Banasthali University

संस्कृतर्याभाषाभाष्यसंहिता

मिश्र, ज्वालाप्रसाद · 2009/03

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CLOSE श्रीः। श्रीयजुर्वेदीय- रुद्राष्टाध्यायी। मुरादाबादनिवासियजुर्वेदभाष्यकारविद्यावारिधि- श्रापण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृत- संस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्विता। साच श्रीकृष्णदासात्मज-गंगाविष्णोः अध्यक्ष "लक्ष्मीवेङ्कटेथर” मुद्रणोगारे मैनेजर पं० शिवदुलारे वाजपेयी इत्यनेन स्वाम्यर्थ मुद्रायत्या प्रकाशिता। संवत् १९८०, शकांन्दाः१८४५, BeetroMEERANELOR DIRolpronselp कल्याण-मुंबई, अह अन्यस्य सर्वेऽधिकाराः यन्त्राधिकारिणा स्वायत्तीकृताः सान्त । BEFRVAY ANY PERSITES

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DAN..:lllll IPDIPITI (iHI 'res -- .. - CCES भूमिका 122305 सम्पूर्ण जगत् में वेदकी महिमा कौन नहीं जानता, वेद हो सम्पूर्ण ज्ञानको भंडार है, सर्वज्ञ परमात्माका स्वरूपही वेद है, उपनिषद्, स्मृति, पुराण, मीमांसासूत्रादिमें वेदकी महाप्रशंसा पाईजाती है, पाराशरस्मृतिमें लिखाहै-"वेदो नारायणः साक्षात्स्वय- म्भूरिति शुश्रुभ" वेद साक्षात् नारायण स्वयम्भू ही है, ब्राह्मणभागमें भी वेद परमात्माका निःश्वसित कहा है-“अरे मैत्रेयि अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्य- दृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः" इति शतपथः । जब कि वेद, नारायणरूप नारायणप्रेरित अपौरुषेय और अनादि है और अनन्तकल्पोंके पहले भी विद्यमान था इसमें लगनेक प्रमाण हैं तव यह सम्पूर्ण धार्मिक पुरुषोंकी श्रद्धाकी सामग्री है इसमें शंका ही क्या है। वेद अपेन धर्मका मूलग्रन्थ है, प्रवृत्तिलक्षण निवृत्तिलक्षण धर्म वेदमें विद्यमान हैं प्रवृत्तिलक्षणवाला धर्म, जिन पुरुषोंको वैराग्य नहीं है उनको क्रमकमसे निष्काम- कौका वोध कराकर उनसे मनशुद्धि करके निवृत्तिकी और लेजाता है, और निवृत्तिलक्षणवाला धर्म ज्ञान वैराग्यरूप होकर साक्षात् मोक्षका साधनरूप होता है, निवृत्तिलक्षणवाले धर्ममें भी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यस्त इन आश्रमोंकी व्यवस्था है । ब्रह्मचर्य आश्रममें वेदविद्याके ज्ञानकी प्राप्ति, सन्ध्या, अग्निहोत्र, देवपूजा आदि वैदिककर्मीको करतेहुए आचार्यकी सेवा करना मुख्य कर्तव्य है, इस आश्रमकी सम्पूर्णरीति पालन करनेसे शन्द्रय और अन्तःकरण अपने वशमें होते हैं, पहले आश्रममें ही यदि जीवनपर्यंत ब्रह्मचर्यकी इच्छा करे और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर वेदाभ्यास और योगसाधन को तो भी मोक्षमार्ग में पहुंचता है, इस आश्रमके उपरान्त ही चतुर्थ आश्रम संन्या- स ग्रहण कर संसारसे निवृत्त होजाय, यदि इन्द्रियसंयम नहीं हुआहै तो शक्तिके अनुसार आचार्यको दक्षिणा देकर प्रसन्नतापूर्वक पिताके घर आकर विवाह करके गृहस्थ आश्रममें वेदमें काहे धर्मोका अनुष्ठान करता है । गृहस्थाश्रममें पडकर जिससे मन विषयलोलुप होकर अधोगतिको प्राप्त न हो, और अपनी वृत्तियों को स्वच्छ रखसकै इसके निमित्त रुद्रका अनुष्ठान करना मुख्य 1 और उत्कृष्ठ साधव है यह रुद्रानुष्ठान ही प्रवृत्तिमार्गसे निवृत्तिमार्गको प्राप्त करानेमें . जिस प्रकार दूधर्मेसे मक्खन निकाल लिया जाताहै इसी प्रकार द्विजातियोंके त याणके निमित्त यह रुद्राष्टाध्यायी वेदेका साररूप महात्माओंने संग्रह को है, (२) भूमिका । इसमें कुछभी संदेह नहीं कि इसमें गृहस्थधर्म, रामधर्ष, ज्ञान, वैराग्य, शान्ति, ईश्वरस्तुति जादि अनेक सर्वोत्तम विपयोंका वर्णन है। येदमंत्रोंका विनियोग, अर्थ, ऋषियोंका स्मरणादि जाननेका माहात्म्य ब्राह्मण और मनुक्रमणिका विशेषरूपले वर्णन कियाहै, अर्प और विनियोगको. जानकर जो कार्य कियाजायगा वह कल्पवृक्षकी समान विशेषरूपसे फलदायक होताहै इससे 'अर्थका ज्ञान अवश्य होनाचाहिये । जैसे “हे रुद्र । रुत् दुःखं द्रावयति रुद्रः । यदा- 'हगती' ये गत्यस्ते ज्ञानार्थाः रवणं रुत् ज्ञानम् मावे कि- तुगागमः । रुत् ज्ञानं राति ददाति रुद्रः ज्ञानप्रदः । यदा-"पापिनो नरान् दुःखभोगेन रोयति रुद्रः । इस प्रकार अर्थ के ज्ञानसे विशेष प्रतिपचि होनेते श्रुतिमें भी विशेषफल प्रतिपादन कियाहै [उतत्वः पश्यन्न ददर्शवाचमुतत्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् उतोत्वस्मै तन्वं विससे जायेव पत्य उशली सुवासाः ] इत्यादि मंत्रोंमें अर्थज्ञानकी प्रशंसा सुनी है, और यिद गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । मनग्नाविध शुष्कधो न तज्ज्वलति कहिचित् ] इत्यादि वाक्यों के द्वारा अर्थ न जाननेकी निन्दा सुनी है । दूसरा बचन भी निरुक्तमें लिखा है [ स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽयज्ञ इतः सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ] अर्थात्-जो वेदं पढकर उसका अर्थ नहीं जानता वह दूँठकी समान भार ढोनेवाला है । और जो अर्थको जानताहै वह सब कल्या- णोंको प्राप्त होता है । और पापरहित हो वैकुण्ठको माप्त होताहै, इस वचनोंसे अर्थका जानना सम्पूर्ण कल्याणों का करनेवाला है । जो कहते हैं कि " स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इस वचनसे पाठमानसे ही कर्मानुष्ठानमें सफलता होजाती है यह सत्य है, परन्तु अर्थज्ञा- नसे विशेष वीर्यवान् होताहै, इससे अर्थज्ञान अवश्य होनाचाहिये । इस विषयमें पहु- तसे प्रमाण हैं, जिनका यहां लिखना हम उचित नहीं समझते वेदार्थज्ञानके निमित्त शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिषकी आवश्यकता होती है। पर माष्योंमें ये सब सुलभ होजाते हैं, इस कारण हमने संस्कृत और भाषा इन दो प्रकारोंसे रुद्राष्टा- ध्यायीका थाप्य आरंभ किया है । उपनिषदू, स्मृति, पुराण आदिमें रुद्रजापका विशेष माहात्म्य वर्णन कियाहै मोक्षणी माप्ति, पापनाश, आरोग्य, आयुष्यकी प्राप्ति, रुद्रजापसे होती है। जावाल उपनिषद्में लिखाहै-[अथ हैन ब्रह्मचारिण ऊचुः किंजप्येनैवामृतत्व इति ब्रूहीति । स होवाच याज्ञवल्क्यः शतरुद्रियेण इति ] अर्य-ब्रह्मचारियोंने । ल्क्यषिसे प्रश्न किया कि क्या जपनेसे मोक्षक्षी प्राप्ति होतीहै । याज्ञवल्क्यने दिया कि शतरुद्रियके जपसे । कैवल्य उपनिपटूमें लिखा है-(यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति स्वा कल त्पूतो भवति सुरापानास्पूतो भवति ब्रह्महत्यातः पूतो भवति कृत्यांक . भूमिका। (३) भवति तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति सत्याश्रमी सर्वदा सकृद्धा जपेदनेन ज्ञानमामोति संसारार्णवनाशनं तस्मादेवं विदित्वैनं कैवल्यं फलमश्नुते' इत्याह शातातपः ] अर्थ-जो शतरुद्रिय पाठ करता है वह जैसे अग्निसे निकाले पदार्थ सुवर्ण मादि पवित्र होजाते हैं, तद्वत् पवित्र होताहै, सोनेकी चोरीके पापसे छूटजाताहै, सुरापानके पापसे रहित होताहै, ब्रह्महत्यासे पवित्र होताहै, कृत्याकृत्यसे पवित्र होताहै, आश्रम- स्यागी भी एकबार पाठमात्रसे पवित्र होताहै, इसके जपसे ज्ञानको प्राप्ति होती है, संसारसागरसे पार होजाता है। इस कारण इसको जानकर कैवल्यझी प्राप्ति होती है इस प्रकार शातातप कहते हैं। [स्तेयं कृत्वा गुरुदारांश्च गत्वा मद्यं पीसा ब्रह्महत्यां च धृत्वा । भस्मच्छन्नो भस्मशय्याशयानो रुद्राध्यायी मुच्यते सर्वपापरिति ] अर्थ-सुवर्णकी चोरी, गुरुन्त्रीमें गमन, मद्यपान, ब्रह्महस्यादि पाप करके सर्वांगमें भस्म लेपन करके भस्ममें शयन करनेवाला रुद्राध्यायीके पाठसे सब पापोंसे छूट जाताहै। याज्ञवल्क्य कहते हैं ( सुरापः वर्णहारी व रुदनापी जले स्थितः । सहस्रशीर्षा. नापी च मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।) अर्थात्-मद्य पीनेवाला सुवर्णकी चोरी करनेवाला जो जलमें स्थित होकर रुद्राध्यायका जप करताहै, तथा सहस्रशीर्षा इस अध्यायको पढताहै, वह सब पापोंसे छूटजाताहै । तथा च-( रुद्रेकादाशनी जप्त्वा तददैव विशु- ध्यति ) अर्थात-एकादश वार रुद्रजापसे उसी दिन शुद्ध होजाता है। महात्मा शङ्खजी कहते हैं (स्वर्णस्तयी रुद्राध्याची मुच्यते । ) अर्थात्-सुवर्णरतेयी रुद्राध्यायके पाठसे मुक्त होता है। "तथा व वायुपुराणे- यश्च रुद्राञ्जपेनित्यं ध्यायमानो महेश्वरम् । यश्च सागरपयंतां सशैलवनकाननाम् ॥ १ ॥ सर्वानात्मगुणोपेतां पुवृक्षजलशोभिताम् । दयारकाञ्चनसंयुक्तां भूमिं चौषधिसंयुताम् ।। तस्मादप्याधिकं तस्य सकृद्धद्रजपाद्भवेत् ॥ २ ॥ मम मावं समुत्सृज्य यस्तु रुद्राञ्जपेरसदा ॥ स तेनैव च देहेन रुद्रः संजायते ध्रुवम् ॥ ३ ॥ अर्थ-वायुपुराणमें लिखा है जो महेश्वरका ध्यान करताहुआ एकवार रुद्रीका जप ताहै उसको, जो शैल वन काननके सहित, सब श्रेष्ठगुणोंसे युक्त, अच्छे वृक्ष और ऐसे शोभित, सुवर्ण और औषधिसहित, समुद्रपर्यंत पृथिवीको दान करता है " (१) भूमिका । उससे भी अधिक फल होताहै । अर्थात् रुद्रीनपका फल इससे विशेष है। और जो मम- त्वको छोडकर सदा रुद्रदेवका जप करताहै वह उसी देहसे निश्चय गुरु होजाता है । चमकं नमकं चैव पौरुषसूक्तं तथैव च ॥ नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते ॥ १ ॥ चमकं नमकं होतृन्पुरुषसूक्तं जयेत्सदा ॥ प्रविशेत्स महादेवं गृहं गृहपतियथा ॥२॥ भस्मदिग्धशरीरस्तु भक्ष्मशायी जितोन्द्रयः ॥ सततं रुद्रजाप्योऽसौ परां मुक्तिमाप्स्यति ॥ ३ ॥ रोगवान्पापांश्चैव रुद्रं जप्त्वा जितेन्द्रियः ॥ रोगापापाहिनिमुक्तो छतुल सुखमश्नुते ॥ ४ ॥ ' में अर्थ-चमकनमक अध्य य तथा पुरुषसूक्त तीन बार जपनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा पाताहै ॥१॥ जो चमक नमक तथा युरुषसूक्तका सदाजप करते हैं, वह महादेवमें ऐ७ प्रवेश करजाते हैं जैसे गृहपति अपने घरमें प्रवेश करजाते हैं ॥ २ ॥शरीरमें भरूहों लगानेसे, भरूममें शयन करनेसे जितेन्द्रिय होकर निरन्तर रुद्राध्यायका पाठ कर- नेसे मनुष्य मुक्त होजाता है ॥ ३ ॥ और जो रोगी तथा पापी मी जितेन्द्रिय होकता। रुवाध्यायका पाठ करै तो रोग और पापसे निवृत्त होकर महासुखको प्राप्त होताहै ॥४॥ याहच शंख:-(रहसि कृतानां महापातकानामपि शतरुदियं प्रायश्चित्तमिति ।) - अर्थ-शंखऋषि कहते हैं गुप्तमहापातकोंकाभी प्रायश्चित्त शतरुद्रियका जप है। शसदिय इसका नाम इस कारण है कि रुद्रदेवता १०० संख्यावाले हैं यह रुद्रोत पनिषद है इसमें शिवात्मकब्रह्मका निरूपण है। ब्रह्मके तीन रूप हैं एक सो कार्यरूप, सबका उपादानकारण सर्वात्मक, दूसरा सृष्टिस्थितिसंहारनिमित्तक पुरुषनामवाला, तीसरा अविद्यासे परे निर्गुण निरञ्जन सत्य ज्ञान आनन्दके लक्षणवाला, यह रुद्रके सुख्य स्वरूप हैं। इस ग्रंथमें ब्रह्माके सगुण निर्गुण दोनों प्रकार के रूपोंका वर्णन है, परमात्माकी उपासना, भक्तिमहिमा, शान्ति, पुत्रपौत्रादिकी वृद्धि, नीरोगता, यज्ञिय पदार्थ आदि, कितनाही वस्तुओंका वर्णन है इसके पाठसे पाठकोंको यह भली प्रकारसे विदि. होजायगा, कि यह मंत्रविभागरूप ग्रन्थ अल्पकालका नहीं है । जब कि उपनिष स्मृति पुराणोंमें इसके पाठका माहात्म्य वर्णन कियाहै तब प्राचीन समयमें ही कर यजुर्वेदसे कार्यके योग्य सलह होचुकाथा इसमें कोई सन्देह नहीं है । ज -- - भूमिका (५) जिस प्रकार पूजा पाठके गुटके विद्वान् महात्मा अपने पास रखते हैं इसी प्रकार त्रिवर्ण- भात्रको यह ग्रंथ अपने पास रखना चाहिये । यद्यपि संस्कृतभाष्य तथा टीकों सहित यह ग्रंथ एक दो जगह प्रकाशित हुमा है पर उसमें सर्वसाधारणकी उपयोगिता न होनेके कारण हमने उन त्रुटियोंको इसमेंसे दूर करके द्विजमात्रके उपयोगी इस ग्रंथको बनादिया। इसका क्रम इस प्रकारसे रक्खाहै कि पहले मंत्र, फिर उसका ऋषिछन्द-देवत तथा विलियोग, संस्कृतमें पदार्थक सहित मंत्रभाष्य, पीछे भाषामें सरलार्थ वर्णन कियाहै । साथमें इस बातका भी विचार रक्खाहै कि जिससे भाषामें भी वेदके मंत्रोंका अर्थ ऐसा रहना चाहिये कि जिससे वेदार्थका विज्ञान भलीप्रकार होजाय । इसी शैलीसे यजुर्वेदीय उपासनाकाण्ड तथा मंत्रार्थदीपिका यह और दो. ग्रंथ तैयार होरहेहैं, और आशा है कि वह बहुत शीघ्र तैयार होजायँगे । एक बात हमको यहां विशेषरूपसे और कहनाहै, वह यह है कि इस समय भी देशमें गण्डितोंकी कमी नहीं है तथा अनुवादके ग्रंथ भी तैयार होतहैं पर जहांतक हम देख- तेहैं बहुत कम तैयार होते हैं, हां जिनके पास कुछ मसाला है वह केवल अपना महत्त्व- विधायक ग्रंथ वनाकर छपादेते हैं जिससे धार्मिकसमूहोंको कोई लाभ नहीं पहुँचता, देखिये महाराजा बुकने सायणाचार्यजीसे वेदोंका भाष्य कराकर कितना जगत्का उपकार कियाहै, अब भी श्रीमानोंक नरपतियोंके दूसरे कार्योंमें सहस्रों नहीं लक्षों रुपये व्यय होते हैं यदि थोडी भी श्रीमानोंकी कृपादृष्टि इधर होजाय और चारों वेदों, ब्राह्मणभागोंका रहस्योंके सहित हिन्दीभापामें अनुवाद होजाय तो जगत्का कितना उपकार होसकताहै, जगत्में वेदोंका महत्त्व बहुत शीघ्र प्रकाशित होसकताहै। महामण्डलके नेताओंका ध्यान हम इस ओर आकर्षित करतेहैं कि, आपलोगोंने प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थराजमें कुम्भपर क्या क्या प्रतिज्ञायें की थीं, काशीमें ब्रह्मचारी- आश्रम खोलनेको कहाथा, शास्त्रप्रचारविभागसे वैदिकग्रंथोंके निकालनेकी प्रतिज्ञा की थी, धर्मवक्ताओंको मूलसहायक समझकर उनके उत्साहवृद्धिका मण कियाथा, धर्मसभाओंको लाभ पहुंचानेका वचन दियाथा, आजतक उसमेंसे एक बात भी हुई ? ..एक भी नहीं, केवल आशाही आशा शब्द सुनाई आये यदि ऊपरी बात छोडकर कर्तव्यपालन कियाजाय तो बहुत कुछ उपकार होसकताहै, यदि कोई अपने पुरुषार्थसे कोई कार्य कर और दूसरा उसके अपना कर्तव्य बताये तो यह भुलावा. या पालसीके सिवाय और क्या है। हां यदि शास्त्रप्रचार, विद्याप्रचार, धर्मप्रचारमें हम वैश्यवंशावतंस देशहितैषी धर्मप्रचारानिरत श्रेष्टी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदय मालिक "श्रीवेंकटेश्वर' भूमिका। यंत्रालयको सहस्रों धन्यवाद दें तो भी उनके लिये वह थोडे हैं, कारण कि आपने बहुतसा धन व्यय कर तथा परिश्रम उठाकर पुरातन उपयोगी ग्रंथोंकी खोज कर सर्वसाधारणके उपकारके निमित्त भाषानुवादसहित अनेक ग्रंथोंको प्रकाशित कियाहै और कररहेहैं, इम परमात्मासे चाहते हैं प्रार्थना करते कि, उक्त सेठजी दीर्घायु होकर पुत्रपौत्रोंकी तथा लक्ष्मीकी वृद्धि के सहित संसारका उपकार करतेहुए चार पदार्थोके भागो हों। उन्ही सर्वगुणस म्पन्न सेठजीके लिये मैंने यह परमोपयोगी ग्रन्थ निर्माण करके सष प्रकारके सस्वसहित प्रकाश करनेको समर्पण करदिया है, इसके प्रकाशादि कर- नेके वही अधिकारी है। यहां यह कहदेना भी परम उपयोगी है कि इस भाष्यअनुवादमें श्रीसायणाचार्य, श्रीमहीधर और श्रीउबटजीके भाष्योंसे बहुत कुछ संग्रह कियाहै । इस प्रकारसे यह ग्रंथ पाठकोंके अवलोकनार्थ उपस्थित है, यदि इसमें कोई त्रुटि रहगई हो तो पाठकण अपनी उदारतासे उसे क्षमा कर सूचना देंगे तो दूसरी बारमें क करदीजायगी। सजनोंका अनुगृहीत- आषाढकृष्ण १३ संवत् १९६६ ज्वालाप्रसादमिश्र, दिनदारपुरा सुरादाबाद.

॥ श्रीः ॥ अथ पूजाप्रयोगः। आचम्य प्राणानायम्य नमस्कारं कुर्यात् । श्रीमन्महागणाधिपतये नमः इष्टदेवताभ्यो नमः । श्रीमदुमाहेश्वराभ्यां नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो देनेभ्यो नमः॥ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ॥ लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ १॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ॥ द्वादशैतानि नामानि यः पठेतृणुयादपि ॥२॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ॥ संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ३ ॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लवर्णं चतुर्भुजम् ।। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥४॥ अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो या सुरासुरैः ।। सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥५॥ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥६॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् ।। येषां हृदिस्थो भावान्मंगलायतनं हरिः ॥७॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः॥ येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ ८॥ सर्वष्वारम्भकार्येषु प्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।। देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥ ९॥ विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥ सरस्वती प्रणीम्यादी सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥ १० ॥ अथ सङ्कल्पः। ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याधब- पणो द्वितीये परार्दै श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे षष्टाविंशतितमे कलियुगे विप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावतैकदेशे बौद्धावतारे अमुक- मसंवत्सरे अमुकायने अमुकी अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमु- तिथौ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते चन्द्रे अमुकराशिस्थिते भास्करे (८) पूजाप्रयोगः। शेषेषु ग्रहेषु यथास्थानस्थितेषु सत्सु एवंगुणविशिष्टायां पुण्यतिथौ ममात्मनः श्रुतिस्ट. तिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थम्, ऐश्वर्याभिवृद्धयर्य अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थम् । प्राप्तलक्षपाश्चिर कालसरक्षणार्थम्, सकलकामनासंसिद्धयर्थस्, सर्वत्र यशोविजयलाभादिप्राप्त्यर्थम, जन्म जन्मान्तरकुरितोपशमनार्थसू, सम समायस्य सपुत्रस्य सवान्धवस्याखिल कुटुम्वसहितसर सपशोः समस्तभयव्याधिराजपीडामृत्युपरिहारद्वारा आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं तथा म जन्मराशेः सकाशाये केचिबिरुद्धचतुर्थाष्टमद्वादशस्थानस्थितकरग्रहास्तैस्सूचितं सूचयि- ध्यमाणं च यत्सर्वारिष्टं तहिनाशद्वारा एकादशस्थानस्थितवमफलप्राप्त्यर्थम् पुत्रपौ- त्रादिसन्ततेरविच्छिन्नवृद्ध्यर्थमाधिदैविज्ञाधिभौतिकाध्यात्मिकत्रिविधतापोपशमनार्थ धर्मा- र्थकाममोक्षफलमाप्त्यर्थं रुद्राभिषेकानन्तरं श्रीरुद्राष्टकस्य पाठमहं करिष्ये । ত্ব উন্নামিদাঃ । ॐ यजायत इत्यादिभिर्विभ्राडित्यलुवाकान्तः पञ्चभिरंगमन्त्रैः पूर्वमभिषेकः । ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ नमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेपां जम्भे दधमः । ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ इत्यन्तेनाष्टप्रणवयुक्तेन रुद्राध्यायेन चाभिषेकः । ॐ वय०सोमेत्यष्टभिः कण्डिकाभिश्च कामेवानां तु सप्तकण्डिकाभिरिति विशेषः । ॐ उग्रश्चेति सिस्मृभिः सप्तभिवों रुद्रजटा. नाम्नीभिश्चेति परशुरामादयः निर्मूलत्वान्नेति देवयाज्ञिक्षादयः ॥ ॐ वाजश्चमे इत्यष्टानुवा. कात्मकेन चेति देवयाज्ञिकाः। महच्छिरसाभिषेकपक्षेन चमकानुवाकैराभिपेकः । चमका- नुवाकैराभिषेकपक्षे तु न महच्छिरसाभिषेकः इत्यपरे। ॐ प्राचं वाचं प्रपद्य इति शान्त्यध्या- येन शान्तिकरणम् । ॐ शान्तिरिति निरुच्चारणं वा इत्येको रुद्राभिषेकप्रकारः ॥ अथापरप्रकारः । ॐ यजाग्रत इत्यादिभिर्नमस्ते रुद्रेति रोद्राध्यायान्तैः पड्भिरंगमंत्रैः पूर्वमभिषेक । ॐ भूः ॐ भुवः स्वः ॐ नमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेषां जन्भे दध्मः ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ओमित्यन्तेनाष्टप्रणवयुक्तेन रौद्राध्यायेनाभिषिच्यॐ वय: ० सोमेत्यष्टभिः कण्डिकामिरसिपेकः। ॐ उग्रश्चेति तिसृभिः सप्तभिर्दा । महच्छिरो रुद्रजटाभ्य मभिषाऽ. भावपक्षे तु ॐ वाजश्च म इत्यष्टानुवाकेनाभिषेकः । ॐ प्राच वाचमिति शान्त्यध्यायेन पक्षद्वयेऽपि शान्तिकरणम् । ॐ शांतिरिति त्रिरुच्चारणं वा इति द्वितीयप्रकारः। वृहत्पाराशरतिमते तु-पञ्चांगमन्त्रपूर्वकरीद्राध्यायस्येव जपोऽन्ते च शान्तिकरणमि- त्ययमेव रुद्रजो न तु पुनरन्यस्य कस्यचिन्मनस्य जप इनि विशेषः । एवमभिषिच्य पट्रपष्टिनीलसूक्तं च पुनः पोडपञ्चो जपेत् । एव ते नमस्ते द्वे नतं विद्वयमेव च । मी पति चत्वारि ह्यतेच्च शतहाद्रियम् । नीलसूक्तं वयठ० सोमेत्यष्टी । इति तृतीयप्रकार ॐॐ . श्रीवेदपुरुषाय नमः। अथ रुद्राष्टाध्यायी। आष्यसहिता। अथ प्रथमोऽध्यायः। - मंत्रः । हरि ॐ ॥ गुणामान्यागणपति हवामहे रियाणान्त्वाप्रियतिहवामहेनिधीना- न्वानिधिपतिठहवामहेबसोमम ॥ आहर्म- जानिग धमाधमजाखिग धणा ॥१॥ ॐ गणानां त्वेत्यस्य प्रजापतिषिः । आणी बृहती छंदः । लिङ्गोक्ता देवता अश्वप्रक्रमणे विनियोगः । व्वसोममेत्यस्य सान्नीपंक्ति- छन्दः । महिष्या अश्वसमीपे संवेशने विनियोगः॥१॥ भाष्यम्-हे ब्रह्मणस्पते वयम् (गणानाम् ) गणानां मध्ये (, गणपतिम् ) गणा कूष्माण्डादयः तेषां पालकम् । यदा-गणनीयानां पदार्थसमूहानां स्वामिनम् (त्वा) त्याचा . हवामहे ) आह्वयामः । (प्रियाणाम् ) वल्लभानाभिष्टमित्रादीनां मध्ये (प्रियपतिम् )) प्रियस्य पालकम् (त्या) त्वाम् ( हवामहे ) आह्वयामः । ( निधीना ) निधयः पद्मादयः निधीनां मध्ये (निधिपतिम् ) सुखनिधेः पाकलम् (त्वा) त्वाम् ( ह. वामहे) आयामः । विघ्नोपशमाय भार्यादिप्रियलाभाय च त्वाम् आयामीति वा- ल्यार्थः (वसो) वसत्यस्मिन्सर्व जगदा यत्र वसति स वसुः तत्सम्बुद्धौ है वसो सार्व- इन वभूतदेव ! त्वम् (मम ) मम पालको भूया इति शेषः । हे प्रजापते ( गर्भधम् ) मम करवातीति गर्भधं गर्भधारकं रेतः । अर्थात् कर्मफलप्रजननसामर्थ्यधारकं श्रद्धाख्या- .

(२) ) रुद्राष्टाध्यायी- (प्रथमो क्षुदकम् “ रेत ' उदकनामसु पठितम्, [ निघ० १११२ ] (मा अजानि) व्याकृष्य क्षिणामि श्रद्धया स्वीकृत्य फलोन्मुखीकरोगि (त्वम् ) त्वञ्च (गर्भधम् ) रेतः श्रद्धाख्य- टुदकम् (आ अजासि ) श्रद्धयाकृष्य क्षिपसि श्रद्ध्याकृष्टा देवताः कर्मफलप्रदानमवश्यं कुर्वति ( यजु० स० २३ सं० १९) प्रमाणानि-गणानान्त्वागणपतिहिवामह इति पल्यः परियन्त्यपढुवत एवास्मा एत- दतोन्ये वास्मै झुक्तेऽयो धुवत एवैनं त्रिः पारयान्त त्रयो वा इमे लोका एमिरेवैनं लोकै- वुवते । त्रिः पुनः परियन्ति षट् सम्पद्यन्ते पडाऽऋतव ऋतुभिरेवेने धुवते ४ अप वा एतेभ्यः प्राणाः कामन्ति ये यज्ञे धुवनं तन्यते नवकृत्वा परियन्ति नव वै प्राणाः प्राणा- नेवात्सन्दधते नैवः प्राणाः अपक्रामन्त्याहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्मधमिति रजा वै पशवो गर्भः प्रजामेव पशूनात्मन्धत्ते [ श० कां० १३ अ० २ ब्रा० २ २० ४-५ ] गणानान्त्वा गणपति हशमहेब्रह्मणस्पत्यं ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिह्मणवेनं -तदिपज्यति [ एतरे० पं० १कं० २१] राष्ट्रभश्वमेधोज्योतिरखे तद्राष्ट्रे दधाति [ श० कां० २३ अ० २ बा०२ कं० १६ ] अयं मन्त्रः संहितायामश्च धप्रस्ताव पठितस्त- त्रावस्तुतिरस्य संत्रस्य वाच्योऽर्थः । स च यजमानपत्नीनां परिक्रमन्तीनां कर्मणामतो अपमिति बहुवचनान्तनास्मदो निर्देशः । सद्भावेऽपि वह्वीनां पत्नीनां यस्य न स्यात्पु त्रोत्पादनं तेनाप्यस्य कर्त्तव्यता ज्ञायते ॥ १॥ भाषार्थ-हे प्रजापते गणपते ! हम क्रूष्माण्डादि गोंके मध्यमें गणपतिरूपसे वा गणनीय- पदाकि मध्यमें स्वामीरूपसे आपको बुलाते हैं, प्यारे इष्टमित्रादिके मध्यमें प्रियजनों पालक आपको बुलाते हैं, पद्मादिनिधियोंके मध्यमें सुखनिधिके पालक.आपको · हम बुलाते हैं, आशय यह कि विनशान्ति और भार्यादि प्रियजनोंके लाभ के निमित्त हम आपकी स्तुति करते हैं। हे हमारे सर्वस्वधन ! तुम हमारे पालक हो "अहं त्वया अजानि"आपने हमको घट किया है मैं गर्भसे उत्पन्न हूं आप मज अविनाशी सव जगत्को गर्भद्वारा प्रगट करते हो, जीव गर्भद्वारा प्रगट होताहै और आप स्वतंत्रतासे प्रगट हुएहो, और तुमसे सम्म आत् प्रगट होताहै। १ यजुर्वेद श्रीत कर्मानुष्ठानमें यह मंत्र अश्वमेध प्रकरणों में प्रजापतिरूप अप- की स्तुति में है, इससे राजामें क्षात्रतेज और वैश्यमें वैश्यत्व वृद्धिको प्राप्त होताहै, और निस सार्वभौम महीपालके सन्तान न हो अश्वमेध यज्ञसे उसके सन्तान होतीहै इस अनुष्ठानों महिषी पुत्रपती होती है इस अनुष्ठान में इस कण्डिकाके पहले तीन मंत्रोंसे पत्नी तीन प्रद्: क्षिणा करे, तीन प्रकार इस भांति प्रदक्षिणा करनेसे प्रजापति देवताके ध्यानसे मानो चिले कीली परिक्रमा की, फिर तीन परिक्रमा करनेसे छः होती हैं, ऐसा करनेसे, मानो मातुओंसे समृद्धि की, फिर तीसरे मंत्रसे तीन परिक्रमा करनेसे, मानो नौ प्राण मात्र चारण कियेजाते हैं, फिर वे प्राण दृढ होजाते हैं, वह जो अश्व विश्वकी परिक्रमा र आया है उसके प्रभावसे पत्नी दृढ प्राणवाला पुत्र 'चक्रवर्ती होताह उस प्राणवलके सम् दन उपरान्त पत्नी 'आहमजानि०' इस मंत्रार्थको धारण करें । अध्यात्ममें प्रनापशु प्रजापशुमै मात्माको धारण कियाजाताहै, परिक्रमाके समय पत्नीद्वारा उच्चरितमंद .

ईयायः १.]
भाष्यसहिता।
देवगणोंके मध्यम गणरूपले पालक ! आपको हम बुलाती हैं, प्रियांके मध्यमें प्रियोके
पालक अथवा सबसे अधिक होनेसे आत्मा ही प्रिय पति है कारण कि, आत्माके निमित्त
सवको त्यागदेना होताहै, इससे प्रियपति आपको हम बुलाती हैं, सुखनिधियोंके मध्यम वा
विद्यामादि पोषण करनेवालोंके मध्यमें सुखनिधिके पालक आपको हम बुलाती हैं, हे प्रजापते !
व्यापक होकर सब जगत्में निवास करनेके कारण तुम मेरे पालक हूजिये । (अगले मंत्रसे
अश्वका स्पर्श कर परमेश्वरसे प्रार्थना है ) मैं गर्भ धारण करानेवाले रेते अर्थात् कर्मफल
उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य धारण करनेवाले श्रद्धानामक जलको सब प्रकारसे आकर्षण कर-
तीहूं, र्थात् श्रद्धासे स्वीकार करके फलके उन्मुख करतीहूं, आप गर्भधारण कराते अर्थात्
श्रद्धानामक जलको आकर्षण कर उत्सर्ग अर्थात् फलोन्मुख करतेहो । अथवा गर्भके समान
सब संसारकी धारक प्रीतिके धारण करनेवाले वा अपनी शक्तिसे जगत् के अनादिकारण
गर्भ धारण करनेवाले, वा सम्पूर्ण मूर्तिमान् पदार्थोकी रचना करनेवाले आपको सब प्रकारसे
सन्मुख करतीहूं, सब जगत्के तत्वोंमें गर्भरूप बीजको धारण करनेवाले आप सब प्रकार
जानते वा सन्मुख होते हो ॥ १॥
.
.
गायत्रीविष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पयासुह !! बुहु-
त्युष्णिहाकुकुप्सूचीनिशब्दयतुत्वा ॥२॥
ॐ गायत्रीत्यस्य प्रजापतित्रापः । उष्णिक छन्दः । अश्वो
देवता । अश्वशरीरे रेखाकरणे विनियोगः ॥२॥
भाष्यम्-हे अश्य (गायत्री ) गायत्री (त्रिष्टुप् ) त्रिष्टुप् (जगती) जगती
( अनुष्टुप् ) अनुष्टुप् (पंक्त्या सह) पंक्त्या सह (बृहती) बृहती (उष्णिहा सह)
उष्णिहा सह (ककुप् ) ककुप् एतानि छन्दासि (सूचीभिः) एताभिः सूची-
मिः (त्या) त्वाम् (शम्यन्तु ) संस्कुर्वन्तु “विशो वै सूच्यो राष्ट्रमश्वमेधो विशं चैमा-
स्मिन राष्ट्रे समीची दाते' [ श० १३ । २ । १०२ ] अश्वो यत ईश्वरो वा
अश्वः [१३ । ३।८।८] [ यजु० २३ । ३३] ॥ २ ॥
भाषार्थ-हे अश्वरूप देव । गायत्री अर्थात् गानेवालेका रक्षक गायत्रीछन्द, तीनों तापोका
रोधक त्रिष्टुप्छन्द, जगत्में विस्तीर्ण जगती छन्द, संसारका दुःखरोधक अनुष्टुप्, पंक्तिछन्दके
थ वृहती, प्रभातप्रियकारी उष्णिक्छन्द, अच्छे पदार्थोंवाला ककुपूछन्द, सचियोंद्वारा तुमको
आन्त करे। प्रजाका नाम पक्षान्तरमें सूची राष्ट्र अश्वमेध है यही राज्यको शान्त रखता है ॥२॥
ब्रह्मस्तुतिपक्षमें-गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिक, ककुप्छन्द,
न सबके द्वारा सव दिशाम सुन्दर उक्तियोंके द्वारा सब :कोई आपकी स्तुति प्रार्थना
करते हैं ॥ २॥

(४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[प्रथमो-
२४ मरका गायत्री छन्द, त्रिष्टुप् ४४ का, जगती ४८, अनुष्टप ३२, बृहती ३६.
उष्णिक २८, पक्ति ४० अक्षरका होता है ॥ २ ॥
मन्त्रः।
द्विर्षदायाश्चतुष्पदाविपदायाश्वषट्पदा है।
विच्छन्दायाचसच्छन्दात्सूचीभिशम्म्य-
तुत्वा
ॐ द्विपदेत्याच्या प्रजापतिपिः । अनुष्टुप् छन्दः । अश्वो देवता
वि० पू० ॥३॥
भाष्यम्-(द्विपदाः) द्वे पदे यासां ता द्विपदाः (याः) याः ( चतुष्पदाः) चतुष्पदा
(याः) याः (त्रिपदाः ) त्रिपदाः (याः ) याः ( पट्पदाः) पट्पदाः ( याः )
(विच्छन्दाः) विंगतं छन्दो याभ्यस्ताः छन्दोलक्षणहीनाः (या)(सच्छन्दाः )
छन्दोलक्षणयुताः ताः सर्वा छन्दोलक्षणजातयः (सूचीभिः) सूचीभिः (त्वा ) त्वाम्
(शस्यन्तु ) संस्कुर्वन्तु [ यजु० २३ । ३४ ] ॥ ३ ॥
भाषार्थ-दो पदोंवाले, जो चार पदोवाले तीन चरणावाल और जो छहपदोंवाले, तथा छन्द-
लक्षणास हीन और जो छन्दलक्षणों से युक्त छंड हैं वे सब छन्द सूचीद्वारा तुमको शान्त करें
वा संस्कार करें । अर्थात्-इन छन्दोंके उच्चारणसे तुममें शान्ति विराजमान हो।
हे भगवन् दुपाये ( पक्षी और मनुप्यादि), चौपाये, तीनपौवाले, पराधीन और स्वाधीन
सपही सुन्दरउक्तियोंसे आपकी प्रार्थना करते हैं ॥ ३ ॥
शुहस्तोलिसहच्छन्दसऽआवृत्तं
सुहष्णा
ऋषयत्तुप्तदेहयाः ॥ पूर्वेषाम्पन्थामनुश्य
वीरांऽशुब्बालेमिरगुत्थ्योनरश्मीन्॥४॥
ॐ सहस्तोमा इत्यस्य याज्ञवल्या ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः पयो देवता
पाठे विनियोगः॥४॥

ऽध्यायः १.] भाष्यसहिता। (५) भाज्यम्-( सहस्तोमाः) स्तोमः त्रिवृत्पञ्चदशादिमिः सह वर्तमानाः सहस्तोमा: (सहच्छन्दसः) गायव्यादिभिः छन्दोभिः सह वर्तमानाः ( पावृतः ) मावर्तमाना: ( सहप्रमाः ) ममितिः प्रमा यज्ञस्येयत्ता परिज्ञानं तेन सह वर्तमानाः ( देव्याः । देवस्य प्रजापतेः सम्बन्धिनः (ऋषयः ) द्रष्टारः ( सप्त) सप्तसंख्याका शीर्षण्याः । यहा-मरीचिप्रमुखाः सप्तर्षयः होत्रादयः सप्त वषट्कारो वा एते (पूर्वेषाम् ) पूर्वपुरु- पाणामगिरप्रभृतीनां विश्वसृजां देवानां वा (पन्यास ) अनुष्ठानमार्गम् अनुदृश्य ) क्रमेण ज्ञात्मा (धीराः ) धामन्तः सन्तः ( अन्यालेभिरे) क्रमेणारब्धवन्तः; यागा- नुष्टाने प्रवृता इत्ययः । (न) यथा (रथ्यः) रथेन युक्ताः रथस्य नेतारः सूनाः (रझमी- न्) रथे अश्वनियोजनान् प्रग्रहान् सस्यग्रथस्य नयनाथ इस्तेनान्धारमन्ते । यद्वा, देव्याः सप्तर्षयः, देवस्य प्रजापतेः इमे दैव्याः प्रजापतिप्राणाभिमानिनः सप्तर्षयः भरद्वाजकश्यपगौतमात्रिवसिष्ठविश्वामित्रजमदग्निसंज्ञाः अन्दालेभिरे सृष्टवन्तः सृष्टिय- ज्ञमिति शेषः । किं कृत्वा, पूर्वेषां पन्यानमलुदृश्य-अधस्तनकल्पोत्पन्नानामवलिता- धिकाराणां मार्ग विलोक्यं पूर्वकल्पोत्पन्नपिभिर्यथा सृष्टं तथा सृष्टवन्त इत्यर्थः “सूर्या- चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इति श्रुतेः । कथमिव रथ्यो न रश्मीन नकार उपमा- र्थः । रथी यथा इष्टदेशप्राप्त्यर्थं प्रथमं रस्मीन्प्रग्रहानालभते स्पृशति सृजति वा, तथा तेऽपि सृष्टियॉ सृष्टवन्तः । किम्भूताः ऋषयः स्तोमसहिताः माययादिभिः सहिताः (वृतः ) आवृत्तशब्देन कोच्यते सहावृतः कर्मसहिताः श्रद्धासत्यार चानानां कर्म- णामनुष्टातारः ( सहप्रमाः ) प्रमाणे प्रमा तत्सहिताः शब्दप्रमाणपरीक्षणतत्पराः ( धीराः) धीमन्तः [यजु० ३४ । २९] ॥४॥ .माषार्थ-शब्दप्रमाणके जाननेवाले धीर त्रिवृत्पंचदशादि स्तोम' गामघ्यादि छन्छ और यज्ञका परिमाण इनके सहित वर्तमान देवप्रजापतिके सम्बन्धी सप्तऋषिस्थानिक चक्षुआदिक (चक्षु जमदग्निः ऋषिरिति श्रुतः) अथवा मरीचि आदिक अपने पूर्वज अंगिरा आदिक मह- र्षियोंका अनुष्टित समझकर सर्वज्ञकी समान यज्ञमें प्रवृत्त हुए, जैसे रययुक्त घोडौंकी लगाम पकडकर सारथि स्थको भलीप्रकार चलाताहै, अथवा प्रजापतिके आणाभिमानी सप्तऋषि- भरद्वाज, कश्यप, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र और जमदग्नित पूर्वकल्पमें उत्पन्नहुए ऋपियोंके मागीका अनुसरण करके इस सृष्टि यज्ञका आरंभ किया अर्थात् जैसे पूर्वकल्पमें सृष्टि हुईथी उसी प्रकार सृष्टि की, जैले स्थी वोडौंको वशम रखनेके लिये पहलेही लगाम बनाता है इसी प्रकार सृष्टिकार्यक्री सुशृंखलाके लिये सबसे पहले यह ऋषि प्रगट हुए और -सृष्टिकार्य किया ॥ ४ ॥ 4 यजायतोदर दैतिवन्तसुप्तस्युतथे-

रुद्राष्टाध्यायी-
[प्रथमो--
वैति ॥ दूरङ्गमङ्योतिषाख्योतिरेकुन्त-
मेमन शिवसलगायतु।। ५॥
ॐ यदित्यल्य याज्ञवल्क्य ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । मनो
देवता । पाठे विनियोगः ॥ ५ ॥
भाष्यम्-( यत् ) यन्मनः (जाग्रतः ) जाग्रतः पुरुषस्य (दूरम् उदेति) उद्गच्छवि
चक्षुराद्यपेक्षया दूरगामीत्यर्थः । यच्च (दैवम् ) दीव्यति प्रकाशते देवो विज्ञाना-
त्मा तत्र भवं देवमात्मग्राहकामित्यर्थः (तत उ) यदः स्थाने तच्छन्दः उकारश्चार्थः ।
यच्च मनः (सुप्तस्य) सुप्तस्य पुंसः (तथैव एति ) यथा गतं तथैव पुनरागच्छति,
यञ्च (दूरंगमम् ) दूरं गच्छतीति दूरंगमस्, अतीतानागतवर्तमानविप्रकृष्टव्यवहितपदा--
थानां ग्राहकमित्यर्थः । यच्च मनः ( ज्योतिपाम् ) प्रकाशकानां श्रोत्रादीन्द्रियाणाम्
(एक ज्योतिः) प्रकाशकं प्रवर्तकामित्यर्थः । प्रवर्तितान्येव श्रोत्रादीन्द्रियाणि स्वविषये
प्रवर्तन्ते आत्मा मनसा संयुज्यते मन इन्द्रियेणेन्द्रियमर्थनेति न्यायोक्तमनःसम्बन्ध-
मन्तरा तेषामप्रवृत्तेः (तत्) तादृशम् (से ) मम ( मनः) मनः ( शिवसङ्कल्पस)
शिवः कल्याणकारी धर्मविषयः सङ्कल्पो यस्य तादृशम् ( अस्तु') भवतु मन्मन सि सदा
धर्म एक भवतु न कदाचित्पापमित्यर्थः [ यजु० ३४ । १] ॥५॥
भाषार्थ-जो मन, जागते पुरुषका चक्षुआदिकी अपेक्षासे दूर प्राप्त होताहै जो द्युतिमान
वा प्रकाशक देव विज्ञानात्माका ग्राहक है, वही सोतेहुए पुरुपके उसी प्रकारसे सुपुप्तिमवस्थामें
फिर आगमन करताहै, जो दूर जानेवाला या अतीत-भविष्य-वर्तमान-विप्रकृष्ट व्यवहित
पदार्थोशा ग्रहण करनेवाला है, और जो प्रकाशक श्रोत्रादि इन्द्रियोंकी एक ज्योति है,
अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका बालक है, आत्मा मनसे, मन इन्द्रियसे, इन्द्रिय पदार्थोंसे संयोग
करती है, विना इसके कुछ प्रवृत्ति नहीं होती, वह मेरा भन कल्याणकारी संकल्पनाला धर्म
विषयमें तत्पर हो मेरे मनमें कभी पाप न हो धर्मही सदा प्रवृत्त हो ॥ ५ ॥
~
জালuস্যুত্বীলফিীসুড়ঙ্কুন্দিয়া
छियेषुधीरोह ॥ बर्दपूर्वाध्यक्षमुन्त अजा-
नान्तन्मन्न-शिवसंकल्पमस्तु ॥६॥

ऽध्यायः १.] भाष्यसाहिता। (७ ॐ येनेत्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ६ ॥ भाष्यम्-(अपसः) “ अप इात कर्मनाम" [निघं० २।१] अपो विद्यते. येषां ते अपस्विनः कर्मवन्तः सदा कर्मनिष्ठा इत्यर्थः । (धीराः) धीमन्तः (मनीषिणः) मेधाविनः ( यज्ञे) यज्ञकर्मणि (येन ) मनसा सता (करमाणि) कर्माणि (कृण्वन्ति) कुर्वन्ति मनःस्वास्थ्यं विना कर्माऽप्रवृत्तेः केषु सत्सु ( विदथेषु ) ज्ञानेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदथानि तेषु यज्ञसम्बन्धिनां हविरादिपदार्थानां ज्ञानेषु सत्स्वित्यर्थः । ( यत्) यच्च मनः ( अपूर्वम् ) न विद्यते पूर्वमिन्द्रियं यस्मात्तदपूर्वम् इन्द्रियेभ्यः पूर्व मनसः सृष्टेः । यहा अपूर्वमनपरमबाह्यमित्युक्तरपूर्वमात्मरूपमित्यर्थः । यञ्च ( यक्षम् ) यष्टुं शक्तं यक्षम् यच्च (प्रजानाम् ) प्रजायन्ते इति प्रजास्तासां प्राणि- मात्राणाम् ( अन्तः) शरीरमध्य आस्ते इतरोन्द्रियाणि बहिष्ठानि मनस्त्वन्तरिन्द्रिय- मित्यर्थः । तादृशं मे मनः शिवसङ्कल्पमस्त्विति व्याख्यातम् [ यजु० ३४।२ ]॥६॥ मावार्थ-कर्मानुष्ठानमें तत्पर बुद्धिसम्पन्न मेधावी; यज्ञमें जिल मनसे उत्तमकर्मीको करते हैं जो प्राणिमात्रके शरीरमध्यमें स्थित है अर्थात् इन्द्रियबाह्य और मन अन्तरमैं स्थित है यज्ञ- सम्बन्धि हवि भादि पदार्थोके ज्ञानमें जो मद्धत वा सबसे प्रथम वा आत्मरूप पूजनीयभावसे स्थित है वह मेरा मन कल्याणकारी धर्मविषयकसंकल्पवाला हो ॥ ६ ॥ यत्प्रज्ञानसुत चेतोवृतिश्चु बज्योतिरन्त- रमृतम्प्रजासु ॥ बहरूमान्नऽजुत्तेचिक्षणक- म्पयितुतकमनशिबसहरूप्पमस्तु॥७॥ ॐ यत्प्रज्ञानमित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ७ ॥ भाष्यम्-( यत् ) मनः ( प्रज्ञानम् ) विशेषेण ज्ञानजनकम् (उत) अपि यन्मनः ('चेतः) चेतयति सम्यग् ज्ञापयति तचेतः 'चिती संज्ञाने' सामान्यविशेषज्ञानज- नकमित्यर्थः । (च) यच्च मनः (धृतिः) धैर्यरूपं मनस्येव धैर्योत्पत्तेर्मनासि धैर्य मुपचर्यते ( यत् ) यच्च ( अमृतम् ) आमरणधर्मि आत्मरूपत्वात् (प्रनासु ) जनेषु ( अन्तः ) अन्तर्वर्तमानः सत् ( ज्योतिः ) सर्वेन्द्रियाणां प्रकाशकमुत्तमपि पुनरुच्यते (यस्मात् ) मनसः (ऋते ) विना (किञ्चन ) किमपि ( कर्म ) को (न क्रियते) जनैः सर्वकर्मसु प्राणिनां मनः पूर्व प्रवृत्तेः मनःस्वास्थ्यं विना कर्मा- भावादित्यर्थः ( तन्मे मनः) इति व्याख्यातम् [ यजु० ३४ । ३ ] ॥७॥ भावार्थ-जो मन विशेषकर ज्ञानका उत्पन्न करनेवाला है और भली प्रकारसे सामान्या- विशेष-ज्ञानका प्रगट करनेवाला, चित्स्वरूप और धैर्यरूप है, आत्मरूप होनेसे मविनाशी, 1८) रुद्राष्टाध्यायी- [प्रथमो- जो प्राणियोंके मध्यमें अन्तर वर्तमान प्रकाशक है, जिस मनके बिना कुछमी कार्य नहीं कियाजाता वह मेरा मन कल्याणकार्य में संकल्पवाला हो ॥ ७ ॥ अस्पतम्मुवनमाविष्ष्यत्पारगृहीतम्- मृतेनुत्तीया ।। शेनझस्तार्थतप्तहो- तातोमलमशिबलकुल्यनमस्तु ॥ ८॥ ॐ येनेवालित्यल्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ८॥ भाष्यम्-( येन ) ( अमृतेन ) शाश्वतेन मुक्तिपर्यन्तं श्रोत्रादीनि नश्यन्ति मनस्त्वनश्वरमित्यर्थः । मनसा (इदस्) (सर्वस्) सम्पूर्णम् (मृतम् ) भूतकालसम्बन्धि बस्तु (भुवनसू ) भवतीति भुवनं वर्तमानकालसम्वन्धि, ( भविष्यत् ) भविष्यतीति सविष्यत् ( परिगृहीतम् ) सर्वतो ज्ञातं सवति त्रिकालसम्बद्धवस्तुषु मनः प्रश्र्तत इलार्थः । श्रोत्रादीनि तु प्रत्यक्षमेव गृह्णन्ति ( येन ) मनसा ( सप्तहोता ) सप्तहो- तारो देवानामाहातारी होतमित्रावरुणादयो यत्र स सप्तहोता अग्निष्टोरे सप्तहोतारो सवन्ति । ( यज्ञः) अग्निष्टोखादिः ( तावते ) विस्तार्यते ( तन्मे मनः ) इति व्याख्यातम् [ यजु० ३४।४ ] ॥ ८ ॥ भावार्थ-जिस अविनाशी मनसे (मुक्तिपर्यन्त रहनेसे मनको अविनाशी कहाँ ) यह सम्पूर्ण भूतकालसम्बन्धी वस्तु, वर्तमान कालसम्बन्धी, होनेाले कालसम्बन्धी पनार्थ ग्रहण कियेजातेहैं, (विकाससम्बन्धी वस्तुभोंमें मन प्रवृत्त होताहै ) जिसके द्वारा लात होता होट- क्षेत्रावरुणादि-पाला अग्निष्टोम यज्ञ विस्तार कियाजाताहै वह मेरा मन कल्याणकारी संक- पवाला हो ॥ ८ ॥ वृचालामुखजलि ঘসুত্রি- ব্রিাহলার্জিাহা | बल्लिनगश्चित्त কুম্ভীজেলিলঘলাহুবন্ধুত্ব - ध्यायः १.] भाष्यसहिता। (९) ॐ थास्मिन्नित्यम्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥९॥ भाज्यम्-( यास्मिन् ) पनास (ऋचः) ऋचः (प्रतिष्टिताः) स्थिताः (यस्मिन् ) मनास ( साम) सामानि प्रतिष्ठितानि ( यजूधषि) यजुर्मन्त्राः प्र० मनसः स्वास्थ्य एक वेदत्रयीस्फूर्तमनसि शब्दमात्रस्य प्रतिष्ठितत्वम् (स्थनाभी ) रथचक्रनामौ मध्ये (इव) स्था ( आराः ) आराः प्रतिष्ठिताः तद्वच्छब्दजालं मनसि । शिश्च (प्रजानाम् ) प्रकृती- नाम् ( सम् ) सर्वम् (चित्तम् ) ज्ञान सर्वपदार्थविषाय ज्ञान ( यस्मिन् ) मनास (मोतम् ) प्रोतं निक्षिप्तं तन्तुसन्ततिः पटे इष संवै ज्ञानं मनप्ति निहितम्, तन्मे मनः (शिवसंकल्पछु ) शान्तव्यापारम् ( अस्तु ) भवतु [ यजु० ३४।५] ॥ ९ ॥ भाषार्थः-जिस मनमें ऋचाएँ अर्थात् ऋग्वेद स्थित है, जिसमें साम और यजुः स्थित हैं मनकीही स्वस्थतासे वेदनयकी स्फूति हाता छ । जिस प्रकार स्थचक्रकी नाभिमें आहे स्थित हैं इसी प्रकार मनमें शब्दजाल स्थित है, प्रनाओंका सब ज्ञान जिसमें, पटमें. तन्तुके समान ओतप्रोत है, वह मेरा मन करयाणकारीकार्य में संकल्पवान हो ॥ ९ ॥ हन्त्रः। [ सुपारधिश्वानिवृषन्मनुष्यालेनीयते- मीशुमि जिनऽइव ॥ हुत्गलिष्यजिर- अविष्ठन्तब्येमन शिवसंकल्पमस्तु॥१०॥ इतिसहितायोलहापाठेप्रथमोऽध्यायः॥शा ॐ सुधारधिरित्यल्या ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ १० ॥ भाव्यम्-(यत्) मनः (मनुष्यान्) नरान् ( नेनीयते ) अत्यर्थमितस्ततो नयति । मनुष्यग्रहणं प्राणिमात्रोपलक्षणस् (इस ) यया ( जुषारथिः ) शोलना साराथः ( अमीशुभिः ) प्रग्रहः । (वाजिनः १) वेगयुक्तान् ( अश्यान्न ) अयान नेनीयते । यहा तत्र दृष्टान्तः (सुपारथिः) शोमनः सारथिर्यन्ता (इब ) यथा (अश्वान् अश्वान् कशया ('नेनीयते ) नेनीयते द्वितीयो दृष्टान्तः ( इव ) यथा सुसारथः (अमीशुभिः) प्रग्रहः (वाजिनः ) अश्वान्नेनीयत इत्यनुषङ्गा । उपमाइयं प्रथमायां लयनं द्वितीयायां नियनम् । तथा मनः प्रवलयति नियच्छति च नरानित्यर्थः ( यत् ) एच मनः (आजरम् ) जरारहितं बाल्ययौवनस्थापिरषु मनसस्तदवस्थत्वात् यच्च इ जविष्टम् ) अतिजस्वद्वेगवत् जविष्ठम् “न कालात्किञ्चनाशीयोस्ति न मनसः किञ्च- रुद्राष्टाध्यायी- - (१०) [द्वितीयो- नाशायास्ति” इति श्रुतेः । यच्च मनः ( हत्प्रतिष्ठर हदि प्रतिष्ठा स्थितिर्यस्य तत् होल मनः उपलभ्यते (तना मनः शिवसंकल्पमस्तु ) इति व्याख्यातम् । [ यजु० ३४६. ६]॥ १० ॥ माषार्थ-जो मन, मनुष्यादि जीवोंको इधर उधर लेजाता है, अर्थात्-मनकी प्रेरणासही प्राणी कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, जैसे अच्छा सारथि लगामहारा वेगवान् बोडॉको लेजाताहै, जो मन बाल्य, युवा मोर जरासे रहित अतिशयवेगवान् तुल्यहृदयमें स्थित है, अर्थात्-जैसे सारथी लगामकी सहायतासे घोडोंको यथेच्छस्थलमें प्राप्त करता है, इसी प्रकार चक्षुआदिः इन्द्रियोंको अवलम्बन करके मनुप्यादिके. शरीरके अंगप्रत्यंगको वारंवार विविधविपयोंमें प्रेरण करताहै, नो जरारहित और हृदय में स्थित है वह मेरा मन कल्याणकार्यमें सङ्कल्पवाला हो ॥ १० ॥ इति श्रारुद्राष्टके मुरादाबादनिवासि-पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य- भाषाभाष्यसमन्वितः प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ अथद्वितीयोऽध्यायः। मन्त्रः। सुहस्रशीपुरुषल्लाहलाक्षाहनंपात् । सभूमिठन्सुतिस्मृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गलम् १ ॐ सहलाशीपत्यस्य नारायण ऋषिः । लिच्यदाय॑नुष्टुप् छन्दः । पुरुषो देवता । स्तुतिकरणे विनियोगः ॥ १॥ भाष्यम्-( सहस्रशीपो) सहस्रमसंख्यानि सर्वप्राणिशिरांति यस्य सः । सर्वस्थूलां- गोपलक्षणार्थमिदम् । ( सहस्राक्षः ) सहस्रमसंख्यान्यक्षीणि यस्य सः । सर्वज्ञानेन्द्रि- योपलक्षणार्थमिदम् । (सहस्रपात् ) सहसं पादा यस्य सः । सर्वकर्मेन्द्रियोपलक्षणार्थ- मिदम् । एवंभूतः सः (पुरुषः) पूर्षु शेतेऽवतिष्ठते तस्मात्पुरुषोऽव्यक्तादपि पर: साक्षी देता परमात्मा ( भूमिम् ) पृथिव्यादिपंचभृतात्मकं सर्व भूमिमित्यपलक्षणं भूतान ( सर्वतः) विश्वतः ( स्पृत्त्वा) परिवष्टय नामितः (दशांगुलम् ) दशांगुलपरिमित देशम् ( अत्यविष्ठत् ) अतिक्रम्य व्यवस्थितः । हृदयदेशेऽतिष्ठत् स्थितोऽस्ति स एवैक- स्तत्तद्देवतानामरूपैलपास्यः। “लोयं विज्ञानमयः पुरुषः प्राणिषु हृदयं ज्योतिः इति । दशांगुलमित्युपलक्षणं ब्रह्माण्डाइहिरपि व्याप्यावस्थित्त इत्यर्थः । [ यजुर्वेदीयकत्रि- शोऽध्यायः । ] ॥१॥ भाषार्थ-अव्यक्त-महदादिसे विलक्षण, चेतन, श्रुतियों में प्रसिद्ध, सब प्राणियोंकी समाष्टरूप ब्रह्माण्डरूप देहयुक्त विराट् है वही अनन्तशिरोंसे युक्त है, जितने सब प्राणियोंके शिर हैं वह.

- ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। (११) सप उसके शिरके अन्तर्ति होनेसे वह अनन्तशिर संपत्र है । सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेसे सह . स्राक्ष अर्थात् सब ज्ञानेन्द्रियसंपन्न है । सहस्रों चरणोंसे युक्त अर्थात् कर्मेन्द्रिय संपन्न होनेसे यह सहस्रपात है वह पुरुष ब्रह्माण्डगोलकरूप भूमिको षा पंचभूतोंको तिर्यक, अर्घ, नीचे, सब मोरसे व्याप्त करके दश संगुल परिमित देशको अतिक्रमण करके स्थित हुआहै। दशांगुल ब्रह्मा- ण्डका उपलक्षण है, अर्थात् ब्रह्माण्डसे बाहर भी सव ओर व्याप्त होकर स्थित है अथवा नाभिके. स्यानसे दश अंगुलं अतिक्रमण करके हृदयमें स्थित है। ("सोयं विज्ञानमयः प्राणेपु हृयन्त- ज्योतिः” इति श्रुतेः) विज्ञानास्मा, हृदय में कर्मफल भुगानेके निमित्त अवस्थान करताहै (वासु- पर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्याहत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचा कशीति मग्वेदः ) इन लोकोंमें पूर्ण करने और शयन करनेसे वह पुरुष है ॥ १ ॥ मन्त्रः। पुरुषऽएवेदठसवयद्भूतम्यञ्चमाध्यम् ॥ उतामृतत्त्वस्येशानीयदन्ननातिरोहति।२।। पुरुष इत्यस्य ना० ऋ० । निच्युदा जगतीछन्दः । पुरुषो वता । वि० पू० ॥२॥ - भाष्यम्-(इदम् ) यत्किविद्वर्तमानकालीनं ( यद्भूतम् ) यदतीतकालीनं (यञ्च ) (भाव्यम् ) भविष्यकालीनं तत् (सर्वम् ) सम्पूर्णम् (पुरुष एव) परमात्मा एव यथास्मिन्कल्पे वर्तमानाः प्राणिदेहाः सर्वेऽपि विराट्पुरुषस्यावयवाः तथैवातीतागामिना-- रपि कल्पयोर्द्रष्टव्यमिति भावः । (उत ) अपि ( अमृतत्वस्य ) देवत्वस्य (ईशाना) स्वामी स पुरुषः ( यत् ) यस्मात् ( अन्नेन ) प्राणिनां भोग्येनान्नेन फलेन निमित्तभूतेन ( अतिरोहति ) स्वीयां कारणावस्थामतिक्रम्य परिदृश्यमानां, अगदवस्थां प्राप्नोति । तस्मात्पुरुष एव प्राणिनां कर्मफलभोणाय जगदवस्थास्वीकारान्नेदं तस्य वस्तुत्वमित्यर्थः। अमृतत्वस्यामरणधर्मस्येशानः मुक्तेरीशः यो हि मोक्षेश्वरो नासौ म्रियत इत्यर्थः॥२॥ भाषार्थ-जो यह वर्तमान जगत् है, जो अतीत नगत् और नो जो मषिष्य जगत् है वह संपूर्ण पुरुषही है अर्थात् जैसे इस कल्पमें वर्तमान प्राणियोंके देह विराटपुरुषके अवयव है वैसे ही अतीत और मानेवाले कल्पोंके भी जानने और जो कि प्राणियोंके भाग्यसे वा अन्नरूप फलके निमित्तसे अपनी कारण अवस्थाको अतिक्रमण करके जगतकी अवस्थाको प्राप्त होता है (अथवा जनके निमित्त जो संपूर्ण मतिरोहण जन्म मृत्यु होती हैं, उस संबन्धमें अमृतत्व देने में ईश्वर ही है) अर्थात् प्राणियोंके कर्मफल भुक्तानेको जगतकी अवस्था स्वीकार करताहै ! यदि कहो कि जो सब पुरुष है तो परिणामी भी होसकताह इसपर कहते हैं-मरणधर्मरहित मुक्तिका अधिपति अर्थात् संपूर्ण जीवोंका जो कि ब्रह्मासे स्तम्पपर्यन्त हैं उनका अधिपति २

(१२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो-
पुरुष ही है, अर्थात् यहीं प्राणिगणको देवता करते हैं निस कारण कि प्राणिगणके भोगोंके
निमित्त अपनी कारण अवस्था परित्यागपूर्वक कार्यावस्थाः अर्थात्-जगत् को स्वीकार कर-
ते हैं ॥ २॥
विशेष-भगशन यदि स्वयं इस प्रकार अपित्यशक्तिद्वारा जगत्अवस्थाको प्राप्त न हो तो यह
जगत् किलीके झंवधर्म स्वर्ग और किसी के संबंध नरकरूप होजाय तो एकही वस्तु के लिये
स्वर्गनर कल्वरूप विरुद्वधर्मा प्रकाश असंभव है । अनीश्वरवादी कहेंगे प्रकृतिका स्वभाव है,
परन्तु आस्तिकगण करेंगे जिसको नास्तिक प्रकृतिका स्वभाव कहते हैं उसीको हम ईश्वरकी
अचिन्त्यशक्ति कहते हैं ॥ २॥
।
हन्त्रः।
एतानिएपहिमालोज्यापाश्वरुप ।
पादौत्युनिश्वानुवानिचिपादस्यामृत-
दिहि ॥३॥
ॐ एतावालयेत्यल्प नारायण ऋषिः । नियदाWछन्दः ।
पुरुणो देवता । वि० पू० ॥६॥
माष्यम्-(एतावान् ) अतीतानागतवर्तमानरूपं जगवावदस्ति सापि (मस्य)
पुरुपस्य (महिमा) स्वकीयसामर्थ्य विशेषः न तु तस्य वास्तवं स्वरूपम् (च) (पूरुषः
अतः ) अतो यहिनोऽपि ( ज्यायान् ) अविशयेन अधिकः (स्य) पुरुपस्य (विश्वा)
सर्वाणि (सूतानि) कालत्रयातीनि माणिजातानि (पादः) चतुर्थांशः (अस्य) पुरुष-
स्य अवशिष्टस् (निपात ) त्रिपादस्वरूपम् ( अमृतम् ) विनाशरहित' सन् (दिवि)
द्योत्तनात्मके प्रकाशस्वरूपे व्यवतिष्ठत इति शेषः । यद्वा त्रिपाद विज्ञानमयानंदरूपं दिवि
विद्योतने स्वमहिन्नि स्वर्ण द्वारे व्यातिष्ठतीत्यर्थः। यदा-योधिध्येयं तदेव निपात् दिनि
सत्यसंकल्पादौ गुणे स्थितमित्यर्थः ॥ ३ ॥
लापार्थ-अतीत, अनागत, वर्तमान कालसे सम्बद्ध जितना जगत् है यह सम इस पुरुषकी
सामर्थ्यविशेप विभूति है। वास्तविकास्वरूप नहीं है, और पुरुष तो इस महिमावाले जगत्से
यतिशय अधिक है, संपूर्ण तीनकामि वर्तनेवाले प्राणिसमूह इस पुरुपका चतुर्थाश है। इस
परमात्माका अवशिष्ट त्रिपात्स्वरूप विनाशाहित प्रकाशात्मक सपने स्वरूपमें स्थित है ।
यद्यपि ( सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म) इस तैत्तिरीयारण्यकके वचनसे ब्रह्मवी इयत्ता कोई निरू-
पण नहीं करसकता तोमी उसकी अपेक्षा यह जगत् अतिअल्प है, इस कारण पादरूपसे
"रूपण किया है ॥ ३ ॥

ऽध्यायः २५] भाष्यसहिता। (१३) त्रिपादू ऽउदैत्पुरुषत्पादौत्येहाभवत्पु- न॥ ततोविष्ष्वङ्ख्यकालत्साशनानशु- नेऽअभि ॥४॥ ॐ त्रिपादूई इत्यस्य नारायण ऋषिः । आर्ण्यनुष्टुप् छन्दः । विक पू० ॥४॥ भाष्यम्-(त्रिपात् ) योऽयं त्रिपात् ( पुरुषः ) संसारस्पर्शरहितः ब्रह्मस्वरूप: (जः) अस्मात् अज्ञानकार्यात् संसारात् बहिर्भूतोऽत्रत्यैः गुणदोषैरस्पृष्ट उत्कर्ष- ण (उदैत् ) स्थितवान् वा पादत्रयस्वरूप ऋग्यजुःसामलक्षणो भगवानादित्यः सोऽभयु- दैत् कर्मवन्धनिन्वधनानां स्थावरजंगमादीनामुपरिभूतः (बस्य ) (पादः) लेशः (इह ) मायायां (पुनः) पुनरपि ( भाभवत् ) सृष्टिसंहाराभ्यां पुनःपुनरागच्छति (ततः) मायायामागत्यानन्तरम् (विष्वङ्) देवतिर्यगादिरूपेण विविधः सन् (साश- नानशने) साशनं भोजनादिव्यवहारोपेतं चेतनं प्राणिजातं लक्ष्यते, अनशनं तद्र- हितमवेतनं गिरिनद्यादिकं तदुभयं यथा स्यात्तथा ( अमि) स्वयसेव विविधो भूत्वा (व्यकामत ) व्याप्तवान् ॥ ४ ॥ भाषार्थ-जो यह तीनपादयुक्त संसारस्पर्शरहित ब्रह्म, इस मज्ञानकार्यसंसारसे दहिभूति अर्थात्-इसके गुणदोषोंसे अस्पृष्ट होकर उत्कृष्टतासे स्थित हुआहै, इसका लेशरूप जगत् इस मायामें फिर प्राप्त होताहुआ, अर्थात्-सृष्टि संहार द्वारा बारंबार आगमन करताहुआ (विष्ट- भ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ),मायामें मानेके उपरान्त देवतिर्यगादिमें विविधरूफ होकर अशनादिव्यवहारयुक्त चेतनप्राणिसमूह इससे राहत गिरिनदीमादिक अर्थात्-स्थावर जंगमको देखकर व्याप्त करता हुमा । अर्थात् इन सवको निर्माण कर इनमें प्रवेश कर अलेक रूपसे व्याप्त हुआ ॥ ४॥ ततोविराईजायतविराजोऽअधिपूरुषः ।। सजातोऽअत्यरिच्यत पश्चादूमिमयोपुर६५ ॐ तत इत्यस्य ना० ऋ०। शेषं पूर्ववत् ॥५॥ .

(१४) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- भाष्यम्-( ततः) अनन्तरमादिपुरुषात् (विराटू) ब्रह्माण्डदेहः ( अजायत ) उत्पन्नः (विराजः ) विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेति विराट् ( अधि ) देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणं कृत्वा (पुरुषः) तदेहाभिमानी. कश्चित्पुरमानजायत योऽयं सर्व- वेदान्तवेद्यः परमात्मा स एव स्वकीयमायया शिराड्देहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीव- रूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देववाल्मा जीवोऽभवत् ( सः) विराट् पुरुषः (जावः ) जातः सन् (अत्यरिच्यत ) अतिरिक्तोऽभूत् । विराडतिरित्तो देवतिर्यमनुष्यादिरू- पोऽभूत् (पश्चात् ) देवादिजीवभावादूर्ध्व (भामम् ) ससर्जेति शेषः अनन्तरं तेषां जीवानों पुरः पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ससर्ज ॥५॥ भाषार्थ-इसके उपरान्त उस आदिपुरुषसे ब्रह्माण्डदेह-जिसमें अनेकप्रकारकी वस्तु विराज- मान होतीहैं वह प्रकट हुआ, विराट्देहको ऊपर उसी देहको अधिकरण फरके उस देहका अभिमानी एकहीं पुरुष हुआ, अर्थात्-संपूर्णवेन्दान्तसे जानने योग्य परमात्मा अपली मायासे विराट्देह ब्रह्माण्डकी रचना कर उसमें जीवरूपसे प्रवेश करके उसमा अभिमानी देवतात्मा नीवरूप हुआ', और वह विराट्रपुरुष प्रगट होकर अतिरिक्त-देवता, तिर्यङ्, मनुष्यादिरूप हुआ, देवादिजीवभावके उपरान्त भूमिकी रचना करताहुआ, भूमिरचनाके उपरान्त उन जीवोंके सात धातुणोंसे पूर्ण होनेवाले शरीरोंकी रचना करताहुआ ॥ ५ ॥ मन्त्रः॥ तल्ख्याधुज्ञाल हुतुल्स त पृषदाज्य- সু। ঘহাঁবাঁহাম্বালহত্যা- म्याश्चये॥६॥ ॐ तमादित्यस्य नारायण ऋषिः । आर्चीपंक्तिश्छन्दः । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥६॥ भाष्यम्-'तस्मात् ) ( सर्वहुतः ) ( सर्वात्मकः) पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हूयते सोऽयं सर्वहुतः ताशात्तस्मात् पूर्वोक्तात् मानसात् ( यज्ञात् ) पुरुषोधाख्ययज्ञरूपात सर्वव्यापकात् पुरुषचतुर्थपादात (पृषदाज्यस्) दधिमिश्रमाज्यं (सम्भृतम्) समुत्प- नम् भोगजातं सर्व सम्पादितमित्यर्थः । तथा ( तान् ) ( वायव्यान् ) वायुदेवताकान् ( पशून ) पशून् ( चक्रे) उत्पादितवान् (ये) आरण्याः (हरिणादयः) च (ग्राम्याः) छामादयः तानपि चक्रे ॥६॥ भाषार्थ-उससे सर्वात्मा पुरुष जिसयज्ञमें हवनद्वारा पूजेजाते हैं, उस पुरुषमेधयज्ञसे दाधाम श्रित घृत संपादित हुआ, दधि आज्य आदि भोग्यजात वस्तु पुरुषद्वारा प्रकट हुई और उस पुरुषने उन वायुदेवतावाले पशुओंको उत्पन्न किया “अन्तरिक्षदेवस्याः खलु वै पशवः” इति श्रुतेः) जो वनके पशु हरिणआदिक और प्रामके पश गा अश्व आदिक हैं ॥ ६ ॥ ( - (१५) ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। विशेष:-सर्व विश्व (संखार ) पुरुष जिस यज्ञ में आहुतहुए, उस मानसयोगको सर्वहुत कहते हैं, सर्व प्रथम दधिवृतादि वस्तु प्रगट हुई, यहाँ दृषिवृतादिभोग्य वस्तुसे वृक्षोंके रस विशेष जानने यह घृत, दधि उपलक्षण है । पर्वतवासी योगीगण इन्हीं वृक्षोंके पूषदाज्यस्वरूप अन्नफलोंको भोजन कर क्षुधा तृष्णा निवृत्त करते हैं, यहाँ दधि तसे उत्पन्न होनेवाले जीवों- के खाद्यपदार्थकी सृष्टि जाननी, कोई कहते हैं-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषद्वारा दुधिमिश्रित घृत संपादित हुआ, उससे ग्रामचारी अरण्यचारी ओर (च) कहनेसे नभश्चारी जीव उत्पन्न हुए। इस स्थल में यथार्थ कर्तृत्व ब्रह्मको मानकर ब्रह्मले अस्मदादिपर्यन्त यथार्थ कर्तृत्व नहीं है ऐसा दिखाया है इसीसे कहा है कि उससे प्रगट हुए ॥ ६॥ तस्माद्यज्ञालबहुतु ऋचऽसामानिजज्ञिरे। छन्दांसिगझिरवम्भाधजुलाम्मादजा- यत ॥७॥ ॐ तहमादित्य नारायण ऋषिः। आर्यनुष्टुप् । पुरुषो देवता । वि० पू०॥७॥ भाष्यम्-( तस्मात् ) ( सर्वहुतः ) सर्वैहूयमानात् ( यज्ञात् ) यज्ञपुरुषात् (ऋचः) ऋग्वेदः ( सामानि ) सामवेदाः (जज्ञिरे ) जाताः ( तस्मात् ) पुरुषात् छन्दा- लि) गायत्रीप्रभृतीनि ( जाज्ञरे ) जाताः ( तस्मात् ) ब्रह्मणः (यजुः ) यजुराप ( अजायत ) जात इत्यर्थः ॥ ७ ॥ भाषार्थ-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषसे ऋक्, साम, उत्पन्न हुए। उसीसे छन्द अथर्वमंत्र प्रकट कुए, उससे यज्ञात्मक यजुः प्रगट हुमा ॥ ७ ॥ मन्त्रः॥ तमाश्वा अजायन्तुयकेचोभयादतः ॥ साबोहणजिएतस्मात्तस्माजावाजा- वयं ॥८॥ ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदाय॑नुष्टुप छंदः । पुरुषो दे० वि० पू॥८॥ .

(१६)
रुद्राष्टाध्यायी-
(द्वितीयो-
भाष्यम्-( तस्मात् ) ( यज्ञात् ) सर्वरूपयज्ञरूपात् ( अश्वाः ) अश्वाः ( अजाय-
न्त ) प्रकटीभूताः (च)(ये के)(उभयादतः) अश्वव्यतिरिक्ता गर्दभादय ऊर्धाधो-
मागयोर्दन्तयुक्तास्तेपि मजायन्त (ह) प्रसिद्धी (तस्मात् ) पुरुषात् ( गावः)
गावश्च ( जज्ञिरे) अजायन्त ( तस्मात् ) सर्वव्यापकात् ( अजावयः) अजा गाव
यश्च अनाः छागाः अवयो मेषाश्च (जाताः ) जज्ञिरे । पत्र कण्डिकाव्य यत्किचि-
दविरात्मकं विध्यर्थवादमन्त्राभया वेदाश्च पुरुषोत्तमात्पुरुषमेधयज्ञस्वरूपादेव सबै
जातमिति वाक्यार्थः ॥ ८ ॥
भाषार्थ-उस यज्ञपुरुषले घोडे उत्पन्न हुए जो कोई घोडोंसे अतिरिक्त गर्दभादि तथा
ऊपरनाचेके दांतोंसे युक्त हैं वे उत्पन्न हुए, प्रसिद्ध हैं कि उस यज्ञपुरुषले गाएं प्रकट
उसीसे भेड वकरी उत्पन्न हुई ॥ ८ ॥
विशेष-पूर्वमंत्र में सामान्यतासे आरण्य और ग्रामके पशु उत्पन्न होने कहे, इस मंत्रमें यज्ञका-
साधक विशेष पशुओका निरूपण किया है। ब्राह्मणभागमें उनके चिह्न भी लिखे हैं ! (स्थूल
पृषतीमाग्निवारुणीमनवाहीमालभेते ) मर्य-जिसका शरीर हष्ट पुष्ट गोल बडे बडे बिहों
युक्त हो नेत्र सूर्य और अग्निके समान रक्तवर्ण हों, उस गौको यज्ञके घृत, दुग्धके निमित्त
ग्रहण करके फिर प्रदान करदे । इत्यादि यहाँ याज्ञेय पशुओं का वर्णन किया, इससे पहिले
६ मंत्रोंसे इसमें भेद है ॥ ८ ॥
मन्त्रः।
4
বজাহিঙ্গিীতজ্ঞালতঃ |
तेनदेवाऽयजन्तसुध्यायश्चये ॥ ९ ॥
ॐ तं यज्ञमित्यस्यादिपूर्ववत् ॥ ९॥
.
भाग्यम्-( अग्रतः ) ( जातम् ) सृष्टेः पूर्व जातम्, पुरुषत्वेनोत्पन्नं ( तम् )
( यज्ञम् ) यज्ञसाधनभूतम् ( पुरुषम् ) . यज्ञपुरुषं पशुत्वभावनया यूपे वई .
( बहिपि) मानसे यज्ञे (प्रोक्षन) प्रोक्षितवन्तः मानसयागं निष्पादिवन्तः (तेन)
गुरुपेण ( साध्याः) सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयः (देवाः) निर्जराः (च)
(ऋषयः ) मंत्रद्रष्टारः ( अयजन्त ) यागं कृतवन्तः । अन कारणे कार्योपचारात
यज्ञेन यज्ञसाधनमभिधीयते प्रौक्षन् ग्रहणं सकलसंस्कारोपलक्षणार्थ तथा व पुरुएं
पृपदाज्यादिरू यज्ञसाधनभूतं प्रोक्षणादिसंस्कारः संस्कृत्य तेन पृपदाज्यादिरूपेण
देवा याग कृतवन्त इति वाक्यार्थः ॥९॥
भाषार्थ-सृष्टि के पूर्वमें प्रकट हुए अर्यात्-पुरुषरूपसे प्रादुर्भूत उस यज्ञसाधनभूत पुरुषको
मानस यज्ञमें मेदि संस्कारोंसे संस्कार करतेहुए, उसी पुरुषसे जो साध्य देवगण और
अपि अर्थात् सृष्टिसाधनयोग्य प्रजापति और उनके अनुकूल मंत्रद्रष्टा मावि मानसयागको
निष्पन्न करतेहुए ॥ ९ ॥

ऽध्यायः २ भाष्यसहिता। (१७ ॥ मन्त्रः। यत्पुरुषूब्धदधुस्कतिधाध्यकल्पयन् ॥ मु- खुद्धिमत्यासीस्किम्बाहू किमूरू पादाऽउ- स्पते ॥१०॥ ॐ यत्पुरुषमित्यस्य नारायण ऋषिः । नि० छ० पुरुषो दे० । वि० पू० ॥ १०॥ भाष्यम्-( यत् ) यदा ( पुरुषं ) विराडपं ( व्यदधुः) प्रजापतेः प्राणरूपा देवाह. संकल्पेनोत्पादितवन्तः (तदा) तस्मिन्काले ( कतिधा) कतिमिः प्रकारैः (व्यकल्प- यन् ) विविधं कल्पितवन्तः ( अस्य ) पुरुषस्य ( मुखम् ) मुखम् (किम् आसीत् । किमासीत् (को वाहू ) को बाहू अभूताम् (किम् ) (ऊरू) की अरू ( पादौ ) को व पादौ च्येते ) पादावपि किमास्तामित्यर्थः । पुरुषावयवनिरूपणे द्विवचनम् ॥ १० ॥ भाषार्थ-प्रश्नोत्तर रूपसे ब्राह्मणादिकी सृष्टि कहते हैं-प्रजापतिके प्राणरूपदेवता तथा साध्या गणादि जिस समय विराटपुरुषको संकल्पद्वारा प्रकट करतेहुए उस समय कितने प्रकार पु.ल्पना करतहुए अर्थात्-पूर्ण करतेहुए इस पुरुषका मुख क्या हुआ, क्या भुजा, क्या जंघा, कौन चरण कहे जातेहैं ॥ १० ॥ विशेष-पहिले सामान्यप्रश्न और मुखादि विशेषप्रश्न हैं, अर्थात्-देवगण सृष्टि के निमित्त मानसयाग विस्तार करके जिस समय निज अमोघ संकल्पद्वारा विराटपुरुषको सृजन करतेहुए उस समय यह विराट कितने प्रकारसे पूर्ण हुआ, क्या पदार्थ उसका मुख पाछु उरूं और चरण हुमा । तात्पर्य यह है कि-ऋषियोंने मानसयागमें सूक्ष्मदृष्टिसे ब्रह्मरूप प्रजापतिक मुख वाहू आदिअंगोंका अवलोकन किया और उसमें ब्राह्मणादि जातिका दर्शन किया।॥१०॥ मन्त्रः। ब्राहमणोल्युमुखमास्त्रीद्वारा जुन्या कृतः ।। कुरूतर्दस्युयोश्यापुद्भयाशूद्रोऽभजाय- त॥ ११ ॥ ॐ ब्राह्मणोस्यत्यस्य वि० पू० ॥ १३॥ - २

(१८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ द्वितीयो-
भाष्यम्-जाह्मण इति पूर्वकण्डिकायां स्तुत्यर्थ विकल्पः कृतः आकाङ्क्षोत्थापना-
पात्र स्तुतिमाह-(ब्राह्मणः) बाह्मणत्वजातिविशिष्टः पुरुषः (अस्य) प्रजापतेः (मुखम्)
शुवम् (मासीत् ) सुखादुत्पन्नः (राजन्यः) क्षत्रियः (बाहू कृतः) बाहुत्वेन निष्पादितः
अस्य ) प्रजापतेः (यत्) यौ (अरू) (तद् वैश्यः) तदूपो वैश्यः सम्पन्नः अरु-
स्यामुत्पन्न इत्यर्थः । (पन्यास) पादाभ्यां (शूद्रः ) शूद्रत्वजातिमान् पुरुषः (अजा-
अत) उत्पन्नः । अयमेव ब्राह्मणादिचतुष्टयरूप इति वाक्यार्थः । श्यमेव कृष्णयजुःस
ॐहितायां सप्तमकाण्डे र सुखतनिवृत्तं निमिमीत इत्यादी विस्पष्टमानातः ॥११ ।।
भाषार्थ-ब्राह्मणत्वजातिविशिष्ट पुरुप इस प्रजापतिका सुख हुआ, अर्यात्-सुखले उत्पन्न
अआ । क्षत्रियत्वज.तिविशिष्ट पुरुप चाहुरूपसे निष्पादित हुआ, अर्थात्-भुजाओंसे प्रकट
हुआ। इसकी जो जंघा हैं वह वैश्य हुआ, 'चरोसे शूद्रजाति विशिष्ट पुरुप उत्पन्न हुआ,
बुखादिरे ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति कृष्ण यजुःके सप्तम कांडमें लिखी हैं, (स मुखतस्थिवृतं निर.
मिमीत ) तथा (तिसृभिरस्तुवतब्रह्मासृज्यत [ १४ । २८ यजुः ० ]) इस प्रकार स्पष्ट लिखी
है, इस्तीते सायणाचार्य और महीधरने इसी प्रकार अर्थ किया है यहां कल्पना और उत्पन्न
होना दो शब्द इस कारण आये हैं कि पुरुपमेधमें जो सब जातिके पुरुष पेठे हैं उनको वि.
रापले मानना कल्पना है और सृष्टिपक्षमें उत्पत्ति है इससे दो शब्द आये हैं ॥ ११ ॥
मन्त्रः।
चुम्मायनयोजातश्चक्षोह सूर्योऽअजा-
यात ।। श्रोन्बोहायुश्वप्नाणश्वमुखाग्नि-
जायत ।। १२॥
चन्द्रमा इत्यस्य नारायण ऋ० । आमेष्टुप् छ । पुरुषो.
देवता । वि० पू० ॥ १२॥
भाष्यम्-अस्य प्रजापतेः (सनसः) सकाशात ( चन्द्रमाः ) शशी (जातः)
लत्पन्नः (चक्षाः) चक्षुषः (सूर्यः) सूर्यः (अजायत) उत्पन्नः (च (श्रोत्रात् ) कर्ण-
सिवात् । वायुः ) पवनः (प्राणश्च ) प्राणोऽपि (मुखात् ) आस्यात् (अग्निः ) वह्निः
अजायत) उत्पन्नः। अन्यत्र चन्द्रमाः सूर्यो बाहुभ्यो मनश्चक्षुः श्रोत्रेभ्य इति चन्द्रम:-
मृतीनामुत्पत्तिरिति सृष्टिक्रमः । अत्र तु अचिन्त्यमहिम्नि पुरुषे मनश्चक्षुः श्रोत्रभ्यः
चन्द्रमा प्रभृतीनामुत्पत्तिकम इति विपरीतोऽर्थः स्तुतिरिति वाक्यार्थः ॥ १२ ॥

ऽध्यायः २] भाष्यसहिता। (१९) भापार्थ-जैसे गौमादि, ब्राह्मणादि उसले उत्पन्न हुएई, इसी प्रकार उसझे मनसे चन्द्रमा प्रगट हुआहे, चक्षुओंसे सूर्य प्रगट हुआहे, भोभसे वायु.और प्राण प्रगट हुए और मुखसे अग्नि प्रगट हुई ॥ १२ ॥ विशेष-पह जो अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा लक्षित होते हैं इनमें वेतनता है या नहीं इसका विचार इस प्रकार जानना कि, इनमें अधिष्ठित होकर विराट का अंश (शक्ति) चेतनवस्तु है, जिसने चन्द्र कहते हैं, वह चन्द्र देवताके रहनेका एक प्रधान गोलक इसी प्रकार दृश्य- मान सूर्य, मग्नि भी सूर्य और अग्निदेवताके रहनेके प्रधान स्थान है, इसी प्रकार सपदेवता- ऑमें जानलेना । इन संपूर्ण देवताओंके प्रधान स्थान एक एक गोला होकर भी इनके संपूर्ण संश अपने अपने कारणस्थानमें अधिष्ठातृदेवता होकर अवस्यान करते हैं जिस प्रकार जलका प्रधानस्थान समुद्र होकर भी उसके किंचित् २ अंश सपजीवोंमें हैं इसी प्रकार विराटके मन- से समष्टि चन्द्र हुआ उसके कुछ २ अंश कारणस्थान मनमें स्थित हो अधिष्ठाह देवतारूपसे प्रस्थान करते हैं अधिष्ठातृदेवता ही अधिष्ठानका चालक होता है । इसी प्रकार सूर्यका भी प्रधानस्थान यह दृश्यमान सूर्यलोक वा सूर्यगोलक होकर भी उसके किंचित् मंश हमारे चक्षु- म भावर अधिष्ठातृदेवतारूप होकर रहते हैं जिससे हम देखते हैं। अंधेका अधिष्ठातृदेवता विदारूप है, इसी प्रकार अग्निदेवताका प्रधानस्थान अन्तरिक्ष, शु और जठर-यह तीन हैं तो भी अपने किंचित् संशसे अपने कारणस्थान ( हमारे मुख में स्थित पाक्-इंद्रियमें स्थित होकर अधिष्ठातृदेवता होकर मवस्यान करते हैं. इसी प्रकार संपूर्ण देवताओंमें जानना. मंत्रब्राह्मण, अहाँ (मृदयवीत्आपोऽनुवन् ) ऐसा आताहै वा ( तेहेमेप्राणाअहंश्रेयसविदमानब्रह्मजग्मुः कोषीतकी० ) वे प्राणादिक अपनी श्रेष्ठतासंपादन करते प्रजापति के समीप जाकर कहनेलगे ऐसे स्थानों में यही जानना कि, यह जडके संवोधन नहीं किन्तु उनके भधिष्ठातृदेवता हैं, सो प्रारंभमें भी कह चुकहैं, पिछला आधा (मुखादिंद्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत) ऐसा है मुखसे अग्नि और ब्राह्मण दोनोंकी उत्पत्ति है इस कारण दोनों में माहुति होती है ॥ १२ ॥ ॥ १२॥ मंत्रः । नामयोऽआसीइन्तरिक्षठशीषण्णोद्यौल- मवर्तत॥पुद्भयाम्भमिर्दिशुलश्रोत्रात्तयाँ लोका२॥ अंकल्प्पयन् ॥१३॥ ॐ नाभ्या इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ १३॥ भाष्यम्-(नाभ्याः) प्रजापते भेः (अन्तरिक्षम् ) आकाशम् (आसीत् ) उत्प- नम् ( शीर्णः) शिरसः (द्यौः ) धुलोकः (समपर्वत) उत्पन्नः (पद्भ्याम् ) पादाभ्यां (भूमिः ( पृथिवी) श्रीत्रात् (कर्णात् )दिशः (दिश उत्पन्नाः) तथा ( इत्थम्) लो- (२०) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- कान ( अन्तरिक्षादीन् )अकल्पयन् (देवा उत्पादितवन्तः) देवमनुष्यादिनिखिलस्थावर जंगमाविलोक्यमकल्पयन्नित्यर्थः ॥१३ ॥ भाषार्थ-नाभिसे मंतरिक्ष हुआ, शिरसे स्वर्ग प्रकट हुभा, चरणोंसे पृथिवी, श्रोत्रीसे संपूर्ण दिशाएं उत्पन्न हुई, उसी प्रकार भूरादिकोकोंको पूर्वोक्त कल्पना करतेहुए, वा विराट्के देहसे कल्पना करतेहुए ॥ १३॥ विशेष-अन्तरिक्षदेवताका प्रधानद्वार अन्तरिक्षलोक है, तो भी उसका किंचित् मंश हम जीवगणोंके नाभिस्थानमें रहकर शरीरगोलकका केन्द्ररूप हुआ है, मस्तक झुलोक इसके कहनेसे प्रकाशात्मक देवताका बोध जानना, मस्तिष्कमें वह प्रकाशात्मक देवता होकर अवस्थान करते हैं, यह देवता यदि क्षणमात्रको भी तिरोधान होजाय तो शारीरमें स्थित रक्तकणिका और धमनी सव अबळ होजावें और रुधिरके जमनेसे तत्काल जीवनमूछी भोर अंधकारसे व्याप्त होजाय यदि यह ादेवता पुनवीर भागमन न करे तो फिर जावन नहीं होता, अर्थात् मृत्यु होजाती है. योगीजन चक्षु मूंदकर भ्रूमध्यमें इसी किरणका दर्शन करते हैं, वह किरण इस दिवदेव देवताके मस्तिष्कले आई हुई प्रकाशमात्र है जिनके मस्तक में यह क्षण- क्षणमें आविर्भाव और तिरोभाव होती है, वह पुरुष अस्थिरमति मौर संपूर्णकार्यों में अस्थिर होताहै उन्माद इसका ही प्रधानकारण है । यह भस्तकका अधिष्ठातृदेवता है, प्रगट और तिरोहित होता है. वरणोंसे भूमि हुई भूमिको आधारशाक्त जानना, आधारशक्ति और भूमि एकही बात है, भूमिदेवता अपने कारण पादयुगलमें किंचित् अवस्थित हुई है इसीसे दोनों चरणों में सब शरीरोंके वहन करनेकी सामर्थ्य है, यदि भमिदेवता चरणोंसे क्षणकालको भी तिरोहित हो तो यह शरीर गिरजाय भतिशैशव और मतिवार्धक्य यह इन दोनों पादोंमें गठमाषसे अवस्थान करते हैं, श्रोत्रसे दश दिशाएँ हुई, दिग्देवता अपने कारण श्रोत्रइन्द्रि- धर्मे कुछ संशसे स्थित होकर अधिष्ठातृदेवतारूपसे विराजते हैं हम देखते हैं इसी दिशामें अपने कर्ण स्थापन करें सव ओर सुनेंगे इसका कारण क्या ? यह सब दिशामों में व्यापी दिग्देवताका अधिष्ठान मात्रही इसका कारण है ॥ १३ ॥ मन्त्रः। यत्पुरुषेणहुवि/दुवायुज्ञमतन्वत॥वसुन्तो- स्थासीनाज्ज्यङ्ग्रीष्टमाइमल्शुरविः ॥ ॐ यत्पुरुषेणेत्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदायतुष्टुप् छन्दः । अज्ञो दे० । वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-(यत्) यदा पूक्तिक्रमेणैव शरीरघुत्पन्नेषु सत्सु (देवाः ) उत्तरसृष्टिसि- यथै बाह्यद्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन हविरन्तरासंभवात् पुरुषस्वरूपमेव मनसा हविष्ट्न सकंल्प्य (पुरुषेण ) पुरुषाख्येण ( हविषा) हविर्भूतेन (यज्ञम् ) मानसं यज्ञम् ( अतन्वत ) J ऽध्यायः २. माष्यसहिता । (२१) मतनिषत, तदानीम् (बसन्तः) वसन्ततः (मस्य ) यज्ञस्य ( आज्यम् ) घृतम् (मासीत् ) अभूत (ग्रीष्मः:) प्रीष्मतुः (इध्मः) समिद्विशेषः मासीत् ( शरत् ) शरह- तुः ( हविः) हविरासीत् । एवं पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन संकल्पोऽनन्तर बसन्ता- दीनामाज्यादि विशेषरूपत्वेन संकल्प इति ज्ञातव्यम् ।। १४ ॥ भाषार्थ-जिस समय पूर्वोक्त क्रमसे देवशरीरोंके होनेपर देवताओंने उत्तरसृष्टिके सिद्ध कर- नेके निमित्त बाह्यद्रव्यके उत्पन्न न होनेके कारण पुरुषस्वरूपको ही मनसे हविहीरा संकल्प कर उस पुरुषरूपहविर्वारा मानस यज्ञको विस्तार किया, उस समय वसन्त ऋतु इस यज्ञको धृतरूप कल्पना हुई, ग्रीष्मभानु समिधू और शरद ऋतु हवि हुई. प्रयमपुरुषकी हवि सामा- न्यरूपले संकल्प करके फिर वसन्तादिकी साज्यविशेषरूपसे कल्पना की है, यजुःमें कण्डि- काव्यत्यय है, ऋक्में इसके उपरान्त “ तं यज्ञम् ॥ ९ , फिर "तस्माद्यज्ञात्" ६, फिर “सप्ता- स्यासन" हैं ॥ १४ ॥ मन्त्रः। सुप्तास्यासन्परिधयुस्त्रिः सुप्तसुमिधः कृता ॥ देवायाज्ञन्तन्छालाऽअबभुन्गुरु- पम्पशुम् ॥१५॥ ॐ सप्तास्यासनित्यस्य नारायण ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । यज्ञो देवता। वि० पू० ॥ १९॥ भाग्यम्- ( अस्य ) सांकल्पिकस्य यज्ञस्य ( सप्त) गायत्र्यादीनि सप्त छन्दांति (परिधयः) ऐष्टिकस्याहवनायिस्य त्रयः परिधयः उत्तरवेदिकात्रय आदित्यश्च सप्तमः परिधिः प्रतिनिधिः पुरुषस्य यज्ञस्य परिधयः भूमिवेष्टनानि सप्तसागरा आसन्निति का (त्रिसप्त) एकविंशतिः द्वादश मासाः पञ्चर्तवस्त्रय इमे लोका असावादित्य एकविंश इति एते पदार्थाः सप्त छन्दांसि सप्त उपच्छन्दांसि सप्त व्याहतयश्च वा । एतानि (समिधः कृताः ) या दारुयुक्तमत्वेन भाविताः ( यत् ) यदा (देवाः ) प्रजापतिः प्राणेन्द्रियरूपाः ( यज्ञम् ) मानसं यज्ञं ( तन्वानाः ) कुर्वाणाः (पुरुषम् ) विराट् पुरुः अमेव ( पशुम् ) पशुत्वेन ( अवघ्नन् ) भावितवन्तः ॥ १५ ॥ भाषार्थ-जिस समय पूर्वोक्तदेवताओंका मर्थात् प्रजापतिके प्राणहन्द्रियके अधिष्ठातामोंने मानस्यज्ञको विस्तार करतेहुए विराट् पुरुषको पशुरूपसे भावित करके बांधा तन इस संक ल्पित यज्ञकी सात गायत्री भादि छंद परिधी हुई, ऐष्टिक माहवनीयकी उत्तरवेदीकी तीन मादित्य सातौं परिधी हुई, यह प्रतिनिधिरूप है ( तथाच श्रुतिः "गुप्त्यैवा अभितः परिषयो भवन्स्यथैतरसूर्यमेव पुरस्ताद्गोप्तारं करोति । इति तत एते आदित्यसहिताः सप्त परिधयोऽत्र (२२) रुद्राष्टाध्यायी- [ द्वितीयो- सप्तच्छन्धोरूपाः") इक्कीस समिधाओंकी अर्थात् बारह महीने पांच बहतु तीन लोक और यह मादित्य यह इस यज्ञमें काष्ठरूपसे भावित कियेगये. अथवा सात क्षीरादि समुद्र यज्ञकी परिषी हुई। कारण फि-भरतखण्डमें यज्ञ होते हैं और गायत्रीआदि सात अतिजगतीआदि सात और कृत्यादिसात यह पक्कीस छन्द इसके सानिधारूप हुए यही इस ब्रह्माण्डके और. शरीरक आवरण हैं इन्हील स्थिति है।। १६॥ युझेन ज्ञानयजन्तदास्तानिधम्माणित থাকা ॥ বলাবছিল্লাল यपईसाध्या सान्तिदेवाः ॥१६॥ ॐ यज्ञनेत्यल्या नारायण ऋषिः । बाणिक् छं० यज्ञा देवता । वि० पू० ॥१६॥ भाष्यम्-( देवाः ) प्रजापतिप्राणरूपाः सिद्धसंकल्पाः ( यज्ञेन) यथोत्तेन यज्ञसा- धनभूतेन संकल्पेन सामन्या वा ( यज्ञम् ) पुरुष यज्ञस्वरूपं प्रजापति विष्णुं वेत्ति । “यज्ञो वै विष्णुः” इति श्रुतेः । (अयजन्त ) पूजितवन्तः (तानि) ते (धर्माणि) धर्माः (प्रथमानि ) मुख्यानि ( आसन् ) लथएन् । अन्यत्र तद्दर्शनमसंभावितमेले- त्यर्थः । ( यत्र ) यस्मिन् विरामाप्तिरूपे नाके (पूर्व) पूर्व ( साध्याः ) साध्यादयों देवाः ( सन्ति ) वर्तन्ते तसू (नाकम् ) दिरामाप्तिरूपं स्वर्ग (ह) निश्चयेन (ते) ( महिसानः ) तदुपासकाः ( सचन्ते ) समस्यन्ति प्राप्नुवन्ति । इति पुरुषसूक्तानु- नाकः ॥ १६ ॥ भाषार्थ-सिद्धसंकल्प देवता मानसयज्ञसे यज्ञस्वरूप प्रजापतिमा पूजन करतहुए, वे यज्ञ- पुरुष पूजनसंपंधि धर्म वा जगदूपविकारोंके धारण करनेवाले मुख्य हुए अर्थात् उसले फलके चिरन्तन धर्म प्रथम हुए । यहाँतक सृष्टिगतिपादक सूक्तभाग है। अगला उपासनारूप फला- नुवादक भाग कहते हैं, जिस विराट्प्राप्तिरूप स्वर्ग पुरातन विराट् उपाधिसाधक देवता स्थित रहते हैं. विराटप्राप्तिरूप स्वर्गको ही वे उपासक महात्मा प्राप्त होते हैं, इसले सृष्टिका प्रवाह मित्य दिखाया । ( "सूर्याचन्द्रमसौ पाता यथापूर्वमकल्पयत्" इति) ॥ १६ ॥ জীবহতাহাঅষ্ম । मन्त्रः। अद्भयासम्मृत पिपैरसांचविश्वकर्मणु . न्यायः २.] भाष्यसहिता। (२३।। समवर्तताग्ने ॥ तस्यत्वष्टालिदचंदूपमें- तितन्मत्त्य॑स्यदेवत्वमाजानुग्मने ॥१७॥ ॐ अन्य इत्यस्य नारायण ऋषिःभुरिणाविष्टपूछन्दः । आदित्यो दे। सूर्योपस्थाने वि०॥१७॥ माष्यम्-(पृथिव्यै ) पृथिव्या मपि (च) (अङ्ग्यः ) जलात् (सम्भृतः) पुष्टर अत्र पृथिवीपदं पंचभूतोपलक्षणार्थ लेन पंचभूतोत्पत्तिपूर्वकाल एव सम्भृतः पुष्ट इत्यर्थः । (विश्वकर्मणः) विश्वं कर्म यस्य सस्प कालस्य ( रसात् ) प्रीतियों रस:- (अग्रे) प्रथमं (समवर्तत ) समभवत् । यदा विश्वकर्मणो जगन्निर्माणेच्छाऽभूतदैक समवर्तत इत्यर्थः । भूतपंचकस्य कालस्थ सबै प्रति कारणत्वात् पुरुषमेध्याजिनो लिंगशरीरे पंचभूतानि तुष्टानि कालश्च । ततस्तुष्टेभ्यः कश्चिद्रसविशेषफलरूप उत्तमज. न्माद उत्पन्नः वेत्यर्थः। (तस्य ) रसस्य (पं) तद्रूपं ( विदधन् ) धारयन् ( खष्टा) आदित्यः (एति ) प्रत्यहसुक्ष्यं करोति । ( अग्रे) प्रथमं (मर्त्यस्य ) मन्च- व्यस्य सतस्तस्य पुरुषोधयाजिनः (माजानम् ) मुख्यम् (तत्.) ( देवत्वम् ) सूर्यरू- पेण-तस्मात्तस्यादित्यस्य तदूपं मण्डलाकारं मर्त्यस्य मनुष्याणां सृष्टितोऽपि. अग्ने पूर्व देवत्वं विदधत धारयत एति वेत्यर्थः। द्विविधाः देवाः कर्मदेवा माजानदेवाध-उत्कृष्टता कर्मणा देवत्वं प्राप्ताः कर्मदेवाः सृष्टयादाकुत्पन्ना आजानदेवाः ॥ १७ ॥ भाषार्थ-पृथिवीमादिसृष्टिके निमिस अथवा पृथिवीसे और जलोंसे पृथिवीके ग्रहण करने पंचभूतका ग्रहण है, अर्थात पंचभूतोले जो रस पुष्ट हुआ, और जिसका विश्व कर्म है उस कालकी प्रीतिका रस सवले प्रथम होताहुआ, पंचभूत और काल इन सबके प्रति कारण होने पुरुषमेघपानी के लिंगशरीरमें पांच भूत और काल तुष्ट होते हैं, उनके तुष्ट होनेसे कोई ररू फविशेष उत्तमजन्मका देनेवाला उत्पन्न हुआ। उस रसको रूप धारण करताहुआ आदित्य प्रतिदिन उदय करता है. प्रथम मनुष्यरूप उस पुरुपमेधयाजी सूर्यरूपसे दुख्य उस देव- स्वको प्राप्त करता है, दो प्रकारके देवता होते हैं-कर्मदेव और आजानदेव, कर्मसे देवत्वको प्राप्तहुए कर्मदेव, सृष्टिकी आदिमें उत्पन्नहुए आजानदेव होते हैं. कर्भदेवोंसे खौगुणा अधिक आनन्द आजानदेवताओंको होताहै ('ते कर्मदेवेभ्यः श्रेष्ठाः ये शतं कर्मदेवानामानन्याः ९ एक आजानदेवानामानन्दः' इति श्रुतेः।) [बृहदारण्यक ४ । १.१ ३५ । ] पुरुषमेधयाजी पूर्वकल्पमें आदित्यरूपको प्राप्तहुआ स्तुति किया है ॥ १७ ॥ विशेष-पृथिवीआदि सृष्टिके निमित्त उसके द्वारा जलसे रस हुआ। वही सब जगत्का उपा- दानस्वरूप है, उससे ही यह समस्त जगत् जो आगे वर्तमान था उसकी सृष्टि हुई, तब इल जगत्के रूपविधानार्थ त्वष्टाकी सृष्टि हुई, उन्होंने इस मर्त्यभुवनमें कर्मदेवत्व प्रगट किया ! भुक्तपक्षमें-पुरुषमेधयाजीके कर्मले फलरूप रस प्रगट होताहै । वह कर्मफलका देनेवाला यह (२४) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- सूर्य है, वह पुरुष सूर्यमें गमन कर आदिस्यरूपको प्राप्त हो जाताहै। और यही मुक्तिका मार्ग है सो आगे प्रगट करते हैं ।। १७ ॥ मन्त्रः। वेदाहमेतम्पुरुषम्मुहान्तमादित्यवर्णन्त- मंसहपुरस्तात् ॥ तमेवविदित्वातिमृत्यु मैतिनान्यपन्थविद्युतेयनाय ॥१८॥ ॐ वेदाहमित्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदापत्रिष्टपू छ० पुरुषों दे० । वि० पू० ॥ १८॥ भाज्यसू-( अहम् ) ( एतम् ) ( महान्तम् ) सर्वोत्कृष्टम् (आदित्यवणम् ) सूर्य- सशम् उपमान्तराभावात् स्वोपमम् ( तमसः) अंधकारस्य ( परस्तात् ) दूरतरम् तमोरहितमित्यर्थः । तमाशब्देनाविधाच्यते (पुरुषम् ) सूर्यमण्डलस्यं (वेद) जानामि (तम् ) आदित्यम् (एव) (विदित्वा ) ज्ञात्वा (मृत्युम् ) मरणम् ( अत्येति) अतिक्रामति परं ब्रह्म गच्छति ( अयनाय ) आश्रयाय (अन्यः) द्वितीयः ( पन्था) मार्गः (न विद्यते ) नास्ति । पुनरावृत्तये मोक्षाय अन्यः पन्था न विद्यते तथा चायमेव पुरुषो ध्यानगम्यो जातो मोक्षं ददातीति वाक्यार्थः । यथा मादित्यः स्वप्रकाशकः परा- नपि प्रकाशयति तथाऽयमपि स्वप्रकाशब्रह्मरूपी जगदपि प्रकाशयतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ मषार्थ- मैं इस सबसे उत्कृष्ट आदित्यरूप और उपमा न होनेसे अपनी ही समान अंघ- चारसे परे मंधकाररूपी विद्यासे दूर पुरुषको जानताहूँ लसही आदित्य को जानकर मृत्युको साक्रपण करताहै, अर्थात् परमब्रह्मको प्राप्त होताहै, छाश्रयके निमित्त दूसरा मार्ग नहीं है, सूर्यमण्डलके अन्तमें आत्मरूप पुरुषको ही जानकर मुक्ति होताहै ।। १८ ॥ विशेष-उस कारणरूप सबसे उत्कृष्ट जगदीश्वर. आदित्यवर्ण विद्याप्रकाशक परमेश्वरके ज्ञानसे ही मनुष्यकी मुक्ति होती है, यही देवयान मार्ग कहाताहै, इसके सिवाय मुक्तिका दूसरा मार्ग नहीं है, इसीसे मात्मा तदाकार होताहै उस समय जो ईश्वरकी महिमा है उसको पह जानता है ॥ १८ ॥ मन्त्रः मुजापतिश्चरतिगमऽअन्तरजायमा- नोबहुधाबिजायते ।। तस्युयोनिम्परि- ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। (२५) श्यन्तुिधीरास्तस्मिन्हतस्त्थुर्भुव॑नानि विश्वा ॥१९॥ यते रामा- - * प्रजापतिरित्यस्य नारायण ऋषिः । भुरिगापी त्रिष्टुप् छ० ॥ गुरुखो देवता। वि० पू० ॥ १९ ॥ भाष्यम्-(प्रजापतिः) प्रजानां पतिः (अन्तः) अन्तहदि स्थितः सन् (गर्भ) -मध्ये (चरति ) प्रविशति प्राणिनां मध्ये जीवात्मकरूपतया वसतीत्यर्थः । ( अजा- यमानः) नित्यत्वादनुत्पत्तिधर्माऽपि (बहुधा) बहुप्रकारेण कार्यकारणरूपेण (जायते) स्थावरजङ्गमात्मकदेहेषु जन्म लभते, यद्वाऽजायमानोऽपि गर्भ बहुधा दिशरीरेणेत्यर्थः । गायया प्रपञ्चरूपेणोत्पद्यत इति वा । ( धीराः ) ब्रह्मविदः ( तस्य ) प्रजापतेः (योनि) स्थानं स्वरूपम् (परिपश्यन्ति ') अहं ब्रह्मास्मीति जानन्ति ध्यानेन सम्यगुपलक्ष्यन्त इत्यर्थः । (ह) ( सस्मिन् ) तस्मिन्नेव ब्रह्मणि (विश्वा) सर्वाणि ( भुवनानि ) भूतजातानि (तस्थुः) स्थितानि स्वर्गमृत्युपाता- लादिस्थितानि सर्व तदात्मकमेवेत्यर्थः ॥ १९ ॥ माषार्थ-सत्मिा प्रजापति अन्तर्हदयमें स्थित हुभा प्रत्येक गर्भके मध्यम प्रविष्ट होताहै । रमन न होनेवाला और निष्य होकर भी मनेक प्रकार कार्यकारणरूपसे उत्पन्न होताहै, अर्थात मायाद्वारा प्रपंचरुपसे रामादिशरीर धर उत्पन्न होताहै, ब्रह्मके ज्ञाता उस प्रजापति के स्थान- स्वरूपको देखतेहैं, (महं ब्रह्मास्मीति ) इस प्रकारसे जानते हैं. संपूर्ण भूतसमूह प्राणी उसी कारणात्मा प्रझमें स्थित हैं अर्थात् संपूर्ण जगत् तदात्मक है, आशय यह कि सर्वत्र परमात्मा स्थित है, वही सबमें व्याप्त होकर अजन्मा होकर भी अनेकरूप धारण करता है ॥ १९ ॥ मन्त्रः। . योदेवेब्क्यऽआतपतियो देवानाम्पुरोहि- लह ।। पूर्वायोदेवक्योजातानयोरुचाय ब्राह्मये ॥२०॥ ॐ यो देवेभ्य इत्यस्य नारायण ऋ० । आर्ण्यनुष्टुप् छपुरुषो दे। वि० पू० ॥२०॥ भाष्यम्-(यः) प्रजापतिरादित्यरूपः ( देवेभ्यः) देवानां प्रयोजनाय ( बात- पति ) आ समन्ताद्भावेन द्योतते ( यः) ( देवानाम् ) अमराणाम् ( पुरोहितः ) (२६) रुद्राष्टाध्यायी- [ द्वितीयो- कार्येष्यने नीतः देवानां इविनाय पूर्वमग्निरूपेणाधीयत इत्यभिप्रायः । (य) (देवेभ्यः) देवभ्यः सकाशात् (पूर्व) (जातः) उत्पन्नः तस्मै (रुचाय) रोचमानाय (ब्राह्मये) ब्रह्म- भूताय बह्मण अपत्यं ब्रालिः तस्मै, ब्रह्मावयवमूताय वेत्यर्थः। (नमः) नमोऽस्तु ॥२०॥ भाषार्थ-जो आदित्यरूप प्रजापति देवताओंके निमिस सब ओरसे प्रकाशित होताहै, जो देवताओंका सष कार्याम अग्रणी है, वा प्रथम हितकर तथा पूज्य है, जो सब देवतानोंसें प्रथम प्रगट हुआहै उस दीप्यमान ब्रह्म अवयवरूपके निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥ विशेष-जो सूर्यरूपसे सप देवतामोको तपाते, जो अग्निरूपसे देवताओंके पुरोहित, जो कारणजलसे सबसे पूर्व प्रगट हुए हैं उन ब्राह्मीकान्तिमानके निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥ रुचाम्बाइमञ्जुनयन्तोदेवाऽअग्रेतदनवन् । बल्लेखम्बाहमुणोविद्यातल्या देवाऽअंसु- नवशे ॥२१॥ ॐ रुचमित्यस्य नारायण ऋ० । आय॑नुष्टुन छ० । पुरुषो देवता। वि० पू० ॥२१॥ भाज्यसू-(देवाः) ब्रह्मादयः यद्वा दीप्यमानाः प्राणाः ( रुचस् ) शोभनम् (ब्राह्मस्) ब्रह्मणोऽपत्यमादित्यम् (जनयन्तः) उत्पादयन्तः (पग्रे) प्रथमम् (तत्) ( अनु- वन् ) अयमेवास्माकं मुख्य इत्युक्तमन्तः । किं च हे पुरुषोत्तम (यः) (ब्राह्मणः ) ब्राह्मणः (त्या) त्याग ( एवम् ) उक्तविधिना (विधात् ) जानीयात् (तस्य) आदित्यो- पासकस्य ब्राह्मणस्य (देवाः) देवगणाः (वशे) इच्छायाम् (असन्न्) भवन्ति । पादित्यो- पासको जगत्पूज्यो मपति तथा च सहनशीपेत्यादिन्यतोऽर्पतश्चाधीत्य को ब्राह्मणः पुरुषोत्तमं जानाति ब्रह्मादयः देवास्तस्यामिलपितासम्पादयन्तीति वाक्यार्थः ॥ २१ ॥ मापार्थ-दीप्तिमान इन्द्रियोंके देवता शोभन मा ज्योतिरूप आदित्यको प्रगट करतेहुए प्रथम वह वाणी बोलते हुए हे आदित्य ! जो ब्राह्मण तुमको उक्त प्रकारसे प्रगट हुआ अजरामर. जाने उस आदित्यउपासतावाले ब्राह्मणके देवता पशमें होते हैं ॥ २१ ॥ श्रीश्चत लक्ष्मीचपान्यावहोरात्रै লীলাঞ্জঙ্গুিলীতাহা । -

ऽध्यायः २.]
भाष्यसहिता।
(२७
घष्णनिषाणामुम्मऽइषाण सर्वलोकम्मs
इषाण॥२२॥
इतिसहितायांद्रपाठद्वितीयोऽध्यायः२॥
ॐ श्रीश्चत इत्यस्य नारायण ऋ० । निच्यात्रिष्टुप् छ । पुरुषो
देवता। वि० पू० ॥२२॥
भाष्यम्-हे देव पुरुषोत्तम (श्रीः) श्रीयतेऽनया श्रीः सम्पत्तिः (च) (लक्षमी)
सौन्दर्यम् (ते) तब (पत्न्यौ ) नावास्थानीये (' च ) ( अहोराने ) अहोराने
(पार्श्व ) पार्श्वस्थानीये । अहः शब्दः परब्रह्मपरः तस्य विद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात
रात्रिशब्दः संसारपरः प्रकृतिपरः तस्याविद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात् एतेन धर्मार्थ-
कामात्मका संसारः मोक्षश्च श्रीपरमेश्वरपार्वेऽद्वयमित्युक्तं भवति । ( नक्षत्राणि) पा-
नगास्ताराः (रूपम् ) तब मूर्तिः (अश्विनौ ) द्यावापृथिव्यौ (व्यात्तम् ) विकासित-
मुखस्थानीये विवृत मुखमित्यर्थः । (इष्णन् ) कर्मफलमिच्छन् सन् (इषाण) गच्छ
अनुगृक्षण ( अमुम् ) परलोकम् (मे) (इषाण ) मम परलोका समीचीनोऽस्तु मे इम
लोकें भार्यापुनजनादिकमिषाण न केवलममुं किन्तु भूरादिसप्तलोकम् इषाणायं वाल्यार्यः।
(सर्वम् ) पशुपुत्राविधनयुक्तमिह लोकं स्वर्गमोक्षादिकमिच्छितवाञ्छामात्रेणैव सर्व (में)
मह्यम् (इषाण ) इच्छेत्यर्थः । सर्वात्मकोऽहं भवेयमितीच्छेत्यर्थः ॥२२॥
भाषार्थ-हे स्वप्रकाश स्वरूप ! श्री जिसके द्वारा संपूर्णजन माश्रणीय होते हैं, और.जिसके
द्वारा देखानालाहै सौंदर्य रूप लक्ष्मी आपकी त्रस्थिानीय है और दिनरात पार्श्वस्थानीय हैं
आकाशमें स्थित नक्षत्र आपका रूप हैं कारण कि तुम्हारेक्ष तेजसे प्रकाशित हैं यावापृथिवी
तुम्हारे मुखस्थानमें व्याप्त हैं ("मश्विनौ द्यावापृथिव्यौ इमे हीद ॐ सर्वमश्नुमाताम् ॥ इति
श्रुतेः । ) कर्मफलकी इच्छा करते इच्छा करो, परलोककी मेरे निमित्त इच्छा करो अर्थात्
मेरे निमित्त परलोक समीचीन हो ऐसी अमोघ इच्छा हो सक्लोकात्मक मैं होनाऊं. अर्थात्
मुक्त होजाऊँ ऐसी मेरे लिमित्त इच्छा करो ॥ २२ ॥
सरलार्थ-मनुष्योको इस प्रकार ब्रह्मबोध लाभ करना चाहिये कि हे देव ! श्री और लक्ष्मी
शोभा पौ कान्ति और संपत्ति यह तुम्हारी पत्नीरूप हैं, दिनरात तुम्हारे दोनों पार्श्वपारी,
तुम्हारे रूपसे नक्षत्र रूपवान हैं, द्यावापृथिवी तुम्हारे शरीरके रक्षकरूपले सावधानतासे
तुमको दृष्टिपूर्वक व्याप्त करके स्थित हैं, यदि तुम इच्छा करो तो यह लोक तो तुम्हारी
इच्छानुगत है सबलोकही तुम्हारी इच्छानुगत हैं, मुझ उपासकको ब्रह्मप्राप्ति हो, मैं सर्वत्र
आपको अनुभव करू, यह आदित्यमें ब्रह्मउपासना है ॥ २२ ॥
इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रेधादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितो'
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥

(२८)
[ तृतीयो-
रुद्राष्टाध्यायी-
अथ तृतीयोऽध्यायः।
आशुशिशानोब्बषमोलभीमोघनाघुनरुक्षो-
संण चर्षणीना ।। सुक्रन्दनोनिमिषाएं
कधीरशतहसेनाऽअजयत्साकमिन्द्रः ॥१॥
ॐ आशुश्त्यिस्याप्रतिरथ ऋषिः आपी त्रिष्टुप्० । इन्द्रो देवता जपे
विनियोगः ॥ १॥
भाष्यम्-(आशुः) शीघ्रकारी व्यापको वा (शिशानः ) शावनकर्ता (वृषभः)
वृषभः (न) इब (भीमः) भयानकः (घनाधना ) घातकः शत्रूणां इन्ता (सब-
णीनाम् ) मनुष्याणाम् (क्षोभणः) सञ्चालकः ( संक्रन्दनः) सम्यक् क्रन्गा जा
प्राणिनामाकर्षण प्रहारेण वा ( अनिमिषः) अप्रमादी चक्षुर्निमेपरहितः सर्वदा स्वयज्ञ-
गमनयुद्धादिकार्येष्वनलस इत्यर्थः । (एकवीरः ) विक्रान्तः असाहाय्येन कार्यक्षम
इत्यर्थः । (इन्द्रः) इन्द्रो देवता (शतं सेनाः) षबीः सेनाः ( साकम् ) एक्दैव
है अजयत् ) जितवान् [ यजु० १७ । ३३ ] ॥१॥
भापार्थ-शीघ्रगामी, वज्रकी तीक्ष्णकारी वर्पणशीलकी उपमावाला, भयकारी, शत्रुभाका
अतिशयघातक या वृष्टि करने में मेघरूप, मनुष्योंके क्षोभका हेतु, पारंपार गर्जन करनेवाला,
पथपा शत्रुओंका आह्वान करनेवाला, देवता होनेसे पलक न लगानेवाला अत्यन्तसावधानवा
निरंतर जाग्रत् वा अपर २ विद्युत्मकाशयुक्त एक अद्वितीय वीर इंद्रनामसे प्रसिद्धने साथही
एक ली २ शत्रुसेनाको जय कियाहै, इस मंत्रके विशेषण अवतारोंमें भी घटले हैं तथा इस
मन्त्र में सेनानायकके गुणोंकाभी वर्णन है कि, वह इस प्रकारका होना चाहिये ॥ १ ॥
मन्त्रः।
सुकन्हलेनानिमिण जिष्णुनाबुत्कारे-
जहच्यवनप्राणुना ॥ तदिन्द्रेणजयतुत
सहकुलबुशोनर इधुहस्तेनुवृष्णा॥ २ ॥
ॐ सङ्कन्दनेनेत्यल्याप्रतिस्थ ऋषिः । विराबायनुष्टुपू० इन्द्रो
दे० वि० पू० ॥२॥

