Adarsh Library, Jaipur
Pashan Yogh
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पाषाण-युग
तीन लघु उपन्यास
ज्वालामुखी के गर्भ में
पाषाण-युग
निष्कासन
पाषाण-युग मालती जोशी
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वाई-पपा को-
लिखने-पढ़ने का यह
जिनसे विरासत में मि
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জামাতা
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ज्वालामुखी के गर्भ में
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‘ए साहब बहादुर ! लोग-बाग आपको देखने के लिए नही आये हैं।'
अपनी कलमों को तरतीब मे संवारते हुए हरि भैया दर्पण में मेरी
परछाई देखकर झेंप गये। फिर एकाएक बोल्ड बनने की कोशिश में मेरी
ओर पलटकर वोले, 'मैं जरा दूरदर्शिता से काम ले रहा था। हो सकता है,
उन लोगों के साथ एकाध वहन, एकाध सहेली हो।'
'जी नहीं, उन लोगो के साथ सिर्फ एक अदद मम्मी है।' मैंने मुंह
बिचकाकर कहा।
'तो क्या वे लोग आ गये?'
और क्या। गाडी समय से पहले चल रही है। हमारी तो एकदम
मुसीबत ही हो गयी।
"भैया तैयार हो गये"
'सो रहे हैं कुंभकर्ण महाराज । उन्ही को जगाने के लिए तो आयी है।
और हा, मौसी ने कहा है, 'मिलन स्वीट्स' के यहा ऑर्डर दे रखा है,
जल्दी से मिठाई ले आओ। और देखो, पीछे से आना।'
पलटकर मैं देहरी तक ही जा पायी थी कि उन्होंने पुकारा, 'ए मीता,
सुन इधर!
'क्या है बाबा ' हमे देर हो रही है।'
'लड़की कैसी है?'
'एकदम हेमा मालिनी है।' मैंने कहा और भाग आयी। हेमा मालिनी
ज्वालामुखी के गर्भ में
. के नाम से ही हरि भैया का कलेजा धक-धक होने लगता है। वड़े भैया आराम से सो रहे थे। चारखाने की लुंगी और वनियान पहने । सुबह ही नाइट पुलमन से पहुंचे थे। शेव भी नहीं बनाया था । खाना खाकर जो सोये थे, तो अब तक.. अभी जो लड़कीवाले आकर देख जाएं तो दुवारा इस घर का रुख न करें। मां और मौसी भी खूव हैं । कम-से-कम सुवह इन्हें संकेत तो दे देतीं। कोई घर से भाग तो नहीं जाते । उन्हें फंसाने में खुद फंस गयी हैं । अच्छा हुआ, ऐसा ही होना चाहिए। 'भैया, उठिए, मां बुला रही हैं।' मैंने उन्हें झकझोरते हुए कहा । उन्होंने तुरंत ही आंखें खोल दी। डॉक्टरी पढ़ने का यह एक अच्छा लाभ है । हरि भैया की तरह घंटों प्रभाती नहीं गानी पड़ती। 'क्या है ? क्यों परेशान कर रही है ?' उन्होंने अलसाये स्वर में पूछा। 'मां बुला रही हैं। 'कह दे, आ रहा हूं।' उन्होंने अंगड़ाई लेकर उठते हुए कहा। 'जल्दी आना.. और सुनिए, जरा ढंग से तैयार होकर आइएगा।' मैंने रहस्यमय ढंग से कहा। 'तैयार होकर आऊं? क्यों ?' 'नीचे लोग-बाग आए हैं।' 'कौन लोग?' 'लड़कीवाले। पिछली बार आप आए थे, तो आपको फोटो दिखायी थी न मां ने । उज्जैनवाली ? इतनी सुंदर लड़की है। मां तो एकदम खुश हो गयी हैं। कह रही हैं- अगर दिन अच्छा होगा, तो आज ही शगुन भी कर . । । मैं उत्साह में कहे जा रही थी, पर देखा-सामनेवाले पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं हो रही है । कंघी करते-करते उनका हाथ एकदम रुक गया था। माथे पर गहरी लकीरें खिंच आयी थीं । मैं चुप हो गयी। 'लड़की के साथ कौन-कौन हैं ?' उन्होंने धीरे से पूछा। 'मां , पिताजी हैं, भाई हैं। पूरा कवीलाहै।' भाई को जरा ऊपर भेज दे मेरे पास ।' ४ : पापाण-युग मैं असमंजस में वही खड़ी रही, तो खोजकर बोले, 'सुनाई नही दिया क्या?' 'जी, अच्छा।' मैंने मुंह फुलाकर कहा और जीना उतरने लगी। सारा उत्साह फीका पड़ गया था। हॉल में खनकती हुई हंसी के साथ संभाषण पूरे यौवन पर था। मौसी एक-दो बार उज्जन हो आयी थी। लड़की के भाई, पिता भी पर देखने और मां से मिलने के बहाने एक-दो बार आ चुके थे। इसीलिए अपरिचय की कोई दीवार बीच में नहीं थी। मैं एकदम सबके बीच मे जाकर खडी हो गयी । लड़की के भाई की तरफ मुखातिब होकर बच्चों की तरफठुनकती आवाज में कहा, 'आपको भैया बुला रहे है । कपर कमरे मे।' क्षणभर को बातचीत जैसे जम गयी। वे पिता की मौन सम्मति पाकर उठे और मैं गाइड की तरह साथ हो ली। ऊपर जाकर देखा, भैया पतलून और कमीज पहन चुके है । मुह पर पानी के छोटे देकर नीद भगाने का भी प्रयास किया गया है। विखरे बाल भी भव तरतीब से संवारे हुए लग रहे थे। दोनो ने अपना-अपना परिचय देते हुए गर्म-जोशी से हाथ मिलाया। भैया ज्यादा उत्साहित नहीं लगे। शायद सफर की थकान और नीद का बोझिलपन अब भी उन्हें छोडने को तैयार नहीं था। 'तू जा, मीता! मैं मि० पाठक को नीचे से आऊंगा ।' भया ने कहा। यह आदेश था, नरम स्वर में कहे जाने के बावजूद मैं उसे टाल नहीं सकी। मि. पाठक ज्यादा देर ऊपर नहीं रुके। हॉल में लौटे, तो उनका चेहरा भारी था। सबकी याखें उन पर टिक गयी। 'क्या बात है, ललित ?' पिता ने व्यग्रता से पूछा । मि० पाठक ने एक बार अपनी और एक बार मेरी मा की ओर देखा। फिर सख्ती से होंठ भीचते हुए बोले, 'डॉ. मनीप चाहते हैं कि उनकी मां के सामने यह रहस्य न सोला जाए, मगर मेरी बला से ! पापा, इन महाशय का कहना है कि इनकी समाई हो चुकी है।' ज्वालामुखी के गर्भ में या?' कितने कंठों ने एक साथ प्रश्न किया। मनीष ?' मां किस बुरी तरह से चीखीं। क्या है, मां?' भैया ने कमरे में आते हुए शांत स्वर में पूछा। ये...ये ललित भाई क्या कह रहे हैं ?' 'ठीक कह रहे हैं। 'किस लड़की से शादी कर रहा है तू ?' 'यह सब चर्चा वाद में भी हो सकती है, मां !'भैया ने उसी शांत स्वर कहा और फिर मेहमानों से माफी मांगते हुए कहा, 'मुझे बहुत-बहुत सोस है, इन लोगों ने अगर जरा भी संकेत दिया होता तो शायद...' 'ओह, जरा इन्हें संभालिए।' कहते हुए वयोवृद्ध मेहमान एकदम उठ ड़े हुए थे। हम सबने चकित होकर देखा, मां बेहोश होकर कुर्सी पर ही ढ़क गयी थीं। मैं तो चीखकर उनसे लिपट जाने को हुई, पर भैया ने सख्ती से मुझे दूर खड़ा कर दिया। उस समय उनका चेहरा ऐसा लग रहा था, जैसे पत्थर में तराशा गया हो। अपनी मज़बूत बांहों में मां का दुर्बल शरीर समटते हुए उन्होंने भीतर जाते हुए इतना ही कहा, 'मौसी ! मेरे साथ आना ज़रा।' पीछे-पीछे जाने की इच्छा को बहुत मुश्किल से रोक पायी मैं। वहीं सोफे पर बैठकर दोनों हाथों में मुंह छिपाकर सिसकने लगी। मिसेज़ पाठक मेरा सिर सहलाती रहीं। अजीब असमंजस की स्थिति थी। एकाएक ललित ने कहा, 'हम अब चलें, पापा!' 'ना वेटे, ऐसे अच्छा नहीं लगता। बहनजी की हालत ज़रा ठीक होने...... 'तो आप रुकिए ! मैं जा रहा हूं।' 'ठहरो, दादा ! मैं भी आपके साथ चलूंगी।' उस दर्द भरे स्वर से चौंककर मैंने सिर उठाया। कमरे में उस सजी- धजी मूर्ति का अस्तित्व ही मैं भूल गयी थी। लेकिन क्या यह वही चेहर था, जो कुछ समय पहले तक शर्मीली मुसकान से दमक रहा था ! भैय का चेहरा अगर काले संगमरमर में बदल गया था, तो यह तो पूरी-की-पू प्रतिमा वर्फ़ हो गयी थी। . ६ : पापाण-युग "अरे, ये लोग जा रहे हैं । अंदर चाय लग गयी है न!' खुशबू का एक भभका याया और लजीली मुसकराहट लिये हरि भैया कमरे में दाखिल हुए । एक क्षण को अनचाहे सबकी निगाहें उन पर टिक गयी। गोरे-चिट्टे हरि भैया नेवी ब्लू पैट और क्रीम कलर की मनीला पहने सचमुच बड़े प्यारे लग रहे थे। उन्होंने अपनी सजावट पर काफी समय खर्च किया था। टाई पिन से लेकर जूतों तक सब कुछ लकदक कर रहा था। सवको अपनी ओर घूरते देखा तो वे कुछ सचेत हो गये। 'और लोग कहा है ? चाय बिलकुल तैयार है।' बेचारे हरि भैया ! इतना तरस आया उन पर । दीन-दुनिया से बेखबर वे चाय की मेज़ ही सजाते रह गये थे। 'आपकी तारीफ !' ललित के पिताजी ने पूछा। 'ये हरि भैया हैं ।" मैं बच्चों की तरह इतना ही कह पायी। 'पढते हैं ?' 'जी हा । बी० कॉम० फाइनल में हूं।' उन्होने लजीले अंदाज में कहा। ललित और सुलक्षणा इस वीच कव चले गये, पता ही नहीं चला। कुछ देर बाद तौलिये से माथे का पसीना पोछते हुए भैया वाहर आये। 'अव वे कैसी हैं ?' मि० पाठक ने व्यग्रता के साथ पूछा। 'अब अच्छी हैं। येक गाँड ।' 'क्या ऐसा अकसर होता है ?' मिसेज पाठक ने पूछा। 'जी, पहले अकसर होता था। दरअसल मेरे पिताजी और मुझसे छोटी एक बहन, एक साथ एक एक्सीडेंट में चल बसे थे । उम हादसे ने मा का मन बहुत तोड दिया है। किसी भी आघात को मह नही पाती। मुझे अफसोस है, सब मेरी वजह से हुआ ।' 'कोई बात नही।' मि० पाठक ने उनकी पोट को थपथपाते हुए कहा। 'आप लोगों को मेरी वजह से इतनी परेशानी उठानी पटी, मैं अपनी शमिदगी का बयान नहीं कर सकता।' भैया ने भर्राये कंठ से कहा। 'नहीं, इममे तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।' मि० पाठक ने सात्वना के स्वर मे कहा । मुझे वे पति-पत्नी सज्जनता की प्रतिमूर्ति लगे। ज्वालामुखी के गर्भ आत्मग्लानि से उवरकर अव भैया ने सिर ऊपर उठाया, 'अरे हरि, तुम कहां थे अभी तक ? जज साहब, यह मेरा छोटा भाई हरीश है।' 'हां, अभी नमिताजी ने परिचय कराया था।' 'भैया, चाय यहीं मंगायी जाए, या...'हरि भैया कहते-कहते रुक गये। संग का गांभीर्य अव भी उनकी समझ में नहीं आया था । और सबके सामने उन्हें समझाया भी नहीं जा सकता था। पर शायद वातावरण के तनाव को वे कुछ-कुछ अनुभव कर रहे थे । 'एक-एक कप चाय भी हम आपको न पिला सके, तो हमें बहुत दुःख होगा । मुझे उम्मीद है, आप ना नहीं करेंगे।' भैया इतने विनम्र हो सकते हैं, यह मेरी कल्पना से भी परे था। शायद वे अब भी अपने आपको क्षमा नहीं कर पा रहे थे। उनके अनुरोध को पाठक दंपति टाल नहीं सके। मेज दुल्हन की तरह सजी हुई थी। सवने निःशब्द चाय के बूंट भरे और उठ खड़े हुए । भैया, मैं और हरि भैया गाड़ी तक उन लोगों को छोड़ने गये। मौसी मां की सुश्रूषा का बहाना लिये कमरे में ही बैठी रहीं। गहमागहमी में वीता हुआ दिन शाम को. यूं चुपचाप उदास होकर लौट गया था। । 'मां, मुझे कुछ कहना है।' मां के तलुओं में घी की मालिश करते हुए मैंने सिर उठाकर देखा, भैया छाती पर दोनों हाथ बांधे विवेकानंद की मुद्रा में खड़े थे। मां ने कुछ जवाब नहीं दिया और मुंह फेरकर लेट रहीं। इतना रोष हो आया मां पर। पिछले दो दिनों से उन्होंने भैया से एक बार भी बात नहीं की थी। वेचारे चुपचाप उनकी सुश्रूपा करते रहे थे। इन दिनों उनका चेहरा इतना करुण लगता था कि दया हो आती थी। 'मैं सोचता हूं मां, अब तुम्हारी तबीयत इस लायक हो गयी है कि मेरी बात सुन सको, सह सको। वैसे भी मेरे पास अव समय नहीं है । सुबह की बस से मुझे चले जाना है।' भैया ने कहा और दरवाजा बंद करके कुर्सी पर बैठ गये । कुछ क्षण ८ : पाषाण-युग तक वे क्लाई-घड़ी को गोल-गोल घुमाते रहे, शायद अपनी बात ठीक से कह पाने का साहस मंजो रहे थे। पर मां ने उन्हें मौका ही नहीं दिया। वोली, 'मीता, दरवाजा खोल दे, मेरा दम घुट रहा है।' मैं उठने लगी, तो भंया ने हाथ पकड कर मुझे रोक दिया, 'दरवाजा मैने जान-बूझकर बंद किया है, मीता। इस घर में प्रायवेसी नाम की नहीं थी। आशा रह गयी है । दो दिन से छटपटा रहा हू, पर इतने सारे लोगों के बीच मैं अपने मन की बात नहीं कह सकता।' 'उम दिन कह तो चुका था मन की। क्या अब भी कोई कसर बाकी है ?' मां एकदम उठ बैठी। उत्तेजना से उनको माथे की नसें फड़कने लगी थी। 'उस दिन कहाँ कुछ कह पाया था ! तुम सुनने की स्थिति में ही नहीं थीं। आशा थी कि नुम स्वय पूछोगी कि मैं यू एकाएक कैसे चला आया हूं। सोच रहा था कि शादी की बात सुनकर तुम्हें कुछ तो उत्सुकता होगी। पर लगता है, तुम्हे अपने बच्चों में उतनी भी दिलचस्पी नहीं रह गयी है ।' 'दिलचस्पी नहीं होनी, तो तेरे लिए दुनिया-जहान की लड़किया देखती फिरती मैं ? चार भले आदमियो के मामने मेरा अच्छा तमाशा वनाया तूने।' और मा ऐसे कांपने लगी, जैसे जूडी चढ आयी हो । "मैया, प्लीज ! अभी ये मब बातें रहने दो। मा की हालत देख रहे हो न !' 'देख रहा हूं, बरमो से देख रहा हू । अपनी बडी-से-बडी समस्या को मंझधार में छोडकर, पहले दोडकर इन्ही को देखना पडा है, इन्ही को मंभालना पड़ा है। मारी जिंदगी यही करता आ रहा है। तभी तो पचीस साल की उम्र में एकदम बुढा गया है।' मां का हिलता हुआ शरीर एकदम काठ की तरह स्थिर और निस्पंद हो गया था। वे फटी-फटी याखो से भैया को देखने लगी थी। पर वे एक क्षण को भी वहा नही रुके। मां देर रात तक तकिये मे मुह छिपाये सुदकती रही । मौसी ने तरह- तरह से मुझसे तर्क-वितर्क किये, पर मैंने कुछ नहीं बताया । और बताने के ज्वालामुखी के गर्भ में : ।
- - - लिए था भी क्या ! सुबह भैया वस के लिए घर से निकले, उस समय मां सो रही थीं। काफ़ी रात गये वे सो पायी थीं, इसी से उन्हें जगाया नहीं गया था। जाते हुए कमरे में चुपचाप बुलाकर उन्होंने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया था । 'रात देर तक सो नहीं सका था। काफी बातें इकट्ठा हो गयी थीं मन में । तू पढ़कर फाड़ देना, शायद तेरे संदूक में भी यह सुरक्षित न रहे और यह है तेरी भाभी की फोटो।' मैंने झपटकर फोटो उठा ली थी। एक भरा-भरा चेहरा और दो हंसती हुई आंखें ! मौसी की व्यूटी-परेड में खड़ी होती, तो शायद फेल हो जातीं, पर कुल मिलाकर मुझे अच्छी लगीं। 'कितनी स्वीट हैं न! क्या नाम है, भैया?' 'बेला।' 'ओ लवली!' 'ये लोग पंजाबी क्रिश्चियन्स हैं।' भैया की इस घोपणा से मेरी खुशी वहीं जम गयी। 'क्यों? बुरा लगा सुनकर ?' 'अपने लिए नहीं। मैं मां के लिए सोच रही थी।' 'मुझे मालूम था, मां नाराज होंगी। मैं अपने को उस विस्फोट के लिए तैयार करके आया था। लेकिन बिना कुछ जाने उन्होंने जो उपेक्षा बरती है, वह बहुत तकलीफदेह है।' 'भैया, रिक्शा ले आया हूं। चल रहे हैं न ?' हरि भैया कमरे में आये और भैया ने चेहरे पर फैलती उदासी की चादर को एकदम समेट लिया। दोनों भाई एक-दूसरे के कंधों पर झूलते हुए स्कूटर की ओर चले गये। मैं डबडबायी आंखों से उस ओर देखती रही। भैया पिछले छह सालों से बाहर थे । मेडिकल उन्होंने ग्वालियर से ही किया था और वहीं अब हाउस जॉब भी कर रहे थे। पर कभी उनके जाने का इतना दुःख नहीं हुआ। इस बार पता नहीं क्यों ऐसे लगा, जैसे वे हमेशा के लिए जा रहे हों। . । १० : पापाण-युग' 1 । मौसी की पनी दृष्टि सारे घर को नापे रहती है । भैया के जाते ही बोली, "आज तो बड़ी प्राइवेट बातें हो रही थी। क्या कह रहा था मनीप?' भाभी की फोटो दिखा रहे थे। मैंने तुनककर कहा। भैया ठीक ही कह रहे थे, इस घर मे जरा प्रायवेसी नहीं है। 'कहां है फोटो, दिखाना जरा? इतना घृन्ना लडका है ! दो दिनों में मैंने वीस बार पूछा होगा, पर मुझे जरा सुराग नहीं दिया उसने।' 'मेरे कमरे में आकर देख लेना फोटो।' मैंने कहा और अपने कमरे में चली आयी । मेज पर शिव-पार्वती का एक फोटो था। वह चंदन के फ्रेम मे मेरे लिए सुपर्णा मैसूर से लायी थी। मैंने उसी मे वह फोटो सजा दिया लडकी बहुत सुन्दर नहीं थी, उसके किश्चियन होने की बात सुनकर दुःख भी हुआ था, पर मन-ही-मन एक निर्णय ले लिया था कि मुझे भैया का साथ देना है, उनका बचाव करना है। इसी निश्चय के बल पर मैं घर में उठते तूफान का सामना कर सकी, सहेलियों के बीच गर्वोन्नत होकर इस अंतर्जातीय विवाह की सूचना दे सकी। मां की प्रतिक्रिया तो अपेक्षित ही थी। वे दिनभर वेहोश होती रही, लेकिन मौसी बहुत ही जल्दी समल गयी और मा को सात्वना भी देने लगी। उनकी आलोचना का तीखापन परिचित था, पर उनकी यह समझ- दारी...लगा, जैसे भीतर ही भीतर वे भैया के इस विवाह से प्रसन्न हैं । कौन जाने ? दिनभर उधेड़बुन मे पत्र को हाथ भी नहीं लगा पायी। मौसी के देख लेने का अंदेशा बरावर बना रहना। रात को मा के सो जाने के बाद ही खोल सकी। पर क्या था, यादों काएक लम्वा सिलसिला। नैरोबी के सुहावने दिनो को ढेरों स्मृतियां थी । नैरोबी जहा पापा थे, सुनीता दीदी थी, सुख था, मंपन्नता थी, ठहाके थे, किलकारियां थी । यहा आने के बाद वे सारी स्मृतियां मुहरवन्द करके रख दी गयी थो; क्योकि उनसे मा को तकलीफ होती थी। पता नही, किस संजीवनी से भैया ने उन्हे अपने मन के भीतर यो तरो-ताजा रखा हुआ था। मैं तो सब भूलभाल गयी थी । दम साल पुरानी वातें थी । एक सात-आठ साल की लड़की याद भी क्या रख 1 ज्वालामुखी के गर्भरे पाती। - भैया ने लिखा था-~-मां का दुःख बहुत बड़ा था, मैं मानता हूं। पर अपने शोक से उवरकर उन्होंने क्षणभर को तो हम वच्चों का खयाल किया होता। जिन्हें काल यूं निर्ममता से छीन ले गया था, वे क्या सिर्फ उनके पति थे, हमारे पिता नहीं थे ? सुनीता क्या हमारी कोई नहीं थी? क्या हमारी उम्र मृत्यु को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करने की थी? चाहिए तो था कि मां अपनी ममता का आंचल कुछ और फैलाकर पापा का भी स्थान ले लेतीं, पर वे तो मां भी नहीं रह पायीं। इस पराये देश में, पराये घर में, पराये हाथों में हमें छोड़कर निश्चिंत हो गयीं। 'पराया' शब्द शायद तुम्हें ठीक न लगे। मीता, मौसी लाख उनकी बहन थीं, पर हम उन्हें कितना जानते थे ! हर बार, हर काम के लिए उनका मुंह जोहना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा । फीस के लिए, कपड़ों के लिए, कितावों के लिए उनके आगे हाथ फैलाते हुए मेरी आत्मा को कष्ट होता था। उन्होंने कभी किसी चीज़ के के लिए मना नहीं किया, क्योंकि जो पैसा खर्च हो रहा था, वह हमारा था; फिर भी मेरा संकोच कभी नहीं टूटा। मां किसी चीज़ के लिए झिडक भी देतीं, तो मुझे इतना दुःख नहीं होता। इस सिर-दर्द से बचने के लिए ही मैंने ग्वालियर में दाखिला लिया था । रोज़-रोज़ अपने स्वाभिमान की हत्या मैं नहीं कर पाता था। मौसी ने हम लोगों के लिए बहुत किया है। मेरी परीक्षा के दिनों में वे रात-रातभर मेरे लिए चाय बनाती रही हैं। सुबह-सबेरे अलार्म लगा- कर मुझे जगाती रही हैं । मेरे लिए उन्होंने स्वेटर बुने हैं, पिकनिक के ‘लिए खाना बनाकर दिया है, मेरी बीमारी में दिन-रात मेरी सेवा की है। पर उनकी इस ममता के भीतर ईर्ष्या की एक हल्की-सी पर्त है। उसे मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता । कई वार इच्छा होती है कि अपनी सारी अच्छाइयां किसी जादू के जोर से हरि को दे डालूं। तभी शायद इस संत्रास से मुक्ति मिले। इसके बाद भैया ने वेला से अपने परिचय की कहानी लिखी और अंत में लिखा था-वह घर नहीं है, ज्वालामुखी है। किसी दिन तुम भी । १२ : पापाण-युग उस गर्भगृह के बाहर आने के लिए छटपटाओगी, मीता। तब मुझे खबर करना । जहा भी रहंगा, दोहा आऊंगा। पत्र का कई-कई वार पारायण करके मैंने उसे अपने ट्रंक मे छिपा- कर रख दिया। सोच लिया था कि किसी दिन मां को जरूर दिपाऊंगी। भैया के मन की अंधेरी गुफाओ मे एक बार उन्हें फेरी लगानी ही होगी, नहीं तो मा किसलिए बनी थी भैया के पत्र का अंतिम वाक्य मैंने मन के कागज पर अंकित कर लिया था। मेरे लिए वह दीप-स्तंभ हो गया था। मैं और हरि भया निश्चय कर चुके थे कि घरवालो विरोध को ताक पर रखकर भैया के विवाह में अवश्य भाग लेंगे। पर उन्होंने हमारे इस निश्चय पर पानी फेर दिया। इस बार भी उन्होने विवेक का पल्ला नहीं छोड़ा था। शादी को सूचना तब मिली, जब बाठ दिन ऊपर हो चुके थे। सूचना क्या थी, अच्छा-खासा पार्सल था। मेरे और हरि भैया के लिए दो कलाई घडियां थी--एच०एम०टी० की, जिनके पीछे लिखा था-- 'माभी की और से। और साथ दर्जन भर लड़कियों की तसवीरें थी, जो समय-समय पर यहां मे भेजी गयी थी। भैया की सस्त हिदायत थी कि वे सारी तसवीरें सही पतों पर वापस भेज दी जाए। मा और मौसी को अब इन कामों में कोई रस नहीं रह गया था इस- लिए यह दिलचस्प काम हमी लोगों के सिर पर आ पडा। एक सुवह चाय की मेज पर ही हमने इस वापसी-अभियान का शुभारभ कर दिया। डायनिंग टेबल का काला टॉन किमी अल्वम की तरह लग रहा था। हरि भैया विखरे हुए फोटो में से एक-एक चुनकर नाम और पते मिलाते जाते, में लिफाफो पर बड़े-बड़े अक्षरों मे उन्हें लिखती जा रही थी। आखिरी लिफाफे को सीलबद करते हुए हरि भैया बोले, 'और दो. एक साल बाद हमारी मीता की फोटो भी इसी तरह जगह-जगह भेजी जायेगी।' और इमी तरह लौटायी जायेगी। मैंने उनका वाक्य पूरा करते हुए ज्वालामुखी के गर्भ मे : १३ । कहा। 'लौटा कर तो देखे कोई, तबीयत दुरुस्त कर दूंगा!' और उन्होंने एक काल्पनिक मुक्का हवा में उछाल दिया। 'अरे वाह, कोई जबरदस्ती है। मान लो, तुम्हारे पास कोई दस-वीस फोटो आ गये, तो क्या सबसे शादी करोगे ?' 'शादी तो खैर एक से ही करूंगा, पर तसवीरें सब संभालकर रग्बूंगा । बीवी ने जरा अकड़ दिखायी कि अपना अल्बम दिखाकर कहूंगा कि देवी देखो, श्रीमान हरिप्रसन्न शर्मा की अर्धांगिनी बनने के लिए कितनी बालिकाएं लालायित थीं।' 'तव तो और भी उसके पांव जमीन पर नहीं पड़ेंगे कि इतनी सारी लड़कियों में से उसे चुना गया है।' 'चाई री ! क्यों मन के लड्डू फोड़ रही हो। सावुत हाथ-पांव की एक ही मिल जाए, तो भाग समझना । दस-बीस तो क्या आयेंगी अपने दरवज्जे । 'मौसी की बात से हमारी हंसी मुंह में ही जम गयी । मां भी नाराज हो गयीं। बोलीं, 'छोटी, तु जब करेगी, उल्टी वात करेगी। कोई मेरा लाल लंगड़ा-लूला है, जो लड़की नहीं मिलेगी ?' और उन्होंने हरि भैया के गोरे गुवरले चेहरे की बलाएं ले ली। 'लंगड़े-लूले की क्या शादी नहीं होती, जिज्जी । शादी होना और बात है, और अच्छे खानदान से रिश्ता होना और बात । लड़कीवाले घर देखते हैं, घराना देखते हैं। कोई हमारे मां-बाप की तरह लड़की को धूरे पर नहीं फेंक देता।' 'त्वमेव केवलं हर्तासि, त्वमेव केवलं धर्तासि, त्वं सर्व खविदम ब्रह्मासि ।' पूजाघर से मौसाजी का गुरु-गंभीर स्वर कुछ ऊंचा ही आने . लगा था। गणपति अथर्व शीर्प का ओट लेकर वे मौसी के वाग्वाणों से वचना चाहते थे। उनकी यह जानी-पहचानी आदत थी। पर कितना वच पाते थे, वे ही जानें! टेबल पर सारा सामान यूं ही विखरा छोड़कर हरि भैया उठकर चल दिये थे। मां कह रही थीं, 'पैसे से ही क्या सब सुख मिल जाते हैं। छोटी, मुझे . - १४ : पाषाण-युग
देख, कितना दुःप छाती में छिपाये बैठी हूँ। पति तो भाग्य गे छीन लिया,
धेटे को पता नहीं कौन कहां मी लड़की मोह पर से गयी। भय हरा पर
को, घराने को ओढू कि बिछाऊ! मेरे साप तो तेरा राय-युछ है । उगकी
बदौलत तू सिर उठाकर तो घस गकती है, फिर मयों उरा देवसा भादमी
की आत्मा जलाती है ?'
