Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Nandisutram Vol-ix With Curni
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Prakri! Tox! - Society Series 10..
NANDISUT TA M
DEVAVĀCAKA
sith the CTRTE
JINADASA GAN MAHSTIR
MUN SHRI PUNYA.
Published by DALSUKH MALVANIA Secretary, PRAKRIT TEXT SOCIETY VARANASI-5 Price Rs. 10/- Available from: 1 MOTILAL BANARASIDASS, NEPALI KHAPRA, Post Box 75, VARANASI. 2 CHAUKHAMBA VIDYABHAVAN, CHAWK, VARANASI. 3 GURJAR GRANTHARATNA KARYALAYA, GANDHI ROAD, AHMEDABAD-1. 4 SARASWATI PUSTAK BHANDAR, RATAN POLE, HATHIKHANA, AHMEDABAD- 5 MUNSHI RAM MANOHARLAL, NAI SARAK, DELHI. Printed by :- JAYANTI DALAL Vasant P. Press Gheekanta, Ghela AHMEDABAD-1.
प्राकृतग्रन्यपरिषद् अन्याङ्क ९
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सिरिदेववारविन्द
नंदीसुत्तं
मिरिजिणदासगणिमहनारबिरयाप युपगीए मंजु
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मुनिपुण्यविजयः
जिनागमग ग्यदिनाचार्यश्रीनियर :...:.....:: ::-
प्रमदानीनमामा..... :: . . . . :-
शासनमा मानन्दमा :: ...
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भासन
भी
प्रकाशक:-
दलसुख मालणिया
सेक्रेटरी, प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी,
वाराणसी-५
मुद्रा
जयंति दलाल
वसंत प्रिन्टोग प्रेस
घीकाटा, घेलाभाई की।
अहमदायाद-१
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प्राकृतिग्रन्थपरिषद प्रन्या ९ ANS यामम्मरम्पर टमा माता का नावमा ममता प्रदानम्मनाकाम्यानपरमानन्यायका --- ਨਾਝੜu मिदिनाक सामंथता vah मंगगनग्निवननिगराविनियcिiANA मामाघमार माय परममामामयman: समापanमारमधमधामीपनरंच समागम्यननयमनन्यामागविनायपगपतिक सनामनामनका जानायकवादारमनवनाकारामना ਲੇਖ नामायान्यानकाकगकाम्नमानानानामा मार Aroयारम्भपाशमग्रmमम्म जसपनायाममाचारहावामामा" मानावंदनमधमयमयगंगा ममिवान्यपवमाना मकामामवमयादवजानावादातसम्मत The रा.प्रतमतमामाया समागमता दानन्यायअपनी Ram प्राम मान्नाम्फमियम गालामालवामाता समकातानाधर्ममाम न्धमाशायरताठा पायानामा रियलगायक गमावानर हम माया ਧਰgriਫ਼ਰ ਸਸਕੈਡਮੀ समयपश्यजिम्ममाना मयमापORis ਦਾ ਸਮਾਂ टाटा धन PE W 200ER LILLA NATIREMELLERS 'खं.' मंजक नन्दित्रमूलके साथ लिखी गई श्रीमलयगिरिविरचितनन्दिसूत्रट काकी प्रतिके प्रथम और अंतिम (२४७वे) पत्र की द्वितीय पृष्टि । सासरता sana Faisalaiदाजाजराजारापिटासादास्तववालय लामाजिटलक्षणासहानीयात संघडाया लिमिटाना गुण्डाहोलशासघरगलस्टिा चरिलयाना सवलवादयस्मतामासम्मतयार --- वियन मिशालामामायामाचपनालायपवार मायणमायावसाचारघमासमणाणाहाबणासाती। शाझियाक्षिावालानंदीसम्माधाविमाया 2. ' संजापतिके प्रथम और अतिम (८२वे) पत्रकी द्वितीय पृष्ट ।
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प्राकृतग्रन्थपरिपद ग्रन्धार ९ म. बाधिनसावादकासियगारिखमनायविसरवाचकितिदीवसमादसादियापयालावादमानियनीमिया HTोपनावोगाणदमागणाणादागिनभयसागरयारगंधालानिदरमियतविणएनिधकालमजETERTY मिया मागटिलवमांगलिसाधादयसनमागचायावासा सवासाप्राणवागरणकरण नंगिय कामपयरीपहाणारंगार सानिया जासमप्यमामुहीयायलयानबागायचवायगमाराकानामापाप्ययनःनिरकातकालियमयपधाराबलाARAN वीरवारमपरपाभिनागापयरधावियनरावजषयरातिगयनामबादरवदिलायरिणाचतानाहि वंशमियाक मतमादिशामविपरिधाममहानासानायमानधारदिनातवंदिामामिरमापालियायतणुगसारसारण्याचा निमवत परमवार स्वमामामालागायनिशामिप्रावधनचा विवायगणपानापरसुयायारानाराजगवायपवादावरकागगनविय का पाविमगरकादासरवाना नदियनरस्यियपदयाअग विमारपधाराव्यानरमपमाणबजविरसमायरामणियप्पarijarगागरिक पश्यदायकानालकलचेमनेरिकामा यहियो गाभिधाधनलपिनमायशिजवनयज्यिकारमासमmainRKAHTR५ नामगिभिनिसमापियनारयnिy चादरलोधाभावनाamalमस्चरकासममा घरकाणाहपनियाjusDASTयाण-पञ्चानमामिला : utpaaनियमसंजमविगाववत्तिमचरयागंसीलर याणागोजगप्पोमालकालनमामि पणमामिलरकणपत पाएपावयापाडिगमदिंपणिवseपिन नायनागवतकालियनयन्त्रणनगरधारानुपानिमामिरमानास्सपणा शिधिरावली मिलघणडेगवानगिरि asramawe गगतमासमामासयममगजविराजीवाटेगांगा नरिचानारामारामासतिविपन्नला। महा। जाणियायाणियादि राणाबाहेर माणपmsal म. ii नावविपन्नतजात्रानियोदियूनायनाउदिनाभागपावनाणकवजनासमाजविपनना है पक्षाकवाकरकंबासवितपबरकोपबरकविसन्ततीक्ष्यिपरकंवानादियुपवाकासकिदिएपञ्चकाइदियपधरकरचलिन गनती ताता लोदियपतालविपरघारिदियपरकररागिदियययस्कफासिदियपचरसहियपधरकीसिकितनी मजयनिता Ramमालती पागारियायकातलिस्पन्नातासादियागागागपजवनागपचरकालगायवरांसकिरोहिनाणपरका मानवियतानपश्यनारपसमियादातरवश्यायाबायतिरियावासा वागवामयामा HONE .arunil Rimittartinathti.FRNaine Ar:.:..::mmittains --- 3ftish-२ विna विमfairs RFALS NAI ME JA२ • Manor Micपयनसंजयसाहिडिपसगावश्वासघाममगगावातियमएरमाणपटना Pारतमालाविनलाईनममासमानदारतीयाinism माहियतराजागतिपातिरिक्ततानकमतांत्रास्त्राचारयापनाप तयारिमार Rasifनागनानिरिएंजायमस्वारवानाबादीवनमाध्यापनासमतीमंतासार मक नवाजपविदियागपवनगाणभागागएं नावजागतिपातिवामनाया विदतगावितिमिस्तरागारवनजागतियासतिकालकातार हान्नागपालमduinni तापतिनागंजागनियामवियतीतापागवावविश्वाशादियाममा विधानाबानामती तनावबागपासावासघनावसमागमनियामानाचतार MaitanyaनाsvaMITHपर्शिवतियपायsariमारा मागीमांकनमापक गगा बालविपन्नतामानवाकवलनका साचनाविधनासानामिनायलनाणेना-inay ...नविपनत्रपिट गमनयसाभिनवारजना पदावनमामिलनगर चवलनामांधा-यधरिमसनमाविमानस गिता उचालनामधिपापभाजनामा मानिसमाचलनामधार बामनिमममयन्यायालय काम ::Micialमिलनागाजविस्यवहाकवलनान iranरमविपासनका निविदा कारभदE:.:.. मिनिधागसिंचालिमinite:..:... inानमिवाचलना..itrit. ट "JP और तृतीय पत्र की द्वितीय पृष्टि (विशेष वर्णन के लिए सिंद, प्रस्तावना, पृ :)
प्रस्तावना ॥ जयन्तु वीतरागाः ।। वृर्णिसहित नन्दीसूत्रके संशोधनके लिये मूलसूत्रकी माठ और वर्णिको चार एवं सब मिलकर काम लिना मान खात्री गई हैं। इनमें से मूलसूत्रकी तीन और चूणोंकी एक. ये चार ताडपत्रीय प्रतियां है । इन मोका पनिक है- जे० प्रति-यह प्रति जेसलमेरके किलमें स्थित न्वन्तगीय युगप्रधान आचार्य भंडारकी नाइपत्रीय प्रति है । सूचीमें इस प्रनिका क्रमा; ७७ है। इनमें पत्र १ में २६ में नमी और :: २९.७ में श्रीमन्न्यगिरिलूरिकृत वृत्ति है । प्रतिकी लंबाई-चौडाई ३३||४२।। ई है। प्रतिस्त्र कमी कर चार या पांच पंक्तियों लिखी हैं। प्रति तीन विभागमें लिखी गई है। प्रनि चुबनम है। किसान गंगाधन खरतरगन्छीय आचार्य श्रीजिनभरिने स्वयं किया है । अन्क न्यानर आपने उन किमी. मिने हमारे मुद्रणमें तत्तत् स्थान पर दे दी है। प्रतिक्री लिपि मुन्दरतम है। अनसनी :::: ग्वस्ति । संवत् १४८८ वर्षे श्रीसत्यपुरे पौष बदि १० दिने श्रीमान श्रीजिनराजरिपट्टालंकारसारैः प्रभुश्रीमजिनमन्नियंत्रना पारित चनन श्रीश्रमानवाच्यमानं विनन्दन । २ २ डे० प्रति-~-यह प्रति अहमदावादके ढेला उपाश्रयके ज्ञानभंडारकी है। इसमें मलगगिरीया टीका भी पंचपाटरूपसे लिखित है । साथमें अनुज्ञानन्दी भी है । कागज पर लिखी हुई यह प्रति अनुमान सत्रहवीं सदी में लिखी मालूम होती है । ल० प्रति-यह प्रति अहमदाबाद लवारकी पोलके उपाशयके ज्ञानभंडारकी है। इसकी पत्र संख्या ३५ हैं । हरेक पत्रमें नव पंक्तियाँ हैं । हरेक पंक्तिमें ३१ से ४२ अक्षर लिखे हैं । प्रतिकी लिपि सुन्दरतम है। अक्षर मोटे हैं । कागज पर लिखी हुई इस प्रतिके अंतमें लेखककी पुष्पिका इस प्रकार है- नन्दी सम्मत्ता छ। सं. १४८५ वर्षे फाल्गुन सुदि ७ शनी श्रीभीमपल्लीय....[अक्षर बीगाड दिये हैं ] । श्रीः |||| शुभं भवतु ॥छ।। इस पुप्पिकामें जो अक्षर बिगाड दिये हैं उनके स्थानमें बहार इस प्रकार नये अक्षर लिखे हैं- साह श्रीवच्छासुत साह सहिसकस्य स्वपुण्यार्थं पुस्तकभंडारे कारापिता सुत वर्धमानपुस्तकपरिपालनार्थ ॥ छ । मो० प्रति-यह प्रति पाटन--श्रीहेमचंद्राचार्यजैनज्ञानमंदिरमें स्थित मोदी ज्ञानभंडारकी है। यह प्रति विक्रमकी सोलहवीं सदीमें लिखी हुई है। शु० प्रति--यह प्रति पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमंदिरमें स्थित शुभवीरजैनज्ञानभंडारकी है । प्रति प्रायः शुद्ध है । प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीके उत्तरार्द्धमें लिखी प्रतीत होती है । मु० प्रति--यह प्रति आगमोद्धारक श्रीसागरानन्दसूरिवरसम्पादित श्रीमलयगिरिकृतटीकायुक्त है। जो आपने आगम- वाचनाके समय सम्पादित की है । यह आवृत्ति वि. सं. १९७३में आगमोदयसमिति-सुरतकी ओरसे प्रकाशित हुई है । चूर्णीकी प्रतियाँ जे० प्रतियह प्रति जेसलमेर किलेमें स्थित श्रीजिनभद्रीय ताडपत्रीय जैन ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। इसका क्रमाङ्ग, ४१० है । इस क्रमांकमें तीन ग्रन्थ हैं-१. दशवकालिक अगस्त्यसिंहीया चूर्णी पत्र १८४ । २. नन्दीसूत्रचूर्णी पत्र १८५-२२३ । ३. अनुयोगद्वारसूत्रचूर्णी पत्र १२४-२७५ । इनमेंसे नन्दीचूर्णी और अनुयोगद्दारचूणी, ये दोनों चूर्णीयाँ किसी गीतार्थकी संशोधित हैं । प्रतिकी लंबाई-चौडाई २५४२॥ इंचकी है । प्रतिके अंतमें लेखनसंवत् या लेखककीपुष्पिका नहीं है । तथापि प्रतिका रंग-ढंग देखनेसे प्रतीत होता है कि-यह प्रति तेरहवीं सदीमें लिखित है । प्रति शुद्धप्राय है । आ० प्रति- —यह प्रति आगमोद्धारकजी श्रीसागरानन्दसूरिमहाराजसम्पादित मुद्रित प्रति है। जिसका प्रकाशन श्रीरुपमदेवजी केशरीमलजी श्वेताम्बरसंस्था-रतलामकी मोरसे हुआ है। पूज्यश्रीको इसकी कोई अच्छी प्रति न मीलनेके कारण यह बहुत अशुद्ध छपी है । फिर भी एक प्रत्यन्तरकी तोरसे हमारे संशोधनमें यह आवृत्ति काममें ही आई है। दा० प्रति-~-यह प्रति जिनागमज्ञ पूज्य श्रीविजयदानसूरिमहाराजससम्पादित मुद्रित प्रति है। जो भाई हीरालालके द्वारा प्रकाशित है । इसमें भी काफी अशुद्धियाँ हैं । तथापि पूज्य सागरानन्दसूरिम० की आवृत्तिको अपेक्षा यह कुछ अच्छी आवृत्ति है। चूर्णिके सम्पादन और संशोधन के समय पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमंदिर की एक प्रति और श्रीलालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामंदिरकी प्रतिको भी सामने रक्खी थी। ये दोनों प्रतियां क्रमशः सोलहवीं और सत्रहवीं सदीमें लिखी हुई प्रतियाँ है और अगुद्धिभरपूर प्रतियाँ हैं । तथापि शुद्ध पाठोंके निर्णयमें ये भी सहायक हुई है । इस पूणींके संशोधनमें हमारे लिये मुख्य आधारस्तम्भ जे० प्रति ही है, जो अतीव शुद्ध प्रति है । सूत्रप्रतियों की विशेषता सं० मा०, ये तीन प्रतियोका प्रतिलखनके बाद किसी विद्वानने संशोधन नहीं किया है। - -
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-- ---- टिप्पन, इन चारोंका समग्रभावसे उपयोग किया गया है, इतना ही नहीं, किन्तु जहाँ जहाँ नन्दीसूत्रके उद्धरण, व्याख्यान आदि आये हैं ऐसे द्वादशारनयचक्र, समवायाङ्गसूत्र एवं भगवती सूत्रकी अभयदेवीया वृत्ति, विशेषावश्यकमलधारीया वृत्ति, पाक्षिकसूत्रवृत्ति आदि अनेक शास्त्रोका उपयोग भी किया है, जिसकी प्रतीति इस सम्पादनकी पाद टिप्पणियोको देखनेसे होगी। नन्दीसूत्रकी चूर्णिके संशोधनके लिये मेरा आधारस्तम्भ जैसलमेरकी प्रति ही है। अगर यह प्रति प्राप्त न होती तो इसका जो गौरवपूर्ण सम्पादन हुआ है, वह शक्य न बनता । संस्कृत टीका निर्माणके बाद चूर्णियोंका अध्ययन कम हो जानेसे प्रायः आज ज्ञानभंडारोंमें जो जो आगमिक या आगमेतर शास्त्रोंके चूर्णिग्रन्थोंकी हस्तप्रतियां हैं, वे सभी अशुद्धि- भाण्डागारस्वरूप ही हो गई हैं। इतनी बात जरूर है कि-ज्यों ज्यो प्रति प्राचीन त्यों त्यों अशुद्धियाँ कम रहती हैं। किन्तु एक ही युगकी प्रतियों के लिये यह अनुभव हुआ है कि अगर वह प्रति प्राचीन प्रतिकी या मिल प्रदेशस्थित प्रतिकी नकल न हो कर, उसी युगकी या प्रदेशकी उत्तरोत्तर नकलकी नकल हो, तब तो उत्तरोत्तर अशुद्धियों की वृद्धि ही होती रही है, इतना ही नहीं पंक्तियाँकी पंक्तियां और सन्दर्भ के सन्दर्भ गायब हो गये हैं। अस्तु, मेरेको जैसलमेरकी प्रति मौली, यह मैं सिर्फ अपना ही नहीं, साथमें सव शास्त्रपाठी जैन गीतार्थ मुनिगण एवं विद्वानों का भी सौभाग्य समझता हूं । अनेक आगमोंकी चूर्णि, वृत्ति आदिके अवलोकनसे प्रतीत हुआ है कि अगर प्राचीन एवं अलग अलग कुलकी प्रतियाँ प्राप्त न हो तो मुद्रणादिमें प्रायः सैंकडों अशुद्धियाँ पाठपरावृत्तियाँ आदि रहनेका सम्भव रहता है, इतना ही नहीं सन्दर्भके सन्दर्भ छूट जाते हैं । विद्वान् संशोधकोंके ध्यानमें लानेके लिये मैं यहाँ एक बातको उद्धृत करता हूं. भनुयोगद्वारसूत्रकी चूर्णिका संशोधन मैंने पाटन-ज्ञानभंडारकी दो प्राचीन ताडपत्रीय हस्तप्रतियां और खंभातके श्रीशान्तिनाथ ज्ञानभंडारकी दो ताडपत्रीय प्रतियाँ, एवं चार प्रतियोंके आधारसे सुचारुतया कर लिया। कुछ शंकास्थान होने पर भी दिलमें विश्वास हो गया था कि-एकंदर संशोधन अच्छा हो गया है। किन्तु जव जैसलमेर जानेका मोका मिला, और वहाँके ज्ञानभंडारकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिसे तुलना की तो कितने ही शङ्कास्थान दूर हुए, इतना ही नहीं, परन्तु अलग अलग स्थानमें हो कर दश-बारह पंक्तियाँ जितना दूसरे कुलकी प्रतियोंमें छूट गया हुआ नया पाठ प्राप्त हुआ और अनेकानेक अशुद्धियाँ भी दूर हुई । यह प्राचीन प्राचीनतम एवं अलग अलग कुलकी प्रतियोंके उपयोगका साफल्य है। प्रसंगवश यहाँ यह कहना भी उचित है कि-इस नन्दीसूत्रचूर्णीक संशोधन एवं सम्पादनमें साद्यन्त उपयोगमें लाई गई प्रतियोंके अलावा दूसरी अनेक प्रतियाँ मैंने समय-समय पर देखी हैं, इससे ज्ञात हुआ है कि जैसलमेरकी प्रतिकी अपेक्षा इन प्रतियोंमें त द ध आदि वर्णकि प्रयोग विपुल प्रमाणमें नजर आये हैं । नन्दीसूत्रके प्रणेता नन्दीसूत्रकारने नन्दीसूत्रमें कहीं भी अपने नामका निर्देश नहीं किया है, किन्तु चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरने अपनी पूर्णिमें सूत्रकारका नाम निर्दिष्ट किया है, जो इस प्रकार है- एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेमु य दंसितेसु दूसगणिसीसो देववायगो साहुजण- हितढाए इणमाह" [पत्र १३] इस उल्लेसद्वारा चूर्णिकारने नन्दीसूत्रप्रणेता स्थविर श्रीदेववाचक हैं-ऐसा बतलाया है। आचार्य श्रीहरिभद्रसूरि एवं भाचार्य श्रीगलयगिरिगरिने भी इसी आशयका उल्लेख अपनी अपनी टीकामें किया है, किन्तु इनका मूल आधार चूर्णिकारका हम ही है। पुर्णिकारके उल्लेससे ही ज्ञात होता है कि-नन्दीसूत्रके प्रणेता नन्दिसूत्रस्थविरावलिगत अंतिमस्थविर श्रीदुष्यगणिके सिम शादेववाचक है। .
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द " ही हैं, और ऐसे प्राचीन उल्लेख पट्टावली आदिमें पाये भी जाते हैं; किन्तु भाप्य-चूर्णियोंके अवगाहन बाद ये दोनों मान्यताएं । गलत प्रतीत हुई हैं । यहाँ पर भाष्यकारोंका विचार अप्रस्तुत है, अतः सिर्फ यहीं पर जैन आगगांके उपर जो प्राचीन चूर्णियाँ उपलब्ध हैं उन्हीके विषयमें ही विचार किया जाता है । आज जैन आगमोके उपर जो चूर्णिनामक प्राकृतभाषाप्रधान व्याख्याग्रन्थ प्राप्त हैं उनके नाम क्रमश: ये हैं- १ आचासङ्गचूर्णि २ सूत्रकृताङ्गचूर्णि ३ भगवतीचूर्णि ४ जीवाभिगमचूर्णि ५ प्रज्ञापनासूत्रशारीरपदचूर्णि ६ जम्बूद्वीप- करणचूर्णि ७ दशाकल्पचूर्णि ८ कल्पचूर्णि ९ कल्पविशेपचूणि १० व्यवहारसूत्रचूर्णि ११ निशीथसूत्रविशेषचूणि १२ पञ्चकल्पचूर्णि १३ जीतकल्पवृहणि १४ आवश्यकचूर्णि १५ दशकालिकचूर्णि श्रीअगस्त्यसिंहकृता १६ कालिकचूर्णि वृद्धविवरणाख्या १७ उत्तराध्ययनचूर्णि १८ नन्दीसूत्रणि १९ अनुयोगद्वारचूर्णि २० पाक्षिकचूर्णि । उपर जिन वीस चूर्णियोंके नाम दिये हैं उनका और इनके प्रणेताओंके विषयमें विचार करने के पूर्व एतद्विपयक वृर्णि- ग्रन्थों के प्राप्त उल्लेखोंको मैं एकसाथ यहाँ उद्धृत कर देता हूँ, जो भविष्यमें विद्वानों के लिये कायमकी विचारसामग्री बनी रहे । (१) आचाराङ्गचूर्णी । अन्त:---- से हु निरालंबणमप्पतिद्वितो। शेपं तदेव ।। इति आचारचूर्णी परिसमाता | नमो सुयदेवयाए भगवईए ॥ ग्रन्थानम् ८३०० ।। (२) सूत्रकृताङ्गचूर्णी । अन्तः- सदहामि जध सूत्रेति गंतव्वं सव्वमिति ।। नमः सर्वविदे वीराय विगतमोहाय || समाप्त चेदं सूत्रकृताभिधं द्वितीयमङ्गमिति । भद्रं भवतु श्रीजिनशासनाय । सूगडांगचूर्णिः समासा || ग्रन्थानम् ९५०० ॥ (३) भगवतीचूर्णि- श्रीभगवतीचूर्णिः परिसमातेति ।। इप्ति भद्रं !! मुमदेवयं तु वंदे जीइ पसाएण सिक्खियं नाणं । विइयं पि वतव (बंभ)देवि पसलबाशि पगिवयामि ।। ग्रंथानं ६७०७ ॥श्री।। (४) जीवाभिगमणि- इस चूर्णीकी प्रति अद्यावधि ज्ञात किसी भंडारमें देखनेमें नहीं आई है। (५) प्रज्ञापनाशरीरपदचूणि । अन्तः- जमिह समयविरुद्ध वद्धं बुद्धिविकलेण हो जा हि । तं जिणवयणविहन्नू खमिऊगं मे पसोहिंतु ॥ १ ॥ ।। सरीरपदस्स चुग्गी जिणभदखमासमणकित्तिया समत्ता || अनुयोगद्वारचूर्णि पत्र ७४ ! याकिनीमहत्तरासूनु आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिकृत अनुयोगद्वारलघुवृत्ति पत्र ९९ में भी यही उल्लेख है । (६) जम्बूद्वीपकरणचूर्णि । अन्तः- एवं उयरिखमागरस तेरासियं पउंजियच्यं । विरुवेहवुड्ढीओ आगेयब्बाओ ॥ जंबुद्दीवपत्तिकरणाणं चुण्णी समत्ता । (७) दशाश्रुतस्कन्धचूर्णि । अन्तः- जाय णया वि । जाव करणओ-सचेसि पि णयाणं० गाधा || दशानां चूर्णी समाप्ता ।। (८) कल्पचूर्णी- आउयवना उ० गाहा ९९ । विश जहा यिसेसावरसगभासे । ' सामित्तं चैव पगडीणं को केवतियं बंधइ ! सवेइ वा केनियं को उ? ति जहा कम्मपगडीए । एतं पसंगेण गतं । -- --
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८ जिणभदखमासमणं निच्छियसुत्तथिदायगामलचरणं । तमहं वंदे पयओ परमं परगोवगारकारिणं महापं ॥ २ ॥ । जीतकल्पचूर्णिः समाता । सिद्धसेनकृतिरपा ॥ (१४) आवश्यकचूर्णी । अन्तः- करणनयो----सञ्चेसि पि नयाणं० गाधा ।। इति आवस्सगनिजुत्तिचुण्णी समाता । मंगलं महाश्रीः ।। (१५) दशकालिकसूत्रअगस्त्यसिंहचूर्णी । अन्तः-- एवमेत धम्मसमुक्कित्तगादिचरण-करणाणेगपरूवणागभं नेवाणगमणफलावसाणं भवियजणाणंदिकरं चुणि- समासवयणेण दसकालियं परिसमत्तं ॥ नमः ॥ वीरवरस्स भगवतो तित्ये कोडीगणे सुविपुलम्मि । गुणगणवइराभस्सा वैरसामिस्स साहाए ॥१॥ महरिसिसरिससभावा भावाऽभावाण मुणितपरमत्था । रिसिगुत्तखमासमणा खमा-समाणं निधी आसि ॥ २॥ तेसि सीसेण इमा कलसभवमइंदणामधेज्जेणं । दसकालियस्स चुण्णी पयाण रयणातो उवणत्था ॥ ३ ॥ रुयिरपद-संधिणियता छड्डियपुणरुत्तवित्थरपसंगा। वक्खाणमंतरेणावि सिस्समतिबोधणसमत्था ।। ४ ।। ससमय-परसमयणयाण जं थ ण समाधितं पमादेणं । तं खमह पसाहेह य इय विण्णत्ती पवयणीणं ॥५॥ ।। दसकालियचुण्णी परिसमत्ता ।। (१६) दशकालिकसूत्रचूणि वृद्धविवरणाख्या । अन्तः-- अझयणाणंतरं 'कालगओ समाधीए' जीवणकालो जस्स गतो समाहीए त्ति । जहा तेण एत्तिएण चेव ..... आराहगा भवंति त्ति ॥ दशवकालिकचूर्णी सम्मत्ता । ग्रन्थाग्रन्थ ७४०० ॥ (१७) उत्तराध्ययनचूर्णि । अन्त:-- वाणिजकुलसंभूतो कोडियगणितो य वजसाहीतो । गोवालियमहतरओ विक्खातो आसि लोगम्मि ॥ १ ॥ ससमय-परसमयविऊ ओयस्सी देहिमं सुगंभीरो । सीसगणसंपरिखुडो वक्वाणरतिप्पियो आसी ॥ २ ॥ तेसि सीसेण इमं उत्तरायणाण चुण्णिखंडं तु । रइयं अणुग्गहत्थं सीसाणं मंदबुद्धीणं ॥३॥ जं एत्थं उस्मुत्तं अयाणमाणेण विरतितं होजा । तं अणुओगधरा मे अणुचिंतेड समारेतु ॥ ४ ॥ !! पत्रिंशोत्तराध्ययनचूर्णी समाप्ता II ग्रन्थाग्रं प्रत्यक्षरगणनया ५८५० ॥ (१८) नन्दीसूत्रणि । अन्तः- णि रे ण ग म त ण ह स टा जि या (1) पसुपतिसंखगजट्टिताकुला । कमट्ठिता धीमतचिंतियक्खरा फुडं कहेयंतऽभिधाण कत्तुणो ॥१॥ शकराज्ञो पञ्चसु चर्पशतेषु व्यतिक्रान्तेषु अष्टनयतेषु नन्धध्ययनचूर्णी समाप्ता इति ॥ ग्रन्थाग्रम् १५०० ॥ (१९) अनुयोगहारसूत्रचूर्णि । अन्तः- चरणमेव गुणो चरणगुणो । अहवा चरणं चारित्रम् , गुणा खमादिया अणेगविधा, तेसु जो जहढिओ साधू सो सन्यायसम्मतो भवतीति ॥ ॥ निः श्रीश्वेताम्बराचार्यश्रीजिनदासगणिमहत्तरपूज्यपादानामनुयोगद्वाराणां चूर्णिः ।। १. इस चूत पर टिप्पन रचनेवाले श्रीश्री चंद्ररिजी प्रस्तुतचूर्णिका यहचूणिके नामसे उल्लेख करते हैं ।
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तवो दुविहो-~-झो अभंतरो य। जधा दसवेतालियचुण्णीए चाउलोदणंतं (? चालणेदाणत) अलोणं
णिज्जर साधूसु पडिवायणीयं ८ । [आवश्यकचूर्णी विभाग २ पत्र ११७]
आवश्यकचूर्णिके इस उद्धरणमें दशकालिकचूर्णीका नाम नजर आता है । दशवैकालिकसूत्रके उपर दो चूणीयां
आज प्राप्त हैं-~-एक स्थविर अगस्त्यसिंहप्रणीत और दूसरी जो आगमोद्धारक श्रीसागरानन्दसरि महाराजने रतलामकी श्री-
ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर संस्थाकी भोरसे सम्पादित की है, जिसके कर्ताक नामका पता नहीं मीला है और
निसके अनेक उद्धरण याकिनीमहत्तरापुत्र आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने अपनी दशवकालिकसूत्रकी शिष्यहितावृत्तिमं स्थान स्थान
पर वृद्धविवरणके नामसे दिये हैं। इन दो चूर्णियोंमेंसे आवश्यकचूर्णिकारको कौनसी चूर्णि अभिप्रेत है ?, यह एक कठिनसी
समस्या है। फिर भी आवश्यकचूर्णीके उपर उल्लिखित उद्धरणको गौरसे देखनेसे अपन निर्णयके समीप पहुंच सकते हैं । इस
उद्धरणमें "चाउलोदणंतं" यह पाठ गलत हो गया है । वास्तवमें "चाउलोदणंत" के स्थानमें मूलपाठ "चालणेदाणंतं" ऐसा
पाठ होगा । परन्तु मूलस्थानको विना देखे ऐसे पाठोंके मूल आशयका पता न चलने पर केवल शाब्दिक शुद्धि करके संख्या-
वन्ध पाठोंको विद्वानोंने गलत बनाने के संख्याबन्ध उदाहरण मेरे सामने हैं । दशवकालिकसूत्रकी प्राप्त दोनों चूर्णियोंको मैंने
बरावर देखी है, किन्तु “चाउलोदणंत"का कोई उल्लेख उनमें नहीं पाया है और इसका कोई सार्थक सम्बन्ध भी नहीं है । दश-
वैकालिकसूत्रकी अगस्त्यसिंहीया चूर्णिमें तपके निरूपणकी समाप्तिके बाद "चालणेदाणि" [पत्र १९] ऐसा चूर्णिकारने लिखा
है, जिसको आवश्यकचूर्णिकारने "चालणेदाणंत" वाक्यद्वारा सूचित किया है । इस पाठको बादके विद्वानोंने मूल स्थानस्थित
पाठको विना देखे गलत शाब्दिक सुधारा कर विगाड दिया-ऐसा निश्चितरूपसे प्रतीत होता है। अतः मैं इस निर्णय पर आया
हूं कि--आवश्यकचूर्णिकारनिर्दिष्ट दशवैकालिकचूर्णि अगस्त्यसिंहीया चूर्णी ही है। और इसी कारण अगस्त्यसिंहीया चूर्णी
आवश्यकचूर्णिके पूर्वकी रचना है।
आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने अपनी शिष्यहितावृत्तिमें इस चूर्णीका खास तौरसे निर्देश नहीं किया है। सिर्फ रइवका
सं० रतिवाक्या नामक दशवैकालिकसूत्रकी प्रथम चूलिकाकी व्याख्या [पत्र २७३-२] "अन्ये तु व्याचक्षते" ऐसा निर्देश करके
अगस्त्यसिंहीया चूर्णीका मतान्तर दिया है । इसके सिवा कहीं पर भी इस चूर्णिके नामका उल्लेख नहीं किया है।
इस अगस्त्यसिंहीया चूर्णिमें तत्कालवर्ती संख्याबन्ध वाचनान्तर-पाठभेद, अर्थभेद एवं सूत्रपाठोंकी कमी-वेशीका काफी
निर्देश है, जो अतिमहत्त्वके हैं।
यहाँ पर ध्यान देने जैसी एक बात यह है कि दोनों चूर्णिकारोंने अपनी चूर्णीमें दशवैकालिकसूत्र उपर एक प्राचीन
चूर्णी या वृत्तिका समान रूपसे उल्लेख रइवक्काचूलिका की चामें किया है । जो इस प्रकार है-
"पत्थ इमातो वृत्तिगतातो पदुद्देसमेत्तगाधाभो । जहा-
दुक्खं च दुस्समाए जीविउं जे १ लहुसगा पुणो कामा २ ।
सातिबहुला मणुस्सा ३ अचिरट्ठाणं चिमं दुक्खं ४ ॥ १ ॥
भोमजणम्मि य खिसा ५ वंतं च पुणो निसेवियं भवति ६ ।
महोवसंपया वि य ७ दुलभो धम्मो गिहे गिहिणो ८ ॥ २॥
निवयंति परिकिलेसा ९ वंधो ११ सावन जोग गिहिवासो १३ ।
एते निरिंग वि दोसा न होति अणगारवासम्मि १०-१२-१४ ॥ ३॥
साधारणा य भोगा १२ पत्तेयं पुण्ण-पावालमेव १६ ।
नीयमपि मानवागं कुमागजलचंचलमणिचं १७ ॥ ४ ॥
११ १ णत्थि य अवेदयित्ता मोक्खो कम्मरस निच्चओ एसो १८ । पदमट्ठारसमेतं वीरवयणसासणे भणितं ॥ ५॥" अगस्त्यसिंहीया चूर्णी दूसरी मुद्रित चूर्णीमें [पत्र ३५८] "एत्थ इमाओ वृत्तिगाधाओ । उक्तं च" ऐसा लिखकर उपर दी हुई गाथायें उद्धृत कर दी हैं। इन उल्लेखोंसे यह निर्विवाद है कि-दशवैकालिकसूत्र के उपर इन दो चूर्णियोंसे पूर्ववर्ती एक प्राचीन चूर्णी भी थी, जिसका दोनों चूर्णीकारोंने वृत्ति नामसे उल्लेख किया है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि-आगमोके उपर पद्य और गद्यमें व्याख्याग्रन्थ लिखनेकी प्रणालि अधिक पुराणी है । और इससे हिमवंतस्थविरावलीमें उल्लिखित निम्न उल्लेख सत्यके समीप पहुंचता है- "तेषामार्यसिंहानां स्थविराणां मधुमित्रा-ऽऽर्यस्कन्दिलाचार्यनामानौ द्वौ शिष्यावभूताम् । आर्यमधुमित्राणां शिष्या आर्यगन्धहस्तिनोऽतीवविद्वांसः प्रभावकाश्चाभवन् । तैश्च पूर्वधरस्थविरोत्तंसोमास्वातिवाचकरचित- तत्वार्थोपरि अशीतिसहस्रश्लोकप्रमाणं महाभाष्यं रचितम् । एकादशाङ्गोपरि चाऽऽयस्कन्दिलस्थविरा- णामुपरोधतस्तैर्विवरणानि रचितानि । यदुक्तं तद्रचिताऽऽचाराङ्गविवरणान्ते यथा- थेरस्स महुमित्तस्स सेहेहिं तिपुब्बनाणजुत्तेहिं । मुणिगणविवंदिएहिं ववगयरायाइदोसेहिं ॥ १ ॥ वंभदीवियसाहामउडेहिं गंधहत्विविव्हेहिं । विवरणमेयं रइयं दोसयवासेसु विक्रमओ ॥ २ ॥ आचाराङ्गसूत्रके इस गन्धहस्तिविवरणका उल्लेख आचार्य श्रीशीलाङ्कने अपनी आचाराङ्गवृत्तिके उपोद्घातमें भी किया है । कुछ भी हो, जैन आगमोंके उपर व्याख्या लिखनेकी प्रणाली अधिक प्राचीन है । ४. उत्तराध्यनसूत्रचूर्णिके प्रणेता कौटिकगणीय, वज्रशाखीय एवं वाणिजकुलीय स्थविर गोपालिक महत्तरके शिष्य थे । इस चूर्णिकारने चूर्णिमें अपने नामका निर्देश नहीं किया है। इनका निश्चित समयका पता लगाना मुश्किल है । तथापि इस चूर्णिमें विशेषावश्यकभाष्यकी स्वोपज्ञ टीकाका सन्दर्भ उल्लिखित होनेके कारण इसकी रचना जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके स्वर्गवासके बादकी है। विशेगावश्यक भाष्यको स्वोपन टीका, यह श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणको अन्तिम रचना | छटे गणधरवाद तक इस टीकाका निर्माण होने पर आपका देहान्त हो जानेके कारण वादके समग्र ग्रंथकी टीकाको श्रीकोट्टार्यवादी गणी महत्तरने पूर्ण की है। ५. जीतकल्पवृहचूर्णीके प्रणेता श्रीसिद्धसेनगगी हैं। इस चूर्णिके अन्तमें आपने सिर्फ अपने नागके अतिरिक्त और कोई उल्लेख नहीं किया है। श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणकृत ग्रन्थके उपर यह चूर्णी होने के कारण इसकी रचना श्रीजिनभद्रगगिके वादकी स्वयंसिद्ध है । इस चूर्णिको टिप्पनककार श्रीश्रीचन्द्रसरिने बृहर्णीनामसे दर्शाई है. नवा श्रीमन्महावीर परोपकृतिहेतवे । जीतकल्पवृष्टच्चूर्गाच्या काचिन् प्रकाश्यते !! १ ॥ उपरनिदिष्ट सान चूगीयोंके अतिरिक्त तेरह चूगीयों के रचयिताके नानका पना नहीं मिटता है । नचापि इन चीयाँक अवलोकनसे जो हकीकन ध्यानमें आई है इसका यहाँ उलख कर देता है। यद्यपि आचारायचूर्णी और नत्र कृताइचूकि रचयिताके नामका पता नहीं किया है तो भी आचाग मि पनि कारने पंद्रह स्थान पर नागार्जुनीय वाचनाका उल्लेख किया है. उनले सान यान पर "भदंतनाग लिया" प्रकार समानदर्शक भदन्त शब्दका प्रयोग किया है, इनसे अनुमान होता है कि ये वर्गिकार गाईनमालानीय को कि होने चाहिए। मूत्र ताइचूणाम नहां जहां नागार्जुनीय याचनाका उजेड कारने किया है वहां सामान्यतया -- १२ नागज्जुणिया इतना ही लिखा है । अतः ये दोनों चूर्णिकार अलग अन्ग ज्ञात होते हैं। नामि जिनमतगणी के विशेषावश्यकभाष्यकी गाथायें एवं स्वोपन टीकाके सन्दर्भ अनेक रथान पर उदृत किये गये हैं, इसरो इस यूणिकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके बादकी है; तब आचाराङ्गचूर्णीमें जिनभद्रगणिके कोई गन्धका उल्लेख नहीं है, इस कारण इस चूणांकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके पूर्वकी होनेका सम्भव अधिक है। भगवतीसूत्रचूर्णिमें श्रीजिनभद्रगणीके विशेषणवतीग्रन्थकी गाथागों के उदरण होनेसे, और कल्पनृगि साक्षात विसेसावस्सगभासका नाम उल्लिखित होनेसे इन दोनो चूर्णियोंकी रचना निश्रित रूपसे श्रीजिनभद्रगगी के बादकी है । दशासूत्रचूर्णीमें केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोगादिवादका निर्देश होनेसे यह चूर्णी भी श्रीजिनभद्रगणी के बादकी है। आवश्यकचूणिके प्रणेताका नाम चूणींकी कोई प्रतिमें प्राप्त नहीं है । श्रीसागरानन्दसरि महाराजने अपने सम्पादनमें इसको जिनदासगणिमहत्तरकृत वतलाई है। प्रतीत होता है कि-आपका यह निर्देश श्रीधर्मसागरोपाध्यायात तपागच्छीय पट्टावलीके उल्लेखको देख कर है, किन्तु वास्तवमें यह सत्य नहीं है। अगर इसके प्रणेता जिनदासगणि होते तो आप इस प्रासादभूत महती चूर्णिमें जिनभद्र गणिके नामका या विशेषावश्यकभाष्यकी गाथाओंका जरूर उल्लेख करते । मुझे तो यही प्रतीत होता है कि इस चूर्णीकी रचना जिनभद्रगणिके पूर्वकी और नन्दीसूत्ररचनाके बादकी है । दशवैकालिकचूर्णी (वृद्धविवरण)में और व्यवहारचूर्णीमें श्रीजिनभद्रगणिकी कोई कृतिका उद्धरण नहीं है, अतः ये चूणीयां भी जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके पूर्वको होनी चाहिए । जम्बूद्वीपकरणचूर्णी, यह जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिकी चूर्णी मानी जाती है, किन्तु वास्तवमें यह जम्बूद्वीपके परिधि-जीवा- धनुःपृष्ठ आदि आठ प्रकारके गणितको स्पष्ट करनेवाले किसी प्रकरणको चूर्णी है। वर्तमान इस चूमि मूल प्रकरणको गाथाओं के प्रतिक मात्र चूर्णिकारने दिये हैं, अतः कुछ गाथाओंका पता जिनभद्रीय वृहत्क्षेत्रसमासप्रकरणसे लगा है, किन्तु कितनीक गाथाओंका पता नहीं चला है। इस चूमें जिनभद्रीय बृहत्क्षेत्रसमासकी गाथायें भी उद्धृत नजर आती हैं, अतः यह चूर्णी उनके बादकी है। यहां पर चूर्णियों के विविध उल्लेखोंको लक्ष्यमें रख कर चूर्णिकारोके विषयमें जो कुछ निवेदन करनेका था, वह करनेके बाद अंतमें यह लिखना प्राप्त है कि-प्रकाश्यमान इस नन्दीसूत्रचूणीके प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्तर हैं, जिसका रचनासमय रपष्टतया प्राप्त नहीं है, फिर भी आज नन्दीसूत्रचूर्णाकी जो प्रतियाँ प्राप्त हैं उनके अन्तमें संवतका उल्लेख नजर आता है, जो चूणीरचनाका संवत् होनेकी संभावना अधिक है । यह उल्लेख इस प्रकार है- शकरः पञ्चमु वर्षशतेषु व्यतिक्रान्तेपु अष्टनवतेपु नन्द्यध्ययनचूणां समाता इति । अर्थात् शाके ५९८ (वि. सं. ७३३) वर्षमें नन्यध्ययनचूर्णी समाप्त हुई। इस उल्लेखको कितनेक विद्वान् प्रतिका समानसमय मानते हैं, किन्तु यह उल्लेख नन्यध्ययनचूर्णिकी समातिका अर्थात् रचनासमाप्तिका ही निर्देश करता है, लेखनकालका नहीं। अगर प्रतिका लेवनकाल होता तो 'समाप्ता' ऐसा न लिख कर लिखिता' ऐसा ही लिखा होता । इस प्रकार गयसन्दर्भ में रखनासंवत् लिम्बनेकी प्रथा प्राचीन युगमें थी ही, जिसका उदाहरण आचार्य श्रीशीलायकी आचारावृत्तिमें प्राप्त है । १. “पौवोरात् १०५५ वि. ५८५ वर्षे याकिनीसूनुः श्रीहरिभद्रप्रिः स्वर्गभान् । निशीथ-वृहत्कल्पभाष्या-ऽऽवश्यकादि- एणिकाराः श्रोजिनदासमहत्तरादयः पूर्वगतथुतघरश्रीप्रद्युम्नक्षमणादिशिभ्यत्वेन श्रीहरिभद्रसूरितः प्राचीना एव यथा कालभाचिनो पोध्याः । १११५ श्रोजिनभद्रगणियुगप्रधानः । मेरी पु. ११, पृ. २५३ ॥ अयं च जिनमदीयम्यानशतककाराद् भिन्नः सम्भाव्यते।' इपियन १३ ? सूत्र और चूणिकी भाषा नन्दीसूत्र और इसकी चूर्णिकी भाषा का स्वरूप क्या है ? इस विषयमें अभी यहाँ पर अधिक कुछ मैं नहीं लिखता हूं। सामान्यतया व्यापकरूपसे मेरेको इस विषयमें जो कुछ कहना था, यह मैंने अखिलभारतीयप्राच्यविद्यापरिपत्-श्रीनगरके लिये तैयार किये हुए मेरे "जैन आगमधर और प्राकृत वाङ्मय" नामक निबन्धमें कह दिया है, जो ' श्रीहजारीमल स्मृतिग्रन्थ में प्रसिद्ध किया गया है, उसको देखनेकी विद्वानोंको मूचना है। परिशिष्टादि चूर्णिके अन्तमें पांच परिशिष्ट और शुद्धिपत्र दिये गये हैं। पहले परिशिष्टमें मूल नन्दीसूत्रमें जो गाथायें हैं उनको अकारादिक्रममें दी गई हैं। दूसरे परिशिष्टमें नन्दीचूर्णिमें चूर्णिकारने उद्धृत किये उद्धरणोंको अकारादिक्रमसे दिये हैं। तीसरा परिशिष्ट चूर्णिगत पाठान्तर और मतान्तरोंका है। चौथे परिशिष्टमें नन्दीसूत्र और चूर्णिमें आनेवाले ग्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर, नृप, श्रेष्ठी, नगर, पर्वत आदि विशेषनामोंका अनुक्रम है । पांचवे परिशिष्टमें सूत्र और चूर्णिमें आनेवाले विषयद्योतक एवं व्युत्पत्ति- योतक शब्दोंका अनुक्रम दिया गया है । इन परिशिष्टोंके बादमें शुद्धिपत्रक दिया गया है । वाचक और अध्येता विद्वानोंसे नम्र निवेदन हैं कि इस ग्रन्धको शुद्धिपत्रके अनुसार शुद्ध करके पढ़ें । संशोधन और सम्पादन इस ग्रन्थके संशोधनमें अनेक महानुभाव विद्वान् व्यक्तियोंका परिश्रम है । खास तोरसे पं. भाई अमृतलाल मोहनलाल भोजकका इस सम्पादनमें महत्त्वका साहाय्य है। जिसने चूर्णि और मूल सूत्रकी प्रामाणिक प्राण्डुलिपि (प्रेसकॉपी) तैयार की है, साद्यन्त प्रुफपत्र देखे हैं और इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी किये हैं। भाई श्री दलसुखभाई मालवणिया-मुख्यनियामक ला. द. भारतीय संस्कृतिविद्यामंदिर-अहमदाबाद तथा पंडित बेचरदासभाई दोसीने मुद्रगके बादमें सायन्त देखकर अशुद्धियोंका परिमार्जन किया है, जिसके फलस्वरूप शुद्धिपत्र दिया है। भाई श्रीदलसुख मालवणिया का आगमोंके संशोधनमें शाश्वत साहाय्य प्राप्त है, यह परम सौभाग्यकी बात है। वसंत प्रिन्टींग प्रेसके संचालक श्री जयंति दलाल और मेनेजर श्री शांतिलाल शाह प्रमुख प्रेसके सर्व भाईओंका प्रस्तुत मुद्रणकार्यमें आंतरिक सहयोग भी हमारे लिए चिरस्मरणीय है । चूर्णिमहित नन्दीसूत्रके संशोधनमें मात्र ग्रन्थकी प्रतियोंका ही आधार रखा गया है, पसा नहीं है, किन्तु मूलसूत्र एवं चूर्णिके उद्धरण प्राचीन व्याख्याग्रन्थों में जहाँ जहाँ भी देखने में आये उनसे भी तुलना की गई है । इस प्रकार प्राचीन प्रतियों, प्राचीन उद्धरणोंके साथ तुलना एवं अनेक विद्वानोके बौद्धिक परिश्रमके द्वारा इस नन्दीमूत्र एवं चूर्णिका संशोधन और सम्पादन किया गया है । मैं तो सिर्फ इस संशोधन एवं सम्पादनमें साक्षीभून ही रहा है। अतः इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण संशोधन एवं सम्पादन का यश हम सभीको एकसमान है। भन्तमें गीतार्थ मुनिप्रवर एवं विद्वानोंसे मेरी नम्र प्रार्थना है कि मेरे इस संशोधनमें जो भी छोटी मोटी अनि प्रतीत हो, इसकी मुझे सूचना दी जायगी तो जरूर अतिरिक्त शुद्धिपत्रकी तोरसे उसको आदर दिया जायगा । . सं. २०२२ माघ शुक्ल पूर्णिमा मदनदावाद मुनि पुष्यविजय का चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम सूत्र ९ १ २ २ ३ 1 विषय पृष्ठ चूर्णिकारका उपक्रम-प्रारम्भ १ गाथा १३ मङ्गलसूत्र--गाथा महावीरपरमात्माकी स्तुति गाया ४-१७ सबस्तुतिसूत्र-श्रीसंघकी रथ, चक्र, नगर, पद्म, चन्द्र, सूर्य, समुद्र और मन्दरगिरिके रूपको द्वारा स्तुति गाथा१८-१९ जिनावलीसूत्र- चोवीस जिनोंको नमस्कार ६ गाथा २०-२१ गणधरावलीसूत्र- भगवान् महावीरके ११ गणधरोंकी स्तुति गाथा २२-४२ स्थविरावलीसूत्र-- भ्रतस्थविरोंकी स्तुति ७-१२ गा. २२ सुधर्मा, जम्बूस्वामि, प्रभवस्वामि, शय्यम्भव, गा. २३ यशोभद्र, सम्भूतार्य, भद्रयाहु, स्थूलभद्र, गा. २४ महागिरि, सुहस्ती, बहुल, गा. २५ स्वाति, श्यामार्य, शाण्डिल्य, जीवधर, गा. २६ आर्यसमुद्र, गा. २७ आर्यमा, गा. २८ आर्यनन्दिल, गा. २९ वाचक आर्यनागहस्ती, गा. ३० रेवतिनक्षत्र वाचक, गा. ३१ सिंहवाचक, गा. ३२ स्कन्दिलाचाय, ३३ हिमवन्त गा. ३४-३५ नागार्जुन वाचक, गा. ३६-३८ भूतदिनाचार्य, गा. ३९ लोहित्य, १०-४१ दुप्यगणि, गा. ४२ सामान्यरूपले सर्व स्थविरोकी स्तुति गा. ४३ पर्पत्स्त्र-श्रुतज्ञानके-शास्त्रके अधिकारि-अनधिकारी शिष्यों की परीक्षाके लिये शलपन, पुट, चालनी, परिपूणक, हंग आदिके लाक्षणिक उदाहरण और सायद् अशपर्षद् एवं दुर्षिदग्यात् १२ शानसा-पांच मानके नाम मन्यादि पांच ज्ञान की व्युत्पत्ति, क्रम आदिका निस्सा सूत्र विषय प्रत्यक्षशान के इन्द्रियप्रत्यक्ष नोइन्द्रियप्रत्यक्ष दो भेद १० इन्द्रियप्रत्यक्षके पांच भेद ११ नोइन्द्रियप्रत्यक्षके तीन भेद १५ १२ अवधिप्रत्यक्षके दो मेद-क्षायोपशमिक और भवप्रत्ययिक १५ १३ क्षायोपशमिक तथा गुणप्रत्ययिक अवधि- ज्ञानका स्वरूप अवधिज्ञानके आनुगामिकादि छ मेद १५-२१ १ आनुगागिक अवधिज्ञानका स्वरूप, उसके अन्तगत और मध्यगत मेद तथा पुरतो अन्तगत, मागतो अन्तगत, पार्श्वतो:अन्त- गतादि प्रभेदों का स्वरूप,उन में प्रतिविशेष आदिका निरूपण २२ २ अनानुगामिक भवधिज्ञान ३ वर्धमानक अवधिज्ञान, गाथा ४४-४५ अवधिज्ञानका जघन्य और उत्कृष्ट अवधि- क्षेत्र, गा. ४६-४९ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावकी अपेक्षासे अवधिज्ञानकी वृद्धिका स्वरूप, गा ५. द्रव्य-क्षेत्र काल-भावका पारस्परिक वृद्धिका स्वरूप गा. ५१ क्षेत्र-कालकी सूक्ष्मताका निरूपण १७-१८ ४ हीयमान अवधिज्ञान २५ ५ प्रतिपाति अवधिज्ञान १९ ६ अप्रतिपाति अवधिज्ञान २७ द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री अवधिज्ञानका स्वरूप २८ गा. ५२ अवधिज्ञानका उपसंहार २९ मनापर्यवशानका अधिकारी मनःपयवशानके पाजमति विपुलमति दो मेद २२ ३१-३२ द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री माजुमति- विपुलमतिमनःपर्यवज्ञानका स्वरूप और गा. ५३ मनःपर्यघशानका उपसंहार चूर्णिमें-- अष्ट रुचकप्रदेश और उप- रिम-अधस्तन क्षमकप्रतरका स्वरूप गा. *** २. ८ २३ मायादित नौका यक्ष परोक्ष रूप विभाजन चूणियुक्त नन्दीसूत्रका विपयानुक्रम १५ सून ३ , ४४ ११ विषय पृष्ठ केवलज्ञानके भवस्थ और सिद्धकेवलज्ञान दो भेद ३४-३६ भवस्थकेवलज्ञानके भेद और स्वरूप २५ सिद्धकेवलज्ञानके अनन्तरसिद्ध परम्परसिद्ध दो मेद अनन्तरसिद्धके तीर्थसिद्ध, अतीसिद्ध आदि पंद्रह भेद चूर्णिमें-पद्रह भेदोंका विस्तृत स्वरूप परम्परसिद्धकेवलज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आधी केवलज्ञानका स्वरूप २८ चूर्णिमें केवलज्ञान केवलदशनविषयक युग- पदुपयोग-एकोपयोग-क्रमोपयोगवादको चर्चा २८-३० गा. ५४-५५ केवलज्ञानका उपसंहार ३० परोक्षनानके आभिनियोधिक श्रुतज्ञान दो मेद ३१ आभिनिबोधिकज्ञान और श्रुतज्ञानकी सदैव सहभाविता ३१ चूर्णिमें-मतिज्ञान और ध्रुतज्ञानका पृथकरण मतिज्ञान और मतिअज्ञान तथा ध्रुतज्ञान और श्रुतअज्ञानका तात्तिक विवेक आभिनियोधिक ज्ञानके श्रुतनिश्रित अश्रुत- निश्रित दो भेद ३२ अश्रुतनिश्रित आभिनियाधिकज्ञानके भेद, स्वरूप और उदाहरण गा. ५६ अश्रुतनिश्रित आभिनियोधिकके औत्पत्तिकी आदि चार भेद गा. ५७-६० औत्पत्तिको मतिका स्वरूप और उदाहरण गा. ६१-६३ बनयिकी मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा.६१-६५ कमजा मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा. पारिणामिक, मतिका स्वरूप और उदाहरण श्रुतनिधित मतिज्ञान के. अत्रग्रह, ईहा आदि चार भेद अपग्रह के अर्धावप्रद व्यसनावग्रह दो भेद यजनावग्रहके नेद और स्वस्त ३५ भावप्रदके मेद और एकाथिक दान्द बाके मेद और एकाधिक राम सूत्र विपय पृष्ठ अपायके भेद और एकाथिक शब्द ३५ धारणाके भेद और एकाधिक शब्द ५४ ५६ २८ प्रकारके मतिज्ञानका और व्यञ्जनाव- ग्रहका प्रतिबोधक और मल्लक दृष्टान्त द्वारा स्वरूपनिरूपण द्रव्यक्षेत्र काल भाव आधी आभिनियोधिक ज्ञानका स्वरूप ४२ ५८ गा. ७०-७५ आभिनिवोधिक ज्ञानके मेद, अर्थ, कालमान, शब्दश्रवणका स्वरूप, एकाधिक शब्द और उपसंहार ४३ श्रुतज्ञानके चौदह मेद ६०-६३ १ अक्षरश्रुतके संज्ञाक्षर, व्यअनाक्षर और लध्यक्षर, तीन मेद और स्वरूप ४५ २ गा. ७६ अनक्षरश्रुत ६५-६८ ३ संनिश्रुनके कालिक्युपदेश, हेतूपदेश और दृष्टिवादोपदेश तीन प्रकार, स्वरूर और ४ असंनिश्रुत ४५-४७ चूर्णिमें-ईहा, अपोह, मागंणा, गवेषणा, चिन्ता, विमर्श इन शब्दों के अर्थका स्पष्टीकरण ५ सम्यक्धुत-द्वादशाहो के नाम : मिथ्याभूत-भारत, रामायग मी मासु- मवत्र आदि प्राचीन अनेक जेनेतर शालों के मुन्यध्रुत-मिथ्याश्रुतका तात्विक विवेक ७१-७३ ७-८ नादि-अनादि ९-१० गपर्पयामिन अश्ययमित भूनशान, और उनका क्षेत्र वाल माय आधी दान ७१-७५ पनामाक्षरका निहार और गिट- पाहत दाम भी अपको अक्षरके अन. न्समें भाग जिनने पानमसायनिक गद्रार १२ चूर्णिमें- अक्षरपटल का विग्न निम्मा ५२-५६ ५६-१२ गमिक अनमित अवमान १३-१४ दिट और args मदत. आवाया और आदला- दतिरित. दो प्रकार १५ नाम खासदायरधुतो कलिक और उन्दर दो प्रकार १६ १ चूर्णियुक्त नन्दीसूनका विषयानुक्रम पुष्प ८१ . ६० ८१ ६१ ८७ सूत्र विषय पृप उत्कालिकश्रुत के २९ नाम चूर्णिमें-- २९ उत्कालिक£तके नामोंका व्युत्पत्त्यर्थविवरण कालिकश्रुतके २९ नाम ५८ चूर्णिमें--कालिक श्रुतके नामोंका व्युत्प- त्यर्थविवरण | टिप्पणी में नामोंकी कगी- वेशीका निर्देश ८३ आवश्यकव्यतिरिक्तश्रुतका उपसंहार अङ्गप्रविष्टश्रुतके १२ नाम १ आचारामसूत्रका स्वरूप ८६ २ सूनकृतामसूत्रका स्वरूप ६२ ३ स्थानाजस्त्रका स्वरूप ४ समवायानसूनका स्वरूप ५ विवाहप्रज्ञप्तिअगसूत्रका स्वरूप ६५ ६ ज्ञाताधर्मकथासूत्रका स्वरूप ९१ ७ उपासकदशामसूत्रका स्वरूप ८ अन्तकृद्दशामसूत्रका स्वरूप ९ अनुत्तरोपपातिकदशाङ्गसूत्रका स्वरूप १० प्रनव्याकरणदशासूचका स्वरूप ११ विपाकसूत्रके दुःखविपाक सुखविपाक दो प्रकार, उनका वर्णन और स्वरूप १२ दृष्टिवाद अंगके पांच मेद ७१ ९७-१०५ परिकमष्टिवादके सात प्रकार और इनके भेद ७१ सुनदृष्टिवादके २२ प्रकार १०७ पूर्वगतदृष्टियाद-चौदह पूर्व ८८ निपग १०८-१० अनुगोगद सिायके मूलप्रमानुगोग और गदिनानुगोग को प्रकार तथा इनका स्वरूप चूर्णिमें--सिण्डिकाका गणन १११ चूलिका दलिाद ११२-१३ दृष्टिवारका परिमाण और निषग द्वादशातीके वराधकों को हानि ११५ द्वादशातीके आराधकों को लाभ ८१ ११६ द्वादशाजीकी शावतिकता द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री श्रुतज्ञानका स्वरूप ८२ ११८ गा. ८१ श्रुतज्ञानके चौदहमेद, गा. ८२ श्रुतज्ञानका लाभ, गा, ८३ बुद्धिके आठ गुण, गा. ८४ सूत्रार्थश्रवणविधि, गा. ८५ सूत्रव्याख्यानविधि और उपसंहार-नन्दी- सूत्रकी समाप्ति ८२ प्रथम परिशिष्ट- नन्दीसूत्रगत गाथाओंका अकारादिक्रम द्वितीय परिशिष्ट- नन्दीचूर्णिगत उद्ध- रणोंका अकारादिक्रम तृतीय परिशिष्ट- नन्दीचूर्णीगत पाठान्तर और मतान्तरीका निर्देश चतुर्थ परिशिg- नन्दीसूत्र और चूर्णिगत ग्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर. नृप, श्रेष्ठी, नगर आदि के विशेपनामोंका अकारादिक्रम पञ्चम परिशिष्ट- नन्दीसूत्र और चूर्णिगत विपयविभाग और व्युत्पत्तिदर्शक शब्दोंका अकारादिकम ८५ ८७ ९५ ८८ . .
