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Nayee Dishayen
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नयो
दिशाएँ
(भारतीय दूरदर्शन पर आयी हुई
घटना-श्रृखलाओं पर आधारित युवा-पीढी की
समस्याओ का समाधान करने वाला उपन्यास)
रवीन्द्र वाघ
हमारे नवीनतम प्रकाशन नीली रेखा तक (काव्य) सूर्यपुत्र (खण्डकाव्य) भ्यक्तिगत (नाटक) बलराम की तीथयावा (नाटक) अरुण कमल एक (नाटक) मनू (नाटक) पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र सिद्धान्त और परिदृश्य कविप्रिया प्रकारा भवानीप्रसाद मिश्र जगदीश चतुर्वेदी हॉ० लक्ष्मीनारायण लाल ग. लक्ष्मीनारायण लाल डॉ. लक्ष्मीनारायण साल डॉ० लक्ष्मीनारायण माल डॉ०नगेद्र डा० बोम्प्रकाश सिंहल मूल्य प्रथम सस्करण कापीराईट बीस रुपये 1989 सुरक्षित प्रकाशक पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी 888 ईस्ट पार्क रोड, करोल बाग, नई दिल्ली-110 005 (भारत) दूरभाष कार्यालय 526933 आवास 5721321 मुद्रक पीयूष प्रिंटर्स पब्लिशर्स प्रा.लि. जी-12 उद्योग नगर,रोहतक रोड, इन्डस्ट्रीयल एरिया नई दिल्ली-110041 दूरभाष 5472440 NAYEE DISHAYEN Dr Ravindra Wagh Price Rs 2000
युवा पीढी की समस्याओ पर ज्वलन्त उपन्यास
नयी
दिशाएँ
डा० रवीन्द्र बाघ
लेखक के विषय मे
डॉ० रवीन्द्र वाघ पिछले 20 वर्षों से देश के प्रमुख स्कूल
कैथील जॉन कॉनन स्कूल, बम्बई मे अध्यापन-रत हैं जिससे
उन्हे विद्यार्थियो को बहुत निकट से देखने का सुअवसर प्राप्त
हुआ है। उन्होने नाटक के क्षेत्र मे भी बहुत काम किया है और
उनके दो नाटक
"पागलो की दुनिया", और "लॉटरी का
धमाका" दूरदर्शन पर दिखाए जा चुके हैं। नाटक के क्षेत्र मे
उनकी विशिष्ट सेवाओ पर बम्बई विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट
की उपाधि प्रदान की है। उन्होने अनेक पुस्तको की रचना की है
जो कि विद्यार्थियो मे बहुत लोकप्रिय हैं।
SAIR
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पीताम्बर पब्लिशिग कम्पनी
888, ईस्ट पार्क रोड, करौल बाग
नई दिल्ली-110005 भारत
सदेश - - ऐनौजवान, कमजोरी की बात मत सोचो। पहचानो, अपनी असीम शक्ति को और लग जाओ अपने कर्तव्य का पालन करने मे। यह भूलो मत कि तुम्ही आने वाले कल के निर्माता हो, तुम्ही अपने भाग्य के विधाता हो। तुम्हारे दिल मे इन्सानियत का अनत सागर हिलोरे ले रहा है। उठो, और अपनी शक्ति से तोड दो उन दीवारो को जिसके कारण इन्सान शैतान बनता जा रहा है। जगा दो अपनी सोयी शक्ति को। तुम चाहो तो बजर धरती को चीर कर उसमे से सोना उगा सकते हो। तुम खुद एक मजबूत चट्टान हो। अपनी जिन्दगी की मुसीबतो की चट्टानो को तोड दो। उठो। धरती के दुखी इन्सान तुम्हे पुकार रहे हैं। नयी आकाक्षाओ के फूल खिला दो। प्यार के रिश्तो मे दुनिया के हम इन्सानो को करीब लाकर एक कर दो। तुम एक ऐसी दुनिया का निर्माण करो जहा हम सभी इन्सान प्यार से, सुख से और अमन से इस दुनिया के चमन मे जी सके। दुनिया का इतिहास गवाह है कि तुमने अन्याय को मिटाने के लिए अपना कीमती खून बहाया है। अपनी जिन्दगी कुर्बान की है। तुम्हारा खून पानी नही हो सकता। उठो, दुनिया की बुराइयों को जलाकार खाक कर दो। कुछ बुजदिल, कुछ गुमराह और कुछ कमजोर बने जवानो की अच्छाइयो को जगा दो और दे दो उन्हे नयी दिशाए।
दो शब्द नयी दिशाएँ हिन्दी साहित्य मे प्रथम उपन्यास है जो युवा-पीढी की जिन्दगी के विभिन्न पहलुओ पर प्रकाश डालता है। दिल्ली दूरदर्शन पर 'नयी-दिशाएँ' घटना-श्रृखला के रूप मे प्रस्तुत किया जा चुका है और अत्यधिक चर्चित हुआ है। आज युवा-पीढी की समस्याओ पर चिन्तन की आवश्यकता है। इसलिए मैने गुरूजनो और मित्रो के सुझाव पर अनावश्यक बातो को निकालकर मूल समस्याओ के समाधान हेतु उपन्यास रूप देने का निश्चय किया है। इस उपन्यास मे मैंने युवा-पीढी की शक्ति को ललकारा है। वे अपनी असीम-शक्ति से बडे-बडे परिवर्तन कर सकते हैं। कभी-कभी दुर्बलताओ के कारण वे सही रास्ते से भटक जाते हैं लेकिन सही और नयी दिशा प्राप्त होने पर उनकी रचनात्मक शक्तिया जागृत हो उठती हैं। नशीले पदार्थो के सेवन करने से कमजोर मन के विद्यार्थी नये वातावरण मे जीवन का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। शिक्षा की समस्याए, पीढियो का सघर्ष, शहर एव गाँव की समस्याएँ, आडम्बर, तस्करी, आदि विषयो का लेखा-जोखा इस उपन्यास मे हुआ है। पैंतीस वर्षों से अध्यापन-कार्य करते समय युवा-पीढी को मैंने काफी करीब से देखा है। मैंने ऐसा महसूस किया है कि उचित मार्गदर्शन से युवा-पीढी व्यक्तिगत विकास के साथ-साथ देश के सर्वतोन्मुखी विकास में भी चार चाँद लगा सकते हैं। -लेखक
समर्पण
नई पीढी के युवको और युवतियो
को समर्पित
जो आधुनिक भारत के
निर्माता
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प्रकरण एक रामकृष्ण कालेज जुहू के सागर-किनारे से जरा दूरी पर बहुत ही खूबसूरत जगह पर बाधा गया था। कालेज के चारो ओर हरि- याली फैली थी और हरियाला के किनारे पर नारियल के पेडो की कतारे पहरेदागे की भाति खडी थी। इस हरियाली के बीच लाल मिट्टी के रास्तो का जाल विछा हुआ था। कॉलेज के सामने दीवार से सटकर रगीन फूलो के पौधे मद हवा के झोको मे लहराते हुए दिखाई दे रहे थे। कालेज के प्रवेशद्वार के बीचोबीच राष्ट्रपिता गांधीजी की मूर्ति विराजमान थी। इस प्रशस्त प्रवेश-द्वार से विद्यार्थी, विद्यार्थिनिया, प्रोफेसर आदि आते-जाते दिखाई देते थे। प्रवेश-द्वार के ऊपर दीवार पर 'रामकृष्ण कालेज आफ कामर्स' का फलक । दिखाई दे रहा था। कालेज से कुछ दूर, छात्रावास की इमारत थी जिसमे केवल सीनियर विद्यार्थी रहते थे। चौथी मजिल पर प्रोफेसरो के लिए चार फ्लंट थे । कालेज के पीछे प्रिसिपल का छोटा-सा वगला था। पिछले वर्ष ही कालेज ने पच्चीस वर्ष पूरे किए थे और इन पच्चीस सालो के इतिहास म रामकृष्ण कालेज ने तेज रफ्तार से तरक्सी पी थी। कालेज के प्रागण के बाहर बगीचा, खेल का मैदान, कालेज का कटीन और इस कटीन के पास ही विद्यार्थियो के मनोरजन के लिए और आराम से बैठकर बात करने के लिए बहुत बडा हॉल था। गम-कृष्ण कालेज का भवन पत्थरो से बना था और बीच-बीच में दीवारो पर हिन्दू देवी-देवताओ की मूर्तियां लगी हुई थी। कालेज । का भवन अर्द्ध-चन्द्राकार था। चार मजिलो के इस विशाल भवन मे पहली मजिल पर प्रोफेसरो के लिए स्टाफ रूम था और उसी के पास मटकर कालेज का दफ्तर था। प्रिंसिपल तथा वाइस-प्रिंसिपल के रूम चौथी मजिल के कोने मे थे। कुछ क्लास-रूम वडे थे और कुछ छोटे थे । क्लास-स्मो के सामने का वरामदा काफी चौडा था। अक्मर विद्यार्थी इस बरामदे मे खडे पडे बाते करते दिखाई देते थे इस कालेज में आने वाले विद्यार्थी दो प्रकार के थे। ग्यारहवी और बारहनी के जूनियर कालेज के विद्यार्थियो का बी० काम० के विद्यार्थियो से इतना मेलजोल नही था। जूनियर कालेज के विद्या थियो मे ऐसे अनेक विद्यार्थी थे जो मराठी, गुजराती और हिदी मा यम से दसवी उत्तीण करके आए थे। ये विद्यार्थी कुछ महमे सहमे से रहते थे। वे अपने दोस्तो का दल बनाकर साथ-साथ घूमते रहते थे। बातचीत मे वे केवल अपने दोस्तो के सामने रग जमा देते। अग्रेजी बोलने मे उहे दिक्कत होती थी इसलिए आम तौर से हि दी म ही बातचीत होती रहती। इन विद्याथियो मे अग्रेजी माध्यम से पढ़ कर आये विद्यार्थी जोर-जोर से अग्रेजी मे बाते करके इन पर प्रभार जमाने की कोशिश में रहते थे। प्रातीय भाषाओ के माध्यम मे पढकर आये विद्यार्थियो को जग्रेजी भापा सीखने में समय लग जाता था। विश्वविद्यालय की शिक्षा मे हमारी यह बहुत बड़ी मिज़ोरी है । होशियार होर भी अग्रेज़ी-भापा मे कमजोर होने के कारण जधिकाग विद्यार्थी निराश हो जाते थे। इस तरह की शिक्षा- पद्धति मे होशियार विद्यार्थी कभी-कभी कमजोर हो जाते हैं । दूसरी गात यह थी कि क्लामेज बडे होने के कारण प्रोफेमर विद्यार्थियो यो व्यक्तिगत समस्याओ की आर ध्यान नहीं दे मक्ते । इसी कारण अनेक विद्यार्थी परीक्षामो के लिए चुने हुए प्रश्नो के उत्तगे को रट- पर अपनी परीक्षाएं उत्तीण करते रह थे। किसी भी विषय का गहगई मे अध्यान नहीं होता। मीनियर विद्यार्थी बी० काम के लिए तीन सालो तक अध्ययन रते हैं। ये सभी विद्यार्थी जूनियर कालेज के विद्यार्थियो पर प्रभाव जमाने की इच्छा में रहते हैं। ये विद्यार्थी तीन प्रकार के होते २/नपी गिगाएँ । । है। कुछ विद्यार्थी मन लगाकर दिन-रात अपने अध्ययन में लगे रहते हैं । कुछ विद्यार्थी अध्ययन को इतनी गम्भीरता से नहीं लेते। बाज़ारो मे मिलने वाले गाइड्म आदि लेकर परीक्षा के लिए उपयोगी प्रश्नो के उत्तर तैयार करके अपनी डिग्री ले लेते हैं। तीसरे प्रकार के वे विद्यार्थी होते है जो केवल मनोरजन और दिखावे के लिए कालेज में आते है और थोडी-सी तयारी करके डिग्री लेने की कोशिश करते है। अक्सर यह देखा गया है कि अध्ययन को गम्भीरता से लेने वाले विद्यार्थी कालेज के दूसरे कार्यक्रमो मे भी भाग लेते रहते है । कुछ अमीर वच्चे दूसरे विद्यार्थियो का ध्यान आकर्पित करने के लिए पैसो को पानी की तरह बहा देते है। इनमें से कुछ वियर और शराब के आदी होते है । इनमे से ही कुछ विद्यार्थी गर्द और हेरोइन आदि भी लेते है । गर्द आदि लेने वाले विद्यार्थी मागर के किनारे पेडो के पास पडे हुए मिलते है। जीवन की विफलताओ या टूटते परिवारो की परेशानियो मे ये बच्चे पूरी तरह से निराश हो जाते हैं और जब उन्ह लगता है कि अब जीना बेकार है तो गर्द जादि नशीती चीज़ो का सहारा लेते है । समाज भी इनकी उपेक्षा करता है। इस तरह वम्बई शहर के कालेजो के लगभग चार लाख विद्यार्थियो मे रोज दो-तीन जवान विद्यार्थी मौत के मुह मे चले जाते हैं। ऐसे विद्यार्थियो की लाश कभी-कभी सागर के किनारे या सडक के फुटपाथ पर पड़ी दिखाई देती है। विद्यार्थियो और प्रोफेसरो मे जो मामजस्य या सुमगति होनी चाहिए वह नही है । उदासीनता और जलगाव की भावना दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कालेज के लेक्चरगे मे अधिकाश लेक्चरर लेक्चर देने का काम करके चले जाते हैं । कुछ मीनियर लेक्चरर अध्यापन के साथ-साथ कालेज के दूसरे कार्यों का उत्तरदायित्व भी निभाते हैं। कालेज के खेल, योग, भारतीय संगीत तथा नृत्य, नाटक, वाद-विवाद स्पर्धा, ममाज-सेवा आदि बातो के लिए अलग-अलग सीनियर लेक्चरर है। अध्ययन के माथ-साथ अन्य मनोरजक वाते होने के कारण विद्यार्थियो मे जिन्दादिली की भावना मौजूद है। कुछ सीनियर लेक्चरर अपनी जिम्मेदारियो से भी ज्यादा काम ३/नयी दिशाएँ करते हैं। वे कालेज के सभी कार्य निजी कार्य समझकर पूरा करते है । इनमे से वाइस-प्रिसिपल प्रो० भारती विद्यार्थियो मे बहुत मशहूर है। वे कालेज के होस्टल मे ही रहते हैं। वे विद्यार्थियो के बहुत ही करीव है । वे कुछ खाम ममय उन विद्याथियो के लिए रखते हे जो किसी-न-किसी समस्या के साथ पीडित हैं। वे उनसे वाते करने, उन्हे समझाते और प्रोत्साहन देते है। प्रो० भा ती का सबसे प्रिय विद्यार्थी है मिलन । मिलन चदन पुर गाँव का आदिवासी लडका है । पढाई मे वह होशियार तो है ही लेक्नि तरह-तरह के खेलो मे भी उसने अनेक पुरस्कार जीते है । वह भी होस्टल मे रहता है और हरदम हर काम म तत्पर है । मिलन के दोस्तो मे से रॉबट कोलासो और कुशल सागर खास दोस्त है । गरट को सभी रॉबी कहकर पुकारते है । कुशल अमीर खानदान का लडका है। उसके पिता अनेक कारखानो के मालिक है। राबी के पिता इन्जीनियर थे और दुघटना मे गुज़र चुके थे। गॅची गोवा का निवासी था। पिता की नौकरी के कारण वह बम्बई मे था । मा अब गोवा मे ही अपने पुराने मकान मे रहने लगी थी। रात्री अकेला ही एक चाल में रहता है। उसके साथ एक बूढा नौकर है। मिलन, गवी और कुशल-ये तीनो थर्ड इयर वी० काम० मे है । पढाई खत्म होने के बाद तीनो तीन जलग-अलग दिशाओ में जाने वाले है। रामकृष्ण कालेज के प्रिंसिपल सिद्धात खोसला बहुत ही सस्त और अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। प्रो० भारती इकनामिक्स के प्रोफेसर । प्रिंसिपल खोसला का ऐसा लग रहा था कि मि० खोमला के पाद प्रो० भारती इस कालेज के प्रिसिपल बन जायेंगे। दुर्भाग्य से कुशल ब्राउन शुगर लेने लगा था और इससे उसकी पढाई पर जसर हा रहा था। वह मिलन और गंवी को छोडकर उन बदमाश विद्यायियो के साथ जाया करता था जिनसे उमे ब्राउन शुगर मिलता था। प्रो० भारती को लगा था कि कुशल एक होन- हार विद्यार्थी होगा। कालेज मे कुशल को बहुत मे विद्यार्थी जानते थे। अमीर होने के बावजूद यह परिश्रमी, सेवाभावी और नम्र स्वभाव काथा । उमके दादा लाशनाथ सागर का कुशल पर ४/नयी दिगाएं । ।
काफी अमर था। पिछले वर्ष ही उनका देहान्त हो चुका था। गरीवी से संघर्ष करके कैलाशनाथ ने अपने व्यावसायिक जीवन में चार चाँद लगा दिए थे। उसूलो के साथ चलकर परिश्रम के सहारे उन्होने अपने व्यवसाय का काफी विस्तार कर दिया था। कुशल की बहिन स्नेहा भी अपने दादा से प्रभावित थी । स्नेहा बारहवी कक्षा मे थी। कुशल के पिता अपने व्यवसाय मे डूबे रहते थे। कुशल की मां श्रीमती कचन सागर का अधिकाश समय क्लवो और पार्टियो में बीत रहा था। इस सागर खानदान मे तनाव और अशाति का वातावरण था। मि० सागर और श्रीमती मागर में हमेशा लडाई-झगडे होते थे । कुशल एक भावुक लटका था इस- लिए उम पर इनके व्यवहार का असर होने लगा था। ब्राउन शुगर की लत पड़ने का कारण शायद माता-पिता द्वारा उसकी उपेक्षा की गई थी। मिलन कुशल की इस आदत को रोकने की जी-जान से कोशिश कर रहा था। रॉवी भी कुशल को समझा-समझा कर हार गया था, एक दो बार मिलन और कुशत का मारी झगडा भी हो गया था। मिलन ने कुशल के हाथो से ब्राउन शुगर छीनकर फेस भी दिया था और कुशल ने मिलन को दो थप्पड भी लगाये थे। इसके बाद दो दिनो तक उनमे वातचीत ही नही हुई । अन्त मे कुशल ने मिलन से माफी मांगी । कुशल को इस बात का डर था कि यह वात प्रो० भारती को ज्ञात हो गई तो उसे कालेज से निकाल दिया जाएगा। कालेज के आस-पास गद (ब्राउन शुगर) और जन्य नशीली चीज़ वेची जा रही थी। एक दो छोटे-छोटे टी स्टाल्स विद्यार्थी वहा चाय के बहाने जाते थे और गर्द खरीद कर ले जाते थे। वहाँ दो-चार पान की दुकाने भी थी । वहा भी गर्द वेची जा रही थी। कालेज से सागर की ओर जाने वाले रास्ते पर गद के नशे में चूर कुछ विद्यार्थी पेडो के नीचे पड़े रहते । गर्द का नशा करने के वाद कुशल किसी दोस्त के पास खडा रहता। धीरे-धीरे उसकी आँखे अदर धंसने लगी थी और शरीर मै कमजोरी भी आ गई थी। वह अब खेलो मे भी दिलचस्पी नहीं लेता था। मिलन ने प्रो० भारती से यह बात बताने की धमकी दी तो कुशल रो पड़ा । उसने ५/ नयी दिशाएँ उसके पैर पकडे और कहने लगा, "मैं युद इस नशायोगे से बाहर आना चाहता है लेकिन मजबूर हूँ। दोस्त मेरी मदद करो, नही ता मै वरवाद हो जाऊँगा।" कुशन के इन शब्दो मे मिलन द्रवित हो गया था। कुशल को समझापर वह रांची के घर उसे बार-बार ले जाता था। मिलन वम्बई से करीव मी पि० मी० दूर चन्दनपुर गाव में रहता था। उसके पिताजी दयानन्द पेती का काम करते थे। वे पढना-लिखना जानते थे इसलिए गांव के लोग उनका आदर करते थे। माँ का नाम जानकी या । यह बहुत ही धार्मिक थी और जवसे मिलन बम्बई गया पा तब से वह हर रोज अपने बेटे के लिए पूजा- पाठ और प्रार्थना करती थी। चदनपुर गांव में लगभग तीन सौ छोटे-मोटे घर थे और इनम मे वहुत घर झोपड़ीनुमा थे । गांव के कोने में शिवजी का मन्दिर या। पास में ही ए छोटी नदी थी। यह छोटा-सा गाव दो पहाडो को गोद मे बमा हुआ आदिवासी लोगो का गाँव था। मिला कुशल और राबी को अपने गाँव ले गया था। इन दोनो को मिलन का गाँव बहुत ही अच्छा लगा था। जानकी माई के हाथ की बाजरे की रोटी और आम का अचार खाकर वे दोनो तृप्त हो जाते और बाद मे आग्रह करके जानकी उन्द एक-एक गिलास दूध पीने के लिए मजबूर कर देती । जानकी माई मे ममता कूट-कूट कर भरी थी। मिलन उन्हे अपने खेतो पर ने जाता और उन्हे हल च नाना सिखाता । वहा की शाम बहुत ही सुहावनी होती थी। पश्चिम मे डूबते सूरज की लाली आकाश मे फैल जाती और पूरा गार इन लाल प्रकाश में नहा उठता । गाव के रास्तो पर किसान और कुछ मजदूर दर दर गाव को वापिस आते दिखाई देते थे । वम्बई मे गाव करीव होने के कारण छुट्टियो मे मिलन वार-बार अपनी मा जानकी से मिलने गाव आ जाता था। इस प्रकार मिलन कुशन और गबी इन तीना की दोस्ती मशहर थी। विद्यार्थी इन्हे ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहकर चिढाते थे। सोमवार के दिन, सुबह होते ही गमकृष्ण कालेज के विद्यार्थियो, लेक्चररो और प्रिमिपत्र ने जो खबर सुनी उससे कालेज के माहौल में ही नहीं बल्कि पूरे बम्बई शहर म सनसनी फैल गई। सुबह ६/ नयी दिशाएं । ।
- । सुबह जब सूर्य को सुनहली किरणो से धरती मां सज रही थी और चारो ओर के मन्द पवन मे पेड, पौधे और खुशबूदार फूल जागने लगे थे तथा चारो आर धरती पर शोरगुल और हलचल मचने लगी थी तव कालेज के कोने में एक छोटे से बगीचे में एक नौजवान की लाश पड़ी थी। वह कालेज का सबसे अच्छा विद्यार्थी मिलन था। उसके शरीर के नीचे कुछ पौधे दव गये थे। सिर के पास के पौधो पर गुलाब के फूल खिले थे। पुलिस कास्टेवल, दो इस्पेक्टर और एक सीनियर इस्पेक्टर जयचद वहां मौजूद थे। होस्टल के विद्यार्थी, प्रोफेसस, लेक्चरर तथा कालेज के अन्य कर्मचारी भी वहा आ गये थे। कालेज के दूसरे विद्यार्थी भी आने लगे थे। पुलिस कास्टेबलो ने भीड को दूर कर दिया था। जहाँ लाश पडी थी वहाँ प्रिंसिपल खोसला और वाइस प्रिंसिपल भारती सीनियर इस्पेक्टर जयचद के साथ खडे थे। जिस छोटे से बाग मे वैठकर वह अपने मित्रो के साथ तरह-तरह के विषयो पर वहम करता रहता था उसी जगह पर आज उसकी लाश पड़ी थी। इम आदिवासी वालक पर प्रकृति-माँ के खिले हुए गुलाब के फ्ल मानो इस शहीद के लिए श्रद्धा के फूल थे। मिलन ने अपनी ज़िन्दगी मे अनेक सपने सजाए थे। वह आज अपने अधूरे सपनो के साथ इस ससार को छोड चुका था। वहाँ खडे हुए लोगो के चेहरो पर अनेक प्रश्न-चिह्न थे। इतने अच्छे और होशियार विद्यार्थी का खून क्सिने किया होगा ? क्या मिलन को इसी जगह पर मारा गया ? उस समय कालेज के वाच- मैन कहा थे? पून करने मे कुछ वदमाश गुण्डो का हाथ तो नही है न ? या चदनपुर गाव के कुछ बदमाश आदिवासी लोगो ने किसी दुश्मनी की वजह से यहा आकर उसका ख्न किया होगा इ० जयचद वहा उपस्थित प्रिंसिपल, वाइस प्रिंसिपल, प्रोफेसर एव विद्यार्थियो से तरह-तरह के सवाल पूछने जा रहे थे और दूसरे इस्पेक्टर यह सारी तहकीकात रजिस्टर मे दर्ज करते जा रहे थे। मिलन की खास जानकारी के लिए इ० जयचद ने कालेज के प्रिसि- पल मि० खोसला से आग्रहपूर्वक अनुरोध किया तो उन्होने कहा- "सचमुच, हमारा यह दुर्भाग्य है कि हमने एक बहुत ही होशियार ७/नयी दिशाएँ - ?
