Allahabad University, Allahabad
Kiratarjuniyam2
Front matter
महाकविश्रीमारविविरचितम्
किरातार्जुनीयम्
(प्रथमसर्ग)
[आचार्य मल्लिनाथकृत घण्टापथ-व्याख्या, श्लोकान्वय, हिन्दी-अनुवाद]
सस्कृतभावार्थ व्याकरणात्मक टिप्पणी एव छात्रोपयोगी
विस्तृत भूमिका सहित .
व्याख्याकार
अभिराज डॉ० राजेन्द्र मिश्र
सस्कृत-प्रवक्ता, प्रयाग विश्वविद्यालय
अक्षयवट प्रकाशन
इलाहाबाद
प्रकाशक
अक्षयवट प्रकाशन
८ बाघम्बरी मार्ग, इलाहाबाद ।
• २६ बलरामपुर हाउस, इलाहाबाद ।
© प्रकाशनाधीन
छात्र सस्करण
छ रुपये
पुस्तकालय सस्करण
दस रुपये
→मुद्रक
शुभचिन्तक प्रेस
३१३ बस्की खुर्द, दारागज
इलाहाबाद-६
तृतीय संस्करण !! महाकवि भारवि-प्रणीत किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के प्रथम-सर्ग की यह व्याख्या मैने स्वर्गीय श्री जमुना प्रसाद भट्ट के अनवरत निवेदन तथा पूज्यपाद पितृव्य डा० आद्याप्रसादमिश्र जी के आदेश मे सन् १९७० ई० मे लिखी थी। इसके पूर्व भी, कई एक ब्वप्रतिष्ठ ब्याख्याकारो की पुस्तके इस एक सर्ग पर प्रकाशित हो चुकी है । अतएव यह कहने का मिथ्या-साहस न . करूँगा कि 'दम नवीन व्याख्या के विना छात्रो का काम नहीं चल सकता था । फिर भी, यह कहने मे मुझे मकोच नहीं है कि किरातार्जुनीयम् की नारिकेलफलसम्मित पदावली के रमगर्भनिर्भरमार का जैसा गाख्याजन्य आनन्द मुझे विद्यार्थी जीवन मे, रमणीय पाठन-शैली के कारण, अपने प्रद्वय गुरुजनो मे मिला था अथवा प्रवक्ता बन जाने के बाद, उन्ही की नकल पर छात्रा को जैसा आनन्द देने का प्रयत्न मैं स्वय करता रहा है विगत सस्करणो मे उस व्याख्या-सामग्री का अभाव था । प्रस्तुत प्रकाशन के सन्दर्भ मे उसी 'अभाव' को मेरी 'छात्रहित भावना' भी मान लीजिये । स्वर्गीय भट्ट जी द्वारा प्रकाशित प्रथम सस्करण सन् ७४ ई० के पूर्व ही समाप्त हो ग-1 था । तब से निरन्तर छात्र-समुदाय मे इस व्याख्या की माँग होती रही । अनेक छात्र समय-समय पर मुझसे इस विषय मे पूछताछ करते रहे । बाहर से भी अनेक प्रवक्ता मित्रो तथा शिष्यो के पत्र इस सन्दर्भ मे प्राप्त होते रहे । वस्तुत उन्ही आग्रहो के कारण सन् ७६ मे इस व्याख्यात ग्रन्थ का दूसरा सस्करण 'सरस्वती प्रकाशन मन्दिर' ( बैरहना ) द्वारा प्रकाशित किया गया और अब उसी क्रम मे 'अक्षयवट प्रकाशन' द्वारा तीसरा सस्करण प्रस्तुत किया जा रहा है। पिपीलिका-वृत्ति से इस व्याख्या को उपादेय बनाने का प्रयत्न मैने किया है, फिर भी प्रूफजन्य अथवा प्रमादजन्य त्रुटियो की सम्भावना को नकारा नही जा सकता । मै उन त्रुटियो के लिये हृदय से क्षमाप्रार्थी हूँ। प्रस्तुत सस्करण की प्रस्तुति मे मेरे अनुज तथा प्रकाशन के स्वत्वाधिकारी चि० सत्यव्रत मिश्र ने प्रशसनीय सहयोग दिया है । सुन्दर प्रेस-व्यवस्था तथा आकर्षक मुखपृष्ठ के लिये उन्हे सस्नेह आशीर्वाद देता हूँ।
( ४ )
भ्रमन् रौति कल भृङ्गो नाऽत्र कार्या विचारणा।
न स्वार्थोऽत्र न वैवश्यमेतदेवास्य जीवितम् !!
अप्रत्याशित मूल्यवृद्धि के कारण, अब प्रकाशन-कार्य मे कोई आर्थिक लाभ
नही है। फिर भी ग्रन्थ की उपादेयता को दृष्टि मे रखकर हमने प्रस्तुत व्याख्या
प्रकाशित की है । सुरुचिपूर्ण मुद्रण के कारण इस सस्करण मे पहले की अपेक्षा
एक फर्मा (१६ पृष्ठ) और बढ़ गया है । फिर भी ग्रन्थ का मूल्य मात्र छ रूपया
रखा गया है।
रामनवमी
विनीत
राजेन्द्र मिश्र
मार्च, सन् १९८० ई.
चतुर्थं संस्करण !!
प्रस्तुत सस्करण तृतीय सस्करण का ही सशोधित एव परिष्कृत रूप है ।
जुलाई सन् १९८१ ई०
लेखक
पाठकों के लिये stic सस्कृत काव्यवाड्मय अपने वैविध्य के लिये प्रख्यात है। यह वैविध्य मुख्यत प्रतिपाद्य का, प्रतिपादन-शैली का, रस एव छन्द का है । एक ओर तो हम जीवन के सुभग आदर्शों की व्याख्या करने वाले कविकुलगुरु कालिदास के काव्य पाते है और दूसरी ओर केवल नायक-नायिका के उद्दाम प्रणयचित्रण के दर्पणभू त अमरुशतक प्रभ ति आञ्चलिक काव्य । एक ओर व्याकरण के कठोर, शुष्क सिद्धान्तो की रसपेशल व्याख्या से सवलित भट्टिकाव्य तो दूसरी ओर भूपति-विशेष का प्रशस्ति-विलास-नवसाहसाङ्कचरितम् । माँ भारती का ऑगन इतना विशाल है और उसकी यशोगाथा इतनी सायाम है कि उसे सक्षिप्त करना असम्भव ही है । फिर भी भौतिक दृष्टि से हम यह कह सकते है कि सस्कृत काव्यवाड्मय रामायण से आज तक कई सहस्राब्दियो के युगक्षय का प्रतिफलन हे । इसी विशाल काव्याकाश का एक लघु किन्तु ज्योतिष्मान् नक्षत्र -भारवि । यह भूमिका छात्रो के लिये लिखी जा रही है अत समस्या- समावान शैली मे इसी सुकवि से सम्बद्ध कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे है । पहली समस्या---यह है कि सस्कृत काव्य का सामान्य स्वरूप क्या है और महाकवि भारवि का उसमे क्या स्थान है ? दशम शताब्दी ई० मे विद्यमान आचार्य अभिनवगुप्तपाद के काव्य गुरु आचार्य भट्टतौत ने अपने लक्षणग्रन्थ 'काव्यकौतुक' मे लिखा था-'तस्य कर्म स्मृत काव्यम्' । अर्थात् उस (कवि) के कर्म को ही काव्य कहते है । कवि उसे कहते है जो कवन ( वर्णन ) क्रिया करे-कवयति इति कवि । 'कवृ' धातु का प्रयोग वर्णन करने के अर्थ मे होता है। इस प्रकार व्युत्पत्ति की दृष्टि से कवृ धातु मे एक विशेष प्रत्यय जोड कर कवि शब्द बनता है जिसका सुस्पष्ट अर्थ यह है कि जो (निर्दोष रीति से गुणो, रसो तथा यथोचित अलङ्कारो से भी सवलित शब्दार्थसमष्टिमय) वर्णन करे । और काव्य क्या है ? वही कविकर्म अर्थात् ऐसा शब्दार्थसाहचर्य जो कि निर्दोष हो, गुणो से युक्त हो माथ ही साथ सालद्धार भी हो । आचार्य मम्मट कहते हैं-तत् (काव्यम्) अदोषौ शब्दार्थों सगुणौ अनलड्कृती पुन स्वापि । सस्कृत काव्यवाड्मय के मेरुदण्ड है कविकुलगुरु कालिदास । अतएव सौकर्य के लिए उन्हे ही केन्द्रविन्दु मानकर प्राय आलोचक-गण सस्कृत-काव्य के तीन ( ६ ) युगो की कल्पना करते है-पूर्व कालिदासयुग, कालिदासयुग और कालिदासोत्तर युग । कालिदास का समय ई० पू० प्रथमशती हे अतएव उनका पूर्ववर्ती युग स्थूलरूप से वाल्मीकीय रामायण से लेकर उनके उदयकाल तक है। यह युग कितने वर्षों का था, कुछ कहना सभव नही क्योकि रामायण का रचनाकाल आज भी एक अनवूझ पहेली ही बना हुआ है । फिर भी यदि भारतीय परम्परा का आश्रय ले तो महाभारत से भी पूर्व प्रणीत लोनिक सस्कृत का यह प्रथम महाकाव्य ई० पू० लगभग पाँच हजार वर्षों से पहले का ही होना चाहिए। इस युग की प्रमुख काव्यकृति गमायण है । यदि आज उपलब्ध होने वाले ग्रन्थो एव ग्रन्थकारो के उल्लेखो पर विश्वास करे तो हम महर्षि पाणिनि प्रणीत जाम्बवती विजय एव व्याडिकृत सग्रह ग्रन्थ (?) आदि को भी इसी युग की रचना स्वीकार कर सकते है । यह वह युग था जब कि हजारो वर्षों से अभि- व्यक्ति का साधन बनी रहने वाली वेदभाषा अपनी जटिलताओ के कारण प्रयोग से बहिष्कृत हो रही थी। आपिशलि काशकृत्स्न, स्फोटायन, शाकल्य, सेनक, शौनक, यास्क एव अन्यान्य प्राचीन आचार्य भाषा को एक सुस्थिर रूप देने के प्रयत्न मे जी जान से लगे थे। उनका यह प्रयत्न फलीभूत हुआ ई० पू० सातवी शती मे, जब कि महर्षि पाणिनि ने 'अष्टाध्यायी' का प्रणयन करके युगयुगान्तर के लिये भाषा का रूप निश्चित कर दिया । महर्षि पाणिनि ने प्रकृति-प्रत्यय सम्बन्धी सूक्ष्मातिसूक्ष्म असगतियो को भी एक सुस्थिर रूप प्रदान किया । तुमुन् र त्यय के अर्थ मे प्रयुक्त होने वाले लगभग चौदह प्रत्ययो को उन्हान अमात्न घोषित किया, षष्ठी एव चतुर्थी विभक्तियो के वैकल्पिक प्रय ग. पर उन्होंने रोक लगाई । एक ही अर्थ में प्रयुक्त क्त्वा तथा यक् (जैसे गत्वा-गन्वाय) प्रत्ययो मे से केवल एक 'क्त्वा' को उन्होने शुद्ध घोषित किया आदि आदि । महर्षि पाणिनि के इन्ही कठोर व्याकरण-नियमो मे मॅज कर अब भाषा निखर आई। उन्होने इसकी विसगतियो, विकल्पो एव दुरूहताओ का परिशोधन करके आमूलचूड सस्कार किया । फलत युग-युग से देववाणी, सुरभारती या वेदभाषा प्रभुति सज्ञाओ से मण्डित रहने वाली यह भाषा कालान्तर मे 'सस्कृत' कही गई। आचार्य दण्डी (सातवी शती) लिखते है-'सस्कृत नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभि ।' यद्यपि रामायण पाणिनि से पहले की काव्यकृति है परन्तु भाषा की दृष्टि से हम उसे पाणिनियुगीन ही मान सकते है । इसमे एक मोर तो हम वेदभाषा से पृथक् लौकिकसस्कृत का वर्धमान प्राञ्चल रूप पाते है ( ७ ) तो दूसरी ओर 'प्रवोधयित्वा' जैसे अपाणिनीय प्रयोग भी पा जाते है जिनसे स्पष्ट ध्वनित होता है कि रामायण के रचना-काल तक भाषा का स्प स्थिर नही हो सका था । वस्तुत वह दो भाषाओ के पतनोन्यान की सान्ध्य-बेला मे प्रणीत काव्य कृति है। पूर्वकालिदासयुगीन काव्यकृतियो का सर्वश्रेष्ठ वैशिष्ट्य यह है कि उनमे भावपक्ष का प्राधान्य है और भाषापक्ष या कलापक्ष की गौणता। कवि ने मानवीयभावो के सूक्ष्मातिसूक्ष्म चित्रण मे अपनी सारी रचनाचातुरी लगा दी है । इसका यह अर्थ नहीं कि इस युग के काव्यो के भाषा मे कोई कौशल नही । वस्तुत भाषा अत्यन्त सरल है उसमें कोई जटिलता नहीं। चित्रात्म- कता का नाम नहीं, वह अलङ्कार-भार से बोझिल नही । परन्तु भावो की तूलिका मे आबद्ध कल्पना के एक से एक रमणीय चित्र साकार हो उठे है। वर्षाकाल मे पर्तदार कृष्णमेघो की घटा वृक्षो के ऊपर इस प्रकार घिर आई है कि यदि कोई चाहे तो इन मेघसोपानो से बढता हुआ मूर्य को भी कुटज एव अर्जुन की मालाओ से अलकृत कर दे- शक्यमम्बरमारुह्य मेघसोपानपक्तिभिः। कुटजार्जुनमालाभिरलङ्कर्तु दिवाकरः ॥ -किष्किन्धाकाण्ड । पूर्वकालिदास युग की काव्यकृतियाँ प्राय मिलती नहीं है परन्तु प्रामाणिक साक्ष्यो से सिद्ध हो जाता है कि इस युग मे काव्यवाट्मय अत्यन्त समृद्ध था। रामायण के अतिरिक्त महाभारत एव अनेक पुराण इसी युग की कृति है । भले ही हम उन्हे काव्य के स्थान पर 'इतिहासपुराण' की सज्ञा दे परन्तु उनके पृथुलकलेवर मे इतस्तत बिखरे मनोहर काव्य रत्नो को नकारा नहीं जा सकता । पाणिनिप्रणीत जाम्बवतीविजय एव व्याडिप्रणीत सग्रह ग्रन्थ की चर्चा ऊपर की जा चुकी है । मौर्ययुगीन कवि एव वात्तिककार, वररुचि कात्यायन की रचनाओ का भी परिचय हम आचार्य पतञ्जलि एव राजशेखर से पाते है । पतञ्जलि 'वाररुच काव्यम्' का उल्लेख करते है जिसे कि राजशेखर ने 'कण्ठाभरण' नाम दिया है-'व्यवत्त कण्ठाभरण य सदारोहणप्रिय ।' वासवदत्ता, सुमनोत्तरा तथा भैमरथी नामक आख्यायिकाएँ, कसवव तथा बलि- बन्धन नामक नाटक साथ ही दृष्टान्त रूप मे समुद्धृत सैकडो पद्याश-महा- भाष्यकार पतजलि द्वारा उद्धृत ये सब के सब काव्य यह बताते है कि पर्वकालिदासयुग कितना समृद्ध और सशक्त था।
