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Shrimadbhagwatsamiksha

Swami, Chuttanlal · 2009/09

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मोम् भूमिका वाचकबन्द ! वेदमतमात्तैरह को पौराणिक घटा ने ऐसा दयाया है कि संसार में घोरं रात्रि..प्रतीत होती है । यद्यपि श्री स्वामी शङ्कराचार्य आदि महापुरुषों ने कठिन प्रयत्न से बेदभगवान् भास्कर के भगणितगुण गण सुझा दिये थे, तथापि अधिकतर पौराणिक पोल न खोलने के कारण शहर खामी के मत को ग्रांस करने में पौराणिक कृतकृत्य होगये। चाहे उन्हों ने शङ्कर को शहरावतार भी कहकर विश्व में विशेष प्रतिष्ठा बढ़ा दी है, परन्तु सिद्धान्त हानि अवश्य हुई । क्यों कि- ....... ...- शाक्तः पाशुपतैरपि क्षपण इत्यादि प्रमाणों से प्रमाणित है कि स्वामी शङ्कराचार्य सम्प्रदायों का खण्डन कर चुके हैं । अस्त- चाव से स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पौरणिकमत खण्डन कर वेदधर्म को पुनरुज्जीवित किया है तब से पौराणिक भाई भकुला उठे हैं। अब जब तक १८ हों पुराणों का खराइन न कर दिया जावे तब तक वेदभगवान् की किरणोका प्रकाश व्याप्त न होगा। पुराणोंका खरहन सबसे पूर्व भागवत से भारम्भ हुवा है क्योंकि इसदेश में भागवतका ही प्रचार अधिक है “विद्यावतां भागवते परीक्षा यह वाक्यभी प्रमिद्ध है ॥ भागवत का मूल परीक्षित राजा से आरम्भ है। मेरा स्थान भी यहां परीक्षितगढ़ ही है इसलिये मेरा किया सपउल अच्छा हो जायेगा । छुहनलाल स्वामी । स्वानी प्रेस मेरठ - भागवत समीर आज भागवंतसमीक्षा For ततीयस्कन्ध ) चनीयीत्या की सीक्षा को प्रथम ही हर एक बात और भी विचित्र सरत कराते हैं कि हमने मागवत की भाषाटीका ( जो भारतधर्न भामराग द्वारा पदनात, महामारोपदेशक, पं० बालाप्रसाद जी की शोधित है। देसी जिग ग्रारम्भ में ही लिखा है कि- पहिले मा भगवान् पवाद गक्षेमरोफखो है फेर शेव जी की काही भागात सुन्दर घिस्तार से कहें हैं ॥ दो प्रकार मे भागास सम्प्रदाय की प्रवृत्ति है, एक तो राक्षेप से श्रीनारायण प्रज्ञा के द्वारा और विस्तार से थेग, सनत्कुमार, सांस्पायन आदि द्वारा भई, तहां द्वितीयस्कन्ध में शा- रायणा ब्रह्मा के सम्बाद से संक्षेप में "अहमेयारमेवाग्ने” इत्यादि करके चतुः सोफी मागत कही। गोही मला नारद के मंवाद में दश लक्षण से कुछ विस्तार से फही, मोही शेष भी की फही, अय अतिविस्तार से फरिवेको नीगन्ध आदि को मारा है, तहाँ तृतीय ने पहले विदुर भन्नेय को सक्षम हुयी। इत्यादि। १--भागबत मला और नारायगा, २-प्रामा और गारद,३-शेष जी की। इन में शुक परी गित मंवाद की १ भी नहीं । न व्यास जी की भागवत फा नाम निशान है। इस तृतीयस्कन्ध में एक प्रहुत पातह फि द्वितीय के अन्त में तो शौनक ने गूत मे बाप्रासंगिक प्रश्न किया कि विदुर का तीर्थयात्रा करते२ मैत्रेय से क्या संवाद हुधा ? मृत जी ने कहा कि परीक्षित के बूझने पर जो शुकदेवजी ने : राजा परीक्षित को उत्तर दिया वही उपर हम तुम को सुनाते हैं ।। भय तृतीयस्कन्ध में "शुक उवाच- प्रथम ही है। शुकदेय कहरो हैं कि- एबमेष पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल । क्षत्रा घनं प्रविष्टेन त्यक्तवा स्वगृहमृद्धिमत् ॥ १॥ अर्थात हेराजन् । असी प्रकार घरं त्यांग बार शास. विदुर ने मैनेय से समीदा-अभी राजा का कोई नही बड़ी, फिर इसी प्रकार पूर्छ। वात कैसी असङ्गत हैं। भागे राशोधाच-- कुत्र क्षत्तुर्भगवत्ता मैत्रेयेगाऽसि संगमः * मका,घा॥

१ 'तृतीयस्कन्धः कदा का सह संवाद एतद्वर्णय न: प्रभो ! ॥ ३ ॥ नर्थात् विदुर मैत्रेय का संवाद कर कहां हुवा है... यह हम से वर्णन कीजिये । यह प्रश्न पीछे, उत्तर पहले, कैसे बन सकता है। तृ समअ लोक में अद्भुत कथा है। अजय जन्मोत्पयनाशनाय कर्माण्य कर्तुग्रहाय मुलाम् नम्चान्यया कोऽहंति देहयोग परीगुणानामुत कर्मतन्त्रम्४४. अर्थ- अनन्ना का जल पापी पुरुषों के नाशार्थ और नकर्मा जगदीश में धर्मशाध घुरुषों को ग्रहण करने के लिये होते हैं ॥ धोंकि जय करहित को ही मोच पाकर जान्न भरण से रहित हो जाता है तब निर्गुण स्यरूप पराशर क्षाधम में अपना असम्भव । दमीक्षा-यहां नया नाम ही नहीं हो सकेगा, यदि जन्म लेगा, और उस को को कभी नहीं काट सकलें जो मानुष फर्न करेगा. तथा.. कृष्णचरित्रों ( जो दशम में लिखे ई ) हो तौ भागवत्ती लोग सभ्य सभा में सिन्धुलों के रहगीयं नाही बतायेंगे क्योंकि नृत्य करमा और एफपुरुषको९६००० रानी होना कोन स्वीकृत करेगा तथा यह बात भी बहुत ही स्पष्ट है कि जब मिसित से सब जी की मुक्ति से पुनरावृति पौराणिक नहीं मानते, . कि रूपमा से झुक जगदीश का जन्म कप उम्भव है । झाले अ२. में श्री मृत्यु रानाधार को रोकर बहुद कहते हैं कि- दुर्भशो बत लोकोयं यो नितरामपि । श्रे संबसन्ता न बिदुहरि मीना इबाँडपम् ॥ ८॥ उद्धव जी विदुर ने कहते हैं कि यह लोक ( दुनिया ) भाग्यहीन है. और यादव (श्रीवा के कुल बा) बिलकुल ही भाग्यहीन हैं क्योंकि जो पास इसने मुझे भी ओव्या को नहीं जान. सो. कि यह ब्रहा है, जैसे अन्द्रमा को मखली नहीं जानती ॥ इस पर श्रीधरी दोका कहती है शि:- शोचनाह दुर्भगो भाग्यहीनः । ये सह वसन्तोपि श्री हरियमितिन त्रिटुः यया क्षीरसमुंजात मुलुपंतदास प्रत्या मीजा केल कसनीयः कश्चिज्जलचर इत्येव त्रिद समय इंति, तवंत । यद्वा जले प्रतिबिम्बित चन्द्र यथोति है ... भागवत-समीक्षा अपार उदयशी सोचते हुवे पाहते हैं कि जैसे जल के ही वाली नीम ( मछली) पीर समुद्र में जन्म :पाये पद्मा को यही जानते नि यह कोई सुन्दर शासजीव है, अमृतमय नमाना इसी शफार लोक और यदुधों ने सीकर को साधकीयादि करते हुवे भी जल न जाना ॥ इस से शो स्पष्ट ज्ञात होता है कि श्रीवास्या को जीन समय में इनको कोई: Ranार नहीं जाता । हो १५ में रासलीला और गोपियों की भक्ति दाई हैं। और भारी- दृष्टा भयदिन राजसूये चैदास्य कृष्णं द्विषतोपि शिविः ।। चां योगिनः संस्पयन्ति सम्यग्योगेन कस्तविहं सहेत ॥१६॥ उदयची फाहते हैं कि हे विदुर । आप लोगों ने राजजूर में देखा कि शिशुपाल ने श्रीरुल्या महाराज को कितने पद यहै परन्तु व ते भी जो गति शिशुपाल ने पाई उच्च गति के लिये योगी जन योग मार्ग में भी तरसते है। उसके विरह को कौन सह सकेगा। : समीक्षा हम नहीं जानते कि जहां यह बताया जाता है कि मत्युय. पापियों को बधाई अवतार होते हैं, वहां यह बैसे सक्षम है कि हम पापियों को मोघा मासोता है। प्रतिपाप का प्रायश्चित्त भगवान के हाथ से 'सरने मात्र से होना कौन सी फिलासती है। आगे २०वें श्लोक में कंघल रुण्या', ही नहीं अर्जुन के मारे लोगों की भी मुक्ति बताई है । भोक २३ पूतना, जो सान में ज़हर लगाय दूध पिलाने आई, उस को माता यशोदा के समान गति दी । दौड़ फसूर कपाच सब एक ही भाव हुवा। ततोनन्दनजर्मित: पित्रा साद्वि बिभ्यता । एकादश न मास्तत्र गढार्चिः सबलोऽवसत् ॥२६॥ कंत्र के मय से पित्ताने.नन्द के ब्रज में पहुँचाये ११ वर्ष यहां ही गुप्त हो रहे समीक्षा-जध कि इसी अध्याय में पूतमा का, कालिय.का. और बका पुर का वध, गोवद्धन उठाना और अनेक स्त्रिों का वर्णन है, तब बाल लीला में गुप्त बताना पन्धकशी की बाल लीला ही नहीं तो. कमा. गरच्छशिवराटनमानयन रजनी मुखम् । ग प्रद रेम खोला भइलाण्डे । दत्तायस्कन्ध शरदं के चन्द्रमा को रात्रिमुख ही जान स्त्रियों पो. गयडल के शोभित करने वाले कलपद गाते रमण शरते थे ॥ ३४ ॥ मला यह कोई प्रशंसित बात है क्या ?... अध्याय में सांदीपने सछत् प्रोक्तं ब्रह्मांधीत्य सन्निस्तरम् । तस्मै मादावर पुन मृतं पशुजनोइरात् ॥ २ ॥ उल्लव जी कहते हैं कि सांदीपन नचि से एक बार ही सुनकर समस्त वेद पढ़ा और उसका मरा हुशा पुन पञ्चगन के पेट से ला दिया। यहां "तुरांनी किरानियों से बढ़ गये, नुदों को मिलाना ही नहीं है, बल्कि पेट में से ले आये जहां माहार का रच रक्त बनता है। लोक ३ में रुक्मिणी हरण को भी प्रशंसा की है। यहां गांधर्व विवाह बताया है परन्तु यह राक्षस विवाह हुवा है, क्योंकि मार छीन करे तो गांधर्व विवाह नहीं कहात इसलिये भागे नामिजिती से स्वयंधर और सत्यभामा से विवाह लिखा और आगे ६।७ में भौमासुर के रगवास में से भनेक राजकन्यायों से श्रीकृष्ण का विवाह वर्शित है। आसां मुहूर्त ए कस्मिन्नानागारेषु योषिताम् संविधं जगृहे पाणीनलुरूपः स्वमायया ॥८॥ तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः। एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबझूया ॥ ६ ॥ अर्थात् सब का एक मुहूर्तमान में सामीप्य में पाणिग्रहण किया। एक २ में दश-२ पुत्र माप जैसे उत्पन्न किये। भला एक कृष्ण यदि अवतार थे तो सब जियों में १० । १० निजतुल्यपुत्र होने पर शतशः कृष्ण भूमंडल में जाने चाहिये. थे, फिर कृष्णभक्ति देती है शोका १५ में कहा है कि ठी मद्य (शराब) के मद से लाल लोशन हो विवाद.फर परस्पर लड़ कर यादव नरेंगे। मैं फिर कहा है:- मथ ते तदनुज्ञाता अरवा पीतवा व वारुणीम् तया सिशित्रज्ञाना दुरुत्तरिम प्रस्पृशुः यादव बागुडी शराब पीकर बेहोशी गयें नरम यदा ती रुपया फी मात्रा से मय पीना फहा थे। इस समय में ती यादवों भागवतःसमीक्षा समीता--भला श्रीरुष्णा से महात्मा गद्य पीने का ज्ञान होते भी कुल रमाणे नप से निरण का योग न फर उके, यह कब सम्भव है । फिर का सामयी मामी न था। फिर भी मद्यपान का निषेध नहीं किया गया। इसमें स्पष्ट है कि इस फधा के कर्ता मद्यपान पाप नहीं समझते थे। इस पर भी पीछे ०३ प्रो भावानपि विश्वात्मा लोकावेदपधानुगः । कामान्सिपेवे द्वार्वत्यामसक्तः सख्यमास्थितः ॥१९॥ नमें श्रीकृष्ण को लीक वेद पचगानी बनाया है, फिर भी मद्यपान फा उपदेश निज कुल को पयों किया? और भोगापुर फी कन्या का स्त्री. माय में रखना वसव मे भोगायलाच करना भी यहीं वर्णित है, यह बेद मार्ग कहा गया। 1०५ में स्पष्ट कहा है कि विदुर जी 'ध्यासवीर्य से हुवे हैं । नैतच्चित्रं त्वयि क्षत्तर्नादरायणिधीर्यजे ॥ अर्थात मैत्रेय जी विदुर से कहते हैं कि आप ध्यासवीर्य से (भुजिया दासी में ) उत्पमा हुवे हो। आगे घमा, विष्णु, शिव को वैकारिक तया- स्मक लिया है ॥ श्लो०२० से सृष्टि की उत्पत्ति लिखी है ॥ यथा- भगवानेक आसेदमग्र मात्माऽऽत्मनां विभुः। आत्मेच्छानुगतो वात्मा नानामत्युपलक्षणः ॥२३॥ सवा एष तदा द्रष्टा नापश्यदृश्यमेकराटू । मेनेऽसन्तमिवारमानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ।। २४ कामवृत्त्या तु मायायां गुणमय्यामधोक्षज: पुरुपेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त बीर्यवान् ॥ २६ ॥ इस पर टीका यह कहती है कि तासमय ये सर्वद्रष्टी ईश्वर सम्पूर्ण गति से प्रकाशित होने पर भी इस भय को कोई देखने हाराम होने से और मार्दिक शक्तिीन प्रिने को प्रात:सामानते भी हम हैं. तो सही पर कुछ नहीं हैं महाभांग। तब चर्वद्रष्टा या ईश्वर की , कृतीयवाघ कार्यकारण हरिणी ये माया नानी नहाशक्ति अनुसयानरूपा होती मई, जाले व्यर्थ ईश्वर को रयतेसवे ॥२५॥ नुसनपी काल की शक्ति से साया में पुरुषरूप करके दीर्यवान् वीर्य को धारण करते मरे ॥ ६ काल- मेरित अव्य माया से नदतत्व भयो, तमोगुण को नागदा विज्ञान भात्मा जीव के देश में स्थित होकर विध को प्रकाशित करतो भयो । सो जीव अंश गुण काल अारमा भगवत् की दृष्टि के मानने या विश्वो रपये की इच्छा करो जीवात्मा अपने मात्मा को रुपामार करते भये बारा मह.. तस्व जब विकार को प्राप्त भयो, तव अहं तव भयो । कार्य कारण कर्ता जीव पञ्चभूत प्रन्द्रिय मनोमय होतो भयो म दह भ्राहकार कारिक तेस तानस भेदले तीन प्रसार का भयो, अहवार विकार तो प्राप्त भयो सब वैकारिक प्रकार से नन भयो ॥३०॥ देहारिक जो देवता भरे दम ते शब्दादिक गुण प्रकाशक होय , रताःसत्यतमोनय ब्रह्मा विष्णु शिव हैं (३१) समीक्षा- यहां तष्टि का फिल प्रकार वसंन किया है, लिहले सोक २५ में ईश्वर से मायाशक्ति की स्पतिलिखी है। यह बाताधादम से हव्वा ले पैदा होने की बात से मिलती है, इसी शाक्तनत से यवनों के कुरान में यह-शिक्षा गई होगी। फिर श्लोफ ३१ में तत्वमय ब्रह्मा विष्णु शिव को बताया और कहीं इन को साक्षात लगदीश बताना मी पिन्त्य है। यहाँ नाभि कमल, जल सभी सूख गये जान पड़ते हैं। आने सोक्ष ३४ में- अनिलोऽपि विक्रुर्वाणो नभसोरुमलान्धितः । रूस रूपतन्मानं ज्योतिलोकस्य लोचनम् ॥३४॥ इत्यादि लोकों में "आकाशाद्वायुः क्योरग्निरग्रायः" इत्यादिअपेका वर्णन है । फिर-- एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशयोगतः। मानास्वारस्वकियाऽनीशाःप्रोचुः प्राञ्जलयो विभुम् ॥३८॥ श्रर्थात् इतने देवता ये जो पूर्व दर्शित हैं, विष्णु को पता हैं। इनका सामर्थ्य-नाना होने से वृष्टि रचने का न हुला, तब हाथ जोड़ स्तुति करने लगे । भला आकाश ने हाथ कहां से आये। सबसे ब्रह्मा विग्णु शिवको साक्षात् भगवान नहीं कहना पाये। - - पुत्र व्यास जी भागवत-समीक्षा। में सुपादेव भी कहते हैं कि मोघ ने कहा कि--- प्रवर्तये भागवत पुराण यदाह साक्षाद् भगवान पिभ्यः । पार घर भागवत कहता हूं जो नामार शेष भगयान रे ऋपियों से फहरा घर । सनत्कुमार गत्यलोफ ने गङ्गा जी में बहते २ सीगे हुवे पाताल में पहुंपो थे (०।५) एक सराप शेष जी ने सनत्कुमारों से भागवत कही थी वही भारत "मोरयायग" मुनि को सगशुमारी ने सुनाई । ख्यायन ने पराशर और सरतिमारे गुरुनाको सुगाई,गुरुजी ने मुझे सुमाई नैं मापको सुनाता हूं। पीमापाटीका हिसा है कि पिता को राक्ष द्वारा भक्षित सुन, पराारसी राजग फा वध कर या में पहात हुय, राव वशिष्ठ 'की ने रोके धीर पुलस्त्य ने अपनी सन्तति की रक्षा की, प्रसन्नता में पराशर को कर दिया कि तुग पुरामायणा होंगे। समीक्षा -या गई गागयत हि, ऋ तक ती पराशर पुरागफा घे, परन्तु उन को पुत्रो इस वचन में पराशर श्री पुराणों के यका हो गये। गचे भागे ०८ में विष्णु के गाभिकमल से मला की उत्पत्ति है। प्राला को गोगा कि मैं यहां से आया, या करू, तब धार मुख वाले प्रस्मा पागल की उपडी की माल में को नीचे पसे, यह (१९) श्लोक में बताया ।। शैप शया के रुप की गोमा भी खून ही पसानी है । ० C में बला कदा "जातीशि मेघ आयात जो वरनाउससे स्पए है कि अन ns गही जागा था। यह नाभिकमल का ढकोसला न जाने कहां से भा गया जय फि पहिले नष्टि का वर्णम ती कर हो चुकी है। ० १० में दविधा का वर्णन है। जिसमें पशु, पक्षी, कीट, पता, सन, भेल, विशाच, गुखरू चव की उत्पत्ति पर्सित है। अ० ११ में परमाणु मादि विपरापर्यन्त दया करूम का बर्मन है । मागे ऋ० १२ में नन्वन्तर का वर्णन है, उश में प्रथम ही अश्यतामिल, तामिल, महामोह, मोह, तामसी रचना की । तब- सृष्टिं नामानं त भगवदध्यानपूतेन मनसान्या तत्ती सृजत् ॥ ३ ॥ - - । - दृष्ट्वा पापीयसी - । तृतीयस्कन्ध । पापी सृष्टि को देख ब्रह्मा दुःखी हुवे, फिर रचना की, तव सनकादि ४ मुनि रचे, यह ब्रह वारी हो गये, इन से ब्रह्मा ने सृष्टि रचनार्थ कहा, यह न माने, तब ब्रह्मा को कोप भया इससे 'रुद्र' हुने । रुद को रची सृष्टि सब ओर से अगत् को खाने लगी, सहस्त्रों यूथ खाये सुन ब्रमा को शङ्का हुई, कहा कि "बस करो, रहने दो, तप करी ॥ समीक्षा-म जाने सदनों यूथ बिना ही रचों को कैसे मनोमांदफयत वागये ? क्षेवल ४.सनकादि ही ती उत्पन्न हुवे थे, उनमें से एक भी नहीं खाया लिखा या यह रुद्गयूथ परस्पर साले थे, यह कोई अन्य ब्रह्मा रच रहा था? रुद्द तपोर्थ गये तज्ञ ब्रह्मा-ने १० पुत्र रघे, मरीच्यादि नाम के इस प्रकार से हुये-"उत्संग' घोंटे से नारद । अंगूठे से दक्ष । प्राण से वशिष्ठ । स्वचा से अगु । हाथ मातु । नाभि से पुत्रह । कानों से पुनरत्य । मुख से अंगिरा । नेत्रों से अग्नि, मन मे मरीचि । दाहिने स्तर से धर्म । पीठ से अधर्म । अधर्म से मृत्यु । हृदय से काम । भों से क्रोध । अधर श्रोष्ठ से लोभ । मुख से वाणी । लिग से समुन्न । गुदा से पापाश्रय मृत्यु हुवा। खाया से "कर्दम-देवहूति का परि" हुवा ॥ वाचं दुहितरं तन्मीं स्वयंमूहरतीं मनः ॥ अकामांचकमे क्षत्तः सकाम इति नः श्रुतम् ॥२७॥ अर्थात् वाणी रूप बेटी ने 'मला का मन हर लिया। अकाम वाणी से ब्रमा सकाम हुषा, ऐसा सुना है ॥ २७ ॥ বৰম कृत मतिं विलोक्य पितरं सुनाः । मरीचिमख्यामुनयो विनम्भात्प्रत्य बोधयन् ॥ २८ ॥ नेतत्पूर्वैः कृतं त्वा न करिष्यन्ति चापरे । यत्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याङ्गजं प्रभुः ॥ २६९ तेजीयसामपि ह्येतन सुश्लोक्यं जगद्गुरो। यवृत्तमनुतिष्ठन्दै लोकः क्षमाय कल्पते ॥ ३० तृतीयस्यन्ध भर्षात प्रक्षा के पुत्र मरीचि भरदिने पिताको सकाम जान रोका- मा काम न किसी ने फिया, न प्रागे कोई करेंगे, जैसा कि आप पुत्री नमन (पाप).फरते। तेशस्थियों को भी ऐसा नहीं चाहिये क्योंकि वे जैसा करते हैं दुनियां भी वैसा ही कर सुख पाती है । इस पर ब्रह्मा जी शर्मा गये और गरीर त्याग दिया, वह शरीर नीहार (कुहरा) संसार में अब भी वर्तमान है। इस पर भापा टीका ने ती टिप्पणी लगाई है कि ". या अलंकार है। यहां सरस्वती रुप विद्या जाननी.. ॥ इम.सी इस को मष्ठंकार ही मानते हैं परन्तु श्रीधरी आदि टीका. कारोंने यहां कुछ भी न कहा, यह आश्चर्य है। ऐसे अलंकारादि यदि भागवत में न होते तो क्या हानि थी और अलंकार है तो शरीर त्यागना, दिलानी,यद, सय क्यों फल्पना करके प्रजा का मन बिगाहा ब्रह्मा के शरीर से. लोभ मोदादि की भी उत्पत्ति लिखी है, क्या उन के भी कोई शरीर है। यम यह सब कल्पमा शास्त्र से श्रद्धा हटाने को हैं। कहीं पापी सृष्टि को देख ब्रह्मा को दुःख होना, यह सब इजील केसे किस्से हैं वहां भी नाग के खाने में मात्मा. पापी होगया है, कहीं मादम हव्या. के.सी कहानी यहां भी भरी गई है। इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेद ईश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९ ॥ अर्थात् ग्रहमा ने ऋग, यजु, साम, अपर्व । आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्व वेद (स्थापत्य), अर्थवेद चारों पुत्रादि मुखों से यथासंख्य रचे परन्तु इतिहाम: पुराण चारों मुखों से रचे । यहाँ यद्यपि पुराणों का नाम नहीं बताया यदि हमारे मनातनी भाई भागवतादि पुराणों का अर्थ करेंगे तो अब पराशर से भी पूर्व ब्रह्मा ही पुराणकर्ता हो गये । यदि एक गवाह तीन बार तीन प्रकार से पृथक बयान करे तो दावा बारिश हो.जाता आज पुराणकर्ता व्यास, पराशर और ब्रह्मा तीन बता दियम, क्रिसं.को सत्य माने । फिर सूत वैशंपायन मादि:पृथक् रहे । ५२ में मनु और शतरूपा की उत्पत्ति झा में बताई है। .

