Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mahatma Kavir

Sharma,ayodhyanath Ji · 2011/04

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महात्मा कबीर
(विश्लेपणात्मक विवेचन)
भूमिका-लेषक
प.अयोध्यानाथ जी शर्मा, एम० ए०
सम्पर-हिन्दी-विभाग, सनातन धर्म पाखेज, कानपुर ।
माननीय सदस्य, हिन्दुस्तानी पॅकेटमी, प्रयाग।
कन्वीनर-पोर्ट घोल स्टडीज, हिन्दी,
আবহবিয়ায়।
श्रीररिरर नियास द्विवेदी

प्रकाराक- श्री मदनलाल सूरी, सूरी प्रदर्स मोरी गेट, लाहौर मूल्य सवा स्पया मायाराम लखनपाल भारती प्रिण्टिङ्ग प्रेस, हस्पताल रोड, माहौर भेट

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भूमिका
हिन्दी साहित्य के उन महाकवियों में से
त की धर्म-प्राण हिन्दू जनता पर आज भी
हो रहा है । क्वीर की सासी एव पदों का
के जीवन की प्रत्येक स्थिति, तथा अवस्था
रहता है । कनीर में पाण्डित्य अधिक
नुभन, लगन, सत्य-प्रियता,स्पष्टवादिता
तनी उच्च कोटि की हैं कि जिनके
शेष स्थान ही नहीं रहता। जिन
सास्वादन किया है वे भली भाति
गर प्रतिमा थी, वे जिस घात को
फिता और धारावाहिक प्रवाह
* ने न तो काव्य-शास्त्र काही
पनी भाषा के परिमार्जन का
थे उसे कहने मे आगा-
इस प्रवृत्ति के कारण हो
यही उन से संतुष्ट थे,
धारणा थी
सी उद्देश्य

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भूमिका महात्मा कवीर हिन्दी साहित्य के उन महाकवियो मे से हैं, जिनका प्रभाव भारत की धर्म-प्राण हिन्दू जनता पर आज भी पूर्ण रूप से लक्षित हो रहा है । कबीर की सासी एव पदो का इतना अधिक प्रचार है कि जीवन की प्रत्येक स्थिति, तथा अवस्था में उनका उल्लेख होता रहता है । कनीर में पाण्डित्य अधिक भले ही न हो, पर उनका अनुभव, लगन, सत्य-प्रियता,स्पष्टवादिता और आचरण की पवित्रता इतनी उच्च कोटि की हैं कि जिनक सामने पाण्डित्य का कोई विशेष स्थान ही नहीं रहता जिन लोगो ने कवीर के काव्य का रसास्वादन किया है वे भली भाति जानते हैं कि उन में कितनी प्रसर प्रतिभा थी, वे जिस यात को कहना चाहते थे उस में कितनी निर्मीकता और धारावाहिक प्रवाह है। इस में सदेह नहीं कि कबीर ने न तो कान्य-शास्त्र का ही अध्ययन किया था और न उन्हें अपनी भाषा के परिमार्जन का ही ध्यान था। वे जो ठीक ठीक समझते थे उसे कहने में आगा- पीछा या सकोच न करते थे। उनकी इस प्रवृत्ति के कारण हो उस समय के हिन्दू और मुसलमान दोनों ही उन से सतुष्ट थे, पर कबीर को इसकी क्या परवाह थी। कनीर की धारणा थी कि वे विशेष उद्देश्य से संसार में आए थे और उसी उद्देश्य

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भूमिका महात्मा पनीर हिन्दी साहित्य के उन महाफवियों में से है, जिनका प्रभाव भारत की धर्म-प्राण हिन्दू जनता पर आज भी पूर्ण रूप से लक्षित हो रहा है। फवीर फी साग्वी एव पदों का इतना अधिक प्रचार है कि जीवन की प्रत्येक स्थिति, तथा अवस्था में उनका उल्लेख होता रहता है । फीर में पाण्डित्य अधिक भले ही न हो, पर उनका अनुभव, लगन, सत्य-प्रियता, स्पष्टवादिता और आचरण की पवित्रता इतनी उच्च कोटि की है फि जिनमें सामने पाण्डित्य का कोई विशेष स्थान ही नहीं रहता जिन लोगों ने कबीर के काव्य का रसास्वादन किया है वे भली भाति जानते हैं कि उन में कितनी प्रसर प्रतिभा थी, ये जिस यात फो पहना चाहत थे उस में क्तिनी निर्मीकता और धारावाहिक प्रवाह है। इस में सदेह नहीं कि कबीर ने न तो कान्य-शास्त्र का ही अध्ययन किया था और न उन्हें अपनी भाषा के परिमार्जन का ही ध्यान था। ये जो ठीक ठीक समझते थे उसे कहने मे आगा- पीछा या सकोच न करते थे। उनकी इस प्रवृत्ति के कारण ही उस समय के हिन्दू और मुसलमान दोनों ही उन से संतुष्ट थे, पर कबीर को इसकी क्या परवाह थी। कबीर की धारणा थी कि वे विशेष उद्देश्य से संसार में आए थे और # ना की पूर्ति में उन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया था । हिन्दी. साहित्य में सत-परम्परा का स्पष्ट रूप से प्रारम्म फरीर के समय से ही हुआ और उसका उत्तरोत्तर प्रचार बढता ही गया। श्री राहुल साझतायन ने गगा के पुरातत्व अंक में एक लेख द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि कपीर अपनी परम्परा के प्रथम कवि न थे, वरन् उन से पहले बहुत से सन कवि हो गये । परन्तु अभी यह विषय विवादास्पद ही है, और ऐसी अवस्था में कबीर अपने उच्च श्रासन से व्युत नहीं किये जा सकते । कबीर न ही हिन्दी मे रहस्यात्मक कान्य-प्रणाली का सूत्रपात किया और इस के वास्तव में वे ही अधिकारी भी थे। उन 2 पदो से यह स्पष्ट सूचित होता है कि कनीर को परम रहस्यपूर्ण शक्ति से साक्षात्कार अवश्य हुआ था। कवीर में गोक्ति नहीं वरन् उन्होंने जो कुछ जैसा देसा मुना और अनुभर क्यिा था उसी का उल्नेख किया है । आधुनिक छायावाद तथा नोबुल-पुस्कार- विजेता पर भी कवीर का प्रभार लक्षित होता है। परन्तु अत्यन्त खद् की बात है कि ऐसे महात्मा और दार्शनिक कवि की ओर जैसा चाहिए था, वैसा ध्यान विद्वानों ने नहीं दिया। समालोचना का तो प्रभाव है ही, अभी तक कौर का ठीक ठीक पाठ भी नहीं मिलता। संकलन-कर्ताओं ने अपनी रुचि अनुसार भाषा में भी परिवर्तन कर दिया जिस से कवीर की वास्तविक भाषा का ठीक ठीक पता नहीं लगता। पनीर फ विचारों में भी स्थान स्थान पर विरोध मिलता है जिसे दख कर कुछ विद्वानो की धारणा है कि कनीर एपेश्वरवाद, अवतार-बाद आदि का समर्थन भी करते हैं तथा खण्डन भी। यदि क्सिी प्रकार कवीर का कान्य-रचना-काल क्रमानुसार रसा जा सकता तो उन के विचारों के क्रमिक तथा उत्तरोत्तर विकास एप विचार-परिवर्तन का पता लग सकता था, परन्तु अभी तो इस प्रोर सफल होने के कोई साधन ही नहीं उपलब्ध प्रतीत होते कवीर पर कार्य करने के लिए इस समय एक प्रकार से सम्पूर्ण क्षेत्र ही पड़ा हुआ है । जिन विद्वानो ने कनीर पर लिखा भी है वह पर्याप्त नहीं है। उन को तो फेवल पथ-प्रदर्शन का कार्य कर भावी लेसको तथा समालोचकों को उत्माहित करने का श्रेय प्राप्त है। मेरे प्रिय विद्यार्थी प० हरिहर निवास जी द्विवेदी जिस ममय अपनी परीक्षा के लिए कीर का अध्ययन कर रहे थे उसी ममय उन्होने हिन्दी के धुरधर विद्वानों और श्रेष्ठ समालोचक प्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल की शैली पर, कबीर पर एफ समालोचना लिसने का न्ढ निश्चय किया। अफाश मिलते ही सम्पूर्ण उपलब्ध सामग्री का अध्ययन कर उन्होने यह आलोचना लिख डाली। हरिहर निधास जी के अध्यनसाय और साहित्य-प्रेम को दस कर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है और उन की भूरि भूरि प्रशसा करता हुआ भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि उन क हृदय में यह प्रेम दिन प्रति दिन उनत होता रहे और य हिन्दी-साहित्य की अमूल्य सेवा करते हुए उसक भण्डार की वृद्धि करन रहें। मेरे लिए पुस्तक के सम्बन्ध में कोई सम्मति देना उचित नहीं है । यह मेरे विद्यार्थी की कृति है और स्वभावत यह मुझे अच्छी ही लगती है, पर यदि विद्वानो ने इस होनहार युवक के इस प्रयास को अपना कर उसे प्रोत्साहन प्रदान किया तो मेरा यह विश्वास इस पुस्तक का लेखक निकट भविष्य मे ही मातृभापा की अत्यन्त सुन्दर थायोजन लेकर A V

।
लेखक न पुस्तक को थठारह परिच्छेदों में विभाजित किया
है और प्रत्येक परिच्छेन को योग्यता-पक निमाहा है। इसक
अन्तर्गत मे भी शीर्षक हैं जिनपर इमरे पहले कभी प्रकाश
नहीं डाला गया है। यापि लेखक न पुस्तक की सामग्री एकत्रित
करने में प्रात पुस्तफी से भी सहायना ली है तथापि उमये विवेचन
का दंग कम और शैली मौलिक है। मैं लेखक के विचारों से
सर ही स्थलों पर सहमत नहीं है परन्तु उनका उद्योग परम सरा-
हनीय है और उन्हाने विचार प लिये साममो उपस्थित कर
दी है।
प्रेस ये भूनों में यह पुस्तक भी नहीं यच सकी है। आशा
कि द्वितीय मस्करण म अशुद्धिया और भूलें ठीक हो जायेंगी।
अन्त में यह अवश्य कहा जा सकता है कि कोर-सम्बन्धी
प्राय सभी बातो का विवेचन लेखक ने इस पुस्तक में किया है।
और यह कबीर परिणार्थियों पे लिये उपयोगी सिद्ध होगी।
-~~-अयोध्यानाय शर्मा
है

लेखक का निवेदन ग्म० ए० की परीक्षा के सम्बन्ध में श्रद्धेय ५० अयोध्यानाथ जी शर्मा के चरणों में बैठ पर मुझे कबीर के गम्भीर और विस्तृत अध्ययन का अवसर मिला था। उसी समय इस पुस्तक का सूत्रपात भी हुआ था। मुझे वडी प्रसन्नता है कि उन्हीं फे आशीर्वाद से अभिषिक्त हो कर यह हिन्दी-ससार के सम्मुख जा रही है। इस पुस्तक की रचना में कसीर का विश्लेपणात्मक दिग्दर्शन फराने का प्रयत्न किया गया है ऐसा करते समय उनके साथ पूर्ण सहानुभूति का भाव रखा गया है, जो सत्समालोचना के लिए श्रावश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। कबीर के बालोचकों को उनके धार्मिक सिद्धान्तों में नितान्त अस्थिरता दिखलाई दी। उन्हें उन धर्म-सिद्धान्त-निरूपण में 'धर्म-सक्ट' ज्ञात हुआ परन्तु इस सहानुभूति ने ही मेरे मार्ग से यह धर्म-सकट हटा दिया और 'फनीर फे राम' में मुझे उनके क्रमिक धार्मिक-विकास के दर्शन हुए। परन्तु इस सहानुभूति ने कहीं भी अंध-विश्वास का रूप धारण कर तर्क की पासों पर पर्दा नहीं डाला है। यदि मैं ने फवीर के गुणों पर प्रकाश डाला है तो उनकी त्रुटियों फे दिसलाने में भी कमी नहीं की। इसके प्रथम तीन परिच्छेदों में क्वीर के व्यक्तित्व, अगले दस परिच्छेदो में उनके धार्मिक सिद्धान्त एव अन्तिम पाच परिच्छेदों में उनके कवित्व का विवेचन किया गया है । इस प्रकार मैंने अपनी शक्ति भर यह पूर्ण प्रयत्न किया है कि यह पुस्तक कनीर की एक सर्वाङ्गीण समालोचना के अभाव की पूर्ति कर सके। इसमें मुझे कहा तक सफलता मिली है इसका निर्णय करना मेरे अधिकार

की बात नहीं, और मिनय अधिकार में है उनकी अनुमतियों स
लाभ उठाने के लिए मैं सदा प्रस्तुत हूँ।
इस पुस्तक पे प्रस्तुत परने में सहाय्य एवं परामर्श दने के
लिए में श्रद्धेय ५० कालोशर जी शर्मा एम० ए०, पल-पल० पी०
(अध्यन, ला विभाग, सनातन धर्म फालेज, पानपुर), भद्रेय ५०
चन्द्रशसर जी पाएडय एमvo, माहित्य-रन, तया बन्धुवर
चिरजीवलाल जी अप्रपाल यी० ए० फाइदय से श्राभारी हूँ।
अपनी पुस्तफ 'कान्यकलाधर' से महात्मा फवीर प चित्र
को इस पुस्तप में प्रकाशित करने की अनुमति दन पे लिए में
पं० रामनहोरी जी शुक्ल एम० ए०, साहित्यरत्न को अपनी
तथा प्रकाशक की ओर से धन्ययाद देता हूँ।
पजाव प्रान्त में महात्मा फवीरदास जी का धार्मिक मसीहा
प रूप में आदर हुअा है । कोई आश्चर्य की धान नहीं यदि उसी
प्रान्त मे राष्ट्र भापा फ सेग-गृत में दीक्षित होकर श्रीयुत सर्वदयाल
जी सूरी ने कयीरदास जी फी यह समालोचना प्रकाशित की।
पुस्तक की वाह्य सजावट का सम्पूर्ण श्रेय इसन प्रराशक श्री सूरी
महाशय को ही है।
प्रियवर 'मिलिन्द' और 'प्रेमी' फो धन्यवाद देफर मैं उनपे
असीम स्नह का अपमान नहीं करना चाहता, परन्तु यहा उनका
कृतज्ञता पूर्वक स्मरण फिर विना समस्त मरे हदय को शान्ति
भी न मिलती।
कई पई कारणा से पुस्तक में छाप की अशुद्धिया बहुत रह
गई है, इसका मुझे खेद है। पाठकों से प्रार्थना है कि वे इसे
शुद्धि-पत्र पे अनुसार ठीक करपे ही पढ़ें।
विद्यामन्दिर,
दिनारा,
विनीत,
ग्वालियर-राज्य
श्रीपसत पचमी १५१३
हरिहर निवास द्विवेदी

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महात्मा फार
0
New
महान्मा कपीर
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समकालीन परिस्थितियाँ
जब समाज स्वनिर्मित बन्धनो में फँस, उत्पीड़न से बात
त्राहि कर उठता है तब विश्वेश्वर उसके सम्बल तथा पथ प्रदर्शन
के लिए अपनी दिव्य ज्योति सम्भूत किसी शक्ति को प्रेपि
कर उसे शान्ति प्रदान करते हैं। भगवान् के वाराह रूप धारर
करने से लेकर तथागत बुद्ध तक के अवतारों का यही रहस्य है।
जिस काल में जैसी परिस्थितियाँ हुई, उस काल में वैसी ही
शक्ति ने उनका समाधान किया। महाभारत काल में भगवान्
बुद्ध अवतार नहीं ले सकते थे । हिरण्यकशिपु, के राज्य में
योगिराज कृष्ण की आवश्यकता न हो सकती थी। तथा,भगवान्
का पशुपल प्रधान नृसिंहावतार महात्मा बुद्ध की समकालीन
परिस्थितियों का समाधान न कर सकता था । अत , कहा जा
सकता है कि महात्माओं का अवतार परिस्थितियों के अनुसार
शक्ति और सदेशों सहित होता है । दूसरे शब्दों में, परिस्थितियाँ
ही अपने अनुरूप महात्माओं का निर्माण कर लेती हैं। महात्मा
कबीर को भी उनके काल की विशेष स्थितियों ने निर्मित किया
था। अतएव उनकी आत्मा के दर्शन करने के लिए, उनकी अमर
वाणी के वास्तविक सदेश को समझने के लिए उनकी समकालीन
परिस्थितियों का सिंहावलोकन कर लेना परमावश्यक है।
म तथा राजान्नों के परि
रा प्रभाव नहीं पड़ता.
.

महारमा पार देशों पर । राजनीति की ओर से हमारी इम उदासीनता को तुलसीदास जी न मंथरा के मुस से कहलाया 'कोऊ नृप होउ हमादि काहानी!' मुसलमानों के प्रारमण के पहले समान में परिवर्तन करने वाले अशोक दो धार भी नहीं हुए तथा उन्होंने मारतीय संस्कृति के मूल आधार पर काई आघाव नहीं किया। यौद्धधर्म हिन्दू धर्म के ही सिद्धान्त-स्पी स्तन्य से पोषित हुआ था और अन्त में उसी मारधारा में मिल भी गया। परन्तु मुमलमानो के आक्रमण के पश्चात् स्थिति सर्वया यदल गई। मुहम्मदगोरी ने निस दिन अपने प्रपल पदापात से हिन्दुओं के विजय-दर्प को चूर्ण पर अपने गुलाम को दिल्ली के उस महत्तम सिंहासन पर बैठाया था, जिसपर आरूढ़ व्यक्ति जगदीश्वर का अवतार समझा जाता था, उस दिन राजनीति की घोर से अखि फेरे रहने वाले हमारे इस धर्मप्राण समाज द्वारा यपन किए हुर अन्तद्रोह एव फूट के विपक्ष में फटु फल लगन प्रारम्भ हुए। यद्यपि मुसलमान विजेवा इसी देश में यस गए और उनस शासन प्रिटिश शासन की तरह सात समुद्र पार से न पलता था, तथापि शताब्दियों तक मुसलमान शासफ अपनी हिन्दू और मुसलमान प्रजा को एक ही दृष्टि से न देख सके । राजपूतों की पिशाल एव दूरदर्शिता रहिव धीरता को राजपूताने के रेगिस्तान की शरण लेनी पड़ी। उनकी यारंपार की पराजय के प्रत्यक्ष सत्य के सामने घाटुकार राज्याश्रित फरियों को भी उनके यशोगान से विरत होना पड़ा। धीर फार्यों तथा विजयों के अभाव में वीर गाथाएँ ममात हो गई। रक्षक मुसलमान,न्यायकर्ता मुसलमान,नियामक मुसलमान, २ समकालीन परिस्थितियों शामक मुसलमान-हिन्दुओं की एक मारगी आँसें खुल गई। गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद एव लोदी वंश क्रमश दिल्ली की गद्दी पर आए पर सयने समान रूपसे काफिर बुतपरस्तों पर कहर ढान का ही प्रयत्न किया। अलाउद्दीन जैसे यादशाहों के शासन म तो उत्पीड़न की पराकाष्टा हो गई । हिन्दुओं का धन तो दूर की बात है उनके तारे-पीतल के बर्तन भी उन्हें असरने लगे। ऐश-बाराम, मान-मर्यादा, आदि तो चोर विजेताओं के लिए, शासकों के लिए हैं, गुलामों का, हारे हुए गीदड़ों का उन पर क्या अधिकार ? धन के साथ हिन्दुओं की दाराओं पर भी शासकों को लोलुप दृष्टि पडना स्वभाविक था। हिन्दू रमणियों को हरमों की श्री बढाने के लिए बाध्य होना पडा । मान-मर्यादा के लिए सर्वप्न होमने वाले भीमसी अधिक न ये और अपनी गौरव की रक्षा के लिए जौहर-व्रत उद्यापन करने वाली राजपूत ललनाएँ भी बहुत नहीं थी, श्रत बाल-विवाह एवं पर्दे की प्रथा प्रारम्भ हुई । कन्याश्री, बहनों, माताओं और पत्नियों की रक्षा की शक्ति के अभाव में येचारे हिन्दुओं ने उन्हें घर में बंद कर सतोप किया। इतना ही नहीं,काफिर हिन्दुओं को नवी रसूल के पाक दामन में लाना मुसलमान बादशाह अपना पालन कर्तव्य समझते थे। लालच से, डर से, समझाने से, हर प्रकार से इस्लाम धर्म का प्रचार किया जाने लगा। भूमिकर, जलकर, आयकर आदि की तरह हिन्दुओं को हिन्दू रहने का भी कर देना पड़ा। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुस्लिम विजय का भारतीय समाज पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। समाज में बालविवाह, छुआछूत, पर्दाप्रथा आदि कुरीतियाँ मुमलमानों के ससर्ग का ही ३ महारमा कबीर परिणाम हैं । मुसलमानों की कट्टरता एव हिन्दुओं की महत्ता के कारण यद्यपि हिन्दू और मुस्लिम समाज घुल मिल कर एक तो न हो सके तथापि वे एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना भी न रह सके। यद्यपि शान-गर्वित पण्डित तथा जाहिदेखुश्क मौलवी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की तरह अलग ही रहे तथापि साधारण जनता में सौहार्द बढ़ता ही गया। यद्यपि राजपूत-रक्त सतत मुस्लिम सत्ता का विद्रोह करके स्वतन्त्रता देवी का तर्पण करता रहा तथापि यह कहा जा सकता है कि देश में उस नपुसरता का सूत्रपात हो चुका था जिम के परिणाम स्वरूप आन हमें सामाजिक रूप में हथियार रस देने पडे हैं । उसके मूल म अशत बौद्ध और जैन धर्म का अहिंसा प्रचार भी है। मुस्लिम धर्म का एक प्रभाव वर्णाश्रम धर्म को, शिथिलता के रूप में भी दृष्टिगोचर हुआ । मुसलमानों में नीच- ॐच का भेद-भाव नहीं है। इस समानता को द्विजातियों के दुर्व्यवहार से पीड़ित शूद्रों ने बडी लोलुप दृष्टिस देखा। परिणाम- स्वरूप सांसारिक कार्यों में न मही, कम से कम ईश्वर के दरवार मे तो भगवान् की समस्त सतान को समानता स्वीकार करने का विचार उत्पन हुआ | महात्मा रामानन्द के शिष्यों में दरजी, मोची, धुनिया, जुलाहे श्रादि निम्न जातियों के व्यक्ति भी थे। उन्होंने स्त्रियों को भी भक्ति का वही अधिकार दिया, जो पुरुषों को प्राप्त था। उनकी शिष्य मडली में दो स्त्रियों को भी स्थान मिला। शकर भगवान ने भारत से बौद्ध धर्म का उन्मूलन कर दिया तथा उसके स्थान पर अपना अद्वैतवाद चलाया । परन्तु उनका अद्वैतवाद ज्ञानमूलक था। यह वैयक्तिक साधना के ही उपयुक्त ।

समकालीन परिस्थितियाँ था। अतएव, जन-समाज फी यात्मतुष्टि उससे न हुई । श्री रामानुजाचार्य ने विशिष्ट द्वैतवाद चलाया जिममें सगुणोपासना को स्थान मिला। इन आचारयों की परम्परा के कारण वैष्णव धर्म का देश में प्रमार हो रहा था। सैद्धधर्म के नष्ट हो जाने पर भी उमकी महायान शाखा द्वारा प्रचारित मूर्ति पूजा पा लोप न हो सका था तथा शाक्त, गोरखपंथ श्रादि सम्प्रदाय भी दश में चल रहे थे। जैन धर्म का स्रोत भी अपने मघर प्रवाह से वह रहा था । मूर्तिपूजा एव सगुणोपासना से साधारण जनता की श्रात्मतुष्टि होनी श्रारम्म हो गई थी। पर महमूद गजनवी की गदा के प्रहार ने सहस्रश अन्धविश्वामी हिन्दुओं की आँखों के मामने मोमनाथ के मदिर में दुष्ट दलन भगवान की मूति के टुकड़े टुकड़े कर डाने और मूर्तिपूजा को गहरी चोट पहुँचाई । मंदिर पर मदिर टूटते थे, भक्तों के रफ से पृथ्वी सोंची जाती थी, पुजारियों की प्राणाधार धनराशि लुट जाती थी तथा राम- मदिर में मूर्तिखण्ड विपर्मियोंके पदाणे से गेंद की तरह ठोकरें पूला साते थे । परन्तु वह सर कुकृत्य चे प्रस्तर मूर्तियां अपनी निश्चेष्ट एव निश्चल आँसो से देखा करती। द्रोपदी का चीर बढ़ाने वाले ने एरु पट्टी भी भक्तों के प्रणों पर न योधी । भयानक दानवों को क्षण भर में मार डालने वाले ने श्राततायियों के शरीरों पर अपने प्रस्तर-सण्डों से भी प्रहार न किया । परिणाम यह हुआ कि हिन्दू-समाज मूर्ति पूजा का अवलम्ब अधिक समय तक न ले मका । साथ ही मूर्तिपूजा हमारे विजेताओं के धर्म के सर्वथा प्रतिकूल थी, अत इसका प्रचार उत्तरोत्तर क्षीण होने लगा। हिन्दुओं की प्रतिमाएव शक्तिके विरास के सरद्वार बंद कर दिए गए थे। उनका जीवन निरानन्द हो गया था। उनका राज्य 1 महारमा कबीर परिणाम है । मुसलमानों की फट्टरता एवं हिन्दुओं की महत्ता के कारण यद्यपि हिन्दू और मुस्लिम समाज घुल मिल कर एक वो न हो सके, तथापि ये एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना मी न रह सके। यद्यपि शासनावित पण्डित तथा जाहिदेखुश्क मौलवी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुषों की तरह अलग हो रहे वापि साधारण जनता में मौहार्द बढता ही गया। यद्यपि राजपूत-रक्त मतत मुस्लिम सत्ता का विद्रोह करके स्वतन्त्रता देवी का तर्पण परता रहा तथापि यह कहा जा सकता है कि देश में उस नपुसाता का सूत्रपात हो चुका था जिम के परिणाम स्वरूप बार हमें मामाजिक रूप में हथियार रस देने पडे हैं । उसके मूल म अरात बौद्ध और जैन धर्म का अहिंसा प्रचार भी है। मुस्लिम धर्म का एक प्रभाव पर्याश्रम धर्म की शिथिलता के रूप में भी दृष्टिगोचर हुआ । मुसलमानों में नीथ- ऊंच का भेद भान नहीं है। इस समानना दुर्व्यवहार से पीड़ित शूद्रों ने पही लोलुप दृष्टिस देन्या । परिणाम- स्वरूप सांसारिक कार्यों में न मही, कम से कम ईश्वर के दरयार में तो भगवान की समम्न सतान की ममानता स्वीकार फरने का पिचार उत्पन्न हुआ। महात्मा रामानन्द्र के शिष्यों में दरजी, मोची, धुनिया, जुलाहे आदि निम्न जातियों के व्यक्ति भी थे। उन्होंने स्त्रियों को भी भक्ति का वही अधिकार दिया, जो पुरुषों को प्राप्त था। उनकी शिष्य-मंडली में दो स्त्रियों को भी स्थान मिला। शकर भगवान ने भारत से घौद्ध धर्म का उन्मूलन कर दिया तथा उसके स्थान पर अपना अद्वैतवाद चलाया । परन्तु उनका अद्वैतवाद ज्ञानमूलक था। यह वैयक्तिक साधना के ही उपयुक्त द्विनातियों के समकाजी परिस्थितियों था। अतण्य, जन-समान की आत्मतुष्टि उमसे न हुई । श्री रामानुजाचार्य ने विशिष्ट वैतवाद चलाया जिममे सगुणोपासना को स्थान मिला। इन आवाययों की परम्परा के कारगा वैष्णव धर्म का देश में प्रसार हो रहा था। बौद्धधर्म के नष्ट हो जाने पर भी चमकी महायान भासा द्वारा प्रचारित मूर्ति पूजा का लोप नहो सका था तथा शाफ, गोरखपंथ श्रादि सम्प्रदाय भी दश म चल रहे थे। जैन धम का स्रोत भी अपने मथर प्रयार से घर रहा था । मूर्तिपूजा ग्य सगुणोपासना से साधारण जनता की आत्मतुष्टि होनी पारम्म हो गई थी। पर महमूद गजनवी की गदा के प्रदार ने सहस्रश अन्धविश्वामी हिन्दुओं की प्रासों के मामने मोमनाथ के मंदिर में दुष्ट-दलन भगवान की मूति के टुकड़े टुकड़े कर डाने और मूर्तिपूजा को गहरी चोट पहुँचाई । ( मंदिर पर मदिर दूटते थे, भक्तों के रफ मे पृथ्वी सींची जाती थी, पुजारियों की प्राणाधार धनराशि लुट जाती थी तथा राज- मदिर में मूर्तिखण्ड विधर्मियोंक पदनाणों में गेंद की तरह ठोकरें साते थे। परन्तु वह सर कुकन्य वे अन्तर मूर्तियां अपनी निश्चेष्ट एवं निश्चल आँखों से देखा करती । द्रोपदी का चीर चढ़ाने वाले ने एक पट्टी भी भक्तों के प्रणों पर न योधी। भयानक दानवों को क्षण भर में मार डालने गले ने आततायियों के शरीरों पर अपने प्रस्तर-सएडों से भी प्रहार न किया। परिणाम यह हुआ कि हिन्दू समाज मूर्ति-पूजा का अवलम्भ अधिक समय तक न ले सका। साथ ही मूर्तिपूजा हमारे विजेताओं के धर्म के सर्वथा प्रतिकूल थी, अत इसका प्रचार उत्तरोत्तर क्षीण होने लगा। हिन्दुओं की प्रतिभाएव शक्ति विराम केसर द्वार बंद कर दिए गए थे। उनका जीवन निरानन्द हो गया था। उनका राज्य महामाडवीर परिणाम है । मुसलमानों की कट्टरता च हिन्दुओं की महचा पारण यद्यपि हिन्दू और मुस्लिम ममाज घुल मिल कर एक है न हो सके. तथापि ये एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना भी नए सके। यद्यपि ज्ञान-गवित पण्डित तया जादिदेसुरक मौलवी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुषों की तरह अलग ही रहे तथापि साधारण जनता में मौहार्द बदवा ही गया। यद्यपि राजपूत-रक सतत मुस्लिम सत्ता का विद्रोह करके म्वतन्त्रता देवी का तर्पण करना रहा तथापि यह कहा जा सकता है कि देश में उम नपुसत्ता का सूत्रपात हो चुका था जिसमें परिणाम स्वरूप आज म मामाजिक रूप में हथियार रख दे, पड़े हैं । उसके मूल में अंरात बौद्ध और जैन धर्म का अहित प्रचार भी है। मुस्लिम धर्म का एक प्रमाय पर्याश्रम धर्म शिथिलचा के रूप में भी दृष्टिगोचर हुआ ! मुसलमानों में नीच अंच का भेद-मार नहीं है। समानता को दिशातियों दुर्व्यवहार से पीड़ित शूद्रों ने बड़ी लोलुप दृष्टिस देखा। परिणाम स्वरूप मांसारिक कार्यों में न महो, कम से कम ईश्वर के दरवा में तो भगवान की ममत सतान की ममानता स्वीकार करने म विचार उत्पन्न हुआ। महात्मारामान के शिष्यों में दर्ज मोची, धुनिया, जुलाहे आदि निन्न जातियों के व्यक्ति भी थे उन्होंने स्त्रियों को भी भक्ति का वही अधिकार दिया, जो पुरुषं को प्राप्त था। उनकी शिष्य-मंडली में दो स्त्रियों को " स्थान मिला। शकर भगवान् ने भारत से बौद्ध धर्म का उन्मूलन कर नि तया उसके स्थान पर अपना अद्वैतवाद चलाया। परन्तु उन अद्वैतवाद ज्ञानमूलक था। यह वैयक्तिक साधना के ही उपर समकालीन परिस्थितियाँ इन परिस्थियों से पूर्णत प्रभावित होकर इनके प्रभाव के समाधान के लिए ही महात्मा फनीर अवतीर्ण हुए थे। उन्होंने अपने धार्मिक सिद्धान्तों को अद्वैतवाद और सूपीमत पर स्थित किया और इस प्रकार वे हिन्दू और मुसलमानों में ऐक्य बढ़ाने में प्रयनशील हुए। दोनों धर्मों की खरी तथा मिलती जुलती बातों का उन्होंने संग्रह किया। साथ ही दोनों की बुरा- इयों का निर्णय स्वर से खंडन भी किया। उनका यह सैद्धान्तिक समन्वय परिस्थितियों का ही परिणाम था । मुसलमानों के प्रवल विरोध फ रहते हुए एकेश्वर याद तथा निगुणोपासना ही पनप सकते थे । मूर्ति-पूजा की निस्सारता सिद्ध हो जाने के पश्चात् यह 'अटपटी यानी' में वर्णित 'निर्गुण' ही समाज को थोड़ा यहुत सहारा दे सकता था । फनीर का जाति पाति का विरोध ही अछूतों को हिन्दु बनाए रह सकता था । तत्कालीन समाज के हिन्दुओं और मुसलमानों म सद्भाव उत्पन्न करने वालों की, जनता को धम पर स्थिर करने वालों फी, पण्डितों और मौलवियों की विशता के बोम से साधारण जनता को बचा कर उसे उसी की भाषा में ईश्वर का ज्ञान कराने वालों की, सक्षेप मे, सत्य के अन्वेषकों की तथा असत्य के विरोधियों की आवश्यक्ता थी। इसी आवश्यकता ने निगुण पथी संतों को जन्म दिया, जिनमें प्रथम और प्रधान महात्मा फपीर दास हैं। ७ महारमा पपीर गया, धन गया और प्रा धर्म भी प्रमश जारहा था। ऐसे समय में केवल भगवान का ही सहारा रह गया था। मूर्ति पूना घट्ट सम्यक जनता का वह प्राधार भी थोथा हो गया था) प्रेम ममय में यह आवश्यकता थी कि जनता के सम्मुख धर्म का ऐसा रूप लाया जाय जो उस निराशा के काल में उमे घोडा श्रात्मतुष्टि दे सके, और साथ ही मुसलमानों का कम से कम विरोधभाजन बने । इसी प्रापश्यस्ता ने निर्गुण सम्प्रदाय की जन्म लिया। साथ ही हिन्दी माहत्य और मापा की तत्कालीन स्थिति मी अस्त यस्त एर अव्यवस्थित थी। उस समय हिन्दी ने कठिनता से अपना शैशर पार किया था। यद्यपि उस समय नक हिन्दी में प्रचुर मात्रा में रचना हो चुरी थी तथापि उसका कोई निश्चित रूप नहीं था। प्रत्येक प्रान्त की अलग भाषा थी । मुसलमानों ने पारसी को राजभाषा बना दिया था। श्रत उसका मी प्रभाव भाषा पर पड रहा था। इधर बाह्मण लोग देवगणी संस्कृत को अपनाए हुए थे। हिन्दी में रचना करना हेय समझा जाता था। इन्हीं कारणों से कबीर की भाषा में एकरूपता या स्थिरता के दर्शन नहीं होते। सक्षेप में कहा जा सकता है कि जर महात्मा कनीर का प्रादुर्भाव हुआ तब नेश में रानीतिक अशान्ति व्याप्त थी, हिन्दू और मुस्लिम समान के संघर्ष से नवीन परिस्थितियां उत्पन्न हो रही थी, समाज में अन्धविश्वास व्व कुरीतियाँ फैल रही थीं, पार्मिक विश्वास में अस्थिरता आ रही थी, मूर्तिपूजा और मगुणोपासना की जहें गल गई थीं तथा हिन्दी का कोई स्थिर स्प नहीं था। । -- समकालान परिस्थितियाँ इन परिस्थियों से पूर्णत प्रभावित होपर इन कुप्रभाव के ममाधान के लिए ही महात्मा कबीर अवतीर्ण हुए थे । उन्होंन अपने धार्मिक सिद्धान्तों को अद्वैतवाद और सूझीमत पर स्थित किया और इस प्रकार वे हिन्दू और मुसलमानों में ऐक्य बढ़ाने में प्रयत्नशील हुए। दोनों धर्मा की सरी तथा मिलती जुलती बातों का उन्होंने संग्रह किया। माथ ही दोनों की बुरा- इयों का निर्णय स्वर से खंडन भी किया। उनका यह सैद्धान्तिक समन्वय परिस्थितियों का ही परिणाम था । मुसलमानो के प्रवल विरोध के रहते हुए एकेश्वर याद तथा निगुणोपासना ही पनप सकते थे। मूर्ति-पूजा की निस्सारता सिद्ध हो जाने के पश्चात् यह 'अटपटी वानी' में वर्णित 'निर्गुण' ही समाज को थोड़ा बहुत सहारा दे सकता था । फवीर का जाति पाति का विरोध ही अछूतों को हिन्दु बनाए रह सकता था । तत्कालीन समाज के हिन्दुओं और मुसलमानों में सद्भाव उत्पन्न करने वालों की, जनता को धम पर स्थिर करने वालों की, पण्डितों और मौलवियों की विशता के योम से साधारण जनता को बचा कर उसे उसी की भाषा में ईश्वर का ज्ञान कराने वालों की, सक्षेप में, सत्य के अन्वेषकों की तथा असत्य के विरोधियों की आवश्यकता थी। इसी धानश्यकता ने निगुण पथी संतों को जन्म दिया, जिनमें प्रथम और प्रधान महात्मा कबीर दास है। "