"ध्यायः ३.] भाष्यसहिता। (२९). माष्यम्-(युधः) हे योदारः ( नरः) हे मनुष्याः ( धृष्णुना ) प्रसहनशीलन ( संक्रन्दनेन ) शब्दकारिणा (युत्कारेण) युद्धकारिणा ( मनिमिषेण ) निमेषरहितेन एकवित्तेन वा (इपुहस्तेन ) बाणपाणिना ( जिष्णुना ) जयशीलेन (दुश्चयवनेन ), अमच्युतस्वभावेन (वृष्णा ) वर्षणशीलेन (इन्द्रेण ) इन्द्रेण (तत्) तयुद्धं (जयत) जयत (तत्) शत्रुवलम् ( सहध्वम् ) अमिभवत ॥२॥ माषार्थ-हे युद्ध करनेवाले मनुष्यो! प्रगल्भ भयरहित शब्द करनेवाले, वाहत युद्ध करनेवाले, एकपित्त, याण हाथमें धारण किये, जयशील, अजय्य, कामनामोंके वर्षानेवाले, इन्द्रके प्रभा- वसे उस शत्रुसेलाका जय करो और उस शत्रुसेनाको षशीकरके विलाश करो। सेनानायकोंका यह मंत्र पढकर इन्द्रकी सहायतासे युक्त हो युद्ध करना चाहिये [थजु० १७१ ३४ ] ॥ २॥ मन्त्रः। सऽइर्षु हस्तत्सनिषुङ्गिभिर्बुशीसछतष्ठान यघऽऽइन्द्रोगणेन । सर्छन्सष्टुजिल्सोमपा- बाहुशक्यंग्अर्धन्यापतिहितामिरस्तां ॥३॥ ॐ सऽइषुहस्तैरित्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । आपाँत्रिष्टुप्० । इन्द्रों देवता वि० पू० ॥३॥ भाष्यम्-(सः) (वशी) जितेन्द्रियः कान्तो वा (इधुहस्तः) वाणहस्तैः (निषाङ्गि-- भिः) निषङ्गः खङ्गः तद्भिः भटैः ( संस्रष्टा) एकीभवनशीलः (स.) (गणेन)शत्रुसं- घेन) युधः युद्धका (स इन्द्रः) इन्द्रः (संसृष्टजित् ).संमृष्टान् शबून जयति (सोमपाः), सोमस्य पाता (बाहुशी) वाहुवलोपेतः ( उग्रधन्वा ) उद्यतधन्वा (प्रतिहिताभिः) प्रेरिताभिरिपुभिः (अस्ता) मारयिता । ईदृशेनेन्द्रेण जयति सम्बन्धः । [ यजु०१७. । ३५] ॥३॥ भाषार्थ-वह जितेन्द्रिय वा शत्रुओंको पश करनेवाला अथवा मनोहर सर्वजनोंका प्रिय, अथवा स्वतंत्र वा शत्रुओका ऐश्वर्य ग्रहण करनेवाला वाण हाथमें लिये धनुपधारियोंसे युद्धके. निमित्त संसर्ग करनेवाला, वह शत्रु समूहोंसे युद्ध करनेवाला है, वह इंद्र युद्धके निमित्त संगतहुए शत्रुओका जीतनेवाला, यजमानोंके यज्ञमें सोमपान करनेवाला, वाहुओंके पलसे युक्त, उत्कृ- धनुषवाला, भपने धनुपसे प्रेरित वाणोंसे शत्रुओंपर चलता है वह इन्द्र इमारी रक्षा करे ॥ ३ ॥ मन्त्रः। बृहस्प्पतुपरिंदीयारथैनरक्षोहामित्राँ २॥

• (३०) रुद्राष्टाध्यायी- [ तृतीयो- अपबाधमानः । प्युअञ्जन्त्वेनाप्रमुणो बुधाजयनुल्माकमेवयविताराना॥४॥ ॐ बृहरूपत इत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः। आधी त्रिष्टुप् छ। बृहस्पति देवता । वि० पू० ॥ ४॥ भाष्यम्-(बृहस्पते ) बृहतां पते पालयितः देव ( रक्षोहा) रक्षसां हन्ता (स्पेन) ( परिदीयाः) परिगच्छ (अमित्रान् ) शत्रून् ( अपवाधमानः) सर्वतो नाशयन् (सेनाः) शत्रुसम्पधिनी सेनाः (प्रभञ्जत् ) प्रकर्षण नाशयत् ( युधा ) युद्धन (प्रणः ) प्रमर्दकान् ( जयन्) जयन् ( अस्माकम् ) (रथानाम) रथानाम् (अविता) गोप्ता (एधि) भव [ यजु० १७ । ३६ ] ॥ ४ ॥ भाषार्थ-वाणीके पति व्याकरणकर्ता होनेसे इन्द्रका नाम वृहस्पति है,मथवा उनके पुरोहित बृहस्पतिका संबोधन है, हे वृहस्पते ! तुम राक्षसों या विनोंके नष्ट करनेवाले हो, रथके द्वारा सब ओर गमन करते शत्रुओंको पीडा देतेहुए शत्रुओंकी सेनाको अतिशय पीडा करतेहुए युद्धसे हिंसा फारियोंको जय करतेहुए हमारे रथोंके रक्षक हो ॥४॥ मन्त्रः। बलविज्ञायस्थविरप्वीरसहस्वान्याजी सहमानऽम्य ॥ अमिवीरोऽअभिसत्त्वा सहोजाजैमिन्दुस्थमाविष्टगोवित्॥५॥ * बलविज्ञाय इत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । आपी त्रिष्टुप् छन्दः । इन्द्रो दे० वि० पू० ॥५॥ भाष्यम्-(इन्द्र ) हे इन्द्र त्वम् ( बलविज्ञायः) सर्वभूतवलं विजानातीति बलविज्ञायः ( स्थवीरः ) सर्वानुशासकः सर्वमान्यश्चिरन्तनो वा ( प्रीरः ) प्रकृष्टो वीरः ( सहस्वान् ) वलवान (वाजी ) वाजमान् वाजमन्नम् ( उग्रः) उद्गृर्णबलः ( अमिवीरः ) वीरमभिलक्षीकृत्य गच्छतीत्यभिवीरः अमिगता वीरा वीर्यवन्तोऽनुचरा यस्य सः तथोक्तः । ( अभिसत्त्वा ) सत्त्वमभितिष्ठति सः

ऽध्यायः ३.]
भाष्यसहिता।
(३१)
(सहोजाः ) वलाजातः (गोवित् ) स्तुतिज्ञाता ( सहमानः ) शत्रूणामंभिभविता
(जैत्रम् ) जयंशीलम् (रथम् ) रथम् ( आतिष्ठ ) अस्य साहाय्यार्थमारोदु-
महोस [ यजु० १७ । ३७ ] ॥ ५ ॥
भाषार्थ-हे इन्द्र ! तुम दूसरोंका वल जाननेवाले,. पुरातन, सबके अनुशासन करनेवाले,
सतिशय शूर, महावलिष्ठ, मन्नवान्, युद्धमें क्रूर, सब ओर, वीरोंसे युक्त, सब ओर परि-
चारकों से युक्त, पला ही उत्पन्न, स्तुतिको जाननेवाले, शत्रुओंके तिरस्कारकर्ता हो, अपने
जयशील रयमें सारोहरण करो ॥ ५ ॥
मन्त्रः।
~
স্থাগুডিজীঘি মুম্বাজ-
प्ममृणन्तुलोजसा ॥ इमरजाताऽगर्नु
बीरय मिन्द्रन्सखायोऽअनुसमक्ष ६
ॐ गोत्रसिमित्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । भूरिमा त्रिष्टपू छं० ।
इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥६॥
भाष्यम्-(सजाताः ) सहोत्पन्ना योद्धारः ( सखायः) परस्पर सखिभूता यूयं
(इमम् ) (गोत्रमिदम् ) वृष्टयर्थ मेघ भिनत्ति तं पर्वतानां भेत्तारं वा (गोविदम् )
पण्डितम् (बज्रवाहुम् ) वज्रहस्तम् (मज्म जयन्तम् ) संग्राम जयन्तम् अज्म-
वि युद्धनाम् [ निपं० २।१७।४३ ]" ( ओजसा ) वलेन (प्रमृणन्तम् ) मईयन्तम्
(इन्द्रम) देवेन्द्रम् ( अनुवीरयध्वम् ) वीरकर्म युद्धं कुरुध्वम् ( अनुसंरभध्वस् )
अनुगम्य संरंभ कुरुत [ यजु० १७ । ३८ ] ॥ ६ ॥
भापार्थ-हे समाननन्मदाले देवतामो ! इस असुरलोकके नाशक वा मेषके भेदन करनेवाले
देववाणीके ज्ञाता, पंडित, हाथमें वज्र धारण करनेवाले, संग्रामके जीतनेवाले वलसे शत्रुओंको
मारनेवाले, इन्द्रको पारकर्मका उत्साह दिवाभो, और इस वेग करनेवालेके उपरान्त
तुम वेग फरो ॥ ६॥
अभिगोत्राणिलहसुागाहमानोदयोवीरशु-
तर्मन्युरिन्द्रः ॥ दुश्च्यवुन पृतनापाडयु-
द्धयोस्म्माकुर्छसेनाऽअवतुष्प्रयुत्सु॥७॥

[
(३२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ तृतीयो--
ॐ अभिगोत्राणीत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । निच्यदार्षी त्रिष्टपू० ।
इन्द्रो देवता । वि० पू ॥ ७॥
भाष्यम्-( अदयः) नित्रासः निर्दयो वा (वीरः) विक्रान्तः (शतमन्युः) बहुयज्ञः
बहुक्रोधो वा ( दुश्च्यवनः) अन्यैरचाल्यः ( पृतनापाट् ) शत्रुसेनानाममिभविता
(अयुध्यः ) सम्प्रहर्तुमशक्यः (इन्द्रः ) ऐश्वर्ययुक्तदेवः (युत्सु) संग्रामेषु (गोत्राणि )
अभ्राणि असुरकुलानि वा ( सहसा) बलेन ( अभिगाहमानः) प्रविशन् ( अस्माकम्)
(सेनाः) चमः (प्रावतु ) रक्षतु [ यजु० १७ । ३९] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-शत्रुऔपर दयारहित, विक्रान्त, अनेक प्रकारके क्रोधयुक्त, वा, शतयज्ञकर्ता,
जिसको कोई च्यावित न करसके, अजेय संग्राममें सेनाको सहकर तिरस्कार करनेवाला, जि.
सके संग कोई युद्ध नहीं करसकता, सो इन्द्र युद्धोंमें असुरकुलोंको वा मेघवृन्दोको एकसाथहीं
विलोडित करताहुआ हमारी सेनाकी रक्षा करें ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
इन्द्रऽआसान्नुताबृहस्पतुिईक्षिणायुज्ञःपुर
ऽएंतुसोम ॥ देवसेनानामभिमञ्जतीना-
अर्यन्तीनाम्मुरुतोबुन्त्वग्यम् ॥ ८॥
* इन्द्र इत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । ब्रायुष्णिक् छं० । इन्द्रो
देवता वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-( आसाम् ) अस्मत्सहायार्थमागतानाम् (देवसेनानाम् ) व्यूहरचनानाम
(इन्द्रः) देवेन्द्रः (नेता) नायकः अस्तु (बृहस्पतिः) बृहस्पतिः (पुरः ) पुरस्ताव
(एतु) आगच्छतु ( दक्षिणा) दक्षिणस्यां दिशि ( यज्ञः) यज्ञः ( सोमः ) सोमः
(पुर एतु) अग्रे आगच्छतु यहा दक्षिणायज्ञः सोमः पुरं एतु सेनानाम् । किम्भूताना
(अभिभञ्जतीनाम् )शत्रून् मर्दयन्तीनाम् ( जयन्तीनाम् ) विजयमानानाम् तासाम्
(मरुत) मरुन्नणः (अग्रम् ) सेनाग्रभागम् ( यन्तु) गच्छतु [ यजु०१७।४०] ॥ ८ ॥
भाषार्य-बृहस्पति, इन्द्र, इन शत्रुओंको मर्दन करनेवाली विजयशीकदेवसेनाओंके शिक्षक
या पालक हैं, यज्ञपुरुष विष्णु वा यज्ञ सोमदक्षिणा मागे गमन कैर, गणदेवता सेनाके अग्र-
भागमें गमन करें । अथवा विष्णु दक्षिणओरसे रक्षाको गमन करें, वा यज्ञ सोम दक्षिणा
मुल जयको प्राप्त करें, यही प्रकार सेना चलानेका है ॥ ८ ॥

ऽध्यायः ३.] माष्यसहिता। इन्द्रस्याहष्णोवरणस्पुराऽमादित्याना- म्मुरुता शईऽ उछयाय ॥ महामनसा म्भुवनच्युवानाकोषों देवानाजयंतामुर्द स्थति ॥ ९॥ ॐ इन्द्रल्येत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । आषी त्रिष्टम् छन्दः । इन्द्रा- यो देवताः । वि० पू० ॥ ९ ॥ भाष्यम्-(वृष्णः ) वर्षतुः ( इन्द्रस्य ) देवेन्द्रस्य ( राज्ञः ) ( वरुणस्य ) वरूणदे- वस्य ( मादित्यानाम् ) आदित्यसंज्ञज्ञानाम् ( मरुतास् ) मरुगणानाम् ( शई: ) हस्त्यश्वपादान्तलक्षणं बलम् ( उग्रम् ) उतीर्णायुधं यथा स्यात्तथा उदभूब (जयताम् ) जयशालिनाम् । ( महामनसाम् ) उत्कृष्टचित्तानाम् (भुवनच्यवानाम् ) भुवनच्यवनसमर्थानाम् (देवानाम् ) देतानाम् ( घोषः ) जिजितमिति शब्द (उदस्थात् ) उत्तिष्ठति [ यजु० १७ । ४१ ] ॥ ९ ॥ भाषार्थ-महामन अर्थात् युद्धमें स्थिरचित्त, लोकनाशकी सामर्थ्यवाले, जयशील देवता बारह आदित्य मरुद्गणों और कामनाकी वर्षा करनेवाले इन्द्र और राजा वरुणका उत्कृष्ट बल. अर्थात् गज; तुरंग, रथ, पैदलोंकी सेनाका देवनलकी जय देवबलकी नय यह शब्द सम्य- प्रकारसे हुआ, अर्थात् देवताओंकी बलप्रकाशक उग्रवज्रध्वनि सर्वदा समुत्थित होति है। सेनानायकोंको इन देवताओंका स्मरण कर जयशब्दपूर्वक सेना चलानी चाहिये ॥ ९ ॥ ওয়াহাঙ্কফুসুলাল্প- कानापानासि ॥ त्रामवाजिनांक्षा- जिनान्युदानाअयंताँथ्यन्तुथोषाला १०॥ ॐ उद्धर्षयेत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । ब्राहयुष्णिक छन्दः । इन्व्हे देवता । वि० पू० ॥ १० ॥ BAR भाष्यम्-(भगवन् ) हे इन्द्र ( आयुधानि ) अस्मदीयानि शस्त्राणि ( उड्वर्य उद्गतहर्षाणि कुरु प्रहरणेपूयुक्तानि भवन्त्वित्यर्थः । ( मारहानाम् ) अस्मदीयानमा ३

(३४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ तृतीयो-
र सत्यानाम् ) सैनिकानाम् (मनालि) चेतांसि (उत् ) उद्धर्षय (वृत्रहन् ) हे
देवन्द्र (वाजिनास) अश्वानाम् (वाजिनानि ) बलानि (उत् ) उद्धर्षय तथा
जपतास् ) जयशालिनाल ( स्थानास्) (घोपाः ) शब्दाः ( उद्यत्तु ) उद्गच्छन्तु
यजु० १७ । ४२ ] ॥ १० ॥
भापार्थ-हे इन्द्र ! अपने आयुधोंको भली प्रकार तीक्ष्णतापूर्वक हर्पित करो, हमारे जीवोंके
जीरोंके मन हर्पित करो, घोडोंके शीघ्रगमनको उत्कृष्टतायुक्त करो, हे इन्द्र ! जयशीलरयोंके
शब्द फैल अर्थात् विजयी रथोंकी हर्षध्वनि प्रकाशित हो ॥ १० ॥
मन्त्रः।
अल्साकसिन्दुसम्तषुछ जेष्वुल्याउँथ्या-
দুহাতে৷ সুহীহাSঙাহিম
खुलाँ २ ॥ उदेवाऽभवताहवैषु ।। १.१॥
१
ॐ अल्लाकरित्यल्याप्रतिस्थ ऋषिः । निच्दापी त्रिष्टुप् छन्दः ।
इन्सादयो देवताः। वि० पू० ॥११॥
माष्यम्-(अस्माकम् ) अस्माकं सम्बन्धिष्वेव ( समृतेषु ) परसेनां सम्प्राप्तेषु
जेषु ) ध्वजवत्सु सैनिकेषु ( इन्द्रः ) इन्द्रः अविना मस्तु ( अस्माकम् ) अस्मा-
एम् ( या इपरः ) ये वाणाः सन्ति ( ताः) ता एव ( जयन्तु } जयशोला भवन्तु ।
तन्या ( अस्माकम् )(वीराः) भटाः (उत्तरे) उपरि ( भान्तु ) विजयिनो सन्तु
उलंब ( देवाः ) हे देवाः (हरेषु ) संग्रामेषु ( अस्मान् ) (उ) निश्चयेन ( अयंत )
सक्षत । [ यजु० १७ । ४३ ] ॥ ११ ॥
माषार्थ-ध्वजाओंके मिलने में अर्थात् जिस समय हमारी रणपताका शत्रुओंकी रणपताकासे
सम्मिलित हो, उस समय इन्द्र हमारी रक्षा करें, और हमारे जो बाण हैं वे प्रयोगकरनेमें शत्रु.
सैलाको ताडन करके जय प्राप्त करें, हमारे शूर शत्रुके योधाओं उत्कृष्ट हों, ओर देवता
संग्रामों में हमारी रक्षा करें ॥ ११ ॥
मन्त्रः॥
अमीषाञ्चित्तप्रतिलोमयन्तीगृहाणा-
हाव्योपहि ।। असिनेहिनिहहृत्सु
शोकैरन्धेनामिछास्तमसाखचन्ताम्॥१२॥

ऽध्यायः ३.] भाष्यसहिता । ॐ अमीषामित्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । ब्रायुष्णिक छन्दः । इन्द्रसे- ना देवता । वि० पू० ॥१२॥ भाष्यम्-( बड़े ) हे पापाभिमानिनि देवते त्वम् ( अमीपास्. ) योहणां शत्रूणाम् (चित्तं ) मनांसि (प्रतिलोभयन्ती) विमोयन्ती सती (अङ्गानि ) शिरआदिकान् (गृहाग) स्वीजुत । ततः (परेहि ) परागच्छ ( अभिप्रेहि ) अभिगच्छ तेषां समीप गत्वा च ( हासु) हृदयेषु ( शो ) दुःखैः (निर्दह ) नितरां भस्मीकुरु (अमित्राः) नमछत्रयः ( अन्धेन तमसा ) अज्ञानलक्षणेन ( सचन्ताम् ) सेवन्ताम् ॥ [ यजु० २७ १ ४४ ] ॥ १२ ॥ मापार्य-हे शत्रुओंके प्राणोंको कष्ट देनेवाली व्याधी ! इन शत्रुओंके चित्तौंको मोहित करती हुई शत्रुओंके शरीरोंको ग्रहण करतीहुई दूर चलीजा, सब सोरसे दूसरे शत्रुओंको ग्रहण करके चल उनके हृदयाको धन पुत्र नाश आदिके निमित्तसे दग्ध करो, हमारे शत्रु गाढ अहंकारसे संगतिको प्राप्त हों ॥ १२ ॥ विशेष-इन बारह मंत्रों में परमात्माने यह उपदेश कियाहै कि सेना सेनापति शूरवीर इस प्रकारके गुणयुक्त एकचित्त परस्पर सहायकारी होने चाहिये और इन्द्ररूप परमात्माकी प्रार्थना कर शत्रुओंपर चढाई करनेसे धर्मसे विजय प्राप्त होगी यह पिचारे तथा सब देवताओंकी तृप्ति साधन कर विजयको गमन करै सध्यात्मपक्षमें काम, क्रोध, लोभ और मोह ही शत्रु हैं इन्हीका जय करना है । अप्वा व्याधिकी अधिष्ठात्री देवता है ॥ १२ ॥ मन्त्रः। अवलुष्टापरांपतुशरंब्यु ग्रहमसर्डशिते॥ गच्छामिडामपंद्यस्खमानीषाङ्कञ्चनो- च्छिषः ॥ १३॥ ॐ अवसृष्टेत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । आर्यनुष्टुप् छन्दः । इषुर्देवता । इषुप्रयोगे विनियोगः ॥ १३ ॥ भाष्यम्-(ब्रह्मशंसिते ) मंत्रेण तीक्ष्णीकृते ( शरव्ये ) हिंसाकुशले इषो त्वम् (अरसृष्टा ) क्षिप्ता सती (परायत ) इतो देशात् नियत (गच्छ ) गत्वा च (अमि- त्रान् ) शत्रून् ( प्रपद्यस्व ) प्राप्जुहि ( अमीषाम् ) शत्रूणां मध्ये ( कञ्चन ) किंचिदपि (मा उच्छिषः ) अवशिष्टं मा कुरु । शवनुत्कृत्तमूलान् कुर्वित्यर्थः । [ यजु० १७ ॥ ४५ ] ॥ १३ ॥ भाषार्थ-ब्रह्ममंत्रसे तीक्ष्ण किये हुए हे वाणरूप ब्रह्मास्त्र ! तुम हमसे छोडे हुए एक साथ शत्रुसेनापर गिरो, गिरकर शत्रुभाको ग्रास करो और शत्रुमोके शरीरमें प्रवेश करके इनमें किसीको भी मत छोडो ॥ १३ ॥ !

(३६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ तृतीयो-
मन्त्रः
।
प्रेताजयंतान इन्छोल्शयनयच्छतु। उमा-
वसन्तुकाहानाधष्ण्यावथाय॥१४॥
ॐ प्रेत इत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । विशडाय॑नुष्टुप् छन्दः । बोधा
देवता। बीतेजले विनियोगः !! १४ ॥
भाष्यम्-(नस) हे मनुष्याः नेतास संग्रामस्य निर्वोढारो योद्धारः (प्रेत ) प्रकर्षण
अच्छत गत्वा च (जयत ) प्रतिभटान जयत (इन्द्रः ) इन्द्रः ( ब ) सुधमाकम्
( शर्म) कल्याणम् ( यच्छतु ) दशातु, सिंच (व.) भवताम् (वाहवः ) भुजाः
( उत्राः) उद्गृणवलाः ( सन्तु ) भवन्तु । तया (बनावृष्याः) अन्धनभिभाव्याः
(यथा ) यथा यूयम् ( असाथ ) भशिष्यथ तथा वो. वाहवः उपाः सन्तु [ यजु०
१७ । ४६ ] ॥ १४ ॥
भावार्थ-हे हमारे योधामनुप्यों ! शत्रुओंकी सेनापर शीव्रतासे जाओ, और विजय प्राप्त
करो अवश्य जय होगी, इन्द्र तुमको जयसे प्राप्त हुए सुखको प्रदान करें, तुम्हारी भुजायें
उदगूर्णायुधवाली हृष्ट पुष्ट हो, जिससे तुम किसीसे भी तिरस्कार न पानेवाले हो ॥ १४ ॥
.
.
সুআলালুদাই'জাহক বিলীজ
স্মাহম্বোলা বাজুয়াল-
यानीऽशुरुयोऽध्याजानन्।॥ १५॥
ॐ असौ इत्यस्य अप्रतिरथ चषिः । नियवाची त्रिष्टुप् छ ।
मरुतो देवता सेनोत्तेजने विनियोगः ॥ १९
आण्यम्-( मरुतः ) हे मरुतः ( असौ या लेना वाहिनी) (नः) अस्मान (ओजसा)
बलेन (स्पर्द्धगला) स्पृहायुक्ता (परेषां) शत्रूणां (अभ्येति ) अभिमुखमेति ( ताम्)
सेनाम् ( अपव्रतेन ) अपगतकर्मणा "व्रतमिति कर्मनाम" [निघ०२।१। ७ )
(तमसा ) अंधकारेण तथा (गृहत ) व्याप्नुत (यश) येन (अमी) योद्धारः ( अन्य:
अन्यम् ) अन्योऽन्यसू (न जानन् )न नानीयुरित्यर्थः। [यजु०१७॥ ४७ ]॥ १५ ॥

स्यापा ३.
माष्यसहिता।
(३७)
मापार्य-हे मारुतो । पाहे सेनानायझंगण ! जो यह शवमोकी सेना वलसे स्पर्धा कर-
तीहई हमारे सन्मुख मागमन करती है, उन सेनाको कमरहित अंधकारसे इस प्रकार
नाच्छादित करो, कि जिस प्रकार यह शत्रुसेनाके लोग परस्पर नहीं जानते हुए परस्पर अब
पलाकर नष्ट हो ॥ १५ ॥
मन्त्रः ।
घाणाम्पतन्तिकुमाराविशिखाऽईच ।।
तन्दोवृहस्पतिरनिति शर्मयच्छतुहि-
वाहाशमयच्छतु ।। १६ ।।
ॐ यत्रेत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः पंक्तिश्छन्दः । ब्रह्मणस्पतिरदितिश्च
देवृते । प्रार्थने विनि० ॥ १६ ॥
माज्यम्-( यत्र) संग्रामे (विशिखाः) मुण्डिताः (कुमारा: ) वालकाः (इक)
(बागाः)शराः ( सम्पतन्तिः) सत्यक्तया पतन्ति (तत्) तत्र (इन्द्रः ) इन्द्रः
(वृहस्पतिः) वृहतां पतिः (अदितिः) देवमाता (शर्म) सुखम् ( नः) अस्माकम्
(रच्छतु ) ददातु (विश्वाहा ) सर्वदा (शर्म ) सुखम् (यच्छतु ) ददातु पुनरुक्ति-
रारार्थी [ यजु० १७ । ४८] ॥ १६ ॥
भाषार्थ-जिा रणक्षेत्रमें वीरगोंके छोडे हुए वाण इधर उधर गिरते हैं, जिस प्रकाए
शिलारहित वा लीयोपाछे छोटे बालक चपलताके कारण इधर उधर फिरते हैं, उस युद्धमें
बृहस्पति देवता मथवा मंत्रोंक पालक दिनयके उचित मंत्रॉकी जाननेवाली घेवमाता अथवा
अखण्तिशक्ति इन्द्र हमको कल्याण प्रदान करे, पह सम्पूर्ण शत्रुओंको मारनेवाला कल्याण
प्रदान करें ॥ १६ ॥
मम्मीणितवर्मणाच्छादयामिलामस्वारा-
जामृतुनानुबस्तान । रोर्वरीयोहलणस्तक-
गोतुजयन्तुन्वानुदेवानंदन्तु ॥ १७ ॥
इति सहितायां रुद्रजाघ्ये तृती-
योऽध्यायः॥३॥

(३८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थों-
ॐ मर्माणीत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः । सोमवरुणो
देवते । कवचप्रयच्छने विनियोगः ॥ १७ ॥
भाष्यम्-हे राजन् (ते) त्वदीयानि (मर्माणि) येषु स्थानेषु विद्धः सबो म्रियते तानि
मर्माणि ( वर्मणा) मंत्रपूतेन कवचेन (छादयामि ) आच्छादनं करोमि ( सोगाराजा)
सोमराजा ( त्वा) त्वाम् ( अनु) छादनानन्तरम् (अमृतेन) अवृतरूपेण द्रव्येण
( वस्ताम् ) आच्छादयतु (वरुणः ) वरुणदेवोऽपि (ते ) तव वर्म ( उरोवरायः )
उत्कृष्टादप्युत्कृष्टम् (कृणोतु ) करोतु (जयन्तम् ) जयशालिनम् (वा) त्वाम् .
( देवा) देवाः ( अनुमदन्तु ) प्रहर्षयन्तु । [ यजु० १७ १ ४९ ) ॥ १७ ॥
भाषार्थ-हे राजन् मैं । कवचसे आपके मर्मस्थानोंको [ कि जिनके छिन्न होनेसे शीबही
मरण होता है ] आच्छादन करताहूं. राजा सोम आपको अमृतसे आच्छादन करे, और
घरुण आपके वर्मको उत्तमोत्तम कर, तथा देवता आपको विजय पाता देखकर आनन्दयुक्त
हॉ॥ १७ ॥
इत्यप्रतिरथसूक्तम् ।
इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यहमस्मितस्त-
तीयोऽध्यायः ॥ ३॥
ত্ব স্বীকাঃ
लिकाहल्पिबतुलोम्यम्मायुधा-
ज्ञातावविहतम् ॥ छातंजतोयोऽभिरक्ष
तित्वमानाजा पुणेषपुरुचाहिराजलि।
ॐ विनाडित्यस्य विनाइऋषिः । जगती छन्दः । सूर्यो देवता।
सार्थपुरोरुकमंत्रपाठे विनियोगः ॥ १ ॥
साष्यम्-(विभ्राट् ) विशेषेण भ्राजते दीप्यत इति विभ्राट् सूर्यः ( वृहन् ।
महत् (सोभ्यम् ) सोममयम् ( मधु) मधु (पिबतु ) पिवतु किकुर्वन् ( यज्ञपती )
यजमाने ( आवहतम् ) अकुटिलम् (आयुः ) ( दधत् ) स्थापयत् (यः ) सूर्यः
(सातजूतः) महावायुना प्रेर्यमाणः सन् (त्मना) आत्मना स्वयमेव ( अभिरक्षति)
सबै जगदधिपश्यन् पालयति “राशिचक्रस्य वायुप्रेयवाद सूर्यस्यापि तत्मेयंत्यम्” ः
सूर्यः (प्रजाः) प्रजाः (पुपोष ) वृष्टयादिमदानेन पोषचति ( पुरुषा) बहुधा
(सिराजति) विशेषण दीप्यते च ॥ [ यजु०३३ । ३.1] ॥ १॥

न्यायः ४.]
भाष्यसहिता।
(.३९)
भाषार्थ-विशेषदीप्तिमान सूर्य देवता यजमानमें अखण्ड आयुको स्थापन करतेहुए
बडे स्वादुरससे युक्त सोमरूप हविको पान करो, जो सूर्य वायुसे प्रेरित आत्माद्वारा प्रजाकी
रक्षा करता वा पालता है पुष्ट करता है वह भनेकप्रकारसे विराजमान होताहै । आशय
यह कि-जो अधिक कान्तिमान् सूर्य परमात्माके नियमसे वायुवेगसे निरन्तर भ्रमण
करते प्रजावर्गको रक्षा करते हैं पोषण करते हैं और चन्द्रनक्षत्रादिकी ज्योतिरूपसे अनेक-
रूपसे विराजमान हैं वह आज इस अतिमधुर अधिक सोमरसका पान करें और यज-
मानकी आयुकी वृद्धि करें ॥ १ ॥
मन्त्रः।
उदुत्यजातवेदसन्देवाहन्तिकताई।
॥ -
शेविश्वायुसूर्यम् ॥२॥
ॐ उदत्यमित्यस्य प्रस्फण्ड ऋषिः । झुरिगाी गायत्री छन्दः ।
सूर्यो देवता । आज्येन शालाबार्येऽग्नौ हवने विनियोगः ॥२॥
भाष्यम्-( केतवः ) सूर्यरश्मयः सूर्याश्वा वा ( जातवेदसम् ) अग्नितेजोमयं यद्वा-
जातं वेदः कर्मफलं यस्मात् (त्यम् ) प्रसिद्धं तम् ( सूर्य देवम् ) घोतमान सूर्यम्
(विश्वाय) विश्वस्य (शे) दर्शनाय ( उद्वहन्ति ) ऊ वहन्ति ॥ २ ॥
भाषार्थ-ब्रह्मल्योति इस जातवेदस सर्य देवताको सव संसारकी दर्शनक्रिया सम्पादन
करनेके निमित्त अर्वभागमै निरन्तर वहन करता है । अथवा उदयको प्राप्त हुए अग्निकी
समान समस्त प्राणियोंका कार्य करनेवाले संसारके सब पदार्थों के दर्शनके निमित्त जिसने,
सूर्यको प्रकाशित किया है उस परमात्माकी विद्वान् पुरुष उपासना करते हैं ॥ २ ॥
मन्त्रः।
येनापासषक्षसाभरण्यातजना २॥भ-
नु ॥ वरुणुपश्यति॥३॥
ॐ येनेत्यस्य प्रकण्व ऋषिः । गायत्री छन्दः । सूर्यो देवता
वि० पू० ॥३॥
माष्यम्-(पावक) हे शोधक (वरुण) अनिष्टनिवारक सूर्य ( त्वम् ) त्वम्
(येन) येन ( चक्षसा) दर्शनेन (जनान् ) जातान प्राणिनः ( सुरण्यन्तम् ) धार-
यन्तं पोषयन्तं च लोकं येन चक्षता प्रकाशेन (अनुपश्यासि ) अनुक्रमेण प्रकाशयसित
वेन ज्ञानेन अस्मानपि भुरण्यतः पश्येत्यर्थः ॥ [ यजु० ३३ । ३२] ॥३॥

[ चतुर्यो- । ४० ) रुद्राष्टाध्यायी- मापार्थ-हे पावक ! अर्थात सपके शुद्ध करनेवाले वरुणदेव ! इस सच ब्रह्माण्डको अपनी ज्योतिसे आच्छादन करके स्थित हुए तुम जिस सूर्यरूप ज्योतिसे वा अनुग्रहरूप दृष्टिसे उस सुपर्णरूपको देखने हो मर्थात् सर्वमेघयाजीको पक्षीके समान शीघ्रतासे स्वर्ग में गमन करते देखते हो उसी दृष्टि से हम अपले जनौको भी सब प्रकार से देखिये ॥ ३ ॥ . देहयांवरूभागंतुनखम्बत्वचा ।। म यशसमजाथे। तमुस्कायवेन- श्चिन्नन्वानाच ॥ ४॥ ॐ देव्यालित्यस्य प्रल्कण्ड ऋषिः । गायत्री छन्दः । दैव्याव! देवते। वि० पू० ॥ ४॥ भाष्यम्-(देव्यौ ) देवानामिमा देव्यौ (अध्वर्यु ) हे अश्विनौ युवास (सूर्यत्वचा) सूर्यदीप्तिमता ( रथेन) रथेन ( आगतम् ) आगच्छत्तम् एत्यच ( मध्वा) मधुस्वाद स्ता विपा खोमपुरोडाशदध्यादिना ( यज्ञम् ) अस्मद्यज्ञम् ( समझाये ) संरक्ष यता, वहूनि हवीपि कुरुत । “तम्पत्नया ७।१२। अयम्बेनः ७ । १६ चित्रन्देवानास . .. १४३ तिला प्रतीकोक्ताः" [ यजु० ३३ । ३३ ] ॥ ४ ॥ भावार्थ-हे दिव्य अधिनीभार | आप सूर्यकी समान कान्तिमान् स्थके द्वारा आइये, माधुर हषि सोमप्रोडाश दधि मादिद्वारा यज्ञको सींचकर बहुत हविषाला करो । दूसरे "रक्षा-सूर्य कान्तिरूप में आरूट हुए, यह दिनरात्रिरूप अध्वर्यु साग्निष्टोमादियज्ञके और सष्टरूप महायज्ञके सम्पादक हैं ॥ ४ ॥ संत्रः । সুজগুন্নি हताति- ईपर्द ज দেবীদ্ভঞ্জালিওয়ালা !! ॐ तिमाथा इत्यस्य अवत्सार ऋषिः । लिच्यदाी जगती छन्दः । विश्वेदेवा देवता । शुक्रग्रहग्रहणे विनियोगः ॥६॥ माध्यम्-(प्रत्कथाः ) पुरातना यजमाना इव (पूर्वथाः) स्मदीयाः पूर्वं यथा विश्वया) विश्वे सर्व प्राणिनो पथा (इमया ) इदानीं वर्तमाना यजमाना यथे.

४. भाष्यसहिता। (४१) म स्तुत्या फलं लभन्ते के अन्तरात्मन् ( ज्येष्ठतातिम् ) उत्ष्टविस्तारमथवा प्रश- या । पा) तिमि तिरन्तम् (शरवस् ) सर्वतं सर्वस्य रमरितारं फलं भाव- कनार (पतीचीनस) मात्मनोऽभिमुखर (वृजनम.) वनवन्तम् ( आशुम् ) शीघ्र- शामिनम् ( जयन्तम् ) सर्वमभिभवन्तम् (धुनिम ) कम्पयितारं शत्रूणामिति शेपः । बन्नं स्तुन्या सायन (दोहसे ) पूरयसि ( यासु ) स्तुतिषु (वई से ) प्रवृद्धो भवास चन्द्र क्या स्तुत्येति यास्थिति व्यत्ययेन वचनम् । [यजु० ७.१२ ] ॥५॥ मय-न्द्र : जो कि तुम, हमले प्रतिकूल गमन करनेवाले मालस्य स अद्धा आदिको को तलत विनाश करो जिन किमाओंमें लापरे अनुग्रहसे शत्रुओंको पिन करते, शधिकारी सम्पर अछानाने और यजमानोंसे अधिक इस यजमानके पीछे सोलर तिरी जो तुम वृद्धिको प्राप्त होतो जग क्रियानाम सर्वश्रेष्ठ उस तुमको हम तुति करो । जसे पुरातन नादिने, पूर्व पितर मादिने, सतीत यजमानोंने, इस जायके जानने तुम्हारी स्तुति की। उसी प्रकार हम करते हैं । जो कि तुम सर्व- मोसीपार में स्थित यजमान देने योग्य वर्गको जानतेदो ॥ ५ ॥ एमः। अगदचोदयत्पृश्निाजिमोतिना- यूरनलोचिमा हुनुमा गराई- সুজিস্ক্রিয় কিলোহিনি !! 5 ६॥ वेन इत्यमावत्सारः कश्यप ऋषिः । निक्षपी त्रिष्टुम् । सोमी ६० । सन्थीग्रहणे वि० ॥६॥ माप्यम-(ज्योतिर्नरायुः ) ज्योतिबिधुलक्षणं जरायुः वेष्टनं यस्य सः । (वयम् ) (वेनः ) मान्नश्चन्द्रः ( रजसः) उसाय ( विमाने ) निर्माणकाले श्रीमान्त गात ( पृश्निगर्भाः ) अपः (चोदयत् ) प्रत्यति पृश्निधुलोक यादित्यो वा गर्माऽवस्थान याला ताः द्यलोजस्थावस्था वा पो पति ( विमाः ) विद्वांसो त्रालणाः (इमा ) ( सोमन) सोमम् (प्पाम् )(सूर्यस्य) देवस्य ( संगमे ) संगमे गति । शिशुं न ) बालमित्र ( गतिभिः ) यतिपूर्वाभिवनिमः (हिन्ति ) स्तुपन्ति । मागोमपां सूयस्य च संगमे गृह्यन्ते ता वै वहन्तीनां स्यन्दमानानां दिया गृहीयात् पनि शुदः । [ यजु० ७१६ ] ॥ ६ ॥ भापषि-यह अनुपमकान्तिमान् चन्द्रदेवता जलपत्र पारने निमित्त उद्यत होपार पृश्निगर्भ (पृश्निशमसे पूर्य मोर झुलोम लेने ) पृथिवीके समस्त रस सूर्यकी फिरणोंसे वीपकर गुलोकमें मेघर पसे बढतेहुए काल पायफर वर्पते हैं । मतएव इस स्थान में इल मेघरूपगर्मके

(४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थो-
पि सूर्य और माता (लोक हैं, और ज्योतिर्जरायु (ज्योति विजली, सो यहाँपर जरायु-गर्म
बष्टल है) पृष्टिको प्रेरण करते हैं, विद्वान्लोग जलसंगमके विषयमें इनको सूर्यका प्रियपत्र.
समझकर स्तुति कियाकरते हैं ॥ ६ ॥
मन्त्रः
चिनदेवानामुगाड्नीकुञ्चक्षुर्मिमुनस्य
वरुणस्याले । आप् द्यावापृथिवी-
সৃহিঙ্গাত্মাহুজিহাদ-
.
जय।।७॥
ॐ चित्रमित्यस्य कुत्स ऋषिः । युरिगार्षी निष्ठपू छन्दः । सूर्यो
देवता । शालादाऽग्नौ हवने विनियोगः ॥ ७॥
भाष्यम्-(देवानाम् ) दीव्यन्तीति देवा मयस्तेषां देवजनानामेव वा (अनीकम् )
तेजःसमूहरूपम् (चित्रम् ) आश्चर्यकरम् (मित्रस्य) (वरुणस्य )(अग्नेः) त्रयाणां
देवानाम् ( चक्षुः ) उपलक्षितानां जगतां चक्षुः असौ सूर्यः ( उदगात् ) उदितो वभूव
उदयं प्राप्य च (यावापृथिवी) दिवं पृथिवीम् ( अन्तरिक्षम् ) आकाशम् ( आमाः )
स्वकीयेन तेजसा आ समन्तादापूरितवान् । ईग्भूतमण्डलान्तर्वती (सूर्यः) सूर्यदेवोऽन्त.
चोमितया सर्वस्य प्रेरकः परमात्मा (जगतः) जंगमस्य (तस्थुपः) स्थावरस्य (आत्मा)
स्वरूपभूतः सकलसंसारमयोऽयमेव सूर्य इत्यर्थः ॥ [ यजु० ७ । ४२] ॥ ७॥
भाषार्थ-महौ ! क्या आश्चर्य है, यह किरणपुंज देवता प्रतिदिन ही दित होतेहैं, भलोकसे
द्युलोकतक तीनों लोकोंमें अपनी किरणोंका जाल विस्तार करके समस्त संसारके नेत्ररूप
होकर प्रकाशमान होरहेहैं, यह स्थावर जंगम समस्तपदार्थों के जीवन और सूर्यनामसे प्रसिद्ध
हैं, इन पेषताके निमित्त दियाहा यह हवि सुन्दरप्रकारसे ग्रहण कियाजाय ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
B
आनुऽइडाभिदियोसुशास्तविश्वानरः -
विताएंतु ॥ अपियर्थाथुधालोमत्सथानो--
सिन्धुजगदभिपित्त्वमनीषा ॥८॥

ऽध्यायः ४]
भाष्यसहिता।
(४३)
ॐ आन इडाभिरित्यस्यागस्त्य ऋषिः । त्रिष्टुप् छं० । सविता
देवता । वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-(विश्वानरः) विश्ववर्तिनो जनान् स्वत एव रक्षकः ( सविता ) (देवः).
प्रेरको देवः ( नः ) अस्माकम् (विदथे) यज्ञे (सुशस्तिभिः ) शोभनशंसनहेतुभूतैः-
(इडाभिः ) यज्ञकारणभूताभिः इडाभक्षणेन सुशस्ति शोभना शस्ति प्रशंसा यस्यां कि-
यायां तथा यथा सर्वे इडां भक्षयन्ति तथा (आ एतु ) आगच्छतु । सूर्यमुस्वा देवा-
नाह-(युवानः ) हे जरारहिता देवाः (अपि) निश्चितम् ( भिपित्वे ) आगमनकाले
(यथा) येन प्रकारेण ( मत्सथ ) यूयं तृप्यथ तथा (नः) अस्माकम् (विश्वम् )
सर्वसु ( जगत् ) पुत्रमवादिकम् (मनीषा ) सनीषया बुध्या तपयथ । यथा भवद्धि-
स्तृप्तिः क्रियते तथास्मत्प्रजास्तर्पणीया इत्यर्थः । [ यजु: ३३ । ३४ ] ॥ ८ ॥
भाषार्थ-सब प्राणियोंका हितकारी सबका प्रेरक देव हमारे सुन्दर अन्नद्वारा प्रशंसायुक्त
यतगृहमें मागमन करें, अर्थात् मन्नोंसे सुन्दर प्रशंसा संपन्न यज्ञगृहमें आगमन करें । हे देव-
ताओ ! जरारहित तुम आगमनकालमें जिस प्रकारसे हो वैसे तृप्त होकर हमारे संपूर्ण जंगम
पुत्र गौ आदिको बुद्धिपूर्वक सब प्रकार तृप्त करो ॥ ८ ॥
विशेष-अथवा विश्वके हितकारी सविता देवता, प्रतिदिन अपने नियमसे उदित होकर
इस सृष्टियज्ञमें अन्नउत्पन्नकी प्रशंसा लाभ करतेहैं । उस अन्नसे हम देवताओंको तृप्त करतेहैं
वे हमारे परिवारको तृप्त करें ॥ ८ ॥
मन्त्रः।
बढयकचत्रहनुदाऽअभिलूडब्ध ।। सर्बुन्त
दिन्द्रतेव ॥९॥
ॐ यद्येत्यस्य श्रुतकक्षसुक्कक्षी ऋषिः। गायत्री छन्दः । सूर्यो
देवता। वि० पू० ॥९॥
भाष्यम्-(वृत्रहन ) वृत्रस्यायामावरकस्य मेघस्य इन्तः (सूर्य) हे सूर्यात्मकेन्द्र
(अ ) अस्मिन्दिने ( यत् कच ) यत्किञ्चित्पदार्थजातम् ( अभि) अभिमुखीकृत्य
(उदगाः ) प्रादुर्भूतोऽसि (इन्द्र) हे ऐश्वर्यसम्पन्न ( तत्सर्वम् ) स्थावरजंगमात्मक
जगत् (ते) तव ( वशे ) वदधीन भवति । उदिते सूर्य त्वदधीनं प्रादकर्म कुर्वन्ति
जुह्वति च । [यजु० ३३ । ३५ ] ॥ ९ ॥
भावार्थ-हे अंधकारके नाशक ! हे ऐश्वर्ययुक्त सूर्यदेव ! आज जो कहीं किसी प्रदेशमें उदय
होतेहो यह सब तुम्हारे वशमें हैं अर्थात् जो लोक सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित हैं उनकी
स्थिति सूर्यकेही मधीन है ॥ ९॥

(४४) रुद्राष्टाध्यायी- - [ चतुर्यो- तुरणिश्विदर्शतोज्ज्योतिष्कृतसिसय ।। विश्वमााखिरोखुलया ॥१०॥ ॐ तरणिरित्यल्प पारकण्ड वाणिः गायत्री छन्दः । सूर्यों देवता । वि० पू० ॥ १० ॥ भाष्यम्-(सूर्य) हे सूर्य त्वम् (तरणिः) तरिता अन्येन धन्तुमशक्यस्य महतोऽ- धनो मन्तासि तथा च मयते-“योजनानां लहले देशते है ब योगने । एकेत निमिषान क्रममाण नमोऽस्तु ते" ।। यद्धा उपासकान् रोगातारयरिस (विश्ववतः ) विधैः सर्वेः प्राणिभिर्दर्शनीयः । यहा-विश्वं सकलभूतजातं दर्शतः द्रव्यं प्रकाश्य येन मा तथाः । (ज्योतिष्कृत ) प्रकाशस्य कर्ता । यदा-चन्द्रादीनां रात्री प्रकाशयिता ( अरिस) अलि ( विश्वम् ) व्याप्तम् ( रोचनम् ) रोचमानमन्तरिक्षमासमन्तात् (मासि) महाशति । यदा-हे सूर्य अन्तर्यामितया सर्वस्य प्रेरक परमात्मन् त्वम् तरणिः संसा- राधे तारकोसि यस्मात्त्वं विश्वदर्शनः' विश्नः सर्वैर्मुमुक्षुभिदर्शितः द्रष्टव्यः साक्षात्क- तब्ध इत्यर्थः । 'ज्योतिष्यत् सूर्यादेः कर्ता शिस्त्वं चिद्रूपतया विश्व सबै दृश्यजातं 'शेचन दीप्यमानं यथा भवति तथा ( भाभासि) प्रकाशयति चैतन्यस्फुरणे हि सर्व जनश्यते । “तमेव भान्तमनु भाति सम्" इत्यादि श्रुतेः । [यजुः३३॥३६॥१०॥ भापार्थ-हे सूर्यदेव ! आप महामार्गमें गमन करनेवाले, अथवा उपासकोंके रोग दूर करने बाद सब प्राणियोंके दर्शनयोग्य अया-दृश्यवर्ग के प्रकाशक हो । अमवा-चन्द्रादिकमें भी आपहीका प्रकाश है, आपही उनके प्रकाशक हैं, आपही दीप्यमान सन्तरिक्ष प्रकाश करते हो । अथवा-सन्तर्प मीरूपसे प्रेरक हे परमात्मन् ! संसारसागरसे यापही पार लगानेवाले हैं। इस कारण सम्पूर्ण मुमुक्षुजनोंसे आपही देखनेयोग्य हैं। इससे आपही साक्षात् करनेके योग्य ভোগাছিছালী- हितातलजमारादित्यज्ञहरित सुषस्था- बादाबीबासस्तनुतेस्तिमौ ॥११ ।।

ऽध्यायः ४.] भाष्यसहिता (४५) ॐ तत्सूर्येत्यस्य कुत्स ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता । वि० पू० ॥११॥ भाष्यम्-(सूर्यस्य ) सर्वप्रेरकस्य आदित्यस्य ( तत् ) (देवत्वम् ) ईश्वरत्वम् ( महित्वा ) महत्त्वम् माहात्म्यञ्च यत् ( कर्ताः ) कर्मणोः (मध्या) मध्ये (विततम) विस्तीर्ण स्वकीय समिजालम् ( सञ्जभार ) अस्तं गच्छन्नमाल्लोकात्स्वात्मनि उपसं- हरति (बदा) यस्मिन्नेव काले ( हरितः ) रसहरणशीलान् स्वरज्ञाचीन हरिद्वनिया- न्या ( सधस्यात् ) सहस्थानादस्मात्पार्थिवाल्लोकादादाय (ईत) एव ( अयुक्त ) अन्यत्र संयुक्तान् करोति । यदा-यदा असौ स्वरश्मीनश्वान् सध्दयात् सह तिष्ठत्यस्मिन्निति सवस्यो रथस्तहमादयुक्त अञ्चत् ( आत् ) अनन्त रमेव ( रात्री ) निशा ( वासः) आच्छादयितृतमः सिमस्मै ) सर्वस्दै ( तनुते ) विस्तारयति । एवमेक आदित्यसहित. ज्योतिरन्यत्र तमः आदित्यप्रभावाद्वसतीत्यभिप्रायः । [ यज० ३३१३७ ] ॥ ११॥ भाषार्थ-सूर्यका वही देवत्व है वही महत्व है, कि जो ईश्वरके कार्यश्रेष्ठ जगत्के मध्य स्थित झडर विस्तीर्ण किये ग्रहमंडलको अपनी किरणोद्वारा अथवा अपने भावार्षणसे निज- वक्षों में नियमित रखते हैं, जपही हरितवर्णकी रश्मियोंसे युक्त आकाशमंडलसे अपने में युक्त करते हैं, अर्थात्-जब यह संध्याकालमें किरणोंको आकाशसे अपने में युक्त करते हैं तब रात सबके निमित्त वस्त्रको विस्तार करती है । अर्थात् अंधकारसे पाच्छादन करती है. अथवा-जिस समय यह रथारोहण कर गमन करते हैं; राभि अपने सीमान्तमें वस्त्राच्छादन करती है । अर्थात् रात्रिरूपी अंधकार दिशाओंके भध्यमें गमन करता है ॥ ११ ॥ मन्त्रः। লুঙ্গিu্যাম্বিগ্রফুজুর शोल्पस्य ॥ अनुन्समध्यानस्थुपाय- कृष्णमुन्यचरितुहम्मरन्ति ॥१२॥ ॐ तन्मित्रस्येवल्या विनियोगः पूर्ववत् ॥ १२ ॥ भाष्यम्--( सूर्यः ) मादित्यः (योः) द्युलोकस्य (उपस्थे ) संगमे (मित्रस्य ) मित्रदेवस्य (वरुणस्य ) वरुणदेवस्य ( तत् ) (रूपम् ) रूपम् ( कृणुते ) कुरुते येन रूपेण जनान् । ( अभिचक्षे ) अभिवष्टे पश्यति, मित्ररूपेण सुकृतिनोऽनुगृह्णति, वरुणरूपेण दुष्कृतिनो निगृह्णातीत्यर्थः । ( अस्य ) सूर्यस्य (अन्यत् ) एकम् (पाजः)

(४६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्थी-
रूपम् (अनन्तम्) कालतो देशतस्तथा परिच्छेद्यम् (रुशत ) शुक्लं दीप्यमानं जरा-
मरणाचयुक्तं विज्ञानघनानन्दमयमित्यर्थः । ( अन्यत्) (कृष्णम् ) दैतलक्षणं रूपम्
(हरितः ) दिश इंद्रियवृत्तयो वा (संभान्ति ) धारयति । इंद्रियग्राह्य द्वैतरूपमे शुद्ध
दैतन्यमद्वैतमिति के रूपे सूर्यस्य सगुणं निर्गुणं ब्रह्म सूर्य एवेत्यर्थः । [यजु०
३३।३८]॥१२॥
भाषार्थ-सूर्य शुलोककी गोदीमें मित्र और वरुणका वह रूप करता है जिससे मनुष्योंको
देखता है अर्थात्-मित्ररूपते पुण्यात्माओंपर अनुग्रह करता, वरुणरूपले पापियोंको निग्रह
करता है. इस सूर्यका एक रूप देशकालले सपरिच्छेद्य शह दीप्यमान विज्ञानधनानन्द
ब्रह्म ही है । एक कृष्णवर्ण द्वैतलक्षणवाला रूप है उसको दिशा वा इन्द्रियवृत्ति धारण करती
है। अर्थात् इन्द्रियग्राह्य द्वैतरूप है । एक शुद्धचैतन्य है इस कारण ब्रह्मके सगुण निर्गुण दो
रूप कहे हैं ॥ १२ ॥
विशेष-भदेतरूप मित्र अर्थात् --उत्तरायण दिन है, इसमें पुण्यात्मा गमन करते हैं, कृष्ण
दक्षिणायन रात्रि है, इसमें पापियोंका वरुणरूपसे निग्रह करता है ।। १२ ॥
सन्नः।
बण्मुहाँ॥ असिसूर्घबडाहित्यानुहा २ ॥
ব্ধি । বীথিংলা-
मुहाँ २॥ अति॥ १३॥
ॐ बण्महानित्यस्य जमदग्निपिः । बृहती छन्दः। सूर्यो देवता
वि० पू० ॥ १३॥
भाष्यम्-(सूर्य) हे सूर्य त्वं (बद् ) सत्यम् (महान् ) तेजसाधिकः ( असि )
महदसि ब्रह्मेत्यर्थः । (आदित्य ) हे आदित्य (क्ट् ) सत्यम् (महान् असि ) बले-
नाप्यधिकोऽसि । किञ्च-(महः) महतः (सतः) (ते) तर ( महिमा) (महाभाग्यम्
(पनस्यते ) सः प्राणिभिः स्तूयते पूज्यते वा, अतः (देव) हे देव दानक्रीडादियुक्त
( अद्धा) तत्त्वतः (महान् असि ) वीर्येणाऽप्यधिकोऽसि अभ्यासे भूयांसमर्थमन्यत्
यथा दर्शनीयोऽर्थनीयोन पुनरुक्तिदोषः । [ यजु०३३ । ३९ ]॥१३ ॥
भाषार्थ-हे जगत्को अपने अपने कार्य में प्रेरण.करनेवाले सूर्यरूप परमात्मन् ! सत्य ही
आप सबसे अधिक हो, हे आदित्य ! सबके ग्रहण करनेवाले सत्यही आप बडे हो, बडे होनेसे
आपकी महिमा लोकोंसे स्तुति की जाती है। प्यिमान परमात्मन् ! सत्यही तुम सबसे श्रेष्ठ
हो आदरके निमित्त पुनरुक्ति है ॥ १३ ॥

अध्यायः ४.] भाज्यसहिता । (४७) बट्टू अवसानहाँ असिसुमादकमहाँ सामालि ।। मुहादेवाभिमान पुरोहितोछि- मुजयोतिरदारक्याम् ॥ १४॥ ॐ बसूर्यत्यय जमदग्निषिः । सतोबृहती छन्दः । सूर्यों दे० । वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-(सूर्य) हे सूर्य ( वट् ) सत्यम् (श्रवसा ) श्रवणीयेन बलेन (महान् असि ) सर्वाधिकोऽसि (देव) हे द्योतमान ( सत्रा) सत्यम् (महालसि ) अधिकोऽ- सि किञ्च-(महा) स्वकीयमहत्वेन ( देवानाम् ) सुराणां मध्ये (अपुर्य:) ठालुगणा इल्ता । यहा- मसुरस्यास्तीति अतुरः प्राणस्तस्मै हितः प्राणिनां हित इत्यर्थः । (पुरो- हित ) प्रथमपूज्यः (विभुः) व्यापक ते (ज्योतिः ) तेजः (मदाभ्यम् ) केनाप्य - हिंस्यम् । यदा-अनुपहिस्यज्योतिः विज्ञानघनानन्दमयमित्यर्थः। [ यजु० ३३ । ४०] ॥ १४ ॥ भापार्थ-हे सूर्य ! आप सत्यही धन वा यशसे वा अन्नके प्रगट करनेसे श्रेष्ठ हो, हे दीप्य- सान प्राणियों के हितकारी देवताओंके मध्यमें भप्रस्थापित अर्थात्-लपकार्यों में प्रथम पूज्य अर्थात्-प्रथम तुमको अर्षदान करनेपर पीछे दूसरे देवताओंकी पूजामें अधिकार है, व्यापूक उपमारहित किसीसे न रुकनेवाले तेजसे युक्त आप यज्ञद्वारा महत्त्व से अधिक श्रेष्ठ हो, अर्थात तुम माहात्म्य के प्रभावसे एककालमें सर्वदेशव्यापी प्रतिद्वन्दीशून्य ज्योति विस्तार करते प्राणि- मात्रके हितकारी स्वरूपसे सबके आगे पूजनीय हो ॥ १४ ॥ স্মাঠভৰূিক্ষ্মীন্ধুিত্বৰ ৷ পুলিজালসলনজাঙ্গালিঙ্গ दौधिम ॥१५॥ श्रायन्त इत्यस्य नृमेध ऋषिः । बृहत्ती छन्दः । सूर्यों देवता। वि० पू० ॥१६॥ भाष्यम्-हे अस्मदीया जनाः यथा सूर्यरश्मयः ( सूर्यम् ) सूर्यम् ( श्रायन्त इन ) समाश्रिताः सूर्य भजन्ते तथा (इन्द्रस्य) इन्द्रसम्बन्धीनि, इन्द्रानुज्ञातनि (विश्वेत् ) (४८) रुद्राष्टाध्यायी- [चतुर्यो- विश्वानि धनानि (मक्षत ) सजत (बसूलि ) धनानि पुत्रपौत्रपौत्रादौ ( जनमाने) जनिष्यमाणे भविष्यकाले (मोजसा) बलेन ज्ञानसमुच्चयकारितया (प्रतिभागमू) (न) नकार उपमार्थीयः प्रतिपुरुष भागनिय ( दीधिमः ) स्थापयामः । इन्द्रः यानि बसूनि बलेन जनिष्यमाणानि पारोति पिपस्थागमिव तानि धनानि प्रतिधारयेमेत्यर्थः । । यजु० ३३ । ४१] ॥ १५ ॥ भाषार्थ-सूर्यको आश्रय करतीहुई चिरण ही इन्द्र के संपूर्ण धन अर्थात् वृष्टि धान्यनिष्पा- दुक सम्पत्तिको सेवन करती भक्षण करती है, अर्थात् विभागकरके प्राणियोंको देती है । आ- शय यह कि, सूर्यफी मिरणें इन्द्रकी दी हुई वृष्टिको भूमिमें विभाग करती हैं। और हम उन धनों- को पुत्रादिके उत्पन्न होलेमें अपने भागके समान तेजके सहित धारण का स्थापन करते हैं ॥१५॥ सरलार्थ-हम सूर्यको आश्रय करके जिससे विश्वाधिपति परमपिताके विषयभोगमें समर्थ होते हैं, उनके उत्कृष्ट वा उत्सृज्यमान लंपूर्णसंपत्ति में भी मनके बलपूर्वक अपने २. प्राप्तमा- गमें अधिकार किये हैं, अर्थात्-सूर्यकी सहायतासे ही सटा कार्यकी प्रवृत्ति होती है। आशा यह कि-भूमिअधिकारीके भाग्य के अनुसार न्यूनाधिक वर्णन करते हैं ॥ १५ ॥ मन्त्रः। ঞ্জাবি निरहसरूपित জুবালিংয়ালু । तन्नोमिनोहरणोमाम- हन्तामानितिलिन्छुःपृथिवीऽजुतद्यौ।१६।। ॐ अच्छत्यस्य कुत्ता शाणिः । निक्षुप छन्दः । देवा देवता दलाहि- त्यग्रहश्रयणे विनियोगः ॥ १६ ॥ भाष्यम्-(देवाः) हे द्योतमानाः सूर्यरझमयः (अद्या) ठासिन्काले (सूर्य) आदित्यस्य ( उदिता) उदयकालीनाः उदये सति इतस्ततः प्रसरंतो रायसल्माता ( अहसः ) पापात् (निष्यिपृतः ) निर्मुश्चत ( अवधात्) दुर्यशसोऽपि निर्मुश्चत । यदिदमस्माभिरुततस् (न) अस्मदीयम् ( तत् ) ( मित्रः ) अहरभिमानी देवः (वरुणः) अनिष्टानां निधारयिता राज्यभिमानी ( अदितिः ) अखण्डनीया देवमाता (सिन्धुः) स्यन्दनशीलोदकाभिमानी देवता ( पृथिवी ) भूलोकस्याधिष्ठात्री (द्यौः) द्यलोकाभिमानी (उत) समुखये (मा) माम् (महन्ताम् ) पूजयन्तु अनुमन्यता- मिति [यजु० ३३ । ४२] ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे रश्मियों में स्थित देवताभो । आज अब सूर्यका उदय हमको पापले तथा दुर्थ- शसे पृथक् करे, मित्र, वरुणदेवता, देवमाता, सिन्धुनदी, पृथिवी और स्वर्ग इस हमारे बाप- नको अनुमोदन करें ॥ १६ ॥ ।

