Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Rayansar
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श्रीमर आचार्षपर मगगन TEAरिषित
रयासार
श्रीक्षुलक शानमागरजी महाराज
प्रकार:-श्रीलात जैन काम्पनी,
मंत्री-गाधी हरी माई देवकरण एंउगम मापित
मारतीय जैन मिदारागिनी संस्था, समकता ।
TRENTRENTERTATARINEETI
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Imler som
trairioinute
पदक-भीलाल जैन काण्यतीर्य
मैनसिद्धान्त प्रयाक प्रेस
कलकता
मारि श्री शातिमागराय नमः।
आद्य निवेदन
पर रयणसार नामक पंथ प्रारत भाग भगवान धीर भाभीने निमांग किया है।
इस छोटेसे सूत्र में प्रावकम मुनिधर्मचन्द रहस्य भीर और मधुर माने योग
मरा एमा।
-
रपण सर दोहा की पपारमा रचना किन महानुभागने की देर नहीं जाता?
तो भी रवणसर दोरम्न प्रनिमें "५० सदागत समारोहा" मा है।"
सदायखनीका विशेष विवरण पहा दोनेसे दिखेपन करने ममता है। दोहों की पसनना
बसे कही कही परस्पति है परंतु माथि माल मेनारिती है।
-मुलक धानमागर
EmaiINDRAMA
मद्रक-श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ
गैनसिद्धान्त प्रकाशक प्रेस
कलकता
गरि श्री शांतिमागराय नमः। आद्य निवेदन रहस्यणसार नामक ग्रंथ प्रारत भाग भगवान श्रीकुंदमुंद स्वारीने निर्माण किया है। इस छोटेसे सूत्र प्रथमें श्रावकधर्म य मुनिधर्मका गृह रम्य गम्भीर भोर मधुर मा प्रोतप्रोत मरा भाई। रपण सार दोहा की पात्मक रचना किन महानुभावने की यह सहा नही जाता। तो भी रयणसार दोश मूल प्रतिमें "५० सदाराम यणसार दोहा" ऐगा उलग है। पर सदानीका विशेष विवरण बड़ा होनेसे विवेचन करने ममता है। दोहों की पालना मे कही कही पावनि है परंतु प्राष्टिमे भाषपूर्ण और दमदारिती है। -क्षुल्लक मानमागर कीर्तिध्वनि। झालरापाटननिवामी श्रीमान्मेठश्नि दीराम पालनंदजीने स्वर्गीय सुपुत्र दीपचंदजीके झोनावरणीय कर्म क्षणार्थ संस्थाको शास्त्रोद्धार करने के लिये ४०१ रु. दिये थे। उसी द्रव्यसे "मकरघज पराजय" नामक नाटकका जीर्णोद्धार (प्रकाशित) हुआ था। उम ग्रंथकी लागत उठाने पर अब यह "रयणसार" नामक ग्रंथ उक्त सेठजीके स्मरणार्थ प्रकाशित किया जाता है। यद्यपि इस समय उक्त स्वर्गीय सेठ दीपचदजी सा० इस नहर पर्याय में नहीं है परन्तु उनके अनुकरणीय दान और नामको ये ग्रंथ सदाही कीर्तित करते रहेंगे। इस ग्रंथ की न्योछावर उठ आनेपर फिर अन्य किसी ग्रंथका जीर्णोद्धार होगा। इस तरह एक पार दिये गये दानसे सैकड़ों वर्ष पर्यंत जैन शास्त्रों का प्रनार होता रहेगा। अतः इस परिपाटीसे लाभ उठाने की इच्छा रखनेवाले और सुलममें थीजैनशानोंका प्रचार चाहने वाले भाइयोंको अपनी अपनी शक्ति अनुसार किसीभी एक जैन शास्त्रके उद्धार करनेके लिये सहायता देनी चाहिये । निषेदक धीलाल जैन काम्पतीर्थ पोरसपत् २०५४ भामरेरी मंत्री-माजलmm पैशाख घनी ११ श्रीनीलगाय नमः। कारयणसारक पमिका कमाण, परमणाण जिणं तिसुदेण! योछामि स्यणमा, मायारणयारधामीणम् ॥१॥ मन सि, स्वाय रितुद। की पनि , मगर || रपण. अर्थ-श्री परमात्मा वर्धमान जिनेन्द्रदेवको मनवचनकायकी शुद्धिसे नमस्कार कर गृहस्थ और मुनिक धर्मका व्याख्यान करनेवाला 'रयणसार' नामका अन्य कहता हूं ॥१॥ पुवं जिणेहि भणियं, जहद्विगं गणहरेहि वित्थरियं । पुबाइरियकमज, तं वोल्लइ जोहु सदिही ॥२॥ जो जिनवर ने कहा, भाषा गणधर देव । अनुक्रम पूर्वाचार्यके, सम्पादृष्टि कहेव ॥२॥ अर्थ-सर्वज्ञ जिनदेवने अपनी दिव्यध्वनिसे यथार्थ उपदेश दिया था, चारज्ञानके धारक श्रीगणधर देवने उसीका विस्तार कर अल्पज्ञानी जीवोंको समझाया था। उसके बाद उत्तरोत्तर आचार्योंने उसी पदार्थका निरूपण किया, इस तरह पूर्वाचार्योंकी परंपरा चली आई। इस परिसाटीके अनुसार जो बोलता है, श्रद्धान करता है, वह सम्पदाधि है। भावार्थ-श्री सर्वज्ञ जिनदेव और गणधरदेवके पीछे उत्पम होनेवाले आपार्योंने मी वीतरागमावसे सर्वतके वचनोंका ही प्रतिपादन किया है। इसी पफार जिन जिन मशारक है और थदा करने योग्य हैं। उन वपनोंमे जीका कल्याण होता है। जो सर्वप्न. सके सपनों को वीतरागमा पयगत रहिन प्रतिपादन करता है वा सम्यादृष्टी है। मोक्षमार्गानुमारी मन्य बनन करनेवाला प्रामानिक है किंतु जो पनि असनारी या पंडित जिनागके वचनों को अपने विषय कपाय मान पाई रागद्वेष और पक्षपात- मावोंमे अन्यथा प्रकामा करता है, अर्थका विपरीत अर्थ करता है, वह मिथ्या- रष्टिनम वहित है। मदिसुदणाणवलेण दु सच्छंदं वोलई जिणुचमिदि। जो सो होइ कुदिट्ठीण होई जिणमग्गलग्गरवो ॥३॥ मी तहान मुबर मद, मो निन अदिए। को सो पुष्टि नर, नदि निनमरगा ॥३॥ -जो मनुष्ण परिधान या शुनमानके अमिमानमे श्री जिनेन्द्रदेव सारा प्रतिपादित वर्षामन्त (अपने मनहन्निन यदा ना विरुदार्य अपरा आगमके सत्यार्यको हिरा मिपा अयंकर हतार मिप्यारी है। वर मिनधर्मका पातन- AAJ रपण. - ४ करता हुआ मी जैनधर्मसे सर्वथा पराङ्मुख है, जैनधर्मसे यहि त है, मिथ्याष्टी है! भावार्य-जिनको पुद्धि व मानकी प्रखरता है परन्तु दर्शनमोहनीपकर्मका जिनके उदय है, ऐसे जीव जैनधर्मको धारण करके भी अपने शानके मिथ्या अमि- मानसे श्री जिनेन्द्र मगवानके द्वारा प्रतिपादित अर्थके स्वरूपको अन्यथा (आगमके विरुद्ध ) कहते हैं, वे मिथ्यादृष्टी हैं। जो विषय फपाय मान पढ़ाई आदि स्वार्थके वश होकर अयया किसी कारणसे रागदेपके वश होकर अपने ज्ञानके अभिमानसे आगमके अर्थको अपने मनकल्पित अर्थके द्वारा अन्यथा प्रतिपादन करते हैं वे मिथ्याटी हैं। खरूप-विपर्यास, मेद-विपर्यास, लक्षण-विपर्यास, कारण-विपर्याससे वस्तुका स्वरूप अन्यथा हो जाता है। जो रागी द्वेपी पक्षपाती मनुष्य इशिक्षा प्राप्त कर शानके मदमें विवेक और विचार रहित हो फर विषयकपायोंकी पुष्टिके लिये जिना- गमका अर्थ विपरीत करता है या अपने मन कल्पित अर्थफो जिनागमका स्वरूप बतला फर वस्तुस्वरूपमें विपर्यास उत्पन्न करता है वह पापी है, जैनी हो कर भी जैन- धर्मसे पहिभूत मिपारटी है। भोर जो मनुष्य सदाचारफा-नीति-धारिष और । L+ -- कर अपनी पाप-पापनाको pिr के लिये लाया ५ सहर तताकरजिनागमका मासदकर जिनागम पर अक्षणवाद लगाताह का भी पापी जिनधर्मगे यहित मिध्याष्टी है। जो मनुष्ण तर्फ या युक्तिके बल पर हिंसा सूठ और पापाचरणोंको धर्म सिद्ध करता है वहमी मिध्यादृष्टी है तथा जो विनागमको अपनी युक्ति पर ही सिद्ध करना पाहता है वह भी मिथ्याष्टी है। सम्मचरयणसारं मोक्खमहारुखमूलनिदि भणियं । तंजाणिजह णिच्छयववहारसरूवदो भेदं ॥४॥ समकिन रतन मुसार मा, कहो मोशतसम्म । सो निथप स स्वरुपते, व्यवहार म अनुकूस ॥ ५ ॥ - गम्यमर्शन ही समस्त रलोंमें सारभूत रत्न है और वह मोक्षरूपी पक्ष- मूल है। सम्यग्दर्शन के निश्चयसम्पादन और व्यवहारसम्यग्दर्शन इस प्रकार दो मेद है। • मागध-बाप और आम्यतर कानोंके निमिनसे जीवोंके परिणामों में जो विद्या प्राणोनी है उममे आत्माको प्रतीति आत्मानिरुचि और आरिमक गुणों ग्यण. सात ६ श्रद्धाका होना निचयसम्पग्दर्शन है। तथा आत्माके स्वरूपको व्यक्त करनेवाले सच्चे देव शास्त्र और गुरुका श्रद्धान करना व्यवहार सम्यग्दर्शन है। आत्मा अनंत गुणोंका पिंड है, उन गुणोंमें एक सम्पग्दर्शन भी आरमाफा गुण है। वह आत्माको अपनी आत्माके स्वभावमें स्पिर कराता है और उससे आरमा अपने स्वरूपमें परिणमन करता है, अपने आत्मगुणोंमें अभिरुचि करता है और पर पदार्थोंको अपनेसे भिन्न समझ कर अपनाता नहीं है यही सम्यग्दर्शन है। भयविसणमलविवजिय संसारसरीरभोगणिनण्णो। अहगुणंगसमग्गो दमणसुद्धो हु पंचगुरुभत्तो ॥५॥ सात विसन भयमल रहित, विरत भोगभवदेह । यमुगुण पूरण पंचगुरु, भक्ति सुदर्शन एह ॥ ५॥ अर्थ -सात म्पसन, सात प्रकारके भय और पच्चीस शंकादिक दोपोसे रहित सपा । संसार, शरीर, भोगोंसे विरक्तमाय और आठ नियंकादिक गुणों सहित पप परमेटीमें प
-
सार
७
णियमुहणणुरत्तो पहिरप्पावन्छवजिओ णाणी।
जिणमुणिधाम मण्णइ गइदुक्खी होह सदिही ॥६॥
निब गुदापण मनुरक्त, महिर मवरण न को।
उपमानत दिन मुनिधरम, अमदिठि निरम हो ॥६॥
अ-जो पिारपीत मग्यात्मा अपनी आत्माके गुद स्वभावमें अनुरक्त
(गन्माता और पर पदार्यजन्य पुराणों की शुमाधम पर्यायोंसे रिक्त होता
है, जो श्रीजिनेन्द्र मगान निग्रंथ (नग्न ) गुरु तथा जिनधर्मको श्रदामात्र मक्ति-
सं मानवाहे पर संभारके समस्त प्रकारके दोंसे रहित सम्परराष्टी है।
माग-दाद वापसमा परमनीवगग आरमाके समागमें वन्मयो
राममं गुरकी प्रतीनिमे वीतराग परिपतिय स्थिर होने की भावना करना सो
गम्मान है।
मयमृढमणापदण मंकाइबसणभयमईयारं ।
जेसि नउदालेदोण मंति ते होति मंदिही ॥७॥
रयण भय मद भूदानायतन, शंकादिक अतीचार । विसन जासु नहि चालचतु, सो समदिष्टी सार ॥ ७ ॥ अर्थ-जिनके आठ मद, तीन मूढता, छह अनायतन, आठ शंकादिक दोप, बाव व्यसन, सात प्रकारके भय और पांच अतीचार ये चालीस क्षण नहीं हैं ये सम्यग्दृष्टी हैं। उहयगुणवसणभयमलवेरग्गाइचारभत्तिविग्धू वा। पदे सत्तचरिया दसणसावयगुणा भणिया ॥८॥ अर्थ- आठ मूलगुण और बारह उत्तर गुणों (वारहवत-अणुक्त, गुणवत, शिक्षाप्रत )का प्रतिपालन, सात व्यसन और पच्चीस सम्यक्त्व दोषोंका परित्याग, पारह वैराग्यभावनाका चितवन, सम्यग्दर्शनके पांच प्रतीचारोंका परित्याग, मक्ति- भावना, इस प्रकार दर्शनको धारण करनेवाले सम्पादृष्टी श्रावकके सत्तर गुण है। देवगुरु मियभत्ता संसारसरीरभोगपरिचित्ता। रयणत्यसंजुचा ते मणुव सिवसुई पचा॥९॥ पद सपा प्रायोन मिनिटातीमही है लया बोसकरिबीबाये