जीवन-वृत्त
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संसार को अपनी सुरभि से मुग्ध करने वाले सुमन के
रोषक सामग्री दो प्रकार से मिलती है । एक तो, या प्रकृति
उसे वायु, सूर्य-रश्मि, चन्द्र किरण आदि से पुष्ट करती है, दूसरे
उसका वृन्त पृथ्वी मे रस लेकर उसमें जीवन सचार करता
इसी प्रकार कवि का साहित्य-सुमन भी दो प्रकार के साथ से
पापित होता है। एक तो फयि को बाह्य परिस्थितियों से, "दूसरे
उसक निजी जापन से। उसका साहित्य-प्रसून उसके जीवन
यून से रस लेकर उत्फुल होता है और अपनी मधुर सुगन्ध से
काव्य-प्रेमी मिलिन्दों के मनों को मोहित करता है। परन्तु साथ
ही यह भी सत्य है कि वह उन दोनों प्रकार को सामग्रियों से
सर्वथा भिन्न एव श्रेष्ठ होता है।
कीर की बाह्य परिस्थितियों पर विचार हो चुका,अब उनके
निजी जीवन पर भी एक रष्टि डालना है। उनके काव्य की
विशेषतामा को पूर्णत समझने एव उनसे पूर्ण सौहार्य स्थापित
करने के लिये यह धावश्यक भी है।
कवीर का जीवन-वृत्त लिखने का प्रयास करते समय दो
कठिनाइयाँ विशेष रूप स उपस्थित होती हैं। भारत वर्ष के मक
कवियों की यह प्रणाली रही है कि वे अपने विषय में बहुत
कम लिखते थे । कबीर ने भी अपने विषय में अधिक नहीं कहा
जो कुछ अपने विषय में उन्होंने कहा भी है वह अपने सिद्धान्तों
के प्रतिपादिन के रूप में। अव ,
प्रथम कठिनाई तो यह है कि

जीवन-वृत्त उनकी रचनाओं से उनके जीवन पर अधिक प्रकाश नहीं पड़ता, दूसरी कठिनाई उनकी शिष्य-मडली ने उपस्थित की है। उन्होंने फनीर के जीवन को लौफ्फि रूप में देखना पसन्द न किया, अत उसके साथ बहुत मी अलौकिक किंवदन्तियों को गुम्फित कर दिया। ऐसी दशा मे शुद्ध सत्य को ढूंढ निकालना कठिन होगया है। इन कठिनाइयों के कुहरे में से कनीर के जीवन- वृत्त का जो ढाँचा दिखाई देता है, वह भी इनकी रचनाओं की तरह रहस्य से परिपूर्ण है। अस्तु । नीरू नामक काशी का एक मुसलमान जुलाहा जय अपनी पत्नी नीमा का द्विरागमन काराकर घर वापिस लौट रहा था, तर उसने लहरतरा नामक तालान के पास एक नावजात शिशु पाया । उस दयामय दम्पति ने उस पालक को ईश्वर की देन समझ कर औरस पुत्र की भॉति पाला। जब वे काजी से इस शिशु का नाम पूछने गए तो काजी महाशय के कुरान शरीफ सोलने पर पहला शब्द 'कबीर' निकला । अत इस बालक का नाम 'कवीर ही रख दिया गया। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि कभीर संभवत नीमा, और नीरू के औरस पुत्र थे । परन्तु इस मत के समर्थन में महात्मा रैदास अथवा महात्मा पीपा का जो पद दिया गया है उससे उपर्युक्त जन-श्रुति पर हमारा विश्वास कम नहीं होता। यह पद इस प्रकार है- 'जाके ईद बकरीद फुल गऊ रे बध करहि, मानियहि शेख शहीद पीरा। । जाके याप ऐसी करी, पुत्र ऐसी घरी, तिहुँ लोक परिसिघ कीरा ॥ ९ P

महारमा कयौर
--
इसमें वापसे तास्पर्य्य केवल पालन-पोपण करने वाले पिता
से भी हो सकता है।
कि तु वास्तिविक कठिनाई तो तय उत्पन्न होती है जब य
प्रश्न सामने आता है कि यह शिशु तालाब के किनारे पाय
कहाँ से ? श्रद्धालु कबीर-पथियों का कहना है कि शुभ मुहूर्त में
सत्पुरुष ने माया के जाल से संसार का उद्धार करने के लिए
इस महापुरुष को आकाश-मंडल से एक सुन्दर विकसित कमल
पर उतारा। वहीं माग्यवान नीमा नीरू ने उसे पाया । किन्
उस समय की कुरीतियों से प्रभावित कठोर पास्तविकता-वादियं
का कहना है कि यह पालक किसी विधवा के कलंक का जीवित
प्रमाण था। इस मत को भी गौरवान्ति पनाने के लिए
यह जोड़ दिया गया है कि उस विधया को स्वामी रामन्दि जीने.
भूल से 'पुत्र वती भव का आशीर्वाद दे दिया था। उस
आशीर्वाद का परिणाम यह बालक था ।
महात्मा फ्यीर के घाल्य-काल के विषय में कुछ भी ज्ञात
नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि बचपन हो से
इन्हें भगवद्भक्ति का रस मिल गया था। मुसलमान पालकों क'
यहाँ रहने पर भी इनका मुकाव स्वामी रामानन्द प्रचारित राम
नाम की ओर ही अधिक था। इसके कारण माक्षणी माता के
गर्भ से पैदा होने के सस्कार, काशी का प्रभाव एव रामानन्द जी
द्वारा निर्मित राम-मय वायुमण्डल ही हो सकते हैं। संभव
इस राम-प्रेम ने 'ईद बकरीद शेख, शहीद, पीरा' आदि मानने
Vवाले नुसलमान जुलाहे के यहाँ पलने वाले कपीर का बाल्यकाल
संकटपूर्ण बना दिया हो। निम्न लिखित पद उनकी इस विषम
परिस्थिति की ओर संकेत भी करता है-
१०

- बीवन-वृत्त - नित उठ कोरो गगरी श्राने लीपत जीउ गपो। - ताना बाना कळू न सूझे हरि रस लपट्यो । हमारे पुल को रामु कयौ । फपीर को इस्लाम-धमोचित नियम छोड़ हिन्दू धर्म की ओर प्रवृत्त होते देख कर लोगों ने अवश्य ही 'पागल' एव निगडा हुआ लड़का बतलाया होगा। उन्होंने संभवत उमी का स्मरण कर लिसा है- 'सय दुनी सयानी मैं यौरा, हम विगरे गिरी जिनि प्रौरा ॥ टेक ।। मैं नहि बोरा, राम कियो यौरा, सतगुरु जारि गयो भ्रम मौरा ॥ रिया नहिं पडू बाद नहि जार, हरि गुन क्थत सुनत बौरीन ॥ काम प्रोध दोऊ भए विकारा, धापहि मीठो कहा ! जाहि जो भावे, दास कपीर राम इस राम-भक्ति में पड फर कनीरदास जी अपने पैत्रिक व्यवमाय की भी उपेक्षा करने लगे। उससे उनके भजन में गडबड जो पडती थी! जब नीमा वीनी ने यह शंका की कि 'ऐ खुदा ! यह लडका थपनी जिन्दगी किस तरह नसर करेगा?' तन कबीर दास जीने उत्तर दिया कि, माता जी, आप चिन्ता न फरे, भगवान सब के निर्वाह का प्रबंध करता है । 'तानना बुनना सज्या कबीर, राम नाम लिख लिया सरीर । श्राप जरे ससारा ॥ गुन गाये ॥ में A महाग्मा कबीर कई पवीर मुरा जय लग मरी नसी या पेह, माग टूटे राम सा नेह॥ ठाढ़ी रोये पीर की माय, ऐ लरिका क्यू जीरे शुदाय । । माई, দুহায় निमयनराद ॥ यडे होने पर जब इन्हें ज्ञात हुआ कि गिगुरा रहने स साधना में असफल हो जाने की आशंका है, सय इन्हें गुरु घनान की चिंता हुई। इनकी दृष्टि स्वामी रामानन्द जी पर गई । मुसलमान पिता के यहां पोपत हान के कारण रामानन्द जी में इन्हें शिष्य बनाना स्वीकार न किया । परन्तु कयीर इतनी कशी धातु के यने हुए न थे। उन्हों।एक अचूक युक्ति सोची। मामी जी सूर्योदय के पहले ही गगा-स्नान करो आया करते थे। वही मीढ़ियों पर श्राफर फनीर लेट गए । ज्यों ही म्यामी जी का पैर इनसी देह से टकराया, घे बोल उठे-'राम राम' । यस कबीर दाम जी ने पैर पकड लिए और उमी राम-मन को गुरु- मंत्र के रूप में ग्रहण कर लिया। परंतु कुछ लोगों का मत है कि कबीर अॅमी के शेस तरी, नामक सूफी महात्मा के शिष्य थे। पिन्तु यह वात सक्या अमान्य है। बीर की रचना ध्यान से पढ़न वाले को यह भ्रम फापि नहीं हो सस्ता । फनीर का फाय रामानन्द जो के मूल-मत्र राम' से ओत प्रोत है। वे स्वयं अपना रामानन्द-द्वारा चेताया जाना स्वीकार करते हैं। उसके प्रधान शिष्य धर्म दास भी लिसा है- कासीम प्रगटे दास पहाए, नीम के गृह श्राए । १२

जीवन त
m
.
ग
गमानन्द के शिष्य भए।
मय-सागर पथ चलाए।
दूसरी थोर शेख तकी के गुम होने का कोई प्रमाण नहीं
मिलता । कबीर न कहीं भी उन्ने गुरु के रूप में स्मरण नहीं
किया है।
किन्तु, रामानन्द का शिष्यत्व भी नाम मात्र का ही था ।
फयीर के 'राम' आगे रामानद के 'राम' से भिन्न हो गए ।
उन्होंने अपना निजी सप्रदाय चलाया, हिन्दू एव मुसलमान
दोनों धमों के मतो से मत्मग कर अपनी असीम
शान पिपासा को शांत पिया । इनरा सत्सगी होना प्रसिद्ध है।
बचपन में अथवा आगे चन्न कर कभी उन्हें नियमित पाठशाला,
की, अथवा धामिक शिक्षा नहीं मिली। उनका ज्ञान यात्रा एव
सत्सग द्वारा स्व-अजित था। उनहोंने स ममय के समी
"मता के महात्मामा से शान-लाभ पिया था। यह सत्य उनकी
रचनाओं मे स्पष्ट झलकता है। हिन्दू धर्म के तत्वों से तो ये पूर्ण
रूप स परिचित थे, उन्होंने नाय-पथियों से ठयोग की बाते
भी सीसी थीं। सूफी मत भी मुमलमा के माथ-साथ
भारतवर्ष में आया था। उम मत के महात्माओं से भी कमीर
ने शान-साम किया था। इनके धिपय मे पनीर दास जी ने
स्वयं लिसा है-
'मानिक पुरहि फबीर बसेरी, मदहति सूनी सेख तकि फेरी ।
श्रजी सुनी जवन पुर य ना, झूसी सुनि पीरन के जामा |
क्वीर दास जी ने विवाह किया था अथवा नहीं, इस याा
पर भी विद्वानों में मतभेद है । परन्तु हमारे विचार मे तो
उन्होंने ग्रहस्थाश्रम मे प्रवेश अवश्य किया था। यदि ऐसा न होता

महात्मा फवीर तो वे बचपन से उपक्षित वान पाने के मगडे में पुन क्यों पडत ? फबीरदास जी अपना विवाह होना स्वय ही स्वीकार करत ई- 'नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार । जब जानी तर परिहरी, नारी यड़ा विशार' इसके अतिरिक्त लोइ को सम्बोधित फरक उन्होंने कुछ पद भी को है । इसमे तो यही मिद्ध होता है कि प्रारम्भ में कनीर दास जी और लोइ प्रश्य ही दम्पति के रूप में रहत होंगे। यह सभव है कि पोछे स यह गुरु और शिप्या के रूप मे साथ साथ रहन लग हो। यह भाग्यवती लोई कनीर दास जी के उपयुक्त पानी भी थीं। एक वनसएडी वैरागी को माता जान्हवी के किनारे एक पालिका पड़ी हुई मिली। यह बालिका कहाँ से आई ? सम्भवत यह भी कनीर की तरह किसी विधवा के कलक की निशानी रही-हो। पर इस विषय में लोगों ने कोई अनुमान नहीं लगाया और न कोई अलोकिक कथा ही जोडी । कीर के समान कवीर-जाया को महत्व देन की सम्भवत पावश्यकता नहीं समझी गई । यह अवश्य कहा जाता है कि लोई में लिपटी हुइ मिलने के कारण इसक पालक न इसका नाम लोइ ही रख दिया। यह कन्या जर बडी हुई तो उस बैरागी ने उसे अतिथि सेवा पर नियुक्त कर दिया। एक दिन कबीर उस वैरागी के यहाँ अतिथि हुए। एकान्त था और दोनों ही युवा थे। अत सम्भव है कि फनीर 'विचार न पान' प कारण लोई पर अनुरक्त हो गए हों। उन पाने के पश्चात् ही पाच और साधु आए। लोई ने उन साधुया को पुर दूध दिया। उन्होंन उसे सात भागों में बांट दिया। पांच भाग तो उन्होने ही ले लिये और एक-एक भाग फनीर - La जीवा-वृष और लोई को दिया । कवीर ने अपना भाग स्वय न पी कर रस दिया। बाद मे लोई के कारण पूछने पर कबीर ने एक नागत साधु की ओर इगित करके कहा कि यह भाग उस के लिए है। इस सज्जनता तथा अज्ञात-दर्शिता को देख कर, कहते हैं, लोई उन पर मुग्ध हो गई और उनके साथ होली। इनकी कमाल और कमाली नामक दो सन्तानें भी कही जाती हैं। यह कहावत सम्भवत सभी जानते हैं- 'ना वश कबोर का, उपमा पूर्व कमाल ।' किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि कमाल ने अपने महात्मा पिता का विरोध किया था अथवा वे कुपुत्र थे। यह तो उस त्यागी पिता ने इस लिए कह डाला था कि उसका पुत्र- 'हरि का सुमिरन छोड़ के घर ले आया माल ।' महात्मा कीर का उपदेश वडा सरा, मर्मस्पर्शी एव समयानुकूल था। इस कारण उनके जीवन-काल मे ही हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही जातियों के अनेक व्यक्ति उनके अनुयायी ओर समथक हो गए थे। कबीर के अनुयायी मण्डल मे बडे-बडे। नवान और सरदारों से लेकर साधारण जनता तक थी । परन्तु वर्तमान समय के समान बहुमत निम्न श्रेणी के लोगों का ही रहा होगा। परन्तु जहाँ उनके अनुयायी बहुत से थे, वहाँ उनके विरोधियों की सख्या भी कम न थी। प्रत्येक युग मे सुधारक महात्माओं को यह कटु अनुभव करना ही पड़ता है। अपने विश्वास के कारण उन्हें प्राय अपने प्राण तक देने पडे हैं। अपने उद्धारकर्ताओं एव सुधारकों को सूली पर चढ़ाना चिरतन काल से मानव-समाज का एक व्यसन सा रहा है। सुधारकों ,

मदारमा कवार
पर पत्यर परमाने की आदत प्रत्येक काल पी और प्रत्येक जाति
का जनता को मानों अनादि काल मे विरासत म मिली है।
कटुसत्यवादी क्योर इस व्यापक मत्य के अपवाद फैमे हो सकते
थे। उनका रपएडन तो एकदम तीव्र और हृदय वेधी होता था।
कहते हैं जर सिकन्दर लोदी काशी पाया तो लोगों न उसे इनके
विरुद्ध खून भइसाया। सामना होने पर जन उन्होंने स्वय ग्राह
होने के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तन वह और भी पुपित
हुआ और इन्हें अनेक यातनाएँ दी तथा धन्त को राज्य मे
निर्वासित तक कर दिया।
अपने तीक्ष्ण खडन-मडन द्वारा कीर न विद्वान् पडित
एवं मौलवियो को भी अपना शत्रु बना लिया था । उन
आडम्बरी की पोल खोलना, जनता को उन फे ढकोसले से सचेत
करना उनका प्रमुख कार्य था। मौलवियों का कोप तो सिकन्दर
लोदी के द्वारा उत्पीडन के रूप में प्रकट हुआ था और पण्डितो
की कृपा से कीर को अन्त समय में काशी-धाम छोड़ना पड़ा।
पण्डितों का विरोध ही फाशी छोडकर मगहर जाने का प्रधान
कारण था । फनीर ने लिखा है-
'सकल जनम सिवपुरी गँवाया।
मरति पार मगहर उठि धाया ॥'
इस का कारण बतलाते हुए वे लिखते हे--
'कहु गुरु गजि सिर सभु को जानें।
मुना कपीर रमत श्री रामै ।'
कबीर दो अपन राम को हो सय पुछ समझते थे। राम नाम
उनकी निर्गुन-भक्ति का सार था । मला ये काशी विश्वनाथ की
महिमा क्या गाते ? इसी धार्मिक मत-मैद के कारण अन्त में

نم जीवन-वृत्त उन्हे काशी छोड देनी पडी । परन्तु काशी छोडते समय ये लोगों को एक प्रकार की चुनौती सी देते गए- 'कासी मगहर सम बीचारी। योछी भगति केसे उतरै पारी ।' कबीर की भक्ति ऐसी ओछी नहीं जो उन्हें काशी छोडने पर नरक जाने अथवा मोक्ष न मिलने का डर हो। उन फी भत्ति तो सरी है। उन के राम में वह शक्ति है कि कबीर कहीं भी देह- त्याग करें, उन्हें मोक्ष अवश्य मिलेगा। मोक्ष पाने के लिये उन्हें फाशी की सहायता लेने को प्रावश्यकता नहीं। वे कहते हैं- 'क्या कासी क्या मगहर असर, राम हृदय यस मोरा। जौ कासी तन तजै कनीरा, तोरामै कौन निहोरा ।। परम धार्मिक कवीर की राय में किसी स्थान विशेष पर मृत्यु होने को मुक्ति-साधन में बाधक बतलाना अपनी नास्तिकता प्रकट करना है। लोगो का ऐसा विश्वास है कि मगहर मे मरने से गधा होता है । इस पर कबीरदास जी लिखते हैं- "मगहर मरै सो गदहा होई ।। मल परवीति राम सों सोई।।' जन्म की तरह क्षीर का निर्वाण-वृत्तान्त भी रहस्य से गुम्फित है। कनीर के मुसलमान एव हिन्दू अनुयायी अपने २ धर्म की रूढेि के अनुसार उनके शर का अतिम सस्कार करना चाहते थे । झगडा अनिवार्य था। काशी नरेश वीरसिंह बघेला एवं नवाव बिजलीखाँ पठान लडने तक को तैयार हो गए । कहते हैं, उसी समय श्राफाश-वाणी हुई । उस के अनुसार शव पर से को महागमा कवीर चादर उठाकर देखा गया । यहाँ थोड़े से फूलों के अतिरिक्त और कुछ न मिला। इस आकाशवाणी पे स्थान पर यह विचार अधिक युक्ति सगत प्रतीत होता है कि महात्मा फनीर न ही मृत्यु से पूर्व अपनी शिष्य-मडली को रक्तपात से बचाने के लिए यह युक्ति को होगी। कहते हैं कि मृत्यु के पूर्व व कमल फ फूल और चार मँगाकर लेट गए थे। जो कुछ भी हो, वे पूल दोनों दलों में बाँट दिए गए। हिन्दुओ ने उन का दाह-सस्कार किया तथा भस्म की फाशी में समाधि धनाई, जो 'क्योर चौरा' के नाम से प्रसिद्ध है । मुमलमाना ने अपन भाग के फूलों को मगहर में ही समाधिस्य फिया । यह दोनों स्थान फयोर-पथियों के लिए पवित्र तीर्थ-स्थान है। अन्ध-श्रद्धालु शिप्य-महली न जीरन-वृत्त की तरह महात्मा फयीर के जन्म और मृत्यु पे सरतों में भी अलौकियता उत्पन्न कर दी है। पनीर-पन्यी लोग कनीर साह्य की आयु तीन सौ घर्ष की बतलाते हैं। य उन का जन्म सन् १२०५ और मृत्यु सरन् १५०५ कहते हैं। इस बात पर हम न तो विश्वास कर ही सकते हैं और न करने की आवश्यकता है। क्योंकि उनके शिष्यों में ही उनक जन्म और मृत्यु सवतों के विषय में दो पद प्रसिद्ध हैं । जो अधिक विश्वसनीय एव युक्ति-मगत जात होते हैं । जन्म के विषय में यह पद कहा जाता है- 'चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्र पार एक ठाठ ठए । जेठ सुदी परसाइत को पूरनमासी प्रगट भए ।' अत फीर दास जी का जन्म-सवत् १४५६ हुआ । 'कवीर-कसोटी' के लेखक न कबीर का जन्म संवत् १४५५ लिसा है। परन्तु सभवत उन्होंने 'चौदह सौ पचपन साल गए' के 'गए' । -

जीवन-वृत्त
शब्द पर विचार नहीं किया, जिस का अर्थ 'बीत जाने पर है।
मृत्यु के विषय में प्रसिद्ध है-
'सवत पद्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को वन |
माघ सुदी एकादसी रलो पवन में पवन ॥'
इस प्रकार कबीर की निर्वाण-तिथि सवत् १५७५ माघ सुदी
एकादशी मानी जानी चाहिए। इन सवतों के अनुसार महात्मा
कबीर की आयु ११६ वर्ष की हुई, जो आज कल भी न तो
अलौकिक ही है और न असभव ।

स्वभाव
महात्मा फोर प जीवन-गृत्त और उपदों पर विचार कर
ए पवार यह अनुमान किया जा मकता है कि उन का स्वम.
कैसा होगा। यह निश्चित है कि 'क्थनी और करनी' में अटू
सम्बन्ध स्यापा का उपदश दने वाने फार ने अपने उपदेशों
अनुसार स्वय भी आचरया किया होगा । यह सत्य उनको
जीवनी से बहुत मुख सिद्ध भी होता है।
सोपरि कीर सत्यान्यपी य । असन्य के त्याग और सत्य
प्रहण प लिये उन्हान सर पुर किया। मत्य फी सोज में
ही कवीर ने सारा भीरन सपाया था। महान् आत्म-चिन्तन
के पश्चात् उन्होंन जीवन प इस प्रमुस तत्त्व का पता लगाया
था। यही कारण है कि उन प सपहन एवं महन दोनों मही
असीम दृढता आ गइ थी। उन की प्रष्टि में जो यात सत्यर्थ
उसे उन्होंने निमीक होकर भारत-सम्राट् सिकन्दर लोदी तक
पर प्रफट कर दिया। उन्हान चिन्ता न की कि इस के कारण
उहेंथनक यातनायें सइनी पड़ेगी। काशी से उन्हें अपार प्रेम
था। फाशी का जुलाहा' होने या उन्हें गर्न भी था। परन्तु उस फाशी
फो भी सत्य के कारण परित्याग करने में उन्हों ने थानाकानी
न को। उनके चरित्र की यह असीम दृढ़ता और निर्माता उन
के उपदेश की पक्ति पक्ति से मालकती है।
कमीर को स्पष्टवादिता और सरापन उनके विशेष गुण हैं।
'सत्य घूयात् प्रियं घूयात्' का 'सत्य भूयात्' वो उन्हों ने अपनाया,

स्थभाव
-
परन्तु यह चिंता कभी न की कि वह किसी को प्रिय लगेगा
अथवा अप्रिय । उन्हें चरम सत्य का बोध हो चुका था।
वे ज्ञान प्राप्त कर चुके थे । अब यदि ससार उन की बातो
पर हँसे, अथवा बिगडे तो वे उसकी परवाह क्यो करने लगे-
'इस्ती चदिए ज्ञान का सुरत दुलीची डार ।
स्वान रूप संसार है भूपन दे मषमार ॥'
कीरदास जी स्वावलम्बी थे। वे अपने निर्वाह के लिए या
तो भगवान पर आश्रित रहते थे या अपनी स्व अर्जित कमाई पर ।।
भीख माँग कर पेट पालना रे नितान्त घृणित कार्य समझते थे-
'माँगन मरन समान है मत कोई माँगी भोस ।
माँगन ते मरना मला यह सतगुरु की सीख ॥'
यह प्रसिद्ध है कि अपने तथा अपने परिवार के भरण-पोपण
के लिए फनीरदास जी आजीवन करघे पर ताना-बाना पूरते
रहे। वे ज्ञान की बातें बनाकर समाज पर अपने पालन का भार
डालने वाले निकम्मे साधुत्रो में न थे, बल्कि परम स्वावलम्बी
कर्मयोगी थे।
श्रादर्श गृहस्थ के घर के समान इस थोडी सी कमाई में से
अभ्यागत एव सन्तों की सेवा भी होती रहती थी । साधु-सेवा
उनकी प्रकृति का एक अंग बन गई थी। सुत्सरा के प्रेम एव अपनी
अपार ज्ञान-पिपासा के कारण वे बिना अक्षर ज्ञान के ही वेदान्त,
हठयोग, सूझीमत श्रादि के रहस्यो से परिचित हो सके। वे
सतसग को ज्ञानार्जन का साधन बनाते और इस के लिए सतो के
पास लम्बी यात्राएँ करके तो जाते ही थे, इसके अतिरिक्त वे घर
पर आए हुओं का आदर-सत्कार कर उन्हें दान देने को भी साहब
के पाने का साधन समझते थे-
२१

महारमा कीर
'कशि हरि पे मिलन की राह मुनी हम दोय ।
के माहब का नाम ले, में कर ऊँचा होय ॥'
जर थान चुन कर बाजार में पचन को ले जाते तो कभी कमी
सब का सर साधुनो को देकर खाली हाय घर लौट आते । इन
पे घर पर साधुओं का तांता-मा लगा रहता । यह फथा भी बहुत
प्रसिद्ध है कि एक बार क्योर के घर पर बहुत से साधु आए।
उनके लिए उनके यहां कोई स्वागत सामग्री नहीं बची थी । इम
पर इनको स्त्री लोइ ने कहा कि एक धनिक-पुत्र मुझ पर आसक
है। में उम १ पास जाऊँ तो यह अवश्य ही मुझे धन दे देगा।
समयत यह घटना (यदि मत्य होगी तो) उस समय की है,
जर कबीर दास जी अपनी माधुता के लिए प्रसिद्ध हो चुके थे।
धन दो उन्हें वैसे भी मिल जाता, किन्तु उम धनिक की आँखें
सोलन के लिए वे बरसते पानी में लोई को उठाकर तथा अपने
फ्धे पर धैठाकर उस के घर ले गए । जब उसने लोई ये इस
प्रकार निना भीग श्रासरने का कारण पूछा तो उसने सर कथा
यह सुनाई। इस पर उम कामान्य युवक य ज्ञान चतु खुल
गए । वह कबीर और लोई के पैरों पर गिर गया। इस कथा
की सत्यता पर सन्देह होना नो प्राकृतिक है, परन्तु कनीर के अपने
साधना के अनुसार महान् दानी और परोपकारी होने में कोई
सदह नहीं।
इस दान और साधु-सेवा के कारण फबीरदास जी सदा
अर्थ सकट में ही रहे । माया के बैरी जो ठहरे । उनका जीवन
भगनान् से यही कह्ते बीतता था-
'दुई सेर मांगौ चूना । पाव घीउ संग लूणा ।
श्राध सेर माँगी दाले। मो को दोनों दखत निमाले ।'
ܝܢ

स्वभाव
किन्तु यह कभी न भूल जाना चाहिए कि यह मांगना था
उसी जगत्पति के दरबार में, और किसी के सामने नहीं ।
ऐसी परिस्थितियों में भी सतोप से रहना फवीरदास जी ने
सीख लिया था। सतोप तो ये सतों का प्रधान गुण बतलाते हैं।
जो कुछ मिल जाय उसी में मस्त रहना जगत् का 'साहसाह बन
जाना है। इस सतोप-रूपी धन के सामने सब धन तुच्छ हैं-
'चाह गई चिन्ता गई मनुवाँ वे परवाह ।
जिन को कछू न चाहिए वे ही साहसाह ॥
गोधन गजधन बाज धन और रतन धन पान ।
जब श्रायै सतोष धन, मब धन धुर ममान ॥'
कवीर की दयालुता का तो कहना ही क्या | ससार पर
माया का अत्याचार होते देस और उस से द्रवित होकर ही तो
उन्होंन आत्म-चिन्तन मे विन डाल कर उपदेशक का यह वाना
पहना था। जहाँ कनीर की दयालुता के विस्तृत रूप का यह
उदाहरण है, वहाँ उनकी व्यक्तिगत दयालुता का भी प्रगल प्रमाण
उपस्थित है । कबीर ने लोई का साथ आजीवन न छोडा। वे जानते
थे कि पति के वियोग में पत्नी को बडा विपम टुस उठाना पडता
है । उन की दयालुता एव सहृदयता ने पत्नी को निराश्रित छोड़ने
की अनुमति न दी। इस विषय मे हम तो कबीर की गोस्वामी
तुलमीदास जी से कहीं अधिक सहृदय और दयालु पाते हैं।
गोस्वामी जी तो अपनी पत्नी को 'खरिया खरी कपूर की तरह
भी साथ रसने को तैयार न हुए थे
महात्मा कबीर में उदाराशयताभी असीम थी। वे भाव-जगत्,
के उस ऊचे स्तर पर रहते थे, जिस तक सकीर्णता को पहुँच हो/
ही नहीं सकती थी वहाँ 'कावा और काशी' 'वेद और फतेव।
।
२३.....

महारमाबार
'राम और रहीम' 'मन्दिर और मसीद' तथा 'हिन्दू और तुरक'
सर एक दिसाइ देते हैं।
नम्रता सतों के प्रधान गुणों में से है। बिना दैन्य के भक्ति
वनती भी नहीं चाहे वह सगुण राम की हो अथवा निर्गुण
राम की । फवीर भी अपने राम के सम्मुस दैन्य दिखलाते समय
तुलमी के समान ही 'सर पतितन के नायक' यन जाते हैं, उन्हें
अपने समान कोई और पापी दीसता ही नहीं-
/'बुग जो देखन मैं चला बुरा न देखा कोय ।
जो दिल खोगा पापना मुझ से बुरा न कोय ।।"
प्रभु के सामने जाने में उहें यडा सकोच होता है । उन्हें
अपनी हीनता का ध्यान जो है--
'यार बुलावै भाव सों, मो पे गया न जाय ।
घन मैली पिउ ऊजला लागन सक्कों पाय ॥'
उन्हे अपने इष्ट-देव पर पूर्ण विश्वास है। वही तो सदा उन
की सवर रसता है । उसी के सहारे घे माया को ठुकरा सके हैं-
'साधू गांठ न बांधई उदर समाता लेय।
श्रागे पीछे हरि खड़े जय माँग तर देय ॥"
वे 'हरि' भक्त की स्वल इस मसार फी श्रावश्यक्ताओं ही
की पूर्ति की चिन्ता नहीं बल्कि पारलौकिक आवश्यकताओं का
भी पूर्ण प्रवन्ध परते हैं। कनीर का विश्वास भगवान् में इतना
दृढ था कि मोन पाने के लिए वे अन्य किसी को रिश्वत देने की
आवश्यकता नहीं समाते थे। इसीलिए उन्होंने 'काश्या मरणा-
न्मुक्ति' घाले सिद्धान्त को ठुकरा कर, अपने मोक्ष के लिए
फाशी का अहसान उठाना पसन्दन किया था।
किन्तु फीर का यह दैन्य फेवल उसी परम पिता के दरबार
-
,

स्वभाव
तक सीमित है । इस संसार के महाराजो प्रथा ज्ञान-गर्वित
व्यक्तियों को तो वे तुन्छ ही समझते हैं। यह भी साई पर अत्यन्त
विश्वास होने के कारण ही । वे जानते हैं कि-
"जाको राखे साइयों मार न सरके कोय ।
पान न बाँका कर सके जो जग बैरी होय ॥
मासारिक मामलो मे जहाँ सतगण दीनता की पराकाष्ठा
करत हैं, वहाँ व यह मानन को फदापि प्रस्तुत नहीं कि प्रभु की
भक्ति में, साधना में भी वे किसी से कम फनीर न अपनी
वासनायो की यलि चढाकर, जीवन्मृत बन कर, भक्ति की यह
अमूल्य मणि पाई थी ) उसका उन्हें उचित गर्न धा । कहा जा
सस्ता है कि यह गर्न प्रकार की मात्रा तक बढ गया था।
साधना के मार्ग में अपना समकक्ष किसी को न मानत थ ।
अपन ज्ञान के सामन सर का ज्ञान उन्हें थोथा दिसाई देता था।
जिस शरीर-रूपी चादर को सुर-नर मुनि मभी ने प्रोढ-ओढ़
कर मेला कर दिया, उसी का कनीर दास जी ने इतने सयम और
यत्न से प्रयोग किया कि अन्त में उसे ज्या-की-त्यो विना एक
धब्बे के वापस रस दिया। उन्हें अपने कारण गर्व न भी हो, पर
उस जगत् पिता के कारण तो है ही जिस के पावन स्पर्श से वे
स्वर्ण हो गए थे। उन्हें यह बोध हो गया था कि उन की साधना
सफल हो गई है, उन की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई है और ये
अमर बना दिए गए हैं-
'मरते मरते जग मुत्रों औरस मुघौं न कोय ।
दास कबीर अस मुओं बहुरि न मरना छोय ॥'
- हम देखते हैं कि कबीर का हृदय जहाँ दृढ़ता में हिमालय
से होड करता है, वहाँ कोमलता में नवनीत के समान है, जहाँ धे
२५
है

महात्माकार
-
1 'राम और रहीम' 'मन्दिर और मसीद' तथा 'हिन्दू और तुरक'
सर एक दिखाई देते हैं ।
नम्रता सत्तों के प्रधान गुणों में से है। विना दैन्य के भक्ति
बनती भी नहीं चाहे वह सगुण राम की हो अथवा निर्गुरा
राम की। फीर भी अपने राम के सम्मुस दैन्य दिखलाते समय
तुलसी के समान हो 'सर पनितन के नायक बन जाने हैं, उन्हें
अपने समान कोई और पापी दीखता ही नहीं-
1'ग जो देखन मैं चला बुरा न देखा कोय ।
जो दिल खोमा आफ्ना मुझ से बुरा न कोय ।
प्रभु के सामने जान में उन्हें बडा सकोच होता है । उन्हें
अपनी हीनता का ध्यान जो है-
'यार तुलाव माव हो, मो गया नाय !
धन मैली पिउ ऊजला लागन सक्कों पाय।'
उन्हें अपने इष्ट-देव पर पूर्ण विश्वास है । वही तो सदा उन
की सर रखता है। उसी के सहार घे माया को कुरा सके हैं--
'साधू गांठ न कधी उदर समाता लेय।
आगे पीछे हरि बडे जर मांग तब देय "
व 'हरि' मक फी केवल इस ममार की श्रावस्यक्तायो ही
की पूर्ति की चिन्ता नहीं बल्कि पारलौकिक आवश्यकताओं का
भी पूर्ण प्ररन्य करते हैं। कवीर का विश्वास भगवान् में इतना
घट था कि मोक्ष पान के लिए व अन्य किसी को रिश्वत दने की
श्रावश्यकता नहीं सममते थे। इसीलिए उन्होंने 'काश्या मरणा-
न्मुक्ति' पाले सिद्धान्त को ठुकरा कर, अपने मोक्ष के लिए
फाशी का अहसान उठाना पसन्द न फिया था।
फिन्तु कवीर का यह दैन्य फेवल उसी परम पिता फे दरवार
-

स्यभाय तफ सीमित है । इस संसार के महाराजो अथवा ज्ञान-गर्वित व्यक्तियों को तो वे तुच्छ ही समझते हैं । यह भी साई पर अत्यन्त विश्वास होने के कारण ही । वे जानते हैं कि- 'जाको राखे साइयाँ मार न सके कोय । यान न याँका कर सके जो जग भैरी होय । सासारिक मामलों में जहाँ सतगण दीनता की पराकाष्ठा फरत हैं, वहाँ वे यह मानने को कदापि प्रस्तुत नहीं कि प्रभु की भक्ति में, साधना में भी ये किसी से कम हैं। कनीर ने अपनी वासनायों की पलि चढ़ाकर, जीयन्मृत वन कर, भक्ति की यह अमूल्य मणि पाई थी ) उसका उन्हें उचित गर्व था । कहा जा सस्ता है कि यह गर्न प्रहकार की माना तक बढ गया था। साधना के मार्ग में वे अपना समकक्ष क्सिी फोन मानते थे । अपने ज्ञान के सामने सत्र का जान उन्हें थोथा दिखाई देता था। जिस शरीर-रूपी चादर को मुर-नर मुनि सभी ने श्रोढ-श्रोढ कर मेला कर दिया, उसी का फनीर दास जी ने इतने सयम और यत्न से प्रयोग किया कि अन्त में उसे ज्यों-की-त्यो धिना एक धने के वापस रस दिया। उन्हें अपने फारण गर्व न भी हो, पर उस जगत् पिता के कारण तो है ही जिस के पावन स्पर्श से व स्वर्ण हो गए थे। उन्हें यह बोध हो गया था कि उन की साधना सफल हो गई है, उन की प्रार्थना स्वीकार कर ली गई है और वे अमर बना दिए गए हैं- 'मरते मरते जग मुओं औरस मुओं न कोय । दास कबीर अस मुनाँ बहुरि न मरना होय ॥' हम देखते हैं कि फनीर का हृदय जहाँ दृढ़ता मे हिमालय से होड करता है, वहाँ फोमलता मे नवनीत के समान है, जहाँ थे । २५ M

