद् भवन चिरायुपम् । तीयः........ वाटिका:........ "छि प्वनर्धा बहुलीभवन्ति।". तोकेस्यिमाना:.. ...... स्वदेशं गताः। ....। ......
१४० . । " (३) एकस्मिन्........राजा.................स्वभावात् दानशील:. | अलसे सविशेष........ दापयति स्म। तेन....... अलसशाला........। शनैः शनैः तत्र...... आगताः । मन्त्रिभिः........ कपटेन.:. गृह्णन्ति । यथार्थान्........ परीक्षेमहि ।...... ते नियोगपुरुषा अमिं ज्वालयित्वा........ पलायिताः। चत्वारः पुरुषाः तत्रैव........ कोऽ धार्मिको नास्ति यद्.... । चतुर्थेन........। तूष्णीं तिष्ठत। श्रुत्वा नियोगिपुरुपैः...... बहिरानीताः। निबन्ध लेखन परोपकारः परेषामुपकारः इति परोपकारः । जनानां नि:स्वार्थसेवा 'परोपकार:' कथ्यते। पृथिव्यां परहितसदृशो धर्मो नास्ति। परोपकारस्यान्तर्गतानि-विद्यादानम्, धर्मशालानिर्माणम् आर्तसेवा, पतितोद्धार समाजसेवा-प्रभृति कर्माणि सन्ति। वेदव्यासेन कथितम् - 'परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।' अर्थात् -परोपकार: सर्वधर्मसार: पुण्यञ्च वर्तते। परोपकारेण मानवस्य, समाजस्य राष्ट्रस्य च लाभो भवति। अचेतना: (निर्जीवा:) अपि परोपकारं कुर्वन्ति । यथा- परोपकाराय फलन्ति वृक्षा: परोपकाराय वहन्ति नद्यः । परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥ नद्यो जलं न पिबन्ति। वृक्षा: फलानि न खादन्ति। गावः स्वयं दुग्धं न पिबन्ति किन्तु सर्वेऽपि मानवेभ्य एव ददति। अत: दीनेभ्यो धान्यम्, वस्त्रम् दातव्यम्। महर्षि-दधीचिः राजा शिविः, गौतमः, महावीरः, महात्मा गाँधी इत्यादय: सन्त: परोपकारिण: अभवन् । अतो हि सर्वे: परोपकार: कर्तव्यः। विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् सर्वेषु धनेषु विद्याधनं प्रधानमस्ति। विद्यायां सर्वे गुणा: निवसन्ति । मनुष्येभ्यो विद्याय, महती आवश्यकता उपयोगिता च विद्यते। विद्या विनयं ददाति। विद्यैव कर्तव्याकर्तव्यं जानाति । विद्यया मानव: शिक्षितः, सभ्य:, आचारशीलश्च कथ्यते। उक्तञ्च-विद्याविहीनी ना. पशुतुल्यः। विद्यया मानव: सर्वत्र पूज्यते। विद्यावतां कृते जगति किमपि न दुर्लभम् । विदेशे वा विद्या मानवं मित्रवत् रक्षति। यत्र वित्तस्यापि प्रभावो विफली-भवति, तत्र विद्यार प्रभाव: सफलीभवति। केनाऽपि कथितम्- .
९४९ 1- ज -- “विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्, विद्या भोगकरी यश: सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः । विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतं, विद्या राजसु पूज्यते नहि धनं विद्याविहीन: पशुः ।। विद्या मातेव रक्षति। पितेव हितं सम्पादयति। कान्तेव खेदमपनयति। यश: प्रसारयति, लक्ष्मी तनोति। विद्या कल्पलतेव सर्वं साधयति। विद्यावतां यश: सर्वत्र व्याप्नोति, न च धनवताम्। विद्याधनं सुरक्षितं धनमस्ति। यतो हि- न चौरहार्य न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।। चौरा विद्यां चोरयितुं न शक्नुवन्ति। शासका: तामाहर्तुं न समर्थाः । भ्रातरोऽपि विभाजने असहाया:, विद्या व्ययतो वृद्धिमायाति। संसारेऽस्मिन् यः कोऽपि आत्मानं सुखिनं द्रष्टुमिच्छति तेन विद्याधनस्य संग्रहो विधेयः। यतो हि जगति विद्याधनमेव सर्वधनप्रधानम् । सत्संगतिः। सतां साति: सज्जनानां संगति: सत्सङ्गतिः कथ्यते। सहति:---अर्थात् सज्जनैः सह निवास:। ये जना: साधवः, धर्मपरायणाः, परोपकाररता: सन्ति, ते सज्जना: कथ्यन्ते। अस्मिन् जगति सज्जनैः सह सम्मेलनं निवासो वा सत्सङ्गः, सत्सङ्गति: सर्वेषां सुखानां कारणमस्ति। महता सौभाग्येन सतां सहवासो लभ्यते। सत्सङ्गत्या जना: सुमार्ग गच्छन्ति। सुमार्गेण जनानामुन्नतिर्भवति। सत्सङ्गत्या सामान्य-जनोऽपि महत्त्वपदमलंकरोति। अनेक-कुमार्गगामिनोऽपि सज्जनानां सम्पर्कात् साधवो भवन्ति दुर्जनसङ्गतिः सदा परिहर्तत्र्या। दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालंकृतोऽपि सन्। मणिना भूषितः सर्पः किमसौ यथा-चन्दनसंसर्गेण वृक्षा: सुगन्धिता: भवन्ति, काचोऽपि स्वर्णसंसर्गेण दिव्यां द्युति दधाति, कीटा: पुष्पैः सह देवानां शिरः समारोहन्ति, तथैव कुमार्गगामिन: सज्जनैः सह सुखिनो भवन्ति। सज्जनानां मैत्री सदा वर्धनशीला भवति। तेषां सहति: सदा कर्तव्या। सत्समति: कल्पलतेव सर्वं साधयति। उक्तञ्च- जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यम, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकोति। प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिम्, सत्सहतिः कि करोति पुंसाम्॥ वयं सामाजिका: समाजे वसामः, तत्र भिन्नाचिहि लोकः, समाजेन का सम्पर्कमप्यावश्यकम्। साधूनां जनानामेव सम्पर्केण सुखिनो भविष्यामः । अतो हि सत्साति: न भयङ्करः।। । चेत: कधय न विधेया।
१४२ - भावनात्मकमैक्यम् मानवो यत्र जन्म लभते तत्स्थानं तस्य राष्ट्र कथ्यते। मानवश्चान्यराष्ट्रस्थोऽपि स्वराष्ट्र कदापि न विस्मरति। सर्वेषां हृदये स्वराष्ट्रप्रति समादरो भवति “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" उक्तिरियं सुप्रसिद्धा वर्तते। श्रीमदमृतवाग्भवाचार्यैः राष्ट्रलक्षणं कृतम्- समानसंस्कृतिमतां यावती पितृपुण्यभूः। तावती भुवमावृत्य राष्ट्रमेकं निगद्यते॥ यत्र मानवस्य बन्धुबान्धवा निवसन्ति, यस्यानजलेन शरीरपोषणं भवति तत् तस्य राष्ट्रं भवति। राष्ट्रस्योनत्यै राष्ट्रभक्तिभावनाया आवश्यकता वर्तते। राष्ट्रभक्ता एव राष्ट्रमन्नतिशिखरमारोहन्ति। भारतस्येतिहास: राष्ट्रभक्तानां गाथाभि: परिपूर्णो वर्तते। भारतीयसंस्कृतेर्वैशिष्टयमिदमेववर्तते यत्सा मानवान् सर्वविधपापेभ्यो निवारयति, सर्वान् सन्मार्गमुपनयति। सर्वेषां हृदयेषु सत्यस्य, अहिंसाया:, धर्मस्य, दयायाः, धैर्यस्य त्यागस्य च सन्देशं स्थापयति विश्वबन्धुत्वस्यापि। अस्माकं देश: परतन्त्रबन्धनान्मुक्तो जातः। विभित्रधर्मावलम्बिनां वीराणां बलिदानरस्माभिः स्वातन्त्र्यमधिगतम्। अस्माभि: लोकतन्त्रात्मके राष्ट्र सम्प्रभुतासम्पन्नं नूतनं संविधानं विनिर्मितम्, स्वसंविधाने धर्मनिरपेक्षताया: समुद्घोषणा कृता । येन वयं विश्वे समादृताः सन्तः राष्ट्रस्योन्नतिसाधने संलग्नाः। यद्यपि अस्माकंराष्ट्र भिन्नधर्मावलम्बिनो भिन्नजातीयाश्च जना विभित्रप्रान्तेषु निवसन्ति तेषां समस्याश्च भिन्ना: सन्ति किन्तु राष्ट्रं तु सर्वेषामेकमेव वर्तते। एते एकत्वभावनया युक्ता: कार्यं कुर्वन्ति। इयमेकता तेषु बलमादधति। यथा क्षुद्रतृणै: रज्जुः, जलबिन्दुभिः सागरः, मृत्तिकाकणैः महापर्वतः, तन्तुसमूहै: सुदृढः पटो भवति- इत्येष एकताया महिमा वर्तते। अत एव ऋग्वेदे प्रतिपादितं यत्सर्वे जना: एकत्वभावनया युक्ता: स्युः, तेषां मनांसि, विचाराश्च समाना: स्युः। समानया भावनया राष्ट्रियमैक्यं सुचिरं स्थापयितुं शक्यते। प्रत्यय-ज्ञान (अण) अपत्यार्थ (सन्तान, पुत्र, पौत्र व वंश आदि बताने) के लिए 'अण्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। 'अपत्य' शब्द का अर्थ है- 'सन्तान'। 'अण्' का 'अ' शेष रहता है। आदि स्वर को वृद्धि हो जाती है। जैसे- मगध+अण् (अ) = मागधः । वसुदेव+अण् (अं) वासुदेवः। मनस्+अण् (अ) = मानसः। बन्धु+अण् (अ) = बान्धवः । यहाँ अन्तिम 'उ' के स्थान पर 'ओ' गुण करके 'अ' आदेश हुआ है। " यदु+अण् (अ) = यादवः। मनु+अण् (अ) = मानवः।
१४३ - रघु+अण् (अ) = राघवः। युवन् अण् (अ) = यौवनम्। प्रज्ञा+अण (अ) - प्राज्ञः । सार्वनामिक दृष्टि से युष्मद् एवं अस्मद् सर्वनामों से भी अणू प्रत्यय होता है। अस्मद् (मामक)+अण् = मामकः (मेरा) युष्मद् (तावक)+अण् = तावकः (तेरा) प्यञ् प्रत्यय यह स्वार्थिक प्रत्यय कहलाता है। इस प्रत्यय के जुड़ने पर अर्थ में किसी प्रकार का अन्तर नहीं होता है। ‘प्यञ्' में से 'य' शेष रहता है। शब्द के आदि स्वर को वृद्धि हो जाती है। जैसे- अलस+घ्यञ् (य) = आलस्यम्। समर्थ+प्यञ् (य) = सामर्थ्यम् । निपुण+ष्यञ् (य) = नैपुण्यम्। सुन्दर+ष्यञ् (य) = सौन्दर्यम्। चपल+ध्यञ् (य) = चापल्यम्। सुख+घ्यञ् (य) = सौख्यम्। मलिन+घ्यञ् (य) = मालिन्यम्। मूर्ख+प्यञ् (य) = मौर्यम्। तृच् प्रत्यय लुट् लकार के अन्य पु० एकवचन के ता के समान किसी भी धातु से तृच् (४) प्रत्यय होता है। जैसे- कृ+तृच् (तृ) कर्तृ = कर्ता भृ+तृच् (तृ) भर्तृ = भर्ता गम्+तृच् (४) गन्तृ = गन्ता सोढ्+तृच् (४) सोढ़ = सोढा अभ्यास • १. अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए, जिसमें एक सौ रुपये धनादेश से भिजवाने की प्रार्थना हो। २. निबन्ध लिखिए--- (क) हिमालयः (ख) अहिंसा परमो धर्मः। ३. दानवः, शैशवः, साफल्यम्, चतुर्थ:-शब्दों में प्रत्यय बताइए।