व्यायः ४.] भाष्यसहिता। (४९ में मन्त्रः। - 1. आकृष्णेनुरज॑सावर्तमानोनिवेशार्थनमृत- अमर्त्यश्च ॥हिरण्यय नसवितारघुनादेवो बांतिभुवनानिपश्यन्॥१७॥ মুন্নি বিদ্যালুঘাইঃ ৪ ॐ आकृष्णेन इत्यस्य हिरण्यस्तूप ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सविता देवता । सावित्रग्रहणे वि० ॥ १७॥ % भाष्यम्-( सविता) देवानां प्रसविता ( देवः) स्तुतिदीप्तिक्रीडायुक्तः ( कृष्णेनो कृष्णवर्णेन ( रजसा) लोकेन 'लोका रजांस्युच्यन्ते' अन्तरिक्षलोको हि सूर्यागमनात्यु कृष्णवर्णो भवति तेनान्तरिक्षमार्गेण (आवर्तमानः) पुनः पुनरागच्छन् (त्यामृतम् ) देवरा ( मर्त्यम् ) मनुष्यम् (च) (निवेशयन् ) स्वस्वव्यापारे स्थापयन् । यदा-'अमृता मरणरहितं प्राणं 'मय॑म् मरणसहितं शरीरं व 'निवेशयन्' स्थापयन् ( झुक्नानि । सर्वान् लोकान् ( अपश्यन् ) अवेक्षमाणः प्रकाशयन्नित्यर्थः । (हिरण्येन) सुवर्णनिर्मित तेन ( रथेन ) यानेन (आयाति) अस्मत्समीपमागच्छति । सुवनवर्तिलोकान् पुण्यापा- यकर्तन् क्षिप्रं निरीक्षमाणः यः सविता देवः देवमनुष्यव्यापारस्थापकः यश्च पुण्यपाह- साक्षी तस्याादिकमुचितामति वाक्यार्थः। [ यजु० ३३ । ४३ ] ॥ १७ ॥ भाषार्थ-सबके प्रेरण करनेवाले सविता देवता सुवर्णमय रथमें आरूढ होकर कृष्ण रादिलक्षणवाले अन्तरिक्ष मार्ग में पुनरावर्तन क्रमसे भ्रमण करते देवादि और अनुष्यादि अपने अपने व्यापार में स्थापन करते सम्पूर्ण भुवनोंको देखते हुए आगमन करते हैं । अथक सब लोकोंको प्रकाश करते आगमन करते हैं । आशय यह कि-भुवनवर्ती लोकोंके यु पापको शीघ्रतासे निरीक्षण करते हुए पुण्यपापके साक्षी यह सविता देवता हैं इनकी उप- सना पूजा उचित है ॥ १७ ॥ इति श्रीरुद्राष्टके मुरादाबादनिवासि-पण्डितज्वालाप्रसाद मिश्रकृतसंस्कृतार्य- भाषाभाष्यसमन्वितश्चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ "

(९०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
अथ पंचमोऽध्यायः।
मन्त्रः।
ॐ नमस्तेरुद्रमन्पर्वऽउतोतुऽइपंचनमः ॥
बाहुक्पांमुततुनम ॥१॥
ॐ नमस्तं इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । गायत्री छन्दः । रुद्रो दे० ।
माटो विनियोगः ॥३॥
भाष्यम्-हे रुद्र ! यद्रोदन रु दुःखं द्रावयति रुद्रः । यद्वा-रुद्रमुपशान्तयति, ये गत्य-
चोस्ते ज्ञानार्थाः खणं रुत् ज्ञानं भावे कि तुगागमः । रुत् ज्ञानं राति ददातीति रुद्रा
सोहनिदारकः परमेश्वरः । यदा-पापिनो जनान् दुःखभोगेन रोदयतीति रुद्रः जगच्छा-
सक्षः। हे रुद्र (त) तब (मन्यवे) रोपाय (नम:) नमस्कारोऽस्तु, (उत) अपि (ले)
जा (इषवे) शराय ( नमः ) नमस्कारोऽस्तु (उत) अपि च (ते ) तव (बाहु-
स्यास् ) सुजाभ्याम् (नमः ) नमः तव क्रोधवाणहस्ता बस्मच्छत्रुष्वेव पतन्तु नास्मा-
स्वित्यर्थः । [यजुर्वेदीयोडशोऽध्यायः ] ॥ १ ॥
साषार्थ-हे दुःखके दूर करने अथवा ज्ञानके देनेवाले अथवा पापी जनोंको उनका कर्मफल
देकर रुलानेवाले रुद्रदेव ! आपके क्रोधके निमित्त नमस्कार है ! और तुम्हारे वाणोंके निमि-
ल नमस्कार है ! और तुम्हारी दोनों भुजाओंके निमित्त नमस्कार है, अर्थात् हे रुद्रदेव !
माएका क्रोध और वाणधारी इस्त शत्रुओंपर पडे हमको शान्ति हो ॥ १ ॥
विशेष--तत्त्ववादी मेघोंके अन्तर शक्तिमय रुद्रका निवास कहते हैं। कि गर्जना उनका
क्रोध है । उल्कापात पाण हैं, समुद्र में रठे तरंग एक भुजा, भौर महाधारा वर्षा उनकी
कसरी भुजा-रूप हैं | उससे शत्रुओंका अनिष्ट हो मोर हमको मंगल हो । अयबा-पादि-
के नाशको तुम वाण मोर क्रोधरूप हो । इस अध्याय में परमेश्वरका सगुणनिर्गुणरूप लग्न
दोपासनासे वर्णन किया है ।। १ ।
बातें लदाशिवातुनघोरापापकाशिनी।।
तयानस्तुन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिर्चा
कशाहि॥२॥

अध्यायः ५.]
भाष्यसहिता।
ॐ यात इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः। आधी स्वरानुष्टुप्छन्द रुद्रो
दे० । वि० पू० ॥२॥
भाष्यमू-(रुद्र) हे देव (वा) (ते) तव ( अघोरा ) सौस्या (अपापकाशिनी)
पापामुलं काशयति प्रकाशयति पापकाशिनी न पापकाशिनी या भक्तानाम् पुण्यफल-
मेव ददाति न पापफलमित्यर्थः । (शिवा ) शान्ता मंगलल्पा ( तनूः ) शरीरमस्ति
(निरिशन्त) लैलासवासी गिरौ कैलासे हियतः प्राणिनां शं सुखं विस्तारयति वागिरि
शचि स्थितः शं तनोति वा गिरौ मेछे स्थितो दृष्टिद्वारेण शं तनोति वा गिरौ शेते गिरि-
शः समति गच्छति जानातीति वा अन्तः सर्वज्ञः, 'अमगतौ' लजने शब्दे कर्तरि क्तः।
गिरिशचालावन्तश्च गिरिशन्तस्तत्सम्बुद्धिः शकन्ध्यादित्वात्पररूपम् । ( तया )
( शन्तमया) सुस्तमया (तन्या) शरीरेण (नः ) पस्मान् (अभिवाकशीहि )
अधिपश्य ॥२॥
भाषार्थ-कैलासपर्वतपर स्थित होकर प्राणियोंके सुखको विस्तार करनेवाले मघवा पाणी,
रियस होकर सुखका विस्तार करनेवाले, अथवा मेघमें स्थित होकर वर्षालादिके रूपसे सुख-
को विस्तार करनेवाले, वा पर्वतपर शयन करनेवाले सर्वज्ञ, हे रुद्र ! जो तुम्हारा शान्त मंग-
रूप लिष्मतारहिता-होनेसे सौम्य पाप फलको न देकर पुण्यफलका ही देनेवाला शरीर
है, उस सुखभरे शरीरसे हमको अवलोकन कीजिये ॥ २ ॥
विशेष-जो सर्वव्यापी आरमाका भी मास्मा है दृश्य अदृश्य संपूर्ण शरीरोंमें उसकी स्थि-
ति है केवल तत्व विचारवाले कहते हैं कि, इस स्थलमें रुद्रका मेघोदयरूप शरीर देखनेकी
प्रार्थना है, किन्तु जिससे गृहपतन लौर बाढकी प्राप्ति हो उसके
उदयकी प्रार्थना नहीं है.
किन्तु जिसके उदयसे कृषिआदिकी उन्नति हो उसीकी प्रार्थना है । यहाँ रुद्रका कल्याणमय
शरीर और कैलासवास होनेसे शिवका विग्रह भी कथन किया है, अथवा हे रुद्र ! मापना
कल्याणकारी विस्तार मनोहर है, पापोंको दूर करके हमको महासुख दो ! इससे सगुण ब्रह्म-
प्रतिपादित है ॥ २ ॥
Vidha
KOTTspur
library
ARDA
জাৰিঞ্জিফিহালুদ্ধি,
शिवाहिरिचतामुलमाहिठी पुरूंपुज-
गत् ॥३॥
ॐ यामिषुमित्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । विराडार्ण्यनुष्टुप् छ । रुद्रो
देवता। वि० पू० ॥३॥

(५२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ पञ्चमो-
DRANI
भाष्यम्-(गिरिशन्त ) देव (याम् ) (इघुम् ) शरम् ( अस्तवे ) शत्रून् क्षेप्तुं
१ हस्ते) करे (बिभर्षि ) धारयसि (गिरित्र ) गिरौ कैलासे स्थित्वा भूतानि त्रायले
इति तत्सबुद्धिः (ताम् ) बाणम् (शिवाम् ) कल्याणकारिणी (कुरु ), किच
(पुरुषम् ) पुत्रपौत्रादिकम् (जगत ) जंगममन्यदपि गवाश्वादिकम् ( माहिर्टन्सीः)
मावधीः सर्वथाऽस्मद्गेहे शान्ति कुर्वित्यर्थः ॥ ३ ॥
भाषार्थ-हे वेदवाणीमें स्थित ! वा पर्वतपर उदित भेधवृन्दके अन्तर स्थित होकर जग-
तुका कल्याण करनेवाले कैलास वा वेदवाणीमें स्थित होकर प्राणियों की रक्षा करनेवाले तुम
जिस वाणको शत्रुओंके नाश वा प्रलयमें जगत्के अस्त करनेको हाथमें धारण करते हो, हे
नक्षक ! उस याणको कल्याणकारी करो । पुत्र पात्र आदि जगत्के गवाम्बादिको मत मारो,
अर्थात् सकालमें हमको और इस संपूर्ण जगत्को नष्ट मत करो ॥ ३ ॥
विशेष-गिरिशृङ्गमें जो रहते हैं निम्नभागके मेधोपद्रव उनका अनिष्ट नहीं करसकते इंस
निमित्त अधश्चारी दुर्घटनाके अन्तर स्थित देवताको गिरित्र कहते हैं। यह तत्त्यवादी जन्त
कहते हैं ॥ ३ ॥
मंत्रः ।
হিলিলাংরাহিঙ্গাল্ডংম্বাজ
সুগছি। দলেজছলাঙ্গালু।
ॐ शिवनेत्यल्य परमेष्ठी ऋपिः । निवृतार्ण्यनु० छ । २००६
वि० पू० ॥ ४॥
भाष्यम्-(गिरिश ) गिरी कैलासे शेते गिरिशः तत्सम्बुद्धी हे गिरिश (शिवन)
मंगलरूपेण ( वचसा) वचनेन ( त्वा ) त्वास ( अच्छ ) प्राप्तुम् (बदामस्ति) बदामा
त्रार्थयामहे (नः ) अस्माकम् ( सर्वम् ) सम्पूर्णम् ( जगत ) जंगमै मनुष्यपश्वादि
( यथा) येन प्रकारेण ( अयक्ष्मम् ) व्याधिरहितम् (सुमनः) शोभनं सनः ( सत)
तथा कुर्वित्यर्थः ॥४॥
भाषार्थ-हे वेदवचन वा कैलासमें शयन करनेवाले ! मंगल स्तुतिरूप वचनसे तुमको प्राप्त
होनेको हम प्रार्थना करते हैं। हसको सवही जंगम, मनुष्य, पशु आदे जिस प्रकार नीरोग
शुम मनवाल। होवे सो करो, अर्थात् यह जगत् स्वस्थ और रोगरहित हो । यही मापसे
हमारी प्रार्थना है सो स्वीकार करो ॥ ४ ॥
विशेष-जिसका उदय सर्वदा ही पर्वत पृष्ठपर देखा जाता है, ऐसे मेधके जन्तर स्थित देव-
ताको गिरिश कहते हैं, यह तत्ववादी जनोंका कथन है। तात्पर्य यह है कि रुद्रदेवता सर्वत्र
विद्यमान है वह जगत्में मंगल करें मजामें कोई रोग न हो ॥ ४ ॥

ऽध्यायः ५.
भाष्यसहिता ।
अईयवाचदधिवुवामथुमोदेहयोमिषक् ।।
महउखाम्ययुन्साच यातुधान्योधु-
राचील्पांसुव ।। ५॥
ॐ अध्ययोचादित्यस्य प्रजापतिषिः । भुरिगापी बृहती छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५॥
भाष्यम्-( अधिवक्ता) अधिवदनशीलः निगमकयनतत्परः (प्रथमः) पूज्य-
त्वात्सर्वेषां मुख्यः (देव्यः ) देवेभ्यो हितः (भिषकू) स्मरणेनैव रोगनाशको रुद्रः
( दाध्यवोचत् ) मां सर्वाधिक कदति, अयं याजका सर्वाधिसो भवत्विति । परोक्षमु-
पल्हा प्रत्यक्षमाइ-हे रुद्र ! (च) ( सर्वान् ) सम्पूर्णान् (अहीन् ) सर्पव्याघ्रादीन
(जम्भयन् ) विनाशयन् ( सीः ) समस्ताः ( अधराचीः ) अधोधोगमनशीला:
( यातुधान्यः ) राक्षसीः (च) (परासुव ) अस्मत्तो दूरीकुरु ॥ ५ ॥
भाषार्थ-अधिकवदनशील सर्वदा निगम कथन करनेवाले, सब देवताओं में मुख्य, पूजनीय,
देवताओंके हितकारी, स्मरण से ही संसार तथा जन्म मरणके रोगनाशक रुद्र हमको सप्रू
अधिक हैं, लथात् सबसे अधिक करें । और सव सर्प व्याघ्र आदिको विनाश करते हुए
संपूर्ण अधोगमनशील राक्षसी आदिको भी हमसे दूर करो ॥ ५ ॥
अध्यात्म-परमात्मा हमको महावाक्यका उपदेश करो और सर्पके समान डसनेवाले
काम आदिको नाश करो, और अधोगमनशील कामकलारूपी राक्षसियोंको दूर करो. अथवा
संपूर्ण विद्याभोंके कहनेसे ही यह सबमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, इसीसे दिव्यगुणयुक्त ज्ञान
सबके संसारी रोगके दूर करनेवाले हैं ॥ ५ ॥
जडवादी कहते हैं कि, गर्नन ही प्रधान शब्द है ! अति पृष्टि होने से ज्वरादि रोग और
सपीक्षा प्रादुर्भाव होता है इनसे मृत्युसंख्या अधिक होनेकी संभावना है, प्रेतभय लपस्थित
न हो इस कारण तीनों भयके निवारण करनेके निमित्त रुद्रदेवसे प्रार्थना है ॥ ५ ॥
मन्त्रः॥
अलीबत्तानोऽकृणऽइतबुब्सलालना
बेचनरुद्राऽभुमितो विशुनितासहस्नु-
शेविषा,हेड ईमहे ॥६॥

(५४) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- ॐ असौ य इत्यस्य प्रजापतिषिः । विराडार्षी पंक्तिश्छन्दः ।। रुद्रो दे० । वि० पू० ॥६॥ भाष्यम्-मादित्यरूपेणाऽत्र रुद्रः स्तूयते-- या असी) प्रत्यक्षो रुद्रो रविरूपश्च (ताम्रः) उदयेऽत्यन्तरक्तवर्णः (च अरुणः) अरुणरूपः ( उत ) अपि ( वचः) छास्वकाले पिंगसवर्णः (सुमंगलः) शोमनानि मंगलानि यस्य सः । सूर्योदये सर्व मंगलप्रवर्तनात् क्रमेणैतानि रूपाणि दधातीत्यभिप्रायः । अथवा असौ यस्ताम्र: अरुणः सुमंगल प्रयोजनक्शात् नानारूपाणि करोति (च) पुनः (ये )( सहस्रशः) सह- स्वशः संख्याः (रुद्राः) रुद्राः (एनम् ) (माभितः) सर्वतः (दिक्षु ) प्राच्यादि- दिक्षु (श्रिता) आश्रिताः (एषाम् ) रुद्राणाम् ( हेडः) अस्मदपराधनं क्रोधमा (ईमहे) भत्त्या निवारयामः ॥ ६॥ भाषार्थ-और जो यह प्रत्यक्ष रुद्र सूर्यरूप उदयसमयमें अत्यन्त लालवर्ण, अस्तको समय एक्तवर्ण और मध्याह्न समयमें पिंगलवर्ण मंगलरूप कौका उदयमें विस्तार करनेवाले हैं, और जो सहस्त्रों रुद्रांशरूप वा किरणरूपसे इनके सब जोर दिशाओमें स्थित हैं, अर्थात् जो सप सहस्रों देवता नक्षत्रमंडल इन देवताके दशौ दिशाओमें देदीप्यमान हैं इन्हींका क्रोध हम भक्तिद्वारा निवारण मारते हैं ॥ ६ ॥ मन्त्रः। ভশ্রীলুলীতজ্ঞীল্লিীভিও | বীভূহৃৎস্পঞ্জাবী इंडियातिनः ॥७॥ हा असौ य इत्यस्य प्रजापतिषिः । विराजर्षी पंक्तिश्छन्दः । रन्नो देवता। वि० पू० ॥७॥ माध्यम-( यः) (असौ) मादित्यरूपः ( नीलग्रीवः) विषधारणेन नीला ग्रीवा जण्ठो यस्य अस्तमये नीलकण्ठ इव लक्ष्यः (उत) ( विलोहितः)रक्तः ( अवसपति) उदयास्वमयी कुर्वन्निरन्तरं गच्छति ( एनम् ) रुद्रम् (गोपाः ) गोपालाः वेदोक्तसं- स्कारहीनाः ( अदृश्रन् ) पश्यन्ति ( उदहार्यः ) जलहारिण्यो योषित अपि (-मह- अन्न ) पश्यन्ति ( सः) शंकरः (दृष्टः ) दृष्टः सन् (न:) अस्मानू ( मृड्याति ) सुखयतु ॥ ७॥ भाषाय--जो वह विषधारणसे नीलग्रीव वा मस्तसमयमें नीलकण्ठके समान और विशेष रक्तवर्ण आदित्यरूपसे उदय अस्त करते निरन्तर गमन करते हैं, इनको वेदोक्त संस्कारहीन अध्याय: ५.] भाष्यसहिता । (५५) गोपालत देखते हैं, जल ले जानेवाली नारी भी दर्शन करती हैं, वह रुद्र दर्शनपथमें प्राप्त होते ही हमको सुखी करें । सूर्यमें नीलिमा आकाशका नीलतासे कही है । गोष्ठम गोपाल. नदी आदि तीरपर पनिहारी इनकी शोभा अतिशय देखतीहैं ! पक्षान्तरमें-इन्द्रियगोलकोंकी रक्षक इन्द्रियशक्ति गोप, और अमृतकी प्राप्त करनेवाली प्राज्ञशक्ति उदकहारी हैं ॥ ७ 835 मन्त्रः। नमोस्तुलीलग्ग्रीवायसहस्राक्षायमुढ़िये।। अोवेऽस्युसत्त्वानोहन्तेश्यों करना अनमोरित्वत्यस्य प्रजापतिषिः । निच्यदायम् छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥ ८॥ भाष्यम्-( नीलग्रीवाय ) नीलकण्ठाय ( सहस्राक्षाय ) सहसमक्षीणि यस्य इन्द्र- स्वरूपिणे ( मीढुषे) वृष्टिकत्रै पर्जन्यरूपाय ( नमः ) नमस्कारः ( व्यस्तु ) भवतः ( अथो) अपि ( अस्य) रुद्रस्य (ये) (सत्त्वानः) प्राणिनः सेक्काः सन्ति (तेभ्यः) (महम् ) स्तुतिकर्ता ( नमः ) नमस्कारं ( अकरम् ) करोमि ॥ ८ ॥ भाषार्थ-नीलकण्ठ, सहस्रनेत्र, खच जगतको देखनेवाले, अथवा इन्द्रस्वरूप वा पहु रश्मिा रूप सेचनमें समर्थ पर्जन्यरूप रुद्रके निमित्त नमस्कार हो । और रुद्रदेवताके जो अनुच- रविशेष हैं, मेषादि राशि हैं, उनके निमित्त मैं नमस्कार करता हूँ | तात्पर्य यह-यह सवही शिवरूप हैं सबमें रुद्र वर्तमान ई ॥ ८ ॥ मन्त्रः। प्रमधन्यनुरुत्वमुमोरारकोज्याम्द ।। আত্মহাত্মাফাজ্জল ! | ॐ प्रमुञ्चेत्यस्य प्रजापतित्रषिः । सुरिगार्युष्णिक छन्दः रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ९॥ भाष्यम्-(भगषः) हे भगवन् परमैश्वर्यसम्पन्न (धन्वनः ) धनुषः ( उभयोः ।। द्वयोः ( मान्योः ) कोट्योः स्थिताम् ( ज्याम् ) मौर्वीम् ( त्वं ) ( प्रमुञ्च ) दूरीकुक, (च) (याः) (ते) तव (इस्ते ) करे ('इषवः) पाणाः सन्ति (ताः) शश, हूँ परावप) पराक्षिप ॥९॥ भाषार्थ-हे पलैश्वर्यसम्पन्न भगवन् ! माप धनुषकी दोनों कोटियोंमें स्थित ज्याको दूर करतो. मर्थात् उत्तार को। और जो आपके हाथमें वाण है उनको दूर त्यागदो हमारे निमित्त तोटा- मार्त हो जाओ। हमारे लिये किसी प्रकारका रोग शोक न हो यही आपसे प्रार्थना है ॥ ९॥ E

रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
मन्त्रः।
शिष्यन्धनमापदिनोविशल्योबाणवाँ।।।
उत ॥ अनेशनल्युषाऽइप आपुरस्यनि-
बङ्गुधिः ॥१०॥
ॐ विज्यन्धनुरित्यय प्रजापतित्रपिः । भुरिगार्ण्यनुष्टुप्छन्दः ।
दो देवता । वि० पू० ॥१०॥
भाष्यम्-( कपर्दिनः ) कपर्दा जटाजूटोऽस्यास्तीति कप तस्य रुद्रस्य (धनुः ।
शरासनम् (विज्यम् ) गौवीरहितमस्तु (उत) व वाणवान इपुधिः ( विशल्यः )
विफलोऽस्तु ( मस्य ) रुद्रस्य (याः) (इषवः) शराः ताः ( अनेशन ) नश्यन्तु
(अन्य ) रुद्रस्य (निपंगधिः ) कोशः सः (बाभुः ) खगराहतोऽस्तु । रुद्र अस्मा-
प्रति न्यस्त सर्वशस्त्रोऽस्त्वित्यर्थः ॥१०॥
मापार्थ-जटाजूटधारी रुद्रका धनुप ज्यारहित हो, और तरकस भालेवाले पाणोंसे शत्ता
हो, इन देवताके जो पाण हैं वे अदर्शनको प्राप्त हों, इनके खड्ग रखनेका कोश रीता हो
सात रुद्र हमारे प्रति सर्वथा न्यस्तशस्त्र हो ॥ १० ॥
मातहसिलोढशनहरसे नमवतुधात-
হিলার্মিংহাজি ? ? ?
ॐ यात इत्यस्य प्रजापतिषिः । लिच्यदलुटुप्छन्दः । सन्तो
हेपत्ता । वि० पू० ॥ ११॥
भाष्यम्-(मीदृष्टम) सेकृतम ववर्धक (ते) तद हस्ते (या)(हेतिः) धनूरुप-
सायुधमस्ति (ते हस्ते ) करे ( धतुः ) धनुः ( बभूव ) अस्ति ( तया) धनूरूपया
६ लयाया) निरुपद्रव्या च्या हेत्या ( विश्वतः ) सर्वतः ( अस्मान् ) नः
(परिभुज) परिपालय ॥ ११ ॥
भाषार्थ-हे अत्यन्त ज्ञानामृत वा वर्षासे सींचनेवाले ! तुम्हारे हाथमें जो ‘आयुध है।
सापके हाथमें जो धनुप है उस उपद्रवरहित अनुषरूप हेतिसे आप सब ओरसे हमको
पालन करो, अर्थात् आप वर्षा करनेवाले अस्त्रको ही धारण कीजिये किन्तु उससे कोई
उपद्रम न हो ॥ ११ ॥

त्यायः ५.1
भाष्यसहिंता ।
(५७)
मन्त्रः।
আহিলাহিদান্ত্রস্থল
अथो बऽईपुधिस्तबुरिक शुरूसरिघडि
तम् ॥ १२ ॥
ॐ परीत्यस्य प्रजापतिर्ऋषिः । निच्यदायेनुष्टुप्छन्दः । रुद्रो
देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥
भाष्यम् हे रुद्र (ते ) तव (धन्वनः ) धनुःसम्बन्धि ( हेतिः ) आयुधमा
( विश्वतः ) सर्वतः ( अस्मान् ) (परिवृणक्तु ) त्यजतु ( अयो) अपि च (यः)
(तब ) ( इषुधिः ) कोशोऽस्ति ( तम् अस्मत् ) सकाशात् ( आरे) दूरे (निधेहि )
स्थापय ॥ १२ ॥
भाषार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारे धनु संबंधी आयुध सब ओरसे हमको त्यागन करे, और जो
तुम्हारा तरकस है उसको हमारे निकटसे दूर स्थापन करो । आशय यह कि, हमारे काँ-
द्वारा जो व्याधि होती हैं वह तुम्हारी सत्तासे हैं सो हमको कष्ट न दें ॥ १२ ॥
मन्त्रः।
अबुतत्त्युधनुष्टुन्तहलाक्षुशतेषुधे । लि-
शीर्षशल्यानाम्सुखाशिवोर्ल सुमनाम-
व।॥ १३ ॥
* अवतत्त्येत्यस्य प्रजापतिषिः । नियदानुष्टुप् छन्दः।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१३॥
भाष्यम्-(सहस्राक्ष) सहस्रमक्षीणि यस्य तत्सम्बुद्धौ (शतेषुधे) शतमिषुधयो यस्य
तत्सम्वुद्धौ (त्वम् ) (धनुः) शरासनम् (मयतत्य अपज्या कृत्वा ( शल्यानाम् )
शराणाम् ( मुखाः) अग्राणि (निशीर्य) शीर्णानि कृत्वा ( नः ) अस्मान्प्रति
( शिवः) शान्तः (सुमनाः ) शोभनचित्तश्च (मव) अनुगृहाणेत्यर्थः ॥ १३ ॥
भाषार्थ-हे विराटू ! हे सहस्रनेत्र ! हे सहस्रों तरकसवाले ! तुम धनुषको ज्यारहित करो
और वाणोंके मुख (भाल) निकालकर हमको शान्त, शोभनचित्त हो अर्थात् हमपर
कुपा करो ॥ १३ ॥

(५८) रुद्राष्टाध्यायी- [.पञ्चमो- मन्त्रः। नमस्तु आयुधायानांततायधष्णवै ॥ उमा- क्यामततेनमोबाहुभ्यान्तबुधन्वने ॥१४॥ नमस्त इत्यस्य प्रजापतित्राषिः । भुरिगायुष्णिक छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-हे रुद्र (ते ) तव ( मनातताय ) धनुष्यनारोपिताय (आयुधाय) बाणाय ( नमः ) नमोऽस्तु (ते ) तव (धृष्णवे ) धर्षणशीलाय रिपून् हन्तुं प्रगल्माया (धन्वने ) धनषेऽपि (नामः) नतिरस्तु (उत) च ( तें)तव (माभ्याम् ) द्वाभ्यास बाहुभ्याम् ) सुजाभ्याम् ( नमः) नमस्कारोऽस्तु ॥ १४ ॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! आपके धनुषपरं न चढाये हुए वाण निमित्त नमस्कार है, आपके दोनों बाहुओंके निमित्त और आपके शत्रु मारनेमें प्रगल्भ धनुषके निमित्त नमस्कार है ॥ १४ ॥ मालोसुहान्तलुतमानोऽअर्भुकम्मानुऽउ- क्षन्तमुरुमा उक्षितम् ।। मानोबधीमपि रुसोतमातरम्मान-प्रियास्तुन्योलन- रीरिषद ॥१५॥ ॐ मानो महान्त इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निवृतार्यां जगती छन्दः । सदो० दे० । वि० पू० ॥ १५ ॥ भाष्यम्-हे रुद्र (नः) अस्माकम् (महान्तम) वृद्धं गुरुपितृव्यादिकम् (मावधी:) मा हिंसीः ( उत ) अपि (नः) अस्माकम् ( अर्भकम् ) बाल कम् (मा) मावधी (न:) अस्माकम् ( उक्षन्तम् ) सिञ्चन्तं तरुणम् (मा) मावधीः ( उत) अपि (नः) पस्माकम् ( उक्षितम् ) सिक्तं भर्भस्थस् ( मा ) मावधीः (नः) अस्माकम्यू (पितरम् ) जनकम् (मा) मावधी: ( उत ) अपि (न:) ( मातरम् ) जननीम (मा) मावधीः (नः ) अस्माकम् (प्रियाः ) बल्लभा (तन्वः) पुत्रपौत्ररूपाणि शरीक शाण ( मा रीरिषः) मा हिंसीः ।। १५ ।।

ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता। भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे वृद्ध गुरु पितृव्य आदिको कर्मानुसार मत मारो। और हमारे नाळकको मत मारो, हमारे तरुणको मत मारो और हमारे गर्भस्थ बालकको मत मारो, हमारे पिताको मत मारो, और हमारी माताको मत मारो, हमारे प्यारे शरीर पुन पौत्र आदिको मत मारो । आशय यह कि, यदि कमांनुसार उनकी आयु पूरी होगई हो तो भी आपकी कृपा होनी चाहिये ॥ १५ ॥ मानस्तीकेतनयमानुऽआयुषिमानोगोषु मानोऽअश्वैपुरीरिषः। मानोडीशल्छ- भामिनोवधी विष्टमन्तुलसमित्याहवा. महे ॥ १६ ॥ ॐ मानस्तोक इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यदार्षी जगती छन्दः । रुद्रो दे० । वि० पू० ॥१६॥ भाष्यम्-हे रुद्र (नः ) अस्माकम् ( तोके) पुत्रे (तनये ) पौने ( मा रीरिषः) मा हिंसीः (नः आयुषि ) जीवने (मा) मा हिंसीः (नः) (गोषु ) धेनुषु (मा) मा हिंसीः (नः) (अश्वेषु ) तुरगेषु (मा) मा हिंसीः (नः भामिनः) क्रोधयुतान्न (वीरान ) भृत्यान् (मा वधीः ) मा हिंसीः (हविष्मन्तः ) हवियुक्ताः (सदमित्) सदैव (त्वा ) (हवामहे ) वयं यागायायामः । त्वदेकशरणा वयमित्यर्थः ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे पौत्र पुत्रको मत मारो, हमारी आयुको मत नष्ट करो, हमारी गौ- ओम प्रहार मत करो, हमारे घोडोंमें प्रहार मत करो, हमारे क्रोधयुक्त वीर पुरुषोंको मत मारो ! हवियुक्त निरन्तर आपको हम यज्ञके निमित्त आह्वान करते हैं । अर्थात् आपकी ही शरण हैं । तात्पर्य यह है कि-ईश्वर रुद्र किसीको नहीं मारते पर कर्मानुसार रोगादिमें अपनी शक्तिकी प्रेरणा करते हैं उन पापोंसे मनिष्ट न होनेकी प्रार्थना है ॥ १६ ॥ मन्त्रः। नमोहिर॑ण्यबाहवे लेनाध्यदिशाचुपतयेन- मोनमौवृक्षेब्क्योहरिकेशेळ्यल्पशूनाम्पत- येनमोनम+शुष्टिपञ्जरायु त्विषमतेपी- रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- (६०, नाम्पतयुनमोनमोहरिकेशायोपवीतिनैपु- धानाम्पतयेनमोनमोचपलुशाय॥ १७ ॥ ॐनम इत्यस्य कुत्स ऋषिः। निच्यततिकृतिश्छन्दः । रुद्रो देवता। जपे विनियोगः ॥ १७ ॥ : भाष्यम्-(हिरण्यवाहवे ) हिरण्यमाभरणरूपं बाहोर्यस्य स हिरण्यवाहुः तस्मै (सेनान्ये ) सेनां नयतीति सेनानीः तस्मै (नमः) रुद्राय नमः (च) (विशांपतये) पालकाय रुद्राय ( नमः ) नमः (हरिकेशेभ्यः) हरितवर्णाः केशाः पर्णरूपाः. येषां ते हरिकेशास्तेभ्यः (वृक्षेभ्यः) वृक्षल्परुद्रेभ्यः (नमः) नमः ( पशूनाम् ) जीवानाम् ( पतये) पालकाय रुद्राय ( नमः ) नमः ( विषीमते) विषिदीतिरस्यास्ति तस्मै (शपिञ्जराय ) शष्पं वालतृण तेवत्पिञ्जराय पीतरक्तवर्णीय रुद्राय ( नमः) नमोऽस्तु (पथीनाम् ) मार्गाणां पालकाय रुद्राय ( नमः ) नमः ( हरिकेशाय ) नीलवर्णकेशाय जरारहिताय (उपवीतिने ) मंगलार्थयज्ञोपवीतधारिणे रुद्राय (नमः) नतिरस्तु (पुष्टानाम्) शुणपूर्णानां नराणाम् (पतये) पालकाय खामिने (नमः ) नमोऽस्तु ॥ १७ ॥ भाषार्थ-भुजाओंमें सुवर्ण धारण करनेवाले महायाहु सेनापालक रुद्र के निमित्त नमस्कार है, दिशाओंके अधिपति अर्थात् समस्त जगत्को अपनी भुजामोंके नीचे रक्षा करनेवाले सेनापत्ति- के निमित्त भी नमस्कार है, पर्णरूप हरे पालोवाले वृक्षरूप रुद्रोंके निमित्त वारंवार नमस्कार है, जीवोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, कान्तिमान वालणवत् पीतवर्णवाले सरके निमित्त नमस्कार है, मागाके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, मंगलके निमित्त उपवीत धारण करनेवाले नीलवर्णकेश वा जरारहित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, गुण- पूर्ण मनुष्यके स्वामी रुद्रके निमित्त नमस्कार है ॥ १७ ॥ तात्पर्य-तात्पर्य यह-सव मागामें शान्तरूप रुद्र हैं, अश्वत्यादि वृक्षोंपर जैसे आकाश गेल लादि निर्मूल लता होती हैं तद्वत् यज्ञोपवीत धारे है विना रुद्रके किसीकी स्थिति नहीं होसक्ती इससे रुद्र सबके स्वामी. पालक कहाते हैं ॥ १७ ॥ मन्त्रः। - . জ্বীনছিলালম্বী नमोबुवाहित्य जगतापतये नमोनमो रुद्रायांततायिनेक्षेत्राणाम्पत्तयेनमोनमः J

ऽध्यायः ५.]
भाष्यसहिता।
(६१)
सूतायाहन्त्येवनानाम्पतयेनमोनमोरोहि-
ताए ॥१॥
लय इत्यस्य कुत्त ऋषिः । निच्युदष्टिछन्दः । रुद्रो देवत्ता ।।
वि० पू० ॥ १८॥
भाप्यम्-(वभ्लुशाय) कपिलपर्णाय यदा-विभर्ति रुद्रामिति बम्लुर्वृषभस्तस्मिन्
शेते स वभ्लुशस्तस्मै रुद्राय ( नमः ) नमः ( व्याधिने ) विध्यति शत्रूनिति व्याधी
तस्मै लदाय नमः ( अन्नानाम् ) धान्यानाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमः ( भव-
स्य ) संसारस्य (हेत्यै ) आयुधाय संसारनिवर्तकाय रुद्राय ( नमः ) नतिरस्तु.
( जगतां पतये ) पालकाय रुद्राय ( नमः ) नमः ( आततायिने ) प्राततेन विस्तृतेन
धनुषा सह एति गच्छत्तीति आततायी उद्यतायुधस्तस्मै रुद्राय ( नमः ) नमः (क्षेत्रा-
णाम) देहानाम् ( पतये ) रक्षकाय पालकाय ( नमः) नमः (महन्त्रे) न हन्तीति
बहन्ति-तस्मै (सुताय ) सारथये तद्रूपाय ( नमः ) नमः ( वनानाम् ) अरण्यानाम्
(पतये) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु ॥ १८ ॥
भाषार्थ-कपिलवर्ण वा वृपभपर स्थित होनेवाले शत्रुओंको वेधनेवाले व्याधिरूप रुद्रको
नमस्कार है । अन्नोंके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, संसारके आयुध अर्थात् संसारनि-
वर्तक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, संसारके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है उद्यत आयु-
घवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, देहोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, नहीं.
मारनेवाले, पापसे रक्षक प्रधान सारथिरूपके निमित्त नमस्कार है, वनोंके पालकके निमित्त
नमस्कार है ॥ १८ ॥
विवरण-रोगियोंका रक्तह्रास होनेपर जो वर्ण होताहै उसको वभ्लुश कहते हैं ॥ १८ ॥
मन्त्रः॥
শ্রীহীহিলথয়া-
নীমুল্যাযিজংকুয়াশ্মীলাম্বলি-
मोनसों मुन्त्रिणेवाणिजायवाणाम्पतये
नमोनमऽउँचघोषायागुताले पत्तुरीणा
म्पतयेगमोनमःवरूनाय ॥१९॥

. (६३) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- ॐ लगा इत्यस्या कुत्स ऋषिः । विराजतिकृतिश्छन्दः । रूद्धो दुवेता । जपे विनियोगः ॥ १९ ॥ माध्यस्-( रोहिताय ) लोहितवर्णाय ( स्थपतये) स्थपतिहादिकर्ता विश्वकर्म- रूपेण तस्मै ( नमः) नतिरस्तु ( वृक्षाणाम् ) तरूणाम् ( पतये) पालकाय ( नमः) नमः (भुरन्तये) भूमण्डलविस्तारकारिणे (वारिवस्कृताय) स्थानभोग्यकराय (नमः) नमोऽस्तु ( ओषधीमाम् ) ग्राम्यारण्यानामोषधीनाम् (पतये) पालकाय (नमः ) नमोऽस्तु ( मंत्रिणे) सचिवलपिणे ( वाणिजाय) व्यापारकर्ने रुद्राय ( नमः .) नमोऽस्तु ( कक्षाणाम् ) वनोत्पन्ना शुल्मवीरुधादयः कक्षारतेपार ( पतये ) पालकाय (नमः) नमोऽस्तु ( उच्चैः घोपाय) युद्धे महाशब्दाय ( माकन्दयते) रिपुरोदकाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( पत्तीनाम् ) पसातीनाम् ( पतये) पालकाय नमः ) नमोऽस्तु ॥ १९ ॥ भाषार्थ-लोहितवर्ण गृहादिकता विश्वकर्मरूपके निमित्त नमस्कार है, वृक्षोंके पालकक निमित्त नमस्कार है, भूमंडलके विस्तार करनेवाले स्थान भोग्य करनेवालेके निमित्त लम- स्कार है, ग्राम्य और मारण्य औपधियोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, मालोचनमें कुशल ध्यापारकर्ताओंके रूपमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, वनके गुल्मीरुधादिके पालकके निमित्त नमरकार है, शत्रुओंको रुलानेवाले, युद्ध, वडा उग्र शब्द करनेवाले रुद्रके निमित्त लमस्कार है, एक रथ, एक हाथी, तीन घोडे, पांच पैदलमा नाम पत्ति है । इस प्रकार सेना- विशेषके पालक सद्रके निमित्त नमस्कार है ॥ १९ ॥ विशेष-स्थपति-शब्दसे गृहमादि निर्माण करनेवाले इनके मनमें सदा ही इष्टकाकी चिन्ता रहगीरहतीहै, इस कारण इनका अन्तरदेवता लोहितवर्ण कहा है, कारण कि इष्टका लाल होती हैं ॥ १९ ॥ सूत्रः। জাহাঙ্গালিব লালায়িঞ্জাঞ্জিলালী- জুবিলীলা'হচেলা- नाम्पतयेनमोनमोनिचुरोपारिचुराया- ग्यानाध्यताओनसोनभोजञ्चते ॥२०॥ ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः अतिधृतिश्छन्दः । रुद्रो देवता' वि० पू० ॥२०॥ "

'ध्यायः ४]
भाष्यसहिता।
(६३)
भाष्यम्-( कृत्स्नायतया) कृत्स्नं समग्रमायतं विस्तृतम् अर्थाद्धलुर्यस्य स कृत्स्ना -
यतस्तस्य भावः कृत्स्नायतता तया आकर्णपूर्णधनुष्टुन (धावते ) युद्धे शीघ्रं गच्छते
रुद्राय (नमः) नतिरस्तु । अथवा कृत्स्नः सर्व आयो लाभो यस्य सः कृत्स्नायस्तस्य
भावः कृत्स्नायता तया (धावते ) सर्वलाभप्रापकत्वेन धावते ( सत्वानाम) शरणाग -
तानां प्राणिनाम् (पतये) पालकाय ( नमः.) नमोऽस्तु (सहमानाय ) अभिभवनशी -
लाय (निव्याधिने ) नितरां विध्यति हन्ति शत्रूनिति निव्याधी तस्मै ( नमः ) नमः
(बाव्यापिनीनाम् ) मा समन्ताद्विध्यन्तीत्याव्याधिन्यः शूरसेनास्तास्वाम् ( पतये )
पालकाय ( नमः) नमः ( निषङ्गिणे ) खड्गयुक्ताय ( ककुभाय ) महते रुद्राय नमः
(स्तेनानाम् ) गुप्तचोराणाम् (पतये ) पालकाय ( नमः ) नमः (निचेरखे ) नितरां
चेहः निवेरूः तस्मै (परिचराय ) परितः चरतीति परिवरस्तस्त्रै ( नमः ) नमः
(भरण्यानाम् ) वनानाम् (पतपे) पालकाय ( नमः) नतिरस्तु ॥ २० ॥
भाषार्थ-जो हमारी रक्षाके निमित्त कर्गपर्यन्त धनुष बैंचकर धावमान होते हैं, उन रुद्रके
निमित्त नमस्कार है, अथवा सब लाभ प्राप्त करानेवाले के निमित्त नमस्कार है, शरणमें आये
हुए प्राणियोंके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, शत्रुओंका तिरस्कार करनेवाले, शत्रुओंको
अधिक मारनेवालेके निमित्त नमस्कार है, सब प्रकारसे प्रहार करनेवाली शूरसेनाओंके पाल-
कके निमित्त नमस्कार है, उपद्रवकारियोंपर खग चलानेवाले महान् रुद्रके निमित्त नमस्कार
गुप्तधनहारी जनोंके सब रूप होनेसे पालन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, अपहारकी
बुद्धिसे निरन्तर फिरनेवाले तया पणत्यानमें हरणकी इच्छासे फिरनेवालों ( गठकटों) के
अन्तर्यामीके निमित्त नमस्कार है, वनोंके पालन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥
विवरण-जगत्भरमें सर्वात्मा रुद्र हैं, इस कारणसे स्तेनादि भी रुद्ररूप लिखेह, रतेनादिके
शरीर में जीप ईश्वर इन दो रूपोंसे ईश्वर स्थित हैं, जीवरूप स्तेनादिशब्दवाच्य है, ईश्वर रुद्र-
ररूपसे लक्षित है-जैसे शाखाके अग्रसे चन्द्रमाको दिखाते हैं इस प्रकार लक्ष्यार्थकी .विवक्षासे
संत्रोंमें लौकिकशब्द लिखे हैं ॥ २० ॥
मन्त्रः।
नमोहचले परिवञ्चतेस्तायूनाम्पलथुलमो-
नमोनिपुतिऽइषुषिमते तस्कराणाम्पत-
युनमानमस्कायियो जिघांसद्भयो
मुष्ण्णुताम्पतयनमोलमो सिमड्योना-
ञ्चर योविकृन्तानाम्पतयनमः ॥ २१ ॥

(६४)
रुद्राष्टाध्यायी-
-
[पञ्चम:-
ॐ नमोवञ्चत इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्युदतिधृतिश्छंदः
रुन्जो देवता । वि० पू० ॥२१॥
भाष्यम्-(वञ्चते ) वञ्चति प्रतारयति तस्मै, का गमनशीलाय रुद्राय ( नमः ।
नमोऽस्तु ( परिवञ्चते ) सर्वतो गमनशीलाय वा सर्वव्यवहारे धनापहवः पारवञ्चनम् ।
शुप्तचौरा द्विविधाः-रात्रौ देश्मनि खातादिना द्रव्यहारः स्वीया एवाऽहर्निशं ज्ञातारो
हतारश्च पूर्व स्तेना उत्तरे स्तायवः तेषाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः ।). नमोऽस्तु
(निषङ्गिणे ) खङ्गिने ( इषुधिमते ) इपुधिस्तुणस्तत्सहिताय ( नमः) नमोऽस्तु
(तस्कराणाम् ) प्रकटचौराणाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु (सृकायिभ्यः)
सुकेण वज्रेण सह यन्ति गच्छन्तीत्येवंशीलाः सृकाविणः तेभ्यः ( जिघांसद्यः )
हन्तुमिच्छङ्ग्यः तेथ्यो रुद्रेभ्यः ( नमः) नमोस्तु (मुष्णताम् ) क्षेत्रादिषु धान्यान
अपहर्तारो मुष्णन्तस्तेषाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ( असिमद्भः
असियुक्तेभ्यः ( नक्तञ्चरद्यः) रात्री गच्छद्यः रुद्रेभ्यः ( नमः) नमोस्तु (विकृन्ता-
नां) विकर्तनशीलानास् ( पतये) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ॥ २१ ॥
भाषार्थ-ठगोंके अन्तर्यामीके निमित्त,स्वामीको अपना विश्वास दिलाकर व्यवहार में उनका
बंचन करनेवालों के साक्षीके निमित्त नमस्कार है, गुप्तचोरॉके पालकके निमित्त नमस्कार है,
खड्गधारी, वाणधारीके अर्थात्-उपद्रव करनेवालेके शान्त करनेवालोंके निमित्त नमस्कार है,
प्रकाश चोरोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, पत्र लेकर चलनेवाले हत्यावारीजनोंके अन्त-
र्यामी वा उनके रूप रुद्रोंके निमित्त नमस्कार है, क्षेत्रादिसे धनादिके हरण करनेवालोंके
पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, स्वङ्गधारी रात्रि में फिरनेवाले दस्यगणोंके हृदय
स्थितके निमिन्न नमस्कार है, छेदन करके पराया धन हरनेवाले दस्युगणके पालनकरनेवाले
निमित्त नमस्कार है ॥ २१ ॥
=>ওতায়াজিলিহিল্লোহ-
হইলগ্রী(Sদ্ভুলল্লাহিঙ্গালী
কালীলফঙ্গাব্দষ্মলকপূহঃবিশ্বালকঃ-
শ্রীশ্রী জযন্ত্ৰীষ্মন্ত্রী
नमोणमोहिणत्युः ॥२२॥

ऽध्यायः५.]
भाष्यसहिंता ।
(६५)
ॐ नम उष्णीषिण इत्यस्य कुत्स ऋषिः । नियष्टिश्छन्दः । रुन्त
देवता । वि० पू० ॥२२॥
भाष्यम्-( उष्णीषिणे) उष्णीषं शिरोवेष्टनमस्यास्तीत्युष्णीषी तस्मै ( गिरिच
राय) गिरौ चरति पर्वतसंचारिणे ( नमः) नमोऽस्तु ( कुलुञ्चानाम् ) कुं भूमि क्षेत्र-
गृहादिरूपां लुञ्चन्ति हरन्ति कुलुञ्चाः तेषाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु
( इघुमद्भ्यः) जनान् भीषयितुं वाणधारिणस्तेभ्यो रुद्रेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च).
बपि (धन्वायिभ्यः) हे रुद्राः धनुर्धारिभ्यः (वः) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्ता
(आतन्वानभ्यः) आतन्वन्त्यारोपयन्ति ज्यां धनुपीत्यातन्वानास्तद्रूपेभ्यः (नमः ।
नमोऽस्तु (च) अपि (प्रतिदधानभ्यः) प्रतिदधते सन्दधते बाणं धनुषीति सन्दधाना-
स्तेभ्यः (वो) युष्मभ्यम् (नमः ) नमोऽस्तु (आयच्छद्भयः) पायच्छन्त्याकर्षन्ति,
धनूंषि ते यायच्छन्तस्तेभ्यः ( नमः ) नमः (च) अपि ( अस्यद्यः) अस्यन्तिा
क्षिपन्ति वाणानित्यस्यन्तस्तेभ्यः (वः ) युष्मद्भ्यः ( नमः) नमोऽस्तु ॥ २२ ॥
भाषार्थ-उष्णीष (पगडी) धारण करनेवाले सभ्यगण ग्रामोंमें विचरनेवाले, शून्यमस्तक
गिरि वनमें फिरनेवाले दोनों प्रकार दलोंके हृदयमें स्थित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, छक
बल कौशलसे दूसरोंकी गृह भूमि मादि हरण करनेवालोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, मनु
घ्योंके डरानेको बाण धारण करनेवाले और धनुष साथ लेकर चलानेवाले वा बुलुञ्चगों के
दमनार्थ वाणधारी आप रुद्रके निमित्त नमस्कार है, कुलुचौके दमनार्थ धनुषपर ज्या आरोपमा
करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और धनुषपर बाण चढानेवाले आपके निमित्त नमस्कार
मुलंचोंके दमनके निमित्त धनुषको आकर्षण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, और पाणी
निक्षेप करनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २२ ॥
मंत्रः।
नौविसृजदयो विद्यार्थड्यश्चवोनमो नमः
स्वपढ्योजामंचच बोलमो नमुख्शयनि-
ভঙ্গালিদাঙ্খলী লীগল্পী।
घायश्ववोनमोनम सुमा॥२३॥
ॐ नमो विसृजद्भय इत्यस्य कुत्स ऋषिः। लिच्यदत्तिजगती छन्दुः ।।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २३ ॥

रुद्राष्टाध्यायी-
[ पश्चमो-
राष्यम्- (विसृजद्भ्यः) विमुञ्चन्ति बाणानारशिति विसृजन्तः तेभ्यः (नमः)
(च) अपि (विध्यद्भयः) शत्रून् वाडयद्यः (व.) युष्मभ्यम् (नमः) नमोऽस्तु,
स्वपझ्यः) स्वप्नावस्थामनुभवद्भ्यः (जाग्रयश्च) जाग्रदवस्थावन्तस्वेभ्यो (4)
सुजलाम् नमोऽस्तु (शयानेभ्यः ) सुषुप्त्यवस्थावद्भयः (च बासीनेम्यः) भासते ते
शालीनाः लेभ्यश्च (वो नमः) नमोऽस्तु (तिष्टयः ) स्थिति कुझ्यः (नमः)
नमोऽस्तु (धावड्यः ) धावन्ति ते धावन्तो वेगवद्गतयस्तेभ्यः (यो नमः ) नमोऽस्तु,
शुरलदैतप्रतिपादनाय स्तुतिः ॥२३ ॥
भाषार्थ-पापियों के दमनार्थ वाण त्यागनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और शत्रुओंके लक्ष्य
लेचनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है, और जाग्रत् अवस्थाके अनुभवी मापके निमित्त नम-
एकार है, सुषुप्ति अवस्थाबालोंके अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, बठेहुओंके
अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार. है, वेगवान्गतिवालों अन्तरमें स्थित मापके
अनमित्त नमस्कार है ॥ १३ ॥
मसानुसाम्पत्य
समातिनावश्ववोललो
জস্বীগুঘকালাম-
साध्यापिनी योनिविदर्यवतीलप्रश्वबी
লীলাজাৰাণমন্ত্রী
कमोनलागुणेन २४॥
ॐ नमः समास्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । शकरी छन्दः। ततो दे-
कृता । वि० पू० ॥ २४॥
माण्यम्-(समाभ्यः) समारूपेभ्यः रुद्रेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च सभापतिभ्यः)
समायाः पतिभ्यः (बो नमः ) नमोऽस्तु समादिषु रुद्रदृष्टिः कर्तव्योत तात्पर्यम् ।
मशेभ्यः) अश्वास्तुरगास्तेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (अश्वपरिभ्यः) अशानां पति-
च्या (वो नमः) नमोऽस्तु (आव्याधिनीभ्यः) आविष्यन्तीत्याव्याधिन्यः सेनास्ता-
स्क( नमः ) नमः (ब) अपि (विविध्यन्तीभ्यः) विशेषेण विध्यन्तीति विविध्य-
त्यः ताभ्यः (वो नमः) नमोऽस्तु (उगणाय ) उत्कृष्टा जणाः मृत्यसमूहाः यासांता
जमणा बायादयः सातरस्ताभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च) अपि (ठहतीच्या)
हन्तुं समर्थाः दुर्गादयस्ताभ्यः (वी नमः) नमोऽस्तु ॥ २४ ॥

त्याय: ५.]
आष्यसहिता।
( ६७
मापार्थ-अप वातसंज्ञक रुद्र जो रुद्रलोकमें निवास करतेहैं, मतप्रतिपादनके निमित्त
उनका वर्णन करतेहैं-समारूप रुद्रके निमित्त नमस्कार है, सभानादिमें रुद्रदृष्टि करनी चाहि-
ये। और समापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है, प्रत्येक अन्योंके अन्तरमें स्थित आपके
निमित्त नमस्कार है, और अश्वोंके अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, देवसेनामों में स्थित
आपके निमित्त नमस्कार है, और विशेषकर वेधनेवाली देवसेनाओंमें स्थित आपके निमित्त
नमस्कार है, उत्कृष्ट भृत्यसमूहवाली ब्राह्मीआदि माता धा सेनामें स्थित रुद्रके निमित्त
नमस्कार है, और युद्ध में प्रहार करनेवाले दुर्गादिमें स्थित मापळे निमित्त नपस्कार हैं।॥२४॥
লক্ষ্মীকালজবিহীলক্ষ্মীলী
ফ্রাগ্রা জালবিলীলা-
দুর্থী সেলিং জ্বালম্বীশ্রীন্ত্রি-
कैपेबन्योखिमहरूपियश्योगोषमुस्से-
नाम ॥ ३५ ॥
*लो ऋणय इत्यल्या कुत्रू चषिः । शुश्क्छिकरी छन्दः । रुनो
देवता। वि० पू० ॥ २० ॥
भाष्यम्-(पणेना) गणः समृहः तत्स्वरूपेभ्यः (:) नमः, (गणपतिभ्यश्च )
शणपालज्ञास्तेभ्यश्च (वो नमः ) नमस्कार, (व्रातभ्यः ) नानाजातीयानां संघास्तेभ्यः
( नमः) नसः (ब) (व्रातपतिभ्यः )बालपालकास्तेभ्यः () ( नमः.) नमः
(गृत्ले यः) गृत्सा मेधाविनस्तेभ्यः ( नमः ) नमः (च) मृत्तपतयस्तत्वालका-
र तेस्यः (ः) युष्माकम् (नमः) नमः ( विरूपस्यः ) नग्नमुण्डजटिलादयस्तभ्यः
( नमः ) नमः (विश्वल्पेभ्यः ) नानाविध रूपं येषांते विश्वरूपास्तुरबदनहयग्रीवा
यस्तेभ्यः (वः)(नमः ) नमः ॥२५॥
माषःर्थ-देवानुचर भूतविशेषोंके निमित्त नमस्कार है, गणोंके अधिपति आपके निमित्त
नमस्कार है, विशेष गण अयवा अलेकजातियों के समूहके निमित्त नमस्कार है, वातगों के
अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, बुद्धिमानोंके अयवा विषयलंपटके निमित्त नमस्कार
और बुद्धिमानों के रक्षक आपके निमित्त नमस्कार है, नग्न-मुण्ड-जीटलादि-विकृतरूपके
निमित्त वा विविधरूपवालोंके निमित्त नमस्कार है, सर्वरूप नानाविधरूप वा तुरंगवदन
हयग्रीवादिरूप भापके निमित्त नमस्कार है ॥ २५ ॥

(६८)
रुद्राष्टाध्यायो-
[ पञ्चमो-
मन्त्रः।
नमुहलेनायल्सेनानियश्चबोनमोनमों
रथियोऽअरुथेक्यश्चवोनमो नमः क्षुत्त-
क्य-लहीतमयश्ववोनमोनमोमुहद्भयोs
अब्मकन्फ्यश्चवोनमः ॥ २६ ॥
ॐ नमः सेनाभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगतिजगती छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२६॥
भाष्यम्-(सेनाभ्यः चमूस्वरूपेभ्यः ( नमः) नमः (च)(सेनानिभ्यः) सना-
नयन्तीति सेनान्यः तेभ्यः (व.) ( नमः) नमः ( थिभ्यः ) रया येषां ते रथिनस्ते-
भ्यः ( नमः) नमः (च) ( सरथेभ्यः) स्थवर्जिता योद्धारस्तेभ्यः (वो नमः) नमः ।
{क्षतृभ्यः ) रथानामधिष्ठातारस्तेभ्यः ( नमः ) (च) ( संग्रहीतृभ्यः) संग्रहीतारः सा-
स्थयस्तेभ्यः (वो नमः) नमः ( महङ्ग्यः ) जातिविद्यादिभिरुत्कृष्टास्तेभ्यः (च)
(अमकेभ्यः) प्रमाणादिभिरल्पास्तभ्यः ( वो नमः) नमः ॥ २६ ॥
भाषार्थ-सेनारूपके निमित्त नमस्कार है, सेनापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है, प्रशं-
सित रथवालोंके निमित्त नमस्कार है, रथहीन आपके निमित्त नमस्कार है, रथके आध-
ठातृके अन्तरमें स्थितके गिमित्त नमस्कार है, और साथियों के अन्तरमें स्थित वा रणसाम-
ग्रीग्रहणकर्ता आपके निमित्त नमस्कार है, जाति, विद्या. और ऐश्वर्यमें उत्कृष्ट पूज्यरूपके
निमित्त नमस्कार है, प्रमाणादि अल्परूप आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २६ ॥
मन्त्रः।
नमुस्ताक्योरथकारेयश्चयोन मान्य
कुलालश्यका रेग्मयश्ववोनमोगम
জ্বাজি
प्टेियश्चयानमो नम
शुवनिनोमृगयफ्यश्चवोनमोनम-
जय ॥२७॥

ध्यायः ५.] भाष्यसहिता। ॐ नमस्तसभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्च्छकरी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २७ ॥ भाष्यम्-(तक्षभ्यः) तक्षाणः शिल्पजातयस्तेभ्यः ( नमः ) नमः (च) ( स्थ- मतारेभ्यः) रथं कुर्वन्तीति स्थकारास्तेभ्यः (वः) ( नमः) नमः (कुलालेभ्यः ) कुम्भकारेभ्यः ( नमः ) नमः (च) कारेभ्यः लोहकारेभ्यः ( वो नमः ) नमोऽस्तु (निपादेभ्यः ) मिल्लेभ्यः ( नमः ) नमः (च) (पुञ्जिष्ठेस्यः ) पुक्कसादिभ्यः ( नमः) नमोऽस्तु (श्वनिभ्यः) शुनो नयन्तीति वन्यस्तेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च) (मृगयुभ्यः) मृगान् कामयन्त इति लुब्धकास्तेभ्यः (वो नमः) नमोऽस्तु ॥ २७ ॥ भाषार्थ-काष्ठकी शिल्पविद्याके जाननेवालोंमें व्याप्तके निमित्त नमस्कार, और विमान रथ निर्माणकारी उत्कृष्ट तक्षाके अन्तरमें स्थित आपको नमस्कार है, प्रशंसित मृत्तिकाके पात्र बनानेवालोंमें स्थित के निमित्त नमस्कार, और लोहेके शस्त्र वनालेवालोंमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, गिरिचारी भीलआदिमें स्थित रुद्र के निमित्त नमस्कार, और पक्षिधातक. पुल्कस भादि वा संकीर्णजातियोंके अन्तरमें स्थित व्याप्त आपके निमित्त नमस्कार है, कुत्तोंके गलेमें रस्सी बाँधकर धारण करनेवालोंके अन्तरको नाननेवाले निमित्त नमस्कार है, मृगोंकी कामनाशले व्याघाझे अन्तर स्थित मापको नमस्कार है ॥ २७ ॥ मन्त्रः দ্বিত্বঃলী- हार्यवहार्य शुषिशपशुपतयेचु- मोनीलग्रीवायच शतिकण्ठाय नमः कपुर्दिन ॥२८॥ ॐ नमः स्वभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । आपी जगती छन्दः । रुद्धो देवता। वि० पू० ॥२८॥ भाष्यम्-(श्वस्यः ) कुकुररूपेभ्यः ( नलः ) नमोऽस्तु (ब ) ( श्वपतिस्य) श्वपालकेभ्यः (वः) युष्मभ्यम् ( नमः) नमोऽस्तु इत उत्तरं रुद्रनामानि (च) (मवाय ) भवन्ति उत्पद्यन्ते जन्तोऽस्मादिति भवस्तस्यै ( नमः ) नमोस्तु ( च्य रूदाय )रु दुःखं द्रावयति रुदस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (शर्वाय) पापहा- रिणे (नमः) नमोऽस्तु (च) (पशुपतये) जीवानां पालकाय वा अज्ञान् पाति रक्षतीति पशुपतिस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( नीलग्रीवाय ) नीला श्यामा ग्रीवा यस्य स (७०) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- तस्मै (शितिकण्ठाय ) शितः श्वेतः कण्ठो नीलातिरिक्तभागो यस्य शितिकण्ठस्तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥२८॥ भाषार्थ-बुक्करोंके अन्तर में स्थितके निमित्त नमस्कार है, कुकुरोके अधिपति किरातीके अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, ( यह पूजावाचक वः-शब्द है, उभयतो नम- स्कारवाले मंत्र पूर्ण हुए। अव नमस्कारोपक्रम मंत्र लिखते हैं) और जिनले सब जगद उत्पन्न होता है उनके निमित्त नमस्कार है, दुल दूर करनेवाले देवके निमित्त नमस्कार है और पापके नाश करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, प्राणियोंके अधिपतिके निमित्त नमस्कार है। जीलवर्णग्रीषावाले अथवा नीलवर्ण भाकाशमैं उदित सूर्यमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, नील- कण्ठबाले वा मेघसहित आकाश में उदित हुए सूर्यके अन्तरमें स्थितके निमित लम- स्कार है ॥ २८॥ - मन्त्रः। नम कपर्दिनेबुड्युप्लकेशायधुलभ साहला- স্থাইংখলা | লজিস্থিতৃত্ব शिपिविष्टायचुनगोपीदुष्टमायुन्चेञ्जुमलेबुलू- मोहल्वाय॥२९॥ ॐ नमः कपर्दिने इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगतिजगती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ २९ ॥ माष्यम्-( कपर्दिने ) जटाजूटधारिणे ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (व्युतलेशाय) झुण्डितलेशाय (नमः ) नमोऽस्तु (च) (सहस्राक्षाय) बहुलेनाय (ब) (शतध. न्वने) बहुधन्वने (नमः) नमोऽस्तु (च) (गिरिशयाय ) गिरौ शेते गिरिशयस्वस (च) (शिपिविष्टाय ) विष्णुरूपाय यदा-शिपिसु पशुषु विष्टः प्रविष्टः पशवो वै शिपिः' इति श्रुतेः (च) (मीढुष्टमाय ) सेत्तृतमाय यूने परिणामहीनाय (च) (इपुमते) शरयुक्ताय ( नमः) नमोऽस्तु ॥ २९ ॥ माषार्थ-जटाजूटधारक्षे निमित्त भी नमस्कार है, मुण्डितकेशके निमित्त नमस्कार है और खहस्त्रलोचन इन्द्ररूपके निमित्त नमस्कार है, बहुत धनुष धारण करनेवाले के निमित्त नम- स्कार और सवप्राणियोंके अन्तर व्यापक विष्णुरूपके निमित्त नमस्कार है, ("विष्णुः शिपि- विष्टः” इति श्रुतेः । अथवा पहातो वै शिपिः इति श्रुतेः ) वगणोंमें व्याप्तके निमित नम- स्कार है, ( अथवा यज्ञो वै शिपिः ) यज्ञमें अधिष्ठातृदेवतारूपले प्रविष्ट अथवा शिपिः