महारमा कमीर
सांसारिक मामलों में अपने समान कोई बुरा नहीं पाते, वहाँ
साधना में अपने आगे किसी को नहीं देखना चाहते । महान्
व्यक्तियों का स्वभाव ऐसा होता ही है-
'वादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोचरणो चेतासि कोनु विशतुमईसि ।'

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yo
कवीर के राम
फयोर रामानन्द स्वामी के शिष्य थे। टन्होंने उन्होंने
राम-मन प्रहण किया था । स्वामी जी दुष्ट-दलन दारी
माकार राम की भक्ति का प्रचार करते थे। फीर फोन
में भी अपवार-याद का समर्थन कहीं फहीं मिलता है।
है कि प्रारम्भ में महात्मा पनीर का भी अवतार-बाद :
था, और उन के राम भी यही स्वामी रामानन्द के
थे । तुलसीदास आदि अवतारवादी महामा
फनोर भी मानव-रूप धारण कर, लीला का निरी
भगवान की प्रार्थना करते हैं-
"दर माँ ठादे दरपार।
तुम रिन मुरति करै को मेरी दरसन दी
तुम धा पनी उदार तियागी सपनन मुनि gr
मांगों कादि रफ मय देयों तुम ही ,
जयदेव नामा विप्र मुदामा तिन :
कहै कबीर तुम समरय दाता चार :
उन के भगवान भी आरम्भ में ये
ये। जिन्हों ने फौरव-पति मे कहा था-
'राजन कौन तुम्हार पाये।
ऐमो माव विदुर को देख्यो याra
हस्ती देम्स मरम ते भूला ar
तुमरो दुध विदुर को पानी बन्नु

महारमा फवीर
वीर समान साग में पाया गुन गावत रैन विहानी ।
कवीर के ठाकुर श्रान द विनोदी जाति न काहू की मानी ।'
कबीर के जीवन-यत्त में हम ने अनुमान किया था कि
समरत कौर को राम-प्रेम के कारण वाल्य-काल में बहुत कष्ट
उठाने पडे होंगे । ऐसी दशा में यह प्राकृतिक है कि उन्हें
उन दुष्ट-दलन भगवान ने पर्याप्त सरल प्रदान किया हो, जो भक्तों
के दुख दूर करन के लिए पाँव-पियाद ही भाग देते हैं तथा भक्त
की लाज रमन के लिए सम्म फाड फर प्रक्ट हो जाते हैं। ऐसे
अवसरों पर भक्त को भगवान् का यही स्वरूप सहारा पहुंचाता है।
निम्न लिसित पर पढ़न मे ज्ञात होता है मानो पालक कबीर की
धात्मा ही प्रहाद के मुख से योल रही है-
नहिं छाही माया राम नाम ।
मोहि और पठन सू कौन काम | टेक ।।
प्रहलाद पधारे पदन साल
सग सखा लोये बहुत घाल ॥
मोहि कहा पदावे पाल जाल ।
मेरी पाटी पे लिख दे भी गोपाल ||
तब हरनाकस को कहो जाय ।
प्रहलाद
पधायो बेग प्राय ॥
तू राम कदन की छाँड बानि ।
वेगि छुड़ाऊं मेरो फह्यो मानि ॥
मोहि कहा डरावे चार बार !
जिनि जल थल गिरि को कियौ प्रहार ||
वाघि मारि, मावै देह जारि ।
हू राम छाडी तो मेरे गुरुहिं गारि ॥
२८

कपीर के राम
तब काढि सहग कोप्यो रिसाई ।
तोहि राखन हारी मोहि पता ॥
सभा ते प्रगटौ गिलारि।
हरनाकस मारयो नस विदारि ॥
महापुरुष देवाधि देव ।
नरसिंह प्रगट क्यिो मगति मेव ॥
कहै कबीर कोर लहे न पार ।
प्रहलाद उवार्यो अनेक पार ॥'
जिसने प्रह्लाद को रक्षा को थी उमने वीर फे विश्वास को
भी उन विषम परिस्थितियों में सुरक्षित रखा होगा।
कनीर की रचना में भगवान् के 'हरि' 'गोविन्द' 'नारायण'
शारगपाणि' आदि अवतार वाद के समर्थक नाम प्रचुर रूप में
किंतु क्रमश ज्ञान-वृद्धि के साथ कवीर को यह बोध,
ध हुआ
कि यह अवतार-धारी राम तो भ्रम में डालने वाला है। उन्होंने
देसा कि दाशरथि राम को लोगों ने बडा सकुचित बना दिया है।
उसके दरबार में निम्न जातियों के लोगो का प्रवेश नहीं तथा एक ही ।
मिट्टी पानी के बने और एक ही प्रभु की सतान मुसलमानों की
भी गुजाइश नहीं । वह मन्दिर के समुचित दायरे में प्रस्तर-प्रतिमा
धन पुजारियो की पेट-पूजा का साधन बन गया है ।) अत उनका
अनतार-वाद पर से विश्वास कम होना प्रारम्भ हुआ। उनके राम
स्वामी रामानन्द के राम से भिन हो गए। 'राम' शब्द निर्गुण
निराकार अझ का प्रतीक बन गया। कबीर ने कहा-
'दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना,
राम नाम करमरम है श्राना!
२६
आए हैं।

- महात्मा कपीर उन्हें साकार राम तय्य हीन एवं माया सया भ्रम,से पूर्व दिखाई हने लगा। उन्होंने कहा- 'मसो मा जाय मो माया। जिस नृसिंहावतार का मारपूर्ण वर्णन पर किया गया है । उसी के विषय में कनीर ने कहा- वे को न बराह कहावे, परणिधरे ना मारा। ई सब काम साहब के नाही भूट को सहारा खेम फारिजो बाहर हो, ताहि पडिज सब कोई। हिरनाकुस नर उदर विदार, सो करता होई। 'राम' क नाम से जो वस्तु व फोरदास जी ने वितरित करनी प्रारम्भ की यह रामानन्द के यम से बिलकुल मेलन खाती थी। 'राम' शब्द रापारि कर वाचक न हो कर अब "निरगुन निरकार के पार परमा है, y रामको नाम रकार जानी। का बोधक हो गया। उन्होंने यह पुराना राम' शब्द छोड़ा तो र नहीं, किन्तु उसकी निराकार परिमापा फरदी तथा साम हो ‘ব’ না ‘নি”ে ‘গেম ‘বন’ খাদি শখ নিয मत-समयक नामों को भी प्रचार किया। साकार राम से निराकार को और थाने में कार का प्रदेव- शाद की ओर श्रापित होना कार्य कर रहा था। इसके अतिरिक एक और कारण भी था । वीरदास जी ऐसी महि-पद्धति पलाना .

कमीर के राम चाहते थे, जो हिंदू और मुसलमान दोनो को ग्राह्य हो और साथ ही शासक जाति के विरोध का विषय न वने अपनी धार्मिक कट्टरता एव राजनीतिक शक्ति के कारण मुसलमान हिंदू सिद्धाता को अंगीकार न कर सकते थे और अपनी विशालता एवं प्राचीन गौरव के कारण हिंदू मुहम्मद साहब को ईश्वर का पुन न मान सकते थे (प्रत कवीर ने राम और रहीम दोनो को मन्दिर और मसजिद के झगड़ालू प्रागणों के बाहर घसोट कर घट घट व्यापी निराकार ब्रह्म में स्थापित करने का प्रयत्न किया । कबीर दास जी का यह ईश्वर न तो फेवल मुसलमानों पर ही रहम करने वाला तथा काफ़िर हिन्दुओं को दोजस की आग में भूनने वाला रहा और न केवल हिन्दुओं का हो उद्धार करने वाला एव यवनो का सहार करने वाला। उसकी करुणा वृष्टि समान रूप से उभय-धर्मावल- म्बियो पर हुई। परन्तु कवीर अपने इस निराकार ब्रह्म का कोई निश्चित रूप निर्धारित न कर सके । यह उनका उद्देश्य भी न था। उनका उद्देश्य तो श्राडम्बर रहित एव दोनो दोनों को समान रूप से मान्य ब्रह्म का निरूपण करना था । सूर्यग्रद, एफेश्वरवाद अथवा ब्रह्मवाद आदि की वारीकियों पर सम्भनत उन्हनि कमी विचार नहीं किया और न यह उनकी उद्देश्य सिद्धि के लिए अभीष्ट ही था। अतएव उनका निगुण ब्रह्म इन तीनो ही वादों की परिभापा में श्रा सकता है, परन्तु वे अपने उद्देश्य मे सफल हुए। अर्थात् वे एक ऐसे घक्ष का निरूपण कर सके जो दोनो धर्मवालों को सरलता से प्राह्य होसके। यही कारण है कि कबीर अपने राम के विषय में कह सके- 'कहे कबीर एक राम जपहु रे, हिदू तुरक न कोई।

महारमा कीर
-
-
इसी कारण राम स भी अधिषराम नाम की महिमा ।
गई। जय राम का रूप पूरी तरह सम में न भाये तो माधारए
मकों को नाम काही अक्लम्बन लेना उचित है। ऐसी दशा में
मक्ष और जोच फ बोर कपल नाम हा साक्षी रूप रह गया।
उसमे से रूप का पूर्ण पहिष्कार हो गया।
ज्ञान होता है कि कबीरदाम जी को यह सगुए-निगुंग का
मगडा भी अधिक रुचियर न हुआ। इसम भी उन्हें सरिता
और पाहम्बर फी यू भाई, अत उन्होंन कहा-
'सरगुन निरगुन ते परे
तदा हमारा प्यान।"
महात्मा फ्यौरदाम जीन किमी धर्म शास्त्रों का निमित्त
रूप से अध्ययन नहीं किया था। उनका तात्विक मान केवल
सुना-सुनाया और उथला था । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण में
तव मिलता है जब हम कौर द्वारा निरूपित ब्रह्म के स्वरूप पर
(दृष्टिपात करते हैं । कबीर ईश्पर में जो अस्थिरता एव यिमि
मता दिसलाई देती है उसके कारण स्पष्ट है। रामानन्द जी के
शिष्यत्य के फलस्वरूप उन्होंने सगुण राम एवं अवतार पार
का समर्थन किया।व्यों ज्यों उनका सत्सग और ज्ञान बढ़ता
गया उनकी धास्था इस स्थूल राम पर से कम होती गई और
ये निराकार राम की पार माते गए और उन्होंने निर्गुण बम
का निरूपण प्रारम्भ किया। परन्तु यहां उन्हें परिस्थितियों ने
विवश प्रिया । शकराचार्य द्वारा प्रवर्तित घेदान्त के प्रक्ष घाद के
समर्थक होते हुए भी राम रहीम को एक म ढालने के विचार
उन्होंने ब्रह्म वाद को पैगम्बरी एप्रेश्वर-याद की भोर पसीटा।
मन्त को वे शुद्ध एकेश्वर-वाद अथवा प्रहपाद पर भी स्थिर न
३२

कबीर के राम रह सके । निम्यकाचार्य और सूफोमत की माधुर्य भक्ति का समर्थन करने के कारण उनके निगुण ब्रह्म में गुणों का आरोप हो गया। किन्तु यदि कपीर की गौण अस्थिरता तथा आध्यात्मिक विकास की पहली श्रेणियों पर विचार न किया जाय और उनके प्रौढ़ एवं प्रधान सिद्धान्तों पर ही ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट दिसाई देगा कि उन्होंने शंकराचार्य के निर्गुण ब्रह्म फा ही निरूपण किया है।

माया, जीव और मोक्ष फपीर सारत हिन्दू थ । राष्टि की उत्पत्ति का वर्णन एवं गाया, जीव और मोक्ष के सम्बंध का निरूपण उन्होंन हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुकूल ही पिया है । सूक्रीमत अथया इस्लाम मतो माया के लिए स्थान ही नहीं है। हिंदू धर्म सिति के अनुसार ती मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक जीय के लिए माया के आवरण का श करना अत्यंत आवश्यक है । मायावाद हिंदू धर्म की शेषता है। (ससारोत्पत्ति का वर्णन करते हुए कपीर दाम जी ने यतलाया है कि इस जगत् की उत्पत्ति ही माया से हुई है। सृष्टि प प्रारम्भ में एक निर्विकार समर्थ आत्मा थी। उसने संसारोत्पत्ति की इच्छा की। संसारोत्पत्ति की इच्छा से उसने सात अतियों २ की रचना की । पुन इच्छा का प्रादुर्भाव हुआ । इच्या के पश्चात् पांच प्रहा हुए। इन ब्रह्माओं को सृष्टि की रचना और रक्षा का कार्य दिया गया, किन्तु ये सफलता न प्राप्त कर सके। तय उस समर्थ श्रात्मा ने अक्षर नामफ ग्रह्मा पर कृपा की। 3 जब अक्षर निद्रा से उठा तो उसने जल पर एक अएडा सैरता हुआ देखा। उसकी दृष्टि के प्रभाव से वह अण्डा फूट गया और उससे 'निरजन' निकला। यह निरंजन भी अफ्ले सृष्टि रचना में सफल न हो सका, अत इमने एक स्त्री पाने की इच्छा प्रकटा की। परिणाम स्वरूप उस समर्थ आत्मा ने एक स्त्री की सृष्टि की। उस स्त्री से निरंजन ने प्रया, विष्णु और महेश नामक तीन ३४

माया, जीव और मोर
पुत्र उत्पन्न किए ! इसके पश्चात् निरजन अवश्य हो गया। इम
बी का ही नाम माया है। वह अपने पुत्र प्रक्षा पर ही मक्त
हो गई । ब्रह्मा ने उससे पूछा-
'के तोर पुरुष काकर तू नारी'
इसका उत्तर कबीर दास जी ने माया से इस प्रकार
दिलाया है-
'तुम हम, हम नुम और न कोई
त् मोर पुरुष हमैं तोर जोई।
माया का कबीर ने घोर विरोध क्यिा। 'हरि बिच अन्तरा'
डालने वाली माया के प्रति घृणा उत्पन्न कराने के लिए ही महात्मा
कीर ने उसकी उत्पत्ति के माय यह घृणित प्रश्नोत्तर जोड दिया है।
इस प्रकार उत्पन्न होकर और प्रारम्भ में अपने पुत्र पर ही
आसक्त हो कर इम विपम माया नेससार में अपनाप्रपच फैलाना
आरम्भ कर दिया। उसका प्रभाबहा व्यापक और भयंकर
हुआ। उसके प्रभाव से-
'मुर नर मुनि जोगी जती
कोई पचा न पाया।
नीन तेन ढूँढे नहीं
कच्चे धरि खाया ॥
ससारियों को तो चर्चा हो क्या, उसके प्रभाव से देवलीक
भीन बच सका-
'एक नारी जाल पसारा,
जगमें मया श्रन्देशा ।
खोजत कार पार न पाया,
ब्रह्मा विष्णु महेशा॥
३५
-

माया, जीव और मोक्ष कवीर सारत हिन्दू थे। सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन गाया, जीव और मात के सम्बंध का निरूपण उन्होंने हिन्दू-धर्म शास्त्रों के अनुकूल ही किया है। सूफीमत अयया इस्लाम में तो. माया के लिए स्थान ही नहीं है। हिंदू धर्म-सिद्धति के अनुसार ही मोक्ष प्राप्ति के इच्छुफ जीव के लिए माया के आवरण का नाश करना अत्यंत आवश्यक है । मायावाद हिंदू धर्म की, विशेषता है। ससारोत्पत्ति का वर्णन करते हुए कबीर दाम जी ने बतलाया कि इस जगत् की उत्पत्ति ही माया से हुई है। सृष्टि के आरम्भ में एक निर्विकार समर्थ आत्मा थी। उसने संसारोत्पत्ति की इच्छा की। संसारोत्पत्ति की इच्छा से उसने सात अतियों : की रचना की । पुन इच्छा का प्रादुर्भाव हुआ। इच्छा के पश्चात् पांच प्रझा हुए। इन प्रभाओं को सृष्टि की रचना और रक्षा का कार्य दिया गया, किन्तु ये मफलता न प्राप्त कर सके। तब उस समर्थ आत्मा ने अक्षर नामफ बझा पर कृपा की। जव अक्षर निद्रा से उठा तो उसने जल पर एक अण्डा तैरता, हुआ देखा। उसकी दृष्टि के प्रभाव से वह अण्डा फूट गया और उससे 'निरजन' निकला । यह निरंजन भी अकेले सृष्टि रचना : में सफल न हो सका, अत' इसने एक स्त्री पाने की इच्छा प्रकट की। परिणाम स्वरूप उस समय प्रात्मा ने एक स्त्री की सृष्टि की। उस स्त्री से निरंजन ने ममा, विष्णु और महेश नामक तीन 7 A ३४ प

माया, जीव और मोत
पुत्र उत्पन्न किए । इसके पश्चात् निरजन अटश्य हो गया। इस
स्त्री का ही नाम माया है। वह अपने पुत्र ब्रह्मा पर ही आसक्त
हो गई । ब्रह्मा ने उससे पूछा-
'के तोर पुरुष काकर तू नारी'
इसका उत्तर कबीर दास जी ने माया से इस प्रकार
दिलाया है-
'तुम हम, हम तुम और न कोई
तू मोर पुरुष हमैं तोर जोई।'
माया का कीर ने घोर विरोध किया। 'हरि विच अन्तरा'
डालने वाली माया के प्रति घृणा उत्पन्न कराने के लिए ही महात्मा
कीर ने उसकी उत्पत्ति के माथ यह घृणित प्रश्नोत्तर जोड़ दिया है।
इस प्रकार उत्पन्न होकर और प्रारम्भ में अपने पुत्र पर ही
आसक्त हो कर इम विपम माया नेससार मे अपनाप्रपच फैलाना
आरम्भ कर दिया। उसका प्रभान बडा व्यापक और भयंकर
हुआ। उसके प्रभाव से-
'मुर नर मुनि जोगी जती
कोई रचन न पाया।
नौन तेन ढूँटे नहीं
कच्चै धरि खाया ।।'
ससारियों को तो चर्चा ही क्या, उसके प्रभाव से देवलोक
भी न बच सका-
'एक नारी जाल पसारा,
जगमें भया श्रदेशा ।
खोजत काहू पार न पाया,
ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥
३५

महारमा कबीर
इसके प्रभाव से योगी, यती, पण्डित, मौलयी, काडी आदि
कोई भी न बच सका। सभी माया के मोहन-मन्त्र से मुग्ध हो
कर मतवाले पन रहे हैं-
सद ही मदमाते कोई न जाग।
संगहि चोर घर मूसन लाग ।।
योगी मदमाते योग ध्यान ।
पपिडत मदमाते पदि पुरान ।।
तरमी मदमाते तप के मेव।
रा यासी मदमाते करि हम ॥
मौलान मदमाते पदि मोगा ।
कानी मद माते निसा॥
संसार मत्यो माया के धार ।
गणा मद माते करि इकार ॥'
इस माया के दो प्रतीक है, क्नक और कामिनी । इन्हीं दो
रूपों से माया संसार में अपना दुसद प्रपच फैलाती है। यही
कामिनी और फनक आत्मा का परमात्मा से सयोग नहीं होने
देते, उनके बीच दुर्गम घाटी का काम करते हैं-
'चलो चलो सर कोई कहे, पहुचा बिरला कोय।
एक कनक एक कामिनी, दुरगम पाटो दोय।।'
यही कारण है कि कबीर ने माया के साथ-माथ कामिनी
और कांचन पो भी जी भरकर कोसा है। इन्हीं दोनों
के पीछे पड़ने पर जीव माया फी विषम ज्वाला से दग्ध
होता है-
'माया के मक गजरे, कनक कामिनी लागि
कह कबीर क्स याचि है, रूई लपेटी प्रागि"
-

माया, जीव भोर मोर 1 - d और इन दोनों में भी कामिनो को तो वे बहुत ही बडा विकार कहते हैं। वे कहते हैं- 'नारि नसा तीन गुण जो नर पास होय । मक्ति मुक्ति निज ध्यान में पैठ सकै नहिं कोय ॥' और नारी सग को तो ये बहुत ही भयंकर बतलाते हैं- 'नारी की माँइ परें अंधा होत भुमग । कविरा तिन की कौन गति नित नारी का मग!' कीर को इस बात पर बड़ा आश्चर्य होता है कि जो नारी-जाति मातृत्व का गौरव पूर्ण पद सुशोभित करती है, वही प्रमदा-रूप धारण कर मनुष्य को माया के जाल में फंसाने में भी सहायक होती है । इस सत्य का वर्णन कबीरदास जी अपने अनूठे ढग से करते हैं- 'नागिन ने पैदा किया, नागिन धरि खाया इस कनक और कामिनी फे चिन्तन से ही मनुष्य की विवेक-बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और बिना विवेक के मनुष्य समार्ग से पतित हो जाता है- 'बिन विक भटकत फिरै ।' इस प्रकार समार्ग से भटक कर जीव काम, क्रोध, लोम, मोह और अहंकार का शिकार बनता है । उसके हृदय में आशा, तृष्णा, कपट, परनिन्दा आदि दुर्गुण उत्पन्न होते हैं। यह सब माया का परिवार है। इस प्रकार पूर्ण रूप से माया-पंक में फँस कर जीव भक्ति और ज्ञान के मार्ग से विमुस हो कर, विनाशोन्मुस होता है। कधीर दास जी का मत है कि जिस प्रकार जल से भरे हुए अनेक घटो में एक ही सूर्य के भिन्न भिन्न प्रतिविम्ब दिसाई ३७ -

महारमा कबीर
इसके प्रभाव से योगी, यती, पण्डित, मौलवी, कारी आदि
कोई भी न यच सका। सभी माया के मोहन-मन्त्र से मुग्ध हो
पर मतवाले पन रहे हैं-
'सही मदमाते मोन जागा
संगदि चोर पर मूसन लाग |
योगी मदमाते योग पान ।
पपिद्धत मदमाते पदि पुरान ।
तपमी मदमाते सप के मेर।
सयासी मदमाते करि इमेष ॥
मौलान मदमाते पदि मोसार ।
काजी मद माते के निसाफ ।
ससार मस्यौ माया फे
धार।
गजा मद माते फार कार'
इस माया के दो प्रतीक है, पनक और कामिनी । इन्हीं ।
रूपों से माया संसार में अपना दुसद प्रपंच फैलाती है। यह
कामिनी और फनक आत्मा का परमात्मा से सयोग नहीं हो
देते, उनके बीच दुगम पाटी का काम करते हैं-
'चलो घनो सब कोई कहे, पटुना बिरला कोय ।
एक कनक एक कामिनी, दुरगम घाटो दोय ।।'
यही कारण है कि कबीर ने माया के साथ-साथ कामिनी
और कांचन को भी जी भरकर कोसा है। इन्हीं दोनों
फे पीछे पड़ने पर जीव माया की विपम ज्याला से दग्ध
होता है-
'माया के मा जग जरै, कनक कामिनी लागि।
यह कबीर कस याचि है, रुई लपेटी आगि ।'

-
माया, जीव और मोर
और इन दोनों में भी कामिनी को तो ये बहुत ही बडा
विकार कहते हैं। वे कहते हैं-
'नारि नमाचे तीन गुण जो नर पास होय ।
भक्ति मुक्ति निज ध्यान में पैठ सके नहिं कोय ॥'
और नारी-सग को तो वे बहुत ही भयंकर बतलाते हैं-
'नारी की झाई पर अंधा होत भुजग। V.
कविग तिन की कौन गति नित नारी का मग ।।'
कीर को इस यात पर वडा अाश्चर्य होता है कि जो
नारी-जाति मातृत्व का गौरव पूर्ण पद सुशोभित करती है,
वही प्रमदा-रूप धारण कर मनुष्य को माया के जाल में फैमाने
में भी सहायक होती है । इस सत्य का वर्णन कबीरदास जी
अपने अनूठे ढग से करते हैं-
'नागिन ने पैदा किया, नागिन घरि खाया ।
इस फनक और कामिनी के चिन्तन से ही मनुष्य की
विवेक बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और विना विवेक के मनुष्य
समार्ग से पतित हो जाता है-
नि विक मटकत फ्रैि
इस प्रकार सदमार्ग से भटक कर जीव काम, क्रोध, लोभ,
मोह और अहंकार का शिकार बनता है। उसके हृदय में आशा,
तृष्णा, कपट, परनिन्दा श्रादि दुर्गुण उत्पन्न होते हैं। यह सब
माया का परिवार है । इस प्रकार पूर्ण रूप से माया-पंक में फैंस
फर जीव भक्ति और ज्ञान के मार्ग से विमुस हो कर,
विनाशोन्मुख होता है।
कबीर दास जी का मत है कि जिस प्रकार जल से भरे
हुए अनेक घटों में एक ही सूर्य के भिन्न भिन्न प्रतिविम्ब दिसाई
DA

- . J महात्मा कयीर देते हैं, उसी प्रकार एफ ही पर-ग्रह परमात्मा की ज्योति क प्रकाश प्रत्येक जीवधारी में है। प्रत्येक आत्मा उसी परमात्मा का अश हैं। कबीर साहब ने लिखा है- 'सब घट व्यापक हो रहा सोई श्राप अलेख।' अब प्रश्न यह है कि जब प्रत्येक जीव में उसी परम- ज्योति का प्रकाश है, प्रत्येक आत्मा उसी परमात्मा का अर है, तब क्या कारण है कि इस ईश्वर-अंश जीव को परमात्मा के वियोग म संमार के भ्रम जाल में फंस कर, भटकना पड़ता है । घर के भीतर ही यह आँख मिचौनी कैसी ? जब यह सत्य है कि- 'जा कारण जग दूटिया सो तो घट ही माहिं।' तब क्या कारण है कि उससे साक्षात्कार नहीं होता इस प्रश्न का उत्तर कबीर साहब यह देते हैं कि- 'परदा दीया मरम का ताते सूझे नाहिं।' यह 'भरम'-यह 'माया' ही जीव और हरि के अनन्त संयोग में बाधा डालती है। यदि इस माया के आवरण को फाड़ दिया जाय तो श्रात्मा और परमात्मा में कोई भेद ही न रह जाय। किन्तु माया का यह प्रपच नष्ट कैसे हो ? आवागमन के बखेड़े से छुटकारा पाकर जीवात्मा का परमात्मा से अनन्त योग कैसे सिद्ध हो ? दूसरे शब्दों में, जीव को मोक्ष किस कार प्राप्त हो महात्मा कबीर दास जी का मत है कि मृत्यु के पश्चात् न पाने का प्रयत्न मेयस्कर नहीं है । उचित तो यह है कि जीवन में मुक्त होने का प्रयत्न किया जाय । मनुष्य को, .

माया, जीव घोर मोक्ष इसी जीवन में अपनी आत्मा को सांसारिक बधनों से छुटकारा दिलाना चाहिए। कनीर के शब्दों में उसे 'मरजीवा' अर्थात् 'जीवन्मृत' बनने का प्रयत्न करना चाहिए । अत उन्होंने इसी जीवन में इन्द्रियों को पूर्णत अपने घश में करके माया के जजाल से निकलने की रीति बतलाई है। माया का प्रभाव मन पर पड़ता है। मन ही माया के अस्त्र काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह यादि का लक्ष्य बनता है- 'मन पांचौ प बस परा, मन के बस नहिं पाच' और इसी कारण जीव व्यथित रहता है- जित देखू तित दो लगी, मित देसू तित पाच । मन की प्रकृति ही विधाता ने ऐसो बनाई है कि उसे नरा स्वतन्त्रता मिली नहीं कि वह माया पर आसक्त हुथा- 'मनुश्री तो पछी मया उड़ि के चला अकास । ऊपर ही ते गिरि पड़ा या माया के पास ' अत यह आवश्यक है कि मन पर कठोर अनुशामन रखा जाय । परन्तु यह कार्य बडा कठिन है सरल नहीं है, क्योंकि- 'सन्तो यह मन है बड़ा आलिम । जाको मन सौ काम परयो है तित ही हैमालुम ।' -साधन का पवीर दास जी यह उपाय बतलाते हैं कि साधक सर्व प्रथम तो सद्गुरु की शरण में जाय । सद्गुरु और उनके गुरुमंत्र का प्रभाव हो ऐसा है कि जिस पर गुरु देव की कृपा होती है उस पर माया-नागिन का प्रभाव नहीं पड़ता। गुरु मन से वह नागिन भस्म हो जाती है- 'नागिन सरपै सत पै उहवा नहिं आवै । कह कबीर गुरु मत्र से श्रापै जरि जावै ॥' इस दुघ्तर कार्य- 7

महारमा कमीर
तत्पश्चान मन रूपी कुजर को भक्ति रूपी जजीर बम
कर जकड़ दे
'मन (जर महमंत था, रिता गर गभीर ।
दुहरी तिहरी चौदरी पर गई प्रेम जजीर ।'
इस प्रकार शासित हो जाने के पश्चात् मन में यहा पावन
परिवर्तन होता है-
पहले यह मा काग याकरता जीवन पात ।
श्रर तो मन इसा भया चुगि चुगि मोती सात !'
इस प्रकार यह मन काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह आदि
विकारों से हट कर शील, क्षमा, दया, संताप, धैर्य, उदारता,
दानता, सत्य श्रादि सत-सुलभ लक्षणों से पूर्ण हो जायगा और
ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे । शान-चनु खुलते ही मनुष्य माया के
जान से मुक्त हो जायगावीर न भक्ति को ज्ञान-लाम करने
पी मुलभ सीढ़ी माना है, क्योंकि व ज्ञान-मार्गी ये गोस्वामी
तुलसीदास जी न भक्ति को ज्ञान की अपेक्षा सुलभ और सरल
बतलाया और माया एव भक्ति दोनों को नारी बतला कर यह
दलील दी है कि 'नारि न मोह नारि के रूपा' । श्रत भक्तों पर
माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा । परन्तु, फनीरदास जी यद्यपि
भक्ति की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं, परन्तु ये माया पी.
टट्टी को शान की आधी से उड़ना हो पत्तलाते हैं। कबीरदास जी
लिखते हस
सतो भाई भाई शान की श्राधी रे ।
प्रम की टाटी स्नै टहानी माया रहे न पाँधी ॥ टेक !!
हिति चत को धूनी गिनी, मोह दी तूटा ।
मिना छति परा घर अपरि, कुबुधि का भांडा"
४०

माया, जीव और मोष
गया।
श्रांधी पीछे जो जल बूठा प्रेम हरी जन भीनां ।
कहे कबीर भान के प्रगटे, उदित भया तम पीना' ।
ज्ञान की आँधी से भ्रम की टट्टी टूट गई, माया का पर्दा फट)
गया, तृष्णा का छप्पर गिर पड़ा और कुबुद्धि का भण्डा फूट
क्वीर दास जी का मत है कि इस प्रकार ज्ञान यनु खुल
जाने पर गुरुदेव की कृपा से, मनुष्य माया के जाल से मुक्त हो।
जाता है-
'माया दीपक नर पतग भ्रमि भ्रमि मांहि परत
कोइ एक गुरु ज्ञान ते उपरे साधू सत ॥
इस प्रकार गुरु की कृपा से भक्ति द्वारा मन का मार्जन होता
है तथा ज्ञान लाभ करने के पश्चात् मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता
है। सांसारिक विकारों की ओर से इस जीवन में ही मृत होकर
जीव देश काल से परे होकर सिद्धावस्था की प्राप्ति करता है।
और अत को उसका ब्रह्म से साक्षात्कार होता है-
'मैं मर जीवा समुद्र का डुबकी मारो एक ।
मूठी लाया ज्ञान की जामें वस्तु अनेक ॥
दुबकी मारी समुद्र में निकसा जाय अकास ।
गगन मडल मे घर किया हीरा पाया दास
४१

-
भक्ति-पद्धति
स्वामी रामानन्द के शिष्यत्व अथवा अन्य किसी कारण
से कबीर का कभी अवतारवाद पर विश्वास भले हो रहा हो,
पर यह निश्चित है कि भूनि पूजा की उपयोगिता उन्होंने कमी
स्वीकार नहीं की। भक्ति की महिमा का वहत अधिक वर्णन
करते हुए भी वे मूर्ति-पूजा के सदा क्टर विरोधी रहे । उसे तो ये
स्वाथों पुजारिया की पेट पूजा का साधन बतलाते हैं-
'ला सार लासी पूना चढे अपार ।
पूजि पुजारी ले चलाद मूरत मुस छार।।'
इस पत्थर पूजन को तो वे सदा पागलपन ही समझते रहे,
भगवान से मिलने का साधन नहीं-
'पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पून पक्षार ।'
कबीर दास जी मस्जिद में नमाज पढ़ना भी लाभदायक
नहीं समाते। वे कहते हैं कि इस प्रकार मस्जिद में योग देने
स क्या लाभ ? क्या भगवान बहरे हैं, जो गला फाड़-फाड़ कर
उन्हें अपनी भक्ति की सूचना देना आवश्यक है। ये लिखते हैं-
'काकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय ।
ता चदि मुल्ना बांग दे स्था पहरा हुआ खुदाय ।'
वास्तव में क्योर दास जी ऐसी भक्ति-पद्धति के विरोध
थे, जिसमें प्रदर्शन का थोड़ा सा मी अश होघे व्यक्तिगर
माधना से समर्थक ये प्रधानत ज्ञान मार्गी होने के कारण
अकेले में बैठफर हृदयस्थ परमात्मा का दर्शन करने के
उपदेश देते हैं।

भक्ति-पद्धति फवीर दास जी कहते हैं कि निश्चय ही भति, मुक्ति का साधन है- 'कह कवीर ससा नहीं भगत मुकुति गति पाइरे।' परन्तु यह भक्ति अध-भफि न होनी चाहिए, परन शान युक्त होनी चाहिए- 'शान संपूरन ना मया हिरदा नादि जुड़ाय । देसा देवी मति का रंग नही ठहराय॥' फेल भक का वेप धारण कर लेने से ही भक्ति नहीं होती, और न इससे वांछित परिणाम ही निकलता है । वेप और भक्ति में तो पृथ्वी और आकाश के समान अन्तर है- 'भगति मेस यहु श्रतग, जैसे धरति अकास ।' tar इस भषि-मार्ग में सम्पूर्ण प्रात्मत्याग की आवश्यकता है। कच्चे जी के व्यषियों को इस ओर न आना चाहिए- 'सीस उतारै भुई धरै तापर रासे पाव । दाम कीरा यों कहै ऐमा दोय तो श्राव ॥' साथ ही यह भक्ति नितान्त निष्काम होनी चाहिए । कारण यह है- अब लग मक्ति सकाम है तब लगानिस्कन सेय । कह कमीर यह क्यों मिले नि कामी निज देव ॥' भक तो केवल भगवान की भक्ति करते रहने का अधिकार चाहता है, उसे स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा नहीं होती । कनीर दास जी भगवान् के सामीप्य को ही भक्ति का अन्तिम लक्ष्य नहीं मानते, वे सायुज्य को प्राप्त करने में ही अपनी शान-प्रधान भक्ति की सफलता बतलाते हैं। श्रत उन की ष्टि में तो स्वर्ग का मूल्य और भी नगण्य है । वैकुण्ठ प्राप्त करने की आशा। ।

हैं कि इस में इन्द्रियो की वासनाओं को पूति प्रचुर रूप में
महात्मा कीर
ना
जय तक मन में रहेगी, तर सफ कभी सभी भक्ति हो ही
सकती। वैकुण्ठ के विषय म कपीर दास जी लिखते हैं-
'चलन चलन सब कोऊ कात है,
जानों पैठ का है।
जोगन
एक प्रमिति नहि जाने,
वातन हरि यमुण्ठ यवान ॥
जप लग है एठ को श्रासा,
तब लग नहि हरि चरन निवासा।।'
उन के मत स पिहिरत श्रथवा स्वर्ग माया का प्रपंच ही
है। इसके पाने के इच्छुक इमकी कामना इसीलिए करते
होगी (अत सच्चे भक्त का लक्ष्य निहिश्त अथवा स्वर्ग नहीं
वरन् भक्तिनस द्वारा अपनी वासनाथों का माजन एवं परमात्मा
से अपना एकीकरण होना चाहिए।
भक्त-प्रवर गोस्वामी जी ने भक्तिरस में सराबोर हो कर
अपने इष्ट देव को सम्बोधन कर के लिखा है-
'मोहि तोहि नाते अनेक'मानिये जो भावे ।
ज्यो त्यो तुलसी कृपालु चरण शरण पावै ।।'
क्वीर दास जी भी भक्ति के आग में अपने राम से
अपने अनेक नाते स्थापित कर लेते हैं। कहीं तो वे कहते हैं-
'अब मोहि लेचल नणद के पीर' अपने देसा।
इन पाँचिन मिलि लूटीहूं, सग प्राहि भदेसा ।'
इस प्रकार भगवान् फोनणद वीर बताते हैं,तो कहीं कहते हैं-
'अवगुण मेरे पाप जी, बकस गरी नेवाज ।
जो में पूर्व कपूत , तऊ पिता को लाग ।'