और ध्येयवादी विद्यार्थी खो दिया। मिलन के विद्यार्थी-जीवन के इन तीन सालो मे मैने कभी किसी से कोई शिकायत उसके बारे मे नही मुनी । वी० काम० की परीक्षा के बाद इन गरमी की छुट्टियो मे यह लडका प्रो० भारती और हमारे कालेज के कुछ सीनियर विद्यार्थियो के साथ आदिवासी लोगो के गाँवो मे समाज-सेवा करने जाने वाला था। इस योजना का सूत्रधार यही था। हमारे इस कालेज का मिलन एक आदर्श विद्यार्थी था।" उन्होने मिलन की याद मे उस दिन कालेज को छुट्टी दे दी। वैसे भी सीनियर विद्या थियो की पढाई के लिए छुट्टिया शुरू हो चुकी थी। प्रिंसिपल ने सभी विद्यार्थियो को वहाँ से जाने के लिए कहा। अब तक यहाँ दो विद्यार्थी नहीं दिखाई दे रहे थे—कुशल और राबी। प्रो० भारती को इस बात का ताज्जुब हो रहा था कि इन दोनो मे से इस वक्त यहा कोई भी मौजूद न था। इ० जयचद ने कुछ विद्यार्थियो से यह जान लिया था कि शनिवार की शाम को मिलन और कुशल का कालेज कैटीन मे झगडा हुआ था। कुशल मिलन को जोर का धक्का देकर गिरा दिया था और वह वहा से चला गया था। कुछ विद्यार्थियो द्वारा यह भी ज्ञात हो गया कि कुशल ब्राउन शुगर का नशा करता है और मिलन उसे इस बुरी लत से रोकने के लिए बार-बार उससे लड़ता रहता था। इ० जयचद ने ये सारी बाते नोट कर ली। मिलन की लाश के पास आते ही इ० जयचद ने यहाँ से चदन पुर गाँव खबर दे दी थी। इसी वक्त लाश ले जाने के लिए वहा शववाहिनी आ पहुँची । और इस गाडी के साथ वहाँ रॉबी भी दौडता हुआ आ पहुँचा । पुलिस काम्टेवलो ने बगीचे के बाहर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन इ० जयचद ने उसे भीतर छोड़ने के लिए कह दिया। आते ही उमने मिलन की लाश की जोर नजर दौडाई। उसके गमगीन चेहरे की आखा में पानी भर गया। शद गले से अटक कर रह गये। इ० जयचद ने गॅवी से मवाल पूटने शुरू किये । अनेक छोट- छोट प्रश्नो के उत्तर देने के बाद रावी ने कहा-"यल, मैने इसे और कुशल को अपने घर दिनर के लिए बुलाया था। कल रात भर म ८/नयी गिाएं ।
इनका इन्तजार करता रहा।" बोलते-बोलते रॉबी को आयो से ऑसू वहने लगे। प्रो० भारती ने उसे शात किया। इ० जयचद ने पूछा- "तुम्हारा दोस्त कुशल कहाँ है ? अब तक उसे भी यहाँ आ जाना चाहिए या।" रांबी शात था। इ० जयचद ने दूसरा सवाल पूछा- "क्या कुशल ब्राउन शुगर और दूसरी नशीली चीजो का नशा करता है ?" इस प्रश्न से रोबी ने चिन्तित होकर पो० भारती और प्रिंमि- पल खोसला की ओर देखा । उसने कहा-"हाँ, कभी-कभी । हमने कुशल को रोकने की बहुत कोशिश की थी।" प्रो० भारती ने कहा, "राबी, तुमने मुझे यह बात क्यो नही बताई ? और न ही मिलन द्वाग मुझे यह बात मालूम हुई। कुशल की भयकर आदत के बारे में बताते तो मै उसे इस बुरे रास्ते से हटाने में शायद कामयाब हो जाता।" राबी ने अपना सिर नीचे झुकाकर कहा-~"मुझे माफ कर दीजिए सर, आइ एम ऐक्सट्रीमली सॉरी।" और इसी समय एक खूबसूरत मोटरगाडी बगीचे की और आती दिखाई दी। कुशल के पिता मि० मागर इस गाडी से उतरे और भीड को चीरते हुए आगे पढे । वे मिलन को लाश की ओर कदम बढाते हुए प्रिंसिपल खोमला के पास आये । थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। उन्होने मिलन की लाश देखी और उन्हे एक धक्का-सा लगा। गाडी रोक कर यहाँ तक आते समय भीड को देख कर उनके मन मे शका-कुशका पैदा हो गई णी। विद्यार्थियो की बाहर खी भीड, पुलिस, लेक्चरर और प्रिंसिपल आदि लोगो को इस तरह खो देखकर उन्होने किसी भय कर पात का अन्दाजा कर लिया था। प्रिं. खोसला ने जयचद से परिचय कराया। इ० जयचद ने पूछा--"आपका बेटा कुशल कहाँ है ?" मि० सागर बोले, "मैं यहाँ उसी के बारे में प्रिमिपल साहब से पूछने आया हूँ। वह पिछले तीन दिनो से घर में नहीं जाया है । हम उसे ढूढ रहे है। और अव मिलन की लाश देखकर म अधिक चितित हो गया हूँ। मिलन को हम अच्छी तरह जानते हैं।" इ० जयचद ने कहा-"ताज्जुब है, आपने अब तक पुलिस स्टेशन मे इस बात की शिकायत नही की।" फिर विी की ओर इशारा करके पूछा, "इस लड़के ने मिलन को और आपके बेटे कुशल को कल ९/नयी दिशाएँ डिनर के लिए बुलाया था। यह जाहिर है कि कल तक मिलन और कुशल दोनो माथ-माय होगे। और आज मितन का यून हो चुका है और कुशल ? वह लापता है । मि सागर हमे कुशल की खोज करनी होगी। और मने यह भी सुना है कि कुशल और मिलन का झगड़ा हुआ था। कुशल गर्द जैसी भयकर नशीली चीजो का शिकार हो चुका है।" योडी देर तक मि० मागर अवाक रह गए। उनके चेहरे पर गहरी चिता दिखाई देने लगी। रूमाल में उन्होने पमीना पोछा । फिर मि० सागर बोले, "देखिए आप मेरे बेटे कुशल पर शक कर रह है। शायद आपको पता नहीं होगा कि मिलन और कुशत मे गहरी दोस्ती थी। क्या कुशल अपने दोस्त का खून कर सकता है ? यह नात नामुमकिन है । मेरे बेटे को यहाँ सभी अच्छी तरह जानते हैं। आप गर्द की बात कर रहे है लेकिन मेरा बेटा ऐमा बुरा काम नहीं कर सकता। जकर कुछ गलतफहमी हुई है इ० जयचद ने उन्हे तहकीकात और पूरी जाच के बाद ही हम किसी नतीजे के बारे में सोच सकते। कुशल की खोज करना जरूरी है।" फिर रबी की ओर देखकर वाले, "तुम्हें अपने दोस्त की खोज मे हमारी मदद करनी होगी। हो सकता है कि वह किसी मुसीवत मे फस गया हो।" इस्पेक्टर जयचद ने अपने दो इम्पेक्टरी से बातचीत की। वे फौरन शववाहिनी की ओर गये। कुछ काम्टेबल स्ट्रेचर लेकर मिलन की लाश के पास आये। लाश को स्ट्रेचर पर रखा गया। स्ट्रेचर पर रयते समय पीठ की जरम दिखाई दी। वहा की कमीज पूरी तरह फट चुकी थी। पीठ पर एन फैलकर सूप गया था। लाश को शव- वाहिनी में रखा गया । इस शववाहिनी म प्रिंसिपल खोसला, वाइस प्रिंसिपल भारती और गनी ३० जयचद के साथ बैठ गए। जयचद ने मि० सागर से यहा~मि० सागर हम बहुत जल्द जापके घर आयेंग।" सुनकर मि० सागर के चेहरे पर टर और चिन्ता के भाव छा गये । और, शववाहिनी चली गई। पताया- १०/नयी साएँ प्रकरण दो रात भर की लम्बी प्रतीक्षा के बाद दयानद को मगल के दिन सुबह बम्बई के जे० जे० अस्पताल से मिलन का मृत शरीर मिला। पोस्टमार्टम के मुताविक मिलन का खून रविवार को मध्य रात्रि के समय किया गया था। दयानद और चदनपुर के दो आदमी मिलन का शव गाँव ले जाने की तैयारी मे ये । प्रो० भारती ने शववाहिनी का इन्तजाम किया था। मिलन की शव-यात्रा में शामिल होने के लिए मिलन के अनेक मिन, नेक्चरर, प्रो० मारती, प्रिंसिपल सिद्धात खोसला और रात्री था। रॉबी ने उस दिन लगातार कुशल की तलाश की लेकिन वह निराश हो गया। उसके मन मे तरह-तरह के बुरे खयाल आने लगे थे। कही कुशल का भी खून नही हुआ हो ? उसे खोजने ड्रग्ज वेचने वालो के अड्डो पर भी वह गया लेकिन वहाँ से भी उसे कुशल का सुराग नहीं मिला था । अव रावी चुपचाप मिलन के पिता के साथ शववाहिनी मे बैठ गया था। कुछ विद्यार्थी तथा अन्य लोग रेलगाडी मे चदनपुर रवाना हुए थे। और कुछ विद्यार्थियो ने अपने मित्रो की कारो मे बैठने की जगह प्राप्त की थी। कुछ विद्यार्थी मोटर-साइकिलो पर थे। परीव दस कारे और चौदह मोटर-साइकिले थी। सभी शववाहिनी के साथ थी। ११/नयी दिशाएँ - मिलन का शव स्ट्रेचर पर हिल रहा था। उसके मृत शरीर पर बहुत-सी फूल मालाएँ दी। जो विद्यार्थी मिलन पी शव-याना म शामिल नहीं हो सोये रे मिलन के शरीर को फलो। हार पहना कर चले गये थे । शववाहिनी में गेंगी मिलनो स्ट्रेचर के माथ बैठा था। मिलन के हिलते शरीर मा देखकर उसके तप्त मन मे अतीत के चिन सरकते जा रहे थे। वहाँ ठहर गभी लोग मौन हो गए थे। सभी के मन मे कुन कुछ पतनी मची हुई थी। शायद सभी के मन में जीवन की क्षणभगुरता के विचार जाते हाग । सचमुच, मृत्यु कितनी भयानक हाती है । एक पल मे रिश्ते नातों के सारे धागे टूट जाते है । किसी के सुख का कोमल म्पर्श हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। शववाहिनी, मोटर गाडियाँ और मोटर-माइकिल-मभी तेज गति से चदनपुर की ओर दौड रही थी। हमाग जीवन भी समय की गति पाकर इमी प्रकार दौटता रहता है और यही समय की गति एक दिन उसका साथ छोड देती है । तब ऐसा लगने लगता है कि ससार में हर चीज का निर्माण नष्ट होने के लिए हुआ है । फूल खिलते है मुरझाने के लिए और मनुष्य जन्म लेता है मृत्यु की गोद में सो जाने के लिए। रावी का अपने पिता की मृत्यु की याद आई। कितने सपने थे उनके ? सब टूट कर विखर गए। उस समय रॉबी को यह महसूस हुआ था जिदगी का जाखरी अजाम मौत ही तो है । अकड से चलने वाला रॉगी तब से शात हो गया था। उसे लग रहा था कि इस छोटी-मी जिन्दगी मे आदमी क्यो अहकारी बन जाता ? क्यो लडाई-झगडे करता है ? और क्या दिखावा करता रहता हे ? यह सारी दुनिया मुसाफिरखाना ही तो है । हम सभी मुसाफिर इस मुमाफिरखाने मे रुक्ते है और अपनी यात्रा के लिए निकल जाते है। लेकिन ऐसे विरक्ति के भाव योडी देर तक ही रुकते है और मनुष्य सब-कुछ भूलकर फिर से अपने जीवन की वातो मे मग्न हो जाता है। मिलन के साथ बिताये दिनो की याद करके राबी दुखी हो रहा था। अनजाने मे ही उसकी आखो से आसू टपक रहे थे । वह सोच रहा था कुशल को सुधारने के लिए मिलन ने कितनी कोशिश १२/नयी निशाएं । । । । थी। उसने शिवजी से प्रार्थना की थी कि उसका बेटा सुरक्षित वापस घर आ जाए लेकिन वेटे का मृत शरीर वापिस आ गया था। इस छोटे से गाँव मे विजली की तरह मिलन की मौत की खबर फैल गई। स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे और बूढे-मभी दयानद के घर की ओर आ धमके। स्त्रिया मिलन की याद मे आँसू बहा रही थी। छोटे वच्चे जिज्ञासा के भाव से यह सब देख रहे थे। कुछ औरत जानकी को उठाकर घर के अन्दर ले गयी, उन्होने उसे ज़मीन पर लिटाया। किसी ने प्याज को नाक के पास सूधने के लिए रखा ! दो औरते हायो और पैरा को मलने लगी थी। दयानद ने जानकी को बेहोश होते देखा तो 'जानकी | जानकी ।' पुकारने लग । वे उसकी ओर दौडना चाहते थे। उन्हे एक वुजुर्ग ने रोक दिया । दयानद अपनी पन्नी को बेहोश देखकर जत्यन्त व्याकुल हो उठे लेकिन वे उसके पाम न जा सके । उसके इस दारुण दु ख का हल्का करने के लिए वे जपनी पत्नी जानकी को सात्वना देना चाहते थे। जव बुजुगा ने शव-यात्रा की तैयारी शुरू की तो ऐसा लगा कि दुख की भी एक अपनी मर्यादा होती है । गाव के बुजुग जनाजा बाँधने म लगे। शहर से आए हुए विद्यार्थी, लेक्चरर, प्रोफेसर भारती, प्रि० खोसला जादि एक जोर शात खड थे। उन्हे यह समझ में नहीं जा रहा था कि वे किस प्रकार की मदद करे । मिलन के शरीर को गरम पानी से स्नान कराया गया। चन्दन और हल्दी की पाउडर लगाई गई। उसके शरीर पर सफेद कपड़ का कफन डाला गया । जनाजे के चारो ओर फूलो की मा यी। जनाजे के बीच में गुलाब के फूल विखरे थे। मिलन के शरीर का उठाकर जनाजे पर रखा गया । लोग फूलो की मालाएँ नेकर आगे जाते और उसके शरीर को पहना कर हाय जोडते और जाकर एक जोर खडे हो जाते। उसके मिर के पास जगरबत्तिया जल रही थी। गाव के ब्राह्मण- पुजारी वहाँ आकर गीता के श्लोक बोलने लगे। कोने म भजन- मण्टली ने जासन जमाया था। ढोलक और मजीरे के साथ वे भजन गाने लगे थे। कबीर के पद के शब्द वहाँ गूजने लगे थे- दम तन घन की कौन बडाई? । १४/नयी दिशाए हाड जले जैसे सूखी लकडी, वाल जल जैसे घास की पूजी। इस तन-धन की कौन बडाई ? शव-यात्रा की इन अलग-अलग क्रियाओं के कारण आदमी अपना दुख भूलकर कर्त्तव्य में जुट जाता है। शायद खामोशी में दुख की गहराई बढती जाती है। होश में जाते ही जानकी रोने लगी। उसकी आँखों से निरन्तर जासुओ की धाराएँ बहने लगी थी। वह मिलन को देखना चाहती थी। कुछ औरतो के सहारे वह मिलन के मृत शरीर के पास आई। उसके काँपते हाथ अपने बेटे के चेहरे को प्यार से सहलाने लगे। मन्त्र उच्चारण करन वाले ब्राह्मण ने जनाजा उठाने के लिए कहा। जानकी सिम किया ले रही थी और दयानद भी रोने लगे थे। जव कुछ स्त्रियो ने जानकी को एक ओर ले जाने के लिए जबरदस्ती की तब दयानद ने कहा--"उसे अपने बेटे को जी भरके देख लेने दो। हमारे वेट के ये आखरी दर्शन है।" लोगो ने जव अर्थी उठाई गई, गाँव के कुछ लोगो ने मिलन के शरीर पर फूल फेके और शव-याना का प्रारम्भ हो गया। गाँव से कुछ दूरी पर मिलन के दाह-सस्कार का काय पूरा होने वाला था। गाव के सरपच शंकरदास ने शरीर को चिता पर रखा और मिलन को सम्बोधित करके कहा-"यह हमारा भूमि- पुत्र था। हमे सुधारने आया था। हमारे पुराने रीति-रिवाजा को बदलने आया था। कितने सपनो के साथ इसने इस भूमि पर जन्म लिया था। इस छोटे से गाव मे वह पाठशाला बनाना चाहता था। लोगो के पक्के घर बनाना चाहता था। गाँव के टेढ़े मेढे रास्ता को चौडे करना चाहता था। यह सव काम वह प्यार से मयको साथ लेकर करना चाहता था । जपने जादिवासी भाइयो को महापुरुषो की कहानियों सुनाता था । क्या कहूँ और क्या न कहूँ।" वालते- बोलते शकरदास की जबान लडखडाने लगी। वे स्वय सो माल पूरे कर चुके थे। व वाले-"यहा हम अपन भूमि-पुत्र की समाधि वनायग। सौ माल की इन पुगनी हड्डियो में शक्ति का संचार हो गया है। आआ, हम सब शपथ लेते हैं कि हम इस लाटले बेट १५/ नयी दिशाएँ । ढल चुके के सपना का साकार करग।" शकरदास ने अपने हाथो मे फूल लेकर मिलन के शरीर पर डाल दिए । वृद्ध के इस जोश को देखकर जनेक लागो ने मिलन के शरीर पर फूल समर्पित किये । शहर के सभी लोग इन आदिवासी लोगो के प्रेम से गद्गद हो गये थे। प्रो० भारती ने भी वहाँ के लोगो से कहा-“म मिलन के इन सभी दोस्तो के साथ आपके गाव मे जरूर आऊँगा। मिलन के सपनो को साकार बनाने में हमारा भी साय होगा।" दाह-संस्कार का कार्य पूरा हो गया जोर धीरे-धीरे सभी श्मशान-भूमि से जाने लगे। दयानद और सरपच शकरदास जाने वाले लोगा के सामने हाय जोड कर आभार प्रदर्शित कर रहे थे। सूर्य-देवता पश्चिम ये । जाकाश मे लालिमा फैल गई थी। पेडो की छायाएँ लम्वी हो रही थी। ऐसा लग रहा था कि चिता की लाल लपटे आकाश की लालिमा मे घुलमिल जाना चाहती थी। मद मद हवा के झोको मे फिर से हरे-भरे खेत लहराने लग थे। जैवेरा प्रकाश को निगल रहा था। शहर के लोग गाव छोडकर कर के निकल गए थे। दयानद, शकरदास और गाव के योड से लोग श्मशान-भूमि मे रके हुए थे। चिता जलने के बाद अस्यिया का मगल-कलश मे रखकर वे दयानद के घर की ओर मुड । जब तक चारो ओर रात का अँधेरा फैल चुका था। मिलन की इम अचानक मृत्यु के कारण सारा गार शोक के अंधेरे मे डूव गया था। आकाश मे कही-कही तारे टिमटिमा रह ये जोर नीचे धरती पर चदनपुर म विजली की वत्तिया दूर से टिमटिमाती हुई नज़र जाती थी। रात के धकार ने जाकाश और धरती को एक कर दिया या । चारो ओर रात का सन्नाटा छा गया था। रात का तीसरा प्रहर शुरू हो गया था और जब भी गाव के कुछ लोग जागन म दिखाई दे रह थे । दयानद ने उन सभी से वार- चार प्राथना की थी कि वे सब जाकर सा जाये। घर के मीतर एक डाटा दीपक टिमटिमा रहा या जा मिलन के कमरे मे या। जमीन का गालामार म गोवर से पातकर उनके बीच इस दीये का रखा गया था। वही जानकी दीवार म सटकर बैठी हुई थी। वढी हिम्मत मे । १६/नयी निशाएँ उमने दूसरी स्त्रियो को जाकर सोने के लिए कहा। योडी देर के वाद सभी स्त्रियाँ अपने-अपने घर गयी। जानकी उस कमरे में अव अकेली थी। उसने दीये मे तेल डाला और वह वाहर आई । दयानद जाग रहे थे और वाकी जादमी वही सो गये थे । जानकी दयानद के पास आई और उसने कहा--"दो दिन के इस दौड-धूप मे जापके मुह मे अन्न का एक कण भी नहीं गया। आप यक कर चूर-चूर हो गये । जरा सो जायेगे तो थोडा आराम मिलेगा।" जानकी के मुह से इन कापते शब्दो को सुनकर दयानद की आँखो से आँसू बहने लगे। उसे लगा कि मेरी यह पत्नी किस मिट्टी की बनी है और कितना सहन करती है। मुझे इसे धीरज देना चाहिए लेकिन अपने मयकर दुख को दवाकर यह मेरा विचार कर रही है। दयानद ने कहा--"जाओ, पहले तुम सो जाओ तो मुझे नीद आएगी।" दोनो ने यह समझ लिया था कि उन्हे नाद आनेवाली नहीं है। फिर भी जानकी ने झूठ कहा कि वह यक गई है और उसे नीद आ रही है । वह कमरे के भीतर जा गई। अब भी दीपक की ज्योति जल रही थी। सदूक पर मिलन के कपड पडे हुए थे। जानकी ने उन कपडो को वहाँ से उठा लिया जऔर उन्हें अच्छी तरह से सजाकर अपने तकिये पर रखा। उसकी कुछ कितावो को साफ करके अलमारी मे वन्द कर दिया । दीपक की गशनी वाहर न जाये इसलिए उसने दरवाजा वन्द कर लिया। पूरे कमरे को वह ठीक कर रही थी। उसी वक्त उसकी नजर एक दीवार की जोर गयी। वहाँ मिलन की तस्वीर टॅगी हुई थी। वह कितनी देर तक उस तस्वीर को निहारती रही । आसू उसके गाला पर में धीरे-धीरे बहते जा रहे थे। उस तस्वीर को देखते देखते जानकी जतीत मे खो गई। उसी तस्वीर मे अतीत की जनेक रंगीन तस्वीरे दिखाई देने लगी। मिलन हमेशा अपनी मा को छेडता रहता और कहता, 'तू तो बहुत भोली-भाली है, तुझे में अग्रेजी पढाऊँगा और फैशनेबल कपड पहताऊँगा।' इस वक्त भी इस बात की याद से जानकी के चेहरे पर एक हल्की मुस्कराहट आ गई। न जाने ऐसी कितनी ही यादो के चित्रो मे वह खो गई थी। यही वह १७/नयी दिशाएँ सो गई और अपने बेटे के कपडो को तकिये की तरह सिर के नीचे रख लिया या। सुबह का आगमन हो गया था। दयानद ने उन आदमियो को जगाकर भेज दिया। उन्होने दरवाजा खोल दिया। जानकी दीपक के पास ही सो गई थी। उसके सिर के नीचे मिलन के कपडे थे। दयानद ने जानकी को ऐसी हालत में देखा तो दुखी हो गए। उहोने मिलन के कपडे धीरे से निकाल लिए और माये के नीचे तकिया सरका दिया। वे उन कपडो को अलमारी में रखना चाहते थे। जैसे ही वे अलमारी के पास पहुंचे तो उन कपडो से मुह ढक कर सिसकियाँ लेने लगे। अव तक जानकी जाग गई थी। वह उठी और अपने पति के पीछे आकर खडी हो गई। उसकी जाँखे भी गीली थी। उमने अपने पति के हाथ से कपडे लिए और अलमारी में रख दिए। जानकी ने कहा- "जब हम इस गॉव मे नही रहेगे। मैं तो मिलन की याद मे यहाँ घुल-घुलकर मर जाऊँगी।" अपने ऑसू पोछते हुए दयानद ने कहा-"पगली जैसी वाते करती हो। हम अपने बेटे को यहाँ अकेला छोडकर कही ओर जा सकते है ? है तुम मे हिम्मत यह मिलन का कमरा, मिलन का बगीचा, यहा रखी मिलन की सारी चीजे तुम्हे पुकार-पुकार कर वापिस बुला लेगी।" दयानद ने मिलन के एक गुलाव के पौधे की याद दिलाई। पता नही कैसे, जानकी मे जचानक एक ताकन-सी ना गई। उसने दयानद के मुह पर हाथ रख दिया और 'पानी लाइए' कहती हुई वाहर दौडकर गई । दयानद पानी लेकर वाहर आए। दोनो ने पौधे का पानी दिया आम-पास की मिट्टी का मंवारा। चारा जोर से पौधे को मिट्टी से ढक मा दिया। दयानद पानी डालते रहे । दोनो के हाथ कीचड से मने थे। जानकी ने दयानद की ओर देखा-"म इस पौधे को मरने नही दूगी। यह मिलन का पौधा है।" "इसे हम जिन्दा रखगे।" दोना कितनी देर तर वही खड रहे । थोडी देर के बाद वे वही बैठ गए । सूरज ऊपर चढ़ रहा था। फिर से लाग मांगन म जाने नगे थे। गांव की कुछ औरते भी ना गयी। रहा ो रिवाज के मुताधित जानकी और दयानद का कुछ नहीं पसा पडा। एप पिसान ने जानवरा को दाना-पानी दे दिया जोर 7 १८/नया रिसाए जांगन मे विखरे सामान को ठीक लगा दिया। जानकी और दयानद ने स्नान कर लिया। वहाँ आई हुई औरते दाल और चावल ले आई थी। बड़ी मुश्किल से दोनो ने योडा-सा खा लिया। थोडी देर के बाद फिर से दोनो ही रह गए। रह-रहकर उन्हे कुशल की याद जा रही थी। जानकी वहाँ कुशल को न देख दुखी और चकित हो गई थी। वह बार-बार अपने पति से पूछ रही थी। दयानद इतना ही कहते कि कुशल वम्बई म नही है। वह कुछ दिनो के लिए कही चला गया है । जानकी इस वात को मानने के लिए तैयार नही पी। उसके मन मे शफा की भावना पैदा हो गई थी। शहर मे तो ऐसी वात फैल गई थी कि कुशल ने मिलन का खून किया है। जानकी के कानो में ऐसी भनक पड़ी तो वह और भी दुखी हो जाएगी। जानकी कुशल को अपना दूसरा वेटा मानती थी। ऐसा दु ख शायद वह बर्दाश्त नहीं कर सकेगी। दयानद तो उसे झूठी बातो से बहला रहे थे--"कुशल वम्बई आते ही अपने घर दौडकर आ जाएगा। उसे कितना दुख होगा । आएगा, कुशल जरूर आएगा, हम दोनो को देखने आएगा।" और जानकी इन्तजार करने की तैयारी दिखाती थी। उस दिन शाम को शकरदास अपने हाय म लाठी टेकते टेकते दयानद के घर जा पहुंचे। उनके साथ और भी कुछ लोग थे । उनके चेहरो पर क्रोध की भावना थी। दयानद को उनके ऐसे चेहरे देख कर ताज्जुब हो गया। उन्होने उन्हे विठा दिया । शकरदास ने कहा-"दया, यह कुशल कौन है ? वही लडका तो नहीं जो मिलन के साथ दो-चार बार आया था? क्या उसने मिलन का खून किया है ? जसवार मे मिलन के खून के बारे में पूरी जानकारी छपी है। और इस लडके पर शक किया गया है। ऐसी बाते सुनते ही जानकी का दिल काप उठा। उसके दिल ने कहा कि यह बात बिल्कुल झूठ है । जव-जब कुशल यहाँ आया है उसने मिलन की देखभाल करने की कसम खायी है और मिलन ने भी कहा था कि बीमारी के समय कुशल ने उसकी कितनी सेवा की थी। नही, नही कुशल ऐसा नहीं हो सकता। जानकी अपने मन को बार-बार समझा रही थी। कुशल से मिलने की तीव्र इच्छा उसके मन म १९/नयी दिशाएं पैदा हो गई। उसी समय दयानद गाव के लोगो को समझा रह थे कि जखवार की खबर गलत है। कुशल स्वय ही मुसीबत में फंसा हुआ है। वह वम्बई से कही दूर गया है। कालेज के प्रिंसिपल, वाइम प्रिंसिपल और दूसरे लोग भी कुशल को मिलन का खूनी नही मानते। दयानद ने समझाया कि वे स्वय फिर से वम्बई जाने वाले है और उस समय उन्हे असलियत का पता जरूर चल जाएगा। फिर भी यह सुनकर गांव के लोगो को शंका का समाधान नही हुआ। दयानद जानको को समझाने लगे कि कुशल भी मुसीवत म है। इस बात पर कोई विश्वास नहीं करता कि कुशल ने मिलन का खून किया है। जानको शाति से अपने पति को मा स्थिति को पढ़ रही थी। सब कुछ सुनने के बाद जानकी ने भी यह बताया कि कुशल ऐमा काम नहीं कर सकता। दयानद की अतरात्मा भी यही कहते लगी थी कि कुशल ऐमा काम नहीं कर सकता। दोनो ने यह फैसला कर लिया कि वे कुशल को देखने वम्बई जायेगे । दयानद ने गवी का घर तो देख लिया था। उन दोनो ने यह विचार किया कि वे रावी के यहाँ रहेगे और कुशन को मिलकर आयेगे। वे दोना मिलन को मृत्यु-तिथि मे तेरह दिना ना कही जाने वाले नहीं ये । उसके वाद ही वे गाव के लोगो से मिलना शुरू करने वाले थे । और वही ममय बम्बई जाने के लिए भी उचित वा । कुशल को वे बेटे के रूप में देखते थे। बुशल मिलन की कमी को तोदर नहीं कर सकता था लेकिन उसमे दो प्यार भरी वाते सुनने के बाद इन दोनो को कुछ स तोप जरूर मिनता। कुशल को जानकी से जा मा का प्यार मिला था वह उमको अपनी माँ मे नही मिला था। कुशल की जानकी माई की पुकार मे बहुत प्यार छिपा या । दयानद भी कुशल के पिता को तरह उगे डांटते नहीं थे। कुशल का यहा जाकर एक सकून मिलता था। शहर से आते समय वह इन दोनो के लिए कुछ-न-कुछ खरीद लाता था। वे इस प्यार का केमे मुला सकते थे। उह कुशल के दिन म मिलन की धडकनें सुनायी देती थी। उहाने कुशल को मिलने का निश्चय दिया था। २०/नयी दिशाएँ प्रकरण तीन कुशल का पता जव तक नही चला था। मिलन की मृत्यु के बाद सागर परिवार मे चिन्ता जऔर तनाव का वातावरण बना रहा । इ० जयचद ने कुशल की जानकारी प्राप्त कर ली थी। कालेज में सागर परिवार के यहाँ और उसके दोस्ता के घर कुशल के बारे में पूछताछ शुरू हो गई। जानकारी के मुताविक कुशल जव गद का नशा करता, तो वह सभी लोगो से दूर किसी दोस्त के घर या किसी होटल म पडा रहता था। इ० जयचद ने रावी की मदद से नशीली चीज़ बेचने वालो के सभी जड्डे छान डाले ये। धीरे-धीरे उनके मन में शका के वादल छा गए ये कि मिलन की तरह कुशल का भी खून न हो गया हो। कालेज के विद्यार्थियो म कुशल की बात हो रही थी। एक दिन रात के दम बजे इ० जयचद राबी के घर आये। रावी इस वक्त अपने पुराने नौकर के साथ खाना खा रहा था। जव इ० जयचद ने रॉबी को साथ देने के लिए कहा तो रॉवी खाना छोडकर उठ गया । इस्पेक्टर ने रावी को इसलिए बुलाया था ताकि वह कुशल को खोजने मे उनकी मदद कर सके । वे दोनो जीप गाडी में वठकर रास्तो पर और यहा-वहा के नुक्कड के जड्डों पर कुशल की खोज करते रहे। इसके पहले दिन ही किसी एक चरसी विद्यार्थी ने यह वताया था कि कुशल को उसने वोरिवली के नेशनल पाक म २१/ नयी दिशाएं - पेड़ के नीचे पड़ा देखा था। अचानक इस बात को याद जाने से रॉवी खुश हुआ और उसने इस्पक्टर से कहा कि यदि जीप बोरिवली तक जा सके तो बेहतर होगा। इ० जयचद ने पूछताछ की तो पता चला कि इस नेशनल पार्क के जास-पास के झोपडो मे ये नशीली चीजे मिलती है। कुछ बच्चे इन चीजो को खरीदकर वही दो दा चार-चार दिनो तक पटे रहते थे। उन झोपड़ो मे रहने वाले इन बच्चों से पैसे लेते थे। कही-कही पोरिवली के जगल मे झोपड़ियाँ बनाकर पैमो के लिए इन वच्चा की ओर खास ध्यान दिया जाता या। इन बच्चो को मालूम या कि पुलिस अधिकारी इतने दूर नहीं जा सकते थे। इ० जयचंद ने रावी की सलाह मान ली और जीप गाडी बोरिवली की ओर तेज रफ्तार से दौडने लगी। वम्बई स करीव पैतीस किमी० दूर बोरिवली वम्बई की लोकल गाडिया का एक जकशन स्टेशन हे और दिल्ली, जहमदावाद, वरोटा और सूरत आदि शहरो से दिन-रात यहा गाडिया जाती रहती है । इस स्टेशन पर तस्करी की काफी चीज पकड़ी जाती है। दो तीन बार तो गद और हेराइन नादि भी पकडी गई थी। इन सब बातो की वजह से इ० जयचद ने रात्री के साथ बोरिवली की जोर अपनी जीप ले ली थी। उन्हाने नेशनल पाक के पाम जीप रोक दी थी। दूर से किसी झोपटी में पुछ-कुछ रोशनी दिखाई दे रही थी और कोई एक अंग्रेजी गाना बज रहा था । झोपड़ी में जोजी गीत इ० जयचद ने जपन हाथ मे टाच लिया और जीप का ड्राइवर के साथ छोडकर धीरे-धीरे उम रोशनी की जार चलने लगे। उस झोपडी के करीव जाकर एक पेड़ की आड म ये दाना खडे रहे। तीन-चार हिप्पी नाच रहे थे और दो नौजवान अपने मिर नीचे किये हुए बैठ थे। इतन म रावी चिल्लाया-"कुशल । सर, यही कुशल है । इ० जयचद ने उसे शात किया और अपनी जेब से पिस्तौल निकालो। उहाने गैगी से कह दिया कि वह जापर कुशल को मजबूती से पकड़ ले और चे पिस्तौल दिशाार उन ससा जीप म बैठने के लिए मजबूर कर दग । गाल नाममय किसी न टार्च की गशनी देव ली। उसने योडीदर तर उमी दिशा म ध्यान दिया और वहाँ से टाचं जलाया । राशनी २२/नया गाएँ इ० जयचद पर गिरी। वह हिप्पी डर से चिल्लाया- भागो, पुलिस ।" नाचनेवालो ने अपने हाथ जो भी सामान आया उसे ले लिया और माग खडे हुए । कुशल और दूसरा साथी दोनो उठकर भागने वाले ये कि इ० जयचद जौर रॉवी ने दोनो को पकड़ लिया। कुशल ने रॉबी को जोर से धक्का मारकर गिरा दिया। उसने दौडना चाहा लेकिन रॉबी ने उठकर उसे कसकर पक्ड लिया। जीप के ड्राइवर को ऐसा लगा कि वहाँ कुछ झगडा हो रहा है । जीप को लेकर ड्राइवर वहाँ आ पहुँचा । कुशल चिल्ला रहा था--"छोडो मुझे। मैं किसी को पहचानता नही हूँ। मुझे आप पकड नही सकते। मै आजाद हूँ । अव दुनिया की काई ताकत मुझे पकड नहीं सकती। मै आजाद हूँ।" न जाने वह क्या-क्या वक रहा था। वह गद के नशे में चूर या और चलन म असमथ या । दूसरे साथी ने नशा किया था। इस्पेक्टर अपनी हथकडिया कुशल को पहना रहा था और रॉवी न कुशल को पकड रखा था। इस मौके का फायदा उठाकर वह दूसरा माथी जोर से भाग निकला । रावी पीछा करना चाहता या लेकिन इ० जयचद ने मना कर दिया। इस तरह कुशल का दूसरा साथी उन हिप्पियो की तरह गायव हो गया। कुशल जीप गाडी मे बैठने से इन्कार कर रहा था। दोनो ने उसे उठाकर जीप मे रखा तो कुशल ने ज़ोर-ज़ोर से हाथ-पैर हिलाने शुरू किए। इ० जयचद ने कुशल को एक ज़ोर का तमाचा लगा दिया। लाचार होकर कुशल ने गुस्से से रॉबी की ओर देखा । जीप गाडी चल पडी । इस वक्त रात के करीव दो वज चुके थे। जीप तेज़ रफ्तार से जुहू की ओर दौडने लगी और करीब आधे घटे के भीतर वह मागर परिवार के वगले पर आ धमकी । कुशल करीब-करीब वेहोशी की हालत मया। मि० सागर अब तक जाग रहे थे। जीप की रोशनी से भयभीत होकर वे बाहर आये । जव जीप में कुशल को ऐसी हालत म देखा तो वे बहुत दुखी हो गए। उन्होने अपने नौकरो को जगाया। वे सभी जीप के पास आ गये। वे सभी कुशल को अपने हाथो पर उठाकर एक कमरे के भीतर ले गए। मि० सागर ने फौरन अपने दास्त डा० रोहित को फोन कर दिया। इस हलचल के कारण २३/ नयी दिशाएँ मिसेज सागर मी जग गयी थी। अपने वेट बुशल की दयनीय स्थिति पर रो पडी। इस गदं ने कुशल पे जिस्म का विल्कुल ही दुवल कर दिया था। आये जन्दर धंस गई थी और चेहरे की रौनक चली गई थी। शरीर पर छोटी-छोटी फुसियाँ हा गई थी। शरीर के कपडो से दुर्गन्ध आ रही थी। फौरन कपडे बदले गए। यूडिकालन और गरम पानी स शरीर को साफ किया गया। पूरे शरीर को मुगन्धित पाउडर लगाया गया । मुह से बार-बार लार टपक रही थी। श्रीमती सागर उसका मुह साफ करती जा रही थी। रॉवी भी नौकरो की मदद कर रहा था। उसी समय इसक्टर जयचद न अपने पुलिस-स्टेशन पर फान किया और कुशल के मिलन की खबर दी। पुलिस स्टशन से कुशल के विरुद्ध उन्ह बहुत सी बातें सुनने को मिली। कुशल गद जादि चीजे पगेदन के लिए गर्द वेवन वाला के जड्डो पर भी जाया करता था। इस्पेक्टर ने फान रख दिया और रावी को बुलाया। रॉबी ने बताया कि एक बार दो ड्रग्ज वेचनेवालो ने मिलन को धमकाया था। हाथापाई की नौवत ना गई थी पर रावो ने ही मिलन को शात किया था। मिलन ने इनके बुरे धधो के बारे में पुलिस मे खवर देने की चेतावनी दी थी और ऐसी धमकी मुनकर वे मुस्कराए थे। रावी दन दोना को पहचान मकता था । सबूत के बिना कोई भी मुकदमा नही चल मक्ता । इ० जयचद जब दुविधा म ये क्योकि क्रोध मे जाकर कुशल मिलन का खून कर मकता या । नशीली चीजो के लिए कभी कभी पैसे नहीं मिलते तो इन चीज़ा का नशा करने वाले चोरिया करते है और कभी-कभी तो मारपीट करके भी पैसे ले जाते है । मिलन बार वार कुशल का विरोध करता रहा । तो ऐसी हालत में कुशल के हाथो से गलती हो सकती थी। कुशल के को अपराध थे। एक ता वह गर्दै, हेराइन, जादि नशीली चीजे ले रहा ना! कानून की निगाह म यह अपराध था। मिलन का खून यह जा दूसरा अपराध या, सिद्ध होना बाकी था। कुशल की सेहत विरकुल विगड गई थी। सभी डा० रोहित के इन्तजार म थे। करीब आधे घण्ट के वाद डा. रोहित आ गए। २४ / नयी दिशाएँ - वे कुशल को जांचने के लिए कमरे म आगे बढे ये कि वह जाग गया, वह पेट पकडकर बैठ गया और हाथ-पॉव हिलाने लगा । डाक्टर ने उसे सुलाने की कोशिश की लेकिन वह चिल्लाने लगा। वह गर्द मांग रहा था। मुझे दो । मुझे दो।। -लगातार वह चिल्लाने लगा। डा० रोहित इजेक्शन देना चाहते थे लेकिन कुशल अपने हाथ-पैर पटक रहा था और डा० रोहित को वहाँ से जाने के लिए कह रहा था। डा० रोहित ने रावी की मदद से उस पकड रखा या और बाद मे पवीडीन इजेक्शन दे दिया। इस इजेक्शन से कुशल शात हो गया और वहुत जल्द व सो गया। डाक्टर रोहित बाहर आए। कुशल की इस हालत को देखकर वे बहुत ही परेशान हो गए थे । एक वार कुगल को देखगर उन्ह सन्देह हो गया था, लेकिन कुशल की बाते सुनकर वह सन्देह दूर हो गया था। वे सोचने लगे 4 कि कुशल की ऐसी हालत के लिए कौन जिम्मेदार हागे । ० रोहित मि० सागर के अच्छे दोस्त थे क्योकि बहुत पहले से वे दोनो एक-दूसरे को जानते थे। वे हमेशा किसी भी महत्त्वपूर्ण काम मे एक-दूसरे की सलाह ज़रूर लेते थे। डा. रोहित जानते थे कि मि० सागर बहुत ही परिश्रमी एव जिद्दी स्वभाव के इन्मान थे। इसी कारण उनके अपने व्यवसाय में खूब तरक्की हा गई थी। श्रीमती सागर के पास वक्त नही या क्योकि वे अपनी सहेलियो के साथ शानदार दावत खाने में तथा क्लवो में जाकर ताश खेलने जौर गप्पे हाकने मे ही सारा समय जाराम से गुजार रही थी। सागर परिवार के पति-पत्नी में हमेशा जारदार वहस होती रहती। दोनो मे अहकार की भावना होने के कारण समझौते का प्रश्न ही नहीं उठता। यही वजह थी कि प्यार और मदद का अभाव था। सभी भौतिक सुख मौजूद ये लेकिन ममता की कमी थी। ये दोना पति-पत्नी अपने जहकार का और जाडम्बर को जिन्दगी से निकाल नहीं पा रहे थे। स्नेहा अपने पिता से वेटी की तरह बात करने को तरसती रहती थी और कुशल अपनी माँ के कोमल हाथी के प्यार भरे स्पश को चाहता था। ये दोनो माता-पिता जिन्दगी के रास्ते से भटक गए थे। वास्तव मे देखा जाये तो ये दो मासूम जिन्दगिया इन माता-पिता के झगडो के कारण अपनी-अपनी राह २५ / नयी दिशाएँ ।
अलग बनाने लगी थी। राकेश अपने बच्चो को पैसे देकर यह समझते
कि उनकी अपनी जिम्मेदारी पूरी हो गई।
मि० सागर और मिसेज सागर ने डाक्टर रोहित में इस बात
को छिपाकर रखने का अनुरोध किया तो दा० रोहित क्रोधित हा
गए। उन्होने बताया कि इन नशीली चीजो का असर मी भयपर
होता है । कुशल नीद स जब जाग जाएगा तो उसके बदन में मोच
आएगी। पसीने म वह भीग जाएगा। वह चीखेगा और चिल्लाएगा।
उन्हें कुशल के इलाज की चिता करनी चाहिए। अपनी आन और
इज्जत बचाने के लिए इस जसली वान को वे कर तक छिपान
वाले थे। टा० रोहित ने कहा-"मैं चाहता हूँ कि इसे म जपन
ड्रग्ज रिहविलिटेशन मटर मे ले जाऊँ । इसके शरीर से इन जहरीली
जौर नशीली चीजो का असर निकालने के लिए वक्त जगगा। और
कभी यह मत सोचिए कि दूसरे लोग क्या कहगे ?"