। -- . प्रातan HIDISAमोतीनगगायामहतधनादाणमेलाधिकारणदिनिधनगंदाणादानंदनिवारणागन्निनंदानदीपमोदादरिमोमदाप्यापित्यधीनसयवविधोगिारमावागाय मातामहवाणामावणदीनानागाननगददाताणगनवियसरीस्वनिशिताशानसवित्रयासंघावाश्मानमा छदामहलोकदवा मल्लरिजरुकासालाकादलानिलिमासे |मा गानामग्योयबाग्ममोवानादादिमद्दोपहननामामदवाइसंवक्षिणागपश्चंगानिलयात सामाणमहर्मननातवममतारनेवियोवसमणमा inमंगलंपयुठातितिरमयमंगलहावसानमायरोधाविष्णय मान्नमयागारवाणायचा अविचयसंगाणगय मुययादरिमाणमधेरावलियंकदेशातानासमध्यतिराम मुलायमानानियकरयानावामाताaapसायगादगर्वितगायपगतोगनमोकारंकारनामविजयनिगाथासतिदियादिविसयकसायपरासदोवसरावधातिकमा गारंवानवाक्षिागायतामसवाड़यनिविततितितिरिवानावामितजीवासिताlamसनियक्तिमातमंदादिया क्रासीलरकवितावाविधिदएका १११११११११११), दिनाmवियाग गदवानादिकमेदितागणीवशातनदा मातितिविसिहोताणणावियाणागायदयानगगादाणानाधमाधम्मागासयोगालगदपासी निमछलीवगगगासालिनिवासीनमनिहागासदायगपति। शिवावधामसागतिविधियाणगाप्राननववनासवलासमातिासह नामवाकाणानिनिरत्याक्तिनानायसनितिगतिसबमलिलोगोतमात मानवाशाप्रकाघोजगावाटणाविशाम्रामितिमवीवीताछोनिश्यिमण्यम देवामुगरिसागसम्मारिकाशातावातासनकायशिवायुसक्याना aanरायमाश्विश्दर्शितनामाझगासनानणयाणंदकाशीतगोगादासव्याता मानिसमागणावावायामाबदेमकारणानाजानामपितामनागाima रियानयना परिपत्रवाणग्द्यावयनिविससातामधमाकघणनामायादेकारी) लासिमानानवमतानिननववाननक्षितावादाकदावितिनतिजामतानयागाहियरितविद्यारकशमितगणधशाकदंग्यानामागावयणकायविकता नमानसिकांनातंगागदोमवतियाननवाननमणीय समाहतादमितालवानिजगहनिमगासनमानसिंबंध कादंवाडोरप्पागापरवायावतारदिएपरिचयति मोवानगवंचानावियरीमदोवसणादिमुयाविद्यमाणावामाननबंधनायवियोनाणविसमवेनिशानागवामाननवधाननसब सामगसदभन्नादिसिनामवनिति नामदोairaiविपितामदासायनगाववमानांशितामहोकियालासघससाणादिमादिनरकामाधाम्मापितारस्कानानानासगधामयितापवसंघसनाणातगएिता गालियाननवताननधामा उन्नादिपुरिमाातान्ननतिगादानदायातरेइमंतिणनसतोसततियवसातविमोयधम्मालगवायाणानामगनामदावा रातिण मागसपनासबन्द्राणाविकमानायसायमधाराशियामनिलानणतिवामदाद्रिणाणेवापुरिमझिमचलणाणंझकसरफेवकरणमविक्रमासानिडियदमा • - Haaunpurmagazaarahmingकातरिनादानियोनासारखद्यायनवंतिनानिमायामानक्यानणाानिमुक्ट्रिासादात्मयावविक्षनछोए FFEnामीनदारकालानामिनावनिमत्रावविवानिारकालयनिकतावकेशवाधिकालनावमणानविवादलसनाविद्याशिवमदिवतापवणाताव तीनागिनतमोनियमालामानवाशिकायनियमानावेवमासयंजाबनवतातिसमयावलिममुकप्तादिनाक्षिशिवकालमासयनणातादेवावाय गादिपराकायनानियोगमायागंगाyिiपियरगमदेवताकयतणावादितावायनामापायावायामानामारावदियममुरवतामयणाताववा मm:Taginatimemaeaaraनियमाणिवाशासाशवनायविनाशातायातयाणात वादियागावयाचोदकामासाशवदज्वालसंगंधुको PATARATiloinावादsapanावादिष्णानशामिंवयांसवंग्राणानदेवगताकदिवदिष्टानागमोइवालमंगमावदिएकवितवम्मामाधाका Sriesmanामानन्यादिकांद्यायानगंगमनेमविदद्यादिक्ष यानावरायणाणाकवलातपातल्दिवानाणसयपाणाययणारगरगावानासन्नविष्सना शासदारलाfamisfafarnोयानालालदिहागविमरमा। दिमागासणवापागारमातिदशणवादिहीलरकाशयाणवणाएयतणिताच्यणाणपसा maramगादापातापामगाणीतमादमपाण्यामागा) नयामायत्तयणामतिविससानासाणियचीएवीवनकालतादमुदिनानिहायतणा mzmनापति गाकरगामानामविषयतनावपावागावं अायादिएणधरागमणीतम्मानयवसामितीवातावदालिकालाणनावातावल KarunaTrinitणालयगयनावत्यापरिवदिगिदधानादि दीशिवआगमगादाभातग्रस्तादिगमणानुनसशााणियममममधाणामाविदी मागमायामानामवविभटवाविवरीयामाप्रयोगधराकमासमानियवाणिारागामामदासदासदानिानापमयतासंवासामहिताकल HDFRIMinातरसनादनमतिधालगागागासगावागतवर्षशारातिकोनियमवनवतियुनंद्यधायननाणीममाझाच्या यशापयशाचा -~ ૧.૨ ..... में समाचार शान मन्दिर (पाटन) की गति Thr प्राकृतग्रन्थपरिपद ग्रन्थाङ्क ९ . एनिमायापंचयराष्टिछाजयश्जगजीवाजाणीवयातजाम्नागाणादाज नंदीस्त्र राताादाजगबंधुनयनापियामादातयवाजियश्सयागोयतावातिबयराणेश्यालमा डायशजटाश्यशालागाणजयाप्यामहावार॥श्तदेसवजयाद्यायासतदेब्रिाणवा रसातसुरासुरतसियशत अयस्यमाश्यगणनवायरयासार टादेमणाविसहरवागासंघन रसदातारकंडचरितयागासिंनसतव वेबारयतामासस्यतयारियल माणविरकस जनादानस्यासंघवक भासदेसालाडार लिटासातवनियामबरिटाबानशासघरस्तावसझायम्सनेदि छासमाप्टकतारटानालादविणिययावयाराणादादतालयासमवयघिरकनिटामाय मलालाबशनपसनदरियारिवडम्बनिणरातयबुदसावयनमाता VARA मा ३२ ५.० १.१. समसालाई वसावातण्डहसाउवाद्यनाराक्वाश्यदसाउँबाएदाम शिवारावाहिहायशासवधयायचावदिसवाणुटारोवारमाजाणिद्यास सत्तावामाकिसणुहानामामाकवश्कालंपवतियाणुमा आदिकरता लिटालमसाला अणुशासिमपाशामणामयाणासपा :: सालावायदा पातसयादियामायणायाममा सादर Maरधितिकरणाववजावहाया EMAMALशालानालापोदासम्मतालासंगपवायफाय मालावतंतववा॥8॥ उसका डावातवमानतकति . ३१ . ) पत्रकी द्वितीय पृष्टि।
॥ णमो त्यु णं समणस्स भगवओ महइ-महावीर-चद्धमाणसामिस्स ॥ णमो अणुओगधराणं थेराणं । सिरिदेववायगविरड्यं नंदीसुत्तं । सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुप्णीए संजुयं । ॥ नमो भगवते वर्द्धमानाय ॥ सचमुतबंधगादीणं मंगलाधिकारे णंदि त्ति वत्तव्वा । णंदणं णंदी, गंदति वा अणयेति गंदी, गंदंति वा गंदी, पमोदो हरिसो कंदप्पो इत्यर्थः । तस्स य चतुविहो निक्खेवो । गतासु णाम-वणासु दन्नणंदी जाणगो अणुवउत्तो । अहवा जाणग-भवियसरीरवतिरित्तो वारसविधो तूरसंघातो इमो- भंमा १ मकुंद २ मद्दल ३ कडंब ४ झल्लरि ५ हुडुक्क ६ कंसाला ७ । काहल ८ तलिमा ९ बंसो १० पणवो ११ संखो १२ य वारसमो॥१॥ 5 با 15 भावणंदी णंदिसद्दोवयुत्तभावो । अहवा इमं पंचविहणाणपरूवगं गंदि त्ति अन्झयणं, तं च मृतंसेण सबमुत- भंतरभूतं । तं च सब्बसुतारंभेसु विग्योवसमणथमादीए मंगलं पयुज्जति । तस्स य मंगलट्ठाणावसरपत्तस्स गुरवो विणेयस्स अत्थ-मुतगोरचुप्पादणत्थं अविच्छेदसंताणागतमुतप्पदरिसणत्यं च इमं घेरावलि कहेत्ता ततो से 10 अत्थं कयंति । सबमुतत्था य जतो तित्थगरप्पभवा, अतो भत्तीए पंग्णवग-साग-पढग चितगा य पदमताए णमोकारं करेता भणंति- [सुत्तं १] जयइ जगजीवजोणीवियाणओ जगगुरू जगाणंदो । जगणाहो जगवंधू जयइ जगपियामहो भयवं ॥१॥ जयति गाहा । सोतिंदियादिविसय-कसाय-परीसोवसेन्ग-चयातिकम्म-ऽप्पगारं या परप्पादिणा य जिणमाणो जितेनु वा जयति त्ति भण्णति । जगं ति-खेर्तलोगो तम्मि जे जीवा ननि जानी जोपात्रा-मगिन-मान- संवुडादियाओ चउरासीतिलवखविहाणा वा विविहपगारहिं जाणमाणो विचाणी । अवा जो जहा जहि कम्मति जाए जोणीए उववज्जति तं तहा जाणति त्ति विसिट्टी जागगो वियागयो । अवा जगनपानी पम्मा-अम्मा. ऽऽगास-पुग्गलग्गहणं. जीव ति सबनीवग्गहणं, जोणि ति-सीवाऽजीपनिटाणं. जहा य उपनि विग- यति धुवं वा तं तहा सव्वं जाणइ ति वियाणगो । अनेन वचनेन केवलनापमामन्यतो मञ्चमाद गबहा नानि १ ‘पषंधतादीणं आ० दा० ॥ २ अणार त्ति आ० । अणे ति दा० ॥ ६ गयाको काम दृषनागे । व्य आ० दा० ॥ ४ मादीप मंगलहूं पर्यु आ० ॥ ५ वलियं काहेना १०८० ॥ ६ कानि • टा. । ८ जिणवसभो सललियदलमविद्यमगती महामोरोप, नेर समादारों उपलभ्यते ॥ ९ सम्गावधाति आ० । 'सगुपवाति ८. १० रेटमादो टन्नि ?. ! पाया 370 दा० ॥
. २ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० १-२ गा. २-८ त्ति ख्यापितं भवति । 'जगगुरु' ति जगं ति सबसण्णिलोगो, तस्स भगवानेव गुरुः । कथम् ? उच्यते- [जे० १८६ प्र०] गृणाति शास्त्रार्थमिति गुरुः, ब्रवीतीत्यर्थः, तिरिय-मणुयं देवा-ऽसुराए परिसाए धम्ममक्खाति । जो वा जं पुच्छति तं सव्वं कहयति ति तेग शुरू, अनेन वचनेन परोपकारित्वं प्रदर्शितं भवति । जगा-सत्ता ताण आणंदकारी जगाणंदों। कई ? उच्यते-सन्वेसिं सत्ताणं अब्बावादणोवदेसकरणत्तातो। जतो भणितं-"सव्वे सत्ताण 5 इंतव्वा ण परियावेतव्या ण परिवेत्तया ण अजावेतव" [आचा० श्रु.१ अ.४ उ.२ सू. ३] त्ति । विसेसतो सण्णीणं धम्मकहणत्तातो आणंदकारी, ततो वि विसेसतो भव्वसत्ताणं ति । अनेन वचनेन हितोपदेशकर्तत्वं दर्शितं भवति । जगा-सत्ता ते अण्णेहिं परिभविजमाणे रक्खइ ति जगणाहो। कह? उच्यते-मणो-चयण-काएहिं कत-कारिता ऽणुमतेहि रक्खतो जगणाहो भवति । अनेन वचनेन सबपाणीणं सणाहता दंसिता भवति। 'जगबंधु' ति जगा-सत्ता तेसिं वंधू जगवंधू । कई ? उच्यते-जो अप्पणो परस्स वा आवतीए वि ण परिचयति सो बंधू, भगवं च मुठ्ठ वि 10 परीसहोवसग्गादिसु वाहिज्जमाणो वि सत्तेसु बंधुत्तं अपरिचयंतो ण विराहेति त्ति अतो जगवंध, अनेन वचनेन सव्वसत्तेमु सबंधुता दंसिता भवति । पितामहो ति जो पितुपिता स पितामहो, सो य भगवं चेव । सव्वसत्ताणं पितामहो कहं ? उच्यते-सव्वसत्ताण अहिंसादिलक्खणो धम्मो पिता रक्खणतातो, सो य धम्मो भगवता पणीतो अतो भगवं धम्मपिता, एवं च सव्वसत्ताणं भगवं पितामहो ति । अनेन वचनेन धम्म पञ्च आदिपुरिसत्तं ख्यापित भवति । एतीए गाहाए पन्छद्धस्स पाढंतरं इम-"जिणवसभो सललियवसभविक्कम (जे० १८६ हिं०] गती महावीरो।" जिण 15 एव वसभो जिणवसभो । वसभो त्ति संजमभारुवहणे । चंकमतो मुभा गायसंचालणक्रिया सललितं भण्णति । वाम-दाहिणाणं वा पुरिम-पच्छिमचलणाणं जं कमुक्खेवकरणं स विक्कमो भण्णति, दुपदस्स पुण एगचलणुक्खेवो चेव विकमो । सेसं कंठं ॥१॥ किंच--- -- 20 - जयइ सुयाणं पभवो तित्थंयराणं अपच्छिमो जयइ । जयइ गुरू लोगाणं जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥ जयति सुताणं० गाहा । राग-दोसादिअरी जिणंतो जितेंसु वा जयति त्ति। [ सुताणं'] सव्वसुताणं ति, सुतणाणत्यो भगवंतातो पभवो । 'पभवो' ति पसूती । अणिढवयणपरिहारातो पच्छिमो वि अपच्छिमो भण्णति, अहवा पच्छाणुपुचीए अपच्छिमो, रिसभो पच्छिमो। अविसिहजीवलोगस्स विसिहसणिजीवलोगस्स वा, अहवा सम्मदिद्विमादिसंजता-संजतलोगस्स गुरू। महं आता जस्स सो य अकम्मवीरियसामत्यतो महात्मा, केवलादि- पिसिलद्धिसामत्यतो या महात्मा ।।२॥ किंच- भदं सबजगुज्जोयगस्स भई जिणस्स वीरस्स । भई सुरा-ऽसुरणमंसियस्स भदं धुयस्यस्स ॥३॥ भई सब्ब० गाहा । भायते भाति वा भद्रम् , तं भगवतो भवतु ति। सव्यजगं ति-लोगो । अट्टविही वि लोगनिरखेयो भाणितव्यो [ आव० नि० गा० १०५७ ] । सेसं कंठं ॥३॥ इमं संघस्स रहरूवर्ग- १ 'य-सदेवा' ज. दा० ॥ २एवमक्खा जे० ॥ ३ "सव्ये पाणा सव्वे भूया सव्वे जीवा सव्वे सत्ता ण हतव्या ग अप्रापया न परियादया प परिपेतन्या ण उद्दवेयव्वा " इतिरूपं सूत्रमाचा विसंघ आ० ॥ ५ मद्दो भवति । मनेन भा• ॥ ६ 'त्यगरा मं० ॥७°णाणत्याणं भग आ० ॥ ८ 'च्छिमो चीरो, रिसभो आ• ॥ .
मंगलं संघाथुई य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ३ [सुत्तं २] भई सीलपडागूसियस्स तव-णियमतुरगजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ सज्झायसुणंदिघोसस्स ॥४॥ भदं सील० गाहा । रहो सामण्णतो पंचमहत्वतमइओ । उस्सितो ति तस्सऽद्वारससीलंगसहस्ससिता जतपंडागा । वारसविहो तवो इंदिय-गोइंदियो य णियमो एते अस्सा। सझायसद्दो पंदिघोसो । सेसं कंठं ॥४॥ 5 संघस्सेव इमं चक्करूवर्ग- संजम-तवतुंवारयस्स णमो सम्मत्तपारियल्लस्स । अप्पडिचकस्स जओ होउ सया संघचकस्स ॥ ५॥ संजम० गाहा । विमुद्धभावचकस्स सत्तरसविधो संजमो तुंवं । तस्स वारसविहतवोमता अरगा । पारियल्लं ति-जा बाहिरपुट्टयस्स वाहिरूममी, सा से सम्मत्तं कतं, जम्हा अग्णेहिं चरगादिएहिं जेतुं [जे० १८७ प्र०] ण 10 सकति तम्हा एयं जयति, अप्पडिचकं च एतं । णमो एरिसस्स [संघ चकस्सेति ॥५॥ इमं संघस्सेव णगररूवर्ग-- गुणभवणगहण ! सुयरयणभरिय ! दंसणविसुद्धरच्छागा!। संघणगर! भई ते अखंडचरितपागारा ! ॥६॥ गुणभवणगण० गाहा । तम्मि पुरिससंघणगरे इमे गुणा-पिंडविनुद्धि-समिति-गुत्ति-दव्यादिअभिग्गह- मासादिपडिमा-गोयरे य चरगादिया, एमादिउत्तरगुणा तम्मि संघगगरे भवणा• कता, भवण त्ति घरा, तेहिं 15 गहणं ति-निरंतरं संठिता घणा । तं च संबपुरिसणगरं अंगा-ऽणंगादिविचिनमुनरयणभरितं । खयोवसमितादि- सम्मत्तमझ्यरच्छाओ य, मिच्छत्तादिकयारवज्जितत्तणतो विमुद्धाओ । मूलगुणचरिनं च से पागारो, सो य अखंडो त्ति-अविराधितो निर्रतिचार इत्यर्थः । सेसं कंठं ।। ६॥ इमं पि संघम्मेव पर्युमन्यग- कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स सुयरयणदीहणालस्म । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स गुणकेसरालस्स ।। ७ ॥ सावगजणमहुयेरिपरिखुडस्स जिणसूरतेयबुद्धस्म । संघपटमस्स भदं समणगणसहस्सपत्तस्म ॥८॥ [ जुम्मं] कम्मरय० गाहा । कम्म एव रयो कम्मरयो । अहवा जं पुष्पदं नं कम्म. वनामा ग्यो, न गव्यं पि १ भई सील० इति संजमतय० इति गुणभपण इति २ साविक दिग्निद्र मलयगिरि पक्षानुपा व्याल्यातमस्ति ॥ २ हरि मृत्ती मलयवृत्तौ च पुणेमिघोसम्म पनि हो । मंगविटा- सरसंपो रिमेघ-सुंदुभि-पराम-गय-सीह- सल-नगर-धणेमिपियोसरिल सरकार-- तीसर-गीत-भारत-तलतालपोस-उसह दलित-पोषित-विकिपिमारपोसाक परः। रत्र मिलिमीर:- ३ पाता आ० ॥ ४ सं० मो० आदर्शयोः वेगापि दिनुपा 'बारदस्त स्थान 'दारर इनिन । मलपगिरिपादयाल्यान पते ॥ ५ 'तो मारमा ३० तः ॥ ६ बाटदारिन : 'यामा ८ पतपर आ० पा० ॥ ९ णिरावार सा ॥ १० पटम' ! 'पपरि' -. :: - 20 5 जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुयं [मु० २ गा. ९-१ जलोहमिव कल्प्यते । अहया पुचपद्धं कम्मं पंको, वज्झमाणं जलोहो, ततो विणिग्गतो संघपेनुगो । तस्स णालं मृत एव रयणं सुतरतणं तं से णालो कतो। पंचमहचता य से थिर त्ति-ढा ते कणिय ति-बाहिरपना कत गुणा-मूलुत्तरगुणा य से अणेगविहा [ केसरा ] तेहिं गुंणेहिं आलस्स ति-अधिकयोगयुक्तस्य गुणकेसराला मूलादिगुणकेसरयुक्तस्य इत्यर्थः ॥७॥ वितियगाहाए-परिवुड ति-परिवारितं, जिणसरस्स धम्मकहणक्खाणतेयेण प्रबोधितं । अणेगसम सहस्सा य से अभंतरपत्ता कता । एरिसस्स संघपदुमस्स भद्रं भवतु ॥ ८॥ इमं चंद्रसंघरवर्ग- तव-संजममयलंछण ! अकिरियराहुमुहदुद्धरिस ! णिचं । जय संघचंद ! णिम्मलसम्मत्तविसुद्धर्जुण्हागा! ॥९॥ तवसंजम० गाहा । संघचंदस्स मियो तव-संजमा, तेहि लंछितो । अकिरिय त्ति-णत्थियवादी ते राहुम 10 तेहिं दुआधरिसो त्ति-ण सकते जेतुं । 'णिचं 'ति सव्वकाल। संकादिविमुद्धसम्मत्तं से जोण्डा । सेसं कंठं ॥९ सूरसंघरूवर्ग इमं- परतित्थियगहपहणासगस्स तवतेयदित्तलेसस्स । णाणुज्जोयस्स जए भई दमसंघसूरस्स ॥१०॥ परतित्यिय० गाहा । हरि-हर-हिरण्ण-सकोक-चरग-तावसादयो परतित्थिया गहा, तेसिं णाणतेय 18 सुतादिणाणप्पभाते णासेति। [जे० १८७ द्वि०] तव-णियमकरणातो य अतीवदित्तिमंतलेस्सो। लेस्स त्ति-रस्सीय मुतादिणाणुज्जोतसंपण्णस्स य इमम्मि जए संघमूरस्स भदं भवतु । सेसं कंठं ।। १० । इमं संघसमुदरूवर्ग- भदं धिईवेलापेखुिडस्स सज्झायजोगमगरस्स । अक्खोभस्स भगवओ संघसमुदस्स रुंदस्स ।। ११ ॥ भई धिति० गाहा । जल-वेदियंतरे जं रमणं सा वेला, सा य मेरा वि भण्णति, एवं संघसमुदस्स Eि 20 वेला, ताए परिवुडो त्ति-वेढितो । वायणादिसज्झायजोगकरणं मगरो । परपवादोपसर्गादिभिर्न क्षुभ्यते । महतो । सेसं कंठं ॥११॥ इमं संघस्स मेरुरुवर्ग-तस्स य पवतस्स इमे ख्वगा, तस्स य पचतस्स इमे अपयवा-पेढं मेहला उस्स सिला, मेहला कूडा, मेहलाए वणं गुहा, गुहामु य मइंदा सुवष्णादिधातवो, नागाविधवीरियोसहिपज्जलि णिज्झरा य सलिलजुत्ता, कुहरा य से मयूरादिपक्खिउबसोभिता, अणुवग्यातिविज्जुलतोक्सोभितो य सो, क 26 दिरुक्खुबसोभितो य, अंतरंतरेस य वेरुलितादिरतणसोभितो । एतेसिं पदाणं पडिरूवेग इमाहि छहिं गा उपसंहारो- १ 'पयुमो आ० । पउमो दा० ॥ २ गुणेहिं अभदितस्स त्ति अधिक आ० ॥ ३ परिकरियस्स जिण अ ४ इमं संघरस चंदरूवगं आ• ॥ ५ जोण्डागा शु० । जुन्दागा ३० ॥ ६ मियो णाम तव आ० ॥ ७ सं सूररुचगं तिमं आ० ॥ ८ धीधेला सं० दे० ल. ॥ ९ परिगयस्स सर्वामु सूत्रप्रतिषु । हरिभद्ररि-मलयगिनि मामतापाटानुसारेगवं व्याख्यातमस्ति । चूणिकृत्सम्मनस्तु पाठः कुत्रा'यादर्श नोपलभ्यते ।। १० जलवाहि (? इढियं) . ११ 'मुपपसा जै० दा० ॥ १२ मिगिंदा आ० ॥ १३ णाणादिविविधदित्तोसहि आ० ॥ १४ 'संथा(घा)रो आ• ॥ 7 5 10 संघgई ] सिरिदेववायगंविरड्यं गंदीसुत्तं । सम्मईसणवइरदढरूढगाढावगाढंपेढस्स । धम्मवरस्यणमंडियचामीयरमेहलीगस्स ।। १२ ॥ णियमूसियकणयसिलार्यलुज्जलजलंतचित्तकूडस्स । णंदणवणमणहरसुरभिसीलगंधुंधुमायस्स ।। १३ ॥ जीवदयासुंदरकंदरुद्दरियमुणिवरमइंदइण्णस्स । देउसयधाउपगलंतरत्तदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवखरजलपगलियउज्झरपविरायमाणहारस्स । सावगजणपउरखंतमोरणचंतकहरस्स ।। १५ ।। विणयमयपवरमुणिवरफुरंतविज्जुज्जलंतसिहरस्स। विविहंकुलकप्परुक्खगणयभरकुसुमियकुलवणस्स ॥ १६ ।। णाणवरस्यणदिपंतकंतवेरुलियविमलचूलस्स । वंदामि विणयपणओ संघमहामंदरगिरिस्स ।। १७ ॥" [छहिं कुलयं ] सम्मइंसण. गाहा । णियमू० गाहा । जीवदया० गाहा । संवर० गाहा । विणय० गाहा । णोणवर० गाहा । संघपव्यतस्स सम्मईसैणं चेव वइरं । तं च संकादिसल्लरहियत्तगयो दढं ति" रुढं ति-चड्ढितं, कई ? विमुझमाणत्तणयो । गाढं ति-अतीव, अवगाहं ति-ओगाहं, सहाणतणतो जीवादिपदत्येमु अतीवओगाहं 15 ति वृत्तं भवति । एतं पेढं । धम्मो दुविहो मूलुत्तरगुणेन । लो य दुविहो वि वरो नि-पधाणो । तत्युत्तरगुणधम्मो रयणा, तेहिं मंडिता जे मूलगुणा ते चामीकरं ति, तं च लवणं, नम्मयी मेहला, तया जुनम्स मेहलागम्स ॥१२॥ नियमो त्ति इंदिय-गोइंदिएमु अणेगविधी, सो य णियमो सिलानला तेहि चैत्र उम्सिनो, अमुभन्यवसाग- विरहितत्तणतो कम्मविमुज्झमाणतणतो वा उज्जलमुत्त-ऽत्थाणुसरणनणनो । जन्मति विनं. नितिन्जद जेण नं चित्तं, ते चेव कूडं ति चित्तकृडं तस्स। [जे० १८८ प्र०] गंदंति जेण वायर-जोनिम-भवण-पमानिया विजाहर-मण्या य 20 तेण णंदणं, वणं ति-वणसंडं । तं च लता-बल्लि-विताणाणेगोनहिननेति गरपं. पन-पय-पुष्प-फलोय वनाहि, मण- १ सणवरपरदढरूढ २० शु० ल० मु० । 'सणीयरहरढ सं० ॥ २ 'टपट ॥ ४ 'चलज शु० ॥ ५ 'गंधुद्धमा सस्विपि सूत्रप्रतिषु । 'गधसमा हरि सनी ॥ ६ मपंदापना । 'मददग्गन.॥ ७ तरयणदित्तों मो. मु० । 'तरिस्थदित्तो रे ॥ ८ विणणयपदा ! पमिय: पर: जापा मोपलभ्यते ॥ ९ विविहगुणयप्परुपखगफलभरपुरसुमाउलयणस्स गनुप्रः । चर्षिक १० सप्तदागाथानन्तरं घृणिकदादिभिरल्याल्यात गाथायुगलमिदमधिक करने गुणरयणुजलपाडयं सीलनुयंधतवमंटिसं । मुपदारसंगसिहरं मंदमहानंदा करे। नगर र८ घया परमे चंदे सूरे समुह मेरुम्मि । जो उपमित समयं मे गुमायो ।' अनाथें जेयू. आदर्श इस टिप्पणी रसते---"गुणेन्यादि गामा २ दृन्तारमा " ! ११ पाणावरण. गाटा सं. दा. । अपोय पा.मेदः ॥ १२ ईससे वरं । : 'दि दियटनं. : १४ य उजल-दित्तिमं चितिजर तेण दिलं, तं देव आः । ! 1. 'विटाटापटि. तेहि गाणं दा. ॥ १६ 'लोपतेहिं आ० ॥ ३ 'लायम मं. ॥ - -- ur 5 जिणदासगणिमहत्तरविरयाए चुण्गीप संजुयं [सु० ३-५ गा. १८-२४ हारित्तणतो मणहरं, गंधतो सुरभिगंधं । सीलवणसंडे वि जम्हा साधबो गंदंति प्रमोदंति रमंतीत्यर्थः। विविहलद्धि- विसेसतो य मणहरं सीलवणं, विसुद्धभावत्तणतो य सुगंधं, जहा दचवणसंडं गंधेण उद्भुमातं ति-च्याप्तं तहा सीलगंधेण संघस्स गंधु मायस्से ॥१३॥ किंच- जं पचतासण्णं सिलारुवरखगहणं तं कंदरं ति । भावे जीवेमु दयाकरणसुंदरं जं तं कंदरं ति । तत्य य उ-पावल्ले, दरितो त्ति-दप्पितो, जीवदयाकरणदप्पितो त्ति वुत्तं भवति । को य सो ? मुणिगणो। सो चेव मुणिगणो मइंदो परप्पवादिसासणसंघमयाण इंदो। कहं ? सितवादउत्तमभावत्तणतो। हेतु त्ति-परखधम्मो कारणं वा, ते सतगसो सुत्ते संभवंति । ते य हेतवो धातू, ते य पगलंति परूषणगुहाए । सा य परूषणगुहा णाणादिर- तणादिएहि दित्ता, खेलोसहिमादिओसहीहिं वा दित्ता ॥१४॥ एवं दित्तोसहिगुहस्स संघस्स संवरो त्ति-पञ्चक्रवाणं, तं चेव सलिलं, किंचि पन्चतग्गातो ओसरितं उज्झरं, 10 ईहावि खाइगभावातो खयोवसमियं उज्झरं, ततो पलंविता खतोवसमितसंवरदगधारा, स चेव धारा हारो, तेण विरायते--सोभत्ति त्ति । सावगजणो पउरो त्ति-बहू मचुरः सो य गीतद्धणीए रवति त्ति-रडती, ते चेव मोरा णाडगादीहि य णचंति । जं पन्चतस्स अद्धे समप्पदेस रुक्खाकुलं [जे०१८८ द्वि०] च तं कुहरं । एवं संघपन्नतस्स हिवणमंडवादी कुहरं ति ।। १५॥ विणयकरणत्तातो विणयमतो मुणी । सो य विणयकरणत्तेण फुरते, तं चेव फुरितं विजुतं ति-चकोरितं 15 तं च उज्जलं ति-निम्मलं, तेण उज्जलत्तेण संघसिहरं जलितमिव लक्विज्जति । संघसिहरं च पावयणिपुरिसा दट्ठन्वा । तत्थ य विविहकुलुप्पण्णा साहवो कप्परक्खा, खीरासवादिलद्धिफलेहि य णयभरा, लद्धिहेतुद्विता साहबो कुसुमिती कुलवण त्ति दवा ॥१६॥ मति-सुतादिनाणा वर ति-पहाणा, ते चेव णाणावेरुलियादिरतणा इव कंता, कंता इति-कंतिजुत्ता। कति तत्तणतो चेव सविसतेण जीवादिपदस्थसख्खोवलंभतो दिप्पंति । नाणस्स य मलो गाणावरणं, तचिगमातो 20 य विगतमलं । चूलामणिरिव सिहरोपरि चूला, सौं य णाणातिसयगुणेहिं जुत्ता, जुगप्पहाणो पुरिसो चूला इति । एवं संघपञ्चतस्स पेढादिचूलपज्जवसाणकप्पियस्स बंदामि विणयपणतो त्ति छह विगाहाणं एतं क्रियापदं ति ॥१७॥ एवं चरमतित्थगरस्स संघस्स य पणामे कते इमा अवसैरप्पत्ता आवली भण्णतिसा तिविहा तित्थकर १ गणहर २ थेरावली ३ य । तत्थ तित्थगरावलिदसणत्थं इमं भण्णति- [सुतं ३] वंदे उसभं अजिअं संभवमभिणंदणं सुमति सुप्पभ सुपासं । ससि पुष्पदंत सीयल सिज्जंसं वासुपुजं च ॥ १८ ॥ १ 'स्स किया। २ उत्- प्रावल्ये इत्यर्थः ।। ३ °उत्तिम आ० ॥ ४ इधावि आ० ॥ ५बहु: ६ गीताणीए आ० ॥ ७ अहे आ० ॥ ८ पहाण आ• ॥ ९ 'यणतो आ० दा० || १० य फलभरा आ. दा० ॥ ११ ता गुणवण त्ति आ० । १२ पंतादिनुत्त आ० ॥ मुगप्पदाणा पुरिसा चूला आ० ॥ १४ त आ० ॥ १५ सरापण्णा आ आ ॥ १६ से सं० शु० । सेयंसं सं० " १३ सो य णाणातिसयत्यसरूवोचलभगुणोद्दजुया 25 जं आ० ॥ आ० ॥
