Adarsh Library, Jaipur
Shaal Walo Ki Deip
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शालवनों का द्वीप
विद्या प्रकाशन मन्दिर
PA
Hola
शालवूनों
শামীণ
তালী
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भूमिका अपने मित्र और मापी श्री मानी को इस रचना पर दो पद लिसते हुए मुझे एक साय गौरव भी है और हर्ष भी। उन्होंने बस्तर में मुझे जो उदार गहयोग दिया, उसमें पहाड़ी-माड़िया-गोंडों के सामाजिक जीवन और नृतत्य के अध्ययन की सफलता में मुझे अत्यन्त टोग महायता मिली। आज उन दिनो की कोई भी पर्चा ययवा उन पहाडी-माहिया-गोंडों की कोई भी यात मुझे महमा नास्टेनजिया और मुराद स्मृतियों से भर देती है। मैं अयूझमाड-पहाड़ियों को तराई पाले एक गांव औरया में अपनी पत्नी के साप डो यर्प रह गयाऐगे क्षेत्र में जो आज भी भारत का रायमे अधिक अछूता, पिछडा हुआ और विरला-बमा इलारा है। इस तेजी में बदसते संसार में ओरछा के लोग आज भी अपनी संगहों परस पुरानी, ठेठ पारम्परिक, लेकिन गम्भवतः सबमे अधिक मूल्यवान जीवन पद्धति से चिपके हुए हैं और उसे रिसी कीमत पर भी सोहना नहीं पारले। एक माडिया गोड़ पा पर पहाड़ियो, यनों और नालों पर होता है। यो गाय के दामन में लगकर बहने वाली नदी, जिसे बोरठा यातों ने अपने गांव के नाम पर नाम दे रहा है, के तट पर धान के रोत दी जा सरते हैं, मेकिन गोड अथवा जंगा कि वे लोग अपने को पुरारते हैं, कोई सूर लोग, रोती की प्राचीनतम गति दाही' को छोड़ने के लिए आज भी कई तपार नहीं । यहाँ चार, दालें, मेम लोसो, वान, और दूसरी कुछ सजिया पहाटी-यन को काटने जलाने, साफ करने और योने की मरततम पति के अनुसार उगाई जाती हैं। जिन हथियारों का उपयोग किया जाता है, ये है देवन । ५ ६ कुदाली और कुल्हाड़ी। लेकिन ये वनीय-पहाड़ उनके केवल खेत नहीं हैं-ये अनेक घरेलू उप- योग की चीज़ों-मसलन, पत्तल-दोने या टोकनी-चटाई आदि के वृक्ष-वन या वांस-वन के महत्त्वपूर्ण-भण्डार हैं। वन घने हैं, जंगल प्राणों या धन से भरपूर और कभी-कभार तीर-कमान से किया हुआ चीतल, सांभर, खरगोश या वनमुर्गी का शिकार उनके खाने की एकरसता को तोड़ता है। वर्षा के दिनों में इन्हीं पहाड़ियों से अनेकों छोटे-छोटे और तेज़ झरने फूट आते हैं जिसके जल को खेती के पास रोककर वेशुमार मछलियाँ पकड़ी जाती हैं। यही नहीं, इन पहाड़ियों में इनकी और भी व्यक्तिगत और निजी सम्पदा छिपी हुई है-इन्हीं के इस या उस पार, असंख्य छोटे-छोटे समूहों में शेप कोईतूर जाति बसती है, जो वास्तव में किसी भी एक जगह नहीं वसती, बनजारों की तरह दस जगह वसती है, दस जगह उजड़ती है। इन्हीं पहाड़ी के पार वाले नन्हें-नन्हें गाँवों से ओरछा के नवयुवकों के लिए वधुएँ माती हैं अथवा यहाँ की नवयुवतियां वधू बनकर पहाड़ी पार के गाँवों को जाती हैं और इस तरह सारे अवूझमाड़ की कोईतूर जाति एक-दूसरे से रक्त सम्बन्धी रूप में सम्बद्ध रहती है। त्योहारों के अवसर पर-~-मसलन, वसंत-ऋतु में मनाए जाने वाले शृंगार पर्व 'काकसार' पर 'कोईतूर' युवक पहिले एक और फिर दूसरे गाँवों में धार्मिक समारोह मनाने, युवतियों के साथ उन्मुक्त होकर नाचने- गाने, जी खोलकर शराब पीने अथवा शामों को रंगीन और दिलचस्प बनाने के लिए जुट जाते हैं। इन्हीं उत्सवों में अलग-अलग गांवो के युवक और युवतियों के बीच मधुर सम्बन्ध स्थापित होते हैं और अक्सर ये ही सम्बन्ध अबूझमाड़ की अनेक शादियों के आधार बनते हैं। कोईतूर जाति मूलत: सुखी लोगों का समुदाय है और उनके बीच की जिन्दगी मेरे जीवन का एक अत्यन्त सुखद अनुभव । अक्सर अलस्सुवह और देर-गई शामों को, गांव के पास वाले वन के किसी सलपी पेड़ के गिर्द जुटने - वाले लोगों में मैं भी शामिल हो जाता। एक जलती हुई अंगीठी को घेरकर हम लोग बैठ जाते और अपने-अपने पाल-पात के दोने से पेड़ की ताजा उतरी मलपी पूंट-पूंट पोते हुए गौव-जवार की चर्चा करते। सवेरे के अव- गरों पर मारे दिन का कार्यक्रम यहीं तैयार होता। अगर कोई उत्सव आदि का आयोजन होना हो तो सारी सामग्री तैयार है अथवा नहीं, यह देखा या विवार दिया जाता। हरेक को अपने परिवार की ओर से मूअर, मुगं या अनाज आदि पूजा के लिए भेंट करना पडता। किसी विशेप 'लस्के' अथवा पुरोहित को किसी पड़ोसी गांव से निमंत्रित करने पर विचार-विमर्श किया जाता। स्वयं ओरछा में एक नही तीन-तीन पुरोहित हैं। लोगों की आस्था है मि इन पुरोहितों में देवी को आमंत्रित कर अपने शरीर पर धारण करने थो नमामान्य क्षमता होती है और यह कि लोग केवल इनके ही माध्यम में अपने देवी के माय मीधे-सीधे बातें कर सकते हैं। ऐसे उत्सव बडे उत्तेजक होते हैं । 'लस्के अपवा पुरोहित नगाड़े की धुन पर पहिले तो उन्मुक्त और सुला नृत्य करते हैं फिर यमकर, कांपती हुई उत्तेजक और देव-मुलभ वापी में बातें करते हैं। ये लोगों को अपना कर्तव्य-पालन करने, गेतों की देखभाल करने और नियमानुसार चढाय देने की सलाह देते हैं । लेकिन कभी-कभी गांव की खुशहाल जिन्दगी को आतंकित करने वाली दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं जैमी कि एक बार हमारे यहाँ रहने के दौरान हुई। हमारे पड़ोस में रहने वाली एक नवयुवती को एक आदमखोर शेर ने दिन-दहाडे मार सला। वह गांव को कुछ और युवतियों के साथ जंगल में पत्ते तोडने गई थी और यह घटना घटी। दूमरी युवतियां चीख मारती हुई गांव नाग आई, लेकिन क्या हो सकता या आदमखोर दोरी वा भय कोई नूरो मे निरनर बना रहता है क्योकि ऐमी मौत सम्भवतः मवसे अधिक भयावह होती है। सतरे और भी हैं और ये हैं बीमारियां, जिनका अन्त कई वार मृत्यु के साथ होता है। पेचक इनमें सबसे अधिक प्रापलेवा है । कोईतूर लोगों वश्वास है कि देवी माता-दाई, जिस व्यक्ति से रुष्ट होती है, में ले लेती है। चेचक के दाने इस बात के चिन्ह हैं कि देवी ने व्यक्ति आक्रांत कर लिया है। ऐसे अवसर पर सारी रात नगाड़े बजते हैं र माता-पुजारी चेचकग्रस्त व्यक्ति पर निरन्तर मयूरपंख झलता है, स विश्वास के तहत कि बीमार को किसी अलौकिक शक्ति का संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। फिर 'लस्के' देवी को आमंत्रित करता है। देवी बताती है कि वह क्यों नाराज़ है और उसे प्रसन्न करने के कौन-कौन से उपाय किए जा सकते हैं बावजूद इन समस्याओं,खतरों तथा सिर पर निरन्तर मँडराने वाले भय के, कोईतूर लोग प्रसन्नचित्त रहते हैं। नाच, गाने और शराब उन्हें प्रिय है और उनके साथ विताए हुए खूबसूरत दिनों के लिए मैं मन-ही-मन कृतज्ञ हूँ। विशेषकर वे शामें भुलाना कठिन है, जो मैंने किसी परिवार के साथ, अहाते के भीतर जलने वाली गर्म अँगीठी के गिर्द वैठकर, जंगली जानवर, फसल या आनेवाली किसी वाजार-यात्रा पर चर्चा करते हुए विता दी हैं । ऐसी ही चंद वे रातें थीं, जो मैंने घोटुल में विताई-घोटुल, जहाँ शाम होते ही गांव का सारा युवा-रक्त इकट्ठा हो जाता है। युवक और युवतियाँ पारस्परिक गीत गाते और ऐसे धीमे सधे हुए और लययुक्त कदमों के नृत्य करते हैं जो उनकी विलक्षण संस्कृति के ही अनुरूप होता है। और मेरी स्मृति में बसे हुए हैं सबसे अधिक स्वयं ओरछा के गूम वरी, मासा और रेको जैसे लोग जो मेरे और पत्नी के सबसे घनिष्ठ मि थे। फिर वहाँ का पटेल उसेन्डी लकमा था जिसने बेहद उदारतापूर्वक केवल समय, आतिथ्य और ध्यान दिया वल्कि कोईतूर लोगों की जी पद्धति समझने में मेरी बड़ी मदद की। शायद ये मित्र नृतत्वशार पारिभापिक अर्थ अंत नहीं जान पाए, जीवन-पद्धति कोस के लिए निरीक्षण तथा उसका एक हिस्सा बनकर चलना कितना जर यह वे अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने हमें समाज में विलकुल एक वारिक सदस्य स्वीकार किया और 'पेपी' तथा 'परी' लेकिन एक । की तरह ६ बडे भाई और उसकी पली) कहकर पुकारा । बाहरी रूप के पीछे भी, जो मनुष्य को अलग-अलग संस्कृतियों में विभाजित करता है, एक मूलभूत मानवीयता छिपी होती है और मैं समझता हूं कि ओरछा में इस तथ्य को हम लोगों ने परस्पर अच्छी तरह समझा था। बासिर नृतत्वशास्त्र का सत्य ही यही है कि मानव जाति के यार को ही नहीं, उसके भीतर छिप मनुष्य को भी समझा जाय । मेरे प्राध्यापक स्व. रावट रेडफोल्ड अवमर पहा करते थे कि किमी पराई जीवन-पति का अध्ययन दो तरह से किया जाना चाहिए। एक, वैमानिक का तकनीकी और समाजशास्त्रीय विस्तृत प्रतिवेदन । दुमरा, किगी उपन्यामकार अपवा मृजनशील लेखक का चुनिंदा, गूम तथा संवेग- पूर्ण विवरण । ऐगे ही मंयोग मे शायद एक विशाल परिप्रेक्ष्य-युक्त तपा अधिक गहरे अर्यो वाला चित्र उभर सकता है जो कि अकेले एक दृष्टिकोण मे प्रायः सम्भव नहीं हो पाता। श्री शानी की यह रचना गायद उपन्यास नहीं, एक अरपति मूक्ष्म मं. दनायुक्त मृजनात्मक विवरण है जो एक अर्थ में भले ही ममाजविज्ञान न हो लेकिन दूसरे अर्थ में यह समाज-विज्ञान में आगे की रचना है। एक गृजन- गोल रचनाकार के रूप में घटनाओ तया चरियों के निरूप में भी शानी यी उम स्वतन्यता मे मुझे ईया होती है जिसका अमर तकनीकी विवरणो' में आवश्यक रुप से अभाव होता है। श्रीशानी द्वारा प्रस्तुत मानव-जाति के एक भाग का यह अध्ययन, समग्न मनुप्य-जाति को समझने की दिशा में एक योगदान है। गोहार। एडवर्ड जे.जे., पी-एच. डी. एमोसिएट प्रोफेसर ऑफ एमापॉनाजी, केलिफोनिया स्टेंट पालेज, हायडं, गयुस गम्प अमेरिका 3. Jay, Edward J., A Tribal Village of Middle Ir.dia, ph D. dissertation. The University of Chicago, August.1963.
दो शब्द - 'शाल वनों का द्वीप' उपन्यास नहीं है। यात्रा-वर्णन भी इसे आप नहीं कह सकते। मध्यप्रदेश के वस्तर, वस्तर के घोर आदिजातीय भू-भाग अबूझमाड़ और अबूझमाड़ के ओरछा नामक एक छोटे-से गाँव के सामा- जिक जीवन और उसके यथार्थ का यह एक कथात्मक-विवरण है। इसके माध्यम से मैंने वहाँ की विशिष्ट आदि-जाति माड़िया-गोंड़ों की जीवन- पद्धति, रीति-रिवाजों, परम्पराओं, रूढ़ियों और धार्मिक तथा सामाजिक मान्यताओं के मलवे में दवी मनुष्यता की पीड़ा और उल्लास--दोनों को पहचानने की कोशिश की है। समाज-विज्ञान अथवा नृतत्त्वशास्त्र से मेरा सम्बन्ध नहीं के बरावर है। मूलतः और अंततः मैं कथाकार हूँ और वही मेरा प्रिय क्षेत्र भी है। स्व-. भावतः मुझे इस जीवन पर उपन्यास लिखना चाहिए था । पहिले स्वयं मैंने भी यही चाहा था, लेकिन बाद में कई कारणों से यह विधा मुझे अधिक उपयुक्त लगी। किसी आदि-जातीय जीवन को उसकी समग्रता में बांधकर, उसकी समस्याओं व विडम्बनाओं की तटस्थ और गहरे अर्थों वाली अभि- व्यक्ति लिए उपन्यास का पारस्परिक ढांचा कम-से-कम मुझे बड़ी सीमाओं वाला लगता है। नागरीय जीवन और संस्कृति में पले-बड़े किसी भी ईमानदार लेखक की शायद यही कठिनाई होगी। जिस जीवन से आप आन्तरिक या अनुभूति के स्तर पर अपरिचित हैं, उस पर पत्रकारिता भले की जा सके, उपन्यास किस तरह लिखा जा सकता है, यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। शायद इस वर्ग का सच्चा उपन्यास तभी लिखा १० जाएगा जब इन्हीं में से कोई लेखक उभरकर आएगा और अपनी तथा अपने वर्ग की प्रामाणिक अनुभूतियों को साकार दे सकेगा। सभी पिछड़ी जातियों और विशेषकर वस्तर की आदि-जातियों के मम्बन्ध में आमतौर पर एक एकांगी धारणा पाई जाती है। यह कि ये बेहद मुगी हैं, उनके जीवन में अपार उल्लास है, येइन्तिहा संगीत है और कभी न थमने वाले नृत्य हैं। अजीब बात है कि मैंने उन्हे जहां तक निकट से दंगा है, उसके आधार पर मेरे सामने एक और सामानान्तर तस्वीर उभ- रती है---ऐसी, जिमै पहिली तस्वीर अपनी भावुकता या चोर दारावे के मारण भले ही ढाप ले, लेकिन जिसमे शायद उनका अधिक मानवीय और यास्तविक चेहरा अंकित है । मुझे यह सोचकर ही हैरानी होती है कि किसी भी जाति या वर्ग का जीवन चन्द रिवाजो, गोतो व विविधता का बोध परने याती मान्यताओं में ही होता है ? बहरहात, यह कथा-विवरण ओरछा का है, इसमें घटने वाले लोग ओरडा के हैं। यही निरूपित और संकेतित वेदना, समस्याएं, व विडम्बनाएं प्रामाणिक रूप से उसी जन-जाति की हैं। लेकिन क्या इन सबकी सीमा- बन्दी ओरडा में ही हो जाती है ? क्या इन्ही स्थितियो अथवा इनसे दम गुना अधिक जटिल परिस्थितियों में सारा अबूझमाड नहीं जी रहा है ? और क्या यही सब बस्तर या किसी-भी आदिवासी क्षेत्र जीवन में नहीं घट रहा? --शानी ४/२५ साउय टी. टी. नगर भोपाल।
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कांति
और
साधना भाभी
के लिए
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शाल वनों का द्वीप From the forests and highlands we come, we come.
पोबरमे के लिए ही मही, मा-माया घर भी वीरान छोड़ दिया जाए तो तिना अपरिचित लगता है, इसका अहमाम मुझे पहिली वार हुआ। जंग हो एड ने कॉटेज का दरवाजा खोला । कमरे की सीलन भरी व फ'- दपाई-मी गंध के माय भीतर मे गैमेवजीन पाउडर का भभका आया । एक साटिकरकार नाम मलते हुए एड ने कमरे मे प्रवेश किया। उसके पीछे- पोधे में और फिर अमरसिंह। सारा घर अन्न-व्यस्त और गंदा पड़ा हुआ था। फर्श पर कई दिनों का इकट्ठा कचरा और गर्द ! कटिज शायद हफ्ते-डेढ-हफ्ते के लिए ही बन्द छोडी गई थी, लेकिन उतनी छूट में घर को हुलिया बदल गई । लगा, उग बेरोक-टोक वीरानी में चूहो ने बेहद उत्पात मचाया है। सतरे के सूखे छिनके, विस्कुट के साली डिब, अधजले मिगरेट और दियासलाई की जली हुई तीलियो-मबका जगह-वेजगह अवार था । जैसी हालत लिविंग रूम की थी, कमोबा, उगी स्थिति में एड का वेडाम भी था। घासलेट का टिन उलटा पड़ा हुआ था। मिल्क पाउडर का डन्या सुला व खाली था। मेज़ पर की पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों पर चूहों की कई-कई बैठक हुई थी और साट की ममहरी वडी हो दयनीय मी टंगी हुई थी। "देवत हो, पर की क्या हालत हो गई है," सारे दृश्य को एक नजर में भरकर खिसियानी-मी हमी हंसते हुए एड ने कहा- "इसीलिए इतने अरसे के लिए मैं पर मूना नहीं छोडता।" भमरसिंह और मैं दोनों ने बारी-बारी से एड की ओर देखा। वमी हो.
शाल वनों काद्वीप . हँसी के प्रयत्न हम लोगों ने भी किए और अलग-अलग खड़े हो गए। कुल दो कमरों की कॉटेज, सामने-पीछे बरामदे, एक किचन और उसी से सटा- कर जीप के लिए उतारा गया कच्चा शेड । घर के वे दो कमरे ही सब कुछ थे। पहिला लिविंग, स्टोरिंग व डाइनिंग का मिला-जुला काम देता था। दूसरे में स्टडी व बेडिंग थी तथा कुछ खास-खास सामान रखे हुए थे। मस- लन, टीन की बड़ी ट्रक, फिल्मों की पेटियां, टाइपराइटर, मेडिसिन-वाक्स आदि। "वह तो शुक्र है कि मेरे साथ फ़िलिस नहीं है," एड ने पीछे के आँगन की ओर निकलते हुए कहा-"वर्ना यह सब देखकर वह आग हो जाती। तुम जानते हो न, वह यह सब विल्कुल बरदाश्त नहीं कर पाती।" मैं कुछ कहूं कि पीछे के आंगन से सहसा अमरसिंह की चिचियाती-सी आवाज़ आई । मेरे पास से हटकर वह कब बाहर निकल गया था, इसका पता हम दोनों को न था। "साहब, यह दड़वा देखिए..." बाहर आने पर परेशान चेहरा लिए अमरसिंह ने बताया। आंगन के किनारे वाले मुर्गी के दड़वे के पास वह जैसे आश्चर्यचकित-सा खड़ा था और एकटक दड़वे की ओर धूरे जा रहा था। "क्यों, क्या हुआ ?" कहते हुए जैसे ही एड निकट पहुंचा वह भी जैसे ठगा-सा रह गया । दड़बे का दरवाजा खुला हुआ था, उसके ऊपर वाला फूस का छाजन आधा उड़ चुका था और भीतर दो-एक क्षत-विक्षत मुगियों के शवों के अलावा उनके नुचे हुए पंख और जख्मी डेने पड़े हुए थे। यों उसके आगे समझने के लिए कुछ भी बाक़ी न था। लेकिन तब तक जीप की आवाज़ और चहल-पहल से गांव वाले इकट्ठे हो गए थे। मालूम हुआ कि पिछली रात चीते ने दो-तीन और घरों पर धावा किया था, पर आहट शोर सुनकर भाग गया। अवश्य उसके बाद सूने घर का मुगियं वाला दड़वा उसकी गिरफ्त में आ गया होगा । परिणाम-स्वरूप कूद-फॉर कर व फूस की छाजन उजाड़-विगाड़कर उसने सारी मुर्गियां साफ कर ।
पालवनोदीप और पिल-स्वरूप छा गया-छ नुपे हुए पंस, टेहए और एक- दो पीष्टियों से लिपटे शव.. "ओ हेल!" एड ने मनाए हुए स्वर में पहा---'यही तो मटारह- बोस में एक भी नहीं बनी।" सचमुच, एड तो जमे भौंचकरा रह गया कि उसकी महीने मी मेहनत पर चीते ने अकस्मात पानी फेर दिया। यह गौर साग तौर पर पि.निम का पा। उनी ने आग्रह करके दाया बनवाया था और एक-एक परक अटारह-बीग मुगियों की संख्या कर ली थी। जब तक वह गांव में ही उनकी मारी देखभाल वह खुद किया करती थी। अब भी सरानऊ मेहर गप्ताह आने वाले उमरे पत्रों में मुगियों का जिक्र बराबर होता । मह पूछना यह कभी न भूलती कि सारी मुगियो सही-गतामत है अथवा नहीं। कौन-गी मुर्गी बड़ी हो गई, जिमने देने शुरू पिए और किसने बन्द, मादि। "परसो मेरे घर का नया पछा गया." गाय थानो में से एक युटने पहा-"रोज की तरह गोटान में अपनी मां के पाम यंपा था। मर नसीय मी नीट गया कि गाय के चिन्नाने की आवान तक नहीं सुनी। जागा तब, जय किपीता उमे ले भागाथा..." "और येबारे माह का कुत्ता!" किमो ने हमार याद दिलाया और एड की ओर देगार बोला--"पेपो, दुमी यान है कि नहीं। वहीं यारियां बंधती है. यह गरीब यही बंटकर रोज रात को भोगा करता था। पीता माया परियों के फिराक में आता होगा। आमिर नहा रात पु.ते को भी मार ले गया..." थोड़ी-मो हंसी के बाद धोने से सम्बन्धित मन्य अनेक छोटी-मोटी घट. नाभीमा वल्लेस हुआ । गापार चौदह महीने उम गोय में रहने रे याव. जूद उन मरको एड उतने ही ध्यान से सुन रहापा जिमना किम जी गया पा और जिसने अपने जीवन में से आप कभी नहीं देंगे। ये मागवान कितनी डरावनी और रोमापित करने वाली पी! मोग पौत के उस्तानी २० शाल वनों का द्वोप को यूं चर्चा कर रहे थे जैसे किसी घरेलू विगडैल कुत्ते की शरारतों की बातें हों। मैं सिर से पांव तक सिहर गया-~-मुझे एंड के साथ अबूझमाड़ मे दो महीने काटने हैं और उसका पहिला दिन ही यूं आता है कि... “यहाँ तो सब ठीक है," अमर सिंह ने डोडी (ग्रेनरी) से नीचे उतरते हुए कहा--"ताला लगा है और भीतर अनाज भी वरावर भरा है।" एड ने ज़रा चौंककर झंझलाई आँखों से अमरसिंह की ओर देखा, वोला कुछ नहीं । वैसे भी ग्रेनरी की जाँच करने के लिए उसे किसी ने नही कहा था। अबूझमाड़ मे हर घर के सामने अनाज रखने की डोडी बनी होती है । अक्सर माने पर उसे यूंही खुला छोड़कर लोग हपतो गायब रहते है । लकिन अनाज-वनाज की चारी कभी नहीं होती । इतने अरस तक वहाँ रहने के बाद भी एड इस तथ्य को न जानता हो, क्या यह सम्भव था? म अमरसिंह की ओर दखन लगा। उस रात वावजूद थकान के वड़ी देर तक हम लोग जागते रहे। एड ने शाम स ही बन्दूक और टाचं तैयार रखी थी कि शायद चीता फिर आए। शायद इसीलिए दड़वे से मरी हुई मुगियों हटाई भी नहीं गई थीं । भीतर पेट्रोमेक्स जला कर हम लोग वठे थे, लकिन आँगन में जरा भी खटका होता ता धीरे स बन्दूक उठाकर एड दवं पांव बाहर निकल जाता। खटको या आहटों की ओर वन्दुक तान बैठा रहता, पर थोड़ी दर वाद निराश होकर उसे लौटना पड़ता । यह क्रम वड़ी रात तक चलता रहा, लेकिन प्रत में चीते को न आना था, उस रात वह नही आया । ओरछा! तीन अक्षरों के इस नाम को दुहराते हुए आज भी मेरी आंखों के सामने नील रूपवाली सुन्दरी माड़िन नदी आ जाती है। अबूझमाड़ मैं माड़िन के कई रूप है-झारा घाट के पास अथवा छोटे डोंगर के उतार पर, जहाँ के अकेले वन मे, ऊंची पहाड़ी जैसे माडिन के जल में घुटनों तक माल बनोकादर पाव डुबोए गडी है और नीन और क पपरी परे के कारण पता न. जमा जन नीला और पारी हो गया है। उमा भागे, जहाँ सहमपाना गामने आती हुई मानो रास्ता रोकर गही हो जाती है और हांगडा गाव के किनारे-किनारे के रेतीले तटो वानी माठिन जिसमें टापू मी सरह पाली कानी घट्टानें उभरी हुई है ?--गस्त, गरदरी और मंगों परम पुगनी ! मध्य प्रदेश के दक्षिण पूर्व में १५१२७ वर्गमीन से घेरे में भारत का सबसे वडा जिना यस्नर वमा हुआ है । यो तो अपने ऐगे रिमी परिषर का मोहताज नहीं होना चाहिए तो भी उल्लेरा के लिए इतना वासी है कि इमरे पश्चिम में महाराष्ट्र. पूर्व में उडीगा तया दक्षिण में आन्ध्र प्रदेश है। सम्पूर्ण क्षेत्रकन मे मे २०७४ वगेमोन अपवा १६ प्रतिगत भूमि में गेली होती है तथा शेष में रक्षित अरक्षित वन, नदी-नाले, पहाडिया और मायादी है । मारे बम्नर में ११ प्रमुग योगियों योनी जाती हैं। मगमग ३६ प्रति- मान लोग गोडी बोलते हैं-दमकी भी मोन प्रमुग गापाएँ हैं। मुरिया, मैदानी माहिया तया पहा माहिया। अयूझमाड़ की पहाडिया अधिकांगत: नारायणपुर तहमील में मी हैं। इनकी जनसंख्या सगमग ७०००० है जिगम में १०००० लोग पेस पहाड़ी माटिया है। उत्तर वस्तर रा अधिमा भाग पने जगली, पहाडियो, नदी-नानी में पिराया है। छोटे डोगर रक्षित दनी रे टोक दक्षिण में औरया गांव वगाहमा है-मुन्दर, रमणीक व अस्पन धात्रिम ! इमी के दौरे परिमन से अबूझमाड़ की पहाड़ियां आराम हो जाती है-लोनी, चीनीची नपा धंगनावरा "माहिया गोडग ऑफ यस्तर" के प्रमिस मगर निगमन के अनुमार अबूझमाड़ की ऊंचाई २०५० मे ३३२२ पुट तक है मौर महने अंगी पोटो मंगनार परगना के पुरानार के निस्ट है। पो परे में भगभग १५.० वर्गमीस तक फैली हुई है। जनगस्या का पनरय इम पास में २२ शाल वनों का द्वीप ६.६ व्यक्ति प्रति वर्गमील है । यद्यपि ओरछा अबूझमाड़ के पूर्वीय किनारे परल्ला हुआ है, लेकिन यह स्वयं अबूझमाड़ का एक भाग है--प्रमुख तथा अत्यन्त महत्वपूर्ण । उस सुवह उसी ओरछा वाली माड़िन के जल में घुटने-घुटने तक डूबे हुए हम लोग बड़ी देर से नहा रहे थे। लेकिन क्या वह नहाना सचमुच नहाने जैसा था ? कपड़े उतरे हुए थे और सारा शरीर नंगा था। कभी रेतीली तट पर वेपरवाही से हाथ-पांव फेंककर चुपचाप लेटे हैं, कभी किसी चट्टान पर बैठे दूर से चुपचाप वही आती माड़िन की धार देखते रहे हैं अथवा विना बात किए चुपचाप वन का शोर सुन रहे हैं । जनवरी के दूसरे सप्ताह तक की दोपहरी कितनी मादक हो जाती है ! घूप अत्यन्त प्यारी लगती है और पहाड़ियों से घिरी वन की हवा बेखुद तथा नशीली। मन होता है कि वहीं कहीं निष्क्रिय वैठे समय को चुपचाप सरकते जाने दो... ऊप्स! सहसा एड के मुंह से यह आवाज़ निकली। दरअसल, उसके हाथ से साबुन की टिकिया फिसलकर गिर गई थी। दोनों बाहें डुबोकर वह उसे ढूंढने लगा और जल्दी-जल्दी ऐसा करने के कारण उसकी झुकी हुई पीठ धूप में और भी लाल होकर चमकने लगी। कहाँ अमेरिका, कहां भारत, कहाँ बस्तर और उसमें भी कहाँ अवूझ- माड़, मैंने सोचा। एड को देखकर जैसे विश्वास ही नहीं होता कि वह किसी और देश का आदमी है। इतने अपरिचित और अजनवी मुल्क में कोई इतनी दूर से आएगा और केवल माड़ियों के जीवन को निकट से देखने के लिए साल-भर ओरछा में रह जाएगा, यह मैं सोच भी नहीं सकता था। जब पहिली बार एड-दम्पति से भेंट हुई थी तव भी मन में यही मविश्वास था। शिकागो विश्वविद्यालय का अठाइस वर्षीय अमरीकन माम वनों कादीप स्कारर नवपरिणीता परती सहित यस्तर के वनों में रहेगा, यह मात किताबी लगती थी। अपने अध्ययन के लिए उचित स्थान भी सपाग में जब सारे बस्तर का दौरा हुआ सब भी मैं ही साप पारदक्षिन यस्तर बागांव. गांव जानने के बाद आगिर उतर आए । नारायणपुर गा-बंगले में टहर- कर पहिले सोनपुर-गरमकोट का सारा इलाका देगा और अन्त मे ओरडा पहुंचे तो यही गांव अध्ययन के लिए मागिर निश्चित हो गया। लगभग गाल भर पहिने का वह दिन अच्छी तरह याद है जब एर दम्पति के गाय में अयूझमाड़ आया था। जितने नये वे पे, उम उगा के लिदान से उतना ही नया मैं भी था। वह प्रथम अवसर पा जब मैंने जाना किअजनवी देश में आरिचित और अजानो भाषा हो तो रितनी पुटन होती है ! हमारी भाषा न ये समझे न उनकी भाषा हम, गनीमत यही हुई कि बस्तर को लिया का हल्वी के पोडे-बहुत शान ने मेरी बड़ी सहायता पी, अन्यथा उस गांव के पटेल और परिणामस्वरूप गांव वालो से बातें करना असम्भव पा। कुछ पहिले अबूझमाड़ में बिना अनुमति के प्रवेग सरला गैर-मानूनी माना जाता था, सेपिन अब एगी रात नहीं है । वहा के नियामी लोग पहिने पहन हर याहर के आदमी को अविश्वास की दृष्टि से देयते सपा उनसे भय पाते हैं । जय हमारी जीप गांव की पानागुड़ी के पास पहुंचकर सीसद भी यही हुआ था। इमली के मिले जुने पेड़ोसी पनी छाव मे गेलते कई बच्चे हर कर भाग गए थे। मोरने दरवाजों के पीये टिमर देखने लगी थी और आदमी अपने-अपने घरो के मामने सहमे गे गये थे। पोडी देर बार धीरे-धीरे सोग इकट्ठेहए और जर एर की योजना उनके सामने रगी गई तो एरबारगी कोई स्वीकार रनको संपार न हुआ। मभी ने एक-दूसरे की ओर मागंचित कोषों में देखा और कई प्रश्न रणे गए पे-"ये मोग कौन हैं ! यहाँ में आए है इनका देश शितनी दूर है ? क्या जगदमपुर से भी आगे? हमारे गांव में क्यों रहना पाहते है?" स्तिनी देर तर उन्हें समझाना पल, पहपहना टिन है। वाहम २४ शाल वनों का द्वीप लोग दो बजे आए थे और शाम हो गई। उन लोगों को यह विश्वास दिला सकना कि ये विदेशी लोग उनका कोई अहित नहीं करेंगे, क्या आसान बात . थी? मैं उन्हें किस तरह बताता कि वे लोग क्या काम करना चाहते हैं ? आखिर यह तय हुआ कि सभी गांव वालों की एक सभा होगी और उसमें जो निर्णय किया जाएगा, वह अन्तिम होगा। एड-दम्पति की बात तो दूर रही, स्वयं मुझे विश्वास न था कि उन लोगों का निर्णय पक्ष में होगा, पर शायद भाग्य ने साथ दिया और इस शर्त पर एड-दम्पति को वहां रहने की अनुमति मिली कि गांव वालों को जरा भी असुविधा होती दिखाई दी तो उन्हें तत्काल गाँव छोड़ना पड़ेगा। सम्भवतः स्वयं एंड ने वैसे सहयोग, प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता की अपेक्षा नहीं की थी जो उस एक वर्ष में अनायास ही उन्हें मिली । अव स्थिति यह है कि एड दम्पति उस गाँव के अभिन्न सदस्य हो गये हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे माडियों के गाँव में होता है कि हर एक व्यक्ति दूसरे से किसी न-किसी सम्बन्ध या रिश्ते से आत्मीयतापूर्वक जुड़ा है। गांव के लोग एड को 'पेपी' कहते हैं और वह उस और दूसरे सम्बन्धों के अनुसार लोगों को आता, दादा या मामा आदि-गांव के प्रत्येक दुःख-सुख में वह समान रूप से भागीदार है। -"आज का क्या कार्यक्रम है ?" नदी से लौटते हुए मैंने एड से पूछा। तट के पार बांस की पीली पड़ती झाड़ियों के बीच से एक पगडण्डी शाल वन में निकल गई है। वापस गांव पहुंचने के लिए कुछ देर शाल बन में से होकर गुजरना पड़ता है। एक बार में एक ही व्यक्ति के चलने लायक पगडण्डी पर आगे-आगे केवल एक निकर पहने एड चल रहा था। खूब चटक धूप में उसके अभी-अभी धुले सुनहरे बाल चमक रहे थे। माडिन पीछे छूटती जा रही थी और शाल वन में बनसुग्गे तथा मैना की मीठी किल- कारियों के साथ कठफोड़वा की किट्ट-किट्ट को आवाज लगातार गूंज रही थी।
शाल वनों का द्वीप २५ --"आज तो कोई खास काम नही," एड ने बिना लौटे मुझे जयाय दिया--"एक-दो घरों मे सोशियल-काल के लिए जाना चाहूंगा। तुम्हें बताया था न कि मेरा फील्ड वर्क करीब-करीव खत्म हो गया है। चोदा. सा बजट आदि का काम रह गया है सो उसे तुम्हारे रहते-रहते निवटा लूंगा।" बजट यानी माडिया परिवार की सालाना आमदनी और यचं का ब्योरा। समाज-शास्त्रीय दृष्टिकोण से, किमी भी जाति के मामाजिक अध्ययन के लिए आर्थिक पक्ष का लेखा-जोखा चाहे जितना जरूरी हो, 'बजट' शब्द का प्रयोग माड़ियो के सन्दर्भ में मुझे बड़ा अजीव-मा लगा। जहाँ मेरे जैसे मध्यम-वर्गीय भारतीय के परिवार का ही कोई बजट नहीं, वहाँ उन अभागों का क्या बजट होगा जो कुल वालिस्त-भर का कपडा पहि- नते है, कठिन परिश्रम और सघर्ष के बाद दो जून जैसे-तैसे पंज-यमिया पति है और अकसर ठांव-कुठाँव जानवरो और जंगली जानवरों से चीथ जाते हैं। पर मैं क्या कहता' कुछ मनाएँ शब्दो के अर्थ के अनुरूप नहीं होती। उनका काम केवल एक संस्कारगत नाम भर दे देना होता है । और माट्रियों के ही सन्दर्भ मे जब हम मानवीयता की बात करते हैं तब भी उनके पीछे क्या वही संस्कारगत तथा सम्बेदनहीन सम्बोधन ही होता है ? जनवरी की शाम । उम दिन ओरछा कितना पराया-पराया और अजनबी. सा लग रहा था। चारो ओर को कोहरा-पी पहाड़ियों से उतर कर धीरे. धोरे शालवनो मे दुवकता हुआ अंधेरा। उममे आहिस्त-आहिस्ते मनी जाती फूम की झोपड़ियो, ढलवां मैदान से दूर तक फैली हुई भूरी धाम और यहां वहां वेतरतीवी से खडी बांस को अनगिनत माड़ियाँ दूर के वनों से चरकर मवेशी कब के हलवान में लौट चुके थे । इमली की छाब में खेलते हुए बच्चों की चिल्लाहट कम हो गयी थी और वनी में किमी मन्थ्या कोट का अजीव उदास-उदास-सा शोर उभर रहा पा.