" भागवत-समीक्षा। ५२ तभी से मैथुनीसुष्टि चली है, मनु की ५ सन्तान हुई, प्रियव्रत और उत्तानपाद २ पुत्र, तथा प्राकृति, देवहूति और प्रमूति ३ कन्या । १० १३ में मनु से ब्रह्मा ने कहा-हे राजा मनु! प्रजा को उत्पन्न करो। रक्षा करो, तब मनु ने कहा कि प्रजा को यहां बमा ! पृथ्वी तो है ही नहीं । ब्रह्मा ने शोच किया तब ब्रह्मा को नाक में से छोट सा सूकर का भधा निकला, देखते २ अङ्गुष्ठमात्र से हाथी के समान होगवा, मन्वादि चकित होगये। इसके नख रोम खुरादि सभी का वर्णन है, जो पार्थिव होते हैं । स्वदंष्ट्रयोदत्य महीं निमग्नां सउत्थितः संरुरुचे रसायाः। तत्रापि दैत्यं गदया पतन्तं सुनाभसंदीपिततीब्रमन्युः ॥ अर्थात् डूबी हुई धरती को अपने दांत पर रख कर दैत्य से गदायुद्ध लड़े। षया अच्छी पदार्थविद्या है। यदि दांत भादि बाराह का शरीर पार्थिव था, तो किस पृषिवी पर खड़े हो कर लड़े ॥ श्लोक २९ में 'ध्राणेन पृथिव्याः पदवीं विजनम् " भी लिख चुके हैं, इस से पार्थिव ही माना जा सकता है, क्योंकि पृथिवीत्व से ही गन्ध गुण जाना जा सकता है। चौदहवें अध्याय में हिरगयाक्ष की उत्पत्ति लिखी है कि दक्ष की बेटी दिति मरीचि के पुत्र कश्यप की खी थी, उसने सन्ध्या समय मुनि से बोर्यदान मांगा फि सौतेलो सन्तानों से मुझे दुःख है । भर्ता ने समझाई भी तो भी दिति ने वेश्या समान लज्जा त्याग पूजन करते मुनि की धोती खोल दी, भाग्य जान मुनि ने."किया, स्नान कर पुनः जप करने लगे, दिति ने शिव और पति की स्तुति की, तब पति ने कहा तेरा पोता भक्त होगा। ०१५ में दिति ने सौ वर्ष गर्भधारण किया, संसार में अन्धकार छा गया देवगण घबराकर ब्रह्मा की स्तुति करने लगे, कि यह क्या हुवा !!! ब्रह्मा ने कहा-मेरे सनकादि ४ पुत्र वैकुण्ठ गये थे, द्वारपालों ने इन्हें ७ वी डौढ़ी पर बेत लगा के रोक दिया तब सनकादि को क्रोध माया, शाप दिया कि तुम दोनों इस पद के अधिकारी नहीं हो। हाथ जोड़ पग पकड़, अपराध स्वी- कार किया। भगवान् लक्ष्मीसहित इस (केस) की बात सुन उठ आये ॥ • - "अ० १६ में भगवान् ने फैसला किया कि तुम असुरता को प्राप्त होकर फिर यहीं पाओगे। इस शॉप के वश वही दोनों राक्षस दिति के गोद में भाये । श्लोक ३० में यह भी विष्णु ने कहा है कि लक्ष्मी ने मुझ से प्रथम ही करी पा शिखए भावेंगे, उन्हें द्वारपाल रोकेंगे । -

ya
-
अतीयस्फा ।
फिर भला इन बेचारों का पपा दोष था. यहाँ वैकुण्ठ की बनावट
भी बहिश्त जैसी वर्णित है, न जाने कुरान ने पुराण से या पुराण ने कुरान से
यह शब्द मोरी हैं। हमारे सनातनी भाई मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं मानते
पर यह धैकुरठ से गिरना क्या है ।
अ०१७ में वर्णन है कि दिति के गर्भ जन्म समय गधे बोलने लगे, पक्षी
पोंमले छोड़ भागने लगे, सून घरसने लगा, भयङ्कर वायु चला, उत्पात हुवे ।
कश्यप ने उन दोनों पुत्रों के हिरण्यकशिपु हिरण्याक्ष नाम धरे । हिरण्य-
कशिपुने ३ लोक के लोकपालों को वश में कर लिया। छोटा हिरण्याक्ष गदा
लेकर ख गया, देवगण भाग गये, तय यह वरुणलोक को गया, वहां भी देख
कर सबभागगये। वरुण ने कहा-सिवाय ईश्वर के आप से फीन लड़ सकता
है, यह पाताल में हैं। इस बात को सुन कर रसातल को गया वहां धाराह
जी फो दांत पर पण्विी घरे देखा और अ० १८ श्लोक ३ में कहा कि-
आहैनमेह्यज्ञमहीं विमुञ्च नो रसौकसां विश्वसृजेयमर्पिता।
छोड, पधिवी हम को ब्रह्मा ने दो है । फिर धाराह जी से युद्ध हुवा ।।
समीक्षा-हम पौराणिों से सुना करते थे किं धरती का बारिया सा
लपेट कर राक्षस लेगया था, सो यहां नहीं माया, कदाचित बाराह पुराण
में इस की विशेष कया हो। यहां ती ब्रह्माने दो है, यही लिखा है । अब
१८ में हिरण्याक्ष मारा गया है । प्र० २० में ब्रह्मा ने सृष्टि रची और
विससर्जात्मनः कायं नाभिनन्दस्तमोमयम् ।
जगृहुर्यक्षरक्षांसि रात्रि क्षुत्तट्समुद्भवाम् ॥१९॥
तमोमय सष्टि से अप्रसन्न हो ब्रह्मा ने अपना शरीर त्याग दिया, इस
शरीर में रात्रि उत्पन्न हुई, यक्ष राक्षसों ने ग्रहण की । यक्ष. राक्षस जहा को
साने की सलाह करने लगे। और अद्भुत बात-
देवोदेवाजघनत: सृजतिस्मातिलोलुपान्।
त एनं लोलुपतयां मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३ ॥
ततो इसन्सभगवालासुरैर्निरपत्र।
अन्वीयमानस्तरसा द्योभीतः परापतत् ॥ २६ ॥