• . 5 10 तित्थयर-गणहर-थेरावलीओ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । विमलमणंतेइ धम्म संति कुंथु अरं च मल्लिं च । मुणिसुब्बय णमि णेमी पासं तह वद्धमाणं च ॥ १९ ॥ [ जुम्मं ] वंदे उसभ० गाहा। विमल गाहा य] कंठा ॥१८॥१९॥ चरमतित्थगरस्स इमा गगहरावली- [सुत्तं ४] पंढमेत्थ इंदभूती वितिए पुण होति अग्गिभूति त्ति । ततिए य वाउभूती ततो वितत्ते सुहम्मे य ॥ २० ॥ मंडिय-मोरियपुत्ते अकंपिते चेव अयलभाता य । मेतज्जे य पभासे य गणहरा होंति वीरर्स ॥ २१ ॥ [जुम्मं ] एत्थ गणहरावली ॥२०॥२१॥ तो सुधम्मातो थेरावली पबत्ता, जतो जे०१८९ प्र०] भणति- [ सुत्तं ५] सुहम्मं अग्गिवेसाणं जंबूणामं च कासवं । पभवं कच्चायणं वंदे वच्छं सेजंभवं तहा ॥ २२ ॥ सुहम्मं अग्गिवेसाणं० सिलोगो। समणस्स पं० महावीरस्त कासगोत्तस्स सुधन्ने अंतेवासी अग्गिवेसायण. सगोत्ते । सुहम्मस्स अंतेवासी जंबुणामे कासवे गोत्तेणं । जंबुणामस्स अंतेवासी पभवे कञ्चायणसगोत्ने । पभवस्स अंतेवासी सेजंभवे वच्छसगोत्ते ।।२२।। जसभई तुंगियं वंदे संभूयं चेव मादरं । भद्दबाहुं च पाइण्णं थूलभदं च गोयमं ॥ २३ ॥ जसभई० गाहा । सेनंभवम्स अंतेवासी जसभद्दे तुंगियायणे बग्यायगमगाने । असमान्य अंतेवासी इमें दो पेरा- भदवाह योगग्गिसगोत्ते, संभृतविजए. य माइग्सगोत्ते । संभूतविजयम्य अंगनानी लभते गतिमागोने ॥२३॥ एलावैचसगोतं" वंदामि महागिरि सुहत्यि च । तत्तो कासवगोत्तं बहुलस्स सरिब्वयं वंदे ।। २४ ।। १ मणतय है. ल. नु० ॥ २ मि सं० ज० गु० ॥ ३८ गाभाग वर्षियता चली बात। पदमित्य इंदभूई दीप पुण घोर अग्गिभूर त्ति । ताए य पाउई नमो दिया ने गहम्मे य। मंदिय मोरिया सांपिए चेव अयलभाया य । मेयज्जे य सं० १० १० मो० ॥ ४ पाय 2. !: ' नहा ।। ६ एवाविशति-नाविशतिगाधयोरन्तराले चूर्णिताऽध्यायाताऽपि पीरिममूरि-भीमलयगिरिया : जिनशासनस्तुतिरूपा ट्यगेका गाधाऽधिका मदपि सन्माद - णेनुपहसासणयं जया सया सम्घभाव देसगये । पुसमयमदणाममय शिविरमामा जयति शुरु । जयउ है. ल. । जिणंद रु.॥ ७ अंदुणामं २० ॥ ८ सिज्जभ ल. मो. ९ पाए २० र. 12. सापनिारमन ११ पदम सं० २०० । 'वत्ससः ॥ १२ 'गुतं . २० ॥ १३ पोलिपपोतं मनः । रिटमानि? भारपद मास्यातमरिन । णिशागतः स्प्रपाले नोपलाते सभासद । 15 -- • - ८ जिगदासगणिमहत्तरविरझ्याग चुण्णीए संजुयं [सु० ५ गा. २५-३२ एलाञ्च० गाहा । थूलभदस्स अंतेवासी इमे दो थेरा-महागिरी एलावगसगोत्ते, मुहत्थी य वासिझसगोत्ते । सुहत्थिस्स सुद्वित-सुपडिबुद्धादयो आवलीते जहा दसासु [अ० ८ सूत्र २१०] तहा भाणितव्या, इई तेहि अहिगारो णत्थि, महागिरिस्स आवलीए अधिकारो। महागिरिस्स अंतेवासी बहुलो बलिस्सहो य दो जमलभातरो कासवस- गोत्ता । तत्थ बलिस्सहो पावयणी जातो, तस्स थुतिकरणे भणंति-"बहुलस्स सरित्रयं वंदे । 'सरिव्ययं ति सरिसवयो, वयो य जम्मकालं पडुच जा जा सरीरपरिवढिअवत्था सा सा वतो भण्णति ॥ २४ ॥ हारियगोत्तं साई च वंदिमो हारियं च सामज्जं । वंदे कोसियगोत्तं संडिलं अज्जजीयधरं ।। २५ ।। हारिय० गाहा । बलिस्सहस्स अंतेवासी साती हारियसगोत्तो । सातिस्स अंतेवासी सामजो हारितसगोत्तो चेव । सामजस्स अंतेवासी संडिल्लो कोसियसगोत्तो, सो य अजजीतधरो ति अजं ति-आर्य आद्यं वा जीतं ति-सुत्तं धरति, सुत्तत्थस्स अविचुतिधरणत्तातो, वंदे त्ति बकसेसं । पाढंतरं वा “जीवधरं" ति, आर्यत्वात् जीवं धरेति-रक्षती- 10 त्यर्थः । अण्णे पुण भणंति-संडिलस्स अंतेवासी जीवधरो अणगारो, सो य अजसगोत्तो ।।२५।। संडिल्लस्स सीसो- तिसमुद्दसायकित्तिं दीव-समुद्देसु गहियपेयालं । वंदे अज्जसमुदं अक्खुभियसमुदगंभीरं ॥ २६ ॥ तिसमुद्द० गाहा । पुन्व-दक्खिणा-ऽपरा ततो समुद्दा, उत्तरतो बेतड्ढो, एतंतरे खातकित्ती । सेसं कंठं ॥२६॥ तस्स सीसो [जे० १८९ द्वि०] इमो- भणगं करगं झरगं पभावगं णाण-दसणगुणाणं । वंदामि अज्जमंगुं सुयसागरपारगं धीरं ।। २७॥" भणगं० गाधा । कालियपुरमुत्तत्थं भणतीति भणको । चरण-करणक्रियां करोतीति कारकः । मुत्तत्थे य मणसा झायंतो ज्झरको । परप्पवादिजयेण पवयणप्पभावको । नाण-दसण-चरणगुणाणं च पभावको आधारो य । सेसं कंटे ॥२७॥ तम्स सीसो- णाणम्मि दंसणम्मि य तब विणए णिच्चकालमुज्जुत्तं । अज्जाणंदिलखमणं सिरसा वंदे पसण्णमणं ।। २८॥ १ अत्र चूणिरता हरिभद्रपादेव सुहस्ती भगवान् दशाशुतस्कन्धाष्टमाध्ययनस्थविरावल्यामिव वासिष्ठगोत्रीयः सत्यापितः, कित मलयगिरिरिचरणरयं स्त्रगाथानुलोम्याद् पेलापत्यसगोत्रीयः ख्यापितः, तदत्र तज्ज्ञा एव प्रमाणम् ॥ दा० ॥ ३ भणियं आ० ॥ ४ यगुत्तं सायं च टे० शु० ल० ॥ ५ 'जीवधर इति चूर्णी पाठान्तरम् ॥ ६ “ तेषां शाण्डिल्या चायांणी आर्यजीतधर-आर्यसमुद्राख्यौ द्वौ शिष्यावभूताम् । आर्यसमुद्रस्याऽऽयमनामानः प्रभावकाः शिप्याः जाताः दिमयन्तस्थविरावल्याम् पत्र ९ ॥ ७ साइकित्ति ल० ॥ ८ पत्थंतरे आ० ॥ ९ अजमंगू ल० ॥ १० अष्टाविंशतितम- गापानन्तरं तु. प्रति विहाय रामु एत्रप्रतिषु गाथायुगलमिदमधिकमुपलभ्यते- चंदामि गजधम्म यंदे तत्तो य भद्दगुत्तं च । तत्तो य मजवहरं तव-नियमगुणेदि चयरसमं ॥ पंदामि अनारयिसयसमणे रक्षियचरित्तसव्यस्से । रयणकरंडगभूमो अणुओगो रक्सिओ जेहिं ।। तदापायुगलपिपये जंग• प्रताधियं टिप्पणी- "चंदामि अजधम्म० "एतदपि गाथादयं न वृत्ती विगृतम् , गम्भावित सम्भाव्यते ।" ११ घाझानंदिल गं. ॥ 15 20 २ कोसियगोत्ता इति - आवलिकान्तर- थेरावली] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । S । 10 णाणम्मि दं० गाहा । कंठा ॥२८॥ तस्स सीसो- वड्दउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं । वागरण-करण-भंगी-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥ २९ ॥ वड्ढतु० गाहा । 'वड्वतु' त्ति वृद्धिं यातु । को य सो ? 'वायगवंसो' वाति सिरसाणं कालिय-पुन्चमुतं ति वातगा-आचार्या इत्यर्थः, गुरुसणिहाणे वा सिस्सभावेण वाइनं मुतं जेहिं ते वायगा, वंसो त्ति-पुरिसपन्च- 5 परंपरेण ठितो वंसो भण्णति । सो चेव जसोवज्जणतो संजमोवज्जणतो वा जसवंसो भष्णति, सो य अणागतवंसो इत्यर्थः । कस्स सो एरिसो वंसो ? भण्णति, अज्जणागहीणं ति । करिसाणं ? ति पुच्छा, भण्णति-जीवादिपदत्य- पुच्छामु वाकरणे सद्दपाहुडे वा पहाणाणं, एवं चरणकरणे कालकरणेमु वा सन्चभंगविकप्पणामु य तप्परूवणे य तहा कम्मप्पगडिपावणाए पधाणाणं पुरिसाणं वड्तु वायगवंसो ॥२९।। तस्स सीसो- जचंजणधाउसमप्पहाण मुद्दीय-कुवलयनिहाणं । वड्ढउ वायगवंसो रेवेइणक्खत्तणामागं ॥३०॥ जचंजण० गाहा । जचंजणग्गहणं कित्तिमवुदासत्थं, सरीरवण्णेण तन्निभो। तता सरस-पकमुडियफलसज्णिभो य । कुच्छितो उवलो कुवलयो, सो य कण्हकायो, कुवलयं वा-णीलुप्पलं, कुवलयं वा-रयणविसेसो । खतिवायगो त्ति । सेसं कंठं ॥३०॥ तस्स सीसो- अयलपुरा णिक्खंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । वंभद्दीवग सीहे वायगपयमुत्तमं पत्ते ।। ३१ ।। अयलपुरा० गाहा । भद्दीबगसाहीणं आयरियाणं नमी निवग्वनी गोदबायको. उनमायकलणं च तना- लमृतसंभवं पडुच्च । सेसं कंठं ।। ३१ ।। तस्स सीसो- जेसि इमो अणुओगो पयरइ अज्जावि अद्भाहम्मि । बहुनगरनिग्गयजसे ते वंदे खंदिलायरिए ॥३२॥ जेसि दमो० गाहा । कई पुण तेसिं अणुओगो ? उच्यते-दारमारिए महंने दरिमालका महा अम्गणतो फिडिताणं गण-गुणणा-ऽणुप्पेदाभावानो मुने विपणढे पुगो मुभिक वाटे जाने पर महंगे माह- समुदए वंदिलायरियप्पमुदसंवेण 'जो जं संभरति' त्ति एवं मंडित ९:. वालियननं । नया ग एतं मधुराए कतं नम्दा माधुरा वायगा भण्णति । ला र गरि करिबमय नि काट दम्पनियां भी भण्णति । सेसं कंठं । अण्णे भगति जता-जुतं ण णटुं, तम्मि दुनिया के भाई पटाका : विणहा, एगे दिलायरिश संधरे. तेण मधुराए अणुयोगी पुगो कार पानिलो नि:: तग्मंतिनी र अणियोगो भण्णाति ।।३२ ।। १ भगिय-फारम : मोविया । ...... : २॥ ४ एन्जितओ पलयो हदलयो डा० ॥ ५ अखि निको 1 : 15 5 10 ७ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं (सु० ५ गा. ३३-४१ तत्तो हिमवंतमहंतविको धिइपरकममहंते । सज्झायमणंतधरे हिमवंते वंदिमो सिरसा ॥ ३३ ॥ तत्तो हिस० गाहा । हिमवंतपन्नतेण महंतत्तणं तुलं जस्स सो हिमवंतमहतो, इह भरहे णत्थि अण्णो तत्तुल्लो त्ति, एस थुतिवादो । उत्तरतो वा हिमवंतेण सेसदिसामु य समुद्देण निवारितो जसो, हिमवंतनिवारणो 5 जसो महंतो त्ति अतो हिमवंतमहतो । महंतविकमो कहं ? उच्यते-सामत्थतो, महंते वि कुल-गण-संघप्पयोयणे तरति त्ति, परप्पवादिजएण वा विसेसलद्धिसंपण्णतणतो वा महंतविकमो । अहवा परीसहोवसग्गे तवविसेसे वा धितिवलेण परकमंतो महतो । अणंतगम-पज्जवत्तणतो अणंतधरो तं, महंतं हिमवंतणामं वंदे । सेसं कंटं ।। ३३ ।। किंच- कालियसुयअणुओगस्स धारए धारए य पुवाणं । हिमवतखमासणे वंदे णागज्जुणायरिए ॥ ३४ ॥ कालिय० गाहा । हिमवंतो चेव हिमवंतखमासमणो। तस्स सीसो णागजुणायरितो ॥ ३४ ॥ तस्स इमा गुणकित्तणा- मिर्दु-मदवसंपण्णे अणुपुचि वायगत्तणं पत्ते । ओहसुयसमायारे णागज्जुणवायए वंदे ॥ ३५॥ मिदु-भद्दय० गाहा । 'अणुपुची' सामादियादिमृतम्गहणेण, कालतो य पुरिमपरियायत्तणेण पुरिसाणु- पुचितो य वायगत्तणं पत्तो, ओहसुतं च उस्सग्गो, तं च आयरति । सेसं कंठं ॥३५॥ णागजुणवायगस्स सीसो भूतदिण्णो आयरितो । तस्सिमा गुणकित्तणा तिहिं गाहाहि- तेवियवरकणग-चंपय विमउलवरकमलगभंसखिण्णे | भवियजणहिययदइए दयागुणविसारए धीरे ॥ ३६॥ अड्ढभरहप्पहाणे बहुविहसज्झायसुमुणियपहाणे । अणुओगियवरखसहे गाइलकुलवंसणंदिकरे ॥ ३७ ।। १ मणते सं० सं० ल० । जेसू० प्रती 'महंते' इति पाठस्योपरि टिप्पणी यथा- "मणंते' इति वृत्ती व्याख्यातम् २ सुतिवादो आ०॥ ३ जसो हिमवंतो ति, अतो हिमचंते महंत विक्कमो, कहं ? आ०॥ ४'णतो अणतं वा सुतं, महंतं आ०॥ ५ 'गुजोग सं० ॥ ६ मिय-म डे० ॥ ७ पचत्रिंशत्तमगाथानन्तरं P प्रति विहाय सर्वास्वपि सूत्रप्रतिप्पलभ्यत इदं गाथायुगलमधिकम्- गोविंदाणं पि णमो अणुओगे विउलधारणिदाणं । निच्चं खंति-दयाणं परूवणे दुल्लभिंदाणं ॥ तत्तो य भूयदिनं निशं तव-संजमे अनिश्चिन्नं । पंडियजणसामन्नं वंदामी संजमविहन्नू ॥ ताधायुगलविषये "इदमपि गाथाद्वयं न वृत्तो कुतश्चित्" इति जेसू० प्रती टिप्पणी ॥ ९ वरिवपि सूत्रप्रतिषु वरकणगतवियचंपय इति पाठ उपलभ्यते । भगवता हरिभद्राचार्येण "वरकणग० गाहा" इति प्रतीक पाप पाटः स्वीकृतोऽस्ति । चूर्णी पुनः “तविय० गादा" इति प्रतीकदर्शनात् चूर्णिकृता तवियवरकणगचंपय० इति पार आर. गाभाव्यते । श्रोमलयगिरिपादस्तु परतवियेत्यादि गाथात्रयम्" इति प्रतीकनिष्टानेन परतवियफणगचंपय इति यो वन । न गवतश्चम्किद-मन्तयगिरिपादनिर्दिष्ट पाठभेदयुगल सुत्रादषु हरयत सिरिव २० । 'भसमय १. !! ११ 'भोयिय० । 'णुओइयं शु० । श्रीहरिभद्र-मलयगिरिभ्यामयमेव पाठः स्वस्थवृत्तौ स्वीकृतोऽस्ति । 15 20 " इति॥ ८ पूरिमपरि आ० । पूरपरि जे० ॥
5 10 थेरावली]] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । भूयहिययप्पगब्भे वंदे हं भूयदिण्णमायरिए । भवभयवोच्छेयकरे सीसे णागज्जुणरिसीणं ॥ ३८॥ [विसेसर्य ] तेविय० गाहा । गम्भो त्ति-पोमकेसरा । सेसं कंटें ॥३६॥ अड्ढभरह० गाहा । बहुविहो सझायो त्ति-अंगपविट्ठो वारसविधो, अणंगपविट्ठो य कालिय-उकालितो यणेगविहो । सो य पधाणो त्ति, सुगुणितत्तणेण निस्संको त्ति कातुं । सेसं कंठं ।। ३७ ॥ भूतहितय० गाहा । भूतहितं ति अहिंसा । [जे०१९० द्वि० ] पगन्भं ति-धारिटं । अहिंसाभावे पाग- भता, अतीवअप्पमत्तताए अहिंसाभावपरिणता इत्यर्थः । सेसं कंटं ।। ३८।। भूतांदण्णस्स सीसो लोहिच्चो । तस्स इमा थुती- सुमुणियणिचा-ऽणिचं सुमुणियसुत्त-ऽत्यधारयं णिचं । वंदे हं लोहिचं सम्भावुभावणातचं ।। ३९ ॥ सुमुणित० गाहा । मुट्ठ मुणितं मुमुणितं । किं तं ? भण्णति-जीवो जीवत्तणेण निचो, गतिमादिएहि अणिचो । परमाणू अजीवत्तणेण मुत्तत्तेण य निचो, दुप्पदेसादिएहिं वण्णादिपज वेहि य अणियो । मुठ्ठ त मुणितं मुत्त-ऽत्यं धरेति । णिचकालं पि स्वे भावे ठितो सम्भावो, स-सोमणो वा भावो सम्भावो, सं-विज्जमाणो वा भावो सम्भावो, तं उन्भासए तच्चत्तेण, तथ्यत्वेन इत्यर्थः । तं च लोहिन्छणाम आयरिवं वंदे । सेसं कंठं ॥ ३९ ॥ तस्स लोभिच्चस्स सीसो दृसगी । तम्स इमा थुती- अत्थ-महत्वखाणि सुंसमणवस्खाणकहणणेब्वाणि । पयतीए महुवाणि पयओ पणमामि दृसगंणि ॥ १०॥" सुकुमाल-कोमलतले तेसि पणमामि लमवणपसत्य । पादे पावयणीणं पांडिच्छगसएहि पणिवहा ।। ११ ।। अत्य-महत्य० गाहा । वाणि त्ति-आगरो। मा य अत्यन्न ग्यानी विनिय? मान्यम्य । मन्यो ग 2) अणेगपज्जायभेदभिण्णो । अध्वा भासगरूवो अत्यो, विभानगरवपन्जवनी मालो। परिणाम प्रभाग खाणी । का सा ? 'वाणि' त्ति संबज्झति । मुभो समण(णो) सम्मान को नाम माग गया ji ति-अत्थयाणं, तम्मि अत्यकहणे सोताराण करेति वाणी यानी । भरा कानि-अपमोगरा, १ परवाणग० गादा आ० । घरयाणगतरिय० गालाचा : पारनं । टिम्ग , भाग्य ३ धारयं चंदे । सम्भावुम्भाषणया, तत्थं लोहियनामापं ।।... पिन र रामप्रतिपलभ्यते ॥ ४ सन् शोभनो या भावः गलामा, नन-नियमानी ६ 'पद्राणी रे०६० ॥ ७ सुनवण' सूर्गा पाटामाम् ॥ ८ मादी. 1. वाई.......... ११ पवारिशतमगाधानात Pप्रति विहाय सांग ना मासादिको- तय नियम सध-संगम विषय-जय-ति-माया ! महिला सत्र "गरमा' इति गतिलाना 'यामार" कि आदरपदी शिकार माया में क्षित" तिलिपी को ।। ६६ परिसरमा भिर ! 15 । -- ܀ ,-ܟܼ ܕܨܨܕ:; ܆ 1 १२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं । सु० ६-७ गा. १२-४३ कहणं ति-अक्खेवमादियाहि कहाहि धम्मकहणं । तत्थ कुद्धाण वि आगताणं तस्स वाणी व्याणि जणेति, किमंग पुण धम्मस्सवणहमागताणं ? । अहवा पाढो-"लुसवण" ति तत्थ सवण त्ति-कागा, तेमु मुई जणे त्ति सुस्सवणा, एवं हकारलोवातो भण्णति । अहवा गुस्सवणा सुहसवा इत्यर्थः। सेसं कंठं ।। ४० ।। इमा वि दुस्सगगिणो चेच चलणथुती- सुकुमाल० गाहा । पचयणं-दुवालसंगं गणिपिडगं जम्स अस्थि सो पावयणी, गुरवो त्ति कातुं बहुवयणं भणितं । सेस कंठं ॥४१॥ एस णमोकारो आयरिययुगप्पहाणपुरिसाणं विसेसग्गहणातो कतो। इमा पुण [जे० १९१ प्र०] सामण्णतो मृतविसिहाण केजइ- जे अण्णे भगवंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । ते पणमिऊण सिरसा णाणस्स पैरूवणं वोच्छ ।॥ ४२ ॥ ॥ थेरावलिया सम्सत्ता ॥ जे अण्णे० गाहा । कंठा ॥४२॥ एतं च नाणपरूवणज्झयणं अरिहस्स देजति, णो अणरिहस्स देज्जइ । जतो भणितं- [सुत्तं ६] सेलघण १ कुडग २ चालणि ३ परिपूणग ४ हंस ५महिस ६ मेसे ७ य ।। मसग ८ जलूग ९ विराली १० जाहग ११ गो १२ मेरि १३ आभीरे ॥४३॥ सा समासओ तिविहा पण्णता, तं जहा-जाणिया १ अजाणिया २ दुब्बियड्ढा ३। ६. सेलघण० गाहा । एत्थ अरिहा इमे कुढेसु-अप्पसत्यवम्मसारिच्छा, पसत्यभावितेमु य अवम्मसा- रिच्छा। तहा हंस-मेस-जलूग-जाहगसारिच्छा अरिहा, गो-भेरी-श्रीमीरेसु य पसत्योवणतोवणीता अरिहा । सेसा अणअरिहा ॥४३॥ इमस्स य नाणपख्वणझयणस्स परूवणे परिसा जाणिगाइ तिविहा जाणितव्या । तत्थ जाणिया- गुण-दोसविसेसण्] अणभिग्गदिता य कुस्मुइ-मतेमु । सा खलु जाणगपरिसा गुणतत्तिल्ला अगुणवजा ॥१॥ -- 15 ५ 20 [ कल्पभा. गा. ३६५ ] १ फिजइ दा० ॥ २ बंदिऊण सं०। घंदितृण P॥ ३ परूयणं खं० ॥ ४ आभीरी सर्वास्वपि सूत्रप्रतिपु । एप एव पाठ श्रीहरिभद्र मलयगिरिभ्यां व्याख्यातोऽस्ति ॥ ५ एतत्सूत्रानन्तरं जे. २० मो० शुसं० मु० प्रतिषु चूणि-वृत्तिद्भिरथ्याख्यातोऽधिकोऽयं प्रक्षिप्तः रामाभास: पाठ उपलभ्यते- आणि जद्दा- खीरमिय जहा हंसा जे घुटृति इ६ गुग्गुणसमिद्धा । दोसे य विवज्जती तं जाणतु जाणिय परिस ॥ यमाणिआ जहा- जा होइ पगइमहुरा मियछावय-सीह-कुकुडगभूया । रयणमिव असंठविया अजाणिया सा भवे परिसा ॥ धुव्यिपढा जद्दा- न य कत्थइ निम्माओ न य पुच्छइ परिभवस्स दोसेण । यत्थि ब्ब चायपुपणो फुट्टइ गामेल्लयवियो । एलादियो जम्० प्रताधियं टिपणी केनापि विदुषा टिपता या जाणियत्यारभ्य एतद् गाथाग्रयं वृत्ती न मास्सातम्, अनोऽन्य सम्भाव्यते ।" इति ।। ६ भाभीरीम् आ० ॥
10 परिसा णाणपरूवणा य] सिरिदेववायगविरड्यं णंदीसुत्तं । १३ इमा अजाणिया- पगतीमुद्धमजाणिय मियछावय-सीह-कुक्कुरगभूता । रयणमित्र असंठविता मुहसग्णप्पा गुणसमिद्धा ॥२॥ [ कल्पभा. गा. ३६७ ] इमा दुब्बियड्ढा- किंचिम्मत्तग्गाही पल्लवगाही य तैरियगाही य । दुवितड्ढिया उ एसा भणिता तिविहा भवे परिसा ॥३॥5 [ कल्पमा. गा. ३६९] एत्थ जाणिया अनाणिया य अरिहा ॥ एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेमु य दंसितेसु दुस्सगणिसीसो देववायगो साहुजणहितहाए इणमाह ७. णाणं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणियोहियणाणं १ सुयणाणं २ ओहिणाणं ३ मणपज्जवणाणं ४ केवलणाणं ५। ७. नाणं पंचविहं० इत्यादि । अस्य व्याख्या-णाती णाणं-अवबोहमेनं, भावसाधणो। अवा गज्जइ अणेणेति नाणं, खयोवसमिय-खाइएण वा भावेण जीवादिपदत्या णजंनि इति गाणं, करणसाधणो। अहवा गज्जति एतम्हि त्ति णाणं, नाणभावे जीवो नि, अधिकरणसाहणी । पंच इति संखा । विधिरिति भेदो । पण पण्णवितं प्ररूपितमित्यनर्थान्तरम् , अस्थतो तित्थकरेहि, मुनतो गणपरेहिं । अहवा पणा-युद्धी, पहाणपण अवाप्तं पण्णत्तं, सम्मनिटिणा लद्धमित्यर्थः । अहवा पहाणपण्णातो अवाप्त पानं, नित्यकरसमीवातो गणधरेहि । लद्धं ति वुत्तं भवति । अहवा पण्णा-युद्धी, तीए अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकर गणधरा-ऽऽयनिएहिं कहि ० १९१ वि०] बुद्धीए पण्णत्तमिति । तदित्तणेण अधिकतत्थं नाणं संवझनि । जे पुन्चमुत्रन्या पंच पानभेदा नेपां मतिपद- मभ्युपगमे जहासहो। अस्थाभिमुहो णियतो बोधी अभिनियोधः च एव पाकिमन्ययोपादानादाभिनिरो- धिकम् । अहया अभिनिवोधे भवं, तण निव्वत्तं, तम्मतं तप्पयोयणं वाऽऽभिणिवाधिक प्रहला भाना नदभिनिगुमाए. तेण वाऽभिणिबुझंते, तम्हा वाऽभिणि बुझते, तम्हि बाऽभिनिवुनप ननो प्राभिनिवाधिकः । म पवाभि- 20 णिवोधिकोपयोगातो अनन्यवादाभिनिवोधिकम् १ । तका नन्द्राणोनि. गंगा गुगनि. नया का प्रपोनि, तम्हि वा मुणेतीति मुतं । आत्मैव वा श्रुतोपयोगपरिणामादनन्यन्यामानानि प्राम। माधीमा पनि अवधिः, नेण वाऽवधीयते, तम्हि वाऽवधीयते. अवधाणं वा अवधिः. मदिनाः गाए पगियानो दबादतो अवधीय(यं)त इति अवधी ३ । परि-सन्नतीभावण बन पाया. सांग गागोया पज्जयो मणपज्जवी, स एव नाणं मणपज्जवनाणं । तता पजवणं पजयः नामिकामा पयः पनाम:. ग :: एव नाणं मणपज्जयणाणं । तहा आयो पावणं लाभो इत्यनयन्तन मननों अदो पदो. गिरगांना पज्जायो मणपजायो, स एव नाणं मणपज्जय(?पजाय)णाणं । अरवा नमामि नमो का यामाग नेनु वा नाणं मणपजवनाणं । तटा मणमि मणलों का पजया [मणपजा मिलेगा । गमणपरायत्तेगो लामो भेदा य बहुपराबत्ता । मणपजयन्नि नाप नियने ।। . । १ जे गेलि एगयगुमा मिग ति भारी ॥ हरिय' at ? | : का त्यर्थः । “ रमा विमान 'सर' इति - मन । .. ::::
१४ जिणदासगणिगहत्तरविरझ्याप चुण्णी संजुर्ग [सु० ८-१४ "केवलमेगं सुद्धं सकलमसाधारणं अणंतं च ।" [विशेषा. गा० ८४] इत्यर्थः ५। नाणसहो य सञ्चत्याऽऽ- भिनिबोधिकादीण समाणाधिकरणो [जे० १९२ प्र०] दट्टयो, तं जहा-आभिनिवोधिकं च तं नाणं च आभिनि- वोधिकनाणं । एवं सन्वेसु देटुव्यं । पुच्छा य-किमेस मतिनाणादियो कमो ? पत्थ उत्तरं भण्णति-एस सकारणो उवण्णासो । इमे य ते कारणा-तुलसामित्तणतो सन्यकालाविच्छेद द्वितत्तणतो इंदिया-ऽणिदियणिमित्त- 5 तणतो तुल्लक्खतोवसमकारणत्तणतो सम्बदन्वादिविसयसामण्णतणतो परुक्खसामन्नत्तणओ य त भावे य सेसणाण- संभवातो अतो आदीए मति-सुताई कताई । तेसु वि य "मतिपुयतं सुतं" [सुत्तं ४३ ] ति पुव्वं मतिणाणं कतं, तस्स य पिट्टतो सुतं ति । अहवा इंदिया-ऽणिदियनिमित्तत्तणमविसिढे वि मति-गुतेसु परोवदेसत्तणमेत्तभेदातो अरिहंतवयणकारणतणतो य मतिविसेसत्तणतो य सुतस्स मतिअणंतरं मुतं ति । मति-सुयसमाणकालत्तणतो मिच्छ- इंसणपरिग्गहत्तणतो तन्विवज्जयसाहम्मत्तणतो सामिसाहम्मत्तणतो य कत्थइ कालेगलाभत्तणतो य मति-मुताणंतरं 10 अवधि त्ति भणितो । ततो य छउमत्थसामिसामण्णत्तणतो य पुग्गलविसयसामण्णतणतो य खयोवसमभावसाम- ण्णतणतो य पञ्चक्खभावसामण्णतणतो य अवहिसमणंतरं मणपजवनाणं ति। सबनाणुत्तमत्तणतो सबविसुद्धत्तणतो य विरतसामिसामण्णत्तणतो य सव्वावसाणलाभत्तणतो य सव्वुत्तमलद्धित्तणओ य तदंते केवलं भणितं ।। ८. तं समासओ दुविहं पण्णतं, तं जहा-पच्चक्खं च परोक्खं च । ८. सव्वं पेतं समासतो दुविधं-पञ्चक्खं च परोक्खं च० इत्यादि । इह अप्पवत्तव्बत्तणतो पुन्वं पञ्चक्खं 15 पण्णविज्जति । इह जीवो अक्खो । कहं ? उच्यते-" अशू व्याप्तौ " इति, णाणप्पणताए अत्ये असइ त्ति इचेचं जीवो अक्खो, णाणभावेण चावेति त्ति भणितं भवति । अहवा “अश भोजने" इच्चेतस्स वा सव्वत्थे असइ त्ति अक्खो, पालयति भुङ्क्ते चेत्यर्थः । अक्खं पति वदृति त्ति पञ्चक्ख, अणिदियं ति वुत्तं भवति । चसदाओ य से अवधिमादि- भेदा दहव्वा । अक्खातो [जे० १९२ द्वि० ] परेसु ज णाणं उप्पजति तं परोक्खं सभेदं चसदाओ इंदिय-मणो- निमित्तं ददृव्यमिति । ९. से किं तं पञ्चक्वं? पञ्चक्खं दुविहं पण्णतं, तं जहा-इंदियपञ्चक्खं च णोई- दियपच्चक्खं च । १०. से किं तं इंदियपञ्चक्खं ? इंदियपञ्चक्खं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-सोइंदिय- पञ्चक्खं चक्खिदियपञ्चक्खं घाणिदियपञ्चक्खं रसणेदियपञ्चक्खं फासिदियपञ्चक्खं । से तं इंदियपञ्चक्खं । ९. से किं तं पञ्चरखं ? पुच्छा । 'से' ति स पञ्चक्खनाणभेदो । 'किं तं' ति परिपण्हे, कतिभेदं ति युत्तं भवति । तं च किंसरूवं ? ति आयरियो पभेदमुवण्णसितुं तस्सरूवकहणेण पञ्चक्खसरूवं कहितुकामो आह-पञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तं ति। १०. इंदियं ति-पुग्गलेहिं संटाणणिव्यत्तिरूवं दबिंदियं, सोइंदियमादिइंदियाणं सव्वातप्पदेसेहिं स्वा- चरणपन्यतोवसमातो जा लद्धी तं भाबिंदियं, तस्स पञ्चक्खं ति इंदियपञ्चक्खं । तं पंचविहं । पर आह-णणु १ यत्तव्यं मो० ॥ २ द्वितित्त आ० ॥ ३ त्तत्तेण अविसिटे वि सति सुते वि परों आ०॥ ४ °णतो सम्मत्ता इकाले आ० ॥ ५ घेत्यर्थः आ० ॥ ६ परोक्न, तं चे, चस आ० ॥ ७ चक्युदिय सं० ॥ ८ जिभिदिय मो० मु० ॥ 20 25 ?
? 5 10 आणुगामियं अणाणुगामियं च मोहिणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । दबिंदियावत्थियपदेसमेत्तगहणतो सेसप्पदेसेमु अणुवलद्धी खयोवसमनिरत्यता वा भवति । आयरिय आह-ण एवं, पदीबदिटुंतसामत्थतो, जहा चतुसालभवणेगदेसजालितो पदीयो सव्वं भवणमुज्जोवेति तहा दबिंदियमेत्तप- देसविसयपडिवोधओ सब्वातप्पदेसोवयोगत्थपरिच्छेययो खयोपसमसाफल्लया य भवति त्ति ण दोसो। भाबिंदियो- वयारपत्रखत्तणतो एतं पचखं, परमत्थओ पुण चिंतमाणं एतं परोक्वं । कम्हा? जम्हा परा दबिंदिया, भाविदियस्स य तदायत्तप्पणतो ॥ ११. से कि तं णोइंदियपञ्चक्खं ? णोइंदियपञ्चक्खं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-ओहि- णाणपञ्चक्खं १ मणपज्जवणाणपञ्चक्खं २ केवलणाणपचरखं ३ । १२. से किं तं ओहिणाणपञ्चक्खं ? ओहिणाणपञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा- भवपञ्चतियं च खयोवसमियं च । दोन्हं भवपञ्चतियं, तं जहा-देवाणं च णेरतियाणं च । दोन्हं खयोवसमियं, तं जहा-मणुस्साणं व पंचेंदियतिरिक्ख जोणियाणं च । ११-१२. णोइंदियपञ्चक्खं ति इंदियातिरित्तं । तं तिविहं ओहिमादी। अबहि नि-मजाया, सा य रूविदव्वेन त्ति, "रूविस्सऽवधे" [तत्वा. अ. १ न्यू. २८] त्ति वयणातो. तमु णाणं ओहिनाणं । 'भवपचईतो' त्ति भणिते भण्णति--णणु औधी खयोवसमिते भावे, णरगादिभवो से उदइए भावे. कई भवपाहतो भणति ? त्ति, उच्यते-सो वि खयोवसमितो चेव, किंतु सो चेत्र खयोसमी परग-दंबभवन अवसं भवति नि दिनों पक्खीणं आगासगमणं च, एवं भवपञ्चइतो भण्णति । खोवसमियं पुण णर-तिरियाणं. ते णावन्न उप्प जति । नि खयोबसममवेक्वति ॥ खयोवसमसल्वं च मुत्तेणेव [जे० १.३ प्र० : भगिनं- १३. को हेऊ खायोवसमियं ? खायोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिग्णाणं खएणं अणुदिणाणं उवसमेणं ओहिणाणं समुप्पज्जति । अह्या गुणपडिवण्णस्म अणगारस्स ओहिणाणं समुप्पज्जति । १६. को हेतु त्ति इन्चादि । सो य वयोवसमो गणमंतरेण गणपटिनिनो मा भनि । गणना) गगणभन्छादिते अहापवत्तितो छिदेणं दिणकरकिरण व विणिमिता दयानि नाविभाग खयोवसमे अवधिलंभो अधापवत्तितो विष्णेतो। गुणपडियनिती-पहिया यादि । जनाना. चरणगुणविमुज्झमाणमवेकखातो अवधिणाण-दसणावरणाण वयोवनमा नगन । बाम ग मी - 1- उप्पज्जति ।। १४. तं समासओ छविहं पण्णतं, तं जहा-आणुगामियं: अमागामियं ५, वड्दमाणयं ३ हायमाणयं ४ पडिवाति ५ अपडिवाति ६ । १४. आणुगामियं ति । अणुगमणनीली अणुगामितो. नदार टो गोषण व ॥ { गणिद प्रम-निर्दचनात्मयमपि उपलभ्यते-ले दि.तं भवपाय! : टुपएं, जागर में कि. मोदममियं ! २ दुष्ट, तं जटा-ममाण र पंधियतिरिका ! जिभि समय उनं सन्मतम् । : दिपा .
