Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mother India Ka Jawab

Pal,chandrawati Lakhan · 2011/01

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Front matter

कुछ कढ़िया घुस्तकें अंतर्राष्ट्रीय विधान २७ दक्षिण माफ्रिका के सस्या अंगरेन-आदि का इतिहास २) प्रह का इतिहास पायर में मातृ मापा 12) देश-भक मेऊमी के खेश २) प्रापर्खेर में होमरून ॥) परिचमीसम्मता का विवाना ) इटली के विधायक पामेंट us), B) महात्मागण २१) फ्रिमी-झोप में मेरे २१ वर्ष) एशिया-निवासियों के प्रति मिमी में भारतीय प्रतिज्ञा पोरपिममों का यदि ) पद मुखी-प्रया पशिपा में प्रमात , रूस का पंचायती राम्म 0) केनिया में हिंदुस्थानी रूस का पुनर्मम्म 1) गोरा चाम और काले काम ) सस की राज्य-क्रांति २॥ चीन की राज्यक्रांति रूस में पुगांतर मर्मनी की राग्यभ्यवस्था ) रोम-साम्राग्म २) जर्मनी में बोशिका 10) पर्वमान एशिया मापान की रामनीतिक समयाटसम D प्रगति 210) संसार की क्रांतियाँ परिण-मामिका का स्वतंत्रता के प्रेमी पा सस्यामा 100 सिनफ्रिमर ॥ गगा-पुस्तकमाला-कार्यालय २९-३०, अमीनापाव-पार्क, जयनऊ

गंगा-पुस्तकमाला का विपासीत पुष
मदर-इंडिया का जवाब
मेमिया
भीमती चंद्रावती लसनपाल एम० ए०
(गुरुकत विरपियालय, काँगडी)
प्रकाशक
गा पुस्तकमाला-कार्यालय
२५. ममीनाबाद-पाक
लम्वनऊ
रितीपात्ति
सनिय 110)]
सं.NER वि.
[सावी 12)

भीमती चंद्रावती लखनपाल पम्० ५० दो शब्द । है रफ्ले गए पह युग श्वेताग आवियों के प्रमुख का युग है । कासी जासियों को चिरिया-घर की चीज समझा जाना है। जनवरी, १९२६ में पक्षिन के एफ विशाल चिड़िया घर में गुजराती तथा तामिल पालकों को वहाँ की एफ कपनी ने भजूया खानवरों के तौर पर प्रदर्शित किया था। इसी साल जून पेरिस के एफ पिपिया-घर में १५० भारतीय मामीण इस हत-भाग्य देश के मामों की दुरवस्था प्रदर्शित करने के लिये ये 1 मारस क्या एशिया के अन्य देशों के प्रति घृणा के माषों का, योरप तया भमेरिका में महा-सहाँ प्रचार किया ला रहा है। मिस मेयो की पुस्तक 'मदर-नारिया' इसी उद्देश्य से जिम्मी गई है। यह पुस्तक भारत में पढ़ने के लिये नहीं मिस्त्री गई-पह लिखी गई है योरप के लिये, अमेरिका के लिये, अपने को सभ्य कहने प्रथा कहलानेवाले पेवाग देशों के लिये ! मिस मेयो ने सभ्य-संसार (१)के सामने टोल पीट- कर पोपणा की है-'देखो भारस ! यहाँ वषों के नाम पर बकरों के खून की नदियाँ यहाई बायी है, स्त्रियों पर भस्या- पार होता है, गोशालाभों में गोषष होता है, पवित्र कहामे- - .

।
वाले सीयों में गदगी का ढेर होता है! यह घोपण मिस
मेयो ने योरप तया अमेरिका के एफ-एक कोने में कर दी है।
मिस मेयो के दिमारा में श्वेतांगों के स्वाभाविक प्रभुत्व का
मिसात फूट-फूटकर मरा हुआ है । समने झूठ-सच की
चिंता न करते हुए भारतवर्ष फो चिदिया-घर फा-सा रूप
दिया है। प्रस्तुत पुस्तक में मिस मेयो के अनर्गज झूठों को
जगह-जगह पर्शाते हुए अत में परिशिष्ट के तौर पर योरप
तथा अमेरिका के अघ पतन का भी नग्न रूप दे दिया गया है।
परतु क्या यही 'मदर-इडिया' का अपाय है ? इसमें सदेह
नहीं कि योरप तथा अमेरिका में शराप, व्यभिचार, चोरी,
साफे तथा अत्याचार दिनों-दिन पढ़ रहे हैं, परसु
शब्दों में उद्घोषित कर देना चाहती हूँ कि यह सम ऊम कह
देना 'मदर-इरिया' का असली जघाप नहीं है। मिस मेयो
की यहुत-सी बातें झूठ है, झूठ ही नहीं, गदी तथा नीचता-
पूर्ण हैं, परंतु क्या इस पुस्तक के पन्नों को पलट जाने पर
कोई इस यात मे इनकार कर सकता है कि उसकी कई पातें
सरुची भी हैं, और यह लिखते हुए भावी फटती है कि
थिलकुल सच्ची है। मैं चाहती हैं कि भारतवर्ष के एक-एक
में स्पष्ट

मदर-इंडिया का जवाब
प्रथम भाग
भारवषर्प की स्वसत्रमा का मिन भमानुपिक उपायों से
भपहरण किया गया है, वे हमारी स्मृतियों में अभी साणे ही
है कि हम अपनी मॉरों के सामने उन पालों को काम में लाया
जाता देख रहे हैं, जिनसे परतत्रता के जुए को भारवषासियों
के कपों पर कसफर पाँध दिया आय । ससार की महान्
शक्रिया (World Forces) मिस दिशा की तरफ दौड़ रही
है, उसे देखते हुए आशा होती है कि ये था और सफ न पक्ष
सकेंगी-परतु पालपाप स्वार्थी अपनी चालों से पाप नहीं
भाते। कहते हैं, परमात्मा ने उन्हें ससार को सभ्य पनाने का
मार सौंपा है, इसलिये उनका फर्क है कि असभ्य मारव में भी
सभ्यता का प्रकाश फैलाएँ, और सब स बह सभ्यता के
सियतों को स्वीकार न करके, आप तक उसे अपनी सरचा में
रक्खें , क्योंकि उनमें से पाहुवन्मे परमात्मा को नहीं मानते,
इसलिये वे कहते हैं कि उन्होंने ससार को सम्म पनाने का
.
.

२ । मदर इसिया का जवाब 'ठेका लिया है। इसकी परवा नहीं कि यह 'ठेका' सन्हें किसी ने दिया हो या न दिया हो । ससार की प्रगति को देखकर-जप कि चारों तरफ जागृति के विह दिखाई दे रहे हैं किसी देश का मी सोया रहना असमय है, इसक्षिये प्रत्येक परतत्र पेश परतत्रता की पेमियों को तोड़ गिराने के लिये हाय-पैर मार रहा है। यह दृश्य झठे 'ठेकेदारों' से नहीं सहाजावावे अपने 'ठेके' के समय को पढ़ाने के लिये भी उतना ही हाथ-पैर मारते दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने स्वार्यों के लिये सर, रेमें और स्कूल खोले हैं, परतु हमें सबोधन कर कहते हैं- "देखो, तुम्हारे देश को हमने फितना सभ्य पनाया " मानो ये हमें समझाना चाहते हैं कि सफें मनाना, रेसें चलाना, स्कूल और हस्पताल खोलना दुनिया भर में अंगरेज ही जानते हैं, और कोई नहीं मानसा । ये चीजें तो वर्तमान मभ्यता के अमर फल अंगरेज भारत में भावे या न पाते, यह वो युग ही मागृति फा है। अंगरखों के बगैर भी रेसें और सड़कें भारत में। पनवी और स्कूल या इस्पताल खुलसे । हाँ, इस समय यह सब कुछ अंगरेजों के मुमीते को सामने रखकर और अंगरेजी राज्य की भारत में मुद नीष सामने के लिये किया गया है, और दूसरी हालत में यह सब कुछ भारतीयों के मुभीवे को सामने रस्त्र. कर भौर भारतीय राम्य को मुद्ध वनाने के लिये होता। जरा- - है

प्रथम भाग
परा-सी चीज दिखाकर-चाकू, मिस और दियासलाई दिसा-
कर--अंगरेज फहसे है-"हम यह साए", परतु पे मूल जाते
है कि यदि वे न होसे, चो "यह सम कुछ हमारे घर होता "
इस ममय भारतवासी ठेकेदारों' फी इस युकि के खोखलेपन
को समझ रहे है, इसलिये मालूम पड़ता है, इन्हीं 'ठेकेदारों
में से कछ ने अमेरिका की एक औरत को जिसका नाम
कैपरीन मेयो है-इस काम पर लगाया है कि वह सभ्य
अगत् के सामने अंगरेपों के भारतवर्ष में रहने के हक की
सफाई पेश करें । बहुखों का विश्वास है कि मिस मेयो
एंग्लो-इडियन लोगों की एजेंट हैं। हो सकता है, यह
ठीक हो या न हो । कहते हैं, इन लोगों ने मिस मेयो की
लिथी 'मदर-नदिया' पुस्तक की हजारों, प्रवियाँ वरीय
कर पार्लियामेंट के मेंबरों को मुफ्त वॉटी हैं। सुना
अमेरिका में इस पुस्तक की ५० हजार कॉपियों मुक्त बटी
है। यदि ये पासें ठीक है, मो इस बात में संदेह नहीं रह
आता कि इस पुस्तक के पीछे एक युदिया ही नही है ।
यह पुस्तक ठीक ऐसे समय प्रकाशित की गई है, नब फि
'स्टेलमुटरी कमीशन' भानेवाला है, अप कि एक सरह से
मारस के भाग्य पर, विघार होनेवाला है
के लिये मिस मेयो को चुना गया हो, इसमें ज्यादा
काम

मदर इंडिया का अपाय पारचर्य की बात भी नहीं । दो साल पहले 'फिलिपाइस' की स्ववप्रसा-विषयक प्रश्न पर जप विचार हो रहा था, तो इसी मेयो ने उन लोगों को दुनिया भर में बदनाम करने के लिये "The Isles of Fenr" नामक पुस्तक लिखी थी। मेयो ने अपनी राजी का पेशा ही यह पनाया, 'मालूम परता है । 'मदरनसिया' का उद्देश्य ही भारत को बदनाम करना है। मसफे एक-एक पृष्ठ, एक-एफ पकि और एक- एफ शब्द में भारतीयों को निदाया गया है । जगह-अगह दोहराया गया है कि भारतपर्प स्वराज्य के भयोग्य है। एक-एफ शम्ब इसी उद्देश्य को सम्मुख रख कर लिखा गया है । स्वाहान व्यक्कि ऐसी पुस्तक लिख ही नहीं सकता, भसभव है । मिस मेयो ने बेघदफ होकर मूठ मोला है। मिन-जिनसे उसकी पातचीत हुई है, उनमें से बहुतों के हो उसने नाम नहीं दिए, जिनके दिए है उनमें से पहुतों ने कह दिया है कि हमने ये या इससे कहीं ही नहीं, झूठ लिखती है महात्मा गाधी तथा रवींद्रनाय टागौर तक के नाम से। झूठ पोल गई है । वह जानती होगी कि ये लोग इनकार करेंगे, परंतु शायद वह यह भी बामसी होगी कि उसकी फिताब सो बालों में मुफ्स पॅटेगी, इन बेचारों की पावाज कहाँ पफ पहुँगी ।"

प्रयममाम कैसे हो, . महारमा गांधी ने 'मदर इडिया' की मालोचना करते हुए ठीक कहा है कि इसमें मिस्त्री बहुत सी पामें तो माधारण भारतीयों को मारम भी नहीं । मालूम जय उसमे कोई-सी बात कही मे सुनकर कह दिया, 'देखा हिंदुस्तान " एफ ईसाई महिला ने मिस मेयो के भारत में आते ही उसे सलाह दी थी कि तुम यदि कुछ पुराई कहीं देखो, सो उसे सामान्य नियम न समझ लेना। यही सलाह है, जिसे मिस मेयो ने मानने से इनकार कर दिया, वीबधा है। लेखी पसरहल ने बहुत ठीक लिया है-"क्या मिस मेयो,भष सप कि वह भारत में यकार लगा चुकी हैं, भारत के विषय में पहले की अपेक्षा ज्यादा जानती हैं ?" ज्यादा कैसे जानतीं। जिस पुस्तक को उसने लिखा है, उसका खाका तो पहले से ही उसके दिमाग में था। सस खाके को भरेनवाली घटनाएं ४ महीने के घर में इकट्ठी करके वह ले गई, और किसाव लिन मानी । जगह-जगह के अंगरेजों से मिली, उनसे पूछा, को कहानी छो सुनाओ, हिंदुस्तानी फैसे गदे हैं। बस, वह कहानी बने-बनाए स्वाके में अपनी जगह पर अब दी और 'मदर-इडिया' सैयार हो गई कइयों का कथन है कि 'मदर-इसिया' पुस्तक ने पर्य के विषय में जितनी हलचल पैदा कर दी है, इतनी - भारत-

६
मदर इंडिया का अपाय
।
हलचल इस शवाम्दी में किसी और पुस्तक ने उत्पन्न
नहीं की । भारतवर्ष के सवध में सबसे ज्यादा पटने
तथा बिकनेवाली यही पुस्तक है । इस पुस्तक में क्या
हिस्सा है, यह आनने की प्रत्येक भारतवासी को उत्सुकता
है। इस पर अब पफ नो कुछ लिखा गया है, वह प्राय
अंगरेजी प्रत्यारों की समालोचनाघों के आधार पर ही
लिखा गया है परंतु जिवना कुछ लोगों क सामने आया
है, वह उससे बहुत कम है, जितना इस गदी पुस्तक में
मौजूद है । मैंने इस पुस्तक को भावि से अंत तक
पढ़ा है, मैं चाहती हूँ, इसकी झूठी-सची बासें हिंदी-
पाठकों के सामन आवें साकि उन्हें माळूम हो कि यदि
वे वासें झूठी हैं, वो विदेशी लोग उनकी स्वतन्त्रता के
फूटवे हुए पंखों को किस प्रकार काटने की चिंता में है
और यदि वे भातें सची है, वो उन्हें दूर करने में प्रया-
शील हों, वाफि पह लाछन उन पर से घठ नाय
इस पुस्तक के प्रथम पृष्ठ का शीर्षक है-'The Bus
to Mandalny'-मादले को बानेवासी 'पस-परतु
सारी पुस्तफ में मारने का कही जिक्र तक नहीं है।
पुस्तफ तीस अभ्यायों में घाँटी गई है, परसु प्राय शीर्षक
कुछ दिया है और अदर कुछ लिखा है । शीर्षक का एस
।
।

।
प्रथम भाग
--
अन्याय से ज्यादा समय नहीं, और अध्यायों का परस्पर
म्यादा मषध नहीं भारत के कोने-कोने से गद इफट्ठा
फरने में मिम मेयो ने अपने को इसना मुना दिया है कि
उसे घूसरी किसी पात का ध्यान नहीं रहा मालूम पड़ता ।
गुरू से माखोर तक पुस्तक को पढ़ जाने से
मालूम पदसा
है, किमी ने भारतीयों के प्रति घृणित अट्टहास सस्पन करने
के लिये 'चुटकलों का संग्रह कर दिया है । पहले ही पृष्ठ पर
फतफत्ते का वर्णन करती हुई मिस मेयो लिखती है-
"In the courts nod nlleys and bazars many
little bookstalls, where narrow-chested, nenr
sighted, ancomic young Indian stndents, il
native dress, brond orer piles of fly-blown
Russien pamphlets"
"कसफते की गली-गली में छोटे-छोटे किसाप पर है।
उनमें भारतीय विद्यार्थी, जिनकी छाती सिकुना हुई है,
भॉमें कमजोर है, पदन में ताकत नहीं है धोती पहने हुए,
रूस के गदे-गदे ट्रैक्टों को ऑखें फार फासफर पर
रहे हैं।"
इस सूत्र से पुस्तक का भीगणेश होता है । यह सूत्र मिस
मेयो पर पर्याप्त टीका है । इस पुस्तक के लिखने का यही

८ मदर-इंडिया का जवाय उद्देश्य है 'गदे, मरियम-से हिंदुस्तानी, पोलशीषकों H सुन-सुनकर 'स्वराज्य-स्वराज्य' चिल्ला रहे हैं, असल में इनकी क्या हालत है ?-मिस मेयो कहती हैं, 'सुनिए, मेरे शब्दों में। मानूम पड़ता है कि यह कुमारी गवर्नमेंट हाउस कलकत्ता में ठहाई गई । यहाँ मे यह सीधी फालीघाट गई । हलघर- नामक किसी व्यक्ति ने उसे मदिर दिखलाया । यहाँ पकरे-पर- घफरा काटा जा रहा था। इतने में क्या हुमा- "aleanwhile, and instantir, a roman who waited behind the killers of the goat las rush ed forward and fallen on all fours to lap up the blood with her tongue 'in the hope of har ing a child''In th14 manner ve kall here from 150 to 200 kids each day', says Air Haldar with some prida. "The worshippera supply tho Lids's "दखने में एफदम एक स्त्री, नो मकरा मारनेवालों के पीछे पड़ी भी, वोड़ी-दादी पाई और बच्चा लेने की उम्मीद से घुटने और फुहनी जमीन पर टेकफर सून को भीम से सप-सप पाटने लगी । हलधर ने कुछ अमिमान मे कहा- 1

प्रथम माग
है
'इस प्रकार हम रोपण १५० से २०० मेमने मारते है, और
भद्धालु जोग उन्हें जुटाते हैं।"
मिस मेयो सीधा गवर्नमेंट हाउस से उतरकर फाली
के मदिर की प्रदक्षिणा करने गई। दो ही पी कलमले में
देखने लायक थीं। एक योमशेधिक लोगों के भगह-अगह पर
विखरे हुए ट्रेक्ट ओ, शायद बगाल के गवर्नर की सवारता से
गली-गली उड़ रहे थे और दूसरी चीज कासी का मंदिर,
जिसे प्रत्येक समझदार हिंदू हिंदू-पर्म पर कम क समम्म रहा
है और जिसकी पुराइयों को दूर करने में हिंदू-समाध क्षगा
हुआ है । भीमती मारगरेट फान ने इस स्थल की पासो-
धना करते हुए ठीक लिया है कि काली का धीमत्स पर्सन
करते हुए मिस मेयो ने यह लिखना छोड़ दिया है कि नि-
दिश भारत में वो यह कुआंनी, परसु द्रावनकोर की महा-
रानी ने, जो कि एक देसी रियामत में राग्य करती है राज्य
की पागशेर हाय में लेते ही पहला काम यह किया कि सम
तरह की कुर्यानियाँ पद कर दी। मिस मेयो को पता होना
पाहिए था कि हमारी बहुत-सी फरीवियाँ हमारी 'माई-बाप'
पनी हुई सरकार की मेहरबानी से भी हैं । भगले दिन एफ
थियोसोफिस्ट मॅगरेज ने मिस मेयो से कहा भी, 'तुम काली
का मदिर देखने नाहक गई, वह मारतवर्प नहीं है। परंतु धन

मदर-इंठिया का जवाम . - महाशय को क्या मालूम था कि मिस मेयो सो 'मदर-दरिया' के लिये एक 'चुटफला' ढूँढने गई थीं । । 'कलकत्त' और 'फाली' का रौद्र वया वीभत्म वर्णन कर यह मिस भगले अध्याय में पतलाती है कि वह भारसपर्प क्यों आई थी ? पूछनेवाला हो, तो इससे पूछे कि यह बात तो पुस्तफ के शुरू में लिखनी थी, सुमे इतनी उमावलापन क्या था कि कक्षम सठति ही घोनशेधिकों के ट्रेक्टों और फाली के एश्यों की दुहाई देनी शुरू कर दी १ खैर, पाने का उद्देश्य सुनिए- "What does the average American aotunlig hoow about India? That Ar Gandhı lives there, also tigers. It was dissatisfaction with this state that sent me to India, to seu that a volun teer unsubsidized, uncommitted, and unattached could obsery of common things in doily human life Therefore in early October 1928 I ment to London, called at Intima Office, and, a complete stranger, stated my plan' "अमेरिफम लोग भारतीयों के विषय में क्या जानते हैं ? यही कि वहाँ गांधी रहता है, और शेर । इस अवस्था से मैं । " प्रधम भाग मतुष्ट न यी, इमलिये में भारत गई । मैं दखना चाहती थी फि एफ पालटियर, जिसने फिमी का रुपया न खाया हो और पहले में अपने विचार न बना लिए हों, भारसषप के दैनिक मानव-जीपन का क्या चित्र स्वीच सफा है ? इसलिये मैं १४२५ के ऑस्टायर फ शुरू में लग्न फ इडिया मॉफिस में गई और पिनकल अपरिचित व्याकि फी मासि अपनी स्फीम फहराली" अच्छा, सो मिस साहब 'पासटियर' मनकर आई थीं ऐसी वाल टियरी के लिये पर्याई । आपका विचार है कि मापने 'रुपया नहीं खाया' और मारतवर्ष के संबंध में आपके विचार 'पहले से बने हुए नहीं ये क्योंकि आपने 'रुपया नहीं खाया' इसीलिये आप सीधा इविया मॉफिस गई । ठीक है, रुपया साठी, वो भला इडिया प्रॉफिस क्यों जाती इस जगह आपको यह कहने की मी मावश्यकता महसूस हुई कि आप उन लोगों से 'विलकुल अपरिधिस' थी मिस का एक-एक शब्द मसला रहा है कि वह 'वाक्ष- टियर' थी, उसने रुपया नहीं खाया', अपने विचार 'पहले से नहीं बनाए' और यह इडिया ऑफिसवाप्नों से 'विलकुल अपरिमित थी मुनिए, पाठक, इस 'बासाटियर' ने क्या-क्या गजव राया ! - मदरठिया का जवाब दूसरे अध्याय के शुरू में मिस लिस्पती है- * The Indian girl, in common prrutice, looka for motherhood ninc months after reaching pubertymor anrlere between the age of 14 or8" "अक्मर यहाँ की लड़कियाँ जवानी के ९ महीने पाद मा पन जाना चाहती हैं । यह समय ८ से १४ वर्ष की उम्र के अदर-अदर होता है।" मिस मेयो की यह यात सफेद आदमी का फाला झूठ है । इसफा खडन करते हुए सॉ० मिस वासफर एम्० पी० ने 'टाइम्स ऑफ इसिया' में अपने अनुमष के माधार पर लिखा है-"३०४ हिंदू माताओं का ययई के हस्पताल में पहला पचा उत्पन्न हुषा । उनकी पानुपातिक भायु १८० पर्प यो । इनम से ८५ ६ प्रतिशतक की आयु १७ वर्ष या इस- से ऊपर थी और १४ ४ प्रतिशतक की १७ से नीचे मी। सबसे छोटी उम्र १४ वर्प ची और उनमें सस सम्र की फेघम ३ त्रियाँ थी। मैंने मदरास मेटर्निटी हस्पताल फे १६२२-२४ के अफ भी देने हैं। यहाँ २३१२ सियों की प्रथम सतान हुई और भानुपातिक प्रायु १६४ वर्ष थी । ८६२ प्रविशतक १७ वर्ष या इससे ऊपर की थीं और १३८ प्रविरावक १५ L

प्रथम माग
१३
से नीचे की थी, सपसे छोटी सम्र १३ वर्ष थी । ७ खियों की
उम्र १३, भोर २२ की १४ वर्ष थी। मेरे पास अन्य प्रांतों
की, जिनमें उत्तर भारत मी शामिल है, रिपोटे हे । इनम ३६६४
में से केवल १० की भायु १५ वर्ष से कम पी और सबसे
छोटी उम्र १३ वर्ष थी।"
इन प्रों की मौजूदगी में मिस का सात सदरण मान
भूमकर उगला हुआ विष नहीं तो और क्या है ? परंतु ये
धक उसके 'घुटकला-सप्रह' का फाम पोदे ही देखें। इसके
मागे मिस मेयो लिखती है-
"Because of her place in the social system,
child bearing and matters of proorention nro
the womnn's one interest in life, her ono subject
of nou versation, be her caste high or low
Therefore the child groping up in the home
learns, from earliest grasp of word or act, to
dwell upon sex relations"
"हिंदुमों की सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों का काम
याचे उत्पम करना ही है, इमलिये त्रियों की पासचीत इसी
विषय पर हुमा करती है, चाहे घे सकप जाति की हों, चाहे
नीच जाति की, और इसीलिये ऐसे घर में पलता हुमा
-

मदर इंडिया का बयान
मच्चा मा यही कुछ सुन और देखकर जिंग-सषधी पावों पर
सोच विचार किया करता है।"
भारतवर्ष में लिया अपने विन का उद्देश्य मातृत्व
फा सच्च प्रादर्श समझती हैं और योरप में पचों को माता-
पिता अपने उच्च स्त्रज्ञ जीवन में विघ्न मममसे हैं और इसी-
लिये फत्रिम साधनों का प्रयोग करते हैं। इन दोनों में मे
कौन-सा सवतर प्रादर्श है, इस पर बहस करने का यहाँ मौका
नहीं, परसु बों में गदे विचारों की चर्चा का जो कारण मिस
मेयो ने पतलाया है, वह मारतवर्ष की ही विशेपता नहीं है।
यह गिराषट योरप में भारतवर्ष से ज्यादा है। डॉ० एनवट
Hogyat yras "The Sexual Life of the Child'
फे १६१ पृष्ठ पर अपने देशों की अवस्था पर लिखते हैं-
" While the child is to all appearance
immersed in a book, irhile a girl is playing
with her doll, the parents or some other adults
carry on a conversation in the child's presence
under the influence of an utterly falou bolief
that thu latter'E'occupation ingrosses his or her
entard attention but the danger ]s hardly less
ben tlo schildren have an opportunity of

प्रथम भाग
१५
obsorving their oirn parents engaged in sarnal
acts, or oren inerc preparation for Auch nche
"अप पचा पाहिरा तौर पर पुस्तक में मग्न होता है या
सदको अपनी गुड़िया में खेल रही होती है, माता पिता या
दूसरे नवयुवफ, भूल से यह ममकर कि उनका ध्यान
पदने या खेलने में है, उनके सामने गदीनादी वा शुरू कर
देते हैं परतु कमी-कभी सो माता पिता अपने पड़ों के देखते-
देसवे फाम में प्रवृत्त होते हैं, या उसकी तैयारी शुरू कर
देते हैं इससे वनों के पतन की समावना और मी मद
आती है।"
यह नहीं हो सकता कि मिस मेयो को अपनी जाति के
मोगों की इन बातों का पता न हो। जिसे अपनी मास्त्र का
शहतीर कष्ट नहीं देखा, वह दूसरे की ऑस्न के जिनके को
निकालने चली है। मेरे फयन का पह अभिप्राय पिलकुल
नहीं कि मैं अपने देश के ऐसे मासा पिताओं का पचाव
चाहती है। वे मूर्ख हैं, अपनी सतान की अपने हाथों इत्या
कर रहे हैं, उन्हें माता-पिता बनने का ही प्राधिकार नहीं-
मेयो । भारत को यह पाठ पढ़ाने के लिये तुम्हारी
प्ररूरत नहीं तुम अपने देश की
सुष
स्रो
इमी भन्याय में सिमा है- Shiva, one of thu
-

१६ मदर इंडिया का जवाय ted upon greatest Hindn deithes, is represented, on highrond shrnce, in the temples, on the littlo altar of the humo, or in personal amulets, by tho image of the male generative, organ,, in which shape he receive the daily sacrifices of tho devout The followers of Vishnu wear pain their forehends the sign of the func tion of generation "शिव जो कि हिंदुओं के बड़े-बड़े देवसों में से एक है, मुख्य सड़कों पर बने देवालयों में, मदिरों में, घर के छोटे-से स्थान में, तावीज़ों में, पुरुप-जननेंद्रिय की शक में प्रतिदिन पूजा आता है विष्णु के अनुयायी अपने माथों पर प्रजनन क्रिया के चिन्नु की छाप लगाते हैं।" मिस मेयो का कहना है कि १२ मितबर, १९२३ की बेनवा की कान्फरेंम में घरलील साहित्य को बद करने के लिये सब जातियों ने प्रस्ताव स्वीकृत किया, किंतु भारत की 'कोर' में ( १९२५ का एक्ट न० ८, सेक्शन' २६२ ) उक अश्लीलयाओं को धर्म का हिस्सा समझकर सनकी रक्षा कर ली गई। मारस की गिरावट का चित्र मींचती हुई यह मिस लिखती है- . - 1 -

प्रथम भाग
१७
* In many parts of the country, north and
sonth, the little boy, his mind so prepared, 18
likuly, if plıysically attractive, to be drafted
for the satisfaution of grown men, or to be
regularly attachid to templu, in the capacity of
a prostatute Neither parent as a rule sees ndy
harın in thie, bat is rather flattered that the
802 lias been found pleasing"
"भारतवर्ष में, उत्तर-दक्षिण, भनेफ स्थलों पर, छोटे-
छोटे मालक यदि देखने में खूबसूरत हों, वो फाम-पासना की
पूर्ति में काम भावे है, या नद्रं पश्यावृत्ति के लिये मदिर में
रख लिया जाता है । माता पिता को भी इसमें कोई भापचि
नही, सन्हें इस पाव से खुशी होती है कि उनका लड़का
इतना पसंद किया गया है।"
मिस मेयो ने अपनी निलम्जसा और मूठ की यहाँ परा
काष्ठा कर दी है। मदरास की तरफ कई मदिरों में देव-वासियाँ
रखने का रिवाज है, जिसके विरुद्ध भी हाल ही में वहाँ की
लेजिस्लेटिव कॉसिश में प्रस्ताव पास हो गया है। मदिरा
में लड़के रखने की प्रथा कहीं महीं है। यह दुरापार भारतवर्ष
में मुमलमानों की रुपा से भाया है। मिस मेयो का देश भी

मदर-इंडिया का जपाप
इससे खाली नहीं है । हेविलाफ इलिस Sexual Invar
8ion' नामक पुस्तक के २६१ पृष्ठ पर लिस्यते है-
«iIt has been stated by many observers-in
America, in France, in Germany, and in Eng
land-that homosexuality is increasing among
women I bellore', writes a well informed
American correspondeut, 'What sexual 10 version
is increasing among Americans-both men and
women'
"अनुसघान करनेवालों में पता लगाया है कि अमेरिका,
फ्रांस, जर्मनी और इंगलैंड में पदमाशी, खास कर लियों में,
पड़ रही है। एक बानफार अमेरिकन का कथन है कि ममे-
रिका की स्त्रियों तथा पुरुषों में बदमाशी बढ़ रही है।"
इलिस महाशय इसी पुस्तफ के ३५१ पृष्ठ पर अमेरिका
एक और जानकार की साधी उद्धृत करते हैं-
"The great prevalence of sexual inversion
in American çities 18 shown by the wide know-,
ledge of its existence Ninety-nine normal
men out of a hundred have been accosted on
the streets by inverts, or have among their
।
,
T
।
।
(4
ז
T

प्रथम साग १९ oin acquaintances mon #hont they knot to be sexully inserted Bveryone has seen in verto and kno8 what they are The world of sexual inverts is, indeed, a large one in any Amencan city, and it is a community distinctly organized-rords, customs, traditions of its and every city bas numerous meeting places, crrtain churches where inverts con gregate "अमेरिका में बदमाशों की अधिकता का परिचय इससे मिलता है कि उनके होने का ज्ञान प्राय' सपको है। राह गावे १०० मल-मानसों में से 4 आदमियों को इन पद- माशों ने पुकारा है, अथवा १०० में से १८ भावमियों के ऐसे लोग परिचित है, मिन्हें घे जानते हैं कि ये पदमाश है। हरएक भादमी ने बदमाशों को देखा है और यह मानता है कि पदमाश क्या मला है इन पदमाशों की दुनिया अमेरिका में बहुत बदी हुई है, इनका एक मुनियत्रिव समुदाय है। इनके अपने सफेत, प्रथा पया कपानक है, प्रत्येक शहर में इनके अनेक मिलने के स्थान है, कई गिनें ऐसे हैं, वहाँ ये लोग इकटे रोखे है।"

, 4 २० मदर इंडिया का जवाय यदि भारत में देव-दासियों की प्रथा है, वो योरप में भी इस- से कम घृणित प्रथा नहीं रही है। डॉ० सेंजर महोदय की 'History <i prostitution' में योरप के देवालयों ने व्यमि- पार को नो प्रोत्साहन दिया और सभषस अब भी दे रहे हैं, उसके विषय में लिखा है- "Pope Olomant II 188ued a bill that prosti tutes would be toleruted if they pay a cortain amount of their earnings to the church " "Pope Sixtus IV was more practical, from one single brithel, which he himself had bault, he received an income of 20,000 ducats." पोप लोग घेश्यालय पनवाते थे, और उनसे भामवनी करते थे। जिस मिस के अपने देश की यह अवस्या है, यह भारत पर लांछन लगाने का साहस करता है। इसके भागे मिस मेयो क्षिनवी है-"In fact, so far ure they from seeing good and evil ab ve 600 good and oril, that the mother Fill praotice upon her child--the girl 'to make her sleop well', the boy 'to make him manly', an .