२६ शाल वनों का द्वीप चिक! चिक! हम लोग पटेल के घर की बाड़ी में उसके बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते हुए बैठे थे। अहाता खूब बड़ा था और उसमें किनारे-किनारे तीन झोंपड़ियां, एक डोडी और केवल एक बड़ा आंगन था। आंगन के बीचों- बीच खूब मोटे-मोटे लट्ठों वाली एक अंगीठी जल रही थी जिसे कुछ लड- कियों ने एक तरफ से घेर रखा था। दूसरी छोटी अंगीठी डोडी के नीचे जल रही थी जिसके पास कोई बुढ़िया वैठी हुई थी। "आओ, वहां अंगीठी के पास ही चलकर बैठते हैं," एड ने ठण्ड से सिहरकर एकाएक उठते हुए कहा,-"यहाँ तो शाम से हुए कहा,-"यहां तो शाम से ही कितनी सर्दी पड़ने लगती है ! तभी पटेल भी आ गया और हम तीनों-चारों अंगीठी के पास बैठ गये। वहाँ पहिले से बैठी हुई लड़कियां उठकर दूसरी अंगीठी के पास चली गई । एड के ग्रुप में मैं नया आदमी था। अतः पटेल कुछ पहिचानती हुई आँखों से मुझे देख रहा था । ओरछा में काम शुरू करते वक्त के दिनों में एड ने हिन्दी अंग्रेजी दुभापिए के रूप में जार्ज नामक एक ईसाई सज्जन को नियुक्त किया था, लेकिन अपनी आदतों के कारण वह टिक नहीं पाया। ऊबकर कुछ दिनों पहिले एड ने जार्ज को छुट्टी दे दी थी। शायद पटेल ने पहिले-पहल मुझे उसी दुभापिए की जगह कोई नया आदमी समझा था। एड ने साल भर पहिले ओरछा में प्रथम प्रवेश का उल्लेख करते उसे मेरी याद दिलाई तो भी उसके चेहरे पर कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। बताया कि मैं मिय हूँ और एक-दो माह एड के साथ ओरछा में ही गुजारने माया हूं। "और वाई कब तक आ रही हैं ?" पटेल ने उत्सुकतापूर्वक पूछा। वाई याने एड की पत्नी फिलिस, जो दो-तीन महीनों से लखनऊ गयी हुई थीं । पति-पत्नी दोनों के लगभग मिलते-जुलते सपने हैं। दोनों एन्थ्यपाला जिस्ट्स-मानव-विज्ञान के विद्यार्थी हैं। दोनों इस विषय पर शोध करके पी-एच० सी० फर लेना चाहते हैं। अन्तर फेवल इतना है कि एड को शाल वनो का द्वीप थीसिस का क्षेत्र मानव-समाज है और फिलिस लगूरो का अध्ययन कर रही है। ओरछा में जितना कार्य सम्भावित था उसे करने के पश्चात् फिलिस लखनऊ चली गयी थी। लखनऊ के आसपास कोई गांव है जहां वन्दरो- लंगूरों की धूम है । फिलिस के अध्ययन के लिए उपयुक्त स्थान । -"अभी तो उसके लौटने में एक-दो माह और लगेंगे।" एड ने पटेल को बताया। -"बिना घरनी के घर मूना नहीं लगता?" पटेल ने मुस्कराकर पूछा-"अब तो बहुत दिन हो गये। सभी कहते हैं कि".."कहते-कहते उमने डोडो के नीचे वाली अंगीठी के गिर्द घिरी औरतो की ओर देखा और हेमकर बोता- "कहते हैं कि अब जल्दी ही बुला लो।" अंगीठी के पास की कुछ औरतें हसने लगी और वही बैठी किसी अधेड-सी महिला ने गोंडी बोली मे कुछ ऐसा चुभता हुआ वाक्य कहा। कि एड का मुस्कराता हुआ चेहरा सहसा लाल हो आया। --"लो, लो, बीड़ी पीयो।" हंसते-हंसते एड ने जेव से बोडियां निकाली और पटेल की ओर देखकर यूं बोला जैसे संकोच दूर कर रहा हो। सबो ने एक-एक बीड़ी लो-हिन्दी गोडी के दुभापिए अमरसिंह ने, मैंने, सात-सात, आठ-आठ वरस के दो-तीन लडको ने, तथा स्वय एड ने। जब पटेल का अवसर आया तो एड को छुए बिना बोडी लेने के लिए उसने दूर से ही हाथ फैला दिया। सम्भवत एड को भी इस सम्बन्ध मे तब तक कुछ ज्ञान नहीं था। वह अपना हाथ बढाए जा रहा था और पटेल छू जाने के भय से हाथ पीछे खीच रहा था । अन्त मे अमरसिंह ने ही मुस्कराकर स्थिति स्पष्ट कर दी कि एड को उसे नही छूना चाहिए । कारण पूछने पर पहिले बताया गया कि वैसा करना 'पोलो' है। बाद मे पूरे विवरण मालूम हुए। पटेल की पत्नी उन दिनो चौके से 'बाहर' थी, इसलिए वह तो अस्पृश्य थी ही, रिवाज के अनुसार पटेल को भी छूना इसीलिए वर्जित माना जा रहा था । प्राय ऐसे अवसरों पर माडिया स्त्रियां घर-चौके में प्रवेश नहीं करती । प्रत्येक माड़िया परिवार के अहाते में कम-से-कम तीन अलग- । ।
२८ शाल वनों का द्वीप अलग झोंपड़ियाँ होती हैं--एक में चौका-चूल्हा होता है तथा परिवार का मुखिया-दम्पति सोता है, दूसरी झोंपड़ी खासकर घर की युवा तथा कुंआरी लड़कियों के सोने के लिए होती है और तीसरी झोंपड़ी ही इन अवसरों अथवा और गृह के काम आती है। अपनी परम्परा के अनुसार हर युवा स्त्री महीने में तीन दिन इसी घर के काले कमरे में जैसे कैद रहती है। लोग उसका चेहरा देखना भी पाप समझते हैं। केवल नियत समय पर कोई-कोई दूर से खाना खिसका देता है और सारे समय अपने को छिपाए हुए वह वहीं वन्द रहती है। "पत्नी की बात और है," एड ने पटेल से कहा-"लेकिन तुम्हें क्या हो गया है ? क्या तुम्हें भी दूर से खाना दिया जाता है ?" पटेल ने मुस्कुराकर धीरे से सिर हिला दिया । -''और धार्मिक काम-काज हो तो?" - ‘ऐसे मौके पर किसी भी काम के लायक नहीं रहते." पटेल ने जवाब दिया-"और तो और पवित्र स्थानों में हम लोग जा भी नहीं सकते धार्मिक काम-काज में भाग लेने की बात तो दूर की है ।" एड ने आश्चर्य-विस्फारित नेत्रों से मेरी ओर देखा। अमरसिंह धीरे- धीरे मुस्कुरा रहा था और डोडी के नीचे वाली अंगीठी के गिर्द आग तापती औरतें तथा युवा लड़कियाँ गर्दन फेरकर हँसी छिपा रही थीं।
दो वहाँ से उचटकर सहसा मेरी निगाहें पहाडियो को और उठी तो जमी की जमी रह गई.--कितना अद्भुत दृश्य था ! अंधेरा पूरी तरह फैल चुका था। पटेत के आँगन की अंगीठी और दूर पाम की इसकी-दुवकी झोंपड़ियों को टिमटिमाती रोशनी के अलावा मव नही माह-स्याह ऐसे में उत्त काली पहाड़ी पर उतरते आग के सैलाव को देखकर मेरी आँखें हैरान ही रह गई तो क्या आश्चर्य ! सचमुच, वैसा अभूतपूर्व दृश्य मैंने जीवन में कभी नहीं देखा था। पहाडी पर एक जगह कई-कई आग के दरिये वहे आ रहे थे और धीरे-धीरे उनका फैलाव बढ़ता जा रहा था। वहां कई रेखाएँ थी और कई आकृतियां । लग रहा था जमे अमख्य मशाले लिए कोई फौज पहाडी में लगातार नीचे उतरती आ रही हो और उसी की शाखाएँ प्रमा- खाएं इधर-उधर फूट निकली हो। एक मिलसिला है, जो खत्म ही नहीं होता। -~-''जंगल जल रहा है !" एड ने मुझे उस ओर आश्चर्यभरी आँखो से ताकते देखकर वताया। जैसे उस एक पक्ति से मेरी आशंका बता देना चाहता हो कि वह आग का सैलाव क्या है। - "कमे ?" मैंने उसी स्वर में पूछा-"क्या अचानक आग लग गयी है ?" अपने विद्यार्थी जीवन मे मैंने दावानल को यात सुनी थी। सुना था कि जंगल में अकस्मात भी आग लग जाए तो तुरन्त दूर-दूर फैल जाती दूर कर "अचानक नही, हम लोगों में में किसी ने लगाई होगी। मेरे प्रश्न का उत्तर पटेल ने अपने आप दिया-"पंडा के खेत तैयार हो रहे हैं ३० शाल वनो का द्वीप - क्योंकि अब कुछ अरसे बाद कुटकी बोनी शुरू हो जाएगी।" कुछ समझते और कुछ न समझते हुए मैं चुप हो गया । पटेल से कुछ कहना व्यर्थ है। यों भी पेंडा खेत की तैयारी की सूचना के साथ मुझे सब समझ जाना चाहिए था। अबूझमाड़ के पहाड़ी माडियो में खेती करने की वही आदिम और पुरानी प्रणाली है । उनके यहाँ धान के खेत नहीं केवरा- वर हैं । लोग कुटकी या कोल्हा नुका खाते हैं और उसकी उपज के प्रयत्न बहुत सीधे-सादे हैं। पहाड़ी के किसी ढलवानवाले भरे-पूरे नए शालवन में आग लगा दी जाती है। जब उस जगह का जंगल जल कर खाक हो जाता है, ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के लम्बे तनों के बदले केवल छोटे-छोटे भुने हुए ढूंठ रह जाते है और सूखे पत्तों के अम्वार से ढंकी हुई ज़मीन पर केवल राख उड़ने लगती है तब वहां की मिट्टी खोदी जाती है । वहाँ हल-बक्खर का भी कोई गुजर नहीं, सिर्फ कुदाली या फावड़े से थोड़ी मिट्टी उलट-पुलट ली जाती है और कुटकी और दाल के वीज छिड़क दिए जाते हैं-मोटे तौर पर पेंडा खेत का काम यहीं समाप्त हो जाता है । जब फसल पकने पर आती है, बच्चों को छोड़कर सारा परिवार अपने-अपने पेंडा खेतों पर जाकर अनाज काट लाता है । वाज़ छोटे परिवार वाले लोग पहाड़ी के नीचे वाला अपना घर छोड़कर ऊपर खेत में ही चले जाते हैं। वहीं खेतों के बीच छोटी-सी टपरिया बना ली जाती है जिनके नीचे फसल कटने तक दिन-रात रहकर सारा परिवार अपने खेतों की रखवाली करता है। घने जंगल और विशेषकर पहाड़ी में हिरन, चीतल सांभर या खरगोश आदि जानवरों से खेत की सुरक्षा क्या साधारण बात है ? सहसा बाड़ी के प्रवेश द्वार के पास एड की टार्च की रोशनी फिर लौटी। एकाध मिनट पहिले उठकर वह बाहर चला गया था। अमरसिंह अपनी जगह जमा हुआ था-पूरी तरह मुस्तैद। वाहर कोहरा पड़ा रहा था । अंगीठी का बड़ा लट्ठा जलकर थोड़ा पीछे सरक गया था और उस पर ढेर राख पड गई थी। पटेल तब भी अनथका उकठा पत्ते की चोंगी शाल वनों का द्वीप पी रहा था। अलबत्ता डोडो के नीचे की एक-दो लड़कियां सर्दी के कारण लुढककर अंगीठी के पास हो गई थी और बुढ़िया बैतरह ऊँघ रही थीं। - "इट्म आफुली कोल्ड, नो?" कहकर जोर-जोर से अपनी हथेलियां रगड़ता हुआ एड लौटा और और सिहरता हुआ अंगीठी के पास वैठ गया.। अमरसिंह ने अपने साथ लाई हुई थली सामने कर दी और एड की ओर देखकर इशारे कुछ पूछा। क्षण भर बाद खाली थली एक और कर दी और शराब की दो बोतलें निकालकर अमरसिंह ने सामने धर दी। अवश्य पटेल की आखो मे चमक पैदा हो गई होगी जिसे अंधेरे के कारण मैं नहीं देख सका। थोड़े से शाल पत्ते खीचकर वह सराव पीने के लिए छोटे-छोटे प्याले बनाने लगा। -"तुम्हारे पेंडा के कितने सेत हैं ?" मैंने इस बार सीधे पटेल से पूछा। -"दो-तीन है।" -"और धान के ?" -"आठ-दस।' --"इतने चावल का क्या करते हो ? मैंने कहा- "तुम लोगो के यहाँ तो ज्यादा कुटकी खाई जाती है न ?' "-लेकिन पेंडा के इतने खेत कहां से लाएं ? पटेल ने एड की ओर देखकर कहा-'आसपास की सारी पहाडियां वेकार हो रही है। ऐसा ही रहा तो यह गांव कुछ वर्षों मे उजड जाएगा।" पटेल की बात में न आवेश था, न अतिशयोक्ति। अमूमन माडिया परिवार किसी एक गांव मे तीन-चार वरस से ज्यादा टिककर नहीं रहता। उनका सारा जीवन केवल भटकाव मे वीतता है। जहां पहाड़ी देखी, वन देखा, जला डाला। उसी की तराई मे दो-चार झोपड़ियां लगा ली और रहने लगे। साधारणतः एक पेंडा खेत तीन वरसो बाद उपज देना बन्द कर देता है और परिणामस्वरूप वह गांव उजड़कर किसी और पहाड़ी के नीजे.
शाल वनों का द्वीप . बस जाता है। लेकिन ओरछा धीरे-धीरे करके दूसरी तरह का गाँव होता जा रहा है। अव्वल तो वह अबूझमाड़ का सर्वसे बड़ी आबादी वाला गाँव है और कमोवेश, माड़ के प्रवेश द्वार पर पड़ता है । वरसात के चार-छह महीने छोड़कर बाकी दिनों में वहाँ तक जीप आ-जा सकती है। स्कूल हाल में खुला है और नहीं तो वन विभाग वाले तो हैं ही। बहरहाल, ओरछा अबूझमाड़ का होते हुए भी जैसे उससे कई मानो में अलग जा पड़ता है। वहाँ एक वंश या गोत्र नहीं, कई-कई गोत्र व जातियों के लोग रहते हैं। पर्याप्त संख्या में गाय-बैल पाले गये हैं। हल वक्खर चलते हैं और मैदानी खेतों में धान की उपज काफी होती है । अबूझमाड़ के बेशतर गांवों का यह हाल है कि किसी पहाड़ी के नीचे आज जो गांव बसा नजर आ रहा है तीन चार वरस बाद देखें तो वहां जंगल ने झाड़ पूर दिए हैं और लोग उजड़कर गांव के नाम समेत कहीं और बस गये हैं। यह उजड़ने व बसने का सिल- मिला सदियों पुराना है और ऐसे ही चल रहा है। - "सुना है कि यह डाही खेती सरकार कानूनन वन्द करने जा रही है," पटेल को सुनाते हुए मैंने एड से कहा। "क्यों ?" -"ख्याल है कि इससे काफी जंगल वरवाद होते जा रहे हैं।" -"डाही खेती क्या ?" पटेल ने पूछा। -"यही जो तुम लोग जंगल जलाकर करते हो।" पटेल जैसे मेरी नासमझी की बात पर हँसने लगा। वोला-"सरकार कैसे बन्द कर सकती है ?" -"क्यों, जब कानून ही बन जाय तो क्या करोगे ?" "यहाँ मानेगा कौन?" पटेल ने मुस्कराकर कहा-"वही तो हमाग खाना-पीना है। चावल से तो पेट भरता ही नहीं। हां, तीज-त्यौहार की वात और है।" कानून न मानने की वात जैसी दृढ़ता से पटेल ने कही उससे चकित -- - शाल वनों का द्वीप होकर में एड की और देखने लगा । डाही खेती सदियों पुरानी उनकी पर- म्परा है। जिसे एकाएक तोड़कर बदल देना आसान नहीं। सचमुच, क्या होगा यदि ऐसा कानून ही बन जाय? क्या किसी सामूहिक विरोध की सम्भावना हो सकती है ? क्या यह हो सकता है कि... अचानक सारे वातावरण में महुए की शराव की वैज गंध फैल गई- अमरसिंह बोतल से शराय निकालकर पत्ते के प्यालों में डाल रहा था। सिवाय मेरे मभी ने एक-एक प्याला सम्हाला । डोडी के नीचे वाली एक-दी महिलाएँ भी आई और शराबनोशी में शामिल हो गई। खुद एड भी अपने प्याले का हिस्मा गटगट पी गया। महुए की शराव उससे पी नहीं जाती, यह शिकायत उसने कई वार की थी, लेकिन मैंने देखा कि पीने के दौरान उसके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई। जिस समाज को जानना है, नृतत्व- शास्त्री के लिए उसका एक अंग वनकर चलना ज़रूरी है। इसमें कई चीजें समाज के मन की करनी पड़ती हैं । भले ही जी मे उसके लिए नफरत हो । अव यही दम-पे-दम बोड़ियां फूंकना या सबके साथ मिलकर महुए की तेज दुर्गन्ध वाली शराव पोना, क्या एड के मन की बात हो मकती है ! जब शराब बंट रही थी, उस समय पटेल खामोश था। पर थोड़ी देर याद वह बहकने लगा। कई तरह की बातें उसने शुरू कर दी जिनमें सबसे प्रमुख यात आपत्तिस्वरूप यह थी कि मैंने शराब क्यों नही ली? क्या गराब पीना बुरी बात है ? क्या ऐसे लोग सराव होते हैं ? और जो वे लोग पीते हैं, इसीलिए क्या सचमुच बुरे हो गए हैं ? कुछ बहकते और न बहकते हुए एड ने समझाया कि उसमे खरावी की तो कोई बात नहीं, केवल अपनी. अपनी रुचि का प्रश्न है। उस समय मैं यह सोच रहा था कि इन माडियों के गांवों में कल अगर मद्य निषेध हो जाय तो ये लोग क्या करेंगे? क्या ऐसा कोई भी कानून वहां प्रवेश पा सकता है ? जिससे इनका एकमात्र मनोरजन शराब हो हो, जिनके यहां शराव के बिना हर सामाजिक-धामिक उत्सव अधूरा हो उनके जीवन से शराव को एकाएक सोंच लेना क्या साधारण घटना होगी?
३४ शाल वनों का द्वीप - वही परिन्दा, वही आवाज और वही शालवन, केवल समय के भेद से आवाज़ के प्रभाव में इतना अन्तर आ गया था। दोपहर को छूती सुवह के वातावरण में पंडकी का वही चिर-परिचित स्वर गूंज रहा था, पर अजीव बात है कि उस समय वह आवाज़ किलकारी-सी आती थी, यही स्वर भरी दोपहरी के सन्नाटे में एक अजब-सी वीरानगी पैदा करता है। आज शाम को इसी आवाज़ से एक जकड़ती हुई उदासी-सी महसूस होती है, और अब ? "अब ?" मैं बाहर ही ठिठककर एड के निकट आने की प्रतीक्षा करने लगा। जाहिरा तौर पर मैं इन्तजार कर रहा था, लेकिन वैसे शायद यही सोच रहा था कि वहाँ प्रमुख कौन है -पंडकी की आवाज़ या वह समय, जो हमें चारों ओर से घेरे हुए था ? "-केये घर पर है ?" पूछता हुआ एड मेरे नजदीक आया, पर मेरे जवाव की प्रतीक्षा किए विना स्वयं ही बाड़ी के दरवाजे तक चला गया। थोड़ी देर बाद वहीं से मेरी ओर देखकर उसने आवाज़ दी-"आ जाओ, हैं. सभी हैं।" जिस परिवार का बजट लेने हम लोग आए थे, देखा उसका मुखिया कोये मांगन में ही बैठा चटाई चुन रहा है। अकस्मात हम लोगों को अपनी दहलीज पर देखकर भी उसके चेहरे के भावों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। बहुत हल्के-से मुस्कुराकर पहले उसने हाथ रोक दिए फिर बैठने के लिए पुरानी चटाई सरकाकर उसी तरह अपने काम पर जुट गया। "-जोहार !" निहायत अनौपचारिक ढंग से बैठते हुए एड ने कहा । उसी का अनुसरण करते हुए अमरसिंह और मैं आकर चटाई के एक- एक कोने में बैठ गए। संभवतः हम लोगों को सुविधा का ही ख्याल रखते हुए केये ने भीतर की ओर आवाज़ दी- -- "रेको वेटी, एकाध चटाई और दे जा!" वैसे हमलोग सुविधापूर्वक बैठे हुए थे, अतः मना करते रहने पर भी चटाई आखिर आई ही। चटाई लेकर बाहर आते हुए क्षण भर जो दारीर दहलीज की ओट में ठिठकगया था उसकी ओर मेरा ध्यान भी गया . .
शाल धनो का द्वीप था। उस एक उचटती हुई दृष्टि में मैंने देखा था कि केये की विटिया रेको एकाएक सामने आने में झिझक रही है। फिर जब वह चटाई लेकर आ ही खड़ी हुई तो सहसा यह मानना कठिन हो गया कि रेको कुआरी तथा अनन्याही युवती है। वह तो मुझे अपने ढलवान पर खडी एक ऐसी औरत लगी, जो संयोगवश ही अनव्याही रह गई है। ऊपर नाभि से लेकर गले तक और नीचे आधी जंघा से लेकर टसनों तक पूरी सुली। बीच कमर में कपडे का एक छोटा-सा टुकडा और वस । कुआरी लड़की का रूप क्या ऐमा ही होता है ! एक नजर मे में सिर से पांव तक उसे देखा गया-कम-से- कम ३१-३२ की उम्र, फल दे चुके केले के पेड़-जैसा उतरा-उतरा व टीला जिस्म, गले में बहुत थोड़े-से माला मूगो के हार, मैले रंग वाला कातिहीन चेहरा, जो गुदने के निशानो से भरा पड़ा था और ऐमी आंखें जिन्हें देखकर वेसाना तालाव तट के छोटे-छोटे गड्ढो की याद आ जाए। ---"जोहार पेपी ।" चटाई डालने के लिए झुकते हुए उसने एड की ओर देखा और मुस्करा कर बोली । जवाब देकर एड भी स्नेहपूर्वक मुस्कु. राया। फिर अमरसिंह से हंसकर गोंडी में कुछ कहती हुई रैको चली गई, तभी शायद वातावरण कुछ मुक्त हुआ। पिछली रात रेको के बारे में बड़ी देर तक हम लोगो में बातें होती रही। जव तक फिलिस गांव मे थी, रेको प्राय. रोज आकर एड के यहाँ बैठ जाया करती थी-विकुल एक सहेली या परिवार की सदस्या की तरह । सभवत आत्मीयता के उसी सूत्र ने फिलिस के माध्यम से एड को कही जोह रखा है । रेको के सम्बन्ध मे बातें करते हुए वह उमको परिस्थि- तियो के साथ कितना घुला-मिला लगता है ! --"क्या तुम भाग्य पर विश्वास रखते हो?" रात, एड के इस आकस्मिक प्रश्न में मैं वैतरह चौंका था। पटेल के यहाँ मे लौटने के बाद उसने मेरे माथ घोडी सलपी पी ली थी, अतः मुझे लगा कि वह बहक रहा है। पर शायद वह बात न थी। पूरे होशो-हवाम के माय अत्यंत सहज और स्वाभाविक स्वर में उसने कहा था--"पहले कोई शाल वनों का द्वीप भाग्य-वाग्य की बात करता तो मुझे हँसी आती थी, लेकिन अब चुप रह जाता हूँ। सोचता हूँ, वह कौन-सी शक्ति है जो मुझे अनायास अमरीका से भारत धकेल लाई है । यहाँ सचमुच एक दिन आ सकूँगा, यह मैंने कब सोचा था! और मान लो, कल यहाँ अचानक मेरी मौत हो जाए और अपने देश से हजारों मील दूर इस वियावान जंगल में दफन होना पड़े तो इसे कौन- सा नाम दोगे?" में आगंकावश एकाएक सिहरकर रह गया। क्या सचमुच यह किसी के साथ भी हो सकता है ? मेरे साथ भी ? किसी विलकुल अजनवी देश में अपने-परायों से अपरिचित लोगों के वीच मर जाने का दुख कैसा होता होगा! ---"यह लड़की कितनी बदकिस्मत है," एड ने विल्कुल भावुकता में भरकर कहा था-"सोचो तो मन करुणा से भर जाता है। मैं अगर इसे नज़दीक से न जानता तो शायद कभी विश्वास न करता कि गरीवी आदमी को इस हद तक विवश कर सकती है। अबूझमाड़ की माडिया युवती को तीस-बत्तीस उन तक पति न मिले, कसी अजीव बात है !" और उसके दुर्भाग्य की जो कहानी उसने वताई उसका सारांश यह था कि रेको अपने यौवन के आरम्भिक दिनों में ऐसी संजीदा, उदास और खामोश मिजाज़ लड़की नहीं थी। गांव की अन्य युवा लड़कियों की तरह पत्ते तोड़ने या कंद-मूल खोदने वह भी जंगल जाती थी, प्रायः प्रत्येक रात घोटुल के नृत्यों में भाग लेती थी और कई काकसार के उत्सव निहायत उत्साहपूर्वक उसने गुजारे थे। शायद यह भाग्य ही था जिसने निश्चित जीवन-संगी प्राप्त करने के उसके सारे प्रयत्न विफल कर दिये । अन्यया तब एक के बाद एक ऐसी अनेक बाधाएं उसके व्याह में क्यों आ खड़ी होती? -"और अब क्या हो गया ?" मैंने पूछा। "गयों?" एड ने साश्चर्य कहा-"क्या आदमी अपनी गई हुई उन लोटा सकता है ? पहले कुछ वरम शायद एक उम्मीद से बंधी वह घोटुल तथा काकमारों में भाग लेती रही, लेकिन बाद में ऐसी हर जगह जाना शाल वनो का द्वीप ३७ उसने बंद कर दिया। अब स्थिति यह है कि च्याह करना भी चाहे तो वह नहीं कर सकती। वाप बूढा है और भाई तपेदिक का मरोज। यहाँ के संघर्ष- मय जीवन के लिए जो शारीरिक शक्ति चाहिए, उस लिहाज से दोनों बेकार हैं, अतः अपनी मेहनत और ईमानदारी से अकेले रेकी ने ही सारे घर को संभाल रखा है । वताओ अब व्याह करके उसके चले जाने का मत- लव क्या बाप-भाई की मौत नहीं होगी ?" शायद मन ही मन में यह निर्णय कर रहा था कि मुझे क्या कहना चाहिए, इमोलिए चुप था। जब व्याह को सुविधा थी तो रेको की राह में बाधा अड़ी थी, अव कोई बाधा नहीं है तो एक दुविधा खड़ी है जो उसे छूटने नहीं देती। यदि भाग्य इसी को कहते हैं तो इस संकट का अंत कहाँ है ! क्या रेको सचमुच बदकिस्मत है ? क्या उसका सारा जीवन बाप-माई के बीमार आंगन में इसी तरह चुपचाप बीत जाएगा? और फिर उसके बाद?... बजट] मैंने मन ही मन इस शब्द को एक बार दुहरा लिया। अवश्य यह ही पूर्व-ग्रह है कि अंग्रेजी के इस शब्द का उच्चारण करते या सुनते ही मेरी आंखों के सामने सैकड़ों-हजारो की सख्यायें खड़ी हो जाती हैं अयदा ये परि- बार झूलने लगते हैं जहां की दीवारें सुख-समृद्धि से घिरी हुई हैं। एड ने दुवारा बीडियो निकालकर सवको बांट दी थी और नोटबुक तथा पेन लेकर तैयार हो गया था। पहिले मुझसे, मेरे माध्यम से अमरसिंह से तथा फिर केये से प्रश्न हुआ~-"अच्छा, साल भर मे कुल कितनी आम- दनी हो जाती है ?" केये भौंचक्का-सा थोडी देर ताकता रहा फिर हंसकर बोला--"क्या आमदनी बताऊँ ? यह घर है और तुम्हारे सामने ये हमलोग बैठे हैं। जिस तरह की जिन्दगी चल रही है देख ही रहे हो। ऐसे में कहां की आमदनी और कहां का खर्च ?"