भति-पद्धति
पिता तो पुत्र के अररान जमा कर उसे अपनागा ही,
परन्तु फिर कोर को ध्यान पाता है कि पिता तो एक पार
निष्ठुर हो भी जाय परन्तु माता नहीं हो सकती, अत वे भगवान्
को माता बनाकर उनमे कृपा मिक्षा मांगते हैं-
हरि जननी में चालक तेरा,
काहे न अवगुन यकसद मेरा ॥ टेक ॥
अपराध करै दिन फेते,
जननी फे चित हैं न तेते ।
पर गदि फेस करे जो पाता,
न त उतारै माता ।
कहै कबीर एक बुधि बीनारी,
यालक दुग्यो, दुमी महतारी ॥
इम प्रकार स्वयं सेवक, पत्नी, पुन, आदि यन कर तथा
भगवान को सेव्य, पति, पिता, माता आदि बना कर अनेक
नाते निभाने की प्रार्थना करते हैं।
जाति, वर्ण एवं कुल के कारण तो फनीर वैसे भी मनुष्यों
में भेद-भाव स्वीकार नहीं करते परन्तु उपासना के क्षेत्र में
तो वे सभी प्राणियों को समानता का प्रवल समर्थन करते हैं-
'भक्ति गेंद चौगान की भावे कोर ले जाय ।
कह कबीर पल भेद नहिं कहा रक कहा राय ।।'
घम के अन्तर्गत अन्य कर्म-काण्ड तो माया में फंसाने
घाले हैं, अत सब कुछ छोड़-छाड़ कर भक्ति का आश्रय लेना
उचित है-
'और फर्म सब कर्म हैं मगति कर्म निष्कर्म ।
कहै कपीर पुकारि के भगति करौ तनि धर्म ।'

महारमा कबीर भक्ति के स्रोत में बदफर कर अपने निर्गुण राम में गुणों का आरोप कर देते हैं, तथा पाखण्ड विरोधी होते हुए भी वे 'सपोह यहि के लेई राम का नाम । ताये पग की पैतरी मेरे तन का चाम ॥' कीर के ब्रह्म-निरूपण की तरह उनके भक्ति मार्ग पर भी परिस्थितियों का प्रमार पहा है। कोई भी भकि-पद्धति जिस में प्रदर्शन का योहा-सा भी श्रश होना हिन्दु एवं मुसलमान दोनों के अनुकूल न हो सकती थी । ऐमी दशा में यही संभव था कि व्यक्तिगत साधना पर जोर देर निराकार ब्रह्म के चिन्तन का उपदेश दिया जाता । अपने आध्यात्मिक विकास को चरम सीमा पर पहुँचने पर फीर साहय स्वय तो भक्ति की अपेक्षा ज्ञान को अधिक महत्व देन लगे थे, परन्तु जन साधारण की दृष्टि से वे भक्ति का नितान्त नहिष्कार भी न कर सकते थे, क्यों- कि युद्धों और अशान्ति से पूर्ण उम काल में कोरा शुष्क ज्ञान- मार्ग उपयोगी न होता । अत, समाज को उनकी माधुर्य भावना युत निर्गुण भक्ति हो शान्ति प्रदान कर सकती, तथा हिन्दू और मुसलमानों के हृदय को निकट लाने में समर्थ हो सकती थी। ५१

गुरु और जिज्ञासु
अनजान देश में राह बतलाने वाले की प्रारश्यकता पड़ती
है । जब इस छोटे से ससार के छोटे-छोटे स्थान ढूंढने के लिए
भी पथ-प्रदर्शक की आवश्यकता होती है, तब उस अगम
अगोचर देश के यामी परब्रह्म के महल की राह पाने के
लिए गुरु-रूपी पथ-प्रदर्शक की कितनी अधिक आवश्यकता
होगी, इस का अनुमान कनीर दास जी ने पूर्ण रूप से कर लिया
था। इस मार्ग प्रदर्शक फी खोज न उन्हें सारी रात बेचैन रस कर ||
सूर्योदय के कई घण्टे पहले मणि काणिका घाट की सीढियों पर
ले जाकर लेटा दिया था। दिव्य लोक का मार्ग इतना सकीर्ण एव
भूल भुलैयों से पूर्ण है कि यदि सद्गुर ने राह न पत्तलाई तो
मार्गच्युत हो जाना अवश्यभावी है । कबीर दास जी ने कहा है-
'ताकी पूरी क्यों परै, गुरून लसाई पाट ।
ता को बेड़ा बूड़ि है, फिर फिर अवघट घाट ॥'
इस भवसागर को पार करने के लिए गुरु-रूपी चतुर
खिवैये की बहुत अधिक आवश्यकता है।
कबीर दास जी का कथन है कि वे भी पत्थर पूजने की
ओर चल दिये थे, वे भी ससार की मूर्सता-पूर्ण रूढियों में
फैसे जा रहे थे, केवल गुरुदेव की कृपा से ही वे उस पाखंड से
बच कर सच्चे ज्ञान को पा सके-
'हम भी पाहन पूजते होते यन के रोक ।
सतगुर की किरपा भई उतरा मन से बोम ||

महारमा कबीर
-
पोछे लगा माइ था लोक वेद पे साथ ।
श्रीगे ये मत गुरू मिला दीया दोहा हाथ || 0
यदि गुस्दव शिष्य को मान-रूपी दीपक देकर सच्चे मार्ग
पर न चलाते तो वह अज्ञान के पारण पशु के समान विवेक
हीन ही रहता।
जिस समय मनुष्य माया नाल में फंस पर अपनी आत्मा
फो पाप की छाप से क्लुपित कर लेता है, उस समय उसे केवल
सद्गुरु ही निर्मल कर सकते हैं-
'गुरु धोबी सिप फापना, सावन सिरजन हार।
मुरति सिला पर धोइये, निकसे जोति अपार ।'
महात्मा कनीर ने अपने धर्म सिद्धान्त वेदान्त, सूझीमत तथ्य
हठयोग से अधिक लिए हैं । इन सब मता में गुरु का स्थान
पाहत महत्त्वपूर्ण है । भारतीय भक्त तो तुलसीदास जी के
शब्दों में सदा से ही गुरु के पद-नत्र की रज से मन रूपी मुकुर
को स्वच्छ करने का उपदेश देते रहे हैं।
को श्रापश्यफता बहुत अधिक कही गई
है। उनके सिद्धान्त के अनुसार गुरुदेव की कृपा के बिना न
सो पात्मा और परमात्मा का मिलन हो सकता है और न आत्मा
के मिलन-पथ की ओर अग्रसर होने की तीन आकांक्षा ही हो
सकती है।
यह वियोगिनी प्रात्मा ससार के झूठे मगहों में फंस कर
ऐसी येसुध हो जाती है कि उसे अपने प्रियतम परमात्मा का
स्मरण भी नहीं रहता। गुरुदेव ही उस पर कृपा करके उसे
परमात्मा के वियोग का स्मरण दिलाते हैं, जिससे वह व्यर्थ के
सांसारिक मगहों को भूल, विरह-विकल होकर अपने प्रियतम
-
सूजीमत में
।

--
-
पाऊ
गुरु थार जिज्ञासु
के मिलन-पथ पर चल देती है । कपीरदास जी लिसते हैं
के गुरुदेव ने ही मेरे हृदय में भगवान् का वियोग जामत
किया है--
'सतगुरु हो महाराज, मोपै साइ रंग डारा,
विरह की चोट लगी मेरे मन म, येध गया त सारा ।
औषध मूल कछु नहि लागै, क्या करे वैद विचारा॥
सद्गुरु के द्वारा छोडे हुए विरह-बाण ने ऐमा विधिन प्रभाव
डाला कि ससार की और से समस्त वृत्तियाँ फिर गई -
"गूगा हुवा बावला, बहरा हुवा कान ।
थै
पगुल मया, सतगुरु मारथा यान ।
हसे न बोलै उनमनी, चचल मेल्हयो मारि ।
कहै कबीर मीतर भिद्या, सतगुरु के हथियार ।'
इस विपम वियोग के जाप्रत हो जाने के पश्चात भी विना
मुरशिद (गुरु) की कृपा के मुरीद (शिष्य) प्रियतम के प्रेम-पथ
पर निफएटक याना नहीं कर सकता। प्रसिद्ध सूफी कवि जायसी
ने पद्मावत की अन्योक्ति को स्पष्ट करते हुए लिखा है--
'गुरु सूवा जो पथ दिखाया ।
विनु गुरु जगत को निरगुन पावा ।'
महात्मा कीर भी इस प्रेम-पथ पर गुरुदेव की घतलाई हुई
विधि के अनुसार चल कर ही सफलता प्राप्त करने की आशा
रसते हैं। वे लिखते हैं-
V पॉश्या पकड़ा प्रेम का, सारी किया सरीर ।
सतगुरु दाव बताइया, सेले दास कबीर ॥'
हृदय में इस अलौकिक प्रेम का सचार गुरुदेव ही करते हैं,
जिसके यह मानव जीवन धन्य हो जाता है-

महारमा क्वीर - 'सतगुरु हमर रीमि कर कहा एक प्रसंग । परस्या वादल प्रेम का मीजि गया सय अंग ॥" हठ-योग के अनुसार भी साधक को गुरु की सहायता क बिना सिद्धि कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। यद्यपि इम घट के भीतर ही ब्रह्म का निवास है किन्तु विना गुरु की कृपा के उससे साक्षात्कार नहीं हो मफता- 'श्रष्ट कयल दल भीतरी, वह भी रंग फेलि कराह रे । सतगुर मिले तो पाहये, नहिं वो नम अमारप जाइ जय तक गुरुदेव प्रसन होकर साधक को अपनी देख-रेख मे साधना न करावें, तब तक उसे व्यर्थ प्रयास करने की मूर्तता न करनी चाहिए- 'गुरू गम ते पाइये, मपि मरे जिन कोपरे ।' जय गुरदेव अनुग्रह करके अपनाते हैं तब फिर ब्रह्मज्ञान मिलने में देर नहीं लगती, हृदय-फमल सिल जाता है, सम्पूर्ण । मिद्धियां अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं तथा जरा-मरण का भय भाग जाता है- 'श्रय मैं पाइयो रे पाइयो रे बघ गियान । महज समाधै सुख में रविवो कोटि कलप विभाम ॥ गुरु कृपाल कृपा जब कोही हिरदै कवन विगाण। भागा प्रम दो दिसि सूमा परम ज्योति परगासा ॥ श्रत , यह आवश्यक है कि सद्गुरु फा आश्रय शी लिया जाय । परन्तु सद्गुरु की सोज सरल नहीं । कनीरदार जी को भी अपने गुरु की सोज में दर-दर घूमना पडा था इसी के लिये उन्होंने भूसी, जौनपुर, मानिकपुर आदि स्थानों में साक छानी थी, शेख तकी, अदी, सकर्दी आदि के उपदेश गुर और जिशासु पर विचार किया था । पर उनकी कसौटी पर एक भी सरा न उतरा। बडी दौड़ धूप के पश्चात् अन्त में उन्हें अपनी इच्छा के अनुफूल गुरु स्वामी रामानन्दजी मिले थे। इसीलिए वे कहते हैं कि यदि गुरु की सोज में पूरी माव- धानी से काम न लिया गया. यदि दुर्भाग्य से गुरु की खोज में धोग्या हुआ और किसी फच्चे सिद्ध से पाला पड़ गया, तो विनाश निश्चित है । जव गुरु महाराज स्वय ही खोसले होंगे तो रे शिप्य को क्या शान देंगे ?- 'जानता झा नहाँ, वूम किया नहिं गौन । अधे को श्रन्धा मिला, राह बता कौत ॥' ये मूर्य शिष्य और अनाडी गुरु दोनो निश्चय ही बीच धार मे डूबेंगे- 'दोऊ दूडे धार में चदि पायर की नाव।' इसलिए सद्गुरु की सोज बड़ी सामधानी से करनी चाहिए। सद्गुरु की पहचान के लिए कनीरदाम जी ने उसके कुछ लक्षण भी बतला दिए हैं- 'सायो सो सतगुरु मोहि भाव । सत्तनाम का भर भर प्याला श्राप पियै मोहि प्यावै ।। मेले जाय न महत कहावै पूजा भेट न लावै। परदा दूर करे आँपिन का निज दरसन दिखनावै ॥ जाके दरसन साहब दरसैं अनहद शन्द सुनावै । माया के सुख दुख कर जानै सग न सुपन चलावै ।। निसि दिन सतसंगति में राचे, शन्द में सुरत समाचै । कह कबीर ताको भय नाहा, निरमय पद परसावै ।। 'ऐसे सद्गुरु को एक बार पा जाने पर फिर उस का पल्ला

-
महारमा कधीर
नहीं छोड़ना चाहिए। यदि गुरदेव अप्रिय व्यवहार भी करें तो
शान्ति के साथ सह लेना चाहिए, क्योंकि वह देखने में कद
व्यवहार वास्तव में शिष्य की भलाई के लिए हो होता है-
'गुरु कुम्हार शिष उम , गद गद कादै पोट ।
श्रतर हाथ सहार दें बाहर याहे चो।'
और यदि गुरु अपनी किमो चूम से रुष्ट हो जाय तो उन्हें
अपनी दीनता प्रादि में अपराध क्षमा करवा कर मना लेना
चाहिए। उनकी प्रसन्नता ही मन सिद्धियों का मूल है-
'जो गुरु रूठ होय तो तुरत मनाइए।
हुए दीन अधीन चूक बकसादर |
जो गुरु होय दयान दया दिन हरि हैं।
कोटि मरम कटि नायें पल छि फेरि हैं।'
गुरुदेव के उपकार और उनकी गरिमा इतनी अधिक है
कि जव गुरु और उनके द्वारा बतलाए हुए गोविन्द दोनों
सामने खड़े होते हैं तो कबीरदाम जी इस सशय म पड़ जाते
है कि पहले किसके चरणों में मस्तक मुकाया जाय ? -
'गुरू गोविन्द दोनों खड़े, काके लागू या'
किन्तु दूसरे ही क्षण कीर येधड़क गोविन्द की उपेक्षा कर
गुरदेव की बन्दना करते हैं । गुरुदेव की कृपा से हो तो 'हरि'
मिले हैं गुरु की कृपा बनी रही तो गोविन्द फिर मिल जायेंगे-
" य गुरु जी श्राग्ने, जिन गोविद दिया पताय ॥'
वीर दास जी जानते हैं कि-
'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु मंठे नहि ठौर ॥'
महात्मा के शान विकास के साथ उनकी गुरु को
में भी परिवर्तन हुआ है। प्रारम्भ में तो वे अपने गुर
भावना
५२

दग्स ग्राई । गुरु और निशामु को मानव-लोक के प्राणी के रूप मे ही चित्रित करते हैं, किन्तु क्रमश उन के राम को तरह उनके गुरु भी निर्गुण निराकार हो कर अन्त को ब्रह्म के-राम के पर्यायवाची हो जाते हैं। निम्न-लिखित पद से स्पष्ट ज्ञात होता है कि कबीर दास जी स्वामी रामानन्द का ही यशोगान कर रहे हैं- राम । मोहि सतगुरु मिले अनेक- -कलानिधि, परम तत्र सुखदाई । काम अगिनि तन जरत रही है, हरि रस छिरकि बुझाइ ॥ परम ते दुरमति नासी, दीन रटनि ल्यो कपाट अनभै सुनाई ॥ परन्तु फिर कनीर के गुरु एक सिद्ध योगी के रूप में दिखाई देते हैं- 'माई कोई सतगुर संत कहावै, नैनन अलख लखावै । धरती त्याग अकासह त्यागै अधर मडैया छावै । सुन सिखर के सार सिला पर श्रामन श्रचन जमावै ॥ भीतर रहा सो बाहर देसै दूजा दृष्टि न श्रावै । कहत कबीर बसा है हसा श्रावागमन मिटावै ।' इन 'अधर मडैया छाने वाले गुरुवर और 'पापड-भरम कपाट सोलने वाले गुरु में अन्तर स्पष्ट है किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि ये दोनों पद दो भिन्न व्यक्तियो के परिचायक हैं। ये तो कबीर के ज्ञान के विकास के अनुमार उनकी गुरु भावना के दो चित्र हैं। पापड मरम सोलि के, कथा ।

महारमा पपीर
पूर्ण तत्वज्ञान लाम फरने के पश्चात् कौर दाम जी गुरु
और शिष्य के साक्षात्कार को भी अनावश्यक बतलाते हैं-
'कवीर गुरु यसै बनारमी मिप ममदर तीर।
रिसरया नहीं थीम जे गुण होय मरीर ॥'
कनीर की गुरु मावना का चरम विकाम उस समय दिखाई
। देता है, जय उनके गुरु में और परम्रा राम में कोई अन्ता
नहीं रह जाता-
'गम बिन तन की तग्न न जाई।
मन में अगिनि उठी अधिकाई ।।
तुम जलनिधि में जल कर मोग।
जल में रहीं जलहि विन पीना ॥
तुम सतगुरु मैं नौतम चेना।
कई क्योर राम रमू अना।।
जहाँ कनीर जी ने गुरु में योग्य गुणों का होना आवश्यक
वतलाया है, वहां उन्होंने यह भी स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि तत्व
ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होने के लिए शिष्य में भी तीन
जिज्ञासा एव सुपात्रता होनी चाहिए । अन्यथा, सद्गुरु कितना
ही प्रयत्न क्यों न करे, सफलता मिलना नितान्त असंभव है-
'सतगुरु बपुरा क्या करें जो सिप में ही चूक
मन्द थान वे नहीं बस बनाये कुरु ॥
जायसी ने लिखा है-
'गुरु विरह चिनगी जो मेला।।
को सिलगाय लेहमोचेमा ।'
परन्तु यदि चेला नितान्त हो गीली घास हो तब गुरु का
परिश्रम अवश्य ही व्यर्थ जायगा। बुद्धि हीन शिष्य के साथ
1
.

गुरू भौर जिज्ञासु
अम करना व्यर्थ है। ऐसे ही किसी मूर्स चेले से सीम कर
रदास जी ने लिसा है-
'पसुया सो पाल्या परा, रह रह हिया न सीग ।
असर बीज न ऊगसी पाले दूना योश ।'
प्रम-ज्ञान लाम करने में पूर्ण सफलता नभी मिल सकती है
पहुँचे हुए गुरु और योग्य चेले फा सयोग उपस्थित हो ।
य गुरु को सुपात्र शिष्य मिलना भी यड़े भाग्य की पात है,
सच्चे जिज्ञासु के लिए भी मय से अधिक सौभाग्य का
वही है जन सद्गुरु कृपा दृष्टि कर उसे चरण-कमल फी
ल छाया में श्राश्रय दें-
'सो दिन कैसा होयगा, गुरू गहेंगे पाह।
अपना करि बैठाहिगे चरन कमान की छ।'
और उस शुभ मेला में सद्गुरु के स्पर्श मात्र से ही शिष्य
सारे पाप धुल जायेंगे, उसके ज्ञान-चतु खुल जायेंगे, वह
सोना बन जायगा एवं उमे मुक्ति प्राप्त करने में विलम्ब
लगेगा-
("गुरु पारस गुरु परस है चन्दा बास सुवास ।
सत गुरु पारस जाप को दीक्षा मुक्ति नियास ॥'

कवीर का रहस्यवाद सांसारिक सुपों की असारता एव दुखा की प्रबलवा से घराकर प्राणी किसी ऐसे सबल को ढूँढने लगता है, जो उसे इन सुख दु सों से परे फरके किसी अनन्त और अलौकिक आनन्द-सागर में मग्न कर दे। ससार की कुटुता से घबरा कर ही जीव को परमात्मा का ध्यान आता है। वह अपने आपको किसी अज्ञात शक्ति के इंगित पर नाचता हुश्रा अनुभव करता है। वह अनुभव करता है कि वह अज्ञात शक्ति उसे ही नहीं, सारे ब्रह्माण्ड को परिचालित कर रही है और वही सय का मूल है। महात्मागण अपने जीवन के सारे स्रोत उसी शक्ति की ओर प्रवाहित कर के उमसे एकीकरण प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। सब को यथा साध्य तथा यथा शक्ति सफलता मिलती है। कोई उससे एकाकार होकर अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करता है, कोई उसका दर्शन मात्र कर पाता है और किसी को धुधला-सा आभास मात्र दिसाई देता है । उसका प्रकाश इतना दिव्य, अलौकिक तथा अनिर्वचनीय है कि उसके दर्शन.से वे अवाक् हो जाते हैं। वणन करने की चेष्टा करने पर वे याणी को अपर्याप्त और असमर्थ पाते हैं। अन्य साधन के अभाव में प्रेमाषा-साधन का ही अवलम्बन ग्रहण करके रहस्यवादी कवि के रूप में उपस्थित होते हैं । स्वभावत उनके यणन में एक धुंधलापन-सा आ जाता है । कभी कभी तो केवल सकेत-मान हो होता है। इसी वर्णन करने की असमर्थता को कोर ने इस प्रकार प्रकट किया है- कबीर का रहस्यवाद क 'यय कानी प्रेम की किछु कही न जाय । गूगे देरी सरकरा सावे और मुसकाय ।।' 'गूगे के गुड़' की तरह कवि स्वयं तो आनन्दानुभव करता है पर उसका वर्णन नहीं कर सकता । केवल इतना कह सकता है "कहई कबीर पुकारि के अद्भुत कहिये ताहि" इस 'अद्भुत' का गद्य-द्वारा वर्णन करना तोनितान्त असम्भव है। गद्य की शुफ, वैज्ञानिक एव सरल प्रणाली इसके उपयुक्त नहीं। पद्य की सपूर्ण व्यञ्जन शक्ति द्वारा उसका आभास-मान दिगा जामकता है। यही कारण है कि ससार के प्रत्येक देश के महात्माओं ने अपनी रहग्यपूर्ण वाणो को प्रस्फुटित करने का माध्यम पद्य ही चुना है। महात्मा कनीरदास के रहस्यवाद पर विचार करते समय यह जानना आवश्यक है कि इस नैसर्गिक महाकवि की रचनापर कौन कौन सी विचार-धाराओं का प्रभाव पडा। ध्यान से देसने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इनकी रहस्यमयी वाणी पर भगवान् शकराचार्य के अद्वैतवाद एव मुसलमान सन्तों के सूफी मत का-विशेष प्रभाव पड़ा है. देश में प्रचलित ये दोनों विचार- धाराए निर्गुर्णोपासक रहस्यवादी सन्तों के उपयुफ भी थी, और ब्राह्मणी माता से उत्पन्न होने वाले तथा नीमा और नीरू के पोप्य-पुन द्वारा इन दोनों मतो का समन्वय सम्भव भी था। इन सिद्धन्तों पर ही कीर ने अपने रहस्यवाद को नीर प्रतिष्टित की है। अतएव, कनीर के रहस्यवाद के मूलाधार इन दोनों सिद्धान्तों का विश्लेषण कर लेना उचित है । -अद्वैतवाद रहस्यवाद की आत्मा है । इसके अनुसार आत्मा - V महारमा कमीर और परमात्मा के बीच माया ने पर्दा डाल रखा है। उपासना अथवा ज्ञानोपार्जन द्वारा इस माया से छुटकारा पाकर भात्मा और परमात्मा की पुन एकमता स्थापित हो सकती हा आत्मा. और परमात्मा का एक ही तत्व होना कीर ने इस प्रकार प्रकट किया है. "जैसे जलद तरंग तरगिनि ऐसे हम दिखरावहिंगे' पस्तुन जल और जल की तरग एक तत्व है, परन्तु माया के प्रसाद से ये भिन्न ज्ञात होते हैं। इसी कारण आत्मा और परमात्मा में विगेह डालने वाली इस माया की वीरदास ने खूब खयर ली है। वे उसका तत्व भली प्रकार समझते हैं । 'माया महा ठगिनी हम जानी वे समझते हैं कि यह पिशायनी माया ही उनके और हरि के बीच में श्रन्तर साले हुए है. 'मैं जान हरि से मिलें, मो मन मोटी पास / हरि विचार अन्तरा माया पदी पिनास ।' किन्तु, शान द्वारा इस माया का प्रावरण छिन हो सकता है। इसका वर्णन फोर ने इस प्रकार किया है- 'आँधी प्राइ शान की, ठही मरम की मीति । माया टाटी उड़ गई, लगी नाम से प्रीति ॥' इस ज्ञानाजन तथा उपासना द्वारा माया के नष्ट हो जाने पर श्रात्मा और परमात्मा का एकीकरण हो जाना कबीर ने इस प्रकार प्रकट किया है 'जल में युम्म, कुम्म में ल है, बाहिर भीतर णनी। फ़्ा कुम्म जल जनहिं समाना यह तय हो गियानी।" साथ ही शुद्ध अद्वैतवाद और रहस्यवाद में अन्तर जान - W . -- - पवीर का रहस्यवाद लेना भी उचित है। पण्डित रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार "चिन्तन क्षेत्र में जो श्रद्वैतवाद , भावना शेन में वही रहस्यवाद । इन दोनों में केवल भाव प्रकट करने की प्रणाली का ही भेद है। अद्वैतवादी शुष्क मानी अपन विचार प्रकट करते समय तर्फप्रधान प्रणाली का उपयोग करते है, परन्तु रहस्यगदी. भावुकता प्रधान प्रणाली का अनुसरणा करते हैं। फबीर के रहस्य-वाद का दूसरा आधार सूफीमत है। इस मत के अनुसार भी 'यन्द्र' और 'खुदा' का एकीपरण हो सकता है। । किन्तु अद्वैतवाद के विरुद्ध म म माया को कोई स्थान नहीं। 'महनून' के घर का मार्ग सामने है। किसी 'मुरशिद' का इगित पर चल कर, उस मार्ग की समस्त कठिनाइयों के लिए कटिबद्ध होकर एय 'शरीयत' (फर्मकाण्ड), 'तरीक्त' (उपासना काण्ड) तथा 'हकीकत' (शान काण्ड) की साधना समाप्त कर 'मुरीद' 'मारिफर' (सिद्धावस्था) प्राप्त करता है जिमसे आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। तब आत्मा को परमात्मा का अनुभव होता है तया 'अनलहक (सोऽहम्) सार्थक होता है। आत्मा और परमात्मा शराब और पानी की तरह मिल जाते हैं। अत , सूफियों में 'मुरशिट' की बड़ी प्रधानता है। 'मुरशिद' (अध्यात्म-गुरु) ही 'मुरीद' (शिप्य) के हृदय में परमात्मा का विरह उत्पन्न करता है तथा उसे प्रेम-पथ पर श्रमसर करता है। जायसी ने लिखा है। गुरू विरह चिनगी जो मेला । जो मुलगाई लेइ सोचेला ॥' गुरु के विना सूफियों का प्रेम पथ दुसाध्य है। कबीर फो भी गुरु के विना सब अन्धकार-मय दिखाई देता है. -

महारमा यार
.
कार
"चौसठ दीवा जोई फे, चौदह चदा माहि।
तेहि पर किसका बाँदना, जेहि पर सतगुरु नाहि ॥"
द्वितीया से लेकर पूर्णमासी तक पे सारे चन्द्र एक साथ ही
उदित हो और चौसठ दिए जलाए आए, फिर भी गुरु के चिना
उस प्रणय पथ पर अन्धकार ही रहेगा मार्गच्युत हो जान की
शका तथा सम्मारना बनी ही रहेगी।
किन्तु, सूफियों की प्रधान विशेषता तो उनका प्रेम-राज्य है।
सदा अपने प्रियतम के गहरेक में नीवाने रहते हैं । इसी
प्रेम के लारण्य का वणन करते हुए प्रसिद्ध सूफी कवि जायसी
लिखते हैं
'तीन लोक चौदा पर, सबै परे मोहि सूमि ।
| प्रेम छादि नदि लोन विद्यु, जो देखा मन कि !'
कवीर क रहस्यवाद पर इस प्रेमराज्य को पूर्ण प्रभार है।
अपने प्रियतम की लाली में वह सारे संसार को रंगा देखते हैं
और उसीमें आत्म विस्मृति कर देते हैं-
'लाली मेरे लाल की जित देसू मित लाल !
| लाली देमन में
गह, मैं भी होगद लाल ॥
- कपीर वास्तव में प्रेमोपासक रहस्यवादी (Lore mystue
थे। यदि किसी को क्योर का कोमल हृदय देखना हो तो उसे
इनके रूदियों एवं कुरीतियों के विरुद्ध भ्यायों और कलियः
में नहीं देखना चाहिये. वरन इनके प्रेम निम्पण, वित
निवेदन आदि में खोजना चाहिये। वहीं उनके बाल-सुलम
तरलता-सम्भूत एवं भकि-विहल हृदय के दर्शन होते है
(कुरीतियों के विवेचन के समय तो कीर युद्धभूमि में ललका
हुए एक वीर सेनापति के समान दिखाई दंगे। पर, 'साइब
।

कबीर का रहस्यवाद
सम्मुख वे भोले बालक के समान भक्ति-विहल मरल हृदय 3
लेकर आते है
'जो तन माहे मन घरै, मन धरि निर्मल होय ।
साहब मो समुस रहे, तो फिर पालक होय !! v
इस प्रेम-राज्य में सन्तगण प्रेम की मदिरा में छके हुए उसके
फभी कम न होने वाले नित्य-क्यापी शुमार में मस्त विचरण
करते रहते हैं । उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती। उन पर पूर्ण
आत्म विस्मृति का शासन रहता है-
'हरिनस पीया जानिये, कयहुँ न जाय खुमार ।
मैंमन्ता धूमत रहे नाही तन की मार ॥'
इस राम-रस को पीकर कीरदास मस्त हो जाते हैं।
कैसी अपूर्व है वह मस्ती (कबीर विह्वल हो जाते हैं, कातने-चुनने
का स्मरण नहीं रहता। ताना, पाना, फॅची सभी मस्ती से नाचते ।
हुए से दिसाई देते हैं।
'को बीनै प्रेम लागौरी, माई को बीन ।
राम रसाइण माते री, माई को यीनै ॥ टेक ॥
पाई पाई तू पुतिहाई ।
पाइ' की तुरिया वेचि. साई री, माई को चीन ।
ऐसे पाई पर बिधुराई।
त्यू रस धान बनायो री, माई को पीने ॥
नाचे तीन नाचे बानी ।
नाचे कूच 'पुराना री, माई को बीन ।
करगहि वैठि कवीरा नाचे।
चूहै काटया तांनां री, माई को बीनै ।'
पर इस मदिरा का मूल्य बहुत अधिक है, यह बड़े त्याग के

महारमा वीर
पापार प्राप्त होती है। इसका प्याला आमोत्सर्ग की पर
गीमा पर पहुँचाने पर ही होठों से लग पाता है-
'मीरा माटी कलाल की, रहवा बैठे प्राई।
पिर पे सोई पिधे, नाहिं तो रिया न जाई ।'
गशी लोग सदा एक अनन्त-विरह की वेदना से न्यायः
। जप तक आत्मा का परमात्मा से अनन्त-संयोग:
काय, प्रिय से प्रेमी का साक्षात्कार न हो जाय, तब तक के
देगा? इसी-विरह की अमि से जायसी ने कोये श्री
मायत काली कर दी, पेह जला दिये और समुद्र सुला दिये
मानों को सुन किस सहृदय का हृदय द्रवीभूत न ।
-
'हा मर सय किंगरी नसें कई सब दाँत ।
विशेष वेधुनि उठे कहा
पायगी जिस प्रकार 'प्री-
"बह गिर पाउ
में अपना
पसीप में
'गलिया
--
'राग शही'

कबीर का रहस्य वाद
'कप देख मेरे राम सनेही,
जा पिन दुरा पावै मेरी देही ॥ टेक॥
हूँ तेरा पथ निहारूँ स्वामी।
कबरे मिनहुगे अतरजामी ।।
जैसे जल बिन मीन तलपै,
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलपै ॥
निस दिनहरि बिन नींद न आवै।
दरस पियासी राम क्यू सचु पावै ॥
कहै कबीर श्रय विलम्ब न कीजै ।
अपनों जानि मोहि दरसन दीजे ॥'
(कबीर की अक्खड़ भाषा भी इस प्रेम-राज्य में आकर
मधुर हो जाती है। नैसर्गिक कवि की स्वयभूप्रतिमा का यह
मुख्य लक्षण है कि वह यथावसर बिना प्रयास ही उपयुक्त
रूप धारण कर लेती है। जायसी की माधुरी से टक्कर लेती
हुई भाषा में कबीर लिखते हैं
लेखनि करौं करक की, लिखि गम पठाऊँ ।'
इस पर सहसा नागमती की वियोग वाणी स्मरण हो
(आती है
'यह तन जारौं छारकै, कहीं कि पवन ! उड़ाव।
मकु तेहि मारग उड़ि परै कत धरै जहां पाँव ॥'
राम को वियोगिनी कनीर की आत्मा उन दिनों की अधीरता
से बाट देखती है जब वह प्रियतम का आलिंगन करेगी
'वै दिन कब श्रावैगे माई ।
जा कारण हम देह धरी है, मिलवो अग लगाई ।'
६३
-

'कवीरा माटी कलाल की, वहता बैठे प्राईV
कोयलें काली कर दी, पेड जला दिये और समुद्र सुखा दिये।
J"धबह निठुर आउ एहि बारा" उसी प्रकार कबीर भी भार्मिक
'राम सनेही के वियोग में व्याकुल कबीरदास लिखते
मदारमा कबीर
पश्चात् प्राप्त होती है। इसका प्याला आत्मोत्सर्ग की घर,
सीमा पर पहुँचाने पर ही होठों से लग पाता है-
ani
सिर सौंपे सोई पिवे, नाहिं तो पिया न जाई ॥
सूफी लोग सदा एक अनन्त-विरह की वेदना से व्यथित
रहते हैं । जब तक आत्मा का परमात्मा से अनन्त-संयोग न
हो जाय, प्रिय से प्रेमी का मातात्कार न हो जाय, वेव तक चैन
कैसा? इसी-विरह की अग्नि से जायसी ने कौवे और
इन शब्दों को सुन किस सहदय का हृदय द्रवीभूत न हो।
जायगा?
-
। 'दाङ मए सर किंगरी नसे मई सब वात।।
रोव रोप वे धुनि उठे कहीं विथा केहि मावि ।।
जायसी जिस प्रकार प्रीतम को पुकारते हुए कहत ।
शब्दों में अपना विरह-निवेदन कर अपने प्रियतम का माहान
"प्रीत लगी तुश्र नाव की पल बिसरे नाहीं ।
नगर करो अब मेहर की मोहि मिली गुमाई ।।
विरह सतावै मोहि को जिउ तपै मेरा ।
तुम देखन की चाव है प्रमु मिली सवेरा।।
इसी दुःख में कातर होकर वे लिसते हैं
--
मुखिया सब संसार दाखाव और सोवे ।
.
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवै ।।'

कवीर का रहस्य बाद
'कब देखू मेरे राम सनेही,
जा ग्नि दुर पावै मेरी देही ॥ टेक ॥
हू तेरा पथ निहारूँ स्वामी।
कबरे मिल हुगे अतरजामी ॥
जैसे जल दिन मीन तलपे,
ऐसे हरि बिन मेरा जियरा कलप ।।
निस दिन हरि विन नींद न आवै ।
दरस पियासी राम क्यू सजु पावै ।।
कहे कबीर अव विलम्ब न कीजै ।
अपनों जानि मोहि दरसन दीजे ॥'
(कबीर की अक्खड़ भाषा भी इस प्रेम राज्य में श्राफर 7
मधुर हो जाती है। नैसर्गिक कवि की स्वयभू प्रतिमा का यह
मुख्य लक्षण है कि वह यथावसर बिना प्रयास ही उपयुक्त
रूप धारण कर लेती है। जायसी की माधुरी से टक्कर लेती
हुई भाषा में कबीर लिखते हैं
'यह तन जारों मसि करौं लिखौं राम को नाऊँ।
लेखनि करों करक की, लिखि गम पठाऊँ ।'
इस पर सहसा नागमती की वियोग वाणी स्मरण हो
आती है
'यह तन जारी छारकै, कहीं कि पवन ! उड़ाय । wh
मकु तेहि मारग उड़ि परै कत घरै जहाँ पाँव ।'
राम की वियोगिनी कनीर की आत्मा उन दिनों की अधीरता
से बाट देखती है जब वह प्रियतम का आलिंगन करेगी
'वै दिन कय श्रावैगे माई।
जा कारण हम देह धरी है, मिलवो अग लगाई।'
६३
-