प्रथम भाग २१ " abuso such tho loy, at least, is apt to conti nue daily for the rest of his life" "ये लोग अच्छाई-चुराई के यह भर्य नहीं लगाये, जो हम लगाते हैं, इसलिये एकमा अपनी समकी को गार निद्रा में मुलाने और सरके को पुरुप बनाने के लिये उन पर (हस्स- मैथुन ) करती है, जिस पुराई को फम-से-कम लरका प्रतिदिन मीयन-भर जारी रखता है।" इन पाक्यों को पढ़कर किस भारतीय की बॉखों में खून नहीं उतर पाएगा। भारतीय देषियों पर यह कसक माताएँ स्वय अपने लड़के-लड़कियों को खराप फरती है-यह ऐसा झूठ है, मिसे पदकर पुस्तक फार गलने फो मी पाहता है। ऐसा झूठ गढ़ सकनेवाली के शप-कोप में सच-झूठ का क्या भर्य होगा ? फिर लिखा है- the beginning of the average boy's sexual commerce barely awaits his ability Br Gandhi has recorded that he lived with his wife, as such, then he was 13 years old, and adds that if he had not, unlike his brother in similar onge, loft her presence for a certain period each day to go to school, he would efthor have fallen २२ मदर-इंडिया का जवाब a prey to disease and premature death or have led a burdensome existence" "सामाम्यव मड़के फाखी-सवध कबी उम्र में हों बावा है मि० गाधी ( यगइडिया ७ बनवरी १९२७) ने लिखा है फि घे १३ वर्ष की आयु में ही इस प्रकार का जीवन मिता रहे थे। गाधीमी लिखते हैं कि यषि थे स्कूल माने के समय प्रतिदिन बी को छोड़कर न जाते, तो या तो किसी बीमारी के शिकार हो जाते, या छोटी उम्र में मर जावे, या बुरी हालत में होते " गाघीणी फो क्या मालूम था कि उनकी जीवनी का यह सदुपयोग किया जायगा । ५० साल पहले यह पात होगी, पर मेव बाल-विवाह की प्रथा ठसी जा रही है । यह मिस मेयो को न पता पमा । ब्रह्मचर्य के विषय में एक हिंदू-बैरिस्टर से मिस मेयों की निम्न मातचीत हुई- 'My father', said an eminent Hindu barrls ter, taught me wisely, in my boyhood, how to avoid infection .

प्रथम भाग
२३
उसने कहा-
एक प्रसिद्ध हिंदू-पैरिस्टर ने मुझसे कहा--"मेरे पिता ने
पर्चपन में ही पड़ी पुद्धिमत्ता से मुझे सिस्नों दिया था कि
प्रसनन-सपषी धीमारियों से कैसे पच मकते हैं।"
मिस मेयो मे पूछा-"क्या यह अच्छा न होता, यदि तुम्हारा
पिसा सुम्हें प्रमचर्य की शिक्षा देवा "
- मोह । प्राचर्य यो, हम लोग जानते हैं,
एक प्रसंभव चीन है।
यदि यह घटना ठीक है, जिस पर हमें रची-भर भी
विश्वास नहीं, वो मिस मेयो के साथ किसी मी पुरुप का
इस प्रकार की बातचीत फर सफना मिस मेयो पर भी कम
प्रकारा नहीं मालसा। भारतवर्ष का प्रादर्श प्रापर्य है, पे
वैरिस्टर महोदय चैरिस्टरी के साय-साथ इन गदे विचारों को
योरप से लाए होंगे, ये विचार मन्हें इस प्व-भूमि से
नहीं मिले।
भारतीयों की शारीरिक शक्ति के हास का वर्णन करते
हुए लिस्सा है-"Atter the rough outlines just
given, small surprise will meet the statement
that from one end of the land to tho other the
average male Hindu of 30 years provided he
has means to command his pleasure, is an old

मदर-डिया का जपाष
.
man, and that from 7 to 8 out of erery 10 such
males between the ages of 25 and 30 are impa
tent"
।
"उपर मो सक्षिप्त खाका खींचा गया है उसके बाद यह
कहते हुए पाश्चर्य नहीं होता कि भारत के एक कोने से दूसरे
कोने तक ३० वर्ष की आयु में हिंदू, यदि मह समृद्ध हो, तो
बूढ़ा हो जाता है और इस प्रकार के प्रत्येक १० पुरुषों में
से ७ या ८ नपुमफ होते हैं।" "इसके लिये प्रमाणों की
भाषश्यकता हो, वो अखबारों के विज्ञापनों पर, जिनके मालिक
हिंदुस्तानी है, दृष्टि डाल लो । नपुसकों को आबू के चमस्कारों
से पौरुष देनेवालों के इश्तिहारों से प्रासम-के-झालम रंगे
रहते हैं।" सभी भारत की बन सध्या दिनोंदिन बढ़ती मा
T
-
.
यदि किसी स्त्री के पच्चा न होता हो, घो-"In RBB,
however, of the oontinued failure of the vict
any wifo-to give him a child, the Hindu
husband has a last recourse, he may bond his
wife on a pilgrimage to a temple, bearing gifts
And, it is affirmed, some castes habitually save
time by doing this on the first night after
1
-
-

प्रयम माग
२५
-
the marnage At the temple by day, the woman
must beseech the god for a son, and at night sho
must sleep within the sored prooints Morning
come, she has a tale to tell the priest of what
befell her under the veil of darkness."
"Give praise, Oh daughter of honour, it
Tas the God', replies the priest And so she
returns to her home"
"बच्चा न होने की हालत में हिंदु-पति के पास एक
रास्ता है। वह अपनी स्त्री को कुछ उपहार लेकर धार्मिक
यात्रा के लिये किसी मदिर में भेज सकता है। कहते हैं, कई
जातियाँ सो समय पचाने के लिये शादी की पहली रात को
ही स्त्री को मदिर में भेज देती है। मदिर में दिन को
सो स्त्री पुत्र-प्राप्ति के लिये देषसा का पाराधन करती है, और
राव फो मदिर में ही सोती है। प्राव काम होता है और
वह पुजारी को राव की घटना सुनाती है, अपरे में उसके
साप क्या-क्या हुधा ' पुमारी कहता है, हे सती देवता
की स्तुति कर यह स्वय परमारम-देष ! और इस प्रकार
सी अपने पर को मोट भावी है।"
तीसरे अध्याय में मिस मेयो ने माल विवाह के तीन
-

२६
मददंडिया का अपाय
कारण पलाए हैं-(१) प्रथा, (२) हिंदुओं के
घर में कई सड़क मी रहते हैं, इसलिये फहीं हाथ से निकलने
से पहले लड़की दूषित न हो माय, यह मय, और (३)
योधन के माद सदकी की जागसी हुई प्रश्न कामना | Age of
Consent Bill 'स्वीकृति की आयु के पिल' पर १९२५ में
हुए एसेंबली के विषाद को उद्धृत करते हुए समने पर्शाया है
कि मदनमोहन मालवीय जैसे नेताओं ने भी स्वीकृति की प्रायु
के १४ वर्ष किए जाने का घोर विरोध किया । इसका उत्तर
मालवीयजी ही देहा, पाल-विवाह के पिछले जो घो कारण
पसनाए गए हैं, वे इस मिस फी नीचता को सिद्ध करते हैं।
हिंदुभों के घर में, जो जरफे रहते हैं, वे या सोलरकी के माई
होते हैं, या नजदीकी रिश्तेदार !-उनसे सर यह भारतर्षप
के लिय नया विचार है, जो कि मिस मेयों के दिमाग में उपजा
है। हाँ, योरप में जरूर माई-बहन शक में परवा नहीं रहता।
डॉ. मौल मपनी पुस्तक के २१२ पृष्ठ पर लिखते हैं-
.

- प्रयम माग इसक्षिये चमका विवाह जल्दी कर देते हैं, यह ऐसा क्षछिन है जिसका उत्तर-'पाहिमाम्', 'बाहि माम्' फे भतिरिक कुछ नहीं दिया जा सकता। यह फैसी स्त्री है, जो दूसरे देश की अपनी बहनों के मयघ में इसना पड़ा झूठ लिस्त्रने के लिये चैयार हो सकती है। किसी का 'रुपया विना स्मापनि स्वार्थ भाव से ऐसा झूठ बोलने की हिम्मत मिस मेयो में ही है। Age of Consent का विल एसेंपनी में गिर गया, इस पर मारगरेट फन्स मिलती है-"भारत का मामय स्त्री-समाम पिछले १० षषों से 'स्वीकृति की भायु' पदाने का सरकार से अनुराधे कर रहा है। रामा राममोहन राय के समय से माज- मुपारक दक्ष भी इसके लिये प्रयमशील है। एक ही पिसे से १० हजार स्त्रियों ने इसके लिये सरकार के पास प्रार्थना-पत्र भेजा है। दूसरी जगह की ७ हजार नियों ने सरकार से भनुरोध किया है कि १६ वर्ष से पहले लड़की की शादी को दरनीय समझा जाय। इन संप मासों का मिस मेयो ने कही जिक सक नहीं किया। इसके स्थान पर पद यहाँ तक झूट पोलने पर उतारू हो गई है कि यह पिस हिदुषों की विमति के कारण गिरा दिया गया । असक्ष पात यह थी कि महापक 'पायु पढ़ाने का प्रश्न था, सरकारी सदस्यों के विरोध करने पर मी, वह भरा स्वीकृत हो गया था, परतु नियम को चोदने २८ मदर-मंडिया का जाप पर पर फितना रक्खा जाय, इस प्रश्न के माने पर यह विक्ष गिर गया । यदि एमेंबली के सरफारी सदस्य बिल का विरोध न करणे, वो १४ वर्ष की लड़कियाँ माता यनती हुई दिखाई न देखीं । हम षियों,,मिटिश सरकार पर दोषारोप करती है कि जिन सुधारों के लिये देश तैयार है, उन्हें लाने में वह मान- यूमकर देरी कर रही है।" इस प्रकरण में एक और पात ध्यान देने योग्य है । इघर सो 'स्वाकधि की मायु' पर एसें- बली में इतना विषाद दिखाई देता है, परतु पिछले साल मौर्षी- राम्य में, जो एक छोटी-सी देसी रियासत है, कानून द्वारा 'स्वीकृत्ति की बायु' १६ साल फर दी गई है। क्या एक देसी शासक का यह प्रशसनीय कार्य सिद्ध नहीं करता कि शासन- नियों का अधिकार भारसवासियों के हाथों में आते ही समाज-सुधार में भी पिछड़े नहीं रहेंगे। इसके अतिरिक्त भारतवर्ष ही ऐसा देश नहीं, जिसमें 'Age of Consent' इसनी छोटी उम्र में हो। अमेरिका के का हिस्सों में स्वीकृति की भायु ८ पर्प है। इक्षिस महोदय Sex in Relation to society' के ५२८ पृष्ठ पर लिखसे है.--iPhere has been, during recent years, Rwide limitof variation in the legislation of the different American States on this point, the difference 1

प्रथम माग
२९
"
of the two limits being as much as eight years,
and in some important States eighteen 18
declared to be 'rape' मर्यात, "हाल ही के सालों में
'स्वीकृति की भायु के सवप में अमेरिका की भिम भिन्न रिया-
सतों के कानूनों में पहुव भेद दिखाई दे रहा है। कई जगह पाठ
पर्प फी भर्षाघ है, तो फोजगह १८ वर्ष से छोटी लरकी के
साप सपध को नियम विरुद्ध ठहराया गया है।"
हाल ही में, प्रेट मिटेन में, 'विमेंस सोश्यल कॉसिल' का
एक रेप्यूटेशन गृह-सचिव के पास इसलिय गया कि वहाँ
साद-जकियों की शादी की भायु पर प्रतिबप लगाया
गाय । सम रेप्यूटेशन की एक सदस्या मिस थीं। उन्होंने
forur We hear a good deal about child
marriages in India, but while the home country
allows its children to marry at 12 years of ago
(tor girls) and 14 years (tor boys) there is little
hope of such legislation being introduced in
India and other countries where it is vitally
necessary
अर्थात् "जय इंगस में ही ससकियाँ कानूनन १२ वर्ष
पौर सरक १४ पर्प में शादी कर सकते, सब मारतवर्ष से

मदर-इंडिया का नवाब
-
क्या पाशा की जा सकती है ।" १९२४ में दो लड़कियों की
१४ वर्ष में और १६ की १५ वर्ष में शादी हुई, १९२५ में भी
दो की १५ और २४ की १५ वर्ष में शादी हुई, १९२६ में ४
सड़कियों की १४ और ३४ की १५ वर्ष में शादी हुई । यह
प्रेट-मिटेन की कहानी है, जिसकी वकालत 'मदर इडिया'
में की गई है।
मिस मेयो ने चौथे भभ्याय का शीर्षक 'Early to Mary
and Early to Die'--'जल्दी शादी करो और मन्दी मर
मायो'-रक्सा है। घास-विवाह के पोषकों के पास इसका-
क्या जवाब है ? क्या मिस मेयो, के चेलेंज का वे कम
अषाय देंगे ? मैं चाहती हूँ कि हम इस प्रथा को दूर कर सकें।
पाँचवें अध्याय में लिखा है-"fost of the women are
very young Almost all aro venereally affected
यह एफ इस्पताल का जिक्र है-"उनमें से बहुस-सी
विलफुल युषी है। प्राय सभी प्रजनन सपधी सामारियों,
से भाक्रांत है।" इसी प्रकार एक अंगरेज सी-चिकित्सक ने
मेयो से कहा-"मेरे वीमार विश्वविद्यालय के विद्याधियों की
खिया है । प्राय सभी को प्रजनन-समधी रोग है । जब मैं
भारतवर्ष में आई थी, मैं लड़कियों के पियामों से जाफर
उनकी लड़की की हालत कह देती थी, क्योंकि मुझे भाशा थी
"

प्रथम भाग
कि वे अपनी लड़को के कल्याण के लिये कुछ फरेंगे, पद्ध
पातचीत करने पर मुझे मालूम पड़ता था कि माता-पिता को
अपनी लटकी के पति की अवस्था का शादी से पहले ही शान
था और फिर भी उन्हें इसमें शर्म नहीं भाती थी, और नये
इसमें कुछ पोप ही समझसे ये । यह देखकर मैंने उन लोगों से
कहना ही छोड़ दिया।" एक मदरास की डॉक्टरनी मे कहा-
"मैं हजारों खियों का इलाज करती हूँ। मैंने एक श्री भी नहीं
खी, जिसे प्रजनन-संवधी ( Venereal ) बीमारी न थी।"
एक कथनों में मिस मेयो की मिलावट कितनी है और
यथार्थ कहा फिसना गया है, इसका निर्णय नहीं हो सकता।
चालाक मिस ने नाम एक का भी नहीं दिया । यह हम पहले
ही तिम्म चुके हैं कि जहाँ-जहाँ उसने नाम दिए हैं, यहाँ-वहाँ
लोगों ने मन पावों के कहे जाने की सस्यसा से इनकार किया
है । परस हो सकता है, इससाल में ऐसे रोगी मावे हो।
आखिर हस्पताल सो इसी काम के लिये है। इससे क्या सम
रोगी सिर हो जाते है ? इन वीमारों से भारतीय जनवा के
विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता । हाँ, जनता के विषय
में कधन निम्न प्रकार के होते हैं। The Sexual Life of
Our Time के लेखक म्झौच महाशय ३९२ पृष्ठ पर लिखते

मदर इंडिया का जपाष
-
.
.
"From those tre lenrn thut Denmark, Ger
many, Germun Austria and Switzerland, show
the most favouruble conditions, next come
Belgium, France, Spum, Portugal, North and
Middlo Italy Worst of all ure the conditions
in Southern Italy, Greece, Turkey, Russia, and
--England "
"प्रजनन-सयधी रोग देनमार्क, जर्मनी, जर्मन-आस्ट्रिया
आदि में है। यह रोग पुरी हालत में दक्षिणी इटली, प्रीस,
टर्की, रूस तथा इंगलैंस में पाया जाता है।"
यहाँ अच्छी हामत सेनमार्फ की पतलाई गई है । उसकी
राजधानी के विषय में लिखते हुए ग्लौच महाशय लिखते हैं-
"In these lust ten years, for every 100 young
men living, there have been 110 infections
during ten yours, that is to buy, on the average
overy one hus boon infected once, and a great
many have been infooted more than opos."
"पिछले यस वर्षों में १०० भादमियों में से ११६ को
प्रजनन सवधी पीमारी हुई है, अर्थात, सामान्यतया हर एफ
भावमी को एफ धार तो रोग हो ही चुका है, परतु फायों
.

प्रथम माग
को दो पार हुआ है।" आगे बसिन के विषय में सोच
महाशय लिखसे है-
-
"It further appears that of the men who
entered on marriage for the first time then
above the age of 80 years, euch hud, on the
average, had gonorrhau turice, und about one
in four or five had been infected with syphilf.
“गणना से ज्ञात होता है कि पर्सिन में ३० वर्ष में पार
जिन लोगों ने पहली शादी की, उन सपको दो बार 'गनारिया
की बीमारी हो चुकी भी, भौर प्रत्येक ४ या ५ में से एक
'सिफलिस की बीमारी हो चुकी थी।"
और फिर गिर के विषय में, सो म्लौच महाराप त्रि
की चुके हैं कि उसकी पशा सभी देशों से पुरी है।
अमेरिका के विषय में, जहाँ की मिस मेया है,
जिप,
एलिस महोदय अपनी पुस्तक 'Analysis of the frust
Impulse २२४ पृ० पर लिखते हैं-"}} oilert,study.
ing the profulonce of gonorrhæu 514093 lays in
New York states-In my study of the subjmet
there have been observed 3 cases of gonorrhead
ursthritis, in boys agod, respectiyrh,1, 10 and
1

मदर-इडिया फा जवाय 12 years, which Tere acquired in the usual manner, from girls ranging betireen 10 and 12 years of age In each caso, nocording to the story told by the victini, the girl made the first advuncos - "पोलयार्स्ट महोदय न्यूयार्क के सदकों में 'गनोरिया' पर लिखते हुए कहते है कि उन्हें वीन ऐसे रोगी मिले, जिन्हें ४, १० और १२ षर्प की बायु में यह धीमारी थी। पूछने पर मालूम हुआ कि १० या १२ साल की आयु की लड़कियों से सन्हें यह बीमारी लगी और प्रत्येक अवस्था में पहले सरकी की तरफ से हुई ।”—यह है 'न्यूयार्क' की कहानी । एलिस महोदय अपनी पुस्तक 'Sex in Relation to Boorety' के ३२६ पृष्ठ पर 'Oivilization(सिविक्षिणेशन) को 'Syphilization' ( सिफिक्षिजेशन ) बसमाते हैं और लिनते है-"In America a Committee of the Medical Society of New York appointed to investigate the question, reported as the result of exhaustive mquiry that in the city of New York not less thun a quarter of a million of cases of venereal diseuse ooourred प्रथम भाग overy rear, and a leading Neir York derma tologist has stated that among the better olugs families he knows intimately at least one-third of the song have had syphilis In Germany eight hundred thousand Qubes of venereal diseave aro by one authority estimated to ocour yearly, and in the larger universities twenty fire per cent of the students are infected every terni, venereal disease being, however, specially common among students Yet the German army stands fairly high as regards freedom from reneroal disouso when compared with the Bri tish army which is more syphilized than any other European army Even within the Unuto of the English army it is found in India that Tenereal disease 1: ten times more frequent among British troops than among Native troops Stritoh estimates that the cost to the Bri tish nation of veneroul diseuses in the army, navy and Government departments alones amounts annually to £3,000,000 the

मदर-इंडिया का जवाय
mora ncourate estimate of the cost to the nation
1s stated tove27,000,000"
"भमेरिका की एक कमेटी का कहना है कि न्यूयार्क में
प्रतिवर्ष प्रदाई लाख से ज्यादा लोगों को प्रजनन संषधी रोग
होता है । एफ स्वमोगा फा, जो न्यूयार्क का रहनेवाला है,
फयन है कि उप घयने के लोगों के घरों में से, जिन्हें वह
भली प्रकार जानता है, कम-से-कम एक विहाई को सिफसिल'
है । अर्मनी में भाठ मान को प्रतिवर्ष प्रजनन-संपधी रोग
होते हैं। वहाँ के विश्वविद्यालयों में २५ प्रतिशतक विद्यार्थियों
को प्रवि-सत्र ये रोग होते हैं समन-कोष का सिफलिस
की दृष्टि से अंगरे-फौज से, बहुत अच्छा हाल है। अंगरेप
सेता तो योरप के सभी देशों से गई बीवी है। मिटिश सेना में
भी भारतीय सैनिकों की अपेक्षा अंगरेज सैनिकों में यह बीमारी
दसगुना ज्यादा फैली हुई है। स्ट्रिप महोदय ने हिसाम
लगाया है कि अंगरेजों का मार्मी, नेवी सपा सरकारी विभाग
में ही प्रजनन सधी बीमारियों का ठीक-ठीक बजट ७०
खान पाँड (दस फरास रुपए के लगभग) प्रतिवर्ष है।"
जिन देशों की यह अवस्या है, वहाँ से एक महिला पाकर
मारव की ऐषियों पर लांछन लगाने का साहस करती है।
यह सप कुछ घो हमने यही बैठे-बैठे सिम डाक्षा है!!

प्रथम माग
२७
अमेरिका तथा इंगलैंड जाकर देखा जाय, यो न-मामे फ्या-
क्या गुल खिलें।
इस अध्याय को समाप्त करने से पहले मिस मेयो लिखती
है कि पसे एफ डॉक्टर ने पतलाया-"They commonly
experienos marital ure tiro and three times
a das
"धे प्राय दिन में दो-चीन पार सयोग करते हैं।"-मिस
मेया ने लेखनी की लगाम को खुला छोड़फर मिला है। इस
प्रकार की यातें जो गद में और में एफ दूसरे से मुका-
विला फरसी हैं, पफ योरपियन महिला की कलम से ही निफल
सफती है। इन्हीं पायों में 'मदरदारिया' का प्रयम भाग
समाप्त हो गया है।

द्वितीय भाग
मिस मेयो लिखसी हैं कि इससे किसी बूढे हिंदू-अमीदार
ने कहा- "मेरे १२ पञ्चे हुए । १० लड़कियाँ थीं, भला कैसे
जीवीं ? इतना खर्चा कौन धाश्च करता १ दो लड़के थे , बस,
उन्हें मैंने बचा लिया।"
सर माइफल ओस्पायर जव मरतपुर रियासत का 'सेटल
मेंट ऑफिसर' था, उस समय की एक घटना का वर्णन उसने
अपनी पुस्तक 'India As I Kner It' में किया है।
इसका उल्लेख भी मिस मेयो ने इस सिलसिले में कर दिया है।
घटना का वर्णन प्रोग्वायर ने इस प्रकार किया है-"महाराज
की बहन की पजाब के किसी यदे सरदार से शादी होनेपाली
यो । महाराजा उस समय बहुत छोटा था, इसलिये घरवाले
लोग पोर साल रहे थे कि इस अपमर पर बड़े लोगों को
जिसना खर्च करना चाहिए, उतना किया जाय, भास् ३००
४० हजार पोस। रियासत की कौंसिल के सो स्थानीय सदस्य
ये, पे इसके पक्ष में थे। उस समय रियासत ब्रिटिश सरकार
की देख-रेख में थी, इसलिये पोलिटिकल एजेंट ने और मैंने
ऐसे दुष्काल के समय इवना अपव्यय फरने का घोर विरोध

द्वितीय भाग ३९ . किया । अत में मामला मरी कौंसिल के सामने रक्खा गया। मैंने फौसिल के सबसे पुराने मदस्य से पूछा कि ऐसे अप- सरों पर पहले कितना व्यय होता रहा है ? उसने सिर हिला- फर कहा 'ऐसा पहला कोई अवसर ही नहीं पाया । वृद्ध महानुमाव कुछ देर सकचुप रहे, फिर पोले-'साहप, भापको हमारी प्रथानों का पता ही है, आपको इसका कारण माधम ही होगा । मड़कियाँ पैदा तो जरूर दुई थी, इस मवति तफ कभी किसी लरकी को जिंदा ही नहीं रहने दिया गया।" क्या महाराज भरतपुर ने 'मदर-इरिया' में यह घटना पड़ी है ? यदि मचमुच ऐसा होता रहा है, सो पद खेद की यात है । परसु यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसी अवस्था भारतवर्ष में शाम पाइ जाता है । ऐमा होता, तो भारत में ३१ करोष मायादी काहे को दिखाई देती । इसमें शक नहीं कि को लोगों का लाडकियों के प्रति यह ध्यान नहीं, जो सटकों के प्रति होता है। स्त्री-जाति के प्रति इस उपेक्षा को हमें दूर अवश्य करना चाहिए। मेयो ने फिमी इस्पताल में 'स्वय देखी हुई एफ पटना लिखी है। वह कहती है कि यह पगाल की घटना है-"पॉप- म पर्ष की एक क्षमकी कुएं में गिर गई। माता से लेकर ।

-
मदर इंडिया का जवाय
हस्पताल में दौड़ी-चौड़ी आई। एक-दो दिन में अवस्था मया
नफ हो गई। लड़की की हासय विगट रही थी, उसको घम्मा ।
पास पेठी थी और परमात्मा से प्रार्थना कर रही थी।इतने
में एक बगालो
घायू.
मोस-सा जान पड़ता था,
पाया
और
डॉक्टरनी से घोला-
'मिस साहय! मैं अपनी स्त्री को लेने पाया हूँ।
'तुम्हारी स्त्री, डॉक्टरनी न चिल्लाकर'कहा। 'अपनी स्त्री
की हालत देखो, अपनी लड़की की तरफ ऑक्ष उठाकर
देखो-स्या तुम्हें कुछ होश नहीं है ?
'क्यों नहीं, पर, मैं अपनी बी को घर ले जाने के लिये
पाया हूँ। विवाह-संवध कालो सचित उपयोग है ( For my,
proper marital use ) उसके लिये मैं चाहता हूँ, यह मेरे
साथ घरचने।'
'परतु यदि तुम्हारी स्त्री इस समय चक्षी जायगी, मो लरकी
मर जायगी-तुम इन दोनों को जुदा नहीं कर सफने, पेखो'-
पचने में लड़की, जोभपने पिता की घमफियों को समझाती-
सीमान पड़ी, अपनी मा के साथ चिपट गई और चिश्ताने
पक्षगी।
'मी ने दरवस्-प्रणाम फरके, घुटने पकड़कर, पाँव पूम
कर, दोनों हायसोनकर, पति के पाँव कीरज माथे पर लगा-
~
-

द्वितीय भाग
४१
फर वारपार कहा-'मेरे स्वामी, दया करो, करुणा
करो।
'घलोचनो, मुझे तुम्हारी जरूरत है, तुम्हें मुझसे जुदा
हुए पहुस देर हो गई है।'-पाधू मे कहा।
'मेरे स्वामी, पञ्चे की हालत देखो !'-स्त्री ने करुणा-स्पर
में रुदन करते हुए कहा।
यापू ने अपनी सुकोमलांगी पनी फो पॉप से ठुकरा दिया
और कहा–'मुझे जो कहमा था कह चुका'-और पावू
युपचाप बाहर चला गया । वो उठी, लड़की चिल्लाई।
डॉक्टरनीने पूषा-'क्या तुम बसी सामोगी 'स्त्री ने आए
भरते हुए कहा- मैं माझा उम्मपन नहीं कर सकसी।' यह
Sठी. मुँह पर परदा किया और अपने पति के पीछे दौरती हुई
इस्पसाज सेवाहर हो गई।"
इस घटना को पदफर किसने ही माप दिल में उठत्ते
हैं। भाखिर, हम भी वो भारतवर्ष को जानते हैं। यदि कोई
कहवा कि यह घटना अमेरिका या इंगलैंर में हुई, मो इमें
इवना अषमा म होता, क्योंकि महॉ तक समाचार-पत्रों से
मात हो सकता है, यहाँ के स्त्री-पुरुषों का वैवाहिक संबध
पाराविक सिद्धातों पर ही मामिल है। यदि कोई कई कि
भारतवर्ष में यह घटना हुई, वो भारतवर्ष को, और यहाँ के

मदर इंडिया का जवाब
-
.
हस्पताल में दौड़ी-चौड़ी आई। एक-दो दिन में अवस्था मया
नक हो गई । नमकी की हालत बिगह रही थी, उसको अम्मा ।
पास बैठी थी और परमात्मा से प्रार्थना कर रही थी। इसने
में एफ यगालो घायू, जो कर्क-सा जान पड़वाया, पाया और
ऑक्टरनी से बोला-
'मिस साइव! मैं अपनी स्त्री को लेने भाया है।'
'तुम्हारी स्त्री', डॉक्टरनी ने चिल्लाकर कहा । 'अपनी स्त्री
की हालत देखो, अपनी लड़की की तरफ ऑन 'उठाकर
देखो-क्या तुम्हें कुछ होश नहीं है ?'
'क्यों नहीं, पर, मैं अपनी सी को घर ले जाने के लिये
भाया हूँ। विवाह-मथध काजो उचित उपयोग ( Formy
proper marital use ) उसके लिये मैं चाहता हूँ, यह मेरे
साथ घर चले।'
'परतु यदि तुम्हारी स्त्री इस समय चली जायगी, तो जदकी
'भर जायगी-तुम इन दोनों को जुदा नहीं कर सक, देखो'-
इचने में क्षरकी, शोभपने पिता की धमकियों को समझाती-
सी मान पड़ी, अपनी मा के साथ पिपट गई और पिल्लाने
लगी।
स्त्री ने पख्यत् प्रणाम करके, घुटने पकड़कर, पाँव पूम
फर, दोनों हाय जोड़कर, पति के पाँव कीरज माथे पर लगा-
1

द्वितीय भाग ४३ - 1 उसफी स्थिति अपनी सास की नौकरानी की हो खासी है। उसके हरएक हुक्म को उसे यजाना होता है। ससुर और ननद भी उसे जो चाहती हैं फहती है। सड़की को शिक्षा ही ऐसी मिसी होसी है कि वह चूं तक नहीं कर सकती। 'पह सिर ऊषा उठा सकती है या उसे किसी प्रकार की स्वतन्त्रता मिल सकती है-इस विचार का ससके मन में पीज सक नहीं होता । सास की मृकुटि सदा तनी रहती है, उसके शासन में दया या प्रेम को जगह नहीं होती। यदि दुर्भाग्य से 'पषी' को बचे पैदा करने में देर मग, या उसके साकियाँ ही होने लगें, तब तो दो मास का जीम कटार हो खादी है, तमके हाथों की मार कही हो जाती है. यह आए-दिन, नई पर लाने की धमकियाँ गन-गमकर सस पेचारी के बीवन को भष- फारमय यना देती है, क्योंकि हिंदू-नियम के अनुसार दुवारा शादी फरफे प्रथम स्त्री की नए उड़ सालना या उसे पासी घना लेना जायज है मैं मनुमय से कह मकती हूँफिकई सामें यह को अपनी जसकी से भी ज्यादा प्यार से रखती है, परतु फिर मी अघि कांश सत्या का चित्र मिस मेयो ने ठीफ सींचा है। मैं चाहती हूँ कि मारवर्प का मास-समुदाय इम पाक्यों को पढ़े और अपनी बहुमों के साप सहने के स्थान में मिस मेयो के साथ . "

.
.
४२
मदर इंडिया का जवाप
स्त्री-पुरुषों में विवाह विषयक जो उच्च-विचार काम कर रहे है
उन्हें जानता हुआ व्यक्ति इसमें विश्वास नहीं कर सकता।
फम-से-कम इस घटना को भारतीय जीवन का सूचक नहीं कहा
खा सकता। भारत का कोई भी युवक किसी डॉक्टरनी के
सम्मुख उन शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता, जिनका प्रयोग
उक्त घटना में शाबू' ने किया है।
मिस मेयो इमफे आग पल-पुराण के उस वाक्य की
खिल्ली उड़ाती है, जिसमें लिखा है कि पति चाहे कैसा ही क्यों
न हो, चोर हो, मार हो, व्यभिचारी हा, जुआरी हो, पागल
हो, यह स्त्री के लिय देवता ही है ।
इसमें संदेह नहीं कि भारत की मतियों ने अपने पति को
सदा सेवता ही माना है, क्या पत्तियों का फतव्य नहीं कि,
इन उस भावों में जीवन पिसा नेपाली, देषियों के योग्य
पनने का प्रयत्न करें ? इसके उत्तर का मार मैं भारतवर्ष के
पुरुप-समाज के लिय यहीं छोर देती हूँ।
वियाह-सबध के बाद सुमराज में सड़की की, जो घुर्गति
पनाई आती है, उसका चित्र मिस मेयो ने यों खींचा है-
"हिंदू-विवाह का प्रमिप्राय यह नहीं है कि नई गृहस्पी खुले।
वह छोटी-मी पश्वी, जिसे पधू कहा जाता है, पर के माता-
पिया की गृहस्थी में ही शामिल कर क्षा जासी है। वहाँ एकदम
--
~
-