( ८ ) । कालिदास के अभ्युदयकाल से लेकर भारवि के पूर्व तक का समय सस्कृत- काव्य-वाड्मय का 'कालिदास-युग' है । यह युग भाव एव भाषा के समन्वय का है । व्यञ्जना शक्ति का अमोघ-आयुध लेकर 'कविकुलगुरु' कालिदास ने इस युग का नेतृत्व किया । भावपक्ष रामायण की ही भॉति समृद्ध रहा इस युग मे किन्तु भाषा मे अनेक चामत्कारिक परिवर्तन हो गये। वह अब एक अल्हड ग्राम्या किशोरी नहीं रह गई बल्कि कालिदास ने रसपेशल पदावली से, मञ्जुल पदशैय्या से तथा रमणीय अर्थालङ्कारो से अलकृत करके उसे एक नववधू का रूप दे दिया। कालिदास की अभिव्यक्ति-कला, उनकी उपमाएँ, उनकी सूक्ष्मातिसूक्ष्म कल्पनाएँ, चराचरैक्यभावनाएँ-सब ने एकबारगी उन्हे उस युग का पुरोधा कवि बना दिया। उनका अनुसरण किया अश्वघोष, मातृचेट, कुमारदास एव अनेक बौद्ध कवियो ने । परन्तु ईसा की छठी शताब्दी मे सस्कृत-काव्य मे एक उल्लेखनीय मोड आया जिसने इस समूची काव्यधारा को एक विपरीत दिशा मे मोड दिया । इस क्रान्ति का सूत्रपात किया महाकवि भारवि ने जिनका उदयकाल ५५० ई. के आसपास माना जाता है। भारवि ने भावपक्ष की अपेक्षा कला या भाषापक्ष को ही अधिक महत्त्व दिया । फलत सस्कृत कविता मे चित्रकाव्य का अवतार हुआ । कविता को अब रसानुभूति के लिये नही, चमत्कार मात्र पैग कर देने के लिये लिखा जाने लगा । कवियो मे एक होड सी मच गई अपना बुद्धिवैभव तथा प्रतिभाप्रकर्ष प्रदर्शित करने के लिये । मुरज, पणव कमल, नाग, डमरुक, खड्ग एव गोमूत्रिका जैसे बन्धो का तथा अनुलोम, एकाक्षर, एकस्वर, भापासम एव अन्यान्य काव्यप्रणयन शैलियो का विकास हुआ । आलोचको ने पूर्वकालिदास एव कालिदास युग की कविता को 'सुकुमार- शैली' की सज्ञा दी थी और अब इस कविता को 'अलङ्कारशैली' कहा गया। महाकवि भारवि, माघ, भट्टि तथा आनदवर्धन आदि इसी शैली के कवि हे । यह काव्यधारा संस्कृत काव्यवाड्मय मे कई शतको तक रही । अनेक विस्मयो- पपादक, गणित के समान नीरस किन्तु आश्चर्यचकित कर देने वाली काव्य- कृतियाँ इस युग मे प्रणीत हुई। परन्तु १२वी शती ई० के आसपास जनता पुन कालिदास के लिये लालायित हो उठी और एक बार फिर रसगर्भनिभर, सरल-सुमधुर काव्यसृष्टि होने लगी। मखक, विल्हण, श्रीहर्ष एव पण्डितराज जगन्नाथ आदि इसी युग का प्रतिनिधित्व करते है । आचार्य मखक का व्यक्तित्व . , ( १ ) - दुहरा था-आचार्य भी थे, कवि भी थे । उन्हे कालिदास के प्रति बडी आस्था थी, बडा ममत्व था । फलत उन्होने काव्यरसिको को खु नआम प्रेरणा दी कि वे अलकारशैली का बहिष्कार करे क्योकि यह कविता लोकानुरञ्जन के लिय नही, केवन आत्मप्रकर्ष-प्रख्यापन क लिये थी। उन्ही के एक सन्दश में इस समस्या की समाप्ति की जा रही है। यातास्ते रससारसग्रहविधि निष्पोड्य निष्पीड्य ये वाक्तत्त्वेक्ष लता पुरा कतिपये तत्त्वस्पृशश्चक्रिरे। जायन्तेऽद्य यथायथं तु कवय. ये ह्यत्र सन्तन्वते येऽनुप्रासकठोरचित्रयमकश्लेषादिशल्कोच्चयम् ॥ दूसरी समस्या यह है कि महाकवि भारवि कौन थे, कहाँ थे, कब थे ? उनकी उपलब्धियाँ क्या है ? भारवि की अमरकीर्ति का साक्षी उनका एकमात्र महाकाव्य 'किरातार्जुनीयम्' है जिसमे कि उन्होने अपने विषय मे एक शब्द भी नहीं लिखा है। फिर भी कुछ बहिरग साक्ष्यो के आधार पर हम उनक जीवनकाल, जन्मस्थान, जाति, धर्म एव अन्यान्य वैशिष्ट्यो के विषय म कुछ जानकारी प्राप्त कर सकते है । वे प्रमाण इस प्रकार है- १ आटाव्यायी के एक मूत्र 'प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च' (१।३।२३) की व्याख्या करते हुये 'काशिका' नामक वृत्ति के लेखक आचार्य जयादित्य ने उदाहरण के रूप मे किरातार्जुनीय के एक पद्याश को उद्धृत किया है- किया है-सशस्य कर्णादिषु तिष्ठते य (किरात ३।१४) काशिकावृत्ति का रचनाकाल, चीनी यात्री इत्सिग के (जो सन् ६७३ ई० मे भारत-यात्रा पर आया था) विवरण के आधार पर ६६० ई० के आसपास स्वीकार किया जाता है। जयादित्य जेस महान् वैयाकरण द्वारा किरात के पद्य का उदाहृत किया जाना यह सिद्ध कर देता है कि निश्चय ही तब तक भारवि एक सम्मान्य महाकवि का यश प्राप्त कर चुके रहे होगे । यदि इस प्रसिद्धि-अवधि को सौ वर्ष का समय दे दिया जाय तो भारवि का अभ्युदयकाल ५६० ई० के आसपास सिद्ध होता है । २ दक्षिणापथ-नरेश पुलकेशिन् द्वितीय के प्रशस्तिलेख मे भारवि का सुस्पष्ट नामोल्लेख है । यह शिलालेख बीजापुर जिले के ऐहोल (ऐहोड या आयहोल) ग्राम के एक जैनमन्दिर मे प्राप्त हुआ है। इस लेख का समय ५५६ ( १० ) मकाब्द (अर्थात् ६३४ ई० है ।' प्रशस्तिलेखक रविकीर्ति नामक किसी कवि - काव्यप्रणयन म अपने को कालिदास तथा भारवि की ही भॉति यशस्वी बनाया है- येलायोजिन देश्म स्थिरमादेधौ विवेधिना जिनवेरम। मनिज रविकीति कविताश्रित कालिदासभारविधीति. ३ इम उत्लख से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारवि के जीवनकाल की निम्न- तम सीमा मन् ६३४ ई० है । यदि भारवि का उदयकाल इस प्रशस्तिलेख से मो वर्ष पूर्व मान लिया जाय, जो कि अनुचित नही, तो उनका समय सन् १३४ ई० के समीप सिद्ध होता है। दक्षिण भारत में विद्यमान गृम्मरेड्डीपुर नामक स्थान से प्राप्त एक पत्रलेख के प्रामाण्यानुसार महाराज दुर्विनीत ने किरातार्जुनीय के पन्द्रवे सर्ग की टीका लिखी थी। दुविनीत कोङ्कणनरेश अविनीत का पुत्र, काञ्ची के पल्लववशी नरेश सिहविष्णु का समकालीन था । त्रिचनापल्ली से कुछ दूर 'उण्याकौण्डनतिरुमलाइ' नामक स्थान पर चोलनरेश परान्तक प्रथम का एक स्तम्भलेख भी मिला है जिसम कि अनक गगवशी भूपतियो के साथ दुविनीत का नामोल्लेख किया गया है । 3 गगवशी दुविनीति अपने नामार्थ से सर्वथा भिन्न अत्यन्त विनयी एव विद्वान् नरेश था । उसने वृहत्कथा का मस्कृत रूपान्तर 'शब्दावतार' नाम से किया था ओर किरात के उस सर्ग (१५ वॉ) पर सस्कृत- टीका प्रणीत की थी जो कि पूरे महाकाव्य मे सर्वाधिक क्लिष्ट, चित्रकाव्यो का अश है। दुविनीत का समय आधुनिक इतिहासकार ५८० ई. के आस- पञ्चाशत्सु कलौ काले षट्सु पञ्चशतासु च । समासु समतीतासु शकानामपि श्रीमत्कोकणमहाराजाधिराजस्य अविनीतनाम्न पुत्रेण शव्दावतार- कारेण देवभारतीनिवद्ध-वृहत्कथेन किरातार्जुनीयपञ्चदशसर्गटीकाकारेण दुविनीतनामधेयेन । (आर्कियोलाजिकल रिपोर्ट, कृष्णामाचारियर सन् १९१६ ई०)। ३ 'आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया'-'साउथ इण्डियन इन्स्क्रि- प्शन्स' ग्रन्थ दो, भाग तीन । पृ. ३८७ । भूभुजाम् ॥ -- क ( ११ ) पास स्वीकार करते है अतएव भारवि का उदयकाल इससे पूर्व ही होना चाहिए। ४ महाकवि दण्डी विरचित 'अवन्तिमन्दरीक्था' और उसी के आधार पर प्रणीत श्लोकमय 'अवन्तिसुन्दरीकथासार में भी भारवि के जीवनकाल पर प्रभूत प्रकाश पडता है । इस कया मे भारविवि यक जो सूचनाए प्राप्त होती है उनमे यह मुम्पप्ट हो जाता है कि भारवि चालुक्यवगीय सन्ना- विणुवर्धन के राजकवि थे । विष्णुवर्धन ऐतिहासिक प्रमाणो के आकर पर पुलकेशिन् द्वितीय का अनृज और उसी के द्वारा नियुक्त 'युवराज' भी या । सेन्यसञ्चााक के रुप मे इसी विष्णुवर्धन ने पल्लवो को तथा कान्यकुब्जनरेश हर्पवर्वन को पराजित किया । गोदावरी नदी के किनारे 'पिष्टपुरम्' नगरी को गजवानी बनाकर वह अपने भाई के सरक्षण में एक प्रदेश का शासन भी करता था। कालान्तर मे उसने अपने को स्वतन्त्र घोषित करके सन ६१५ ई० म पूर्व चालुक् यवश की सस्थापना की।' इस प्रकार भारवि विष्णुवर्वन के समकालिक सिद्ध होते है। इसी 'अवन्तिसुन्दरीकया' से भारवि के विपय मे कुछ और प्रामाणिक सूचनाए उपलब्ध होती है। कथा मे उल्लिखित प्रामाण्यानुसार काञ्ची का पल्लवनरेश मिहविष्णु अत्यन्त प्रतापशाली था । किसी दिन अपनी प्रशस्ति मे पढी गयी एक आर्या को सुन कर जब उसने गायक गवर्व से उसके रचयिता का परिचय पूछा तब गन्धर्व ने सविस्तर वर्णन किया---'दव परमनुग्रहीतोऽस्मि क्षणमवधानादतुगहींततम णवास ततो हि निस्सृता सर वनीव ब्रह्म- लोकादगस्त्यमूर्तिरिव गीतोद्गीर्णम रचलस्य कृतनिवेशितमवलपुर नाम गवप्रोदक्पुष्पवासितकलकाननायासि सम्भृततिरविवसति कुशिकवशवधिनी सर्वातिथिरप्रतिगहीत्री महत्यु · (ना) रायणस्वामिनो नाभीपद्म इव ब्रह्मक- धाम दामोदरस्वामिनामात्त मेत (?) सर्वाङ्गमनोहरया सवज्ञया विदग्वया सर्वभापाप्रवीणया प्रमाणयुक्तया ललितपदविन्यास स्नेहमस्वज्यत । को हि नाम भगवतीभवितव्यतामतिक्रम्य यथासमीहितेन सावयति पया (?) यत कौशि (बी) व पुण्यकर्मणि विष्णुवर्द्धनाख्ये राजसूनौ प्रणयमन्वब-नात । एकदा च मृगर्या गच्छतामुना नीत यात्राप्रसङ्गण दिनान्तराणि भ्रमण- 'हिस्ट्री आफ क्लै सिकल सस्कृत लिटरेचर' - एम्० कृष्णमाचारियर पृ० १४७ । १ ( १२ ) शीलकीर्तेर्गाङ्ग यकुलध्वजस्य दुविनीत इति विपरीतनाम्न वदनादिसौजन्य दर्शयता वगीकृततदभ्यामे वसत्यार्ययमिय च व सौ विगतिवर्षदेशीय ।" इस वर्णन का सक्षिप्त आशय यह है कि-'पश्चिमोत्तर प्रदेश मे आनन्दपुर नामक स्थान मे कौशिक गोत्रोत्पन्न एक शिखारत्न ब्राह्मण परिवार रहता था जो कि कालान्तर मे नासिक्यप्रदेश स्थित अचलपुर मे आकर रहने लगा। इसी परिवार मे नारायण नामक एक महापुरुष से दामोदर उत्पन्न हुए । अत्यन्त मेधावी, विद्धान्, वाणीनिपुण इन्ही कवि भारवि (दामोदर) ने अनुरोध सहित चालुक्यनरेश विष्णुवर्धन से मित्रता की' । एक दिन मृगयाप्रसग मे राजा के साथ वनप्रान्त मे जाकर क्षुधाविष्ट होकर भारवि-दामोदर ने अभोज्य मासभक्षण कर लिया और बाद मे इस पाप से त्राण पाने के लिये तीर्थयात्रा पर निकल पडे । मार्ग मे उनकी भेट असार्थक नाम वाले (गगवशी राजपुत्र) दुविनीत से हुई । उसी दुविनीत से भारवि ने यह आर्या कही ।' पल्लवनरेश सिंहविष्णु ने यह परिचय पाकर महाकवि भारवि को अपने दरबार मे बुलवाया और कवि का भरपूर सम्मान किया । इस प्रकार भारवि काञ्चीनगरी मे पल्लवनरेश सिंहविष्णु (५.५-६०० ई.) तथा बाद मे उसके पत्र महेन्द्रविक्रम के साथ सुखपूर्वक रहने लगे । “सिहविष्णु से मिलते समय कवि की अवस्था केवल बीस वर्ष की थी' ऐमा कथा का प्रामाण्य है। ऐतिहासिक साक्ष्यो के आधार पर सिंहविष्णु का शासनकाल ५७५ से ६०० ई० तक माना जाता है । उसने मलय, पाण्ड्य तथा चोलनरेशो को पराजित करके काबेरी नदी के समीपवर्ती प्रदेशो पर अधिकार कर लिया था। सिंहविष्णु के पुत्र महेन्द्रवर्मन् या 'महेन्द्रविक्रम' ने (६००-६२५ ई०) 'शत्रुमल्ल' तथा 'अवनी' भाजन' उपाधियाँ धारण की । पिता की ही भॉति महेन्द्र भी सँस्कृत-भाषा का परमोपासक था। उसमे काव्यप्रतिभा भी थी जिसका कि प्रमाण हम उसकी कृति 'मत्तविलासप्रहसन' से प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सिहविष्णु तथा महेन्द्रविक्रम के प्रीतिभाजन भारवि का समय छठी शती के उत्तरार्ध एव सातवी के पूर्वार्ध मे सिद्ध होता है । or वाभवत् ॥ दामोदर इति श्रीमानादि स मेधावी कविविद्वान् भारवि प्रभवो गिराम् ।। अनुरुध्याकरोन्मैत्री नरेन्द्र विष्णवर्धने ।। अवन्तिसुन्दरीकथासार ।