- -- -- - महारमा वीर पर इन मन्त कवियों का यह प्रेम नितान्त निस्वार्थ प्रेम । है। धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष पाने की न तो वे अपने प्रियतम से इच्छा ही करते हैं और न प्रार्थना । वे तो केवल दीदार (साक्षात् ) चाहते हैं। दादू ने एक स्थान पर लिया "दरशून दे, दग्शन दे, तेरी मुक्ति न चाहू / कीर भी कहते हैं । 'जब तक मक्ति सकाम है तर लग निसाल देव।। कह कपीर वह क्यों मिले नि कामी निज देव ॥" वे दो केवल उससे साक्षात्कार के इच्छुक हैं । जायसी ने भी अपनी मोली भाषा में लिखा है ना ही सरग क चाही राजू । ना मोहि नरक सेति किछु कानू। चाही श्रोहि कर दरसन पावा । जेहि माहि पानि प्रम-पय लावा ।' इन महात्माओं को प्रिय-दर्शन ही अभीष्ट है। उसक मयोग में ही इनके जीवन का परम-आनन्द विद्यमान है और उसके वियोग की जाला मे इन का हृदय सवन दुग्य होता रहता है । कबीर कितने मर्मस्पर्शी शब्दों में लिखते हैं J 'परफै बिन बालम मोर जिया । दिन नहि चैन गत नहीं निदिया, तर तरफ दे मोर किया ।' इम प्रेम की पीर से व्यथित भक्त की औपधि करने वैद्य पाया, पर वह मूर्स तो नाडी परीक्षा करने लगा । उसे क्या पता कि यह रोग तो हृदय का है । कवोर ने लिसा है 'कनीरा वैद दुलाइयां पकरि के देखी बाह । वैद न वेदन जानई करक कर माह इसी 'करेजे की करक' को मोरा ने भी प्रकट किया है-- + - क्यीर का रहस्यवाद 'याचल घेद युनाइया रे पका दिखाई मारी यौह ३)- मूरम वैद मरम नहिं जानै करक करेगे माहि ।।" फवीर की उपर्युक्त दो पहियो में मीरा की परियो से कम माधुय्य नहीं। आत्मा और परमात्मा की स्त्री और पुरुष के रूप मे कल्पना हर करने से रहस्यवादी कवियों की रचना में एक विशिष्ट माधुर्य का आगया है । इस भाव में भक्तगण सदा मग्न रहते हैं। भक- शिरोमणि मीराबाई को तो ससार में कोई पुरुष ही नहीं दिखाई देता था। उन्हें विश्वात्मा अभिसारिका के रूप में परमात्मा-स्व ट रूप गोपाल-कृष्ण के प्रति अभिसारोन्मुख दिसाई देती थी। इस प्रेम-मार्ग की दुरुहता का वर्णन भी कयीर तथा अन्य सन्तो ने पर्याप्त रूप में क्यिा है सर्वस्व-त्याग, आत्म- विस्मृति तथा आत्म समर्पण नो इमकी वर्णमाला है। कबीर दास लिसते हैं 'यह तो घर है प्रेम का साला का पर नाहिं। सीम उतारै भूई धरै तप श्रार इहि माहि ।। प्रेम न बाड़ा ऊपजे, प्रेम न मोल विकाय । राजा परजा जैदि मचे, सीस देह ले जाय ॥' प्रेम-पन्य की दुरूहता ए गम्भीरता का वर्णन करते हुए कनीर कहते हैं 'समम सोच पग धारौ जतन से बारयार डिग जाय । | ऊची गैन राह पटीनी, पाव नहीं ठहराय ॥ इस प्रेम-पथ के विषय में जायसी ने लिखा हे 'जो लगि श्राप हेरान न कोई। । तो लगि हेरत पाव न सोई ।' - - - - - - महात्मा कपीर पर कवीर फे प्रियतम उनके हृदय में ही स्थित हैं। उन्हें - बाहर ढूढ़ना अन्धापन है 'प्रीतम को पतियां लिखू , जो कहु होय विदेश । तन में मन में नैन में, वाको कहा स देस ।' उनका प्रियतम उन्हें वन-वन नहीं भटकाता, उनके घर आफर मिल जाता है। केवल सच्ची लगन चाहिये 'बहुत दिनन के बिछुरे हरिपाए । माग बडे घर बैठे श्राए ॥' कबोर के प्रभु तो, वास्तव में हृदय में ही रहते हैं । 'मो को कहां दूढे बदे में तो तेरे पास में। इसीको जायसी ने इस प्रकार कहा है 'पिउ हिरदे महँ मेट न होई । केहि रे मिलाव कहौं केहि रोई ॥' / अन्त में प्रतीत होता है कि वीर का अपने प्रियतम साक्षात्कार हो गया। आत्मा का परमात्मा से मिलन होग- । साधक ने सिद्धि प्राप्त कर ली। आत्मा स्वय ना होकर बम लिये प्रस्तुत हुई तथा 'अनल हक्क' सार्थक हुआ। ससार 'का-और हो गया। माया का परदा फट गया। ५ “घट घट में रटना लगि रही, हुधा अलेख ली। कहु चोर हुश्रा कहुँ साहु हुश्रा, कह बाझन है कहु सेख जी॥' चोर, साह, वामन और सेस सब एक ही पिण्ड के दिसाई देने लगे। प्रकृति के व्यापार भी और-के-और हो - माली का फूल तोड़ना भी आध्यात्मिक तत्वों की सूचना परघट

षयीर का रहस्य वाद
-
-
लगा। फूले फूल फलियों को उपदेश देते प्रतीत होने लगे।
वढई को आते देस पेड़ का हिलना भी आत्मा को उपदेश देता
मालूम पड़ने लगा-हे पक्षी (आत्मा) तुम अपने घर जाओ,
हम तो अर कटेंगे ही
'बादी श्रावत देख कर तरवर डोलन लाग।
हम काटे की कुछ नहीं पछेरू घर भाग ।'
यह सब उसी संयोग के परिणामस्वरूप हुआ। उसीने
कवीर के ज्ञान चतु सोल दिये और ये प्रकृति के प्रत्येक कम्पन
में उस अनन्त श्रात्मा का संचार देखने लगे।
उस सयोग में कनीर की आत्मा को नमानन्द प्राप्त हुआ
और वे मस्त होकर गा उठे
'न पल पिछुड़े पिया हम से, न हम बिछुड़े पियारे से । 2-/c
उही से नेह लागी है, हमन को करारी क्या ?"
इस आनन्द-मिलन के पश्चात् , आत्मा और परमात्मा के
सयोग के पश्चात् , कवीर अमर हो गए। उन के हृदय से गर्यो-
। क्तियां निकली। पर, वास्तव में ये गर्वोफिया नहीं...
- सिद्धि साधक का जयोल्लास है। जीवन की अनन्यतम परीक्षा
में सफल छात्र का सन्तोपोझास है । पह छोटे मुंह बड़ी बात
नहीं, अपनी असीम आराधना से रिझाए हुए सर्वशक्तिमान
प्रियतम की मुजाओं के बल पर. प्रियतमा का उचित गर्व है।
वे कहते हैं
"हम न मर मरि है ससारा।
हम कु मिल्या जियावन हारा ॥ टेक ।।
अब न मरौं मरनै मन माना।
तेई मुए जिनि राम न जाना ।।
..एक प्राप्त
-

की उस आत्मा क मूल्य में अगर कोही कसेहता
उपयुक्त विवेचन के पश्चात् यह यदा जा सकता है कि
भगवान के अद्वैतवाट मे माया और चिन्ता, तथा सूफीम
सत्य तो यह फिकवीर की यह परमात्मा घोर आत्मा
की पति-पत्नी की कल्पना भी ठेठ सूफी मत की नहीं है। यह
निम्बा के सगुण।। कनीर ने निम्बार्फ स्वामी के भगवान्
को सूफी मत के रंग में रण कर सगुण से निर्गण.पर दिया।
से प्रेम-तत्त्व लेफर कबीर अपन रहस्यवाद की मष्टिक
'बार रामाया प्रपन निशरी 1977
उन्होंने मूल में ता निम्माचार्य की माधुर्य भक्ति से ली
मदारमा कत्रीर
हरि मरिता म मरि है।
इरिनमरे गाम ॥
कई कत्रीगमन मनदि मिलाया।
अमर भये मुरा मागर पावा।"
जय राम के माय प्रियतमा आत्मा शरान और पाना
की तरह घुल मिलकर एफ हो गई, तय राम के और कौर
है ? जब एक दमर का भेद हो नया तो एक का दूमरे नि
नाश कैसे हो सकता है ? यस्तु ।
-
है। पर सूफियों के विरुद्ध फीर ने परमात्मा को पत्नीस
में नहीं माना, पति, पिता व माता के रूप में माना है।
'हरि मरेर पोव में सर की बहुरिया।
धरि जननी मैं यानय मोरा ।'
। है। कबीर प माधुय्य भाव और निम्बार्काचार्य के माधुर्य-भाव
में यही अन्तर है कि कपीर के भगवान् निर्गुण हैं और
।
अस्तु

पीर दारहस्यवाद
।
-
कीर ने अपने पीर'कोसोज लिया। आत्मा तथा परमात्मा
का अनन्त-मिलन कराने में समर्थ हर। पर जैसे ही उन्होंने
नीचे इस मर्त्य लोक की ओर दृष्टि डाली तो उन्होंने माया के
विकराल मोहनमन्त्र में वशीभूत इम असहाय समार को
देखा।माया के धने आवरण से मम के द्वारा चक्षु मूंदे हुए
दिसाई दिए । दयानु महात्मा का हृदय द्रवीभूत हुआ। प्रत
उन्होंने परमात्मा के उस दिव्य स्वरूप को मामारिक मनुष्यों
को मममाो का प्रयत्न कर उन्हें मिलनपथ पर अग्रसर करने की
चेष्टा की। पर वह श्रवणनीय वन्तु सामथ्यहीन मानव-शन्दों
की परिमापा में कैसे याँधी जाती ? कबीर ने स्वयं कहा है
कदिवे की सोभा नहीं देसे ही परमान ।'
श्रत उम मनीपो द्वारा भो वह तत्व पूर्णत स्पष्ट न हो,
सका । उनको अटपटी याणी, उलट-वासियों, अर्ध-प्रस्फुटित
शन्दों और रूपको द्वारा उसका सफेत मान व्यक्त हो सका।
इसी प्रयास के परिणाम स्वरूप यचीर का रहस्यवाद
प्रस्तुत हुआ।
रकबीर ने कान्य के रूढ़िगत नियमों के अनुमार किसी
सांसारिक वस्तु का वर्णन नहीं किया, वरन् अपने नैसकि
ज्ञान से मरिताक में प्रथम श्राने वाले शब्दों द्वारा विश्व के
गहनतम तत्त्व का निरूपण किया है । अत साधारण
व्यक्ति मानर-भाषा के अयप्त शब्दों के माध्यम-द्वारा इस
महात्मा-कवि के छदय से तादाल्य स्थापित करने में असमर्थ
होते हैं। कबीर ने स्वय चेतावनी देदी है
'ज्यों गूगे के मेन को गूगा ही पहचान ।
त्यो शानी के सुक्ख को शानी होय सो जान
६६
=

महारमा फवार { कोर की वाणी पूर्णतः स्पष्ट न होने का कारण यही है । कवि को समझने के लिये कवि हृदय चाहिये, उसी प्रकार कीर का रहस्यवाद समझाने के लिये आत्म-शान की भाव- श्यकता है। किमी दम्भी का प्रलाप नहीं वरन् एक दया-द्रवित महात्मा के हृदय से लोकोपकार के लिये किये हुए निर्गुण के चर्णन का रहस्य-मय निझर है। यही कारण है कि पीछे के सारे संत-कवियों की रचनाएँ कबीर की उच्छिष्ट उकिया- मार हैं तथा वतमान काल के कवि-सम्राट कवीन्द्र रवीन्द्र भी उनका श्रीशिक ऋण भार वहन करते हैं । हिन्दी की अधुिनिक काल की रहस्य-वादो' कहलाने वाली कविताओं का भी यदि विश्लेषण कर के देखा जाय तो उनमें अधिकांशत कबीर की अमर पाणी के ही कणों को आमा दिखाई देगी। हिन्दी की- भारतीय भाषाओं की कविता में रहस्य-वाद की कभी एकान्त अनुपस्थिति नहीं रही, और कबीर के पश्चात् के सभी रहस्य- वादी कवि कीर के ऋणी हुए, इसका मुख्य कारण यही है कि मारत रहस्य-चादी देश है तथा उस रहस्यवाद के प्रतिनिधि कवि है~-महात्मा कोरदास ।।

कवीर और हठयोग कहते है कि स्वामी रामानन्द जी की आयु ज्योतिपियों ने यदुत पम यतलाइ थी। स्वामी राघवानन्द जी ने जो पो भारी योगी थे. इन योग-माधन की शिक्षा दी। मृत्युयोगफ मगय स्वामी रामानन्द जी समाधिस्थ हो गए और इस प्रकार अपनी स्वप आयु का बड़ा मके। 'प्रत या स्वामाविक है कि उनकी शिष्य-मण्डली में योगसाधन की पर्याप्त चर्चा रही हो। महात्मा कीर को योग-सम्बन्धी शान मर्य प्रथम मम्भवत अपने गुरु भाइयों के मौतिक विरा द्वारा ही मिला होगा। उनकी रचनाओं में हठयोग की प्रियाओं का वर्णन प्रचुर परि- माण में मिलता है। पिन्तु, उन्होंने उसका कोई सम्बद्ध अथया विस्तृत विवेचन नहीं किया है । इसका कारण यह है कि उन्होंने हठ-योग का नियमिन एव सागोपाग अध्ययन नहीं किया था। उस समय गोरसपथी साधुओं का भी यहुत जोर था। उन का प्रधान स्थान गोरसपुर मगहर के पाम ही है। अन्त समय में तो फीर का सम्बन्ध मगहर से था ही, बुध विद्वान यह भी अनुमान करते हैं कि समरत कवीर का जन्म भी मगहर में हुआ था। हम तो इससे बाल इतना ही अनुमान कर सकते हैं कि ( कबीर दास जी का मगहर में पर्याप्त सम्बन्ध रहा था। गोरखपुर पास होने के कारण कबीर दास जी के समान सत्सगी महात्मा

महात्मा फीर
फागोरसपथ के सिद्धान्तो को जान लेना स्वाभाविक था । अत'
यह कहा जा सकता है कि स्वामी रामानन्द जी के योग-सम्बधी
विश्वाम को प्रेरणा के प्रतिरिफ गोरस पथी साधुओ के मत्सग
द्वारा भी चोर दाम जी को हठयोग को बहुत मी वाते मात
हुइ होगी।
यहा हठयोग के अगों, चनों अथवा नाडियो श्रादि का विस्तृत
विवचन र प्रसग को व्यर्थ हो यढाना उचित नहीं है, अत
उनका पवल सूक्ष्म रूप से उल्लेख-मान नीचे किया जाता है।
हठयाग में मानव शरीर को सरप्रकार की सिद्धियों या
मुरम्य साधन माना गया है। यदि मनुप्य अपनी दुत्तिया या
दमन न करे तो यह शरीर उसके आध्यात्मिक पतन का कारण
बन जाता है, किन्तु यदि सयम और नियमों द्वारा अपनी वासनाओं
फा दमन फर शरीर की सद्-शक्तियों को जामत किया जाय तो
यही मानव शरीर स्वात स्थ परमात्मा के दर्शन का साधन हो
जाता है । कस्तूरी के समान परमात्मा भी इस देह रूपी मृग में
निवास करत हैं, उन्हें फहीं याहर खाजना मूग्यता है-
'सो साई तन में घरी, भ्रम्यो न जाणे तामा
कस्तूरी के मुग्ग ज्यू, पिरि परि हुदै घास ॥'
हठयोगियों के अनुमार मानव शरीर की सदुशधियों का
वर्णन करते हुए कनीरदास जी लिखते हैं-
'अवधू अधर अधियारा
या घट भीतर सात समुदर पा ही में नदी नारा।
मा घट भोतर काशी द्वारका, यादि में ठाकुरद्वारा ||
या घट मीवर चद सूर हैं याहि में नौ लस तारा ।
कहत कबीर सुनहु मइ साधो याही में सत करतारा।।'
७२

कधीर भोर हठयोग
मानव शरीर के निर्माण का वर्णन करते हुए भी कमीर
दास जी ने योगियों की इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ी, पंच तत्त्व,
तीन गुण आदि का उल्लेख किया है। शरीर का चादर से
रूपक बाँधते हुए ये लिसते हैं-
'झो। मोनी बोनी चदरिया ।
काहे क ताना काहेक भरनी कोन तार से बीनी चदरिया ।
इंगला, पिंगला ताना मरनी, सुषमन तार से बीनी चदरिया ॥
अट कमल दल चरसा होले, पाच तत्त गुन तीनी चदरिय
साई को सुनत मास दस लागे ठोक ठोक के पनी चदरिया ॥
अत , हठयोग के अनुसार इस शरीर की शक्तियों को
जामत फर के ही ब्रह्मा के पान का उद्योग करना चाहिए । इसके
लिए प्राणायाम द्वारा इडा, पिंगला तथा सुपुम्ना नाड़ियों को
उत्तेजित किया जाता है । परिणाम-स्वरूप सर्प के समान साढ़े
तीन बार मुड़ी हुई 'फुडलिनी' जाग्रत् होकर ऊर्द्धगामी होती है।
इसका निवास प्राधार चक्र में होता है तथा इसका मुख नीचे
की ओर होता है । पाँच हजार फुभफ कर लेन के पश्चात्
कुडलिनी उलट जाती अर्थात् उसफा मुस ऊपर की ओर
हो जाता है । इस अवस्था मे श्राजान के पश्चात् यह सुपुम्ना
नाडी के सहारे ऊपर को ब्रह्मरध्र की ओर अप्रमर होती है। मार्ग
में भिन्न भिन्न अगों मे छ चक्र मिलते हैं, जिनके जाप्रत होने से
भिन्न भिन्न सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं। इन चक्रों को पद्म अथवा
कमल भी कहते हैं तथा प्रत्येक चफ के दलों की संरया भी
अलग अलग है। कयोर की रचनाओं में इन चक्री के नाम तथा
सख्या आदि बहुत आई है, अत उनका जान लेना भी
* है। इन पद-पक्रों के नाम, स्थान तथा दलों की
७३

महारमा कचीर भृकुटी संख्या निम्नलिखित है- स्थान दलों की संख्या १ श्राधार चक्र गुदा २ स्वाधिशन चक्र षट ३ मणिपूरक चक्र नाभि ४ अनाहत चक्र हृदय बारह ५ विशुद्ध चक्र कएठ सोलह ६ अक्षा चक्र इन चक्रों को पार करती हुई तथा इन्हें जाग्रत करती हुई डिलिनी प्रारंध्र तक पहुचती हैं । इसी प्रारंभ म प्रदा का नेवास है। यहां पर ए: सहन-दल फमल है, जिसम स्थित 'चन्द्र' से इडा नाड़ी के द्वारा सुधा का साय होता है । जा योगी बहा है ये इस मुधा का उपयोग नहीं कर सकत, पर जिन्होंने योग साधन किया है व इसका उपयोग कर जरा-मरए क भय से मुक्क हो जाते हैं । हठयोगियों का ध्येय पुण्डलिनी को इसी प्रक्ष-रम तक पहुचा कर उसम स्थित प्रा के समीप प्राणों को पहुंचा देना होता है। इस प्रकार समाधि द्वारा आत्मा का शरीरस्थ परमात्मा से एकीकरण संभव होता है तथा अनाहदु नाद सुनने का परमानन्द मिलता है । कबीरदास जी ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है- 'उलटे पवन चक्र षट बेधा मेरदह सरपूरा । गगन गरजि मुनि समाना, राजे अनहद तरा।। मुमतिस र कपोर विचारी, त्रिकुटी मगम स्वामी। पद मानद काल थे छूटे, सुख में सुरति समानी ! हठयोग के इन्हीं तत्वों का जरा विस्तृत रूप कबीरदास

पपीर और हठयोग
जी के निम्नलिखित रूप में पड़े मधुर रूप में मिलता है-
"हिहोलाना वहां भूने प्रातम राम ।
प्रेम भगति हिंदोलना, मप सतन को विभाम !! टेक ।।
श्चद रवर दोह समवा, ३यानानि की होरि ।
मूने पर पियारियां तहां झूले जिय मोर !
५दादा गम के अन्तरा तहाँ अमृत को ग्राम ।
पिनु यह अमृत चारिया सो ठाकर हम दाम ।।
सहज मुम्न की नेहरो गगन महल तिर मोर।
दो
कुल हम श्रागरी जो हम भूने हिंटोन ॥
अरघ उरप की गगाजमुना इमूल कमल को पाट ।
१०५ट चक की गागरी ११त्रियेनी सगम याट ||
१२साद व्यद की नावरी, राम नाम कनिहार ।
कई कपीर गुण गाइले गुरु गम उतर पार ॥'
ऊपर लिखा जा चुका है कि भिन्न भिन्न चक्रों के जापत्
होने से अलग अलग मिद्धियां प्राप्त होती हैं । मूलाधार चक्र स
दादुरो-मिद्धि (उछलने की शक्ति) प्राप्त होती है, स्वाधिष्टान
(बहार में स्थित महस्यदल कमन के भीतर एक चन्द्रकार
स्थान जिप्तमे सदा अमृत का साप होता रहता है । २ मूलाधार
चक्र में स्पित एक गोलाकार स्थान जिसमें विष का साव होता है, यह
विष पिगला नाही द्वारा प्रवाहत हो कर मनुष्य को वृद्ध बनाता है ।
३=कुइलिनी! ४-पाँच गुण (शन्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध )
५- अनाहत चक्र । ६-झारंध्र । ७=हड़ा नाड़ी। ८-पिंगला
नाड़ी-मूलाधार चक्र |१०-मूलाधार स्वाधिष्ठान, मणिपूरक
आदि छ चक्र । ११- भौहों के मध्य का स्थान । १२अनहदनाद।)

महारमा कीर
-
मे अणिमा और लधिमा सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं अथान
अत्यन्त छोटा और हलका रूप धारण करने की शक्ति या जाती
है मणिपूरक के जाप्रत होने से पाताल मिद्धि (सदा सुप देने
वाली ) प्राप्त होती है, अनाहत चम के चिन्तन से सेवरी
(श्राकाश में चलने की) शक्ति मिल जाती है आदि। यद्यपि
कबीरदाम नी न योग को क्रियाओं का वर्णन किया है और
उन पर पर्याप्त अनुरफि मा दिसलाई है तथापि उनका उद्देश्य
कभी ये सिद्धियां प्राप्त करना नहीं रहा, मच्चे साधु योग द्वारा
मिद्धि प्राप्त करना नहीं चाहते । इन मिद्धियों के इच्छुक सिद्धों
और मन्चे माधुओं में अन्तर घतलाते हुए कबीरनाम गो
लिखते हैं-
'साधु सिद्ध २४ अन्तरा जैमे ग्राम बघुन ।
वाकी डाली श्रमी फस, दाकी डाली शन।'
मच्चे माघु परमात्मा मे ऐक्य पाना ही अपना परमलक्ष्य
मनाते हैं । हठयोग से श्रष्ट सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करने
वाले तो कच्च योगी होते हैं । उनके विषय में कवीग्दास जी
ने लिसा है-
'कहि कबीर सुनहु हो सर जोगिन सिटि पियारी।
ये सिद्धियो माया में लिप्त करने वाली हैं, अत त्याज्य है।
कवीरदास जी तो योग साधन द्वारा आत्म ज्ञान-रूपी उस रद्द
नौका का निर्माण कर लेना चाहते हैं, जिसमें अपनी आत्मा
को यैठार, प्राह-रूपी माया परिवार से बचाकर, उसे भवसागर
के उस पार अनहद शब्द पूर्ण अनन्तालोकमय परब्रह्म के
लोक में पहुंचा सकें।

क्यार और हठयोग
--
जी के निम्नलिखित रूपक में बड़े मधुर रूप में मिलता है-
'हिंडोलना तहाँ भूने प्रातम राम ।
प्रेम मगति हिंडोलना, सब सतन को विश्राम !! टेक ।।
१चद २सूर दोइ खमवा, ३वकनालि की डोरि ।
मूले पच पियारियां तहां भूले जिय मोर ।।
५द्वादम गम के अन्तरा तहां अमृत को प्राय ।
जिनु यह अमृत चालिया सो ठाकुर हम दास ॥
सहज सुन्न को नेहरो गगन मडल सिरमौर ।
दोऊ कुल हम नागरी जो हम झूल हिंडोन ॥
श्ररथ उरथ की जगगा जमुना मूल कमल को घाट ।।
१०पट चक्र की गागरी ११त्रिवेनी संगम याट ।
१२साद व्यद की नावरी, राम नाम कनिहार।
कहै कबीर गुण गारले गुरु गंम उतरे पार ॥'
ऊपर लिखा जा चुका है कि भिन्न भिन्न चक्रों के जामत
होने से अलग अलग मिद्धियाँ प्राप्त होती है । मूलाधार चक्र से
दादुरी-सिद्धि (उछलने की शक्ति) प्राप्त होती है, स्वाधिष्टान
(१-बहार में स्थित सदस्यदल कमन के भीतर एक चन्द्रकार
स्थान जिससे सदा अमृत का साथ होता रहता है । २- मूलाधार
चक्र में स्थित एक गोनाकार स्थान जिसमें विष का साव होता है, यह
विष पिला नाड़ी द्वारा प्रथा हत हो कर मनुष्य को वृद्ध बनाता है
३ कुडलिनी। ४=पाँच गुण (शन्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध )
५- अनाहत चक्रब्रह्मरंध्र । ७-डा नाड़ी! ८-पिंगला
नाही. मूलाधार चक्र ! १०= मूलाधार स्वाधिष्ठान, मणिपूरक
चक्र। ११- मोहों के मध्य का स्थान| १२=अनहदनाद।)

-
महारमा कबीर
से अणिमा और लधिमा मिद्धियां प्राप्त होती है अर्थात
अत्यन्त छोटा और हलका रूप धारण करने की शक्ति आ जाती
है, मणिपूरक के जापत होने से पाताल मिद्धि (मदा सुस देने
थाली) प्राप्त होती है, अनाहन चम के चिन्तन से खेचरी
(आकाश में चलने की) शक्ति मिल जाती है आनि । यद्यपि
कीरदास जी ने योग को क्रियाओं का वर्णन किया है और
उन पर पर्याप्त अनुरक्तिभा दिसलाई है तथापि उनका उद्देश्य
कभी ये सिद्धिया प्राप्त करना नहीं रहा, मच्चे माधु योग द्वारा
सिद्धि प्राप्त करना नहीं चाहते । इन मिद्धियों के इच्छुक सिद्धों
और मन्चे माधुओं में अन्तर पतलाते हुए कबीरनाम को
लिखते हैं-
'आधु सिद्ध २अतरा जैमे ग्राम बघून ।
पाकी डाली श्रमी फाम, बाकी हाली शन ।'
मुच्चे माघु परमात्मा से ऐक्य पाना ही अपना परमलक्ष्य
बनाते हैं । हठयोग से अष्ट सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करने
वाले तो फच्च योगी होते हैं । उनके विषय में कनीरदास जी
ने लिखा है-
'कहहिं कबीर मुनहु हो सत जोगिन सिदि पियारी ।
ये सिद्धियां माया में लिप्त करन वाली है, अन त्याज्य हैं।
(कवीरदास जी तो योग साधन द्वारा आत्म ज्ञान-रूपी उस दृढ़
नौका का निर्माण कर लेना चाहते हैं, जिसमें अपनी आत्मा
को बैठाकर, ग्राह रूपी माया परिवार से बयाकर, उसे भवसागर
(के उस पार अनहद शब्द पूर्ण अनन्तालोकमय परब्रह्म के
लोक में पहुँचा सकें।
,
७६

धर्म-समन्वय यदि उदारता पूर्वक विचार किया आय वो ज्ञात हागा कि सप धर्मों का मूल एक ही है। सभी धर्म मुमुक्षु जीयों को परम परमात्मा तक पहुँचने के मार्ग हैं। यह हो सकता है कि एक मार्ग अपेक्षाकृत अधिक प्रशस्त, मुरवित एवं सरल हो और दूमरा सकीर्ण, अरक्षित एव फुटिल। किंचित् उदार विचार द्वारा विभिन धमां की संकीण सीमाएं अपने आप दृष्टि से श्रीमल हो जाती हैं और यह सत्त्व टि गोचर होता है। जिस प्रकार विभिन्न देशो और कालों को विभिन्न परिस्थितियों फे कारण यहाँ की शासन पद्धतियों भिन्न-भिन्न होती है, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों की गौण था-फर्मराएड आदि-भी भिन्न भिन्न होती हैं, किन्तु, जिम प्रकार सभी शासन प्रणालियों का मूल उद्देश्य देश में सुव्यवस्था रखना एव देश को याह्याभ्यान्तर शवों से बचाना है, उसी प्रकार सभी धर्मों का प्रधान उद्देश्य भगवान् का साक्षात्कार फराना एवं मनोराज्य को बायाभ्यान्तर शनुओं से बचा कर मनुष्य को सद्-जीवन व्यतीत करने में समय करना है। किंतु दुर्भाग्य से मनुष्य जाति की बुध ऐसी प्रवृत्ति है कि वह अच्छी से अच्छी वस्तु का भी क्रमश दुरुपयोग करने लगती है। धर्म के समान फल्याणकारी वस्तु भी मगहों का कारण धना ली गई, उसे मिथ्या धाक्षम्बरों से भर दिया गया। धर्म के

महात्मा कबीर
नाम पर अपरिमित रक्तपात हुश्रा, धर्म के नाम पर ही अगणित
ढोंग चल निकले और धर्म के नाम पर ही व्यक्तिगत और
जातिगत स्वार्थी को सिद्ध किया गया। किंतु, जहां एक ओर
यह मत्य है, यहाँ यह भी सत्य है, कि कभी न कभी एकाध
ऐसा महात्मा भी उत्पन्न होता है जो मन धा की नैसगिक
एस्ता देखता और मानव जाति को इस सत्य से परिचित
कराने का प्रयत्न करता है।
महात्मा कीर ने भी धर्मा की इस संकीर्ण हदवन्दी
के विरुद्ध श्रापाज ठाई थी। -न्होंने हिंदू और इरलाम धर्म की
एक्ता का मन्त्र फेंको का शक्ति भर प्रयत्न किया। उन्होंने इन
धर्मों के कल्याणकारी सिद्धान्तो का प्रतिपादन कर उन्हें उदारता
पूर्वक पालन करने का उपदेश दिया। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों
फा भेद अच्छा नहीं लगता था। वह इहलौकिक और पारलौकिक
दोनों दृष्टियों से घातक था। अत उन्होंने राम और रहीम की
एकता का निर्घोष अपनी सपूर्ण शक्ति मे किया । राम और रहीम
एक ही परम शक्ति के दो नाम हैं। हिन्दू और मुसलमान दोनों
को एक ही ईश्वर ने बनाया है-
'हमती एक एक करि जानो।
दोई कह दिनही को दो जग, जिन नाहिन पहिचाना | टेक ॥
एफै पवा एक ही पानी, एक जोति संसारा।
एक ही खाक गढे सब मांडे एक ही सिरजन हारा॥
जैसे बादी काष्ट ही कटे, अगिनि न काटे कोई ।
सब घट अत्तर त् ही व्यापक, धरै सरू होई ॥'
ये भेद तो लोगों ने भ्रमवश उत्पन्न कर लिये हैं। हिन्दू
और तुरुक दोनों के हृदय में एक ही प्रज्ञा बोल रहा है। वह न

धर्म समन्वय
-
हिंदू है, न मुसलमान
'अरे भाई दोह कहां सो मोयापतावी,
बीच ही भरम का भेद लगावौ ॥ टेक।।
जोनि उपाय रची दै धरनी,
दीन एक बीच मई करनी॥
राम रहीम जपत सुधि गई,
उनि माला उनि तसबी लई॥
कहै कबीर चेत रे भोंदू,
बोलन हारा तुरूक न हिदू॥'
किन्तु कबीर साहन इतने से ही सतुष्ट न हो सके। उन्होंने
अपने उपदेश इस दृष्टि से दिए कि उनका उनके अनुयायिय
द्वारा एक नए धर्म के नवीन मसीहा द्वारा दिए गए आदेशों के
भांति पालन किया जाय । धर्मोपदेश इतनी गुरु वस्तु है कि जब
तक वह किसी महान गौरवशाली उद्गम द्वारा प्रसूत न हो, तब
तक उस पर साधारण जनता का विश्वास नहीं जमता । जैसे हैं
उपदेशकर्ता में महत्ता की छाप लगी कि इसके उपदेश दिन
तर्क की कठोर कसौटी पर कसे ही स्वीकार कर लिए जाते है
यही कारण है कि, यद्यपि महात्मा कीर ने अपने घमे सिद्धान्त.
में मुख्यत हिन्दू और इस्लाम धर्म के उपयोगी सिद्धान्तों का
समन्वय मान किया है, तथापि उन्होंने उन्हें एक नए पथ क रूप
में प्रकाशित किया है और अपने आपको ईश्वर का भेजा हुआ
मसीहा कहा है-
'समरथ का परवाना लाए हस उबारन पाए'
यदि कबीर साहब यह 'समरथ का पारवाना' न दिसाते तो
उनके उपदेश में कोई न्यूनता तो न आती किन्तु उनकी शिष्य
७६
-
ur

महारमा च्यार - - मढली के हृदय में उपदेशक के प्रति बह धार्मिक मय एव श्रद्धा भी न पा सकती थी जो नवीन पंथ के पनपने के लिए मुग्न्य 'साद' है । कबीर साहम कहते हैं कि केवल उन्हीं के बतलाए हुए मार्ग पर पलने से भ्रम जाल छूट सफता है अन्यया नहीं- 'हा हमार मार्ने नी, किम चूरै भ्रम पान। ऐसी पात पर विश्वास तभी हो सकता है जय उसके कहने याले को अलौफिकता पर पूर्ण विश्वास हो । अत वे कहते हैं कि कबीर सनातन काल से उपदेश करते चले आरहें हैं, उन पर जिननी शीघ्रता से हो सक विश्वास करना चाहिए- 'इम और जुग जुग कही। जव ही चेको तप ही सी।' यह उपदेश कितना प्राचीन है,इसके विषय में उन्होंने लिखा है-- - "जहिया किरतिम ना हती, परती हता न नीरा । उतपति परनय ना इसी, तप यह कही कवीरा ॥' किन्तु 'कबीर' से तात्पर्य यहाँ उस हाड-मास के पुतले से नहीं हो सकता जो नीमा और नीरू के यहाँ पला या, और यह उपदेश भी उन शब्दो में ही नहीं बंधा है जो बीजक में लिखे हैं। यह 'कोर' उस अनन्त आत्मा का प्रतीक है जो सदा ही किसी नापसी रूप में संसार को सचेत करती रहती है, और यह उपदश वह सनातन सत्य है जो सदैव उसकी पाणी-द्वारा मानव-आति को शान्ति प्रदान करता रहता है। रेवरेंड जी० एच० येस्स्ट ने अपनी पुस्तक 'कवीर एण्ड दी फनीर पन्य' की भूमिका में लिखा है कि फयोर पन्य पर हिन्दू, मुसलमान और ईसाई धर्म का प्रभाव पड़ा है । सम्भवत वेस्फट् साहब ने इसाई पादरी होने के कारण ही कवीर-पथ की यह तीसरी टाँग पैदा कर दी है। वैसे तो कबीर साइय केवल दो ८० धर्म समय राहों से ही मन्यन्ध रखते हैं। संदन-मएडन में भी उन्होंने हिन्द और इस्लाम धर्म का अथवा इनके अन्तगत मतमतान्तर (शाधमत, वैष्णव-सम्प्रदाय श्रादि) का हो उल्लेरा किया है व स्वल 'राम रहीम' का ही साम्य दिसलात हैं। निन्दा भी 'वेद फतेव' ही की परत है। वे 'याइबिल' अथना 'होलीगोस्ट' (Holy Ghost) का नाम भी नहीं जानते। खतना, रोज़ा नमाज प्रत, तीर्थ श्रादि काही चे मण्डन फरत है । मन्दिर मस्जिद तफ ही उनकी दौड है। गिरजे से उन्हें कोई धास्ता नहीं तात्पय यह कि कोर पर पाल हिन्दू और मुममान धर्म का ही प्रमार पड़ा है इसाई धम फा कदापि नहीं। ईसा और फीर के उपदशों में जो कुछ माम्य पाया जाता है वह उन उपदेशों की सार्वभौमिक्ता क कारण ही है। वैसे तो कवीर ने जैन, बौद्ध चार्वाक आदि मतों का भी उल्लेख किया है, परन्तु उनका उन्हें पेवल ऊपरी ज्ञान या, गहरा परीक्षण तो उन्हाने फेवल दो राहों का किया था- 'सतो राह देकहम दीठा / यदि ध्यान से देसा जाय तो इन दोनो मतों में भी फवीर का हृदय वैष्णर धर्म को मिट्टी से बना हुआ दिखाई दगा। कबीर के समान उदार विचारों वाले व्यक्ति को इस्लाम-धर्म की अपदाकृत संकुचित विचारधारा से अधिक उपयोगी सामग्री मिलन की सम्मावना कम थी । कबीर में कहीं-कहीं जो एकेश्वरवाद की झलक दिसलाई देती है वह अवश्य इस्लाम धर्म के प्रभाव के कारण है । मूर्ति पूजा का विरोध भी ये कट्टर मुसलमान की भांति हो करते हैं। इन बातों के अतिरिक्त उन पर इस्लाम धर्म का प्रभाव प्राय नगण्य है। .