द्वितीय भाग पाठक के यह सब कुछ पढ़कर समझ पड़ने लगता है कि मिस मेयो ने कहीं-कहीं सत्य को विलकुल प्रमाक नहीं दिया परतु इसने में वह एक पुटकुला और छोड़ देती है, जिससे मन की अवस्था उसके प्रति फिर पैमी-की-सी हो माती है। यह सिखती है-'She has not the vaguest conception how to feed him or develop him Her ideu of a suficient moal is to tie a string around his little brotvn body and stuff him till the string bursts." "भारतीय माता को परा भी माम नहीं कि पच्चे को. किस प्रकार मिलाना भार उसकी परवरिश करना चाहिए । पेव मरकर मोजन करने का मवक्षम वह यह समझती है कि परे के पेट के पारा तरफ रस्सी बाँध दी बाय और वस- के पेट को तष क भरा माय, अप क रस्सी टूट न जाय। मिस मेयो से हरएक भारतवासी पूछ सकता है, क्या यह पाव पुटकुले के तौर पर लिखी गई है या सपमुष उसने यहाँ पेट भरने के लिये इस विचित्र प्रकार को अपनी माँसों से देखा है? में मम्माय में मिस लिससी है कि इससे एक हिंदू मे "४४ मदर-इंडिया का जवाय लड़ने की तैयारी करे । मिस मेयो का कहना है कि पुलिस के सामों में १४-१६ वर्ष की बहुत-सी युपतियों की भात्म- हत्या की रिपोर्ट मिली । खात खुलवाकर देखा गया, उनमें लिखा था-"पुराना पेटदर्द और सास के साथ झगड़ा, आत्महत्या का कारण है " स्त्रियों की तुदर्शा पर मिस मोरावजी ने 'Bettreen The Tum lights' पुस्तक में कुछ लिखा है । मिस मेयो ने उसका भी यह नाम फर दिया है। मिस सोरायेजी लिखती है- "भय हिंदू-खी किसी सरफे की मांसा बन जाता है, वष उस- की कुछ कद्र होने लगती है, और उनाने की दूसरी स्त्रियों की। अपेक्षा उसका दर्जा ऊँचा हो जाता है। यह कलकत्य हुई, उसने अपनी पहरत साबित कर दी। बच्चे की मा पनकर उस स्त्री के मुख पर श्रात्मगौरव की रेखा झलकने लगता है । अव भी वह अपने पति की आज्ञाकारिणी दासी ही रहती है, परतु मय वह अपनी 'सत्ता' अनुमर्ष करने जगसी है, हिंदू-जमाने में जहाँ सफ सभव है, वह अपने 'व्यफित्व' का अनुभव करती है। जो लिया उसे ताने दिया करती थी, उनकी सरफ यह भाप उठाकर देख सकती है, उसके हृदय में अप सौविन का डर नहीं । 1 द्वितीय भाग - घृणित प्रया को वैसे-का-सा बनाए रखने के लिये इन लोगों ने मिषी कोसिस तक फे दरवाजों को खटखटाया था। इस सयम भी बाल-विवाह सथा महेश आदि की कुप्रथाओं के दैत्यों पर कई लड़कियाँ, जीवित-जामत्, सादी में आग लगा- कर यति बढ़ गई है। परसु मप भी, इस इसमाग्य देश में, ऐसे लोग मौजूद हैं, जो इन रष्टाठों से कुछ सयत सीखने के स्थान में पाक्षिका के मूदुन अंगों से उठती हुई लपटों को देखकर उनमें सतीस्व की ज्योति मसकती देखये और हर्ष के आँसू पहाते हैं । १९२५ में मारववर्ष में २६,८३४,८३८- पढ़ाई करोद से ज्यादा-विधवा मौजूद थीं। मिस मेयो की पुस्तक के ८३ अध्याय का शीर्षक 'Mother India' है। घाया का वर्णन करसे है-"यह घृणिव कार्य सममा खाता है, और अछूत जाति की स्त्री ही माया का काम करती है । मिस समय बचा पैदा होनेवासा हो, उस समय धाया को खबर भेजी जाधी है। पदि वह मच्छे कपड़े पहने होती है, तो उन्हें स्मारकर एफ- पम पुराने फपरे, मो इसी काम के लिये रक्स्ने होवे हैं-मो पिछली पार गच्या उत्पन्न होने पर भी पहने गए ये भौर जिनमें न जाने कितने फमि मौजद है-पहनकर भा जासी है। एक छोटा-सी धरी कोठरी में, स्त्री को, अमीन तक लिखा - - ४६ मदर-इंडिया का जवाष कहा-"We husbands so often make our wives unhappy thut we might wel four that they would poison us Therefore did out rise anoes tors make the penalty of widowhood so frightful in order that the women may not to tempted." "हम पति लोग अपनी स्त्रियों को इसलिये दुखी रखते हैं कि ये हमें विप न दे दें। इसीलिये हमारे बुद्धिमान् पूर्वजों ने वैधव्य की इसनी दुर्दशा की है, वाकि पत्री को विप देने का कभी प्रलोभन ही न हो।" यदि हिंदुभों को अपनी स्त्रियों से विष दिए जाने का, सदा मय रहा करता, वो शायद उनके घरों में चौका-चूल्हा दिखाई न दता, और वे योरपियनों की सरह होटलों में ही खीवन बिसाया फरते, यदि सचमुष यह बात फिसी हिंदू ने उसे पाई है, वो झूठ घसाई है। हॉ, भारत में विधवाओं की दुर्दशा अषश्य की जाती है, और उसके प्रायश्चिच में उसे 'मपर-इसिया' जैसे थप्पा भी खाने पड़वे हैं। स्मियों के प्रति हिंदुओं की हृदय-हीनता का मर्मवेषी पर्यन करते हुए मिस मेयो लिखती है-"जब सती प्रथा के हटाए आने का प्रिटिश सरकार प्रयम कर रही थी, उस समय इस द्वितीय भाग -- घुणित प्रथा को वैसे-का-वैसा बनाए रखने के लिये इन लोगों ने प्रियी कौसिल तक फे दरवाजों को खटखटाया था। इस सयम भी पास-विवाह तथा दहेश आदि की ऊपयानों के दैत्यों पर कई लड़कियों, जीवित-जाप्रत्, साकी में भाग लगा- कर यान चढ़ गई है । परतु अब भी, इस हतभाग्य देश में, ऐसे लोग मौजूद है, जो इन दृष्टानों से कुछ सबक सीखने के स्थान में पालिका के सूतुल अंगों से उठती हुई लपटों को देखकर उनमें सतीस्व की ज्योति मसावी देखते और हर्ष के माँसू बहाते हैं । १४२५ में भारतवर्ष में २६,८३४,८३८-- भड़ाई करोड़ से ज्यादा-विधवाएँ मौजूद थीं" मिस मेयो की पुस्तक के ८ अध्याय का शीर्षक 'Mother India' है । धाया का वर्णन करते हुए लिखा है-"यह घृणित कार्य सममा खाता है और भछूत जाति' की स्त्री ही धाया का काम करती है । जिस समय पणा पैदा होनेवाला हो, सस समय धाया को खबर भेजी जाती है। यदि यह मच्छे कपड़े पहने होती है, तो उन्हें उतारकर पक- दम पुराने कपड़े, सो इसी काम के लिये रक्खे होते हैं जो पिछली पार बच्चा उत्तम होने पर भी पहने गए थे और जिनमें न जाने कितने कमि मौजूद हैं--पहनकर मा जाती है। एक छोटी-सी अपर कोठरी में, श्री को, धमीन तक .

४८ . मदर इंडिया का सघाघ लटफचे हुए ढीले थानोंवाली चारपाई पर साल दिया जाता है। घर के मैले-कुचले, फटे कपड़ों से उसका पिस्वर धनाया जाता है। उस फोठरी में धाया प्रवेश करती है। यदि कहीं दीवार में छिद्र हो, तो वह उसे गोषर से यह कर देती है। इस विपक्षे घायु-मग्न में यह एक धुएँदार मिट्टी के तेल की पती को, जिस पर चिमनी मी नही होती, जलाती है। यदि यथा पैदा होने में देर हो, तो वह अपने गदे हाथों को, जिनके नाखून भी फटे नहीं होते, स्त्री के गर्भाशय में साल- सालफर पद के कोमल अंगों का भापरेशन-सा कर देती है। फई युवतियाँ सो इन्ही पाइयों को सेंट चढ़ जाती हैं।" सब मुष यह वर्णन हदय को कँपा देनेवाला है । मिस मेयो इसी सिलसिले में लिखती है-"हिंदुभों में विश्वास है कि यदि कोई स्त्री, बथे पैदा होने से पहले ही मर जाय, तो वह भूत घन बांसी है, उसके पैर पीछे को होते है, पछ उसी घर में इधर-उधर घूमा करती है । इसलिये यदि कोई स्त्री इस अवस्था में होती है, वो पापा उस पर को ऐसे भूत से बचाने के लिये मरणासन्न स्त्री की भाखों में पहले मिर्च मलवा है, पाकि भास्मा,आधी हो माप और उसे रास्ता ही न मिले। फिर वह दो समी-सपी लोहे की कीलें लेती है, भौर उस वेचारी के छोये हुए हाथों को फैलाकर-

विसीय माग
४९
क्योंकि ऐसी अवस्था में यह स्त्री भी अपने भाग्य फो जानती
है, पौर उमे विना कुछ फिए स्वीकार करती है-प्रत्येक
हथेली में से जोर से कीलों को फर्श में गाद देवी है । इसका
यह अभिप्राय है फि मारमा फरी में गर गई, अप हिल-क्ष
न सकेगी और घरवालों को किसी प्रकार का कष्ट न दे
सफेगी। इस प्रकार यह स्त्री, दीन माव से परमात्मा का नाम
लेती हुई और अपने पिछले अम्म के उन मयेकर पापों का
स्मरण करती हुई, जिनके कारण उसे हम अम्म में ये सप
याचनाएँ मोगनी पर रही है, जीवन को समाप्त कर देवी है।"
यह भटमा उन घटनामों में से है, जिन्हें महात्मा गांधी के
शब्दों में कह सकते हैं कि मिस मेयो ने कई ऐसी पावें लिखी
है, जिनका साधारणपया हम लोगों को शान तक नहीं है।
क्या सचमुच मारतवर्ष का यही चित्र है ?
मिस मेयो ने लिखा है-"भारतवर्ष में नो परे जीवित
पैदा होते हैं, उनमें से २० लाख प्रति वर्ष मर जाते हैं। पैदा-
रा के पहले महीने में ही ४० प्रतिशत बों की मृत्यु हो
जाती है, और पपे हुओं में से पहले महीने में ६० प्रतिशतक
की मृत्यु होती है ! पहुस-से पये वो मरे हुए ही पैदा होते
हैं, जिसका कारण, सिफक्षिस समा गनोरिया है।" सिफलिस
समा गनोरिया के विषय में पहले पर्याप्त हिस्सा जा चुका है !

५० मदर-इंख्यिा का अवाम 1 . । नवा अध्याय परदे पर है । प्रारम में ही मिस मेयो एक ऐसी वास लिस्य डाक्षसी है, जो भारतीय गाँवों से परिचित व्यक्ति को एक गदी गाली मालूम पदवी है । मिस मेयो ने स्वय स्वीकार किया है कि मारत की १० प्रतिशत जनता ग्रामों में रहती है, और यह हम अच्छी तरह जानते हैं कि मारत के प्रामों में सनातन-काल से यही भाष घलेभा रहे हैं कि गाँव के किसी भी व्यकि की लड़की मारे गाँव की लड़की है, और किसी भी पहू सारे गाँव की बहू है। माताएँ अपनी ससकी को घर में छोड निश्चित होकर बिस- किसी मी काम के लिये पाहर जा सकती है, और जाती है, परतु फिर मी मिस मेयो ने मानो जहर उंगलसे हुए लिख हाला है-"The Hindu peasunt villager's wife will not leave her grl at home alone for: the space of an hour,, being practically sure tliat if she does so the child will be ruined" "हिंदू-मामीण की नी अपनी सदकी को एक घटेके लिये भी भकेली घर पर नहीं छोड़ेगी, क्योंकि उसे पूर्ण । निश्चय होता है कि यदि वह ऐसा फरेगी वो घरकी की इजस स्त्रतरे में होगी।" हमें तो मिस मेयो की बातों पर विशाम इसीलिये होवा

.
निर्णय भाग
है, क्योंफि उसने मुठ मा पोशा है, सो वो है ही, परसु साय
ही इतने गदे प्राक्षेप किए हैं, जिन्हें मुनये ही, नफरत होती
है। इस पुस्तक को पदन से ऐसा मालूम पड़ने लगता है
कि भारतवर्ष बदमाशों से भरा हुभा देश है, महफियों को
सुरक्षित रखने के लिये उनके माता-पिता चौपीसी घटे
पाहरा देते रहते हैं, किसी क्षण मी चूक जाय, सो सुटिया
ध्य माती है । मिस मारगरेट कच्चन ने लिखा है कि धमे-
रिौ को जानकारों ने 'दुरापार से मरा हा देश'-The
most orime-ridden country in the troriu-1-कहा है,
मिस मेयो की पुस्तक पढ़कर मान पदसा है कि इस धन में
संचाई मवरंय है । समी सो अमेरिका की एफ सी मे, मारेस
के विपर्य में, और वह मी भारस की क्षियों के विपय में,
निघडक होफर, अपनी प्रवरात्मा को वाफ में रेस पी
शायद पंचफर, ऐसे-ऐसे मापं किए हैं, जिन् 'पाप' यो
'दुष्टाधार' से कम नहीं गिना मा सफया, जिनके लिये, उस
मिर्स को भारत की ससियों के सामने, इस लोक में या उसे
लोक में जवाब देना ही पड़ेगा।
उक मूठ से भपंनी प्रास्मा को हलका करके मेयो में
मारत में प्रचलित परदा प्रथा को भाद-दायों लिया है। भारसे
की ४ फरोह लिया, हिंदू मथा मुसलमान, परेड में कैद है।
-

५२ 1 मदर-इसिया का जवाय मेयो सिखती है कि यह एक परदा-पार्टी में मौजूद थी। उस पार्टी का पड़ा रोचक वर्णन 'मदर-इडिया' में दिया गया है। दिल्ली में उच्च-पदाधिकारी एक अंगरेज की पनी ने अपने घर में एक परदा-पार्टी का इतिजाम किया। दिल्ली के बड़े- बड़े घरानों की स्त्रिया अपने-अपने घुर्के दास, महार्य-वस्त्रों तथा भामूपणों से महित हो, मकान में जुटने लगी । क्योंकि ये स्त्रियाँ परदा करती थी, इसलिये इनका स्वागत भारत- महिला को स्वय ड्योदी पर जा-जाफर फरना पड़ रहा था। किसी पुरुष को वह इस काम के लिये कैसे रख सकसी यो.. सबने अदर बा-श्राफर अपने पुर्के उतार झूटियों पर टाँग दिए। चाय की तैयारी होने लगी । यहाँ पर भी खाद्य- पदार्थ उठा-उठाकर परवाने का काम ऑग्ल-महिला को ही फरना पद रहा या, हॉ, दूसरी ऑग्म-महिलाएँ भषश्य उसे इस काम में सहायता दे रही थी। इवने में क्या हुमा-एक- दम, पाहर परामदे में, किसी के पाने को आवाज सुनाई सी-भादमियों की आवाण, स्त्रियों की आवाज ऊँची-ऊपी सुनाई पड़ने लगी-ये पाषाणें नजदीक आने लगी ! भाविष्य फरनेवाली मॉग्ल-महिला के मुख पर सन्नाटा-सा बा गया, कमरे के मीसर तो मानो प्रलय मच गई ।। सनके , . .

द्वितीय भाग
५३
.
.
लवे-क्षये, मारी मारी सफेद मुझे पहुँच से दूर थे, इसलिये
हिंदुस्तानी मौरतें मागसी हुई कोनों में जा छिपी, परषाने
फी सरफ पीठ फरफे दुषक गई। मॉम-महिलाएँ उनकी
अवस्था सममफर, दरवाजे पर जा खड़ी हुई, इस प्रकार
उनकी पीठ से दरवाजे पर परदा हो गया। इसके अनतर
ऑग्म-महिला ने आकर कॉपी हुई भारतीय स्त्रियों से
कहा--'मुझे पड़ा लेप है, पर अब वो सब हो चुफा, माफ
करना, अम आपको उगनेवाली कोई घटना न होगी',
और हमारी तरफ मुंह करके कहा, 'रूपवादस मिझने के
लिये भाए थे, उन्हें नहीं मालूम था कि यहाँ पह सप कुछ
हो रहा है।"
इसमें संदेह नहीं कि भारत में परदा की प्रथा बहुत फैशी
हुई है, उस पर कई 'प्रहसन' लिम्ने पा सकते हैं। यदि
मिस मेयो ने भी सक्त पटना परदे पर 'प्रहसन' के तौर पर,
नाटकी ठग से, लित्री है, सब तो हमें कुछ नहीं कहना, यदि
इस घटना के सल्लेख करने का यह अभिप्राय है कि हम
स्वीकार करें कि यह घटमा पसी ही हुई होगी, सम हमें
इसके सस्प होने में पहुत कुष सदेह है। परदापारी स्त्रियाँ
अंगरेज स्त्रियों से खरा कम ही मिलती है, और मिलनेपाली
मक्सर परवा नहीं करसी ? कम-से-कम भपने पर से पाहर,

५४
मदर इंडिया का जपाय ।
.
किसी धूसर के घर में कोई पुरुष पाता हो, तो वे भाग
नहीं, मिर का पल्ला नीचे को खींच लेती हैं । हाँ, परदे प
यह एक अच्छा 'प्रहसन' है, और इस प्रकार के 'प्रहसमें
सथा 'घुटकुजों' की मिस मेयो को पुस्तक में कमी नहीं।
परतु 'चुटकुलों' से किसी देश की अवस्था का चित्र स्त्रीचा
पाला व्यक्ति स्वय पक 'महसन' पार 'भारो चुटकुला' ।
लासा है। मिस मेयो को ऐसे ही लोगों में भाजफल गिन
हो रही है।
मिस मेयो स्वय एक स्त्री है, इसलिये स्थामाविक तौर
उसफा ध्यान स्त्रियों की तरफ फ्यादा खिंचा है । हर
त्रियों की दुर्गति भी कम नहीं कर रक्खी । स्त्रीशूद्राना
याताम्' का अय-घोष करनेवालों को यह याद विमाधी है
मारतवर्ष में १६११ मे १००० में से १० स्त्रियाँ अक्षर पत्र
जानती थी, १६२१ में १००० में से १८ को भवर-घोष
और १६२५ में यह मझ्या १००० में २० हो गई। प्रवि
मेयो ने सच्चे दिल से भारतीय स्त्रियों के लिये भासू था
होवे, वो इज संस्थानों को सुन प्रत्येफ मारववासी स
झामुमों के साथ अपने भासू बहाता । इस लोगों में वि
को शिक्षा देने की प्रवृधि ही नहीं है। जिस लड़की का
विलायत तफ बाफर शिक्षा-नाम कर पाया है, वह चौ

द्वितीय भाग
पूरहा फरने के भातिरिफ पुस्तक को हाथ लगाना तक नहीं
जानवी । इसमें संदेह नहीं कि मन धीरे-धीरे नियों की तरफ
भी पुरुप-समान का ध्यान जा रहा है, परंतु अमी यह पाल
पहुत धीमी है । मिस मेयो ने १०३ अभ्याय में भारतीय
नियों के प्रशिचित होने का ही रोना रोया है। क्या मैं
मारत के शिशिव पुरुप-समाज से पूछ सकती हूँ कि वह
'स्त्री शिक्षा के प्रभाष पर किए गए मिस मेयो के मानेपों
का उचर देने की क्या सैयारी कर रहा है । उन्हें मासूम
होना चाहिए कि इसका अवाप प्रखपारों के कालम रग देने
और मिस मेयो को कोसने से नहीं दिया जा सकता | भाज
पे प्रश्न मिस मेयो के मुख से सुनाई देते हैं, कल इन्ही प्रश्नों
को भारत का मुट्ठी-मर 'शिशिव श्री-समाध' पुरुप-समाम से
फरनेवाला है। इन प्रश्नों को टाला नहीं चा सकता, इनका
असर देना होगा। भाज हो या कलहो, स्त्रियों के लिये
शिक्षा का द्वार खोलकर ही इन प्रश्नों का सचर देना होगा।
.

तृतीय भाग
'मदर-डिया' के तीसरे भाग में 'माक्षण' का प्रवेश
कराया गया है और उसका चित्र एक 'नान-माझण' से
खिंचवाया गया है। मिस मेयो के कयनानुमार उसके मम्मुन
एक 'नान-माझण' ने 'माक्षण' का चित्र इस प्रकार ग्वीचा-
"प्राचीन काल में जय कि सब लोग अपनी मर्जी का
जीवन व्यतीत करते ये, प्रामण ही ऐमा था, जो पढ़ने-जिसने
का फाम फरता था। वह चतुर भी पड़ा था। अपनी विद्या
का नाम उठाकर उसने पारी से धर्म-शास्त्रों को स्वासफर
उनमें अपनी तरफ से जिन डाला फि प्रामण ही सबसे अष्ठ
होता है । इस घटना को हुए युग बीत गए । धीरे-धीरे, क्योंकि
प्राक्षण ही पद मफना था और मूठ-मूठ धर्म-शास्त्रों का
नाम लेकर दूसरों को पढ़ने से रोकता था, लोग भी उसे
पृथ्वी का परमेश्वर समझकर पूजने लगे, उसकी माझा
मानने लग, उसने अपना नाम भी 'भू-देव' (Earthly God)
रख लिया। भय वह सपूर्ण हिंदुस्तान में प्रत्येक व्यक्ति की
मात्मा पर शासन करने लगा, और
जाति के यषों के लिये
-

तृतीय भाग वक प्रामण के विरुद्ध आवाज उठाने की किसी को हिम्मत भी न पड़ी। "भारतवर्ष में प्रत्येक हिंदू मामण देषता को सरकार की अपेक्षा का गुना फ्यादा टैक्स देता है । भन्म के दिन से क्षेफर मरण के दिन तक प्रामण-देवता का पेट भरते रहना प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है । बप पच्चा पैदा हो, सो प्रामण को 'फर' देना चाहिए, नहीं तो बच्चा 'फले-फूलेगा नहीं। सूतक समाप्त होने पर प्रामण को 'कर' देना चाहिए । कुछ दिनों पाद नामकरण-सस्कार होता है, और प्रामण को 'कर' देना चाहिए । तीसरे महीने मुडन-सस्कार पाता है, और फिर मामय को 'कर' देना चाहिए। बठे महीने प्रममारान- सस्कार करो, और फिर ग्रामण को 'कर' देना चाहिए । अम वा पाँवों से चलने योग्य हो जाय, फिर मामण को 'कर' देना चाहिए । सान ममाप्त होने पर जन्म दिवस' मनाया जाता है फिर मामण को 'कर' पेना चाहिए । सातर्षे साल में उपनयन सरकार फिया आमा है या लड़का पिपा भ्यास करता है, फिर मामण को कर देना चाहिए । समृद्ध घरानों में विधाभ्यास प्रारम करने के लिये सोने की फ्रजम पनवाकर प्रामण परपे के हाथ मे दो एफ अतर लिखपाता है, भौर सोने की क्रसग मामण-देषसा फी मेंट पदा ऐनी पाहिए ।

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वतीय भाग
-
५४
हमारे पैसे का कुछ पदला भी चुकाया है, और हमें उठने का
मौका देता है । उस पफ दूर बैठे राजा के स्थान पर हमें १५
शाख, हर समय हमारे सिर पर सड़े हुए मालिकों की, सो
हमारा ही दिया हुमा माकर हमें कूने सफ मे परे भागते
और कहते है कि हमारे स्पर्श से ये अपवित्र हो मायेंगे,
परुरत नही है।"
'नान-ब्राह्मण' के कहे हुए इन शम्दों में एक चीख है, एक
पुकार है, जिसकी हदय को चीर देनेवाली टमर को वही
अनुमष कर सफसा है, जो मदरास प्रांत में आकर 'प्राण'
तथा 'नान-बामणों के पारस्परिक वैमनस्य को अपनी आँखों
से देख पाया है। में मदरास फे 'प्रामणों से पूछना चाहवी
हूँ कि क्या वे अपने व्यवहार द्वारा मिस मेयो के इस फयन
का क्रियास्मक उचर देने के लिये कटियर होंगे।
तृतीय माग में मिस मेयो प्रापण-देवता पर इस प्रकार
अपने एदय फे फल घड़ाकर क्रमषर अम्पायों के सिलसिले
में ११वें अध्याय का प्रारम करती है, जिसका शीर्षक
है-'Lees than JMen'--'मनुप्प से भी तुच्छ मभ्याय
फा प्रारम इन पाक्यों से होता है-
"Surely, if there be a mystery in India it lies
here-it lies in the Indian's inability any
--

मदर-इंडिया का जवाब
-
"जप लपकी एक साल की हो जाती है, या कभी-कमी
सात या नौ वर्ष की होती है, इसी प्रकार जब लड़का रे
या दो वर्ष का होता है या १६ वर्ष के नीचे होता है, पर
किसी समय 'सगाई की जाती है, और फिर ब्राह्मण को मारी
'कर' दिया जाना चाहिए । फ़िर शादी पर प्रामण की
मोली भरनी चाहिए । प्रहण पर प्राक्षण को दाक्षिणा देनी
चाहिए-पस, यह 'फर' का या दक्षिणा का सिलसिला
मृत्यु सफ चलता ही चला जाता है।
"प्राह्मण कहता है कि ये सब सस्कार कराना और इसी
प्रकार की अन्य बहुत-सी बातें उसफा 'जन्मसिद्ध मधि-
फार' है, जो कि शास्त्रों ने उसे दिया है जो इन सबको
नहीं करता, वह रौरव नरक में जाता है । प्रत्येक सस्कार के
समय हमें ब्राह्मण-देवता के पाप धोकर सफा अयं अबक्षि
से पान करना पड़ता है। ब्राह्मण एफ निकम्मा, आलसी
जीव है, जो किसी काम के लिये हाथ-पैर नही हिलाया।
मदरास-पास में ही १५ लाख ग्रामण हैं, जिनका पेट ४ करोड़
१० सास्त्र नान ब्राह्मण प्रतिदिन भरसे हैं।
"वस, यही कारण है कि जब तक हम लोग भी अपने
में दम नहीं मर खेस, सब सक हमारे लिये समुद्र-पार का दूर
को रामा ही ठीक है, जो कि हमें शांति वमा न्याय दे रहा है।
1
.

हवीय भाग
किया है, जो जीवन के सब प्रलोभनों को विमामलि दकर
मनुष्य-जाति के अधिकारों की रक्षा के यज्ञ में अपने प्राणों को
भाहुति की सरह उठा उठाकर फेंक रहे हैं। इस समय चारों
सरफ अधिकारों की पुकार मच रही है, हिंदू लोग जाग रहे है,
और पिछली सदियों में किए हुए पापों का प्रायश्चित कर रहे
है। भाखोंपाले देख रहे हैं कि देश के एक मिरे से दूसरे सिरे
सफ लागृति की लहर जोर से यपेने मारकर पट्टानों को भी
हिला रही है । अबूत लोग जाग रहे हैं, परतु उन्हें जगाने के
जिये किसनों ने ही गले में मामी बाल ली है । मिस मेयो फी
भाने इन लहरों को भी देख जासी, वो शायद 'मदर-इडिया'
को पढ़कर मारवषामियों का इसना असतोप न होता।
मिस मेयो मागवस-पुराण का उद्धरण ती ई-खो
प्रामण की इस्पा करेगा, यह विष्ठा सानेवाला कमि बनेगा।
अनेक जन्मों में पा-योनि से गुजरकर वह अछूत-बावि में
सस्पन्न होगा और गौ के शरीर पर मिवन पास होवे है. उससे
चौगुनी पार प्रधा पनेगा । हाँ, ४० हजार मामणों को भोजन
देकर वह इस पाप से छूट सकता है । यदि प्रामण किसी
शूद्र को मार डाले, तो १०० यार गायत्री का पाठ करने से पाप
पूरहो जाता है।"
तक वाक्य किसी भोजन-मट्ट प्रामण के पुराण में लिखा

६०
मदर-इंठिया का जवाष
.
wbere, under any oiroumstances, to nouse any
man, any society, any nation, of 'Tace proju
dice', so long as he can be remanded of the
existence in India of 60,000,000 fellow Indians
to whom he violently denies the common
rights of man
"निस्सदेह, भारतवर्ष में यदि कोई रहस्य है, तो यह है-
रहस्य यह है कि कोई भारतीय मी कहीं भी, किसी
अवस्थाओं में भी किसी व्यक्ति को, किसी समाज को, किसी
जाति को तब तक 'जाति-पिप का लाछन नहीं लगा
सकता, जब तक उसे याद दिलाया आ सकता है कि वह स्वयं
अपने देश में अपने ही छ कराम भाइयों को मनुष्यता के
अधिकारों में भी परपरस्ती पपिस किए हुए है।"
भारतीय माइयो । ये शब्द फितने वयल हुए हैं, परतु
किसन सच्चे है । क्या हम इनकार कर सकते हैं कि हमने
अपने भाइयों के ही हाथों से मनुष्यता के जन्ममित अधिकारों
को भी छीन रक्या है? यदि पनिषेशों में हमें दूसरी जाति के
सोग पख्त गिनते है, और अपने ही देश में हम भलून गिने
जाते हैं, तो क्या कहीं यह ईश्वरीय न्याय' ही सो नहीं हो
रहा । हाँ, मिम मेयो ने उन लोगों के साथ भारी भन्याय
.