- " शाल वनों काहीप .-.-"फिर भी," अमरसिंह ने समझाया-"आखिर जैसे-तैसे जिन्दा रहने के लिए कुछ तो आता ही है। रसी का विवरण अंदाज से बता दो ! केये कई क्षण विवश और करुण-हंसी हंसता रहा। फिर उसने भीतर वाले दरवाजे की ओर संभवतः रेको के लिए देखा। बाद में रुक-रुककर उमने जो विवरण दिए, वे कुछ इस प्रकार थे- मो दुर्भाग्यों में एक यह है कि उनके पास अपनी खुद की जमीन या खेत नहीं। जिनके खेत खाली होते हैं, उन्हीं में थोड़ा-बहुत अनाज वे लोग वो लेते हैं, लेकिन वह भी बस नहीं होता। न हल-बक्खर, न वैल, न खेत और न पैसा । यहाँ तक कि अच्छे स्वास्थ्य वाले दो पुरुप हाथ भी नहीं । ऐसे में क्या सेती-किसानी और क्या पैदावर ! ले-देकर एक रेको का सहारा है, जो अकेली जान सब करती है, लेकिन कुछ भी हो वह आखिर औरत-जात ही है । कहाँ तक क्या करेगी ? पहाड़ी पर अवश्य किसी का अधिकार नहीं, लेकिन पेंडा खेत के लिए जितनी मेहनत चाहिए, वह करनेवाला कौन है ? लिहाजा उससे भी पेट नहीं भरता तो यह बुनने-गाथने का काम करने लगते हैं। बांस की चटाई, टोकरी, सूप, और झाड़ आदि जिन्हें समय-समय पर बाज़ार ले जाकर स्वयं रेको ही वेच लाती है। मेरी आँखें घर की ओलती तथा आंगन के कोने-अंतरों की ओर गई। वही सव कहीं बांस की बनी चीजों का जैसा अम्बार फैला हुआ था, उससे मुझे यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिए थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया था। फिर स्वभाव के अनुसार ही मेरे मन में आया कि खेती-किसानी का चक्कार छोड़ यदि बांस की यही चीजें बड़े पैमाने पर बनाई जाय तो भी केये का परिवार क्या ऐसे ही गरीव रहेगा? सहसा एड ने पूछा--"और नला, इससे कितनी आमदनी हो जाती - इसने पहले कि केये कुछ कहता, स्वयं अमरसिंह ने उसके विषय में विस्तार से बताया। बांस की कमी नहीं, चारों ओर उसी का जंगल है। यों मेहनत भी खास नहीं लगती, छोल-डालकर चुपचाप युनते जाने का काम है शाल बनो का द्वीप लेकिन खाली समय में घर के तीनों लोग भी काम करें तो चार-छह आने से अधिक का काम दिन भर मे नही होता। वैसी स्थिति में उससे साल भर यदि केवल चार-पांच रुपये ही कठिनाई से आते हो तो क्या आश्चयं? मेरा सारा उत्साह ठंडा हो गया। साल में बारह महीने और उन महीनों में इतने-इतने दिन पर कमाई के नाम पर इतने लम्बे अरसे में सिर्फ चार-पांच रुपए। मुझे लगा कि शरीर के रोगटे खड़े हो रहे हैं। क्या अबूझ- माड में रुपये का मूल्य इतना अधिक है ? ---"क्यो ?" लिखते-लिखते सिर उठाकर एड ने पूछा--"क्या बित्री नहीं होती या"... --"होती है," केये ने बेपरवाही से कहा-"लेकिन कोई भी चीज़ घर बैठे तो विकेगी नहीं, उसके लिए भी तो बाजार जाना पड़ता है और तुम तो जानते ही बाजार जाना हम लोगो के लिए कितना मुश्किल है।" उसके आगे हालांकि किसी ने कुछ नहीं कहा और सिर झुकाकर एड भी चुपचाप नोट्स बनाने लगा पर मुझे लगा, जैसे हमारे आसपास का वातावरण यकवयक भारी हो गया है ! अबूझमाड़ के इतने बड़े क्षेत्र के हफ्ते में केवल एक बाजार लगता है -ओरछा से अठारह-बीस मील दूर धवड़ई नामक जगह मे। लोग अकेले- दुकेले नहीं जा पाते, झुण्ड के झुण्ड तैयारी करते हैं और दो-तीन दिनों पहले के निश्चित कार्यक्रम के अनुसार निकलते हैं। जिस उत्साह और गम्भीरता से बाजार की तैयारी होती है, उसे देखकर लगता है जैसे किसी मेले में जा रहे हों। वैसे केवल शगल के लिए जाने वाले युवक-युवतियो की प्रमुग्वता होती है। इस अवस्था के कई आकर्षण हैं-एक झुण्ड मे साथ-साय दूर तक सफर करने का मोह; गीत, गले और उन्मुक्त स्वच्छन्दता । बाजार के छाँव-छांव मे लगे हुए माला-मूंगो के ढेर, चूडियां, गिलट के जेवर, अल्मुनियम या पीतल की अंगूठियां अथवा सावुन । एक झुण्ड उन अरनिकों, प्रौढों व उम्र पार के लोगो का होता है जो सिर अथवा कंधे पर बोझ लादे, किसी आशा से बंधे-बंधे मीलों का फासला तय करते हैं - ४० शाल वनों काहीय के चिन्ह हैं और तब कहीं बाजार आता है। मेरी आँखों के आगे कई आकृतियां सजीव गई। मैंने नहीं देखा, लेकिन एड की आँखों से देखता हूं कि ओरछा से भी कई-कई मील दूर, अबूझमाड़ के भीतरी इलाके से दो या तीन लोगों का एक ममूह बाजार आ रहा है। पुरुषों के कंधे पर कावड़ है और औरतों के सिर पर भारी-भारी टोकरियाँ । चेहरों पर थकान और धूल और भाराकांत पांव धीरे-धीरे पहाड़ी के नीचे उतर रहे हैं: "मुझे एकाएक विश्वास नहीं होता कि अवूझमाड़ के कुछ लोग बाजार के लिए चालीस- मील का फासला लांघकर आते हैं... केये अपनी बूढी तथा धुआ-धुआँ आँखों से मेरी ओर देख रहा था, अतः मैंने दूसरी ओर मुंह कर लिया। मुझे आशंका हो रही थी कि किसी भी क्षण में घिर जाऊँगा। लग रहा था जैसे उससे आंखें मिलते ही वह अचानक पूछ बैठेगा- -"अच्छा साव, सरकार हम लोगों के लिए कुछ और बाजारों का इंतजाम क्यों नहीं करवाती ? क्या यह नहीं हो सकता कि अबूझमाड़ के कई गांवों में बाजार भरे ? अपने जीते-जी क्या मैं वह दिन नहीं देख सकता जव बच्चे, जवान, बूढ़े, हर किसी की पहुंच में यह बाजार आ जाए? और तब मैं उसे किस तरह समझाता कि अभी छटाक भर नमक के लिए चालीस-चालीस मील उन्हें चलना ही पड़ेगा, क्योंकि यही उनका भाग्य है ! on- तीन जहाँ पर एड की कॉटेज खड़ी थी, वह खुले मैदान का अपेक्षाकृत ऊंचा हिस्सा था-जैसे समतल भूमि वाला छोटा और रहस्यमय-सा टोला हो। गांव की आबादी का एक भाग होते हुए भी वह कॉटेज यूं अलग-अलग दिखाई देती थी मानो गांव से अधिक वह शालवन तथा उससे भी अधिक पहाडियो से सम्बद्ध हो । पश्चिमी अहाते को छूती हुई जो पगडण्डी नदी की ओर निकल गई थी, उसके गज-दो-गज चौड़े टुकड़े को छोड़कर दस- पांच फुट छोटी घास वाली खाली जमीन पड़ी थी। ठीक उसके बाद शाल वृक्षो का घना जंगल शुरू हो जाता था। यो गांव की वास्तविक आवादी कॉटेज के पीछे पूर्व की ओर थी । पिछली बाड़ी से लगा हुआ एक ढलवां मैदान था जिम पर उतरते व चलते चले जाने पर एक-एक करके कुछ आवाद झोंपडियां मिलती थीं। बरअक्म इसके, इघर प्राय. एकान्त और सन्नाटा रहता था। पडोस के घेरे में तीन परिवार आते थे-नदी की और बाला लस्के का घर, पीछे केये का मकान और दाहिने हाथ की ओर मासा का परिवार । इनमे एड के सबसे निकटतम पड़ोसी मासा लोग ही थे । आज जब कि मैं ओरछा से इतनी दूर निकल आया हूं और बीच में लम्बे-लम्बे दो वर्ष गुजर गए हैं, कई छोटी-वडी स्मृतियां होगी जिन्होने मेरा साथ छोड़ दिया है । शायद कोई होगी जो स्पष्ट और धुंधली हो गई हैं। लोगों में कुछ के नाम याद रह गए हैं, कुछ की हंसी और कुछ की अधूरी-अधूरी सी रेखाएं। लगता है, अनेक अलग-अलग तस्वीरो व सण्ड ४१ ४२ शाल वनों काहीप - चित्रों के अम्बार में कई चेहरे हैं जो या तो दव गए हैं अथवा सब-के-सब एक ही नजर होने के कारण आपस में गडमड हो गए हैं । पर इनमें निश्चय ही मामा को आज मैं ज्यों-का त्यों अपनी नज़रों के सामने खड़ा कर मकता हूँ। पहले-पहल मैंने उसे तब देखा जव एड को ओरछा में रहते हुए साल पूरा हो रहा था और मासा उन लोगों का सबसे अधिक विश्वासपात्र तथा अपना बन चुका था। यदि मैं भी उसी गांव का एक निवासी होता तो उनके सम्मान, अधिकारों व सहूलियतों को देखकर अवश्य मासा से ईया करने लगता। उसके रहन-सहन, रख-रखाव, पहनाव-उढ़ाव व बातचीत मे आश्चर्यजनक परिवर्तन हो चुका था। प्रायः माडिया तरुणों की तरह छोटी-सी धोती (जिसे घोती नहीं ही कहनी चाहिए) वह भी पहनता लेकिन जिस्म का ऊपरी हिस्सा एक साफ-सुथरे शलूके से बरावर ढेंका होता-इसके अलावा सिर पर सफेद चौड़ी और ऊँची पगड़ी, गले में लाल रंग की छोटी-बड़ी कई मालाएं, कलाई में अल्मूनियम के मोटे-मोटे कड़े और कानों में छोटी-छोटी पीतल की बालियां। निश्चय ही उसे मैंने मके मूल रूप में नहीं देखा जब वह पहिले पहल एड दम्पति के सम्पर्क में आया होगा । अब तो जैसे विश्वास ही नहीं होता कि कभी यह मैले कपड़े और गन्दे शरीर वाला, दुबला-पतला, सहमा-सहमा व मरियल-मा लड़का होगा--कुछ उन्ही नगे बच्चों में से एक जो आज भी कॉटेज में के बरामदे या आंगन मे सुबह-सुबह आ जमते हैं और घण्टों अकारण बैठे, एड के मुंह की ओर ताकते हुए कुछ-न-कुछ प्रतीक्षा किया करते हैं । मुबह के उनींदेपन मे अथवा नींद खुलने पर मुझे सबसे पहिले मासा की आवाज सुनाई देती। न जाने कितनी मुवह उठकर, अपने लायक घर के काम-काज निवटा कर वह हमारे यहाँ आ जाता और कॉटेज के बरा- मदे अथवा आंगन में बैठा एड की प्रतीक्षा करता रहता । मेरा कमरा अपेक्षाकृत बरामदे के अधिक निकट था अतः खाट पर लेटे-लेटे ही बाहर की नारी बातें सुनी जा सकती थीं। नित्य की सुबह कॉटेज के बाहर तीन शाल वनों का द्वीप ४३ प्रकार के लोगों का जमघट लग जाता-एक समूह पांच-आठ साल के बच्चों का, जो बेपरवाही से बरामदे में बैठा होता, एक उनका जो नोट को सिक्कों में बदलने आते और एक समूह वह जो अछूत और अपराधियों की तरह काफी अलग-अलग और दूर बैठा अपनी जमी हुई आँखो से बरा- वर दरवाजे की ओर ताकता रहता । इनमें से पहिले ग्रुप का आकर्षण न विशिष्ट था और न महत्वपूर्ण । शायद छोटी-मोटी लालच कैंडी या पिंपर- मेन्टों की होती क्योकि एड किमी-किसी सुबह यही करता था। वह सब बच्चों को बुला लेता--अकारण ही एक सिरे से मिठाइयां बांटना शुरू कर देता फिर उन्हें तन्तिपूर्वक घूमते देखकर अन्त में मुस्कराकर कहता- 'बच्छा, अव तुम लोग जाओ।" दूसरे समूह मे प्रायः चार-आठ लोग होते, ऐसे लोग जो नोटो के बदले एड से सिक्के लेने के लिए खडे रहते। आदिवामियों के बीच जो मूल्य सिक्को का है, वह नोटो का कतई नहीं। उनके लिए इन्हें संभालकर रखना चाहे एक के हो, पाँच के या दस के, सासी बडी जहमत है । शायद इसीलिए पहले तो वे नोट स्वीकार ही नहीं करते और यदि विवशतापूर्वक करना ही पड़े तो उन्हें सिक्कों में बदलने के लिए वेचैन हो जाते हैं। पहिले पहल ओरछा मे बसते ही एड के सामने जो मांग आई वह सिकको की ही थी। उस इलाके में सिक्को की वैसी अहमियत होगी, यह उमने नहीं सोचा था और स्वभावत. ही टाल आया था। लेकिन गांव का रुख देखकर उसे जगदलपुर के बैंक में कई सौ रुपयो के मिक्वे लाने पडे । अब हाल यह है कि सुबह से लेकर रात तक कोई-न-कोई हाथ मे नोट लेकर सडा रहता है और एड चाहै, या न वाहे व्यस्त हो अथवा खाली बैठा हो, अनमने भाव से उटकर उसे निबटाना ही पड़ता है। और तीसरा? आज भी तीसरे समूह के बारे मे साचते हुए मेरी आँखों में वह तस्वीर सजीव हो उठती है जो ओरछा में रहने के दौरान मन में नक्श हो चुकी थी। तस्वीर का वह टुकड़ा कितना मर्मस्पर्शी है कि उसको एक मलक-मात्र ही साल वनों का द्वीप न को उदास कर जाती है। कटिज के अहाते का काफी अलग-अलग कोना । पुरुप, स्त्रियों तथा बच्चों का एक महमा-सहमा व भयभीत-सा समूह एड के वन्द कमरे की ओर ताकता हुआ अचानक कुछ घट जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। सुबह की धूप आंगन में उतर कर बरामदे के एक कोने को छू रही है, एड अभी भीतर है। मेरे बाहर आते ही सहसा उस समूह में एक छोटी-सी हलचल होती है। कई जोड़ी आँखें जो एड के निकल आने के प्रेम में एकाएक चमक उठी थीं फिर से मायूस होकर लटक जाती हैं और वे लोग एक-दूसरे की ओर तसल्ली देती आंखों से देखकर चुप हो जाते हैं । उसके बाद फिर वही ढलकी गर्दन और उदास आँखों से उन लोगों का दरवाजे की ओर घूरना और अन- वरत प्रतीक्षा! ----"जीवित मृत्यु और कैसी होती है ?" उन्हें देखते हुए एकाएक मेरे मन में यही विचार आया-"क्या एक जीवन इस तरह भी होता है ? वस्तर के जिन आदिम जातियों के उल्लासमय गीत, उन्मुक्त नृत्य और उमंगपूर्ण जीवन की चर्चा में पन्ने-के-पन्ने रंगे जाते हैं, वे क्या सचमुच यही हैं ? उनके । बीच जिस रूमानी ज़िन्दगी की कल्पना हम लोग दूर के सभ्य नगरों के ड्राइंग रूमों में बैठे करते हैं, उसका वास्तविक स्वरूप क्या यही है। वह सहज स्वाभाविक और अकृत्रिम जीवन जिसके लिए हमारे होठों से कई बार ईया भरे वाक्य निकलते हैं ?" में जैसे भीतर-ही-भीतर सिहर गया। समूह में तीन प्रौढ़ पुरुप, एक वृद्धा, चार-पांच युवतियां और दो छ: सात साल के बच्चे थे, बीमार लाग व कमजोर । किमी का शरीर 'योज' से गल रहा था, किसी को 'हाइड्रोसिन ने चलने-फिरने लायक नहीं रखा, किसी का बदन और दूसरे चर्म रोग चितकबरा हुया जा रहा था, किसी को सांस लेने में कठिनाई पड़ रही और कोई मूखकर हड्डी-पसली ही रह गया था। हर आंख बीमार और दष्टि वुझी हुई। वहां बैठे-बैठे लगा, बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सबकी - - शाल वनों का द्वीप ४५ वरावर है, सब हमजात व कमजात हैं । ऊपर एक काला तथा अदृश्य-सा शामियाना तना है जिसके नीचे सबके सब पांव-पर समेटे दुवके हुए है- आशकित व भयभीत! पर उन्ही चेहरों में सहसा एक असाधारण परिवर्तन मैंने तब देखा जब एड उनके पास आकर खडा हो गया। सबके-सब हड़बडाकर उठ गए। पोछे-पीछे आया अमरसिंह व उसके साथ दवाइयों का वाक्स उठाए हुए मासा. दूर बैठा मैं बीमारों से घिरे एड को देखता रहा। धूप मे उसका शरीर चमक रहा था, सुनहरे वाल माथे पर धीरे-धीरे कांप रहे थे लेकिन उसके दोनों हाथ थे कि बीमार हाथो को थामे बरावर व्यस्त ! किमी का घाव देखा जा रहा था, किसी के ज़ख्म पर दवा लग रही थी, किसी को तसल्ली दी जा रही थी और किसी को उत्साह वातावरण मे कई प्रकार की दवाओ की गन्ध समाई हुई थी। -"क्या मैं किसी डर से इतनी दूर आ बैठा हूँ?" अचानक मैंने अपने आप से चुपचाप पूछा-"वैसी आत्मीयतापूर्वक किसी 'याज' से गल रहे हाथ को छूना या उसमे दवा लगाना क्या मैं भी कर सकता हूँ? क्या ऐसी खतरनाक बीमारियो से घिरकर भी मन की वितृष्णा को रोका जा सकता है ? और नहीं तो यह संवेदना जो बार-बार मेरे मन मे जग आती है, वास्तव में क्या है ?" तो अच्छे-खासे डाक्टर हो?" उन रोगियों के चले जाने पर मैंने एड से कहा। वह लौटते हुए रोगियों के ठिठकते पांवो की ओर देख रहा था, चौंककर मेरी ओर पलटा, एक पल टटोलती-सी नजरो से मुझे घूरता रहा फिर धीरे से कधे उठाकर बोला- "आई विश आई कुड बी !" मैंने देखा यह कहते हुए उसकी आँखों में एक खीझभरी विवशता और होठों पर उदास-सी मुस्कराहट तर आई है। --"तुमसे सच कहूं," थोडी देर बाद मेरी तरफ देखकर ड वोला ४६ शाल वनो का द्वीप "डाक्टर के पेशे ने पहले मुझे कभी इतना आकर्षित नहीं किया था। लगता था और पेशों की तरह एक पेशा यह भी है, बस । लेकिन ओरछा आने के बाद मेरी धारणा ही बदल गई। यहाँ आकर खुद डाक्टर बन जाना पड़ेगा, यह मैंने कब सोचा था !" और उसके बाद पहले दिन से लेकर डाक्टरी शुरू करने का विस्तृत विवरण उसने दिया। वन-पहाड़ों में दो-दो साल सुरक्षित व स्वस्थ बने रहने के लिए एहतियातन थोड़ी-सी दवाइयां उन्होंने रख ली थीं। अनुभव के नाम पर केवल उतनी ही जानकारी थी जितनी की 'केटलॉग' देखकर किमी भी साधारण आदमी को हो जाती है। लेकिन यहाँ आने पर कुछ लोगों की तकलीफें उससे देखी नहीं गई अतः उसने दाद-खुजली आदि चर्म रोग की दवाएँ दे दी। उसी तरह एक-दो लोगों के पेट की शिकायतें भी जाती रहीं। अजीब बात है कि उनके आराम होने की खबर अबूझमाड़ में दूर-दूर तक फैल गई और उसके बाद लोगों का तांता लग गया। - "मेरी हालत उस पहुंचे हुए वली-जैसी है," एड ने हँसतेहुए कहा- "जिसने मजाक-मजाक में चुटकी-भर राख उठाकर दे दी हो और संयोग से मरीज अच्छा हो जाय। अव उसी संयोग के वल पर यदि भक्तों से घिर जाय और लाख सच कहने पर भी लोग छोड़ने या मानने को तैयार न हों तो कोई क्या करे?वहरहाल में ऐसा ही डाक्टर हूँ जिसे न होने का अपराध- भाव हर पल खाए जाता है..." उतना कहकर वह चुप हो गया लेकिन मुझे लगा जैसे वह पहले चुप था और बोल भव रहा हो। जैसे इस ऊपरी चुप्पी के बाद ही उसका वास्त- विक स्वर फूट रहा हो। क्या उसके स्वर की व्यथा में अपनी व्यर्थता का वोध न था? क्या यूं नहीं लग रहा था जैसे सहमा ही उमे अपने काम के सोखलेपन का हमाम हो गया हो? समाजशास्त्र का आधार अवश्य मान- बीय है लेकिन वैसी संवेदनात्मक दृष्टि की अपेक्षा तटस्थ, निर्विकार व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की वहाँ अधिक आवश्यकता है। अन्यथा एक भावुक कथा-लेखक और निर्मम समाज वैज्ञानिक में अन्तर ही क्या हुआ? पर www- दाल वनो का द्वीप उनके बीच रहकर निर्विकार रह सकना कितना कठिन था ! और स्थान और स्थिति के अनुसार उन दोनों से भी अधिक क्या किसी तीसरे की ही आवश्यकता वहां नही थी ! . .-"यू सीम टु वी क्वाइट हाई, डोन्य यू?" पीछे से एड ने विटकती-मी आवाज में कहा और बहुत हल्के स्वर में हंसने लगा। मैंने पलटकर नहीं देखा। सामने टार्च में रोशनी करता और राह दिखाता हुआ अमरसिंह बराबर चल रहा था। उसी के सहारे मकरी पगडंडी पर नजर जमाए, धीरे-धीरे पांव रसता हुआ मैं हंसने लगा और वोला-"नही..." हमलोग सलपी पेड से वापम आ रहे थे। सामने टार्च लिए हुए अमरसिंह उसके पीछे मैं, एड और फिर ओरछा-निवामी माडियों की लम्बी कनार । रात की गुरुपात का भयानक वन, घना और एक-दूसरे से गुथा हुआ -~-बीच में केवल एक मादमी के चलने की पगडडी थी। वे जोर-जोर से वात कर रहे थे और केवल उन्ही की आवाज रात के मूने वन मे दूर- दूर तक गूंज रही थी। हमलोग प्राय: खामोश थे सिवाय एड के उस एक वाक्य के जिमका जवाव मैंने 'नहीं' से दिया था। हालांकि 'नहीं' कहते हुए भी मुझे वरावर लगा कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। क्या उतनी सलपी पी जाने के बाद भी अपने को संभाल रखना आनान था। दोनो पांव मुझे निहायत हल्के लग रहे थे, आँसो के आगे का हर दृश्य परदे की तरह उटता और गिरता दिखाई दे रहा था और यूं महसूस हो रहा था जैसे किसी भी क्षण पगडी के बदले वन मे पांव धरकर मैं भटक जाऊंगा! रात-रात को अबूझमाड के वन कैसे लगते हैं ?" सांय-सांय और चुप । ऐसा सन्नाटा कि पत्तो पर कीड़ो के रेंगने की आहिस्ता आट मालूम होती है, दीमक के ऊंचे-ऊँच डेंगुर झरते-से लगते हैं, दूर से जगली मूअर और वन-मुर्गी को आवाज आती है और विन्ही पेडो के बीच ४८ शाल वनों का द्वीप तरह के जंगली परिन्दे चिल्लाते हैं--एक वह जो अचानक अपनी आवाज़ को तेज, तेजतर और तेजतरीन बनाकर 'की-की-की-की-को' करता हुआ एक सांस से पुकार उठता है, दूसरा बेहद भारी और डरावने स्वर वाला "परिन्दा, जो केवल एकबार बोलकर बड़ी देर के लिए चुप हो जाता है- फुड्डूउ-ऊऊऊर ! कुड्डूऊऊऊर !! झाड़ियों की ओट से बनविलाव या खरगोश की आंखें अचानक जल- कर बुझ जाती हैं। एक क्षण के लिए अजीब-सी आशंका के कारण मैं सिहर पड़ता हूँ। जब हम लोग सलपी पेड़ के गिर्द बैठे थे, तब भी एक बार ऐसा ही हुआ था । अंधेरा फैलने के पहले हल्का झुटपुटा । सर्दियों का नीला-नीला कोहरा, शाल, सागीन और दूसरे पेड़ों की गर्दनों तक झुक आया था। हम लोगों के बीच मोटे-मोटे लट्ठों की अंगीठी जल रही थी, जिसकी आंच की तपिश में थमा हर आदमी सलपी के दौर चलने की प्रतीक्षा कर रहा था। बड़ी-सी तूंबी में ताजा उतरी सलपी मुंह तक उफनती धरी थी और एक ओर की आग में शिकार का मांस भूना जा रहा था। एड का ध्यान दरअसल उसी ओर था। वह उस क्षण की बाट देख रहा था जब वहां का आदमी मूड में आकर अपना सारा संकोच उतार फेंके और उससे कुछ ऐसे प्रश्न पूछे जा सकें जिन्हें सामान्य स्थिति में पूछ पाना ही कठिन होता है । क्या सचमुच एड की धारणा ठीक है कि नशे में आदमी कभी झूठ नहीं बोलता? एका व्यक्ति गोल घेरे के बीच सलपी की तूंवी लेकर बैठ गया, हम सबों ने दाल पत्तों के प्याले मेंभाल लिए और फिर दौर चला.. एक-दो नहीं, चार-चार। पेड़ रो ताजा उतरी दूध-जैसी सफेद खट-मिट्टी सलपी और आग में भुना हुआ मांस । थोड़ी ही देर में वही माहौल बन गया जिसकी प्रतीक्षा थी और उसके बाद एड के प्रश्नों की झड़ी लग गई। सब गुन-गुनाकर मुझे एकाएक विश्वास नहीं हुआ। आदमी अपनी नतिगता और यौन जीवन के बारे में सरे-महफिल उस तरह खुल सकता है, हर शाल वनों का द्वीप ४६ यह मैं सोच भी नहीं सकता था। सारे समय में उम आदमी की ओर देखता रहा जो थोड़ी देर पहिले केवल रस उतारने के लिए पचास-साठ फीट ऊंचे पेड़ की चोटी पर जा पहुंचा था। मलपी का पेड नारियल की तरह एक पोड वाला, लम्बा और विना शाख-टहनियो का होता है । ऊपर पहुंचने के लिए एक उभरे हुए तथा लम्बे गठानो वाला बांस लटका दिया जाता है और उसी के सहारे लोग ऊपर टेंगी उस हांडी तक पहुंचते हैं जहां बूंद-बूंद करके जूस चौबीसों घटे इकट्ठा होता रहता है। जब तक वह आदमी ऊपर टंगा रहा, मैं गर्दन उठाकर धड़कते दिल से उसकी ओर ताकता रहा। यदि बांस या रस्सी घोखा दे दे अथवा टूट जाए तो...? उम 'तो' के जवाब मे कई दुर्घटनाओ की आंख-देखी कहानियां मुझे बताई गई--उतनी ऊंचाई से गिरने वाले का एक ही भाग्य होता है- अत्यन्त करुण, दर्दनाक और दिल दहलाने वाला अंत । लेकिन इसके बाव- जूद न तो मलपी के प्रेमियों की संख्या घटती है और न रस उतारने वालों की । आसपाम वैसी घटनाएं प्रायः होती हैं, लोग सुनते हैं लेकिन कोई न कोई हल्की और फुसफुमी-सी दलील रख दी जाती है-अवश्य उस अभागे का ही कोई दोप-खोट रहा होगा, नहीं तो हर आदमी जो ऊँचे से ऊंचे सलपी पेड से रस उतारता है, भला क्यों नही गिर पडता? मैंने देखा आदमी वही है, वही जो हम लोगों के साथ-माथ पेड तक आया था। वही जो थोडी देर पहिले हवा मे टॅगा रहा। सारे खतरे को काटकर वह चुपचाप नीचे भी उतर आया और भीड़ मे मिलकर विल्कुल वेअसर बैठा सलपी पी रहा है। लेकिन उस क्षण उसका व्यक्तित्व मुझे सबसे भारी लगा था। साहसी व्यक्ति मुझे चकित कर देते हैं। (इसका कारण कही यह तो नहीं कि मैं स्वयं ही भीतर से कही बेहद कमजोर हूं') और ऐसे ही साहम का परिचय अधिकाश लोगो ने तब दिया जव पेड के पीछे वाले जगल में मूअर की आवाज गूंजी और एक क्षण के लिए सब चौकन्ने हो गए थे। फिर उमके सामने आने की संभावना असंभावना पर ५० शाल वनों का द्वीप - वातें करके सव नार्मल मूड में आ गए और एड ने अफसोस प्रकट किया कि वह रायफल लेकर नहीं आया। तब भी मुझे यही लगा था। सोचा, कहीं ऐसा तो नहीं कि सलपी के खुमार ने सतरे की आशंका को हर किसी के दिमाग से निकाल दिया है या संभवतः मेरी ही बदहवासी के कारण हर छोटी चीज बड़ी नजर आ रही हो । -"वता सकते हो," सहसा और निकट आते हुए एड ने पूछा-'वता सकते हो कि हम लोग गांव से कितनी दूर आए थे?" "नहीं।" - 'कम से कम तीन मील ।" कहकर एड हँसने लगा और मैंने सोचा कि यदि मुझे यह बात पहिले मालूम होती तो शायद मैं न आता। शायद यह बात मुझे पटती नहीं कि केवल सलपी पीने के लिए मैं तीन मील चलूं और वह भी शाम-शाम को अबूझमाड़ के वन में। लेकिन एड की बात और है। इधर तीस बरसों बाद सलपी का वह पेड़ पहिली वार रस देने लगा है। शाम को करीब-करीव तीन चौथाई गांव वहीं इकटठा होता है और बड़ी देर बाद सब वहां से लौटते हैं। अव्वल तो किसी दूसरी जगह इतने सारे लोग एक साथ कभी नहीं मिलते। दूसरे सलपी पेड़ के नीचे की बैठक और ही होती है । बेलुद, वे परदा और सुली ! घोटुल ! इस शब्द को होठों पर लाते ही अक्सर मुझे रोमांच हो आता है । शायद शब्दों का भी एक संस्कार होता है। इसका भी है। जब-जब यह शब्द जहन में आता है मेरी आंखों के सामने कई रोमानी तस्वीरें आकर खड़ी हो जाती है-कुछ देखी हुई, कुछ सुनी-सुनाई और कुछ नितान्त गल्पित !
शाल वनों का द्वीप ५१ मूलतः घोटुल मुरिया जाति को अपनी विशिष्ट परम्परागत संस्था है जिसकी व्यवस्था केवल उतरी बस्तर के कुछ भागों में बची रह गई है। यह गांव के अविवाहित युवा तथा युवतियों का एक ऐमा सुनियोजित संगठन है जो उनके समस्त सामाजिक जीवन को अर्थ, शक्ति अथवा प्राण प्रदान करता है। आदिम जातियों के विशेषज्ञ डाक्टर वेरियर इलविन के अनुसार घोटुल वास्तविक अर्थों में मुरिया जाति के जीवन व चरित्र का नियामक है । यही वह मंगठन है जो प्रत्येक सदस्य के चरित्र में अनुशासन, महिष्णुता, उदा- रता तथा अन्य उदात्त गुणो का बीजारोपण करता है नया एक ऐमा स्कूल है जहाँ उन्हें भविष्य के वैवाहिक व यौन जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है । उत्तर बस्तर के जिन गांथो मे घोटुल की प्रथा है वहाँ एक अलग-अलग कुटिया बनी होती है। मध्या होते ही गांव के मभी अविवाहित युवक नया युवतियां वहाँ एकत्रित होते है, देर नक नृत्य -गान चलता रहता है और अत में वे सब वही मो जाने हैं। इसके मदस्यो में वाकायदा मगन होना है। उन्ही के बीच से मुखिया तया अन्य अधिकारी चुने जाते है जा घोटुल प्रशासन के लिए पूरी तरह उत्तरदायी होते है । लेकिन केवल चालीस-चाम मील के फामले पर बसे अवझमा की घोटुत प्रथा का स्वरूप और ही है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। सलपी पेड से बापम लौटने में इतनी गत हो गई कि गांव म मन्नाटा पड गया था। कोहरा पहिले से गाढ़ा होकर गिर रहा था और मर्दो अपेक्षाकृत बढ़ गई थी। गांव का हर घर दंका-मुंदा और बोरान लग रहा था, सिवाय उन अंगीठियो के जो कई घरों के मामन जलने के कारण दूर से टिमटिमा रही थी। उस सन्नाटे को भेदने वाली वहाँ केवल एक आवाज थी जो दूर-दूर तक गूंज जाती थी, वह थो इक्के-दुक्के कुत्तों के भौंकने की आवाज। वंसे में हम लोग कॉटेज के पास ठिठकर रह गए। जब देखा कि पूर्व की पहाड़ियों में खूब बडा-मा चाँद धीरे-धीरे उभर रहा है, और कोटेज के बाई ओर खड़े बैर की कंटीली और विरली शायो म निहायर विया चांदनी आंगन मे वरस रही है । वातावरण में मर्दी, मन्नाटा, माहि - ५२ शाल वनों का द्वीप "कहीं बाहर नदी का अनछुआ शोर और कोहरे के रेशे-रेशे में सनी मद्धम चाँदनी ! लगा, मैं वहीं का होकर रह जाऊंगा। लगभग घंटे भर बाद जब वही चांद छोटा होकर और ऊपर चढ़ आया तो माडिन नदी के शोर में एक और समवेत स्वर घुलने लगा और शायद उसी का आकर्पण था कि थकावट के बावजूद हम लोग ओरछा के घोटुल तक उस रात खिचे चले गए घास-फूस की वही छोटी-सी कॉटेज । सामने जलाऊ लकड़ी का कोई वीस फीट ऊंचा अम्वार पड़ा हुआ था और उसी के वाज वाले खुले मैदान में युवक-युवतियों का सामूहिक गीत वाला नृत्य चल रहा था । नृत्य क्या, एक नौटंकी-सा खेल था। के कुछ शिकारियों ने वन के एक चीतल का शिकार किया, लेकिन वह चीतल जख्मी होकर भाग निकला और दुर्भाग्यवश उसे शरण भी मिली तो गांव वाले की, गांव वालों की संभवत: नीयत खराव थी, जब शिकारी अपने शिकार को ढूंढते हुए गांव में पहुंचे तो गांव वालों ने जगमी चीतल को छिपा दिया। गाँव वालों के रूप में युवक-युवतियों का एक छोटा-सा सटा हुआ घेरा है जो गोल-गोल घूमकर नाचते हुए गीत गा रहा है। घेरे के बीच में जख्मी चीतल के रूप में एक छोटा-सा लड़का छिपाया गया है। कुछ दूरी पर तीन-चार शिकारी अलग नृत्य कर रहे हैं । उनके साथ फुत्ते भी हैं जो घेरे को गति के साथ-साथ चल रहे हैं । उनका प्रयत्न है कि किसी तरह उस घेरे को तोड़कर जन्मी शिकार पकड़ लें। गीत में शिकारियों का प्रश्न है कि उनके तीरों से घायल चीतल (जिसके पैरों व खत के निशान से वे यहां तक आए थे) इसी गांव की ओर आ छिपा है, क्या किसी ने उसे देखा है ? "नहीं देखा, नहीं देखा!" गांव वालों का जवाब है। वहीं प्रश्न और का प्रकार ले दुहराकर किया है, लेकिन गांव वालों का एक ही जवाब है कि वहां कोई चीतल नहीं आया। गीतों में यह सवाल-जवाव बड़ी देर तक शाल वनों का द्वीप चलता रहता है। अंत में शिकारी कुत्ते अपने प्रपल में सफल होते हैं- घरे को तोड़कर वे शिकार उठा लाते हैं और इस तरह खेल खत्म हो जाता है। एक पेड़ के साये मे अलग-अलग खड़े हम लोगो ने चुपचाप यह सारा सेल देखा। चांदनी वैसी ही चटक थी, लेकिन वहाँ से किसी के भी चेहरे को पहिचान पाना कठिन था। केवल यही दिखता था कि उस धुलो-धुलाई उजली रात में कुछ स्त्रियों व पुरुषों का एक झुंड गतिशील है। उनके सफेद रग के मैले कपड़े भी जुन्हाई में भीगे हुए साफ-साफ लगते हैं और गीत की धुन के साथ उनके हाथों वाले गिलट के कडे रह-रहकर चमकते हैं। नाच के खत्म होने के बाद ही झुण्ड बिखर गया । पहिले दो-दो चार- चार युवको तया युवतियो के झुण्ड अलग-अलग खड़े दवे-दवे स्वर में गाते, एक दूसरे को छेड़ते, आपस मे हंसी-मजाक करते और खिलखिलाते जमे रहे, लेकिन थोडी देर बाद वह सिलसिला भी जाता रहा । धीरे-धीरे करके वे लोग पास खड़े पेडो की छांव तक सरककर गए और बडी देर तक उन अंधेरे सायो के कोनो से चुहल, छीना-झपटी, खीचतान और उन्मुक्त हंसी के साथ वहशियाना पकड़-पकड़ की आहट मिलती रही। 'यह भी एक पहलू है,' मैंने सोचा-'लेकिन वे वल यही सबसे ज्यादा हमारी दृष्टि को मांग करता हो, ऐसा भी नहीं है।' मैंने एड की ओर मुड- कर देखा । कुछ कहना चाहता था, लेकिन होठ हिलने के पहिले ही एड ने हाथ के इशारे से मुझे रोक दिया और सामने देखने लगा। सामने के दृश्य में उसी क्षण एक परिवर्तन हुआ। पेड़ों की छोच वाले झुण्ड में से कोई एक युवती जैसे किसी से छूटकर निकली और हंसती-हंसती आकर खुले आसमान के नीचे खड़ी हो गई। एक पल बाद उसी छाँव में से कोई युवक तेजी से भागता हुआ निकला और उसे अपनी ओर आता देखकर युवती फिर दुगने वेग से भागी। मेरा ख्याल है इस सारे व्यापार में कठिनाई से एकाघ मिनट लगे होगे। आखिर लाख भागने, गच्चा देकर निकलने या वचने की कोशिश ५४ शाल वनों का द्वीप बावजूद उसे पकड़े ही जाना था। जहां हम लोग खड़े थे, संयोग को वात कि दौड़ती-दौड़ती आकर वह उसी छांव के पास रुक गई-वैसे ही जैसे थककर अंत में मुर्गी बैठ जाती है। वह जोर-जोर से सांस लेती हुई हांफने लगी थी। तभी तीर की तरह छूटे हुए युवक ने आकर उसे पीछे से जकड़ लिया और एक बार खुशी की बड़ी किलकारी मारकर युवती चुप हो गई । शायद वह हंसते-हंसते ढेर हो जाना चाहती थी, शायद वह कुछ कह रही थी या कुछ कहती कि अमरसिंह ने मूर्खता कर डाली उसने अचानक ही उघर टार्च की रोशनी फेंक दी और लम्हा भर ठहरकर बोला- "मासा!" कुछ देर के संकेत और स्थिरता के बाद वहां से प्रश्नभरी आवाज आई--'पेपी ?' और उसे वहीं छोड़कर हंसता हुआ मासा हम लोगों के निकट चला आया। मैं सोच रहा था कि मासा लज्जित होगा या यह कि इस समय वातें करते हुए अवश्य झेपेगा, पर मेरी धारणा गलत निकली । विल्कुल निर्विकार व निरपराध भाव से आकर वह खड़ा हो गया और उसी स्वा- भाविक स्वर में पूछने लगा कि हम लोग कब आए, क्या खाना-पीना हो गया, क्या शिकार के लिए निकले हैं, आदि । युवती वहाँ से भागकर अपने झुण्ड में मिल चुकी थी और धीरे-धीरे यह हुआ कि एक-एक, दो-दो के छिटकाव सहित उसी उल्लासमय स्वर में गाती हुई सारी लड़कियां अपने-अपने घर लौट गई। थोड़ी देर बाद वाता- वरण में वैसा कोई कोलाहल नहीं रहा। हम लोगों के साथ सभी युवक घोटुल के भीतर वाली अंगीठियों के पास बैठ गए और थोड़ी-सी तपिश के बाद सारा माहोल अत्यन्त मैत्रीपूर्ण व आत्मीय हो गया । तब भी मुझे बराबर लगता रहा जैसे लड़कियां गई नहीं हैं या चली भी गई हों तो अपनी आवाज छोड़ गई हैं। जैसे उनका स्वर वायुलहरियों में फंसा हो और माडिन नदी के शोर वाले हर झोंके के साथ एक पंक्ति बार-बार आकर टकरा जाती है- शाल वनो का द्वीप प्राचीग रोप वादा, कोकोरे 5-5.5-5 कोरंग ! कोकोर कोरंग! काकड़ रोम दादा, कोकोर कोरंग ! आखिर बड़ी देर तक गोल-गोल वातें करने के बाद अमरसिंह से मैंने पूछ ही लिया तो वह झंपकर दूसरी ओर देखने लगा । अच्छा-मला जवान और साक्षर मुरिया लडका, लडकियो की तरह शरमा रहा है देखकर मुझे हंसी आ गई, बोला -"तुम न वताओ वह वात दूसरी है लेकिन मैं जानता हूं कि यह सब होता है।" ~~"फिर पूछते क्यों हैं साहब?" विनम्रतापूर्वक धोरे से हंसकर तिरछी-तिरछी आँखो से केवल एक बार मेरी ओर देसकर अमरसिंह ने कहा और झुककर उसने किसी जंगली पौधे की दहनी तोड ली। ' ये बातें दूमरी मुबह की है जब मेरे और अमरसिंह के अलावा कोई नहीं था। एड भी नही । वह भीतर वैठा अपने नोट्स टाइप कर रहा था और साली होने के कारण अमरसिंह मेरे पास आ गया था। पिछली रात घोटुल से लौटने के बाद जल्दी नीद नहीं आई। कई उल्टे- सीधे सवाल दिमाग में आ रहे थे। कुछ वात घोटुल के जीवन के बारे मे थी, कुछ अपने बारे में और कुछ दोस्तों के , लेकिन सबका केन्द्रविन्दु एक ही था। कोई पूछे कि आखिर वह क्या था तो आज भी मैं कुछ बता सकता हूँ? बहरहाल, अमरसिंह से पूछने के बाद भी वहुत देर तक मुझे अपने स्वर पर विश्वास नहीं हुआ। क्या सचमुच वैसे प्रश्न मेरे हो सकते है ? मुझे एड का वह मजाक याद आ गया जब ऐसे ही किसी प्रश्न का जवाब दिए बिना वह हंसने लगा था और बाद में उसने छेड़ते हुए कहा था-"यू नीड ए गर्ल-फ्रेंड, शानी।" लगा, अमरसिंह ऐसी कोई बात भले न कह पाए लेकिन सोच जरूर रहा होगा। अपने अफसोस और उसके संकोच को कम करने के लिए मैंने धोरे मे कहा-~-"भाई, मैंने तो घोटुल में तीन-तीन रातें रहकर देखा है, वहाँ के सदस्यो से दोस्ती को है और अच्छी तरह जानता हूँ। मेरे लिए; .
साल वनों का द्वीप ऐसी वात नई नहीं है । वह तो मैंने इसलिए पूछ लिया कि तुम भी घोटुल के सदस्य रहे होगे और चूंकि पढ़े-लिखे आदमी हो इसलिए शायद ईमान- दारी से बता जाओ..." अमरसिंह हंसने लगा और जैसा कि मेरा अनुमान था, अपने घोटुल जीवन की सारी कच्ची-पक्की बातें उसने निसंकोच मेरे सामने घर दी। नारायणपुर तहसील के बिजली गांव का निवासी है अमरसिंह; जाति के मुरिया, पेशे से किसान और अपने गांव का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा युवक । मुरिया-परिवार में जन्म लेकर भी यदि जैसे-तैसे उसने प्रायमरी पार्स कर ली तो मामूली बात नहीं हुई। परम्परा के अनुसार किशोरावस्था से ही वह घोटुल जाने लगा और धीरे-धीरे एक दिन वह आया जब वह घोटुल का मुखिया बन गया- ऐसा अधिकारी, जिसकी आजा गेटुल में सर्वोपरि मानी जाती है। उसी के इशारे और हुक्म से साथियों की अदला- बदली होती है--सिवाय मुखिया के किसी को भी यह अधिकार नहीं कि एक युवती के साथ तीन दिनों से अधिक कोई रह सके। जो भी सदस्य यह करते पाए जाते हैं, घोटुल का नियम भंग करने के अपराध में उन्हें सजा मिलती है अथवा उसे आपस में व्याह करके घोटुल छोड़ने का अनु- रोध किया जाता है। - "मुझे घोटुल छोड़े आज पांच साल हो गए," अमरसिंह ने कहा- "शादी हो गई और बच्चे भी हैं, लेकिन आज भी घोटुल में कोई गैर-मामूली बात हो तो फैसले के लिए मुझे ही बुलाया जाता है। हालांकि उनका मुखिया न हो, ऐसी बात नहीं । एकाध वार मैं भले चला जाऊं, लेकिन अक्सर टाल जाता हूँ। जिस जिन्दगी को मीलों पीछे छोड़ आए हों वहाँ वार-चार लोटने से क्या फायदा ?" उसके स्वर में दर्द भरे संकेत को पड़ककर मैंने धीरे से पूछा-"अमरसिंह, जिस लड़की से तुम्हारी शादी हुई, क्या वह तुम्हारी घोटुल की संगिनी नहीं थी?" ---"नहीं।" ...