( १३ ) , इस सन्दर्भ में एक तथ्य का उल्लेख कर देना आवश्यक है । वह यह कि 'अवन्तिसुन्दरीकथा' के जिस अश मे भारवि-दामोदर एव चालुक्यनरेश विष्णु- वर्धन की मैत्री का साक्ष्य मिलता है, वह अश विवादास्पद है । ग्रन्य के सम्पादक श्री रामकृष्ण कवि 'यत कौशिक व पुण्यकर्मणि विष्णुवर्ध- नाख्ये राजसूनौ प्रणयमन्वबध्नात्' इस अश को उद्धृत करके 'भारवि' को दामोदर का विशेषण मानते है फलत उनके मन्तव्यानुसार 'भारवि दामोदर कवि की पदवी थी। भारवि के पुत्र थे मनोरथ । मनोरथ के चतुर्थपुत्र वीरदत्त तथा उनकी पत्नी गौरी से ही दण्डी पैदा हुए । यही दण्डी अवन्तिसुन्दरीकथा, काव्यादर्श एव दशकुमारचरितम् के प्रणेता है । परन्तु जी० हरिहर शास्त्री ने, सस्कृत-पाण्डुलिपिप्रकाशन विभाग, त्रिवेन्द्रम् से प्राप्त उक्त ग्रन्थ की एक अन्य पाण्डुलिपि के आधार पर उपर्युक्त वाक्य को इस प्रकार पढा है-'यत कौशिककुमारो (दामोदरो) महाशैव महाप्रभाव प्रदीप्तभास भारवि रविमिवेन्दु अनुरुध्य दर्श इव पुण्यकर्मणि विष्णुवर्वनाख्ये राजसूनौ प्रणयमन्वबध्नात् ।' वस्तुत इस पाठ से श्री रामकृष्णकवि की मान्यता पूर्णत विनष्ट हो जाती है क्योकि शास्त्री जी ने जो पाठ निश्चित किया है उससे यह सिद्ध होता है कि भारवि एव दामोदर दो पृथक व्यक्ति थे । भारवि का सम्बन्ध राजा विष्णुवर्वन से पहले भी था। हॉ, दामोदर ने अवश्य ही भारवि की कृपा से महाराज विष्णुवर्धन के दरबार में प्रवेश प्राप्त किया। जो भी हो, चाहे भारवि तथा दामोदर एक हो (जैसा कि अवन्तिसुन्दरीकथा एव कथासार-गत श्लोक से सिद्ध होता है) १ चाहे दोनो परस्पर मित्र रहे हो-इतना तो निश्चित ही है कि भारवि का सम्बन्ध चालुक्यनरेश विष्णुवर्धन से (६१५ ई०) पल्लवनरेश सिंहविष्णु से (५७५ से ६०० ई०) तथा कोकण के गगवशी नरेश दुविनीत (५८० ई० के आसपास) से अवश्य था । भारवि की प्रतिभा एव उनके महाकाव्य 'किरातर्जुनीयम्' का वैशिष्ट्रय देख कर ही विद्वान् नरेश दुविनीत ने किरात के १५ वे सर्ग की सस्कृतटीका लिखी थी। इन तीनो भूपतियो का एक साथ आकलन करने पर यह कहा जा सकता है कि यथावसर इनकी १. अवन्तिसुन्दरीकथा, पृ० ६-७ (दक्षिणभारतीय ग्रन्थमाला-३) तथा अवन्तिसुन्दरीकथासार, श्लोक-१९-२६ तक ।
( १४ ) छत्रन्द्राया मे जीवनयापन करने वाले महाकवि भारवि का समय छठी शती के उत्तराध से सातवी शती ई० के पूर्वाध तक रहा होगा । यद्यपि उपर्युक्त साक्ष्यो के बाद अब अन्य किसी बहिरग साक्ष्य की अपेक्षा नही है, फिर भी एकाच उल्लेखनीय बाते रह जाती है। प्राय समस्त पाश्चात्य एव पौरस्त्य विद्वान् यह तथ्य स्वीकार करते है कि भारवि पर कालिदास का और माघ पर भारवि का सुम्पष्ट प्रभाव है । दूसरी बात यह कि बाणभट्ट कादम्बरी की पुष्पिका मे जहाँ अपने अनेक पूर्ववर्ती भवियो का उल्लेख करते है वही भारवि के विषय मे मौन है । लगता है कि या तो भारवि वाणभट्ट के बीच दस-बीस वर्ष का ही अन्तर रहा होगा अथवा बाणभट्ट के समय तक भारवि की ख्याति ही अपनी पराकाष्ठा पर न पहुच सकी होगी । अस्तु, बाण का समय स्पष्टत हर्ष का शासनकात (६००-८४८ ई०) हे अत भारवि का ममय छठी शती का पूर्बाध ही होना सम्भव एव समुचित है। (क) इन समस्त बहिरङ्ग प्रमाणो का निर्गलितार्थ यह है कि महाकवि भारवि का जन्म नासिक के समीपवर्ती अचलपुर ग्राम मे हुआ। उनके पिता का नाम नारायणस्वामी था। उनका अपना मूलनाम दामोदर था। बीस वर्ष की नवीन अवस्था मे ही उन्हे काञ्चीनरेश सिंहविष्णु (५७५-६०० ई०) से राजकीय-सम्मान मिला । अत निश्चय ही कवि की जन्मतिथि छठी शती ई० के उत्तरार्ध मे होगी। चालुक्यनरेश विष्णुवर्धन जब युवक थे तभी भारवि के आश्रयदाता बने । चूँकि विष्णुवर्धन की स्वतत्र राजवश-सस्थापन तिथि सन् ६१५ ई० है अत सिद्ध है कि भारवि सातवी शती के पूर्वार्ध मे विकासपथ पर थे । यही भारवि महाकवि दण्डी के प्रपितामह और किरातार्जुनीयम् महा काव्य के प्रणेता हैं। किन्तु यदि दामोदर एव भारवि एक ही व्यक्ति के दो नाम न हो तो? तो भी कोई विशेष अन्तर नही, हानि केवल दामोदर की है। हा, तब महाकवि भारवि के परिचय मे परिवारविषयक थोडा परिवर्तन हो जायेगा। वह यह कि-भारवि विष्णुवर्धन, सिहविष्णु, महेन्द्रविक्रम एव दुविनीत के आश्रय मे रहने वाले एक दाक्षिणात्य कवि थे। उनके परमप्रिय मित्र का नाम था 'दामोदर' जो कि दण्डी के प्रपितामह ये। भारवि का दाक्षिणात्य होना कई तथ्यो से सिद्ध हो जाता है-(क) किरात के एक लोक मे (१८।३) किरात- ( १५ ) वेषधारी शकर एव अर्जुन के युद्ध-प्रसङ्ग मे कवि ने 'सह्यपर्वत से सागरतरगो के टकराने' का औपम्य प्रस्तुत किया है- उरसि शूलभृतः प्रहिता मुहुः प्रतिति ययुरर्जुनमुष्टयः । भृशरया इव सह्यमहीभृतः पृथुनि रोधसि सिन्धुमहोर्नयः ॥ इस रमणीय औपम्य की अनुभूति प्रत्यक्षदर्शी व्यक्ति ही कर सकता है अतएव प्रो० आर० अर० भागवत का मन्तव्य है कि भारवि अवश्य ही पश्चिमी सागरतट के निवासी थे। (ख) गिथिावमुमगावे मग्नपत्पयोवौ' (किरात ११४८) 'तत्त्रियायमिव यानुमथास्त भागमानुपपयोधि ललावे' (किरात ।।२ ) तथा 'सामि मज्जति रवौ न विरेजे (किरात ६।५) आदि समस्त र्यास्तवर्णनो मे कवि सूर्य का तिरोधान सागर मे ही दखता है जत्र कि कालिदास आदि उसे अस्ताचल पर तिरोहित होता हुआ देखते है। इन साक्ष्यो से भी भारवि का दाक्षिणात्य होना सिद्ध होता है (ग) भारविकृत हिमालय-वर्णन भी उत्तरी-भारत, विशेष करके हिमगिरि के प्रति उनकी अल्पज्ञता अथवा पूर्ण-अज्ञता का ही द्योतक है । अर्जुन की इन्द्रकीलशिखर यात्रा मे वैसा कुछ भी तत्त्व नहीं है जैसा कि मेघ की अलकापुरी यात्रा मे । भारवि मार्ग में पड़ने वाले भौगोलिक स्थानो का सविस्तर उल्लेख तक नही कर सके है । निश्चय ही उत्तरापथ से उनका कुछ विशेष परिचय नहीं था। भारवि के विषय मे अन्य ज्ञातव्य तथ्य उनके धर्म एव व्यक्तित्व से सम्बद्ध है । बहिरग प्रमाणो एव किरातार्जुनीय मे प्राप्त व्यक्तिगत अभिरुचि को सकेतित करने वाले पद्यो के आधार पर यह कहा जा सकता है कि महाकवि भारवि का व्यक्तित्व बहुमुखी था। उन्होने काव्य, व्याकरण, नीति, काम, छन्दोऽलङ्कार एव अन्यान्य स्वयुगीन प्रचलित विद्याओ का भी पूर्ण अनुशीलन किया था। यात्येकतोऽस्तशिखर पतिरोषधीनाम् आदि । शाकुन्तलम् ४।२ तथा यातोऽस्मि पद्मनयने समयो ममैष सुप्ता मयैव भवती प्रतिबोधनीया। प्रत्यायनामयमितीव सरोरुहिण्या सूर्योऽस्तमस्तकनिविष्टकर करोति।। रत्नावली ३१६ १ ( १६ ) निरन्तर राजाओ के साहचर्य मे रहने के कारण भारवि राजनीति के उद्भट पण्डित हो गए थे । किरात का दूसरा सगं उनकी नयज्ञता का परिचायक है। गजगेखर के प्रमाण्यानुसार तो कालिदास एव भर्तृमेण्ठ की भॉति भारवि क भी परीक्षा उज्जयिनी मे ली गई थी। प्रमाण इस प्रकार है--- 'श्रूयते चोज्ज- यिन्या काव्यकारपरीक्षा- इह कालिदासमेण्ठावनामररूपसूरभारवयः । हरिश्चन्द्रचन्द्रगुप्तौ परीक्षिताविह विशालायाम् ॥ - तत्कालीन रसिक-समुदाय ने महाकवि भारवि को अत्यन्त सम्मान दिया था। उन्हे 'आतपत्रभारवि' की उपाधि भी मिली थी। जिस पद्य के कारण कवि को यह प्रतिष्ठा मिली थी वह किरात के पचमसर्ग मे इस प्रकार है- उत्फुल्ल्लस्थलनलिनीवनादमुष्मादुद्भूतः सरसिजसम्भवः परागः । वात्याभिवियति विजितः समन्तादाधत्ते कनकमयातपत्रलक्ष्मीम् ॥५॥३६ 'पृष्पित कमलिनियो के वनप्रान्त से उत्पन्न कमलपुष्पचूर्ण आकाश मे चारो ओर वातचक्र से आन्दोलित होकर इस प्रकार सुशोभित हो रहा है मानो कन्कछत्र तन उठा है ।' कितनी अनूठी कल्पना है कवि की। इससे कवि की कल्पनाशक्ति के साथ-साथ उसकी सौन्दर्यात्मक अनुभूति का भी हमे ज्ञान होता है। भारवि परमर्शव थे । यह तथ्य उनके कथानकचयन से ही सिद्ध हो जाता है । ग्रन्थ के १८ वे सर्ग मे कवि ने अर्जुन के मुख से भगवान् पशुपति की जो भावभीनी स्तुति कराई है वह उनकी वैयक्तिक शिवभक्ति का ही स्वर है । कवि की एकमात्र उपलब्धि उसका महाकाव्य 'किरातार्जुनीयम्' है जिसकी गणना 'वृहत्त्रयी' काव्यो मे किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम् तथा नैषधीयचरितम्) की जाती है । इसमे कुल १८ सर्ग तथा १०४० श्लोक है । तीसरी समस्या यह है कि महाकाव्य है क्या ? और एक महाकाव्य के रूप मे किरात के क्या वैशिष्ट्य है ? इस प्रसग मे अत्यन्त सक्षेप मे कुछ तथ्यो पर प्रकाश डाला जा रहा है। वस्तुत जिस काव्य की चर्चा ‘पहलीसमस्या' शीर्षक मे की गई है वही काव्य 'इन्द्रियमध्यस्थता' की दृष्टि से दो प्रकारका ?
. ( १७ ) हो जाता है-दृश्य, जिसमे अभिनेय रूपक-वाड्मय आता है और श्रव्य, जिसमे मुक्तक एव प्रबन्ध रचनाएँ आती है। प्रबन्धकाव्य का ही सर्वोत्तम निदर्शन 'महाकाव्य' है । आचार्य भामह, आचार्य दण्डी एव आचार्य रुद्रट आदि ने क्रमश पाँचवी, सातवी तथा दसवी शती ई० मे महाकाव्य के लक्षणो को प्रस्तुत किया है, युगानुरोधवश उनमे परिमार्जन एव परिवर्धन भी किया है किन्तु इस सन्दर्भ मे, महाकाव्य का स्वरूप जानन के लिए सर्वाधिक सरल और सुन्दर परिभाषा १४ वी शती ई० मे उत्पन्न आचार्य विश्वनाय ने अपने लअण-ग्रन्थ साहित्यदर्पण मे दी है । उनके कथनानुसार-- महाकाव्य एक मर्गबद्ध प्रबन्ध- काव्य है जिसमे कि कोई देवता अथवा सद्वश मे उत्पन्न वीरोदात्त गुणो से अन्वित एक या अनेक नरेश नायक होते है । महाकाव्य का प्रारम्भ इष्ट-देवता के प्रति नमस्क्रिया, आशीर्वाद अयवा वस्तुनिर्देश से होता है। शृङ्गार, वीर एव शान्त मे से कोई एक रस अगी होता है, शेप अन्यान्य रम अङ्गभूत होते है। समस्त नाटकसन्धियाँ इसमे होती है । न बहुत छोटे और न बहुत बडे, ऐसे आठ से अधिक सर्ग होते हे । प्रत्येक सर्ग मे एक ही प्रकार के छन्द होते है, हाँ सर्ग के अन्त मे छन्द परिवर्तन हो जाता है । कभी-अभी एक ही सर्ग मे अनेक छन्द भी होते है । सर्ग के अन्त मे भावी-मर्ग की कथा सूचित कर दी जाती है। महाकाव्य मे यथावसर नगर, सागर, पर्वत, षड् ऋतु, चन्द्रसूर्योदयास्त, वनोपवन, जलविहार, सन्च्या, प्रात , रजनी, मधुपान, रतोत्सव, सयोग, वियोग विवाह, कुमारजन्म, रणप्रयाण, विजय एव अभ्युदयादि का निबन्धन होना चाहिये । पुरुषार्थचतुष्टय (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) मे से कोई एक महाकाव्य का फल होता है । इस प्रकार के सल्लक्षणो से अलकृत महाकाव्य किसी महापुरुष के जीवन का व्यापकचित्र प्रस्तुत करता है । - , १ सुर । सर्गबन्धो महाकाव्य तत्रैको नायक सद्वश क्षत्रियो वापि धीरोदात्तगुणान्वित । एकवशभवा भूपा कुलजा बहवोऽपि वा। शृङ्गारवीर शान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥ अङ्गानि सर्वेऽपि रसा सर्वे नाटकसन्धय । इतिहासोद्भव वृत्तमन्यद्वा सज्जनश्रियम् ।। चत्वारस्तस्य वर्गा स्युस्तेष्वेक च फल भवेत् । फा०२ ( १८ ) किरातार्जुनीय एक ऐसा ही महाकाव्य है जिसमे साहित्यदर्पणकार द्वारा बताये गये प्राय समस्न लक्षण घटित हो जाते हैं । प्रस्तुत सन्दर्भ मे केवल एक-एक अनुच्छेद मे किरात के नामकरण, कलेवर, कथावस्तु, नेतृनिर्णय, छन्दोयोजना, रसपरिपाक एव अन्याय काव्यात्मक वैशिष्ट्यो पर प्रकाश डाला जा रहा है। १ नामकरण-प्राय महाकाव्यो के नाम उनके नायक के नाम पर (जेसे रघुवशम्) कथानक के नाम पर (जैसे कुमारसम्भवम्) अथवा अपने रचयिता के नाम पर (जैसे भट्टिकाव्यम्) होते है ।' महाकवि भारवि ने अपने महाकाव्य का नाम 'किरातार्जुनीयम्' रखा है जो कि कथानामक अर्जुन से सम्बद्ध है। वस्तुत इस महाकाव्य के समस्त कथानक का केन्द्र है--'अर्जुन द्वारा किरात- वेषधारी भगवान् शङ्कर से पाशुपतास्त्र की प्राप्ति' । इस प्रकार किरात (शिव) तथा मध्यमपाण्डव वीर अर्जुन के सुचरित से सम्बन्ध यह ग्रन्थ किरातार्जुनीयम् है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार होगी-'किरातश्च अर्जुनश्च इति किरातार्जुनौ द्वन्द्वसमास ) तौ अधिकृत्य कृत काव्यम इति किरातार्जुनीयम् (किरातार्जुन+छ प्रत्यय) महर्षि पाणिनि के मतानुसार शिशुक्रन्द यमसभ, पृ० १७ का शेष ॥ आदौ नमस्क्रियाशीर्वां वस्तुनिर्देशएव वा ।। क्वचिन्निन्दा खलादीना सताञ्च गुणकीर्तनम् । एकवृत्तमय पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकै ।। नातिस्वल्पा नातिदीर्घा सर्गा अष्टाधिका इह । नानावृत्तमय क्वापि सर्ग कश्चन दृश्यते ।। सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथाया सूचन भवेत् । सन्ध्यासूर्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासरा प्रातर्मव्याह नमृगयाशैलतुवनसागरा सम्भोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वरा रणप्रयाणोपयममन्त्रपुत्रोदयादय वर्णनीया यथायोग साङ्गोपाङ्गा अमी इह ॥ कवेवृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा। नामास्य सर्गोपादेयकथया सर्गनाम १ कवेर्वृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा नामास्य-साहित्यदर्पण ! - ॥