-- १४ भागवत-समीक्षा। + - 1 --- ។ ब्रह्माने जंहासे असुर रचे,वे कामी होकर ब्रह्मामे ही मैथुन करने दौड़े। निर्लज्ज असुरों की चेष्टा देख, व्रता हंस कर क्रोधित हुवे, भागे भगवान्, से फर्याद की कि- पाहि मां परमात्मंस्ते प्रेषणेनाऽसृजं प्रजाः । ताइमा यभितुं पापा उपकामन्ति मां प्रभो ॥२६॥ हे परमात्मन् ! मैंने तो आपके कहने से प्रजा उत्पन्न की, अब ये पापी मुझ से मैथुनार्थ पीछे पड़े हैं। प्रभो रक्षा करो। सोवधाास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः । विमुज्जात्मतन धोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥२८॥ भगवान् इस ब्रह्मा को दीनता जानकर बोले कि हे ब्रह्मा | अपना यह घोर शरीर त्याग दो, तब ब्रह्माने शरीर त्यागा और छम छमाती, उच्चस्तनी, सुन्दर, गेंद उछालती स्त्री को देख दैत्य बोले कि तू कीन है ? कहाँ से आई है? हेरफेर की बातें कर सन्ध्यानाम की स्त्री असरों ने घेर ली। समीक्षा-क्या यह ब्रह्मा जी का ही रूप था या कौन थी? कुछ भी पता न दिया । शोक २८ में ब्रह्मा का शरीर त्यागना, : में स्त्री का वर्णन शङ्का में डालता है। ब्रह्मा का वार २ शरीर त्यागना भी अद्भुत बात है । एक वार पुत्री सरस्वती के अलङ्कार में, दूसरे इसी अध्याय झोक २० में, फिर खोज २८ में शरीर त्याग है, परन्तु फिर जन्म कैसे हुवा, यह पता नहीं। चौमुखे ब्रह्मा पुरुष पर उसी के रचेहुवे पुत्र असुर कैसे आसक्त हुवे ? क्या यह नेचर के विरुद्ध कुरीति उस समय भी थी? कदापि नहीं । इस प्रकार की कथा केवल सनातनियों के नीचा दिखाने के अतिरिक्त क्या मतलब रखती हैं, हम नहीं जानते कि ऐमी २ भद्दी रद्दी बातों के पुस्तक को धर्म पुस्तक कैसे कह सक्ते हैं। इस के घर बैठने पर ब्रह्मा ने अप्सरा बनाई, फिर- विससर्ज तनुं तां वै ज्योत्स्ना कान्तिमतीम्प्रियाम् ॥ ३९ ॥ फिर शरीर त्यागो.। फिर भूत प्रेत पिशाच नंगे रहने वाले रचे निद्रा सन्माद रचे, पालस्य रंधा, फिर पितर रने जिन का श्राद्ध होता है, सिद्ध विद्याधर किकार जो ब्रह्मा के त्यागे तनु थे,वह-नन्हों ने पाये। क्या यह तनु कपड़े की पोशाक का तो नाम नहीं धरा है ? ।

५५:: दतीयस्कन्ध । किर मोदि सृजे हैं,फिर ऋषि रखें । झोक ४८ में फिर शरीर त्यागा है। मला के मुर्दा बालों से सर्प हुवे, तय ग्रमा प्रसन्न हुवे और मनु सृजे ॥ पाठको ! यदि हम इस प्रकार भी अपाय वार वर्णन करेंगे ती पुस्तक बहुत यदशावेगी, इसलिये आगे संक्षेपसे किसी कथा का वर्णन ही करेंगे। N० २१ में मनु की पुत्री देवहूति में कदम से कैमे सन्तान हुई ? इत्यादि प्रम तय कदम के नप का वर्णन और भगवदर्शन की कथा में भगवान् को गरुड पर भयार यताया है। लोक ४ ० २२ में--- मनु ने खकन्या कर्दम से विवाह की प्रार्थना की तो कदम अटपटांग कहते किस से अवश्य विवाह करेंगे? कारी है और जब यह अपने माल पर गेन्द खेलती थी, तब विश्वावसु इस के रूप को देख विमान से गिर पहा.पा. समीक्षा-बाहरी सभ्यता ! जैसे आजकल असभ्य सांगीत गीत गाते हैं कि ( कितने सेने पापल कीने, कितने लोट पोट ) इत्यादि । प्रभी गरुड़ पक्षी. कद्रू विनता से उत्पन्न हुवे ही नहीं थे, भगवान् पहले ही कहां से पद ठे। ०२ झोक द... ३१ में लिखा है कि बाराह अवतार ने जहां गरीर कम्पाया था, सम के झड़े रोंगटों से कुशा हुई इसी लिये यज्ञं रक्षार्थ काम में आती हैं। शोक ३४ में इस कथा के प्रवण से कलियुग में उद्धार कहा है। अ० २३ में देवहूति को कर्दम ने सारा धुलोक विमान में बैठाय, दिखाय कन्या उत्पन्न कर फिर १०० वर्ष भोग किया, जो क्षणमात्र प्रतीत हुवा । म २४ में कर्दम में कपिलावतार बताया है, वहां जब गर्भ में- तस्यां बहुतिथे काले भगवान्मधुसूदनः । कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञऽग्निरिव दारुणिः ॥ ३ ॥ अवादयंस्तदा व्योनि वादिनाणि घना घनाः । अर्थात परमेश्वर कर्दम के वीर्य में वास कर देवहूति के गर्भ में आये, तब प्रकाश में बाजे बजे, अप्सरा नाची इत्यादि । समीक्षा-गीता में तो कृष्णचन्द्र ने कहा है कि जब २ धर्म की ग्लानि, अधर्म की वद्धि होती है तभी मेरा अवतार होता है, परन्तु यहां तौ धर्मात्मा मागयत-समीक्षा। प्रजा में ही कपिल देव ना पहुंचे। माता को उपदेश करने आये, या कर्दन, कम उपदेशक थे? फिर गर्भवती से"नाना ब्रह्मा कहते हैं कि सेरे गर्भ में कैटभासुर का मारक उत्पन्न होगा । देखो नोक १८ (इस के विरुद्ध मधुकैटम; का दुर्गापाठ में देवी से वध बताया है ) ब्रह्मा की माला से कर्दम ने बेटी भरीध्यादि को देदी, विवाह विधिपूर्वक किया। भला यह कैसी विधि, जो मामाओं के साथ भानजी व्याही जावे ? भीमसेनादि बहुत से पौराणिक कह देते हैं कि मानसीसृष्टि में यह पाय नहीं है, परन्तु यहां तौ स्पष्ट मैथुनी प्रजा है, कन्या मैथुन से हुई हैं । अ० २६ लोक ११ में २४ तत्वों की गणना है, परन्तु प्रथम ३३ तत्त्व बता आये हैं, देखो अ० ६ । २ यहां उसके विपरीत २४ हैं। अ० २८ में योगमा- गोपदेश है, उसमें भी श्लोक ६ में- वैकुण्ठलीलाऽभिध्यानं समाधानं तथात्मनः ॥ ६ ॥ अर्थात एकान्त वासादि कहते २ वैकुण्ठ की लीला का ध्यान करना भी बताया है, सो ठीक नहीं ज्ञात होता, क्योंकि पुराणों ने वैकुण्ठ लीला में ऐश्वर्य का सामान, मद, मोह, मत्सरता, स्त्री, गान, वाद्य, युद्ध, शाप, सोना, जागना आदि सभी सांसारिक भोग लिखा है। फिर घर छोड़ कर वन में भी घही ध्यान बताना उचित नहीं है । लोक १४.से विष्णु का ध्यान प्राणा- याम में जो बताया है, वह भी सब हारकडूणादिधारी शेषविहारी का ही वर्णित है, जो योगशास के प्रशिकूता है । १९ ३३ में लिखा है कि अहो वत श्वपचोऽतोगरीयान् यज्जिडांग्रेवर्तते नाम तुभ्यम्। तेपुरतपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ते ये ॥ जिस की गिता पर तेरा । परमेश्वर का) नाम है, वह चण्डाल भी श्रेष्ठ है, उन्हों ने तप,होम, स्नान, वेदपाठ-सब कुछ कर लिया, जिन प्रायो ने तेरा नाम लिया. हे सनातनर्नियों। यहां तौ भागवत ही भनियों को भी वेदपाठ करा कर आर्य बनाने शुद्ध करने लगी ? इति कृतीयस्कन्धसमीक्षा ॥३॥ - . 7 तृतीयस्फन्ध ! - - । . + - * ओम . अथ चतुर्थस्कन्धसमीक्षणम् ( मगे भाई का वहन से विवाह) प्रयमनाचे मक्षिकापात: से अनुसार चतुर्थ स्कन्ध में सब से पहिले ही एक महाअधर्म की शिक्षा लिखी है। प्र०९ श्लोक १-६ तक देखिये ॥ मैत्रेय उवाच-- मनोन्तु शतरूपायां तिस्सः कन्याश्य जज्ञिरे । आकूतिर्देवहूलिश्च प्रसूनिरिति विश्वनाः ॥ १ ॥ आजूति रुच्ये प्रादादपि भ्रास्टमर्ती नृपः । पुत्रिकाधर्ममाग्नित्य शतरूपानुमोदितः ॥ २ ॥ प्रजापतिः स भगवान्रुचिस्तस्यामजीजनत् । मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना ॥ ३ ॥ यरतयोः पुरुषः साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक् । या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरंशभूताऽनपायिनी ॥४॥ आनिन्ये स्वगृहं पुच्या पुत्रं विततरोचिषम् । स्वायंभुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम् ॥५॥ तां कामयानां भगवानुवाह यजुपां पतिः । तुष्टायां तोपमापन्नोऽजनयद्वादशात्मजान् ॥६॥ अर्थ-स्वायंभुव मनु के तीन कन्या शतरूपा में उत्पन्न हुई १-आकूति, २--देवहूति,३-प्रसूति । अाफूति "रुचि को व्याधी,उससे पुत्रः पुत्री विष्णु. यज्ञस्वरूप और लक्ष्मी का अंश दनिणा नाम की हुई । पुत्र ( यज्ञ) को उस के नाना मनु ने रख लिया और (दक्षिणा) पुत्री पिता ( रुचि ) के घर रही, फिर सहोदर भाई यज्ञ का अपनी बहिन दक्षिणा से विवाह हुवा १२- पुत्र पैदा हुवे ॥ मीक्षा-१-17 से बढ़कर पाप साधारण पुरुष भी नहीं कर सकता फिर ईश्वरावतार जिस को २४ अवतारों में गिना माना है. यह क्यों ऐसे पाप में मवत हुवा ? जब कि अवतारों के कर्म लोगों को सिखाने को बताये जाते हैं।

भागवत-समीक्षा। दक्ष प्रजापति ने नर नारायण अवतार अ०१ श्लोक ८ १३ कन्या धर्म को पाहीं थी,उन के नाम और सन्तान भी नीचे लिखे जानों । १ श्रद्धा से शुभ, २ मैत्री से प्रमाद ३,दया से ४ शान्ति से सुख, ५ तुष्टि से मुद्.६ पुष्टि से स्मय, क्रिया से योग, अति से ... ९ बुद्धि से अर्थ,१० मेधा से स्मृति, ११ तितिक्षा मे क्षेम, १२ जो से प्रश्रम और १३ मूर्ति से नर नारायण उत्पन्न हुवे ॥ इन बारहों के पुत्रों के माम विचार देखें यह मूर्तिमान शरीरधारी नहीं हो सके .फिर एक तेरहवीं स्त्री से ही नर नारायण अवतार अधिरुप कैसे यताये गये । इन तेरहों पुत्रियों के नान भी शरीरधारीके से नहीं जात होते। इन दोनों अवतारों का स्वायंभुव मनु के समकालीन होना मिद्ध है परन्तु आगे लोक ५९ में अर्जुन श्रीकृष्ण बताये हैं । यथा:- ताविमौ वै भगवतो हरेशाविहागती। भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५ ॥ यह तौ,इसी गत द्वापरान्त में हुवे हैं। आगे स्वाहा बी से अग्निदेव की सन्तति का वर्णन है ।. अग्नि के ही सन्तान अग्निष्यात वहिषद् सौम्य और प्राज्यपा पितर हुए। समीक्षा-आज कल सनातनी लोग अग्निष्वात्त आदि का मर्च मरे पितर कहते हैं परन्तु यहां उत्पत्ति ही लिखी है ॥ दूसरे अध्याय में दक्षप्रजापति के यज्ञ का वर्णन है। दक्ष का अर्थ है और प्रजापति होने से भी उस के ज्ञान मान का अनुमान हो वक्ता है तथापि उस ने अपने जामाता शिव को ( जैसे कि पौराणिक ईश्वर मानते हैं बड़ी निन्दा से पुकारा है, नमूने के लिये दो श्लोक लिखते हैं:- प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणतः । अठत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशी हसन रुदन ॥१४॥ चिताभस्मकृतस्नानः प्रेतखनुस्थिभूषणः ।।.. शिवापदेशो ह्यशिवो मत्तोमत्तजनप्रियः॥ १५ ॥ . .

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५
mard.
धतुर्थस्कारसमीक्षा।
अर्थात् शिव प्रेतों में धामी, रोता, हंसना, मनुष्य की हड्डी की माला
भार अभिय। प्रजापति फी यह राय है । अध्याय ५ नोक में शिव की
जटा ने धीरभद्र की उत्पत्ति लिखी है। या बालों से बचा या जवान पुरुप पैदा
हो सकता है ? R० १३ में क्षेत्रेयश्याध-लो०१४ से भागे तो था ही पुनः पर
से जागे लिख दिया है। और वेग की उत्पत्ति भी यज्ञ से हुई है, फिर
जाने अधर्म क्यों हुआ। ० १४ में बेन राजा के देह मंथन से ( निषाद )
मोठ का पैदा होना, अ०१५ में पृथु राम की उत्पति, अधि देवी का अव-
तार भी लिखा है, या भी जीडिया ही हुई हैं। सो०२ में लिखा है:-
तन्दृष्ट्वा मिथुनं जातम् पयो ब्रह्मवादिनः ।
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१
एप साक्षाहररंशो जातोलोकरिरक्षया
इथं च तत्परा हि नीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥६॥
अर्घाग यह कोटा हुवा है,यह साक्षात् हरि का अवतार है,यह रानी
मी हुई।
हम नहीं कह उकसे कि भदों के देव से सन्तान हो और फिर भी पहन
भागों में जो पुरुपों का व्यवहार कैसे हो सकता है। सभी अवतारों के दोष
घर कर पुरागा कैसे भाधा ऊंचा कर वक्त हैं ? अ० १९ लोक २४ । २५ पृथु के
अश्वमेघ में से एन्द्र ने घोड़ा पुराने के लिये बहुत से फ़फोरी बाने धनाये,
यही पासप चिह्न दिगम्बर जैन बौद्ध बताये गये हैं। यथा इस शोक की
टीका में स्पष्ट लिखा है कि-
तानि पापस्य खण्डानि लिङ्गं खण्डलिहोच्यते ॥ २३ ॥
धर्म इत् पधर्मेषु नगरपटादिषु। पेशलघुच वामिषु २५
इन पर श्रीधरी टीका मी (नना जनाः रक्तपटा बौद्धाः कापालि.
कादिकाः ) इस से सिद्ध है कि भागवत के फर्श से पूर्व जनी हो चुके हैं।
इन्द्र की में पासएडी टाताना मी विन्त्य है।
। २० २३
में उसी अर्थ
पानी फा
प्रय के साथ सती होना भी लिखा है.जो वेन के शरीर से पृथु के
काय ही पैदा हुई , यो । यथा-
अर्चिाम महाराज्ञी तत्पल्ल्यनुगता वनम् ॥२०॥