तृतीय भाग
६१
किया है, वो जीवन के सप प्रलोमनों को सिनोमनि देकर
मनुष्य-जाति के अधिकारों की रक्षा के यज्ञ में अपने प्राणों को
भाहुति की तरह उठा-उठाकर फेंक रहे हैं। इस समय चारों
वरफ अधिकारों की पुकार मच रही है, हिंदू लोग माग रहे हैं,
और पिछली सदियों में किए हुए पापों का प्रायश्चिच कर रहे
हैं। भाखोंषाले देख रहे हैं कि देश के एक सिरे से दूसरे सिरे
सक जागृति की लहर जोर स यपेसे मारकर चट्टानों को भी
हिला रही है । भछूत लोग जाग रहे हैं. परतु उन्हें भगाने के
लिये कितनों ने ही गले में मोतीराम की है। मिस मेयो की
मॉखें इन लहरों को भी देख जावी, वो शायद 'मदर-इडिया'
को पढ़कर भारतवासियों का इवना असपोप न होता ।
मिस मेयो भागवत-पुराण का एवरण देवी है-"जो
मामा की हत्या करेगा, वह विष्ठा खानेपामा फमि बनेगा।
भनेक जन्मों में पशु योनि से गुजरकर वह अछूत-जाति में
उस्पन होगा और गौ के शरीर पर मिसने पास होते हैं, उससे
धौगुनी पार भघा पनेगा । हाँ, ४० हजार प्राह्मणों को भोजन
देकर वह इस पाप से छूट सकता है । यदि माझएं किसी
शूद्र को मार गले, तो १०० घार गायत्री का पाठ करने से पाप
दूर हो जाता है।"
एक वाक्य किसी भोमन-मट्ट माझए के पुराण में लिम्मा
1

मदर-इडिया की अपाष छुप्या प्रतीत होता है। मारस के मध्यकालीन इतिहास में इस प्रकार की अनेक पासें पाई जाती है। परंतु इन घटनाओं का उल्लेख करफे वर्तमान भारत को चित्रित करना सतना ही हास्यास्पद है, जितना 'रिफार्मेशन' से पहले 'पोप' के अत्याचारी, दुराचारों, अन्यायो तथा लोमों का वर्णन कर वर्तमान योरप का चित्र स्त्रीचना । इस समय यदि कोई ब्राह्मण शुद्ध की हत्या कर १०० वार गायत्री के पाठ से छूटना चाहे, वो भ्रम में रहेगा। इसमें भी यहा संदेह है कि पुराण में लिस्मे रहने से ये बातें कही क्रिया में भी बाती थी या नहीं। ऐसे सदि आधार को युक्ति के रूप से पेश करना भारी भूल है। मिस मेयी हिखती है "मारसे में ऐसे मिस मग मौजूद हैं, जो मीन में फेंके हुए पैसे को सव इथि नहीं लगा सकने, अब तक देनेवाला उनी मामों से भीमसम हो जाय। उनके मात्र की पहुँच में रहने से पैसे को हाथ मेंगा दिया बाय सोपे अपवित्र हो जाते हैं। यदि इस जाति का कोई व्यक्ति श्राम सड़क के समीप आना चाह, वो इसे देख लेना होती है कि कोई प्राह्मण उसके इर्द गिर्द २०० रोज की दूरी धक न हो। यदि इसने में कोई प्राक्षणं भा जाय, तो यह उस 'अछूत' की देखकर ठहर जाता है, और जोर से चिल्लाया है। वह अड्व ससी सड़क पर प्रामण को देखकर एकदम भाग वसा होता तृतीय मार्ग था, है और जप 'अपवित्रता की दूरी' ( Pollution distance ) वफ निकल जाता है, सो पाषाण देता है.---'मैं २०० ग्रब दूर भा गया हूँ, भाप मेहरवानी कर गुजर जाइए ।' सुविधोस नामक एक लेखक ने Hindu funners Customs and Ceremonies' पुस्तक में लिखा है कि उसकी यात्रा के दिनों में यदि किसी नायर को परिया रास्ते में मिल मावा तो ससे परिया की छाती में पर्या मारफर इस अपराध के एड देने का अधिकार यो।" मिस मेयो का कथन है कि समाज से इस प्रकार घृणिव व्यवहार के पाकर इन लोगों ने मो ४५ शास्त्र के लगमग है, चोरी-उकैती भादि का भ्यवसाय प्रारभ कर दिया, और अप ये सोग मनुष्य-गणना में 'क्रिमिनल ट्राइम्स' के नाम से जिसे जा है। १२वें अध्याय का शीर्षक है- Behold a Light.' मि० माटेगु को मदराम के अछूतों की सरफ से, जो भमिनदन- पत्र दिया गया था, उसमें से मिस मेयो में निम्न उद्धरण दिए है- "aladras Presidency Outcastes' Assdolation deprecates polítical change and desires onls to bo sved from the Brahman, whose motive in sooking greater share in the Government 16

1
६४
मदर इंडिया का जवाय
-
।
that of the cobra seoking the charge of a young
frog
"मदरास-प्रांत के अछूतों की यह सभा भारत में राजनैतिक
परिषसन को नहीं चाहसी और प्राणों मे अपनी रक्षा की
इच्छुक है, क्योंकि शासन के कार्य में प्राणों का पडा भाग
लेने की इच्छा फरना वैसा ही है, जैसा फनियर मॉप का
मेंढक की रखवाली करने की इच्छा प्रकट करना।"
एक दूसरे अभिनएन में लिखा गया था-"We need
not say that we are strongly opposed to Home
Rule. Te shall fight to the last drop of our
blood any attempt to transfer the boat of nu
thority in this country from British hands to
so-called High caste Hindus who have ull treat
ed us in the past and would do so again but
for the protection of the British lan
as it 18, our olaams, nay our very existence 18
ignored by the Hindus, and how vill they
promote our interests if the administration
passes into their hands."
Eren

. सृतीय माग ६५ भी पिंदु है, हम उच्च जाति के हिंदुओं के हाथों में राज- शक्ति लाने के प्रस्येक प्रयम के विरुद्ध करेंगे। उन्होंने भूस में हमसे पुरा व्यवहार किया है, भौर यदि प्रिटिश कानून न रहे, वो फिर हमसे ये पैसा ही व्यवहार करेंगे। अब मी ये हमारे किसी अधिकार को स्वीकार नहीं करते , हिंदू लोग हमारी 'सत्ता'कोही मानने के लिये तैयार नहीं । यदि शासन फा नियम उनके हाय चला गया, तो पे हमारे स्थायों की रक्षा कैसे करेंगे हमारा सो विश्वास है कि स्वराम्य प्राप्त करने से पहले हमें अछ्वों की इम विकट समस्या को अवश्य इस फरना होगा। अपने अन्यायों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने के लिये प्रयमशील होना होगा । ६ करोड भवों को अपनी पेह से काटकर भारतवर्ष मारसपर्प नहीं रह सकता। इसी स्थल पर मिस मेयो ने प्रिंस ऑफ पेन्स' के स्वागत का वर्णन किया है-'पपई में प्रिंस का भाशातीत स्वागत हुमा। प्रिंस की मोटर धीरे-धीरे सरक रही थी। पुलिस ने मोटर का घेरा पनाने का प्रयास किया, परतु सम व्यर्थ हुभा। लोग मोटर की परफ पदपले भाप, उसके किनारों को हाथों से पकड़ लिया, और घोर-धार से राजकुमार क जय-पोपों से भास्मान को फाइने लगे। इसी हालत में मोटर मई के . ६६ मदर-इंडिया का नवाय स्टेशन पर पहुंची । प्रिंस स्टेशन पर चले गए, लोग श्रमी पाहर खड़े थे , यड़ी फठिनता से उन्हें रोका गया था। गाड़ी के छूटने में ३ मिनट पानी ये फि प्रिंस ने फाटफ स्त्रोलने का निर्देश दिया, ताकि जनवा उनके दर्शनों के लिये भवर मा जाय । बाद में उमड़ रही नदी के प्रवाह.की तरह अनत जन- समुदाय यह पड़ा । वे हँसते थे, कूदते थे, जय-पोप करते थे और हर्प के आँसू बहाते थे , जप गाड़ी चली तो वे गाठी के साथ-साथ मागने लगे, और जब तक गादी उनकी पहु, से विलफुल दूर नहीं निकल गई, तब तक वे अपने घरों को नहीं लौटे।" मिस मेयो के इस 'स्वतःप्रकाशमान झूठ' पर क्या टीका टिप्पणी की आय ? जिन दिनों प्रिंस का भारत में पदार्पण हुधा, उन दिनों असहयोग का आदोलन जोरों पर था। प्रिंस जहाँ-जहाँ पहुँचे, वहाँ-वहाँ हदवा हुई, पाजार खाली विसाई दिप, सरफार के नाकादम हो गया। गावों से, पौर टिफट के, और पझे से रोटी देफर, प्रामीण लोगों को शहरों में लाया गया, जो घड़ी-घड़ी 'महात्मा गाधी की जय' के नारों से प्रिंस का स्वागत करते रहे । यदि इस सबको 'प्रिंस का स्वागत' कहा जा सकता है, तो यह भी घड़क होफर कहा जा सकता है कि मिस मेयो ने झूठ पोलने के लिये ही असम

हतीय भाग.
ठाई है। 'मदरासिया' का मारतवर्ष, अनेक अशों में,
मेयो के दिमारा फा भारतवर्ष है, वास्तविक मारतयर्प महीं।
'मदर इरिया' का १श्वा अन्याय भारत में प्रपक्षित
शिक्षा और उसके दुष्परिणामों पर लिखा गया है, इसका
शीर्षक है-'Give afe Ofica, or Give afe Death'-
'मुझे नौकरी दो, या मौत दो!' इस अध्याय में कई
मजेदार चुटको दिए गए हैं-
एफ नषयुवक ने कहा- "मैं पी० ए० है, मुम रिमी
लिए यो साल हो गए । परसु अभी तक मुझे कोई ठीक नौकरी
नहीं मिली । मेरा भाई मुझे खाने को दे रहा है। वह पी०
२०-नहीं है, इसलिये मुझे अपनी स्थिति के लिये जिसने
घेसन की जरूरत है, उससे सिहाई में भसे सतोप हो
जाता है।
फिर लिया है-" A man may and does write
atter his name 'B A. Pluoked' and 'BA.
Perled' thout exciting tho mirth of his
public. The terms are actually used in common
parlance is if in themselves a title uke MA
or Pb D As see the 10th Report of the Society
for the Improvement of the Backyard Olasse
08, Bengal and Asram (1925) P 12 The

६८
मदर-इंडिया का जवाब
sohool 18 1101 under an enthusiastio B A.
pluokod teacher' »
"लोग अपने नाम के साथ पी० ए० प्लफ्स' या 'पी० ए०
फेज' लिखते हैं और उन पर कोई हँसता नहीं। इन शब्दों ।
फा पोलचाल की भाषा में ऐसे ही प्रयोग किया जाता है, मानों
ये भी पम्० ए० और पी० एच० सी० की तरह सिमियाँ हो ।
१९२४ में प्रकाशित, पगाक्ष तथा प्रासाम के अछूतों के
घद्वार की सोसाइटी की १५वी रिपोर्ट के १२ पृष्ठ पर लिखा
है-इस समय स्कूल एक सत्साही बी० ए० फेज अध्यापक
की देने-रेख में है।"
एफ अमेरिफन ने किसी भारतीय युवक से पूछा-
"वहाँ सुम लोगों की जरूरत नहीं, वहाँ क्यों घुसे यावे हो ।
फिर जब तुम्हें कहा जाता है कि कोई नौकरी खाली नहीं
तो पुरा मानने लगवे हो । यह कैसे समय है कि तुम सवको
सरकारी दफ्तरों में की मिल जाय ? तुम अपने गांव
के घर में क्यों नहीं जा पेठवे । यहाँ एफ स्कूल खोल दो,
खेती फरो, गाँव के स्वास्थ्य को सुधार करो, तुमने विद्या-
ध्ययन करके जो कुछ सीखा अपने प्रामीण भाइयों
को भी लाभ पहुंचायो । क्या यहाँ थोड़ा-सा काम करफे तुझे
भर पेट पाने को नहीं मिल सकपा, जो मारे-मारे फिरते हो?"
.
T
।
उसका
.
"

एवीय भाग
६९
उस युषफ ने उत्तर दिया-"ठीक है, परसु तुम यह भूल माघे
हो फि यह सब काम मेरी शान के खिलाफ है। मैं सो पी० ए०
हूँ। यदि तुम मुझे नौकरी नहीं दोगे, सो में भात्म घास फर
मूंगा।" मौर, सपमुघ, नौकरी न मिलने पर उस युवक ने
आत्मघात कर लिया है।
मिस मेयो ने ये एप्टांत देकर मानो भारतीय नषगुषकों
को चिढ़ाया है-'अरे तुम स्वराज्या चाहते हो !-परशु मिस
मेयो को मालूम होना चाहिए था कि यह पोप मारपीय युवकों
का नहीं, परंतु भारत के वर्तमान शासकों का है। जिस घस्वा-
भाविक शिक्षा प्रणाली को उन्होंने यहाँ प्रचलित किया है,
उसका नतीजा एक्त घटनामों के अतिरिक्त कल हो नहीं मकता।
पर्वमान शिक्षा की भारत में नीष माननेवाले लॉर्ड मैकाले ने
२ फवरी १८२५ में अपनी 'शिक्षा-समति' की जो रिपोर्ट
लिखी थी, उसमें स्पष्ट शब्दों में उपोषित कर दिया गया था-
"Tre must at present do our best to form a class
Who may be interpreters betreen us and the
millions whom we govern, a glass of persons
Indians in blood and colour, but English in taste,
in opinions, in morals and in intellects. "
अर्यात् "हमें इस समय ऐसे लोग पैदा करने की भरसक
कोशिश करनी चाहिए, जो हममें और उन मास्त्रों मशिक्षित

मदर-मडिया को जपाय 14 T मारतीयों में जिन पर हमको शासन करना है,माध्यम का काम फर सफें. जो चमढ़ी से हिंदुस्थानी, परंतु पानी सप पातों से भंगरेज हो" ऐसे ही लोगों को उत्पन्न करने के लिये भारत के विश्वविद्यालय स्रोले गए । फिर अब, जब कि ऐसे लोग सस्या से अधिक उत्पम हो गए, वो उनको भाकर चिदाना कमीनापन है मिस मेयो की 'फलम की हम पार देते, यदि वह इन अवस्थाओं को देखकर ब्रिटिश गवर्नमेंट पर स्त्रीझ उठती, और उनके द्वारा स्वार्थ-साधन के लिये प्रप- लित किए गए अस्वामायिक शिक्षा-क्रम के विरुण उपन पढ़ती । इसके प्रसिफूम देखिए, यह क्या लिखती है- "Government', they repeat, sustains the University, Government is responsible for its existence What does 't mean by aocepting our fees for educating us and then not giving us the only thing we want education for I Carsed be the Government ! Còme, let us drive it out and make places for ourselves and our friendo' "नौकरी से हताश हुए युवक कहते हैं, सरकार विश्व- विद्यालय पलाती है, सरकार ही उनकी जिम्मेदार है। इसका .

तृतीय भाग . क्या मसलब है कि सरकार हमसे फीस लेकर हमें शिक्षित सो कर देती है, परतु जिन नौकरियों के लिये हम शिक्षा ग्रहण करते है, सनसे हमें वचित रखती है ? सरकार पर हमारा शाप पदे, पाचो, सरकार को निकास साझे और अपने प्रया अपने मित्रों के लिये नौकरियाँ निकाल में मिस मेयो के विचार में स्वराज्य का पादोलन इन्ही नौकरियों को ढूंढनेषाले मौमषानों का उठाया हुधा है । न- माने मिस मेयो किस भूल में है स्वराज्य का आयोजन सो एन मपयुषकों के कधों पर चल रहा है, जो नौकरी को कुचे की नूछ समझकर ठुकरा देते हैं । स्वराज्य का आंदोलन 'नौकरियों की माँग' नहीं, 'अधिकारों की लड़ाई है। मो दिन इस युस का विजय-विषस होगा, उस दिन यदि मिस मेयो जीसी रही, जो ससे पता लग जायगा कि इस युद्ध में सदनेवाले सिपाही किस घात के बने हुए ये १५खें अध्याय का विषय है, 'शिक्षा के प्रमाष का कारण ।' इस माष के लिये शीर्षक रखा गया है, "Why is Light Denied ?"--"प्रकाश क्यों रोका जा रहा है " अक्सर कहा जाता है कि सरकार शिक्षा पर ध्यान नहीं दे रही, इमलिये भारत में शिक्षियों की सम्या पहुत कम है । मिस मेयो फहसी है, यह प्रिटिश सरकार का वोपनहीं, तुम्हारा - - . मदर-मंडिया का जवाय अपना दोष है । सुनिए, मिस मेयो की अगरेजी सरकार की तरफ से वकालत- "स्त्रियों को तया अछ्तों को तो मारसषासी स्षय शिक्षित नहीं होने देते, क्योंकि उनके शात्रों की यही आशा है। प्रिटिश भारत में प्रशिक्षित खियों की संख्या १२,१०,००,००० तथा मशिक्षित अछूस पुरुषों की मस्त्या २,८५,००,००० है । इस प्रकार कुल १५,६५,००,००० फो तो भारतीयों से शास्त्रों के कानूनों से शिक्षा से पचित कर रखना है। भारत की कुल जन-सम्या ३१,६०,००,००० है, परतु इनमें से २४,७०,००,००० ही ब्रिटिश भारत में रहते है, पानी के लोग रियासतों के रहनेवाले है । अर्थात् सादे २४ करावं में से १५ करोड़ के लगभग स्त्री-पुरुषों को भारतवासी स्वयं पढ़ने-लिखने नहीं देना चाहते, अधकार में रखना चाहते हैं। यह सख्या ६० ५३ प्रति शव पड़ती है । बाकी रहे ३९४७ इनको प्रशिक्षिप्त रखने की भी ज्यादातर जिम्मेदारी भार. वीयों की ही है । भारत में प्रति शतक लोग गाँवों में रहते हैं , मारस में ५ मात्र गाँव है, जो १०,६४,३०० (दस सास्त्र ) वर्गमील देश में पसे हुए हैं। गाँवों में पढ़ाने के लिये किसन शिक्षक पाहिए । परंतु अब हिंदू-शिषकों को गॉवों में जाने के लिये कहा जाता है, वो वे ।

तृवीय माग सैयार नहीं होते। पे घाइते हैं, उन्हें शहर में नौकरी मिले।" इसमें सपेह नहीं कि मिस मेपो ने अंगरेजी सरकार की जो वकालत की है, वह प्रशसनीय है, परतु यह कहना झूठ है कि इस समय भी स्त्रिया तथा अछूतों के पढ़ने में 'स्त्री- शद्रो नापीयावाम' का कानून जारी है। भारत के इतिहास के क्षेफाले पन्ने सदा शर्म से खाले जायेंगे, परतु भारत का इति- हास सपने में ही समाप्त नहीं हो जाता । प्रश्न यह है कि -इस समय, मम फि सब तरह से जनवा सामाजिक सुधारों के लिये तैयार है, उसे सरकार से क्या सहायता मिल रही है ? इस ममय मारत में प्रति व्यक्ति कुल पार पाना प्रति- पर्ष शिक्षा पर खर्च होता है । अमेरिका के प्रसिस ममाज शासम मॉलस्वर्थ रॉस महोदय मिन्नते है कि अमेरिका ने २५ वर्प फिलिपाइस में शासन किया और इवने भरसे में यहाँ की जनता का दसवाँ हिस्सा स्कूलों में जाता है, जप कि मारत में अंगरेजों के इसने समय के शासन के पाद भी ननसा के कुछ सीसवें हिस्मे को स्कूलों की हवा लगी है। अंगरेज लेखकों ने ही स्वय लिखा है कि उनके पाने मे पूर्व भारत के प्रत्येक गाँव में एक स्कूल था । इस समय मिटिश भारत में ५लाख ८८ शहर और गाँव है, उनमें केवल२,१६,१३१ ४७ मदर-इडिया का उपाय शिक्षाफी सस्थाएँ हैं, जिनमें से १,६८,०१३ प्रारमिक शिक्षण- लय है । अंगरेजों फे पाने के पाए प्रारभिक शिक्षा में कमी ही हुई है। उनसे पहले देश की शिक्षा की अवस्था अय से बहुत अच्छी थी। जापान ने वो हमारे देखते-देखत शिक्षा में उन्नति की है। १९१८ में यहाँ केवल ४ विश्वविद्यालय थे, परतु १९२३ में ३१ हो गए , १९१८ में विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे विधा- र्थियों की सप्ल्या १०४३ थी, १८२२ में २६२० हो गई। मिस मेयो को मालूम होना चाहिए या फि पिना सरकार की सहायता के फेवल भार्य-समाज की तरफ से, जो पधिक पजाप तथा युफ-पायों में ही फाम फर रही है, २६२ कन्या-पाठ- शालाएँ चल रही है और उनकी मांग पदवी जा रही है। यदि सरकार का शिक्षा की तरफ ध्यान हो, सो हमें कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि देश में शिक्षा की दृषि क्यों न हो ? मिस मेयो का कथन है कि श्री-अभ्यापकाएँ नहीं मिली, क्याफि- . .

मृतीय भाग
7
"सामाजिक पापामों सथा सर के कारण कोई स्त्री गाँव
में नहीं पढ़ा सकसी, अब तक उसका पति उसके साथ न हो।"
इसी प्रकार एक अमेरिकन श्री ने मिस मेयो से
$67"No Indian girl can go alone to teach
in rural distriots If she does, she is runed
It 18 disheartening to knote that not one of the
young women that you see running about this
compass, bethreen alassroom and olassroom,
oan be used on the great job of eduoating India
Not one will go out into the villagos to anater
the abysmal need of the country Not one dare
risk what atraits her there, for it is no risk,
but a certainty And yet these people ory
out to be given self-government
"कोई भी मारतीय सड़की, अकेली, पेहावों में पढ़ाने
नहीं मा सकसी । यविषह बाय वो उसका सर्वनाश हो जाता
है। यह मानकर कितनी निराशा होती है कि इस स्कूल में
इस समय बो सड़कियाँ सामने खेमवी विसलाई दे रही है,
इनमें से एक को भी भारतीय शिक्षा के महान कार्य पर नहीं
लगाया जा सकता । इनमें से एक भी देश की इस गहरी

, । मदर-मंडिया का जवाब शिक्षा की सस्थाएँ हैं, जिनमें से १,६८,०१३ प्रारामिक शिक्षणा- कय है । अंगरेजों फे पाने के बाद प्रारमिफ शिक्षा में कमी ही हुई है। उनसे पहले देश की शिक्षा की अवस्था भय से बहुत ' अच्छी थी। मापान ने वो हमारे देखते-देखते शिक्षा में अन्नति की है। १९१८ में यहाँ केवल ४ विश्वविद्यालय थे, परतु १९२३ में ३१ हो गए , १६१८ में विश्वषिद्यालयों में पढ़ रहे विद्या- र्थियों की संख्या १०४३ थी, १९२२ में २६२०८ हो गई। मिस मेयो को मालूम होना चाहिए था कि विना सरकार की सहायता के केवल भार्य-समान की तरफ से, जो भधिकत' पखाव सया युक-प्रांतों में ही काम कर रही है,२६२ कन्या-पाठ- शामाएँ चल रही है और उनकी मांग बदती जा रही है। यदि सरकार का शिक्षा की सरफ भ्यान हो, तो हमें कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि देश में शिक्षा की वृद्धि क्यों न हो? मिस मेयो का कयन है कि नी-अभ्यापकाएँ नहीं मिलती, क्योकि- "On acoount of social obstacles and dangers, at is practically impossible for women to teach in világos unless they are accompanied by husbandsh - 1

तृतीय भाग
?
oommas
were
never
कहा-'Agrint many of the things printed in
inverted
spoken'-1
'बहुस-सी पातें मिन्हें पसरण के रूप से मिस मेयो ने लिखा
है, मैने कही तफ नहीं।" ऐसी अवस्था में अभ्यापिकानों
के न मिलने का कारण मिस मेयो ने अपनी सूझ से गद
लिया हो, मो माश्चर्य नहीं, खासकर अप कि यह सय
कुछ लिखफर यह भारतीयों को फटकारना चाहती
हो-"और फिर मी ये लोग स्वराम्य स्पराम्य पिलाते
रहते हैं।"
'विक्टोरिया-गर्स-स्कूल' की प्रिंसिपल मिस बांस की
पावधीत का समरण देते हुए मिस मेयो एक स्पल पर
लिखती हैं कि मिस योस ने उनसे कहा-"हम शिक्षा के
लिये नाम-मात्र का शुल्क लेते हैं। हिंदुस्थानी लरकियों
की शिक्षा के लिये खर्च करना नहीं चाहते। यह स्कूल भी
सरकारी
मदद से चल रहा है, और पहुस-सा पदा इंगलैस
स पाना है।"
इस पासपीद के सपध में दीवान बहादुर के० पी० थापर
माला लाजपतराय को एक पत्र में लिखते हैं-
"मैं १८८७ से १५१४ तक इस स्कूल का सेक्रेटरी रहा
हूँ । इस भरसे में स्कूल ने एक पाई भी योरप या इंगर
-
.
1

मदर-इंडिया का सवाय
11
-
आवश्यकता को पूर्ण करने के लिये गावों में नहीं जायगी।
पह बदा भारी खतरा है जिसे उठाने का फिसी को साहस
नहीं होता । अकेले जाने म खतरा ही नहीं, परतु निश्चय
है। और, फिर भी ये लोग स्वराज्य-स्वराज्य चिल्लावे
रहसे है।
मिस मेयो लिखती है- १९२२ में ब्रिटिश-मारतः की'
१२,३५,००,००० स्त्रियों में से कुल ४,३६१ स्त्रियाँ अभ्या-
पिका पनने की तैयारी कर रही थीं, जिनमें से २०५०--
प्राधे के लगभग-ईसाई थीं, यद्यपि माइयों की सस्या का
भारत की कुल जनता से अनुपात १५ प्रतिशतक का है "
इन पाक्यों से स्पष्ट है कि मिस मेयो को मालूम
है कि हिंदुओं में ऐसी स्त्रियों की इसनी सल्या ही उत्पन्न
नहीं हुई, जिनके सामने पेहावों की शिक्षा का प्रश्न रक्खा मा
सके । फिर भी उसने जान-बूझकर इस प्रश्न को इस
प्रफार रखने का प्रयास किया है, मिससे मारवषर्प को ससार
के सम्मुख पदनाम किया जा सके । मालूम पता है कि
स्फूल की चक्त यातचीत मिस मेयो ने अपनी तरफ से पना-
कर लिखी है । लाहौर के 'विक्टोरिया गर्स स्झूम' की
मिस मोम के नाम से 'मपर-इडिया में कुछ बातें मिस्त्री
गई है, जिनके सपा में एक 'सषाददाता से मिस गोस ने
-

सृतीय भाग
-
.
क्या कहना । मॅगरेश सिप्टीकमिश्नर, बिसे टेनिस
भौर शिकार नेनने, गन्स और टी पार्टी से ही फुर्सत नहीं
मिलती, भारतीय ग्रामीणों के दुख दूर करने की पिंवा में ही
सोया रहता है. वमी घो मारत फी सालाना आमदनी
प्रति मनुष्य २१) रुपए है । प्रविमास दो उपया, ४ आने !!
प्रतिदिन चार पैसे से कुछ ही फ्यादा ! विदेशी शासन मारत
में पेदाखियों की हिव-साधना नही, उनके मुँह की रोटी तक
छीने जा रहा है । १८१३ ई० में पार्लियामेंट की एक कमेठी
मारस के विपय में जाँच करने को आई थी। उसने कुछ गवा-
हियाँ भी ली थी । गवाहों में वारन हेस्टिंग्म, टामस मनरो-
अस व्यक्ति शामिल थे। इन गवाहों से क्या प्रश्न पूछे
गए ?--यह कि 'भारत में प्रिदिश पस्तुओं की मांग किस
भाँति बढ़ सकती है " ब्रिटिश म्युरोक्रेसी का एक-एक व्यक्ति
अपने देश के व्यापार पाने का मारत में एमट है, गाँव.
वालों की उसे तनिक भी परवा नहीं, वे जीते है या मरते
है। सर पी० सी० रे ने ठीक कहा है कि एक भाना रोज
कमानेवाला भारतीय मांथस्टर के जुलाहे फा, ओ ३२०
५ थाना रोज कमाता है, पेट क्यों मर रहा है। किंतु यह सब
प्रिटिश सरकार के उन्हीं रिप्टीफमिश्नरों के घर पर होवा
है, जिन्हें भारतीय प्रामीणों को रिया रात-दिन भ्याकुम किए

-
-
७८
मदर-इडिया,फा जवाय
से नहीं लिया । सरफारी सहायता क्या राजे-महाराजाभों
के पदों से ही यह स्कूल चलवा रहा है।"
यह है मिस मेयो का सफेद मूठ ।
अंगरेजी-शासन की प्रशसा के गीत गाती हुई तो मिस
मेयो यफती ही नहीं । देखिए, यह एकदम क्या बोझ उठवी
"But it is only to the Briton that the
Indian villager of today oan look for stéady,"
sympathetio and practical interest and steady
and reliable help in his multitudinous necossió
ties It is the British Deputy Distriot Com
missioner, none other, who 18 his father and
his mother, and upon the mind of that Deputy
District Commissioner the villagers' troubles .
and the villagers' interests sit day and night'
"भारत के देहाती लोग सो अंगरेजों की तरफ ही बाख
सठाकर सहानुभूति तथा सहायता के लिये देखते हैं, अंगरेजों
से ही सन्हें अपनी रोजमर्रा की आवश्यकसानों के पूर्ण
होने की भाशा है। मिटिश-रिष्टीकमिश्नर ही उनका
माई-याप है, और सिप्टी कमिश्नर भी गांववालों के दुखों
को दूर करने की चिंता में दिन-राव लवलीन रहता है !"
1
।

सृतीय माग
करते हैं? क्या देहातियों की हिसार्षिता मी का
नाम है?
मिस मेयो सिखसी है कि उसने एक पार म० गाधी से
पूछा-"आपके पदे-लिखे नौजवान यदि राजनैतिक
सड़ाई को छोड़कर गांवों में जा पै और किसानों की
सेवा में अपने को मिटा दें, तो क्या मारत की अमूल्य सेवा
.
न होगी?"
मा गांधी ने कहा-"पिलकुल ठीफ, परतु यह हो
Counsel of perfection' है "यह सिम्यकर मेयो एक
और पटना का उल्लेख फरधी है-"कसकचा के पार
प्रसिद्ध राजनैतिक कार्यकर्ताओं से मैंने यही प्रश्न पूछा,
'क्या यह अच्छा न हो कि यदि भाप लोग अपने यक्षिक
समा राजनैतिक स्थायों की माहुति देकर, गांवों में आकर,
भारत को नींव से उठाने के कार्य में मिट सामो? क्या
मारस-मासा की ऐसी सेवा प्रादर्श सेवा न होगी ? पीस
वर्ष में शायद आप लोग इसना काम कर सकेंगे कि इस
समय जिस राजराति को भाप फ्रोध में भाकर मांग रहे हैं,
यह स्वय आपके हाथों में भा खोटेगी ?-उनमें से तीन ने
कहा-'शायद भापफा कहना ठीक है, परम, पिझाना भी
यो कम काम नहीं है । इस समय दो यही पड़ा भारी काम

८० मदर-इंसिया की जवाय रखती है। जिन दिनों सदर का प्रचार हो रहा था, उन दिनों बिहार के एक मैजिस्ट्रेट ने गांवों में विदेशी कपडा पने के लिये फेरीवाले 'भेजे थे और धारवाद के कलेक्टर ने खादी का पहिष्कार फरने के नोटिस जारी किए थे । पीछे से पसा चला कि ये नोटिस मारत-सरकार के निर्देशानुसार सब प्रांतों में जारी किए गए थे। भारत-सचिध लॉर्थ सेलिसबरी के १८७५ में कहे गए प्रसिद्ध शब्छ-Thdia must be bled- 'भारत का खुन अवश्य ही चूंसना होगा'-फिसे भूम सकते हैं ? भारत का खून चूसकर ही सो जर्मन-महायुद्ध में अंगरेप लोग १० करोड रुपैया रोश सादे चारवर्ष सफ लगातार खर्च फरते रहे । यह रुपया या इंगझेट के पेड़ों पर से मनाया ? इतने सालों के निरंतर भत्याचार से घुसे हुए भारतीय देही- तियों के खून से यह रुपया लसपत था। उस समय भूखें भारत से २०० करोड़ रुपए भारत सरकार ने उधार के तौर पर लिए थे। पर पीछे भारतीयों को भुलावा देकर पर्फ सभा की गई और उसमें प्रस्ताव, अनुमोदन, समर्थन सब हो- हरों से फराकर यई प्रस्ताव मारस की ओर से पास किया गया कि भारसवासी मिटिश-प्रमा के नावे दो सौ करोड़ को दिया हुआ ऋण बोई देते हैं। क्या मिस मेयो को मालूम नहीं कि भारत में सिप्टी कमिश्नर इसी धुन में रहा सुतीय माग ८३ " al over the land, before over they may a grammar sohool, two generations of grammar soliools before the creation of the first high school, and certainly not before the seventh or eighth generation should a single Indian Uni versity have opened its doors." "मैं भारतवर्ष में २० साल के अपने अनुभव से इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि सारी शिक्षा प्रणाली ही पित है । पीदियों तक तो यहाँ सपूर्ण देश में प्रारमिक स्कूल ही खोलने पाहिए थे, ससफे पाद दो पीढ़ियों वक मभ्य- विभाग के स्कूल सपूर्ण देश में सुनने चाहिप में, और फिर माकर पहला हाई-स्कूल खुलना चाहिए था । पहली यूनी- वर्सिटी सो सावर्षी या पाठवी पारी में जाकर ,ससनी पाहिए थी!"