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रपर पूजा शील उपवास प्रत, बहुधा अथ मुनिरूप । समक्ति संगुत मोक्षमुख, पिन समकित भक्कूप ॥ १०॥ अर्थ-दान पूजा,प्रमचर्य, उपवास अनेक प्रकारके मन और सुनिलिंग धारण आदि सर्व एक सम्पग्दर्शन होने पर मोक्षमार्गके कारणभूत हैं और सम्पग्दर्शनके बिना अप सप दान जादि सर्व कारण संसारको ही पदाने वाले हैं। दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा। झाणाझयणं मुक्खं जइधर्म ण त विणा तहा सोवि ॥११॥ धावक धर्म प्रधावगइ, दान पूजमुख जानि । ध्यानाप्पयन जती सुमुख, तिन विन दुड्न मानि ॥ ११॥ अर्थ-सुपानमें चार प्रकारका दान देना और थी देव शास्त्र गुरुकी पूजा करना थावकका मुरुप धर्म है। जो नित्य इन (दोनों) को अपना मुरुप कर्तव्य समझकर पालन फरता है वही थावक है, धर्मात्मा सम्पादृष्टी है तथा ध्यान और जिना गमका स्वाध्याय करना मुनीम का पुण्य धर्म है। जो मुनिराज इन दोनों को अपना , गमन कर बानिय पालन करना स्यण संलग्न है। पदि श्रावक दान नहीं देता है और न प्रतिदिवस पूजा करता है वह श्रावक नहीं है । जो मनीश्वर ध्यान और अध्ययन नहीं करता है वह मुनीश्वर नहीं है। भावार्थ--श्रापककी पहिचान (लक्षा) दान और प्रजासे होती है और मुनि. सरोंकी पहिचान प्यान और अध्ययनसे होती है। दाणु ण धम्मु ण चागु ण भोगुण पहिरण जो पर्यगो सो। लोहकसायग्गिमुहे पडिउ मरिउ ण संदेहो ॥१२॥ दान न धर्म न न मोगगुण, लो पतंग यहिरात | होम फराप हुतासमुग्नु, पर मरे विम्यात ॥१२॥ अर्थ-जो प्रावक सुपायमें दान नहीं देता है, न अमूल गुणमत संयम पूजा आदि अपने धर्मका पालन करता है और न मोग ही नीतिपूर्वक भोगता है यह पहिसरमा है मिथ्याष्टी है। जैनधर्म धारण करने पर भी जैनधर्मसे वहित है। वह लोमकी तीव्र अग्निमें पसंगके समान पड़ कर मरता है इसमें सदेह नहीं है। भावार्य-जो प्रारक परस्पर विरोध रहित धर्म अर्थ और काम पुरुषार्थको सेवन . स्यण ar TATTA करता है वह मोक्षमार्गमें संलग्न है, सम्यग्दृष्टी है। किंतु जो धावक मोके पर फिर धर्म सेवन नहीं करता है और मुपात्रमें दान नहीं देता है नपा न मगरानफी पूजा ही करता है कितु खाना पीना आदि सर्व भूलकर केरल धन कमानेमें ही प्राना जीवन पूर्ण करता है वह लोभी निरंतर हिंसा आरंभ आदि पोर पापोंको ही संपादन फर संसारमें भ्रमण करता है। जिणपूजा मुणिदाण करेह जो देह सचिरूवेण। सम्माइट्टी साक्य धम्मी सोहोह मोक्खमगारो ॥१३॥ यज्ञ कर जिन दान मुनि, दे। समति अनुसार समदृष्टी श्रावक धरम, सो उतरे भवपार ।। १३ ॥ अर्थ- जो श्रावक अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिवस देव, शान, गुरुकी पूजा करता है और सुपात्रमें चार प्रकारका दान देता है वह मम्पारष्टी धारक है। दान देना तथा पूजा फरना थायफका मुरुप धर्म है। जो भक्तिमार और प्रशा पूर्वक अपने धर्मका पालन करता है सो मोक्षमार्गमें शीघ्र ही गमन करता है। सपार सबसेपारोलासार।
सार. पूयाफलेण तिलोके सुरपूज्जो हवेह सुद्धमणो। दाणफलेण तिलोए सारसुहं भुंजदे णियदं ॥१४॥ मनसुध पूजै तासाल, जिग ईस कार पूनि । दान फलै त्रैलोक मधि, नियमसार सुख भूजि ॥११॥ अर्थ-जोद भावसे श्रद्धा पूर्वक पूजा करता है वह पूजाके फलसे त्रिलोकके अधीश व देवताओं के इन्द्रोंसे पूज्य हो जाता है और जो सुपात्र में चार प्रकार दान देवा नादान के फलसे त्रिलोक में सारभूत उत्तम सुरोंको भोगता है। दाणं भोयणमेचं दिग्णइ घण्णो हवेह सायारो। पचापचविसेस सदसणे किं वियारेण ॥१५॥ दीने भोजन मात्र दत, होत धन्य सागार। पात्र मात्र विशेष सत, दरशन कौन विचार ॥१५॥ अर्य-मोजन (आहार शन) दान मात्र देनेसे ही श्रावक धन्य कहलाता है। पंचा- अर्पको प्राप्त होता है, देरठाओंसे पूज्य होता है। एक जिनलिंगको देखकर आहार. दान देना चाहिये। जिनलिंग धारण करने पर पात्रापात्र की परीक्षा नहीं करनी चाहिये। ~ सार भावार्थ-सर्वप्रकारके परिग्रह और आरमरहित नग्न दिगम्बर जिनलिंगको धारण करनेवाले मुनीश्वरों को आहारदान देने के प्रथम यह विचार करना कि ये मुनीश्वर द्रष्यलिंगी हैं या भावलिंगी है। जबतक इनको पूर्ण परीक्षा न होजापगी तब तक इनको आहार नहीं देना चाहिये। अथवा जिनलिंग धारण करनेवाले वीव- राग निम्रन्थ मुनीश्वरों की परीक्षा कर आहारदान की प्रवृत्ति करना आदि समस्त विचार सम्पाटोके लक्षणसे विपरीत भाव समझने पाहिये। परम निस्पृह वीतराग-आरंभ परिग्रह रहित मुनीथरोंके छिद्र देखना, अपनी धुदि और तर्फके द्वारा जिनलिंगके विषयमें आगमके विपरीत मावोंको प्रदर्शन फर त्रिनलिंग धारण करने वाले मुनीश्वरों की परीक्षा करना आदि सप मिपावकर्मका उदप है। आहारदान प्रदान करने के लिये इस प्रकार कुपेष्टाओं के द्वारा दिनलिंगको धारण फरने वालोंके उत्साह और चारित्रको मंद करना भी मिध्यावफा कार्य है। जिनलिंगको देखते ही उसको सुपात्र समझकर भक्ति भाव और श्रथा पूर्वक नषधा- गुणसे आहारादि दानको देना श्रावकका धर्म है। श्रापकके लिये श्रीकुंकुरमग. वान की यही आशा है कि जिनलिंग ही सुपात्रका चिरहे। पापफफो पान देनेके लिये जिनलिंगको देखकर फिर यह द्रष्य लिंगी कुपात्र हैरंग प्रकारकी परीक्षा करनेफा कोई भी अधिकार नहीं है और न मकार परीक्षा मीसरिये।
सार
'दिण्णा सुपत्तदाणं विसमतो होइ भोगसम्गमही।
णियाणसुई कमसो णिहिं जिणवदिहिं ॥१६॥
दीन दान सुपात्र गा, भोगभूमि पुरभोग!
अनुकमते निरवान एख, पइ जिन कपन वियोग ॥१६॥
अर्थ- सुपात्रको दान प्रदान करने नियमसे भोगभूमि व्या वर्गके सर्वोत्तम
मुखकी प्राप्ति होती है और अनुक्रमसे मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है ऐसा श्री-
जिनेन्द्र भगवानने परमागममें कहा है।
खतविसस काले पविय सुवीयं फलं जहा विउल।
होइ तहात जाणइ पत्तविससेस दाणफल ।। १७॥
ज्यों सुखेर धुमाल जो, व वीज फल।।
तस पात्र विशेष फल, जान सुदान अंकूर ॥ १७ ॥
अ-जो मनुष्य उनम खेतमें अच्छे प्रोजको पोता है तो उसका फल मनचा-
च्छित पूर्णरूपसे प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्तम पात्रमें विधिपूर्वक दान देनेसे
परिकष्ट मुमकी प्राप्ति होती है ॥१७॥
. पण- Tranama इह णियसुवित्तवीयं जो ववह जिणुत्त सचखेचेसु ! सो तिहुषणरजफलं भुजदि कल्लाणपंचफलं ॥१८॥ रह निज विच सुधीज जो, पै जिनुक सतखेत । सोत्रिभुवनको राजफल, मौगि तीर्यकर हैत ॥१८॥ अर्थ-जो मन्यात्मा अपने (नीतिपूर्वक संग्रह किये हुये पन) द्रव्यको भी. जिनेन्द्र भगवानकै फहे हुऐ सात क्षेत्रमें वितरण करता है यह पंचकरपाणकी महा विभूतिसे सुशोमित त्रिभुवनके राज्यसुखको प्राप्त होता है। मादुपिदुपुचमित्तं कलत्तधणधण्णवत्थुवाहणविसयं । संसारसारसोवखं सव्वं जाणउ सुपत्तदाणफल ।।१९।। मात पिता सुत मित्र तिय, धन पट याहन मेव। विभवसार संसार सुर, नानो पारदत हेव ॥ १९॥ अर्थ--माता पिता पुत्र स्त्री मित्र आदि कुटुंब परिवारका मुख और पन पाय - in IN ETथी महल तथा महान विभूति आदिका पण एक रापान दानका सार सत्तगरपणवाणाहनारसगंपलपवर- छपणवदिसदसिच्छिविहउ जाणउ सुपत्तदाणफलं ॥२०॥ सप्तराज अंग निद्विना, कोस भंग घटसेन । रतन दुसत त्रियनिव, सहस जान पात्रदानेन ॥२०॥ अर्थ-सात प्रकार राज्यके अंग, नवनिधि, पौदह रत्न, माल खजाना, गाय हाथी घोडे सात मकारकी सेना, पदरांडका राज्य और छयानवे हमार रानी ये सर्व सुपात्र दानका ही फल है ऐसा समझना चाहिये। सुकुल सुरूव सुलखण सुमइ सुसिक्खा सुसील सुगुणचारित। सुहलेसं सुहणायं तुहसाद सुपत्तदाणफलं ।। २१॥ मुकुल रुप रक्षण मुमति, शिक्षा सगुण सुशीष 1 शुभ चरित्र सब अब सुख, विभव पारदतलील ॥२१॥ अर्थ-उत्तम कुल, मंदर सरूप, शुभलक्षण, श्रेष्ठ युदि, उत्तम लिदापशिक्षा, उद्यम वील, उत्तम उरकट गुण, अन्डा सम्परचारित्र, उत्तम शुमलेश्या, शुमनाम और १७ RAMER सार समस्त प्रकारके भोगोंपमोगकी सामग्री आदि सर्व सुखके साधन संपाप्रदानकें फलस प्राप्त होते हैं। जो मुणिभुत्वसेसं भुजई सो भुंजए जिणुवहिं। संसारसारसोक्खं कमसो णिव्वाणवरसोक्खं ॥२२॥ जो मुनि भोजन शेष भुक्, भाष्यो जिनपर देव । भोगि सार संसारसुख, धनुफम शिव सुख हेव ।। २२ ॥ अर्थ-जो भव्यजीव मुनीश्वरोंको आहारदान देनेके पश्चात् अवशेष अन्नको प्रसाद समझ कर सेवन करता है वह संसारके सारभूत उत्तम मुखौंको माप्त होता है और क्रमसे मोघमुखको प्राप्त होता है ऐसा श्रीजिनेन्द्र भगवानने कहा है ।। भावार्थ-जिस घालमें मुनिराजको आहारदान दिया है उस थालमें पपे हुए अमको मनिराजका प्रसाद (गुरु प्रसाद ) समझ फर सेपन करना चाहिये । 'दाम- शासन' आदि किमने ही ग्रंधों भाचापीने यही माझा परागकी है कि STERESTEETTEERTANTEENSHETATE- -- - 1 कायकिलेसुवासं जाणिज्जे दिण्णा दाणं ॥ २३ ॥ गीत उसन अथवा विपुल, रलैम परिश्रम व्याधि । कायकिलेश उपवासात, तिनहि दान धाराधि ।। २३ ॥ अर्थ-श्रीमुनिराजकी प्रति शीत है या उष्ण, वायु पातरूप ले मारूप है या पितरूा है। निराजने कायोत्सर्ग ओर विविध प्रकार आमनोंसे कितना श्रम किया है, गमनांगमनसे कितना परिश्रम हुआ है, मनिराज शरीरम वर संग्रहणी आदि पापिकी पीड़ा वो नहीं है। कायस्लेश तप और उपवासके कारण मुनिराजके फण्ठ आदिमें शुम्कता तो नहीं है इत्यादि समस्त वाका विचार कर उसके उपचार स्वरूप योग्य आहार औषधी दूध गर्मजल आदि देना पाहिये। माग-मुनिराज की प्रकृतिको विचारफर और द्रव्पक्षे कालके स्वरूपको लपमें रमार दान देना चाहिये। दावाफे मावगुणोंमें सबसे पुरुष विवेकगुण माना है। विवक और विचार के पिना मन्तिमात्र यदा वा दान देनेसे विशेष हानि होने की प्रमाना और पापकर्मकी प्रादि होसकती है। मुनिराज को गा और मुकतावद MARATHIMATLALLAHARYALAYANE , ९ १९ सार २. हो ऐसे समय एदि विवेक और विचाफे विना विरुप गर्म पदार्थ दान दिया आप तो वह दान विशेष हानिप्रद ही होगा। इसी प्रकार आहारकी सामग्री वैपार फरने में विशेष हिंसा और मलिनताकर विचार अवश्य ही रखना चाहिये। हियमियमपर्ण पाणं णिरवजोसहिणिराउल ठाणं । सयासणमुवयरणं जाणिजा देह मोक्खरवो ॥२५॥ हित गित मेषज पान भख, रदन निरायुल पान । सज्या भासन उपयरन, जो दे शिवमुख मान ||२४ ॥ अर्थ-दिव मिव भानुफ शुद्ध अन्न पान, निदोष हितकारी औषधी, निराकुल स्थान, शयनोपकरण, आसनोपफरण, शासोपकरण आदि दानयोग्य वस्तुको अपायकी आवश्यकतानुसार सम्यादी प्रदान करते हैं। -.--.irnetnewsinantarwको बहने है।मासमोरकरण- --- २१ भावा-गुपात्रकी प्रकृति और द्रव्य क्षेत्र कातके नाम प्रयकी शिथिलता एवं देवनिमिचसे होनेवाले मोधमार्गके माधनके विघ्नों को करने के लिये, मोधमार्गको सतत प्रकट करने के लिये, धर्मकी प्रमानना के लिये, जिन- शासनकी स्थिरता के लिये, अममर्थ गुपात्रों के उत्साहकी पदि और गारमन्यमारके लिये हित मित भोजन पान, मठ प्रादि निगम स्थान औपषि और उपकरण आदि सम्परहटीको प्रदान करना नाहिये। जो भव्य जी दूग क्षेत्र कातकी परिस्थितिको विचार कर उसके योग्य पार प्रकारका दान मुपायमें देना है वा मोषमार्गमें अन. गामी है। अणयाराणं वेजावचं कुजा जइह जाणिमा। गम्भभवेव मादा पिदुवाणि तहा णिरालसया ॥२५॥ अणगारह वैयावरत, फरे जपा जो नित्त । मात पिता जैसें गरम, पाठ निरासस चित्त ॥ २५ ॥ अर्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने गर्मसे होनेवाले पालकका मरणपोषण लालनपालन और सेवामुक्ष्पा तनमनकी एकाग्रता और प्रेममायसे करते हैं, मई. WENTERTAINMENT ETAITara मामारसे पालकको सुरक्षित- रखते हैं, इसी प्रकार- सुपात्रफी यापथ्य सेवासुपा- माहार पान व्यवस्था निवासस्थान आदिके द्वारा पात्रफी प्रकृति फापपलेश पात- पंच आदि पाधि और द्रव्यक्षेत्रफालके उपद्रयोंको विचार फर करनी पाहिये। वार्ष-पदि सुपात्र (मनिमार्ग) सुरक्षित है सो धर्म सुरक्षित है। गनिमार्गके पर धमफा सर्व प्रकारसे लोप हो जाता है। गृहस्थपकी स्थिरता मी पर ही अवलंपित है। जिनशासनका प्रकाश सानिमार्गसे ही है इसलिये कार हो सफे सर्प सफारके मयलोरो सनिमार्ग स्थिर करना पाहिये, मुनिमार्ग माना पाहिये, सर्वप्रकारफी आपदामोंसे सुरक्षित और निरागुल पनाना पाहिये। मुनिधर्मको सर्प प्रफारसे निराकुल फरना ही पैथापत्य है। मुनिका ममाप एफट करना सेवासुरुषा करना आहारदान देना भीपदान देना सनिका.