मि. सागर बोले-~-"टा० रोहित आपकी वात विल्कुल ठीक है
लेकिन लोगो को पता चनने से हमारी बदनामी होगी और हमारे
बेटे का भविष्य विगड जाएगा। हमारे सम्बन्धी और मित्र कुशल
को लेकर चर्चा करते रहगे।"
कुशल की माँ कचन भी इस बात को छिपा रखने के लिए अनु-
रोध करने लगी ता डा. रोहित दुखी हो गए और उन्हे समझान
लगे-~~"कुशल के शरीर को अब इन नशीली चीज़ा की इतनी
जादत हो गई है कि वह उनके बिना बहुत तडपेगा। उसके शरीर स
इन जहरीली चीजो के असर को निकालने की सख्त जरूरत है, नहीं
ता उसकी हालत बिना जल की मछली जैसी होगी।
कपन आग कुछ न बोल सकी। उनको आखो में आस् जा गए।
उसी समय ३० जयचद वहा जा गए और उन्होने उन्हे समझाया
कि वे कुशल का सरकारी अस्पताल ले जायगे, वही उसका इलाज
होगा।
मि० सागर बोले-"आप क्या बात कर रह है? मेरा बेटा और
सरकारी अस्पताल म? इस्पेक्टर जयचद, जाप इस बात का
२६/नयी दिशाएँ
। कुशल इज़ अच्छी तरह याद रखिए कि म उसे इलाज के लिए विलायत भी ले जा सकता हूँ।" इ० जयचद ने जवाब दिया, "देखिए, कुशल पर मिलन के खून का शक है और हमे बहुत-से ऐसे सबूत भी प्राप्त हुए है।" कचन ने जाश मे जाकर कहा-"मेरा बेटा ऐसा काम नहीं कर सकता । यह सब झूठ है।" इ० जयचद वोले-"काश ! यह वात झूठी होती। मि० सागर और मिमेज सागर मुझे माफ कीजिए। डाक्टर रोहित जी आप मुझे कुशल के इलाज के बारे म एक स्टेटमेन्ट दीजिए । अव कुशल का इलाज हम सरकारी अस्पताल मे ही करेगे। अभी हमारे साथी इस्पेक्टर डिसोजा रोगी-वाहन लेकर जा रहे है । सो, अण्टर अरेस्ट।" कुशल के मिलने की उनकी खुशी गायर हो गई । डाक्टर रोहित इन्स्पेक्टर जयचद को स्टेटमेन्ट देकर चले गए। जब तक स्नेहा भी जाग गई थी। कुशल को देखकर खुशी तो हुई लेकिन कुछ पला के लिए । घर मे सभी नौकर भी दुखी ये । इन्जेक्शन के असर के कारण कुशल पूरी नीद में या। जव तक की जो वात वहा हुई थी उनकी जानकारी उसे बिल्कुल नही थी। मिस्टर मागर कुशल को घर पर ही रखना चाहते थे और वहा चाहे तो पुलिस का पहरा रखने की बात भी उन्होने बताई। इस्पेक्टर जयचद इस बात के लिए तैयार नही थे क्याकि उन्हे लग रहा था कि कुशल का अपराध सगीन या । स्नेहा पर इम माहौल का बुरा असर हो रहा था और वह जपनी पढाई ठीक तरह से नहीं कर रही थी। कालेज मे कुशल को लेकर जो बात होती थी उनसे वह परेशान और दुखी हो जाती थी। उसकी सहेलियाँ भी कुशल के बारे मे पूछती तो वह क्रोधित हो जाती थी । आज कुशल को गिरफ्तार किया जा रहा है । वह कालेज में किसी को अपना मुह नहीं दिखा सकेगी। माँ-बाप की लडाइयो का उम पर असर था लेकिन वह मन से मजबूत थी । वह पढाई के साथ-साथ कुछ-न-कुछ समाज-कार्य करके अपनी खुशी पाप्त कर लेती थी। इसी कारण मा-बाप के प्यार का अभाव उमे इतना २७ /नयी दिशाएँ खलता नही था। स्नेहा पर दादा के उसूलो का बहुत प्रभाव था। उसके दादा का कहना था कि मन का मकल्प हा, ता सारी कम जारिया भाग पडी होती है और वह इन्सान अपने सुनहले मविप्य का मालिक बन जाता है। स्नेहा में समझदारी और समझौते को भावनाएँ प्रबल थी। यह भी कुशल की तरह बहुत ही भावुक थी लेकिन हर कार्य का हाथ लगाने से पहले सोच लेती थी। उसका भाई कुशल भी पहले कितना अच्छा था। कितना होशियार । उसन ता स्नेहा से भी ज्यादा सोशल कार्य किया है । इमी माल कुशल इन नशीली चीज़ो का शिकार बनकर कमजोर हो गया। स्नेहा जानती थी कि कुशल अपने मां-बाप की वजह से बहुत ही तनाव और चिता महसूस करता जा रहा था। यह एक मानसिक रोग या शरीर के राग दवाइया से और अच्छे माहौल स मिट जाते हैं लेकिन मन के रोग के लिए प्यार, समझदारी, सहायता और सहानुभूति की जमरत होती है । महानुभूति ऐसी, जो अपने कार्यों म प्रकट हो। मागर परिवार के सभी लोग वेवस होकर खडे थे। मि० सागर को ऐसा लगा कि उसकी बहुत बडी हार हो गई है। फिर भी परिवार के प्रमुख व्यक्ति के नाते उन्होंने सभी को हिम्मत दी और बताया कि कुशल बहुत जल्द अस्पताल से घर वापस आ जाएगा। उन्हान मिमेज मागर के ऑम् पोछ दिए और स्नेहा के माथे पर प्यार से अपना हाय रखा। मि० सागर की इन बातो से सभी को अच्छा लगा लेकिन मायसी कम न हुई । कुशल को ले जाते समय इ० जयचद भी दुखी हुए थे लेकिन कानून से उनके हाथ बँधे हुए थे। उ होन मि० सागर को समझाया-"मिला के खूनी के बारे में हम पूरी जाच करेग लेकिन खूनी कुशल ही होगा तो यह आपका दुर्भाग्य होगा। सच्चाई को सामने लाने की मै जी-जान से कोशिश करूंगा और इतनी बात जरूर याद रखिए कि कुशल निर्दोष छूट गया तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होगी।" उसी समय रोगी-वाहन वहाँ से सरकारी अस्पताल तक पहुँचा। । - २५/नयो दिशाएँ प्रकरण चार मि. सागर ने फौरन वकील की सलाह ली और कुशल को छुड़ाने के लिए उन सभी वातों की सम्भावना पर बातचीत की जिनके सहारे क्या-क्या किया जा सकता है। वकील ने यह कहा कि कुशल के एक ड्रग-डिक्ट होने की वजह से मुकदमा जरा कमजोर हो गया है। मि० सागर अव तक रिश्वत आदि देकर छोटे-छोटे काम आसानी से करवा लेते थे। पहली बार उन्हे यह अहसास हुआ कि पैमा यहा कुछ नही कर सकता। वे शात होकर अपने दोस्तो और रिश्तेदारो की राय लेने लगे थे। बाद मे वे कालेज के प्रिंसिपल सिवात खोसला और वाइस प्रिंसिपल भारती से भी मिले। कालेज में कुशल को काफी सम्मान प्राप्त था क्योकि कुशल ने कालेज मे बहुत से अच्छे-अच्छे काम किए ये और वह पढाई में भी एक होशियार विद्यार्थी या। रामकृष्ण कालेज के बहुत-से विद्यार्थी भी कुगल को बहुत चाहते थे और व कुशल को निर्दीप मानते थे। इन बच्चो को मिलन और कुशल की दोस्ती देखकर ताज्जुब होता था । कालेज मे जाकर मि० सागर को अपने बेटे की अच्छी बाते सुनकर कुछ कुछ मानसिक शाति मिल रही थी। कालज के जनरल नोटिस-बार्ड पर मिलन का फोटो लगा हुआ या और प्रिंसिपल तथा वाइस प्रिमिपल ने मिलन के वारे मे अच्छे लेख लिखे थे, जो फोटो के बगल मे थे । दाहिनी जोर कुशल के बारे २९/नयी दिशाएँ + ड्रग वेचनेवाला मिले तो - में लिखा गया था और यह बताया गया था कि वह कितना हाशि- यार था और अपने कालेज के लिए कितनी वाते उसने की थी, लेकिन बाउन-शुगर (गद) ने उसे मानसिक रूप से कितना कमजार बना दिया था। ब्राउन-शुगर, हेराइन, चरस और अन्य नशीली चीजो से हमारे 'युवको' का किम तरह नुकसान होता है, जादि वातो का उल्लेख वहाँ या। स्टूडेण्टस सेक्रेटरी ने लिखा था-"कालेज मे काई भी इन नशीली और जहरीली चीजा को अपने पास रखता हो ता फौरन प्रिसिपल या वाइस प्रिंसिपल को खवर दी जाय। यदि किसी विद्यार्थी को कालेज के जासपास कोई कुछ विद्यार्थियो की मदद से उसे पकड कर वह प्रिंसिपल के पास ले आए।' कालेज में जाकर मि० सागर ने यह जनरल नोटिस वाड देखा और उस पर लिखी हुई बाते भी पढी। कालेज के इस माहौल म जाकर मि० सागर को पश्चात्ताप हुआ। अगर उन्होने कुशल के जीवन म दिलचस्पी ली होती तो उसकी तरक्की में चार चाद लग जाते । वे केवल पैसे देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी हो गई, ऐमा सम झते थे। उन्हें अपनी पत्नी पर क्रोध जाया। यदि वह कुशल के कामो की सराहना करती और उसकी जोर योडा-सा भी ध्यान देती तो कुगल की राह बदल जाती। ऐसा मोचते समय उन्होने अपने आपको ही अधिक दोपी पाया । दिन-रात व्यवसाय बढान के चक्कर मे वे अपने परिवार को भूल से गए थे। उन्होने अपने मन मे निश्चय कर लिया कि वे जव अपने परिवार की जोर अधिक ध्यान देगे। कुशल का सरकारी जस्पताल म एक अलग कमरे में रखा गया या और बाहर दो पुलिसवाला का पहरा या। सरकारी डाक्टरा न जाच को थी और दा० रोहित न भी वहाँ जाकर डाक्टरा को कुशल क बारे मे समझाया था। वहा कुशल पर इलाज शुरू हो गया या। पहले दिन ता माता-पिता और डा० रोहित के अलावा और क्सिी को जदर जान की इजाजत नहीं मिली। कुशल को कोल्टटर्की का दौरा पड़ा था, इसलिए वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसके पेट मे और सिर में काफी दद शुरू हो गया था। पूरा वदन पसीने स तर हा गया था और बार-बार उल्टी करन की इच्छा हो रही थी। पर अक्डन लग थे, इसलिए वह विस्तर पर तडपने लगा था। ३०/नयी दिशाए डाक्टरो न उसो हाथ-पैर पकडे और एक इन्जेक्शन दिया ये जिससे कुशल का शरीर शिथिल हो गया और उसका तडपना कम हो गया। कुछ ही देर में ऐसा लगा कि वह सो गया है। कुशल के सारे लक्षण कोल्टटर्की के थे। ड्रग्ज लेकर नशा करने वाले के सारे शरीर मे इन नशीली चीज़ो का असर बढता जाता है। उसके शरीर की पूरी क्रिया ही बदल जाती है। अगर बाद में उसने गर्द का नशा नही किया तो वह कोल्डटर्की का शिकार हो जाता है। इसे हम एक प्रकार का रोग कह सकते है जिससे सारा जिस्म पीडित हो जाता है। दवाइयो से धीरे-धीरे कुशल की सेहत में सुधार दिखाई देने लगा। वह जव आनेवाले डाक्टरो और मुलाकातियो से अच्छी तरह बात करने के काबिल हो गया था। अब उसे मिलने के लिए कालेज के विद्यार्थी, प्रो० भारती, रांची आदि लोग आने लगे थे। धीरे-धीरे कुशल अपनी वास्तविक हालत की जोर जपने कदम बढाने लगा था। रह-रहकर उसे मिलन की याद आती थी और उमकी आँखे आँसुओ से भर जाती। रापी और प्रो० भारती से उसन कह दिया था कि मिलन का खून उसने नही किया। उसका खून करने वाले ड्रग- पेडलस है। ड्रग-पेटलस यानी गर्द, हरॉइन, गाँजा, चरस आदि नशीली चीजे वेचने वाले लाग । इन चीजो को वेचकर ये ड्रग-पेडलस हजारो रुपए कमाते थे और इनके हाय इन चीजो को देने वाले लाखो रुपये कमा लेते थे। यदि ऐमी बाते पुलिस अधिकारियो को ज्ञात हो जाती है तो इनके लिए यह खतरा सावित होता था। नशीली चीज लानेवाले और इन्हें वेचनेवाले और खरीदनेवाले-इन सवका आपस में एक तालमेल सा या । एक जादमी के पकड जाने से अनेक जादमी पकड जा सकते थे जार इस व्यवसाय मे खतरा पैदा हो सकता था। इसी कारण नशीली चीजे खरीदनेवालो को अपने जड्डे नही दिखाते । ढाबो मे, पान-बीडी की दुकानो मे या किसी निश्चित किए नुक्कड़ पर इन जहरीली चीजो का व्यापार चलता था। पुलिस अधिकारियो म कुछ रिश्वत जादि लेने वाले अधिकारी इतना ध्यान नहीं देते थे क्योकि इन्ही लोगो से इनकी कमाई में वरकत थी। मिलन ने कुशल को ड्रग्ज देने वाले लोगो को धमकाया था कि ३१ / नयी दिशाए वे ड्रग्ज वेचा छोड दे नही तो वह पुलिस अधिकारिया को बताकर उन्हे पकडवा देगा। कुशल ने ड्रग्ज परीदते समय मिलन का हमेगा टालने की कोशिश की थी लेकिन मिलन कुगल को इस तवाही के रास्ते से बचाना चाहता था। उसने एक ड्रग्ज वेचनेवाले का दो थप्पड भी लगाए थे और दोबारा न जाने की कसम खाने पर उसे छोड दिया था। कुशल ने मिलन को वार-वार समझाया था कि ये बहुत ही खतरनाक लोग है और इनसे टक्कर लेना खतरे से खाली नहीं। मिलन ने कुशल की इन बातो की जरा भी परवाह नहीं की -"यदि यी। प्रो० भारती, डा. रोहित और रॉची मिलन के खुनी के बारे म जानने के लिए बहुत ही उत्सुक थे। कुशल ने यह बताया- उस यूनी का नाम मैने बताया तो शायद वे मुझे भी जिन्दा नहीं छोडेगे, लेकिन मुझे इस बात का डर नही है। पुलिस के कुछ अधि कारी भी इनसे मिले हुए है और वे रिश्वत लेकर चुप हा जाते है । ये नशीली और जहरीली चीजे विदेशो से भी आती है और इन बदमाशो ने ऐसी चीजे वेचनेवालो के पास पिस्तौल दे रखे है। नशीली चीजे वेचनेवालो पर भी निगाह रखने के लिए इहोन गुण्डो को नियुक्त किया है। कुछ जमीर लोग भी ऐसे व्यापारो में दिलचस्पी ले रहे है।" प्रो० भारती ने पूछा-"लेकिन मिलन का सून होते समय तुम वहा मौजूद थे? और तुम उसका हुलिया बता सकते हो।" कुशल न टरते हुए धीरे-धीरे कहा- मै और मिलन रावी के घर जा रहे ये, क्याकि रावी ने हमे डिनर पार्टी के लिए बुलाया था। अचानक हम दोनो पर हमला हुआ। कुछ लोगो न मिलन को खूप मारा। उसने इन सवका प्रतिकार तो किया लेकिन वह अकेला था और मुझे कुछ लोगा ने पकड रखा था। मेरे मुह पर रुमाल बाध दिया गया था। मिलन चिल्ला रहा या- कुशल । कुगल ।।' लेकिन म मजदूर था, इसलिए उसे बचा न सका। मिलन के साथ उन्होने क्या किया इसका मुझे पता ही न लगा। मुझे उन्होन अपनी जीप गाडी म विठाकर वोरिवली पार्क के पास छोड दिया था। इन्होन मुझे धम काया था कि यदि मिलन के बारे मे कुछ भी बताया तो वे स्नेहा का ३२ / नयी दिशाएँ । अपहरण कर लगे। डर और तनाव से मै चुप रहा। खूब विचारने के कारण मेरा दिमाग फटने लगा था इसलिए मैंने फिर से ब्राउन शुगर (गर्द) का सहारा लिया। इस जहरीली दवा के सिवा उस समय मेरे पास कोई नही था। मुझे रामू दादा पर शक है क्योकि उसने मुझे धमकाया था कि यदि पुलिस को खवर देने की मैने कोशिश की तो मेरी भी मिलन की तरह दुर्गति हो जाएगी और वे हाथ धोकर मेरे परिवार के पीछे पड जायेगे। इसी कारण मै चाहता हूँ कि मेरा नाम कही न जाए।" कुशल ने उदामी और वेवसी से अपनी गर्दन झुका दी। कुशल की वातो मे प्रो० भारती, रॉबी और डा० रोहित को सन्तोप हुआ । उन्होने ये सारी बाते इ० जयचद को बताइ । जयचद + जव कुशल के मुंह से पूरी कहानी सुनी तो रामूदादा के बारे मे उनके शक की भावना विश्वास में बदल गयी । कुशल को खोजते ममय वे रामू दादा के अड्डे पर भी गये थे लेकिन उस समय इन्स्पेक्टर जयचद का मकसद कुशल की खोज करना था। उन्होने कुशल को दिलासा दिया और चेतावनी दी कि ऐसी बाते हर जगह पर वह न कहे। रॉबी ने इ० जयचद को यकीन दिलाया कि कुशल को वेगुनाह मारित करने के लिए वह किसी भी खतरे का मुकावला कर सकता है। रावी ने जाग्रह किया कि वह भी इन्स्पेक्टर जयचद के साथ रहेगा और हर तरह से उनकी मदद करेगा। इ० जयचद राबी की बातो से बेहद खुश हुए। उसी शाम को कुशल के कमरे म एक वार्ड वॉय पानी का जार तथा गिलास रखने वहाँ आया और उसने कुशल के हाथ म एक चिट्ठी दी और कहा कि वाहर कोई आदमी कार मे आग था, उसी ने यह चिट्ठी दी है । कुशल ने वार्ड वॉय की ओर शक की नजर से देखा और पढ़ने के लिए उसने चिट्ठी खोली । लगता था कि यह चिट्ठी रमादादा की ही होगी। उसमें यह लिया गया था-चेतावनी देने के बावजूद तुमा मिलन के उनी का नाम बता दिया है। हमारे अड्डो के बारे में और लागो के बारे में उन्हे अगर खबर दी गई ता तुम्ह जान से मार डालेगे । तुम्हारे कमजोर गरीर को एक गोली काफी है। तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे परिवार को भी तबाह कर देगे। ३३/नयी दिद्याए यासकर स्नेहा का अपहरण कर लगे।" चिट्ठी पढकर कुशल का गरीर काँपने लगा और उसके दिमाग म पलवली मच गई। उसने मन-ही-मन सोचा कि मेरी इस माकर गलती की सजा क्तिन लोग मोगगे। जब उसके मन मे मिलन के यून की बात ना गई। उसने कुशल के लिए अपनी जान पुर्वान कर दी। कुगल मे गद छुड़ाने के लिए उसने जी-जान से कोशिश की। एक-एक करके मिलन की सारी अच्छाइयाँ तस्वीरो के रूप में कुशल के मामने जाने लगी थी। एक आदिवासी लडके ने उसके लिए कितनी बाते की थी। रितनी बार वह अपने गाव ले गया था। कुगल नोचने लगा-वहा की जानकी माई और दयानन्द, कितने अच्छे लोग है ये । मिलन के सून की बात से उन पर क्या गुजरी होगी । यहा ता लागो ने मुझ पर शक किया कि मैने अपने दोस्त का खून कर दिया | वाह री दुनिया । अखबारा मे मेरा फोटो भी छपकर आ गया। हे भगवान ! मै मिलन के माता पिता को कैसे यकीन दिलाऊ कि मने मिलन का खून नही किया। कुशल को मिलन ने 'माय वेस्ट फ्रेंड' का चादी का गोल्ड दिया था। वीमार होकर भी वह कुशल के जन्म-दिन पर हाजिर था। क्या रिश्ता था इम मिलन से । मेरे लिए वह शहीद हो गया और मैं एक गुनाहगार बनकर यहाँ इस सरकारी अस्पताल में मड रहा हूँ। क्या में ही मिलन का खूनी नही हूँ ? मिलन की मौत के लिए जिम्मेदार मैं ही तो हूँ। अपने माता-पिता और स्नेहा के कदमो की जाहट से कुशल अपने विचारो मे से जाग उठा। उसने अपने पिता राकेश की ओर याचना की निगाहो से देखा । उसने मा और वहिन को देखकर मुस्कराने की चेष्टा की। सभी ने उसकी पूछताछ की और कुशल ने कहा कि वह जव विल्कुल ठीक है। उसके इस कयन मे झिझक थी। मि० सागर फौरन ममझ गए । उहाने कुशल के माथे पर हाथ रखा और कहा-"बेटा कुशल, चिन्ता मत करो। हम तुम्ह घर ले जायेगे और वहा भी इलाज करके तुम्हे अच्छा कर देग। हम हर के मवसे अच्छे वकील द्वारा तुम्ह छुडाने की कोशिश करेंगे । वेटा, तुम सूनी नही हो । रामूदादा ने मिलन का सून किया है और ३४/ नयी दिशाएँ पुलिस उसके पीछे पड़ी है। वेटा, मेने पुलिस कमिश्नर से बात की है। वे शायद तुम्हे यहाँ देखने भी आयेगे।" कुशल ने चिट्ठी अपने तकिये के नीचे छिपा रखी थी। वह यह चिट्ठी दिखाना नहीं चाहता था क्योकि उसे लगता था कि उसके माता-पिता और स्नेहा-मभी रामूदादा के चगुल मे फँस जायेंगे । उसने इतना ही कहा--"डैडी मुझे वचा लीजिए। मैंने मिलन का खून नहीं किया है।" उसकी आखो से ऑसू बहने लगे। उसकी माँ कचन और वहिन स्नेहा भी आँसू बहाने लगी। अपने बेटे की इस दयनीय हालत के लिए कौन जिम्मेदार या? मि० सागर और मिसेज सागर दोनो ने एक-दूसरे की ओर अपराधी की निगाहो से देखा। उनके जाने के वाद, कुशल बिस्तर पर पडे-पडे सोचता ही रहा । वह ड्रग पेडलरो को अच्छी तरह जानता था। उनका वहुत वडा जाल था। कुशल अव इन लोगो से बच नही सकता। कोई-न- कोई कही भी कुशल को मार सकता था। कुशल के सिर मे दर्द शुरू हुना और पेट भी दुखने लगा। सोच-सोचकर उसके मन मे निराशा का घोर उधकार भर गया था। उसे लगा कि अब मौत ही उसे इन मव वातो से छुटकारा दिला सकती है । क्या खुदकशी कर लेना इतना जासान है ? बाउन-शुगर का प्यादा नशा किया तो मौत आ सकती है। मैंने कितने कष्ट दिए सवको । मुझे मरना ही पडेगा। सभी का मुसीवता से छुटकारा मिल जाएगा। खुदकशी के विचारो ने उसे घेर लिया था। वहाँ वार्ड थॉय चादर और तकिये के कवर्स बदलने आ गया। उसने कुशल को सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया और तकिए के नीचे की चिट्ठी कुशल के हाथ म दी। चादर और कवसं बदलने के बाद कुशल ने उसे अपने पास बुलाया। उसने वार्ड बाय को समझाया कि वह कही से ग्राउन-शुगर ले जायेगा तो उसे वह खूब पैसे देगा । वाड चाय ने यहां-वहाँ देखा और कहा-"साव, यह तो जोखिम का फाम है। यदि मैं पकड़ा जाऊँगा तो मेरी नौकरी चली जायगी।" कुशल ने उससे पानी मंगाया । वह अव बहुत ही उत्तेजित हो गया और उसे लगा कि किसी भी हालत मे पाउन-शुगर लेना ही चाहिए। इस नशे से थोड़ी देर के लिए ही क्यो न हो, छुटकारा जरूर मिलेगा। ३५/नपी दिवाएं - वाड-बॉय ने पानी का जार रया और वह जाने लगा या तो कुशल ने उसे रोक दिया-"देखो, मै अच्छा हो रहा हूँ। मुझे नशा नहीं करना है लेकिन एक वार, सिर्फ एक बार पाउन-शुगर लाकर दो। मै फिर से नही माँगूगा।" और उँगली से अगूठी निकालकर देते हुए बोला-“यह लो जगूठी, सोने की है और बेचने पर एक हजार से ज्यादा ही पैसे मिलेगे।" वाड-बाय ने यहाँ-वहाँ देखा और कुशल से कहा- "देखो साव, दूसरा भी दो आदमी दस नम्बर वाड मे है। वो भी हमसे ब्राउन-शुगर मँगाता है। एक महीने से मै उनको ब्राउन-गुगर देता । किसी को कुछ भी मालूम नहीं । काम बिल्कुल सफाई के साथ होता है लेकिन आपके यहाँ तो बहुत से लोग जाते हैं और बाहर पुलिस भी है।" यह बात सुनकर तो कुशल सुश हो गया और उसने जगूठी देते हुए कहा-“जाजो जभी ले जा मै किसी को भी नहीं बताऊँगा। ला, यह अगूठी | जाओ, जल्दी करो।" जगूठी लेकर वाड-जाय वहाँ से जल्दी निकल गया। पुलिस को इस वाड-वाय पर शक हुआ। उसके पूछने पर वाड-वॉय ने कहा कि वह उसके लिए फल लेकर आएगा। पुलिस कास्टेवल ने इतना ध्यान नहीं दिया। कुछ ही देर के बाद वाड-पाय डरते-टरते वहा आकर झाकने लगा। अदर नर्स थी इसलिए वह बाहर ही रुक गया । नम के जाने के बाद वह कुशल के कमरे मे आ गया। झट से कुशल ने उसके हाथ से ब्राउन-शुगर ले लिया और उसे भगा दिया और उसी वक्त प्रा० भारती तथा गवी वहा जा पहुचे । आते ही उन्हाने कुशल की जोर देखा । कुशल को घबराहट उनसे नही छिपी। प्रो० भारती ने फौरन पछा- क्या बात हे ? महमे- सहमे क्यो लगते हो ?" और जव कुगल ने कहा-“कुछ नही । कुछ नही ।।" तो प्रो० भारती का शक चढ गया । उहोने फौरन तकिये के नीचे से वह चिट्ठी और जाउन-गुगर के पैकेटस निकाले, जैसे उह पहले से ही मालूम हो गया हो । इनको देखकर प्रा० भारती जापे से बाहर हो गए और उन्होन कुशल के गाल पर एक तमाचा जड दिया। रॉची फौरन उनका हाथ पकड़ लिया और कहा--"सर, ३६ / नयी मिाएं ।
। यह अस्पताल है।" अपने-आपको सयत करते हुए उन्होने कुशल की ओर क्रोध से देखा । वाद मे उन्होने वह चिट्ठी पढी। रॉबी ने भी वह चिट्ठी पढी। योडी देर शात रहने के बाद प्रो० भारती ने क्रोध से पूछा--"यह चिट्ठी किसने दी? वोलो कुशल, कौन आया या यहाँ ? वोलो कुशल, यह चिट्ठी किसने दी ?" कुशल ने डरकर सब कुछ बता दिया और यह भी बता दिया कि ब्राउन-शुगर भी उसी वार्ड-वाय ने लाकर दी है और उसने उसे इसके बदले म अपनी सोने की जगूठी दी है। रावी क्रोध से पागल हो गया और उसने वार्ड बाय को जाकर पकड लाने की बात कही तो प्रो० भारती ने उसे शात किया और कुशल के पास बैठने के लिए कहा। प्रो. भारती अस्पताल से बाहर आये और उन्होने इ० जयचद को फोन करके फौरन जाने के लिए कहा। पुलिस स्टशन में एक-दूसरे इस्पेक्टर थे और उन्होने बताया कि वे ड्यूटी पर बाहर गए हुए है । आते ही वे उनका सदेश दे देगे। प्रो० भारती कुछ निराश होकर अस्पताल की जोर लौट रह ये कि रास्ते में उन्हे इ० जयचद दिखाई दिये । प्रो० भारती ने उनका अभिवादन किया। वे दोनो अस्पताल के पाली कमरे मे वैठ गय । प्रो० भारती ने इ० जयचद को सारी बात समझायी और यह कहा कि वार्ड वाय शायद रामूदादा को अच्छी तरह जानता है। इस्पेक्टर जयचद को बाहर बैठे हुए दो पुलिस कास्टवलो पर भी शक हुआ लेकिन उस समय वे चुप रहे । उन्होने रॉबी से कहा कि वह अस्पताल मे जरा चक्कर लगाये और उस वार्ड-बॉय के नाम का पता लगाय । रावी सावधानी से वहां से निकला और प्रा० मारती तथा इ० जयचद वहा बैठ गये । थोड़ी ही देर के बाद बाहर शोर सुनाई दिया। रावी ने जाते-जाते उस वार्ड-बाय को पकड लिया जिसे वह हमेशा कुशल के कमरे म देख चुका था। उसने उसका नाम वगैरह नहीं पूछा और उसे कसकर पकड लिया। वह चिल्लाने लगा कि उसे पेशेण्टस के लिए खाना ले जाना है, लेकिन रॉवी ने उसे बिल्कुल नही छोडा। दो नसें और तीन डाक्टर भी इस वद- तमीजी के कारण रावी का डाटने लगे थे। एक ने तो रावी को पुलिस के हवाले कर देने की धमकी भी दी थी। इस शार को सुनकर ३७ / नयी दिशाए इ०जयचद वाहर ना गये और उन्होने देया कि सभी रात्री के हाथा से वाड-वाय को छुडाने लगे ह । इ० जयचद ने फौरन सभी को राका और वार्ड-वाय को पकडकर कुशल के कमरे में ले जाए। वाहर लोगो की भीड इकट्ठा हो गयी थी और चार-पाच वाड वॉयज मी चिल्लाने लगे थे। इतने मे कुशल के डाक्टर वहा जा पहुँचे। उसी समय पार्ड-वाय ने सब कुछ बता दिया। इ० जयचद ने वार्ड-बॉय को हथकडी लगा दी और कुशल यी जगूठी प्रो० भारती को देकर कहा-"प्रो० भारती और रवी जाप दोना का बहुत बहुत शुक्रिया। मुझे लगता है कि इस वार्ड-पाय के जरिये रामूदादा की जानकारी हासिल करना जव मुमकिन हो गया है।" प्रो० मारती मुस्कराये-"वैसे इस वार्ड वाय ने कुशल को चिट्ठी और ब्राउन- शुगर देकर अच्छा काम किया, नहीं तो हमे रामदादा के बारे म कुछ भी मालूम नहीं होता।" "ओ० के० जापको जल्दी कामयावी मिले यही प्राथना है । "शुक्रिया, इतना कहकर इ०जयचद न अपनी जीप स्टार्ट की ओर वह वहाँ से धूल उडाती हुई ओझल हो गई। जीप के जाते ही प्रो० भारती रॉवी के साथ कुशल के कमरे म वापिस आ गये। रॉची जाना चाहता था लेकिन प्रो० भारती को यह डर था कि दूसरे वाड-बाय इससे झगडा करेगे । वे दोनो कुशल के पास आ गये । वाहर बैठे हुए दोनो पुलिस कास्टेवल टर गये।