महारमाकवीर सूफी-मत की उदारता अवश्य उनकी प्रकृति से मेल खात थी। सूफी मत भी इस्लाम की कट्टरता के विरुद्ध पानी के रूप में उत्पन्न हुआ था और कबीरदास जी भी धर्मों की सफोर्णता के विरुद्ध सड़े हुए थे। अत निम्बकाचार्य की सगुण माधुर्य उपामना को उन्होंने सूफी-रंग में रग कर अपनाया सुफ़ियों का प्रेमतत्त्व वियोग-व्यया प्रियतम के मिलन का ध्याकुल-उद्योग, गुरु-महिमा आदि उनको रचना मे पूर्ण रूप से विगमान हैं। यही कारण है कि लोग कमी-कभी तो उनके प्रसिद्ध सशी महात्मा तकी के शिष्य होने की कल्पना तक फरने लगते है । परन्तु, जैसा कि 'कबीर रहस्यवाद'का विवेचन करते समय लिसाजा चुका है,कबीर का यह माधुर्य भाव भी फेवल सूफी मत के ही प्रभाव का परिणाम न था। तात्पर्य यह कि रामानन्द के शिष्य कपीर सारत हिन्दू वैष्णव थे। हिन्दू अद्वैतवाद उनकी रचना का मूल है। ये आत्मा की नित्यता को मानते हैं। आत्मा अमर है और मृत्यु से केवल शरीर ही नष्ट होता है, यह विचार हिन्दू-धर्म का प्रधान-सिद्धान्त है। फवीरदास जी उसे इस प्रकार प्रकट करते हैं- 'कौन मरै कहु पहिन बना, सो समझाय कहो हम सना॥ टेक।। माटी माटी रही समाई। पवन पवन लिया गि लाई। कहि कबीर सुनि पडित [नी। रूप मुवा सब देव दुनी ।। हिन्दू-धर्म के दूसरे मुख्य विश्वास कर्म-फ्लानुसार आत्मा पावागमन के सिद्धान्त को भी वे पूर्ण रूप से मानते हैं। उन्हों स्वयं अपने विषय में लिखा है- धर्म समन्वय प्रकट करत 'पूरब जन्म हम बाहान होते, श्रोछे करम तप होना। रामदेय की तुरति विसारी, पार जुलादा कोntu' इस प्रकार वे कर्म फल और पुनर्जना में अपना विश्वास हैं । मुस्लिम अथवा ईसाई धर्म म तो पुनर्जन्म का सिद्धान्त है ही नहीं। प्रा, जीव और माया का सम्बन्ध भी ये पूरे घेदान्ती के ममान पान करते हैं। महि-माग पर उन्हें विश्वास है। इठ- योगिया के पट्यक, अनहद नाद, इडा पिंगला, मुपुम्ना नाडी, पुण्डलिनी श्रादि से वे पूर्णत परिचित हैं। वे कहीं-कहीं अवतार वाद का भी समर्थन करते हैं। घेण्याच जनों की प्राणा अहिंसा उनमें फूट फूट कर भरी है। उन्होंने अपने आप को यद्यपि कभी प्रफट रूप मे वैष्णव नहीं कहा, तथापि यह निश्चित है कि उनका 'मुकाव वैष्णव धर्म की ओर बहुत अधिक था, वे लिखते हैं- 'मेरे सागी होणा, एक यैप्णय एक रामा। और यह 'राम' भी गोपाल, हरि, यादवराय श्रादि हिन्दू नाम धारण करके ही अधिक आया है। एक स्थान पर तो उन्होंने हिन्दू-धम का बड़ा जोरदार पक्ष- पास भी क्यिा है- 'मुनत कराय तुरुक जो होना, नारी को कहिए । अरघ शरीरी नारि भगाने तात हिन्दू रहिए ।' संक्षेप में, यह कहा जा सफ्ता है कि फबीरदाम जी ने हिन्द और इस्लाम धर्म की सीमाएं तोड कर उन्हें एक करने का प्रयत्न क्यिा है और यद्यपि उन्होंने अपने धर्म सिद्धान्तों को सूफी मत और इस्लाम धम पर भी अनलम्बित किया है तथापि उन की विचार-धारा का प्रधान उद्गम हिन्दू धर्म ही है।

खराडन-मराडन
यह पहले ही कहा जा चुका है कि सब धर्मों का मूल-तत्त्व
एक ही है। किन्तु, अन्य ममानताओं के माथ इन धमा में एक
भयकर समानता भी है। यह यह कि ये एक दूमो के प्रति
अत्यन्त असहिष्णु है। पिना एक दुमरे का मण्डन किये मानों
उनका काम चलता ही नहीं। ईमाई यदि अन्य धर्मावलम्बियों
का 'हीदन' ( Heathen ) नाम मे स्वागत रते हैं, तो मुमल
मान लोग उन्हें काफिर' कहते हैं। हिन्दूधर्मावलम्बी भी दूसरों
का यवन अथवा म्लेच्छ नाम से सम्मानित करते हैं। यद्यपि
कबीर पथ में गैर-क्नौरपथियों के लिए ऐसे किसी विशेपण का
विधान नहीं किया गया है, तथापि उन्होंने 'येद-फतेय' की खूब
खबर ली है।
'वेद क्वेव दोष फॅदवारा।
ते पदे पर बार विचारा ||
✓
उन्होंने हिन्दू-देवताओं को भी अपने सामने नगण्य पतलाया
है। त्रिदेव के विषय में कबीर साहब की राय है
'बझा, विस्नु महेसर कहिए इन तिर लागी काई।
इनहि मरोमे मत होहरहियो, इनहू मुकि न पाई ।'
माव ही अपनी महिमा गाते हुए ये कहते हैं
सुर नर मुनिजन श्रोजिया यह सब उरजी वीर ।
प्रवाह गम की गम नहीं वह घर किया कबीर।।"
-
-

वयटम मपरन
अर्थात , कीरदाम जी इस्लाम और हिन्दू धर्म के मकुचित
'अलाइ' अथवा 'राम' से कहीं भष्ट है।
अपर यह देख चुके हैं कि कबीर के धर्म-मिद्धान्त हिन्दू और
मुसलमान धर्म से ही लिये गये हैं, फिन्तु उन्हीके 'बेन-केतय'
को ये कितने प्राहर फी -ष्टि में देखते हैं यह भी उपर्युक उद्धरण
से सष्ट हो गया है।
मुमलमानों के सतना, नमाज, रोजा जिन आदि को यह
पड़ी कटुनापूर्ण आलोचना करते हैं। फीर का विरोध नास्तव
में पड़ी हदयवेधी भाषा में होता है। वे विरोध परते समय
पहुधा व्यंग्य और कक्तियों से काम लेते हैं। सतना के विषय
म आप लिसते हैं
'मुनत कराय तुरुक ओहोना, औरत को का काहिर ।
नमाज के समय मुल्ला मस्जिद में जो यांग देता है, उस पर
फबीर साहब की फझि६-
'ना जाने तेरा साहय सा!
मसजिद भीतर मुला पुकारे क्या साहय तेरा याग है"
जीव-इत्या से फीर को अत्यन्त घृणा थी। इसीलिए इन
का हिंसा-प्रतिपादन और हिंसा-सण्डन बहुत चुभता हुआ
और प्रचुर परिमाण में हुआ है । जिब के घिपय में ये
लिखते हैं-
'पकरी मुरगी किन फरमाया ।
किस फे हुकम तुम छुरी चलाया ।'
दिन भर रोजा घरत हो रात हमत हो गाय
'यह तो सून या बदगी कैसे खुसो खुदाय ॥
वे पीर साहब से कहते हैं कि नाम तो आप का 'पीर'
-

महारमा स्थीर - - परन्तु आप हे बड़े वेपीर'- 'दरद न जाने पर कहावे । वैता पदि पढि जग समुझावै ।। V हिंसक की गति का स्मरण कर वे सिहर उठते हैं- 'वकरी पाती सात है, ताकी काटी खान । जो बकरी को खात है ग्निको कौन हान॥' नवीन सम्प्रदाय चलाने की इच्छा करने वालों के लिए दूमरे धर्मों का महत्त्व बीकार करना असम्भव ही है, क्योंकि इससे उनके मत का महत्व घट जाता है। अत, कपीरनाम जी ने सभी धर्मों का समानरूप स सडन किया है। किन्तु, माथ ही या बात भी स्मरण रखनी चाहिये कि उन्होंने सभी बातों की प्रास चन्द करके बुराई नहीं की है। वे ऊपरी दिसावट और ढोंग के विरोधी थे। हिन्द् एव इस्लाम धर्म की बातों का वे बिना पक्ष पात किए समान रूप से सण्डन करते थे। वे कहते हैं- 'अरे इन दोउन राह न पाई। हिन्दू अपनी करै बदाई गागर छुबन न । घेस्या के पायन पर सौवे यह देखो हिंदुआई। मुमतमान के पीर श्रौलिया मुरगी मुरगा खाई। खानाफेरी बेटी ध्याहे घर ही करें सगाई । बाहर से एक मुर्दा लाए धोय-धाय श्रवाई ।। मब सखिों मिल जेवन बैठी घर मर करें बड़ाई। हिंदुन की हिंदु प्राई देवी, तुरकन की तुरुकाई ।' हिन्द और मुमलमानों का यह ढोंग और अनाचार उन्हें रुचिर न था। दोनों में इतनी बुराइयाँ होते हुए भी वे अपनी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए एक दूसरे से लड़ते हैं। राम और - O

रहीम को अलग अलग पतला कर उन्हें आपसी द्रोह का कारण
थनाते हैं
"हिंदू कहें मोहि राम पियारा तुक कई हिमाना।
प्रापस में दुदिलर लारमू मरमन का गाना "
यही कारण है कि फनीरदाम जी उनको मुर्खता पर ध्यंग
करके उन्हें चेताने का प्रयत्न करते हैं। जाति-पाति फे भेद भाय
फा उन्होंने तीन सएहन किया है। एक परमेश्वर के पुत्रों में,
एक ही मिट्टी-पानी के पुतलों में हिन्दू और मुसलमान, मारण
और शुद्र मादि में-भेद-भार पैसा ? चीरदास जी लिखते है--
"ऐसा मेद दिगूचा मार्ग
थेद पतेव दीन पर दुनिया, फोन पुरुप, कौन नारी ॥
एक बूद एके मल मूनर, एक नाम एक गूदा ।
एक जोति में सर उतपना, कोन पालन कौन सदा ॥ १-
माटी का प्य सहज उपना, नादक पद मnts
पिनसि गया ये कानावं परियो, पदि गुनिभ्रम जाना ||
रण गुन महार सम गुन सकर, सत गुन हरि है सोई।
कहै कबीर एक राम जपहुरे, हिरक न कोई ॥'
मूर्ति पूजा का विरोध वे तबस्सुयी मुसलमान की तरह करते
हैं । उस पर उन्होंने यह घड़ी चुभती हुई कटूक्ति कही है।
'दुनियाँ फैसी बावरी, परपर पूजन जाय ।
घर की चकिया कोई न पूजे, जिसका पीमा साय
पनीर फा मत है कि इस 'पीतर पायर' पूजने से कभी मुति
नहीं मिल सकती । उनका कथन है कि यदि मन शुद्ध नहीं है, तो
ऊपरी तिलक, छापे, माला यादि से कुछ नहीं होता। भगवान्
ऐसे सीधे नहीं जो इन उपरी यनावटों के चकर में आ जायें।
n

महारमा कबीर ६ .. - उन्हें रिझाने के लिए तो करका मनका छोड़कर मन का मनक- फेरना चाहिए- 'प्रासन मारि हिम परि बैठे मन में बहुत गुमाना। पतर पायर पूमन लागे तीरप गरब मुनाना । माला पहिरे टोरी दीन्हें छाप तिलक अनुमाना। साखी सरदै गावत भूले प्रातम खबर न जाना ।।' भेप के धोसे में ससार भले ही आ जाय,पर भगवान नहीं पा सकते। जब तक आत्म-शुद्धि नहीं हुई साधु-येश रसना व्यर्थ है 'साधु मया तो क्या मया माला पहरी चार। बाहर मेष यनारया मीर मरी मगारि॥' इस प्रकार झूठ मूठ सिर मुड़ाने अथवा जटा रखाने से कोई साधु नहीं बन नाता। सथा साधु तो हृदय को पवित्र कर कनफ और कामिनी से विरत होकर ही बना जा सकता है 'गाठी दाम न यार, नहिं गरी सो नेह । कर कपीर ता साधु की हम चरनन की सेह॥ धन घटोर कर जमात बनाकर घूमना तो 'साधु' नाम को नाना है। ऐसे महन्तों के विषय में कनीर ने लिखा है 'मक विरह लोम मन ठाना। सोना पहिरि लगावे पाना॥ पोरी घोरा की गाँव पाय जस चले करोरा।' च्चे साधु तो जमात बांधकर रहते ही नहीं, घे तोसौभाग्य - कहीं एकाध दिन दिखाई देते हैं 'सिंहों के लँहड़े नहीं, हसों की नहिं पाति । हालों की नहिं बोरिया, साधु न घझे पसा - घटोग। - 1

सएसन-मरान
क्षीरदास जी की गोरसनाथ जी पर विशेष आस्था थी।
हे वे अपना समकक्ष मानते हुए लिखते हैं-
'सनक सनादन जैदेर नामा ।
मगति करी मन उनहून माना ।
वा मन का कोई जाने मेव ।
स्नफ लीन भया सुसदेय ।।
गोरग भरपर गोपीचन्दा ।
ता मन सोमाल करें धनदा॥
हल निरजन सपल मरीरा।
ता मन सो मिनि रहा कपीरा।।'
राम नाम की महिमा भी गुरु गोरसनाय ने ही भली प्रकार
जानी थी
'राम गुण बेलझी रे अवधू गोरसनाय जानी।'
उनकी प्रशमा मे कबीर ने यहां तक लिखा है-
'कामिशिग्रंग बिरकत भया, रस मया र नाइ।
सारसी गोरख नाथ ज्यू अमर मये जग माहि ॥
महात्मा गोरसनाथ जी उन थोड़े से भाग्यवानों में हैं, जिन
की कनीर दास जी ने प्रशंसा की है। उनके इस श्रद्धा प्रकाशन
से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि गोरस पथ की ओर
कबीरदास जी की पर्याप्त रुचि थी।
कबीर सरेपन के समर्थक थे । गोरसनाथ जी में उन्हें सची
साधना दिखाई दी। श्रत, उन्होंने उन का यशोगान किया।
परन्तु उन्होंने देखा कि गोरख-पथी साधुओं में से धीरे धीरे
सञ्चाई विदा ले रही है और फेवल प्रदर्शन मान शेष रह गया है।
अत उन्होने कहा

घूघट कादया सतान कोई 8.10
"मुद्रा पहरयाँ जोगन होई।
सल मिगी' 'मुद्रा' मिखला' आदि धारण करने से कोई
योगी नहीं हो जाता । द्विगावटी-पनम कपीर को आन्तरिक
घृणा थी, अत ये प्रदर्शन रहित मन्चे योगी का लक्षण यनलावे
हुए लिसते हैं -
'सो जोगी बाके मदन भाइ
प्रकन प्राति की मस बार।
सन्द अनाहद सिंगो नाद,
काम क्रोध विषयान बाद ।
मन मुद्रा डा गुरु को ग्याँन,
प्रिट कोट में घरत प्यान ॥
मन ही करन को करे सनान,
गुरु को सपद ले ते घरै ध्यान।।
काया कामी खोने वास,
वहाँ जोनि सरूप म्यो पर काम ॥
ग्यान मेवनी सहज माय,
वचनानि को
रस बार
जोम मूल को देर बन्द,
कहिकबार पिर होर कद ।'
इस साक्ष्य में वे चर्य गोरसनारको लार सडा कर
'गोरस नाथ न मद्रा पदरी मस्तक हुन मुंडापा ।
मायामच भूट यो धरों के विषय में फनीरदास जी न
लिया है
M

सहपामयटन
पाये ॥
'महादेव का
पथ चलाये।
ऐसा
बड़ा महंत
पाट में लाये चारी।
कन्धे गिटार माया प्यारी'
इन्दी हाट याट में 'तारी' लगाोया कपचे मिों के विषय
में कौर ने लिया है-
'योगी मदमाते योग प्यार'
शाको से फयीर का जन्मजात पैर मा था। संभवत निफ
पंच-सयार (मल्म्य, मांस, मदिरा, मैथुन, मुद्रा) से यह अहिंसा-
प्रिय मत चेहद चिढ़ गया था। इसी कारण इसन उन्ह शुत्तों
फा माई तक कह डाला:-
"मकत गुनहा दुनो भाई'
कीर ने शामों फा माया मे घड़ा पनिष्ठ सम्यन्ध यतलाया
है । ये नो कमी माया ये पन्दे से छूट ही नहीं मफते, क्योंकि
वह ठगनी माया-
'साक्त के घर पता घतां,
हरि भरान की घेरी हो।'
सात चाहे जाति या मादायण भी हो, तो भी वे उससे
मिलना पसन्द नहीं करते।
'साकन यान ना मिले पैम्नव मिले चंडाल ।'
कवीर व्यक्तिगत साधना के पक्षपाती ज्ञानमार्गी सन्त थे।
अत' धर्म के दिखापटी श्रग कर्मकाण्ड आदि से उन्हें घृणा थी।
ये उसे पासण्ड समझते और उसका खून खण्डन करते थे।
ऐसी रूदि सी भी चल पड़ी है कि प्रत्येक नवीन मत-प्रवर्तक
खण्डन-मण्डन दोनों ही परे। यह बात अवश्य है कि कबीर का
६१

वादिता को देखते हुए नितान्त बुरी नहीं लगती।।
महारमा कवीर
।
खएडन किंचित असयत एव तीन हो गया है। इसके लिये उनका
तीव्र प्रकृति, उनकी परिस्थितियाँ एव स्पष्ट-वादिता ही उत्तरदायो
हैं। कीर की यह उद्दण्डता पाखण्ड-सण्डन में ही दिखाई
देती है, अन्यथा नम्रता तो सन्तों का प्रधान लक्षण है और कबीर
निश्चय ही यहुत यह सत थे। पर ये करें क्या ? उनका ढोंग स
दिल ही न मिलता था-
'मेरा तेरा मनुश्रा से एक होय ।
और इसके कारण वे दुसी भी होते थे। कबीर साहब
यही दुख प्रकट करते हुए कहा है -
'साँच कहो तो सब जग खोजे झूठ कहा नहिं जाई।-
कहे कबीर सोई भयो दुखिया जिन यह राह चलाई।।
ईश्वरोन्मुख ज्ञानी जब तक केवल आत्म चिन्तन तथा साधना
गे लगा रहता है, तब तक वह महात्मा एव सन्त के रूप में
समाप्त होता है, परन्तु जैसे ही यह अपने ज्ञान को संसार के
उपकार के लिए प्रकट करने लगता है वैसे ही वह उपदेशक का
रूप धारण कर लेता है। उपदेशकों को कोरी पट्टियों पर नहीं
लसना होता । उनको शिप्य मण्डली में पहले से भी कुछ सस्कार
ते हैं। उन्हें निकालने के लिये उन्हें सुधारकों का काम करना
हता है। उस स्थिति में उन्हें खण्डन और मण्डन दोनों ही
र्य करने पड़ते हैं। यही कारण है कि कबीर साहब को भी
ने सिद्धान्तों के प्रचार के साथ-साथ समाज में फैली हुई
वियो का सण्डन करना पड़ा। उनका परिष्कार किए बिना
के उपदेशों का शिष्य-मण्डली पर यथेच्छरगजमता ही नहीं।
भी इनके खण्डन में जो कटुता है, यह इनके खरेपन और:
4
-

KANER व्यावहारिक उपदेश अभी तक यह बतलाने की चेष्टा की गई है कि क्वीरदास जी के धार्मिक सिद्धान्त क्या थे, उन्होंने फिन किन बातो का पण्डन एव किन-किन का समर्थन किया है। अब इस अध्याय में यह दिखलाने का प्रयत्न किया जायगा फि उन्होन केवल प्रदा, माया, जीव आदि का तात्विक विवेचन एवं विभिन्न मतमतान्तरो के सकुचित सिद्धान्तो का सण्डन-मण्डन आदि ही नहीं किया है, वरन् वे व्यावहारिक उपदेश भी दिए हैं जिनका पालन कर इस ससार-यात्रा को भली प्रकार समाप्त किया जा सके तथा अन्त में.. मनुष्य देह धारण करने का चरम लक्ष्य प्राप्त हो सके। प्रत्येक महात्मा से इस बात की आशा करना उचित भी है, क्योकि उस की अनुयायी-मण्डली को दिन रात एकान्त मे बैठ कर केवल ब्रह्म चिन्तन ही तो करना नहीं होता, समार के ससर्ग में भी आना पडता है। ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि उन्हें सासारिक व्यवहार की रीति भी बतलाई जाय । परन्तु, कबीर के व्यावहारिक उपदेशो पर विचार करने के पहले यह बात अवश्य समझ लेनी चाहिए कि उनका उपदेश लोक- संग्रह प्रधान न होकर वैराग्य-प्रधान था। उन्हें इस बात की चिन्ता नथी कि यह ससार किस प्रकार ठीक-ठीक चलेगा। उनकी दृष्टि मे लोक-धर्म का स्थान गौण था। किसी प्रकार जीव को मुक्ति मिले, यही उनके उपदेश का सार था, फिर चाहे वह सामाजिक - महारमा कवीर नियमों की सलाओं को तोड फर ही क्यों न प्राप्त की जाय। उनकी रचनाओं में इसका उपदेश गौण रूप में ही है कि इस संसार में शान्ति और व्यवस्था से फैसे रहा आय, परन्तु वे यह बारबार स्मरण दिलाते रहते हैं कि- 'या दिन की कट मुधिकर मन मा। जा दिन ले चलु ले चलु होई, वा दिन संग चले नहिं कोई ।' व इस ससार फ निराशात्मक पहलू पर ही प्रकाश डालते हैं इस दह से यदि प्रेम करना चाहिये तो पल इस लिए कि यह सिद्धि-प्राप्ति का मुख्य साधन है, अन्यथा तो, घे कहते हैं कि- 'या देहीका गरम न कीजे, मिट्टी ज्यों घुलि जायगा। यह सन होते हुए भी उनके उपदेश, यहुत मार्मिक होने के कारया, राजमहल से लेकर गरीब की झोपडी तक के लोगों की : जिता पर रहते एवं उनके नित्य व्यवहार में पाते हैं। फवीर का मत है कि यह ससार दुस का मूल है। मनुष्य दह धारण करना ही मानों दुसा को आमंत्रित करना है। इस सत्य को स्मरण रस कर ससार के सुख-दुख धैर्य के साथ सहने चाहिए- 'देह घरे का दरह है सब काहू को होय । ग्यानी मुगते शान से, मूरख भुगतै रोय ॥' जरा, मृत्यु और आपत्ति सभी पर आती हैं, इनसे डरने को धारश्यकता नहीं- 'कविरा मैं तो तब हरौं, जो मुम हो में होय । मीच बुढ़ापा आपदा, सव काहू में सोय " ... ६४ - - - . ग्यावहारिक उपदेश किन्तु मनुष्य को एक बात कभी न भूलना चाहिए । दु स हो या सुरम, ईश्वर का स्मरण वह कभी न छोड़े। कैसे भी रहे, कहीं भी रहे, भगवान का स्मरण करता रहे । यदि स्मरण को दु सके समय के लिए टालता रहेगा तो फिर उस पर भगवान ध्यान क्यो देंगे- "सुख में सुमिरन ना किया, दुख में कीया याद । कह कबीर ता दास की कौन सुने फरियाद ।।' सच बात तो यह है कि यदि मनुष्य सच्चे हृदय से सदा भगवान् का स्मरण करता रहे तो उसे दुप हो ही क्यों- V 'दुख में सुमिरन सब करें सुख में कर न कोय। सुस में सुमिरन जो करै दुस काहे को होय ॥' पूर्ण आत्मज्ञान पाना सरके सामर्थ्य की बात नहीं। अत उचित यह है कि दृढ विश्वास रस कर सद्गुरु के उपदेश का अक्षरश पालन किया जाय । उसे अपनी ओर से घटाया-बढ़ाया न जाय । जब सद्गुरु ने उपदेश-रूपी शीतल जल प्रस्तुत कर दिया है तर उसी को स्वीकार करना चाहिए। शकाशील को, अस्थिर बुद्धि प्राणी को, कभी सफलता नहीं मिलती- / 'चीटी चावल ले चली, बीच में मिल गई दार । कह कबीर दोउ ना मिले एक ले दूजी हार ।।' कबीरदास जी ने स्वय तो जो कार्य हाथ में लिया उसकी पराकाष्ठा कर दिसलाई, परन्तु वे यह भली भाँति जानते थे कि महापुरुषों और साधारण जनता के आदशों में बहुत अन्तर होता है। अत जनता को तो उन्होंने मध्यम मार्ग का ही उपदेश दिया है- 'अति का मला न योलना, अति की मलीन चूप। अति का मना न बरसना, अति की भली न धूप ॥' - * A महारमा कबीर मनुष्य जैसी सगति मे रहेगा उसकी प्रकृति पर पैसाही प्रभाव पडेगा । श्रत , वे सत्सग की बडी महिमा बतलाते हैं। अच्छे व्यक्तियों के सत्संग में रहने से सदा लाभ की ही सम्भावना है- 'जो गधी कुछ दे नहीं तो मी बास सुवास ।' चुरी सगति का परिणाम फोरदास जी ने निम्नलिखित अन्योक्ति द्वारा यहुत सुन्दर रूप में समझाया है- 'केरा तबहिन चेतिया, जब जामी थी बेर। अब चेते क्या होत है, कौटिन लीहा घेर।' साधना-क्षेत्र में कबीर ने स्त्रियों का स्मरण बडे अवाहनीय रूप में किया है। वह एक प्रकार से अपमानजनक ही कहा जा सकता है। कारण यह था कि कबीर विरक महात्मा थे। साथ ही विचार करने पर यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि कयीर को मातृ-जाति से घृणा नहीं था, वे तो नर नारी के वासना-पूर्ण सबंध ही की घोर निन्दा करत थे- 'नर-नारी सब नरक हैं जय लग देह सकाम ।' या उन्होंने पतिव्रता स्त्रिया एव पातित्रत धर्म की सराहना मुत्तकण्ठ से की है- 'पतिवरता मैली मन्त्री, काली कुचित कुरूप । पवियरता के रूप पर वारों कोटि सरूप ॥' जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्त का श्रादर्श चातक रखा है, उसी प्रकार कबीर ने अपनी साधना का घरम मादर्श पतिव्रता स्त्री को माना है- 'सती बिचारी सत किया कांटों सेज विद्याय । लै सूती पति अापना चहुँ दिसि भाग लगाय ॥' उनका कथन है कि भगवान् का स्मरण उसी । ल- ध्यावहारिम उपग ar तन्मयता के माथ करना चाहिये, जिनमे पतिनता अपने पनि का करती है। उस में प्रदर्शन का अंश न होना चाहिए- 'नाम रा तो क्या भया नो अन्तर नहि हैन ।|| पतियरता पति को ममै मुख से नाम न लेत ॥ यह नात स्मरणीय है कि फीर के सागारगा पंदेश में तात्विक सिद्धातों से भरे पड़े हैं। व्यावहारिक उपदेश दते भने । आध्यात्मिक तत्वों की ओर इंगित कर देते हैं । अत , नोकिय पतिव्रता का फर्म निरूपण करत समय वे यह भी मान करा देने कि उनकी यह पतिनता माधफ का प्रतीक है और पनि प्रम का जिस प्रकार पवित्रता अपने पति ही को मम्य सममती है, पर प्रकार सचे निर्गुणोपासक को भी एक परश्रम को छोड़ किस दुसरे दवता का स्मरण न करना चाहिए। किन्तु, यह निश्चित कि उपर्युक्त पद्यों में कबीर का तात्पर्य लौकिक पतियता में है। इन पक्तिया में केवल एमेश्वर-बाद फा ही ममर्थन नहीं पातित्रत धर्म की पुष्टि भी है। क्योंकि आगे कबीर लम्पट पुरु को भी चेतावनी दते हुए कहत है- 'पर नारी पैनी छुरी कोउ मिन लागौ श्रग । रावण के दम गिर गए पर नारी संग।" ईसा ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया-अपन शर्मा प्रेम करो, जो तुम्हें शाप दे उमे तुम आशीर्वाद दो।मी गाय फनीर ने कितने सुन्दर रूप में प्रकट किया है- '/ 'जो तोको काटा धुवै तादि पाईन पत्र । तो को फल पे पूल है याको तिर ।' वे संग्रह करना मूर्सता की निशानी और नरक या समझते हैं। जव ईश्वर पर विश्वास है, तब कान की चिन -

महारमा कबीर
-
क्या प्रयोनन ? सग्रह करने से लाभ हो क्या, जब हम नित्य
देसन हैं कि
- 'साली हायो वे गए, जिनके लास कर।
इस समारमें केवल चार दिन रहना है, तब सन श्राडम्यर और
साज-सामान क्सिलिये-
'काहे को भीत बनाऊँ टाटी,
का जानें कह परि है माटी।
काहे हो मदिर महन यनाऊँ,
मुग पापड़ी एक रहन न पाऊँ।"
महात्मा फ्यीर स्वयं भी बटे सरल हदय थे और सरलता का
ही उन्होंन उपदेश दिया है-
'कविरा आप उगाइए और न ठगिए कोय ।
थाप ठ- सुरव ऊपजे, और ठगै दुख होय ॥'
माधना-मार्ग वास्तव में, इतना सरल और सूक्ष्म है. कि उस
पर फुटिल हदय की गति हो नहीं । उस पर चलने की इच्छा
करने वाले को सरसे पहले कुटिलता और पाखण्ड को विलाजलि
देनी चाहिए।
शब्दों को सँभाल पर बोलने का ध्यान अत्यधिक रखना
चाहिए, ऐमा न हो कि मुख से अपशब्द निकल जाय । गाली के
विषय में कीर लिखते हैं-
'गाली ही में अपजे, कलह कष्ट भो मीच ।
श्रत, गालीनालोज में तो बो..-
हारि मजे सो साधु है लागि मेरे को नीच।'
बातचीत परते समय इसका बहुत अधिक ध्यान रखना
६८
।

ग्यावहारिफ उपदेश
चाहिए कि कहीं दूसरे की निन्दा न हो जाय ! यह बडा भयंकर
एक निंदक के सीम पर, कोटि पाप को मार ।'
किन्तु साथ ही जो अपनी निन्दा फरे उसका अनादर करना
उचित नहीं है, क्योकि अपना निंदक तो-
"बिन पानी साबुन रिना
निरमल करत मुभाष ।
दुचलों पर विशेष रूप मे दया करनी चाहिए। क्षमा, शील,
उदारता, सन्तोप आदि सद्गुणों का अजन करना चाहिए। यदि
यह सदा स्मरण रखा जाय कि एक दिन यहाँ से अचानक कूच
फर देना होगा तो कभी गर्व अथा पाप करने की प्रवृत्ति होगी
ही नहीं। परन्तु मरने से डरना भी न चाहिए। यह अज्ञान की
निशानी है। अपने मालिक को इस जीवन का हिसार किसी भी
समय देने को महर्ष प्रस्तुत रहना उचित है, यह जीयन उसी की
धरोहर है, इसे लौटाने में सकोप कैसा.१-
'मेरा मुझ को कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुम को सौपते स्या लागे है मोर "

सत-परपरा का समाज पर प्रभाव स्वामी रामानन्द जी यद्यपि वर्ण-व्यवस्था के विरोधी नहीं थे तथापि उन्होने साधनाक्षेत्र में ब्राह्मण और शूद, स्त्री और पुरुप, सबकी समानता स्वीकार की। कोर के आविर्भाव के समय की परिस्थितियों पर विचार करते समय यह लिखा जा चुका है कि सवर्ण जातियों के अपमान-जनक- दुर्व्यवहार से व्यथित निम्न जातियों पर मुसलमानों के सहधर्मियों के प्रति व्यापक बन्धुत्व का बड़ा मोहक प्रमार पडा था । किंतु स्वामी रामानन्द ने भी उन्हें अपने चरणों में आश्रय देकर उनके हृदय को शान्ति प्रदान की । उन्होंने दर्जी नामदेव, चमार रैदास, धुनियाँ दादू , मुसलमान जुलाहे के यहाँ पले हुए कबीर, आदि को अपना शिष्य बना कर मंत्र-भूत किया। यही नहीं कि उन्होंने भक्ति-भवन के कपाट सर वर्ण के पुरुषों के लिए ही खोले हों, उन्होंने शतादियों से तिरस्कृत स्त्री-जाति को भी उसके अन्दर प्रवेश करने का परवाना दे दिया। उन्होंने देगी पद्मावती एव सुरमरी को अपनी शिष्यमडली में स्थान दिया। परन्तु इन निम्नश्रेणी-उद्भूत महात्माओं को सम्भवत हिन्दू ममाज पूर्णरूप से सतुष्ट न कर सका। इनकी विचार- धारा हिन्दू या मुस्लिम किमी भी एक धर्म से पूरी तरह मेल न सा सकी । परिणाम यह हुआ कि इनमें से प्रत्येक सत ने एक स्वतन मसीहा बनने का प्रयत्न किया । जो धर्म तत्व ज्ञान-- १०० समाज पर प्रभार गवित पंडितों एव मोलविया ने देववाणी संस्कृत अथवा अरजी- पारसी की भारी भरकम तिजोरियों में बन्द कर रस्सा था, उस को इन मत महात्माओं ने ठेठ गँवारू भाषा मे मुस-हस्त होकर . साधारण जनता में लुटाया। इस संत-परपरा के सर्व प्रथम एव सर्व-श्रेष्ठ सदस्य महात्मा फनीर य । इस पुस्तक में महात्मा करीर के धम-सिद्धान्ता पर प्रकाश डाला जा चुका है। अन्य सन्तों ने भी कनीर से मिलते-जुलते उपदेश दिये । सनने एक हो ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार किया। मभी न व्यक्तिगत साधना का समर्थन कर धर्म के प्रदर्शन प्रधान अग फा सण्डन किया। सबने वर्ण-व्यवस्था का विरोध किया और बहुधा सपने अपना स्तत्र मत चलाया। महात्मा कबीरदास तथा उनके परवर्ती सतों का भारतीय समान पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। यह प्रारम्भ में ही लिखा जा चुका है कि यह सत परपरा कतिपय विपम परिस्थितियों के परिणाम स्वरूप ही प्रारम्भ हुई थी। इन महात्माओं के द्वारा उन परिस्थितियों का समाधान पूरी तरह हुश्रा। माधारण श्रेणी के हिन्दू एव मुसलमान राम और रहीम की एकता के घोप को सुनकर अपने आप को एक दूसरे के अधिक निकट ला सके। उस समय के शुन्ध वातावरण में निर्गुण भक्ति ने हृदय को शक्ति एप सम्बल प्रदान किया। वास्तव में/ तुलसीदास के राम ने भारतीय-हृदय पर जो जादू का सा असर किया था, उसके लिये बहुत कुछ क्षेत्र तो कनीर के राम ने ही तैयार किया था ) हिन्दु- ओं में धार्मिक अविश्वास के अफर उत्पन्न हो चुके थे। उसकी वृद्धि के लिये पर्याप्त कारण भी उत्पन्न होने लगे थे । शकराचार्य वेदान्त उनके लिए अरुचिकर भी था और उसके मनन १०१ महारमा कबीर . के लिये इस्लामी लूट नार के काल में उन्हें समय भी न था। कोई ऑसों वाला प्राणी उस स्थिति में मूर्तिपूजा पर भी अधिक समय तक विश्वास नहीं कर मक्ता था । ऐसे कठिन समय में कबीर की निर्गुण भक्ति ही जन-साधारण के विश्वास के अकुर को सुरक्षित रसे रही और उसो अकुर को पीछे से तुलसी, सूर आदि सगुणोपासक महात्माओं ने अपने भक्ति रस-वर्पण द्वारा पल्लवित एव पुष्पित किया। आज भी एक 'राम' शब्द अटक से कटक तथा फैलाश मे कुमारी तक के विभिन्न भाषा भाषी, विभिन्न वेशभूपा, विभिन्न जाति पॉति, विभिन्न चाल-ढाल के शिक्षित और अशिक्षित भारतीय नर-नारियों को एक दृढ़ सून में बाँधे साधना क्षेत्र में वर्ण-भेद को विपमता हट गई । स्त्री-पुरुप का भी ईश्वर के दरवार में भेद न रहा । परिणाम स्वरूप याबाई और महजोगाई की शान्ति-दायिनी मधुर वाणी सुनने को मिली। यद्यपि सामारिक व्यवहार में तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्रो जाति को पुरुषों की नासी बनी रहन का उपदेश दिया और यह 'फतवा' दे डाला कि स्वतंत्र होकर नारी अवश्य ही बिगड जाएगी, परन्तु वे ही मीराबाई को कुछ और ही उपदेश देते सुनाई देते हैं। कहते हैं कि मीराराई ने घर वालोंसे तग आकर गोस्वामी जी को लिखा कि 'घर के वजन हमारे जेते सबह उपाधि बढ़ाई। साधु सग और मजन करत मोहि देत कलेश सदाई ।। मेरे मातु पिता के सम हो परि-मरन सुखदाई। हम को कहा उचित करिवो है सो लिखिए समझाई ।' इस पर गोस्वामी जी ने यह उत्तर लिस भेजा-

समाज पर प्रमान
'जाफे प्रिय न राम वैदेही।
तजिये ताहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम सनेही।
नाते सवै राम फे मनियत सुहृद सुसेव्य जहालौ ।।
श्रजन कहा सि जो फूटै, बहुतक कहीं कहाली ।।'
मीरा और गोम्वामी जी का यह पत्र व्यवहार चाहे ऐतिहा।।
सिक कसौटी पर पूणत सत्य न प्रमाणित हो, परन्तु वह उस
व्यापक साम्यवाद का माक्षी अपश्य है जो सत कवियों ने साधना।।
क्षेत्र में उत्पन्न कर दिया था।
ममुद्र-मंथन से अमृत निकला था । सुनते हैं, उससे मुर
समाज अजर-अमर हो गया, लोक का कल्याण हुआ और आज
भी चन्द्रकिरणों से चूकर वह अमृत जीव धारियो को शक्ति
प्रदान करता है । पर समुद्र-मथन से विप और वारुणी भी तो
निकली थीं। पिप तो शङ्कर पी गए और देवों म महादेव धन
गए, पर वारुणी श्राज भी ससार को मतवाला बनाए हुए है।
सतो ने भी इस धर्म समुद्र का मेथन कर यह साम्यवाद का, प्रेम
का, भक्ति का अमृत निकाला था। उससे उस समय भी समाज
का कल्याण हुआ था और आज भी इस पावन अमृत द्वारा उसे
शान्ति प्राप्त होती है । पर, इस मथन से कालान्तर मे बहुत सी
अवांछनीय एव हानिकारक वस्तुए भी समुद्र-मथन के विष और
वारुणी के समान निकली। गोस्वामी तुलसीदास जी उनमें से
बहुतों का नाश करने में समर्थ हुए और देवो में महादेव की
तरह 'मामाल' के 'सुमेरू' बने । परन्तु उनका दुष्प्रभाव सम्पूर्ण
ना उनकी भी शक्ति स परे निकला। इस संत.
"शों के सुपरिणामो पर विचार किया जा
।
NIK