१४४ अनुवाद कीजिए- धर्म जीवन का सुख है। धर्म से अर्थ मिलता है। अर्थ से इच्छाएँ पूरी होती हैं। इच्छाएँ पूरी होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रत्येक को अपना धर्म निभाना चाहिए। आचरण पहला धर्म है। धर्म के बिना जीवन व्यर्थ है। धर्म ही मनुष्यता का प्रतीक 000 अध्याय-२९ सूक्ति प्रकरण असतो मा सद् गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। (असत्य से सत्य की ओर ले जाओ, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाओ, मृत्यु से जीवन की ओर ले जाओ) जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। (जननी (माता) और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है) साहसे श्री: प्रतिवसति। (हिम्मत सफलता है) न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं है) आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् । (अपनी आत्मा के विपरीत कार्य दूसरों के लिए भी मत करो) मनुष्याः स्खलनशीलाः। (मनुष्य गलती का पर्याय है) सम्भावितस्य चाकीर्तिमरणादतिरिच्यते। (अपयश मृत्यु से भी अधिक दुःखदायी है) यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी। (जिसकी जैसी सूरत उसकी वैसी मूरत) १४५ न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः। (सोते हुए शेर के मुँह में हरिण स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं) काले दत्तं वरं ह्यल्पं अकाले बहुनापि किम् ? (का वर्षा जब कृषि सुखाने)। असमय की वर्षा व्यर्थ है।) इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः । (स्वयं अपने गुणों की प्रशंसा करने से इन्द्र का भी महत्त्व घट जाता है।) ते हि नो दिवसा गताः। (सुख के दिन बीत गये) महाजनो येन गतः स पन्थाः। (बड़ों का अनुगमन उचित है) क्षते क्षारप्रक्षेपः। (घाव पर नमक छिड़कना) सुखमुपदिश्यते परस्य। (पर उपदेश कुशल बहुतेरे) प्रत्यय ज्ञान (तरप एवं तमप्) दो की तुलना में एक की विशेषता बताये जाने के लिए तरप् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'तर' का तर शेष रहता है। तीनों लिंगों में रूप चलते हैं। जैसे- लघु+तरप् (तर) = लघुतरः। राम लक्ष्मण से सुन्दर है (राम: लक्ष्मणात् सुन्दरतरः) महत्+तरप् (तर) = महत्तरः । धनिन्+तरप् (तर) = धनितरः। युवन्+तरप् (तर) = युवतरः । दीर्घ+तरप् (तर) = दीर्घतरः । तमप् बहुतों में से एक का वैशिष्ट्य बताने के लिए 'तमप्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'तम' का तम शेष रहता है, जैसे- लघु+तमप् (तम) = लघुतमः। वह सभी में श्रेष्ठ है-स: सर्वेषु श्रेष्ठतमः । राम भाइयों में सबसे बड़ा है- राम: भातृषु ज्येष्ठतमः। महत्+तमप् (तम) = महत्तमः । दीर्घ+तमप् (तम) = दीर्घतमः । सुन्दर+तमप् (तम) = सुन्दरतमः । युवन्+तमप् (तम) = युवतमः।
कथा लेखन त्रयो धूर्ताः गच्छन् ।रे ....... -- ... एक: ब्राह्मण:स्वस्कन्धेअजम्. ।मार्गेधूर्ताः........अपहर्तुम्... विप्रं प्रथम: धूर्तः........ भो ब्राह्मण ! किमिति सारमेयं........ मूढ़ ! नायम्... तत: द्वितीय: धूर्त:. तत: तृतीय: धूर्तः.. .... । स: ब्राह्मण: अजंकुक्कर मत्वा........ उपायेन सर्वं शक्यम् एकस्मिन् कानने...... हस्ती। तं........ शृगाला:. .... केनाप्युपायेन........ भोजनं भविष्यति। वृद्धशृगालेन........ स्वबुद्धेः प्रभावाद्.. स्वबुद्धेः प्रभावाद्........। स: वंचक:........ गत्वा........ उवाच- भवादृशा:........ गौरवम्। पशुभिः........ अटवीराज्येऽभिषेक्तुम्. । तद् तथा लग्नवेला........ आगम्यताम्।. ... आगम्यताम्।........ धावन महापंके... ........ विपत्काले........ शृगालेन........ पुच्छकावलम्बनं........ उत्तिष्ठ।........ निमग्नः........ भक्षितः। जवाहरलालनेहरूः भारतस्य हृदयसम्राट्. प्रधानमन्त्री........ विभूतिरासीत्। अस्य........ १८८९........ नवम्बर... ........चतुर्दश................. पं० मोतीलाल: .................इग्लेंड....... वाक्कील । राष्ट्रसेवायाम् ..........। कारावासं स्वीचकार। स्वतंत्रताया:........। १९४७ त:........ मई-मासस्य २७ तारिकापर्यन्तं... .......... दिवमगात्। अपठित-गद्य सर्वभाषासु संस्कृतभाषा अतिप्राचीना वर्तते। पुरा संस्कृतभाषा सर्वसाधारणानां जनानां भाषा आसीत् परं वैदेशिकशासकानां साम्राज्ये इयं भाषा हासोन्मुखी बभूव। इयं भाषा सर्वभाषाणां जननी ज्ञान-विज्ञान-विकासिनी-अमर-भारती पुराणनयंधर्मसाहित्यप्रकाशिनी वर्तते। इयं भाषा व्याकरण-निकष-परिष्कृता, कोमलपदान्विता अस्ति। संस्कृतोन्नतिं विना स्वतन्त्रभारतस्य प्रगति: न भवितुमर्हति। च वर्तते। प्रश्न १. भाषा सर्वभाषाणां जननी वर्तते" रिक्तस्थान की पूर्ति के लिए उचित पद है-- (क) इदम् (ख) इयम् (ग) अयम् (घ) एतत्। ( ) २. अतिप्राचीना भाषा का? ३. . "व्याकरणनिकषपरिष्कृतां" पदस्य कः अर्थः ? ४. इयं भाषा कदा हासोन्मुखी बभूव ? ५. स्वतन्त्रभारतस्य प्रगति: कां विना न भवितुमर्हति ?
१४७ वा -- निबन्ध-लेखन संस्कृतभाषा संस्कृतं सर्वभाषाणां जननी। परमप्राचीनाऽपि स्वदीप्त्या प्रकाशते। संस्कृतभाषा सर्वासां भाषाणां जननी अस्तीति विद्वांसः कथयन्ति। अद्यापि भारतीय-जीवने संस्कृतभाषाया अपरिमितप्रभावोऽवलोक्यते। संस्कृतं विना मानवजन्म निरर्थकमस्ति। अस्माकं महनीया संस्कृतिरस्यामेव प्रतिबिम्बिता दृश्यते। संस्कृतभाषायामेव ज्ञानविज्ञानयोर्निधिविद्यते। भारतीया एव न, प्रत्युत पाश्चात्या: विद्वांसोऽपि संस्कृतं प्रति श्रद्धावन्तः । वेदाः, स्मृतयः, पुराणानि, रामायणम्, महाभारतञ्च यावन्तो वाङ्मयनिबन्धा उपलभ्यन्ते सर्वे ते संस्कृतभाषायामेव सन्ति। संस्कृतभाषायाः साहित्यं समुद्रवद् व्यापकम्; तत्र नानाविधानि काव्यरत्नानि सन्ति । संस्कृतभाषासूक्तीनारत्नाकरः। नैतिकी शिक्षा संस्कृतेनैव सम्भाव्यते। सम्प्रति संस्कृत-प्रचार: प्रसारो अपेक्षणीयः। सर्वकारेण संस्कृत-भाषाध्ययनमनिवार्यं कृतम्। अस्या उन्नतये शासकीयप्रयत्न: सम्पाद्यते। सर्वेपामस्माकं कर्तव्यमस्ति यत् वयं संस्कृतस्य प्रचार प्रसारे प्रयत्नं कुर्याम। अस्माकं भारतराष्ट्रम् अस्माकं भारतीयानां देशो भारतवर्पनाम्ना प्रसिद्धः। पुरा भरतनामा महर्षिः बभूव । तस्य सम्बन्धादयं देश: भारतं कथ्यते। अस्य पूर्वस्यां ब्रह्मदेश:, दक्षिणस्यां हिन्दमहासागर:, उत्तरस्यां हिमालय:, पश्चिमायाञ्च पाकिस्तानदेशस्य विध्य-नीलगिरि-हिमालय-प्रभृतयः पर्वता: राजन्ते। पर्वतेभ्यो नद्यः प्रवहन्ति। ता: भूमिभागं शस्य-श्यामलं कुर्वन्ति। भारतदेशो बहुषु प्रान्तेषु विभक्तः। अत्र नानाधर्मावलम्विनो नानाभाषाभाषिणो नानावेशवन्तो निवसन्ति, परं सर्वे भारतीया: स्वराष्ट्र प्रति समर्पिता:। अस्माकं संविधाने धर्मनिरपेक्षता घोषिता, अतो हि सर्वे सुखिन: सन्ति। भारतस्य गौरवं सर्वप्राचीनमस्ति। सभ्यतायाः प्रथमाविर्भाव: भारते एवाभूत्। अस्मिन् देशे मर्यादापुरुषो रामः, कर्मयोगी कृष्णः, अहिंसापथप्रदर्शको महावीरः, महात्मा बुद्धः, स्वातन्त्र्योपासकाः शिवाजी-प्रताप-दुर्गादास-भगतसिंह-चन्द्रशेखर-गाँधी-नेहरू-सुभाषादय: महापुरया: साता: । अयं देश: १९४७ वर्षस्य अगस्तमासस्य पंचदशतारिकायां स्वतन्त्रोऽभवत्। अयं देशो मानवकल्याणाय सततं यतते। दिष्ट्याऽस्य प्रधानमन्त्री थ्रीमान् पी.