'मेरी आत्मा जलेगी, तो मुंह पर यात आयेगी ही। राजकुमार
मेरा लड़का किमी लायक नहीं यन सका। लोग-बाग यरा टारगी
आगे घंटी भर बजाना जानते हैं।'
इतनी ग्रीग! इतनी कय हो आयी मुभं । पता नहीं, इन दोनों यदनों
को अपने दुमी में इतना लगाव क्यो है ? खुद भी रोयेंगी, गाथबात की
जिंदगी भी जहर करके रख देंगी।
पूजाघर मे अब विष्णुमहननाम गुनाई दे रहा था।
"हरि भया, चलिए, 'घर-घर की कहानी' दंग आएं । वीणा माह रही,
खूब अच्छी पिक्चर है।' मैंने यापी की तरह उनके कमरे में प्रया करते
हुए कहा।
'अपने घर की कहानी गे नो क्या अच्छी होगी ।' पुग्मक if
यांगड़ाये ही विपण म्बर में बोले ।
बेकार की फिलॉमी नो मन साड़िए, चलिए न ! मोटगए
कविता के यहां होते यायेंगे । मृने अपनी कापियांगनी है।'
मेरी महलियों के नाम में जिन वाया उनका पहा धपाही
महत बना रहा । वे पूर्वदन् पृतक के पन्ने पलटन गई।
'चलिए भी हमारे माय कोई नहीं है, धी गरी सुशामद कर
रहे हैं । यार माहब, मादा ही कार ने आई हैं। 'और मैं मृतक
छीनकर परे दी।
न कोई नुहाग दासगाई है. राह मा मुम्हार माथिपटना
चिकंगााजीर, मेरे कमरे मे दमाहा रारा।'
दयां! पहचहा! यह वादार 'हिटदी सावित्री मंग
ठन-ददन लगा, पर दिम्य और मग भाडामोटी ग्राठी
याम
। से उन्हें निहारती रह गयी। पांव मन-मन भर के होकर वहीं जम गये। किसी तरह अपन को ठेलकर मैं दरवाजे तक ले तो गयी, पर उतनी देर बाद उस जाने में कोई प्रतिष्ठा नहीं रह गयी थी 'सॉरी, मीता!' मैं अनचाहे ही ठिठककर रह गयी। 'मुझे बहुत अफसोस है, मीता। इस तरह तुम्हें जलील करने का मुझे कोई हक नहीं था। इस कमरे पर मेरा अधिकार ही क्या है । यह कमरा, यह घर.. ये सब तुम्हारा ही तो है। हम तो केवल.. क्या हैं हम लोग, यही समझ नहीं आता । नौकरों की भी अपनी कुछ औकात होती है। लेकिन हम तो सिर्फ .. पैरासाइट्स हैं।' सॉरी होना क्या इसे ही कहते हैं ? उसके बाद वहां रुकना संभव ही नहीं था। सीधे अपने कमरे में आ- कर विस्तर में पड़ रही। दुःख, अपमान, रोप, ममता-~-सब-का-सव सिमट आया था मन में। - तीन-चार साल पुराना एक प्रसंग याद आ गया। हरि भैया का हायर सेकंडरी का परिणाम आया था। वेचारे जनता क्लास में पास हुए थे। मां कह-कहकर हार गयीं, पर मौसी ने सवा रुपये के लड्डू भी नहीं बांटे। दो साल पहले ही मनीष भैया के पास होने पर मिठाई, पार्टी और बधाई-पत्रों की कितनी धूमधाम लगी रही थी। भैया मेरिट लिस्ट में चौथे नंबर पर आये थे। उसके मुकाबले में हरि भैया का परिणाम सचमुच फीका था, पर मौसी के वाग्वाणों ने तो उसे करुण बना दिया था । आखिर मां ने ही डांटा था, “चुप कर, छोटी। तेरी बातों से तंग आकर लड़का कहीं नदी-कुआं कर वैठेगा, तो जिंदगी भर को रोती रहेगी। तव कहीं मौसी का अनवरत भाषण समाप्त हुआ था। शाम की आरती के बाद मौसाजी ने मुझे पूजाघर में बुलाकर मेरे हाथ पर दो पेड़े रखे थे, 'ये मेरे बेटे के पास होने की मिठाई है; विटिया। गरीव आदमी हूं न! ज्यादा जश्न तो नहीं मना सकता।'' सातवी-आठवीं क्लास की वेवकूफ-सी लड़की थी मैं। उनकी बात का १६ : पापाण-युग मतलब नहीं समझ सकी। पर उनकी आखों की पीडा, उनके स्वर का वात्सल्य मुझसे छिपा नहीं रहा । वह थोड़ी-मी मिठाई लिये मैं प्रतीक्षा में बैठी रही। बहुत गत गये लोटे थे हरि भया । आकर छत पर अपने बिस्तर पर चुपचाप लेट गये थे। मैंने देवे पांव जाकर पेडा उनके मुह मे डूंस दिया था। 'क्या है यह ?" वे हइवड़ाकर उठ बैठे थे। 'मिठाई है।' 'किस बात की मिठाई ?' उन्होने भरी हुई आवाज़ में पूछा। 'एक हमारे हरि भैया हैं, उनके पास होने की।' मैंने गरारत से आखें नचाकर यहा। कुछ क्षण वे चुप रहे, फिर वोले, 'किसने बाटी है।' 'मौसी ने।' 'मेरे सिर पर हाथ रखकर कहो।' कैसे कहती! चुप होकर रह गयी। 'बाबूजी ने अपने ठाकुरजी को भोग लगाया होगा । ठीक है न ! अपने नालायक बेटे के पास होने की खुशी सिर्फ वे ही मना सकते हैं।' और फिर एकाएक उनका चेहरा तमतमा उठा था, "क्यों आये थे तुम लोग यहा ! क्या उतने बड़े अफ्रीका मे तुम लोगों के लिए जगह नही यी! आते ही तुम लोगों ने मेरा घर, मेरी मा, मेरा मुख-मव-कुछ छीन लिया. छोटा-सा घर था हमारा । पर उस घर मे मैं राजकुमारो की तरह पलता था। उस समय मेरी हर इच्छा पर अम्मा विछ-बिछ जाती थी। उम समय में उनको आखों का तारा हुआ करता था और अब, अब दुनिया में बस एक ही नाम रह गया है, मनीप-मनीप-मनीप।' 1 और पलंग की पाटी पर सिर रखकर वे सिसक-सिसककर रो पडे छोटी थी में उस समय, पर नारी की सहज ममता ने उम्र का ध्यवधान कव माना है। उनके आसु सोख लिये थे मैंने, उनका ददं वाट लिया था। तब से उनकी हर व्यथा को अपने सपूर्ण मवेदन के साथ जीने की जैसे भरी आदत हो गयी थी। अधिकार हो गया था । । ज्वालामुरी के गर्भ मे : १७ और इस अनाम रिश्ते की पृष्ठभूमि पर आज उनका यह व्यंग्य कैसी : कर गया था! भीतर तक तिलमिला उठी थी मैं। - । सरे पहर मैं अपनी वुनाई लेकर छत पर बैठी हुई थी। हरि भैया पास आकर ऐसे बैठ गये, जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं भी जान-बूझकर दों के उलटफेर में उलझी रही। 'मीता!' 'हुँ।' 'मेटिनी तो अब शायद नहीं मिलेगा । फर्स्ट शो में चलोगी?' 'नहीं, रहने दो। 'यानी कि नाराज हो गयी, यही न । ठीक तो है, इस घर में हर एक को नाराज होने का अधिकार है, सिवाय मेरे।' 'नाराज होने की बात नहीं है, हरि भैया ! बस, मूड नहीं रहा ।' मैंने कुछ तल्खी के साथ कहा। वे चुप हो गये। फिर कुछ देर बाद बोले, 'अच्छा चलो, नेहरू पार्क चलते हैं। वहां से लौटते हुए किशन के यहां चलेंगे। उसकी मां तुम्हें बहुत याद करती हैं।' 'आज रहने दो। 'अच्छा तो तुम्हारी कविता के यहां चले चलते हैं । या फिर वह कौन है अपर्णा-सुपर्णा, उसके यहां हो आते हैं।' 'कहा तो भई कि मुझे कहीं नहीं जाना है।' मैंने खीजकर कहा। वे फिर चुप हो गये और इस बार उनके चेहरे पर एक अजीव-सी असहायता उतर आयी। मेरे रूठ जाने का दुःख उन्हें साल रहा था। परंतु मुझे मनाने का कोई उपाय भी वे खोज नहीं पा रहे थे। उनकी उदास डवडवायी आंखों को मैं अधिक देर तक नहीं सह पायी । अपने स्वर को यथाशक्ति नरम बनाकर मैंने कहा, 'सच कहूं हरि दा, आजकल किसी के घर जाने की इच्छा ही नहीं होती। कहीं भी जाती हूं, तो तुलना में अपना घर उभरकर सामने आ जाता है। सोचती हूं, इतने अभाव में, दु:ख में भी ये लोग खुश कैसे रह लेते हैं ! दुनिया भर की मनहूसियत हमा ही यहां क्यों है । कविता की मां छह महीने से खाट पर पड़ी है। सुपए १८ : पापाण-युग का इतना बड़ा परिवार इतनी-सी गाय के महारे चल रहा है। तुम्हारे किशन के यहां तीन-तीन अनव्याही यहबंटी हुई हैं, फिर भी इन लोगों के यहा कुछ ऐमा जो मन को वाघ लेता है। जाती हूं, तो लौटने की इच्छा ही नहीं होती। और यहां तो हरदम भाग जाने का मन होता है।' 'इनमे आश्चर्य की क्या बात है। यह कोई रहने की जगह थोडे ही है। यह तो कविन्तान है। यहा आदमी नहीं रहते, उनकी छाया रहती है। अपने-आपको दफना कर उन पर पत्थरों की तरह जड़ी हुई ये छाया भर 'छि., या नवकवियों जैसी उपमाए दे रहे हो। क्या इससे अच्छी कोई वात तुम्हारे दिमाग नहीं में आती।' मैं कॉममं का विद्यार्थी, उपमा-उत्प्रेक्षा क्या जानू ! जैमा सोचता हूं, कह डाला । और तुम जानती हो मीता, कब्रिस्तान में भी कभी-कभी कोई प्यारा-मा पेड़ उग आता है। अपने सिर पर ढेर मारे युशबूदार फूलों का मुकुट धारण किये हुए यह अनोखा पेड़ वातावरण की उदासी को सुगंध में भिगोता रहता है। इस पेड का नाम जानती हो?' मैंने प्रश्नार्थक दृष्टि से उन्हें देखा। उनकी आखों में उस फूल का नाम पड़ लिया मैंने। इसके बाद भी रूठे रहना क्या मंभव था। 'मीता !' थोड़ी देर बाद वे बोले, 'तुम्हे वह जूनी कसेरा वाखलवाला हमारा घर याद है? 'नहीं तो।' 'कभी-कभी वह घर बहुत याद आता है। उस घर के साथ कितना कुछ छूट गया है.''तुम्हे याद है मीतू, तुम लोग आये थे न तब, तुम दिन भर कहा करती थी—यह घर गदा है, हमे यहा नहीं रहना।' 'मैं बहुत छोटी थी न उस समय ।' मैंने अपराधी स्वर मे वहा । 'हां, तुम बहुत छोटी थी, इसीलिए मन की बात कह सकी। जो बान मनीप नैया और मौसी अनुभव करके रह जाते थे, वह तुम बेझिझक कह डालती थी । घोरे-धीरे सबको लगने लगा कि वह घर छोटा है, गदा है। अम्मा को भी...और तब से इस मनहस कोठी से वध गये हैं हम " - ।' ज्वालामुग्नी के गर्भ में : १६ - 'यह घर क्या शुरू से ही ऐसा मनहूस लगता रहा होगा ! ' मैंने विस्मय में भरकर कहा। 'क्या पता ! तब इतना समझने की अवल कहां थी ! इतना याद है, वावूजी यहां नहीं आना चाहते थे। सालभर तक वे पुराने मकान का किराया भरते रहे.. पर अंत में उन्हें भी हथियार डाल देने पड़े। वे मुझसे अलग होकर नहीं रह सकते थे, मैं अम्मा के विना नहीं रह पाता था। और अम्मा ! उनके लिए इतना बड़ा घर, इतने सारे नौकर, इतना ऐश्वर्य, इतनी हकूमत छोड़ना बहुत कठिन हो गया था। वैभव की इस दौड़ में मैं और बाबूजी कव पीछे छूट गये, पता ही नहीं चला। वावूजी के पास तो फिर भी उनके ठाकुरजी हैं, लेकिन मैं क्या करूं ! अपने निष्प्रयोजन जीवन का क्या करूं?' 'तुम्हें कुया हो गया है आज ! कैसी ऊटपटांग वातें कर रहे हो जव से।' 'मां की नजरों में जो वेटा धूरे से भी गया-वीता हो गया हो, उससे अच्छी बातों की तो अपेक्षा नहीं की जा सकती।' ओह, अब समझी। सुबह वाली बात फांस की तरह चुभ रही है मन में अव तक। मैंने अपने स्वर में ढेर-सी ममता उंडेलकर कहा, 'मौसी की बातों का बुरा मानने चलेंगे, तो हो चुका । दिन भर मातम ही मनाना होगा । जानते तो हो उनकी आदत ।' 'जानने से ही क्या पत्थर बना जा सकता है ? हाड़-मांस का मनुष्य जितना सह सकता है, उतना ही तो सह पाऊंगा । सच कहता हूं मीतू, पढ़ते हुए भी कभी-कभी इसी खयाल से कांप उठता हूं कि क्या होगा इतनी मेहनत का । अम्मा को खुश करने लायक परिणाम तो मेरा कभी बन नहीं सकता । तब फिर हफ्तों तक पुस्तक को हाथ लगाने की इच्छा नहीं होती। पुरुष जब भीतर से टूटने लगता है, तो नारी का सहज स्नेह ही उसे संबल दे पाता है। इसी स्रोत से वह शक्ति गहण करता है । नारी चाहे वह मां हो, पत्नी हो, बहन हो, मिन हो... कहां पढ़ा था यह वाक्य-किमी नाटक में | जागा ? mr mr- . , भैया के पत्र में। कहीं भी पड़ा हो, आज इस वेला उममा स्मरण हो आना ही सार्थक हो उठा था। । उम बार बी० कॉम० में हायर सेकंड क्लास पाने पर जब मैंने उनका अभिनंदन किया, तो बोले, 'अभिनदन की असली हकदार तो तुम हो। परिणाम का मारा श्रेय तुम्ही को जाता है।' शनिवार की शाम को मैं हमेशा की तरह पूजाघर में बैठी मुदर काड का पाठ कर रही थी। परो की आहट सुनकर मिर उठाया, मौसाजी नहा- कर शाम को संध्या-वंदना के लिए अदर आ गये थे। मेरी उपस्थिति में निलिप्त होकर उन्होंने मूती धोती उतार खूटी पर टगी लाल रंग की रेगमी धोती पहनी । आसन लेने के लिए इस ओर मुडे, तो मुझं एकटक अपनी ओर देखते हुए पाया। अपनी झेंप मिटाते हुए बोले, 'कहिए पंडितानीजी, क्या निरीक्षण हो रहा है ?' 'निरीक्षण यह हो रहा है कि इस पूजावाली धोती का काफी पहले रिटायरमेंट हो जाना चाहिए था। मैंने दवग स्वर में कहा । 'एक बार और कायाकल्प कर दो इसका । अव की तनखा मिलने पर पहला काम यही करूंगा, ठीक है न !' मैने सिर हिला दिया। वे आसन पर बैठ गये । आचमन लेकर ध्यानस्य होने को ही थे कि महमा मुझे कुछ याद आ गया, 'मोमाजी, भाग आपके वे तिवारीजी आये थे । गोरखपुर से किताबे मगायी थी न आपने, वे दे गये हैं।' 'अच्छा? कब लौटे वे लखनऊ से?' 'कल ही आये है । और कह रहे थे-गर्माजी से कहना, मेरी मिठाई तयार रखें । दफ्तर में पार्टी दे देने से ही आप बच नही जायेंगे।' एक शर्मीली मुसकान उनके चेहरे पर तर गयी। 'अच्छा मौसाजी, दफ्तर मे तो आपने प्रमोशन की पार्टी दे दी और हमे बताया तक नहीं। चाहिए तो कि सबसे पहले घर में मिठाई आती।' मैंने मुह फुलाकर कहा। 'घर में वनलाने जैनी कोई बड़ी बात नही थी.विटिया। मेढक कितना ।
'यह घर क्या शुरू से ही ऐसा मनहूस लगता रहा होगा!' मैंने विस्मय में भरकर कहा। 'क्या पता! तब इतना समझने की अक्ल कहां थी! इतना याद है, वावूजी यहां नहीं आना चाहते थे। सालभर तक वे पुराने मकान का किराया भरते रहे.. पर अंत में उन्हें भी हथियार डाल देने पड़े। वे मुझसे अलग होकर नहीं रह सकते थे, मैं अम्मा के विना नहीं रह पाता था। और अम्मा ! उनके लिए इतना बड़ा घर, इतने सारे नौकर, इतना ऐश्वर्य, इतनी हकूमत छोड़ना बहुत कठिन हो गया था। वैभव की इस दौड़ में मैं और वावूजी कव पीछे छूट गये, पता ही नहीं चला। वावूजी के पास तो फिर भी उनके ठाकुरजी हैं, लेकिन मैं क्या करूं ! अपने निष्प्रयोजन जीवन का क्या करूं?' 'तुम्हें या हो गया है आज ! कैसी ऊटपटांग बातें कर रहे हो जव से।' 'मां की नजरों में जो वेटा धूरे से भी गया-बीता हो गया हो, उससे अच्छी बातों की तो अपेक्षा नहीं की जा सकती।' ओह, अब समझी। सुबह वाली बात फांस की तरह चुभ रही है मन में अव तक। मैंने अपने स्वर में ढेर-सी ममता उंडेलकर कहा, 'मौसी की बातों का बुरा मानने चलेंगे, तो हो चुका । दिन भर मातम ही मनाना होगा । जातते तो हो उनकी आदत।' 'जानने से ही क्या पत्थर बना जा सकता है ? हाड़-मांस का मनुष्य जितना सह सकता है, उतना ही तो सह पाऊंगा। सच कहता हूं मीतू, पढ़ते हुए भी कभी-कभी इसी खयाल से कांप उठता हूं कि क्या होगा इतनी मेहनत का । अम्मा को खुश करने लायक परिणाम तो मेरा कभी वन नहीं सकता । तव फिर हफ्तों तक पुस्तक को हाथ लगाने की इच्छा नहीं होती।' पुरुप जब भीतर से टूटने लगता है, तो नारी का सहज स्नेह ही उसे संबल दे पाता है। इसी स्रोत से वह शक्ति गहण करता है । नारी चाहे वह मां हो, पत्नी हो; वहन हो, मित्र हो... कहां पढ़ा था य यो नाटक ? N HTTre- २० : पापाण-यु भैया के पत्र में। कही भी पढ़ा हो, आज इस वेला उसका स्मरण हो आना ही सार्थक हो उठा था। उस बार वी० कॉम० मे हायर सेकंड क्लास पाने पर जब मैंने उनका अभिनंदन किया, तो बोले, 'अभिनदन की असली हकदार तो तुम हो । परिणाम का सारा श्रेय तुम्ही को जाता है।' शनिवार की शाम को मैं हमेशा की तरह पूजाघर में बैठी मुंदर कांड का पाठ कर रही थी। पैरो की आहट सुनकर सिर उठाया, मौसाजी नहा- कर शाम की मध्या-वंदना के लिए अदर आ गये थे। मेरी उपस्थिति से निर्लिप्त होकर उन्होंने मूती धोती उतार खूटी पर टंगी लाल रंग की रेशमी धोती पहनी । आसन लेने के लिए इस ओर मुड़े, तो मुझे एकटक अपनी ओर देखते हुए पाया। अपनी झेंप मिटाते हुए बोले, 'कहिए पंडितानीजी, क्या निरीक्षण हो रहा है 'निरीक्षण यह हो रहा है कि इस पूजावाली धोती का काफी पहले रिटायरमेट हो जाना चाहिए था।' मैंने दवग स्वर मे कहा। 'एक बार और कायाकल्प कर दो इसका । अव की तनखा मिलने पर पहला काम यही कहंगा, ठीक है न !' मैने मिर हिला दिया। वे आसन पर बैठ गये। आचमन लेकर ध्यानस्य होने को ही थे कि महमा मुझे कुछ याद आ गया, 'मौसाजी, आज आपके वे तिवारीजी आये थे । गोरखपुर से किताब मंगायी थी न आपने, वे दे गये है।' 'अच्छा? कब लौटे वे लसनऊ से ?' 'कल ही आये हैं । और कह रहे थे-दशर्माजी से कहना, मेरी मिठाई तैयार रखें । दफ्तर में पार्टी दे देने से ही आप बच नही जायेंगे।' एक शर्मीली मुसकान उनके चेहरे पर तर गयो । 'अच्छा मौसाजी, दफ्तर में तो आपने प्रमोशन की पार्टी दे दी और हमे बताया तक नहीं । चाहिए तो था कि सबसे पहले घर में मिठाई आती।' मैंने मुह फुलाकर कहा। 'घर मे बतलाने जैसी कोई बड़ी बात नही थी, बिटिया। मेढक कितना - भी फूल जाए, बैल तो वनने से रहा। दफ्तर का वाबू हूं, प्रमोशन हो गया तो वहुत-से-बहुत ओ० एस० वनूंगा और क्या !' हंसकर ही कही थी उन्होंने यह वात, लेकिन उसमें छलकती हुई व्यथा को मैंने पा लिया और मैं भी उदास हो आयी । सुख में हो या दुःख में, मनुष्य को सबसे पहले घर ही याद आता है। कैसे जब्त कर पाये होंगे इतनी बड़ी खुशी को वे मन-ही-मन में ! तिवारीजी बता रहे थे, दफ्तर में उन्होंने बहुत शानदार दावत दी थी। बाहर की दुनिया में जो इतना लोकप्रिय है, उसका अस्तित्व घर में इतना नगण्य क्यों है। मुझे तो कई दिनों तक यह भी नहीं पता था कि वे दफ्तर भी जाते हैं। उनके ऑफिस आने-जाने को लेकर घर में कोई गहमागहमी नहीं होती थी। जूनी केसरा वाखलवाले घर की एक धुंधली-सी याद है कि मौसाजी बाहर से लौटे हैं, तो मौसी ने आगे बढ़कर हाथ से झोला लिया है। उनके लिए चाय बनायी है, उनके लिए पान लगाया है । अब तो मौसी के पास इतना समय ही कहां है । मिसरानी है, रामदीन है, वे ही सव देखभाल लेते हैं । प्राणायाम की मुद्रा में बैठे मौसाजी पौराणिक चित्रों के शिव की तरह लग रहे थे। ठाकुरजी के पास जलते हुए दीपक का मंद प्रकाश उनके सुदर्शन व्यक्तित्व को रहस्यमय बनाये दे रहा था। रहस्यमय ही तो थे वे । कितना जानते थे हम लोग उनके विषय में ! घर से बाहर की दुनिया में उन का क्या रूप था, कभी जाना ही नहीं। पिछली साल की एक बात याद आयी। नया-नया कॉलेज था, नयी-नयी सहेलियां थीं। सबसे ज्यादा अच्छी लगी थी मधूलिका । श्रीनगर कॉलोनी में वड़ा-सा बंगला था उसका । रोज़ गाड़ी छोड़ने आती थी, लेकिन बातचीत में अमीरी की जरा भी वू नहीं थी। बहुत जल्दी घुल-मिल गयी थी हम दोनों । दो-चार वार उसके घर हो आने पर मैंने उसे अपने घर भी आमंत्रित किया था। तीन-चार घंटे तक गपशप की महफिल जमने के बाद जब वह जाने को हुई, तो मैं फाटक तक उसे छोड़ने गयी थी। उसी समय मौसाजी अपनी साइकिल लिये दफ्तर से लौट रहे थे। 'अच्छा, तो ये पंडितजी तुम्हारे यहां भी आते हैं ?' मधूलिका ने . पूछा। २२ : पापाण-युग ? 'कौन-से पंडितजी?' 'यही जो अभी अंदर गये। हमारे पीछे सर्वेट्स क्वाटमं हैं न वहां हर रविवार को इनका चक्कर लगता है । खूब भक्तिनें जोड़ रखी हैं। दो-दो घंटे तक भविष्य वाचते रहते हैं। यू नो, ही इज ए लेडी-किलर ।' इससे ज्यादा मुझमे सुना नहीं गया या, 'मधु, ही इज माय "वे मेरे मोमाजी हैं । ज्योतिष बहुत अच्छा जानते हैं और किसी से कुछ लेते भी नही । तुम तो जानती हो, ऐसे लोगों के लिए हिंदुस्तान में भक्तों की कमी नहीं रहती।' सॉरी नमिता, मुझे मालूम नहीं था।' मधु ने झेंपते हुए कहा था। बात आयी गयी हो गयी थी, पर जब भी मधु को देखती, वही वात याद आ जाती । क्या यह सच कह रही थी ? ऐसा होना अमभव भी तो नहीं है ? मनुष्य ही तो हैं आखिर वे। कही तो उनके अह की तुष्टि होनी चाहिए । पत्नी द्वारा निरतर लाछिन और अपमानित व्यक्तित्व को कही तो सिर उठाने का अवसर मिलना चाहिए । नहीं तो कोई जियेगा कैसे ! 'विटिया !' 'जी?' मैंने चौंककर कहा। 'पाठ कर रही होन!' 'कर तो रही हू। आपने वीच मे टोक दिया।' 'तुम कर नहीं रही थी, इसीलिए टोका था। पता है, तुम कितनी देर से एक ही पन्ना खोले वंठो हो।' "आज मन ही नहीं लग रहा।' और मैंने रामायण बंद करके रख दी। 'मन अपने से लगता थोडे ही है, उसे तो कान पकडकर लगाना पडता है। और उनकी इस बात पर हम दोनों ही हस पडे। 'विटिया!'वे एकाएक गंभीर होकर बोले । 'कहिए।' 'अपना मन अच्छे से टटोलकर देखा है तुमने ? तुम कहोगी, तो अब भी सारा आयोजन उपाड़कर फेंक मकता हूं। बुराई जो भी आनी होगी, मेरे मिर आयेगी, तुम चिंता मत करो।' 'आप पता नहीं, क्या कह रहे है।' ज्वालामुखी के गर्भ मे : २३ 'यह मत सोचो मीता बेटी, कि मैं भी तुम्हारी मौसी की तरह अंधा हो गया हूं। मेरी आंखें सब कुछ देखती हैं। तुम एक वार संकेत भर कर दो, फिर देखो मैं क्या करता हूं।' 'मौसाजी, आप तो गलत-सलत पता नहीं, क्या सोच लेते हैं। मैंने वेसुरी खिलखिलाहट के साथ कहा और वाहर भाग आयी। पूजाघर के वाहर खड़ी होकर पहले अपनी उफनती सांस को सामान्य किया, फिर धीरे-धीरे मां के कमरे की ओर चल पड़ी। । हॉल में मौसी रंग-बिरंगे कपड़ों का अंबार लेकर बैठी थीं। 'ऐ छोकरी, कहां थी अभी तक ?' 'शनिवार की शाम को मैं क्या करती हूं, मालूम है न ।' 'हां, सो तो सब मालूम है । एक वो नरसी भगत कम थे घर में ! अब ये एक मीराबाई वनी जा रही 'काम क्या है, वोलो न !' 'काम क्या एक है, इन साड़ियों पर फाल लगाने हैं। इनमें मोती टांकने हैं, इनमें गोटा लगेगा, इन पर फूल लगेंगे...' 'एक दर्जी विठा लो न घर में, चुटकी में सव काम हो जाएगा।' मैंने वेजारी से कहा । 'दर्जी तो बिठा लूं, पर फिर तू नेग किस बात का लेगी बता तो। वहन- -बेटी के यही तो काम होते हैं। और यह कार्यों का डिब्बा ले जा । सब नमूने देखकर, छांटकर अच्छा-सा ब्लॉक बनवा दे. 'तेरे मौसाजी कहां हैं ?' 'पूजा में।' 'वस, और किया ही क्या है जिंदगी भर । उनसे कहो कि जल्दी से फैक्टरी चले जाएं। आज के दिन लड़का जरा जल्दी घर आ जाता, तो टेलर के यहां हो आता । सूट का ट्रायल लेना है। दिनभर तो फैक्टरी में चला जाता है फैक्टरी-फैक्टरी-फैक्टरी. सुन-सुनकर मेरे कान पक गये हैं। वेडिय कार्ड त का डिब्बा उठाकर मैं मां के कमरे में आकर बैठ गयी। अपने कमरे २४ : पापाण-युग में जाते हुए डर लगता है । अलेपन में कभी-कभी कितने ऊटपटांग विचार आते हैं। मौसी की तेज मावाज़ यहां तक आ रही है। शायद फैक्टरी में फोन किया जा रहा है । फैक्टरी -द शर्मा स्टील वस । प्रोप्रायटर एण्ड जनरल मैनेजर श्री हरिप्रसन्न शर्मा, वी० काम 1 उद्घाटन के फोटोज का अच्छा- यासा अल्बम तैयार हो गया है । कोई स्थानीय असवार नहीं वचा होगा, जिसमें फोटो नहीं छपे होंगे। अविवाहित, युवा, मेघावी जनरल मैनेजर की प्रशसा में किराये से लेख लिखवाये गये थे । समझ में नहीं पा रहा था कि इतनी प्रचार की आखिर क्या जरूरत थी। सेकिन मोमी की दूरदर्मिता का लोहा मानना पड़ा, जव घडाधड़ वधु-पिताओं के पत्र आने प्रारंभ हुए। हर पत्र के आने पर वाकायदा सिलेक्शन कमेटी वैठनी । लाभ और हानि की मदों पर विचार-विनिमय होता । मौसाजी हमेशा की तरह तटस्थ वने रहते। गंभावित पुत्रवधुओ की चिन-प्रदर्शनी में एक दिन परिचित चेहरा भी मम्मिलत हो गया और मौमी ने निर्णय ले ही लिया। वह चित्र था सुलक्षणा पाठक का। यद्यपि रिटायर होने के बाद जज साहब का वैभव पहले का-मा नहीं था, फिर भी यह रिश्ता और सबसे बहेतर था। मौसी का एक चिरसचित स्वप्न पूरा हो गया था कि हरि के लिए भी ढेर-मारे रिश्ते आये थे। सुलक्षणा को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा था, 'उसने यही देहरी पूज रखी होगी, तभी तो अव तक कुवारी बैठी है।' शायद ठीक ही कह रही होगी वे। 'क्या कर रही है, मीता?' मा के पलग से क्षीण स्वर मे प्रश्न आया। 'निमंत्रण पत्र का मसौदा बना रही है। मैंने ठंडे स्वर में जवाब दिया। 'तेरी मौसी क्या कर रही है ?" 'माड़ियों का ढेर लेकर बैठी हैं।' 'वह साड़ियो में फात लगाने को कह रही थी, लगा दिये " 'लगा दूगी, जल्दी क्या है।' 'हां, जल्दी क्या है, अभी तो पूरा महीना पडा है. लेकिन देख तो, ज्वालामुखी के गर्भ में : २५ - अभी से कैसी रौनक हो गयी है घर में और...' और वात खतम करते- करते मां सुबकने लगीं। 'अव इसमें रोने की कौन-सी बात है ?' मैंने खीजकर पूछा । आज जैसे सबने मेरी सहनशक्ति की परीक्षा लेने की ही ठान ली थी। 'मनु के लिए दुःख होता है रे। उसके लिए कुछ भी नहीं किया जा सका। पता नहीं, कहां, किस मंदिर में जाकर फेरे पड़वा लिये थे वेचारे न । क्या-क्या सोच रखा था, पर कुछ नहीं हो सका ।' 'आज उसके लिए आंसू बहाने की क्या तुक है, मां ।' मैंने वुझे स्वर में कहा । मन तो हो रहा था कि चीखकर कहूं-मां, रोना ही है, तो आज मीतू के लिए रोओ । मनु के लिए रोने का समय तो बहुत पीछे छूट गया। पुरुप होते हुए भी मौसाजी ने जो जान लिया था, उससे मां होकर भी मां अनजान कैसे रह गयी ! अपनी व्यथाओं के झुरमुट से एक बार तो वाहर आकर झांकती कि कहां क्या हो रहा है। मां के स्वभाव का भी कुछ पता नहीं चलता। कहां तो बेला भाभी के लिए एक चेन भी उन्होंने नहीं दी थी; नलिन के जन्म पर एक अंगूठी तक हम लोग भेज नहीं पाये थे, और अवगहनों-कपड़ों का अंबार लग गया है। यह सब कहां से हो रहा है, क्या मैं जानती नहीं ! जिस फैक्टरी का इतना ढोल पीटा जा रहा है, उसकी पोल भी मुझसे छिपी नहीं है । नानाजी की ज़मीन एकाएक ऊंचे दामों पर बिक गयी थी और मां ने अपना हिस्सा भी मौसी के नाम कर दिया था। स्टील फर्नीचर का कारखाना खोल लिया गया था। और वी० कॉम० के बाद क्लर्की के लिए वांटेड के कॉलम्स पढ़नेवाले हरि भैया एकाएक जनरल मैनेजर की कुर्सी पर पहुंच गये थे । और उस कुर्सी ने उन्हें भीतर-बाहर कितना बदल डाला था। और मेरा सारा रोप मां पर उमड़ पड़ा, 'तुम्हारा भी तो जवाब नहीं है, मां । मर्जी आयेगी, तो दूसरों के लिए घर लुटाकर रख दोगी। नहीं तो पेट-जाये लड़के के नाम तुम्हारे पास कौड़ी तक नहीं निकलेगी । लोग भी तो कैसे चंट होते हैं, मीठी-मीठी वातों से किसी को फुसला कर अपना काम खूब बना लेते हैं। २६ : पापाण-युग 'मो-ता!' मां के स्वर में अप्रत्याशित कड़क थी। मैं सहम कर चुप हो गयी। 'यह तुझे क्या हो गया है, लड़की ! आजकल तू इतनी जहरदुझी वाले कहां से सी गयी है। ये अपने पराये को भाया कौन सिम्खा गया है तुझे? मैं किसी को कुछ नहीं दे रही हू रे। सिर्फ पुराना वजं उतार रही हूं। इतना भी नहीं करूंगी, तो सुख से मरना भी नमीव नहीं होगा मुझे ।' मा दिन में तीन बार तो मरने की तैयारी कर ही लेनी थी। इसलिए मुझ पर कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं हुई। 'और तुझे मौमी पर इतना गुस्सा क्यों आता है री! वरसो के बाद तो मुख के दिन देख रही है वह । सारी जिंदगी मिवा गरीबी के देवा ही क्या है उसने। कभी मन भरकर ओढा नहीं, पहला नहीं। कितनी कममे दे-दिलाकर कभी एकाघ चीज़ दे पापी हूं उमे । इननी स्वाभिमानी है वह ।' मा एकदम गलत भी नहीं कह रही थी। इस मारे ताम-झाम के बीच भी मौमी एक्दम सादगी से रहती थी। तीज-त्योहारों पर मां जिद करके उन्हें अपने गहने-कपडो से नजाती, फिर उनका चेहरा अपने दोनों हाथों में उठाकर कहती, 'छोटी, मच भगवान ने कमा राजरानी-मारूप देकर भेजा है तुझे धरती पर। 'लेकिन दीदी, किम्मत तो भिखारियों को दी है न, उमका कोई क्या करे।' मामी यपने को छुढाकर कहनीं। यह बात दूब जोर से कही जाती, जिमने मामाजी उसे जरूर मुन लें। तब मौसाजी का चेहरा व्यथा से काला पड़ जाता और हमारी मारी सहानुभूति उन्ही के माथ होती। मां की बनारमी साडिया मौसी लौटाने आती, तो मा बहती, 'रहने दैन! यहा भी तो पडी यही मड़ ही रही हैं।' 'न, जीजी! इतने अच्छे कपड़े मुझ पर सगे भला । अपनी औकात भी तो मुझे देखनी चाहिए । मैं तो तुम्हारे चरणों में पड़ी है, इसलिए कि सड़के की जिंदगी बन जाएगी। नहीं तो पता नहीं कहा भीख मागता फिरेगा।' यह तो वढे होने पर ही पता चला कि ये बातें मा से कहने का बहाना भर होता था, अमली लक्ष्य होते थे लड़के के पिता। मैने तिक्त स्वर में कहा, 'पता नही नानाजी ने दोनो लड़कियो के ज्वालामुखी के गर्भ में : २७ । - साथ इतना पक्षपात क्यों किया। वे तो कन्यादान करके छुट्टी पा गये, जिंदगी भर का काला पानी भुगतना पड़ा है मौसाजी को।' 'कोई खुशी से अपनी बेटी कुएं में नहीं फेंक देता री ! उसका इतना बड़ा सर्वनाश तो मेरे कारण हुआ है।' 'तुम्हारे कारण ?' 'हां, तुम्हारे पापा के कारण।' कमरे में कुछ समय तक केवल मेरी चूड़ियों की खनक ही सुनाई देती रही। 'मनु के जन्म के समय की बात है । मैं सातवां लगते ही माताजी के पास हैदरावाद आ गयी थी । तेरे पापा बंगलौर में थे । वहां और कोई नहीं था, इसलिए मनु चार-पांच महीने का हो गया, तव भी मुझे उन लोगों ने भेजा ही नहीं। मैं भी मजे में थी, क्योंकि तेरे पापा हर पंद्रह-बीस दिन बाद आते रहते थे । वे आते थे, तो घर में रौनक-सी आ जाती थी। माताजी रसोई में घिरी रहतीं। छोटी अपने जीजा के आगे-पीछे घूमती रहती। घर में छोटा और कोई था नहीं। सेवा का सारा भार उसी पर था। वे भी दिन भर शामली-शामली का जप किये रहते।' 'तुम्हें बुरा नहीं लगता था ?' 'वुरालगने जैसा तो इसमें कुछ था ही नहीं । साली-बहनोई का रिश्ता तो ऐसा ही होता है। फिर मैं तो उस समय अपने रूप-लावण्य पर रीझी हुई थी। एक बेटे को जन्म देकर सोचती थी, मैंने स्वर्ग का राज्य जीत लिया है । यह अकल नहीं थी कि कर्त त्ववान पुरुप सिर्फ सौंदर्य पर नहीं रीझा करते । बुद्धिमती नारी का आकर्षण भी उतना ही प्रबल होता है । वे इतने विद्वान थे और मेरे पास वात करने के लिए सिर्फ एक ही विषय था--मनु, हमारा मुन्ना। छोटी और वे दिन-रात गपशप किया करते और मैं दिनभर अपने लाडले को दुलराया करती, उसके लिए स्वेटर बुनती रहती। अपनी इस बेवकूफी का ध्यान आया तो "मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।' 'यानी ?' मैंने घड़कते हृदय से पूछा, पर मां को शायद मेरा प्रश्न सुनाई ही नहीं दिया। २८ : पापाण-युग । 'जव सारी बात पता चली, तो पिताजी बुरी तरह घबरा गये। माताजी तो पाट से ही लग गयी। मैंने पहले तो उसे ग्वव कोसा, फिर समझाया-बुझाया, मनु को उसके पैरों पर डाल दिया। पर वह मेरनी की तरह अडिग रही। 'बोली-मैं तुम्हारा कोई हक छीन नहीं रही, जीजी । लेकिन अपना अधिकार भी मैं नहीं छोडूगी । वावा रे, उसकी हिम्मत देवकर तो म दातों-तले उगली दवाकर रह गये थे।' 'फिर?' जिस विश्वास पर वह पर जमाकर पड़ी हुई थी, वहीं जव भरभराकर गिर पड़ा, तब कही जाकर वह अवॉर्शन के लिए राजी फिर क्या, 'उफ!" 'दूसरा उपाय ही क्या था । तेरे पापा तो मुह छिपा गये थे। कंपनी मे उन दिनों वे चीफ एडवाइजर के पद पर थे । और भी ऊंचा उठने के स्वप्न देख रहे थे। यह वदनामी उनका भविष्य खराव कर सकती थी। उन्होंने नैरोवी ब्रांच में ट्रासफर मांग लिया। मुझे लिवाने भी नही आये। उनकी चिट्टी पाकर पिताजी का कारकून ही मुझे छोड आया था।' 'इतनी निष्ठुरता!' 'ऐसा ही होता है, मीता। महत्त्वाकांक्षी पुरुष पता नहीं, कितनो की भावनाओ को रोदता चला जाता है। उमे जरा भी मलाल नहीं होता। घर के पुरोहित का लडका उसके आगे-पीछे घूमता रहता था। पिताजी ने बहला-फुसलाकर उसी से छोटी को ब्याह दिया। लडकी एक बार बदनाम हो जाए, तो शादी में कितनी मुश्किलें आती हैं, तुझे पता नही है ।' 'मोमाजी को पता था सब?" 'क्या पता, उनके मन की थाह किसी ने पायी भी है कभी।' 'वे जरूर जानते होंगे । वे सबके मन की जान जाते हैं। तभी न इतनी दूर याकर वस गये हैं।' । अपनी लवी कहानी सुनाकर मा निढाल होकर पड गयी थी। मेरे मन में एक हाहाकार-सा उठा। मैने मचलकर कहा, 'मा, यह सब मुझे सुनाने की ज्वालामुखी के गर्भ मे : २६ जरूरत थी। पापा की कितनी प्यारी इमेज थी मेरे मन में स्ट करके तुम्हें क्या मिला ?' और मुझे सचमुच लगा कि गां ने पुराने अन्याय का नये सिरे से प्रतिशोध लिया है । लेकिन मरे हुए व्यक्ति से प्रतिशोध, छिः ! 'पापा की प्रतिमा के बनने-विगड़ने से अव क्या फर्क पड़ता है, मीतू ! लेकिन मौसी के लिए तू थोड़ा सहृदय होकर सोच सके, इसीलिए यह सब कहना पड़ा है । जरा सोच तो, वह अपनी वाजी जीत जाती, तो आज कहां होती। और मैं अपने मन को लेकर उसी की शरण में आने को वाध्य नहीं होती क्या ? जरा सोच तो।' क्या सोचना था मुझे। मां ने तो सारी रामायण इसलिए सुनाई थी कि मौसी के प्रति मेरा आक्रोश कुछ कम हो । कुछ सहानुभूति उमड़े । सहानुभूति उमड़ी तो पर मां के लिए । कैसा लगा होगा, फिर उस व्यक्ति के साथ दाम्पत्य निभाना! उसके बच्चों को जन्म देते समय क्या मौसी के अजन्मे शिशु की याद नहीं आयी होगी ! मौसी से मुंह छिपाकर तो अफ्रीक चले गए ये लोग । पर क्या अपने आपसे बच सके होंगे ? अपने आपक छल सके होंगे ? विचारों का एक रेला-सा उमड़ आया था मन में। उसे सप्रयास हटाकर मैं पुनः कुर्सी पर आकर बैठ गयी थी। राइटिंग पैड सामने खिस कर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा-हरिप्रसन्नऔर सुलक्षणा का शुभ विव . रसोई में आकर मैंने चाय का कप उठाया ही था कि मौसी ने कहा, हरितालिका है न, मीतू ?' 'ओह, मुझे याद ही न रहा।' मैंने खिसियाकर कहा और का रख दिया। 'पता है काकी, मीता इतनी-सी थी, तव से तीजा उपासी पानी की बूंद तक नहीं लेती।' मौसी ने मिसरानी से कहा। 'हूं जाणू नइ काई । तवई तो संकर भगवान् परसण होइ 'मुझे तो उनके परसन्न होने की कोई खबर नहीं मिली। क्या संकर भगवान् का टेलीफोन आया है ?' ३० : पापाण-युग 'हे म्हारा बाप! तमे मालम नी पड़ी काई । अयं हाल तारवालो कागद दे गियो नो नानी बाई" मुझे सचमुच ही कुछ मालूम नहीं था। मैंने घडते दिल से मौसी की और देया। 'इमे कहा मे पता होगा, काकी। मीधी विस्तर से उठकर चली आ रही है।' 'किमका तार था?' 'मनीय का। पंचमी को तेरी सगाई हो रही है । वाजपेयी लोगो को लेकर वह आ रहा है।' 'कौन ? भैया आ रहे हैं ?' 'हा, फिर याद पड़ जायेंगे, तो मारे काम घरे रह जायेंगे न ! इसी से इतनी जल्दी है।' मैं चुप हो रही। गर्मियों मे भैया के यहा रायपुर में जिस युवक का साक्षात्कार हुआ था, उसकी आकृति आखो के सामने लाने का यत्न करने लगी। 'लुगायों को जलम वापडो ऐमोज है हो। वाप को घर को सुख चार दिण को, फेर तो.. पर या नानी वाई चली जावेगा, तो सुन्न कार हो जावेगा हो।' और काकी तो यू बिमूरने लगी, जैसे मेरी डोली उठने ही वाली है। मैं मुश्किल से अपनी रुलायी रोक पायी। अपने कमरे में लौट जाने में ही मैंने कुशल ममझी। 