ऽध्यायः५.]
भाष्यसहिता।
सादित्यमंडलमें स्थित ("शिपयोऽत्र रश्मय उच्यन्ते तैराविष्टो भवति" इति ) के निमित्त
नमस्कार है । और तृप्तिका मेषरूपसे तृप्तिकती वा चार पदार्थोकी वर्षा करनेवाले के निमिच्छ.
भार वाणघारीके निमित्त नमस्कार है ॥ २९ ॥
नमोहवायंचवाशुनायंचनमोबृहत चार्जीया
हेचुलमोवृछायचसुवचनमोठयायचय-
शुमार्यचनमऽआशवे ॥३०॥
ॐ नमो ह्रस्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । विराडार्षी त्रिष्टुप् छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३० ॥
LEnd
माध्यस्-हस्वाय) घुममाणक: हवः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च)
(वामनाय ) संकुचितावयवाय (च) (बृहते ) बृहन् प्रौढाङ्गस्तस्मै (च) ( वर्षी-
यसे) वर्षीयानतिशयेन वृद्धस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (R) (वृद्धाय ) वृद्धो वयरसा..
धिकस्तस्मै (व) ( सवृधे) वर्धन्ते विद्याविनयादिगुणैस्ते वृधः पण्डिताः कि वैः सह
वर्तत इति सवृत् तस्मै (नमः ) नमोऽस्तु (च) (अध्याय) जगतामने भवः पश्य.
स्तस्मै (च)(प्रथमाय ) मुख्याय (नमः) नमोऽस्तु ॥ ३० ॥
भाषार्थ-कल्पशशिरके निमित्तभी नमस्कार है। और संकुचित अवयवमें व्याप्तके निमित्व'
नमस्कार है, प्रौढाङ्गके निमित्त नमस्कार है, अतिवृद्धिके निमित्त नमस्कार है, अवस्था
आधिकके निमित्र नमस्कार है, विद्या विनय आदि गुणयुक्त पंडितोंके साथ वर्तनेवाले युवाके
निमित्त नमस्कार है। और मुख्य सब जगत्में प्रादुर्भाव होनेवालेके निमित्त नमस्कार है
सबमें प्रथम मुख्य निमित्त नमस्कार है ॥ ३० ॥
विशेष-आशय यह कि, जब सृष्टि नहीं थी तब भाप थे, आप सबसे प्रथम और मटर,
कहे जाते हैं लापको नमस्कार है ॥ ३० ॥
नमऽआशवेचाजिरायंचनामुल्शीयायचशी-
क्यांयचननुऽऊम्म्यायचावल्यायचुन-
मौनात्यायचप्यिायच ॥३१॥

७२) रुद्राष्टाध्यायी-- [ पञ्चमो- ॐ नम आशन इत्यस्य कुत्स ऋषिः स्वराडार्षी पश्छिन्दः । नद्रो देवता। वि० पू० ॥ ३१ ॥ भाष्यम्-( आशवे) जगव्यापिने (च) ( अजिराय ) गतिशीलाय ( नमः) नमोऽस्तु (च) (शीघ्याय) वेगवस्तुनि सवः शीघ्यः तस्मै (च) (शीभ्याय) शीयते कत्यते इति शीभ आत्मश्लाघी पचायच तत्र भव हात छान्दसो यत्प्रत्ययः । शीभो जलप्रवाहो वा शीभाक्षियो वा तत्र भवाय (नमः) नमोऽस्तु (च) (जाय) कल्लोलेषु भाः ऊर्यः तस्मै ( च ) ( अवस्वन्याय ) अर्वाशनं गच्छन् उदकस्य स्वनो शनिः आवयनः जत्र भवाय ( नमः ) नमः ( च ) (नादेयाय ) नद्यां भवो नादेय- स्म (च) (द्वप्यिाय) द्वीपे भयो द्वीप्यस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३१ ॥ भाषार्थ-जगत्-व्यापकके निमित्तभी नमस्कार है, गतिशीलके निमित्त, सर्वत्र व्याप्तके निमित्त नमस्कार है, और वेगवाली वस्तुआमें विद्यमान और जलप्रवाहमें विद्यमान आत्म- लाघी का आत्मारूपके निमित्त नमस्कार है, जलतरंगमें होनेवाले और स्थिरजलोंमें विद्य- मानके निमित्त नमस्कार है, नदीमें होनेवाले के निमित्त और द्वीप मर्यात् टापूमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३१ ॥ गूढार्थ-प्राणोंके पुष्ट करनेवाले अन्तःकरणचतुष्टयके पुष्ट करनेवाले शीघ्रगमनादि सुखकी प्राप्तिकी लहरे, शब्दादिका सुनना, शब्द करना, इत्यादि शक्तियोंके दाता आपको नमस्कार है, द्वीप द्वीपान्तरोंकी शक्ति देनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ मन्त्रः। निष्ठायंचन पर्छजार्य वापरणाचलमोमध्यमार्य चापगुल्माय- बुनो जान्यायाचवुयायमुस्लो क्याय ।। ३२॥ ॐ नमो ज्येष्ठायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडा त्रिष्टपू छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥ ३२ ॥ म.प्यम्-( ज्येष्ठाय ) अत्यन्तं प्रशस्यो ज्येष्ठस्तस्मै ( च ) (कनिष्ठाय ) प्पत्यन्त युवाऽल्पो वा कनिष्ठस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (पूर्वजाय ) पूर्व जग. दादी हिरण्यगर्भरूपणोत्पन्नः पूर्वजस्तस्मै (च)(अपरजाय) अपरस्मिन्काले प्रलये कालाग्निरूपेण जातः अपरजस्तस्मै (नमः ) नमः (च) (मध्यमाय ) मध्ये भवो ऽध्यायः ५.] माष्यसहिता। (७३) माध्यमस्तस्मै देवतिर्यगादिरूपिणे ( अपगल्भाय ) अव्युत्पन्नेन्द्रियरूपाय, वा एक- पान्तरितोऽपगल्भस्तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (जघन्याय ) जघनं गादीनां पश्चाद्भागस्तत्र भवो जघन्यस्तस्मै (च) ( बुध्न्याय ) बुघ्ने वृक्षादिमूले भनो कुन्दस्तस्मै (नमः) नमोऽस्तु ॥ ३२ ॥ भाषार्य-अतिप्रशस्य ज्येष्ठरूपके निमित्त और अतियुवा वा कनिष्ठरूपके निमित्त नम- स्कार है, ( अर्थात् सृष्टिके आरम्भमें जो प्रथम उत्पन्न हुमा तिसके अन्तरमें भी विद्यमान और उसके पीछे जो कछ होरहाहै उस सबके हृदय में भी विद्यमान होनेसे ज्येष्ठकनिष्ठरूप है ) और जगत्की आदिमें हिरण्यगर्भरूपसे उत्पन्न और प्रल्यकाल में कालाग्निरूपसे होने- वाले के निमित्त नमस्कार है । और सृष्टिसंहारके अनन्तर देवतिर्यगादिरूपसे होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, (अर्थात् प्रथम गीधानमें वालकके रक्षकरूपसे उस बालकके आत्मा- एका आत्मा होकर गर्भ में वास करके उस बालकके साथ ही उत्पन्न होताहै. तिसके उपान्तर गर्भाधानमें भी और गर्भमें भी इसी प्रकार इसको प्रथम द्वितीय तथा संपूर्ण ही सन्तान कहा नाताहै ) और अप्रगल्भ अव्युत्पन्न इंद्रिय प्रकाशरहित अण्डरूपके लिमित्त नमस्कार और पवादिके पश्चाद्भागमें होनेवाले स्वेदन काम कीट आदिमें वर्तमानके निमित्त नमस्कार है, तथा वृक्षादिके मूलमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३२ ॥ विशेष-यह मवयव विधायक नमस्कार है ।। ३२ ॥ मन्त्रः। नमुल्सोक्यायचष्प्रतिसुध्यायच नमोया- अन्यायचम्म्यायचुनमुद श्लोक्यायचा- बसायायचुगमऽउ व्यायचु खल्ल्यायच नमोवन्याय ॥३३॥ ॐ नमः सोन्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । आपी त्रिष्टुप्छन्दः । कुन्नो देवता । वि० पू० ॥ ३३ ॥ भाष्यम्-( सोभ्याय ) सोमं गन्धर्वनगर तत्र भवस्तस्मै यदा-सोभ्यः उमाभ्यां पुण्यपापाभ्यां सहितः मनुष्यलोकस्तत्र भवः सोभ्यस्तस्मै (च) (प्रतिसर्याय) प्रति- सरो विवाहोचितं हस्वसूत्रमभिचारो वा तत्र भवस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( यास्याय) पापिनां नरकार्तिदाता तस्मै (च) (क्षेस्याय) क्षेमे कुशले भवः क्षेम्यस्तस्मै ६ नमः) नमोऽस्तु (च) (श्लोक्याय ) श्लोका वैदिकमंत्रा यशो वा तत्रभवः श्लोक्य- स्वस्मै (च) (अवसान्याय ) अवसानं समाप्तिर्वेदान्तो वा तत्र भवः तस्मै ( नमः ) .

[पञ्चमो- (७४) रुद्राष्टाध्यायी- नमोऽस्तु (च)(उपर्याय) उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूमिस्तत्र धान्यरूपेण भवस्तर (च) (खल्याय) खले धान्यविवचनद्देशस्तत्र भवस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु॥३३१ भाषार्थ-गन्धर्वनगरमें होनेवाले अथवा पुण्यपापखाहत वर्तमान मनुष्यलोकमै होनेवाले ("पुण्येन पुण्यलोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यां मनुष्यलोकम्” इति) अथवा पृथिवीलोक, उत्पन्न होने के समय जन्यरे मालकके अन्तर देवतापके लिमित्त भी नमस्कार है, और वियाहादिकार्य में हायमें बंधे मंगलसूत्र में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । और पादि- याँको दुःख देलेको यममें वर्तमान और कुशलमें होनेवाले वा परलोक गये हुए प्राणाके. कल्याणमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, और इस संसार में यशप्रचारके कारणमूक्त वा वैदिक मंत्ररूपी यशमें होनेवालेको और बेदान्तमें स्थित वा जिसके प्रसादसे प्राणी जन्न- मृत्युसे छुटकारा पातहि उसके निमित्त नमस्कार है, उपजाऊ भूमिमें उत्पन्न हुए धान्या- दिके अन्तरमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है और धान्यविवेचन देशमें होनेवाले निमित्त नमस्कार है ॥ ३३ ॥ नमोहन्यामकक्ष्यायचन अवार्यच प्रति श्रुवायचुनम आशुषेणाय चाशर- यायचनमहशूरायचाव दिन बुनामोजि- लिमने ॥३४॥ ७ ॐ नमो बन्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराजापी बिष्ट छन्दः । रुन्नो दे० । वि० पू० ॥ ३४ ॥ माध्यम-(बन्याय ) बने वृक्षादिरूपेण भवो वन्यस्तरमै (च) ( नमः) नमोऽस्तु (च) (कक्ष्याप ) कक्षं तृणं बल्ली वा तत्र भवः कक्ष्यस्लम ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वाय ) शब्दरूपाय (च) प्रतिशवाय ) प्रतिशब्दरूपाय (नमः) नमोऽस्तु (च) (आशुषेणाय) माशु शीघ्रा सेना यस्य सः तस्मै (च) ( बाशुरथाय) शीयो रथो यस्य सः माशुरथस्ती (नमः ) नमः (च) ( शूगय) युद्धधराय (च) (अबमेदिने) अपभेदी पर्वाचीन भत्तुं शीलमस्येति व्यवमेही तस्मै नमः) नमोऽस्तु ॥ ३४ ॥ भाषार्थ-वनमें वृक्षादिरूपसे होनेवाले के निमत्त वा घरमें विद्यमानको भी नमस्कार है। और तृणवल्ली में होनेवालेके निमिस नमस्कार है, शब्दरूप वा ध्वनिमें वर्तमानके निमित्त नमस्कार है, और प्रतिध्वनि में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, शीघ्र चल्नेवाली सेनाकी

ऽध्यायः५. ]
माष्यसहिता।
(७५)
श्रेणीमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, भौर शीघ्र चलनेवाले रथोकी श्रेणीमें विद्यमानके
निमित्त नमस्कार है, युद्धविशारदोंके हृदयमें विद्यमानके निमित्त, और शभुका हृदय वेध-
नबोल शस्त्रमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ३४ ॥
मन्त्रः।
नमोबुलिम्मचकचिनेचुनौतुमिणे
चवरूथिने चुनमः श्रतायंच श्रुतसेनायचन
मौदुन्दुक्यायचाहनुन्यायचनमोधष्ण-
वें ॥ ३५॥
ॐ नमो बिलिमन्द इत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वरावाणी । त्रिष्टुप
छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३९ ॥
भाष्यम्-(विल्पिने) विल्ममस्यास्तीति विल्मी, बिल्मं शिरस्त्राणमस्यास्तीति
विल्मी तस्मै ( ब ) ( कविने ) पटस्यूतं कासगी देहरक्षक कवचं तदस्यास्तीति
तस्मै (न) नमोऽस्तु (च) ( वर्मिणे ) लोहमयं शरीररक्षक वर्म तदस्यास्तीति
तस्मै (च) ( वरूथिने ) वरूयः रथगुतिर्वा सोऽस्यास्तीति वरूथी तस्मै (नमः)
नमोऽस्तु (च) (श्रुताय ) प्रसिद्धाय (च) (श्चतसेनाय ) श्रुता प्रसिद्धा लेना
यस्य स श्रुतसेनः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (दुन्दुभ्याय ) दुन्दुभौ भवः
दुन्दुभ्यस्तस्मै (च) (माहनन्याय) आहनने भरः आइनन्यः तसो (नमः)
नमोऽस्तु ॥ ३५॥
भाषार्थ-शिरस्त्राण धारण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, वा बेलपत्र धारणसे प्रसन्न .
होनेवालेके निमित्त नमस्कार है । और देहावरण स्यूत अंगरखा काच धारण करनेवालेके
निमित्त नमस्कार है, बख्तर धारण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, स्थका गोपनस्थान वा
हाथीके ऊपरकी अम्बारीमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । और प्रसिद्धके निमित्त नम-
स्कार है, प्रसिद्धसेनावालके निमित्त भी नमस्कार है । और रणके बोजेमें विद्यमानके.
निमित्त और वाद्यसाधनदण्डआदिमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३५ ॥
भावार्थ-यह संसार बिल्वके तुल्य है, इसमें जलके तुल्य आपकी शीतल वेवाणी है,
आप कवचके समान मायाले ऐसे ढके जिस प्रकार शरीर बरसे आच्छादित होता है,
सद्गुण सस्यविज्ञान धनादिलेलारूप हैं, जिससे पापादि शत्रु भागते हैं. आपका यश वेदा--
दिमें बहुत प्रकारले सुना है, इसीसे वेदको श्रुति कहते हैं वही दोषरूपी शत्रुके निवारण
करनेकी सेना है, उसके शब्द दुन्दुभी हैं, जिस सेनासे पापादिशत्रुओंका हनन होताहै
ऐसे आपके निमित्त नमस्कार है ॥ ३५ ॥

रुद्राष्टाध्यायी पञ्चमो नमाधुष्णवेचप्रमुशायंचनमोनिषङ्गिणेचे अधिमतेचणमस्तुधिषवेचायाधचनम+ स्वायुधायवशुधन्वनेच ।। ३६ ॥ ॐ नमो धृष्णव इत्यस्य कुत्स ऋषिः । सुरिणापी पतिश्छन्दः । लाहो देवता वि० पू०॥ ३६॥ भाष्यम्-(च) (धृष्णवे ) धृष्णुः प्रगल्भः तस्मैः (नमः ) नगेऽस्तु ( च ) ( प्रशाय) पंडिताय नमः ( च )( निषङ्गिणे ) वङ्गयुताय ( च ) (इघुधिरते) तृणयुताय (नमः) नमोऽस्तु (च) ( तीक्ष्णेपरे ) तीक्ष्णा असह्या इपको बाणा यस्य सः तीक्ष्णेपुस्तस्मै (च) (आयुधिने ) आयुधधारिण ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (खायुधाय ) शोभनायुधाय (च) (सुधन्वने ) शोभनधनुषे ( नमः) लोऽस्तु ॥ ३६॥ भाषार्थ-प्रगल्भरूप अपने पक्षकी रक्षा करनेवाले के निमित्त नमस्कार है; विचारशील पंडितरूप वा विपक्षदटन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है । और खड्गधारीके निमित्त नम कार है, तरकसयुक्तके निमित्त नमस्कार है। तीक्ष्णपाणधारीके निमित्त और मुद्रादि लायुध धारण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, शोभन आयुध, त्रिशूल, लोह, शिलादि धारण फरनेवालेके निमित्त नमस्कार है । और पिनाक श्रेष्ठधनुषधारीके निमित्त नमस्कार है ॥३६॥ मन्त्रः। " RG महत्यांयचुपस्थ्यायचनमुकाट्याय चुनीप्यायचुनसुत्कुल्ल्यांयचरस्यायच गोमानियाचवेशन्वायचनमा कन्या- म॥ ३७॥ ॐ नमः खुत्यायेत्यल्य अत्स ऋषिः । लिवृक्षार्षी त्रिष्टुप् छन्दः . ! रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३७॥ माष्यस्-(च) (खुत्त्याय ) सुतिः नद्याः क्षुद्रप्रवाहस्तत्र भवः सुत्यस्तस्मै (च) (पथ्याय) पथि भवः पथ्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) ( काट्याय) काटे

g
ऽध्याय: ५.]
भाष्यसहिता।
(७७)
भवः काटयः कुत्सितम अटति काटः विषममार्गः तत्र भवः काट्यः तस्मै (च),
(नीप्याय) नीचैर्गच्छन्त्पापो यत्र स नीपः निम्नभूमिः तत्र भवः तस्मै ( नमः ) नमोऽ-
स्तु (च) (कुल्याय) कुल्या अल्पा कृत्रिमा सरित् कुलेषु देहेषु वाऽन्तर्यामिरूपेण
भवः कुल्यः तस्मै (च) (सरस्याय ) सरस भवः सरस्यः तस्मै (नमः ) नमः (च)
(नादेयाय ) नयां भवो नादेयः तस्मै नदीजलरूपाय (च) (वैशन्ताय ) वेशन्तोऽ-
ल्पसरः तत्र भवः वैशन्तः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३७ ॥
भाषार्थ-क्षुद्रमार्ग ग्रामकी बाटमें स्थितके निमित्त और राजमार्गमें होनेवालेके निमित्त
नमस्कार है, दुर्गम मार्गमें स्थितके निमित्त और पर्वतके नीचे मागमें स्थितके निमित्त नम-
स्कार है, नहरके मार्गमें स्थितके निमित्त वा देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थितके और सरोवरोम
होनेवालेके निमित्त नमस्कार है, नदीमें जलरूपसे स्थितके निमित्त और अल्पसरोवर गोष्प-
दादिके जल में स्थितके निमित्त नमस्कार है ॥ ३७ ॥
गर्मित आशय-वेदही सबके निमित्त मुगम मार्ग है, इसमें चलनेले दुःखादि नहीं सताते
कारण कि इसमें कंटक नहीं हैं। और छोटे बडे सरोवररूप जो आश्रमोंका वर्णन है उनके
द्वारा आप प्राप्त होते हो ॥ ३७ ॥
मन्त्रः।
नमस्कप्यायचाबुट्यायचुनमोबीयांय
चातुप्यायचुगमोमेघ्यायचविद्युत्यायषु
नमो व्यायचावायचनमो बाया-
य॥ ३८॥
ॐ नमः कूप्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगार्थी पंक्तिश्छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३८॥
माष्यम्-(च) (कूप्याय) कूपे भवः कूप्यः तस्मै (च) (अवट्याय ) भवटे
गते भवः अवटयः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वीधयाय ) विशेषेण इनं निर्मल
शरदभ्रं तत्र भवो वाध्यः । यद्वा-विगतं इथ्रो दीप्तिर्यस्मात्स वीध्री धनागमः तत्र भवाय
(च)(मातप्याय) आतपे भवः आतप्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (मेघाय)
मेघे भवः मेग्घ्यः तस्मै (च) (विद्युताय ) विद्युति भवः विद्युत्यः तस्मै (. नमः
नमोऽस्तु (च) (वाय ) वर्षे भवो वर्ण्य तस्मै (च) (अवाय) अवर्षे भवो
अवय॑स्तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३८ ॥

(७८) रुद्राष्टाध्यायी- पञ्चमो- भाषार्थ-कूपमें होनेवाले के निमित्त और गर्त में होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और महा- प्रकाश मा घोर अंधकारमें स्थितके निमित्त और धूप वा प्रकाशमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है मेष में होनेवालेके निमित्त और बिजली में होनेवाले के निमित्त नमस्कार है। और वर्षांकी पारामें स्थितके निमित्त, तथा दृष्टिक प्रतिबंध होनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥ ३८ ॥ एन्त्रः। नमोवात्यायचुरेहान्यायाचनमोहा गन्तुध्या- यवहारसुपायानुनमुल्योमायचारुवायचन- मस्तानायचाणायचुनम शुङ्गवे ॥३९॥ ॐ नमो वात्यायेत्थरल्या कुत्स ऋषिः। स्वराजापी पंक्तिश्छन्दः । सन्नो देवता । वि० पू० ॥ ३९॥ भाष्यम्-(च) और (वात्याय ) वाते भवः वात्यः तस्मै (च) (रम्याय ) रियन्ले नश्यन्ति भूतान्यत्रेति रेष्मा प्रलयकालः तत्र वा रेष्म्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽ. स्तु (च) (वास्तव्याय ) वास्तु गृहे तत्र सः वास्तव्यः तस्मै (च) (वास्तुपाय) वास्तु गृहं पाति वास्तुपः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च)(सोसाय) उमासहितः सोम- स्तही () (रुवाय) दुःखनाशकाय ( नमः) नमोऽस्तु (च) (ताम्राय ) उद- याविरूपेण तस्मै (च) (अरुणाय ) अरुणरूपाय ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३९ ॥ भावार्थ-वायुप्रवाहमें होनेशलेके निमित्त नमस्कार है, पौर प्रलयकी पवनमें होनेशलेके निमित्त नमस्कार है । वास्तुगृहमें होनेवाले के निमित्त और वास्तुगृहके पालनेवालेके निमित्त नमस्कार है । चन्द्रमामें स्थितके निमित्त वा उमालहितके निमित्त, और दुःखनाशक रुद्ररूप या अग्निरूपके निमित्त नमस्कार है । सायंकालके सूर्यमें स्थित्तके निमित्त प्रभातकालीन सूर्य में स्थितके निमित्त नमस्कार है वा उदयकालीन ताम्र भौर उदयकालके उपरान्त कुछ रक्तरूपसूर्यमें स्थितके निमित्त नमस्कार है ।। ३९ ॥ आशय-वायु आदिके प्रमाणु मोको एकत्र कर पंचीकरणकी रीतिसे इस संसारकी संपूर्ण वस्तुओंके रचनेवाले और सबके रक्षक सोम यव आदिके उत्पादक पापादि दोष निवारणको भयानकरूप अग्निसे तप्त धातुके समान शुद्ध रजोगुणले संसार उत्पादक निमित्त नम- नर्म-शुङ्गवेचपशुपतयेचन उग्यायची-

त्यायः ५.]
भाज्यसहिंता।
८७९)
मार्यचनमोषचार्यचदरेवधार्य चनमोह-
স্থলীঘলীমুলা ক্রিীশ্রী
नमस्ताराय॥
॥
ॐ नमः हांगड इत्यून्य परमेष्ठी प्रजापतिका अषयः । भुरिगति-
शकरी छन्दः । सो देवता । वि० पू० ॥४०॥
याव्यम्-(शङ्गने ) शं सुखं गमयतीति शंगुः सुखरूपा गावो वाचो वेदरूपा
यस्येति या तस्मै (च) (पशुपतये ) प्राणिनां पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु ( च
( उपाय) शत्रून् हन्तुमुद्गूर्णायुधाय (च) (भीमाय ) भीमः शत्रुभयोत्पादकः तस्मै
( नमः) नमोऽस्तु (च) (अग्रे वधाय ) अग्रे स्थितो हन्तीति अग्रेधः तस्मै (च)
(दूरे वधाय) दूरे स्थितो हन्तीति दूरेखधः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (हन्त्रे)
हननक्षत्र लोके यो हन्ति तदूपण रूद एव हन्तीत्यर्थः । (च)(हनीय से) अतिशयह-
जनक ( नमः) नमोऽस्तु (च ( हरिकेशेभ्यः ) हरिता वर्णा केशा इस येषां तेभ्यः
(वृक्षेभ्यः) कल्पतरुरूपेभ्यः ( नमः) (च) (ताराय) तारयति संसारमिति तार:
वस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ।। ४० ।।
सापार्थ-कल्याणरूए देववाणीवाल्लेके निमित्त नमस्कार है, और प्राणियों के पालकके निमित्त
नमस्कार है, शत्रुओं के मारनेको कठिन आयुध उठाये कठिन अन्तःकरणवाले के निमित्त और
शङ्मयउत्पादक भयानकदर्शन के निमित्त नमस्कार है, सन्मुखके शत्रुका वध करनेवाले के
निमित्त और दूरके शत्रुका वध करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, मारनेवाले के रूपमें स्थित
स्थावर पदार्थके लयकारीके निमित्त लमस्कार और अतिशयहन्ता सदाको मृत्युका अभाव
करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, हरेपत्तेलप केशवाले कल्पतरुरूपके निमित्त नमस्कार है,
संसारक्षे तारनेशले ॐ शाररूपके निमित्त नमस्कार है ॥ ४० ॥
नाम शम्भवायंचयोमवायचनमः शङ्खरा-
बचमयस्स्करायचुनम शिवायंचशिवत-
रायच॥४१॥

(८०) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- ॐ नमः शम्भवायेत्यस्य परमेष्टीऋषिः।रुद्रो देवता । वि०पू०४१३ भाष्यम्-(शम्भवाय ) शं भवत्यस्मादिति शम्मवः । यद्वा-शं सुखरूपश्चासो भवः संसाररूपश्च मुक्तिरूपो भवरूपश्च यानन्दविज्ञानघनरूपश्च तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च) (मयोभवाय) सुखरूपाय (च)(शङ्कगय) शं करोतीति शङ्करः लौकिकसुखकराया ( नमः ) नमोऽस्तु (ब) मयस्कराय मयः मोक्षसुखं करोतीति मयस्करस्तस्मै (च) (शिवाय ) कल्याणरूपाय ( नमः ) नमः (च)(शिवतराय ) निर्विकाराय निरति- शयसर्वबीजाय भक्तानपि निष्पापान करोतीत्यर्थः । तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४१ ॥ भाषार्थ-इस लोकके कल्याणकारी जिनसे इख होताहै अथवा सुखरूप, संसाररूप और मुक्तिरूपके निमित्त नमस्कार है, संसारसुखदाता पारलौकिक कल्याणके आकारके निमित्त नमस्कार है, लौकिकसुख करनेवालेके निमित्त नमस्कार है और मोक्षसुख करनेवाले निमित्त नमस्कार है, कल्याणरूप निष्पापके निमित्त नमस्कार है और भक्तोंके अत्यन्त कल्या- णकारक तथा निष्पाप करनेवालेके मिमित्त नमस्कार है । ॥ ४१ ॥ विशेष-स्रक्चंदनादिरूपसे लौकिकमुख शास्त्रज्ञानसे मोक्षमुख देनेवाले हैं ।। ४१ ॥ मन्त्रः। সুহৃদ্যাজাগুয়ালাল- यचोत्तरणायचुनसल्तीस्थ्यीयचकल्ल्यांचा चुनमुहशष्ट्यांयचुफेन्यायचुन सिकुत्त्या- य॥४३॥ ॐ नमः पार्यायेत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिदेवा ऋषयः । लिच्चदार्थी त्रिष्टुप् छन्द । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥ भाष्यम् (च) (पार्याय ) पारे भवः पार्यः संसाराब्धेः परतीरे जीवन्मुक्त रूपेण वा मवः पार्थः तस्मै ( च ) (आवाव्य ) अवार्वतीर संसारमध्ये संसारित्नेन्न भव आवार्यः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु ( च ) ( प्रतरणाय ) प्रकर्षण मंत्रजपादिन पापतरणहेतुर्वा प्रतरति येन प्रतरणं नौकादि लघुद्रव्यं तत्र भवः त रैमैं (च ) (उचर- णाय) उत्कृष्टेन तत्त्वज्ञानेन संसारतरणहेतुरुत्तरणं वा उत्तरति बनेनेत्युत्तरणं तीनः तत्र भवः तस्मै (नमः) नमः (च)(तीर्थ्याय ) तीर्थे प्रयोगादौ भवः तीर्थ्यः तस्मै ऽध्याय: ५. ] भाष्यसहिता। (८१) (ब)(कूल्याय) कूले तटे भवः कूल्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च)(शमा य) शष्पे शस्तृगे भवः शष्प्यः तस्मै (च) (फेन्याय ) फेने भवः फेन्यः तरी (नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४२ ॥ माषार्थ-समुद्रके भी विद्यमान मथवा संसारसागरके परंपारमें जीवन्मुक्तरूपसे वर्तमानके निमित्त और सागरके इस पारमें भी विद्यमान वा संसारमध्यवर्तीके निमित्त नमस्कार है। जहाजमें विद्यमान वा मतिमंत्र जपादिसे पापके तारनेके कारणके निमित्त और डॉगेमें भी विद्यमान धा उत्कृष्ट तत्त्वज्ञानसे संसारसागरके पार करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, सागर- मादिके गर्भ में पा तीर्थ प्रयाग पुष्करआदिमें विद्यमानके निमित्त और जलप्रणाल वा किना- रॉमें प्रगट होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, गंगादिके तटमें उत्पन्न कुशमंकुरादिमें विद्यमानके.. निमित्त और सागरादिके फेनमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ४२ ॥ मन्त्रः। न सिकुल्यायचप्णवाहायचुनसभा- शिलायंचायणाचनकपुदिन वपु- लुस्तयेचनमऽऽरण्याय च प्रपत्थ्यायच नलोब्याज्याय॥४३॥ ॐ नमः सिझत्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवादय ऋषयः । ज- गती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥४३॥ भाष्यम्-(च) (सिकत्याय) सिकता भवः सिकत्यः तस्मै (च) (प्रवाह्याया) प्रवाहे स्रोतसि भवः प्रवाह्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (किशिलाय) कुत्सिता शुद्राः शिलाः शर्करारूपाः पाषाणा यत्र प्रदेशे सं किंशिलः तद्रूपाय (च) ( क्षय- णाय) क्षियन्त्यस्मिन्नाप इति क्षयणस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( कपर्दिन । जटाजूटयुक्ताय (च)( पुलस्तये ) पुरोऽग्रे तिष्ठति पुलस्तिः । चहा-पूर्षु शरीर अस्ति सत्ता यस्य स पुलस्तिः सर्वान्तर्यामी तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( इरि ण्याय) इरिणे भवः इरिण्यः तस्मै (च) (प्रपथ्याय) प्रकृष्टः पन्थाः प्रपन्थो बहु सेवितो मार्गस्तत्र भवः प्रपथ्यः तस्मै (नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४३ ॥ भाषार्थ-नदीआदिकी रेती में विद्यमान और नदी आदिके प्रवाहमें होनेवालेके निमित्त नाम- स्कार है, नदीआदिके भीतर वृक्षकंकरादिमें विद्यमान वा क्षुद्र पाषाणकी शर्करायुक्त स्थानमें स्थितके निमित्त और स्थिरजलमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, जटाजूटयुक्त वाघूमतोल ६ ८२) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- जल में विद्यमान और पुरजलमें विद्यमान अथवा शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान निमित्त और तृणरहित ऊषरभूमिमें विद्यमान और वासेषित मार्गवालोंमें घि "लासत नमस्कार है ॥ ४३ ॥ नामोज्यायचगोष्टयायच नस्तल्प्प्या- यचुगेहांयचनमोहव्याय च निष्प्या- सचन्हकायायचगहरेष्ठाय च नमःशु- महायाय॥४४॥ ॐ नमो ज्यायेत्पत्य परमेष्टी प्रजापतित्रपि। आप निष्ठप छन्दः।। सुद्धो देवता वि० पू० ॥४४॥ भाष्यम्-(च) (व्रज्याय ) बजे गोसमूहे मवः व्रज्यः तस्मै ( च ) ( गोष्ठयाय) पावस्तिष्ठन्ति यत्रति गोष्ठः तत्रभवो गोष्टयस्तस्मै नमः) नमोऽस्तु (च ) (तल्प्या- १) तल्पं शय्या तत्र भवस्तल्प्यः तस्मै (च) (मेह्याय) गेहे भयो गेह्यः तस्मै (नमः) रामोऽस्तु (च) (हृदय्याय.) हृदये भयो हृदय्यो जीवस्तस्मै (च)(निष्प्याय) निवेप्यं आवर्ती नीहारजलं वा तत्र भयो निष्प्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (छ) ( जाटयाय ) काटे सवा काट्यः काटः कूपः कुत्सितमटन्ति गच्छन्ति जना यत्र स बाटो दुर्गारण्यदेशस्तत्र भवः तस्मै (च) (गहरेष्ठाय ) गहरे विषमे मिरिगुहादी धारमारे जले वा तिष्ठतीति गह्वरेष्ठः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥४४ ॥ मापार्थ-गोचारणस्थानमें विद्यमान और गोठ में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । शय्या विचमानके निमित्त और धरमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है हृदयमें जीवरूपसे स्थित्तके निमित्त और हिमसमूहमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है, दुर्गम. मार्ग में विराजमानके निमित्त मौर गिरिगुहा वा गंभीरजर में विराजमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ४४ ॥ मन्त्रः। नमुल्शुयायचरित्यायन पासु- यायचरजुल्यायचनमोलोपायचोल-

ध्यान ५.
भाष्यसहिता।
प्प्यायचुनसंऽध्यायसूयायचुनम पु-
जाय ॥४५॥
ॐ नमः शुष्क्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋ० । निच्यु-
क्षी निष्ठम् छन्दः । रुझो देवता । वि० पू० ॥ ४६ ।।
माप्यम्-(ब)(शुष्क्याय ) शुओं काष्ठादौ मदः शुष्ज्यस्तस्मै (ब) (हरित्याय)
लाने काष्टादो मकः हरित्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) ( पांसव्याय ) पांसुटु
धूलिपु सः पांसव्यः तस्मै (च) ( रजस्याय ) रजति गुणे पराग वा भवः रजस्यः
तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (लोप्याय) लोपे भवः लोप्यः तस्मै (च)(उल-
प्याय ) उलपा बल्बजादितृणविशेषास्तत्र भवः उलप्यः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च)
(उयाय ) ऊव्यौ भूमौ भवः अधः तस्मै (च) ( सूर्याय ) शोभनः अर्व्यः
कल्पानलः तत्र भवः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ४५ ॥
भाषार्थ-सूखे काष्टादिमें विराजमानके निमित्त और हरे पत्ते आदिमें विराजमानके निमित्त
नमस्कार है, धरिमें विराजमानके निमित्त और रजोगुण वा पुष्पधुरिमें विराजमानके निमित्त
नमस्कार है, सगन्धदेशमें विराजमानके निमित्त और बल्बजादि तृणमें विराजमानके
निमित्त नमस्कार है, भूमि वा वडवानल में विराजमानके निमित्त और महाप्रलयकी अग्निमें
विराजमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ४५ ॥
-
नर्मपण्णायचपर्णशक्षार्थयुनमऽजबद्गुर-
साणायचामिन्नतेचमाखिते-
কিন্তু কুনজাল-অল্প অলক্ষ্মেী
सोनमोक्षामिरिकन्यों हुँचानाम्हरये-
योनमोधिचिन्नुत्केब्क्यो नमोशिक्षिण-
केन्योनमऽआनिहतेयः॥ ४६॥
ॐ नमः पर्णायेत्यस्य परमेष्ठी ऋ० । स्वराः प्रकृतिश्छन्दः। रून
देवता । वि० पू० ॥१६॥

(८४) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- भाष्यम्-(च)(पर्णाय) पत्ररूपाय (च) (पर्णशदाय) पतितपर्णावस्थानको ( नमः) नमोऽस्तु (च)(उद्गुरमाणाय) उद्यमशीलाय (च) (अभिन्नते ) याभि- हन्ति शनित्यभिन्नन् तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च) (आखिदते) आसमंतात् लि. यते दैन्यं करोत्यभक्तानामित्याविदन् तस्मै (च) (प्रखिदते ) प्रकर्षण खेदयति पापिनामिति प्रखिदन तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (इषुकृद्भ्यः) ये इषवो बाणान कुर्वन्ति तेभ्यः (च)(धनुष्कृझ्यः ) ये यूयं धनुष्कृतस्तेभ्यः (क) (नमः) नमोऽस्तु वो युष्मदादेशात्प्रत्यक्षा एते रुद्राः तिस्रोऽशीतयो रुद्राः समाप्ताः । एवं चत्वा- रिंशदधिकशतद्वयमन्त्रै रुद्रस्य सर्वात्मत्वमुक्तम् । इदानी रुद्राणां हृदयभूतानामग्निवायु- सूर्याणां सम्बन्धीनि यजूंषि उच्यन्ते (व.) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु केभ्यः ( किरिकेभ्यः) कुर्वन्तीदं जगदृष्टयादिद्वारेणेति किरिकाः वाय्वग्निसूर्याः किंभूतेभ्यः (देवानां हृदयेभ्यः) देवानामनिकायुसूर्याणां हृदयभूता इत्यर्थः ।(नमः) नमोऽस्तु (वि- चिन्वत्केभ्यः) विचिन्वन्ति पृथकुर्वन्ति धर्मकारिणं पापकारिणं चेति विचिन्वत्का: तेभ्यः ( नमः) नमोऽस्तु (विक्षिणत्केभ्यः) विविध क्षिण्वन्ति हिंसन्ति पापमितिशिक्ष- ग्णत्कास्तेभ्योऽध्यादिभ्यो नमः ( जानिईतेश्यः) का समन्तानिर्णताः सौदी लोकेल्या इत्यानिहतास्तेभ्यो नमः । हन्तिर्गत्यर्थः। ("तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रीण ज्योतीठष्यजायन्ता- निर्योऽयं पवते सूर्यः") इतिश्रुतेः ॥ ४६॥ माषार्थ-पर्णमें विद्यमानके निमित्त और पर्णपतित पर्णस्थित देशरूप वा पर्णमें उत्पन्न की- दादिमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है. निरन्तर -द्यमी उत्पन्न करनेवालेके निमित्त और शत्रुओंके संहारकके निमित्त नमस्कार है, अभक्तोंको सदा दुःखदाता त्रिविधतापके प्रेरको निमित्त और त्रिविध तापके उत्पन्न कर्ता वा पापियोंको अतिदुःखदायीके निमित्त नम- स्कार है, बाणको उत्पन्न करनेवाले के निमित्त और धनुषके करनेवाले रुद्ररूप आपके निमित्त नमस्कार है (युष्मदादेशसे यह प्रत्यक्ष रुद्र है, यहां २४० पूर्ण हुए ) ( यहांतक रुद्रकी प्रधानता कहकर अब प्रधानभूत अग्नेि वायु सूर्यादिरूपले वर्णन करते हैं) प्रथम यजु १४ का और तीन सात अक्षरके व्याहृतिसंज्ञक हैं, जो देवताओंके हृदयस्वरूप प्रधान अग्नि सूर्यके हृद- यरूप वृष्टयादि द्वारा जगत्को सृजन करते हैं, ऐसे सापळे निमित्त नमस्कार है, जो देवता देवतामोंके हृदयस्वरूप हैं, जो वृष्टि आदिसे जगत्का पालन करते, जो धर्मात्मा और पापा- स्माओंको पृथक् करते हैं उन अग्नि, वायु और सूर्यके हृदयरूपके निमित्त नमस्कार है। विविधपापोको दूर करनेवाले अग्नि आदिले निमित्त नमस्कार है, अर्थात् जो देवताओंका हृद- यस्वरूप विक्षिणक वृष्टि आदिसे जगत्का संहार करते हैं आग्ने वायु :सूर्यके हृदय स्वरूप उनके निमित्त बारबार नमस्कार है सृष्टिको आदिमें होनेवाले रुद्रावतारोंके निमित्त नमस्कार है अर्थात् जो देवताओंका हृदयस्वरूप आनिहत "काल प्राप्त होनेसे स्वयं भी गुप्त होजाताहे" a जो सृष्टिकी आदिमें होते हैं इससे आनिहत कहते हैं जो अग्नि, वायु और सूर्यका मी हृदयस्वरूप है, उसको बारबार नमस्कार है ।। ४६ ॥

ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता। হ্রাঙ্গণ জুবিলীভাঙ্কি জুায়াজালালুথাযথুন্দাজ্জাইফাখীভূ- सोचनक्किचनार्मलत् ।। ४७॥ ॐ बाप इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिज्ञपिः । भुरिगापी बृहती छन्दः । सन्नो देवता । वि० पू० ॥४७॥ माष्यम्-(दापे) ना कुस्सायां यती च दापयतीति द्रापि पापकारिणां कुत्सितर्ता गति नपतीत्यर्थः ( अन्धसस्पते ) सोमस्य पालक (दरिद्र) हे निष्परिग्रह ( नीललो- हित) कण्ठे नीलोऽन्यत्र लोहितः शिव (नः ) अस्माकम् ( मासार प्रजानाम् ) पुत्रादीनाम् (एषाम् ) (पशूनाम् ) अस्मदीयानां गवादीनाम् ( मालेः ) मा भैषी मयं मा कुरु (मा रोक) भङ्गंमा कार्षीः (१) (किञ्चन ) अपत्यादि ( मा ) । आममत् ) मा भीः मा रुग्णं कुरु ॥ ४७ ॥ भाषार्थ-हे पापियोंकी दुर्गति करनेवाले ! हे सोमके पालक ! अद्वितीय होनेसे सहायशून्य निष्परिग्रह हे नील और लोहित एक मंश नील दूसरा लाल शुक्ल कृष्ण उभयात्मक वा कंठमें नील जन्यत्र लोहित शिव ! हमारे इन पुत्र पौत्रादि और इन पशुओंको मत भय को तथा प्रजा पशुओंका भंग मत करो और किसी प्रकार भी हम लथा हमारी . मजा पशुको मत रुग्ण करो सब प्रकार प्रजापंशुमें मंगल करो ॥ १७ ॥ इमाहायंतुबनेकपाहिनेपही राय হা হা महेनती बधाशमतिपदेचतुष्पविर्थ- জ্বাঈ'sঞ্জঙ্কিা ৪৫} ॐ हमारूदायेल्यस्य कुत्स ऋषिः । आपी जगती छेदः । रुड़ो देवता । वि० पू० ॥१८॥ भाष्यम्-( यथा) येन प्रकारेण (द्विपदे) पुत्रादये ( चतुष्पदे ) मशादिपशाने (शम् ) सुखम्म् भवतु तथा (अस्मिन् ) (ग्राबे ) वासस्थाने (विश्वम् ) सवैःप्राणि. गतम् (पुष्टम् ) समृद्धम् ( अनातुरम् ) निरुपद्रवम् ( असत्) भवत् तेन प्रकारेण्ड

[पञ्चमो-
(८६)
रुद्राष्टाध्यायी-
वयम् ( इमाः) अस्मदीया (मतीः) बुद्धिीः ( तवसे) महते ( कपर्दिने ) जटिलाय
(क्षयद्वीराय ) क्षयन्तो निक्सन्तो वीराः शूरा यत्र स क्षयद्वीरस्वस्मै क्षयन्तो नश्यन्तो
बीरा रिपको यस्मादिति वा (रुद्राय ) रुदेवाय ( प्रभरामहे ) समर्पयामः ॥ ४८ ॥
भाषार्थ-जिस प्रकार पुत्रादिमें गवादिपशुओंमें सुखकी प्राप्ति हो तथा इस ग्राममें संपूर्ण
प्राणिसमूह पुष्ट उपद्रवरहित हो उसी प्रकार हम इन अपनी बुद्धियोंका महाबली जटिळशूरवी-
होके निवासमत रुद्रदेवताको निमित्त समर्पण करते हैं॥४८॥
मन्त्रः।
यातेरुद्राशिवातुन शिवाविश्वाहामेषुजी ॥
शिवातरुतस्य भेषजीतांनोस्डजीकलै४९।।
ॐ गाते रुद्र इत्यस्य परमोडी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः । आर्यनुष्टुप
छंदः । रुनो देवत्ता। वि०पू० ॥ ४९ ॥
भाष्यम्-(द) शंकर (या)(ते) तव (शिवा) शान्ता ( विश्वासा)
सर्वदा (शिवा) कल्याणकारिणी ( भेषजी) औषधरूपा संसारख्याधिनिवर्तको तथा
( रुतस्य ) व्याधे (शिवा) समीजीना (मेषजी) निवर्तकौषधिः (तनूः ) शरीर
मस्ति (तया ) ( तन्वा) शरीरेण शक्त्या वा (नः) अस्मान् (जीवसे ) जीवितुम,
(मृङ) सुखय ॥ ४९ ॥
भाषार्थ-हे शंकर ! जो आपकी शान्त निरंतर कल्याणकारिणी बीवधिरूप संसारकी
च्याधिनिवृत्त करनेवाली लथा शरीरव्याधिकी समीचीन औषधी रूप शरीर वा शक्ति है उस
शक्तिले हमारे जीवनको सुखी करो ॥ ४९ ॥
मावार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारी कल्याणरूपिणी जो तनू सबके कल्याणखाधनी जो सब रो-
गोंकी महौषधि है उस सनुके द्वारा हमको झुली करो ॥ ४२ ॥
-
परिनोशुटल्यहोलिई कुपरिवेषस्य इमाई-
तिरधागो । अवस्थिरामुघवंद्रयस्तगुण्य-
मीदस्तोकायुतनयायमूड ॥ ५० ॥
ॐ परिन इत्यस्य पटोष्टी प्रजापतिर्देवा ऋ० । आर्णी त्रिष्टुप् छेदः ।
कुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ५० ॥

ऽध्याय: ५.]
भाष्यसहिता।
(८७
माष्यम्-(रुदस्य) शिवस्य (हातः ) मायुधम् नः) अस्मान् (परिवृणक्तु
परिवर्तयतु ( त्वेषस्य) क्रुद्धस्य (अघायोः) पापशीलस्य (दुर्मतिः ) दुष्टा मतिःह-
श्चास्मान् (परि ) परिवृणक्तु ( मीट्स) सेक्तः ( मघवद्भ्यः ) म हविलक्षणं धर्म
विद्यते येषां ते यजमानास्तदर्थः यजमानानां भयनिवृत्तये (स्थिरा) स्थिराणि दृढान्ति-
धनूंषि ( अवतनुष्न ) अवतारय ज्यारहितानि कुरु किञ्च (तोकाय) पुत्राय ( तन-
याय) पौत्राय ( मृड) सुखय ॥ ५० ॥
भाषार्थ-रुद्रके संपूर्ण आयुध हमको परित्याग करें । पापियोंपर क्रोधित अर्थात् कोपनव--
माव दण्ड देनकी इच्छावाली दुर्मति हमको सब प्रकार स्याग करें। हे आभलषितफलप्रद ।
हविरूप धनसे युक्त यजमानोंके भय दूर करनेको दृढ धनुषाको ज्याहीन करो, हमारे घुमन,
पौत्रादिको सुख दो ॥ ५० ॥
मन्त्रः।
मीढुष्टमुशिवतमाशबोन+सुमनाभव ।।पुर-
मवक्षऽमायुधान्निधायुकृत्तिवसान आर्चर
पिनाकुम्बि दाहि ॥५१॥
ॐ मीढुष्टम इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवा ऋ० । निच्यवार्षी, यव--
मध्या त्रिष्टुम् । रुद्रो देवता। वि० पू० ॥९१ ॥
-
भाष्यम्--( मीढुष्टम ) सेक्ततम (शिस्तम ) हे अत्यन्तं कल्याणकर्तः ( न: ).
अस्माकम् (शिवः ) शान्तः (सुमनाः ) हृष्टचित्तः (भव ) भवतु ( परमे ) दूरस्थे ।
उन्नते वा (वृक्षे ) वटादौ ( आयुधम् ) त्रिशूलादिकं ( निधाय ) संस्थाप्य (' कृति-
वसानः ) चर्म परिदधानः सन् ( आचर) यागच्छ तपश्चरेति वा ( पिनाकसू में
धनुः (विभ्रत् ) ( आगहि) आगच्छ ज्याशरहीनं धनुर्मात्र,शोमार्थ धारयन्नागच्छे-
त्यर्थः ॥५१॥
भाषार्थ-हे अतिशय फलप्रदाता ! हे अत्यन्त कल्याणकर्ता ! हमको ज्ञान्त सुन्दरमनवा
हो दूरास्थित वा उंच वृक्षपर अपना त्रिशूल रखकर मृगचर्म धारण किये आगमन कीजिये का
तप कीजिये, पिनाक धनुषको धारण किये आगमन करो अर्थात् ज्या और बाणोंसे होन
धनुष शोभाके निमित्त धारण किये आइये ॥ ११ ॥
भावार्थ-भाव यह कि, संसाररूपी वृक्षपर पापोंके संहारकी शक्तिको फैलाकर कार्यकारिणी
शक्तिसे वश कर हमारी रक्षा करो, इस मंत्रका तात्पर्य बडा गूढ है, इसमें संसारियों के
निमित्त शस्त्र है, मुमुक्षुओंके निमित्त मभय है इत्यादि तपस्वी महात्माओंके जान्नन्
योग्य है ॥ ५१ ॥

(८८) रुद्राष्टाध्यायी- [पश्चमा- विकिरिवहिलोहितनमस्तेऽअस्तुभगवः ।। भारत मुहलतयोन्यायुरूम्मन्निवपन्तु ता॥५२॥ ॐ विकिरिनेत्यस्य परमेष्ठी प्र० ऋ०। आगेजुष्टुप् ०। रुद्रो देवता ! पवि० पू० ॥ १२ ॥ भाष्यम्-(विकिनिद्र) विविध घातागुपद्रवं द्राक्यतीति विकिरिद्रः तत्सम्बुद्धी है विसिरिद (विलोहित ) विगतकलुपभाव (भगवः) हे भगवन् (ते) (नमः) नमः ( अस्तु.) बस्तु (सा)(ते) (सहसठहतयः) असंख्यान्यायुधानि सन्ति (ताः) जानि ( अस्मत् ) ( अन्यम् ) अस्मन्यतिरिक्तम् (निवपन्तु ) नन्तु ॥ ५२ ॥ भाषर्थ-डे अनेक उपद्रव नाश करनेवाले ! हे शुद्धस्वरूप भगवन् ! आपके निमित्त नम्- स्कार हो तुम्हारे जो सहस्रों शस्त्र हैं वे हमको छोडकर और कहीं उपद्रवियोंपर पटें (विलो- हितका अर्थ अत्यन्त रक्तवर्ग संहारमूर्ति भी है ) ॥ १२ ॥ सुहाणिसहशोबास्तबहुतयः ॥ ता- सामीशानोभगवरूपगुचीनामुखांवधि५॥ ॐ सहस्त्राणीत्यस्य परमेष्टी प्रजा० ऋ० । निदाप्यनुष्टुप् छन्दः। झदो देवता । वि० पू० ॥१३॥ भाष्यम्-(भगवः ) हे पड्रगुणैश्चर्यसम्पन्न ( तव) (वाहोः ) हस्तयोः ( सह- खाणि ) असंख्यातानि ( सहस्रशः) सहस्रशः (हेतयः) आयुधानि सन्ति (ईशानः ) जगन्नाथरत्वम् ( तासासू ) हेतीनाम् (सुखाः) मुखानि (पराचीनाः ) अस्मत्तः परा- मुखानि (कृषि) कुरु ॥ ५३ ॥ भाषार्थ-हे भगवन् ! षडैश्वर्यसंपन्न ! भापकी भुजाओंमें बहुत प्रकारके सहस्रों खड्गशूलादि आयुध हैं जगत्के पात'आप उन संहारकारी आयुधोंके मुख हमसे पराङ्मुख कीजिये ५३ ।। मावार्थ -दृश्यादृश्य जितने बाहुयुगल हैं वह सवही उन्के हैं वा सबहीमें उनकी सत्ता लाशय यह कि पापोंके द्वारा प्राणी दुःख पातेहैं माप उन पापको नीचे मुख कीजिये मौर हलको सुखी कीजिये ॥ ५३ ॥ है।

'ध्याय: ५.] मायलहिता। . (८९) জল্লাল্কা গুন্ডাগ্রি ঔ শুES জাগুযু- হচ্ছি। বিদ্যালন্থ অঞ্জলি तहमति ॥ ५४॥ ॐ असंख्याता इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिषिः । विशडाl- टुप छन्दः । सानो देवता । वि० पू० ॥ ९ ॥ भाष्यस्-(असंख्याताबहस्त्राणि ) असंख्यातानि सहस्राणि अमितानि ( ये ) रहद्राः ( मूल्यास ) भूमेः (आधि ) उपरि स्थिताः ( तेषाम् ) रुद्राणाम् ( धन्दानि ) धपि ( सहस्रयोजने) सहस्राणि योजनानि यस्मिंस्तादृशे पथि सहस्त्रयोजनव्यव- हिते मार्ग ( अवतन्मसि) अवतन्मः अवतारयामः ॥ ५४ ॥ भाषार्थ-जो असंख्य सहस्त्रों रुद्र मिके ऊपर स्थित हैं, उनके धनुष सहस्र योजन दूर यह मंत्र पढकर प्रार्थनाके पलसे डालकर अभय होतेहैं, इस मंत्रसे रुद्रका असंख्यत्व वा असंख्य वस्तुमें एकरुद्रका व्यापकत्व सिद्ध हुआ ॥ १४ ॥ अस्मिन्महत्यर्णवेत रिक्षेमुवाऽअधि। तेषांसहः॥ ५५॥ লিলি অস্থী জাহানঃজিঃ। হিস্ট্রিীog- छन्दुः । सन्नो दे० ॥ वि० पू० ॥ १६ ॥ भाष्यम्-अन्तरिक्षस्था रुद्रा उच्यन्ते ( अस्मिन् ) बस्मिन् ( महति ) विशाले (अर्णवे ) अणांसि जलानि विद्यन्ते यत्र तदर्णवम् । मेघाधारत्वात् (अन्तरिक्ष ) अन्तोरक्ष ( अधि) अधिश्रित्य ये (भवाः) रुद्राः सन्ति तेषां धन्वान्यवतन्मसीति 'पूर्ववत् ॥ ५५ ॥ भाषार्थ-संतरिक्ष के रुद्रोंका वर्णन करते हैं इस अंतरिक्षमें और वडे सागर अर्थात् आकाश गगानामस. प्रसिद्ध नक्षत्रपुंज धाराप्रवाहमें आश्रय करके जो रुद्र स्थित है उनके संपूर्ण धनुष मंत्र वलसे सहस्रयोजन दूर ज्यारहित करडालते हैं ॥ ५५ ॥ गूढाशय-इस पडे संसाररूपी समुद्रमें उस्पन्न हुए जीवोंके हृदय अन्तरमें जो ज्ञानयुक्त परमश स्थित है उस मसंख्यात फलदाताका विचार करो ॥ १९ ॥ .