दान देना सो सर्व पयापरण है। .mमामा, मा गएर फैकमा, बारका भाविको न काना Militarunा. परप am मुनिराज स्थानको साफ करना, बीग रमा शौot ml नागो देना, पाहा गौरवी पीछी कारागारमादिगण मेना, nxnn femstale २२ ३ लोहीणं दाणं जद विमाणसोहाम जाणे ॥२६॥ मानके दानी, मुग्नह मुरुल मुछेभा सोनी रनि दान गौ, शवविमान सम गोभ ॥२६॥ प्रा मात्न. मम्मरीका दान कसा फलके ममान मदान सोमाको प्राप्त ताई और नोमी पुगदान मृतक पुष्पक विमान (ठाठरी) के ममान है। माता-धमामा गम्यारी पुरुषों का मुपात्रमें दान, श्रद्धा, मक्ति और मारपूर्वक होता है इसलिका दान पंचाय विभूति के माय स्वगमोधक महान फलको प्राप्त गाहे परन्तु लोमी पुरका दान मान बहाईकी इच्छासे दिया जाता है इसलिये महांकी ठीक ममान है। जमकित्तिपुण्गलादे देह मुबहुगंपि जत्य तत्येव । मम्माइ मुगुणमायण एत्तविमण जाणति ॥२७॥ {.marathi felरी पुगेको XिTTAR) दो निशान Muntaiमरनेयोगपगप्रदानी को माननेशला भीमार मानो ALL रपण. जस कीरति शुभलाभको, जहं तहं बहुत सुदेहि । भाजन सुगुण सुपात्रको, नहिं विशेष जानेहि ॥२७॥ अर्थ-लोमी अन्नानी पुरुष अपनी कीर्ति-यश मान पडाई और पुण्यलामकी इच्छा कुपात्र अपात्र आदि अयोग्य मिथ्या अनायतनोंमें यहुत दान देते हैं परन्तु उन को मम्यक्त्वरत्नसे सुशोमित अनेक गुणोंकी खानि ऐसे सुपात्रकी पहिचानही नहीं है याति लाम मान प्रतिष्ठा मोर खुशामके गौरवमें पड़कर निपात्यको विके लिये मिपामार्ग. में दान प्रदान करता सो भी संसारका ही कारण है। जैनयात्रा प्रतिष्ठा संघरपोरसय जिनपि. निर्माण मदिके लिये प्रदान किया हुमा दान, मान पाईके कारण विधायम स्कूल मोर पोरिंग भादि लगा देना मो संसारका ही कारण है। जिन जिन कारणों से जैनधर्मका हास, देव शाखा गुहा मपर्णद मोर पारित्रका लोप होता हो ऐसे कारणों में दान देना संसारका ही कारण है। शिक्षा, हिंसा, मोर पापके कार्यों में दान देना भी भयोय है। इसी प्रकार मान पहाईके लोममें पात्र अपात्रको परीक्षाका विकार किये बिना पan नया भपाय करात्र में दान देकर पुरा होमा मोर सत्पात्रकी निंदा करना चादि nिeपापकर्म 34 २४ सार २५ जंतं यतं तंतं परिवरिय पखवायपियवयणं । पदुच्च पंचपकाले भरहे दाणं ण किं पि मोक्खस्स ॥२८॥ समंवतंत्र हि प्रति, पसरात प्रिपवैन । पहंकाल पंचम भरत, दान मोक्ष कछु हैन ॥२८॥ अर्थ- मंत्र और तंत्रकी सिद्धि और जनतामें अपनी प्रचि, पक्षपातकी मिद्धि और गुमासदका लक्ष रयकर इम मानक्षेत्र पंचमकालमें जो दान दिया जाता है बादान मोधका माधक (मोबस्तका देनेगला) नहीं होता है। दाणीणं दालिई लोहीणं कि हवेह महाइसरियं । उहयाणे पुनजियकम्मफलं जाव होह घिर ॥२९॥ -मरामनामा धान रस फल देनेवाला नहीं है। क्षारसे पता मा मात्र पिया मा दार बना पलगे प्रमारता है। सामइसे मिस्या मग ममामों में पाया दमक पदाता है । सो प्रकार केरल माल प्रमिया मिमियम और मिया ममापनन में पान देना मंसारमा बन
ग्पण-
सार
दानीके दालिद किम, लोभी मह ईसत्य ।
दुहून पूर्वकृत कर्मफल, होत विपाक महत्व ॥२९॥
अर्थ--दानी पुरुषोंको दरिद्रता और लोमी पुरुषोंको महान विभवकी प्राप्ति होना
अपने अपने पूर्वजनितकोंका फल है। इसलिये भव्यजीवोंको चाहिये कि जस्तक
पूर्वकोके फलका उदय है तबतक अपनी अवस्थापर हर्ष या ग्लानि नहीं करे और
न यह विचार करे कि में धर्मसेवन करते हुये भी दरिद्र क्यों होगया और पापी
पुरुष धनयान क्यों होगये।
भावार्थ--धर्म का सेवन सदैव सुखका प्रदान करनेवाला है। दानका फल सदेव
सुखकर है परन्तु पूर्वजनित पापकोंका फल जो इस समयमें उदयरूप होरहा है
उसके निमित्त से दरिद्रता आदि सर्व दुसकर सामग्री प्राप्त होजाय तो उसके भोगनेमें
शोक और विषाद क्यों करना चाहिये ? परन्तु भावपूर्वक धर्मका सेवन विशेषरूपसे
करना चाहिये जिससे पाप कर्मोंका उदय पुण्यरूप होकर परिणमन करे।
घणघण्णाइ समिद्धं सुहं जहा होइ मवजीवाणं ।
मुणिदाणाइ समिदं सुहं तदा त विणा दुक्ख ॥३०॥
निरातिमादि यो मर जीवन ।। को मुभिहनने मकल, मुन्न हिहि दुम विन लोह ॥३०॥ अर्थ-जिम कार पर वाय आदि मोगोपमोग मामग्री और विभूतिम मुसकी प्रतियोटी मीसार मसन कारके परिग्रह और आरंम रहित वीतराग पनीपदान के फलम समान प्रकारकं मॉन्कट मुम स्वयमेव प्राप्त हो जाते हैं। पन विणा दाग न सूपुत्त विणा बहुधनं महाले । वित्त विणा वगुणवारिचं गिकारणं जाणे ॥३१॥ गि मात्र किन, बरन र मह रहेन । पिन बिया दृष्टगुण कारत, निशान त ॥३१॥ -जिस प्रकार मारके गिना मान विभूति मान और प्रसार पन व्यर्थ है। मारिना करित्रम पालन अग्ना पर्य है, इसी कार मुपात्रके माना। पात्र में मामीदान एसपी समान मान फलो दान करना नामनिन सामी इन्द्र की गुर विमति प्रदान in सार २८ करता है और क्रमसे मोक्षसुखको भी देता है। परन्तु अपाबमें प्रदान किया हुआ दान संसारका मदानेवाला और घोर दुःखका देनेवाला होता है ।। जिद्धारपत्तिहा जिणपूजातित्थवंदण विप्लेय। धर्ण जो भुंजह सो मुंजइ जिणदिह गरयगयदुक्खं ॥३॥ (UT RER कुंकुंद स्वाने पापा निर्मात्यसंधनका पार नही बतलाया है रितु पक मनुष्यने घोजिनेन्द्रमगामकी मिट्यपूजा पाश्चन्द्रदिपाकर सतत कायम रहने के लिये of ार साये धर्मार्थ दान निये और उसको शाजमें भगवामको निश्य पसा होतो हे सो भाषना को मोसोलिये दान किया, परन्तु कालान्तरमें उस प्याको हम करताना मोर मविपमें होनेवाली पूनाका विश्वास करना AT KARE In मायतनों का उप खाना और भविष्य में होनेयाले धार्मिक कार्यको विश्वाना सोयह सर्व नरकगतिका कारण है। पूजा भष्ट द्रव्य घड़ाने के बाद जो निमोहप द्राप होता है का फल तो पूअफ मध्य पुरुपने भगवान की पूजा करते हो प्रात कालियातोपकार प्रतिमा मावि के लिये रखेहुए पका फल भविष्य में प्रतिष्ठा करते समय माहोगा किलिमेm पण. १ जिन उदार प्रतिष्ठा पूजा जिनकी करे । वंदन तीर्थ विशेष जास धनको हरे॥ भूजै भोग अज्ञान काज धर्म नहिं धेरै । कहिउ जिनेश सो पुरुष नरकके दुम भरे ॥ अर्थ-श्रीजिनमन्दिरका जीर्णोद्धार, जिनपिम्य प्रतिष्ठा, मदिर प्रतिष्ठा, जिनेन्द्र भगवान की पूजा, जिनयात्रा, तीर्थयात्रा, रथोत्सव और जिनशासनके आयतनीकी रक्षाके लिये प्रदान किये हुए दानको जो मनुष्प लोभ मोहयश प्रहण करे, उससे मविश्यमें होनेवाले धर्मकार्यका विवसकर अपना स्वार्थ सिद्ध करे तो वह मनुष्य नरफगामी महा पापी है ऐसा श्रीजिनराजने कहा है। पुचकलिचविदूरो दारिदो पंगु मूकवहिरंघो । चंडालाइकुजादो पूजादाणाइदबहरो॥ ३३ ॥ पुत्र कलित्र विना दलिद, पगुमकवहिरंध । चांदालादि कुजाति हुर, महदतधनहर मुंध ॥ ३३ ॥ अर्थ-जो मनुष्य पूजा प्रतिष्ठा तीर्थयात्रा आदिके लिये संरक्षित द्रव्यका अप- हरण करता है वह पुत्र स्त्री आदि कुटुंष परिवारसे रहित होता है । दरिद्र पंगु मूक बहिरा अंधा होता है और चांडालादिक कुजातिमें उत्पन्न होता है। - सार Tartr. इत्यीयफलंण लम्भय जइ लभई सो ण भुजदे णियदं । वाहीणमायसेसो पूजादाणाइदबहरो॥ ३४ ॥ अर्थ-जो मनुष्प पूजाके निमित्त प्रदान किये हुए द्रव्यका अपहरण करता है वह इच्छित फतको कदापि प्राप्त नहीं होता। उसके पुण्यका उदय कभी नहीं होता है। कदाचित इष्टवस्तुका संयोग प्राप्त हो जाय तो भी यह उसका फल भोग नहीं गयहत्यपायणासिय कणउरंगलविहीणदिट्ठीए। जो तिबदुक्खमूलो पूजादाणाइ दवहरो ॥३५॥ गत कर पद नासा कणव, जो अंगुलि दिठि हीन । तीप्रदुमलको मूल दुइ, पूजदान धनलीन ।। ३५ ॥ अर्थ-जो मनुष्प पूजा प्रतिष्ठादिके निमित प्रदान किये हुए द्रव्यका अपहरण परताहेपा हाप पद (पैर) नासिका कर्ण अंगुलि आदि रहित हीनांग होता है। आयो अन्धा होना है और ठीवर नको भान होना। २ 10 सयकुठमूलसूला लयभयंदरजलोदरखिसिरो। सीदुण्हवाहिराइ पूजादाणांतरायकम्मफल ।। ३६ ॥ फुटसिद पप भून लूत बलोइमगइ करा पात पिचकास्त पूजदान अन्तरायफल ॥३६॥ अर्थ-जो मनुष्य तोम मोहक वन्न होकर श्रीजिनेन्द्रमगवानकी पूजाके निमित्त दान किये हुऐ द्रष्यका अपारण कर पूजादि धार्षिक कार्योंमें अंतराय करता है, वित्र करता, पुण्योसादक कारका विम करता है वह घर कोद शूल लूता जोर मगदर गनाटि त नि और मन्निपात आदि रोगों की तीववेद नाना रोता है। मा-जिननासन और पर्यारतनोंको उद्योत करने वाले पूजा प्रतिष्ठा रघ- पायानी वागादि धार्मिक कार्यो नि पदान किो हुऐ दपको वह धार्षिक कार्य होने के प्रयपट्टी बाहरण कर धार्मिक कार्यमें अंगय करना अथवा धाकि कायोंकी पारधा विन करना, पार्मिकाया दान देने वाले मायोंको रोकना, मुचारु धम कार्य करने वाले शाकि आयाम हा प्रकाना, पन्दिरके छन पमर आदि रपण- ३२ विभूतिका लोप करना मन्दिरकी द्रव्यसे आजीविका कर मन्दिरके कार्यको पंद करना आदि अनेक प्रकार पूजा और दानके कार्योंमें अंतराय करनेसे दुःख प्राप्त होता है। परइतिरियाइदुरइदरिदवियलंगहाणिदुक्खाणि । देवगुरुसत्थवन्दणसुयभयसज्झादाणविषणफलं ॥३७॥ अर्थ-जो मनुष्प देव गुरु शास्रके उद्धार, पंदना और पूजा प्रतिष्ठा आदिके निमित्त होनेराले दानमें अथवा प्रदान किये हुऐ दानमें, श्रुतकी पदि पाठशाला विद्यालय और स्वाध्याय आदिके लिये दानमें विघ्न करता है उसको नरफ तिपंप आदि दुर्गतिके दुःख और मनुष्यगतिमें दरिद्रता विकलांग व्या विविध प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं। सम्मविसोही तवगुणचारित्तसण्णाणदानपरिषीणं । भरहे दुस्समकाले मणुयाण जायदे णियदं ॥३८॥ समकितसुध तपचरित, सतहानदान परधान । भरतफाख पंचममनुष, निह उपज महान् ॥३॥ अप-सदुरमह दाखम (फलिकाल) पंगमफाल में मनुष्यों के निपार्षक
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+ रपण. ३४ ण विजाणइ कजमकज सेयमसेयं च पुण्णपावं हि । तचमतनं धम्ममधम्म सो सम्मउम्मुको ॥४०॥ फाज अकार न जानही श्रेय अश्रेय पुन्य पाप । तत्व अतत्व अधर्म धर्म सो समकित रिन थाप ॥१०॥ अर्थ-~जो मनुष्य सम्यग्ज्ञानके साथ अपना कार्य अकार्य, अपना हिन अहित, तत्त्व अवय, धर्म अधर्म और पुण्य पापको नहीं जानता है वह सम्पादनसे रहित मिथ्याप्टी है। ण विजाणइ जोग्गमजोगं णिचमाणने हेय मुवदेयं । सञ्चमसचं भव्वमभव्वं सो सम्मउमुफो॥४१॥ जोग भगोगह नित थनित, सत्य यसस्य न जानि । हेय घहेय न भवि धभवि सो समकित विन मानि॥११॥ अर्थ-जो मनुष्य योग्य अयोग्य, निरम अनिश्य, हेप उपादेय, सत्य प्रसरण संसार भोर मोक्षको न जानमा परीसर त मे...