प्रो०भारती ने उन्ह कुशल पर नजर रखने के लिए कहा। कुशल की मन स्थिति बहुत ही विचित हो गई थी। उसने कभी ऐसा सोचा तक न था कि इस तरह प्रो० भारती और रावी जा धमकेगे और वार्ड-बॉय को पकडवा देगे । कुशल प्रो० भारती के स्वभाव को अच्छी तरह जानता था। जब भी उन्हे किसी बात का सदेह होता तो वे फौरन उस विद्यार्थी की गलती को तरह-तरह के सवाल पूछकर पकड लेते थे। कुशल ने प्रो० भारती को देखकर जपना सिर झुका लिया। प्रो० भारती ने वहुत देर तक कुशल को समझाया और कहा कि वह जब अच्छा हो रहा है तो उसे हर काम हिम्मत से करना चाहिए । मिलन के बलिदान का नाम लेते ही कुशल मिहर उठा । प्रो० भारती ने बड़े दुख के साथ कहा- "कुशल, तुम्हे अपना विद्यार्थी कहते हुए जाज मुझे शम जाती है। मुझे ३८/नयी दिशाएं यह मालूम नही या कि तुम इतने गिर सकते हो। जिस दोस्त ने तुम्हारी खातिर अपनी जान गवा दी उसकी तुम्ह जरा भी परवाह नहीं। तुम्हारे रग-रग मे मिलन के खून के लिए प्रतिशोध की भावना भडक उठनी चाहिए थी। ऐसी चिट्ठियो से डरकर तुम फिर से ब्राउन- शुगर का नशा करने पर उतारू हो गये हो। लानत है तुम पर । कमजोरी की मी हद होती है। वुज़दिल की तरह जीने से तो मर जाना अच्छा है। में फिर से तुम्ह कायर के रूप में देखना नहीं चाहता।" प्रो० भारती से ऐसी बाते सूनकर कुशल को अपने-आप पर ही क्रोध जाया। उसने कहा-"सॉरी सर, मैं कुछ पलो के लिए गहरी निराशा और भयकर दुख मे डूब गया था। सर, मैं अपनी कमजोरियो को अपने दिमाग से निकाल दूगा । नाय प्रामिज यु सर।" प्रो० भारती कुगल के मुंह से ऐसी बाते सुनकर कुछ शात हो गए। उन्होने कहा-"क्या, इस समार म तुम अकेले ही दुखी हो। क्तिन ही ऐसे लोग है जो भयकर दुखो से पीडित है। कितने हो ऐसे मासूम बच्चे ह जा अनाय होकर अन्न के कण-कण के लिए तरसते है। फिर भी भविष्य के सुनहरे सपनो को साकार करने के लिए वे जी रहे है। तुम्हारा दोस्त रावी क्या तुमसे कम दुखी है ? दुर्घटना मे पिता की मौत हो गई और गावा म जाकर मा बीमार हो गई। वह वेचारी अपन पति की मृत्यु से हिल गई और वह इस शहर मे नही जाना चाहती लकिन रावी ने हिम्मत नहीं हारी। यहा वह अकेला रहता है। कुछ-न-कुछ काम करके अपनी पढाई करता है और जपनी मा के लिए पैसा भी भेजता रहता है। बताओ, कुशल तुमने कौन-सी ऐसी ज़िम्मेदारी निमायी? तुम्हारे जैसे बुद्धिमान नौजवानो को मावुक वनकर कमजोरियो का शिकार नहीं होना चाहिए। तुम सभी मिलकर काम करागे तो कितनी अच्छी बाते हो सकती है। मिलन मुझसे हमेशा कहा करता था कि सर-मै गाव के कुछ लोगो को सुधारना चाहता हूँ, गाँव मे मै अच्छी पाठशाला बनाना चाहता हूँ-वहाँ के रास्ते, वहा के घर और वहाँ के लोग-इन सभी को वह सुधारना चाहता था। क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि जिस मिलन ने तुम्ह अच्छा करने के लिए अपनी जाहुति दे दी उसके अवरै मपनों का मै पूरा कर दू ? ठीक है, सभालो अपने-आपको।" ३९/नयी दिशाएँ प्रो० भारती बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन वे शात हो गये। व रॉवी को वही विठाकर चले गए और जाते समय उन्हान यह बताया कि रॉबी को ले जाने के लिए वे पुलिस की जीप गाडी का इतज़ाम करेगे। कुशल के पास जव केवल रॉवी था। दोनो दोस्त सोच-विचार करने लगे थे। प्रो० भारती का कुशल पर काफी प्रभाव पड़ा था। वह किसी भी हालत मे इस अस्पताल से जल्दी निकल जाना चाहता था। कुशल के चेहरे पर निश्चय की रेखाये उभर आयी थी। उसन रावी से कहा कि कुछ ही देर पहले उसके मन मे खुदकशी के विचार जा रह थे और जब उसमे जीने की और कुछ कर दिखान की हिम्मत आ गई। कुशल ने कहा-"रॉची, देश की बात तो हमारे नेता सोचेग लेकिन हम अपने कालेज के उन विद्याथियो के बारे में सोचना चाहिए जो नशीली चीजो से वरवादी के रास्ते पर जा रह है। म कालेज के कुछ ऐसे विद्यार्थियो को जानता हूँ जो विना वजह अपनी जान देने पर तुले हुए है। सचमुच, प्रा०मारती न ठीक ही कहा, क्या इस दुनिया मे केवल हम लोग ही दुखी ह ? कितने ही ऐसे वस्मित जादमी होगे जा मरते दम तक दुख सहते-सहते जिन्दा रहते ह । हम कुछ करना होगा रावी । मैन जो नशाखोरी का पाप किया है और अहकारी बनकर अपने परिवार को तथा कालेज को जो ठेस पहुँचाइ है वह भयकर है। मेरा एक दोस्त मुझे अच्छी राह पर लाने के लिए अपनी जान दे सकता है और म खुदगर्ज की तरह केवल अपर ही दुस की वाते सोचता रहा। रावी, भगवान से प्रार्थना करो कि म यहाँ से निर्दोष इट जाऊँ।" कुशल वी बाते सुनकर रावी फूला न समाया। कितने दिना के बाद कुशल जाग उठा था। फिर से वह पुराना पुशल जिंदा हो रहा था। एक ऐमा कुशल जिम पर सभी नाज़ या। रांची अपनी सुशी न छिपा सका। मागास, मेर दास्ता' पहते हुए उमन कुगल या गर्ने नगा लिया। उसने तुगल को वचन दिया--'युगल मने जिदगी का बहुत करीबन देया है । मरे पिता की मौत न ता मेरा जीवन ही मलियामेट कर दिया पानि उही ग प्रेरणा पासर मन हा मे जीता गीय लिया है। सोम, गाति तभी मिल सकेगी जब हम मिलन के टूट सपना कामवार ../नया गिाएँ कर उन्हे असलियत म बदल देगे। मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि तुम्हारे किसी भी अच्छे काय मे मेरा साथ जरूर होगा। मुझे यकीन है कि तुम जरूर इस कलक को दूर कर दोगे। यहाँ से छुटने के बाद हम मिलन के माता पिता से मिलने जरूर जायेगे। उन्होने अपना इकलौता बेटा खो दिया है। हम उनके बेटे वनकर गाव वालो की मदद करेग । मुझे इ० जयचद पर पूरा भरोमा हे कि वे तुम्हे यहाँ से छुड़ा देगे। मै तो हरदम उनकी सहायता के लिए तैयार हूँ।" उसी समय जीप गाडी का हार्न सुनाई दिया और रॉवी कुशल को फिर मिलने का वादा करक उस कमरे से निकल गया। आज रावी के चेहरे पर रौनक देख- कर कुशल को एक जात्मिक शाति प्राप्त हुई। प्रकरण पाँच वाड-बाय को इ० जयचद अपने पुलिम-स्टशन ले गए और वहाँ पहले लॉक-अप मे बन्द कर दिया। एक घटे के बाद उन्हाने उसे बाहर निकाल कर अपने पास बिठा लिया। जय जयचद ने तरह-तरह के सवाल पूछने शुरू किए। इस वाड-वॉय का नाम था किसन कदम । किसा ने अपनी पूरी जानकारी दी-वह चौवीस साल का है और उसकी मादी हो गई है तथा उसकी एक साल की बेटी भी है। वह उम सरकारी अस्पताल के क्यारो म ही रहता है। रामूदादा दम अस्पताल में अपने एक माधी को देखने जाया या जा नशीली चीजा का बुरी तरह शिकार हो चुका था। उस समय रामूदादा ने स ४१/नयी दिशाएं किमन को दस रुपये चाय-पानी के लिए दिए थे। जव किसन ने रामू दादा की उदारता की वात अपने और साथियो को बताई तो वाद में रामूदादा ने उन्हे भी इसी तरह पैसे दिये। बहुत-से वाड बाय उसे जानने लगे थे। किसन ने बताया वह वेहद खतरनाक आदमी है। यदि मै आपके द्वारा पकडा गया हूँ, ऐसा मालूम हुआ तो मेरी बुरी हालत कर देगा। किसन रोने लगा। अपनी सफाई मे उसने बताया कि यहा का पगार बहुत कम होने की वजह उसे ड्रग्ज वेचने का भी धधा करना पडता है। इ० जयचद ने पूछा-"यह तुम्हारा रामूदादा रहता कहा है ? और वह दीखता कैसे है ?" किसन ने हिचकिचाते हुए कहा-"साव, उसका कोई ठिकाना नही, वह पैसे वसूल कर लेता है और चला जाता है।" उसी समय दो कास्टेवल एक चोर को पकड कर वहा ले जाये। उस चोर के पीछे काफी लोग ये । इ० जयचद ने उसे लाक-अप म वद कर दिया और इन लोगो को वहा से भगा दिया। वह चोर कोई और नही या वह रामूदादा काही जादमी था। इ० जयचद को शक तो हुआ था। उसने उसे एक दूसरे कमरे मे रखा और ठीक तरह से जवाव न देने के कारण उसे मार खानी पडी। उसे ऐसा लगा कि किसन कदम को कुछ देर के लिए छोड देना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सकता था। इ० जयचद वोले-"देखो जाइन्दा ऐसे बुरे काम मत करना नही तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी।" किसन ने पैर छू लिए और वह वहाँ से भाग गया। किसन कदम को छोड़ने के बाद इ० जयचद ने अस्पताल के प्रमुख डाक्टर को फोन कर दिया और बता दिया कि वह उसी रात को सभी वाड-वायज़ से मिलना चाहते है । डाक्टर ने बताया कि शायद यह सम्भव नहीं है। वे एक- एक वाद के वार्ड-वायज़ को बुलाकर उनसे मिल सकते है । इ० जयचद ने एक एक वाड म उनमे मुलाकात की और इन जह रीली और मशीनी चीजो के वारेम नमझाया तथा यह चेतावनी दी कि यदि ऐसे अपराध से करेंगे ता उनकी नौकरी चली जायेगी और वे जेल म मुसीवत उठाते रहगे। उनके बाल-बच्चे फुटपाथ पर आ जायेंगे। इतना ही नहीं बल्कि वे बदनाम हो जायेगे। उन्होन बताया कि क्सिन पदम की वजह स पूरे अस्पताल की बदनामी हो गई है। इसस ४२/नया गिगाएं लोगो का अस्पताल से विश्वास उठ जाएगा और लोग अपने बीमार आदमियो को जस्पताल भेजने के लिए तैयार न होगे। इसके बाद इं० जयचद ने हर एक वाड-बॉय से अलग-अलग मिलकर उसकी पूरी जानकारी हासिल की। कुल चार वाड बायज ये नशीली दवाएं वेचते थे। अकेले म मिलने के कारण इ० जयचद को काफी लाभ हो गया। कुछ लोगो ने रामूदादा का वर्णन किया और जन्य कुछ साथियो की भी जानकारी दी थी। जब इ० जयचद का काम जासान हो गया था। वे जस्पताल के मुख्य डाक्टर से मिले तो उन्होंने इ० जयचद की हर तरह से मदद करने का वचन दिया। अस्पताल के आसपास नशा- खोरी के भयकर परिणामो के पोस्टर्स लगा दिये गये। उन्होंने यह भी मजूर किया कि कुछ दिनों के लिए कुछ पुलिस अधिकारी मामूली पोशाको में अलग-अलग वार्ड मे घूमते रहेगे । जस्पताल के मुख्य डाक्टर ने सभी डाक्टरो एव नों को सूचित किया कि वे बाहर से आने वाले लोगो की ओर सजगता से व्यान दे। एक हफ्ते मे ऐसी हलचल मची कि अस्पताल का नाम अखवार मे आ गया और वह वदनामी से बच गया। ३० जयचद रामूदादा को पकडने की फिक्र में थे। यदि यह सावित हो जाय कि रामूदादा ने ही मिलन का खून किया है तो कुगल की रिहाई हो सकती थी। इ० जयचद दो बार भेप बदलकर उस वस्ती के चक्कर लगा जाए ये। एक बात की जानकारी इ० जयचद को हो गई कि वस्ती के लोगा म से वहुत-से लोग तस्करी का धधा करते है। उनके झोपडा म बम्बई के लोगो को हर चीज मिल सकती यी। बाउन-शुगर भी वहा मिल सकता था। वहाँ के सभी लोग रामू- दादा की बहुत इपजत करते थे क्योकि उमने वस्ती के जनेक गरीव लोगो की मदद की थी। गमूदादा को पकड़ने के लिए सबूत का होना जरूरी या । अस्पताल के वार्ड वाय से उसे काफी जानकारी नहीं मिल सकी लेकिन उसके जन्य साथियों पर कडी नज़र रखकर इ० जयचद ने रामूदादा की जानकारी प्राप्त कर ली थी। एक वार वे भिखारी वनकर एक पेड के नीचे बैठे तो किसी बूढे ने रामूदादा कहकर बुलाया ४३ / नयी दिशाएं था तो रामूदादा रक गया था। उसी वक्त इ. जयचद न उसे गौर से देखा और निश्चय किया कि वह इसे वहुत जल्द ही मिलन के खून के इल्ज़ाम म गिरफ्तार कर लेगे। रामूदादा ऊँचे कद का और मजबूत शरीर का गुण्डा था। उसका चेहरा देखकर और उसकी दाढी देखकर लोग डर जाते थे। उसके हार के नीचे तकरीवन पचाम ऐसे लाग ये जो ब्राउन शुगर, हरोइन, चरस आदि चीजे वेचते थे। इनमें से कई लोगा को उसने गलतियो के लिए खूब मारा था और जरमी होने के बाद डाक्टर की दवाइया भी स्वर ने ही लाकर दी थी। जपने इलाके के सभी पुलिस अधिकारियो का ता वह जानता था। कुछ अधिकारियो का तो वह पैसे देकर निपटा देता या लेकिन जो जपने फज़ के लिए ईमानदार थे, उनसे वह डरता था। इ० जयचद उनम से एक थे जिनसे वह अपने-जापको पचाने की कोशिश करता था। ये जहरीली चीजे वेचनेवाले उसे ऐसी जगह मिलते थे जहाँ से वह आसानी से कही भी भाग मकता या । उसने किसी भी ड्रग-पेडलर को अपना पता नहीं दिया था। उसके सारे कार नामे रात के वक्त शुरू होते थे। ड्रग पेइलर उससे जहरीली चीजे ल जाते थे और दूसरे दिन उसे पैसे मिल जाते थे। वह पैसे इक्टठे करके जपने वास के सुपुद कर देता था । उसका वास हमेशा कार म जाता था और नशीली चीज़ो की यैली देकर वसूल किए हुए पैसे ले जाता था। रामूदादा ज्यादा पढा-लिखा नही था लेकिन दूटी फूटी अग्रेजी से वह काम चला लेता था । वम्बई के जुहू के किनारे मछुओ की वस्ती म वह रहता था और उसी के घर से ज़रा दूरी पर रात के समय किनारे पर नावे आती रहती। उनम से वहुत-से तस्करी के सामान उतारे जाते थे। वहा कुछ मोटर जाती और सारा सामान लेकर जश्य हो जाती । रात के सन्नाटे म सुनसान किनारे पर ऐसा धधा चलता रहता था। वीच-बीच म कभी-कभार बहुत से पुलिस अधिकारी जाते जार कुछ तस्करा को पफ्ड कर ले जाते । सागर का सुनसान किनारा दूर तक फला हुना था इसलिए पुलिस द्वारा इनका पकडना बहुत ही मुश्किल था। इस सुनसान किनारे पर कई वार तस्करा ४/नयो दिशाएँ के खून हो चुके थे। कुछ पुलिस अधिकारी भी तस्करी की गोलियो का निशाना बन चुके थे। रामूदादा का वचपन ऐसे ही माहौल मे गुजरा था इसलिए तस्करी की वातो मे वह बहुत सजग और चालाक वन गया था। पलक मारते ही वह दूसरे जादमी की नियत जान जाता या। वह कभी-कभी जान-बूझकर नशीली चीज़ा के एक दो पैकेट ज्यादा देकर अपने साथियो की ईमानदारी को परख लेता था। द- मागी करने वाले को वह बहुत पीटता था। रामूदादा भी गरीरी की आग में झुलस उठा था। उसके माता- पिता वचपन मे गुजर गये थे। वाद में उसने उसी वस्ती की एक गरीव नड़की से शादी कर ली थी और उससे चार साल का बच्चा भी था । वह अपने बच्चे को पढाना चाहता था और इस वस्ती से दूर किमी अच्छी वस्ती म मकान लेकर अपनी बीवी और बच्चो को रखने वाला था। उसने अपनी बीवी से यह कह रखा था कि काई भी गगर उसके बारे में पूछताछ करे तो 'मालूम नहीं' यही उत्तर देना । घर पर वह कभी भी आता और कहीं भी चला जाता। बीवी बेचारी चिन्ता और तनाव में जी रही थी। एक बार रामूदादा पर किसी न चाकू का वार किया था लेकिन बडी होशि- यारी से उसने उस वार को बचाने की कोशिश तो की लेकिन दाहिने कान के पास के गाल पर जरम की लकीर उभर गई थी और उससे वहन वाले खून से सारा चेहरा लाल हो गया था। बाद मे घाव तो अच्छा हो गया या लकिन दाहिने गाल पर जख्म का निशान हमेशा के लिए रह गया था। उस समय से रामूदादा की वीवी डर का शिकार हो गई थी। वह रामूदादा को यह काम छोडने के लिए भी नहीं कह सकती थी क्योकि रामूदादा का वॉस बहुत ही खतरनाक आदमी या । उसने कुछ महीने पहले रामूदादा के साथी को वरली के समुद्र के किनारे पर पिस्तौल की गोलियो से मार डाला या और उसी बाँस के साथियो ने लाश को बड़े पत्थर से वाधकर समुद्र मे फक दिया था । वास का रामूदादा पर वडा भरोमा या। इ० नयचद तकरीवन ग्यारह बजे के बाद रात को अपने कुछ साथियो के साथ सागर के उस किनारे जा छिपे जहा तस्करी का ४५/नयी दिशाए सामान आया करता था। उन्होने अपनी जीप गाडिया किनारे मे दूर छिपाकर रखी थी और उन ड्राइवरो को बता दिया था कि जब पटाखो की आवाजे सुनाई दे तो वे फौरन वहा पहुँच जायें। रात का करीव एक बज चुका या फिर भी किसी का पता नहीं था। थोडी देर के बाद समुद्र मे कुछ रोशनी दिखाई देने लगी। अलग अलग जगहो पर रोशनी के दीये तैरते दिखाई दे रहे थे। इ० जयचद अपने साथियो के साथ सतक हो गये । किनारे पर उतरकर वे अपने मामानो के साथ चलने लगे तो पीछे से बहुत-से लाग आये और उन्होने इन सभी को पकड़ लिया। अचानक हमले के कारण और शरीर पर सामानो का बोझ होने के कारण वे माग नहीं सके। फौरन पटाखो की आवाजे शुरू हो गयी और चारो ओर मे जीप गाडियाँ आ धमकी। सामानो सहित वे सभी गिरफ्तार हो गए। उनमें से एक या रामूदादा। रामदादा का गिरफ्तार होना एक वडी घटना थी। दूसरे दिन इस घटना की पूरी खबर अखबार में छप गई। रामूदादा का फोटो भी जखवार मे छप गया था। पुलिस ने रामूदादा कमरे में बद कर रखा था। उससे मिलने की इजाजत किसी को भी नहीं दी गई। उसकी पत्नी अपने बेटे के साथ वहाँ आई थी। इ० जयचद ने उसे बिठाया और उसे चाय पिलाई और उसे समझाने की कोशिश की तो वह रोने लगी और उसके साथ वह चार साल का बच्चा मी रोने लगा। इ० जयचद स्वय उन्हे रामूदादा के पास ले गए । रामूदादा तो अपनी पत्नी पर गरम हो गया और उसन कहा -"मेरे बेटे को यहाँ क्यो ले जाई । दोवारा यहाँ मत आना। यह जगह मेरे बेटे के लिए अच्छी नहीं है । और आगे चलकर मेरे वारे मे उसे कुछ न वताना । म तो वरवाद हा गया हूँ लेकिन इसे म अच्छा इन्सान बनाना चाहता हूँ। पढ लिखकर वह इज्जत की जिन्दगी बसर करेगा।" इ० जयचद ने डरा-डराकर रामूदादा के जीवन के बारे म उसके माथियो से बहुत जानकारी प्राप्त की थी। उन्हें ऐसा लगा पि रामूदादा को बहुत ही सुरक्षित जगह पर ले जाना चाहिए क्यालि उसकी जान के लिए खतरा पदा हो सकता था। रामूदादा को एक विशेष ४६ /नयी दिशाए ही उन तस्करो के नाम बता सकता या जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तस्करी के जाल में फंसे हुए है । इ० जयचद द्वारा रामदादा को पूना की जेल में रखा गया। वहाँ इ० जयचद ने बडी सावधानी से और चतुराई से रामूदादा से मिलन के खून की जानकारी प्राप्त कर ली। रामूदादा को इ० जयचद ने साफ-साफ कह दिया~"तुम्हारे दूसरे साथी ने मिलन के खून के बारे में सब कुछ बता दिया है कि खून तुम्हारे द्वारा हुआ है । अपने अपराध को स्वीकार करने से सभी काम आसान हो जायेंगे। मुझ यह भी मालूम है कि तुम्हारे बॉस ने ही तुम मवको मिलन को मार डालने का हुक्म दिया था। अव तुम्हारा बाँस भी गिरफ्तार हो चुका है। रामूदादा ने यह सुनकर जाश्चर्य प्रकट किया । वह अन्दर से बहुत ही डर गया था। उसने ऐसा महसूस किया कि अब उस पर बड़ी मुसीवत जा गई है । जेल मे बाहर जाने के बाद वांस के लोग उसे जिन्दा नहीं छोड़ेगे । उन्हे लगेगा कि इस आदमी ने सारा भेद बता दिया होगा और अब उनकी लाखो की कमायी डूब जाएगी। इ० जयचद ने उसे सोचने का वक्त दिया और वे वाहर चले गए । रामूदादा की जाखो के सामने उसकी वीवी और छोटा बच्चा बार-बार जा रहे थे। पश्चात्ताप के कारण उसे ऐसा लग रहा था कि सही बात बताकर जी का बोझ हल्का कर लिया जाये। एक घण्टे के बाद, इ० जयचद वहाँ आ गये तो रामूदादा ने उन्ह सव कुछ बता दिया और बताने के बाद उसे पश्चात्ताप भी होने लगा। इ० जयचद ने रामूदादा की सारी तहकीकात टप-रेकाडर पर रेकार्ड कर ली। उसने मारी बातें बता दी लेकिन जव मी उसे अपने वाम के बारे में विशेष जानकारी नहीं थी। रामूदादा के द्वारा मिलन मारा गया था। मिलन ने रामूदादा तथा उसके साथियो के साथ झगडा किया और उसने रामूदादा के साथी को बहुत पीटा और उमे पुलिस स्टेशन की ओर ले जाने लगा या तव रामूदादा ने उसकी पीठ पर चाकू का वार किया था। इमी वार मे मिलन गिर पडा। इरादा धमकान का पा लेफिन गलती से उसके हाथो सून हो गया था। रामूदादा ने रहा--"मिलन सचमुच एक अच्छा लडका था।" ४०/नयी दिशाएं दूसरे दिन गमूदादा ने जितने भी नड्डा के नाम वताए ये और नशीली चीजे वेचनेराली दुकाना के पते प्रताये थे उन सभी लागा को गिरफ्तार कर लिया गया था। तकरीरन पीस लाख का गाउन शुगर, हेराइन चरस आदि चीजे पुलिस ने कब्जे म ली। अखबारो मे सारी बाते छपकर आयी और यह भी उपकर जाया कि रामू दादा ने मिलन का चून दिया है न कि कुगल ने । रामकृष्ण कालेज के विद्यार्थी बहुत ही खुश हुए । प्रिंसिपल खोसला और वाइस प्रिमिपल भारती फूले न समाये । कालेज की प्रतिष्ठा और मान मर्यादा बच गई । जखबार सोमोटिस वोट पर लगाया गया। सागर परिवार भी फूला न समाया । गुगल के सारे मित्र उससे मिलने के लिए वेकरार हो गए। मिलन के गाँव मे भी यह खबर पहुंची तो दयानद और जानकी की आये नासुजो से भर गयी । वे कुशल से मिलने का फैसला कर चुके थे। उन्हान कुशल के बारे मे ऐमा कभी नहीं सोचा था कि कुशल मिलन का खून कर सकता है । उनका सोचना कितना सही या। उनके दिन का वोझ हल्का हो गया पा। कुगल को ये दूसरा मिलन समझने लगे थे। उसे उन्होन वेट का प्यार दिया था इसलिए उनके मोचने का तरीका भी मां-बाप जैसा ही था। मिलन के इस छोट से गाव के मिलन की जीवन-कहानी छप गई और गाव का नाम भी जा गया तो सभी लोगो के दिलो मे मिलन के लिए श्रद्धा और प्यार का भाव दुगुना हो गया। चदनपुर के मुखिया शकरदास तो लाठी टेकते हुए दयानद के घर मा पहुँचे और कितनी ही देर तक वे वातचीत करते रहे। इस बूढे ककाल म मिलन के लिए कितना प्यार छिपा था । वे वहा से दयानद जौर जानकी को मिलन की समाधि की ओर ले गए। उन्होने उस समाधि पर फूल चढाये और मन ही-मन मिलन की तारीफ की। शकरदास ने बताया- मिलन वेटे की सारी इच्छाये पूरी होनी चाहिएँ । मै मरने से पहले इस गाव मे उसके सारे सपनो को साकार करना चाहता हूँ। मिलन की यह समाधि जव समाधि नहीं बल्कि प्रेरणा का मन्दिर होगा। पूरा गाव जब काम म लग जाएगा। देखो दया, पहले हम इस कच्ची समाधि को पक्की बनायेगे। चारो ओर गुलाब के पौधे लगायेगे क्योकि ४८/ नयी दिशाएँ । मिलन को गुलाव बहुत अच्छे लगते थे।" कुछ देर वे दोनो मौन रहे और वाद मे वे धीरे-धीरे वहाँ से चले गये। सुवह उठकर रॉवी ने अखवार मे पढा तो वह खुशी से उछलने लगा। उसने अपने दोस्तो को फोन किए और कुशल के घर पर भी फोन किया। जल्दी-जल्दी वह कपडे पहन कर तैयार हो गया और वहा से पुलिस स्टेशन गया। वह इ० जयचद से मिलने आया था लेकिन उस समय वे मिले नहीं । उन्होने वहाँ 'अभिनदन' की एक चिटठी छोड दी नौर वह कुशल को मिलने गया लेकिन उस समय रॉवी को अन्दर नहीं जाने दिया। लाटरी लगने पर या यूब पैसे मिलने पर किसी इसान की जो मन स्थिति होती है वही मन स्थिति रावी की हो गयी थी । और, जव वह वहा से कालेज गया और उसने प्रिंसिपल एव वाइस-प्रिंसिपल से मुलाकात की तथा दूसरे दोस्तो से भी वह मिला तब उसके दिल को राहत मिली । अधिक खुशी भी वाहर आने के लिए तडपती है। वह अपने दोस्तो के साथ नोटिस वोर्ड पढने लगा। इस पूरी खबर मे राबी का नाम भी जाया था। इ० जयचद ने उसकी तारीफ की थी। रावी खुश हुआ और उसने सभी दोस्तो से कहा कि परीक्षाओ के वाद हमे मिलन के गाव जरूर जाना चाहिए। कुशल के पिताजी मि० सागर ने इ० जयचद को फोन पर बधाई दी और उहोने कुशल को बचाने के लिए जो तकलीफ उठाई थी उसके लिए शुक्रिया जदा किया । जपने बेटे को निर्दोष पाकर सबसे ज्यादा खुशी श्रीमती सागर को हुई थी। वह तो अपने बेटे को गले लगाने के लिए वेकरार थी। वह इ० जयचद को मिलना चाहती थी। उसने वहा फोन भी किया था लेकिन वे वहा नही थे। वे तो ड्रग-पेडलरो के साथ (नशीली चीजे बेचने वालो के साथ) उलझे हुए थे और इस कोशिश मे थे कि उन बडे-बडे जादभियो के नाम बता दे जो इन जहरीली चीजो का वेचकर देश के नौजवानो को बरवादी के रास्ते पर ले जा रहे है। इ० जयचद उन्हे जड से उखाड देना चाहते थे। दुर्भाग्य से उनके कुछ साथी इतनी दिलचस्पी नहीं ले रहे ये जितनी उन्ह लेनी चाहिए थी। इ० जयचद को इस बात का दर या ४९ / नयी दिशाएं कि वहा की सारी गुप्त वात ड्रग-पेढलरो मालूम न हो जाये । जा भी पुलिस अधिकारी इन ड्रा-पेडलरा मे पैसे कमाते ये उन सभी के नामो की सूची इ० जयचद को मिली थी। ये सारे नाम उन्हाने सी० बी०आई० के मुपुर्द किए थे। अभिनदन' के काफी पन उह जा रह ये लेकिन उन्हे पढने के लिए उसके पास समय न था। केवल वे कुशल से मिले और उन्होने उसकी रिहाई की खुशखबरी उसे दी। कुशल खुश हुआ लेकिन कोधित भी हुआ। वह चाहता था कि रामू दादा को फासी की सजा मिल जाये । इ० जयचद ने उसके जोश को शात करके कहा---'"देखो, कुशल रामूदादा ने मिलन का खून जरूर किया है लेकिन वह इतना बुरा नही जितना तुम मोचते हो। यदि वह अपना अपराध स्वीकार न करता तो वहुत दिनो तक तुम्ह मान- सिक संघर्ष के बीच से गुजरना पडता और पुलिस-डिपाटमेट का भी दिन-रात की खोज मे हैरानी हो जाती । कुशल, रामूदादा का भी अपना परिवार है, उसकी बीवी है, उसका चार साल का बेटा है। कुशल, हम पुलिस वाले हमेशा इन जपराधियो से सख्ती से पेश जाते हे पर हम यह कभी नहीं भूनते कि वे भी इन्सान है। रामूदादा एक ऐसे माहौल मे पला है इसलिए वह ऐमा अपराधी बन गया। अपराधी ऐसे का जीवन तनाव और दु खो से भरा रहता है । पता नही, कानून उसे कुछ मालो की सजा देकर छाड देगा या उसे फामी की सजा देगा, लेकिन मैं जानता हूँ कि उसके हाथो मिलन का खून जानबूझ कर नही हुआ है । तुम जिस मानसिक कष्टो से गुज़रे हो उसके लिए मुझे अफसोम होता है। मिलन का खून जिभ वान के लिए हुआ है, उस वात को अपने जीवन से हटा दो। कुशल नशीली और जहरीली चीजो को विल्कुल हाथ मत लगाओ।" इ० जयचद कुछ कुछ उत्ते जिन हो गये और कुशल से हाथ मिलाकर वहा से चले गये। अव कुशल के मन मे तरह-तरह के विचार आने लगे। उमे मिलन के वाक्य याद आने लगे--मन का निश्चय होगा तो इन्सान क्या नहीं कर सकता ? कुशल माचना छोडो, पढाई करो, मेहनत करा । उज्ज्वल भविष्य के प्रकाश से तुम्हारा जीवन प्रकाशित होगा। कुशल को मिलन ही दिखाई दो लगा था। मिलन के माता- पिता की याद ने उसे