Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Patan
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पतन
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पतन
लेखक
प्राल्बेयर कामू
रूपान्तरकार
उमा राव
राजकमल
उपजाबाठमाडा प्रावासावाना
दिल्ली इलाहाबाट बम्बई पदना
मूल्य
२२५ रूपये
फेंच उपयास LaChute १९५६ काहि वो पान्तर
मूल प्रकार सीमार, पेरिस
C१९६० राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड नई दिल्ली
मुद्रक हिली प्रिटिंग प्रस, रिल्सी
प्रसार राजकमल प्ररान प्राइवेट लिमिटेड दिली
'मान विश्राप उस वनमानुस को, जाइम जगह का भाग्यविधाता है, अपनी बात सममा न सकेंगे। वात अमल म यह है कि वह डच मापाके अलावा और बाद भापा नहीं जानता। अगर आप मुझे अपनी और मे वबालन करन की इजाजत न देंगे तोशायद वह अनुमान ही न करपाएगा कि आप जिन राव की माग कर रहे हैं । लीजिए, उम्मीद है कि वह मेरी बात ममम गया-~सके सिर हिलाने के तो यही मतलब हुए कि उसने मरी बात मान ली है । लीजिए, वह चल पडा। वाह ! उसकी जन्दगजाम भी एक प्रकार की सावधानी और मकल्प है। आप भाग्य गानी हैं कि उसने वहम्दर नही निकाला। जब वह किसी की खिदमन नहीं करना चाहता तो वम मुअर की-सी एक आवाज कर देता है। कुछ जोर-जबरदस्ती नहीं करता। बडे-बड जन्तुमा को ही तो अघि कार है अपनी तवीभत के मालिक हान का। अच्या श्रीमान, अब मैं चरता हूँ पापको मवा वरसका इसकी मुझे प्रमन्नता है। धन्यवाद ! अगर मुझे यह निश्चय हाना कि मैं आपका परशान नहीं कर रहा है तो अवश्य ले नेता श्राप बढत ज्यादा महदान हैं तो मैं अपना गिलास यही लिय आता हूँ। आप ठीक कहत है। उसका मौन हमें वघिर बना देना है। प्रारिम वना का निम्तन्यता है वह मौन, विभीपिकामा की मार से वामिल। कभी-कभी तो मैं अचम्म म पड़ जाता हूँ कि वह विनुन हठ के साय सम्प मापामा को उपना करता है। उसका धया है एम्स्टरडम के इस रावसाने म हर दश के नाविका का मन वह्लाना---और इस शरावरवाने का नाम इसने रख छाडा है जाने क्या, मेक्सिको सिटी'। क्या आपका खयाल नहा है कि इस तरह के काम में अपने अनान के पारण दिक्कत उठान का उसे डर होगा? जरा कपना कीजिए, डॉमनोन मनुष्य की वबल की मीनार मे बद। बेगक वह हमावस्या रह जाएगा अपनी जानी-पहचानी दुनिया से बिलकुल वाहर । पर इसे तो अपने निर्वासन का कोई प्राभास नहा है। यह तो अपने ही रास्ते चलता जाता है काई चीज़ इस पर असर नहीं करता। इसके मुख से एव दुलभ वाक्य मैंने सुना था जव इसने घोषणा की थी कि लना हो तो लो, वरना जान दो। वह क्या चीज़ थी जिम कोई लता या जाने देता? जरूर वह हमारा यारसुद हो रहा होगा। मैं मानता हूँ कि ऐम जीव मुझे बहुत आकर्षित करते हैं जा समूचे एक ही खण्ड से गढे गए हा। ऐम किसी भी व्यक्ति के मन म, जिसने व्यवसाय को खातिर या अत प्ररणा से मानव के विषय म चि नन क्यिा हा स्तनपायी यानि के लिए क्सक उठती ही है। कम-से-कम उनकी प्रेरणापा का को परोग हेतु तो नहीं होता। सच कहूँ तो हमारे मे जनान वे मन म कुछ तो है ही, जिस वा अपने मन की गहराई में छिपाए रहता है । प्रपन सामन की जाने वालं याता को न समझ पाने की वजह से वह बडा अविश्वासी प्रकृति वा हो गया है। तभी तो उसरे चेहरे पर एमा पक्की माव टपकता रहा है माना उमे इसम सनेह हो कि मनुष्य में सव-युछ सवया दोष हीन नहीं है । उसी इमी प्रवृत्ति के कारण उमा व्यवगाय के प्रति रिक्त यारी विपया पर उमम बातचीत करना मुशित है। मिमान के लिए, उसके सिर के ऊपर पीछ की दीवार पर वह खाली चौलोर जगह देख रहे हैं न वहां गे कोई तम्बीर उतार दी गई लगती है। सचमुच वहाँ एक तस्वीर लगी थी बडी उम्टा तस्वीर थी एप सही मायना म उत्तुप पनाति । इस जगह के मालिस ने जब उमे प्राप्त दिया था ६ और जब उममे विदा नी तब दाना अवसरों पर में मौजूद था। दोनो ही अवसरा पर उमन एक्मा निश्चय अनिश्चय हातासोचा विचारा। इस दष्टि मे आप मानेंगे कि समाज न उमदे म्वभाव की सहज निष्कप- रता का कुछ दूपिन कर दिया है। आप यह न समझे कि मैं उमरे वारे म काई फ्मला दिय दे रहा हैं। मैं उमरे अविश्वास का मुनासिब समझता हूँ और अगर मेरा वाचा स्वभाव इसके विन्द्ध न हाता तो उसके अविश्वाम म सामा भी वंटाता। पर अफसोम मैं बटुन वानूनी , और वढी जन्नी दोस्ता कर लेता हूँ। हालाकि मैं प्राचार-व्यवहार म दूरी बनाए रखना भी जानता हूँ,पर बातचीत करने के अरमर में हाय म नहीं जान दता। जब में मास मया और अगर मुझे कोई बुद्धिमान व्यक्ति मिल जाना तो पोरन उसके मग लगन की काशित करता। यदि यह मूबता है ता आप मेरे इम ममाव्य-कारक के प्रयोग पर मुस्करा रहे हैं। मैं मानता हूँ कि यह चार मुझ वाम पसद है और वम ही मुसस्कृत सम्भापण भी। आप सच मानिए कि अपनी इस मजारा का मैं स्वय कडा आलोचक है। मैं खूब जानता हूँ कि अन्तर रामो कपड़े पहनन के यह अनिवाय अय नहीं हात नि आपके पर गदे हैं । जो मा हो, विशुद्ध रेराम की तरह ला के पाछे भी बाज दिपारहता है। मैं अपन को यह कहर सात्वना दे नेता हूँ कि भाषा के हपारे भी नो पार-माप नही होत । हां जहर पप गिताम गराब और लें। पाप क्या एम्स्टरडम म अभी कुछ दिन रहगे? वडा मुदर गहर है है न? मनमाहत ? यह विरोपण मैन बहुत दिन में नहीं मुना था जब से परिम दाहा,नवमेवो हुए। परस्मृतिया की बात ही निरानी होती है। हमारा उस रमणो राजधानी को-या उमर पारा की- भाई मा चात मैं नहीं भूना हूँ। परिम वाम्नर म एव मगचिका है पर भव्य रगमच चातीम लास छायाचित्रा मावापिधनी जन-गणना थे अनुमार पचाग नाव । अब तो और भी वह गाहांगे। पर यह ७ वाई प्रापचय की बात नहीं। मुझे हमेगा लगता था कि हमारे नाग- रिव घुमो के दो ही व्यसन है--विचार और व्यभिचार । जिसको कह लीजिए न बाई अथ न कोई तुर। फिर भी हम उनको निदान ही करें तो अच्छा । वे अवेले तो एस नहीं, सारे यूरोप का ही यह हाल है। वभी-कभी मैं साचता हूँ कि भविष्य के इतिहासकार हमारे विषय में क्या पहग ? अाधुनिक मानव के लिए एक वाक्य पर्याप्त है-उसने व्यभिचार किया और अखबार पढे। और अगर आप इजाजत देतो मैं पहूँगा वि टम पाजपूण परिभाषा पर इस विषय की इतिश्री हो चुदेगी। पर हो, डच जाति की बात नहीं है, व तो कही कम माधुनिक हैं। उनके पास समय है । दखिए तो उहे वे करत क्या हैं? य सज्जन जो इधर बठ है वहाँ बटी उन महिलामा का मेहनत पर जीते हैं । और ये सब नर और मादा, दोना बिलकुल मध्यम वर्गीय जीव हैं जो यहा हमशा की तरह वल्पना-जगत में रहने की इच्छा से या मूरतावा पाये हैं या दूमर पाठामे या कह कि अत्यधिक या अति-न्यून कल्पना शक्ति के कारण । कभी कभी य सज्जन छुरे या पिस्तौर पे खेल खेल लने हैं, पर पाप यह न समझ लीजिएगा कि इह उनम काई विशेष रचि है। मक्वल अपना पाट अदा करने के लिए यह सब करते हैं और गोली घनन चलाने के समय उनकी जान निकलती रहती है। फिर भी मैं इहे उन नागा म अधिव नतिमतापूण समझता हूँ जो परिवार की परिधि दरही पारम्परिर रापप की प्रक्रिया में व्यक्ति यी हया पर हारते हैं । पया मापने कभा इस पर ध्यान नहीं लिया कि हमारे समाज की व्यवस्था इसी ढग की समष्टि के लिए की गई है? आपने ग्राज्ञान की उन घाटी-छोटी मनिया के बारे म ता मुना ही होगा जाप्रमाव धान तराप पर हजारा की मस्या म मात्रमण करती हैं और नजीमे अता-पुतगर उमसा मारा साप पर दती है—पौर तव रह जाता है मेत एक ढांना । जी हाँ यही उनका व्यवस्था है। 'क्या तुम एर S अन्ठा, माप-मुयरा जीवन चाहत हा, जैमा प्रौरा का हैआप जवार दत है 'हाँ अवार। कोई ना कर ही बन सकता है? 'टोर है साफ- मुथरा बना दिया जाएगा-यह रही तुम्हारा नौकरी, यह तुम्हारा परिवार और यह तुम्हारा व्यवस्थित विधाम।' और फिर वे नुकीले दाद मास को छेद-वेदारहडी तक पहुंच जात हैं। पर मैं अन्याय कर रहा हूँ। मुझे व्यवस्या 'उनकी नहीं रहनी चाहिए, यह तो 'हमारी' है। सवाल यह है कि कौन दिम साफ-सुथरा कर देगा। लीजिए हमारी शराब प्राविर आ ही गई। प्रापी सम्पन्नता बढे। हाँ वनमानुस न 'डॉक्टर' पहार मुझे सम्बोधित करने के लिए अपना मुह माता या। इन देशा महर काई या तो डॉक्टर कहा जाता है या प्राफ्मराये लाग ग्रादर प्रकट करना पसदकरते हैं कुछ तादया के कारण पौरपुर विनय के । कम-से-कम इन लागा म विद्वप भावना एक राष्ट्रीय सस्थान नहीं बन गई है। इसके अलावा में डॉक्टर हूँ भी नहा । आप अगर जानना ही चाहें तो मैं यहां पान मे पहले वकीन था। और अब मैं कह सकता है कि मैं एक अनुवापी निर्णायक हूँ। मुने माना परिचय दन की मार इजाजत दें-जा वपटिस्ट कामस प्रापकी मवा म हाजिर है। प्रापन मिलकर मुगी हुई। प्राप निश्चय ही व्यापारा हागे । एक प्रकार मे क्या खूब बवाब है । समम-बूम का भी है। हर जगह हम जो मी हे एक प्रकार मे ही ता है। अब मुझे जामूमी वरनबी इजाजत दें। आपकी मायु एक प्रकार से मरी आयु के वरावर है आपका नबर चातीम साल की उम्र के दुनियादार प्रादमी का नतर है जिसन एक प्रकार स सव-बुद दवा और अनुभव किया है। भापरी वेशभूषा मुचिपू है,एर प्रकारसे उमावि हमार दाम लागों की रहती है और ग्रापके हाप मुतायम हैं। इसलिए आप वूमा है-- एक प्रकार म । पर एक सुसंस्कृत जुना । सम्भाव्य-कारख के प्रयोग पर मुस्कराना वास्तव में आपकी मस्कृति का दूनी स्पष्टता मे सिद्ध करता है, गोंदि एकता प्रापन उसे पहचाना और फिर अपन कासगे ६ । अप्ठतर अनुभव किया। और अन्त म में भापके लिए विनाद की सामग्री हूँ। प्रात्मनापान समझ इसे आप। प्रापकी इस प्रवत्ति म उदारता निहित है। इसलिए आप एव प्रचार से पर जाने भी दीजिए । व्यव माया म मुझ सम्प्रदायो से भी कम रचि है। भाप मुझे दो सवाल पूछने दें और अगर उह मुनासिव सममें ताजवाव न दीजिएगा। प्रापकी कोई सम्पत्ति है ? कुछ है ? बहुत खूब | उसके उपभोग मापन गरीबो को शामिल किया है ? नहीं तो मैं पापको सदूसो बढेगा। भाप यदि घमाया म भली भांति परिचित नहीं हैं ता मैं मानता हूँ कि यह बात आपकी समझ में न पाएगी। समझ म मा गई तो पाप धमग्रथो से परिचित हैं । निश्चय ही प्रापको जानन की मरी इच्छा बलवती हो रही है। और मेरे बारे म भाप स्वम निणय परल । क्द, पपा और चेहरे म मुभ बताया गया है मैं फुटवाल के खिलाडी की तरह लगता हूँ।हैन यह वात पर अगर मरी बातचीत ममताज लगाएँ तो या मानना पडगा वि मूक्ष्मता के कुछ गुण मुभम हैं । जिस जानवर के गाना म मरा प्रोवरकार बना है यह हो सकता है कि गदा रहा हा, पर मर नाना तो अच्छी तरह संवरे हुए हैं। मैं भी दुनियादार हूँ पर मैं बिना मागा-पीया मोचे मात्र आपकी पाति में मायार पर विश्वास परव य सब बातें कर रहा है । और अन्न म गिष्ट माचरण और गुम एत भाषा वायजूद में जोदित पर स्थित नाविका ये इमरामाने म बराबर मामा परता । बोलिए छाड भी दीजिए। मरा व्यवसाय दुरगा यम-मनुष्य की तरह। मैंने पापा भी बताया ही है | में अनुनापी निर्णायक है। वरल र चीज मर चार म सरल है कि मेरी कोई सममि नहीं है। हो मैं धनी था। नही मैंन गरीचा पसाय कुछ बाया नहीं। मग या सारित होता है कि मैं भी मदमी था- पाह' पाका यरगाह में युहाग व रिगुत पो प्रावाज मुनायी दरही है पास गावागजी पर मुहासा रहेगा। १० आप अभी म चन दिएक्षमा करें, मैने शायद आपकारोके रखा। नही नही, मेरी प्रायना है मैं पापको दाम न चुकाने दूगा । 'मेक्मिको सिटी म में मेजवान हूँ और आपको मेहमान बनाकर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई। मैं निश्चय ही कल भी यहीं रहेंगा, जसे कि हर गाम रहता है और आपरानिमत्रण सहप स्वीकार कम्गा। वापम जान का रास्ता? हुँ, अगर आपको आपत्ति न हो तो सबमे प्रामान तो यही होगा कि मैं बदरगाह तक ग्राप साय चला चलू । वहाँ से यहदी वस्ती के किनारे से निकलकर आप उन आलीशान सड़कों पर पहुंच जाएंगे जहा फूलो से लदी ट्रामगाडियां गरजती हुई दौडती हैं । आपका होटल उही मे म एक पर है-मराव पर। पहले पाप । मैं यहूदी बस्ती म रहता हूँ या कहिए वि जातबतक यहूदी वस्ती यो जव तक कि हमारे हिटलरप था भाई-बदान उसके घनेपन का घानही दिया।क्या सफाई की गई यो । पचहत्तर हजार यहूदियों को या तो निवासित कर दिया गया था या मौत के घाट उतार दिया गया था। इने कहते हैं 'वयूग्रम क्नीनिंग । उनके परिश्रम की और नियम मे चलने के धीरज की मैं दाद देता हूँ। प्रादमी म चारिपिक दतान हा तो नियमों का पालन पाव- "पर है। यहाँ तो उसने कमाल ही कर दिखाया, कार्द इस बात मे इन्कार नही कर सकता। और मैं जहा रहता हूँ वह म्यान इतिहास के धारतम अपराधा म मे एक का घटनास्थल रहा है। शायद इसी कारण मैं उरा वनमानुस पोर उमको मह करने की प्रवत्ति का ममझ पाता है। इस तरह मैं अपनी प्रकृति के विन्द्ध,जामुभाचिकर चीजों की तरफम्योचती है सुधरकर पाताहूँ। जब मुझे काई अनजानी व दिनायी देनी है, तामरे भीतर मतर वी घण्टी बज उरती है 'पाहिस्ता बनरा है।' जब प्रावपण अधिकतम हाता है तब भी मैं मना रहता हूँ। प्राप जानते हैं मेरे छोटे-म गांव म प्रतिगोप के मनिक काय मएक जमन अफ्मर न वडी गालीनता से एव वदा में निवदन किया था, 'माप कृपया चुनाव कर लें कि मापने दोनों बेटा म मे कौनमा व यक 2" के रूप म गाली स उहा दिया जाए चुनाव कर लें। कल्पना वर सकता है अाप इसकी वह नहीं, यह और फिर उसे जाते हुए देखें। सर हम लोग उसकी पौर चर्चा क्या करें पर विश्वास कर श्रीमान् अचम्भे की कोई भी यात सम्भव है। मैं जानता या एक शुद्ध हृदय का! अविश्वास उसने त्याग दिया था।वह गातिवादी और स्वाधीनतावादी था। समस्त मानव-जाति यहाँ तक कि पशुमा को भी समान रूप से प्यार करता था। विलगणमात्मा था, इतना तो निश्चित है। हां तो, यूराप के पिछन धमयुद्ध के दौरान उसने गाय की गरण नो । अपनी दहरी पर उसन लिस रखा था-तुम जहाँ कही से भी पाये हो मदर आमा तुम्हारास्वागत है। और क्या प्रापसाच मदत हैं कि इम उदात निमत्रण को किसने स्वीकार क्यिा नागरिक सना ने। वह अदर घुसी मकान म पसरवर पर गई-और उस उदार मकान मालिक की प्रतियां गलियां फाड वीं। पोह श्रीमतीजी ' क्षमा प्रार्थी हूँ। पर उ हाने तो धोनी एर पान भी न समझा था। इतने सारे लोग इतनीदर हुए भी वाहर घूम रह हैं-चारिश वे वावजूर जोकई दिन से पमने का नाम ही नहीं लती है भाग्य से 'जिन शरार तो है-इरा अधार म प्रकाश की एक मात्र भलर ! पापा भी लगता है न दि वर एर सुनहले तांच के रगाप्राणमापने पदर जगाती है ? "जिन राव वा गरमाहट में मुझ शाम के वक्त पहर को महका पर घूमना अच्छा लगता है। मैं राता घूमता रहता हूँ, सपने देखता रहता हूँ या निरतर मापन मापग वाता- साप करता रहता है। ही इस गाम की तरर-मुझे हर है कि मरी बाता समापसा सिरन पाराने लगा हो। गुपिया भाप बहुत महर- वान हैं। पर यह तो मेरा उपान है । जगे ही मरा मुह मुलता है पाद उफनत चने मात हैं। इसके अलावा इस देश रो मुझ प्ररणा मिलती है। राघव पी परिया पर उमहनी मोठ मुझ पस- है। परो और नहरावे चीच पोपोडी-माजमीन मगवासव भरे हा पुहागा, टपणे भूमि पोर 1 गीले कपडा की तरह मपाते हुए समुद्र के दी। मुझे यह सब पसन्द है। इसम दूत है। यह यहा भी है अन्यन भी। हा-हा । इम भीगी सडर की पटरी पर परा की भारी आवाज सुन- कर और गम्भीरता मटूवानों के अन्दर-बाहर जान पान दादकर (टन दूकाना से जामुनी हरिंग' मलिया मे और पीली पत्तियारण के आभूषणों से भरी हैं) आप साचने हगि वि व लाग आज गाम को यही हैं। आप भी औरा की तरह ही हैं । आप भी साचन है कि ये मद्र लोग व्यापारी और व्यवसायी मघा के सदस्य हैं जा अपने अमरत्व कासम्मा- वनामा के साथ सुनलो अाफिया का भी गिनन हैं, जिनके जीवन की गातारमकता इतनी ही है कि वे कभी-कभी दिना अपनी चौड किनारा कीटापियां पहने शरीर-विनान का पाठ पट लेन हैं। आप गलती पर रह हैं। व हमारे साथ टहन रह हैं। वैग पर देखिए उन दिमाग कहाँ है ? उस कुहास म जो निॉन प्रकारा, तिन' गराब और दूकाना पर लगे लाल और हर साटन-बोझै म स उठती हुई पिपरमेट की खुशबू स बना है। हॉलण्ड देश एर सपना ह श्रीमान्-धुएँ और सोन का सपना दिन म धुएँ से मरा रात का सुनहले प्रकाश मजगमगाता हुआ। और रात दिन उस कल्पना-दाम इन्हीं-जन नोनिन भरे रहत हैं, ऊंचे हैंटल लगी काली साइक्लिं स्वप्नावस्था में चलात हुए, माना वे अन्त्य- सन्देशवाहर हस हादा मर म समुद्रा के चारों ओर नहरो के क्निार किनारे निरनर नरत हुए। उनका मन ताम्रवण वादों म उहता रहता है वे सपन दवत रहत हैं चक्करमाटत घूमन रहत हैं, व उपासना करत हैं कुराम के मुनढे मार धूम्र म नी म चलते हुए ने वे अब यहां नहीं है । व हमारा मार दूर जा चुरे हैं जावा के इस सुदूर द्वीप की प्रार। वे इहालिया क विकृत मुट वारदवताना को पाराधना करते हैं जिनम उहाने पानी दूकाना की सब खिडकिया सजा रखी हैं और जाइाममय निादाय हमारमिर पर मंडरा रह हैं- नीच उतरन वे पहले जम वे कोई भडीले बन्दर हा जो मीनीटारसा और साइनबागें पर उतरेंगे और घर की याद से बेचन इन उपनिवेश वासिया को याद दिलाएंगे कि हालण्ड केवल व्यापारिया का यूरोप नही है, समुद्र का भी है-वही समुद्र जो उन दूसरे द्वीपा की राह दिखाता है जहाँ मनुप्प उमत्त भोर पाहादित होकर मत्यु पाते है। पर मैं ता अपनी बातो मे बहन लगा, इनकी वरालत ही करने लगा। क्षमा प्रार्थी है। भारत श्रीमन और पेगा और साथ ही यह भावाभा भी कि इस शहर का पाप पूरी तरह समझ ल और हर चीज ये मूत तत्त्व या जान सक । क्योकि यहाँ हम भादपर पहुंच गए हैं। पापने म पोर मान लिया कि यहां की घुमावदार नहर नरक से चको समान है-मध्यमवग का नरक जो दुस्वप्ना से भरा है । जव बोई बाहर मे पाता है और उन चारा म घूमता है जीवन सपनतर हाता जाता है और अधिक अधारमय । इसी कारण उसके पाप भी। पर हम पासिरी चकार म पहुच गए हैं, यह है ? अच्छा आप जानते हैं ? राचमुच पापना वर्गीकरण कठिनतर होता चना जा रहा है । तो पाप राममन है कि मैं क्या कहता हूँ विगारी चीजोमा मूल वेद्र यही है, यद्यपि हम इस महाप न येवत एक छोर पर ही हैं। एक सवेदनशील व्यतिथे लिए इन विलगणतामा वा समझ लेना पटिन नहा । सर, अपवार पडन यार और व्यभिचार करन वाल इसके आगे तो जा नही सकते। यूरोप ये चारा रोनास प्रारर व अन्तर्देशीय समुर की पोर मुह किय उगो मलिन तट पर गजान है। ये कुहाग ने विगुल सुनते हैं, मुहाने के गम म घुघली नागा व पायाचित्रा को ढ़ने की व्यय चेष्टा पले हैं पिर हारे ऊपर मै नोटन हुए वर्ण म भोगत पपायरचने जान * । हरियो तर ठड से ठिरते हुए व मेक्मिका सिटी में पहुँच पर तमाम भापामा म राम की मांग करते हैं। मैं वहीं उनकी प्रनाला परता है। मल तानिए विना श्रीमा~मरे बगवासी वधु' मारतो प्रब मासानी ग राम्ना मिल गया। मैं इग पुन तर पारो घोर दूगा। मैं रान को कभी पुल पार नहीं करता मैंने शपथ ली थी।मान लीजिए कि काई पानी में कूद पड। दो म मे एक ही बात सम्भव है- या ता पाप उमे बाहर निकालन के लिए खुद भी वही रास्ता अपनाएंग जा इस ठण्ड के मौसम म खतरे मे साती नहीं है, या आप उस वही छोड दंगे। नाग मारने की इच्छा का दमन वरन से कभी-कभी एक विचित व्यथा उत्पन्न होती है । नमस्कार 'क्या? उन खिडक्यिो के पोदे वाली व महिलाएं ? सपना श्रीमन् एक सस्ता सपना---डीज़ की याना। वे मसाला की गघ से अपना शरीर मुवामित करती हैं । आप अन्दर जान हैं परदे खीच लिय जाते है और यात्रा प्रारम्भ हा जानी है। उन नग्न गरीराम देवता उतर पात हैं द्वीप तरन-उपरान लगते हैं वायुम लह- रात हुए ताड-वक्षा के अव्यवस्थित केगा का मुकुट पहने खोयी हुई आत्माएँ । जाइए, देखिए । ? अनुनापी निणायक होता क्या है ? तो मैंने आपका कुतूहल जगा दिया? विवास कीजिए मरा तनिक भी बुरा इरादा न था। अन्दा मैं अपना वान ज्यादा माफ करक कह दता हूँ । एक तरह मकहूँ तो यह मरे टफार के कामो म स एव है। परपहने मुझ कुछ तथ्य अापके सामने रखने होंगे ताकि आप मेरा रामकहानी महज समझ जाएँ। कुछ मान हुए मैं परिस म वकालत करता था, और मच पूदिए तो काफी नामी वकीन था ।हां, मैंने आपका अपना अमनी नाम तावताया ही नहीं । एमे मामला म जो नक काम मान जाएं, मरी विपचि थी, जसे विधवा भार अनाय । कहा जाता है जान क्या एमी भी विधवाएँ हाती है जा छल-कपट करती हैं और अनाथ एम मा हैं तो ववर हाने हैं। पर मरे लिए ता इतना ही काफी था कि मुझ प्रतिवादा पर प्रत्या चार पी गध-मात्र मिल जाए मोर मैं मदान म कूद पडता था।सा कूदना भी कसा भभावात की तरह । मरा हृदय सुला हुमा रहता था। आप यहाँ तक यह सकत थ वि नीति हर रात मरी ही गोट म साती थी। मुझ विश्वास है कि अदालत के सामने मेरे स्वरपी विशुद्धता, मरे सवेगा यी उपयुक्तता, वक्ततामा की प्रेषणीयता यथा सवेदनातता, और पात्रो के गयम की आप अवश्य सराहना करते । प्रकृति ने मरे शारी- रिव गटन के सम्बघ म उदारता दिसायी है और मुझ दाक्षिण्य यी मुद्रा सहज ही प्राप्त हो जाती है । इसके अलावा दो सच्ची भावनाएँ मुझ उपर उठाए रपती थी। एप तो थी ववील-समाज म प्राप्त प्रतिष्ठा वा सन्तोष और दूसरी यायाधी-वग के प्रति स्वामाविक भवहेलना। गायद अवहेलना या भाव इतना स्वाभाविक नहीं था। अब मैं जान गया है कि उसके पीछे कइ वारण ये। पर या बाहर से देखने मवह एक तरह वा उमाद लगता था। इससे ता इन्कार नहीं किया जा सकताविकम- स-यम मभी कुछ समय के लिए हम यायाधीश रखने ही पडगे । क्या? मैं यह नहीं समझ पाया था कि कोई भी व्यक्ति ऐमा विचित्र काम करने के लिए अपन वो क्स तयार कर लेता है। उम तथ्य को मैं इसीलिए स्वीकार कर लेता था कि मुझे वह सामने दीस पटना या। यह पुछ उसी तरह था जमे मैं टिडिया के दल का स्वीकार कर लता हूँ। तर फेवत इतना था पि उन जन्तुना के प्रारमण मे ता मरा एव पसे या भी साम न होता था, जब कि मरी आजीविका चनना थी ऐमो माप सलाप करके जिनगा मैं तिरस्कार करता था। सर मैं सत र पक्ष मया मोर अपन अन्तमन पी गान्ति के लिए मरे नि यही पयाप्न था। याय वा सस्सग, सन के पक्ष म हाने या सतोप पारम-गौरव या मानत-श्रीमन् य अनुभूनिया हम सच्चा बनाए रमन के लिए, या प्रागे यढ़ने के लिए वलवता प्ररणा देती हैं। दूसरी तरफ प्रगर प्राप लागामाइन भावनामागेवचित कर देन हैं तोप्राप उहाय ग पागल कुत्ता म परिणत वर दते हैं। जान कितने माराध रिये जाते है पल इसलिए जिउन करने वाल गतीपर हाना पर- दान नहीं पर पाोमैं एवणव्यापारीको जाता था जिसकी पत्नीम रोई कमीन थी। सब उनको प्रशसा करत थे, फिर भी उस व्यक्ति ने अपनी पली यो घोचा दिया। अपनी गलती के माम में पाप सब मानिए, वह कोपामार पागल हो गया था, क्यावि मदाचारकीसनद पाने या अपने को देने के वह माय नहीं रह गया था। उसी पली जितन ही गद्गुणाका प्रशान करती थी उतना ही इसका कोप बहता जाना था। निदान गलती पर रहते हुए जीवन विताना उस लिए असहनीय हा गया। सोच सकते हैं पाप कि उसन क्या दिया? अपनी पला का धावा दना छाड दिया? जी नहीं, जरा भा नही। उसने उसकी हत्या परमाती। इसमें मेरा सम्बप इनी घटना में स्थापित हुमाया। मेरी स्थिति अत्यधिक ईप्यामरन याम्य थी। अपराधिया के गुट म शामिल होने की बोई प्रासका तो मर लिए थी नहीं (और पली की हया करने की तो जरा भी नही थी क्योंकि मैं अविवाहित था), मैं वो उनका भी पक्ष लनालयार रहता था कवल इस आधार पर कि वे उगत हयारे हाउसी तरह जिस तरह और लोग उन बवर हाते हैं। जिम ग स मैं उनकी वकालत करता था मुझे उमम बहन काफी सन्तोप मिलता था।मरा व्यावसायिर पावन सवथा अनिंद्य था। यह रहन को सो उग्रल नहीं है कि मैंने कभी काई धूम नहीं ली, न ही मैंने नु दिपकाई नाम दिया। और यह और भा दुलभ है....मैं बभी मिमी पत्रकारको सामद करन पर नहीं उतरादि वह मरपन महो সা মানে কি সুদে ঋণ,নিশী সিম্বা মসি उपयोगी हो मरनी थी। यह मामीमाम्य रहा क्दिा-तीन चार 'तीजन माफ मॉनर मुझे भेंट किये जानकायस्ताविया गया, जिम मैं गम्भीर पारम-गौरव के साथ अस्वीकार कर सका। वास्तव म मरा मच्चा पुग्मार यही था। और पासिरी बात यह है कि मैंन गरावास कमी कुद नहीं लिया, और न ही कभी इसका गिरा पोटर वायु, पार यह नसमझे नि में सावधार रहा है। इसलिए मैं कोई मयनरी लेना। १७ हमारे समान म लालच की जिस मावनाको महत्त्वाकाक्षा रामझ लिया जाता है उस पर मुझ हमासी पाती रही है। मेरा लक्ष्म इससे ऊँचा था। प्रापखगवि मह वयन मर सम्बध म बिलकुल ठीक वठता पाप मरे परितापीकल्पना तावर ही मक्त हैं। मैं अपने स्वभार पापूरा रम लता था और हम सब जानते हैं कि आनन्द इसी म है। यद्यपि एक-दूसर वा सात्सना दन के लिए एम सुम को हम स्वाथ कह- कर भत्सना करन का दाग कर लियानरत हैं । मैं अपने स्वभाव के कम- रो-कम उम अाम तो रम ले हो लेता, जिसको प्रतिनिया विधवा और मनाप लिए इतनी समीचीन होती थी, अभ्यास करते-करते अन्त में यह मेरे समूने जीवन पर छा गया। मिसाल के लिए सपा को सड़क पार करने म सहायता देना मुझ बहुत प्रिय था। सडप की पटरी पर जहाँ तम मरा नजर जा रापती अगर किसी के हाथ की घड़ी सोच परती दासता तो मैं भपटवर पहुँचना । कभी-कभी तो अपन म वेवल एक क्षण पहल परुणा से भागे बढ़े किसी दूसरे वे हाय रो, अपन अतिरिक्त दूसरे थे दया भाव से मध को छुड़ा लेता और पाती-जाती गाडिया ये रातरे के बीच हाथ थामे धीरे धीर, पिन्तु दृढ़ता से पदल रास्ते से दूसरे पार की पटरी की शरण म उम पहुँचा देता, जहाँ पहुँचवर हम भावुरता के साथ एक-दूसरे से अलग होत। उसी तरह मुझ प्रिय था राहगीराया सडर बनाना सुतगती दियारालाई पारला भारी सामान टोन की गाडियो ठनन म सहायता करना, विगही हुई माटर ढपतला 'सातवेगन मार्मी की लडकी से अमबार लेना और बुड़िया परीवाली से पूनपरी ना हालांकि मैं जानता था कि उमन य मापर नारा पे करिस्तान रा चुराग हैं । पौर मुभ पस द पा-यह बात बहता पुष मुनिरही है मुझ दान दना पमदया। मेरए पनि धर्मामा मित्र ने चोर पिया पाविपरीनरप पातए भिगमगपो दम पर पा-मी व मन म पहता भार उठना है यह पणासा होता है।