D भागवत समीक्षा ००० विवेश वहिं ध्यायती भार्टपादी ॥ २३ ॥ अर्थात्त अर्चि रानी बन की गई, सरने पर पति के चरणों का ध्यान करके अभि में प्रवेश कर गई । (यह साई बहन थे,गन्तान भी हुई ) फिर खती हुई। यह सती की धाट पुराणों से प्रचलित होगई है ! १०२८ में एक स्त्री से एक एक अरब १००0000000 सन्तान लिखी हैं । एकैकस्यां भवत तेषां राजन्नकुंदसवुदम् ॥ ३१ ॥ झूठा दूवा भारे तो फिर कमी या थी, पूरी संख्या ही लिये ! ! ! ० २९ में लिखा है कि साक्षात शिव मनु दक्षादि सनकादिक मरीच्याद सो देखते हुवे भी परमेश्वर को नहीं देखत्ते । यथा- पश्यन्तोपि न पश्यन्ति पश्यन्ति परमेश्वरम् । अघ शिव को साक्षात भगवान् फिस प्रकार कह सके हैं। प्रतिम 1 । मोम * अथ पञ्चमस्कन्धसमीक्षणम्। ब्रह्मा को ईश्वर बताने वाले पौराणिक यदि ध्यान देकर भागवत के स्कन्ध ५ अ० १ झोक १४ । ९५ को भी पहले तो ज्ञात हो जाय कि ब्रह्मादि फर्मबन्धन से सुख दुःख भोगते हैं, वहां प्रियव्रते से ब्रह्मा ने स्वयं कहा है कि हे पुत्र ! जिन की वेदवाणी रुप डोर में अति दुस्तर गुण कमी से अन्धे हुवे हम सब ईश्वरार्थ ऐसे भेट देते हैं, जैसे नाथ में बंधे चौपाये यैल मनुष्यो ने कार्य करते हैं ॥ १४ ॥ हे मन । कर्मानुसार ईश्वर के दिये हुवे सुख दुःख हम भोगते हैं। छम ईश्वर के प्राधीन ऐसे योनियों में जाते हैं जैसे समाखे के पीछे अन्या घखता है, चाहे वह धूप में लेजावे चाहे ठरठ में ॥ १५ ॥ दण्डक १९ में लिखा है कि प्रियव्रत के पुत्र परम हंस हो गये और ग्यारह अरब वर्ष राज्य किया, नित्य खीसम्मोग करता रहा। जब कि सृष्टि ही ४ अरब वर्ष रहती है, उसमें १४ मनु होते हैं,फिर स्वायंभुवके पुत्र भिय- प्रत का राज्य १९ अरब वर्ष लिखना गप्प नहीं तो क्या है ? पुराणानुसार भी लक्ष वर्ष से अधिक किसी युग में भी आयु नहीं होती ॥ * सेष्टि का सनय वेद मनु महाभारतादिमें पुराणों में और नित्यो संकरों तक से ४ अरब वर्ष का ही पाता है, विस्तार के भयसे यहां नहीं लिखा गया । पञ्चमस्कन्धमनीषा। समुद्दों का वर्णन- N० १ ०३१ में लिखा है। यथा-- ये या उ ह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखातास्ते सप्त सिन्धव आसन्यत एव कृताःसप्तभुवोद्वीपाः ॥ ३१॥ राजा मियत ने यह शोध फर कि सूर्य रात्रि को नहीं रहता इतने मैं अपना प्रकाश फरंगा, सात परिक्रमा सूर्य के रघ समान अपना रथ बनाय उस रप में घट कर कौं ॥ ३० ॥ ये जो समुद्र हैं उसी के पहिये की लीक हैं। इसी से सात द्वीप घने ४ ॥३१॥ यहां भागवत ने वेद का विरोध किया है। क्योकि- सूर्याचन्द्रमसी धाता यथापूर्वमकल्पयत् । यजु० १० १९०३ ततः समुद्रोअर्णवः समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत ॥ इत्यादि प्रमाणों से समुद्र का होना पनातन सिद्ध है,और भागवत ही में क्षीरसागर ममुद्र में विष्णु का शयन, मला को जल से उत्पत्ति आदि लिखी है, फिर यहां सात समुद्गों का प्रियवतरणनेमि की लीक से उत्पन्न, लिसना भूल ही सिद्ध करता है । मापा टीकाकार ने भी यहां शङ्का की है कि राजा का रथ आकाश में घूमता था फिर पृथ्वी पर समुद्र कैसे बने । एक से रथ से समुद्रों में यह भेद कैसे हुवा एक दूसरा द्विगुण तीसरा उस से भी द्विगुण इसी प्रकार एक सी उभ्याई चौड़ाई के रथ पृथक् २ प्राकार वाले ममुद्र कैसे बने ? इस का उत्तर भी स्वयं दिया है कि इस के रथ के चारधि को उतार भगवाम स्वयं सारधि बन जाते थे,रथ को बढ़ा लेते थे। परन्तु यह पाठ मूल में नहीं है, सपना मात्र है । हम यह प्रशन करते हैं कि यह इतना बड़ा रथ जय चला होगा तो घो कहां पांच रखते थे? तथा धुरा पृथ्वी से कितना ऊंचा था, घना कहा था ? ( भापाटीकाकार यह भी लिखते हैं कि ब्रह्मा- मे स्वायंभुव मनु से जो सुष्टि रचना कराई तंब उन्होंने ७ रामुद्द्वीप नहीं अधिनाये ) परन्तु रथ का दूसरा पहियां कहां रहा, 'यह नहीं बताया ! पक्षा थाइसिकल के समान था? " TI भागवत्त-समीक्षा 4 . - - दिया है और २० वें पर दो कर दिये हैं। इस लिये १ दण्डक आने पीछे ६२ इस में १ खारी जल, २ ईख का रस, ३ मदिरा, ४ घृत, ५ घोर (दूध) ६ मटे और ७ सातवां शुद्ध जल का समुद्र है। यदि ईस के रस का मुद्र है ती छोई कहाँ गई, ईख के रस से पौराणिक भाई मिठाई सजाकर यापार करें तौ लाभ है परन्तु यह तो रख कर मिरका होगया होगा। न माने यह किसने भरे हैं, यह नहीं लिखा । भूगोलविद्याविद् माइली ने मन समुद्रों को . क्षार ही पाया है, ज्योतिप के अन्धों में भी पार पनुन्द्र फाही वर्णन है, फिर न जाने पुराश वालों को ईख,शा रस, मदिरा, घम, दूध, पट्टा कसं चूमा ? ०२ में प्रियनन के पुत्र भाग्नीघ्र ने ती ब्रह्मा की पूजा पर्वत में आ- रम्भ की और ब्रह्मा ने पूर्वचिती अप्सरा भेजी। भला यह न्याय कैसा है कि भक्त को शुभ कर्म से हटावे ? उस समर से “युतायुत परिवरमेरोप- लक्षणम्०" १* ( दश हज़ार को अयुक्त कहते हैं, यहाँ तो 'अयुगायुक्त कहा गया है जो दश लक्ष होते हैं,परन्तु टीका ने दश हज़ार ही अर्थ किया हैं ) संयोग किया, नी पुन उत्पन्न किये। आगेदएडक २० में "सासूरवाज्यसत्तानयानुयत्वरंगृहएबापहाय" अर्थ- 'यह अप्सरा प्रतिवर्ष एफ बेटा पैदा कर ऐसे वेटेब्रल्ला ती पर छोड़ चली गई। यहां गणितशास्त्रविद् भी चक्कर खाते होंगे, प्रतिवर्ष एक पुत्र होने पर भी बेटे ही हुवे । १८००० वर्ष व्यर्थ भोग हो रहा । बलिदारी ! गणक जी ! अध्याय ३ में नाभि राजा के पुत्र प्रयदेव जी की उत्पत्ति है, यह २४ अन- तारों में गिने जाते हैं, परन्तु रवयं भापा टीका में लिखा है कि यह जैनमत प्रवर्तक थे। इस से सिद्ध है कि जैनमत भी पुराणों की शाखा है जो वेदों और ईश्वर को भी नहीं मानते हैं। इन को ईश्वरावतार लिखने से हमें संदेश है फि कदाचित् यह कथा जैनियों ने ही पुराणों में बगाई होगी ॥ अ० १६ गक ५- योवाऽयं जम्बूद्वीपः कुवलयकमलकोशाभ्यन्तरकोशी नियुतयोजनविशालः समवर्तुलो यथा पुष्करपत्रम् ॥ * द्वितीयाध्याय में छठे दण्डको भापाटीकाकार ने नई पर 'अङ्क नहीं पाई हो गया है।

पञ्चमस्त्यसमीशा। जहाद्वीप कमलपत्र सा १ लाख योजन यतुल है । पूर्व अध्यायों में कहें चुके हैं कि एक समुद्र ने दूसरा दुगना है तो उस के बीच का भाग मी द्विगुणा ही होगा * इस हिसाय मे १।२।४।८।१६ । ३३ । ६४ लाख योजन ये सातों द्वीप हुचे। योग १२७ लास योजन होते हैं। इस के यदि ५ मील का योशन मान कर मील बनाये जाये ती ६५ लास सील होते हैं। इस में समुद्रों ही योजग रात्पर और जोड़ी जाने से पूर्व यह निश्चय करना है कि तार सद् गत शोजन विस्तीर्ण खिसा पाया जा है। यदि इस का पांट योशन है तो दूसरे रागुन का २०० योजन फांद होगा और वह चारों ओर को ऐने ही फैला हुघा होगा ती घाल अधिक भूमि को घेरेगा, इसी प्रकार तोमरा चौधा भी ममझना चाहिये, परन्तु हम द्विगुणा ही रकमा लगावें तो करोड़ों मीट फा विस्तार हुबा ॥ सिद्धान्त शिरोमणि के गणिसाध्याय में लिखा है कि- प्रोक्तो योजनसंख्यया कुपरिधिः सप्ताङ्गनन्दाब्धयः । तदव्यासः कुभुजङ्गसायकसुवोऽथमोच्यते योजनः । अर्थात् पृथिवी की परिधि ४८६५ योजन है । यदि ५.३० मील का एक योजन माने ती २५८५६ गोल होते हैं, यही परिधि योरोप के वासी विज्ञान- विदों में मानी है. तथा इसी झोक में व्यास १५१ योजन का बताया है, यह भी उता विद्वानों की राममति का समादर फारक है। कुछ हम ही पुराण पपइन नहीं करते हैं,पूर्व भास्कराचार्य शो. सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के कर्ता हुये है, बद भी स्वयं पुराणोक्तभूगोल का खण्डन. अपने ग्रन्य में इस प्रकार कर गयेई। यथा- कोटिन्नेखनन्द पदक नख भू भूभृद भुजङ्गेन्दुभि- ज्योतिः शास्त्रविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमा योजनैः॥ तद् ब्रह्माण्ड कटाह सम्पुट तटे केचिज्जगुर्वेष्टनं- केचित् प्रोचुरदृश्य दृश्यक गिरिं पौराणिकाः सूरयः ॥ अर्थ-( १८७१०६९२०:070000 योजन को ज्योतिष शास्त्र के जानने वाले सारी सृष्टि का एक छोटा भाग मानते हैं । बहुत से इसको पृथ्वी की परिधि का मान समझते हैं, और पौरागिंफ विद्वान् केवल इस को लोकालोक पर्वत ऊंचाई समझते हैं । * २०२० में एक से दूसरा द्विगुणहलिखा ही है.॥ .

कूल है। कोई - भागवत-समीक्षा। इंच से शिव है शि पौराणिक भूगोल का नान्य पूर्वाधाों में भी नहीं थाम पृथ्वी को कमपत्रवत चपटी साना और सुमेरु को जट में १६ हजार रूपर से ३२ हजार योजन और एकलक्ष योजनांचा लताना भी भी पर्वश ऐसा नहीं खो जपर चौड़ा नीचे से पतला हो । तथा एक लाख योजन जंधा हो, आई इतनी पतली हो, यह तो टूट ही पड़ता । तथा पृथ्वी को चपटा मानने का सपन भी मि०शि० में लिखा है- यदि समा मुकुरोदरसलिला भगवती धरणी तिरणिःक्षितेः। उपरि दूरगतोपि परिश्रमन् किमु नरैरमरैरवि नेक्ष्यते ॥ १॥ अर्थ-यदि पृथिवी चपटी दर्पणोदर धरातल के समान होती तो सूर्य-- पृथिवी के अपर गया हुवा भी सायंकाल के पीछे लनुथ्यों को क्यों नहीं दीसता। धरती के चपटी होने पर और भी एफ आश्चर्य की बात है कि सात समुद्रों के आठ द्वीप होने चाहिये क्योंकि सात दरों के माठ स्तम्भ होते हैं, फिर सात द्वीप लिखना भूल ही सिद्ध होती है । आगे पुथिवी का चूनना वैदिक मन्त्रों और प्राचीन ज्योतिष आचार्यो । के मत से लिखा जाता है। पाठक विधारें कि पुराण चेद को वैधे प्रतिकूल हैं भूमि अपनी कक्षा में स्थित होकर सूर्य की परिक्रमा करती है ! यथा हि- या गौर्वतनि पर्यंति निकृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः। सा प्रवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविपा विवस्वते (०१०। ६५।६) -अर्थ-(यागीः ) जो पृथिवी ( अवारतः ).निरन्तर अर्थात् सदा ( पयो दुश्मा ) अन्न, रस, फल, पूल मादि पदार्थों से प्राणियों को पूर्ण करतो तथा (व्रतनीः) अपने निया का पालन करती (प्रधाना) परमेश्वर की महिमा का उपदेश करती (दाशुषे बरुणाय ) दानी और श्रेष्ठ जन को (देवेभ्यः.) और विद्वानों को ( हविया दाशत) अनेक सुख देती (वर्तनिम्) अपनी कक्षारूप नार्ग में (विवस्वते ) सूर्य के (पर्येति) चारों ओर घूमती है। * पृथिवी का नाम निचं० १ । १ में गौः है,जिस का अर्थ "गकृतीति गौः जो चलती है सी गौः ( सूमि) है। इस से भी सिद्ध है कि ऋषि जोग भूमिमा घलना मानते थे । । - । 1 पञ्चमस्कन्धसमीक्षा। ६५. इथिवी केवल सूर्य के चारों ओर ही मही घूमती किन्तु साथ ही साथ अपनी (AN) कीली पर भी घूमती है, ले लट्टू अपनी कोली पर भी . धूमता है और अपनी जगह से भी हटता है और जैसे गाड़ी का पहिया अपनी धुरी पर घूमता है और साथ ही साथ चड़क पर भी धूगत्ता जाता है। इसमें प्रमाण यह है- आयंगौ.पृम्भिरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरंच प्रयन्टस्वः॥ ( ० ० ८ ० ८३० ४७ और यजु० ० ३ ०६) अर्थ-(अयम् ) यह (गः) पृथिवी लोक (मातर) जल को (महत) प्राप्त होकर अर्थात जल के सहित (भिः) अन्तरिक्ष में (आझमीत ) आक्रमण करता है अर्थात् अपनी धुरी पर घूमता है। (च) और पितरम् ). सूर्य के भी ( पुरः जयन् ) चारों ओर घूमता है । इस विषय में बहुधा मनुष्य कई प्रकार शङ्का किया करते है कि पधिवी चलती हुई प्रतीत क्यों नहीं होती। उत्तर-कुलालचक्रभ्रमिवामगत्या योन्तो न कीटा इव भान्ति यान्तः ॥ सिद्धान्तशिरोमणि ॥ अर्थ-जैसे कुम्हार के घूमते हुवे चाक ( घ) पर बैठे हुवे कीड़े उस को गति को नहीं जान सकते, ऐसे ही मनुष्यों को पृथिवी चलती हुई नहीं, प्रतीत होती । अन्यञ्च-आर्यभट्टीये- अनुलोमगतिनीस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वतः । अचलानिभाति तद्वत् सपश्चिमगानि लङ्कायामिति । अर्थ-जैसे नौका में बैठा हुनामनुष्य किनारे स्थिर वस्तुओं को दूसरी ओर से चलते हुवे श्वे देखता है ऐसे ही मनुष्यों को सूर्यादि नक्षत्र जो स्थिर है, * यहां जल को अलङ्काररूप में पृथिधी की माता कहा है। पथाह- तस्माद्बा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः आकाशाद्वायुः वायोरग्नि अग्नेरापः“अदुभ्यः पृथित्री"इत्यादिसति उ०॥ । यहां सूर्य को अलङ्काररूप से पृथिवी का पिता कहा है क्योंकि सूर्य ही से पृथिवीको (अपनी कक्षा में) स्थिति,मनुष्यों को जीवन, वर्षा और उस 1 से अस्पति आदि की उत्पत्ति होती है, - । भागवत-समीक्षा पश्चिम की ओर चलते हुवे से, दीसते हैं और पृथिवी स्थिर प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में भूमि ही चलती है। दण्डक १२में चार पक्षों का वर्णन है फि १९ हज़ार योजन ऊंचे चारों वृक्ष हैं । आम, जामन, कदम्ब और बट; इनके फल माठ खौ इकसठ हाथ -लम्बे वायुपुराण में लिखे हैं, फल कुष्ठों में जाकर गिरते हैं, उन की कारों नदी चारों दिशाओं को बहती हैं, उन में स्नान करते हैं। भारतवर्ष की ओर को जम्बू नदी बहती बताई है । यथा द० १९- एवं जम्बूफलानामऽत्त्युच्चनिपातविशीर्णानामनस्थिप्रायाणा विना गुठली की खामन हाथी सी गिरती हैं, ४० कोस तक सुगन्ध देती नदी बहती है। अन्यों की तो खबर नहीं, पर जम्बू नदी तो इधर ही होनी चाहिये थी, सो है नहीं । इस पर भाषाटीकाकार व संशोधक पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र भारतधर्म- 'महानखल के महोपदेशक के हृदय में भी शङ्का हुई थी, टिप्पनी में चित्त कांपना छिपणाना लिखा है, परन्तु उत्तर में यही कह टाल दिया है कि सभी वर्णाश्रमधर्म लुप्त हो गये, सो भेगवान् भी हर गये फि यह दुष्ट लोग धन स्थानों को नष्ट कर देंगे; अतः छिपा दिये हैं, किसी का प्रभाव हर लिया हैं। वाह क्या ठीक'उत्तर' है ॥ ६६२८- सुभेस के ऊपर १० हज़ार योजन लम्बी ४ हजार चौड़ी ब्रह्मा की बनाई वर्णपुरी है-अ० १७ में द०१॥ तत्र भगवतः साक्षाद् यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो वामपादाङ्गुष्ठनखनिर्भनोर्वाण्डकठाहविवरणान्तः प्रविष्टा या बाह्यजलधारा तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिंजल्कोपर- जिताखिलजगदधमलापहोपस्पर्शनाइमलाखांक्षाभगवत्प- दोत्यनुपलक्षितवचोऽभिधीयमानाऽतिमहता कालेन युगस- इस्रोपलक्षणेन दिवो मूढन्यवततार ॥ १ ॥ जब वामन अवतार बलि के यज्ञ में पृथ्विी नापते थे तब वाय पांव का भंगूठा 'ब्रह्माण्ड फोड़ बाहर निकल गया उस से जलधारा चर शकमला घर को धोने से सात २ हन्नार युगों में मीचे गिरी, यह गहा है ।