इस बात को सोचने पर मजबूर किया कि । ५०/नयी दिशाएं उन्हे जल्दी-से-जल्दी मिलना चाहिए। उसे इस अस्पताल से जाने के लिए डाक्टरो के डिस्चाज सर्टिफिकेट की ज़रूरत थी। इस वात के लिए मि० सागर और श्रीमती सागर की जरूरत थी। कुशल उनके इन्तजार मे या । उसी समय, रावी वहा आता हुआ दिखायी दिया। रॉबी को देखते ही कुशल का चेहरा खिल उठा। दोनो एक-दूसरे के गले लग गये । कुशल ने कहा कि हमारा पहला काम यह है कि हमे मिलन के माता-पिता से मिलना चाहिए। रॉवी ने कहा--"हाँ, हम जरूर मिलेगे । अब अकल और आण्टी आने वाले है । अव तुम्हे जपने घर जाना है।" प्रकरण छा 'कुशन की रिहाई के कारण उसका पुनर्जन्म हो गया था और उसके माथे का कलक धुल गया। सागर-परिवार, कालेज के प्रिंसि- पल, वाइस-प्रिसिपल, प्रो० भारती, अन्य अध्यापक और विद्यार्थियो ने एक उत्साह का अनुभव किया। रांबी और अन्य मिन तो खुशी से झूम उठे । अस्पताल छोडते समय कुशल का मन सतुष्ट था कि वह जपने प्यारे मिन मिलन का खूनी नहीं है । जैसे-जैसे कुशल के कदम घर की ओर वहे, तो उसके मन मे विचारो का द्वन्द्व शुरू हो गया । मोटर-गाडी जुहू के किनारे से उसके वगले की और दौड रही थी। गाडी मे मि० सागर और डा० रोहित थे लेकिन कुशल अपने विचारो मे इतना डूब चुका था कि उसे उन दोना के अस्तित्व का अनुभव ही न हुना। ५१ / नयी दिशाएं दुनिया की नज़रो मे वह वेकसूर या लेकिन मिलन की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है ? रामूदादा ने उसका खून किया था और मिलन के खून के इल्जाम मे शायद उसे फाँमी की सजा मिल जाये। उसके फामी के लिए कौन जिम्मेदार है ? कुशल को लग रहा था कि इन नशीली और जहरीली चीजो की बुरी लत ने ही इतने घोर अनथ कर डाले । मैं मोचता रहा कि माता-पिता ने स्वार्थी वनकर मेरी जिदगी को वरवादी के रास्ते पर ले जाने के लिए मजबूर किया। वे हमेशा एक-दूसरे से लडते रहते और अपनी इम लडार्ड के द्वारा वे अपने अहकार को पुष्ट करते जा रहे थे। दिखाया, जहकार, धोखे- वाजी भौतिक वस्तुओ की बहुतायत आदि बातो ने कुशल के माता- पिता को जिन्दगी की अमलियत से अलग कर दिया था । कुशल अपने मन के सामने अपने माता-पिता को कमजोरिया देख रहा था। खानदान, परिवार की प्रतिष्ठा आदि बातो की जाड मे मनुष्य के खोखले और नकली व्यवहार कुशल देख चुका था। शायद इन सभी बातो की वजह कुशल का सवेदनशील मन अपनी शक्ति खोकर दुर्वलता का शिकार हो चुका था और इन जहरीली चीजो के सहारे झूठे और आडम्बरयुक्त व्यवहार को भुलाने की उसकी यह कोशिश थी। अव उमे ऐसा लग रहा था कि इन सब बातो के साय उसे संघप करना चाहिए था । अमलियत का मुकावला न करके उसने पलायनवाद को अपनाया था। कुशल सोचता जा रहा था और उसकी बुद्धि कह रही थी कि दूमगे की दुवलतालो को देखना कितना जामान था। मनुष्य हमेशा अपने दुर्गुणो की ओर थोडा-सा ध्यान देकर अपने ही सद- गुणो का गुणगान गाता रहता है । कुशल को लगा कि अपने माता-पिता के दोप देखने का उसे क्या अधिकार है ? क्या उसके दोप कम है ? उसने मा-बाप का दिल तो दुखाया ही है। कालेज के कितने लोगा को उसने दुखी कर दिया। मिलन की मौत ? दयानद और जानकी की असहाय अवस्था | नही, नही, मै खूव मोचूगा तो मेरा सिर फट जाएगा । मै तो कमजोरियो का पुतता हूँ। मेरे बारे मे लोगो की क्या-क्या अपेक्षाए थी। मैंन अपने जहकार के चक्कर म किसी की परवाह ही नही की। उमका मन उमे धिक्कारने लगा। ५२/नयी निगाएँ - कुशल, पदलो, अपने जापको पदलो। अच्छाई को स्वीकार करो, मन को दृढ करो। जव कार वगले के पास जाकर रुक गई और पिता ने उसे बुलाया 'कुशल' तब वह अपने विचारो से जाग गया। मि० सागर ने कहा- "वेटे, मै वहुत वदल गया हूँ। मुझे तुम पर नाज़ है। तुम्हारे बारे म कालेज म अच्छी बाते सुनकर मुझे अपनी गल- तियो का अहसास हो गया है । बेटे, हमने तुम पर बहुत जन्याय किया है । सब कुछ भूलकर खुश हो जालो । तुम्हारे घर लौटने की खुशी मे हमने एक छोटी-सी पार्टी रखी है। तुम्हारे प्रिंसिपल, वाइस- प्रिसिपल, अध्यापक, दोस्त और मेरे मिन और तुम्हारी मम्मी की सहलियाँ आदि लोगो का बुलाया है। मेरी इच्छा है कि तुम अपनी पिछली जिन्दगी भूलकर खुशी के साथ या जीरन शुरू करो।" कार से उतरते समय अपने पिता के मुह से ऐसी बाते सुनकर कुशल को एक प्रकार की खुशी हुई। डाक्टर रोहित ने भी उसके कवे पर हाथ रखकर उमे होमला दिया। कुशल ने कहा- डैडी, मुझ माफ कर दीजिए। मैने आपको बहुत तकलीफ दी है।" वगले मे प्रवेश करते ही पाश्चात्य संगीत सुनाई देने लगा। सभी कुशल को मिलने के लिए उत्सुक थे। मुस्कराकर कुशल सबसे हाथ मिलाता जा रहा था । बगले मे जाते ही उसने अपनी माँ और वहिन को गले लगा लिया और नौकरी से बातचीत की। वह अपने दोस्तो से मिलकर खिल गया और कितने ही दिनो के बाद वह अपने दोस्तो के साथ मिलकर ज़ोर-ज़ोर से हस रहा था। जव कुशल ने प्रिंसिपल, प्रा० भारती तथा अन्य अध्यापको से माफी मागी तो प्रो० भारती ने कहा-"हम तुम्ह फिर से पुराने कुशल के रूप में देखना चाहते है । सब कुछ भूलकर पढना शुरू करो।" कुशल ने अपने-आपको सुधारने का वचन दिया। इस पार्टी में रह-रहकर कुशल को रावी की याद आ रही थी इसलिए उसने अपने जन्य दोस्तो से रॉवी के बारे में पूछा भी लेकिन उन दोस्तो ने कहा कि रावी ने ही उन्ह यहाँ बुलाया था। कुशल जव भी मानमिक रूप से स्वस्य नहीं था क्योकि वीच-बीच मे वह एकदम निराश हो ५३/ नयी दिशाएँ जाता था और वह अपने-जापको अपराधी समझने लग जाता था। थोडी देर के बाद रावी आया और वह कुशल से जा मिला। कुशल ने उसे देखते ही गुस्सा करने का अभिनय किया और देर से आने की वजह पूछी। रावी ने अपने दोस्त अजय के बारे में यह बताया कि वाउन-शुगर की वजह से उसे अस्पताल मे रखना पड़ा या और अब ठीक होने की वजह से उसे घर छोडने गया था। कुशल अजय को जानता था और उन दोना ने दावार मिलकर वाउन- शुगर का नशा भी किया था। अजय के बारे म सुनकर कुशल दुखी हुआ और उसने राबी से कह दिया कि किसी भी हालत म उसे इन जहरीली चीजो से छुडाना होगा। कुशल को ऐसा बोलते सुनकर राजी को बहुत अच्छा लगा। वातो बातो म प्रिसिपल खोसला और मिस्टर सागर की पीढिया के बारे मे बातचीत शुरू हो गयी। पुरानी पीढी के लोग नई पीढी के लोगो को समझने की कोशिश नहीं करते । इस बात को समझाते समय प्रिसिपल ने मि० सागर से कहा कि नई पीढी के विचारो को जानना जरूरी है। प्रो० भारती ने भी यह कहा कि हमारे पुराने विचारा का जनेक वार वनमार जीवन के साथ कोई सम्बन्ध नही होता। उनसे कुछ भी लाभ नहीं होता फिर भी हमारी पुरानी पीढी जबरदस्ती से इन रीति-रिवाजो को नयी पीढी पर थोप देती । मि० सागर न प्रो० भारती का विरोध किया और बताया कि हमारे पुराने रीति-रिवाज ऐसे ही नहीं बने है । इन रूढियो के पीछे हमारे बुजुर्गा के जीवन का अनुभव छिपा है । जीवन के इन अनुभवो के आधार पर ही ये रूढिया बनी है। इन्हे वधन मानने के बजाय मनुष्य-जीवन को ठीक तरह से चलाने के लिए इह सुशी से स्वीकार कर लेना बुद्धिमानी हागी । प्रो० भारती कुछ कुछ उत्तेजित-से हो गये "देखिए सागर साहा, जा रीति रिवाज समय के साथ जनुप- युक्त हो जाते हैं उन्ह निकाल देना चाहिए । समय की धाग के साथ मनुष्य-जीवन भी वहता जाता है। हम जीवन को सीमित बनाकर पुछ रीति रिवाजो मे नही घराध सकते । यदि हम ऐसा करते तो आज २४/ नयी दिशाएं तक हमारी जो तरक्की हो गयी है वह नही होती। एक जमाने में जाति-भेद की भावना ठीक थी क्योकि इसके आधार पर मनुष्य के अलग-अलग व्यवसाय जाधारित ये लेकिन आज इस वैज्ञानिक युग में इस बात को हम स्वीकार नहीं कर सकते । उस ज़माने म मनुष्य के पास काफी समय था इसलिए उस समय का मनुष्य पूजा-पाठ और कर्मकाण्डो म तीन-चार घण्टे विता सकता था लेकिन आज की इस तेज़ ज़िन्दगी मे कोई भी नौजवान पूजा-पाठ मे इतना समय नही विता सकता। इस तरह की कितनी ही वाते वदल गयी है। हर वात के परिवतन के लिए विरोध तो होता रहा लेकिन इस विरोध के वावजूद रूढियाँ वदलती गयी, और बदलेगी।" मि. सागर प्रो० भारती की वाते ध्यान से सुन रह ये। उन्हे लगा कि मि० सागर गलती पर है। उन्होन जपने विचार रखे -"हमारी नयी पीढी जवानी के जाश में उतावली वनकर गलत काम कर बैठती है । वे जनेक वार विना सोचे समझे कदम उठाते है और नतीजा यह होता है कि वे जीवन में असफल हो जाते है। उनकी जसफलता की वजह से मा-वाप को परेशानियाँ उठानी पडती है। हम किसी भी वात का जव समझाते है तो वह इन नौजवानो की भलाई के लिए ही होती है और उसमे स्वार्थ की वात तो विल्कुल नहीं होती। फिर भी इन नौजवानो को ऐसा लगता है कि हम जपने विचार थोप रहे हैं। वे हमारी वाते सुनते नहीं और अजाम ? निराशा । और इसी निराशा के कारण उनके कदम गलत रास्ते पर पड जाते हैं।" कुशल जपने पिता की वाते सुन रहा था और उसे ऐसा लग रहा था कि पिताजी उसी के जीवन को सामने रखकर बाते करते जा रह हे । प्रिसिपल खोसला ने इस बहस में दिलचस्पी ली-"देखिए सागर साहव जाप रूढिया और सिद्धातो को मिलाकर सोच रहे हैं। प्रो० भारती रूढियो, रीति-रिवाजों की वाता पर जोर दे रह ह और जाप उन जादर्शा की वाते कर रहे है जो हम सभी के लिए लागू होते है । मैं समझता हूँ कि मनुष्य अपनी जावश्यकतालो के अनुसार नियम बना लेता है और उनका पालन करके अपने जीवन को ५५/नयी दिशाएँ सुचारु रूप से चलाने का प्रयास करता है। समय-परिवतन के साथ जब मनुष्य की आवश्यकताएं खत्म होती है और वे नियम रूढिया बनकर चलते रहते है तब नयी पीढी इन रूढियो के विरुद्ध वगावत कर देती है। आज ये जाति-भेद, ये प्रातीय-भेद, ये भापा-भेद, ये धर्म-भेद आदि भेदा की दीवार खड़ी हो गई है। इसलिए जीवन में सघप की भावना का आगमन हो गया है। नई पीढी खुली हवा में सास लेना चाहती है और इन भेदो की दीवारो को तोडना चाहती है।" सागर साहव ने पिराध प्रदर्शित करते हुए कहा-"जिन्हें आप भेद की दीवार कह रहे है वे तो मनुष्य जीवन की सुविधाए है। और मुझे लगता है हर इन्सान को अपने-अपन उसूलो पर चलने का पूरा हक है।" प्रिसिपल ने कहा--"आप विल्कुल मही फरमा रहे है, लेकिन अपने उसूलो पर चलने का पूरा हक निभाते समय हमे इस बात का रयाल रखना चाहिए कि दूसरो के हक भी होते है । वात यह है कि हम जपनी ही बातो का वढा-चढाकर महत्त्व प्रदान करते रहते हैं और प्रत्यक्ष रूप से दूसरा के हको पर दवाव डालते जाते है । नयी पीढी रूढियो की गुलाम नहीं बनना चाहती। एक बार अजमेर मे स्वामी विवेकानदजी को एक मुसलमान मज्जन ने खाने पर आमनित किया। उन्ह लगा कि स्वामी जी कुछ बहाना बनाकर निमन्त्रण नगल दगे । स्वामी विवेकानदजी ने जामार प्रदर्शित करते हुए निमन्त्रण को सहप स्वीकार किया तो वे मुसल- मान सज्जन गदगद हो गए। स्वामीजी उसके घर गये और उन्हान उनके साथ खाना खाया। इसका एक पडोसी हिन्दू धम का कट्टर भक्त था इसलिए उसे यह बात जच्छी नहीं लगी। उसने स्वामीजी से पूछा-"आप हिन्दू है फिर भी जापने मुसलमान के घर खाना खाया?" स्वामीजी ने कहा- "उसने प्यार से बुलाया तो म कैसे टाल सकता हूँ? में तो सन्यासी हूँ और सयासी के लिए धम या जाति का कोई महत्त्व नहीं । किसी की श्रद्धा और किसी का प्रेम ही मेरी जाति है, मेरा धम है।" रूढि के विरुद्ध स्वामीजी की यह वगावत २६/नयी निशाएँ थी जो इसानियत की भावना को बढावा देती है। समय और माहौल के साथ बदलने वाले विचारो का हमको यानि पुरानी पीढी को स्वागत करना चाहिए । मै यह नहीं कहता कि नई पीढी गल- तियों नहीं करती। हमे उनकी गलतियाँ इस प्रकार दिखानी चाहिए जिनसे उनको ऐसा न लगे कि उनका अपमान किया जा रहा है। और साथ-साथ गलतियाँ दिखाने वाले को आत्म-गौरव आ जनुभव नहीं होना चाहिए। पास-पडोसियो के सामने, रिश्तेदारो के वीच हममे से अधिकाश लोग अपने बच्चो की गलतिया दिखाकर उनकी आलोचना करते है। उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करन से उसके वच्चे सुधर जाएंगे। मै तो कहूँगा कि उल्टा उनमे क्रोध की और बदले की भावना जा जाती है। कारण ? सबके सामने उनका अपमान हुआ है । वात ऐसी है कि हमारी नई पीढी भी पुरानी होने वाली है। यदि उनमे स्वस्थ विचारो के बीज नकुरित होगे तो जानेवाली पीढी को जाजादी के साथ जपने विचारो को प्रकट करने का मौका मिलेगा।" कुशल, रॉची आदि नौजवान इनकी वाता को सुन रहे थे। कुशल को लगा कि प्रिंसिपल के विचारो मे सच्चाई की खुशबू है मि० सागर भी सोच में पड़ गए थे। उन्होने उस वक्त तो पार्टी का मजा लूटने की वात कहकर प्रिंसिपल की वाता की उपेक्षा की लेकिन भीतर से वे अपने स्वभाव का विश्लेपण कर रहे थे । मि० राकेश सागर के दादा एक सिद्धातवादी इसान थे लेकिन वे अपने विचारो को मि० सागर पर थोप देते थे। मि. सागर अपने पिता को सम- झाने की कोशिश मे हार जाते थे। जाज उन्हे अपने पिता की याद जाई । अपने पिता के मना करने पर भी उन्होने बहुत-सी वाते उनके मन के विरुद्ध कर डाली थी। वे जब अपने पिता का ही किस्सा दोहरा रहे थे थोडी देर के वाद, वे प्रो० भारती के पास आये और उन्होने कहा --"आप के प्रिसिपल के विचारो से मै प्रभावित हो गया हूँ। पुरानी पीढी के हम लोगो को अपना दुराग्रह त्यागना चाहिए । हँसते-हँसते उन्होने हमारी गलतियो को वडी वसूवी से दर्शाया है।" ५७ /नयी दिशाएं । प्रो० भारती ने कहा-"आप ज़रा सोचिए, कालेज म पढने वाले कितन प्रकार के विद्यार्थी होते हैं । तरह-तरह की जातियो के, धर्मो के और प्रातो के इन विद्यार्थियो मे भेद-भाव नहीं होता। वे सव मिलकर एक स्वस्थ जीवन जीते है । आप अपने बेटे कुशल की ही वात लीजिए। रॉबी गोवा का एक कैथलिक लडका है और मिलन ? एक छोटे से गाँव का आदिवासी लडका । आपस म एक दूसरे से प्यार करते समय एक-दूसरे की मदद करते समय कभी धर्म के बारे मे उन्होंने सोचा है ? विल्कुल नही । लेकिन पुरानी पीढी के लोग जरूर सोचेगे । मि० सागर धर्म, या जाति मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म या जाति के लिए नहीं है । जिस धम के कारण हम आपम मे लडते हा उस धर्म का क्या उपयोग है ? फिर भी मै किसी धम या जाति का दोप नही देता। मेरा कहना वम इतना ही है कि धम या जाति के नाम पर हम इसानियत का गला न घोट द । धम का काम है इसा- नियत की रक्षा । वास्तव मे हमारे विचार स्पष्ट रूप से नयी पीटी के सामने आते ही नहीं । हम अपने को उनसे वडे और अनुभवी समझ कर नई पीढी का उपहास करने पर तुल जाते है । नई और पुरानी पीढियो मे विचारो का जादान-प्रदान एक जत्यन्त महत्त्वपूर्ण चीज है। यदि ऐसा नहीं होता तो हम गलतफहमी के शिकार हो जाते है। अच्छे बुरे का फैसला तभी हो सकता है जब हम साथ-साथ वैठकर जापस के विचारों को समझने की कोशिश करे।" मि० सागर कुछ पला के लिए विचारो मे डूब गये फिर भी वे सभी बाता से सहमत नही थे। मि० सागर ने कहा-"हाँ, प्रो० मुझे ऐसा लग रहा है कि यह विषय गम्भीर है और हम इस पर सोचना चाहिए। हम दानो अपने-अपने हाय मे खाली तश्तरियाँ पकडे वैठे है । आइए, कुछ पट- पूजा हो जाए।" दोनो ने अपनी तश्तरियो म कुछ भोजन परोस लिया और वे खाने बैठ गये। पार्टी में जो भी खाना लेना चाहते थे वे भेजो पर रखे गये खाद्य-पदार्था की ओर जाकर अपनी-अपनी तश्तरी में जो भी चाहते ले लेते थे। कुशल का सोचना शुरू हो गया क्याकि सोचने की उसे एक जादत-सी पड गई थी। पार्टी उसके लिए रखी गयी थी और जाधे से ज्यादा लोग उसी के बारे म बातचीत कर रहे थे लकिन कुशल ५८/नयी दिशाए इतनी मोड में भी अपने-चापको अकेला महसूस कर रहा था। आज उसे अपने-आप पर ही क्रोध आ रहा था, क्योकि उसे लग रहा था कि वह अपने मां-बाप के लिए वोझ बन गया है। उसे अपने पैरो पर खडे होकर जीवन का नया अध्याय शुरू करना था, अपनी कम- जोरियो से लडना था और जहरीली और नशीली चीजो की बुरी लत को जलाकर खाक करना था। पता नही, उसके दिमाग में कितने विचार आ रहे थे । वह रावी के पास गया। उसने रॉबी को वाहर बुलाया और धीरे से कहा--"रॉबी, मैने कितने ही दिनो तक कुछ भी पढाई नहीं की। यदि मै वी० काम० की इम फाइनल परीक्षा मे अच्छा परिणाम न लाऊ तो मुझे दुख होगा। मै प्रो० भारती से कहकर अगले वर्ष के लिए वी० काम० की तैयारी करूगा।" रॉची ने सोचकर बताया, "कुशल, वात सही है । इस फाइनल इयर मे फस्ट क्लास नहीं मिला तो पूरी जिन्दगी बिगड जाएगी । जव तक तो तुम अव्वल आते रहे हो और डटकर परिश्रम करोगे तो तुम फिर से जव्वल जा सकते हो । मेरी यह बहुत ही तीन इच्छा है कि तुम पूरे विश्वविद्यालय में प्रयम जाजो। छोटे-मोटे कामो की वजह से मेरा भी अध्ययन रुक गया था। माँ की बीमारी के कारण भी मुझ चार पाच पार गावा जाना पड़ा। मै भी जगले साल ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की कोशिश म रहूगा। चलो, हम प्रो० भारती से अपना इरादा बता दे और उनकी मलाह ले।" पुशल और रावी न प्रो० भारती को वचन दिया कि वे कड़ी मेहनत करके अच्छी सफलता प्राप्त कर दिखाएगे। कुशल ने दूसरी एक बात के लिए प्रो० भारती से सलाह मागी। कुशल की बात सुन पर प्रो० भारती को ताज्जुब हुना क्योकि कुशल अपने पिता का घर छोडकर रॉती के यहां रहना चाहता था और वह पिता की किमी भी हालत मे मदद नहीं लेना चाहता था। प्रो. भारती ने उसे इस बात के लिए टोका कि वह परिवार की जिम्मेदारिया से पलायन करना नाहता है । कुशल ने यह बताया-"सर, मै अपने परिवार समय योडे ही ताडना चाहता हूँ । इनी शहर मे मै रहूगा और अपनी व्यक्तिगत प्रगति करूगा। छोटी-माटी कोई मी नोकरी करके में स्वावलवन का जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ। पर पर रहूगा ५९/नयी दिशाए तो मुझे ये लोग कुछ भी करने नहीं दगे । मै ड्रग्ज लेने वाले दोस्तो को भी सही रास्ते पर लाने की कोशिश करने वाला हू । पिताजी इस बात के लिए तैयार नही होगे। मर, यकीन कीजिए कि काफी ठोकरे खाने के बाद मैं इस प्रकार सोच रहा हू ।" प्रो० भारती ने विरोध नहीं किया। पार्टी के वाद, कुशल ने अपना फैसला सुनाने का निश्चय किया। कुशल ने घर के लिए एव परिवार के लिए कुछ भी नही किया था। माता पिता से जरूरत पड़ने पर पैसे माग लेना और दोस्तो के साथ खचते रहना। पैसे न मिलने पर घर की कितनी ही चीजे उसने वेच डाला थी। गद के लिए पैसो की चोरियाँ भी की थी। मिसेज सागर ने अपने बेटे की बहुत मारी बाते मि० सागर से छिपा दी थी। नशीली चीज़ो की लत ने कुशल को कुछ भी करने पर मजबूर कर दिया था। एक बार उमने स्नेहा के गले का सोने का हार चुराकर वेच दिया था। स्नेहा यह जान गई थी लेकिन उसने मम्मी को बता दिया था कि उसने इसे कही खो दिया है । स्नेहा को अपने भाई कुशल की कमजोरी का बहुत दुख हो रहा था। उसने कुशल को समझाने की कोशिश की थी और एक दिन उसकी डाट भी खायी थी। कुशल शायद यहा रहकर अपने आपको जपराधी के रूप में देख रहा था। परिवार के लोगो को देख-देखकर वह अपनी पुरानी दुरी वातो को याद करता। उसके अतमन मे कही सघप चल रहा था। खूब सोचने के बाद वह अपना निणय सुनान मे हिचकिचाने लगा। क्या परिवार के लोग कुशल के मनोभावो को समझेगे ? कही वे ऐना तो नही सोचेगे कि मैं उनसे प्यार ही नहीं करता ? मा तो कुशल के निणय को विल्कुल मानेगी नही । स्नेहा भी ऐसा ही सोचेगी कि इतने दिनो के बाद जाकर अव कुशल जाने की बात कर रहा है । क्या कुशल का परिवार से जरा भी लगाव नहीं है ? जगह वदलकर दूसरी जगह जाने से प्यार की भावना योड ही बदलती है ? ऐसे प्रश्नो ने कुशल को झकझोर दिया था, अन्त में उसने सभी को चिटठी लिखकर घर से निकल जान ६०/नयी दिशाएँ का फैसला किया। रॉवी तो कुशल का स्वागत करना चाहता था लेकिन कुशल जमीर परिवार का बेटा था। क्या वह जीवन की मुश्किलो से मुकाबला कर पाएगा? कितनी बार में सूखा सोया हूँ | क्या कुशल के लिए यह मुमकिन है ? राबी को कुशल के निश्चय मे शक नहीं या । मोच-विचार के बाद उसने कुशल का साथ देने का फैसला कर लिया। "आदरणीय पिताजी, माताजी और प्रिय स्नेहा, मेरी यह चिट्ठी पढकर शायद जाप नाराज हो जायेगे लेकिन मेरे मन की कमजोरियो को दूर करने के लिए मुझे ही इनसे मुका- बला करना पड़ेगा और यह मुकावला मै तभी कर सकता हूँ जव में आप लोगो से दूर रहूँ, अकेला रहूँ। अपने प्यार के कारण आप हमेशा मेरी सहायता के लिए दौडकर आयेगे तो मैं स्वावलम्बी कव बनूगा ? जब तक मे सागर-परिवार के योग्य नही वनता तब तक में घर मे कदम नही रखूगा । कृपया आप इस वात को जानने की कोशिश मत कीजिए कि म कहा रहता है और क्या करता हू । जो भी करूगा मैं उसकी जानकारी पनो द्वारा देता रहूगा। मेरे इस फैपले के लिए मैने आपकी अनुमति नही मागी इसलिए क्षमा- प्रार्थी हूँ।" आपका आज्ञाकारी कुशल ६१/नयी दिशाएं प्रकरण सात । कुशल और रॉबी दोनो सोचते-सोचते रास्ते से रॉबी के घर की ओर जा रहे थे, इतने में पीछे से एक तेज कार उनकी दिशा मे आती हुई दिखाई दी। रॉवी ने कुशल को बीच रास्ते से इतने ज़ोर से खीच लिया कि वे दोनो सडक के किनारे गिर पडे । वे उठकर खडे हुए और उन्होने उस कार को देखा तो कार की हुई दिखाई दी। वे दोनो एक-दूसरे की ओर देखकर दग रह गए और जब कार मुडकर उनके पास जाकर रुकी तो वे दोनो जाश्चय के साय भयभीत हो गये । कार चलाने वाले ने काला चश्मा पहना था। उसने इन दोनो की ओर देखकर कहा, "देखो, कुशल, पुलिस को अड्डो के नाम वताओगे तो हम तुम्हे जिदा नहीं छोड़ेगे। तुम्हे शायद पता नहीं कि हमारा जाल कहाँ तक फैला हुआ है । अगर हमारे आदमियो को कुछ हो गया तो हम तुम्ह ऐसी जगह पर जिन्दा रख दगे जहा तुम तड़प तडप कर दम तोड दोगे । बस समझदार ड्रग-अडिक्ट को इतना इशारा काफी है।" और तेजी से वह कार वहा से अदृश्य हो गयी। कुशल ने रांची से कहा कि वह ऐसी धमकिया से डरने वाला नहीं । कुशल काफी उत्तेजित हो चुका था लेकिन रावी सोच में पड गया था और उसे मिलन की याद जा गई थी। मिलन तो इन दोनो मजबूत था लेकिन इन लोगो ने उसकी मामलो धमकी से उसका ६२/ नयी दिशाएँ खून कर दिया जोर कुशल तो पहले से ही उनके शिकजो मे फंसा हुआ है। दोनो घर पहुँचे। रॉबी का बूढा नौकर बैठे-बैठे सो रहा या और जव दरवाजे को घण्टी बजी तो वह चौक कर उठ गया। उसने दरवाजा खोल दिया और घर के भीतर आते ही उसने रॉवी के हाथ मे तार दे दिया। रावी की मा गोवा में गभीर रूप से वीमार हो गयी थी और उसे अस्पताल मे भरती कर दिया गया या। राबी ने तार पढकर उसे अपनी जेव के हवाले कर दिया तो कुशल ने समझ लिया कि शायद मा की बीमारी का ही तार होगा। दोनो कुछ देर तक मौन ये तब तक नौकर ने मेज पर खाना लगाया उसी समय कुशल का माथा दुखने लगा । कुशल जैसे ही बाहर आया और ऑगन में पेड के पास बैठ गया तो उसके पेट मे बल पड़ने लगे और शरीर पसीने से तर हो गया, वह जमीन पर, गिर कर हाथ-पैर पटकने लगा - 'मुझे चाहिए। मुझे चाहिए।' चिल्लाने लगा। परस में खड़े दो ड्रग-पेडलरो ने उसे उठाकर अपनी कार में डाल दिया। शोरगुल के कारण रॉवी बाहर ना गया लेकिन तब तक वहाँ मे कार कुशल के साथ गायब हो गई । कुशल | कुशल ।। चिल्लाता हुआ वह कार के पीछे दौडा । खूव दौडने के बाद रॉबी रुक गया और रास्ते के किनारे खडा होकर सोचने लगा। रावी की मानसिक स्थिति विचित्र-सी हो गई थी। यदि वह पुलिस इस्पेक्टर जयचद को जाकर बता देगा तो कुशल के खून का खतरा पैदा हो जाएगा। रात के सन्नाटे में रॉबी ने ड्रग-पेटलरो के अड्डा पर कुशल की योज जारी रखी। अचानक उसके मन में एक बात आई। वह पुलिस- स्टेशन की ओर तेजी मे कदम वढाने लगा और पुलिम-स्टेशन के करीव आते ही वह झाडियो मे ठिप गया। योडी देर के बाद उसने वही कार देखी जिसमे वह काले चश्मेवाला गुण्डा बैठा हुआ था। जोश म जाकर रोंगी उस कार की ओर दौडाऔर उसमें झांक कर कुशल का देखने लगा। रॉबी ने अपने आपको मयत करके उम गुण्डे से पहा--"कुशल कहाँ है ? उसे कुछ हो गया तो आप सब मुमीत मे जा जायेग । मेहरवानी करके उसे छोड दो। मैं वचन देता हूँ कि म उस गोवा ले जाऊगा । वह वम्बई म नहीं रहेगा।" उन गुण्डे ने रॉथी के सामने पिस्तौल तान दी और कहा-"इसकी एक गोली ६३/नयी दिशाएँ - आपके लिए या कुशल के लिए काफी है। कल तक तुम दोनो के वम्बई मे नही होना चाहिए, नही तो कल