14 . रपण- लोहय जणसंगादो होइ महमुहरकुडिलदुभावो । लोइय संगं तहमा जोड वित्तिविहेण मुंचाहो ॥ ४२ ॥ लौकिक जन संघात मह, मुखर कुटिल दुरभाव । होर संग ताते तनौ, मन वच तनकर जाय ।। १२ अर्थ-लौकिक मनुष्योंकी संगतिसे मनुष्य अधिक योलनेगाले ( पानाल) पफड कुटिल परिणाम और दृष्ट मायाँसे अत्यंत क्रूर हो जाते हैं इसलिये लौकिक मनुष्योंकी मंगति को मन वचन कायसे छोड़ देना चाहिये । भावार्थ-धर्माचरण विहीन-नास्तिक मनुष्यों की संगति और उनकी शिक्षा. मनुष्य वाचाल हो जाते हैं। इससे वे पापकर्म-हिंगा झूठ चोरी आर व्यभिचार आदि अनीति के कार्य करनेमें जरा भी नहीं हिचकते हैं बल्कि उस ऋशिक्षाके प्रमय पापकर्म करते हुए अपनी सफाई मूब पढ़ाई के साथ पुकार पुकार कर गाते हैं । अपनेको जैन रतलाते हुए मी लौकिक जनकी मगतिसे जनधर्मके विरुद्ध आचरण करने हैं। दुष्ट मायों को रख कर अधमकी द्धि कर मिथ्यात्वको बढ़ाते हैं इसलिये लीफिक जनकी संगति का परित्याग करना चाहिये।
सार रपण. ३ उग्गो तिब्बो दुबो दुभावो दुस्सादो दुरालाको। दुमदरदो विरुद्धो सो जीवो सम्मउमुकरे ॥४३॥ उन तीव्र दुर्भाव दुठ श्रुत दुर आलाप । दुरमत रत अविरुद्ध जिम सो विन समकित पाए ॥४॥ अर्थ-उन्न प्रकृतिवाले, तीन क्रोधादि प्रकृतिवाले, दुए स्वभाववाले, दुर्भापाले, मिथ्या शाखोंके श्रवण करनेवाले, दुष्ट यचनके कहनेवाले, मिथ्यामिमानको धारण करनेवाले, आत्मधर्मसे विपरीत चलनेवारने और अतिशय र प्रकृतियाले मनुष्य सम्यक्त्व रहित होते हैं। खुद्दो रुद्दो रहो अणिपिसुणो सग्गस्थि असुइउ । गायणजायणभंडनदुस्सणसीलो दु सम्मउमुफो ॥४॥ तुद्र रुद्र रोपी पिशुन गरची निघ अनिष्ट । गायण जाचक दोषकप भडन समकित नए ॥१४॥ अर्थ-क्षुद्र प्रकृतिवाले, रुद्रपरिणामी. क्रोधी, जुगुलगोर, कामी, गर्यिध, अस. हनशील, द्वेषी, गायक, पाचक, लड़ाई नगरे करनेवाले, दारोफे दोषोंको गफट करने पाले, निप पागाचारी और मोदी मयुरप गयावादिन होने हैं।
HERE रपण- वाणरगदहसाणगयावग्यवराहकराह । पक्खिजलूपसहाव णर जिणवरचम्मविणामु ॥१५॥ वानर गर्दम अरु महिए गज मात्र पराइ कराइ। पनि जलूस समारनर जिनवर धर्म न लाह ॥ १५ ॥ अर्थ-पंदरकै स्वभाववाले, गडहाके समाववाले, भंगा हाथी आप शूकर कप पक्षी जलूकादि स्वमाववाले मनुष्यों के श्रीजिनेन्द्रदेवका धर्म धारण नहीं होता है । कुतेवकुलिंगकुणाणी कुवयकुपीलकुदमणकुमस्थो। कुणिमित्त संथुय युह पसंमणं मम्महाणि होड णियमं ।। ४६ ॥ अर्थ-मिध्यातपश्चरण करनेवाले, अस्मिन मेपको धारण करनेगल, मिथ्यावान- की आराधना करनेवाले, कुस्मित बनानरगों को पालन करनेवाले, कुनीलगपन करने वाले, मियादर्शनके मायाले, मिथ्याशास्त्रों का पठन पाठन और स्वाध्याय करनेवाले, कुत्सित आचरण करनेवाले, मिथ्याधर्म, मिथ्यादेव और कुगुरुकी प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सम्पावरहित होते हैं। उनके निपमक सम्पदर्शन नहीं होता है।
३4 सम्मविणा सण्णाणं सञ्चारित्र्तण होइ णियमेण । तो रयणत्तयमज्झे सम्मगुणकिडमिदि जिणुदिह ॥४७॥ समकित विन सतज्ञान सतचारित नियत न जोय । रत्नत्रय सम्यकगुण जिनकाहि उत्तम होय ॥१७॥ अर्थ--सम्यग्दर्शनके विना सम्यग्ज्ञान और सम्यक् पारित नियमपूर्वक नहीं होते हैं। जिसके सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूप रग्नत्रय है उसके ही सम्यक्त्व गुण प्रशंसनीय हैं ऐसा श्रीजिनेन्द्र भगवानने कहा है। तणुकुही कुलभंगं कुणह जहा मिच्छमप्पणो वि तहा। दाणाइ सुगुणभंगं गइभंग मिच्छसेव हो कह॥४८॥ तनपुष्टी कुलभंग ज्यों करे जथा ज्यों जानि । स्यों दानादिका मुगुण यहु कर गिध्याती हानि ।। ४८॥ अर्थ-जिस प्रकार कोदी रोगपाला मनुष्य एएफे कारण अपने गलको ना फरणा ठीक इसी प्रकार निमारटी जीप दान जि.पारिन और धर्मागरमौका शिष्य कनारे .
सार
३
३९
मिथ्यात्वसे समस्त आत्मीयगुण नष्ट हो जाते है और सच्चे देव शास्त्र गुरु तयाँ
धर्माचरणोंसे विपरीत भार हो जाते हैं। इसलिये मिध्यात्वका सेवन करना संसार-
के दुसोका ही कारण है।
देवगुरुधम्मगुणचरिच तवायारमोक्खगइभेयं ।
जिणवयणसुदिडिविणा दीसइ किह जाणए सम्मं ॥४९॥
देव धरम गुरु गुण चरित शुम तप शिव गति मेव ।
जिनवर वचन सुदिष्टि विन अंधफ सम्यक वेव ॥४९॥
अर्थ- सम्यक्दर्शनके विना देव गुरु धर्म क्षमादिक गुण, चारित्र तप मोक्ष मार्ग-
वघा श्री जिनेन्द्र भगवानके वचन ( जिनवाणी) को नहीं मानते हैं।
मायार्थ-जिनके सम्यग्दर्शन नहीं है उनके देव शास्त्र गुरुका श्रद्धान भी नहीं
है । तथा ब्रत तप चारित्र और मोक्ष मागमी नहीं होता है।
एक्कु खण ण विचिंतेइ मोक्खणिमित्तं णियप्पसाहावं ।
अणिसं विचित्चपाव बहुलालावं मण विचितइ ॥ ५० ॥
रयण- सार ४० खिन न चिंतय शिव निमित्त निज आतम सदभाव । श्रह निश चिन्तय पाप बहु मन चिन्ता घालाव ||५|| अर्थ-मिथ्यादृष्टी जीव एक क्षणमात्रभी मोक्षको सिद्धिके लिये अपने आत्म. स्वरूपका चितवन नहीं करता है, परंतु रात्रि दिवस पापके कार्योंका वारपार विचार करता है तथा परवस्तुकी निरंतर अभिलाषा करता है। मिच्छामहमयमोहासवमत्तो वोलए जह भुलो। तेण ण जाणइ अप्पा अपाणं सम्मभावाणं ॥ ५१॥ मिथ्या मति मदमोह भुल्ल बकत जिम मत्त | तैसे जानत नांहिं निज अरु समभावहि तत्त ।। ५१ ॥ अर्थ -मिथ्याप्टि जीव मिथ्यावृद्धिके अभिमानसे मदोन्मत्त होकर मदिरा पान- करने वाले मुल्लद मनुप्पफे समान या नद्वामिथ्या प्रलाप करते हैं। परंतु वे मोह- के उद्यमे अपनी भारमाफोकी में , ENTRALIVE सार मिहरो महंघमारं मरुदो मेहं महावर्ण दाहो। वज्जो गिरि जहाविय सिंज्जड़ मम्मे जहाकम्मं ॥५२॥ महायध्यारो रवि मरत मेघ महावन दाह । पर्वत यजू पिनाशए समकित फर्म अपाह ॥१२॥ अर्थ-जिसमप्रकार सूर्य अंधकारको तत्काल नष्ट कर देता है। वायु मेघका नाश करती है । दावानल बनको जला देता है । वन पर्वतों को भेदन (चूर्ण) करदेता उसी प्रकार एक गम्यक्त्व ममस्त कमाको नाश कर देता है। मिच्छंधयाररहियं थियमझं मिव सम्मरयणदीव कलावं । जो पज्जलइ स दीसह सम्म लोयत्तयं जिणुदिई ॥१३॥ पनि अध्यारे गेह मधि दीपकला परगास । समकिन ना प्रश्वले दिपै तीन लोक जिन भास ५३॥ अर्थ- जो धर्मात्मा अपने हृदय-मदिरमें मम्पावरत्नरूपी दीपक प्रज्वलित करता है उसको त्रिलोकके समस्त पदार्थ सयमेव प्रतिमा सित होते हैं। ४१ ४२ SH कामदुहिकप्पतरं चिंतारयणं रसायणं य समं । लद्धो भुंजह सोखं जहच्छियं जाण तह सम्म ॥ ५४॥ कामदुधा तरकल्प रससार रसायन चित। मणि लाभै सुग्व मुजए इच्छिन निमिसम दिन ।। अर्थ--जिस प्रकार भाग्यशाली मनुष्य काप,नु, कल्पक्ष, चिंतामणि रस्न और रसायणको प्राप्त कर मनवांच्छित उनममुखको प्राप्त होता है उगीप्रकार गम्गदर्शन से भव्य जीवोंको सर्वप्रकारके सलिष्ट प्रग और समस्त प्रकारफे गोम्योपमोग स्वयमेव प्राप्त होजाते हैं। कतकफलभरियणिम्मल यगय कालिया सुवणञ्च । जुचो मचबरो लद्दइ लहु मोवयं ॥५५॥ टी) के मंगोगरी जल निर्मल योजाना। रहित निमल होजाता है। उसी प्रकार रहितात work पन सार पुञ्चट्ठियं सवइ कम्मं पहसुदु णो देह अहिणवं कम्म । इहपरलोयमहप्पं देइ तहा उवममो भावो ॥५६॥ प्रवपित सो करम नव नाहि देत प्रवेश । देय म्हातम लोक द्वय उपसम माव नरेश ॥५६॥ अर्थ-मध्य जीवोंको उपशम भाव पूर्ववद्ध कौकी निर्जरा करता है । (पूर्वपद्ध काँकी स्थितिका क्षण करता है ) और नवीन कर्म ग्रंथ होने नहीं देता है (नवीन सोका आमा नहीं होता है। इसलिये उपश्रममाव दोनों लोकमें अर्व माहात्म्य प्रगट करता है। सम्मादही कालं बोलइ वेरम्गणाणभावेण । मिच्छाही वांछा दुभावालस्मकलहेंहि ॥५७॥ अर्थ:-मभ्याटी पुरुष समयको वैराग्य और मानमें व्यतीत करते हैं । परंतु मिप्यारी पुमादार पालम और कलहसे अपना समय व्यतीत करते हैं। अज्जविमणिणि भरहे पउरा रुट्ठआणया दिहा। गट्टा दुधा कहा पायिहा किष्णणीलकाऊदा ॥५॥ ४ -- मार HARE आज भरत अवसय सरपिणी प्रचुराते अतिरुद्र । नष्ट दुर पापिष्ट फळ प्रयलेश्या जुत हुद ॥ ५८ ।। अर्थ-इस भरतक्षेत्र अवसर्पिणी पंचमकालमें दुयानी रुद्रपरिणामी कृष्णादि अशुभ लेश्याके धारक क्रूर स्वमाय पाले नष्ट दष्ट पापिट भौर कठोर मार्योको धारण करनेवाले अधिक मनुष्य उत्पन्न होते हैं । अज्जविसप्पिणि भरहे दुस्ससया मिच्छपुजया सुलया। सम्मत्तपुब्बसायारणयारा दुल्लहा होति ॥ ५९॥ अयसपिणि दुःपम भरत सुलभ पूर्णमिथ्यात । सममित पूरय जति गृही दुर्सभ धर्म विदयात ॥ ५९॥ अर्थ- इस भरनक्षेत्र अवसार्पणी पंचमफालमें मिथ्यात्वी गनुष्प अधिक है। परंतु सम्पहष्टी मुनीश्वर और गृहस्थ दुलम हैं। भावार्थ- जैनधर्मको धारण करनेवाले धर्मात्मा राम्याटी गृहस्थ और सनीपर अरपन्त र्लग हैं। मियामतको धारण फरमेयाले पिनापी अधिण-गुलगता
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अन्जावरापाणभरह मन्माण पगादराहामाद।
जिविष्टं गहु मुण्णा मिच्छादिट्टी हो सोहु ॥६०॥
Rasifa मत दिन प्रमद धर्मपान ।
हत यति दिन सदी जो दुनिटि नहिं मान ॥६॥
अर्थ-इस सरनक्षेत्र प्रमाणी नमकालमें श्रीमुनीभरोंके प्रमाद रहित धर्म-
रानागा श्री जिनेन्द्रदेशने कहा है। जो इसको नहीं मानता है वह
निगरी है।
पापाय--अप्रमाद या गाता गुमम्यान होती है । मन्तक्षेत्र परमकालमें
पाठ गुयानपती मुनीयम्माद हिन धर्मभ्यान नियम पूर्वक होता है, ऐसा
धारित मानने परमागममें कहा है। जो नी दर पर कालमें मात गुण-
पनपनी मुनिधर्म मंत्रीगोंदा अनिय । नया प्रमाद रहिन भानको नहीं
Triमराला जनधने गर्दिन है
अमुद्दादो रियादी मुहमावादोदु नग्गमुहमाओ।
दुहमुहमा जाप ने मचे दणं कुणहो ॥ ६१ ॥
पण- ४६ असुभभावत नरकगति शुभै पुरण सुख भाव । दुखसुख भायह जानि तुव रुचै सु कार अनुराय ॥६॥ अर्थ--अशुभभावसे नरकादि दुर्गति होती है। शुभ भावोंसे स्वर्गके अनुपम सुख मात होते हैं। दुःख और सुराकी प्राप्ति अपने शुभाशुभ भावों पर ही निर्भर है। हे भव्य आत्मन् ! जो तुझको अच्छा मालूम होता हो वह फर। भावार्थ--अशुभ भाव करेगा वो दुरए होगा। शुम भाप फरेगा तो मुए होगा इसलिये अशुभ भावोंका त्याग कर। हिंसाइसु कोहाइसु मिच्छाणाणे सुपरखवाए। मच्छरिएम मएसु दुरिहिणवेसेसु असुहलेसेसु ॥६२॥ विकहाइसु रुद्दटुज्झाणेसु असुयगसु दैडेसु । सलेसु गारवेसु नापसु जो वहइए अमुहभावो ॥ ६३॥ हिसादिक प्रोधादि अरू गृपा ज्ञान रक्षयात।
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पण. सार ४८ अस्तिकाय पण द्रव्य पट् तव सात नव भाव। बंध मोक्ष कारण सरुव द्वादश भावन ध्याव ॥६॥ रानापहि स्वरूप थर आरिज दयादि धर्म । एरो मारग वर्तई सो शुभ भाव सुसर्ग ॥६५॥ अर्थ-पंच अस्तिकाय, छहद्रव्य, सात तत्व, नव पदार्थ, पंधमोक्ष, दयाक्रोध, पारद भावना, रत्नत्रय, आर्जवभाव क्षमाभाव और सामायिकादि चारित्रमय जिन भव्य जीरॉके भाव है , वे शुभ भाव हैं। सम्मत्तगुणाइ सुग्गइ मिच्छादो होइ दुग्गई णियमा । इदि जाण किमिह वहुणा जते रुचेइ तं कुणहो ॥६६॥ समकित गुणते शुभसुगति दुर्गति देव मिथ्यात । यह जानि भव्य जो रचे करुद्ध नियम अवदात ।। ६६ ।। अर्थ-सम्यग्दर्शन के प्रभावये जीवोंको नियमसे शुमगति होती है और मिथ्यात्वसे निपम पूर्वक दुर्गति होती है इसलिये मध्य तुसफो जो अच्छा लगे पह कर, अधिपा करें।