'बाई तो चाल्या रे ससुराल' की करुण स्वर-लहरी सीढियों पर भी मेरा पीछा करती रही। 'मीता!' मौमी नै आवाज दी। 'अपनी भाभी से कहना, ग्यारह बजे पडितजी पूजा करवाने के लिए मायेंगे । वह तैयार होकर नीचे आ जाए।' दरअसल यह वात मौमी ने इतनी जोर से कही थी कि अपने कमरे मे भाभी ने उसे जरूर सुन लिया होगा। इतनी सुवह उनके कमरे में जाने की मेरी इच्छा भी नहीं थी, पर मौसी नीचे पहरे पर खड़ी थी, लिए यह काम टाला नहीं जा सका। दो वार हल्की दस्तक देने के बाद कम इन' का संदेशा पाकर मैंने ज्वालामुखी के गर्भ में : ३१ दरवाज़ा खोला और स्तब्ध रह गयी । भाभी अपनी छोटी-सी डायनिंग टेबुल पर नाश्ता कर रही थीं.--वह भी आमलेट का। भाभी अंडे लेती हैं, हम लोग जानते थे। उनके छोटे-से फ्रिज में दो-चार अंडे हमेशा रखे रहते थे। अपने कमरे में अकसर ही वे मनपसंद नाश्ता बनाकर लेती रही हैं, पर आज...| 'भाभी, आप शायद भूल गयीं कि आज हरितालिका है।' मैंने किसी तरह इतना कहा। 'नहीं नमिताजी, भूली तो नहीं हूं। कुछ भी भूलने की सुविधा आपके यहां कहां है ?' मैं प्रश्नार्थक दृष्टि से उनकी प्लेट को देखती रही। 'नाश्ते की बात सोच रही हो न । वह तो एक 'एंटीडोट' के रूप में ले रही हूं। इस जन्म में जो सौभाग्य मिला है, उसे जन्म-जन्मांतर तक वहन करने की सामर्थ्य नहीं है मुझमें ।' स्तब्ध रह गयी मैं । मन हुआ, वेडरूम में झांककर देख लूं, हरि भैया सुन तो नहीं रहे। भाभी ने किसी अंतर्यामी की तरह मेरे मन की बात पढ़ ली। हंसकर बोलीं, 'ननदरानी, क्यों अपने मन को क्लेश दे रही हो। तुम्हारे भैया अस्सल सूर्यवंशी हैं। सूर्य जब तक सिर पर नहीं चढ़ आता, वे नहीं उठते । रातभर सड़कें नापने के बाद अभी-अभी तो सोये हैं बेचारे।' मुझसे यह निर्दय परिहास अधिक नहीं सुना गया। अपनी मुद्रा को यथाशक्ति कठोर बनाकर कहा, 'मैं तो मौसी का संदेश देने के लिए आयी थी। ग्यारह बजे पंडितजी आयेंगे, आप तैयार होकर नीचे पहुंच जायें।' 'आ जायेंगे भाई, पूजा की फार्मेलिटी भी हो जाए, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन नमिता, इस घर में बालू रेत के महादेव की इतनी प्रतिष्ठा क्यों है ! हमारी पूज्यनीया अम्माजी का अपने जीते-जागते महादेव के साथ जैसा...' अधिक सुनना मेरी सामर्थ्य के बाहर था। बाहर आकर मैंने दरवाजा जोर से बंद कर लिया, ताकि आगे की वात मेरे कानों तक न पहुंचे। - । कमरे में आकर मैं सुन्न होकर बैठी रही। अभी शादी को दो साल भी नहीं हुए, भाभी में कितनी कड़वाहट आ गयी है। शादी होकर आयी थीं, ३२ : पाषाण-युग वे ऐसी नहीं थीं ! अपनी लजोली मुसकान से तव घर भर को एक उजास से भर देती थी वे।हरि भैया तब भी कितने खिले-खिले-से रहते थे। लेकिन हथेली की मेंहदी भी न उत्तर पायी थी कि यह रंग उतरने लगाया। ये मुमकाने वुझने लगी थी। और इसके लिए सिर्फ मौसी ही उत्तरदायी हैं। एक-दूसरे में खोया हुआ यह सारस का जोडा उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाता था। दिनभर दरवाजों को देखकर वे क्रोध में मुनमुनाती रहती। कभी-कभी ऐसी बातें भी कह बैठती कि पास बैठी में शर्म से गड जाती। एक दिन अकेले में मौसाजी ने मेरे हाथ में एक लिफाफा पकड़ाकर कहा था---'विटिया ! हरि से कही, कहीं घूम घाम आये। घर में तो फिर सारी जिंदगी रहना ही है।' 'लेकिन यह है क्या ?" 'थोड़े से रुपये है, बेटा !' उन्होंने अत्यंत सकुचित होकर कहा था। मैं फिर ज्यादा कुछ नही पूछ सकी थी। अपनी छोटी-सी नौकरी मे बड़े यत्न से जोड़ी हुई यह पूजी उन्होंने वेटे की खुशी के नाम कर दी थी। लेकिन खुमी मिली कहा ! हिम्मत करके हरि भैया ने गोवा घूमने का इरादा किया, तो घर में जैसे तूफान आ गया। एक तो उन्होने अपने मन से ऐमा इरादा किया-मोसो को नाराज होने के लिए यही बहुत था। फिर मौसाजी के यनुदान ने तो आग में घी का काम किया था। वाप-चेटे दोनो ही एक साथ कटघरे में खड़े हो गये थे। गोवा तो खैर वे लोग गये ही, क्योकि पहली बार मौसी को पति के दृढ निश्चय से टक्कर लेनी पड़ी थी । और वे हार गयी थी। लेकिन घूमने का आनंद निर्मल नही रह सका। लौटने पर भी प्रेमी युगल का जैसास्वागत हुआ, उससे विखरे हुए हृदयों को पास आने का मंबल नहीं जुट भका था। शायद मौसी को सबसे ज्यादा ईर्ष्या उम प्रेम के आवेग से थी, जो उनके दांपत्य जीवन को कभी सरावार नहीं कर सका। सभवतः इसीलिए उनका रुप वेटे-बहू को लेकर इतना विकृत हो गया था। लेकिन हमेशा निलिप्त रहने वाले मौसाजी इस विवाह के बाद घर में रस लेने लगे थे। मौसी का कोई वाक्-शर सीधा बहू पर न पडे, इसके लिए । ज्वालामुखी के गर्भ में . ३३ . - खोला और स्तब्ध रह गयी। भी अपनी छोटी-सी डायनिंग टेवुल पर नाश्ता कर रही थी मलेट का। भाभी अंडे लेती हैं, हम लोग जानते थे। उनके छोटे-से में दो-चार अंडे हमेशा रखे रहते थे। अपने कमरे में अकसर ही वे संद नाश्ता बनाकर लेती रही हैं, पर आज..। 'भाभी, आप शायद भूल गयीं कि आज हरितालिका है।' मैंने किसी ह इतना कहा। 'नहीं नमिताजी, भूली तो नहीं हूं। कुछ भी भूलने की सुविधा आपके हां कहां है ?' मैं प्रश्नार्थक दृष्टि से उनकी प्लेट को देखती रही। 'नाश्ते की बात सोच रही हो न । वह तो एक 'एंटीडोट' के रूप में ले रही हूं। इस जन्म में जो सौभाग्य मिला है, उसे जन्म-जन्मांतर तक वहन करने की सामर्थ्य नहीं है मुझमें ।' स्तब्ध रह गयी मैं । मन हुआ, वेडरूम में झांककर देख लूं, हरि भैया सुन तो नहीं रहे। भाभी ने किसी अंतर्यामी की तरह मेरे मन की बात पढ़ ली। हंसकर वोलीं, 'ननदरानी, क्यों अपने मन को क्लेश दे रही हो। तुम्हारे भैया अस्सल सूर्यवंशी हैं। सूर्य जब तक सिर पर नहीं चढ़ आता, वे नहीं उठते । रातभर सड़कें नापने के बाद अभी-अभी तो सोये हैं बेचारे ।' मुझसे यह निर्दय परिहास अधिक नहीं सुना गया। अपनी मुद्रा को यथाशक्ति कठोर वनाकर कहा, 'मैं तो मौसी का संदेश देने के लिए आयी थी। ग्यारह बजे पंडितजी आयेंगे, आप तैयार होकर नीचे पहुंच जायें।' 'आ जायेंगे भाई, पूजा की फार्मेलिटी भी हो जाए, क्या फर्क पड़ता है लेकिन नमिता, इस घर में वालू रेत के महादेव की इतनी प्रतिष्ठा क्यों है हमारी पूज्यनीया अम्माजी का अपने जीते-जागते महादेव के साथ जैसा अधिक सुनना मेरी सामर्थ्य के बाहर था। बाहर आकर मैंने दरव जोर से बंद कर लिया, ताकि आगे की बात मेरे कानों तक न पहुंचे। , कमरे में आकर मैं सुन्न होकर बैठी रही। अभी शादी को दो साल में हुए, भाभी में कितनी कड़वाहट आ गयी है। शादी होकर आयी ३२ : पापाण-युग वे ऐसी नहीं थी। अपनी लजीलो मुसकान से तब घर भर एक उजास से भर देती थीं वे । हरि भैया तब भी कितने खिले-खिले-से रहते थे। लेकिन हथेली की मेंहदी भी न उतर पायी थी कि यह रंग उतरने लगा था। ये मुसकानें बुझने लगी थी। और इसके लिए सिर्फ मौसी ही उत्तरदायी हैं । एक-दूसरे मे खोया हुआ यह सारस का जोड़ा उन्हें फूटी आंखो नहीं सुहाता था। दिनभर दरवाजो को देखकर वे क्रोध मे भुनभुनाती रहती। कभी-कनी ऐसी बातें भी कह वैठती कि पास बैठी में शर्म से गड जाती। एक दिन अकेले में मौसाजी ने मेरे हाथ में एक लिफाफा पकड़ाकर कहा या--'बिटिया ! हरि से कहो, कहीं घूम-घाम आये। घर में तो फिर सारी जिंदगी रहना ही है। 'लेकिन यह है क्या?' 'थोड़े से रुपये हैं, बेटा !' उन्होने अत्यंत संकुचित होकर कहा था। मैं फिर ज्यादा कुछ नही पूछ सकी थी। अपनी छोटी-सी नौकरी में बड़े यत्न से जोड़ी हुई यह पूजी उन्होंने बेटे की खुशी के नाम कर दी थी। लेकिन सुनी मिली कहा । हिम्मत करके हरि भैया ने गोवा घूमने का इरादा किया, तो घर में जैसे तूफान आ गया। एक तो उन्होंने अपने मन से ऐसा इरादा किया--मौसी को नाराज होने के लिए यही बहुत था। फिर मौसाजी के अनुदान ने तो आग मे घी का काम किया था। वाप-बेटे दोनों ही एक साथ कटघरे में खडे हो गये थे। गोवा तो खर वे लोग गये ही, क्योकि पहली बार मौसी को पति के दृढ निश्चय से टक्कर लेनी पड़ी थी। और वे हार गयी थी। लेकिन घूमने का यानंद निर्मल नहीं रह सका। लौटने पर भी प्रेमी-युगल का जैसा स्वागत हुआ, उससे विखरे हुए हृदयों को पास आने का मवल नहीं जुट सका था। शायद मौसी को सबसे ज्यादा ईर्ष्या उम प्रेम के आवेग से थी, जो उनके दांपत्य जीवन को कभी सरावार नहीं कर सका। संभवतः इसीलिए उनका रख वेटे-बहू को लेकर इतना विकृत हो गया था। लेकिन हमेशा निलिप्त रहने वाले मौसाजी इस विवाह के बाद घर में रस लेने लगे थे। मौसी का कोई वाक्-शर सीधा बहू पर न पड़े, इसके लिए ज्वालामुखी के गर्भ मे : ३३ ।
-- रही हूं दरवाजा खोला और स्तब्ध रह गयी। भाभी अपनी छोटी-सी डायनिंग टेबुल पर नाश्ता कर रही थीं.---वह भी मामलेट का । 'भाभी अंडे लेती हैं, हम लोग जानते थे। उनके छोटे-से फ्रिज में दो-चार अंडे हमेशा रखे रहते थे। अपने कमरे में अकसर ही वे मनपसंद नाश्ता बनाकर लेती रही हैं, पर आज...! 'भाभी, आप शायद भूल गयीं कि आज हरितालिका है।' मैंने किसी तरह इतना कहा। 'नहीं नमिताजी, भूली तो नहीं हूं। कुछ भी भूलने की सुविधा आपके यहां कहां है ?' में प्रश्नार्थक दृष्टि से उनकी प्लेट को देखती रही। 'नाश्ते की बात सोच रही हो न । वह तो एक 'एंटीडोट' के रूप में ले । इस जन्म में जो सौभाग्य मिला है, उसे जन्म-जन्मांतर तक वहन करने की सामर्थ्य नहीं है मुझमें ।' स्तब्ध रह गयी मैं । मन हुआ, वेडरूम में झांककर देख लूं, हरि भैया सुन तो नहीं रहे। भाभी ने किसी अंतर्यामी की तरह मेरे मन की बात पढ़ ली। हंसकर बोलीं, 'ननदरानी, क्यों अपने मन को क्लेश दे रही हो । तुम्हारे भैया अस्सल सूर्यवंशी हैं। सूर्य जव तक सिर पर नहीं चढ़ आता, वे नहीं उठते । रातभर सड़कें नापने के बाद अभी-अभी तो सोये हैं बेचारे ।' मुझसे यह निर्दय परिहास अधिक नहीं सुना गया। अपनी मुद्रा को यथाशक्ति कठोर बनाकर कहा, 'मैं तो मौसी का संदेश देने के लिए आयी थी। ग्यारह बजे पंडितजी आयेंगे, आप तैयार होकर नीचे पहुंच जायें।' 'आ जायेंगे भाई, पूजा की फार्मेलिटी भी हो जाए, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन नमिता, इस घर में बालू रेत के महादेव की इतनी प्रतिष्ठा क्यों है ! हमारी पूज्यनीया अम्माजी का अपने जीते-जागते महादेव के साथ जैसा अधिक सुनना मेरी सामर्थ्य के बाहर था। बाहर आकर मैंने दरवाजा जोर से बंद कर लिया, ताकि आगे की बात मेरे कानों तक न पहुंचे। . ... कमरे में आकर मैं सुन्न होकर बैठी रही। अभी शादी को दो साल भी नहीं हुए, भाभी में कितनी कड़वाहट आ गयी है। शादी होकर आयी थीं, तव ३२ : पापाण-युग । वे ऐसी नहीं थी । अपनी लजीली मुसकान से तब घर भर को एक उजास से भर देती थी वे। हरि भैया तब भी कितने खिले-खिले-से रहते थे। लेकिन हथेली की मेंहदी भी न उतर पायी थी कि यह रंग उतरने लगा था। ये मुसकानें वुझने लगी थी। और इसके लिए सिर्फ मौसी ही उत्तरदायी हैं। एक-दूसरे में खोया हुआ यह सारस का जोडा उन्हे फूटी आखो नहीं सुहाता था। दिनभर दरवाजो को देखकर वे क्रोध मे भुनभुनाती रहती। कभी-कभी ऐसी वातें भी कह बैठती कि पास बैठी में शर्म से गड जाती। एक दिन अकेले में मौसाजी ने मेरे हाथ में एक लिफाफा पकड़ाकर कहा था---'विटिया ! हरि से कहो, कहीं घूम-घाम आये । घर मे तो फिर सारी जिंदगी रहना ही है।' 'लेकिन यह है क्या ?' 'थोडे से रुपये हैं, बेटा !' उन्होने अत्यंत सकुचित होकर कहा था। मैं फिर ज्यादा कुछ नही पूछ सकी थी। अपनी छोटी-सी नौकरी में बड़े यल से जोड़ी हुई यह पूजी उन्होंने बेटे की खुशी के नाम कर दी थी। लेकिन खुशी मिली कहा ! हिम्मत करके हरि भैया ने गोवा घूमने का इरादा किया, तो घर मे जैसे तूफान आ गया। एक तो उन्होने अपने मन से ऐसा इरादा किया--मौसी को नाराज होने के लिए यही वहुत था। फिर मौसाजी के अनुदान ने तो आग में घी का काम किया था। बाप-बेटे दोनो ही एक साय कटघरे में खडे हो गये थे। गोवा तोखर वे लोग गये ही, क्योकि पहली बार मौसी को पति के दृढ़ निश्चम से टक्कर लेनी पड़ी थी। और वे हार गयी थी। लेकिन घूमने का आनंद निर्मल नही रह सका। लौटने पर भी प्रेमी-युगल का जैसा स्वागत हुआ, उससे बिखरे हुए हृदयो को पास आने का सबल नहीं जुट सका था। शायद मौसी को सबसे ज्यादा ईर्ष्या उम प्रेम के आवेग से थी, जो उनके दांपत्य जीवन को कभी सराबोर नहीं कर सका। सभवतः इसीलिए उनका रुख बेटे-बहू को लेकर इतना विकृत हो गया था। लेकिन हमेशा निलिप्त रहने वाले मौसाजी इस विवाह के बाद घर में रस लेने लगे थे। मौसी का कोई वाक्-शर सीधा बहू पर न पडे, इसके लिए , ज्वालामुखी के गर्भ मे : ३३ वे बड़े सजग रहते थे। वरसों बाद उनके स्वाभिमानी और निरीह व्यक्तित्व का मूल्यांकन हुआ था-~-बहू ने किया था। उनके कपड़े, उनका पूजाघर उनकी पुस्तकें, उनका कमरा-बहू के सुघड़ हाथों के स्पर्श से दमकने लगे थे। जैसा अकृत्रिम स्नेह वे देते थे, वैसा ही प्रगाढ़ आदर उन्हें मिलता था। मुझे यह सब देखकर बड़ा अच्छा लगता था। लेकिन इसके मागे भाभी का अधिकार नहीं था। शुरू-शुरू में उन्होंने बगीचे का कायाकल्प करना चाहा था, रसोई नये सिरे से जमानी चाही थी, ड्राइंगरूम की सजावट बदलने का प्रयास किया था, पर कहीं भी कुछ भी करने की अनुमति नहीं मिली। उनके साथ आया बहुमूल्य फर्नीचर भी उनके कमरे में कैद होकर रह गया था। 'यह आकाशवाणी है...' दूर कहीं से प्रसारक की जुकाम में भीगी आवाज़ आयी, तो मैं चौंकी। वाप रे ! आठ बज गये । ऊटपटांग बातों को सोचती रह गयी मैं और यहां कॉलेज का समय हो चला था। दनादन सीढ़ियां उतर- कर नीचे आयी। रसोई में झांका, पूजा-पाठ से निवृत्त होकर मौसाजी पहली चाय ले रहे थे। मिसरानी काकी आज सुबह से ही मौसी की हाजिरी में थी। चाय उन्होंने खुद ही बनायी थी शायद । 'प्लीज मौसाजी, फिफ्टी-फिफ्टी! आपको मैं दोबारा बना दूंगी।' 'आज तो विटिया का उपवास होगा न ?' उन्होंने मेरे मग में चाय उड़ेलते हुए पूछा। 'सब छोड़-छाड़ दिया। दरअसल अव इन चीजों में बचपन की-सी आस्था नहीं रही।' मैंने दोबारा चाय का पानी चढ़ाते हुए कहा। मौसाजी के सामने यह सब कहते हुए शिक्षक भी न हुई। उनसे छिपा ही क्या था। 'उड़ते-उड़ते खबर मिली है कि परसों तुम्हारी सगाई है। भई, मुबारक हो।' 'अव मुझे थैक्यू भी कहना पड़ेगा। ठीक है न?.. वैसे मौसाजी, सबसे खुशी की बात तो यह है कि भैया इतने दिनों वाद घर आयेंगे।' 'हां विटिया, मनीप को देखे अरसा हो गया । तू तो कभी-कभार जाती भी रही है उसके पास, पर वहनजी तो तरस गयी होंगी।' ३४ : पापाण-युग 'क्या कहते हैं वहनजी के ! इतना ही प्यार होता, तो क्या बात थी?' मैंने कड़वाहट से भरकर कहा मौर विषय वहीं समाप्त कर दिया। माज सुबह-सुबह यह अच्छी खबर मिली थी और मैं खुश रहकर उसे सेलिब्रेद' करना चाहती थी। पर कहते हैं न, मेरे मन क्छु और है... पूजा-सामग्री और दक्षिणा पोटली में वायकर पंडितजी ने दरवाजे के वाहर पर दिया ही होगा कि मौसी बरस पड़ी, 'तीज-सोहार पर तो ढंग से पहन-ऑड़ लिया करो। जिसके पास नहीं होता, वे लोग नकली गहने-गुरियों से घर भर लेती हैं। इनके पास है, तो ये दलिद्दर दिखाने में ही धन्य होती चौकी के आसपास रागोली बनाती हुई भाभी का हाथ क्षणभर को काप गया, चेहरे की रेखाए कठोर हो आयी, पर दूसरे ही क्षण उनकी उंगलियां पूर्ववत् चलने लगी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं । उनका यह पपरीला मोन ही मौसी को सहमा देता है। सामने बोलनेवाले को तो वै चुटकियों में उदा देती हैं। मैंने उम यप्रिय प्रसंग को ममाप्त करते हुए कहा, 'मा, भैया के लिए अपना कमरा खाली कर दूं? मैं तुम्हारे कमरे में आ जाऊंगी।' 'अरे, वह कौन-मा महीना भर रहने आ रहा है। कहीं भी पड रहेगा। लेकिन दिल्ली वालो को कहा टिकायेंगे । पता नहीं, कितने लोग है । हॉल में इंतजाम कर लें, या किसी होटल में ठहरा लें। क्यो, छोटी ?' 'मुझसे क्या पूछनी हो जीजी, घर का मालिक जाने और उनका काम जाने । अपन हुकुम के गुलाम हैं ।' मोसी ने रुखाई से कहा। 'बाहरी, घर के मालिक तो गऊ से सीधे हैं। वे कब हुक्म चलाते है। मारा तो तुम पर सौंप रखा है। वेचारे अपने ठाकुरजी को लेकर मगन रहने हैं। कभी किसी काम में दखल नहीं देते।' 'तुम घर का मालिक किसे समझ रही हो, मीतू के मौमा को । बाह जीजी ! तुम्हारा भी जवाब नहीं है।' और मौसी विद्रूपमरी हमी हम उठी। 'तो क्या हरि के लिए कह रही है ? उसको तो आठ-आठ दिन मुझे - . सूरत ही नहीं दिखाई देती। पता नहीं, कहां रहता है । अचा, लोटे तो उससे कह देना, जल्दी से कुछ व्यवस्था कर ले । अव समय ज्यादा नहीं है।' मां का उत्साह देखकर मुझे खुशी हो रही थी। 'हरि कुछ नहीं करेगा, जीजी !' 'क्यों ?' मौसी के कंठस्वर से आशंकित होकर मां ने पूछा। 'क्योंकि वह घर का मालिक नहीं है । घर का मालिक मनीप है। उसे आने दो, जैसा कहेगा, कर देंगे।' मौसी ने जैसे दो-टूक बात कह दी 'तू हमेशा उल्टी वात करेगी, छोटी !' 'इसमें उल्टा क्या है, जीजी । अपनी मर्जी का मालिक नहीं होता, तो क्या यूं परभारे शादी तय करता। मैं तो खैर, कोई नहीं हूं, पर तुमसे तो पूछ सकता था। वताओ भला, तुम्हें एक बार लड़का तो दिखा सकता था।' ओह, अव समझी। मैं सब कीन्ह तोहि विनु पूछे तेहि ते परेउ मनोरथ छूछे । वाली वात थी। मां का तो बहाना भर था । ठेस तो मौसी के अभिमान पर लगी थी। उनके सहज अधिकार की भैया ने सीधे उपेक्षा कर दी थी। इस अपराध को थोड़ा सौम्य बनाने की गरज से मैंने कहा, 'पूछताछ की गुंजाइश थी ही कहां? तुम्हारी काली-कलूटी लड़की को किसी ने पसंद कर लिया, यही गनीमत थी। तुम लोग ठीक से देख-परख सको, इसीलिए तो यहां आ रहे हैं, नहीं तो यह प्रोग्राम भी रायपुर में नहीं हो सकता था क्या ?' 'पहले से कुछ पत्र तो देना चाहिए । एकदम तार ठोंक दिया।' मौसी , अव कुछ-कुछ नरम पड़ती जा रही थीं। 'उन्हें विश्वास है तुम्हारी कार्यकुशलता पर, इसीलिए तो निश्चित हैं।' मैंने मस्का मारा, 'उन्हें विश्वास है कि सारी व्यवस्था ठीक-ठाक मिलेगी।' 'व्यवस्था कौन बड़ी बात है। सगाई का क्या, मैं तो चार दिन में शादी खड़ी कर सकती हूं। पर तेरे भैया से डर लगता है । पूरा सनकी सैनिक है । और जिद्दी एक नंवर का । पाठक लोग पहली बार आये थे, ३६ : पापाण-युग तब कैसा तमाशा किया था, याद है न!' मैं सहम गयी । मौसी क्या सहज भाव से यह सब कह गयी थी। मैंने कनखियों से भाभी की योर देखा। उनका गुलाबी चेहरा मफेद पड़ गया था । होंठ इतनी सस्ती से भिचे थे कि लगता था, अव खून ही या जायेगा। स्मृति का वह अध्याय निश्चय ही किसी भी लड़की के लिए अपमानजनक था। वे कुछ देर बुत बनी बैठी रही और फिर एक झटके के साथ उठकर ऊपर को चल दी। उनसे दृष्टि हटाकर मैंने मा को देखा। वे एकटक भाभी को देख रही थी। उनकी आंखो मे क्या था और मैं समझ गयो कि मौसी ने यह नव सहज भाव से नहीं कहा था। भाभी के स्वाभिमान को डंक मारने का चाहे उनका उद्देश्य न रहा हो, पर भैया के प्रति मां के मन में जहर घोलना उनका मतव्य था । यह काम योजनावद्ध तरीके से वे वरमों से करती आ रही हैं । दर्जन भर लडकियों में से सुलक्षणा को चुनने के पीछे भो शायद यही हेतु था । दिनभर वह मां के सामने इसी घर में रहेगी और मां कभी न भूल पायेंगी कि मनीप ने उनके साथ क्या किया है। । पूजा दूसरे दिन सुबह-सुबह मौसी ने कहा, 'मीता, भाभी से कहो कि जल्दी आरती कर ले, तो सिरा दें। बिना उसके गणेशजी कैसे विराजेंगे?' मैंने तुनककर कहा, 'बार-बार मुझे उनके कमरे में मत भेजा करो, मौसी । अच्छा नहीं लगता।' दरअसल मुझे उस कमरे में जाते डर लग रहा था। रात घनघोर बारिश होती रही थी। मैं पढ़ने का बहाना करके • नीचे जागरण में भी शामिल नहीं हुई थी। अपने कमरे को साकल लगा- कर चुपचाप पड़ रही थी। पर बद किवाडो को भेद कर भी वगलवाले कमरे की आवाजें अनचाहे सुनाई पड रही थीं । निश्चय ही वह प्रेमालाप नहीं था। भाभी को पहली बार मैंने इतनी ऊंची आवाज़ में बोलते हुए सुना था । बार-बार एक प्रश्न हवा मे तैरता आ रहा था, 'आखिर मुझे भी बताइए, इस घर में हमारी स्थिति है क्या ?' क्या उत्तर दिया था हरि भैया ने, सुन नहीं पायी मैं जब रात ऐसी महाभारतवाली थी, तो सुबह का आलम पता नही ज्वालामुखी के गर्भ मे : ३७ कैसा होगा, इसी से ऊपर जाना टाल गयी मैं। रतजगे के लिए मिसरानी काकी यहीं रुक गयी थीं। वे ही इस समय काम आयीं । बड़े उत्साह से ऊपर गयीं और कुछ ही देर में लौट आयीं। 'लाडी उजीन जा रही दीखै । कहै कि म्हारा दाजी वैमार ह ।' 'हरी !' मौसी की धारदार आवाज़ घर में गूंजी। 'क्या है ?' सीढ़ियों के सिरे पर खड़े होकर हरि भैया ने पूछा । पता नहीं, कितने दिनों बाद उन्हें देखा था। एक ही छत के नीचे रहते हुए हम लोग एक-दूसरे से हफ्तों नहीं मिल पाते थे। वे सोकर उठते, तव मैं कॉलेज जा चुकी होती । वे रात को लौटते, तब तक सारा घर सो चुका होता । जब-जव उन्हें देख पाती, हर बार लगता, वे पहले से अधिक संवला गये हैं, दुबला गये हैं। तब प्राणों में कैसी तो मरोड़ उठती... 'बहू कहां जा रही है ?' मौसी का प्रश्न मेरी विचारधारा को तोड़ - गया। 'मैं क्या जानूं । पूछ लो उसी से!' हरि भैया ने सपाट स्वर में कहा। 'उसी से क्यों पूछूगी, मैं तो तुझी से पूडूंगी।' 'ये आग का गोला मेरे पल्ले बांधने से पहले पूछा था ? अब क्यों पूछती हो ?' और मुंह फेरकर वे वापस अपने कमरे में चले गये। उनके आरोप से जड़ बनी मौसी वहीं खड़ी रह गयीं । 'मैं भाभी साब के लिए रिक्शा लेने जा रहा हूं।' मांगीलाल ने कहा और छाता लेकर सबके सामने निकल गया। मौसी फटी-फटी आंखों से देखती भर रह गयीं। घबराकर मैं पूजाघर की ओर दौड़ी। मनोयोग से चंदन घिसते हुए मौसाजी 'मानस पूजा' का पाठ कर रहे थे। 'मौसाजी! जरा बाहर आइए, जल्दी से। भाभी पता नहीं क्यों, एकदम उज्जैन चली जा रही हैं । आप कहेंगे, तो रुक जायेंगी। आपका वहुत आदर करती हैं । आपकी बात नहीं टालेंगी।' किंतु वे वैसे ही बैठे रहे। ३८ : पापाण-युग 'चलिए न !' मैंने व्यग्रता से कहा। 'यह तुममे किसने कह दिया कि वह मेरा आदर करती है । उम जैसी मनस्विनी का आदर पाने के योग्य में कहा हूं। वह सिर्फ मुझ पर दया करती है। उस समय यह सारी चर्चा इननी निरर्थक मालूम हो रही थी। 'हरि कहां है ?' 'अपने कमरे में। 'रोकना अगर चाहे, तो वही उमे रोक मकता है । चाहे प्यार से, चाहे अधिकार से । मेरे कहने का कोई मतलब नहीं निकलता...' रिक्शा रकने की आवाज़ आयी और मैंने हताश होकर ऊपर देखा । वांहों पर रेनकोट और हाथ मे मूटकेस लेकर भाभी उतर रही थी। लेकिन दरवाजे के भीतर जिसने प्रवेश किया, वह मागीलाल नहीं था, वे भया थे । आते ही चिल्लाये, 'गुडमानिंग, एवरीबडी।' 'मा, भंया आये हैं !" मैंने खुशी से किलककर कहा और उनके कंधे से झूल गयी। मा और मौसी दौडी आयी और हम तीनो-चारों प्यार के सैलाब मे वह-से गये । सीढ़ियों पर बुत बनी बडी भाभी को ओर किसी का ध्यान नहीं गया। 'भाभीजी, रिक्शा आ गया।' मागीलाल ने एकदम आकर कहा और तय हमें होश आया। 'किसके लिए रिक्शा आया है ? मुलक्षणा के लिए क्यो' कहां जा रही है ?' भैया ने जैसे प्रश्नों की झड़ी लगा दी। 'उज्जैन जा रही है।' 'क्यों? कोई खास बात ?' 'नहीं.. ऐसे ही.."पिताजी से मिलने जा रही हैं।' मैंने यत्नपूर्वक 1 ? । 'तब तो वह रुक सकती है । यह फक्शन हो जाये, फिर मैं खुद जाकर उसे छोड़ आऊंगा। मागीलाल, यह रुपया दे और रिक्शा लोटा दे।' दूसरे ही क्षण भाभी के कमरे का दरवाजा इतनी जोर से वद हुआ कि में काप उटी । सोचा, भैया से कह दू-'उन्हें जाने दो। जबरदस्ती किस ज्वालामुखी के गर्भ मे : ३ को रोकने में क्या तुक है।' लेकिन आते ही सारी रामायण सुनाकर उन्हें परेशान करने की इच्छा नहीं हुई। . । लेकिन इतना सब शायद औरों से नहीं हो सका था। शाम को भैया ने कहा, 'चल मीतू, थोड़ा घूम आएं।' बरसात में इंदौर घूमने लायक कतई नहीं रह जाता, पर भैया साथ थे, इसलिए सब-कुछ सुहावना लग रहा था। ओवर ब्रिज पार कर हम लोग 'आइडियल' में जाकर बैठ गये । और स्थानों की अपेक्षा यहीं थोड़ा एकांत था। भैया शायद इसके लिए तरस गये थे। ऑर्डर दे चुकने के साथ ही वोले, 'अव थोड़ा चैन आया। घर में तो जरा भी प्रायवेसी नहीं है। कहने को इतनी बड़ी कोठी है।' फिर थोड़ा रुककर बोले, 'मीता ! हरि को क्या हो गया है ?' क्यों? 'नहीं, मुझे लगा कि सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं है, खासकर उसकी पत्नी। मौसी बता रही थीं कि उसका व्यवहार एकदम...' 'वह बिलकुल ठीक हैं, वस भ्रांति की शिकार हुई हैं और यही सारे असंतोप की जड़ है। जो सब्जबाग उन्हें दिखाये गये थे, सव-के-सव नकली थे।' 'फैक्टरी का क्या हुआ ?' 'अभी चल रही है, जैसे-तैसे । पर हरि भैया वहां हफ्तों तक झांकते भी नहीं। दिनभर पता नहीं कहां-कहां भटकते रहते हैं। रात गये घर लौटते हैं । अजीव-अजीव-से दोस्त पाल रखे हैं।' 'वेचारा ! दरअसल वह लड़का विजनेस के लायक था ही नहीं। वैसी सामर्थ्य उसके पास नहीं है। इससे तो कहीं नौकरी में लग जाता, तो ठीक रहता।' भैया के स्वर में सहानुभूति का पुट था। 'उनकी अम्मा की महत्त्वाकांक्षाओं का भी तो पार नहीं है।' मैंने कड़वाहट से कहा। 'यही तो रोना है। बीवी से भी तो उसका स्वभाव मेल नहीं खाता। ४० : पापाण-युग उसे तो कोई घरेलू लड़की हो सूट करती। लेकिन यह काफी महत्त्वाकांक्षी है। पता है, उसने हरि से कहा है कि अब वह दूसरों की छत के नीचे नही रहेगी।' का का सारा इतिहास मेरी आंखो के सामने घूम गया। मैंने होले से पूछा, 'आपने कैसे जाना?' 'मौसी ने ही बताया है.. और मीता, एक बात मेरे मन में आयी है।' 'क्या?' 'तुम्हे अगर कोई आपत्ति न हो, तो यह मकान में हरि के नाम करना चाहता हू"अर्थात् तुम्हारी शादी के वाद ददं का एक वडा-मा घट मेरे गले मे अटक गया । वरबस अपने आंसू रोकते हुए मैंने पूछा, 'और मा " 'मां मेरे पास रहेंगी। किमी-न-किमी दिन तो उन्हें यह फैसला करना ही था । जितनी जल्दी कर लें, उतना अच्छा है।' "उनसे पूछ लिया है ? 'हा, एक तरह से यह प्रस्ताव उन्ही की ओर से आया है।' 'पता नहीं, मा यह किम जन्म का कर्ज उतारती जा रही हैं।' मैंने तड़पकर कहा, 'भापको इस तरह वेघर करने का उन्हें क्या हक है 'जिस दिन पापा की मृत्यु हुई थी मीता, वेघर तो मैं उसी दिन हो गया था। यह घर कभी मेरी आत्मा को स्वीकार नहीं हुआ। इसके साय जुडी हुई सारी स्मृतिया उदास कर जाती है...सिवा तेरे ।' और उन्होंने मेरे माथे को प्यार से थपकिया दिया, "और यह मत भूलो मीतू, कि यदि मौसी जीवन की याजी जीत गयी होती, तो यह घर आज उन्ही का होता। मैं और मां बाश्रय के लिए शायद उन्ही का मुह जोहते होते।' 'भया, आप.."आप भी यह सब जानते हैं ?' मैंने अस्फुट स्वर कहा। 'हो मीता, और दुख की बात तो यह है कि यह सब मैं अपने आप जान गया । कितनी छोटी आयु मे मैंने घर के वातावरण से इस कहानी के वीज चुन लिये थे। मा ने पापा को कभी क्षमा नही किया था। उनकी इस इकलौती भूल का वे किसी अमोघ अस्त्र की तरह समय-असमय प्रयोग ?" ज्वालामुखी के गर्भ में : ४१ को रोकने में क्या तुक है।" लेकिन आते ही सारी रामायण सुनाकर इच्छा नहीं हुई। उन्हें परेशान करने की लेकिन इतना सन्न शायद औरों से नहीं हो सका था। शाम को भैया ने कहा, 'चल मीतू, थोड़ा घूम आएं।' वरसात में इंदौर घूमने लायक कतई नहीं रह जाता, पर भैया साथ थे, इसलिए सब-कुछ सुहावना लग रहा था। ओवर ब्रिज पार कर हम लोग 'आइडियल' में जाकर बैठ गये। और स्थानों की अपेक्षा यहीं थोड़ा एकांत था। भैया शायद इसके लिए तरस गये थे। ऑर्डर दे चुकने के साथ ही बोले, 'अव थोड़ा चैन आया। घर में तो जरा भी प्रायवेसी नहीं है। कहने को इतनी बड़ी कोठी है।' फिर थोड़ा रुककर वोले, 'मीता ! हरि को क्या हो गया है ?' 'क्यों?' 'नहीं, मुझे लगा कि सव-कुछ ठीक-ठाक नहीं है, खासकर उसकी पत्नी। मौसी बता रही थीं कि उसका व्यवहार एकदम...' 'वह विलकुल ठीक हैं, वस भ्रांति की शिकार हुई हैं और यही सारे असंतोप की जड़ है। जो सब्जबाग उन्हें दिखाये गये थे, सब-के-सब नकली थे।' 'फैक्टरी का क्या हुआ ?' 'अभी चल रही है, जैसे-तैसे । पर हरि भैया वहां हफ्तों तक झांकते भी नहीं। दिनभर पता नहीं कहां-कहां भटकते रहते हैं। रात गये घर लौटते हैं । अजीव-अजीव-से दोस्त पाल रखे हैं।' 'वेचारा! दरअसल वह लड़का बिजनेस के लायक था ही नहीं। वैसी सामर्थ्य उसके पास नहीं है । इससे तो कहीं नौकरी में लग जाता, तो ठीक रहता।' भैया के स्वर में सहानुभूति का पुट था। 'उनकी अम्मा की महत्त्वाकांक्षाओं का भी तो पार नहीं है।' मैंने कड़वाहट से कहा। 'यही तो रोना है । बीवी से भी तो उसका स्वभाव मेल नहीं खाता। ४० : पापाण-युग उसे तो कोई घरेलू लड़की ही सूट करती । लेकिन यह काफी महत्त्वाकांक्षी है। पता है, उसने हरि से कहा है कि अब वह दूसरों की छत के नीचे नहीं रहेगी।' करा का सारा इतिहास मेरी आखों के सामने घूम गया। मैंने हौले से पूछा, 'आपने कैसे जाना?" 'मौमी ने ही बताया है और मीता, एक बात मेरे मन मे आयी है।' 'क्या?' 'तुम्हें अगर कोई आपत्ति न हो, तो यह मकान मैं हरि के नाम करना चाहता हू' अर्थात् तुम्हारी शादी के बाद ।' दर्द का एक वडामा घट मेरे गले में अटक गया। वरवस अपने आंमू रोकते हुए मैंने पूछा, 'और मा" 'मा मेरे पास रहंगी। किसी-न-किसी दिन तो उन्हें यह फैसला करना ही था। जितनी जल्दी कर लें, उतना अच्छा है।' 'उनसे पूछ लिया है ?' 'हा, एक तरह से यह प्रस्ताव उन्ही की ओर से आया है।' 'पता नहीं, मा यह किम जन्म का कर्ज उतारती जा रही हैं ।' मैंने तड़पकर कहा, 'आपको इस तरह वेघर करने का उन्हें क्या हक है ?' 'जिस दिन पापा की मृत्यु हुई थी मीता, बेघर तो में उसी दिन हो गया था। यह घर कभी मेरी आत्मा को स्वीकार नहीं हुआ। इसके साथ जुड़ी हुई सारी स्मृतियां उदास कर जाती हैं...सिवा तेरे ।' और उन्होंने मेरे माथे को प्यार से यपकिया दिया, "और यह मत भूलो मीतू, कि यदि मौसी जीवन की चाजी जीत गयी होती, तो यह घर आज उन्ही का होता। मैं और मां आश्रय के लिए शायद उन्ही का मुह जोहते होते।' "भैया, आप.. आप भी यह सब जानते है ?' मैंने अस्फुट स्वर में कहा। 'हा मीता, और दुख की बात तो यह है कि यह सब मैं अपने आप जान गया। कितनी छोटी आयु मे मैंने घर के वातावरण से इस कहानी के वीज चुन लिये थे। मा ने पापा को कभी क्षमा नहीं किया था। उनकी इस इकलौती भूल का वे किसी अमोघ अस्त्र की तरह समय-अममय प्रयोग ज्वालामुखी के गर्भ में : ४१ को रोकने में क्या तुक है।' लेकिन आते ही सारी रामायण सुनाकर उन्हें परेशान करने की इच्छा नहीं हुई। . . - लेकिन इतना सन्न शायद औरों से नहीं हो सका था। शाम को भैया ने कहा, 'चल मीतू, थोड़ा घूम आएं।' बरसात में इंदौर घूमने लायक कतई नहीं रह जाता, पर भैया साथ थे, इसलिए सव-कुछ सुहावना लग रहा था। ओवर ब्रिज पार कर हम लोग 'आइडियल' में जाकर बैठ गये । और स्थानों की अपेक्षा यहीं थोड़ा एकांत था। भैया शायद इसके लिए तरस गये थे। ऑर्डर दे चुकने के साथ ही बोले, 'अव थोड़ा चैन आया। घर में तो जरा भी प्रायवेसी नहीं है। कहने को इतनी बड़ी कोठी है।' फिर थोड़ा रुककर बोले, 'मीता ! हरि को क्या हो गया है ?' 'क्यों?' 'नहीं, मुझे लगा कि सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं है, खासकर उसकी पत्ली। मौसी बता रही थीं कि उसका व्यवहार एकदम... 'वह विलकुल ठीक हैं, वस भ्रांति की शिकार हुई हैं और यही सारे असंतोप की जड़ है। जो सब्जबाग उन्हें दिखाये गये थे, सब-के-सव नकली थे।' 'फैक्टरी का क्या हुआ ?' 'अभी चल रही है, जैसे-तैसे । पर हरि भैया वहां हफ्तों तक झांकते भी नहीं। दिनभर पता नहीं कहां-कहां भटकते रहते हैं। रात गये घर लौटते हैं । अजीब-अजीव-से दोस्त पाल रखे हैं।' 'वेचारा! दरअसल वह लड़का विजनेस के लायक था ही नहीं। वैसी सामर्थ्य उसके पास नहीं है। इससे तो कहीं नौकरी में लग जाता, तो ठीक रहता। भैया के स्वर में सहानुभूति का पुट था। 'उनकी अम्मा की महत्त्वाकांक्षाओं का भी तो पार नहीं है।' मैंने कड़वाहट से कहा। 'यही तो रोना है । बीवी से भी तो उसका स्वभाव मेल नहीं खाता। ४० : पापाण-युग उसे तो कोई घरेलू लड़को ही मूट करती । लेकिन यह काफी महत्त्वाकांक्षी है। पता है, उसने हरि से कहा है कि अब वह दूसरों की छत के नीचे नहीं रहेगी।' कल का सारा इतिहास मेरी आखो के सामने घूम गया। मैंने हौले से पूछा, 'आपने कैसे जाना?' 'मौसी ने ही बताया है और मीता, एक बात मेरे मन में आयी है।' 'क्या ?' 'तुम्हे अगर कोई आपत्ति न हो, तो यह मकान में हरि के नाम करना चाहता हू"अर्थात् तुम्हारी शादी के बाद।' ददं का एक बडा-मा घट मेरे गले मे अटक गया। वरवस अपने आंसू रोकते हुए मैंने पूछा, 'और मा " 'मां मेरे पास रहेगी। किसी-न-किमी दिन तो उन्हें यह फैसला करना ही था। जितनी जल्दी कर लें, उतना अच्छा है।' 'उनसे पूछ लिया है ? 'हा, एक तरह से यह प्रस्ताव उन्हीं की ओर से आया है।' 'पता नहीं, मा यह किस जन्म का कर्ज उतारती जा रही हैं। मैंने तड़पकर कहा, 'आपको इस तरह बेघर करने का उन्हें क्या हक है ?" 