(९०)
रुद्राष्टाध्यायी-
पञ्चमो-
नीलग्गीवाशितिकण्ठादिवठकुद्राऽउप-
श्रिताः ॥ तेषां ॥५६॥
ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिः । निच्यदायनुसुफ
छन्दः । रुखो देवता । वि० पू० ॥१६॥
भाष्य-द्यालोकस्थिना रुद्रा उच्यन्ते (नीलग्रीवाः) कृष्णकण्ठाः ( शितिकण्ठाः)
श्वेतकण्ठाश्च (रुद्राः) ये रुदाः (दिवम् ) दालोकम् ( उपश्रिताः ) उपरिस्थिता:-
तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ५६ ॥
भाषार्थ-डुलातस्थित रुद्रोंका वर्णन | नीलग्रीकावाले श्वेतकंठमाले विषमक्षणले कितनाएक
कण्ठ श्वेत और कितनाएक नील अथवा निर्मल भावाश और मेधसहित आकाशम चन्द्र-
तारादिमें वर्तमान जो रुद्र (लोकमें आश्रय किये हुए है उनके तब धनुष सहस्त्रयोजन दूर
मंत्रवलसे निक्षेप करते हैं ॥ ५६ ।।
লীষ্মেজ্জাহিতিস্তাহাজীঅঙ্গুজা-
चुराह ॥ तेषां ॥१७॥
ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परराष्टी प्रजापतिमीषिः । निदाी-
नुष्टुप्छन्दः । रातो देवता । वि० पू० ॥१७॥
माध्यसू-पातालस्था रुद्रा उच्यन्ते ( नीलग्रीवाः ) कृष्णप्रीलाः ( शिति-
कण्ठाः) श्वेतश्रीवाः ये (शा) रुद्राः (अधः) अधोला (क्षलाबराः ) पाताले
वर्तमानाः (लेषाम् ) तेषामित्यादि पूर्ववत् ।। ५७ ॥
भाषार्थ-पातालस्थित रुद्रोंका वर्णन । नीलीगर्दनवाले, श्वेतकंठयाले जो शवनामक रुद्र नीचे
पातालमें स्थित हैं, उनके सब अनुष सहस्रयोजन दूर मंत्रचलसे निक्षेप करते हैं ।। ६७ ६.
मन्त्रः।
লুখাগুহাদ্যিলীলতীন্বিতীছি-
ताई ।। तेषा०॥ १८॥

ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता। ९१ ॐ ये वृक्षेवित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिषिः । निच्यदायॆनुष्टुप. छन्दः । रुतो देवत्ता वि० पू० ॥ २८॥ भाष्यम्-(ये) (शपिञ्जराः) शष्पा इव पिञ्जरवः हरितवर्णाः (नीलग्रीशः) नीलला (विलोहिताः ) विशेषेण रक्तवर्णाः विगतकलुषमावा बा (वृक्षेदु) अश्वत्यादिषु स्थिवाः तेषामित्यादि पूर्ववत् ! लोहितशब्देन धातब उच्यते तेन त्वग्लो- हितमञ्जादियुक्ता इत्यर्थः ॥५८ ॥ भाषार्थ-जो हरितवर्ण नीलग्रीवाबाले विशेष रक्तवर्ण अथवा तेजोमय शरीरखाझे वृक्षोंग अर्थात् पत्ते शाखा कोपल आदिमें वर्तमान हैं, उनके संपूर्ण धनुष सहस्त्रयोजन दूर मंत्रबलखे निक्षेप करते हैं ॥ ५८ ॥ मन्त्रः। भूतानामाविपतयोविशिखास कपाई- न । तेषां ॥ ५९॥ ॐथे भूतानामित्यस्था परमेष्ठी प्रजापतिः । आनुष्यप्छन्दः । रुनो देवता । कि० पू० ॥ १९ ॥ आष्यम्-(ये) रुद्राः (भूतानाम् ) देवविशेषाणाम् ( अधिपत्यः ) अन्तर्हित. शरीराः सन्तो मनुष्योपदक्करा भूतास्वेषां पालकाः ( विशिखामः ) शिरवारहिता मुण्डा इत्यर्थः (ज्ञपर्दिनः ) अन्ये जटाजूटयुताः लेषामित्यादिपूर्ववत् ॥ १९ ॥ भाषार्थ-जो रुद्र देव विशेषोंके अधिपति हैं अर्थात् अन्तर्हितशरीर होकर मनुष्योंमें उपद्रव करनेवाले भतोंके पालक हैं, तथा शिक्षाहीन मुण्डितशिर जो जटाजूटमे युक्त हैं, उनके संपूर्ण धनुष सहस्रयोजन दूर प्रक्षेप करते हैं ॥ १९ ॥ अघुयाम्पाथरॉयऽऐलबुझाऽआययुः ।। तेषा० ॥६॥ ॐ ये पथामित्यस्य परमेष्टी प्रजापतिवधिः । आयनुष्टुप् छन्दः । रुद्धो देवता । वि० पू० ॥ ६॥ भाष्यम्-(ये) ये कद्राः (पथाम् ) लौकिकवैदिकमार्गाणाम् ( पथिरक्षय : माधिपतयः तथा पायरक्षसः (ऐलभृतः ) इलानामन्नानां समूह ऐलं ये विभ्रति ते

(९२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
यदा-इला पृथिवी तस्या इदमैलमन्नं लदिभ्रति ते ऐलभृतः अन्नैर्जन्तूनां पोषका
इत्यर्थः । (बायुयुधः ) यावज्जीवयुद्धकराः। आयुरेख जीवनं पाणी कृत्य युध्यन्ति
तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६॥
भाषार्थ-जो लौकिक वैदिक मागौंके अधिपति, मागाँके पालक, राज्यशासनकारी वा अन्न-
के धारक अथवा अन्नसे प्राणियोंको पुष्ट करनेवाले जीवनपर्यन्त युद्ध करनेमें रत हैं उनके
सब धनुव सहस्रयोजन दूर निक्षेप करतेहैं ।। ६० ॥
L
घेतीनि चरन्तिकाहस्तानिपुति-
जातेषां ॥६॥
ॐ ये तीर्थानात्यल्य परमेष्टी प्रजापालऋषिः । निच्यदा
ष्टुप्छन्दः । शुद्धो देवता । वि० पू० ॥ ६१ ॥
भाज्य-(ये) रुद्राः ( सृकाहस्ताः) मुकत्यायुधनाम सृका आयुधानि हस्ते
येषां ते ( निषङ्गिणः ) निषङ्गा खड्गा हस्ते येषां ते ( तार्यानि ) प्रयागकाझ्यामीनि
( प्रचरन्ति ) मच्छन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ।। ६१ ॥
भाषार्थ-जो रुद्र आयुधविशेष (ढाल ) हाथमें लिये तथा सङ्गधारण किये, काशीप्रया
गादि तीथों में फिरते हैं वा जो तीर्थीका तथा धर्मका प्रचार करते हैं, उनके संपूर्ण धनुष सहस्त्र-
योजन दूर निक्षेप करते हैं ।। ६१ ॥
मन्त्रः
অঞ্জলিদিল্কিবাজীজুথিলা ।
तेषा ६२॥
ॐ येोविन्यास्या परमेष्टी नजापतिदेवा ऋषयः । विराडार्धनु-
'हुम् छंदः । रुदो दे० । वि० पू० ॥ ६२॥
भाष्यम्-(ये) रुद्राः ( अन्नेषु )'सुज्यमानेषु ( जनान् ) प्राणिजातान् (विवि-
बचान्त ) विशेषेण ताडयन्ति धातुवैषम्यं कृत्वा रोगानुत्पादयन्तीत्यर्थः । तथा
(पात्रेषु ) पात्रस्थक्षीरोदकादिषु स्थिताः सन्तः (पिरतः ) क्षीरादिपानं कुर्वतो
जनान् विविद्ध्यन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६२ ॥
भाषाथ-नो रुद्र मन्नभोजन करने में प्राणियोंको विशेष करके ताडन करते हैं अर्थात् धातुकी
विषमता कर रोगीको उत्पन्न करते हैं, पात्रोंमें जल दूध आदि पीते हुए जनोंके कुत्सित जल
आदिसे रोगप्रत्रित करते हैं, उनके संपूर्ण धनुपोंको सहस्रयोजन दूर निक्षेप करते हैं ॥ ६२॥

ऽध्यायः ५.] माष्यसहिता। (९३) बडएतावन्तवमाखचदिशोदावित- लिथरे । ती० ॥ ६३॥ ॐ य इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्दैवा ऋषयः । नियदाण्या- ष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६३ ॥ भाष्यम्-(च) (ये)(रुद्राः) रुद्राः (एतावन्तः) एतत्प्रमाणं येषां ते (च) (सूयांसः ) अतिशयेन वहयो भूयांसः (दिशः ) दश दिशः (वितस्थिरे ) मा- श्रिताः दश दिशो व्याप्य स्थितास्तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६३ ॥ भाषार्थ-और जो रुद्र इन दशौं दिशाओंमें अथवा इतने और इन कहे हुआ. भी अधिक सम्पूर्ण दिशाओमें माश्रित हैं अर्थात् जिनके दर्शन हमको नहीं होते और जिनका दर्शन इन मंत्रों में नहीं हुआ उनके संपूर्ण घनुष सहस्रयोजनकी दूरीपर मंत्रबलले निक्षेप करते हैं । ६३ । नमोस्तुरुदेश्योपतिविशेषाँवर्षभिषवः ।। বশীভল্যাভিলিয়শ্রী- সুধীজীবী বলল বন্দীবালুডাঙ্খা हेष्टितमेवाअौध्मः ॥ ६४॥ ॐ नमोऽस्वित्यस्य परमष्टी प्रजापतिषिः । निच्यूद्धति- श्छन्दः । सन्नो देवता । वि० पू० ॥६॥ ROM নাঅe CHER भाग्यम्-त्रिलोकरथा रुद्रा उच्यन्ते-(चे ) रुद्वाः ( दिवि ) धुलोके वर्वन्त (येपास् ) रुद्राणाम् (वर) वृष्टिरेख (इपवः)शराःणायुधस्थानीया वृष्टिः (तेभ्यः) (रुद्रेभ्यः) (नमोऽस्तु ) नमस्कारोऽस्तु (तेभ्यः) रुद्रेभ्यः (दश प्राची ) दशसं. ख्यानाः प्राचीः प्रागाभिमुखाः अङ्गुलीः कुर्व इति शेषः । (दश दक्षिणा ) दाक्षिणा-- भिमुखाः दशांगुलीः कुर्दै ( दश प्रतीचीः) प्रत्यङ्मुखाः दशांगुली कुर्वे (दशादीचीः) उदीची उदमुखाः दशांगुलीः (दशो ः) उपरि दशांगुलीः कुर्वे, बञ्जाल बड़ा

(९४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
सर्वदिक्ष नमस्करोगीत्यर्थः। ( नमः) नमोऽस्तु (ले) रुद्राः (न: ) अस्मान्
(अवन्तु ) रक्षन्तु (ते) (नः ) अस्मान (मृडपन्तु) सुखयन्तु (ते) रुद्राः (यम्)
पुरुषम् (द्विष्मः ) देशं कुर्मः (च) (यः) पुरुषः (नः) अस्मान (बेष्टि ) द्वेष
करोति (तम् ) पुरुषम् (एषाम्.) पूर्वोक्तानां रुद्राणाम् (जम्भे) दंष्ट्राकराले मुखे
( दध्मः ) स्थापयामः । अस्मद्विषमस्मद्वेप्यं च नरं पुर्वोक्ता रुद्रा मक्षयन्तु ममा-
चावन्तु चेत्यर्थः ॥ ६४ ॥
भाषार्थ-जो रुद्र शुलोकमें विद्यमान हैं, जिन रुद्रोंके वृष्टि ही बाण है उन रुद्रोंके निमित्त
नमस्कार है, उन रुद्रोंके निमित्त पूर्वदिशामें दश अंगुली होकरके अर्थात्- हाथ जोडकर,
दक्षिणा दशअंगुली होकर, पश्चिममें दशअंगुली होकर, उत्तरमें दशअंगुली होकर, ऊर्ध्वमें
दशअंगुली अर्यात कर जोडकर प्रार्थना करताहूं, उनके निमित्त नमस्कार हो, वे रुद्र हमारी
रक्षा करें, वे हमको सुखी करें, वे रुद्र जिससे हम वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है
उनको इन रुद्रोंके गढमें स्थापन करतेहैं ।। ६४ ॥
मावार्थ-जो देवता युलोक में हैं तिनके वाण वाष्ट है अर्थात् वृष्टिद्वारा सृजन पालन और
अतिवृष्टिसे संहार किया करते हैं, सबदिशाओं में उनको हाथ जोडकर प्रणाम करते हैं ॥६॥
"
सम्मोस्तुरुदेश्योषन्तरिक्षे शेषाँचातुऽइप-
वह ॥ तेयोदशुष्माची दक्षिणादशा-
तीचीईशोदींचीहशोला । लेयोनमोऽ
অবলীলণলীলঙ্গলবললিহী
अर्थानोहेष्टितमेषाजसहध्मः ॥६५॥
ॐ नमोस्त्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिषिः । इतिश्छन्दः
को देवता । वि० पू० ॥ ६६ ॥
भाष्यम्-(रुद्रेभ्यः) रुद्रेभ्यः ( नमोऽस्तु) नमस्कारोऽस्तु (ये ) ( यन्तरिक्ष )
अन्तरिक्ष वर्तन्ते (येषाम् ) रुद्राणाम् ( वातः) वायुः ( इषवः) आयुधस्थानीयः
कुर्वातनान्नं विनाश्य वातरोगं चोत्पाच जनान् नन्ति तेभ्योऽन्तरिक्षस्थेभ्यो रुद्रेभ्यो
नमः । शेषं पूर्ववत् ॥ ६५ ॥
भाषार्ष-उन रुद्रके निमित्त नमस्कार हो, जो रुद्र अन्तरिक्षमें विद्यमान हैं जिनके बाण
पवन है अर्थात् पवनद्वारा जो सृजन, पालन औ मांधी आदिसे संहार करतेहैं उनके
निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्ववत् ॥ ६५ ॥

ऽध्यायः ५.] भाष्यसहिता। (९५) नमोस्तुरुहेश्योपथिक्ष्याँख्येषामन्ननिर्व- समातेकयोदशुष्णाचीईदक्षिणाशप्पती- चीईशोदींचीईशो तेयोनमोऽअस्तु লীলা নুডলআন্নিস্থলী वेष्टितमेषाजम्मेद्धधमा ६६ ॥ इतिखहितापछिटपाटेपञ्चमोऽध्याय:५॥ ॐ बमोरित्वपल्यं परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः । धृतिश्छन्दः । रुद्रो देवता । वि०पू० ॥६६॥ साध्या-( रुदेश्यः ) रुद्रेभ्यः ( नमः) नमस्कारः (ये ) रुद्राः (पृथिव्याम् ) भूम्याम वर्तन्ते ( येषाम् ) (इषवः) बाणाः (अन्नम् ) अदनीय वस्तु आयुधम् मक्यान्नवक्षणे चौर्ये वा अवयं रोगसुत्पाच जनान् नन्ति तेभ्यो नमः तेऽस्मानवन्तु । शेषं पूर्ववत् ।। ६६ ॥ भावार्थ-उन स्त्रों के निमित्त नमस्कार है, जो रुद्र पृथिवीमें स्थित हैं, जिनके वाण अन्न हैं, जो अन्नद्वाराही सृजन, सलन और मिथ्याहारविहारसे शेग उत्पन्न कर प्राणियों का संहार करते हैं, उनके निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्वके समान ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जिस समय मनुष्यको रुद्रका सर्वभाव विदित होजाय और उसकी दृष्टि में यह भाव समाजाय कि, यह सब कुछ रुद्रद्वारा होरहाहै वही शंकर रुद्र नीललोहित कपर्दी आदि अनेक नामों को कार्यानुसार धारण कर रहाहै उसके सिवाय नहीं है तब वह औतनिष्ठ होताहै और रुद्रकी महिमाको प्राप्त हो जीवन्मुक्त होकर विचरता है । इस प्रकार इस षोडश अध्यायमें रुद्रदेवताका संपूर्ण जगत् में अधिकार वर्णन किया है अर्थात् संपूर्ण जगत्में वह परमात्मा रुद्ररूपले व्याप्त है कोई स्थान उसले भिन्न नहीं है इसी कारण स्थावर जंगम सब- हीको प्रणाम किया है, इष्ट अनिष्ट सब उसीके द्वारा होता है, त्रिलोकीका उत्पत्ति, पालन, प्रलय सब रुदसेही होता है, (एको रुद्रो.न द्वितीयः) इस श्रुतिके अनुसार एक अद्वैतरुद्रका प्रतिपादन होताहै, वेद नुसार उनकी उपासना करनी चाहिये, रुद्रकी उपासनाले सब उपद्रव दूर होकर चारों पदार्थीकी प्राप्ति होती है इसका पाठ करनेसे सब मनोरथ सिद्ध होते ॥६६॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसाद मिश्रकृतसंस्कृतार्थभाषाभाष्यसमन्धितः पंचमोऽध्यायः ॥

रुद्राष्टाध्यायी-
[षष्ठो-
अथ षष्ठोऽध्यायः
सन्त्रः।
हरिः ॐ पठसोमनले तबु मर्मस्तुनवि-
मुजावन्तहलचमाहि॥१
ॐ बठन्सोम इत्यस्छ बन्धुषिः । गायत्री छन्दः । सोमो
देवता । दक्षिणान्युपस्थाले विनियोगः ॥ १ ॥
भाष्यम्-(सोम ) हे सोमदेव (बया ) वन्ध्यादयः ( तब व्रते ) त्वदीयाप्ति
वर्तमानाः (तनूषु ) त्वदीयेष्वङ्गेषु जाग्रत्स्वमसुघुप्त्यादिषु ( मनः) मनः (विभ्रतः)
धारयन्तः ( प्रजावन्तः ) पुत्रपौत्रादिगिर्युक्ताः सन्तः ( सचेमहि ) सङ्गच्छेनहि ।
पिनु०६३९६]॥१॥
माघार्थ-हे सोम ! (पितृयज्ञका सोमदेवता है “ सौभाय पितृमत स्वधा इस मत्र हीदी
दीजाती है ) हम यजमान तेरे व्रतसंबंधिकर्ममें वर्तमान हुए आपके शरीरावयवमें या जान
स्थान, सुपुप्तिमें मन धारण करते वा लगाये हुए आपहीकी कृपासे पुत्रपौत्रादिसे युक्त हुए हर
सेवन करते हैं पा सदा तुम्हारे संबंधवाले हैं।॥ १ ॥
E
বী
वामगरहरका
গ্রহন
र-चामतेलमागाऽयुतपशु ॥३॥
* एणत इत्यस्य बन्धुभिः प्राजापत्या ब्रहरी छन्दः । लो.
देवता । रावदानहाने विनियोगः ॥२॥
माप्यम्-(रुद्र ) हे रुद्र (एपः ) अस्मानिरुपकार्यमाणोऽतिरिक्तः पुगेजसः
(ते) तव ( स्वस्खा ) भनिन्या (अग्निकया ) अम्बिशनान्या ( सह ) (भाषा)
मजनीयः स्वीन्तु योग्यः “अम्बिका ह वै नायास्य स्वता" इत्यादिश्रुतेः । (तस्) पुणे-
जाशम् ( जुषस्व ) सेवख (स्वाहा ) सुहुतमस्तु । अतः परमाखूकिर परिक्तिरति
( रुद्र) हे रुद्र (एपः) अस्माभिरूपकीर्यमाणोऽतिरिक्तः पुरोजाशः (ते) तब (मा)
अंशः तथा (ते) तर (बाखुः) भूषकः ( पशुः) पशुत्वेन समर्पितः । आखुदा-
नेन तुष्टो रुद्रस्तयाऽम्बिक्या यजमानपन्न मारबतीत्यर्थः। [ यजु००५७ ] ॥२॥

इस्पायः ६.] भाष्यसहिता (९७) भाषार्थ-विरोधियोंको, पापियोको, अधर्मियोंको सन्याथियों को उनके कर्मका फल देकर लानेवाले हे सददेवता ! तुम्हारी भगिनी अम्बिकाके साथ यह हमले दियाहुमा पुरोडाश स्वीकार करने योग्य है इस पुरोलाशको सेवन करो हे रुद्र ! हमारे बारा अवकीर्ण ( बखेरा) हुला यह पुरोलाश तुम्हारे खेवनीय है तथा आपका बिलमध्यम रहनेवाला भूशा (बहा) रक्षणीय पशु इल कारण शेषमाग इसको भी देते हैं ।॥ २ ॥ विशेष-मशिना नामकी रुद्रकी दहन है, उसके साथ रुद्रदेव विरोधियों के मारनेकी इच्छा करताह ली इस तावता अम्बिकाके साथ उल्ले मारते हैं, वह अम्बिका शाररूप हो जरा. दिक उत्पन्न कर उस विशेषीको भारती है, रुद्र माम्बिकाकी उग्रता इस हविले शान्त होती है। केवल तत्त्ववादी कहते हैं-रुद्रबह मेघगर्जनका आदिकारण विद्यदग्निविशेष है ! कि. धाशजका प्रकृत अर्थ गमनशील अर्थात् जगत् है यही शररूपले रुद्रकी भगिनी होकर कार्यसाधन करती है। स्वाध्यायमें मेरा ऋतु आदिम भी रुद्रका निवास लिखा है, इससे यह भी होसमताह मेघनियाज होनेसे शस्तु प्राप्त हेतिह, वही उनकी भगिनीरूप है, प्राचीन्द्र कालमें शरदले ही नवीनवर्ष प्रारंभ होताथा और एकवर्ष वीलनेसे शरीहमें परिवर्तन होताई वही जश है। भयका बार में वर्षाके उपरान्त एक नवीन ज्वरोध होता है, जो बङा बाट करता है । इसको ही अम्बिकाकृत जरा करते हैं, इसमें बहुधा मनुष्य असावधानीले मृतक होजातहैं इसके निमित्त हान वश्य करना चाहिये और इन्ही रोगोंकी शान्तिके निमित्त चातुर्मासके अन्तर्गत पल भी हवन है, इस समय भी शरत्कालमें नवदुर्गामा में जो हवन होता है वह अम्बिकादेवीका ही विधान है परन्तु धर घर होनेले बहुत उपकार होसकता है। इस मंत्र में बड़ा गूढ तत्व है बुद्धिमान इसमें से बहुतकुछ जॉनसने हैं। इस कारण दिग्दर्श नमात्र लिखा है ॥ २ ॥ अग्नः अहमदी मुसाबंदिवल्यम्बकम् ॥ नोबस्य रधान श्रेय सुरकर यांनो व्यवसायांत् ॥३॥ ॐ अवरुनमित्यस्य बन्धुक्रषिः । विराट् पंक्तिश्छन्दः । नमो देव- ता। जो विनियोगः ॥ छ । माध्या-बाल-बा) अती सद इति मनसा तम् थ्वयमस्य (अदीमहि ) त्व- नुग्रहानं भक्षयेष तथा ( व्यस्वकम् ) त्रीणि अल्पकानि नेत्राणि यस्य - ताही देवम् ( अब ) अनत्यादीमहीलानुनतो । यहऽन्यदेवताभ्यः पृथकृत्य रुनहीमहि पद्यामो भोजयामः ( यथा) येन प्रकारेण (न:) अस्मान (वस्त्रातः ) वस्तृतराज वसनशीलान् (करत ) असौ कुर्यात् (यया) बेन प्रकारेण (न:) अस्मान (श्रेय

...
"
९८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पष्ठो-
करत ) ज्ञातिषु प्रशस्यतरान् कुर्यात् । ( यथा) यथा च (नः) मस्मान्डू ( ध्यर
लाययात ) सर्वेषु कार्येषु निश्चययुक्तान्न कुर्यात् तथैनं जपाम इत्यर्थः । [यजु०३१५८]
भाषार्थ पापियोंको रुलानेवाले तीननेत्र वा सूछोक, अन्तरिक्षलोक, झुलोकरूप वा गमन-
शील वा जिनके नेवसे तीनलोक प्रकाशित होते वा जिनके नेत्रप्रकाशसे तीन लोक आकृष्टः
होते हैं मथमा तीन वेद, तीन काल, आधिदौकि आध्यात्मिक, आधिभौतिक ही जिनके नेत्र
ई ऐसे सगादिसे क्रीडा करनेवाले शत्रुजेता माणियों में आत्मरूपसे वर्तमान द्युतिमान् स्तोत्रास
स्तुति किये हुए रुद्रदेवकी और देवताओं से पृथक कर वा उत्कृष्ट जानकर सब दुःख लाश करते
हैं वा उनके गनु प्रहले अन्न भक्षण करते हैं वा त्रिनेत्र जानकर उनको भाग देते हैं जिस
पत्रकार हमको वह उत्तम प्रकारले निवासफरनेवाले कर, जिस प्रकार हमको ज्ञातियों में श्रेष्ठतए
करें, जिस प्रकार हमको सव कार्यों में निश्चययुक्त करें, इस प्रकार इनका जप करते हैं (.पा.
शीर्वाद है) ॥ ३ ॥
तत्वविवार-जिनकी अम्बिका भागनी है वह यंपक होते हैं। तीन लोकमें गमन होनेसे
मसिएका विद्युतिविशेर रुद्रदेवताकी भगिनीस्थानीय है ।। ३ ॥
भावार्थ-तीनकालों में एकरसरूप परमात्माका भजन करना सबको उचित है वह रुद्ररूप
प्रार्थनीय हैं धनसंपति वही देवताहे तेजकी वृद्धि वही करता है ॥ ३ ॥
अपुजामाख । मपुजङ्गोश्वायुपुरुषाय
भेष-
जान्छ । सुखन्येषायनुप्रध्यै॥ ४॥
अपजमसीत्यस्य बन्धुक्रषिः । वराडूगायत्री छन्दः । रुद्रो
देवता । जपे विनियोगः ॥ ४॥
माप्यम्-हे रुद्र स्वसू (भेपनम् ) औषधवत्सबोपद्रवनियारकः ( असि ) सर्वप्रा-
'णिनां हितकारी आवास, अतः प्रार्थयाडि, अस्मदीयेभ्यः ( गरे ) (अश्वाय ) (पुरु-
पाय) (भेषजम् ) सर्वव्याधिनिवारकमौषधं देहि ( पायमेष्य) ( सुखम् ) क्षेर्म
देहीति शेपः । सुहितं खेभ्यः प्राणेभ्यः इति सुखम् । अनेन मन्त्रेण गृहपशूनां क्षमप्रा.
लिभरति ( यजु० ३१९९] ॥ ४ ॥
माषार्थ-हे रुद्र ! आप अपवित संपूर्ण उपद्रवों के निवारण करनेवाले हो इस कारण हमारे
यो, चोडे, पुत्र, पौत्र, भ्राता और परिजनों के निमित्त सब रोग दूर करनेको औपधि दो बा ।
-औषधिरूप प्रकाश करो तथा भेष भेषी आदि पशुओं के उपद्रवरहित जीवनके निमित्त सुख-
दायक अपना भेषजस्वरूप प्रकाश करो (इस मंत्रसे घरके पशुओंकी क्षेमप्राप्ति होती है)
विशेष-पदार्थविद्याव ले यहाँ विद्यु का अर्थ करके कहते हैं कि, विद्युत् कितनी उत्कृष्ट
ओपन है, यह भेषजके व्यवसायी ही विशेषरूपले जानसकतेहैं ॥ ४॥

ऽध्यायः ६. माष्यसहिता। नम् बिष्यजामहे सुगन्धियुष्टिवठूलए। उतिकार्निव बन्धनासत्यामिक्षीय मासू- तात्।। यम्बतव्यजामहे सुगन्धिष्यतिवेद দু। হুমকিলোনিক্সেীয়- मामुत् ॥५॥ ॐ त्र्यम्बकामित्यल्प वशिष्ठ ऋषिः । वाइबाली त्रिष्टुप् छन्दः । सन्नो देवता। परिक्रमणे विनियोगः ॥५॥ भाष्यम्-(सुगन्धिम् ) दिव्यगंधोपेतं मर्त्यधर्महानम् ( पुष्टिव ईनम् ) धनधान्या दिपुष्टयितारम् (व्यंबकम् ) नेत्रत्रयोपेतं शिपम् ( यजामहे ) पूजयामः । ततो रूदप्रसादात् (मृत्योः) पम्योः संसारमृत्योश्च (मुक्षीय) मुक्तो भूयासम् (मा- तात् ) स्वर्गरूपान्मुक्तिल्पाच (मो ) मुक्तो मा सूयासम् अभ्युदयनिःश्रेयरूपान फलद्धयान्मम अंशो माभूदित्यर्थः । मृत्योर्मोचने दृष्टान्तः (इव ) यक्ष (उरिका) फर्कन्वादेः फलमत्यन्तपकं सत् (बन्धनाव ) दृन्तात् रूपमेव मुच्यते तान् व्यस्बा प्रसादेन मुक्तो भूयासम् । यजमानसम्बान्धन्यः कुमार्योषि व्यंबकमंत्रेणानि नि परि यन्ति (पतिवेदनम् ) पति वेदयतीति तं भर्तुलम्भयित्तारम् (सुगन्धिम् ) दिव्यगन्ध- धुक्तम् (यंवकम् ) देवं शिवम् ( यजामहे ) पूजयामः ( इनः ) मातृपितृभ्रातृवर्गान, (मुक्षीय ) मुक्ता सूयासम् ( उतः ) विवाहादू भविष्यतः पत्युः ( मा ) मुक्कामा सूयासम् । जनकस्य गोत्रं गृहं च परित्यज्य पत्युर्गांत्रे गृहे च सर्वदा व्यम्बकपसाक्षात घसामीत्यर्थः । सा यदित इत्याह-ज्ञातिभ्यस्त दाह-मामुत इति पतिभ्यस्तदाहति राख २११४ श्रुतरितोऽमुतः शब्दाभ्यां पितृपतिवर्गों ग्राह्यौ । [ यजु०३।६० ] "समुद्दिश्य महादेवं त्र्यम्बकं त्र्यंबकेयूच।। एतत्पशतं कृत्वा जीवेर्पशतं पुखी ॥१॥ त्रिरात्र नियतोपोष्य अपपत्पायसं चरुम् :। तेनाहुतिशतं पूर्ण जुहुयाच्छंसि तरतः॥ २ ॥” ॥५॥ भाषार्य-दिव्यगंधसे युक्त, मर्त्यधर्महीन उभयलो कोंके फलदांता धनधान्यादिसे पुष्टि वढाने- हाले पूर्वोक्तनेत्रत्रयसंपन्न शिवशंकरका पूजन करते हैं, वह रुद्र हमको मृत्यु, अपमृत्यु, पा संसा रके मरणसे मुक्त करै वा छुड़ावै, जिस प्रकार अपने बंधनसे पकेहुए कर्कटीफल अर्यात जैसे

(१००)
স্বল্পাদ্যাজার্ষী
[षष्ठो-
पक्कफला म पनी ग्रांपसे टूटकर भूपतित होताहै इस प्रकार शिवकी कृपासे नन्ममरणपंधन
चिरयुक्त होजाऊं और स्वर्गरूपमुक्तिसे न टूं । अभ्युदय निश्रेयसरूप दोनों फलसे भ्रष्ट न
होऊ, पति के प्राप्त करानेवाले या संपूर्णगुणसंपन्न मुन्दरपतिके विधान करनेवाले दिव्यवश सौर-
मपूर्णधर्माधर्मके ज्ञाता यंबकदेव शिवको पूजन करता हूं, जैसे किफाच बंधनले छूट जाता
है इस प्रकार इस माता पिता भ्रातृवर्गसे वा इनके गोत्रसे छूटकर विवाह उपरान्त पतिके समी-
पसे मत छुटाओ ! आशय यह कि पिताके गोत्र और घरको छोडकर पतिके गोच और घर
शिवजीके प्रसादसे सदा निवास करें ॥५॥
विशेष-पहला मंत्रहीं महामृत्युंजय कहलाता है इसको विधिपूर्वक शिवपूजन करके जप
करनेसे अपमृत्यु निवारण होती है इसमें संदेह नहीं, और इस मंत्रसे यह भी विदित होता है कि
शुक्त होकर फिर संसार में नहीं आता इस मंत्र से तीन दिनतक प्रत्य पर वरुकी सौ आहुति
हे तो १०० वर्ष जियें ॥ ६॥
য
Sm
চুলল। দ্বিীলবৃহীতলাক্তি।
লঙ্কলিজাওজুলি-
हिन्सनाशिमोतीहि ॥६॥
एतत्व इत्यस्य बासिष्ठ ऋषिः । सुरिगातारपक्तिछन्दः । सन्द्रों
देवता । वंशयाधिसंतजन विनियोगः ॥६॥
भाष्यम्-(रुद) हे रुद्र (एतत् ते ) तव ( अवसम् ) हविशेषाख्यं भोज्यम
सबसशब्देन देशान्तरं गच्छतो मार्गमध्ये बराकादिसमीपे भोक्तव्य ओदनविशेष
उध्यते" तेन साहितस्त्वम् ( मृजवतः ) पर्वतात् “मूजवानाम कश्चिपर्वती रुद्रस्य
वासस्थानमू” (पर) परभागवर्ती सन् (अतीहि ) अतिक्रम्य गच्छ कोशवस
(मवततधन्दा) अक्षरोपितधतुझः। अल्मद्विशोधिनां लया निवारितादित की
धनुपि ज्यासमारोपणस्य प्रयोजनाभावादवरोपणमेवेदानी युक्तं तथा ( पिनाकवासः )
पिनाकाख्यं त्वदीयं धनुरावस्ते सर्वत आच्छादयतीति पिनायासः यथा धनुद्देष्टा
प्राणिनी न नियति तथा त्वदीयं धर्नुवस्त्रादिना अच्छाध गच्छेत्यर्थः । है रुद्र त्यस
(कृत्तिवासा) वानरः (ना) अस्मान् ( अहिंसन् ) हिंसामकुर्वन् (शिवः)
अस्मदीयपूजया सन्तुष्टः कोपरहितो भूत्वा (. अतीहि ) पर्वतमतिक्रम्य मच्छ ।
बिजु०३।६१ ॥ ६ ॥

अध्यायः ६.] साष्यसहिता। (१०१) भावार्थ-हे उक्तगुणसंपन्न महादेव । यह भापका हविःशेषापं भोजन है (देशान्तरको जाते हुए मार्गमें जो तडागादिके समीप बैठकर भोदन आदि भक्ष्य खायाजाता है उसे अवस कहते हैं) इसके साथ तुम हमारे विरोधियोंके निवारण होलेसे ज्या उतारे हुए घनुपको लमपने पिनाक धनुषको वसमें छिपाये मूजधान नाम पर्वतके परमागवर्ती होकर गमन करी अर्थात इस कपले भागको लेकर दीर्घ गन्तव्यपथ अतिक्रमण कर अपने निवासभूत झुंज. जान नाम पर्वतके शिवरपर लपस्थित हो अथवा तुम्हारा निरन्तर विस्तृत धनुष है तुम अपने लेनले पपर्यन्त आच्छन्न करके गमन करने में समर्थ हो तुमको किसी प्रकारको सहायताकी भावश्यकता नहीं ( धनुष छिपाकर जानेका कारण यह कि प्राणी भयभीत न हो अर्थात् रुद्रने अपना धनुन काल कार लिया) हे सह ! तुम वर्मारवारण किये हो वा संपूर्ण प्राणियोंके अन्तर रहने चम्माल्बरधारी हो हमारी हिंसा करतो अर्थात् हमारी सब शारीरिक लिए- तको अतिकम कर रक्षाके अभिप्राय हमारी पूजाले सन्तुष्ट वा पोपरहित होनेके कारण पल्याण स्वरूप होकर अपने स्थानमें निवास करो या पर्वतको अतिक्रम परजाभो ॥६॥ विशेष-शिपके धनुषका नाम पिनास है गजचर्म धारण करने कृत्तिवास है पौराणिक पदार्थ विद्यावाले कहते हैं पर्वतके उपर मेघोंके उदय होनेले सदा इन्द्र धनुष देखा जाताहै । इस कारण यहाँही रुद्रका निवास स्थान कथन किया है विद्युत में संपूर्ण शरीर चन्ति- की है इस कारण रुद्रको विद्युत् में होनेसे कृत्तिवात और महादेव कहा है ॥ ६॥ মুসলিং ব্যবহার । অন্যায় নীলংহে!{\sk ॥ ॐ न्यायुपमित्याहम नारायण ऋषिः। इणि छन्दः । रुद्रो देवता । वपनादौ जपे विनियोगः ॥ ७ ॥ भाज्यस्-( जमदग्नेः ) सुलेः (न्यायुपस् ) त्रवाणा वाल्ययौवन्नस्थाहिराणामायुर्णा समाहारख्यायुपसू । तथा (कश्यपश्य ) एतनामकरच मजापतेः सम्वन्धि सूद ( व्यायुपसू) व्यायुधम् । तथा ( देवेषु ) इन्द्रादिषु (यत् ) यत् (व्यायुपम् )व्यायु. हामस्ति (तत्) तत्सर्वम् ( ध्याशुष) व्यायुषम् ( नः ) बमाकं यजमानानास (बस्तु) भूयात् जमदग्न्यादीनी वाल्यादिषु यादृशं चरितं तारशन्नो मूयादित्यर्थः । [ यजु० ॥६२ । ७॥ भाषाय-हे रुन्न । जमदग्नि ऋषिकी जो पाल्य यौवन वृद्धावस्था है तथा कश्यप प्रजापतिकी जैसी तीनों अबस्थाएँ हैं जैसे देवगणकी अवस्थाके चरित्र हैं वह सब व्यायुष मुझ यजमा- लले प्राप्त हों अर्थात् इन पूोक्त महारमामोसे चरित्र हमारे होना [[ ७ [!

(१०१) रुद्राष्टाध्यायी... [ षष्ठो- C शिवोनामासुिस्वधितिस्तेपितानमस्तेऽअ- स्तुमाध्याहिठन्सी । निवर्तयाम्म्याधुणेना- স্বল্পনায়াথাব্দীঘলুজা- यसनीयाय॥८॥ इति सहितायां सहपाठे षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ * शिवोनामालीत्यस्य नारायण ऋषिः । झुरिजम ही छन्दः । शुरग्रहणे बापने च विनियोगः ॥ ८॥ ) भाष्य हे क्षुर त्वम् ( नाम ) नाना (शिवः) शान्तः (अस्ति) बसि ( एक धितिः) वजम् (ते) तल (पिता) पिता (ले) तुल्यम् ( नमः) नमः (अस्तु ) भवतु (मा) मा ( माहिठसी) मा नाशय । हे यजमान साम् ( निर्वतचामि ) घुण्डयामि किमर्थन ( बाणे):जीवनाथ (अन्नाद्ध्याय) भक्षणाय ( प्रजननाव) सन्खालाय (रायस्पोपाय) रायो धन लस्य पोशाय पुष्टये (सुमनास्वाय) शोधना सत्यताले (सुवीयच ) शोमनसायऱ्यांग [ यजु० ३।६३ ] | CR भापार्थ-सर्वव्यापी होनेले सुरमें व्याप्त क्षुरापिष्ठित देव ! तुम नामकरके शान्तस्वमा कल्याण कारक हो वन तुम्हारा पालक रक्षक है तुम्हारे निमित्त नमस्कार है सुझको मता भाघात करना । हे यजमान ! इस क्रियाके फलसे जीशनके निमित्त अनादि म्हाणके निमित्त बहुत प्रजा पछुत धन पुष्टि उत्कृष्ट प्रजननसामर्थ्य प्रशंसनीय बलकी प्राप्ति निमित्त मुण्डन करताहूं ॥ ८ ॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यमाषाभाष्यसमन्वितः षष्ठोऽध्यायः॥६॥ • किसी २ रुद्राष्टक में यह दो मंत्र विशेप से जाते हैं- म জঙ্গুিঞ্জাজাঙ্কফজ্ঞফন্যা- तारम्बमध्वा ॥ नीहारणुष्माताजल्प्यांचा सुतृपऽउक्युशासश्चरन्ति ॥१॥ १ ऽध्यायः ७.] (१०३) माष्यसहिता। अथ सप्तमोऽध्यायः। हरिः ॐ प्रश्च भीमाश्वध्वान्तश्चधुनिश्च।। सुाराताश्चामियुग्वालिक्षिपल्ल्याहा ॥१॥ ॐ उग्नश्चेत्यस्य परमेष्ठा प्रजापतिऋषिः । भायत्री छन्दः । महतो देवताः । अरण्ये विमुखपुरोडाशहोमो वि०॥ १ ॥ भाष्यमू-(उग्रः) उत्कृष्टः (च) ( भीमः ) विभेत्यस्मादसो भीमः ( च ) (ध्वान्तः ) ध्वनति शब्दं करोतीति ध्वान्तः (च) (धुनिः ) धूनयति पयति शङ्क: निति धुनिः (च) (सासहान्न ) तहतेः शत्रूनाभिभवति स राद्वान् (च) ( अमित युम्हा) अभियुनक्ति पल्मसंमुखं योगं मामोत्याभियुग्मा (च) ( विक्षिपः ) विविध क्षिपति रिपूनिति विक्षिपः, एले उपादिनामकाः सप्त मरुतः तेभ्यः ( स्वाहा ) सुहुत. मस्तु [ यजु० ३९ ७ ] ॥ १ ॥ भाषार्थ-उत्कृष्ट क्रोधन स्वभाव और जिससे भय लगे भयानक स्वभाव और ध्वनिकारी और शत्रभोंको कम्पानेवाले और सबके तिरस्कार में समर्थ तथा सब वस्तुमाके सहित योग्य बाले और प्राणीके शरीर बुद्धि आदि और वृक्षशाखादिक्षेपणकारी वा शत्रुओंके नाशल बायु देवताकी प्रीति के निमित्त यह आहुति देते हैं भली प्रकार गृहत हो ॥ १ ॥ भावार्थ-जिस परमात्माने इस सब जगत्को उत्पन्न किया है वह तुमसे भिन्न होकर, तुम्हारे हृदय में स्थित है । तुम नो अज्ञान और वृया जल्पनामें प्रवृत्त हो और पुत्रपौत्रला. मादिसे तृप्त तथा स्वर्ग फल्लोभमात्रके लिये यज्ञानुष्ठान करते विचरण करते हो, इस कारण एसका तत्व अवगत नहीं होता, वह निष्काम कर्म और तत्वविचारसे ध्यानमें भाता है । मन्ना विश्वकम्मुख्यजनिवऽभाविन्धोऽs- भवाहितीयः ॥ तृतीय पिताजनितौषधीना- मुपाङ्ग व्यदधात्पुमा ॥२॥ भाषार्थ-विश्वकर्माने प्रथम देवगणकी सृष्टि की, गन्धर्वगण उपकी दूसरी सृष्टि है, पर्जन्या उसकी तीसरी सृष्टि है, यह औषधियों के उत्पादक पर्जन्य अनेक स्थलों में गर्भ धारण करतेहैं ।

(१०४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ सहमो-
मग्नः।
ভগ্নিলাস্টিজেরথুস্তুম্বাই
হঙ্কা ॥
ফাহিঙ্গা-
मीशानम् धुन महादेवमन्तपशुयेलोण्या-
दुवईनिधनाजाशिवहशिङ्गीनि कोश्या-
अमाम् ॥ २॥
२
सो अग्निमिल्यस्य प्रजापतित्रापिः । सुरिनाली त्रिपू छन्दः ।
चनमानो देवता । समाजदेवतास्पश्चतुहीताज्याहुतिक्षाने
वि०॥२॥
भाष्यम्-हदयेन) अंमेन (अग्निम् ) अग्निदेवं प्रीणामि (हृदयात्रेण ) हृदय-
त्यामागेन ( मशनिस् ) अशनि देव प्रीणामि (कृत्स्नहृदयेन) समग्रहृदयेन (पञ्च
पतिम् ) पशुपति देवर (यका ) यकृता (भवम् ) मा देवम् (मत्स्नाभ्याम्) मत्स्ले
हृदयास्थिविशेपो ताल्चा ( शम्) श देवस ( सन्युना ) अश्वसम्बन्धिकाशन
(ईशानम् ) ईशानं देवम् (अन्तःपर्शपेन ) अन्तर्वर्तमानेन पर्शव्येन पार्शस्थिरह-
सानिधना मांसेन (महादेवम् ) महादेवम् ( बनिष्टुना ) चनिष्टुः स्थूलान्त्रं तेन (उ
देवन्द ) उग्र देवम् ( वशिष्ठहः) वशिष्ठल्य देवस्य हनुः कपोलैकदेशो ज्ञातव्यः ।
अथवा वसिष्ठाया हतुः कपोलादेशः 'तत्परा हनुः' इत्यमरः । वसिष्टहन्वा ( कोश्या.
भ्यास) कोशो हृदयकोशः तस्याभ्यां मांसपिण्डास्यां च ( शिंगीनि ) शिगिसंज्ञानि
देवतानि प्रीणामि [ जु० ३९ । ८] ॥२॥
भापार्थ-हृदयद्वारा अग्नि देवताको प्रसन्न करताहूँ १, हृदयके अग्रभागस अशनिदेय-
नाको २, संपूर्ण हृदय से पशुपति देवताको ३, यकृत् (कालखंड) द्वारा प्रभव देवताको प्रसन्न
करताहूँ , हृदयास्थिविशेषद्वारा शव देवताको प्रसन्न करताहूँ, ५ क्रोधाधारद्वारा ईशान्द
देवता को प्रसन्न करताहूँ ६, पार्थमस्थिके मध्यगत मस्तिसे महादेवको प्रसन्न करता, ७
स्यूलान्त्र हे उग्रदेवको प्रसन्न करताहूँ ८, कपोलके एकदेश का अधौदेश और हृदयकोशमें
स्थित मांस पिण्डद्वारा शिडी देवताको प्रसन्न करताहूँ ९, (हनुद्वारा वशिष्ठको प्रसन्न करता
हूं, ऐसा भी किसीका मत है १० ) ॥ २ ॥

ऽध्याय ७.
भाष्यसहिता
ভষজীছিল জ্জিহীহীব্র
भव
জুডলীল স্ক্রাবা-
सूष्णुमूना ! भवस्युकण्ठठल्यान्ता
मुकाबहादेवल्युलच्छईस्वशानिहा-
शुपतेहपुरातत् ॥ ३॥
CAR
ऑलयमित्यल्या मनापतिवधिः । मिव्यवाही विधुश् छन्दः ।
अजमालो देवता । वि० पू० ॥३॥
भाष्यम्-(लोहितन) अहना (उग्रम् ) जय देवं प्रोणामि (सौत्रत्येन) शोभन
जत कर्म यस्य सः सुव्रतस्तस्य भावः सौनत्यं शोभानमत्यादिकर्मकत्व तेन (मित्रम्)
मित्रं दे प्रीणामि (दो-त्येन) दुष्ट स्खलनोच्छननादि व्रतं यस्य स दुव्रतः तस्य
भादो दौत्यं तेन (म्) रुद्रं देवं प्रीणामि ( प्रक्रीडेन) प्रकृष्टं कीडन प्रक्रीड:
तन (इन्द्रम् ) इन्द्रं देवं प्रोणामि ( बलेन ) सामर्थेन ( मरुतः) सहतो देवान प्रीणा-
कम ( प्रमुदा) प्रकृष्टा सुत् हर्षः प्रमुत् तया (साख्यान ) साध्यान्देशान् प्रो० (मनस्य)
पत्र षष्ठयन्तो देवः अंग प्रयमान्तम् मादेवस्य (कण्ठयम) कण्ठे भर मांस मरतु विभा-
क्तिव्यत्ययो वा कण्ठयेन मा देव प्रोणामि । एवमग्रेऽपि (अन्तः पार्थम्) हास्या-
स्तमध्ये भव मांसमन्तः पार्श्वम् ( रुद्रस्य ) रुद्रस्थास्तु (यवत् ) कालखण्ड (महा-
देवस्य ) महादेवस्यास्तु (वनिष्ठु) स्थूलान्त्रम् (शर्वस्य) शस्यास्तु (पुरीतल् )
हृदयाच्छादशमन्त्रम् ( पशुपतेः ) पशुपतेदेवस्यास्तु [ यजु० ३९।९ ] ॥ ३ ॥
माषार्थ-लोहितद्वारा उग्रदेवताको प्रसन्न करताहूँ १, श्रेष्ठगत्यादि कर्म करनेवाले मित्र
देवताको प्रसन्न करताहूँ २, जो शरीरका शोणित दुख्यकरनेको प्रवृत्त होताहै उसले रुद्र
देवताको प्रसन्न करताहूँ ३, क्रीडा करने में समर्थ रक्तद्वारा इन्द्रको प्रसन्न करताहूँ ४, पल-
प्रकाशमें समर्थ रक्तद्वारा मरुतोको प्रसन्न करताहूँ ६, प्रसन्नता करनेवालेहारा साध्यदेव-
ताको प्रसन्न करताहूँ ६, कंठमें होनेवालेसे भवदेवताको प्रसन्न करताहूँ ७, पार्श्वकी मध्यरू
क्तिमासे रुद्रको प्रसन्न करताहूँ, यकृत्के रक्तद्वारा महादेवको प्रसन्न करताहूँ ९, स्थूला-
न्त्रद्वारा शवदेवताको प्रसन्न करताहूँ १०, हृदयाच्छादकनाडीकी रक्तिमाले पशुपतिको
प्रसन्न करताहूँ ११, अर्थात् सर्वांग देवताओंके हैं इससे सर्वस्वत्याग है ममत्व कुछ नहीं है ।
इसमें स्थानगत रुधिरके गुण कहे हैं ॥ ३ ॥

१०६) [ सप्तमो-- रुद्राष्टाध्यायी मन्त्रः । लोमायुरुत्वाहा लोमक्युलस्वाहा बुचे हन्ताहांत्वचेस्बाहालोहिताय स्वाहालोहि- तारवाहा मेदाफ्युत्स्वाहामेदोमयुहन्या- होमासमयुरल्याहा माझ्युल्वा- हालावयुस्वाहा स्नावमयुलस्वाहास्थ्य- युवाहास्थायहचाहामन्जलयुटरचा हांमुज्जफ्युत्स्वाहा ॥ रेतसुस्वाहाँ पायवे इन्चाहा ॥४॥ लोगल्या इत्यस्य पंचाक्षरमंत्राणां प्रजापति वणिः । देवी पक्तिछन्दः । अङ्गानि देवता । चतुरक्षामन्त्राणां दैवी बृहत्ती पडक्षरमन्त्राणां देवी त्रिष्टप० । अष्टाक्षरमन्त्राणां देवी त्रिष्टुम् কে प्रायश्चित्ताहुत्तिदाने विनियोगः ॥ ४॥ भाष्यम्--लोगभ्यः स्वाहेति प्रायश्चित्तातयो द्विचत्वारिंशल्लोमादीन्यगानि ( लोग मभ्यः स्वाहा ) लोमानि जुहोमीत्यर्थः । (त्वचे) त्वचे (लोहिताय ) लोहिताया ( मेदोभ्यः) मेदो धातुविशेषः (मांसभ्यः) मांसेभ्यः ( स्नावभ्यः) स्नावानः स्नायदो भसा ( अस्थत्यः) मास्थिभ्यः ( मज्जभ्यः) मज्जा पठो धातुः (रेतले) रेतो वार्यम ( पायवे ) पाथुगुदम् । [ यजु० ३९।१० ] ॥ ४ ॥ भाषार्थ-लोमोंके निमित्त सुद्धत हो १, व्याप्टिलोमोंके निमित्त सहत हो २, स्वग्वाके निमित्त हुत हो ३, व्यष्टित्वचाके निमित्त सुहत हो ४, लोहितके निमित्त सुहत हो ५, लोहित तके निमित्त महुत हो ६, मेदके निमित्त सुहुत हो ७, मैद०८, मांसके निमित्त सुहुत हो ९, मासके, १०, स्नायुओंके निमित्त सुहुत हो ११, स्नायुके निमित्त० १२, अस्थि शाके निमित्त सहुत हो १३, अस्थियोंके० १४, मज्जाके निमित्त श्रेष्ठ होम हो १५, मज्जाके निर्मित सुहुत हो १६, वीर्षके निमित्त सुहृत हो १७, गुदाके निमित्त सुहुक्तहो॥ १८ ॥ ४ . .

ऽध्याय: ५. माध्यसहिता। मन्त्रः। - आयास्त्रायुस्वाहा प्यायालाय स्वाहा - व्याखायुस्वाहावियाखायुवाहोद्यालाय स्वाहा ॥ शुचेस्वाहाशाचतुरुवाहाशोच. मानायुल्चाहाशोकायुस्वाहा ॥५॥ ॐ आयासायेत्यमध्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ ६ ॥ भाष्यसू-(मावासाय ) बाबासादयो देवविशेषाः प्रायासाय संघासाय लिया साय उघासाय शुचे, शोचते, शोषमानाय, शोझाय, देवविशेषाख ( स्वाहा ) पुहुत. मस्तु ।। बजु० ३९।११।। भावार्थ-सायासदेवताके निमित्त सुहुत हो १, प्रायाप्तके निमित्त सुहुत हो २, संयासदे. प्रता निमित्त सुहुत हो ३, वियानदेवताके निमित्त सुहुत हो ४, उद्यासदेवताके निमित्त हत्त हो ६, शुचदेवताके निमित्त सुहुत ही छ, शोचदेवताके निमित्त सुहुत हो ७, शोच. बानके निमित्त सुहत हो ८, शोकके निमित्त सुहुत हो ९ ॥ ६ ॥ विशेष-देहपरिश्रमको भोग हो, इन्द्रियपरिश्रमको भोग हो, मानसपरिश्रमको भोग हो, शुद्धिपरिश्रमको भोगहो, प्राणपरिश्रमको भोग हो, यह मायालादि पाचौंका अर्थ है ॥ ६ ॥ तर्पसुस्वाहा तप्यतुस्वाहातच्यमाना- युस्वाहातुप्तायुस्वाहाघुम्मायुवाहा । निष्कृत्युस्वाहाघ्प्रायश्चित्त्यै स्वाहासेाजा- युवाहा ॥६॥ ॐ तपस इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥६॥ माष्यम्-(तपसे) तप्यते, तप्यमानाय, तताय, धर्माय' 'निष्कृत्यै, प्रायश्चित्य, मेषजाय स्वाहा । [ यजु० ३९।१२ ] ॥ ६ ॥ मापार्थ-तपके निमित्त सुहुत हो १, तघ्यत्के निमित्त सुहुत हो २, तप्यमानके निमित्त सुहत हो ३, तप्तके निमित्त सुहुत हो ४, धर्मके निमित्त सुहुत हो ५, निष्कृतिके निमित्त- (१०८). खनाष्टाध्यायी- [अहमो- सुहत हो ६, प्रायश्चित्त के निमित्त सुहृत हो ७, भेषजके निमित्त भोगसमर्पण हो ॥६॥ बुनाथस्वाहान्तकायुस्वाहामुत्य स्वाहा।। बटणे स्वाहाँ बाहात्यायै स्वाहा विषये শ্রীন্ত্রিক ছাাদ্ধাআহিলভিশ্যাও स्वाहा॥७॥ इसिसहितायांसहपाठसप्तमोऽध्यायः ७॥ समायोति विनियोगः पूर्ववत् ॥ ७ ॥ भावा-बसाय ) प्रेतपतये ( जन्तज्ञाय ) लालाय ( मृत्यवे ) मृत्युलामकाय असणे ) परमात्मने (ब्रह्महत्यायै ) ब्रह्महत्यायै (विश्वभ्यो देवेभ्यः ) एतेभ्यो हेययः (वाहा) हुतमस्तु (पावापृथिवीभ्याम् ) छावापृथिवीभ्याम् ( स्वाहा । छहतमस्तु । इत्यन्तामाहुतिं जुहुयात् [ पजुः ३९०१३ ] ॥७॥ भाषार्थ-यमके निमित्त सुहुत हो १, अन्तकके निमित्त मुहुक्त हो २, मृत्यु के निमित्त सहुत हो ३, ब्रह्मके निमित्त सुहत हो ४, ब्रह्महत्याके निमित्त सुहुत हो ५, संपूर्णदेवता- भोले निमित्त सुहुत हो ६, भूलोकसे दालोकपर्यन्त जितने देवता हैं उन सबकी प्रीतिको निमित्त यह शेप पूर्णा हुति दीनाती भलीप्रकारले गृहीत हो ।॥ ७॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषामाण्यसमन्धितः सक्षमोऽध्यायः । अथाष्टमोऽध्यायः हरिः ॐ ॥ बार्जन मेमवश्य प्रयति- লিবিলক্ষ্মীপ্রিলুছলম্বলহজ্ব मुख्बर असेलोकश्श्चमेवश्चम श्रुतिश्च मे জীবিহংজ্বলজ্বললাম?

ऽध्यायः८,
भाष्यसहिता ।
ॐ वाजश्च म इत्यस्य देवा ऋषयः शबरी छन्दः । अनिदेवता ।
वसो(राहुतिहोमे चिन्ति ॥ ३ ॥
भाज्यमू-यजमान पाउदसंस्कृत्यार्थपरिमाणया महत्यौदुरपया बक्षा महता सुरेण
पंचवार गृहीलमाध्यमरण्येनूच्ये पुरोडाशे सदुपरि सन्ततं विच्छिन्नधारं यथातथा बसो.
शिलतामाहुन्निं जुहोति । तेग्निप्राति सति बालश्शेत्यादिहोममंत्रारामा । चकाराः सह-
वयाः । (राजा) हाल ( प्रतक्षा ) अन्नदानाभ्यनुज्ञा दीयतां भुज्यवामिति,
प्रतिः ) शुद्धिः ( प्रतितिः) बचनमाविषयौनुत्यस ( धीतिः ) ध्याना (कतुः)
संकल्पो यहोवा (स्वरः) लाश (श्लोका ) पधजन्यः स्तुतिली ( शशः) बेह-
मन्ना भणसामध्ये या ( श्रुति ) नाह्मणम् श्रवणसामध्ये चा ( ज्योतिः ) प्रकाश
( रु. ) वर्गः एते (मे) मम ( यज्ञेन ) यज्ञेन (कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना मवन्तु इस
यज्ञो शाजादीनी दातारमभ्यं भवधियः । एवंमने सर्वत्र । [यजु० १८११] ॥१॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवगण मेरे निमित्त जन और मेरे लिमिल (दीयतां भज्यताम् ),
इस प्रकार अन्नदानकी अनुज्ञा और मेरे निमित्त शुद्धि भन्न विषयक उत्सुकला, ध्यान
विचार और संकल्प वा यज्ञ और साधुशब्द, पद्य पंधन वा स्तुति और बेदमंत्रोंका श्रवण घा
उखकी सामर्थ्य, ब्राह्मणश्रवणकी सामर्थ्य, प्रकाश और स्वर्ग मात करें, अर्थात् यज्ञ करते
यह सब पतार्य हमको प्राप्त हो ॥ १ ॥
माणश्चमेपान मिट्यानश्चमेसु बमोचित्त
मुबाई मेमन
লজ্বল জ্বলন্তলাক্তত্ব
मुऽआधीत
प्राण इत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदतीजगती छन्दः । अभि-
देवता । वि० पू० ॥२॥
भाष्यम्-(प्राणः ) अर्वसंचारी शरीरलायुः (अपान ) अधोवृत्तिर्वायुः (व्याना)
सर्वशरीरगामी वायुः (अलुः ) प्रवृत्तिमान् वायुः (चित्तं ) मानसः संकल्पः (माधी-
तम्) बाह्यविषयज्ञानम् (वाक) वागिन्द्रियम् (मनः) प्रसिहा (बक्षुः) चक्षुरिन्द्रिय
(श्रीत्रम्) श्रवणेन्द्रियम् (द) ज्ञानेन्द्रियकौशलम् (बलम) कमन्द्रियकौशलम् एतानि
(मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु । [यजु० १८ । २] ॥ २ ॥

. १११०) रुद्राष्टाध्यायी- [ अहमो- भाषार्थ-मेरे निमित्त अवश्य प्राण (उर्ध्वायु) और मेरे निमित्त अपान ( अधौवायु- प्रवृत्ति) और मेरे निमित्त शरीर संचारी वायु, प्रवृतिमान् वायु, मानसतंकल्प, बाह्यविषय ज्ञान, पागिन्द्रियसामर्थ्य, मन-चक्षु इन्द्रिय-सामर्थ्य, श्रोत्रहन्द्रियसामर्थ्य, ज्ञानेन्द्रियकी कुशलता और बळ इस यज्ञके फल प्राप्त हो ॥ २ ॥ सच भोजश्चमेसह चमऽआलमार्चमतुन ईमे शम्सचमुहमीचुसेकानिचुमेस्थीनिचमेष- पिन शरीराणिचमुऽआयुश्चमेजराची धुझेनल्टएन्ताम् ॥ ३॥ ओज इत्यस्य देवा ऋषयः । सुरिक्छहरी छन्दः । अनि देवता । वि० पू० ॥३॥ साव्यम्-(ओनः) पलहेतुरष्टमो धातुः ( सहः) शारीरं बलं सम्पन्नालिभामिहत्व सा (आत्मा) परमात्मा (तनूः) स्यं वपुः (शर्म) सुखम् (बर्म ) कवचम् (अंगानि) इस्तावश्यवाः (अस्थीनि) शरीरंगतानि ( पवेषि ) गंगुल्यादिपर्वाणि ( शरीराणि ) पूर्वानुक्ताः शरीरावयवाः (घायुः ) जीवनम् (जरा) वार्धक्यान्तमायुः एते () सम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्तम् । यजु० १८१३ ] ॥ ३ ॥ भाषार्थ-बलहेतु शरीरकी आठवीं धातु, शत्रुका तिरस्कार करनेवाला वल, पास्मज्ञान मनो हर शरीर, सुख, कवच हस्तादिअवयवॉकी दृढता, शरीरकी अस्थियोंकी दृढता, अंगुल्यादि पर्वोकी दृढता, शरीरका आरोग्य, जीवन और वार्धक्यपर्यन्त आयु मेरे निमित्त इस यज्ञके फलसे देवता संपादन करें ॥ ३ ॥ : ज्यैश्यञ्च मऽआधिपत्यञ्चमेमन्युश्चमेभा- संश्लेर्मश्चमेम्भश्चमेजेमाचमेमहिमार्चमे परिमाची प्रथिमाचमेवर्षिमाचमेद्राधि-

सरायः ८.]
भाष्यसहिता।
माचमेह भनिएको कल्प-
ताम् ॥४॥
ज्यष्टमित्यस्य देवा नपयः । नियदत्यष्टिश्छं० अग्नि
प्रता। वि० पू० ॥४॥
भाष्यम्-(व्यैष्ठ्यम् ) प्रशस्तत्वम् ( आधिपत्यम् ) स्वामित्वम् (मन्युः ) मानस
पसोधः (म
मः) अधिक्षपादिलिंगको वाह्यः क्रोधः । (अमः ) न मीयत इत्यमा अप.
रिमेयत्वम् ( अम्भः ) शीतमधुरं जलासू (जेमा) जयस्य माओ जयसामर्थ्यम् (महिमा)
महतो धारो महिमा महत्वम् (परिमा) उरोमीको वरिमा प्रनादिविशालता (प्रथिमा)
पृयोर्यायः गृहक्षेत्रादिविस्तारः (वर्षिमा ) दीर्घजीवित्वम् (द्राधिमा ) अविच्छिन्नपशवम
(बईम् ) प्रभूतभन्नधनादि (वृद्धिः ) विवादिगुणैरुत्कर्षः एते मे यज्ञेन कल्प-
साम् । [ यजु० १८।४] ॥४॥
भाषार्थ-और लडाई, स्वामित्व, मानसकोप, बाह्यकोप, गंभीरता, अपरिमेयत्व, शीत
लवुर जल जयकी सामर्थ्य, महत्त्व, प्रजादिविशालता, गृहक्षेत्रादिविस्तार, दीर्घजीवित्व यह
खब मेरे निमित्त प्राप्त हों, वंशपरंपराकी प्राप्ति, बहुत भन्न धनादि, विद्यादिगुणकी उत्कर्षता
पनके द्वारा संपादन करें अर्थात् दें ॥ ४ ॥
सुत्यश्चमेश्रुद्धार्च रोजगचा धनबह-
क्षमईश्वमेकीलाची मोमेजावईमे।
जानुष्ष्यमाणञ्चमेसूक्तश्चमेसुकतच मेथुज्ञ-
नकल्यन्ताम् ॥५॥
लम सत्यमित्यस्य देवा ऋषयः । विराट् शकरी छन्दः । अग्नि-
देवता । वि० पू० ॥६॥
भाष्यम्-(सत्यम् , यथार्थभावित्वम् (श्रद्धा) परलोकविश्वासः ( जगत् ) जयम
सवादि (धनम् ) कनकादि (विश्वम् ) स्थावरम् (महा) दीप्तिः (क्रीडा) अक्षयू-
लादिः ( मोदः) क्रीडादर्शनजो हर्षः (जातम्) पुत्रोत्पन्नमपत्यम् (जनिष्यमाणम् )
भविष्यदपत्यम् (सूक्तम् ) ऋक्रूसमूहः ( सुकृतम् ) ऋपाठजन्यं शुमादृष्टम् एते
( यज्ञेत कलमन्ताम् ) सम्पयन्ताम् । [ यजु० १८ । ५ ॥५॥

{{{২} হাত্মী- * [ অনুমতি भाषार्थ-और मेरे निमित्त यथार्थभाषण, परलोकविश्वास, जंगमगवादि, सुवर्णादि स्थावर অথ, ভুবি, কীভা, কীভাহানা হুণ, ভুলক ভন্ন ভবন, ভীলঙ্গা প্রত্যশাল अचाओंका समूह, ऋचाओके पाठसे शुभअष्ट देवताओं द्वारा इस यज्ञ फरसे बात हो ॥५॥ { গলক্ষেশ্রণিলালজীা- কাৰীষ্মীকাললিকা- হজ্বংলম্বাললিকাসুদা হুষ্টিছাত্র ৪ জু সুসম্বিংস্ব স্ক: বিবিষ্মী দঃ। ওলি- বা? ০ e { । ফায়ু-() অাছিম (অব) নড়তে বাড়ি সমঃ সুফীবাদী ধৰিীয়া জলফ } নাম্যাধিৰাখি (জীৰান্তঃ} চাৰিনাহাগীব (দাগ) একাত্ত( কললিস হায়, যদ্ভিজ (স) ব্রীবিধি ( লিঃ এ জা) করা আত্মা (ঘ) হল ভঃ নাভিঃ মাহ (লি) অন্ধ জুলাগুলালিত স্বত্ত্ব ভিন দু (ঈ) ম সুজল জুব্বা দ্বিন্তু { অe {%। এ ] । ২ । भाषार्थ-यज्ञादि कर्म, उसका फल स्वादि, धातुक्षयादि रोगका अभाव, सामान्यच्या. ঘিা দান, শিলাহা বঘি, খন্তু, হাকা ভাজি, লিনা, ভাল, বলা हुई सेन, संध्यावंदनादियुक्त सुप्रभात और यज्ञदानाध्ययनादियुगक संपूर्ण दिन इस यज्ञके फलसे देवता यह सब मेरे निमित्त प्रदान करें।॥ ६ ॥ : গুগু তিযুবিলুনিৰ্ম্ম- সাঞ্জ জিলাঙ্খিচান্দু- সমস্বীয় ভূহজালঙ্কাল্প ||\98 ] - ऽध्यायः ८.] माज्यसहिता! *यन्ता त्यस्य देवा ऋषयः । नियतिजगती छन्दः । अनि देवता । वि० पू० ॥ ७॥ भाष्यम्-(यन्ता) अश्वादेनियन्ता (धर्ता) पोषकः पित्रादिः (क्षेमः) विद्य- मानधनस्य रक्षणशक्तिः (धृतिः ) मापत्स्वपि स्थिरचित्तत्वम् ( विश्वम् ) सर्वानुकूः ल्यम् (महः ) पूजा (संवित् ) वेदशास्त्रादिज्ञानम् (ज्ञात्रम् ) विज्ञानसामर्थ्यम् (सू) पुत्रादिप्रेरणसामर्थ्यम् (प्रसूः ) पुत्रोत्पत्त्यादिसामर्थ्यम् (सीरम् ) हलादिकृषिकृतधा- न्यनिष्पत्तिः ( लयः ) कृषिप्रतिवन्धनिवृत्तिः । एते (मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ). सस्पचन्ताम् । [ यजु० १८७] ॥ ७ ॥ भाषार्थ-अश्वआदिका नियन्तृत्व, प्रजाकी पालनशक्ति, विद्यमानधनकी रक्षणशक्ति, आपत्तिने भी स्थिरचित्तता, सबकी अनुकूलता, पूजासत्कार, वेदशास्त्रादिका ज्ञान, विज्ञानकी सामर्थ्य, आज्ञाप्रदान वा पुत्रादिप्रेरणकी सामर्थ्य, पुत्रोत्पत्ति आदिकी सामर्थ्य, कृषिआदिके. उपयोगी हलादि वा कृषिकृत धान्यकी प्राप्ति और कृषिक प्रतिबंधकी निवृत्ति, अनावृष्टिका. अभाव यह सव यज्ञद्वारा अर्थात् इस यज्ञके फलसे मेरे निमित्त देवता प्रदान करें ॥ ७ ॥ मृन्त्रः। शंचमुण्यश्चमेणियचमेनुकामश्चमेकाम- श्चमेसीमानसीमगच हार्विमञ्चमेमुहू- चमुश्रेषश्चमेवमीपश्वमेषशश्चरे बुझेनी कल्पयन्ताम् ॥६॥ ॐ शमित्यय देवा ऋषयः । विराट्शकरी छन्दः। अग्निदेवता। वि० पू० ॥ ८॥ भाष्यम्-(शम् ) ऐहिक सुखम् ( मयः) आमुष्मिकं सुखम् (प्रियम् ) प्रीन्युत्पा- । दकं वस्तु ( अनुशामः) अनुकूलयत्नसाध्यः पदार्थः ( सामः ) विषयभोगजनिती सुखम् (सौमनसः) मनःस्वास्थ्यकरो बन्धुवर्गः (अगः) सौभाग्यम् ( द्रविणसू ) वनम् (भद्रम् ) ऐहिकं कल्याणम् (श्रेयः) पारलौकिकम् (वसीयः) निवासयोग्यो वसुमान् गृहादिः ( यशः) कीर्तिः । एते (मे) मम (यज्ञेन कल्पन्ताम् ) क्लार: भवन्तु । [ यजु० १८१८] ॥८॥ -