वी. नरसिंहराव: विश्वस्य प्रमुखनेतृणामन्यतम आसीत्। सम्प्रति देशस्यार्थिकः, सांस्कृतिकः, सामाजिकः, औद्योगिक विकास: पर्याप्त: समभूत्। भारतस्य मानवकल्याणाय महती भावनेयं विद्यते- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभान्भवेत् ।। भाग.। अत्र १४८ वर्षर्तुः. ग्रीष्मानन्तरं वर्षर्तुः समायाति। अयमेव ऋतु: वर्षाकाल इत्यभिधीयते। ग्रीष्मकाले सूर्यकिरणैः प्रतप्ता: सर्वे प्राणिन: विकला भवन्ति। कुत्रापि हरीतिमा न दृश्यते, तडागा:, नद्य:, वाप्यादयः सर्वे शुष्यन्ति। वर्षाकालं दृष्ट्वा सर्वे नन्दन्ति। आकाशे नीलपयोदाः दृश्यन्ते, गर्जन्ति वर्षन्ति च। मेघेषु विद्युत् द्योतते, मनोहारीणि इन्द्रधनूंषि प्रतीयन्ते। मयूरा: नृत्यन्ति, दर्दुरा: भाषन्ते, पक्षिण: उड्डीयन्ते, जीवा: विवरेभ्यो: बहिरागत्य विचरन्ति। वर्षाजलै: स्नाता वसुन्धरा नितरां मोदते। सर्वत्र हरीतिमा विभाति। निर्झरा: मधुरं नदन्ति, नद्य: वेगेन प्रवहन्ति। वर्षाप्रभावादेव धरेयं सस्यश्यामला सजला च सञ्जायते। वर्षाकाले सर्वे नवोत्साहेन कार्यरता: भवन्ति। सर्वेषु नवजीवनं संचरति। कृषकाणां कृते वर्षर्तुः जीवनमेव। कृषका: स्व-स्व-क्षेत्रेषु बीजानि वपन्ति, अंकुराणि आरोपयन्ति, गीतानि गायन्ति च। यदि समये वृष्टिर्न स्यात् तर्हि प्राणिनां जीवनं संकटग्रस्तं भवेत्। वर्षाभावात् महादुर्भिक्षमापतति। वर्षा जीवनम्, वर्षाभावः मृत्युः। वर्षाकाले मार्गा: अवरुध्यन्ते। अतिवृष्ट्या विनाशो जायते, यथा भवनानि पतन्ति, क्षेत्राणि जलप्लावितानि भवन्ति नगराणि विनष्टानि जायन्ते। इन्द्रस्य कृपयैव वर्षा यथासमयं वर्षति। समाज-सेवा मानव: सामाजिक: प्राणी अस्ति। समाजे परस्परं सेवाभावना अनिवार्या। अस्मिन् न कोऽपि एतादृश: मानवः, य: समाज-सेवाया: महत्त्वं न जानाति। समाजस्य सेवा मानवसेवा प्राणिसेवा वा विद्यते। समाजस्य सेवा मानवताया: परिचायिकाऽस्ति। ये जना: समाजसेवां कुर्वन्ति ते सर्वाधिकं पुण्यं प्राप्नुवन्ति। समाजसेवया सेवका: महान्तो भवन्ति महत्त्वपदं च प्राप्नुवन्ति। अनेके महापुरुषा: संजाता: ये जीवनं सेवायै समर्पितवन्तः। समाजसेवाया: प्रकारा: विविधाः सन्ति। आर्तसेवा, दीनदया, निर्बलानां साहाय्यं, लेखनं, अध्यापनं, दिशानिर्देशनं, मैत्रीभावना, सहयोगः, धर्मशाला-विद्यालय-कूप-वापी निर्माणादीनि कार्याणि समाज-सेवाऽन्तर्गतानि सन्ति। केचन दीनेषु दयां कुर्वन्ति, अन्ये निःशुल्कं पाठयन्ति, इतरे आतुराणां चिकित्सां कुर्वन्ति, केचन धनिन: धर्मभवनानि निर्मान्ति। महान्तः स्वभावत एव समाज-सेवका: भवन्ति। मालवीय-गांधी-नेहरू- बिनोवानां जीवनसेवार्थमेवाऽसीत्। समाजसेवका एवसमाजस्योन्नतिकारका: भवन्ति। अतो हिसमाजसेवा कर्तव्या। जनसंख्या-समस्या १९९१ तमे वर्षे विश्वस्य जनसंख्या ५ अर्बुद ४० कोटिपरिमिता सञ्जाता वर्तते। विश्वे प्रतिक्षणं १५० बालकाः समुत्पद्यन्तेभारते च ४८ बालका: । प्रत्यहं प्रवर्धमाना जनसंख्या 6 भारतसदृशस्य विकासशीलदेशस्य कृते मुख्या समस्या वर्तते। स्वतन्त्रराष्ट्रस्य विकासाय या अर्थव्यवस्था निर्धार्यते सा जनसंख्याविस्फोटेनावरुध्यते। जनसंख्याधिक्येन अनेका: समस्याः समुत्पद्यन्ते। प्राकृतिकसंसाधनेषु न्यूनता समापतति। उत्पाद्यमानानां वस्तूनां वितरणे न्यूनता महर्घता च सञ्जायते। सर्वेषां जनानां कृते कार्यस्य, आवासस्य, शिक्षा-चिकित्साया: भोजनवस्त्रादीनाञ्च व्यवस्था कर्तुं न पार्यते। सर्वकारस्यार्थव्यवस्था चञ्चूर्यते। विविधपञ्चवर्षीययोजनासु कृतायामपि व्यवस्थायां जनसंख्याधिक्यात् लक्ष्यपूर्तिर्न जायते। जनसंख्यानियन्त्रणाय सर्वकारः प्रयतते। एतदर्थमनेके कार्यक्रमा: समायोजिता वर्तन्ते। अशिक्षिता: जना लघुपरिवारस्य महत्त्वं नोरीकुर्वन्ति । ग्रामीणमहिलासु जनसंख्याशिक्षाप्रसारण जनसंख्यान्यूनीकरणाय जनजागरणं कर्तुं शक्यते। साधनानां दिग्दर्शनेन, नीतीनां क्रियान्वयनेन कुरीतिनिवारणेन च समस्यानां समाधानं कर्तुं पार्यते। परिवार प्रति स्वोत्तरदायित्वस्य शिक्षा प्रदेया येन जना लघुपरिवारस्य महत्त्वं स्वीकुर्युः । सम्प्रति जनसंख्यानियन्त्रणं मानवाधीनं वर्तते। एतादृशाः सरला उपाया साम्प्रतं समुपलब्धा वर्तन्ते येन जनसंख्यावृद्धिर्नियन्त्रयितुं शक्यते। शिक्षितास्तु स्वयमेव सावधाना: सजाता: सन्ति। जनसंख्यानियन्त्रणस्य समस्या भारते राष्ट्रिया समस्या वर्तते। जनसंख्याधिक्येन राष्ट्रस्य विकासश्चावरुध्यते। सम्प्रति “आवां द्वौ, आवयोः द्वौ" अयमुद्घोषः सर्वत्र श्रूयते। सर्वेषां राष्ट्रवादिनामिदं पुनीतं कर्तव्यं यत्ते जनसंख्यासमस्यां समाधातुं प्रयतेरन् येन भारतराष्ट्र समृद्ध भवेत्। परिवार नियोजनम् सामान्येन निखिले जगति विशेषतश्च भारते जनसंख्या प्रतिसंवत्सरम् आक्रामकरूपेण परिवर्धते। यथा भारते जनसंख्या-वृद्धिः, न तथा खाद्यसामग्रीवृद्धिः। खाद्य-सामग्र्यभावे जनसंपोषणं न संजायेत। अन्नाभावे शरीरापचयः, मनोबलक्षय:, स्वाभिमानावनतिः। परिवार नियोजनाभावे जनसंख्यावृद्धौ खाद्याभावेन सममेव जीवनस्तरस्यावनति:, कार्यक्षमता-न्यूनत्वम्, रोग-शोक-ताप-सन्ताप- विपत्पात-क्लेश-दैन्य-हीनत्वभावनादयो विवृद्धिम् अश्नुवते। । सन्तति-निरोधाभावे न पारिवारिकी शान्तिः । सन्तति-सुख-साधनार्थ माता-पितरौ महान्तं क्लेशम् अनुभवत: । मातॄणां तु बालसंरक्षणादिषु स्वास्थ्यमेवोपक्षीयते प्रतिदिनम् प्रतिपतं चावश्यकताया वृद्ध्या, लाभस्य साधनानां चाभावेन, जीवनमेव नारकीयं संजायते। साधनानां अभावे बालानां समुचितपोषणाभावः, शिक्षाया अभाव:, अन्नपानाद्यभावः, जीवनस्तरन्यूनत्वं च संजायते। परिवार नियोजनार्थं सर्वकारेण बढ्यो योजना: प्रवर्तिताः । प्रतिक्षेत्रं प्रतिनगरं प्रतिग्राम बहुविधया रीत्या परिवार नियोजनप्रचारो दृश्यते धूयते च। परिवार नियोजन सन्ततिनिरोधी १५० . वा सिद्धान्तरूपेण ग्राह्यम्। व्यवहाररूपेण च संयमपालनमेव सन्ततिनिग्रहस्य सर्वोत्कृष्ट उपाय:। एष: उपाय: प्रयुक्तो व्यवहृतश्चेत् तदा सन्ततिनिरोधने सममेव लोकजीवनं लोककर्म लोक-व्यवहृतिश्च सदा श्रेयसे भविष्यति। अपठित-गद्य (१) अस्माकं देशे कृषियोग्यक्षेत्राणामभावो नास्ति। तथापि सत्यमिदं यत् पंचविंशति-प्रतिशतं कृषियोग्य क्षेत्रमकृष्टमेव वर्तते। जनताया आलस्यमेव तत्र कारणम्, यत्ने कृते तत्सर्वं शस्यश्यामलं भवितुमर्हति। यत्र-तत्र तृणकमुत्पद्यते, तत्र-तत्रानं शस्यमुत्पादयितुं शक्यते इति वैज्ञानिक: सिद्धान्तः। परमं सौभाग्यमेवास्माकं देशस्य भविष्यति । यत् सर्वं तृणक्षेत्रं शस्यक्षेत्रे परिवर्तते। प्रश्न-१. अस्माकं देशे कियत् क्षेत्रमकृष्टमेव ? २. वैज्ञानिकानां किं मतम् ? ३. अस्माकं सौभाग्यं किं भविष्यति ? (२) परोपकारो हि महान् धर्मः । सत्पुरुषा: कदापि न स्वार्थतत्परा भवन्ति, अपितु परार्थसाधने स्वजीवनस्य साफल्यं मानयन्ति। ते तु परकीयं दुःखं स्वकीयमेव मन्यन्ते यतन्ते च तन्नाशाय। ते च असहायेभ्य: साहाय्यं, निर्धनेभ्यो धनं ज्ञानरहितेभ्यश्च ज्ञानं ददति। परहितसाधनं हि 'परमो धर्म: । परोपकारस्तु धर्मस्य सारः । अत एव सर्वशास्त्रेषु विविधेषु च मतेषु परोपकारस्य वर्णिता स्मरणीयं चात्र विषये भगवतो वेदव्यासस्य सारगर्भितं वचनम्।' प्रश्न-~१. किं नाम जीवनसाफल्यम् ? २. सत्पुरुषाः कथमाचरन्ति ? ३. वेदव्यासस्य किं वचनम् ? अभ्यास १. तरप् एवं तमप् प्रत्यय में क्या अन्तर है ? २. निबन्ध लिखिए- (क) कृषकजीवनम्। (ख) विजयादशमी। (ग) विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः । ३. अनुवाद कीजिए- दण्डक वन में एक मुनि रहता था। उसने कौए के मुख से गिरती हुई एक चुहिया को देखा। दया करके उसे अपनी कुटी में ले आया। चुहिया की इच्छानुसार उरे बिल्ली बना दिया। बिल्ली से कुतिया और कुतिया से व्याघ्री बना दिया। वह व्यानी बनने पर मुनि को ही खाने के लिए दौड़ी। मुनि से फिर उसे चुहिया बना दिया। 000 अध्याय-३० शब्द-प्रयोग अधिकारवन्त: (अधिकारी गण)-अधिकारवन्त: कार्याणि निरीक्षन्ते। अनपत्यः (नि:सन्तान)-अनपत्यस्य भवनं शून्यम्। अनाहूतः (बिना बुलाया)-अयं अनाहूतोऽपि आगतः । अनसूयः (ईर्ष्या रहित)-अनसूय: सदा सुखं लभते। शरणवत्सलः (शरण देने वाला)-भारतदेश: सदा शरणवत्सलः। अवाङ् मुखः (नीचा मुँह किए हुए)-सोऽवाङ्मुख: स्थित: किमपि नाऽवदत् । अविवेकता (अज्ञान)-अविवेकता परमापदां पदम् । आधयः (रोग)---वामा कुलस्याधयः । आपन्नसत्त्वा (गर्भिणी)-आपनसत्त्वा शकुन्तला पतिगृहं यास्यति। आर्जवम् (सरलता)—आर्जवं विदुपां भूषणम्। ऋजवः (सरल)-ग्रामीणा: ऋजवो भवन्ति। उज्झितम् (छोड़ा हुआ)-उज्झितमहं पुनर्न गृह्णामि । उपरोध: (रुकावट) कर्मणि उपरोधो न सोढव्यः । क्षणभंगुरः (विनाशशील)-क्षणभंगुरोऽयं संसारः। महान्तः (बड़े लोग)-महान्तो जना: विपत्कालेऽपि स्वलक्ष्यं न त्यजन्ति । सर्वत: (चारों ओर)-चरित्रस्य रक्षा सर्वत: विधेया। भूपणम् (गहना) -वाणी मनुप्यस्य भूपणम्। शिक्षेरन् (सीखना चाहिए) स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथिव्यां सर्वमानाः । निरामयाः (रोग रहित) सर्वे सन्तु निरामयाः । उत्तरस्याम् (उत्तर में) -उत्तरस्यां हिमालयो विराजते। परित: (चारों ओर) ग्रामं परित: सस्यश्यामला धरित्री राजते। दारिद्र्यम् (गरीबी)-प्रायशो जना: दारिद्यं गर्हन्ति। आसक्तिः (लगाव)-धनस्यासक्तिः दुःखं प्रददाति। कुटुम्बकम् (परिवार)---उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् । समया (निकट)---गंगायमुनासंगमं समया प्रयागो वर्तते। हीन: (रहित)-स विद्यया हीनः । अर्थ: (प्रयोजन, क्या)---धनेन कोऽर्थः २ किम् (प्रयोजन)-विवादेन किम ? स्वदते (अच्छा स्वाद लगना)-याला दुध बाला दुःधं स्त्रो।