( १६ ) द्वन्द्वसमास तथा इन्द्रजनन आदि शब्दो से छ प्रत्यय होता है यदि उनके सम्बन्ध मे प्रणीत किसी अन्य की सज्ञा बनानी हो तो।' प्रस्तुत सदर्भ मे किरातार्जुन (जिसमे कि द्वन्द्व-समाम है) से सम्बद्ध एक काव्य का नामकरण करना या अत छ प्रत्यय को ईय आदेश हो जाने के कारण किरातार्जुनीयम् शब्द बनता है। ग्रन्थवाची शब्द सदैव नपुसकलिग मे प्रयुक्त होते है । २ क्लेवर- -सस्कृत काव्यवाड्मय मे कुछ उत्कृष्ट रचनाओ का बहुत आदर है । आलोचको ने उन्हे दो वर्गों मे विभक्त कर रखा है-वृहत्त्रयी और लघुत्रयी । वृहत्त्रयी मे वे तीन उत्कृष्ट काव्यकृतियाँ है जो पृथुलकलेबर है-भारविप्रणीत किरातार्जुनीयम्, माघप्रणीत शिशुपालवधम् और श्रीहर्षप्रणीत नैषधीयचस्तिम् । इसी प्रकार लघुत्रयी मे कविकुलगुरु कालिदास के तीन ग्रन्थो की गणना की जाती है जो अपेक्षाकृत छोटे किन्तु अत्यन्त सम्मानार्ह हैं-रघुवशम, कुमारसम्भवम् तथा मेघदूतम् । इस प्रकार हम देखते है कि किरात बृहत् कलेवर वाला एक महत्त्वपूर्ण काव्य है । इसमे कुल १०४० श्लोक हैं तथा १८ सर्ग है। ३ कथावस्तु -भारवि ने किरात का कथानक मूलत महाभारत के वनपर्व से लिया है । परन्तु कथा का विकास कवि ने अपनी प्रतिभा से किया है फलत किरात की सुमधुर काव्यात्मकता महाभारत के केवल वर्णनप्राण कथानक मे नही प्राप्त होती। पाण्डवाग्रज महाराज युधिष्ठिर बारह वर्ष के अरण्यवास की बाजी लगा कर कौरवो से जुआ खेलते है और पराजय पाकर अपने अनुजो तथा प्रियतमा द्रौपदी के साथ 'द्वैतवन' मे रहने लगते है । वन मे उन्हे अपने शुभैषी महर्षि वेदव्यास के दर्शन होते है जिनसे भावी कौरवपाण्डव- युद्ध की अवश्यम्भाविता जानकर, साथ ही साथ आत्मोद्योग के लिए प्रेरणा भी पाकर वीर धनुर्धर अर्जुन पाशुपत अस्त्र प्राप्त करने के लिये भगवान् शङ्कर के प्रसादनार्थ इन्द्रकील पर्वत की यात्रा करते है । अर्जुन की सच्ची लगन एव कठोर तपश्चर्या से पिनाकी प्रसन्न हो जाते है और किरात का वेष धारण करके, एक वनशूकर के लिए अर्जुन से युद्ध छेड देते है। भयङ्कर सग्राम होता है और अन्तत पार्थ के प्रचण्डपराक्रम से अभिभूत शङ्कर अपने सहज रूप मे प्रकट हो जाते है । अर्जुन को अमोघ पाशुपत अस्त्रो की प्राप्ति हो जाती है। १ शिशुक्रन्दयमसभद्वन्द्वन्द्रजननादिभ्यश्च ।४।३।८८ २. आयनेयीनीयिय, फढखछघाना प्रत्ययादीनाम् ।७।१।२ - १ ( २० ) प्रस्थान । . यही किरातार्जुनीयम् का मक्षिप्त कथानक है। यदि मर्गानुमारी व्याख्या की जाय तो इस महाकाव्य का यह स्वरूप होता है-१ वनेचर द्वारा सुयोधन की राज्यव्यवस्था का युधिष्ठिर के प्रति ज्ञापन तथा द्रौपदी का अमर्ष । २ युद्ध के लिए भीमसेन का उत्साह, कोरवो के प्रति क्रोव । युधिष्ठिर द्वारा क्रोधशमनोपाय तथा महर्षि व्यास का आगमन । ३ पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिये व्यास द्वारा अर्जुन को प्रेरणा । अर्जुन का इन्द्रकील-शिखर की ओर ४ शरवर्णन । ५ हिमगिरि-वर्णन । ६ से ११ तक युवति- प्रस्थान, स्नानक्रीडा, सन्च्या, सूर्यास्तगमन, चन्द्रोदय, सुराङ्गनाविहार एव सुर-सुन्दरी-सम्भोग आदि । १२ मे १८ तक-शिवोपासना के लिए इन्द्र द्वारा अर्जुन को उत्साहदान, अर्जुन की कठोर तपश्चर्या, स्कन्दसेना से युद्ध, शङ्कर से युद्ध तथा पाशुपतास्त्र की प्राप्ति । स्पष्ट है कि कवि ने मूल-कया मे मनोनुकूल परिवर्तन किया है । महाभारत मे यह कथा वन पर्व मे वर्णित है। इस कथा को ध्यान में रखते हुए महाकवि भारविकल्पित कथा मे कुछ विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होते है- क-महाभारत कथा मे महर्षि व्यास युधिष्ठिर को और युधिष्ठिर अर्जुन को पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिए प्रेरणा देते है परन्तु किरात मे महर्षि व्यास स्वयमेव अर्जुन को मन्त्र देते है । ख मूलकथा मे अर्जुन मन्त्रबल से इन्द्रकील शिखर पर पहुँचते है किन्तु किरात मे एक यक्ष उन्हे मार्गदर्शन कराता हुआ वहाँ ले जाता है। ग-महाभारत मे अर्जुन को तपविरत करने के लिए देवराज इन्द्र स्वय आते हैं परन्तु किरात मे वे सर्वप्रथम गन्धर्वो एव अप्सराओ को प्रेषित करते हैं समाधि-भग करने के लिये और बाद मे स्वय आकर अर्जुन को प्रेरणा दे जाते है शिवोपासना के लिए। घ-वनेचर का कुरुप्रदेशवृत्तान्त-कथन, हिमालय, गन्धमादन तथा इन्द्रकील शिखरो का युगपद् धारावाही वर्णन, अर्जुन की कठोर तपश्चर्या का चराचर पर प्रभाव तथा सुरसुन्दरी-सम्भोगादि वर्णन, महाकवि भारवि की अपनी कल्पनाएँ है जो कि महाकाव्य के विकास मे प्रचुर सहयोग देती है। ड - महाभारत मे किरातवेषधारी शङ्कर से अर्जुन का केवल मल्लयुद्ध होता है तथा पार्वती (किराती) एव शिव के गण (सभी किरात) उसके द्रष्टा बनते हैं परन्तु प्रस्तुत महाकाव्य मे सर्वप्रथम अर्जुन स्कन्द के सेनापतित्व मे ( २१ ) आई हुई शाङ्करीसेना से युद्ध करके विजयी होते है, बाद मे उनका युद्ध शङ्कर से भी होता है। च--महाभारत मे किरातवेशवारी शिव, वीर अर्जुन के धराशायी हो जाने पर प्रकट होते है किन्तु किरात मे, आकाश मे उछलते समय अर्जुन द्वारा पैर पकड लिए जाने पर । छ-महाभारत मे पाशुपतास्त्र-प्राप्ति के बाद अर्जुन इन्द्र के साथ स्वर्ग- लोक की भी यात्रा करके अन्यान्य दिव्यास्त्रो की प्राप्ति करते है परन्तु किरात मे अस्त्रप्राप्ति के बाद वे सीधे अपने भाइयो के पास आते है ४ नेतृनिर्णय-किरातार्जुनीयम् का नायक कौन है ? यह प्रश्न प्राय ग्रन्थ के टीकाकारो अथवा अधुनातन विद्वानो के लिए भी विवादास्पद रहा है । दो परम्परायें है इस विषय मे । एक तो युधिष्ठिर के नायकत्व का अनुमोदन करती है और दूसरी अर्जुन के नायकत्व का। पहली परम्परा की मानने वाले किरात के एक टीकाकार चित्रभानु है। उनके तर्क इस प्रकार है--यदि अर्जुन कथानायक होते तो कथारम्भ मे ही उनकी नायक के रूप मे स्वतन्त्र स्थापना होनी चाहिये थी। परन्तु कथारम्भ तो ज्येष्ठ पाण्डव युविष्ठिर से होता है और प्रधानता भी उन्ही की है। कथा के आदिभाग मे ही नही, मध्य एव अन्त भागो मे भी युधिष्ठिर की ही प्रतिष्ठा है । यद्यपि दिव्यास्त्रलाभ अर्जुन को हुआ किन्तु उस अस्त्र का प्रयोजन युधिष्ठिर के ही पक्ष मे है । वह उनके शत्रुदलोच्छेदन कार्य मे साधन रूप है अत अर्जुन द्वारा प्राप्ति मात्र होने से भी कोई विशेष अन्तर नही पडता । यदि यह कहा जाय कि ग्रन्थ का नाम 'किरातयुधिष्ठिरीयम्' क्यो नही रख दिया गया ऐसी स्थिति मे ? तो इसका उत्तर प्रस्तुत करते हुये चित्रभानु कहते है चूँकि अर्जुन के पराक्रम से ही कुरुकुल का विनाश हुआ अतएव प्रधानता उन्ही के चरितवर्णन की होनी चाहिये । फिर भी है तो वे युधिष्ठिर के अङ्ग ही । महाभारत का भी नामकरण 'भरतो' पर आश्रित है परन्तु चरितवर्णन प्रायेण युधिष्ठिर का ही है । इस प्रकार कथानायक युधिष्ठिर ही है । परन्तु टीकाकार चित्रभानु के ये तर्क बहुत स्थिर और सुदृढ नही है। यह कहना असगत है कि कथा का आदिमध्यावसान युधिष्ठिर की ही प्रमुखता से सवलित है । बल्कि सत्य तो यह है कि तृतीय सर्ग से अन्तिम सर्ग (१८वा) तक अर्जुन ही अर्जुन दिखाई पडते है । प्रथम सर्ग मे भी बार-बार कवि ने यही भाव उपन्यस्त किया है । सुयोधन को युधिष्ठिर जैसे धर्मप्राण से तिलभर ।
( २२ ) भी डर नहीं है पर हॉ, अर्जुन का नाम सुनते ही वह कॉप उठता है । 'अनुस्मृताखडलसूनुविक्रम तवाभिधानात् व्यथते नतानन' इसका प्रमाण है। द्रौपदी द्वारा किये गये स्तवनो मे भी अर्जुन के ही प्रति सर्वाधिक निष्ठा व्यक्त होती है । वह युधिष्ठिर, भीम तथा नकुल-सहदेव के प्रति सकरुण है तो केवल उनकी दिनचर्या, अलकरण अथवा कोमल-सौख्य मे विपर्यय होने के कारण ! किन्तु पार्थ के प्रति उसकी करुणा उनके अप्रतिम, लोकातिशायी शौर्य के ही कारण है, क्योकि वे उत्तरकुरु प्रदेश के विजेता, वासवोपम, प्रभूत वसुप्रदाता, तथा वीर धनञ्जय है । भला इसमे अधिक और क्या वैशिष्ट्य चाहिये एक नायक के लिये ? किसी भी महाकाव्य का परम प्रयोजन नायकाश्रित ही होता है । किरात का परमप्रयोजन है-'पाशुपत अस्त्र का लाभ' और वह लाभ भी अर्जुन को हुआ है । नायक के नाम पर ही ग्रन्थ का नामकरण हुआ है। इस प्रकार प्रत्येक दृष्टि से अर्जुन ही कथानायक सिद्ध होते है। और फिर अर्जुन का नायक होना युधिष्ठिर के सम्मान का ही सूचक है क्योकि- 'सर्वतो जयमन्विच्छेत् पुत्रादिच्छेत् पराजयम् ।' पुत्र छोटे भाई को भी कहते है- सून पुत्रेऽनुजे रवौ । किरात के दूसरे स्वनामधन्य टीकाकार आचार्य मल्लिनाथ भी इसी मत के समर्थक है। उन्ही के शब्दो मे- - नेता मध्यमपाण्डवो भगवतो नारायणस्याशजः तस्योत्कर्षकृतेऽनुवर्ण्य-चरितो दिव्यः किरातः पुनः । शृङ्गारादिरसोऽङ्गमत्र विजयी वीरः प्रधानो रसः शैलाद्यानि च वणितानि बहुशो दिव्यास्त्रलाभः फलम् ॥ ५. छन्दोऽलङ्कारयोजना-महाकवि भारवि ने सम्पूर्ण महाकाव्य मे विविध छन्दो एव अलङ्कारो का प्रयोग किया है । यद्यपि महाकाव्यलक्षण के अनुसार ही कवि ने सर्ग के अन्त मे छन्द परिवर्तन कर दिया है फिर भी बहुलता की दृष्टि से सम्पूर्ण महाकाव्य की छन्दोयोजना इस प्रकार है- १ वशस्थ ( अन्त मे पुष्पिताग्रा तथा मालिनी ) २ वियोगिनी ( अन्त मे वियोगिनी एव उपजाति, पुष्पिताग्रा एव बसन्ततिलका ) ३ उपजाति ( अन्त मे वशस्थ, वियोगिनी एव मालिनी ) ४ वशस्थ ( अन्त मे पुष्पिताग्रा एव मालिनी ) ५ द्रुतविलम्बित ( औपच्छन्दसिक, क्षमा, प्रमिताक्षरा, प्रभा, रथोद्धता, जलधरमाला, प्रहर्षिणी, जलोद्धतगति, वसन्ततिलका, पुष्पिताग्रा, मालिनी ६ प्रमिताक्षरा ( अन्त मे वसन्ततिलका तथा मालिनी । ७ प्रहर्षिणी ( २३ ) ८ . ( अन्त मे वसन्त) वशस्थ ( वसन्ततिलका) ६ स्वागता ( अन्त मे वसन्त तथा मालिनी ) १० पुष्पिताग्रा ( अन्त मे शिखरिणी) ११. श्लोक ( अन्त मे उपजाति तथा वसन्त० ) १२ उद्गता ( अन्त मे प्रहर्षिणी ) १३ औपच्छन्दसिक ( अन्त मे वसन्त०) १४ वशस्य ( अन्त मे द्रुतविलम्बित एव मालिनी ) १५ श्लोक ( अन्त मे वियोगिनी, उपजाति, वशस्थ एव वसन्त० ) १६ उपजाति ( अन्त मे मालिनी एव वसन्त० ) १७ उपजाति ( अन्त मे प्रहर्षिी एव मालिनी ) १८ द्रुतविलम्बित, रथोद्धता, प्रमिता- क्षरा, अपरवक्त्र, प्रमुदितवदना, उपजाति, प्रमिताक्षरा, शालिनी, औपच्छन्द- सिक, स्वागता, मत्तमयूर, वशस्थ, प्रहषिणी, मालिनी, एव शिखरिणी)। महाकवि भारवि अत्यन्त सफलता पूर्वक प्राय समस्त प्रमुख अलङ्कारो का प्रयोग करते है। किरातार्जुनीयम् का साकल्येन परिशीलन करने पर जो अलङ्कार दृष्टिगोचर होते है उनके नाम इस प्रकार है-अनुप्रास, अतिशयोक्ति, अनुमान, अर्थान्तरन्यास, अर्थापत्ति, अर्धभ्रमक ( ५।२७) उत्प्रेक्षा, उपमा, उदात्त, ऊर्जस्वल (१०।