- पर मेरे साय जो यात यी वह ता और भी खराब थी, मैं मस्त हो उठता था। परन्तु छाडिए इम बिम्प का। मग मिष्टता कोही ले लिए। वह विव्यात थी। काइ मेरी तरफ उँगला नहीं उठा सकता था। सच ता यह है कि शिष्टाचार मे मुझे वडे-बड मानमिने। अगर क्मिीदिन मुबह मुझे अडरग्राउण्ड गाडीया वस में विमी एम व्यक्ति के लिए अपनी जाह छोड सकने का सौभाग्य प्राप्त हो जाना काम्पट ही मुममे योग्यतर पार हा या किसी बद्ध महिला की गिरायो हुद वस्तु अपनी मुपरिचित मुस्कान के साथ उन वापस कर सकता, या केवल इतना ही कि किसी एये व्यक्ति के लिए अपनी टक्मो का त्याग कर माना जा मुभम श्यादा जल्दी म हा, तो वह मरे लिए मगल दिवस हाता या। मुझ यह भी स्वीकार करना पडगा कि उन दिना जन मावजनिक यातायात के साधना का हडताल हाती थी तो मैं पाहादित हा उठता, क्यापि वम-स्टॉप पर खड, घर पचन म असमय वचारे प्रान कुल सह नागरिको को अपनी मोटर म भरकर ले जाने का मुझे अवसर मिलता। थियटर हॉन म अपनी जगह छाड देता तादि कोई दम्पति साथ वठ सकें रलगाडी म क्सिी युवती का मूटकेस उठावर पर रखना, य सब काम प्रौरा से ज्यादा में इमलिए बरला या कि मैं अवमरा वी तार में ज्यादा दाया और उनने प्राप्त मुख वा उपभोग ज्यादा कर पाता था। इमी वारण मैं उार सममा जाता था--पौर या भो। में प्रकट और गुप्त सम वात-बुछ रिया करता था।किमी वस्तु अथवा किसी धनराति से विदा लत समय काहाना तो दूर, मुझ निरन्तर मुख ही पहुँचते रहत ये। न्हीं म विपाद का वह भाव भी या जा इन दान- कृत्या की निपता और मभाव्य प्रतनना विचार स कभी-वनी मेरे मन म उटता था। दन म मुम इतना हप हाता था कि अगर एना स्थिति प्रा जाए वि देने म असमयतानी या बडी हा ना मुझ अत्यन्त पाम होना था। हिमाय-विनार ये वगर नियमा म में तना अधिक उपना जाता था वि उनसरापालन में काफी प्रयोभन तरावे मे करता या। अपनी उदारता का स्वामी मैं स्वयं ही रहना चाहता था। ये तो कुछ छोटी मोटी बातें रही पर इनसे अाप इतना तो समझ ही जाएंगे वि अपने जीवन में और सास तौर से अपन पोम, मुझे अनवरत नितने मुग मितत रहते थे। वचहरी के दालान मक्मिी प्रति वादी वा पत्नी द्वारा रोका जाना जिस प्रतिवादी का पक्ष प्रापन केवल यायपरता या करणावालिया हो -मेरा मतलब है बिना फीस लिये- और उस महिना का पुसफुमावर आपमे बना दि अापने उन लिए जा लिया उसवा मूत्य प भी नहीं चुनाया जा सकता है और आपका उत्तर देना कि वह ता पाई एमी वात नहीं थी इतना तो कोई भी परता। और फिर प्रागे भान वाले बुरे दिना के लिए कुछ प्रार्थिव सहायता दन या प्रस्ताव वरना और फिर-उदगारोवा वेग रोक्ने तिए सावि उनी भनारसुरीत रह सो ~~-उस प्रभागिनी महिला का हाय चूमपर विटा लना--विवाम मानिए श्रीमान यह प्राप्ति, सामान्य महत्त्वाकाक्षी व्यक्ति की प्राप्ति से कही अधिक है और यह पापया उस सर्वोच्च शिमर पर पहुंचा दती है, जहाँ सदाचार सपना ही प्रतितान है। मस्या तो इस ऊचाई की बात पर जरा ठहरें। अब ग्राप समझ गए होगरि जव मैंन स्याऊंच लण्य वी बात की थी तो मेरा मतलर गया था। वास्तव म में उही सर्वोच्च गिरा को यात कर रहा था। केवल वर्गम स्थान है जहाँ मैं वास्तव म गांग ले सकता हूँ। हाँ ऊँचे परिवाये पनावा और वही मुझ चन नहीं मिलता। रोजमर्रा यी वातो म भी मुभ उचाई का अनुभव करन की पार यस्ता प्रतीत होनी थी। अडरग्राउपर गाडीसी प्रपना मुभ यग त्याला पमदयो टवमी की घरमा गती गाम्पिा मार रहने को मपेशा मुली छन । मैं उन हवाई जहाजों परागर-पार चार या जिनम चाला मागिर बाहरगुतम रहता है। और ममुरी जहाग पर मैं हमेशा गवस ऊँचे डर पर पहल कदमी करन वाला म हाताया। पहाडी स्याना म पाटिया से भागकर में पठारा और दर्रा पर जा पट्टेचता था,यानी कि मैंचे स्थानों का निवासी था। यदि नियति के प्रादेश में मुझे खराद पर और छता पर काम करने कवीच चुनाव करना पड जाता, तो मैं छतों का ही चुनना, और ऊंचाई पर सिर चकराने के अनुभव से परिचित होता । कायले की खाना, जहाजों के निचले हिस्मों, जहाँ मामान रहता है, जमीन के नीचे पाने जाने की मडको गुफापा और गड्ढों म मुझे घणा यो। भूगभगामियों से ता मुझे दिरोप घणा हो गई यो । उनका दुम्मास था कि हमारे समा- चारपत्रों के मुखपृष्ठ उनकी करामातों से मर दिए जाते थ, और उन करामानों स मुझे मतली माती थी। दा हजार फुट नीचे उतरने को चेय करनायह खतरा उठाते हुए वि चटटानों की कीप म सिरन फंस जाए (उमे वे मूब नली कहते हैं ) मुझे ता लगता था कि विकार- ग्रस्त व्यक्तिया का काम है। उसकी तह म कोई अपराध प्रवृत्ति है। दूसरी तरफ किसी १५०० फुट ऊंचे प्राकृतिक हने पर जहा म मूय के प्रकाश मनहाता समुद्र दोन पडता हा, मैं सबसे ज्यादा खुनकर सपल नक्ता या-विशेषकर अगर अकेला हाता मानवी चीटे-चींटिया से वहृन पर । मैं खूब समझ सकता या कि धामिर प्रवचन, निश्चया त्मक उपदेश और अग्नि-परीक्षाएं माम ऊँचाइया पर ही सम्भव क्या हाती थी। मरी राय म तहखानों या कारावास की कोठरिया म किमी न चिन्तन न रिया हागा (व काटरियां किसी मीनार में रही हो, वहा में दूर-दूर तक दीख पडता हो, तो और वान है), नहीं ता आदमी म पफूदा लग जाता है, बस । और मैं उस व्यक्ति के मनोनाव भी समझ मुक्ता या जिमन धार्मिक पय में प्रदा परन के बाद केवल इसलिए उमे रयाग दिया कि उनकी वाटरी से प्राकृतिक दृश्य का विस्तार दीवन २ बाय एक दीवार दीखती थी। इतना तो तय मानिए कि जहां तक मरा प्रश्न था मुझम परदा नहा ला। हर पहर अपने प्रन्नरम और दूमरों के बीच में ऊंचाइयों को लापवर भाम्बर अग्नि प्रज्वलित परता २१ था पोर एस आहारमय जयपाप मेरी ओर उठता चला माता था। इस प्रकार बम-बम में जीवन का और अपनी श्रेष्ठता का मानन्द उठा लेता था। भापवा मरा पा ऊँचाइया की मैरी प्रपत्ति को तृप्ति प्रदान परता था। पडोमी ये प्रति पटुता घुन जाती मी सौर मैं उस पर हमा एहसान किया करता था--हालौकि मरे और उसका कुछ देय नहीं था। यह भाव मुभ निर्णायक से अप्ठतर बना देता था और मैं स्वम उसके विषय म निणय देता था,प्रतिवादी अतिरिक्त जिसे में विवश करता पारि मरा माभार मान । मेरे मित्र सोचिए जरा मुझ जीवन म दण्ड विमुक्ति प्राप्त थी। किसी भी निणय स मरा कोई निमित्त नहीं था , मैं यायालय म उपस्थित नहीं रहता था बल्कि नपथ्य म रहता था-उन देवताना की तरह जा नाटक का भूमिका को परिणति करके उसे अथ प्रदान परने के लिए विसी यात्र द्वारा ऊपर से मच पर उतारे जात हैं। प्रापिर ऊचाई पर रहर ही ता अधिक्तम व्यक्तिया को दान देना और उनरा अभिवादन पाना सम्भव है। मर विही भने अपराधियों न इसी भावना के वशीभूत होकर ही तोहत्या की थी। बाद म अपनी उरा प्रसहाय स्थिति म जहाँ व तब तर पहुँच पुरे थे, समाचारपत्रा को पढ़ार नि स देह उहें एक प्रकार का वेदनामय परितोप मिला होगा। वहुता की तरह उहें भी प्रशात रहना प्रताप हो गया था भौर उनकी इस वेचनी न भी उह दुर्भाग्य की इस सीमा तक पहुचाया था । वदनामी के लिए प्रपन द्वार er मी हत्या परना ही पापी है। बदरिस्मती ग यह म्यानि साधारणत पण भगुर होती है। एग रितने ही द्वार रार हैं जा हत्या के पार हात हैं और इन परिणति मा प्राप्त भी करते हैं। प्रपराप का भरामारों मशीर्पा सीन हाने का पाधिारमा में प्राप्त है पितु अपराधी तो आणि प्रयाहा गरता है एक अपराधी पा स्यामरा लता रहता है। गमप म पहें तोमी क्षगिर गफ्नना बहुत मर्गी पाती है। पर इन । २२ प्रभाग महलाकानिया के परम बडा होना वास्तर म ख्याति प्राप्त करने का मुगम माग मिद हाता है सा भी उहा स्थाना म, उसी समय और अधिर मितव्ययिता के माय । परिणामस्वम्प इममे मुझे और भी अधिक पुष्प प्रयास करन की प्ररणा मिलती थी कि उह (मेरे मुवक्किला का) कम-मे-कम मूल्य चुकाना पडे। पिसी हद ता दातच वे मेरी जगह चुरा ही रह थे। जा पाया जा यायना और जो भावुकता मैं उन पर निछावर करता या प्रतिदान म वह पामार की उस भावना का उडन दते थे, जा मर मन में उसके लिए उठ सकती था। पायाधीश दण्ड दत य, प्रतिवादी प्रायश्चित्त बरत थे और मैं क्त्तव्य के भावो म मक्या विमुक्न, निणय तथा दण्ड दाना मे समानत परिरक्षित में था दिव्य ज्याति स्नान, निवाघ महिमा-मण्डित । और मव बनाशा बघु क्या वह स्वग नहीं था जीवन और मेरे बीच काई मध्यवर्ती नहीं । ऐसा था मरा जीवन । मुझ कभी यह नहीं मोबना पारि जिया कम जाता है। उसके बारे म में जम लेत ही सब-कुछ जान गया था। कुछ लोगा की समस्या होती है कि कम मनुष्या ग अपनी रक्षा करें, या कम-से-कम कम उनम मममीना कर लें। पर मरे लिए तो समझौता पहा ही हो चुका था। मरी मगति सदा ठौर वना थी। अचित हाता तो पुन मिल पाता आवायकना पडनी ता मौन रहना । प्राचार-व्यवहार मे गम्भीरता और महज स्वाभावकिता दाना के लिए समान रूप म ममय था। इमोलिए मेरी लोकप्रियता बटन यो प्रौर ममाज म मरी मफताएं अनगिनत धी। मेरी प्राकृति स्वीकाय थी, बिना यो नाच मान बी क्षमता और विनयपूण विद्वत्ता दाना ही मन मापन प्रापम प्रगत की थी और मैंन नारी और न्याय दानो गए माय प्रम वरन का यह मरल नरी है--मामप्य प्राप्त पर ना थो। मैं ललितातामा पोर मेल-कूद दाना म रम लता था। पर यहुन हुमा अब में पोर न मा, नहाता नहीं माप यह गान फरन नगे नि मैं ही हार रहा हूँ। मेरा तावना अनुराध है हि २३ भाप जरा करना कीजिए एक एसे व्यक्ति को, जो अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर है, जिसका स्वास्थ्य उत्तम है, जिसको प्रतिमाएं प्रदान करने में नियनि । उदारता दिपायी है जो शारीरिक तथा मानसिप व्यापाराम युगल है जो न निधन है न धनवान, जिसे चन की नीद माती है और जो मूलत प्रारम-तुष्ट है पर जो इस भाव को अपनी सहज मितासारिता के अतिरिक्त पोर विसी तरह नहीं दिखाता। भाप मासानी से समझ जाएंगे कि मैं कसे प्लाघा के बिना सफा जीवन की बात कर सकता हूँ। हो मुभम पयाला सहज-स्वाभाविव कुछ ही जीव और रहे होंगे। मने जीवन के साथ पूण एकरूपता प्राप्त कर ली थी, ऊपर से नीचे तक म उसरा मल साता था उसके निहित विसी व्यग्य गौरव पथवादासत्व या परित्याग क्यि विना । विशेष रुप से वाया प्रकृति या,सक्षप मे महूँ तो भौतिक तत्व जा बहुतराको प्रवेलपन या प्रम के क्षणो मे विमुख या हुतात्साहित परते हैं मुझे रिना किन्ही व धनों म चौधे निरन्तर मुस पहचान रहे । म ता जसे पारीर भोगने के लिए बना था। उसीसे प्राप्त वह सतुलन भोर यह अनायास उत्वप मुझम था जिसे लाग भनुभव परत ५ महाँ तक विषमी-य भी मुभमे यह भी कहते थे कि उससे उह जीवन म सहायता मिली है। उसकी वजह से मरी सोहबत की बहुत मांग रहती थी। भपसर लोगापो या लगता या मि ये मुमग पहल यही मिल घुके हैं। जीयन उसर जन्तु मोर उगवे उपार मेरे लिए प्रस्तुत थे और मैं शाभिमान कृपालुतारा श्रद्धाजलि य इन चिहो को अगौशार मरता पा। राच बात ता यह है वि धूनि में एप सहन और सम्पूण माराव था, मैं पपने का युप-युर पतिमानव समभने लगा था। मैं एक प्रतिष्टिन पर गरीब परिवार म पाहुना था। मेर पिता मामाय रमारी पर मैं गविनय बार बरा हूँ frविमी निमोनि मुम सातानि में पिमा राजा या बेटा हूँ-~दम यजह से नहीं कि मुझे पूरा विश्वास या वि म सबर ज्यादा बुद्धिमान हू । इम - विश्वास मे कोई लाभ भी नहीं न जाने कितने मूख ऐमा ही सममत हैं । वान यह थी कि यद्यपि ऐसा कहन में मुझे सकाच होता है- नियति की कृपापा की प्रचुरता स म अपन या विशिष्ट व्यक्ति सममने लगा या, भाना सवम स एक दीपकालीन और अनवरत सफ्ना के लिए व्यक्तिगत म्प से मुझे ही चुना गया हो। ऐसा समझना भी मेरी विनयशीलता काही परिणाम था। उस सफलता का थेय अपनी योग्य ताग्रा को देना मुझे स्वीकार नहीं था और न ही म यह विश्वास कर पाता था कि एक ही व्यक्ति मे इतने विविध और उत्कृष्ट सद्गुणा का हाना केवल सयाग हो सकता है। इसीलिए अपने खुशहाल जीवन म मुझे लगता था कि मेरा सुख क्सिी उच्चतर आदेश द्वारा अधिकृत किया गया है। जब आपको यह विदित होगा कि मेरा क्सिी धम म विश्वास नहीं था, तब आप और भी अच्छी तरह अनुमान लगा सकेंगे कि मेरी यह धारणा क्तिनी विलपण थी। खर वह साधारण रही हो या नहीं कुछ समय के लिए ता राजमर्रा की जिंदगी मे मुझे ऊपर उठाने के काम आई और मैं कुछ वर्षों वास्तव म उडाने भरता रहा। और मच कहे तो आज भी उनके लिए मेरा जी तडप उठता है । म उडान भरता रहा उम गाम तक, जब पर नही, वह वात ही और है, उमे भुला देना चाहिए। और शायद म कुद वटा धरा कर बातें कर रहा हूँ। यह तो सच है कि म हर तरह म मजे म था, पर साथ ही क्मिी भी चीज़ मे सन्तुष्ट न था। एक सुख की प्राप्ति दूसरे की पावापा मेरे मा म जगाती थी। एक प्रानन्दा मव स दूसरे भानन्दोत्सव म म घूमता रहता था। कभी-कभी म रातें नाचते विनाता, लोगा और जीवन के बार म अधिकाधिक पागल होता हुमा । कभी कभी काफी रात बीत जव नाच,एक हलासर मरा निर्वाध उत्माह और हर एव का प्रचण्ड अमयम मुझ एव शान्त और पराभूत हर्षों माद से भर देते ये तव-गाति की चरम सीमा पर पहुंचकर मण भर वे लिए, मुझ लगता कि पासिर इस ससार और उम जन्नुमों का रहस्य - २५ । मरी समझ में आ ही गया। पर दूसरे ही नि मेरो धवान गायव हा जाता और उसके साथ ही रहस्य का नान भी । और मैं फिर नय सिरे से निरल पडता था। इसी तरह मैं दौड लगाता रहा, सदा उपहारो के भार में लदा, सवा प्रतप्त, यह न जानते हुए कि यहाँ रक जाना पाहिए उस दिन तप-या कहना चाहिए-उम नाम तक, जब सगात पम गया और प्रकाश बुझ गया। उस पत्तती महापित म जहाँ मैं "तना खुश रह चुना थापर मुझ अपन मिन उस प्रारिमजीव, को चुनाने की इजाजन द । इनका शुक्रिया अदा करन के लिए अपना सिर हिला दीजिए और एक प्याला शराब पीने म मरा साम दाजिए मुझ पापी महानुभूति की आवश्यपता है। देयता हूँ कि स पापणा ग प्राप स्तम्भित हैं। क्या आपको कभी अचानर सहानुभूति प्राश्रय या मित्रता की प्राव यकता नहीं पड़ी है ? जरर परी होगी। मन मात्र सहानुभूति स सन्तुष्ट हो नना सीप लिया है। वह ज्यादा प्रामानी से मिल जाती है और इसरे अलावा उसम कोई वपन भी नहीं। यह पहला पि मेरी प्रायना है कि भाप मेरी सहानुभूति पर विपास बर विसी भी प्रनय वाना वा प्राक्वथन हता है, इसका वि भर हम दूसरे विषया पर पाएं। यह ता मभाध्यक्ष सी ही भापता है। पिसी महाविपत्ति के या यह कह ना सस्ता पडता है। मिषता इतना सरत नहा । उमे पाना मुश्विन है और पान म पापी समय लगता है पर जर मिल जाती है तो उराम मुक्ति पान पा भी कोई उपाय नहीं। उग भुगतना ही पता है। पल भर क लिए भी यह न समझ बटिगा पिपापरे मित्र हर गाम प्रापतो टलीपास नरेंगे, जो उह परना चाहिए या पता वरन के लिए मिकी मापन मात्महत्या वरल वा निश्चय ताना कर डाना है या गिफ इतना ही पाने के निरावि प्रापरो राग-माय पो गरा तो नगे या मापा पही बाहर धनन या जाता ही हो रहा है। नी, निग्निन्त रहें ये पान परगना उग जाममा जय पाए मकरन हांगे जर जिनगा 7 मीन होगी। और रहा आत्महत्या की, सा व शायद आपरा उस तरफ धक्लने मे ही ज्यादा सहायक होंगे, इस आधार पर कि आपका अपन प्रति दायित्व क्या वधु, मिना द्वारा ऊँचे सिंहासन पर विठाए जान म भगवान् रक्षा करें। और जिनका क्तव्य ही है कि हम प्यार करें, मेरा मतलब है कुम्विया और सम्बघिया मे (वाह ' क्या गब्द हैं ') उनकी बात ही और है। उन्हें उपयुक्त गन्द मिल ही जाते हैं, और निशाना अचूक वठला है, वे तो एसे फोन करते हैं मानो चांदमारी कर रहे हों, और निगाना लगाना वे खूब जानते हैं। क्या? कोनसी शाम उस पर भी पाउँगा, जरा धीरज रखिए । एक तरह से तो चिपसरा ही हुआ हूँ अपने विषय म, मित्रा और सम्ब घिया की य सर वान करके । वात यह है कि मैंन एक एमे आदमी के बारे में मुना है जिसका मित्र कद कर लिया गया था और वह अपन कमरे के फा पर इमलिए साने लगा या नि उस पाराम का भाग न करे जो उस मित्र में छीन लिया गया था। हमारे लिए बधु कौन फा पर साएगा ? क्या मैं ही ऐमा कर मक्ता हूँ? मैं जरूर चाहूँगा कि कर स' और कर भी सकूगा। हाँ एक दिन हम मब एसा कर सकेंगे, और वही हमारा मोस होगा । पर यह सामान नहीं है, क्यादि मित्रता अयमनम्का होती ही है या कम-से-कम वया तो होती ही है। अपनी इच्छा पूर्ण करने म वह असमय है। शायद उसकी इच्छा काफी तीव्र न हाती हा । गाय- जीवन से हमारा पर्याप्त लगाव न हो ! आपका ध्यान कभी दम पर गया है कि केवल मत्यु हमारी भावनाएं जगाने म समय हानी है। हम अपने उन मित्रा का कितना प्यार करते हैं तो अमी प्रभा हमम विछुडे हैं । अपन उन गुरुना का विनना मादर करत हैं जिनकी वाणी बर हा चुका है जिनके मुह मिट्टी मे ढाप दिये गए हैं ' तब श्रद्धा के भाव महन व्यक्त हो उठते हैं-उसी श्रद्धा व जिमनी पागा शायद व जीवन मर हमम करत रहे । पर जानते हैं प्राप, हम मृतकों के प्रति अधिक उदार मौर यायशील पया होत हैं चारण सरल है। व धन का उनके माथ कोई प्रश्न नहीं । व हम मुरा छोड दत हैं और हम अपनी मुविधा के अनुसार प्रपती श्रद्धा या प्रमाणपत्र दन का समय विसी कारटेल पार्टी और प्रमिसरा साय अमिसार के बीच यानी अपने पालतू वक्त म नियत पर सक्त है । अगर वे हमे वाध्य करें भी तो येवल याद रखने के लिए हीमा परेंगे और हमारी स्मति काफी मद होती है। हाँ, हम अपने मिमा म हाल वे मर हुमा से ही लगाव रपते हैं, दुपदाई मनवा मे हो, स्वय अपनी भावनामा से, अन्तत अपने पाप म हो। उहरणाय मेरे एक मित्र थे, जिनसे मैं वलुत वचता था। वह मुझे उग देने धे पोर इरावे अनागा वह युध उपदेशाव भी थे। पर जब यह अपनी मृत्यु गय्या पर पर पे तो मैं जा पहुंचा। मैंने एक दिन का भी नागा नहीं किया। यह मुझगे सन्तुष्ट होकर मर मेरे दोनों हाथ अपन हाया मे लिय हुए। और एक औरत थी जो मेरे पीछे पड़ी थी-बिलकुल यवार। उगने बुद्धिमानी का वि युवावस्था म ही मर गई। वितनी जगह निवल पाई प्रचाना मेरे दिल म उसके लिए और जव साथ में भारमहत्या पी हो । उफ ईश्वर, तव कसो सुगद हलचल मचती है। पापो टेलीफोन को घण्टी बानी है प्रापरा हृदय उमडने लगता है मथ भरे पोर जान-बूभार छोटे विये याक्या आपको मयत पीडा, पोर हा पोर पो उपर थाहा-मा दापारोपण भी। मनुष्य बना हो ऐसा है, व घु। उसने दो मेहरे हैं । प्रारम प्रेम के विका यह प्रेम नहीवरसामान पडागियों पर गौर कीजिए मान लीजिए कि जिम मयन म पे रहते हैं उसमें वोई मौत हो जाती है। ये अपनी नित्यानि की जिदगी में ये हुए हैं कि मान लीजिए द्वार पालथी मार हा जाती है। तुररा चौरन हो जान हैं, हायगर हिलाते जाने लगत हैं। छोरीगोटी बातों का पता लगाने हैं, महानुभूति प्रगट करते हैं। कोई मरा नरी निनाटा पा पारम्न हा जाता है। जानते नहीं पाप दि उहें दुगद परनामो यो उमरत होनी है। यह २८ व-मचरण की उनकी छोटी-मोटा चष्टा है मुख जगाने की चीज़ । पर क्या मैंन चौकीदार की वात देवन नया मे की? मेरा भी था एक बदमूरल, मूर्तिमान विद्वप क्षुद्रता और दुभावना ने भरा रासस, रोमा विजो प्रामिस्कन पादरी का भी हाय न घरन दता। मैंन नो उमम दोनना नव बद कर दिया था पर अपन अम्निव मात्र में वह मेर मदन सन्नोप को विचलित करता रहता । जब वह मरा तो मैं उसके अन्तिम मस्कार म गामिल हुआ। आप बता सकते हैं क्या बर, बहरहाल मस्कार के पहले वे दा दिन बहुत गचा रह। चौकीदार की पत्नी बीमार थी, छोट-म कमरे म पडी थी और पास ही पाया पर ताबूत रखा था। हर एर को अपन मत लेन मुद ही जाना पड़ना था। प्राप दरवाजा मारत और कहत 'नमम्यार, श्रीमनाजी, शिवगत म्नेहपात्र को प्रगमा व कुर सुनन जो वह उनके गरीर की तरफ इशारा करत हुए कहती थी अपने खत उठान और चल पाते। इस बान मे कोई विशप मनोरजन नहीं था पर उम भवन का प्रत्यक निवासी उनके कमर मे जा कार्वोति की बू म भरा रहता था गुज- रता जरथाविरायदार अपने नौपराका नहा मेजत थ, स्वय ही जात थे, ताकि इस अप्रत्याशित पारपण का रस ल मा । नौकर भी जाते प्रवयप,पर लुक-छिपकर । अन्यष्टि किया गिन यह पता चला कि ताबूत दरवाने म ज्यादा चौटा है। दइया रे दइया ।' पत्नी ने पला पर मै हो कहा अचम्भ व माय जिसम प और व्यया दोना गामिन थे। 'क्तिन वढे थे वह | 'पाप चिन्ता न कर श्रीमतीजी अडरटेकर न वाद निया, 'हम नातून कोमडा करते एक दिनार से निकार लंगे। सहा करतेनी उमे निकाला गया और फिर लिटा दिया गया। और केवल मैं (एक नाटपाला व भूतपूर्व द्वारपान के साथ जा पता चला कि राजगाम बगवामी के माप बठकर परनान पिया करता पा) पद्रिस्तान तर गया, और एक एम नास्त पर पून चढा जिसकी विगाला न मुझ चक्ति कर दिया था। फिर में चौकोरवी पनी २६ मे भट करने गया, उसका प्राभार प्राप्त करने के लिए और उमने क्सिी महान दुमान्त नाटक की नायिका की भांति उस व्यक्त किया। अब बताइए इस सबके पीछे मारण क्या था कुछ नही, केवल भूव जगाने वाली चाज । इसी तरह मैंन बार एसोसियान के एक सहयोगी को दफनाया था। वह एक पनक था, उसकी पोर कोई ध्यान नहीं देता था, हालांकि मैं हमा उमम हाथ मिला लेता था। खर, जहाँ मैं काम करता था, वहाँ हर एक मे हाथ मिलाता ही था बहुतो स ता दो दो बार। मरा कुछ लगता थोड था और इस तरह की शिष्टतापूण सादगी मुझ वह लोकप्रियता दिला दती थी, जो मर सन्ताप के लिए बहुत जरूरी थी। वार-एमासियान के अध्यक्ष न हमारे इस क्लक ये अत्यष्टि सस्कार म कुछ मारा पिया नहीं। पर मैंन पिया, भौर सो भी यापा पर जाने के ठीय पहले जिस बात का पर्याप्त प्रचार भी हुअा। मैं जानता था कि मेरी उपस्थिति लागा का घ्यान प्रापित परगी और उसकी सराहना भी पी जाएगी। इसलिए उस दिन गिरती हुई बफ भी मुझे पीछे नहीं । हटा सकी। क्या? हाँ जी हाँ म प्रभा पहुँचता हूँ उस पर, आप चिन्तित न हो । मैंन विपर छाडा ही कब है ? पर पहले म यह मज पर दंवि मरे चोरीलारवी पली, जिगने त्रास की प्रतिमा और तागत के लिए चांदी और यनून के हैंएल बनपान म इतना पा इसलिए दिया था कि अपन उगारा का पूरा रम सन या उन मोगा मिल रही महाने या एय वारे यहाँ जिमपी अावाज बडी सुराली थी यठ गई । वह उसे पीटता पा, दाना पीगे सुनायी पडती थी और फिर तुरन हा वह मिडयो गावर अपनी विप पमन्द गीत नीटर लगाता था-गारी, तुम कितनी गुदर हा! 'हो-ही टोक है मगर तो भी पडामी यहा परते। सो भी गया? मैं पापम ही पूराना है। ठीक है ना कुछ तास पता पावह गायर में मिलाफ पा, और चौकीर को पत्नी ने भी पर कोई बातमी नवी यो वा यह सिद्ध दिएक-दूमर म प्रम नहीं करते ये। मोकाटमी दात ना नही थी जायरी सिद्ध कर लिव प्रोग्तु अपन पनि म प्रेम नगरतीयी।ौ जब दह दावा अपनी बाहो और गत को पकाकर माा बाहृया नाका पति गगमा पन्नी न पिर म अपने स्वावामी पति का म्नुतिगान गुरुद दिया । और कि मैं मों का भी जानना में बिना परम सब-दाद पडता है पजा विषमुच्च और पवे नहीं रोतु । मैं एक आदमीगजानना था जिमन एक पमना प्रोग्न पर पानी रिगी के बीम मात्र निद्रावर कर लिग, अपना सब-कर उमगेम्मातिर त्याा दिया-प्रान मित्र अपना घना यहां तक कि अपने जावन का मान नवाग नी-ौर मियाम 'उम यह पता चला कि उमन उन प्रोग्न न कमी प्रम नगै किया था। वह अधिक की तरहनिन्दगी ने वेवा ज्दा हुया था। इसलिए उमन गारी करके अपन मिस टिनता और नाटकीयता मे भरे जीवन गनिमारतिया था । कुब ना हाना चाहिए । अधिगा मानवी वाध्यतामों का कारण इमो म निग्नि है। कर ना होना ही चाहिए, चाह वह प्रेम र नानना ही क्या ना युद्ध या मयु हो क्यों न हो। ना फिर जब हा अप्टिमम्बागेंगे। पर मेर पाम क्य-न-कम या वहाना नर्गया। मुझ जब नहा मना रही थी, क्यादि मैं ना उनी हुइ नहर व गियर पर मवार था। जिस नाम की मैं चचा कर गया उन गाम का नाम बद मुस्ता कि और दिनोंम भी कम ज्या दुधा मानना भी वान या है, वधु पनन्ड का मुगवना नाम यो नहर के वातावरण में गरमी था, पर मत पर नमी छा गरी यो। गत हा चली थी आवाम पश्चिम की मार तब ना उजाला यार प्रकार पान लाया महर की पत्तियां टिमटिमा रही थी। मैं बार विनार पोग्ग मका नरफ घागपर धार- पोरे चनतामा जारहा था। मकड हैंड स्तिावें वचन वाला की धारी दूकाना में प्रभावीच नी चमर रहा यो। पाटा पर बहुत वन लोग थे । पेरिस का नगर रात के गाने पर बठ चुका था। मैं धूल भरी पीली पत्तियाका, जो ग्रीष्म की याद दिलाती थी, रोदता हुअा चल रहा था। धीरे धीरे माया तारोम भरता जा रहा था, सहक की एक बत्ती छोड़ दूसरी वी तरफ जाते हुए वे एक क्षण को दीस जाते थे। मैं शानि यी वापसी, सध्या की मृदुता और पेरिस के सूनेपन का रस ले रहा था। मैं सुखी था। दिन अच्छा गुजरा था। एक अधा, सजा में कमी, जिसकी मैंने पासा की थी, मुवक्किल का पूरे दिल से हाथ मिलाना, उदारता के कुछ काम और दोपहर को मित्रमण्डली में शासक-वग की कठार-हृदयता पौर नेतानो के पाखण्ड पर प्रत्युत्पन्नमनित्य का प्रदशन। मैं पाँडजाट स तर पहुंच गया था। उस समय वहाँ सुनसान था। मैं नदी का देखने के इराद मे गया था, रात हो जाने के कारण उसका पता लगाना पठिन था । वत-गाला की प्रतिमा की तरफ मुह क्यि खा मैं उस द्वीप पर छा रहा था । मुझ अपने अतर स एव निराट गरिन की अनुभूति उठनी हुई जान पडी, और नहीं जानता कसे कहूँ-और सम्पूणता की। उसने मरे हृदय को उल्लाम से भर दिया । मैं तनकर सडा हो गया, और सिगरेट जलाने ही जा रहा था--सन्तोप की सिंग रेट-~-जब उसी समय मेरपीछे एय हेमी फूट पडी। चौंकमर मैंने घूमकर देसा, वहाँ बाई नहीं था। मैं रेलिंग तक गया, कोई पाब या वजरा भी नहीं । मैं फिर दीप की तरफ मुडा और फिर मुझे बही हसी मपने पीछे सुनायी पडी-जरा दूर जसे धारा के प्राह म नीच की पोर जा रहा हो । मैं वहीं स्थिर महा रहा । हसी क्षीण होती आ रही थी पर मैं पर भी उसे अपने पाछे साप मुन राक्ता था । जाने यहाँ मे पा रही थी अगर पानी से नही नो । साथ ही मुझ प्रपन रिल पी पवन बढ़ती हुई लगी। पाप मुझ गलन न सगळं। उस हमी मरोई रहस्य नही था- मन्त्री तोह यह साते हैं कि मित्रता की हमी पी जिसने हर चीज यो उचित स्थान पर बिठा लिया था। पौर वमे मा मुख पर बाद मुझ फिर कुछ भी सुनायी नदिया। मैं घाटों पर लौट पाया, रूदो की राह परहा, सिगरेट सराद जिनकी मुझे आवश्यक्ता नहीं थी। मेरा सिर चकरा रहा था और मेरी माम देव चल रही थी। उस शाम का मैंने एक मित्र को पान किया, वह घर पर नहीं था। बाहर जान के बार में मेरे मन म दुविधा हा रही थी, जव कि सह्मा अपना बिडकी के नीचे मुझे हंसो मुनापी दी। मैंन विडीखाल दी। नीचे सडक की पटरी पर कुछ नौ वान गार मचात हुए एष-मर से विदा ले रहे थे। खिडकी बन्द करत हुए मैंन मोचा, जान दा। आखिर मेरे पास एक मुकद्दमा तैयार वरन को था हा। एक गिलास पानी पीने मैं गुसलखान मे गया । ती म मेरा चेहरा मुम्बरा रहा या, पर मुम लगा कि मरी मुस्कराहट दोहरी है। क्या 'माफ कीजिए मैं कुछ और सोचने लगा था। मैं गायद मापसे क्ल मिना । जाहां, क्ल । नहीं-नहीं, में ठहर नहीं सकता। उसके अलावा वह जानूरा भालू वहाँ वटा है मरी राय लेन के लिए मुझे बुला रहा है। अच्छा प्रादमी है बाद पुलिस का दुगपहा, नीचता स मे मता रही है । प्रापरे याल म उसकी आवृति हयारो-जनी है ? विश्वास रमिए, उसके कम उनको प्राकृति में ही मेल सात हैं। चारी भौ यह उमीप्रसार करता है। और पापको जानकर प्राचय होगा यह पादिम-जीव कला-कृतिया दे व्यापार का विरोपन है । हॉलड दा में हर मादमी कला-कृतिया और ट्यूरिस के फूलो का विशेषत होता है। यह जो है, या जा वहा विनय गोल लाता है, यह सवमे प्रसिद्ध चित्र पोय का कत्ता है। पौनसा चित्र दिनी दिन शायद प्रापका दवाऊँ। पर मैरी जानकारी पर ग्राप पा चयन करें। यद्यपि मैं एक अनुतापी निगायर हूँ वहाँ पर मेरा एक पा है। इन सजना का मैं कानूना सलाहकार है। मैंन म देश के कानून का अध्ययन किया और इस माइन्ने म मुवकिला की जमात इट्टा करली। यहाँ कानूनी डिग्री भी प्राव यकता नहीं पहनी। मामान नहीं था पर मैं दूदरों म विश्वास ।