१५२ रोचते (अच्छा लगना)-मह्यं मोदकं रोचते। अलम् (बन्द करना) कलहेनालम्। अलं कलहेन। अलम् (समर्थ)-~-मल्लो मल्लाय अलम्। निलीयते (छिपना)-समाजात् निलीयते चौरः। जायते (उत्पन्न होना)-बीजात् अंकुर: जायते। पाहि (बचाओ)-पाहि दुष्टात्। दण्डयति (सजा देना)-राजा चौरं शतं दण्डयति। पठितवान् (पढ़ा)-अहं वेदं पठितवान्। प्रार्थितः (प्रार्थना की गई)-शिष्येण गुरुः प्रार्थितः । अनृतम् (झूठ)-सत्यमेव जयते नानृतम्। स्वार्थम् (मतलब)-सर्व: स्वार्थं समीहते। जरा (बुढ़ापा)-जरा रूपं हरति। अजीर्णः (अपच)-अजीर्णे भोजनं विषम् । मद्यपः (शराबी)---मद्यपा: किं न जल्पन्ति। शूरः (वीर)-शतेषु जायते शूरः । पराश्रयः (पराधीनता)-कष्टः खलु पराश्रयः। दुर्लभः (दुष्प्राप्य) -दुर्लभ: स्वजनप्रियः। श्रेयसे (कल्याण के लिए)-एष विधिः युप्माकं श्रेयसे। काकिणी (कौडी)—नाहं गृह्णामि काकिणीमपि। औत्सुक्यम् (उत्कण्ठा)-ग्रामीणानामौत्सुक्यं नि:सीमं भवति। आहूयताम् (बुलाओ) आहूयताम् स छात्रः । वञ्चित: (ठग लिए गये)-वञ्चित: खलु भवान् । भूयः (फिर)---नैवं भूयोऽपि वाच्यम्। कोलाहलः (शोर) -किमयं कोलाहलो नगरमध्ये ? कुकृत्यम् (कुकर्म)- -किमेतद् भवता कुकृत्यमनुष्ठितम् ? समायाताः (आ रहे हैं)-कुतो भवन्त: समायाता:? अग्रे (आगे)-नाऽहमग्रे यास्यामि। शाठ्यम् (धूर्तता)--शठे शाठ्यं समाचरेत्। निर्मक्षिकम् (शून्य, एकान्त)-निर्मक्षिकं कृत्वा रहस्यं भण। अशक्तः (शक्तिहीन)-अशक्त: जन: सुखं न लभते। यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार)~~-मानवा: यथाशक्ति कार्यं कुर्वन्तु। जननी (जननी)-संस्कृतभाषा सर्वासां भाषाणां जननी। उद्यमेन (परिश्रम से)---उद्यमेन-कार्याणि सिध्यन्ति।
.१५३ बुभुक्षा (भूख) बुभुक्षा पापानां मूलमस्ति। विश्वविश्रुतः (विश्व विख्यात) -श्री नेहरू: विश्वविश्रुतो नेता आसीत्। रुद्यते (रोना) -किमर्थं भवती रुद्यते? तुतोष (प्रसन्न हुआ)--भ्राता भगिनीं विलोक्य भृशं तुतोष । विमाता (सौतेली माता)—विमाता बालिकायां नास्निात्। स्वीचकार (स्वीकार किया)—पिता पुत्रस्य प्रार्थनां स्वीचकार। कलहप्रिया (झगड़ालू)—सा कलहप्रिया आसीत्। प्रयतमानोऽपि (प्रयत्न करने पर भी)—स प्रयतमानोऽपि किमपि नाससाद। प्रोवाच (कहा)—प्रहसन् वृद्धः प्रोवाच-तुष्टोऽस्मि। रुग्णः (बीमार)—बालक: रुग्णोऽभवत्। मलीमसाः (गन्दे)-गृहस्य कोष्ठा: मलीमसा अभवन् । समारोहः (उत्सव)-नगरे संस्कृतदिवससमारोह: सम्पन्नः । विरचितम् (रचा हुआ)-कालिदासविरचितं मेघदूतकाव्यम् अस्ति। (इस प्रकार अन्य शब्दों के प्रयोग द्वारा अभ्यास किया जाना चाहिए) अव्यय-शब्दों का प्रयोग एव सज्जनानां सम्पत्तय: परोपकाराय एव भवन्ति। खलु- सर्व खलु इदं ब्रह्म। किलकिल ते निर्मलं वपुः । अपि सर्वेऽपि सुखिनः सन्तु । च-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। यथा यथा रोचते तथा विधीयताम्। किं-किं नाम सत्यम् ? तु-उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। अहो- अहो! अद्य ते दर्शनम्। चिरम्-चिरं पठित्वाऽपि अबोधः । प्रात:-प्रात: सूर्य: उदेति। कारक शब्दों का प्रयोग धिक्-धिक् देशद्रोहिणम्। प्रति-चन्द्रं प्रति पश्यति। विना-ज्ञानेन विना जीवनं व्यर्थम्। सह-पुत्रेण सह आगत: पिता। अलम्-मल्लाय मल्ल: अलम्। नमः---कृष्णाय नमः।
१५४ स्वस्ति--पुत्राय स्वस्ति। क्रुध्-राम: रावणाय क्रुध्यति। तरप्रामात् श्याम: श्रेष्ठतरः । तमप्—कविषु कालिदास: श्रेष्ठतमः। अंगविकार-कर्णेन बधिरः। प्रत्ययों का वाक्यं प्रयोग तरप्-रामात् केशव: श्रेष्ठतरः । तमप-कक्षायां राम: श्रेष्ठतमः। क्त्वा-छात्र: पठित्वा गृहम् आगच्छति। ल्यप् स: कार्यं विधाय गच्छति। तुमुन्-श्याम: पठितुम् आगच्छति। व्यावहारिक शब्द आक्रीडी (खिलाड़ी)---आक्रीडी यश: लभते। द्यूतकारः (जुवारी)—द्यूतकार: सर्वं नाशयति। लवणान्नम् (नमकीन)-मह्यं रोचते लवणान्नम्। पत्रवाहकः (डाकिया)-पत्रंवाहक: पत्राणि वितरति। प्रतिभूः (जामिन)–कस्ते प्रतिभू: ? प्रतोलिका (गली)—प्रतोलिकासु यामिका: भ्रमन्ति। द्रावकवर्तिका (मोमबत्ती) -कुत्र वर्तते द्रावकवर्तिका? सम्मार्जनी (झाडू)-सम्मार्जनीम् आनंय। हसन्ती (अंगीठी) -हसन्ती चेतय। मसितूलिका (डाटपेन)--मसितूलिकया मा लिख। उपहासचित्रम् (कार्टून)-विचित्रमिदं उपहासचित्रम् । भ्रष्टापूपः (टोस्ट)—चायेन साकं भ्रष्टापूपं भक्षय। प्रावृत्तम् (लूंगी)-निशायां प्रावृत्तं धारय। तमाखुवर्तिका (सिगरेट) -तमाखुवर्तिका हानिप्रदा। यामिकः (पहरेदार) यामिका रक्षन्ति नगरम्। सन्धितम् (अचार)-आपणाद् सन्धितमानय। निर्णेजकः (ड्राईक्लीनर)-अत्र सौचिका:, एजका: निर्णेजकाश्न पानपात्रम् (प्याला)-त्वं पानपात्राणि प्रक्षालय। वृहतिका (ओवरकोट)--शीतकाले वृहतिका: धारयन्ति जनाः । लेखपाल: (पटवारी)---लेखपाल: ग्रामप्रशस्तिपत्रं प्रेपयति। कङ्कतिका (कंघी)--सा कंकतिका आनयति।
१५५ वधिक: (जल्लाद)-वधिक: अपराधिनं मारयति। पाखण्डिकः (ढोंगी)-पाखण्डिक: जनं व्यथते। भारिकः (पलेदार)-भारिक: भारं वहति। जल्पाक: (बकवादी) -जल्पाक: मानं न लभते। दस्युः (डाकू) -अत्र दस्यवः न भ्रमन्ति। आवपनम् (बाल काटना)-नापित: शिशो: आवपनं करोति । इस प्रकार अन्य शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य रचना की जा सकती है। अपठित-पद्य (क) गच्छन् पिपीलको याति योजनानां शतानि च। अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति॥ (ख) यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्॥ नारी विनैव मर्योऽपि कर्तुं किमपि न प्रभुः ।। (ग) यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।। न तस्य निप्कृति: शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि। (घ) अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण ! रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।। (ङ) दृष्टिपूतं न्यसेत्पादम्, वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्। सत्यपूतां वदेत् वाणीम्, मन:पूतं समाचरेत्।। (च) यदि सन्ति गुणा: पुंसां विकसन्त्येव ते स्वयम्। न हि कस्तूरिकामोदः शपथेन विभाव्यते॥ (छ) सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्स: सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्।। (ज) वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ: प्रतिपत्तये। जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी॥ (झ) गायन्ति देवा: किल गीतकानि, धन्यास्तु हे भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्ग-भूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।। () पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। कार्यकाले समुत्पने न सा विद्या न तद्धनम्। (ट) माता वैरी पिता शत्रुर्येन बालो न पाठितः । न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।। इन श्लोकों का उच्चारण करते हुए भाव-विवेचन कीजिए।
अनुवाद (अभ्यास कीजिए) (१) आकाश में दिनभर सूर्य विचरण करता है। भारत की रक्षा करना भारतीयों परम कर्तव्य है। केशव स्नातक परीक्षा में सर्वप्रथम आया है। वे सुरक्षा कोष में सर्व दान करेंगे। हमारे स्कूल में हैडमास्टर व पन्द्रह मास्टर हैं। उन्हें अपने गुरुओं को नमस्ट करना चाहिए। एक मास में तीस दिन होते हैं। (२) तुम इस मुकदमे में गवाह बनो। कल सुबह उन दोनों के बीच झगड़ा हुआ। बोलना चाहिए। वे हमारे साथ नहीं चलेंगे। अध्यापकों के बिना पढ़ाई बन्द है। सरए के साथ गाँव वाले जायेंगे। शिक्षा मन्त्री से मिलकर व्यवस्था के लिए कहेंगे। उसने अखन पढ़ते हुए कहा--'आज मन्त्री से मिलना सम्भव नहीं है। . जल बहुत था, एक वन में अकेला सिंह रहता था। वह प्रतिदिन अनेक पशुओं को मारता थ जंगल के सभी प्राणी उसके इस कृत्य से दुःखी थे। एक दिन वे सभी मिलकर सिंह पास पहुँचे और निवेदन करने लगे—'एक पशु से आपका पेट भर सकता है। आप हर राजा हैं, आपको कष्ट करना होता है। हममें से प्रतिदिन एक पशु आपकी सेवा में आ रहेगा।' सिंह ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। (४) गर्मियों के दिन थे। आकाश में उड़ता हुआ एक कौआ वृक्ष पर आ बैठा। व बहुत प्यासा था, किन्तु पास में कहीं भी जल नहीं दिखाई दे रहा था। वृक्ष के नी एक घड़ा.