८२ . मदर-इंडिया का जवाय है जब तक हम विदेशियों को निकालकर बाहर नहीं कर देते, सब तक कुछ नहीं किया जा सकता 11'. -मिस मेयो के उन परामशों में भारत के राजनैतिफ फार्यकर्तामों को शिक्षा लेनी चाहिए। उसकी हरएक यात मूठी नहीं है। एक अमेरिकन ने मिस मेयो से कहा- If I were running this country I would alose erery Uni versity to-morrow It as a crime to teaoli them to be clerks, lawyers and politiolans till they had been taught to raise food." "यदि मैं इस देश का शासन कर रहा होता, तो मैं कम ही सब विद्यालय बंद कर देखा । जिन लोगों को रोटी तक कमाना नहीं सिखाया गया, उन्हें कर्फ, वकील और राज- नेतिक कार्यकर्ता बना देना मारी पाप हुआ "-पस, इस पाप की जद है ब्रिटिश सरकार की शिक्षानीति । सन्हींने चो सपूर्ण देश को नकों की मौज मे भर दिया । एक और अमेरिकन शिक्षक ने, जो देर तक किसी भारतीय कॉलेज के अभ्यता रहे हैं, मिस मेयो से कहा- "After 20 odd years of experience in India I have come to the conolusion that the whole Bystem here is wrong These people should have had two generations of pritary schools - . . 4 तृतीय भाग ८३ all over the land, before over they sat a grammar sobool, two generations of grammar schools before tlio creation of the first high school, and certainly not before the seventh or eighth gonoration should a single Indian Uni Tersity hare oponed its doors" "मैं भारतवर्ष में २० साल के अपने अनुमय से इस परिणाम पर पहुंचा हूँ कि सारी शिक्षा प्रणाली ही पित है।यो पीदियों तक वो यहाँ सपूर्ण वेश में प्रारामिक स्कूल ही सोमने पाहिए थे, उसके बाद वो पीदियों तक मम्प- विभाग के स्कूल सपूर्ण देश में खुलने चाहिप थे, और फिर जाकर पहला हाई-स्कूल खुलना पाहिए था । पहली यूनी- पसिटी तो सातवीं या पाठवीं पीढ़ी में जाकर खुमनी पाहिए थी।

1 चतुर्थ भाग 'मदर-इडिया' के चतुर्थ भाग का प्रारम महात्मा गांधी के नाम से हुधा है, परतु इस भाग में महारमा गांधी के उद्धरण उतने ही दिए गए हैं, जिवने पहले तीन भागों में । मिस मेयो का फयन है कि भारतीय लोग शिफायत करते हैं कि भारत की सैकड़ों मील भूमि सरकार ने 'सालवेशन आर्मी को क्यों दे दी है ? प्राचीन काल में यहीं पर तो जानवर घरते थे । अाज गौधों को चारा नहीं मिलता, क्योंकि जगनों को सरकार ने हथिया लिया है, या 'साल- पेशन मार्मी' को मुम्स दे दिया है। मिस मेयो की मशा इस 'आक्षेप का उत्तर देने की है। यह १७वें अध्याय में इस प्रकार लिखती है- "राजा हो या रफ हो, गौ सपकी पूननीय माता है, पवित्र है । जब कोई हिंदू मरे, सो गौ निफट होनी चाहिए, वाफि असिम रषास छोड़वे समय गौ की पूँछ उसके हाथ में हो, भौर किसी क्षिय नहीं, तो इसलिये ही, गौ को सदा घर में रखा जाता है। अब काश्मीर के महाराज की मृत्यु-समय निफट था, एप कहा जाता है कि निर्दिष्ट गौ , T -

चतुर्थ भाग
सास्त्र कोशिश करने पर भी महाराज के कमरे में न घुसी ।
फिर क्या था, महाराज को उठाकर पड़ी क्षेजी से गो के
पास ले जाया गया, वाफि उमकी पूंछ पकड़े-पकरे ही उनका
प्राणांत हो।"
मिस मेयो मिलती है कि प्रात काल भारत में अनेक
लोग लोटा लिए गौ के पीछे-पीछे जाते दिखाई देते हैं, साकि
वह पेशाप करे भौर पे इकट्ठा कर में । इस पेशाम से की
लोग माघमम फरके भपने सिर पर छींटे मी देते हैं, ताकि
थे पवित्र हो माय।
गौ फी दुम पकड़कर स्वर्ग आ सकते हैं या नहीं, इसका
सत्तर पीयों के पडों को और उन पढ़े-लिखे लोगों को, जो
इस बात में विश्वास रखते हैं, देना चाहिए | हॉ, गोमूत्र
में बुध गुण है या नहीं, यह वैद्यफ का विपय है। इसकी
खिली गने से पहले मिस मेयो को मॉक्टरों से सलाह
ले लेनी चाहिए थी । मो० मुपु मिन्होंने सहन में ४२ साश
सक डॉक्टरी की है, मिस मेयो के इस कथन की भालोचना
करसे इए लिस्म है---"हिंदुधों में गोमूत्र का उपयोग
चिकित्सा सवभी सिद्धांतों पर भामित है। इंगलैट में तो
एक ऐसी सोसाइटी खुसी है जो कई पीमारियों में ननुष्य

-
-
८६
मदर-इंडिया का जवाय
सपथ हैं। हिंदू लोग मलेरिया तथा अन्य बीमारियों के
लिये गो-भूत्र का प्रयोग करते हैं। इसमें अमोनिया पनीमून,
मात्रा में होता है, और इसीलिये जयरोग में इसका इस्तेमाल
किया जाता है । एधारों वर्ष हुए, सुभुव ने इसका यही
अपयोग पसनाया है। इंगलैंड में भी ऐसी सस्याएँ खुल रही
हैं। १५११ में जयरोगियों के लिये प्रेठफोर्ड में पहली सस्था
खुली थी, जिसमें अमोनिया का सूपना ही इस रोग की
चिफित्सा समझी गई थी। सभी भारतीय वैद्य पय-रोगी
को पकरियों के अहाते में सोने का परामर्श देते हैं, क्योंकि
उनके मूत्र मे मी अमोनिया बहुत मात्रा में निकलता है। माजूम
पपता है कि मिस मेयो ने इस विषय पर लिखसे हुए
चिकित्सा सवधी दृष्टि को विलकम मुला दिया है।"
मिस मेयो लिखती है कि भारतीय लोग योरपियनों से
दाय मिलासे हुए समझते हैं कि वे उनके स्पर्श से भपवित्र
हो जायेंगे । “एक कट्टर राना मो योरपियन लोगों से मिलते
समय हार्यों पर, मस्ताने रखता है, ताकि, उसके हाथों को
फाई छुन सके। कहा जाता है कि एक समय लाउन में एक
मोन दिया गया । अब राजा ने भोजन के समय हायों से
पस्ताने सतारे, तो उसके समीप बैठी हुई एक महिला की नजर
उसकी अंगूठी पर पड़ी।
-

चतुर्य माग ८७ ""महाराज ' भापफी अंगूठी में हो महार्ण्य मोसी लगा है "-उस महिला ने कहा, 'क्या मैं इसे देख सकती हूँ? "रामा ने कहा-'येशफ '—और अंगूठी उतारफर उसने उस महिला की थाली के निकट रख दी। "यह महिला सर घराने की थी । समने मोदी को इधर- उधर फेरकर देखा, प्रकाश के सामने देखा, उसकी प्रशसा की, भोर, पम्यषाद देफर उसे राजा की थाली के निकट रस दिया । पसा ने मॉम के इशारे मे पास पदे नौकर को जो समीप ही सहा था, वुलाया और कहा-'इसे पो लामो ।' यह कहकर वह राजा फिर वैस ही मजे से बात करने - - लगा।" इसके बाद १८वा अध्याय खुल जाता है, मो "गो" पर है । 'इसियन इटस्ट्रिमन फमीटी' की रिपोर्ट में से एक गवाह की नीचे लिखी गवाही दी गई है- 'Havo these slaughter-houses aronged any local feeling in the matter?" "They have aroused," said the Fitness, "local feelings of greed and not of indigpation I think you'll ind that many of the manjoipal "

८८
मदर-इंडिया का जवाब
members are shareholders in these yards, Brah
mans and Hindus are also found shareholders"
"क्या इन कसाईखानों से स्थानिक लोगों में कुछ हलचल
उत्पन्न हुई है "
गवाह ने जवाब दिया-"इनके खाने से क्रोध के नहीं,
परंतु सोम के भाष अवश्य उत्पन्न हुए हैं। इन कसाईखानों
के हिस्सेदारों में काफी सल्या म्यूनिसिपलिटी के मेंबर
की है। इनके हिस्सेधारों में बहुत-से हिंदू तथा प्राप्मण भी हैं।"
बैलों पर जो अत्याचार होता है, उसका चित्र भी मिस
मेयो ने स्त्रीचा है-"कलकत्ते में हावड़ा के पुल पर भाप
घंटों तक खरे समीप से गुजरती हुई बैल गादियों को देखत
खाइए, एक भी पेक्ष ऐसा नहीं मिलगा, जिसकी पूंछ
इदियों के टूट जाने से टेढ़ी न हो गई हो । हॉकनेवाला वैज
फो सरे से चलाने की जगह बैस की पूछ हाय में पकड़कर
उसके गोड़ों को ऐसे मरोड़ता है फि पूंछ की हाही-हड़ी अलग
हो जाती है। यदि भाप गारी में पढ़ाय, सो पापको मालूम
होगा कि थैलों को देश बनाने के लिये गादीवान एक भौर
नया ढग इस्तेमाल करता है। अपने उछे से या पॉप के अंगूठे
के क्षये भौर समुप्त नाखूनों से वह पार-पार बैल के भरकोपों
पर प्रहार करता है, जिससे बैल जल्दी पक्षने लगते हैं।

चतुर्थ माग
"भारत में अनेक स्थानों पर 'का' की प्रथा प्रचलित
है। इस प्रथा का उद्देश्य गौ के दूध फो पढ़ाना है । इसके
कई तरीके हैं, परतु भधिक प्रचलित यह है कि एफ लकड़ी
लेफर उस पर तिनके माँध दिए माते हैं, और सफड़ी को
गौ की योनि में डालकर खूप पाएं-बाएँ धुमाया जाता है ।
इससे गौ को जलन पैदा होती है, जिससे कुछ दूध ज्यादा
भा भाषा है। गाधीजी का कथन है कि काफचे की
गौशालाघों में १०,००० गौत्रों में से ५,००० पर नित्य प्रति
यह भस्या पार होता है।
"गोषों पर इससे भी न पड़े अत्याचार किए मासे
हैं-गौ को भाम के पचे खिसाए आवे हैं और कुछ खाने
फो नहीं दिया धावा ! पानी मी उसे नहीं छूने दिया आमा !
उसके मूत्र का एक प्रकार का रग बनता है, जो बहुत महंगा
विकता है । इस प्रयोग से गौ को इसना कष्ट होता है कि
वह सड़प-सड़पकर भर माती है । गौ की पछिया को
मारना हिंदुओं के यहाँ पाप है, परतु उसके पालने के खर्च
को घे सठाना नहीं चाहते। पहले योड़ा-थोड़ा दूध पीने देते
है, इसना योदा जिससे वह केवल जिंदा रह सके । बलिया
दिनोंदिन कमजोर होने लगती है, खासबाती-सबसमावी
मर आती है। इस प्रकार से मारने में पाप नहीं समझसे ।

मदर-इंडिया का जवाब यह शायद उसफ कमों की गति है बछिया के मरने के बाद ससकी चमड़ी में मुस भरकर नीचे चार लकड़ियाँ लगा ऐवे है, दुइसे समय मस कृत्रिम बछिया को गौ के सामने खड़ा कर दिया जाता है, साफि उसे देखफर गक खुलकर दूध दे । मैंस के फटने को भी पास न देकर और धूप में पड़ा रख फर सुखा दिया जाता है, जिससे वह मर जाय " मिस मेयो न १९-२० अध्यायों में गौओं पर किए गए भन्य भत्याचारों का चित्र स्त्रींचते हुए लिखा है कि धार्मिक गोशालाओं में पानी लोग जो कुछ दे जाते हैं, उसे गोशाला- पास ही था माते है और गौ सुख-सूखकर ऐसी, कमजोर हो जाती हैं कि सनफी नाफोनी हड्डियाँ धमड़ी को पीर-धीर- फर बाहर निकल पाती हैं। 'गोरखा' की रट लगानेवाले हिंदुओं के घरों में गौ की यह कद्र है, भी २० अध्याय फा शीर्षक दिया गया है- In the House of Her, Friends'-'गो रक्षकों के घरों में गौ का हाल " मिस मेयो का यह वाना कितना गहरा परंतु किसना मचा है। यह कहना कि योरप में प्राणि-हिंसा मारस से फ्यावह होती है और पाभों को भस्यव घोर कष्ट देकर होती है, पाकि धनकी मोटी-मोटी चमड़ी उन्हें मिल सके, मिस मेयो के आधेपों का उचर नहीं है । पौरप मे गो-रक्षा, प्राणि-रखा या .

धतुर्य भाग अहिंसा फी रट ही कप लगाई ? हॉ, गौ को मासा पुकारने- पाने हम लोगों के हाथों भव तक गौ का यह हाल रहेगा, तब तक मिस मेयों के प्रश्न प्रत्येक हिंदू-धर्माभिमानी की बावी को टफरा-टफराफर से वंग करते रहेंगे, और उसकी पारमा में मलयली मधासे रहेंगे। वाईसवाँ अध्याय 'सुपारों!-- Reforms'-पर है। इसमें विस्माया गया है कि किवने महाम् अधिकार मारतीयों को दिए गए हैं। इस अध्याय में भी एक भसपस चुटकला छोड़ा गया है। जिस्सा है-"भारतवासी, साधारण प्रयों में नहीं परसु परमार्थिक प्रयों में, 'सचाई के उपासम' है। परस्पर फी यासपीस में अनेक स्थलों पर तो पड़ी साफ-साफ पास फछ भाते हैं, परसु फिर भी समय-समय पर देखा जाता है कि उनकी स्पष्ट पक्तियों में की ऐसी बातें होती है मिनमें झूठ का कुछ-न- फुछ भरा फहीं-न-कहीं मिला रहा है। अप पार-धार यह वाव देसी गई, सो मैंने पफ प्रसिख पगाक्षी क सम्मुख पा समस्या सपस्थित की। उसने कहा-'महाभारत में सिस्वा दे, सस्या- मास्ति परोधर्म । यदि हम सचाई ने परे घले जाय, तो इसका कारण यह है कि जिन उल्टी परिस्थितियों में हम रहते हैं, उन- काइम पर प्रभाव पड़ गया है। झूठ बोलने का अभिप्राय यह है कि हम सच पोजने के परिणामों मे ररसे है। फिर मैंने ९२ मदर-इंडिया का जवाब यही प्रश्न एक योगी के सम्मुख रक्खा। उसने कहा-'सत्य क्या वस्तु है ? मलाई या धुराई तो सापेक्षिक शब्द हैं । मुम्हारा अपना 'माप' बना होता है । उस माप पर जो कुछ ठीक सतरे, उसे ही तो सुम 'भा' कहते हा ! भतः 'मलाई' को पैदा करने के लिये यदि कुछ कहना पड़े, तो वह झूठ नहीं है। मेरे लिये भनाई-पुराई में कोई मेप नहीं है। हरएक चीत मली है । अपने में काई चीश पुरी नहीं है । भली या चुरी, नीयत होती है, काम नहीं।' इन दोनों से अब मोष न हुमा, तब मैं एफ योरपियन के पास अपनी समस्या को ले गई। वह बहुत दिनों से भारत में रहता था। मैंने पूछा-'भारतवर्ष में उपस्थितियों के व्यक्ति ऐमी-ऐसी झूठी यावें क्यों कह आसे हैं, और साथ अपने कयन की पुष्टि में ऐसे-ऐसे हवाले भी वे जास है, मिन- को पता लगाने पर मालूम होता है कि उनका कोई प्राधार था ही नहीं १' उसने कहा-'क्योंकि हिंदू के लिये झूठ कोई चीज नहीं है। सब कुछ माया है, अत' माया के सबंध में नो कुछ कहा जाय, यह भी माया ही है। इसीलिये अपने देश्य की सिद्धि में हिंदू लोग चोभी मूठ बोलना चाहें, योल सकते हैं। और, जब पफ हिंदू मन से बास बनाकर कह रहा होगा है, तब उसे यह नहीं सूझता कि तुम उसफी पाों की यथा- थवा का पता लगाने का भी कष्ट करोगी" चतुर्थ माग ९३ - मिस मेयो की सत्यान्वेषण-पुरि पर पलिहारी । पहले उसने एक भारतीय पगाक्षी के सम्मुस्स अपने मन की शका रक्सी, फिर एक योगी के वध की खाक छानी भोर भत में जाकर एक यारपियन ऋपि के मामम में दौड़ी गई, और वहीं उसकी शका का समाधान हुआ। सप हिंदू झूठे हैं- यह लाखन लगाया गया है, उदाहरण एक भी नहीं दिया गया, चुटकले छोड़फर ही काम निकालने की मशा है। हिंदू झूठे हैं या नहीं, इसे मिस मेयो सिद्ध नहीं कर सकी, हाँ, 'मदर-इरिया' में हवाले दे-देकर की ऐसी बातें मिस्त्री गई है, मो निराधार सिद्ध हो चुकी हैं । महात्मा गांधी ने, जिनके नाम से 'पसुर्व माग' प्रारंभ होग है, स्पष्ट लिखा है--"She has not only taken liberty with my writings but she has not thought it necessary even to verity through me certain things asaribed by her and others to me."-मर्मात्, "मिस मेयो ने मेरे लेखों का, जहाँ-सदा पूर्वापर का बयान न रखते हुए, इस्तेमाल किया है। साथ ही, उसने मेरे नाम से, स्वय अमवा दूसरों के कहने से, फई ऐसी माते भी हालस माली हैं, जिनकी ययार्यता को मुझसे पूछने की उसने भापरयकवा ही मही समझी ।" क्या इसी सत्यान्वेषण- -

-
P
९४
मदरनडिया का जवाब
बुद्धि के सहारे मिस मेयो सप हिंदुषों को मुठा सिद्ध करने
के प्रयन में है १ झूठ बोलकर किसी को भी झूठा सिद्ध
करना शायद पहुत आसान काम है!
अगला अभ्याय है, 'Prances of India'--'भारत के
रामा जोग' मिस मेयो इसमें अपने एक अमेरिकन दोस्त
की फिसी राजा और उसके दीवान से बातचीत लिख
रही है-
"His Highness does not believe," said the
Dewan, "that Briton is going to leave India.
But still, under this new regime in England,
they may be so ill-advised 80, Hw Highness
18 getting his troops in shape, acoumulating
munitions and colring silver And if the
English do go, three months afterward not a
rupee or a virgin will be left in all Bengal."
दीयान में कहा--"महाराज को यह विश्वास नहीं कि
भंगरेप कोग मारतवर्ष को छोड़कर चले जायेंगे । परतु सो
भी, शायद, इंगलैंड में इस नए शासन में, उन्हें यही सलाह
कहीं पसदमा जाय । इसलिये महाराज अपनी फौजों को
वैयार कर रहे हैं, पारूद इकट्ठा कर रहे है और उपए बनवा
रहे हैं। यदि गिय पक्षा जायगा, सो तीन महीने के पीछे

.
चतुर्थ माग
९५
सारे पगाल में एक रुपया भी न घषेगा , और-और,
एक कुंभारी मी न बरी रहेगी।"
कौन नहीं जानता कि कुंभारियों का सतीस्व नष्ट करने-
वाले कौन लोग हैं और किनकी विषय-वासना की प्रथम
'वामाभों में भनेकों भपक्षाभों का जीवन नष्ट हो जाता है ?
ऐसे लोगों के मुख से निकली हुई हवा पादों पर विश्वास
करना या उनके पाले वेना मिस मेयों के ही पस्ने पहा है!
“Our treaties are mith the orown of Eug
land," one of themi said to me, "the princes of
India made no trenty with a Government that
included Bengali Babus We shall novor deal
with this ner lot ot Jacks-in-office While
Britain stays Britaw till send us English
gentlemon to speak for the King Emporar, and
all will be as it should be between friends. It
Britain leaves, we, the prinoes will know, how
to straighten out India,eren as princes should."
एक राजा ने मिस मेयो से कहा-"हमारी सीषयाँ इंगनेर
साय
हैं । मारत के राजामों में ऐसी गर्वनमेंट के साय
कोई सपि नहीं की, जिसमें 'बगामी-पापू मरे हुए हों । इन
'नौकरी ढूँढनेयासो' के माय हम फोई सरोकार नहीं
--

९६
1
-
मदर-इठिया का जवाब
रक्संग । जम तक मिटेन भारत में है, तब तक वह सम्राट
के प्रतिनिधियों को यहाँ भेजता ही रहेगा और हमारा-उनका
बिरादराना मलूप रहेगा । यदि ब्रिटेन चला जायगा, वो गया
लोग जानते हैं, हिंदुस्तानियों को कैसे सीधा किया जाय In
मिस मेयो इसके आगे लिखती है-"Then, I recall
a little party given in Delhi by an Indian
friend in order that I might privately hear the
opinions of certain Home Rule politicians.
They had spoken at length on the coming
expulsion of Briton from India and on the
future in which they themselves will rule the
land
'And what', I ashed, '19 your pļnn for the
princes? ' 'Ve shall drive them out', exolaimed
one with conviotion And all the rest nodded
assent 11
"सक्त राजा की बातें सुनने के बाद मुझे याद है, मुझे दिल्ली
के एक मारतीय मित्र ने एक पार्टी दी, बाफि में एफोस में
होमरूलों की पा सुन सकें। मय पहुस देर तक ये लोग
अंगेरजों को भारतवर्ष से निकालने तथा स्वय इस देश में
शासन फरने पर पोल चुके तो मैंने पूछा-'भारत के रानों
।
"
है

चतुर्थ भाग को ठीक करने के लिये आप लोगों की क्या प्रमाण है। ने दृढ़ विश्वास से कहा-'उन्हें हम मटियामेट कर देगें" और, पाग ने सिर मुकाफर इसका अनुमोदन किया।" लाला लाजपतराय लिस्पते है कि इस घटना का पता सगाने पर मालूम हुआ है कि मिस मेयो के पे मित्र जिन्होंने सने दिल्ली में पार्टी दी थी, एसोशिएटेट प्रेस के के० सी० राय है। फे० सी० राय वथा उनकी पनी, दोनों का कहना है कि उस पार्टी में पसि पनी के अतिरिक्त एसोसिएटेर प्रेस के मि० सेन मी मौजूद थे, और बाहर का कोई व्यक्ति इस पार्टी में मौजूद नहीं था। जिस वाव का सिक मिस मेयो ने किया है, वह यहाँ विलकुल नहीं हुई ! यह है मिस मेयो की सत्य- प्रियसा । उक्त घटना का उलख ही पसा रहा है कि वह सच नहीं हो सकती। भारतवर्ष फ होमरूझर मिलकर, एकांत में, मिस मेया के सामने स्पराग्य की पर्चा करें और मिस मेयो सनसे पूछे कि राजामों के लिये क्या स्कीम चैयार की गई है, यह दमी समव हो सकता है, अप मिस मेयो को किसी पठ्यत्रकारी पार्टी में निमत्रित किया गया हो, और यह सनका भेद पता लगाने के लिये उनका पिलका भग पन गई हो । चार महीनों में मिस मेपो ने सब कुछ करके सचमुच गयब ठा दिया है। ।

१८
मदर इंडिया का जपाव
२४वें अध्याय में हिंदू-मुसलमानों के झगड़ों पर लिखा
गया है.- 'स्वराज्य के सदेश-हर मोपला लोगों के पास
भी भेमे गए । मोपमा मुसलमान थे। उनके लिये तो स्वराज्य
का अर्थ मुसलिम-राम्य था, जिसमें एक भी मूर्ति न हो।
सन लोगों ने चाकू उस्तरे, सडे इकट्ठे करने शुरू किए ।
२० अगस्त, १६२१ को मोपला लोग हिंदुओं पर टूट पड़े
काफिरों को मुसलमान बना लेना ही तो उनके लिये स्वयम्य
था । इस उपद्रव में तीन हजार मोपला मारे गए, और न
माने कितने हिंदुओं को यमपुर पहुंचा गए । ६ महीने
सक सरकारी को पड़ी रही । मोपनों ने जिस हिंदू को देखा,
उसका खतना कर दिया, कइयों के खून में विष का संचार
हो गया। वे लोग इसी अवस्था में मदराम-भर में फिर रहे थे
और अपने सहधर्मियों को पतला रहे थे कि यदि स्वराज्य
मिल गया, वो तुम सपकी भी यही दुर्दशा होगी, जो हमारी
गई।" एक अमेरिकन ने, जिसने ये पाभरस दृश्य देखे थे,
मिस मेयो से कहा-
-
"I saw them in village after village, through
the south and east of Madras Presidenoy They
had been ouroumcised by a peculiarly painful
method, and pot, in many cases, Tere blifforint

पतुर्ष भोग
९९
tortures from blood poisoning They were
proolaiming their misery, and calling on all
their gods to ourse Staraj and to keep tho
British in the land 'Behold our miserable
bodies! re are deiled, outcasted, unolean, and
all because of the serpents who oropt among
us with their poison of Btaraj Ono let the
British leave the land and the shame that has
befallen us will assuredly befall you also,
Hindus, man and womon, everyone'
The terrors of hell nore Interally upon them "
"मैंने उन्हें गाँव-से-गाँव में, मदरास-प्रांस में, दक्षिण-पूर्ष,
आते देखा। उनके ममीय तरह से, किसी दर्दनाक परीके
से बसने किए गए थे, और अब, भनेक व्यकि, रुधिर में
विप-सपार हो जाने की असम मेदना से सड़प रहे थे।
अपने
दुख
की चिल्ला-चिस्माकर पोषणा कर रहे थे और
अपने देववों को सपोधन कर स्वराम्य' को भमिशापित
करने की धुषा माँग रहे थे और अंगरेजों के मारत में टिके
रहने की प्रार्थना कर रहे ये कह रहे थे-देखो हमारे
शरीरों की दुर्दशा । हम अपमानिस हुए, जाति-पहिप्कत
हुए, फेवल इसलिये क्योंकि कुछ साँप अपना 'स्वरान्य' का
।

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. चतुर्थ भाग १०१ फरने के स्थान में खिलाफत फे प्रश्न को अपनाकर 'इसलाम- भक्ति के भाव पैदा कर दिए । मौका मिलते ही कट्टर मुसल- मानो फा, रग-रग में पसा हुआ पशुपन माग उठा और इस- लाम की इविकाम प्रसिद्ध राघलने लगी। मुमलमानों की इस फर कट्टरता का नग्म नृत्य देखफर देश मभन रहा है। भय या वो मुसलमानों को इसलाम की रक्षा' का शोर छोरफर देश की रक्षा की फिक फरनी होगी, या हिंदुओं के जाग जाने फे अगम दिन उनका इसलाम हो, जो देश में सनाष उत्पन करने का कारण है, स्वतरे में पड़ जायगा । इसके अतिरिक, हिंदू मुसलमानों को लसाना किसी तीसरे दल का स्वार्थ समझा जाता है। यह झगड़ा पहले नहीं था, इसे यह सूल- रूप दिया गया है। मिंटा-मोर्ने सुधारों का वर्णन करते हुए कोर्स मोर्ले ने अपने 'रिकोक्षस' में मिंटो को लिखी एक चिट्ठी दी है, जिसमें उसे समोमिट करके लिखा है- "You started the Muslim hare स्वरूप यह है कि सुमारों की घोषणा करने से पहले मिटो ने कुछ मुसलमानों को बुलाकर कहा कि तुम अपनी बाधिके लिये नातिगत-प्रतिनिधित्व (Communal representation) माँगो, तुम्हें दिया जायगा । तब से हिंदू-मुसलमाना के पार्मिक मागदेने राजनीति के क्षेत्र में पदार्पण किया पौरभारत - घटना का १०२ मदर-देखिया का जवाय की जातीयता के षायु-मटल में विप कासचार कर दिया। इस समय हिंदू-मुसलमानों के मग धार्मिक या राजनैतिक धोनों क्षेत्रों में दिखाई देते हैं । धार्मिक क्षेत्र में तो उनकी भिन्नता थी ही, राजनैतिक क्षत्र में भी सरकार की भेद-नीति के कारण भिन्नता आ गई है । और, धाए दिन दोनों की सिरफुटौन हुधा करती है, जिसका तमाशा हमारी सरकार पड़े मजे मे देखा करती है। इन दोनों में से, धार्मिक झगड़े को हम सुजमा लेंगे। आज नहीं वो कल यह झगड़ा शात हो जायगा, परतु राज- नैतिक झगदे की शांति का एक मात्र उपाय सरकार के हाथ में है। यदि राजनैतिक अधिकारों का बँटवारा 'हिंदू' या 'मुसक्ष- मान' होन के कारण किया जायगा, वो झगड़े की न भी पासाल की तरफ चलती चली जायेगी । इस झगड़े को शांत करने के जिये, "हिंदुत्व' या 'मुसक्षस्थ' को भुलाकर, 'भारतीयत्व' को नितारना होगा और उसका उपक्रम सरकार पर ही निर्भर है। राजनीति के क्षेत्र में इन मेदों को मिटा दिया जाय, तो धार्मिक क्षेत्र में झगड़े रहेंगे ही नहीं। कम-से-कम उनका तीखापन भषश्य चला जायगा । पार्मिक मगरे वो चतुर्थ भाग १०३ माताओं की पारस्परिक सहाई के फारण पद हो गए।' २६ जून, १९१० का समन का एक सार था-' -'लिवरपूल का कैयोलिक पादरी अपने घर को जा रहा था, रास्ते में प्रोटेस्टेंट लोगों ने जमकी गाड़ी पर पत्थर फेंके।' अगस्त, १९१० का वार था-'वक्षिणी पेपस में यहूदियों पर माक्र- मण हो रहा है। यहूदी लोग भाग-मागकर काररिफ में इकट्ठे हो रहे हैं। पारगोडमोर गिक्षमैच में भभी उपद्रव शारी है। सेमघनयोह में यहूदियों की दो दुकानें बक्षा दी गई हैं।' पोरप में भाज यह धार्मिक प्रसाहिष्णुता दिखाई देती है। भारत सो धार्मिक सहिष्णुता का केंद्र रहा है। मुसलमानों से सताए बाकर पारमी बाग इसी क्षेषभूमि में पाकर सो पचे थे । अमाउद्दीन के कप्तान मलिक काफूर ने जय रामे- रवरम पर माफमण किया, वो लोटसे ममय यहाँ एफ छोटी- सी मसजिद पना दी। मक्षिक पला गया, रामेश्वरम में एक मी मुसलमान नहीं रहा, परतु यह मसजिद वैसी-की-वैसी सदी रही, उसकी एफ इंट को भी किसी ने नहीं हिलाया। औरंगजेष की पोती दुर्गादाम के यहाँ छुटपन मे रही और मुर्गादास ने उसके लिये वाम एफ मौलवी रखकर उसे फुरान पढ़ाया, वाकि वह अपने धर्म में ही दीक्षिस रहे । १५- १६ वर्ष की भायु में अप लड़की अपने दादा के यहाँ १०४ मदर-इंडिया का जवाब पहुँचा दी गई, तब वह उसे इमलाम में पहले से ही दीक्षित दुस- कर फा-वधा रह गया । हिंदुओं की धार्मिक सहिष्णुता इतिहास-प्रसिद्ध है। उन्होंने वो इसमें 'पति' कर दी है। अब भी भारत में धार्मिक दृष्टि मे हिंदू-मुसलमानों का प्रश्न जाति को सविन नहीं करेगा, उसफा सीखापन एकदम मिट जायगा, यदि राजनैतिक पत्र में जिस मंद-नीति का प्रयोग किया जा रहा है, उस छोर दिया माय। यह भेद-नीति ययो सावधानी से काम में लाई जा रही है, और इसके लिये आपस में पूरी-पूरी सलाहे की या दी जाती हैं। १८२१ में एक प्रिटिश-अफसर ने Aslatio Journal में लिखा था- "Drosde et Impera should be the motto of our Indian administration, whether political, oivil or military" इसी माव को मुरादाबाद के लफ्टीनेंट कर्नल बौन कोक ने १८५७ में इस प्रकार कहा था- "Our endeavours should be to uphold in Tull force the (for us fortunate ) separation which exists between the different religions and T2009, not to ondeotonr to Amalgamato them Diodo ।

चतुर्थ भाग
१०५
el Impem should lie tho principle of Indian
Gorernment"
"मिन्न-भिन्न धमा में वर्तमान भद का बनाए रखना, सन्हें
मिलान का प्रयम न फरना ही भारतीय शासन का उद्योग
होना चाहिए. इमी में उमफी भलाई है।"
१४ में पई के गवर्नर ने लिया था-" Drords et
Impera ras the old Roman Mintto and it
should be ours-"रोमन लोग मेद-नीति से ही शासन
करते थे, यही परीक्षा हमें परित्वयार करना चाहिए।"
इन उद्धरणों को पढ़कर हिंदू मुसलमानों की सदाइयों का
युद्ध-मेष समझ में आ जाता है।
मोपलों ने जिन हिंदुओं पर अत्याचार किया था, उनकी
राशि की चर्चा मेयो ने यों की है.-"बामण लोग शुद्धि करने
के लिये १०० से १५० रुपए तक प्रति व्यक्ति मांग रहे थे,
और
शुर हुए विना उन पेपारों की मुक्ति नहीं हो सकती
थी । यह शुसि भी विचित्र वीज थी। इसमें मास्त्र, फान,
मुख, नाफ को पहले गौ फे गीले गोवर से मरा जाता था,
फिर उन्हें गौ-मूत्र से धोया नाता था, अनतर शुद्ध होनेवालों
को घी, दूध, वही खिलाया जाता था। पैमे तो यह सस्कार
पड़ा सीधा-सादा मानम पाया है, परसु इसे पाकायदा पेड़-
-

१०६
मदर-इंडिया का जवाय
-
,
-
मत्र पढ़कर प्राप्मण ही फरा समता है, और अम प्रामण
जोग तो अपने मेहनगान की दक्षिणा इमनी माँग रहे ये, जो
सप न दे सकते थे। उन लोगों की इस छीनावस्था को देख.
फर, ब्रिटिश अफसरों ने, पहली बार, धर्म में हस्ताक्षेप करते
तुप, ब्राह्मणों मे कहा फि इतने लोग इकट्टे शुद्ध हो रहे हैं,
प्रत थोक माल का खयाल करके २० रुपया प्रति व्यक्ति के
खो, और शुद्ध कर दो"
इसके थाद मिस मेयो ने ४ फरवरी, १९२१ की चौरीचौरा
की घटना का उल्लेख किया है-"स्वय सेषक तथा गाँव के
लोग लगभग ३००० आदमी पुजिम-स्टेशन के चारों भोर
घिर आए, कुछ को गोली मारकर खतम फिया, पाकी को
घायल करके इकट्ठा किया, और उन्हें सेम खासकर जीते-जी भस्म
फर दिया । क्योंकि पुलिस स्टेशन में प्राय हिंदू ही सरकारी
नौकर थे, अत यह कर सथा फायरता पूर्ण हृदय-हीन पर्ताव
हिंदुओं का हिंदुओं के प्रति हुआ।"
भय मुनिए, हिंदुओं का अंगरेजों के प्रति पाव मिस
मेयो के शब्दों में मिम भयो लिखती है कि १९१६
में मायमपुर में एक नोटिस लगा था, जो 'Disorders
Enquiry Committee' की रिपोर्ट में दिया गया है। वह
नोटिस यह था-
1
14
।
T

चतुर्थ भाग
"Blessed bo Mahatma Gandhi Years sons
of India Gandhi Tve the Indianbrill fight
to death after you, that time are you maiting
for not. There are many ladies here to die
honour Go all around Indin, clear the conntry
of the ladies"
.
"महारमा गांधी की जय हम मारस के पुत्र है गांधी।
हम तुम्हारे पीक मरत दम तक सरेंगे, अव फिस बात का
इविधार है यहां काफी भौरस है-चारों तरफ मामा और
उनका सफाया करो"
यदि मिस मेयो के भएर परमात्मा की दी हुई काई भी
पात्मा है, सो क्या वह पाइपिल को हाथ में लेकर, यदि
यह पाइपिल फो न मानती हो, सो प्रिटिस मरफार को
गवाह पनाकर, यह शपथ ग्वा सकती है कि उपर दिया
हुभा नोटिस किमी एक माघ व्यकि की घृणित रागरस
के सिवाय कुछ और अर्ध नम्बसा है ? क्या मारे पमहयोग
भादोलन में इस प्रकार की एक मी घटना हुई ? हाँ, सायर
और मोक्षायर ने मारतीय नियों के साथ जो व्यवहार
किया उसकी कहानी भारत का पच्मा-यच्या जानता है,
और सफा चिक इस पुस्तक में कहीं नहीं