पा मणि या पदीयं वा जोति वा पुरओ इति मु० पाठस्तु नास्मत्समीपस्थेपु आदर्शपु ईक्ष्यते ॥ ५ काउं समुव्वहमा' जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए गुणगीय राजुगं [स० १५-२३ १५. से किं तं आणुगामियं ओहिणाणं ? आणुगामियं ओहिणाणं दुविहं पणतं, जहा-अंतगयं च मज्झगयं च । १५. अंतगयं ति। जहा जलंतं वणंतं पञ्चतंतं, अविसिटो अंतसहो। एवं ओरालियसरीरंते ठितं गतं ति एगहें, च आतप्पदेसफड्डगावहि, एगदिसोवलंभाओ य अंतगतमोधिण्णाणं भण्णति । अहया सव्यातपदेसविमुद्देन वि रालियसरीरेगतेण एगदिसिपासणगतं ति अंतगतं भण्णति । अहवा फुडतरमत्यो भण्णति-एगदिसावधिउवलद्ध- त्तातो सो अवधिपुरिसो अंतगतो त्ति जम्हा तम्हा अंतगतं भण्णति । मझगतं पुण ओरालियसरीरमज्झे डुगविसुद्धीतो सव्वातप्पदेसविसुद्धीतो वा सबदिसोवलंभत्तणतो मज्झगतो ति भण्णति । अहवाऽवधिउवल- इखेत्तस्स वा अवधिपुरिसो मझगतो ति अतो वा मज्झगतो भण्णति ॥ १६. से किं तं अंतंगयं ? अंतगयं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-पुरओ अंतगयं ? मग्गओ अंतगयं २ पासतो अंतगयं ३ । १७. से किं तं पुरतो अंतगयं ? पुरतो अंतगयं से जहानामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलिअं वा अलायं वा मणि वा जोई वा पदीवं वा पुरओ काउं पणालेमाणे पणालेमाणे गच्छेज्जा । से तं पुरओ अंतगयं । १८. से किं तं मग्गओ अंतगयं ? मग्गओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे • उत्कं वा चुडलियं वा अलायं वा मणि वा जोई वा पईवं वा मग्गओ काउं अणुकड्ढेमाणे अणुकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से तं मग्गओ अंतगयं २ । १९. से किं तं पासओ अंतगयं ? पासओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणि वा जोई वा पईवं वा पासओ काउं परिकड्ढेमाणे परिकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से तं पासओ अंतगयं ३ । से तं अंतगयं । २०. से किं तं मझगयं? से जहानामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पई वा मत्थए काउं गच्छेज्जा । से तं मझगयं । ४ १७-१९ सूत्रेषु अलायं वा पदीयं वा मणि वा जोति वा पुरता इति पाठः सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु दृश्यते । न शूमि-वृत्तित्सम्मतः पाठः कुत्राप्यादर्श उपलभ्यते तथापि व्याख्याकृन्मतानुसारेणास्माभिः परावृत्त्य मूले पाठ सगुम्बदमाणे गच्छिना जे० मो० मु० ॥ १६-२०. उक्क त्ति-दीविया । चुडलि त्ति-तणपिंडी अग्गे पज्जलिता । अलातं ति-दारुयं जलंतं । मणि या जलंतं । जोइ त्ति-मल्लगादिठितं अगणिं जलंतं । पदीयो त्ति-दीवतो । 'पुरतो' ति अग्गतो 'पणोल्लणं' ति जे. मो० ॥ ३ अत्र १७-१९ सुनेपु चहुलिअम्बा अलायम्वा पदीवम्वा मणिम्वा जोतिम्वा इतिरूपः पाठः सं० प्रती वर्तते । १ सं० प्रती १६-१९ सूत्रेषु सर्वत्र अन्तगयं इति परसवर्णान्वितः पाठो दृश्यते ॥ 20 २ १७-१९ सूत्रेषु चबुलिभ इति पाठ १७ 10 भणाणुगामियं वड्डमागयं च ओहिणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । "णुद प्रेरणे" हत्यगहितस्स दंडग्गहितस्स वा परंपरेण नयनमित्यर्थः । 'मन्नतो' ति पिट्ठतो 'अणुकड्ढणं ति हत्यग्गहितस्स दंडग्गहितस्स वा अणु-पच्छयो कहणं ति । 'पासतो' ति वाहिणे वामे वा पासे सा(दो)पा- सयाजे० १९३ द्वि० ]जमलहितं । परिकड्ढियं ति-हत्य-डंडगट्टितं वा परि-पासतो द्वितस्स कड्हणं परिकवणं ।। सीसो पुच्छति- २१. अंतगयस्स मज्झगयस्स य को पइबिसेसो ? पुरओ अंतगएणं ओहिनाणेणं । पुरओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, मंग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, पासओ अंतगएणं ओहिणाणेणं पासओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणिवा जोयणाई जाणइ पासइ, मझगएणं ओहिणाणेणं सब्बओ समंता संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिणाणं । २१. अंतगतस्स० इचादि। आयरियाऽऽह-पुरतो० इञ्चादि । 'सन्चतो ति सचामृ वि दिसि-विदिसामु 'समंता' इति संचातापदेसेसु सव्वेमु वा विमुद्धफड्डगे। अहवा 'सव्वतो तिसव्वानु दिसि विदिसामु सन्चाताप देसफडगेम च । 'से' इति निदेसे अवधिपुरितस्स, 'मंता' इति णाता। अहवा "समता" इति समं दबायो तुल्ला यत्ता इति-प्राप्ता इत्यर्थः॥ २२. से कि तं अणाणुगामियं ओहिणाणं ? अणाणुगामियं ओहिाणं से जहा- 15 णामए केइ पुरिसे एगं महंत जोइहाणं काउं तस्सेव जोइटाणस्म परिपेरंतेहिं परिपेरंतेहि परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे तमेव जोईवाणं पासइ. अण्गस्थ गए ण पासई, यमेव अणाणुगामियं ओहिणोणं जत्थेव समुप्पज्जइ तत्थेव संसेज्जाणि या अनखेज्जाणि वा संबद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ. अगत्य गए ण पामः । से तं अणाणुगामियं ओहिणार्ण । २२. णो गच्छंतमणुगच्छति ति अणाणुगामिक, संकल्लापटिवदनिभदायका नायगासपो ममनाभनणतो अगाणुगामित्तं । परंतं ति-समंततो अंगणिमानण्यं नाम रोग टिमटिमा ममता परिघोलणं ति-पुणो पुगो इतो इतो परिसवाणं २३. से किं तं वड़माणयं ओहिणाणं ? हमाण मोहिमा पलायन - २३. वर्धनं वड्ढी, पुवावत्थातो उवरुवरि वड्ढमाणं ति, तं च उस्सण्णं चरणगुणविमुद्धिमपेख, ततो [ गु० २३ -२७ गा. १४.५१ जिणदासगणिमहत्तरविग्याए नुण्णीय संजुगं णहाणेसु बट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स विसुज्झमाणस्स विसुझगाणचरित्तस्स वओ समंता ओही वड्डइ । जावतिया तिसमयाहारगस्स सुहुमस्स पणगजीवस्स । ओगाहणा जहन्ना ओहीखेनं जहन्नं तु ॥ १४ ॥ सब्बबहुअगणिजीवा णिरंतरं जत्तियं मरेज्जंसु । खेत्तं सव्वदिसागं परमोही खेत्तनिदिह्रो ॥ ४५ ॥ अंगुलमावलियाणं भागमसंखेज्ज दोसु संखेज्जा। अंगुलमावलियंतो आवलिया अंगुलपुहत्तं ॥ ४६ ॥ हत्थम्मि मुहत्तंतो दिवसंतो गाउयम्मि बोद्धब्बो । जोयण दिवसपुहत्तं पस्वंतो पण्णवीसाओ ।। ४७॥ भरहम्मि अधमासो जंबुद्दीवम्मि साहिओ मासो । वासं च मणुयलोए वासपुहत्तं च रुयगम्मि ॥१८॥ संखेज्जम्मि उ काले दीव-समुद्दा वि होंति संखेज्जा । कालम्मि असंखेज्जे दीव-समुद्दा उ भइयव्वा ॥ १९ ॥ काले चउण्ह वुड्डी कालो भइयव्वु खेत्तवुड्डीए । वुड्डीए दब्ब-पज्जव भइयव्या खेत्त-काला उ ॥ ५० ॥ सुहुमो य होइ कालो तत्तो सुहुमयरयं हवइ खेत्तं । अंगुलसेढीमेत्ते ओसप्पिणिओ असंखेज्जा ॥ ५१ ॥ से तं वड्डमाणयं ओहिणणं । 0 15 20 पसत्यज्झयसाणातो य चरणा-ऽऽतविमुद्धी, चरणा-ऽऽतविमुद्रीतो य चरणपञ्चतलद्धीणं वड्ढी भवति । इमाओ य जद्दण्णुकांस-विमज्झिमोधिवढिदसणगाहाओ जहा पेढियाँप ॥ ४४-५१ ॥ १ सायट्टा' म. ॥ २ वड्ढमाण ल० ॥ ३ 'यीसं तु ल । वासंती २०॥ ४ वि शु० । य मो० ॥ ५ 'गाणय पं. ॥ ६ पसत्तगतो पसत्य आ• दा० ॥ ७ आवश्यकनियुकिपीठिकायां गाथाः ३०-३७ ॥
१९ . 5 वड्ढमाणयाइ ओहिणाणं तत्र्भेया य सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । २४. से किं तं हायमाणयं ओहिणाणं ? हायमाणयं ओहिणाणं अप्पसत्थेहि अन्झवसायट्ठाणेहिं वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकिलिस्समाणस्स संकिलिस्समाणव- रित्तस्स सब्बओ समंता ओही परिहायति । से नं हायमाणयं ओहिणाणं । २४. हाणि त्ति-हस्ससाणं, पुसावत्याती अशेऽयो हस्खमाणं । तं च वड्माणविपक्खतो भाणितत्वं । अप्प- सत्यलेन्सोवरंजितं चित्तं अणेगान्दुभत्वचिंतणपरं चित्तं संकिलिलु भगति ।। २५. से किं तं पडिवाति ओहिणाणं ? पडियाति ओहिणाणं जण्णं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेजतिभागंवा संखेजतिभागं वा बालगं वा बालगपुहत्तं वा लिक्खं वा लिक्खपुहत्तं वा जूयं वा जूयपुहत्तं वा जवं वा जवपुहत्तं वा अंगुलं वा अंगुलपुहत्तं वा पायं वा पायपुहत्तं वा वित्थि वा वियत्थिपुहत्तं वा स्यणि वा स्यणिपुहत्तं वा कुच्छि वा कुच्छिपुहत्तं वा धणुयं वा धणुयपुहत्तं वा गाउयं वा गाउयपुहत्तं वा जोयणं वा जोयणपुहत्तं वा जोयणसयं वा जोयणसय. 10 पुहत्तं वा जोयणसहस्सं वा जोयणसहस्सपुहत्तं वा जोर्यणलतसहस्सं वा जोयणसतसहस्सपुहत्तं वा जोयणकोडिं वा जोयणकोडिपुहत्तं वा - जोयणकोडाकोडिं वा जोयणकोडाकोडिपुहत्तं वाद- उक्कोसेण लोगं वा पासित्ता णं पडियएज्जा । से तं पडियानि ओहिणाणं । २२. उप्पणादिनाणग्स पुणो पाती नि पडिवाती, नागेन्याः । न खनविमेनोनलंगा भनि । ते य इमे-असंन्पयंगुलभागादिया । दुप्पभिति जाव णच ति अंगल पहनं भागनि । दहमा गुनी। पदिनानियो । जाव उधामो लोगमेत एव ।। २६. से कितं अपडियाति ओहिणाणं ? अपडियानि ओहिणान जेणं अयोगम एगमवि आगासपैदेसं पासेज्जा तेग परं अपरिवानि ओशिवानं । सेन अपडियानि ओहिणाणं ।
२० पासइ २। जिणदासगगिमहत्तरविरझ्याग चुणगीय मंजुर्ग (मु० २८.२९ गा. १२ सव्वाई रूविदव्वाई जाणइ पासइ १ । खेतओ णं ओहिणाणी जहणणेणं अंगुलस्स असंखेज्जतिभागं जाणइ पासइ, उकोसेणं असंखेज्जाई अलोए लोयमेत्ताई खंडाई जाणइ कालओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं आवलियाए असंखेज्जतिभागं जाणइ पासइ, उझोसेणं असंखेज्जाओ उस्सप्पिणीओ अवसप्पिणीओ अतीतं च अणागतं 5 च कालं जाणइ पासइ ३ । भावओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं अणते भावे जाणइ पासइ, उकोसेण वि अणते सावे जाणइ पासइ, सव्वभावाणमणंतभागं जाणइ पासइ ४ । २७. वित्थरेण खयोवसमविसेसतो असंखेजविधमोधिण्णाणं, ओधिमादिगतिपज्जबसाणं वा चतुइसविध- वित्थरो, ते पडुच इमं चतुविहं समासतो भण्णति दव्यादि । दन्यओ ओधिण्णाणी जहण्णेणं तेयाभासंतरे अणंते दव्वे उबलभति, उक्कोसतो सव्वविदवाई । जाणइ ति नाणं, तं च जं विसेसग्गाहगं तं गाणं, सागारमित्यर्थः । 10 पासति त्ति दसणं, तं च ज सामण्णग्गाहगं तं दंसणं, अणागारमित्यर्थः । खेत-कालतो य सुत्तसिद्धं । भावतो ओधिण्णाणी जहण्णेणं अणते भावे उचलभति, उक्कोसतो वि अणते, जहण्णपदातो उक्कोसपदं अणंतगुणं । उकोसपदे चि जे भाषा ते सवभावाण अणंतभागे वहति ।। २८. ओही भवपञ्चतिओ, गुणपञ्चतिओं य वण्णिओ एसो । तैस्स य बहू वियप्पा, दव्वे खेत्ते य काले यं ॥ ५२ ।। से तं ओहिणाणं । २८. ओधी भव० गाधा । दन्यतो बहू विगप्पा परमाणुमादिदम्वविसेसातो। खेत्ततो वि अंगुलअसं- खेयभागविकप्पादिया । कालतो वि आवलियअसंखेज्जभागादिया। भावतो वि वण्णपज्जवादिया ॥ ५२ ।। मणपज्जवनाणमिदाणि । तस्स सरुवं वणितमादीए पत्रम् १३] । इदाणि सामी विसेसिज्जइ पुच्छुत्तरेहिं- २९. [१] से किं तं मणपज्जवणाणं ? मणपज्जवणाणे णं भंते ! किं मर्गुस्साणं 20 उप्पॅज्जइ अमणुस्साणं? गोयमा! मणुस्साणं, णो अमणुस्साणं । [२] जइ मणु- स्साणं किं सम्मुच्छिममणुस्साणं गम्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! णो सम्मुच्छिम- मणुस्साणं, गम्भवतियमणुस्साणं । [३] जइ गम्भवकंतियमणुस्साणं किं कैम्मभूम- १ लोयापमाणमेत्ताई सं० सं० विना ॥ २ ओसप्पिणीओ उस्तप्पिणीओ मो० सं० ॥ ३ °सेणं पि अणते ० ॥ ४ 'भागो सं० । चूणिकता हरिभद्रपादानां चायभव पाठः सम्मतः ।। ५ इत्याद्यावश्यकनियुक्ति२७-२८- गाधायुगलोक्तानि चतुर्दशा द्वाराण्यत्राययोद्धव्यानि ॥ ६ वणिओ दुविहो इति वृत्तिकद्धयां निर्दिष्टः पाठभेदः ॥ ७ तस्सेय सं० ॥ ८ बारमातमगाथानन्तरं सर्वष्यपि सूत्रादर्शपु हरिभारिपाद-मलयगिरिचरणव्याख्याता एका गाथाऽधिका उपलभ्यते- रतिय-देव-तित्थंकरा य ओहिस्सऽवाहिरा दौति । पासंति सचो खलु सेसा देसेण पासंति ॥ ९ सम्मनं दोदि ० ॥ १० गाणपञ्चपलं मु० ॥ ११ पुब्धमुत्तेहिं आ० ॥ १२ गाणं भंते ! जे० मो० ॥ १३ मणूसाणं • । एमऽरि अस्मिन् एत्र (२९) सर्वत्र सेयम् ।। १५ कम्मभूमि मो• मु० । एसपि पर्या अस्मिन् पत्रे (२९) सेयम् ।। 15 . ओही खेत्त परिमाणे." १४ उपजइ इति सं० सं० नास्ति ।। ४ मोहिण्णाणस्स भेया मणपन्जवगाणं च ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीनुत्तं । २१ गगव्भवकंतियमणुस्साणं अकम्मभूमगगमवकंतियमणुस्साणं अंतरदीवगगम्भवतियमणु- स्साणं? गोयमा ! कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं. णोअकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो अंतरदीवगगम्भवतियमणुस्साणं । [१] जइ कम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं किं संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवतियमणुस्सागं असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भ- वतियमणुस्माणं ? गोयमा ! संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंनियमणुस्सागं. णो । असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवतियमशुस्साणं । [५] जइ संखेज्जवासाउयकम्मः भूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं पज्जत्तगसंखेज्जयामायकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंनियमणुस्साणं ? गोयमा ! पज्जत्तगसंग्वेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्लाणं, णो अपज्जत्तगयंखेज्जामाउयकम्मभूमगगम्भ- चक्रतियमणुस्साणं। [६] जइ पज्जत्तगसंखेज्जवायाज्यकम्मभूमगगभनियमगुस्साणं 10 कि सम्मदिडिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवनियमणुम्मागं मिन्यदिद्विपज्ज- त्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवदंतियमणुस्माणं सम्मामिच्छदिद्विपज्जनगसंवेज्जवा- साउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! मम्मदिहिपज्जत्तगमवज्जयासाउयक- म्मभूमगगम्भवयंतियमणुस्साणं, णो मिच्छदिद्विपज्जत्तगनखज्जबागाउयकम्मभूमगगम्भव- फंतियमणुस्साणं. णो सम्मामिच्छदिद्विपज्जत्तगयंखेजवानाउयक्रममगगभवनियमणु- 13 ससाणं । [७] जइ सम्मद्दिटिएज्जत्तगखेज्जयामाग्यकामगाभयांनियमण- स्साणं किं संजयसम्मबिट्ठिपज्जनगसंवेज्जवानाउयकामगारनियमनागं अगंज- यसम्मद्दिविपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भव नियममा जयागंजयमम्माधि- ट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवनियममा गीता जयसिद्रि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्ममगगन्भवतिरमणमा जाहिदिनना: संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवपंनियमणुगाणं. गोजमायजिन- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुम्माणं । [हिना मंग्वेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमन्माणं शिकवादिदि बामाउयकम्मभूमगगमवतियमणुम्लाणं अपमननयमादितिमालामाल कम्मभूमगगम्भवतियमणुस्नाणं ! गोषमा : अनजाहिदिनमा ज्यकम्मभूमगगम्भवपतिवमणुम्लाणं, णो पनत्तनंतनाम दिन अलि । अदि । । ल २२ ग० ३०.-३२ ३०. रिज़ मती उज्जुमई, सामण्णग्गाहिणि त्ति भणितं होति । एस मणोपज्जायविसेसो ति। ओसणं जाणति । विपुला मती विपुलमती, बहुविसेसग्गाहिणि त्ति भणितं भवति । मणोपज्जायविसेसे जाणति, दिलुतो जहा-णेण घडो चिंतितो, तं च देस-कालादिअणेगपज्जायविसेसविसिहं जाणति ॥ अहवा रिजु-विपुलमतीणं इमं जिणदासगणिगहत्तरविरइयाग गुण्णीप संजुरां म्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [९] जइ अपमत्तसंजयसम्म हिद्विपज्जत्तगसंखे- ज्जवासाउयकम्मसूमगगव्सवलियमणुस्साणं किं इडिपत्तअपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तग- संखेज्जवासासाउयक्रम्मभूमगगमवकंतियमणुस्साणं अणिडिपत्तअपमत्तसंजयसम्मदिट्ठि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्ममगगम्भवमंतियमणुस्साणं ? गोयमा! इड्डिपत्तअपमत्तसंजय- 5 सम्मदिहिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो अणिविपत्तअपम- तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगभवतियमणुस्साणं मणपज्जवणाणं समुप्पज्जइ । २९. किं मणुस्सा० इत्यादि । सम्मुच्छिममणुस्सा गम्भवातियमणुस्साण चेव वंत-पित्तादिमु संभवंति । कन्मभूमगा पंचसु भरहेसु पंचसु एरवदेसु पंचमु महाविदेहेमु य । हेमवतादिमु मिधुणा ते अकर्मभूमगा । तिण्णि 10 जोयणशते लवणजलमोगाहित्ता चुलहिमवंतसिहरिपादपतिहिता एगृरुगादि छप्पण्णं अंतरदीवगा । किं पज्जत्ताणं अपज्जत्ताणं ? ति । प्रज्जत्ती णाम-सत्ती सामत्थं । सा य पुग्गलदव्योपचया उप्पज्जति । ताओ य छ पज्जत्तीतो- आहार-सरीर-इंदिय-आणापाणू-भासा-मणपज्जत्ती चेति । तत्थ एगिदियाणं चउरो, विगलिंदियाणं पंच, अस्सण्णीणं संववहारतो पंच चेव, सण्णीणं च छ । तत्थ आहारपज्जत्ती नाम खल-रसपरिणामणसत्ती आहारपज्जत्ती । सत्तधातुतया परिणामणसत्ती सरीरपज्जत्ती । पंचण्डमिंदियाणं [जे० १९४ द्वि० ] जोग्गा पोग्गला चियित्तु अणाभोगनिव्वत्तित- 15 विरियकरणेण तव्भावणयणसत्ती इंदियपज्जती। [उस्सास]पोग्गलजोग्गाणापाणुण गहण-णिसिरणसत्ती आणा पाणुपज्जत्ती। वइजोग्गे पोग्गले घेत्तूण भासत्ताए परिणामेत्ता बइजोगत्ताए निसिरणसत्ती भासापज्जत्ती । मण जोग्गे पोग्गले घेत्तूणं मणत्ताए परिणामेत्ता मणजोगत्ताए निसिरणसत्ती मणपज्जत्ती । एताओ पज्जत्तीओ पज त्तयणामकम्मोदएणं णिव्यत्तिज्जति, ता जेसि अस्थि ते पज्जत्तया । अपज्जत्तयणामकम्मोदएणं अणिवत्तातो जेसि ते अपज्जत्तया । अप्पमत्तसंजता जिणकप्पिया परिहारविमुद्धिया अहालंदिया पडिमापडिवण्णगा य, एते 20 सततोययोगोषउत्त्तणतो अप्पमत्ता । गच्छयासिणो पुण पमत्ता, कण्डा अणुवयोगसंभवतातो । अहवा गच्छवासी णिग्गता य पमत्ता वि अप्पमत्ता वि भवंति परिणामवसओ। 'इटिप्पत्तस्से ति आमोसहिमादिअण्णतरइड्ढियत्तस्स मणपज्जयनाणं उप्पज्जइ ति । अहवा 'ओहिनाणिणो मणपज्जवनाणं उप्पजति ति अण्णे नियम भणंति ॥ ३०. तं च दुविहं उप्पज्जइ, तं जहा-उज्जुमती य विउँलमती य । -- ता जेसि आ० ।। ५तं च दुविह उप्पलाइ इति खं० सं० नास्ति ।।६उपजइ इति शु० नास्ति ।। ७ विमलमती सं॥ दव्यादीहिं विसेससख्यं भण्णति- १ सामत्यतो य आ० ।। २ ला विचिणिसु अणा आ० ॥ -' ४ अणिहिता ३ तभावापायण' आ० दा० ॥
२३ मणपनवगाणं तस्सामी तन्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीयुत्तं । ३१. तं समासओ वउविहं पण्णत्तं, तं जहा-देव्यओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं उज्जुमती अणंते अणंतपदेसिए खंधे जाणइ पासइ, ते चेव विउलमती अन्भहियतराए जाणति पासति । खेनओ णं उज्जुमती अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उवरिमहेहिल्लाई खुड्डागपयराइं उ8 जाव जोतिमस्त्र उवरिमतेले निरियं जाव अंतोमणु- ससखित्ते अड्डाइज्जेसु दीव-संमुद्देसु सुण्णीणं पंचेंदियाणं पज्जत्तगाणं मणोगते भावे जाणइ 5 पासइ, तं चेव विउलमती अड्डाइजेहिं अंगुलेहि अमहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं "खेत्तं जाणति पासति । कालो णं उज्जमती जहण्णेणं पलिओ- बमस्स असंखेज्जतिभागं उक्कोसेणं पि पलिओवमस्स असंखेजतिभागं अतीयमणागयं वो कालं जाणति पासति. तं चेय विउलमती अब्भहियतरागं विउलनरागं बिसुद्धनरागं विति- मिरतगगं जाणइ पासइ । भावओ णं उज्जुमती अगते भावे जाणइ पालइ सयभा- 10 वाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अभहियतरागं विउलतरागं विसुद्धत- रागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ । ३२. मणपज्जवणाणं पुण जणमणपरिचिंतिवत्यपायडणं । माणुसखेत्तणिबद्धं गुणपन्चइयं चरितवओ ।। ५३ ।। से तं मणपज्जवणाणं। .. -- 1 १ दध्यमो ४ । दचओ ट० ॥ २ तत्थ पनि , . . ' : Earriage दिनिमितराए जाणति ० ० मो० ल. । अायिनग fun.ariff... .. पाठदयोः प्रथमः सूत्रपाठभेदः श्रीमलयगिरिपार पालो । मगरातकाहिलीयोदेशके मनापर्यवज्ञानविषयकानन्यायागानगरे जाहीय.. पूर्णि-भिवृत्तिसम्मलरनु राम्रपाठः १० भावी ए उपलयते ॥ गरे बार मु० । नोपलभ्यते यस्मिभिदायाऽयं पार, जि .. पर्नने । अपि च श्रीअभयदेशाचायणानि भगत्यां मामी मापि विशेरावयवादी नदीवा.ि या गनापर्यशान का गहिर दागपरेलु उरट ० । गिरि kie ॥ ८ 'समर एण्णासरतु ममीर तोमर 7 2. मोल गु० । श्रीनिमयदेवाचार भगवत्याना : ( दि.गु मो० ॥ to NErयतरं विलत दिन :-- : साग: ॥ ११ हे..' re नका...: ॥ मादी... पर ना . ॥ ६५ : निति भगवा मादीमा :.:. दिल k -- - जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याग चुण्णीग संजुयं [मु. ३३- ३१-३२. सणिणा मणत्तेण मणिते मणोखंधे अणंते अणंतपदेसिए दबट्टताए तग्गते य चण्णादिए । मणपज्जवनाणेणं पञ्चवं पेक्खमाणो जाणाति त्ति भणितं । मणितमत्थं पुण पञ्चक्खं ण पेक्खति, जेण मणार मुत्तममुत्तं वा, सो य छदुमत्थो तं अणुमागतो [जे० १९५ प्र०] पेक्वति ति अतो पासणता भणिता । अ छदुमत्थस्स एगविहखयोवसमलंभे वि विविधोपयोगसंभवो भवति, जहेत्थेव रिजु-विपुलमतीणं उपयोगो, . 5 विसेस-सामण्णत्थेलु उवउज्जतो जाणति पासइ त्ति भणितं, ण दोसो । विपुलमती पुण दबद्वताए वण्णादिएगी अधिगतरं जाणतीत्यर्थः। उपरिमहेहिल्लाई खुल्लागपतराई ति इमस्स भावणत्थं इमं पण्णविज्जति-ति लोगस्स उड्ढाऽहअद्वारसजोयणसइयस्स बहुमज्झे एत्थ असंखेयंगुलभागमेत्ता लोगागासप्पयरा अलोगेण संर्वा सव्वखुड्डलतरा खुड्डागपतर ति भणिता, ते य सव्वतो रज्जुप्पमाणा। तेसिं जे बहुमज्झे दो खुड्डागपतरा तेर्सि बहुमज्झे जंबुद्दीवे रतणप्पभपुढविवहुसमभूमिभागे मंदरस्स बहुमज्झे एत्य अठ्ठप्पदेसो रुयगो,-जत्तो दिसि-नि 10 सिविभागो पबत्तो,-एतं तिरियलोगमज्झं । एतातो तिरियलोगमज्झातो रज्जुप्पमाणखुड्डागप्पतरेहितो उ तिरियं असंखेयंगुलभागअसंखेयंगुलभागवड्ढी, उपरिहत्तो वि अंगुलअसंखेयभागारोहो चेव, एवं तिरियमुर्वा अंगुलअसंखेयभागवड्ढीए ताव लोगवड्ढी गेतवा जाव उड्ढलोगमझं, तातो पुणो तेणेब कमेणं संवट्टो कात उवरिलोगंतो रज्जुपमाणो । ततो य उड्ढलोगमज्झातो उपरि हेटा य कमेण खुडागप्पतरा भाणितया जाव रज्जुप्पमाणा खुड्डागप्पतर त्ति । तिरियलोगमज्झरज्जुप्पमाणखुड्डागप्पतरेहितो पि हेटा अंगुलअसंखेयभागव 15 तिरियं, अहोवगाहेण वि अंगुलस्सअसंखभागो चेव, एवं अहेलोगो बड्ढेतब्बो जाव अहेलोगंतो सत्त रज्जूउ सत्तरज्जूपयरेहितो उपरुपरि कमेण खुड्डागप्पतरा भाणितच्या जाच तिरियलोगमज्झरज्जुप्पमाणा खुड्डागप्पतर एवं खुड्डागपरूवणे कते इमं भण्णति-उपरिमं ति-तिरियलोगमज्झातो [जे० १९५ द्वि० ] अहो जाव णव जो सता ताब इमीए रयणप्पभपुढवीए उवरिमखुड्डागपतर ति भण्णति । तदहो अहेलोगे जाव अहेलोइयगामवति ते हेहिमखुड्डागप्पतर त्ति भण्णति, रिजुमती अधो ताव पश्यतीत्यर्थः । अहवा अहेलोगस्स उवरिमा खुड्डागप्प 20 तिरियलोगस्स य हेठिमा खुड्डागप्पतरा ते जाव पश्यतीत्यर्थः । अण्णे भणंति-~~-उवरिम त्ति-अधोलोगोपरिद्विता जे ते उवरिमा । के य ते ? उच्यते---सव्वतिरियलं वत्तिणो तिरियलोगस्स वा अहो णवजोतणसतवत्तिणो ताण चेव जे हेद्विमा ते जाव पश्यतीत्यर्थः, इमं ण घड अहेलोइयगाममणपजवणाणसंभवपाहण्यत्तणतो । उक्तं च- इहाधोलौकिका ग्रामा न तिर्यग्लोकवर्तिनः। मनोगतांस्त्वसौ भावान् वेत्ति तद्वर्तिनामपि ॥१॥ 25 [ अड्ढातियंगुलग्गहणं उस्सेहंगुलमाणतो। कहं णजति ? उच्यते--"उस्सेहपमाणतो मिणे देह" [वृहत्संग्र गा. ३३५] ति वयणातो। अंगुलादिया य जे पमाणा ते सव्वे देहनिप्फण्णा इति, णाणविसयत्तणतो य ण.... रिजुमतिरोत्तोचलंभप्पमाणातो विपुलमती अन्भतियतरागं खेत्तं उबलभइ ति। एगदिसि पि अभतियसंभवो भ नि समंततो जम्हा अभइयं ति तम्हा विपुलतरागं भण्णति । अहवा जहा घडो घडातो जलाहारत्तणतो अब्भति 30 सो पुण नियमा घडागासखेनेण विउलतरी भवति एवं विउलमती अभतियतरागं मणोलद्धिजीवदन्वाधारं गाणति, नं च नियमा विपुलतरं इत्यर्थः । अहवा आयाम-विक्खंभेणं अभइयतरागं वाहल्लेण विउलतरं र ६ अंतेलोगोपरिट्टितो ले ज० ॥ २ संभववाहल्लत्तणतो आ० दा. हरिभद्रवृत्तौ च ॥ महापारिफ्लो चरण दो सा० रिनु आ० ।। ४ आ. दा. आवृत्त्योः एतत्स्त्रचूर्णी सर्वत्र अभतिय स्थान अभदिय इति यो ३ ण दोसो। रिजु केवलगाणं तब्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीनुत्तं । २५ उपलभत इत्यर्थः। अहवा दो वि पदा एगहा । विसिविमुद्रिविसेसदसगो तरसहो त्ति, यथा शुलः शुक्लतर इति। किंच--जहा पगासगदचविसेसातो खेत्तविमुखि(डी) विसेसेणऽक्खिजति तहा मणपन्जवनाण-चरणवितेसातो रिजुमणपज्जवणाणिसमी जे० १९६ प्र०बातो विपुलमणपज्जवणाणी विमुद्धतराग जाणति, मणपजवनाणाव- रणवयोवसमुत्तमलंभत्तणतो वा वितिमिरतरागं ति भण्णति । अहवा पुचबद्धमणपज्जवनाणावरणसयोवसमुत्तमलंभ- तणतो विमुद्धं ति भणितं तस्सेवाऽऽवरणबजमाणस्सऽभावत्तणतो पुचवलम्स य अणुदयत्नणतो वितिमिरतराग-ति । मध्यति । अवा दो वि एते एगट्ठिया पदा । मणपजवनाणम्य सेन कंठं ।। द्वाणि केवलनाणं भणति, मण- पज्जवनाणाणंतरं नुत्तकमुहिछत्तणतो विद्धिलाभुत्तमयों व केवलं भगति- ३३. से किं तं केवलणाणं ? केवलणाणं दुविहं पण्णत्तंतं जहा-भवत्य केवलणाणं व सिद्धकेवलणाणं च २. से किं तं केवलेत्यादि सूत्रम् । केवलनाणमभेद वि मंदो भव-निशावयादि अणेगा इमो 10 कन्जति-मणुम्सभवद्वितस्स जं केवलनाणं तं भवत्थकंवलनाणं । चनही उम्सणं मददसणे । सचम्मविषमुको सिद्धा, तस्स जणाणं तं सिद्धकेवलनाणं ॥ ३४. से किं तं भवत्थकेवलणाणं ? भवत्यदेवलणाणं दुविहं पण्गतं. तं जहा-जो- गिभवत्यकेवलणाणं च अजोगिभवत्यकेवलनाणं च । ३४. मणादितो जोगी, सा य जहासंभवातो, तण मह जोगण नलीनी. नन्न नामजीनिमवय : केवलणाणं । अजोगी-सव्वजोगनिदो सइलेमभावहिनी, नन्य जगावं ने अयोनिमवयनमा ।। ३५. से किं तं सजोगिभवत्यकेवलणाणं ? रजोगिभवत्य संयन्त्रमाणं दुवि पणनं. तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्यकेवलणाणं च अपदमसमयमजोगिमपन्यवरणानं च. अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अनरिमन्नममनोगियांगणा। से तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३६. से कितं अजोगिमवत्थकेवलणाणं ? मनोगिमावला कि पान. नं जहा-पदमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं अपनानायनागिन पकटमा च अहवा चरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं व अनमिनमानानिमाया। से सं अजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३५-३६. पदमसमया-वेचलणाणप्पनिलमदोर. पदन ...' :: ল। গ ৰা নাবি ও কেন- पर अयोगी भविष्यतीत्यर्थः । अपरिमोनि-रिलीन न.. परमरमयों ताद अदरमसममा नजनि. एनम ने 37 ५ दिलिदिले हो रुपित १ 10 २६ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याण गुणगी संजुर्ग ३७. से तं किं सिद्धकेवलणाणे ? सिद्धकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं केवलणाणं च परंपरसिद्ध केवलणाणं च । ३७. से किं तं सिद्ध केवलनाणेत्यादि सूत्रम् । तत्थ सिद्धकेवलणाणं दुविहं- णों समयंतरं पत्तं, सिद्धत्वप्रथमसमयवर्तिन इत्यर्थः ।। ३८. से किं तं अणंतरसिद्धकेवलणाणं ? अणंतरसिद्धकेवलणा तं जहा-तित्थसिद्धा १ अतित्थसिद्धा २ तित्थगरसिद्धा ३ अतित सिद्धा ५ पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ बुद्धवोहियसिद्धा ७ इथिलिंगसिद्धा णपंसगलिंगसिद्धा १० सलिंगसिद्धा ११ अण्णलिंगसिद्धा १२ गिहिलि १४ अणेगसिद्धा १५ । से तं अणंतरसिद्ध केवलणाणं । ३८. ते पंचदसविधा तित्थसिद्धाइया । 'तित्थसिद्धा' इति जे तित्थे सिद्धा चातुबण्णो समणसंघो पढमादिगणधरा वा, भणितं च आरिसे--"तित्थं भंते ! तित्थं ? [जे० गोतमा! अरहा ताव तित्थंकरे, तित्थं पुण चातुषण्णो समणसंघो" [भग. श. २८ तित्यकालभावे उप्पण्णे ततो वा तित्यकालभावातो जे सिद्वा ते तित्थसिद्धा १ । अति तित्यकालभावस्स वा अभावो। तम्मि अतित्यकालभावे अतित्थकालभावातो वा जे रि 15 अतित्थं तित्यंतरे तित्थे वा अणुप्पण्णे जहा मरुदेविसामिणिप्पभितयो २। रिसभादयो नि णामकम्मुदयभावे हिता तित्थकरभावातो वा सिद्धा तम्हा ते तित्थकरसिद्धा ३।। गोतमादि, तम्मि अतित्थकरभावे द्विता अतित्थकरभावातो वा सिद्धा अतित्थकरसिद्धा युद्धा, सतं अप्पणिज्ज वा जाइसरणादि कारणं पड़च्च बुद्धा सतंबुद्धा । स्फुटतरमुच्यते-- दास्ते स्वयंबुद्धा । ते य दुविहा-तित्थगरा तित्थगरवतिरित्ता वा । इह वइरित्तेहिं अ 20 वारसविहो चि उवही भवति, पुन्याधीतं से मुतं भवति वा ण वा । जति से नत्थि : पडिवज्जइ, गच्छे य विहरति । अह पुब्बाधीतमुतसंभवो अस्थि तो से लिंगं देवता पडिवज्जति । जइ य ऍगविहारविहरणजोग्गो, इच्छा व से तो एको चेव विहरति, अ एतम्मि भावे द्विता सिद्धा एतातो वा भावातो सिद्धा सयंबुद्धसिद्धा५ । 'पत्तेयबुद्धा' भिसमीक्ष्य युद्धाः प्रत्येकबुद्धाः। बहिःप्रत्ययमतियुद्धानां च पत्तेयं नियमा विधारो ज 25 जहा करकंडमादयो । किंच-पत्तेयबुद्धाणं जहण्णेण दुविहो उकोसेणं णवविधो उवही नि किंच-पनेयबुद्धाणं पुन्वाधीतं गुतं णियमा भवति, जहण्णेणं एकारसंगा, उकोसेणं ति देवता पयच्छति, लिंगवजितो वा भवति । जतो [जे० १९७ प्र०] भणितं-" रुप्पं पत्ते इति । एतम्मि भावे एतातो वा सिद्धा पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ । बुद्धबोधिता-जे सतंबुद्ध पनेययुद्धेहिं, या कविलादिएहिं बोधिता ते बुद्धयोधिता। अहवा बुद्धवोधिएहि बोधित 30 दिएहि अंबणामादयो भवंति । अहया बुद्ध इति-प्रतियुद्धा, तेहि प्रतियोधिता बुद्धयो १ सपणा जे या जाईया. दा. 11 २णितमा मो० ॥ ३ पगविधारविधरणजोग्गे केवलगाणं तमेया य] सिरिदेववायगविरड्यं गंदीयुत्तं । २७ एतभावे द्विता एतातो वा सिद्धा बुद्धबोधितसिद्धा ७ । 'सलिंगसिद्धा दलिगं प्रति रजोहरण-मुहपोत्ति-पडिन्गह- धारणं सलिंग, एतम्मि दवलिंगे हिता एतातो वा सिद्धा ललिंगनिना ८। 'अलिगसिद्धा तास-परिवाय- गादिवकल-कासायमादिदवलिंगट्टिता सिद्धा अग्णलिंगसिदा ९। एवं गिहिलिंगे वि-सादिअलंकरणादिए दव्य- लिंगे हिता सिद्धा निहिलिंगसिद्धा १० । इथिलिंग ति-इवीए लिंग इत्यलिंग, इल्लीए उपलक्षणं ति युतं भवति । तं तिविह-वेदो सरीरनिवत्ती जेवच्छंच, इह सरीनिवनीए अधिकारी, पवेद-णेच्छेहि । तत्य वेदे । कारणं-जम्हा वीणवेदो जहण्णेणं अंतोमुहुनातो उकालेण देवणापुञ्चकोडीती निति. गेवरा य अणियत- तणनी, तम्हा ण तहिं अधिकारी । सरीराकारणिचनी पुण णियमा वेदयानो णामशम्दयायो य भवति तम्मि सरीरनिवत्तिलिंगे ठिता सिद्धा तातो वा लिद्धा इथिलिंगनिदा ११ । एवं पुरिन-जनकलिंगा वि भाणितया १२.१३ । एकासिद्ध नि-एकम्मि समए एको चेत्र लिखी १४ । अणेगसिद्ध नि-एकम्मि समर अणेने लिया, दुगादि जान असतं ति । भणितं च- बत्तीसा अडयाला सट्टी बावत्तरी य बोधन्दा । चुलसीनी छग्गउती दुहिन अनुनमनं २ ॥१॥१५॥ दस गा. ३३३ चोदक आह-णणु एते एण्णास भेदा छभहितामणोनियावा भी कई पंचदमभेद नि पाना? आचार्य आह-गणु नित्यातिन्यपुरिलवि जे० १९.७ विभागप्पण्या गुणाकालदनो दो भा परोप- रविरुद्धा १, नहा नित्यगरणामकम्मुन्यानो अमावनी य दो मंत्रा पचविदा २. नहा लिंगादिया कानिंग- 1. पडिबनिभदा परोप्परविरुदा ३, नहा मोहनरपगडिवे भद्रोदयनी मिमादिनविजनी पापविदा ५. पना-गंगा वि एकाकालयहचारिता चरिननणनो भिण्णा', संयंत्रसादयो विनोमगावगानि बोधविसेवनणनी पनि विभिट्टा ६. एवं नित्यादियाण अग्णांनभाना बनाना.नि- जा मनिणाण गवादियाण चरिमपन्जरमाणाणं भगोगा जीविकोपानी गांगी? विच-नाणाणयाभिप्यायनणनी गुनग्य य अणंगगय-कायन नाशिक: दोनो ॥ दाणिं तं चेव सिद्धवावरणाणं समनभेदनी अगानि ३९. से किं तं परंपरसिद्ध केवलणाणं ? पनि गणित पणनं. जहा-अपदमसमयगिंदा दुनमयनिता निममनिका नाममा ममममिता संखेज्जसमयसिद्धा असंखेज्जयमसिला भणमामिला मनमान। से न सिद्ध केवलणाणं । १९. परमसमसिद्धन्य जी विनियमममित माणितम् । नच 'अपरमसगार यादि । नाम ::: चच परंपापिदिसणन्य प्रमः नग्न पालो लि: मिरर १ मेदा दिन सदा । पर.::. :::: म. . .:::..-: TEE १. की .. -- E पर दि. ५ 1 . ५...६ . नि . ..
२८ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णी, संजुगं ४०. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-देवओ खेत्तओ व तत्थ दव्वओणं केवलणाणी सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ । खेत्त सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं केवलणाणी सव्वं कालं भावओ णं केवलणाणी संव्वे भावे जाणइ पासइ । ४०. तं सव्वं पि चतुन्विहं दन्वादियं । 'सव्वदच' ति धम्मा-धम्मा-ऽऽगासातयो अणंतगुणा, तेहितो वि पुग्गलदव्या अणंतगुणा, एते सव्वे सरूवतो जाणति । खेत्तं पि लं गंतं सरूवतो जाणति । कालं पि समया-ऽऽअलियादियं तीयमणागतसव्वद्धं वा सरूवतो स. वि दुविधा भावा-जीवभावा अजीवभावा य । तत्थ जीवभावा कम्मुदयसतत्तपरिणामितला दिया कम्मुदयलक्खणा अणेगविधा, उवसम[जे० १९८ प्र०]-खय-खयोवसमजीवसतत्तल 10 पारिणामिता य जीव-भव्वा-ऽभवत्तादिया, अजीवाऽमुत्तदन्वेसु धम्माऽधम्मा-ऽऽगासा गति- अगुरुलहुगा य अणंता, पुग्गलदव्या य सुहुम-बादर-विस्ससापरिणता अभिदधणुमादिया : मादीण य वण्णादिपज्जवा एगादिया अणंता । एते व्यादिया सन्चे सव्वधा सवत्थ सन्चक ऽणागारलक्खणेहिं णाण-दसणेहिं जाणति पासति य । एत्य केवलणाण-दसणोवयोगेहि आयबुद्धीए पकप्ता इमं भणंति- केयी भणंति जुगवं जाणइ पासति य केवली नियमा। अपणे एगंतरियं इच्छंति सुतोवदेसेणं ।। १ ।। अण्णे ण चेव वीसुं दसणमिच्छंति जिणवरिंदस्स। जं चिय केवलनाणं तं चिय से दसणं वेति ॥ २॥ [विशेषण. गा. तत्थ जे ते भणति 'जुगवं जाणति पासति य' ते इमं उववत्तिं उवदिसंति- जं केवलाई सादी-अपज्जवसिताइं दो वि भणिताई । तो वेति केह जुगवं जाणति पासति य सव्वण्णू ॥ ३ ॥ किंच- इहराऽऽयी-णिहणत्तं मिच्छाऽऽवरणक्खयो त्ति व जिणस्स । इतरेतरावरणया अहवा णिकारणावरणं ॥४॥ तह य असवण्णुत्तं असव्वदरिसित्तणप्पसंगो य । एगंतरोवयोगे जिणस्स दोसा बहुविधीता ॥५॥ [विशेषण. गा. १ एवं परेण बहुधा भणिते आगमवादी उत्तरं इमं आह- भण्णति, भिण्णमुटुत्तोवयोगकाले वि तो तिनाणिस्स । मिच्छा छावट्ठी सागरोवमाइं खयोवसमो ॥ ६ ॥ [ विशेषण. गा. २० १ दबयो ४ । व्यसो ल० ॥ २ तत्य इति सं० सं० ल• शु० नास्ति ।। ३ 'व्वाति जा सं. ॥ ५ गु-दुयणुगादीण आ० दा० ॥ 15 - १ 20 - 25 ।
२९ - . 1 केवलणाण-दसणोवनोगवायथलं ] सिरिदेववायगविरश्यं गंदीमुत्तं । जहा छउमत्वस्स मति-मुता-ऽवधिणाणे अंतमुहुत्तकालोपयोगसंभवे उपयोगाऽणुयोगेण य छावहिसागरा से ठितिकालो दिहो, तहा जति जिणम्स णाण-दसणा सादिअपज्जवसाणा उपयोगाऽणुवयोगेण भवंति तो को दोसो ? । जति एतं ते णाणुमतं तो इमं ते कई अणुमतं भविस्य ?- अह ण वि एतं तो सुण, जहेव खाणंतराइओ अरहा । संते वि अंतरायक्वयन्मि पंचप्पगारम्मि ॥ ७ ॥ सततं ॥ देह [जे०१९८ हि लमह व मुंजा उवमुंजई यसवण्णू । कन्नम्मि देह लमह व भुंजइ व नव इयं पि ॥८॥ किंच- दितस्स लभंतस्स व भुजंतस्म व जिणस्म पम गुणो। खीणंतराइयत्ते जं से विवंण नभवति ॥ १॥ उवउत्तरसेमेव य णाणम्मि व दमणम्मि व जिगाल। खीणावरणगुणोऽयं, जं कमिणं मुणह पामति या ॥ १० ॥ कि. २०३-६ : पुणों पर आह- पासंतो वि न जाणइ, जाणं ३ ण पानी जनि जिमिंत्री। एवं ण कदाइ वि रो मचा मञ्चवचिनी ! उत्तरं आचार्य आह- जुगवमजाणतो चिहु चर्हि वि नाणेनि जनामा ! भण्णद. नरेव अरका सम्यण्ण रागिनी :: पर एचा557- तुम्हे उभयाररणय ग्याग्मि कमाया दुविधुरयोगामारे जिणार जुग :::: उत्तरं आचार्य आ.- भण्णति. ण पर निरमी नगwrite ! होय हपओगेण, एल्य र मासिन जा. जगप्पत्तीय दिसले मालमानि लाटर; पत्रि जुगयोपगोगो मग नांदकर किर--- भणितं पिरहीन सा जाणी पा पामति का 1 पद भयो .... । -- 7 मु० ४. - 5 10 15 ३० जिणदासगणिमहत्तरविरड्याप चुण्णी. संजुर्य जे भणंति केवलणाण-दसणाण एगत्तं ते इमं हेतुजुत्ति भणंति जह किर वीणावरणे देसन्नाणाण संभयो ण जिणे । उभयावरणातीते तह केवलदसणस्सावि ।। १७ ॥ एस ते हेतुजुत्ती जहा अत्थसाधणं ण संसहइ तहा उत्तर(रं) हेतजुत्तीए चेव भण्णति देसण्णाणोवरमे जह केवलनाणसंभयो भणितो। देसदसणविगमे तह केवलदंसणं होतु ॥ १८ ॥ अह देसनाण-दंसणविगमे तव केवलं मतं नाणं । ण मतं केवलदसणमिच्छामेत्तं णणु तवेदं ॥ १९॥ [विशेषण. गा. किंच- भण्णति जहोहिणाणी जाणति पासति य भासितं सुत्ते । ण य णाम ओहिदसण-नाणेगत्तं तह इमं पि ॥ २०॥ विशेषण. एवं पराभिप्पाये पडिसिद्धे एगंतरोवयोगता सिद्धा तह विमं भण्णति जह पासतु तह पासतु, पासति सो जेण दंसणं तं से। जाणइ य जेण अरहा तं से णाणं ति घेत्तव्यं ।। २१ ।। [विशेषण. किंच-सिद्धऽधिकारे एगंतरो जे० १९९ प्र० वयोगदसिगा इमा फुडा गाहा-- नाणस्मि दंसणम्मि य पत्तो पगतरयम्मि उवउत्ता सव्वस्स केवलिस्सा जुगवं दो णस्थि उवयोगा ॥ २२ ॥ [ विशेषण किंच भगवतीए--- उवयोगो पगतरो पणुवीसतिमे सते सिणायस्स । भणितो बिगडत्यो चिय छठ्ठद्देसे विसेसेतुं ॥ २३ ॥ [विशेषण. : किंच-- कस्स व णाणुमतमिणं जिणस्स जति होज दो वि उपयोगा। गृणं ण होति जुगवं जतो णिसिद्धा सुते बहुमो ॥ २४ ॥ [ विशेष ४१. अह सब्बदव्यपरिणामभावविण्णत्तिकारणमणतं । सासयमप्पडिवाती एगविहं केवलं जाणं ॥ ५४॥ केवलणाणेणऽत्थे जाउं जे तत्थ पण्णवणजोग्गे। ते भासइ तित्थयरो, बेइजोग तयं हेवड सेसं ।। ५५ ॥ से तं केवलणाणं । से तं पञ्चकखणाणं । १ बजोग सुयं हबइ तेसि इत्ययं पाठः वृत्तियां पाठान्तरत्वेन निर्दिष्टोऽस्ति । तथाहि-"अ- गुय दर लेगि' स वाग्योगः शुन भानि 'तपां' श्रोतृगाम् ।" इति हारि० वृत्तौ । “अन्ये त्वेवं पठन्ति- समायार्थ:-'तेयां' शोमां भावभुतकारणवान् म बाग्योगः श्रुतं भवति, श्रुतमिति व्यवाहियते इत्यर्थः ।" इति पु. ॥ ३ अन चर्षि गृत्तिनां से तं पञ्चवं इत्येव पाठः सम्मतः । नोपलव्धोऽयं कस्यांचिदपि प्रतो ।। 20 - 25 परोक्षजानं तद्भदौ च ] सिरिदेववायगविड्यं गंदीयुतं । ४१. अह सव्वदच० गाहा। केवलनाणेण० गाहा । एतानी जहा पटियाए ।। ५४ ॥ ५५ ॥ सेसं कंठं ॥ इदाणिं कमागतं बहुवत्तव्वं पारोक्खं भण्णति- ४२. से' किं तं परोस्खणाणं ? परोक्खणाणं दुविहं पण्णनं, तं जहा-आभिणिोहि- यणाणपरोक्वं च सुयणाणपरोक्वं च । ४२. अक्खम्स इंदिय-मणा परा, तेनु जं जाणं ने परीक्वं । मनि-श्रुते परोक्षमात्मनः. परनिमिनतात. । अनुमानवत् । णणु नुत्ते इंदियपञ्चकन्वं भणितं ? उच्यते-मचमिणं. एन्ध ज दिय-भगेरि बहिलिंगपचयमुपजनि नमेगंतणेच इंदियाण अत्तणो य परोक्वं, अणुमाणनगतो. मात्रओ अग्निवाणं च । जं पूण माया दिय मणी- निमित्तं तं तेति चेत्र पञ्चक्वं, अलिंगनणतो, अनणो अवधिमादि व्य. अनणी तु नं पगंतच पोरखें । दिया पि तं संबवहारतो पञ्चक्वं, ण परमत्यतो । कम्हा? जम्हा विदिया अवेरणा इति । तं दृषि - मतिता उतनाणं च । इह मतिनुताणमुवण्णासकमे कारणं पुन्युनं नवं ।। मनि-ताण र अभेदनामिनिस्वयं इमं मुनं- 10 ४३. जत्याऽऽभिणियोहियणाणं तस्य सुवणाणं. जन्य सुयणाणं तयाऽऽभिणियोहिय- णाणं । दो वि एयाई अण्णमण्णमणुगयाई तह वि पुण त्याऽऽयरिया जाणत्तं पणनि- अंभिणिबुझइ ति आभिणिकोहियं, सुंणतीति सुतं । "मतिपुर्वयं सुयं, ण मती मुश्विया ।"
३२ जिणदासगणिमहत्तरविरहगाए गुणी, संजुगं [गु० ११ गंगाइभेदभिण्णं अणेगहा । अहवा मति-मुताणं इंदियोवलद्धिविभागतो भेदो इमो-योति [विशेषा. गा. १२२] पूर्ववद् व्याख्येया । अहवा मति-गुतभेदं भणंति-बुद्धीदिटे० गाहा।। एतीए गाहाए अत्थो मति-मुतविसेसो य जहा विसेसावरसगे तहा माणितन्यो। अपणे वागसमं सुतणाणं भणंति तं च ण घडति, जम्हा वागमुंबदिलंतेणं मइनाणस्सेव मुतं परिणामो दंरि 5 जुज्जते इत्यर्थः । अहवऽण्णो मतिमुतभेदो-अक्खराणुगतं मुतं, अणक्खरं मतिनाणं ति । मतिणाणं, स्व-परप्रत्यायकं मुतनाणं । अहवा मति-मुताण आवरणभेदातो (जे० २०० प्र०] भेट वसमविसेसातो चेव मति-मुताण भेदो भवति ।। भणितो मति-मुतविसेसो। इदाणि जहा मति कारणभेदेहि भेदो दिवो तहा मतीए मुतस्स य सम्म-मिच्छविसेसो दसणपरिग्गहातो भवइ त्ति ४४. अविसेसिया मती मतिणाणं च मतिअण्णाणं च । विसेमिया मतं 10 मती मतिणाणं, मिच्छादिहिस्स मती मतिअण्णाणं । अविसेसियं सुयं सु अण्णाणं च । विसेसियं सुयं सम्मबिहिस्स सुयं सुयणाणं, मिच्छदिहिस्स सुः ४४. अविसेसिता मतीत्यादि । सामिणा अविसेसिता मती इमं वत्तव्या-आ चसदो समुच्चये। विसेसिता मतीत्यादि । जता पुण इमेण सामिणा विसेसिता मती भवति सम्मदिहिस्स मतीत्यादि सूत्रसिद्धं । अविसेसितं मुतमित्यादि एतं पि उवउजिर एवं चेव व 15 विसेसणेण अविसेसिता मती ताव मती चेव वत्तव्या। सच्चेव मती णाण-Sण्णाणसदविसेसण आभिनिवोधिकेत्यादि सूत्रसिद्धं । णाण-ऽण्णाणसदविसेसणं कह? भण्णति-सम्मत्त-मिच्छसामिगु सस मतीत्यादि मुत्तसिद्धं । सुते वि एवं चेव वत्तव्यं । पर आह-तुल्लखयोवसमत्तणतो घडाइ: च्छेदत्तणतो सदादिविसयाण य समुत्रलंभातो कई मिच्छदिहिस्स मति-गुता अण्णाणं ति भणित सदसदविसेसणातो भवहेतु जतिच्छितोवलंभातो । नाणफलाभावातो मिच्छदिहिस्स अण्णा मतिपुव्वं मुतं ति कातुं मतिणाणं चेव पुव्वं भणामि- ४५, से किं तं आभिणिवोहियणाणं ? आभिणिवोहियणाणं दुविहं प सुयणिस्सियं च असुयणिस्सियं च । ४५. से किं तं आभिनियोधिकेत्यादि मुत्तं । तत्थ 'मुतनिस्सितं' ति मुतं ति-सुत्तं बिंदुसारपज्जवसाणं । एतं दव्यमुतं गहितं । तं अणुसरतो जे मतिणाणमुप्पज्जति तं सुतणिस्साए 25 वा णिसतं तं मुतणिम्सितं भण्णति । तं च उग्गहेहा-बाय-धारणाठितं चतुभेदं । 'अस्सुतनिसि दव-भावमुतणिरवेकरवं आभिणिवोधिकमुप्पज्जति तं अमुयभावातो समुप्पण्णं ति असुतनिस्सि उप्पनियादिबुद्धिचउकं । इमं- १ जम्दा जे० दा० ॥ २ 'विसेसदसण' आ० दा० ॥ ३ अयं मूले स्थापितः सूत्रपाठः सं० मो० ॥ १९५ पत्र नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे उपलभ्यते । श्रीहरिभद्रसूरिणापि स्ववृत्तावयमेव सूत्रपाठी व्याख्यातोऽस्ति । विरे मती मतिणाणं, मिच्छादिहिस्स मती मतिअण्णाणं । एवं अविसेसियं सुयं सुयणाणं च सुयमा सम्मििहम्स मुयं सुयणाणं, मिछद्दिहिस्स सुयं सुयअण्णाणं । जे० दे० ल० शु० । अयमेव र गिरिणा स्वीला व्याख्यातचाप्यस्ति । विसे सिया मती सम्मदिहिस्स मतिणाणं, मिच्छद्दिहिस्स मतिम मुयं मुयणा मुयमपणाणं च । विसेसियं सुयं समद्दिहिस्स सुयणाणं, मच्छद्दिहिस्स सुयमण 20 ...MAA...- ३३ 5 बमुगित्सियं महणागं उत्पत्तियाइबुद्धीओ य] सिरिदेववागविल्यं गंदीपुतं । ४६. से किं तं असुयणिस्मियं ? असुरणिस्मियं वउविहं पण्णत्तं, तं जहा- उप्पत्तिया १ वेड्या २ कम्मया ३ पारिणामिया । बुद्धी चरविहा बुत्ता पंचमा नोवलम्मइ ॥ ५६ ।। पुब्बं अदिट्ठमसुयमवयतस्वणविसुद्धगहियत्या । अब्बाहयफलजोगा चुद्धी उप्पनिया णाम ।। ५७ ।। भैरहसिल १ पणिय २ रुस्खे चुड्डग ४ पड ५ सरइ ६ काय ७ उचारे । गय ९ घयण १० गोल ११ मे १२ खुड्डग १३ मगि १४ यि १५ पनि १६ पुने १७ ॥ ५८॥ भरह सिल १ मिंढ २ कुंकुड ३ वालुय ४ हत्यी ५ [4] अगड ६ वसंडे ७ । पायस ८ अड्या ९ पने १० खाडहिला ११ पंच पियरो १२ च ॥ ५९ ।। महुसित्य १८ मुद्दि १९ यंके २० य णाणए २१ भिक्षु २२ वेडगणिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्यसत्ये २५ इच्छा य महं २६ मनलहस्से २७ ॥६०॥ १ । भरणित्थरणसमत्था तिवरगसुत्नत्यगहियपेयाला । उभयोलोगफलवती विणयसमुत्था यति युती ॥३॥ णिमित्ते १ अत्थसत्थे २ य लेहे ३ गणिए ? य कव ५ संग ६ ग । गद्दभ ७ लवण ८ गंठी ९ अंगए १० रहिए न मिला ।। ६२ ।। सीया साडी दीहं च तणं अवनवा च नमः । निब्बोदर १३ य गोणे घोडग परणं मानी ||: उवओगदिट्ठसारा कम्मपमंगपरिघोलपविताना। साहवारफलवती कम्मरमुल्य दवनि कही ।।२।। हेरण्णिए ? करिसए २ कोलिय ३ डोरे ? तुण्णाग ८ वहती ९ पूतिए १० च छह १६ किमी ६:: . ..