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ArranmiNT.MEAraRaTE 1 सा सा एक सम्पदन के रिमा जिनलिंग भी संसारका नाश नहीं कर सकता है। मोक्पणिमित्तं दुक्खं वहेइ परलोयदिद्वितणुदिट्ठी । मिच्छाभाव ण जिइ कि पावइ मोक्खसोखं हि ॥ ५९॥ मोक्ष निति दुख यहे तर दगडी दिछि परलोक । मियाभाव न छीजा किम पास शिव चोक ॥६९॥ अर्थ निभ्यारी पहिरात्मा जीपने मोधकी प्राप्तिके लिये यार पार अनेक प्रयत्न फिरे और प्रत तपथरएफे द्वारा शारीरिक अनेक कष्ट भी सहन किये परंतु मिथ्या मावों का परित्याग नहीं किया इसलिये यह अशानी आत्मा मोक्षके मुखको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है। ण हु दंडइ कोदाई देहं देटेइ कई खवह कमें। सपो किंमुवइ तदा चम्मिउ, मारिउ लोए॥७॥ मतमोभारितन किये किमबर्म।
सार सा या परतावरण आदि नागरीको [] देता है इसमे नौ सम्म मरोगामगे का! कदापि नही।चोंकि सर्पक विलको मारनेसे सप पी मरता है। उगसम भवभावजुदो गागी मो भावसंजुदो होई। पानी कमायामगो अमंजदो होइ सो ताव ॥ ७१ ॥ सपनामा त दादा मडम इन। हनीले दरवारमान पान ॥१॥ -मन मारले तपमात्र पनि अदिघा स्लेि बांग तो वे मामाको नाममा मायके वापस तासरण परग किन जांय नोभी मनमानी। मा-गायतको मारने सरसादक होते है त तक उनके परमार प्रकाशनाना महज नी पुराने सानके मिसन में कारोबादि कान गा दे पातु माोंने स्तुत परिगाम ने की।
सार गाणी सवेइ कम्म णाणवलेणेदि सुवोलए अण्णाणी । विजो भेसजमहं जाणे इदि णस्सदे वाही ॥७२।। शानी खेप ज्ञानवल फर्भ न मान मज्ञान | दी भेषज ज्ञान यह व्याधि नाश इति मान ॥७२॥ अर्थ--शानी पुरुष अपने ज्ञानके पलसे कर्मोको नष्ट कर देता है ऐसा जो कहता सो अशानी है क्योंकि बिना पारित्रके अफेले झानसे कभी कर्म नष्ट नहीं हो सस्ते । मैं मर औषषियोंको बानता हूं मैं एक अच्छा वैद्य हूं, ऐसा कहनेमात्रसे पया म्पाधियां न हो जाती हैं ? कमी नहीं। भावार्थ-जि. कार रोग और आपषिक जानने मात्रसे व्यापि दूर नहीं होती उसी प्रकार अफेले शानमे कर्म नष्ट नहीं होते किंतु, जेरो औपधिको घोट छानकर पीनस ध्यापि नष्ट होती है उसी प्रकार चारित्रसे कर्म नए होते हैं। पुग्न सेवह मिच्छामरसोदणदेउ सम्ममेसज । ५२ नियामक धन प्रथम समकेत भेज सेव। पये सेवइ परन हब नाशन चारित हेत।। नप-मम्प जीवोंको सरसे प्रपम मिथ्यात्वरूपी मलका शेषन सम्यस्त्वरूपी रखापनसे करना चाहिये। पुनः पारिवाली ओपपका सेरन करना चाहिये। इस. मार बावरण करने से मिली रोग तरकात ही नियमांक नाम हो जाया है। माध-सम्पादनके बिना धान और पाधि निफत है नोंका नाश सम्पाचारित्रमे ही होता है। पदि सम्मानपूर्वक नारित्र है तो कर्मोके नाश होना मी रिरंग नहीं है। मम्मदर्शन होने पर मी जरता सम्पर चारिय पूर्ण- अपमेशन नहीं है जानुक को नाश कदापि नहीं होगा और निष्पालके मार पारिव धारण किया जाय तो फेवल संमारका ही पर्दक है कोंका नाश करने वाला है। इसलिये मुने प्रथम मिपातका नाश कर चारित्र धारण वाना पारे। अगागी विमपविरतादो होइसयमहसगुणो। पाणी कमापविरदो रिसयामचो जिपुटिं।७४॥
.. सार, मानी सिरसिताकपाप दिन होय। तानी विपशु जिन को लघु गुन सोय ॥ ७९ ॥ -मारी ( असानी)बीर पिपर और कपायोंसे विरत होक पल प्रापसाता है मरीजी पर क.पायोंको मान कर पुए भी उससे लाख एपा फल अनायाम ही शाप कर लेना है एमा श्री जिनेन्द्र गगवान ने कहा है। मागई -- विपर सर गको मेवन करते हुए भी मम्यष्टी पुरुषोंको मियादृष्टी दिनलिंग पारीकी प्रधामे अन गुणी कोंकी निर्जग होती है। प्रथम तो मिराको काफी निना ही होती नहीं है कदाचिन् यह मियादृष्टी मोहनीयः महोदयमे श्री जिनेंद्र भगवान कधिन पारिवको धारण कर लें। और समस्त पसारकी विषय कपापा परित्याग कर देवे तो भी काफी निजरा मिथ्याटीको नही होती है। . पुण्यकी पनि भय ही होती है, इसलिंग मिथ्याटीका विषय हरायोपहिया. सर्पकारी नहीं है और मुम्पटी पुरुषोंको विषयः यासका मेपन मुसारके वका कारण या नहीं है। विणगो भक्तिविहीणो मदिलाण रोयणं विणाणेई। भागोवेरभाविणारारिया जिना॥७५।। FINA :
रपण- या गृहत्याग विराग दिन दुहवरित यह होगा | : अर्थ:-मक्तिके पिना विनय, स्नेहके विनास्त्रियोंका रदन, वैराग्य मारके पिना सोगा यह सर विंडंबना है। • मावार्थ-मक्तिके पिना विनय करना छल या विचना है, मेम विना स्त्रियोंका रोना विंचना है, उसीतकार वैराग्य उत्पन्न हुए पिना परका त्याग कर देना केवल विटंबना है। सुहडो सूरत विणा महिला सोहग्गरहियपरिसोहा। वेग णाणसंजमहीणा खपणा ण किं विलभते ॥७६।। एभट राकि पिन यामिनी दिन सोहाग सोभत । संजमहान विराग पिन, ग्यो मुनि कानुन सईन ।। ७६ ॥ अप-शूरवीर शक्तिके विना, स्त्री मोमाग्यके पिना जिस प्रकार कार्यकारी नहीं है उसी प्रकार मंयम ज्ञान और पैराग्य मिना पुनीभर मी यथेष्ट सिद्धि नही मात करता है। PANLALLANTHALAL . --
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अर्थ-कौनसी यातु ग्रहण करने योग्य है और कौनसी वस्तु त्याज्य है इस मकार आत्महितके लिये सम्यक विचार कर एवं संसार शरीर भोगोपभोग पदाफासे विरक्त होकर जो जिनलिंगको धारण फर तपश्चरण [ ध्यान ) फरवा है यह मोक्षके सुखका अधिकारी है। सत् असत् योग्य अयोग्य हित अदित ग्रास अग्राय यस्तुके विचार रहित केवल पाह्य सुखका परित्याग करनेसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति नहीं होती है। भावार्थ-जिनको आत्माका परिशान है स्यानुभव है और जिन्होंने विज्ञान द्वारा आत्मीय और अनात्मीय वस्तुका विचार कर आत्मीय धमा मादर आदि गुणों को धारण कर पर पदाधं अनात्मीय कर्म पेतन और कर्म फल घेतनाका परित्याग कर दिया है तथा संसारके स्वरूपको हेय व दुखकारी समझकर पैराग्यभायसे जिन लिंगको धारण कर कठिन व्रत तपश्चरण के द्वारा फर्ममलको दूर कर दिया है वे ही मोक्ष सुखके अधिकारी है। पितु जिनको आत्मशान नही मयारपफा विपार है फेवल बाद मुखफा त्यागकर साधु मन गये हैं ये फटिन सपश्चरण पारने पर भी चोध पत्र काम अधिकारी महा। सम्पादनminal Unit
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रपण. सार फरम न क्ष न मम पर जो विन सम्पक मुक। लिंग धरनु परतरति जनु सो जिय खेद भजुक ॥ ७॥ अर्थ-जो जीव परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता है और जो सम्पायनसे रहित है वह जीन न तो गृहस्थ आस्थामें है और न साधु अवस्था है फेल लिंगको धारण कर क्या करते हैं। कोका नाश वो सम्परत्व पूर्वक जिन लिंग धारण करने से ही होता है। भावार्थ-- सम्यग्दर्शनको विना पारण किये व्रत तप आचरण और साधु अवस्था व्यर्थ है, संसारको प्रदाने वाली ही है। संसारमें अनेक मनुष्प साधुका मेप धारण कर अपनेको महंत मानकर अनेक प्रकारके मपंच रचकर ससारके जीवोंको ठगते हैं और विपय फपार्योसे अपनी आत्माको ठगते हैं। वे फर्मों का नाश नहीं पर राके हैं। ये मक्षा (आत्मा ] को नहीं जान सक्ते है । इसलिये सम्पनको धारण कर आरमाफे स्पसको सबसे प्रथम जानना चाहिये पुनः दीक्षा ग्रहण करना चाहिये। अपाणं पिगपिच्छह ण मुणइ णवि सहरण भावे । hi पहपख भारमल लिंग पिसूण विकार naam
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रपण सार आत्माको फर्मजन्य दुरका भार है ही और जब यह आत्मा अपने शुद्धस्वरूप टको. रकीर्ण ज्ञायकस्वभाव आत्माको जान लेता है, अपने शुद्ध स्वभावको प्राप्त हो जाता है उसी समय अनंत मुखको स्वयमेव प्राप्त हो जाता है। इसीलिये मुनिगण शुद्ध- स्वरूप अपने आत्मस्वभावका ध्यान करते हैं, अपने शुद्धस्वरूपमें तन्मय हो जाते है और मोक्षगुसको प्राप्त करते हैं। भावार्थ-जबतक अपनी आत्माके शुद्धस्वरूपकी भावना नहीं है, स्वस्वरूप- की प्राप्ति नहीं है और जबतक अपने भावोंकी स्थिरता अपनी आत्माके शुद्धस्वरूपमें रहतास नहीं है तबतक जिनलिंग धारण कर कठिन तपश्चरण करना उत्तम सुखका कारण नहीं है। इसलिये स्वात्मस्वरूपको जानकर तपश्चरण फरना स्वेध. सिद्धिके लिये लाभदायक है। इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि अपने आत्म- स्वरूपको जान विना जिनलिंग धारण करना ध्यर्थ है। जिनलिंगको धारण कर अभम्पजीरभी नवम प्रेयिफ पर्पन्त उसम अहमिन्द्रीक सुख प्राप्त कर सत्ता है। मिनलिंग धारण करने का मादास्पदी भरभूत और लोकोतरी पुष्प किसी भी ..दिन दिन तयारम : Sadhai - HAIRTAIMAAVATARNINTANT
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रयण- ६८ भावार्थ-सम्यग्दृष्टी भव्य जीव ही जिन लिंगको धारण कर मोधके अधिकारी हैं । निर्वाणप्राप्तिकी योग्यता सम्यग्दृष्टि जीवोंको ही है। सम्पग्दर्शन की माप्ति आत्माके स्वरूपको जाननेसे ही होती है। जिनने आत्मा स्वरूपको जाना है उनने समस्त तत्वोंको जान लिया है । इसलिये वनोंकी यथार्थ प्रतीति भार निर्दोष परिज्ञान आत्माके स्वरूपको जाननेवाले भव्यात्माको ही है और उनको ही सम्यग्दर्शन है। पवयणसारभासं परमप्पाज्झाणकारणं जाणं । कम्मक्खवणणिमित्तं कम्मक्खवणेहि मोक्खसोक्खं हि ॥९॥ प्रवचनसार अभ्यास विदि परम ध्यानको हेत । ध्यान कर्म खेपै करम खिप मोक्ष सुखदेत ॥११॥ अर्थ-आत्माके शुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिका अभ्यास ही परम परमात्माके ध्यानमा कारण है । विशुद्ध आत्माके स्वरूपका ध्यान ही फोफा नाव मोधायकी प्राओं लिये प्रधान कारण है।
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सार ७० है। परिणामोंकी विशुद्धता हुए विना आत्माके भाव अपनी आत्माके शुद्ध सरूपमें कदापि एकाग्रता पूर्वक स्थिर नहीं रह सक्त हैं। मोहोदयसे जीवोंके भानोंमें राग देप की मलिन परिणति नियमपूर्वक अवश्य ही होती है और राग द्वेपसे आर्च रोद्र अप्रशस्त ध्यान दुर्गतिके कारण होते हैं। साल विहीणो राउ दाणदया धम्मरहिय गिह सोहा। णाणविहीण तवो विथ जीवविणा देह सोहं च ॥ ९२ ॥ साल राज दिन दान दय धर्म रहित गृह देसि । ज्ञान झोन तप जीय विन देद सोभ ज्यों पेखि ॥ १२ ॥ अर्थ--जिम प्रकार परिकोटा (नगररक्षाका कोटा) के विना राजाकी शोभा, दान दया और धर्मके बिना गृहस्थकी शोभा, जीवके विना मृतक शरीर की शोभा पिटल है उसी प्रकार ज्ञान के बिना तपकी शोभा भी विफल है। भावार्थ-सम्यम्मानफे साथ तपश्चरण कफ नाशका पारण है। अनेक प्रकार की प्रादि, ममतारार्यलोक.फी पूजपत्ता भादिका कारण भी सम्परवानपूर्वक रूप. EHATRATERMENT .. stro
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पण सार णाणभासविहीणो सपरं तच्चं ण जाणए किंपि। गाणं तस्स ण होइ हु ताव ण कम्मं खवेइ णहु मोक्खो ॥१४॥ ज्ञानाभ्यास विन सुपर तत्त्व न कुछ जानत। ध्यान न होइ न कर्मक्षय मोक्ष न है तावंत ॥ ९ ॥ अर्थ- सम्यग्ज्ञानके अभ्यास विना यह जीव भेद विज्ञानको प्राप्त नहीं होता है। आत्मतत्त्व और परतत्वको सर्वथा ही नहीं जानता है । स्वपरके ज्ञान दिना ध्यान नहीं होता है और सम्यक् ध्यानके बिना कोका क्षय और मोक्ष कदापि नहीं होती है। इसलिये सम्यग्ज्ञानका अभ्यास अवश्य ही करना चाहिये । भावार्थ--मिथ्या शास्त्रोंके अभ्यासरो आत्मामें मिथ्या श्रद्धान पूर्वक कुतत्वका ही ज्ञान हेता है, सम्परज्ञान नहीं होता है। जीवोंको मिथ्या शास्त्रोंका अम्पास प्रत्यक्षमें ही गृहीत मिथ्यात्यको पढ़ानेवाला और धर्मकर्मसे शून्य यनानेवाला है। नास्तिकताके भाव और बुद्धिम मिथ्यात्वकी प्रचि फरानेवाला है । जीयोंको जिवनी पड़ी भारी दानि मिथ्याशास्रफि अभ्पाससे दोसी है उतनी हानि इदेष रोपन हिंसा मूड और पापाचरणफे रोषन पार रो नई नी' पौकि near.