मदर-इंडिया का जवाब
।
इसके बाद मिस मेयो ने हिंदू मुसलिम वैमनस्य दिखाने
के लिये लखनऊ के एक दगे का इस प्रकार एक्लेख किया
है-"लखनऊ क शहर के लिये एक पार्फ घनाने फा
प्रस्ताव हुआ। जिस जमीन पर पार्फ धनना था, उसकी
पैमाइश की गई । उसी जमीन में एक छोटा सा हिंदू-मदिर
भी कोने की तरफ पड़ता था। सरकार ने अपनी नीति के
अनुसार मदिर को
अछूता
उसी प्रकार छोट दिया। अब
मुसलमान भी आए और कहने लगे कि हमें भी इस सुंदर
'पार्क' में कुछ जगह नमाज पढ़ने के लिये मिल आय, तो
पहुत कृपा हो । म्यूनिसिपैझिटी ने एक सुवर-सी अगह
मुसलमानों के लिये भी 'पार्फ' में रखवा दी । हिंदू सपने
मदिर में भौर मुसनमान खुली जगह में लगभग ८ वर्ष तक
बड़े मजे में अपना पूजा-पाठ करत तथा नमाज पढ़से रहे।
इसने में भारस को नवीन सुधार दिए गए, इन सुधारों के
साथ उनका फल भी आया, हिंदू-मुसलमानों का पारस्परिक
विरोध पद गया लखनऊ मुसलमानी शहर है । इसलिये
मुसलमान सोचने लगे कि यदि भारत का शासन हिंदुस्ता-
नियों के हाथ में भानेवाला है, तो उनका शहर, जननऊ,
मुसलमानों को ही मिलना चाहिए । परसु जहाँ लखनऊ में
घनियों की संख्या ज्यादातर मुसलमानों की है वहाँ हिंदू,

अच्छा है, चतुर्थ भाग १०९ मुसलमानों से निगुने हैं इसलिये घे मापस में सोचने लगे, यदि स्वराभ्य सचमुच मिलनेवाला है तो हम हिंदुओं की लखनऊ में क्या स्थिति रहेगी? क्या हम लोग मुसलमान- शासकों के नीचे रफ्ने जायगे । इससे वो हम पाहर खाकर मर जायें । पस, यह सोचकर हिंदू लोग सगठन करने लगे, अपनी 'सत्ता' नवकाने लगे । प्रतिदिन मायफाल 'पार्फ' के उस छोटे-से पुराने मंदिर में वे इकडे होकर शोर-शार मचाने लगे । सार्यकाल का समय मुसलमानों की नमाज का पर होता है। माठ साल सफ मुसलमान यहाँ अपने कयन पिछा बिछाकर नमाप्न पदवे रहे थे, इसलिये उन्होंने पोपणा कर दी-"हिंदुओं को मंदिर में इकट्ठा होने के लिये ऐसा समय चुनना चाहिए जो मुसलमानों की नमाज के समय से भिन्न हो। हिंमुमों ने मुसलमानों की इस घोपणा पर क्रोध किया, मुमतमानों में हिंदुभों के क्रोप पर क्रोध किया । यस, फिर क्या था, दोनों दलों के मुख- के-मुस साठियों कधे पर रख-रखफर एक ही समय 'पार्क में इकट्ठे हो गए माफि पेबर-भिदकर मामले को स्वयं सय कर दें । घमासान युद्ध हुमा जिसमें मुसलमानों ने हिंदुनों को भगा दिया !" इस घटमा से हिंदू-मुसम्मानों के पारस्परिक झगों पर

११०
मदर-ठिया का जवाब
जहाँ प्रकाश पड़ता है, यहाँ यह बात भी स्पष्ट हो मासी है
कि सरकार को ऐसी अवस्थाएँ उत्पन्न करने से कोई स्वास
इनकारी नहीं, जिनसे हिंदू-मुसलमानों के झगड़े की भाशंफा
धनी रहे । साथ ही 'मदर-इडिया' की एक विशेषता है।
महाँ-वहाँ हिंदुओं को कोसा गया है, उन्हें पदनाम किया
गया है, परतु मुसलमानों के विषय में एफ अध्याय लिखा
गया है-२५वा-'Sons of the Prophet'--'पैरावर
की औलाद'-परतु उस औलाद की पापत न-जाने उधना
प्रकाश क्यों नहीं डाला गया, जिसना हिंदुओं के विषय में ?
२६ अध्याय में पनारस का वर्णन है, इस अध्याय
फा शीर्पक है 'The Holy City'--'पवित्र शहर। धनारस
में वैज्ञानिक उपायों से शुद्ध किए पानी को लोग न पीकर
गंगा के गंदे भरे पानी को ही पीते है भौर का है-
"It lies not in the power of man to pollute
the Ganges. And, flitering Ganges water tabos
the holiness out."
"गंगा को अपवित्र कर सकना यो मनुष्य की शक्ति से
बाहर है। और, गगा-अक्ष को निखारने से उसका माहात्म्म
निकल पाता है।" फिर लिखा है-
"Again, whoever dies in Benares goes straight
-

पतुर्य माग to hearen Therefore endloss sich, hopeless of ouro, como loro to breathe their last, it possi ble, on the brink of the river with their feet in the flood" "जो मनारस में मरता है, वह सीधा स्वर्ग जाता है । इस- लिये अनस रोगी, जिन्हें अच्छा हाने की पाशा नहीं रहती, मरने के लिये यहाँ पहुँचते हैं और, यदि सभव हो, वो गगा के किनारे पावों को गगा के वहाष में डालकर पर जाते हैं साकि वे इमी हालत में मरें।" मनारस के स्वास्थ्य विभाग के अफसर के माप मिस मेयो मरपट पर गई । यहाँ पर ठठी चिता की रात्र में कच्चे कुछ सूघ रहे य । मिस मेयो लिसती है- See those dogs nosing among the ashes There-me has found a piecet', said I to the dootor, as we stood looking on 'Yes', he ansrored. That happens often enough. For they burn bodies here, sometimes rather incompletely, at all hours of day and night Still, if the dog lad not got that bit it would simply have got into the river, to float don among the bathore As the dead babies do, in

११२
मदर-इडिया का जवाब
.
any ale No Hindu bums an infant They
merely togs them into the stream
"मैंने कहा, देखो वे कुत्ते मामने की रास्त्र की ढेरी में नाफ
घसा रहे हैं। यह देखो-एफ कुत्ते को कोई टुकड़ा मिल
गया " डॉक्टर ने कहा-'हाँ, ऐसा तो अक्सर होता है।
यहाँ पर मुर्दो को भाषा-सा हीनला देते हैं, पौर मुर्दे यहाँ
दिन-रास जलते रहते हैं। तो भी, यदि कुत्ते को वह टुकड़ा न
मिलवा, घो षह नदी में कूद पड़ता क्योंकि उसे कोई मुर्दा-पछा
वोहर हालत में मिल जाता । कोई हिंदू मी थयों को बनाया
नहीं है-पे उसे घार में यहा देते हैं।" पनारस के गद के
विषय में लिखा है-
" The river bauks are dried setrage
The
river water 1s liquid serage
The faithful
millions drink and bathe in the one, and spread
out their alothes to dry upon the other
in due time, having picked up whatgerms they
oan, they go home over the length and breadth
of India to give them further oprrenoy, carry
ing jara of the precious water to serve through
the year"
"नदी का फिनारा शुष्क विष्ठा से, नदी का पानी घुसी
-
Then
--
-

क
"
1 पतुर्य माग
११३
हुई विष्टा से भरा होता है। लाखों भक लोग इनमें से एक
में स्नान कर हैं क्या दूसरे पर अपने फपड़े सूखने के लिये
डालते हैं । फिर, ययाषसर, जितने भी रोग क्रिमियों को घे
ले जा सकते हैं, उन्हें सपूर्ण मारतवर्ष में फैलाने के लिये, इस
धमूल्य पानी को, पड़ों में मर-मरकर ले जाते है, पाकि
साल भर काम भावे
एक हिंदू सॉक्टर मे मिस मेयो से पनारस के मदिरों का
पर्णन यों किया-"The temples of Benares are as
evil as the ooze of the river banks. I myself
Trent within them to the point n here one is
obliged to take off one's shoes, because of
Banctity Beyond lay the shrines, rising out
of mud, decaying food and human filth 'I
Tould not walk in it I baid-Nol But hun
dreds of thousands do take off their shoes, wall
in, worship, walk out, put back their shoes
upon thoir untrushed foot,"
"पनारस के मदिर इसने ही गदे है, जिसने नदी के किनारे,
मैं स्वय उनमें इस जगह तक गया वहाँ पर पवित्रता के
कारण भूवा उतारना पड़ता है। सामने मदिर है, पारों सरफ़
कीचड़, सदा हुषा मोजम ज्या विष्ठा पड़ी है। मैं भवर नहीं

कहा-'पस।
११४
मदर-इंखिया का जवाब
गया।
मैंने
परतु
लाखों भादमी वहाँ जूता
उतारकर, अपर जाते हैं,
, पूजा करते हैं, उसी तरह बाहर
पाते हैं और बिना पैर धोए जूता पहनकर अपने अपने घरों
फो चल देते हैं।"
बाजारों का वर्णन करते हुए लिखा है-"Glose upon
platforms, on both sides of the road, runs an
open gutter about a foot wide Heaped on the
slats of the wooden platform, just escaping tho
gutter, aro messes of fried fish, rice cakes,
cooked curry, sticky sveetmeats and other foods
for sale All the food heaps lie exposed to
every sort of acondent, while flies, dirty hands,
the nosing of dogs, cows, bulls and sheep and
rats constantly add their contributions."
"दुकानों के पास लकड़ी के मच बने होते हैं, जिनसे लगी
हुई, ससक के दोनों तरफ, एक फुट चौबी, खुली, गद की
नाली पह रही होती है। इस मच के फट्टों पर, नाली से
पारा ही परफर, उसी हुई मछली, पाषल की रोटी, दाम,
चिपचिपी मिठाई सया दूसरे खाय पदार्थ पेचने के लिये रखे
होते हैं। इन चीजों के वेर-के-देर स्वखे पड़े रहते हैं और
मक्सियाँ, गदे हाथ, कचों की मासिकाएँ, गौ, पैक्षा पकरी,
.

चतुर्य भाग ११५ चहे, सपफी इन पर मेहरवानी होती रहती है। फिर लिखा है- "And you must be caroful, in walking, not to brush against the wall of a house, for the Intrines of the upper stories and of the roots drain down the outside of the houses either in leaking pipes or else from small vont-holes in the walls, dripping and stringing into the gutter slog streams that just clear the fried fish and the lollypops." "घसते हुए सावधान रहना चाहिए कि कहीं किसी पर की दीवाल से छू न जाये । क्योंकि ऊपरली मशिनों की ट्टियों के नम के या दीवार ही फटी होने के कारण सप गई रिस रिसकर मकान के पाहर की दीवार पर लगा होता है, और उसफा गदा पानी घू-धूकर नीचे पड़े हुए मंछनी के टुकों और वसासों को साफ कर रहा होता है।" इस प्रकरण में मिस मेयो में महात्मा गाधी का निम्न- उमरण दिया है-"दक्षिण की तरफ देखा गया है कि सोग गलियों पथा पाजारों को गंदा करने में कोई कसर नहीं रख छोपे। प्राय काम गलियों, में, दोनों तरफ लोगों को कसार घोंघे वह फाम फरसे पेठा देखकर, जो उन्हें

११६
मदर-इंडिया का जवाष
एफात में करना चाहिए, इसना पुरा मालूम पड़ता है कि
किसी भलेमानुम के लिये तो गुजरना भी मुश्किल हो
जाता है। पगाल में भी लगभग यही हाल है। उसी तालाम
में वे आमदस्त लेते हैं, उसी में उनके मवेशी पानी पीते
हैं, और उमी में मे घड़े भर-मरफर घे घर के काम के
लिये पानी ले जाते हैं।
यदि राजनैतिक रग से जुदा फर, इन पासों पर विचार
किया जाय, तो प्रत्येक भारतीय को मिस मेयो की इन पासों
से शिपा लेनी चाहिए।
इस अध्याय का प्रत मिस मेयो में एक विचित्र घटना
लिखफर किया है.--"अंगेरेजी पढ़ लेना उतना मुश्किल नहीं
जितना लातीय स्वभावों से पीछा छुड़ाना । मारतवर्ष में ऐसे
आदमी मिलेंगे, जो अँगरेजों को मात कर देनेवानी अगरेजी
पोलसे होंगे, लिषास भी नख से सिख तक अंगरेजों का ही
होगा, परंतु थे ऐसे गाँव के रहनेवाले होंगे, जहाँ कुओं स्रोपने
फी जमीन को चुनने के लिये, वैज्ञानिक उपायों के अवलयन
करने की जगह पकरे पर एक पानटी-भर पानी डालकर स्यान
का निर्णय फिया, जाया होगा। पानी सामने से वकरा
मागता है, लोग उसके पीछे भागते हैं। जहाँ पकरा पहले
पदा होकर पवन को माइया है, प्रस, षहीं कुमाँ सोदा माता
1
।
--

। चतुर्य भाग
है, चाहे वह जगह पाजार के ठीक बीच में ही क्यों
न हो।"
मिस मेयो को विश्वास दिलाया जा सकता है कि कुएँ
स्रोपने के उक्त प्रकार का वर्णन 'चुटपले' का मतलब ही इस
करता है।
क्या यह पहला सकती है कि ऐसे कितने
कएँ व
सत्ताईसवाँ अध्याय है-The World-Menaw'-
'ससार के लिये खतरा'-कौन है ? भारतपर्प । मिस गेयो
कहती है फि मारतवर्ष न्यूयार्क से कुल एक महीने का रास्ता
है, इसलिये भारत में दिनोंदिन फैलनेवाली पीमारियों का
अमेरिका सक को खतरा है। भर्जासीय विभाग में काम
करनेवाले स्वास्थ्य रक्षा के जानकार एक अमेरिकन ने मिस
मेयो से कहा-
"Whenever India's real condition becomes
known all the civilized countries of the torld
will turn to the Longue of Nation and demand
protection against her"
"भव सभ्य ससार को भारत की असली हासत माजूम हो
बायगी, सा सष देश राष्ट्र-संघ से दोस्त करेंगे कि हमें
भार सपचामो

मदरनडिया का जवाष
१
मिस मेयो को मालूम होना चाहिए फि घासक बीमारियों
का भारतवर्ष की अपेक्षा योरप से ज्यादा खतरा है । मिफि-
लिस-जैसी मर्यकर धीमारी का भारतवर्ष में कहीं पता तक
न था । योरपियन लोग इस बीमारी को यहाँ लाए, इसीलिये
इसका नाम संस्कृत में 'फिरग रोग' है-पर्यात्, फिरगियों
की बीमारी ' घरफ, सुभुस में वो इस बीमारी का जिक्र ही
नहीं। पीछे के प्रय 'भाष -प्रकाश' में जिक्र है और इसमें
लिखा है-
गधरोग फिरंगोऽयं आयते देहिनो ध्रवम ।
फिरगिणोऽग ससर्गाफिरंगिण्या प्रसंगतः।
अर्थात्, “यह गध-रोग फिरंगी मनुष्यों के ससर्ग से और
फिरंग-देश की स्त्रियों के प्रसंग से होता है।" 'एन्साइको-
पीरिया मैडिका' में सिफिलिस के विपय में लिखा है कि योरप
में १४६४ ई० में यह रोग फोलपस के नाषिक अमेरिका से
लाए और संपूर्ण योरप में इसे फैला दिया। इस समय यह
अपस्या है कि जहाँ-वहाँ योरपियन लोग नाते हैं, वहाँ-वहाँ
सिफिलिस भी पहुँचता है। सभी ईषिलाक अलिस ने 'सिविलि-,
पोशन' को 'सिफ्रिीलशन' लिखा है! क्या झाग माफ
नेशस' के सामने यह एस्ति न करनी चाहिए कि फिरग
रोग फैलानेवाले फिरगियों से संसार की रक्षा की बाय !
-

चातुर्य माग ', 'घरक सथा सुभुत में सिफिलिस, मेग, हैजा, इन्फ्लुएन्जा, पार फीवर, रेह कोवर-किसी बीमारी का भी निशान महीं मिलता । ये बीमारियाँ मारतवर्ष में बाहर से भाई है, इसलिये मिस मेयो को 'झीग ऑफ मेशस के पास दख्खास्त करने की जरुरत नहीं। भारसवासी बीमारियों का कारण क्या समझते हैं ? "सित की सबसे पच स्थिविषाली महिला सिरहाने पर सही डॉक्टरनी से कहती है-में सुम्हें अपनी जीभ क्यों विमला मन कि दर्द नीचे कहीं जाकर पेट में है और यदि मैं मुन सारंगी तो और पुरी आस्माएँ अदर प्रा घुसेंगी। जिले का प्रमीदार अपने इस दिन के पचे के कुछ ही दूर, नहाँ से पह पना न मार सके, परे मारी बदर को बाँध देवा है और फिर मैदर को दिक कर उसे गुस्सा विजाता है साकि यह बये की सरफ मुंह पनाए और उससे सरफर यो फो सतानेषाला भूत माग जाय । अब उब स्थिति के लोगों की यह भषस्था है सप गायों में रहनेषाले भशि- पिव देशातियों से क्या भाशा की या समसी है ?" परंतु यह भूत-प्रेत-सीमा तो पोरस में भारत से पढ़कर हो चली है । मसन के प्रसिद्ध वैधानिक प्रविलियम फास भूतों को, और जिनों को, मानसे थे । इन मूत-प्रेय- १२० मदर-इंसिया का जवाब पांदियों ने योरस में एफ सोसाइटी कायम कर रक्खी है जिसका नाम Society for Psyohical Researoh (परान्वेषण- परिपत) रक्या है। थियोसोफिकल सोसाइटी के सभी सदस्य, जिनकी संख्या योरप में यहुत काफी है, भूत प्रेत में विश्वास करते हैं । कहने का यह अभिप्राय नहीं कि भूत-प्रेस, होवे ही है, हमारा विश्वास वो है कि यह पहम है, परंतु यह सो निश्चित है कि यह बीमारी केवल भारतीयों को ही नहीं, अपितु इस बीमारी कहनेवाली मिस मेयो के देश-भाई भी इस रोग से पीड़ित है। भारतीय 'वैचों' का वर्णन करने के लिये ('हकीमों' का जिक्र इस पुस्तक में नहीं है) एक अलग अध्याय लिखा गया है-'Qunoks Whom Wo Knor.-'नीम हकीम'! इसका प्रारम इस प्रकार किया गया है- "प्रामणों की एक कहावत है-पलने से पेठना भना, पेठने से लेटना भला, लेटने से सोना मला, और सस ममा -मर माना फिर 'मुश्रुत' की खिल्ली उड़ाई गई है। "मुन्नस में लिखा, है कि मीमार भादमी के दूत की शक्ल, उसके कपड़े, ससकी पारधी, उस समय हवा की गति भादि को देखकर कहा जा सकता है कि बीमार पचेगा या नहीं 1m है। " ।

- + चतुर्य भाग १२१ घरक और मुभुत की शल्य-चिकित्सा पर लिया है- "एक वैध ने आयुर्वेदिक की पुस्तक सामने रखफर, एक घोपरेशन करना शुरू किया । धीमार को नीचे वषाकर विना मा फी दया मुंपाप, उसने चीरा दे डाला । चाकू पदर चुभ गया, पीमार छस पदा, उसकी नसें, पेट, आस सय कुछ फट गया । वह वैद्य शरीर-शास्त्र से अनभिज्ञ या । पीमार को निकटवर्ती सिस्सरी में ले जाया गया। यहाँ एक मामूली-सा हिंदुस्तानी डॉक्टर था, यह इस थीमत्स-व्यापार को देखफर पर गया। उमने अपनी जान बचाने के लिये कहा, मैं वो छोटे-छोटे फोरे फुसी के इलाज के लिये है, इसे किसी हस्पताल में ले जाभो । इस्पताल पहुंचने से पहले-पहल ही बीमार मर गया।" क्या मिस मेयो फा मसलम यह है कि बिना अभ्याम किए यदि हैलीयर्टन की पुस्तक हाथ में लेकर कोई डॉक्टर माप- रेरान करने लगेगा वो उनकी हालत कुछ हसर होगा? परक भौर मुभव से ही तो योरप ने सीखा है ! मदरास के भूतपूर्व- गवर्नर लॉर्ड एपपिल ने कहा था-"I am not whether it is generally known that the solence of medicine originated in India, but this is the cabo, and the science as first exported from India sure । - १२२ मदर-इंडिया काजवाब to Arabia and thence to Europe " अर्थात्, “यह यात शायद लोगों को उसनी मालूम नहीं कि वैद्यकशास्त्र की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई । यहाँ से अरब के क्षोगों ने सीखा और उनसे योरप ने " सर डब्ल्यु हटर ने लिखा है- "हिंदुओं का मेवफ-शास्त्र स्ववत्र रूप से बना । परावाद के खलीफा ने ६५०-६६० ई० में घरफ तथा मुमुस के आधार पर अरवी हिकमत की प्राधार-शिखा रक्सी और १७वीं शताब्दी सफ योरप के लोग अरव से ही घेयक सीखसे रहे। अरषी प्रयों के लावीनी-अनुषादों में जगह-जगह 'चरक' का नाम पाता है। कोलत्रफ ने हिस्सा है कि अरवियों ने 'चरक' फा 'सरक', 'सुभत' का 'मुनव', 'निदान' फा 'पदान', 'अष्टांग' का असकर' बना दिया। मायुर्वेद के विषय में पीवर महो- दय जिस्यते हैं- "In surgery, táo, the Indians seem to have attained a special proficienoy, and in this department European surgeons might, perhaps oven at the prosent day, stull lenrn something from them, as indeed they hove already borrored from them the operation of rhinoplasty" "सनरी में भारतीयों ने पर्याप्त पातुर्य प्राप्त कर लिया था, L चातुर्म माग १२३ और इसमें योरप के समन, भाज मी, भारत की समरी से बहुत कुछ सीख सकते हैं, जैसा फि नाक आदि के मॉपरेशन वया नई नाफ, कान पनामा सन्होंने भारतीयों से सीखा है। भीमसी मैनिंग लिखती हैं-'The surgical instru monts of the Hindus were suffoiently sharp, indeed, as to be capable of dinding a hair loogitudinally"-"इनके सर्जरी के पौधार इसने वेष होसे ये कि एनसे बाल को भी सवाई के रुख काट सकसे थे।" विंसेंट स्मिय का कयन है कि योरप में १०वीं शबाब्दी में सबसे पहला इस्पताल खुला, जिसमें सर्वसाधारणको दवाई दी जाती थी। इधर चीनी यात्री फाहियान झिसता है कि जिस समय पा मारत पाया गे पाटलीपुत्र में भोप- घालय खुले हुए थे, मिनमें गरीष लोग पाकर अपना इलाम कराते थे। क्या इसी सासी को सामने रखकर मिस मेयो ने परफ-मुमत को 'नीम हकीम' लिस्सने की पृष्टवा की है ? इस अध्याय में मिस मेयो ने महात्मा गांधी के बेल के ऑपरेशन का विक्र किया है। वह लिखती है- "इससवाल के सर्जन ने कहा--'गांधीमी, मुम्हे भापको यह सूचना देते हुए पड़ास है कि भापको एसिाइटिस' रोग हो गया है। भाप यदि मेरी पवा करसे.यो में .

१२२ मदर इंडिया का जवाष to Arabia and thenon to Europer" भर्यात्, "यह बात शायद लोगों को उसनी मालूम नहीं कि वैद्यकशास्त्र की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई । यहाँ से अरष के लोगों ने सीखा और उनसे योरप ने " सर डब्ल्यु हटर ने लिखा है- "हिंदुषों का धैद्यक-शास्त्र स्वतंत्र रूप से पना । पग्रदाय के खलीफा ने ६५०-६६० ई० में चरक तथा मुमत के आधार पर भरपी हिफमत की आधारशिला रक्खी और १७वी शवान्दा सक योरप के लोग अरव से ही वैद्यक सीखते रहे। अरषी प्रयों के मावीनी-अनुषादों में जगह-जगह 'घरक' का नाम आता है । कोप्लवक ने लिखा है कि परयियों ने 'घरक' का 'सरक', 'सुत' का 'सुनुप', 'निदान' का 'पदान', 'भष्टांग' का 'असकर' पना दिया। मायुर्वेद के विषय में वीवर महो- घय लिखते है- "In surgery, too, the Indians seem to have attained a special proficiency, and in this department European surgeons might, perhaps even at the present day, still learn something from them, as indeed they have already borrowed from them the operation of rhinoplasty "सर्जरी में भारतीयों में पर्याप्त पातुर्य प्राप्त कर लिया था, . -- चतुर्य भाग - " १२३ और इसमें योरप के सर्वन, माज मी, मारस की सनरी से पाहत कम सीन सकते हैं, जैसा कि माफ भादि के ऑपरेशन तथा नई नाफ, कान पनामा उन्होंने भारतीयों से सीखा है।" that far faterdit "The surgical instru ments of the Hindus were sufficiently sharp, indeed, as to be capable of dividing a hair longtudinally -"इनके सर्जरी के बौखार इसने खेज होवे ये कि उनसे, पाल को भी सपाई के रुख काट सकते थे।" विमेंट स्मिथ का कथन है कि योरप में १०वीं शवाम्मी में सबसे पहला हस्पताल खुला, जिसमें सर्वसाधारण को दाई दी जाती थी। इधर पीनी यात्री फाहियान लिखता है कि जिस समय वह मारत आया सो पाटलीपुत्र में भोप- पालय मुले हुए थे, जिनमें गरीय लोग घाफर अपना इलाज करावे थे। क्या इसी साली को सामने रखकर मिस मेयो ने घरक-समय को 'नीम हकीम' लिखने की घृष्टता की है ? इस अध्याय में मिस मेयो ने महात्मा गांधी के जेल के ऑपरेरान का विक किया है। वह लिखती है- "हस्पताल के सर्जन ने कहा-'गांधीजी, मुझे भापको यह सूचना देते हुए पापुस्य है कि भापको 'एपेंडसाइटिस रोग हो गया है। भाप यदि मेरी वा करते. पो में एक-

१२४२
मदर-इंडिया का अवाष
5
दम चीरा दे डालवा । शायद आप तो अपने मायुर्वेदिक वैयों
का इलाज कराना पसंद करेंगे।'
"परंतु मिस्टर गाधी के मन में यह खयाल न दिखाई दिया
"मर्मन ने फिर कहना शुरू किया-'मैं तो ऑपरेशन न
फरना ही पसद करूँगा, क्योंकि यदि मामला विगढ़ गया, सो
आपके सय मित्र हमें दोषी ठहराएंगे, हालांकि इमारा काम
आपकी निगरानी करना ही है।'
"मिस्टर गाधी ने डॉक्टर को मनाते हुए कहा-'यधि प्राप
चीरा देना मान जाय, सो मैं अपने सब मित्रों को बुलाकर
सममा दूंगा कि यह काम मेरी प्रार्थना पर ही किया गया है।"
मिस मयो के इस क्षेत्र का महात्मा गाधी ने प्रतिवाद
किया है । सनका कहना है कि ऐसी कोई पासपीत नहीं हुई।
३०वाँ अध्याय मदर-इडिया' का अतिम अध्याय है।
इसमें भी चक्षते-चलते दो घुटफले छोदे गए हैं-
"मारत में १५२६ में ५८ लोस माघु थे । सरकों पर
पिलवल नगे बदन, रात्र लगाए, जटामों को सन की सरह
सपेटे, दवाओं से ऑम्मों को लाल किए वे सर्वत्र दिखाई
पनिए का चित्र सूप खींचा है-"ये लोग नहीं चाहते कि.
साधारण जनवा भएर पड़े। भर पदने से वो गाववाले।

चतुर्थ भाग १२५ पनिए का सिसा पद लेंगे । फिर थे २०० रु० लेकर ५००) पर अंगूठा क्योंकर सगाने लगे पनिए से एक पार पार्ष क्षेने पर फिर कोई उनके घगुल से निकलता नहीं है, मफली के खाले में मक्खी की वरह देहाती फंसता ही चला माता है। भ्याख पर पक्र-व्याम पदसा जाता है और कर्म के घोड़ेसे रुपयों का पोम वीसरी या चौथी पीढ़ी तक दम नहीं लेने देखा !" फाश की हमारे पनिए, बासी पर हाथ रखफर, परमास्म- देव को साक्षी समझकर, कह सकें कि मिस मेयो ने ये चाफ्य झठ लिखे है॥ पर्स, यहाँ मिस मेयो की पुस्तक समाप्त हो जाती है। 1

१२४
मदर-इंडिया का जवाब
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एम चीरा पे डालवा। शायद आप तो अपने आयुर्षेविक वेद्यों
का इलाज कराना पसंद करेंगे।
"परंतु मिस्टर गांधी के मन में यह खयाल न दिखाई दिया।
"मर्जन ने फिर कहना शुरू किया-'मैं वो ऑपरेशन न
करना ही पसप फरूँगा, क्योंकि यदि मामला बिगड़ गया, हो
आपके सय मित्र हमें दोपी ठहराएंगे, हालांकि हमारा काम
थापकी निगरानी करना ही है।'
"मिस्टर गाधी ने डॉक्टरफो मनाते हुए कहा-'यदि पाप
चीरा देना मान जायँ, वो मैं अपने सब मित्रों को युलाकर
समझा दूंगा कि यह काम मेरी प्रार्थना पर ही किया गया है।"
मिस मयो के इस क्षेत्र का महात्मा गाधी ने प्रतिवाद
किया है। उनका कहना है कि ऐसी कोई वासपीत नहीं हुई !!
३०वा अध्याय 'मदर-दसिया' का अतिम अभ्याय है।
इसमें भी घन-घनवे दो चुटकले छोड़े गए हैं- ।
"मारत में १९२६ में ५८ लाख माघु थे । सड़कों पर
मिनकुल नगे पदन, राख लगाए, मटाघों को सन की सरह
सपेटे, दवाभों से माम्सों को स्वास किए थे सर्वत्र दिखाई।
दत है 10/- 1
पनिए का चित्र स्यूम थीथा है ~"ये लोग नहीं चाहते कि
साधारण जनता मार! पदे भरे पड़ने से धो गाँववाले ।
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पसुर्थ भाग १२५ पनिए का लिस्ना पद लेंगे । फिर ये २००) १० लेकर ५००) पर अंगूठा क्योंफर लगाने लगे । अनिए से एक पार फर्म लेने पर फिर कोई उनके घगुल से निकलता नहीं है, मकदी के माले में मक्सी की सरह देहाती फंसता ही चला जाता है। न्याज पर पक्र-व्याज पदता माता है और फर्ज़ के योदे-से उपयों का पोम वीसरी या चौथी पीढ़ी एफ दम नहीं लेने देखा !" कारा की हमारे पनिए, छाती पर हाय रखकर, परमात्म- देव' को साक्षी सममफर, कह सके कि मिस मेयो ने ये पाक्य मुठ लिस्से है।। पस, यहाँ मिस मेयो की पुस्तक समाप्त हो जाती है । ,

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परिशिष्ट
१ अमेरिका में पाप की पराकाष्ठा!
डॉ० सुधींद्र पोस अमेरिफा की आयोषा यूनिवर्सिटी में
अभ्यापफ हैं। आपने २ फीरी १९२६ के 'मॉडर्न रिव्यू' में
अमेरिका की अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है-
"अमेरिका के समाचार-पत्र यह रोना रोया करते हैं कि
एशियाई लोग यहाँ अधिक सस्या में जाने लगेंगे, वो उनके
स्वर्ग का खावमा हो जायगा । उनका कहना है कि एशिया
के लोग अमेरिफन सभ्यता के लिये, जो कि फमम-पत्र की
परह शुभ्र तथा निर्मल है, खतरे का कारण हैं । 'खतरा'--
'खसरा' चिल्लानेवाले ये सभ्यता के ठेकेदार एशिया के पवन
व्या पापों का पृणित चित्र स्त्रींचकर अपने देश-भाइयों को
वापनी दिया करते हैं-'इन एशियाई भूवों से अपने देश
को पचाओ " यह रोग सपूर्ण अमेरिका में फैलवा चला जा
रहा है। परतु, 'पवित्र'-एशियाइयों को देखफर नख-से-शिख
धफ कॉपने के पक्षाय, अच्छा हो यदि ममेरिका भपने नैविक
पतन पर, भाठ-पाठ भासू यहाए । यो दिन हुए,
पफ भमे-

अमेरिका में पाप की पराकाष्ठा रिकन राम नाविक्ष में अमेरिका को, ससार के सप देशों में सब से ज्यादा पाप की तरफ झुका हुभा देश कहा था। पैशाचिफ पापों की घृणित कहानियाँ यहाँ रोद भखया में छपा करती है । एक सो मे अपने पति को विप दे दिया। भर एक पीमा कपनी मे ३० हजार रुपया जो कि उसके नाम पर बीमा कराया गया था पस्त करने में लगी है। पीमा इस शर्त पर था कि यदि पति शांति-पूर्पक विस्वर पर मरेगा, वो उसकी स्त्री को १५ हजार रु० मिलेगा, यदि पम- प्रयोग से मारा भायगा, तो स्त्री को ३० हजार मिलेगा। सूरियों में मृत्यु में पल-प्रपोगमा था' मायामा रियासत में एक मासा ने अपने १५ दिन के पोके गले तया हाम की फलाई को उस्तरे मे इसलिये फाट सक्षा, क्योंकिवापिक्षावाब था और उसे दिफ करता था मैसाचुसेट के मैदान में एक सार्वमनिक सभा हो रही थी। कम नागरिकों ने सभा मग करना चाहा । भयकर युस लिस गया, सैफ ने हिस्सा लिया । इंट, पत्थर, भरेमो पुष हाय पाया पक्षापा गया। पुलिस की नाक में भी वम पर दिया। यानेदार फो पिस्तौल, हथकदी, सम छीन लिया। पुलिस की छाती पर बर्के रखकर यह कार मा शिकागो के यो सब-कमा के पियार्थी, जो धमी घरानों के की राय !