जगाता हूँ, हूँ न मरी हसी बटिया, दुली हुई है मरा हाथ मिलाना मानदार है, और य गुण तुरुप के पत्त है। इसके अलावा मैंने बुध जटिन मुकद्दमा बोल दिया था, गुरु म अपने हित के लिए और बाद म ठीक समभवर । यदि चोर मौर दताल हर बार सजा पा जाएँ तो मव मर्यादापूर्ण व्यक्ति यह सोचने लगेंग वि व स्वय निरन्तर निप रह हैं और मेरी राय म हां हां पा रहा हूँ भाई उम परिणनि का ता किसी भी मूल्य पर परिहार सरना ही चाहिए। नहीं तो सब कुछ एक उपहाम बन जाएगा। मैं वास्तव में बहुत अनुग्रहीत हैं, मरे प्यारे स्वदावामी वधु पापी जिज्ञासा के लिए। पर मरा गाथा म कुछ भी अमाधारण नहीं है। चूमि मापन दिनचस्सा दिलाया है मनिाम प्रापको बताता हूं कि बुध दिन उस हेभी वे चार म मने साचा विचारा फिर म उम भूल गया। कभी-नटा मुझ अपने अन्नर म बह सुनायो गड जाती थी। पर ज्यादातर पिना कोई प्रयल रियम और चीता क बार म सोचता रहता था। ता भी यह मुझवताना पडगा कि परिम ये पाटो पर टहलना मन पार दिया। जब भी विमा मोटर या वम मम घाटा वेरिनारेस गुजरता था ता एक प्रारमोन मरे ऊार या जाता था। मैं शायद इतजार करता था। पर मैं मन पार पर पता था मौर होता कुछ नही था रात्री सारा पिर पसने लगती थी। उसी समय म्वास्थ्य की भार स भी मुझ बुध चिता रही। बाई निश्चित गेग नहा शाय- उनासी अपना उन्लास फिर स प्राप्त परन म एव प्रसर बी कठिनाई। मैं डॉपरो के पास गया उहाने मुभ दायर दवाइयां दा । मरे मन म मानर म म सभी पनि और कभी प्रवगार के भाव माते-जात र मरे निरा जीवन युधयम गरल हो गया। जब गरीर उगरा हो तोहाय मा थपिन रहा है। मुभ लगता था मैं उग पीज का मुनाए 1 दे रहा है जो मैंने कभी सीवी नहीं था, पर जानना बहुत अच्छी तरह था यानी जीना। हा, मैं मानता हूँ मव-कुद तनौ गुरु प्रा। पर पाज नाम भी मैं पूरी तरह ने स्वम्य नहीं हूँ । अाज तो मुझे वान बट्न म नी कठिनाई हो रही है। मुझे लावा है कि मैं ठीक से दाल नहीं पा रहा हूँ और अपन गन्दों के बार म मुझे वारित आत्मविश्वास नहीं है । पायद मौसम का प्रसर है । मान लेन में मुस्किल हो रही है। वातावरण में इतना भारीपन है कि सोने का दवा रहा है। प्रापका वाहर चलकर गहरम धूमने मकाई एतराज ना न हा वधु' गुनिया आज गाम य नहर किननी सुन्दर नारही हैं । मुने स्थिर, प्रवाह हीन जल की मामें प्रिय हैं नहर म डूबी हुद मूबा पनिया की गर प्रिय है, और फूलों मे लद बजरा पर म उनी हुई अन्ध-गय प्रिय है। नहीं- नहीं, मैं आपका विवामनिताता है कि दम चि म कुद मी दूपिन नहीं है, बन्दि यह ता मेरा एक निचयारमा कम है। मच बात तो यह है कि मैं इन नहरा का पनदवा के लिए अपन आपको मजबूर करता हूँ। पापा बताऊँ, ममार म मुम सवम अति प्रिय है मिसती और विशेषकर एना की चोटी मे मूय के प्राण म उसका दृश्य, वगर्ने कि समुद्र और द्वीप पर मैं दाया हुप्रा हाजे। जावा भी प्रिय है पर केवल व्यापारी वायुप्रा के समय । हो मैं युवावस्या म वहां गया था। सामा यत मुन मत्र द्वार प्रिय हैं। उन पर छा जाना ज्यादा आमान है। प्यारा मकान है, है न' पर जा प्राप दा सिर दर र है व हमी गुलामों के हैं । दूकान का साइनबोड है। पर गुलामा के एक व्यापारी वाया।उनलाम प्रारम विग्वाम या। व घोषणा करत ये-'दयते हैं माप में समदिशाली हूँ मैं गुलामा का व्यापार करता है, का मांस का मग वागार है। माप मानते हैं प्रात वाई बुर प्राम कह सकेगा किया है उसका पधा उफ, मा अनाचा है। माना मुन्ने प्रश्न परिमी महयागिया के स्वर मुनायाद रहे हैं । व इस विषय र सम्बध में - । दल हैं । दो-तीन घोषणा पत्र प्रकाशित करने म उह मवाच न होगा--- या दो-तीन से ज्यादा भी। और सोच विचारसर में भी अपना दस्तखत उन दस्तपता म गामिल कर देता । गुलामी ? बदापि नहीं। हम उसके विरुद्ध हैं। अपने पराया कारखाना म इम स्थान देन की लाचारी हम हा सबनी है--पर वह ता स्वाभाविक है पर उसके बारे मे बढ-बबर बातें करना बिलकुल हद है मैं खूब जानता हूँ कि बिना प्राधिपत्य जमाए या सवा स्वीकार किये भाप काम नहीं चला सक्त । हर एक व्यक्ति का गुलामो की उसी प्रकार आवश्यकता है जिस प्रकार स्व छ वायु की। पाटेग देना, सौस लेना है भाप सहमत है मुभसे? पिर अत्यधिक दीन-हीन भी सौम लत ही हैं। गामाजिक शृखला की निम्नतम कडीपर जो व्यक्ति है उसके भी बीवी बच्चे ता है हो । और अगर अविवाहित है ता उसके पास कुत्ता तो है । मन यात तो यह है कि आप ऐसे व्यक्ति पर गुस्मा हो सकें जिम उलर पर जवाब देन का अधिकार न हो। अपने पिता को उलटार जयाय नहीं दिया जाता', पाप जानते हैं न इस उक्ति को एक तरह से यह वही विचित्र यात है। दुनिया म जवाव कोई विस दे, भगर उसे नहीं जिसम प्रेम करता हमरी तरह यह वात विश्वासजनर है। किसी नविसी योता मागिरी वात बनी ही होगी। नहीं तो हर एव तर ये नगन म दूसरातय हाजिर क्यिा जा सके और इग तरह सभी विसी बात का अन्त हो न हो। दूसरी तरफ शकित हर मामल मोहन परदती है। समय तो रामा, पर मन्त में यह बारा हमारी समझ म मा गई। मिमान के लिए मापने गौर किया हागा कि हमारे पुरातन युरोप भी दानिकतामासिवारप्रय सही रास्ते पर आ गई है। पुगने सीधे गा उमान म हम जसे कहते 4 पर नहीं पहते नि 'यह मरा मत है। माली क्या पापत्तियां हैं हम ज्यादा स्पट हो गए हैं। सताप स्पान पर हमन बिनप्ति प्रतिपित कर दी है। सत्य यह है "हम पहले हैं माप जितनी चाह इस पर वहस पर हम कोई दिलचस्पी नहीं, पर कुछ साल म पुलिस आपको दिखा देगी कि हमारी दात सही ही - और यर प्यारा पुरातन ग्रह ! अब सब-कुछ मा हा गया है। हम अपन प्रापका जान गए हैं, हम अपनी क्षमता मे परिचित हो गए हैं। मुझे ही ले सीनिय-विषय न सही, उदाहरण म ही परिवतन ना दें। मरी मेगा इच्दा रही है कि मेरी मवा मुस्कराते डा की जाए। अगर नौकरानी की मुखमुद्रा दुख भरी हाती थी तो मरे दिन विपान हा जात या वाक, उने प्रसन्न न रहने का अधिकार था। पर मैं अपन-आपमे कहा था कि उस लिए बह्नर हागा वि रा रोकर काम करन के बजाय हेमतेन्दमन करे। असल म वहतर ता मरे लिए था। फिर मा गान वधारने का सवाल नहीं है, पर मैं सममता हूँ कि मरा तक कोई मूखतापूर्ण नहीं था। यो ही में चीनी रम्नरां मे मान में सदा इन्चार करता रहा । क्या क्यादि जब वे मौन रहते हैं और गारीचमटी वानों के सामन रहत हैं ता पूरव के रहने वालों के चहर पर अक्सर प्रवना के भाय होते हैं । म्दामाविर कि खाना परामत समय भी उनके चेहरे वा भाव यही बना रहता है। फिर दम दमा म कम पाप मुा का मजा ल सकते हैं ? और सबसे वही वात, कमे आप उनकी तरफ देखत हुए भा माच सक्त हैं कि आप हर तरह म टीव टार हैं ? नो मैं या नंगा वि दासता मुम्बराती हुई दसीलिए अनिसाय है। पर हम यह वात स्वीकारनहीं करनी चाहिए। क्या यह बहतर नौं कि जा गुलामा के बिना अपना काम नहीं चा भरता वह उन्हें 'स्वाधीन' घापित कर पल ता सिद्धान के नात और दूसरे इसलिए ताकि व पार नराय मन दूर जग। यह मुमावता ता रहें हमारी तरफ मे पान का अधिकार है ही क्या? इन तर द मुम्बराते रहा और हम मापन वतमान वा परितुष्ट बनाए रख मङगे। नहीं तो हमें अपने दार म अपना राय पर पुनर्विचार करना पड जाएगा हम देना से पागल हा उगे या फिर विनात वन जागे, क्यापि मुखमा सम्भव है।
पतस्वरूप दुवानो पर साइनवोड न हाँगे और यह माइनबोर्ड तो बहुत हो बुरा लगता है। इसके अलावा अगर हर आदमा सय घुछ यता दे, अपना सच्चा पयमाप पोर गच्चा परिचय ने द, तोहमारी ममझ मन भाएगा विविधर जाएँ । जरा खयान तो कीजिए विजटिंग कार्डो का-'हयूपी विशृखल दागनिक या 'धमनिष्ठ ज़मीदार या 'व्यभिचारी मानवता वानी मन पूदिए तो वहाही विस्तृत क्षेत्र है। पर एपदम नारकीय हो जाएगा सब । हो, नरय सा ही होगा-दुकानो के गाइनगोडों से भरी सडरें और अपना मागय स्पष्ट परन का कोई उपाय नहीं। एक बार जा वर्गीकरण हो गया मो हा गया। माप प्रपो को ही ल लीजिए मेरे स्वगवासी मधु जरा ठहर पर सोचिए तो कि पापा सादनबाद क्या होगा? पाप धुप हैं ? मर बाद में वताइएगा। मैं अपना तो जानता हूँ-दो मुह वाला प्यारा जनस पोर फार मस्था वा प्रादा-याक्य स पर विश्वास न करी। पोर मे पाडों पर होगा 'जो-चपतिस्त बमस नाटय मेलने याला। जिस नाम की मैंने मापने चर्चा यी थी उसके बाद मुझ एर वात पता पती। जर मैं पिगी भय को पटरी तक पहुंचावर विदा लेता था तो अपनी टागी उठावर साफ है विटोपी उठार अभिवादन करना म के निर तो या नहीं यह तो टेप हा नही माता था।था विमरे कि जनता । अपना पाट मा करने में जनता को सलाम झुगाना पा। कुछ बुरा नही क्यों ? उहीं दिनाएर दिन जर एक मोटर पनान याल न सहायता के लिए मुझे पयवाद किया तो मैंन कहा 'काई भी दाना पिरता। मेरा मन ब या 'इतनाना कोई भी वर देशा। पर उग वमन भूत का पान मेर मन पर बना रहा विनयशीलताम तो मैं बााई तीममारपां था। मुभ नतिर हार मोकार करना पड़ता है मरे म्बावामी म घुमिमी भरा था। म म म यही मगे जीवन रागिनी मोटेर रही है और जाभा यात पसाया उमी म य मुशायी पर .
सकती थी। विना गान बघार मैं वान ही नहीं कर सकता था। खास तौर स तब, जब मैं अपनीध्वम्नकारी विवेद की गली का अपनाना था, जिसका मैं पहित था। यद् विन सच है कि मैं जीवन म हमा स्वतन्त्र और गतिगाती रहा । औरा के साथ अपने सम्बधोंम मैं अनु भव करता था कि मैं मुक्त हूँ, मिफ इसलिए कि मैं किसी का अपन वरावर का नहीं मानना था। म प्रापा बता ही चुदा हूँ कि म अपन को हर एक मे ज्याला बुद्धिमान नममता या। मैं अपन को ज्याल कुरान और ज्यादा सवदगीत मी सममता या अचूक निशानेबाज, वजाड हाइवर और प्रेम-व्यापार म अनुपम । उन भना म मा जहा मुझे अपनी हानता का प्रमाण पाना मुक्ति नहीं या जम टनिन म-मैं दम साय सेर नर लेता था-मर लिए यह सोचना कठिन था कि अभ्यास करन का योग समय मिल ताम अप्ठतम दिनाडिया मग्रार न पहुच जाऊँगा। मुभ अपन अदर श्राग्रा के अलावा और कुछ न दीरता था और मीनिए मैं गान्त प्रकृति का था, सौजय मे भरा रहता था। जव म दूमरों के मामता म पडता या तो मात्र कृपा मपरित हारर पूरा स्पा स्वाधीन पर सारा श्रय मुझ ही प्राप्त होता था। मरा सामनापा एप डिग्री और बढ जाती थी। बुर और वास्तविकतामा व साय-माय इनरी मा उम गाम के, जिमको मैंन प्रापर चचाकी यो, वाद वे कान म धीर पीरे मुझे जान कााहु । सब-कुछ एक माय ही नहीं नही बहुत स्पष्ट म्प मे।पहरे तो मुझ पानी म्मरण-गक्तिपिर मप्राप्त करनी पड़ी। धीरे धीर मम ज्यादा माफ टीमन लगा । मुना नान प्राप्त था उमी की मने गिता जामि ममय तर मुझ बिम्पग्ण की विना पाग्यता मे सदा सहा यना मिलता रही थी। ममद-चुछ भूल जाना या, गमात अपन मक्लास हाती थी। काई वान एनी नहीं थी जिमका गहरा प्रभाव पड। युद्ध, मा महया, प्रम, गरीबी मद मग ध्यान मारपिन करते अवय ५ व परिस्थितियों वाध्य करती यों तव, पर वह देवर प्रौपचारिक और सतही ध्यान होता था। कभी-कभी म अपन दनिव जीवन में बाहर को विही वातावे लिए भी उत्तजित होने का ढोग पिया करता था । पर बिलकुल मच पूछिए ता म वास्तव म उनम पडता नहीं था--सिवा उस वक्त जब मरी स्वत गता में बाधा पहुँच रही हो। को कहूँ म इस बात को। हर एक चीज़ मेरे ऊपर म फिसल जाती थी-हाँ वम सरक्ती नाती थी। पर इन्साफ परें हम लोग ! कभी-कभी मेरा भुलाडपन प्रासा के योग्य हाता या। आपन देसा होगा कि कुछ लोगो का धम यही है कि सबब मूर माफ कर द और व माफ कर भी दत हैं पर उह भुना नहीं पात। म इतना भता तो नहीं था कि कमूरो का माफ कर दता पर अन्त म सना उह भुला दिया करता था। औरफिर, जापादमी साचता था कि म उसमे घणा परताहूँ उसके पाश्चय का ठिकाना न रहता था जय देखता था कि मैं टोपी उठाकर मुस्कराता हुआ उसका अभिवादन पर रहा ह । तब अपने स्वभाव के अनुम्प वह या तो मेरे महान चरित्र वी स्तुति परता या या मरे अशिष्ट आचरण की भत्मना । वह यह न समझ पाता था कि वारण इनगे वही सीधा-मादा है । मैं उसका नाम तक भून चुका होता था। वही कमजोरी जो निही स्थितियो म मुझे गृतघ्न या उदासीन बना देती थी ऐसी स्थितिया म अत्यन्त उदार भी बनाती थी। परिणामत दिन-पर दिन मेरे जीवन की शृगला बाबोधन याला और कुछ न रहा फेल वही म म म । औरतो के मग पाप और पुण्य म-प्राने वाले पान या योई ध्यान नहीं हर दिन पपा म ही सीमित--तार जमे कुत्त पर हरति म प्रपती जगर पर जमा हुप्रा। इस तरह म जिदगी यो मतह पर जीना रहा नग 1-1 की दुनिया म वास्तपिपता स परे। वे मारी पिना नाम लिए पतीहुद प मार दास्त, जिनग मुहानाम व निराधी मारे गर fTHI नाम भरम निए दसा पा मोर पसारी प्रोग्न नाम मात्र पिए .
- अपनाई हुई। या तो ज्वम या अनमनेपन म में मात्र चेप्टाएँ करना रहा। फिर पाय इन्सान व चिपक जाना चाह्न थे, पर उहें थामने के लिए कुछ मिना नहीं, और यह दुभाग्य की बात थी, उनके लिए | रही मरी वात, सामने भुला दिया । मुझे अपने अनावा और किसा चीन की याद ही नहीं रहती थी। फिर धीर धौर मरी स्मरण शक्तिवापस लौटी। या कहें किम ही उस तक वापस पहुंचा और उसम मुझे वह स्मति मिली तो मेरी प्रतीमा कर रही थी। पर उसको चर्चा करने के पहले आप इजाजत देता कुछ मिसालें पेग कर मरा विश्वास है कि य आपने लिए उपयोगी सिद्ध हागी-बनाने के लिए कि मैंने अपनी खोज के दौरान में क्या-क्या पाया। एक दिन पानी मोटर में जाते हुए जब मैंन चौराहे पर हरी बत्ती का इशारा पावर भी आग वन म सुम्नी का पार हमारे कई सन्नापी नागरिव औरन मरे पीदे जार-जार से हान बजान लग तो मुभ सहमा एक घटना यादहा पाई जो इसी तरह की परिस्थिति मे घटी थी। च मा लगाए और प्लस पोर पहन एर दुवलेपतो जरा-म आदमी न अपनी माटर-माइकिल मेरे सामन ल आर लान बत्ती के पास सदी कर दी थी। जब उसने माटर-याइवित राकी तो उसका इजन बन्द हो गया था, और उम फिर स चालू करन का वह व्यर्थ चेप्टा कर रहा था। जब रागनी बदनी ता मैंने अपनी मामा य गालीनता मे उमम प्राचना की कि वह अपनी मोर-माइक्लि रात मे हटा ले ताकि मैं प्राग व सकू। वह वचारा अपने सा-मा करते हुए इजन म जूझ रहा था, अन उमन परिसी लिप्टता के अनुसार जवाब दिया, 'जामा, जापर पर पर च- जापा। मैंने फिर जार दिया-गालीनता से हो पर अधारता र हवान्ना भाव अपन स्वर में लात हुए। पौरन मुमने कहा गया और वाशी म्पष्ट गरम कहा गया-वि मैं जहनुम का जा सकता हूँ उपर तक तक प्रना हान मर पोर्ट वजन नग थ। बडीदरता म मैन अपने प्रतिवादी म प्रायना की कि यह भलमनसाहत से पेश आर और यह समझ न कि वह सारा ट्रफिर रोक रहा है । उस चिडचिड आदमी ने-गाय तव तर वह अपने इजन के दुव्यवहार में बहुत परेशान हो चुना था-मुझ ज्ञापित पराया कि अगर मैं खूब अच्छी तरह स अपनी मरम्मत करवाना चाहता होऊँ तो वट बदी पुगी स करने को तयार है। इस प्रकार के बहत्पन ने मुभम एक स्वस्थ पाको उत्पन्न कर दिया और मैं इस इरादे से अपनी माटर से उतरा वि उम बदजवान की अच्छी तरह पिटाई करें। यह मैं नहीं समझना कि मैं कायर है। (पर क्या क्या विचार प्रारमी के मन म नहीं उठने ' ) मैं अपने प्रतिद्वन्द्वी मे एक वालिश्त लम्बा था मरी मासपगियां भी हमना दृढ और सुडौल रही हैं । अब भी मरा विश्वास है वि मरम्मत उसकी हाती न वि मेरी। पर मैंन जमीन पर पर रवा ही था रि जमा हाती हुई भीड म मे एव पादमा मागे वटा और मुभम वाला कि मैं धूल पा कीडा हू और वह मुझ उम आदमी पर हाथ न उठाा देगा जिसवे परो के नीर मोटर-साइकिल है और जिसकी वजह म में उसके साथ उलमन म फायदे म हूँ। मैं उस योद्धा की तरफ मुडा, पर सच कहूँ ता मैंन उस टेवा भी नहीं। मैंने अपना मिर घुमाया ही था वि मुभ माटर-माक्लि पो फरफर सुनाई पडी और वह जोर का एर घूया मेरी कनपटी पर पड़ा । रमपे पहन कि मैं समभू-भूरि हुमा यया, मोटर-माइविन चती गई । सकार खाना हुमा शिर निय मैं यात्रवत् फिर दार्तानियो की तरफ बढा दि उसी समय पर तर काफी मायाम हट्टी मोटरामे हानों का तुमुल-मार गुरू हो गया। वत्ती ही होो लगा था। य युधरित्तव्यविमूर -गा उग मुस की मरम्मन किये बिना हा दुम दबाए मैं अपनी मारर पर वापम चला गया पौर मोर स्टाट पर दी । जब मैं उस मूमके पाग ग गुजरा तन उगन वयाप गया 'पहार मरोमम्यथाापी । मुभ ग्राजीयार होमासी है। विनामही तुमच्या है पापली राम में हो, नायदफिर भी ४२ उमे भुलाने म मुझे कुछ ममय लगा और यही तत्त्व की बात है। मेरे पास वहाने थे वेशक'। मैंन पिना जवाब दिय मार खा ली थी लकिन मुझ पर कायरतावा यारोप नहीं लगाया जा सकता या । अचानका साथ दो तरफ से सम्बोधित किय जाने पर मैं चकरा गया था, मेरे दिमाग म मव गडवडा गया था, और माटर के हानों को भा भो नेता मरी धव राहट का वचा-खुचा हिस्मा भी पूरा कर दिया था। पर मैं उसके बारे में इस तरह दुखी था जमे मैंने मयादा के नियमा का उल्लघन क्रिया हो । मेरी नजरों के सामन विना किमी प्रतिक्रिया के मोटर की तरफ अपना वापस जाना पा जाता था, भीट की व्यग्य भरी दष्टि मुझ पर थी और वह भीड, जहाँ तक मुझ यार है, इस वजह से और भी ज्यादा मानद ले रही थी क्याकि मैं एक बढिया नीला सूट पहने या। मेरे काना म 'देवकूफ गया गूजता रहा और सब वाता के बावजूद यह मुझ मुना. सिब ही लगता था। मक्षेप म क तो जनता के सामन मरा मानमदन हो गया था। वैगर परिस्थितियो के म के कारण, पर परिम्पिनियाँ तो हमेगा ही रहती हैं। बाद म मुझे साफ दीखा कि मुझ गया परना चाहिए था। मैं कल्पना करता कि मैंने तार्तानियो को जबड पर धूमा मारकर गिरा दिया है, अपनी मोटर म वापस पहुंचा हूँ, उम बन्दर का, जिरान मुझे मारा था, मैंन पीटा क्यिा है उस परड लिया है, उसकी माटर-माकिल दवावर किनारे लगवा दी है और एक तरफ ले जाकर खूब अच्छी तरह मे उमकी मालिश की है, जो कि उसने पूरा नरह कमाई थी। कुछ हर-फेर करत यह बोटा-सी फिल्म सक्दा वार मेरे कल्पना-पट पर पानी-जानी रती। पर मौका हाथ से निकल चुरा था पौर कई रोट तक एक कडवा पापा मुझ कचाटता रहा। परे पानी पिर बरसन लगा 'पाइए वयानम लाा इस बरमाती के नीचे स जाएँ। टीम । हाँ, ता मैं वहाँ या हा-हाँ मान-मर्यादा। मुझे जब उस घटना वा पुन स्मरण मा ता मेरी समझ में पाया कि उसक प्रय क्या है। प्रापिरवार मेरा स्वप्न ययाय के सामने टिक नहीं पाया था। यह साफ जाहिर था दि मैंने एक सम्पूण मानत्र हान का मपना देखा था- एम मानव का जो व्यक्तिगत रुपम और अपने व्यवमाय म सम्मान प्राप्त कर सका था। आप चाह तो यह लें आधा मटा और प्राधा डि गोल। थाड म वहूँ तो मैं हर चीज पर छा जाना चाहता था। इसीलिए मैं शान दिखाता था दिमागी प्रतिभा के बजाय गागैग्वि क्ला-कौल वा प्रदान करना चाहता था । पर सबके मामो विना यूँ चपड विये मार खा राने के बाद मेरे लिए सम्भव न घा वि अपना वह चित्र मजोए रख सकू । अगर मैं सचाई और बुद्धिमानी के प्रति इतना निष्णवान होता, जितना कि मैं कहता था कि मैं हूँ ता वह घटना मर लिए क्या महत्व रखती जो उसके साथी रने थे व तो उमे भुना चुचे थे। मैं बिना वजह गुम्मा हाजाने के लिए अपने को कुछ कोस नेता और कुछ इसके लिए भी कि गुस्मा वरने घे बाद दिमाग सही न रस सवन के कारण अपने गुस्से के परिणामो का भी समुचित सामना नहीं कर सका । उसपी बजाय मैं पटना लना चाहता था मारपर विजय पाना चाहता था। जमे मेरी सच्ची मावाला पथ्वी पर सबसे अधिव बुद्धिमान होन की या रावग अधिर उदार हाने वी न रहा हा यत्ति यह रही हा कि जिसे मैं चाहे मारकर गिरा मक, पानी रिलबुल प्राथमिर अर्थो म अधिर शक्तिशाली सिद्ध होऊ। सच बात ता य - दि हर बुद्धिजीवी गुण्डो का मरनार होने के और ममाज पर मान दिन के महारे प्राधिपत्य जमाने के सपने देखता है। चूंकि यह उतना मरल नहीं है निानावि जामूगी उप यामा मनिसा रहता है इसलिए प्रादमी पयाातर राजनीति का सहारा तारे और लपककर फूराम दतम गामिन हा जाता है। हज क्या है अगर अपने विनया अपमान करने माप्य हर एक पर प्राधिपत्य जमान म सफा हा रारे गुभ प्रपा अन्नर म माता जमाने के मपुर सपनो या माभाम मिला। पग-ग-मदतना तो मैं नाही गया कि मैं अपगधी और पी पा पण उमी ह नर ताइ जहाँ सर पि उनना अपगप मुझ कोई हानि न पहुंचाए । उनका अपगप मरो वाक्पटुता प्रर करता था, क्योकि मैं उनका गिवार नहा या। सटा मेरे लिए हाना ता में नवर निसाया बन जाता पनि उमम अधिन आधी स्वामी बन जाना, जा चाहता था कि याय के सिद्धान्ता की अवहनना रख दापी पर आघात कर उम घुटन के वल टिकाटा उमत्र बाट, मरे स्वदा गामी पधु इस पर विवान वरल रह्ना कठिन था कि प्रादमी न्याय कापस लेन के लिए बना है ग्रार विश्वा और अनाय को रक्षा का भार भाग्य न उस सौपाई चूनि पानी और भी जार म वरम रहा है और हमारे पाम ममय है क्या मुझे दनातन है एक और बात अापका बतान की, निमकीरीज मैंन नलीही (अपना स्मति म) की तो आइए हम पारिणम वच घर म पच पर वठ । मदिया में पाए पीन वाले इमी नहर पर एमा ही पानी बरसन देखन रह हैं । जाबात मुझ अापका बनानी है वह कुत्र ज्यादा मुश्किल है। इस बार उमका मम्द व एर औरत म है । पहाता प्राप यह जान लें कि औरता के माय मुभ हम ना मानता मिनती रही बिना काइदिप प्रयत्न विय। मैं यह नहीं बना दिमफनता उह मुत्री करन म या उनके द्वारा अपन को ही मुवा वग्न म मिलती रही। नरी बम मफ्नता मिलती रहा। अपना मभ्य म जर भी चाता पा प्राप्त कर लता था। कहा जाताथा कि मेग प्राचार बहार पारपत्र है। गोचिए तो जरा आप जानत है रियह यात्रा क्या-विना काई म्पष्टप्रान रियही उत्तर महाँ रहतवा लना। और उस समय मेर वार म यर मच था । प्रारको प्रावर होता है? मान भी लीजिए इन्चार क्या करत' मग चेहग जमा अव है उमन ता यह स्वाभा विक ही है। अफ्मा । अवम्याप्रानकरलन र बाद मपनी प्राति मा दायित्व हर व्यक्ति पर भार बन जाता है। मरा पर उमा क्या पर अपनी जाह पर सर है दिमममा जाता था कि मुमम प्रारपण है पोर मैन उमगा यूर पापा उगया। 