शाल वनों का द्वीप 1 -"फिर ?" -"उसका ब्याह किसी दूसरे गांव में हो गया।" --"शादी के बाद उससे मुलाकात नहीं हुई ?" -"हुई थी।" अमरसिंह ने झिझकते हुए कहा-"अक्सर बाजार- आजार में हो जाती है, लेकिन अब तो वह पराई है। जो अपना नहीं उससे दो-चार बोलो के अलावा और क्या सम्बन्ध रह जाता है ? और उसके बाद वह मेरे ही मूल प्रश्न पर आ गया। मैंने कहा था कि अजीब बात है कि अबूझमाड़ की घोटुल-प्रया नारायणपुर तहसीलो से इतनी भिन्न और अलग-सी है । न संगठन और न कोई अनुशासन । जैसे घोटुल नाम के पीछे एक जगह मात्र हो जहां संध्या समय लोग इकट्ठे होकर अपना जी वहला सकें और वम । पहिले मुझे यह मालूम हुआ था कि गांव के सभी अविवाहित युवक मात्र ही एकत्रित होते हैं, युवतियां नहीं आती। पर जब मैंने आंखो से वही देख लियातो हर बात पर अविश्वास होने लगा। अपने आप में यह कितनी दुखदाई हैं कि हम लोगो से घोटुल के बारे में बातें करने मे हर आदमी चाहे बूढा हो या जवान, सकोच करने लगता है और कई वार सही वातें सामने आती ही नहीं। और तो और हम लोगो के साथ का अमरसिंह भी पहिले-पहल भैपकर रह गया और वडी देर तक गोल-गोल बातें करता रहा जब मैंने उनके आपसी संबंधो को लेकर सीधे एक सवाल कर दिया.. अव अमरसिंह पता नहीं कहां है । निश्चय ही अपने गांव की पुरानी जिन्दगी में लौट गया होगा जहाँ उसके खेत हैं, बीवी हैं, बच्चे है। सभव है, ओरछा के वीते दिनो की याद उसके लिए कोई मानी ही नही रखती हो। शायद वे भाबुक क्षण और मस्ती की घड़ियां भी पूरी तरह भुलाई जा चुकी हो जिनका भागीदार अकेले में था केवल मैं, जो कई रात एड को काम में मसरूफ देखकर प्रायः उसके कमरे मे खिसक गया था। छोटा- सा कमरा, खाट के पास की जमीन में मोटी-मोटी लकड़ियों की अंगीठी और उसे घेरकर बैठे हम दोनों । गीत कई हैं, गीत के बोल कई हैं और ऐसे क्षण शाल वनों का द्वीप ऐसी बात नई नहीं है । वह तो मैंने इसलिए पूछ लिया कि तुम भी घोटुल के सदस्य रहे होगे और चूंकि पढ़े-लिखे आदमी हो इसलिए शायद ईमान- दारीसे वता जाओ..." अमरसिंह हंसने लगा और जैसा कि मेरा अनुमान था, अपने घोटुल जीवन की सारी कच्ची-पक्की बातें उसने निसंकोच मेरे सामने घर दी। नारायणपुर तहसील के विजली गांव का निवासी है अमरसिंह; जाति के मुरिया, पेशे से किसान और अपने गांव का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा युवक । मुरिया-परिवार में जन्म लेकर भी यदि जैसे-तैसे उसने प्रायमरी पास कर ली तो मामूली बात नहीं हुई। परम्परा के अनुसार किशोरावस्था से ही वह घोटुल जाने लगा और धीरे-धीरे एक दिन वह आया जब वह घोटुल का मुखिया बन गया- ऐसा अधिकारी, जिसकी आज्ञा गेटुल में सर्वोपरि मानी जाती है। उसी के इशारे और हुक्म से साथियों की अदला- बदली होती है--सिवाय मुखिया के किसी को भी यह अधिकार नहीं कि एक युवती के साथ तीन दिनों से अधिक कोई रह सके। जो भी सदस्य यह करते पाए जाते हैं, घोटुल का नियम भंग करने के अपराध में उन्हें सजा मिलती है अथवा उसे आपस में व्याह करके घोटुल छोडने का अनु- रोध किया जाता है। -"मुझे घोटुल छोड़े आज पांच साल हो गए,” अमरसिंह ने कहा- "शादी हो गई और वच्चे भी हैं, लेकिन आज भी घोटुल में कोई गैर-मामूली बात हो तो फैसले के लिए मुझे ही बुलाया जाता है। हालांकि उनका मुखिया न हो, ऐसी बात नहीं । एकाध बार मैं भले चला जाऊं, लेकिन अक्सर टाल जाता हूँ। जिस जिन्दगी को मीलों पीछे छोड़ आए हों वहाँ बार-चार लोटने से क्या फायदा?" उसके स्वर में दर्द भरे संकेत को पड़ककर मैंने धीरे से पूछा-"अमरसिंह, जिस लड़की से तुम्हारी शादी हुई, क्या वह तुम्हारी घोटुल की संगिनी - । नहीं थी ?"
१७ शाल वनों का द्वीप -"फिर?" -"उसका ब्याह किसी दूसरे गांव में हो गया ।" -"शादी के बाद उससे मुलाकात नहीं हुई ?" -"हुई थी।" अमरसिंह ने झिझकते हुए कहा-"अक्सर बाजार- आजार में हो जाती है, लेकिन अब तो वह पराई है। जो अपना नही उससे दो-चार बोलों के अलावा और क्या सम्बन्ध रह जाता है ? और उसके बाद वह मेरे ही मूल प्रश्न पर आ गया। मैंने कहा या कि अजीब बात है कि अबूझमाड़ की घोटुल-प्रथा नारायणपुर तहसीलो से इतनी भिन्न और अलग-सी है । न संगठन और न कोई अनुशामन । जैसे घोटुल नाम के पीछे एक जगह मात्र हो जहाँ सध्या समय लोग इकट्ठे होकर अपना जी वहला सकें और वस । पहिले मुझे यह मालूम हुआ था कि गांव के सभी अविवाहित युवक मात्र ही एकत्रित होते हैं, युवतियां नहीं आती। पर जब मैंने आंखो से वही देख लियातो हर वात पर अविश्वास होने लगा। अपने आप में यह कितनी दुखदाई हैं कि हम लोगो से घोटुल के बारे में बातें करने मे हर आदमी चाहे बूढा हो या जवान, सकोच करने लगता है और कई बार सही बातें सामने आती ही नहीं। और तो और हम लोगो के साय का अमरसिंह भी पहिले-पहल मेंपकर रह गया और बड़ी देर तक गोल-गोल बातें करता रहा जब मैंने उनके आपसी सवघो को लेकर सोधे एक सवाल कर दिया... अब अमरसिंह पता नहीं कहां है । निश्चय ही अपने गांव की पुरानी जिन्दगी में लौट गया होगा जहां उसके खेत हैं, बीवी हैं, बच्चे है। मभव है, ओरछा के बीते दिनों की याद उसके लिए कोई मानी ही नहीं रखती हो। शायद वे भावुक क्षण और मस्ती की घड़ियां भी पूरी तरह भुलाई जा चुकी हो जिनका भागीदार अकेले मैं था केवल मैं, जो कई रात एड को काम में मसरूफ देखकर प्रायः उसके कमरे में खिसक गया था। छोटा- सा कमरा, खाट के पास की जमीन मे मोटी-मोटी लकड़ियों को अंगीठी और उसे घेरकर बैठे हम दोनों। गीत कई हैं, गीत के बोल कई हैं और ऐसे क्षण
शाल वनों का
ई जब अपने चेहरे पर अंगीठी का दमकता साया लिए अमरसिंह बहक
है, पर यह मेरी ही विवशता है कि उसकी स्मृति के साथ केवल गीत
द रह गया है—वही जो उसका अत्यन्त प्रिय गीत था नौर जिसे खूब.
लकर तथा लम्बी अलाप लेकर वह गाया करता था-
"रेरेलोयो, रेरेरेला, रेलारे रेला रेला रेरेला।
पारो माडी दमकी ते वारा कीयलतोन भाजी
नोड़ोल वदूर सोलोड़ बेलोसा, सोलोड़ उराइतोन
वेलोसा सोलोड़ उराइतोन!
नका सोलोड़ उरमा माजी जीवा लगाहता
नाकनेर जीवा लकतेक वेलोसा, नाकेर वायतीन,
वेलोसा नाफेर वायतीन !
नांगन गला वेहविर माजी, नीकर वायेनन
इज्जके महलान बातूर माजी दाड़ेगा उनटोर रोय
माजी दागा उनटोर रोय!
(स्त्री : ऐ मेरे मीत, इस सुनसान पहाड़ी की लम्बी-लम्बी घास के बीच
अकेले बैठे यह तुम क्या कर रहे हो ?
पुरुष : बेलोसाराजी, यह बालिंग बांस की वाँसुरी मेरी अपनी संगिनी है
इसे ही छेड़कर मैं जी हल्का कर रहा हूँ।
स्त्री : भगवान के लिए इसे बन्द करो। मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं। देखो
तुम्हारी बांसुरी की तान में मैं अपने आप को भूलती जा रही हूँ
पुरुप : बेलोसाराजी, तुम झूठ बोल रही हो। अगर यह सच होता
तुम्हारा मन सचमुच मेरी ओर लगा होता तो कब की मेरे पास
आई होतीं।
स्त्री : हाय रे, इस घड़ी से पहिले यह बात मुझे क्यों न मालूम हुई ?
तुमने मुझसे पहिले ही क्यों नहीं कहा ? मैं सब कुछ छोड़
तुम्हारे पास चली पाती, लेकिन अब तो लोग मेरी मंगनी-
m गए-देखो, वे पी भी रहे हैं !
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चार ओरछा-निवासियों की इतनी बडी इवट्ठी भीड मैंने पहिले नहीं देखी थी। देखता हूँ कि माताढाई के मंदिर वाले पवित्र अहाते में पुरुप, स्त्री, बच्चे और बूढे मिलाकर लगभग अढाई सौ लोग जमा है। बच्चो को छोडकर प्रायः सय शान और गंभीर मुद्रा में हैं। बिना किसी व्यवस्था या प्रवन्ध के मदिर के सामने वाले अहाते में एक गोल दायरा बन गया है जिसमे छूटे हुए या देर से वाते लोग चुपचाप आ-मिलकर आदर सहित बैठ जाते हैं-- दोनो घुटने करीली जमीन पर टिके हुए, गर्दने मुद्रा से थोड़ी-थोड़ी झुकी हुई, करुणा पूरित आंखें दया की भीख मांगती-सी और सारे चेहरों पर समर्पण का भाव... कुछ पहिले गाँव मे शीतला माता का प्रकोप हुआ था । तर एका-चौयाई गांव साफ हो गया। बच्चे, जवान और बूढे, सभी उठ गए और एक तरह से गाँव मे हाहाकार फैल गया। स्वभावतः ही सारा गाँव देखता 'देवान' की शरण में पहुंचा और पेन-लरिकतास' नामक एक समारोह हुआ। देवता ने परिस्थिति की गंभीरता देखकर आदेश दिया था कि गांव भर में मास- भक्षण तब तक बंद कर दिया जाय जब तक कि देवी का प्रकोप शात न जाए । आदेश का उसी तरह पालन किया गया और देवी ज्ञात हुई तो एक दूसरा 'पेन-लस्किताल' का आयोजन हुआ। इस बार आदेश मिला कि गोव वाले मिलकर 'माता-विदा' का आयोजन करें। उसी 'माता-विदा' के लिए आज सारा गांव मंदिर के सामने इकडा हो गया है। हर हृदय आभार और श्रद्धा से भरा हुआ। जो अछूते रहे वे ते शाल वनों का द्वीप - भी कई जव अपने चेहरे पर अंगीठी का दमकता साया लिए अमरसिंह बहक गया है, पर यह मेरी ही विवशता है कि उसकी स्मृति के साथ केवल गीत याद रह गया है-वही जो उसका अत्यन्त प्रिय गीत था और जिसे खूवः खुलकर तथा लम्बी अलाप लेकर वह गाया करता था--- "रेरेलोयो, रेरेरेला, रेलारे रेला रेला रेरेला। पारो माड़ी दमकी ते वारा कोयलतोन भाजी नोड़ोल वदूर सोलोड़ बेलोसा, सोलोड़ उराइतोन बेलोसा सोलोड़ उराइतोन! नका सोलोड़ उरमा माजी जीवा लगाइता नाकनेर जीवा लकतेक वेलोसा, नाकेर वायतीन, बेलोसा नाकेर वायतीन! नांगन गला वेहविर माजी, नीकर वायेनन इज्जके महलान वातूर माजी दाड़ेंगा उनटोर रोय माजी दाड़ेगा उनटोर रोय ! (स्त्री : ऐ मेरे मीत, इस सुनसान पहाड़ी की लम्बी-लम्बी घास के बीच अकेले बैठे यह तुम क्या कर रहे हो ? पुरप : वेलोसाराजी, यह बालिंग बांस की बांसुरी मेरी अपनी संगिनी है । इसे ही छेड़कर मैं जी हल्का कर रहा हूँ। स्त्री : भगवान के लिए इसे बन्द करो। मैं तुम्हारे पांव पड़ती हूं। देखो तो, तुम्हारी वांसुरी की तान में मैं अपने आप को भूलती जा रही हूँ। पुरुष : वेलोसाराजी, तुम झूठ बोल रही हो। अगर यह सच होता और तुम्हारा मन सचमुच मेरी ओर लगा होता तो कव की मेरे पास भागः बाई होती। स्मी : हाय रे, इस घड़ी से पहिले यह बात मुझे क्यों न मालूम हुई ? दुश्मन, तुमने मुझसे पहिले ही क्यों नहीं कहा ? मैं सब कुछ छोड़-छाड़कर तुम्हारे पास चली पाती, लेकिन अब तो लोग मेरी मंगनी की शराब लेकर मा गए-देखो, वे पी भी रहे हैं ! -- - चार ओरछा-निवामियों की इतनी बडी इकट्ठी भीड मैंने पहिले नहीं देखी थी। देखता हूँ कि मातादाई के मंदिर वाले पवित्र अहाते मे पुरप, स्त्री, वच्चे और बूढ़े मिलाकर लगभग अढाई सौ लोग जमा हैं। बच्चो को छोडकर प्रायः सब शांत और गंभीर मुद्रा मे हैं । बिना किसी व्यवस्था या प्रवन्ध के मदिर के मामने वाले अहाते में एक गोल दायरा बन गया है जिसमें छूटे हुए या देर से आने वाले लोग चुपचाप आ-मिलकर आदर सहित बैठ जाते हैं-- दोनो घुटने कंकरीली जमीन पर टिके हुए, गर्दने मुद्रा से थोड़ी-थोड़ी झुकी हुई, करुणा पूरित आंखें दया की भीख मांगती-सी और सारे चेहरों पर समर्पण का भाव कुछ पहिले गांव में शीतला माता का प्रकोप हुआ था । तब एक-चौथाई गांव साफ हो गया। बच्चे, जवान और बूढे, सभी उठ गए और एक तरह से गांव मे हाहाकार फैल गया । स्वभावत ही सारा गांव देखता 'देवान' की शरण मे पहुंचा और 'पेन-नस्किताल' नामक एक समारोह हुआ। देवता ने परिस्थिति की गंभीरता देखकर आदेश दिया था कि गांव भर मे माम- भक्षण तब तक बंद कर दिया जाय जब तक कि देवी का प्रकोप शात न हो जाए । आदेश का उसी तरह पालन किया गया और देवी शांत हुई तो एक दूसरा 'पेन-लस्किताल' का आयोजन हुआ। इस बार आदेश मिला कि गांव वाले मिलकर 'माता-विदा' का आयोजन करें। उमी 'माता-विदा' के लिए आज सारा गांव मंदिर के सामने इकट्ठा हो गया है । हर हृदय आभार और श्रद्धा से भरा हुआ। जो अछूते रहे वे तो शाल वनों का ज्ञताभार से नत हैं ही, जिन पर कुपित होने के बाद भी माता दया कर ई उनके मन के आभार व श्रद्धा को बता सकना साधारण वात नहीं। से लोगों का समूह अलग और मंदिर के सबसे निकट घुटनों के बल पर बैठा है। वैमे गांव का अपना 'लस्के' भी है, लेकिन इस आयोजन के लिए नल- नार मे एक विशिष्ट लस्के को बुलाया गया था। लस्के वास्तव में वह भाग्यशाली व्यक्ति होता है जिसके शरीर पर आवश्यकता, अवसर व समयानुसार देव हावी होता है और उतनी देर के लिए वह साधारण व्यक्ति नहीं रह जाता-उसकी वाणी से देवता बोलते हैं। अपने इसी विशिष्ट गुण के कारण ही गाँव के समाज में उसका सम्मान सबसे अधिक होता है। 'माता-विदा' संबंधी यह आयोजन वैसे सुबह से प्रारम्भ हो चुका था। मूरज निकलने के साथ ही कुछ लोगों का एक समूह घोटुल के सामने इकट्ठा हुआ। गांव के प्रत्येक परिवार की ओर से एक-एक व्यक्ति आकर लगभग दो-दो मेर चावल जमाकर गया। थोड़ी देर बाद गांव के दो लस्कों पर माता-दाई आई और थोड़ी-सी भीड़ के साथ वह जुलूस शीतला मात के मदिर में जाकर थम गया। वहाँ देवी ने उन व्यक्तियों में से एक को अप सामने बुलवाया जिस पर माता कुपित हुई थी। आदेश हुआ कि उसे वा दान स्वरूप एक रुपया, एक मुर्गी, एक बकरा तथा मूअर देना पड़ेगा। इस उत्सव का दूसरा महत्वपूर्ण चरण यह था कि उपस्थित लोगों एक छोटा-सा समूह बनाया गया जो कि गांव के बाहर जाकर किस स्थान का चुनाव करें जहां कि देवी ले जाई जा सके। उसमें अंड भावना संभवतः यह थी कि देवी को गांव से विदा कर दिया जाय रूप में बीमारी भी गांव के बाहर हो और लोग निश्चिन्त होक 'नामल' जिन्दगी में लौट आएं...। --"आओ, उधर चलकर देखते हैं।" महमा मेरे कंधे को छूकर एड ने और विना अधिक ITI जहाँ बलिदान के बकरे, सूअर, मुर्गी कहा शाल वनों का द्वीप लोग खडे थे हालांकि उस समूची भीड मे शायद एक भी आदमी ऐमा नही था जो कि खाली हाथ आया हो। हुर्रररररर ! हिच । हिच्च!। अचानक मंदिर के निकट ऐसी कई-कई चीखें एक साथ उठी और पहिले का थोडा-बहुत कोलाहल भी एकदम शांत हो गया। दोनों लस्को पर पुन. देवी हावी हो गई थी और स्वभावत: ऐमी चीखें उनके किल्लोल को प्रकट करती थी। जब पूरी तरह से देवी के अधिकार में आकर लस्के उठे ठो भीड में एक हल्की-सी हलचल हुई। पटेल ने आगे बढ़कर देवी के माथे पर काली का टीका लगाया, वही टीका लौटाकर उसने अपनी पेशानी पर भी लगाया और उसके बाद देवीधारी दोनों लस्को ने घुटनो के बल बैठे या खडे लोगों में से प्रत्येक के निकट जाकर एक-एक भेंट दी। सारा समय माता देवी का पुजारी साथ बना रहा और मेंट समाप्त होने ही वह अपने अध- पके चावल का टीका प्रत्येक के माथे पर लगा देता। इस प्रसाद को काफी देर बाद और अत में पाने वाले लोग वे थे, जो बीमारी भोगकर उठे थे। थोड़ी देर बाद लस्को के साथ वह सारी भीड एक लम्बी और इकहरी पंक्ति में गांव के बाहर निकल गई। जंगल में एक निश्चित स्थान पर लकडी का चौडा बलिदान स्थल बनाया गया था। वही देवियों सहित मारी भीड रुकी, एक-के-बाद एक लोग देवी के सामने आते गए और बलिदान होता गया-पहिले वे जो बीमारी में उटे थे और फिर दूसरे लोग। बलिदान का यह मिलमिला लगभग घंटे भर तक चलता रहा और कुल मिलाकर पन्द्रह मूअर, दस बकरे, दर्जनो मुगियां, वीमियों बडे, नारियल तथा ढेर-सी दाराव मेंट-स्वरूप चदाई गई। मुझे याद है लौटते में कई लोग नगे के मारे वहकने लगे थे। घोटुल मे आकर और भी शराब पी गई और उस समय तक वक-भक चलती रही जब तक कि उसी घोटुल में पका के लिए जुटो औरतों ने माना तैयार न कर दिया-निश्चय ही उसके बाद एक विराट मामूहिक भोज का आयोजन था ।, ऐमा जिसमे बच्चे में लेकर वूटो तक ने सूब छककर सापार - साल वनों का द्वार र पी। रात बड़ी देर तक नशे का प्रभाव सारे गांव पर बना रहा, य एक अभागे पीरचे के, जिसका वच्चा अचानक उसी रात मर गया। हते हैं जान के साथ सहनशीलता आती है और साधारणतः वही आदमी ह के प्रति अनासक्त व निर्विकार होता है जिसे काही अंतदंष्टि प्राप्त है। नबूझमाड़ की जंगली जाति के सन्दर्भ में यह बात चाहे जितनी हास्यास्पद लगे, लेकिन पीरचे को देखकर एकाएक मुझे यही लगा था। क्या आदमी अपने दुख के प्रति इम सीमा तक तटस्य रह सकता है ? अपनी आंखों से न देखा होता तो मुझे बिल्कुल विश्वास न होता। बीच वाले आंगन की ओलती-तले दो चार लोगों से घिरा हुआ वह उकडवंठा था और निहायत सहज भाव से चोंगी पी रहा था । अगर भीतर से औरतों के सामूहिक क्रन्दन को आवाज न आती तो सहसा यह जान पाना ही कठिन होता कि हम लोग दुग्व-घर आए हैं और पीरचे पर वज्रपात आ है। गायद गांव का सबसे अधिक सम्पन्न, सुन्दर व बड़ा परिवार पीरचे का ही है । पन्द्रह-बीस खेत हैं। कई मुंड मवेशियों के हैं. लेकिन उसी अनु- पात में बढ़ी हुई जिम्मेवारियां भी हैं । जब-जब उसके यहां गए हैं, उसके पारिवारिक जीवन का गढ़न देखकर मुझे अपने समाज के सामूहिक हिन्द परिवारों की याद आ गई है। अगर ओरछा में न होकर वह परिवार हमा संसार में होता तो कौन कह सकता था कि वे लोग आदिवासी हैं। र रूप, चेहरा-मोहरा, किसी बात में नहीं । पहिले-पहल तो मैं हैरान रह गए इतना उजला साफ़ रग और ऐसे तीसे नाक-नकम तो हमारे यहां भी न चुपचाप जाकर हम लोग मातमपुर्सी करने के अंदाज में बैठ ग फबारहमें देखकर पीरवे मुस्कुराया हालांकि उसकी होठों पर इतनी हलकी थी कि मतही आंखों से देखना असभव था। "ह सब अचानक कब हो गया?" कुछ देर बाद एड ने मुम्पुराहट की शान वनों का दौर १३ । कहा-"मुझे बड़ी रात गए सदर मितो कि...।" अपजती चोंगी को जमीन की रगड़ देकर पोरचे नीचे ही नीचे देसमा रहा । कुछ देर ठमके गले से आवाज ही नहीं निकलो फिर यह रासारगर गला साफ करने लगा। ---"कल शाम को दिया-वती के वक्त..." उसके पास बैठे एक सामी ने जवाब दिया-"हम लोग तो यही समझते रहे कि मामूली बुसार ठीक हो जाएगा । अब कौन जानता था कि इतनी जल्दी..." भीतर में बडे जोरो काक्रन्दन फिर उमड़ आया-यह सामा पोको मां थी। दोनों पांव फैलाए, दाल बिखेरे हुए वह छाती फूट-कूटरररोसी थी और सवेदना प्रकट करने तथा मातम करने वासियो ने उसे गारो ओर से घेर रखा था। पीरचे मूखी आँखे तथा पत्थर जैसा मन लिए दूर एक ओर देत रहा 'था, जैम-तसे स्वर में बोला-"सब थक गए, पेपी । दया-पार, देव-मामी, सभी । भाग्य की बात है...।" मैंने देखा, एड के चेहरे पर झुंझलाहट भरे गुस भान भाए। शाम वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन किसी विचार के कारण म. गमा। मृत बालक पीरचे को इकलौती संतान पा--पडे भागो का बार अधेड उम्र मे प्राप्त एक ही लडका, जो कठिनाई गती-III) होगा। पीरचे से जब भी घर में भेंट हुई है, परणे से अगant) नहीं देखा। उतने बड़े बच्चे को गोद लिए, पिता-निसान, 'पूरा करते अथवा उसके साथ सुद किसी मेस में लीन । दो-नीन दिनो पहिले यह एरो पारा दागे माग गी॥ 'मलेरिया की कुछ टेबलेट्स दी थी। उसके बाद पारी 1111 मुझे याद आया कि पिछली रातों में समा जोferinar आवाज आती रही, वह इसी अभागे प . ftiparnी। "लाश अभी तक क्यों रोकती है पी गो I HOT- क्या किसी की राह दगी जाहीहै?"
शाल वनों काही से "हो । पास-पड़ोस के गांवों से कुछ रिश्तेदार आने को हैं । उनके विना क्रया-कर्म कैसे होगा?" थोड़ी देर बाद उस आंसू सने वातावरण से मैं बाहर निकल आया। लगातार क्रन्दन व मातम-भरे माहौल में देर तक चुप बैठकर टुकुर-टुकुर ताके चले जाना कितना अजीब लगता है। दोपहरी चढ़ रही थी। पड़ोस के बन में बनरामियों, सुग्गों व हरियल का गोर गूंज रहा था, ढलवान के मैदान में चर रही मवेशियां थककर पेड़ों के नीचे आ गई थीं। धूप के रेशे मोटे तौर पर गाढ़े हो रहे थे जिसमें सनी केवल आवाज़ सबसे प्रमुख थी-वही कठफोड़वा की अनवरत 'कट-कट्' और रह-रहकर पंडकी का बोलना.." फिर दोपहरी भी ढल गई लेकिन जिनकी प्रतीक्षा थी वे लोग नहीं पहुँच सके। चूंकि चौबीस घटे होने को जा रहे थे अतः अन्त में सबके आग्रह लाग उठी। छोटी-सी अर्थी की श्मशान-यात्रा जिसके लिए अधिक दूर नहीं जाना पड़ा । थोड़े ही फासले पर गाल वन ने स्वागत किया। हरे दर की छांव में बिना घेरे का श्मशान जिसमें ढोरों की सफेद हड्डियां व झो चमक रहे थे। छोट-मी कब खुदी, भीतर की मिट्टी पर एक पुराने कपड़े का विछाया गया-वही कफन था। मां की आकाया-व्यापीचीत्कार और की पथराई आंखों के सामने नन्हा-सा शव उतार दिया गया। दिगा की ओर पांव, ऊपर मैले कफन का चीयड़ा, उस पर साल समेत छोटी-छोटी डगालियों को ढंकाव और फिर मिट्टी पर मिट्टी याद है, मब याद है। यह भी अच्छी तरह याद है कि उसके तक जिधर भी आंखें उठाता वही तस्वीर आकर खड़ी हो जाती और आपस में गुथे ऊंचे शालवनों के बीच एक उभरे हुएई सन्नाटे में एक छोटी-सी कत्र है, नास पास बच्चे के खिलौने, ले पलना आदि सारी चीजें फैली हैं और चारों दिशाओं की ताल तुस के कपड़े हवा में धीरे-धीरे थरथर .