१५) एकावली, कारणमाला, काव्यलिङ्ग, तदगुण, तुल्ययोगिता, दृष्टान्त, निदर्शना, परिकर, परिणाम, परिबृत्ति, पर्याय, पर्या- योक्ति, प्रेय ( ५।५१ ) भाविक, भ्रान्तिमान्, माला, मालोपमा, मीलन, यथासख्य, यमक, रसवत्, रूपक, विभावना, विरोध, विरोधाभास, विशेषोक्ति, विषम, व्यतिरेक श्लेष, सङ्कर समुच्चय, समामोक्ति, समाहित, सहोक्ति, सामान्य, स्मरण, स्वभावोक्ति, सशय, अपह्र ति एव हेतूत्प्रेक्षा । स्थानाभाव के कारण इन अलङ्कारो के महाकाव्यगत मन्दर्भ का सविस्तर व्याख्यान नही किया जा रहा है । इन अलङ्कारो के साथ ही साथ महाकवि ने चित्रकाव्य के अनेक स्वरूपो ( गोमूत्रिका, दू यक्षर, निरोष्ठ्य, प्रतिलोम, प्रतिलोमानुलोमपाद, शृखलायमक एव सर्वतोभद्र आदि) का भी सफलतापूर्वक प्रयाग किया है । ६. रसपरिपाक-आचार्य मल्लिनाथ के अनुसार किरात का प्रधान रस 'वीर' है । शृङ्गार आदि उसके अङ्ग है-'शृङ्गारादिरसोऽङ्गमत्र विजयी वीर प्रधानो रस ।' यह तथ्य सुस्पष्ट है कि महाकाव्य का आद्यन्त स्वरूप उत्साह, शौर्य एव पराक्रमादि का परिचायक है । पुरुषार्थचतुष्टय का एक विशेष अग 'अर्थ' इसका अभिमत फल है, फलत सम्पूर्ण महाकाव्य मे वीर-रस का ही प्रभावातिशय है । परन्तु महाकवि ने इस 'वीर' को पुष्ट करने के लिए अन्यान्य रसो का प्रयोग भी अन्य मे किया है, अर्जुन के इन्द्रकीलशिखर-प्रयाण मे द्रौपदी-गत वियोग-शृङ्गार तथा गन्धर्वोपभोग प्रसग मे सयोग शृङ्गार, और ( २४ ) किरातार्जुन युद्ध मे रौद्र एव भयानक रसो का भी परिपाक दृष्टिगोचर होता है । सदुक्तिकर्णामृतकार की तो घोषणा हे--प्रकृतिमधुरा भारविगिर ।' और शारदातनय के मतानुसार भारवि की वाणी मे भाव एव रस का तादात्म्य है-तादात्म्य भावरसयो भारवि स्पष्टमूचिवान् ।' वस्तुत महाकवि ने समस्त रसो का परिपाक ग्रन्थ मे नही प्रस्तुत किया है परन्तु यह सच है कि कवि द्वारा प्रयुक्त रस प्रसङ्गानुकूल है । अर्जुनकृत ईशस्तुति देवविषयक रति- भावना का सर्वोत्तम निदशन है। भारवेरर्थगोरवम्--भारवि के महाकाव्य का सर्वश्रेष्ठ वैशिष्ट्य है उनका अर्थगाम्भीर्य जिसका कि तात्पर्य है-'अल्प शब्दो मे प्रभूत अर्थ का सन्निवेश ।' भारवि की कविता का आदर्श ही अप्रतिम है। उनका व्यक्तिगत अभिमत यह है कि 'सुस्पष्ट वर्णालड्कारो से विभूषित, शत्रुओ को भी वशीभूत कर लेने वाली, प्रसादगुणोपेत, गम्भीर पदो वाली सरस्वती पुण्यहीनो के मुख मे कभी प्रकट ही नही होती' । देखिये- विविक्तवर्णाभरणा सुखश्रुतिः प्रसादयन्ती हृदयान्यपि द्विषाम् । प्रवर्तते नाकृतपुण्यकर्मणा प्रसन्नगम्भीरपदा सरस्वती॥ कि० ०१४।६ भारवि की पदावली परिस्फुट हे, अस्पष्ट नही। अर्थगाम्भीर्य से सवलित है, अर्थो की पुनरुक्ति से परे है और आकाक्षित भाव को प्रकट करने मे सर्वथा समर्थ है । कवि महाराज युधिष्ठिर के मुंह से अपनी वाणी का यह रमणीय आदर्श प्रस्तुत करता है- स्फुटता न पदैरपाकृता न च न स्वीकृतमर्थगौरवम् । रचिता पृथगर्थता गिरा न च सामर्थ्यमपोहित क्वचित् ॥ कि० २।२७ भारवि की वाणी का अर्थगौरव प्रथम सर्ग से ही प्राप्त होने लगता है। सुयोधन की राज्यव्यवस्था का सम्यगाकलन करके जब वनेचर द्वैतवन मे महाराज युधिष्ठिर के पास आता है तभी उसके 'सन्देशज्ञापन' मे हम अर्थगौरव का प्रथम दर्शन करते है। कवि कहता है-'स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी विनिश्चितामिति वाचमाददे ।' वस्तुत यही एक वाक्य अर्थगौरव का लक्षण भी है। कवि ने प्रथमसर्ग के अनेक पद्यो के अन्तिम चरण मे सदुक्तियो का प्रयोग किया है। ये सदुक्तियाँ अल्पशब्दा होकर भी विपुल अर्थ का प्रकाशन करती हैं-'हित मनोहारि च दुर्लभ वच ।' विचित्र रूपा खलु चित्तवृत्तय ।
( २५ ) वर विरोधोऽपि सम महात्मभि ।' आदि इसी प्रकार की उक्तियाँ है। अर्थगाम्भीर्थ किरात के प्रत्येकपात्र के वचनोपन्यास मे प्राप्त होता है । दूसरे सर्ग मे यदि भीम 'उपपत्तिमद्' एव 'ऊजिताश्रय' वचन प्रस्तुत करते है तो द्रौपदी भी अर्थगौरव मे वागीश बृहस्पति तक को विस्मित कर देती है-'अपि वागधिपस्य दुर्लभ वचन तद्विदधीत विस्मयम्' । जैसे अल्पमात्रावाली शक्तिशाली औषधि मे गुणाधिक्य होता है उमी प्रकार द्रौपदी की वाणी व्यथित करने वाली होकर भी अन्तत सुख देने वाली है । महाकवि भारवि के ही शब्दो मे- परिणामसुखे गरीयसि व्यथकेऽस्मिन् वचसि क्षतौजसाम् । अतिवीर्यवतीव भेषजे बहुरल्पीयसि दृश्यते गुणः ॥२४॥ व्यवहारज्ञान कराना भारवि के काव्य का प्रमुख लक्ष्य है । जो व्यक्ति शठ के साथ शठता का व्यवहार नहीं करता वह मूर्ख है। क्योकि दुष्ट लोग ऐसे सीधे-सादे व्यक्ति का रहस्य जान कर उसी प्रकार उसे विनष्ट कर देते है जैसे तीखे बाण कवचविहीन योद्धा को- ब्रजन्ति ते मूढधियः पराभव भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः । प्रविश्य हि ध्नन्ति शठास्तथाविधानसवृताङ्गान्निाशता इवेषवः ॥ कितनी सटीक बात है यह कि जिस व्यक्ति का क्रोध सफल होता है समस्त प्राणी उसके वशीभूत हो जाते है परन्तु खिम्सू व्यक्ति के खुश या नाराज होने से लोगो का कुछ भी बनता-बिगडता नही | कवि कहता है- अवन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदा भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः । अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहान न विद्विषादरः ॥१३० भारवि का यही अर्थगाम्भीर्य उनके प्रकृति-वर्णनो मे भी प्राप्त होता है । कवि ने साधारण सवादो मे भूपतियो का 'निसर्गदुर्योधचरित' एव उनका 'निगूढतत्त्व नयवर्त्म समाहित कर दिया है । सुयोधन यथोचित रूप से समय का विभाजन करके, समान आदर के साथ अर्थ, धर्म एव काम का सेवन करता है, फलत कभी भी उसके इस पुरुषार्थत्रय मे कोई विरोध नही पैदा होता । दुर्योधन के एक वैशिष्ट्य-ख्यापन मे कवि नीतिशास्त्र का एक अध्याय ही उँडेल देता है-- असक्तमाराधयतो यथायथं विभज्य भक्त्या समपक्षपातया। गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान् न बाधतेऽस्य त्रिगणः परस्परम् ॥ ૧૧૧ - ( २६ ) इसी प्रकार की अर्थगुरुता १११५ सख्यक पद्य मे भी प्राप्त होती है । ऊपर भारबि के प्रकृतिवर्णन की बात कही गई है। भले ही भारवि कालिदास की भाँति प्रकृति को मानवीय भावो की सन्देशवाहिनी न बना सके हो, इतना तो स्पष्ट है कि किरात में वर्णित प्रकृति कल्पनाचारुत्व मे, रसचणा मे और सर्वाधिक अर्थगौरव द्योतित करने मे, अत्यन्त उदग्र है । कही-कही तो कवि कालिदास की ही भॉति जड-चेतन को एकीभूत कर देता है । प्रकृति एव नवयुवती के अनुपम सौन्दर्य को एक ही तुला पर तौलते हुये कवि शिशिरोपगम प्रस्तुत करता है- कतिपयसहकारपुष्परम्यस्तनुतुहिनोऽल्पविनिद्रसिन्दुवारः । सुरभिमुखहिमागमान्तशसी समुपययौ शिशिरःस्मरैकबन्धुः ॥ शरद् ऋतु मे शिरीषपुष्प के समान हरितवर्ण शुकसमूह मूगे के समान लाल चञ्चपुट मे वान की पीली बालियाँ लिए आकाश मे उडा जा रहा है । इस प्रकार क्रमश हरित, रक्त, पीत एव नील वर्णो के परस्पर मिश्रण से आकाश मे एक मनोहर इन्द्रधनुषी शोभा की सृष्टि हो रही है- मुखेरसौ विद्रुमभङ्गलोहित शिखाः पिशङ्गीः कलमस्य विभ्रती । शुकावलिय॑क्तशिरीषकोमला धनुःश्रियं गोत्रभिदोऽनुगच्छति ॥ ये है भारवि की कविता के कुछ प्राञ्जल उद्धरण जिनमे उनका काव्या- त्मक-वैशिष्ट्य (अर्थगौरव) साकार हुआ है । कवि दीर्घकाय समासो का प्रयोग नही करता अतएव उसकी कविता मे क्लिष्टत्वदोष नही है। चित्रकाव्यो मे नवश्य ही कुछ अर्थावगति मे बाधा होती है परन्तु उसका कारण कवि का अपना स्वारस्य नहीं प्रत्युत 'चित्रकाव्यता' मात्र है। उदाहरण के लिये पन्द्रहवे सर्ग का यह एकाक्षर श्लोक देखे- न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना नुनु । नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुम् ॥ १५॥१४ भारवि अत्यन्त निपुण वैयाकरण हैं अत अप्रसिद्ध पाणिनीयनियमो का उदाहरण प्रस्तुत करने मे वह कालिदास एव माघ से भी आगे हैं | युद्धप्रसङ्गो मे, चित्राकाव्यो मे तथा गूढ-नीति का प्रकाशन करने वाले पद्यो मे भाषा अत्यन्त भावमयी अथ च नीरस सी प्रतीत होती है । विशेषत प्रथम तीन सर्गो मे ! इसी कारण इन्हे 'पाषाणत्रय' कहा जाता है । वस्तुत भारवि-काव्य, नारियल के समान कठोर भाषा की कञ्चुलिका मे तिरोहित है, परन्तु यह बहिरग कठोरता ही उसकी इयत्ता नही । नारियल के - ( २७ ) अन्तराल की ही भाँति भारवि के काव्य का अन्तराल भी, रसगर्भनिर्भर, सरल एव सुमधुर है। आचार्य मल्लिनाथ ने ठीक ही कहा है- नारिकेलफलसमितं बचो भारवेः सपदि तद् विभज्यते । स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भरं सारमस्य रसिका थेप्सितम् ॥ इसी प्रकार की प्रशसा भारतचरित के प्रणेता कृष्णकवि ने भी की है जिसके अनुसार भारवि की कविता 'सत्पथदीपिका' सिद्ध होती है- प्रदेशवृत्त्यापि महान्तमर्थ प्रदर्शयन्ती रसमादधाना। सा भारवेः सत्पथदीपिकेव रम्या कृतिः कैरिव नोपजीव्या। चौथी समस्या-किरातार्जुनीयम् के टीकाकार की है। अद्यावधि प्राप्त होने वाले सस्कृतसाहित्य के इतिहासो मे विविध विद्वानो द्वारा किरात की अनेक टीकाओ की गणना की गई है। श्रीकृष्णमाचारियर महोदय ने अपने ग्रन्थ मे किरात की कुल ३४ टीकाओ का उल्लेख किया है। परन्तु उनमे सर्वाधिक प्रसिद्ध, प्रामाणिक एव सारवती टीका आचार्य मल्लिनाथ की है जिसका नाम है-घण्टापथ | आचार्यमल्लिनाथ ने अपनी टीकाओ मे आत्मविषयक जो सूचनाएँ दी है उनसे उनके व्यक्तित्व पर प्रभूत प्रकाश पडता है । टीकाकार मल्लिनाथ काश्यपगोत्रोत्पन्न तेलुगुब्राह्मण थे। उनके पितामह का नाम भी मल्लिनाथ था और पिता का नाम कादिन् । पेड्डिभट्ट तथा कुमारस्वामी उनके पुत्र थे । इन्ही कुमारस्वामी ने सुप्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ 'प्रतापरुद्रयशोभूष- णम्' की टीका लिखी। मल्लिनाथ की आनुवशिक उपाधि 'कोलाचल' तथा व्यक्तिगत उपाधि, 'महोपाध्याय' थी । वे वैशेषिक, वेदान्त, साख्य, योग एव न्यायशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होने स्वय घोषणा की है- वाणी काणभुजीमजीगणदवाशासोच्च वैयासकोम् अन्तस्तन्त्रमरस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् । वाचामाचकलद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरा लोकेऽभूद्यदुपज्ञमेव विदुषा सौजन्यजन्य यशः॥ आचार्य मल्लिनाथ का समय १४ वी शती का उत्तरार्ध माना जाता है। काञ्जीवरम् के समीप प्राप्त होने वाले एक अभिलेख के अनुसार विजयनगर नरेश देवराज ने उन्हे एक विवाद के निर्णयार्थ आमत्रित किया था। इसके अनुसार उनका समय १४००-१४ ई० सिद्ध होता है। दूसरी ओर स्वयं ( २८ ) आचार्य मल्लिनाथ ने कोमटिवेमविरचित 'साहित्यचिन्तामणि' से ( सन १४०६ ई०) उद्धरण लिया है । अवश्य ही उद्धरण का आदान करने समय मल्लिनाथ प्रौढ अवस्था के रहे होगे। श्री के० बी० पाठक जी ने इन्ही प्रमाणो के आधार पर उनका समय १४ वीशती ई० का उत्तरार्व निश्चित किया है। 