'जिस दिन पापा की मृत्यु हुई थी मीता, वेघर तो मैं उसी दिन हो गया था। यह घर कभी मेरी आत्मा को स्वीकार नहीं हुआ। इसके साथ जुडी हुई सारी स्मृतिया उदास कर जाती हैं. सिवा तेरे ।' और उन्होंने मेरे माथे को प्यार से थपकिया दिया, 'और यह मत भूलो मीतू, कि यदि मौसी जीवन को याजी जीत गयी होती, तो यह घर आज उन्ही का होता। मैं और मां आथय के लिए शायद उन्ही का मुह जोहते होते।' 'भैया, आप.. आप भी यह सब जानते हैं ?' मैंने अस्फुट स्वर में कहा। 'हां मीता, और दुख की बात तो यह है कि यह सब मैं अपने आप जान गया। कितनी छोटी आयु में मैंने घर के वातावरण से इस कहानी के वीज चुन लिये थे। मा ने पापा को कभी क्षमा नहीं किया था। उनकी इस इकलौती भूल का वे किसी अमोघ अस्त्र की तरह समय-असमय प्रयोग ज्वालामुखी के गर्भ मे : ४१ करती रहीं। पापा वेचारे तव कितने असहाय नज़र आते थे।' 'सच कह रहे हैं ?' 'हां, सच ही तो कह रहा हूं। और वह एक दिन तो आज भी ज्यों-का- त्यों मेरे मन में अंकित है। उस दिन ड्राइवर नहीं आया था। पापा सिरदर्द के कारण आफिस से जल्दी लौट आये थे। मां चाहती थीं कि वे सुनीता को स्कूल से लिवा लाएं। पापा कह रहे थे, स्कूल में फोन कर दो, किसी के भी साथ चली आयेगी। 'वस, इसी जरा-सी बात को मां ने इतना तूल दे दिया। क्या-क्या तो कह डाला। पिछले सारे आरोपों को फिर से दोहरा गयीं वे । कह डाला कि बच्चों के प्रति उनमें जरा भी ममता नहीं है। मजबूर होकर पापा ने गैरेज से गाड़ी निकाली थी और वे सुनीता को लिवाने चले गये थे... और स्कूल से लौटा था उनका और सुनीता का छिन्न-विच्छिन्न शरीर।' सिहरकर मैंने दोनों हाथों से मुंह ढांप लिया। स्मृति की क्षीण रेखाएं कल्पना के सहारे कैसे-कैसे चिन्न वनाने लगी थीं। 'रोओ मत, मीता। अब यह विसरा हुआ अतीत है।' भैया ने खुरदरे स्वर में कहा । मैंने भीतर-ही-भीतर अपने आंसू सोख लिये। एक गहरा मौन हम दोनों के बीच फैल गया। 'मां शायद अपने को अब तक क्षमा नहीं कर सकी हैं.. वेचारी।' कुछ देर बाद कॉफी सिप करते हुए मैं कह रही थी। 'हां, और यह पछतावा उनके साथ जीवन भर रहेगा।' 'अन्याय तो मां के साथ भी कम नहीं हुआ था। पर परिस्थितियां सारा दोष उन्हीं के सिर मढ़ गयी हैं।' मैंने मां के प्रति आर्द्र होते हुए कहा। 'अन्याय तो हुआ था, पर उन्होंने जिस तरह पापा को सताया, वह भी कम भयानक नहीं था। अगर क्षमा नहीं कर सकती थीं, तो उन्हें रास्ते से हट जाना चाहिए था । कम-से-कम वे दो प्राणी तो सुख से जी लेते... मैं तो हैरान हूं, मौसी भी अपने मन की आवाज़ क्यों नहीं सुन सकीं। इस अनमेल विवाह से तो एकाकी जीवन कहीं अधिक अच्छा होता । कम- से-कम उस जीवन में शांति तो होती, सुकून तो होता।' ४२ : पाषाण-युग 'अकेले रह लेना क्या इतना सरल है, भैया? हम लोगों को इतनी आजादी कौन देता है ! विवाह भी कई बार एक विवशता बन जाता है...' कहते-कहते मेरा कंठ इतना भीग उठा कि भैया मुझे देखते रह गये । उनकी पारदर्शी आंखें मेरे भीतर तक उतर आयीं । एकाएक मेरे दोनो कंधे पकड़कर वोले, 'सच कहना, मीता-क्या तुम हरि को लेकर भावक रही हो?' क्या उत्तर था मेरे पास? "तुमने मुझसे कभी कुछ कहा क्यो नही, पगली ! वहाँ मैं अपनी घर- गृहस्थी में खोया रहा और यहां तुम अपने आप में इस तरह घुलती रही.. क्या कभी क्षमा कर पाऊंगा मैं अपने आप को?' 'जो भी हो भैया, हम लोग यह विषय ममाप्त नहीं कर सकते। प्लीज !" और यह कहते हुए मेरा स्वर कांप-काप गया। 'विपय तो सचमुच समाप्त कर ही देना है। बीते हुए को साथ घसीटने से सिर्फ दुख ही हाथ आता है और उसकी आंच तुम्हारे हमराही को भी लग सकती है। यह अन्याय तुम कभी मत करना, क्योंकि इसकी विभीषिका तुम रोज़ देख रही हो । मेरे लिए इतना करोगी न, मीता?' भैया मेरे सिर पर धीरे-धीरे हाथ फेर रहे थे। जीवन में पहली बार लगा कि मैं अनाथ नहीं हूं, मेरे सिर पर भी पिता का छत्र है। सगाई का मुहूर्त तो शाम का निकला था, पर पंचमी के दिन सुबह से ही घर में चहल-पहल हो गयी थी। नौकरों को दम मारने की फुर्सत नही थी-कभी मौसी और कभी भैया की पुकार पर इधर-उधर दौड़ रहे थे। भया की दौड-धूप का तो अंत ही नहीं था। निमत्रणों से लेकर बिछायतकी ध्यवस्था तक-सब उनके जिम्मे था। मौसी भी कम व्यस्त नहीं थी। भैया ने बडी चतुराई से सर्वाधिकार उन्हें सौंप कर खुश कर दिया था। आश्चर्य तो यह था कि मां भी छिटपुट कामों में हाथ बंटा रही थी। करने को इतना मारा काम था, पर संकोच के मारे मुझसे कुछ करते नहीं बन रहा था। और सब ओर से आख मूंदकर कमरे में बैठना भी अच्छा नहीं लग रहा था। इसीलिए मेंटी का टेवल क्लॉथ लेकर वही बरामदे मे बैठ ज्वालामुखी के गर्भ में : ४३ गयी थी। भैया हॉल में विछायत लगवा रहे थे। मिसरानी काकी के बच्चे गुब्बारे फुलाने का काम बड़े शौक से कर रहे थे। 'मनीप?' एकाएक मौसी ने दरवाज़े में खड़े होकर कहा, 'यह तूने क्या किया?' . 'क्यों ? क्या हुआ?' 'यह कालीन इस कोने में क्यों लगा दिया ? लड़की का मुंह दक्षिण को हो जायेगा न।' 'अव यह उत्तर-दक्षिण मुझे नहीं आता, मीसी । तुम लोगों से कहता हूं, पांच मिनट यहां खड़ी रहो, तो पता नहीं अंदर क्या करने लग जाती हो । अब यह काम होने तक यहां से जाना नहीं।' 'अंदर कितना काम पड़ा है भैया। टेंट हाउस से क्रॉकरी आकर पड़ी है, उसे पोंछना है। मिठाइयों की पेटियां खोलनी हैं, थाल जमाना है, पंडितजी का सामान तैयार करना है...' 'घर में बहू के होते हुए तुम इन छोट-मोटे कामों में सिर क्यों खपाती । हो ?' 'क्या कहते हैं ! एक वार नीचे उतरकर झांका भी है उसने।' 'अच्छा ! मीतू, भाभी को बुलाकर तो ला।' भैया ने कहा तो इतना गुस्सा आया मुझे। 'मैं सुबह से यहां फालतू बैठी हूं। मुझसे कोई काम करवाइए न आप लोग । मैं नहीं बुलाने जाऊंगी किसी को।' मैंने तुनककर कहा। 'ठीक है, तो मैं जाता हूं।' और सचमुच वे दनादन सीढ़ियां चढ़कर चले गये। बड़ी मुश्किल से उनके साथ-साथ पहुंच पायी मैं। 'भाभी!' मैंने जल्दी से उनके कमरे में जाकर कहा, 'आपको नीचे बुला रहे हैं ! 'कौन बुला रहे हैं ?' उन्होंने उपन्यास से सिर उठाकर वेफिक्री से पूछा। 'मैं बुला रहा हूं।' दरवाजे के बाहर से भैया का दबंग स्वर आया, तो हम दोनों ही क्षणभर को सकपका गयीं। '४४ : पापाण-युग 'शाम को मीतू की सगाई का कार्यक्रम है । तीन बजे तैयार होकर तुम नीचे आ जाना । और अभी अगर मौसी चाहें, तो उनका भी हाय वटा लो।' इतना कहकर भैया नीचे जाने के लिए उतर चुके थे कि भाभी तेजी से बाहर आयीं और बोली-'यह मालिक मकान का आदेश है ?' 'हां, आदेश ही समझ लो । मालिक न सही, घर का बडा लड़का तो मैं हूं।' बडी सहजता से भैया ने कहा और नीचे उतर गये। बाद का नाटक देखने को मेरी इच्छा नहीं थी, इसलिए मैंने कमरे में अपने को बंद कर लिया। नियोजित वर महोदय की तसवीर को सामने रखकर देखती रही, उसे मन में उतारने का प्रयास करती रही। पता नहीं, कब भैया इसे कमरे में रख गये थे। । ढाई बजे से ही मा-मौसी मुझे तैयार करने का संकल्प ले बैठी । कभी जूडा, कभी चोटी, कभी ढीली, कभी कसी-ऊह, किसी तरह संतोप नही हो रहा था। मा ने अपने तीनो-चारों सेट निकालकर रख दिये थे। दोनो ने अपनी कीमती और चटख साड़ियों का मेरे सामने अंबार लगा दिया था। दोनों बहनें 'चंपई वरन' की थी। ये साड़िया उन पर सचमुच फबती थी, पर मेरा नाम तो कॉलेज मे 'लंक रोज ऑफ अफ्रीका' पड़ा हुआ था, यह उन्हें कैसे समझाती। उन साड़ियों की ओर तो झाकते भी डर लगता था। मा का तो सारा वार्डरोब ही पुराने फैशन का था । बरसों बद रहने के कारण उन कपड़ो मे अजीब-सी गध भर गयी थी। भैया किसी काम से अदर आये, तो मैंने याचना की दृष्टि से उनकी ओर देखा । वे मेरी परेशानी समझ गये और खुद उस ढेर को उलट-पलट करने लगे। तभी सुगंध का एक झोंका-सा भीतर आया और उसके साथ ही यह प्रश्न भी-'मेरे लिए क्या आज्ञा है ?' हम सभी को आखें एक साथ दरवाजे की ओर उठ गयी । वहा जैसे महालक्ष्मी की अलंकृत प्रतिमा ही उतर आयी थी । नाजुक जरी वर्क को साड़ी मे भाभी को पहली बार देखा था। पिछली दीवाली पर यह उनके ज्वालामुखी के गर्भ में : ४५ । पीहर से आयी थी, पर एक बार भी उन्होंने पहनी नहीं थी। एक अजीव- सा विराग उन पर आ गया था। पहनने-औड़ने का कोई शौक ही नहीं रहा था। महीनों उनके चेहरे पर मेकअप की हल्की-सी पर्त भी दिखाई नहीं देती थी पर आज जैसे उन्होंने सारी कसर निकाल ली थी। गर्वोन्नत मुद्रा में द्वार पर खड़ी वे पलभर को सवको अभिभूत कर गयी थीं। उनके इस आयोजन को सार्थक करते हुए सबसे पहले भैया ने ही सहज स्वर में कहा, 'वाह, इसे कहते हैं तैयार होना । सुलक्षणा, अब जरा मीतू को संभालो तो। ये दोनों वहनें तो उसका कार्टून बनाने पर तुली हुई इतना कहकर जब वे बाहर चले गये, तो लगा, मैं एकदम अजनबी हायों में सौंप दी गयी हूं। - चार दिन पता नहीं कैसे फुर्र-से उड़ गये और भैया के जाने का दिन आ पहुंचा । मैं भारी मन से उनके आस-पास ही मंडरा रही थी। सोच रही थी उनके साथ का एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दूंगी। 'आपने बुलाया था ?' दरवाजे के बाहर खड़े होकर भाभी ने कुछ इस अंदाज में पूछा, जैसे उन्हें बुलाकर कोई अपराध किया गया है। 'आओ सुलक्षणा, बैठो। कुछ जरूरी बातें करनी थीं तुमसे।' भाभी भीतर तो आ गयीं, पर बैठी नहीं। दीवार के सहारे खड़ी ही रहीं, मानो कह रही हों-जो कुछ कहना है, जल्दी से कह-सुन लीजिए। 'मैं तुम्हें एक जिम्मेवारी सौंपना चाह रहा हूं। दहेज का सारा सामान तुम लोगों को ही खरीदना है । मैं तो विलकुल समय पर ही आ पाऊंगा। मां और मौसी के भरोसे यह काम नहीं छोड़ सकता। ऊटपटांग सामान खरीदकर घर भर देंगी. ये अभी कुछ रुपये रख लो। जाते ही और भेज दूंगा।' भैया ने उनकी ओर लिफाफा बढ़ाया भी, पर वे उसे अनदेखा कर काठ की तरह खड़ी ही रह गयीं। ४६ : पाषाण-युग ।' 'सुलक्षणा ! क्या सोच रही हो?' 'आप यह काम उन्हें नहीं सौंप सकते थे ?' भाभी ने सीधे उनकी आखों में देखते हुए पूछा, 'या आप भी उन्हें किसी लायक नहीं समझते ?' उनके स्वर की तल्खी परेशान कर देनेवाली थी, पर भैया ने बड़े ही शात स्वर में कहा, 'चाहता तो यही या ! पर तुम्हारे 'उन' का पता- ठिकाना कहा से पाऊंगा । मुझे तो शक है, तुम्हे भी उसके बारे में कुछ नहीं पता।' भाभी के पास कोई उत्तर नहीं था। 'आया था, उस दिन सिर्फ एक झलक उसकी देखी थी...और देख- कर खुशी नहीं हुई थी। चाहता था, पास बिठाकर कुछ बात करूंगा, लेकिन उसके पास शायद फालतू बातों के लिए समय नहीं है । ठीक है न?' और फिर एकाएक गंभीर स्वर में बोले भया, 'मैं तुमसे बहुत नाराज हूँ, सुलक्षणा भाभी की बड़ी-बड़ी आंखें प्रश्न बनकर फैल गयी। 'अपनी गृहस्थी का यह कैसा मजाक बना डाला है तुमने । हरि किस रास्ते से जा रहा है, कुछ पता भी है तुम्हे । या तुमने कभी सोचने की आवश्यकता ही नही समझी?" उत्तर में भाभी के होठ सस्ती से भिच गये। मुझे वहां बैठना अजीव- सा लगने लगा । उठकर चला जाना शायद और भी अशोभन लगता। मैं वैमतलव भैया के सूटकेस को उलट-पलट करती रही। "विवाह कोई बच्चों का खेल तो नहीं है। तुम्हारी बेरुखी देखकर मुझे हैरत होती है । भैया ने फिर कहा, 'विवाह से पहले तुमने इन दायित्वों के बारे में सोचा तो होगा। और भाभी जैसे एकदम फट पड़ी, 'सोचा क्यों नही था, लेकिन विवाह किया था मैंने एक पुरुष के साथ; तब यह नहीं सोचा था कि जिसका वरण कर रही हूं, वह मान रबड़ का एक ववुआ है, जिसके पास न अपनी कोई संवेदनाएं हैं, न आस्थाएं, न बाकाक्षाएं । वह न ढग से प्रेम कर सकता है, न घृणा । इस तरह शून्य में कितने दिन जिया जा सकता है, बतायेंगे ?' उनके प्रवल भावावेग के सामने हम लोग एकदम स्तब्ध रह गये थे। ज्वालामखी के गर्भ में : ४ कुछ समय बाद भैया ने स्नेहसिक्त स्वर में कहा, 'मनुष्य का स्वभाव अपने आप नहीं बन जाता, सुलक्षणा! उसका भी एक इतिहास होता है। हरि का बचपन बहुत सुखद परिस्थितियों में नहीं बीता है। हो सकता है, कुछ ग्रंथियां उसके मन में हों.. लेकिन यह कोई इतना बड़ा कारण नहीं है कि तुम्हें घर छोड़कर जाना पड़े, बल्कि उसे तो तुम्हारी सहानुभूति की जरूरत है।' 'पूज्यनीय भाई साहब, मैं कोई फिल्मी हीरोइन नहीं हूं, जो हमेशा के लिए घर छोड़कर चली जाती।' भाभी का व्यंग्य-भरा स्वर तिलमिला देने वाला था, 'मैं सिर्फ देखना चाहती थी कि उनकी आत्मा में कोई चिनगारी शेप है या नहीं। वे मेरा हाथ पकड़कर मुझे रोक सकते थे। अगर . क्रोध में आकर मेरा रास्ता रोक लेते, तब भी मुझे खुशी होती । लेकिन उनकी मानसिक जड़ता इस हद तक पहुंच चुकी है कि वे टुकुर-टुकुर देखते रह गये । और आप चाहते हैं कि मुझे उनसे सहानुभूति होनी चाहिए। खैर, आपके उपदेशामृत के लिए आभारी हूं। आशा है, दूसरों को अपनी जिंदगी जीने की सुविधा भी कभी-कभी देते रहेंगे।' भाभी निमिप भर में कमरे से अलोप हो गयीं। पर उनके दर्प भरे अस्तित्व का बड़ी देर तक भान होता रहा । और एकाएक मुझे भान हुआ कि वे भैया का कितना बड़ा अपमान कर गयी हैं। रोप में भरकर मैंने कहा, 'आपको क्या जरूरत थी उस पचड़े में पड़ने की। उन्होंने कभी किसी की बात मानी भी है आज तक । हरि भैया उन्हें आग का गोला कहते हैं।' 'आग का गोला! सचमुच यह तो भभकता हुआ ज्वालामुखी ही है। पता है, उसे मैंने क्यों बुलाया था। मैं घर के बारे में भूमिका बांधना चाहता था, पर हिम्मत ही नहीं हुई। उसका इतना बड़ा अपमान करने का साहस नहीं बन पड़ा मेरा।' भैया गंभीर होकर बोले । 'इसमें अपमान भला क्या होता! बल्कि 'तू समझती नहीं है, मीतू। उसकी जाति के लोग दान-पत्रों से अपमानित ही होते हैं।' . 'मीतू !' भैया को सी-ऑफ करके लौटने के बाद, अपने कमरे में बैठी मैं ४८ : पापाण-युग चुपचाप आंसू बहा रही थी। भाभी को बावाज सुनकर चौंक पड़ी। वे मेरे पास ही पलंग पर आकर बैठ गयी थी। उस अनजाने सामीप्य से ही याद आया कि उन्होंने हमेशा की तरह 'नमिता जी' कहकर आवाज नही दी थी। 'क्या है ?' मैंने रुखाई से पूछा। उन्हें मैं अब तक क्षमा नहीं कर पायी थी। "एक बात कहनी थी।' 'कहिए।' 'अभी-अभी मन में बात उठी, तो कहने चली आयी, बाद में पता नही कह भी पाऊंगी या नहीं।' 'कहिए भी।' 'अपने भाईसाहब को पत्र लिखोगी न ! तव मेरी ओर से क्षमा मांग लेना । मुझे इतना कटु व्यवहार नही करना चाहिए था।' 'यह बात उनके सामने कहती, तो शायद वे ज्यादा सुश होते । पता है, कितने बुरे मूड में यहा से विदा हुए हैं वह ।' 'पता नही मुझे आजकल क्या हो जाता है । वे बात कर रहे थे, तो मुझे लगा, अपना अधिकार जता रहे हैं । और मेरा खून खौल गया । यह तो बाद मे ठंडे दिमाग से सोचने पर लगा कि अधिकार तो उनका फिर भी हम पर है, बड़े जो हैं।' 'हां, और उसी प्यार के अधिकार से वे दो बातें कर लेना चाहते थे, पर आपके तो मन में पता नहीं कैसा पूर्वग्रह पैठ गया है। मैंने तुनककर कहा, 'कितनी बड़ी बात कहने जा रहे थे वे आपसे, पर आपने मौका ही न दिया।' 'क्या बात थी?' 'यह घर हरि भया के नाम करना चाहते हैं वह । 'क्या? ...'भाभी चीखी और एकदम उठ खड़ी हुई, 'सच कह रही हो, नमिता?' 'हा, और आपको खुश होना चाहिए कि आपकी जिद पूरी हुई। बद से आपको किसी और के घर में नहीं रहना पड़ेगा।' 'तो यह मेरी शान मे हो रहा है" नमिता, अभी-अभी मैं तुम्हारे ना ।' ज्वालामुखी के गर्भ में :
।' साहब से क्षमा मांगने आयी थी। लेकिन लगता है, अब कभी क्षमा नहीं कर पाऊंगी। शादी के बाद हर औरत अपना घर चाहती है। इसमें अनहोनी क्या है ? फिर उसके लिए इतना आडंबर रचने की क्या आवश्यकता है।' 'इसमें आडंवर क्या है, भाभी? यह तो बल्कि...' 'एक और उपकार है, यही न । पिछले अहसानों के बोझ से दबे हुए हैं अव तक हम लोग । इसके बाद तो शायद कभी भी सिर नहीं उठा सकेंगे। एक तरह से मेरी उमरकैद का फरमान होगा यह 'क्या अंटशंट बके जा रही हैं आप ! अहसानों की भाषा में हमने कभी सोचा भी नहीं।' 'यही तो आपका बड़प्पन है। देते जायेंगे और कभी जवान पर नाम न लायेंगे, लेकिन हमारे लेते रहने की भी तो कुछ सीमा होनी चाहिए... सच कहती हूं नमिता, मैं किराये के दो कमरों में भी गुज़ारा कर लूंगी, बशर्ते वह मेरा घर हो । जहां हर पल यह भान न होता रहे, हम किसी और की छत के नीचे खड़े हैं । हर कौर के साथ यह ग्लानि न लिपटी रहे कि हम किसी और का दिया खा रहे हैं । इस तरह का अन्न खाते-खाते इन लोगों का स्वाभिमान जंग खा चुका है। पर मुझमें अभी कुछ स्वत्व शेप है, तभी तक मुझे यहां से चले जाना है ।' कहते-कहते भाभी बुरी तरह कांप उठी थीं। उनका चेहरा एकदम श्रांत-क्लांत हो गया था, आंखों की कोरें भीग गयी थीं। 'आप बेकार परेशान न हों,' मैंने सांत्वना के स्वर में कहा, 'भैया समझ गये थे कि इस बात से आपको दुःख होगा । इसीलिए फिर चुप रह गये थे।' 'भाई साहब बहुत समझदार हैं।' उन्होंने थके स्वर में कहा, 'उन्हें मेरी ओर से धन्यवाद दे देना और कहना-इतने उपकार किये हैं, तो एक और कीजिए, अंतिम । हम लोगों को निकाल बाहर कीजिए।' 'छिः भाभी, कैसी बातें करती हो!' मैंने मीठी झिड़की दी। 'सच कह रही हूं नमिता, दो पीढ़ियां इस घर में राख हो चुकी हैं। तीसरी को मैं आग में नहीं झोंक सकती। नहीं, मैं यह नहीं कर सकती।' - - ५० : पापाण-युग 'तीसरी पीढ़ी ?' 'हां, महाभारत के अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्र-व्यूह-प्रवेश का तंत्र सीख लिया था। मेरा अभिमन्यु मुझे चक्रव्यूह से बाहर आने का मंत्र दे रहा है।' 'तुम्हारा अभिमन्यु ?.."ओ भाभी, हाउ स्वीट !' और मैं दोनों वाहे उनके गले में डालकर झूल गयो । हरि के अजन्मे शिशु के प्रति यह कैसी ममता उमड़ आयी थी !
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पाषाण-युग
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'चल वकुल, तेरे दुल्हे को स्टेशन छोड़ आएं।' भाभी ने लाह भरे स्वर में इसरार किया। 'ना वाया ! मैं तो यही मे टाटा कर लूगी।' मैंने कहा। भाभी ने ज्यादा जोर नहीं दिया, तो समझ गयी कि महज एक फार्मेलिटी निभायी यी उन्होंने । चली जाती, तो शायद उन्हें असुविधा ही होती। लेकिन जब अपनी तीनों मवारियों को लेकर तागा आंखो से ओझल हो गया, तब लगा, चली ही जाती, तो ठीक था। कुछ ऊब तो कम हुई होती। पर दूसरे ही पल इनका रातवाला रौद्र रूप याद आया, तो लगा, अच्छा ही हुआ। कही सबके सामने ही कुछ कह बैठने तो! रात तो खैर, अपने अपमान को मैंने अकेले ही झेल लिया था। भाभियो ने तो इतनी चुहलबाजी के बाद ठेल-ठालकर मुझे कमरे मे भेजा या, पर दरवाजा बद करते ही ये उबल पड़े थे, 'हर वात का अपना एक समय होता है, बकुल । अपना एक औचित्य होता है । इस घर की जो भी परंपरा रही हो, लेकिन मैं इतना अधीर नहीं कि श्वसुर की तेरही के दिन भी पत्नी की कामना करने लगू। उनके इस वक्तव्य से स्तब्ध रह गयी थी मैं । जवाब भी क्या देली ! कैसे बनलाती कि आयी हूं, उसी दिन से इमी कमरे में मेग बिस्तर लगता रहा है । दूसरा ठोर ही कहां था! दोनों भाभियों ने तो अपने-अपने कमरे पापाण-युग : ५५ । . घेर लिये थे। कभी किसी ने नहीं सोचा कि वकुल अकेली कमरे में घबराएगी। उसके पास कोई सो जाए, या अपने पास ही बुला ले। दाखीवाई तो रोज़ बर्तन मलते हुए बड़बड़ाती थी, 'बाप मरे पे भी लुगायों नी छोड़ी जायें हो । कसो जमानो आयो है।' चूड़ियां खनकी, तो मैंने पीछे मुड़कर देखा, दाखीवाई ही थी। सूखे कपड़ों का ढेर समेट रही थी। 'कंवर साव गिया कांई ?' उसने पूछा। मैंने सिर हिला दिया। 'तम नी गया साथे ?' 'अभी कुछ दिन मम्मी के पास रहूंगी।' 'और ई सब ?' 'ये लोग तो कल-परसों चले जायेंगे । छुट्टी खतम हो रही है न ।' 'हूं।' उसने मुंह विचका दिया। उसके मन का सारा अविश्वास, सारा तिरस्कार इस भंगिमा में प्रकट हो गया। शिशिर की गुनगुनी धूप में छत पर खड़ा रहना बड़ा सुखद लग रहा था, पर दाखीबाई का वाचाल साथ रसभंग करनेवाला ही था। उसके लिए कोई भी विषय निपिद्ध नहीं था और कई बार वह मुझसे भी कुछ न कुछ कहलवा ही लेती थी। और फिर देर तक मुझे डर लगा रहता कि किसी ने सुन न लिया हो। 'नीचे कोई आया तो नहीं ?' मैंने जीने की ओर पैर बढ़ाते हुए पूछा। 'आया है नी! छोटी भाभी जी बैठी हैं वड़ा कमरां मां।' मेरा दिल बैठने-सा लगा। इन दिनों आनेवालों का तांता लगा हुआ था। हॉल तो कभी खाली ही नहीं रहता । पापा की लोकप्रियता का सजीव प्रमाण था यह । पहले-पहल तो ढेर सारे लोग देखकर खुशी होती थी... लगता था, इतने सारे लोग हमारे दुःख में हिस्सा बंटा रहे हैं । लेकिन अब ता दहशत-सी होने लगी है । बार-बार वही जुमले वोलकर मुंह का स्वाद जाता रहा है और प्रत्येक वार प्रत्येक आगंतुक को रिपोर्ट-सी देनी होती है- अजय कब आया ? अभय कब आया ? कितने दिन ठहरेंगे? शकुन क्यों नहीं आयी ? और फिर दीदी के विवाह की अप्रिय चर्चा | । ५६ : पापाण-युग इन सबसे बचने के लिए मैंने पिछले दरवाजे से जाना ही ठीक समझा। दवे पाव जीना उतरकर मैं वगीचे की ओर मुड़ गयी। हॉल के नीचे से गुजर रही थी, तभी मुना, छोटी भाभो नाटकीय शैली में बता रही थीं, 'हाय, मैं तो इतनी घबरा गयी थी। इंडवॉडी को लाइफ में फस्ट टाइम देखा था न! ओह, इट वॉज टेरीवल!' इतनी कोफ्त हो आयी। आखिर यह सब कितनी बार कहा जायेगा और डेड बॉडी क्या रोज देखने की चीज़ है ! कौन ऐमा अभागा होगा! सच तो यह है कि इस तरह की बात कहने से दो काम सिद्ध होते हैं। एक तो अपनी नजाकत का वखान हो जाता है। दूसरे यह भी साबित हो जाता है कि पापा को मृत्यु के समय केवल यही लोग उपस्थित थे और अगर थे भी, तो आश्चर्य क्या है ! आखिर नागदा से इंदौर की दूरी ही कितनी है । इन्हें तो समय पर पहुचना ही था। लेकिन कितनी बार यह प्रसंग सुनाया जायेगा। यू ही लते-भुनते मैंने पिछले दरवाजे से भीतर पर दिया, तो मसालो की सुगंध ने स्वागत किया । समझते देर नहीं लगी कि बुआजी किचन में विराजमान है। आयी है, उसी दिन से उन्हें शिकायत है कि महाराज साना ढंग से नहीं बनाता । इसीलिए अकसर कुछ-न-कुछ अपनी पसद का छोंक लेती है। 'आज तो बुआजी, बड़ी जल्दी खाना बन रहा है।' मैंने एक कुर्सी खीचकर आसन जमाते हुए पूछा। 'अरे, माज गीता भवन जाऊंगी। महाराज वोला कि बड़े अच्छे प्रवचन हो रहे हैं वहा । और सुन तो, अजय कहा गया है " 'स्टेशन गये हैं, इन्हे छोड़ने ।' 'बहू भी साथ गयी है क्या? बड़ी देर से दिखाई नहीं दो।' (बुआजी का दिमाग क्या है, पूरा हाजिरी रजिस्टर है)। मैंने जवाव नहीं दिया, तो बोली, 'अच्छा लगता है यह ! लोग तुम्हारे दरवाजे मिलने आ रहे हैं और तुम मिया-बीवी घूमने जा रहे हो।' 'दरअसल उन्हें बच्चों के लिए कुछ 'अरे, वाह ! दुनिया तो बंबई से सामान मंगाती है और ये यहा से ले पाषाण जायेंगी। और बच्चों को साथ ले आतीं, तो क्या छूत लग जाती? कोई बीए-एमे की पढ़ाई थी, जो मारी जाती। अरे, बच्चों का दादा भरा था, कोई ऐरा-गरा नहीं था। 'हम भी तो अपनी सुमा को लाये ही हैं कि नहीं।' छोटी भाभी ने. आग में घी छोड़ते हुए कहा। वे पता नहीं कव मेहमानों को विदा करके भीतर मा गयी थीं। मैंने बेजार होकर मेज़ पर सिर रख दिया। शोक-प्रदर्शन की जैसे होड़-सी लगी हुई है और हर कोई दूसरे से बाजी मार लेना चाहता है। और जिस पर यह दु:ख का पहाड़ टूट पड़ा है, उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है । फूफाजी की मृत्यु पर मैं पापा के साथ बुलंदशहर गयी थी, तव देखा था-बुआजी दिनभर निढाल पड़ी रहतीं और घरभर उन के आराम के लिए, सांत्वना के लिए खटता रहता। घर में पचासों लोग आ-जा रहे थे, उन्हें कोई होश नहीं था। कितने रिश्तेदार घर में जुट गये थे, कितने सारे लोगों के लिए रोज़ खाना वनता था, पर उन्हें कोई परेशान नहीं करता था। और यहां, यहां तो सब जैसे मेहमानदारी के लिए ही आये हुए हैं। हर बात के लिए मम्मी के पास दौड़ जायेंगे -मम्मीजी, मच्छरदानियां कहां रखी हैं ? मम्मीजी, गैस खतम हो गयी ! मम्मीजी, शाम को दूध कितना आयेगा ? मम्मी, अमुक का फोन नंबर क्या है ? मम्मी, सामान कौन-सी दुकान से आयेगा? एक नहीं, सौ-सौ प्रश्न । अपनी जिम्मेवारी पर जैसे कोई कुछ करन ही नहीं चाहता । और पत्थर में तराशा-सा चेहरा लिये मम्मी सवके जवार दिये जाती हैं । जरूरत आ पड़े, तो खुद भी दो-चार काम निपटाती रहतं हैं। और ऐसे मौकों पर मुंह पर पल्लू की आड़ देकर बुआजी फुसफुसार रहती हैं, 'उसे क्यों दरद आयेगा भला । कौन फेरे पड़कर इस घर में आर . जैसे दु:ख के लिए भी अग्नि-नारायण की साक्षी बहुत जरूरी है। भला हो महाराज का, जो बुआजी को गीता भवन के प्रवचन सुनाने लि ५८ : पापाण-युग ले गया और हम लोगों को पहली बार कुछ प्रायवेसी मिली। देर रात तक हम लोग बैठे वतिपाते रहे । पता नहीं, कितने सालों बाद यह संयोग आया था। दसेक बज चुके होंगे, जब बड़े भैया बोले, 'एक-एक कप कॉफी हो जातो, तो मजा मा जाता।' मैंने कुछ क्षण प्रतीक्षा की, पर दोनों भाभियां बुत बनी बैठी रही। तव मैंने ही यह भार अपने ऊपर ले लिया और नीचे आ गयी। मम्मी के कमरे की बत्ती जल रही थी। सोचा, चलकर उनसे भी पूछ लू । 'मम्मी, आप...' मैंने कहा तो, पर शब्द जैसे मुंह में ही जम गये । उनकी छोटी-सी राइटिंग मेज पर ढेर-सी चिट्ठियां बिखरी पड़ी थीं और वे निनिमेष सामने गुप्ताजी की कोठी की ओर देख रही थी। एक उजड़ी हुई दुनिया उनके चेहरे पर प्रतिविवित हो उठी थी और मुझे यह ग्लानि कचोटने लगी कि इतनी देर तक किसी को भी उनका ध्यान न आया। सहसा कुछ सम्मिलित ठहाकों की आवाज सामने वाली कोठी से उभरी और कलेजे को चीरती चली गयी। मम्मी ने भी दोनों हथेलियों से कान ढक लिये। तो क्या उन्हें भी उन ठहाको मे पापा की हंसी को अनुगूंज मुनाई दे गयी थी। तैश में आकर मैंने इतनी जोर से खिडको बद की कि वे भी चौक पड़ी, 'कौन है"बकुल 'क्या ये लोग कुछ दिन तक सेल नही बद कर सकते ?' मैंने गुस्से से उफनते हुए कहा। 'इतने दिनो बाद आज ही तो बैठे हैं बेचारे।' उन्होंने शात स्वर में कहा, 'खेलने का तो बहाना है। दरअसल ये लोग तो अपनी मॉनोटॉनी से, ऊय से भागकर यहा आते हैं । ऐसा न करें, तो अपने पेशे मे ही दफन हो जायेंगे ये सब।' मुझे इस वक्तव्य में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए मैंने कहा, 'दरअसल मापसे पूछने आयी थी, माप कॉफी लेंगी? मैं सबके लिए बना रही हूं।' 'चलेंगी। और हा, आपको परम पूज्यनीय बुआजी कहा हैं ? बड़ी पाषाण-युग :.". .
देर से उनकी गर्जना नहीं सुनाई दी।'
मुझे आश्चर्य होता है, इतनी तीखी बात भी मम्मी कितने स्वाभाविक
ढंग से कह जाती हैं।
'वुआजी आज थोड़ा पुण्य' संचय करने गयी हैं।'
'अच्छा ! तब एक काम करो। सबकी कॉफी यहीं ले आओ। कुछ
जरूरी बातें करनी हैं।'
बुआजी की अनुपस्थिति का लाभ हर कोई उठाना चाहता है, मैंने
सोचा और किचन का रुख किया।
!
'आप क्यों दिनभर इन चिट्ठियों में दिमाग खपाती हैं। एक अच्छा-सा
मैटर प्रिंट करवा लेते।' बड़े भैया ने उस कॉफी-पार्टी का मौन तोड़ते हुए
कहा।
'मेरे पास करने को अव है ही क्या। चिट्ठियां लिखते हुए कुछ समय
तो कट जायेगा।'
'मम्मी, आप मेरे साथ चलिए न ।' इतने दिनों से मन में घुमड़ती बात
को मैं आज कह पायी।
'पगली! जाना ही होगा, तो पहले अपने लड़कों के पास नहीं जाऊंगी।'
'मम्मी ने अजीव-से वुजुर्गाना अंदाज में कहा ।
'श्योर-श्योर।' बड़े भैया बोल उठे और काफी देर तक भाभी को
इशारा करते रहे। पर जान-बूझकर वे एक पत्रिका के पन्ने पलटती हुई
उन्हें अनदेखा करती रहीं। बंबई के अपने ढाई कमरों वाले फ्लैट में शायद
वे मम्मी को एडजस्ट नहीं कर पा रही थीं.. और छोटे भैया से ऐसी उम्मीद
ही व्यर्थ थी।
एक अजीब-सी चुप्पी कमरे में फिर घिर आयी थी। मम्मी ने ही उसे
तोड़ते हुए शुरूआत की, 'मैं ऊपर की मंजिल किराये पर देने की सोच रही
'किराये पर,
पर, क्यों?'
'इतने बड़े घर में मैं अकेली कैसे रह पाऊंगी? और "और मुझे पैसों
की भी जरूरत है।'
'६० : पाषाण-युग
एक अजीब-सी शर्म से हम लोग भीतर-ही-भीतर सिकुड़ गये। सचमुच मम्मी के हिस्से क्या आया था, सिर्फ यह मकान । पापा की पुस्तकों की रायल्टी भी थी, पर वह कितनी होगी ! गंभीर, विद्वत्तापूर्ण विवेचनात्मक पुस्तकें थी वे-उपन्यास तो थे नहीं कि हाथों-हाथ विक जाते । पापा ने अपनी सारी पुस्तकें कॉलेज को दे दी यो । मां के भारी-भरकम गहन बहुओं में और मुझमें बंट गये थे । थोडी-बहुत जमापूंजी थी, उसमें सबका हिस्सा था.. और एक प्रोफेमर की कमाई होती ही कितनी है। मम्मी ने ठोक ही तो सोचा है । जीवनयापन के लिए कुछ तो चाहिए । 'मैं यह सोच रही थी कि यहां से जो सामान जिसे अच्छा लगता हो, लेते जाओ। उतनी-सी जगह में सारा सामान समायेगा नहीं।' मम्मी शांत स्वर मे कह रही थी। 'लेकिन मम्मीजी,' इतनी देर बाद छोटी भाभी का मुंह खुला, 'सव लोग आ जाते हैं, तो घर आज भी छोटा पडता है। फिर तो बहुत ही मुश्किल होगी।' 'सब लोग कब-कब आते हैं, अणिमा। उनके सामने ही कितनी बार आये हो तुम लोग !' मम्मी ने अपने उसी सहज स्वर मे चोट की। छोटी भाभी का मुंह इतना-सा निकल आया । "एक बात और पूछनी थी। इस पर के प्रति तुम लोगों को कोई मोह तो नहीं है?' 'क्या मतलव ?' 'मैं इसे शकुन के नाम कर जाना चाहती हूं।' स्तब्ध रह गये हम लोग। दीदी के नाम ? क्यों ? मम्मी को सबसे ज्यादा तिरस्कार, उपेक्षा, अवना जिनसे मिली, उन्ही के नाम इतना बड़ा दान ! क्यों? (सच कहूं तो मुझे कुछ कचोट-सी हुई। मैं अपने को सबसे ज्यादा मम्मी के निकट पाती थी)। 'हमें कोई एतराज नहीं है मम्मी,पर मैं नहीं सोचता, दीदी अव लौटेंगी। वे तो वही सेटल हो चुकी है।' बड़े भैया ने जैसे सबके मन को 'न आये तो ठीक ही है, वह जहा भी रहे, मुख से रहे। लेकिन अगर किसी दिन लौटना भी चाहे, ती यहा उसका ठिकाना तो होना चाहिए कि । कह दी। पापाण-युग : ६१
देर से उनकी गर्जना नहीं सुनाई दी।'
मुझे आश्चर्य होता है, इतनी तीखी बात भी मम्मी कितने स्वाभाविक
ढंग से कह जाती हैं।
'बुआजी आज थोड़ा पुण्य संचय करने गयी हैं।'
'अच्छा ! तब एक काम करो। सबकी कॉफी यहीं ले आओ। कुछ
जरूरी बातें करनी हैं।'
बुआजी की अनुपस्थिति का लाभ हर कोई उठाना चाहता है, मैंने
सोचा और किचन का रुख किया।
'आप क्यों दिनभर इन चिट्ठियों में दिमाग खपाती हैं। एक अच्छा-सा
मैटर प्रिंट करवा लेते।' बड़े भैया ने उस कॉफी-पार्टी का मौन तोड़ते हुए
कहा।
'मेरे पास करने को अब है ही क्या। चिट्ठियां लिखते हुए कुछ समय
तो कट जायेगा।
'मम्मी, आप मेरे साथ चलिए न ।' इतने दिनों से मन में घुमड़ती वात
को मैं आज कह पायी।
'पगली! जाना ही होगा, तो.पहले अपने लड़कों के पास नहीं जाऊंगी।'
मम्मी ने अजीव-से वुजुर्गाना अंदाज में कहा ।
'श्योर-श्योर।' बड़े भैया बोल उठे और काफी देर तक भाभी को
इशारा करते रहे। पर जान-बूझकर वे एक पत्रिका के पन्ने पलटती हुई
उन्हें अनदेखा करती रहीं। बंबई के अपने ढाई कमरों वाले फ्लैट में शायद
वे मम्मी को एडजस्ट नहीं कर पा रही थीं. और छोटे भैया से ऐसी उम्मीद
ही व्यर्थ थी।
एक अजीव-सी चुप्पी कमरे में फिर घिर आयी थी। मम्मी ने ही उसे
तोड़ते हुए शुरूआत की, 'मैं ऊपर की मंजिल किराये पर देने की सोच रही
।
'किराये पर, क्यों ?'
'इतने बड़े घर में मैं अकेली कैसे रह पाऊंगी? और और मुझे पैसों
की भी जरूरत है।'
'६० : पाषाण-युग
एक अजीब-सी शर्म से हम लोग भीतर-ही-भीतर सिकुड़ गये। सचमुच मम्मी के हिस्मै क्या आया था, सिर्फ यह मकान । पापा की पुस्तकों की रापल्टी भी थी, पर वह कितनी होगी! गंभीर, विद्वत्तापूर्ण विवेचनात्मक पुस्तकें थी वे--उपन्यास तो ये नहीं कि हाथों-हाय विक जाते । पापा ने अपनी सारी पुस्तकें कॉलेज को दे दी थी। मां के भारी-भरकम गहने बहुओं में और मुझमे बट गये थे। थोड़ी-बहुत जमापूंजी थी, उसमें सबका हिस्सा था. और एक प्रोफेसर की कमाई होती ही कितनी है। मम्मी ने ठीक ही तो सोचा है । जीवनयापन के लिए कुछ तो चाहिए। 'मैं यह सोच रही थी कि यहां से जो सामान जिसे अच्छा लगता हो, लेते जाओ। उतनी-सी जगह में सारा सामान समायेगा नहीं।' मम्मी शात स्वर में कह रही थी। ग्लेकिन मम्मीजी,' इतनी देर बाद छोटी भाभी का मुंह खुला, 'सव लोग आ जाते हैं, तो घर आज भी छोटा पड़ता है। फिर तो बहुत ही मुश्किल होगी।' 'सब लोग कब-कद आते हैं, अणिमा। उनके सामने ही कितनी बार आये हो तुम लोग ।' मम्मी ने अपने उसी सहज स्वर में चोट की। छोटी भाभी का मुंह इतना-सा निकल आया। "एक बात और पूछनी थी। इस घर के प्रति तुम लोगों को कोई मोह तो नहीं है?' 'क्या मतलब ?' 'मैं इसे शकुन के नाम कर जाना चाहती हूं।' स्तब्ध रह गये हम लोग। दीदी के नाम? क्यो? मम्मी को सबसे ज्यादा तिरस्कार, उपेक्षा, अवज्ञा जिनसे मिली, उन्ही के नाम इतना बड़ा दान ! क्यों ? (सच कहूं तो मुझे कुछ कचोट-सी हुई। मैं अपने को सबसे ज्यादा मम्मी के निकट पाती थी)। 'हमें कोई एतराज नहीं है मम्मी, पर मैं नहीं सोचता, दीदी अब लौटेंगी। वे तो वही सेटल हो चुकी हैं।' बड़े भैया ने जैसे सबके मन को वात कह दी। 'न आये तो ठीक ही है, वह जहा भी रहे, सुख से रहे। लेकिन अगर किसी दिन लौटना भी चाहे, तो यहा उसका ठिकाना तो होना चाहिए कि पापा..