7 पर पिता कोई जोरलोड लगाए में ईमानदारी परतता था या, मरीव-रोग। औरता मे मेरे मम्बध महज-स्वाभाविप और मुक्न थे। उमम वाईकपट न था, सिवाय उस प्रक्ट कपट वे जिस वे पदानि समझनी हैं। मैं उर प्रम वरता था उस पावन कथन ये अनुमार ही जिसका मतलब है कि मैंने उनम से विमीस कभी प्रम नहीं दिया। मैं हमशा नारा विरोध वा बहदा और मूसनापूण समझता रहा पोरजिननी भी औरतो म मरी मुलाकात हुई उनम प्राय सभी को मैंने अपन मे बेहतर ही पाया । फिर भी ऊंचे प्रासा पर विठावर मैं मदा परन की प्रपेशा उनका उपयोग ही मधिर दिया। फिर इगका रिमी का पना भी वमे चल सकता है? यह बातो है ही पिराचा प्रम अमाधारण होता है तारी म वग दो या तान बार और क्या चावी ममय या तो माया होती है या उर रहा मरी बात मा में विमाहालत म भी ना पुनगाना भक्तिन तो था ती। मैं कठोर हृदय नहा हूँ उमग बहा दूर बलि उसये विपरीत, करुणा से भरा हुआ हूँ यहाँ ता कि मर प्रौमू पलना पर रहे रहत हैं । वस यही है कि मरी भावना सना मरी ही पार उमुख होनी है। परुणा वे मर भार प्रपन ही लिए होते हैं । यह बात सन नहीं है कि मैंन यभीप्रमानी रिया। अपने जीवन म कम-से-कम एक महान प्रम पीमापातोमरे माम उठी ही,तिरावापान हमगा में स्वयं ही रहा। उस दष्टि म, युवावस्या की प्रनिगाय पठिनात्या के बाद मैं जली ही मुव्यवस्थित हो गया था। मर प्रम जीवन म पेचा विषयासक्ति का प्रमुख पा । मैं कल भाग विजाग और परास्त वन वा सामग्री की तलाश मरना था। पराम्प इसम मरा सहाया था। पाति न मा प्रति उदारता दिमाया यो। मुझ उन पर गय पा मोर उगा द्वारा मापत म परिताप प्राप्त विय जो अब मैं नहीं जाता कि वेवल शारीरिव गुग ग प या प्रतिष्ठा प्राप्ति म। पाप प्रदाय वा दि मैं पिर मान बघार रहा है। मैं इमग इलार ही गरेगा मौरस मुभ इस पर काई गव ही है क्यादि दस ममय मैं इस बात की टी हार रहा है जो मच है। तो मी हा मरी विषयासक्ति (उसी तव अपने को सीमित रखू) ननी वाम्नदिन योनि दम मिनट की मौज के लिए भी मैं मां-बाप का त्याग कर सकता था चाह बाद म उनके लिए विनना ही अनुताप क्या न करता नही, यो कवि दम मिनट का मौज के लिए नोमाम नौर में कर मरता था, और विपरर तब जब मुझे यह दिग्वाम हाता कि सका कोई उपमहार न होगा । मिदान मरे भी ये, जस यही वि मित्र की पत्नी पुनीत है । पर मैं बिलकुल सच्चे मन में दो-चार दिन पहले वाछिन स्त्री के पति के प्रति मित्र भाव त्याग दता या । गायद मुझे इसे विषयामक्ति नहीं कहना चाहिए। विषयाति प्राचिकर नहीं है। हम उदारतापूवर मे दुदरता कह लें-3 प्रकार की जमजात दुबलता नोप्रेम-व्यापार म गरीर के मिवाय और कुछ नहीं देख पानी । पर वह दुवसता यो सूब मुविधापूण | भरी विम्मरण की ममता के माय मित कर वह मेरी स्वच्छता म याग दती थी। माय ही एक प्रकार की अभ्यता का मामाम देवर और पर अविचरम्बनता प्रदान कर वह मुभ नयी-नयी मफ्ननाएं प्राप्त करने के अवसर नती थी। रामाटिव न हान के परिणामम्बम्प मैंन गमान को कुद्ध निमित प्रान रिया । हमारी महिला मित्रा को बोनापाट के माय एक समानता है वे समझती हैं वि जहाँ और सब अगफल गरे दहा वे अवय सफलता प्राप्त वर संगी। दम व्यापार विनिमय म अपनी विपयाक्ति है यतिरिक्त मैंने एक पौर भूष भी गात वी-जुमा मेरन की अपनी तात्र भूख ।औरतो मभी मैंन प्रेम उनम किया जाएष प्रकार के मेन म मेरा माय देनीथी जिमम बम-बम निष्पाप हान काम्बार हाता है। मैं यापको बताऊँ अब मुझे धमा है मैं जीवा म मन-बरलाव के माधना काही प्रानन्द ले माना है।माई मा मफिल चा वह दिन्नीगे जगमगाती हुई क्या न हो, मुझ गीघ्र ही उगा देती है पर अपनी मनचाही औरता से मुझ कभी ज्य नही हुई। मुझ यह स्वोरार करते हए क्लश हाता है, पर प्राइस्टाइन म दस तपा की बातचीत मैं पिसी मूबसूरत कारस-गल से पहली मुला पात पर प्रासानी में निछावर कर देता। यह वात और है कि उसस दसपी मुतारात तय पहुचत-पहुंचत माइस्टाइन के लिए या पिसी गम्भीर ग्रथ वे लिए मरा मन वचन हो उठना । ममप म क तो बडी बडो समस्यामो की मुझ मपनी दिनामिता के बीच में अराण के अतिरिक्त और कभी फिक्र न होगी यो । क्या बताऊँ क्तिनी पार पटरी पर खद्ध हुए मित्रा साथ बडे जार के वादविवाद के बीच तक का तार मरे हाथ से छूट जाता था क्योकि उसी समय कोई गजब की यूब सूरा भरत सडर पार करती हई दीस जाती थी। प्रत में यह मेल सेता रहा। मैं जानता था कि उहे यह पसद नहा माता पिआपरा उद्दश्य चट स पता चल जाए। पहो वातचीत हाना स्री था, जिसे ये कहती पी प्रमालाप । मैं भाषणा से नही घराता था वरील ताथा मोर न कटाक्षोम क्यापि अपनी सन्य मेमा के दौरान म एमचर कर रह चुका था। मैं अक्सर अपना पाट या लता रहता था पर नाटर हम वही रहता था। मिसाल के लिए पहले ताएर दाटा-मा पर अयोधगम्य भाषण में अभिनय का रहता था, रम्यमयी कोई बात वा, इरावा कि यह एकत्म रामभ म नी माता मैंने पिलाल नहीं पाहा नियापित होऊँ यहाँ तर वि ता प्रमम पर गया था-पानि माटि। यह सा मान रहता था, यद्यपि पह नाटप-महिता ये सबम पुरान प्रका मया। फिर वह दूसरा-- प्रार का भे भरा मुग पाा या जगा गुर विसी पोर पोरत मे प्राप्त रहा हो ससरा पा । हा सा है कि यह मधी गती हो है ही (क्यापि कोई भी मान या पूरी तरह नहीं दचा गवता) पर यह है पद्धितीय । इमो पसावा मैंन ए छोटेग भाषण पीतयारी पर ली या ग्गिा गानी गातार स्वागत पिया गया पौर जिरा, मरा पूरा विन्यास है, १८ आप भीमराहगे। उन अब का सार दद मरी देवसी के माय जोर ने म बात का बटन में या कि 'मैं कुछ नहीं हैं, मेर साथ मने म कुर नही रखा है मरा जीवन पही और ही है, उसका दिन प्रतिदिन के मुबाकोई मम्बर नहीं [-दामुत्र गायद मुझे और सबसे अधिक प्रिय हाता, पर अब तो काई चारा नहीं समय निकल गया।' ममर निक्ल जान के कारणों को मैं पापन रखना क्यानि मैं समझता था दि रहस्य मावत हाकर गय्या पर जाना वहतर है। एक तरह मे इसके अलावा मैं जानता या रम पर दि वाम भी करता था मैं जिम भूमिराम उतरठा था उसे जावन्त बना दता था। फिर पाश्चय वया कि मेरी सायिन मा मेरी ही नर उमापवर मच पर थिरकने लाता थी। उनम जो सर्वाधिक मददनशील थी उन्होंने मुझे समभन की चेप्टा की और सम दे एक प्रकार के विनित विपाद की स्थिति म पहुँच गद । और दूमग जो या व इमीम मन्नुष्ट होकर मैं मेक नियमों का पालन कारणहूँ और कायग्न होने के पहले मवाद करन की नवगर कारता का प्रगन कर रहा ,गीत ही वास्तविकताओं पर उतर प्राती या। इमर अय होत थे कि मैंन विजय पाया और दाही विजय पाची पाकि उन्हें प्राप्त करने की जो कामना मर मन म थी उस तान बरन अतिरिक्त मैं अपन लिए अपने प्रमका मीनप्त कर रहाथा- हर बार अपनी विशिष्ट गति को प्रमाणित करके। यहाँ तक कि उनमें में कुछ यदि केवल पाडा-ना ही मुन पहुँचाता थीं, 11 भो म लम्ब प्रकाश के बाद उनसे पुन सम्बध स्थापित करन को चय करता या, निश्चय ही उस कामना स प्रन्ति हाकर जो अनु पम्पिति द्वारा पापित हाती रहती है और विन्हीं सम्बचा वे पुनरा विवार के बाद जाता है पर गाय इमनिता मी कि मैं म बात को प्रमागित बर मा वि मार मम्ब प-या। मुरमित रह हैं और उन्हें बमने का अधिकार केवन मग है। यमीबनी तो मैं यहाँ तर बला था कि उनमे प्रतिना कराता था कि व विमी और पुषका पार . समपण नहीं करेंगी, ताकि इस सिलसिले म मैं बिलकुल निश्चिन्त हो जाऊँ। पर मेरा हृदय जरा भी उस चिन्ता का भागी नहीं था और न ही मेरी कल्पना। एक प्रकार का मिथ्याभिमान मुभमे कुछ इस प्रकार जम गया था कि मेरे लिए क्लनानीत था यह साचना यथाथ के बावजूद, दियाई औरत जा एक बार मरी हा चुवा है कभी किसी और की हो सकती है । जा प्रतिमा व मुभमे करता थी वह मुझ तो स्वतत्रवर दनी यी, और उहे बांध देती थी। जस ही मुझ निश्चय हा जाता था कि व और विमी को नहीं हो सकती, मुझ इसका अवसर मिल जाता था कि मैं उनसे सम्बध विच्छे कर दू-जो करना वस मरे तिए परीव परोन असम्भव हाता । जहाँ तक उनका प्रश्न था मैं अपनी बात सिद्ध कर चुका हाता या और काफी दिना क लिए अपना अधिकार सुरभिल वर चुका होता था। विचित्र है है न? पर था एमा ही, मर प्यारे म्व दावामी वधु पुछर पी पुत्रार हाता है कि मुझ प्यार करो' ता बुध की मुझ प्यार मत करो । पर एक प्रकार का जीव हाता है सवम बुरा और सबम दुनी, जा पुकारता है मुझ प्यार मत करा पर मरे प्रति ईमानदार बन रहा । वस पहा है दिमत मकाई भी प्रमाण कभी सनातन नहीं होता इसलिए हर व्यक्ति के माय नय सिरे से प्रारम्भ करना पड़ता है। वार बार भारम्भ करते रत्न वारण पादमी की भारत पड़ जाती है। जल्द ही विना साचे भाषण जगन पर पान लगना है योर मनापास पाचरण उसका अनुगमन करता है। और फिर एप दिन एमा भी माता है वि विज्ञापिगी विरुप कामगार मा मापसीवार कर लत हैं । सच मानिए, पुर सागा व लिए दुनिया म गबग मुग्विर याम यही है कि जिसरापामना पो हो उग स्वावार न करें। मलताग वा यही हुमा। पापो यह बताने म कोई साम नही पि यह बौन था। इतना बनाना पयाजोगा कि उसने अपनी निरपण विसामे मुझ पापित किया था। मप बताऊँ वहा वाहियात अनुभव . या वह जसादि मुझे समझ लेना चाहिए या वि होगा। पर मेरे स्वभाव में कोई जटिलता नहीं थी और जिम व्यक्तिको मैं दुबारा दखता नही था उमे गीन हा मुलाता था। मैंन मोचा था कि उसका ध्यान ही उघर नहा गया है और यह तो य पना भी नहीं की थी कि उसके काई विचार भी होग। म अगावा मरा दृष्टि मे उसका निरपर प्राचरण उमे नमार म अलग कर देना था ! पर कुछ हफा बाद मुम पता चला कि उमन मरी दमिया दा वणन क्मिी तीसर यक्ति मे किया है। फौरन मुझे लगा कि मैंन दुध धावा बाया है । वह उतनी निरपर नहीं थो जितना कि मैंन माचा था और निणय करन का दिवा उसम था। तब मैंने माचा 'पर, हटापा और हेमी म टारने की कोगिता की। मैं ठहाका मारकर हेम भी पन, स्पष्टया कि घटना मह वहीन थी । अगर ऐमा वोरक्षा नहीं मोच कानियम हाना चाहिए, ना क्या वह यौन सम्बयाका क्षेत्र नहीं है अपनी सभी अपूव-नेयताग्रा के माथ' पर नहीं, हमम से हर एक अपना श्रेष्ठतम पर मामन रखना चाहता है प्रम मो। कहता दिया मैंन वि 'अर हाया' पर मेरा माचरण कसा था? मेरी मुलानात उग प्रोग्न मे कुछ दिन बाद फिर हुई और मैंनहर तरह म उसे पापिन बरन और वास्तव म पुन प्राप्त करने की चेप्या वी। यह बहुत मुसिन नीथा काकि उ है यह पसन्द ही नहीं है रि ममाप्ति विफरता महा । टस पण म बिना किसी इराक, में वास्तव म हर तरह मै उम मान कादम पहुँचाने लगा। मैं उनै त्याग दना प्रौर फिर स्वीकार कर लेता। उमे बाध्य करतानि वह अनुप युक्त गमय और अनुपयुक्त स्थितियाम प्रात्म-यमपण को।हर दष्टि म मैं इतना पर व्यवगर उसने वरता था कि अन्न म मैन उमी तरह मान या उममे बांध लिया जिम नरवि मैं समझता हूं जेलर का में बंध जाता है। यह सब उस दिन तर चला रहा जबकि व्यया और विवाना मिश्रित सुत्र यी उप अम्न-व्यम्नता मे उमन नम नम्य का मुपर श्रद्धाजति अपित पी जामता दे पाग मे उमे बांध हुए पा।
उसी दिन स मैं उससे दूर हटन लगा । और भव मैं उस भूल चुका हूँ। मैं मापसे महमत हूँगा यद्यपि मापन शालीनतावा बुध वहा नहीं है, कि यह दित-वहतार वार बढ़त मुदर नहीं था। पर, अपने जीवन के बारे म जरा सोचिए मर प्यार स्वदेशवासी मधु अपनी स्मतियो का जरा पुनिता शायद आपको भी ऐसो काई घटना याद हा भाए जा आप वार म मुझ बताएँगे। रही मरी, जब जब मुझे वह तुच्छ घटना सात हो पाती थी मैं हंस पडता था। पर यह हेमो दूसरीतरह की थी-- दुष-युध उस तरह की जमी मैंन पौडजाट रा पर सुनी था। मैं यायालय म दिय गए एन भरणा और दतीला पर हसरत था---ौरता में सामन दिय गए अपने भापणाची अपना अपनी दलीलो पर श्यादा। उनग बम-म-बम मैंने बहुत झूट नटी बोला मा । मरे भाव बिना किसी उल-पट पे मर पाचरण ग साप्त व्या हो जात याप्रम की प्रक्रिया एर स्पोकरण है। म्याथ चौर उरना है दम्भ अपना मन परता है पौर सच्ची उदारता उद्घाटिन हा जाती है। निदान उम गोपनीय महानाम अपन मय सम्बधाम अधिर मैंन जितना समभा था उसन ज्यादा सवारी हा गया था मैंन द्रमकी पापणा कर दी थी कि मैं कौन है पोर बम जो मवत्ता है। देगा मजो भी लगता रहा हा अपने व्यक्तिगत सावन म में श्रष्ट रहा था तब भा मोर विपकर तब, जर मन उग प्रारबा व्यवहार पिया या जा मैंन माया अभी बताया है.याय भोर मपाई 4 विपय म अपन यवसाय य क्षत्रम बड़ी-बड़ा उद्यान जब भर रहा पा उममवती अधिक प्रष्ट । बम-ग-मम इतनाता या निगरापनि स्वय यामाारण परन दस मैं प्रपन सच्च स्वभाव पविषय म प्रपन वा मुलाया नहीं द गश्ता था। वाई भी व्यक्ति माने मानणाम पायनल हालायह मैंन यहीं पता है और पावागावपुमासद ही मालिकाना है? जास प्रारमन इम मावापरा रिपोरराम हमारे मिा नाना नान म मुझ निना कठिनाई हानी योजिस कठिनाई 7 के कारण ही में एक माथ दई सम्बघा म फंस जाता था तो मैंन अपनी कामल-हृदयना वा दापी नहीं ठहराया। जब मेरी एक प्रेमिका न हमार प्रेम-व्यापार के चरम शिखर तक पहुंचन की प्रतीक्षा म अधीर हार मुमबाडकर चले जाने की बात की, उस समय जिस भावना न मुझ प्ररित किया था वह यह नहीं थी। मैं ही था जिमने तुरन्त आगे कदम बताया, जो झुका, जिसकी वारपटुता जागी। रही बामल-हृद यता घोर अनुराग । इहें मैंने उसम जगा दिया और मैंन स्वय केवल उनके पहिग म्प को ही अनुभव क्यिा-केवर दस अस्वीकरण से कुछ उत्तजिन होकर और एक अनुगम-सम्बध को सम्भाव्य हानि मे घराकर । सच है कि मैं कभी कभी सोचता था कि मैं वास्तव मे व्यथित है पर विद्राहिणी के वारई चले जाने की देर थी कि बिना कोई चेप्टा क्येि, मैंन उमे भुला दिया-ठीक उसी तरह जसे उसके निश्चय बदलबर तौर पाने पर मैं यह भूल जाता था कि वह मेरे घर मे है। जी नहीं, वह प्रम या उतारता नही थी जा मेरी भावनामो को जगाती थी, जब इसका पतग मुझे हाताधा विकाई मुझे छोडकर जा रहा है, वह केवल प्रम पान की और जिो ने अपना सममता था उसे पाने की पापाभा थी। जम ही मुझ पम प्राप्त हा जाना या और मगिनी भुला दी जाती था, में पिर चमक उठना या, मैं चोटी पर पहुंच जाता था, मैं पमद परन पोग्य बन जाना था। और यह भी कहा जाए पि जसे ही मैं वह अनुराग पुन प्राप्त कर नेता था बम ही मुझे उमवे बोझ का अनुभव होने लगता था। अपनी पोझ के भणाम में अपने आपमे बहना था कि समस्या का माग हल ता यह है कि रिम व्यक्ति म मुझे दिलचस्पी है उसकी मौत हा जाए । उसली मत्पु एक पोर तो हमारे लिए हम दोना के सम्बय पर माहर लगा देती और दूसरी पोर उमवी निहित वाध्यता यो दूर परती। पर कोई भी व्यक्ति हर एव वा मृत्युको कामना तो कर नहीं माना और न ही भूमण्डल को जनगूय करन का हद तय मा
सकता है--सिप उम स्थातव्यको भागने के लिए जो अयथा कल्पना
तीन है। मरी मवेदनशीलता इसके विरद्ध घी और मानव-जाति के लिए
मेरी महृदयता भी
इन प्रम-व्यापाराम कभी-भी जो गहरा
मवेग मेर मन में उठता
था वह देवल तावा हाता था। जब राय-बुछ मजे म चल
रहा होता भी मुझ न बदल नाति मिल जाती वरन जान पाने
को स्वतनता भी-चिमी एक के साथ इतना उतार मैं भी नहीं
हाता था जितना कि तब जव मोघ दुसरी वे पलंग मे उठार माया
हाता मानो मैं एक के प्रति सद्य ऋणी होरर अय सभी स्त्रिया
वा भी ऋणी हो गया होऊँ । का भी हो, प्रवट सम भरे भाव
वितन ही उलझ हुए यया न रहे हा जिस पर भी मैं प्राप्ति करता
पा यह स्पष्ट था। मैं अपने सार प्रम-गम्बघा को अपनी पहुँच ये
भातर गमता या तारि गव चाहूँ तब उनका उपभाग पर स। मैं
स्वय स्वीकार कर घुया हूँ कि मैं मुमी तभी रह सकता था जबपि
पनी प राव प्राणी या जितनी मधिर माया म सम्भव हा उतने मरी
ही भोर उमुष हों सगवा के लिए बधनहीन पिसा भी पथर
मगिल मे पचित पौर विसी मावदा मरे गित परत पर रेप
म उग दिन तक के लिए यध्याय से अभिप्त जब तक कि मैं उस पर
पृपा-टिन दाएं। थाराम मेरे गुप म जीने के लिए अनिवाय
पाकिजा व्यक्ति मरे पापात्र पुने जाएं वे जिये ही न । उह जीवन
या उपरिष हो याादा पोर पवन मराारा पार।
पापपो यह राप बनाम मुम पोमगोप नहीं होता, पाप सा
मानिए जय मैं उरा माल पीया करताह Trfr में स्वयं गोई मूप
या गिा हर चीज की मांग मिना या जर मैं अपनी मेवा ये
निए इलामार सागा तानियोजित रिला पा जा मैं पाप कि उन्हें
रमिजरेटर म ग्यदायमाजिरगा मरी मरजीहातमी हाथ बढ़ा
पर वह निजात म मा में IITEगाता-िउग माय पायाव?
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जो मर पर या जाता है। शायद वह लज्जा का भाव है क्यो आप वताएँ मुझ मेरे मित्र लग्ना क्या चमतो है ' तो गायद लग्ना ही है या उन मूम्बनापूर्ण भावनाप्रो मे स बाइह स्तिका सम्ब व मान-मयादा से रहना ।जा भी हो मुझे लाता है कि जब मै अपनी म्मनि के अन्तरान मटिपो उस घटना की मुझे याद हा पाई है नब में इन भावना मुझ योगगनहीं-~और उस घटना का वर्णन करना अब मैं टात नहीं सकता। विनना ही क्यों न घर-उधर वहस्तार या कुछ-न-कुछ गडकर सुनाने मैचया करताएं। इनके लिए ना पागाई पाप मुझे श्रेय देगे ही। विए, यागिरम गद है । मेरमाय पर तव चतन कृपा करें। में कर अगीन तरह म यसमा गया हूँ। इतनी दर तर बात करने की वजह मे नहीं पर इस नयान महीकि अभी मुम कितना और बताना है। स्वर अपनी अमती सोन के बारे म बवान कनिए नो कुर-एक गन्द ही पयान हांगे । और बहन कहने म पायदाही का? प्रतिमा का अना वत म्प प्ररटहान के लिए प्राव या ह कि अलकृत मापा पलायन कर जाए। तालीजिए। ननम्बर पीर बाउस नाम के दानीन सार पहन, जिम गाम मुझ यह नगा या विमर पाये काई हेम रहा है, मैं पौं गया होता हया वा रिनारे अपन घर लौट रहा था। प्राची रानन एक घटा और ज्यालावीन चुका था। वडील्गे फुटार पट जी थी जिसन महका परदे छ- ला भी नितर वितरहा गर ये में सीघ अपनी राब प्रमिका वाचाहकर पा रहा था, वह नर तर पायद नींद महब चुकी होगी। मुझे उस समय वा चनना पच्दा ता रहा या, कुद निर्व कोम्पिनि में मरा गरीर अनुद्विग्न गिरती हुदैफुटार के जन रक्त प्रवाह माचित । पुन पर नदिमी के पोधन गुतगावह छाया रनिंग के मर भुको नली का एकसय सी हुई-गो लगो। पान ने दान पर मशाल रपड पगार युक्ती व प्राचार का अनुमान पर मका। उनके गर्ने बाला और वाटर वार बौच गरएनवापिटला हिम्म दीना था मागाहमा नोर ठग। उन मुन दुर उत्तजित दिया, पर एक क्षण दिग्वन के बाद मैं आगे बढ़ गया। पुनपारपरये में घाट वे किनारे विशारे मा मिशन की तरफ चलने लगा, नही मैं रहता था। मैं कोई पचास गज ही प्रागे गया था यह प्रावाज मुझ सुनायो पड़ी, जादूरी के बावजूद माधी रात के सन्नाट म वह जारको मालूम हुई-रिसी गरीर में पानी पर प्राधान की प्राग।मैं ठिटा गया पर धूमा नही। उमी क्षण मैंने एक पुरार गुनी गावईवार दाहरायो गर्दगिने प्रवाह की मार जाती हुई पिर प्रचार मूव हा गई। । गुप्पी उसके बाद फ्ली जब रात मला स्त घ हो गई मुझ गावि जसे मानहीन है । मैं चाहता था कि दौड पडू पर इच भर भी बढ़ नही सपा। मैं वांप रहा था मेरा विरास है कि ठप और घटना के पापान मे मैं अपा मापसे कह रहा था कि जल्ली परनी है। पर एक बलवती दुबलता अपने शरीर म पाती हुइ मालूम पडी । मुझे याद नहीं है कि मैंने उस समय क्या सोचा दर बहुत हा गई दूरी बहुत है या इसी तरह का पुष । निष्क्रिय सदा में ता भी कान लगाए सुन रहा था।फिर धीरे धीर वरमते पाम भाग बढ़ गया। मैन विनीयो बताया नहीं। परे, हम ना मा पहुंचे। यही मरा पर है मरा प्राश्रय । वल हो जान, अगर प्राप चाहते हैं नो मैं पापा मान के द्वीप, जाना पाहूँगा ताकि पाप वाडरजी देम गरें। ताम लाग यल ग्यारह बजे मेविमया सिटी में मिलें। पपा 'यह मौरत ' मुझे मालूम नहीं । गप मुझ नहीं मालूम । प्रगते राज पोर उमर बई राज बाद नर मैंने भग धार नहीं पर। . विणकृत गुशिया का गाँव है है।' यो प्रनारस्पना बाईकमा नहीं है । पर मर दाम्न में भापका इस दीए म प्रनोपान गाने नर्गनाया हूँ। रिमाना वीटोपियो साड़ी के जूत और मज गनाए म जिगर गामो बर मया, परनीपरोपि मे घिर टए, उत्तम तमार्ग रह हा यह ना प्रारका गई भी दिवा मकना यापर मैं न पाईने सों में हूंजो आपसे व चा दिवा मान है जो वाम्नव म महत्व रखता हैं। अब हम दौर पर पहुँचने दात है। उसी के किनारक्निा हमा चरना पडेगा ताकि इन अतिशय मनाहर मकानों से दूर पहुँच सकें। प्राइए, हम वठ जाए । वहिए, काराय है मापौ? क्यों क्या नहीं है यह एक मुटतम, निर्जीव दृश्य ? रघर ददि उरा, राख के उस टेर का निसचे साग वा काटीना कहते हैं दाट तरण सिटी वाघ है हमार परों के नीचे नीलाम यूमिन समुद्र नट औरहमा मामन है समुद्र दिसता पानी ही राम मिश्रित इव के समान दोन्द पडना है और उसके ऊपर विस्तृत माना जिमम पानी का फोरा रा प्रतिविम्बित हा रहा है सचमुच टीना, पसरा हुमा नग्व' हर चौर लेडी, पडी हुई,कहीं कोई दृश्यान्तर नहीं मन्नति निवाा है और सावनिता। क्या यह दिव-याला विलुप्ति नहीं,एर अनन पूय जाप्रत्यय हो उन हो। कदों काइ मनुष्य नहीं। सबने वही वात कि कहीं कोई मनुष्य नहा। पाप और मैं सारे द्वारा परित्यक्त इस सोर क एकागदाव याना दिल है दया ? आर टोर कहत है, मेरे मित्र बहहराता है स्नोर हाता है वायुर नीर शेडना है और मेघ का बद माना है। यह माता मापने कभी ध्यान दिया है कि हार जावों कपोगों ने नरा रहता। पपना ऊँचाई ये वारा प्राय वे अपने पर फहरात हैं माय उट रिन हैं और दमानिय अन्नराकानी रगरे पमों या घना र ममा दन है-जिहें हा "यर-घर उडाती रहती है। ये पान वहीं सर दर-पपन्न प्रीशा करत है। पप्पो पर का चार कराते हैं नोच दृष्टि डालत हैं मोर जरना चाहत है पर नीचे समुद्र पौर नहगें अतिरिका दहीं है, दुकानों मालमा म ढा नहैं पर पवियन वाम र मोगिसरग्हीं नहीं। ७ आपकी रामभ म नहीं पाया कि मेरा मत र क्या है? मैं म्वीसार करता हूँ कि मैं थक गया हूँ । मेरो दात का तार टूट जाया करता है, मेरे मित्राका मा विचारा की जिम स्पष्टता का आदर करना रुचिकर लगता था वह मैंो गवा दी है। मैं बह रहा 'मरे मित्र , पर यह वेवल सिद्धान्त और अभ्याम की बात है। अब मरे कोई मित्र नहीं अब मेवल माझीदार । कमी पूरी करने लिए माया वह गई है, ये अव समस्त मानव जाति तय विस्तृत हैं। और मानव-जाति म सबसे पहन हैं पाप । जा भी अपन पास हा वही सवप्रथम हा जाता है। से माम मुझ कि मेर वाई मित्र नहीं हैं ? बहुत आसान है। गुझ यह उस दिन पता चला जिस दिन मैंने उह ववकूफ बनान ये TV या कहूं कि सजान के लिए अपनी प्रात्महत्या करन का विचार किया था। पर गाविस ध एक पो पाश्चय हाता, पर दपिन्त तापाई भी अनु मवारला। मैंन तव जाना कि मरे बोई मित्र नहीं है। और अगर हान भा तामरी स्थिति एउवहतर नहाता । अगर मैं गात्महत्या करने के पाद उनरी प्रतिक्रिया न पाता तव पाई वात भा हाता । पर मरे प्यारे दास्त पप्वी अधकारमय है, तादत माग है और वा अपारी है । प्रात्मा यी पांसें' हो यदि प्रात्मा है और उसर प्रांग होती हैं पर हम जानन ता नहीं और न जान हा मरते हैं। नहाता गमम्या या माई न होता , कम-म-कम मा मी "नना तो कर हा पाता कि लोग उसमा बानो यो गम्भीरता म ग्रहण पर। तोग प्रापरे तर पापभी म्योपारही परत न प्रापरी सचाई वो न प्रापसीवनापी गम्भीरता का- ता नही जर तर शिपापा मत्युन हा जाण । तय माप जोदित प्रापा मामला मरिग्य है माया अधिकार है येवल उनमा मगह मिश्रिा वियाम पारा। इसलिए अगर जग भी इगमा मिपय हातादि प्रादमी गुद अपनी मौत ये नाटक का रम ले मरेगा तामह वात परन योग्य हाना शिवह उन गामने उन तम्या पाप्रमा गित कर जिन पर विश्वास कान पा व तयार नही हैं ---पोर इगप्रपार - ५० उ अचम्भे में डाल दापर प्रापन ता कर ली अपनी हया उसके वार इसम रम ही क्या रह गया कि वै पापी वान पर विश्वाम करते हैं या नहीं प्रापता मौजूद हांगे नहीं दा उना अचम्भा और मतोप (बहुल हा तो भी क्षणित) दन सकें, अपनी अयष्टि-क्रिया के सानी हा उ-जैमा हो पाना म्वप्न हर व्यक्ति देवता है। मदिग्ध नबन रहन का केवल एक उपाय है कि प्रादमी बना ही न रहे। क्या यही देहतर नहीं है? एक लडका ने अपने दाप ने कहा, 'पापका इनकाच चकाना पड़ेगा। बाप न उमे उधारत ने श्यादा मुस्तद चाहन वारे सगादा करन मे रागया। लडकी न पात्महत्या कर ला । लकिन वार का दिमी बीत का मूल्य नहीं चुकाना पडा। उमे छोटी मलियों शिकार का गौर यानीन इतवार बात जान के वाट वह फिर नदी-किनारे पहुँच गया-जा उसने कहा, 'सब-युद भुला देन के लिए। टीर हा कहा ज्मन, वह दून गया। मच वान ता यह है कि इसके विपरीत हाता तामा चय हाता। प्राप सोचन हैं कि पाप अपना वीवी कागदने के लिए मररर हैं,पर सच तो यह है कि प्राप उमे मुक्ति द रह हैं। पर टम बात कान दम पाना हो श्रेयस्कर है। मौत के बाद यदि साप मुन पाते ता सिवा दमके रि अापके कृय के क्या प्रेरक कारण निय जाते हैं और करा मुनत । जहाँ नर मय प्रन है मुम तो मनी हीन्नकी पावा मुनायी पड़ रही है-- 'उसन प्रारम- हया वरना करियर यह महन न कर पाया कि मनुष्य की कल्पना-यक्ति विननी दुबल नाती है। व होगा यही समन्द्र हैं कि पादमा विमा व हा कारणवश मामग्या करता है पर हिन्दी दाकारणों के वाहावरमा तो प्रामदया करना सम्भव है। रिन्नु नहा, यह उने कभी नहीं मूमना। ता फिर जान-बूसर करन मे ग्या घरा है-उस बात पर अपना वलि चलने मजा प्राप चाह्त हैं कि लोग पापने वारम मोचें। जब पाप मर ही एना व इमालाम उठाकर गाई बहदा या महा कारण प्रापर इत्व के लिए लें।गों का पाह मेर मित्र मर दोस्त, भुला दिए जान, हमे जाने और इस्तमाल किए जाने क पाच चुनाव परना पडता है । रहा इसकी बात कि साग उह ठीक समझ सब-सो कभी नहीं होता। पर हम लोग बेवार घर उधर न वहः । मुझ जावन प्यारा है यही मरी पराली कमजारी है। मुझ जीवन इतना स्यादा प्यारा है कि मैं इसकी कल्पना वरन म मममध हूँ पि वह क्या है जा जीवन नही है। पाप नहीं समझते पि इतनी लिप्मा म कुछ गवारपन है ? प्राभिजात्य यह पल्पना नहीं कर सकता कि उसका और उसने जावन का घर हुए एक अन्नराय नहीं है। अगर स्रत पड तो वह मर मिन्ना है, वह नाता नहीं टूट जाता है। पर मैं झुाता हूँ, क्यानि में अब भी अपने सप्रम मरता हूँ। मिसाल प लिए मैंने जा बुध ग्राप को बताया उसवे वाद पार या समभन हैं वि मो अन्तर म पिस भापका विसास हुना' अपने प्रति जुगुप्मा वा जा नहीं, जो बुरक्षाम मुझ था वह ज्यादा तर दूसरा के प्रति ही पा। मच है कि मैं अपनी रमजारियां जानता था मोर जावे लिए अपसोस भी गा था। ता भी मैं पपमाल भी जिद को माय उह मुलाता ही रहा । हम विपरीत दूगरो पर अभि योग लगान की प्रवृत्ति मेरे मन म निरन्तर नित्यागील रही। बिनबुल पपा प्रापना बुरा मगायट माप यह सोचते रागपि यह तागत यही है' पर सवाल तर मगत रहन का ताहै नहीं। मवार तो यच निवनामा मोर इमर भी ज्यादा ही दाम भा ग्याग-इसरा मिणिय सगे बचा जाए। मैं म बचन पोबान नहीं पहना, पाति विना निणय के दपर ता रा है। उसका मजा जा हमारीपना पापा पम्त पर दना है- उम कहन हैं दुर्भाग्य । नहीं उसके विपरीन यह ता निणय ग वषेचो रहने का मन है--उग स्थिति ग पर रन का जिगम निरपर निर्णय नो हाता रहता है पर एण्ड मापनी पापणा नहीं की जाती। परवा पामाना गया ही जा सकता। मानता हम पिणय ६.