१२८ मदर-इंडिया फा जपामा ' थे, दिल में यह सोचकर चल दिए कि कोई महाघोर पाप करें! एफ छोटे बच्चे को फुसलाफर उन्होंने अपनी मोटर में विठा लिया, हयोड़ी से उसका सिर फोर डाला, मेजा निकाल दिया और एफ नाली में लाश फेंफफर चपस हुए प्रोहियो में एक महिना ने अपने ६ हपये के पच्चे को दब में पानी भरफर अदर साल दिया, नीचे से भाग असा दी। कई घटों के पाद उसके पति ने देखा कि पच्चा उपसफर मर चुका था दक्षिणी सेफोटा के एक बैंक में दो त्रिया मोटर पर चढ़- फर पहुंची । एक ने खजानची की छाती पर पिस्तौक्ष मानी; दूसरी ने रुपए घटोरे । बुढ़िया ने कहा-'हिले नहीं, और गए नहीं, मुझे जान से मारना पसद नहीं, पर तुम हिले तो देखना !' बैंक का सफाया कर धोनों स्त्री-डाकू मोटर में सवार हुए और चल दिए। न्यूयार्फ के एक आदमी ने एक स्त्री का सिर हथौदे से इस- लिये फोड़ दिया, क्योंकि वह पेचारी अपने पति को छोड़ कर इसके साथ नहीं पाती थी ! उसने उसे मूलितावस्या में घसीटकर सहसाने की भट्ठी में ला फेंफा । मट्ठी का दरवाणा पर फर ऊपोला साय खड़ा कर दिया, पाकि दरवाजा सुज न आए । वह देवी चीत्कार करती हुई आग में " । . ।

। - अमेरिका में पाप की पराकाष्ठा १२९ मुन गई, राख हो गई। ऐसे कर फर्म जिस देश में हो सफ हो, वह दूसरों को अपदेश देने का दम मरे । ये घटनाएं रोमांचकारी है ! ये यचलाती है कि हषा का रुख किघर है। अमेरिफन लोग अपनी सभ्यता के गीत गासे-गाते नहीं थकते, परतु उन्हीं के देश में ससार के पापों की पराकाष्ठा पहुंच चुकी है। न्यूयार्फ के बम मसफर टैली महोदय ने कहा था, इस पेश पर पाप का भूत सवार हो गया है, पमी वह ससार के सभी देशों से ज्यादा शासन- दीन (Lawless) है । इंगलैंड, फ्रांस, इटली, जापान- ससार किसी भी देश में इसना पाप, इसना दुराधार मही होसा, जिवना, जन-सस्या की दृष्टि से, इस देश में ! पोर, गफ लुटेरे जगह-जगह हैं। इस देश में पदूक इतनी प्रचलित है, जिसनी देवाकू की पाइप, या घरों में मियों के मुस्न पर लगाने का पासडर । अमेरिकम लोग पिस्तौल लेकर निकलवे है, साकि कहीं रास्ते में कोई लुटेरा उनकी छाती पर न पड़ बैठे। अमेरिका में शिकागो सबसे बड़ा शहर है, इसकी ससार के परे-पड़े शहरों में दूसरी सम्या है । इस शहर में, इस्यामों की संध्या रोजाना एक से कुछ ज्यादा ही है । १९२५ में, साल में, केवल एक म्यूयार्क शहर में , ३४७ हस्याएँ हुई, १५२४ में २५० । ईसाइयत .

मदर-इंडिया का जवाब
के इस युग में शिकागो पाप की राजधानी बना
हुआ है।
अमेरिका में पिछले २५ साल से पाप फी लहर नहीं,
पाप का तूफान उमड़ रहा है। डॉ० फ्रेरिफ हाफमेन के कथना-
नुसार, ओ इस विषय के पचित है, पिछले २४ साल में
इत्याओं की समया दुगुना हो गई है । १६१४ के महायुद्ध
में ४० हजार अमेरिफन मरे, परंतु युद्ध
के
बाद
से १६२५
तक अमेरिका में खो हस्याएँ हुई, उनकी ही सख्या ४० हतार
से कहीं ज्यादा है। अमेरिका में ११ हजार पेशाधिक वष
प्रति वर्ष होते हैं। पिछले १५ सालों में यहाँ हत्या की चाल
प्रसि-सहरू १०० या ८० रही है, बम कि बापान, प्रेटनिटन,
भायखस, होलैंड, स्विटजरलैस और नारखे में इस्यामों की
सख्या ३ से ९ प्रति-लाख रही है ! डॉ० हाफमैन का कथन
है कि अमेरिका में वह समय आ गया है, जप कोई भी,
कहीं भी, फमी, सुरक्षित नहीं इस्याएँ पैशाधिक रखा से
की जाती है, उनमें सारी अस खर्च कर दी जाती है, देश के
शासर्फ इन्हें रोक नहीं सफसे । अमेरिका की सभ्यता की
उन्नति पर यह क्या ही अच्छी टीका है।
ऐसोशियदेख प्रेस की हाल ही की रिपोर्ट से झाव होसा
है कि केवल मोटर से अमेरिका में प्रति दिन, प्रविघटा, यो
-
+

अमेरिका में पाप फी पराकाष्ठा ! से ज्यादा आने जाती है । १६२३ फी रिपोर्ट से मालूम होता है कि अमेरिका में, एक शास्त्र में १४८ फी मृत्यु मोटर- दुर्घटना से हुई जहाँ कि इंगलैंड सया बेस्स में ५.३, स्कोट- केंड में ४ ३ न्यूज़ीट में ४६ और मैनेडा में ३६ हुई। १९२४ की रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि अमेरिका के १५८ राहरों में १ मास में १६.४ की मोटरों से मृत्यु हुई- अर्थात् इस साल मोटरों ही १७,४०० फी मृत्यु हुई। मोटर को सेज चलाने में मजा आता है वह भला अपने बेसे इन्सान की जिंदगी की परवाह करने पर कहाँ मिल सकता है ? केवल न्यूयार्क में ही प्रति वर्ष ३०० पच्चे मोटरों के नीचे धजाते हैं, शिकागो में २५०-इन दो शहरों में हा ५५० पच्चे प्रति वर्ष मोटरों के नीचे कुचले मासे है। इस हिसाब से अमेरिका में ७००० पञ्चे मोटयें की दुर्ष- टनामों का शिकार पनते होंगे । 'नेशन' पत्र का सवाववासा लिखवा है कि यदि टर्क लोग प्रति पर्प ७००० इसाधनों को इस प्रकार प्रस्त कर दिया करें, वो भी क्या हमारा खून इसी प्रकार ठग पढ़ा रहे १ अमेरिका में चोरी, साफे से सपधि का जो नुक्सान होता है वह मी सापारण नहीं है । लड़के-लड़कियाँ रिपास्वर लेकर गारियों को सदा कर लेती हैं।

१३२ मदर-इंडिया का जवाब गाड़ी को लूटना इसना बढ़ गया है कि पिछले दो सालों से पोस्ट आफिसों ने रजिस्टर्ड-मेल को राम की गाड़ी से मेजना ही घद कर दिया है। दिन को भी स्टेशन पर साक पहुँचानेवाली गाड़ियों पर पदूकों का पहरा रहता है। पिछले भक्तूपर से पोस्टन का पड़ा पोस्ट आफिस और उस शहर के छोटे-छोटे ८३ आफ्रिस किले के ढग पर बनाए गए हैं, जिन पर कहा पहरा रहता है। पोस्ट माफिस की रसीदों को लोहे फी गाड़ियों में ले जाया जाता है जिनके साथ चार-चार पद्- कधी जाते हैं । स्तुली हुई धारी पर काम करनेवाले साफखाने के प्रत्येक कर्क के पास पिस्तौल रहती है-यह मोस्टन का । १९२५ में सिर्फ शिकागो तया न्यूयार्क, दो शहरों में ही त्रिटिश फनाडा की अपेक्षा ६गुना भाषमी लुटे थे। विलियम पर्स का कथन है कि रेल आदि की चोरी प्रति वर्ष ३० करोड से कुछ ज्यादा होती है। 'अमेरिकन बैंकर्स एसोसिएशन के हिसाप से उन्हीं के अपने प्रादमियों में से ४५५ घोर थे, जिन- के कारण उन्हें २६,७३,४६७ १० का घाटा उठाना पड़ा। इसफा यह अमिप्राय है कि वर्ष के हर-एफ दिन बैंक के भाव- मियों में से ही एफ से ज्यावह चोर पकरे बासे हैं, दूसरे भादमी ओको घोबा दे जाते हैं उनकी गिनवी ही नही।

। अमेरिफा में पाप की पराकामा १५ स्या यही अमेरिका है ? क्या लुटेरापन अमेरिका के जापीय स्वमाव का भग पन गया है? अमेरिका के एक प्रसिद्ध पत्र 'पिजिनेस' में पसवर्ड एच्. स्मिथ महोदय सियदे है कि अमेरिका में ३० अरष रुपया प्रति वर्ष चोरी, दाफा, घोम्या, दिवाला धावि में जाति को खोना पड़ता है । यह सख्या १९२३ फे अमेरिका के भातीय पघट से विगुनी है, उस वर्ष की जावि साधारण आमदनी से भदाईगुनी है, भाभी सया नेपी के धार्षिक खर्ध से धारह- गुनी है । पदि सारे देश को भामदनी ६०-७० खर्य समम्मी साय पो उसफा ६ठा या ७वा हिस्सा है। अमेरिका में 'पोई माफ ट्रेड के नाम से साल में ६ भरप रुपया ठगा जावा है, साद ३७ करोड़ गवन होता है। १ भरम सादे समा- पन करो, सेंध लगाफर, ३० करोड माली दस्तखतों से , १ भरय २० करोड मूठे दिवाले निकालकर , ४५ फरोप पसूस म होनेवाले रुपए के तौर पर, ३० करोड आली हुटियों से, ६० फरोद सरकारी घोरी से जाति का रुपया सीधा पक्षा पाया है। इस धन को रोकने के लिये पुलिस भादि का वर्ष ३ परम प्रति वर्ष है। इसके साथ ही कोर्ट, खेल, पागल- खाने भादि का वर्ष भी बोदना चाहिए । पाप के परमयों का विचार है कि अमेरिका में एक से रोग प्रतिरावक तक .

१३४ ! मदर इंडिया का अपाय जाति में अपराधी लोग हैं । अमेरिका में २ वान आदमी अलखानों में हैं । ये दो लाख, असली अपराधियों का श्या हिस्सा हैं । कुल १० क्षाख के लगमग हुए । ये सब लोग मिल- कर बावि का जितना रुपया नष्ट करते हैं उसी का हिसाब ३० अरव वा गया है। फई पापाण-वय अमेरिका, नीमो लोगों को जीधे-जी जना देते हैं, इसे सिंचिंग ( Lynching) कहते हैं । १८८५ से १६१८ वफ २६७७ नीग्रो लोगों को इस प्रकार जलाया जा चुका है। इन लोगों को बिना किसी प्रदालत के सामने लाए जनता ने ही अपने सन्माद में अनाया है। इनकी तालिका ला० लाजपतराय ने निम्नलिखित दी है- सन् सन् १८८५ १८६३ १५४ १८५६ १५६४ , मस्या सख्या - १३४ १८८७ ८० १५१५ ११२ १८५ १८१६ ८० १८८४ १८१७ १२२ १८६० १८१८ १०२ १२१ १८४८ . १८६१ ।१८१२ । ११०० १०७ अमेरिका में पाप की परायाष्ठा! १३६ ८६ ८० सम् सख्या सन् सख्या १६०१ १६१० ११०२ १६११ १६०३ ८६ १६१२ १६०४ १६१३ १६०५ १९१४ १६०६ ६४ १६१५ १६०७ ६० १९१६ १६०८ ४४ १९०६ १६१८ ६४ १९१६ से ३० साल पहले धक, बीविव-दाह की सस्या १०७ मीमो मति पर्प रही है । १९२० से १९२४ तक, पिछले ५ साल में २३४ नीग्रो को जीव-जी बसाया गया है। पार रियासतों को छोड़फर भमेरिफन 'राष्ट्र-सघ' में पिछले ४० पषों से हर-एक रियासत में यह प्रणिय कार्य होता है ! मानष- शरीर को अग्निसास् करने के साथ-साथ अन्य पाशषिक पस्यापार भी किए जाते हैं । पेटनूगा शहर के 'डेला टाइम्स' (१२ फर्षरी, १९१८) में से बीविध-दाह का निम्न पर्सन किवना दिल दहला देनेवाला है- "मिम मैफलहान मीमो को अपादा पहने हुए (Maked -

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१३६
मपर-इंख्यिा का जवाष
Men) लोगों ने समाफर जला दिया । हलायें स्त्री.
पुरुप-पच्चे दृश्य ऐन रहे थे । नीमो का खून लेने
फी पाया आस्मान को फाड़ रही थी। यह रोबर्स का
पासक था । टाईमर्स को उस नीमो ने घायल किया था।
वे दोनों श्वेताग थे। उसे १२ 'मुंह पे हुए भादमियों' ने
सवाफर जलाया और २००० के लगभग स्त्री, पुरुष, पच्चों
ने तमाशा देखा। नीमो को पकाकर ये लोग स्टेशन से २
फलांग की दूरी पर ले गए, वहाँ उसे जलाने के लिये भनि
प्रदीप्त की गई । नीयो को एक वृक्ष से बाँध दिया गया । उसके
पास एक आग की ढेरी तैयार की गई, उसमें लोहे की
राजाका गर्म होने के लिये डाल दी गई। अप वह लाल हो
गई वो जनता में से एक भादमी ने उसे उठाकर नीग्रो के
शरीर में घुसद दिया । यह नामोरर से पागल हो गया,
उसने शलाफा को हाथ से पकड़ा, पर यह हार्थों को पारकर
गई । वायु-महल में जलते हुए मास की वुगंध भर गई। नीमो
का दिल टूट गया । वह चीख-पर-धीख मारकर भास्मान
को फादने लगा । लोहे की लाश शमाफा उसके शरीर के
भिन्न-भिन मागों पर लगाई जाती थी और उसका दन)
शहर में सुनाई दे रहा था । कई मिनटों का यह कार करने,
के बाद एक ने उसके कपड़ों पर तेल डाल दिया, भागलगा
.

।
अमेरिका में पाप को पराकाष्ठा !
दी । भाग की लपटों में काला भादमी मलने लगा। उसने
पिंभार-पिंपारफर कहा कि उसे गोली से मार दिया वाय,
परतु उस पर चारों सरफ से सिरस्कार-पूर्ण भट्टहास ही सुनाई
दिया। मन वालाभों ने उसके कपड़ों को भस्म कर दिया
और उसके घेतना-रहित होने के पूर्व ही उसके सिर के
पालों को अक्षाप्ती हुई अमि-शिखाएँ नीली-नाली दिखाई
देने लगी।"
इस प्रकार का हत्याकांड करनेवालों का भमेरिका में
एक सगठित दल है, जिसे 'एक्लक्स-लैन'--Ku Klux
Klan-फहा जाता है । इस सस्था के लोग एक प्रकार का
सफेद सपादा पहनते हैं । इनका रेश्य श्वेतांग आदि के
प्रमुत्व को, आसक द्वारा, प्रायम रखना है । इस संस्था के
सदस्य, मो-पुरुषों को पुरा से मासे हैं, भलग से आकर
उन्हें पाटवे हैं. उनके शरीर पर कोखटार मलते हैं, उन्हें
गोसी से मार डालते सया फांसी पर लटका देते हैं । इस
गुम सस्था को १८६६ में कुछ युवकों ने जारी किया था।
कुम देर शांत रहने के पाए १४१५ में कनैक विलियम जोन्स
साइमन ने इस सस्था को मागृत किया। पित्रले दिनों समा•
पार-पत्रों से प्राप्त हुभा कि इसकी भमिनेत्री एक महिला
है, जिसका नाम इतिवेथ टाइमर है। यह इस सरमा की

१३८ मदर-इंडिया का जवाप । 'महारानी' फहलाती है। इसकी अध्यकृता में ही सब कर फर्म होते हैं। संस्था में अमेरिका के ऊंचे-से-ऊँचे पदाधिकारी गुप-चुप शामिल हैं। ५ लाख के लगभग -इनके सदस्य है जिनमें खेद नाख के करीम लिया है। आतफ तथा जम्बलता का ऐसा राज्य उस देश में दिखाई दे रहा है जो ईसाइयत की उच्च सभ्यता के अभिमान से सिर ऊँचा करने का साहस फरसा है , अहाँ की मिस मेयो है। २ सभ्य संसार में 'थछूत'! इसमें सदेह नहीं कि अपने भाइयों को ही 'अछूत' कहने- वाले ससार में अकेले इमी है। इसका प्रायश्चित्त हमें मोगना पर रहा है, और जप तक इस फलक को हम दूर नहीं कर लेने, सब तक ईश्वरीयन्याय में हम दस भोगते रहेंगे। परख मनुष्य को 'अछूत' समझने का पाप सपूर्ण श्वेतांग-ससार में हो रहा है। गोरी जातियों ने काफी भातियों के साथ क्या पाप किया और कर रही है, यह ससार के इतिहास में सब- से कामा पना है। नीमो लोगों के साथ अमेरिका में क्या-क्या अत्याचार नहीं होते रहे । श्वेतांग लोग कह रहे कि नीमो में मात्मा नहीं होती, वह चिपांझी का नजदीकी रिश्वेदार है। नीमो को बेचा माता रहानीलाम किया गया। भाज, अब ।

. सून, १९२६ के 'मोहन सभ्य संसार में 'अछूत । कि इस बासि में पदे-पड़े डॉक्टर, पैरिस्टर, व्यापारी भी हो गए हैं. उनके कई विश्वविद्यालय खुल गए हैं और कई अहास पलते हैं, अमेरिका के ७२ प्रतिशतक नौया लिस-पद सफसे हैं, भाज उनके साथ अमेरिका का मभ्य समार क्या पताष कर रहा है। अभी जीवित-दाह का हदय-वेधी वर्णन दिया जा घुका है 'अमेरिफा में इस समय नीपो के लिये अलग होटल पने हुर है, अलग गादियाँ हैं, जिन पर लिखा है, 'फेवल नीयो के लिये', भलग शिक्षणामय है। रिव्यू' में "Tho TV orld To-morrom' में से निम्न स्वरण दिए गए “हाम ही में क्रिश्चियन हैराट' का विज्ञापन देखकर पैन- स्टाइन में पादरी का काम करने के लिये एक प्रार्थना पत्र भाया । प्रार्थी को न्यूयार्क मुसा लिया गया । उसके वहाँ पहुँचने पर माराम हुमा कि यह काला धादमी (नीमो) है। उसे वापिसी का खर्च देकर लौटा दिया गया। "एक विज्ञापन छपा-'भावश्यकता है फैक्टरी में काम करनेवालों की । केवल अनुमयी लोग घरख्वास्त में । श्वेतांग को २४ डालर, फालेको २० बगलर प्रति सप्ताह ।' "दव-वैयों का एक सम्मेलन होना था। सम्मेलन के कुछ दिन पहले काले दस-वैचों को मनके हमपेशा षेवाग पैचों -

१४०
मघर-इंडिया का जवाब
ने कहला भेजा कि यदि वे सीदियों पर बैठना पसद करें,
तो पड़ी खुशी से सम्मेलन में पा सकते हैं ।
"साग्य करोलिना में एक श्वेतांग ने एक मोटर चुरा ली,
उसे ३० दिन की कैद दी गई , उसी दिन उसी जन ने
एक नीमो को साइकिल चुराने के अपराध में ३ वर्ष फा
कठोर फारावास दिया ।
"एक शिक्षिस नीमो फ्रांस के विश्वव्यापी युस में 'मनुष्यों
के अधिकारों के लिये जान को हथेली पर रखकर सदा ।
लौटकर थाने पर यह सिविल सर्विस के इम्तिहान में
पेठा । उसके नबर ६८५ प्रतिशतम आए , सबसे पहला
रहा । नौकरी के लिये जब यह दप्सर में गया, वो यहाँ कार्य
फरनेवाली स्त्री उसे देखकर दातों-वले जीभ दवाने लगी,
क्योंकि वह तो काला आदमी निकला । उसे नौकरी नहीं
दी गई, एफ दूमरा श्वेवाग, जो ७५ प्रविशतक से पास हुआ
था, भर्ती कर लिया गया !
"नीप्रो-कॉलेज की एक नामो-अध्यापिका शहर से बाहर
एक रास अपने माई के यहाँ गई । उसका भाई बड़ा कस्कार्य
जमीदार था। उसकी रुई की फसल को देखकर गोरे जमींदारों
की छाती पर सॉप लोट गया । थे उसकी फसल को भाग
लगाने की सोचने लगे। इसी रात को भाई-बहन ने घर के

सभ्य संसार में 'अछूत'! १४१
पाहर कुछ भाषायें सुनीं । माई बाहर गया ,
इसने में पहन
को गोली फी भाषाप्त सुनाई दी । उसने बाहर खाकर
देखा, वो उसका भाई मरा पड़ा या । यह अपने भाई के
पास खड़ी ही थी कि गोरों में से कुछ ने चिक्षाफर कहा-
'इसे भी साफ कर चलो " यानेदार ने आगे पढ़कर
उसे पचा लिया और वह भली भाई को गादी में रखकर
शहर में ले गई।
"एक श्वेतांग सरकी पर भाक्रमण करने के अपराध में
एक नीमो को देसावर में फांसी दी गई। असामामा में दो
गोरों ने काली कदकी पर हमला किया-एफ-एक को २५०
सर जुर्माना करके छोड़ दिया गया।
"गल्फ स्टेट की एक भयापिका कॉलेज में पढ़ाती थी।
उसने नामो विद्यार्थियों की काम्फ्रेंस में भाग लिया, उनके
साय मोबन मी किया। नतीजा यह हुमा कि ससे स्याग-पन्न
देना पड़ा । उसने त्याग-पत्र देते हुए कहा कि कान्फ्रेंस का इसना
मूल्य या कि उसके लिये स्माग-पत्र का पणि ही महीं।"
रखेवाग लोगों के व्यवहार को घेसकर मीमो-मावि का
पदप पिशुन्य है। उसमें क्या-क्या उमार भा रहे हैं,
इसका चित्र एक नीमो मे ही नींपा है। इनका माम
है 'परगार पोयस' 1 'Darl Water' नामक पुस्तक के

१४२ मदर इंडिया का जवाब । "The soul of White rolk' अध्याय में ये नामो लिखते हैं- "मैं अपनी छत पर बैठा मानव-जाति के समुद्र को थपोरे मारते हुए देख रहा हूँ। कई प्रात्माएँ दिखाई दे रही है , ये पाती हैं, जासी है, घुमरघेरी में चक्कर काटती हैं, परतु मेरी टिफटिकी श्वेवाग महाप्रभु की आत्मा पर गही हुई है। "श्वेतांगों की आत्माओं का मुझे पर्या-पर्वा दिवाई दे रहा है । मैं इन प्रात्माओं का चोला प्रसारकर, उमाट-फेरफर उन्हें आगे-पीछे से देख रहा हूँ। उनके पेट में जो बात छिपी है, वह भी मुझे दिखाई दे रही है । मैं उनके एक-एक मनोमाष को पढ़ रहा हूँ, उन्हें भी मालूम है कि मुझे उनका सय हाल झाव है इसीलिये सोधे कमी घषमा उठते हैं, कभी फ्रोध में एपल पड़ते हैं। ये कह रहे हैं, मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं, उनके शब्दों में में सृष्टि का कसक हूँ। मैं सन पर खीम- खीमकर रह जाता हूँ, मेरी आत्मा में निराशा छा जाती है। वे आगे-पीछे भटकते हैं, चिल्लाते हैं, धमकाते हैं, उपदेश देवे हैं. सच्चाई को लिपाकर अपनी प्रास्मा के गवेपन को छिपाना चाइसे हैं, परसु मैं उनके सब पर्यों को तार-उसार कर देख रहा हूँ--मोहो, वे संख्या में कितने हैं, और मनुष्य होते हुए भी कितने फत्सित और पवित है!

सभ्य ससार में 'अछूत'।
१४३
"परमास्मा के दिए सप रगों में गोरा रग ही सर्वोत्कृष्ठ है,
यह विचार हरएक गोरे रगवाले के मस्तिष्क में अमिट छाप
की सरह मुद्रित है। इसके नतीजे अजीब-अजीव दिखाई दे
रहे हैं। गोरों में से वे लोग, जिनके हदय में कुछ मिठास है,
बप मेरे साय साधारण विषय पर मी पावधीत कर रहे होते
है, वो उनकी मी आवाज में मानो ये शन्द गूंजते है-'मोह,
बेचारी फाली चीन! त् आँसू मत यहा, क्रोध में मत जल
मैं खूप मानता हूँ कि परमात्मा का कहर तुम पर पड़ा है। मैं
नहीं जानता, क्यों, परसु मैं इतना जरूर जानता हूँ कि यह
पाव ठीक है । परतु देख, हिम्मत मत हार | इस पतिवावस्या
में ही अपना काम किए जा, पौर परमात्मा
से
हाथ जोड़कर
प्रार्थना कर, क्योंकि वह यो प्रेम का भार है, कि एक दिन वह
मुझे मी किसी जम्म में गोरा-रग यसशे " मैं पह सुनकर हँसता
नहीं, परतु मैं सीधे शब्दों में पूछता हूँ-'गोरेपन में क्या परा
है कि मैं उसके लिये दुआ करु ?' यह प्रश्न फरखे हुए ही,
'किसी-न-किसी प्रकार, विना बोले किंतु स्पष्ट, मुझ उत्तर दिया
भाता है-'गोरेपन का मसलप है पूप्वी का सदा-
सर्वदा स्वामित्व ! एकाधिकार
निरवाय शासन
भामीन
साध्व-यामिका में भारतीयों के साथ यहाँ के श्वेतांगों
भखर,
-

. १४२ मदर इंडिया का जवाब 'The Soul of White Poll अन्याय में ये नामो लिखते हैं- "मैं अपनी छत पर बैठा मानव-माति के समुद्र को यपोरे मारते हुए देख रहा हूँ। कई आत्माएँ दिखाई दे रही हैं ; वे आती हैं, जाती हैं, घुमरधेरी में चकर काटती हैं, परतु मेरी टिकटिकी श्वेताग महाप्रभु की प्रात्मा पर गड़ी हुई है। "श्वेतागों की प्रात्माओं का मुझे पर्दा-पर्दा दिखाई दे रहा है । मैं इन प्रात्माओं का चोला सवारकर, सलट-फेरकर, उन्हें आगे-पीछे से देख रहा हूँ। उनके पेट में जो पात छिपी है, षह भी मुझे दिखाई दे रही है। मैं उनके एक-एफ मनोमाव को पढ़ रहा हूँ, सन्हें भी मासूम है कि मुझे उनका सप हाल भाव है इसीलिये तो कभी घषमा उठसे हैं, कभी कोष में सपा परसे हैं । वे कह रहे हैं, मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं, ननके शब्दों में में सृष्टि का फलक हूँ | मैं उन पर सीमा स्त्रीमकर रह जाता हूँ. मेरी भास्मा में निराशा मा मासी है। वे आगे-पीछे भर्टफसे हैं, चिल्लाते हैं, धमकाते हैं. सपदेश देते हैं. सच्चाई को छिपाकर अपनी प्रात्मा के गदेपन को छिपाना चाहते हैं, परंतु में उनके सब पदों को संवार-सवार कर देव रहा हूँ-पोहो, ये सख्या में कितने हैं, और मनुष्य होवे हुए मी किवने कुत्सिव और पसिव है। , -

।
सभ्य ससार में 'अछूत
१४३
"परमात्मा के दिए सब रगों में गोरा रंग ही सर्वोत्कृष्ट है,
यह विचार हरएक गोरे रगवाले के मस्तिष्क में अमिट छाप
की तरह मुद्रित है। इसके नतीने अजीव-अमाव दिखाई दे
रहे हैं। गोरों में से वे लोग, जिनके हृदय में कुछ मिठास है,
बप मेरे साथ साधारण विषय पर भी बातचीत कर रहे होते
हैं, वो सनकी मी आवाज में मानो ये शरद गुमसे हैं-'मोह,
बेचारी काली चीज स् आँसू मत महा, क्रोध में मव जल ,
मैं सूम धानवा है कि परमात्मा का कहर तुम पर पड़ा
मही मानसा, क्यों, परतु मैं इसना शुरूर बानता हूँ कि यह
बात ठीक है । परतु देख, हिम्मस मत हार | इस पविवावस्था
में ही अपना काम किए जा,
और परमास्मा से हाथ मोड़कर
प्रार्थना कर, क्योंकि वह सो प्रेम का मगर है, कि एक दिन वह
मुझे भी किसी चन्म में गोरा-रग परो " मैं यह सुनकर हँसवा
नहीं, परसु में सीधे शब्दों में मचा हूँ--'गोरेपन में क्या परा
है कि मैं उसके लिये दुमा कसे ?' यह प्रश्न करते हुए ही,
किसी-न-किसी प्रकार, पिना योस किंतु स्पष्ट, मुझ उत्तर दिया
खावा है-'गोरेपन
का मतलब है पृथ्वी का सदा---
सर्वदा स्वामित्व । एकाधिकार | भक्षा निरमाय शासन
भामीन
सारप-आफ्रिका में भारतीयों के साय वहाँ के खेतांगों

। . १४२ 'मदर इंडिया का जवाब 'The Soul of White Toki अध्याय में ये नामो लिखते हैं- "मैं अपनी छत पर बैठा मानव-जाति के समुद्र को थपोरे मारते हुए देख रहा हूँ। कई प्रात्माएँ दिखाई दे रही हैं , धे आती हैं, जाती है, घुमरधेरी में चक्कर काटती हैं, परतु मेरी टिफटिकी श्वेवाग महाप्रमु की आत्मा पर गड़ी हुई है। "श्वेतांगों की आत्माभों का मुझ पर्या-पर्वा दिखाई दे रहा है । मैं इन आत्माओं का घोक्षा सतारकर, उलट-फेरफर, उन्हें आगे-पीछे से देख रहा हूँ। उनके पेट में जो पास छिपी है, वह भी मुझे दिखाई दे रही है। मैं उनके एक-एफ मनोभाव को पद रहा हूँ, उन्हें भी मालूम है कि मुझे उनका सब हाल झास है इसीलिये तो वे कभी घषमा ठते हैं, 'कमी कोष में अवम पड़ते हैं। वे कह रहे है, मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं, उनके शब्दों में मैं सृष्टि का कलक हूँ मैं हन पर स्त्रीमा बीमकर रह जाता हूँ. मेरी आत्मा में निराशा छा माती है। थेमागे-पीछे मटकते हैं, चिलाते हैं, घमका है, उपदेश देते है, सच्चाई को छिपाकर अपनी यात्मा फे गरेपन को छिपाना पाहते हैं, परतु मैं उनके सब पर्दो को बार-बार कर देख रहा हूँ-बोहो, वे सख्या में कितने हैं, और मनुष्य होखे हुए भी किचन परिसत और पतित है। H है 'सभ्यता' या 'दुराचार? १४५ भी वे गाड़ी में पैठ नहीं सकीं, उन्हें नीचे उतर जाना पड़ता । सब हिंदुस्थानी 'कुली' कहाते हैं। स्कूलों में पढ़ाई बानेपाली पुस्तकों में साफ-साफ लिखा है कि हिंदु- स्थानी 'कुली' है। केंनिज में पढ़ा हुमा भारतीय जप दाम में पढ़ा जा रहा होता है तो निरक्षर, मूर्ख गोरा ससे 'कुली' कहकर पुकारता है। हिंदुस्तानी सोग नाटकों में नहीं जा सकते, जिन पुस्तकालयों तथा वाघनाक्षयों के लिये उन्होंने पदा दिया होता है, उनमें मी प्रमिष्ट नहीं हो सकते । होटलों में ये खानसामों की हौस यत में ही मा सकते हैं । मिस होटल में मैं ठहरा हुघा मा उसमें कष हिंदुस्तानी मुझे मिलने भाए । वे गिरफे विश्व- विद्यालयों के प्रेजुएट थे, धनी थे, वे मोटरें भी रसते थे, परंसु ने मुझे मिझने होटल के भदर न आ सकते थे, उन्हें मिलने के लिये मुझे होटल के बाहर आना पड़ा । माझीका के गोरे साफ शब्दों में कहते हैं कि हिंदुस्सानी हम सपसे दिमाग में परकर है, भाघार में ऊँघ है, परतु इन बासों के होते हुए भी भाफ्रीका में हिंदुस्सानी भछूत पने हुए है।" ३ 'सभ्यता' या 'दुराचार'? कहा जाता है कि अमेरिका ने शराब का सर्वया पहिष्कार 1 - १४४ मदर-इंडिया का जवाब फा क्या पर्वाव है ? मिशप फिशर ने इस घाव का वर्णन फरते हुए लिखा था- "ट्रांसपाल शहर में विना लाइसेंस लिए कोई हिंदुस्तानी रेल-गाड़ी पर भी नहीं चढ़ सकता । यह लाइसेंस देना एफ गोरे आदमी के हाथ में है। उसे यह अधिकार होता है कि जिस हिंदुस्तानी की दुकान को चाहे शहर के एक हिस्से से उठवाफर दूसरे हिस्से में ले जाने का हुक्म दे दे । यहाँ हिंदु- स्वानी पछा मफान नहीं पनपा सकते, क्योंकि उन्हें जब-कमी जगह छोड़ने को कहा जा सकता है । ट्रासपास के एक गरे हिस्से में सप मारतीयों के लिये अलग स्थान कर दिया गया है। उन्हें वही रहना होगा, परतु यहॉ पर भी सन्हें स्थिर जाय याद बनाने का कोई अधिकार न होगा। यदि कोई वहाँ पर मी पणा मकान बना लेगा, तो उसे यो वर्ष पाद भी जगह छोड़ने पर बाधित किया जा सकता है। प्राचीन रूस में,जो हालत यहूदियों की थी, यही हाल माज मारतवासियों की दासपाल में है। ट्राम-गाड़ी में जाते हुए भी इसी प्रकार के अमानुपिक नियम दिखाई देते हैं। सारी दामनाादी में केवल तीन हिंदुरसानी पैठ सकते हैं । मारत की धियाँ गोद में पवा लिये दाम पर पढ़कर पदि देखें कि उन तीन स्थानों में से कोई खाकी नहीं है, वो सारी ट्राम के सुनसान परे रहने पर , 'सभ्यता' या 'दुराचार १४७ से ५ दिसयर, १९२७ का सार अभी समाचार पत्रों में छपा है कि शराब न पीने के कानून का भग करने के अपराध में ५४ लास्त्र पौंड जुर्माने फे सौर मे वसूल हुआ है । अब से शराब पीना पद हुमा है तब से २२,२३,००० भादमियों को इस अपराध में पकाटे जाने के कारण पर मिला है । क्या इसी का नाम शराप का बहिष्कार है? क्या यही अमेरिका की विशाल सभ्यता है ? न्यूयार्क के 'हेरॉस्ट ट्रिब्यून' में १९२४ में रिचमह पीयर- सन होम्सन महोदय लिखते हैं कि मारे पश्चिमी योरप में इसनी हस्याएँ नहीं होती जितनी अमेरिका के केवल एक शहर में । कारण क्या है ? सनका कथन है कि पिछले १० साल से भारफा में हीरोयन ( Heroin ) नामक नशे का, खो अफीम से पनसा है, प्रचार दिनोंदिन बढ़ रहा है, इसीलिये निकटतम पापों की सस्या भी अमेरिका में बढ़ती चली मा रही है । इस नशे का पापप-रूप से ही कानूनन उपयोग हो सकता है, परंतु म्यूयार्क में ७६,००० पौंस हीरोयन वर्ष हुई, जिसमें केवल १२ माँस रोक्टरों ने खर्च की थी, माकी मरो-घोरों ने । अमेरिका में १० बास्त्र युवक जिनकी भायु २३ वर्ष से कम है, इसका इस्तेमाल चोरी पोरी कर रहे हैं। नपबर, १९२७ के मॉडर्न रिव्यू में इसी म्यूयार्क हेरेस्क-