था, 'कुछ मंज़िलें ऐसी होती हैं रणजीत, जहां से लौटने की राह नहीं होती।' रात के घुप्प अंधेरे में यह वात एकदम विजली की तरह कौंध गयी। दीदी की बात कहते हुए मम्मी क्या अपना ही इतिहास नहीं दोहरा रही थीं! दीदी की शादी तो महज एक अप्रिय घटना थी, पर मम्मी की शादी तो अपने साथ एक तूफ़ान लायी थी । उम्र के इस पड़ाव पर खड़े होकर पता लगता है, मम्मी ने कितना उपहास सहते हुए यह कदम उठाया था। कितना भरा-पूरा ममतामय परिवार पीछे छोड़ आयी थीं वे और स्वागत को थे चार-चार जवान होते हुए बच्चे, जिनके हृदय प्रतिहिंसा और विद्वेष से धधक रहे थे। और पाटने को कितनी खाइयां थीं-जाति की, भाषा की, संस्कारों की और सवसे बढ़कर उम्र की। कैसे निभाया होगा उन्होंने यह सब ? कैसे काटे होंगे ये लम्बे बारह वर्ष ? कैसे जीवित रख पायीं अपनी अस्मिता, अपना अहं ? पापा मन एकदम पीछे दौड़ गया था। मई की उस वेफिक सुवह में हम चारों नाश्ते की मेज़ पर थे। पर रोज की तरह चीख-पुकार, छीना-झपटी, शोर-शरावा कुछ नहीं हो रहा था। महाराज को अपनी शालीनता से चौंकाते हुए हम लोग चुपचाप कोर मुंह में ठुसे जा रहे थे। मेज़ के बीचों- बीच पड़ा तार का गुलावी कागज़ हम सबको मुंह चिढ़ा रहा था। 'नीरजा से शादी कर ली है रविवार को पहुंचूंगा उस छोटे-से वाक्य ने जैसे हम सबके मुंह के शब्द छीन लिये थे । और फिर एकाएक छोटे भैया मेज़ पर मुक्का मारकर चीखने लगे, 'मैं उसे घर से बाहर निकाल दूंगा और वुढ़ऊ को शूट कर दूंगा।' 'बकवास मत करो !' बड़े भैया गुर्राये । 'मुझे तो पहले ही पता था।' दीदी बोलीं। 'वकवास मत करो !' बड़े भैया फिर गुर्राये, 'किसी को कुछ पता नहीं था। यह केवल सरप्राइज की तरह हुआ। ए हेटफुल सरप्राइज ।' 'वकुल तो बड़ी खुश हो रही होगी। मोस्ट फेवरिट नीरू दीदी... - ६४ : पाषाण-युग 'क्या नीरू दीदी तुम्हारी फेवरिट नही थी?' मैंने तड़पकर कहा और सब एकदम चुप हो गये। मैंने झूठ नही कहा था। मा के बिना भाय-भाय करते हुए इस पर के लिए नीरू दीदी सचमुच वरदान थी। हम सभी अपनी-अपनी जरूरतों के लिए उनका मुह तकते थे । बड़े भैया उनका बुना स्वेटर पहने बड़ी शान से कॉलेज जाते थे। कॉलेज से लौटकर छोटे भैया बड़ी शान से चाय-नाश्ते की फरमाइश करते थे। मेरे लिए तो वे सबसे बड़ा आश्रय-स्थान थी। मा की याद जब असह्य हो उठती, तब उन्हीं की गोद मे मुह छिपाकर रो लिया करती थी। इसके अतिरिक्त डियेट्स के लिए पाइट्स तैयार करना, समारोह के लिए फेन्सी ड्रेस चुनना, रविवार के दिन धुले हुए वालो को मुलझाना -सारे काम उन्ही को सौंपकर मैं निश्चित हो जाती थी। दीदी के पास इन फालतू कामो के लिए वक्त कहा था। एक तो मेडिकल की पढाई, दूसरे किशोर भाई “वस, उनका सारा समय इन्ही मे वीतता था। इसी- लिए हर छोटी-छोटी बात के लिए नीरू दीदी का सहारा लेना पड़ता । इस सबके बावजूद उनका यू अचानक मा की जगह ले लेना किसी को अच्छा नहीं लगा-मुझे भी नहीं। टैक्सी रुकी, तो हम लोग खिड़कियो से झाक-झाककर देखने लगे। अपना सूटकेस लेकर नीरू दीदी उतरी थी, अकेली । वे चटनी कलर की काम- दार चंदेरी साड़ी पहने थी।प्यारा-सा खूब बडा-सा जूडा बना रखा था। माथे पर बड़ा-सा गोल टीका था और माग मे दप-दप करती गाढ़ी सिंदूर की रेखा थी। नीरू दीदी एकदम अलग लग रही थी...और खूब अच्छी। 'हलो एवरीवडी !' कुछ ही पल में उनके अभ्यस्त चरण उन्हे डायनिंग रूम के दरवाजे तक ले माये थे। दोनो भैया तो पता नहीं कब से खिसक गये थे। लेकिन दीदी अपनी नाराजगी का खुला प्रदर्शन करती हुई उनके सामने से निकल गयी । मुझे कुछ सूझ ही नहीं पड़ा, मैं वही कुर्सी से चिपकी बैठी रह गयी। क्षणभर पहले खिले गुलाव-सा लगनेवाला उनका चेहरा एकदम मुरझा गया। 'पापा कहा हैं ?' बड़ी देर बाद मैंने पूछा। - पापाण-यग ६५ 'यूनिवर्सिटी गये हैं। डीन ऑफ फैकल्टीज की मीटिंग थी शायद ।' उन्होंने बुझी-सी आवाज़ में कहा । इतना गुस्सा हो आया पापा पर । यहां परिस्थिति से जूझने के लिए उन्हें अकेले भेज दिया और खुद कायर की तरह यूनिवर्सिटी में जाकर दुवक गये। । एकाएक मुझे उन पर ममता हो आयो। अपनी कुर्सी खिसकाते हुए मैंने कहा, 'दीदी, आप बैठिए न ! मैं अभी चाय के लिए कहकर आती हूं।' लोटकर देखा, नीरू दीदी टेबल पर सिर डाले चुपचाप बैठी हैं । आंखों में एक अजीव-सा सूनापन घिर आया है। 'दीदी, चाय लीजिए। नाश्ता अभी लेंगी या पापा के साथ ?' मैंने कुछ-न-कुछ बोलते रहने की गरज से कहा। 'तार कव मिला?' अभी-अभी।' 'बहुत नाराज हो न तुम लोग !' 'दीदी, आप चाय ले लीजिए, ठंडी हो रही है।' 'बकुल !' इस बार उनकी आवाज़ खूब कांप रही थी, 'प्लीज, मुझे मम्मी कह सकोगी ?' मैं स्तब्ध होकर देखती रह गयी। 'औरों से तो कहने की हिम्मत नहीं है, पर तुम पर शायद थोड़ा अधिकार है।' एक दिन - 'इस औरत के साथ मैं इस घर में नहीं रह सकती।' दीदी ने अपना फैसला सुना दिया। उनकी इंटर्नशिप शुरू हो गयी थी। हर महीने एक छोटी रकम उनके हाथ आ रही थी, इसीलिए वे पापा से इस टोन में बात कर सकीं। यह तो अच्छा था कि नीरू दी-सॉरी मम्मी, वहां नहीं थीं। वे बहुत ही कम नीचे उतरतीं । पापा भी ऊपर अपने कमरे ही में रहते । पहले की तरह वहां दौड़-दौड़ जाना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। किसी ने मुझे ये बातें सिखायी नहीं थीं, पर पता नहीं क्यों, अब इच्छा नहीं होती. - ६६ : पापाण-युग थी। पापा भी अब उतने वपने में नहीं लगते थे। दोदी के चले जाने के बाद एक दिन बड़े भैया ने अपने स्वर में कहा, 'पास, इस साल मेरा फाइनल है । मोचता हूं, होन्टल में रह जाऊंगा, तो टीक ने पढाई हो सकेगी।' 'अच्छी बात है, पापा ने कहा 'अभय, तुम ?' 'होस्टल ।' छोटे भैया का दो टूक उत्तर था। मुझे डर हुना, अब शायद मुझमे पूढेंगे। दरअसल मेरी ममझ में कुछ नहीं आ रहा था । घर से बाहर रहने का कभी अवमर नहीं आया था। और घर भी अब पहले का-मा नहीं लग रहा था। मत्र लोगों के चले जाने के बाद तो एकदम ही खाली-वाली-मा लगने लगा था। खाने की मेज पर हम तीनों ही होते । मेरा खूब लाइ होता, पर मैं पहले की तरह चहकना ही भूल गयी थी। घूमने जाते समय मम्मी- पापा मुझे साथ ले जाते थे। पर हर वार अपनी उपस्थिति बहुत गैर- जबरी-मी लग उठती थी और सारा उस्माह फीका पड़ जाता था। यूं भी घर से बाहर निकलना सुखद नहीं था। लोगों की आंखें और फुसफुसाहटें हमारा पीठा करती होती । छुट्टियां तो हम लोगों ने ताश- करम के सहारे गुजार दी थी, लेकिन स्कूल-कॉलेज गुलते ही हम लोग परेशान हो उठे। लडकिया इतने ऊटपटांग प्रश्न पूछनी, टीचमं कुछ ऐसी नजरी से मुझे देखती कि भाग जाने की इच्छा हो जाती। और जब ये बातें घर के भीतर भी पहुचने लगीं तो अपमान और लज्जा के ये क्षण बहुत ही कठिन होते । मेरै कारण तो और भी ज्यादा । और इसीलिए एक सुबह मेरे लिए भी होस्टल का निर्णय ले लिया गया। दीदी होस्टल में मिलने आयी थी, छूटते ही बोली, 'चलो, यह भी अच्छा हुआ। सारी भीड छंट गयी। लोग-बाग अव जी भरकर हनीमून मनायेंगे।' मुनकर अच्छा नहीं लगा। कम-से-कम पापा का लिहाज तो जरूरी था। लेकिन इतना ऊंच-नीच दीदी रानी कव सोचती थी। गुरू-शुरू में होस्टल अच्छा नहीं लगाया। रविवार की देसब्री से प्रतीक्षा रहती। पापा लेने आते, तो लगता, पिंजरे से छूटकर भाग रही हूं। घर का दिनोदिन निसरता-संवरता प अच्छा लगता । वरामदे मे पा-. Sta खड़ी बाट जोहती मम्मी बहुत अपनी लगतीं। पर धीरे-धीरे यह कार्यक्रम रुटीन बन गया और उसमें भी ऊव महसूस होने लगी। सहेलियों को छोड़कर घर के उस एकांत सुनसान में जाने से जी कतराने लगा। रविवार की छुट्टी वरवाद करने की इच्छा नहीं होती। अच्छा हुआ, मम्मी-पापा जल्दी ही इसे समझ गये । वैसे भी उन्हें समझाने के सौ बहाने मेरे पास थे--कभी पढ़ाई का, कभी पिकनिक, तो कभी पिक्चर का। उस दिन हम सबको स्कूल-बस से पातालपानी ले जाया गया था। फॉल के सिरे पर बस के रुकते ही हम सब लोग कूद पड़े थे । एक होड़-सी थी--ऊबड़-खाबड़-सी पहाड़ी सीढ़ियों को लांघकर कौन सबसे पहले पानी के पास पहुंचेगा। मैं सबसे आगे थी, क्योंकि वीसों बार देखी हुई जगह थी मेरी। लेकिन कुछ दूर जाकर ही मैं ठिठक गयी । सामने कुछ दूर पर किशोर भाई अपनी मोटर साइकिल लिये दोस्तों के साथ खड़े थे। 'जीजाजी !' मैंने आवाज़ दी और दौड़कर उसके पास पहुंच गयी। दीदी लोग डांटंगी, इसका भी ध्यान नहीं रहा। 'जीजाजी, नमस्ते ।' मैंने खुशी से किलकारियां भरते हुए कहा । उन्होंने पलटकर देखा, चेहरे पर जैसे बर्फ जमी हुई थी। 'मेरा नाम जानती हो, बकुल?' बहुत ही सख्त स्वर में उन्होंने कहा, 'मुझे मेरे नाम से बुलाया करो।' मैं फटी-फटी आंखों से देखती रह गयी। पीछे से किसी ने पुकारा, तव जाकर होश आया कि मैं अपना ही तमाशा बना रही हूं। किसी तरह चलकर अपने ग्रुप तक पहुंच पायी मैं। आउटिंग का सारा मूड तो हवा हो ही चुका था। उसके कई दिनों बाद दीदी से मुलाकात हो पायी थी। उन्हें देखते ही अपमान की कड़वी याद ताजी हो आयी और मेरी आंखें डवडवा आयी थीं, 'आपके किशोर भाई ने इतनी इंसल्ट की थी हमारी उस दिन । मैं अव कभी भी उनसे बात नहीं करूंगी।' मैंने मुंह फुलाकर कहा। 'मत करना. वह तुम्हें मनाने भी नहीं आयेगा ।' दीदी का स्वर और ६८ : पापाण-युग 'वकुल, देख तो - चेहरा इतना रूखा था कि मैं सहम-सी गयो"और अब वह मेरा किशोर भी नहीं है।' बड़ी देर बाद उन्होंने सपाट स्वर में कहा। क्यों? लेकिन प्रश्नों के उमड़ते मलाब को मन ही में रोक लेना पड़ा । दीदी से कुछ पूछने का साहस नही था। और फिर कुछ दिन बाद तो वह वात भूल भी गयी मैं। फिर पता नही कैसी छुट्टी थी, पर इतना याद है कि दो दिन के लिए पर गयी हुई थी। होस्टल की अनुशासन-बद्ध जिंदगी के बाद नौ बजे तक विस्तर मे लेटना बडा प्यारा मालूम हो रहा था। नीद तो क्या आती, पर लिहाफ में लेटने का मुख छोड़ते नही बन रहा था। पापा एकाएक मेरे कमरे मे आये, तो मैं चौक पड़ी। एक अरसा हो गया था, वे मेरे कमरे में नहीं आये थे। मैं हडबडा- कर उठ बैठी। 'यह कार्ड देख।' उन्होने एक 'वेडिंग कार्ड' मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा । बचपन में वडा शोक था मुझे 'ग्रीटिंग कार्ड्स' और 'वेडिंग कार्ड्स, इकट्ठा करने का। पर अब वे वातें कितनी दूर की लगती थी, हालाकि अभी मैं औरों के लिए 'स्कूल-गर्ल' ही थी। 'कितना प्यारा है न !' मैंने उस लवे-चौडे कार्ड के सुनहले, मखमली धरातल पर हाथ फेरते हुए, जरी के धागे से खेलते हुए कहा। 'खोलकर तो देख।' पापा ने कहा। मैंने खोला और दो बडे-बडे शब्द मेरी आखों में चुभ गये- किशोर और भारती जबकि कायदे से यहां नाम दीदी का होना था। 'यह कैसे हो सकता है ?' और इसके साथ ही मुझे दीदी से पिछली- वाली मुलाकात याद हो आयो। 'तैयार हो जा बकुल, शकुन के पास चलते है ।' पापा ने कहा और उठकर चले गये। - पापाण-युग: ६६ . मैं साथ जाकर क्या करूंगी, मैंने सोचा । पर शायद पापा अकेल नहीं जाना चाहते थे। मन-ही-मन दीदी से डरते थे शायद । और मम्मी के साथ जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चले तो थे हम दीदी के होस्टल के लिए । लेकिन पापा ने जव स्कूटरवाले को राज मुहल्ले का पता दिया, तो मैं चौंक पड़ी, 'हम लोग . कहां जा रहे हैं ?' 'किशोर के यहां ।' पापा ने जवाब दिया। उनकी आवाज़ जैसे वहुत दूर से आ रही थी। राज मुहल्ले के उस आलीशान बंगले पर वैसी ही हलचल थी, जैसी अकसर शादीवाले घरों में हुआ करती है। ढेर सारे लोग और ढेर सारा सामान इधर-उधर बिखरा था। जज साहब हमें देखते ही इस कदर झेंप गये कि ढंग से नमस्ते भी न करते बनी। लेकिन पता नहीं कहां से माताजी पहुंच गयीं और उन्होंने मौके को बड़ी खूबसूरती से संभाल लिया। लंबी-चौड़ी मुसकराहट विखेरते हुए वोलीं, 'अहा, डॉक्टर साहब आये हैं। कार्ड तो मिल गया होगा न। मैंने कल ही पोस्ट करवाये हैं।' 'जी, मिल गया था, तभी तो हाजिर हुआ हूं।' (क्या यह पापा ही बाल रहे थे ?) 'वह तो आपको आना ही था, घर के आदमी हैं आप तो। यह कौन, आपकी छोटी बेटी है न ! एकदम लंबी हो गयी है । हू-ब-हू अपनी मां पर गयी है।' 'किशोर की शादी एकाएक तय हो गयी, हमें पता भी न चला।' बहुत ही सधे हुए स्वर में कही गयी इस बात से जज साहव सहमकर रह गये। पर माताजी बड़ी ही पुख्ता मिट्टी की बनी हुई थीं। परेशान-सी मुद्रा बनाकर बोलीं, 'अव आपको क्या बताऊं ! लड़कीवालों ने हमारी नाक में दम कर रखा था । पिछले छह-सात महीनों में तो यह हाल रहा कि सुबह एक आ रहा है, तो शाम को दूसरा । किस-किस को मना करें, और मना करने का कोई कारण भी तो हो। इन मसूरीवालों ने तो हद कर दी। लड़की यहां दिखाने ले आये और बोले-पसंद हो, तो बोलिए, हम ७० : पापाण-युग । । शगुन करके ही जायेंगे। दरअसल उन्हे जरा जल्दी थी। दोनों बड़े लडके इग्लैंड में हैं। उनकी छुट्टियां खत्म होने में हैं। बताइए, बार-बार इतनी दूर से आया जाता है कही। फिर हमने भी सोचा, लड़की अच्छी है, घर भी अच्छा है। बेकार देर करने से क्या लाभ ! एक बार लड़कों की उम्र निकल जाए, तो फिर अच्छे संबंध भी नहीं आते।' 'मेरा खयाल था, आप लोग शकुन के बारे में जानते होगे। फर्स्ट इयर से दोनो साथ हैं।' पापा ने किसी तरह उनकी मेल ट्रेन को बीच ही मे रोककर कहा। 'वो तो कोएजुकेशन का जमाना है जी।' जज साहब ने इतनी देर वाद मुंह खोला, 'और फिर मेडिकल में तो ये लोग इतने फ्री होते है कि कुछ पता ही नहीं चलता। पापा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। माताजी फिर मौके की नजाकत को समझकर वोली, 'हाय डॉक्टर साहब, आप इतनी देर बाद आये है। काई स न छपे होते, तो मैं सगाई भी तोड देती। शकुन इस घर मे आती तो मुझसे ज्यादा खुश कौन होता । देखी- भाली लड़की है, फिर घर में सभी उसे चाहते हैं । पर देखिए न, इस तरह की कभी कोई बात ही नहीं उठी। किशोर भी अगर कभी कुछ कहता 'किशोर ने भी कुछ नही कहा ? तब तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना है।' और पापा एकदम उठकर चल दिये । चाय की प्यालिया और मिठाई की तश्तरिया मुंह चिढाती रह गयी। "मैं अपनी शकुन के लिए ऐसा राजकुमार लाऊंगा कि ये लोग देखते रह जायेंगे।' तागे में बैठते हुए पापा ने गुस्से मे दात पीसते हुए कहा। उनके चेहरे पर करुणा, वात्सल्य और रोप का मिला-जुला भाव था । बहुत दिनों बाद वे मुझे पहलेवाले पापा लगे थे । पापा, जो बच्चो को बेहद प्यार करते थे—खासकर दीदी को। पहली सतान होने के कारण उनकी मारी ममता, सारी आकांक्षाएं दीदी पर केन्द्रित थी। दीदी को लेकर अकसर वे मा से लड़ पड़ते थे। कहते, 'उसे परेशान मत किया करो। दये तुम्हारी तरह चूल्हा-चौका नहीं करना है जिंदगी भर।' मा भुनभुनाकर चुप हो जाती। पर जब भी कोई दात पापा में मनवानी - - होती, तो दीदी को ही आगे किया जाता । हम भाई-बहनों को भी यह रहस्य ज्ञात था। घर में कोई भी नयी चीज़ आती, उसके लिए दीदी की सिफारिश जरूरी थी। त्योहारों पर मिठाई भी वनती, तो उनकी फरमाइश पर। छुट्टियों का प्रोग्राम भी बनता,तो उनकी पसंद से । मां की मृत्यु के वाद तो जैसे घर में उनका एकछत्र साम्राज्य हो गया था । मम्मी के घर में आते ही दीदी अपने उस सार्वभौम साम्राज्य को छोड़- कर होस्टल के इस कमरे में आ गयी थीं। उनके प्रति अन्याय से क्षुब्ध, उनकी व्यथा से भीगे पापा जब उस कमरे तक पहुंचे, तव वे सो रही थीं। 'आज हॉस्पिटल नहीं गयीं ?' मैंने पूछा। 'नहीं, आज छुट्टी थी।' कमरे के बीचोंबीच स्टूल पर रखा हुआ किशोर भाई की शादी का कार्ड देखकर छुट्टी का कारण समझ में आ गया और इस वेवक्त की नींद का भी। अलमारी में एक पत्रिका पड़ी थी। उसे लेकर मैं तो खिड़की पर जावठी। उस छोटी-सी जगह में इससे ज्यादा दूर जाना संभव भी नहीं था। पापा ने जैसे प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी। वड़ी देर बाद दीदी ने बस इतना ही कहा, 'उसकी इच्छा थी कि दूसरे वधु-पिताओं की तरह आप भी थैली लेकर क्यू में खड़े हो जाते ।' 'किशोर की इच्छा थी?' 'इच्छा शायद उसके मां-बाप की थी, पर उसने उनका विरोध भी नहीं किया था। इकलौता लड़का है न, मां-बाप का मन कैसे तोड़ देता वेचारा!' 'और इतनी-सी बात के लिए तूने 'वात छोटी थी, पर अपमानजनक थी । मुझसे सहन नहीं हुआ ।' 'मुझसे एक बार कहना तो था, पगली !' 'किसी की बात सुनने की आपको फुरसत ही कहां थी !' दीदी ने जैसे पत्थर फेंककर मारा। पत्रिका के पन्नों पर यूं ही घूमनेवाली नज़रों को उठाकर मैंने देखा, वेदना से पापा का चेहरा काला पड़ गया था। मुझं भी बहुत बुरा लगा। बात चाहे सच ही हो, उसे क्या इस तरह मुंह पर फेंककर मारना चाहिए। ७२ : पापाण-युग लेकिन सारा दुःख, सारा अपमान पीकर भी पापा जी-जान से दीदी के लिए वर खोजने में जुट गये थे। हायर सेकंडरी की परीक्षा में निवृत्त होकर घर पहुंची थी, तो पापा ने जन्म-कुंडलियों की कॉरी करने का काम मुन् मौंप दिया था। रोज की डाक में कम-से-कम एक पत्र तो ऐना होता, जिसमे किसी नये रिश्ते का पता-ठिकाना होता, या कोई फोटो मा जन्न- कुडली होती । दस नामों में एक-दो लड़के ऐने निकलते, जिन्हें दीदो के योग्य समझा जाता । उन लोगों के ही फोटो मंगाये जाते। मेरे जन्मदिन का वहाना लेकर उत्त दिन दीदी वो पर दुला लिया गया था। खाना खाते हुए पापा बिलकुल महज म्बर ने बोले, 'शाम को दोनो बहनें जाकर एक फोटो सिंचवा आना । यादगार रहेगी।' स्टूडियो में मैंने मचलते हुए कहा था, 'दीदी, एक फोटो अपनी अनन मे उतरवाइएन।' 'पापा ने मिनाकर भेजा होगा, क्यों ?' उन्होंने मुझे पूग्ने हुए पूछा। फिर हंस पड़ी और एक प्यारा-मा पोज लेबर कर सामनेर गयी। अपनी इस सफलता पर मैं फूली न ममाती थी।ा ने भी खुश होकर शाबाशी दी थी। रात के खाने पर भी उनका मूड बद अन्तः रहा था। कई दिनों बाद उनके ठहाके, उनके नतीजे नुनाई दे रहे थे। छोटे भैया ने तो कुटिलता मे व्यंग्य भी विचा, 'काज पाया हो गया है?' उठते हुए पापा ने कहा, "वाना मा नो नो पांच मिनट पाम आना । जरूरी काम है।' 'जी, बहुत अच्छा।' दीदी मे बाज गालीनता कीट थी। दीदी के पीछे-पीछे दवे पांच में बोर होनवानन्द्र पर्दे की आड़ में सांस रोके मुड़े रहे। पापा की मेज पर पाच-छह छोटो पहा :- मरका वर्णन कर रहे थे। अंत में दोन, ईद :- से मोच-समझकर मुझे दताना छिट्टिार निकल आऊंगा । इस माल मुझे पकानकाटे दीदी इतनी देर तक मूर्तिवत् बैठी सुन रही थीं। उन्होंने एक नज़र भी उठाकर उन तसवीरों पर नहीं डाली थी। पापा के चुप होते ही बोलीं, 'पापा ! इस जून में मैं कैलिफोनिया जा रही हूं।' 'क्या ?' हम लोगों के मुंह से भी हठात् निकल पड़ा और हम डर के मारे भाग खड़े हुए। किसी समय पापा का सबसे बड़ा सपना था, दीदी को अमरीका भेजने का। कर्ज लेकर भी वे अपनी ज़िद पूरी करते । पर दीदी ने जिस तरह अपने आप सव-कुछ तय कर लिया था, उससे साफ़ ज़ाहिर था कि पापा को उन्होंने फ़ालतू सामान की तरह जीवन से अलग निकालकर फेंक दिया था। इस धक्के से वे एकदम भीतर-ही-भीतर टूट गये थे। एकदम बूढ़े लगने लगे थे। इस परिवर्तन को अनदेखा करके दीदी अपनी ही तैयारियों में व्यस्त थीं। दिनभर शॉपिंग में निकल जाता, सुवह-शाम मित्र-परिवारों में । कभी कोई प्रोग्राम बनता, 'बनता, कभी कुछ । जाने से आठ-दस दिन पहले बड़े भैया ही उन्हें घर लिवा लाये थे । पापा ने फिर कभी कुछ नहीं कहा था । सव-कुछ देखते रह गये थे। यह तो वाद में मेहता अंकल ने बताया था कि सिक्यूरिटी का प्रबंध भी पापा ने ही किया था और रुपयों की व्यवस्था भी। पर दीदी के रवैये से डरकर उसे जाहिर नहीं किया था। और मम्मी! वे इन दिनों कहां थीं? घर के किसी कोने में जलने- वाली अगरबत्ती की तरह चुपचाप अपने अस्तित्व की सुगंध विखेर रही थीं। पर हममें से किसी को भी उनका खयाल न था। इस तुफानी दौर में भी घर अपनी सामान्य गति से चल रहा था, इसका श्रेय उन्हीं को था। दिनभर वे किचन में व्यस्त रहतीं, क्योंकि घर पर दिनभर लोगों का आना-जाना बना रहता था। इस आपाधापी के वीच भी उन्होंने दीदी के लिए एक शाल काढ़ा था, एक कार्डीगन बुना था। प्यारी-सी दो साड़ियां भी वे दीदी के लिए लायी थीं, पर एक छोटी-सी 'बैंक्यू' के अतिरिक्त दीदी ने उसका कोई प्रतिदान नहीं दिया था। - । ७४ : पाषाण युग विदावाले दिन स्टेशन पर बंधु-बांधव, मित्र-परिवारो की अपार भीड़ उमड़ पड़ी थी। उतने-से समय में हर किसी से हंस-बोल पाना बड़ा कठिन काम था।पर दीदी बड़ी चतुराई से, कौशल से यह कठिन काम अंजाम दे रही थी। अपने गुरुजनों से, सहयोगियों से हमारा परिचय करवा रही थी। किसी को पत्र लिखने का वचन दे रही थीं, किसी को कोई वस्तु भेजने का वादा कर थी । अजीव-सी गहमागहमी थी वातावरण में। पापा-मम्मी भीड से अलग-थलग एक कोने में खड़े थे । सच तो यह है, उनके इस तरह दूर खड़े होने का भान भी हम नही था। गार्ड की सीटी होते ही दीदी को सबसे पहले याद आया। उन्होने शीघ्रता से पापा के पैर छुए और मम्मी से कहा, 'अच्छा नीरू, बाऽऽय ।' और भीड़ को चीरती हुई कंपार्टमेंट तक पहुंच गयो। पापा के निःशब्द आगीर्वाद उन तक पहुंचे भी या नहीं, कौन जाने । गाही जव चली, तब प्लेटफार्म पर कितने ही रूमाल लहरा रहे थे । मेरे हाथों में फूलमालाओ का ढेर था, जो दीदी को पहनायी गयी थी, और आखों में आंसू। दोनों भया दिल्ली तक दीदी के साथ गये थे। स्टेशन मे भारी मन लिये हम तीनो ही लौट आये । घर जैसे काटने को दौड रहा था। पिछले आठ-दस दिन तक जैसे यह शादी का घर बना हुआ था। सारी रौनक एक व्यक्ति के जाते हो विदा हो गयी। दिनभर हम लोग अपने-अपने कमरे में कैद रहे । कही जाने की, किसी से बात करने की इच्छा ही नही हो रही थी। रात खाने की मेज़ पर हो हम लोग एकत्र हुए । उतनी बड़ी मेज पर हम तीनो- पहला कोर लेते ही पापा ने कहा, 'सब्जी मे नमक नही है क्या?' मम्मी ने चखकर देखा, 'ओह ! भूल गयी शायद ।' 'यह क्या बेहूदगी है !'पापा एकदम गरम हो उठे, 'एक चीज़ ढंग से नही बना सकती तुम? जिस दिन महाराज नही हो, उसी दिन खाना मिट्टी हो जाता है । किससे पूछकर छुट्टी दी उसे तुमने ?' मम्मी स्तब्ध होकर फटी-फटी आखों से उन्हें देखती रह गयी । यह शशायद पहला अवसर था, जब पापा ने मम्मी से इतनी कठोर वात कही -बस। पाणण-यग.७५ थी। फिर तो जैसे यह सिलसिला-सा चल पड़ा। दिनभर मेरा मन घवराया-सा रहता कि पता नहीं कब, किस वात पर पापा गरम हो उठे। उनकी इस बमवारी के सम्मुख मम्मी निरीह लगतीं। कॉलेज की डिवेट्स में हमेशा इनाम जीतनेवाली मम्मी पापा के उन तर्कहीन आरोपों का कोई उत्तर नहीं दे पाती थीं। पर लगता था, कोई चीज़ है, जो धीरे-धीरे उनके भीतर ढहती जा रही है। उनका चेहरा देखकर इसका अहसास होता था। कितने बदल गये थे पापा! अब तो यह वात कपोल-कल्पना-सी लगती थी कि इसी आदमी की पीठ पर मैंने कभी घुड़सवारी की है, कंधे पर चढ़कर अमरूद तोड़े हैं, गुडिया के लिए या गुब्बारे के लिए ज़िद की है । और मां की मृत्यु के बाद इसी गोद में विश्राम पाया है। छुट्टियां समाप्त हुई और साथ ही मेरी परेशानी भी। कॉलेज की रंगीन दुनिया मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। बड़े भैया बंवई की एक बड़ी कंपनी में चले गये थे और मेरे लिए अच्छा-खासा जेव-खर्च भेज देते थे । दीदी तो मेरे लिए उपहारों की वर्षा-सी कर रही थी और मेरे पास इंपोर्टेड कपड़ों, सेंट्स और कॉस्मेटिक्स का ढेर लग गया था। जब भी कोई उपहार आता, मुझे बड़ा संकोच होता था। एकाध चीज़ मम्मी के लिए भेजती, तो क्या हो जाता। पापा के लिए भी उन्होंने वहां से सिर्फ पहुंच की चिट्ठी लिखी थी, वस । वाकी तो हमारे पत्रों में प्रणाम भर रहता। बड़े भैया जरूर कभी- कभार एकाध कार्ड पापा को डाल देते थे। पर अकसर मेरे पत्र में ही दो- चार लाइनें उनके लिए लिख देते । बच्चों के साथ जैसे उनका संवाद टूट- सा गया था। छोटे भैया कभी-कभार दर्शन दे जाते-पैसों के लिए। पापा न पिछला हिसाब पूछते, न कारण पूछते । वस जो मांगते, वह हाथ में रख देते। बाप-बेटों में जैसे बस जरूरत भर का ही संबंध रह गया था। मेरी बहुत इच्छा थी, होस्टल ज्वॉइन करने की। दो साल तक होस्टल में रहने के बाद घर पर अच्छा नहीं लगता था। फिर कॉलेज होस्टल का जीवन कुछ स्वच्छंदता से जीने की भी आशा थी। कम-से-कम स्कूल जैसी छोटी-छोटी बंदिशें तो वहां नहीं होती । पर मम्मी ने मुझे रोक ७६ : पाषाण युग लिया। वोली, 'खाली घर काटने को दौड़ता है । तुम रहोगी, तो कुछ रौनक रहेगी। मजबूरन मुझे रह जाना पड़ा। रौनक तो खैर मेरे बलबूते पर क्या होती, पर लगा, मम्मी अकेलेपन से नही, पापा से खौफ खाने लगी है। इसीलिए अपना मनोवल बनाये रखने के लिए मेरा सहारा लिया जा रहा है । दिन-पर-दिन इसी एकरसता मे वीत रहे थे और महीनो की शकल में बदल रहे थे। महमा एक दिन लगा कि इस मुर्दा माहौल मे भी कुछ हलचल हो रही है। कुछ रौनक, कुछ गहमा-गहमी हो रही है। मालूम हुआ, पापा की नयी पुस्तक का विमोचन समारंभ है । खूबसूरत काई स छपकर आ गये थे, जिन पर मोटे अक्षरों में पुस्तक का नाम चमक रहा था- 'वेदकालीन भारत की सास्कृतिक सपदा' । पापा की इससे पहले भी दो-तीन पुस्तके प्रकाशित हुई थी, पर उनके प्रकाशन समारोह की मुझे याद नही थी। शायद इतने बड़े पैमाने पर कुछ हुआ भी नहीं था। इस बार तो सचमुच एक उत्सव का-सा वातावरण था। मैंने बड़े भैया को सूचित कर दिया था और उनका बधाई का तार भी ठीक समय पर पहुंच गया था। लेकिन छोटे भैया जान-बूझकर 'टिंद फाल्स' देखने निकल गये थे। उनके जाने से वैसे कोई हानि भी नहीं हुई थी। पापा के ढेरो विद्यार्थी काम में जुट गये थे । बैठने की व्यवस्था से लेकर प्लेटें सजाने तक का काम उन्ही लोगो ने किया था। शाम को मम्मी एक रेशमी बातिक की साडी और ढीली-सी चोटी डालकर बैठ गयी। मैं इतना कहती रह गयो, पर न उन्होंने कपड़े बदले, न हेयर स्टाइल । बड़ी मुश्किल से जिद करके एक बडा-सा पीला गुलाब उनके वालों में लगा पायी मैं, पर थोडी देर बाद देखा, वह भी था । मुझे देखकर अपराधी भाव से बोली, 'ठीक से पिन नहीं किया था क्या? पता नही, कहां गिर गया।' में मुंह फुलाकर बैठ गयी। जव उन्हें ऐसे ही अच्छा लगता है, तो ठीक है । मुझे क्या गरज पड़ी है ! पर गुस्से का उवाल धीरे-धीरे कम होने लगा, तो जैसे इस विराग का कारण मेरी समझ मे कुछ-कुछ आने लगा। । नदारद पापाण-युग : ७७ पिछले महीने वार्षिकोत्सव पर मम्मी-पापा को मैं खींचकर कॉलेज ले गयी थी। मुझे चार पुरस्कार मिलने थे, इसीलिए पापा मेरा अनुरोध टाल नहीं पाये थे। कॉलेज कैम्पस में प्रवेश करते ही सहेलियों ने मुझे घेर लिया था, 'तेरी दीदी कब आयी रे अमरीका से ? छुट्टी पर आयी है, या हमेशा के लिए आ गयी है ?' 'धत् पगली ! ये तो उसकी मम्मी हैं। किसी ने बताया था। 'हाय मम्मी ?' वह चीखी थी, 'हाय राम! कितनी यंग लगती हैं।' 'स्टेप मदर हैं।' कोई ,फुसफुसाया था। 'सच्ची? कितनी स्वीट हैं न !' इस बातचीत से मैं संकोच से भर उठी थी। सचमुच मम्मी उस दिन बड़ी 'स्वीट' लग रही थीं। प्याजी रंग की बनारसी साड़ी मे उनका गोरा रंग निखर आया था। मेरी ज़िद पर उन्होंने अपना बारीक मोतियोंवाला सेट पहन लिया था। उनका सजा-संवरा व्यक्तित्व देखनेवालों को बांधे ले रहा था और उनकी तुलना में पापा एकदम बूढे लग रहे थे। पापा ने घर पहुंचने तक भी सब नहीं किया। टैक्सी में बैठते ही बोले, 'कितना ज्यादा मेकअप किया है तुमने आज । जरा सलीके से साज- सिंगार किया करो। अब तुम कॉलेज में पढ़नेवाली लड़की तो नहीं हो ।' अंधेरे में मम्मी का चेहरा नहीं देख पायी मैं, पर बार-बार यही लगता रहा, पापा यह सब मेरे सामने न कहते तो अच्छा था। उस प्रसंग को याद करके अपने ऊपर ही खीज उठी मैं। क्यों वार-. वार ज़िद करती हूं मैं; जबकि मालूम है, पापा को यह सब जरा अच्छा नहीं लगता। - । शाम से ही मेहमान जुड़ने लगे। प्रिंसिपल साहव थे, कुछ पापा के सहयोगी थे, कुछ मिन्न, कुछ विद्यार्थी । चालीस-पचास लोगों का मजमा था। छत पर ही सव लोगों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी, जिसे पापा के विद्यार्थियों ने दिनभर बैठकर सजाया था। प्रिंसिपल साहब की अध्यक्षता में समारोह प्रारंभ हुआ। धुआंधार ७८ : पापाण-युग भाषण हुए। मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा । बस, इतना समझ में आरहा था कि पापा की तारीफ हो रही है। और अंत में पुस्तक का विमोचन प्रिमिपल साहब के कर-कमलो द्वारा सम्पन्न हुआ। पापा ने वह प्रति बड़े ही विनय के साथ उन्हें भेंट की। ताली की गड़गड़ाहट से आकाश गूंज उठा। कुछ ही देर में पुस्तक की प्रतियां मेहमानों के हाथों में घूम रही थी। तीस रपये मूल्य की वह भारी-भरकम पुस्तक थी, कई दुर्लभ चित्रों के साथ । पन्ने उलटते हुए मेरी दृष्टि 'समर्पण' वाले पृष्ठ पर टिक गयी : शीला को, जिसका स्नेहमय सान्निध्य मेरी प्रेरणा था, जिसकी पवित्र स्मृति मेरा सवल है। इतना गुस्सा आया। इस 'हिप्पोक्रेसी' की भला क्या जरूरत थी। अपनी दिवंगत पत्नी के प्रेम का ढिंढोरा पीटना क्या इतना आवश्यक था? मां का स्नेहमय सान्निध्य | वाह ! कम-से-कम पुस्तको के संबंध में तो मां की भूमिका स्नेहमयी नहीं थी। पापा के पढने वाले कमरे में वे बहुत ही कम जाती थी। एक तो एकांत के लिए वह कपर बनवाया गया था और विद्याथियो की सुविधा के लिए जीना भी वाहर की ओर से ही था। दिनभर अपने पढ़ने-लिखने में ही व्यस्त रहने वाले पापा पर वे अकसर खोज भी उठती थी-'घर चलाने का ठेका क्या मैंने अकेले ही ले रखा अपने विद्वान् पति पर नाज उन्हे जरूर था । पापा का भाषण सुनने जरूर जाती और गभीर मुद्रा बनाकर स्टेज पर बैठी रहती। मन्त्रमुग्ध योताओं को देखना उन्हें अच्छा लगता। इसी तरह पापा की पुस्तको में लेखक की जगह छपा हुआ पति का नाम भर पढकर वे कृतार्थ हो जाती थी। उन्हें पढने की कभी उन्होने हिम्मत नहीं की। पापा को उनसे किस तरह की प्रेरणा मिलती थी, वे ही जानें। लेकिन अगर ऐसा था, तो पहले भी तो उनकी पुस्तकें निकली थी। उनमे मा को याद क्यो नही किया - पापाण-यग: ७६ - गया? या शायद इसके लिए 'स्वर्गीय' की उपाधि जरूरी है। और मां की पवित्र स्मृति ? इतना बड़ा मजाक कैसे कर सके पापा! इतनी ही उस स्मृति में कशिश थी, तो चार-चार बच्चों के होते हुए भी दूसरा विवाह कैसे कर सके वे ? और वह भी अपने से सोलह वर्प छोटी, अपनी विद्यार्थिनी के साथ ! विवाह कैसी भी परिस्थिति में हुआ हो, पर मम्मी ने अपना कर्तव्य पूरी तरह निभाया था। इस पुस्तक का असली श्रेय उन्हीं को जाता था। शादी से पहले और शादी के बाद भी इस पुस्तक पर उन्होंने अपार मेहनत की थी। लायब्रेरी से पुस्तकें जुटायी थीं, रात-रात जागकर नोट्स तैयार किये थे, टाइपिस्ट के साथ घंटों दिमाग खपाया था। कई-कई वार प्रूफ देखे थे। परंतु पूरी पुस्तक में उनका कहीं नाम भी नहीं था । कृतज्ञता के दो शब्दों की हकदार तो वे भी थीं। प्लेटें लगाते मैंने कहा, 'मम्मी! आपके साथ बड़ा अन्याय हुआ । कैसा अन्याय ?' 