'आचार्य मल्लिनाथ ने 'उदारकाव्य' तथा रघुवीरचरित' नामक मौलिक काव्यो का भी प्रणयन किया' ऐसी जनश्रुति है। परन्तु उनकी अमरकीर्ति की परिचायक उनकी अप्रतिम टीकाएँ ही है। कालिदासप्रणीत रघुवश, कुमार- सम्भव एव मेघदूत पर सञ्जीवनी, भारविप्रणीत किरातार्जुनीय पर घण्टापथ, माघप्रणीत शिशुपालवध पर सर्वकषा, भट्टिप्रणीत रावणवध तथा श्रीहर्षप्रणीत नैषधीयचरित पर जीवातु टीका आचार्य मल्लिनाय ने लिखी । इसके अतिरिक्त उन्होने विद्याधरप्रणीत लक्षणग्रन्थ 'एकावली' वरदराजप्रणीत 'तार्किकरक्षा', प्रशस्तपादभाष्य, लघुशब्देन्दुशेखर तथा नलोदय प्रभृति ग्रन्थो पर भी टीकाये लिखी। आचार्य मल्लिनाथ की टीकाशैली अत्यन्त रमणीय है । वे प्रत्येक शब्द की आमूलचूड व्याख्या प्रस्तुत करते है तथा मूल लेखक के अभिप्राय को अधिक से अधिक समझाने का प्रयास करते है। इस विषय मे उन्होने आदर्श स्वय निश्चित किया है- इहान्वयमुखेनैव सर्व व्याख्यायते मया। नामूल लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥ अपनी टीकाओ मे मल्लिनाथ पौराणिक-कथाओ का अनेक उल्लेख करते है जिससे उनकी बहुश्रु तता का बोध होता है । कोश, व्याकरण एव छन्द का व्याख्यान भी वे अत्यन्त निपुणता से करते है । न अनपेक्षित व्याख्यानो से उन्होने ग्रन्थ का उपबृ हण किया है और न ही आत्मवैदुष्य का प्रदर्शन । प्राय अपनी समस्त टीकाओ मे उन्होने कवि की काव्यशास्त्रीय ग्रन्थियो को सुलझाने का प्रयास किया है । किरातार्जुनीय की मल्लिनाथी टीका का नाम है 'घण्टापथ' जिसका शाब्दिक तात्पर्य है-'राजमार्ग । महाकवि भारवि की जटिल एव विषम पदावली का निबन्धन इतना दुरूह एव कण्टकाकीर्ण है कि पाठक सुख- पूर्वक उसमे प्रवेश कर ही नही सकता । फलत आचार्य मल्लिनाथ उस दुर्गम काव्यसौध तक पाठक को पहुंचाने के लिये एक 'घण्टापथ' का निर्माण करते है- 'नानानिबधविषमैकपदैनितान्त साशंकचड कमणखिन्नधियामशङ्कम् । कतुं प्रवेशमिह भारविकाव्यबन्धे घष्टापथ कमपि नूतनमातनिष्ये ॥ - - ( २६ ) - किरात की अन्य टीकाओ मे सर्वाधिक लोकप्रिय टीका 'शब्दार्थदीपिका' है जो महाकाव्य के केवल प्रथम तीन सर्गो पर है । इसके प्रणेता श्री चित्रभानु है जिनका कि समय कुछ निश्चित नहीं । इसका प्रकाशन श्री टी० गणपति शास्त्री ने 'त्रिवेन्द्रम् सस्कृतग्रन्यमाला' मे किया है पाचवी समस्या-किरातार्जुनीयम् प्रथमसर्ग की है, जो पाठ्यक्रम मे निर्धा- रित काव्याश है । कुछ अपेक्षित तथ्यो पर प्रकाश डाला जा रहा है । किरातार्जुनीय प्रथमसर्ग का कथानक महाराज युधिष्ठिर द्वारा भेजे गए एक गुप्तचर के आगमन से प्रारम्भ होता है । पाण्डवबन्धुओ के अरण्यवासी हो जाने पर समृद्ध कुरुप्रदेश की कैसी दशा हुई, कही स्वार्थी सुयोवन ने आत्मसुख के लिए प्रजा हितचिन्तन विस्मृत ही न कर दिया हो । इन समस्त तथ्यो को सविस्तार जानने के लिए ही कुरुप्रदेश के भूतपूर्व नरेश युधिष्ठिर ने उस बनेचर को भेजा था । वनेचर लौटकर दुर्योधन के शासनप्रबन्ध, पाण्डवभय, सेचनप्रबन्ध, अनुजीवियो के प्रति सद्व्यवहार, सैनिको के प्रति सदयभाव, धर्मप्रियता, यज्ञयागादि के प्रति आस्था तथा एवविध अन्यान्य गुणो का भी विस्तृत-वर्णन प्रस्तुत करता है। सुर्योधन की इस कल्पनातीत चतुर्मुखी समृद्धि का वृत्त महाराज युधिष्ठिर राजमहिषी द्रौपदी से कहते है । द्रौपदी का नारीहृदय शत्रुकृत अपमानो को याद करके उनका यह अभ्युत्थान नही सह पाता और वह फूट पडती है। भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव तथा स्वय धमराज के ही पूर्व-वैभवो का स्मरण कराती हुई वह उनके साम्प्रतिक दैन्य के प्रति महाराज का यान आकृष्ट करती है और उन्हे शत्रुओ से युद्ध करने की प्रेरणा देती है । अन्त मे द्रौपदी द्वारा अभिव्यक्त की गई धर्मराज के प्रति मङ्गलकामना से ही सर्ग की समाप्ति हो जाती है । प्रथम सर्ग मे कुल ४६ पद्य है । पहले के ४४ पद्य वशस्थ बृत्त मे ४५ वाँ पुष्पिताग्रा वृत्त मे और ४६वाँ मालिनी मे। इन छन्दो के स्वरूप यथावसर व्याख्यात किये गये है। प्रथम सर्ग के प्रमुख अलङ्कारो मे अनुप्रास, यमक, पूर्णोपमा, श्लेष, अर्थान्तरन्यास, सहोक्ति एव उत्प्रेक्षा आदि है जिनके लक्षण यथावसर श्लोको मे सुस्पष्ट कर दिये गये है। किरात का प्रथम सर्ग महाकवि भारवि के अर्थगौरव का, उनकी वर्णन- चातुरी का, राजनीति-ज्ञान का, मनोहरकविकल्पना एव भावाभिव्यक्ति-क्षमता का सर्वोत्तम निदर्शन है । दुयोवन का शासन-प्रबन्ध और द्रौपदी की प्रतिक्रिया- यही दोनो प्रथमसर्ग के प्रतिपाद्य के दो मूलस्तम्भ है । मुयोवन ने यद्यपि विशाल , ( ३० ) कुरुप्रदेश को हस्तगत कर लिया है, वह यह भी जानता है कि पाण्डवबन्धु कान्तारवासी हैं, फिर भी वह रात दिन भयभीत ही रहता है । क्योकि वह साम्राज्य उसे अपनी योग्यता एव प्रजाप्रियता से नही, जुआखोरी से मिला है। बह राज्य 'दुरोदरच्छअजित' है । फलत अब आगामी बारह वर्षों मे दुर्योधन अपने को प्रजा का 'न्याग्यसरक्षक' सिद्ध कर देना चाहता है। अपनी इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए सुयोधन ने सारे कुरुप्रदेश को, नहर आदि का सुप्रबन्ध करके 'अदेवमातृक' बना दिया है। कुरुप्रदेश की प्रजा बिना किसी विशेष परिश्रम के हो धन-सम्पत्ति से मालामाल हो उठी है- 'वितन्वति क्षेममदेवमातृकाश्चिराय तस्मिन् कुरवश्चकासति । दुर्योधन ने यपने अनुजीवियो से मित्र जैसा, मित्रो से भाई जैसा और भाइयो से स्वामी जैसा व्यवहार कर रहा है। उसने नवयौवन-सम्पन्न अनुज दुश्शासन को युवराज-पद पर अभिषिक्त कर दिया है और स्वय पुरोहित के निदेशानुसार रातदिन यज्ञयागादि धर्मानुष्ठानो मे सलग्न हो उठा है- 'मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ।' सुयोधन सदैव एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार ही कार्य करता है । यही कारण है कि समपक्षपात-बुद्धि से प्रत्येक का सेवन करने के कारण 'धर्म-अर्थ और काम' इनका त्रिगण कभी भी परस्पर बाधा नहीं डालता-'न बाधतेऽस्य त्रिगण परस्परम्' | दुर्योधन की दण्डव्यवस्था सब के लिए समान है। एक न्यायपिय नरेश के रूप मे वह अपने पुत्र तक को भी समुचित दण्ड देने के लिए समुद्यत रहता है-'रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ।' अपनी लोकातिशायिनी समृद्धि के कारण सुयोधन कुबेर के समान ( वसूण्मान ) हो गया है । वह इतना गुणशाली हो गया है कि माँ वसुन्धरा स्वय उसकी भव्या- काक्षिणी बन गई है । कवि कहत! है- उदारकीर्तरुदयं दयावतः प्रशान्तबाध दिशतोऽभिरक्षया । स्वय प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ॥ सुयोधन को अपने अनुचरो, सैनिको एव सहायको से अनपायिनी प्रीति है । वह सेवको को कितना चाहता है, इसका एक मात्र प्रमाण वे पारितोषिक हैं जो कर्तव्यपालन के बाद सेवको को प्राप्त होते हैं-'कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पद । न सुयोधन को कभी आँख तरेरने की अपेक्षा हुई, न थनुष उठाने की, क्योकि । ( ३१ ) अधीनस्थ नृपतिगण उसके इतने वशवर्ती है कि रात-दिन आदेशपालन के लिए लालायित रहते है-उह्यते नराधिौल्यमिवानुशासनम्' । सैनिक सुयोधन को इतना मानते है कि प्राण देकर भी उसकी सिद्धि चाहते है-'प्रियाणि वाञ्छ- न्त्यसुभि समीहितुम् ।' यह है मुयोधन के रमणीय शासन-प्रबन्ध एव उसके वैभवोत्कर्ष का एक चित्र जिसे महाकवि भारवि ने किरात के प्रथम सर्ग में प्रस्तुत किया है। अब इसी सन्दर्भ मे कथानक के दूसरे स्तम्भ 'द्रौपदी' के विषय मे कुछ तथ्यो पर प्रकाश डाला जा रहा है । द्रौपदी एक नारी है, नारी स्वभाव से ही सुखवैभव से प्रीति रखने वाली होती है । और फिर द्रौपदी तो साधारण नारीस्तर से कही ऊपर थी । पाञ्चा- लनरेश द्रुपद की कन्या, भरतवश की कुलवधू, पञ्चपाण्डवो की राजमहिषी, मनोरम, हृद्य एव अगणित सद्गुणो से मण्डित । ऐसी राजकन्या यदि अपने पतियो की अज्ञता एव अकर्मण्यता के कारण दर-दर की ठोकरे खाती फिरे, भिखारिनो जैसा जीवन-यापन करे, तो शत्रुवर्ग का निरन्तर अभ्युत्थान सुन कर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी? वस्तुत इसी मानसिकस्थिति मे द्रौपदी सुयोधन की अभ्युत्थानकथा अपने ही पति के मुँह से सुन एव सह नहीं पाती । स्त्रियो- चित्त मर्यादा का वॉध टूट जाता है और द्रौपदी अपनी विषाक्त अन्तर्वेदना, व्यङ्ग यवाणो से रूप मे प्रकट करने लगती है। अपनी विवशता को वह जानती है, स्वीकार भी करती है-'तथापि वक्तु व्यवसाययन्ति मा निरस्त- नारीसमया दुराधय ।' द्रौपदी युधिष्ठिर को उलाहना देती है कि उन्होने अपनी मनोरम सुन्दर, एव सद्वशोत्पन्न प्रियतमा की ही भॉति साम्राज्यलक्ष्मी को भी गंवा दिया है और इस कुचक्र के उत्तरदायी बे स्वय है । क्योकि यदि वे द्युतव्यसनी न होते तो यह स्थिति ही क्यो आती- गुणानुरक्तामनुरक्तसाधनः कुलाभिमानी कुलजा नराधिपः । परैस्त्वदन्यः क इवापहारयेन्मनोरमामात्मवधूमिव श्रियम् ॥ द्रौपदी जानती है कि धर्मराज युधिष्ठिर जैसे महामहिम पडित व्यक्ति को कर्तव्य की शिक्षा देना उसके वश की बात नही-'भवादृशेषु प्रमदाजनोदित भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् ।' फिर भी बिना ।' फिर भी बिना कुछ खरी-खोटी सुनाए उससे रहा नही जाता । वह कहती है कि ससार मे निष्फलक्रोध वाला व्यक्ति कुछ नही कर ( ३२ ) me- सकता, उसकी अनुकूलता-प्रतिकूलता का कोई मूल्य ही नही । क्योकि दोनो ही स्थितियो मे वह किसी का कुछ हित-अहित नहीं कर सकता । स्वय धर्मराज ऐसे ही व्यक्ति है- अबन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदा भवन्ति वश्या स्वयमेव देहिनः अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहान न विद्विषादरः ॥ वे मूर्ख व्यक्ति अवश्य ही पराभव प्राप्त करते हे जो गठ के साथ शठता का ही व्यवहार नही करते । क्योकि जैसे नीखे बाण कञ्चुकविहीन योद्धा को छलनी कर देते है ठीक यो ही शठ लोग मीवे-सावे व्यक्तियो का साहचर्य करके, उनके रहस्य जान करके अन्तत उन्हे वराशायी कर देते हे । महाराज युधि- ष्ठिर भी ऐसे ही ऋजु-व्यक्तित्व के प्रमाण है । द्रौपदी कहती है- ब्रजन्ति ते मूढधियः पराभव भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः। प्रविश्य हि ध्नन्ति शठास्तथाविधानसवृताङ्गानिशिता इवेषवः ॥ द्रौपदी को अपने वैभव के दिन याद आते है | राजसूय याग की वह शोभनवेला, जब वीर अर्जुन ने समस्त उत्तरकुरुप्रदेश की दिग्विजय करके अपार स्वर्ण-रजत सम्पत्ति ला दी थी। साम्राज्य के वे रमणीय दिन जब वीर वृकोदर लालचन्दन का अनुलेप करके मस्त पडे रहते थे, नकुल-सहदेव की वह कमल- कोमल जोडी जिसे देखने के लिये इन्द्रप्रस्थ नगर के नागरजन उत्कण्ठित रहते थे ।। स्वय महाराज युधिष्ठिर, जो ब्रह्मवेला मे ही चारणो-वैतालिको द्वारा गाई गई स्तुतियो-गीतियो को सुनकर आँखे खोलते थे और अन्तत इन पाँचो वीर पाण्डवबन्धुओ की एकमात्र हृदयहारिणी, प्रियतमा राजमहिषी द्रौपदी || कहाँ गये वे सुनहरे दिन ।। द्रौपदी एक-एक करके महाराज युधिष्ठिर को याद दिलाती है- 'महारथ सत्यवनस्य मानस दुनोति नो कच्चिदथ वृकोदर ? वल्कवासासि तवाधुनाहरन् करोति मन्यु न कथ धनञ्जय कथ त्वमेतौ धृतिसयमौ यमौ विलोकयन्नुत्सहसे न बावितुम् ? और अन्त मे जब विहितवर्षण सघनघनघटा की भॉति द्रौपदी का अन्तस्ताप व्यक्त कर देने से शान्त हो जाता है तब वह अत्यन्त श्रद्धा एव आस्था के साथ महाराज युधिष्ठिर के अभ्युदय की कामना भी करती है-'रिपुतिमिरमुदस्यो- दीयमान दिनादौ दिनकृतमिव लक्ष्मीस्त्वा समभ्येतु भूय ॥' ?