पाँच राजरोगी लाली को मैंने पहली बार मासा के घर देखा। कितने आश्चर्य की बात है कि ओरछा में रहते मुझे इतने दिन हो गए थे, प्रायः अधिकारा लोगों को मैं पहिचानने लगा था, लेकिन एक लाली ही बचा रह गया। वहीं, जिसके घर में सबसे पहले-पहिल गया था और जिसकी चर्चा ने अन- देखे ही उसके प्रति मेरे मन को द्रवित कर दिया था। फिर रेको के प्रसंग में जैसी आत्मीयतापूर्वक एड ने उसे एकाध बार याद किया था, सभवतः उसके कारण भी लाली को देखने को उत्सुकता हुई थी। पर उस दिन जिस शिद्दत से उसके लिए करणा उमडी थी उसी शिद्दत से वह दव गई और शायद मैं भूल-भाल गया । मंभव है उसका एक कारण यह हो कि उससे भी अधिक दूसरी करणाएं मुझ पर छा गई थी या शायद उससे मिलने का अवसर नहीं आया । अवश्य ही गांव के उत्सवो मे वह रहा होगा, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया। -~-"उसे पहिचानते हो?" बाहर मासा की वाड़ी के पास ही ठिठक- कर एड ने पूछा । उसका सकेत उस युवक के लिए था जो इघर पीठ किए मासा के पास उन्ही के घर-आंगन मे बैठा हुआ था। मैं थोडी देर उन लोगो की ओर देखता रहा और तब तक मैंने जवाब नहीं दिया जब तक कि वाडी और आंगन की आधी राह तय हो गई। मासा के सामने बडे-बड़े धुंघरुओ का एक ढेर पड़ा था, कुछ मुर्गी और मोर के पंख भी आसपास फैले हुए थे और चमड़े की एक चौडी पट्टी हाय में लेकर वह कुछ गूंथने में व्यस्त था। --"याद नही?" एड ने कहा-"तुम्हारे यहाँ आने के दूसरे दिन ही ग केये नामक एक आदमी के यहाँ गए थे?" -"वह जो चटाई-अटाई बुनता है और..." -~"हाँ, विल्कुल वहीं। मेरा ख्याल है कि तुम्हें अब रेको की याद लाना नहीं पडेगा..." इतने में मासा के पास बैठे युवक ने गर्दन फेरी और जैसे ही हम लोगों को आते देखा थोड़ा खिसककर बैठ गया। उस एक झलक के विना कुछ कहे-बताए अचानक स्पष्ट हो गया कि रेको का भाई और राजरोगी लाली यही है ! . निहायत मामूली कद, दुबला-पतला शरीर, पिचके गालों वाला जर्द चेहरा और छोटी-छोटी निस्तेज आँखें। रंग उसका और दूसरे लोगों की अपेक्षा साफ था और शायद इसलिए भी वह पीला तथा रक्तहीन दिखाई देता था। दूसरे कुंआरे युवकों की तरह माला, मूंगा, कंघी, अंगूठियां तथा अन्य प्रकार की सजावट उसके शरीर पर कहाँ थी? गले में लाल रंग की छोटे दानों वाली एक लड़ की माला और कलाइयों में गिलट के घिसे कड़े "कहो लाली, कैसे हो?" कहता हुआ एड मुझे छोड़कर आगे बढ़ा और मुस्कराकर उसी के पास जाखड़ा हुआ। मासा ने वैठने के लिए एक पीढ़ा सरका दिया, पर लाली वहां से नहीं उठा। यही नहीं बल्कि एड चे मिलने पर हर किसी से जो जोहार का आदान-प्रदान होता था, वह लाली से नहीं हुआ । मेरो निकट आती आंखों ने देखा कि एक क्षण के अचकचाकर वह सकुचा-सा गया और आंखें नीची करके चुपचाप लगा। -"पेपी, क्या अभी चलना है ?" मासा ने लाली की ओर ध्य देकर पूछा। -"हां भाई," एड ने कहा, "मैंने गाड़ी भी बाहर निकाल ली ---''पहिले तो इतने बैर चलने की बात थी न ?" मासा ने खास ऊंचाई की ओर निर्देश कर, संध्या के चार बजे वाले शाल वनों का द्वीप ६७ संकेत किया-"मैं तो यही सोचकर यह सब ले बैठा हूँ।" मासा के सामने छोटे-बड़े धुंघरुओ का ढेर था जिसमें से एक-एक लेकर वह चमडे की पट्टी में पिरो रहा था। इसके अलावा मुर्ग और मयूर के लम्बे-लम्बे पंख अलग फैले धे। स्पष्ट था कि वह सारी तैयारी नृत्य सम्बन्धी वेश-भूपा की थी । नाच के दौरान कमर में बंधने के लिए बड़े-बड़े घुघरी का झुब्बा और सिर के पीछे पगड़ी मे खंसने के लिए मयूरपंख की झाल ! पिछले दिन मासा के साथ जंगल मे जाकर कुछ जलाऊ लकड़ियां काट लाने की बात थी। घर के उपयोग के लिए लकडी खत्म हो चुकी थी, अत: एड ने जंगल चलने के प्रस्ताव के साथ मासा को आज शाम का समय दिया था। बिना मूचना के इस अचानक समय परिवर्तन के लिए उसने कैफियत दी कि शाम को उसे कोई दूसरा जरूरी काम है । इसके अलावा शाम-गाम को जंगल काटना अच्छा भी नही लगता--मूरज डूबने के पहिले ही लौट आएँ यह बेहतर होगा। -"तो ठीक है," मासा ने कहा -"मैं चलता हूं, लेकिन यह हाथ का अधूरा काम पूरा कर दूं नही तो सारे धुंघरू इधर-उधर होकर रह जाएंगे।" -"क्यों?" इतनी देर अनवरत मौन के बाद मैंने एड मे पूछा- "आसपास क्या कोई उत्सव वगैरह होने को है ?" -"नहीं। अभी तो ऐमी कोई वात नहीं। शायद यह तैयारी काकमार की है।" काकसार! मेरी आंखों के सामने अचानक एक तस्वीर आकर खड़ी हो गई-ऐसी तस्वीर जिसका केनवास खूब बडा है जिसमें असंख्य और अनगिनत बिन्दु हैं । और जिमका हर बिन्दु गतिशील और स्वरमय है। उस स्वर में कितने प्रकार के शोर हैं, कह मकना सम्भव नही-नाल, तुरही, गवर-मोग आदि की चिल्लाहट के साय, छोटे-बड़े कई प्रकार के धुंघरुओं का समवेत स्वर- भन्न ! भन्न झन्न तभी लाली झिझकता हुआ उठ खडा हुआ और विना कुछ कहे मासा र अनुमति मांगती आंखों से देखने लगा । मासा ने मुस्कुराकर गदन दी और एकाध क्षण वाद लाली वहां से चला भी गया । --"आज लाली कैसे आया था ?" जब वह दूर निकल गया तो एड ने । TI -"क्या बताऊँ ?" कहकर मासा हंसने लगा। कई क्षण वह उसी तरह सता रहा फिर बोला-"मुझे कई दिनों से परेशान किए हुए है। कभी धुंधरू लाकर देता है, कभी पंख-बंख और कभी कपड़े । कहता है, काकसार नाच के लिए यह बना दो, वह बना दो। मैं भी उसका मन रखने के लिए हां-हूं कर देता हूं, आने पर कुछ जोड़-तोड़ भी कर-करा देता हूं, हालांकि सभी जानते है कि वह वीमार आदमी है, काकसार उसके लिए कोई मानी नहीं रखता। एड और मैंने एक-दूसरे की ओर अर्थभरी दृष्टि से देखा। जिस वात पर मासा हंस रहा था, वह क्या हंसी के लायक थी ? -"और इन सबका यह करता क्या है ?" मैंने पूछा। -"करेगा क्या। पिछले साल तो बीमारी के कारण उठ भी नहीं सका। इस साल क्या होता है, कौन जाने । ज्यादा-से-ज्यादा यह होगा कि नाच के कपड़े पहिनकर या सजधजकर आ जाएगा और कहीं खड़ा होकर चुपचाप दूसरों को देखता रहेगा। जो आदमी ठीक से चल फिर नहीं सकत उससे... पास के खभे से टिककर मैंने धीरे से आंखें मूंद लीं, हालांकि वन्द पल में भी जो आकृति रह-रहकर उभरी आ रही थी वह लाली की ही देखता हूं कि अबूझमाड़ के सर्वाधिक लोकप्रिय, महत्वपूर्ण व चिर-प्रती शृंगार-पर्व काकसार का एक विराट आयोजन ओरछा में हुआ है। से लोग आए हैं, असंख्य युवक-युवतियों के जोड़े शराब केन शे में धु रहे हैं। ऐसा नृत्य जिसमें एक स्टेप के सिवाय गति कोई नहीं। स्कलात्मक, नीरस व उवा देने वाला, लेकिन उससे अधिक उल्ल में कहीं और नहीं है। पूरे चांद की धवन चांदनी सब-कहीं यकस चाल वना का द्वीप और जहाँ कहीं पेड़ खड़े हैं उनके नीचे छिदरी-छिदरी व चितकबरी छाया निःस्वर पड़ी है-चुपचाप व अपलक निहारती-सी। उन्ही छायाओ मे से एक पर मेरी निगाह अचानक ठिठक जाती है। देखता हूँ कि नृत्य को भरी-पूरी पोशाक मे अपनी कमजोर व धक-धक करती देह को छिपाए लाली मौन खड़ा है-अविचल व निःशब्द ! उसकी आँखें कभी इस नृत्य-रत जोड़े पर ठहरती हैं, कभी उस पर । कुछ देर वह जाने कैसी करुण व पिपासित आंखों से ताकता रहता है फिर लौटकर अपनी विवरा व असहाय शरीर को देखने लगता है। रेको वहां कही नही है-किसी अंधेरे कोने में भी नहीं । संभवतः उस सारे वातावरण मे अलग व दूर अपने घर के अंधेरे कोने मे और मुंह लेटी है और दोनो हथेलियों से कानो को ऐसे मूंद रखा है कि यहां कोई भी स्वर भटककर उनके कानो तक न पहुंचे। लाली देखता है। लेकिन नहीं देखता। देखता है कि एक-एक करके उसके सारे साथी लडकियो ने चुन लिये, नाचते-नाचते किसी दूसरे का उन्हें ध्यान नहीं रह गया है-शराव, नशा और नशा! चांदनी कभी मदम, कभी तेज हो जाती है और उस धुंधलाई-धुंयलाई रोशनी मे कई जोड़े धीरे- से झाड़ियों की ओर खिसक जाते हैं। नही देखता कि पेहो के नीचे को छिदरी छायाएं हल्की-हल्की होकर क्षण-भर के लिये मिटने-सी लगती हैं झाडी मोट की कच्ची डगालियो व छोटी पत्तियों वाली घास की नसो में महुए वाली शराब की तेज गंध लिपटने लगती है, क्षण-दो-क्षण वाद कुछ जोड़ों को सम्मिलित व दबी-दबी हंसी झाडियों में महक जाती है और फिर लम्बी. लम्बी उसमें अयवा थकी, श्लय व थरथराती हुई कई निश्वास हवा से इधर वहक आती हैं..." जैसे ऋतुओं मे वसन्त कईयों के घाव करता है, लालो, रेको जैसे लोगों को अधमरा करने के लिए वैसे ही अबूझमाड़ में फाकसार आता है-- शृंगार-पर्व काकसार, जिसकी प्रतीक्षा वर्ष भर की जाती है। ऐसा पर्व जिसमें प्रेमी तथा प्रेमिकाओं का उन्मुक्त मिलन होता है। इस अवसर पर चित तथा अजनबी युवक-युवती निकट आकर एक-दूसरे को ते हैं और उनके बीच भविष्य में सुदृढ़ होने वाले प्रेम की नींव । यहीं पर अधिकांश विवाहों की भूमिका वनती है लगभग नब्वे- दाम्पत्य जीवन का सूत्रपात भी यहीं से होता है । किन काकसार क्या केवल शृंगार और समागम का ही त्योहार है। उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह गोत्र देव-पूजा और आस्था का परावादी पर्व नहीं है जिसके माव्यम से उनके वर्ष भर की एकरसता ती है और उत्साह व उमंग लौटता है ? अबूझमाड़ में प्रमुखतः पहाड़ी माडिया नामक एक जाति बसती है। यह जाति कई गोत्रों या वंशों में बंटी हुई है जिन्हें नृतत्वशास्त्रीय शब्दावली के अनुसार 'क्लेन' अथवा 'सिब' कहा जाता है । इन शब्दों की गूढ़ परिभापा में न जाकर यहां केवल इतना कहना पर्याप्त होगा कि आदिम जातियों के सन्दर्भ में गोत्र नातेदारी की इकाई माना जाता है। ऐसे सारे लोग जो किसी एक पूर्व-पुरुष के वंशक्रम से आते हैं (प्रत्यक्षतः अथवा पौराणिक कथा के रूप में सम्बन्ध) आपस में रक्त सम्बन्ध मानते हैं और इनका गोत्र एक होता है। जैसा कि स्वाभाविक है, कि इन गोगों का माड़िया समाज में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि शादी-व्याह गोत्र के अनुसार ही होता है। एन माड़िया समाज में एक व्यक्ति अपने ही गोत्र की किसी लड़की से कभी व्याह नहीं कर सकता। साधारणत: एक गोत्र के लोगों का एक ही गोत्र देवता होता है जिसकी पूजा की जाती है और आपस में उनकी एकता प्रतीक भी वही है। उदाहरण के लिए मैं यहां ओरछा गांव को ही लेत जहां उसेन्डी' नामक एक माडिया-गोत्र का आधिक्य है । उसेन्डियों गोन-देवता है 'देवान' और देवान का मंदिर गांव के बाहर एक जंग हुआ है। मंदिर की स्थिति महत्वपूर्ण है। गांव के बाहर शाल वनों का द्वीप स्थापना इस बात का प्रतीक है कि यह गांव का नहीं है। यह गोत्र-देवता है ग्राम-देवता नही । अन्य गांवों के उसेन्डी भी समय-समय पर इसी मंदिर में आकर पूजा करते हैं। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि अन्य कई ऐसे गोत्र हैं जो किसी पौराणिक कथा के आधार पर इस उसेन्डो गोत्र से जुड़े हुए हैं और उनके सदस्य भी देवान पर आस्था रखते हुए उसकी पूजा करते हैं । ऐसे समस्त गोत्र जो एक दूसरे की नातेदारी पर विश्वास करते हुए आपस में सम्बद्ध हैं,'दादा-भाई-गोत्र' कहलाते हैं। दूसरे गोत्रों का समूह जिनके सदस्य उसेन्डी दादा-भाई-गोत्र से सम्बन्धित नहीं हैं, 'आकोमामा' कहताते है (आको अर्थात् नाना और भामा यानी मां का भाई)। एक व्यक्ति न केवल अपने गोत्र की किसी लड़की से ब्याह नहीं कर सकता वरन उसका ब्याह उन समस्त लडकियो से भी वर्जनीय माना जाता है जो उसके गोत्र के दादा भाई गोत्र है । अवश्य उसका ब्याह केवल आको-मामा-गोत्र को किसी लड़की से हो सकता है । इस तरह उसेन्डी, गुता, बड्डे, कोरे, इरकिटी, कोये तथा नाचोर गोत्रो के सदस्य एक दूसरे के दादा भाई हैं और उनमे ब्याह वर्जनीय है जबकि वे पटावी, द्रुवा, कोला, हाकर, वड्डी, करमे, गचा, वरपा, नोनेर तथा नीरा गोत्रो में किमी से भी ब्याह कर सकते है। ये मारे प्रथम समूह के आको-मामा है । इन दोनो गोत्र के समूहों को अर्धाश कह सकते हैं कारण कि ये अपने आप में असम्पूर्ण हैं और व्याह के लिए इन्हें एक दूसरे का महारा लेना ही पड़ता है। येल यूनिवसिटी के नृतत्वशास्त्री सी० पी० मरडॉक ने कनेन की जो परिभाषा दी है उसके अन्तर्गत एक गोत्र की कडी सीमाएं निर्धारित हैं। उसके अनुमार उसेन्डियो का उत्सव केवल उन्ही का होना चाहिए जबकि देवान की पूजा न केवल उसेण्डी गोत्र के लोग करते हैं बलि सारा गांव, जिसमे कई गोत्र के लोग होते हैं, मानता है। समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि देवान की अहमियत धोरे-धीरे गोत्रदेवता की हैसियत से कम होती जा रही है और वह प्राम-देवता बनता जा रहा है। - माल यही बल्कि एक देवता के आधार पर पहिले दो गोत्र-समूहों में जो तता थी, वह धीरे-धीरे टूटती जा रही है। लगता है, जैसे इन दोनों गोत्रों में वैवाहिक सम्बन्ध को संकेत द्वारा पित करने के लिये ही देवान का व्याह आडेर गांव के जूरा तथा तोदे- ड़ा के नीरा और बरवा गोत्रों की देवी 'करमावेला' से किया गया है। इसी तरह देवान के दोनों बड़े भाई-गुता के पयकोल तथा वड्डे गोत्र के हुन्गोमुइतो उन सारे समूहों द्वारा पूजे जाते हैं जो कि उसेन्डी के दादा-भाई हैं। इन विभिन्न देवी-देवताओं की माड़ियों के विभिन्न उत्सवों में वर्ष भर पूजा होती है, लेकिन उन सारे पर्वो में काकसार अत्यन्त विशिष्ट तथा महत्वपूर्ण है गर्मियों के अन्त तथा वर्षाकाल के पूर्व यह त्योहार तब गुरू होता है जब नई फसल के लिये वीज डालने का मौसम आ जाय-वस्तुत: बोनी से पहिले एक महान उत्सव के रूप में यह मनाया जाता है और इसके बाद ही गांवों में व्याहों का सिलसिला प्रारम्भ होता है। काकनार की कोई एक ही निश्चित तिथि नहीं होती। प्रत्येक गांव का काकसार हर दूसरे भिन्न तारीख को रखा तथा मनाया जाता है। दरअसल, यह वह अवसर है जब कि अच्छी फसल के लिए गोय-देवता की प्रार्थना की जाती है और उ हर तरह से प्रसन्न किया जाता है । उस देव को जो परम्परा के अनुस ग्रामदेवता से अधिक महत्वपूर्ण तथा शक्तिशाली माना जाता है। यों इस उत्सव की रूपरेखा बड़ी सीधी-सादी है। काकसार से एक रात पहिले इरपानार गांव के लोग पयलीब (देवान का बढ़ा भाई) को लेकर ओरछा आते हैं । देवान के म एकषित प्रत्येक परिवार के एक-एक प्रमुख तथा कुछ नवयुवकों अतिथि देव का स्वागत करते हैं। उसी रात देवान के दूसरे बड़े भ गातों को भी गुमियाबेड़ा गांव से लाया जाता है। दोनों देवों शाल वनों का द्वीप एक मुर्गी की बलि दी जाती है । लोग अच्छी फसल के लिए देवों से प्रार्थना करते है और नगाड़े को तेज ध्वनि के बीच एक सामूहिक भोजन होता है। इसी अवसर के लिए नई फसल का अनाज एक जगह पहिले से जमा किया जाता है। गांव वाले दस्तूर के अनुसार देवों के लाने वाले अतिथियों को विशेषकर यही अनाज खिलाते हैं। दूसरे दिन पयलोक तया हुन्गोमुइतों को स्नान के लिए माडिन नदी ले जाया जाता है। यहां फिर कुछ नवयुवक, देवों का स्वागत-सत्कार करते हैं । जैसे ही देव के निकट पहुँचे कि ऊँचे स्वर मे जोर-जोर से नगाडे बजाए जाते हैं । नदी मे आदरपूर्वक मुंह धुलाने, नहलाने तथा मयूरपंखों से उनकी पूरी सजावट करने के बाद ये दोनों देव गांव के मध्य में लाकर रखे जाते है जहां विशेषकर एक खंभा गडा होता है। इसी स्थान पर देवान को भी लाया जाता है और थोड़ी देर बाद कुछ लस्को के शरीरो मे देव प्रवेश करते है । वहां पत्थर की बलिवेदी पहिले से तैयार होती हैं । देव जिन-जिन बलियो की, मसलन मुर्गी, मूअर, वकरे आदि की मांग करते हैं, तुरन्त मान लिया जाता है । पत्थर की उसी वलिदेवी पर चावल के दाने चढाकर बलि- दान की विशेष छुरी से कई जानवरो की बलि दी जाती है। पिछले वरसो मे जिन्होंने मिन्नतें की थी और जिनकी आरजुएं वर आई थी, उनकी ओर से बलिदान अलग होते है । तत्पश्चात्, मातादाई (जो देवान के बाद मर्वा- धिक महत्वपूर्ण देवी मानी जाती है) के मंदिर मे भी कुछ बलियां देने के बाद सब वापस आते हैं । सारे लोग छोटे-छोटे समूहों मे बेटे होते हैं और खूब शराब पी जाती है। थोड़ी देर बाद घर लौटने पर सारे गांव में विभिन्न फसलों के अनाज के साथ वलिदान का मांस खूबतृप्त होकर खाया जाता है। लगभग तीसरे पहर लोग फिर उसी सभे के ईर्द-गिर्द जमा होते है जो गांव के मध्य गड़ाया गया था। लस्को की देहो मे पुनः देव प्रवेश करते हैं और देवो का नृत्य आरम्भ होता है । बड़े-बड़े नगाड़े, घंटे और धुंधरओ के सोर मे खोए हुए देव वडी देर तक नृत्य करते हैं और बीच-बीच मे वे अनेक ७४ शाल वनों का द्वीप दर्शकों के माथे पर माशीर्वाद स्वरूपं लाली के टीके देते चलते हैं। कुछ देर बाद देव आराम करने के लिए घोटुल पहुंचा दिये जाते हैं। इस समय तक दूसरे गांवों के लोग भी पहुंचने लगते हैं। काकसार नृत्य में भाग लेने वाले चाहे दो-चार ही हों, देखकर आनन्द लेने वाले अनेकों होते हैं। अँधेरा होते-होते नर्तकों की तैयारियां शुरू होने लगती हैं । नृत्य की पूरी वेशभूषा में सजने के लिए प्रत्येक नर्तक अधिक से अधिक समय लगाता है । नाच की पूरी पोशाक पहिनना, गले में माला-मूंगों का ढेर, सिर की पग- ड़ियों में मयूर अथवा मुर्ग पंखों की सजावट और कमर के पीछे बड़े-बड़े घुघओं की ऐसा कसावट कि नाच के दौरान अधिक-से-अधिक जोर से भन्न्-झन्न् को आवाज हो। इस तैयारी में हर नवयुवक एक-दूसरे की सजावट के लिये पूरी सहायता करता है बावजूद इसके कि हर एक को दूसरे से होड़ होती है। काकसार की सबसे बड़ी विशेषता तथा विचित्रता यही है कि वहीं आकर्षण का केन्द्र युवक होता है, युवती नहीं । नृत्य के दौरान प्रत्येक नर्तक इसी बात पर प्रयत्नशील रहता है कि ज्यादा-से- ज्यादा आकर्षक वही दिखे ताकि युवती ही आकर्षित होकर पास चली आए,. नाच के लिये उसके संग की कामना करे। अन्त में, एक-एक करके अलग-अलग समूह नृत्य के लिए आते हैं और जब तक कि नृत्य शुरू हो, आकाश में पूरा चांद खूब निखर जाता है। पहिले नतंकों का दल अर्द्धचन्द्राकार घेरा बनाकर नाचता है, युवतियाँ उनमें अलग थोड़ी दूर पर नाचती हैं, लेकिन कुछ देर बाद एक एक करके युवतियां छंटकर युवकों के पास खिंचती चली जाती हैं। सारी रात नाच उनी एक गति व उत्साह से चलता रहता है । बीच-बीच में कुछ जोड़े एक-. दूसरे की अनुमति ने झाड़ियों की ओट चले जाते हैं...। काकसार का यही परिचय तथा उन्मुक्त मिलन अकसर आगे चलकर विवाह में परिणत हो जाता है। कई बार नाच के बाद युवक युवती को सीधे अपने घर ले जाता है और ऐसी परिस्थिति में 'एका-देसीना' नामक शाल वनों का द्वीप एक विशेष प्रकार का ब्याह होता है। इसमें वर-वधू दोनों छप्पर के नीचे खड़े कर दिए जाते हैं और ऊपर से सिरो पर जल उलीचकर उन्हें परिवार में पति-पत्नी की तरह स्वीकार किया जाता है। वास्तव में काफसार एक साधारण पर्व ही नहीं, माडिया युवक के जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण अवसर है जिसकी वर्ष भर प्रतीक्षा की जाती है। काकसारों का जो दौर चलता है तो अधिकांश युवा समुदाय अपने गांव में नहीं मिलता। नवयुवक तथा नवयुवतियो के झंड-के-झुंड एक गांव से दूसरे गांव की ओर बहते चले जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं उजडे हुए मेने के इपके-दुको चिन्ह और वातावरण मे धुंधाओ, पदचापो और गीतो का समवेत स्वर जो सन्नाटा पड़ने के बाद भी देर तक गूंजता रहता है। हार्न की आवाज से अचानक चोंककर मैंने देखा कि एड की जीप ट्रॉली समेत आकर सामने ही खडी है, मासा ने अपने सारे सामान समेट पर लिए हैं और केवल मेरे उठने की प्रतीक्षा की जा रही है। अचानक मैं फौरन उठ गया तथा होले कदम उठाता व मुस्कराता हुआ जीप की ओर बढा। तब भी कोई मुझसे पूछता तो? क्या मैं कह सकता था कि लाली की बीमार, करण और अमहाय आँखो की चुमन को अपने अन्तर से मैंने निकालकर अलग कर दिया है ? अपने भीतर मैंने बहुत हल्की. सी हरकत कर दी, भीतर कुछ मुबहम-सा स्याल आया और उस एक जुमले को लादते हुए मैंने सोचा-~-हम लोग लकड़ी काटने वालवन जा रहे है।
छः अक्सर शामें हमारी एक तरह की होतीं। सूरज डूबने के पहले ही हम लोग सलपी पेड़ तक चले जाते और वहां से लौटने तक साढ़े सात-आठ बज जाते। एड का शोध-कार्य लगभग समाप्त हो चुका था, अत: यों भी कुछ बेफिकी थी। प्रायः खाते-पीते दस बज जाते; कुछ तो इस कारण कि खाने की मेज पर कई तरह की बातें निकल आती-कभी हिन्दू धर्म, दर्शन या राजनीति की, कभी अमरीकी जीवन, वहां की समानता उनकी सुख-सुविधा की अथवा भारतीय जीवन के अभावों व मध्यवर्गीय समस्याओं की। धर्म की चर्चा हो या कला की, एड ने अपने उदार विचारों से मुझे सदंव प्रभा- वित करके यह सोचने के लिए विवश कर दिया कि विचारो की ईमानदारी साफगोई व खुलापन आदमी को कभी छोटा नहीं बनाता । उन्हीं लोगों को देखकर मैंने जाना कि सहिष्णुता, उदारता, त्याग, दया आदि गुणों को भारतीयों की विरासत कह रहकर चाहे हम जितने गौरवान्वित होते रहें, हम लोगों के वास्तविक जीवन में इनका अभाव ही है। लगता है धन से ही नहीं, हम मन से भी दरिद्र हैं और हमारी स्थिति बहुत कुछ दफ्तर के उस क्लर्क की तरह है जो हीनभाव-ग्रसित होने के कारण बार-बार इस बात की याद दिलाता है कि वह खानदानी वावू नहीं है। उसके घराने का सारा अतीत अत्यन्त गौरवशाली है। दादे-परदादे से लेकर पिता तक ने बड़ी-से-बड़ी अफसरी की है और वह तो भाग्य है कि । गया इसी पुर्नजागरणवादिता ने हमें निप्निय और खोखला नहीं बना रखा है ? अपने गौरवमय अतीत के मद में चूर हम शीयं-पराक्रम और साहस - ७६ शाल वनों का द्वीप को चाहे जितनी बातें करें, वास्तव में हमारे अपने स्वभाव में साहस कितना आर्म- जगदलपुर के डाक बंगले में जिस दिन एड से पहले-पहिल परिचय हुआ उम दिन भी मैंने यही सोचा था। माध्यम थे 'ट्राइबल-इन्स्टिट्यूट ऑफ छिन्दवाडा, के रिसर्च-आफिसर व मेरे मित्र श्याम कालिया। स्पष्टतः हम लोगो ने कुछ नहीं कहा, लेकिन एड के जाने के बाद हमारी उन गोल-गोल व मुवहम-मी बातो मे वही क्षोभ था। मैंने कालिया को अपने एक वंशीय मित्र के बारे में बताया था। मित्र महोदय मध्य प्रदेश पासी हैं । बस्तर से बहुत दूर भी नहीं रहते। नतत्वशास्त्र सम्वन्धी शोध-कार्य के लिए बस्तर आना चाहते थे, लेकिन मुझे बार-बार लिखने के बाद भी एक अरसे तक केवल इस डर से नही आए कि पता नहीं यहां पानी-वानी मिलता भी है या नही और शायद उनसे ऐमा कष्ट-साध्य कार्य न हो। इस उदाहरण के परिप्रेक्ष्य में एड को देखना कितना आनन्ददायी, लेकिन साथ ही कितना क्षोभकारी था! "तुम वेड-टी नही पीते ?" एक दिन अचानक एड ने मुस्कुराते हुए मुझमे पूछा था । पहिले मैं समझ नहीं पाया इसीलिए 'क्यो' कहकर रह गया। "यहां के अधिकाश लोगो में यह पी जाती है कि नहीं?" उसने कहा ---"भारत आने के बाद जितने भी भारतीय मित्रों के यहां ठहरने का अव- सर मिला है, यह विपत्ति मुझ पर आती-आती बची है।" "तुम 'साहब' लोगो को बात कर रहे हो," मैंने हंसते हुए जवाब दिया--'और तुम जानते हो कि मैं साहब नहीं हूं।" "लेकिन साहब लोग क्या भारतीय नहीं हैं ?" एड ने उसी स्वर में कहा-और मुझे चुप हो जाना पड़ा। लगा, एड ने किसी गलत जगह मुझे पकड लिया है। बंड-टी का चलन अंग्रेजो के माय भारत आया था। अव अंग्रेज नहीं हैं, लेकिन समाज के कई वर्गों में यह मानसिक गुलामी अभी भी ज्यों-की-स्यों है। यह बात कालिया कहते या अन्य कोई भी भारतीय ७८ शाल वनों का द्वीप मित्र कहता तो मायद मैं भी हंसी में शामिल हो जाता लेकिन चाहने पर भी वहां हंसी नहीं आई, क्योंकि एड विदेशी था। कोई हमारे भौतिक अभाव के प्रति सहानुभूति प्रकट करे, यह भले हमें मान्य हो, यह कतई गवारा नहीं होता कि हमारी बुद्धि पर तरस खाया जाए- लगा मेरे भीतर का ऐसा ही कोई भारतीय अहं आहत हो गया है । ऊपर से हमकर मैंने कहा-"उसमें ऐसी बुराई क्या है ? क्या केवल यही कि अमरीकी न होकर वह अग्रेजी चलन है ?" "यहाँ चलन की राष्ट्रीयता न देखी जाए वही बेहतर है।" एड ने कहा-"अगर उस दृष्टि से देखना भी हो तो इसी छोटी-सी बात से दोनों देशों के जीवन व उनके बीच के मूलभेद को समझा जा सकता है। क्या कोई भी आदत व्यक्तिगत स्वभाव का एक अंग नहीं होती? क्या स्वभाव से चरित्र नहीं बनता और इसी चरित्र के अनुसार क्या देश और राष्ट्र का मिजाज़ नहीं ढलता ? अंग्रेज साम्राज्यवादी जाति के लोग हैं--एक हद तक विलासित व ऐश्वर्यप्रिय, उनके बीच इस आदत को समझा जा सकता है ! अमरीकी जाति के यह मुआफ़िक नहीं आ सकता, क्योंकि जन्मतः वह संघर्पगील हैं और ऐसी छोटी-छोटी विलासिता के लिए औसत अमरीकन को समय नहीं। भारतीय जीवन में भी क्या यही दूसरी स्थिति नहीं घटनी चाहिए ? वात चाय पीने या न पीने की नहीं, ऐसे अनुकरण की है जो हर लिहाज से निकम्मी व फिजूल है। मैंने एक सिगरेट निकालकर सुलगा लिया और खूब गाढ़े धुएँ की कई परतें अपने चेहरे पर ढांक ली। बहुत पहिले बीच में एकाध सप्ताह के लिए दोनों पति-पत्नी रायपुर गए थे। वहाँ एक भारतीय मित्र आग्रह के साथ उन्हें अपने यहाँ लिवा ले गए। मित्र महाशय दक्षिण भारतीय थे और केन्द्रीय सरकार के खासे बड़े अधिकारी-एड-फिलिस को वहां किसी प्रकार को कोई अमुविधा नहीं हुई। अलवत्ता मिय महाशय के अतिथि-प्रेम, उदारता, सेवा भाव आदि की वे लोग अकसर प्रशंसा किया करते थे, सिवाय उस एक बात के जो उनके शाल धनों का द्वीप लिए अचरज और हंसी की बात हो गई थी। "तुम मेरी बात का अविश्वास तो न करोगे," एड ने स्वयं कहा था- "वे दक्षिण भारतीय सज्जन हृदय के इतने अच्छे सावित हुए कि हम लोग हमेशा उन्हें याद रखेंगे। उनका प्रेम और सौहाद्रं कतई भूलने की चीज नहीं, लेकिन जानते हो हमे यह देखकर बडा आश्चर्य हुआ कि वह इतने 'बेचारे' हैं । चपरासी, रसोइये, माली व नौकर-चाकर मिलाकर कुल सात- आठ आदमी हमेशा इनकी मदद के लिए तैयार रहते थे। मैं समझता हूँ, मिवाय खाने के अपने हाथ से वह कोई काम नहीं करते-चीजें वही रखी है, दो कदम बढाकर ली जा सकती हैं, लेकिन उसके लिए भी चपरासी को पुकारा जाता है-क्षण-क्षण में नौकर-चाकर, माली, ड्राइवर या किसी-न- किमी की सहायता के लिए पुकार देख-सुनकर हमे बड़ा आश्चर्य होता था। सायद भारत में अधिक से अधिक नौकरी से घिरना सम्मानजनक वात समझी जाती है जब कि अमरीका में ठीक इसका उल्टा होता है । वहाँ ऐसे लोग क्या समझे जाते हैं, मालूम है ? बेचारे और अपाहिज, जिन पर समाज तरस खाता है। मैं एड की बात पर चुपचाप सोचने लगा। यद्यपि उसने नहीं कहा लेकिन मेरे ही मन आया कि यह गौरव भी क्या हमने अग्रेजो से नहीं लिया है ? जैसे नित्य का नियम वही यन गया था। साने की मेज से उठने के बाद एड बन्दूक लेकर निकल जाना। उम निकलने मे एक लोभ विशिष्ट था और वह था चीते का शिकार । प्राय रोज चीते के गांव में घुस आने, मुर्गी, बकरा या कुत्ता उठा ले जाने अथवा असफल हमले की खबर हम सभी सुनते, लेकिन एड से कभी चीते का मुकाबिला न होता । वड़ी टार्च लेकर गांव के किनारे-किनारे व छूने-छुपाने जगलों के आस-पास वह दो-दो घटे भटकता, लेकिन सिवाय निरामः शाल वनों का द्वीप . - और कुछ हाथ न लगता। व्यक्तिगत रूप से मुझे शिकार से कोई दिलचस्पी न थी। शायद एक कारण यह हो कि शिकार जितने धैर्य की मांग करता है, उसका मेरे यहां अभाव है। अंधेरी रात के साथ-सांय जंगलों में भूत-प्रेत की तरह निकल पड़ना और विना किसी बातचीत के घंटों खाक छानते रहना मुझे उवा डालता था। एड के आग्रह पर एकाच बार तो मैंने साथ दिया लेकिन बाद में मैं टालने लगा । अमरसिंह के साथ चाहने या न चाहने का सवाल न था- हर हाल में उसे एड का संग देना ही पड़ता । अत: एड के चले जाने के बाद अकेले कॉटेज में मेरा कोई साथ देता तो वह थी चन्द कितावें या पत्र- पत्रिकाएँ...1 पर पढ़ते-पढ़ते अचानक बीच में ही बुरी तरह चौंक पड़ता। शालवनों से घिरी निस्तब्ध रात बन्दूक के घाय-धांय की आवाज से एकदम कंपकपा कर रह जाती। कॉटेज के आस-पास वाले दरख्तों में पांव-पंख समेटकर सोए परिन्दे हड़बड़ाकर जग जाते । पहाड़ियों में वह आवाज टकराकर इतनी जोर से प्रतिध्वनित होती कि खेतों पर चर रहे जंगली जानवर विदककर ; बेतहाशा भागते और लगता जैसे माडिन नदी की तटवाली रेतीली कगार कहीं-कहीं से लरजकर शांत जल में छप-छप गिर पड़ी है... में अचकचाकर खड़ा हो जाता। जी ऐसे जोर-जोर से धड़काता जैसे कहीं अनिष्ट हो गया हो। मानो कोई विपत्ति का भंवर बढ़ता चला आ रहा हो जिसकी चपेट में थोड़ी देर बाद वह सारा हल्का समा जाएगा। उसके बाद एड की प्रतीक्षा कितनी लम्बी और उकता देने वाली होती । मैं अधूरी किताब फिर खोल लेता लेकिन आंखें एक परे से आगे नहीं बढ़ती । कान बाहर की पदचाप व आवाज सुनने के लिए जैसे मुझे समूचा बाहर निकाल लेते। सोचता कि कोई भी क्षण एक अप्रत्याशित समाचार लेकर मेरे सामने खड़ा हो जाएगा। पर वह कभी नहीं हुआ। अक्सर बड़ी देर को ऐसी प्रतीक्षा के बाद वास्तविक क्षण अत्यन्त साधारण व निराशाजनक होता । देखता कि बन्दूक पाल वनों का द्वीप लेकर सामने-सामने एड और पोछे अमरसिंह चने का TER बोरन प्रसन्नता । ठंडे दंग से आकर एड खड़ा हो जादाजा स्वर में कहता-"वंड लक! नो पेन्यर एराउण्ड !" मेरी आँखें अमरसिंह के एक हाथ मे मूलती पौर जिसे क्षण-भर के बाद फर्श पर फेंक दिया जाता को जवान में डैम रेविट ! नन्हा-मुन्ना-मा मर बालों वाली गदीली खाल, लम्बे-लम्बे कान, छह- स्थिर पुतलियो को गोल-गोल आखें। अपनी क्या कम जतन किए होंगे, लेकिन केवल एक- गतियाँ पत्थर, जड, सख्त!
शाल वनों का द्वीप इससे पहिले भी एड के दिमाग में यह बात कई वार आई थी कि एकाध सूअर को गारे में बांधकर चीते की प्रतीक्षा की जाय । लेकिन लगातार प्रयत्नों के बाद भी इस काम के लिए ओरछा में सूअर पा जाना आसान वात नहीं थी। अधिक-से-अधिक पैसों के बदले भी साधारण माड़िया लोग सूअर वेचना नहीं चाहते। उनके घरों से जवाब मिला कि जो भी दो-चार सूअर उन्होंने पाल रखे हैं, वे बलिदान के लिए हैं-बकरे, बकरियों की तादाद इतनी कम थी कि न होने के बराबर ही था, अतः वह योजना पूरी नहीं हो सकी थी। वह समस्या भी इस समाचार से सुलझती दिखाई दी। पीरचे की जख्मी मादा सूअर चूंकि मर रही थी, इसलिए उसे दे डालने में किसी को कोई दर्द न हुआ। अकेले एड का ही नहीं सभी गांव वालों का ख्याल था कि अपने जख्मी शिकार के फिराक में चीते को फिर आना चाहिए और उसी प्रकार की तैयारियां हुई। पीरचे के आहाते के पीछे ढलवान थी-ऊबड़-खाबड़ और वेहद कुशादा। उससे लगे हुए एक-दो खेत थे और फिर जंगल शुरू हो जाता था। तय हुआ कि पीरचे के अहाते से लगभग २०० गज की दूरी वाले एक छोटे पेड़ पर मचान बनाया जाय, और कुछ दूरी पर जख्मी सूअर को चीते का ग्रास बनने के लिए बांध दिया जाय। जंगल से जो पगडंडी निक- लती थी, वह मेतों के बगल से होती हुई उसी पेड़ के नीचे से गुजरती थी और उसी पर पंजों के निशान भी देखे गए थे। मचान कुछ इस तरह बँध- वाया गया था कि चीते के आने सूअर पर आक्रमण करने और लोटकर भागने-तीनों अवसरों पर एड को फायर करने की सुविधा हो और किसी भी मूरत में चीता जाने न पाए। जनवरी का अंतिम हफ्ता और अबूझमाड़ की सर्दी! तीवा करने को जी चाहता था। चहारदीवारी और छत के साये में रहने तथा गरम कपड़ों से के-मुंदे होने के बावजूद अंगीठी के बिना बैठा नहीं जाता था। और शाल वनों का द्वीप ८३ इसे मंयोग ही कहना चाहिए कि पिछली तीन रातो में ऐमी बला की ठंड पड़ रही थी कि वरामदे में निकलने का साहस बड़ी बात मानी जाती। हम लोग सरेशाम कॉटेज में वन्द हो जाते और उसके बाद दरवाजे, खिड़कियां लगाकर एड के कमरे मे दुबक जाते। जब अभागिन मादामूअर को गारे में बांधने की बात चल रही थी तो सबसे पहिले मुझे इसी सर्दी का स्याल आया था। और लोगों के सामने तो नही, अकेले पड़ने पर मैंने एड से कहा तो वह बोला-"तुम नहीं जानते कि उत्साह और रोमाचकारी कामो मे कितनी गर्मी होती है। फिर मेरे पास गरम ऊनी कपडे हैं, कम्बल हैं.. वही कपडे वास्तव मे कहां तक एड का साथ दे रहे हैं. इसका एहसास मुझे तभी हो गया था जब हम लोग घर छोडकर निकले। एड ने थोडी व्हिस्की भी पी ली थी, फिर भी अपनी सांस खुद को जमती-सी मालूम होती। कोहरा इतना घना और गाटा होकर पड रहा था कि दस कदम दूर को आकृति दिखाई नहीं देती थी। पीरचे के घर पहुंचते ही सब अंगीठी की ओर झपटे और अपनी- अपनी हथेलियां सामने करके आग के पास बैठ गए। वहां आग के गिर्द पीरचे के यहाँ अधिकांश युवा-सदस्य घिरे हुए थे-पीरचे का छोटा भाई व्हीले, युवा कोसी, पडोस की दो-तीन और कुआंरी युवतियां तथा स्वय पीरचे। कुछ देर के लिए आग का लोभ छोडकर हटना एड से भी नहीं हुआ। वैमे मचान शाम को ही बांध दिया गया था। सूअर के बंधने के लिए खंभा, रस्मी आदि की तैयारी भी पूरी थी, लेकिन जख्मी मूअर को दडये के पास से हटाकर निश्चित स्थान तक ले जाना सामी बड़ी समस्या थी। बडो कोशिश, घेरा-घेरी, चीख-पुकार और हो-हल्ले के बाद वह काम हुमा । सूपर के गले में रस्मी फंमाकर तथा दूसरा छोर अपने हाय में लेकर आखिर एड मचान पर जा बैठा तो उस समय रात के ग्यारह बजे थे। सुले तथा सर्द आकाश के नीचे सिहरकर मैंने एक सिगरेट मुलगा ८४ शाल वनों का द्वीप लिया। अंगीठी के गिर्द व्हीले, कोसी तथा अन्य युवतियां उकडूसटी बैठी थीं और वात-बात में अकारण हंस रही थीं। कोसी को मैंने दिन की रोशनी में केवल एक बार दूर से देखा था। सिर पर घड़ा लिए वह नदी की ओर जा रही थी और मुझे देखता हुआ देखकर तेजी से बढ़ गई थी। तब भी मैं क्या नहीं चौंका था? पीरचे चोंगी सुलगाकर उस ओर देख रहा था जिधर मादा सूअर बंधी थी। मचान में बैठकर एड थोड़ी-थोड़ी देर में हाथ की रस्सी को झटक देता और परिणामस्वरूप सूअरनी बुरी तरह कराहकर चिल्लाती। वह आवाज इतनी तेज, तीखी और ऊँची होती कि सारा अंधेरा थरथराकर रह जाता। ऐसे हर वार कोसी अपनी सहेलियों की ओर और वे सब व्हीले की ओर देखती और वेसाख्ता हंस पड़तीं, हाला- कि यो देखने पर उनकी हंसी का कोई भी नुक्ता समझ में न आता। -~-"जरा दूर हटकर वैठ," क्षण-भर वाद कोसी ने अपने बाएं बैठी सहेली से कहा । वह कोसी के कंधे पर हाथ रखकर लगभग लद-सी गई थी और उसके भार को सहने के लिए कोसी का कंधा न सिर्फ दवता, बल्कि उसे एक ओर झुक जाना पड़ता । -"क्यों, क्या हो गया?" उस लड़की ने और सटते हुए सिसकारी भरकर कहा-"ठंड लगती है ?" -"क्या कहा ?" कोसी ने बनावटी क्रोध वाली मुद्रा से उसकी ओर घूरकर पूछा । सहेली ने वही वात दुहरा दी तो कोसी के होंठ-कोनों पर दवी मुस्कुराहट धीरे-से फैल गई। दूसरी ओर मुंह मोड़कर वह हंस दी फिर बोली-"तो मैं क्या करूं?" -"चलो, चलकर सोएं: -"मुझे अभी नींद नहीं आ रही," कोसी ने वेपरवाही से कहा- "तुझे ऊपना आ रहा है तो जाकर मो।" "नहीं, अकेले सोना मुझे अच्छा नहीं लगता !" उतनी बड़ी लड़की ने जैसे ठुनकते हुए स्वर में कहा-"चटाई ठंडी होगी और मुझे व्होले और अमरसिंह एकाएक जोर-जोर से हंसने लगे। उन्हीं के स्वर . .. -- ...