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. . सार मना मधीकरण भीर कपायोंका उपशम होता है इसलिये पंचमकाल भरतक्षेत्र में एक बिनागमका ही अभ्यास करना श्रेष्ठ है । कफि नाश करनेका यही मूल कारण। मामा-भी जिनेन्द्र भगवानका प्रणीत सत्यार्थका प्रकाश करनेवाला आगम है। जिनागमके अम्पानसे भारत और द्रव्यश्रुतकी प्राप्तिके साथ मन और इन्द्रियों का पूर्ण निग्रह होता है और विषय कषाय तथा काम क्रोध मान माया राग द्विपादि विकारभावोस आत्माकी परणति रुक जाती है इसप्रकार राग द्वेपकी परमतिरा संरोष होनेरो आत्मा अपने शुद्ध स्पसमयरसमें तल्लीन हो जाता है शामलमारमें स्थिर होना ही ध्यान है। घम्प्रज्झणभासं करेह निविहेण जाव सुद्धण । परमप्पज्झाणचेतो तेणेव खोइ कम्माणि ॥ ९६ ॥ धमान भास्याम फरि भाय शुद्ध त्रिविषन । चा आनमम्पनर कामखपत तेन ॥ ब-मनपपनकापकी रिपदताये अपने भारमा परिणामविरोन पाले ७४
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Mamare सार ७६ पारंभ नित्ति हप प्रत्ति पुण्य आरंभ । पामयन यदा शानको जिग सब जीवन धंभ ॥ ९७ ॥ --पाप कार्पी निशचि और पुण्य कायोंमें प्रवृचिका मूल कारण एक सम्पमान। इसलिये मुमधु जीरों के लिये सम्यग्ज्ञान ही धर्मध्यान श्रीजिनेन्द्र ने कहा। भावार्थ-सम्यग्ज्ञानसे तरस अतच, धम अधर्म, पुण्य पाप, हित अहित, योग्य अयोग्य, सतव्य अमनव्य, ग्राम और अग्राह्यका बोध होता है । भव्य जीव सम्यग्ज्ञानसे अपनी प्रामाका शुद्ध स्वरूप विचार कर अपने आत्मपरिणामों को छोड़कर पर पदाथों पर रागद्वप नहीं करते हैं और न विपप कपायों की सिद्धिके लिये इटानिष्ट वास पर पदार्थोंमें शुभाशुभ संकल्प विकल्पही करते हैं। इसलिये सम्यग्ज्ञानी पुरुपकी स्वाभा- निस्सयमेव ऐमी विशुद्ध परणति हो जाती है कि जिससे उनकी हिंसादिक पाप काम नहीं होती है। ये पुण्योत्पादक शुभ पारिश की निरन्तर प्रसि करते हैं। इसीलिये सम्पमानजीकि भारोमें साम्पमारफी स्थिरता प्रकट होती है। naरियामारास्तिसाम्प बारयादी धर्मपान।
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को महान भारका प्रकट करनेवाला है । ऐसे महान विशाल ज्ञानसे यतीश्वरोंको* भी
बस्नुस्यस्पसा यपाधोध कदापि नहीं होता है। बल्कि मिथ्याज्ञानभावसे उनका
पारण भी आमसोध रहित होनेरो संगारका ही कारण होता है।
सार
. .fe cोशे भी मियाश
स्त्रोपास सादर्शनको नए रवाना
और ससानाम्यो स्त्रिों की माप तो फेयल्ट पापोंकाही
प्रधान समझना चाहिये। ANAaunा मुकारण फुपास्त्रोका पास है।
Pu. faranal पास का पति या IIमो पाते है ये हिनामिक
faitha सायति फने पाले शोर मायासे शस्य होते है।
Tatti नहीं हhinारिसे मत दिम समझने
ten fotu पटनाटन पर महान संपादन कर ममेक की
ciensumm५१ मरिशिंगो बनकर पकायचालित AndR
Routinutana Raisint और framm।
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STER ८० चारह भावनाओंके द्वारा तव स्वरूपका विचार करनेवाले ज्ञानी भन्य जिनलिंग धारक मुमुक्षु यतीश्वर होते हैं। भावार्थ-यतीश्वरोंका स्वरूप चार लक्षणोंसे प्रकट होता है। यतीश्वर विकथादि पापजन्य बातें और परिग्रह विषय कपायोंको बड़ानेवाली 'किरसा कहानियां नहीं करते हैं । आधादि कर्मके दोपोंसे उत्पन्न हुए आहारको ग्रहण नहीं करते हैं। उनका समय जिन शासन की वृद्धि के लिये निरंतर धर्म देशना (धपिदेश) में ही व्यतीत होता है और वे सतत बारह भावनाओंसे संसार-शरीर भोग आदिकसे विरक्त होकर अपने आत्मतत्त्वक विचारमें लीन रहते हैं। अवियप्पो णिइंदो णिम्मोहो णिकलंकओ णियदो। जिम्मल सहावजुत्तो जोई सो होइ मुणिराओ॥१०॥ भविकल्पी निरहुँदनर मोह निय न निकलंक । निर्मल जुता सुभाष मुनि सो योगीश निसक ॥१०॥ अर्थ-परमोत्कए एनीश्चरफा स्वरूप पतलाते हैं। जो यतीधर शुमाशुभ संकल्प विपरोसे रहित । नि.६ निमार, निसंपदे, अपने यरूप रिपरदे भीर Tiwww.
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सार ८९ भार -उनम संहननके धारक और मूलगुण तथा उत्तर गुणोंके प्रतिपालक तमा मोक्ष की प्राप्ति करनेगले यतीसरोंका स्वरूप यतलाते है-जो यतीश्वर समस्त मारके उपसर्ग व समस्त प्रकार की परीपहके दुखोंका अनुभव न कर अपने स्वात्म- गुर समारमें स्थिर रहते हैं, वचन गुप्तिका पालन करते हैं द्वादशंग श्रुतज्ञानका अम्पाम करते हैं, शुभध्यानमें तत्पर रहते हैं और परिग्रहरहित जिनलिंगको धारण करते हैं वे ही परम यतीधर है। पद्यपि मनीघरोंका वाह्य स्वरूप जिनलिंग ही है जिन भव्य समुच जीवोंने परिग्रह का परित्याग कर निःशल्पभारस जिनलिंग (नम्न दिगम्परत्व को धारण कर मूल- गुमरी भागधना की है वे ही मुनीश्वर है। सामान्यरूपसे सर्व मुनीश्वरोके उत्तम संहनन नहीं होना । जिन मुनीश्वरांको उत्तम वयपमनाराच संहनन है । पे उपमग ए ममस्त कारकी परीपहोको सहन फर साम्पमाफी प्राप्ति करते हैं, मायांगरे पाटी आर भाषनके पााफ होते हैं। सियाविरमयमो गए पगा। ८२
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सार ४ आवश्यकता है क्योंकि निर्मल आत्मामें ही आत्माका अनुभव होता है। जो आत्मा राग द्वेपसे मलिन है उसमें आत्माका अनुभव कमी नहीं हो सकता। इसलिये साधुओंको सबसे पहले अपने रागद्वेप आदि दोपोंका त्याग कर आत्माको निर्मल पनाना पाहिये, जिससे अपने आत्माका अनुभव हो सके। दंडत्तयसलतत्तयमंडियमाणो असूयगो साह । भंडणजायणसीलो हिंडइ सो दीहसंसारे॥१०५॥ दंडशन्यत्रय मुंडियो निंदक साधु ज होय भंडण जाचण शील है हिंडे बहुभव सोय ॥१०५॥ अर्थ--जो मनि मन वचन कायको अपने वशमें नहीं रखते, मापा मिध्या निदान इन तीनों शल्यों को धारण करते हैं जो दूसरोंसे ईया धारण करते हैं जो लगाई सगड़ा करते हैं और याचना करते हैं ये साधु इस संसारमै दीर्घ फालतफ परिभ्रमण heshish देशादिर मणुरचा विसयासचा सायसंचा।
सर्वरो उपदेश यह सो महि शिव मुखमुक्त ॥१०॥ अर्थ-जो मिथ्यात्वकर्मक उदयसे होनेवाले भावोंको धारण करता है परंतु काप क्लेश अत्यंत तीन करता है। ऐमा जीप भी मोक्ष सुखको प्राप्त नहीं हो सकता। पही सर्वत्र देवका उपदेश है । अभिप्राय यह है कि तीन उपकरण करने पर भी जप तक मिध्यातको धारण करता है तबतक उसे कभी भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। रायाहमलजुदाणं णियप्परूवं ण दिस्सये किं पि । समलादरिसे रूवं ण दिस्सए जह तहा णेयं ॥ १०४ सादिक मठ जुगत निज रूप तनक ना दीख । समल बारमो रूप जिम नाहिं जपावत दीख ॥१०॥ अर्थ-जिस प्रकार मलिन दपंगमें अपना यथार्थ रूप दिखाई नहीं देता उसी मकार जिनका मारमा राग द्वप आदि दोषों में मलिन हो रहा है उस मलिन आत्मामें मारमाका यथार्थ कसा कुछ भी दिखाई नहीं देना है। माप-अपनी शुद्ध आरमाका अनुमत्र करने के लिये आत्माके निर्मल होने की ८३ AALANA रमण सार ८४ आवश्यकता है क्योंकि निर्मल आत्मामें ही आत्माका अनुभव होता है जो आरमा राग-द्वेपसे मलिन है उसमें आत्माका अनुभव कमी नहीं हो सकता। इसलिये साधुओंको सबसे पहले अपने रागद्वेष आदि दोपोंका त्याग कर आत्माको निर्मल पनाना पाहिये, जिससे अपने आत्माका अनुभव हो सके। दंडत्तयसत्तचयमंडियमाणो असूयगो साह । भंडणजायणसीलो हिंडइ सो दीहसंसारे॥१०५॥ दंशपत्रय मुंडियो निंदक साधु जु होय। भंडण जाचण शील है हिंडे पहुभव सोय ॥१०५॥ अर्थ--जो मुनि मन पचन फायको अपने वशमें नहीं रखते, माया मिथ्या निदान इन तीनों शल्योंको धारण करते हैं जो दूसरोंसे ईया धारण करते हैं जो लगाई झगडा करते हैं और याचना करते हैं वे साधु इस संसारमें दीर्घ कालतक परिश्रमण देहादिसु अणुरचा विसयासत्ता कसायसंजुत्ता। मताने ने मान inflat 10 ||
सार
८५
सोरत भार मुभावतें सो मुनि समकित मुक्त ॥ १०६ ॥
अर्थ-जो सनि शरीर भोग वा सांसारिक कार्योंमें अनुरक्त रहते हैं, जो विषयोंके
सदा आधीन रहते हैं, कपायोंको धारण करते हैं और अपने आत्माके स्वभावमें सदा
सोते रहते हैं, आत्माके स्वभावको प्रगट करनेमें कभी जागृत नहीं होते ऐसे नियों.
को सम्परत्वरहित मिथ्यादृष्टी ही समहाना चाहिये ।
आरंभे धणघपणे उवयरणे कक्खिया तहा सूया ।
वयगुणसीलविहीणा कसायकलहप्पिया मुहुरा ॥ १०७ ॥
संघविरोइकुसीला सच्छंदा रहियगुरुकुला मृढ।।
रायाइसेवया ते जिणघम्मविराहिया साहू ॥१०८ ॥
है प्रारंभ धनधान उपकरणइच्छ अरु जाच ।
वतगुगशील विना कलह प्रिय कसाय बहुवाच ॥१०७॥
मूद कुशीन विरोधसंघ गुरुकुल रहे स्वछंद ।
रानसेव कर जिन घरम है विरोष मुनिमंद ॥१०८॥
. सार अर्थ-जो मुनि होकर मी फिसी आरंमकी, पनकी, धान्यकी या किसी उपकरणकी इच्छा करते हैं, जो अन्य साधुसे ईर्ष्या करते हैं, जो व्रत समिति गुप्ति सधा शीलसे रहित हैं, जो फपायके वशीभूत हैं, कलह करनेवाले हैं और पहुत पोलते हैं, जो सपसे विरोध करते हैं, कुशीलता धारण करते हैं, जो गुरुके आधीन नरहकर स्वतंत्र रहते है, गुरुके समीप नदी रहते अपया गुरुकी आज्ञानुसार नहीं पलते, जो भानी है और राजादिककी रोया करते हैं उन साधुओंको जिनधर्मके विरोधी समझना चाहिये। जोइसचिजामंचोपजीवणं वा य वस्तववहारं । धणपणपडिग्गवणं समणाण दुमणं होई ॥१०९॥ मोनिसरया मंत्र उपजीवन या व्योहार । धनधान्यादिक प्रतिमण मुगिदूमन परमाद ।। अ-बसने ज्योतिपवास वा किसी अन्य विधासे या मंत्र तंत्रोंसे अपनी उपजीरिधारता है, जो यतिकक पवहार करता है और धनधान्य आदि सपका परप पाता है वह शनि समस्त मुनियों को दूषित करनेवाला होता है ।
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सार कारलाती है। जिस प्रकार किसी गडेको मिट्टी कूड़ा आदि चाहे जिससे भर देते है उसी प्रकार इस पेटको अच्छे बुरे चाहे जमे आहारसे भर लेना सभ्रपूरण विधि भ्रमर स प्रकार फूलोंको कट न देना हुआ उनका रस लेता है उसी प्रकार फिसी भी गृहस्थको कष्ट न देते हुए आहार ग्रहण करना भ्रामरी वृत्ति है। इस प्रकार इन आहारफी विधिभारो जाम कर इनके अनुसार आहार ग्रहण करना पाहिये। रसरुहिरमसमेददिठसुकिलमलमुत्तपूयकिमि बहुलं । गंध मसुई चम्ममयमणिश्चमचेयणं पउणं ॥११५॥ दुक्खभायणं कम्मकारणं भिण्णमप्पणो देहो। चेदि पोसए भिक्खु । ११६॥ गे मलमुच। 'अचेतन जुत्त ।। ११५॥ तमा देह ।
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सार ९२ पापना फर आहार लेता है, या संक्लेश परिणामोंको धारण करता हुआ आहार लेता है, अपने रौद्र परिणामोंसे आहार लेता है वा क्रोध करता हुआ आहार लेता है। यह साधु नहीं है किंतु उसे तर समझना चाहिये । भावार्थ-ध्यंतर नीच देव होते हैं। क्रोध कलह करना, रौद्र परिणाम धारण करना, संस्लेश परिणाम करना आदि उनका कार्य रहता है । मुनियों का यह कार्य नहीं है। इसलिये जो मुनि होकर भी ऐमे मलिन परिणाम रखता है वह नीच पंतरके समान है। दिव्युत्तरणसरित्थं जाणिचाहो धरेइ जइ सुद्धो। तचायसपिंडसमं भिक्खू तुह पाणिगयपिंडं ॥ ११८॥ दिनु तिरन राम जानिये शुद्ध दे धार महार । तरत लोह सम पिंड तुन मुनिवर कयलहि धार ॥ ११८॥ भर्ष- हे मुनिवर ! तेरे हाथपर रखा हुआ आहारका पिंड यदि वपाये हुए लोके गोलेके समान अत्यंत शुद्ध है वो त उसे संसारसे पार करदेनेवाला समझकर प्ररणा - अ-यारीररस, रुघा, मांस, मेदा, दही, वीर्य, मल, मूत्र, पीर आर पधारक कीराम भरा हुआ है। इसके सिवाय यह शरीर दुगंधमय है, अपवित्र है. परमे लपटा हुदा है अनित्य है, जर है और नास होनेशाला है । यह शरीर अनेक प्रकारके दुःखका पात्र है, बने आनेका कारण है और आत्मासे सर्वथा भिम पिने घरीर को सनिगज कमी पालन पोपग नहीं करते हैं किंतु यही शरीर धी- नानका कारण है। सही समझ कर इस शरी[से धर्म सेवन करनेके लिये आर मोघमें पहुंचने के लिये मुनिराजामको मंगामा आहार देते हैं जिना आहारके यह शरीर चल न सकता और बिना मरीरके मानुष्टान हो नहीं सकता वा चारित्र पालर हो नहीं मुख्ता इसलिमको प्रहार का इसने चारित्र पालन कगया जाना है। मुनिराजों- के माहार प्रान का यही कारण है और कुछ नहीं। कोहण य कलहेण य जायण सीलेण संक्लेिमेण । संदण य रोमण य भुंजह किं तिरो भिक्खू ॥ ११७॥ रमेनके सस्तेमपशाम । रसर म करिन मधूछमार ॥ १२॥ ई-बहन ओरदिगार आगर लेता है, कह कर आहार लेना है। * ।