-
.
१४६
मदर-ईडिया का जवाब
फरके सभ्य ससार के सम्मुख आदर्श स्थापित किया है।
परतु अमेरिका में शराब का कानूनन निषेध होने पर भी
१९२४ में ३८॥ प्रतिशतफ अमेरिका शराब में गोते लगा
रहा था । २३ शर्वरी, १९२४ के 'लिटररी बाइजेस्ट' से सात
होसा है कि शराम को देश में आने से रोफने के लिये ४०००
सरकारी कर्मचारी ये, परतु ४३ पर रिश्वत लेकर शराय
लाने देने का दोप लगाया गया, जिनमें से २३ पर दोप सिद्ध
भी हो गया । 'प्रोहिविशन कमिजर' मि० हेनीज फा कथन
था कि यह सख्या साधारण है, परतु इस पर मि० फौक ने
कहा, यदि ४३ पर रिश्वत लेफर शराम लाने देने का दोष
लगा है वो कितने ही अफसर ऐसे होंगे जो अपनी चालाकी
से पकड़ में नहीं पाए होंगे उनकी संख्या, पकड़े जाने-
पालों की संख्या से, अवश्य अधिक होगी । भीमती मेषक
पाकर विलस ने इस सबंध में ओ जाँच की, उसके अनुसार
विहाई से ज्यादह अमेरिका भी शराम में
कैलीफोर्निया में कई स्थानों पर ८५ प्रतिशतक, भोरेगन,
वाशिंगटन, मौन्टाना, नौर्यरेकोटा, मिनेसोटा और मिचिगन
में ५० प्रतिशतक, म्योगिया में १० प्रविशक्षक, प्रलोरिसा में
७५ प्रवि रासफ; सियाना में १० प्र० श०, न्यूयार्क में ९५
प्र० श० शराप पहिष्कार के बाद भी चल रही है ! न्यूयार्क
स्वा हुमा है।
-

'सभ्यसा' या 'दुराचार'१ १४९
से कार्तिक मास की 'सुधा' में निम्न उदरण लिया गया है,
जो 'सम्पमा' का गग अलापनेपाले देशों की सभ्यता पर
काफी टीका है-

१४८
मदर-इंडिया का जवाब
"
ट्रिब्यून' में से निम्न उद्धरण लिया गया है-Then over
1200 young people between the ages of 16
and 24 take their own lives in
one year (in
America), when with the present rate of statis
tios, overy murriage will end in divorce in eleven
years, when 80 per cent of all orimes are com
mitted by children under eighteon , when 48
per cent of unmarried mothers are school girls
under sixteen, is it not time to ring the chan
ges on self denial instead of self-expression
"अप अमेरिका में १५ से २४ वर्ष की आयु के १२००
युवक एक साल में आत्मघात कर रहे हैं जब पर्वमान गणना
के आधार पर विचार करने से ११ साल में प्रत्येक विवाह
का तलाक हो जायगा, जब सब तरह के पापों का ८०
प्रतिशत हिस्सा १८ वर्ष से कम भायु के युवक कर रहे
हैं, जव भविवाहिता कुमारियों में से, सो माता पन जाती
है उनमें से, ४२ प्रविशतक सम्या १६ वर्ष से कम आयु
की, स्कूल जानेवाली लड़कियों की है, वप क्या यह उचित
प्रतीत नहीं होगा कि अमेरिफा भपने विकास की जगह अपने
को मिटाने की फ्रिफ करे "
'इंगलैंस के समाचार' के सपथ में 'नाइन्टीन्य संपुरी' में
.

'सभ्यता' या 'दुराचार' १४९ से कार्तिक मास की 'सुधा' में निम्न उद्धरण लिया गया है, जो 'सम्पमा' का राग अलापनेषाले देशों की मभ्यता पर काफी दीका है- सन् कुल कितने वो पैम सहवास अषैध सहवास पैदा हुए? से कितने? से कितने १६१४ ८,७६,०६६ ८,४१,७६. ३७,३२६ १६१५ ०,१४,६२४ ७७९,३६१ ५४,२६३ १६१६ ७,५५,५२० ७,४०,५३१ ३७,६८६ १६१७ ६,६८,३४६ ६,३१,३३६ १९१८ ६,६२,६६१ ६,२१,२०४ ४१.४५२ १९१९ ६,६२,४३८ ६,१०,५६२ ४१,७६ यह है इंगस का पदसा हुमा भ्यभिधार ! नववर मास की 'मनोरमा' में 'गुजराती से निम्न पर- रण लिया गया है जो मोरपियन देशों के नैतिक पठन का मगा चित्र मॉखों के सम्मुख स्त्रींच कर रख देता है- "मुमार के पथ पर अग्रसर कहलानेवाले योरप और अमेरिका के सभ्य प्रदेशों में, 'बेटिसमेनी' ग से व्यभिचार- मति के साप वेश्यामों की समस्या भी पेसरह पदवी आ रही है। यहाँ तक कि अब तो इसमे एक खासे व्यापार का रूप ही धारण कर लिया है। भास् , इस बीसवीं शवाग्दी की, 3

-
१५०
मदर-इंख्यिा का अवाप
भन्य की विशेषताओं में गोरी औरतों और लड़कियों का
पेश्या षनकर व्यापार की वस्तु हो जाना एक खास बात है।
समस्त पड़े-बड़े राष्ट्रों के सहयोग से निर्मित 'राष्ट्र-सम' के
सम्मुख जब इस गदगी का नाम शेप करने के लिये एक स्वर
से अपील की गई, तब उसने पफ फमीशन पिठाफर इस
विषय की जाँच कराई । फलवः, फिपनी ही गवाहियों तथा
अन्य साधनों धारा जो विवरण प्राप्त हुए, वह सहसा पोका
देनेवाले है। उसी महासागर में केवल ऊपर तैरते विखाई
देनेवाले कुछ अश य है जो राष्ट्र-सघ के सम्मुख उपस्थित की
हुई 'गोरी लड़कियों के व्यापार' की रिपोर्ट से लिए गए है-
फ्रांस का वेश्या थकला.योरप में वेश्याओं का
व्यापार पदे ही धूम धड़ल्ले के साथ बारी है और बड़े-बड़े
शाखपती एव फोट्याधीश धनिफ इस काम में जी-जान से लगे
हुए हैं। इस व्यापार में उनकी लगभग तीन करोड़ की पूंजी
सगी हुई है। अकेले पेरिम (ोस की राजधानी) में ही
१७००० मकान पेश्याओं के रहने के लिये पाकायदा पाना
देकर सुरक्षित रक्सले गए हैं। एसे प्रत्यक घर में कम-से-कम
३० बषान लड़कियाँ रबन्धी आती है। इस हिसाब से पेरिस
में केवल लाइसेंस-होस्टर वेश्यामों की सक्या ५१००००
(पॉप क्षास दस हजार ) है, दब गुप्त व्यभिचार करनेवाली

का
'सभ्यता' या 'दुराधार' ? १५१
त्रियों का सो हिसाव ही क्या ? इसी प्रकार प्रसेस्स एक
बोटा-सा मगर है, किंतु यहाँ भी धेश्याओं के लिये ७०००
मकान सुरक्षित रक्खे गए है।
सपूर्ण स देश में इस प्रकार के पा जास्त्र मफानों
सेना सो सरकारी दफ्तरों में मौजूद है। इसके भतिरिक
गुप्त व्यमिचारियों की सस्या फिसनी होगी, यह भमुमान से
ही मानी जा सकती है । इसने पर मी सारीफ यह कि एक
वेश्यापों को सरकार की भोर से डॉक्टरी प्रमाण-पत्र भी
लाइसेंस के साथ दिए माते हैं।
अमेरिका में दक्षिण अमेरिका में भी पह व्यापार
कम नहीं है । वहाँ के अकेले युएनों पेरिस नाम के शहर
में पेश्याओं के लिये २० हजार घर सुरक्षित हैं। मर्यात्
यहाँ भी ५-६ सान सड़कियाँ इस घदे में लगी हुई है। इसी
प्रकार सिमेनेरा, मोटे विडियो, मेक्सिको सिटी और पनामा-
जैसे शहरों में भी इस म्यवसाय का माजार गर्म है।
मूख संचालक पेरिस-पितु इन सप गोरी पेश्यामों
या युवतियों के व्यापार का प्रधान केंद्र पेरिस ही है।
और वहाँ यह फाम व्यवस्थित एम विज्ञानसिद् पति पर
पसाया जाता है ! इसके लिये स्वसत्र माफिस खोलकर
पपी-बड़ी सनस्मा पानेवास भधिकारी भी नियुक कर
.

१५२
मदर-इंडिया का जाप
दिए गए हैं। ये पाकिम वहाँ नाटक-सिनेमा की एजेंसियों
के नाम से प्रसिद्ध है और प्रत्येक व्यापारिफ फर्म की सरह
इन एजेंसियों में मोटर, टेलीफोन आदि व्यवहारोपयोगी
साधन भी रफ्वे जाते हैं। प्रत्येक देश की राजधानियों में
इस उद्योग की शाखाएँ खोल दी गई हैं और इस विभाग
के अधिकारी लोग आवश्यकतानुसार नई गोरी लड़कियों
उन प्रत्येक स्थानों में भेमते रहते हैं।
सन् १९२६ ई० में जर्मनी की राजधानी मर्लिन नगर में
इस व्यापार के लिये ७५,००० सदकिया एकत्र की गई थी,
मौर षे सय, जहाँ-वहाँ से लुभा-फुसलाकर लाई गई थी।
इन सहकियों का मूल्य शरीर की पनावट और चेहरे के
सौंदर्य पर लगाया जाता है, और २० पौर ( ३०० रुपए)
से लगाकर २०० पौंड ( ३ हजार रुपए) तक में पेची
माती हैं।"
रूस का हाल योरप के सम देशों से विचित्र है।६ अगस्त,
१९२७ के "लिटररी साइजेस्ट' में मानस महोदय रूस के
विषय में लिखते हैं-
"यपि त्री-पुरुष शादी करना चाहें, वो वस, पच्छा' ही
कानून के लिये काफी है। वे चाहे वो ससे रजिस्टर में वर्ष
करा दें, चाहे म कराएँ, यह मी 'इच्छा' पर निर्भर है।
-

"श्वेयांगों का मार" सोमवार को शादी दोषी है, मगमवार को समाफ हो जाता है ! १९२६ में १,००,००० त्रियों को उनके पति छोड़ गए, १०,००० बियों कपों को 'सपना' स्वाफार करनेवाला कोई नहीं मिला; १८,००० नियों ने अदालत में दरख्वास्त दीफि उन्हें अपने पसियों से पयों के भरण-पोपण के लिये खर्चा दिलवाया जाय । इस प्रफार २,०८,००० त्रियों का कुछ ठिकाना नहीं मालूम पड़ा। ये अक सरकारी कागजों के हैं, और जो सम्मा सरकारी कागजों में आने से रह गई है, उसका दिसाप ही नहीं। दो मास, भाठ हजार खियों की सखान का मरण-पोपण कौन करेगा ? रूस में लावारिस परे, मो इसी प्रकार की सोमवार की शादी पौर मगलवार के समाफ से पैदा हुए है, ४० लाख की सक्या में मौजूद है। सम्यतामिमानी देशों के मुख पर मह कालिख पुती देख- कर स्वामापिकतया प्रश्न होता है, यह 'सभ्पवा' है या 'दुराधार' ४ श्वेतागों का भार" गरीब पर गोरी दुनिया को यह वीन पिंसा हर समय व्यपिस किए रहती है कि ससार की रंगीन (लाल, पीली और काली ) नावियों का मसभ्यता की दमदम से किस १५४ मदर-इंडिया फा अवाय । प्रकार उद्धार किया जाय। इस पिता के भार से गोरीमावियों के लिये पाराम करना हराम हो गया है। वे हर समय अपने को इस भार से दया हुआ अनुमष फरसे है; भपनी इस धीन चिंता को वे लोग-"Whiteman's Burden"- इस नाम से पुकारते है । रगीन आवियों को सभ्यता का स्वर्गीय प्रकाश देने का कार्य योरप की भिन्न-भिन्न जासियों ने आपस में बाँट रक्खा है । यहाँ पफ कि योरप का नन्हा-सा बच्चा येलजियम मी, जिसकी मायावी ३० लाख से अधिक नहीं है, अपने उत्तरदायित्व फो भक्षी प्रकार निभाने का यम कर रहा है । काँगो के काले 'निवासियों को सभ्यता का पाठ पढ़ाने के लिये लाजियम के रपर-सोटरों ने काँगों-त्रियों के स्वन कटषाए, पचों और नौजवानों के हाथ- पैर कटवाए, यूद्रों को कोरे लगषाए, उनकी नियों का सतीत्व नाश किया, पिताओं के सम्मुख लड़कियों को अप- मानिस किया । यह सब इसजिये किया गया कि यहाँ के असभ्य निवासी रघर की उत्पत्ति करते हुए मशीन की तरह काम न करके भूख, प्यास, यकावट भादि की शिकायत करते थे। यह वो प्रापशक्ति बेलबियम की मास हुई। यहाँ हम, नमूने के घोर पर, ठा० पीलाल एम० ए०॥ बैरिस्टर के प्रमा' में प्रकाशित छ लेखों रेमाघार पर - "श्वेतांगों का भार" १५५ ३-४ मुख्य-मुख्य गोरी जातियों के शुद्ध मिष्काममाष से रंगीन जातियों की सेवा के लिये किए गए कार्यों का वर्णन करेंगे। मिस्र- -क्या हुमा यदि एक समय मिस्र (इजिप्ट ) संसार के सम्यवम देशों में था । उस समान को तो अब ५ हजार साल पीव गए । यहाँ के समस-मस्तक-पिरमिट और हजारों सालों तक सुरतिस पड़ी रहनेपाली लाशें मिस्री लोगों के रंगीन होने के भारी पाप का तो प्रतिकार नहीं करती अतएव योरप-निवासी मिस्र को सभ्यता की शिक्षा देने फो व्यग्र हो उठे । १६वीं सदी में, जरूरत पड़ने पर, अब वहाँ के राजा इस्माइल ने यारपियन साहूकारों से ८ करोड १० लाख रुपए उधार लिए, तब उन्होंने उमसे बेईमानी फरके १४ करोड ४० लाख की रसीद लिखा ली । इसके पाद, राखा के वैयक्तिक कर्म को मारे देश पर लादकर मिस्र को अपने घगुल में फंसा लिया गया। इस्माइल के बाद १८८० में जप खदीप राखा पना, वो प्रथा का असतोष देखकर ग्सने शासन में सुधार करने का निश्चय किया । परतु, इन सुधारों से गोरे लोग मिस्त्रियों को सभ्यता का पाठ न पढ़ा सकसे घे, भव रामा को बहकाया गया । राजा मे प्रया परवीन दमम-नीति का पक चलवाकर मिल का पार्षिक 4 १५६ मदर-दडिया का जवाब प्रयघ इंगलैंड और फ्राम ने अपने हाथ में कर लिया। प्रसा का नेता परापी-पाशा था, उम पर तथा उसके अनुयायों पर इन लोगों ने मारी अत्याचार फराए । माय ही मिन के सच्चे समाचारों से ससार को अपरिचित रखने के लिय रुटर सया हवाम फपनियों को १२०० पौड ( १८ हजार रुपया) पार्पिक की रिश्वस दी गई । खदीय जब कमी प्रजा-पक्ष की घरफ मुकता था, सब उसे सब उपायों से भदफाने का यन किया जाता था। इस काम में एसवर्ड फालविन ने बड़ी बसता दिखलाई । कालविन अपनी धूर्तता तथा चालवाणी के बारे में स्वयं कहता है कि "पूर्षी लोगों को हमसे अधिक चासाफ समझना लोगों का भ्रम है। यदि कोई अंगरे पालों से मान- फारी रस्त्रखा हो, तो वह अपनी चालाकी से खूप छका सकसा है । सप फमी हमसे इनका मुनायित्ला हुआ, वो ये लोग घूर्वता और छत में हमारे सामने निरे बच्चे प्रतीच हुए।" उक्त 'घटना के बाद, अम-दिमाग के सिांतानुसार, इंगखैर ने मिस्र मो और फ्रांस ने मोरोको को शिक्षित करने का काम संभाल लिया । इंगट अपना उत्तरदायित्व किस मुस्वेदी से निमाता रहा है, यह बात निम्न घटना से प्रकट होता है- 'सन् १९०५ में पॉप या छ अंगरेजी फौजी अफसर दिनरा- माई गाँव में शिकार खेलने गए । यहाँ माकर वे दो पक्षों "वेगों का भार" १५७ में विभक्त होकर गाँव के पाले हुए कधूतरों का शिकार करने लगे । गाँववालों के मना करने पर साहम लोगों ने नाराज होकर पदूक से गाँव की एफ औरस तथा तीन पुरुष जख्मी किए । गाँववालों ने इस उच्छृखला से ऋड होकर इन अफसरों को मारा और उनकी पर्फे छीन ली । एक मफसर छूटकर भागा , मगर क्षेत्र धूप में भागने स रु सगने के कारण यह मर गया । इस पर फौषवाले दूसरे सिपाही गाँववालों के साथ मनमाना भत्याचार करने लगे। एक सास प्रदासस मैठाई गई, जिसने चार भावमियों को फाँसी की, या और दो गाँववालों को जन्म-भर कामा पानी से लेकर ५० मेंद की सजा दी। इस प्रकार इंग की सभ्यक्षता में मिस्र को सभ्य बनाने का कार्य पत दिनों तक पलसा रहा। ईरान-महास्मा परपुरयू, रोनसावी, हाफिम, फिर- दौसी तथा उमर खय्याम की अन्मभूमि ईरान मी एशियाई भयवा रंगीन होने से पहसी है । उसे सभ्य करने का मार रंगस मे उस दिन से अपने ऊपर लिया, जिस दिन ईरान- नरेशनसीरुद्दीन ने १५हप्पार पौर वार्षिक पर टासवक-नामक अंगरेप को देश के वमा का कुल म्मापार सौंप दिया । अपनी मूस मासूम पड़से ही नसीरुदीन ने ठेका वापस लेना १५८ मदर-इंडिया का जवाब . चाहा, परंतु इंगलैंड बीच में कूद पड़ा । कहा गया कि ७५ लाख रुपया हर्जाने के तौर पर देफर ही ठेका तोड़ा था सकता है । कोश में रुपया न होने से 'इपीरियन बैंक ऑफ पर्शिया' से, जो अगरेजों का वैक था, यह रफ्रम शाह को दिलाई गई। इस प्रकार केवल सूद के रूप में ईरान पर ४॥ लाख रुपया सालाना देने का भार पिना कारण साता गया । अगले शाह मुजफ्फरदीन ने रूस से ३ करोड रुपया फर्म लेकर टालषक से पीछा छुड़ाया, परन्तु एफ नई भाकत खड़ी कर ली। इसके फलस्वरूप, रूस ने ईरान से कर वसूल फरने का कार्य अपने हाथ में लिया । १६०२ में मूत्र मुजफ्फर- दीन ने सीन करोड़ रुपया रूस से फिर उधार लिया। प्रजा में असतोप बढ़ने लगा, लोग पार्लियामेंट की मांग करने लगे, शाह ने प्रजा की बात मानकर पार्लियामेंट खोल दी, परंतु इस पीच में शाह की मृत्यु हो गई। अगला शाइ पार्लियामेंट के विरुख था, जनता में असतोप पड़ने लगा । इधर १९०७ में रुस तथा इंगलैंड ने ईरानवालों के विना माने ही भापस में यह समझौता कर लिया कि उसरी ईरान में इंगलैंस हस के कार्य में इस्ताप न फरे, और दक्षिण में इंगट मो पाए सो करे। ईरानी प्रजा में इस समझौते के कारण और भी अस-- खोप फैला । पार्लियामेंट ने शाह को पेश की पास मानने का

"श्वेतांगों का भार
।
नोटिस दिया, इस पर गिस और रूस दोनों ही शाह की आर
में पार्लियामेंट पर पिल पड़े। पार्लियामेंट पर गोलियां चलाई
गई, नेता कैद कर लिए गए। इंगलैट तथा रूस के जगी
महा ईरान के समुद्र में दिखाई देने लगे। दाल में फाला
घेनकर राष्ट्रीय दल ने सेहरान पर पढ़ाई करके शाह को
उतारकर १९०६ में अहमदशाह को गद्दी पर बैठाया । देश
का शासन पार्लियामेंट द्वारा चलने लगा। नया प्रबंध होने
के कारण धन की आवश्यकता थी, परतु इंगलैट और रूस
योरपियन महाजनों से रुपया दिलवाने में रोड़ा पटकावे ये।
अस में अमेरिका ने भार्थिक सहायता दी। ईरानी
प्रजा-सत्र का काम सममता देखकर रूस ने पदच्युत
शाह का पक्ष लेकर पार्लियामेंट से शाह की वैयक्तिक सपधि
पर अधिकार माँगा भौर 'मल्टीमेटम दे दिया | ईरान के
इस्लीन घरानों की ३०० महिलामों में पाक्षियामेंट के भधि-
घेशन में जाकर प्रधान से ईरान का गौरव पचाने का पीरवा-
पूर्ण अनुरोध किया। इन वीर देषियों ने यहाँ सक कहा कि
पदि पार्मियामेंट देश के मान की रक्षा में कुछ भी कसर
छोमेगी तो हम सप भपने हाथों से पुत्र, पति सथा पिता को
मारकर स्वय भी मर जायगी। परिणाम यह एभा कि सस
ने वेहरान पर पढ़ाई कर दी और प्रविष्ठित नेवाभों के टुकड़े-

१५८
मदर-इंडिया का जवाब
चाहा, परंतु इंगलैंड पीच में कूद पड़ा । कहा गया कि ७५
मास्न रुपया होने के चौर पर देकर ही ठेका तोड़ा मा
सकता है। कोश में रुपया न होने से 'इपीरियल बैंक
बॉफ पर्शिया' से, सो अंगरेजों का बैंक था, यह रकम शाह
को दिलाई गई। इस प्रकार केवल सूद के रूप में ईरान पर
४|| लाख रुपया सालाना देने का भार विना कारण डासा
गया । भगले शाह मुशाफरदीन ने रूस से ३ करोड़ रुपया
फर्ज लेफर टासषक से पीछा छुड़ाया, परतु एफ नई भाफत
पड़ी कर ली। इसके फलस्वरूप, रूस ने ईरान से कर पसूल
करने का कार्य अपने हाथ में लिया। १६०२ में मूत्र मुजफ्फर--
दीन ने तीन फरोद रुपया रूस से फिर उधार लिया। प्रजा में
असंतोप पदने लगा, लोग पार्लियामेंट की मांग करने लगे,
शाह ने प्रमा की पात मानकर पार्लियामेंट स्त्रोत थी, परंतु इस
पीच में शाह की मृत्यु हो गई। अगला शाह पार्शियामेंट के
विरुद्ध मा, मनमा में असतोप पड़ने लगा । इधर १९०७ में
रूस तथा इंगलैंस ने ईरानघालों के विना साने ही आपस में
यह समझौता कर लिया कि उत्तरी ईरान में इंगलैंड रूस के
कार्य में एस्ताक्षेप न करे, और दक्षिण में इंगलैंड भो चाहे,सो
फरे । ईरानी प्रजा में इस ममझौते के कारण और भी बस--
तोप फैला । पार्लियामंट ने शाह को देश की बात मानने का
।

-
"खेवांगों का भार"
१५९
1
।
नोटिस दिया, इस पर गोठ भौर रूस दोनों हीशाह की मार
में पाधिधामेंट पर पिल पड़े। पार्लियामेंट पर गोलियां चलाई
गई, नेता कैद कर लिए गए। इंगलैंड सथा रुस के भगी
बापगम के समुद्र में दिखाई देने जंग। दाल में फाला
देखकर राष्ट्रीय दल ने देहरान पर चदाई फरके शाह को
मदारकर १६० में अहमदशाह का गद्दी पर बैठाया। देश
का शासम पार्लियामेंट द्वारा पलने लगा। नया प्रबंध होने
के फारस धन की भावश्यकता थी, परतु इंगलैंस और रूस
योरपियन महालनों से रुपया दिलवाने में रोड़ा अटकाते थे।
मत में अमेरिका ने पार्थिक सहायता दी। ईरानी
मचा-चत्र का काम समजता देखकर रूस ने पदच्युस
पाइ का पप लेकर पार्लियामेंट से शाह की वैयक्तिक सपति
पर अधिकार मांगा और प्रस्टीमेटम दे दिया। ईरान के
उमीन परानों की ३०० महिलाओं में पार्लियामेंट के अधि-
मेंशन में धाकर प्रधान से ईरान का गौरव कमाने का वारसा-
पूर्ण भनुरोध किया। इन वीर देवियों ने यहाँ तक कहा कि
पदि पार्लियामेंट देश के मान की रक्षा में कुछ भी कसर
घोडेगी तो हम सम भपने हाथों से पुत्र, पति तपा पिता को
मारकर सप भी मर जायेगी। परिणाम पर हुमा किस
ने वेदरान पर चदाई फर दी पौर प्रविहित नेताओं के टुको

१६२ मदर-पिया का जवाब की थी । १८६ में अंगरेजों के विरुद्ध चीन में कई स्थानों पर विद्रोह हो गया । इसका परिणाम यह हुआ कि योरप के समस्त डाकुओं ने एक होफर गरीय पीन पर चढ़ाई कर दी। इन सभ्य कहलाए जानेवाले लोगों ने, मो पर्षरता पीन में की, उसका सदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है।"चीन के मदिरों में घोड़े बाँधे गए। चीन की राजधानी पेकिन में एक सप्ताह वफ खूप मार-काट रही । सपूर्ण नगर से हस्त- लिखित फ्रीमती किवायें गाड़ियों में भर-भरकर लाई जाती थी, और राजमहल के ऑगन में उनका ढेर लगाकर उसे आग लगा दी जाती थी 'हसारों अमूल्य पुस्तकें जलाई गई। सारी सड़फ पुस्तकों के फटे और जले हुए पलों से भर गई।" यह कथन सरन-टाइम्स के सपादलासा जॉर्ज किंर का है, मो उस समय पेकिन में ही था । इसी प्रकार हिंसमैन का कयन है कि "चीन में इस युद्ध के अवसर पर लूट-मार करना, भाग लगाना, स्त्रियों का अपमान करना, सनका ससीस्व हरण करना, ये सप घृणित याचें की गई।" इस युद्ध के बाद पीन के बहुत-से भाग को इंगलैंड, रूस और जर्मनी ने परस्पर पॉट लिया। अब फ्रांस और भमेरिका को भी काफी भाग दे दिया गया है। ये सब शक्तियाँ मिलकर पीन को सभ्यता का पाठ पढ़ा रही है

भारत-मारत के विषय में खेसांग महाप्रभुमों का भारी
पोम दाने के लिये भी क्या कुछ सिखने फी पसरत है।
पीछे क्या हो चुका है, इस कहानी मे क्या ? इसपीगी
शताब्दी में मी यहाँ क्या हो रहा है ? वा पाता से पागल
-

१६६
मदर-इंडिया का जवाष
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को दूर नहीं किया जासा, तव वफ, ससार अच्छा हो या
धुरा हो, हमारी सरफ से मिस मेयो की पुस्तक का, पुस्तकों
से जवाथ, असली जपाय नहीं है। क्या हिंदू-जाति मिस
मेयो के चैलेंज को स्वीकार करती है ? यदि हॉ, वो मुझे भी
अपनी माँखों के सामने नध्य भारत का सषकाल दिखाई
दे रहा है।

गंगा पुस्तकमाला की उत्तमोत्तम, उत्कृष्ट और सचिन पुस्तके बासूस की गमी अपमा(सचित्र) ), चिप्रशामा (सचित्र)ym) कर्मफल (सचित्र) 110) बात-कमा-मामा जप स्पोदप होगा ), मगमग मुमार वेसा (सचित्र))) , पतन (सचित्र) my,२) पविका (सपित्र), amy पविन पापी (सचिव) मारपक्पाभ्यूत बहता हुमा म (सचित्र) 290 (सचित्र) २७," मंगर- निग m), बिदा (सपित्र) २), प्रेमांगा (सपित्र)". my मगमग । मेमनापशी (सपिभ),110) रंगभूमि (दो माप) .) प्रेम-प्रसून 10), विचित पोगी D, ५) मंबरी (सचित्र) ayury विनया (सचित्र) 10) सौ ममान और एक सी परित १) सुशान Ju) संसारनहस्प प्रमा 11. भबापतन सय की प्यास कम्पमारी (सचित्र), 10 (सचित्र) १) प्रांगदा (सचित्र) प्रमुख भावाप D, HD मपद्रप-बम me) पपात (सचित्र) , (सचित्र) פרון ,עי वेणी सहार प्रमु चरित्र बुद परिन (सचित्र) 19, " साहित्य-सदर्भ 15,10 संभापण .U परमाता (सचित्र) my, 11) देव और विहारी 210,२७ पसिमता Ha), imej भवभूति 15), 2) भचलायसन H, U हिंदी-मयरन 0 पूर्वभारत IMP, 12) भगवद्रसेन ), an) ईश्वरीय न्याय मारनेगी और उनके विचार Hoj मस्र मन्त्री 15,92) 10," मिस्टर म्यास की या२),) प्राचीन पंरित और रावबहादुर 90 15, 12) सपोधों 15, वंझिमचा घटी P0 विवाह विज्ञापन मुषवि-सफीतन 40 (सचित्र) 19, ily इंगत का इतिहास प्रास्मार्पस (सचित्र))," (सान माग, सचिन) उपा (सचित्र) 2), 10) ३), पराग (सचित्र) "," भापान का इतिहास पुष्पावलि मगमग 100 स्पेन का इतिहास । पूर्व-ममह 10), २७ भारतीय प्रशाम भारत-गीस 11),) (दो भाग) २३), ३) मानस-मुकापसी DU रविरामी जगभग 10 निबंध-नियम ७), रयान (सचित्र) ), nilay विश्व-साहित्य सिामों की कामधेनु (सचित्र) 12) मौदरमंद महाकाम U इपिमिन्न 119), 12) कुपि विधा my,m 1) विदेशी विनिमय फपि । H २) माहिम सुमन हिंदी .

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Mother India Ka Jawab

Author
Pal,chandrawati Lakhan
Title
Mother India Ka Jawab
File name
Mother India Ka Jawab
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2011/01
Publisher
Ganga Pushtak Mala Karyalaya Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546651
Barcode
4990010025105.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
faC0j7KIyFA
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