[ To ९ 5 10 जिगदासगणिमहत्तविग्गा नगीए गं अणुमाण-हेउ-दिद्वंतसाहिया वयविवागपरिणामा हिय-णीसेसफलवती बुद्धी परिणामिया णाम ॥ ६६ ॥ अभए १ सेट्ठि २ कुमारे ३ देवी (?) ४ उदिओदए हवति साहू य णदिसेणे ६ धणदत्ते ७ साव(? वि)ग ८ अमचे ९ ॥ खैमए १० अमञ्चपुत्ते ११ चाणके १२ चेव थूलभद्दे १३ य । णासिकसुंदरीनंदे १४ वइरे १५ परिणामिया बुद्धी ॥ ६८ ॥ चलणाहण १६ आमंडे १७ मणी १८ य सप्पे १९ य खग्गि २० थू परिणामियबुद्धीए एवमादी उदाहरणा ॥ ६९॥ ४। से तं असुयनिस्सियं । ४६. पुब्बं० गाहा। भरहसिल० गाहा]। भरह० गाहा । मधु० गाहा ॥ ५७ ॥५ उप्पत्तिया गता १ । इमा वेणतिया. मरणि० गाहा। निमित्ते० गाहा । सीता० गाहा ।। ६१॥ ६२॥ ६३॥ विण[जे मुत्था गता २ । इमा कम्मइया- उवओग० गाहा । हेरण्णि गाहा ।। ६४॥६५॥ कम्मइया गता ३ । इमा पारिणानि 15 अणु० गाहा । अभए० गाहा। खमए० गाहा। चलणा० गाहा । एताओसवाओ जहा णमोब ९३८-५१) तहा दट्टयाओ॥६६॥६७॥६८॥६९।। ४ । इदाणिं मुतणिस्सितं उग्गहाइयं ४७. से कि तं सुयणिस्सियं मतिणाणं ? सुयणिस्सियं मतिणाणं , तं जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाए ३ धारणा ४ । ४७. इह सामण्णस्स बैबादिअत्थस्स य विसेसनिरवेक्खस्स अणिदेसस्स अवग्रहणमवर 20 विचारणविसेसण्णेसणमीहा । तस्स विसेसणविसिटस्सऽत्थस्स व्यवसातोऽवायः, तबिसेसावर सेसावगतऽत्थस्स धरणं-अविचुती धारणा इत्यर्थः ।। तत्थ- ४८. से किं तं उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-अत्थोग्गहे य ४८. ओग्गहो दुविदो-अत्थोग्गहो बंजणओग्गहो य॥ एत्थ वंजणोग्गहस्स पच्छ गहातो या पुव्वं वंजणओग्गहो भवइ 'त्ति वंजणोग्गहमेव पुव्वं भणामि- १ 'विवद्यापरि सं० सं० टे. ल. शु० ॥ २ णिस्सेस शु० मो० मु०॥ ३ खवगे मो० ॥ ४ ५ स्वादिबसेसविसेसनिर आ० दा० । श्रीमलयगिरिपादस्तु आवश्यकवृत्ती नन्दिवृत्ती चायं चूर्णि- “मदार चूर्णित्-" सामनस्रा कवादिविसेसणरहियस्स अनिद्देस्सस्स अवग्गणमवरगह' इति । सन १६८-१॥ ६ ‘णविससेणेद्दणमीहा आ० दा० ॥ ७ "स्स भवसातो आ० दा० ॥ तबिसेसावगमरस धरणं आ० दा० ॥ [आवटी Awart+ tramanartha मुगिल्लियं मशागं वंजगोगहाई य] सिक्दैिववायगवियं गंदायुनं । ४२. से किं तं वंजणोरगहे ? वंजणोरगहे वरबिहे पाणने. तं जहा-मोतिदियवंज- गोग्गहे ? घाणेदियवंजणोगहे २ जिभिदियवंजणोग ३ फादियरंजणोग्गहे ।। से नं वंजणोगह। ४५. जणाणं अवगही जणागडी. एल्य वंजणगणनापगिता दया नया । जो प्राणको वंजगावणही, एल्य वंजणगणेण दचिंद्रियं चनचं । पतनि विमानाचं इमो अन्यो- काभूता : अन्यों निजानं वंजणं. जहा पदीयण यहो। एवं न्याधिपनि मिर्गदि बिन अब गंपन िजन्हा अन्या चंजिला नि नन्दा ने दया वंजगावनी ममति पत्रकारको सुनियोजित। ५०. [१] से कि तं अत्योरगहे ? अत्योरगह छबिहे पगले. तं जहा-सोदिय- अयोगह १ वविदियअयोगह २ वाणिदियअन्योग३ जिभिदियभयोग? फामिदियअत्योगह ५ णोइदिवअयोगहेछ। [aj नमन हमे एगहिया पागा-1 घोला णागावंजणा पंच णामधया भवंति. नं जहा-ओनिम्हारा । अथारगया २ सयगता ३ अवलंबणता ? मेहा ५ से नं उगह । ५०. [१] से किं नं अन्धोगहन्यादि म । अन्न तो कोको चन्मिनम याणन एकान्यमय अविनिटिदियविनयं गहनी अन्याय भ!ि परमं चर जं अविमिटमन्यगाणं कालयों एगवनयं को अयोग विनि, ण पुण नग्योन्गाय काले महादिविन ली और यानन्ध मणपनिणामकादयानो जागं मणांक जीवा पुण मणणररिणामनिया वणी भावमणी । पर भनि । नगर जो उपकारणिदियदाना: যায়। নি। * ::
३६ ३ जिणदासगगिमहत्तरविल्याण गुणगी रानुगं [P० १. भण्णति ४ । उत्तरुत्तरविसेससामण्णत्वावग्गोमु जार मेरया धाय नाव मेधा भगाइ ५। जन्य गंजणावगाहों तत्थ सवणादिया तिण्णि एगहिता भवंति । आह-गणु शिणातलंदंगणे पगठित नि विगढ़ ? उगने, ण नि जतो सचनिकैप्पेसु उगहस्सेव सरूवं दंसिजति ॥ इदाणि उग्गासमणंतरं ईहा-~ ५१. [१] से किं तं ईहा ? ईहा छबिहा पण्णत्ता, तं जहा-सोतेंदियईहा १ चनि ४ दियईहा २ घाणेदियईहा ३ जिमिदियईहा ४ फासेंदियईहा ५ णोइंदियईहा है। [२] तीसे णं इमे एगट्ठिया गाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेयाँ भवंति, तंज आभोगणया १ मग्गणया २ गवेसणया ३ चिंता ४ वीमंसा ५। से तं ईहा । ५१. [१] सा छबिहा सुत्तसिद्धा । [२] इमे तस्सेगढिया, ते वि ईहासामण्णतो एगहिता चेत्र, अत्यविकप्पणातो पुण भिण्णत्था । 10 विधिणा-आभोयणता इत्यादि । ओग्गहसमयाणंतरं सम्भूतविसेसत्याभिमुहमालोयणं आभोय भण्णति १ । तस्सेव विसेसत्थस्स अण्णय-वइरेगधम्मसमालोयणं मग्गणा भण्णति २ । तस्सेवऽत्थस्स वइरेगः परिचाओ अण्णयधम्मसमालोगणं च गवेसणता भण्णति ३। तस्सेव तद्धम्माणुगतत्यमा पुणो पुणो समालोयण चिंता भण्णति ४ । तमेवत्थं णिचा-ऽणिचादिएंहिं दव-मावेहिं विमरिसतो बीमंसा गणति ५। एवं व अस्थमालोयंतस्स उक्कोसतो अंतमुहुत्तकालं सत्या ईहा भवति ॥ ईहाणंतरं अबातो- ५२. [१] से किं तं अवाए ? अवाए छबिहे पण्णते, तं जहा-सोइंदियावा चक्खिदियावाए २ घाणेंदियांवाए ३ जिझिदियावाए ४ फासेंदियावाए ५ णोइंदियाँवा [२] तस्स ण इमे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेयो भवंति, तं जान आउट्टणया १ पञ्चाउट्टणया २ अवाए ३ बुद्धी ४ विण्णाणे ५। से तं अवाए। ५२. [१] सो छबिहो सुत्तसिद्धो । [२] तस्सेगहिता इमे पंच, ते य अबायसामण्णतणतो णियमा एगहिता चेव, अभिधाणभिण्णतणतो भिण्णत्था । [जे० २०१ द्वि० ] इमेण विधिणा-आउट्टणता इत्यादि । ईहणभावनियत्तस्स अत्थसख्वपडि युद्धस्स य परिच्छेदमुप्पादंतस्स आउट्टणता भण्णति १ । ईहणभावनियट्टसा वि तमत्थमालोयंतस्स पुणो णियट्टणं पञ्चाउट्टणं भण्णति २ । सव्वहा ईहाए अघणयणं कातुं अवधारणावधारितत्थस्स अवधारयतो अबातो भण्णइ ३ । पुणो पुणो तमत्वावधारणावधारितं बुझतो बुद्धी भवइ ४ । तम्मि चेवावधारितमत्थे विसेसे पेक्र 25 अवधारयतो य विण्णाणे ति भण्णति ५॥ अवायाणंतरं धारणा-~- १ 'त्यत्ताओ एग' आ० ॥ २ 'विधिक जे० ॥ ३ चनदि सं० ॥ ४ धेजा मो० मु० ॥ ५ पईि दंदर्भ सं० । “विगपंग विमर्षः, क्षयोपशमविशेषादेवोध्य पटतरावबोधतः सद्भतार्थविशेषाभिमुलगेय व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मालोचनं । । ” इति हारि• वृत्ती । 'तत ऊर्य क्षयोपशमविशेषात् स्पष्टतरं सद्भतार्थविशेषाभि परिवधर्मपरित्यागतोऽन्ययधर्मापरित्यागतोऽध्ययवर्गविमर्शन निगः" इति मलयगिरिवृत्तौ ॥ ६ 'यअवाण ० ॥ ७ चक्षु सं० ॥ ८-९-१०-११-१२ यअवाए १० ॥ १३ धिजा मो० मु० ॥ १४ आवडणया पावणाया सं० शु० हारि० " 15 20 मित्या-मिरवादिद्रव्य-भावालोचनमित्यन्ये। मृत्योध। माउंटणया पचाउंटणया सं. ल. ॥ १५विण्णाणं सं० सं० ॥ ।
३ .. ईहावायवारमानो पडिवोदगदिद्रुतो य ] सिरिंदवावगविश्वं गंवायुतं । ५३. [ से किं तं धारणा ? धारणा छविता पणना. जहा लोइंदियधारणा १ चक्खिदियधारणा २ घाणिदियधारणा ३जिभिदियधारणा ? फालिदियधारणा ५ णोइंदिय- धारणा ६॥ [२] तीसे णं इमे प्रगटिया गाणाघोला जाणाजणा पंच णामधेया भवंनि. नं जहा-घरणा १ धारणा २ ठवणा ३ पतिवाट कोडे ५। सेनं पारंगा । ५३. [१] ना छत्रिका जुनविदा । [२] नागठिता पंच । ते य मारणाधारणं पडच चियमा पगलिया. धान्यत्रिकाकानाए भिल्या । मेण विधिणापरणा इत्यादि । अत्रापाणन नगन्य अविचुनी जानुहोगा जमुनं नाम शाला भणति १ । नमेव अत्थं अणुयोनगणना विनं जगणं अनुमती पन्नो विस्मादिकालमागेन भगतो च धारणा मण्णनि २ । 'ठवण जि ठावणा, मा र अनायास्यान्नित्यं सामान वियतन वायंकाय ठरणा भणति, पूर्णघटस्थापनाइन् ३ ! पति निलो दिन यानिकी बिनय प्रमेन पावनमानी पनित्रा भणति, जले उपप्रलेपनिष्ठावन ४ । 'कोई निना कोही मानिमानिया पति का धाग्निनि नहा अवानाधारितमन्य गुम्ववियुलमन्य वा अवि धालनी या निबनना ५॥ ५१. चनस्य अठ्ठावीसनिविहल्य आभिणियोहिया पन्यांकरित गमि पडिवोहगदिईतेण सलगविण । ५४. लंदन्यादि पनि म ।' चीन मंदा ? उच्चन-ववियनमा Pणा, पवने अायी । आहामाया ---- है . है || * . ५५. से किं तं परियोगनिने पनि पनि । चि पुरिसं नुन पहिलो रोज्जा लगा :: :: :: :: नमानी- रावस्यएचिका पोराला नाम: चममयपत्रिका होगया गणना संज्जनगरविकराल... 1ो एकतापकिा पोता. ." , M + . . है ३८ [मुन -- - १ जिणदासगणिमहत्तरविरल्याए. गुणी रांजुरां गच्छंति, जाव णो दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो संखेजसमयपनि पोग्गला गहणमागच्छंति, असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति । से चंप बोहगदिलुतेणं। ५६. से जहाणामयेत्यादि । 'से' ति पडिवोधकरस गिसे । 'जहाणामये' ति जहाणा [ । २०२ प्र० ]म, संभवतः आत्माभिप्रायकृतादित्यर्थः । सवण्णुप्पणीय मत्थं तदणुमारि सुतं वा अपघुद्धिविण तणयो अणगच्छमाणो सीसो पुच्छाचोदणातो चोदको, अहवा तमेव मुत्तमत्थं वा 'अघडमाणं' ति मण्याम तदोसचोदयो य चोदगो भण्णति । पवयणमविरुद्धं निदोसं गुत्तत्थं पागतो पण्णगो, विरुद्ध-पुणतागुत्तं अस्थतो अविरुद्धं दरिसतो पण्णवेति जो सो वा पण्णवगो भण्णति, यथावत् संशयच्छेदीत्यर्थः । चोदको सं मावण्णो पण्णावगं पुच्छति--'कि एगसमयादिपविटा' इत्यादि कंटं । एवं चोदकं पुच्छाभिप्पायेण वदंतं । 10 चगाऽऽह-'गो एगसमयपविटा' इत्यादि । जो एस पडिसेहो कतो एस सदाइफुडविण्णागजणगत्तेणं ति गहणमागच्छति, इहरा पोग्गला गणमागच्छंत्येवेत्यर्थः । एवं एगादिसमयपविठ्ठपोग्गलपडिसिद्धेगु इमा अणुण, 'असंखेन्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहमागच्छंति' ति । इमस्स अणणुयोगत्यो अणुयोगत्यो य । तत्य आ योगो इमोजहा पवासी सगिहमेंतो अद्धाणं पंचाहेण दसाहेण वा बीतीवतित्ता सगिहं पविट्टो त्ति, एवं अर जेहि समयेहिं आगता पविद्या कण्णविलेमु पोग्गला गेण्हति त्ति, एवं अणणुयोगो भवति । इमो अणुयोगर 15 पदमसमयादारव्म पतिसमयं पविसमाणेमु असंखेज्जइमे समए जे पविद्या ते गैहणमागच्छति, ते य सहा Uणाणजणग त्ति कातुं, अतो तेसिं गहणमुवदिढे । सो य असंखेन्जइसमयो किंपमाणे असंखेनए भत्र उच्यते-जहण्णेणं आवलियाए असंखेजइभागमेत्तेसु समयेसु गतेमुं ति, उक्कोसेणं [जे० २०२ द्वि० ] संखेर आवलियासु आणापाणुकालपुहत्ते वा, उभयधा वि अविरुद्धं । गतो पडिवोधकदिद्रुतो । इदाणिं आवागदिटुंतो- ५६. [१] से किं तं मल्लगदिढतेणं ? मल्लगदिटुंतणं से जहाणामए केई पुरिसे आव 20 सीसाओ मलगं गहाय तत्थेगं उदगविटुं पक्खिवेज्जा से णद्वे, अण्णे पक्खित्ते से वि। एवं पक्खिप्पमाणेसु पक्खिप्पमाणेसु होही से उदगविंदू जे णं तं मल्लगं सवेहिति, हो से उदगविंदू जे णं तंसि मलगंसि गहिति, होही" से उदगबिंदू जेणं तं मलगं हिति, होही से उदगविंदू जे" णं तं मल्लग पवाहेहिति, एवामेवं पक्विपमाणेहिं पनि प्पमाणेहिं अणंतेहिं पोग्गलेहिं जाहे तं वंजणं पूरित होति ताहे 'हु ति करेति णो" २ 'आवागदिलुतो' इति मलकदृष्टान्तस्य नामान्तरम् ॥ ३ तेणं जदा को दिढतो? से ० ॥ ४ फेयि शु० ॥ ५ अण्णे वि पगं० चिना ॥ ६ 'माणे पक्खिप्पमाणे सोही है. ॥ ७-९-२१ होदिति स० होतिए १० १० ॥ ८ राहिइ सं० ल. शु० । रवेहिद जे० ॥ १० मल्लगे वं० सं० । १२-१४ जो पं सं० । हारि मृतौ ॥ १३ भरेदिति इत्यनन्तरं विशेषावश्यकमहाभाष्यमलधारीयटीकायां १४८ पत्रे नन्दीपाठोद्धरणे होही से उदगयिंद संसि मादगंसिन द्वाहिहिति इत्यधिक ‘ग ठाहिहिति सूत्रमुपलभ्यते, नोपलभ्यते इदं सूत्रं गर्वास्तपि सूत्रप्रतिषु ॥ १५ गवमेय गं० । पु० ॥ १६ 'मेय पविषप्रमाणे िअणतेहिं पोग्ग ल. विआमलगृती १४८ पने नन्दीसूत्रपाटोद्धरणे । 'मेव पक्षिया पोग्ग ! 'गेव पविणापमाणेहिं परियप्पमाणेहि पोग्ग सं० ॥ १७ 'हो' ति ० ॥ १८ ण उण जासं० १ गहत्थमा जे० ॥
३९ . मगदियो । निरिदेवायगविन्दवं गंवानुन । णं जाणति के वेसं सद्दाइ ?, तओ ईह पविसति तओ जाणइ अमुगे एन मंदाइ ?. तो अवायं पविसइ तओ से उबगयं हवा. तो गं धारणं पविसह नओ गं धारे नंखेनं वा कालं असंखेज्ज वा कालं। [२] से जहाणामए केई पुरिने अन्धनं नई चुणेज्जा तेणं सहे नि उग्गहिए, जो वेव णं जाणइ के वेस सह ति. तओ ई अणुविसह नतो जाणनि अमुगे एम न, नतो णं अबायं पविलइ ततो ले उवयं हानि, नतो धारणं पविबह नओ गंधारे नवेनं या कालं असंखेज्नं वा कालं । एवं अव्वनं नवं, अब्बनं गंध. अश्यत्तं सं. अव्यनं फास पटिसंवेदेजा। [३] से जहाणामए केई पुरिने अञ्चनं सुमिण डिववेजा. ते मिणे नि उग्गहिाँ ण गुण जाणनि के वेग मुमिण नि, यो ई पत्रिमा नमओ जागति अमुगे पख सुमिणे त्ति, नतो अवार्य पंबिया नतो ने उस ननो धार पविनइ नमो पारेख संखज्ज वा कालं अनबज्नं या काले । नेन मानिन । .
जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्गीए संजुयं [सु० ५६ ५६.[१] तत्थ आवागतीसगं ति [आवागट्ठाणमेव, अहया आपागट्ठाणस्स आसाणं समंता परिपेरंतं, अहवा आपागमुत्तारियाण जं ठाणं तंआपागसीसयं भण्णति । 'अणंतेहिं ति प्रथमसमयादारभ्य प्रतिसमयं अणंता प्रविशंती- त्यतो अणंता । 'जाहे तं वंजणं पूरितं भवति' त्ति, एत्य वंजणग्गहणेण सहाइपुग्गलदना दबिदियं वा उभयसंबंधो चा घेतव्वं, तिधा वि ण विरोधो । बंजणं पूरियं ति कहं ? उच्यते-जदा पुग्गलदन्या वंजणं तदा पूरियं ति पभूता पोग्गलदव्या जाता, स्वं प्रमाणमागता सविसयपडिवोधसमत्था जाता इत्यर्थः १। जदा पुण दबिंदियं वंजणं तदा पूरियं ति कहं ? उच्यते-जाहे तेहिं पोग्गलेहिं तं दबिदियं आंदृतं भरितं वावितं तदा परियं ति भण्णति २। जदा तु उभयसंबंधो वंजणं तया पूरियं ति कह ? उच्यते-दबिदियस्स पुग्गला अंगीभावमागता, पुग्गला य दबिदिए अनुपक्ताः, एस उभयभावो, एतस्मि उभयभावे पुग्गलेहि इंदियं पूरितं, इंदिएण वि सविसयपडिबोधकप्पमाणा पुग्गला गहिता, एवं उभयसामत्थतो विण्णाणभावो भवतीत्यर्थः ३। 'हुँ ति करेइ ति वंजणे पूरिते तं अत्थं गेण्हइ त्ति वुत्तं भवति । एस एकसमयिओ अत्थावग्गहो। तं पुण किंगारं गेहति ? उच्यते-'नो चेव णं जाणति के वि एस सदादी' तकाले सामण्णमणिदेसं, सदादिविसेसं ण जाणइ त्ति वुत्तं भवति । किंच-सरूव-णाम-जाति-गुण-किरिया- विकप्पविमुहं अनाख्येयं गृह्णातीत्यर्थः । एत्थ पडिबोधकालातो [जे० २०३ प्र०] गुब्बं बंजणोग्गहो से भवति । एसा एवं वंजणोग्गहस्स पत्रणा कता । वंजणोग्गहस्स परतो 'हुति करेति' ति एतम्मि पडिवोधकाले .एग- समइयो अत्थावग्गहो से भवति, ततो से कमेण ईहा-ऽवाय-धारणाओ त्ति । एत्य पडियोह-मल्लगदिढतेहिं बंजणो- 5 ग्गहस्स अत्थोग्गहस्स य भिण्णकालता फुडं दंसिता । पर आह-साधु मे पडिवोध-मल्लगदिद्वंतेहिं वंजण-ऽत्थावग्ग- हाण भेदो दंसितो, जागरओ पुण सदाइअत्थे पडुप्पण्णे ण:वंजणोग्गहो लक्खिजति, जतो पुब्बामेव सदाइअत्थ- विण्णाणमुप्पज्जते, भणितं च सुत्ते से जहाणामये केयि पुरिसे'त्यादि । अहवा इमस्स मुत्तस्स इमो संबंधो-पर आह-यदुक्तं भवता सरूव-णाम-जाति-गुण-क्रियाविकल्पविमुखं अनाख्येयं गृह्णातीत्येतद् विरुध्यते, कुतः ? यतः सूत्रेऽभिहित-से जहाणामतेत्यादि । अहवा इमो संबंधो-प्रसुप्तप्रतिवोधक-मल्लगदिटुंतेहिं बंजण-उत्थावग्गहाण भेदो 0 दंसितो, इह पुण सुत्ते मल्लगदिढतेणेव वंजण-ऽत्थावग्गहाण भेदो दंसिज्जति- [२] ‘से जहाणामते 'त्यादि । सुत्तुञ्चारणसवणाणंतरमेव पर आह-एत्थ मुत्ते वंजण-ऽत्थावग्गहेहा ण लक्वि- जंति,जतो 'अव्वत्तं सदं सुणेई' त्ति भणितं, सदमेत्तेऽवधारिते पहमतोअवाय एव लक्खिजति ति । आयरियं आह-ण तुम मुत्ताभिप्पायं जाणसि, णणु अन्यत्तसहसवणातो अत्थावग्गहग्गहणं कतं, जतो अव्वत्तमणिदेसं सामण्णं विकप्परहियं ति भण्णति, तस्स य पुज्यं वंजणावग्गहेण भवितव्यं, जतो एतग्गाहिणो सोतादिइंदियस्स अत्थोग्गहो बंजणोग्गहमंतरेण 25 ण भवति त्ति नियमेसो, सो य कालसुहुमत्तणतो उप्पलसतपत्तछेनदिटुंततो ण लक्खिजति । चोदक आह-जति एवं तो जं मुत्ते भणितं "तेणं सद्दे ति ओग्गहिते" तं कहं ? उच्यते-इहतं " तेणं सद्दे ति ओग्गहिते "त्ति वक्खा- सूत्रकारोऽभिधत्ते इति करणनिदेसातो सव्यविसेसविमुहं शब्दमात्रमुक्तं [जे० २०३ द्वि० ] भवति, णो चेत्र णं जाणति के वेस सद्दे ? त्ति, ण तु शब्दोऽयमित्येवं बुध्यते, कम्हा ? उच्यते-एकसमयत्तातो अत्थावग्गहस्स, किंच पण्णतो य पण्णवगो संयवहाराभिप्रायतो “ तेणं सद्दे त्ति ओग्गहिते "त्ति ब्रूते, ण दोसो। जति वा “सद्दोऽय" 30 मिति युद्धी भवे तो अबातो चेव भवे, तच्च न, कहं ? उच्यते-णो जतो अत्यावग्गहसमयमेत्ते काले "सद" इति १ पुण उचगरणिदियं मलय नन्दिवृत्तौ चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ २ आफुण्णं भरितं आ० । "आभृतं” इति हारि० वृत्तौ ।। ३ अभिषक्ताः इत्यर्थः, तदा परियं ति भण्णइ इति मलय नन्दिवृत्तौ चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ ४ पतारं आ०॥ ५ जाति-किरिया 2. ॥६जतो पत्तग्गादिणो जं. दा. ॥
मगदिलुतो सिरिदेवनायगविलयं नंदीनुतं । विसेसणाणमत्यि, अह तम्मि विलमए सहोऽयमिति युद्धी त्रज तो फुड वार एव मन.पोच नशाले अवानी इच्छिन्नति जतो अत्यपरिच्छेदा असंखजनमयकालियो भवः नि । भानायला तं गुनं- विजयाव- गहे भणंति-'अञ्चनं सई गुणेन नि एन--विनगन्यावी. 'नक मंडे नि उपनिनि. पतं नुमाई सामान सहत्यावगदंलगं, कई ? उच्चने-जती भग्णानि णी जाति कविपन को " निगमोनिकारक लादिको नि, एलो वि अविरुदो गुनन्यो । 'ततो अन्यायगडयनयान पाममादिन अनुगादिति नि केंद्र संनयं मगने, न ण भवनि. नयच्च अग्णाणभावनणतो. मतियानोनि। आर-को पु, संन्यवहाण विमेलो ? उच्यत-इज थाणु-रिमादित्य पंहितं विनं बदलडिवान। पडिक मुनादनों संसयो भण्गति, तं च अग्णाणं. जं पुण नवनि चायणे भिमान को मर अधम्मविमुई असम्मोहमविफलमन्यपरिच्छेदकं चिनं जना | अनि-नातो पाना :- खेजनमइयं परिमाणतो ईडीययोग अविलंयनणनो नमुना नि. लो विविनिमयभार : नणतो अंनमृहलकालन्तर एव जाणनि 'अमुने एन नहें गंगादि नि कोष तोकि निष्टमण्णाणग्रयोगसमनणतो बा इंडोवयोगधेनमुनचुतो अवगतको जो विधान नि... २०४ प्र० [एवं] ईशोपयोगाविच्छेदननाणतो करवि अंगुन कालो नो य महाअन्धपापण्णम्य जे परधम्मा नेन निमाम्य का सामना :- गंभीरनणनी गंग्यमहोऽयमित्यवमानन्धी [जाणतो अवबोधी अन्धपरिच्छेदा नो अथातो भवनि । नदी आया ! अयंग्यजसमने अविच्चाए नमन्धं धनि, उद्योगको प्रकार नि धारणा । एवं सा संग्य जवायाज्याणं मान-निकमारिया m । + , 4 4 -- . mami " ४२ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णी संजुयं [ गु० १७.५८ गा० ५०...७५ र्थग्रहणं भवेत् । तस्य च प्रथमसमयार्थप्रतियोधकालेऽर्थावग्रहः, तस्य पूर्वमसंख्येयसगयेषु व्यञ्जनावग्रहः । शेषमी- हादि पूर्ववत् । सीसो पुच्छति-उग्गहादीणं उ कमातिकमे एगतरअभाव वा कि सदादिवत्शुपरिच्छेदो ण भवति ? आचार्याह-आम, ण भवति, अत एव च क्रमे नियमः, जम्हा णो अगहित ईहति तम्हा पुन्वं उग्गहो, जम्हा य अणीहितं णो अवगच्छति ईहाणंतरं तम्हा अवायो, जम्हा य अणावात ण धारिजति वत्थु अबायाणंतरं तम्हा 5 धारणा । जम्हा य एस क्रमनियमो तम्हा सबो आभिणियोधियनाणावगमो नियमा एवं भवति, अत एव च कारणा सव्वे अवग्गहादयो मतिनाणभेदा भवतीत्यर्थः ॥ ५७. तं समासओ चउब्विहं पण्णत्तं, तं जहा-देवओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दबओ णं आभिणिवोहियणाणी आएसेणं सब्वदव्वाई जाणति ण पासति १ । खेत्तओ णं आभिणिबोहियणाणी आएसेणं सव्वं खेत्तं जाणंह ण पासइ २ | कालओ णं 10 आभिणिवोहियणाणी आएसेणं सव्वं कालं जाणइ न पासइ ३ । भावओ णं आभिणि- वोहियणाणी आएसेणं सव्वे भावे जाणइ ण पासइ ४ । ५७. तं समासतो चतुविहेत्यादि मुत्तं । 'तं च मतिनाणं खयोवसमरूवतो एगविहं पि होतुं णेयभेद- तणतो नाणाभेदा दयादिया से भवंति । 'दबतो णं' ति दन्यतो बत्तब्वे 'ण' ति वयणालंकारे, देसीवयणतो वा 'ण' अहवा, अपादानान्ते पञ्चमी विभक्तिः, तत्थ पायतवयणसेलीतो दव्यतो णं एवं आभिनिवोधियनाणी लभति-- 15 'आदेसेण'मित्यादि, इहाऽऽदेसो नाम-प्रकारो । सो य सामण्णतो विसेसतो य । तत्थ दबजातिसामण्णादेसेणं सव्वदव्याणि धम्मत्थिकायादियाणि जाणति, विसेसदव्वे वि जहा धम्मत्थिकाये धम्मत्थिकायस्स देसे धम्मत्थि- कायस्स पदेसेत्यादि केयी जाणति, सव्वे ण याणति, जहा सुहुमपरिणता अंविसतत्था अप्पण्णवणादिया य। 'ण पस्सइ' ति सव्वे सामण्ण-विसेसादेसहिते धम्मादिए, चक्खु-अचक्खुदंसणेण रूब-सदाइते केयिं पासति त्ति वत्तव्यं । अहवाऽऽदेसो-मुत्तं, तस्सादेसतो सव्वदन्वे जाणतीत्यादि । चोदक आह-जति मुत्तं कई मतिनाणं ? ति, उच्यते- 20 मुतोवलद्धमत्थेसु अणुसरतो तभावणबुद्धिसामत्थतो [जे० २०५ प्र०] सुतोवयोगणिरवेक्खा वि मती पवत्तइ त्ति ण मुत्तादेसो विरुज्झते १ । खेत्तं पि सामण्ण-विसेसादेसतो । तत्थ सामण्णतो खेत्तमागासं, तं चेगं सबग- १ दव्ययो ४ । दबओ ल० ॥ २ तत्थ इति पदं खं० सं० हे. ल. नास्ति, जे० शु० मो० मु० विआमलवृत्तौ नन्ाद्धरणे २३० पत्रे पुनर्वर्तते ॥ ३-४-५-६ अत्र द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावविषयकेषु चतुर्वपि सूत्रांशेषु जाति पासति इति पाठो जाणति ण पासति इति पाठभेदेन सह भगवत्यां अष्टमशतकद्वितीयोद्देशके ३५६-२ पत्रं वर्तते । अत्राभयदेवरेटीका-“दव्वओ गं' ति द्रव्यमा प्रित्य आभिनियोधिकविपयद्रव्यं वाऽऽश्रित्य यद् आभिनियोधिकज्ञानं तत्र 'आएसेणं ति आदेशः-प्रकारः सामान्य-विशेषरूपः तत्र च 'आदे- शेन' ओपतो द्रव्यमानतया, न तु तद्गतसर्वविशेषापेक्षयेति भावः, अथवा 'आदेशेन' श्रुतपरिकर्मिततया 'सर्वद्रव्याणि' धर्मास्तिकायादीनि 'जानाति' अवाय-धारणापेक्षयाध्ययुध्यते, ज्ञानस्यावाय-धारणारूपत्वात् , पासई' ति पश्यति अवग्रहहापेक्षयाऽवबुध्यते, अवग्रहेहयोदर्शनत्वात् । ...'सेत्तओ' त्ति क्षेत्रमाश्रित्य आभिनियोधिकज्ञानविपयं क्षेत्रं वाऽऽश्रित्य यद् आभिनिवोधिकशानं तत्र 'आदेसेणं' ति ओघतः भुतपरिफर्मपया या 'सव्यं खेत्तुं' ति लोका-ऽलोकरूपम् । एवं कालतो भावतश्चेति ।...............इदं च सूत्रं नन्यां इहैव च वाचनान्तरे 'ग पासइ' त्ति पाठान्तरेणाधीतम् । एवं च नन्दिटीकाहता हरिभद्रसूरिणा] व्याख्यातम्-"आदेशः-प्रकारः, स च सामान्यतो विशेषाय । म द्रव्यजातिमामान्यादेशेन 'सर्वव्याणि धर्मास्तिकायादीनि जानाति, विशेषतोsपि यथा धर्मास्तिकायो धर्मास्तिकायस्य देश इत्यादि, 'न पर्याप्त' गर्वान् धर्मास्तिकायादीन् , शब्दादीरतु योग्यदेशावस्थितान् पश्यत्यपीति ।" ३५८ पत्रे ॥ ७ अवि सतत्था उप्पाणवणादिया आ० दा० । अविशदाथा अप्रशापनादिका इत्यर्थः ॥ ८ सेसा दसविहे धम्मादिए आ० दा० ॥ , भाभिगिबोड़ियगाणस दवाइमेयाइ सिवित्रायवियं गंवानुन । नममुनं अवगाहलवणं सच्चं जाणति । दिनेलको बि लोगाउलोगशा-निन्यिादिविनेगाने जाणति. पजागा य केची, भंत्रं न पश्यत्येव २। काले विआदलो मान-विभवती । नन्य मायनो मनि.पर दलितो. णिजमणि वा मुनममुनं वा कलासमझ नचचाणि वा कला निकलां वा कालो. नेत्रविकासमतोमन- कालं जाणति । विमलादलो-समया-उज्वलिगादि उन्मपिनीमादिका दिनमा कति जानि.मा.वि. शान ण पश्यत्यय भाव इति मनं निकां मात्र एवं यजमानामानिनसामानो जाति। विगागलो जीवा जीवभावे । नन्य नाण-कसायादिया जावे, अनी कामवादित बगहा जीवन परिपते. मति- जाणविनयन्ये जाणति, नेने न यानि. स्त्रमा जवानः मि. मनिकाय भाव मिनी ।। ५८. उगह ईहा वाओ र धारणा पर हानि नानि। आभिणियोहिरणाणस्य भवन्य नमानेनं ।।७।। अत्याणं उरगहणं तु उग्गहो, नह दिया । बवसायं तु अवायं, धरणं पुण या बिनि ।। ७. !! उग्गह एवं समयं, ईसा-वाया कालमग्नवं संग्वं च धारणा होति जायचा ।। || पुटं गुणेति नई. स्वं पुण पाती । गंधं रसं च पानं च ब-किशन : !! भासायानेदीओ यो र वीनही गुण नई सुगनि farm :: :: ; वटा अपो वोमंगा गाणा साणा सती गली ए. से" आhिere ! म.,! . - ४४ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ५९-६५ गा० ७६ ५८. उग्गह ईहा० गाहा । अत्याणं० गाहा । उग्गह एक० गाहा । पुढे सुणेइ० गाहा । भासा. सम० गाहा। ईहा० गाहा। एताओगाहाओ जहा पेढियाए [आव० नि० गा०२-६ तथा गा० १२] तहा भाणितव्या इति ॥७०।७१।७२।७३।७४।७५।। "से किं तं मतिणाण ?"[सुत्तं ४५] ति एस आदीए जा पुच्छा तस्स सबहा सरूवे वण्णिते इमं परिसमत्ति- दंसगं णिगमणवाक्यम्-“से तं मतिणाणं" ति। अह्वा सीसो पुच्छति-जो एस वण्णियसरूवेण ठितो णाणविसेसो सो किंवत्तव्यो ? आचार्य आह-'से' इति निदेसे, 'तं' ति पुष्वपण्हामरिसणे, तं एतद् ‘मतिणाण' ति स्वनामाख्यान- मित्यर्थः । अहवा 'से' त्ति अस्य व्यञ्जनलोपे कृते एतं मतिणाणं ति भवति, एतावद् मतिज्ञानमित्यर्थः ।। इदाणि सव्वचरण-करणक्रियाधारं जधुदिहें कमप्पत्तं सुतणाणं भण्णति- ५९. से किं तं सुयणाणपरोक्खं ? सुयणाणपरोक्वं चोद्दसविहं पण्णत्तं, तं जहा- अक्सरसुतं १ अणक्खरसुतं २ सण्णिसुयं ३ असण्णिसुयं ४ सम्मसुयं ५ मिच्छसुयं ६ सादीयं ७ अणादीयं ८ सपज्जवसियं ९ अपज्जवसियं १० गमियं ११ अगमियं १२ अंगपविढे १३ अणंगपविट्ठ १४॥ ५९. से किं [जे० २०४ द्वि० ] तं सुतनाणेत्यादि । तं च मुतावरणखयोवसमत्तणतो एगविहं पि तं अक्खरादिभावे पडुच जाव अंगवाहिरं ति चोदसविधं भण्णति । तत्थ अक्खरं तिविहं-नाणक्खरं अभिलावक्खरं 5 वण्णक्खरं च । तत्थ नाणक्खरं "क्षर संचरणे" न क्षरतीत्यक्षरम् , न प्रच्यवते अनुपयोगेऽपीत्यर्थः, आतभावत्तणतो, तं च णाणं अविसेसतो चेतनेत्यर्थः । आह-एवं सन्यमविसेसतो णाणमक्खरं कम्हा मुतं अक्खरमिति भण्णति ? उच्यते-रूढिविसेसतो १ । अभिलाववण्णा अक्खरं भणिता, पङ्कजवत् , एवं ताव अभिलावहेतुग्गहणतो सुतविण्णा- णस्स अक्खरता भणिता २। इदाणिं वण्णक्खरं-वणिज्जति अणेणाभिहेतो अत्यो इति वण्णो, स चार्थस्य, कुडचे चित्रवर्णकवत् , अहवा द्रव्ये गुणविशेपवर्णकवत् । वर्ण्यते-अभिलप्यतेऽनेनेति वर्णाक्षरम् ३॥ एत्य मुत्तं- ६०. से किं तं अक्खरसुतं ? अक्खरसुतं तिविहं पण्णत्तं तं जहा-सण्णक्खरं १ वंजण- खरं २ लद्धिअक्खरं ३। ६०. से किं तं अवरसुतं इत्यादि । अक्सरसई मुणतो भासतो वा अक्खरसुतं । तत्थऽक्खरलंभो अभिलावो वा दव्यमुतं, खयोयसमलद्धी भावमुतं । तच वर्णाक्षरं त्रिविध सण्णक्खरादि । तत्थ- ६१. से किं तं सण्णक्खरं ? सण्णक्खरं अक्खरस्स संठाणा-ऽऽनिती।से तं सण्णक्खरं । ६१. 'सण्णवरं' अक्खरागारविसेसो । सो य ब्रह्मादिलिबिविधाणो अणेगवियो आगारो। तेसु आ(अ)- कारादिआगारेमु जम्दा अकारे अकारसप्णा एव भवति, एवं सेसेम वि, तम्हा ते सण्णक्खरा भणिता, जहा वटं घडागारं दद्रं टकारसप्णा उप्पजतीत्यर्थः १॥ १ चउद्दस मो० ॥ २ अक्सरं ति दुचिदं-नाणयसरं अभिलावषण्णवरं च । तत्थ नाणं ३'टायणा समपरं आ•॥४'ती सण्णस्यरं । से तं सं० सं० २. ल. शु० ॥ 20 ? 25 क्षर जे० ॥
-- अकाग-स्वराद मुयगाणं सिन्दिकाविमचं नवागनं । ६२, से कि तंबंजणवरं ? वंजणश्वरं अक्सरम बंजणाभिलायो। सेनंजणावरं । १२. व्यक्तीकरणं वंजणं. व्यन्यन अनेनार्य निकायनन . या प्रदान करा. सनं न नहार चनि व्यञ्जनातरम् . नंचं सर्वमेव भाध्यमाणं अादि कागना यांति अन्याभिव्यंजनं यंजणवरं भवति. जहा पटः परः इत्यादि। ६३. से किलदिअंग्रवरं ? लडिअक्चरं अस्वडियम्य नदिअन्वरं समुपज्जा : नं जहा-सोइंदियलद्धिमस्वरं १ चक्विदियलजियस्वरः घाणदिल्लनियन्वरं मान- दियलद्धिअकबरं ४ फामंदियलद्धिस्वरं ५ जोडदिलविश्वरं । मेलनिअक्सरं । ननं अक्बरमुयं ।। ६६. 'लड्यावर अायल दी जम्वयि नम्प दिया। जति न चनियन्वरं । न च पंचविट नोदियादि । साविकको भज० २०६५० ] यति, एवं मान्य नदिक मन-- मनविण्णाणकारगनानी, बदलब मायनं. मा किया ६४. से कि नं अणमयाचं ? अणना उन्ममियं जीनिय णित मानि णियिधिगयामा अपरं . . ! से अणयग्य । ६.१. यसरयासको समित गा.पा :: . . . ६५, में किया aur उपाणं : दिवाली। -- . . १ - जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजुयं [ सु०६६-६८ ६६. से किं तं कालिओवएसेणं ? कालिओवएसेणं जस्से णं अत्थि ईहा अंपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमंसा से णं सैण्णि त्ति लसइ, जर्स णं णत्थि ईहा अंपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमंसा से णं असणीति लम्भइ । से तं कालिओवएसेणं १ । ६६. 'कालितोवदेसेणं' ति इहाऽऽदिपदलोवो दट्टयो, तस्मुच्चरणे 'दीहकालितोवदेसेणं' ति वत्तव्यं । दीहं- 5 आयतं, कालितो ति विसेसणं । कस्ल ? उच्यते-उवदेसस्स, जहा जिणभवणे मुहुत्तकालितोदीहकालितो वा पूयामंडवो कतो तहा दीहकालितोवदेसेणं ति भाणितव्यो । उपदिसणमुवदेसो, उपदेसो त्ति वा आदेसो त्ति वा पण्णवण त्ति वा परूवण, त्ति वा एगहा। दीहकालिओ उवदेसो दीहकालिओवदेसो, तेण दीहकालितोवदेसेणं जस्स सण्णा भवति सो आदिपदलोवातो कालिओवदेसेणं सण्णीत्यर्थः । अहवा कालियं-आयारादि सुत्तं तदुवदेसेणं सण्णी भण्णति। सो य इमेरिसो-जो य अतीतकाले सुदीहे वि [जे० २०६ द्वि० ] इदं तदिति कृतमणुभूतं वा सुमरति, वट्टमाणे य इंदिय- 10 णोइंदिएणं वा अण्णतरं सदाइअत्थमुवलद्धं अण्णत-चइरेगधम्मेहिं ईहइ ति ईहा । तस्सेव परधम्मपरिचागे सधम्माणु- गतावधारणे य 'अयोहो' त्ति अवातो। विसेसधम्मण्णेसणा मग्गणा, जहा मधुर-गंभीरत्तणतो एस संखसद्द इति । वीसस-प्पयोगुज्मवणिचमणिचं चेत्यादि गवेसणा । जो यऽणागते य चिंतयति 'कहं वा तं तत्थ कातन्वं ? ' इति अण्णोण्णालंवणाणुगतं चित्तं चिता। आत-पर-इह-परत्थयहिता-ऽहितविमरिसो वीमंसा । अहवा 'किमेयं ?' ति ईहा। णिच्छयावधारितो अत्थो अबोधो । अभिलसियत्थस्स मणो-बयण-काएहिं जायणा मग्गणा। अभिलसितत्थे चेव 15 अपहुँप्पज्जमाणे गवेसणा । अणेगहा संकप्पकरण चिंता। द्वन्द्वमर्थेपु वीमंसा, जहा णिच्चमणिचं हितमहितं थूरं कृशं थोवं वर्ल्ड इत्यादि । अहया संकप्पतो चेव विविधा आमरिसणा वीमंसा । अहवा 'अबोहो' त्ति अबातो। सेसा ईहाएगठिया । जस्सेवं अप्णयरविकप्पेण मणोदव्यमणुगतं चित्तं धावति एस कालिओवदेसेण सण्णि त्ति । सो य अणते मणोजोगे खंधे घेत्तुं मणेति, एतलद्धिसंपण्णो मणविण्णाणावरणखयोवसमैजुत्तत्तणतो य जहा चक्खुमतो पदीवादिप्पगासेण फुडा रूबोवलद्धी भवति तहा मणखयोवसमलद्धिमतो मणोदव्यपगासेण मणोछटेहिं इंदिएहि 20 फुडमत्थं उवलभतीत्यर्थः । कालितोवदेससण्णीविवक्खे असण्णी, जहेह अविसुद्धचक्खुमतो मंदमंदप्पीसे रूबोवलद्धी असुद्धा एवं सम्मुच्छिमपंचेंदियअसण्णिस्स, उक्कोसखयोवसमे वि अप्पमणोदव्वग्गहणसामत्थे मंदपरिणामत्तणतो य असणिणो अविसुद्धमप्पा य अर्थोपलब्धीत्यर्थः । ततो वि अविसुद्धा चतुरिंदियाणं, ततो तेइंदियाणं, ततो वि अविमुद्धा वेइंदियाणं अत्थुवलद्धी । जस्स य जइ इंदिया स तहा तेसु अवग्गहादिसु पबत्तते । विगलिंदियाण वि आदेसंतरतो मणोदव्य[जे० २०७ प्र० ]ग्गहणं असुद्धमप्पत्तणतो य भाणितव्वं ।. सो य मणो तेसिं अमणो चेव 25 दहव्यो, असुद्धत्तणतो, असीलवद् बैंज्ञानवद्वा । तयो वेइंदियेहितो वि समीवातो अव्बत्ततरं विण्णाणं एगिदियाण, जहा मत्त-मुच्छिय-विसभावितस्स य तहा एगिदियाण सव्वधा मणाभावे विण्णाणं सबजहणं । कालितोवदेससण्णिणो एते सम्मुच्छिमादयो सव्वे असण्णी भवतीत्यर्थः १॥ इदाणि- ६७. से किं तं हेऊवएसेणं ? हेऊवएसेणं जैस्स णं अत्थि अभिसंधारणपुब्बिया १ स्सऽत्थि सं० सं० ल० शु० ॥ २ अवोदो जे० मो० मु० ॥ ३ सपणीति जे० मो० मु० ॥ ४ स्स णत्थि सं० सं० शु० त० ॥ ५ अपोद्दो जे० मो. मु.॥ ७ आत्म-परेह-परनजहिता-ऽहितविमर्थ इत्यर्थः ॥ ८ 'दुप्पामाणे दा० । 'दुश्चमाणे आ० ॥ ९ तं वा वत्तति पस जे० आ० दा० । धावति इति पाठस्तु मो० चूर्णादर्शगतो शेयः ।। १० 'महेतुत्तपतो आ० दा० ॥ ११ गासा रूवो आ० ।। १२ यघनवद्वा आ० ।। १३ जस्सऽस्थि सं० सं० ल• शु० ।। ६ पणी ल' सं० सं० डे. ल. शु० ॥
.. समि-अरिंगमुबगाणं ] मिविवायविनवीन । करणसंनी से णं सेणीति लम्भइ, जस्म णं णत्यि अभिसंधारणपुब्धिया करणसनी से । असणि त्ति लगभइ । सेनं चालणं २ । ६७. 'हेन्दसणं निरतः कारणं निमिनामनन्तम निरन् । काम निजण नमो दनक नगी भवति । 'नचनिजीमा. मग नोकरी नयमवर्गवचनोपन्याने वा अध्यनन बितानन अभिनन्याय का निशान :- निः-सामर्य, अयश करणे शनिः करणानिः प्रथा का अनि: नः । न अभिकार संचिन्य चिन्य टेन विपयवन्यून भागविन प्रवनं. प्रणिय नि । तेच पार पठणकावे. नीता-गागकालावधी - उमाका कविणो वि भवनि ने पुण ण बोकालागि त्रिविमान यो । वन विवादिया नम्वृहिमपंचदिन का काम वाणिनिमविणियामारा मन लिय-विनोदिति हिना वाणि- ६८. से किं ने दिहिवां ओवपलेणं ? विधि चमो मण्णी लमनि, अणिमुपद माओवनम अमन- लामो णं ३ । ये नं गणिणग्गुनं २ । न भर्माण । - . --- ma- । का wom ।
- जिणदासगणिगहत्तरविरट्याग चुगीए संजुयं [गु० ७१-७२ [२] इंचेताई सम्मद्दिहिस्स सम्मत्तपरिग्गहियाई सम्मसुयं । इचयाई मिच्छदिहिस्स मिच्छत्तपरिगहियाई मिर्छसुतं । [३] अहवा मिच्छद्दिहिस्स वि ऐयाई चेव सम्मसुयं, कम्हा ? सम्मत्तहेउत्तणओ, जम्हा ते मिच्छदिविणो तेहिं चेव समएहिं चोइया समाणा केइ सपक्खदिट्ठीओ वमति । से तं 5 मिच्छंसुयं ६ । ७०. [१] से किं तं मिच्छसुतं इत्यादि । अण्णाणं इतेहिं [जे० २०९ प्र०] अण्णाणितेहिं । अण्णाणं-अयोधो विवरीयत्थबोधो वा तेण इतो-अणुगतेत्यर्थः । मिच्छादिहि इतेहिं मिच्छादिहितेहिं, मिच्छ ति-अनृतं, दिष्टि त्ति- दरिसणं, मिच्छादिटिणा अणुगतेहिं ति भणितं भवति । स-इत्यात्मनिर्देशः, छन्दः-अभिप्रायः, तत्यमतत्येण वा अत्यस्स जो बोहो स बुद्धिः-अवग्रहमात्रम् , उत्तरत्र ईहादिविक्रप्पा सव्ये मती । अहवा नाणावरणखयोवसमभावो 10 बुद्धी, सो चेव जदा मणोदव्यणुसारतो पवत्तइ तदा मती भण्णति । एवं आत्माभिप्रायबुद्धि-मतिभिः यच्छ्रुतं विविधकल्पनाविकल्पितमिति रचितं, तच भारबादि जाच चत्तारि य वेदा संगोवंगा, सव्वेते लोगसिद्धा, लोगतो चेतेसिं सरूवं जाणितव्वं । एतं सव्वं मिच्छभावहितं ति कातुं मिच्छमुतं भाणितव्वं । एतम्मि सम्म-मिच्छमुत- विकप्पे चतुरो विकप्पा माणितव्या इमेण विधिणा- [२] सम्ममुतं सम्मदिद्विणो सम्ममुतं चेव १, सम्ममुतं मिच्छदिहिणो मिच्छ मुतं २, मिच्छमुतं सम्मदिठिणो 15 सम्ममुतं ३, मिच्छमुतं मिच्छदिहिणो मिच्छमुतं चेव ४ । 'इचेताई सम्मबिटिस्स सम्मत्तपरिग्गहिताई सम्ममुत' एत्य मुत्ते पढम-तइयविकप्या दहव्या । 'इच्चेयाई ति सम्म-मिच्छमुताई, अहवा मिच्छमुताई चेव । सेसं कंठं । 'मिच्छदिटिम्स' इचादिमुत्ते वितिय-चतुत्यविकप्पा दट्टव्वा । तत्व पढमविक्रप्पे सम्ममृतं सम्मत्तगुणेण सम्म परिणामयतो सम्ममुतं चेव भवति १ वितियविकप्पे वि जहा खंडसंजुतं खीरं पित्तजरोदयतो ण सम्मं भवइ तहा मिच्छत्तुदयतो सम्ममुते मिच्छाभिणिवेसतो मिच्छमुतं भवति २ ततियविकप्पे तिफलादिमणिर्ट पि उवउत्तं उवका- 20 रकारितणतो सम्मं भवति तहा मिच्छमृते मिच्छभावोवलंभातो सम्ममृते दढतरभावुप्पायकरणतणतो तं से सम्ममुतं भवति ३ चरिमविकप्पे मिच्छमुतं, तं चेव मिच्छाभिणिवेसतो मिच्छमृतं चेव भवति ४ । [३] तस्स चा मिच्छडिटिणो तं चेव मिच्छमुतं सम्ममृतं भवति । कम्हा एवं भण्णति ? उच्यते-परिणाम- विसेसतो, जम्हा ते मिच्छदिहिणो 'तेहिं [जे० २०९ दि०] चेत्र' पुलावरविरुद्धेहि मिच्छमुतभणितेहिं 'चोदिता' भणिता 'समाणा' इति सन्तः, चोदणाणंतरं आत्मैकालावस्थायां सन्त इत्यर्थः । पुच्चं जं सासणं पडिवण्णो "तं से 25 सपक्खो, तम्मि जा दिट्टी तं 'चमेति' परिचयंति, छडेति ति युत्तं भवति । जम्हा एवं तम्हा तं पुवमिच्छमुतं सम्ममुतं से भवति । पर आह-तत्तावगमसैभावसामण्णे सम्मत्त-गुताणं को पतिविसेसो जेण भण्णति 'सम्मत्त- परिग्गदिताई सम्ममुतं' ? उच्यते-जहा णाण-दसणाणं अवबोधसामण्णे भेदो तहा सम्म-मुताणं पि भविस्सति । १ एयाणि चेय सम्म गर्वाग, मूत्रप्रतिषु । गृत्तिकबारगमेव सूत्रपाठः सम्मतोऽस्ति ॥ २ एयाई मिच्छ सर्वासु सूत्रप्रतिपु. सिनोरयमेव रामपाटः सम्मतः ॥ ३ च्छद्दिट्टिपरि' पं० ॥ ४ मिच्छामुयं टे. मो० मु० । अपि च-सम्यक्श्रुत-मिथ्याश्रुतविवेचकोऽयं गांगा गयांग गुनपनिषु वृत्त्योरपि च ममव्यत्यारोन वर्तते ॥ ५ पयाई चेव इति सं० सं० ० ० ० नास्ति । श्रीहरिभद्राचारपि नादयं पाठः स्वतः ॥ ६ हिया तेहिं दे० स० विना ॥ ७ ससमपहिं जे० ॥ ८ चयंति जै० मो० । श्रीमलयगिरिपादरे समाळानुमाय व्याख्यानाति ॥ ९ मिच्छामुयं . मो. मु० ॥ १० तत्थ यातत्येण वा सत्थस्स आ• दा० ॥ ११ 'त्मकलावस्थायाः सं आ• ॥ १२ तम्सेस पक्मो जे० ॥ १३ सम्भावं आ. दा.॥
-- -- --- -- V सादि-समन्वनियाविनवणानं निकायरिग बस्ने । कां ? उच्चने-जहा विनगाणं बोयमशन-धारण ना. अध्याय नहा। नने नानी सम्मन, नत्येव ज रोचकं ने चुनं । एवं मिनपरिग्गा वि चननं ६ वा मावि-समाजमा ७१. से कि तं सादीयं सपज्जवनि ? अणादीयं अपज्जवनियंत्रयं बुवालसंग गणिपिडगं विन्छित्तिणयछ्याय नानी नपज्जवनियं. अविउन्जिनियट्याए अगादीयं अपज्जवसियं । ७१. किन मादीयं त्यादि । मानटिनो गया. करमाकानी : मरमाणं । कई ? जहा गागादिममानी जात्रों का मिलने जनंग पि 'अणादि अपनयनाणं त्रिकालजन्याची माधिकार का काम चिनिजनि । न्य- ७२. नं समानओ बि प्राणनं. जहा-ओ-बोकालो मारो। नत्य दव्यओ णं सम्मन्सुयं एग पनि एक मादी अपज्जवनियं ।। खतओ णं पत्र भरा जमाई मलिन महावितहाई पञ्च अणावीयं अजरि: । काम ------ एम मादी नपज्जवनियं. गाण --- ३। भावओज जानिए मिज्जनि णिगिजनि उनिधन मि गुण मा एमाणाकी } A 44- A AHARMA . -- + .