महारमा कबीर किन्तु, उनके भारतीय समान पर जो दुष्परिणाम हुए उनका भी विवेचन कर लेना उचित है। सत-कवियों ने धर्म काण्ड का नितान्त लोप कर देने का उपदेश दिया है। इससे लाभ के बदले हानि ही अधिक हुईं। धर्म के नाम पर जो कुछ पूजा-पाठ अथवा रोजा नमाच आदि होता है, यदि यह भी नन्त कर दिया जाय तो उसका परिणाम यही होगा कि कुछ इने-गिने ज्ञानी लोग तो निर्गुण में लौ लगा कर बैठ जायेंगे, किंतु माधारण जनता कालान्तर में धर्म और ईश्वर के नाम को भी भूल जायगी । मन्दिरों और गिरजों के घंटे यदा-कदा साधारण जनता को यह तो स्मरण दिला देते हैं कि ईश्वर का स्मरण करना भी उनका एक कर्तव्य है । मास्जद में घांग देकर मुल्ला यह तो सूचित कर देता है कि मनुष्यों की रक्षा के लिए ऊपर एक सर्वशक्तिमान् अल्लाह भी मौजूद है, उसे मत भूलो। आज कल जो बहुत से कर्म-काण्ड-हीन पासण्डी साधु दिखाई देते हैं उन्हें निर्गुण पथ से बहुत सहारा मिलता है । यदि उनसे कोई शंका कीजिए तो वे सुनी सुनाई ज्ञान की बातें कह कर पूना, व्रत आदि का खण्डन कर देंगे और केवल "अलस' को लखने का उपदेश देंगे। यदि वे वास्तव म ज्ञानी हो अथवा ब्रह्म क ध्यान में लवलीन हो तर तो बहुत ही अच्छा हो । परन्तु सत्य यह है कि यदि उनमें से अधिकांश के हृदय का रहस्य किसी प्रकार प्रकट हो सके तो यह स्पष्ट दिग्पाई देगा कि वे निर्गुण के ध्यान में नहीं वरन् 'रमैया पी दुलहिन' (माया) के ध्यान में मम हैं। और यह सव निर्गुण-गान किस लिए किया गया था ? १०४

महारमा कपीर
--
यही सिद्ध करने के लिए न कि-
'हिन्दू तुरक की राह एक है।'
पर दुर्भाग्य से वे राहें एक न हो सकी। सम्भव है कुछ काल
के लिए हिन्दू-मुसलमानों की राहों में अस्थायी ऐक्य बढ़ गया
हो, पर देश के दुर्भाग्य से दाढ़ी चोटी, लुगी-धोती और,
राम-रहीम का यह समन्वय स्थायी न हो सका।
अधिक क्या कहा जाय कोरपथी हिन्दू और मुसलमानों ने
ही कोर की आत्मा को चीर डाला। उन्होंने मगहर में दो
ममाधियाँ बनाई, एक हिन्दू क्वीर-पथियों के लिए और दूसरी
मुपलमान कपीर-पथियों के लिए।
'ससार असार है। यह उपदेश समाज में सीमा से अधिक
प्रचलित हुआ । इससे निराशवाद एव अकर्मण्यता को प्रोत्साहन
मिला । आश्रम-धर्म के अनुसार तीसरे-पन में, सफल गृहस्थ
होने के पश्चात, संन्यासी होने के स्थान पर यचपन ही में सिर
घुटा घर साधु बन जाना अच्छा समझा जाने लगा। कर्मयोग
की महिमा मानों लुप्त हो गई। आलसी साधुओं की संख्या
बढ़ी। समाज में, संसार को श्रसार कह कर छोड देने वालों की
महिमा गाई जाने लगी। बालसी जीवों को जब केवल गेरुमा
पल पहन लेने से अन्न-वस्त्र की चिन्ता से छुटकारा मिलने लगा,
तो फिर वे जीवन-क्षेत्र की कठिनाइयों के झमेले में क्यों पडत
हमारा यह तात्पर्य कदापि नहीं कि गेरुवा परत्र श्रालसी-पन
अथवा पाखण्ड ही फा प्रमाण-पत्र है। आशय इतना ही है कि
आलसी और पासण्डियों को साधु-वेश धारण करने में अधिक
सुविधा प्रतीत होने लगी, अत उन्होंने उस क्षेत्र में अपना बहुमत
कर लिया।
।
१०५

समाज पर प्रभाव
1
जय आग पी हरि पड़े और जय मांगते हैं तभी ये गन
माना देते है, अथवा जय मय दावा राम है और अजगर तया
पक्षियों को भी यिना मजदूरी किए देते हैं, तर फिर व्यर्थ हो
हाथ पैर हिलाने की यया आवश्यक्ता।
प्रत्येक मत प्रवर्तक के मूल मिद्धान्त एव उसके मत में पालन
किए जान बाले सिद्धान्तों में यहुत अन्तर पढ़ जाता है । कबीर
पंध को ही लीजिए जिन तिलक, माला आदि का फीर ने
सएडन किया है, यहा प्राज कबीर-पंथ की प्रधान यस्तुएँ हैं।
जिस अज्ञान एव भेड़िया-धसान का चीर ने गएडन किया है,
यही पान निम्न श्रेणियों के अधीरपंथिया के ज्ञान चतुओ पर
आवरण सारो हुए है। हमारा तो विचार है कि यदि पान
महात्मा पनीर भारत भूमि पर पुन अवतार लें, ता ये फीर
Hथ को देख फर अवश्य ही पहुव दुसी होंगे और उसीफा
सम्भयत ये सबसे अधिक उम्र सएहन प्रारम्म फर देंगे। कबीर
ने अपन समय के पासण्डियों के विपय में निम्नलिखित परियाँ
लिसी थीं, परन्तु क्या व प्राज्ञ पयोर-पथिया पर ही अक्षरश
लागू नहीं होती।
'माला पहरे टोपीदी हैं माप तिलक अनुमाना ।
साली सन्दै गायत भूले प्रातम सपर न जाना ॥"
1
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१०६

कवीर की भाषा दय के भार व्यक्त करन का माध्यम मापा है। अपने मनोगत भाव स्पष्ट एप प्रभावशाली रूप से दूसरों पर प्रगट करने को मामय प्राप्त करने के लिए ही भाषा का सुचारु रूप से अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन के साथ जर किसी व्यक्ति की नैर्गिक प्रतिभा भी मिल जाती है तर परिणाम स्वरूप उस फा भार प्रदर्शन यही प्राअल, आकर्षक एवं रसानुरूप मापा में होता है। किन्तु इसका तापर्य यह नहीं कि जो लोग भाषा का नियमित रूप से अध्ययन नहीं करते वे भावों का प्रकाशन कर ही नहीं सकते। जब घट में भाव स्रोत प्रान्त गति से प्रवाहित होता है तो उसका बाहर बह निकलना प्राकृतिक है। जव युछ कहने की सामग्री होती है तय भाषा अपने आप साहाय्य देन के लिए दौडी पाती है। यह सम्भय है कि वह अन्न कारभूपिता रमणी के रूप में न पाकर कृग्रिम आभरण हीना धन्ययुमारी के रूप में आवे । महात्मा कपीरदास जी पर यही बात घटित होती है। उन्हें कहना बहुत घुछ था, परन्तु जीवन में 'मसि कागद' कभी न छूने के कारण उनके विचार प्रगट करने के माध्यम- भाषा में एकरूपता एवं स्थिरता के स्थान पर कहीं कहीं चेढगापन, कहीं कहीं अस्पष्टता एच कहीं कहीं असयतता मा गई है। १०७

महारमा क्वीर
कीर की भापा पर विचार करते समय एक चढी कठिनाई
उपस्थित होती है। कबीर का काव्य अपने मूल रूप में नहीं
मिलता | कवीर ने अपनी रचनाएँ लिग्नी नहीं वरन् गा गाकर
सुनाई। पीछे से लिपिबद्ध होते समय उनमें कुछ परिवर्तन
अवश्य हुए होंगे। वतमान काल में उनके काव्या प्रकाशक
उनकी भाषा को सुसस्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। इसके कारण
कबीर की भाषा की विशेषता एव मौलिकता पर आधाट
पहुँचता है।
कवीर पढ़े लिसे नहीं थे। रचना प्रारम्भ करने के पहले
अथया कमी पीछे, उन्होंने क्सिी भाषा विशेष पर अधिकार
प्राप्त नहीं कर लिया था। अतः उनका अनेक भाषाओं से प्रमा
वित होना प्राकृतिक था। अपनी भाषा के विषय में उन्होंन
2 स्वय लिसा है 'मेरी वोली पूरबी', किन्तु यह पूरयी बोली है
कौन-सी ? उनकी भाषा देसने से तो यही ज्ञात होता है कि यह
न पूरवी हैं और न पश्चिमी, परन्तु एक ही हाँडी में पजानी, व्रज,
राजस्थानी, अवधी, मैथिली, उगाली, अरबी, फारसी आदि
को चढ़ा कर पकाया हुआ सधुक्कड अन्नकूट है। कहीं कहीं तो
उन्होंने शुद्ध पडी बोली लिखी है।
क्योर की भापा पर पंजाबी का प्रभाव बहुत अधिक है।
कहा नहीं जा सकता कि कबीर की भाषा नितान्त इसी प्रकार
को थी अथवा उनके किन्ही पजापी लिपिकार की कृपा से वह
इम रूप में हो गई है । कबीरदास जी का एक दोहा है-
'चोट साणी विरह की सब तन जर जर होय ।
मारणहारा नानिहै के निहिं लागी सोय ॥'
इसका यह रूप भी हो सकता है-
१०८

फोर का भाषा चोट घतानी विरक्ष की, सब तन जर जर होय । मारनहारो जानिहै, के निहिं लागी सोय ।। यह सम्भव है कि किसी पजानी लिपिकार ने उनकी रचनाओं में 'न' के स्थान पर 'ण' कर दिए हों और उन्हें पंजाबी रंग म रंग दिया हो। परन्तु कधीरदास जी पर अन्य भाषाओं की तरह पजानी का प्रभाव था परश्य । उनकी भाषा में पजापी शने के साथ मुहाविर भी मिलते हैं- 'अखिहियाँ म कसाइयां, लोग आणि दूखडिया ! साई अपणे कारण, रोइ रोइ रतडियो । आपहियां माई पड़ी ५५ निहार निहार । जीमड़ियो छाला पड्या, नाम पुकार पुकार ।। मन लागा उनमन सों, उन मन मनहिं बिलग। লু ভিন্য বিষা, ধান্য পুষ্ট বিল {} उपर्युक्त दोहों में 'आपडियाँ', 'कसाइयाँ', 'दूखडिया', 'रत- डिया' और 'जीमाडियाँ पजाची भाषा के शब्द हैं, 'और 'लूण बिलगा पाणिया, पाणी लूण विलग पजावी मुद्दाधिरा है। पटरस भोजन भगति करि जू कदे न छाडे पास। 'शथि परघर उथि परि जोवण पाए हाट।' "विरहिण थी तो स्यू रही गली न पिय के नालि ।' श्रादि पक्तियों में 'कदे 'एधि', 'उथि' व 'नालि' भी शुद्ध पजानी के चुछ शब्दों के उच्चारण भी कवोर ने पजानी कर दिए हैं। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है-- राम चरन जाके रिदै बसत हैं, का नर को मन क्यू शैले।' - शब्द हैं। h-N - महात्मा कवीर यहाँ 'रिदै शन्द 'हृदय' का पनायो उच्चारण के अनुमार रूपान्तर मान है। कनीर ने और भी कई शब्दों का उच्चारण पजाबी कर दिया है। 'विवेक'को ये 'क्येक' लिसते हैं। 'नारी सेती , बुधि यवेक सपही हरै। काई गराचे देह, कारिज कोई ना सरै।।' इस सोरठे में 'बक तो पजावी उचारण का सूचक है और 'काई है क्यों' का मारवाड़ी रूप । 'और सबै रग इहि रत थें छूट, हरि रग लागा कदे न खूटे।' इन पक्तियों में यदि 'कदे' पजाबी का प्रतिनिधि है तो थे' राजस्थानी का। क्रिया-पद कीर ने अधिकतर प्रज्ञ एव सड़ी बोली से लिए है। • 'घरी चरन विसवासा। 'अपधू अगिनि जरै के काठा।' आदि में 'धरौ' 'जरे' अज के हैं, और 'पाऊँगा न जाऊँगा, मरूँगा न जीऊँगा, गुरु के सबद मैं रमि रमि रहूँगा में 'आऊँगा, 'जाऊँगा', 'मरूँगा', 'जीऊँगा' और 'रहूँगा' खड़ी बोली के हैं। कबीर का एक पद है- 'कवीरा यिगरथा राम दुहाई। तुम बिनि विगरी मेरे माई ।। चदन के लिंग विरष जु भैगा, विगरि निगरि सोचदन हैला ।। ११० L. . .

कयीर की भाषा - गंगा में लो नीर मिलेगा, विगरि विगरि गंगोदक हेला ॥ कहै कबीर जो राम कहेला, बिगारि विगारि सो रामहि दिला।' इम पर में 'विगरया' राजस्थानी का है, 'मिलेगा' सडी बोली का और 'जिनि विगरौ' ग्रन के शब्द हैं। 'भैला' और 'कहेला' मैथिली के प्रतिनिधि हैं और 'लैला' बॅगाली के 'होइल' का स्मरण दिलाता है। बगालो क्रिया 'दिल' का कनीर ने 'आछिलो बनाकर प्रयोग किया है- 'कह कबीर कछु प्राछितो जहिया' 'राम रहीम की तरह फनीर ने सस्कृत और फारसी का भी सम्मेलन किया है- 'तू पाक परमान दे। पीर पैकम्बर पनह तुम्हारी, मैं गरीब क्या ग दे ।' यह 'पाक परमानन्द सभवत आजकल को 'हिन्दुस्तानी का पूर्व पुरुष है। यत्र तन तो कबीर ने फारसी अरवी के शब्दों का प्रयोग प्रचुर रूप में किया ही है, कहीं कही तो उन्होंने उनकी झडी सी लगादी है- 'खालिक हरि कहीं दरहान । पजर जसिकरद दुसमन, मुरद करि पैमाल । मिस्त हुसको दोगा, दुदर दराज दिवाल । पहनाम परदा ईत प्रातस, जहर जगम जाल ॥ हम फरत रहबरहु समां, मैं खुदा सुमो विसियार । + - - - JHAR

मामा कधीर
हम जिमी असमीन खालिक, गुद मुसकिल कार ॥
असमान म्याने लहग दरिया, तदा गुसल करदा दूद।
करि फिकर रह सालक जमम, वहाँ स तहां मौजूद ।।
हम चु चूदनि वूद सालिक, गर हम तुम पेस ।
कबीर पनाह खुदाइ की रह दिगर दावानेस ।'
इस पद में केवल हरि' 'करि प्रादि दो तीन शब्दोंने ही हिन्दी
की हिमायत की है अन्यथा तो अरबी-फारसी का हीसाम्राज्य है ।
कबीरदास जी ने विविध भाषाओं के शब्द लेने ही की
स्वतन्त्रता का उपभोग नहीं किया उन्होंने उन शब्दों के रूप को
इच्छा और आवश्यकतानुसार तोडा मरोडा भी है। उदाहरण के
लिए कुछ उद्धरण दिए जात है-
'वाल्हा श्राव हमारे ग्रेड
'पच चोर घर मझा, गट लुटें दिवस और समा'
'मिस्त न मेरे पाहिए बाम सियारे तुम।'
'तही जिनि जाय दामन का हर है।'
'जवलग घसैन श्राम।
'माया बड़ी पिचास ।'
इन मे रेखाकिन शब्द प्रमश बल्लभ, गृह मध्य, विहिरत,
वज्ये, दहन आर एव पिशाच क तोडे मरोडे हुए रूप हैं।
अवधी का एक शब्द 'सन' है जिसका प्रयोग प्रज भाषा प
कवियों ने भी ग्यूब किया है। देसिए उसका कवीर ने कितनी
तरह प्रयोग किया है--
हरि सन किया न हेत।
'कैसे छोडगा मिनाया हरि मना
-

मगीर की भाषा
रेत् विषय विकार तजि मना'
'मारा एक निवेरी राम
जे तुम अपने जन सू काम ।'
'भापनि तौ मुनि जन है बैठे,
का सनि कहाँ कसा।
लिङ्ग, वचन, कारक प्रादि के नियम कनीर को न बाँध सके।
इनक नियमों को पालन करने के लिए कवीर ने कभी अपने
मस्तिष्क को कष्ट नहीं दिया। कनीर न भाषा का पाठ प्रकृति
फी पाठशाला में पढ़ा था जहा उसे परिमार्जित एव अलंकृत
फरना नहीं वरन् उसके द्वारा हृदयगत भाव प्रकट करना ही
खिलाया जाता है।
यह पहले ही लिख जा चुका है कि कबीर के पहले हिन्दी
का कोई स्थिर रूप नहीं था अत कनौर की भाषा में स्थिरता या
एकरूपता नहीं मिलती। इस भाषा-सम्मेलन का दूसरा कारण
यह है कि इनकी स्वय की कोई भाषा नहीं थी तथा इनका शब्द
भाण्डार भी मीमित था) अत विभिन्न दिशाओ के एव विभिन्न
मतो के विद्वानी के साथ भारों के आदान प्रदान का प्रभार इनकी
भाषा पर पडा । साथ ही इनकी भापा के सम्बध में एक और
स्थिति भी विचारणीय है। क्योर का देहावसान मगहर में हुना
उन्होंने बहुत तम्बो थाना की, काशी में वे वमे और उनके पदो
का समह सिरसो के 'अन्य साहब' में भी हुआ । इस प्रकार पक्षाय
से लेकर विहार तक फयीर अथरा उनफ काव्य का सम्बध
स्थापित हो गया। एक और यात भी विचारणीय है। फवीर
वैष्णव महात्मा स्वामी रामानन्दजी के शिष्य थे, शेख तकी आदि
मूफी फ़कीरी मे मिले थे, अत उनका इन दोनो धर्मों की शब्दा-
११३

महारमा कार
वली से परिचित हो जाना स्वाभाविक था। सत्सग से हो कपीर ने
हठयोग न्याय आदि के शब्द जान लिए थे। सूफी फकीर एवं
मुसलमानी राज्य क परिणाम स्वरूप उनकी भाषा में फारसी एवं
अरवी के शब्द आग हैं । जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है
व कहीं कहीं पद क पद ऐसे बना गए हैं जिनमें अरयो फारसी के
शब्दों की भरमार है । सभर है यह पद उन्हान अपने मुसलमान
श्रोतागणो तथा सूफी मित्रों के लिये ही लिखे हो।
कबीर ने बहुत थोड़े छन्दों का ही प्रयोग किया है, परन्तु
उनको भी वे मस्त एव परमार्जित न बना सके। जिस व्यक्ति ने
मसि कागद पभी न छुआ था उसने चन्द शास्त्र से अवगत
होने का प्रयत्न किया होगा ऐसा सम्भव नहीं ज्ञात होता पिंगल
काममूण सार उनकी माडी एव तानपुरा था। उन पर तान
1 लगाते समय जो पद्य ठीक प्रकार से गाया जा सकता था उसकी
माना यण श्रादि गिनने की बारश्यकता नहीं होती होगी।
फयोर ने ध्यावरण और पिंगल के नियमों को तो ठुकराया ही
है साथ ही मयनता एव श्लीलता की भो चिन्ता नहीं की। जब
हम उन्हें बहते सुनते हैं-
'सापु मया चौक्या मया को नहि होला विचार।
नै पराई सातमा,
जीम लिए सरवार ॥
बोली एक अमोल है, जो कोई योले जानि ।
र रा सीन के सय मुम्प पाहर प्रानि ।'
त उनसे यह आशा करत है कि उनकी बोली यड़ी शिष्ट व
मिष्ट होगी। यापि अन्य मिद्धान्तों में कपीर 'करनी और कयनी'
को एक ही रम्बने हैं तथापि ये इस दिशा में तो 'गोम लिए तरवार'
को युरा बताते हुए भी अपनी वाणी को कमी फमी विपमरी

ये कारण न होत, तो पवर Monomer- तलवार के रूप में प्रयोग करते arary दोप है कि वे विरोध करते करने गान कीर की अस्पष्टता का arra के साथ साथ उनकी भापा को PERS कवि के रहलाने के लिए रचना लिए उन्होंने पद्य का अरजम्दनाsire अपेक्षा वह अधिक प्रभाव भारी किसी उपदेशक सन्त का भाव ... अधिक प्रभाव डाल सकता in H1- शक्ति अधिकहोती है अत घटन के लिए उपयुक्त माध्यम था। Histers पद्य का प्रचार भी शोघ्रता are ma नास जा पद्य न लिम्रता 4 रस और अलंकार ससार के सभी प्राणी प्रेम करते हैं, सर को क्रोध आता है, सर के हृदय में किसी न किमी समय कोई महत् कार्य करने का उत्साह उत्पन्न होता है, तात्पर्य यह है कि, विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न नामों से भरजाना मानव हृदय का स्वभाव है। जिन्होंने आत्म-सयम द्वारा अपने मन को विउल दगा दिया है, उन वीतरागों के अतिरिक्त समयत सभी के हृदय में उन भावों को व्यक्त करने की इच्छा भी अवश्य होती है और वे उन्हें प्रकट भी करते हैं। मानव-हदय के इन्हीं भावों को इतनी मफलता के साथ शब्दों में वर्णन करना कि उनका प्रत्यक्ष रूप पाठक अथवा श्रोता के मम्मुस था जाय और वह उन भागों में स्वय मग्न हो जाय, रम-परिपाक कहलाता है, और यही रम परिपाक काव्य की आत्मा है। फाज्य शास्त्र के विपाताओं ने मानव-हत्य के मुरय मुरय भावों को स्थायी भाव' सज्ञा दी और यह बतलाया कि किम प्रकार अनुभाव, विभार एवं सचारी-भावों की सहायत से रस परिपाक होता है। इन्हीं भावों के वर्णन में रमणीयता लाने के लिये, उसमें चमत्कार पैदा करने के लिये अलफारों का विधान किया गया। यह पहले कहा चुका है कि चोर ने कवि कहलाने के लिए रचना नहीं की यो, वे काव्यशास्त्र का अध्ययन करने के

है। उनकी श्रात्मा फभी तो प्रियतम के वियोग में तड़पती है
और कभी उसके संयोग में मगल गाती है। इसके कारया उनके
अपने प्रियतम परमात्मा के वियोग में कहती है-
वर्णन तो बडा ही मुन्दर हुआ है। उनकी मात्मा
काव्य में विप्रलम्म एव सयोग भंगार, दोनोंदी की यड़ी मुन्दर
--
रम मार मासकार
पश्चान् रचना करने नहीं बैठे थे। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं
कि कबीर की रचना केवल नौरम तुपन्दी ही है, उसमें रस.
सामग्री अथवा अलंकार हे ही नहीं। जब धादि वि पामोकि
ने अपने अमर काव्य की रचना प्रारम्भ पी थी. तब उन्होंन...
कोई काव्य-शास्त्र सामने रस फर लेपनी न उडार जागी। सत्प
तो यह है कि जब कोई नैसर्गिक प्रतिमा मम्मन महाकयि अपनी
रचना म सहृदय पाठको को आनन्द-मन फरो बाली मामी
उत्पन्न कर देता था, तो पालोचकगरा उसकी रचना का विश्लपण
फर अलकार और रसां का निम्पण कर दत थे। किन्तु, केपण
उन काव्य शास्त्रों के अध्ययन के भरोसे तो यही कयि रचना
करते हैं, जिनमें कवि प्रतिभा प्रचुर परिमाराम नहीं होती।
कबीरदास जी तो स्वभारत प्रवर-कवि-प्रतिमा-मम्पन्न छ।
उन्होंन न तो काव्य-शास्त्र का अध्ययन किया और न उन्हें ऐमा
करने की कोई आवश्यक्ता थी। उनकी रचनाओं में तो अपने-
श्राप रस एव अलकार यथारयान आवश्यक्तामार श्रागए हैं।
कबीर ने आत्मा और परमात्मा की पना और पति के रूप
में कल्पना कर अपनी रचना म अलौकिक माधुरी उत्पन्न कर दी
-
शृगार का
'वाल्हा श्राव हमारे ग्रेहरे।
तुम दिन दुम्विया दो रे ॥ टेक॥
-

महाश्मा कधार
-
सब कोउ कहै तुम्हारी नारी मोको यह देह रे"
एकमेक है सेज न सोवै तब लाग कैग नेह २ ॥
श्रम न मावै नींद न श्रावै मिह पन धरैन धीर रे।
ज्यू कामी को काम पियारा ज्यू प्यासे को नीर रे॥
है कोई ऐसा पर उपकारी, हरियूँ कह सुनाय रे ।
ऐसे हाल कबीर भए है, बिन देखे जिव जाय रे ।'
इस पद में कितना श्रौत्सुक्य, किननी व्याकुलता, और
कितनी तीन वेदना है। इस पर की तीन भाग्ना मीरा के विरह
निवेदन का स्मरण दिला देती है।
यद्यपि पीर अपने विरह निवेदन में कहीं कहीं अपने
विरह की अलौकिकता स्पष्ट कर देते हैं, तथापि इससे उसकी
माधुरी एव उसके रति भान की तोत्रता नष्ट नहीं होन पाती-
1 "अविनामी दुलहा कर मिलिहौ, भगतन रखपाल ।
जल उपभी जल ही मों नेहा रटत पियास पियास ॥
मैं ठाडी विरहिन मग जोऊँ प्रियतम तुमरी श्राम ।
छोड़े गेह नेह लागी तुमसों, मई चरनन लवलीन ।
तालावेलि होत पर भीवर, जैसे जल बिन मौन ।
दिवस रैन भूम्व नहि निद्रा, घर धागन न सुहाय ॥
सेजरिया वैरन मई हमको, जागत रेन विहाय ।
हम तो तुमरी दाठी सजना, तुम हमरे भरतार ||
दीन दयाल दया कर श्राओ, समरथ सिरजन हार।
के हम प्रान तनत है प्यारे, के अपना कर लेव ।
दास कबीर विरह अति बाढेउ, इमकै दरसन देव ।।'
यद्यपि इस पद्य की प्रथम पंक्ति मे ही यह संकेत कर दिया
गया है कि यह विरह 'अधिनासी' एवं 'भगतन के प्रतिपाल'

चोट सतावी विरह की सब तन जरजर होय। मारणहारा जानि है के जिहि लागी सोय ॥ कबीर का सयोग शृङ्गार परिमाण में भी थोड़ा है और उतना श्रेष्ठ भी नहीं जितना कि उनका विप्रलम्म गृङ्गार । जहाँ वे संयोग का वर्णन करने लगते है वहाँ ईश्वर-तत्त्व घहे स्यूल रूप में रस और भलकार दुल्हा के वियोग में है, परन्तु आगे की पक्तियों के विरह-निद्रन में जो तीव्रता उत्पन्न कर दी गई है, वह बहुत ही सुन्दर है। प्रेम- गायाकार सूकी कवि जहाँ-कहीं रहस्य-भावना की ओर सकेत करते हैं वहां बहुधा भावों के उत्कर्ष पर भारी आघात पहुचता है। किन्तु, इस पद्य में यप यह सकेत कर दिया गया है कि यह रियोगिनी आत्म ब्रह्म-रूपी जल से ही उपजी है और उम जन से ही उसका 'नह' है, तथापि इस पद की सरसता पर काई आघात नहीं पहुचा। 'तालावेलि होत घट भीतर' के द्वारा हदय की व्याकुलता बहुत हो मार्मिक रूप म प्रकट की गई है। कबीर ने विरह निवेदन क दोहे भी बहुत सुन्दर ण्य मर्म- स्पर्शी लिखे हैं । उनकी माधुरी जायसी के दोहों की माधुरी से कम नहीं। कबीर कहते हैं यहि तनु जालौ मसि करौं ज्यू धूवा जाई सरगि । मति वै राम दया करे, वरसि बुमावै अगि । एक पद पर्याप्त होगा- सामने आकर रस-परिपाक में बाधा डाल देता है। उदाहरणार्थ 'दुलहिन गावो मंगलचार। हमरे पर आये राम भतार || तन रति कर मैं मन रति करिहों पांचों तत्व मराती। रामदेव मोहि व्याहन आये, मैं जोबन मद माती ।। j

महारमा क्योर
सरि सरोवर येदी परिह मा येद उवाश
रामदेव सगमावर ले हो धन धन मांग हमारा ।।
सुर तैतीसो कौतुक श्राए मुनियर सहस अठासी।
यह कबीर मोहि व्याह चले हैं पुरुष एक अपिनासी ॥"
किसी भी महत् कार्य के करने के लिये हृदय में उत्साह व
भाव जाग्रत होता अत्यन्त आवश्यक है। भगवान् से मिलने व
प्रयत्न करन वाले के हृदय में तो अगाध उत्साह-सागर ६
आरश्यकता है कीर ने जिज्ञासु को उद वीर से तुलना य
है। यह अपना आपापोर माधना क्षेत्र में अवतीर्ण होता है-
गगन दमामा बामिया पक्ष्या निसाने पाव ।
खेत पुकारया सूरमा मुम मरने का चाय ॥
पूरा तपहि परखिये लदै पनी के हेत।
पुरजा पुरजा है रहे तक न घाई खेत ॥
खेत न छाई सरमा जूझ दैदल माहि ।
श्रासा जीवन मरण की मन में लावै नाहिं।"
उपर्युक्त दोहों में वीररस की सम्पूर्ण सामग्री उपस्थित है।
यद्यपि इन दोहों के रम प्रवाह में आध्यात्मिकता ने थाधा नहीं
डाली, तथापि यह स्पष्ट है कि फनीर फा यह वीर नायक
सांसारिक रणक्षेत्र मे लड़ने वाला सैनिफ नहीं, परन अपनी
इन्द्रियों का दमन कर, हृदय के विकारों ही से लड़ कर जीवन्मृत
बनने वाला साधक है
'पूर्ण पड़या न छूटियो, सुणिरे जीव अवम ।
कबीर मरि मैदान में करि इन्द्रियां जूम ॥
कमीर सोई सूरमा मन सौ माई जूम।
पंच पियादा पाई ले दूरि करे सर दूs !!'
१२०

v नर-नारियों के वासनामय सम्बन्ध का भी कीर ने बडा जीभत्स वर्णन किया है, और कुछ स्थलों पर तो वह अश्लील कनीर की सृष्टि-उत्पचि की कल्पना एव का महत्ता आदि । में अद्भुत रस का.सचार हुया है। यत्र-तत्र हास्य रस की छटा प्रयत्न करते है । शान्त रस अपनी पूर्ण सामग्री के साथ कनीर के काव्य में प्रवाहित हुआ है। निम्न पद शान्त-रस का सुन्दर जा दिन ले चल्नु लै चल होईता दिन सैगचले नदि कोई ॥ नेहा शस्त नारी। किसकी पीवी किटकी । रस और प्रबबर अपने सुन्दर एवं स्वस्थ शरीर पर ससार में बहुतों को गर्व होता है। इस गर्व का नाश करने के लिये कबीर न उसी शरीर का कैसा वीभत्स वर्णन किया है-3 'चलत का टेढे टेटे टेदे। दसों द्वारा नरक में यूढे दुरग घों के वेत् ॥ फटे नैन हृदय नहिं सूझ मति एकौं नहिं जानी। काम क्रोध तृष्णा के मारे थदि मुए बिनु पानी ।। जारे देह मसम है जाई गाड़े माटी खाई। राकर स्वान काग के मोचन तन की यह बड़ाई ।। वक हो गया हैं। उदाहरण हे- १२१ 1 भी दिखलाई देती है। पर तु ग्रान्त-रस से तो कुचीर का काव्य भरा पडा है । जगत् की नश्वरता एव सांसारिक सुखों की असा ता का बोध करा फर कबीर मन को ईश्वरोन्मुग्य करन का 'वा दिन की कछु सुधि कर मन मा । तात मात्र मुत नारी रोई, माटी के सा दिया सो मारी काटेगी तन मा समोई॥ 1 महारमा कपीर किसका सोना किसकी चादी। जा दिन म ले चल है बोपी॥ डेरा जाम पर पहियन मो। जो कोई गुरु सो नेह लगाई । यहुत माति सोई मुख पाई ॥ माटी में काया मिलि माद । कर करीर धागे गोहराई ।। कीर के कान्य में अलकार भी कहीं-कहीं यडे मुन्दर रूप में आ गये हैं। इनमें मारश्य मूलफ रूपक, उपमा, दृष्टान्त आदि का। ही पाहुल्य है। कबीर ने वत्प्रेक्षा का उपयोग भा अच्छा क्यिा है। कीर के रूपक एव अन्योकियों पहुत सुन्दर एव अपनी विशेपता लिए हुए हैं, अत उन पर हम आगे एक स्वतन्त्र अन्याय में विचार करेंगे । कीर की उपमाएँ भी बहुत सुन्दर हैं। उन्होंन गूढ़तम तात्विक विषयों को रूपफ एवं उपमा द्वारा ही सममाने का प्रयत्न किया है। निम्न लिखित पद्य में फयोर ने उपमाओं द्वारा ही प्रात्मा और परमात्मा का सरन्ध सम- भाया है 'साधो सतगुरु अलख लखाया श्राप भार दरमाया ।। बीम मध्य ज्यों पिरछा दरसे पृच्छा म छाया। परमातम में मातम तैसे श्रातम म काया || ज्यो नभ मद्धे सुत्र देखिये मुल मद शाकाग। निद श्रच्छर ते अच्छर से अच्छर घर विस्तारा ॥ ज्यो रवि मद्धे किरन देखिये किरन मद परकामा । परमातम में जी ब्रह्मा म जीव मध्य तिमि स्वाहा । स्वासा मढे सन्द देखिये श्रये शन्द के माहो। घहा ते जीव जीव ते मन इमि न्यारा मिला सदाही।।' दृष्टान्त तो कबीर की साखियों में बहुत से भरे पड़े हैं। यहाँ हम उदाहरण-स्वरुप फेवन दो दोहे देते हैं १२२ / - । गया रस और अलंकार कबिरा तहां न जाइये जहाँ कपट का हेत । मानो कली अनार की तन रावा मन सेत ।। चित कपटी सरसों मिलै माही कुटिल कठोर । इक दुरजन एक पारसी भागे पीछे और ।' एक सुन्दर उपेक्षा का उदाहरण लीजिये 'रितु बसन्त जाचक मया हरमि देय द्रुमपात । ताते नव पल्लव भए, दिया दूर नहिं जात ॥' हमारा उद्देश्य क्योर के काव्य के सम्पूर्ण प्रल कारों एव रसों की धान बोन करना नहीं है, अतः इस प्रसग को अब और अधिक बढ़ाना उचित नहीं । कवीर का काव्य इन बातों से बहुत ऊँचा है । यह सब तो केवल यह दिखाने के उद्देश्य से लिखा है कि वास्तविक-कवि प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति चाहे काव्य- शान से पूर्णत अपरिचित हो चाहे उसे साधारण अक्षर ज्ञान भी न हो, परन्तु यदि वह कुछ कहेगा तो वह अवश्य ही सरम एवं रमणीय होगा । यदि उसमें भावुकता है तो उसकी रचनाओं में रस सामग्री अपने आप आ जाएगी। अस्तु । कनीर के पास एक सन्देश था। वे 'हंस उभारने आए थे। उन्होंने आत्म-तत्व प्राप्त किया था। साधना के मन्दिर में वास: नाओं की बलि चढा कर उन्हें श्रात्मज्ञान का प्रसाद प्राप्त हुआ था तथा इस महाप्रसाद को ससार मे वितरित करने के लिए उनकी आत्मा व्याकुल थी।)मूर्सतापूर्ण कुरीतियाँ एव रूढ़ियाँ ससार के माया-बद्ध प्राणियों को नाना प्रकार के कष्ट दे रही थीं। उन पर महात्मा कनीर को अमर्प हुआ था । उसे कठोरतम शब्दों में प्रकट किए बिना सम्भवत उनकी आत्मा का ताप न उतरता । धर्म के नाम पर लोगों को अधर्म करते देख, ईश्वर को १२३

महारमा क्वीर
अनैतिस्ता का आधार यनाते देख फरीर को शोम हुआ था और
उसे प्रकट किये यिना वे अपना पतन्य पूर्ण न समम था इसी
अनन्य आवश्यकता ने उन्हें कुछ काने को बाध्य किया। जैमा
भी अस्तव्यस्त एवं असयत भाषा साधन इम सत्मगी जुलाहे
महात्मा के पास था, उसन उमी अपने तीन भाषा को प्रकट
करन का प्रयत्न फ्यिा।
फबीर माहव इस सत्य के प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि किमी
के पास व्यफ करने को कोई सन्दश हो तो भापा अपनी सम्पूर्ण
शफियों के साथ मिना नियमित प्राराधना किर ही उसके चरणों
म लोटेगी, और वह भाषा कितनी ही धुरूप एवं अस्पष्ट क्यों न
हो, यदि उसम निहित सदेश शिय और सत्य है तो संसार के
श्रेष्ठतम मस्तिक उस फठोर थोर येडौल आवरण के भीतर
सप्रयाम मांक कर उसकी दिव्य एवं पवित्र आत्मा के सौंदर्य
का दर्शन कर अपने आपको उपकृत एवं धन्य सममेंगे।)
1