. पिप. सार अविरत देश महाविरत श्रुति रुचिरस्य विचार । पात्र नु अंतर सहसगुन काहि जिनपति निरधार ॥१२॥ अर्थ-अविरत सम्यग्दृष्टी, देशवती धायक और महामतियोंके भेदसे आगम में रुचि रखनेवालोंके भेदसे और तच्चोंके विचार करनेवालोंके भेदसे भगवान जिनेन्द्रदेवने हजारों प्रक.रके पान बतलाये हैं। भावार्थ-मुनि उत्तम पात्र है, श्रावक मध्यम पाम है और अविरत सम्य- रदृष्टी जघन्यपात्र हैं। इनमें भी मुनियोंमें अनेक भेद हैं श्रावकों में अनेक भेद हैं और भविरत सम्यग्दृष्टियों में अनेक भेद हैं। इस प्रकार पायोंके अनेक भेद है। उपसम णिरीह झाणज्झयणाइमहागुणा जहा दिट्ठा । जेसिं ते मुणिणाहा उत्तमपत्ता तहा भणिया ॥ १२ ॥ उपशमध्यानाध्यपन महा मछक दिए। जे मुनि एते गुण सहित पात्र पाहे उस्कृष्ट ॥१२१॥ 4-उपशम परिणामोंको धारण करनेवाले, बिना किसी इच्छाके ध्यान फरने पाले तथा अध्ययन करनेवाले मुनिराज उसमपान कहे जाते हैं । मुनियों के इन महा गजीभगी जी ......... अर्थ-
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सार भारत देश महाविरत श्रुति रुचिरव विचार ! पार नुमंतर सइसगुन यहि जिनपति निरधार ॥१२०॥ मर्थ-अविरत सम्पादृष्टी, देशमती धायक और महाव्रतियोंके भेदसे आगम में रुचि रखनेवालोंके भेदसं और तोंके विचार करनेवालोंके मेदसे भगवान जिनेन्द्रदेवने हजारों प्रकारके पान यतलाये हैं। भाई-पनि उतम पात्र है, पावक मध्यम पात्र है और अविरत सम्य- गरी जपन्पपात्र है। इनमें भी मुनियोंमें अनेक भेद हैं श्रावकों में अनेक भेद हैं और अविरत सम्पष्टियों में अनेक भेद है। इस प्रकार पायोंके अनेक भेद है। उचसम णिरीह झाणज्झयणाइमहागुणा जहा दिट्ठा। जेसिं ते मुणिणाहा उत्तमपत्ता तहा भणिया ॥ १२ ॥ उपशम पानाध्ययन महा भयंक दिए। जे मुनि एते गुण सहित पात्र कहे उत्कृष्ट ॥१२१।। अर्थ-उपशम परिणामों को धारण करनेवाले, बिना किसी इच्छाके ध्यान करने पाले रुपा अध्ययन करनेवाले मुनिराज उत्तमपान कहे जाते हैं । मुनियोंकि इन महा गुपोटी बसी जसी वृद्धि होती जाती है जैसे ही वैसे पासताकी उकरता उनमें आती
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सार धि जाणइ जिणसिद्धसरूव तिविहेण तहणियप्पाणं । जो तिब्बे फुणइ तवं सो हिंडह दीइसंसारे ॥ १२ ॥ मदिजाने जिन सिद्ध ह निज स्थल विविध हि। सोनालीम करे तऊ अंमं दीयं भव ।। १२४॥ अर्थ--जो मुनि नमो भगरान रहंत देवका स्वरूप जानता है, न मगरान सिद्ध परमेशीका स्वरूप जानता है आरन पहिरारमा अतरात्मा और परमात्मा मेदसे अपने प्रात्माका स्वरूप जानता है वह पनि यदि तीन वपश्चरण करे वो भी यह इस जन्म मरण हर महासंसारमें दीर्घ कालतक परिभ्रमण करता है। मारा-पंच परमेष्ठिका तथा आत्माका स्वरूप जानना सम्पादनका सापन है। जो इनका स्वरूप नहीं जानता यह सम्पादनको भी माप्त नहीं कर सकता सपा बिना सम्पग्दशनके तीम तपश्चरण करने पर भी यह संसारमें ही परिभ्रमण करता रहता है। पिच्छ्यववहारसरूवं जो स्यणतये ण जाणह सो। जं फीर तं मिच्यारूवं सव्वं जिणुद्दिई । १२५।। HAMARIAARI
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भीरपालाप मुमसम्मानके विना मान और पदोनों ही संसारकै कारण सार हम भाषा- सम्पादन के साथ साप रोनेवाला मान और उप मोक्षका कारण पिना सम्पनिक शान और तप दोनों ही मिध्या कहलाते हैं। तथा मिथ्या शान और मिथ्या सप दोनों ही संसारके कारण हैं। वयगुणमीलपरीसह जयं च चरियं च तवं पडासयं । झाणझारणं मयं सम्मविणा जाण भववीयं ॥१२७॥ मतगुरणशील परीपजय भावसि तप छरित्र । दानापन सम्म दिन माह बीज सरक्क १२७॥ -बिना सम्मदर्शनके प्रत पालन करना, गुप्ति समिति पालन करना, पील पालन करना, परीपहोंको जीतना, पारिवका पालन करना, तपथरण करना, हो आपकासा पालन करना, ध्यान करना और अध्ययन करना यादि सब संसारक माप समझना चाहिये। मारा-चिना सम्पदर्शनके ये सर मिथ्या है, इसलिये रिना सम्यग्दर्शनक सा संसारके कारण है। SHAYARI
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रपण १८ भी फ्पा लाम है । शुद्ध सम्पग्दर्शन के विना ज्ञान और तप दोनों ही संसारके कारण समाने पाहिये। भावार्थ---सम्पग्दर्शन के साथ साथ होनेवाला शान और तप मोक्षका कारण दे, विना सम्यग्दर्शनके ज्ञान और तप दोनों ही मिथ्या कहलाते हैं। तथा मिथ्या ज्ञान और मिथ्या तप दोनों ही संसारके कारण हैं। चयगुणसीलपरीसहजयं च चरियं च तवं पडावसयं । झाणज्झयणं सम्बं सम्मविणा जाण भववीयं ॥१२७॥ अतगुणशील परीपजय भावसि तप चारित्र । ध्यानाप्यन सम्यक्य पिन भवह चीज सरवत्र ॥१२७|| अर्थ-विना सम्यग्दर्शनके प्रत पालन करना, गुप्ति समिति पालन करना, शील पालन करना, परीपहोंको जीतना, चारित्रका पालन करना, तपथरण करना, छहों आपापकों का पालन करना, ध्यान करना और अध्ययन करना आदि सप संसारके कारण ही समझना चाहिये। भावार्थ-चिना सम्यग्दर्शनके ये सब मिथ्या है, इसलिये पिना सम्यग्दर्शनके पे सर संसारके कारण है।
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सार पाम्गादविहारसहायगुणं जो भाविऊण भावेण । पिपमुदाणा रचइ तस्मय णियमण होइ णियाणं ॥१२॥ करमाविमा विदाल, चाभाग गुमायगुरा। कचे गुर निज भात, तिई नि निस्वान हु ॥१२९॥ भ--जो मुनिराज कर्मके उदयसे होनेवाले आत्माके वैमाविक गुणोंका ( राग- प मोह मद मत्सर पाप आदि भाषाका) चितवन करता है तथा उन काँकि नाश होनेरो रगट होनेवाले उनमधमा मार्दव आर्जय आदि आत्मा स्वाभाविक गुणोंका चितवन करता है। इन दोनों यथार्थ स्वरूपका चितवनकर जिसको अपने शुद्ध भात्या मेम होता है, जो अपने गुद प्रात्माका प्रदान करता है उसको अवश्य ही मोधी मानि होती है, इसमें कोई मंदेह नहीं है। मृलुचरुवरदव्वादो भावकम्मदो मुफो। आमवयंधणसंवरणिजर जाणेह किंबहुना ॥१३०॥ मन उनर उतरउतर द्रव्यकर्म नाई भाव । सस सस निरराव जानि वर यार In
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सार मध-मानापरणादिक फर्म द्रम्पकर्म कालावे हैं, उनकी मूल प्रतियो भानावरणादिक हैं और उघरमहतियां मतिनानावरण आदि हैं। अपग्रह हा प्रापधारणा पा स्मरण चिता आदिको आवरण करनेराले फमाको उचरोचर प्रक. तियों करते हैं। जो मनि मूलप्रकवि उत्तरप्रकृति तथा उत्तरोघर प्रकृतिरूप द्रन्प. कमासे सर्वथा रहित है और राग दंप आदि भावोसे भी सर्वथा रहित है ये ही भाषक, पंथ, संवर, निर्जरा और मोक्ष आदि समस्त पदायाँको जानते हैं। विसयविरत्तो मुंचा विसयासत्तो ण मुंचए जोई। वहिरंतरपरमप्पाभेयं जाणेह किं पहुणा ॥ १३१॥ विषयविरत सुंचाविषय दात न मुंच मुनीश । बहिरंतर परमातमा मंद जानि यदु फीश ।। १३१ ।। अध-जो मुनि इन्द्रियों के विपयोरो रिक्त है यह इस द्रव्यकर्म और मार- कर्मसे एट जाता है क्या जो मुनि विषयासक्त है यह इन कोसे कमी नहीं एट सरता । इसलिये ई मनिराज बहुत कहनेसे क्या लाम है आत्मा जो पहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्माक मेदसे तीन प्रकार हे पहले उसका स्वरूप समझ । १०१ .
FICE राले मनुष्प पिकार को नही खात या विष मिले संदुओंको नहीं खाते उसीप्रकार अधय गुख पाने वाले जीरो इन्द्रियोंकि मुसका राधा त्याग कर देना चाहिये भारमाका हत्याप इसीसे हो सकता है। देहकलचे पुतं मिचाइ विदावचेदणारूवं । अपसरूवं भावइ सो चेव हवेइ बहिरप्पा ॥ १३ ॥ तन व भत मित्र बहु चेतनरूप विभाव । भाभारनुरुप सो वहिरातमा उसाच ॥ १३ ॥ अर्ध--जो जीव इस शरीरको आत्मस्वरूप मानता है, स्त्री पुन मित्र आदिको अपने आत्मवरूप मानता है अथवा राग दंप मोह आदि आरमाके पैमाविक परि. पामों को प्रात्मारूप मानता है यह आरमा अवश्य ही पहिराला है। भाराध-गरीर व मित्र फलब आदि सब इस आत्मासे भिन्न पदार्थ हैं। राग आदिवमावि परिणाम भी आत्मासे मिन्न है क्योंकि ये फर्मके उदयसे होते है। जिसपर टिक पापायके पीछे लाल फूल रख देनेपे उस पापागम लाली दिखाई देती है सरंतु वर टाटी सुपापाप सर्वधा मिरमा ०४ गियरन पर विमनिस्मिदमोदगिर चारुमुई। जिम्ममुह दिपियं जद तह जागरवमोपि ॥१३३॥ MITTERatinाबो देनने और सानेमें मामrant पर वह बहुत ही मीठा और सुंदर हो जाता है। परामिं पाते ही मनुष्यमा बाना है। दिमकार किराफल भाने मामुनाना और देखने मुंदर होता है मीतकार इन्द्रि- म मुम परमानों के मुख देना होते हैं और उस समय अच्छे गदनिकासको मानेने मनुन दुर भोगता है और मर जान्दिनी गुपों मी जी अनेक मकारक भोगते महामें किया करते हैं । अयाचित्र भिने हुए लाडू मगंदा का मन मोकार इन्द्रियों के मुत है। मारक बने मकानोकादिरो मुसीका फल भी दिशानियों में मनमाना है। इसलिये निमप्रकार सुख पाइने सार प्रो विचार ही नहीं करता यह आत्मतचका स्वरूप या जीवादिक समस्त पदार्थोंका स्वरूप कभी नहीं जान सकता। ऐसे अज्ञानी जीको पहिरात्मा कहते हैं। भावार्थ-इन्द्रियजन्यसुख नरक निगोदके कारण हैं। जो मनुष्य केवल इन्हीमें लीन रहता है और इनमें लीन रहने के कारण आत्मतत्वको भी नहीं जान सकता उसे आचाोंने पहिरात्मा ही बतलाया है। जंजं अक्खाणसुहं तं तं तिब्बं करेइ बहुदुक्खं। अप्पाणमिदि ण चिंइ सो चेव हवेइ वहिरप्पा ॥१३६॥ अर्थ--संसारमें इन्द्रियजन्यजितने सुरा हैं घे सब इस आत्माको तीय दुःख देते हैं। इसमकार जो मनुष्य इन इन्द्रियजन्य विषयोंके स्वरूपका चितवन नहीं करता यह पहिरात्मा कहलाता है। मारा-जिस पदार्थका जैसा स्वरूप है उसका उसीरूपसे श्रद्धान करना सम्पग्दर्शन है। इन्द्रिय जन्य सुखका स्वभाव आत्माको तीन दुःख देते हैं। इस पातको सर कोई जानता है । परन्तु जो अशानी इन सुखोंका स्वरूप कभी चितान नही करवा तथा विना इनका स्वरूप जाने सदा इनमें लीन रहता है यह मिभ्यारष्टी है और इसीलिये यह पहिरात्मा कहलाता है। १०६
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समय मिन मा हात । IFERESTERNEA मदन भात ॥१३८॥ as-SIXIT आने आत्मा शरीरादिसे सर्वथा मिन्न मानता है या कोसिस अनुभा की सनमें भी नहीं करता। जो सदा अपने आत्माका अनुमा हरताराताई और मोक्षक मुराम सदासीन रहता है। उसे मध्यम आत्मा अस अतरात्मा करते हैं। भारा--जो आत्मा नि३ स्वरूप जानता है और इसीलिये जो शुद्ध सम्सही विषयोंगी इन्द्रियजन्य मुखको आरमासे सर्वथा भिन्न और तीन रस देनेराले समाता इसलिए जो उन विषयों का कभी सेवन नहीं करता। वह काल अपनी शाम को अपना समझता है अतएव उसीका सदा अनुमव फरवा मा तथा मापक अनंत मुसुको मार करनेकी सदा सालमा करता रहता है किसान करता रहता भार उसीकी सदा मारना रखता है। एक रमासे सो पता पास किसी मोरक सुसुम सदा लीन राता है ऐसा रख हा असा पटाना। १०८
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(एफ- फर्मका उदय पना रहता है तातक विषयवासनाका त्याग सर्वधा नहीं होता। अनादिकास लगी हुई यह वासना पनी रहती हैं। यह वासना चारित्र मोहनीय कफनाश होनेपर नट होती है। सम्माइट्टी णाणी अक्खाणसुहं कपि अणुहवइ । केणाविण परिहारण वाहणविणासण? भेसज ॥१४०॥ सदिटि दानी भामुख कसे अनुभव हो । काह विधि परिहार नहिं रजहर मरिदि कोइ ॥ १४०॥ अर्थ-सम्पारप्टी मान्मज्ञानी पुरुष इन्द्रियों के सुखोंको अनिच्छा पूर्वक किसी भी प्रकार अनुभव करने हैं, जिसरकार कोई पुरुष रोगको दूर करने के लिये औप- पिका सेवन करता है उमीप्रकार वह सम्पादृष्टी पुरुप उन विषयोंका अनुभव करता सिपका ओपधिका सेवन करना किसीको इष्ट नहीं है, औपधिका सेवन करना जर पुरा समझते हैं तथापि रोग हो जानेपर उसका सेवन करना ही पड़ता है। पर आधिका संस्न इच्छापूर्वक नहीं होता तयापि जबतक रोग है तपतफ उसका काम नहीं किया धासम्ता । इसीप्रकार सम्परटी पुरुष विपरि सपन करने
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सार रपण. . को पुरा समझता है तथापि जस्तक चारित्र मोहनीय कर्मका उदय है तबतक उस फर्मके उदयसे उन विषयों का सेवन करना ही पड़ता है। यया यह उन विपयोंका सेवन इच्छा पूर्वक नहीं करवा तथापि जातक पारित्र मोहनीय कर्मका उदय है तर तक उनका त्याग भी नहीं कर सकता । चारित्रमोहनीयकर्मका जर मंदोदय होता हेमी षियोंका त्याग होता है। किं बहुणा हो तजि वहिरपसरूवाणि सयलभावाणि । भजि मज्झिमपरमप्पा क्युसरूवाणि भावाणि ॥१४१॥ बहुत कहा कहि सातमि सर्व मात्र पहिरात । बस्नुखरूप खभारमा भजि मध्यम परमात ॥४१॥ अर्थ मन्य जीव ! बहुत करनेसे क्या नाम है । घोडेसेमें इतना ही समझ लेना चाहिये कि वहिरात्माके सरूपको धारण करनेवाले जितने मार हैं उन सबका त्याग कर देना चाहिब और मध्यम आत्मा तथा परमात्मा जो यथार्थ स्वभाव है उन सप धारण कर लेना चाहिए । माबाई-बहिरात्मा मात्र धारण करना तीव दुःखके कारण हैं इसलिये UALLYRIHITHILSINALININDE + .