" परन के लिए उनन ही तत्पर रहत है जितना कि व्यभिचार करन व लिए। देवल अन्नर तना है कि इसम अभाग्य या अपमान हान का काई डर नहीं है। अगर आपना काई मदे हा ना अगस्त के महीने म उन ग्रीष्मकालीन हाटलों मे, जहाँ हमार दानवार मह नागरिक अपनी ऊब दूर करने के लिए पहुंचते हैं मेजों पर व नागों का बातचीत जा पर मुन लीजिए। अगर फिर भी पाप विमा निपय पर पहुंचन में मकान करता हमारे भाज के नरपुगवों के लखन का पाठ कर लाजिए। नहीं ता अपन परिवार का हा अध्ययन कर लाजिए, दा-गद पाउप्राप अवाय मीप जागे । मेर प्यार दान, हम उटवाई भी बगना--- माह कितना होगा क्या न हा-अपन पर पमना दन का न दें। नहीं तामारी धज्जियां उतार रन दी जाऐगा। म लाचार हावर घही सावधानी बरतनी हागोर का काम करन वातावर तना पडती है। अगर क्टयर वे अन्दर जान के पहल हजामत बनाते वस्त दुर्भाग्य म वहीं उम्नर महरा क्ट जाए तो माचिए जरा पशुपा की वमा बन पाएगीमुक यह चाज उस दिन अकम्मान समझ म मा गइ जिस दिन मुझ यह नगन लगा कि शायद मैं नारीप २ काबिल नहीं हैं। नव स मैं मारने लगा। चूंधि मरे थाहान्मा खन बह रहा था, मरनिय काद छुटकारा नहीं या, द मुझ मा जान । अपने समरातीना म मर सम्बप दबनम ताज्यो-कन्याध पर लय पही जरा-ना टूट गई थी। मर मित्रा मवा अनर नहीं हुआ था। कभी-यदा अब भीमगसापत ममिलन वानामन्विनि प्रारमुगमा कामराहना कर लेन २ । पर मुझ येवन प्रान अन्नर म भरी बाता पोर सम्न-व्यम्नता या हो मान हाता था मुझे लगता था कि मैं भेद्य हा गया हूँ माना मुभ सवनाधारण द्वारा अभियाग लगाए जान के लिए मौप दिया गया हो। मराटि म मर गाया वह प्रारमे भरी जनता नहीं रह य मित्रा में पाती था। वह वत्त जिमवा वेद पा, सह-मटहा गया या मोर व सब माराव पस्ति बनारर यापागन पर बट गए थे। म ही यह वान मरी पाम माई कि मुझम ऐसा बुध है जिस पर निणय दिया जा सरना है तभी मर भी मैं समझ गया कि असल म निणय दन वा प्रिया उनमा मनियाय धम है । व थे तो रहा पहा या तरह ही, पर अब यस रह थ ! या यो यहूँ कि मैं उनम म जितना म मिलता था मुझ लगता था कि हर एक हँसी छिपाए मुक दम रहा है। उस समय मुझ यह भी लगा था कि लोग मुझे लगी मारन की कोशिश है । दो-तीन बार सावजनिर भवना म प्रवेश परते समय मैं सचमुच गिरत गिरत बचा । एक बार तो मैं चारा शाने चित गिरा भी। मरे मटर जो हाई या अनुयायी पासीमी था उग अपने यो मभाल न म दर नही लगी न उन दुघटनामा के लिए एकमात्र युक्ति-सगत दैवा शक्ति प्रर्यात गोग का उत्तरदायी ठहरान म । ता भी मर मन मशवा बनी ही रही। एक बार जब मरा ध्यान प्रापित हा ही गया तब मुझ यह पता गात दर नगी विमरे दुश्मन भी हैं पहले ता मेरे व्यवसाय मोर फिर मेरे सामाजिव जीयन म भी। उनम मे बुर पर मैंन कृपा की थी पुछ पर परनी चाहिए थी। वह सरना स्वाभावित ही था और यह गव जानकर मुझे काई बढ़त दृरा भी नहीं हुप्रा । पर दूसरी तरफ यह ग्वीकार करना स्याग यठिन और पप्टदाया था कि जिन लोगोको में नाममात्र के लिए जानना था या जानता ही था, उनम भी मेरे दुमन यं। महमा यही समझना रहा था उम मरलताक साथ जिममा उहरण मैं पापा ५ चुगाई हिजो मुझ मानत नही थे वे मुझ जानने पर पगद पिप बिना रह नही मवन थ। पर जग भी न । मुझ विशेष विगधना उही मागा ग मिजाजा बिना मर स्वयं जान हुए र म मुभ जान था निस्मह उस मा थी कि मंग जीवन भरा-पूरा है और पूरा तरह मुगम प्रति समपिन है पोर यह मपग पगम्य पा । माताप भाय जरा गाग तरीष मप्र पिप जाता गधा मा पाप ग तिलमिना उठगा।
तसरे प्रसादा मरा नौवन पावष्य मग हा या सलिए समय के प्रमाद वारा मैं वग्ना की समीप मान का चप्टाग्रा का प्रमान्यवर दिया करता था। और बाद म अपनी प्रस्वीनिया भा उमी कारण र नाया करता था। पर ममीप पान वाद वगएँ एम नागा दाग काइ हाती योनिनके जीवन मर-यूर नहीं य और जो "मो कारण मग अस्वीकृति का याद रदत थे। इसीलिए एसा हुअा विरही जाहरण ल लें, प्रोन अन्त में मरे दिए बटन महंगा पही। बा ममय मैं उर अपित करता था वह पुष्पा का नहीं है पाला था और पुरुप हर वारदमे क्षमा नहीं करते थे। "मम क्या कार्य राम्ना है। आपको मारता और मुत्र नभा क्षम्य हाँगे जब प्राप उरता मे उनम हिम्मा वान के लिए नयार हा । पर मुवी हाने के लिए मनिवाय* कि आदमी दूसरा व माय ज्यादा पानरह। फरत काई गम्ना है ही नहीं। मुखी और निर्णीत अथवा विमाचित मोर दयनीय और मर प्रति ता अन्याय और भी अधिक मैं अतीत वामपनामों क लिए अपगधी रगया गया था । वहुन दिन तर मैं म भ्रम म रहा कि मामान्य महमति मुभ प्राप्त जव दि चाग पार 7 फल, धन्य और नीने बाणा की दौडार मर पर हानी थी और मैं उनकी उपसा करता हुया मुम्बराता जा रहा था। रिम दिन मुझे मावधान किया गया, मेर नान-वभुमले, मागचाट एक साथ Tी और एक्दम अपनी मारी गस्ति मैन पाना मारा प्यार नब मरपरहमन 11 पोर यह वह चार है जावाईमा यति(उहें छापरमा वाम्नर में जीवन नहा है -दूमर गगम परें तागनी)सन्न नहीं करमरता। परमात्र सम्भव प्रदान विद्वेष काही । सागमा दन के लिए उतावले मानिा रहता है शिवहीं उम्पयी पमना न मुनना पर जाए। क्या माचन हैं पाप प्रादमी के मन मग विचार विजन स्वामाविका में उतार माना समग महत प्रकृति म हा उठा हा, .7 वह है उसके अपने निर्दोप हान वा भाव । इस दृष्टि से हम मव चूरून वाल के उस प्रामोगी की तरह हैं जा इस बात की जिद पर रहा था frक्लक के पास अपनी शिकायत जहर लिपागा। क्ला म्वय भो पदी था। वह इस मामीमी वे प्रागमन का रिपाड भर रहा था। शिकायत तक और उसके माथी हमे- बार है माई यहाँ निवा यतकाई नहीं सिखाया परता। पर श्रीमान वह फ्रांसीसी गाना, मेरी बात ही पोर है। मैं निर्गेप हैं। हममें रा हर एन को 'यात ही और हाती है। हम सब किमी न विसी क विरुद्ध अपील करना चाहते हैं। हमम ग हर एक किसी भी मूल्य पर निर्भप बना रहना चाहता है चाहे हम सारी मानव-जाति और दव-लोक पर भी दोपारोपण क्या न करना पड जाए। पाप किसी व्यक्ति को उमकी बुद्धिमत्ता या उगरता पी मराहना में प्रमान न कर पागे । पर पार पाप उसका स्वभावजन्य उदारता की प्रगमा परें तो उमरी पाठ सिन उठेंगी। उम विपरीन अगर आप किमी अपराधी मे कहें कि उनके अपराध का कारण उमर ग्वभाव अथवा चरित्र की प्रवृत्ति नहीं बल्कि परिस्थितियां हैं तो वह मापका बहुत ही प्राभार मानेगा। अपने वकील के मापण म यही यह स्यन हागा जहाँ वह ग्राम बहाने यो माचगा। सिराज मम ईमानदार या बुद्धिमान हाने म भेट कोई नहीं है, टीर बने ही परिस्थितियों में विवाहावर या सभानम अपगधीयान म व्यक्ति के दायित्व मपाई विशेष प्रतर नहीं है । पर उन य'मागोमा ता चाहि छूट, या अनुारदायित्व, और य वार्मी म म्वार अथवा परिस्थितियो की विवशता वी पाडल नो पाह र परम्पर विरोधी हा या न हा । जरुरी ताया है कि वपि रह और उन मद्गुणा पर जमनान हान में नात मदेह न पिया जाए और उनी पाप-वन वी अनि दुर्भाग्यजय हान वारण अस्थायी स अधिा पगी 7 मानी जाए । उमा मैंन पग प्रश्न तो निणय गे या रोका। चूकि पोरना मुशि है और प्रपा म्यभाय कीर हो गाय स्तुति कराना ६४ पौर उम अन्नन्य या रखना कष्ट-माध्य है इसलिए ये मव धनवान चनन की चप्टा करते हैं। क्या आपने कभी अपन अापने यह पूध है ? गक्ति प्राप्न वग्न के लिए, और नही ता क्या? पर खास नौरन इसलिए कि ममद्धि तात्कालिक निणय पाने के विरुद्ध दाल का काम करती है अरमान की मीड से हटाकर मारका गानदार माटर बार के भीतर पहुचा दता है विमानमरक्षित तान 'पुनमन' वसा और फस्ट-क्लाम विनों मगर आपका औरास पथक कर दती है। ममद्धि मेरे दाम्न, एकदम छुटयाग ता नहीं है पर दरम्यगन प्रश्न है और इसलिए निचय ही माझ ह। अपन मित्रा पर उस समय भी दिग्वाम न कागि नव वापस अपन प्रनि मच्चे व्यवहार का प्राह करें। व कवल इमली प्रागा करत हैं कि उनकी अपन बारे मजा अच्छी राय है उगमापनी सन्ची मित्रता की प्रतिना द्वारा एक प्रार आवासन पाकर प्रान्गाह्न मिलेगा। मित्रता का प्राधार मच्चा व्यवहार कम हा मक्ताई । विहीं भी दामा सचा का आग्रह एक एना भावानेव है जान जग भी छूट देता है और न जिसका बाद अबराप करता है । वह एक अवाण है जा कभी-कभी हो पावनामद हाता है या या कहें कि एक म्वाथ है। इसलिा अगर भार उम स्थिति महा ना माचन परिा दादा करिा मच दालने का, और जितन दरिया तरी म हा मरे नट वालत जाइए। आप उनी छिपा हमवाना का नप्त करगे प्रो प्रपन प्रम का दूना प्रमाण - सगे। यह बात "ननी सच है कि हम उन नागा म अपन मन का वात कम ही कहत है ना हमम बहतर है बल्कि हम उनकी मगन म दूर-दूर मान हैं । अपित हम उनम अपन मन का बात बत है जो हमारी हो तरह है और ना हमारा दन्तामा के माभागार है ! अन हम अपनी उन्नति करना या राना नगेचाहत दयादिम चेप्यमी यह निहिन हागा दिगर न करता प्रमफरता पर हम निणयापपी बनना अरे वाह पडेगा । हम तो केवल चाहत हैं कि जा राह हमन चुना है उसा पर हम सहानुभूति प्राप्त हाती रहे और हमारा उत्साह्वधन किया जाता रहे। मक्षप म हम चाहते हैं कि एक ही साथ हम दापी भी रहें और हमें अपने का पवित्र बनान वो चप्टा भी न करनी पड़े। न तो हम पापा रानको ही हैं न वापी पुण्यवान । न ता हमम दुमम वरन को अपक्षित शक्ति है और न मत्साय करने की। माप दाते में परिचित हैं सचमुच 1 मैंने कभी न साचा था। तब तो आपको मालूम हागा वि दाते ने ईश्वर और धतान की लडाई म निप्पक्ष त्वदूतो का अस्तित्व स्वीकार किया है और उहे वह निम्बा म स्थापित करता है जो उसके नरक के दालान की तरह है। हम उसी दालान म हैं, मरे प्यार दोस्त । धीरज पाप गायद ठीक कहत हैं। क्यामत का इनजार करने में निए धारज ही अपेक्षित है । पर बात ता यह है कि हम जल्दी म हैं- "तनी जल्दी में वि मुझ अपन पापना अनुनापी निर्णायन बनाना ही पना पर पले मुभ अपनी नयी खोजो क साथ क्गिी प्रकार काम चलाना पढा पोर अपन रामपालीना की सीसाथ अपना तालमल बिठाना पडा। उस शाम के बाद जब मुझ पुवाग गया था-क्यापि वास्तव में मुझे पुकारा गया था-मुझ उत्तर देना था, या कमी-यम उत्तर खाजना ना था ही। यह प्रामान नहीं था और कुछ समय तब मैं सडखाता रहा। पल तो उस अनवरत गो और हसन वाला व द्वारा मुभ यह निशा मिसनी यो दि मैं अपने अनरम पर यम जिगम पन्तत यह गम जाऊ कि मैं सरनन्यक्ति व नहीं हूँ। मुमगहा नही, वह मत्य इतना सारभूत नहीं है जितना दीपता है। जिह हम मारभूत म यबहन हैं ये पोरवाई नहीं गिफ वे ही हैं जिनका पता हम पौरो के बाद लगता है। जो भी हा अपने यार म सम्या प्रदपण करन ये यार मैन मनुष्य मौलिक विविधता का पता लगाया। नव अपनी म्मतियो धोमोग्न परिणामस्वरूप में मममा जिविनपणीरतान मुझ चमबन म महा यतानी नग्नता ने विजय पाा ग पोर सद्गुणो ने मत्याचार करन में।
में गानिपूण माधना मे युद्ध करता था और अन्त म निलिप्तता की विधिया म जा पाहता या प्राप्त कर लेता था। उदाहरण के लिए अपन जमदिन के उपक्षित हान की मैन भी शिकायत नहीं की दम विषय पर मरी बुद्धिमानी स नागा काया'चय हानाथा-कुछ पार मिश्रित भाव के माय। पर मेरी निलिप्तता के कारणा में ता और भा अधिव बुद्धिमानी थी, मगे तीव्र उत्तष्टा थी कि लाग मुम भूल जाएं ताकि मुझे शिकायत का अवसर मिले । उमविश्यात तिथि के (निमे मैं चयूबी जानना या) कई दिन परत मे मैं चौकन्ना रहता था, व्यता म देवता था कि कोई एमी वात नहा जिमम दन लागा की, जिनका भूत मामर में बठा या, स्मति नाग उट। मन क्या एक बार यह तर नहीं साचा वि अपन मित्र के कारको तारीय गान कर एक बार मरा अनापन पूरी तरह प्रमाणित हा जाना ता में गक्तिशाली प्राम याणा के प्रति यात्म-समपण वर दना । म प्रकार मरे ममन मदगृणा का पभाग दलना भव्य न या। यर मच है कि एक और तरह मे मरा कमियाँ मर निरा नाभनायक मिद्ध हुद। अपन जीवन व दूपिन प्रा का छिपान की जा बाध्यता मैं मनुभव करता था उसन मेरी प्राकृति पर एक निर्व की मुद्रा ला दी यो, जिम लोग मदाचाग्निाका मुद्रामममन की भूल कर वठले थ। मरी सुदामीनता मरे प्रति प्रम जगाना थी मरा म्वाथपरता की चरम परि पनि मरो उतारताएँ थी। यहाँ में स्कूगा नहा ता अनिय साम्य पर तर दोगडबडा दगा। पर बात ना यह है कि बाहर म मैं बहा बदार गमता या फिर भी कभी एक प्याला गराव या पिमा औरत काम अण को मैं अम्वीकार नहीं कर सका। मैं क्रियाशील और उथमगीर सममा जाता था और मरा मानाया गयनागार। मैं अपनी सचाई का बिगपनताकरता था, पर मैं नहीं ममता दिएमा का भी व्यक्ति है जिसमे मैंन प्रम दिया हा पौर जित अन्न म पायान दिया हा। पर मम मन्द्र नहीं कि मर विश्वासघात मेरी सचाइ म वापर नहायने। मकर्मण्यता की प्रमिय प्राधियाम में वापो वाम निपटा लिया करता था, और मैंने पहोगा की महायता करना कभी नहीं छोडा, मुझे उसमे गुम्न जा मिलता था, इगी वारण। पर न तथ्यो को मैं स्तिनी ही वार अपने स क्या न दुहराता रहा हाऊँ, मुभ उनमे देवर सतही मान्त्वना भर मिलती थी। विही विही टिना में अपने विरुद्ध अभि याग भनी भाति तयार करके इरा परिणाम पर पहुंचना था कि मरा प्रधान दाप रहा है तिरम्बार करना। वे ही लाग जिनसी मैं सबसे श्याग सहायता यता सरस ज्या निरस्कृत भी थे। माना मैं गिप्टनापूवय सवेगसिपन दृढता व साय, प्रतिदिन माघावे मुंह पर थूरता रहा हो। मुझ मापाप बताइए क्या इसके लिए कोई ममुचित कारण हो मरना है । है ता एव पर वह इतना वारियात है कि उम पेश करने की कल्पना भा नहीं कर समतामर जा भी हो लीजिए बताता हूँ- मैं यभी इस बात पर विकास नहीं कर सका कि मानव-व्यापार मोई गम्भीर विषय है। यह मैं बिलान नहीं जानता था कि गम्भीरता यदि *ता विगम जानता वन इतना ही था वि अपन धारा भार जो मैं देखना या उगम तो नहीं ही पो-यह गुभ मिना-सा लगता था, मनारजर या उयान बाला । सचमुच ऐमे यात गे प्रयास हैं, रहन से विन्यास है जि" मैं कभी नहीं गमझ पाया हूँ। मैं उन विचित्र जीवों का अचम्भे मे पोर मरहमोगता था जापानि जान दते थे या रिमी पर या प्रतिष्ठा मा जान मे पार नगर मे डूब जात ध, या अपने परिवार मी मानता व हतु वह ही गार राव के माथ मारम बलिदान परत थ । मैं उग मित्र गा पागधग्री तरह समझ पाता पा ग्मिने एक बार मिगरेट नपानमा निचय किया पौरमात्र दृमियप दे मारण मफन नामा। एक दिन गुरह उगा पावार गोला पग पिहरो उद्गन-चम या विस्तार हो गया है, उसी पमवारी प्रभावा १ यार मारा-मममा पौर पिर भापरता प्रा तम्बार भी दान की नरप वा - पह सच है कि कभी-कभी में जीवन के प्रति गम्भीर बनन का दहाना क्यिा करता था, पर गीतही मुन गाम्नीय को निरयस्ता का ध्यान हा आता या और मैं केवल ययाय अपना पार्ट प्रदाता रहता था। मैं पाट अदा करता था गाय-बुगर होन का, बुद्धिमान होन का सदाचारी हान का, अन्टा नागरिक हाने का, ममाहत हान का, मागील होन का, दायित्व-परायण हान का, मनीपी हान का-सप में ठून दन की ताकाई प्रावग्यकता नहीं है यह ता पापी ममन में पा हो गया होगा कि मैं अपन उन हारडवानिया की तरद या बापहा होते हुए भी नहीं है । अपन अधिकतम विस्तार के सा में मैं रुदया अनुपस्थित रहता था। मैं कभी भी बहुत गम्भीर या दमाही नहा रहा हूँ, देवर सेल म भागलेत ममय का छाडरर, और आम समय का छोडकर जब मैं पोज में था और अपने ही मनारजन के लिए किय गए नाटकों म भाग लेना था। दोना म ही में नियम थे जो गम्भीर नहीं थे, पर जिनके प्रति गम्भीर रहने में हम रस रेन या अभी भी रवि वार क खेला के वक्त उचाखच भर दृए स्टडियम म और नाटयाला में-जिसके प्रति मरा अप्रतिम अनुराग है-ममार में य दोहा स्यान एम हैं जहाँ में निर्दोप अनुभव करता। पर कौन इस प्रकारक्दप्टिकापवाचित माना, प्रेम,मरण और मरिचनता-उम विषयों के ममक्ष पर इस बार में किया ही क्या जा सम्हाहैमैं सादेमप्रम कीमत्पना पयासा मे प्रयदा नाम में ही कर मम्ता या। कनी-कभी मुहलाता या वि मृत्युशय्या पर पर नाग अपन पाट का प्रयासरह हैं। मेर सारे मुवक्किा जो कुच योरत ये दह मुझे लाता या दमा नमून ने वान रद हैं। अत लागों कवाच रहत हुए, पिना उनको मंच की वस्तुओं में रम लिय में जा दा करताया उन परमरी ग्राम्या नहाहा पाती यो । मैं इतना मालमी मा पा और कालीन भी पिरन व्यवसाय मे,परिवार म प्रयवा नारा रिर जावन म मुन जा भी भाभितथा वह पूरा कर दता या परह ६ बार इतनी उदासीता के साथ कि वात विगाड देता था । मेरा समस्त जीवन दाहरे सिद्धाता के अधीर रहा और मरी गम्भीरतम त्रियाएँ बहुधा व होती थी तिनम मरा यूनतम लगाव रहता था। मेरा सारी भूलो व उपर क्या यही वह बात नहीं थी जिसके लिए मैं अपन को क्षमा नहा कर राना, जिसने मुभा। उस निणय के विरुद्ध तीव्र विद्रोह की प्ररणा दी जिरा निणय को मैं अपने अनम् म और परिवंश मे मूत्त होता हुआ अनुभव कर रहा था, और जिसने मुझ पलायन करने के लिए वाघ्य दिया। कुछ दिन तक तो दखने मे मेरा जावन बसा ही चलता रहा जमे इसम कोई परिवतन न माया हो। मैं जमे रेल की पटरी पर भागे दौडता ही चला जा रहा था। लोगा की प्रससाना में वद्धि हाता गई-माना विसी उद्देश्य से । और वही म विपत्ति वा प्रारम्भ हुआ। आपको वह उक्ति याद है.---'दुर्भाग्य होगा तुम्हारा जब सब तुम्हारी प्रासा करने पाह, जिगन य श यह ५ उसने कितनी बुद्धिमानी वी यात वही थी । दुभाग्य मेरा । परिणामन इजन मनमानी परा लगा और उसम अजीब अजीव सराविया पदा हान लगी। उसी समय मेरे दनदिन जीवन म मत्यु के विचार वा विम्फार हुा । मैं अपन जीवन गा मत्यु वे समय स पृथर परने वाली अवधि का अनुमान करने लगा उन लागा वे उदाहरण देने लगा जो मरे समय म थे और जिनकी मृत्यु हो चुकी थी। और मुझे इस विचार से पत्रणा होने लगी यी विकही ऐसा न हो कि मुझ अपना काम पूरा करने का समय न मिले । कौनसा याम ? मैं पिलमुल नहीं जाता था। साप बात तो यह पी यि जा मैं कर रहा था यही क्या करते रहने योग्य पा? पर एपम यही बात नहीं थी। वास्तव म तोय हास्यास्पद मासा मेरा पोग्दा पर रही घा-अपने मारे भट स्वीकार पिय पिना पोई कम मर सरना है? ईश्वर के मामन या उग मिमी प्रतिनिधि के सामने नहीं, इम रायर तोमैं ऊपर या जमा मिसाप मासानी ग समझ सरते उगें?