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पञ्चारमन्दसमीक्षा।
सनाक्षा-( १ )मामय से भटगे पानी निकलना के डी असम्भव बार
३, मामलाएड के यादर ? पा लाडले भीतर पाश का यह
अर्थ कि कोई अब जैसा माल हमारी पृथिनी और सूर्यादि के चारों और
चौर वह अशा नाके के अंग को समान कही जल को पाच बरा है ?
(२) वह पारा साल मनोशर को लेकर १०० युग में तो उत्तरी परन्तु
तुही बनी ही रहती तो अब गङ्गा में सुई पल पदों नहीं ?
(३ जार युगती एक मन्वन्तर में भी नहीं होते ३१ पतुर्युगियों का
ही १ मन्धन्दर छाया है तौ १ मम्वन्सार के २८४ ग सुचे ।।
(४) यदि, १०२० युग में वहां से पानी की गति नीचे को हुई तो कितनी
दरी से यह जल गिरा, आप स्वयं अनुगाम थार समे। याच मिनट में
छ में शाल गिरे ती मी १ धगट में ६० नील १०८ घरटे में ६००० मील खाती
महीनों वर्षों में ही कोड़ों मील छा जादेगा फिर युग कहां, युग पर भी सन्तोष
नहीं १८०० युग बता दिये हैं १००० युग की तो प्रलय गमय ६० १५ सें तो
कस्पान्त होमाताहै,पिर फल्प मध्य में यहपत्तान्तमानाजवषौनहीं।
इलाकृतेतु भगवान् शवएक एधपुमानला भाऽपरोनिविशति
इला पल र पूछ में तो शिय ही एक पुरुष है (अन्य राम स्त्रियां ही रहती है।
समीक्षा-भला वहाँ सुष्टि क्षमे होती है। कियों को फोन पैदा करता है।
भवानीनाथैः स्खीगणाव॑दसहसरवरुध्यमानो.
हज़ार अरय शियां घ रहती हैं ( यहां नाथ शब्द याहुबपनान्त है।
शब्द
इम से यहां अन्य युष्य रहने गिनु हैं।
भ० १८, १९ में प्रत्येक सएछ ( 1 ) में एफ २ अवतार की स्तुति एक २.
भार करता है, ऐसा लेख है । यो पा इलाम में कोई दूसरा HIT तुति
करता है, वहां ती होई पुरुप हसी मही स्थति करने कहां से आगया।
समय नहीं लिखा, या सदाकाल एक ही युरुष स्तुति करता रहता है ? भारत
२६ दरलागयण तप करते और मारद स्तुति करते ॥ १०९९ दल ११०
यालयानसोत्तरमेवारन्तरं तावती भूमिः काञ्जन्यन्या35
दर्शतलोपमा यस्यां प्रहितः पदार्थो न कथंचिव युनः
प्रत्यपलभ्यते तस्मात
त्वकस्वपरिहतासीत् ॥ ३५ ॥

१ - भागवत-समीक्षा। "भापोटीकाकार कहते हैं कि मानोर और खुवर्ण पत्तोबीच जितनी भूमि है सतने ही प्रमाण एक कारोष्ट्र साढ़े सावन गार योजग दूसरी भूमि स्वादिष्ट मण से सागर के आगे है, उस में प्राशी रहते हैं, उस से परे सुवर्ण मग भूमि है। यह द्वीप का वर्णन है क्योंकि मामलोपर दचि मास ( मठे ) के समुद्र से आगे है। युष्कर द्वीप छठा लिखा है यहां भी गहवह है मोंकि उसमामे 9वें का वर्णन मीर सो है, समझ में नहीं आता कि जब गहे का समुद्र कठा और नत से भागे ही मानसोत्तर लिखा है, इसी को पुष्कर द्वीप कहा है फिर यह मासयां पयों नहीं हुभा ॥ ०२० २०२९ । ३० देखो । हो मान- सोर और सुमेरु के बीचके भूभाग को उल्लवर्णन है इस को वादक समुद्र शुद्ध जल से घिरा भी उक्त दरखफों में गताया है । और फिर द०३४ . ततः परस्तात् लोकालोकनामाचलो० ३४ प्रम द्वीप से परे लोकालोफ नाम पर्वल है इत्यादि लिया है । यह पर्वत लौ राम को पारों ओर होने से कोड़ों मील छम्मा चाहिये जो सर्दया मीठ ही हो सकता है। मापाटीकाकार " मानर्शतपोपम के अर्थ को छोड़ गये है।योंकि आज कल ती भूमि को सभी अंगडाकार मानते हैं । भास्कराचार्य नेदर्पणा- कार पृथिवी का खराटण किया है सो हम पूर्व विखा चुके हैं।८ करोड योजन व स्वर्णमयी है और शीशे के समान है। यहां शिव तम्त्र का प्र- माण दिया है कि पृथिवी ९५३५०००० घो परिमाण में है। हम ४६योजन - पिदी की परिधि का परिमाण पीछे दे आये हैं । देखो १० (६३) अस मात द्वीप से भी आगे अर्थात शुद्ध स्वाद समुद्र से प्रागेकोहों योजन' भूमि बताना भारी भूल भाम होती है। क्योंकि यहां तो खोकालोकवताया है,सभी वर्णमयीभूनि बसानेलगे । नागे पृथिवी का समस्तविस्तारकोड़ योजन बताया है। यथा- एतावांलोकविन्यासो मानालक्षणसंस्थाभिर्विचिन्तितः कविभिः . स तु पञ्चाशत्कोटिगणितस्य भूगोलस्य तुरीयभागोऽयं लोकालोकाचलः । द० ३८ अ० २० ॥ - - - पञ्चमस्कन्धसमीक्षा समस्त पथिवी ५०को योजन उसके चौथाई भाग में लोकामक पर्वत है। ६५ के कहे १५७५०००० योजन का विस्तार स्वादूदा से बाहर का और इतनी ही भूमि सुमेरु पुटकार के बीच को लगाने से ३१५७०००० योजन्दगोसे यदि शिवतन्त्रो ३९००००० योजन को भी मिलाले तो भी १९५४००००० योजन भी होता है. ५० कोई तो फिर भी नहीं थे। “अण्डमध्यगतः सूर्यो यावाबूभ्योर्यदन्तरम् । सूर्याण्डगोलयोर्मध्ये कोट्यः स्युः पञ्चविंशतिः ॥ #०२० नोक. ३. श्रीवरी टीफा-. अएडमध्यगतः कितन्मध्यं तदाह यावाभूम्योः पूर्वोत्तर कपालयोर्यदन्तरं मध्यरथानं सर्वतः पञ्चविंशतिकोट्य:४३ नयोस पृथिवी और सूर्यमाल के बीच २५. कोटि योजन का फासला है। टीकाकार भी सूर्य शब्द का अर्थ धुलोक करते हैं, यह शूल आगे ०२१.८०७ में १५१००००० योजनका फासला सूर्यमानखोत्तरेकी भूमि का बताया है, इस लिये परस्पर विरोध है ।। अ० २९ ९०२ में वर्णित है कि दिव मराठल व भूमण्डल द्विदल समान है। टीका ने लिखा है कि जैसे दोनों दल बराबर होते हैं, ऐले ही जूति के समानही दिमगडलं भी है, जिसे खगाल कहते हैं। यथाविवडयो इत्यादि। समीक्षा-यह भारी भूल हैं, पृथ्वी से .,बड़े २ बहुत बड़े लोक सूर्यादि धुलोक ) सगोल में विराजते हैं, फिर भूगोल के समान ही खगोल कैसे सकता है ०३. में स एष उदगयन दक्षिणायन वैषुवत संज्ञा भिन्शिनधसमानाभिमंतिभिरारोहणावरोहणसमान य थासवनमभिपद्यमानो मकराविष राशिवहोरात्राणिदीर्घ- हूस्वसमानानि धत्ते ॥ ३ ॥ यानमेषतुल यावर्तते तदाऽहोरात्राणि समानानि भवन्ति ।।

so भारत-जनीक्षा 5 - अर्थात् सूर्य उत्तरायण दक्षिणायन में नन्द, शान, और समान गति से चलता है ॥३॥ जबसेप तुल राशि पर प्राता है तब दिनरात्रि समागहोती है। उमीक्षा-सूर्य सदा एकची गति चलता है, ए-बी भी सदा एक ही गति पर चलती है, वह तो पृथ्वी की गति से मृतुभेद होता है, इसी से अयन भेद भी होता है। मेष तुल में रात्रिदिन समान बताना भो भारी भूल है, जब कि गनर भो । १२ कन्या १२ मीन दिनरात बरोबर कीन ' कहते हैं रुदा कन्या मीन के सूर्चा में ही दिनरात बराबर होता है ४ यदा कृषमादि पसु च राशिपु चरति तदा अहान्येव बर्द्धन्ले हसति च मालि मारपेकशा घटिका रात्रिषु" ॥४॥ अर्घ--सब सूर्य वृषमादि राशियों पर चलता है तब दिन बढ़ते हैं और रात्रि प्रतिमास १ घड़ी घस्तो है ॥ समीक्षा-यह भी सून है क्योंकि उत्तरायण धन के सूर्य को ९ । १० अंशों पर हो जाता है तभी से दिन बढ़ता है, ६ मास बढ़ता है,फिर ६ मास घ- टता है। और कन्या १२ झंशों पर पूरा ३० घड़ी हो जाता है,-दिनरात बराबर होते हैं रघर नीन ले १० अश से जपर ही दिनरात बराबर होजाते हैं यह गरित शाल भागवतका को नहीं पाता घा, यही ज्ञात होता है। टीकाकार भी ऐसे ही हैं । द. २ में जहां सूर्य शिलोकी को तपाता है, लिखा है, उस पर टीका भी शाडूा करती है कि सूर्य पाताण में प्रकाश नहीं पहुंचाता पिर व्यासदेव ने त्रिलोखी क्यों कहा । उत्तर भी खुद ही दिया है कि शुकदेव जी ने भूमि । के नये सात लाक जी कथा नहीं कही है, पृथ्वी के ऊपर से तीन लोक मान कर उन का होवर्णन है। धन्य ०४ में तो पाताल हातों पदों का वर्णन किया है । . सूर्य की दूरी एवं नव कोठय एकपाशल्लक्षाणि योजनानां सान- सोरगिरिपरिवततस्योपदिशन्ति प्रपोत मावदोत्तर पर्वत के जरोड ५ लाख गोजन दूरभूर्य धमता सी पश्चस्वन्धमोक्षा। सूर्य की गति यदा बैन्द्रया:पुर्याः प्रचलते पञ्चदश घटिकाभिर्याम्यां संपादकोटिद्वययोजनानां सार्घद्वादशलक्षाणि साधिकानि चोपयाति ॥ १० ॥ जय इद्रपुरीने भूयं अलसाई तब १५ घड़ी में सवा दो कोर १९५००००० या यारह जाय कुछ कपर चलता है। सवा दो क्रोष्ठ में सवा.बारह लाख मिलाने से २३१३५०० वे ॥ और भी-- एवं मुहूर्तेल चतुशिल्लक्षायाजनान्यष्टशताधिकानि सौरो रथस्त्रयीमयोसौ चतसृषु परिवर्त्तते पुणेषु ॥ १२ ॥.. इस प्रकार दो घड़ी में ३४ लाख ८ सी योशनसे अधिक सूर्यरथ चलता है। शनीमा-१ हिंसाय १५. घड़ी में २५५०६००० योजन होता है अब पाठक विचार कि. ६वडक १० में २३७२५८०० ही होता था । सूर्य रथ के धुरे- द के टीका में दो धुरे यताये हैं, एक जो सुमेरु से मानसोत्तर तक. ला है, वह १५५५८००० योजान का है, दूभरा इस से चौथाई है ( यह लेख दूरी के हिसाब लगा कर लिखा है जो कि ७० २०८०३५ में बता आये है ) रथनीडस्तु षट्त्रिंशल्लक्षयोजनायतस्तत्तुरीयभाग विशालस्तावान् ॥ द. १५ ॥ सूर्यरघ ३६: लास योजन चीड़ा . लास योजन ऊंचा है। समीधा-अ०२० प्रलो.४३.७ २५ भोट ऊंचाई लिखी है क्या सुमेरू पर धेरे में और ९साख जची चोटी से भी अधर हो सूर्य चलता है या २५.फोड़ लिख चुके हैं. १ ९० १०- लक्षोत्तर साधनवकोठियोजनपरिमण्डलं मूवलयस्य क्षणेन सगव्यूत्युत्तर द्विसहस्रयोजनानि स भुङ्क्तः ॥ १८ ॥ अर्थात् एफ लाखं साढ़े नौ करोड योजन पृथ्वी चक्र के घूमने के लिये एक क्षण में २००० योजन और २ कोश पालता है। भाषाटीका ने ०५०००० जान अर्थ इस देश का जाने कैसो किया है। घरे धरे मानस-मीक्षा an . चन्द्रलोक वर्णन' ०२२ एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्ला- योजनत उपलक्ष्यमानोऽर्कस्य स० ॥८॥ अर्थात चन्द्रमा सूर्य से ऊपर लाल. योजन ऊंचा है। समीक्षा-प्रहलाघय तथा सिद्धान्तशिरोमणि और योपियनः खगोल विद्याविद् विद्वानों के सिद्वान्तानुसार भी धन्द्रलोक पृथ्वी के समीप और सूर्य से बहुत नीचे है परन्तु भागवसकर्ता को पया खयर, ऐसी फूल क्यों हुई ! • अर्काद.धश्चकक्षा वासना भाये * २४ अध्याय में शिशुमार चना या वर्शन है जिसमें सुध ग्रहो कर निवास, पूंछ, कोख, छाती, मस्तकादि लिखा है। ग्रहण विचार सूर्य से नीचे १० हजार योज़म राहु है; ऐसा किसी का मत है । यधार अधस्तात् सवितुर्याजनाय तेस्वर्भानुनक्षत्रवञ्चरतीत्येक ॥५॥ यददस्तरणमण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतीयोजनायुतमा- चक्षते, द्वादशसहस्तं सोमस्य, त्रयोदशसहस्र राहोर्यःपर्वाणि तव्यवधानकृद् वैरानुबन्धः सूर्यचन्द्रमसावभिधावति ॥२॥ टी-राहु के अधोभाग में रह कर सूर्य तपता है, सूर्य का विस्तार १० हजार योजन, चन्द्रमा का १२ हजार योग, राहु का १३ हजार योजन का विस्तार है, और याद कर ग्रहण में राष्ट्र सूर्य चन्द्र की ओर भागता हैं । समीक्षा-हम इस प्रकरसा में इतना ही लिखेंगे कि ज्योतिः शान से भागवत का कितना भेद है। ग्रंशलाघव ने स्पष्ट है कि- छादयत्यर्कमिन्दुर्विधु भूमिभाः अर्थात सूर्य को धन्द्रमा ढकतासे है और चन्द्रमा को पृथ्वी की लाया थापती है; तब ग्रहण होता है। पृथ्वी और सूर्य को बीच में चन्द्रमा है। चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकता है। देखो मास्कर प्र० उत्तरार्थ प. अध्याय २५ तस्य मूलदेशे त्रिंशदोजनसहखान्तर आस्ते ।। पातालकेमू लमें ३० हजार योजन विस्तार से शेषजी संकर्षण नामी र जनमें है। द्विजः कश्चिद्दासीपतिरजामिल। नेमारायण का षाएंव धसमीक्षा यस्येदं क्षितिमण्डल भगवतोऽनन्तमूर्तःसहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि नियमाणं सिद्धार्थइवलक्ष्यते॥२॥ अनन्त नामक लिन शेष के हजार शिरों में एक शिर के ऊपर यहमि मपाल सरनों के दाने के समान जान पड़ता है ॥ २ ॥ समीक्षा 1.३० सहस्र यो जन विस्तार बता चुकी है उसका नाम लिन्त कहना उचित नहीं है और उस के एज़ार शिर में एक शिर ३० यो. में को हुवा, पिर पृथ्वी को तरकों के सा दाना बताना श्री शिवत्ता सरसों का सामा अर्थ पाना अर्थ भी दाना पंज्वालाप्रसाद का सम्मत भाषादीको रखा है। योजना के शिर पर ५० कोई योजन की भूमि को सरसों पाने सपा पाने सान से ही बुद्धि की बानगी मिलती है। फिर यह शेष काहे पर बेठे या स है। वह भूमि कहां है। अथ षष्ठस्कन्धे समीक्षा १ में शो०:२९ से प्रशामिल का उपाख्यागे. नाम्ना नष्टसदाचारो दास्याः संसर्गदूषितः ॥ २१॥ बन्धक्षकैतवैश्चौं यर्महितां वत्तिमास्थितः । इत्यादि। अर्थात कान्यकुल में देश में कोई अजामिल नामक दासोपतिकुकर्मी था, जेल में जूवे में बलविंद्र में चोरी में गुजर करता था,१० बेटे थे, छोदेका "नारायण था। संदा उसी में प्यार रखना था,मरते समय यम के दूतों को देख “ (पुत्र) नारायणं । " कह धिल्लाया तब विष्णके दूत जल्दी आगये, यस के दूतों को धमकाने लगे कि तुम कौन हो, क्यों खड़े हो, क्यों आये हो । यमदूतों में कहा-यह पापी महापापी हैं वैदिक धर्मका विरोधी विष्णु के दूतों ने कहा- अ०२ में) अहो । न्यायोशन पर ही अन्याय ले जावेंगे. और हो गये। समीक्षा-पाठक खयं शिवारे,पा न्याय है। विष्णको कानम को आगे मोया देते 1 माम दिया .