'समर्पण तो आपके नाम होना चाहिए था।' 'इससे क्या फर्क पड़ता है। वड़ों का हक तो उन्हें देना ही चाहिए।' 'और काम सारा जो आपने किया है।' 'तो क्या हुआ ? काम तो मैंने विद्यार्थी की हैसियत से किया है । अव ये इतने लोग नहीं कर रहे हैं ? वस, मेरा भी अंशदान ऐसा ही है । और उन्होंने लिखा तो है-मेरे छात्रों ने बहुत सहायता दी है।' मन हुआ, जवरदस्ती इस औरत के दिल में झांककर देखू । क्या सचमुच ही कहीं जरा-सी भी खरोंच तक नहीं आयी है ! रणजीत से पहली भेंट इसी पार्टी में हुई थी। पापा ने ही परिचय करवाया था, 'वकुल, ये हैं रणजीत वहल । मेरे बहुत अच्छे विद्याथियों में से थे। अव आइ. ए. एस. हैं और यहां डिप्टी कलेक्टर बनकर आये हैं।' 'सर, आप कौन हैं ?' 'अरे, इसे नहीं पहचाना ! यह अपनी वकुल है। उस समय बहुत ८० : पापाणन्युग छोटी रही होगी शायद।' 'अच्छा ! वकुलजी, आप पढती है ? कहाँ ? किस इयर में ? क्या विषय हैं ?' वे प्रश्न पूछते रहे, मैं उत्तर देती रही। पर उस भव्य व्यक्तित्व के मम्मुख बार-बार सिकुड़ी-सिमटी जा रही थी। 'अच्छा तो, बकुलजो, इजाजत है ?' जाते हुए उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, तो मैं अभिभूत हो गयी। पहली बार किसी ने मुझे इतना सम्मान दिया था। घर-बाहर मभी के लिए मैं अब तक खिलंदड़ी बकुल ही थी। 'अच्छा नीरू, चलता है। कभी घर पर आओ न !' 'तुम भी आना न मिसेज़ को लेकर । आज ही ले आते, तो परिचय हो जाता।' 'आज तो वह वोर हो जाती, इसलिए नहीं लाया। किसी दिन जरूर लेकर आऊंगा । अच्छा और हम सबको वडी अदा से नमस्कार करते हुए वे चले गये। 'आप जानती हैं इन्हें ?' मैंने मम्मी से पूछा। 'हा, हमारे पड़ोसी थे। बाद में बी. ए. भी हम लोगो ने साथ ही में किया।' उन्होंने बतलाया। मुझे बड़ी खुशी हुई कि यह सज्जन मम्मी के परिचित हैं। तब तो कई बार मुलाकात हो सकेगी। पापा के यू तो ढेरों विद्यार्थी थे, पर अधिकतर वाहर ही से लौट जाते थे। घर का अनुशासन ही ऐसा था। कई अक्खड़ किस्म के लोग 'भाभी-भाभी' की रट लगाते हुए किचन तक पहुंच भी जाते थे, पर पापा को यह अच्छा नहीं लगता था। मम्मी को बाद में बहुत कुछ सुनना पड़ता था। मा के जमाने में जो बातें सहज-स्वाभाविक थी, अव एकदम वर्जित-सी हो गयी थी। रणजीत के साथ यह मुश्किल नही थी। वे कई बार आये—कभी अकेले, कभी मिसेज को लेकर । उनकी गुड़िया-सी खूबसूरत वीवो मुझे एकदम बेवकूफ-सी लगती । वेवी, किचन, पिक्चर्स और नौकर-ये चार उसके प्रिय विषय थे । शेष समय वह चुप बैठी रहती। वोलने वतियाने का सारा जिम्मा में ले लेती। मम्मी तो अकसर चाय-वाय लगवाती । पापाण-यग:५१ रहती। पापा कॉलेज से लौटकर सहज भाव से पुछते, 'रणजीत आया था शायद आज ।' मैं भी उसी सहज भाव से उत्तर दे देती। पर कुछ दिनों के वाद मुझे उन प्रश्नों में जासूसी की गंध आने लगी। शायद मेरे मन का चोर ही मुझे डरा देता था। एक दिन तो हद हो गयी। पापा ने लौटते ही अजीव-से स्वर में पूछा, 'रणजीत फिर आया था आज !' 'नहीं तो।' 'फिर यह सिगरेट कैसी पड़ी हुई है यहां ?' 'मुझे क्या पता।' 'मक्कार लड़की, झूठ बोलती है।' और पापा ने तड़ से एक तमाचा जड़ दिया मुझे। पलभर को मैं तो काठ होकर रह गयी। आंसू तक सूख गये मेरे । मेरी याद में पहली बार पापा वे मुझ पर हाथ उठाया था और वह भी बिना किसी कारण के । और तभी किचन से मम्मी दौड़ी आयीं, 'क्या पूछना है, मुझसे पूछिए । उसे क्यों परेशान कर रहे हैं । बेचारी अभी- अभी कॉलेज से लौटी है। पापा चुप ! 'रणजीत के बारे में पूछना है न ! हां, वह आया था। यह जरा-सी वात जानने के लिए इतने घुमावदार रास्ते से जाने की जरूरत नहीं है। मुझसे पूछ लिया होता और इतनी बड़ी लड़की पर हाथ उठाते हुए शर्म आनी चाहिए आपको। बड़े 'कल्चर्ड' बनते हैं !' और मम्मी जिस तरह आयी थीं, उसी तरह झमाझम भीतर चली गयीं। पापा हतप्रभ-से खड़े रह गये । शायद मेरी तरह वे भी मम्मी के इस रूप को देखकर सहम गये थे। रणजीत वेचारे को पता ही नहीं था कि उन्हें लेकर इस तरह का कोई कांड हो गया है। वे पहले की ही तरह आते रहे । अकसर दफ्तर से सीधे ही आ जाते, क्योंकि बाद में आने का मतलब होता, बीवी को भी साथ लाना । उस दिन के बाद मैंने उनके सामने पड़ने की हिम्मत नहीं - ८२ : पापाण-युग को । एक निरर्थक-पी ग्लानि मन में भर गयी थी पर जब भी उनकी मोटर का हॉर्न सुनती, तो अपना कमरा छोइकर ऐमी जगह आकर बैठ जाती, जहा से उनकी आवाज़ सुनाई देती रहे और एकाध झलक भी मिलती रहे। एक अजीव-मा पागलपन सवार था मुझ पर । दिनभर नीरज की कविताएं पढ़ा करती, तलत की गजलों में घोयी रहती। 'गुनाहो का देवता तो पता नहीं, कितनी बार पढ़ गयी थी मैं । जव श्रीमती रणजीत भी माथ होती, तो मुझे पर्दे मे बाहर आना ही पड़ता। वे अकसर माने की फरमाइश कर बैठती, क्योकि वानचीन में तो उन्हें रम नहीं आता था। तब मैं लता की भावप्रवण आवाज की नकल उतारते हुए ऐसे गीत चुन लेती, जो मेरी मनोदशा को व्यक्त कर सके, जैस 'तू प्यार करे या ठुकराये, हम तो है तेरे दीवानों मे', या 'हम प्यार मे जलनेवालों को चैन कहा, आराम कहा', या 'हाले दिल इस तरह सुनाया न गया' आदि। माचं का महीना था। परीक्षा की तैयारियो के लि छुट्टियां हो चुकी थी । पुस्तको का अवार सामने रखकर मैं वी. ए. फाइनल की तैयारी में व्यस्त थी । तभी उम परिचित हॉन को सुनकर मेरे कान खडे हो गये। कैलेंडर पर नजर दौडायी, तो पता चला, आज दूसरा शनिवार है। तभी श्रीमान दोपहर में पधारे हैं । छुट्टी है, तब तो जरूर मिसेज़ माथ में होगी। पढाई-वदाई को गोली मारकर मैं डायनिंग रूम में अपनी परिचित कुर्सी पर बैठकर आहट लेने लगी। बडी देर तक मिसेज रणजीत की पतली तीखी आवाज की प्रतीक्षा करती रही, पर विश्वास हो गया निघे अकेले ही आये हैं। मतलब मेरे बाहर जाने का कोई उपाय नहीं था। मन मारकर बैठी रही। रणजीत कह रहे थे, 'तुम जानती हो नीरू, मैं यहा क्यो आता हूं। अपनी स्टीन लाइफ में जव ऊब जाता हूँ तब यहा आकर कुछ देर को फ्रेश हो लेता हूँ । बस ।' 'वो तो ठीक है, जीतू, लेकिन...' लेकिन क्या? क्या सर एतराज करते है "सिर्फ उन्ही के एतराज की बात होती, नो तुममे कभी कहती भी नही " 4 पापाण-युग 'फिर...?' 'जीतू ! मुझे वकुल का डर लगता है। मेरा मतलव वकुल के लिए डर लगता है।" (बकुल ! माय गॉड) 'वकुल ने क्या किया? वह तो बड़ी प्यारी लड़की है।' 'वह लड़की तुम्हारे पीछे पागल हुई जा रही है और उसे रोकने का कोई उपाय मेरे पास नहीं है।' 'लेकिन वह तो जानती है, मैं शादीशुदा हूं।' 'इससे क्या फर्क पड़ता है । भावनाओं का ज्वार उठता है, तव ये छोटी-मोटी वा तिनके की तरह पता नहीं कहां वह जाती हैं ! भावुक लड़कियों के साथ यही तो ट्रेजेडी होती है। बकुल जिस वातावरण में पल रही है, उसमें तो यह आवेग खतरे की सीमा तक पहुंच सकता है। यह तो गनीमत है, कि सामने तुम जैसी शख्सियत है, नहीं तो ड्राइवर, माली, रसोइया...प्रेम फिर पान-सुपात्र कुछ भी नहीं देखता।' 'छी: नीरू ! कैसी बातें कर रही हो आज ।' इससे अधिक सुनना मेरे भी वश में नहीं था । हांफते कदमों से आकर अपने विस्तर पर पड़ रही मैं, सामने दीवार पर मां का बड़ा-सा चित्र लगा था । आज मां होती, तब भी शायद इतनी बारीकी से मेरा मन नहीं पढ़ पाती। मां के विचारों की दुनिया भी उन्हीं की तरह सीधी-सरल थी 'बकुल !' 'आयी, मां!' और एकदम याद आया मां अब कहां है । यह तो मम्मी की आवाज़ है । ड्राइंग-रूम के दरवाजे में खड़े होकर पूछा, 'मुझे बुलाया, मम्मी?' 'हां, महाराज शायद आया नहीं अभी तक । कॉफी बना सकोगी दो कप ?' . 'जी!' 'वकुल !' मैं जाने लगी, तो रणजीत ने रोक लिया, 'बकुल, तुम इन्हें मम्मी क्यों कहती हो। मां कहा करो। ज्यादा नेचुरल लगता है । अभी तुमने पुकारा था न !' ८४ : पापाण-युग 'नहीं-नही, मम्मी ही ठीक है।' मम्मी की आवाज़ में अनावश्यक तल्खी थी। किचन की ओर जाते हुए मैंने सुना, वे कह रहे थे, 'नीरू! मैं सोचता हूं, बच्चे तुमसे मा कहेंगे, तो ज्यादा इंटीमेट हो सकेंगे, जस्ट ट्राई।' 'नौ।' लेकिन क्यों?' 'मं इन बच्चो की मा बनकर इस घर में नहीं आयी हू ।' 'तो?' 'इनके पिता के रंगमहल में एक बौद्धिक वक्ष खाली था, मेरी नियुक्ति वहीं हुई है।' 'नीरू, इसका मतलब है, तुम खुश नहीं हो !' 'म दुःखी भी नहीं है । परेशान मत होओ।' कॉलेज से लौटकर देखा, छोटे भैया वरामदे में विराजमान हैं। 'अरे, आप कब आये नागदा से?' 'सुबह आठ बजे।' 'एकदम आ गये । कोई सूचना भी नहीं दी।' दरअसल खुशी के मारे मुझसे बोलते ही नहीं बन रहा था। 'सूचना देता, तो तुम लिवाने आती स्टेशन पर उन्होंने चुटकी ली। 'अच्छा वताइए, कैसे आये हैं ?' 'वस, ऐसे ही । नहीं तो यहां कौन हमारी अम्मा बैठी हैं, जो तीज- त्योहार पर खुला भेजेंगी। इसीलिए जव मर्जी हुई, चला आया।' 'मैं तो बैठी हू अभी, फिर राखी पर क्यो नही आये ? मेरा एक साडी का नुकमान हो गया।' 'अब ले लेना, बस चल, ला दिखा तो, क्या-क्या पढती है ?' और मेरे हाथ में चिंतामणि' और 'धनानद' लेकर देर तक उलट-पुलट करते रहे । फिर एकाएक वोले, 'अच्छा बकुल, यह तो बता मौसम का क्या हाल 'मौसम ?' मैंने सोचने की-सी मुद्रा बनायी, 'तापमान साधारण से कुछ . पापाण-युग: ८५ - ज्यादा ही रहता है । अकसर धूलभरी आंधियां चलती रहती हैं। और कोई ताज्जुब नहीं, शाम को गरज के साथ छींटे भी पड़ें।' 'तब तो बड़ी मुश्किल है।' उन्होंने भी बड़ी गंभीर मुद्रा बनाकर कहा और हम दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े। हंसने का दौर समाप्त होने पर मैंने कहा, 'आपको मौसम की चिंता क्यों होने लगी। अब तो भगवान की दया से आपकी जेब भारी है।' 'पैसों की बात नहीं है, पगली !' 'फिर ?' 'दरअसल में शादी करना चाहता हूं।' 'शादी!' मैं चीखी, 'अभी से ?' 'अभी से का क्या मतलब ? मैं तेईस का हो चुका हूं।' उन्होंने इस अंदाज में कहा, जैसे चालीस पार कर गये हों। 'पर बावा, अभी आपकी लाइन क्लीय र कहां है ? अभी तो बड़े भैया वैठे हैं ?' 'बैठने को तो अभी दीदी भी बैठी हैं । इन लोगों के भरोसे रह गया, तो जिंदगी भर कुआंरा रह जाऊंगा।' 'च्-च् ! ऐसी भी क्या वेसवी है ! भला बताइए, आप वहां नौकरी करने गये थे, या प्रेम करने ?' मैंने कहा । लेकिन उसकी सिफारिश करना मंजूर कर लिया, क्योंकि वे वाकई सीरियस लग रहे थे । मेरे आश्वासन से निश्चित होकर वे मित्रों से मिलने चल दिये । जिम्मेदारी ले तो ली बड़े मजे से, पर बाद मेंखुद ही डरने लगी कि यह विपय घर में उठाऊंगी कैसे । मौसम के बारे में मैंने मजाक नहीं किया था। वातावरण सचमुच घर का इसी तरह का हो गया था। कल शाम से तो मैं सहमी-सहमी-सी ही थी कि पता नहीं कब विस्फोट हो जाए। मम्मी चार-पांच दिनों से एक टाइपिस्ट की प्रतीक्षा में थीं। यह लड़का उनके पिताजी के ड्राइवर का पुत्र था। वे मदद के रूप में उसे कुछ काम देना चाहती थीं। सारी बातें तय हो गयी थीं और वह भला आदमी गोल कर गया था। कल जब हम लोग पिक्चर देखकर लौट रहे थे, तो 'यशवंत' के फाटक पर ही वह मिल गया। मम्मी तो उसे देखते ही बरस पड़ी। वह ८६ : पापाण-युग बड़ी कठिनाई मे समझा पाया कि वह तो आरा या पर मात्र ने ही उसे लौटा दिया था। सुनकर मम्मी का चेहरा तमतमा आया या। मारे राम्ने मुझे डर लगा रहा कि आज कुछ होकर रहेगा । ईश्वर की कृपा मे कुछ हुआ तो नही, पर वातावरण मे कुछ तनाव-मा जरूर था। फिर भी माहस करके मैने माने की मेज पर वह वात छैड ही दी। छोटे भैया जान-बूझकर वाहर ही रह गये थे। 'सुनो, यह फोटो देखी तुमने ।' बड़ी देर तक उम फोटो का निरीक्षण करने के बाद पापा ने उसे मम्मी की तरफ बढ़ा दिया था, 'अजय इन लड़की से शादी करना चाहता है । कमी है ?' 'आप लोगों को पसन्द आनी चाहिए, मेरा क्या है।' मम्मी ने वेरखी से कहा। 'बाह भई, तुम्हारा भी तो हक है।' 'मेरा हक ?' मम्मी ने कडवे स्वर से कहा, 'अपनी पसंद का टाइपिस्ट तक तो में रख नहीं मकती। आपके वेटे के लिए बहू पसद करना तो बहुत बड़ी बात है।' 'अव यह कहा की वात कहा ले जा रही हो तुम 'क्यों ? मेरे अधिकार को वान नहीं हो रही यो क्या" मम्मी ने सीधा प्रश्न किया। पापा परेशान हो उठे। पके स्वर में बोले, 'मुसीबत तो यह है नील कि तुम ऐसे आदमी इकट्ठा कर लेती हो, जो मेरी चि से मेल नही ?' खाते। 'नहीं, मुसीवत तो यह है, बल्कि हकीकत है यह कि आप नहीं चाहते कि मेरी योसिस कभी पूरी हो । पिछले चार-पांच मालो से मैं यही देख रही हूं।' 'क्या वकनी हो! 'ठीक तो कह रही हमें। आप चाहते हैं कि वम मैं आपकी मेक्रेटरी बनी रहू। आपके पनो का, पुस्तको का, घोबी का, दूध वाले का हिमाव रखती फिरूं।' "तुम कोई अहसान नहीं कर रही मुझ पर। दुनिया को आम औरने घर मे यही सद-कुछ करती है।' पापाण-युग ८३ -- . . ज्यादा ही रहता है । अकसर धूलभरी आंधियां चलती रहती हैं। और कोई ताज्जुव नहीं, शाम को गरज के साथ छींटे भी पड़ें।' 'तब तो बड़ी मुश्किल है।' उन्होंने भी बड़ी गंभीर मुद्रा बनाकर कहा और हम दोनों खिलखिलाकर हंस पड़े । हंसने का दौर समाप्त होने पर मैंने कहा, 'आपको मौसम की चिंता क्यों होने लगी। अव तो भगवान की दया से आपकी जेब भारी है।' 'पैसों की बात नहीं है, पगली !' 'फिर ?' 'दरअसल में शादी करना चाहता हूं।' 'शादी!' मैं चीखी, 'अभी से ?' 'अभी से का क्या मतलव ? मैं तेईस का हो चुका हूं।' उन्होंने इस अंदाज में कहा, जैसे चालीस पार कर गये हों। 'पर वावा, अभी आपकी लाइन क्लीयर कहां है ? अभी तो बड़े भैया बैठे हैं ?' 'वैठने को तो अभी दीदी भी बैठी हैं । इन लोगों के भरोसे रह गया, तो जिंदगी भर कुआंरा रह जाऊंगा।' 'च्-च् ! ऐसी भी क्या बेसब्री है ! भला बताइए, आप वहां नौकरी करने गये थे, या प्रेम करने ?' मैंने कहा । लेकिन उसकी सिफारिश करना मंजूर कर लिया, क्योंकि वे वाकई सीरियस लग रहे थे । मेरे आश्वासन से निश्चित होकर वे मित्रों से मिलने चल दिये । जिम्मेदारी ले तो ली बड़े मजे से, पर बाद में खुद ही डरने लगी कि यह विपय घर में उठाऊंगी कसे । मौसम के बारे में मैंने मजाक नहीं किया था । वातावरण सचमुच घर का इसी तरह का हो गया था। कल शाम से तो मैं सहमी-सहमी-सी ही थी कि पता नहीं कब विस्फोट हो जाए। मम्मी चार-पांच दिनों से एक टाइपिस्ट की प्रतीक्षा में थीं। यह लड़का उनके पिताजी के ड्राइवर का पुत्र था । वे मदद के रूप में उसे कुछ काम देना चाहती थीं । सारी बातें तय हो गयी थी और वह भला आदमी गोल कर गया था। कल जब हम लोग पिक्चर देखकर लौट रहे थे, तो 'यशवंत' के फाटक पर ही वह मिल गया। मम्मी तो उसे देखते ही बरस पड़ीं। वह - ८६ : पापाण-युग 'मेरा हक । बडी कठिनाई से समझा पाया कि वह तो आया या पर माहब ने ही उसे लोटा दिया था। सुनकर मम्मी का चेहरा तमतमा आया था। मारे राम्ने मुझे डर लगा रहा कि आज कुछ होकर रहेगा । ईश्वर की कृपा से कुछ हुआ तो नही, पर वातावरण मे कुछ तनाव-मा जरूर था। फिर भी माहम करके मैने खाने की मेज पर वह बात छेड ही दी। छोटे भैया जान-बूझकर बाहर ही रह गये थे। 'मुनो, यह फोटो देखी तुमने ।' वडो देर तक उस फोटो का निरीक्षण करने के बाद पापा ने उसे मम्मी की तरफ बढ़ा दिया था, 'अजय इम लड़की से शादी करना चाहता है । कमी है ?' 'आप लोगो को पसन्द आनी चाहिए, मेरा क्या है।' मम्मी ने वरती से कहा। 'वाह भई, तुम्हारा भी तो हक है।' ?" मम्मी ने कडवे स्वर से कहा, 'अपनी पसद का टाइपिस्ट तक तो मै रख नहीं सकती। आपके बेटे के लिए बहू पसंद करना तो बहुत बडी वात है।' 'अव यह कहा की वात कहा ले जा रही हो तुम ?" 'वयो ? मेरे अधिकार की बात नहीं हो रही थी क्या?" मम्मी ने सीधा प्रश्न किया। पापा परेशान हो उठे। पके स्वर मे बोले, 'मुमीवत तो यह है नीरू कि तुम ऐसे आदमी इकट्ठा कर लेती हो, जो मेरी रचि से मेल नही खाते।' 'नहीं, मुसीवत तो यह है, बल्कि हकीकत है यह कि आप नहीं चाहते कि मेरी थीसिस कभी पूरी हो । पिछले चार-पाच सालो से में यही देख रही हूं।' 'क्या वकती हो !' 'ठीक तो कह रही हूं में। आप चाहते हैं कि वस मैं आपकी मेक्रेटरी बनी रहूं। आपके पन्नो का, पुस्तको का, धोबी का, दूध वाले का हिमाद रसती फिरूं।' 'तुम कोई अहसान नहीं कर रही मुझ पर। दुनिया को आम औरते घर मे यही सब-कुछ करती है।' पापाण-युग :
प्लेकिन मैं तोआम औरतों की तरह नहीं हूं। इसलिए तो लीक से हटकर चली हूं। नहीं तो आम औरतों वाला रास्ता मेरे लिए भी खुला था।' 'पछता रही हो अव?' अच्छा हुआ, मम्मी ने इस बात का उत्तर नहीं दिया और वहीं पटाक्षेप हो गया। नहीं तो मेरी तो मुसीबत आ गयी थी। उन दोनों को तो मेरी उपस्थिति का होश नहीं था और मुझसे न उठते वन रहा था, न वैठना अच्छा लग रहा था। शाम को छोटे भैया ने उत्सुकता से पूछा था, तो मैंने मुसकराकर छोटा-सा जबाव दे दिया था, 'थोड़ा तो धीरज रखो, बावा । आज तो अर्जी पेण हुई है।" छोटे भैया खिसियायी-सी मुसकराहट के साथ वोले, 'उसके मां-बाप बड़े घोंचू किस्म के हैं, इसीलिए । नहीं तो मैं तो सीधे कोर्ट से शादी करता और यहां तार से खबर भेज देता। वस । नो फॉरमेलिटी।' छोटे भैया ऐसा कर भी लेते, तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। + . । पापा पता नहीं, कब जाकर मेरठ से बुआजी को लिवा लाये और घर में शादी-ब्याह की चर्चाएं जोर-शोर से चल पड़ीं। पापा की वातों से लगा कि इस बार वे दोनों लड़कों की शादी करके रहेंगे । छोटे भैया की तो कोई चिन्ता नहीं थी, लेकिन बड़े भैया के लिए तो वहू की तलाश अभी वाकी थी बुआजी माल फेरते हुए मुझसे कहतीं, 'अरी, तेरा बाप मेरे पास आया और बोला, अजय के लिए एकाध अच्छी-सी लड़की देखनी है । लो, सुन लो, लड़कियां क्या बाज़ार में मिलती हैं ? अरे तुम चार लोगों में उठो- बैठोगे नहीं, बेटों की बात नहीं करोगे, तो कौन जानेगा कि तुम्हारे यहां व्याहने को लड़के बैठे हैं।' कभी रसोई में बैठकर महाराज से सुख-दुःख की चर्चा चलाते कहती, "भैया रे, वो तो पेट जाये की ममता ही कुछ और होती है । अब इन बच्चों की मां होती, तो वताओ क्या अब तक कुवारे बैठे रहते थे। - ८८ : पापाण-युग वह लड़की क्या मेम बनकर विलायत चली जाती!' कमी पापाजी शेव करते होते और वही बैठकर छालियां कतरती हुई बुआ जी कहती, 'विशन रे, मेरी माने तो इस छोकरी को भी लगे हाथ निवटा ही दे। आजकल की लडकियों का कोई ठिकाना है ! कव क्सिका हाथ पकड़कर चल दें और फिर तेरे यहा तो कोई देखने वाला भी नहीं है। इन वाक्यों में व्यंग्य को दोहरी मार होती मम्मी पर । लेकिन वे किसी बात का उत्तर नहीं देती। चुपचार अपना काम करती रहती। या कमरे में बैठकर किताव पढती रहती। बुआजी के आ जाने से रसोई का क्षेत्र उनके लिए निपित हो चुका था। उन्हें इस बात का बुरा लगा भी हो, तो उन्होंने कभी जाहिर नहीं किया। बुआजी की गोलाबारी अकसर चलती ही रहती। पर यह तो मानना होगा कि जिस कार्य-विशेष के लिए उन्हें लाया गया था, उममे वे सिद्धहस्त थी। महीने भर के अंदर ही दूरदराज से वधु-पिताओं की चिट्ठिया, फोटो और कुंडलिया याने लगी। बुआजी के नाते-रिश्तेदारो का जाल भारतीय रेलवे की तरह पूरे देश में फैला हुआ था शायद । उनकी प्रमारण-व्यवस्था भी वही ही कार्यक्षम ज्ञात होती थी। तभी तो सब लोग जान गये थे कि उनके विद्वान् प्रोफेसर भाई का मुदर, सुदृढ, एक हजार रुपये महीना पानेवाला इजीनियर वटा शादी के योग्य हो गया है। मुझसे ही उन्होंने बड़े भैया को पत्र लिखवाया कि फौरन एक महीने की छुट्टी लेकर आ जाओ। ना-नुकर करने की गुजाइश नहीं है । तुम्हारी वजह से छोटे की शादी रुकी हुई है । और आश्चर्य की बात, बड़े भैया सचमुच छुट्टी लेकर आ गये । विजय-गर्व से उल्लसित होती हुई वुआजी बोली, 'देखो, आ गया न राह पर । अब कोई लडका तुमसे खुद आकर कहेगा कि मेरी शादी करो।' बुआजी के भाषणों का एल० पी० दिनभर चलता रहता। मुझे लगता कि किसी दिन मैं पागल हो जाऊगी। एक दिन मम्मी मे मैंने कहा, तो मूखी हंसी के साथ बोली, 'मेरे बारे में कभी सोचा है !' तव लगा, सचमुच अगर पागल होने की नौबत आयी है, तो मम्मी को। क्तिना सुनाया जाता है दिनभर उन्हें । कभी उनकी कोर्ट मैरेज का मखौल उड़ाया जाता है, कभी मा के रूप-रग, याचार-व्यवहार से उनकी । पापाग-युग : ८६ तुलना की जाती है। नौकरों-चाकरों का, हम बच्चों का कोई लिहाज नहीं बरता जाता। उनकी सूनी कोख पर भी एकाघ उसांस भरा वाक्य कहा ही जाता, जैसे-'भगवान का दिया इसके भी एकाध हो जाता, तो गृहस्थी में मन भी लगता । अव तो क्या है, जैसे होटल वैसे घर ।' दस-वीस लड़कियों को देखने-सुनने के बाद एक रिश्ता सर्वानुमति से पास हो गया। लड़की वाले पूना से लड़की को लेकर आये थे। उन लोगों की भी इच्छा थी और बुआजी ने भी राय दी कि दिन अच्छा है, बड़का अगर राजी है, तो शगुन हो ही जाए तो अच्छा है । उन्हें तो उन दिनों वीटो पॉवर थी। फौरन पापा-मम्मी बाज़ार दौड़े गये। एक बनारसी साड़ी, एक अंगूठी, मिठाई, नारियल, फल-फूल-सब- कुछ लाया गया। सब चीज़ों को देख-परखकर बुआजी ने एक थाली में सजा दिया। पास-पड़ोस के दो-चार लोगों को जल्दी में कहलवाया गया। सारी तैयारी होने के बाद बुआजी ने मम्मी से कहा, 'वहू, चार बजे के वाद फिर मुहूरत अच्छा नहीं है । लोग-बाग आयेंगे, जब आते रहेंगे। तू लड़की की गोद भर दे झटपट ।' आज्ञाकारी बहू की तरह मम्मी ने थाल की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि कैसे कुछ याद करके बुआजी बोलीं, 'वकुल ! पड़ोस से मथुराइन को टेर न ले जरा।' 'क्यों ?' 'पहले-पहल खौल भरी जा रही है। किसी लड़कौरी के हाथ से होती, तो ठीक था।' जैसे बिजली का करंट छू जाए, मम्मी ने हाथ थाली से खींच लिया। हमी सभी सन्नाटे में आ गये थे । एकाएक बड़े भैया गरजे, 'बुआजी ! आज आपने कह दिया, सो ठीक है । भविष्य में कभी इस तरह की बात करेंगी, तो इस घर में आपका निभाव नहीं हो सकेगा। हम सब सन्न रह गये। महाप्रतापी बुआजी का अपमान ! और वह भी परम संत वड़े भैया के द्वारा । बुआजी को संभलने का मौका दिये बिना ही वे वोले, 'इतना ६० : पाषाण-युग शास्त्र-पुराण पढती है आप ! इतना तो आपको मालूम होना चाहिए कि हम लोगों के होते हुए मम्मी को इतनी बडी गली आप नहीं दे सकती।' भैया ने 'मम्मी' कहा था । उन्हें पहली बार यह सबोधन करते हुए सुना था। काश ! मम्मी ने भी यह सब-कुछ मुना होता ! लेकिन वे तो पता नहीं, कब से कमरे के बाहर चली गयी थी। ड्राइग रूम में लड़की वाले बैठे हुए थे और भीतर यह नाटक हो रहा था। बड़े भैया ने निर्णय के स्वर में कहा, 'मैं मम्मी को लेने जा रहा हूं। अगर उन्हे मना सका, तो ठीक है । नहीं तो इन लोगों को लौटा दीजिए। मुझे शादी-वादी नहीं करनी है।' और दरवाजे तक जाते हुए फिर ठिठक गये। इस बार अपनी रोपभरी आ पापाजी की ओर उठाते हुए बोले, "पूज्यनीय पापाजी | मा को मृत्यु को तीन माल भी न हो पाये थे कि आप अपनी ही एक छात्रा से ब्याह रचा वैठे थे। लेकिन उस दिन भी आपसे इतनी नफरत नहीं हुई थी, जितनी आज हुई है। बुआजी ने इतनी बड़ी वात कह दी और आप चुप खड़े सुनते रहे, जबकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी कोई गलती नहीं है।' 'कोई गलती नहीं है, लेकिन फिर भी यह संतानहीन जीवन विताने पर विवश होना पड़ा है मम्मी को । क्या गादी से पहले उन्हें यह बात पता थी? या प्रेम के ज्वार में उस समय यह सब-कुछ बहुत महत्वपूर्ण नहीं लगा था 'चार वच्चो के बाद पापा का मन भर जाना तो स्वाभाविक था। पर क्या मम्मी के मन मे कभी ममता का सैलाव नहीं उमड़ा होगा ? तब किस पर बरसाया होगा उन्होने अपना प्यार-दुलार । कभी तो तिरस्कार उपजा होगा उस पुरुप के प्रति, जिसने उन्हें नारीत्व के इस गौरव से वचित रखा था। एकाध बच्चा सचमुच अगर होता, तो आज उनका जीवन यू लक्ष्यहीन नाव की तरह लडखडाता नही लगता । उनके एकाकीपन को घाटनेवाला कोई होता, तो शायद हम लोग भी स्वस्थ मन से घर लौट । सकते थे। सुबह उठकर यही सब मेरे मन में आ रहा था। दोनो भैया अपना सामान । पापाण-युग : ६१ वांध चुके थे। मम्मी के आदेश को सिर-माथे रखकर दोनों भाभियां ले 'जाने योग्य सामान छांट रही थीं। बुआजी भी दो-चार चीजें अपने परम प्रिय भाई की 'याद' में लिये जा रही थीं। 'वकुल, तुम नहीं देख रहीं अपने लिए कुछ ?' मम्मी ने कहा। 'अभी से क्या करूंगी। अभी तो पंद्रह दिन पड़े हैं जाने को।' मैंने कहा। 'लेकिन तब सिर्फ तलछट ही हाथ आयेगी।' उन्होंने मुसकराकर कहा । वे चुपचाप बैठी दोनों बहुओं की 'कुशलता' देख रही थीं। कितनी चीजें पैक की जा चुकी थीं। पतिदेवता के डर से जो चीजें साथ नहीं जा रही थीं, उन पर रिजर्वेशन स्लिप लगाकर रखा जा रहा था, ताकि अगली ट्रिप में आसानी हो। मैंने हंसकर कहा, 'मम्मी ! इस स्पीड से अगर हम सब लोग घर को खरोंचना शुरू कर देंगे, तो कुछ दिनों के बाद आपके पास यादगार के तौर पर सिर्फ दीवारें रह जायेंगी।' 'मेरी चिंता मत कर रे ! मेरे पास इतनी यादें हैं कि ऐसी-ऐसी दो- दो जिन्दगियां वसर हो सकती हैं ।' मैने गौर से देखा, समझ ही मे नहीं आया कि यह कथ्य विगत स्नेह का सूचक है, या व्यथा का । और उत्तर में चुप ही रह जाना पड़ा । तभी 'पोस्टमैन ने आकर मुझे मुक्ति दिला दी। रजिस्टर्ड लेटर था मम्मी के नाम । पढ़कर ही वे कुछ ऐसी उदास हो गयीं कि मेरा तो मन घबरा उठा। पूछने का भी साहस न बन पड़ा। वगीचे में बड़े भैया किसी ठेलेवाले से बात कर रहे थे। शायद शाम के लिए तय कर रहे थे । मैंने उन्हीं से जाकर बतलाया । वे मेरे साथ मम्मी के कमरे में आये । उसी तरह पत्र हाथ में लिये वे निस्संद बैठी थीं। 'मम्मी ?" उन्होंने चौंककर सिर उठाया। 'किसकी चिट्ठी है ?' उन्होंने लिफाफा हाथ में थमा दिया। पापा के कॉलेज से आया था। मम्मी के लिए नियुक्ति-पत्र था । यह तो खुश होने की बात थी। उनके एकाकीपन की समस्या का हल इतनी जल्दी मिल जायेगा, ऐसा सोचा भी । .६२ : पापाण-युग न था। फिर मम्मी क्यो उदास हैं ? शायद पापा के ही कनिज में जाने की कल्पना उनके लिए अमह्य हो उठो हो । 'मम्मी! नौकरी आपके लिए ऐसी जरूरी भी नहीं है । आपका जी न चाहे, तो आप मना कर दीजिए। आप तो याराम से अपना थीसिस पूरा कीजिए, कब से रका पडा है। मैंने कहा। 'जी न चाहने की तो कोई बात ही नहीं है रे ! मेरी तो कब मे यह अभिलाषा रही थी, अपने ही कॉटेज में पढ़ाने की।' 'फिर आप इतनी उदास क्यों हैं " मैंने बच्चों की नयह मचल- कर कहा। 'यही मोच रही थी कि इतनी पुरानी इच्छा अब जाकर पूरी होनी यी। बुरा तो लगता ही है न ।' उन्होंने इतने स्वाभाविक ढंग मे वहा मुझे चुप हो जाना पड़ा। 'मम्मी ।' वड़े भैया गंभीर स्वर में बोले, 'मेरे खयाल में आपका अभी यहां रहना ठीक नहीं है । कॉलेज जाने की बात तो और भी नहीं जंचती मुझं । आप छुट्टो भर मेरे साथ रहें। जुलाई में ज्वाइन कर लें। तब तक कुछ...' 'आऊगी, अजय, तुम्हारे यहां भी आऊगी, पर अभी नहीं । सहानुभूति से इन लोगों ने जो ऑफर दिया है, दुवारा शायद न दें।' मम्मी का कहना ठीक ही था। बात पुरानी होने पर फिर उतनी वजनदार नहीं रहती। ऐमा यवमर दोबारा मिले न मिले। पापा की जिद के कारण उनकी यह इच्छा अब तक पूरी नहीं हो पायी यो। पापा नौकरी के सख्त खिलाफ थे। 'मम्मी ! आपकी कोई महेलिया क्यो नही हैं ? आती-जाती रहती, तो मन बहला रहता।' मैंने कहा। "जिस उम्र में सहेलिया बनायी जाती हैं, वह तो तेरे पापा दे चरणों में गुजार दी। और बातों के लिए समय ही कहां रह गया था । शादी के वाद तो सर मवाल ही नहीं उठता था 'न हो, आप कोई क्लब ज्वाइन कर लें। बड़े भैया बोले । 'क्लव | पागल हुए हो।' पापाण-युग : ६ 'मैं तो बड़ी चिंता में पड़ गया हूं। ऐसा कोई घर भी तो नज़र नहीं आता मुझे, जहां आप लोगों के घनिष्ठ संबंध रहे हों । उन लोगों के भरोसे कम-से-कम मैं निश्चित तो हो सकता !' 'इतने परेशान क्यों हो रहे हो अजय, मेरी समझ में नहीं आता । यह अकेलापन क्या आज का है। इसकी तो अब आदत-सी बन गयी है... तुम्हारे पिता के साथ रहकर और सीखा ही क्या है । बचपन में तुम लोगों ने उस जादूगर की कहानी तो सुनी होगी, जो एक राजकुमारी को वश में कर लेता है। दिन भर तो बेचारी पत्थर की मूरत बनी रहती है और रात में...' और सहसा जैसे उन्हें याद आ गया कि वे क्या कह गयी हैं । दोनों हाथों से अपना चेहरा ढंक लिया उन्होंने । मैं और बड़े भैया पत्थर की मूर्ति बने उन्हें देखते रह गये थे । १४ : पाषाण-युग निष्कासन 'मैं तो बड़ी चिंता में पड़ गया हूं । ऐसा कोई घर भी तो नज़र नहीं आता मुझे, जहां आप लोगों के घनिष्ठ संबंध रहे हों। उन लोगों के भरोसे कम-से-कम मैं निश्चित तो हो सकता !' 'इतने परेशान क्यों हो रहे हो अजय, मेरी समझ में नहीं आता। यह अकेलापन क्या आज का है। इसकी तो अब आदत-सी बन गयी है... तुम्हारे पिता के साथ रहकर और सीखा ही क्या है । वचपन में तुम लोगों ने उस जादूगर की कहानी तो सुनी होगी, जो एक राजकुमारी को वश में कर लेता है। दिन भर तो बेचारी पत्थर की मूरत बनी रहती है और रात में...' और सहसा जैसे उन्हें याद आ गया कि वे क्या कह गयी हैं। दोनों हाथों से अपना चेहरा ढंक लिया उन्होंने । मैं और बड़े भैया पत्थर की मूर्ति वने उन्हें देखते रह गये थे। ६४ : पापाण-युग निष्कासन