10 ५२ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुयं [मु०७३-७४ 'आपविजंति' आख्यायन्ते सामण्णतो [विसेसतो] विसेससामण्णतो वा, पण्णविनंति भेदाभेदेहिं, तेसिं भेदप्र- भेदाणं सरूवमक्खाणं परूवणा, दंसिज्जति उबमामेत्तेण जहा गो तहा गवय इति, णिदंसणं हेतु-दिट्ठतेहिं, उवदंसणा उवणयोवसंघारेहिं सव्वणएहि वा । अहवा एगहिता एते । 'ते' इति पण्णवणिजाण णिहेसो । 'तहा' इति पण्णवर्ग पण्णवणिज्जे वा पडुच सादि सपजवसाणं भवति । तत्थ पण्णवगं पडुच्च उवयोगतो सरविसेसतो पयत्तयो आसण- 5 विसेसतो य सादि सपज्जवसाणं। पण्णवणिज्जे पडुच्च गतीतो ठाणतो दुपदेसादिभेदतो तहेगपदेसादिमवगाहतो एगसमयादिमवत्थाणतो वण्णादिपज्जवे य आसज्ज सादि सपज्जवसाणं । पाढंतरं वा "ते तदा पडुच्च" 'तया' इति कालं अनाद्यपर्यवसितम् । भावतः श्रुतज्ञानं क्षायोपशमिके भावे नित्यं वर्तते स्वामित्वसम्बन्ध इति । ७३. अहवा भवसिद्धीयस्स सुयं साईयं सपज्जवसियं, अभवसिद्धीयस्स सुयं अणा- दीयं अपज्जवसियं । ७३. अहवा सादि सपज्जवसाणं सपडिपक्खपदेसु भंगचतुक्के पहमभंगे सम्मसहितसुतभावो चिंतेयचो, अणेगविहं वा खयोवसमभावं पडुच्च दन्वादिउवयोगं वा पडुच्च पढमभंगो भवति । वितियभंगो मुण्णो, अह्वा अभव्याणं अणागतद्धसंजोगेण सुतभावो भाणितब्बो। चरिम-ततियभंगेसु अविसिटमुतभावो अभव्य-भव्वे पडुच्च जोएतव्यो। अभवसिद्धीयस्स इत्यादि मुतसिद्धं । इह चरिम-ततियभंगेसु अणादिमुतभावो दिट्ठो मुताधि- कारतो, इधरा मतिभावो वि दट्टव्यो, मति-सुताण अण्णोण्णाणुगतत्तणतो। सो य अणादिणाणभावो जहण्णो 15 अजहण्ण[जे० २१० द्वि० ]मणुकोसो वा हवेज, उकोसो ण भवति, कम्हा? जम्हा उक्कोसनाणभावो केवलिणो भवति ।। तस्स य सुत्ते इमं पमाणं पढिज्जति-- ७४. सव्वागासपदेसगं सव्वागासपदेसेहिं अणंतगुणियं पज्जवग्गक्खरं णिप्फज्जइ । ७४. सव्वागासपदेस इत्यादि सूत्रं । सबमिति-अपरिसेससव्वग्गं अधिकिच्चेवं भण्णति, सव्वं आकासं सव्वाकासं, सव्वागासस्स पदेसा सव्वागासपदेसा, जं एतेसिं अग्ग-जं परिमाणं ति वुत्तं भवति, एतं सव्वागासप्प- 20 देसरासियग्गं अणंतेण रासिणा अण्णेण गुणितं ताहे जं रासिपमाणं लभति तं सबपज्जवाण अग्गं भवति । पज्जाया णाम-एकेकस्साऽऽगासंपदेसस्स जावंतो अगरुलहुयादी पन्जवा ते पण्णाए सव्वे संपिंडिता, तेसिं संपिडिताणं जं अग्गं एतप्पमाणं अक्खरं लमति । [अक्खर पडलं] इह अक्खरं ति दुविहं-णाणं अकारादिदम्बसुतक्खरं च । तत्थ नाणमक्खरं ति अविसेसतो सबनाणमक्खरं 25 जम्हा तं जीवातो उप्पण्णं अणण्णभावत्तणतो णो क्खरति त्ति, इह पुण सव्वपज्जायतुल्लत्तणतो केवलणाणं घेत्तव्यं, जम्हा केवलं सम्बदन्बपन्जायविण्णत्तिसमत्थं भवति । तं च केवलं णेये पवत्तइ, तस्स वि परिमाणं इमेणं चेच विधिणा भाणितव्यं-'सव्यागासपदेसग्गं' इत्यादि पूर्ववत् । ते य सव्वदव्यपज्जाया समासतो तीसं इमेण विधिणा-गुरू लहू गुरुलह अगुरुलहू एते चतुरो, पंच वण्णा, दो गंधा, पंच रसा, अट्ठ फासा, अणित्यत्य- संठाणसहिता छ संठाणा, एते मुत्तदव्वे सव्वे संभवंति । अमुत्तदव्वेमु अगुरुलहू चेव एको पजायो संभवइ । १ "आपविजेति' ति प्राकृतदोल्या आख्यायन्ते, सामान्य-विशेषाभ्यां कथ्यन्त इत्यर्थः” इति हारिनन्दिवृत्ती । “अग्धविनंति' ति प्राकृतत्वाद् आख्यायन्ते, सामान्यरूपतया विशेषरूपतया वा कथ्यन्ते इत्यर्थः" इति मलय नन्दिवृत्ती ॥ २ सायि सप २० । साई सर्प ल० ॥३ पजवक्खरं जे० मो० मु• विआमलवृत्तौ २६८ पत्रे नन्दिस्त्रपाठोद्धरणे । नायं पाठभूणि वृत्तिरुतां सम्मतः ॥
कर । V नत्रं एत्य र एशले भेटे अणंता मेवा नभनि । मित्र मान्नु पनविनती अभियोगमा अवाची मनार भनि । कई ? उच्चन-चत्र नान पनगुन-लहरजाति विणा । जती - नियनो मध्यानं मना गण विजने । वान्नांत जुननि गवांग ।।१।। णिन्छयणमण नया गुनं मानन्ध बच्छ । विज नो नाममा विक चन नलान्य या उभयमाणन. जनी या उनमा किन का गगन वाद नन्धि । कागवेन गुण की विकास डिमिका माउलापनादी । एवं प्रसारण गमती बाइनियामकिन संग मी काही मान। 'पणे निण नरिणामेन नि जुनं मान ।। के पुण नामपरिणता का? मामा-मामी न गाय नामी अनवित्री मंत्री प्रयोग भनि । काग एण परमानी आकार में गंधा नमन. लोन नगी विन. यादा बंधा। य ओगल-विका- पुननि-जनविगाया वका आयामी, श्रीमगरला यदन्या अणं वगणा । : अगवानी वग्गणामी, महामार्गा. आगवानी नगगानी REP बियाणं जाना यमाणानी : बागरायणि ना! me- ... wom . . * A- .. - winnri list... - ४. जिणदासगणिमहत्तरविरयाग चुण्णीप संजुयं [मु० ७५ रूवि-अरूविदव्याण य पज्जायअप्पबहुत्तं इमं भण्णति-रविदव्याणं जे य अगमलहुपज्जाया ते पण्णाळेदेण पंडिता, एतेहितो एकस्स चेव अमुत्तदव्वस्स जे अगरुयलहुपज्जाया ते अणंतगुणा भवतीत्यर्थः । एत्थ सीसो पणति-केवतितेहिं पुण भागेहिं मुत्तदव्याणं पिंडितपज्जाएहितो अमुत्तदव्याणं अगुगलहुपजाया अणंतगुणा भवंति ? च्यते-नास्त्यत्र परिमाणं, बहुधा वि अणंतएणं गुणिजमाणे अमुत्तदव्यपन्जाएमु णस्थि परिमाणं ।। एवंगते परिमाणार्थे इमं भण्णति- केण हवेज निरोधो अगरुलहूपज्जयाण तु अमुत्ते ? । अचंतमसंजोगो जहितं पुण तधिवक्खस्स ॥ ३॥ [कल्पभा. गा. ६९] जतो अमुत्तदवाणं बहुहा वि अणंतएण गुणिज्जमाणे पन्जायणं ण भवति । ततो 'केनेति' केनान्येन प्रकारेण 'हवेज्ज' त्ति भवे 'णिरोहो णाम' परिमाणं ? परिच्छेदेत्यर्थः, किं मुत्तदव्येहितो अमुत्तदव्याणं अगरुयल-- हुपज्जायपरिमाणं भविस्सति ? त्ति, नेत्युच्यते, 'अचंतमसंजोगो' 'अचंत' अतीव अंयुजमाणो जम्हा संजोगो । [जे० २१२ प्र० ] 'जहियं ति यत्र । 'पुण' विसेसणे। किं विसेसयति ? रूविदन्वे । तदित्यनेन अमुत्तदव्यपकावो, तस्स विचक्खो-मुत्तदव्यपगारो, तेमु पन्जायथोवत्तणतो अमुत्तदव्येमु य पन्जायाण अतीववहुयत्तणतो, अतो मुत्त- दव्वेहितो अमुत्तदव्यपज्जायाण परिमाणकरणसंजोगो एगंतेणेव ण जुजते, ण घटतेत्यर्थः ।। एवं तु अणंतेहिं अगरुलहपज्जएहिं संजुत्तं । होति अमुत्तं दव्यं अरूविकायाण तु चतुण्डं ॥ ४ ॥ [कल्पभा. गा. ७० 20] 'एवमिति' यथेदमुक्तं । सेसं कंठं । णवरिं 'अरूविकाताण तु चतुण्डं ति धम्मा-ऽधम्मा-ऽऽगास-जीवाणं ति एतेसिं चतुण्ह वि नियमा पत्तेय अणंता अगरुयलहुयपज्जाया भवंति । कहं ? उच्यते-जम्हा एतेसिं एकेको पदेसो अणंतेहिं अगरुयलहुयपज्जाएहिं संजुत्तो तम्हा धम्मा-ऽधम्मेगजीवस्स य असंखेजपदेसत्तणतो असंखेजमणंता पत्तेयं भवंति । आगासपदेसअपरिमाणतणतो पुण तस्स नत्थि परिमाणं, तहा वि संववहारतो अणंता उक्ता इत्यर्थः ।। एवं ताव ज्ञेयमनंतमुक्तम् । अथेदानीं तत् केवलज्ञानं यथाऽनन्तं तथेदमुच्यते- उवलद्धी० गाहा । [कल्पभा. गा. ७१] सव्वे रूविदव्या-ऽरूविदवाण य जावतिया गुम्लहुपज्जाता सव्वे अरूविदव्याण य जे अगरुलहुपज्जाया एते सव्वे जुगवं जाणति पासतिं य जतो, एवमणतं केवलनाणमक्खरं ति सप्रसंगमभिहितम् । इदाणिं 'अकारादिदव्यमुतमक्खरं' ति जति अविसेसतो णाणमक्खरमुक्तं णेयं वा तहा वि रूढिवसतो जहा 5 पंकयं तहा सरक्सरं वंजणक्खरं वण्णक्रवरं वा भण्णति । तत्थ 'सरक्खरं' अक्खरं अक्खरं सरंति-गच्छंति सरंति वा इत्यतो सरक्खरं अकारादि, बंजणस्त वा फुडमभियाणं सरंति, ण वा सरक्खरमंतरेण अत्यो संभरिजइ त्ति सरकखरं । ककारादि बंजणक्खरा, व्यज्यते तेनार्थ इति प्रदीपेन घटादिवद् व्यंजनाक्षरम् । तेहिं चेव सर-बंजणक्खरेहिं जदा अत्यो वणिज्जति अभिलप्यते वा तदा ते वण्णकावरं भण्णंति । इह एककस्स अकारादिहकारांतमक्खरस्स स-परप- जायभंदा इमे-अकारस्स य पजाया जहा दीह-इस्व-प्लुतात्रयः, तत्थ दीहो [जे० २१२ द्वि०] उदात्ता-ऽनुदात्त-स्व- 30 रितभेदः, एवं हस्य-प्लुतावपि, पुनरप्यकैको सानुनासिको निरनुनासिकच, इत्येवं अष्टादशभेदः । एवं सेसक्खराण वि जहासंभवं भेदा भावितव्या । अहवा सरविसेसतो एकोकमक्खरस्स अणंता सपज्जया । एत्य अकारस्स १ पन्जायगं जे० दा० ॥ २ अपुजमाणो आ० ॥ ३ 'तसरक्खरस्त आ० दा० ॥ ४ तस्त्रिमेदः, जे० दा० ॥ - --- . . + करपल विवानिननं । अकारजातामामाती परजाया प्रवाल नया पायजामा जापन भाव गगना- रादिवंजणा कंवा अजमाहिना वा अमिला मनम्न मरजानी मानल्य पसलमा म विजेता । जती मु मणिनं-"तापमानापन्या"..' =...मगर- पाल्पणिन्ना गाना पन... १६ जाबर का.. अभिलाया नमागी. नन्निपि अगनमानी पनि नि । काति पलायनमिलमाणमना मनि । क उच्च-भिवानी जमा करने गी, जानिए अमिलो अभियान र नमन में कर आकार मोनू नचम्य वजापतिको पन्यतया गा! आज का आ-या नव पयजया य? कि उच्च नवदा अनंबादाय । नन्य प्रकार अनामय र चापागकाः ने चय पनि अटा नबिनमा अशा मानदिपाया गया मंदा. :- अधिगण अवका. नानी का विनिर्माणका. वादिया?या, - - india ---- । A . है . " ५६ जिणदासगगिमहत्तरविरइयाग चुण्गीत संजुगं [ गु० ७६-८१ तभागो निचुग्घाडियतो, सो केवलस्स न संभवति, केवलरस अविभागसंपुगणालणतो य; ओधीए नि ण संभवति, अणंतभागस्स अभावत्तगतो, अवधेः असंख्येयप्रकृतिसंभवादित्यर्थः; मणपजयनाणे वि रिजु-विपुलदभेदसंभवतो अणंतभागो ण भवति, किंच अवधि-मणपज्जयाणं णिचुग्घाडअभावत्तणतो इस अणधिकारो; परिसिढे मनि-गुते त्ति 'अक्खरस्स अणंतभागो निचुग्याडिययो' अधिकतमुतस्स वा अक्खरस्स अगंतभागो निबुग्याडियनो। जत्थ 5 लुतं तत्थ मतिणाणं पि वेत्तव्यं । 'णिचं' ति सव्यकालं । 'उग्याडिततो' ति णाऽऽयरिजति । सो य आणतभागो पुढवादिएगिदियाण वि पंचण्हें निशुग्याडो, अहवा सवजहणणो अणंतभागो निशुग्वाडो पुढविकाइए, चैतन्यमात्र- मात्मनः । तं च उक्कोसथीणिद्धिसहितनाण-दसणावरणोदए वि णो आवरिजति । जति पुण सो वि वरिज्जेज तेण जीवो अजीवयं पाये । मुट्ठ वि मेहसमुदए होति पहा चंद-सूराणं ॥१॥ [कल्पमाप्ये गा. ७१] 10 जम्हा सो णाऽऽधरिजति तम्हा जीवो जीवत्तं ण परिचयति । सो य कम्हा णाऽऽवरिज्जति ? उच्यते-दव्य- सभावसरूवत्तणतो। इह दिलुतो जहा-गुह वि मेहच्छादिए गभे चंद-सूरप्पहा मेहपडले भेत्तुं दवे ओभासति, तहा अणंतेहिं णाण-दसणाचरणकम्मषुग्गलेहिं एकको आतप्पदेसो आवेढियपरिवेढितो ते कम्मावरणपडले भेत्तुं नाणस्स अणंतभागो उव्यरति, [जे० २१३ द्वि० ] ततो य से अव्बत्तं नाणमकावरं सचजहणं भवति । ततो पुढविकाइ- तेहितो आउकातियाण अणंतभागेण विसुद्धतरं नाणमकबरं, एवं कमेणं तेउ-बाउ-वणस्सति-वेईदिय-तेइंदिय-चतुरि- 15 दिय-असण्णिपंचेंदिय-सण्णिपंचेंदियाण य विमुद्धतरं भवतीत्यर्थः। ७॥ ८॥९॥ १० ॥ भणितं सादि सपञ्जवसितं अणादि अपज्जवसितं च । एत्थेत्र प्रसंगतो अकवरपडलं भणितं । एवं बहुवत्तव्यं अक्खरपडलं समासतोऽभिहितं । वित्थरतो से अत्थं जिण-चोदसपुब्बिया कहए ॥ १ ॥ [॥ अक्व र पडलं सम्मत्तं ॥] इदाणिं गमिया-ऽगमियं- ७६. से किं तं गमियं ? गमियं दिट्ठियाओ । अगमियं कालितं सुयं । से तं गमियं । से तं अगमियं ११ । १२ । ७६. गमबहुलत्तणतो गमियं । तस्स लकवणं-आदि-मझ-ऽवसाणे वा किंचिविसेसजुत्तं मुत्तं दुगादिस- तग्गसो तमेव पढिजमाणं गमियं भण्णति, तं च एवंविहमुस्सण्णं दिटिवातो। अण्णोण्णक्रवराभिधाणहितं जं पहिजति तं अगमियं, तं च प्रायसो आयारादि कालियमुतं ११ । १२ ॥ उक्तं गमिया-ऽगमियं । इदाणि अंगा-ऽणंग-पविटं-तं च गमिया-ऽगमियं चेव समासतो अंगा-ऽणंगपवि भण्णति । कहं ? उच्यते--सव्यमुतम्स तब्भावंतगतत्तणतो। ७७. अहवा तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अंगपविट्ठ अंगवाहिरं च । ७७. अहया अरिहंतमग्गोबदिठाणुसारि मुतं जं तं समासतो दुविहं इत्यादि मुत्तं । १ पटलं मा. दा. ॥ २ पत्थं यद् आ० दा. ॥ ३ अहवा इति मं० सं० ल. शु० नास्ति । ५ थपंगपचिटुं च प• मुं० दे. ल. शु० ॥ 20 25 ४ 8 च यंग
गनियाऽगनियंगवाहिकारिता मिनि !
पायदुगं अंबान गातारा नवीन बहनों । गांचा यो गाली
-
.
1.
न
जनम गुनपरिमन्न अंगमा
1 मनजिनका
गदि ने अंगवाहिनि भनि । श्रा-
गणल्कनमंगगनं न न नानिंग - :::
७८. ले कि तं अंगशहि? अंगबाहिहिं . बा-आवम्य व आद.
म्याग्निं च।
७. किन आवमा ? आत्रमा किनमें
वीनत्यत्री चंदण किया कामामी
७८-8. कि अंगावर
८१. वि. भावनि ? आमा
म
मालिया
८", आप
-
-
५८ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाग नगी संजुरी [गु० ८२ कप्पसुतं ४ । एमेव [पण्णवणा] पण्णवणत्यो सवित्थरो ८ । अण्णे य सवित्यरत्था जत्थ भणिता सा महा- पण्णवणा ९ । मज्जादियो पंचविहो पमातो, तेसु चेव आभोगपुब्बिया उवरती अप्पमातो, एते जत्य सावित्थरत्था देसिज्जति तमज्झयणं पमादप्पमा १० । सूरचरितं पण्णविजते जत्थ सा हरपण्णत्ती १६ । पुरिसो नि-संक पुरिससरीरं वा, ततो पुरिसातो निष्फण्णा पोरिसी, एवं सबस्स वत्युगो जदा स्वप्रमाणा च्छाया भवति तदा 5 पोरिसी भवति, एतं पोरिसिप्रमाणं उत्तरायणस्स अंते दक्खिणायणस्स य आदीए एक दिणं भवति, अतो परं अट्ठ एकसहिभागा अंगुलस्स दक्षिणायणे वड्डंति, उत्तरायणे य हस्संति, एवं मंडले मंडले अण्णोण्णा पोरिसी जत्थ अज्झयणे दसिज्जति तमज्झयणं पोरिसिमंडलं १७ । चंदस्स सूरस्स य दाहिणुत्तरेमु मंडलेमु जहा मंडलातो मंडले पवेसो तहा वणिजति जत्थऽज्झयणे तमज्झयणं मंडलप्पवेसो १८ । विज त्ति-नाणं, चरणं-चारित्त, विविधो विसिट्टो वा णिच्छयो-सव्भावो स्वरूपमित्यर्थः, फलं वा निच्छयो, तं जत्थऽझयणे वणिजति तमज्झयणं विना- 10 चरणविणिच्छयो १९ । सवाल बुड्ढाउलो गच्छो गणो, सो जस्स अत्थि सो गणी, विज त्ति-गाणं, तं च जोइसनिमित्तगतं णातुं पसत्थेसु इमे कज्जे करेति, तं जहा-पव्वावणा १ सामाइयारोवणं २ उवढावणा ३ मुतस्स उद्देस-समुदेसा-ऽणुण्णातो ४ गणारोवणं ५ दिसाणुण्णा ६ खेत्तेमु य णिग्गम-पवेसा ७, एमाझ्या कजा जेस तिहि- करण-णक्खत्त-मुहुत्त-जोगेसु य जे जत्थ करणिज्जा [जे० २१४ द्वि० ] ते जत्थऽज्झयणे वणिज्जति तमज्झयणं गणिविजा २० । थिरमज्झवसाणं झाणं, विभयणं विभत्ती, सभेदं झाणं जत्थ वणिजति अझयणे तमज्झयणं 15 झाणविभत्ती २१ । मरणं-पाणपरिच्चागो, विभयणं-विभत्ती, पसत्यमपसत्थाणि समेदाणि मरणाणि जत्थ वणिज्जति अञ्झयणे तमज्झयणं मरणविभत्ती २२ । आत त्ति-आत्मा, तस्स विसोही तवेण चरणगुणेहिं य आलोयणाविहाणेण य जहा भवति तहा जत्थ अझयणे वणिज्जति तमझयणं आतचिसोही २३ । सरागो वीतरागो य एतेसिं जत्थ सरूवकहणा, विसेसतो वीतरागस्स, तमज्झयणं वीतरागसुतं २४ । वाघातो निव्वाधातो वा भत्तसंलेहो कसायादिभावसंलेहो य जो जहा कातव्यो तहा वणिज्जते जत्यऽझयणे तमझयणं संलेहणासुतं 20 २५ । विहरणं विहारो, तस्स कप्पो-विधि त्ति वुत्तं भवति, सो जिणकप्पे थेरकप्पे बा, जिगकप्पे पडिम-अहालंद- परिहारिया य दट्ठया, एतेसिं सवित्थरो विधी जत्थ अञ्झयणे [वण्णिज्जति] तमझयणं विहारकप्पो २६ । चरण चारित, तस्स विही चरणविही, सभेदो चरणविही वणिज्जति जत्थ अज्झयणे तमझयणं चरणविही २७ । आउरो-गिलाणो, तं किरियातीतं णातुं गीतत्था पचक्खावेंति, दिणे दिणे दबहासं करेंता अंते य सम्बदन्नदात: णताए भत्ते वेरग्गं जणेता भत्ते नित्तण्हस्स भवचरिमपञ्चक्खाणं कारेंति, एतं जत्थऽज्झयणे सवित्थरं वणिज्जइ 25 तमझयणं आउरपचक्खाणं २८ । थेरकप्पेणं जिणकप्पेण वा विहरित्ता अंते थेरकप्पिया वारस वासे संलेहं करेत्ता, जिणकप्पिया पुण विहारेणेव [जे० २१५ प्र० ] सलीहा तहा वि जहाजुत्तं संलेहं करेत्ता निव्याघातं सचेट्टा चेव भवचरिमं पञ्चक्खंति, एतं सवित्यरं जत्थऽझयणे वणिजति तमझयणं महापच्चक्खाणं २९ । एते अन्झयणा जहाभिधाणत्या भणिया ॥ उक्तं उकालियं । इदाणिं कालियं- ८२. से किं तं कालियं ? कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-उत्तरज्झयणाई १ दसाओ २ कप्पो ३ ववहारो ४ णिसोहं ५ महाणिसीहं ६ इसिभासियाई ७ जंबुद्दीवपण्णत्ती १ "जीवादीनां प्रज्ञापनं प्रतापना" इति हारि०वृत्ती ॥ २ कालियं अणंगपविलु ! कालियं अणंगपविलु अणेग सं० गं• • । नायं पाचूर्णि-वृत्तिरतां सम्मतोऽस्ति ॥ ,
कालियामुवं
निकाकिन
८ दीरसागरपणनी ९ वंदपणनी बुद्धियाविमा विभनी । महतियाविमानाविभनी
१२ अंगलिया १३ बंगलिया है। विवाहपलिया :५ अल्लावाए ६ गल्लोकवार १७
धरणीववाए १८ वेममणोश्चाए : नविदांववाए
२२ जना
हाणबु २३ नागपरिमाणिया नियालियाओं का निवासी २६ किमी
२७ पुपचुलियानी वहीदमानी
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जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुगणी संजुगं [गु० ८३-८५ १७ धरणे १८ वेसमणे १९ सक्के-देवेंदे २० वेलंधरे २१ यति । 'उहागलुतं' ति अज्झगणं सिंगगाइयकब्जे जस्स णं गामस्स वा जाव रायहाणीए वा एगकुलस्स वा समणे आमुरुत्ते रुढे उपउचे तं उद्याणमुते ति अझयणं परियट्रेति एकं दो तिण्णि वा धारे ताहे से गामे वा जाव रायधाणी वा कुलं वा उद्वेति, उपराइ ति वृत्तं भवति २२ । से चेव समणे [जे० २१५ द्वि० ] तस्स गामस्स वा जाव रायधाणीए वा तटे समाणे पसण्णे पसण्णलेस्से 5 मुहांसणत्थे उक्उत्ते समुद्राणसुतं परियट्टेइ एकं दो तिणि वा बारे ताहे से गामे वा जाव रायहाणी वा आवासेति । समुवट्ठाणसुये त्ति वक्तव्वे वगारलोवातो समुठ्ठाणलुये ति भणितं । अप्पणा पुव्युटियं पि कतसंकप्पस्स आवासेति २३ । 'णागपरियाणिय' त्ति अज्झयणे णाग ति-नागकुमारे, तेसु समयनियद्धं अज्झयणं, तं जदा समणे उपयुत्ते परियट्रेति तया अकतसंकप्पस्स वि ते णागकुमारा तत्थत्था चेव परियाणंति, वंदति णमंसंति भत्तिबहुमाणं च करेंति, सिंगणाइयकज्जेसु य वरया भवतीत्यर्थः २४ । निरयावलियासु आवलियपविटेतरे य निरया तग्गामिणो 10 य णर-तिरिया पसंगतो वणिजति २५ । सोहम्मीसाणकप्पेमु जे कप्पविमाणा ते कप्पवडेंसया ते वष्णिता, तेनु य देवीओ जा जेण तवोविसेसेण उववण्णा ता वण्णिता, ताओ य कप्पबडेंसियां भणिया २६ । संजमभाव- विगसितो पुप्फितो, संजमभावविचुतोऽवपुप्फितो, अगारभावं परिद्ववेत्ता पन्जाभावेण विगसितो पच्छा सीयइ जो, तस्स इहभवे परभवे य विलंबणा देसिज्जइ जत्थ ता पुफिया २७ । एसेवऽत्यो सविसेसो पुप्फचूलाए देसिज्जति २८ । अंधगवहिणो जे कुले ते अंधगसदलोवातो बहिणो भणिया, तेसिं चरियं गती सिज्झणा य 15 जत्थ भणिता ता वहिदसातो। दस त्ति-अवस्था अझयणा वा २९ ।। ८३. एवमाईयाइं चउरासीतीपइण्णगसहस्साई भंगवतो अरहओ उसहस्स आइतित्थय- रस्स, तहा संखेज्जाणि पइण्णगसहस्साणि मज्झिमगाणं जिणवराणं, चोइस पइण्णगसह- स्साणि भगवओ वद्धमाणसामिस्स । अहवा जस्स जत्तिया सिरसा उप्पत्तियाए वेणतियाए कम्मयाए पारिणामियाए चउब्विहाए बुद्धीए उववेया तस्स तत्तियाई पइण्णगसहस्साई, पत्तेय- 20 बुद्धा वि तत्तिया चेव । से तं कालियं । से तं आवस्सयवइरितं । से तं अणंगपविट्ठ । ८३. भगवओ उसमस्स चउरासीतिसमणसाहस्सीतो होत्था, पइण्णगझयणा वि सव्वे कालिय-उकालिया चतुरासीतिसहस्सा। कहं ? जतो ते चतुरासीति समणसहस्सा अरहंतमग्गउवदिढे जं सुतमणुसरिता किंचि णिजूहंते ते सव्वे पइणग्गा, अहवा मुतमणुस्सरतो अपणो चयणकोसल्लेग ज धम्मदेसणादिसु भासते तं सव्वं पइण्णगं, जम्हा अणंतगमपज्जयं सुत्तं दिढे । तं च वयणं नियमा अण्णतरगमाणुपाती भवति तम्हा तं [जे० २१६ प्र०] 25 पइण्णगं । एवं चतुरासीती पइण्यागसहस्सा भवतीत्यर्थः । एतेण विधिणा मज्झिमतित्थगराणं संखेजा पइण्णगस- हस्सा । समणस्स वि भगवतो जम्हा चोदस समणसाहस्सीतो उकोसिया समणसंपदा तम्हा चोदस पइण्णगज्झय- १ याति सं० ॥ २ भगवओ अरहओ सिरिउसहसामिस्स, मज्झिमगाणं जिणाणं संखेजाणि पइण्णगसह रसाणि, चोहस सं० हे० । भगवओ अरहो उसहस्स समणाणं, मझिमगाणं इत्यादि शु० । भगवओ उसहरिसि- (सिरिस्स समणस्स, मझिमगाणं इत्यादि खं० . । त्रयाणामप्येषां पाठभेदानां मझिमगाणं इत्यायुत्तरांशेन समानत्वेऽपि कतरोऽपि पाटो वृत्तिकृतोः सम्मतः । वृत्तिकृद्यां तु मूले आदृत एव पाठो गृहीतोऽस्ति । चूर्णिकृता पुनः सं० दे० पाठानुसारेण व्याख्यातमस्तीति सम्भाव्यते ॥ ३ सिरिउसहसामिस्स आइ सं० । अत्र चूर्णिकता उसहस्स इति, हरिभद्ररिणा सिरिउ- सदस्स इति मलयगिरिणा च सिरिउसहसामिस्स इति पाठोऽलोकतोऽस्ति ॥ ४ सीसा सं• सं० चूर्णि विना ।। .
3 • . । , .... ... स -- अंगपविट्ठसुयणाणं मायारे य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीयुत्तं । णसहस्सा भवंति । अवा 'जत्तिया सिस्सा' इत्यादि मुत्तं । इह मुत्ते अपरिमाणा पइणगा पइण्णगसामिअपरिमाण- त्तणतो, किंच इस मुत्तें पत्तेयबुद्धप्पणीतं पइण्णगं भाणितव्यं । कम्हा? जम्हा पइण्णगपरिमाणेग चेव पत्तेयबुद्धपरि- माणं कीरइ त्ति भणितं 'पत्तेयबुद्धा वेत्तिया चेत्र' त्ति । चोदक आह्-णणु पत्तेयबुद्धा सिस्सभावो य विरुज्झते ? आचार्याह-तित्वगरपणीयसासणपडिवनत्तणतो तस्सीसा भवतीत्यर्थः ।। भणितं कालितमुतं अंगवाहिरं च । इदाणिं अंगपवि- ८४. से किं तं अंगपविठं? अंगपविढं दुवालसविहं पण्णत्तं, तं जहा-आयारो १ सूर्य- गडो२ ठाणं ३ समवाओ४ वियाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ७ अंतगड- दसाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिठिवाओ १२ । ८४. से किं तं अंगपचिट्ठ इत्यादि सूत्रम् ।। ८५. से किं तं आयारे? आयारेणं समणाणं णिग्गंधाणं आयार-गोयर-विणय-वेगइय- 11 सिक्खा-भासा-अभासा-चरण-करण-जाया-माया-वित्तीओ आघविजंति । से समासओ पंच- विहे पण्णते, तं जहा-णाणायारे १ दंसणायारे २ चरित्तायारे ३ तयायारे ४ वीरियायारे ५। आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा. संखेज्जा सिलोगा. संखेज्जाओ णिज्जुनीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्वंधा, पणुवीसं अज्झयणा, पंचासोती उद्देखणकाला, पंचासीतो समुद्देमणकाला, अट्ठा- 15 रस पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जया. परित्ता तसा, अणंता थावरा । सानत-कड-णिवद्ध-णिकाझ्या जिणपण्णता भावा आवविज्जति पण्ण- विज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंमिज्नंति उपदनिज्जति । से वंआया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवेणा आविज्जइ । ले आयारे । ८५. [से फि तं आयारे इत्यादि सुतं । आपण भावाने । गो-निकामविषाणं । विजयी- १ गाणातियो तिविही वावण्णविधाणो वा । विणण्या-नाना. निजामाने मागा-गाना भगनामांगा य । अमाला-मोसा सचामोसा य । चरण-"पतममितिः"गा! -गि ना १६ तित्थे अपरिमाणा ति पालो मलयतिरिका . ५ सूफी संखजाओ परिवतीभो, मंगेशान मिनी, :: :: :: :: :: : If ६-७ 'सी ल० ॥ ८ साति . । 'साणि मो० ॥ ९ मा .....:.:... किन्तु श्रीहरिभद्रयरिणा प्रोमलयागिरिका र एप पारे . . .:: नाम. . रयते । समाजमनावभय देवगिः एवंभापात नन्दो :::::..." ffer यद-अगों पाहो न समयासारसूत्रप्रति इति । शि:- रोग'.. हरिभदाना क्षमास , भाभयदेवरिप्र बनाया ट :::: पाहबार मालिकारमान पापपरित आ६१ ॥ १६ बादारे..! - - ... . ४ पारणा र० ॥ .. 1. पापा virur " 1 ६२ जिणदासगणिगहतरपिझ्याग नगीनुगं विसोही" गाहा [व्यव. भा.उ. १ गा. २८९]। जाय त्ति-संजमजता, तम्य साहणत्यं आ घेत्तव्यो । वर्तनं वृत्ती । एतं सव्यं आयारे 'आयविजई' ति आख्यायते । मृत्तमत्लम्स ग । अणंता ण भवति, आदि-अंतोवलंभत्तणतो । अहवा ओसप्पिणि-उस्मप्पिणिकालं ना पहन सबद्धं च पडुच्च अणंता । उवकमादि णामादिणिक्खेवकरणं च अणियोगहारा, ते आया 5 गवयणगोयरत्तणतो । वेढो-छंदजाती । 'पडिवत्तीओ' त्ति दव्यादिपदत्यभुवगमो पा पडिवत्तीओ, ते समासतो मुत्तपडिवद्धा संखेजा । तिविहा जेण निक्खेवमादिनिजुत्ती तेण पिंडेसणा सेजा इरिया भासज्जाया वत्थेसणा पातेसणा [जे० २१६ द्वि०] ओग्गहपडिम विमोत्ती, एते एवं णिसीवजा पणुवीसं अज्झयणा । पंचासीती उद्देसणकाला। कहं ? उ- धस्स अझयणस्स उद्देसगस्स, एते चउरो वि एको रहेसणकालो । एवं सत्थपरिणाए 10 विजयस्स छ, सीतोसणिज्जस्स चतुरो, समत्तस्स चतुरो, लोगसारस्स छ, धुयम्स पंच, मा हाततणस्स अट्ठ, उवधाणमुतस्स चतुरो, पिंडेसणाए एकारस, सेजाए तिण्णि, इरियाए। वत्थेसणाए दो, पातेसणाए दो, उग्गपडिमाए दो, सत्तिकयाणं सत्त, भाषणाए एको, वि पंचासीति ।चोदक आहजदि दो मुतखंधा पणुवीसं अज्झयणाय अट्ठारस पदसहस्सा पट "णववंभचेरमइओ अट्ठारसपदसहस्सितो वेदो।" [आचा० नि० गा०११] त्ति एतं विरुज्झति 15 एत्थ वि भणितं 'सपंचचूलो अटारसपदसहस्सितो वेदो' ति, इह मुत्तालावयपदेहि सहि व्येत्यर्थः । अहवा दो मुतखंधा पणुवीसं अज्झयणा य, एतं आयारग्गसहितस्स आयारस्त पदसहस्सा पुण पढमसुतखंधस्स णववंभचेरमइयस्स पमाणं । विचित्तत्यवद्धा य मुत्ता, भाणितब्बो । अक्खरस्यणाए संखेजा अक्खरा। अभिधाणाभिधेयवसतो गमा भवंति विधिणा-सुतं मे आउसं तेगं भगवता, तं सुतं मे आउस, तर्हि सुतं मे आ०, आ मुतं मे : 20 तदा मुतं मदा आ०, तहिं मुतं मदा आ०, एवमादिगमेहिं भण्णमाणं अणंतगमं । अक्व य अणंतं । परित्ता तसा, अणंता ण भवंति । अणता थावरा वगप्फइसहिता । सासत त्ति त्ति-कित्तिमा, पयोगतो वीससापरिणामतो [जे० २१७ प्र०] वा जहा अभा अन्भरुक्खा- मुत्तेण निवद्धा । निज्जुत्ति-संगहणि-हेतूदाहरणादिएहिं य णिकाइया । किंच एते अण्णे य प्पणीया भावा 'आधविनंति' जाव उवदंसिर्जति' एतेसिं पदाणं पूर्ववद् व्याख्या । एवं 25 पुरिसे 'एवं' ति जहा आयारे निवद्धा परूविता य तहा सव्वदन-भावाणं गाता भवति । जाणमाणो विण्णाता भवति । अण्णपावादुरोहितो वा विसिट्टतरे विसिट्टयरं वा जाणमाणो निगमणमुत्तं कंठं से तं आयारे १॥ ८६. से किं तं सूयगडे ? सूयगडे णं लोए सूइज्जइ, अलोए सूइ सुइज्जइ, जीवा सूइज्जति, अजीवा सूइज्जति, जीवा-जीवा सूइज्जति, 30 परसमए सूइज्जइ, ससमय-परसमए सूइज्जइ । सूयगडे णं आसीतस्स ि चउरासीईए अकिरियेवादीणं, सत्तट्ठीए अण्णाणियवादीणं, बत्तीसाए वेण १ज्जति सं० सं० ल० ॥२ ति दे• गु० ॥ ३ असीयस्त सं० सं० विना ॥ ४ 'सीए सं० ॥५ --- सूयगडे ठाणे. य] सिरिदेववायगविरड्यं गंदीपुत्तं । तेसट्ठाणं पावादुयसयाणं बृहं किच्चा ससमए ठगविज्जइ । सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए विईए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तेत्तीसं उद्देसणकाला, तेत्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पदसहस्साणि पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सामय-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्नंति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उव- दंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं वरण-करणपस्वणा आघविज्जइ । से तं सूयगडे २॥ ८६. से किं तं मृयगडेत्यादि गुत्तं । 'सूइजाईनिजधा गट्टा बुई नंतुणा सूइज्जइ, उचलभतेत्यर्थः । अध्वा जहा सूखी पडं सूतेइ तहा सूयगडे जीवादिपदत्या सूइज्जंति । 'वृह किच त्ति प्रतिव्यूह, तण प्रतिव्यहेन ते परप्पवादी णिप्पट्ट-पसिणे कात ससमयस्य सम्भावे हाविन्जति । उसयारिमाणं नातुं उद्देशणकाला जाणेजा। सेसं कंठं । से तं सूयगढे २ ।। ८७. से कि तं ठाणे ? ठाणे णं जीवा गविज्जति, अजीवा अविज्जंति, जीवा-उजीवा विज्जंति, लोए ठाविज्जइ, अलोए ठाविज्जई, लोया-इलोए अविज्जइ ससमए अविज्जइ, परसमए गविज्जइ, ससमय-परसमए दाविज्जइ । ठाणे णं टंका कूडा सेला सिहरिणो पन्भारा कुंडाई गुहाओ आगरा दहा णदीओ आयविजनि। ठाणे गं गंगाइयाए एगुत्तरियाए वुडीए दसट्ठाणगविवट्टियाणं भावाणं एयणा आपविज्जति । ठाणे णं परिता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा. संयज्जा निलोगा. मंग्वेजाओ निज- तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडियनीओ।ने गं अंगव्याग तदा अंगे, एगे सुयखंधे, दस अज्झयणा, एप-वीसं उद्देमणकाला. पसीनं ममुगणकाला, वाचार पदसहस्साई पयरगेणं, संखेज्जा अश्वरा. अगंका नमा. अनता पन्जमा, पग्निा नमा, अणंता पावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाझ्या जिगपणना भामा आपपिनि पगिनि १ तेवहाणं ० सं० ज... Tr: नमदामाद पादित सयाणं ... मो. मु० । धीमलमगिरिभिर पार शोक : ६ सिद: :., ट एतदिहमायव पा. मो. मुसलमान निर::..... ... इति ० सं० २०.० नारित ॥ ७ पगारवा गन्तरिक्षाएं इसहार २.१० मार सिलोगा, रोकामो गाने में :: PETE : Hari:, सरोक्षामो निलीभी, संरोजालो पटियाली । .. : Ext - . - . . . 1 ३ जिगदासगणिगहतरविनयाप तुम्नी को परूविज्जति दंसिज्जति णिदेसिज्जंति उवदंसिज्जति । से एवंआया. विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवेणा आघविज्जइ । से तं ठाणे ३ । ८७. से किं तं ठाणेत्यादि सुत्तं । 'ठाविजंति' त्ति स्वरूपतः स्थाप्यते, प्रमाणनेत टंकं । कूडं ति-जहा वेतड्ढस्सोवरि णव सिद्धायतणाइया कूडा । हिमवंतादिया सेला । 5 वेतड्ढो । जं कूडं उवरिं अंवखुजयं तं पभारं, जंवा पव्ययल्स उवरिभागे हत्यिकुंभागिः पब्भारं । गंगादिया कुंडा । तिमिसादिया गुहा । रुप्य-मुवण्ण-रतणादिया आगरा। पौडरीय सिंधुमादियाओ णदीओ । सेसं कंठं । से तं ठाणे ३ ॥ ८८. से किं तं समवाए ? समवाए णं जीवा समासिज्जति, अजीव जीवा-जीवा समासिज्जंति, लोए समासिज्जति, अलोए समासिर्जा 10 समासिज्जति, ससमए समासिज्जति, परसमए समासिज्जति, ससमय- ज्जति । समवाए णं एगाइयाणं एगुत्तरियाणं गणगसयविवड्डियाणं भावाण विज्जति । दुवालसंगस्स य गणिपिडगस्स पल्लवग्गे समासिज्जति । स वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखे तीओ. संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ। से णं ॐ 15 अंगे, एगे सुयक्वंधे, एगे अज्झयणे, एगे उद्देसणकाले, एगे समुद्देसणका पदसयसहस्से पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जन अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्ज परूविज्जंति देसिज्जंति णिदंसिज्जंति उवदंसिज्जांत । से एवंआया, विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणी आघविज्जति । से तं समवाए । ८८. से किं तं समवाए इत्यादि । समवाए निक्खेबो चतुविहो । दम्बे सचित्तान समवातो इमं चेव अंगं । अहवा जत्थ वा एगत्य ओदइयाइ बहू भावा सण्णिवादियसंजोगा भावसमवाए वा इमं णिरुत्त-जीवा 'समासिज्जति' समं आसइज्जति । समं ति-ण विसमं, ज रिक्तं इत्यर्थः । आसइज्जति-आश्रीयंते, बुद्धया ज्ञानेन गृह्यतेत्यर्थः । अहवा समास त्ति- २१७ द्वि० सव्वपदत्याण समासतो विमरिसो त्ति । सेसं कंठं । उक्तः समवायः ४|| १ घणया खं० सं० ल० शु० ॥ २ जति सं० सं० डे. ल. ॥ ३ दहा इत्यर्थः ।। ४ ५ पजावग्गे सं० । पल्लवग्गे इत्यस्यार्थः--"तथा द्वादशाहस्य च गणिपिटकस्य 'पल्लवग्गे' ति पर्यवपरिमाण यथा 'परित्ता तसा" इत्यादि । पर्यवशब्दस्य च 'पल्लव' त्ति निर्देशः प्राकृतत्वात् , पर्यः पल्याङ्क इत्यादिवदि पटवा:-अवयवास्तत्परिमाणम् ।" इति समवायानसूत्रवृत्तिः ११३-२ पत्रे ॥ ६ वायरस णं जे० डे विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजाओ संगहणीओ । से णं खं० सं० ल. शु.। सिलोगा, संर संजाओ पडियत्तीओ। से णं मो० मु० ॥ ८°णया ल. ॥ ९ जति खं० सं० ॥ 20 0 ६५ समवाए वियाहे णायाघन्मकहानो य ] सिरिदेववायगविरयं गंदीपुत्तं । ८९. से किं तं वियाहे ? वियाहे णं जीवा वियाहिज्जंति, अजीवा वियाहिज्जति. जीवा-ऽजीवा विवाहिज्जंति, लोए वियाहिज्जति, अलोए वियाहिज्जति, लोया-ऽलोए वियाहिज्जति, ससमए वियाहिज्जति, परसमए वियाहिज्जति, ससमय-परसमए वियाहि- ज्जति । वियाहे णं परित्ता चायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिबत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए पंचमे अंगे, एगे सुथक्वंधे, एगे सातिरेगे अज्झयणसते, दस उद्देसग- सहस्साई, दस समुद्देसगसहस्साई, छत्तीसं वागरणसहस्साई, दो लक्खा अट्ठासोति पयसह- स्साई पयरगेणं. संखेज्जा अऋखरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाझ्या जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति पर- विज्जति दसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, 1 एवं चरणकरणपवणा आघविजड़ । से तं वियाहे ५ । ८२. से किं तं वियाहेत्यादि । 'विया नि व्याख्या. इह जीवादयो बाल्याने। इह मनं नेत्र अझ- यणसणं । गीतमादिएदि पुढे अपुढे वा जो पहों तवागरणं [] । नेनं केलं । में वियाई ५ ।। ९०. से कि तं णायाधम्मकहाओ ? णायाधम्मकहासु णं णायाणं णगराई उज्जाणाई चेडयाई वणगंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियंगे धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-पर- 1 लोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिबागा पंचज्जाओ परियागा सुयपरिगगहा नबोवहाणाई मंले- हणाओ भत्तपञ्चचखाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणा मुकुनमनायाईओ पुणवोहिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जंति । दस धम्मकहानं दगा । नत्य नं पगमेगाग धम्मकलाप पंच पंच अवखाइयासयाई, एगमेगाए अनन्यायाग पंच पर उपतपादयामयाट, पगमेगाग उवचखाइयाए पंच पंच अश्वग्वाइओवग्यात्यायवाई. एबव मचायण अगदाओ कहाण: गकोडीओ भवंति त्ति मक्खा । णायामकहाण पग्निा वामना. मजा अायोगदाग, ।
६६ जिणदासगणिगहतरविरहगाण नुनी सजुलं [मु. २१-" संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जत्तीओ, संग्वेजाओ संगहणी संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। सेणं अंगठ्ठयाए छठे अंगे, दो सुयाखंधा, गगृणवीसं गाव ज्झयणा, एगृणवीसं उद्देसणकाला, एगूणवीसं समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पयसहस्साई पर रगेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावर सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जंति पण्णविज्जंति परूविज्जी देसिज्जति णिदेसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विणाया, | चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं णायाधम्मकहाओ ६ । ९०. से किं तं णायाधम्मकहेत्यादि मुत्तं । एकणवीसं णातज्झयणा, णाय ति-आहरणा, दिदंति वा णज्जति जेहऽत्थो ते णाता, एते पढममुतखंधे । अहिंसादिलक्षणस्स धम्मस्स कहा धम्मकहा, धम्मिया i0 वा कहाओ धम्मकहाओ, अक्खाणग ति वुत्तं भवति, एते वितियमुतखंचे। पढम-वितियमुतखंचे भणित णाता-धम्मकहाणं णगरादिया भण्णंति । वितिये सुतक्खंधे दस धम्मकहाणं वग्गा। वग्गो त्ति-समूहो, तन्धि सणविसिट्टा दस अज्झयणा चेव ते दट्ठव्या । एगूणवीसं णाता, दस य धम्मकहाओ । तत्य णातेमु आदिमा ६ णाता चेव, ण तेसु अक्खादियादिसंभवो । सेसा णव णाता, तेसु एकके गाते चत्तालीसं चत्तालीसं अक्स इयाओ भवंति, तत्थ वि एक्ककाए अक्खाइयाए पंच पंच उचक्खाइयासताई भवंति, तेमु वि एकेकाए उचक्र 15 झ्याए पंच पंच अक्खाइओवक्खाइयसताई भवंति, एवं एते णव कोडीओ। एताओ धम्मक्रहामु सोहेतच त्ति क एकोणवीसाए णाताणं दसण्ह य धम्मकहाणं विसेसो कजति-दस णातां देस णव य धम्मकहातो दसहि परोप मुद्धा । एवं विसेसे कते सेसा णव णाता, ते णव चत्तालीसाए गुणिता जाता तिणि सता सहा अक्खाइयाणं, र अक्खाइयपंचसतेहित्तो सोषित्ता, तत्थ सेसं चत्तालं सतं, तं उबक्खाइयपंचसतेहिं गुणितं जाता उबक्साइताणं सत्त सहस्सा, ते पंचहिं अक्खाइतोवक्खाइयसतेहिं गुणिता एवं जाता अहातो अक्खाइयकोडीतो । 'पदग्गेणं 20 उवसग्गपदं णिवातपदं णामियपदं अक्खातपदं मिस्सपदं च, एते पदे अहिकिच्च पंचल[जे० २१८ प्र० कर छाबत्तरि च सहस्सा पदग्गेणं भवंति, अहवा सुत्तालावयपदग्गेण संखेजाई पदसहस्साई भवंति । अहवा छाहत्त हियसहस्सपंचलक्खा वि संखेजपदसहस्सेहिं ण विरुझंति । सेसं कंठं । से तं णाताधम्मकहाओ ६॥ ९१. से किं तं उवासगदसाओ ? उवासगदसासु णं समणोवासगाणं णगराइं उज्ज णाई चेइयाइं वैणसंडाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिन 25 इहलोग-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपरिचाया परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई सील व्वय-गुण-वेरमण-पच्चक्खाण-पोसहोववासपडिवज्जणया पडिमाओ उवसग्गा संलेहणा १ टे. मो० मु० विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजामो संगहणीओ। सेणं सं० सं० ल० शु० । सिलोगा, संखेज निजत्तीओ, संखेजामो पडिवत्तीओ। से णं जे० ॥ २ 'वीसं अज्झयणा सं० जे० डे. ल. मो० शु० समवाया चूणिरुता मलयगिरिणा च मूले स्वीकृत एव पाठो व्याख्यातोऽस्ति ॥ ३-४ एगूणतीसं ल० ॥ ५ संखेजा पथसहर जै० मो० ॥६ पयसयसह समवाया ॥७ वणया सं० सं० ल. शु० ॥ जति सं० सं० हे. शु० ल० ॥ ९ दस य ध जे. ॥ १० चेतियाति गु०॥ ११ वगसंडाई सं० सं० शु० नास्ति । १२ "पियरोधम्मायरिया धम्मकदामो जे० मो० म १३ इलोइय-परलोइया इविवि जे० मो० मु० ॥ १४ या पचनाओ परि जे. तु. ल. ० ॥ - ६७ उवासगदसाओ अंतगडदसामो य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीनुत्तं । भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ. पुणवोहिलामा अंत- किरियाओ य आघविज्जति । उवासगदसासु णं परित्ता वायणा. संखेज्जा अणुयोगदारा; संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्याए मत्तमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, दस अज्झयणा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पदसहस्साई पयग्गेणं । संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परिता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध- णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदं- सिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया. एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं वरण-करणपत्रणा आधविज्जति । से नं उवासगदसाओ ७ । २१. से किं तं उवासगदसातो इत्यादि मुत्तं । उबालक ति सावता । तेसिं अशुब्बत-गुण-सीलवतोच. 1 देखणा दसम् अझयणेमु अवखात त्ति उवासगदसा भणिता । तानु गुत्तपन्न एकाल लकवा वावगं च सह- स्सा पदग्गेणं । जुत्तालावयपढि संखेजाणि वा पदमहन्माई पदणं । सेनं कं । में तं उवामगदसाओ ७ ।। ९२. से किं तंअंतगडदमाओ? अंतगइदमासु णं अंगवाणं णगराई उज्जाणाई चेतियाई वणनंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियंरोधम्पनहाओ धम्मायरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेमा भोगपरिक्षागा पंचज्जाओ परियागा सुनपरिगहा तबोवहाणाई मंलेहणाओ भत्तपञ्चकखाणाई पाओदगमणाई - देवलोगगमणाई मुकुलपनायाईओ, पुगवोहिलाभा--- अंतकिरियाओ य आघविज्जंनि । अनगडदलामु णं पग्निा सायगा. जखजा अणुयोग- दारा. नखेज्जा वेढा. संखेज्जा मिलोगा. गंग्वेज्जाधी गिजनीओ. गजागो गंगा- णीओ, संखेज्जाओ पडिवनीओ। सेणं अंगप्रयाग संग, पंग मुगावे. अब 1.