(११४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[अष्टमो-
भाषार्थ-इस लोकका सुख, परलोकका सुख, प्रीतिआदिकी उत्पादक वस्तु, अनुकूल यत्न-
खे साध्य पदार्थ, विषयभोगननित सुख, मनके स्वास्थ्यकारी बंधुवर्ग, सौभाग्य, धन इस
लोकका कल्याण, पारलौकिक कल्याण, निवासयोग्य धनयुक्त गृहादि और कीर्ति यह सब
मेरे निमित्त देवता यज्ञके फलसे प्रदान करें ॥ ८ ॥
मन्त्रः।
उमेस्तृतांचोपर्यश्वरसंश्चमेतञ्च
কঞ্জুসুঠিলক্ষ্মীবিলা?
वृष्टिश्वसगै चनु औचिंचबुझनक-
কোস্থ {{ ২ ॥
सईचेत्यन्य देवा ऋषयः। शकरी छन्दः । अग्निशता ।
वि०पू०॥९॥
आष्यसु-(उच ) अन्नम् (सूत्रता) प्रिया सत्या वाक् ( पयः) दुग्धम् (रस:)
सारः (घृतम् ) याज्यम् ( मधु ) क्षौद्रम् ( सरिधः) वन्धुभिः सह भोजनम् -
पतिः) बन्धुभिः सह पानम् (कृषिः) तत्कृतधान्यसिद्धिः ( वृष्टिः) धान्यनिष्पा-
दिवानुकूला (जैत्रम् ) जयसामर्थ्य ( मौद्भिद्यम् ) आम्रादिवृक्षात्पत्तिः एते मम
बाजेल कल्पन्ताम् । [ यजु० १९९] ॥९॥
मापार्थ-पन्न, प्रियसत्यवास्य, दूध, दुग्धसार, घृत, शहत वा मधुर पदार्थ, पांधवॉके
जाथ एकत्र भोजन, बंधुजनोंके साथ एकत्र पान, कृपिद्वारा धान्यसिद्धि, धान्य उत्पन्न होनेकी
अनुकूल वृष्टि, जयकी सामर्थ्य और आम्रादिवृक्षोंकी उत्पत्ति, यह सब इस यज्ञके फलसे -
पता मेरे निमित्त प्रदान करें। ९ ॥
मन्त्रः।
যাচ্ছিদ্যষ্টিক্মিসূক্ষ্ম
समृधुर्चपर्णश्नपूर्णतरश्चनुर्पवंचुमक्षि
चमचमेयोनकल्य्यन्ताम् ॥१०॥
ॐ शयिश्चेत्यस्य देवा ऋषयः । निच्यच्छकरी छन्दः । अग्निदेवता-
वि० पू० ॥१०॥

.
ऽध्यायः ८.
भाष्यसहिता।
(११५॥
भाष्यम्-(रथिः) सुवर्णम् (रायः) मुक्तादिमणयः (पुष्टम् ) धनपोषः (पुष्टिः)
शरीरपोषक: (विभुः ) व्याप्तिसामर्थ्यम् (प्रभुः ) ऐश्वर्थम् ( पूर्णम् ) धनपुत्रादि-
वाहुल्यम् ( पूर्णवरम् ) अत्यंत पूर्णतरं गजतुरगार्दिवाहुल्यम् (अयम् ) कुत्सित-
धान्यमपि (अक्षितम् ) क्षयहीन धान्यादि (अन्नम् ) योदनादि ( क्षुत् ) मुक्ता-
अपरिपाकः एते ( यज्ञेन कल्पन्तास् ) सम्पन्ना मदन्तु । [ यजु० १८१०] ॥१०॥
भाषार्य-सुषण, मोती सादि, धनकी पुष्टि, शारीरकी पुष्टता, व्याप्तिसामर्थ्य, ऐश्वर्य वा
प्रभुताकी सामर्थ्य, धनपुत्रादिकी बहुतायत, गजतुरंगआदिकी पहुतायत, निकृष्टयत्र वा नि-
कृष्टमाले मिले नीहि मादि अन्न, क्षयहीन धान्यादि, चावल; मात अदि, और भोजन किये
जन्नपाक, यह सब मेरे निमित्त इस यज्ञले फलले देवता कल्पना करें ॥ १० ॥
मन्त्रः ।
वित्तवेद्यश्चमसूतंचममाविष्ण्याचमेला-
মাশহুজুলজুলৎজষ্ট্ৰিং জি
कुताञ्चलपतिश्यो पुतिश्चव्वेषु मुतिश्यले यु-
शेलकल्प्यन्ताम् ॥११॥
ॐ वित्तमिल्याय देवाः। शुश्क्छिकी छन्दः । अग्निशता ।
वि० पू०॥११॥
भाष्यसू-(वित्तम् ) पूर्वलब्धं धनम् (छम् ) लब्धव्यम् (मृतम् ) पूर्वसिद्ध
क्षेत्रादि ( माविष्यत् ) सम्पत्स्यमानं क्षेत्रादि (मुगसू ) सुखेन गम्यते यत्र तत्सुगं
सुगस्यो देशः (सुपथ्यम् ) शोभनं हितम् (ऋद्धस् ) समृद्धं यज्ञफलम् (ऋद्धि)
यज्ञादिसमृद्धिः ( क्लुप्तम् ) कार्यक्षेमें द्रव्यादि (क्लप्तिः) स्वकार्यसामर्थ्यम् (मतिः)
पदार्थमात्रनिश्चयः (सुमतिः) दुर्घटकार्यादिषु निश्चयः एते (मे) मम (यज्ञेन कल्प-
न्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।११ ॥ ११ ॥
भावार्थ-पूर्वलब्ध धन, संपद्यमान धन, पूर्वसिद्ध क्षेत्रादि, भविष्यकाल में होनेवाले क्षेत्रादि
सुखगम्य देश वा सुखचोधकी सामर्थ्य, शोभनहित, समृद्धयज्ञका फल, यज्ञादिकी समृद्धि,
कार्यसाधक अपर्याप्त धन द्रव्य, स्वकार्यसाधनसामर्थ्य, पदार्थमात्रका निश्चय और दुर्घटका-
यादिका निश्चय यह सब मेरे निमित्त इस यज्ञके फलसे देवता प्रदान करें ॥ ११ ॥

रुद्राष्टाध्यायी-
[ अष्टमो-
मन्त्रः
बीहांश्चमेयवांश्चमेसाषांश्चमेतिलाश्च मे
मुहार देखलवाश्यनिमियावरणावश्य
मेश्यामाकाश्चमेलीबारीश्वभेगोधामांश्च मे
मुसराश्वमेयोनकरूपणन्ताय ।। १२ ॥
ॐ ब्रीहय इत्यस्य देवा ऋषयः । शुरिगतिशकरी छन्दः । अनि
देवता । वि० पू० ॥ १२॥
.
भाष्य-(व्रीहयः ) ब्रीहयः (यवाः) यवाः (माषाः) मापाः (तिलाः)तिलाः (मुद्राः)
मुगाः (खल्याः) चणकाः लङ्गाश्च (प्रियंगवः ) कहवः प्रसिद्धाः (अणवः ) चीनका
(श्यामाकाः ) तृणधान्यानि ग्राम्याणि कोद्रवत्वेन प्रसिद्धानि (नीवाराः) तृणधान्या
न्यरण्यानि (गोधूमाः ) गोधूमाः ( मसूराः) मसूराश्व एते धान्याविशेपाः (मे) मम
(यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सस्पद्यन्ताम् । [ यजु. १८११२ ] ॥ १२ ॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ब्रीहिधान्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको जो प्रदान करें, इस यज्ञके फलले देवतालोग मुझको उडद प्रदान करें, इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तिल प्रदान करें, इस यज्ञके फलले देवतालोग मुझको मूंग
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चना प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता-
लोग मुझको कंगनी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चीनका तंदुल प्रदान
करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तृणधान्य श्यामाक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको नीवार धान्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको गेहूँ प्रदान
करें , इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मसूर प्रदान करें ॥ १२ ॥
मन्त्रः।
अश्मांचकृत्तिकाचमेगिरयश्चमेपर्वता-
इन्चलिकताब लेबनुरप्पतर्यश्वले हिरण्य-
मिश्चमेश्यामचलिलोहचगे सीसंञ्च
नापुचामोबुहोलकरूपन्ताम् ॥ १३ ॥

काय: ८.] भाष्यसहिता। ॐ अश्मोत्यस्य देवा ऋषयः। सुरिगतिशकरी छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥ १३ ॥ भाष्यम्-(अश्ला ) पापाणः (वृत्तिका ) प्रशस्ता नृत् (मिरवः ) शुदपर्वताः गोवर्द्धनार्बुदेवतकादयः ( पर्वताः) महान्तो मंदरहिमालयादयः (सिकताः) शर्कराः (वनस्पतयः) पुष्पं विना फलवन्तः पनसोदुस्वरादयः (हिरण्यम् ) सुवर्णम् रजवं वा (गया) लोहम् (ज्यामम् ) ताम्रलोहम् (लोहस् ) लोहं कालायसम् (सीसम् ) सीसं प्रसिद्धम् (प्रयु ) रंगम् एते कार्यविशेपेषु (मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सस्पचन्ताम् [ यजु० १८।१३ ] ॥ १३ ॥ मापार्य-इस यज्ञके फसे देवतालोग मुझको पापाण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव- तालोग मुझको श्रेष्ठ मृत्तिका प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छोटे पर्वत प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मन्दरादि वडे पर्वत प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वालू प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वनस्पति प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देखतालोग मुझको सुवर्ण प्रदान करें, इस पज्ञके फलसे देवतालोग मुझको लोहा प्रदान करें, इस यज्ञ फल्से देवतालोग मुझको तांषा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हासी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सीसा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको राँग प्रदान करें अर्थात् मनुष्योंको इन वस्तुमाले कार्य कोशल करके अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥ १३ ॥ मन्त्रः। কাহিঙ্গা মুইলুম্ষি- দুআ কৰ্ম্মাম্বা- কথাঅাহমোঃ বিলগুৰ্বিান? मेमतश्चमभतिश्वसेबुझेनकलपन्तान॥१४॥ ॐ अग्निरित्यल्य देवा ऋषयः । नियष्टिश्छन्दः। अग्निदेवता। वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-(अग्निः ) पृथिवीस्थो वह्निः ( आपः ) अन्तरिक्षस्थानि जलानि ( वीरुधः) गुल्माः (बोपक्ष्यः) फलपाकान्ताः (कृष्टपच्याः ) भूमिकर्षणवीजवा- पादिकर्मभिनिष्पाद्या ओषधयः ( अकृष्टपच्याः ) स्वयमेवोत्पधमाना: नीवारगवेघु- कादयः (ग्राम्याः ) ग्रामे भवाः (पशवः) गोऽश्वमहिपाजारिगर्दभोष्ट्रादयः (भारण्याः) परण्ये भवाः पशवः हस्तिसिंहशरभमृगगवयमर्कटादयः ( वित्तम् ) पूर्वलब्धम् (११८) रुद्राष्टाध्यायी- अष्टमा (वित्तिः ) माविलामः ( भूतम् ) जालपुनादिकम् (सूतिः ऐश्वर्य स्वार्जितम् । एतानि ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पयन्ताम् [ यजु० १८११४ ] ॥ १४ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पग्निकी अनुकूलता प्रदान कर, इल यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जलकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको लता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे शेषतालोग मुझको फल पकनेतक रहनेवाली औषधि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जोतने चोनेसे प्राप्त होनेवाली औषधि प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको स्वयं उत्पन्न होनेवाले नीवार गवेधुकादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बिडालादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हाथी आदि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पूर्वलब्ध प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको होनहार लाभ प्रदान करें, इस यज्ञके फक्तले देषतालोग पझको विद्यमान पुत्रादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ १४ ॥ ) জাঙ্খলজান্দ্রাবিং হিলিং सुपएमश्वमहत्यागातिश्वमेयझेनाल्ट- न्ताम् ॥११॥ ॐ वसुचेत्यय देव ऋषयः । विराडापी बृहत्ती छ । अग्निदेवता। वि० पू० ॥ १६ ॥ भाष्यम्-(वसु ) धनं गवादिकम् ( वसतिः) वासस्थानं गृहम् ( कर्म ) अग्नि- होत्रादि (शक्तिः) तदनुष्ठानसामर्थ्य ( अर्थः ) मथिलपितः पदार्यः (एम: ) प्राप्तव्योऽर्थः (इत्या) मावे क्या जयनामिष्टनाप्युपाय: (गतिः) इष्टमाप्तिः एते (मे) मस ( यज्ञेन कल्पन्तान ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।१५ ] ॥ १५ ॥ माषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको धन प्रदान करें, इस यज्ञके, फलसे देवता- लोग मुझको वासस्थान (गृह) प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अग्नि होत्रादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलले देवतालोग मुझको उसके अनुष्ठानकी सामर्थ्य प्रदान करें, इस यज्ञयो फलले देवतालोग मुझको घरभिलषित पदार्थ प्रदान करें, इस यज्ञके फकले देवं. वालोग मुझको प्राप्तियोग्य अर्थ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हष्ट प्राप्तिका उपाय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इष्टकी प्राप्ति प्रदान करें ।। ।। १५॥ मन्नः। अनिश्चय इन्द्रश्चमेसोमश्व इन्द्रश्चमेलावि म 3

ऽध्यायः ८.]
माष्यसहिता ।
(११९)
तांचमुऽइन्द्रश्च सरस्वताचलुइन्श्वयू-
याचसुऽइन्श्चमेबृहस्पतिव
वधु
शेनकल्य्यन्ताम् ॥ १६ ॥
ॐ अशिरित्यल्य देवा ऋषयः । नियूद्राली पतिश्छन्दः ।
अग्निदेवता । वि० पू० ॥१६॥
माष्यम्-ठायाधैन्द्राणि जुहोति अर्धस्येन्द्रदेवत्वत्वादर्धस्य नानादेवत्यत्वात् ( याग्निः)
(इन्द्रः) (सोमः) (इन्द्रः) (सविता) (इन्द्रः) (सरस्वती ) ( इन्द्रः ।
(पूपा ) (इन्द्रः) (बृहस्पतिः ) (इन्द्रः) एते प्रसिद्धाः देवताः । तैः समानभाग
वादिन्द्र एकैकया सह पठ्यते यात्कोक्ता इन्द्रशब्दस्य नानार्थाः कार्या एवमग्रेऽपि.
कण्डिकाव्ये ज्ञातव्यम् । एते पल्पन्ताम् । । यजु० १८।१६ ] ॥ १६ ।।
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अग्निकी अनुलता प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको इन्द्रदेयकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको सोमदेवताकी अनुकूलता प्रदान , इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालो. मुझको सविता प्रदान करें, इस यज्ञ फळसे देव-
तालागे मुझका इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सरस्वती (वाणी)को
अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको पूषादेवता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवलालोग मुझको इन्द्र
प्रदान करें, इस यज्ञ फलसे देवतालोग मुझको वृहस्पति प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको इन्द्रशी मनुकूलता प्रदान करें ॥ १६ ॥
मन्त्रः।
শিক্ষSংলম্বgঙ্Sংশগ্র-
तार्चमइन्ईश्वमेत्त्वष्टाचसुऽइनश्चमुक्त-
श्चमऽइन् अश्वमेधिवेवमेवाऽइलईश्वस्नेख-
ज्ञेनकल्य्यन्ताम् ॥ १७॥
ॐ मित्र इत्यस्य देवा ऋषयः । विराट् शकरी छन्दः । अग्निदेवता ।
वि० पू० ॥१७॥

रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमो- भाष्यम्-(मित्रः) वरुणः ) (धाता ) ( त्वष्टा ) (मरुतः) (विश्वेदेवाः) प्रसिद्धाः । प्रत्येकामिन्द्रः। एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् [ यजु० १८।१७] ॥ १७॥ भाषार्थ-मित्रदेवता, इन्द्र, वरुण, इन्द्र, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, इन्द्र, मरुत, इन्द्र, विश्वेदेवा- देवता और इन्द्रकी अनुकूलता यह सव इस यज्ञके फलसे देनतालोग मुझको प्रदान करें।।१७।। ACC पथिवीचमुऽइन्द्रश्चनुन्तरिक्षञ्चमुऽइन्द्रश्चमे छोऽइन्द्रश्चमेसमाश्वभु इन्द्रश्चमे नक्ष- आणिचऽइन्द्रश्चदिशश्चमाइन्इश्वमेधुज्ञे- नकल्यन्ताह ॥१८॥ ॐ पृथिवी चेत्यन्य देवा ऋषयः । सुस्कूिछकरी छ । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥१८॥ आष्यम्-(पृथिवी ) पृथिवी ( अन्तारक्षम् ) अन्तरिक्षम् (योः) दिवस्त्रैलोक्यम् ( समाः ) वर्षाधिष्ठात्र्यो देवताः ( नक्षत्राणे ) अश्विन्यादीनि (दिशः) प्रागाद्याः एते (मे) मम ( यज्ञन फलान्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।१८ 1 ॥ १८ ॥ भापार्य-इस यज्ञके फलसे देवतालाग मुझको पृथिवी प्रदान करें, इस यज्ञके फलप्ते देवता- लोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अन्तरिक्षलोक प्रदान करें, इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलते देवतालोग मुझको द्यौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलप्ते देवतालोग मुझका इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलस देवतालोग मुझको धर्षीके अधिष्ठातृ देवता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवसालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नक्षत्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फल से देवतालोग मुझको दिक् प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र ऐश्वर्य प्रदान करें ॥ १८ ॥ मन्त्रः। अर्छशुश्वमेष्ठिमश्चमेहास्यश्वमेधिपति- श्यामउपाशुश्चमेन्तव्यमिश्चऽऐन्द्रवायुव- श्चले मैनावरुणश्चम आश्विनश्च मे

-
ध्यायः ८.]
भाष्यसाहता।
(१२)
प्रतिष्प्रस्थानश्चमेशुनश्चमेमुल्याचमेय
ोनकरूप्यन्ताम् ॥१९॥
ॐ अंशुरित्यय देवा ऋषयः । नियुक्त्यष्टिश्च्छंदः । अग्निः-
वता। वि० पू० ॥ १९॥
भाष्यम्-अथ ग्रहान् जुहोति, अश्वादयः सोममहविशेषाः सोमप्रकरणे प्रसिद्धाः ।
( अंशुः ) ( रश्मिः ) ( अदाभ्यः ) अदाभ्यस्यैव गृह्यमाणत्वदज्ञायां पृथक्कृत्य ग्रहणे
राश्मिशब्देन निर्देशः । रमीनां तदहणे साधनत्वात् अह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु इति
८.४८ मंत्रलिंगात् ( अधिपतिः ) अधिपतिशब्देन निग्राह्यो विवक्षितः तस्य ज्येष्टत्वा-
दाधिपत्यम् । 'ज्येष्ठो वा एप ग्रहाणाम्' इति श्रुतेः। (उपांशुः ) ( अन्तर्यमः )
(ऐन्द्रयायवः) (मैत्रावरुणः ) आश्विनः ( प्रतिप्रस्थानः ) प्रतिप्रस्थानशब्देन
निग्राह्यो विवक्षितः (शुक्रः) ( मन्थी ) एते प्रसिद्धाः ग्रहाः ( मे ) मम ( यज्ञेन )
( कल्पन्ताम् ) क्लप्ता भवन्तु । [यजु० १८।१९ ] ॥ १९ ॥
भापार्थ-इस यज्ञके फ़ल देवतालोग मुझको अंशु प्रदान करें, इस यज्ञके .फळसे देव.
तालोग मुझको रश्मि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देयतालोग मुझको अदाभ्य प्रदान करें, उस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको निग्राह्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको
उपांशु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अन्तर्याम प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको ऐन्द्रनायव ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको
मैत्रावरुण प्रदान करें, इस यज्ञके फळसे देवतालोग मुझको आश्विन प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको प्रतिप्रस्थान प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शुक्र
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मंथीग्रह प्रदान करें, यह सव यज्ञके ग्रह-
'यात्र हैं इनकी प्राप्ति यज्ञ करनेकी सामर्थ्य है ॥ १९ ॥
मन्त्रः।
আগ্রহবংংস্থা
সুহাম্বং সুস্থ
सरुत्युतीयांश्चमेनिष्केवलबश्वस्गेसावित्र.
स्वमसारस्वतश्चमेपानीवतश्चमे हारि-
योजुनश्चमेयुज्ञेनंकल्प्यन्ताम् ॥ २० ॥

ॐ । (१२२) रुद्राष्टाध्यायो- [अष्टमो-' आमयण इत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदत्यष्टिश्छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २०॥ भाष्यम्-( आगरणः) (वैश्वदेवः ) प्रातःसवनगतः खाद्यो वैश्वदेवः ( ध्रुवः ) ध्रुवनामा महः (वैश्वानरः) (ऐन्द्रानः) (महावैश्वदेवः) तृतीयसवनगतः । मरुत्य. तीयाः) महामरुत्वतीयाः (निष्केवल्यः) (सावित्रः) (सारस्वतः ) अभिषेचनीये सरस्वतीलामपां ग्रहणमेव सारस्वतो ग्रहः सारस्वतं ग्रहं गृह्णातीति तत्रान्नानात ( पाक्नोलतः) ( हारियोजनः ) एते सम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) [ यजु० १८।२०] ॥ २० ॥ माषार्थ-इल यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको खायण ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वैश्वदेव प्रदान करें, इस यज्ञके फळसे देवतालोग मुझको ध्रुष- ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालग मुझको वैश्वानर प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ऐन्द्राग्न प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वैश्वदेव प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मरुत्वतीय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव- लालोग मुझको निष्कैवल्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सावित्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सारस्वत ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे व तालोग मुझको पारन्कीवत ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको हारियोजन ग्रह प्रदान करें ।। २० ॥ 0 पर खुश्वारेचमुखाश्चमहायुध्याग्निचने छो- গুলুম্মাবলম্বী प्रतभूवन आधवनी यश्चदिश्वो बर्हि এলাকসজ্জাাংলা- रुन्ता॥२१॥ बुच इत्यस्य देवा ऋषयः । विराट् तिछंदः । अनिलता। - ॥ २ माष्यम्-( स्रचः) जुबादयः (चमसाः) चमसानि ग्रहपात्राणे ( वायव्यानि) पानविशेषाः (द्रोणकलशः) (ग्रावाणः) (माधिपवणे) काष्ठफलके (पूतभृत् ) (माधवनीयः) द्वौ सोमपात्र विशेषौ (वेदिः) (बहिः) (अवभृथः) (स्वगाकार) ऽध्यायः८.] भाष्यसहिता। (१२३) शम्युवाकः तेन यथास्वं देवतानां हविरंगीकारात् । एते (से) मम ( यज्ञेन कल्प. न्ताम् ) सस्पद्यन्ताम् ।। यजु० १८।२१] ॥ २१ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चुक् प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता लोग मुझको धमस प्रदान करें। इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वायव्य प्रदान करें। इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको द्रोणकलश प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ग्रावा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अधिषवण प्रदान करें, इल यज्ञके फलसे देवतालोग मुझका पूतभत्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको माधवनीय प्रदान करें, इस यज्ञके फलस देवतालोग मुझको वदि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वर्हि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अवभृय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शम्युबाकनास पात्र प्रदान करें ॥ २१ ॥ अग्निश्चम घुमश्चमेकश्वो सब्यश्च मे মুন্সংঘবলিনি मेदितिश्चमेघौचमुङ्गुलगुरु शकरयोदिश श्वमेयुज्ञेनकल्प्यन्ताम् ॥ २२ ॥ ॐ अग्निस्त्यिस्य देवता ऋषयः । भुरिछकरी छन्दः । अग्नि- देता । वि० पू० ॥२२॥ भाष्यम्-कण्डिकाव्ये यज्ञक्रतुहोमः । अथैवान्यज्ञऋतुजुहोत्यग्निश्च म इति ९॥२॥ ३।१ श्रुतेः । ( स्वामिः) चीयमानो वह्निराग्नष्टोमो वा (धर्मः) प्रवर्यः (अका ) इन्द्रायावते पुरोडाशमिति विहितो यागेऽकः ( सूर्यः) सौर्य चामोते लिहितः सूर्यः (माणः) गवामयनम् ( अश्वमेधः) प्रसिद्धः (पृथिवी ) पृथिवी (दितिः) (अदितिः) बादीना देवमाता (घौः ) दिवः एवे देवविशेषाः ( अगुल्यः ) निराठ्पुरुषावयवाः (शक्करयः) शक्तयः ( दिशः ) प्राच्यायाः ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ) [ यजु० १९।२२ ] ॥ २२ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चीयमान अग्नि वा अग्निष्टोम प्रदान करें। इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्रवर्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पुरोडाशसंबंधी यज्ञ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सूर्यसंबंधी चह- नदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्राण (गवामयनसत्र) प्रदान करें, इस्त यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अश्वमेध यज्ञ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग :.": मुझको पृथिवी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दिति प्रदान करें, इस [ अष्टमो- ( १२४) रुद्राष्टाध्यायी- यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अदिति प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको झुलोक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अंगुलि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शक्तिये प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्राची ..आदि दिशाओंकी अनुकूलता प्रदान करें ॥ २२ ॥ त्रुतगतष्यश्च तर्पश्चगेलंवत्सुरश्च से होरान्नेऽष्टीबृहन्यन्तुरेचसे युज्ञेनक- ल्पवृन्ता॥ २३॥ ॐ व्रतमित्यन्य देवा ऋषयः । पहिछन्द । अग्निदेवता । वि० पू० ॥२३॥ भाष्यम्-(व्रतस् ) नियमः (ऋतवः) वसन्तादयः (तपः ) कृच्छ्रचान्द्राय- गादि ( संवत्सरः) प्रभवादिः ( अहोरात्रे) दिनानिशे ( र्वष्ठावे ) ऊरू चाष्ठी- वन्ती जानुनी च ऊष्टिीवे अवयव विशेपी (वृश्द्रयन्तरे) एतन्नामके सामनी ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सस्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।२३ ] ॥ २३ ॥ भावार्थ-इस यज्ञके फलसे देवत'लोग मुझको शरीरके नियम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वसन्तआदि धातु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग -मुझको तप (कृच्चान्द्रायण आदि ) प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको लंवत्सर प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उरु और जानु प्रदान करें, इस - यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वृहद्रथन्तर साम प्रदान करें ॥ २३ ॥ सन्त्रः। एकाचमतिलाश्चमेतिर सञ्चसुपाचचमेण चामेसुप्सचमेसुप्सचायनाचमेनवंचनुऽए कारशचम एकादशच त्रयोदशवक्षेत्र शेदशचसेपञ्चदशच पञ्चदशचमेलप्सद शचतुप्तदशचपेनवदशचनवदशचम ऽध्यायः ८.] माष्यसहिता। (१२५) एकविठशतिश्चमडएकत्रिशतिश्चमे - योविठशतिश्चमुत्रयोविठशातिश्वी पाच ভিত্ৰিদৰিালিমবি ठशतिश्चमेसुप्सविठशातिश्वलयविश- নিং লাংথsঞ্জালাল मुऽएकविठशबषयलिशचमे घुशेन कल्प्यन्ताम् ॥२४॥ ॐ एकाचेत्यस्य देवा ऋषयः । पूर्वाईस्य संशतिश्छन्दः शेषल्यः विराट्संकृतिः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २४ ॥ भाष्यम्-अयुग्मस्तोमहोमार्था मन्त्राः, अथायुजस्तोमान् जुहोतीति ९ । ३।३ । २. श्रुतेः । एक्कामादाय द्वितीयां विहाय तृतीयामादाय चतुर्थी विहाय परित्यक्तसमसंख्याके. नात्तविषमसंख्याकन मन्त्रेणायुग्मान् स्तोमान् जुट्ठयादित्यर्थः । आदरातिशयद्योतनार्थी सर्वन पुनरुक्तिः । व्ययुग्मस्तोमहोमः सर्वज्ञामावाप्तिः । तथा च श्रुतिः-"एतदै देवाः सर्वान्कामानाप्ता युग्मिः स्तोमैः स्वग लोकमायंस्तथैवैतद्यजमानः सर्वान्कामानाप्ता युग्भिः स्तोमैः स्वर्ग लोकमति" इत्यादि । एका च मेति सुगसम् । [ यजु० १८।२४]॥२४॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको एक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालाग मुझको तीन प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पाँच प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सात प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ग्यारह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तेरह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पंद्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सत्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उन्नीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इक्कीस प्रदान करें, इप्त यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तेईस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पच्चीस प्रदान करें, इस यज्ञक फलसे देवतालोग मुझको सत्ताईस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उन्तीस. करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको .एकतीस प्रदान करें, इस यज्ञके फल हे देवतालोग मुझको तेंतीस प्रदान करें ॥ २४ ॥ विशेष-:स मंत्रमें गणितविद्या मी कथन की है. यज धातुका संगतिकरण अर्थ होने किसी संख्याका जोडदेना और दान अर्थसे व्यय करदेना है कारण गुणन भाग वर्ग घन मूल -

.
(.१२६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ अष्टमो-
आदि यह सब इसीके अन्तर्गत होते हैं, संख्याके जोडनेको योग जैसे ५+५ =१० और
अनेकबार एकसी संख्याके जोडनेको गुणन करते हैं जैसे ४.४५-२० चारको पाँच स्थानमें
जोडनेसे बीस होते हैं, चारको चौगुना किया तो चारके प्रर्ग सोलह हुए इसी प्रकार अन्तरले
माग वर्ग मूल धर्न आदि निष्पन्न होते हैं, तो संख्या बुद्धिमानोंको यथायोग्य जाननी उचित
है। मूलमात्र दिखलाया है, अङ्कगणित बीजगणित मादि सब संख्याएँ इससे उत्पन्न
होती है ॥ २४॥
मन्त्रः।
वर्तश्चमेष्टीचभौचंसेवाशचने हाईश
হুলীৰ্ত্তহাদাভীন্নিবিডি
শুরূষিণানিঞ্জি কিন্তু
বিভ্রাজিলিঙৰিব
মুয়াজ্জিহাক্সান্দ্রিকথাত্বজ্ঞানিকহই সৃষ্ণু
জিহান্ড্রাস্টিয়ারি ধাই হানি
चर्तुश्चत्वारिशव चतुश्चत्वारिक
জহিউথালা
সুন্দ্রাহিঙ্গালদা 2 ||
चतमश्चत्यल्प्य देवा ऋषयः । उत्कृतिश्छन्दः । आशिदेवता ।
वि० पू० ॥ २६ ॥
भाष्यम्-एककण्डिकया युग्मस्तोमान् जुहोति । अथ युग्मतो जुहोति चतनश्च म
इति ९ । ३।३। ४ तत्फलं स्वर्गप्राप्तिः । एतदै छन्दास्पद्रुक्न् यातयामा वा भयु.
जस्तोमायुग्मभिर्वय:स्तोमैः स्वर्ग लोकमयामति तथेतद्यजमानो युग्मम्निस्तोमैः स्वर्ग
लोहमति" इति श्रुतेः । पूर्वपूर्वमुत्तरेण सम्वन्धेनातिवृक्षारोहणवत् तथा च श्रुतिः “पूर्व-
पूर्वमुत्तरेणोत्तरेण संयुनक्तिः यथा वृक्ष रोहन्नुत्तरामुत्तराशाखासमालम्भारोत्ताह-
तात्” इति । अत्रोक्ता संख्या संख्येयनिष्ठा । एते यज्ञेन कल्पन्ताम् ।। यजु० १८ ॥
२५ ] ॥२५॥

. अध्या८.] माष्यसहिता। (१२७) . मापार्य-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चारसंख्याका स्तोम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोक मुझको आठ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वारह प्रदान करें, इस यज्ञक फलसे देवतालोग मुझको सोलह प्रदान करें। इस यज्ञके फलखे देवतालोग मुझको बीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चौवीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अट्ठाईस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बत्तीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छत्तीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव- तालोग मुझको चालीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पौवालीस प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतादोग मुझकों भडतालोस प्रदान कर * ॥ २५ ॥ मन्त्रः। ध्यदिश्चन्युवीचमदित्युवाच मेदित्यो- জীবাৰিংহভ্রান্ধস্থললিয়ুঙ্গে पनिवलाचतुर्व्यवाट्यरतुव्यों हीच सुशेनकल्यपन्ताव ॥२६॥ ॐ त्र्यविश्चेत्यल्य देवा ऋपयः । नाली बृहती छन्दः । अग्निदेवता। वि० पू० ॥ २६ ॥ भाष्यम्-झण्डिकाइयं व्योहोमे विनियुक्तम् । तथा च श्रुतिः-अथवयाछसि जुहोति व्यषिश्च म हाते पशवो दै वयाऽसि पशुभिरेखेनमेतदन्तेन मीणात्ययो पशुमिरेखनमेतद- नामिपिञ्चति' इति । अमिषणमासात्मकः कालः (व्यविः) त्रयोऽवयवो यस्य व्यकि सार्धसंवत्सरो वृपः तादृशी गौः (त्र्यवी) (दित्यवाट् ) द्विसंवत्सरो वृषो दित्यवाद तादृशी गौः (दित्यौही) (पञ्चाविः) पञ्चावयो यस्य सः पञ्चावि । साद्विसंवत्सरो वृषः (पञ्चावी) ताशी धौः (त्रिवत्सः) त्रयो वत्सा यस्य सः त्रिवत्सः त्रिवर्षी वृपः (निबरसा ) तादृशी नौः (तुर्यवाटू) सार्घत्रिवर्षों वृपः (तुर्थीही ) तादृशो गोः एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) संम्पद्यन्ताम् । [यजु० १८।२६] ॥२६ ॥ मापार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षकी अायुका बछडा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षको मायुकी वछिया प्रदान करें, इस यतके फलसे देव- • एक दो तीन चारसे इस वातका भाव भी सूचित होता है कि, एकासे वही एक अद्वि- तीया ब्रह्मशक्ति, दोसे दो सुपर्ण, तीनसे वेदत्रयी वा तीन काल, वारसे चार वेद, पांचसे पांच वाण, छासे छः ऋतु, सातसे सात सागर, आठसे आठ दिशा वा माठ लोकपाल वा आठ पर लेन, नौसे अंक भी इसी प्रकार आगे जानना ।

(१२८) रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमो- तालोग मुझको दो वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दो वर्षकी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षका वृष प्रदान करें इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षकी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षकी गाय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको साढे तीन वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको साढे तीन वर्षकी गो प्रदान कर ॥ २६ ॥ मन्त्रः। पुष्टवाटच मेषष्ठीहीचमाऽउक्षाचमेवशाचा पुषुमश्चमे हमेनडाँश्चमेधेनुश्चलेवोन कृतान्ताः ॥२७॥ ॐ पृष्ठवाडित्यस्य देवा ऋषयः । नियब्राष्णिक् छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २७॥ भाष्यम्-(पष्ठबाट ) पष्टं वर्षचतुष्कं वहतीति पष्टवाट् चतुर्वषो वृषः (पष्टीही ). तादृशी गौः (रक्षा) सेचनक्षमो वृपः (क्शा ) वन्ध्या गौः (ऋषभः) अतियुवा वृषः (वेहत ) गर्भवातिनी यौः (अनडान् ) अनः शकटं वहतीत्यनड्वान् शकटवाहनक्षमो वृषः (धेनुः ) नवप्रसूना गौः एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) स्वस्वव्यापार- समर्था भवन्तु । यद्वा एते यज्ञेन मम कल्पन्ताम् । मह्यमुपभोगक्षमा भवन्त्वित्यर्थः । एवं पूर्वत्र । [ यजु० १८ । २७ ] ॥ २७ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षका वृप प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षकी गौ प्रदान करें, इस.यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सेचनसमर्थ वृष प्रदान करें, इप्त यज्ञके फरसे देवतालोग मुझको बन्ध्या गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अतियुवा वृप प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको गर्भघातिनी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शकट (छकडा) वहन परनेमें समर्थ वृप प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नवप्रसूता गो प्रदान करें, वह सब यज्ञके संपादनके निमित्त हैं ॥ २७ ॥ मन्त्रः। . हाजाशुस्वाहाप्सुवाय स्वाहापिजाय स्वाहाकतवरवाहाबसवेल्वाहाहपतये उदा.८.] माप्यसहिता। (१२९) ( . स्वाहामुग्धायुवाहांसुरुधादिश नायु त्याहाँ शिनुमशिन मास्यायुगायु জ্বাঞ্ছদ্যালীলাযুফাদ্ভুলিঙ্গ ইজাম্বিলই ছোঁজাখই হুজা- हा ॥ इयन्तुराणिमुनायबन्तासिबमेना कुम्वादृष्टथै त्यागाणाम्रणाधिपत्या- य॥२८॥ B ॐ वाजायेत्यल्य देवा ऋषयः । पूर्वाईल्याची वृत्ती छं० । आशि- देवता । वि० पू० ॥ २८॥ भाष्यम्-अथ नामग्राहहोमः । तथा च श्रुतिः-[ पथ नामग्राहं जुहोति वाजाय- स्वाहेत्येतद्र देवाः सन्किामानास्वाथै तमेव प्रत्यक्ष प्रीणातीति ९।३।३।८ ] ( वाजाय) वाजोऽन्नं तस्मै ( स्वाहा ) स्वाहा वाजादीनि चैत्रादिमासानां नामानि तन्नाम गृहीत्वा होतव्यमित्यर्थः । अन्नप्राचुर्याच्चैत्रोऽ अनरूपः । ( प्रसवाय ) अनुज्ञारूपाय जलक्री-- डादा अभ्यनुज्ञादानात्प्रसवो वैशाखः तस्मै० । (अपिजाय ) अप्सु जायत इत्यपिजः जलक्रीडारतसादपिजो ज्येष्ठः तस्मै० ! (क्रतवे ) यागरूपाय चातुमास्यापियागप्राचु- र्यात् ऋतुराषाढ तस्मै० । ( वसवे ) वासयति वसुः चातुर्मास्ये यात्रानिषेधा- वसुः श्रावणः । (यहर्पतये ) दिनस्वामिने सूर्यरूपाय तापकरत्वाभाद्रपदस्थाहपतित्व तस्मैः । ( मुग्धाय ) अह्न तुपारादिना मोहरूपाय दिवसाय तुपारवाहुल्यान्मुग्धमह आश्विनः । ( अमुग्धाय वैनशिनाय) विनश्यतीति विनंशी विनश्येव वैनंशिनः स्वाहा थकोऽण अल्पघटिकावत्त्वेन विनाशशीलाय कार्तिकाय स्नाननियमादिना पापनाशक- त्वादमुग्धाय मोहनिवर्तकाय कार्तिकाय० ( अविनंशिने आन्त्यायनाय ) न विनश्यती. त्यविनंशी तस्मै विनाशरहिताय अन्ते सर्वेषां नाशे भवमन्त्यं तदयनं चेत्यन्याय तत्र भवः आन्त्यायनस्तस्मै । सर्वनाशेऽप्यवशिष्टायात' एवाविनशिने विष्णुरूपाय मार्ग शीपाय " मासानां भार्गशीर्पोस्मीति । भगवद्गी० १०॥३५ । ( यान्त्याया भौवनाय ) भुवनानामयं भौवनः अन्ते स्वरूपे भव आन्त्यस्तस्मै । लोकस्वल्पपुष्टिः करत्वात्तत्र भवत्वं जाठराग्नीप्तिकरत्वेन पुष्टिकरवं पौषस्य । ( भुवनस्पतये ) भूतना- रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमो- तक्ष्य पालकाय भाषाय स्नानादिना पुण्यजनकत्वेन पालकत्वं माघस्य (अधिपतये) आधिकपालकाय फाल्गुनाय वर्षान्तत्वात् (प्रजापतये ) द्वादशमासाधिष्ठात्रे प्रजापति नामकाय देवाय (स्वाहा ) सुहतमस्तु । हे अग्ने (इयम् ) ( ते ) तब ( राट् ) राज्यम् । यत्र यागाः क्रियन्ते तत्तथैव राज्यम् । किञ्च-हे अग्ने त्वं (मित्राय) मित्रस्य । सख्युर्यमानस्य (यन्ता ) नियामकः (असि) मसि । षष्ठ्यर्थे चतुर्थी मित्रायेति । तथा त्वम् (यमनः) यमयतीति यमन: अग्निष्टोमादिकर्मसु सर्वान्नियसयन् अतः (ऊ) विशिष्टान्नरसाय (त्वा त्यामभिषिञ्चामीति शेषः। तथा (वृष्टय) वर्षणाय (त्वा) क्यामनुभिपिञ्चामीति । तथा (प्रजानामाधिपत्याय ) मजास्वामित्माप्त्यै त्वामभिषि चामि वसोर्धारया “प्रजानामाधिपत्यायत्पन्नं वा ऊर्जनं वृष्टिरन्नेनैवैनमेतत्प्रीणाति" इति ९ । ३ । ३ । १०-११श्रे"। यजु० १८.२८]। २८ ।। म.पार्य-चैत्रमास के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, बैशाखके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, ज्येष्ठके नि- 'मित्त श्रेष्ट होम हो, आषाढके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, श्रावणके निमित्त श्रेष्ठ होम हो,भाद्र. उसके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, आश्विनके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, कार्तिकके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, मार्गशीर्ष के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, पैषके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, भाषके निमित्त श्रेष्ट होम हो, फाल्गु के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, संवत्सर के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, भुवनपतिके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, अधिपति के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, द्वादश महीनोंके अधिष्ठावान् अनापति के निमित श्रेष्ठ होम हो, हे प्रजापते यह तुम्हारा राज्य है अर्थात् जहाँ यज्ञ होताहै यह सब तुम्हारा ही राज्य है, अग्नष्टोमादिकमी सबके नियन्ता तुम सखारूप इस यजमा- लके नियामक हो विशिष्ट भन्नरसके निमित्त तुमको पधारासे सिंचित करत हूं " अग्निमें अहुतिदानसे मच्छी बाई होती है" प्रजा के स्वामित्वप्राप्ति के निमित्त व सुधारासे तुमको अभि- जैक करताहूं ॥ २८ ॥ आर्युव्र्घनेनव জুম্মাজহাল साञ्चक्षुम्पने प्रकल्पता श्री यज्ञक ফন্যান্যাজাল লালা मनोपशेनका हप्पतामाकमायुशेनं करूपताम् गुमायुशेन करूपताजपोतियज्ञन कल्पता स्वयं शेनंकल्प्यताम्पृष्ठंब्युशेन हरूप्पताधुज्ञोषु ऽव्याय: ८.] माष्यसहिता । (१३१) शेनकल्प्यताम् ॥ स्तोत्रुधर्जुऽश्चु सुक खुखार्मचबृहच्च रथन्तुरन्छ । एवढेवाऽअर्ग- महामृताऽअमलप्पुजातिहमजाऽभयमुबट् स्वाहा ॥२९॥ इतिखनहितायांपाठेऽष्टमोऽध्यायः॥८॥ ॐ आयुरित्यस्य देवा ऋषयः । विराट् विहतिश्छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥२९॥ भाष्यम्-कल्पहोमः कल्पनामिति लिङ्गाह । अथ कल्पान्जुहोति ९।२३।१२।। ( यज्ञेन ) निमित्तेन (भायुः) जीवनकाल (कल्पताम् ) साध्यतां प्राप्यताम् (यॉन) निमित्तेन (प्राणः ) प्राणः (कल्पताम् ) साध्यताम् ( यज्ञेन) निमित्तेन (चक्षुः) चक्षुः (कलातास ) साध्यता (यज्ञेन ) निमित्तेन (श्रोत्रम् ) श्रोत्रम् (कल्पताम) साध्यताम् ( यज्ञेन ) निमित्तेन (वा) वा (कल्पताम् ) साध्यताम् (यज्ञेन) निमित्तेन (मना) मनः (कल्पताम् ) प्राप्यताम् (यज्ञेन) निमित्तेन (आत्मा) देहः "आत्मेन्द्रिपमनायुक्त मोक्तत्याहुमनीषिणः" । इति स्मृतः । (यज्ञेन)नितिन (बझा) वेदः (कमताम) साध्यताम् (ज्योतिः ) स्वयंप्रकाशः परमात्मा ( यज्ञेन) निमित्तेन (कलाताम) साध्यताम् । पुण्यकर्मानुष्ठानं परमात्मज्ञाने कारणम् । (E) स्वर्गः (यज्ञे न कल्पताम् ) साध्यताम् (पृटम् ) स्वर्गस्थान स्तोत्रं वा ( यज्ञेन कल्पताम् ) यज्ञेन साध्यताम् (यज्ञा) (यज्ञेन ) ( करताम् ) यज्ञो यज्ञेन क्लसो भवतु “ यज्ञेनह यज्ञमयजन्न देवाः" इति श्रुतेः । (स्तोमम् ) स्तोमत्रिवृत्यञ्चदशादि (यजु०) . नियतपादो मंत्रः (छ) नियतपादा (साम) गीतिमधानम् (वृहद्रथन्तर ) - द्रयन्तरे तविशेषौ वसोधारयनमनिमभिषिच्यात्मानं यजमानः प्रशंपति, क्यं यजमाना (देवाः ) देश भूत्वा (.स्व. ) स्वर्गम् ( अगम ) गतवन्तः गत्वा च (अमृता) अमरणधर्मिणः (अभूम) अभूम (प्रजापतेः) हिरण्यगर्भस्य (प्रजाः) मनाः (अभूम) मभूमेति फलपवनम् । अनेन वसोधोरायाः सर्वकामंमाहितुत्वमुक्तम् । (वेट् स्वाही) बसोधीराहोमार्थो मंत्री वेडिति वषट्कारः । षट्टकारोहष परोक्षं यदेट्कारोवषट्कारण (१३२) रुद्राष्टाध्यायी- [नवमो- वा वै स्वाहाकारेण वा देवेभ्योऽनं प्रदीयते” इति ९।३।३।१४ श्रुतेः इति वसोधीराहो- समन्त्राः समाप्ताः । [घजुः० १८१२९ 11॥२९॥ भाषार्थ-इस यज्ञके प्रसादखे आयुकी वृद्धि हो, यज्ञके प्रप्तादसे प्राण रोगरहित होकर पलिष्ट हों, इस यज्ञके प्रलादसे नेत्र इन्द्रिय उत्कृष्टताको प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे श्रोत्रइन्द्रियकी श्रेष्ठता सिद्ध हो, इस यज्ञके प्रसादसे वागिन्द्रियकी श्रेष्ठता सिद्ध हो, इस यज्ञके प्रसादसे मनकी स्वस्थता हो, इस यज्ञके प्रलादसे आत्मा प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसादसे ब्रह्म प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसादसे ज्योति प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे सुख प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे परमसुख प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे महायज्ञ करनेकी सामर्थ्य प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसा- दसे स्तोम यजु ऋक् साम बृहत् और रथन्तर साम यह सवही प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसा- दसे हम स्वर्गीय देवत्व प्राप्त करने तथा अमर होने में समर्थ हों, इस यज्ञके प्रसादसे छम हिरण्यगर्भ प्रजापतिकी प्रियतम प्रजा होस । कयन कियेहुए समस्त देवताओंकी प्राप्तिके निमित्त ही यह वसोर्धाश हवन आहुत हुमा यह समस्त माहुतियां भली प्रकार गृहीत हो॥१९॥ विशेष-यज्ञ और उसका साधन तथा प्राणियोंको जो कुछ माश्यकता होती है उसका वर्णन इन मंत्रों में कियागयाहै यज्ञ के फलसे यह ऊपर कही ३४७ वस्तु सम्पन्न होसकती हैं यह सब कुछ यज्ञके निमित्त ही सम्पादन हो । मनुष्यका सर्वस्व ईश्वरका है और यज्ञसे सब कुछ प्राप्त होसकता है इस कारण यज्ञले निमित्त सव सम्पन्न हों यही प्रार्थना है ॥ २९ ॥ इति श्रीरुद्रा के पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाप्यसमन्वितोऽष्टमोऽध्यायः अथ नवलोऽध्यायः मन्त्राः ॥ हरिः ॐ ॥ ऋचं वामपंधे मनोयजु अपोलामाणमपोचार भोजुपये। बागोर्जन्सहोजोमबिमाणापानी ॥१॥ ॐऋचं वाचमित्यस्य दधीच ऋषिः। जगती छन्दः । लिङ्गोता देवता । शान्तिपाठे विनियोगः ॥१॥ भाष्यम्-(ऋचम्) ऋग्रूपाम् (वाचम् ) वाचम् ( अपये) प्रविशामि शरण व्रजामि ( यजुः) यजूरूपम् (मनः ) मनः (प्रपद्ये) प्रविशामि (प्राणम् ) प्राण- रूपम् ( साम) साम (प्रपद्ये) प्रविशामि (चक्षुः) चक्षुरिन्द्रियम् (श्रोत्रम् ) ओनेन्द्रियं च (प्रपद्ये) प्रविशामि (वाक्) वागिन्द्रियम् ( ओजः ) मानसं बलं धाष्टम् (योजः) शारीरं बलम् (प्राणापानी) उच्छासनिश्वासवायू च एते (सह) पुनीभूताः सन्तः ( माय) मयि वर्तन्ते । वागादित्राण सप्तदशाक्यवोपलक्षं सप्त- ऽध्याय: ९.] भाष्यसहिता। १३३) दशावय प्रजापतेः लिङ्गं प्रपछे इत्यर्थः । त्रयीविद्यां लिंगशरीरं च प्रपन्न प्रवर्यो न नाशयेदिति भावः । [ यजु० ३६ । १ ] ॥ १ ॥ भाषार्थ-ऋषारूप वाणीकी शरण होताहूँ, यजुःरूप मनकी शरण प्राप्त होताहूँ, प्राणरूप सामकी शरण होताहूँ, चाहन्द्रिय औत्रइन्द्रियकी शरण होताहूँ मनका पल शारीरिक पल उछास निश्वास वायु यह स्वस्थ होकर मुझमें स्थित हों ॥ १ ॥ विशेष-वागादिग्रहणसे सप्तदश भवयवका उपलक्षण है, सप्तदश अवयव युक्त प्रजापतिक शरीर है, उसकी शरण होताहै, त्रयोविद्यारून लिंगशरीर है, परमात्माकी कृपाले सव भवा एववल सम्पन्न हों।। १ ॥ मन्त्रः। यभमेछिद्रञ्चक्षुषोहर्दयस्युमनसो जातितृष्ण- म्बृहस्प्पतिम्मतधातु ।। शन्नोभवतुलवन- स्युवरप्पर्ति ॥२॥ . ॐ यन्म इत्यस्य दधीच ऋषिः । पंक्तिश्छन्दः । बृहस्पतिदेवता। शान्तिपाठे विनियोगः ॥२॥ भाष्यम्-( मे ) मम (चक्षुषः ) चक्षुरिन्द्रियस्य ( यत् ) यत् (छिद्रम् .) अव- खण्डनं जातं प्रव-चरणेन ( हृदयस्य ) वुद्धेर्वा यत् छिद्रं जातम् (मनसः) मनसः (वा) यत् ( प्रतिवृष्णम् ) अतिहिंसितम् । प्रवर्याचरणेन यच्चक्षुर्बुद्धिमनसा व्याकु- लत्वं जातम् ( वृहस्पतिः ) बृहतां पतिर्देवगुरुः (मे) मम ( तत् ) छिद्रमतितणं ( दधातु ) संदधातु छिद्रं निर्तियतु ( भुवनस्य) भूतजातस्य (यः ) ( पतिः ) अधिपतिः प्रवर्यरूपो यज्ञः सः (नः) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपः ( भवतु ) भवतु । वृहस्पतिना छिद्रापाकरणात्मवर्यः कल्याणरूपोऽस्त्विर्थः । [यजु०३६।२] ॥२ भाषार्थ-मेरी चक्षु इन्द्रियकी जो न्यूनता है परमात्मा भेरी उस न्यूनता मन बुद्धिकी ध्याकुलताको निवृत्त करो, हमारे निमित्त कल्याण हो, जो संपूर्ण भुवनोंका अधिपति है वह हमको सुखरूप हो, अर्थात् त्रिभुवनके अधिपति देवता हमारा कल्याण करें ॥ २॥ मन्त्रः। भूर्भुवस्व तत्सवितुर्वरेण्यम्भादेवस्य धीमहि धियोयोन प्रचोदयात्।।३।।

१३४ ॥ रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमो- ॐ तत्सवितुरित्यय विश्वामित्र ऋषिः। निच्यगायत्री छन्दः । सविता देवत्ता। वि० पू० ॥३॥ 4. भाष्यम्-यः सविता देवः (नः ) अस्माकम् ( धियः) बुद्धीः (प्रचोदयात् ) प्रेरयेत्-( तत् ) तत्तस्य सर्वासु श्रुतिषु प्रसिद्धस्य ( देवस्य ) द्योतमानस्य (सवितुः) 'सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगत्स्त्रष्टुः परमेश्वरस्यात्मभूतम् (वरेण्यम् ) सर्वैरुपास्यतया. ज्ञेयतया च सस्मजनीयम् (भगः ) अविद्यात कार्ययोमर्जनादर्गः स्वयज्योतिः पर- ब्रह्मात्मकं तेजः (धीमहि ) तद्योइं सोऽसौ योऽसौ सोहामति क्य ध्यायेम । यद्वा- तदिति भगोविशेषण सवितुर्देवस्य तत्तादृशं भर्गो धीमहि किं तदपेक्षायामाह-य इतीति लंगव्यत्ययः । यद! धिया प्रचोदयादिति तद्ध्यायेमेति समन्वयः । यदा-या सविता सूर्यः धिया कर्माणि 'प्रचोदयात्' प्रेरयति तस्य 'सवितुः' सर्वस्यः प्रसवितुर्देवस्य योत्तमानस्य बल्य तत्सईदृश्यमानतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वैः सम्भजनीयं भर्गः' पापा- नां तापकं तेजोमण्डलम् 'धीमहि ध्येयतया मनसा धारयेम, यदा-भार्गःशब्देनान्नम- भिधीयते । यः सविता देवो धियः प्रचोदयति तस्य प्रसादाद्भर्गोन्नादिलक्षणं फलं धीमहि धारयामः । तस्याधारभूता भवेमेत्यर्थः । भगवान् शंकराचार्यस्तु-'पय सर्व. देवात्मनः सर्वशक्तेः सर्वावभावकतेजोमयस्य परमात्मनः सर्वात्मकायद्योतनाथै सर्वा- त्मकत्वप्रतिपादकगायत्रीमहामन्त्रस्योपासनप्रकारः प्रकाश्यते, तत्र गायत्री प्रणवादिस - लव्याहत्युपेतां शिरःसमेतां सर्ववेदसारमिति वदन्ति । एवं विशिष्टा मावनी प्राणायाम रुपास्या सप्रणवव्याहृतित्रयोपेता प्रणवान्ता गायत्री जपादिमिरुपास्या तत्र शुद्धगायत्री प्रत्यक्ब्रह्मैक्यबोधिका 'धियो यो नः प्रचोदयात् इति नोऽस्माकं धियो बुद्धीः यः प्रचोदयात् प्रेरयेदिति सर्वबुद्धिः संज्ञान्तःकरणप्रकाशकसर्वसाक्षी प्रत्यनात्मेत्युच्यते । तस्य प्रचोदयाच्छन्दनिर्दिष्टस्यात्मनः स्वरूपभृतं परब्रह्म तत्सवितुरित्यादिपदैनिर्दिश्यते । तत्र “ॐतत्सदितिनिर्दिशी ब्रह्मणत्रिविधः स्मृतः" इति तच्छन्देन प्रत्यग्भूतं स्वतःसिद्ध परब्रह्मांच्यते, सवितुरिति सृष्टिस्थितिलरलक्षणशस्य सर्वप्रपञ्चस्य समस्तद्वैतविभ्रमस्या- धिष्ठानं लक्ष्यते । वरेण्यमिति सर्ववरणी निरतिशयानन्दरूपम् । भर्ग इत्यविद्यादिदो- पर्जनात्मकज्ञानकविषयत्वम् । देवस्येति सर्वद्योतनात्मकाखण्डचिदेकरसह । सवितुर्दव- स्थत्यत्र षष्ठ्यों राहोः शिरोवदीपचारिकः । बुद्ध्यादिसर्वदृश्यसाक्षिलक्षणं यन्मे स्वरूप तत्सर्वाधिष्ठानभूतं परमानन्द निरस्तसमस्तानर्थरूपं स्वप्रकाशचिदात्मकं ब्रह्मत्येवं धीमहि ध्याये । एवं सति तह ब्रह्मणा स्वविवर्तनडग्रपञ्चन रज्जुसन्यायेनापवादसामानाधिकार एयरूपमेकत्वं सोयमिति न्यायेन सर्वसाधिप्रत्यगात्मनो ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वं भवतीति । सर्वात्मकब्रह्मबोधकोऽयं गायत्री मंत्रः सम्पयते । सप्तव्याहृतीनामयमर्थः । .