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सारी रात शरीर पर जमे छिपकलियां रेंगती रहीं। चार बजे के बाद तो बिस्तर पर लेटना मेरे लिए अमभव हो गया। शॉवर के नीचे बैठकर देर तक नहाती रही, तब जाकर जी हल्का हुआ। घाघरूम से लौटकर देखा, डॉ. कोहली अब भी गहरी नीद में सोये हुए थे। नीद मे उनका चेहरा बच्चों कामा लग रहा था तृप्न, शांत, निलिप्त। उनके हल्के खरटैि दक्षिण महासागर के स्वर मे घुल-मिल गये थे। दक्षिण महासागर, जो इस ब्राह्ममुहूर्त में सपा का आवाहन कर रहा था। मंद्र मप्तक में आरोह-अवरोह भरती हुई उन लहरों का गभीर नाद मुझे वाहर आने का निमंत्रण दे रहा था। कमरे की चारदीवारी मुझे जहर-मी लग रही थी। मैंने अपने गीले वालों का एक ढीला-मा जूडा बनाया और वाहर निकल आयो । काउंटर पर बैठे क्लकं ने मुझे 'गुडमॉनिग' किया। गेट पर कंपते-से दरबान ने मुझे सलाम भी किया। पर किमी की भी आखों में मुझे आश्चर्य या कौतूहल नहीं दिखाई दिया । सागर के सम्मोहन से शायद वे लोग मुझसे ज्यादा परिचित थे । अभी पो नहीं फटी थी, पर गोली रेत में भीड धीरे-धीरे इकट्ठा हो रही थे। सबकी या दक्षिण के प्रसिद्ध मूर्योदय को देखने के लिए ललक रही थीं। उस भीड़ में यद्यपि कही कोई परिचित चेहरा नहीं था, फिर भी उस क्षण दे मारे लोग बड़े अपने-से लग रहे थे। भीड़ से छिटककर मैं एक कोने में बैठ गयी। जल को सिंदूरी प्रामा निष्कासन : ६७ -- , . को अपने में भरती हुई मेरी आंखें विवेकानंद शिला-स्मारक से जा टकरायीं, जो धीरे-धीरे आकार ले रहा था। जैसे-जैसे दिशाएं उजली होती जा रही थीं, उसका एक-एक अंग उद्भासित हो रहा था। पहले शिखर, फिर गर्भगृह, फिर सीढ़ियां । लग रहा था जैसे किसी शिल्पी ने तम का पहाड़ चीरकर एक मंदिर ऊपर से नीचे की ओर तराशना प्रारंभ किया हो । बहुत दिनों पहले, गरोठ के पास धर्मराजेश्वर का मंदिर देखा था। उसी की याद हो आयी। खिलखिलाहट की ध्वनि सुनकर मैंने चौंककर सिर उठाया। कल वाली स्कूल-पार्टी पूरे तट पर फैल गयी थी। कल यही सव शिला-स्मारक पर भी मिली थी। सारा वक्त मेरी आंखें उन्हीं का पीछा करती रहीं। उनका चहकना, खिलखिलाना, गोल-गोल आंखें घुमाकर बातें करना, एक-दूसरे के कंधों पर झूलकर चलना, टीचर को देखकर जीभ काट लेना-सब कुछ कितना प्यारा लग रहा था। जब तक वे लोग बोट पर बैठकर रवाना न हो गयीं, मैं अपलक उन्हें देखती रही। होश में आने पर देखा, डॉ. कोहली एक गवाक्ष के सहारे चुपचाप खड़े समुद्र को निहार रहे हैं। 'मुझे अफसोस है...' मैंने उनके पास जाते हुए संकोच में डूबे हुए स्वर में कहा। 'नहीं, अफसोस की क्या वात...' उन्होंने भर्राये कंठ से कहा और आगे चल दिये । जैसे अब तक मेरी ही प्रतीक्षा में खड़े हों । मैं घिसटती-सी उनके पीछे चल दी। मन में एक अपराध-बोध व्याप गया-मेरी वजह से आज की सारी शाम वेसुरी हो गयी है । तरह-तरह से मैंने उस तनाव को तोड़ने का प्रयास किया। स्मारक के दर्शन के बाद जब हम लोग बोट से इस किनारे तक आये, तब तक वे काफी नॉर्मल हो चुके थे। 'सुनिए।' उन्हें सहज जानकर मैंने सफाई देते हुए कहा, 'इन लड़कियों को देखकर मुझे गुड़िया की याद हो आयी थी। मैं जानती हूं कि यह ठीक नहीं, पर मैं क्या करूं...!' 'इसमें गलत तो कुछ नहीं।' उन्होंने जैसे मुझे आश्वस्त करते हुए कहा, 'लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आती।' ६८ : पापाण-युग मैं बुद्ध की तरह उन्हें देखती रही। 'तुम्हें हर बार स्कूली लड़कियों को देखकर ही गुड़िया की याद क्यो आती है ? इन पंद्रह दिनो मे मैंने यह बात कई वार मार्क की है। कोंक या स्कर्टलाइजवाली किमी लड़की को देखते ही तुम्हारी आखें पीड़ा से भर उठनी है । क्या तुम्हारी कल्पना में वह अब भी छोटी-मी वच्ची ही है ? मैंने भी उसे देखा है। वह एक मुदर युवती है-मनोहर और मांसल । तुम पता नही क्यों उसे अब तक नन्ही-मुन्नी गुडिया ही समझती रही हो। शायद मा की नजरों में बच्चा कभी बड़ा होता ही नहीं । ठीक है न ।' 'मायद यही वात हो।'उनके लंबे-चौड़े वक्तव्य का मैने सक्षिप्त-सा उत्तर दे दिया। अब उन्हें कैसे समझाती कि साड़ी में लिपटी हुई सजी-धजी यह लड़की तो बिन्नी (उमकी वुआ) की विधु है। मेरी गुड़िया तो इन्ही लडकियो जैसी है, हिरनी की तरह कुलाचें भरने वाली, चिड़िया की तरह चहकने वाली, झरने की तरह खिलखिलाने वाली-मेरे मन-प्राणो में तो उसका वही रूप है। कह भी देनी, तो क्या वे समझ पाते । पुरुप हैं, फिर इतने वर्ष पश्चिम में बिताकर आये हैं। पश्चिम, जहा लोग सिर्फ वर्तमान को जीते हैं, उसे पूरी इच्छाशक्ति के साथ भोगते हैं। तभी तो इतना खुलकर हस पाते है। कौन कह सकेगा कि डॉ. कोहली अमरीका में अपनी पत्नी और दो वेटे छोड़कर आये हैं । जो बीत गया, उसके लिए कोई कमक नही, मलाल नहीं । अतीत के लिए विमूरना तो हमारे हिस्से में आया है । बड़ी मुश्किल से अपने को ममेटकर में पूरे मन मे एन्जॉय करने का निश्चय कर चुकी थी पर कन्याकुमारी को प्रतिमा के सामने जाकर फिर विखर गयी । मन सुदूर अतीत में दौड गया, जहा स्कूल के वार्षिकोत्सव मे 'मदन-भस्म' मगीतिका में अभिनय करने के लिए वह पार्वती के रूप में सज-धजकर तैयार बैठी थी। 'म कसी लग रही हूं, मम्मी ?' मुझे प्रीन-रूम मे देखते ही उगने पूछा था। तब दोनों हायों में उसका माया पकडकर मैंने उसे चूम लिया था। उस समय उसकी आखें ऐसे ही हंस रही थी, ऐसे ही। 'वाह, क्या आखें हैं, क्या सौंदर्य है !' डॉ. कोहली अभिभूत होकर निष्कासन : ६६ कह रहे थे। उनकी नजरें बचाकर मैंने अपनी आंखें पोंछ ली थीं। पर उनकी तीक्ष्ण दृष्टि से शायद यह सव कुछ नहीं छूट सका था। क्योंकि रात विस्तर पर आते ही उन्होंने अपने मृदु स्वर में पूछा था, 'माया ! बता सकती हो, मनुष्य शादी क्यों करता है ?' 'यह क्यों पूछ रहे हैं आप?' मैंने उत्तर में एक प्रश्न ही जड़ दिया। 'इसलिए कि मैं बतलाना चाहता हूं कि शादी का मकसद सिर्फ शारीरिक तुष्टि नहीं, उसका इंतजाम तो चांदी के कुछ टुकड़ों में कहीं भी हो सकता है । इंसान जव शादी करता है, तो जरूर ही इससे कुछ ज्यादा - चाहता है।' 'तो क्या"तो क्या आपको वह नहीं मिल रहा?' मैंने कांपते स्वर में पूछा। . 'नहीं !' उन्होंने दो-टूक जवाव दिया, 'उल्टे मुझे रोज़ ऐसा लगता रहा है, जैसे मैंने तुम्हारे साथ बलात्कार किया हो । कोई भी शरीफ आदमी इस भावना के साथ खुश नहीं रह सकता। क्या यह शादी तुम पर थोपी गयी है ?' मैंने नकारात्मक ढंग से सिर हिला दिया, पर उनकी आंखों में अविश्वास वरावर झलकता रहा। 'दरअसल बात यह है कि पिछला सब कुछ एकदम भूलना मेरे लिए मुश्किल है।' मैंने कहने का प्रयास किया । पर मेरी बात काटते हुए उन्होंने कहा, 'भूलने के लिए कौन कहता है ? कम-से-कम हम हिस्सा तो बंटा ही सकते हैं।' सच तो था। उन्होंने भी तो मुझे अपने प्रेम की, असफल विवाह की दास्तान सुनायी थी। यह भी बतलाया था कि वहां की आपाधापी से ऊबकर वे अव एकदम शांत जीवन विताना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने महाराष्ट्र के एक सुदूर ग्राम में अपनी डिस्पेंसरी खोल रखी है। नरेन्द्र की असमय मृत्यु के दाग को छोड़ दिया जाए, तो मेरे वैवाहिक जीवन की स्मृतियां माधुर्य से ओतप्रोत थीं, जिन्हें अपने एकाकी जीवन में भी मैंने अपनी कल्पना में ही कई-कई बार जिया है। इसीलिए मेरा मनोवल कभी टूट नहीं सका। लेकिन अब वे सारी बातें कितनी दूर की १०० : पाषाण-युग लगती हैं। पिछले दो-तीन वर्षों मे मन पर एक ही नाम रह गया है । एक ही कमक, एक ही पीड़ा रह गयी है और वह है गुड़िया, मेरी विध, मेरी विटिया। कमी कहने पर भी आऊं, तो क्या सिलमिलेदार वह सब यह पाऊंगी में ! बड़े फूहड़ ढंग से रात उन्हें अपने मर्वात्म समर्पण का विश्वास दिलाती रही। उन्हें शायद मंतोष हो भी गया हो, पर मुझे अपने से ही नंतोप नहीं या। सच तो यह था कि मकड़ों योजन को मानसिक दूरी के साय जब दो शरीर मिलते हैं, तो उम मिलन में कोई मांगल्य, कोई सोदय, कोई अर्थ नहीं रह जाता। गोचती हूं, जिम तरह उसने मुझे उपेक्षित करके अपने लिए एक नया मंमार खड़ा कर लिया है, में क्यों नहीं कर सकती? लेकिन दोनों की स्थितियों में अंतर भी तो है । मैं मा हूं, वह बेटी है । उमे तो नदी के जल की तरह हमेशा आगे ही दौड़ना है। मुझे तो किनारों की तरह मिर्फ अपनी बांहें फैलाये रखना है। - सभी की लडकिया एक दिन परायी हो जाती हैं । इसीलिए तो विधु के जन्म पर मैं फूट-फूटकर रोयी थी। दो बच्चों को मृत अवस्था में जन्म देने के बाद यह सीजेरियन का अतिम चांस या । तब अम्मा ने समझाया था, 'पगली, रोती क्यो है ? मी ममता विटिया करती है, ऐमी लहके योड़े ही करेंगे। लडकी कही भी रहेगी, तो तेरे लिए आठ-आठ आमू रोयेगी। लड़के तो घर में रहेगे, तब भी आख उठाकर न देखेंगे।' शायद अम्मा अपने अनुभव के बोल सुना रही थी। इसका प्रमाण मुझे मिला जब नरेन्द्र अचानक हमारे बीच से उठ गये थे। दीमारी में बड़े धैर्य से उनकी सुथूपा करनेवाली में एकदम टूट गयी थी। तब इस नौ वर्ष की छोकरी ने मुझे मा की तरह सहारा दिया था। पिता की मृत्यु का दु.प किमी दार्शनिक की तरह पीकर वह मेरी देवमाल करती रही। शोक. प्रदर्शन करने के लिए आनेवाली भीड से, रास्ते पर लोगों की करा दृष्टि मे, नाते-रिश्तेदारों के व्यंग्य-बाणों से-बड़े कोगल से मुझे इन मवरे बचाती हुई वह उधार लायी थी । उसको मजबूत वाही का सहारा पाकर - 1 निवासन : १०५ मैंने पतवार फिर थाम ली थी और ज़िन्दगी बड़े आराम से पार हो रही थी। चुप था फिर तेईस मार्च का वह अशुभ दिन आया। हां, ठीक तेईस मार्च ही थी वह । इतने दिनों बाद भी वह तारीख ऐसे याद है, जैसे कल ही की वात हो । गुड़िया की परीक्षा चल रही थी. -हायर सेकंडरी वोर्ड की। रोज़ की तरह दफ्तर से लौटते हुए मैंने पेस्ट्री, संतरे, मक्खन की टिकिया खरीदीं। एक 'माधुरी' का अंक और एक-दो पॉकेट बुक्स भी वैग में छिपाकर रख लीं। कल आखिरी पेपर थे । परीक्षा खत्म होते ही उसे कुछ-न-कुछ पढ़ने को चाहिए । घर एकदम सुनसान था। आठों पहर चीखने वाला रेडियो भी और उसकी हर धुन पर थिरकनेवाली गुड़िया का कहीं पता नहीं था। सारी चीजें रसोई की अलमारी में रखकर मैंने चाय का पानी चढ़ाया और उसे आवाज़ दी। पर कोई उत्तर नहीं आया। चाय छानने के बाद मैं खुद ही दोनों कप लेकर चारों कमरों में घूम आयी। मेम साहव सुस्त होकर आरामकुर्सी पर पड़ी हुई थीं। बड़ी ममता हो आयी। दिनभर पढ़ती रही होगी वेचारी। 'मेम सा'ब, चाय हाज़िर है।' मैंने एक स्टूल खींचते हुए कहा। उसने आंखें खोलकर देखा, चुपचाप एक कप लेकर सुड़कना शुरू कर दिया। मम्मी को देख रोज़ की तरह मुसकरायी भी नहीं-न नाश्ते की फरमाइश, न देर से आने की शिकायत । मुझे बड़ा अजीब-सा लगा। 'पेपर कैसा हुआ, वेटे ?' मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा । 'अच्छा ही हुआ।' उसने मरी हुई आवाज़ में कहा । लेकिन मैं समझ गयी कि अच्छा नहीं हुआ है, नहीं तो वह इतनी उदास क्यों होती। थोड़ा दुःख भी हुआ, पर मैंने ज़ाहिर नहीं होने दिया। 'लता के घर तक घूम आना हो, तो हो आ। मैं अभी खाना तैयार करती हैं। लेकिन उसने कोई उत्साह नहीं दिखाया। मैंने जल्दी-जल्दी सब्जी छौंकी, परांठे सेंके, थोड़ी-सी बूंदी उतारकर उनका रायता बनाया और १०२ : पाषाण-युग ? उसे आवाज दी। मेज़ पर साना लगाते हुए देखा, सुवह को प्लेटें पड़ी भिनभिना रही हैं । डाटने की इच्छा हुई, पर सोचा कि जाने दो। परीक्षा के दिन है। भूल गयी होगी। खुद मेज साफ करके खाना लगाया। 'खाने के लिए साथ में सुबह कौन था-लता या आरती?' याना खाते हुए मैंने पूछा। कुछ क्षण वह थाली मे उंगलिया चलाती रही। फिर वोली, 'गंगाधर चाचा थे।' 'अच्छा| किसी काम से आया या?" 'नहीं ! रास्ते मे मिल गये थे । मोटर साइकिल पर घर तक छोड गये।' 'खाना तो तुम्हारे ही लायक था, कम तो नही पडा? अलमारी में ग्रेड भी रखी थी, निकाल लेती न । अच्छा, छाया नहीं आयी अभी? तीन महीने हो गये। मा के यहा ही जाकर बैठी हुई है । गगाधर का क्या हुआ फिर से बहाल होने के ऑर्डसं आनेवाले थे इस महीने ? उसके केस का फंसला हुआ या नही" प्रश्नो की झड़ी के बीच खयाल आया कि गुडिया चुपचाप बैठी है। मेरी एक बात का भी जवाब उसने नहीं दिया। ठीक भी था। इतनी-मी लड़की इन बातो को क्या समझती। खाना खाते ही वह विस्तर पर जा लेटी, मैंने पढ़ने के लिए इसरार नहीं किया। सोचा, ठीक से सो लेगी, तो तरोताजा हो जायेगी । वैसे एक रात से फर्क भी क्या पडता था। 'वेटे, अपना गणित का पेपर वाचाजी को दिखा दिया या एक प्रश्न पर सदेह हो रहा था न तुम्हे !' मैंने वत्ती बुझाते हुए पूछा। उसने जवाव नहीं दिया। शायद आज के पेपर से उसका मूड ऑफ हो गया था। 'कोई बात नही। फिर कभी आयेंगे, तो दिखा देना।' मैंने तसल्ली देते हुए कहा । 'फिर कभी आयेंगे, तो धक्के मारकर निकाल दूगी क्या यह गुड़िया की ही आवाज थी ! मैंने दुवारा बत्ती जलायो । य अपने विस्तर में बैठी गुस्से रो तमतमा रही यो। निष्कामन : १० 'ऐसा नहीं कहते, वेटे!' 'उस आदमी को तुमने घर में भी घुसने दिया, तो मुंह नहीं देखूगी।' उसने दांत पीसते हुए कहा । 'लेकिन ऐसा हुआ क्या है ?' 'क्या हुआ है, देखोगी?' कहते हुए उसने तडातड़ अपने ब्लाउज के बटन खोल डाले । उफ़ ! कोई इतना वहशी हो सकता है, मैंने सहमकर अपनी आंखें बंद कर लीं। उजले बल्ब की रोशनी में उसका अनावृत शरीर दीपशिखा-सा दमक रहा था और गंगाधर की हैवानियत के चिह्न उसे धुएं की लकीर की तरह घेरे हुए थे। दुवारा आंखें खोलीं, तब तक वह व्यवस्थित होकर विस्तर पर जा सोयी थी। पर उतनी-सी देर में जान लिया कि गुड़िया अव बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गयी है। मां की बात याद आयी। पिछली बार वे आयी थीं, तो बार-बार कहती रही थीं-'लड़की तो बाप की तरह लंबोतरी हुई जा रही है । इसे साड़ी या सलवार पहनाया कर। ये उघड़ी-उघड़ी टांगें अच्छी नहीं लगतीं।' मुझे इतना गुस्सा आता। खीजकर कहती--'तुम भी गजव करती हो, अम्मा। हम लोगों को तेरह साल की उम्र से साड़ी में बांध दिया था। इस वेचारी को यह सजा क्यों देती हो ! पता है आज तो कॉलेज में भी कोई साड़ी पहनकर नहीं जाता। अम्मा तुनककर कहतीं, 'आजकल के क्या कहने ! इनका बस चले, तो फिराक पहने ही भांवरें पड़वा लें।' घर में गंगाधर, डॉक्टर साहब या अन्य कोई परिचित आते, तो वे भुनभुनाती रहतीं, 'लड़की को समझाया कर, जरा इनसे दूर ही रहा करे। ये चौबीस घंटे चोटी खींचना, गाल मसलना, पीठ पर धौल जमाना मुझे अच्छा नहीं लगता।'. 'गजव करती हो, अम्मा, तुम । ये सव उसके चाचा लोग हैं । पता है, इसे कितना लाड़ करते हैं ?' 'तो लाड़ क्या दूर से नहीं हो सकता ?' अम्मा की इस बात को मैंने हमेशा हंसी में उड़ाया। ऐसी ऊटपटांग १०४ : पापाण-युग कहा, 'डॉक्टर वातों से लड़की का दिमाग खराब करने की इच्छा कभी नहीं हुई। क्या यह मैंने ठीक किया था? उसे अपनी गोद में भरते हुए मैंने कांपतो आवाज में आंटी को आवाज़ क्यों नहीं दे ली, बेटे?' 'ओह मम्मी, मुझे क्या मालूम था?वह विलेनो का-सा व्यवहार करने लगे। बैठे ही बैठे एकदम वदतमीजी पर उतर आये।' फिर मुझसे अलग होते हुए बोली, 'मैंने भी वह सबक सिधाया है कि जिन्दगी भर याद रखेंगे। मैं कोई मिट्टी का लोंदा नहीं हूं कि जो चाहे मुझे रौंदकर चला जाए उसका यह आवेग, वह रोष, वह रूप मेरे लिए एक्दम नया था। अनुभव के क्षण उसे एकदम वडा कर गये थे। और अनुभव भी कितना भयानक । वेवारी अब कभी जान नहीं पायेगी कि पुरुप का पहला स्पर्ग कितना मंगल, कितना पवित्र, कितना रोमांचक होता है । इस दुदिन की स्मृति हमेशा एक काली छाया की तरह उसके अनुभवों के आसपास मंडराती रहेगी। हाय गंगाधर | तुमने यह क्या किया? इसके लिए मैं जिन्दगी भर तुम्हें माफ नही कर पाऊगी। कल तक गंगाधर मेरे स्नेह का, सहानुभूति का पात्र था। वैचारा याठ-दस महीने से मुअत्तिल होकर घर पर बैठा हुआ था। मामन से तिरस्कृतहोते ही सबधियों की उपेक्षा का दुख भी उसे सहना पड़ रहा था। आर्थिक सकट भी मुह वाये खडा था। इन सबमे घबराकर छाया भी बच्चों को लेकर मां के पाम चली गयी थी। सारी मुसीवतो के बीच वह एकदम अकेला पड गया था। पली के तानो से छलनी बने कलेजे को लेकर विभागीय जाच से जूझ रहा था । महीनो से किसी स्नेहिल म्पर्श का प्यामा उसका मन फगुनायो एकांत दोपहरी में विधु का आकर्षण नहीं झेल पाया होगा ! अगर विधु की जगह और कोई होता, तो मेरी सारी सहानुभूति गंगाधर के साथ होती। पर उस समय तो मेरा कण-कण उसे कोस रहा था। लग रहा था कब सुबह हो और... निष्कासन : १०५ लेकिन सुबह होने पर ही मैं क्या कर लेती? क्या उसके दरवाज़े जा- कर इस विश्वासघात के लिए जवावतलब करती ? सर्वनाश जो होते-होते रह गया था, मेरी बातों से शायद पूरा ही हो जाता। तब बहुत याद आये नरेन्द्र । पुरुप के छन्न के विना कितना पंगु हो जाता है नारी का जीवन ! रात के अंधेरे में हम मां-बेटी देर तक एक-दूसरे से लिपटी उनकी याद में आंसू वहाती रहीं। सुवह जव उठी थी, तो एक निश्चय के साथ ही । सारी वात एकदम भूल जाना ही श्रेयस्कर था, जिसमें आज गुड़िया का आखिरी पेपर था। मैंने रोज़ की तरह चाय वनायी, नाश्ता बनाया, उसके लिए पानी गरम किया और रोज़ की तरह सहज भाव से ही उसे जगाया। रोज़ विस्तर से उठते ही उसकी जवान शुरू हो जाती थी । उस दिन उसका चार्ज मैंने ले लिया था। मैं एक क्षण का भी अंतराल नहीं छोड़ना चाह रही थी, जिससे वह कल के बारे में सोचने लगे। उसे नहाने भेजकर मैं कलम में स्याही भरने चली थी कि घंटी बजी। 'इतनी सुवह कौन होगा'- सोचते हुए मैंने दरवाजा खोला । नाइट गाउन पहने पड़ोसी डॉक्टर मित्रा खड़े थे। 'आपका फोन है, भाभी!' 'मेरा ?' मैंने आश्चर्य से भरकर पूछा और उनके पीछे चल पड़ी। 'भाभी, मैं दवे बोल रहा हूं, तिलकनगर से।' रिसीवर उठाते ही आवाज़ आयी। 'कहिए!' मैंने उत्तर दिया । और उसके वाद जो कुछ सुना, वह इतना भयानक था कि मेरे हाथ से रिसीवर ही छूट पड़ा। 'क्या बात है, भाभी?' डॉक्टर दंपति ने घबराकर पूछा। 'गंगाधर ने सीलिंग फैन से लटककर आत्महत्या कर ली है।' मैंने सपाट स्वर में कहा। 'क्या?' वे दोनों भी स्तब्ध रह गये थे। 'कल ही तो गुड़िया को छोड़ने यहां तक आये थे।' मिसेज़ मित्रा ने कहा । मैंने घवराकर उनकी ओर देखा; ईश्वर न करे, आगे का हाल भी वे जानती हों! । १०६ : पाषाण-युग 'सस्पेंड हो गये थे न! मैंने मुना कि बीवी भी लड-झगड़कर चलो गयी थी।' डॉक्टर साहब बोले। 'यही तो गलत होता है। ऐसे समय पति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। पता नहीं कब कैमा मन हो जाए?' मैंने मिसेज मित्रा को बात पूरी नहीं करने दी। हडबड़ाकर उठने हुए वोली, 'सुनिए, मुझे शायद दिन भर वहा लग जायेगा। आप गुडिया को यही रख लीजिएगा । और "और उसमें अभी कुछ नही बतलाइएगा।' 'आप वेंफिक रहिए।' उन लोगो ने आश्वासन दिया। 'कहा चली गयी थी, मम्मी ?' विधु ने पूछा। 'पडोस में कहने गयी थी। आज तुम खाना वही पाओगी। मुझे जरा जल्दी दफ्तर जाना है। वना नहीं पाऊगी।' मुझे लगा, वह सौ प्रश्न पूछ डालेगी, पर वैसा कुछ नहीं हुआ। चुपचाप नाश्ता करके सीढिया उतर गयी। रोज की तरह न भगवान को हाय जोड़े, न मेरे पाच छुए, न सडक से टा-टा किया। उसका वह बदला हुआ रूप देखकर मन भर आया। दुख करने के लिए भी समय कहा था। वहा गगाघर के बगले पर मेरी प्रतीक्षा हो रही थी। कहने को रिश्ता हम लोगों में कुछ भी नहीं था। बरेली में उन लोगों का मकान हमारे घर के मकान से लगा हुआ था, वम । परदेश में आकर यही रिश्ता पक्का हो गया था। नरेन्द्र को वे हमेशा बड़े भाई की तरह मानते रहे थे और उनके बाद भी परिवार को गगाघर का स्नेह-सहयोग मिलता रहा था। इसीलिए सबसे पहले मुझे ही याद किया गया था। यह कल्पना कितनी अजीब लग रही थी कि जिस ममय में अपने संपूर्ण अंतमंन से उसे शाप पर शार दिये जा रही थी, उमका मृत शरीर छत के पंखे से झूल रहा था। मुअत्तिल होने का अपमान उमने दिलेरी से सहन कर लिया था, रिश्तेदारो की उपेक्षा की उसने परवाह नही को थो, पत्नी को अवहेलना भी वह पी गया था, पर आत्मग्लानि को यंत्रणा उससे मेली नही गयी थी। मृत्यु का निश्चित समय दवे बता नहीं पाया था । दूध वाले ने दरवाजा खटखटाने के बाद बेडरूम की खिडकी से झाका घा, तभी इस दुर्घटना का पता लग सका था। निष्कासन : १०७ - । । . लेकिन मुझे निश्चय था कि गंगाधर यहां से लौटकर ही मृत्यु से लिपट गया होगा। जैसा उसे अब तक जाना था, उससे यही लगता था। मेरे मन का सारा आक्रोश करुणा में बदलकर रह गया था । मेरे वहां पहुंचने तक लाश पोस्टमार्टम के लिए जा चुकी थी। मेज़ पर उसकी लिखी चिट्ठी भी पुलिस ले गयी थी। दवे ने बतलाया कि उसमें बस इतना लिखा था, 'जीवन से ऊब गया हूं। सब लोग कहा-सुना माफ करें।' मन का रहा-सहा रोष भी चिट्ठी की बात सुनकर निकल गया और मेरी आंखों से आंसू बह निकले। दिनभर कसे वीता, शब्दों में कहना कठिन है। एक तो मौत का घर, फिर ऐसी भयानक मौत । ढेर सारे लोग इकट्ठा हो गये थे। वे लोग भी थे, जो उससे इन दिनों कतराये थे। वे अफसर भी थे, जो उससे गांव का घी मंगवाते थे, अपनी बेटियों की शादियों में सरकारी पेट्रोल फुकवाते थे, हर छह महीने बाद अपना नज़राना वसूलते थे। उसके मुअत्तिल होने पर इन सब लोगों ने आंखें फेर ली थीं। और अव अर्थी को कंधा देने के लिए तत्परता से हाज़िर हो गये थे। वे रिश्तेदार भी थे, जो उसकी सरकारी जीप में बैठकर यहां-वहां जाने में बड़ा गर्व अनुभव करते थे। उसी जीप के छिन जाने के बाद, जो उसकी नमस्ते का जवाब भी ऐसे देते थे, जैसे अहसान कर रहे हों। वे दोस्त भी थे, जो हर तीसरे दिन उसके यहां डिनर पर आते रहते थे। पर पिछले छह महीनों से किसी ने उसे चाय पर भी नहीं बुलाया था। उन लोगों की आहें और आंसू देख-देखकर चिढ़-सी हो रही थी । पर छाया की प्रतीक्षा में मेरा वहां बैठना आवश्यक था। तीसरे पहर छाया और गंगावर की लाश साथ ही पहुंचे। सव-कुछ निवटाते रात के नौ बज गये । छाया की भाभियां तो मुझे रोकना चाह रही थीं, पर विधु का बहाना कर मैं वहां से निकल आयी। घर पर पहुंचकर भी ऐसा लगता रहा, जैसे वे सारे दृश्य, सारी आवाजें मेरा पीछा करती रही हैं । नहाकर निकली, तो देखा, मिसेज़ मित्रा खड़ी है। 'भाभी, खाना खाने चलिए । हम लोग रुके हुए हैं।' खाने की जरा १०८ : पापाण-युग - इच्छा न थी, पर उनके मोजन्य को ठुकराते नहीं बना 1 मारी बातें दोहराने की जरा इच्छा न थी। पर उन लोगों की उत्सुक आंखो का लिहाज करना पडा । जैसे भी वन पडा, उन्हें सब बताती रही। बार-बार डर लगा रहा कि गुड़िया तक ये सारी बातें न पहुंचें। एक बार देवी जबान से इशारा भी किया. तो मिसेज़ मिन्ना वोली, 'वह सब सुन चुकी है। उनके क्लास की एक लड़की तिलकनगर ही में रहती है। उसने मुबह ही यह खबर उमे दे दी है। ऐसी बातें छिपती थोड़े ही हैं।' शायद उनका कहना ठीक ही था। पर में अपनी तरफ से कोशिग करती रही थी कि यह समाचार उस तक सौम्य रूप में पहुंचे। गंगाधर की वह वीभत्स मृत्यु मुझे भी हिला गयी थी। वह तो सर, बच्ची ही थी। 'मम्मी ।' घर में आते ही उसने करण स्वर में पुकारा। मुझे मालूम था, वह क्या पूछना चाहती है । बड़े ही सयत स्वर में मैंने कहा, 'देखो वेटे ! अभी मुझसे कुछ मत पूछो। दिन भर से यही सब कह- मुनकर मैं पागल हुई जा रही हूं। थोडा सो लेने दो मुझे।' कहने को विस्तर पर आ लेटी मैं, पर आखों में नीद नाम को नहीं थी। शायद विध भी जाग रही थी, पर मैं जान-बूझकर मूर्तिवत् लेटी रही। एकाएक मार्च की वह रात गरम हो उठी और मैं पमीने से नहा गयी। धीरे-से उठकर मैंने पंखा चला दिया। 'वंद करो वह पंखा, मम्मी प्लीज !' वह इतने आतं स्वर मै चीसी कि मैं भीतर तक सिहर उठी। पखा वद कर मैंने खिडकिया पूरी-पूरी पोल दौं। पर्दे ऊपर डाल दिये गये और अखबार के कागज़ से हवा करती हुई उसे थपकने लगी। 'मम्मी!' कुछ देर बाद उसका स्वर आपरा, 'चाचा ने क्यों किया होगा ऐमा ?' 'तुझे मालूम तो है, वह मुत्तिल हो गये थे।' 'मूअत्तिल क्या बाज हुए थे?' 'तेरी चाची लड़-झगडकर चली गयी थी न ! इसी से उदास हो गये थे।' 'चाची को गये तीन महीने हो गये हैं।' निष्कासन : १० - . . 'शायद कर्जदारों ने परेशान किया हो। अव सो जाओ, बेटा । वहुत रात हो गयी है ।' मैंने पीछा छुड़ाते हुए कहा। वह मेरे हाथों से छिटककर उठ बैठी, 'क्यों अपने को झुठला रही हो, मम्मी ? मुझे मालूम है, चाचा ने मेरी वजह से आत्महत्या की है। मैंने उन्हें बहुत बुरा-भला कहा था, उन्हें पापा की खड़ाऊं से पीटा था, इतनी- इतनी गालियां दी थीं मैंने “मुझे बहुत गुस्सा आया था, पर मैंने यह कभी नहीं चाहा था कि वे इस तरह...' और वह फफककर रो उठी। अपनी वजह से एक हंसता-खेलता आदमी दुनिया से उठ गया है, यह कल्पना उसका नन्हा-सा दिल मथ गयी थी। उसकी रुलाई का ज्वार इतना प्रबल था कि मेरे सांत्वना के शब्द वह-वह जाते थे। मुझे खुद पता नहीं था कि वह कव सोयी, क्योंकि शारीरिक और -मानसिक रूप से क्लांत होकर मैं तो नींद को ज्यादा देर रोक नहीं पायी । थी। सुवह नींद खुली भी, तो उसकी चीख सुनकर ही। अलसायी आंखों से मैंने उसके विस्तर की ओर देखा । वह सूना पड़ा था। खुली खिड़कियों से होकर धूप सारे कमरे में बिछ गयी थी। मैं हड़बड़ाकर उठी। देखा, बरामदे में विधु वेहोश पड़ी है। पास ही सुबह का अखबार पड़ा है। फ्रंट पेज पर बड़े-बड़े अक्षर चमक रहे थे-युवक इंजीनियर की दर्दनाक मृत्यु डॉक्टर दंपति भी मेरे साथ ही दौड़कर वरामदे में पहुंचे थे। हम लोगों ने मिलकर उसे उठाया । बिस्तर पर लाकर लिटाया। डॉक्टर साहब ने स्मेलिंग साल्ट वगैरह लाकर उसे सुंघाया। कुछ ही देर में उसने आंखें खोलीं। मेरे जी का बोझ कुछ हल्का हुआ। 'मैंने उन्हें मार डाला ! मैंने उन्हें मार डाला !' अस्पष्ट स्वर में वह बुदबुदा रही थी। 'कुछ कह रही है शायद ।' मिसेज़ मित्रा ने समझने की चेष्टा करते हुए कहा। 'उसे शॉक-सा लग गया है न। कल रात पंखे को देखकर भी ऐसे ही ‘डर गयी थी। मैंने जल्दी से कहा, 'अव तो मेरे खयाल से ठीक है । आइए 'न, बाहर बैठे । मैं चाय बनाकर लाती हूं।' 'जी नहीं, अब तो चलेंगे। हॉस्पिटल के लिए तैयार भी होना है। वैसे - ११० : पापापा-युग घबराने की कोई जरूरत नहीं है।' अस्पताल जाने से पहले वे फिर एक बार आकर देव गये। वह ठीक हो चली थी, पर ऐमी निस्तेज दिखाई दे रही थी, मानो महीनों से बीमार हो। नौ बजे के करीब में जबरदस्ती उमे थोडा-सा दूध और वेड दे पायी। 'मम्मी, जरा अखवार देना।' उसने यके स्वर में कहा । 'देखती हूं, वेटे । सुबह इड़बड़ाहट में पता नहीं वहा रखा गया है। मैंने कह दिया। अखबार इस समय तक राख हो चुका था। मैं नहीं चाहती थी कि गुडिया उसे दोबारा पढे। लाश की फोटो उममे नहीं दी गयी थी। पर सराददाता ने ऐसा हृदयद्रावक वर्णन किया था कि पढते हुए मेरा भी कलेजा काप गया था। वहा तो सब देखकर मैंने आये बद कर ली थी, परंतु पेपर मे जैसा वर्णन या, उन सारी बातो को जैसे मैं फिर से जी गयी थी। 'मम्मी!' 'क्या है, बेटे?' 'उस दिन उन्हें घर में नहीं बुलाती, तो कितना अच्छा होता न ।' 'वार-बार उन बातो को दोहराने से कोई लाभ है, वेटा ?' 'मैं क्या करू, मेरे मन से यह बात निकलती ही नहीं कि मैं उनकी मृत्यु का कारण हू । मैं उन्हे मौत के दरवाजे तक ढकेल यायी थी। सचमुच मैंने उन्हें मार डाला।' उमने तकिये पर सिर पटकते हुए आर्त स्वर मे कहा। मैं परेशान हो उठी। किसी तरह स्वर को सयत करके कहा, 'देखो बेटे! मौत जब आती है, तो अपने आप बहाना ढूढ़ लेती है। तुम इस ऊटपटाग खयाल को दिल से निकाल दो... और फिर सबके सामने यू अपने मन की बात कही थोड़े ही जाती है। लोग कुछ भी सोच सकते हैं !' 'क्या सोचेंगे?' अब इस बात का जवाव मेरे पास क्या या? मैं चुपचाप उठकर कमरे की चीजें करीने से रखने का नाटक करने लगी। मेटल-पीस पर रखी हुई माई बाबा की मूर्ति को हाथ में लेते ही मैंने अनायास गुडिया की ओर देखा, वह अपलक मूर्ति को निहार रही थी। उसकी माखों में पता नहीं क्या-क्या तिर आया था, जो व्यक्ति परसो दुनिया का सबसे कुमित प्राणी था, मरने निष्कासन : १११ - . के बाद फिर से अपने पुराने रूप में याद आ रहा था। वह मूर्ति पिछले साल गंगाधर ही लाया था। वे दोनों मियां-बीवी शिरडी गये हुए थे। लौटते हुए विधु के लिए यह मूर्ति लाए थे। उसने उसे वेडरूम में ही रख छोड़ा था, ताकि सुवह पहले उन्हीं के दर्शन हों। पता नहीं, मुझे क्या हुआ। मैंने मूर्ति उठाकर सेफ में बंद कर दी। गुड़िया ने कुछ ऐसी दृष्टि से मुझे देखा कि मैं स्वयं को अपराधी अनुभव करने लगी। मुझे लगा कि जब तक वह गंगाधर के स्नेहमय रूप को याद करती रहेगी, स्वयं को इसी तरह उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी गिनती रहेगी। इस स्थिति से उसे उबारने के लिए मैंने जैसे अपने आपसे कहा, 'मरने वाले की बुराई नहीं करनी चाहिए। लेकिन अच्छा ही हुआ, जो अपनी . मौत चला गया नहीं तो नहीं तो शायद मुझे यह काम करना पड़ता।' मैंने विलकुल झूठ भी नहीं कहा था। उस दिन सचमुच इतना ही क्रोध आ गया था मुझे। पर उसकी मृत्यु के तीन दिन बाद यह कथन वड़ा वेसुरा लग रहा था। मैंने स्पष्ट देखा कि विधु ने घृणा से मुंह फेर लिया और तकिये में मुंह छिपाकर चुपचाप रोती रही। उसे सांत्वना दे सकू, इतना भी साहस तव न रहा। शाम तक उसकी कई सहेलियां आकर हालचाल पूछ गयीं । हर बार मुझे डर लगता रहा कि यह कहीं ऊलजलूल न वक दे। खासकर लता जव आयी, तो मैं वहीं जमकर बैठी रही । लता उसकी सबसे अंतरंग सखी थी। लता से ज्यादा खतरा मुझे उसकी मां से था। चलती-फिरती सूचना केंद्र थी। उसके कानों तक वात पहुंचने भर की देर थी। चौबीस घंटे के अंदर- अंदर विधु का नाम शहर में मशहूर हो जाता। जितनी देर लता वैठी रही, गुड़िया ने एक बार भी मुंह नहीं खोला। वस, आंख बंद किये चुपचाप लेटी रही। वह उसके सिर पर हाथ फेरती रही। तीन-चार दिन तो यह क्रम चला, फिर वह भी वोर हो गयी। आखिर थी तो बच्ची ही। चौथे दिन जब मैं उसे छोड़ने वाहर तक गयी, तो वोली, 'क्या बात है आंटी, विधु तो एकदम गुमसुम-सी हो गयी है ? तवीयत तो अव ठीक है न !' - ११२ : पापाण-युग 'घर में बैठे-बैठे ऊटपटांग बातें सोचा करती है न। तुम लोग कोई पिक्चर का प्रोग्राम क्यों नहीं बनाती? परीक्षा के बाद एक देखने की बात यो न ।' मैंने सुझाया। 'थी तो, पर हम लोगों ने सोचा. "कल चले जायेंगे।' उसके साप सिनेमा का प्रोग्राम तय करके मैंने गुड़िया को मूचना दी। पिक्चर के नाम से हमेशा उछल पड़ने वाली वह गंभीर बनी बैठी रही। 'मैंने उन लोगों मे वादा कर लिया है, गुडिया!' 'ठीक है, चली जाऊंगी। लेकिन अकेले नहीं, तुम भी साप चलोगी।' उसने ठडे स्वर में रहा। 'मैं ! मैं लड़कियों के बीच अच्छी लगूगी क्या? और फिर मेरा फिलहाल पिक्चर जाना वैसे भी शोभा नहीं देगा।' 'और मुझे शोभा देता है ?' उमने तीखी दृष्टि से मुझे वीधते हुए कहा। वात वही समाप्त हो गयी। किसी तरह उमको महेलियों को समझाया जा सका । धीरे-धीरे उन लोगों का आना भी कम हो गया। करीव-करीब सभी छुट्टियो मे बाहर जा रही थी। मेरी भी छुट्टिया समाप्त हो रही यो। मूने घर में उसे अकेले छोडते न बनता था। ऐसे में बिन्नी (विनीता, मेरी ननद) मुझे देवदून की तरह लगी। गुडिया की बीमारी की खबर सुनकर दिल्ली में दौड़ी चली आयी थी। अपनी लाड़ली वुई को देखते ही उसके चेहरे पर चमक आ गयी थी। विन्नी के साथ में पराग-निहार भी थे ही। मैंने सोचा-चलो, अब इसे सोचने के लिए खाली वक्त नहीं रहेगा। लेकिन मैंने देखा कि अनजाने ही मेरा सोच बढ़ गया था। दफ्तर में टाइप करती उंगलिया एकाएक रुक जातीं। मोचती, गुड़िया ने बिन्नी के सामने सब-कुछ उगल न दिया हो। कई बार छुट्टी लेकर जल्दी लौट भी आती। बिन्नी की ओर देषकर टोह लेती कि वह कितना जान गयी है। पर कुछ पता न चलता। उस दिन गंगाधर के यहां जाने की बात चली। विन्नी का जाना जरूरी था, पर गुड़िया भी जिद पर आ गयी। 'कितनी वार कहा है तुमसे, ऐसी जगह वच्चे नहीं जाया करते। तुम. है निष्कासन : ११३ घर पर पराग, निहार को देखना। हम लोग घंटे भर में लौट आयेंगे।' वह मुझे घूरती हुई दूसरे कमरे में चली गयी। इन दिनों मुझे देखने का एक खास ढंग उसने अपना लिया था। कभी-कभी तो उस दृष्टि से दहशत-सी होने लगती थी। 