हैं। नहीं, बात मनुष्य के सामने स्वीकार करने की यी किसी मित्र के सामने, किसी प्रेयसी के मन । नहीं ता अगर जीवन में एक भी मूठ दिपा रह गया ता मृत्यु उन मुदरबन्द गर देगी। काई भी, कभी फिर न जान सकेगा वि उम तथ्य के वार म सच क्या है क्याकिजा एक व्यक्ति जानता था, वह वही मत व्यक्ति था जो अपने रहस्य वोलिये सो गया था। मत्व को स पूर्ण हया के विचार-मात्र म मरा सिर चकर खाने लगा था पर आन उसुरे बजाय यह विचार मुझे एक मूरम मुव ही दगा। मैं ही एक अकेला व्यक्ति हूं जो वह वात जानता हूँ निमे वाली सब टूट रह हैं और मरे घर म एक एनी ची दिपी है जिन लिए तीन दया की पुलिस वृया भागती फिर रही है यह विचा मुझ परम प्रानन्द दता है। पर इसम हम ना न पड़े। उस समय मुझे यह नुम्बा नहीं मिला था और में परमान था। वा, मैन अपन वा ममाला। पीरी-दर-पारी के इतिहास म एक व्यक्ति के नट का क्या मन' और यह भी कितनी धष्टता योनि सत्य के पूण प्रकाश में एव छागे माटी बदमानी कामीटकर लान की पच्दा हा, जा सरिया के साार मे मी तरह मा गई थी जा समुद्र में बालू का एक कण | मैन अपन प्रापका यह कर भी नमभाया कि गरार की मृयु---ना मौन मैने दवा थी उनक प्राधार पर पहूँ तो- प्रपन म ही पर्याप्त दण्ड है प्री उमम मम्यक् परिमाजन हो जाता है। मुक्ति प्राप्त हाता है (अघात हमला के लिए अन्नधान हान का अघि कार) अय-यातना स्वद से। फिर भी प्रमलाप वरता गया मयु निप्यापूवर मरा गया वे नाप नी रही सुपर मैं ग्रामालता था ता उमरे माय । प्रामावी गडावनी मेरतिए अधिकाधिक असह्य होती गइ। मुझे लगता या कि उसके माय मेरा प्रमय दतने अना धारण प म दिगार होता जा रहा है कि मैं पनी अपना माल न पा। दिन पाया यमर लिए सहन करना अनुम्भव हो गया । मरी पहली प्रनिनिया अत्यन्त उग्र हुई। क्योरि में असत्यवादी या इसलिए मैं इस बात को प्रकट कर दूगा और अपनी द्विविधता उन सब मूसों के सामने ल पदकूगा इसके पहले कि वे खुद उमरा पता लगा सके। जब मुझे सत्य ये लिए ललकारा गया है तो मैं चुनौती स्वीकार करेगा। इसके पहले वि नाग मुभ पर हसना शुरू करें मैंने चारो तरफ स उटते हुए उपहाम ये बीच अपने को भोर दने की सोची। वास्तव म तव भी प्रान निणय से बचन का ही यना रहा। मैं चाहता था पि हसन वाले मरी तरफ हो जाएं या कम-से-कम में उनकी तरप जा मिनूं। मैंन सोरा व यही उदाहरण ले लें, कि सटक पर चलते अपायो धकका दता च पोर इस विचार से जो गुप्त, अप्रत्याशित उल्लास मरे मन में जगा उमरा मैंने जागा कि मरे मन वा एक या उनस कितनी ज्यादा पूणा करता रहा था। मैंी पगुमा की पहिवतार पुसिया 'पह्येि पनर वरन की योजनाएँ बनाइ जिम मवान पर मजदूर काम कर रहे हो उमर नाच जारर गद प्रालिटेरियन 'चित्ताने बी यात सो ग्राउण्ड म गिगुमायो चपतियान या विवार दिया। मैंने इन सरये सपने दम पर किया कुछ भी नहीं घोर अगर इस तरह की कोई चीज को भी हातो अब तक उसे भूल गया हूँ। जो भी हा याय' सन माग से नाप कामजीव तूफान मरे मन में उठ पाता था। यायालय में प्रपा भाषण देते समय मावश्यतावा मैं उमगा उपयोग करता रहा, पर दमारा बदला में निकाल लता था पुन माम मानवतावादी भावना की निन्दा करो। मैंन पापणा की कि मैं एक विमप्ति पाऊँगा, जिसम गापिता द्वारा मन पर पिये गा प्रग्याचारा का योगर गए दूंगा । एक दिन जब मैं प गडर के विनार व स्तराम वटा मधली गा रहा था पोर एप भिगमग ने मुझ दिर परना शुरू पिया ना मी रम्तर मातिा का पुकारगर वन उग भगाद पोर याय पे उग पापयाहाकारमा जाराम समयन रिया कि माई तुम मागा क्या पगार पर रहा। उसन पहा, 'पर जग, इन नद्र महिनामा और मज्जनों की जगह अपने को नो रम के देखो। और अन्न म मैं उन नारा न, ना सुनने को तैयार हो जात, कहता था कि मुझेग्मी बात का अफ्सोम है कि अब यह सम्भव नहीं रहा कि उस ममी मींदार तरह आचरण किया जाए निमसा मैं बहुत प्रादर करता था। वह अपने उन रिसाना को भी कोने लगवाता या ना भून वर उम मलाम करत थे और उन्हें भी जो नहीं करते थे, ताकि वह उस दुम्माम को दन्ति र मरे जिसे वह दानो दशामा में समान रूप मे घप्ट सममनाया। दिन मुझ अनिरक के अधिक गम्भीर अवसर भी याद पाते हैं। मैंन एक स्तुति का काव्य 'पुलिम के प्रति' और एक 'गिलोटीन वन्दना लिखना गुरु क्यिा ।इनस नी ज्यादा-मैं अपने को बाध्य करता या कि नियमित रूप मे उन विशिष्ट क्फ़े म जाऊँ जहाँ हमारे व्यावसायिक मानवतावादी स्वतत्र विचार नास्तिर इक्ट्ठे हात थे। मेरे विात सदाचरण के कारण मरा स्वागत तोपून निश्चित रहता था।वहा विन। किती प्रत्यय प्रयास के मैं कोई निपिद्ध वात हवा में उबाल देना था, जसे ईश्वर को धपवार है या केवल इतना हा विहे भगवान् । 'प्राप ना जानत हा हैं कि हमार व नास्तिर कितन सकोची वाला की तरह हात हैं। मयाा का उन्लघन वरन वाले टन के बाद कुछ म्नम्भित भावान जात 4 भौचकोसे व एक-दूमर की नरफ दान थे और फिर बालात फूट पहना था। कुछ नो का छोड भाग निक ने थ, बुच किमी बान पर कान दिय बिना वरदाने हा जाने थे और मव-के-नय पार यातना मे टमी तरह ऐंठने-तपने सात जसे पुनीत जन मे गतान । मापको यह सर बहुत वसाना लाना होगा। पर गायट इन घाट-माटे मताओं दे पादेकोई ज्यादा गम्भीर वारा रहा हो। सन विभाट दना चाहता था, और सवम पारा यह चाहता था कि अपनी नवनामा यो नष्ट कर दूं निमबे विचार से ही मुम गार का गुस्सा या जाता था। लोग मोटी तरह बढे, 'पाप जो व्यक्ति- और मैं जल उठना । मुभ उनका सम्मान नही चाहिए या योरि वह सावजनान नहीं था और मावान होता भी क्स जब मैं ही उसम मामीदार नहीं बन सकता था?सीलिए वहतर था कि मवरे निणय और सम्मान को उपहार के प्रावरण मे ढक दू। जो भावना मुझे घोट रही थी, उसे किसी भी मू य पर मुक्त वसा आवश्यक था। सबको मासा सामन प्राट करन के लिए दि यह पाहे का बना है, मैं उम मुन्दर माम के पुतले को तोड डालना चाहता था जिसके रुप में मैं हर जगह दीखता था। मिसार के लिए मुझे याद है कि एप घार पौमिपिय धोना पे लिए मुझे एक अनौपचारिस व्याख्यान दा पड़ा। बार मासिएशन के अध्यभ न मरा परिचय जिस अतिशय स्तुत्यात्मर ग ग दिया उससे चिटपर मैं ज्यादा देर प्रपन को राप नहीं सका। भाषण गुरुतो मैंने उसी भागातिरस और उत्साह 4 साय किया जिसकी मुभम पाया पो गई थी और जिसका पायाहा मरे लिए कठिन नहीं था पर महगा मैंने प्रतिरला पीपणातीवमरापि-सम्बया वीराय देना शुरु कर दिया। वह सचि-सम्बध नही मैंने कहा जो माधुनिक यातनाय ना पूर्णतया विरमित घरगिए हैं और ना पोर पोर गाह पार पाप ही तराजू मनीरते है ताकि दूसरे को पहल के अपराधोये बोनस दवा दें। इसके विपरीत में चोर से परामथन लिए ईमान दार न अपराध प्राट चरना चाहेगा अान् इस प्रमग म वालने । इस बात को भावही सप्टना में राममाया मारलीनिए कि मामिगी बचार दयगीय नागरिम गा हाना स्यावार रिया है । इप्या कारण हत्यारा बन गया है। जूरी ये माय सम्यगण गाचिए उग (मैं पहूँगा) गरी नी द्वप मावनाद्वागणी स्वाभाविक जनता पीपरायोजान पर प्राप पाना किसाक्षम्य भाराध है। उसे विपरीत यया यह गुग्तर अप राप नहीं है कि सभी स्वय राजन बने यगर या विनावभी धागा गाए आदमा दरीत वनार ज्ग मैं खडाहूँ दहा मडा हो ? मैं स्वतत्र हूँ प्रापरे कठोर दागस मुरपिन, पर मैं कौन ? गद मंलु चौवें की तरह,काम-वामनामवारे की तरह, भाग्नि म काकी तरह और पालस्य का बादशाह । मैन विमी कोहया नहीं की। सच है अभी तर ता नहा। पर क्या मैंन भने पास का मरन नहा दिया? शायद । और शायद मैं फिर वहीं करन का नयार हा । जब कि यह व्यक्ति- देखिए जरा इम-यह व्यक्ति पिर एमा नहीं पा । नाकुट वह वर वटा है उनमें वर म्दव ही अभी तक अभिभूत है।' इस भाषण मरे युवा महयोगी कुद पारा गए । कुनमा म उहाने तर रिया कि इस पर हँस दिया जाए। और वे पूरी तरह प्रान्तम्त हा गए जब मैं माप को समाप्ति पर पहुँचा औ मैंन व्यग्निवका और उसने तयापित अधिकाराका पावान दिया। रम दिन अन्त म इन्डा नी हार और पान का जीत हु। इन मजेदार सारवाहियों का बार-बार करने में अपन वारेम लागा का राय का देवल उतन्त्र दन महा माल हमा, उसे निया करन म नही और मार-पापा नित्या करन न तो विकुल ही नहीं। अपन यातामा म मुम अवाम के जा नाद अधिकतर मिन-उना पुट मौन-मा मनोच बुदबुद बना हा जमा प्राप दिना रहे हैं-नहा, मी पाप नाइ न दें- मुभ रा भी गान्न नहीं करत ये। वात म है कि अपन का निग्पगन मि परल के लिए प्रान कर दापा राम करना बाजी नहीं है वरना मैं तारिनुलहा मारा माता बन पाता । अपन आर ए गाम तरीरे मापागा वरना होता है उम विपि को शिद वग्न म मुनवाजा समय ल। जब कि मैं दिलान दीन-हीन प्रपन्या म पहुँच गया ना कर मुक कहीं सरा पता ना। नर तर हमी की पुगरें मरा पार वट पाया करती रही और मेर यावर विचमा प्रयत्न उमे उन मदय, वामत्त गुराम,जा निमुन पाहा पचाता या-पृया वरल म मबया मामय रह।
पर लगता है समुद्र बहा मा रहा है । हमागे नाव ये छूटन में प्रय दरहा है, दिन समाप्ति पर है। सिए पोत यहाँ इट्टा हा रहे हैं। प्राय निश्चन | प्रकाश क्षीण हो रहा है। पार नरी चाहत पि हम जोग मौन होकर इस पुध ममगल-म क्षण का मानद लें नहीं। मरी वाता में प्रापपा मजा आता है। आप बहुत मेहरवान हैं। मरे अलावा नव मुझ वावई इसवायतरा मालूम होता है वि यही मैं, मरी चातें प्रापरे लिए दिलचस्प न बन जाएँ । अनुतापी निणायक की व्याख्या करने क पाले मुझ प्रापम बात करनी होगी विलासिता की और पाल काठरी की। आगली पर हैं मित्र, जहाज ना पूरी नगी मे पा रहा है पर स्वा"डरजी मृत रामुन है या मृतप्राय । उसवे समतल किनारे कुहाग म खाय हुए हैं । मासूम हो नहा पडता वि यहाँ उमरा प्रारम्भ है और कहाँ अन्लापन हम नागविता विमो माग चिह्न पे सहारे घर रहे हैं अपनी चाल वी नती वा पोई भमान नहीं कर सकते । हम प्रगति पर रह हैं पर युथ यानही रहा है । यह नौयात्रा नहीं है, सपना गाना है। यूपानी टापुमा व समूहम मरा अनुमन इसके विपरीत थामिति पर निरन्तर नप-नय द्वीप दीपत जात थे। उनकी व विहीन री बी होशिमिज राया था और उननारा मागर ग तीव्र विरोध म उमरता माता या । यहाँ भूतकावाई गम्भावना नया तर रोगनी म सनीनुष माग मिल था।पौर दीप से दूसरे द्वाप तत्र नाच पर, जापिर भी मपर गति ग हो पा रही थी मुमन्तिरमा उगना हिम रात गिन बदाजारह टण्डी सहगे ये गीप पर, पन और हमीरी बौदाग से भरीएर साम्बी दौडमा तब ग यूनान स्वय ही मरमतर म यही प्रवाहित हाता रगा है-मुधिया ये गिर पर,
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पर ग, रोणि मुक में भी प्रवाह म बग जा रहा
* मैं ताबिना मगन नाम रारिए, मित्र
मुर प्रान यूनान म परिचित है। नहीं तो और भी अचा
हैं। हम लोग वगग ही क्या में पूरता है? वर्ग ना मावठा
हर हृदयाँको। प्राय जानन है कि वहां दौमित्र, मन परामर
का हायपरटे मउ हैं। हा ओग्न घरवली है और प्रतिष्ठित अपह,
{पागं पुरुष पटरा पर गम्भीरतापूर्वक पप दगते हुए, सहकों पर
घुमने है अपने मन कीनियों म अपनी उँलिया फैलाय हुए।
अच्छा ता पूव कदमों में भी एमा ही हाता है कभी-कभी हो,
होगा। पर वालिए, माप परिस की महका परमा हाय प्रपन हाय म
कर घूमग मरना मजार कर गया। म नौगों म तो
प्रोविय वे भाव रहा है नमारी प्राति तनटर हाहमारा प्राचरण
प्रौपचारिक बना ली है। पर दूनान क द्वीपों में अवतरित हान ।
नेताहममता माति अपना परिमाजन करना पडगा। वहां वीरवा
पावन है वहां मागर ग्रीन्दिर मुन पारणा है। और हम
पागा, हम इन डेक्चरम पर बठे। सा पाहाया है। हां,
ना मग दयास है मन काल-पास तक पहुँचतगहुंचन पान वा राम
लिया था। जी हाँ में दद्वाजा आपरावि मरा माप क्या है । सघन
करन ने वा मातीपप्तामा की मी चेप्टाग्रा का चुका टम क बाद
मान सारे प्रयामा का व्यपना में लोगहित हाकर ने प्रारमिया
को मुरत छादया का निचर दिया । जा नर्ग, मन किमी मस्तान
गेकामना नर्ग गयी प्राता बाई रानी ना है। मैंननादन
मोग्नोंद वाच गानो मार ना जाननेहा व क्मिी मौ
बलना
रावानवम तिरम्बार नहीं करती नशेतापरदा रहती है माग
"नि कानिह या दना टेन की या उमपी मान-नानिमग्न की।टमी
गणनारा पाडवी नहीं प्राचीगेहाता है। वहा उमरा दन्दा
पाद है उनका प्रायद । विमी प्रोग्न का गप्पा महा अपिल
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। गिरफ्तार किया जाता है। पृथ्वी पर स्वग वा क्या वही एक मात्र मा नहीं है जो अब तक हमे उपल ध है ? प्रापवाल में मैं भी अपन सहा सुरक्षा-स्थल की तरफ भागा! पर अव में मीठ-मीठे भाषण नहीं दता था । भादत के कारण मैं अब भी कुछ दांव तो लगाता था, लेकिन वहानी गढने पी क्या का प्रभाव हो गया था। मुझे कहने में सकोच हाता है, क्यादि मैं शायर कुछ और वजिा गब्दावली का व्यवहार पर जाऊँ। लगता है यि उस समय मुझे प्रमपी प्राव यकता का अनुभव हुमा! अलील है है न ? जो भी हो, मुझ एक गुप्त पीडा अनुभव हुई, एक प्रकार का प्रभाव, जिसने मुझे और भी रिक्त कर दिया और इसकी अनु मति दे दी पुछ तो जान से और कुछ पौतुक समभवर, कि मैं कुछ वादे पर ई। जितना हा मुझ यह लगता था कि मुझ प्रेम करने और पान की प्राव यक्ता है उसा माया म मैं समझना था कि मैं प्रेम म पंस गया हूँ। दूसरे शाम में अभिनय करता रहा। मरसर मैं अपन वो ण्य प्रश्न वरता पाता था जिस वि अनुभवी व्यक्ति होने के कारण पहले मैं हमेगा बचाता रहा था। मैं अपन कोयह प्रपता सुनता था कि तुम मुभम प्रम परती हो? पाप जानते हैं इस तरह की बातचीत म उत्तर यही हाता है और तुम" अगर मैं वह दता पा हो ता मैं दरातानि अपनी वास्तविर नावनाना स अधिक गहरे म पहुँच गया हूँ। और अगर मैं ना करन की हिम्मत करता तो यह टर हाकि मैं प्रमपान म भी वचित रह जाऊँ और परिणामस्वरूप मुझ पोलमनी पर । जिग भावना मे मुझ पाति पान की प्राणा थी उस मावना या जितना हो मधिर में मपट म पडी दगता था उतना हा अधिा अपनी गगितीस उगपी मांग परता था। मन में अधिकाधिर स्पष्ट वादे परला गया। इस प्रकार मैं एप मोहिनी मूर्खा ये पम-पा मपम गया जिमन रसोत सीन प्रकाशन इतनी अच्छी तरह पढ़ रग ये रिया प्रम विषय म उमी विग्यास पोर दाता मे बात परतापी जग या बुद्धिजायी यगहीन समाज के बारे म पर। इरा प्रसारमा विश्वाम आप जानन ही हैं सामन होता है। मैंन भी उसा तरह प्रेम की चचा करने दखा और अन्त म विश्वास दिला ही दिया । वमन्म-बम तब तक च तक कि वह मेरी प्रेमिका नहा बनी और मैंने यह नहीं देखा बिरगीले प्रकाशनाद्वारा प्रेम के विषय म चचा करनाक्तिना ही क्या न आ जाए, प्रेम की कता की PिAT नहीं मिलती है। तात का प्यार करने के बाद मुझ मोना पडा सापिन के साथ । पुस्तकाम चर्चित वह प्रेम जा मैंन जीवन मे कभी नहीं पाया था, मुझे अया टूढन जाना पडा। पर मैं अनभ्यस्त था। तीम वप मे अधिक हो गए थे कि मैं केवल अपने-मापसे ही प्रेम करता रहा था। इस आदत का छुडाने की क्या सम्भावना हो सकती थी? मैं नहीं ही छोड़ पाया और प्रम-व्यापार म खिलवाड करता रहा। वादे मैंने दुगुने चौगुने कर दिए। जिस प्रकार पल एक साथ कई प्रमिकाएँ रहती थी उसी प्रकार पर एक साथ कई प्रम-सम्बघ हा गए। इस प्रकार गुमरा के लिए अब मैंन कहीं ज्यादा मुमौतें इकट्ठा करदा, वनिम्न वअपनी उस गानदार उदासीनता के समय रे। मैंन आपको बताया कि मरतात न दुख मे पवरार भूप मे जान दे दन को साची । भाग्यवा मैं समय मे पहुँच गया और तव तर उमका हाय परहार बटन के लिए तयार हो गया जर तद वह इजीनियर, जिसके कनपटी र बाल सफ्द हो चते थे और जिस वारे म उमने अपन मनपमाद साप्ताहिक म पड रखा घा वाली या यात्रा म वापस न लोप पाए। जो भी हो, यह होन वे बजाय पिप्रम म पडकर मैं इतना उठ जाऊँ शिपाम की अन तत्ता में विलीन हो नाऊँ, जमी रिसोकोकिन है मैं अपन अपराधा वे भार म, और सद्गुणावी राह म पयनष्ट होने में ही, वृद्धि करता रहा । परिणामस्वरूप में प्रेम को मारना स इतनी पणा वरने लगा कि मालों तक में प्रगिद्ध प्रम-गीता 'लावी या रोज मोर 'लोवस्गद' या मुनपर दात पीन विना ना रह पाता था। भत मैंन पोरतावा र तरह से त्याग परन वी चटा यी और ब्रह्मचय ।
-गायद मैं वा पालन करने की । प्रापिर उनकी मित्रता-मात्र से भी मुझे सन्तोष मिलना चाहिए था। पर यह तो जुना छोड़ने के बरावर था। वासना वे होते हुए औरतोसे मुझ प्राणातीत ऊब लगी और म्पप्टत मैंने भी उह उपाया। जुमा नहा और नारयणाला नही- सत्य के क्षेत्र म पहुँच गया था, पर मत्य, मेरे दोस्त, एक भयकर उप है। प्रम मोर ब्रह्मचय मे निराश होकर मैं अपने मन में कहा कि विलासिता के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचा है, जो प्रेम का स्थान ले सक्ती है, हंसी वो दया देती है और शान्ति को फिर वापस ला देती है सर्वोपरि अमरता प्रदान कर सकती है । निमल उमार वे एक विशिष्ट स्तर पर पहुंचकर, देर रात वीते, दो वेश्याप्रो के बीच पड हुए वामना मे सक्था रिक्त प्राशा उत्पीडन नहीं रह जाती युद्धि पूरे अतीत पर छा जाती है और जीवित रहने की व्यथा सदा-मवदा के लिए तिराहित हो जाती है । एक तरह से मैं हमेशा विनासता म ही डूवा रहा था अमर होने को इच्छा का मेरे मन में कभी अन्त न हुमा था। क्या यही मेर स्वभाव की कुशी नहीं थी और उम प्रारम रति या परिणाम जो मैं आपको बता चुका हूँ ? हाँ मैं अमरता यी काक्षा के मारमरा जा रहा था। मुझे स्वयम् अपने से इतना अधिक अनुराग था कि यह ता मैं चाहना ही था वि मरा अमूल्य प्रम-पात्र पभी सार्धान न हो। क्याकि नागन की स्थिति में और कुछ आत्म-बोधन पनस्वाप इसपापोई कारण नहीं दासता कि किसी कार वदर को अमरता क्यो प्रदान की ए इगलिए ममरता के बल प्रादमी को मुधन तुप प्राप्त करना ही पड़ता है। योपि मैं अमर जायन को पापाना परता था, मैं वश्यामा के साथ साया और गराब पीने म राने गुबार दी। मुबह जर मेरा मुंह नसरता के वडर स्वाद मे भर जाया परता था पर रह तो चुवा या घण्टा मानद म मग्न । क्या मैं पाप गामने स्वीकार करन या गाहम पर मैं मभी मा प्यार में कुछ गता पीपाद करता हूँ जव मैं एष निकृष्ट नाइट-क्लवम वहाँ यी एप नाचने वाली औरत स मिलन जाया करता था और वह मुझे अपनी कृपा मे सम्मानित करती या और उसके पीछे मैन एक गाम एक हींग हाक्ने वाल दरियन मनाहा भी किया था। हर रात में गुरावधान मे अवह पर घूमता था, उस पार्थिव म्दग की लार वत्ती और धूल मै--बहद वोलता हुआ और खूब गराब पीता हुमा । मैं टपा की प्रतीक्षा परता था और तव अन्त में अपनी राना अम्न-व्यस्त पिस्तर पर ना पहुंचा था जाय त्रवत् वेलि-क्रिया सम्पन्न करने और फिर दिना किसी मरमण का स्थिनि म गुरे हुए सा जाती थी। दिन चुपरेने आकर इस दुघटना पर प्रकाशन देता था और में उठकर मामा-मण्टिन उपप्रकाराम निश्चल बडा हा जाता था। मदिरा और नारी में मानताहूँ, य ही दाना मुझे वह सान्त्वना प्रदान करती थी जिसके माग्य में था ।मैं यह रम्य आप सामन उदघाटित कर रहा हूँ मर दोस्त इसका उपयाग करने से पार डरें नहीं । तर प्राप दवी कि सच्चा विनासिता मुक्तिप्रद है, क्यादि वह बिताती पर क्तव्यों का कार मार नहीं हारनी। उमम इवार प्रापमा म्यन्व अपने तब ही रहता है, इसीलिए स्वय का प्यार करन वाले महान् प्रेमिया का यहीं प्रिय प्रामाद हो सकता है। यह ता अतीत और भविप्यरहित एव प्ररप्पर जिसमें कोई वाद नही, कोई नावालिक दण्ड नहीं । जहाँ टमा उपभाग किया जाता है व म्बर ममार म पयव हैं। प्रथा वरन पर प्रादमो मागापौर भव कापीघद्याड देता है। वहीं वानालाप की प्रा यकता नहा जिने पान के लिए पार वहाँ जाते हैं । वह गला क विना भी मिल सकता है और अक्सर ता रुपए के बिना भो । माह मुझ मनुमति दें प्राप, पिन यशान्त मौर विस्मत स्त्रिया न उस समय मरी महायता की यो उह पदाति अग्नि करन पा' मात मी मरे मन म उनकी स्मति म मादर को तरह का हो गई भाव मन्निहित है। सामाहा, उस मुक्ति मार का मैन पूरा-पूरा लाभ उठाया दर्ग तभरि में पाप वाममरित पर हाटन म ना दसा या, एर ही समय म एक प्रौटा वेश्या और उच्चतम समाज की एव अविवाहित युवती के साथ रहता हुआ। पहली के साथ तो मैंने रसिया हाने का नाटक क्यिा और दूसरी को जीवन के युव तथ्य जानन का अवसर दिया। प्रभाग्यवश वश्या की दिनचुल मध्यवर्गीय मनावृत्ति थी, बाद में उसने आत्मकथाया वाले एस पत्र के लिए जिसम आधुनिक विचारा के लिए रास्ता खुला था, अपने सस्मरण लिखना स्वीकार कर लिया। मुझे इसरा भी कुछ कम अभिमान नहीं है कि उस समय मैं बरावरी यो हैसियत से एक ऐम पुरुप-समाज म प्रवेश पा सका जिगकी भरार भत्मना की जाती है । पर मैं इस पर जार नहीं दूगा। आप जानते ही हैं कि बहुत बुद्धिमान व्यक्ति भी इसम अपना गौरव समझते हैं कि पास वठ व्यक्ति स एक बातल पयादा पा सकें। शायद अत म मुझ उस सुसमय विला सिता में शान्ति और मुक्ति प्राप्त हो जाती। पर वहाँ भी मुझे अपन ही मदर एक वाघा कारण मिला । इस यार वह था मरा वलजा, और एक ऐसा भयर अवसाद निसने अभी तक मुझ नहा छाडा है। मामी अमरता का खेल सेलता है पर बुछ हफ्ना याद उसे यह भी पता नही रहता कि अगले दिन तक भी टेंगा रह समेगा या नहीं। उस अनुभव का एकमात्र लाभ यह हुमा जव में रात्रि में अपने प्रामोट घोउ चुका था कि जीवन मेरे लिए अपक्षाकृत कम इप्टनापी हा गया। जा यवसाद मरे पारीर को क्योट रहा था उसने एक साय अनव पच्चे घाव वहा दिए। हरण्य अनि मनुष्य की गावित को कम पर देती है और गीनिए व्यया या भी। विलामिता या पोई उ-वग नहीं हाता-जसा रि समभा जाता है उसके विपरीता विलासिता सिफ एक लम्बी नीद है। मापने देखा होगा विजालाग वास्तव म सहम जलत हैं उनकी समगे तीन दच्या रगती ही रहती है रि उस औरत के साप गायें जिगर वारे म व जानते हैं कि उसावि वागधात किया है। पिला गाव बार फिर अपने प्रापरा इराना विश्वास रिवाना पाहत हैं पि उनी प्रिय सम्पाअभी मा उही की है। जमा यहा जाता ८२ है, वे उस पर अधिकार पाना चाहते हैं। पर माथ ही यह भी है कि उमुक तत्यान अन तर उनके दिल की जनन कम हो जाती है। शारी रिक विद्वप कल्पना प्रमूत तथ्य है और साथ ही प्रात्म निरपक्ष भी। थपन प्रतिद्वन्द्वी पर आदमी वह नीच विचार प्रारोपित कर देता है जो उन परिस्थितियों में उसके अपन मन म र चुके हैं। भाग्यवश एद्रिक तप्नि की प्रति कपना और निणय गविन दोना को क्षीण कर देती है। वेदना तब तक मुपुप्त पड़ी रहती है जब तक पुमल्ल । इही कारणा से नवयुवक अपनी आध्यात्मिक प्रगति पहती प्रमिकाक साथ खा देते है। और घुद विवा-मम्ब घ, जो केवल वध व्यभिचार हैं, दुम्माहम और काल्पनिय निमाण को अयों बनकर रह जाते हैं । हा, मेर दास्त, यूर्जुमा विवाह सम्बघ ने हमारे दा का स्लीपर पहनाकर नयार कर दिया है और गोन ही उमे मौत के दरवाजे तक पहुँचा देगा। मैं अनिायाक्ति कर रहा हूँ? नही, पर विपयानर अवश्य कर रहा है। मैं ता वेवल यह पताना चाहता था कि मैंन उन महीनो की घार विलासिता से क्या लाभ उठाया। मैं एक प्ररार के बुहामे म रह रहा था जिमम वह हमी इतनी दा गई थी कि अन्न म मुझे उममा बाध होना हो वन्द हा गया था। जो उदासीनता पहले ही मेरे अतर म भर चुरी धी उमे अब कोई प्रतिराय नहीं मिलता था, उसन अपना कारक प्रभाव दिस्तन कर दिया। अव बाई भवग नहीं। एक मतुलित भाव, या यह कि भार ही नहीं। सय अम्त फाडे मुखाने मे गेग मुक्त रिए पान हैं और धीर धार अपने प्रसन्न स्वामी को ही पोट डालते हैं। मेर साथ भी यहीं हुया । मैं गानिपूर अपनी ही औषध म मर गया। मैं अभी भी अपन व्यवसाय से जापिता निवाह कर रहा था, पर मरे नाम पर भाषा बी मरी उडाना के कारागहा पता लगा था, मेरे जीवन बीपस्त-व्यम्नता में व्यवमाय गोक्षति पहुंचती थी। पर यह ध्यान देने योग्य बात है कि मुभ प्रपन की उम्रना के कारण अपन ना पाच रण को प्रति को अपना प्रधिर विरोध मिला। अपन भाषणाब दौरान .
मयायाधीग सामन भरा ईश्वर का नाम लेना, जा गि मात्र पर प्रयोग ही था, मर मुवक्किला के मन मे भर प्रति सह पदा वर देता था। उह गायद यह गवा हा जाती थी कि परमात्मा उनक हितो की रक्षा उतनी अच्छी तरह नही पर सपना था जितना रियाय नास्त्र म मजेय वकील । वहाँ से इम निप्यप पर पहुँचना सिफ एर कटम प्राग बढाना था कि मैं अपनी मनभिनता के अनुपात म ही पर मारमा की दुहाई देता हूँ। मर मुवक्किला ने वह कदम बढ़ाया और विरल हो गए। कभी-क्दा मैं किसी मुकद्दम म वहस करने चला जाता था। कभी-कभी यह भी हाता था कि इस बात का भूलवर कि जा कह रहा हूँ उसम मुझ विश्वास नहीं है, मैं अच्छी पर भी पर देता था। मेरी अपनी वाणी नेत व वरतीथी मोर मैं उसरा अनुसरण । में पहले की तरह उडान तो नहीं भरता था पर पम-ग-यम भूमि तो छोड़ ही देता था, और कुछ उछल-यूद वर सताया। प्रपा व्यवसाय व बाहर मैं बहुत कम लोगा स मिलता था मोर बडे ही बप्टपूर्वक मन दा-एक प्रवसन प्रम-सम्बघा को जीवित रपा । यह भी हुमा वि दो एव गामें मैंने गुद्ध मत्रीपूर्ण वातावरण म बितायी, जिमम वामना या वाई मा भा न था, पर इस भन्नर व साथ वि ऊरये भाग प्रात्म-समपण बरसे में जा यहा जाता था उम सुनता हा न था। में बुध मोटा हुमा मौर तय मुझ यह विश्वास होन गा बि सकर पार हा गया है। पर बुध भी नहीं रह गया था सियाप इसके कि उग्न वढनी जाए। पर एक नि समुद्र की गर करते हुए जहाँ मैं अपनी एक महिला मित्र मा घुमान स गया या उम बिना यह बताए हुए वि अपनी रोग मुक्ति पी गुणी मना रहा है मैं एक यह जहाग पर था, ऊपर वार म पर । महमा दूर परर याला मा पन्या दम्पाती महासागर म मिाई पड़ा। मैंने एवम मुंह पर लिया पौर मरा लि जार-जोर स पहान गगा। मैं न पिर यतपूयर प्रपना , रघर रिया नोटेसा कि यह भाता पप्या नही मा। मैं चितान मोहा था पूर्गों की तरह महायता के लिए पुकारने कोथा, तभी मुझे वह पिर दिखायी पडा। वह उस क्याड का एक टुकड़ा था जो अक्मर जहाा समुद्र में छोड दिया करते हैं। पर मैं उन देखत रहना सह नहीं पाया था क्यानि तुरन्त मेरा ज्यान एर डूबत हुए व्यक्ति का तरफ गया था। तब मैंने सुम्बिर चित से यह सममा उसी तरह जसे आप किसी विचार का स्वापार कर लेते हैं जिसकी सत्यतावे वार में बहुत पहले से जान चुवे हात है, कि वह पुरार जा साला पहल सन नदी पर से मेरे काना म पडी थी कभी मौन नहीं ईनी ने उसे सागर तक पहुंचा दिया था--पसार भर में घूमत रहन के लिए, मागर वे अनन्न विस्तार-पयन्त और उसने उस दिन तन व्हा मरा इन्तजार पिया था जिस दिन पिर मरा उसम साक्षात् हुा । नाय ही मैंन यह भी जाना कि वह पुकार नदियो म और मागर म, हर जगह मेरा इन्तगर करती रहेगी-जहाँ-जहा मर सस्वार वा अपवित्र जल पहुंचेगा। मार हाँ, यहाँ भी क्या हम पानी पर ही नहीं हैं । इस सपाट, एकम, अन्तहीन जल पर जिसकी सीमाएं पृथ्वी से अलग पहबानी नही जाती? यमा विश्वास होता है कि हम लाग भी भी एम्स्टरडम पहुँच मग पुनीन 17 इस विशाल पाए म हम लोग कभी बाहर नहीं निरन सरो। सुनिए, मुनिए । पापको क्या प्रदश्य जर-परिया के स्वर नहीं सुशायी पडने ? यदि वे हमारी ही दिशा म पुकार रह हैं ता क्या विमरे हेतु य वहीं जल-पी हैं जो अनलानिक महासागर पर उम दिन पुरार रह जिस दिन मैंने हमगा के लिए यह नाना वि मुभ रोग-मुक्ति नहीं मिला निमें अभी भी नाम क्या हुआ है और उस वन पड वम ही निभाना है। गानदार जावन का अन्त हुना माय ही उद्वगों और पनि रवाया भा। मुम घुरन टर टने पड और अपना अपराध स्वीकार परना पडा । मुगल-योटरा म रहना पडा। निश्चय हा आप उन पास-माटरीम परिचित नहीं है जिल मध्य युग म 'जिटल ईत वहा जाता था। यानतर यह हाता यापि उनम पड गादमीना जीवन पर 7 के लिए भुला दिया जाता था। अयकाल-कोठरिया म और उसम अन्तर उस विलक्षण प्रायाम का था । वह इतनी ऊँची नहीं होती थी कि वाई उसम राडा हा सके और न इतनी चौटी वि उसम लेट सब । यामी वो विचित्र प्रापार बनापरनिरछ निरछ जिंदा रहना पडना था । सान TI मतलब था ढर होपर पड रहना और जागोका उमडू वठ रहता । मर प्यारे दोस्त, इस सीवी-गी कारीगरी म विलक्षण प्रतिभा थी-और यह समझ लीजिए माप पि मैं अपनश तोलकर इम्नमाल कर रहा है। हर रोज अपनी उस कभी न गेली पड़ने वाला सिडन द्वारा निमने उमपा शरीर ऐठना हो जाता था, अपराधी को यह पापित होता रता था नि वह दोषी है और निर्दोपिता मासाटमय प्रमार म निहित है। पाप गियरों और ऊपरी टेर पर वितरण गे वाले व्यक्ति की उम यान-नाठरी मे कल्पना कर मक्त है ? क्या प्रादमी उम बाल-योरी म रहता हुप्रा भी निषा इमरी सम्भावना नहीं । तिन नहीं। नगेना मेरा तव ही ढर हो जाएगा कि निगोंपिता वा दा स्थिति म पहुचा दिया जाए रियर कुनडा होकर रह में इस परिसला पो रक्षण के लिए भी पीतार करने को नयार नहीं। इसके अतिरिक्त म पिमी को भी नि पिना वादावा नहा पर गान हैं यद्यपि निश्चय + गाय हराव व दोगरी पापणा अवश्य पर साते हैं। प्रपर व्यक्ति दूगरो २ पापा TT मा हा जाता है-यही मरी भास्था है पोर पहा मरी माता गच मानिए पाप धन उमी ममय गुमराह हा गो है जनवादा। पी उद्घोषणा परन गिन है पोर उनपरा उपनगदी गा है। पाप या मजन परन या दर दन लिए ईपरतीप्राय यवना नरी । हमारे गहवर मावीमारिए पाफी ह हमारी गरापार माय । प्राप नयामत की बात कर र थ। मुभ मनुषद निमें गारदा पर हमूं। मैं उमा निराहार इनार मेगावमुझ उसग त्याग पुरी पीज्ञ वाम्मा घिरा है-मनुष्यो क निणय का । उनर किए कार परिस्थिति अपराधको गुना घटाती नहीं, यहां तक कि मलप्रेरणा भी अपगध व्हायी जाती है। यापन कम-से-कम यूजने वाले वन्दी-गह की वात ता मुतौ हा होगी। इनका निमाण एक नाति ने हाल ही म किया था, यह सिद्ध करने लिए कि वह पृथ्वी प श्रप्तम जाति है । चारा तरफ दोदारा में घिरा एक दक्मा, पिसम की बिना हिते डुले खडा रह सकता है । मामद के उस कोट मराठा दरवाजा उसे बन्द करता है वह टाही की उंचाई तक का होता है। इसलिए मित उसका मुह लापता रना है और चर म निकन हुए हर जेनर मुह भर के गमके ऊपर घूरना जाता है। क्दी चारा तरफ स घिरा हुप्रा अपना मुह पार नहीं माना -~हालाकि उम अपनी प्राय बन्द कर लेन की इजाजत रहता है। यह, मर दाम्न मानत्र गे माना है । दन धष्ठ कृति के लिए डोईवर की आवश्यकता नहीं पड़ी। मा क्या? इवर का एक मात्र पयो। हो निदॉपिता वी प्रनि- भूति करना और मैं घम को इस दृष्टि में दखता हूँ उस वह युनाई का एव महान कारखाना हो। कुछ दिना लिए या भावान नीन वप दनिए । नर उम धम कहार नहीं पुवाग गया था। तब म मावुन की कमी हा गर है हमार चेरे गन्द हैं और हम एक-दमर की नाक पाने ररत हैं । मब मूढ हैं, मब दपिल पाइश हम मद एक-दूम के ऊपर और नल्दी कर लिनट की कार कोठरी मपहुंचने की हर पादमा वी चटा रहती है कि मवम पहने थर मरे दम । मैं आपको एक बहा रहस्य बनाता है,मर पार नाम्न ! क्यामन का इलवार मत फीजिए । वह ता हर राजानी रखती है। नहीं काई दान नहीं दम वाहियात उमा कावजम में कुछ बाप रहा है। हम तट पर पचन ही वान है नीजिए, मा गए । पन मार। पर जगरपति मरी प्राथना है और घरतर मर मारपन चरि मुझ और बढ़त बन्न या है। गरी ग्मा हीना मुक्ति होता । पहिए, पाप जानत हैंम, निसर वार मनापदम मार रह हैं कि उमसलीर पर क्या चढाया गया था उसके अनेर अनेक कारण थ। किसी भी व्यक्ति की हत्या के सदा अनेक कारण रहते हैं । उसक विपरीत, उसके जीवित रन का यौचित्य प्रमाणित करना असम्भव है। इसीलिए पाप या परोकार ता झेशा मिल जाते हैं और निर्दोपिता या कभी वभी हो । राकिन उन कारणा के अलावा, ना हम पिछल हजार वप से समझाए जात रह हैं उस भीषण यत्रणा का एक प्रधान कारण और भी था। मालूम नहा क्या उस इतनी सावधानी सपिाया गया है। असली कारण यह है कि यह जानता था कि वह पूर्णतया निर्दोष नहीं है । जिम अपराध के लिए वह दापी व्हराया गया था अगर उसका भार उस पर नहीं था तो भी उसन और दूगरे अपराध तो पिय ही थे- चाह उसे मालूम भी न रहा हो वि यौनसे । क्या सच मे वह नहीं जानता या? आखिर वही ता भूल म था। उसने निदोषा की कम-स-बम एक हत्या के बार म गुना ही होगा-जूडिया के वन्वा की हत्या, उस समय जब पि उसके मां-बाप उमे सुरक्षिा स्थान पा ले जा रहे थे। वे बच्चे उगयी वजह से नहीं मरे तो क्या मरे ? | खून से सन सिपाही दा टुक्टा म पाटे गए शिशु पर मान ल कि यह यरो ही था जसा कि 'हम ममभत हैं ता मुभ विश्वास है कि यह उह मुसा नहीं सकता था। और रही उस उदामा यी बात ना उपरहा काम म दोवती थी पया वह उम व्यक्ति का अनियाय दिपार ही था जिम हर रात रेगरा की ग्रावाज भपन यच्चा लिा रोती हुई पौर र प्रसार की सायना अस्वीर करती हुई मुनापा परती थादागार रात पापीर दता पा रस अपने बच्चा वा पुगी थी जा उमरा वाहम मारे गए थे और वहारमय जावित थी। उम रावयापासाहुए जिरावा यह जानना या मनुष्य की हर बात म परिचित-पाह पौन या विनाम रातिदूसरा का मरने देना मान मग्न यासाला मयतर प्राराप है। दिन राता निरोप पागप पागामना पगडा डानिए य ग नगन गहना कठिन हो गया। नेहार था कि इस दवा का मन कर दे-प्रनिनाद न पर मर जाए ताकि वही अने जीवित रहने वाला न बचे कही और चला जाए जहाँ शायद उम मा यता प्राप्त हो सके। उमकाममथन नही दिया गया, उसने शिकायत की और प्रागिरी चीज यह हुई कि उन दापी टहराया गया। हां, मैं मोचनाएं शायद वह तीसरा इवेंजनिस्ट था जिमने उसकी शिकायत को पहले पल दवाया था। 'तूने क्या मेरा माय छोड दिया है ? यह विद्रोह का स्वर था या न? 'तो चनाप्रो रची।' अाप इतना समझ लीजिए नि ल्यूर ने अगर कुरवाया न होना ना शायद किमी का उपर ध्यान भी न जाता, मर जो भी हो उसका इतना महत्व तो न ही होता। इमी तरह नियनक जिने वनित करता है उमी का स्वय पुकार-पुकारपर विनापन करता है। समार की व्यव था भी सी तरह व्यथर है। पुल भी हो निर्णीत अपराधी के लिए चलते रह्ना असम्भव हो गया । और मैं जानता हूँ दोस्न वि मैं कह क्या रहा है। एक समय था जर मुझ किसी एक क्षण जरा भी पता न हाता था रि में दूसरे तब कमे पहुँचूंगा । हो पादमी इस मसार म युद्ध घेट सरना है प्रम या स्वाग पर सकता है, अपने सह-मानव को यातना देमरना है और क्वल बुनाई की सलाई चलान चलाते पगेनी यो निता कर सस्ता है। पर चिन्हा नाम चलते रहना मिा चनत रहना ही एक प्रति-मानवीय काय हा जाता है। गौर वह अतिमानव नही था, माप मरा बात मानें । उसने अपनी पत्रणा पुरारवर बनायी और इमोलिए में उस प्यार करता हूँ मरे मित्र उस जो विना जान ही मर गया। दुर्भाग्य यह है कि वह हम अकेला छोड गया चनते रहन ये लिए बुध भी हाना हो चलत रह्न लिए तर मा जब हम 'लिटल इज' पीवान-मोठरी म गिरफ्तार हा~अपनी नफ मे यह मय जानत हुए जो उमे मालूम था पर उमन जो दिया जा रन म प्रयास प्रो उममी तरह मरने म असमय । स्वाभाविक था कि नागा ने उसकी मृत्यु स ८१ कुछ मवल पाा की चप्टा की। आखिर हमम यह कहा तो प रिल क्षण बुद्धिमत्ता की गात थी कि "तना तो निश्चय है वि देयन में तुम सुदर नहा हो । मर हम इसमे अधिक न जाएंगे। मर-कुछ एक बार ही मलीव पर समाप्त कर देंग। पर अब तोबहुत ज्यादा लोग सलाद पर चाने लगे हैं, तानि दूर दूर मे दये जा सर-चाहे यह भी हो नि जा वहाँ इतनी दर में है उस फूछ रौंदना 'पड । बहुत ज्यादा लोगों ने यह निश्चय किया है हि विना उतारता के काम चनाएंगे ताकि दान गौन हो सके। ग्राह क्तिना अयाय, कितना पार अयाय उमदे माथ किया गया है। दिल पर चोट लगती है। पोफ पिननी प्रासाी में प्रारमी अपनी लीन पर लौट जातार- मैं ना विजन पचरी मे भाषण देन के परीब पहुंच गया । मुझ क्षमा पर और ममझत कि इमरे पाछे वारण है । यहाँ मे दो चार मोड प्राग mमग्रहालय है जिसका नाम है 'अटारी म हमारे प्रभु । उस समय उम अटारीमा यी क्यावि यही व तहपाना में पानी भरा रहता है । पर आज–भाप निश्चिन रह--उन प्रभु न अटारी म और न तहमान म । उहान उह उठाकरणायक यी तुरगी पर पिटा दिया है अपन मा के अन्तराल म और वे आपात करत हैं । सरग बडी वान तो यदि वे निणय वरन नै उनव नाम पर। उहाने मृटता से स्वरिणी पपरा था और मैं तुझ भी दोष नहीं दता। पर उममें क्या, वे तो क्सिी का हा छोरत सरको दापी व्हरात हैं "प्रभु के नाम पर या ना जा तुम्ह मिलना चापिए। प्रमु' उ-नि मरे नाम, इतन या माया नहीं की पावता क्वल चाहते थे मिनोग उप्यार परें वग और धन या हैं ग नाग ना उह प्यार करते हैं माइया म भी हैं । पर उनपी गया यहा रहा है । उहाने ना यह भी जान पिया या उनम हंगला क्षमा थी। पोटर जानत है पाप उम वापर उग पीटर न उ पस्कार मिया "मैं नही जारता ग स्परिन को मेनरी गाना तुम क्या वह दहा प्राटि प्रादि। ६०
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सुचमुच वह मीमा का पार कर गया था। और मेरे वे मित्र गदा मै
उनन हैं 'तुम पीटर हा और मोगिता पर मैं अपना गिरनापर
बनाउँगा! बम दसन प्राग नहीं जा मम्ता या नहीं साचन प्राप
पर नहा विन्य रन्हीं का होता है। मुनिए नन्होंने कहा या
उन्होंने कहा या नि वय ही उह प्रश्न की पूरी गानकारी थी। और
फिर वह मया के लिए चलेगा, उसे छोड गए निणय और निन्दा
करन के लिए आग पर क्षमा और मन म दपन के भाव निय हुए।
यत् नहा ग ग सरना है कि कप नहीं है अर नहीं हम
उसरी वात करत यक्तेनरी । वातना ही है जिविनी का भी निर्दोष
नहीं माना जाता है। निदॉपिता के पद पर निगायक महराने हैं,
हर प्रकार से निजात प्रनु नाम पर निार करन वार और प्रमु
कान मानन वारे-नावानव मएर-म ही हैं लिटलटेन की काल
कादरी न परकर धुन मिर जाउ हैं । क्यादि मारा दाप आस्थावाना
वे मत्य नही मर दना चादि दूम भी दमम गामिल हैं । आप जानन
हैं मगर म एक मकान को जिमम याई रहा था, क्या गति हुर
पागलपना बन गया है वहां, यह मामा यशाप है और स्वीडन ।
हम भी स्वाभाविक है कि वा पटुचन पर नाम्य हा। पापन ता
पदप ही पिया है कि एच छोन्ता न और रती पापी मो में
जानता नि पाप मागे तर माचन है। अत मारि हम नव
निमार है दलिए हम सब एकन्दार के मामन तापा है, अपन मार
डामर मगीहा है प प गर नतीय पार हुए और
हमा दिना गाना किया। प्रो जोर पर ना हम हानाही था
अगर में कमा में पर गएनन्द निवारता, एरमात्र हा गय
मन्नन
नहीं समा गाल, हरिए नहा। रनर अनावा मैं
मापका पाप धान्न वाया है, क्यामिर टरसाद पर पर गए हैं टम।
भय पन म मोर प्रशारदे म भादमीमा प्रवनि प्रपनका
.