सूक्तियाँ और उलटवांसियाँ - - कबीरदासजीमे वाग्दग्ध्य एवं उक्ति-वैचित्र्य भी बहुत अधिक है। लोकव्यवहार की माधारण बातें भी उन्होंने एसे अच्छे ढग से कही हैं कि वे वरबम अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लेती है। नीति का उपदेश भी उन्होंने बहुधा इन्हीं सूक्तियों द्वारा दिया है। उनमें जीवन के व्यावहारिक सिद्धान्त बड़े सरल एवं चमत्कारिक ढंग से कहे गये हैं। यही कारण है कि कनीर की ये सूक्तियाँ जन साधारण में लोकोक्तियों के रूप में प्रयुक्त होने लगी हैं। कबीर के दोहों के दूसरे चरण बहुधा लोग कहावतों के रूप में प्रतिदिन व्यवहार में लाते हैं । उदाहरणार्थ- 'श्रागे दिन पीछे गए हरिमो किया न हेत । अब पछताए होत क्या चिड़ियाँ चुग गई खेत ।। करता थातो क्यों रहा, अय करि क्यों पछताय । ज्यो पेड़ बबूर का श्राम कहाँ से पाय || ऊजर खेरे ठीकरी गढि गदि गए कुम्हार । राबन कैसे ना रहे लका के सरदार ॥' उपर्युक्त दोहों की दूसरी पक्तियाँ प्राय पाठकों ने अनेक बार सुनी होगी तथा स्वय भी प्रयुक्त की होंगी। सीधी-सादी साधारण बात भी कधीरदास जी ऐसे चमत्कार- १२५

महात्मा कबीर
-
पूर्ण ढंग से कहते हैं कि वह सुनने पर यरवम हदय पर प्रभाव
डालती ही है-
'माटी कहे कुम्हार से तू क्या रुंधे मोय ।
एक दिन ऐसा होयगा मैं सैंधूंगी तोय ।'
समार में सभी पृछते हैं 'कहिए कुशल तो हैं ? इस प्रश्न
का पडा धुभता हुया मुहतोड़ जवान वे देते हैं-
'कुसल कुसल ही पूछते जा में रहा न फोम ।
जरा मुई ना मय मुश्रा कुसल कहाँ ते होय ॥
'एक दिन मरना अवश्य है। इसी वास्य को कीरदास कैसे
अनूठे ढंग से कहते हैं-
'मठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद ।
जगत चौना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ॥'
अथवा
'चलती चाकी देसिक दिया कवीरा रोय।
दो पारों के बीच में सामित बचा न कोय ॥'
फनीर वृद्ध हो गए। वे ११९ वर्ष जिए थे। उनके सब मित्र
और परिचित ममश मयेर के तारों की तरह एक एक करके
चल बसे थे। अपने उस लम्बे जीवन पर क्षोभ प्रकट करते हुए
ये लिखते हैं-
'साधी इमरे चलि गए, हम भी चालनहार ।
कागद मे वाकी रही ताते लागी बार ।।'
ससार म दूसरों के सामने हाथ फैलाना समसे धुरी घात है।
निकटतम मिन भी हमें याचक के रूप में देख कर उपेक्षा की
दृष्टि से देखने लगते हैं। इस भाव को कीर न कितने सुन्दर
और सक्षिप्त रूप में प्रकट किया है-
१२६
-

सूमियाँ और उलटयासियाँ
'प्राय गई अादर गया, नैनन गया सनेह ।
ये तीनों तबही गए, जयहिं कहा कछु देह ।'
यदि हृदय में स्थान है तर तो आदर-सत्कार का पूछना
हो क्या ? परन्तु हृदय से उतरते ही कुछ भी आशा करना
व्यर्थ है-
कर सोरा सोया भरा, मग जोहत दिन जाय ।
कपिरा उतरा चितम छाछ रियो नहिं जाय ।'
फोरे यातूनी उपदेशकों पर ज्यग फरते हुए कबीरदाम जी
लिग्पते है-
'पण्डित और मसालची दोनो मनाहि ।
औरन को कर चांदना, आप अँधेरे माहिं ।'
धैर्य की महिमा वं आवश्यकता पर फनीरदास जी की यह
पूक्ति बहुत ही सुन्दर एव लोकप्रिय हुई है-
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, रितु पाए फन देय।'
सांसारिक वैभव की भंगुरता पर फीर के निम्नलिखित पद
की पक्तियाँ लोगों के मुख से बहुधा सुनी जाती हैं-
'का मांगें कुछ पिर न रहाइ,
देखत नैन चल्या नग लाई॥टेक।।
इक लप पूत समा लप नाती,
तारापन पर दिया न पाती।
लका सा कोट समंद सी खाई
वा रापन की खपरि न पाई॥
प्रायत संग न जात सगाती,
कहा भयो दरि पधि हाथी॥
१२७

महात्मा कधीर कहे कबीर अन्त की बारी, हाय माहि जैसे चले सुधारी।।' पनीर की सूस्तियां इतनी सुन्दर है कि उनमें से इतनी उद्धत कर देने पर भी सतोष नहीं होता। परन्तु साथ ही परिमाण में इतनी अधिक है कि उन सनका या उनके क्मिी गण्य श्रश का यहाँ उद्धृत कर सकना असम्भर है। फनीरदास जी ने कुछ उलटांसियां भी लिसी हैं। इन रचनाओं के माधारण अर्थ पर विचार परने में उनका मोक- व्यवहार और प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अर्थ ज्ञात होगा। किन्तु यदि उनके साकेतिक अर्थ पर विचार किया जाय तो उनके भीतर किसी तात्विक सिद्धान्त का विवेचन मिलता है। फनीरदास जा का ऐसा ही एक पर है- 'तो एक श्रचरज मो मारी पुत्र परल महतारी ।। पिता के संगेमा वायरी, कन्या रहाल कुमारी। खसमहिछाडिससुर संग गमनी, मोकिन लेह विचारी ॥ माई के सगै सामुर गमनी, साहिं सात दोहा। ननदिमउजि परपंच रन्यो है,मोर नाम हि लीन्हा ।। समधी के संग नाही पाई, सहन भई घरवारी। कहहि कदीर सुनहु हो सम्ता पुरुप नाम मो मारी। इस पद के साधरण अर्थ पर विचार करने से ज्ञात होता है कि यह पद लोकाचार के मिलल विरुद्ध एवं असगत शब्द. योजना मात्र है। परन्तु, यदि शब्दों के कबीरदास क्या अन्य सतों द्वारा प्रयुक्त सांकेतिक अर्थों को ध्यान में रख कर इसी की व्याख्या की जाय तो ज्ञात होगा कि यह माया ठगिनी की लीला का वर्णन है। १२८

.
सुक्तियां चौर उसटासियों
इस पर फा वास्तविक अर्थ श्रीयुत विचारदाम जी शास्त्री ने
अपने पीनक में इस प्रकार रियार
'कभीर माहय बहते हैं कि हे मन्तो। आप मुनिए, एक यहा
Vमारी अचरज हुआ है कि महतारी (माया) 1 पुत्र (जीवात्मा)
के साथ सम्पन्ध फर लिया है।
'इतना ही नहीं यह कुमारी कन्या माया ऐमी पागल हो गई
है कि उसने अपने पिता ( ईश्वर ) के साथ भी सम्बध (सी
पुरुष का मम्मन्ध) कर लिया है। इसके बाद रामम (ईश्वर)
को छोड़ कर उम माया सतुर (अशान) के पीछे पीछे चलना
भारम्भ किया है, इस धान को अन्य लोग क्यों नहीं विचारते हैं।
'इसके बाद यह माया अपने भाई (अविक) के साथ
समुराज (मंसार) में चली आयी और यहाँ अपनी सासु
(वचक लोगों की मापी ) को अपनी सौत बना लिया है। यह
सय अपच ननंद (पुमति ) और भजि ( अविद्या) ने रचा
है, इसमें जीव को मिथ्या ही फलक दिया जाता है।
'माया समधी (सन्त ) के पास नहीं पाती है, क्योंकि यह
समाव से हो प्रपच से सम्बन्ध रखती है। कबीर साहन कहते
है कि पुरुप (जीव ) मे नारी (इका) का जन्म हुआ।
इसी प्रकार का कबीरदाम जी का एक और पद
'प्रवधू जागत नींद न कीजे ।
काल न स्वाय क्लप नहिं न्यापै, देही जुरा न छीजै ॥ टेक।।
उलटी गग समुद्रहि सोरी, समिर यूर गरासे ।
नव ग्रिहमारि रोगिया रेठे, जलमें व्यर प्रकासे ।।
डान गातें मूल नएम, मूल गहलो पल पाया।
चपई उलटि शरपको लगी, परणि महारस खावा ।।
१२६

महामापीर
-
अंबर परत परती भी यदु जाने सब को।
पसी सदर मी अझै रिसा कोई ।'
साधारणत इस में भी उनटी बातें कही हुई मारहोती हैं।
परनु इमषायाम्नायफ अर्थ अयगत हो जाने पर इस में हठ
योग मिद्धान्तों का वर्णन दिग्पादं देता।
४ योगी! साधना के समय को व्यर्थ सोना ठीक नहीं।
यदि माधना सफल हुई सो मृत्यु को पापा न होगी मान का
प्रभाव न पड़ेगा तथा मायस्या का हर न रहेगा।
प्राशायाम द्वारा कार्यगामी होकर पुडनिनी विकारों के समूह
फोन पर एती है। मन में स्थित चन्द्र अमृन घर्षण द्वारा
मूलाधार पर में स्थित गग, रोग उत्पन्न करने वाले सूर्य पे
प्रभाव को नष्ट कर देता है (दतिय योर और हठयोग।) इन्द्रियों
की यासनाघों का दमन कर योगी अपल समाधि लगान है और
जल ( ससार) म विम्य ( प्रम) दिपलाई दने लगता है।
इस 'अयमूलमध शास्त्रम्' याने वृक्ष की डाल (समार) को
प्रादण परोसे मूल (प्रा) दिसलाई नहीं पड़ता और यदि मूल
(प्रस) का सहारा लेते हैं तो फल (मोन ) मिल जाता है।
शरीर-रूपा यांची पुउलिनी को पफड़े हुए है, अतः मझ-रभ से
पहा हुआ अमृत मूलाधार चक्र में नष्ट हो रहा है।
संसार में तो यह प्रसिख है रि पाकाश से जल परसता है
और उससे पृथ्वी प्लायित होती है परन्तु, योगियों के संसार
की उलटी और विचित्र गति योहे ही प्राणी समझते हैं।'
Vइन उलटयासियों का अर्थ लगा सकना सरल नहीं है । जो
अर्थ मिलते भी हैं ये पूरी तरह ठीक होंगे, इसमें सन्द है।
| ऐसी फूट-वाणी के कारण ही कबीर के विपय में प्रसिद्ध है-
-

सूक्तियाँ और उलटयासियों - 'कवीरदाय की उलटी पानी। परसे कयल भोज पानी ।' प्रत्येक धर्म-प्रणेता में इस प्रकार का कूट-उपदेश देने की प्रवृत्ति होती है। महात्मा ईसा ने भी इस प्रकार के गूढ उपदेश दिए है । जर उसके शिष्यों ने इस प्रकार के अस्पष्ट उपदेश देने का कारण पूछा तो उसने उत्तर दिया कि इन उपदेशों के गढ़ कर देने का कारण यह है कि श्रद्धा रहित अविश्वासी लोगों को धर्म का पावन रहस्य न मिले, पर साथ ही श्रद्वालु भक्त उसमे रचित भी न रह जायें। कीर का भी इन उलटरांसियों एवं फूट-पदो के लिखने में यही उद्देश्य था। उन्होंने अपने के लिये ये पद धार्मिक-प्रहेलिकाओं के रूप में फहे होंगे। मरलता से मिला हुआ ज्ञान उतना सतोप नहीं प्रदान करता, जितना प्राप्त किया हुआ। मुमुतु शिष्य इन उलढवासियों पर अपने मस्तिष्क से व्यायाम करा कर आत्मज्ञान सोजते होंगे। असफल होने पर, सम्भवत , वे गुरु की शरण में जाते होंगे, जहाँ उन्हें उनकी पात्रता का ध्यान रसकर उन पदों की 'कुजियाँ' गुरु के महाप्रसाद की तरह, प्रदान की जातो होंगी। ये उलट- बाँसियाँ जनता का चित्त आकर्पित करने का साधन भी हो सकती हैं।/ श्रतरग शिष्यों प्रयास १३१ रूपक और अन्योक्तियां यह पहले लिसा जा चुका है कि आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध-निरूपण के परिणाम स्वरूप रहस्यवाद की उत्पत्ति होती है । जिज्ञासु महात्मा की आत्मा को परमात्मा की ओर अनन्त सयोग की इच्छा से अग्रसर होते समय जो अलौकिक अनुभव होते हैं, उनका भावमय वर्णन ही रहस्यवाद कहलाता है। यह भी लिसा जा चुका है कि ये विषय की सूक्ष्मता एव दुरूहता के कारण उसको मानवी भाषा के शब्दों में सुगमता से समझाया नहीं जा सकता (यही कारण है कि संसार के सभी रहस्यवादी महात्माओं ने अपना रहस्य-भावनाओं को रूपकों और अन्यो फियों द्वारा बहुधा पद्य में प्रकट क्यिा है। यह होते हुए भी वे अपने प्रयन में पूर्ण सफल हो सके हो,यह नहीं कहा जा सकता। उनका वर्णन बहुत जटिल एव अस्पष्ट ही रहा। कबीर ने भी अपनी रहस्य-भारना को प्रकाशित करने के के लिये रूपकों और अन्योक्तियों का सहारा लिया है। उनके रूपक और अन्योक्तियाँ बहुत सुन्दर हैं। उनको पूरी तरह समझने के लिये कुछ ऐसे सरेत-शब्दों से परिचिन हो जाना प्रावश्यक है जिनका कोर ने प्रचुर रूप में प्रयोग किया है। कबीर साहब के रूपका में एक विशेषता पाई जाती है। वे १३०

स्पफ पौर भन्योकिया
जुलाहे थे । यद्यपि पे बीतगग महात्मा थे, तथापि ये अपने निर्वाह
के लिए पायें और ताने-थाने पर ही आश्रित रहते थे।
पर्सा और ताना पाना सदा उनकी ष्टि के मामने रहता था।
पा, हॉन गम्भीरतम तात्विक मिद्धान्ता फो भी उन्हीं च
पौर पादर आदि के रूपा द्वारा मममाग है। अपनी इस
व्यासाय-सामग्री से उन्होंने अपने छोटे स परिवार का उदर
पोपण तो फिया ही, साथ ही इसके द्वारा संसार के मुमुक्षुओं की
आत्मा के लिये भोजन जुटाने के लिए आध्यात्मिक भार प्रकाशन
में भी सहायता ली।
मासे पाले पनीर साधना के प्रधा साधा मानव-देह
फो लिया। (जय नित्य क शिक्षण से उन्दोन देना कि उसमें
और उनकी चुनी हुई चादर म यहुत अधिक साम्य है, पर उन्हों
न कुछ यहुत ही सुन्दर रूपको की रचना की । उनका यह पादर
फा रूपफ बहुत प्रसिद्ध है-
'मीनीगामी यांनी चदरिया।
काहे ताना, काहे ये भरनी, कोन वार से पीनी चदरिया।
इंगशा पिगला ताना मरनी गुपमन तार से पीनी चदरिया ॥
पाठ यल दल चरणा बोले, पाच तत गुन तीनी चदरिया।
रको सियत मास दस लागे ठोक ठोक ये पीनी चदया।
सो चादर मुरार मुनि प्रोढ़ी श्रोद फे मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से श्रोदी स्यों की त्यो घर दीनी चदरिया ॥
इस शरीररूपी पादर में इंगला, पिंगला एवं सुपुम्ना, तीन
नादियाँ हैं, पाल पा रूपी पख से इसके सूत्र का निर्माण हुआ
है, यह अग्नि, जत, वायु, आकाश और पृथ्वी, पाँच तत्त्यों से
पनी हुई है तथा इसमें सत, रज, और तम, तीन गुण हैं।
१३३
,

महारमा कबीर
।
-
विधाता को इस शरीर रूपी चादर को माता के गर्भ में तैयार
करने में दस महीने लगे थे। इतनी महत्त्वपूर्ण चादर का सब लोग
दुरुपयोग करते हैं। सदुपयोग किया केवल एक कनीर ने
यदि इम शरीर-रूपी चादर का उपयोग यत्न से किया जाय तो
फिर 'प्रीतम' के रीमने में देर नहीं लगती। पर, माया का प्रपच
वहा प्रवल है। इसमें पड जाने पर इस चादर में दाग लग ही
जाता है। कहते हैं-
'मोरी चुनरी में लग गयो दाग पिया ।
पाच तत्त की बनी चुनरिया औरह से बन्द लागे पिया ।
यह चुनरी मोरे मैके ते पाद समुरे में मनुया खोय दिया "
यदि दुर्भाग्य से इस चादर में दाग लग जाय वो इसे साफ
करने का उपाय भी कपीरदास जी बतलाते हैं
"मलि मनि धोई दाग न छूटै, शान का साबुन लाय पिया ।
कहत कबीर दाग दब छुटिहै, जब साहब अपनाय लिया ।।"
वह दाग तर छुटे, जब साह्य अपना ले। पर मैली चादर
थोड़ने वाली आत्मा को साहब कभी नहीं अपनाएगा। अत:
भावश्यक है कि सद्गुरु-रूपी घोरी ज्ञान का साबुन लगा कर
इसे स्वच्छ करदे।
"नहर में दाग लगाय पाइ चुनरी।
जरगरेज वा के मरम न जानै
नाहिं मिले धुरिया, कवन करै उजरी।
तन के कुढी शान के सउँदिन
साबुन महग विकाय या नगरी ।।
पहरि प्रोद के चली मसुरिया
गोवा के लोग कहें बड़ फुहरी ।
१३४

रूपय घोर अयोक्तियाँ कहत कोर सुनो मई सापो पिन सतगुरु कबहूँ नहीं सुधरी।" यह आत्मा दुलहिन है और परमात्मा है उसका वरेण्य पति। । यह संसार उस दुलहिन का नैहर है। नैहर में इस पति-प्राणा दुलहिन को चैन केमा? इस मधुर रूपक ने कबीर के काव्य में एक अलौकिक माधुरी उत्पन्न कर दी है। गोपी-कृष्ण की प्रेम- कथाओं की नीव भी इसी भावना पर रखी गई है। दुलहिन का एक दिन 'गौना' होना ही है। उसे सुसराल जाना ही पड़ेगा। सभी दुलहिनें अपनी अपनी समुराल जाती हैं। कोई तो ऐसे गुण सीस कर जाती है कि ससुराल के लोगों की प्रिय बन जाती है और कोई नैहर मे खेल में ही समय विता देती हैं और फूइड बनी रहती हैं तथा पति के स्नेह से पञ्चित रहती है। अत , उचित यह है कि नैहर में ही ऐसे कर्म कर लिए जायें, जिनसे ससुराल में निरादर न हो और प्रियतम का प्रेम भी मिले। "करो भवन ससि साई मिलन की। गुडिया गुडवा सूप सुपेलिया, तज दे बुध लरपैया खेलन की। देवता पितर भुइयां भवानी, यह मारग चोरासी चलन की। मचा महल अजब रग यगला माई सेज यहो लागी फुलन की" इस नहर में तो चार दिन रहना है। अन्त में तो पति के देश की ओर अकेले ही यात्रा करनी पडेगी। वहाँ नैहर का कोई जीव साथ न होगा- "खेल लै नैहरवा दिन चार । पहली पठोनी तीन जन श्राए नौवा वाहन वारी। चाबुल जी मैं पैया तोरी लागों अबकी गवन देव टारी॥ १३५

महात्मा कपीर
--
दुसरी पटोनी अापे श्राए लेके होलिया कहार।
परि बहियां गलिया वेठारन कोउन लागे गुहार ।
लेई डोलिया जाय वन उचारिन कोई नहिं सगी इमार।
को कपीर सुनो भाई साधो इक पर है दस द्वार।"
कवीर ने इस शरीर का सदृश्य एक पिंजर से भी दिसलाया
-
दरवाजे हैं और वे भी सदा खुले रहते हैं । अत यह कैदी पक्षी
किसी समय भी इस पिंजर को छोड़ कर भाग सकता है।
दस दारे का पीजरा, वाम पछी पनि ।
रहने का अचरज महा, गये अचम्मा कौन !"
इस पक्षी के पिंजरा छोड़ने का दृश्य कनीर ने कितना क्रुण
चिनित किया है
"सुगवा पिंजरवा छोरि भागा ।
इस पिंजरे में दस दरवाजे दस दरवाजे किवरवा लागा ॥
अखियाँ सेती नीर बहन लग्यो अव करा नाहिं त् बोल अमागा।"
कबीर की दृष्टि जुलाहे के यन्त्रों तक ही सीमित नहीं रही।
भारत के प्रधान व्यवसाय कृषि-कर्म पर भी उनका ध्यान गया।
उन्होंने उस से भी एक बहुत ही प्रभाव-शाली रूपक की
कल्पनाली-
"गगन पटा घहरानी धो गगन घटा पहारानी।
पूरव दिसि से उठी बदरिया रिम झिम परसव पानी॥
आपन आपन मेंड समारा वही जात यह पानी।
मन के मैल सुरत हरवादश मोत खेत निरवानी।
दुविधा व छोल कर बाहर दोय नाम की पानी ॥
जोग जुगुत करि का रखवारीचर न जाय मृगधानी।
१३६

रूपर और धन्योक्तियाँ
.
।
बाली गार यूट कर लाप होई अषत किसानी ॥
पांच सति मिशो कीन रसोइया एक से एक सिपानी।
दूनयार परापर परसे ये मुनि और शानी ॥
करत कवीर गुन मई सापो यह पद है निरयानी।
जो या पद को परची पाये वाको नाम विशानी॥"
म्पकों की तरह फनीर को अन्योक्रिया भी पड़ी अलौकिक !
और रमणीय हैं। अन्योक्ति और रहस्ययाद में यदा घनिष्ट
मम्यन्ध है। जायमी का रायत एक वृहत् अन्योक्ति मात्र है।
फपीर ने भी पात्मा और परमात्मा का सम्मन्य समझाने के लिये
अन्योपियां का पहा मुन्दरे उपयोग किया है।
यद्यपि इस शरीर के भीतर भी परमात्मा की ज्योति मौजूद
है, तथापि माया के भ्रम के कारण जीगत्मा को उसके दशन
नहीं होते । फयीर ने अन्योकि-द्वारा उस दुसी जीवात्मा को
फैसे भावपूर्ण शब्दों में परमक्ष के उसके निकट ही होने की
सूचना दी है-
'कार शनलिनीतू मिलानी।
तेरे ही नालि यरोपर पानी।। टेक।।
जल में उतपति जल मैं पास, जल में नलनी तोर निगा।
ना तलि तपति न गरि प्रागि, तोर देत का कामी लागि ॥
कहै कबीर जे उदिक समान, ते नहिं मूर एमारे आन ॥"
'हे नलिनी (जीवात्मा) तू दुखी क्यों है ! तेरे निकट ही
तो ब्रह्म-रूपी जल भरा हुआ है। तू उसी जल से उत्पन्न हुई है
और उसी जल में तेरा निवास है। तेरे चारों ओर तो कहीं
भी दुस-दैन्य न होना चाहिये, कहीं वेरा चित्त माया से दो
नहीं लग गया। हे नलिनी (जीवात्मा) यदि तू जल (प्रा)

पवार का भापा
Thug
!! "सुनु हसा प्यारे सरवर तजि कहा जाय ।
लेहि सरपर विच मोतिया जुगत होते, बहु विधि केनि कराय !
सूखे ताज पुरहन जल छोड़े, कवल गइल (मज्ञाय ।
कहहिं कबीर अबहीं के विठुड़े, बहुरि मिशहु का प्राय ॥
हे प्यारे जीव (ईस इस शरीर (मखा) को छोड कर
कहां चले १ इस शरीर के द्वारा ही तो तुम ने इतना ज्ञान
(मोती ) लाभ किया था। तुम्हारे जाते ही यह शरीर (ताल)
सूस जायगा, नेत्रो (पुरइन ) से अनु निकलने लगेंगे और
मुस (फमल ) कुम्हला जायगा। अब की बार के बिछुड़े क्या
फिर कभी मिल सकोगे,

हिन्दी साहित्य मे कवीर का स्थान यह लिखा जा चुका है कि कनीर वस्तुत महात्मा एवं उपदेशक थे । पग तो वे अपने उपदेश को रोचक बनाने के लिए तथा उसकी व्यजना-शफि से लाभ उठाने के लिए लिखते थे। परन्तु उनमें नैसगिक काव्य-प्रतिभा थी, जिस के कारण उनकी अपूर्व एव अद्वितीय कृतिया हिन्दी साहित्य में अपना निशेप स्यान रसती है तथा उसे सम्पन्न बनाती है। अत हिन्दी साहित्य में कबीरदास जी का क्या स्थान है ? इस प्रभ पर विचार कर लेना भी उचित होगा। वर्णित विषय के क्षेत्र पर ध्यान दिए बिना ही कवियों की तुलना कर उनके स्थान निर्धारित करने की प्रथा को निस्सारता एवं थसगतता सिद्ध करने की आवश्यकता अब हिन्दी जगत् में सभवत नहीं रही, क्योंकि विद्वानों ने इस ओर पर्याप्त ध्यान आकर्पित करा दिया है। भत महात्मा कपीर की रचनाओं के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर हम उनके समान- क्षेत्र में रचना करने वाले कवियों में उनका स्थान ढूंढने का प्रयत्न करेंगे। पीछे के सब सन्त कवियों की शैली एवं विचार धारा १४१ महारमा कबीर । कनीर से मिलती जुलती है। परन्तु दुर्भाग्य से, उसमे कबीर । के काव्य की दुबलताओं ने तो प्रवेश कर लिया पर वह शक्ति नहीं आ सकी जो उसमें है। यद्यपि उन्होंने कनीर के ही भावों को दोहराया है, तथापि उन्हें अपनी अतमता से निष्प्राण कर दिया है। अपनी रचनाओं में व वह ताजगी न ला सके जो फनीर की रचनात्रा में है । अत , सन कवियों में तो निश्चय ही कबीर का काव्य सर्व श्रेष्ठ है। कबीर दास जी हिन्दी में रहस्यवादी कविता के जन्म- दाता तो हैं हो, उनका श्रासन भी हिन्दी के रहस्यवादी कवियों में सब से ऊचा है सूफी प्रेम-गाथा-कारों का काव्य सरस भले ही हो, पर उनकी रहस्य भावना कमीर से टकर नहीं ले सक्ती (कनार के कान्य में उन की आत्मा पार्वत्य जल- प्रपात के समान हाहाकार करती हुई परमात्मा की ओर वेग के साथ बढ़ती हुई ज्ञात होती है। प्रेमगाथाकारों को रहस्य भावना क्षीण जल-स्रोत की तरह कहीं-कहीं अकस्मात दर्शन देकर फिर लुप्त हो जाती है । कबीर का सा ओज, तीव्रता एव तन्मयता.हिन्दी का कोई भी रहस्यवादी कवि अपने काव्य में नहीं ला सका।) कनीर ने मुक्तक छद लिखे हैं। उनमें तात्विक सिद्धान्तों के निरूपण के अतिरिक्त नीति विषयक उपदेश भी हैं। इस प्रकार का नीति-काव्य भी हिन्दी में बहुत से कवियों ने लिसा है। यह बहुधा सूक्तियों के रूप में होता है । इसकी सफलता के लिए मर्मस्पर्शी व्यग्य एवं प्रचुर वाग्वेदग्ध्य की आवश्यकता है। कनीर में ये दोनों गुण विशेष रूप से विद्यमान है । नीति: फाव्य की रचना में भी ये हिन्दी के किसी कवि से कम नहीं। १४२ - हिन्दी साहित्य में पायीर या स्थान रहीम तो उनके सामने ठहर ही नहीं सक्ते, धन्दु भी इनफी नीतिकाव्य-रचना-चातुरी को परास्त नहीं कर सकते। धान्य शास्त्र के आचार्य फपियों की तो फरीर के साथ सुलना हो ही नहीं मरती जिस प्रकार वीणा के कृत्रिम स्वरों की तुलना थान फानन में उन्मुक्त विहार करने वाली कोकिला फी फारुली से नहीं हो सकती, उसी प्रकार स्वामाविस्ताहीन केशव आदि प्राचार्या की तुलना इस नैसर्गिक कवि से नहीं हो सस्ती नायिका-भेद-निरूपण एव घोर झारिक वर्णन परनेवाले फरियों का तो करीर के साथ नाम लेना भी अन्याय होगा, ये तो उसी वस्तु का वर्णन करने में अपना अहोभाग्य समझते हैं, जिसे कीर ने संसार की सबसे बड़ी गंदगी समझ फर घृणा की ष्टि से देसा । भौतिक-मापना के निकृष्टतम रूप- फाम-वासना के घणन की प्राध्यात्मिस्ता फी उच्चतम तेजोराशि से तुलना करना नितान्त अनुचित है। निराकर एव साकार की दीवार को हटा कर यदि हम समस्त भक्त फपियों पर विचार करें तो भी कमोर साहव का स्थान अधिक नीचा नहीं दिसाई देवा । फवियुलामणि भक्त-प्रवर गोस्वामी तुलसी दास जी का आमन तो निश्चय हो हिन्दी संसार में सर्वान है । सूर की सुपमा, उनके प्रेम को तन्मयता एव अन्य कायोचित गुण भी अपूर्व है। किन्तु इन दोनों महारवियों के पश्चात् हिन्दी के भक्त कवियों में कनीर फा आसन प्रतिद्वद्वी-रहित है। तुलसी और सुर को छाड कर कवीर की अनूठी वाणी से श्रेष्ठता अथवा समता का दावा करने की शक्ति किसी भात-ऋषि में नहीं। ऐतिहासिक दृष्टि से भी कबीरदास हिन्दी साहित्य के महात्मा कबीर । फनीर से मिलती जुलती है। परन्तु दुर्भाग्य से, उसमें क के काव्य की दुर्वलताओं ने तो प्रवेश कर लिया पर वह शर्मा नहीं आ सकी जो उसमें है। यद्यपि उन्होंने कनीर के भावों को दोहराया है, तथापि उन्हें अपनी अक्षमता से निष्प्रान कर दिया है। अपनी रचनाओं में वे वह ताजगी न ला सके ज कबीर की रचनात्रा में है। यत, संत कवियों में तो निश्चय ही कनीर का काव्य सर्व श्रेष्ठ है। कबीर दास जी हिन्दी में रहस्यवादी कविता के जन्म- दाता तो हैं हो, उनका आसन भी हिन्दी के रहस्यवादी कवियों में सब से ऊचा है सूफी प्रेम-गाथा कारों का काव्य सरस भले ही हो, पर उनकी रहस्य भावना फीर से टकर नहीं ले सकती किबोर के काव्य में उन को श्रात्मा पार्वत्य-जल- प्रपात के समान हाहाकार करती हुई परमात्मा की ओर वेग के साथ बढ़ती हुई ज्ञात होती है। प्रेमगाथाकारों को रहस्य भावना क्षीण जल-स्रोत की तरह कहीं-कहीं अकस्मात दर्शन देकर फिर लुप्त हो जाती है। कभीर, फासा ओज, तीयता एवं तन्मयता हिन्दी का कोई भी रहस्यवादी कवि अपने काव्य में नहीं ला सका।) फबीर ने मुक्तक छद लिसे हैं। उनमें तात्विक सिद्धान्त के निरूपण के अतिरिक्त नीति विषयक उपदेश भी हैं। इस प्रकार का नीति-काव्य भी हिन्दी में बहुत से कवियों ने लिखा है। यह बहुधा सूक्तियों के रूप में होता है। इस के लिए मर्मस्पर्शी व्यंग्य एवं प्रचुर गध्य की है। कबीर में ये दोनों गुण विशेष रूप से काव्य की रचना में भी ये हि - कषि १४२ हिन्दी साहित्य में फपीर या स्थान रहीम तो उनके सामने ठहर ही नहीं सपत, यून्द भी इनकी नीतिकाव्य-रचना-चातुरी को परास्त नहीं कर सकते। कान्य शास्त्र के आचार्य कवियों की तो कबीर के साथ तुलना हो ही नहीं मक्ती जिस प्रकार वीणा के कृतिम स्वरों की तुलना थाम्न कानन में उन्मुक्त विहार फरने वाली कोकिला की कारली से नहीं हो सकती, उसी प्रकार स्वाभाविकता हीन फेशव आदि प्राचार्या की तुलना इस नैसर्गिक कयि से नहीं हो सकती । नायिका-भेद-निरूपण एव घोर शृगारिक वर्णन करनेवाले कवियों का तो कबीर के साथ नाम लेना भी अन्याय होगा। वे तो उमी वस्तु का वर्णन करने में अपना अहोभाग्य समझते हैं, जिसे कनीर ने मंसार की सबसे बड़ी गंदगी समझ पर घृणा की दृष्टि से देसा । भौतिक भावना के निकृष्टतम रूप- फाम-पासना के वर्णन की आध्यात्मिकता की उच्चतम तेजोराशि से तुलना करना नितान्त अनुचित है। निराकार एवं साकार की दीवार को हटा कर यदि हम समस्त भक कवियों पर विचार करें तो भी कबीर साहय का स्थान अधिक नीचा नहीं दिसाई देता । कविकुल-चूडामणि, भक्त-प्रयर गोस्वामी तुलसी दास जी का आसन तो निश्चय ही हिन्दी संसार में सर्वोच है । सूर की मुपमा, उनके प्रेम की सन्मयता एव अन्य काव्योचित गुण भी अपूर्व है। किन्तु इन दोनों महामवियों के पश्चात् हिन्दी के भक कवियों में कबीर का आसन प्रतिद्वद्वी-रहित है। तुलसी और सूर को छोड़ कर कबीर की अनूठी वाणी से श्रेष्ठता अथवा समता का दावा करने की शक्ति किसी भक्त-कवि में नहीं। ऐतिहासिक दृष्टि से भी कबीरदास हिन्दी साहित्य के १४३

महात्मा कपीर
पितामहों में से हैं। भक्ति-काव्य का हिन्दी में श्रारम्भ यद्यपि
इनके पहले स्वामी रामानन्द तथा नामदेव आदि कर चुके थे
तथापि यह स्रोत नितान्त क्षीण था ! उसे प्रयल धारा का रूप
कीर ने ही दिया । मैथिल-फोक्लि विद्यापति अवश्य अपना
शृगार-मिश्रित भक्ति-रस-स्रोत बहा चुके थे परन्तु पश्चिमी
भारत पर उनका उस समय कोई प्रभाव पड़ा होगा, यह संभव
नहीं ज्ञात होता।
कुछ विद्वानों का मत है कि किसी कवि की श्रेस्ता का
अनुमान रसके प्रचार से भी लगाया जा सकता है। इस मत में
कुछ तथ्य भी है। किसी असद् वस्तु का प्रचार अधिक
समय तक जन समाज में नहीं रह सकता। प्रचार और प्रभाव
की दृष्टि से कहा जा सकता है कि कबीर का स्थान गोस्वामी
तुलसीदास जी के पश्चात् ही है । उत्तर-मारत पर जितना
प्रभाव इन दो महात्मा कवियों का है, उतना और किसी का
नहीं । निग्न श्रेणी की अशिक्षित जनता में तो कबीर फा प्रचार
सभवत तुलसी से भी अधिक कम न होगा।
इतना लिखने के पश्चात् भी और कबीर के कान्य की
त्रुटियों को दृष्टि में रखते हुए भी, हृदय तो यही कहता है कि
कवीर में कुछ ऐसी बात अवश्य है, जिसकी समातता हिन्दी
का कोई भी कवि नहीं कर सकता। उनमें कुछ ऐसा अनूठापन
अवश्य है, जिसके कारण वे किसी श्रेणी विशेष के कवियों में
नहीं खप सकते। उनमें कुछ ऐमा आकर्षण है जिसके द्वारा
वे हृदय को उरबस अपनी ओर आकर्पित कर अपने आलोचक
को अपना पक्षपाती बना लेते हैं।
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महारमा कवीर
निबन्ध
कमीर (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग ५ संवत् १९८)
लेखक-प. शिवमगम पाण्डेय ।
कोर साहब का जीवन-वृत्त (ना०प्र० पनिका, भाग १४, अक ४)
लेखक-श्री० चन्द्रपनी पाण्डेय ।
कनीर सिद्धान्त आर रहस्यवाद (परिषद् निरन्धावली, भाग २)
लेसक-श्री. सोमनाथ गुप्ता।
छायावाद व रहस्यवाद ('विशाल-भारत' आपाढ सवत् १९८५)
लखक-श्री. गुलाब राय
रहस्यवाद-लेखक-श्री. गुलाब राय ।
रहस्यवाद और हिंदी में उसका स्वरूप ('सुधा' पोप, तु० स० ३१०)
लसक-त्रो० मद्गुरु शरण अपस्थी।
सत साहित्य ('हिन्दुस्तानी' अक्टूबर १६३१)
लेख-श्री. परशुराम चतुर्वेदी।
हिन्दी-काव्य में निर्गुण सप्रदाय (ना०प्र०प० भाग १५ अक १)
लेखक-डा. पीताम्बरदत्त बडवाल।

Mahatma Kavir

Author
Sharma,ayodhyanath Ji
Title
Mahatma Kavir
File name
Mahatma Kavir
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/04
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552278
Barcode
4990010033025.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
faIPLjerU36
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