आप इस दुनिया में नह रहेग।" रावी ने साहस किया-~"आय प्रामिज यु । मै चाहे त कुशल को लेकर जाज ही रात को चला जाऊगा लेकिन कुशल कह है ? वताइए प्लीज़ बताइए।" कार म वैठे गुण्डे ने रास्ते के एक पेड की जोर इशारा किया और रॉबी ने वहाँ भयकर दृश्य देखा। उस पेड के पास कुशल जखमी हालत में पड़ा हुआ था और गद के नशे में चूर था। रावी वहाँ दौडकर गया और यहा से कार भी नेजी से चली गई। रॉवी ने कुशल की हालत देखी और कुछ देर तक टैक्सी के लिए यहाँ-वहा देखता रहा । वाद मे टैक्सी मे दालकर वह उसे घर ले जाया और उसने नौकर की मदद से उसे कपड पहनाए जौर जखमो को गरम पानी से और आयोडिन से धो डाला तथा सभी जन्मो मे पट्टियाँ बाँध दी । अब भी कुशल करीव-करीव वेहोशी की हालत मे था। उसने उन ड्रग-पेडलरा से हाथापाई की थी और कोल्ट-टर्को की बीमारी से भी वह परेशान हो गया था। इस कारड. टर्की का लाभ उठाकर उहोत कुशल को काफी वाउन-शुगर दे दी थी। कुशल लाचार तथा कमजोर होकर तडपने लगा था। रावी के मन मे विचारो का तूफान उठा या । यहाँ कुशल को रखना खतरे से खाली नही था । अचानक उसके दिमाग मे चदनपुर की वात आ गई और उसे लगा कि दयानद और जानकी कुशल की देखभाल कर मकते है । उमन साचने मे जरा भी समय नहीं गवाया। चदनपुर के लिए उसने एक टैक्मी तय की और वह कुशल के साथ बदनपुर की ओर रवाना हो गया। टैक्मी चदनपुर की आर दौड रही थी और रावी का मन जपनी बीमार मा की ओर दौड रहा था। इस दुनिया म मा के सिवा उमका कोई नहीं था। दोस्त को बचाने की जिम्मेदारी ने थोड़ी देर के लिए मा का भुला दिया था। रावी न वाहर देखा तो घुप अधेरा था और मन्य-राशि वीत चुकी थी। कुशल नशे म होने की वजह से सो गया था। रात के वक्त यातायात न हाने के कारण टक्सी तेजी से दौड रही थी। चदनपुर तकरीवन एक किलोमीटर की दूरी पर या ६. नयी दिशाएँ । । कि टैक्सी का टायर पक्चर हो गया। टैक्सी-ड्राइवर ने कहा कि करीबन आधा घटा तो लग ही जाएगा। रॉबी ने मी ड्राइवर की मदद की और जल्दी-जल्दी दोनो ने मिलकर दूसरा टायर विठा दिया। वीस मिनट के बाद टैक्सी टेढे-मेढे रास्ते से चदनपुर मे मिलन के घर के सामने खड़ी थी। रॉबी ने दयानद और जानकी को जगा दिया। इतनी रात म रॉबी और कुशल क्यो आये होगे । सवाल पूछने के लिए बिल्कुल समय नही था। राबी और टैक्सी ड्राइवर-इन दोनो ने कुशल को अपने हाथो मे उठा लिया और मिलन के कमरे के पलग पर उसे ला रखा। कुशल नीद और नशे में चूर था। रावी ने सारी वाते उन्हे समझायी और यह बता दिया कि बम्बई मे कुशल के लिए खतरा पैदा हो गया है। जिन्होने मिलन को मार डाला है वे ही लोग कुशल के पीछे पड हुए है। रॉवी ने बता दिया कि वह जल्दी मे है और उसे माँ को देखने के लिए गोवा जाना है। गोवा से लौटने के बाद उसने वापिस आने का वचन दिया । जानकी ने चाय बनाने की बात की तो रॉबी ने मना कर दिया लेकिन जानकी ने योडी देर रुकने के लिए कहा और दोनो को एक-एक गिलास दूध दे दिया। टैक्सी-ड्राइवर थक-सा गया था उसे अव जरा अच्छा लगने लगा था। राबी ने जानकी माई और दयानद के पैर छुए तो जानकी की आख गीली हो गयी। उसने कहा-"वेटे, सभलकर जाना, सब कुछ ठीक होगा । कुशल को चिन्ता न करना । हम उसकी देखभाल अच्छी तरह करेंगे । तुम जल्दी आ जाओ और माँ के बारे में जरूर लिखो। मेरा जाशीर्वाद " राबी ने जाने से पहले कुशल की ओर देखा और टैक्सी-ड्राइवर के साथ वह घर मे से बाहर आ गया। जानकी और दयानद टैक्सी तक आ गए और उन्होने दोनो को सभल कर जाने की सलाह दी। टैक्सी चलनी शुरू हो गई और रात के सन्नाटे मे ओझल भी हो गई। दयानद और जानकी देर तक वही खडे रहे। गाव के इन मासूम लोगो को कुछ भी समझ मे नही आ रहा था कि वम्बई जैसे शहर मे यह क्या हो रहा है। चेहरा पर प्रश्न-चिह्न ये लेकिन उन्होने एक- । ६५ / नयी दिशाएँ - दूसरे से कुछ नहीं कहा । जानकी ने कुशल के शरीर पर चादर ओढा दी और उसके पर सीधे कर दिये। उस कमरे में पहली बार उमने दीप जलाया था। सुबह हो गई और सूर्य भगवान् ने पूर्व दिशा में अपनी सुनहली रश्मियो से प्रकाश को चारो ओर पिसेर दिया। चिडियो की चह- चहाट ने मधुर संगीत का काम किया। मन्दिर के घटो की आवाज सुनाई देने लगी और चारो दिशाओ में चहल-पहल शुरू हो गई। दयानद अपने वैलो के साथ कव के खेत पर चले गये थे और जाते जाते जानकी को कुशल की देखभाल के विपय में बताकर गए थे। जानकी ने स्नान वगैरह करने के बाद, पूजा-पाठ किया और कुशल को जगाने के लिए मिलन के कमरे मे गई। कुशन ने जाट पाकर आँखें खोली और वह कमरे के चारो ओर देखने लगा। अब भी उसे लग रहा था कि वह सपने मे ही है। जानकी माई न कहा-"वेटे कुशल, रावी ने तुम्हे यहा लाकर छोडा है । वह आज की गाडी से गोवा जानेवाला था इसलिए यहाँ न रुका। चिला की कोई बात नहीं, म तुम्हारी देखभाल करूंगी।" कुशल ने जानकी माई की ओर देखा । उसे लगा कि वह पहले से अधिक दुर्वल हो गई है। उठकर उसने पद-स्पश किया। जल्मो के कारण कुशल का सारा शरीर दुख रहा था। जानकी ने उसके स्नान के लिए गरम पानी रखा और हल्दी का लेप तयार किया। स्नान के बाद जानकी ने हल्दी का लेप जस्मो पर लगाया और उसे मदिर जाने के लिए कहा। कुशल के पेट मे आग-सी लगी थी लेकिन जानकी माई की आज्ञा का उल्लघन वरना उसके लिए मुश्किल था। उसके अपने कपडे काफी मैले हो चुके थे और उस पर खून के धब्वे भी लगे हुए थे। जानकी माई ने अलमारी से मिलन के कपडे निकाले और कुशल को दे दिये । मिलन के कपडे देखकर कुशल के चेहरे पर मायूसी छा गई और उसे मिलन की याद आने लगी। अतीत के चिनो की भीड-सी हो गई और उसका मन सुन्न हो गया। उसके मन के दूसरे कोने में एक स तोप की भावना यह थी कि उसे अपने दोस्त के कपडे पहनने का मौका मिला है । मिलन कुशल से कुछ ऊँचा और ६६ / नयी दिशाएँ -- और तगडा था इसलिए उसके कपडे कुछ ढीले लग रहे थे। जानकी माई ने कुशल को उन कपडो मे देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट की झलक दिखाई दी। उसने कुगल को समझाया कि वह इन ढीले कपडो मे कुछ सेहतमन्द लग रहा है-"बेटे, इन कपडो में मिला का प्यार छिपा है । इन्हे पहनकर नू बहुत जल्द अच्छा हो जाएगा । जा, मन्दिर से हो आ तव तक में तेरे लिए वाजरे की रोटी बनाती हूँ। आम के अचार के साथ रोटी खाकर एक गिलास दूध पी लेना जौर सो जाना । आराम करने से मन ताजा हो जाएगा।" कुशल के पेट मे चूहे दौड रहे थे । वह तेजी से गाव के मन्दिर की ओर चल पड़ा। वहा पहले से ही एक नौजवान शिवजी की पूजा में लगा हुआ था। उसने यहाँ-वहाँ जल छिडका। कुछ चूद कुशल पर भी पडी। वाद मै अगरवत्तियों जलाकर दीप जलाये। प्राथना के पाद वह धीरे-धीरे मन्दिर के बाहर आ गया। कुशल एक कोने मे खडा होकर उसे निहार रहा था। उस नौजवान ने कोने से छडी उठायी जोर धीरे-धीरे मदिर से ओझल हो गया। जरे, यह तो अन्धा है । इसने फिर भी पूजा के मारे नियमो का ठीक तरह से पालन किया। कुशल ने क्षण भर के लिए सोचा कि शरीर म आखो का कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है । चिना उनके सारा जधेरा । यह नौजवान कितना तेजस्वी लग रहा था। इसकी आखो के आगे जधेरा-ही-अधेरा है और इस अधेरे में मन की रोशनी से वह खुश दिखाई देता है । सचमुच, जानकी माई से पूछना चाहिए कि गाँव में यह कहाँ रहता है । इसे देखकर मुझे एक आत्मिक आनन्द हो रहा है। हमारे सामने चारो ओर प्रकाश फैला हुआ है फिर भी हम उमे न देखकर मन के अधेरे मे ठोकरें खाते फिर रहे है । कुशल ने शकर भगवान् को हाथ जोडकर प्रणाम किया और कुछ पलो के लिए वह वहीं बैठ गया। सुबह की रोशनी मे दूर से कोहरा दिखाई दे रहा या और वह धीरे-धीरे अदृश्य हो रहा था। उसके अदृश्य होते ही हरि- याली और लहलहाते खेत दिखाई दे रहे थे। पास में पक्षियो की चहचहाहट भी सुनाई दे रही थी। मिलन के इस गाव ने कुशल के मन को मोहित कर दिया था। मन्दिर से बाहर निकलते ही बैलो के गलो की घटियो की आवाजें सुनाई देने लगी थी। कुछ ६७ /नयी दिशाएँ किसान अपने साथियो के साथ खेतो की ओर अपने कदम बढा रह थे। सचमुच, यहा की सुवह कितनी सुन्दर है । कुशल के पैर जानकी माई के घर के पास आकर रुक गये। जानकी माई ने कुशल को देखा तो किंचित् क्रोधित होकर वोली --"मदिर मे क्या शिवजी से बात कर रहे थे। यहाँ पूरा नाश्ता ठडा हो गया। चलो, बैठो यहाँ अभी गरम कर देती हूँ।" कुशल मुस्करा कर कहा-"माई, आपके गाँव मे मैने एक जादूगर देखा, अन्धा था फिर भी वह शिवजी की पूजा इस तरह कर रहा था कि देखने वाले को जरा भी मालूम नहीं होगा कि वह अन्धा है । कमाल यह है कि उसने दीप जलाये और आरती तैयार की तथा अपने वायें हाय से घण्टी बजाई। माई मुस्करायी । उसने मिलन के कमरे से गोपी को पुकाग, और गोपी कुशल के पास आकर बैठ गया-"देखो कुशल, माई ने तुम्हारे बारे में मुझे कुछ-कुछ बताया है लेकिन सभी बहुत-कुछ जानना बाकी है । मुझे बार-बार अन्धा क्या कह रहे हो ? अरे, भाई मेरे, मै विना आँखो के भी सब कुछ देख सकता हूँ। ईश्वर की कृपा से एक बार किसी की आवाज़ सुन लेता हूँ तो उसे पहचान लेता हूँ। फूलो की खुशबू, खेता से आनेवाली एक प्रकार की सुगध मम करता हूँ तथा मिट्टी के स्पश से जगह का नाम बता सकता हूँ। यह कोई चमत्कार नहीं है, यह तो सभी जन्धो के लिए आम बात है।" जानकी ने गोपी को रोक दिया और कहा--"तुम दोनो बाद म बाते करना । कुशल, गोपी तुम्हे सारा गाव दिखाएगा और पूरी जानकारी देगा। चलो, जब नाश्ता कर लो।" कुशन गोपी की ज़िन्दगी के बारे मे जानने के लिए उत्सुक हो उठा था। जाख नही फिर भी मुझे गाँव दिखाने वाला है ? गोपी उसे वडा दिलचस्प नौजवान लगा। नाश्ते के बाद दोनो जानकी माई के घर से निकले । गोपी जागे- जागे और कुशल पीछे-पीछे । गोपी उसे मदिर ले गया और मदिर के पास उमने गाव के अनेक छोटे-छोटे रास्तो पर कुगल को घुमाया बीच-बीच में कोई गांव का जादमी मिल जाता और गोपी को ६१/नयो दिशाएं । पुकारता तो गोपी उसका नाम लेकर अभिवादन करता। यहां तक कि छोटे बच्चे भी गोपी को जानते थे। गोपी ने येत दिखाये और शकर दाम का घर दिखाया। वह शकरदास से कुशल का परिचय कराना चाहता था लेकिन शकरदास सूर्योदय से पहले ही पहाडो की सैर करने निकल गए थे। वाद में उसने कुशल को गांव का कुओं दिखाया और कहा- "इस कुएँ मे मै गिरने वाला था जोर विल्कुल कुएँ के किनारे पर एक गज की दूरी पर था लेकिन शीतल हवा के स्पश से मैंने वहां पानी होने का अनुभव कर लिया। बाद में मेरी छडी ने भी सूचना दे दी।" कुगल ने कुआँ देखा तो डर गया क्योकि कुएँ के चारो ओर छोटे-मोठे पौधे थे और रक्षा के लिए दीवार नहीं थी। वहाँ मे वह कुशल को गांव की एक छोटी-सी पाठशाला की ओर ले गया। छाटी-छोटी तीन झोपडियो में प्राइमरी तक बच्चे पढकर हाई स्कूल म पढ़ने के लिए दूसरे गाँव में जाते थे। कुशल को लगा कि मिलन ने भी यही पढाई की होगी। अब तक गोपी ने या कुशल ने मिलन के बारे मे कुछ भी नहीं कहा था । गोपी जब गाव से बाहर कुशल को ले आया । वडे रास्ते से छोटे रास्ते पर दोनो चलने लगे। गोपी मिलन की समाधि के पास आकर रुक गया-"यह है मिलन की समाधि । तुम्हारे दोस्त की । मिलन मेरा पक्का दोस्त था। हम दोनो उसके खेत में हल चलाते थे। उसने तुम्हारे बारे में मुझ जान- कारी दी थी लेकिन जब-जब तुम यहाँ आये मैं दूसरे गाव मे था या किसी के खेत मे। आज हम दोनो का मिलन हुआ है विना मिलन के। कितना दुर्भाग्य है हमारा। खैर, ईश्वर की इच्छा के जागे हम क्या कर सकते हैं।" गोपी और कुशल दोनो मिलन की समाधि के पास बैठे हुए ये उसकी समाधि पर गांववालो मे से कोई-न-कोई फूल अर्पित करता और चला जाता। उसकी समाधि के आसपास की जगह साफ- सुथरी थी और चारो ओर मिट्टी की दीवार थी। उस पर पानी छिडकने से मृदु गध आ रही थी। समाधि के पास गुलमोहर के पेड थे इसलिए नीचे लाल फूल विखरे पडे थे। कुशल को थोडी देर तक ऐसा लगा कि मिलन उस समाधि से बाहर आकर कुछ कहना चाहता है। उसके मन मे अजीव ख्याल आने लगे थे। क्या मिलन । । । ६९/नयी दिशाएँ की आत्मा यहाँ होगी ? या उसने कही दूसरी जगह ज म लिया होगा ? देर तक दोना सामाश थे । ऐसा लग रहा था कि वे मिलन के इतज़ार में बैठे हैं। जब कुशल ने गोपी के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की तो गोपी गभीर हो गया वहाँ बैठे-पठे ही उसने अपनी पूरी जीवन कहानी बता दी--शिवजी के मदिर की सीढिया पर तीन महीने के एक वालक को किमी ने रख दिया था। उसके रोने के कारण मदिर के पुजारी जाग गये और उन्हाने इम वालक को गोद में उठा लिया। पुजारी ने ही उस बालक की देखभाल की । उनका इस दुनिया म कोई नहीं था। उस बालक को पाकर वे धन्य हो गये। गांव के लोगो ने भी उसकी देखभाल करने म अपने हाय पॅटाये । उम बालक के माता-पिता का कोई पता नहीं । पुजारी ही उस बालक के लिए सब कुछ ये । पुजारी ने ही उसका नाम गोपी रखा था। गोपी धीरे धीरे पुजारी जी और गाववालो की ममता पाकर जीवन की राह पर कदम बढा रहा था। उसे कभी ऐसा लगा ही नही कि उसके माता-पिता नहीं है। गाव म उसकी प्राइमरी को शिक्षा पूरी हो गयी थी और आगे बढ़ने की सोच ही रहा था कि दुर्घटना के कारण ग्यारह वप की आयु में उसने जाखे खो दी। लगाडियो की दौड का मुकावला था। गाव का मेला लगा हुआ था। तेज दौडती हुई गाडी से वह एक पत्थर पर गिर पड़ा या । माथा पत्थर से इतने जोर से टकराया कि लोगो को लगा कि उसकी खोपडी ही टूट गयी हो । गाववाले चदनपुर से उसे ववई ले गये और उन्होने डाक्टरो से इलाज करवाया लेकिा गोपी का दुर्भाग्य । वह अधा हो गया। जब उमे अपने अज्ञात माता पिता की याद आने लगी तब पुजारी ने इस आघात से अपने प्राण दे दिए । गाववालो ने हर तरह से उसकी सेवा की और तब से वह मदिर के पास वाली झोपडी में जी रहा या। उसने वबई के क्लाइन्ट स्कूल में ब्रेल लिपि भी सीख ली थी। उसे बवई में किसी कारखाने म नौकरी भी मिलने वाली थी लेकिन गाववालो को और खास तौर से शकरदास एव दयानद को यह पसद नही या। इसी कारण वह गाव मे ही उन लोगो के साथ अपना जीवन चला रहा था। ७०/नयो दिशाएँ 7 गोपी की कहानी सुनते समय कुशल के मन म अनेक विचार आ रहे थे। शहर मे तो हर जादमी अपने-अपने काम मे मस्त रहता है। दूसरो के बारे मे सोचने के लिए शहरवासियो के पास समय कहाँ है सचमुच गोपी यहाँ कितना खुश है । पूरा गाव उसकी देखभाल करता है, प्यार करता है। गोपी भी हमेशा गाववालो के बारे में सोचता रहता है। गाँववाले कितना ख्याल रखते है गोपी का । शाम को खेतो से लौटने वाले किसान उसकी पूछताछ करके ही अपने घर जाते है । गोपी कमी-कभी गाँववालो को रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनाता है और उन्हे समझाता है। कुशल को लगा कि गोपी तो इस गाँव का राजा है । कितने ही लोग उसके पास सलाह लेने आते है। आस-पास के गाँववाले भी शिवजी के दर्शन के साथ-माथ गोपी के भी दर्शन कर लेते है। कुशल ने जब उससे पूछा कि विना पैसो के वह किस तरह अपना जीवन चलाता है तो गोपी ने कहा-"यह गाँव मेरा बैंक है। उसकी झोपड़ी में हमेशा जनाज भरा रहता है । त्यौहारो के दिन गाँव के मुखिया तथा दयानद आदि लोग उसके लिए नए कपडो का प्रवध करते है। उसके विना गाव के त्यौहारो मे जान नही आती। सजी हुई बैलगाडी मे बैठकर वह अपने-आपको राजा समझने लगता है। गोपी की जिन्दगी की कहानी ने कुशल को बहुत ही प्रभावित किया। जब कुशल की सेहत भी सुधरने लगी। कितने ही गाँव- वाला से उसका परिचय हो गया। गोपी के साथ वह खेतो मे जाकर हल चलाता तो लोग मन-ही-मन उसकी दिलचस्पी देखकर मुस्कराने लगते । कुशल मिलन के ही कपडे पहनने लगा था। गाववालो के पास वह अपना परिचय भी ऐसा ही देता था कि वह मिलन का दोस्त है । कुशल को इस चदनपुर गाव मे हर व्यक्ति जानने लगा। गोपी के साथ वार-बार देखकर गांव वाले कुशल पर बहुत खुश ये कुशल गॉव के मुखिया शकरदास से मिला तो वे जोश मे आँ गये । उनकी निगरानी में ही मिलन की समाधि बन रही थी। संगमरमर के पत्थर, सिमेट, रेत आदि चीजे समाधि-स्थल पर पहुंची थी और ७१/नयी दिशाएं काम शुरू हो गया था। कुशल भी उन लोगो के साथ काम करके एक आत्मिक सुख की अनुभूति प्राप्त कर लेता था। समाधि-स्थल बहुत ही सुन्दर बन गया था। सफेद संगमरमर का चबूतरा बनाया गया था और चारो ओर गुलाव के पौधे लगाये गये थे। समाधि के आस-पास और मी पेड लगाये गये थे। कुशल और गोपी तो रोज वहाँ जाकर काम में हाथ बँटाते थे। वे दोनो गुलमोहर पेड़ के नीचे बैठकर वाते करते रहते । वही दो बार कुशल के पेट मे दद शुरू हुआ था और थोडा पसीना भी आ गया था लेकिन उसने अपने कमजोर शरीर को गाव की आबोहवा तथा वहाँ के लोगो के प्यार में मजबूत बना लिया था। उसे अपनी मारी कमजोरिया दिखाई देने लगी थी। गोपी ने इस तरह सभी को अपना लिया था कि उसे अपने बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिलता। कुशल इस माहौल म मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ प्राप्त कर रहा था। कहाँ शहर का गदगी से भरा वातावरण और कहा प्रकृति की सुन्दरता से और स्वच्छता से भरा स्वस्थ माहौल | कुशल सोचने लगा कि शहर की इमारतो ने मनुष्य के स्वाभाविक जीवन को वहुत ही कृतिम बना दिया है । कुशल को अपना बगला और वहा का वातावरण अच्छा नहीं लग रहा था । शहर मे हर एक आदमी अपना महत्त्व वढाने के लिए अपने-जापको कुछ खास समझने लगता है । यहा गोपी कितना जानता है अपने लोगो के बारे में। एक भी शब्द अहकार का उसके मुह से नहीं आता। गोपी धम-ग्रयो को छोडकर ब्रेल लिपि मे लिखी अन्य कितावे भी पढता रहता है विभिन्न महापुरुषो के जीवन से वह प्रभावित है। गाँव मे या आम- पास के गाव मे वह तरह-तरह के लोगो के प्रवचन सुनने जाता है। कभी-कभी वह भी चर्चा में भाग लेता है। कुशल को लगा कि उसका किताबी ज्ञान वेकार है। उसे यह अनुभव हो रहा था कि मनुष्य-जीवन मे वह अपने अधिकाश ज्ञान को नहीं उतार सकता। गोपी अपने देश के बारे मे बहुत-कुछ जानता था। उसने अन्य धर्मों का अध्ययन भी किया था इसलिए वह कुशल से वहस करता रहता था। ७२/नयी दिशाएं उसने कुशल से कहा-"अगर वह कुछ करना चाहता है तो उसे दिन-रात उसके लिए मेहनत करनी चाहिए। रात-दिन उसी का सपना देखना चाहिए। जव कुशल ने कहा कि इस गाँव मे वह कुछ कार्य करना चाहता है तो गोपी ने कहा, "मिलन के सपनो को पूरा करना हम दोनो का कत्तव्य है। गांव में अच्छी पाठशाला, गाव मे अच्छे कुएँ, गाँव में अच्छे मकान और पक्के रास्ते आदि कामो के लिए कडे परिश्रम की आवश्यकता है।" कुशल ने यह बताया कि वह प्रो० भारती को खत लिखेगा। यहाँ जाने के बाद अनेक विद्यार्थी और विद्यार्थिनियो को कुशल चदनपुर मे बुलाकर समाज-सेवा करना चाहता था । कुशल ने कहा, मिलन नही होगा लेकिन उसका जोश हमारे साथ होगा। उसकी आत्मा हमारे साथ होगी । गोपी, तुम्हारी वजह से मुझमे हिम्मत आ गई है । मैं खुद शहर जाकर अन्य लोगो को आमनित करूँगा। शकरदास ने भी अपनी ओर से शहर- वासियो को आमत्रित किया है।" कुशल वार-वार शहर के लोगो की आलोचना करता जा रहा था और कुशल का यह स्वभाव गोपी को अच्छा नहीं लग रहा था। एक वार गोपी ने उत्तेजित होकर कहा, “कुशल, हम जपने-आपका सुधारना है, अपनी कमजोरियो को दूर करना है । दूसरो की कमजोरियो को दिखाने से हमारी कमजोरियाँ कम नहीं होती। शहरवासियो की कुछ मजबूरिया होगी इसलिए उन्हे उस प्रकार न चाहते हुए भी जीना पड रहा है। वे भी तो अपने ही देश मे रहते हैं। और कुशल, तुम यह क्यो भूल रहे हो कि शहर की सुविधाओ को गाँववाले भी चाहते है। मेरे भाई, इस वैज्ञानिक युग मे धीरे-धीरे सारे गाँव एक-न-एक दिन शहरो में बदलने वाले हैं।" गोपी की वातें सुनकर कुशल को ताज्जुब हो गया और उसे लगा कि गोपी के विचारो मे कितनी स्पष्टता है। दयानद, जानकी माई, गोपी और कुशल वहुत दिनो के बाद एक साथ भोजन कर रहे थे। कुशल ने प्रो० भारती को पत्र लिखा या और उमके बारे मे तथा गोपी के बारे मे पूरी जानकारी दी थी। उसने चन्दनपुर गांव के विषय मे और वहाँ के लोगो के जीवन के ७३/नयी दिशाएँ विपय में मविस्तार से लिखा था। उसने दयानद और जानकी माई से कहा-“माई, प्रो० भारती का पत्र आते ही मै बबई जाऊँगा और फिर से जब गरमी की छुटिटयाँ शुरू होगी मैं अपने साथियो के साथ यहाँ आ जाऊँगा। वैसे इस गाँव म मेरा पुनजन्म हुआ है । आप लोगो का प्र म और जापकी सेवा का मूल्य में अगले जन्म में भी नही चुका सक् गा । आप सब इतना याद रखिए कि चदनपुर गाँव मेरे लिए तीर्थ-स्थल बन गया है । मरतेदम तक में यहाँ आता रहूँगा । दो पहाडो की गोद में बसे इस गॉव का पूरा नक्शा ही वदलना है और मिलन की इच्छानुसार हर सपने को साकार करना है।" कुशल की बातो से सभी हर्पित हुए। जानकी माई की ऑखो मे खुशी के ऑसू छलक उठे- 'मेरा मिलन गया तो क्या हुजा ? गोपी ने और तूने तो मेरा दुख दूर कर दिया । तुम दोनो मे मिलन की हर बात मुझे नजर आती है।" दयानद वैसे भी वहुत कम वोलते थे लेकिन एकाध वाक्य इतना सुन्दर होता था कि उसमे उनका पूरा व्यक्तित्व झलक उठता था । कुशल और गोपी के हर काम मे वे खूब दिलचस्पी लेते थे। गाँववाले उनका खूब आदर करते थे। वे शंकरदास के पास जाकर गाँववालो की समस्याओ की चर्चा करके कुछ सही रास्ता खोज निकालने और शाति से जीने की सलाह देकर समझाते रहते । उन्हाने गाँववालो के पास कुशल और मिलन की दोस्ती की बात इसलिए भी बताई थी ताकि गाँववाले कुशल के साथ घुलमिल जाये और उसकी मुसीबता को समझने का प्रयास कर । दयानद ने कहा, 'कुशल, हम सबके विचारो के फूल प्यार के धागे म ऐसे गुथ गये हे कि हम कभी दूर नही हो सकते । बेटे, गोपी तुम्हारे साथ रहकर तुम्हे प्रेरणा देता रहेगा। तुम्हारे जैसे नौजवानो के जोश को देखते हुए ऐसा लगता है कि मिलन के सारे सपने साकार हो जायेगे।" उस दिन के भोजन के बाद कुशल गोपी के घर गया। वैसे भी वह गोपी की सादगी से प्रभावित हुना था। गोपी की झापडी देखकर उसे बहुत ही शाति मिली थी। इसमे एक कोन में स्नानगृह था। एक पलग, एक जलमारी, काने मे एक मिट्टी का घडा और उस पर एक गिलास । जमीन गोवर से पुती हुई थी और दरवाजे पर ७४/नयो दिशाएँ सुन्दर रगोली थी। मिट्टी के घड के पास मिट्टी का चूल्हा और मिटटी के कुछ वर्तन । मिटटी के घडो मे ही आटा, चावल आदि चीजें थी। कुशल के मन मे यह जिज्ञासा थी कि गोपी खाना किस तरह पकाता होगा । उसने एक बार कहा था, "गोपी, मै तुम्हारे हाथ का पकाया भोजन खाना चाहता हूँ।" गोपी मुस्कगया था और उसने कुशल को उसी शाम को घर पर बुलाया था। कुशल को लगा था कि वह उसकी मदद से भोजन पकाएगा लेकिग गोपी तो खाना पकाने के बाद बासुरी बजाने बैठा था। कुशल के कदमो की आहट से वह जान गया था कि कुशल जा रहा है । गोपी कमरे की हर चीज ऐसे उठाता जैसे हम आखो वाले करते है । इस बात से कुशल हैरान था। जानकी माई ने दयानद द्वारा खीर भेज दी थी तो गोपी नाराज हो गया था क्योकि उसने भी खीर पकायी थी । दयानद ने विषय बदलना चाहा तो गोपी ने कहा, "वापू, वह खीर रखिए यहाँ और यह खीर आप दोनो के लिए ले जाइए।" भोजना- परान्त वे मन्दिर म बैठे गप्पे हाकते रहे और मन्दिर मे ही सो गये। इस गॉव मे कुशल करीवन एक महीने तक रह चुका था। इस दरम्यान वह ववई को भूल-सा गया था । उसने अपने माता-पिता को पन लिखकर बता दिया कि वह सुरक्षित है और कुछ दिनो के के बाद उन्हे मिलने ज़रूर आ जाएगा। पत्र म उसने चदनपुर का पता नही लिखा था। रावी को भी कुशल ने पत्र लिखा था और रॉबी की माँ की बीमारी के बारे मे पूछा था। रावी ने पन के जवाव मे लिखा था कि उसकी मा अव अच्छी है और वह वबई जाकर अपनी नौकरी शुरू कर देगा। कुशल ने गोपी को रॉबी के बारे मे भी बता दिया था । अव कुशल को ऐसा लग रहा था कि कुछ-न- कुछ काम शुरू कर देना चाहिए । इसी कारण वह बम्बई जाना चाहता था और प्रो. भारती से मिलकर गरमी की छुट्टियो में चदनपुर में अपने साथियो के साथ काम मे जुट जाना चाहता था। प्रो० भारती का पत्र पाकर कुशल खुशी से झूम उठा क्योकि चदनपुर मे सोशल सर्विस कैम्प की तैयारी हो चुकी थी गौर करीवन ७५/नयी दिशाएँ सौ विद्यार्थी तथा विद्यार्थिनियाँ इसमें