'भाभी! तुम अभी तक उसे छोटे बच्चों की तरह झिड़क देती हो, अच्छा नहीं लगता।' रास्ते में बिन्नी ने कहा, 'मैं हैरान हूं। तुम एक बार भी उसे छाया से मिलाने नहीं ले गयों । इस घर में और दूसरे घरों में क्या कोई फर्क ही नहीं है । कम-से-कम बच्चों को एकाध दिन घर ले आती अपने । क्या कहती मैं ! चुप बनी रही । लौटते वक्त छाया के दोनों बच्चे भी साथ थे। वेचारे बच्चे, वहां सहमे-सहमे घूम रहे थे। यहां आते ही खिल गये । चारों-पांचों ने मिलकर घर सिर पर उठा लिया । जव तक सो नहीं गये, मस्ती करते रहे। रात में मैं रसोई धो रही थी। विन्नी और गुड़िया विस्तर लगा रही थीं। चारों शैतान ड्राइंगरूम में कहीं कालीन पर, कहीं सोफे पर लुढ़क गये। एक-एक कर उन लोगों को लाकर सुलाया गया। 'बुई ?' 'हां, वेटे!' 'तरुण-तृप्ति कितने छोटे हैं न ! 'हां, बेचारे इतनी-सी उम्र में बाप की छाया खो बैठे।' 'वुई, क्या ये बड़े होने पर चाचा को याद रख पायेंगे ?' 'नहीं। और एक तरह से अच्छा ही है, गुड़िया। हम बड़े भूल नहीं पाते, इसी से तो दुनिया में इतने सारे दुःख हैं ।' 'यही तो, इन बच्चों को देखकर तो और भी दुःख होता है। इतनी-सी उम्र में अनाथ हो गये वेचारे, मेरी तरह।' 'ऐसा नहीं कहते, विटिया !' 'सच कहती हूं बुई, कभी-कभी ऐसा सोच हो आता है।' 'गुड़िया ss! मेरी आवाज़ उनकी मद्धम आवाजों को चीरकर वेडरूम तक पहुंची। ११४ : पापाण-युग रमोई में सिर्फ मेरे हाथ काम कर रहे थे । सारा ध्यान तो केन्द्रित या बाहर की ओर। मुझे गर्व हो रहा था कि ठीक समय पर मैंने मंभाषण का मूत्र तोड दिया है। 'क्या है ?' उसकी सूखी-सी आवाज़ मन को कंपा गयी, फिर भी मैंने हंसने का यत्ल करते हुए कहा, 'जरा डॉक्टर आंटी के यहां से दही तो ले आ, बेटी। थोड़ा-सा दूध वच गया है, जमा दूगो।' वह दरवाजे से हिली नहीं । मैंने कटोरी उसके आगे की। उसने लेकर शाति से वह वर्तनों के शेल्फ पर रख दी और फिर कमर पर हाय रगकर वोलो, रात को दही न मागने का सिद्धात तुम्हारा क्या हुआ?' 'अरे, कभी मजबूरी में .. 'कसी मजबूरी है ? यह घर में इतना दही है, नहाोगो क्या ?" उसने अलमारी खोलकर डोगा मेरे सामने कर दिया। उसके बोलने का ढंग मुझे अच्छा नहीं लगा, फिर भी मैंने टालने के इरादे से कहा, 'अरे, मुझे तो याद ही नहीं रहा । अच्छा, रहने दें। जा तू।' पर गैस साफ करते हुए मैंने उसकी जलती हुई माधों को अपनी पीठ पर स्पष्ट अनुभव किया । न चाहने पर भी आखें उधर को उद गयी। 'नुम इतनी भोली नहीं हो, मम्मी, जितना अनती हो।' उसने किसी खलनायिका की तरह चबा-चबाकर कहा। 'क्या बक रही है ?' मैंने गुस्से को जन्त करते हुए कहा। 'किसी दिन तो कहने दो मुझे । तग आ गयी हू तुम्हारी जासूसी से। तुम्हें क्या लगता है, मैं समझ नहीं पाती। कोई भी आता है मेरे पाग, तो तुम्हारे कान खडे हो जाते है । मेरी टीचर आए तो, मेरी सहेनिया आए तो, यहा तक कि युई के साथ भी मुझे घडी भर चैन नही लेने देती हो। गिद्ध की तरह मंडराया करती हो आसपास, क्यों? सटाक... उसका आखिरी क्यों मेरे चाटे की आवाज़ में दब गया। मारने के बाद लगा, जैमे मेरे पैरो मे जान नहीं रह गयी है । मैं वहीं गोले फर्ग पर धम्म से बैठ गयी। तव तक बिन्नी दौड़कर आ चुकी थी और मुडिया उसमें लिपटक निपासन । रो रही थी। रोते हुए कहती जा रही थी, 'मैं इनसे नफरत करती मैं इनसे नफरत करती हूं।' विन्नी उसे सहारा देकर बिस्तर पर ले गयी। घंटे भर बाद जब वह लौटी, मैं उसी तरह घुटनों में सिर डाले गुमसुम बैठी थी। । 'भाभी!'वह आते ही वरस पड़ी, 'यह तुम्हें क्या हो गया है ! सयानी लड़की पर हाथ उठा देती हो। ऐसा व्यवहार मिल रहा है उसे, तभी तो उसे फिट्स आने लगे हैं। कहीं नाखून में भी रोग नहीं था. पिछले साल तक । इस तरह तो तुम उसकी जिंदगी तबाह कर दोगी। मैं कल ही उसे अपने साथ ले जाऊंगी। ऐसे तो वह लड़की यहां पागल हो जायेगी।' और सचमुच वह दूसरे दिन उसे अपने साथ ले गयी। सारा प्रोग्राम ऐसे तय हो गया, जैसे विन्नी ही उसकी मां हो । मुझसे पूछने की भी जरूरत नहीं समझी गयी। स्कूल ट्रिप पर भी जाती, तो मुझसे लिपटकर रोनेवाली विधु ! उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। मैं बाज़ार से उसके लिए कपड़े खरीद- कर लायी, मिठाइयों के डिब्बे, सैंडलें, बुंदे, चूडियां, बोच-~-उसने किसी चीज़ की तरफ झांका भी नहीं। मैं स्टेशन भी गयी, आंखों में टीस उठने तक जाती हुई ट्रेन को देखती रही, पर किसी खिड़की से कोई रूमाल, कोई हाथ मेरे लिए नहीं हिला, कोई आंख मेरे लिए गीली नहीं हुई। आठ-दस दिन बाद विन्ती का क्षमा याचना वाला पत्र आया था। लिखा था, 'विधु के लिए वातावरण का बदलाव बहुत जरूरी था। तुम ऐसे तो उसे भेजती नहीं, इसलिए नाटक करना पड़ा। शायद वह भूल गयी थी कि हर साल गर्मियों में दफ्तर से छुट्टी ले. कर मैं उसे घुमा लाती थी। फिर भी मैंने ध्यान नहीं दिया। सोचा, परिवेश में बदलाव भी जरूरी है । शायद मुझसे दूर रहकर वह मेरे बारे में ठीक से सोच सके रिजल्ट आने तक मैंने बड़ी मुश्किल से सब किया। परीक्षाफल बहुत ही निराशाजनक था। मुश्किल से हायर सेकंड क्लास बन रहा था। आखिरी पेपर उसने लगभग कोरा ही दिया था। उसकी प्रिंसिपल बहुत दुःखी हुई थीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को सांत्वना दी। मैंने कॉलेज का - । । ११६ : पापाण-युग फार्म भरा और उसे लेने दिल्ली पहुंची। मुझे लगा था, वह मुझे देखते ही लिपट जायेगी। पर देवा, उसकी आंखों का वह हिमक भाव जरा भी सौम्य नहीं हो पाया है। बिन्नी की सास, जिठानी,पति--सभी उसके नम्र और मधुर स्वभाव की प्रशंसा किये जा रहे थे। सुनकर मन गवं मे फूल भी रहा था। लग रहा था, काश इसका एक शतांश ही मेरे हिस्से में आता। मौका देख ही रही थी कि उससे चलने के लिए बात करूं कि उसने सुद ही मुझे छत पर आ घेरा। 'क्यों आयी हो यहा ?' उसने उमी स्वर में पूछा, जो उसने सिर्फ मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। 'घर नहीं चलना है, गुड़िया " मैंने जबरदस्ती स्वर मैमिठास घोलते हुए कहा, 'मैंने तुम्हारा फार्म भर दिया है । जी० डी० मी० में जाओगी न। तुम्हारी सभी सहेलिया वही जा रही हैं । सता, मीरा, अनुभा, आयेशा- सब।' 'मेरी कोई सहेली नहीं है । मेरा कोई घर नहीं है । मुझे उस जेन में वापस नहीं जाना । बम ।' और वह किमी मेरनी की तरह गर्वोन्नत चाल से वहा से चली गयी। घोर असमजस में पही मैं देर तक छन पर टहलती रही। रात के खाने पर कुअरजी ने ही मेरी समस्या का समाधान किया। बोले, 'मामी, आपको जानकर खुशी होगी कि गुड़िया को इद्रप्रम्य में दाखिला मिल गया है। मेरी एक दूर के रिश्ते की भाभी वहा है । उन्ही की कृपा से पह काम हुआ है । अब एम० ए० तक आपको चिंता नही करनी होगी।' मेरे कहने-मुनने की कुछ गुंजाइश वहा थी ही नहीं। फिर भी उनका हंमता हुआ चेहरा देवकर मन में मंदेह का ज्वार उठा। विन्नी को एक तरफ ले जाकर कहा, 'वहां का झमेला मोल ले रही है । जानती है, सथानी लडकी आग की तरह होती है। इसे संभालना बड़ी जिम्मेदारी का । 'तभी तो तुमसे बिना पूछे यहा दाखिला करा लिया, तुम तो दिन भर रहती हो दफ्तर में। अकेली लडकी घर में रहेगी, तो हर ही रहना निम्कासन 1 बैठी थी। ! । रो रही थी। रोते हुए कहती जा रही थी, 'मैं इनसे नफरत करती हूं। मैं इनसे नफरत करती हूं।' विन्नी उसे सहारा देकर विस्तर पर ले गयी। घंटे भर वाद जव वह लोटी, मैं उसी तरह घुटनों में सिर डाले गुमसुम 'भाभी!" वह आते ही बरस पड़ी, 'यह तुम्हें क्या हो गया है ! सयानी लड़की पर हाथ उठा देती हो। ऐसा व्यवहार मिल रहा है उसे, तभी तो उसे फिट्स आने लगे हैं। कहीं नाखून में भी रोग नहीं था, पिछले साल तक । इस तरह तो तुम उसकी जिंदगी तबाह कर दोगी। मैं कल ही उसे अपने साथ ले जाऊंगी। ऐसे तो वह लड़की यहां पागल हो जायेगी।' और सचमुच वह दूसरे दिन उसे अपने साथ ले गयी। सारा प्रोग्राम ऐसे तय हो गया, जैसे विन्नी ही उसकी मां हो। मुझसे पूछने की भी जरूरत नहीं समझी गयी स्कूल ट्रिप पर भी जाती, तो मुझसे लिपटकर रोनेवाली विधु ! उसने मेरी ओर देखा तक नहीं। मैं वाज़ार से उसके लिए कपड़े खरीद- कर लायी, मिठाइयों के डिब्बे, सैंडले, बुंदे, चूडियां, ब्रोच-~-उसने किसी चीज़ की तरफ झांका भी नहीं । मैं स्टेशन भी गयी, आंखों में टीस उठने तक जाती हुई ट्रेन को देखती रही, पर किसी खिड़की से कोई रूमाल, कोई हाथ मेरे लिए नहीं हिला, कोई आंख मेरे लिए गीली नहीं हुई। आठ-दस दिन बाद विन्नी का क्षमा-याचना वाला पत्र आया था। लिखा था, 'विधु के लिए वातावरण का वदलाव बहुत जरूरी था। तुम ऐसे तो उसे भेजती नहीं, इसलिए नाटक करना पड़ा।' शायद वह भूल गयी थी कि हर साल गर्मियों में दफ्तर से छुट्टी ले- कर मैं उसे घुमा लाती थी। फिर भी मैंने ध्यान नहीं दिया। सोचा, परिवेश में बदलाव भी जरूरी है। शायद मुझसे दूर रहकर वह मेरे वारे में ठीक से सोच सके रिजल्ट आने तक मैंने वड़ी मुश्किल से सब किया। परीक्षाफल बहुत ही निराशाजनक था। मुश्किल से हायर सेकंड क्लास वन रहा था। आखिरी पेपर उसने लगभग कोरा ही दिया था। उसकी प्रिंसिपल वहुत दुःखी हुई थीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को सांत्वना दी। मैंने कॉलेज का । ११६ : पापाण-युग फार्म भरा और उसे लेने दिल्ली पहुंची। मुझे लगा था, वह मुझे देखते ही लिपट जायेगी। पर देखा, उसकी आखों का वह हिंसक भाव जरा भी सौम्य नहीं हो पाया है। बिन्नी की सास, जिठानी,पति-सभी उसके नम्र और मधुर स्वभाव की प्रशंसा किये जा रहे थे। मुनकर मन गर्व से फूल भी रहा था । लग रहा था, काश इसका एक शताश ही मेरे हिस्से मे आता। मौका देख ही रही थी कि उसमे चलने के लिए वात करूं कि उसने खुद ही मुझे छत पर था घेरा। 'क्यों आयी हो यहा ?' उसने उसी स्वर में पूछा, जो उसने सिर्फ मेरे लिए सुरक्षित कर रखा था। 'घर नही चलना है, गुड़िया ?' मैंने जबरदस्ती स्वर में मिठाम घोलते हुए कहा, 'मैंने तुम्हारा फार्म भर दिया है । जी० डी० मी० में जानोगी न। तुम्हारी सभी सहेलियां वही जा रही हैं । लता, मीरा, अनुमा, आपेगा- सव।' 'मेरी कोई सहेली नहीं है । मेरा कोई घर नहीं है । मुझे उम जेल में वापस नहीं जाना । वस ।' और वह किमी शेरनी की तरह गर्वोन्नत चाल से वहां से चली गयी। घोर असमंजस मे पड़ी मैं देर तक छत पर टहलती रही। रात के खाने पर कुंअरजी ने ही मेरी समस्या का समाधान किया। वोले, 'भाभी, आपको जानकर खुशी होगी कि गुड़िया को इंद्रप्रस्य में दाखिला मिल गया है। मेरी एक दूर के रिश्ते की भाभी वहां हैं । उन्हीं की कृपा से यह काम हुआ है। अब एम० ए० तक आपको चिंता नहीं करनी होगी।' मेरे कहने-सुनने को कुछ गुंजाइश वहां थी ही नहीं। फिर भी उनका हंसता हुआ चेहरा देखकर मन में संदेह का ज्वार उठा । बिन्नी को एक तरफ ले जाकर कहा, 'कहां का झमेला मोल ले रही है। जानती है, सयानी लड़की आग की तरह होती है । इसे संभालना वही जिम्मेदारी का काम है।' 'तभी तो तुमसे बिना पूछे यहां दाखिला करा लिया, तुम तो दिन भर रहती हो दफ्तर में । अकेली लड़की घर में रहेगी, तो डर ही रहता है। निष्कासन : ११७ यहां तो मैं हूं, अम्मा हैं, भाभीजी हैं।' इस दलील का मेरे पास कोई जवाब नहीं था । जैसे गयी थी, वैसे ही लौट आयी मैं । जाते समय मन में उत्साह था, लौटते हुए निराशा। उस निराशा भरी मानसिक अवस्था में घर और भी सूना लग उठा। शाम को डॉक्टर साहब के चीकू ने पूछा, 'दीदी नहीं आयी, आंटी ! जवाव देते-देते मैं एकदम रो ही पड़ी। उस रात डॉक्टर दंपति देर तक वैठे मुझे समझाते रहे । अगले तीन- चार दिनों तक भी चाय-नाश्ता वहीं से आता रहा । आखिरकार मुझे ही शर्म आने लगी। सारी उदासी एक ओर फेंककर मैं नये सिरे से अपनी दिनचर्या में जुट गयी। पिछले दो-तीन महीने में स्वप्नावस्था ही में जी रही थी। सोते-बैठते मेरा मन गुड़िया में ही लगा रहता था। अव मन उतना विखरा-विखरा नहीं रहा । एक बार मनुष्य निश्चय कर ले, तो सव- कुछ सहज हो जाता है । मैंने सारा संचित दुलार चीकू पर उंडेलना प्रारंभ किया। बड़ा प्यारा बच्चा था। गैलरी में खड़े होकर मेरे दफ्तर से लौटने की राह देखा करता। उसके लिए आते हुए रोज़ मैं फल, विस्कुट, खिलौने, टॉफी-कुछ-न-कुछ लेकर ही आती। उसके मां-बाप बहुत नाराज होते । पर मुझसे खाली हाथ घर आया नहीं जाता। । दीवाली की छुट्टियों में विधु की प्रतीक्षा थी। पर एक महीना पहले ही विन्नी ने लिखा कि उसके कॉलेज की ट्रिप गोआ जा रही है । अगर मैं कह दूं, तो अच्छा रहेगा। क्योंकि इतने कम पैसों में इतनी दूर जाने का सुयोग फिर नहीं जुटेगा। मैंने चुपचाप पैसे भेज दिये । हैरत की बात तो यह कि इस अपेक्षाभंग पर मुझे जरा भी आश्चर्य या दुःख नहीं हुआ । जैसे मुझे इस बात का पहले ही से अनुमान था । यूं दीवाली से पहले-पहले सारी ट्रि लौट आया करती हैं, पर विन्नी वगैरह को असमंजस से बचाने के लिए मैंने लिख दिया कि मैं भी दीवाली भैया के यहां की कर रही हूं और अम्मा से मिलने चली गयी। क्रिसमस की छुट्टियों में विन्नी खुद उसे लेकर आयी। इन छह - ११८ : पापाण-युग । महीनों में वह एकदम वडी-सी लग उठी थी। दिल्ली की पालिश उनकी बोलचाल में,रहन-सहन में आ गयी थी। वह निश्चय ही पहले से अधिक मुदर हो गयी थी। पर साथ ही यह लगता रहा कि यह मेरी गुडिया नहीं है, विन्नी की लड़की है। रागा कि बाजार से अपनी पसंद की चीजला- कर उसे पहनाने का अधिकार मेरा नहीं रहा। जाते हुए बिन्नी की तरह उसके हाथों पर भी मैंने रूपये रप दिये थे। वह दस-बारह दिन रही, पर एक दिन भी हम लोग निकट नहीं आ सके। वह और मैं, दोनो ही अकोले मे सामने पड़ने से कतराते रहे। जाने से पहले एक दिन मैंने ही हिम्मत करके कहा था, 'विधु ! गर्मी को छुट्टियों का क्या प्रोग्राम है ?' वह सिर्फ मुझे यूरती रह गयी थी। 'क्या दिल्ली ही में बनी रहोगी ? कम-मे-कम छुट्टियो में तो बाहर जाया करो। यहा न आना चाहो, तो नागपुर चली जाना, मामाजी के पारा । नहीं तो किसी दिन बिन्नी के घरवाले योर हो जायेंगे।' वह कुछ सोचकर वोली, 'ठीक है, मामाजी के पास चली जाऊगी। पर एक पात है, तुम नहीं जाओगी मेरे साथ।' यह बात कहते-कहते उगकी आंखों में वैमा ही हिंसक भाव तैर आया था। उसकी इन आखो से मुझे डर-सा लगने लगा था। कई बार लगा, इसे किसी मनश्चिकित्मक के पाम ले जाऊं। दिल्ली में थी तो एक बार बिन्नी से दबी जबान से चर्चा भी की। लेकिन वह मुझ पर बरम पडी थी, 'भाभी, उसे कुछ नहीं हुआ है। वह सिर्फ तुमसे नाराज है। इसका कारण जो भी रहा है, पर वह एकदम नॉर्मल लड़की है । ऐसो-वंसी जगह उसे दिखाती फिरी, तो कल को जरूर पागल हो जायेगी। किसी को भनक भी पह गयी, तो कल को शादी होनी मुश्किल हो जायेगी।' शायद बिन्नी ठीक ही कहती थी। इन दिनो मुझे छोडकर शायद सभी ठीक थे। लेकिन मेरी हर यात काटी जाती थी। विधु का हित- अहित जैसे मुझसे ज्यादा ये लोग समझते थे। मुझसे तोवर, वह नाराज थी ही, पर छुट्टियो मे न वह अपनी निष्कासन ११६ - सहेलियों से मिली, न स्कूल में मिलने गयी, न पड़ोसियों के निमंत्रण स्वीकार किये। उसकी प्रिंसिपल को तो सर, मैंने समझा दिया कि रिजल्ट खराव होने की वजह से वह आपके सामने नहीं आ रही, पर और लोगों की राय को मैं नहीं बदल सकी कि दिल्ली जाकर विधुमुखी बदल गयी है, घमंडी हो गयी है। उन लोगों के जाने के बाद की बात है। रविवार की सुबह मैं डॉक्टर साहब के यहां बैठी हुई थी। यूं तो मेरा अधिकतर समय वहीं बीतता था, पर उस रोज़ डोसा-इडली का प्रोग्राम था। मैं विशेष रूप से निमंत्रित थी बातों के दौरान डॉक्टर साहब बोले, 'इस वार विधु कब आयी, कब चली गयी, पता ही नहीं चला। नहीं तो इन दोनों घरों में उसकी वजह से काफी रौनक हुआ करती थी।' 'मैं तो खुद हैरान हूं। पता नहीं एकदम कैसी तो हो गयी है। कहां तो सहेलियों के विना एक पल चैन नहीं आता था उसे और अब इतने दिनों बाद आयी भी, तो न तो किसी के घर गयी, न घर आयी लड़कियों से ढंग से बात ही की। चिट्ठी-विट्ठी लिखना तो दूर ही रहा, वस दिन भर वुई और उसके बच्चे ! यही उसकी दुनिया हो गयी है।' मैंने कहा। 'लगता है, फर्स्ट क्लास खोने की बात को उसने जरूरत से ज्यादा महत्त्व दे दिया है।' 'लेकिन डॉक्टर साहब, यह कोई इतनी बड़ी बात तो...' 'भाभी, आप नहीं समझेंगी। यह किशोर मनोविज्ञान बड़ा अजीव होता है । कौन-सी बात उनके लिए बड़ी हो जायेगी, कहा नहीं जा सकता। उसके लिए तो अपना रिजल्ट हमेशा से महत्त्वपूर्ण रहा है। शर्म तो उसे अपने आप पर आ रही है। लेकिन अपने को बचाने के लिए सारा गुस्सा दूसरों पर निकाल रही है । एकाएक ठोकर लग जाने पर हम लोग सामनेवाले पर भड़क उठते हैं न! वैसे ही।' डॉक्टर साहब की बात मन को भीतर तक छू गयी। मेरा व्यथित इन उनकी सांत्वना के लिए तड़प उठा । भर्राये कंठ से मैंने कहा, 'वह ोड़ी भी नॉर्मल हो सकती, तो मैं उसे समझाना चाहती थी कि यह ऐसी - । । २० : पापाण-युग ! बडी बात नहीं है । वह व्यर्थ ही अपना जी जला रही है। पर क्या करूं? वह तो मुझमें भी विश्वास खो चुकी है। मुझसे ज्यादा उसे इन दिनों विन्नी पर विश्वास है।' 'यह भावुकता का एक दौर है, आप उस पर बहुत ज्यादा ध्यान न दें। सबसे ज्यादा तो वह आपसे जुड़ी हुई है । इसलिए आपके सामने सबसे ज्यादा अपराधी महसूम करती है । यह उदासीनता तो अपनी शर्म को छिपाने का एक बहाना भर है।' कितना ठीक निदान किया था उन्होंने । कारण चाहे उन्हें अज्ञात रहा हो, पर मर्ज उन्होंने ठीक पकड़ लिया था। 'भाभी ! मैंने कहा न, इस बात पर आपको ज्यादा नहीं सोचना है।' मैरी विचार-तंद्रा को तोड़ते हुए उन्होंने कहा । फिर पत्नी से बोले, 'आभा! यह तुम्हारा कर्तव्य है। इन्हें अकेला बिलकुल मत छोड़ा करो। दिनभर पता नहीं क्या-क्या मोचती रहती हैं ?" मैंने अनजाने ही मिसेज मित्रा की ओर देखा, वे चुपचाप 'सर्व' करती रही । हमेशा की तरह पति की बातों का समर्थन उन्होंने नहीं किया। उनकी परिचित मुसकराहट भी चेहरे पर नहीं आयी। उनके व्यवहार में एक अव्यक्त ठंडापन था, जिसे केवल नारी ही समझ सकती है। और मुझे लगा कि यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ है। पिछले कुछ दिनों से धीरे-धीरे होता आ रहा है। चीकू भी अब ज्यादा देर मेरे पास बैठ नही पाता। कभी दूध पीने के बहाने, कभी नहाने या पढने के बहाने मम्मी उसे बुला ले जाती, डॉक्टर साहब के व्यवहार में जरूर कोई फर्क नहीं आया। अकसर निमंत्रण की पहल वे ही करते और शायद यही अनयं की जड थी। शर्म से भर उठी है। मेरे छोटे भाई की उम्र के रहे होंगे वेचारे, पर अकेली औरत तो असुरक्षित होती है। उसके संबंध में इतनी ऊच-नीच कौन देखता है। घर लौटने का यह एकमात्र आकर्षण समाप्त होने पर मैंने दफ्तर में अपने को काम से लाद लिया। आखें दुःख आती, उंगलियों के पोर-पोर दर्द कर उठते, पर मैं मशीन पर बैठी रहती। इसका एक लाभ यह भी होता निष्कासन : १२१ . कि रात विस्तर से पीठ लगते ही नींद आ जाती। एक दिन साहब ने पूछ ही लिया, 'क्या बात है, मिसेज़ नरेंद्र ? आजकल आपको घर भागने की जल्दी नहीं रहती! 'जी, वेवी इन दिनों दिल्ली में है । वहीं पढ़ रही है । घर पर अकेले वैठना होता है, तो यहां बैठ लेती हूं।' मैंने नम्रता से कहा। 'दिल्ली पढ़ रही है ? बहुत अच्छा । बहुत बढ़िया शहर है ! देखना कुछ दिनों बाद यहां आना भी पसंद नहीं करेगी। मैं भी दिल्ली यूनिवर्सिटी का छात्र रहा हूं। दस साल आपके इस घटिया शहर में रहने के बाद भी, वहां की खुशनुमा यादें धुंधली नहीं हुई हैं ।' वड़ी छोटी-सी बातचीत थी, पर उस अनौपचारिक बातचीत ने हम लोगों के बीच का अंतर एक मिलीमीटर तो कम-से-कम घटा ही दिया था । उस दिन उन्होंने मेरे लिए कॉफी मंगवायी। इसके बाद किसी दिन गाड़ी में लिफ्ट भी दी। किसी दिन वाज़ार में सामना हो जाने पर दुआ- सलाम के वाद कॉफी हाउस में आमंत्रित भी किया। शायद वे ईमानदारी से मेरा अकेलापन वांटना चाहते थे । शायद उनकी नियत उतनी साफ़ न भी हो, पर मुझे शिकायत का कभी मौका नहीं मिला। पर दफ्तर में सबकी दृष्टि में एक मौन उपालंभ उतर आया। जो मांखें पहले आदर से झुक जाती थीं, अब वेवाकी से मेरा पीछा करतीं। जब-जब कोबिन से बुलावा आता, लगता जैसे मैं घूरती हुई आंखों का गार्ड ऑफ ऑनर लेती जा रही हूं। तव समय काटने के लिए मैं लायब्रेरी जाने लगी। सव ओर से कट- कर यूं किताबों की दुनिया में खो जाना वड़ा प्यारा लगा । बड़ी कोफ्त हुई के यह बात पहले क्यों न सूझी। वहीं लायब्रेरी में कोई दुर्लभ पुस्तक खोजते हुए एक दिन प्रोफेसर प्ता मिल गये। नरेंद्र के सहपाठी रह चुके थे । घर पर भी कभी आते रहे । वे मनुहार करके घर ले गये। मिसेज गुप्ता और बच्चे बड़े प्रेम से ले । मुझे जबरदस्ती खाने के लिए रोक लिया गया। लौटी, तो नये- राने लेखकों की दस-बारह पुस्तकें मेरे हाथ में थीं। प्रोफेसर साहव खुद र तक छोड़ गए थे। २२ : पापाण-युग लेकिन यह स्नेह और आदर हर दार नहीं मिला। चौथी बार जब में पुस्तके तौटाने गयी, तो गृहस्वामिनी वाहर भी नहीं बायी। वहीं रसोई में बैठी बच्चों पर चीखती रही। अनुभव के कड़वे घूट पीकर मैंने जान लिया कि समस्त पली- समाज के लिए खतरे का निशान बन गयी हूं। तब मैंने पार्क का आश्रय लिया। एम. ए. समाजशास्त्र का फार्म भरकर इतने दिनो को छूटी पढाई फिर प्रारंभ कर दी। पार्क के एकात कोने में बैठ देर तक पढती रहती। मेरी तरह और भी कई लोग वहां पढ़ते होते। मेरी उपस्थिति किसी जिज्ञासा या कुतूहल को नही जगाती। विधु को दिल्ली गये दो साल हो गये थे। इस बीच जब भी आयी, अपनी दुई के माथ ही आयी। इसीलिए उस दिन घर लौटने पर सामने एकदम बिन्नी को देखा (अकेले ही), तो मैं चकित रह गयी। 'अरे, कब आयी?' 'दोपहर को।' 'तो फोन क्यों नही कर दिया?" 'मिमेज मिना बोली, तुम शायद दफ्तर में मिलोगी नहीं।' मैंने ताला खोला। वह मेरे पीछे-पीछे घर में आयी। 'जरा साडी बदल लू, बिन्नी । बम, एक मिनट में खाना तैयार करती है। "भाभी, मैंने पडोस में खा लिया है। मिमेज मित्रा वोली, तुम कई वार वाहर ही खा आती हो।' 'तुम्हारे लिए तो बना हो देती।' मैंने गुस्सा जन्त करते हुए कहा। 'परीक्षा दे रही हो क्या ?' उसने मेरी पुस्तकें उलट-पलट करते हुए पूछा। 'हा, क्यों, मिसेज मिना ने यह नहीं बताया क्या तुम्हे ?' मेरी आवाज कुछ ज्यादा ही तल्ख हो गयी थी। मैंने गैस जलाकर कॉफी बनायी। एक कप उसे दिया, एक अपने निफासन : १२३ . लिए भर लिया। अलमारी से ब्रेड निकाल ली और खाना शुरू कर दिया। 'यह क्या, आज सिर्फ ब्रेड ही ?' विन्नी ने पूछा। 'हां, जिस दिन वाहर नहीं खाती, घर पर इसी से पेट भर लेती हूं।' मैंने कहा और अपने स्वर की कटुता से खुद ही सहम गयी। थोड़ा-सा सौम्य होकर बोली, 'बात यह है विन्नी कि अपने अकेले के लिए सारा सरंजाम करने की इच्छा नहीं होती। सुबह तो जैसे-तैसे बना भी लेती हूं। पर शाम को जरा भी इच्छा नहीं होती।' बिन्नी लेकिन वैसा ही आहत भाव चेहरे पर लिये बैठी रही। रात विस्तर पर आते ही उसने कहा, 'भाभी! तुम्हें शायद मिसेज मिना की बात का बुरा लग गया, पर तुम किसी के मुंह पर हाथ तो नहीं रख सकतीं न । और फिर उनका. दोप ही क्या है ? उनकी जगह तुम होतीं, तुम भी यही करतीं। क्योंकि कोई भी औरत इतनी दरियादिल नहीं हो सकती।' मैं बेवकूफों की तरह सिर्फ उसे देखती रही । वह अपनी रौ में कहे जा रही थी, 'हम लोग कोई महात्मा नहीं हैं, हाड़-मांस के मनुष्य हैं। इतनी बड़ी पहाड़-सी जिंदगी अकेले काटना बड़ा कठिन होता है, यह क्या मैं जानती नहीं ! लेकिन फिर भी औचित्य की सीमा लांघना तो ठीक नहीं है।' 'आखिर तुम्हें कहना क्या है ?' मैंने खीझकर कहा। मुझे इतना गुस्सा आ रहा था। यह वित्ते भर की छोकरी, जिसे मैंने फ्रॉक और दो चोटी में देखा था, जिसका मैंने कन्यादान किया था, मुझे नीति और धर्म का पाठ पढ़ा रही थी। 'मुझे जो कहना था, वह तो मैंने तब भी कहा था, जब भैया की मृत्यु हुई थी। आज कोई नई बात नहीं कहूंगी मैं।' 'मैं नहीं सोचती, आज उस चर्चा की कोई जरूरत है।' मैंने रुखाई से कहा। बिन्नी तनकर बैठ गयी, 'जरूरत कैसे नहीं है ! आज इस चर्चा की जितनी जरूरत है, पहले कभी नहीं थी। तुम्हें मालूम है कि विधु के अवचेतन में तुम्हारे कारण कैसी-कैसी ग्रंथियां पड़ गयी हैं । शायद १२४ : पापाण-युग इसीलिए वह तुमसे इतनी नफरत करने लगी है ।' 'बी० ए० मे मनोविज्ञान लेने से कोई मनोवैज्ञानिक नहीं हो जाता, विन्नी!'मैंने व्यंग्य किया। 'यह वात मेरी है भी नही । यह बात दिल्ली के एक बड़े मनोविशेषज्ञ ने बतलायी है । भाभीजी विध को लेकर वही गयी थी।' 'तुम्हारी जिठानीजी को मेरी बेटी में इतनी दिलचस्पी दिखाने की क्या जरूरत आ पड़ी!' "जरूरत तो सचमुच आ पड़ी है। दीपू गुड़िया पर जान दिये बैठा है और भाभीजी चाहती हैं कि उसे इग्लंड भेजने से पहले कम से कम मंगनी तो हो ही जाए। इसीलिए वे उसे डॉक्टरों के पास ले जाती रही हैं । और इसीलिए मैं तुम्हारे पास आयी हूं। प्लीज भाभी, मना मत करना। इतना अच्छा लड़का फिर हाथ नहीं आयेगा।' 'लेकिन वह तो बहुत छोटी है अभी।' मैंने कापते स्वर में कहा । "कहां छोटी है ! मुझसे भी एक हाथ लवी निकल गयी है और इतनी प्यारी लगती है आजकल । दीपू उस पर मर-मिटा है, तो कोई आश्चर्य नहीं है। भाभीजी और अम्माजी भी उस पर जान छिड़कती हैं । यस, उसके फिट्स के बारे में जरा मन डावाडोल था, इसीलिए डॉक्टर के पास गयी थी।' 'क्या कहा है डॉक्टर ने ?' 'यही कि मा को लेकर इसके मन में कुछ कॉम्प्लेक्स है, गाठ है--इसी से मां के सामने पड़ते ही यह अपना सतुलन खो बैठती है । भाभी, तुम नहीं जानतीं, तुमने अनजाने में उसके साथ कितना अन्याय किया है-यह तो यहा से मैं उसे ले गयो, तो अच्छा ही हुआ, नही तो लडकी सचमुच हाय से निकल जाती।' 'तुम लोगो ने गलत समझा है, विन्नी। दरअसल बात यह है...' भावावेश मे कहते-कहते मैं एकाएक रुक गयी। यह क्या कहने जा रही थी मै। यह ठीक है कि अब इतने दिनो बाद गंगाघरवाली बात बिलकुल बेमानी लग रही थी, लेकिन उस दिन तो वह मेरे लिए कितनी वही दुर्घटना प्रतीत हुई थी, पहली बार सुनने पर बिन्नी की क्या वही प्रतिक्रिया नहीं निष्कासन : १२५ होगी? क्या उसकी कल्पना के ताने-बाने घटना को अतिरंजित रूप नहीं दे देंगे ? तब क्या इसी आग्रह के साथ वह गुड़िया को अपने घर की बहू वनाने पर राजी होगी ! हो भी गयी, तो क्या वही स्नेह, वही आदर दे सकेगी? अपनी गुड़िया के साथ कितना बड़ा अन्याय करने जा रही थी मैं। ईश्वर ने समय पर ही सुबुद्धि देकर मुझे उवार लिया था। 'तू ठीक कह रही है बिन्नी, अकेलापन कभी-कभी इतना असहनीय हो जाता है कि उचित-अनुचित कुछ भी याद नहीं रहता।' मैंने तकिये में मुंह छिपाकर कहा। इतना बड़ा झठ कैसे बोल सकी थी मैं ! पर बोलते हुए मन में जरा भी कसक नहीं उठी थी। मेरे उन उद्गारों के साथ ही विन्नी का रोप पता नहीं कहां बिला गया था। वह एकाएक मेरे ऊपर झुक आयी । एक साथ मेरी मां, मेरी सखी, मेरी विटिया बनकर मेरे शरीर पर हाथ फेरती रही। उसके स्नेहिल स्पर्श से मेरे इतने दिनों का संचित दर्द आंसू बनकर फूट पड़ा था और मैं रोते-रोते सो गयी थी। उसकी शादी में मैं नहीं जा पायी थी । उसे वधू वेश में देखने का अरमान मैंने मन-ही-मन में जब्त कर लिया था। रिश्ते के देवर कन्यादान कर आये थे। तैयारी सारी विन्नी ने ही की थी। मैंने सिर्फ रुपया भेज दिया था। अपनी सारी संचित पूंजी मैंने लुटा दी थी। जीने का कोई अर्थ वाकी नहीं रहा था। फिर भी मैं मर नहीं सकी थी। एक आशा थी कि कल को गुड़िया मां बनेगी,अपने ही रक्त-मांस का एक पिंड उसकी गोद में खेलेगा, तव शायद वह जान सकेगी कि मां के लिए छोटे-छोटे भय भी कितने बड़े हो उठते हैं ! उस दिन उसे मेरी याद अवश्य आयेगी, तव अगर मुझे नहीं पायेगी, तो उसकी हंसी में हमेशा के लिए ग्रहण लग जायेगा। उस दिन की प्रतीक्षा में मुझे जीना था और इस प्रतीक्षा को सफल बनाने के लिए मैंने मिसेज़ कोहली बनना स्वीकार कर लिया था। अखबारी कागज़ पर चलकर यह रिश्ता मेरे पास आया था इसलिए इसने मेरा तन ही बांधा था, मन अव भी अतीत के गलियारों में भटक रहा था। १२६ : पापाण-युग । मूरज की तीवी किरणों ने मुझे वर्तमान मे ला पटवा मामाया प्रसिद्ध मूर्योदय में देख नहीं पायी थी, दुली आंदों में भी बंधी बनी रह गयी थी में। भागो-मागी में होटल की तरफ दान आयी। मंकोच के गाव गने कमरे में प्रवेश किया। डॉ० कोहली गव कर रहे थे। "कहा गायब हो गयी थी ? मैं तो पुलिस में रिपोर्ट देने जा रहा था।' उन्होंने मजाक किया। 'मूर्योदय देखने गयी थी।' 'कमा लगा?' 'कुछ वाम नहीं । कल आपके साथ देगी। शायद अच्छा लगे।' मैने मृदु स्वर में कहा। "क्या इसे में अपनी तारीफ मायूँ ?' उन्होंने मेरी आँखों में सीधे देखते हुए कहा । पर दूसरे क्षण उनका चेहरा शरारत भरी मुसकराहट से दमक उठा और मैंने स्वस्ति की सांमली। 'सुनो, चाय आकर लौट गयी है। नीचे जाकर चाय के लिए भी वह देना और कैटीन से एक पैकेट मिगरेट का भी लेती आना।' चाप के लिए कहते हुए चेहद मंकोच हुआ मुझे । वेवारे मेरे लिए अब तक रुके रहे। और सिगरेट लेते हुए तो मेरी ग्लानि की सीमा ही नहीं रही। पद्रह दिन में मैं यह जान नहीं पायी थी कि डॉ० कोहली कोरी यांड पीते हैं। ऊपर पहुंची, तो चाय लग चुकी थी 1 डॉक्टर अखबार हाल में मेरा इंतजार कर रहे थे। 'मॉरी!' कहते हुए मैंने तत्परता से चाय बनायी और जहान की बातों मे खो गये। मुझे मालूम था कि चार- सिगरेट तलब करेंगे। मैंने फुर्ती से उनका चादी का विगत कर पैकेट की सारी सिगरेटें उसमे डाल दी और पंक्टविदेशमा मे खोये हुए थे। सिगरेटकेस बन्द करते हुए मुझे लगानीद दुवारा उसे खोला । ढक्कन के अंदर की तरफ एक तसवीर थी। दो गुला के फूल मेरी तरफ देखकर हंस रहे थे। उनकी आंखें झील की तरह नीलं थीं, शायद अपनी मां की तरह । परं बाकी सारे नाक-नक्श हू-ब-हू अप पिता की तरह थे। मैने अनायास ही उनकी तरफ देखा । अखबार एक ओर पड़ा था औ उनकी आंखें दीवार पर लगे एक कैलेंडर में टंक गयी थीं। पर मैं समः गयी थी कि उन आंखों में मंदुरा का मीनाक्षी मंदिर नहीं है। उन आंख में उस वक्त टेक्सास के किसी नगर की छवि है। उस नगर का एक साफ़ सुथरा मुहल्ला, उस मुहल्ले में एक प्यारा-सा घर, उसमें एक अप्सरा पत्नी, उस पत्नी की गोद में दो फूल-से बच्चे। खट! मैं चौंकी। उन्होंने केस में से एक सिगरेट निकालकर उसे बंद किय था। वे बड़े सहज भाव से उसे सुलगा रहे थे। पर इस सहजता के पी कितना प्रयास था, मेरी पारदर्शी आंखों ने देख लिया था। एकाएक उन पर मुझे ममता हो आयी। पुरुष होने का कितना बड़ दंड भुगत रहे थे। मन भरकर रो भी नहीं सकते थे। एकाएक उनक सारा दुःख वांट लेने की इच्छा हो आयी । व्यर्थ ही उनसे अपना द छिपाती फिर रही थी मैं। वे भी तो मेरी तरह निर्वासन का दंड भुग रहे थे । मेरी तरह अपने स्नेह के साम्राज्य से निष्कासित थे। वैरा जव चाय की ट्रे उठाकर ले गया तो मैं उठकर उनको कुर्स की वांह पर बैठ गयी। उनके वालों में धीरे से अपने होंठ छुआते हु। मैंने कहा, कल गुड़िया के बारे में पूछ रहे थे न ! सुनिएगा?'
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