१ 98 भागवत-समीक्षा। स्तनः सुरायो मित्र ग्रहहा गुरुतल्पगः । खीराजपिटगोहता येच पातकिलोऽपरे ॥६॥ सर्वकामप्यघवतानिदमेव सुनिष्कृतम् । नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विपया मतिः ॥ १० ॥ अर्थात् घोर,शराबी,मित्रद्रोही,गुमच्योगामी,ची पाला पिता और गौ को मारनेहारा और भी जो पापी विष्णु के नाम लेनेमात्र सेशुद्धहोजाते हैं ॥१०॥ या अच्छा प्रायश्चित्त है । अध्याय ३ में यनको दूतोंने यगचे कहा कि कितने न्यायकर्ता संभार में हैं । इस में बड़ा गह यड़ हो जाता है। हम एक भाप ही को न्यायफारी शागते थे । तप यमने कहा-नहीं मुझ से बड़े और विष्णु हैं । न०५ में नारदी ने दक्ष के पुत्रों को शानोपदेश दिया, दतने शाप देदिया। भली गुरुदधिरसा मिली। अ० १८ में इन्द्र मौली दिति को गर्म में घुजगया ७ टुकर करे,फिर प्रत्येक के सात २ कर ४९ टुकड़े करदिये, गझ रोया, इन्द्र ने कहा 'मत रोओ' इस प्रकार ४८ लरुत हुधं ॥ 1 अथ सप्तमम्कन्ध समीक्षा- शा० १. २५-३० तक लिखा है कि कार स्लेह, बैर भावादि किसी प्रकार से भी कृष्या को याद रखने से मुक्ति हो जाती है। समीक्षा-हमारोशम्मतिर्मती दरकी स्तुतिप्रार्थनोपासनानिसान्विक शुभ कों से ही सुख होता है। यदि कृष्णादिको कंसादि देय ईश्वर मानते मानते,ती लहते ही क्यों। कंमादिकों ने कसी भी ईश्वर मान कर वैर नहीं किया । विना ईश्वरीयज्ञान के मुक्ति नहीं होती। वेद कहते हैं- तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय प्रथम शध्याय में विष्णु के द्वारपालोको शाप वालि राक्षत छोशाओ, फिर प्रसन्न होकर कह दिया कि यदि येर करोगेतौ ३ जल्मों मेंमुत्तिपाजानोगे मो० ३२-जन विष्णु के मारने मात्र ते पवित्र हो मुक्तिपा जाते थे तो हिरण्य - मागयत समीती ७५ हिरण्यकशिपु तो सष्टि के भारम्भ सत्ययुग में ही हुवे होंगे, मरकर मुक्ति पाये या कहीं मरक खर्म में रहे या तभी रावणा कुम्भकर्ण बनगये ? रावण कुम्भक श्रेता में मारे गये और वहां भी उन का मुक्ति पाना वर्णित है. फिर द्वापरान्त में शिशुपाल दन्तवक्त्र से प्रा बने या मुक्ति से भी आपके मत में प्रत्येक युग में भी लोद पाते हैं ? यह २८ दो कलियुग है. इश से पूर्व ५००० वर्ष होता शिशुपा लादि की मरेछुवे है,फिर पीनेदोर्व वर्ष तकमवा स्तर में यथा एन पार्षदों के ३ आन्म ही हो ! था प्रत्येक युग में मर २ कै जी जाते हैं पौराणिक विश्वास है कि प्रत्येक वेता में राम,द्वापर में कृष्ण होते और रावण कंसादि को मारते हैं । १० १० छो०१७ से २१ तक कहा है कि महाद। २१ पीड़ी तेरी पवित्र हो गई. शोक २९ में जमा से न सिंह ने कहा है कि ऐमा वरदान न दिया करो जैसा हिरस्यकशिपु को देदिया। इससे क्या विष्णु प्रहारुद्र एक घिद्ध हो सकेंगे। अथाष्टमस्कन्ध समीक्षा M०६ में एक सी का अवतार लिखा है, उसी ने देव दैत्यों को समुद्र मयम का उपदेश दिया है। या यह २५ वा अवतार है? और(न जाने यहां : बीरूप की या प्रावश्यकता पी) पर्वत की रे वासुकि सर्प की नेती बनाकर देवासुरों गे गुग सघा, मन्दर को उठा लाये, दैत्य देव दखने लगे, मरते देस भगवान् आये,उन को जिवाया, हाथ पांव जोड़े,स्वयं पर्वत को गरुड़ पर घर साये। इत्यादि असंगत असम्भव कथा भरी हैं। ० 3-पहाड़ नीचे को सरकने लगा, तय फळवा रन नीचे बेठ गये ॥ ८॥ लाख योजन का पहाड़ पीठ पर धर लिया। यथा- दधार पृष्ठेन स लक्षयोजन प्रस्तारिणा द्वीपइवापरोमहान् : पयत एजातामा सात हुवा है ॥ 43 में समुद्र मथन से रबरूप घोड़ा, हापी, अप्सरा, विष, मदिरा, पन्धन्तरि वैध, सब निकले लिखे हैं । शा० ४१ में मोहनी खीरूप भगवान् का अवतार लिखा है। स्तनभारकृशोदरीम् ४३ इत्यादि रूप का यरहन है । दैत्यदल कामवश मोहांगया,अमृत का बॉट वट से देवतों को दे दिया । १७ म मन्दर" - . .

- घटस्कन्धसमीक्षा समाक्षा-यह धर्मरक्षार्थ कैसा अवतार किस धर्म की रक्षा की । यो कृष्ण ने गीता में कहा है कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥१॥ जब धर्म की ग्लानि, अधर्म की वृद्धि होती है तब अवतार धर्मरक्षार्थ होता है। मोहनी अवतार छलार्थ हुवा । अध्याय १२ मोहनी रूप पर शिव जी मोहित हो गये । यथा--शिव ने सुना मोहनी रूप ने दैत्यों को मोहित कर देवों को अमृत दिलाया था, बैल पर चढ़कर विष्णु के पास गये, स्तुति की कि महाराजावह रूप मुझे भी दिखोदों भगवान् छिप गये और बगीचे में एक उत्तम स्त्री टहलती फिरती देखी ततो ददर्शीपवने वरलियं विचित्रपुष्पारुणपल्लवद्रुमे ॥१८॥ देख कर निर्लज्ज होगये, विठ्ठल हो उस के पास पहुंचे. ॥ २५ तस्यानुधावतोरेतश्चस्कन्दाऽमोधरेतसः ॥ ३२ ॥ यत्र यत्राएतन्मह्या रेतस्तस्य महात्मनः तानि रूप्यस्य हेन्नश्च क्षेत्राण्यासन्महोपले ॥ ३३ ॥ शिवजी के भागते समय वीर्यस्खलित हो जहां खूमि में गिरा, यहाँ नदी पहाड़, वन उपवन सब सोने चांदी के क्षेत्र होगये। समीक्षा-इस कार से शिवजी को अज्ञानी सिद्ध किया है, इसलिये भोग्य नहीं हो सकती । न सोने चांदी के कहीं क्षेत्र ही हैं। वलायत में सोने. चांदी की बहुत खालि हैं, क्या वलायत में ही शिवशी भागे थे? छमासालड़का (वामन अ०७ में कश्यपत्री ने दिति को पंयोव्र बताया है कि फा १२.तक व्रत करे। वहीं व्रत दिति ने किया, जिस से वामन अवतार हुवा है। यह ०.१९ में वर्णित है ॥ समीक्षा-ध्यान देने योग्य बात है कि फा० बोरय बात है कि फा०, शु०१३ को व्रत समाप्तवा तौफिर भाद्र ०.९२. को वामन का जन्म हुवाः पूरा दिन कम

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भागवत समीक्षा
: मास में ही बामन का जन्म हुधा होगा । वामन जी ने ३ पंग में तीनों
लोक नाप लिये, इत्यादि मसिद्ध बुद्धिविरुद्ध कथा का यहाँ उल्लेख कर ग्रन्थ
नहीं बनायेंगे॥
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अथ नवमस्कन्ध समीक्षा..
*जगत में यह ईश्वरीय नियम प्रचलित है कि स्त्री पुरुष नहीं बन सक्ती
और पुरुष को नहीं बन सकता है परना पुराण बालों से इस ईश्वरीय नियम
भी उतार दिया है, श्रीमद्भागवत के नघनस्कन्ध अध्याय १. में लिखा है
फि सूर्यवंश के आदि पुरुष महाराज वैवस्वत मनु के जो इक्ष्वाकु शादि १०
पुत्र प्रसिद्ध है ( वैवस्वत मनु को यह दश पुत्र धे-सधाकु. नृग,शामि,दिष्ट,
पृष्ट, करूपक, नरिप्यन्त, प्रपत्र, नभग और कवि ) उन की उत्पत्ति में पूर्व
अवस्वत मनुने महर्षिवशिष्ठ से पुत्रेष्टि या कराया परन्तु उस यज्ञ के प्रताप
से मनु की स्त्री के गर्भ से इला नाम की कन्या उत्पन्न हुई. कन्या को देख के
मनु को बड़ा प्रसन्ताप उत्पन्न हुमा और उन्हों ने वरिष्ठ से कहा-
भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादिनाम् ।
विपर्ययमही कष्ट सैवं स्याब्रह्मविक्रिया ॥१७॥
यूयं मन्त्रविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्विषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यमन्तं विवुधेष्विव ॥ १८ ॥
तन्निशम्य वचस्तस्य भगवान् प्रपितामहः ।
होतुर्व्यतिक्रम ज्ञात्वा बभाषे नृपनन्दनम् ॥१९॥
एतत्सकल्पवैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः ।
तथापि साधयिष्ये ते सुग्रजस्त्वं स्वतेजसा ॥ २० ॥
एवं व्यवसितो राजन भगवान्स महायशाः।
अस्तौषीदादिपुरुपम् इलायाः पुंस्त्वकाम्यया ॥२५॥
तस्मै कामवर तुष्टों भगवान् हरिरीश्वरः ।
ददाविलाभवत्तेन सुद्यम्नः पुरुषर्षभः ॥ २२ ॥