साल वनों का द्वीप । में स्वर मिलाकर अन्य युवतियां भी हंसी और इतने लोगों के बीच केवल अकेला मैं मूखों की तरह ताकता रह गया। मेरे साथ सबसे बड़ा व्यवधान भाषा का या। समझ में कुछ नहीं आ रहा था- उनको वाते न मजाक, न हंसी का कारण, हालांकि उनकी हरकतों अथवा चेहरे के हाव-भाव से यह अनुमान मैंने अवश्य लगा लिया था कि कोई अत्यन्त ही मनोरंजक बार छिड़ गई है। ऐसे अवसर पर कोफ़्त क्या स्वाभाविक नही ? ---"क्या हुआ? क्या बात हुई," कहकर आसिर मैंने अमरसिंह को घेर लिया। अमरसिंह मेरे आग्रह के बावजूद बड़ी देर तक हंसता-सर- चाता रहा, लेकिन बाद में उसने ऊपर की सारी बातें साफ-साफ खोलकर घर दी तो एकाएक विश्वास नहीं हुआ। फिर जब हुआ तो भीतर जैसे किलक भरी एक कंपकंपी उभर कर मेरे रोम-रोम में समा गई। तभी पड़ोस मे खड़े इमली के पेड़ के नीचे कोई कुत्ता जोर-जोर से भोंक उठा । क्षण-क्षण में उसकी आवाज पहाड़ियो से टकरा-टकराकर गांव भर मे गूंज उठती। पहाडी सदियो को रात जैसे-जैसे भीगती जा रही थी, कोहरें की परतें वैसे-वैसे गाढ़ी हो रही थी। क्या ओरडा मे आज की रात वर्फ पड़ेगी? ---"इस कुत्ते की मौत आई है," लगातार भौंकने की आवाज से ऊब. कर व्हीले ने कहा और 'पिच्च' से एक ओर थूकते हुए उसने होठ पोछ लिए । दरअसल, कुता अब इमली की छांव से ढलवान में उतर आया था और जिधर से सूअर के चीखने की आवाज आ रही थी, उधर ही मुंह उठा- उठाकर भौंक रहा था। --"कोसी !" बगल वाली युवती ने अवको वार धीरे से कोहनी मारी और आग्रह भरी आंखो से फिर उसकी ओर देखने लगी जैसे कहती हो- "चलोन!" --"ओहो," व्हीले ने उकताई हुई नजरो से देखकर कोसी से कहा- "चली क्यों नहीं जाती । देखती नही, वह मरी जा रही है ?" -"मरने थे, मैं तो अभी नही उठने को।"
शाल वनों का द्वीप . -"क्यों?" -"मुझे नींद नहीं।" -"आज नींद को क्या हो गया ? और दिन तो खाने के बाद ही झोंके साने लगती थी ।" -"वह वात और है । हमारे द्वार पर रोज तो मचान वैधता नहीं।" ---"और ये बेचारी लड़कियां जो अपने-अपने घर छोड़कर तेरे घर सोने चली आती हैं ?" -"मैं क्या रोकती हूँ ?" कहकर कोसी ने बगल वाली सहेली की ओर देखा, हाथ का एक स्नेह भरा धक्का उसके शरीर पर दे मारा और बोली-"यह तो पागल है। जान, जाकर मर !" पर इसके बावजूद जब वह लड़की टस-से-मस न हुई और व्हीले लगा- तार उसकी सिफारिश करने लगा तो एकाएक हँसकर वह बोली-"इतनी तरफदारी के बदले तुम ही क्यों नहीं चले जाते ?." ले जा वो, व्हीले को अपने साथ ले जा। विल्कुल ठंड नहीं लगेगी।" सुनकर एक जोर की हंसी उभरी। अंपते हुए व्हीले ने कसकर एक घोल कोसी की पीठ पर जमा दी। वह बगल वाली लड़की इस कदर लजाई कि सहसा तुनककर उठ खड़ी हुई और अकेली ही सोने के घर की मोर भाग गई । एक-एक, दो-दो क्षणों बाद पीछे-पीछे अन्य लड़कियां भी खिसक गई और हम लोगों के अलावा वहाँ केवल कोसी अंगीठी के पास वैठी रह गई। जब कोसी तथा उसकी सहेली की बातों का तरजुमा करके अमरसिंह मुझे बताता जा रहा था उस समय उन लड़कियों की क्या दशा थी? मैंने कोसी पर काफी गड़ती हुई आंखें ठहराकर सोचा-'क्या उनमें से हर कोई लज्जा के मार दुहरा नहीं हुमा जा रहा था? प्रत्येक युवती हर दूसरे की बगल में मुंह डालकर अपने को छिपा रही थी या अमरसिंह को फोमती निगाहों से तिरछे-तिरछे देख रही थी। विशेषकर कोसी की कन- पटियों और गालों में कितना ढेर ग्वून उतर भाया था-जैसे सेमल या
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शाल वनों का द्वीप 1 एक सम्मिलित हंसी। -"और वह कुत्ता कहां जा मरा?" आग की आंच में सफेद-सफेद दांत चमकते, "मैं तो सोचती हूं अभागे को चीते ने न दबोच लिया हो।" धीरे से एक दबी हुई हंसी और अमरसिंह अचानक चौंककर आँखें खोल देता, थोड़ी देर अकवकाया-सा ताकता रहता और समय पूछकर ॐघने लगता। तब रात के साढ़े बारह बज रहे थे। पास-पड़ोस के जंगलों से बचा- खुचा सन्नाटा भी गांव में लौट आया था। पीरचे के कमरे और डोडी के नीचे से गहरी नींद व खर्राटे की आवाजें उभर रही थीं । कुत्ते के भौंकने का स्वर अव बहुत दूर हो गया था। इतनी दूर जैसे गांव के एकदम दूसरे छोर या जैसे किसी दूसरे ही गांव से आवाज आ रही हो। बीच-बीच में दड़बों में बन्द नूमर के नन्हें-नन्हें पिल्ले चिल्ला उठते और जब बातचीत बन्द करके हम लोग चुपचाप आग तापने लगते तो माडिन नदी का शोर विल्कुल साफ और निकट होकर सुनाई दे जाता । केवल एक लड़कियों वाला घर ही था जहां अब भी उसी तरह हंसी-हुल्लड़ हो रही थी और शायद जिनमें से किसी की आंखों में नींद नहीं थी। आखिर व्हीले ने जो कहा था, वही हुआ। उसने कहा था कि जब तक कोसी नहीं जाएगी, उनमें से कोई नहीं सोएगी। किसी न किसी तरह उसे उठाकर ही वे दम लेंगी। सचमुच थोड़ी देर बाद उस कमरे से एक लड़की हंसती हुई निकल आई और शरारत भरे स्वर में बोली-कोसी, तुझे न माना हो तो वैठी रह, लेकिन हम लोगों को चादर दे दें।" "कौन-सी चादर?" "यही जो तूने ओढ़ रखी है।" "क्यों, और मैं क्या करी ?" -~"तुझे क्या करना है," आंखें नचाकर एक क्षण व्हीले की ओर देखा और फिर मुस्कराकर बोली-"इतनी गर्मी तो है..." कोसी कुछ कहती या न कहती कि उस लड़की ने कोसीके कंधे पर पड़े शाल बनो का दीप ८६ चादर के छोर को पकड़ लिया और सोचने का प्रयास करने लगी। कोसी के नहीं-नही करने डांटने या लास खींचतान करने के बावजूद चादर अन्त में जाती रही। पहिले उसका छोर कोसी के एक कंधे से सरका फिर उसकी वाह व सीने की जोड़ खुली और दूसरे कंधे के उघड़ने के साथ ही उसकी नाभि तक का सारा आवरण विल्कुल हट गया। जैसे कोहरा-ढंके बीच आकाश का सीना चीर, कई बड़े-बड़े सितारे एक माय चमचमाकर मेरी आँखो में ठहर आए हों। जैसे उस दायरे के वायुमण्डल से सर्दी विल्कुल उठकर दूर निकल गई हो। और उसकी जगह तपिरा व हरारत भर आई हो । मुझे लगा मानो अयूझमाड के ओरछा में न होकर मैं भजन्ता की किसी रोशन-दराज गुफा मे बैठा है और सामने की कोई निर्जीव तस्वीर एकाएक बोल उठी हो। जैसे शायद कोसी ही अपने आंचल में अब तक अजन्ता को जीवित चित्रकला छिपाए बैठी थी और किसी ने झपट्टा मारकर उसे उघाड दिया हो-हो मासल यौवन, शरीर का बिल्कुल वही कटाव, मांस का उतना ही उतार-चढाव और वही गोलाइयां जिनकी मासूम हरकतो पर अंगीठी का साया धीरे-धीरे कंपकंपा रहा था। कई क्षणों के बाद कोसी ने मेरी ओर देखा और पहिले की तरह हंस दी। उसकी आँखो के भाव मे कोई नयापन न था। वह उसी तरह निचित और बेअसर बैठी थी, बल्कि थोड़ी देर बाद सर्दी के मारे वह अंगीठी के और पास हो गई । समय का ठीक-ठीक ध्यान फिर मुझे नहीं है । है तो केवल पही कि कुछ काल पश्चात कोसी और व्हीले मे कोई बात हुई जिसका एक अक्षर मेरे भी पहले नही पडा। कोसी हंसती रही । रह-रहकर मेरो ओर देखती हुई बडी देर तक हमती रही, फिर आवेग में उठकर निमिप ठहरने के बाद, सीधे सोने के कमरे की ओर भाग गई। एक बज रहा था। तब तक एड की ओर कुछ भी नया नहीं घटा था। अंगीठी के गिर्द अव हम तीनों के अलावा और कोई नहीं था-अकार उदास में, ऊबा हुआव्होले और वैतरह ऊंघता हुआ अमरसिंह । सर्दी का व शाल वनों काद्वीप उस्ज कि खुली हवा के नीचे की अंगीठी भी व्यर्थ लगती थी। मुझे बार- वार कोफ्त होने लगी कि एड के कम्बल लेकर चलने के प्रस्ताव को ठुकरा- कर बड़ी मूर्खता की। पन्द्रह एक मिनट बाद इसीलिए जव अमरसिंह ने घर लौटने की बात मेरे सामने रखी तो मैं तैयार हो गया। एड ने वापस लौटने के लिये पहिले ही मुझसे आग्रह किया था । वह तो मेरी जिद थी कि... पन्द्रह मिनट पहिले कॉटेज की राह आकर मैंने सोचा-जव अंगीठी के पास कोसी बैठी थी, उस समय अगर अमरसिंह यही प्रस्ताव रखतातो? ---"यू नीड ए गर्ल फ्रेंड, शानी !" मुझे सहसा एड का मजाक याद आ गया । धीरे-से मुस्कराते हुए मैंने सोचा--अच्छा हुआ कि यहाँ इतना अँधेरा है और हम लोग एक दूसरे का चेहरा नहीं देख पा रहे हैं । . -- पहिले नींद में ही बड़ी देर तक वैसी माहट मिलती रही, लेकिन पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ था। कुछ क्षण उसी उलझन में फंसे रहने के बाद जब अचकचा कर मैंने आंखें खोल दी तो देखा कि सचमुच एड लौट आया है बंदूक की वैरल साफ कर रहा है । -"एड," मैं तत्काल खाट पर उठकर बैठ गया और बोला- तुम. कब आ गए ?" "-अभी। पांच-एक मिनट हुए होंगे।" "क्यों, क्या हुमा ?" एक क्षण ठहर कर मैंने पूछा । "नथिंग !" उसी अन्दाज में ठण्डे ढंग से जवाब देकर एड ने मेरी और देखा और एक खिसियानी-सी हसी हंसकर फिर उसी बंदूक की सफाई जुट गया। अपने सोने के पहिले मैंने पेट्रोमेक्स को जलता छोड़ रखा था। तेज प्रकाग सारे कमरे को रोशन किये हुए था और दरवाजे का एक पल्ला खुला होने से उजाले का एक टुकड़ा बाहर बरामदे में निकल गया था। --"मैंने कहा न, मैं इस मामले में बदकिस्मत हूं," एड बोला-"और
माल वनों का दौर
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इनमे ज्यादा क्या मिहनत को जा सकती है। ऐसी सर्दी मे इतनेहाने भटे
पेड़ पर बैठना, तौरा ! मुझे तो राग रहा था जैसे मैं यकी मग
हूं."एक्चुअती, आइ वान फोचिंग!"
-"क्या मिस कर गए ?"
-"नहीं," उसने अपनी गदंग झुका सी-"कायत पीताही नही
माया, वर्ना मैं कहता हो क्यों कि 'अनराकी है। एक तो रादी पारे और
ज्यादा बैठना मुश्किल हो गया दूसरे माग गुमर गेगी पीतगा-निकमाता
बन्द कर दिया था। रस्सी में से लारा जोर-शोर से भादफे देता, गरमा
भी न करती। आपिर मैं नीचे उतर भागा तो देखकर हर साल
मादा गूभर तो जाने याय की गर गयी है।"
को
घुपचाप ताकता रह गया । गा पेट्रोगवा में सामने की
भावान और अधिक तेज होकर हम लोगों मे मीरपट गई है-ग कि
माडिन नदी का शोर भी घुल गया है और मई क्षणी भागीन मधीपमा
सबंध-मूत्र उस आवाज ये गिवाय और गगहोहीमही गाना ।
-"कितने बज गए ?" जैगे गुगों पाद पूमा हो।
--"चार।" जवाव देकर एट उट गामा भीरमायाम पाला
बन्द करने लगा। उसके बाद एक क्षण दिटक कर वर माना
फिर उम मर्दी में भी टमने पानी का गिमाम पिपा।
- "मुझे लगता है कि मैंने तुम्हारी मीनसाय दी।"
--"नही तो," अपना म्या मृभ.पी बनावटी मालकिन
मैंने संकोच करते हुए मकाई टी-" मा गदा है।"
---"क्या दहा पहिय या मर"
-~"हो।"
सात । -"सुनो, सुनो," कथावाचक गूमा ऊंची आवाज से घोटुल के सभी सदस्यों को सम्बोधित करते हुए कहता है-"एक माडिया कोलियार नाम था। उसके लड़के का नाम था पोरियल । बरसात के पहिले-पहिले दिन थे। उसकी पत्नी गांव की कुछ स्त्रियों के साथ कंद-मूल खोदने के लिये जंगल गई। दुर्भाग्यवश कुछ मिला नहीं। दूसरे दिन भी इसी कोशिश में वह जंगल गई, लेकिन फिर कुछ हाथ नहीं आया हालांकि उसके साथ की औरतें उससे ज्यादा भाग्यवान थीं, उन्हें ढेर कंद मिले"... कहानी सुनने के लिये घोटुल की अंगीठी के गिर्द सारे सदस्य और गर-सदस्य सिमट आये थे। प्रत्येक ने आग की आंच पर अपनी हथेलियां फैलाकर गूमा के चेहरे पर आंखें जमा दी थीं। सारे गांव में गूमा को छोड़- .९ कहानी कहना और किसी को नहीं आता. -इस मामले में घोटुल के सभी युवक फिसड्डी या लजालू हैं-शायद इसीलिए प्रौढ़ावस्था में घोटुल के सदस्य के वीच गूमा का बेहद सम्मान होता है । नात्र और गीत के दौरान चाहे गूमा को लोग भूल रहें, सोने के बड़े कमरे में अंगीठी के पास आकर हर युवक गूमा की ही याद करता है। भीड़ से घिरकर बात करते समय आत्मविश्वास कैसा होता है, इसका अनुभव गूमा को देखे-सुने बिना नहीं होता। निचले होंठ में सुरती, आंखों में प्यार की चमक और चेहरे पर निस्संकोच-सा भाव लिये वह कहता है "नाले के साफ पानी से अपने-अपने कंद-मूल धोकर सब वापस लौट रही थीं। राह में पोरियल के खेत पड़ते थे। संयोग की बात कि उन्हीं खेतों ... १२ शाल वनों का द्वीप मे पोरियाल की पत्नी को ढेर कंद-मूल मिले। सबके संग-संग मोदकर उसने भी कंद इकट्ठे किये और घर की राह ली। ---"देखो," पर पहुंचकर उसने अपने पति से कहा-"तुम्हारे खेत से ये ढेर जंगली कंद "गारग-आमट" मैं समेट लाई हूँ। यदि जल्दी ही उस खेत में तुमने हल नही चलवाया तो मैं तुम्हें छोड़कर चली जाऊंगी। सप- मुच भाग जाऊँगी। कल घोटुल के लड़कों को बुलवाओगे न?" -"अच्छी बात है," उसके पति ने कहा । पिता कोलियार ने भी स्वीकृत दे दी। घोटुल के लडके तुरन्त बुलवाए गये। लेकिन उस दिन काम करने मे उन लोगो ने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। कहा कि दूसरे दिन यह काम वे कर सकते हैं। दूसरे दिन सारे गांव के लोग अपने-अपने खेतों मे हर चलाने के लिये निकले। उस समय तक बोनी हो जानी चाहिए थी. क्योकि रोग ही बरसात के आसार दिखाई देते थे। -"अभी बोनी न की जाय," कुछ लोगो ने प्रस्ताय रणा-"हम लोगों को चाहिए कि पहिले अपने 'कट्टा-पेन देवान' के लिये काकसार नाच करें।" उस प्रस्ताव से सभी सहमत हो गए । अत: कोलियार व उसका लडका पोरियल दोनो वाहर के गांव भेजे गए । लगातार तीन दिनो तक दोनों ने पडोस के सभी गांवो में इस बात की सूचना दी कि अमुक-अमुक तारीरा को काकसार मनाया जाएगा। आसिर उनके लौटने के बाद काकसार या आयोजन किया गया। काकसार के दौरान पोरियल की पत्नी किमी दूसरे आदमी के साथ भाग गई। उस समय अभागा पोरियल 'देवान' के मन्दिर में था।लौटने पर देखा कि उमकी पत्नी गायब थी। -"मेरी पत्नी कहाँ गई ?" उसने पूछा। --"जाएगी यहाँ, यही कही होगी...!"
-१४ शाल वनों काद्वीप . .. ---"मैं थोड़ी शराब लेकर आया हूँ," पोरियल ने वेफिक्र होकर कहा -'चलो, कहीं बैठकर पिएँ !" ---"ठीक है।" -"लेकिन व्हर," वह बोला-"प्याले बनाने के लिये मैं पत्ते तो ले आऊं।" पत्ते की तलाश में घूमते हुए उसकी निगाह एक चीज पर अटक गई। 'पत्नी-चोर वहाँ कहीं नहीं था, लेकिन नाच की पोशाक में सजने वालीउसकी कुछ घंटियां वहीं छूट गई थीं। उन्हीं घंटियों में पत्ते भी उलझे हुए थे जिन्हें उठाने के लिए पोरियल ने हाथ बढ़ाया। "किन्तु यह क्या ?" अचानक चौंककर वह सोचने लगा-"क्या घंटियों में सांप बैठा है ? जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाया क्या उसी तरह की आवाज नहीं हुई ? नहीं भाइयों, उसने अपने दूसरे साथियों को भी रोक दिया, दूर रहो और गांव वालों को बुलाओ' सब प्राए । 'क्या हुआ, क्या हुआ' । सबके होठों पर एक ही सवाल : था। आखिर देखकर सभी हैरत में पड़ गये। लोग नहीं चाहते थे कि पोरि यल का पिता कोलियार उसे देखे, लेकिन उसे पता चल ही गया। -"नहीं, नहीं," उसने कहा,-"जो मेरी बहू को भगा ले गया है वह और कोई नहीं, बल्कि डिकावंडी है।" -"कोई बात नहीं," पोरियल ने अपने आपसे कहा-"दूसरे दिन देखा जाएगा।" दिन बीता । रात आई। जल्दी ही मुगों ने भी बांग दी। सुबह का जावा खाने के बाद वह जगह उन्होंने छोड़ दी और डिकावंडी के गांव गए। डिकावंडी के घर के पासवाले पेड़ पर पोरियल चढ़ गया और रास्ता देखने लगा । थोड़ी देर बाद सहसा उसकी पत्नी दिखाई दी। यह अपने सिर पर पानी का घड़ा लेकर आ रही थी। चटपट पेड़ से उतरकर पोरियल ने पली को पकड़ लिया और उसे घसीटता हुआ देवान के मंदिर में ले आया। "क्यों रे, तू दूसरे आदमी के साथ क्यों भाग माई ? मेरे घर का to-
गाल वनों का द्वीप
खाना क्या तुझे काटता है ? सच कहता हूं, अभी अगर तू मेरे साय न आती
तो मैं तुझे जान मे ही मार डालता।"
उसकी पत्नी डर के मारे कांपने लगी, बोली-
-"मगवान के लिये ऐसा न करना। मैं अब तुम्हें छोडकर नहीं
जाऊँगी, कभी नही। दिन रात तुम्हारी ही सेवा करूंगी।"
-"जोहार !"
कहकर कथावाचक विदा लेता है।
मोटे-मोटे लट्ठो वाली आग पर राख की पतं पड़ जाती है । उठती हुई
लपट या रोशनी के अभाव में घोटुल का कमरा थोडा धुंधला जाता है।
कहानी समाप्त होते ही मद्धम आंच वाली नीम-रोशनी में सभी चेहरे विन
जाते हैं और कई जोड़ा छोटी-बडी आंखों में चमक पैदा हो जाती है।
-"गूमा दादा, एक और..."कुछ नौजवान आग्रह करते हैं ।
-"हो, हो, एक और।" उन्हें प्राय:-प्रायः सभी का समर्थन प्राप्त है
क्योकि सब एक स्वर से कहते हैं।
---"एकाघ और याद है
'एड धोरे से पूछता है।
---"एक? एकाध की क्या बात है," वीच ही में अमरसिंह बोल
उठना है-"गूमा सुनाने के लिए बैठे तो सारी रात निकल जाय, लेकिन
कहानियो ग्यत्म ही न हों।
-"फिर देरी किम बात की है !"
."
-"ए गूमा दादा"..
गूमा सभी को आवाजें सुनता है लेकिन जैसे नहीं मुनता। दो-एक पण
मुस्कराता है फिर कान पर खुमो हुई चोगी निकालकर चुपचाप तम्बाक का
? पीने लगता है। वैसे भी गूमा संजीदा किस्म का आदमी है। बहुत कम बातें करता है, क्सर यहां-वहां दिखाई नहीं देता और अपने में डूबा हुआ व उदास रहता है। पहिली भेट की पहली दृष्टि में दिल जीतना किसे कहते हैं, यह गूमा को देखकर मैंने जाना था। पैतालिस-पचास की उम्र, अच्छा स्वस्थ शरीर, चेहरे पर स्वाभाविक सादगी और ऐसी डूवी-डूबी तथा प्रभावशाली आँखें कि जिस पर उठती उसे जीत लेती। आकर्षण के साथ आंखों में ऐसी स्वाभाविक उदासी क्या जन्मजात ही हो सकती है ? मैंने सोचा था-या उसके एकांकी जीवन की वेदना सनी छाया है जो पलकों में मुस्तकिल होकर झुक गई हैं ? दुःख को उस सीमा तक आत्मसात कर लेने के वाद का मानसिक स्तर कैसा होता होगा? अबूझमाड़ के चहुं ओर व्यापे दरिद्र जीवन में सबसे विपन्न आदमी वह नोता है जिसके अपने खेतों के अलावा अपने रक्त के सम्बन्धी नहीं होते। (मा, उन्हीं अभागों में से एक था जिसके माता-पिता बचपन से जाते रहे और दूर-दराज के सम्बन्धियों के बीच जैसे-तैसे करके वह पला और एक दिन जवान भी हो गया। जिसके पास अपनी सम्पति जैसी कोई चीज नहीं थी और जिसका गुजारा कठिनाई से होता हो । उसके बाकायदा र की बात सपना नहीं तो और क्या थी? गूमा ने वही राह पकड़ी जिस पर वहां के गरीव युवा जाते हैं । कुर गांव की एक लड़की के लिए गूमा 'लमहाड़े खटने लगा। लमहाड़े खटना अबूझमाड़ की वह प्रथा है जिसके अनुसार युवक के मां-बाप के घर जाकर रहने लगता है । युवती को पत्नी के रूप करने के लिए पिता की ओर से एक शर्त होती है । शर्त यह कि ती या सात बरस तक उसे दिन-रात खटकर कड़ी मिहनत करनी जब मां-बाप प्रसन्न होते हैं तभी लड़की का हाय. पत्नी के रूप में दिया जाता है, अन्यथा नहीं। ।
शान धनों का द्वीप पूरे साल भर तक गूमा ने जी तोड़कर मिहनत की। उसे पांच बरस तक खटना था, लेकिन प्रसन्नता की बात तो दूर रही, युवती के मां-बाप उससे हमेशा नाराज रहते थे। उसके साथ नौकरी की तरह दुर्व्यवहार किया जाता या और हर घडी उसे अपमानित करके निकलवा देने के प्रयल होते थे। गूमा ने उपेक्षा और यातनाओ के बीच अखें खोली थी, अतः ऐसे दुख न नए थे और न अमह्य-वह चुपचाप सब पी जाता। अक्सर जब शाम को घर लौटता तो थवावट के मारे शरीर का जोड-जोड टूटने लगता और अंग-अंग चूर मालूम होता। आखें बंदकर वह निश्चल-सा पड़ जाता- बिलकुल निर्जीव और मृत-सा। कई बार उपेक्षा के अतिरेक के कारण उसकी आंखें झलमला जाती। निश्चय करता कि दूसरे दिन उस जीवन को छोड़कर वह कही भी चला जाएगा, लेकिन एक ऐसी शक्ति याडे जाती जिससे छूटना असभव था-वह यो उसकी होने वाली पत्नी हिरमे जिसका सशरीर आफर उसके सामने खड़े हो जाना ही काफी था --चाहे यह बोले या भरी भरी आँखों से चुपचाप खडी देखती रहे। दस्तूर के मुताविक वे लोग अलग-अलग रहते व सोते थे। पहिले कुछ दिन तो हिरमे से बातचीत का भी सम्बन्ध नही था । जो कहना-मुनना होता उसके मां-बाप से कह-सुनकर वह अपने कमरे में लौट आता लेकिन धीरे- धीरे कई ऐसे अवसर आए जब घर या धन मे अकेली-सुकेली वह टकरा गई। और ऐसी भेंटों में हिरमे ने दी पहिले एक झनझनाहट पैदा करने वाली मुस्कुराहट, फिर हंसी, फिर ताने तिश्ने, फिर... उस रात ऐसी ही किसी चोट से तिलमिला कर वह आपा साना छोड़ पतल से उठ गया। घर के मुखिया ने कोई इतनी अपमान-मरी वात यह दी कि मुंह का कोर गले के नीचे नहीं उतरा। बोता कुछ नहीं, एक क्षण अपने होने वाले वाले ससुर की ओर देखकर वह उठ गया, वम । एक अंधेरे कोने मे पत्तल सीती हुई हिरमे भी वहां बैठी थी। भगवान जाने उगने क्या सोचा होगा क्या एक औरत के लिए गूमा ने अपने पौरुष को वैच दिया है। .
शाल वनो का द्वीप बड़ी रात तक उसे नींद नहीं आई और वह करवटें लेता हुआ पड़ा रहा। उसे लग रहा जैसे निर्णय करने की घड़ी आ पहुंची है-कोई भी अंतिम कदम उसे उठा लेना चाहिए, इस पार या उस पार । इसी निश्चय-अनिश्चय की स्थिति में उसकी आँखें कब लग गई, उसे याद नहीं। यह भी याद नहीं कि उस वक्त रात के कितने बजे थे। बाहर की रात काजल-जैसी काली थी-सुनसान तथा डरावनी। गांव की दुनिया निश्चिन्त हो सो रही थी। नींद में अपने कंधे पर उसे कई वार स्पर्श महसूस हुआ था। कई बार कानों में उसे हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई दी और लगा जैसे कोई नाम लेकर पुकार रहा हो । जव हड़बड़ाकर उसने आंखें खोल दी तो देखा कि हिरमे उसके बिस्तर पर बैठी उसे जगा रही है। आग की विना लिपट वाली लाल-लाल व अस्पष्ट रोशनी में हिरमे का मुख दमक रहा था-सांवले रंग के मांस में सचमुच बहुत चमक होती है और उस पर अगर हिरमे की तरह ठोढ़ी पर गुदने की छोटी-छोटी बुंद- कियां हों तो...? गूमा को एकाएक कुछ सूझा नहीं कि क्या कहना चाहिए। उसने धीरे से हिरमे का हाथ पकड़ लिया और कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसकी "आवाज कंठ में ही फंसकर रह गई। बाहर रात सांय-सांय कर रही थी। कभी अचानक पेड़ों की शाखें डोलने लगतीं और थोड़ी देर हवा में केवल पत्तों के झूमने की आवाज होती। हर क्षण लगता जैसे कोई शोख झोंका अचानक आकर उन्हें वरवस समेट देगा। -"असल में दुश्मन बाप नहीं, मां है।" बड़ी देर बाद हिरमे ने कहा-"वही तुम्हें फूटी आँखों नहीं देखना चाहती। चाहती है कि किसी तरह ऊबकर यहां से चले जाओ..." "क्यों, कोई वजह ?" "वजह तो अब वही जाने," वह बोली-"जब तुम पहिले दिन शाल वनों का द्वीप आए तब भी वह नहीं चाहती थी कि तुम मेरे लिए लमहाई पटो..!" कई क्षण तक गूमा चुप रहा फिर वह बोला-"और घर पर कौन चाहता था कि में खटू, तुम्हारे बावा?" -"और?" बडी देर तक चुप्पी रही। वाहर से हवा के पंखों में सन्नाटा आ-आकर बैठता, फिर चुपचाप निकल जाता । दोनो के बीच आग का हल्का व लाल- लाल साया मर जमा रहा। -"और तुम !" महसा पूछते हुए गूमा को अपनी आवाज कांपतो हुई लगी। हिरमे ने उसकी ओर आंखें नहीं उठाई। धीरे से गूमा की हथेली खींचकर उस पर अपना पसीजता हाथ रख दिया, धीरे से झुकी और उन दोनो मिले हुए हाथो पर चुपचाप अपना वाया गाल पर दिया। उस रात हिरमे गूमा के कमरे से नहीं लौटी। और वही क्या, ऐसी कई रातें आई और चुपचाप निकल गई पर किसी को पता नहीं चल पाया। पता तो शायद तव लगा होगा जब कि एक सुवह गूमा के खाली कमरे के साथ- साथ हिरमे को भी घर से गायब पाया होगा। वे लोग भागकर ओरछा आ गए और अपनी नई ज़िन्दगी शुरू की-ऐसी ज़िन्दगी, जिस पर न किसी का अंकुश था और न अपमान । हिरमे फिर जीते जी अपने मां-बाप के घर लौटकर नहीं गई। जीवनकाल में उसने गूमा को सभी कुछ दिया-अपने घर का सुख, अपने खेत का सुख और दो बच्चियो का सुस । वही बच्चियां जिनमे से बड़ी जब पहिली बार अपने ननिहाल, मामा के यहां गई तो बदले के रूप में उसे नहीं आने दिया गया। मामा ने जबरन उसकी शादी अपने लड़के से कर ली। अव गूमा का विधुर जीवन पहिले जैसा ही वीरान, उदास और अकेला हो गया है । पत्नी को भगवान ने छीन लिया, वडी बच्ची को उसके मामा ने अपने लड़के के साय जवरल ब्याह कर हमेशा के लिए रोक लिया और १०० शाल वनों का द्वीप अकेले होने के कारण घर में वही गरीवी लौट आई है । दस साल की छोटी बच्ची और अपने जीवन के लिए वह कुछ भी कर लेता है-किसी दूसरे के खेत से मेहनत-मशक्कत या कुली-मजदूरी और जैसे-तैसे दिन गुज़र ही रहे हैं...। अंगीठी के सामने फैली राख पर ही सुरती की पीक थूककर गूमा दूसरी कथा का सूत्र पकड़ता है- -"सुनो, सुनो है भगवान, कुछ जवान लड़कियां बाजार जा रही हैं। पहिले बैलगाड़ी तैयार की गई, अच्छे-अच्छे कपड़े पहिने और खूब सज- धजकर वे लोग निकलीं। राह में खाना आदि पकाने के लिए एक रावत रख लिया गया। वह भी अपने सामान वगैरह लेकर आ गया और आखिर सब लोगों को लेकर बैलगाड़ी वाजार की ओर चली। रास्ते में नदी पड़ती थी। पुल उस पर नहीं था और विना नाव की सहायता के पार करना कठिन था। -"ओ नाव वाले," लड़कियों ने उस पार बैठे नाविक को पुकारा- "अपनी नाव लाकर हम लोगों को उस पार कर दोगे?" "कहाँ जाना है ?" -"हम लोग बाजार जा रहे हैं ! -"कौन-सा बाजार?" "हमें गाली बाजार जाना है। नाव लाते हो?" -नाव वाला तव भी उसी पार था, वहीं से चिल्लाकर उसने पूछा --"क्या मिहनताना मिलेगा?" "पैसे दे देंगे, चलना है ?" -"पैसों का मैं क्या करूंगा?" -"फिर क्या चाहते हो? हमारे पास एक पीतल का वर्तन है, चाहो तो उसे ले लो।" -"वर्तन का क्या होगा?" -"या फिर चावल ले लो।" - -- -
साल वनों का द्वीप
-"वह मेरे किस काम का?"
-"अच्छा, चावल न सही, सरसों ले लो।"
-"सरसों का मैं क्या करूंगा?"
-"तो फिर हम तुम्हें क्या दें? तुम पैसे लेते नही, चावत लेते नही,
बर्तन नही, सरसों नहीं। बताओ फिर क्या लोगे?"
नाव वाला मुस्कुराया-"अच्छी बात है, पहिले तुम लोग इम पार तो
आ जाओ मैं अपना मिलताना सुद वसूल कर लूंगा।"
तव नाव वाला नाव लेकर इस पार आ गया। पहिले सारा सामान
ढोकर उसने उस पार किया। उसके बाद फिर लड़कियों को लेने के लिए
इस पार पहुंचा। बल थके हुए थे अतः दैलगाड़ी खोल दी गई और रावत
भी सुस्ताने के लिए बैठ गया । लडकियां नाव पर बैठी और नदी पार होने
लगी।
उस पार पहुंचने पर जब लडकियां नाव से उतरी तो नाव वाले ने
मुस्कुरा कर कहा-
--"मेरा मिहनताना?"
-"ले लो, क्या चाहिए ?"