शामिल थे। इनके साथ चार प्रोफेसर्स और दो लेडी प्रोफेसर्स भी थी। चदनपुर के मदिर के पास की जगह उन्हे मिलने वाली थी जिस पर वे अपने तम्बू लगाने वाले थे। कैम्प के लिए आवश्यक चीज़ो की व्यवस्था हर विद्यार्थी को करनी थी। खाना वगैरह विद्यार्थी ही पकाने वाले थे। पत्र पढकर कुशल बबई जाने के लिए बहुत उतावला हो गया या । उसने दया- नन्द, जानकी माई और गोपी को प्रो० भारती का पत्र पढकर सुना दिया और उसी दिन वह ववई के लिए रवाना हो गया। प्रकरण आठ कुशल को बबई म न देखकर मि० सागर और मिगिज सागर बहुत ही चिन्तित हुए थे और वे कुशल की खोज में लगे हुए थे। उन्होने पु० इस्पेक्टर जयचद को सब कुछ बता दिया था और कुशल का पन भी पढ़कर सुनाया था। इ० जयचद अब कुशल के बारे में निश्चिन्त ये क्योकि कुशल ड्रग-पंडलस के साथ नहीं था। वे अब उन ड्रग-पेडलस के अडडो पर जाकर अपराधियो को गिरफ्तार करने में लगे हुए थे। इसके कारण ड्रग्ज की तस्करी करने वालो में वडी हलचल मच गयी थी। इन गिरफ्तारियो से लाखो का नुकसान हो रहा था। गद, हराइन आदि चीजे बेचने वाले लोग डर रहे ये क्योकि जनता भी उसका साथ नहीं दे रही थी। प्रो० भारती ने ७६/नयी दिशा । । ड्रग-पेटलर्स को पकडवा दिया था इसलिए ड्रग-पेडलर्स ने उन्हे धमकी के पत्र भी भेजे थे। इस तरह माहौल मे भय और खतरा दिखाई दे रहा था। कुछ दिनो के बाद कुशल के माता-पिता प्रो० भारती से मिलने कालेज आ गये । थे उन्होने कुशल के बारे मे पूछताछ की थी लेकिन उस वक्त प्रो० भारती को कुछ भी मालूम नही था । यहाँ से वे रॉबी के घर गये, तो वहाँ ताला लगा हुआ था। पड़ोसियो ने बताया कि रॉधी अपन नौकर के साथ गोवा गया हुआ है । क्योकि उसकी माँ वहाँ बीमार है । उन्होने कुशल का भी जिक्र किया तो उन्हे ऐसा लगा कि कुशल शायद रॉबी के साथ गोवा गया हुआ है। पड़ोसियो से ये वाते सुनकर उन्हे कुछ-कुछ राहत-सी मिल गयी, लेकिन उनके मन में डर की भावना भी बैठ गयी थी। वे अपने बेटे को आखो के सामने चाहते थे । जब इस्पेक्टर जयचद ने बताया कि बवई से बाहर रहना कुशल के लिए बेहतर होगा तो वे सोच-विचार मे डूब गये । स्नेहा भी अपने भाई के कारण दुखी हो गयी थी, लेकिन उसे अपने भाई पर विश्वास था । वह कुशल के निश्चय को देख चुकी थी। कभी-कभी कुशल आठ आठ घण्टो तक लगातार पढाई करता था । स्नेहा की भी उसने मदद की थी। अखवारो मे रोज़ खवरे आने लगी थी और ड्रग्ज लेकर मरने वाले नौजवान के फोटो भी छप जाते थे । शहर में तनावपूर्ण वातावरण था। कुशल चदनपुर से बवई आ पहुँचा तो रॉवी के घर गया। रॉबी ने कुशल को देखा तो दग रह गया। चदनपुर मे कुशल की सेहत अच्छी हो गयी थी। चेहरे पर सेहत की रौनक थी। दोनो दोस्त एक-दूसरे के गले लग गये और मिलकर खाना खाया तथा भविष्य के बारे में चर्चा करने बैठे । कुशल ने बदनपुर की अपनी पूरी कहानी सुना दी और गोपी के बारे म बार-बार वह बोलता रहा । इन दोनो की वाता को सुन-सुनकर रोवी का नौकर हँसता जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि एक रात इनके लिए काफी नही है। रात को वे बहुत देर के बाद सो गये। सुबह होते ही उन्हे प्रो० भारती के पास जाना था। । ७७ / नयी दिशएं दूसरे दिन कुशल और रॉची कालेज गये तो वहुत-से विद्यार्थियो ने उन्हे घेर लिया । कुशल को स्वस्थ देखकर हर विद्यार्थी खुश हो रहा था। वे दोनो प्रो० भारती से मिलने के लिए उत्सुक थे। प्रो० भारती उस वक्त अपने काम में व्यस्त थे इसलिए वे उनसे उस समय मिल न सके । आध घण्टे के बाद उन्होने कुशल और रावी को अपने केबिन मे बुला लिया। बहुत देर तक उनमे वातचीत होती रही और प्रो० भारती ने उनके भविष्य के बारे में सलाह दी। उन्होने इन दोनो को अब एक ही काम सौप दिया था और वह या सोशल-वक के कैम्प की तैयारी । इस कैम्प के कुशल और रावी दोनो नेता थे। कुशल अपने माता-पिता और स्नेहा से मिलकर रावी के घर जा गया। मागर परिवार म फिर से खुशी का माहौल छा गया था। कुशल ने अपनी सारी योजनाएँ पिता को बतायी। मि० मागर और श्रीमती सागर खुश थे। बिना देर किये कुशल और रॉबी दोनो ने चदनपुर के सोशल वर्क के कैम्प के वारे में प्रचार जारभ कर दिया था। सभी विद्यार्थियो का यह अच्छी तरह मालूम हो गया था कि चदनपुर मिलन का गाँव है। अव तक इन दोनो ने जस्सी विद्यार्थियो के नाम दज किये थे । स्नेहा विद्यार्थिनियो के नाम दज करती जा रही थी। कुल तीस विद्यार्थिनियाँ तयार हो गयी थी। प्रो० मारती ने सभी को पहले से ही चेतावनी दी थी कि मई का पूरा महीना वे चदनपुर मे रहेगे और इस छोटे से गाव का काया पलट करेंगे । कैम्प को बीच मे से छोडकर कोई नही जा सकता। कालेज मे जगह- जगह पोस्टस लग गये थे। प्रो० भारती ने सीनियर विद्यार्थियो को बुलाकर चार ग्रुप्स बनाये और हर ग्रुप का एक नेता था। उस ग्रप के काम के लिए वह जिम्मेदार था । प्रो० भारती एव प्रिंसिपल खोसला इस मत के थे कि पढाई के साथ-साथ शारीरिक यम भी महत्त्वपूर्ण है। मिलकर काम करने से एक-दूसरे के लिए प्यार वढता है। और आपस मे भाई-चारे की भावना का विकास होता है। वौद्धिक काम करनेवाले शारीरिक काम करना अपमान समझते है। दुर्भाग्य से हमारे देश मे ऐसा ही ७५ / नयो दिशाएँ सोचने वाले लोग है । हम जापान का उदाहरण ले सकते है। वहीं का काई भी बटा आदमी कोई भी काम करने के लिए तत्पर रहता है। यह काम का पूरा करने के लिए किसी छोटे आदमी की सहायता पर निमर नहीं रहता। यही कारण है कि आज जापान अपने उद्योगा में सबसे जागे है। वौद्धिक काय के साथ-साथ शारीरिक काम भी उतना ही महत्त्व रखते हैं। हमारे राष्ट्रपिता गाधीजी ने स्य शारीरिक श्रम करके हमारे नौजवानी के लिए एक अच्छी मिमाल कायम की है । उसी प्रकार उमरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिकन जपने सारे काम स्वय करते थे। एक बार एक मैनिक अधि- कारी किमी महत्त्वपूर्ण काम के लिए उनसे मिलने आय ये। उन्होने देखा कि लिंकन साहब अपने जूता की पालिश करन मे मशगूल ये। अहोन पूछा, क्या जमरीका के राष्ट्रपति अपने जूतो की पालिग कर रहे हैं "लिंकन ने उस अधिकारी को जार देखा और उन्होंने मुस्करा पर हा, "मैं तो अपने ही जूतो को पालिश कर रहा हूँ, क्या तुम विगी इमरे के जूतो की पालिश करते हो ?" अधिकारी शर्मिन्दा हो गया और उसने माफी मांग कर क्षमा याचना की। किसी भी काम का हम युशी के साथ करना चाहिए। जादमी काम से छोटा या वडा नही पहलाता परित काम में उमकी सच्चाई और सौचन के सरोगे यह पहचाना जाता है। महापुरपा के ऐसे फितन ही उदाहरण है जा पिसी भी काम के लिए सदर नयार रहते थे। प्रो. भारती भी-भी कालज के बगीचे मफूना के पौधे लगाने का काम रित और पोधो को पानी देन का काम मीरते थे। बाद में कुछ विद्यार्थी सोनाकाम म शामिल हो जाते में। प्रल का द्वारा गप्ताह या पो परीक्षाएं गुरू हा नुकी थी। गोर, पदनपुर गाने के लिए पन्द्रह दिन पासी नीरे। प्रा० भारती mirm और गरी इन गाल परीक्षा नहीं ६ रर है। 1ि7) बुलाार पनपुर जाने पर लिया। पद के लिए मंदिर के पास की जगह निषित कर। माध- Trainनी प्राध पावभ्या गामतायुग हार परनपुर - भनेता १/नगार । चदनपुर मे सभी को यह ज्ञात हो गया कि ववई से काफी विद्यार्थी वहाँ आ रहे है। उनमें से मिलन के दोस्त भी काफी है। शकरदास, दयानन्द और अन्य लोगो ने जगह निश्चित की और विना बताये उसकी सफाई भी की। पास ही मे कुजा था। उसकी भी मरम्मत गाँववालो ने की और पानी को स्वच्छ किया गया। चन्दनपुर के लोग तो इन सभी विद्यार्थियो को रोज़ भोजन देने का भी प्रबन्ध करने वाले थे लेकिन कुशल ने इन्कार कर दिया। गोपी ने अपनी झोपडी देनी चाही तो कुशल ने हँसकर कहा, ' काम करके यकने के बाद हम इसमे आराम करेगे।" दयानद और जानकी कुशल और राबी को देखकर पुलकित हो गये। सचमुच उन्हे ऐसा ही लग रहा था कि मिलन के लिए इनमे कितना प्रेम है ? उहोने कुगल और रॉबी का स्वागत किया। कुशल, रावी और गोपी-इन तीनो ने गाँव का पूरा चक्कर लगाया। पहले यह निशिचत हो गया कि वे पहले प.ठगाला को वाँधने के लिए वीम से पच्चीस विद्यार्थियो के एक दल को नियुक्त कर देगे। इस पाठशाला के लिए मोमेट, रेत और इटो की व्यवस्था कुशल बम्बई के एक विल्डिंग-कान्ट्रैक्टर से करनेवाला था। इस काम मे माग दश न करने के लिए उनके दो जादमी आनेवाले थे। पाठशाला के आस-पास की जगह की सफाई की जरूरत इसलिए यी कि बच्चो को खेलने का भी मौका मिले। से चदनपुर गाव से स्टेशन लगभग एक किलोमीटर दूर या। यह रास्ता टेढा मेढा था और केवल वैलगाडियाँ आ-जा सकती थी। स्टेशन के पास से ही मुख्य सडक जाती थी जिस पर बसे, ट्रक और कारे दौडा करती यी। वैसे गाँव मे मोटरे आती थी, लेकिन रास्ते की खरावी की वजह से बहुत धीरे-धीरे आती थी। मिलन की शव-यात्रा के समय कारे और मोटर-साइकिले धीरे-धीरे आकर दयानद के घर के पास रुक गयी थी। कुशल और रॉवी ने इस रास्ते की योजना के बारे मे बातचीत की। इसमे गाववालो का साथ भी जरूरी या । शकरदास ने गाँववालो को मदद के लिए भेजने का वचन दिया तो रावी जोर कुशल खुश हो गये । इस रास्ते की मरम्मत के लिए करीवन पचास विद्यार्थियो की नियुक्ति हुई। गाव के कुलो की मरम्मत भी आवश्यक | नयी दिशाएँ थी। रास्ते का पानी बरसात के दिनो मे कुएँ के पानी को गदा कर देता था । कुएँ के चारो ओर पक्की गोल दीवार बनाने की योजना मन में आ गई। इसी प्रकार गॉव के बीच के रास्तो की भी मरम्मत होने वाली थी। चदनपुर मे आधे से ज्यादा लोग कच्चे झोपडो मे रहते थे। बरसात मे उनकी स्थिति दयनीय हो जाती थी। इनकी मरम्मत के लिए भी कुछ विद्यार्थी नियुक्त हो गये । इस प्रकार के सभी कार्यों की योजनाएँ तैयार हो गई थी। गाँववालो का माथ था और विद्यार्थियो मे कुछ कर दिखाने की हिम्मत थी। तीन दिनो के वाद कुशल और रॉवी प्रो० भारती से आ मिले। प्रो० भारती ने यहाँ कुछ लोगो को मार्गदर्शन देने के लिए लेक्चरर नियुक्त कर दिए थे। वे अपने-अपने व्यवसाय में निपुण थे। रोज़ वहाँ के लिए पूरी चीजे मिलती रहनी चाहिएँ इसलिए ट्रक्स का इतजाम किया गया था। प्रो० भारती ने यहां पहले से ही अपना काम गुरू कर दिया था। एन सी सी के कैम्प-कमाण्डर से अनुरोध करके तबुओ की व्यवस्था भी कर दी थी। एक दिन के लिए एन सी सी के दो सौ कैडेट्स भी काम करने वाले थे। इस प्रकार चदनपुर के सोशल वर्क कैम्प की तैयारी पूरी तरह हो चुकी थी। पहली मई से यह कैम्प शुरू होने वाला था। कैम्प मे आनेवाले सभी विद्यार्थी हर तरह की तैयारी में जुट गए थे। हर-एक के दिल मे जोश था। कुछ विद्यार्थी वहाँ अध्यापक वनकर बूढो को पढाने वाले थे। चदनपुर अब जाग उठा था। वहाँ के सभी लोग हर काम के लिए कमर कसकर प्रतीक्षा कर रहे थे। । OO ८१/नमो दिशा प्रकरण नौ जब भी व्यक्ति कोई अच्छा काम करने जाता है तो दूसरे लोग विघ्न की तरह उपस्थित होकर उसके काम को विगाडना चाहते है । काम करने वाला दृढ-प्रतिज्ञ व्यक्ति हो तो उसका काम सभी के विरोधो के वावजूद भी होता ही है लेकिन वह कच्चे मन का हा तो अच्छा काम वही ठप्प हो जाता है । प्रो० भारती, कुशल, रावी, मीनियर विद्यार्थी, जन्य प्रोफेसस आदि लोगो म उत्साह का और चेतन-शक्ति का संचार हो गया था। चदनपुर के सोशल-वक कैम्प की तैयारी करीब-करीव हो चुकी थी। कालेज से इन सभी की याना आरम्भ होने वाली थी । अव केवल सात दिन बाकी थे। कुशल और रावी रात को दम जे तक कालेज मे काम करते थे। सभी लोग एक नये माहौल मे जाने के लिए वेकरार थे। शाम का सूरज ढलने लगा पा और एक एक करके सभी विद्यार्थी अपने-अपने घर चले गए थे। कुशल और रॉवी भी सात बजे के करीव कानेज छोडकर चले गये थे। प्रो० भारती के केविन मे अव भी रोशनी जल रही थी। नीचे कालेज का पहरेदार एक पिजन से गप्पे हाक रहा था। उसी समय कालेज के कपाउण्ड के पीछे की दीवार से दो गुण्डे कूदकर कालेज के भीतर घुस गए। उन्हें किसी ने भी नही देखा। वे धीरे-धीरे सीढियां चढ रहे ये और मोढिया चढते ८२/नयी दिशाएँ समय यहाँ-वहाँ देखते जा रहे थे। वे जव ठीक प्रो० मारती के केविन के पास आ गए और उसी समय फोन की घण्टी बजी। प्रो० मारती ने फोन पर बात की और खिडकी से पहरेदार को बुलाया। जी साव' कहकर वह ऊपर चढ आया। दोनो गुण्डे जरा डर से गये और फौरन केविन के पीछे के क्लास-रूम मे छिप गये। उन गुण्डो को लगा कि यदि प्रो० भारती चले गए तो उनकी मेहनत वेकार हो जाएगी। प्रो० भारती कुछ थक से गए थे इसलिए उन्होने चाय लाने के लिए कहा। पहरेदार पैसे लेकर चाय लाने के लिए नीचे की ओर चला गया । उसके जाते ही दोनो गुण्डो ने केविन के दरवाजे को जार सर- कना शुरू कर दिया। प्रो० भारती को कदमो की आहट सुनायी दी। वाहर को रोशनी इन दोनो गुण्डो ने वुझा दी। प्रो० भारती तव तक सजग हो गए थे। इतने में दोनो ने केविन के भीतर प्रवेश कर लिया और भीतर से दरवाजा वद कर दिया। प्रो० भारती ने जिन दो ड्रग पैडलस को पुलिस के हवाले किया था, वे ही ये दो गादमी थे। ये कैसे छूट गये ? प्रो० भारती को यह समझने मे जरा भी देर नहीं लगी कि उनकी जान खतरे में है । वे सजग हो गए। उनकी मेज के पास भारत का नक्शा था जिसे लपेट कर रखा गया था। उस नक्शे की लकडी के एक सिरे को पकडकर वे विजली की तरह उन पर झपटे और एक गुण्डे के सिर पर तीन बार ज़ोर से लकडी पटक दी। वह गुण्डा गिर पड़ा तो दूसरे ने दरवाजा खोलकर भागने की चेष्टा की। प्रो० भारती उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे थे कि पीछे से उस दूसरे गुण्डे नै प्रो० भारती की पीठ पर चाकू के तीन बार किये। प्रो. चिल्लाकर नीचे गिर पडे । दूसरा गुण्डा भी भाग निकला। भागते समय चाय लाने वाले पहरेदार से वह टकराया और पूरी चाय पहरेदार के कपडो पर गिर गई। ऊपर से प्रो० भारती की आवाज़ आ रही थी। पहरेदार तेजी से सीढियाँ चढता हुआ केविन के पास आ गया। उसने प्रो० भारती को केविन के दरवाजे के पास पडा देखा । चारा जोर खून फैल गया था। प्रो० भारती केवल एक ही शब्द कह सके-'डॉक्टर'। फौरन पहरेदार नीचे की ओर दौडा। उसने दूसरे पीअन को ८३ / नयो दिशाएँ । प्रोफेसर के पास रहने के लिए कहा और नीचे से ही चिल्लाकर उसने होस्टेल मे रहने वाले विद्यार्थियो तथा प्रोफेसरो से बता दिया। सभी प्रो० भारती की जोर दौडने लगे। एक प्रोफेसर ने प्रिंसिपल का बुलाया। उन्होने फौरन रोगी-वाहन के लिए फोन किया। कालेज की खामोशी तरह तरह के लोगो की आवाजो से भर गयी। प्रो० भारती को जाँचने डॉक्टर भी आ गए। काफी खून बह चुकने के कारण वे बेहोश हो गए थे। उसी समय पुलिस भी जा गयी थी। सभी लोग रोगी-वाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे । उसके आते ही प्रो० भारती को बम्बई अस्पताल में भरती करा दिया गया। उनकी सारी पीठ खून से भर गयी थी। चारो और फिर एक वार तहलका मच गया। जखवारो मे प्रो० भारती के फोटो छप गये। उनके बारे में खास जानकारी दी गयी यी। यह तो दूसरे दिन की बात थी। जिस रात प्रो० भारती को अस्पताल में दाखिल कर दिया गया, वह रात भयकर थी । डाक्टरो ने फौरन उन्हे आपरेशन टेबल पर ले लिया। तकरीवन चार घटो तक आपरशन होता रहा। हालत बहुत ही नाजुक थी क्योकि उस गुण्डे ने एक साथ तीन वार किये थे। प्रो० भारती को ग्लूकोज पर रखा। वे होश मे आये तो सामने डाक्टस थे । उन्हाने उहे वोलने की इजाजत नही दी। प्रि० खोसला ने उनसे हाथ मिलाया और कहा-"ईश्वर कृपा से आप बच गए। विद्यार्थियो तथा अन्य लोगो से बचाने के लिए उन्हे अति-दक्षता-विभाग (इटेसिव केयर यूनिट) मे रखा गया था। हर अखबार म रामकृष्ण कालेज की यह घटना छप गयी थी। चाकू चलाते समय खुद पहरेदार प्रो० भारती के लिए चाय लाने गया था। इस बात को लेकर कालेज की काफी जाला- चना की गयी। पहली बार एक मासूम विद्यार्थी का खून हो गया था और अब चार महीनो के बाद स्वय प्रोफेसर का खून करने की साजिश रची गयी थी। प्रिंसिपल खोसला की भी कटु आलोचना की गयी थी। प्रिंसिपल से तरह-तरह के सवाल पूछे जाने लगे। वे जो कुछ जानते थे उनका उत्तर देते थे। उन्होने इस मामले में पुलिस के दोप ८४/नयी दिशाएँ । - निकाले । प्रो० भारती को अव तीन दिनो के बाद स्पेशल कमरे में रखा गया था। उनके पास तीन पुलिस-कास्टेवल्स थे। वे आने-जाने वाले लोगो पर ध्यान रख रहे थे । सौभाग्य से प्रो० भारती बहुत ही जल्द सुधरने लगे। चदनपुर सोशल-वर्क कैम्प के लिए सिफ चार दिन बाकी थे। प्रिंसिपल ने कैम्प की तारीख बदलने की बात छेडी तो प्रो० भारती ने इसका विरोध किया। वे सोच रहे थे कि चार दिनो मे वे काफी अच्छे हो जायेगे। उनके निश्चय के कारण प्रिं. खोसला ने स्वय कैम्प मे जाने का फैसला किया और प्रो० भारती से कहा-"जब तक डॉक्टर्स आपको इजाजत नहीं देगे आप यही शाति से रहेगे।" प्रो० भारती प्रि०खोसला के सामने कुछ न बोल सके । उन्होने डाक्टरो से अनुरोध किया कि वे उन्हे जल्द-से-जल्द अच्छा करने की कोशिश करे । उन्होने डाक्टरो से बताया कि वे पिछले बीस सालो से सोशल-वक के कैम्प का इन्तजाम करते आ रहे है लेकिन चदन- पुर का कैम्प एक खास वात के लिए महत्व रखता है। यह मिलन का गाँव है और प्रो० भारती ने मिलन की समाधि के सामने गाँव- याला को वचन दिया था कि वे भी मिलन के सपनो को पूरा करने मे गाँववालो के साथ रहेगे। इस कैम्प से उनका भावनात्मक संबंध है। वे डाक्टरो की सलाह मानकर नियमित रूप से आज्ञाकारी विद्यार्थी की तरह सभी दवाइया लेते जा रहे थे। वैसे काफी स्वस्थ हो गये थे लेकिन जरम अभी भरे नही थे और पीठ में चार होने से सोने म असुविधा हो रही थी। धीरे धीरे अव मुलाकातियो की सख्या बढने लगी थी। उनका कमरा फूलो से भर जाता था। इस वक्त उन्हें अपने माता-पिता की याद आती थी। वे तो कव के गुजर चुके थे। वनारस मे उनका छोटा-सा मकान था। वहाँ उनकी विधवा चाची रहती थी। वे हर महीने उसे पैसे भेजते थे। जब कमरे मे कोई नहीं होता और कमरे के सारे फूल निकाल कर बाहर रख दिए जाते और वे अकेले रह जाते तो उन्हे अपनी चाची की याद आती थी। अव भी वे दिन उन्हे याद हैं जब वे बीमार थे तो चाची ने उनके लिए कितने व्रत किये थे। । - २५/नयी दिशाए । वे सस्कृत की पडिता थी। सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर गीता के श्लोक गाकर उन्हे जगा देती। चाची को देखने की उनके मन में तीव्र इच्छा पैदा हो गयी। उन्होने चाची को पत्र लिखने का निश्चय किया। जव शाम हो गयी और रात का आगमन होने लगा ता उन्होने चाची को पत्र लिखा और जून के पहले सप्ताह मे वहा जा जाने का वचन दिया था। उस रात वे बहुत देर तक जागते रहे । उहे अतीत की घटनाएँ मता रही थी। प्रो० भारती अब तक शादी- शुदा न थे और उनकी शादी की उम्र भी बीत चुकी थी। अनेक साथियो ने उन्हे मवाल किये थे लेकिन वे हँसकर इनके सवालो को टालते रहे थे। जिस लडकी से उनकी शादी होनेवाली थी वह बनारस की ही रहने वाली थी। शादी की तैयारिया हो चुकी थी लेकिन दुर्भाग्य से गगा में नाव उलट जाने से उसकी मृत्यु हो गयी थी। अपनी मावी पत्नी की दुघटना को वे सह न पाये थे और उन्होने बनारम छोड दिया था। तब से वे जपनी पढाई और विगार्थी इन दो बातो मे ही खो-से गये थे । अतीत को याद करते करते वे सो गए और सुबह हुई तो नस ने आकर उन्हे जगा दिया। उनके जरमो पर नया वैडेज वाधा गया। दवाइया जादि लेने के वाद, जब उ होने अखवार पढना शुरू कर दिया था तो उस समय इ० जयचद वहा आ पहुँचे । अब तक उन्हाने विशेप रूप से कुछ पूछा नही था । वातो बातो में इ० जयचद ने प्रो० भारती से सभी जानकारी हासिल की। इ० जयचद ने उन्हें जाश्वासन दिया कि वे वहुत शीघ्र उन दोनो को गिरफ्तार कर लेगे। प्रो० भारती ने उन दानो को पकडवा दिया था इसलिए उन दोनो ने एक प्रकार से प्रो० भारती से प्रतिशोध लिया था। उनके अपराध सावित न होन के कारण वे मुक्त हो गये थे लेकिन अब उनका वचना मुश्किल है । इ० जयचद को ऐसा लग रहा था कि कुछ दिनो के लिए उन्होने बबई शहर छोड दिया है। जहा-जहाँ गर्द जादि नशीली चीजे वेची जाती है वहा उनकी खोज जारी है। प्रो० भारती ने बताया कि ड्रग्ज वेचने वालो के पीछे कुछ अन्य शक्तियों काम कर रही है। उनके मूल की सोज आवश्यक है। ८६ / नयो दिशाएँ चदनपुर के कैम्प के लिए अब एक दिन बाकी था और डाक्टरो न प्रो० भारती को और चार दिनो तक अस्पताल मे रुकने के लिए कहा था। डाक्टर की सलाह उन्हें पसन्द नही थी लेकिन वे मजबूर थे। इसी बीच कुशल और रॉवी तथा कुछ सीनियर विद्यार्थी चदन- पुर हो आए थे। उन्होने शकरदास और दयानद आदि लोगो से वातचीत की थी और वहाँ के लोगो को समझाया था। शकरदास और दयानद आदि गाँव के लोग प्रो० भारती को देखना चाहते थे। कुशल ने बताया था कि वे चार-पाँच दिनो के वाद ही उन्हें मिल सक्ते है। जबकि कैम्प के लिए एक दिन वाकी या शकरदास, दया- नद और कुछ गाँववाले प्रा० भारती से मिलने अस्पताल आ पहुँचे। गाव के इन सव लागो को देखकर प्रो० भारती पुलकित हो गये। वे भारती जी के लिए फूल और फल लाये थे। शकरदास को देखकर वे भावुक हो गये। इतनी उम्र में भी उन्होने प्रो० भारती को देखने का कष्ट उठाया था। उन्होने अपने कॉपते हाथो से प्रोफेसर को जाशीर्वाद दिया। दयानद ने कहा-"हम जानते है कि आपकी यह तीव्र इच्छा है कि आप अपने विद्यार्थियो के साथ चदनपुर आये लेकिन आपकी सेहत अच्छी होने के बाद आपको कौन गानेवाला है ? इतना विश्वास रखिए कि आपके इन विद्यार्थियो का हम अच्छी तरह से स्वागत करेगे। उनकी हर तरह से सहायता की जाएगी।" उसी समय कुगल और रॉबी वहाँ जा गये । कुशल ने यह वताया-जाज प्रिसिपल का कैम्प के सम्बन्ध म भापण है और उन्हाने कैम्प में शामिल हाने वाले विद्यार्थियो को बुलाया है । सर, आप निश्चिन्त रहिए। यह कैम्प अविस्मरणीय होगा। सभी विद्यार्थी चदनपुर जाने के लिए मचल रह हैं। वे जोश में हैं और शायद पहली बार उनके दिलो मे इतनी उमग भर गयी है।" प्रो० भारती ने कुशल को वाते सुनी और वे मुस्कराये । वे चाहते थे कि इन जवानो की शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए हो । कालेजा के सकडा विद्यार्थी पढाई के साथ-साथ हमारे गाँवो को सुधारने के लिये छुट्टियों में उनके पास जाकर उन्हे जान देते रहे तो गांवो में जागृति आ जायेगी। ८७/नयी दिशाएं प्रिंसिपल के भाषण के बाद, कुशल विद्यार्थियो के साथ ड्रग्ज वेचनेवालो के खिलाफ जुलूस ले जाने वाला था। उन्होने अपने साथियो की मदद से वहुत से पोस्टस बनाये थे। वे बम्बई के कालेजा मे जाकर वहाँ अपने साथियो से मिलने वाले थे। प्रो० भारती पर हुए हमले के लिए विद्यार्थी ड्रग-पेडलर्स के विरुद्ध नारे लगाने वाले थे। उस प्रकार उनकी तैयारी हो चुकी थी 'ड्रग-पेडलर्स के लिए--- हथकडिया', 'समाज के खतरनाक दुश्मन-ड्रग-पेडलर आदिधापणाएँ वे करने वाले थे। उन्होंने पहले से ही प्रिंसिपल खोसला से इजाजत ले ली थी। कालेज में पोस्टस लगे थे---"खुदगज़ और लालची लोग कुछ रुपयो के लिए हमारे देश के नौजवानों को बरवादी के रास्ते पर ले जा रहे है । दुर्भाग्य से कमजोर नौजवान इसके शिकार हो रह है । कुछ विदेशी लोग जपने लाभ के लिए हमारे देश के नौजवानो को कमजोर कर रहे है।" दूसरा एक पोस्टर कालेज के गेट पर लगा हुआ या--"ब्राउन शुगर, हेराइन, चरस आदि जहरीली चीजे बहुत ही खतरनाक है। इनकी लत पड़ने के बाद, अनेक शारीरिक और मानसिक रोग हो जाते है। इन नशीली चीज़ो को लेनेवाला नौजवान त्वचा रोग से पीडित होता है। शरीर पर फोडे हो जाते है। ऑखे अदर धंस जाती हैं। भूख नहीं लगती और गुद की बीमारियो के कारण पेशाव ठीक तरह से नहीं होता। सास लेने में तकलीफ होन लगती है। फेफडो पर भी इन जहरीली चीजो का असर होता रहता है । लगातार इन नशीले पदार्थों के सेवन से वह नौजवान दो सालो मे नपुसक हो जाता है। इस तरह वह अपनी जिन्दगी को वरवाद कर देता है।" कालेज के विद्यार्थी ऐसे पोस्टर्स जगह-जगह लगा रहे थे। कुशल कुछ ड्रग-अडिक्दो के फोटो लिये थे। उनकी नशा शुरू करने से पहले की तस्वीरो के साथ नशीले पदार्थों के सेवन करने के बाद की तस्वीर लगायी गयी थी। प्रिं० खोसला ने इन सवकी ये जोशीली वातें सुनी इसलिए उन्होने भी दिलचस्पी ली थी। इन सारी