रखा हुआ था। कौवे ने घड़े के भीतर देखा, नीचे लेकिन व हताश न था। एक-एक कंकरी घड़े में गिराने लगा, धीरे-धीरे जल घड़े के मुँह तक आया कौए ने जल पीकर अपने प्राण बचाये। (५) किसी समय भारत में उत्तानपाद नामक राजा थे। उनके दो रानियाँ थीं। बड़ी रान का नाम सुनीति और छोटी का नाम सुरुचि था। सुनीति के बेटे का नाम ध्रुव ओ सुरुचि के बेटे का नाम उत्तम था। राजा को सुरुचि से बहुत स्नेह था। एक दिन ः अपने पिता की गोद में आ बैठा तो सुरुचि ने कहा- “मूर्ख बच्चे! यह गोद तेरे लिए नहीं है।" ध्रुव रोने लगा उसकी माता ने कहा- "रोने से कोई लाभ नहीं है। ईश्वर ही सबका साथी है।" माँ की बात सुनकर वह ईश्वर की खोज में निकल पड़ा। उस तपस्वी को भगवान् ने दर्शन दिये। (६) महारानी अहिल्या इन्दौर की रानी थी। रानी के पति एवं पुत्र मर चुके थे। राम था १५७ सम्भालना रानी के लिए सहज न था। रानी अपने राज्य पर शासन करने लगी। जगह-जगह रायें बनवाई, प्याऊ खुलवाई, गरीबों के लिए अनाज व कपड़े की व्यवस्था की। वह जा में देवी की तरह पूजी जाने लगी। रानी ने तीस वर्ष तक राज्य किया। आज भी जनी की मूर्ति को सभी लोग पूजते हैं। (७) भारत की राजधानी दिल्ली है। दिल्ली बहुत बड़ा नगर है। यह यमुना नदी के किनारे पर बसा हुआ है। बड़े-बड़े रेलवे स्टेशन हैं। पालम व सफदरगंज में हवाई अड्डे हैं। दिल्ली में अनेक दर्शनीय स्थान हैं। जिनमें लाल किला, कुतुबमीनार, लौहस्तम्भ, राष्ट्रपति भवन, पुराना किला, जामा मस्जिद व गुरुद्वारा आदि हैं। दिल्ली बहुत प्राचीन "गर है। युधिष्ठिर ने इसे इन्द्रप्रस्थ के नाम से बसाया था। (८) पाण्डवों के तीसरे भाई अर्जुन का एक पुत्र था। उसका नाम अभिमन्यु था। अभिमन्यु की माता का नाम सुभद्रा था। सुभद्रा श्रीकृष्ण की बहिन थी। वह एक पढ़ी-लिखी और 'योग्य नारी थी। अर्जुन भी उस समय का बहुत बड़ा वीर था। अभिमन्यु ने अपने माता-पिता और मामा से बहुत कुछ सीखा था। वह अस्त्र-शस्त्र चलाने और युद्ध करने की विद्या में बहुत निपुण था। उसने कौरवों के चक्रव्यूह को तोड़कर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। (९) किसी नगर में एक सेठ कपड़े की दुकान करता था। उसकी दुकान का एक नौकर बीड़ी-सिगरेट पिया करता था। सेठ ने कई बार समझाया कि "भाई, बीड़ी-सिगरेट पीना बुरा है।" एक दिन सेठ घर गया हुआ था, नौकर ने बीड़ी पीना आरम्भ कर दिया। 'अचानक सेठ के आने पर उसने बीड़ी को कपड़ों के नीचे दबा लिया। दुकान लग गई। सेठ का सब कुछ नष्ट हो गया। (१०) मनुष्य सभी भाई-भाई हैं। इनमें न कोई बड़ा और न कोई छोटा है। इसमें से कोई अछूत नहीं है, सभी को समान हक है। ऊँच-नीच का भेद-भाव अपराध है। जो अपने भीतर घृणा को जन्म देता है, उसके प्रति सभी घृणा करते हैं। जाति प्रथा समाज के लिए अभिशाप है। जो पिछड़ गये हैं, उन्हें साथ लेकर चलना ही सच्चा धर्म है। (११) संसार में न कोई हिन्दू हैं और न कोई मुसलमान। न कोई ईसाई ओर न कोई पारसी। हम सभी मनुष्य हैं। मानवता ही हमारा धर्म है। हमें एक-दूसरे को भाई मानना चाहिए। धार्मिक भावना साम्प्रदायिकता को जन्म देती है। धर्म के नाम पर युद्ध होते हैं और इन युद्धों में विनाश होता है। मनुष्य वही है, जो दूसरों के लिए स्वयं को अर्पित में आग - कर दे।
१६० भारतस्य यद्यपि भारतवर्षः विभिन्नेषु प्रान्तेषु विभक्त आसीत्। काममत्र विभिन्नधर्मावलम्बिनो नानाभाषाभाषिणश्च जना निवसन्ति परन्तु स्वराष्ट्र प्रति संकटं वीक्ष्य सर्वे राष्ट्रियभावनया युक्ता भूत्वा समग्रस्य राष्ट्रस्य रक्षणं कुर्वन्ति। स्वातन्त्र्यप्राप्तये भारतीया बलिदानशतं कृत्वा विश्वस्येतिहासे प्रसिद्धिमभजन्। . सभ्यता अतिप्राचीना, गौरवञ्चास्य राष्ट्रस्य विश्वप्रसिद्धम्। शस्यश्यामलायामस्यां भूम्यां देवा अपिजन्म कामयन्ते। इन्द्रादिदेवान ध्वजदशरथदुष्यन्तादिभिः सह मैत्रीभाव आसीत्। सर्वमिदं राष्ट्रियत्वेनैव सञ्जातमासीतं। यत्र राष्ट्रियत्वं विद्यते। तत्र संघठनमपिजायते। यत्र संघटनं वर्तते तत्र सिद्भिरपि निश्चिता। यदि वयं स्वदेशसीमारक्षणं, सौहार्दै, समानतां, आर्थिकी समुन्नति, शान्तिं, तुष्टिं पुष्टिञ्चाभिलषामश्चेत्तर्हि राष्ट्रियत्वस्य संरक्षणमावश्यकम्। राष्ट्रियत्वरक्षणेन विभिन्न- धर्मावलम्बिषु सौहार्दै सौमनस्यादि मानवीयगुणानामुत्तरोत्तरं विकास: सम्भविष्यतीति निश्चप्रचम्। अभ्यास (पुनरावृत्ति) १. "समोऽहम्" में सन्धि है? (क) यण् सन्धि (ख) दीर्घ सन्धि (ग) अयादि सन्धि (घ) विसर्ग सन्धि (ङ) वृद्धि सन्धि। मति शब्द के रूप लिखिए। ३. सह धातु के लङ् लकार के रूप लिखिए। ४.. प्रकृति-प्रत्यय बताइये- पठितः, गन्तुम्, सेवमानः, आगच्छन्, स्मृत्वा, आकर्ण्य, दीर्घतमः । ५. उपसर्ग बताइये- ::. निर्वाहः, पराजितः, उत्कण्ठा, प्रकर्षः, अगुगमनम्। ६... कौन-सी विभक्ति होगी?-- (क) अविकारी शब्द होने पर। (ख) सह शब्द का प्रयोग करने पर। (ग) स्मृ.धातु के रहने पर। .... (घ) अभितः शब्द के होने पर। (ङ) रुच् धातु के रहने पर। २ . 00 १६१ अध्याय-३१ . च निबन्धानां रूपरेखा अस्माकं ग्राम: भारतदेशो ग्रामाणां देशः । तत्रैव प्राचीना संस्कृति: विराजते। ग्रामस्य स्थितिः। वर्तमानं वैशिष्टयम्। उन्नत्यै क्रियमाणा: प्रयत्नाः । सत्यमेव जयते किं नाम सत्यम् ? यथार्थकथनं, लेखनं, सम्भाषणं, क्रियमाणं वा सत्यमभिधीयते। संसारे सत्यमेव विशिष्यते, जयति च। सत्येनैव लोकस्थितिः । सत्येनैव प्रतिष्ठा, गौरवञ्च वर्धते। यतो हि सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्। न हि सत्यात्परं किंचित्। अश्वमेधसहस्रञ्च सत्यं तुलया धृतम्। अश्वमेधसहस्राद् हि सत्यमेव विशिष्यते ॥ न हि सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं महत् । अतिथि-सत्कारः भारतीय-संस्कृतौ ‘अतिथिदेवो भव' इति कथ्यते। अतिथि: भगवतो मूर्तिः वर्तते। अतिथे: पूजनात् महत्फलं प्राप्यते। बालो वा यदि वा वृद्धो युवा वा गृहमागतः । पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोऽतिथि: ।। यथाशक्ति कर्तव्यो विधेय:- तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सन्ता। एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ अतिथिसत्कारकरणेन यशः, लभ्यते। भग्नाश: अतिथिर्यस्य गृहात् प्रतिनिवर्तते, स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा गच्छति। विज्ञानस्य प्रगतिः आवश्यकता नवाविष्काराणां जननी कथ्यते। मानवबुद्धि: नूतनवस्तूनां आविष्कारे धर्मः, पुण्यञ्च प्रवर्तते। अस्यां शताब्दयां अनेके वैज्ञानिक-आविष्कारा: संजाताः । सर्वाणि कार्याणि विज्ञानेन सञ्चालितानि भवन्ति। विज्ञानस्य कतिपये प्रसिद्धाऽऽविष्कारा: (रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन आदि) तेयां लाभाश्च।
३. घातकशस्त्रेभ्यो मानवविनाशस्य आशंका। ४. विज्ञानस्योपयोग: मानवहिताय भवेत्। विद्यार्थि-जीवनम् १. मानवजीवने विद्यार्थिजीवनस्यातीवमहत्त्वंवर्तते। विद्यार्थिजीवनं विद्यार्जनकाल:कथ्यते। जीवनस्य साफल्याय ब्रह्मचर्याश्रमस्य आवश्यकता। २. विद्यालयानां महत्त्वम्। शिक्षाया उपयोगिता। प्रथमे वयसि नाधीतं, द्वितीये नार्जितं धनम्। तृतीये न तपस्तप्तं, , चतुर्थे किं करिष्यसि ।। ३. छात्रजीवने, विशेष-नियमाः भवन्ति। प्रातरुत्थाय विद्याध्ययनं, विद्यालय-गमनं, नियताहारविहारौ, अनुशासनञ्चेति। साम्प्रतं छात्राणां स्थिति: शोचनीया। स्त्री-शिक्षा १. समाजे नारीणां स्थानम्। प्राचीनभारते स्त्रीणां स्थितिः। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। 'पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।' पुत्रस्तु स्थविरे रक्षेन्न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥" २. । स्त्रीणामध्ययनस्य उपयोगिता। शिक्षा सर्वमान्या। सर्वेषां शिक्षाप्रात्यधिकारः। दीपमालिका भारतीयानां चत्वार: उत्सवाः । तेषु एक: दीपमालिकोत्सवः । २. कार्तिककृष्णपक्षस्य अमावस्यायां तिथौ दीपमालिका सम्पन्ना भवति। ३. अस्मिन् दिने सर्वे प्रसन्ना: दृश्यन्ते। सर्वत्र आमोदः प्रमोदश्च संलक्ष्यते। रात्रौ लक्ष्मीपूजनं ४. - भवति। ४. अस्मिन् दिने दीपानां पंक्तयः प्रकाशन्ते। होलिका १. पर्वणां महत्त्वम्। फाल्गुनमासस्य शुक्ल पक्षे पूर्णिमायां तिथौ होलिकोत्सवः । २. वसन्तकालस्य रमणीयता। ३. होलिकोत्सवस्य इतिहास:--प्रहलादकथा। ४. होलिकोत्सवस्य विशिष्टकृत्यानि। ५. अस्मिन् दिने सभ्यताया: प्रदर्शनं विचारणीयम्। विजया-दशमी १. पर्वणां महत्त्वम्। आश्विनमासस्य शुक्लपक्षस्य दशम्यां तिथौ विजयादशमीसमारोहः । २. शरदऋतुसौन्दर्यम्।
१६३
४.