-"मुझे और कुछ नहीं चाहिए," आगे बढकर नाव वाले ने एक
जवान लड़की का हाथ पकड लिया-"वस मुझे तो...।"
और जब तक वह या दूसरी लडकियां कुछ कहती, नाव वाले ने उसे
फौरन अपनी गोद में उठा लिया और पास की झाडी मे घुस गया।
उसके आगे गूमा ने क्या कहा, यह सुन पाना हम लोगों के लिए कठिन
हो गया, क्योंकि वीच ही में सारे युवकों की हंसी इतनी जोर से उभरी कि
घोटल का छोटा-सा कमरा गूंज कर रह गया और तभी पड़ोस का कोई
कुत्ता जोर-जोर से भौंकने लगा।
. TE जब जीप धवड़ई पहुंची तो ग्यारह बज रहे थे। घबड़ई के बाजार लगने में अभी देर थी। सड़क के दाहिने किनारे पर मैदान की तरह चौड़ी और बड़ी अमराई में बाजार भरने की पहली-पहली तैयारी चल रही थी। नारायण- पुर तथा दूर की दूसरी जगहों से बैलगाड़ियां पहिले ही पहुंच चुकी थीं और खुलकर सायों में पड़ी थीं। वैसे तब तक कुछेक पेड़ों के नीचे माला-मूंगा या रेडी-मेड कपड़ों को इक्की-दुक्की दूकानें जमायो जाने लगी थीं, लेकिन अधिकांश दूकानदार बैलगाड़ी या किसी पेड़ की आड़ में पका-खा रहे थे। धवड़ई में सारे अबूझमाड़ के लिए केवल एक बाजार लगता है-हफ्ते में एक दिन का । लोग दूर-दूर से खिचे आते हैं । अबूझमाड़ के भीतरी गांव वाले लोग शुक्रवार के बाजार के लिए मंगल या बुधवार को गांव छोड़ते हैं तब कहीं बाजार समय में धवड़ई पहुंचना होता है। जब हम लोग धवड़ई की राह पर थे तो हर फलींग दो फलांग के फासले पर ऐसे कई समूह बाजार की ओर बढ़ते हुए मिले थे। इक दो नालों के किनारे डले हुए पड़ाव अलग. दिसे थे जिनके चिह्न स्वरूप पड़े इंट के चूल्हे में बुझे हुए कोयले और जली हुई लकड़ियां रह गई थीं। किसी वियावान जंगल में ऐसा कुछ देखकर कितनी विचित्र-सी अनुभूति होती है ! मन उसी तरह डूबता है जैसे किसी वीरान में खड़े खंडहर में पहुंचकर हो जाय-निढाल-निढाल और उदास ! --"सेठ तो बाजार में नहीं है," अमरसिंह ने आकर सूचना दी। एट ने सड़क के किनारे जीप रोक दी थी और हम लोग अमरसिंह के ही लौटने की प्रतीक्षा कर रहे थे । सेठ याने मूसाअली घवड़ई का एकमात्र व्यापारी १०२ शाल बनो का द्वीप जिसकी खासी बड़ी किराने व कपड़े को दूकान धवडई में है । मारे अबूम- माड़ के लिए अकेली वही दूकान मुस्तकिल तौर पर जमी हुई है जिससे अधि- काश लोगो की जरूरतें पूरी होती हैं । इस अधिकांश मे सभी हैं, आदि- वामियो के अलाया औरछा स्कूल के मास्टर, जंगल विभाग के कर्मचारी, अबूझमाड मे भूले-भटके दौरा करनेवाले सरकारी अधिकारी, जंगत ठेकेदार व उसके लकडी ढोने वाले ट्रकों के ड्राइवर-कन्डक्टर। ओरछा के पांच मील इधर तक लकडी ढोने वाले ट्रक चलते हैं। पण्डरोपानी का जंगल ठेके से उठ गया और रोज मनी इमारती लकड़ी निर्यात होती है। कुछ तो इस कारण भी सेठ मूसाअली का घर जरूरी स्टाप बन गया है। --"चलो," स्टीयरिंग सम्हालते हुए एड ने अमरसिंह से कहा- "उसो घर ही चलकर देखते हैं।" जीप स्टार्ट हुई और सड़क के बीच आकर पांच-दम मील की स्पीड से मूमा मेठ के घर की भोर रेंगने लगी। दरअसल, वहाँ फासला अधिक नहीं था । थोड़ी ही दूरी पर, सड़क से लगा हुआ पक्का और ऊँचा मकान मूसा सेठ का ही था। -~-'महीने दो महीने या सात दो साल को यात पोर है.' मैंने दूर-दूर तक फैले जंगल और पहाडियो की ओर देखकर मोचा--'क्या इम रिया- वान इलाके में भी घर-बार बसाकर कोई इस तरह रह सकता है? क्या पंसों का आकर्षण सचमुच इतना बहा होता है कि आदमी अपनी अमली जिन्दगी को हमेशा के लिए छोडकर किसी ऐसे जंगल में मा बमे? और वहाँ प्रमुख क्या है ? पैसे इकट्ठे करने की साध या दूसरी जगहों के संपर्क शील जीवन में न टिक पाने की विवशता? कोई पंतीस सात पहिले मूसा सेठ बरार से आकर धवड़ई में वम गया। पहिले दूकान निहायत छोटो और मामूली यो पर धीरे-धीरे बढ़कर आज इस स्थिति तक आ गई है। विना मुल्क की नदावी कमी होती है, यह मूसा सेठ को पवई में ही देखकर आना जा सकता है। -"यह आदमी कमा है?" घर के सामने आते हए मैंने एड से पूर -"कोन मूसा सेठ ?" एड ने ठहरकर कहा-"कैसा मादमी से रो क्या मुराद है, पहिले यह बताओ। अच्छा या बुरा, यही न? मैंने स्वीकृति-सूचक सिर हिला दिया । "अव्वल तो तुम्हारा सवाल ही सही नहीं है", एक क्षण मेरी ही र देखकर एड मुस्कुराता रहा फिर धीरे से हंसकर बोला-"आदमी च्छा या बुरा कैसे होता है, मुझे समझाओ। कोई मेरे लिए बहुत बुरा होकर भी दूसरे के लिए अच्छा हो सकता है या मेरे लिए बहुत अच्छा होकर भी दूसरे के लिए बुरा, नहीं? ऐसी स्थिति में कोई निश्चय स्थिर कर फैसला कर देना क्या आसान बात है ? क्या यह सम्बन्धित या आंशिक सत्य ही न होगा?" मैं चुप हो गया। प्रश्न को इतनी गम्भीरता से लिया जाएगा, यह मैंने कहां सोचा था? एड ने बताया मूसा सेठ के बारे में कई लोग अजीब अजीब बातें करते हैं, लेकिन वह कभी ध्यान नहीं देता। उसे देखना केवल इतना ही था कि एड के साथ उसका व्यवहार कैसा है । सो वह शिकायत उसे कभी नहीं हुई। अलबत्ता, शुरू से लेकर उस घड़ी तक मूमा मे ने उनकी बेहद मदद की थी। खासकर डाक-माक के मामले में उसने जितना सहयोग किया, वह भूलने की चीज़ नहीं। अबूझमाड़ में डाकखाने की कल्पना तक व्यर्थ है। एड की सारी डाफ नारायणपुर के पते पर आती थी। वहां एक सज्जन रिसीर करके किसी ट्रक वाले के हाथ मूसा सेठ को भिजवा दिया करते थे। मूस सेठ किसी गांव वाले के ज़रिए एड तक पहुँचवा देता अथवा बाजार के दि स्वयं आकर एड अपनी डाक उठा लेता। शायद इसीलिए कई बार अ काम न होने पर भी एड धवड़ई अवश्य आता और वहाँ पहुँचते हीस सेठ की तलाश होती। बड़े-बड़े जंगलों वाले उस पपके मकान के सामने रुके तो अजी अनुभूति हुई। कुछ वैसी नवीनता की जैसे महीनों गांव में रहने के अचानक शहर पहुंचने पर होती है। घास-फूस की छोटी-छोटी झोंपा पहिले मूसा शाल वनों का द्वीप १०५ बीच से आए थे। संभवतः इसीलिए उस मकान के बड़े होने का एहसास और शिद्दत से हुआ। मूसा सेठ के मकान के सामने अहाता नहीं था। बाई और की दीवार के पास एक विना चवको वाली टूटी बैलगाड़ी मुद्दतों से पड़े रहने के कारण सड रही थी और बगल से कोई जंगली वेल उगकर छप्पर पर चढ गई थी। जगलो के भीतर मकान में दो खण्ड थे। अलग-अलग दो दरवाजे 'जिनमे से एक पर टाट का परदा झूल रहा था। अगर एड ने मूमा सेठ का नाम मुझे न बताया होता तो भी मैं पहिचान जाता कि वह एक मुसलमान का घर है । सार्वजनिक रूप से एक प्रशिक्षित मध्य-वर्गीय मुसलमान घर का कैरेक्टरस्टिक क्या टाट का परदा नहीं है ? मूसा सेठ को आवाज देने के वाद जितनी देर हम लोग बाहर खड़े रहे, मेरी नजर टाट के परदे की ओर जमी रही। लग रहा था जैसे परदा हटाकर कोई-न-कोई बरावर बाहर झोकेगा और यदि उस क्षण को मैंने गवां दिया तो बडी मूर्खता होगी। क्यों? --"लगता है, भूसा सेठ है नहीं," एड ने उघर ही देखते हुए कहा। --"जाएगा कहां," अमरसिंह बोला--"बाजार में भी तो नही था।" -"उसकी रोज की दूकान कहाँ लगती है ?" मैंने पूछा। -"यही, इस हिस्से में," एड ने जवाब दिया--"लेकिन आज के 'दिन तो वह भी बाजार उठ जाती है।" एकाध मिनट में परदे की ओर और देखता रहा । वह क्षण वास्तव में आता या न आता कि दूसरे दरवाजे से मूसा सेठ के बदले एक ऊंचा-पूरा अफगानी पठान निकल आया। एड ने अभिवादन के लिए हाथ उठाया और जवाब देकर मुस्कराता हुआ वह हमारी ओर बढ पाया। ---"क्या यही मूसा सेठ है ?" हाथ-आप मिलाकर बैठ जाने के बाद मैंने एड से पूछा। --"नही, वह यह नहीं है," एड बोला-"यह तो सान है। उसका एक किरायेदार चलो बाजार ही चलते हैं।"
१०६ शाल वनों का द्वीप खान ने अपनी समझ से हम लोगों की बड़ी खातिर की। बैठाया, पानी पिलाया, चाय के लिए पूछा और इंकार करने पर भी सुपारी तथा इलायची दी। उससे विदा लेने तक मैं उसे लगातार देखता रहा । कम्बस्त ने ऐसी सेहत वाला शरीर पाया था कि पास खड़े होने पर अपने बौनेपन का एहसास होता था-अपनी विशिष्ट पोशाक में उसका खूब ऊँचा-नईगा शरीर किसी पर छा जाने की ताकत रखता था-अच्छा रोबीला चेहरा-मोहरा और सुरमे की लकीरों में डूवी चुभती हुई आंखें ----"यह कहाँ से आन टपका?" वाजार की ओर जाते हुए मैंने रास्ते में पूछा। "क्यों, हम सब किस रास्ते से आए हैं ?" -"राह तो एक ही है," मैंने हँसकर कहा-"लेकिन इस काबुली पठान को यहाँ देखकर ताज्जुब होता है। इस भयानक जंगल में वह किस मतलब से पड़ा हुआ है ? क्या यहां भी इनका धंधा चलता है ?" -"हाँ" -"क्या कहा?" मैं आश्चर्य में भरकर बोला-"कौन लोग लेन-देन करते हैं ? क्या आदिवासी"... -~-"हां, मौर उनके अलावा भी तो कई लोग हैं । मूसा सेठ जैसे वामिन्दे या छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी।" आगे कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। लगा दुनिया का सबसे बड़ा कामज़ोर और विना कलेजे का आदमी शायद मैं ही हूँ। उद्देश्य चाहे जो हो यह नत्य तो अपनी जगह है कि काम करने को वैसी शक्ति मुझमें नहीं। बाज़ार अब अपेक्षाकृत भरा हुआ लग रहा था। कई-कई कोनों से लड़ने या विकने के लिए आए हुए मुगों के बांग देने की आवाज़ एक-पर- एक आ रही थी और उसके साथ वह घुला-मिला स्वर वह रहा था जो. बाजार के माहौल का अपना होता है। वहां एक अनोखी जमघट थी-नंगे-अयनंगे शरीरों का ऐसा जमाव कि मुट्ठी भर भरे-पूरे कपड़ों वाले वहां वेमेल लग रहे थे। कुरता-पाजामा या ।
साल वनो का द्वीप १०७ - साडी पहिने किसी भी व्यक्ति को बाजार के किमी भी कोने से अलग देखा जा सकता था। इतने विभिन्न प्रकार के आदिवामी मैंने कभी नहीं देखे थे। वे अधिकांश माडिया ही थे, लेकिन एक इलाके की स्त्रियों को मजावट दूसरे से विस्कुल मिन्न थी। कुछ की जूडा बांधने की दौली अलग कुछ के अलंकार विचित्र । किन्ही गलों में माला-मूंगो का ढेर तो किन्हीं की आधी-आधी बांह गिलट के जेवरो से लदी हुई।कई-कई युवा स्तन खुले थे, कई अध-खुले और कई वेपरवाही से ढंके हुए। अगर मैं इस जीवन का अभ्यस्त न हो गया होता तो? मान लो अगर किसी सभ्य नगर के एक युवक को अचानक लाकर यहां खड़ा कर दिया जाय? मैं धीरे से मुस्कराया । सहसा मुझे कोसी की याद आ गई और उस याद के साथ ही दो अलग-अलग तस्वीरें आकर जहन मे टिटक गई- एक वह जिममे वह घडा उठाए माडिया नदी की ओर चली जा रही है और दूमरी वह जो अंगीठी के दम-दम करते आंच में झलकती हुई बैठी है... --"पेपी !" अचानक एक ओर से आई कुछ पहिचानो-मी आवाज से मैं चौंका। "रेको?" 'एड मुड़कर आश्चर्य से कह रहा था-"तुम भी आई हो?" लोटकर मैंने देखा कि रेको ने धीरे मे मुस्कराकर सिर हिला दिया। अपने सामने वाम की कुछ चटाइयों और टोकनियां घरे वह उसी कपड़े में खड़ी थी जिसमें मैंने उसे पहिली बार देखा था-उमी अंदाज में जिसमें सादगी से अधिक करुणा टपकती है। -"माना हो या तो मुझमे क्यों नहीं वहा?" एड ने शिकायताना स्वर में आत्मीयतापूर्वक कहा-"पैदल चलने से तो वचती।" रेको फिर फीके ढंग से मुस्कराई और आँप झुकाकर चटाइयों को ओर देखने लगी। उमके पीछे खड़ी गांव की एक लड़की हंसी, मानो कहती हो कि मोटरगाड़ी का आसरा कब तक? जब तुम ओरछा नहीं आए थे त भी बाजार लगता था और यहां से चले जाने के बाद भी इसी तरह लगेगा १०८ शाल वनों का द्वीप "लाली भी आया है ?" एड ने पूछा। "नहीं," रेको ने सिर हिला दिया और इतना ही करते-करते उसका चेहरा एकदम उदास हो गया। कमजोर-सी आवाज़ में वह बोली- "बीमार है।" -- "कब से?" -"एक हपता हो गया।" मैंने एड के हैरान चेहरे की ओर देखकर सोचा कि लाली तो बरसों से बीमार है, क्या एड यह भूल गया? ---"कोई नई बात?" उसने आहिस्ते से पूछा । -"कुछ नहीं," उसी उदास स्वर में एक झटके से रेको बोली-"अव तो उठ-बैठ भी नहीं सकता। आठ दिनों से अनाज का एक दाना उसके पेट में नहीं गया, और..." उसी समय हवा का रुख बदलने के कारण बाजार का सारा शोर जैसे इघर ही वह आया। कुछ दूरी पर बंधे लड़ाई के बड़ी कलगी वाले मुर्गे ने डैने भटककर बांग दी और ऊपर आम की कई-कई टहनियां शरावी जैसी झूम उठीं । नारायणपुर का एक कपड़े वाला व्यापारी हाथ में रेडीमेट बनियाइनें लिए पुकार-पुकार कर ग्राहक खींच रहा था। सामने की एक दूकान के निकट कुछ युवा लड़कियों का समूह ललचाई आँखों से माला- मूंगों के ढेर की ओर ताक रहा था। चूड़ियों की दूकान के सामने बैठी दो युवतियां दूसरी ओर मुंह मोड़कर होठ-भौं सिकोड़ती हुई चूड़ियां पहिन रही थीं। हवा में सखी मछलियों की गंध समाई हुई थी। नाली का प्रसंग फिर से जी उदास कर गया। रेको को छोड़ आने के गद भी मन का कुहासा तब तक नहीं छंटा जब तक कि मूसा सेट की दूकान नआ गई। मूसा सेठ की दूकान सचमुच खासी बड़ी थी। जीरा-धनिया से लेकर आइना-कंघी तक और छोटे-छोटे रूमालों, रेडीमेड कपड़ों से लेकर नमक- मिर्च तक । दूकान के सामने स्वभावत: युवक-युवतियों की भीड़ अधिक जमा -
साल यनों रार
पी और उन्हें निबटाला हुभा दोष में एक और १११
सुवा बैठा हुआ पानीद संयोग कि मा atta
लेकिन उसके न होने से जरा भी रोशनहीं रोक 41
arरी डाक घरी थी।
~~"मामू ने कहा है," दूगा पर गुant. १०५
आएं तो यह डाक मैं आपको दे . क्योकि गत Justram
दूकान आएं।"
उनका याने मूसा सेठ मा, पागा Timi Mir fattitual
बरसो से घर-जमाई होकर रह रहे है। गट itm
ध्यान नहीं दिया। जवाब में एक भी शालिन, ११२.
की तरह झपटा मानो पिट्टी गली म होकर पोtalmmam
यह सह-अनुभूति किगनी पटिन है। गोm. itment,
बाहर की मारी दुनिया में काटा-इटा गनिमोnentinurnimun.
भूति को महीन्मही शायद में भी नगद minimittal
का महत्व होता है यह मैंने उगीक्षण intmlm
एड डाक उलट-पलट रहा थाmugat
वह परीक्षा की घडी हो और गुरागाmum
है। कई दिनों की डाक थी गीगानी गीminatitin
पत्रिका यादम', पाटra Iris RATA SATH
पटिनाई म एक पत्र ही मंगा'
--मायो!"...
११० शाल वनों का द्वीप . वार पढ़कर या तो मन को तसल्ली नहीं होती या शायद उन वाक्यों की हर दुहराहट पर आंखें इस उम्मीद से बार-बार गुजरती हैं कि कोई-न-कोई शब्द या जुमला नया अर्थ दे जाय। पत्र बेहद लम्बा था -फुलस्केप साइज के पूरे चार पृष्ठ जिनके संग- संग मेरा अपना नगर सजीव होकर उठ आया था- ..."और तुम्हारा नगर बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि तुम छोड़ गए थे। डाकखाने से लेकर थाने तक जानेवाली वही गुलज़ार सड़क जो शाम- शाम को कुछ निखर जाती है। दण्डकारण्य-योजना व रेलवे प्राजेक्ट से नगर की ज़िन्दगी में महंगाई चाहे जितनी बढ़ गई हो, एक चीज़ की प्रसन्नता नवयुवकों को जरूर होनी चाहिए। वह यह कि गोल वाज़ार के आसपास अव सौंदर्य व शरीर खूब जी भरकर देखने को मिलता है। तुम स्वयं जानते हो कि कुआरों की दष्टि में जिज्ञासा होती है और विवाहितों की की नज़र में लालसा। इसके अलावा दूसरे की पत्नी को देखने का सुख क्या साधारण होता है? नगर की रोजमर्रा ज़िन्दगी में वही टुच्चापन है जिसे जन्म से तुम देख रहे हो । सम्भ्रान्त नागरिक आज भी पान की दुकान के सामने खड़े होकर घंटों गुजार रहे हैं, मैदानों में फुटबाल-मैच देख रहे हैं, क्रिकेट की कमेंट्री सुन रहे हैं या आगाथा क्रिस्टी के नावेल पढ़ रहे हैं। कुछ समाज-सेवी वकील व स्वतन्त्रता के बाद के देश-भक्त नेतागण बरावर सेवारत हैं, क्योंकि सेवा से ही मेवा मिलती है। ...और इन सबके बीच में कितना अकेला महसूस करता हूँ, कैसे कहूँ ? पहिले जब इस नगर में नहीं आया था तो सोचता था कि मेरे मन में यहां की मिट्टी के लिए मोह है । तुम जब तक साथ बने रहे यह भावना नहीं बदली थी, लेकिन अब सोचता हूं तो लगता है कि यह वात नहीं है। क्या उस सारे मोह के पीछे केवल-मात्र तुम्हारा साथ रहना नहीं था ? और हां, एक बात न लिखू तो तुम शायद मुझे कभी क्षमा न करोगे। उस दिन 'र' मिली थी। इधर-उधर की बातों के बाद बड़ी कठिनाई से .
साल वनों का द्वीप उसने पूछा कि तुम कब आ रहे हो। सच मानना मैंने स्पष्ट देखा कि प्रश्न करते समय उसकी आवाज कांप गई थी। फिर उसके चली जाने के बाद बड़ी देर तक सोचता रहा कि वह क्या केवल यही पूछने नहीं आई थी?"... मैंने घबराकर चिट्ठी बद कर दी। ए४ मेरी ओर देखकर मुस्करा रहा था। इस बीच अपनी सारी चिट्ठियों पढ़-पढ़ाकर वह 'टाइम' के पन्ने पलट रहा था। उसे यूं मुस्कराते हुए देखकर मैं एक क्षण के लिए सकपका गया था। क्या एड ने जान लिया कि पत्र में क्या लिखा है ? फिर अपनी शंका और मूर्खता पर खुद ही हंसी आई। -"वर्माज !" एड ने पत्र की ओर इशारा करके पूछा। -"या !" --"व्हाट'डज इट से !" हंसते हुए, गोल-गोल जवाब देकर मैंने वह प्रश्न टाल दिया। --"फिलिस ने तुम्हे याद किया है," क्षण भर बाद एड वोला-"वह लखनऊ से लौट रही है।" "कव?" -"इस महीने के अंत तक।" मेरे मन में उस समय भी पत्र का वही वाक्य गूंज रहा था-वह क्या केवल यही पूछने नहीं आई थी ? यही पूछने नहीं आई थी...? फिलिस के लौटने वाले समाचार पर अपनी प्रसन्नता इसीलिए बडी औपचारिक-सी लगी। बाजार अरने पूरे यौवन पर आ चूका था । मूसा सेठ के दामाद को अब हमारी ओर देखने का भी अवकाश नही था। माला-मूंगों, कपड़ों और चूड़ियों से अधिक विक्री नमक को यो-जितने भी दूकानदार ये, सब बुरी तरह व्यस्त । अपने लिए जो भी थोड़ी बहुत खरीद-फरोख्त करनी थी, अमरसिंह कर रहा था, अतः हम लोग मुर्ग-सडाई देखने के लिए उठ आ । मुगं-बाजी आदिवासियों का कितना अनोखा-सा मसला है !
११२ शाल वनों का द्वीप बाजार मे योड़ा हटकर खुले मैदान में लोगों का एक गोल घेरा बन जाता है। उसे घेरे में सभी तरह के लोग होते हैं लड़ाई में हिस्सा लेने वाने, उन्हें प्रोत्साहित करने वाले दोस्त अहवाब, महज तमाशबीन और मुर्गो की हार-जीत पर सट्टा खेलने वाले कई शौक़ीन । पहिले लड़ाई में भाग लेने वाले लोग अपने-अपने वहादुरों को गोद में उठाए जोड़ की तलाग में भटकते हैं। हर एक व्यक्ति अपने मुर्ग को दूसरे के निकट छोड़कर पहिले दोनों की शक्ति तोलता है। यदि जोड़ वरावरी का हुआ और दोनों बाज़ी के लिए तैयार हुए तो मुगों के एक-एक पांव में छोटी-छोटी काती (छुरियाँ) बांधकर मैदान में छोड़ दिया जाता है जहां फैसला होने में दो-चार मिनट से अधिक नहीं लगता। जिस क्षण हम लोग घेरे में जाकर खड़े हो गए, उसी समय एक बाजी शुरू हुई थी। मेरा ख्याल है उस लड़ाई के फैसले में कठिनाई से आधा मिनट लगा होगा। मैदान में छूटते ही अपनी-अपनी गर्दन फुलाकर पल-भर के लिए वे दोनों मुर्गे एक-दूसरे को घूरते रहे। फिर अचानक हवा में उनके गरीर उछले और दूसरे क्षण एक ज़ोर की चीख के साथ एक लहू-लुहान मुगं जमीन पर लोटने लगा। काती शायद सीधे उसके कलेजे के पार हो गई थी, फड़फड़ाता हुआ वह तीन-चार वार हवा में उछला और घेरे के पार गिरकर ठण्डा हो गया। घेरे में उस मौत की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। सिवाय इसके कि दो- चार लोग उस मुर्ग के अभाग्य पर हंसने लगे जो केवल एक बार में साफ हो गया था। पर अधिकांश लोगों ने शायद ध्यान भी नहीं दिया, क्योंकि एक जोड़ के हटते ही फौरन दूसरा मैदान में उतर आता और कई बार दो- दो या तीन-तीन जोड़ लड़ाई में लगे होते। घोड़ी देर बाद चीर-फाड़ लहू और मौत के उस घेरे में मैं पीछे खिसक गया और एक पेड़ के नीचे बैठकर एड की प्रतीक्षा करने लगा। बाजार को चुपचाप बैठे देखते जाओ तो कभी ऊब नहीं होती। दृश्य का छोटे-से-छोटा टुगाड़ा कितना परिवर्तनशील होता है ! हर निगाह जो शाल वनों का द्वीप उठती है तो नया चेहरा ही देखकर लोटती है । मैंने आंखें मूंद लो। लगा कि बाजार का शोर और तेज होकर कानो में भरता जा रहा है और सूसी मलियो की सड़ी हुई गघ नासापुटो को बारीक-बारीक रगो को आहिस्ते. आहिस्ते छोल रही है... मुझे पूछने वाली 'र' का चेहरा, गोल और मामल है। छिलका उतरे कोसुम-जैसे रंग का दहकता मुख, जिसे उसको सपनीली आंखें हमेशा के होती हैं । अजीब बात है कि कल्पना करने पर सबसे पहिले मुझे अपने पपोटों पर उन सार-जैसी नोकीली पलको का गडाव महसूस होता है और उसके चेहरे के नुकूश बडी देर बाद लौटते हैं। कई बार लगता है कि 'र' में केवल मोसे ही आवें है । वह अपनी ओर उठी उन लम्बी-लम्बी पल को का बेवजह और दम-पे-दम झपकाव जैसे धूप छांव हो जाए और छवि धूप ! जिम दिन 'र'ने पहिली बार मेंट हुई थी ऐसा ही लगा था। कई दिनों बाद मैंने ईमानदारी वरतनी चाही। जो कडा करके साहस किया और अपनी अनुभूति की बात कह दी तो उसके चेहरे को प्रतिक्रिया आगा के अनुरूप नहीं लगी। वह उसी तरह संजीदा बनी रही फिर मुस्कुराकर धीरे से इतना ही धोनी-"भाई, तुम शायर लोग ही जाने क्या-क्या मोच लेते हा, हमारे पल्ले तो कुछ नहीं पड़ता।" उसके बाद कहने को क्या रह जाता है ? उस दिन मै जो फिर कभी मेरी जवान नहीं खुली । तब भी नहीं जब ऐसे कई अवसर आए ~~हम लोग दोनो अकेले हैं, बाहरी वातें सब धुक गई हैं, रह-रहकर एक- एक मिनट का मौन पड़ जाता है और 'र' इतनी प्रसन्न है कि जाने-अनजाने अपने-आपकी झलक दे-दे जाती है। मैं हेमकर कहता हूं."देखो, तुम बहक रही हो।" --"क्यों ?" माखों को जरा-जरा फैलाकर वह शरारत में पूरी है- "क्या मेरी बातों में नशे की बू आ रही है?" चुप हा तो शाल वनों का द्वीप -"नशा न सही, लड़खड़ाहट तो है।" -"नहीं, नहीं। वह पूरे आत्मविश्वास से मुस्कुराकर कहती है- "मैं अपने कदम खूब पहिचानती हूँ।' फिर सहसा उसकी आवरणहीन लीची-जैसी गर्दन में, पीछे की लाल रिवन टॅकी दोनों चोटियां आकर झूल जाती हैं और मुझे अपना-आप लहू- लुहान लगता है। - -"चलो, चलें..." अचानक निकट आकर मुझे लौटते हुए एड ने कहा । -"कहाँ ?" मैंने आँखें खोल दी थीं। "वापस ओरछा," उसने कहा--"अमरसिंह भी आ गया है और अब मूसा सेठ से मुलाकात नहीं होगी।" दोपहरी ढल चुकी थी। बाजार अब बिखराव पर आ गया था। दूर- दराज के लोग लौटने की तैयारी कर रहे थे और हमें भी शाम से पहले ओरछा पहुंचना था। मुर्गवाजों के घेरे में अब वह उत्साह न रह गया था। आस-पास के पौधों और छोटे-छोटे बूटों से कई विजयी व घायल कलगी वाले मुर्ग बंधे थे और उन्हीं के निकट-पास पड़े थे अनेकानेक पराजित शव । - नो दूसरे दिन की भरी-पूरी दोपहरी झूठी हो गई जय माडिन नदी की ओर से गांव की दो युवतियां कपडे-लत्ते का होश छोडकर, चीखती-चिल्लाती घेत- हाशा भागी-भागी आई और हमारी कॉटेज के पास गिरकर बेहोश हो गई। हम लोग साना खाने के बाद बाहर ही निरद्देश्य बैठे हुए थे। एड 'टाइम' का नया अंक उलट रहा था और मेरे पास कोई काम नहीं था। पहिले-पहल हमारी समझ मे कुछ नही आया। माडिन नदी को और में अचानक दो मिली-जुली व पवराहट ये भरी आवाज आई। जब तक कि कुछ सोचने की कोशिश करें, दो युवतियों जैसे-तैसे दौडती नजर आई और फिर यही देखा कि ठीक हमारी कॉटेज के पास वे आकर गिर गई। हालांकि हमारी कॉटेज माडिन नदी के रायगे पारा पटनी थी, लेकिन इससे भी पहिले रास्ते मे लने का घर था। सयोग को यात किवा भी घर पर था और लड़कियों को वैसी बदहवामी में चिल्लाते व भागते देश- कर उसने भी आवाज दी थी। लेकिन यहाँ मुनकर कराने का साहग किस में था? लपककर हम लोगो के पहुंचते तक लस्वे भी वहाँ आ चुका था और घबराया-मा पूछ रहा था-"क्या हुआ ?" दोनों युवतियों में एक की हालत यहत सराव थी। बदन का रहा-महा कपड़ा तार-तार हो रहा था, वाहों और गरीर के दूसरे हिम्मे मे काटोपी कई-कई सराओं नजर आ रही थी और गायद राह में गिर पटनेवारण एक घुटनादुरी तरह छिल गया था। दोनों की नंगी छानियो धोकनी की जगह ११६ शाल वनों का द्वीप जल्दी-जल्दी चल रही थीं और उनमें से एक पूरी तरह होश में आ जाने के बाद भी बोल नहीं पा रही थी। वह केवल अपने पास खड़े लोगों को बट-बट देखे, हाँफे और रोए जाए. -"बोलती क्यों नहीं ?" आखिर जव लस्के से नहीं रहा गया तो चिल्लाकर डांटते हुए उसने कहा-"हुआ क्या है जो इस तरह मरी जा रही हो?" लड़की पर फिर भी कोई भी असर नहीं हुआ। एक बार डरी हुई आंखों से ताककर वह फिर रोने लगी तो एड ने स्थिति सम्हाली। आगे वढ़कर उसने लस्के को चुप करवाया और लड़की के निकट बैठकर सहानु- भूतिपूर्वक पूछने लगा कि वास्तव में क्या हुआ। -"कोसी..." बड़ी कठिनाई से उसके मुंह से आवाज़ निकली और वह रोने लगी। -"क्या हुआ कोसी को ? -चोल, क्या हुआ कोसी को ?" तब तक आस-पास के घर वाले मासा, केये और अन्य कई परिवार के '. स्त्री-पुरुष व बच्चे सभी जमा हो गये थे। क्षण-प्रतिक्षण बढ़ती भीड़ देख- कर दूर के घरवाले भी भागे आ रहे थे। सहसा इतनी भीड़ से अपने को घिरा हुआ पाकर किसी की भी घबरा- हट का और बढ़ जाना स्वाभाविक था। लड़की ने काफी हांफने के बाद केवल एक शब्द का उच्चारण किया-"वाघ।" और यस । वैसे उसके आगे कुछ बताने की भी आवश्यकता नहीं थी। व्हीले जो सबसे आगे घबराया-सा खड़ा था अचानक जोर से चिल्लाया. -"कहाँtt?" यकवयक सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी और क्षण भर के अन्दर सारे गांव में खलबली मच गई। उस घबराई हुई लड़की ने दो शब्दों के उच्चारण से जिस अप्रत्याशित घटना का संकेत किया था उसके पहिले की या व्हीले जोर गुछ गांव वालों को मारम बी-नित्य की तरह लगभग शाल वनो का द्वीप बारह बजे खाने आदि से निषटकर कोसी व गांव की दो अन्य लड़कियों पत्ते तोड़ने के लिये वन गई थीं। पतो के लिए जाना ही कितनी दूर पड़ता है ? माडिन नदी से लगे हुए शाल के जंगल में तो बच्चे भी सेलते-रोलते पहुंच जाते है । आबादी से बमुस्किल हेढ़-दो फलोग दूर आगे घटना का सम्बन्ध अनुमान से ही जुड़ जाता हैं। तीनो युवतियां अलग-अलग फैनकर निश्चित पते तोडने में लगी हैं। पीछे झाड़ियों में अचानक वाघ निकल आता है-~~-कोसी के बहुत पास किसी एक लड़की की निगाह पड़ते ही वह चिल्लाती है। चौंककर दूसरी लड़की भी देखती है । सब-कुछ वहीं छोड़कर चेतहाशा चिल्लाती हुई ये दोनों भागती हैं। एक क्षण के लिए हक्का-बक्का होकर कोसी स्तम्भित रह जाती है, फिर चीख मारकर भागने का प्रयास करती है, लेकिन उससे हजार गुना फुर्ती से बाघ उछाल मारता है और दूसरे क्षण कोसी का कोमल शरीर बाघ के सूंसार पजो में आ जाता है । एक हृदयविदारक चीत्कार और बस... एड ने असहाय आँखो से मेरी ओर देखा । मैं अधिक भयभीत था या द्रवित, यह कह सकना मुश्किल है । लग रहा था जैसे बाघ माडिन नदी के पारन होकर गांव मे घुस आया है और हम सबका अस्तित्व खतरे में पर गया है। लग रहा था जैसे कोसी वाघ के पजो में नही मेरे सामने बैठी है ----उसी तरह खुली और निश्छल । लडकियां उसे उठाकर सोने के लिये से जाना चाहती हैं, लेकिन वह नहीं हटती। अंगीठी पर हथेलियां फैलाकर हँसती हुई बैठी है और व्होले को चुहल से लजाकर किसी भी पल भाग जाएगी। "कुछ देर बाद मैंने एड से पूछा। --"देखो, गांव वाले क्या करते हैं।" ~~~"तब तक तो कोसो दूसरी दुनिया में पहुंच नुकेगी।" मैंने चेतुकी. सी बात कही, हालांकि मैं जानता था कि गांव वाले भी जाकर अब उसे नही बचा सकते। "तुम क्या समझते हो कि बाप के मुंह में भी पहुंचकर वर अब तक -"अब?"...
११८ शाल वनों का द्वीप जिन्दा होगी?" एड फीके ढंग से हंसा और अपनी मूर्खतापूर्ण वात के लिये पछताकर मैं चुप हो गया। लाख जल्दी मचाने और भाग-दौड़ के बावजूद दो घंटे और लग गए । गांव के अधिकांश पुरुप पहाड़ियों या खेतों की ओर निकल गए थे। उसमें से पटेल भी एक था। कोसी के घर का प्रमुख पीरचे भी नहीं था, अतः उन सबके आने की प्रतीक्षा करनी पड़ी। जब उनके साथ-साथ और काफी लोग जमा हो गए तो ढोल, खाली पीपे, आवाज़ करने वाले वर्तन, आग, तीर-धनुप, फरसा तथा कुल्हाड़ी आदि से लेस एक बड़ा-सा समूह वन की और बढ़ा। तव सूरज पश्चिम की ओर काफी ढलक गया था। आकाश में बादल नहीं थे और धूप बिल्कुल साफ पड़ रही थी। अंधेरे के आने में अभी घंटों की देर थी, लेकिन महसूस हो रहा था जैसे ओरछा-वासियों के वीच शाम हो गई है। माडिन नदी के कगार के नीचे जल शांत सोया हुआ था- उसकी एक धार कुछ दूर पर राह-पड़ी चट्टान से उसी तरह शोखी कर रही थी। उस पर बांस की झाड़ियों की अनगिनत फतार पीली पड़ती-सी वैसी ही झुकी हुई थी। शालवनों के ऊंचे-ऊंचे पेड़ पहिले की तरह आकाश में सिर उठाए खड़े थे, और नित्य की तरह ही दिन जा रहा था । सव-कुछ वैसा ही, जैसे कल था या जैसे कुछ घंटों पहिले था। स्वयं कोसी इसी राह से गई थी। रेत पर पड़े कई चिह्नों में से कुछ निशान उसके पांव धरने के भी होंगे। आगे आने वाले पल से बिल्कुल अज्ञात, नदी, चट्टान, वन और पेड़-पौधों को उसने इसी तरह देखा होगा । तब उसे क्या मालूम था कि उन सबको यह अन्तिम बार देख रही है। एक अप्रत्याशित घटना अचानक भाकर एक क्षण में घट गई और एक युवा-प्राण संसार से उठ गया ! माड़िन नदी का दूसरा तट पार करते ही छोटी-सी पहाड़ी आती थी। दरअसल, वह पहाड़ी नहीं थी, पहाड़ी का ढलवान वाला आखिरी हिस्सा था, लेकिन उसकी चढ़ाई के लिए भी घुटनों पर हाथ रखना पड़ता था। जैसे ही उसकी शुरुआत हुई सारा समूह सतर्क होकर चलने लगा।
शाल वनो का द्वीप लोग एक-दूसरे के बहुत पास-पास होकर शोर-शराबा करने लगे-जार- ज़ोर से ढोल पीटा जा रहा था, खाली पोपे और वर्तन बजाए जा रहे थे, पूरी ताकत से चीख मारी जा रही थी और ऐसी हर हरक्त हो रही थी जिससे कि यदि आस-पास कही हो तो आदमखोर बाघ दूर हट जाए या एकाएक हमला करने का साहस न कर सके। एड ने रायफल रख ली थी। एहतियातन एक बन्दूक मेरे हाथ में भी थी लेकिन उसका होना न होने के बराबर था। जिसे बन्दूक पकड़ना ही न आए ऐसे व्यक्ति के लिये उस प्राणघातक शस्त्र का मूल्य डंडे से भी कम होता है-मेरी वही स्थिति थी। चहार के बाद वाले समतल मैदान में अधिक दूर नहीं जाना पड़ा। पगडडी के समाप्त होते ही एक खुला हुआ टुकडा आया और उसके साथ ही नज़र में आकर ठहर गया वह स्थल, जहाँ कुछ घंटो पहिले कोसी की चीत्कार उमडकर दिशाओं मे गूंज गई थी। एक छोटे-से गाल पेड के पास, भरी वाल्टी मे छलके जल की तरह कोसी का रक्त लुटा पड़ा था। एकाध गज की दूरी पर दो-चार टूटी हुई चूड़ियां बिखरी थी और एक छोटे-से जगली चूटे को टहनियो मे उमको गर्दन की मालाएं जा अटकी थीं। सभी भयभीत, आतकित और उदाम आंखें उन चिह्नों को देख रही थो, केवल में एक क्षण वाद व्होले को देखने लगा था । देख रहा था कि वह क्या देख रहा है, लेकिन क्या सचमुच ? फिर सारे समूह ने वही हल्ला मचाना शुरू किया, ढोल-पीपे व वर्तन बजने लगे और लोग अजीब-अजीब आवाजो व गोर के साथ एक निश्चित दिशा की ओर बढे । कोसी के शरीर से छूटे हुए रक्त की मूखी धार ने ही राह दिखा दी। वह दिशा जो वन-घास, सियाडी, मूलन व काटालो की लताओ पर से होकर नीचे से ऊपर और ऊपर की पहाड़ी पर पहुंचती थी। उम पहाड़ी पर जहाँ के एक खूब चौडे और साफ चट्टान पर कोमी की नंगी देह पड़ी यो-मृत, लहू-लुहान, अस्त-व्यस्त और ऐसे रुप मे जिसकी १२० शाल वनों का द्वीप मैंने कभी भी कल्पना नहीं की थी। अगर मुझे पूर्व-घटना या कथा मालूम न होती तो क्या मैं पहिचान सकता था कि वह कोसी है ? उसके सिर के सारे बाल वाघ ने चाटकर साफ कर दिये थे जिसके कारण खोपडी चिकनी हो गई थी और मुंह लहू से ऐसा सन गया था कि चेहरे की एक भी रेखा स्पष्ट न थी। -"पूयर लिटिल थिंग!" एड ने सांस भरकर कहा। मुझसे कुछ कहा नहीं गया। मौत सभी को आती है। किसी को जल्दी किसी को देर से । लेकिन कुछ के भाग्य से उसका आना ऐसा होता है कि जी दहल जाता है। क्षणकाल के लिए जीवन की सारी निस्सारता मेरे सामने खड़ी होकर ठहर गई । मुझे लगा कि मेरा हृदय बुरी तरह डूब गया है और हर क्षण मेरा आकार छोटे-से-छोटा होता जा रहा है। यहां तक कि अन्त में शरीर या आकृति का कुछ भी नहीं रह जाता । लगता है, केवल यह निराकार शक्ति बची है जो यह सोचती रह जाती है कि वास्तव में वह है भी या नहीं? उस रात बड़ी देर तक नींद नहीं आई । खाने की मेज़ से भी हम लोग जल्दी उठ गए और ऐसी कोई बात नहीं हुई जिसे बात कही जा सके । एड । दोनों के प्यालों में चुपचाप व्हिस्की डाली, 'प्रान्स' का टिन खोला और उस मछली के नमकीन स्वाद के साथ हम लोग अपना-अपना गिलास पीने लगे। शायद और दिन होता तो एड मुझसे एक-दो पेग और पीने का आग्रह करता लेकिन उस क्षण जैसे वह मेज पर था ही नहीं। जरूरत के चन्द शब्दों को छोड़कर अलबत्ता उसने एक बात कई बार कही कि यह सब मुनकार फिलिस को बेहद दुख होगा। कोसी तो गांव की सबसे सुन्दर लड़की थी! और मैं क्या सोच रहा था ? किसी परिचित युवा लड़की की अकाल मृत्यु से मन पर धक्का लगना स्वाभाविक है, लेकिन शिकार वाली रात कोसी को उस रूप में न देखा होता तो यह उदासी शायद इतनी गहरी न होती। खाने की मेज से उठकर एड अपने कमरे में चला गया। पेट्रोमेक्स के पास बैठा थोड़ी देर वह पुराने नोट्स टाइप करता रहा, फिर उसे अधूरा माल वनों का द्वीप छोड़कर कोई मंगजीन उलटने लगा। दस मिनट बाद उससे भी अवसर उसने कपडे बदले, पेट्रोमेक्स वुझाया और चारपाई पर जा लेटा। वही पहाडी सदियो की रात जिसमें माडिन नदी से धुलकर हवा माती थी-वाहर कोहरे मे ठिठुरता हुआ माहोल जिसमें रह-रहकर खेतों में चरते चीतल-सांभर की आवाज डूब जाती थी। काफी देर तर एड के कमरे से चारपाई बजने की आहट आती रही । एक करवट कठिनाई से मिनट-दो-मिनट चलती फिर उसे बदलना पड़ता। आधी रात से ज्यादा गुजरते तक वह तीन बार बाहर निकला। दो बार बाहर जाने के लिए और एक बार पड़े तक पहुंचकर पानी पीने के लिये। आखिर लाख-लाख कोशिश के बाद मुझे भी नीद आयी, लेकिन जैसे डरती-और उचटती-सी। आंख लगती, कुछ देर के लिए मैं सो भी जाता लेकिन जैसे ही वह दृश्य हॉष्ट करने लगता घबराहट में मेरी औ खुल जाती और उतनी सर्दी के बावजूद लगता मानो मेरा सारा शरीर पसीने में भीग गया है। तीसरी सुवह 'देवान' के पवित्र 'रावल में गांव के बडे-बूई तया कुछ बुजुर्ग लोग इकट्ठा हुए-~-आतंकित, भयभीत और वेद पदराए हुए यह मापत्तिकालीन 'पेन-नस्कितात' या जिसमें प्रत्येक घर का प्रमुख पूरी प्रसा- आस्था के साथ देवता के चरणों में समर्पित हो जाता है । गिड़गिड़ाए हुए स्वर में प्रत्येक को केवल एक विनम्र प्रार्थना है-'हे देवाधिदेव, जगल हो हमारा जीवन है। तेरे ही आमरे पर हम लोग अकेले-दुकेले, दूर-दूर तक निकल जाते हैं पर कभी कुछ नहीं होता। तेरे सम्मान में हम लोग किमी प्रकार की कोई कमी नहीं करते । लेकिन इसके बावजूद यदि तू रष्ट है वो जरूर कोई कारण हाना चाहिए। हम अभागों से ऐसी क्या भूल हो गई कि दिन दहाड़े गांव मे आमदसोर वाघ घुस आया है ?' रिवाज के मुताबिक गांव के लरके ने अपनी देह मे देवता 'देवान' को बुलाया और उसकी आराधना करते हुए मैं चडाई गयी--अडे, लाली, कुछ चावल, एक छोटा-सा चूना, शराब, लोहे के किसी टुकड़े से रिम हु अंडे के साली छिलके, पास की पत्तियां और मपूर-पंख..