ऽध्यायः ९]
भाष्यसहिता।
(१३५)
भूरिति-सन्मात्रमुच्यते. भुव इति-सम्भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्त्या चिद्रूपमुच्यते
सुबियत इति व्युत्पत्त्या स्वारीत-सुष्टु सवैत्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते, मह इति-महीयते
युध्यत इति व्युत्पत्त्या सर्वातिशयत्वमुच्यत्ते, जन इति-जनयति इति जनः सकलका-
रणत्वमुच्यते, तप इति-सर्वतेजोरूपत्वम्, सत्यामिति-सर्वबाधारहितत्वम् । एतदुक्तं.
भवति-यल्लोके स्वरूपं तदोङ्गारवाच्यं ब्रौव आत्मनोऽस्य सचिद्रूपस्य भावादिति, अथा
भूरादयः सर्वलोका ॐकारवाच्यब्रह्मात्मकाः न तळ्यातरिक्तं किञ्चिदस्तीति व्याहृत-
योऽपि सर्वात्मकब्रह्मबोधिकाः गायत्रीशिरसोऽप्ययमेवार्थः “आपोज्योतीरसो मृतं ब्रह्म-
भूर्भुवः स्वरोम्” आप इत्यामातीति व्युत्पत्त्या व्यापित्वमुच्यते । ज्योतिरितिप्रकाश-
रूपत्वम् । रस इति सर्वातिशयत्वम् । अमृतामति-मरणादिसंसारनिर्मुक्तत्वं सर्वव्यापि-
सर्वप्रकाशकसर्वोत्कृष्टनित्यमुक्तमात्मरूपं सच्चिदानंदात्मकं यदोङ्कारवाच्यं ब्रह्म तदहम-
स्मीति गायत्रीमन्त्रार्थः । “गुहाशयब्रह्महुताशनोहं कर्तेदमंशाख्यहविर्तुतं सत् । विली--
यते नेदमहं भवानीत्येपप्रकारस्तु विभिद्यतेऽत्र ॥ यदस्ति यद्भाति तदात्मरूपं नान्य-
नतो भाति न चान्यदस्ति । स्वभावसंवित्प्रतिभाति केवला ग्राह्यं ग्रहीतेति मृपैव
कल्पना" ॥ इति शंकरभगवतः कृतो गायत्रीभाष्यम् । योगियाज्ञवल्क्यस्तु-
तच्छब्देन तु यच्छन्दो वोद्धव्यः सततं बुधैः ।
उदाहते तु यच्छन्दे तच्छब्दः स्यादुदाहतः ॥ १॥
सविता सर्वभूतानां सर्वभावान्प्रसूयते ।
सवनात्पावनाचैव सविता तेन चोच्यत ॥२॥
दीव्यते क्रीडते यस्माद् द्योतते रोचते दिीव ।
तस्मादेव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदेवतैः ॥ ३॥
चिन्तयामी वयं भर्ग धियो यो नः प्रचोदयात् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनःपुनः ॥ ४ ॥
भ्रस्जपाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ ।
भ्राजते दीप्यते यस्माजगच्चान्त हत्त्यपि ॥५॥
कालाग्निरूपमास्थाय सप्तार्चिः सप्तराईमाभिः ।
भ्राजते यत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गः स उच्यते ॥६॥
भात भषियते लाकान रोति रञ्जयत प्रजाः ।
गत्या गच्छत्यजत्रं यो भगवान्भर्ग उच्यते ॥ ७ ॥
वरेण्यं वरणीयं च संसारभयभीरुभिः ।
आदित्यान्तर्गतं यच्च अख्यिं वा मुमुक्षुभिः ॥ ८ ॥
जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य विविधस्य च ।
ध्यानेन पुरुषो यस्तु दृश्यः स सूर्यमण्डले ॥ ९ ॥

रुद्राष्टाध्यायी--
[नवमो-
भाषार्थ-यह गायत्री मंत्रही सर्वोपरि मंच है यही ब्रह्मकी उपासना वा ध्यानका परम
मंत्र है इसके सौ अर्थ मिलते हैं संस्कृतमें कई अर्थ इमने लिखे हैं संक्षेपसे भाषार्थ
लिखते हैं। उस प्रकाशात्मक प्रेरक भन्तर्यामी, विज्ञानानन्दस्वभाव, हिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्न
अथवा आदित्यके अन्तर स्थित पुरुष वा ब्रह्मके सबसे प्रार्थना किये हुए संपूर्ण पापके पा
संसारके आवागमन दूर करने में समर्थ, सत्य ज्ञान आनन्द आदि तेजको हम ध्यान कर-
ते हैं, जो स्वविता देव हमारी बुद्धियोंको सत्कर्मके मनुष्टानके निमित्त प्रेरणा करता है, जग-
तके उत्पन्न करनेवाले उन परमदेपताका जो कि भू.क, भुव.क, स्वर्लोक व्यापी भर्ग
उनका हम ध्यान करते हैं।॥ ३ ॥
विशेष-योगि याज्ञवल्क्यने जो अर्थ किया है उसका वर्णन करते हैं, उसका तेज हम
'ख्यान करते हैं, यहां तत् भर्गका विशेषण नहीं है, तथापि तत्के प्रयोगसे ही यस्का प्रयोग
होजाता है, यही इस श्लोकका भाशय है. कि तत्के साथमें यत् शब्द सदा जानना ॥ १ ॥
संपूर्ण प्राणी मौर संपूर्ण भावोंका उत्पन्नकर्ता सेवन और पवित्र करनेसे उसे सविता कहते
हैं ॥ २ ॥ जिस कारण कि वह प्रकाशित होता क्रीडा करता आकाशमें दीप्तिमान होता सक
देवताओंसे स्तुतिको प्राप्त होताहै, इस कारण उसे देव कहते हैं ॥ ३ ॥ हम उस भर्ग तेजका
ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धिवृत्तियोंको पारंवार धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें प्रेरणा
करता है || ४ || भ्रस्ज-धातु पकानेमें है जिस कारण यह पकाता शोभित दीप्तिमान होता
हुआ अन्तमें जगत्को हरण करताहै ॥ ५ ॥ कालाग्निरूपमें स्थित होकर आग्नसूर्यमें
स्थित अपने रूपसे प्रकाशित होताहै, इस कारण उसको भर्ग कहते हैं ॥ ६ ॥ मकारसे
सवलोकोंको भयभीत करताहुआ, रसे प्रजाको प्रसन्न करता है, गसे जो निरन्तर गमना
गम करता है इस कारण उसको भर्ग कहते हैं, परमार्थ चिन्तामें सरिता मोर भर्गमें भेद
नहीं है ॥ ७ ॥ संसारके भयसे भीतहुए प्राणी जिसकी प्रार्थना करते हैं । जो यह
सूर्य जन्तर्गत भर्ग है इसको मुमुक्षु जन्म मृत्यु और दैहिक दैविक भौतिक दुःख इनके
नाश करने के निमित्त ध्यान करते हैं वह पुरुष सर्यमंडल में ध्यान करना चाहिये ।। ८ ॥ ९ ॥
इस प्रकार गायत्रीका माहात्म्य वर्णन करके उसी के महाप्रभावमें सात व्याहृतियोंका
विशेषण जानना । किस प्रकारका वह भर्ग है ? जो भूरादि सात लोकोंको घ्याप्त कर स्थित
होरहाहै, अर्थात् भः (भूमि) भुवः (अन्तरिक्ष ) स्वः ( स्वर्लोक ) महः ( महर्लोक) जनः
( जनलोक ) तपः (तपलोक ) सत्यम् (सत्यलोक) इस प्रकार क्रमसे लोकोंको व्याप्त करके
यह भर्ग इन सात लोगोंको दीपकके समान प्रकाश करता है । अथवा सात महाव्याहृति ही
भराविका भगौविसे भेद करके प्रकाश करतीहै, अर्थात् वह तेज कैसा है जो ( आपो ज्योती-
रसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ) जल, ज्योति, रस, अमृत, ब्रह्म, भूः भुवः स्वः ॐ रूप है,
उसका ध्यान करते हैं ॥ ३ ॥
कांनाश्चिमा वदती सुदाधुः सखा ।
कयाशचिठयाबुता॥४॥

ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिता।
ॐ वामान इत्यस्य वामदेव ऋपिः। गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता ।
शान्तिपाठे विनियोगः॥४॥
भाष्यम्-(सदावृधः) सदावर्धमानः (चित्र) चायनीयः पूजनीया ( सखा)
मित्रभूत इन्द्रः (रिया) (ऊतीः ) ऊत्या अवनेन तर्पणन प्रीणनेन वा ( नः ।
अस्माकम् ( आभुवत् ) आभिमुख्येन भवेत् ( शविष्टया ) प्रज्ञावत्तमया प्रज्ञासहित-
सनुष्ठीयमानेन (कयावृत्ता) केन वर्ततेन कर्मणा च अमिसुखे भवेत् । शचीति कर्म-
नाम । इन्द्रः कया जत्या अस्माकं सहाय मामिाख्येन भवति तया-अतिशयवत्या
यागक्रिययाऽस्माकं सखा भवतीति विशदार्थः [यजु० ३६४ ॥४॥
भाषार्थ-सदा वृद्धि करनेवाले शिचित्र वा पूज्म इन्द्र किस तर्पण वा प्रीतिसे किस वर्त-
मान अतिशय क्रियाद्वारा हमारे सहायक अभिमुख होताहै, मर्यात् हम क्या उत्तम कर्भ
करें, क्या क्रिया करें जिससे परमात्मा हमारे सहायकारी हो और अपनी पालनशक्तिद्वारा
हमारे निरन्तर वृद्धिकारी सखा हो ॥ ४ ॥
सन्त्रः।
करस्वासुत्योमदानाम्म हिटोस्लुन्छ
सः ।। दृढाचिंदाजेनतुं ॥५॥
ॐ कस्त्वत्यस्य वामदेव ऋपिः। गायत्री छ। इन्द्रो देवता।वि०पू०६
भाष्यम्-हे इन्द्र ( मदानाम् ) मदयन्ति तानि मदानि भदजनहानि हवींषि तेषां
मध्ये ( महिष्टः ) श्रेष्टः अत्यन्तमदजनकः ( अन्धसः) अन्नस्य सोमरूपस्य (क)
का अंशः (वा) त्वाम् (मत्सत् ) माद्यवि मत्तं करोति ‘मदी-हप' येनांशेन मत्तः
सन् (हढाचित् ) दृढान्यपि ( वसु) वसूनि धनानि कनकादीनि त्वम् ( जारुजे )
'हजो-मंगे' बारुजसि चूर्णयसि दातुं भनक्षि भक्त्वा भक्त्वा दासीत्यर्थः ।
[ यजु० ३६५ ] ॥५॥
मापाय-हे परमेश्वर ! सोमरूप मन्त्र का कौनसा प्रसन्नताओंका अत्यन्त करनेवाला संश
आपको प्रसन्न करताहै, मर्यात् सब मन्त्रों में कौनसा अन्न आपको माधक तृप्त करताहै
जिस संशसे प्रसन्न होकर माप दृढतासे रहनेवाले सुवर्णादिधनको भक्तों के निमित्त चूर्ण
कर अर्यात् विभाग कर देतेहो ॥ ५ ॥
मन्त्रः।
अभीषणत्सखीनामविताजरितॄणार ॥
शुतम्भवास्यूतिभिः॥६॥

(१३८) रुद्राष्टाध्यायी- [नवमो- ॐ अमीषुण इत्यस्य वामदेव ऋषिः। गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥६॥ भाष्यम्-हे इन्द्र त्वम् ( सखीनाम् ) समानख्यातीनाम् ( जरितॄणाम् ) स्तोह णासू ( अविता ) रक्षिता (शतम् ) शतेन बामिः ( अतिभिः) रक्षाभिः सह (नः) अस्माकम् (सु) सुष्टु (भिभवासि) अभिमुखो भव भक्तानां पालनाय नानारूपाणि दधासीत्यर्थः। [यजु० ३६६] ॥ ६ ॥ भाषाय-हे परमेश्वर तुम मित्रोंके और स्तुति करनेवाले हम ऋषिोंके पालन करनेवाले हो तथा हमसे भक्तोंकी रक्षाके निमित्त भलीप्रकार अमिमुख होनेद्वारा बहुत रूप होतो हो अर्थात् अपने भक्तों की रक्षाके निमित्त भाप सैनडों रूप धारण करते हो वा सेकडो. उपाय अवलंबन करते हो ॥ ६ ॥ मन्त्रः। कयावत्यामिप्रमन्दसेवृषन् ।क- योस्तोतब्युडामर ॥७॥ में स्यात्वामित्यल्य दधीच ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता । शान्तिपाठवि० ॥७॥ भाष्यम् (वृषन् ) दर्पतीति वृया हे सेक्तः इन्द्र (या) (ऊत्या) केन तर्प- गेन हविर्दानेन (न:) अस्मान (अभिप्रमन्दसे) अभिमोदयसि (कया) कया ऊत्या तृप्त्या ( स्तोतृभ्यः) स्तुतिकर्तृभ्यः यजमानेभ्यः (बासर) आहार माहसि धन्- दातुमिति शेषः । तद्वयन तथा वयं कुर्म इति शेषः। [ यजु० ३६१७] ॥ ७ ॥ भ'पार्थ-हे सबकामनाओंके वर्षानेवाळे आप किस तृप्ति वा हविदनिसे हमको प्रसन्न करतेहो, किस उतिद्वारा स्तुति करनेवाले यजमानोंके निमित्त धनदान करनेको लातेहो अर्थात् क्रियावश होकर स्तुति करनेवालोको पूर्णमनोरथ करते हो ॥ ७ ॥ मन्त्रः। इन्द्रोशिश्वस्थराजति ॥ शन्नोऽअस्तुहिपदे शचतुष्पदे ॥ ८ ॥ AREOS

ऽध्यायः ९.
माज्यसहिता!
(१३९)
ॐ इन्द्र इत्यस्य धीच मापः ! हिपता विराट् छन्दः । इन्द्रो
देवता । वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-(विश्वस्थ ) सर्वस्य जगतः (इन्द्रः ) परमेश्वरः महावीरः आदित्यो
वा य: (राजति ) देदीप्यते (न:) अस्माकम् (द्विपदे ) द्विपदा पुत्रादीनाम् (शम् ।
सुखरूपः (बस्तु) अस्तु (चतुष्पदे) चतुष्पदा गवादीनाञ्च (शम् ) सुखरूपोऽस्तु :.
[ बजु० ३६८ ]॥ ८॥
माषार्थ-सबका स्वामी परमेश्वर प्रकाश करताहै, हमारे पुत्रादिमें कल्याण हो, चौपा--
योंमें कल्याण हो अर्थात् परमेश्वर्यसंपन्न पाभदेवता इस संपूर्ण संसारका राजा है, वह क्य
द्विपद क्या चतुष्पदको निर्माण करके ही कल्याणविधानमें तत्पर रहताह ।। ८ ||
शन्नोमिनःशवरुणुशन्नोमवात्सम्युमाई ॥ श-
नुऽइन्द्रोबहुरूपतिशमोहिष्णुहरूम.९॥
ॐ शन्न इत्यस्य धीच ऋषिः । अनुष्टुप् छंदुः । सूर्यों देवता ।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥९॥
भारम्-(मित्रः) मित्रो देवः मद्यात भक्तेषु स्निह्यतीति मित्रः ( ना )
अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवतु (वरुणः ) वरुणो देवो वृणोत्यङ्गीकरोति भक्त
मिति वरुणो देवः (शम् ) सुखरूपो भवतु ( अर्यमा ) श्यति गच्छति मक्तं प्रतात्य..
यमा (शम् ) अस्माकं तुखरूपो भवतु (इन्द्रः ) देवेशः ( नः ) अस्माकं सुखरूपो
भवतु (बृहस्पतिः) बृहतास्पतिर्देवगुरुः (न:) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवत
( उरुक्रमः ) ऊरुविस्तीणः क्रमः पादन्यासो यस्य सः (विष्णुः) परमेश्वरः ( नः)
अस्माकम् (शम् , सुखरूपो भवतु । [ यजु० ३६।९ ] ॥ ९॥
भाषार्थ-मित्रदेवता हमारे निमित्त सुखरूप हों, भक्तले अंगीकार करनेवाले वरुण सुख-
रूप हों, भक्तके प्रति गमनशील अर्यमा हमारे निमित्त सुख करें, देवेश हमको कल्याण करें
देवगुरु और विस्तीर्णपादन्यासवाले व्यापक विष्णु भगवान् हमारे कल्याणकारी हो ॥ ९ ॥
+
शन्नोधात पबताशास्तपतसयशन
कनिक्कददेवपुजन्योऽअभिवतु॥१० ॥

१४०) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमी- ॐ शाल इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । वातादयो देवताः वि०पू० ॥ १० ॥ माष्यम्-(दातः) वायुः (नः ) भरमाकम् (शस् ) सुखकारी अपरुषः अध्या- धिजनकश्च (पवताम् ) वहतासू ( सूर्य ) जनान स्वस्कव्यापारेषु प्रेरयति सूर्यः (शम् ) सुखरूपः सदहनो अपजरूपश्च ( नः ) अस्माकम् ( तपतु ) किरणान लिस्तारयतु (पर्जन्यः) पिपर्ति पूरयति जनामिति पर्जन्यः पर्जन्येशः ( देव:) देव: (कनिक्रदत् ) अत्यन्त क्रन्दतीति शब्दं कुर्वन् ( न: ) अस्माकम् (शम् ) सुखकरम् ( अभिवर्षतु ) काशनिक्षाररहित यथातथा अमिसिञ्चतु [ यजु० ३६।१० ] ॥१०॥ भाषार्थ-उसकी कृपासे वायु हमको सुखरूप वहन करो, सूर्य हमको कल्याणके निमित्त ताप पान करो, मनुष्योंको जलसे तृप्त करनेवाला शब्दायमान देव हमको सुखरूप होकर वर्षा करो ॥ १० ॥ मन्त्रः। महानिशम्भवन्तुनशरात्रीप्रतिधीय ব্রাহ {১াংবালিং ২S इन्द्रावणातहत्या ॥ शोऽइन्द्रापुष गावालाती शालिहालोमालविवायुश यो । ११॥ ॐ अक्षानीत्यस्य दधीच ऋषिः । द्विपदा गायत्री छ । महो राध्यादथो देवताः। वि० पू० ॥ ११ ॥ भाष्यम्-( महानि ) दिनानि ( नः ) अस्माकम् ( शम् ) सुखरूपाणि ( भवन्तु ) भवन्तु ( रात्रीः) रात्री (शम् ) सुखरूपाः अस्मासु (प्रतिधीयताम ) प्रतिधातु महावीर इति शेषः। (इन्द्राग्नी) इन्द्राग्नी ( अमोभिः ) पालनैः कृत्वा (नः) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपी मक्ताम् (रातहव्या ) रातं दत्तं हव्यं ययोस्ती शतह व्यौ हवितृप्ती (इन्द्रावरुणा) इन्द्रावरुणौ (नः) अस्माकम् ( शम् ) शम्भ- वताम् ( वाजसाती) वाजस्य अन्नस्य सातौ निमित्तभूते (इन्द्रापूपणा ) इन्द्रपूषसंज्ञा देवी (नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपौ भवताम् । तथा ( सुविताय) माधुगमनाय

ऽध्यायः ९.]
माष्यसहिता।
(१४१)
साधुप्रसवाय वा तथा (शम् ) रोगाणां शमनाय (योः ) यानाय पृधारणाय च
भयानां रोग भयं च निवर्त्य (इन्द्रासोमा ) इन्द्रसोमी देवी (शस) सुखरूपी भवताम,
[ यजु० ३६ । ११ ] ॥ ११ ॥
भाषार्थ-उसी परमात्माकी कृपाले संपूर्ण दिन हमारे निमित्त कल्याणरूप ही संपूर्ण रात्री
कल्याणविधान करें, इन्द्र और जग्नि अपनी पालनाओंसे हमको सुखरूप हो, वृष्टिप्रद इन्द्र
और वरुण हमको कल्याण विधान करें मन्नको उत्पन्न करनेवाले इन्द्र मोर पूपा देवता हमको
सुखकारी हो, इन्द्र और सोमदेवता श्रेष्ठ गमन या श्रेष्ठ उत्पत्तिके निमित्त तथा रोगोंको
शान्त करने के निमित्त रोग भयके पृय करनेके निमित्त सुखकारी हो अथवा सुखकारी इन्द्र-
सोम देवता हमको कल्याणकारी हो ॥ ११ ॥
शन्नोवेधीरभिष्टाऽआपोसवपीतये ।।
शंश्योरमिलजन्तुनः॥१२॥
ॐ शन इत्यस्य धीच ऋषिः। गायत्री छ । आपो देवताः ।
वि० पू० ॥ १२॥
भाष्यम्-(देवीः) देव्यः दीप्यमानाः (यापः ) जलानि (नः) अस्माकम् ( अ--
मिष्टये ) अभिषेकायाभीष्टाय वा (पीतये ) पानाय (च) (शम् ) सुखरूपाः (मवन्तु)
भवन्तु, अस्माकं स्नाने पाने चापः सुखयियो भवन्तु । आपः ( शंयोः ) रोगाणां
शमनं अयानां यवनं पृथकारणं च ( अभिनवन्तु ) ( नः ) अस्माकं भयरोगनाशं कुर्वक
न्वित्यर्थः [ यजु० ३६ । १२ ] ॥ १२ ॥
मापार्थ-दीप्यमान जल हमारे अभिषेक मभीष्ट और पानके निमित्त. सुखरूप हो, हमारे
स्नान पानमें जल सुखरूप हो, रोगों के शमन मोर भयके पृयक करनेमें स्रवण करें अर्थात् पर-
मात्माके प्रसादसे जल हमको सुस्वकारी हो, अर्थात उत्तम जलपान करनेको मिलें जिससे
नीरोग रह ॥ १२ ॥
मन्त्रः
स्योनाथिविनोमवानाक्षरा निशिनी ।।
यच्छानुशम्भसुप्रथाः ॥१३॥
ॐ न्योनेत्यस्य मेधातिथिऋषिः । त्रिष्टुप् छं। पृथिवी देवता ।
वि० पू०॥१३॥

(१४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ नवमी-
भाष्यम्-( अक्षरा ) अक्षरः कण्टक कन्तपो वा कंपतेर्वाः कृन्ततेर्वा स्यागतिक
अंग इति [ निरुक्त० ९ । ३२ ] तहणं चौरदायादिदुःखनिवृत्त्यर्थम् । ल सन्ति
ऋक्षराः कण्टाः दुःखदायिनो यस्यां सा अनृक्षरा (निवोशनी) निविशन्ति जना यस्यां
सा तथा । (सप्रथाः ) प्रथमं प्रथः विस्वारः प्रथसा लह वर्तमाना सप्रथाः सर्वतः पृथुः
( पृथिवि) हे पृथिवि त्वसू (नः अस्माकम् (स्योना) सुखरूपा (भव ) भय । किञ्च
(नः ) अस्मभ्यम् ( शर्म) शरणम् ( यच्छ ) देहि [ यजु० ३६ । १३ ] ॥१३॥
भाषार्थ-हे भूमि ! कंटकहीन अर्थात् दुःखदायियोंसे हीन सुखसे बैठनेयोग्य सब ओरसे
पृथु हमको सुखरूप हो, हमको कल्याण दो अर्थात् पृथिवीमें स्थित सुकोमल विस्तृत यह शय्या
हमको सुखकारी हो, जल हमारे पापाको दूर करें, वा अपरूप परमेश्वर हमारे पापोंको भस्म
करें, अथवा यह जल हमारे शरीरका मल दूर करके हमको शुचि फरें ॥ १३ ॥
भाणोहियालयोमुवुल्तानऽऊर्जेदधातन॥
मुहेरणायुचक्षते ॥१४॥
म आपोहिष्ठत्वस्य सिन्धुदीप ऋषिः। गायत्री छन्दः । आपो देवता
वि० पू० ॥ १४ ॥
माण्यस्-(भापः)हे पापो याः यूयमेव ( मयोभुवः) सुखस्य भावयिव्यः (स्थ)
अवध, स्नानपानादिहेतुत्वेन सुखोत्पादकत्वमपां प्रसिद्ध तास्तादृश्यो सूर्यम् (न)
अस्माकम् (ऊर्ने ) रसाय ( दधातन ) स्थापयत यथा वयं सर्वस्य भोग्यस्य रसस्य
भोक्तारो भोम तथाऽस्मान्कुरुतेति भावः । किञ्च (महे ) महते ( रणाय ) रमणीयाय
(चक्षसे) दर्शनाय चास्मान् दधातनेत्यनुवर्तते । महद्रमणीयं दर्शनं ब्रह्म साक्षात्कारलक्षणं
तदस्माकं कुरुत । ऐहिकपारलौकिकसुख दत्त तृवोभावः । [ यजु० ३६।१४] ॥१४॥
भाषार्य-हे जलसमूह तुम सुखके करनेवाले सुखकी भावना करनेवाले स्नानपान मादिसे
-मुखके उत्पादक हो । हमारे वडे रमणीय दर्शनके निमित्त अर्थात् ब्रह्मसाक्षात्कार लक्षणयुक्त
और निश्चय ही रसानुभव वा ब्रह्मानन्दके अनुभव के निमित्त हमको स्थापन करो ॥ १४ ॥
यो शिवतमोरलस्तस्यभाजयतेहनः॥
शुतीरिवमातरः ॥१५॥

ऽध्यायः ९.] माष्यसहिता। ॐ योक इत्यस्य सिन्धुदीप ऋषिः । गायत्री ! आपो देवता । वि० पू० ॥१५॥ भाष्यम्-हे आपः (वा) युष्माकम् (यः) (शिवतमः ) शान्ततमः सुखैकहेतुः ह रसः) रसोऽस्ति (इह) अस्मिन्कर्मणि इह लोके वा स्थितान् (ना) अस्मान् (तस्य) तस्य रसस्य (भाजयत) भागिनः कुरुत । तत्र दृष्टान्तः ( उशती) उझाल्या काम- यमानाः प्रीतियुक्ताः ( मातरः) मातरः (इब) यथा सकीयस्तन्यरसं बालं पाययन्ति वदत् ।। यजु० ३६ । १५ ] ॥ १५ ॥ भाषार्थ-हे जो ! मुम्हारा शान्तरूप सुखका एकही कारण रस इस कर्म वा इस लोकमें हमको उस रतका भागी करो, प्रीतियुक्त माता जैसे अपने स्तनोंको वालकको पिलाती गूढार्थ-हे परमात्मन् ! आपका जो शान्तरूप ब्रह्मानन्द है कृपा कर हमको उस अमृ- तका भागी करो ॥ १५॥ मन्त्रः। लम्माऽअरङ्गमामवोवस्यक्षायुजिथ । आपोजुनयंथाचुन ॥१६॥ ॐ तस्मा इत्यस्य सिंधुदीप ऋषिः । गायत्री छन्दः । आपो देवताः । वि० पू० ॥ १६॥ माष्यम्-(आरः) हे आपः यूयम् ( यस्य ) पापस्य (क्षयाय) शिनाशाय अस्मान (जिन्वथ ) प्रीणयथ ( तस्मै ) तादृशाय पापक्षयाय ( मरम् ) शिमम् (क) अस्मान्न ६ नमाम) गच्छाम वयं शिरसि प्रक्षिपामेत्ययः । यद'-(यस्य ) अन्नस्य (क्षयाय ) निशसाथम् यूयमौषधीः (जिन्वथ) तर्पयथ तस्मै तदन्नमुद्दिश्य वयम् (अरम् ) पर्याप्त रथा भवति तथा (वः) अस्मान् (गमाम ) गच्छाम । किञ्च हे आपः (नः ! अस्मान् (जनयथ च ) पुत्रपौत्रादिननने प्रपोजतेत्यर्थः । यहः-हे आपः वा युष्मत्सम्ब- धिनस्तस्य पर्याप्तिं वयं गमाम गच्छेम यस्य क्षयाय चतुर्थी पष्ठ्यर्थे । क्षयस्य निवा- सस्य जगतामाधारभूनस्य यस्याहुतिपरिणामभूतस्य रसस्यैकदेशेन यूयं ब्रह्मादिस्तम्ब- पर्यन्तं जगत् जिन्वय तर्पयय पश्चाहुतिपरिणामक्रमेणेति भावः । हे आपः नोऽस्मान् तत्र ओकृत्वेन जनयर्थ उत्पादयथ ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे जले ! तुम्हारे संबंधी उस रसके निमित्त हम शीघ्र प्राप्तिको चलें, जिसके निवास जगत्के आधाभून अर्थात् आहुतिपरिणामभूत जिस रसके एकदेश तुम प्रेमासे

(१४४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ नवमी-
स्तम्बपर्यन्स जगत्को तृप्त करते अर्थात् पंचाहुतिके परिणामक्रमसे तृप्त कर प्रसन्न करतेहो
और उसके भोगसे हमको उत्पन्न करतेहो, अथवा जिसके निवाससे तुम प्रसन्न होतेहो उस
गुण वा रसकी प्राप्तिके निमित्त विशेषकर हम तुम्हारे निकट प्राप्त हैं, हे जलो ! तुम हमको
प्रजा उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य दो परमात्माकी प्रार्थना भी इसी मंत्र में है, जिसके प्रसाद
मुक्तिका सुख प्राप्त होताई ॥ १६ ॥
.
यौ शान्तिरन्तरिक्षुठशान्ति पृथिवी शा-
नितुरापाशान्तिोषधयुक्शान्तिः ॥ वनु
हप्पतयह शान्तिर्विग्वेदेवा शान्तिलाशा-
न्तिहलाई शान्तिः शान्तिरेवशान्तित्सा
माशान्तिरेधि ॥ १७ ॥
* चोरित्यल्य दधीच ऋषिः । शक्करी छन्दः । विश्वेदेवा देवता ।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥ १७ ॥
माष्यम्-( द्यौः ) धुलोकरूपा या (शान्तिः ) शान्तिः ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरि-
क्षरूपा च या ( शान्तिः) शान्तिः ( पृथिवी) भूलोकरूपा या (शान्तिः शान्तिः
(आप) जलरूपा या (शान्तिः ) शान्तिः ( मोषधयः) ओपधिरूपा या (शान्तिः)
(वनस्पतयः) वनस्पतिरूपा या शान्तिः (विश्वेदेवाः) सर्वदेवरूपा या (शान्तिः)
शान्तिः (ब्रह्म ) त्रयीलक्षणपरं वा तद्रूपा या (शान्तिः) शान्तिः (सर्वम् ) सई
जगदूपा या (शान्तिः ) ( शान्तिरेव शान्तिः) या स्वरूपतः शान्तिः (या) शान्तिः
(मा) मां प्रति (एधि) अस्तु । महावीरप्रसादात् सर्व शान्तिरूपं मां प्रत्यस्त्वित्यर्थः ।
यदा-द्यौरित्यादिषु विभक्तिव्यत्ययः । पृथिव्यामप्स्योषधिषु सर्वस्मिंश्च या शान्तिः सा
आं प्रत्यस्त्वित्यर्थः । [ यजु० ३६ । १७ ] ॥ १७ ॥
भाषार्थ-द्युलोकरूप शांति, भौर अन्तरिक्षरूप शान्ति, पृथिवीरूप शान्ति, जलरूप शांति,
औषधिरूप शांति, वनस्पतिरूप शांति, विश्वेदेवासबांध शांति, या सर्वदेवरूप शान्ति, त्रयी-
युक्त शांति, सर्वजगतरूप शांति, स्वरूपसेही शांति, जो शांति है वह शांति मेरे प्रति
अर्थात् यह सब मुझको शान्तरूप हो ॥ १७ ॥

ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिता
(१४५)
हतुहहमामिन्नत्यमाचाक्षुषाशीणिमता-
निसमीक्षन्ताय ॥ शिल्पाहञ्चशुपासही-
णिभूतानिसमीक्षे ॥ मिन्नत्युचाक्षुषासमी-
क्षामहे ॥१॥
ॐहत इत्यस्य वीच ऋषिः । भुरिगार्षीजगतीछन्दः । महावीरो
देवता । वि० पूर्ववत् ॥ १८॥
भाष्यम्-( दृते ) ह-विदारे विदीर्णे जराजर्जरितेऽपि शरीरे हे महावीर (मा) मा
(ठेह) दृढीकुरु । यद्वा-ते विदीर्णे कर्मणि मां दंह अच्छिदं कर्म कुरु । यदा-स-
सुपिरत्वात् सेक्तृत्वाच्च दृति-शब्देन, महावीरः हे दृते. महावीर मां त्वं दृढीकुरु कथं
दाढ्यम्, तदाह-( सर्वाणि भूतानि ) प्राणिनः (मा) माम् ( मित्रस्य ) मित्रस्य
(चक्षुषा) नेत्रण ( समीक्षन्तास् ) सम्यक् पश्यन्तु मित्रदृष्ट्या सर्वे मां पश्यन्तु नारि-
दृष्ट्या सर्वेषां प्रियो भूयासमित्यर्थः (अहम् ) अहमपि ( सर्वाणि भूतानि ) प्राणि-
जातानि ( मित्रस्य चक्षुपा) मित्रदृष्टया ( समीक्षे) पश्यामि सर्वे मे प्रियाः सन्तु
(मित्रस्य चक्षुषा ) मित्रदृष्टया ( समीक्षामहे ) वयं पश्यामः । परस्पराद्रोहेण सर्वानहि-
सन्तो मित्रदृष्ट्या पश्याम इति सरलार्थः । [ यजु० ३६।१८] ॥ १८ ॥
भाषार्थ-हे सेचनप्तमर्थ देव ! मुझको दृढ कीजिये संपूर्ण प्राणी मुझको मित्रके नेत्रोंसे अक्ष-
लोकन करें, मैं सब प्राणियोंको मित्रकी चक्षुसे देखताहूं, अर्थात् सब मुझे प्यारे हों, अर्थात्
मित्रचक्षु शान्त होताहै, न मित्र किसीको मारता न मित्रको कोई मारताहै, इस प्रकार पर-
स्पर किसीको अहित न विचारते हम मित्रकी चक्षुसे सबको अवलोकन करें ॥ १८ ॥
हतुहमाज्योक्तैसुन्दर्शिजीच्याखुल्यो
क्तेसुन्दशिजीच्यासम् ॥ १९॥
ॐ हत इत्यस्य दधीच ऋषिः। आर्युष्णिक छन्दः । महावीर
देवता । शान्तिपाठे वि० ॥१९॥

(१४६)
रुद्राष्टाध्यायी--
[नबमो-
भाष्यम्-(हते) हे वीर (मा) मां (दृह) दृढीकुरु, आदराथै पुनर्वचनम् ।
हे महावीर (ते ) तव ( सन्दृशि) सन्दर्शने अहम् (ज्योक् ) चिरम् ( जीव्यासम्)
जीवेयम् । पुनरुक्तिरादारार्थी हे देवेश ते सन्हाश ज्योक् जीव्यासम् । चिरञ्जीयमिन् ।
त्यर्थः । [ यजु० ३६।१९ ] ॥ १९ ॥
भाषार्थ-हे महावीर परमदेव ! मुझको दृढ करो, तुम्हारी दृष्टि में वा मापके दर्शन में चिर;
कालतक मैं जीवित रहूँ, मापके दर्शन करता दीर्घकालतक मैं जीवित रहूं ॥ १९ ॥
मन्त्रः।
नमस्तोहरलेशोचिषुनमस्तेऽअस्त्वचिंः ।
अन्याँस्तेऽअरूलतपन्तु तय याबुको
समय शिवोभव ॥२०॥
ॐ नमस्त इत्यस्य लोपामुन्ना ऋषिः । भुरिगार्थी बृहतीछ० अग्नि-
देवता । चित्यारोहणे वि० ॥ २० ॥
भाष्यम्-(हिरण्य सकलसहितं स्तुक्स्थमाज्यं दधिमधुघृतकुशमुष्टियुता पात्री एत-
इश्मादायाध्वर्युश्चित्यानिमारोहति ब्रह्मयजमानौ त्वग्नेदेक्षिणत उपविशत
इति हे पन्ने (ते)
वन ( हरसे) हरति सर्वर खानिति हरस्तस्मै ( शोचिपे ) शोचनहेतवे तेजसे ( नमः)
नमोऽस्तु (वे) तब (मचिपे) पदार्थपकाशकाय तेजो (नमः) नमोऽस्तु (ते)
सव ( हेतयः ) ज्वालाः ( अस्मत् ) अस्मत्सकाशात् ( अन्पाः ) अन्यान्यस्मद्विरो-
धिनः विरुधाः (तपन्तु ) दहन्तु एवं त्वम् ( पावकः ) शोधकः सन् ( अस्मभ्यम्)
शिवः) कल्याणः (अव) एतदर्थं च नमस्कृत ऽग्निात्मक विरुद्धान् दहत्वस्माकं
बाल्याणाय सवित्यर्थः। [ यजु० ३६।२० ] ॥ २० ॥
मापार्थ-हे अग्ने ! तुम्हारे सब रसोंके आकर्षण करनेवाले. तेजस्वरूप ज्वालाके निमित्त
नमस्कार है, तुम्हारे पदार्थ प्रकाशक तेजके निमित्त नमस्कार हो, आपकी ज्वाला हमसे दूस-
रोको तपामो हमको शोधक कल्याणकारक हो ॥ २० ॥
नमस्तेमस्तुविधुतुनसंस्तुतलायनवें।
नगरलेशगवन्नस्तुवतस्य सुमीहले॥२१॥

ध्यायः ९.] नारमहिना (१४७) --- ॐ नमस्त इत्यस्पदवीच ऋषिः । अनुप छन्दः विद्युत्स्तनायित्नु- छपे देवते । वि० पूः ॥२१॥ भाष्यम्-( भगवन् ) ३ भागवन् ! हे महातीर ( विद्याने ) विद्यादपाय (स्तनाय लये ) स्तनयित्नुः गाजतं तमाय (ते ) ( नमः ) नमः ( मस्तु) अस्तु (यतः) यतः कारणात् (स्वः स्वगतुं त्वं ( समीहो ) चेष्टतेऽतः ( ते ) तुभ्यम् (नमोऽस्तु) नतिरस्तु । [ बजु० ३६।२१] ॥ २१ ॥ नापाय-हे भगवन् ! आपके विशुरूपके निमित्त नमस्कार हो, गर्जनारूप आपके निमि. त नमस्कार है, जिस कारण वर्गमुख देनेको चेष्टा करते हो, इस कारण आपके निमित्त वार- पार नमस्कार हो, अर्थात् नाप के अनेक रूप है, भाप सब प्रकार हमारे सुखके निमित्त यत्न करतेहो नापको प्रणाम है ॥ २१ ॥ मन्त्रः। यतोय तहसमाहसततोनोऽअभयङ्गुरु ।। शन कुरुष्वुजान्यो यन्त्र पशुश्य ॥२२॥ ॐ यत इत्यस्य दधीच ऋपिः भुरिक प्राजापत्या त्रिष्टुप् छन्दः । परमात्मा देवता । वि० पू० ॥२२॥ भाग्यम्-ई महावीर ( पतः यतः ) यस्माद्यस्मापात् समीहसे । यदा-यस्माद्यस्मा- इश्वीरताचम् (तमीहसे ) मा.स्वपकर्तुश्चेष्टसे (ततः ) ततस्ततः ( नः ) अस्माका (अभयन) निर्भयम् (कु: ) कुरु किंच (नः.) अस्माक (प्रजाभ्यः ) प्रजाभ्यः (शम् ) सुखम् (कुन कुरु (न:) अस्माकम् (पशुन्यः) पशुस्यः (अभयम् ) भीत्यभावं कुछ। [ यजु० ३.२२ ] ॥ २२ ॥ भाषाय-हे भगवन् ! आप नि: जिस मते घटा करते हो अथवा जिस जिस दुश्चरित्रसे हम- को बचाने की इच्छा करतेहो, अश्या जिस समय हमको सब प्रकार मुम्ब करनेके निमित्त इच्छा करतेहो उस उस रू.पसे वा दुश्चोरेनसे का चेष्टासे इमको भयरहित करो' हमारी प्रनाओंके • निमित्त मुख करो, हमारे पशुओंके निमित्त सुख कीजिये, मर्यात हमारी प्रना और पशुभय रहित होकर आपके दिये हुए सुखभोगमें समर्थ ही ॥ २२ ॥ मित्रियानुऽआपऽओषधयल्सन्तु दुर्मिम - [ नवमो- (१४८) উল্লাহ্মা- . ब्रुियास्तसन्तुषोमान्द्रोष्टपञ्च वयं हिम॥२३॥ * सुमित्रियान इत्यस्य दीर्घतमा ऋषिः । निच्यत्माजापत्या गायत्री छन्दः । आपो देवताः । जलाभिमंत्रणे वि० ॥२३॥ माया-( आपः) जलानि ( गोषधयः) गोषधयः (नः) अस्माकम् ( सुमिः त्रियाः) साधुमित्रसेनावस्थिताः ( सन्तु ) भवन्तु ( यः) शत्रः (अस्मान् ) (देष्टि) वैरं करोति (वयं च ) चयमपि ( यस् ) शत्रुम् (द्विष्मः) द्वेष कुर्मः (तस्मै) उम. यात्मशाय शत्रवे माप ओषधयश्च (दुर्मित्रियाः) अमित्रत्वेनावस्थिताः सन्तु । [ य- जु० ३६।२३ ] ॥ २३ ॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर ! जल वा मोप.ध हमारे निमित्त सुखदायक हो, और जो हमसे द्वेष करता है वा हम जिससे द्वेप करते हैं, उसके लिये दुःखदायक हा आशय यह कि हम तो कि- सीसे द्रोह करना नहीं चाहते पर जो हमले द्वेप करते हैं तब हमारे मनमें देप होताह आ-- पकी कृपासे द्वेषी शत्रुको औषधि जल दुःखरूप हो ॥ २३ ॥ सूत्रः। पुरु m श्याम शुरई शुतजीवनशुरशुतशृणु शासशुरद शतपना नवालशरदः शुतनदीना स्थानशुर शतम्सूर्याश्वशुरद शुतात् ॥२४॥ বিভিন্নাহ: || * तच्चारित्यस्य दधीच ऋषिः ब्राह्मी त्रिष्टुप् छन्दः । सूर्यो देवता । वि० पू० ॥२४॥ भाष्यम्-एतैमन्त्रैर्यो महावीरोऽस्माभिः स्तुतः (तत्) तत् ( देवहितम् ) देवहितं स्थापितम् । यहा-देवानां हितं मियम् ( शुक्रम ) शुक्लं पापासंसृष्टं शोचिष्मद्वा तत् (चक्षुः ) जगतां नेत्रभूतमादित्यल्पम् ( पुरस्तात् ) पूस्यां दिशि (उच्चरत ) उच्च- रति उदेति तस्य प्रसादात् ( शतम् ) ( शरदः ) वर्षाणि ( पश्येम अव्याहत- ऽध्यायः १०.] माष्यप्ताहता। (१४९) चक्षुरिन्द्रिया भवेम (शतं शरदः) (जीवेम ) अपराधीनजीवना भवेम ( शतं शरदः ) शतं समाः (शृणुयाम )स्पष्टश्रोनेन्द्रिया भवेम (शतं शरदः) (प्रब्रनाम) अस्खलितवागिन्द्रिया भवेम (शतं शरदः ) ( मदीनाः) ( स्याम् ) न कस्याप्पग्रे दैन्यं कुर्याम (शतात् शरदः) शतवर्षापर्यपि ( भूयः च ) वहुकालं पश्येमेत्यादि योज्यम् । [ यजुः ३६ । २४ ] ॥ २४ ॥ भाषार्थ-वह देवतामोद्वारा स्थापित अथवा देवतामोंके हितकारी जगत्के नेत्भूत शुक्ल- मलसे रहित शुद्ध वा प्रकाशरूप पूर्व दिशामें उदय होताहै, परमात्माके प्रसादसे सौ शर पर्यन्त देखें, अर्थात् शतवर्षपर्यन्त हमारे नेत्रेन्द्रियकी गति निर्वल न हो, सौ शत् मातुः मोत अपरावीन होकर जियें, सौ शरद पर्यन्त स्पष्ट श्रोत्रइन्द्रियवाले हो, सौ शरद पर्यन्त मस्खलितवाणी युक्त हों, सौ शरद पर्यन्त दीनतारहित हो, सौ शरदेखि अधिक कालपर्यन्त भी देखें, सुनें और जीवित रहैं ॥ २४ ॥ विशेष-इसका सूर्योपस्थानमें भी पाठ होता है, यह सव. परमात्माको प्रार्थना उपासनाके मंत्र हैं ॥ २४॥ इति श्रीरुद्राष्टक पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसभान्वितःशान्त्यध्यायः ।। मन्त्रः। अथ रुद्रे स्वस्तिमार्थनामन्त्राऽध्यायः। हरिः ॐखुल्तिनुऽइन्द्रोद्धश्रवाहस्खुस्ति qজ্বাল্লিগঃ ফহিলাঙ্গল रिष्टनेमिस्खुस्तिनोबृहस्पतिर्दधातु ॥१॥ ॥ ॐ स्वस्तीत्यस्य गौतम ऋषिः । विराट् स्थाना त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वेदेवा देवताः । पाठे विनियोगः ॥ ३ ॥ भाष्यम्-(वृद्धश्रवाः) वृद्धं प्रभूतं श्रवः श्रवणं स्तोत्रं हविलक्षणमन्नं वा यस्य तादृशः (इन्द्रः) इन्द्रः (नः) अस्माकं स्वस्तीत्यविनाशनाम (स्वस्ति ) अविनाश (दधातु) विदधातु (विश्ववेदाः) विश्वानि वेत्तीति विश्ववेदाः । यदा-विश्वानि सबै वेदवेदांसि ज्ञानानि धनानि वा यस्य तादृशः (पूषा ) पोषको देवः (न:) अस्माकम् (स्वस्ति ) स्वस्ति विदधातु (अरिष्टनेमिः ) नेमिरित्यायुधनाम [ निघं० २ । २०.] अरिष्टोऽहिंसितो नेमिर्यस्य वा यत्सम्बन्धिनो स्थनेमिर्न हिंस्यते सेोऽरिष्टनेमिरेवम्भूतः । तायः तृक्षस्य पुत्रः गरुत्मान् (नः) अस्माकम् (स्वस्ति ) अविनाशं विदधातु

(१५०)
रुद्राष्टाध्यायी
[ दशमो-
तथा (वृहस्पतिः) देवानां पतिः पालायिता (न:) अस्माकम् (स्वस्ति) अविनाश
विधातु । [ यजु० २५.१९ ] ॥ १ ॥
भाषार्थ-वृद्धश्रवा (वडी कीर्तिवाले ) इन्द्र हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, सर्वज्ञपूषा
हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, आरष्टनेमि ताय (लाक्ष्य-रथ अर्थात् जो रथकी नेमिकी
अर्थात चक्रधारीकी गति कोई भी रोकनेमें समर्थ नहीं है। तिलको ही अरिष्टनेमि तार्थ
कहते हैं, यहाँपर रथरूपसे वर्णन हुआ) हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, बृहस्पति
हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें ॥ १ ॥
सन्त्रः।
ॐपर्यः पृथिव्यापयुऽओषधीषुपयोदिव्यु-
न्तरिओषयोधास्पयस्वतीला प्रदिशः सन्तम
होश ॥२॥
11
.
ॐ पय इत्यस्य लुशोधानाक ऋषिः। विराटू छन्दः। अग्निदेवता।
वि० पू० ॥२॥
भाष्यम्-हे अग्ने हे देव त्वम् ( पृथिव्याम् ) भूम्याम् ( पयः ) रसम् (धा)
धेहि स्थापय (च)(ओषधीषु ) वनस्पतिषु ( पयः ) रसम् ( धाः ) स्थापय
(दिवि ) स्वर्ग च ( अन्तरिक्षे ) अन्तरिक्षे च (पयः ) रसम् (धार) स्थापय किञ्च
(मह्यम् ) मदर्थ ( प्रदिशः ) दिशो विदिशश्च (पयखतीः) पयस्वत्यो रसयुताः सन्तु
आहुतिपरिणामेन पृथिव्यादयो ममाभीष्टदा भवन्वित्यर्थः ।[यजु०१८६३६ ] ॥ २ ॥
भाषार्थ-पृथिवी देवी हमारे निमित्त ( अर्थात् हमको देनेके लिये ) रस धारण करें,
औषधियें भी हमारे निमित्त रस धारण करें, स्वर्गलोक और अन्तरिक्षलोकभी हमारे निामत्त
रस धारण करें अर्थात् आइतिके परिणामसे पृथिवी लादि हमको भगवत्कृपासे अभीष्ट
देनेवाले हों ॥ २॥
विष्णोररार्ट
मासिविष्णोश्मनेल्ल्युोहि-
ष्णोल्यूलिहिष्णोधभुवोति ॥वैष्णुव-
मंसुिविष्णदेवा ॥३॥

.
१०.
माप्यसरिता।
(९५१)
विष्णारावरियल्यात्यो दीर्घतमा ऋति। याजुपी उष्णिक
छः । विष्णुता । हविधीनोपरिमापारणे दि॥ ॥
भाष्यम्-विर्धानात्ये ६ शकटे दक्षिणोत्तरमानयोः स्थापयित्वा तदावरकत्वेन
परितो क्षविर्धानाख्यं मह जुर्यात् । स च मण्डपो विष्णुदेवताकत्वादिष्णुरित्युपचर्यते
वियोश्च मृतिधरम्य वाक्यबननामाललाटाख्योऽवयवोस्ति, तद्धनिर्धानमण्डपस्यापि
पूर्वद्वारहनिस्तम्भयोमध्ये काचिदर्भमाला प्रथ्यते, तां मालां तद्वन्धनाधारतियग्वंशं वा
सम्बोध्य पुरुष सम्बोध्य ललाटत्वेनोपर्यते, हे दर्भमयमालाधारवंश । त्वं (विष्णोः)
विष्णुमुर्तित्वनोपचरितस्य हविर्धानमण्डपत्य (राटम् ) ललाटस्थानीयः (आसि)
यसि हे राड्यन्ती युवाम् (विष्णोः) विष्णु नामकस्य हविर्धानमण्डपस्य (श्नले
स्यः) मोटसन्धिन्य भवय [ हार्योः परिपीव्यति लस्यूननि प्रतिहतया रज्ज्या विष्णोः
स्थरसीवि कात्यायनः ] हे लस्यूजनि त्वम् (विष्णोः ) हविर्धानस्य ( स्यूसि )
सीव्यन्तेऽनेनेति स्यूः सूचिरसि [ विष्णोः घोसीति अन्यीकरोति ] हे रज्जुग्रन्थे त्वम्
(विष्णोः) हविर्धानस्य (ध्रुवः) ग्रन्थिः ( असि ) भवसि [ प्राग्वंश हविर्धान
निष्टाप्य वैष्णवमसीत्यालभत इति का०] हे हविर्धानत्वम् (वैष्णवम् ) विष्णुदेवताक-
लेन तत्सम्बन्धि ( असि ) भवसि तस्मात् (विष्णवे ) विष्णुप्रीत्यर्थम् (त्वा ) खां
स्पृशामाति शेपः। [ यजु०५।२१] ॥ ३ ॥
भाणार्य-हे तिर्यग्वंशवीर । तुम इस यज्ञियमंडपके रराटी (द्वारके दो खंभोंपर नीचेको
मुलबाला लईवृत्ताकार जो तिरछा वंशचीर होताहै, उसको रराटी कहते हैं, यही इस
मंडपना मायारूप है) होतेहो हे रराटीप्रान्तद्वय ! तुम दोनों इस यज्ञियमंडपकी ओष्ठसं-
धिम्प होतीहो हे लस्यूजनि ! (बडी सुई वा सूजा) तुमही इस यज्ञियमंडपकी सूची हो,
हे रस्सीकी गांड ! तुम इस यज्ञियमंडपकी गांठ हो, इससे दृढ होवो , हे प्राग्वंश । पूर्वपश्चि-
मको सम्मा करके स्यापित पांस । इस मंडपकी उसका प्रधान अवलवन नडावांस (आडा)
तुम इस यज्ञियमंडपकी छत्तके मध्यकाले प्रधान वांस हो, इस मंदपकी Eढताकी परीक्षा
करने के लिये तुनको स्पर्श करताहूँ इस मंत्र में वंशादिमें स्थित सर्वज्ञदेवर्क मार्थना उस
उस रूप वर्णन की है ॥ ३ ॥
मन्नः।
ॐ अधिदेवताहातोदेवतास्थ्यौदेवतांचन्द्रमा
देवताहर्सबोडवाहावतादिल्यादेवतातुरू-
सौदेवतुविश्वेदेवादेवताबृहस्पति तन्नो
देवताविरुणोदेवता ॥४॥

(१५२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[दशमा---
ॐ अग्निस्त्यिस्य विश्वेदेव ऋषिः । भुरिग्वामी त्रिष्टुप् छ ।
अन्यादयो देवताः इष्टकोपधाने वि० ॥४॥
भाष्यम्-इष्टके त्वमग्न्यादिदेवत्तारूपाऽसि तां त्वामुपदधामीति सर्वत्र शेषः। अग्न्या
दीनां देवतात्वं प्रसिद्धम् । अग्निदेवता वातो देववेत्येता वै देवताश्छन्दासि तान्येवैः
तदुपदधातीति श्रुतेः । सर्वं सुगमम् । [यजु० १४।२० ] ॥४॥
भाषार्थ-अग्निदेवताकी प्रार्थना करताहुआ, यह इष्टकास्थापन करताहूँ १ वायुदेवताका
ध्यान करताहुआ यह इष्टका स्थापन करताहूँ २ सूर्यदेवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका
स्थापन करताहूँ ३, चन्द्रदेवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करताहूँ ४, वसु-
देवताओंका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ५, रुद्र देवताओंका ध्यान
करता हुभा यह इष्टका स्थापन करताहूं ६, आदित्य देवताओंका ध्यान करता हुआ यह
इष्टका स्थापन करताहूं ७, मस्त देवताओंका ध्यान करताहुआ यह इष्टका स्थापन करता
हूं ८, विश्वेदेवादेवताओंका ध्यान करता हुभा यह इष्टका स्थापन करताहूं ९, बृहस्पतिदेव-
ताका ध्यान करताहुआ यह इष्टका स्थापन करताहूं १०, इन्द्रदेवताका ध्यान करता हुआ
यह इष्टका स्थापन करताहूं ११, वरुण देवताका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन
करताहूं ॥ १२ ॥ ४ ॥
~
জুলাঙ্গালিন্ত্রীড়াবাসুলী
नमः ॥ भुवनालिलवेमवस्यमांमुवोडू
बायनमः॥५॥
भाष्यम्-मेधाविनः पुरुषस्य ज्ञानोत्पादनाय महादेवसम्वन्धिषु पञ्चवक्रेषु मध्ये
पश्चिमवक्रप्रतिपादक मन्त्रमाह-(सद्योजाताय ) एतन्नामकं यत्पश्चिमव तद्पं परमे.
श्वरं (प्रपद्यामि) प्रामोमि ताशाय ( सद्योजाताय ) महादेशय (वै) ( नमः )
नमो स्तु हे सद्योजात । (अवेनवे ) तत्तजन्मनिमित्तं ( मां) मान ( न भवत) न प्रेर
येत्यर्थः । किन्तर्हि ( अतिभवे ) जन्मातिलंघनानिमित्तं (भवस्व) तत्त्वज्ञानास प्रेरय
(भवोद्भवाय ) भवात्संसारात् उद्धर्ने सद्योजाताय ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ५ ॥
भाषार्थ-ज्ञानप्राप्तिके निमित्त महादेवसम्बधिपंचमुखोंमें पश्चिममुख प्रतिपादकमंत्रका वर्णन
करते हैं। सद्योजातनामक परमेश्वर के रूपको प्राप्त होताहूं सद्योजातके निमित्त प्रणाम है,
हे देव ! अनेक जन्मों में मुझे भन प्रेरण करो, किन्तु जन्मके दूर करने के निमित्त तत्त्वज्ञानके
निमित्त मुझे प्रेरण करो । संसारके उद्धारकर्ता सद्योतजातको प्रणाम है ॥५॥

ऽध्यायः १०.
भाष्यसहिता ।
(१५६)
वामदेवाथुनमोज्येष्ठायुलम-श्रेष्ठायुगमों
रुद्रायुनमुः कलविकरणायुनमोबलविक
रणायुनमः॥६॥बलायुनलोबलप्रमथ-
नायु नमुः सर्वभूतहमनाय नमामुनो-
न्मनायुनमः ॥७॥
भाष्यमू-उत्तखक्रातिपादक मन्त्रमाह-(वामदेवाय नमः) उत्तरवरूपः वामन .
देवः तस्यैव विग्रहविशेषाः ज्येष्ठादिनामकाः एते महादेवपीठशक्तीनां वामादीनां नवानां
पतयः पुरुषाः तेभ्यो नवभ्यो नमस्कार अस्तु ॥ ६ ॥ ७ ॥
भावार्थ-
-उत्तरमुखका प्रतिपादक मंत्र कहते है-उत्तरमुस्वरूप वामदेवको प्रणाम है, उसीके
विग्रह ज्येष्ठादिनाम हैं, यह महादेपकी पीठशक्तियों के स्वामी हैं । वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ,
रुद्र, कालकल, विकरण, बलविकरण, बल, वलप्रमथन, सर्वभूतोंके दमन करनेवाले, मनोन्म-
नके निमित्त नमस्कार है ॥ ६ ॥ ७ ॥
मन्त्रः
अघोरेश्योथुधोरेन्योघोरघोरतरेषयः ।।
सक्युःसर्वशवेन्योनमस्तेअस्तुरुन्द्ररूप-
यः॥८॥
भाष्यसू-दक्षिणवत्रप्रतिपादकमन्त्रमाह-( छाघोरेभ्यः ।) अघोरनामको दक्षिण--
वक्ररूपो देवः तस्य विग्रहाः अघोराः सात्विकत्वेन शान्ताः अन्ये तु (घोराः ) राज-
सत्त्वेन उग्राः अपरे तु तामसत्वेन (घोरतराः ) घोरादपि घोरतराः (शर्व) हे शव
परमेश्वर (ते) त्वदीयेभ्यः पूक्तेिभ्यः त्रिविधेभ्यः ( सर्वेभ्यः ) ( रुद्ररूपेभ्यः )
सर्वतः सर्वेषु देशेषु सर्वेषु च कालेषु ( नमः ) नमः ( अस्तु ) भवतु ॥ ८॥
भाषार्थ-दक्षिणपत्र प्रतिपादक मंत्र कहते हैं-तत्त्वगुणयुक्त होनेसे अघारे, राजस होनेसे.
घोर और तामससम्बन्धसे घोरतर शर्व प्रलयमें जगत्के हरनेवाले हम आपके तीन प्रकारके,
रूपोंको सव देशकामें प्रणाम करतेहैं आपके रुद्र शर्व सर्व रूपोंको नमस्कार है ॥ ८॥

( १९४) रुद्राष्टाध्याची - [दशमी- तत्पुरगायविहेमहादेवाय धीमहि ।।त नोकः प्रचोदयात् ॥९॥ माध्यम्-प्राग्वऋदेवः तत्पुरुषनोमका द्वितीयार्थ चतुर्थी । (तत्पुरुषाय ) तत्पुरुष क्षेत्र (विद्महे ) गुरुशास्त्रमुखाजानीमा ज्ञात्वा च (महादेवाय ) तं महादेवं ( धीमहि ) ध्यायेम (तत्) तस्मात्कारणात् (रुद्रः) देवः (नः) अस्मान् ( प्रचोदयात् ) ज्ञानध्यानार्थ प्रेरयतु ॥ ९॥ भाषार्थ-पूर्वमुखप्रतिपादक मंत्र कहते हैं, तत्पुरुपदेवको गुरु शास्त्र मुखसे जानतेहैं, जानकर उन महादेवको ध्यान करतेहैं, इस कारण वह रुद्र हमको ज्ञान ध्यान के लिये प्रेरणा करे९॥ मन्त्रः॥ AIR ईशानः सर्वविद्यानागाश्वरः सर्वभूता- नाबालिपातुर्वणोधिपतिवमाशि- बोअस्तुसुनाशिलो॥ १०॥ भाष्यम्-ईशानः योऽयमूवको देवः सोयम् ( सर्वविधानाम् ) वेदशास्त्रादीनां चतुःपष्टिकलाविधानाम् (ईशानः ) नियामकः तथा ( सर्वभूतानाम् ) अखिलमाणि- नाम् (ईश्वरः ) नियामः (ब्रह्माधिपतिः ) वेदस्याधिकवेन पालकः तथा (ब्रह्मणः) हिरण्यगर्भस्य (अधिपतिः) मधिपतिः ताशः (ब्रह्मा) ब्रह्मा अस्ति भवृद्धः परमात्मा सोऽयम् (मे) मसानुग्रहाय (शिव:) शान्तः (अस्तु :) अस्तु (सदाशिवोम् ) स एव सदाशिवः ॐ अहं भवामि ॥ १० ॥ मापार्य-उर्ध्वमुखदेवका प्रतिपादक मंत्र वेदशास्त्रादि विद्या जोर चौंसठ कलामौके निया- अक लमस्तप्राणियोंके नियामक वेदके विशेषरूपसे पालक .हिरण्यगर्भके अधिपति ब्रह्मारूप सो परमात्मा मुझपर अनुग्रह करने के लिये शान्तरूप ही मैं सदाशिवरूप हूं यह ६ मन्त्र खत्तरीयारण्यकके हैं ॥ १० ॥ शिवोनामाथि गतिस्तापुतानमस्ते भत्तुभालाहिन्सी । निर्वतयारूपाणु-

ऽध्यायः १०.]
माष्यसहिता ।
(१५५)
पन्नाधायमुनायरायपोचायतम-
जस्त्विायसुवीर्याय ॥११॥
शिवानामासति व्याख्यातं रुद्राष्टके ६८ मंत्रव्याख्यायाम् ॥१३॥
भाषार्थ-शिवोनामासि इसकी व्याख्या रुद्रीके ६ ! ८ मंत्रमें होगई ॥ ११ ॥
मन्त्रः
ॐविश्वानिदेवसवितदुरितानिपरासुव ।।
यछन्तन्नु आसुवा ॥१३॥
ॐ विश्वानिदेवेत्यस्य नारायण ऋषिः। गायत्री छन्दः । सवित
देवता। प्रार्थने वि० ॥ ३२॥
भाष्यम्-(देवसवितः ) देवसवितः ( विश्वानि) सर्वाणि (दुरितानि)
पापानि ( परासुव) दूरे गमय ( यत् ) यत् ( भद्रम् ) कल्याणम् ( तत् ) तत्
(न:) अस्मान्प्रति (आसुव ) आगमय ॥ १२ ॥
भाषार्थः-हे सवितादेव ! हमारे सब पापोंको दूर करो और जो कल्याण है सो हमको प्राप्त
करो ॥ १२॥
ॐ धौ शान्तिरन्तरिक्षुठशान्ति प्रथिवी
शान्तुिरापुःशान्तिरोषधयुत्शान्तिवन
पतयुहशान्तुिर्विश्वेदेवा शान्तुिबाशा
न्तुिस्सढुंठेशान्तुिस्शन्तिरेवशान्तुिस्खामा
शान्तिरेधि॥ १३॥
ॐ द्यौः शान्तिरिति व्याख्यातम् रुद्रायके शान्त्यध्याये ॥ १३ ॥
मापार्थ-द्यौः शान्ति-इसकी व्याख्या शान्त्यध्यायके १७ मंत्रमें होगई ॥ १३ ॥

छन्द्राष्टाध्यायी- । दशमोऽध्यायः । १० । मो- ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तम सुवा रिष्टशान्तिर्मवतु ।। अनेन रुद्राभिषेककर्म- णा कृतन श्रीभगवान्सवानीशङ्करमहारुद्रः प्रीयता न सम ।। ॐ सदाशिवार्पणमस्तु ।। জুলি ফুঙ্গিলার্থাৎঘাষ: माषार्थ-शान्तिः ३ प्रकारसे शान्ति हो सम्पूर्ण अरिष्टोंकी शान्ति हो इस रुद्राभिषेकक- मसे श्रीभगवान् भवानीशङ्कर महारुद्र प्रसन्न हों, मेरा इसमें कुछ नहीं सव शंकरका है, यह शिजीके सर्पण हो। स्वस्तिप्रार्थना मन्त्राध्याय पूर्ण हुआ। इति श्रीरुद्राष्टके मुरादाबादनिवासि पं० हालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य- भापामाप्यसमन्वितः मंत्राध्यायः ॥ दोहा। गौरीशंकर पदकमल, प्रेमसहित हिय लाय । संस्कृत भाषातिलकसह, कीनो रुद्राध्याय ॥१॥ पढे सुनै कर प्रेम जो, हा पदारथ चार । अत्ति होय श्रीशंभुकी, जो जगमं सुखसार ॥ २ ॥ संवत् ऋतु ऋतु मेक विधु, मास आसाढ पुनीत । शुक्लपक्ष तिथि चौथ शुम, चन्द्रवार शिवप्रीत ॥ ३ ॥ पूर्ण कियो शुभ ग्रंप यह, सजनक सुखदान । पहिं सुनाई कर प्रेम जो, पावहिं मोद महान ॥ ४ ॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- चंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, " लक्ष्मीवहटेश्वर स्टीम् प्रेस श्रीवेङ्कटेश्वर"स्टीम् प्रेस, कल्याण-मुंबई, खेतवाडी-मुंबई

संस्कृतर्याभाषाभाष्यसंहिता

Author
मिश्र, ज्वालाप्रसाद
Title
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File name
संस्कृतर्याभाषाभाष्यसंहिता
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2009/03
Publisher
कल्याण, मुम्बई
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Banasthali University
Classification
Biography
DLI number
405013
Barcode
99999990064816.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
f1PrhLB67c3
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