सप्तम समीक्षा इन झाकों का अभिप्राय यह है कि ववस्वत मनु के श दन्ता नाम की कन्या उत्पन्न हुई तब गनु ने महर्षि दशि से कहा कि यह उलमा कार्य क्यों हुआ ? अर्थात मैने जो पुत्र की प्राप्ति के वास्ते यज किया था उस से पुत्री उत्पन्न क्यों हुई? आप सब लोग वेद ( सात्र ) दिक फर्म और ब्रह्म के मान ने वाले हैं, माप के या ऐसा उलटाफरनहोना इत्रिन नहीं होवशिष्टमहाराष ने उत्तर दिया कि होता के उलटे संकल्प से यह उलटा पल हुशा है परन्तु मैं अपने तेज से तुम को लपुन बनाऊंगा । ऐना कहके वशिष्ठ नेविष्णुकीस्तुति की, उस से प्रसन्न होके जो विसु ने वशिष्ठ को घर दिया उस हो वर के प्रताप से मनु की पुत्री इला पुरूप होगई और उसका नाम उद्युम्न रक्षागपा। इन महाराण मुद्युम्न की वही गति हुई जैसी एक पुरे को कथा हितो- पदेश में लिखी है। यह बनाबटी कथा है कि किसी नगर के समीप एकऋषि रहा करते थे, उन के प्राप्रम पर एफ घुम्ही का सच्चा फिरा करता था,एक दिन चुही के बच्चे को खाने के निमित्त एक विम्ली झपटी, ऋषि ने दया करके धुही के बच्चे से कहा कि "स्वमपि माजरोभव इतना कहते ही चुहीका बच्चा बिलाव बन गया, किसी दिन उरा विलाय पर कुत्ते ने हमला किया, ऋषि ने उसे बिलाव से कुत्ता बना दिया, इन ही प्रकार से चुही के बच्चे को बढाते बढ़ाते सिंह रूप में परिचित कर दिया,वही का बच्चा शब सिंह बनकर निर्भय विचरने लगा तय वन के अन्य सिंह उम का यह कहके निरादर क. रने लगे कि " रे ! वू लो वही धुलो का बच्चा है जिसे ऋषि ने बिलाय से बचाया था पन्तु हम लोग असली सिंहवंश के सिंह हैं, तू हमारी घराबरी क्या करेगा इस अपमान को शत्रिम सिंह न सहसका और समझा कि अब तक यह ऋषि जियेगा तब तक मेरा ऐसे ही अनादर होता रहेगा, इस से मघम ऋधि को मार डालना चाहिये, यह विचार कर ज्योंहीं वह ऋषि की और घला त्योंहों ऋषि ने उन के बुरे अभिप्राय को समझ के कह दिया पुनर्मूषिकोभव बस इतना कहते ही वह फिर चुहा होगया । ऐसे ही इयुज फिर भी स्त्री होगया ॥ स एकदा महाराज ! विचरन मृगयों वने। वृत्त' इति । शमात्यैरकपारुहू सैंवत्रम् ॥१३१ भागवत-संगीता प्रगृह्य रुचिर चापं शरांश्च परमाद्भुतान् ।। दंशितोनुमृगं वीरा जगाम दिशमुत्तराम् ॥२४॥ स कुमारों वनं मेरोरधस्तात् प्रविवेश ह। यत्रास्ते भगवान् सर्वो रममाणस्सहोमया ॥२॥ तस्मिन् प्रविष्ट एवासी सुद्युम्नः परवीरहा। अपश्यत् खियमात्मानम् अश्वं च बड़वां नप ॥२६॥ तथा तदनुगास्सर्वे आत्मालङ्गविपर्ययम् । दृष्ट्वा विमनसोभूवन् वीक्ष्यमाणाः परस्परम् ॥२७॥ एक समय मुद्युनः अपने मन्त्री वर्ग को साथ लेके और धनुर्वाण लेके उत्तर दिशा में शिकार खेलने को गया। राजकुमार उद्युम्न एक मृग के पीछे आते जाते सुमेरु पर्वत की तलहटी के धन में पहुंच गया, इस ही वन में महा.. देव जी पार्वती के सहित विहार किया करते थे। उस वन में घुसते ही राज कुमार सुद्यन्न बी और उस का घोड़ा घोड़ी होगया उस के सम्पूर्ण साथी भी खी होगये और आश्चर्य से युक्त होके एक दूसरे को देखने लगे। इस पर भी आश्चर्य यह है कि वह राजकुमार एक महीना बी रहता था और एक महीना पुरुष रहके राज्य के कार्य करता था। इस राजा के सी शरीर से स- तान हुई और पुरुष शरीर से भी वंश चला, इस ही कथा में लिखा है कि महादेव के शाप से वह वन ऐसा होगया था कि जो पुरुष उस धन में जाय वहीशी हो होजाय, श्रीमद्भागवत नवनस्कन्ध के प्रथम अध्याय ही में लिखा है। एकदा गिरिशं द्रष्टमृषयस्तत्र सुव्रताः । दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तस्समुपागमन् ॥२९॥ तान्विलोक्याम्बिका देवी विवस्त्रां ब्रीड़िता भशम् भर्तुरङ्गात्समुत्थाय नीवीमाश्वथ पर्यधात् ॥३०॥ ऋषयोपि तयोक्ष्यि प्रसंग रममाणयोः निवृत्ताः प्रययस्तस्मान्नरनारायणाश्रमम् ॥३१॥ 1 . अष्टनस्कन्धक्षमीक्षा। तदिदं भगवानाह प्रियायाः प्रियकाम्यया। स्थानं यः प्रविशेदेतत् स वै योषितवेदिति ॥३२॥ इन झोको का अभियाय यह है कि एक समय ऋषि लोग महादेव के दर्शनार्थ उक्त वन में गये,उस समय महादेव पार्वती के साथ विहार कर रहे थे, ऋषियों को आता देख कर पार्वती अत्यन्त लाजित हुई क्योंकि वह बन हीन थी, पार्वती ने महादेव की गद से उठ कर वस्त्र पहिरा, ऋषि लोग भी महादेव पार्वती को विहारसमय को जान कर वहां से लौट आये और मरनारायण के आश्रम को चले गये तव महादेव ने पार्वती को प्रसन्न करनेके निमित्त कहा कि आज से जो कोई इस स्थानमें आवेगा वह स्त्री हो जायगा इस भागवत के बनाने वाले लालबुभ छह से क ई पूछे कि उस स्थानमहा- देव जी पुरुष क्यॉकर रहे ? यदि महादेव जी ऐसा कहते कि "मां विना याविशेषतत्" तब कुछ ठीक भी होता है। इसके अतिरिक्त जिन महादेवजी को पुराण वाले सर्वज्ञ मानते हैं उनको यह भी मालूम न हुआ कि ऋषि लोग हमारे दर्शनको भाते हैं। हम उनके माने से पूर्व ही सावधान होजाय॥ । राजा सुद्यन्न की असम्भव कथा की समाप्तिइतने ही में नहीं हुई बरन । चन्द्रमा के पुत्र बुध से उस का गान्धर्व विवाह कराया गया और उस के उदर से पुरुरवा को उत्पत्ति भी हुई और एक पुत्र उत्पन्न हो जाने के बाद खीरूपी सुटुमने अपने हा कता और विधातारूपी गुरु वशिष्ठ को फिर याद किया याद करते ही वशिष्ठ जी ओ मौजूद हुए और सुद्युम्न की दशा को देख कर अत्यन्त दुःखी हुए फिर वशिष्ठ ने महादेव को प्रसन्न करने के निमित्तधोर तप किया, उन के तप से प्रसन्न होके महादेव ने दर्शन देके यह वर दियाकि.. मासं पुमान्स भविता मासं स्वीं तब गोत्रजः । इत्थं व्यवस्थया कामं सुधम्नोवतु मेदिनीम् ॥३३॥ सुद्युम्न एक 'महीना पुरुष और एक महीना स्त्रो रहर करेगा और इच्छापूर्वक पृथ्वी की रक्षा करेगा । A आचार्यानुग्रहात्कामं लबध्वा पुंस्त्वं व्यवस्थया। पालयामास-जगतों नाभ्यनन्दव स्म त प्रजा ॥३१॥ .

भागवग समोला। प्रकार में आचार्य की रुपा से सुधुन को पुरुषत्व प्राप्त हुवा और उस ने एथ्वी को पालन किया परन्तु प्रजा उस से प्रसन्न न रही,सुद्युम्न के पुरुष रूप से नोन और स्त्री रू परे एक पुन्न उत्पन्न हुआ। तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुताख्यः । दक्षिणापथराजानो बभूवुधर्मतत्पराः ॥ ३४॥ से उस्फल गयं और विमल ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ये तीनों दसित देश के धर्मपरायण राणा हुए ॥ अब पाठक स्वयं विधार सक्से हैं कि इस किस्से से अलिफलेला के किस्से अच्छे हैं या नहीं, चिकित्सा शास के प्रमाणों से यह मात सिद्ध हो चुका है कि स्त्री के शरीर की धातु तथा शिरा और अस्थि प्रानि पुरुष के शरीर की धातु और शिरा आदि से अत्यन्त भिन्न हैं, प्रत्येक महीने में वन बदल जाना सथा असम्भव है। श्रीमद्भागवत के नवमस्मन्य मा.३ में यह शत. कथा लिखी है. ॥ उत्तानवर्हिरानत्ती भूरिषेण इति त्रयः । शातेरभवन्पुत्रा आनन्द्रवतोभवत् ॥ २७ ॥ सोऽन्तःसमुद्र नगरी विनिर्माय कुशस्थलीम् । आस्थितोभुङ्क्तविषयानालादीनरिंदम ॥ २८ ॥ तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुविनज्येष्ठमुत्तमम् । क कुत्री रेवती. कन्यां स्वामांदाय विभुं गतः ॥२६॥ पुच्या वर परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकमपावृतम् । आवर्तमाने गान्धर्व स्थितो लब्यक्षणः क्षणम् ॥३०॥.:: तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयतुः । तछत्त्वा भगवान ब्रह्मा प्रहस्य तमुवाच ह ॥ ३९ ॥ अहो राजविरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः । तत्पुत्रपौत्रनपतृणां गोत्राणि च न मृण्महे ॥ ३२ ॥ ...

-- .. नवमरकन्समीक्षा कालोभियातत्रिणवचतुर्युगविकल्पितः। तद् गच्छ देवदेवांशो नरदेवो महाबलः ॥ ३३ कन्यारत्नमिदं राजन् नररत्नाय देहि भोः भुवो भारावताराय भगवान्नु भूतभावनः ॥ ३४ अवतीर्णो निजांशेन पुण्यनवणकातनः । इत्यादिष्टोऽभिवाद्याजं पः स्वपुरमागतः ॥ ३५. त्यक्त. पुण्यजन त्रासात् श्रातभिर्दिश्ववस्थितैः । सुतां दत्वाऽनवद्याङ्गी बलाय बलशालिने । बदऱ्याख्यं तपो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम् ॥ ३६ ॥ पर्म सव लोकों का अभिप्राय यह है कि राजा शांति के, सामाई मानर्त और भूरिषेण ये तीन पुत्र उत्पन्न हुएं । अानतं का पुत्र रेवत हुना जिसने समुद्र के बीच में कुशंस्थली नगरी बसाई और मानत आदिदेशोंका राज्य भीगा । राजा आमत के १०० पुत्र हुए, इन में ककुमा सब से बहाया, राजा ककुन्नी अपनी पुत्री रेवती. को माथ लेके आदिदेव ब्रह्मा के पास गया, वहां की सभा में उस समय गन्पर्व गान कर रहे थे. इस कारणराजा कंकुनी क्षणामात्र ( मौका पाने के वास्ते ) धुपरहे, जब गन्धर्व गाचुके तवं राजा कफुमी ने ब्रह्मा से अपना अभिप्राय केहा ( पूछा कि इस कम्पा को योग्य घर बतलाइये) ब्रह्मा ने हूंस कर कहा कि राजन् ! तुमने शिन राज पुत्रों के साथ अपने हृदय में इस कन्या का विवाह करना विचारा था उनके पौत्र और नातियों को तो क्या उन के गोत्रों का भी अब छिट्ट नहीं रहा है, जिमनी देर' तुम यहां खो प्रतीक्षा करते रहे इतने काल में चारों युग:२७ वार व्यतीत हो चुके, अब संसार में पृथ्वी का.भार उतारने को स्वयं भगवान् ने, अवतार लिया है। तुम उन्हीं नररत् बलराम से इस कन्यारत्र का विवाह करदो ब्रह्मा की इस आज्ञा को सुन के राजा ककुद्मी अपने भगर में आये और अपने नगर को गन्धर्षों के भय से तथा स्वजनशून्य जोन के त्याग दिया और वनराम के साथ रेवती का विवाह करके आप बदा कानम तप करने को घटागया। -- - . मधमका धसमा । ८३ श्रीमद्भागवत समीक्षा .. ( शनवरी से धाने) पाटीदार तो मही दिसुन्न नमानों के बहिश्त में गो हूरें रहती हैं उनका अटाएं कर दुग्य नहीं होता. परन्तु घर वदिश्त से जमीन पर नहीं है और न यहिश्त में गये भाादमी यहां फिर फरवाते हैं फिन्तु पुराण याठों यहिश्त (वनलोका) से राक्षा कमी अपनी कन्या को सहित गौट आये मीर रेयनी को स्वावस्था न आई । और यहभी सही परन्तु उस ह में ज्यानिधियों ने गोत्रादि का मिलान स्योकर फिया थर ? और बलराम से युगोंदीही रेवती का विवाह कैचे ज्ञाशीनाथ के शीघ्रबोध से शुद्ध हुला? ना कोई पौराणिक पगिडत का सक्ता है कि यह विवाह जना ईरानी के मिलाद से छुना पा? क्या २७ चौकड़ी युग बीतभाने पर भी सब सो की चाल ल्यों की त्यों बनी रही थी ? यदि नहीं तो भारतधर्ममहा। मरख रेवती नीर बलराम को विवाह को धर्मविवाह छह सका है? नरवलि T! शोक ! ! पुराणों ने बलिदान में पशुओंपर ही संतोप नहीं किया मनुल प्रीर वह भी पिता के हाथ से पुनों का बलिदान ( कटवाना ) यणाना है। राजा हरिचन्द्र ले पुत्र रोहिताश्च की अधा पाटकों को नाटक नाविनों मे हात हुई होगी, मत्यवीर राजा हरिश्चन्द्र का यश संसार में व्याप्त है, पर तु.भामवन गमरकान्य अ09 में लिखा है कि वह मिथ्यावादी पाउस हरिशाद को सन्तान नहीं पी, उस ने बरुणदेव से प्रार्थना की कि मेरे पुन हो तो हरी झंट करदूं । पुत्र रोहिताश्व तुवा, तर वरुण आमा कि सेंटकर राजा ने कहा, अभी ( पशु) मेरे पुत्र का धानकर नहीं हुवा, नामकरण पर मंटदूमा ॥९० : फिर कहा दन्त निकलने पर, तीसरी पार बरंणनाया कहर दूध को दांत न टूटे हैं, चौथी बार प्राया, तप कहा सज्ञाच पहिर योद्धा हो जाये तब दूंगा । ऐसे ही टोलता रहा, पुत्रे ने जब सुनो, घर से निकल गया । हरिश्चन्द्र ने अन्य पुरुष से पुरुषमेध किया । यथा-- तः पुरुषमेधेन हरिश्चन्द्रो महायशाः ॥ ११ ॥ X ३१ - .

दभामरामीक्षा - + अथ दशमस्कन्धसमीक्षा यह भी अनेक लोगों को धिदित नहीं है कि पुरावा ईसामसीह" संमान बिर पितृमातृसंयोग बलराम की उत्पत्तिमानते हैं, हम नदो जानते कि बलदेव ही चस्पति की कथा बायबिल को देख के घड़ीगई है वा बाय जिल के बनानेवाले ने भागवत को देख के ईचानसीह के जन्म की अमाघ कहानी बनाई है, जो हो परन्तु इच में सन्देह नहीं है कि इस अमाव कहानी का सुन्छभी सिर पैर नहीं हैं, इन बातको कोनसा समुज्य स्वीकार कर सकता है कि एक स्त्री का गर्भ ( गपमान पिचड) दूसरी स्त्रीले गर्भ में घडागपा ॥ भागवत के दशकय ०२ में लिखा है- हतेमु पठ वालेषु देवक्या औनलेनिना ॥ ४ ॥ सहमो वेषणणं धान यमनन्तं प्रचक्षते । गों बभूव देवक्या हर्षशोकविवर्द्धनः ॥ ५ ॥ भगवानपि विश्वासमा शिदिवा कंतज अयम् । यठूनां निजनाथानां योगमायर्या हलादिशात् ॥ ६ ॥ गच्छ देवि ! ब्रज म गोपगोभिलंछतम् । रोहिणी वसुदेवस्य भार्यास्ते बन्दगोकुले ॥ ७ ॥ अन्याय कंससंविग्ना विवरेषु वसन्ति हि। देवक्या जठरी गर्भ शेषाख्यं धाम मामकम् ॥८॥ সালি বীৰত্ব অনুই কলিয়ত্ব। शों संकर्षणान्तं वै ग्राहुः संकर्षणम्भुवि । रामेलि लोशरणणाद बलं बलमदुचछु यात् ॥ १३ ॥ सन्दिष्टेवं लगयता तथेत्यामिति तवचः प्रतिमा परिक्रम्य गां गता लत्तथाकरोत् ॥ १४ ॥ गर्ने प्रणीते देवक्या रोहिणी योगनिदया। , अहो विखंसितो गर्भ इत्ति पौरा विचुकुशुः ॥ १५ ॥ ।

समें को में लिखा दशमस्कन्धहमीक्षा। इन शोकोका तात्पर्य यह है कि उनके पुत्र कंस ने जय देवकीके ६ पुत्र भारडाले तब विष्णु का शयनस्थान, जिसको भानन्त (शेषनाग) कहते हैं। यह सातवें गई माया, देवकी का यह सातवा गर्भ हर्ष और शोककर पढ़ानेवाला हुमा,तय जगद्व्याक भगवान् ( विष्ण-) ने अपने दास यदु- चशियोंको कसके डर से व्याकुल देखके योगमाया (देवी) को आज्ञा दी कि है देवी । तुम रखा और गौओंसे भरे हुए ब्रज माशी, गोकुल में वसुदेव को स्त्री रोहिणी रहती है, उवको तदर में मेरे निवासस्थान. शेष. को देवको के उदर से निकालं को पहुंचादो ( वा स्थापन करदो । शंवरूपा ...यह सोच भर दूसरे गर्भ पहुंचाये गये इससे उन का नाम संकर्षण, लोक में रमण करने से राम और अत्यन्त वलज्ञान होने से बल गत में प्रसिद्ध होगा। योगमाया देवी भगवान् से ऐसी आज्ञा पाकर और सने स्वीकार करके प्रपती में गई और वैसे ही कार्य किया । योगमाया जय देवकी के अंदर से गई को निकाल के रोहिणी, पो.उदर में पहुंचा दिया सब शहर के रहने वालों ने मो! गर्भपात होगया, ऐसा-करके शोक किया अब इत्त में प्रश्न यह है कि प्रत्येक सो. फा गर्भाशय नसों से ऐसा जा रहता है कि उसके निकल जाने से कोई भी नहीं बनती है, यदि गर्भाशय को छोड़कर योगमाया ने देवकी के गर्भ को रोहिणी के गर्भ में प- हुंचाया तो उसका पुनः संधापन क्यों कर हुमा ? यदि गर्भाशय के सहित पहुंचाया तो देशको स्मोकर जीवित रही, यह ौरालिकों की लीला ईसा. इयों की लीला से किसी भंश में कम नहीं है । "ra एक और अद्भुत कथा निय-बलराम को खी रेवती न मालम कितने करोडं वर्षों की थी, लिखतें हंसी माली है कि जमा. बलदेव के दादा का भी जन्म नहीं था, तब रेवती ब्रह्मा की, लमा में बैठी हुई गन्धों के गीत सुन रहीं थी। (यह लेख नवम स्कन्ध समीक्षा का हैं.) ९-सत्यापप्रकाश में खामीजी ने पूतनावयः का खएडान किमाही है कि उस का शरीर कोसों के पलों का नाश कर गिरा। -मही खाते समय श्री कृष्ण ने माता को तीन लोक मुख में दिख -०.१६ अग्नि का माशन ( खाना) असंभव है में गोपी वलहरंग अन्याय हैं.॥ .