-
३. राम-रावणयोर्युद्धे रामविजयप्रतीकदिवसः।
क्षत्रियाणां प्रमुखोत्सवः।
५. रामादिवद् व्यवहर्तव्यम् न च रावणादिवत्-इत्युपदेशः ।
स्वप्रेयान् कविः
(कालिदासः)
१. संस्कृत-साहित्ये अपूर्वोऽयं कविः ।
पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठित-कालिदास:।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव ।।
'कविकुलगुरु: कालिदासः' उपाधिविभूषितः ।
२. कवेर्जीवनविषये निश्चयेन किमपि कथयितुं न शक्यते।
३. त्रीणि नाटकानि-अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्। त्रीणि
काव्यानि-रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, मेघदूतञ्च । अभिज्ञानशाकुन्तलं जगति प्रसिद्धम्।
सर्वत्र प्रसादगुणसम्पन्ना भाषा। भारतीय-संस्कृति-समन्वितं कवितोद्देश्यम् ।
स्वप्रियपुस्तकम्
श्रीमद्भगवद्गीता
१. श्रीमद्भगवद्गीतायाः माहात्म्यम्।
"गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।'
गीतायाः उपदेशः।
३. कर्मणो वैशिष्टयम्।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।"
"योग: कर्मसु कौशलम्।"
सम्प्रति गीतायाम् उपदिष्टमार्गस्य आवश्यकता।
२.
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१६४ अध्याय-३२ छन्द-परिचय जहाँ अक्षर, मात्रा और विराम का विशेष नियम हो, उसे 'छन्द' कहा जाता है। छन्द दो तरह के होते हैं वर्णिक छन्द और मात्रिक छन्द। जिनमें वर्णों (अक्षर) की संख्या व लघु-गुरु वर्गों का स्थान व क्रम नियत हो, वे वर्णिक छन्द कहलाते हैं। जिनमें मात्राओं का ही परिगणन हो, वे मात्रिक छन्द कहलाते हैं। गण-नियम 'य मा ता रा ज भान स ल गा: गा: इस नियम में क्रमश: यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण, (आठ गण) लघु एवं दीर्घ वर्ण हैं। यगण 155 मगण . SSS तगण SSI रगण 515 जगण 151 भगण 5।। नगण सगण 11.5 गुरु - 55 -- 55 SS लघु। इन्द्रवज्रा यह वर्णिक छन्द है। इसका लक्षण है- "स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः।" इसके प्रत्येक चरण में ग्यारह वर्ण तथा क्रमश: तगण, तगण, जगण और अन्त में दो गुरु अक्षर होते हैं- |ISI अर्थो हि कन्या परकीय एव संप्रेष्य परिग्रहीतुः। जातो ममायं विशदः प्रकामम् प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा॥ विशेष- चरण के अन्त में आने वाला लघु भी गुरु माना जाता है। उपेन्द्रवज्रा यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: जगण, तगण, जगण और अन्त में दो गुरु अक्षर होते हैं। प्रत्येक चरण में ग्यारह वर्ण होते हैं। तामद्य -- १६५ त्वमेव बन्धुश्च ISI SS | 15 ISS त्वमेव माता च च पिता त्वमेव सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥ उपजाति SS यह वर्णिक छन्द है। इसके अधिकतम तीन व न्यूनतम एक चरण इन्द्रवज्रा या द्रवज्रा के होते हैं। दोनों छन्दों के मिश्रण से यह बनता है। लक्षण अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजी पादौ यदीयावुपजातयस्ता:।" ISIS ऽ ।। ISS तमध्वरे विश्वजिति क्षितीशं (उपेन्द्रवज्रा) ss I'S 5.|| 5 | SS निःशेष विधाणित कोष जातम्। (इन्द्रवज्रा) 151 ।।5 | SS उपात्त विद्यो गुरु दक्षिणार्थी (उपेन्द्रवज्रा) 5 sss II.S! Ss कौत्स: प्रपेदे वरतन्तु शिप्य: । (इन्द्रवज्रा) द्रुतविलम्बित यह वर्णिक छन्द है, इसमें नगण, भगण, भगण और रगण होता है। प्रत्येक चरण बारह वर्ण होते हैं। लक्षण-"द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।" 11 15 ।। 5 यदि यथा वदति क्षितिप स्तथा त्वमसि किं पितुरुत्कुलया त्वया। अथ तु वेत्सि शुचि व्रतमात्मन: पतिकुले तव दास्यमपि क्षमम्।। वंशस्थ यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: जगण, तगण, जग और ग होता है। बारह वर्ण होते हैं। लक्षण-"जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।" 151551 15 | 515 श्रिय:कुरूगामधिपत्य पालनी 115 15 १६६ वनेचरः॥ 155 प्रजासु वृत्तिं यमयुक्त वेदितुम्। स वर्णलिङ्गी विदित: समाययो युधिष्ठिरं द्वैतवने भुजङ्गप्रेयात यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में चार यगण होते हैं। बारह वर्ण होते हैं। लक्षण-"भुजङ्गप्रयातं चतुर्भिर्यकारैः । ISS 155. 155 महेश: सुरेशः परेश: दिनेश: निशेशो युगेशोऽसि देव। त्वमेवासि देवेश देवाधिदेवः प्रभो पाहि पाहि द्रुतं पापभूमेः॥ वसन्ततिलका यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: तगण, भगुण, जगण, जगण और अन्त में दो गुरु होते हैं। चौदह वर्ण होते हैं। लक्षण-"ज्ञेया वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।" परात्मा उदाहरण SSI समर्थः ॥ s}}} ISIS 5 अभ्भोजि नीवन निवास विलासमेव हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता न त्वस्य दुग्धजलभेदविधौ प्रसिद्धां वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ मालिनी यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश:, नगण, नगण,मगण, यगण था यगण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में १५ वर्ण होते हैं और आठवें व सातवें अक्षर (यति होती है। लक्षण-"ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।" उदाहरण MISS S वनमपथि श्री मदम्भो जखण्डं त्यजति मुदमुलूक: प्रीतिमांश्चक्रवाकः। उदयमहिमरश्मिर्याति शीतांशुरस्तं हत विधिलसितानां ही विचित्रो विपाकः।। 15S 155 कुमुद वनमपश्रि १६७ मन्दाक्रान्ता SSS SS यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और अन्त में दो गुरु होते हैं। यह १७ वर्ण का छन्द है। इसमें चार, छ: तथा सात अक्षर पर यति होती है। लक्षण-“मन्द्राक्रान्ताम्बुधिरसनगैर्मोभनौ तौ गयुग्मम्।' उदाहरण 5 || || 55। SSI कश्चित्का न्ताविर हगुरु णास्वाधि कारात्प्र मत्त: शापेनास्तंगमितमहिमा वर्पभोग्येण भर्तुः। यक्षश्चक्रे जनकतनया स्नानपुण्योदकेषु स्निग्धच्छाया तरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु।। शिखरिणी यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में एक लघु और एक गुरु अक्षर होता है। इसमें छठे और बाद में ग्यारहवें अक्षर पर यति होती है। १७ वर्ण होते हैं। लक्षण-रसै: रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलाग: शिखरिणी। उदाहरण 155 ।।।1SS11 15 करेश्ला घ्यस्त्यागः शिरसि गुरुपा दप्रण यिता मुखे सत्या वाणी विजयि भुजयोर्वीर्यमतुलम् । हदि स्वेच्छा वृत्तिः श्रुतमधिगतैकव्रतफतं विनाप्यैश्वर्येण प्रकृति महतां मण्डनमिदम् ।। शार्दूलविक्रीडित यह वर्णिक छन्द है। इसके प्रत्येक चरण में क्रमश: मगण, सगण, जगण, संगण, तगण तगण और अन्त में एक गुरु अक्षर होता है। इसके प्रत्येक चरण में बारहवें और बाद में सातवें अक्षर पर यति होती है। लक्षण-"सूर्याश्वैर्यदि मः सजो सततगा: शार्दूलविक्रीडितम्।' उदाहरण IISI ऽ ! 15 551 55 लोभश्चे दगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति कि पात: सत्यं चेत्तपसा च किं? शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् ? सौजन्यं यदि किं निजै: ? सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनै: ? सद्विद्या यदि किं धनैः ? अपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना? sss SSS १६८ आर्या यह मात्रिक छन्द है। इसके पहले और तीसरे चरण में १२-१२ मात्राएँ होती और दूसरे चरण में १८ एवं चौथे में १५ मात्राएँ होती हैं। लक्षण- यस्या पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीये स्युः। अष्टादशद्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या॥ उदाहरण 5. 55 5 55 १२ मात्रा (१८ मात्रा (१२ मात्रा (१५ मात्रा किं कार्यम्, सत्कार्यम् S :S S SI SSI 55 किं धार्यम्, सत्यमात्मना वृत्तम्। 51 । 5.5. 55 कुत्र विधेया भक्तिः 5155555 तत्त्वज्ञाने राष्ट्रपम्माने अनुष्टप् इस छन्द के प्रत्येक चरण में आठ अक्षर होते हैं। प्रत्येक चरण में छठा अद गुरु एवं पाँचवाँ अक्षर लघु होता है। दूसरे और चौथे चरण का सातवाँ अक्षर लघु तर ५. पहले और तीसरे चरण का सातवाँ अक्षर गुरु होता है। लक्षण- श्लोके षष्ठं गुरुर्जेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्। द्विचतुष्पादयोर्हस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥ उदाहरण-वर्ण ५ 155 151 अथ सीतामनुज्ञाप्य कृतकौतुकमंगलः। ISS 151 निश्चक्राम सुमन्त्रेण सह रामो निवेशनात्।। अभ्यास १. तीनों वर्ण लघु होते हैं:- (क) मगण में। (ख) सगण में। (ग) नगण में। (घ) यगण में। २. प्रत्येक श्लोक में चरण होते हैं (क) दो। (ख) चार। (ग) एका (घ) तीन। ()
१६९
( )
-
३. समवृत्त कहते हैं:
(क) जिनमें चारों चरण समान हों।
(ख) जिनमें द्वितीय व चतुर्थ चरण समान हों।
(ग) जिनमें चारों चरण असमान हों।
(घ) जिनमें प्रथम व तृतीय चरण समान हों।
४. विसमवृत्त का उदाहरण है:-
(क) वंशस्थ।
(ख) आर्या।
(ग) मालिनी।
(घ) पुप्पिताग्रा।
छन्द का प्रयोग किया जाता है
(क) गद्य में
(ख) संवाद में
(ग) पद्य में
(घ)
कथा में।
६. लघु एवं दीर्घ की परिभाषा लिखिए।
७. उपजाति छन्द किन दो छन्दों के मेल से बनता है ?