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सार रपण- मोक्खगइगमणकारणभूयाणि पसन्छ पुष 'ताणि हवे दुविइप्पा वत्युसरूवाणि भावाणि ॥ १३॥। शिवपतिगमकारण जननु पुरयप्रशस्तह हेत। सो दो विधि भातम दरव भावसरूप समेत ॥ १३॥ अर्थ-अंतरात्मा और परमात्मा जो वास्तविक माव होते हैं ये मोक्षगतिमें पहुंचने के कारण होते हैं और अतिशय पुण्यके कारण होते हैं। भावार्थ-अंतरात्मा जीवके भाव साक्षात पुण्यके कारण होते हैं और परंपरासे मोक्षके कारण होते हैं । इन्द्र धरणेन्द्र गगधर आदि महा पुरुषोंके पद भवरात्माको ही प्राप्त होते है तथा अंवमें तीर्थकर या अन्य केवलीपद पाकर मोक्ष प्राम करते है। परमात्मा उसी मवमे सिद्ध पद प्राप्त करता है तथा साथ समरसरण वा गंधकटी. की अनुपम विभूतिका अनुमत्र फरवा जाता है। यह उसके सातिश्य पुरयकी महिमा है। इसलिये अंतरात्मा बनकर परमात्मा पननेका प्रपत्ल फरना चाहिये जिससे शीघ्र ही मोक्षपदकी प्राप्ति हो। SHAREL --- मिस बहिराम मापसंत रामदासमतिनजिन ॥ अर्थ- पहले दूसरे और तीसरे गुणस्थानमें रहने वाले जीन पहिरामा । पौधे गुणस्थानमें रहनेवाले सम्पार ए जी जपन्य अंतरात्मा हैं। फिर पाप गुणस्पानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्पान तक जार र पहले हुए अधिक अधिक निधनि भारण करते हुए मध्यम अंतरात्मा है। पारहवें गुणाधानगली जीन उ अंतरामा । तेरहवें चौदहवे गुणधानवी केली भगवान सफलपरमात्मा भीर सिमपरी निफलपरमात्मा हैं। मूढत्तयसाहत्तयदोसत्तयदंडगारपत्तयेदि । परिमुक्को जोद सो सिपगइपपणायगो पोई ॥१७॥ भूशियसपनपगारपत्रकोप सो जोगी हम दिल मगति गोष ॥ १७ ॥ भी-गो पोगी देप गया, गुरावा और लोकमानतीमो मामीले 2.पाया fucume REAnuीना मरिदिन समोर सार बानना मत्यावश्यक है । परमात्माका रूप जाने बिना उसका ध्यान नहीं हो सकता। नपा परमात्मा का ध्यान किये बिना यह आत्मा परमात्मा बन नहीं सकता। मतएव इस आत्माको परमात्मा पनने के लिये परमात्माका स्वरूप जानकर उसका ध्यान करना चाहिये । जो मन्यजीव इसमकार परमात्माका ध्यान करता है यह अवश्य ही मोघांचता है। वहिरंतरप्पभेयं प.समयं भण्णए जिणिदेहि । परमप्पो सगसमयं तम्भेयं जाण गुणठाणे ।। १४५॥ बहिरंतर जिय परसमय रहे जिनेवर देव । परमातम ससमय यह मेद सगुन टाने ॥ १५॥ अ-भगवान जिनेन्द्रदेवन यहिरात्मा और अंतरात्माको परसमय पवलाया है तथा परमात्माको स्वसमय बतलाया है। इनके विशेष मेद गुण स्थानोंकी अपेक्षा से समझा लेने चाहिये । सो ही आगे बतलाते हैं। मिस्सोति बाहिरप्पा तस्तमया तुरिय अंतरप्पजहण्णा। संचोचिमज्झिमंतर खीणुचर परमजिणसिद्धा ।। १४६ ॥
सार. ११८ पदिग्भंतरगंयविमुफो सुदोरजोयमंजुचो। मूलचरगुणपुण्गो सिवगइपहणायगो होई ॥१४९॥ बहामना दिन शुद्ध भोग संयुक्त। मनुनागुरपूर शिजतिय नायक उक्त ॥१४॥ अ-मोनिया आभ्यता दोनों सारके परिग्रहोस रहित है, जो सदा शुद्धो. पयोग लोन मताई भार जो मरगुम और उतर गुणोंको पूर्ण रीविस पालन करता पनि अाप ही मांध माम माना है. इसमें किमी प्रकारका संदेह नहीं है। जं जाइजगमग्णं दुहृदुट्टविमादिविसविणामयरं । सिमुहलाई मम्म मंमा इ मुणह साइए साह ॥१५॥ बन्न पर दृष्ट दृय हविश नाश करे। सो मरिन मुनि मुनि माग धारे ॥१५०॥ निद कनिंगले हे माधु ! गुगो और हमकी मारना करो कि पह पावर जन्माद और वृद्धापा आदिके समस्त दुःोंको दूर करनेवाला है रिकारी विषम रहनेवाला और सर्प विच्छ आदिक सात विकीर १९८
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परनेलाई। इसके सिवाय यह सम्यग्दर्शन मोधाखको प्राप्त कराने में प्रधान
कारण या निथय जानो।
किंबहुणा हो दर्विदाहिंदणरिंदगणपरिदेहिं ।
पुजा परमप्पाजे तं जाण पहाण सम्मगुणं ॥१५१॥
बहुत कहा कहि पनिंदद नरिद गणिद।
पूर्व परम मातम निके सनकित प्रधान विद॥ १५१॥
अर्थ-बहुत करनेसे क्या लाभ है थोडेसमें इतना समझ लेना चाहिये कि मग.
पान अांत परमात्मा और सिद्धपरमात्मा जो देवेन्द्र, धरपेन्द्र, पक्रयीं और गण-
भर देवादिकारा पूज्य हुए है सो सम्यग्दर्शन गुणकी प्रधानतासे मे हुए हैं।
मावार्यसम्पादनक माहात्म्यसे ही अरहंत और सिद्धपरमेष्ठी पद प्राप्त
होता है। इसलिये सम्पग्दर्शनको धारण करना प्रत्येक मध्यजीयका कर्तव्य है।
उवसमईसम्मच मिच्छत्तवलेण पेल्लए तस्स।
परिवहति कसाया अवसप्पिणिकालदोसेण ॥ १५२॥
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अनंतपाल तरुपगर संसारमें परिभ्रमण फरना पड़ता है । संसारसे पार कर देने पाला एक सम्पदीन ही है । सम्पादर्शनके सिवाय अन्य किसीसे भी मोक्षसुखकी माप्ति नही हो सकती। वसहीपडिमोक्यरणे गणगच्छे समयसंघजाइकुले । सिस्सपडिसिस्सरचे सुयजाते कप्पडे पुच्छे ॥१६॥ पिच्छे सत्थरणे इच्छासु लोहेण कुणइ ममयारं। यावच अदृरुद्द ताव ण मुंचेदि ण हु सोक्खं ॥ १६२॥ बसत परिम उपसरण गुण, गप्उसमय संघ जाति । कुल शिर प्रतिशिष छात्र सुत, जात सुपट पुषभांति ॥ १६१॥ पिदि सापरउ त्यागमुख, सोम करइ ममकार । तावत धारत रद मुख नहि, मुंचत धनगार ॥ १६२ ।। अ बससा, प्रतिमोपकारण, गण, गच्छ, समय, जाति, कुल, शिष्य, प्रतिशिष्य, विधामी, पुत्र, पात्र, कार पुस्तक, पीली, संस्तर (विजोना) इच्छा आदिमें लोमसे जा ममत्व पाता है तथा ममत्व करने के कारण जस्तक आध्यान और रोद्र १२६ ML सार- १२३ UPEECTheESULi भाग-भुनजान वा मगवान विदेर मणीव शास्त्रों का अभ्यास करनेसे पारगडानकी प्राप्ति होती है । आत्माके वानकी प्राप्ति हो जानेसे पैराग्य संपम और वायरमकी उमरोत्तर वृद्धि होती रहती है । इस प्रकार इन सबका मूलकारण शाखाका अम्पास इसठिये मन्यजीवोंको सबसे पहले शाशोंका अभ्यास करना चाहिये। कालमणतं जीवो मिच्छसरूवेण पंचसंसारे । हिंढदि ण लई मम्म संसारम्भमणपारंभो ॥ १५७॥ काल मनंतह जीव यह, मृषा पंचसंसार । हिंडे समकिन ना रहे, भवभव भ्रमण प्रकार ।। १५७॥ मई-अनादिकाल से मंसारमें परिभ्रमण करनेवाला यह जीव मिथ्यात्वकमके उदयसे ट्रम्प, क्षेत्र, काल, मत्र, मावरूप पंच परावर्तनमय संसारमें परिभ्रमण फरता भाया है। इस अनंत काल में भी इस जीवको अबतक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति नहीं हुई । भावार्थ-सम्पादन प्राप्त होनेसे फिर यह जीव पंच परावर्तनरूप संसारमें परिप्रमग नहीं करता; परंतु यह जीव बराबर संसारमें परिभ्रमण कर रहा है। इससे मिद ताकिमको अभी तक सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हुई। इसलिये मन्य जीको सरम पाले सम्पदर्शन धारण करनेका प्रयत्न करना चाहिये। १U • जिलिंग परो जोई विरायसम्मचसंजुदो गाणी। परमोमाइरियो सिवगइपहणायगो होई ॥ १६४ ॥ दिन मिली उम्स, सम्मान विराग । परमपिता नेशले, सपना हो जाम ॥ १६४ ॥ -विस इनिने जिनालग धारण किया. नग्न दिगम्बर अाधा पारण सीको शमसामने परिपूर्ण है, राम बैराग्य को धारण करता है, जिसका सम्प. दर देवर भार जी रामपम सर्वपा रहित है, उलट धामाप प विरापमारको पार करता है ऐसा मुनि मायका स्वामी प्रपोवाई। मारा-मानी अत्यंत आना, दिगम्बर अपरपा भौर परम पैराग्य पिसके साधाव शरण ।
11 सार १२ . मान करता है तब तक क्या वह मोधक सुससे वंचित नहीं रहता? नहीं नहीं पर मापति रहता। मागर-जीमुनि किसी भी ममत्व करता है वह मोक्षक सतो अश्यचित राता है उस मोपका मुम कमी प्राप्त नहीं हो सकता। रयणचयमेव गणं गच्छे गमणस्म मोक्खमग्गरम । संघो गुणसंघाओ समयो खलु णिम्मलो अप्पा ॥१६॥ रतनश्य ही गाजु गन्छ, गनन करन शिवपंथ । सर सझम गुणसन्य, निर्मल मातम प ॥१३॥ अप--मोध मागमें गमन करने वाले साधुका रत्नत्रय ही गण और गच्छ है क्या गुगका समूह ही मय है और निर्मल आत्मा ही समय है। मागर्थ-मायुमों को गन्नत्रयमे, उत्तम घमा आदि गुणोंसे और निर्मल आत्मासे म करना चाहिये। इनमें मचा लीन हो जाना चाहिये । पही साधु का गण है यही पंप और यही समय इन्दी में लीन होनस मोथकी पाप्ति होती है। १२७ मिलिंगाधरी जोई शिपमम्मचमंजुदो गाणी। मोबायो मिरगापदणायगो होई ॥ १६४ ॥ १६ गत नग | १०.१५० रहा जाय।। १६४ ॥ -- दिमटर पर किसी नग्न दिगम्बर अवस्था पारण कोई, को शासन सो सम वैगम्य को धारण करता है, जिसका सम्य. दर ५२ र भाREE मया हित है, उत्कृष्ट उपेधामाव व KHABRETOR कानाईएमा मुनिकोबा स्वामी अवश्य होता है। समानता, दिगम्बर अवस्था भार परम वैराग्य पनि कारब सुमाग्गनगमा गिरीद्दपिचिचारि । गुपसीटना अपना रयणमारमिणं ॥ १६५॥ मरमर, परदृष्टि। १२८ Prat
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सार हाद सज्जणपुज्ज रयणसारं गंयं णिरालसो णिचं । जो पढइ सुणइ भावह पावइ सो सासयं ठाणं ॥ १६७ ॥ रयणसार यह मह सगन ग्रंथ निरालस निति । १४ा सुनह जो पर्णये भावर लहा निवृत्ति । ॥ १६७॥ अर्थ - यह रयणसार नामका ग्रंथ बड़े बड़े सज्जनोंके द्वारा पूज्य है ऐसे इस ग्रंथको जो पुरुष आलस छोड़कर प्रतिदिन पढता है सुनता है, और इसकी भावना फरता है इसके अनुकूल अपनी प्रवृत्ति करता है यह अविनार मोक्ष स्थानको अवश्य प्राप्त होता है। เจ็งไม่ได้ पणसार समाप्त
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अंघोंके नाम ॥ ) स्वाध्यायोपयोगी ग्रन्थ ग्रंथोंके नाम एप हादशानुपेशा मापाटीका सहित ।) रयणसार मापाटीका पात्रकेशरी स्तोत्र भाषा टीका सहित) रविव्रतकथा परीधामुख ॥) भक्तामरस्तोत्र अनपदसागर १) सामायिक आलोचनापाठ भदयापूजा संग्रह संस्कृत भाषा दोनों १) तत्वार्थस्त्रमूल पतर्षियतिजिनपूजा कविरामचन्द्रात १) पंचमंगल सार्थ नित्य नियम पूजा 11) विनतीसंग्रह धीलकथा क) इरालासंग्रह तीनों छाले एकसाथ ५) दर्शनकथा न्यायवोधक सरल भाषामें •) दानकथा भारतीय जैनसिद्धांत काशिनी संस्था न० ३७३ अपर चित पर गेर, फलफना । 1) "
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