दशमस्य धनमीक्षा। ५- १० २४, मैं इन्द्रयाग को श्री कृष्ण ने रोका । यज्ञ न करने देना नास्तिकता है। ६-०२९-३३ तक का रासलीला में कृष्ण का स्त्रैण बताना दोष है ।। कोवल एक श्लोक लिख कर ही भक्तिभाव, कामीपन कर सूना दिसा देंगे। कौन ऐसा पुरुष भक्त कमा सकता है जो अपने उपास्यदेव पर ऐसा दोप धरे। इससे, हम को शङ्का है कि ऐसी २ कथा श्रीकृष्ण के सभी को रचना ही हो सकती हैं- वं वै मुहुः पिटसरूपनिजेशमावास्तन्मातरो यदभजन् रहढभावाः । चिनतत्खलुरमास्पद विम्बविम्बेकामे स्मरेऽक्षिविषये किमुतान्यनार्यः ॥ श्लोक ४० अ० ५५ ॥ अर्थात पिता कृष्ण के समान प्रद्युम्न जी का रूप ज्ञान उस की माता सक्मिणी आदि भी एकान्त में सेवन को त्यार हुई, तब अन्य नारियों की ती कथा ही क्या है ? यह भाश्चर्य नहीं कामदेव ऐसाही बली है ।। इसी को हरिवश भविष्यपर्व अ० १२३ में भी लिखा है। पधुम्न उवाच- मातृभावं परित्यज्य किसेवं वर्तन्यथा । अहो दुष्टवस्वभावासि स्वीले चापल्यमानसा ॥१८॥ मधुम्न सक्मिणी को अपने उपर नोहित जान कहते हैं कि मारलाव त्याग कर ऐसे बर्ताव क्यों करती हो ? अहो स्त्रियों का स्वभाव बड़ा दुष्ट होता है, इति ॥ शोकृष्ण की सन्तान दशायुतसमाख्याता वासुदेवस्थ बै सुताः ॥ २१ ॥ हरिवंश भ पर्व भ० १०३ में- दशायुत का अर्थएक लक्ष होता है, क्योंकि अयुत दश हज़ार को कहा है हैं दशगुणा करने से लए होते हैं । गागबन अ० ६१ में १६०० रानियों के प्रत्येकको १० १.१० युभ शिखें हैं यथा- - एकादशपन्धममीक्षा एकशस्ता पस्य पुत्रान्दश दशाऽवला। अजीजनन्न नवमात् पितुः सर्वात्मसम्पदा ॥.१ ॥ यल्ल्यस्तु षोडशसहलसनङ्गवाणे- संश्यन्ति विमथितुं करणैर्न शेकुः ॥ १६. जहन गोपीगचे प्रत्येक में १० सन्तान हों तो एक लाख मात बार एक हु । यहाटरिश से विरोध होता है,वहाँ एकलन ही खिखाहैं। (धूत) जुआ ६५ में झोके में तक चल रल देव जी की द्यूत क्रिया का वर्ण है। महां लिखा है कि व्यन्ति राजानः" इत्यादि । मद्यपान अ०६५ में बलदेव जी वृन्दावन भाये हैं, यहां दो मास ठहरे। तं गन्धं मधुंधाराया वायुनोपहृतं बलः। आनायोपंगतस्तत्र ललनाभिः समं पपौ ॥ २० ॥ वग में सीठी मद्य की गन्ध लेते २ स्त्रियों सहित मद्य पिया ॥ समीक्षा-ग्रीकनचन्द्रको २६ सहन रानियों से कामक्रीडा करना लिदाज जी को मद्यप और ज्वारी बताना अनर्थ है । भौमासुर की जीती ९००० राजन्याओं से विवाह करना ०५९ में स्पष्ट लिखा है। . अथ एकादशंस्कन्धसमीक्षा. श्री कृष्ण को कुखता दोष- संह मैच्छ मैच्छत कुलं स्थितकृत्यशेषः ॥ १०॥ ० अर्थात् स्म्रकुल संहार करने को कृष्ण ने इच्छा की। अ०.२ प्रियव्रत के प्रपौत्र ऋषभदेव को.वेदपारग ईश्वरावतार लिखा है स्कन्ध ५ ० ३.में इन्हें जनमतप्रवत्तक लिखा है। देखो भाषा टीका बई का छापा श्री बैंकटेश्वर प्रेस। श०५ कलियंग की महिमा लिंख कर यहां तक लिखा है । यथा- ..

र 4 द्वादशस्यामालीशा। छतादिषु प्रजा राजन्कलाविच्छन्ति र । कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपदकाः ॥ ३८ सत्ययुग के लोग इस कलियुग में जक पाहते हैं, ताकि कलियुग नारायसपनायरा होगे। द्रविरु देश में तापी नदी पार के लोग का के तटके जलपानकरते,ये प्रायः भज्ञ होंगे,फिर बुराई क्यों? । अ०६शो कर में प्रकृब्स की प्रायु कुल १२५ वर्ष की बताई है । यदि हायर में होते तो की होती । ०३० यादय शरोरत्यागा नियम पूजन करने को ले यदुद्धा गधुद्धिपः" बड़े याद शवान को धुरा भारते थे। यह शोक में है परन्तु १२ चे शलाक में महापान का न है। यथा- ततस्तस्मिन्महापानं पपुरेशक मधु दिष्टविशितधियो यदश्यते सतिः ॥ १२ ॥ वन ले जाय बुद्धि पर हुई, खूब शराब पीलई ।। परन्तु यह ठोकर न है कि जो संसार के उद्धार व धर्म के प्रचारार्थ राम लें,वह अपने काही नाश कराने को अधर्म से न रोकें बल्कि प्रत करें। यथा- कृष्णमायाविमूढानां संघर्षः सुमहानभूत् ॥ १३ ॥ कृष्ण को माया से छूख हो स्कूब बसस बजे, लड़ाई हुई । अथ द्वादशस्कन्धसमीक्षा में भविष्यल कथा कही हुवे श्लोक २८ में में कहा है:- ततोऽौ यवना भाग्यश्चतुर्दश च पुछासाः। भूयो दश गुरुंडाश्य मौला एकादशैव तु ॥ २८ ॥ ८पीढी राजा- झुप्तल्मान,१४ पुश पक्षम, 'हर हुल गुरुएडों के * ११ मोमों के राज्य करेंगे । समीक्षा-यदि यवन शब्द का मुहमान सार्थ करें तो उनको बादश मते भारत में हुई या नहीं इस पर विवाद नहीं परन्तु सुक्षल्नानों के व १४. पुकतों को बादशाहत कोष सी हुई। - १ बदनापा: -- - Ang -: कने । या सिकायों का वर्णन नहो। 'गुरुनानक हा नाल २०६. मग अवश्य आया है परन्तु भागात में कहीं भी नहाना*. २१व पर सुपस्याम तो थे परन्तु सिह नहीं दुवे थे। - त्रिशदिशानियवाति परमायुः हमाम् ॥ ११॥ २० । ३० नागरिनय गर्म गनुप्यों की होगी यहां हम यह भी यवान जित नमकते: Pita २० बर्ष की वेदविहित है, यारों युगो । १८० : ना, या हो सकता है कि योग 'सायन में दुगु रितु कन, या भिलारादि से घटा सकें । श्री समय इन्द्र की काय भी एका शEN १२५ वर्ष की ही लिखी है ॥ यबंदोबतोर्णन् भगवतः पुरुपोत्तम !। . १ अभी ।। २५ ॥ नाऽधुना तेलिलाधार ! देवकार्वावशेपितम् । कुलं च विप्रसाशन नमायमभूदिदम् ॥ २६ ॥ रूग्ण से मरने वादा मिसापको १२५ वर्ष बीत,अब देवकार्य काली नहीं रक्षा। याज्ञ भी नयाय होगया । अथ सत्स्युम,जेता, झालर में लक्ष, शाजार और १ मार वर्षकी आयु यताना व्यर्थ है, यानी फी भी इतनी हो शायु हुई है। कह र २ वर्ष शब्द का दिन भी लिया जाता है क्योंकि यारमीकीय रामारा में जब राम चन्द्र की या नालाग मरे पुत्र को लाया है तय अञ्चवर्षगह स्त्रकम् अर्थात Y6:0 वर्ष की प्रायु ताई है,टीका में लिखा है कि-"वर्षशन्दा त्रदिनपरः" अर्थात यहां दिन का वाचक वर्ष मन्द है "किंचिन्न्यू गचतुर्दशमर्ष इत्यर्थः" कुछ कम १४ वर्ष अर्प दिया है। जी से गिद्ध है कि किसी सीयुग १००वर्ष से अधिक झाबु नही होती थी। पुराणों की प्राचीन होने में वयं पौराशिकों को भी विश्वास नहीं है ययोंकि एक बंगाली पति ने अपने पुताक ने लिखा की श्रीमद्भागवत पोपदेव की बनाई है। यथा--

'द्वादशस्कन्धगमीक्षा।
श्रीमद्वावितस्त्रानुक्रमणी रमणाहता ।
विदुषा बोपदेवेन भिषकेशवसूनुना ।
हरिलोला नामक पुस्तक में भी लिया।
श्रीमद्भागवतस्कन्धाध्यायार्थादि निरूप्यते ।
विदुषा बोपदेवेन मन्त्रिमाद्रितुएने ॥
ज्ञानेश्वर मिश्र ने नो गीना की टीका बनाई है उन में उन्होंने १७,
शकाब्द में हेमाद्रि का होना सिद्ध किया है और दोपदेव हेमाद्रि के श्री.
मय में हुये थे इस से भागवा की अत्यन्त नगीना सिद्ध हाती ,मागवत
के चूर्णिका दीका में इन श्लोकों को इश्त किया है जिस के भागवन ८
सर्वाचीनता स्वयं मद्ध हो जाती है ।
भविष्यपुराण प्रति सर्ग पर्य ३ ११० ३२ में बोपदेव कृत भागवत ही
लिखा है जो वेदप्रकाश पर्वरी सन् १८ पृ ४२ में हमने छापा है।
पुराणों की सम्पूर्ण असम्भव और असत्य कहानी लिखी नॉयता एक
बड़ा भारी पुस्तक बन जाय इम के अतिरिक्त इन के परस्परविरोग दिखाने
को भी एक स्वतन्त्र पुस्तक रचने की आवश्यकता है ।
देवीभागवत ० १ स्कन्ध १ में लिखा है:-
विविधानि पुराणानि शाखाणि विविधानि च ।
वितण्डाछलयुक्तानि मिथ्याऽमर्पकराणि च ॥
सब पुराण और विविध शासकल विश्वास गरे । प्रसते शा.
पर भी ल झोंक दी है क्योंकि स्वयं पुराण है ना ?
पाठकवग ! जो कुछ मैंने इस पुस्तक में लिखा है पर अपने हृदय को
शङ्कारूप से लिखा है, किसी का चित्त दुकाने के लिये नहीं । ईश्वर हम
वैर भावको दूर करे,हमें शान्ति दे, यही हमारी प्रार्थना है । भाप लोग
इस के गुण ग्रहण कर' वेदों पर अंडा करेंगे, तभी मेरा भमफल पो..
शमस्याम्
*सुनलाई स्वामी
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४१ 7 4 भागवतसमीक्षा लगे। अध्याय में परीक्षित ने ब्रह्मा का कमल से उत्पन्न होना, ब्रह्मा, माया थादि और अवतारकथा, युगों के धर्म,वेद, उपवेद, इतिहास पुराणों का धर्म भी है। अध्याय में श्रीशुकदेव जी ने उत्तर दिया है। अ०८ ही अन्त में निम्न श्लोक हैं। सूतउवाच- प्राह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८ ॥ यदारपरीक्षिदृषभः पाण्डू नामनुपृच्छति । * आनुपूयेण तत्सर्वमाख्यातुमुपवक्रमे ॥ २६ ॥ अर्थात वेदसम्मित पुराण भागवत शुकदेव जी सुन्नाने लगे,,और जो.२. ने प्रश्न किये उन का समाधान करते रहे । और ४ श्लोक की भागवत प्रसिद्ध है, वह यहीं वर्णित है । यथा:- अहमेवासमेवाग्रे नान्यदात्सदसत्परम् । “पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सेोऽरूयहम् ॥ ३२ ॥ तेथें यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विदादात्मनो मायां यथा भासा यथा तमः ॥३३॥ यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३१ ॥ एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५.॥ ब्रह्मा के प्रति भगवान् की उक्ति है । . २०१० में सृष्टि की उत्पत्ति, अनेक योनियों का प्रादुर्भाव मनुस्मृति के मा अपड से वर्णित है। नाभि, कमल और ब्रह्मा की उत्पत्तिका वर्णन । उस से सिद्ध है कि यह पुराकालीन वात नहीं है कि नाभिकमल ब्रह्मा से पूनोत्पत्ति था पृथिवीतल और सब योनियों की उत्पत्ति वहां पह है कि श्लोक में परीक्षित शब्द का हलन्त होना चिन्त्य है। 3 ३ , भागवतममीक्षा प्रजापतीन्मनन्देवानृपीपितृगणान्पचक् । सिद्धचारणगन्धर्वान्विक्षाध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७॥ शौनक ने श्लोक ४८ में प्रश्न किया कि हे सूत जी ! विदुर मैत्रेय का संवाद कहिये, जो तीर्थयात्रा में हुवा था | इस पर सूत जी ने कहा कि राजा परीक्षित ने भी शुकदेव जी से प्रा किया था । जो वृत्तशुकने परीक्षित को सुनाया, वह तुम भी सुनो। इस रे बिल्कुल ही स्पष्ट है कि यह वह भागवत नहीं है कि जो शुकदेय द्वारा राजा ने सुनी थी। यह तो शौनक के, जो जीमें आता है, यह मझते हैं और मृत जी उसका उत्तर देते समय अपनी याददाश्त सुनाते हैं, जो शुक परीक्षिः संवाद में याद आजाता है उसे भो सुना देते हैं। इति-द्वितीयस्कन्धसमीक्षा A

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Shrimadbhagwatsamiksha

Author
Swami, Chuttanlal
Title
Shrimadbhagwatsamiksha
File name
Shrimadbhagwatsamiksha
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2009/09
Publisher
Merath, Machine Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
52
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345545
Barcode
99999990233881.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
f5OSHpRDFPJ
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