मात्रिक छन्द किसे कहते हैं।
यति किसे कहते हैं?
()
५
.
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८.
९.
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परिशिष्ट-१ धातु रूप १७० धातु अट् (घूमना) अर्जु (कमाना) अर्ह (योग्य होना) - अस् (होना) आप् (पाना) इप् (चाहना) लट् अटति अर्जति अर्हति अस्ति आप्नोति इच्छति लोट अतु अर्जतु अर्हतु अस्तु आप्नोतु इच्छतु आटत आर्जत् आर्हत् आसीत् आप्नोत् ऐच्छत् अटिष्यति अर्जिष्यति अर्हिष्यति भविष्यति आप्स्यति एषिष्यति विधिलिङ् अटेत् अर्जेत् अर्हेत् सामान्य लुइ आटीत् आर्जीत् आहीत् अभूत् स्यात् आपत् आप्नुयात् इच्छेत् ऐषीत् • लङ् अकथयत् कहना] अकथयत धातु कथ (कहना) कम्प (कांपना) कारा (चमकना) कुप (क्रोध करना) सामान्य लुङ्ग अचकथत् अचकथत. अकम्पिष्ट अकाशिष्ट अकम्पत अकाशत (करना) कृप (जोतना) लट् लोट् कथयति कथयतु कथ्यते कथयताम् कम्पते कम्पताम् काशते, काश्यते काशताम् कुप्यति कुप्यतु करोति करोतु कुरुते कुरुताम् कर्पति कर्पतु क्रीणाति क्रीणातु क्रीणीते क्रीणीताम् क्षालयति क्षालयतु क्षालयते क्षालयताम् खनति खनतु खादति खादतु गणयति गणयतु गणयते गणयताम् गति गच्छतु अकुप्यत् अकरोत् अकुरुत अकर्षत् अक्रीणात् अक्रीणीत लूट जययिप्यति कथयिष्यते कम्पिप्यते काशिष्यते कोपिष्यति करिष्यति करिष्यते कक्ष्यति क्रेष्यति क्रेष्यते क्षालयिष्यति क्षालयिष्यते खनिष्यति खादिष्यति गणयिष्यति गणयिप्यते गमिष्यति विधिलिङ् कथयेत् कथयेत कम्पेत काशेत कुप्येत् कुर्यात् कुर्वीत कर्षेत् क्रीणीयात् क्रीणीत क्षालयेत् क्षालयेत खनेत् खादेत् गणयेत् गणयेत गच्छेत् १७१ पारीदना) अकुपत् अकार्षीत् अकृत अकात्ि अक्रेषीत् अक्रेष्ट अचिक्षलत् अचिक्षलत अखनीत् अखादीत् अजीगणत् अजीगणत अक्षालयत् (ो अक्षालयत अखनत् (धोना)J मान् (पोदना) माद (खाना) गण (गिनना) गम् (जाना) अखादत् अगणयत् अगणयत अगच्छतू अगमत् L धातु गै (गाना) / लट् गायति गृहाति लोट गायतु गृहातु गृहीताम् ग्रह (लेना) गृहीते चर् (चलना) ..चल (हिलना) चि लक अगायत् अगृहात् अगृहीत अचरत् अचलत् अचिनोत् अचिनुत अचिन्तयत् अचिन्तयत अचोरयत् अचोरयत (जुनमा)] सामान्य लुङ् अगासीत् अग्रहीत् अग्रहीष्ट अचारीत् अचालीत् अचैषीत् अचेष्ट अचिचिन्तत् अचिचिन्तत लुट् गास्यति ग्रहीष्यति ग्रहीष्यते चरिष्यति चलिष्यति चेष्यति चेष्यते चिन्तयिष्यति चिन्तयिष्यते चोरयिष्यति चोरयिष्यते जेष्यति जीविष्यति ज्ञास्यति ज्ञास्यते उड्डीध्यते चरति चलति चिनोति चिनुते चिन्तयति चिन्तयते चोरयति चोरयते जयति जीवति जानाति जानीते उड्डीयते विधिलिङ् गायेत् गृहीयात् गृहीत चरेत् चलेत् चिनुयात् चिन्वीत चिन्तयेत् चिन्तयेत चोरयेत् चोरयेत जयेत् जीवेत् जानीयात् जानीत उड्डीयत चलतु चिनोतु चिनुताम् चिन्तयतु चिन्तयताम् चोरयतु चोरयताम् जयतु जीवतु जानातु जानीताम् उड्डीयताम् चन्त । चिन्त (सोचना), चुर (चुराना) जि (जीतना) जीव् (जीना) अजयत् अजीवत् अचूचुरत् अचूचुरत अजैषीत् अजीवीत् अज्ञासीत् अज्ञास्त उड्डयिप्ट (जानना] '(जानना). उत्+डी (उड़ना) अजानात् अजानीत उड्डीयेत लोट् ल धातु ताड़ (पीटना) ताडयतु अताडयत् सामान्य लुइ अतीतडत् अतीतडत अताडयत अतूतुलत् ताला] ताडयताम् तोलयतु तोलयताम् तरतु अतोलयत् अतोलयत अतरत् 7 (तैरना) त्यज् (छोड़ना) त्वर (जल्दी करना) त्यजतु लट् ताडयति ताडयते 'तोलयति तोलयते तरति त्यजति त्वरते दण्डयति दण्डयते दिशति दिशते दीप्यते दोन्धि अतूतुलत अतारीत् अत्याक्षीत् अत्वरिष्ट अत्यजत् विधिलिङ् ताडयेत् ताडयेत तोलयेत् तोलयेत तरेत् त्यजेत् त्वरेत दण्डयेत् दण्डयेत दिशेत् दिशेत दीप्येत त्वरताम् अत्वरत अदण्डयत् लुट् ताडयिष्यति ताडयिष्यते तोलयिष्यति तोलयिष्यते तरिष्यति त्यक्ष्यति त्वरिष्यते दण्डयिष्यति दण्डयिष्यते देक्ष्यति देक्ष्यते दीपिष्यते .धोक्ष्यति धोक्ष्यते द्रक्ष्यति धाविष्यति अददण्डत् देना ] अदण्डयत अददण्डत १७३ (कहना) दण्डयतु दण्डयताम् दिशतु दिशताम् दीप्यताम् दोग्धु (दण्ड देना) दिर (कहना) दीप (चमकना) अदिशत् अदिशत अदीप्यत अधोक् अदिक्षत् अदिक्षत अदीपिष्ट अदुग्ध (दुाना) हर (देखना) पाव (दौड़ना) दुग्ध पश्यति धावति दुग्धाम् पश्यतु दुयात् दुहीत पश्येत् धावेत् अधुक्षत् अधुक्षत अद्राक्षीत् अधावीत् अपश्यत् अधावत् धावतु धातु लङ् धृ- - अधरत् (रखना)] लोट् धरतु धरताम् अधरत अनन्दत् अनमत् अनश्यत् अनयत् जाना सामान्य लुक अधार्षीत् अधृत अनन्दीत् अनंसीत् अनशत् अनैषीत् अनेष्ट अपाक्षीत् नन्दतु नमतु नश्यतु नयतु नयताम् पचतु पचताम् पठतु पततु अनयत लट् धरति धरते नन्दति नमति नश्यति नयति नयते पचति पचते पठति पतति पिबति पालयति पालयते पीडयति पीडयते नन्द् (प्रसन्न होना) नम् (झुकना) नश् (नष्ट होना) नी (ले जाना) पच (पकाना) पठ् (पढ़ना) पत् (गिरना) पा (पीना) पाल (पालना) पीह (दुख देना). अपचत् (पकाना)] धरिष्यति धरिष्यते नन्दिष्यति नंस्यति नशिष्यति नेष्यति नेष्यते पक्ष्यति पक्ष्यते पठिष्यति पतिष्यति पास्यति पालयिष्यति पालयिष्यते पीडयिष्यति पीडयिष्यते विधिलिङ् धरेत् धरेत नन्देत् नमेत् नश्येत् नयेत् नयेत पचेत् पचेत पठेत् पतेत् पिबेत् पालयेत् पालयेत पीडयेत् पीडयेत अपचत अपक्त १७४ अपठत् अपाठीत् अपातत् पिबतु (पालना पालयतु अपतत् अपिबत् अपालयत् अपालयत अपीडयत् अपीडयत पालयताम् अपात् अपीपलत् अपीपलत अपीपिडत् अपीपिडत (इस देना पीडयतु पीडयताम् ल सामान्य लुङ अपूरयत् (मना) लट् पूरयति पूरयते पृच्छति प्रीणाति बध्नाति लोट् पूरयतु पूरयताम् पृच्छतु प्रीणातु अपूरयत लुट् पूरयिष्यति पूरयिष्यते प्रक्ष्यति प्रीणयिष्यति भन्स्यति अपृच्छत् अप्रीणात् विधिलिङ् पूरयेत् पूरयेत पृच्छेत् प्रीणीयात् बध्नीयात् भक्षयेत् भक्षयेत अपूपुरत् अपूपुरत अप्राक्षीत् अप्रैणीत् अभान्तसीत् 'अबभक्षत् बध्नातु अवघ्नात् भक्षयतु अभक्षयत् भक्षयताम् अभक्षयत अबभक्षत धातु पूर (भरना) पृच्छ (पूछना) प्री (प्रसन्न होना) बन्धु (वधिना) भ (खाना) भाए (कहना) भू (होना) भ्रम् (घूमना) मन्न् (सलाह) मित् (मिलाप) मुद् (प्रसन्न होना) गत् (प्रयत्न करना) या (जाना) भापताम् अभापत भाषेत अभाषिष्ट १७५ भवतु अभवत् अभूत अभ्रमीत् भ्रमतु भक्षयति भक्षयते भापते भवति भ्रमति मन्त्रयते मिलति मिलते मोदते यतते अभ्रमत् भक्षयिष्यति भक्षयिष्यते भापिप्यते भविष्यति भ्रमिष्यति मन्त्रयिष्यते मेलिष्यति मेलिप्यते मोदिप्यते यतिप्यते अममन्त्रत (गिलाप)] मन्त्रयताम् मिततु मिलताम् मोदताम् यतताम् अमन्त्रयत अमिलत् अमिलत अमोदत भवेत् अमेत् मन्त्रयेत मिलेत् मिलेत मोदेत यतेत अमेलीत् अमेलिष्ट अमोदिष्ट अयतिष्ट अयासीत् अयतत याति यातु अयात् यास्यति यायात् धातु लोट लङ् अयाचत् याचतु (मनको विधिलिङ् याचेत् याचताम् अयाचत सामान्य लुक अयांचीत् अयाचिष्ट अरक्षीत् रक्षतु अरक्षत् रचयतु अरचयत् (वाना)] लट् याचति याचते रक्षति रचयति रचयते रमते रोचते रोहति लभते याचेत रक्षेत् रचयेत् रचयेत रमेत रोचेत अररचत् रचयताम् अरचयत अररचत अरमत . याच् (माँगना) रक्ष (रक्षा करना) रच् (वनाना) रम् (रमना) रुच् (अच्छा लगना) रुह् (उगना) लभ-(पाना) 1-लिख् (लिखना) लुभ् (लोभ करना) लोक (देखना) वद् (बोलना) वन्द् (प्रणाम) यस् (रहना) अरोचत अरोहत् याचिष्यति याचिष्यते रक्षिष्यति रचयिष्यति रचयिष्यते