बातो को खवर प्रो० भारती को भी मिली तो वे खुश हो गये। प्रिंसिपल खोसला का तीन बजे भाषण था। वे अपने भाषण में ८८/नयी दिशाएँ कैम्प के बारे मे जानकारी देनेवाले थे और साथ-साथ चदनपुर के लोगो के बारे में भी बताने वाले ये। भापण का समय नजदीक आ पहुंचा या और कालेज के सभागृह में विद्यार्थी इकटठे होने लगे थे। ठीक तीन बजे कुछ प्रोफेसर और प्रिंसिपल ना गये। सभागृह शात हो गया। प्रिंसिपल खोसला ने प्रो० भारती पर हुए हमले की निन्दा की और विद्यार्थियो को बताया कि वम्बई के सभी कालेजो मे कुछ विद्यार्थी नशीली और जहरीली चीजो के शिकार होते जा रहे है। ऐसे कमजोर नौजवानो को उचित राह दिखानी चाहिए। वे नशीले पदाथ क्यो लेते है ? यह सवाल दूसरा है। यदि नशीले पदार्थ मिलेगे ही नहीं तो लगे कहाँ से? प्रिंसिपल खोसला ने शुरुआत ऐसी की थी। बाद में उन्होने कैम्प के बारे में बताया। अपने भाषण मे उन्होने समाज-सेवा के महत्त्व को बताया। उनके भापण का सार इस प्रकार था- विद्यार्थी यह न सोचे कि कालेज मे आकर पढाई करके परीक्षाओ मे सफलता प्राप्त करना ही उनका कत्तव्य है। पढाई के साथ-साथ उन्हे और भी बहुत-सी बाते करनी होती है और करनी चाहिएँ । शिक्षा में हमारा बौद्धिक विकास होता है और तरह तरह के खेलो मे प्रशिक्षण लेकर उनका अभ्यास करने से शारीरिक विकास होता है। दूसरो की मुसीबतो मे मदद करना, उनकी सेवा करना और उनके लिए त्याग करना आदि बातो से आत्मिक विकास होता है। शारी- रिक, बौद्धिक एव आत्मिक विकास-ये तीनो शिक्षा के अग है। इन तीनो के विकास से ही शिक्षा मे सपूर्णता आ सकती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षाएँ पास करना नहीं है। ऐसा सोचने वाले विद्यार्थी अपने-आपको सीमित बना देते है। अधूरे ज्ञान के कारण जीवन में बार-बार उन्हें असफलताओ का मुह देखना पड़ता है। ऐसे विद्यार्थी जीवन से निराश हो जाते हैं। बाद में वे किसी तरह जीते जाते है । वे अपने किए पर पश्चात्ताप करते रहते हैं, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है । चदनपुर के कैम्प के बारे मे बताते हुए उन्होने यह बताया कि -गाव वालो की कोई आलोचना नहीं करेगा। इनके दोपो को ८९/नयी दिशाएँ निकालना छोडकर उनसे मेलजोल रखकर प्यार का वर्ताव रखना चाहिए। कभी-कभी अनजाने मे ही हम दूसरो की गलतियाँ निकालते समय अपनी प्रशमा करते रहते है। इस प्रशसा म अहकार की भावना प्रकट हो जाती है। दूसरी एक बात यह है कि केवल घरो, रास्तो और पाठशाला की मरम्मत करने से हमारा उन गाववालो के लिए कत्तव्य पूरा नहीं होता। गाववाले भोले जौर मासूम होन से हमारे विचारो का प्रभाव उन पर तुरन्त पड सकता है। दोपो को दिखाते समय उनके गुणो की भी सराहना करनी चाहिए। स्वच्छता का महत्त्व समझाते समय भी अपनी मिसाल से बात को बताया जा मकता है। गाँवो में देवी-देवताओ के बारे मे काफी अध-श्रद्धा है। इस जधश्रद्धा को दूर करने के लिए उनके सामने अनेक उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिएँ। ऐसी बातो को समझाते समय हमे विज्ञान का उपयोग करना चाहिए। कम्प मे जाने के बाद, केवल काम करके वैठना नही। शाम के समय गाववालो के पास जाना, उनके परिवार के विषय में जान- कारी लेना तथा उनके बच्चो के बारे मे जान लेना आदि चीज महत्त्व रखती है। इस कैम्प मे शिक्षा, परिवार नियोजन, सफाई आदि बातो पर जोर देना है लेकिन साय साय यह भी देखना है कि जापकी वातो से किसी का दुख तो नही हो रहा है । शारीरिक श्रम मे गाववाले हमसे आगे हे लेकिन उनके लिए किसी अच्छे माग- दशक की आवश्यकता होती है। गॉव मे कभी कभी ऐसे साधु और फकीर आ जाते है जो चमत्कारपूण कहानिया सुनाकर इनसे पसे वसूल करते रहते है। कभी-कभी वीमार लागा का इलाज के लिए डॉक्टर के पास न भेजकर उनके गले म तावीज आदि वाँध देते हैं। कभी-कभी छाठे वच्चे ऐसे साधुनो जौर फकीरा के कारण मर भी जाते हैं । ऐसे साधुओ और फकीरा पर विश्वास न करके उह गाँव से भगा देना चाहिए। प्रिंसिपल ने यह बताया कि हरएक का एक डायरी रखनी चाहिए। दिन भर काम करन के वाद तीन या चार निश्चित किये परिवारो के साथ हर विद्यार्थी और विद्यार्थिनी का कुछ समय ९०/नयी दिशाएं . विताना होगा। कमी-कभी मिलकर उनके साथ भोजन करने या भोजन पकाने का काम भी करना चाहिए। उन परिवारो को ऐसा लगना चाहिए कि आप भी उनके परिवार के सदस्य हो गये है। भोजनोपरान्त जलग-अलग चलचित्रो का आयोजन भी आवश्यक है। प्रिंसिपल ने यहाँ-वहाँ से दस प्रोजेक्टर मॅगा लिये ये । डाक्यूमैटरी फिल्मे करीवन सी के ऊपर थी जिनमे दहेज-प्रथा परिवार-नियोजन, अध-विश्वास, बचत आदि विपयो पर फिल्मे थी। अर्थात जो भी योजनाएं प्रिंसिपल ने बतायी उनकी तैयारी प्रो० मारती ने की थी। प्रिंसिपल खोसला ने बहुत-से विद्यार्थियो से अनुरोध किया किवे अपने अच्छे अच्छे कैमरे तथा टेप-रेकार्ड स ले जाये । इन टेप-रेकार्डों द्वारा खुद उनको उनकी ही आवाजे सुना देंगे तो वे खुश हो जायेगे। इस कैम्प के लिए प्रिंसिपल ने करीवन वीम डाक्टरो से सम्पक स्थापित कर लिया था और उनकी सुविधा के अनुसार वे एक या दो दिनो के लिए कैम्प में आकर जानेवाले थे। इसका अर्थ यह या कि रोज एक या दो डाक्टर चदनपुर में उपस्थित होने वाले थे। ये डॉक्टर गाँववालो की भी मुफ्त मे जांच करके इलाज करने वाले थे। कैम्प म आवश्यक चीजो की सूची बनाकर प्रिमिपल ने सभी को साइक्लोस्टाइल कापीज़ दी। बम्बई की दो कपनियो ने पांच वसे मुफ्त म दी थी। चार बगो मे सभी विद्यार्थी एव विद्यार्थिनियाँ जाने वाले ये जोर पांचवी बस में सभी सामान या । ममी को ठीक सात बजे कालेज में जमा होना या जऔर वही से ये वमे छूटनेवाली थी। विना प्रो० भारती के कुछ-कुछ फीका लग रहा था । वसा के छूटते समय प्रिसिपल को प्रो० भारती की चिटठी मिली। वे चार दिनो के वाद इस कैम्प में शरीक होने वाले थे। प्रिंसिपन खोला ने चिटठी पढकर मुनायी तो सभी ने ज़ोर से तालिया बजायी और इसके बाद बसे चदनपुर के लिए निकल पड़ी। ११/नरी विताएँ प्रकरण दस डॉ० रोहित ने भी प्रिसिपल खोसला को वचन दिया था कि वे भी चार दिनो के लिए इस चदनपुर कम्प मे ज़रूर आयेगे। उन्होने यह बताया था कि वे प्रो० भारती को साथ लेकर आयेगे। प्रो. भारती के माय किसी डाक्टर का होना ज़रूरी भी था, इसलिए डॉ० रोहित के कथन मे सब खुश हो गए। डॉ. रोहित के अस्पताल मे काफी वीमार आदमी थे इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी काफी बढ गयी थी, इसलिए वे अन्य दो डाक्टरो को सब कुछ समझा रहे थे। इसी बीच उन्हे अचानक एक ऐसे बीमार आदमी को बचाने का सामना करना पड जिससे वे थोडे हिल से गये थे। उनका पेशेण्ट था एक ड्रग-अडिक्ट अजय कुलकर्णी । अजय कुलकर्णी पिछले दो सालो से ड्रग-अडिक्ट या और कभी- कभी वह अपने दोस्तो को ड्रग्ज वेचता भी था। दुर्भाग्य यह था कि वह एक अच्छा और होशियार विद्यार्थी था लेकिन शराबी पिता की वजह से उसके जीवन मे ये जहरीली चीजे आ गयी थी। एक जमाने में अजय के पिता पुलिस इस्पेक्टर थे लेकिन उनका भ्रष्टाचार और रिश्वतखारी इतनी बढ गयी थी कि एक दिन रिश्वत लेते समय वे रगे-हाथ पकडे गये। अपमान और वेइजतो वे बर्दाश्त न कर सके। उनकी नौकरी छूट गयी तो उनसे डरनेवाले चोर-उचक्के भी ९२/ नयी दिशाएँ सीना तानकर उनके सामने चलने लगे थे। एक ज़माने मे उन्होने किसी सेठ जी की जान बचायी थी इसलिए उन्होने इन्हें मिल मे सिक्यूरिटी अफसर की नौकरी दी थी। अजय की मां पहले से कम- जोर थी और पति के ये लक्षण देखे तो वह दुख से भर गयी। उसे तपेदिक की बीमारी ने पकड लिया था। न ठीक तरह से खाना न ठीक तरह से सोना। दिन-रात पति-पत्नी मे झगडे होते रहते थे और अजय के पिता नशे मे अपनी पत्नी को खूब भारते रहते थे। अजय इन बातो से परेशान हो चुका था। उसका ध्यान पढाई से हट गया था और हरदम सोच-विचार मे बैठा रहता था। एक दिन उसके एक मित्र ने उसे ब्राउन शुगर की सिगरेट दी तो अजय स्वर्ग मे उड़ने लगा था। और, तब से आज तक वह गद आदि जहरीली चीजें लेता आ रहा था। उसने कई वार ड्रग्ज़ के लिए चोरियां की, कितावें वेच डाली और दोस्तो से उधार पैसे लिये। उसके शरीर को ड्रग्ज की जादत- सी हो गई थी। उसने ड्रग-पेडलर्स से दोस्ती कर ली थी और पैसे न मिलने पर वह उनसे उधारी लेता था। कभी-कभी वह उनके ड्रग्ज़ वेचकर उनके पास से अपने लिए ड्रग्ज मांग लेता था। ड्रग्ज न मिलने पर उसकी हालत दयनीय हो जाती थी। जब ड्रग-पेडलर्स ने उसे ड्रग देने वद कर दिये तो वह तडपने लगा। उसने अपने दोस्त की घडी चुरायी और ब्राउन शुगर की तीन पुडियो के लिए घडी दे डाली। अजय को प्यास लग रही थी लेकिन पानी पीने की उसकी इच्छा नहीं हो रही थी। वह खाना भी ठीक तरह से नहीं खा पाता था क्यो- कि उल्टी की इच्छा होती रहती थी। ऐसी हालत मे क्रोध से अजय ने गद के तीनो पैकेट वैसे ही खा डाले। कुछ समय तक तो वह नशे मे झूमता रहा लेकिन बाद में उसके पेट मे दर्द शुरू हुआ और वह जोर-जोर से खाँसने लगा। खासते समय, उसके मुह से खून निकल जापा तो अजय घबरा गया। वह अस्पताल की ओर दौडने लगा और दौडते-दौडते तीन वार गिर पड़ा। अस्पताल के बाग मे लिलि ९३ / नयी दिशाएं के सफेद फूलो के पास वह आकर गिर पडा। जब उसने उठने की कोशिश की तो मुह मे खून का फव्वारा सा निकल पड़ा । वहाँ के सफेद फूलो पर रक्त की लाल वूदे दिखायी देने लगी। अजय की कमीज़ सामने से लाल हो गयी थी, उल्टी करते समय वह जोर से चिल्ला उठा तो अस्पताल के माली का व्यानं गया। वह दौडता हुआ वहाँ आया। अजय को रक्त मे सना देखकर वह भयभीत हो गया। उसने और लोगो को पुकारा और सभी ने अजय को तडपते देखा। दो वार्ड बायज दौडकर स्ट्रेचर लाने गये । अजय को स्ट्रेचर पर टालकर वे उसे डा० रोहित के पास ले गए। अजय कुलकर्णी को इस हालत में देखकर डा० रोहित को आघात-मा लगा। उन्हे लगा था कि अजय सुधर गया होगा। नम की मदद से उसने फौरन उसे इन्टेन्सिव-केजर यूनिट म ले लिया। रोहित ने दो और डाक्टरो को बुला लिया और फौरन उसे इजेक्शन देकर ग्लुकोज देना शुरू किया। डाक्टरो ने उसे जाचना शुरू किया लेकिन अजय के मुह से लगातार खून बह रहा था। डा० रोहित समझ गये कि उसका वचना मुश्किल है। अजय की आखे माथ की जोर चली गयी और उसकी सास ज़ोर से चलने लगी। सभी डाक्टर पेट के आपरेशन की सोच रहे ये कि जजय ने दम तोड दिया। नस ने डाक्टरो को पुकारा और सभी वहाँ दौडकर जा गये । जजय अव खामोश हो गया था और दुर्भाग्य से वह एक शब्द भी न बोल सका था। अजय कुलकर्णी भी रामकृष्ण कालेज का ही विद्यार्थी था । दृग- पेडलर्स ने मिलन का खून किया था चाकू से, और अब इन्ही ड्रग- पेडलम ने ही नशीली और जहरीली चीज़ो द्वारा अजय का खन किया था। मौत के बाद, अजय का मृत शरीर अस्पताल म पड़ा रहा । मृत शरीर को मागने कोई नहीं आया तव डा० रोहित ने प्रो. भारती को फोन करके जजय के बारे मे जानकारी दी। प्रो. भारती ने अजय की मौत के बारे में सुनकर पलभर के लिए जाघात के कारण वुत जैसे हो गये। बाप शरावी या और माँ तपेदिक की बीमारी में मौत से लड रही थी। प्रो० भारती जय की लाश ९४/ नयी दिशाएँ अस्पताल से ले जाने के लिए तैयार ये क्योकि वह उनका विद्यार्थी या। प्रो० भारती ने हास्टल के एक विद्यार्थी का बता दिया था कि वह कुछ विद्यार्थियो को लेकर डा० रोहित के अस्पताल में आ जाये। प्रो० भारती धीरे-धीरे चलकर डा० रोहित के पास गये और उन्होने रजिस्टर की खाना पूरी की। प्रो० भारती ने अपने एक विद्यार्थी से कहा-"अजय के लिए कफन और फूला का प्रबन्ध करो।" प्रो. भारती ने उम सीनियर विद्यार्थी के हाथ में पांच सौ रुपये दिये । करीब पचास विद्यार्थी और लगभग आठ अध्यापक भी आ गये थे। उन्होने ही जनाज़ा तैयार किया। अस्पताल में ही अजय को शव-याना शुरू होने वाली थी। प्रो० भारती ने कुछ विद्यार्थियो को बुलाया और कुछ पोस्टस तैयार करने के लिये कहा । अर्थात वे बताते गये और विद्यार्थी पोस्टम के लिये नारे लिखते गये । 'अजय की मौत के लिये ब्राउन शुगर का इस्तेमाल ।' 'ड्रग वेचने वालो ने ही अजय का खून कर डाला।' 'क्या इन नशीली और जहरीली चीजो से अपन देश के नौजवानो को हम बचा नहीं सकते ' 'लालची और खतरनाक तस्करो को पकडकर नौजवानो को वचा लो।' वहुत-ने विद्यार्थी हायो मे ये पोस्टर्स लेकर चुपचाप अजय की लाश के साथ चल रहे थे। प्रो० भारती और डाक्टर रोहित दोनो कार मे बैठे थे। प्रो० भारती कुछ कुछ थके हुए दिखाई दे रहे थे। अजय की लाश, भारतीय नौजवान की लाश और उसकी इस तरह मृत्यु । श्मशान भूमि मे मायूसी छा गयी थी। जजय के कुछ मिन चिता बना रहे थे। मॉ वाप के हाते हुए भी अजय की लाश लावा- रिस थी। लाश चिता पर रखी गयी और अजय के एक मिन ने ही जग्नि-सस्कार का कार्य किया। चिता जल उठी और अजय का शरीर पच-तत्वा मे विलीन हो गया। प्रो० भारती ने कुछ विद्यार्थियो को वहाँ रुकने के लिये कहा और वे स्वय डा० राहित के साथ श्मशान- भूमि से धीरे धीरे चले गये। उन्हे चदनपुर के कैम्प के लिये अपने आपको तन्दुरुस्त और मजबूत रखना या। दूसरे प्रोफेसर उन विद्यार्थियो के साथ वही रहे । अजय जसे दो-तान लोग रोज़ इन ९५ / नयी दिशाएं । ।
भयानक और खतरनाक नशीली चीज़ो के शिकार हो रहे थे। दूसरे दिन जखबारो मे अजय की कहानी छप गयी थी और प्रो० भारती ने अपने शहर के लोगो को जो चेतावनी दी थी वह भी छपी हुई थी। 'कुछ वाहर के देश भारतीय जवानो को कमजोरियो का लाभ उठाकर हज़ारो नौजवानो को तवाही की राह पर ले जा रहे है। यह तो युद्ध से भी भयानक वात है। हमारे लोग अय तक इस बात को गभीरता से नहीं ले रहे है। दिन-ब-दिन नशीले पदार्थों के सेवन करने वाले नौजवाना की सख्या बढ रही है। चम्बई शहर में ही करीबन एक लाख के लगभग यह नवर पहुँच गया है। इसका मतलव यह हुआ कि हमारे एक लाख नौजवान देश के लिये वेकार सावित हो गये। वे जिन्दा लाशो की तरह निरुद्देश्य यहाँ-वहाँ भटक कर रास्ते के किसी कोने पर अपना दम तोड देने वाले है । अव हमे जागना चाहिए। सरकार को नशीले और जहरीले पदाथ बेचने वालो को कडी-से-कडी सजा देनी चाहिए। वाहर से नशीली चीजे लानेवाले तस्करो को फॉसी की सजा ही उचित होगी । मै सभी लोगो से, सरकार से और पुलिस अधिकारियो से दिल से अनुरोध करता हूँ कि नशीली चीजो के शिकार हमारे नौजवानो को वे वचा ले। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि आखिर नौजवान ही हमारे देश की शक्ति है।' चदनपुर तक खबर पहुँचन मे देर न लगी। वहाँ समाज-सेवा का कार्य आरभ हो चुका या । प्रि. खोसला ने अखबार मे छपा प्रो० भारती का भाषण पढकर सवको सुनाया और अजय की आत्मा की शाति के लिए सभी दो मिनट तक मौन रहे । बाद में उन्होने उसके लिए प्राथना की । चदनपुर के गाँववालो को मिलन की याद आ गयी। कुशल और रावी ने जजय को बचाने की दो वार कोशिश की थी लेकिन असफल हो गये थे। ९६/नयी दिगाए प्रकरण ग्यारह जाने वाली मुसीवता की पर्वाह किये विना निरतर अच्छे कायर्या में लगे लोगो की आरभ म काफी आलोचना होती है लेकिन बाद मे उनकी सच्चाई, उनकी लगन और उनकी मेहनत के कारण वे लोगो के दिलो को जीत लेते हैं। रामकृष्ण कालेज के बारे में भी यही बात हो गयी। शुरू-शुरू में मिलन की मृत्यु के कारण और वाद मे प्रो० भारती पर हुए हमले के कारण कालेज की काफी बदनामी हो गयी। जखबारो मे आलोचनाएं हुइ लेकिन प्रिसिपल खोसला ने इन बातो को जरा भी महत्त्व नही दिया था। अब वे ही अखवार इस रामकृष्ण कालेज के बारे मे स्तुति-सुमनो की वर्षा कर रहे थे। इस कालेज के जिन्दादिल विद्यार्थी भारतीय विद्यार्थियो के लिए एक मिसाल कायम करना चाहते थे। क्लास रूम मे शरारत करने वाले विद्यार्थी तथा अपने से वडो के साथ लडने वाले विद्यार्थी आज अपनी शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों के लिए कर रहे थे। योग्य मार्गदर्शन के कारण हमारे जोशीले जवान चदनपुर मे क्रान्ति पैदा कर रहे थे। इन विद्यार्थियो को परिश्रम करते देखकर वहाँ के लोगो ने अपने आलस्य को छोड़ दिया था। पदनपुर में विद्यार्थियो ने जब से काम शुरू किया था तब से आज तक कितने परिवतन आ गये । चदनपुर की पाठशाला बनकर ९७ / नयी दिशाएँ तैयार हो गयी थी और उसके सामने का मैदान खेल का मैदान हो गया था। गाँव से स्टेशन तक पक्का रास्ता बन गया था। वम्बई के अलग-अलग ठेकेदारो ने रास्ते के लिए सभी सामान मुफ्त में पहुंचा दिया था। इस एक किलोमीटर की पक्की सड़क पर चदनपुर के लोए नाच रहे थे। एक महीने का काम पचीम दिनो मे ही हो गया। गांव में भी रास्ते चौडे वन गये। जिस किसी का मकान या झोपडा रास्ते के बीच आता वह खुशी से वहाँ से उसे हटा देता। क्या अपने गाव के लिए वह इतना नहीं कर सकता ? चदनपुर के गाववालो को लगा कि बम्बई के ये विद्यार्थी फरिश्ते बनकर यहाँ आये है। गाव में किसी का विरोध नहीं था। शकरदास ने अपने गाव को इस तरह बदलते देखा तो वे गद्गद हो गये। उहोने इसी गाँव मे अपनी जिन्दगी के सौ साल पूरे किये थे। हर वार लोग इकटठे होते और त्यौहार मनाते । मगल कार्यक्रमो पर आदिवासिया के नाच-गाने होते लेकिन इस तरह का मेल उन्होने अपनी जिन्दगी मे पहली बार देखा था। जव पूरा गाव इस प्रकार बदलने लगा या तब हर एक गाववाले को ऐसा लग रहा था कि उसका घर अच्छा हो, मजबूत हो। कुछ कच्ची झोपडियाँ तोड दी गयी। लोग वहा अपने पक्के मकान बना रहे थे। गाव मे जरा दूरी पर शौचालय बनाये गये ये जिनका उपयोग विद्यार्थी आदि कर रहे थे। वे पक्के और मजबूत थे । उन्ही के पास कुआ बनाया गया था। जव चदनपुर की शोभा और भी बढ गयो । स्टेशन से चदनपुर तक बनायी गयी सडक पर रोशनी के खम्भे खडे हो गये थे। लोगो की चेतना-शक्ति उन्हें थकने नहीं देती। जो लोग छोटी- छोटी मागो पर सरकार की आलोचना किया करते थे, वे चुपचाप अपन-अपने काय करते जा रहे थे। अथक परिश्रम, आपसी मेलजोल और एक-दूसरे की मदद करने की भावना ने सभी की शक्ति जगा दी थी। चदनपुर की पाठशाला का नाम 'मिलन पाठशाला' रखा गया था और उस पाठशाला पर नाम-पट्ट भी लग गया था। इस पाठशाला की तस्वीर जव अखवारो मे छप गयी तव चदनपुर के ९८/नयी दिशाएं गाँववालो के सीने गव से फूल उठे। चदनपुर के बच्चे-बच्चे में काम करने की उमग भर गयी थी। बूढो ने भी घर में बैठना अपनी शान के खिलाफ समझा। मिलकर हाथ वढाने का यह नतीजा था कि चदनपुर चदनवन बन गया था। भारत के लाखो गाँवो के लिए चदनपुर प्रेरक-शक्ति बन गया था। अब चदनपुर मे बिजली, पानी और अच्छे मकानो की सुविधा प्राप्त हो गयी थी। यहाँ लोग व्यक्तिगत सुख की वात को विल्कुल भूल से गये थे। लोगो के इन बाह्य-परिवतनो के साथ-साथ स्वभाव भी बदल गये थे। उनमे कुछ सीखने की इच्छा तीव्र हो गई थी। चदनपुर के करीब-करीब साठ बूढे लोगो ने देवनागरी लिपि मीख ली थी। धीरे-धीरे क्यो न हो, लेकिन वे लिख सकते थे और पढ सकते थे। बहुत-से आदिवासी बच्चो ने टेप-रेकार्डर चलाना सीख लिया। अधिकाश बच्चो और जवानो को बम्बई के इन विद्यार्थियो ने कल्क्यूलेटर चलाना सिखा दिया। जव तक हमारे कितने ही आदिवासी भाई घडी को देखकर समय नहीं बता सकते थे, लेकिन अब वे घडी मे देखकर समय बता कर पुलकित हो रहे थे। छोट छोटे चलचित्रो ने चदनपुर के गाँववालो को खूब प्रभावित किया। एक चलचिन मे उन्हाने हृदय की शल्य- क्रिया देखी तो वे हैरान रह गये। शकरदास ने फिल्म-प्रोजेक्टर खरीदने के लिए अपनी जमा की सारी पूजी दे डाली। इनके पैसो मे गाँववाले एक टी०वी०, एक वीडियो और एक फिल्म-प्रोजेक्टर आसानी से खरीद सकते थे । वहुत-से किसान गरीव थे इसलिए इन चीज़ो को खरीदकर सुरक्षा के लिए मदिर की अलमारी में रखने वाले थे। चदनपुर की क्राति से आस-पास के गाँव भी प्रभावित हो गये थे। लोग इस गाँव को देखने आते और देखकर चकित हो जाते। स्टेशन से आनेवाली पक्की सडक का जहा अत हो रहा था वहा एक हरे बोड पर लिखा गया था- "चदनपुर के निवासी आपका स्वागत करते है।" अव पडोस के गांववालो को भी ऐसा लगने लगा कि वे ९९ / नयी दिशाएँ भी चदनपुर की तरह अपने गांवो का विकसित करें। वहां के मुखिया और सरपच यहाँ जाकर इनकी सलाह लेकर जात । एक छोटे से गाँव ने कितने ही गांवा को प्रेरणा दी थी। एक छोटी-सी चिनगारी शोलो का रूप धारण करती है। ऐसी जागृति की क्राति देश के हर गाँव मे हो जाए तो देश की प्रगति में चार चाद लग जायेंगे। चदनपुर की काया पलट करने म मग्न विद्यार्थियो को और चदनपुर के लोगो को समय का मान ही न रहा। मई का आखरी दिन भी आ पहुँचा । उस दिन गाव म करने के लिए कुछ काम ही नहीं था लेकिन चदनपुर के लोग बहुत ही व्यस्त थे। शकरदास और दयानद आदि लोगो ने बम्बई के लोगा के लिए प्रीति-मोज रखा था और इनके मनोरजन के लिए उन्होने जादिवासी नृत्यो का आयोजन किया था। जादिवासी महिलाओ न बहुत से फूलो के हार बनाये थे। जानकी माई ने इसका प्रवन्ध कर रखा था । चदनपुर का हर एक घर सज गया था । शकरदास न सभी लोगो मे कह दिया था कि वे अपनी-अपनी नयी पोशाका मे शाम को सजधज कर तैयार रहे। दयानद ने तो कुशल, रावी और गोपी के लिए आदिवासी किस्म की पोशाके सिलाई पी। ये तीनो बाघ का शिकार' यह नृत्य पेश करने वाले थे। उफली के ताल के साथ नृत्य करने का वे अभ्यास कर "हये। चदनपुर के सोशल-सर्विस के कैम्प का अतिम दिन था इसलिए प्रिंसिपल अपने कालेज मे वापिस ना गये थे। प्रा० भारती तो यहाँ आकर बिल्कुल स्वस्थ हो गये थे। उन्होने जादिवासी लोगा की भापा भी कुछ-कुछ सीख ली थी। कितने ही आदिवासी गुड मार्निग, गुड ईवनिंग, यक यू सॉरी, आदि शब्द सीख चुके थे। विद्यार्थियो को आश्चय तब हुआ जव अधे गापी ने भी आठ आठ घण्टा तक रास्ता बनाने म मदद की। शाम का समय आ गया ता शकरदास और दयानद न प्रिंसिपल और प्रोफेसगे से अनुरोध किया कि वे सभी विद्यार्थियो को मदिर १००/नयी दिशाएं के पास बुला ले। इनकी बात वे समझ न सके। फिर भी सभी मदिर के पास इकट्ठे हो गये। सूरज डूबने की तैयारी मे था। इन दो पहाडो की गोद म बसे, चदनपुर की शोभा शाम के समय आसमान की लालिमा पाकर और भी वढ जाती है। उसी समय दूर से मधुर सगीत सुनायी देने लगा। बासुरी की तान और डफली की ताल मे तालिया बजाते हुए गाँव के आदिवासी पुरुप महिलाओ के साथ नाचते हुए मंदिर की ओर आने लगे। उनके हाथा मे और पैरो मे घुघरू बंधे थे। उनकी रगीन पोशाको और उनकी लाल टोपियो मे वे प्राचीन युग के दरवारी लोग लग रहे थे। इस दृश्य मे एक जोश था । बूढे शकरदास ने भी नृत्य मे भाग लिया था। विद्यार्थियो की भीड के पास आकर वे रुक गये। सभी ने ज़ोर से तालियाँ बजायी। महिलाओ ने सभी को पुष्पहार पहनाये । कुछ महिलाओ ने उन्हे जादिवासी गहने दे दिए । दयानद ने गाँव की ओर से सभी को प्रीति-भोज के लिए निमत्रित कर दिया। विद्यार्थियो को शहर मे इतना प्रेम नही मिला था। वे हर्षित और चकित थे। भोजन के पश्चात कुशल, रॉबी और गोपी ने एक जोशीला नाच दिखाया। किसी को इस बात का पता नही था इसलिए सभी खुश हो गये । शकरदास ने कायक्रम के अत मे कहा--"आज चदनपुर का भाग्य जाग उठा है। इसी तरह हमारे देश के हर गाव को सुधारा जा सकता है। हम पडोस के गाँवो में जरूर जायेगे और उनकी मदद करेंगे।" दयानद आदि लोगो ने सभी के लिए आभार- प्रदर्शन किया। इस तरह चदनपुर एक आदर्श गाव वन गया। हमारे विद्यार्थी- नौजवानो को लगा कि जिन्दगी में और भी कितनी बातें हैं पढाई के अलावा । मनुष्य जीवन को करीब से देखने का उन्हे यह अवसर मिला था। प्रिंसिपल और प्रोफेसर मारती ने विद्यार्थियो की खूब सराहना की और इनके इस जोश ने हजारो, लाखो नौजवानी का । १०१/ नयी दिशाएँ नयी दिशाएँ दिखाने के लिए प्रेरणा दी। मिलन का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसके बलिदान मे मत्य की ज्योति थी और यही ज्योति हजारो जवानो के दिलो में प्रज्वलित हो उठी थी। मनुष्य म वहुत बडी शक्ति छिपी है। एक बार वह जाग उठती है तो उचित मार्गदर्शन पाकर वह मनुष्य- जाति का कल्याण करती है और तब मनुप्य क्षुद्र भेद-भावो से अपर उठकर मानवता की पूजा करने लगता है। GOU १०२/नयी दिशा
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