महाकविश्रीभारविविरचितं किरातार्जुनीयम् । (आचार्यमल्लिनाथकृतघण्टापथव्याख्या अन्यान्यछात्रोपयोगिव्याख्यानैश्च समलड्कृतम्) (प्रथमः सर्गः) घण्टापथ-अर्धाङ्गीकृतदाम्पत्यमपि गाढानुरागि यत् । पितृभ्या जगतस्तस्मै कस्मैचिन् महसे नम ॥ आलम्बे जगदालम्ब हेरम्बचरणाम्बुजम् शुष्यन्ति यद्रज स्पर्शात् सद्य प्रत्यूहवाय ।। तद्दिव्यमव्यय धाम सारस्वतमुपास्महे । यत्प्रकाशात्प्रलीयन्ते मोहान्वतममश्छटा. ।। वाणी काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासकी- मन्तस्तन्त्रमरस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् । वाचामाचकलद्रहस्यमखिल यश्चाक्षपादस्फुरा लोकेऽभूद्यदुपजमेव विदुषा सौजन्यजन्य यश ॥ मल्लिनाथकवि सोऽय महोपाध्यायशब्दभाक् ।। तत्किरातार्जुनीयाख्य व्याख्यातुमिच्छति ॥ नारिकेलफलसम्मित वचो भारवे सपदि तद्विभज्यते । स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भर सारमस्य रसिका यथेप्सितम् ।। नानानिबन्धविषमैकपदैनितान्त साशङ्कचड्क्रमण खिन्नधियामशङ्कम् । कर्तुं प्रवेशमिह भारविकाव्यबन्ध घण्टापथ कमपि नूतनमातनिष्ये ॥ इहान्वयमुखेनैव सर्व व्याख्यायते मया । नामूल लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥ अथ तत्रभवान् भारविनामा कवि "काव्य यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेत- रक्षतये । सद्य परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥' इत्याद्यालड्वारिकवचन- प्रामाण्यात् काव्यस्यानेकश्रय साधनताम्, 'काव्यालापाश्च वर्जयेत्' इति निषेध- शास्त्रस्यासत्काव्यविषयता च पश्यन् किरातार्जुनीयाख्य महाकाव्य चिकीर्षु श्चिकी- र्षितार्थविध्नपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसावनत्वात् 'आशीर्नमस्त्रिया वस्तुनिर्देशो वाऽपि तन्मुखम्' इत्याद्याशीर्वादाद्यन्यतमस्य प्रबन्धमुखलक्षणत्वाच्च वनेचरस्य युधिष्ठिरप्राप्तिरूप वस्तु निर्दिशन कथामुपक्षिपति- ३ काब्य - श्रियः कुरूणामधिपस्य पालनी, प्रजासु वृत्ति यमयुक्त वेदितुम् । स वणिलिङ्गी विदित समाययौ युधिष्ठिर द्वैतवने वनेचर. ॥१॥ श्रिय इति । आदित श्रीशब्दप्रयोगाद्वर्णगणादिशुद्वि त्रातीवोपयुज्यते । तदुक्तम्-'देवतावाचका शब्दा ये च भद्रादिवाचका । ते सर्वे नैव निन्द्या स्युलिपितो गणतोऽपि वा' इति । कुरूणा निवासा कुरवो जनपदा । 'तस्य निवास' इत्वण्प्रत्यय । जनपदे लुप् । तेषामविपस्य सम्बन्टिनीम् । शेषे षष्ठी। दुर्योधनस्य श्रियो राजलक्ष्म्या । 'कर्तृकर्मणो कृति' इति कर्मणि षष्ठी । पाल्यतेऽनयेति पालनी ताम् प्रतिष्ठापिकामित्यर्थ । प्रजारागमूलत्वात्सम्पद इति भाव । 'करणाविकरणयोश्च' इति करणे ल्युट् । 'टिड्टाणा-' इत्यादिना डीप् । प्रजासु जनेषु विषये । 'प्रजा स्यात्सन्ततौ जन' इत्यसर । वृत्ति व्यवहार ज्ञात य दनेचरमयुक्त नियुक्तवान् । वर्ण प्रशस्तिरस्यास्तीति वर्णी ब्रह्मचारी। तदुक्तम् --- ‘स्मरण कीर्तन केलि प्रेक्षण गुह्यभाषणम् । सङ्कल्पोऽव्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च । एतन्मैथुनमष्टाङ्ग प्रवदन्ति मनीषिण । विपरीत ब्रह्मचर्य- मेतदेवाष्टलक्षणम्' इति । एतदष्टविधमैथुनाभाव प्रशस्ति ('वर्णाद् ब्रह्मचारिणि इतीनिप्रत्यय ) तस्य लिङ्ग चिह्नमस्यास्तीति वर्णिलिङ्गी । ब्रह्मचारिवेषवा- नित्यर्थ । स नियुक्त वने चरतीति वनेचर किरात । 'भेदा किरातशबरालिन्दा म्लेच्छजातय इत्यमर । 'चरेष्ट' इति टप्रत्यय । 'तत्पुरुषे कृति बहुलम्' इत्यलुक् । विदित वेदनमस्यास्तीति विदित । परवृत्तान्तज्ञानवानित्यर्थ । 'अर्श आदिभ्योऽच्' इत्यच्प्रत्यय । उभयत्रापि 'पीता गाव' "भुक्ता ब्राह्मणा' 'विभक्ता भ्रातर' इत्यादिवत्साधुत्वम् । न तु कर्तरि क्त , सकमकेभ्यस्तस्य विधाना- भावात् । अतएव भाष्यकार-'अकारो मत्वर्थीय । विभक्तमेषामस्तीति विभक्ता । 'पीतमेषामस्तीति पीता' इति सर्वत्र । अथवोत्तरपदलोपोऽत्र द्रष्टव्य । 'विभक्तधना विभक्ता' 'पीतोदका पीता' 'भुक्तान्ना भुक्ता' इति । अत्र लोप- शब्दार्थमाह कैयट-'गम्यार्थस्याप्रयोग एव लोपोऽभिमत । 'विभक्ता भ्रातर' इत्यत्र च धनस्य यद्विभक्तत्व तद् भ्रातृषपचर्यते । 'पीतोदका गाब' इत्यत्राप्यु- दकस्य पीतत्व गोष्वारोप्यते । 'भुक्ता ब्राह्मणा' इत्यत्र अन्नस्य भुक्तत्व ब्राह्मणेषु उपचर्यते” इति । तद्वदत्रापि वृत्तिगत विदितत्व वेदितरि वनेचर उपचर्यते ।
( ३५ ) । एतेन 'वनाय पीतप्रतिबद्धवत्साम्', 'पातु न प्रथम व्यवस्यति जल युष्मास्वपीतेषु या' एवमादयो व्याख्याता । अथवा विदितवान् । सकर्मकादप्यविवक्षिते कर्मणि कतरि क्त । यथा 'आशित कर्ता इत्यादौ । तथाऽऽहु -“धातोरर्थान्तरे वृत्तेत्विर्थेनोपसड्ग्रहात् । प्रसिद्धरविवक्षात कर्मणोऽकमिका क्रिया'' इति । द्वैतवने द्वैताख्ये तपोवने । यद्वा द्वे इते गते यस्मात् तद् द्वीतम । तच्च तद्वनञ्च तस्मिन। शोकमोहादिवजित इत्यर्थ । युधि रणे स्थिर युधिष्ठिर धर्मराजम् । 'हलन्तात्मप्नम्या सज्ञायाम्' इत्यलुक् । 'गवियुविभ्या स्थिर' इति षत्वम् । समाययो प्राप्तवान् । अत्र 'वने वनेचर' इति द्वयो स्वरव्यञ्जनसमुदाययोरेक- वैवावृत्त्या वृत्त्यनुप्रासो नामालङ्कार । अस्मिन् सर्गे वशस्थवृत्तम् । तल्लक्षणम्- 'जतौ तु वगस्थमुदीरित जरौ' इति ॥१॥ श्लोकान्वय-कुरूणाम् अधिपस्य श्रिय प्रजासु पालनी वत्ति वेदितुम् यम् अनुक्त, पिलिङ्गी विदित स वनेचर द्वैतवने युधिष्ठिर समाययौ । अनुवाद-कुरुजाङ्गल प्रदेश के अधिपति ( दुर्योधन ) की साम्राज्यलक्ष्मी क प्रजाविषयक कल्याणात्मक व्यापार को हृदयङ्गम करने के लिए ( धर्मराज युधिष्ठिर ने ) जिसे नियुक्त किया था, ब्रह्मचारी वेप वाला ( एव समस्त शत्रु- विषयक ) वृत्तान्तो का ज्ञाता वह वनेचर द्वैतवन मे युधिष्ठिर के पास आया। भावार्थ-दुर्योधनप्रमुखै कौरवैस्सार्द्ध द्वादशवर्षात्मकम् अरण्यवास पणीकृत्य द्यूतक्रीडा समाचरन् ज्येष्ठ पाण्डुनन्दनो युधिष्ठिर दुर्योधनमातुलेन शकुनिना छन्नपूर्वक पराभूत अथ च स्वप्रतिज्ञाम् अनुपालयन् भीमसेनाद्यनुजै प्रियतमया द्रौपद्या च सार्द्ध कम्मिश्चिद् द्वैताख्ये वने वसतिञ्चकार इत्यस्ति किञ्चिदाख्यान श्रीमन्महाभारते । अथ तमेव सन्दर्भमुररीकृत्य किरातार्जुनीयाख्य स्वमहाकाव्य प्रारभमाणो महाकविश्रीभारवि कथामुपक्षिपति । वनवामानन्तर प्रजावत्स- लस्य नरपतेयुधिष्ठिरस्य मनमि चिन्तय समजायत-कच्चित् दुर्योधनस्य शासन- प्रबन्धेपि कुरुप्रदेशस्य प्रजा कुशलिनी वर्तते ? कच्चित् दुरभिमानिना तेन दुर्योध- नेनापि प्रजाकल्याणाय किञ्चित् कृत सौराज्य यद्वा स्वार्थमात्रमेव पूरितम् ? अथ एतत्सर्वं वृत्त नि शेषेण परिज्ञातु स महाराजो वनेचरम् एक प्रेषितवान् । स च वनेचर सकलवृत्तान्त मनसावधार्य ब्रह्मचारिवेषेण आत्मान निगृह्य द्वैतवने सपरीवार निवसन्तं युधिष्ठिर प्रति ममाजगाम । टिप्पणी-किरातार्जुनीयम्-(किरातार्जुन+छ प्रत्यय) किरातार्जुन शब्द मे द्वन्द्व समास है-किरातश्च अर्जुनश्च इति किरातार्जुनौ, तो अधिकृत्य कृत काव्यम् इति किरातार्जुनीयम् । महर्षि पाणिनि के अनुसार शिशुक्रन्द, यमसभ, द्वन्द्वसमास तथा इन्द्रजननादि गण के शब्दो मे, ग्रन्थप्रणयन के सन्दर्भ मे छ प्रत्यय लगता है । सूत्र है-'शिशुक्रन्दयमसभद्वन्द्वइन्द्रजननादिभ्यश्छ । इस छ को बाद मे ईय आदेश हो जाता है-'आयन्एयईन्ईय्इय फ ढ ख छ घाना प्रत्ययादीनाम्', नियम के अनुसार । इस प्रकार किरातार्जुन+छ (= ईय) किरातार्जुनीयम् । किरात का तात्पर्य किरातवेषधारी भगवान् शङ्कर से है । कुरूणाम् कुरुप्रदेश के । कुरु शब्द के षष्ठी बहुवचन का रूप । कुरुजाङ्गल प्रदेश महाभारतकाल मे हरियाणा प्रान्त से मेरठ तक फैला हुआ था। ऐसी मान्यता है । निवास-क्षेत्र होने के कारण 'तस्य निवास' पाणिनीय सूत्र से कुरु गब्द मे अण् प्रत्यय जुडता है परन्तु 'जनपदे लुप्' (अर्थात् निवास-क्षेत्र यदि जनपद के अर्थ मे हो तो अण् प्रत्यय का लोप हो) नियम से उसका लोप हो जाता है । साथ ही साथ 'लुपि युक्तवत् व्यक्तिवचने' नियम से कुरु शब्द बहुवचन हो जाता है । इस प्रकार 'कुरूगाम्' का तात्पर्य है-कुरूणा निवासा कुरव जनपदास्त- षाम् । इसका सम्बन्ध अगले शब्द 'अधिपस्य' से है (शेष षष्ठी) । अधिपस्य- नरपते अर्थात् अधीश्वर की । अधि पाति इति अधिप (अधि उपसर्ग+पा+ कर्तरि क प्रत्यय + षष्ठी एकवचन) अर्थात् जो रक्षा करे, वह अविप है । श्रिय -राजसमृद्ध , माम्राज्यलक्ष्मी की। यहाँ इसका तात्पर्य दुर्योधन के राजकीय वैभव से है । जो पुरुष का आश्रय ले, सवरण करे वही श्री है । सुभाषित भी है-साहसे श्री प्रतिवसति अथवा उद्योगिन पुरुषसिहमुपैति लक्ष्मी । श्रयति आधारत्वेन स्वीकरोति पुरुषम् इति श्री (श्रिधातु+कर्त्तरि क्विप् प्रत्यय+कर्मणि षष्ठी, एकवचन) । प्रजासु-निवासिषु, प्रजाओ मे या प्रजाविषयक (प्र+जन् + कर्तरि ड प्रत्यय +टाप् स्त्रियाम् – सप्तमी बहुवचन) पालनीम-सरक्षणाश्रिताम् अर्थात् योगक्षेम प्रदान करने वाली (वृत्ति) जिसके द्वारा किसी का पालन किया जाय, या किसी को सरक्षण दिया जाय उसे पालनी कहते हैं । पाल्यते अनया इति पालनी, ताम् (पाल् +करणे ल्युट् + स्त्रिया डीप द्वितीया एकवचन)। वृत्तिम्-व्यापारम् अर्थात् व्यवहार को । जिसके द्वारा किसी भाव को कार्यान्वित किया जाय, चरितार्थ किया जाय, वह वृत्ति है-वय॑ते अग्रेसरीक्रियते अनया इति (वृत् करणे क्तिन्, द्वितीया एक- वचन) । वेदितुम्---अधिगन्तु, परिज्ञातुम्, जानने के लिये (विद् धातु + भावे तुमुन् प्रत्यय)। यम् --जिस वनेचर को । अयुडक्त-नियुक्त किया (युज्+लड् लकार प्रथमपुरुष एकवचन)। वणिलिङ्गी-वटुवेषधारी । वर्ण का अर्थ है ( ३७ - प्रशस्ति अर्थात् कामविकारो का अभाव । यह वर्ण या प्रशस्ति जिसके पास हो, उसे वर्णी कहेगे, जैसे गुण से युक्त गुणी, उसी प्रकार वर्ण से युक्त वर्णी । लिङ्ग का अर्थ है चिह्न । इस प्रकार वर्णी(कामभावनाओ से दूर रह्ने वाला ब्रह्मचारी) का लिङ्ग (चिह्न) उसके विशिष्ट वस्त्रविन्यास ( जटाजट, बल्कल, मृगचर्म, कमण्डलु आदि) को इङ्गित करता है। अतएव वणिलिङ्ग का अर्थ है-वटुवेप और इस वटुवेष से सम्पन्न व्यक्ति को 'वर्णिलिङ्गी' कहा जायेगा। आचार्य मल्लिनाय के अनुसार-वर्ण प्रशस्ति अस्य अस्ति इति वर्णी, ब्रह्मचारी (वर्ण+ इनि -'वर्णाद् ब्रह्मचारिणि' सूत्र मे), तस्य लिङ्ग चिह्नम् अस्य अस्ति इति वणिलिङ्गी (वणिलिङ्ग+ इनि प्रत्यय) । विदित -शत्रुविषयकवृत्तान्तविद्, जिमे जानने योग्य बाते ज्ञात हो गई हो। मल्लिनाथ के अनुसार-विदित वेदनम् अस्य अस्तीति विदित , परवृत्तान्तज्ञानवान् इत्यर्थ (विदित-मत्वर्थीय अच् प्रत्यय- अर्श आदिभ्योऽच सूत्र से)। विदित शब्द की गणना अर्शादि शब्दो मे की गई है अत यहाँ अच् प्रत्यय हुआ है (विद् धातु + भावे क्त = विदित + अच् प्रत्यय)। म वनेचर-वह वनेचर, वह अरण्यचारी जिसे भेजा गया था। जो वन मे सञ्चरण करे वह वनेचर है-वने चरति इति (वने+चर्+ट प्रत्यय 'चरेष्ट सूत्र से) । वस्तुत शब्द होना चाहिये था वनचर, परन्तु वने मे आई 'डि' (सप्तमी एकवचन) विभक्ति तत्पुरुष कृति बहुलम्' सूत्र के कारण लुप्त नही हुई। इसका आशय है-तत्पुरुष-समास मे कृतप्रत्ययान्त शब्द यदि परे हो तो विकल्प से विभक्ति का लोप नही होता । चर शब्द कृत्प्रत्यय (ट) से अन्त होने वाला है और सन्दर्भ भी तत्पुरुष समास का है, अत विकल्प से 'वने' की सप्तमी का लोप नही हुआ । द्वैतवने-एक विशिष्ट वन, जहाँ पाण्डव- वन्धु निवास करते थे । द्वि अर्थात् शोक और मोह, इत अर्थात गत (इ+क्त प्रत्यय) विलीन हो जहाँ उसे द्वीत कहेगे-द्वि+इतम् = द्वीतम् । द्वीतम् एव द्वैतम् (प्रज्ञादित्वात स्वार्थे अण् प्रत्यय) । द्वंतञ्च तद् वनञ्च इति द्वतवनम् (कर्मधारय समास), तस्मिन् । द्वैतवन मे । युधिष्ठिरम् -धर्मराज युधिष्ठिर के पास । युधि सग्रामे स्थिर इति युधिष्ठिर तम् (सप्तमी तत्पुरुषसमास) 'हलन्तात् सप्तम्या अलुक्' सूत्र से सप्तमी विभक्ति का लोप नही हुआ है तथा 'गवियुधिभ्या स्थिर' सूत्र से स्थिर के सकार को षत्व हो गया है। समाययौ-आया, प्राप्त हुआ। सम् +आ+या+लिट् लकार (णल् = अ)। प्रस्तुत पद्य मे पालनीम् एव प्रजासु मे प की, वृत्ति एव वेदितुम् मे व की, वणिलिङ्गी एव विदित मे व की तथा वने-वनेचर मे पुन 'वने' की आवृत्ति ( ३८ ) होने के कारण वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है । इस सर्ग मे आरम्भ मे ४४वे पद्य तक वशस्थ छन्द का प्रयोग है जिसका लक्षण है-जतौ तु वशस्थमुदीरित जरौ अर्थात जिसमे क्रमश जगण-तगण-जगण एव रगण क्रम मे आएँ, वही वशस्थ छन्द है । प्रस्तुत सन्दर्भ मे देखे- . श्रिय कु-।। ( = जगण) रूणाम = ss। ( = तगण ) धिपस्य = IS (= जगण) पालनीम् = 515 (= रगण) । चूंकि वगस्थ समवृत्त छन्द है, अतएव चारो ही चरणो मे वर्गों का यही क्रम होगा। सम्प्रति तत्कालोचितत्वमादेशयस्तस्य तद् गुणसम्पन्नत्वमादर्शयन्नाह - -- ای از فرم - कृतप्रणामस्य मही महीभुजे, जिता सपत्नेन निवेदयिष्यतः । न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रिय (प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः॥