जिणदारागणिगतसिंगनाप गुगीर दुर्ग (मु० ९२.. वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज अक्सरा, अणंता गमा, अणंता पज्जया, परित्ता तसा. अगंता थावरा, सासन-कड-णिव णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदी ज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया. एवं विण्णाया. एवं चरण-करणपरूब 5 आघविज्जति । से तं अंतगडदसाओ ८ । ९२. से किं तं अंतगडदसातो इत्यादि सुत्तं । अंतकडदस ति-कम्मणो संसाररस वा अंतो : जेहिं ते अंतकडा, ते य तित्थकरादी, दस ति-पढमवग्गे दस अज्झयण ति तस्सवखतो अंतकडदस ति । अ दस त्ति-अवत्था, तदंते जा अवस्था सा वणिजति ति अतो अंतकडदसा । सरीरा-ऽऽयुदसाण वा दसण्हं अंत- त्ति अंतकडदसा । णवरं 'अंतकडकिरियाओ' ति अस्य व्याख्या-अंतकडाणं किरिया अंतकडकिरिया, वहणं 10 अंतकडकिरियाओ त्ति भणिता । किरिय ति-क्रिया, चर्या इत्यर्थः । अश्वा किरिय त्ति-कर्मक्षपणक्रिया, स सेलेसिअवत्थाए । अहवा किरिय त्ति-सहुमकिरियज्झाणं । अहवा घातिकम्मेमु अंतकडेमु किरिय त्ति-कम्म सो य इरियावहितो ति भणितं होति । एतं च आघविज्जति । वग्गो त्ति-समूहो, सो य अंतकडाणं अज्झया चा। सव्वे अज्झयणा जुगवं उदिसंति । तासु मुत्तपदग्गं तेवीसं लक्खा चतुरो य सहस्सा पदग्गेणं । संखेज वा पदसहस्साणि सुत्तालावगपदग्गेणं । सेसं कंटं । से तं अंतगडदसा ८ ॥ ९३. से किं तं अणुत्तरोबवाइयदसाओ ? अणुत्तरोववाइयदसासु णं अणुत्तरोववाइस णगराई उज्जाणाई चेइयाई बणसंडाई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धर यरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पव्वज्जपरियागा सुतपरिग्स तवोवहाणाई पडिमाओ उवसग्गा संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई अणुन ववाइयत्ते उववत्ती सुकुलपचायादीओ पुणवोहिलाभा अंतकिरियाओ य आधविर्ती 20 अणुत्तरोववाइयदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखे सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीय से णं अंगठ्ठयाए णवमे अंगे, एंगे सुयक्खंधे, तिषिण वग्गा, तिण्णि उद्देसणकाला, ति समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साइं पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अ पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता १वणया सं० ल० ॥ २ 'विज्जति सं० सं० २० ल. शु०॥ ३ तत्साक्ष्यत इत्यर्थः ॥ ४ वणसंडाई इति मो० पत्तते ॥ ५ धम्मायरिया धम्मकदाओ मो० गु० ॥ ६ 'लोइय-परलोइया जे. मो. मु० ॥ ७ अणुत्तरोववत्ती अणुत्तरोववाय त्ति रां० सं० ॥ ८ दसाणं सं० जे० मो० ॥ ९ वाइणा ल० ॥ १० संखेजाओ णिज्जुत्तीओ नास्ति ॥ ११ संखेज्जाओ संगहणीमो ने० मो० नास्ति ॥ १२ संखेज्जाम पडिवत्तीओ सं० सं० ल० शु० नास्ति ॥ १ सुयफ्धे, दस अज्झयणा, तिणि घग्गा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पयसयसा पयग्गेणं प० इति समवाया)। अत्राभयदेवपादा:-"दह अध्ययनसमूहो वर्गः, वर्ग दशाध्ययनानि, वर्गध युगपदेवोद्दिश्यते । एपोदेशनकाला भवन्ति, एवमेव च नन्दायभिधीयन्ते, इह तु दृश्यन्ते दशेति, अत्राभिप्रायो न शायत इति ।" १२३-२ पत्रे ॥ 15 - •-- । .. -- । मगुत्तरोबवाइयदसामो पण्हावागरणाई च] सिरिदेवनायगविरड्यं गंदीनुत्तं । आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं वरण-करणपणा आघविज्जंइ । से तं अणु- त्तरोववाइयदसाओ ९ ९३. से किं तं अणुत्तरोयातियदसा इत्यादि मुनं । णस्थि जस्मुनरं सो अणुत्तरो, उवचजणमुत्रवातो उप्पनीत्यर्थः, अणुत्तरो उचबातो जस्स सो अणुनरोवबाइयो, तसिं बहुवयणातो जि० २१८ दि०अणुनरोच. : वाइय त्ति, बग्ने बग्गे व दसऽशयण त्ति अतो अणुनरोत्रातियहसा मणिता। संसारे नुभभावं पञ्च अशुत्तरः, अहवा गतिचतुवं पच्च अणुत्तरः, अहवा देवगतीए वेत्र अणुनरः । अणुत्तरदनु जेसि उपरानो तलि णगरादिया कहि जति । इह वन्गो ति-समूहो, सो च अजयणाणं, वर्ग बन्गे दन अध्ययना इत्यर्थः। तसिं पदग्गं छातालीसं लाखा अ य सहस्सा, संखजाणि या पदसम्माणि । मेलं कं । सेनं अणुसरोववाड्यदमा ९ ॥ ९१. से किं तं पाहावागरणाई ? पाहावागरणेसु णं अछुत्तरं पसिणसयं, अछुत्तरं 17 अपसिणसयं, अछुत्तरं परिणा-पमिणसंयं, अण्णे वि विविधा दिवा विजा- तिसया नाग-सुवण्णेहि य सद्धि दिब्बा संवाया आघविज्जति । पाहावागरणाणं परिना वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखज्जा मिलोगा, संखेज्जाओ णिज्ज- तीओ, संखेज्जाओ मंगहणीओ. नखेजाओ पडियनीओ। सेणं अंगठ्ठयाए दसमे अंगे, एगे सुयस्वधे, पणयालीमं अन्झयणा, पणयालीनं उमणकाला. पणयालोमं ममुद्देयण- 13 काला, संखेज्जाई पदसहस्साई पदग्गेणं, संखे जा अबन्दगा. अगंता गमा. अगंता पज्जया, परिना तमा, अणंता थावरा, सामत-कड-णिव-गिकारा जिगागना भाषा आपविजनि एपणविज्जति परुविनंति दैनिज्जति णिमिनि व्यमिति । मे आया. गर्व णाय २ से कि तं दुदविवागा इति खं० शु० नास्ति । समवायाले प्रभवाक्यं ? ܟ ܚ ܙ܀ ܘܡܼܲ ܐܼܲ ०. जिणदासगगिमातरनिगाण नगी सवति । अण्णे य विविधा विजातिसता कहिनंति । किन णागा गुवाणा आणे ग भगणनामिणो ने वित्तमंना गरिसिता आगता साहुणा सह संवदंति-जल्पं करेंति । पार्टनर वा “दिला गंधाणा गंधगनि" नदनमुना भवनि, चरदाश्च गर्जितादि वा कुर्वति । दसममंगरस पदग्गं वागति लाना मोटग य गग्गा पागणं, गंजाणि या पदसहस्साणि । सेसं कंटं । से तं पण्हावागरणाई १० ॥ ९५. से किं तं विवागसुतं ? विवागसुते णं मुकड-दुकडाणं कम्माणं फल-विवागा आघविज्जंति । तत्थ णं दस दुहविवागा, दस सुहविवागा । से किं तं दुहविवागा ? दुहविवागेसु णं दुहविवागाणं णगराई उज्जाणाई वणसंडाई चेझ्याइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धमकहाओ धम्मायरिया इहलोइय-परलोइया "रिद्धिविसेसा निरयंगमणाई दुहपरंपराओ संसारभंवपवंचा दुकुलपञ्चायाईओ दुलहबोहियत्त 10 आघविज्जति । से तं दुहविवागा। से किं तं सुहविवागा ? सुहविवागेसु णं सुहविवागाणं णगराई उज्जाणाई वणसंडाई चेझ्याई समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धमकहाओ धम्मायरिया इहलोइअ-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पयजाओ परियागा सुतपरिगहा तबोवहाणाई संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुहपरंपराओ सुकुलपञ्चायादीओ पुणवो- 15 हिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । विवागसुते णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिबत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए एक्कारसमे अंगे, दो सुयवखंधा, वीसं अज्झयणा, वीसं उद्देसणकाला, वीसं समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पैदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता 20 पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघ- विजंति पण्णविजंति परूविजंति दंसिर्जति णिदंसिर्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविजेंति । से तं विवागसुतं ११ । ०५. से किं तं विवागसुतं इत्यादि । विविधो पाकः विपचनं वा विपाका, कर्मणां मुभममुभो वा १ चियागे आधचिज्जइ जे० गो० मु० ॥ पतते ॥ ३ धम्मायरिया धम्मकहाओ सं० जे० दे० ल. मो० मु० ॥ इहलोग-परलोगिया सं० ॥ ५ इविवि मो० मुः ॥ ६ गमणे ० ॥ ७ भवपयंधा सं० ल० समवाया च ॥ ८ से त दुइविवागा । से किं तं सुविधागा ? इति सं० गु० नास्ति । समवाया) तु वर्तते ॥ ९ धम्मायरिया धम्मकहाओ ० ० ॥ १० इहलोग-पारलोगियां इढिविसेसा से. मी. ० ॥ ११ 'ज्जा परि ० ॥ १२ विवागसुयस्स णं जे. मो. मु. । विवागेसु णं शु० ॥ १३ पदसतसह समपाया ॥१४ 'विग्जति ० सं० टै. ल. गु० ॥
. १ २ विवागसुयं दिहिवामो य परिकन्ने सुत्ताई च ] सिरिदेववायगावरइयं गंदीसुतं । जम्मि मुत्ते विपाको कहिजति तं विपाकमुतं । विपाकन्तम्स उनपदगं एगा पदकोडी चुलसीर्ति च लक्खा वतीसं च सहस्सा पदग्गेणं, संखेजाणि वा पदसहम्लाई पदग्गेणं जेल २१९ प्र० । संसं कंठं । से, विवागसुतं ११ ॥ ९६. से किं तं दिठिवाए ? दिडियाए णं सब्बभावपस्वणा आघविज्जति । से समा- सओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-परिकम्मे १ सुत्ताई २ पुचगए ३ अणुओगे ४ चूलिया ५। १६. से किं तं विट्टिवाते नि । दृष्टिदर्शनम् । यद्नं बाइः, ष्टीनां वादो दृष्टिवादः, नत्र वा दृष्टीनां पातः दृष्टिपातः, समंदाभिष्णामो सरणतविहीनी तत्य वदनि पति व नि अा विविातो । सो य पंचभेदो- परिकम्मादि ॥ ९७. से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे मनविहे पणते, जहा-सिद्धसेणियापरिकम्मे १ मणुस्वसेणियापरिकम्मे २ पुझसेणियापरिकम्मे ३ ओगाइसेणियापरिकम्मे ४ उपसंपज्जण- 11 सेणियापरिकम्मे ५ विष्पंजणसेणियापरिकम्मे ६ चुतअचुतमेणियापरिकम्मे ७। ९८. से कि तं लिसेणियापरिकम्मे ? निद्धणियापरिकम्मे चोइसविहे पणते, तं जहा-माउगापयाई १ एगहियपयाई २ अवारयाई ३ पातो ४ आमासपयाई ५ केउभ्यं ६ रासिवन्द्रं. ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ निगुणं १० केउभ्यर डिगही ११ मंचासंडिग्गहो १२ नंदा- वनं १३ सिदावनं १४ । सेनं सिद्धणियापरिकाम। ९९. से किं तं मणुम्रपणियापकिम्मे ? मालजियाग में चोदनविहे, पणते, तं जहा-माउगापयाई १ एगरिएमा २ अाफ्यावाद आमनाया ५ उग ६ गसिरद्धं.७ एगगुणं ८ दुगुणं . निगुणं पालिमाटिगहो १२ गंदावत्तं १३ मणुमारनं ११ । सेनं मलपियोंकि १००, से वि.नं पुनेणियाएपिग्ने : पाली पन नं : जा-पादो १ आमारपरा र पेटमा पनि का दगः नि: 7 रायपरिणतो ८ रंगारंपंडिगो गंदावन दा! गदानमा .
७२ जिणदासगणिगाजर्गनाया [स. 22-६ पण्णत्ते, तं जहा-पाटो १ आमासपयाई २ केउभ्यं ३ गमिवलं ? गगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउसूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावनं १० ओगादावनं ११ । से नं ओगाढसेणियापरिकम्मे 2। १०२, से किं तं उपसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ? उवमंगजजणसेणियापरिकम्मे एकार- 5 सविहे पण्णत्ते, तं जहा-पादो १ आमासपयाई २ केउभयं ३ गमिवद्धं ४ पगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ गंदावनं १० उपसंपज्जणावत्नं ११ । से तं उपसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ५। १०३. से किं तं विपंजहणसेणियापरिकम्मे ? विष्पंजहणसेणियापरिकम्मे एगारस- विहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाई २ केउभ्यं ३ गसिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ 10 तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० विष्पजहणावत्तं ११ । से ते विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ६ । १०४. से किं तं चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाई २ केउभूयं ३ रासिवद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० चुयमचुयायत्तं ११ । से त 13 चुंयमचुयसेणियापरिकम्मे ७ । ९७-१०४. तत्थ परिकम्मे ति जोग्गकरणं, जहा गणितस्स सोलस परिकम्मा, तग्गहितमुत्तत्थो सेस- गणितस्स जोग्गो भवति । एवं गहितपरिकम्ममुत्तत्थो सेसमुत्तादिदिडियातमुतस्स जोग्गो भवति । तं च परिक- म्ममृतं सिद्धसेणियापरिकन्मादिमूलभेदयो सत्तविहं, उत्तरभेदतो तेसीतिविहं मातुयपदादी । तं च सव्वं समूल त्तरभेदं मुत्तत्वतो वोच्छिण्णं, जहागतसंप्रदातं वा वचं ॥ किंच- १०५. [ईचेइयाई सत्त परिकम्माई, छ ससमइयाई, सत्त आजीवियाई.] छ चउकणइ- याई, सत्त तेरासियाई । से तं परिकम्मे १ । १०५. एतेसि सत्तण्डं परिकम्माण छ आदिमा परिकम्मा ससमइका, स्वसिद्धांतप्रज्ञापना एवेत्यर्थः । आजीविकापासंडत्या गोसालपत्तिता, तसिं सिद्धतमतेण चुता-ऽचुतसहिता सत्त परिकम्मा पण्णविज्जति । इदाणि परिकम्मे णतचिंता-णेगमो दुविहो-संगहितो असंगहितो य, संगहितो संगहं पविट्टो, असंगहितो ववहारं, तम्हा १ केउभ्यं ३ इञ्चादि । से तं ओगाढ सुं० सं० दे० ल० ॥ २ परिगहो जे० ॥ ३ पाढो १ इञ्चादि । से तं उव ६ पाढो १ इन्चादि । से तं विजहण सं० सं० दे० ल० ॥ ७-८ चुययचुय जे० दे० ल० ॥ ९ पाढाइ । से तं चुय' म० ० ४० ल० ॥ १० चुयअचुय २० ल० । चुयाचुर्य ३० ११ मा चतुरकोष्टकान्तवैत्ति सूत्र सूत्रप्रतिषु न यतते । चर्णि-वृत्तिन्ति पुनराहतं दृदयत इति समवायानसूत्रात् सूत्रांशोऽयमत्री- नोऽस्ति ॥ १२ याई नइयाई । से तं सं० ॥ ३ 20 रां. मुं० १० ल॥ ४-५ विजहण सं० मुं० ल. शु० ॥
७३ दिद्विवानो परिकन्ने मुत्ताई च] सिरिदेववायगविरड्यं गंदीयुत्तं । संगहो ववहारो रिजुमृतो सदाइया य एको, एवं चतुरो गया । एतेहिं चतुर्हि गएहि छ ससमइकाई परिकम्माई चिंतिजति त्ति अतो भणितं-'छ चतुकणझ्याई ति । ते चेव आजीविका तेरासिया भणिता । कम्हा ? उच्यते- जम्हा ते सर्व जगं ज्यात्मकं इच्छंति, जहा-जीवो अजीवो जीवाजीचश्य, लोए अलोए लोयालोए, संते असंते संतासंते एवमादि । पयचिंताए वि ते तिविई णयमिच्छंति, तं जहा-दवहितो पन्जवहितो उभयद्वितो, अतो [जे० २१९ द्वि० ] भणियं-'सत्त तेरासियाई ति सत्त परिकम्नाई तेरासियपासंडत्या तिविधाए जयचिंताए चिंतयंतीत्यर्थः १॥ १०६. से किं तं सुत्ताई? सुताई वावीसं पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरि- णयं २ बहुभंगियं ३ विजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मासाणं ७ संजूहं ८ संभिण्णं ९ आयचायं १० सोवत्थिप्पण्णं ११ णंदावत्तं १२ बहुलं १३ पुढापुढे १४ वेयावचं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्नं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिस्टुं १९ सबओभई २० पण्णासं २१ दुप्परिग्गहं २२ । । १ मुत्ताई यावीला पण्णता, तं जहा सं० २० । सुत्नाई सट्टानीति भवतीति मागा. तं जहा मम ।। tramari mmm मिलत -.
[स जिणदासगणिगहतरचिरगाए चुनी गंजुयं इच्चेयाई बावीसं सुत्ताई छिण्णच्छेयणझ्याई ससमयमुत्तपखिाडीए बावीस सुत्ताई अच्छिण्णच्छेयणइयाई आजीवियसुत्तपरिवाडीए सुंताई सुत्ताई तिगणझ्याइं तेरासियसुत्तपरिवाडीए सुताई ३, इचेयाई वावीस र ससमयसुत्तपरिखाडीए सुत्ताई ४, एवामेव सपुवावरेणं अट्ठासीति सुत्ताई 5 से तं सुत्ताई २। १०६. 'मुत्ताई ति उज्जुमुताइयाई बावीसं मृत्ताई । ताणि य सृत्ताई सन्बदव्याण स सव्वभंगविकप्पाण य दंसगाणि, सबस्स य पुवगतमृतस्स अत्यस्स य सूयग त्ति, अतो ते सू जहाभिधाणत्याते। ते य इदाणि मुत्त-ऽत्थतो वोच्छिण्णा, जहागतसंप्रदायतो वा बच्चा। ते चेत्र अट्ठासीति सुत्ता भवंति इमेण विधिणा-बावीस मुत्ता छिण्णच्छेदणताभिप्पायतो। कई छिण्ण 10 उच्यते-जो णयो मुत्तं छिण्णं छेदेण इच्छति, जहा-"धम्मो मंगलमुकाढ०" ति सिलोगो [दर सिलोगो सुत्त-ऽत्थतो पत्तेयं छेदेण ठितो, णो वितियादिसिलोगे अवेक्खइत्ति वुत्तं भवति । छि छिण्णच्छेदः, प्रत्येकं कल्पितपर्यतेत्यर्थः । एते एवं वावीसं ससमतमुत्तपरिवाडीए सत्ता टि- अच्छिण्णच्छेदणताभिप्पायतोआजीवियसुत्तपरिवाडीए ठिता।अच्छिण्णच्छेदणतो जहा-एसे= अस्थतो वितियाइसिलोगे अवेक्खमाणो, वितियादिया य पढम अच्छिण्णच्छेदणताभिप्पाययो 15 मुत्ता अक्खररयणविभागविता वि अत्थयो अण्णोण्णमवेक्खमाणा अच्छिण्गच्छेदणयहित ति: वाचीसं चेव सुत्ता, 'तेरासियाणं तिकणइयाई ति त्रिकनयाभिमायतो चिंत्यंतेत्यर्थः । तहा बावीसं चेत्र सुत्ता चउक्कणइया । एवं चतुरो [ जे० २२० प्र० ] बावीसातो अट्ठासीति मुत्ताई २॥ १०७. से किं तं पुब्बगते ? पुव्वगते चोद्दसविहे पण्णत्ते, तं . 20 अग्गेणीयं २ वीरियं ३ अस्थिणत्थिप्पवातं ४ नाणप्पवात ५ सच्चप्पवादं कम्मप्पवादं ८ पञ्चक्खाणं ९ विजणुप्पवादं १० अवंझं ११ पाणायुं १२ लोगबिंदुसारं १४ । उप्पायस्स णं पुवस्स दस वत्थू चत्तारि १ । अंग्गेणीयस्स णं पुव्वस्स चोदस वत्थू दुवालस चॅल्लवत्थू पण्णत्ता पुवस्स अट्ठ वत्थू अट्ठ चुल्लवत्थू पण्णत्ता ३ । अत्थिणत्थिप्पवायस्स गं १-३-५-७ इञ्चेश्याई मो. मु० ॥ २-४-६-८ मुत्ताई इति पदं सं० सं० एव वत्तते, नान्यत्र ९ भवंति इश्चमक्वायं ल० ॥ १० मग्गेणियं खं० ॥ ११ पसाणपघावं मं० सं० विना !! १२ दि १३ पाणाउं जे० । पाणाउ दे० ल. मो. शु० ॥ १४ अस्मिन् सूने उप्पायस्स णं पुवस्स, य पीरियस्स णं पुव्यस्स इत्यादिफेषु चतुर्दशास्वपि पूर्वनामस्थानेषु उपायपुवस्स णं, अग्गेणीयपुचस इत्यादिः पाठभेदो मो० मु० दृश्यते ॥ १५ चूलपत्थू शु० । चूलियावत्यू जे० टे० मो० मु० ॥ १६ १७ चूलपत्थू ल• गु० । चूलियावत्य् जे. हे. मो० गु० ॥ १८ चूलव शु० । चूलिभाय दिट्ठिवाओ पुरगयमयं च] सिरिदेववायगविरड्यं गंदीमुत्तं । वत्थू दस चुल्लबत्थू पण्णत्ता ४ । णाणप्पवादस्त णं पुवस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ५। सब- प्पवायस्स णं पुवस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायस्स णं पुबस्म सोलस वत्थू पण्णता ७ । कम्मप्पवायरस णं पुवस्स तीसं वत्यू पण्णत्ता ८ । पचक्खाणस्म णं पुबस्स वीसं वत्थू पण्णत्ता ९ । विज्जणुप्पवादस्स णं पुब्बस्य पणरस वत्यू पण्णत्ता १० । अझस्स णं पुब्बस्स बारस वत्थू पण्णत्ता ११ । पाणायस्य णं पुब्बस्स तेरस बल्यू पण्णत्ता १२ । : किरियाविसालस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता १३ | लोगबिंदुसारस्स णं पुवस्स पणु- वीसं वत्यू पण्णत्ता १४ । दस १ चोइस २ अट्ठ ३ ऽट्ठारसेव ४ वारस ५ दुवे ६ य वत्यूणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९, पण्णरस १० अणुणवायम्मि ॥ ७७ ॥ बारस एक्कारसमे ११, वारसमे तेरसेव वत्सृणि १२ । तीसा पुण तेरसमे १३, चोइसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ७ ॥ चत्तारि १ दुवालम २ अट्ठ ३ चेव दम ४ व चुलवत्पणि । आइलाण चउण्हं, सेमाणं चुल्या णत्यि ॥ ७९ ॥ से तं पुबगते ३॥ १०७. से किन पुश्यग? नि, उच्चने-जमा नियमि, मानापान पुच्च पुगतनत्थं भामनि तम्हा पुन्च गि मणिना. गणमा भाग ति हनि य । अण्णायरियगनेणं पुण पुनमगमगायो पुल भात दिari पन्ला आयाराइ । एयरवने चोदक आर.- मार्ग : आयारी" गागाचारानि.गा. ८ । आमा-ना. Thi. पुष्य या पाना इत्यर्थः। नेय उपाय बाडिया की Tit.REE: पजावाण र उप्पारामारमंगासारं पाणाममा ताप iii वि सम्पदन्याण पायाण य य यनीयविनना jar गति पानसारखा २ । नियंपिया वास्यिपाद गरम विचार पतनाला । ' धि भागा मिनाताभिपात तालिका माणती मा पारतमालागि एंज लामा पाना मारिएपनि : r:-..: 1. 1 ... ! यार . • • . 1 Prem * +4 . . ... . 4 . -- ..
७६ 15 जिणदासगगिमहासरविग्हयाग जुगी संजुगं गि० २०८ -१० वयणं वा, तं सच्चं जत्थ सभेदं सपडिवक्खं च वणिज्जति तं समापवादं, तरंग पदपरिमाणं एगा पदकोटी छप्प- दाधिया ६ । सत्तमं आयप्पवातं, आय त्ति-आत्मा, [जे० २२० वि० ] सो गहा जन्य गगदागिणेहिं नणि- जति तं आयप्पवाद, तस्स वि पदपरिमाणं छब्बीस पदकोडीओ ७ । अदम कम्मपवादं, गाणावरणाइयं अह- विधं कम्मं पगति-हिति-अणुभाग-प्पदेसादिएहि भेदेहिं अग्णेहि य उत्तरत्तरभेदेहि जत्य वाणिजनितं कम्मप्प- 5 वादं, तस्स वि पदपरिमाणं एगा पदकोडी असीतिं च पदसहस्साणि भवंति ८। णवमं पाखाण, नम्मि सबपञ्चक्खाणसरूवं वणिज्जति त्ति अतो पञ्चकवाणप्पवादं, तस्स य पदपरिमाणं चतुरासीति पदसतसहस्साणि भवंति ९ । दसमं विजणुप्पवातं, तत्थ य अणेगे विजातिसया वणिता, तस्स पदपरिमाणं एगा पदकोडी दस य पदसतसहस्साणि १० । एगादसमं अबझं ति, बंझं णाम-णिफलं, ण वंझमवंझं, सफलेत्यर्थः, सव्वे णाण-तव-संजमजोगा सफला वणिजति, अप्पसत्था य पमादादिया सव्वे अमुभफला पण्णिता, अतो अझं, 10 तस्स वि पदपरिमाणं छवीसं पदकोडीओ ११ । वारसमं पाणायुं, तत्थ आयु-प्राणविधाणं सव्वं सभेदं अण्णे य प्राणा वण्णिता, तस्स पदपरिमाणं एगा पदकोडी छप्पणं च पदसतसहस्सा १२। तेरसमं किरियाविसालं, तत्थ कायकिरियादियाओ विसाल त्ति-सभेदा, संजमकिरियाओ ये छंदकिरियविहाणा य, तस्स वि पदपरिमाणं णव कोडीयो १३ । चोदसमं लोगविंदुसारं, तं च इमम्मि लोए मुतलोए वा विदुमिव अक्खरस्स [सारं-] सव्युत्तम सबक्खरसण्णिवातपढितत्तणतो लोगविंदुसारं, तस्स पदपरिमाणं अड्ढतेरस पदकोडीओ १४ । ३ ॥ इदाणिं अणिओगो त्ति- १०८. से किं तं अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-मूलपढमाणुआगे य गंडियाणुओगे य । १०८. अनुयोग इत्येतद् अनुरूपो योगः अनुयोग इति । एवं सर्व एव सूत्रार्थों वाच्यः । इह जन्म-भव- पर्याय-शिष्यादियोगविवक्षातोऽनुयोगो वाच्यः । स च द्विविधः-मूलपढमाणुयोगो गंडिकाविशिष्टश्च ॥ तत्थ--- १०९. से किं तं मूलपढमाणुओगे? मूलपढमाणुओगेणं अरहताणं भगवंताणं पुव्व- भवा देवलोगगमणाई आउं चवणाई जम्मणाणि य अभिसेया रायवरसिरीओ पव्वज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयाओ तित्थपवत्तणाणि य सीसा गणा गणधरा य अज्जा य पवत्तिणीओ य, संघस्स चउब्विहस्स जं च परिमाणं, जिण-मणपज्जव-ओहिणाणि-समत्तसुय- णाणिणो य वादी य अणुत्तरगती य उत्तरवेउब्विणो य मुणिणो जत्तिया, जत्तिया सिद्धा, 25 सिद्धिपहो जह य देसिओ,जचिरं च कालं पादोवगओ, जो जहिं जत्तियाई भत्ताइ छेयइत्ता अंतगडो मुणिवरुत्तमो तमरओघविष्पमुक्को मुक्खसुहमणुत्तरं च पत्तो, एते अन्ने य एवमादी भावा मूलपढमाणुओगे कहिया । से तं मूलपढमाणुओगे। १ छत्तीसं जे० ॥ २ य यंधकिरिय जे० विना ॥ ३ देवगर्म टे. ल. शु० मो. मु० ॥ ४ आयं सं० ॥ ५ उत्तर- घेउविणा य मुणिणो इति सं० सम० नास्ति ॥ ६ छेदत्ता जे० दे० ल. मो. मु० ॥ ७ रयुध सं० ॥ ८ सुदंभ अणुत्तरं पत्तो सं० ल० ।। ९ पघमन्ने जे. मु० ॥ 20 ७७ मशुओगसुयं मूलपहमाशुभोगो गंडियागुभोगोय] सिरिदेववायगावड्यं गंदीमुत्तं । १०९. 'मूलपढमाणुयोगी' ति, इह मूलभावस्तु-तीर्यकरः, तस्य प्रथम-पूर्वभवादि. अहवा जे० २२१ प्र० ] मूल एव प्रथमः मृलपरमाणुयोगो । एत्य तित्थगरस्य अनीतभवभाषा वट्टमाणभवे य जम्मादिया भाषा कहिजति। अहवा मूलम्स जे पहमा भावा ने मूलपहमाणुयोगो भण्णति । एत्य तित्यकरल जे भाषा पहनाने परियाय- मुन-मिस्साझ्या भाणिनन्या ।। ११०. से कि तं गंडियाणुओगे? गंडियाणुओगेणं कुलगरगंडियाओ नित्यगरगंडियाओ चक्कवट्रिगंडियाओ दमारगंडियाओ बलदेवगंडियाओ वासुदेवगंडियाओ गणधरगंडियाओ भवाहुगंडियाओ तवोकम्मगंडियाओ हरिवंसगंडियाओ ओसप्पिणिगंडियाओ उस्सप्पिणि- गंडियाओ चित्तंतरगंडियाओ अमर-गर-तिग्यि-निग्यगइगमणविविहपरियट्टणेसु एवमाइयाओ गंडियाओ आघविज्जति । से तं गंडियाणुओगे । सेनं अशुओगे ४ । ११०. गंडियाणुओगो नि बाबुमादिपर्वगंडिका एकादिकारनणतो गंडिया श्रीगो भनिती। नाच । युलकरादियाश्री, विमलवाहणादिकुलकराणं "पुचमा जम्म णाम पमाणः गा.नि.क. ११९ एवमादि अंकिंचि कुलकरम्य बनवं तं नवं कुलकरनंडिया, मणिनं । एवं नियमादिगंडियान वि। 'निनंतर- गंडिय' नि चित्रा इति-अनेकार्था, अपने इति-उन-अजिनो नातिवा. मंडिका नि-श्री नितगंडिका भणिता । नानि पत्रणे पुवायरिणति मा विधी निवा- मादिशजगादाण उसमन्स पयोपदे णग्यहीणं । लगाताण कमी परितोति || चोदम बग्या लिदा णिव को यहोनि मर्च। का नाम | पुणरवि चोदय यग्या गिद्धा निवतीण दीक्षिण पदमा रोनाTRI गाव य व्यग्या चोदय मिला पण्णाय नि म । गुगरा न यया यंत्र र नार पाया । :- 1.? । विवयं गव्य, चोय नववा नियमो : ::::::::: नण पर बलय ग्वाटी दी की दाणा यमन ! होगा यिनी Rm : गिवान- गिगा गतिगामितिकार निगमातिना। ari fitti पारिका नि..! का cिmm दिन .. :: एमागमा 1. . ' --- . TE : . । -" 10 - ९ जिणदासगणिगहारविम्याग गुणी संजय [ग. ???-.१२ ताहे-तियगादिविउत्तराए अउणत्तीसं तु तियग ठावेतं । पढगे णलित गोनो गेगेन गो भने रोवो ॥१४॥ दुग पण णवगं तेरस सत्तरस दुबीस छ न अटेव । वारस नोट्स तह अटवीग लम्बीग पणनीमा ॥१५॥ एकारस तेवीसा सीताला सतरि सत्तसत्तरि या । इग दुग सत्तासीती एगत्तरिमेन बानी ॥१६॥ अउणत्तरि चउनीसा छाताल सतं तहेव छब्बीसा । एते रासीखेवा तिगतंता जहाकमसो ॥१७।। सिवगति-सबहिं दो दो ठाण विसमुत्तरा णेया । जाव उगतीसटाणे उगतीसं पुण छवीसाए ॥१८॥ विसमुत्तरा य पहमा एवमसंख विसमुत्तरा णेया । सव्यत्य वि अंतिल्लं अण्णाए आदिमं ठाणं ॥१९॥ गतं ॥ अउणत्तीसं वारा ठावेतुं णत्थि पढमए खेत्रो । सेसे अडवीसाए सव्वत्थ दुगादियो खेदो ॥२०॥ सिवगति पढमादीए वितियाए तह य होति सबढे । इय एगंतरिताई सिवगति-सब्बठ्ठठाणाई ॥२१॥ एवमसंखेज्जाओ चित्तंतरगंडियाओ णेतव्या । जाय जितसत्तुराया अजितांजणपिता समुप्पण्णो ४ ॥२२॥ एवं गाहाहि चित्ततरगंडिया समत्ता । इमा एतासि ठवणा- सिद्धा लक्खा १४|१४|१४|१४ ४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ | १४ सबढे लक्खा १ २ ३ ४ एवं जाव असंखेजा पुरिसजुगा सिद्धा । अतो परं- सिद्धा लक्खा | ८ ९ १० | ५० सबढे लक्खा १४ | १४ | १४ | १४|१४|१४|१४|१४|१४|१४| १४ एवं पि असंखेज्जा पुरिसजुगा सिद्धा । एते वि लक्खा- सिद्धा लक्खा | २३४ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ सबढे लक्खा २३ ९ १० ११ १२ एवं जाव असंखेज्जा आवलिया दुगादिएगुत्तरा दो जे० २२२ प्र० ] वि गच्छंति ।। सिद्धा | ३ ५/७ | ९ | ११ | १३ १५ १७ | १९ सबढे ४ ६८ १० १२ १४ १६, १८ २० एवं असंखेजा। एगादेगुत्तरा पढमा चित्तंतरगंडिया णेया ॥ सिद्धा ९ | १३ | १७ २१ | २५ २९ ३३ | ३७ ४१ सबढे ७ | ११ १५ १९ २३ २७ ३१ ३५ ३९ ४३ एवं असंखेन्जा । एगादिविउत्तरा वितिया चित्तंतरगंडिया ॥ १ इमे भये खेवा आ० ॥ २ चित्रान्तरगण्डिका-तद्यन्त्रकदम्पकविशेषजिज्ञामुभिर्दष्टभ्या अस्मत्सम्पादितनन्दिसूत्रहारिभद्रीपरयनन्तर- मुद्रितदुर्गपव्याख्यायाः १६७ तमे पत्रे टिप्पणी ॥ 15 ३ ४ ६ [ 20 १ २ १ ३ 25 दिट्टिवानो चूलियामो य] सिरिदेववायगविइयं गंदीसुतं । ७९ सिद्धा ७ १३ १९ २५३१ ३७४३४९.५५ सन्चले ४१ १६ २२ २८ ३४.४० ४६ ५२ ५८ एवं जाव असंखेजा। एनादितिउत्तरा ततिया चिननगंडिया ॥ सिवगति ३ ८१६ २५/११ १७.२९/१४ ५०८० ५७? ७२:४९ २९ सन्न १२ २० १५:३१ २८ २६ ७३४ ९०६५ २७ १०३ ----- -- - स २९ ३४.४२ ५१ ३७ ' ४३ ५५ ४०, ७६ १०६ ३१ १०० ९८ : ३५ ५५ सिवानि '३१३८ ४६ ३५ ४१ ५७ ५४ ५२ ९९ ३० ११६ ९१ ५३ १२९ संसं गावाणुनारेण तव्यं नाव अनवजा ४ ॥ १११. से किं तं लियाओ? चुलियाओ आइलागं महं पुचागं लिया. अब- सेसा पुब्या अचूलिया । से नं लियाओ ५। १११. 'चून नि सिहरं । विटियान ज पनिकम्म कुन-कुन वा मतिमा मलिन । गायो य चलानी आदिटपुयाण चतुर, जे बलवन्य मणिना ने व मलविनापरवानाला चुला इन चुला । यि नाया मेण मंग्वा चनु गापा वन , :! ११२, दिष्टिवायग्य णं पग्निा वायणा. जडेजा अनोगाग. गंजा बेदा. संषेज्जा सिन्लोगा. संग्वेज्जाओ पटियनीयी. जामिनीमो. जागो । मंगणीओ । येणं अंगःयाण कालय मा. मंगा वत्थू, संज्जा गुलबन्य. जापा मामी लान याओ. गज्जाओ पापा विजयी HTTE अणंता गमा, अर्णता एजजला. परिमाला मा जिणागता पाया आरिजलि एज इंमिजति । से एक्शाया. एणाम ..... सि। #T १: । -.-- म 14 . है १ । .....
- स. ११:१६ मा ८. जिनाम: ११३. इच्चेइयम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे आणता भाना अणता अभावा अर्णता हेऊ अणंता अहेऊ अणंता कारणा अणंता अकारणा अगता जीवा अणता अजीवा अणंता भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणंता सिद्धा अणंता अमिद्धा पगणता । मंगहणिगाहा- भावमभावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाऽजीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा य ॥ ८०॥ ११३. अणंता भाव त्ति भवनं भूति भावः. ते ग जीना-जीवात्मका गणेता प्रतिपदा । 'अणंता अभाव' त्ति अभवनं अभावः अभूतिर्वा । जहा जीवो अजीनत्तेग अभानो, अजीना ग जीननेण, घडो पडतेण, पड़ो य घडत्तेण, एमादि अणंता अभावा प्रतिवद्धा । अहवा जे जहा जानइया भाना तेसिं पडिपाखतो तावइया अणंता अभावा भवंति । 'अणंता हेतु' त्ति पंच-दसाययययणेगु परसम्मत्तं सपालगत्तं अभिलसितमत्थसाधक 10 वयणं हेतू भण्णति, अहवा सबजुत्तिजुत्तं वयणं हेतू भग्णति, अहया सन्ने जिणगणपहा हेतू , प्रतिपातकत्तणतो, णिदोसहेतुवयणं व, सुत्तस्स य अणंत जे० २२२ दि० गमत्तगतो, एवं अयंता हेतू । भणितपडिवक्खतो य जस्स असाधकं तं तस्स अकारणं, जहा चकन्दंडादयो पडस्स, एवं अता कारणा। भणंता जीवा' इत्यादि करें। चेव अणंता चेव अहेतू । 'अणंता कारण त्ति कन्जसाधयं कारणं ति, ते य पयोग-वीससातो अणंता भाणितवा। जंच १ इञ्चेयस्मि खं० ॥ २ कारणा जीवा । अज्जीव भचियऽभविया, तत्तो सिद्धा सं० ल० शु० ॥३ पचावयव-दशा- वयवज्ञानार्थमत्रोलिख्यमानो दशवकालिकसूत्रनियुक्ति-चूर्णि-युद्धविवरण-वृत्त्यादिगतो अन्धसन्दर्भोऽवधारणीयः-"पइण्णा-हेउ-दिलुतोवसंहार- णिगमणेहि वा णिरूविजति आगमवयणं पंचहि, दसहि वा ।" तथा "पतिण्णा पढमो अवयवो १ पतिण्णासुद्धी २ हेऊ ३ हेउसुद्धी दिटुंतो ५ दिटुंतविसुद्धी ६ उपसंहारो ७ उपसंहारविसुद्धी ८ णिगमणं ९ जिगमणविसुद्धी दसमो १० ।" इति [ "कत्यति पंचावयवं" इति दशवकालिकसूननियुक्तिगाथा २३ अगस्त्यसिंहचूर्णा पत्र २० ] | "कदाइ आगम-हेउ-दिहतोवसंघार-णिगमणावसाणेण पंचाक्यवेण कहिजइ, कदाइ पुण दसावयवेण ।' तथा--"इदाणि दसावयवाणं परूवणं काहामि, तं०-पतिण्या पढमो अवयवो १ पइण्णाविसुद्धी वितियो २ एवं हेऊ तइओ अवयवो ३ हेउविसुद्धी चउत्यो भवयवो ४ दिर्सेतो पंचमो अवयवो ५ दिटुंतविसुद्धी छट्ठो ६ उपसंहारो सत्तमो ७ उपसंहारविसुद्धी अट्ठमो ८ जिगमणं णवमो ९ णिगमणविसुद्धी दसमो १० ।" इति वृद्धविवरणे पत्र ३८-३९ । “पचावयवाक्ष प्रतिज्ञादयः, यथोकम्-'प्रतिज्ञा-हेतूदाहरणोपनय-निगमनानीत्यवयवाः" [न्यायद० १-१-३२] दशवकालिकहरिभद्रवृत्तिः पत्र ३३ । तथा-"ते उ पइन १ विभत्ती २ हेउ ३ विभत्ती ४ विवक्ख ५ पडिसेहो ६ । दिहतो ७ आसंका ८ तप्पडिसेहो निगमणं १.च।। १३७ ॥” दशवकालिकनियुकिः । अस्या व्याख्याथै हारिभद्री वृत्तिरवलोकनीया । एपूलेखेषु दशावयवद्वैविध्यमपि न विस्मरणीयम् ॥ ४ चयणे सपफ्खधम्मत्त-सपक्खत्त-अभिलसितसज्मसाधकं आ• ॥ ५ पादकत्तणतो आ. दा० ॥ ६ इञ्चयं खं० शु.। ८० 5 एवमप्रेऽपि सर्वत्र ज्ञेयम् ॥ ११४. इंचेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं अणुपरियद॒ति । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं अणुपरियट्टिस्संति । ११४. इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता इत्यादि । 'दुवालसंग गणिपिडग' ति तिविहं पण्णत्तं-सुत्ततो अत्थतो तदुभयतो य । एमेव आणा तिविहा-सुत्ताणा अत्याणा 15 चाउरतं संसारकंतारं अणुपरियट्टिसु । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडप्पण्णकाले परित्ता .