दस फिलिम आयो तो गाँव की जिन्दगी में छाई महीनों की एकरसता टूटी है। उसके पहुंचते ही मिलने तथा कुशल-क्षेम पूछने के लिये सारा गांव उमड़- कर कॉटेज के सामने इकट्ठा हो गया। मिलने-जुलने का वह सिलसिला लगभग दो घंटे चलता रहा और इक्के-दुक्के लोगों की आवाजाही शाम. तक बनी रही। मुझे फिलिस से ईर्ष्या हो गयी । इतने सारे लोगों का ऐसा प्यार पाना क्या सब किसी के भाग्य की बात हो सकती है ? उसके लिये सवसे पहिले शायद नारी होना पड़ेगा-ऐसी नारी जिसमें फिलिस-जैसे गुण हों। वह पच्चीस वर्षीय कमनीय शरीर, कटे हुए मुनहरे बाल और नीली आँखों वाला ऐसा रूप जिसके तराशे प्याजी होठों पर आठों-पहर मुस्कान रची होती थी। मुझे अक्सर लगा है कि फिलिस शरीर से चाहे अमरीकी हो मन से भारतीय है और वह भी ऐसी भारतीय महिला जो छोटे-छोटे नगरों या शास्त्रों में रहती हैं । वही अकृत्रिम व्यवहार, सीधा-सादा मिजाज़ और बात बात में घरेलूपन की महक ! वही विशिष्ट भारतीय स्वभाव जिसके अनु- नार हर एक-दूसरे से रिश्ता जोड़कर बातें करता है। गांव में कोई काका है, कोई दादा है, कोई फुआ या कोई माता । माड़ियों की अपनी बोली गोंडी में कभी भीख नहीं पाया । या तो मुझे चने अवसर नहीं मिले या मैंने कोशिश नहीं की। दोनों ही स्थितियों में दोप' मेरा है और यह मुठा मन पर बरावर बनी रही है। यह बढ़कर मुझे तब कचोटने लगी जब एड या फिलिस को गोंडी बोलते मुना । पहिले कितना . ! १२२ शाल वनों का द्वीप १२३ अजीव लगा था ! ऐसे विदेगियो के मुंह से गोंडी, जो हिन्दी न बोल पाते हैं, न समझ पाते हो, कितनी प्यारी लगती थी! जी करता था कि ओरछा के किसी घर-आंगन में बैठकर एड या फिलिस गोंडी में बातें करें और मैं चुपचाप सुनता रहूँ। ऐसा प्यार हर उस वार उमडा है जब नंगे बदन केवल एक निकर पहिने एड को गांव के पर-घर घूमते देखा है अथया उसे मिर पर एक पगडी बांधे, बीडी पीते हुए उनके समूह में मिलकर नाचते-कूदते ... -"हीज केजी "ऐसे अवसरों पर हमकर, निहायत ममतापूर्वक फिलिम कहती और उसकी आबो का प्यार गहरा जाता । मुझे लगता जैसे केजी कहने के बहाने उसने 'तवली' कहा हो। सबमे मिलने-जुलने और गांव भर का दुख-मुख जानने के बाद फिलिस ने अपनी कॉटेज की खबर ली। चीते के हमने के बाद दडवा सूना ही पड़ा था। उसकी पानी हुई मुगियों का एक चूजा भी न था। पीछे के आंगन में उसने टमाटर के पौधे लगाये थे, उसकी वैसी हिफाजत एड से न हो मकी। सामने पोचं के नीचे कुछ गमलो में क्रोटन, कैक्टस और रजनीगंधा के पौधे सहेजकर सजाए गये थे--गनीमत थी कि अमरसिंह ने उनका वराबर ध्यान रखा वर्ना शायद उसके लिये एड को क्षमा भी न मिलती। अजीब बात है कि उसी रात पुमाल भी जैसे सूंघती-मूपती आ गयी जिसे आने के बाद में फिलिम ने दस बार पूछा था । कम्बल विल्ली इस बीच जमे राह ही भूल गयी थी हालांकि उसके लिए भी एड को दो-एक उलाहने गुनने ही पड़े कि उसकी गैरहाजिरी में अवश्य पुमाल को साने-पीने की तकलीफ हुई होगी अन्यथा जो बिल्ली चौबीसो घटे म्याऊ-म्याऊँ करती डटी रहती यो वह इतने इनने दिन न आये, क्या यह संभव है ? फिलिस के लौटते ही गांव की जिन्दगी में अचानक परिवर्तन हो आय अस्वाभाविक न था। अचरज तो तब हुआ जब अपने आने के सीमरे शाल कालिया को भी लेती आयी। मुझे लगा जैसे बरसों वाद कोई बिछुड़ा मित्र अचानक आ मिला हो । श्याम कालिया को यूं ओरछा में देख गा, यह तो मुझे गुमान भी न था। दोपहर को हम लोग माडिन नदी से तैरकर लौट रहे थे। लगातार दो टे खूब तैरने के कारण वुरी तरह थकावट महसूस हो रही थी और भूख अलग लग आयी थी । पहिले दूर से देखा कि कोई सरकारी जीप स्कूल के पास आकर रुकी है। क्षण-भर वाद दो-तीन लोग उतरे और उनमें एक व्यक्ति हमारी कॉटेज की ओर बढ़ आया। पगडंडी पर जैसे-जैसे उसकी आकृति निकट आती गयी वैसे-वैसे मेरी शंका यक़ीन में बदलती गयी- वही औसत क़द, कश्मीरी गोरा रंग, बदन पर फवता हुआ साहवाना लिवास और चाल में ढली वेपनाह मस्ती । उसके चेहरे पर खूब सजती हुई फ्रेंच-कट दाढ़ी देखकर मुझे पूरा यक़ीन हो गया कि कालिया के सिवाय कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। -"हल्लो श्याम !" लपककर आधा फ़ासला मैंने स्वयं ही तय कर लिया और खूब कसकर हाथ मिलाता हुआ वोला-"तुम इस वियावान में कहाँ?" ? दरअसल अपनी प्रसन्नता का अधिकांश हिस्सा मैं दवाए जा रहा था कुछ तो संकोच के मारे कि कहीं मेरी बातें उसे वनावटी न लगें। एक वार मुझे भरपूर आँखों से देखकर कालिया ने याराना लहजे कहा-"डीयर, अपनी जिन्दगी तो इस वियावान के लिए ही बनी तुम सुनाओ कैसे हो? उर्दू का वह शेर है न, 'इसी उम्मीद 4 मीलों जाते हैं दीवाने'..." मैंने हंसकर उसे बाहों में भर लिया । तव तक एड और फिरि- निकट आ चुके थे। वारी-बारी से उन लोगों से भी मिलकर वह के "दरअसल मैं नारायणपुर तक आया था। सोचा कि इतनी दूर से तुमसे मिले विना चला जाऊं तो वेइंसाफी होगी। "नारायणपुर कैसे?"
शाल वनों का द्वीप १२५ -"क्यों ? अपने 'शेरी' को प्रेक्टीकल ट्रेनिंग के लिये जंगल न जाऊ?" शेर यानी 'ट्राइबल इन्स्टीट्यूट ऑफ छिदवाड़ा' के विद्यार्थी। मैं तो भूल ही गया था कि कालिया रिसर्च आफिसर है। तो यूं कहो, मैंने हमकर कहा-"कि हलवाई को मिठाई में दादा की फातिहा दी जा रही है !" कालिया ठठाकर हंस पडा, वोला- ---"भाई, जरूरी फातिहा है, यह देखना कतई नहीं कि मिठाई कहाँ की है।" फिर बही छोटी-सी कॉटेज कालिया के खुले ठहाको और हम लोगो की हंसी से कितनी देर तक, गूंजती रही, यह कहना कठिन है। केवल यही याद रह गया है कि कालिया लगभग साढ़े बारह-एक को पहुंचा था और बातो हो-बातो में तीन बज गये। इस बीच उसके जीप वाले साथियों ने दी पार संवाद भेजे, लेकिन मैंने कालिया को जाने नहीं दिया। एड बरावर आग्रह करता रहा कि कालिया अपने उन साथियो को भी बुलवा ले, लेकिन वह यह कहकर टाल गया कि वे सरकारी दौरे पर आये हैं, अपने काम-वाम मे लगे होगे। फिर इसके अलावा भी थे लोग मिडी किस्म के रेवेन्यू आफि- सर हैं-अपने डिपार्टमेट, मरकारी गतिविधियों और कलेक्टर के सिवाय और क्या बातें करेंगे? दोपहर का सागा कालिया ने हम लोगों के साथ ही साया। जीप वाले सरकारी 'बहादुरों' को वसो खवर भेज दी गई। मेरा ख्याल है कि उन लोगो ने बिल्कुल परवाह न की होगी। देखा, गांव मे थोड़ी-सी हलचल मची है-पटेल यहाँ-वहाँ दौडने में व्यस्त है, स्कूल मास्टर हाथ बांधे सडे हैं और एक-दो ओरछा-निवासी साहवो के लिए जरूरी चीज-वस्त पहुंचाने मे जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। वस्तर के गांव मे किसी सरकारी अफसर का दौरा मामूली बात नहीं होती। खासकर अबूझमाड़ के ओरछा जैसे गांव मे, जहाँ मुद्दतों कोई झांकने भी नहीं पहुंचता।
१२६ शालवनो का दीप amana -"आपकी रिसर्च और कितनी रह गई है ?" खाने की मेज पर कालिया ने पूछा। -"बस, पूरी ही समझ लो," एड वोला--"थोड़ा-सा काम रह गया है, दो-चार दिन में वह भी हो जाएगा। दरअसल, मैं फिलिस की ही राह देख रहा था।" --"तो क्या चला-चली की वेला आ पहुंची ?" कहते हुए कालिया ने मेरी ओर देखा और हंस पड़ा। -"और क्या ? फिलिस ने तो कल से पैकिंग भी शुरू कर दी है। हम लोग इसी सप्ताह निकल जाना चाहते हैं।' मेरे लिए यह बात समाचार न थी। एड का काम वास्तव में समाप्त हो चुका था। पहिले दिनों जिस गति से चल रहा था, वह काम न था जैसे थोड़ी-सी व्यस्तता के बहाने फिलिस की प्रतीक्षा की जा रही थी। फिलिस के आने के बाद से इसीलिए छोटे-मोटे सामानों की पंकिंग शुरू हो गई है। चंद दिनों के मेहमान और... 'सोचिए तो, हम लोग दो साल के बाद अपने देश वापस जा रहे है--दो साल !" फिलिस ने अत्यन्त भावुकता में भरकर कुछ आर्द्र से स्वर में कहा और दरवाजे के पार बाहर आकर देखने लगी-"इतने अरसे बाद अपने प्रियजनों से मिलने की कल्पना ही मुझे सिंहरा देती है । डंडी बूढ़े कमजोर हो चुके हैं, मैं उन्हें जल्द-से-जल्द देखना चाहती हूँ। अभी लखनऊ में मेरी छोटी बहन का खत आया था। लिखा है कि मुझे देखने के लिए यह मरी जा रही है। सच कहूं, खत में वहां के मौसम के बारे में पढ़कर मेरा मन ही यहां से उठ गया । यह सोचकर ही जी डूब-सा जाता है कि इन दिनों वहां मौसम कितना प्यारा हो गया होगा। आठों पहर वर्फ पड़ती होगी और जिधर निगाह फैलाइए रुई-जैसे सफेद-सफेद गाले चुपचाप उतरते और जमतं दिखाई देते होंगे.. ओह, यू कांट इमेजिन, हाउ आइम डायिंग टु सीदेम आल!" कालिया फिलिस के हिलते होठों की ओर निर्मिमेष ताक रहा था, धीरे - . - १२७ साल वनों का द्वीप से मुस्कराकर बोला-"लगता है, अमरीका पहुँचते ही यहाँ का सब-कुछ भूल जाने वाली है।" --"क्यों ? नहीं, नही । यह कहकर आप हम लोगों के साथ ज्यादती कर रहे हैं । आई लव दिस कंट्री, एंजवेल । यहाँ हमारे दो साल किस सूब- सूरती से गुजरे हैं, यह कह पाना आसान नहीं है। ओरछा को हम लोग सारी जिन्दगी नहीं भूल सकते। खासकर कुछ परिवार के मासा-जैसे लोग जो हमे खूब चाहते थे।" -"सच बात तो यह है," एड ने बीच मे कहा-"कि ऐसे अवसर पर अपनी अनुभूतियो को ठीक-ठीक रस सकना कोफी मुश्किल है । यहाँ से लौटने की बात सोचते ही अजीब कशमका का एहसास होता है। जहां से एक ओर घर लौटने की खुशी है वही दूसरी ओर इस बात का दुस भी कि अब यह मुल्क छूट जाएगा। कितनी अजीब बात है कि जिस गाँव के दुस- सुख में दो बरस तक हम लोग यकसा होकर रहे, वही अब कभी लौटकर नहीं आएंगे।" वह सब एड कह रहा था, लेकिन उन शब्दो की वेदना भरे मन में घिरी आ रही थी। भीतर कोई एक कोमल-सी अनभूति घायल सांप की तरह सिर स्टक रही थी-"अब कभी लौटकर नहीं आएंगे.. .""अब कभी..." क्षण-भर की चुप्पी के बाद कालिया ने पूछा-"आप लोग वम्बई से 'सेल' करेंगे?" ---"नही," एड ने फिलिस की ओर देखा-"हम लोगो ने करीव. करीव सारा उत्तरी भारत देख लिया है। पिछली गर्मी में मसूरी गए ये सब देहली-आगरा और उत्तर प्रदेश के कुछ भाग घूम आए। सोचते हैं, दक्षिण क्यो रह जाय। सो, हैदराबाद, मद्रास और सीलोन होते हुए नौटने का इरादा है।" -"दंट्स गुड," कालिया ने फिलिस को देखकर कहा-"ओ आपकी लखनऊ की ट्रिप कंसी रही ! मुझे तो यह सुनकर हो बड़ा आपच हुआ कि बस्तर के घने जगलो को छोड़कर बन्दरो के लिए आपको यह र जाना पड़ा और वह भी लखनऊ।" "कालिया," फिलिस के जवाब देने के पहिले मैंने कहा-"तुम वोल रहे हो । तुम्हें आश्चर्य नहीं दुख हुआ होगा।" -"क्यों?" - "तुम खुद भी लखनऊ के नहीं हो?" आदतन कालिया ठठाकर हंस पड़ा। एड के साथ-साथ अपनी गर्दन जरा-सी मीधी कर फिलिस ने एक खास अन्दाज़ से सिर को झटका दिया और बड़े लतीफ ढंग से हंस दी। फिलिस ने बताया कि रहती वैसे वह लखनऊ में थी, लेकिन वन्दरों को आब्जर्व करने के लिए उसे रोज काकोरी नामक एक गांव जाना पड़ता था। फिर विभिन्न प्रकार के बन्दरों के व्यव- हारों, उनकी विशेषताओं, गुणों आदि की बातें... खाने के बाद हम लोग धूप में बुसियां डालकर कर बैठे। मैंने और फिलिम ने सिगरेट सुलगाई। कालिया काफी वड़ा एक सिगार जलाकर पीने लगा और उस मिले-जुले धुएं की उमड़ती बदलियों के बीच अकेले एड ही ली होंठ बैठा रह गया। जैसे हम तीनों से विल्कुल ही असम्बद्ध और कटा आ हो। इमी वीच कालिया के जीप वाले साथियों का एक सम्वाद और माया जिसे 'चलो, आते हैं' कह कर टाल दिया गया। एड ने कालिया से कहा-"आप दो रोज बाद आए होते तो ज्यादा अच्छा होता।" "स्यों, दो दिनों बाद क्या है ?" "कोई खास बात तो नहीं," फिलिस बोली-"वह हम लोगों के विदा का दिन है। इधर ओरछा के अलावा आसपास के कई गांव वालों यह तय किया है कि उस दिन की सारी रात वे लोग मिल-जुलकर नाचें और कुछ न सही, अपने आप में यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शायद प्यार का अनोखा प्रतिदान है...।" -"वैसे तो तुम्हें आज भी रुकना चाहिए,” मैंने फिलिस का पूरा होते ही कहा-"गांव में एक जगह बड़ी दिलचस्प शादी है। .. - सालवनों का द्वीप १२६ कर कल चले जाना।" पर हम लोगों के सारे प्रस्ताव कालिया ने हंसकर उडा दिए। इस दलील के साथ कि वह सरकारी गुलाम है और उसकी जान को रोने के लिए पचीम-पचास लोग नारायणपुर में अलग बैठे हैं । फिर इसके अलावा मादी देखने की उसकी कोई रुचि भी नहीं । शादी की बात पर मुझे चमरू के व्याह की याद आती है। चमरू की पत्नी आडेर गांव की है। करमे गोत्र की और चमरू की मंदार । एक काकसार की रात वह अपनी मंदार को घर ले आया। उस रात घोटुल के लड़कों ने सुबह तक नृत्य किया और सुबह-सुबह 'एग दो सीना' की रस्म अदा की गई। एग दो सीना' वह रस्म है जिसके अनुसार दूल्हे तथा दुल्हन को घर की खपरैल के नीचे खड़ा कर दिया जाता है। लडकी के सिर पर वास की एक छल्लेनुमा टोपी पहिना दी जाती है और छत पर चढ़ कर लस्के उन लोगों पर तीन बार पानी उलीचता है-ऐसे कि पानी की मोटी धार सीधे उस उल्ले मे गिरे। दूसरे दिन चमरू के पिता ने सारे गांव वालो को सराव पिलाई और दो दिनो बाद लड़की अपने गांव लौट गई। इस बीच ब्याह की तैयारी खूब जोर-शोर से हुई। कुछ दिनो बाद जब 'मोलाहिना' (वधू की कीमत) को पूरी व्यवस्था हो गई तो नकद तीस रुपये, एक हांडी सराव और एक सूअर का चढ़ावा लेकर चमरू के पिता लड़की के गांव आए जिसके बिना वधू का आना असम्भव था। लडकी की विदाई का दृश्य कितना अनोखा लगता है। वधू सहित गांव की अन्य सभी कुंआरी युवतियों का एक जुलूस-सा निकलता है। वे लोग घर-घर रुकते हैं, प्रत्येक से गले मिलते हैं और काफी लम्बा विलाप चलता है। दोपहर मे बेहद शराब पी जाती है। गांव भर के खाने के लिए सारा सामान घोटुल में पहुंचा दिया जाता है जहाँ सब के सामूहिक भोजन की व्यवस्था होती है । इस बीच पेड की कई-कई डगालियों तोडकर युवतियां .
शाल वनों का-द्वीप खूब नाचती हैं । लड़की के नातेदार उन डगालियों को एक विशिष्ट कमरे के भीतर दाखिल करना चाहते हैं पर लड़के वाले रोक लगाते हैं । यह कशम- कश तब तक चलती है जब तक कि लड़के का पिता दस्तूर के मुताबिक युवतियों को पीने के लिए शराब नहीं दे देता । उसके बाद युवक-युवतियों की उन्मुक्त चुहलबाजियाँ, खींचतान, पकड़-धकड़ और रात देर तक वर के आँगन में नशे से भरपूर नाच" अचानक स्कूल के पास खड़ी जीप का हॉर्न जोर-जोर से बजने लगा और कालिया को चौंकना पड़ा। ----"अब तो उठे विना काम नहीं चलेगा," कालिया ने हँसकर कहा और सिगार फेंककर खड़ा हो गया। ओरछा और काकोरी की तस्वीरों का ढेर ज्यों का त्यों छोड़कर फिलिस के साथ हम लोग भी उठ आए । बाहर के गेट के पास कुछ औपचारिक तथा अनौपचारिक बातें हुईं। मैंने खूब कस कर कालिया से हाथ मिलाया और क्षण भर बाद हम दोनों के हाथ हवा में उठ गए" उस रात आखिर गाँव की शादी में हम लोग भी नहीं गए। कालिया के जाने तक सर्दियों का सूरज पश्चिम की ओर काफी ढलक गया था। धूप धीरे-धीरे करके इतनी पीली और हल्की हो गई थी कि स्पर्श भटकटैया-फूल की छुअन-जैसा लगता था । वही और दिनों जैसी जाड़े की उदास सन्ध्या, जिसमें घर लौटे परिन्दों का शोर घुल रहा था, चरोटे के पौधे अपने-अपने पत्ते मूंद कर ऊँघने लगे थे और रह-रहकर किसी गाय या बछड़े के रॅभाने की आवाज चारों ओर की पहाड़ियों से टकराकर गूंज जाती थी। जव कालिया की जीप निकल गई तो हम लोग फिर उन्हीं कुर्सियों पर मां बैठे । फिलिस ने बहुत थोड़ी देर हम लोगों का साथ दिया। कॉफी तैयार करने वह किचन की ओर चली गई । फिर भी हम लोग निरुद्देश्य ।
शाल वनों का द्वीप वहीं बैठे रहे, क्योकि एक बहाना कॉफी के इन्तजार का भी था। -"तुम काफी ऊब गए लगते हो," सहसा एड ने मुझसे कहा तो मैं बुरी तरह चौक कर उसे देखने लगा। -~"कौन?" मैं बोला-"नहीं, यह बात नही। दरअसल काम कुछ रह नहीं गया है इसलिए शायद वक्त नहीं कटता। फिर जैसे-जैसे जाने का दिन पास आता जाता है, प्रतीक्षा भी उतनी ही बड़ी और लम्बी लगती है--यह जानते हुए भी कि वास्तविकता यह नहीं है।" कुर्सी छोडकर एड धीरे-धीरे टहलने लगा। तबीयत अलील या सुस्त हो अथवा मन पर जरा भी उदासी का वज़न हो तो शाम दुश्मन लगती है। मुझे कालिया पर क्रोध आने लगा कि उसे यहां नही आना चाहिए था या आया भी था तो कम से कम मेरा आग्रह रखते हुए एक रात के लिए ठहर जाना चाहिए था । चंद और घटो में भला कौन-सा कहर टूट पडता? सामने शिरीप, सिवना, कनक-चम्पा, ओड़छा और जामुन के पेड निशब्द खड़े थे। लगता है, पेड के एक ही रंग के पत्तों में अक्सर कई- कई रंग छिपे होते हैं-~-सुबह-सादिक मे एक रंग झांकता है, दोपहर की आइना वाली धूप में दूसरा और सांझ के उदास उदास धुंधलके में तीसरा तया बिल्कुल अलग थोडी देर पहले दम तोड़ती धूप का जो फीका टुकड़ा, जामुन और अंजन की ऊपरी फुनगियों पर फैला हुआ था, सांझ उसे भी पहाड़ी पीछे डाल आई। पहाडियों की चोटियों पर जमा कोहरा माहिस्ते. आहिस्ते फैलकर अब गांव की ओर वढा आ रहा था। -"एड!" एकाएक फिलिस की भावाज से पहिले मैं चौंका । देखता हूँ कि इतनी देर की प्रतीक्षा के बाद भी कॉफी नहीं आयी और चेहरे पर मजब-सा भाव लिये फिलिस खाली हाथ खड़ी है। --"तुमने मुझे यह कैसे नही बताया कि लाली इतना बीमार है ?" एड के पास आते ही बिल्कुल कैफियत तलब करने के अंदाज में फिलिस ने पूछा।
१३२ शाल वनों का द्वीप "क्यों, क्या हो गया ?" --"अभी रेको मिलने आयी थी। बता रही थी कि..." "रेको कब आई ? हम लोग तो यहीं बैठे हैं।" -"पिछले दरवाजे से आई थी," फिलिस ने कहा-"सुनो, मैं उससे अभी मिलना चाहती हूँ। कौन जाने किस क्षण क्या हो जाय।" कई क्षणों तक एड ने कोई जवाब नहीं दिया। एकाध पल वह सोचता रहा फिर दोनों हाथ गोद में डालकर वह कुर्सी पर बैठ गया। वैसे कई पल युगों की तरह निकल गये, लेकिन हम तीनों में से कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला, केवल मैंने उस मौन को भंग करते हुए सिगरेट जलाई और चुपचाप पीने लगा। एड की विवशता मैं अच्छी तरह समझता हूँ। क्या हर व्यक्ति चाहने के बावजूद हर काम कर सकता है ? अक्सर कई काम निहायत छोटे होते हैं, लेकिन उसके साथ की असमर्थताएं इतनी बड़ी होती हैं कि लाँघी नहीं - जातीं। लाली का प्रसंग आने पर इसीलिए एड अपंग हो जाता है। -"चलो !" अंत में उसने हारे हुए स्वर में कहा और फिलिस के पीछे-पीछे हम लोग बाहर निकल आए। लाली का रोग आज का नहीं, काफी पुराना है। पहिले-पहल जव एड इस गांव में आया तो कइयों की बीमारियों के साथ लाली का राजरोग भी उसके निकट पहुँचा। छोटी-मोटी वीमारी वालों के साथ लाली भी किसी गोली या पुड़िया-उड़िया ने छुटकारा पाना चाहता था। एड तब क्या करता? न तो साफ-साफ इन्कार करना आसान बात थी और न उसे धोखे - में रखकर अपने हाथों मौत बोलना । कूर रसे तक न चाहते -- .
गाल वनों का दीर - " - - हर बार कहा," एड ने एक दिन गुमे घनाया- यहां पडे हिने कामानब सालहला करना है। सबसे नजदीक का पता नारायणपुर में है नेग्नि वहां जाना न जाना एक ही बात है। जगदलपुर से जाना चाहता था लेकिन वह तैयार ही नहीं हुआ। मेरे मामरे वह हूँ-हूं करना, जानी रक्षामन्दी भी जाहिर कर देता लेकिन कांग मातून होता कि वह बाहर जाने के नाम से चित्र उठता या। फिर जब मुझने वह छिपने ना तो मैंने उस बारे में कहना ही छोड़ दिया।" -"कया वह मरना ही चाहता है एड ने अनंतोगपूर्वक आने दोनो कंधे उचकाकर आहिस्ते से छोड दिय योर दोना- -"शायद ! तुम्हारे इन मवाल का जवाब हां भी हो सकता है और नहीं भी । का कोई अपनी मर्जी से कभी मरना चाहता है ? निश्चय ही लाली भी इसका अपवाद नहीं होगा। लेकिन वह जाने के लिए क्यों तैयार नहीं हुआ, इसका जवाब शायद मेरे पाम भी नहीं। शायद उसे पूरी तरह विश्वास नहीं कि वह मर जाएगा । संभव है, मन ही मन वह किसी करिन की आम लगाए बैठा हो । वात यह है कि आदमी मुंह से चाहे जितना रहे, अन्तिम क्षण तक भी यह नहीं सोचता कि वह मर जाएगा। कहीं-न-कहीं एक दबी हुई बास उमे दरावर दिलाए रखती है और जिस क्षण उसे पूरी तरह विश्वाम हो जाता है, वह बर भी नहीं पाता..." मचमुच क्या ऐमी ही निमो सास ने लाली के हृदय मे घडरन बना रखी है ? '."उम रात उमे देखते हुए मेरे मन में यही आया था। लाली की वह छोटी और झुकी-मो झोपडी अंधेरे में स्पाह और मसा- नक गुफा-मी लग रही थी।न भीतर, न बाहर, रोशनी की एक किरन भी कही नहीं थी। दहलीज के बहुत पास माने पर देखा कि मामने पहने वाले कमरे में भी वही अंधेरा पसरा पड़ा था, सिवाय एक दुझी-दुन्नी बोर्ड जिसका घुओ मारे कमरे में गुंगवा रहा था। -"रको!" फिलिस ने सहमती आवाज मे पुकार' .
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शाल वनो का दीप
रहे थे और मासा के पास घंटों बैठा लागी कामगार 4. Hifi here
भूपा तथा सज्जा तैयार करवा रहा था। उस लिगम भागापान 11
उत्साही युवक क्या इसी मृत-सी देह मे धड़क रहा है?
-"काकसार अब जल्दी ही आएगा, सामी!"
कहा। हालांकि मेरी निगाहों मे सूप पने पालकी निगा
द्वीप तैर आया था जिसके सिरहाने बैठकर उस दिन] fh
गगनव्यापी चीत्कार किया था। देखता है फिटी मात्र या है...
केवल इतना बडा, जितनी लाली की देह है। भागपाग. गाने
कुछ नहीं हैं, सिर्फ एक वह पटाई पडी है जिस पर साली mins
करता है। चारों दिशाओं में बंधी लाल सूराफी भविष्य Arthrsी
से फरफरा रही हैं।
और औरछा का वह अन्तिम दिन ।
हमे माडिन नदी को अलविदा कहना था। उfenguri
व्यस्तता शुरू हुई तो उसका अन्त उस गाय की गामा Tihar
नहीं आया। सारी जरूरी चीजों की पंकिग पहिलाला afrathi
भी ऐसे कई सामानों का ढेर था जिन्हें पाहों पर भी माना froin
था। दो दिनों तक गांव मर में उन छोटी गोटी पाilantar
जो एक लोगों के लिए बैंकार थी और vिine 1
सकते थे, इममें नी अधिक भाग्यशापी अधिकार मानाAPRILM
काम के कई मामानों के अलावा उगम
आया जिममें फस्ट-एर का माग गामान माना।
मंग ट्याल था कि वर, गय देग-गका मामा natarnar
उसे बेहद मुनी होगी पेक्नि मन निगमifrasfantrire
दिए यत्यन मायारा भाव माग HEERArte
जब एड ने महा-"मामाहम 21"
शाल वनों का द्वीप . का-त्यों पड़ा था। हवा के झोंके के कारण कभी वह धनुषाकार होकर फूल जाता और कभी सीखचों से चिपककर रह जाता। बाहर की घास पर ढेर शवनम पडी थीं! फिलिस की उस बात पर मैंने कुछ नहीं कहा और हम लोग वरामदे में निकल आए। थोड़ी ही देर में घर कितना उजाड़ दीखने लगा था ! खाली कमरे, सूनी दीवारें और रद्दी कागज़ तथा फलों के छिलके आदि से पटा हुआ फर्श । यह विश्वास करना ही कठिन था कि थोड़ी देर पहिले हम वहाँ रह रहे थे। फूलों के गमले और अन्य पौधे कल-जैसे ही आज खड़े थे लेकिन एक नजर से अधिक फिलिस ने उन्हें नहीं देखा। अभी कल शाम तक उसने सब की देखभाल की थी। अजीब बात है कि जब तक आदमी किसी चीज से जुड़ा रहता है अपने मोह को काट ही नहीं पाता, लेकिन जैसे ही उससे अलग होता है, सारा मोह अपने आप कट जाता है। बाहर एड ने हॉर्न बजाया। जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर फिलिस आँगन में निकल गई। जीप की ओर बढ़ने से पहिले एक बार आँखें घुमाकर उसने चारों ओर देखा जिसमें कोहरा तथा धुंधभरी पहाड़ियाँ थीं, सामने का परिचित जंगल था, वगल वाला बेर का पेड़ था और था गहरी नींद में सोया हुआ गाँव । बाहर घास पर ढेर शवनम पड़ी थी। "अलविदा ओरछा !" मैंने मन-ही-मन कहा और भारी मन से गाड़ी पर बैठ गया । फिलिस के अनुसार प्रियजन सामने हों तो विदा की घड़ी कठिन हो जाती है ! गाँव वालों के जागने के पहिले ही हम लोग दूर निकल जाना चाहते थे। सचमुच, उस क्षण कोई नहीं था, लेकिन जल के बुलबुले की तरह धुन्ध और कोहरे की परतों में ढंकी जो कई-कई आकृतियाँ उभरी आ रही थीं, उनसे आँखें चुराना आसान बात न थी। वहाँ पहिले दिन की कोसी थी, रेको का चिर-उदास तथा ढलका हुआ मुख था, लाली की चुभती हुई असहाय आँखें थीं, केये का जर्जर शरीर था, गूमा का वीरान चेहरा था, मासा की ममतापूर्ण मुस्कान थी और थे ऐसे अनगिनत नुकूश जो - शाल वनों का द्वीप साथ-साथ मिलकर सामने के सारे माहौल में छाए हुए थे। किसी ने कोई बात नहीं की। एड ने गाड़ी स्टार्ट कर दी और एक बार हम लोगों की ओर देखकर स्टीयरिंग सम्हाल ली। फिलिम ने अन्तिम बार बाहर झांककर धुन्ध में वे अपने कॉटेज की ओर देखा । मी ममय अचानक गाड़ी चल दी। अठारह महीनी की परिचित राह, जानी-पहिचानी पगडंद्रियों, उन पर एक मिरे में खड़ी ऊंची और सफेद कलगी वाली धाम तथा मैकड़ों वरम पुराने गालवनों की अगली कतार-मब तेजी में पीछे छूटने लगे। यहां तक कि उन वनों का शोर भी हम पीछे छोड़ आए। लेकिन अजीब बात है कि जो सालवन पीछे टूटे जा रहे थे, तोर की तरह वही सब सामने भी आ जा रहे थे!
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