पगम्बर समभन यो हो जाती है। राब-कुछपह पुपने के माद यही तो मैं हूँ भा, पत्थर के वोहर वे और स्थावर जाो रेगिस्तान मरण सिये। -युरेगिों के लिए एक मोखला पगम्बर मसीहा ये वगर लाहा बुसार और गरार गे भरा हुआ पपंग लगे हुए इस दरयाले पर पीठ टेरे, घिरे हुए पावापी पोर उँगली उठा, उन समार विहीन व्यत्तिया पर अभि यी पौधार परला हुमा, जानिणय गहन नही कर पाने हैं-वयादि वे मही महन कर पात हैं, परम प्रिय मित्र और यही तो सारा प्रश्न है। गोविसी विधि म प्रारथा रखता है यह उम निणय से परराता ही जो उसे उगरे समुचित स्थान पर सोना हैरोमी व्यवस्था के मतगत भिसम उमरा विश्वाम है। पर मनुष्य या नौपणनम यातना पहुँचती है गिना विमो विपि य निणय पारगे। हम उसी यत्रणा को भोग रह हैं। अपनी प्राकृनिय वल्गा के प्रमाय म हमार निणाय जादि पुरे घाड लिये गए हैं बेतहाशा प्ररना पाम निपटान जा रह हैं । इसलिए हम उनमें ज्यादा तस बढना है हैन ? और यह पार पागनपाना है। पगयर और नीम-हलीम गाम बदन जात हैं, न जलारो पो उतम गनून या कालापहीन व्यवस्था पर यहाँ पहुँगा मारत है पसार पे रिप्त हो जान के पहल । भाग्य मैं पा गहुचा । मैं हैं प्रादि और प्रा विधि की घोषणा परता मपम में अनुनापी निर्णायय हूँ। हो मैं पन मारा बताऊगामि इग श्रष्ठ व्यवसाय येनगन यमा-गा। पार परमा जा रहा है इसलिए म जती है। मरे पर धामा प्रत्यासीवार परी जिग्गा पाए पेरिम यापगा र ? परिपन दूर है पति यहुत गुर है में उगे भूना ही है। मोगग म पासी गोपनी-दसामा पो मुभ मा है। पी पोरगढपलानीद मध्या घरों में पाली पडीतावर उतरना नगर ना माना गोदवायान मगनी है। तागमा पर पूमा गरतापभी भी पूमा में गाय पमने श्रान माया और कई अनुगासन म व्यवस्थित घर की ग्रार तेजी म जान बाबहाना करत हुए-मा मर दास्त, धापना मालम हवन जीव कमा हाता है जा इष्ट-वटे गहरा म अमेला घूमना रता है ? गम मालूम होती है कि आप पाये हैं मोर में बिस्तर में पड़ा मुामयास होती है यति प्रापधुधारे हैं और मैं बिस्तर मापन गराव मे वा रहा हूँ। मुझेन दौरोकी आदत है । मारिया है मेरी ममम म मुझे तव हा गया था जद मैं पोप बना या नहीं, मैं नो या द्री मजाक पर गहूँ। मैं जानता माम क्या साच रहे हैं गरी बानों म सत्य पौर यस च का मुनझाकर अलग करना बहुत मुश्किल है। मैं मानना हूँ मार ठोक ही मोचर हैं। मैं स्वय एक व्यक्ति का मैं जानताया जो मानव जाति का तीन वर्गों में बांटा करता पा-दे जा यह समझा हैं कि बोरने पर बाध्य होन को अपना यह बेहतर है कि दिपान के लिए कुछ हो ही म दूसरे व ना भूट वानना पमद करते हैं, इमली अपना नि छिपाने को कुछ भी न हा घोर अन म वे जो गेलो हो पमन्न करते हैं भूठ बोलना भा मोर दिपाकर रखना भी। अब माप ही नय कर लें कि मैं किस वग म गामिल होन याम्म । पर मुझे क्या परवाह क्या असत्य प्रतापला मत्य तक ना पहुंचाता मोर क्या मेरी सारी गाया व मत्य हा या अमरप, कही निप्प की पोर गित नगैपरती? क्या उन माय ही प्रथ नही है। फिर को क्या दिव मत्य हैं या प्रमत्य यति लाना ही स्थितिया म उनमा मत्व यह बताने में है कि मैं क्या रहा है और पावभी रमा मत्यवानीकी या प्रमत्वदारी के मन म मार लना क्या। मामान हाताहै।मय प्रकोत? चौंधिया रेता है।म विपरीत अमरप एर सोम्य धरने मी तरह है जाहर चौडामावर मामन पर रता है । पर माप जमे चारेंस एन वीगिविर म 7 1 मरा नाम पोप रखा गया था। बठ जाइए मरवानी में । आप कमरे का परीक्षण कर रह हैं ? बराव माती-पाती है पर साफ है। वरमियर की किसी कलाकृति के समान फर्नीचर और नाम्र पात्रा से रहित पुस्तको मे भी रहिल, क्योंकि वाफी दिन हुए मैंन परना छोट दिया। एक समय था जब मेरा घर अघ-पदी किताबो से भरा रहता था। यह उतनी हा वाहियान चीन है जिननी उनकी प्राप्त जो 'पापापा का एक टुक्म वाट लते हैं और बागी फ्रिया देते हैं। जो भी हो मुझे म्वीकारोक्तियो वे अलावा पोर विसीय निरा चि नही रही और स्वीकारोक्तिया वे रोमा पास एस ध्यय स लिखते हैं जिसच्चा स्वीकरण बचा ना, जो वे जानत हैं उसके बार में कुछ न बनाएं। जब ये पष्टप्रद स्वीकरण + ममीप पहुँचन का दाया करते हैं तो मावधान होना पड़ता है क्यापि तत्र व र का रगार करन करते हैं । विश्वास पर पाप मैं सूब जानता हूँ कि मैं क्या वह रहा है। इसलिए मैंन पर पर दिया। पाकिताव न और काई बार पोरें मात्र पार ययता की वस्तुए स्वच्छ और चमाती हुई जम नानून । इसके अलावा य डा पलग इतासरून इनपी निप्पला वाटर इनम तो पातमी वमनी मर जाता है जमे कपन में लपेटा हुमा हा पाचनताका लप लगाये हुए। माप यह जानन के लिए उसुर हैं पि मैन पोप वनवर क्या-क्या कारनामे पिय थे। बुध भी प्रसाधारण नहीं था राा मानिए। पया मुभम तनी शक्ति होगी ति में आपका बना गा ? हाँ युगार उतर रहा है । व गर महा पुरानी बात है। प्रभावामी मिन्टर रोमेन मो वृपा मे पुट हा रहा था। मैं उसम पमान या पररादा नहीं। मैं तो यूगेप पे युद ही वच शिवनामा । गनिसाररण हुया तो था पर मैंने TI सटाई नगदपी।तरह मे मुझे पापा है। गाया यह प्राभर यहा गा गीडोम परिवाराला तापागामी गनारा मार्ग पर मरा भाव यात्रा नही थी, उमा मात्र पाये - टन म निम्ना वन की मुमने माग को यो । द दिन बाद मैं परिम वापस पहुंच गया मना के बीच मुभ प्रतिराय पान्दालन न आति किया उमबार माग गना उमी ममय चत्रा कान नगेय जब मुझे 'ना नान हुअा कि मैं दा प्रेमी । ग्राप मुम्बरार हैं' प्राप गरती पर हैं। मुम यहान मो के गलियारा म माया गरले नगन पर। एक कुत्ता गलियार्गेको नून भुलया म पहुँच गया था । वडा-मा नमो वारा दाना एक कान पर को टगए, हमनी हुई मात्र निय वह पान जान वालों काटा मूधना पुसाया। मुझे बहुत पुराना और बटन म्यायी प्रम कुना के लिए रहा। मैं उ- दलिाग पमद परता वॉरि वे *मैगा मा देत हैं । इमे मैंन ग्रावान दी । वर मगर ने दिया पर ही मैन उम जीत लिया था। मुझमे कुछ गठ माग समापूबर अपना दुम दिलाता हुग्रा वहा हो गया । तनी एक युवा मन मिपारीतनाम कदम बढाता हुग्रा मरपामम गुजरा। उत्त कपास पहुँचकर मने उमा नदरे सिर पर हाय परानि मकाच वह पतु उनने हा त्या द गाय कदम-मनदम मिलाता हुआ मरी प्रामा मग्रामल हा गया । विष और नीद पाम दे जाभाद जमन सिपाही व पनि म मन म उसे उनन माफ जाहिर हा गया कि मगै प्रतिक्रिया प्रम मप्रति थी। अगर कुना किमी पानीमी नागरिक के माय चना गता ना मैं ध्यान भो न ता । पर मैंन उस दगाल कुन का मन मनाचे भाग्य चित म्प में कल्पना गे मोर मन मुझे बहन माग वाघ पाया। अत पगैगा प्रामागि मिस हुमा। में दरिणमा पहना म उह य म रि प्रनिगध प्राशन के वार में पता लगा । पर वहीं पचकर प्रार पता लगान पर में मानि कर गया। वह उचाग मुभयर पाापन-पानमा बन्द में वरनागमान्टिक 1 में माता पि गन गय लामा मेर विमाद वे हा मनुार था और न ऊच श्यामा मगे "मा मादि मुना रहा है रिना ०६.
पर युनाई करता रहे-रात दिा नगातार, जन तक विधिपो जगह मे खदान के लिए युछ दानव न प्रा पहुंचें और मेरी बुनाई उधेडनर मुभ घसीटते हुए दूसर तहबाने म न ले जाएँ जहाँ मार-मारकर मरा दम निकानद। जा स रमातली वीरता में भाग ले रहे थे मन उनकी मरारना तो की, पर उनका अनुवरण न पर सरा। पिर मैं रामु पार पर उत्तरा मफीना पहुँचा । मन में कुछ अस्पष्ट मा उदय लदा पहुंचन वाया । अफ्रीका म स्थिति साफ न थी। दोनो प्रतिरोधी दत मान रूप से मेरी दृष्टि म सच्चे उतरते थे इसलिए मैं सलग रिनारे खडा रहा। प्रापती चेष्टामो मे मुझे लग रहा है कि आपनी राय म मैं बहुत जरती-गली इन पातो वायने जा रहा हूँ जिनका गि पुछ महत्व हा मयता है। पर यों यहे हम कि पापा सच्चा मूल्या पन करसे ही में जल्दी बह रहा हूँ ताकि आप इन बातो पर ज्यादा ध्यार । जो भी हो, मैं टयूनिसिया पहुँच गया जहाँ एक स्नेही मित्र ने मुभ पुध काम दे दिया। वर मित्र एप यहुन बुद्धिमती महिला था जो पिम व्यवमाय से राम्धित थी। मैं उनक पीछे पीछे टयूनिस पहुँचा पर उनका प्रमती धपा अनजीरिया म मित्र राष्टो में उभरने पे या दिनों तक पता लगा पाया। उस दिन जमनो । उहें कर घर पिया मौर मुभ भी बिना रिसी उदय + । मुभ नहीं मालूम उन महिला या क्या दृपा । रहा मरी सो मुम गाई हानि नहीं पहुँचायी गइ और मैंन पापी पलानी में या पानानि मुझे कद वरना मात्र मुरक्षा वं हेतु था। मुभ टिपारीसे पागण पिविर म नजरपद रपा गया था होमोप्रत्यापारयाप्रपेशा प्यास मोर नारिदय मे ज्यागपरपाया। उमरा यणा में नहीं पगा।हम TET अघ गतामी मारमन है, हम एम म्याना पी पपा पान के लिए पिगी मारेको प्राय पाना नहीं पहना। मो पर पहले नोग भोला मोर बनाये यारे म भाव विमार हो जाने थे। भाजपा-माळ ही हमारी कविता है। "मतिए मैं पाप पापा मापापही सारी मोटी गाते गाडनी हागी- -
,
पग्मी, मिर पर सज, नक्विर्या और पानी नअमाद।
मरे माय एक युवा फ्रानीमी या तो प्रास्थावान या । हा वार
या परी-क्या-सी है डोक्ता की तरह गैही मगे। वह युट करनवे
लिए काम को सीमा पार कर म्पन पचा या । बर्ग म्पलिन नगर
न उमरपद पर दिया और यह देर जिसके शिविरों में
विगार मटनी का ही रोमगागीर्वाद प्रान है टन धार विवाद
हा "या । न तापनीका पानाही गं वह उन माद पनी था
और न शिविर का गाना ज्म विपद में उसगान -टान म
मनय मासिने चिन्तन न पोनृरज ने नौ, सर विपिन
करगिया था। एक दिन ज्वम अन्दर ममम माना पिता
हुआ सीना चू रहा था। हम दस-बारह अदमा मक्सिया बीच पह
हॉररहे । उनने पाप के विरद्ध जिने वह रास्न म्हार पुरग्ना या,
माने विपात गन्द-बाप डाइना गुरुविना। नन हमारीनर,मानी
एक हपत की बढ़ी दागारमें पारा मीनराकर देखा।
कमर तर नगा वन पनीन में दनर,अपनी उमरी हुपनियों के
धुनी-पाक पर टमन उतियां वगना गुन विचा। उमन हमा सामने
धापाबीन एस नर पाप का मारना हैजा दीन जीटी के बीच
रह न हि नितानन पर वैटक प्रनुका नाम जर, और पितनी ही जला
पद हा मरे उतना ही अच्छाहामने अपना सिर हिनताना
मोनराहम पूरा । हा, उमने फिरकहा जिनकी मार
होता उनी ली। रिवर सुदा गान हो गया प्रोपर
मयोला कि हम पाप के स्थान पर मपन हानीद मानविनका चुन
में मरेका पद पायोर गणों के माय एकम्मापुर को चुनें और
उसपर निगरपने पीपय लें क्वन म-बिदर न दान
पररावी हा दि अपने अन म और दृमरा मदर हमारी ददनमा
कामात का जीवन्त रवा मन पूछा, "मम मरिम्ने पर
मन प्रपिर है। माम मैंने अपना हायसरिया प्रोवन में
ही निकला जिमन अपना हाथ उठाया था। "ठार है, जोधपटिस्ट ही सही। नहीं, उसने एक्दम यह तो नही कहा, क्योकि उन दिनो मरा नाम दूसरा था। उसने यह घोषणा की वि अपन या नामजद वरना जिस प्रकार कि मैंने किया था, महानतम गुण की भी पूव-पल्पना कर नेना है और इसलिए उसन मुभ निर्वाचित करने का प्रस्ताव रखा। दूसरा न भी हमी में ही मान लिया पर उनकी हँसी म गम्भीरता का कुछ पुट' या अवश्य । सच तो यह है वि डुगेकलां ने हमे प्रभावित किया था। मुझे लगता है कि मैं भी क्वल मजा ही नही कर रहा था। पहली बात तो यह है कि मेरा विचार था कि हमारा यह डाटा सा पगम्बर सही कह रहा है और फिर मूरज वा वडी धूप, पस्त कर देन वाला कठोर श्रम पानी में लिए मघप-हमारी दा कुछ बहुत अच्छी नहीं थी। जो भी हा मैंन मपनी धर्माध्यक्षता कई हफ्नातक चलायी, निरन्तर बढ़ता हुई गम्भीरता के साथ। उसमे था क्या-क्या? मैं एक प्रकार या दल नेता या सल' व मत्री की तरह। दूसरा वी उनकी भी जिह प्रास्था नही थी, जग भी हो मरा प्रादापालन करने की मादत पड़ गई । डगेवता कोवे ना थी। मैंने उम वेदना पा उपचार दिया। तब मैंने जाना कि मैं जिना पासान समझता था पाप बनना उतना पासान नहीं है, और कल ही मुझे यह वात या माई उम वक्त जब मैंने अपने भाई निणायया के बारे में इन।। पत्रहे तना में बातें की। शिविर में गयम बड़ी समस्या थी पानी का बेटवारा करना। दूसर दल राजनीतिक या साम्प्रदायिक बन गाए पोर हरण्य भपा अपने साथिया दे पाम था । परिणामस्वरूप मुम भी अपने दाब साथ पपात वग्ना पटा परमात इमी रिमा यन म हुई। अपादन भातर भी मैं प्री ममाता नही रम पाता या। प्रपन सादिया की या जावाम उह वरना पता था उमल, पामार पमा पाय या दूसरे ये गाय रियायत पर देता पा। माप विनाम नर मप्रकार भे भाव वा बहुत दूर तर प्रभाव ।
पहता है। पर निश्चय ही मैं ग गया और उन दिना के बारे म अर मापना नहीं चाहता। इतना हो वह ल वि उम दिन मैं चरम मीमा पर पहुंच गया तिम दिन मैंने स्वय एन मरणासन माथी के हिस्मे वापानी पोनिया। नहीं-नहीं, वह डुगेकना नहीं था, वह ता तब तक मर चुका था-दशायद इसी वजह से दि वह अपने प्रति बहुत कजमी परततापा। इस मनावा अगर वह हाना तो उसके प्रति स्नह के कारण म ज्यादा दर तक अपने को राक रहता, क्योकि मैं उसस स्नह करता थाहा, मैं उमम स्नेह करना था मुझे लाता तो क्म-मे-कम ऐसा ही ह । पर मेरे पानी पिया, इतना तानिश्चित है, अपने का यह विश्वास दिलात हुए कि दूसरोका उसकी अपथा मेरा ज्यादा जरूरत है। फिर वह ता किमी भी हालत म मरा ही जा रहा था और दूसरो के लिए अपन का पिता रमना मेरा वतव्य था। इमाप्रकार, प्रिय मित्र माम्राज्य और मम्प्रदाय मरण मानण्ड के अचान जमत हैं और मैंने वन ना कहा या उसका कुर गोधन वरन के लिए मैं पापना अपना वह महान् विचार यनाऊगा जो यह मव कहत हुए मर मन म उठा और जिसके विषय म मुझ अब निश्चय नहीं है कि वह अनुभूति घी या स्वप्न । मेग महान् विचार यह है कि मनुष्य को चाहिए कि पाप का क्षमा कर दे। पहली वात तो यह है कि आमा का सबसे अधिक आवग्याता उसी का है। दूपर यही एक तरीका है उसमे ऊपर अपन का स्थापित करन का प्रापन दरवाजा ठीक स बद कर दिया था। हो। जरा पत्र जानिए मेहरवानी मा माफ करें मुझे मैं चिटकनी-पिस पोडिन हूँ। ठोर प्राय नगने के ममय मुझे यह नहीं याद रहता कि मैंन चिटकमालगाइ है या महा। मार हर रात उठकर मुझ दाना पड़ता है। जमा मैंने आगो बनाया है मामी को विनी बान का नियम नही हो माता। यह मा मोचिामा मिटिक्नी के वारा यह पसानी एक महम हा गरम्य का प्रतिषिया है। दीन दिनोम मैं न अपना घर बद करता था और न अपनी मोटर । मैं अपनी धन नत को तालम नहीं रखता था जो मरा था उमगे म चिपया नहीं रहता था। सच तो यह है कि चिमी भी चीज या स्वामी होने में मुझे गम लगती थी । सामान्य बात चीत के दौरान में मैं कह उठना था, गम्भीरता से कि 'सम्पत्ति रागनी हत्या है। इतना बडा दिल न रसो वे पारण कि अपनी सम्पत्ति गुपात्र नियनों के साथ यांट लूँ मैं उमे अन्तत चारा के प्रति समर्पित पर देता था इग प्राया से निप्रयाय कामयोग ही सही, परिगोध पर सकू । और पाज में विसी चीज का स्वामी भी नहीं। इसलिए मुझे अपनी सुरक्षा का खयाल नहीं है। मुझे मयात अपना है और अपनी मा स्थिति का । उतना ही में उत्सुव' हूँ अपने उस घिर हुए पारे गमगार का पट बाद कर देन के लिए जिसका कि मैं राजाहै धर्मा ध्यक्षा हूँ और निर्णाया है। र पाप कृपा करव पया उस मात्मारी षासालगे? हो दगिए उम चित्र पो। भाप नही पहचानते यह है टि जस्ट जाज' । पापर। प्रयम्भा नहीं होता? क्या सम्भव है पि भापती सति में कुछ दरार रह गई हा पर अगर आप अपवार पढत रहे होग तो पापरी या होगा बि १६ ४ म गौ से सट-यवन गिरजाघर सवैन प्राइव मे गुप्रसिद्ध धती त्रिोिरेगन प्रॉफ दिनम्न एक भाग को चोरी हो गई थी। उस मागवानामजिस्ट जी । उसम निर्णायौंना पोहो पर सवार पुनीत पशु वो माराधना के हतु मात हुए चिपित किया गया पा। क्यानिम्न कृति को मिली नती उसो स्थान पर राय उत्तम प्रतिलिपि रम दी गई थी। य' है यह मूल कृति नहीं मरा उगम पाई हाय नहीं था। मक्मियो गिटी वा पवार बाटन धान एक बातमी न-पापो उस शाम को उमदा घा-वनमानुप से हाया राव की एप बोस के लिए पर रात यटन पीपर गरा बेच दिया था। मैंने पहन अपने मित्र का राय दो मिउगे रिमी यड गम्मान स्थान पर पटवाए और पहन लिन जर रमारे निप्यागगनगिगामी सोत ।
सारसबार में मची थी, वे 'मेक्सिको मिटी' मरारिया और दनामा के पर प्रतिष्ठापित बठे रह । पिर वनमानुप न मरी प्राथना पर उहैं पामर सरपण म रख दिया। बाडी यानाकानी की उसन पर जन मैंन उन वात समनायी तो हर गया। तवम ये आदरणीय निणायन मरे एकमात्र मायी हैं। 'मक्सिवा सिटी मगम की आल्मारी के पर आपने देखा था दे कमा खानीपन टोड पाए हैं। मैंन चित्र का वापस क्या नहीं दिया? ग्राहो, आपकी प्रतिक्र्यिा ना पुलिस वाला जसा है ? हां, वशर तो मैं नापका बमे ही तर दूगा उप सरकारी वकीर या देना, ग्रार कभी किसी का ध्यान भी नाना कि मर कमर म इस चिन यो शरण मिती हाती। पहली बात तो यह कि यह मेरो सम्पत्ति नहा है बल्कि 'मविसका सिटी' के स्वामी की है जो दि उमरा अधिकारी हान के लिए उनना ही याय है जितना गा के पाच वियप। दूसरी वाल, मिनालाग एदाररान ऑफ दि लम्ब' क मामन स गुजरते हैं व मूल नि और प्रतिलिपि मे अन्नर नहीं बता मुक्त इसलिए मरे म दुराचरण मे किमी का हानि नहा पहुँचनी । नीगरी बात यह है कि इस प्रकार में महिमा-मति । वृतिम निगा पर पूज जान क लिए तसार वे सामन रम गए हैं और अनतीन काल में ही परिचित है। चौनी वात, कि दम तरह कदवान मन शान की सम्मानना है और यह विचार ही एक प्रकार स पारपर है। पाचरी बात शिव निणायक 'लम्ब' में मिलने जा रह थे और अब वो उन्ब (या भातापन)ोप नहीं ह और क्यादि वह चतुर पदमा जिमन, यह चित्र युगया था,किसी अनात याय का मापन-मात्र था,तिन चाय के माग में वापा डालना उचित नहा। और प्राषिीमात वि इस प्रकार मन-सन्तुलित हा पाता है। हमेगा के लिए न्याय निििपता ने प्रता पर दिया जाना है मतीद पर चदा है और दनग प्रान्मारी म कमर लिए अपनी घारगाग्रा अनुरूप पाचरणकरावा रास्ता मार है। निमन मन मे मैं मनुतापी निणायक का दिन ध या परसाना १०१ हूँ जिसम मैंने कितने ही प्रतविरोधों और विनष्ट पाशानों के बाद अपने को स्यापित क्यिा है मार अय, क्योकि आप जा रहे हैं, समय पा गया है कि मैं आपको यह बताऊँ वि वह है क्या। पल मुझे उठवर वठ जाने की इजाजत दें ताकि मैं ज्यादा प्रामानी मे सांस ले सबू । ओफ, मैं कितना कमजोर हो गया हूँ | मेर निर्णायको या वृपा करके बद कर दीजिए। रही अनुतापी निर्णायक ये धध भी बात सम्प्रति मैं वही कर रहा हूँ। मामा यत मरा दफ्तर 'मेक्सिको सिटी म रहता है । पर वास्तविक याय तो वाम करने की जगह स परे पहुँच जाता है। पिस्नर म पडे हुए घुसार से गम्त भी मैं कायरत हूँ। उसके अलावा इस पध को किया नही जाता, यह तो निरन्तर आदमो यी हर मास म रहता है। यह न साचिएगा कि मैंने इतने विस्तार गे पांच दिन नर जो पापम वातचीत की है वह सिफ मन-बाप के लिए। नहीं मैं प्रनीत म बहुत वर-वक कर चुका हूँ। अब मेरे " उद्देश्य पूर्ण होत हैं । स्पष्ट है कि उनका उद्दश्य होता है हँसी का चुप कराने या व्यक्तिगत स्पोनिणय से बचने या यद्यपि काई छुटकारा है नहीं। छुटकारा पाने के रास्त म सनमे यही बाधा गया यह नहीं है विहमी मरसे पहले अपने पापो दापी ठहराा हैं ? इमलिए प्राव यक है कि गुर महादापमा विना भेट भाव के सवम वोट दो तापिप्रारम्भ से ही सारी सघना कम हो जाए। किसी के लिए कोई छट नही प्रारम्भ स ही मेरा सिद्धान्त यहा रहा है। मैं पयोमार करता है गरियो मादर माग्य भूल को, प्रमावधाना का नोपवाहका करो वानी परिस्थितिया को मेरे निए क्षमादान मथवा पागारदा वा प्रन नहा उठना। हर एक चीज कोसीप-गा- नरीमजार लिया जाता है और फिर 'इनना हमा तुम पुगी हो जन्म से ही प्रात्यवानी हो मप्राानिय व्यभिवारी रा गगार हा आदि मानि। यस, यों हीने हामी गरम जिस प्रकार राजनीनि म उसा प्रभार पान । - पिणाच हा - मना मैं उमो सिद्धान्त का अनुयायी है। ग्रामी वा निदॉपिता प्रान करना अस्वीकार गरता है और उसमाचार प्रसाना काममयन करता है जा टन प्रति दापी की तरह व्यवहार । नुम्मे में नास्त, माप दखत है गुलामी के ममयः एष प्रबुद्ध वकीन का। मच नो यह है कि गुलामी के दार काई नियामर व हा नहीं माता । मुझे बहुत नल्दी इसका गन हा गया था। एक सनच या व में हमला बनता की वात रिचा करला या मुस्ट र नानवे मान मैं उस मक्खन की तरह गस्ट पर ना दिन-भर उम चवाना रहना और साथी-भगिया धामीमामा मन्दता की मुबार ग घ निता करता। टम मुलमन म मैं अपन र दिगधी का गायी कर दता पैन उसका अपनी का पाया और अपना शक्ति पन्तु अपार विमा । पतग पर लेट हुए अपनी मगिनी के कान म में यह मात्र नपुनाता पोर इन। उन त्यागन में मुझे सहायता मिता। मैं चुपक म उमे पर टरिए, मैं पावा म माना जा रहा हूँ और अपना नुन खाए दे रहा हूँ। प्राधिर भीवदाम्पत नाका-पवाग प्रतिनिप्नि भाव मनी मन रियाया पार या भीग याविए ता मैं कितना माता या--विदा-नान वार उममा मुरक्षा के लिए पसा हुमा, पर बाप सनर नहीं बिसरे लिए न दे दूफिर नी कुत्र उतर ना मैंने उभार दी। टन उतारतेपन व निमुपमा मिनाचाहिम मैं नहीं जानना यानि में वापर रहें। मैं नहा जानता था कि म्दननामोद पुग्जार प्रयवा उराधिना है ग्मियोगी गम्पन पार मनायो जाए। न ही मह का सहार है या नगम मिायारा दिया जाएमाहा दिमाप अपन प्राचाटन र जाएँ। पर नहीं। ना विपरीत वह तावठिन श्रम है और लम्बी' एकदम मस्ती और बद यान वाला। गम्पन ना राइ मित्र नाना पूरा दपि मे पडे हा प्रापरे अभिवादाम अनलिान उसमया बहकमा म पर निगारा दे मामन का वटपर म परेरे 1 और अपने निणय के समक्ष अथवा दूसरों के निणय के समग निश्चय वरन वे लिए भी प्रत। सव-युछ ल-वर स्वत अता यायालय में गुनाया गया निणय है इसीलिए स्वतंत्रता या बाभ उठाना इतना दुपर है, खास तौर से तय जब आप युनार मे पह हो या व्यथित हा या विसी से भी प्यारन परत हा। प्राह मेरे दोस्त उस व्यक्ति के लिए जो अकेला है, विना परमात्मा और बिना विसी स्वामी के, दिन प्रतिदिन पा वोमा भयार हो जाता है। मत प्रादमा को कोई स्वामी चुनना ही पड़ता है क्यापि ईयर का अव फान नहीं रहा। उस अलावा उस शब्द से अब कोई अथ नहीं रहे, उसम अव इतना सतरा भी ता नही है कि किसी को धसा पहुंचा सके। हमारनतिन दाशनिका का ही ल लीजिए जिननी गम्भीर प्रति वे होत हैं- अपन पहोसी को प्यार परा वगरह वगरह । धार्मिग ईगाइया और उनमें माय बाई मन्नर नहीं है केवल इतना ही दिवे गिरजापरा म जारर उपही देत । यापपी गय म वह परा पीत है जा उहे घम-परिवतन करने से रोकती है ? मम्मान, मायद मनुष्या के लिए मम्मान होपात्म-सम्मान। व अपया नहा कमाना चाहते, सो अपा भाव पपो तर ही रयत हैं । ए नास्तिवतावादी उपयासकार या मैं जानता हूँ जा हर रात प्राथना करता था पर उसरा कुछ हुमा हराया नहीं। प्रपती विनामवर पीकमी अयर ली उसने पया भाग लगाई है। एस लडाकू मार विहारवादी ग मैंन यह बात वही उमन अपने हाप ऊपर गो उगा-विमो दुभावना से नहीं, मैं मागपि वागल्लिाताई-उपर पलाव की तरफ 'तुम मुभ युध नया नहीं बना रह हा, उम पापित लम्बी सांग लेकर पहा, वे सब एगे ही हाल है। उमर पयागार हमारमती प्रतिमा, मगर अपनी प्रति पर प्राना नाम ना वधा मन तो परमात्मा पे गुणगान ही लिगाकरें। इमारतापान व पाम दाहै पापिय पान को ही प्यार करत हैं मोर व रिसा का भी गुणगान नहीं परत क्याकि वे अपने म घणा करते हैं। पर क्योकि वे विना निणय दिये रह नहा पान, उसका प्रभाव उपदश द्वार पूरा कर लेते हैं। सभेप म, उनका पिताच सदाचारा होता है । विचित्र युग है यह ! कोई पाश्चय नीति लागा के दिमाा गोरखधंधे में पम गए हैं और सम भी नाज्जुब नहीं कि मेग एक मित्र जब वह आदा पनि था ता नास्तिर रहा और व्यभिचारी बनने पर धमनिष्ठ बन गया। ग्राह वे पोछे दगावाज, रलव दिवान वाले नट, पासनी, पर पिर भी कितन करण विश्वास मानिए व सपकरण होत हैं, उम ममय भी जब दव नाक माग लगाते हो । नास्तिर हा चाहे श्रद्धा से गिरजा घर जान वाने, मम्पोवाट हो चाहे वास्टोनियन, सर धमनिष्ठ ईसाई हैं वाप मे वेटे तक । पर वास्तव म नो कोई पिता रहा नहीं कोई नियम रहा नहीं । वे स्वतय है "सलिए अपने ही महारे उह चलना है और याकि वे स्वतता या उसके अन्नगत निणय चाहत नहीं,वे माग वरत हैं कि उनके हाथ पर बेंत नगार दण्ड दिया जाए ये घोर नियम बनात हैं वेतोबर सूखी लकडिया के टेर लगाने हैं गिरजाघरा का स्थान न * लिए । सदोनोगेता है मव-के-सब में कहा है अापन । पर व केवन पाप म विश्वास करने हैं, क्षमा म नहीं। सोचने अवश्य हैं उसके बारे मामा ही है जो उ चाहिए--स्वीकरण आत्मसमपण, मुख, और शायद पयापि वै भावुक भी हैं, नारदान, कुमारी वधू, ईमानदार मनुप्य और गिरजाघरा कामगीन । मुझे ही न नीपिए-और मैं भावुक नही हूँ-पाप जानत हैं मैं विमवा स्वप्न दे करता या? एक सम्पूर्ण प्रम का पूरे मा और शगर का प्रम, रात दिन का अनवरत प्रालिान, ऐतिर सुर और मानमिन भागनिरेक्-सर पांच वर्ष तर रहर मराम विलीन हा जाए। विन्नु हाय दमनिए लनेकर, वाग्दान और प्रविग्न प्रेम वे अभाव म होगा विवाह पाविव विवाह गरिन और बाडे के आधार पर । मून यात सो यह है कि सब-बुच मरत हा जाए, जम बच्चे के लिए सरल हा जाता १०५ । है हर गम का आटेग मिले और अच्छा और दुरा, किसी एक के द्वारा मनमान टग ग निश्चित वग्ने (अत स्पष्टत ) बनाया जाए। मैं बिल कुल इमने पथ में हूँ चाह ईसाइया की तरह हो और जितना ही सिसेली या वा को क्या न देसू । यद्यपि पाटिम ईसाई के लिए मेरे मन म स्नेह है, पर परिस ये पुरावे उपर मैंने भी जाना कि मैं स्वत ना स डरता है। इसलिए, जय हो स्यामी की। वह कोई भी क्यो न हो जो दवी विधान वा स्थान ले ले । 