८१ मुयणागविरागा-गहाण फलाई ] सिन्दैिववायगविन्यं गंदीमुनं । तद्भवाणा य ऐवं एगहिना नहा वि अभिवाणनो विमो कन्जनि-यदा आनाप्य एभिः नदा आना भवति, नंतपटव्यपदेशयन् । आनाप्यतं यया हितोपदेगत्वेन या आना इति । इद्वाणि एनसि विराहणा चिनिन्जति-ज चुनतो दुवालसंग गणिपिडगं तं अत्यता अभिनिनेण अणहा पावेतो नाए अन्यापाए मुनं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीत्रा नचारं भमितपुवा. गोहानाहिलयन् । अश्वा अन्यनो दुवालगं गणिपिड गुनतो अभिणिवेमेण अग्णहा पहुंनो ताए जुनाणार अन्य विगहना नीने का अगंना जीवा मंसा भमितपुच्चा जमालियन । अहवा आणं नि-पंचविहायारांचरणीलच्च गुरुको हितोपदसवय आगा. नमाया आपन गणिपिडनं विराधिनं भवनि, एवं तीए काले अणना नीश का भमिनाया. एलो अवसमा अन्यो । इमो अणकन्याममो-आणाए विगना इनि जहा छायाए मुंजिनागतो. जो छायाए शरणभूयाए भुजिया, किंतु सायायां भुवन्या गनि, एवं भानायां विराधनं कृता । मा य मामा-यदुवानसंग गनिपिगं आनाग विराना । मन पूर्ववत् । पहायच्य-श्रणान्नु वि मुनेछ एवं चत्र बनलं. पर पड़ने वाले परिना जीव नि, अणंना असंवन्जा यजि० २२३ प्रण भवंति, मणिमणयाण मन्जनाती ।। ११५. इन्चेइयं दुवालसंग गणिपिड अतीतकाले अणंता जीवा आणाए आगहेना चाउरतं संसारकनार विनिलु । इन्चेश्य चालन गणिपिडगं पडण-काले पन्निाजीचा आणाए आगहना चाउरंनं मंगारकता विनिश्यति । वयं दुवालगंगं गणिपिडगं अशागए काले अणंना जीवा आणाए आगहना वाउंगाला चिनिनिम्नति । ११५. निट वि आगधणना एका : ११६. इयं दुवालगंगं गणिपिगं कमाती कमाइ भनि नया: ण भविग्मनि. मुवि र भनि र भारनियमनामा. हिए णिो । जाणांमए पनि ण भरिमनि. भवि च गति ::: अहिया णिशा. एयागेर बाल पायाःण भविस्वति भय र शानि अति णि 4-5 , मा 3 है . है 1 . . H - जिगदासगणिगहत्तरविण्याग गुणगी संजुर्ग [मु. ११३ .? ११३. इंजेइयम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे अणंता भावा अणंता अभावा अ अणंता अहेऊ अणंता कारणा अणंता अकारणा अणंता जीवा अणंता अजीवा भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणंता सिद्धा अणंता असिद्धा पण्णता । संगहाँ भावमभावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाऽजीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा य ।। ८०॥ ११३. अणंता भाव त्ति भवनं भूतिर्वा भावः, ते य जीवा-ऽजीवात्मका अणंता प्रतिवद्धा अभाव' त्ति अभवनं अभावः अश्रूतिर्वा । जहा जीवो अजीवत्तेण अभावो, अनीवा य जीवत्तेण, घडो पड य घडत्तेण, एमादि अणंता अभावा प्रतिवद्धा । अहवा जे जहा जावइया भावा तेसिं पडिपक्वतो ता अणंता अभावा भवंति । 'अणंता हेतु' त्ति पंच-दसावयवर्वयणेमु पक्खधम्मत्तं सपक्वसत्तं अभिलसितम 10 वयणं हेतू भण्णति, अहवा सयजुत्तिजुत्तं वयणं हेतू भण्णति, अहवा सव्वे जिणवयणपहा हेतू , प्रतिपात णिदोसहेतुवयणं व, सुत्तस्स य अणंत जे० २२२ द्वि० गमत्तणतो, एवं अणंता हेतू । भणितपडिव अणंता चेव अहेतू । 'अणंता कारण' त्ति कजसाधयं कारणं ति, ते य पयोग-वीससातो अणंता भाणित जस्स असाधकं तं तस्स अकारणं, जहा चक्क-दंडादयो पडस्स, एवं अणंता अकारणा । 'अणंता जीवा' इत्या ११४. इ.इयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए । 15 चाउरतं संसारकतारं अणुपरियट्टिसु । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरंतं संसारकतारं अणुपरियटृति। इचेइयं दुवालसंगं गणि अणागते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरतं संसारकतारं अणुपरियट्टिस् ११४. इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता इस 'दुवालसंग गणिपिडगं' ति तिविहं पण्णत्तं-सुत्ततो अत्थतो तदुभयतो य । एमेव आणा तिविहा-सुत्ताणा १ इचयम्मि सं० ॥ २ कारणा जीवा । अजीव भवियऽभविया, तत्तो सिद्धा खं० ल० शु० ॥ ३ पवाद वयवज्ञानार्थमत्रोल्लिख्यमानो दशवकालिकसूत्रनियुक्ति-चूर्णि-वृद्धविवरण-वृत्त्यादिगतो प्रन्यसन्दर्भोऽवधारणीय:-"पइण्णा-हेड-दिडं जिगमणेहि वा णिरूविन्नति आगमवयणं पंचहि, दसहि वा । तथा "पतिण्णा पढमो अवयवो १ पतिण्णासुद्धी २ हेऊ ३ हेउसुद्ध ५ दिटुंतविमुद्धी ६ उपसंहारो ७ उपसंहार विसुद्धी ८ गिगमणं ९ जिगमणविसुद्धी दसमो १० ।" इति [ "कत्यति पंचाय दशकालिकसूनियुक्तिगाथा २३ अगस्त्यसिंहचूर्णा पत्र २० ] । “कदाइ आगम-हेउ-दिढतोवसंघार-णिगमणावसाणेण पंचाययवेण्- कदाइ पुण दसावयवेण ।' तथा--"इदाणि दसावयवाणं परूवणं काहामि, तं०-पतिण्णा पढमो अवयवो १ पइण्णाविसुद्धी २ एवं हेज तइओ अवयवो ३ हेउविसुद्धी चरत्यो भवयवो ४ दिलुतो पंचमो अवयवो ५ दिटुंतविसुद्धी छट्ठो ६ उपसंहार ७ उपसंहारविमुद्धी अट्टमो ८ णिगमणं णवमो ९ गिगमणविसुद्धी दसमो १० ।" इति वृद्धविवरणे पत्र ३८-३९ । “प प्रतिज्ञादयः, यथोक्तम्---'प्रतिशा-हेतूदाहरणोपनय-निगमनानीत्यवयवाः" [ न्यायद० १-१-३२ ] दशवकालिकहरिभवृत्तिः तथा-" ते उ पइन्न १ विभत्ती २ हेड ३ विभत्तो ४ विवक्ख ५ पडिसेहो ६ । दिहतो ७ आसंका ८ तप्पडिसेहो ९ निगमणं १३७ ॥" दशवकालिकनियुक्तिः । अस्या व्याख्यार्थ हारिभद्री वृत्तिरवलोकनीया । एपूढेखेषु दशावययद्वैविध्यमपि न विस्मय ४ चयणे सपफ्सघम्मत्त-सपक्वत्त-अभिलसितसज्मसाधकं आ• ॥ ५ पादकत्तणतो आ• दा० ॥ ६ इञ्चेयं सं एवमप्रेऽपि सर्वत्र क्षेयम् ॥ . .
सुयणागविराहणा-राहणाण पलाई ] सिन्देिववायगविन्यं गंदीनं । ८१ तदुभयाणा व ऐवं एगड़िता नहा वि अभियाणनो विलमो कन्जनि-यदा नाप्यने एभिः नवा आन भवति, तंतुंपटव्यपदेशचन् । आनाप्यने यया डिनोपवेगवेन मा आळा इति । इब्राणि एनसि विराहणा चिनिजनि- जुत्ततो दुवालसंग गणिपिडगं तं अत्यनो अभिनिण अण्णता पागनो नाए अत्याणाए मुत्तं विराना तीते काले अणंता जीवा संन्यारं भमितपुत्रा, गोट्टामानिन्छन् । अवाज अन्यतो दुवालगंगं गणिपिडगं नं नुनतो अभिणिवण अण्णता पहना ताए जुनाणाए अन्ध विगहना नीने काले अांना जीवा गंगारं भमिनपुच्या जमालियन् । अहवा आणं नि-पंचविद्यायावरणीलन्च गुरुगो हिनावदसवय आणा. नमाया आयांग गणिपिडगं विराधितं भवनि, एवं तीए काले अणंना जीवा नंगा भमिनाया. एमो अवमा अन्यों । इमो अणवम्बरसमो-आणाय विनयेना इनि जहा छायाए भंजिना नको. जो सवाए काणभूत्वार मंजिना, ति बाबायां भुक्त्या गनि, एवं आनायां विराधनं कृता । माय भागा इमा-चालन गतिविगं आगाए विगहना । म पूर्ववन् । पछयण-अणागन वि मुनमु एवं चत्र वननं. परं परमाणे शाले परिना नीग: इनि, अणंना अपयजा य ज २२३ २०ण मनि, मणिमया मनाती । ११५. इबेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अतीतकाल अर्गना जीव आगाए आगहेना चाउरंतं संसारकंता विनिवसु । इयं दुवालसंग गणिपिगं पाइपकाले पग्निा जीवा आणाए आगहना चाउरंतं मंसारकनार विनिश्चनिबाय दुवासंगं गणिपिडगं अगागा काले अणंता जीवा आणाए आगहना चाख्नंगलानां विनितिन्मनि । ११५, निट वि आराधणनगंट पर बन कर । ११६. इंइयं दुवालगं गणिपिगंण कला की याद मानिए कगा: ण भविग्यनि. शुधि च भवति य भविम्यान या हिए णित्र । मे जहाणांया पंचयिताका ण सचिमनि. गर्विस सानिया : मा अबलिया णिशा. एबामेय वाली क्या: ण भविस्यति. भूचि भीतर - है H M . * Hrime ८२ , जिणदासगणिमहत्तर विरइयाण गुणी, सजुगं [ गु० ११७-११८ गा० ८१-८५ णवपदत्येसु नियुक्तं नियतं जहा लोकवचनं पंचारितकायेष्विव । णियतनणतो चेव 'सासत' सधद भवतीतिशावतम् , पतिसमया-ऽऽवलिक-मुहूर्त-दिनादिष्विव कालः । सासतत्तणतो चेव वायणादिसु 'अखगं' नास्य क्षयो अक्षयम् , गंगा-सिंधुप्रबाहेष्वपि पोंडरीकहूदवत् । अक्खयत्तणतो चेव 'अवयं' नास्य गयो अव्ययम् , मानुगोतराद् बहिसमुद्रवत् । अन्वयत्तणतो चेव स्वप्रमाणे अवहितं जंबूद्रीपादिवत् । अवद्वितत्तणतो चेव सव्यहा नितिजमाणं 'निज' आकाशवद् 5 अविनाशीत्यर्थः । अहवा एते धुवादिया एगट्टिता । चोदक आह-इचेयं दुवालसंगं धुवादिपदपरूवितं किमाणागेज्झं दिटुंततो वा सझं? आचार्याऽऽह-जम्हा जिणा अणण्णहावादिणो तम्हा तेसि वयणं सव्वं आणाते चेव गझं, कहिंचि दिद्वंततो वि गझं । इह दुवालसंगस्स धुवादिपरूवितत्थस्स साधको इमो दिलुतो-'से जहानामते'त्यादि कंठं ।। ११७. से समासतो चउन्विहे पण्णत्ते, तं जहा-दवओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं सुयणाणी उवउत्ते सबदब्वाइं जाणइ पासइ । खेत्तओ णं सुयणाणी उवउत्ते 10 सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वं कालं जाणइ पासइ । भावओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ । ११७. तं च दुवालसंगमुतं चतुन्विहं दब्यादि । अभिण्णदसपुवादियाण जाव मुतनाणकेवली ते पडुच्च भणितं । दव्यतो णं सुतनाणी सुतनाणेणोवयुत्तो सुत्तविण्णत्तीए सन्बदन्वादि जाणति पासति य । णणु पासइ त्ति विरोहो ? उच्यते-जम्हा अदिवाण वि मेरुमादियाण मुतणाणपासणताए आगारमालिहइ, ण यादिहें लिखइ, 15 पण्णवणाए य भणिता सुतणाणपासणत त्ति, ण विरोधो । आरतो पुण जे मुतनाणी ते सव्वदचनाण-पासणतासु भइता । सा य भयणा मतिविसेसतो जाणितन्वा । एवं खेत्त-काल-भावेसु वि [जे० २२३ दि०] भाणितन्वा ।। सुतनाणदंसणत्थं भण्णति- ११८. अक्खर १ सण्णी २ सम्म ३ सादीयं ४ खलु सपज्जवसियं ५ च । गमियं ६ अंगपविलृ ७ सत्त वि एए सपडिवक्ता ।। ८१॥ [आव० नि० गा० १९] आगमसत्थग्गहणं जं बुद्धिगुणेहिं अहिं दिटुं । विति सुयणाणलंमं तं पुव्वविसारया धीरा ॥ ८२॥ सुस्सूसइ १ पडिपुच्छइ २ सुणेइ ३ गिण्हइ ४ य ईहए ५ यावि । तत्तो अपोहए ६ वा धारेइ ७ करेइ वा सम्म ८॥ ८३॥ मूयं १ हुंकारं २ वा वाढक्कार ३ पडिपुच्छ ४ वीमंसा ५ । तत्तो पसंगपारायणं ६ च परिणि? ७ सत्तमए ॥ ८४॥ १ जिणा णऽण्णहा आ० ॥ २ तत्थ इति सं० हे. ल. शु० विआनन्द्युद्धरणे ३०० पत्रे नास्ति ॥ ३-५-७-९ ण पासा हाटोपा० ॥ ४-६-८ सव्व खे० विआनन्युद्धरणे ३०० पत्रे ॥ १० अट्ठहिं वि दिढ जे. ल. ॥ ११ मावि सं० । वा वि 20 25 जे. ल. ॥१२ या रां० ।।
मुरगाणलाभ-सदग-ववागविहिमाइ) सिरिदेवनायगविन्दवं गंवायुनं । सुत्तत्यो खलु पढमो. वीओ णिज्जत्तिमीसिओ भणिओ । तइओ य गिरवसेसो, एम विही होइ अणुओगे ॥ ८५।। आव नि: गा०२२-२ से नं अंगपविई । से नं मुयणाणं । सेनं परोक्वणाणं । ॥से गंदी सम्मत्ता ॥ ११८. अपवर० गाहा । पमा चोदनविनतमापनत्रया कता ॥८६॥ एवं महिनाम- पीतम्य पनेगयुद्धमानिनन्य वा नहाकालणभानो बन-बुद्धिमान जाणिजे यामाग आचरिपति निम्न्हा ननु महणविहीं दमिन्ना आगम० गाहा ||८२॥ इमं ने अबुद्धिगुणा- सुम्मानि० गाथा ।।८।। विर्णनम अन्यनत्रणमा विही- मयं हुंकार गाहा ॥८४|| गणी प्रयोगका मात्रिी--- मुत्तन्यो म्बल गाना ||८|| जंण मणिमणंग निग्निं निर्गिनं । नं मम्मणयोगवन कोन का ! णि देणं ग म नणा, पदाजि मा धनियममार्गमाः । काटिना श्रीमननिनियाग, बांदा :: :: यानी पंचया वर्षमा न्यानमा आना DA Pawanet 11 ६
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८६ नन्दीसूत्रगाशानामकारादिकोणानुक्रमणिका गाथा गागा गाथाक १५ २ ५ ६३ २७ ११ ४१ १ ३ ८५. वहउ वायगवंसो ६१ ३९ ८३ ४८ ११८ सूत्राक पुवं अदिट्ठमसुय ४६ [आव. नि. गा. ९३९]] वारस एकारसमे १०७ भणगं करगं झरगं भदं धिइवेलापरि- २ भदं सव्वजगुजो- भदं सीलपडागू- २ भरणित्थरणसमत्था ४६ [आव. नि. गा. ९४३] भरहम्मि अद्धमासो २३ [आव. नि. गा. ३४] भरह सिल पणिय रुक्खे ४६ [आव. नि. गा. ९४०] भरह सिल मिंढ कुक्कुड ४६ [आव. नि. गा. ९४१] भावमभावा हेउम- ११३ भासासमसेढीओ [आव. नि. गा.६] भूयहिययप्पगभे मणपज्जवणाणं पुण ३२ [आय. नि. गा. ७६] गाथा महुसिथ मुदियंके ४६ ६० रांजगतगतुंगार- २ [आर नि. गा. ९४२] संवरनर जलपगलिगउमा २ मंडिय मोरियपुत्ते २१ सावगजणगगरिगरि- मिउमदवसंपण्गे ३५ सीगा साडी दोहं न १६ मूयं हुंकारं वा ११८ [ आर. नि. गा. ९४५] [आव. नि. गा. २३] सुकुमालकोमलतले २९ मुत्तथो खलु पढमो ११८ वंदामि अज्जधम्म पत्र-८ टि०१० [ आर. नि. गा. २४] [ चूर्णि-टीकाद्वयानादता गाथा ] सुमुणियणियाणिच वंदामि अज्जरक्खिय- पत्र-८ टि०१० सुस्सूसइ पडिपुच्छह [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [आव. नि. गा. २२] वंदे उसभं अजियं १८ मुहम्म अग्गिवेसाणं विणयणयपवरमुणिवर- पत्र-५ टि०८ मुहुमो य होइ कालो २३ [१६ गाथाप्रथमचरणपाठमेदः ] [आव. नि. गा. ३७] विणयमयपवरमुणिवर २ १६ सेलघण कुडग चालणि ६ विमलमणंतइधम्म ३ १९ [आव. नि. गा. १३६] सम्मदंसणवइरदढ- २ १२ हत्थम्मि मुहुत्तंतो २३ सवबहुअगणिजीवा २३ [आव. नि. गा. ३३] [ आव. नि. गा. ३१] हारियगोत्तं साइं संखेन्जम्मि उ काले २३ ४९ हेरगिए करिसए ४६ [आव. नि. गा. ३५] [आव. नि. गा. ९४७]] ५८ ३ २२ ५१ ४३ ७४ २५ ३८ € ८८ नन्दीमागिनानामुना गणानामा गनिम: पत्रा पा मागा नासमिति ६१ ७४ 1 [ ३० २९ २९ गाथादि दो लक्खा सिद्धीए धम्मो मंगलमुक्कट्ठ [दशव. अ. १ गा. १] नागम्मि दंसणम्मि य [विशेषणवती गा. २२९] निच्छयतो सव्वगुरुं [कल्पभाग्य गा. ६५] पगतीमुद्धमजाणिय [कल्पभाष्य गा. ३६७] पण्णवणिज्जा भावा [कल्पभाष्य गा. ९६४] ५३ गागादि पुगरवि नोदस लाखा पुचव जन्म णाण [आवश्यकनि. गा. १५९] भागतं पि य पण्णती [विशेषणवती गा. २२०] भगति जहोहिणागी [विशेषणवती गा. १७८ ] भगति ण एस नियमो [विशेषणवती गा. २१८] भण्णति भिगमुहुत्तो [विशेषणवती गा. २०२] भंभा मकुंद मद्दल ३ ४८ १३ २९ २ २८ विवारी सवढे विसगुनग ग पटमा सततं ण देइ लगा [गिगाती गा. २०४ ] सदसदविरोसगातो [विशेषायक गा. ११५) सच्चे सत्ता ण हंतच्या [ आचारा शु. १. अ. ४, उ. २ सू. ३] सञ्चेसिं आयारो [ आचारा नि गा. ८] सिवगति पढमादीए सिवगति-सचट्टेहिं चि- सिवगति-सव्वटेहिं दो पायदुगं जंघोरू -- لا [ २९ २६ ७८ पासंतो वि ण जाणइ [विशेपणवती गा. २१५] पिंडस्स जा विसोही [व्यवहारभाष्य उ. १ गा २८९] रुप्पं पत्तेयबुद्धा [आवश्यकनि. गा. ११३९] रुविस्सऽवधे [तत्त्वा. अ. १ सू. २८] ६१ १५ ७८ ३ तृतीयं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रचूर्णिगतानि पाठान्तर-मतान्तरनिदर्शकानि स्थानानि पत्र पंक्ति पत्र पंक्ति अण्णायरियमतेण अण्णे अहवा अहवा पाटो अण्णे पुण ७५-१७ २२-२२, ३२-३ ८-११ ४१-२ ९-२५, २४-२१ १७-१३ १२-२ ४१-६ २-१४ ८-११,५२-६,७०-२ केइ पाढंतरं इमं पाढंतरं अण्णे पुण आयरिया अण्णे भणंति
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९० नन्दीसूत्र-तगर्णि-टिप्पणीगतानां गन्य-गशकार शानिर नपाविनामनाम: विशेषनाम “पाम *रवय निम्! [क्षेत्र [गोत्र] . " *एलावन . पलावच विशेषनाम किम् ? पत्रम् आर्यमङ्गु [निग्रन्थ-स्थविर ] ८टिक आर्यसमुद्र ८टि० आवश्यकदीपिका [जैनागम] ११टि० आवश्यकनियुक्ति २,२६,४६, ४७,५१ आवश्यकनियुक्ति [जैनागम] २०टि०, २७टि०,३३टि० आवश्यकवृत्ति भालावन्छ जटिल ८ टटिल * कुंथु ऐलापत्य *ओवाइय [जनागम] *ओसप्पिणिगंडियाओ [ दृष्टिबायप्रविभाग] *कचायण [गोत्र] ३४टि० ०आवस्सग " ४९ ७ कच्चायण ८,७टि० ८ ४९टि० ४९टि० " or fi 17.111 पनम कागत [ग] * किम्मिानिसाल गिग ] ७१,७५ किरियाविशाल [अनागिम] ७६ कुन्टगरगंडिया शिवप्रतिभाग] ७७ "कुलगरगंडियाओ [नीकर] * कोडलय [ शार] * कोडिल्लय ४९टि० ०कोडिल्लदंडणीइ [शार] ४९टि० * कोसिय [ गोत्र कोसिय *क्रियाकल्प [शास्त्र] ४९टि० *खंदिलायरिय [निग्रन्थ-स्थविर ] ९ खंदिलायरिय ९ *बुट्टियाविमाणपविभत्ति जिनागम ] ५.९ खुशियाविमाणपविभत्ति *खोडमुह) [शास्त्र] *घोडमुह ४९टि० *गगधरगंडियाओ [ दृष्टियादप्रविभाग] ७७ *गणिय [ शास्त्र] *गणिविज्जा [जैनागम] गगिविजा गरुल [ देव] *गस्लोववाए [जनागम] गंगा [नदी] ६४,८२ गंडिकाणुओग (दष्टिवादप्रविभाग] ७६ *गंडियाणुओग ७६,७७ गंडियाणुओग गोट्ठामाहिल [निर्ग्रन्थनिझव] ८१ गोतम [निर्गन्थ-गणधर ] २६,६५ गोतम [गोन ] गोमटसार [जनशास्त्र] ४९टि० *आवस्सग *आसुरुक्ख [शास्त्र] ४९टि० आसुर्य ०आसुवृक्ष ०इतिहास ४९टि० *इसिभासियाई जनागम] *इंदभूति [निग्रन्थ-गणधर] *उढाणसुय [जैनागम] उढाणसुत ६० *उत्तरायणाई *उप्यादपुत्व [जैनपूर्वागम] ७४ उप्पायपुन्व [दर्शन] *उववाइय [जैनागम] ५७टि० *उवासगदसाओ ४८,६१, ६६,६७ उवासगदसाओ ६७ *उसम-ह [तीर्थकर] ६,६० उसम ७,६०,७७ * उस्सभिगिगंडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] [अन्तरद्वोप] २२ एरवद-य [क्षेत्र] २२,५१ ४९टि० *कणगसत्तर [शास्त्र] *कप्प [जनागम] ५८ *कप्पवडिसियाओ ५९ कप्पचडेंसिया ६० कप्पत *कपासिय [शान] *कप्पियाओ [जैनागम] ५९टि० *कप्पियाकप्पिय कप्पियाकप्पिय *कम्मप्पगडि [जनशास्त्र] *कम्मप्पवाद कम्मप्पवाद करफंड [निग्रन्थ-प्रत्येकबुद्ध] २६ करिसावण [नाणकविशेप] ०कल्पमाप्य [जैनागम ] १२,१३, ५३,५४, ५५,५६ कविल [पि] २६ *कविल [ शास्त्र] ४९ *काविल १९टि० *काविलिय ४९टि० *कासव | गोन [जनपूर्वागम ] ७४,७५
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नन्दीसूत्र-तराणि-टिपगतानां मार र विपनामम: ६० . O । ६ गुना [नामा * गुफलियामो पुष्पदन [नीकर] पुफिया [जैनागम] * पुफियामो * पुराण [शार]] ६० ४९टि० ४९टि० ४९टि० -प्टिवाद। " पनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम दुवाअ [जैनपूर्वागगसगृह ] १८,६१, निगम [जार ९टिक ७१,७९ निरयगइगगण- तुवात , ७१,७२,७९ नंडियाओ [शिवप्रतिभाग] ७७ वसागरपण्णत्ति [जैनागम] निरयावलिया [जैनागम] ६० नपुफिय *निरयावलियाओ सगगि ) [निम्रन्थ-स्थविर ] ११,१२ निरुक्त [शास] ४९टि० सगणि १३ निर्धण्ट सगगि ११ निसीह [जैनागम] [जैनपूर्वागमसमूह] ७१ *पच्चक्रवाण [जैनपूर्वागम ] ७४,७५ दृष्टिपात पचक्वाण देववायग [नन्दीसूत्रकार] १३ *पच्चक्खाणप्पवाद ७४टि० देविंदत्था [जैनागम] पणत्ति [जैनागम] २९ देविंदोववाए ५९ पण्णवगा २९,५८,८२ द्वादशारनय- [जैनशास्त्र] [जैनशास्त्र] ५०टि० *पण्णवणा चक्रवृत्ति *पण्हावागरणाई १८,६१,६९ धणदत्त [श्रष्टी] ३४ पण्हावागरणाई ६९,७० *धम्म [ तीर्थकर] *पभव [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] धरण [देव] ६० पभव *धरणोववाए [जैनागम] ५९ *पभास [निग्रन्थ-गणधर] नन्दिवृत्ति ३४टि०,३५टि० *पमादप्पमाद [जैनागम ] नन्दी-सूत्र २३टि०,३२टि०, पमादप्पमाद ५८ ३८टि०,४२टि०, *पाइण्ण [गोत्र] ६१टि०,६७टि०, ०पाक्षिकसूत्रटीका [ जैनागम] ५९टि० ६८टि०,८२टि० वृत्ति ५७टि० ०नयचक [शान] ५०टि० *पागाउं-उ-यु [जैनपूर्वागम] ७४टि०, नंदी [ जनागम] ७५टि० *नागपरियागियाओ ५९ *पाणाय ७४,७५ अनागपरियावणियाओ, पाणायु * नागपरियावलियाओ ०पाणिनीयधातुपाठ [ शान] १४,१७ *पायंजली [शास्त्र] १९टि० ४९टि० अनागमुहम पायीणग्गि [जैनपूर्वागम] [गोत्र] * नाणपवात [शान] *पास *नागरम ४९ [ तीर्थकर] ८ ७ ७ पुराण * पुस्सदेवय पेडिया [जैनागम १८,२६, आवश्यकपीठिका] ३१,४४ *पोरिसिमंडल [जैनागम] पोरिसिमंडल पोंडरीय [द्रह ] ६४ *बलदेवगंडियाओ [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ बलिस्सह [निग्रन्थ-स्थविर] ८ *बहुल बहुल *बहुलसरिचय (बलिस्सह) *भद्दीवग [निन्थशाखा] ९ बंभदीवग वार्हस्पत्य [शास्त्र] बिंदुसार [जैनपूर्वागम] ३२,४९ २४ बृहत्सङ्ग्रहणी [जैनशास्त्र] ब्रही [लिपि] ४४ ०भगवती [जैनागम ] २३टि०,२६ भगवती ८टि० [निर्ग्रन्थ-स्थविर] भद्दगुत्त *भद्दवाहुगंडियाओ[ दृष्टिवादप्रविभाग]७७ *भदवाहु [निग्रन्थ-स्थविर] भदबाहु ०भम्भी [शान] ९ ४९टि० . . ५९टि० ५९टि० १९टि० - ” ---- ४ 'नन्दीमा तमूर्णि-टिपागलानां गाएका परम ६ वेतड्ढ वेद ৩৩ * मनि [m] १९ मार ९ * गगनाा निगम | १८,६१,६४ रामनाग ६१ समवाया ६३टि०,६५टि० ६६टि०,६७टि० ६८टि०,६९टि०, ७०टि०,७१टि०, ७२टि०,७४टि० ० समवायाजसूत्रवृत्ति ७४टि० *सगुट्ठाणमय ५९ समुट्ठाणमुय ६० *ससि [तीर्थकर] ६ *संडिल्ल [निग्रन्थ-स्थविर] संडिल्ल *संती. [तीर्थकर] *संभव *संभूय [निग्रन्थ-स्थविर] संभूय *संलेहणासुत [जैनागम] ५७ *साई [निग्रन्थ-स्थविर ] ८ सागरानन्दसूरिनिर्ग्रन्थ-आचार्य] ५९टि० साती [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] '८ *सामज्ज ८ " विशेषनाम किम् ? पत्रम् शिसपनाम वासिष्ठ [गोत्र] ८टि० वृत्तित्-कर्न [नी. ११ टि०.१२ टिक. वासुदेवगंडियाओ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ टीका काग - १ टि०.१६०, वासुपुज [तीर्थकर ] श्रीहरिभद्र- २३टि०,३०वि०. विजणुप्पवात [जैनपूर्वागम] ७६ मलयनि- ३१टि०,३३टि०. *विजणुप्पवाद नायी) ५०टि०,५२टि०. ७४,७५ *विजाचरणविणिच्छअ [ जैनागम] ५७ ५७टि०,५८टिल, विजाचरणविणिच्य ६०टि०,६७टि० *विजाणुप्पवाद [जैनपूर्वागम ] ७४टि०, ६९टि०,७२टि० ७५टि० [गिरि ] *वितत्त [निर्ग्रन्थ-गणधर] *वेद [शास्त्र] *विमल [तीर्थकर]] १९टि० विमलवाहण [कुलकर] वेद *वियाह [जैनागम] ६५ वेलंधरे [ देव] ६० वियाहचूला *वेलंधरोववाए [जनागम ] विवागलुत ७०,७१ वेसमगे [देव ] ६० *विवागसुय , ४८,६१,७० *वेसमणोववाए [जैनागम ] *विवाह ६५टि० *वेसियं [शास्त्र] ४९ *विवाहचूलिया-वियाह ,,५९,५९टि० *तेसियं ४९टि० *तेरासियं ४९टि० विशेषगवती [जैनशास्त्र ] २८,२९,३० वैशिक ४९टि० विशेषावश्यक [जैनागम] २३टि०, वैशेषिक ४९टि० ८२टि० विशेषावश्यक- ०व्यवहारभाष्य [जैनागम] ४९टि०,६१ ३२टि० ०व्याकरग ३८टि०,४२टि० [शास्त्र] ४९टि० महाभाष्यमलधा- रीयटीका-वृत्ति ५२टि० शकराज [ राजा] ८३ विसेसावस्सग ०शाण्डिल्य [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ८टि० *विहारकप्प ०शिक्षा [शास्त्र] ४९टि० विहारकप्प सक [श्रमणविशेष] वीतरागमुत *सगमदियाओ-सयभ०- [शान] ४९, * वीयरायसुत संगम०-सदभ०-सगडम० ४९टि० * वीर [तीर्धकर] २ सगर चिकार्ती] वीरिय [जनपूर्वागम] ७४,७५ * सच्चप्पवाद [जैनपूर्वागम] ७४,७५ वारिययवाय सच्चप्पवाद ८ ७ . ८ M ८ ३२ ४९टि० ४ १ सामज्ज सामादिय ०सांख्य *सिज्जंस सिंधु *सीयल *सीह सीहवायक [जैनागम] ३२,४९ [शान] [तीर्थकर] ६ [नदी] ६४,८२ [ तीर्थकर] [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ९ ९ ६ ৩৩ :
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५ पत्रमं परिशिष्टम् नन्दीमत्र-तपूर्धन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्पादियोनकानां शब्दानासकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका [अस्मिन् परिशिष्टे *एतादृक्पुष्पिकाचिह्नाहिताः नन्दीमूलगू गन्तः राजाला रवयं गान्याता ज्ञेयाः, +एताटक्चतुष्किकाचिहाहिताः शब्दाः चूर्णिकना गन्शसन्दर्भ स्वयं प्रयोजिता ज्ञेयाः, शेषाश्च शब्दाः सूत्रान्तर्गताः चूर्णिकृता व्याख्याता अवबोरगाः ।] शब्दाः - शब्द पत्र-पंक्ति पत्र-पति पत्र-पति शन्द +अणियोग अ . अणाणुगामिक ७६-१५ १७-२१ १७-२ ६९-४ ६९-५ अभिलावावर ४४-१७ अरहंत ४८-२० अलात [ जलंतं दास्यं ] १६-२२ अवगाह अगुकड्ढण अगुत्तर अणुत्तरोववाइय अणेगसिद्ध अणंतर आण्णलिंगसिद्ध अण्णाण अण्णाणित [अण्गाणं इत अण्णाणित २७-९ २६-३ २७-२ ५०-६ ५०-७ अकारण ८०-१३ अकिरिय [णत्यियवादी] ४-९ अक्ख [' अशु व्याप्ती" णाणप्पण- ताए अत्थे असइ त्ति इच्चेवं जीवो अक्खो, णाणभावेण वावेति त्ति भणितं भवति । अहवा “अश भोजने" इच्चेतस्स वा सव्वत्थे असइ त्ति अक्खो, त्ति अक्खो, पालयति भुङ्क्ते चेत्यर्थः ।] १४-१५,१६ अक्खर [णाणं] ५५--२३ अखंड [ अविराधित, निरतिचार] ३-१७ अगमिय [अण्णोण्णक्खराभिधाणहितं जे पढिजति तं अगमिय] ५६-२४ ५२-१९ । ७५-२२ अग्गेणीत ७५-२२ अचरमसमयभवत्थकेवलणाण २५-२८ अचरिम २५-२७ अजोगिभवत्थकेवलगाण २५-१६ अजोगी [ सव्वजोगनिरदो, सइटेसभावटितो] २५-१६ अन्न [आयं आयं वा] ८-९ अतित्थ २६-१३ अतित्थकरसिद्ध २६-१७ अतित्थसिद्ध २६-१५ अत्थ ११-२१ अस्थिणत्थिप्पवाद ७५-२५ अत्थोग्गह ३५-१३,१४,१५ अनुयोग [ अनुरूपो योगः अनुयोगः] ७६-१८ अपज्जतय २२-१९ अभाव ८०-७ अमिनियोध १३-१८ अवग्रह ३४-१९ अवधि १३-२३,२४ अवयण [कुच्छितवयणं] ४७-२७ अवलंबणता ३५-२६ अवहि १५-११ अवात ३६-२३,४१-१६ अवाय ३४-२० *अवाय ४३-११ अवि ५५-२२ अवोह [परधम्मपरिचागे सधम्माणुगतावधारणे य 'अबोहो' ति अवातो] ४६-११,१६ अवंझ ७६-८,९ असण्णिसुत १५-२१ असील [कुच्छितसीलं] ४७-२७ अमुतनिस्सित ३२-२६ अंगपविट्ठ ५७-३,५ अंगवाहिर ५७-४,५ अग्ग [परिमाण] A :- 4
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९८ नन्दीसून-तापर्यन्तर्गतानां विषय-अप गारियोजना समानामन जी पत्र-पकि कुच्छी [दो हत्या (दिहस्त- १९-१५ प्रमाणम्)] कुवलय [ १ कुच्छितो उक्लो ९-१३ कुवलयो, सो य कण्दकायो, २ णीलप्पलं, ३ रयणविसेसो] कूड ६४-४ कोट्ठ ३७-११ जोई जो ख खाणी शाण खुद खुशागपतर ११-२० ५९-८ २४-८ चरणविही ५८-२२ चरिम २५-२६ चहित (दे०) [मनोरगरपि] ४९-१ चित्त [मितिजइ जेग निरा] "--१९ चित्तरगंडिका ७७-१३ चित्र ७७-१३ चिंता [जो यऽणागते य ३६-१३० चितयति 'कई वा त ४६-१३, तत्थ कातव्यं?' इति १५ अण्णोण्णालयणाणुगतं चित्त चिता, अणेगहा संकप्पकरणं चिता (पत्र -४६)] चुडली [अग्गे पज्जलिता १६-२२ तणपिटी] ५७-२५ चुल्लकप्पसुत ५७-२५ ७९-११ चोदक ३८-६,७ चोदित ५०-२३ टंक - ठवण णं णदि गंदी णाग ५८-१० गणिविजा गद्दियदि०) [ख्यात ११टि०११ गम्भ [पोमकेसरा] ११३ गमिय ५६-२३ गवेसणा [१ वीससप्पयोगु-३६-१२, भवणिचमणिचं चेत्यादि ४६-१२, गवेसणा, २ अभिलसितत्ये १५ चेव अपडपज्जमाणे भायणा गवसणा (पत्र १६)] गंडिका ७७-१३ गाढ गिहिलिंगसिद्ध २७-2 गुण ४-३ *गुणपञ्चतिम- इय २०-१३, २३-१४ *गुणपढिवण्ण १५-१८ गुरु [गृणाति भासमिति गुरुः] २-२ गोयर ६१-२० छदुमत्थ २४-३ णाण ५०-८ णाण जाय लोगो, - [१ खेत्तलोगो १-१७,२-१,३ (पन १), २ सध्यसणि- ३ सत्त-प्राणी (पत्र २)] जतपडागा [संनयपताका] अमलद्वित १७-३ जयति १-१७:२-२० जलोह जसवंस णिच णिचं णो" जोडी णोई घ घोस ३५-२१ F事 产 . भद्रम् म ३५-४,५,६,७ ९-५ ६९-२० पत्र-पति बुद्धबोधितसिद्ध २७-१ मरण १५ नागना बुद्धि ५०-९,१० मरणविभत्ती १-१ ५८.-१६ गा। बुद्धी ३६-२४ महत्थ ११-२०,२१ गती १८-२० भ ५-२१ महल्ल ५९-८ भगवंत ४८-२१ १४-१८ नगालर महाकप्पसुत २-२७ महात्मा २-२३ वहिदसामो ६०-१५ भवत्थकेवलणाण २५-११ महापचक्खाण ५८-२७ वर्गति ५०-२५ भवपच्चतिम २०-१३ महापण्णवणा ५८-१ चग ८-५ भाव ८०-६ महित १९-२,३ घर ५-१६६-१८ भावमण ३५-१८ मंडलप्पवेस ५८-८ वंजण ३५-२१ भाविदिय १४-२९ मंता १७-१३ *वंजणाखर ४५-१ भासापज्जत्ति २२-१६ माता ४५-४ ६२-१ वंजगावर म माधुरा वायगा ९-२४ वंजणोग्गह-णावग्गह मिच्छा मग्गणा [१ विसेसत्यस्स ३६-११ ५०-७ वंस अण्णय-वइरेगधम्मसमा-४६-११,१४ मिच्छादिद्वित ५०-७ वागरण लोयणं मग्गणा भण्णति (पत्र-३६)। मुद्दिया ९-१०,१२ वातगा-यगा विसेसधम्मण्णेसणा मग्गणा, २ अ मूलपढमाणुयोग ७७-२,३ वायक-ग ९-२,११ भिलसियस्थस्स मणोवयणकाएहि मेधा ३६-१ विटलतराग २३-६,९,११:२४-२९, जायणा मग्गणा (पत्र १६)] ३०,३१ र मग्गओ अंतगय १६-१०,१४,१७-६ रय ३-२३ २-१६ मग्गतो १७-१ रवति ६-११ विजणुप्पवात ७६-७ मज्झगत-य १६-२,७,८,२०० रुयग [अट्टप्पदेसो रुयगो, २४-९ विज्जा ५८-८,१० तिरियलोगमज्झं] विजाचरणविणिज्य ५८-१० मणपजत्ति २२-१७ ५-१४ विजुत ६-१४ मणपज्जयणाणं-नाणं १३-२६,२८ विणिच्छय ५८-९ मणपज्जव १३-२७ लद्धिअक्स्वर ४५-१० विण्णाण ३६-२५ मणपज्जव नाण १३-२५,२८ - लेस्सा ४-१५ वितिमिरतराग २३-७,९,११, मणपज्जाय+णाण १३-२७ लोगबिंदुसार ७६-१४ २५-४,५ मणित २४-२ विधि १३-१३ मति ५०-९,१० वक्खाण ११-२२ विपाक ७०-२३ मतिअण्णाण ३२-९,१० वक्खाणकहण ११-२२ विपाकसुत ७१-१ मतिणाण ३२-९,१० वाग ५९-१०६६-११; विपुलमती २२-२६ मनःपर्यय १३-२५ ६८-१२,६९-८ विभत्ती ५८-१४,१५ व + , भन्दम् रामग m:: १ १ २८ तवो, ५ वा उज्जल १९ ६ ७ 27 ३ १२-१३ ओहिन्नाणं . १७ 7 ९ . ८ . १० चूर्णिसमन्वितस्य नन्दि सजाग शुद्धिपत्रकम् पृष्ठम् पक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् पक्तिः 'भावो भायो(? जीवो) १२ भणति-- भणंति । ११ त्ति त्ति- ३ तवो ३ ५ नियमो नियमो. १९ वाउजल चितिज्जइ चितिज्नद ११ प्रचुरः प्रचुरः, २८ उसभ० उसभं० २८ १८ तुंगियायणे 'तुंगियायणे' अष्टाविश सप्तविंश प्पेहाभा पेहाऽभा १० १० °खमासणे १८ खमासमणे १० ११ भूतादण्ण २० भूयदिण्ण ११ भावणा २० भासणा २१ ११ धारेव्यं १० २४ धारेव्यं । अहिंसा १३ पूर्वार्द्ध निम्नप्रकारेण ज्ञेयम् - ३ गमण १ परावत्तेरगो लाभो ३ भेदा य ४ वहुपरावत्ता ५। २२ १० २३ १४ च २१ २३. १४ १८ समेदं सभेदं । २३ २३ १४ १९ २४ १३ १४ ॥ २४ १४ १६ मज्झगयं? से मज्झगयं? मज्झगयं से १५ २-३ सा(दो)पासय सापासय('दो पासे य) "द्वितं । २४ ३ "हितं [वा] । १५ २५ समंता २५ १७ त्तिसव्वा त्ति सम्मा २५ १३ 'स' २६ १ १६ 'स्स परिपेरंतेहि स्स पेरंतेहि परिपेरंतेहि परंतेहि १३ १७ जोइट्टाणं जोइट्ठाणं १८ १७ ३३ १४. एवमेव एवमेव १० ओहिणाणं २८ ओहिणाणं २९ २० ओहिणाणं ओहिणाणं ३० १५ १७ अगणि अगणि ३० . वासाउ' qv ५.६-11 . स्स परि- परंतेहिं परि- पेरंतेहि रामु यमप्रति हारि० मलय० ॥ १० १० ११ ૨૨ दे०ल. ॥१४ १३ १५ 'साओ साउ तेयाभास तेया-भासं ४ीं टिप्पणी निरुपयोगिनी । 'गभांति 'गन्भवाति वासासाउ 'शते 'सते ख. खं. चूर्णिकृता चूर्णि- वर्णना वर्णना उपरि जाव लस्स 'लस्स अ सत्तरज्जूओ सत्तरज्जुओ भणितं भणितं । रागं-ति 'रागं ति °णाणं च 'णाणं च। से तंकि से कि तं भवति भवति, "द्विता "द्विता भ अण्णोण अण्णो (? पण, 'पर्यवं 'पर्यव "दिया, अजीवा दिया। भजी [बमा]वा अणुरतण सिद्धऽधि सिदाधि श्रुत श्रुतं १४ च. . ॥ जाव उपरि ० ३ से मंता ५ . . १२ ९ o १० २७ २७ २७ २७ . . १८ अणु-रतण ० १२ . JMRIT ܕܙ ܝ 1 . textile It gives the lives of 54 great men revered by the Jains, yiz. 24 Tirthankaras, 12 Chakravartir The Part I of this work on Prakrit metres is published as the Second Volume of the Prakrit Te= matter, as well as, the exact nature of the language of the original text, and also a literary assessme Prākļita Paingalam together with a critical and comparative study of the metres that form the subje of the portion which the author intended to serve as illustrations to the Matrika and Varnika meta It is written by Nemichandra and is commented upon by Amradeya of the 12th Century A. This is the earliest Prakrit version of the story of Rama. It was written in about the third Cente A. D. by Vimala. The work is printed with Hindi translation. It is edited by Muni Shri Punyavijayaji 2 translated by Prof. S. M, yora, M. A., Jainadarśanācharya, Its Introduction is written by Dr. V. M. Kulkar - Demy Quarto size..l'agri..?!!!:::..::: Angavijja is published for it... :!: it in Muni Shri Punyavijayaji, with English Premio pertson2 lsg it. Dr. V. S. Agarwal, Angavijjā is an ancient Irakrit Trnt iritir: dos gerenomirstine con la 112:13 vf burelily 1.944 TL work is of unknown authorsliip bit pris copiilepine to form of bride verrigoitza.co.yundirtitily havin been delivered by Mahavira himself. Ita entrar criticae prints lov iti dvira: 1.93 finally compil the end of the Kushan period, aliouit Ith Crotury A. 1). It is highly important document firstlyfor elin toistory of Bruksvit does and secondly, for it! cultural history of India. It contains bumircils of lists of ilt description, for people, sauts, pnature utensils, containers, flowers. trees, personal time:, formed and drinks, fvoel steali, conveyances ornaments, jewellery, coins, birds, animals, aromi, vepns, burts, 4.015, poulest“, efr. 2. PRÄRRITA-PANGALAM. tert 1. - Demy Octevo size.. Page - 700..Price -Rs, 161- Prākritapaingalam is a text on Prakrit ani Apadlıraruia Metres. It is critically exited with the Sanskrit commentaries on the basis of the two carlier edition and further available manuscript matera by Dr. Bholashankar Vyas, a distinguished member of the lindi Department of the Banaras klin University. He has also added Hindi translation withi philological notes and glossary of Prakrit ar Apabhraíśa words. 3. CAUPPANNAMAHAPURISACARIYAM. -Demy Quarto size..Pages-S+68+391. .Price Rs. 211- Cauppannamahāpurisacariyam is a great biographical work by Acharya Silarika of the 9th Centur A. D. It is critically edited by Pt. Amritlal Mohanlal, Research scholar of Prakrit Text Society. + Introduction is written by Dr. K. L. Bruhn. 9 Baladevas and 9 Vāsudevas. 4. PRAKRITAPAINGALAM Part II. -Demy Octavo size..Pages 16+16 +592 +12..Price Rs. 15/- Series. Part II contains the editor's comprehensive Introduction dealing with dealt with by him. 5. ĀKHYANAKAMANIKOSA. -Demy Quarto size..Pages 8+16+25+422..Price Rs. 21/- Akhyānakamaņikosa is critically edited for the first time by Muni Shri Punyavijayaji. This book is a mine of historical and legendary stories in Prakrit and Apabhramśa. 6. PAUMACARIA Part I. - Demy Quarto size..Pages 8+40+376..Rs. 18/- thc problems of
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