रंस्यते रोचिष्यते रोहिष्यति लप्स्यते लेखिष्यति लोभिष्यति लोकयिष्यति लोकयिष्यते अरंस्त अरोचिष्ट रोहेत् अरुक्षत् अलभत १७६ रमताम् रोचताम् रोहतु लभताम् लिखतु लुभ्यतु लोकयतु लोकयताम् वदतु लिखति लुभ्यति लोकयति लोकयते वदति वन्दते (सका लभेत लिखेत् लुभ्येत् लोकयेत् लोकयेत अलिखत् अलुभ्यत् अलोकयत् अलोकयत अलब्ध अलेखीत् अलोभीत् अलुलोकत् अलुलोकत अवादीत् अवन्दिर अवात्सीत् अवदत् वदेत् वदिष्यति वन्दिप्यते वन्दताम् अवन्दत वसति वन्देत वसेत् वसतु अवसत् वत्स्यति लङ् विधिलिङ् अवहत् वहेत् तहाना] सामान्य लुङ् अवाक्षीत् अवोढ अवहत वहेत विद्यात् निवेदयेत विशेत् लोद वहतु वहताम् वेत्तु निवेदयताम् विशतु वृणोतु वर्तताम् वर्धताम् वर्षतु शक्नोतु शिक्षताम् शोचतु शोभताम् श्रयतु धातु लट् वहति (ढोना) वहते विद् (जानना) वेत्ति नि+विद् (कहना) निवेदयते विग (घुसना) विशति. ३ (चुनना) वृणोति वृत् (होना) वर्तते वृध् (बढ़ना) वर्धते वृप (बरसना) वर्षति शक (मकना) शक्नोति शिक्ष (सीखना) शिक्षते शुन (शोच करना) शोचति शुभ (शोभित होना/ करना) शोभते श्रयति (आय) श्रयते वृणुयात् वर्तेत लुट् वक्ष्यति वक्ष्यते वेदिष्यति निवेदयिष्यते वेक्ष्यति वरिष्यति वर्तिष्यते वर्धिप्यते वर्षिष्यति शक्ष्यति शिक्षिष्यते शोचिष्यति शोभिष्यते श्रयिष्यते अवेत् न्यवेदयत अविशत् अवृणोत् अवर्तत अवर्धत अवर्षत् अशक्नोत् अशिक्षत अशोचत् अशोभत वर्धेत अवित्त न्यवीविदत अविक्षत् अवारीत् अवर्तिष्ट अवर्धिष्ट अवर्षीत् अशकत् अशिक्षिष्ट अशोचीत् अशोभिष्ट अशिश्रियत् अशिथ्रियत वर्षेत् शक्नुयात् शिक्षेत शोचेत् शोभेत श्रयेत् 'थ्रयेत ବଣ' अश्रयत ] थ्रयताम् अश्रयत श्रयिप्यते विधिलिङ् लाट् शृणोतु सहताम् सिध्यतु अभृणोत् असहत असिध्यत् सरतु असरत् असृजत् असेवत श्रु (सुनना) सह् (सहना) सिध् (पूरा होना) सृ (सरकना) सृज् (बनाना) सेव् (सेवा करना) स्था (ठहरना) स्ना (नहाना) स्निह् (स्नेह) स्पृश् (छूना) स्मृ (याद करना) स्वप् (सोना) हन् (मारना) हस् (हंसना) आ+हवे अतिष्ठत् शृणोति सहते सिध्यति सरति सृजति सेवते तिष्ठति स्नाति स्निह्यति स्पृशति स्मरति स्वपिति हन्ति हसति आह्वयति आह्वयते सृजतु सेवताम् तिष्ठतु स्नातु स्निातु स्पृशतु स्मरतु स्वपितु हन्तु शृणुयात् सहेत सिध्येत् सरेत् सृजेत् सेवेत तिष्ठेत् स्नायात् स्निह्येत् स्पृशेत् स्मरेत् । लुट् श्रोष्यति सहिष्यते सेत्स्यति सरिष्यति म्रक्ष्यति सेविष्यते स्थास्यति स्नास्यति स्नेहिष्यति स्प्रक्ष्यति स्मरिष्यति स्वप्स्यति हनिष्यति हसिष्यति आह्वयिष्यति आह्वयिष्यते सामान्य लुक अश्रौषीत् असहिष्ट असिधत् असात्ि अम्राक्षीत् असेविष्ट अस्थात् अस्नासीत् अस्निहत् अस्पाक्षीत् अस्मार्षीत् अस्वाप्सीत् अहनीत् अहसीत् अस्नात् अस्निह्यत् अस्पृशत् अस्मरत् अस्वपीत् अहन् अहसत् 208 स्वप्यात् हसतु (बुलाना)] आहवयतु आह्वयत् हन्यात् हसेत् आह्वयेत् आह्वयेत आह्वयताम् आह्ववत आवत् आवास्त परिशिष्ट-२ प्रत्यय परिचय क्वा ल्यप् तव्यत् अर्जितव्यम् ১০১ शम/शानच् अर्जन् अर्जित्वा प्राय॑ अ अर्जितः क्तदतु अर्जितवान् जग्धवान् जगधः अदन् प्रजग्ध्य जग्ध्वा समश्य अशित्वा अनुवानः अम् अपवान् तुमुन् अर्जितुम् अतुम् अशितुम् भवितुम् आमुम् आसितुम् एपितुम् अम् भूतः भूतवान् संभूय सन् भूत्वा अत्तव्यम् अशितव्यम् भवितव्यम् आप्तव्यम् आसितव्यम् एषितव्यम् प्राप्य आप्त्वा आप्तः आप आप्तवान् आसितवान् आप्नुवन् आसीन: आसितः • आसित्वा आम् उपास्य समिप्य इष्टवान् इवा इच्छन् धातु क्त शत/शानच् क्त्वा कथ् कथितः क्तवतु कथितवान् कुपितवान् कथयन् कथयित्वा कुपित्वा ल्यप् संकंथ्य प्रकुप्य कुप कुपित: कृष्टः क्रीत: कृष्टवान् क्रीतवान् कुप्यन् कर्षन् क्रीणन् कृष्टवा क्रीत्वा प्रकृष्य विक्रीय क्री गतः गच्छन् गत्वा आगत्य गम् ग्रह चि' चिन्त् तुमुन् कथयितुम् कोपितुम् कष्टुम् क्रेतुम् गन्तुम् ग्रहीतुम् चेतुम् चिन्तयितुम् चोरयितुम् जेतुम् गतवान् गृहीतवान् चिन्वान् चिन्तितवान् चोरितवान् जितवान् तव्यत् कथयितव्यम् कोपितव्यम् कर्टव्यम् क्रेतव्यम् गन्तव्यम् ग्रहीतव्यम् चेतव्यम् चिन्तयितव्यम् चोरयितव्यम् जेतव्यम् गृहीतः चितः चिन्तितः चोरितः जित: गृह्णन् चिन्वन् चिन्तयन् चोरयन् गृहीत्वा चित्वा चिन्तयित्वा चोरयित्वा जित्वा संगृह्य संचित्य संचिन्त्य संचोर्य विजित्य १८० जि । जयन् त्यज् त्यक्तः त्यक्तवान् त्यजन् त्यक्त्वा परित्यज्य त्यक्तुम् त्यक्तव्यम् दा दत्तः ददन् दत्वा आदाय दत्तवान् दुग्धवान् दुह दुग्धः दातुम् दोग्धुम् दातव्यम् दोग्धव्यम् दुहन् संदुह्य दृश पश्यन् दुग्ध्वा दृष्ट्वा हित्वा संदृश्य द्रष्टव्यम् दृष्टवान् हितवान्. नतवान् हितः दिधन् विधाय धातुम् नम् नतः. नमन् धातव्यम् नमितव्यम् नंतव्यम् नत्चा प्रणम्य नन्तुम् धातु. क्तवतु शन/शानच् क्त्वा तुमुन् तव्यत् ल्यप् विनश्य नरः नष्टवान् नश्यन् नष्ट्वा नीत्वा नष्टव्यम् नेतव्यम् नी नीत: नीतवान् नयन् नष्टुम् नेतुम् पक्तुम् पठितुम् पक्तः पचन् पक्त्वा पच पठ् पक्तवान् पठितवान् पीतवान् पक्तव्यम् पठितव्यम् पठितः पठित्वा पठन् पिवन् पीत: पीत्वा आनीय विपच्य संपठ्य निपीय संपृच्छ्य संबद्ध्य संभक्ष्य पातुम् पातव्यम् पृष्टः पृष्टवान् पृच्छन् पृष्टवा प्रष्टम् प्रष्टव्यम् प्रय बन्थ बद्धः बध्नन् बद्धवान् भक्षितवान् बद्ध्वा भक्षयित्वा भ भक्षितः भक्षयन् भूतः भवन् भूत्वा संभूय संभ्रम्य १८१ अम् भान्तः भ्राम्यन् भ्रान्त्वा पन्य मथितः मनन् मन्थित्वा संमथ्य वधुम् भक्षयितुम् भवितुम् भ्रमितुम् मन्थितुम् मोक्तुम् मोदितुम् यातुम् याचितुम् रक्षितुम् भूतवान् भान्तवान् मथितवान् मुक्तवान् मुदितवान् यातवान् याचितवान् रक्षितवान् बद्धव्यम् भक्षयितव्यम् भवितव्यम् भ्रमितव्यम् मन्थितव्यम् मोक्तव्यम् मोदितव्यम् यातव्यम् याचितव्यम् रक्षितव्यम् मुस्तः मुदितः मुञ्चन् मोदमानः विमुच्य प्रमुध यातः यान् मुक्त्वा मुदित्वा यात्वा याचित्वा रक्षित्वा प्रयाय पाच याचित: याचमानः प्रयाच्य राम रक्षितः । रक्षन् संरक्ष्य - धातु शत/शानच् कत्वा ल्यप् सदर क्तवतु रुदितवान् रुद् रुदितः रुदन् रुदित्वा प्ररुद्य रुध रुद्धवान् रूधन् रुद्ध्वा विरुद्ध्य लब्धः लभमानः लब्ध्वा उपलभ्य ল लिख् लिखन् आलिख्य वद् लिखितः उदितः उषितः वदन् लब्धवान् लिखितवान् उदितवान् उषितवान् ऊढवान् विदितवान् लिखित्वा उदित्वा उषित्वा वस् वसन् ऊढः वह विद् वहन् विदन् वर्तमानः वर्धमानः विदित: अनूद्य प्रोष्य प्रोह्य संविद्य निवृत्य संवर्ध्य ऊदवा विदित्वा वर्तित्वा वर्धित्वा तुमुन् रोदितुम् रोधुम् लन्धुम् लेखितुम् वदितुम् वस्तुम् वोदुम् वेदितुम् वर्तितुम् वर्धितुम् शक्तुम् शासितुम् शयितुम् श्रोतुम् सोढुम् .::Aa तव्यत् रोदितव्यम् रोद्धव्यम् लब्धव्यम् लेखितव्यम् वदितव्यम् वस्तव्यम् वोढव्यम् वेदितव्यम् वर्तितव्यम् वर्धितव्यम् शक्तव्यम् शासितव्यम् शयितव्यम् श्रोतव्यम् सोढव्यम् वृत् वृत्तः वृत्तवान् वृद्धः 278 वृद्धवान् राक् शक्तः शक्नुवन् शक्वा संशक्य शास् शासन् शिष्टः शयितः शिष्ट्वा शयित्वा शी शयानः शक्तवान् शिष्टवान् शयितवान् श्रुतवान् सोढवान् सेवितवान् शु शृण्वन् श्रुतः सोढः सेवितः सह अनुशिष्य संशय्य संश्रुत्य संसह्य संसेव्य श्रुत्वा सोवा सेवित्वा. सहमानः सेवमानः सेन्