'हमारे पिता, जो अस्थायी रूप म यहाँ हैं हमार मागदाव, पुलक्ति पते वाले हमारे कठार स्वामी, मोर नित्य और परमप्रिय नायव ।' मक्षप में बहें नो या मि स्वत वन रतना ही, और अनुताप में अपन मे बडे बदमाग प्रादेगोवा पालन करना हा मूल तत्व है। जब हम सब दोपोहाग तभी यह गणतन होगा। और हाँ प्यारे दोस्त यह भी वि अवेले मरावं लिए हम बरला सना होगा। मृत्यु प्रदेती होती है जववि दासता सामूहिय है। दूसरा को भी मिलती है और मा भी उसी ममय जब कि हमे-और यही ता पराली बात है। अन्ना सब माथ पर घुटन टन और नतशिर । क्या यह अच्छा नहीं है कि हम बाकी सब गगार की भांति ही रह और उस लिए क्या परी नहीं है कि वासी ममार हमारी तरह ही हा? धमयी मान-गानि पुनिग उम एवापता ये पावन ससार हैं । उपक्षित प्रारोटय जन्तु की तरह गैडाया जाता हुअा, और बाधित मैं तभी दिया मासा किमरा मूल्य क्या है । मैं जा हूँ उमम रस ले सवाई और असम प्राक्त पा साना है। इसीलिए मेरे दोस्त स्वन मा ये प्रति पाटर करने मैंोन निणय क्यिानि जो भी माता मिल जाए उगीयो जल्दी से यह म्बनतामोंगटेनी परेगी। पौर जर भी पर गानाई मक्मिया गिटी वे अपन गिरजाघर म मैं उरटेगा ता। मैं उन मद्रजना यो ग्राम प्रण दामिअधिकार प्रतिमा म ममपण परदे पौर यिायवा दामना की मुविधामा यी याचार--- गह मुझस गवारा वापिस स्वतनमा का रूप ही वपासना पड़े। ..
पर में पगला नहीं गया है, मैं खूब जानता हूँ नि दासनातन्यान नहीं प्राप्त की जा सकती। तना ही ह कि भविष्य में यह एक बरगन सिद्ध होगी।तब तर मुझेनोवतमान के साथ निवाह करना है इसलिए किमी नामवलाऊ ममाधान की खोज करनी पडगा। इसीनिग मुझे पोरा तर निणय का विम्नार करलकाकाइ और माधन छूटना पडा तारि मरे अपने व घोंपर उसका भार कम हो पाएमुभ साधन मिल गए। खिडकी जरा खोल दीजिए। वही गरमी है बहुत ज्यादानमोनिएगा,मुझे टण्ड भी लगती है। मेरा विचार मरल है और उवर है किस तरह सबकापमा दिया जाए ताकि मैं स्वय बाहर चन मे बता रह सकू? क्या मैं वटुन से सम्मानित समकालीना की भाति उपगमा पर प्राम्ह होकर मानवता का गोमू बहुत खतरनार है यह किमी दिन याक्सिी रात बगर चेतावनी पेिहमी फूट सकती है। आप जानिणय औरा पर कर रह हाते हैं छिटर घर आपके ही मुह पर माता है और बुद ही भी परता है। तो इसन क्या आप पूयो हैं । यह है अमाधारण प्रतिभा का प्रमाण । मैंने जाना रिव्रत लिये हुए स्वामियो की प्रतीक्षा धरते हुए हम नागा को कोपरनिक्स की तरह तक को उलट देना चाहिए नारि जीत हमारी हो हो, क्योंकि तलाल अपने उपर निणय दिय विना दसरा पर दापागेपा नहीं किया जा सकता। इमलिए दूसरो पर निपटने का अधिकार पाने के लिए आवश्यक है रिअपन को पूरी तरह अभिभून वर ल । क्यादि हरएक निपायर किमीन किती दिन अनुतापा बन ही जाता है समातिए दूसरे छोर स रार पाडसर अनुतापा का व्यवसाय अपनाना होगा, ताकि रिमोन रिसी दिन अन मनिणाया पन मरें। पाप समझ रह हैं मेरी बात बहुत अच्छा पर अपनी बान और भी स्पष्ट करा लिए मैं मापता बताऊंगा कि मैं वन वाम करता है। पहले तो मैंन वदानत अपना दपार कर दिया, पेरिम छाडा और भ्रमण रिया। मैंने इगगरिया या निनाम बदनार दूसरी माह जमू जहाँ मुझ वाम यी कमी न हो। मार म बहुतेर स्थान हैं पर मयोग, सुविधा नियति काव्यग्य और साथ ही एक प्रकार के यात्म पीटा की आवश्यक्तान मुझे प्ररित क्यिा ! पानी और कोहरे स भरी नहरोपा मखलाया मे बँधी, विशेष रूप से भोड म भरी राजधानी चुाने वे नि-ऐमी जहाँ यि पृथ्वी ये चारो कोना में लोग आते थे। मैंने अपना दपतर नाविको के मुहल मे एक गरावयाो म स्थापिन किया। बदरगाह म विविध प्ररार के बाहर मियते हैं। गरीय घनायो वे मुहला म नहीं नात पावि सभ्य समाज के लाग चार काटत हुए एक चार इन कुत्सित स्थानों में पहुंच ही जाते हैं, जसा वि आप रयर देख चुके हैं। में खासतौर से यूशु पाकीगह देखता है और पथभ्रप्ट यूआ यो विपकर उगीमे मुझ अधिातम फल की प्राप्ति होती है। किसी दुलभ वापलिा गाव की तह मैं संगीत के सूक्ष्मतम स्वर उसी में निवालता हैं। स तरह मैं अपना उपयोगी व्यवसाय युध दिना से 'मेक्सिया सिटी म करता रहा है। उसक अनगत पहले ता यह है जसा प्राप असा अनुभव से जान गए है पिसावनिक पाप स्वीपरण जितनी यार हा सवे दिया जाए। मैं अपन वो पुरार पुगरकर वान-कोन म अप गधी पापित करता हूँ। युछ मुपित नही है क्यारि अव मुभ स्मृति का पग्लान प्राप्त हो गया है। पर इतना कह दूं मैं पापम दि मैं बहू ग म छाती पीट-पीटार अपने का दोषी नही ठहगता। नहीं मैं युगनता म र येता है भेट बिभेटा और इधर-उघर का वाताया हुए-या यह नियमोश्रोताये अनुरूप में अपने सगे का नाम लेना है और उग गाता हूँ वि मुभम वन चररह। जिन गाता का दूसग म सम्बध है और रिना मुझ ही म सम्बध है उन में मिला जुनाता । मैं 37 विापताना को चुनता हूँ जो गमान कप गहमलाना पो होती उन अनुभवा या ना हमन साथ गरे हैं उन समतोरिया का ना हम टोम हैं--पर-उध बट ढग पाहता है अगर 4 उप मुस्त मनुप्प वाम्नव म मा जो मुभम और दूगगें म मदपन करते १०७ शासन करता है। इन सबमा पर मैं म चित्रका निमा लान तो सबका प्रतिस्प है और किसी का भी नहा। या ह वि- मुोग है कुद-कुद वमा जामा म सम्मान किया जाता है ता मनाव और विशिष्ट भी होता है और निप्प्राण और गैनि-बद्ध ना दिन दबार तोग वह टन हैं "अर टनम नामित वगरे व नित्र वनकर नयार न जाता, उमा भान गाम हो गया है, तो मैं बडे दुःख व माथ उम दिदाता हैं, 'यह है मैं, हाय' वाला वी पोरन पागेपण ममाप्त होता ह । पर माय ही जो चित्र में अपन मन- कालानों का निखाता है वह दपण मी बन जाता है। अपमान मे लदा, वान नाचना चेर पर नाजून वे निधान निय, नविन बधन वानीप्टि मे देवताप्रा में समन्न मानवता के सामन वा हाना हूँ, अपन काचारा की कहानी राता हुआ पर दिना “म बात का मुजाय हुए पि कना प्रनार डान रहा है और यह कला मा कि 'मैं नीचा म निम्नतम है । नव चपन में मैं मैं की नगर 'हम' बहन लगता। जब तक मैं इन म्पर पर पहुँचता' कि 'एम म नव ता मेन मुम हा जाता है और मैं गातापा का घना बना सकता है। निचय ही में उही माहम मन परती ग म मार *किन मैं उनम श्रेष्ठ हैं इस बानु म विमुझे यह मानून है और एसलिए मुझे बातन का अधिगर प्राप्त । निवर ग आप सरा प्राया टप पाने ही। जितना हा में प्रश्न का पारोपावना अन्तुना हा मुझे पारवे वारे म निगाव करन का अधिकार मिलता। "मम भी अच्छा मैं आपन उक्साना कि पाप म्वय अपन विषय में निगम दें और मा मेरा स हद ना नार कम गजाता है । प्राहमरान हम अत्राम वाल्यिात जीव प्रोर पार हम अपन उजावन पर दग्मिान करेंताग अधमरा कमी न हागा दिनम में अचम्मा और ना हम जावनत करदें। करवा पार। पार मच मान, मैं वीमात मात्र प्राकाम्बीकरण मुनू। . ।
हँसिए मत हाँ, आप बडे वेडव मुवकिल हैं, यह तो मैंने तुरन्त ताउ लिया था। पर अनिवायन प्राप पहुँचेंगे वही। अधिकतर लोग दिमान होने की अपेक्षा भावुन ज्यादा होत हैं, वे एक्दम विनित हो जाते हैं । बुद्धिमानो के साथ कुछ समय लगता है। उनके लिए तो पयाप्न है कि प्रणाली उह पूरी तरह सममा दी जाए। वे उस भूलते नही मनन करते हैं। देर-सवेर, कुछ तो सिलवाड में, कुछ भावावेश में वे समर्पण करवे मव-युछ बता देते हैं। प्राप 7 वेवल बुद्धिमान हैं अनुभव से मो मेंजाए भी दीखत हैं। पर मान पाइए विमाज प्राप अपने रा उतन प्रसन नहीं हैं जितने कि पांच दिा पहल थे। अब मैं इतजार परगापि प्राप मुझे पर भेजें या यहाँ वापस नोट पोवि प्राप लौटेंगे इसरा मुझे निश्चय है। आप मुभम पाई अन्नर नहीं पाएंगे गौर में बदलूं भी यया जन कि मुझे वह पानद प्राप्त हो गया है जो मेरे अनुम्प है ? मी द्विविधता को स्वीकार कर लिया है, बजाय उसगे परेशान होन के । मैं तो उसम जम गया है और वहाँ मुझ वह प्रागम मिला है जिसे मैं जीवन मरता रहा है। मैं गलती पर था जर मैंन प्रापमे कहा कि मून बान यह है कि निर्णय मे बनो। मल वा तो यह है कि अपने कार चीज की छूट दो, चाहे यह भी हागि समय समय पर अपनी होक्षदा यो जोर-जोर से पापित परना पछ । मैं फिर म अपन वो हर चीत की एट देता है और इस बार रिना उस पर हेगी 4। मैंने अपने जीवन पाग वदना नहीं है मैं अब सी पपने को प्यार परला हे और दूसरोका उपयोग करता है। बस इतना ही है सिपने पापा मारतावरण मुमफिर सेहो नितम श्रीगण करा की मुविधा प्रदान मरता है और दारी प्रमानता दता है-पहलीतोप्रपा स्वभाव की मोर गरे एव मनमा पचाताप यो। जय गमन समाचार लिया है तब से मैं हर वाज के सामामा जाता है --पोरनों के दम ये अवय प्रायो। ये मोर यही सर नि उम पुगार भी जाया मज म इम समय बढ़ रहा है। मत म में ".
प्रमुवा प्राप्त कर लना होगा के लिए पार फिर में उस
चाई पर पहुंच पाईन्हा नक क्दन में ही च. पापा और ग
नमें हर एक पर निणयद मुस्ताहै। इन-लम्बे अरग वार
रिमो मुगवनी रात का मुन रिमी वनौ' र परहमा सुनावी पर
जाती है और मैं फिर मगरम पड जाता हैं। परगीन हो मैं समर
बचा देता हूँ। लागा का प्रो बातों को अपनी हीनताबोन वे नीचे,
और पिर में तुरन चमर जा।
तो मैं पासा इन्तु वार का 'मक्सिा सिटी म जितनी दे
आर पाता हामी जननी देर। यह सम्बन उगाहटा दापिए, मैं नाम
ना चाहता है। पाप ग्रामीन में प्रापको अपनी गती की मूग्म
व बताऊ कोंकि मुझे पार पनि एक प्राकाम्नह हा गया
है। मार रात रात मुन उनको या मित्रात पावि दे त हैं ।
प्रान दो गाम को मैं फिर बरसा दिना इनगमरता
और न ही अपने शन्न माम वचित रचना वाला है जद गराद
वास बनाम न्नम काईदेर हो जाता है प्रारमाना छाना पीटना
TF दता है । तब मैं और लम्बा हा उगना , मदार दाम्न और
सन्चा | नै मल र नास ऐनाः मैं गरि पर प्राप्त गाता हू
पोर मरी पात्रों के मामने ममता नत का विस्तार हाता है। पर
पिग परमामा व समान यनुब मना नो टचरित्रता पो पुरी
मानों का प्रमालयन वादना ग्निना मानता है। मैं पान दु.
ददलों क वाच सिंगमन पर माट हाता चन्दारिए
और मैं दवाई जनम्नाय कामपना पार चरत पात हुर वागोर
पाना मनिक निकलार । वघा पाप दटत हैं नमन समा
का वालगपरचना में दा रहा है। नत्र अग्नि हाय र
मापने चहपट माया है-नशामल दशा का निदा
पोर उगम पनापन न कर पान वाहत प्रो रहा मग #दिना
पार-गान रियल्या मरता बिना क्षमा ग्यि वयानुमति प्रानकता
हूँ और इसगे बडो वात-वि में यह अनुभव करता हूँ कि मरी पारा धना हो रही है। हो, मैं चन फिर रहा हूँ। एक मच्छ मगेत की तरह मैं पलग पर लेटा वम रह सकता था? मुझे तो पापम ऊंचा हाना जरूरी है चोर मेरे विचार मुझे उपर उठाते हैं। ऐमी रातों का, या यह कि ऐसी मुपह (क्यापि पतन उपानाल में हो हाता है) मैं बाहर जापर तशी मनहरो पविनार टहलता है। सुरमई ग्रावात म पग को तहे भोना पडतो जानी हैं वपोत कुछ मोर उपर चल जाते हैं और बनाने कार में एप गुलावी प्रकाश मेरी सप्टि के नम दिन वा घोषणा परता है । डोमस पर पहली ट्राम गाडी नम हवा म अपनी घटी बजाती है और यूरोप इस छोर पर प्राणिया पे जागन को गुचना देनी रे--इस छार पर जहाँ उसी क्षण हारा-लाग्या मनुष्य मर प्रजाजन, प्टिपूषा विस्नर छो' बाहर निात हैं मुहम कपाट भर, अपने अपने मान सीन पापा पर पान के लिए। तब इस महाद्वीप पर उडान भरते हुए, जो सारे या गारा अनजाने ही मर अधीन है उगने हुए दिवस को स्वर्णिम भाभा पापा परत हा दुनो घर में सुया होता है में रहना हूँ प्रापम कि मैं गुगौ हूँ मैं प्रापया पहन सोन दूंगा कि मैं सुग्या नहीं है मैं म यु-गयन मुवी र मोर मय गागर व्यापारी वायुमापाराह घद्वाप और यौवा जिगयी स्मृतियां मनुष्य पो नरा य म मा में फिर विस्तर पटा जा रहा ह मुझ माफ करें। मुझ पर है fr में पाया गया गाया पर मैं आंगू नहीं बहा रहा है। सभी पप्रादमी वहा जाता तथ्यो पर ना परत हुए उस समय भी जय जि उगन मद्जीवन प रहस्य बापनापा लिया होता है। मा मग गमाधान भादा ही है। पर जब पापाप्रपना गौवन पर दन हा जव पापमो पर गाा हा वि जाया बायना ही पगाता परा पामाई मन नहा रह जाता है या रह जाता है ? वोई दूगरा व्यक्ति २ स्न मानवनिए क्या रसात है प्राप' असम्भव है। आदमी को राध भी होन मैथिनि त्याग दनी पडेणे, अपना स्वत्व दूसर के लिए मुना देना पगा। म-न-कम एर वार पर बने मेर प्रति ज्यादा पोरन हा अप। मैं ग्यवृत भिमारी तरह हूँ ना एक दिन का १ चटर पर मरा हाय छोर हो नहीं हो पा "अाह, श्रीमान इतना ही नहीं है वि माल वोट अन्याई नहीं है, पर प्रादमी मे डर लादा ही है कि वह प्रावी ग्मा का भी नाब।' हाल्न प्रकार की रना मादा है व मुमाल भी और उनकी वह पुनीत निदापिता भी जाप्रपन राक्षमारत हैं। लिए, विर गिर रही है। प्रोप में जरूर बाहर जाऊंगा। पटेल रानि म माया मा एम्लहम, वफ न दवे पुरावे नीचे गहरी हरा नहरें, मूनो सदरें मरी दवा हु पगप्यनि-वह हासी पाचनता चाह कर पित होक्या न हो, बल के कोचर ये पहला दबिए, बटर- वा मुदपलेंडिका देगी पर बरपा रही हैं । जहर ही भाव हो। अन्तु म निन्दप रत ही है नीचे उतरन ग, व प्यारे पद पानी को और छतों को परों की माटी वह मटक त हैं, हर विको क मामन फरार हैं। क्या मामा है' प्रालि अभी नवर ही लाए शोहर व्यक्ति तर लाए हो, क्या ' वैदल नि चुन हा नही।मतिमारठिनाइयों का सामा हागा और उहानिए, अार प्रारमहर रात मेरोवातिर जमीन पर सायेंगे। मान राए नि प्रारम्बग म मुझ ले जान के लिए पाई विमान उतर मारा या वफ में आना ना नो पापम्नम्मित रह जाएंगे। आपको वाम न-' न मुझे हा। परता मा बाहर जाना भरे लिए नरी पदा-प्रष्टा में पाया जाता है पवा नहीं। मर मावा वापौर प्रताप यादमा गम्भीर न ममभिए । निमनित है । अर पदभार गुमरा बारे म दान बरनवाल है ता मैं देखूगा दि मेरे त मय कर देने वाले स्वीकरण TET उद्देश्य पूरा हुमा या नहीं। असल मे मैं हमगा आप परता रहता है कि मेरे साथ पार्ने क्रो वाला कोई पुलिस घाला होगा और मुझे 'दि जस्ट जजन' की चोरी के मपराध म गिरफ्तार कर लेगा। सही रह रहा है न कि वाका याता के लिए कोई मुझे गिरफ्तार नहीं कर सकता? पर जहाँ तक उस चोरी का गवाल ह यह कानून के गिजे म है और मैंने सब व्यवस्था इससी पर ती है कि मैं उसका सह-अपराधी माना जाऊँ। मैं उम मतावृति को रसे हुए हूँ और जो देखना चाहता है उने निपाता है। तो आप मुझे गिरफ्तार करेंगे यह तो गुभारम्भ हागा। पर पाप पुलिस वाले तो हैं नहीं होते तो पडी प्रासानी हो जाती। क्या प्राह मुझे यही तो ना थी। ता जो अजीर सा लगाव मुझे प्रापवे लिए महसूस हाता था उसका कुछ प्राधार या ' ता पाप परिम म पालन या गौरवगाला पसा करते हैं। मुझे लगा था जि हम एव' ही जाति के हैं। हम सब क्या एकम नही हाते, निरतर बालते रहत हैं पर विसी "यक्ति विशेष में नहीं मा उही सवालों का सामना करत रहते हैं यद्यपि उनके उत्तर पहले स ही हम मालूम हाते हैं । तो यूपा पर बताइए मुझ मन नदी के घाटा पर ण रात पापका क्या अनुभव हुमा था और कम पाप अपनी गान सतरे में न डालन रा या समाप स्वय व जामरी रातामगिरतर प्रतिघ्यनित हाते रहे हैं और जिर अापक मुह र प्रागिर में वह सगा प्रो युती र बार फिर पानी मजा नापि मुझे मनाना कायवान माम अवसर फिर मिले। दूमरा प्रनगर। पाप मा तरलार सुभार है। माना पीजिए मरे मातिर किमारी वायर मान ली जाए ता? तब ता हानाय राव करना पानी पिनना रहा है। पर हम क्या पाहा' अब तो बहुत दर हा गई। हमला लिए बदतर हो गई-भाग्यदा। पदजाएगा-ग्राम- 'पतन' मे आए विशिष्ट सदों का अर्थ धोमगनोर एक प्रागतिहासिक जाति-विशेष, तिसके अवक्षेप १९६९ में काम में कामानान नामक गुफा म पाय गएप। घेवल को मौनार वा वित्र वी एव क्या के अनुसार जल प्रलय के बाद नूह क जगत में जा मनुष्य वच गए ये उन्होंने वेवल में एक ऐसी मोनार दनान का वादा उठाया जा पाका काछू ले। पर सबकी भाषा अलग-अलाहान के कारण यह मीनार कमा न बन सका। इस लिए प्रानकारिप भाषा म ऐसी जगह को जहा सब अपनी अपनी बात कहते हा पर कोई किसी दूसरे का बान समझना न हो, बेबल कामानार' कहत है। सदमा ईसा के बावनकाल में यहूदियो का एक सम्प्रदाय जो भूत प्रना, परिश्तों और पुनजम म विश्वास नहीं रखता था। ज्वाजा हाट की मवम बढी नदी। दाम-वानिग विजती की माड जो मारा गद खीच लेती है। माहल्नि 'हना का नायक' (नाइट आफ द स्वन) नाम जमन दत-क्या म पनिवार नामर पारवा पुन: तोजन माफ पानर काम की सर्वोच्च सम्मानसूचक उपाधि । सानदेगन मार्मी (मुक्ति मेना) धार्मिक परोपकारी मस्था । शामिन रमादया वा एक सम्प्रदाय विशेष जिसकी स्थापना मन्त मासिस न १२०६म की थी। परनार एक प्रकारका मादक पय। पन मास का नया विमा रिनारे परिम नगर दमा हुअा है । एना पिगला द्वीप पर ज्वालामुखी पक्त । प्यारो दाएं भूमध्य रखा निट चनने वाली बाएं जिनके महारे पुरान नमान में व्यापारी जहाज चना करत थे। धेनस रामन न्दता निसके ता मुह य, एक प्राग और एक पार्छ । प्ता र चार पनाम 'ना एक पश्चिमी पहनावा । हि गोर प्रान व वनमान राष्टपनि जा द्वितीय महायुद्ध म बहुन प्रसिद्ध पाइन वामवों गताब्दी के महानतम दनानिर और दागनिक गिने मापसता वे सिद्धार की स्थापना को। कर (१५६६) मात कामामी वजानिक और दानिर। इजन वार नारियों का कुव्यात नजरबन्दी पम्प जहा हजारा-लायो मन नायर रह चुरे हैं। ११५ - यहूदिया योयत्रणाएं देकर मौत के घाट उतार दिया गया था। दाते (१२६३ १३२१) प्रख्यात इतालवी कवि। लिम्यो रोमन क्योलिक घम-प्रथा के अनुसार वह जगह जहाँ ऐसे लोग मरन के बाद भेजे जाने हैं जिह जीते जी गिरजाघरवी कृपा प्राप्त नही हुई, पर जो इतन पापी भी नहीं थे कि उह जान-बूमकर पाप करने वाला कान दिया गता। इसोल्ले किंग पाथर से सम्बन्धित एक प्रेम-कथा की पात्रा जा रार ट्रिस्न में प्रम करती थी। अपनी पत्नी के विश्वासघात के कारण (पली कानाम भी इमोल्हे था)सर ट्रिस्टन को अपने प्राणा से हाथ धोना पडा । अपने प्रमी के वियोगमइसोडे ने भी अपने प्राण दे दिये। दोना को एक कन्नम दफ्नाकर उस पर गुलाव और अगूर की दा बरों लगा दी गई जो एक दूसरे म इस तरह मिल गई कि उहें अनग वरना असम्भव हो गया। गिलोटीन मास की प्रान्ति के समय प्रान्तिकारिया न अपने विरोधिया वे सर काटन के लिए इस यत्र का प्रयोग किया सुई चौदह (१६३८ १७१२) फास का बादशाह । फैरो प्राचीन मिस्री यादगाह । डेय चेयस जहाज की सुती छत पर इस्तेमाल की जान पालो कुसियो । लिटल ईज टावर प्राफ लदन में यातनाएँ देन के लिए बनायो गइ काल कोठरिया। इवेम्जेतिस्ट एमईसाई सम्प्रदाय । ल्यूक ईसाइ स त जिहोन ईमा का जीवन-वृत्त लिखा है। पीपर इमाई गत हि स्वय ईसा ने सतावाता चुना था। एपाइजा इसाइन के वाटगार गार के समय के एक पैगम्बर । येरमियर एक प्रख्यात चित्रसार। फोप्रा प्रा एव कामीमी परवान । टगेग्ला चौरस्वी पतानगवे वाद प्रख्यात गनापति। दि जस्ट जजित चित्रवाना की एक प्रस्यात कृति । गां (पट) हालट वा एप प्रसिद्ध नगर। मरोगग्ट मासागामी। पोस्टोनियन ममरीका के प्रम्यात योस्टन नगर निवामी।