शा कृतप्रणामस्येति । कृतप्रणामस्य तत्कालोचितत्वात्कृतनमस्कारस्य सपत्लेन रिपृणा दुर्योधनेन 'रिपौ वैरिसपत्नारिद्विषद्द्व पणदुहृद' इत्यमर । जिता स्वायत्तीकृता मही महीभुजे युधिष्ठिराय क्रियाग्रहणात् सम्प्रदानत्वम् । निवेदयि- ष्यतो ज्ञापयिष्यत । 'लुट सद्वा' इति शतृप्रत्यय । तस्य वनेचरस्य मनो न विव्यथे । कथमीदृगप्रिय राज्ञे विज्ञापयामीति मनसि न चचालेत्यर्थ । 'व्यथ भयचलनयो' इति घातोलिट् । उक्तमर्थमर्थान्तरन्यासेन समर्थयते-न हीति । हि यस्मात् हितमिच्छन्तीति हितैषिण स्वामिहितार्थिन पुरुषा मृषा मिथ्याभूत प्रिय प्रवक्तु मेच्छन्ति अन्यथा कार्यविघातकतया स्वामिद्रोहिण स्युरिति भाव । “अमौद्यमान्धममृषाभाषित्वमभ्यूहकत्व चेति चारगुणा इति नीतिवाक्यामृतम् ॥२॥ श्लोकान्वय–कृतप्रणामस्य, सपत्नेन जिता मही महीभुजे निवेदयिष्यत तस्य मन न विव्यथे । हि हितैषिण मुषा प्रिय प्रवक्त न इच्छन्ति । अनुवाद-प्रणामक्रिया से निवृत्त (तथा) शत्र (दुर्योधन) द्वारा जीत ली गई पृथ्वी (के वृत्तान्त) को महाराज युधिष्ठिर के प्रति निवेदित करते हुये उस वनेचर का मन व्यथित नहीं हुआ, क्योकि कल्याण चाहने वाले (स्वपक्षीय)लोग मिथ्याभूत मधुरवचन बोलने की इच्छा नही करते है।
( ३६ ) भावार्थ-दुर्योधनेन यत्किञ्चिदपि भव्य सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय विहित यादृशश्च शोभनोऽशोभनो वा व्यवहारस्तेन स्वायत्तीकृत तत्सर्वमेव मनसा सम्प्रधार्य असौ वनेचर समाजगाम । प्रथममेव स महाराजाय स्वप्रणाम पश्चाच्च वैरिणा दुर्योधनेन जिता साम्राज्यभूमि तद्वृत्तान्त वा निवेदितवान् । एव व वतस्तस्य मन व्यथाक्रान्त न बभूव । यत हितेच्छव जना सत्यमैव वदन्ति, तच्च सत्य कियदपि कठोर प्रतिकूल वा भवेत् । न पुनस्ते असत्यभूत प्रिय वक्त समीहन्ते। टिप्पणी-कृतप्रणामस्य-कर लिया है प्रणाम जिसने । कृत प्रणाम येन स तस्य । बहुव्रीहि समास (कृ + भावेक्त = कृत , प्र+नम्-भावे घञ् प्रत्यय = प्रणाम ) । सपत्नेन-वैरिणा अर्थात शत्रुद्वारा । वस्तुत सपत्नशब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है, काशिकावृत्ति मे कहा गया है-'सपत्नशब्द शत्रपर्याय शब्दान्त- रम् अव्युत्पन्नमेव ।' परन्तु कुछ लोग इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार स्वीकार करते हे-मपत्नीव सपत्न , सपत्नी-अ (निपातनात् ) तेन अनुक्तेकर्तरि तृतीया । जिता महीम्-जीती गई पृथ्वी को। महीभुजे-महाराज युधिष्ठिर को ( के लिए ) मही पृथ्वी भुनक्ति इति महीभुक् तस्मै महीभुजे ( चतुर्थी ए० व०) मही+भुधातु+क्विप् प्रत्यय कर्तरि । वस्तुत प्रयोग होना चाहिए था 'महीभुज निवेदयिष्यत' परन्तु ऐसा हुआ नही क्यो कि व्याकरण का एक नियम है कि जब तु मुन् प्रत्यय से युक्त धातु का प्रयोग परोक्ष हो तो उसके कर्म मे चतुर्थी विभक्ति होती है । उपर्युक्त प्रयोग मे ‘महीभुज वोधयितु निवेदयिष्यत' कहने से ही पूरा अर्थ निकलता है किन्त, 'बोधयितुम्' का प्रयोग प्रत्यक्षत हुआ नही, फलत इस क्रिया के कर्म अर्थात 'महीभुजम्' मे चतुर्थी हो गई। सूत्र है-'क्रियार्योपपदस्य च कर्मणि स्थानिन' । निबेदयिष्यत -निवेदित करते हुए का (नि+विद् + णिच् + लृट् + शतृ प्रत्यय, षष्ठी एकवचन) । तस्य मन. न विव्यथे-उसका मन नही व्यथित हुआ । विव्यथे-व्यथ् धातु -लिट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन । हि-यत क्योकि । हितैषिण ---हित चाहने वाले लोग। हित कल्याणम् इच्छन्ति इति हितैषिण (हित+इष् + णिनि ताच्छील्ये, प्रथमा-विभक्ति बहुवचन का रूप )। मृषा-असत्य । यह अव्ययपद है । मल्लिनाथ इसे 'प्रिय' का विशेषण स्वीकार करते है । अमरकोश के अनुसार- 'मृषा मिथ्या तु वितथे' । प्रियम्-प्रिय लगने वाली बात को । प्रवक्तुम्- प्रकृष्ट रूप मे कहने के लिए (प्र+व+तु सुन्) । न इच्छन्ति-नही चाहते है। - ( ४० ) प्रस्तुत श्लोक मे, प्रथम तीन पक्तियो मे एक विशेष कथन का उपन्यास किया गया है और चौथी पक्ति मे विद्यमान एक सामान्य बात से उसका समर्थन किया गया है, फलत यहाँ अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है । लक्षण इस प्रकार है: सामान्य वा विशेषेण विशेपस्तेन वा यदि । कार्यञ्च कारण नेद कार्येण च समर्थ्यते । सावयेणेतरेणार्थान्तरन्यासोऽष्टधा मत ।। स तथापि प्रिया राज्ञि, कटुनिष्ठुरोक्तिर्न युक्तेत्याशङ्क य स्वाम्यनुज्ञया न दुग्य- तीत्याशयेनाह- द्विषा विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृत.। सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ॥३॥ द्विषामिति । रहस्येकान्ते स वनेचरो द्विषा शत्रूणाम् । कर्मणि षष्ठी । विधा- ताय विहन्तुमित्यर्थ । 'तुमर्थाच्च भाववचनात्' इति चतुर्थी । भाववचनाश्च' इति तुमर्थे घञ्प्रत्यय । अत्र तादर्थ्यमपि न दोष । तथापि प्रयोगवैचित्र्यविशेषस्याप्य- लड्वारत्वादेव व्याचक्षते । विधातु व्यापार कर्तुमिच्छत । 'समानकर्तृ केषु तुमुन् । द्विषो विहन्तुमुद्युक्तज्ञानस्येत्यर्थ । अत एव भूभृतो युधिष्ठिरस्यानुज्ञामधिगम्य । सुष्ठु भाव सौष्ठव शब्दसामर्थ्यम् । सुष्ठुशब्दादव्ययादुद्गात्रादित्वादप्रत्यय । उदारस्य भाव औदार्यमर्थसम्पत्ति तयोर्द्वन्द्व सौष्ठवौदार्ये । अत्रौदार्यशब्दस्याजा- द्यदन्तत्वेऽपि 'लक्षणहेत्वो क्रियाया इत्यत्राल्पस्वरस्यापि हेतुशब्दस्य पूर्वनिपातम- कुर्वता सूत्रकृतव पूर्वनिपातस्यानित्यत्वज्ञापनान्न पूर्व निपात । उक्त काशिकायाम् – “अयमेव लक्षणहेत्वोरिति निर्देश पूर्व निपातव्यभिचारचिह्नम्" इति । त एव विशेष तयोर्वा विशेष तेन शालते इति सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी ताम् । ताच्छील्ये णिनि । विनिश्चितार्था विशेषत प्रमाणतो निर्णीतार्थामिति वक्ष्यमाणरूपा वाचमाददे स्वीकृतवान् । उवाचेत्यर्थ ॥३॥ च श्लोकान्वय-द्विषा विघाताय विधातुम् इच्छत भूभृत अनुज्ञाम् अधिगम्य स रहसि सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी विनिश्चिताम् वाचम् इति आददे ।
~~ ४१) ? + अनुवाद-( दुर्योधनप्रभृति ) शत्रुजनो का विनाश करने के लिये प्रयत्ना- भिलापी महाराज ( युधिष्ठिर ) की अनुमति प्राप्त करके उस वनेचर ने एकान्त मे, मौष्ठव (शब्दमामर्थ्य) एव औदार्य (अर्थ-गौरव) के वैशिष्ट्य से समलड्कृत तथा विनिश्चित ( प्रामाणिक ) अर्थ वाले वचन इस प्रकार कहे । भावार्थ-प्रणामानन्तर स वनेचर शत्रुजनविनाशाय समुद्यतस्य भूपतेर्युधि- ष्ठिरस्य अनुमति प्राप्य काञ्चिद् वाचम् एकान्ते उपस्थापयामास । कीदृशी वाचम् ? सौष्ठवम् शब्दवैचित्र्य सचमत्कारकथन वा । औदार्यम् अर्थगाम्भीर्यम् । तयोश्च यवैशिष्ट्यम् अतिशयत्व तेन समलकृता वाचम् । पुनश्च कीदृशीम् विशेषेण प्रमाणतो निश्चित निर्णीत अथ तात्पर्य यस्या सा ता वाचम् । टिप्पणी-द्विषाम्-शत्रूणाम्, शत्रुओ का । द्विषन्ति द्वेष कुर्वन्ति इति द्विष तेषा द्विषाम् ( द्विष् + क्विप् कर्तरि, षष्ठी बहुवचन ) विधात शब्द मे आने वाला घना प्रत्यय चूंकि कृत् प्रत्ययो मे से एक है तथा द्विष शब्द मूलत उसका कर्म है (अर्थात् होना चाहिये-द्विप विहन्तुम्) । अतएव 'कर्तृकर्मणो कृति' ( अर्थात कृदन्त क्रिया का कर्ता य कर्म कृदन्त क्रिया के साथ पष्ठी विभक्ति में रखा जाता है ) नियम के अनुसार 'द्विषाम्' मे षष्ठी बहुवचन का प्रयोग किया गया है । विधाताय -विनाशाय अर्थात विनाश के लिए (वि+ हन् + धन भावे) वस्तुत "विधाताय' का अभिप्रेतार्थ 'विहन्तुम्' रूप ( वि+ हन् +तुमुन्) मे निहित है परन्तु 'भाववचनाच्च' (अर्थात तुमुन् प्रत्यय के अर्थ मे, भाववाच्य मे धातु के साथ घञ प्रत्यय सयुक्त हो ) सूत्रानुसार तुमुन् के स्थान पर घन प्रत्यय हुआ और बाद मे 'तुमर्थाच्च भाववचनात् ' (अर्थात किसी धातु मे तुमुन् प्रत्यय जोडने से जो अर्थ निकलता है जैसे गन्तुम् -जाने के लिये, उसी अर्थ को प्रकट करने के लिए, उसी धातु से निष्पन्न भाववाचक सज्ञा का प्रयोग करने पर उसमे चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे-यष्टु याति अथवा यागाय याति । यहाँ याग शब्द भाववाचक सज्ञा है, यष्टुम् के ही अभिप्रेतार्थ को व्यक्त करने वाला है तथा उसी धातु से बना शब्द है । यही सादृश्य विहन्त म् तथा विघाताय मे भी जानना चाहिए ) नियम से चतुर्थी हो गई है। विधातुम् - व्यापार कर्तुम् ( वि+धा+तुमुन् ) प्रयत्न करने के लिए । इच्छत -अभिलषत , इच्छा करते हुए (का) इष् + शतृप्रत्यय षष्ठी एकवचन । भूभृत -भूपाल युधिष्ठिर की। भुव पृथ्वी बिभर्ति पालयति इति भूभृत्, तस्य भूभृत (भू+भृ + क्विप् कर्तरि, षष्ठी एकवचन ) अनुज्ञामधिगम्य--अनुमति को प्राप्त करके । अनु+ज्ञा+अड् प्रत्यय भावे द्वितीया एकवचन अधि+ man गम् + ल्यप् प्रत्यय । स-वह वनेचर । रहसि-एकान्त मे ( रम् +असुन् = रहस् , सप्तमी एक वचन) । अमरकोश के प्रामाण्यानुसार -'विविक्तविजनच्छ- ननि शलाका तथा रह ।' सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीम्- सौष्ठव एव औदार्य के विशेष ( अतिशय ) से विभूषित (वाणी) को । सुष्ठु भाव सौष्ठवम् (अव्यय- पद सुष्ठ+अन भावे) उदारस्य भाव औदार्यम् ( उदार+ ष्यज प्रत्यय ) मौष्ठवञ्च औदार्यञ्च इति सौष्ठवौदार्ये (इतरेतर द्वन्द्वसमास ) तयोविशेष (वि+शिष् +भावे घन ) अतिगय इति सौप्ठवौदार्यविशेष ( पष्ठी तत्पुरुष समास ) तेन शालते शोभते इति सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी ( सौष्ठवौदार्यविशेष+शाल + णिनि ताच्छील्ये + डीप स्त्रियाम् द्वितीया एकवचन ) सौष्ठव का अर्थ है-शब्दवैचित्र्य और औदार्य का अर्थ है-अर्थ- गाम्भीर्य । विनिश्चिताम्-प्रमाणत निर्णीत अभिप्रायवाली। वि-विशेषेण अर्थात प्रमाणादिना निश्चित निर्णीत अर्थ यस्या सा ताम् वाचम् (बहुव्रीहि- समास) इति आददे-इस प्रकार बोले ( आड+दा+लिट्लकार प्रथमपुरुष एकवचन ) आड उपसर्ग के साथ दा धातु आत्मनेपदी तभी होती हे जब उसका अर्थ 'आस्यविहरण' ( मुँह फैलाना) न हो । सूत्र है-'आडो दोऽनास्य- विहरणे' । यहाँ 'आददे' का तात्पर्य ग्रहण करने (लक्षणया कहने) से है। प्रस्तुत पद्य मे विघाताय-विधातुम् तथा विनिश्चिताम्-वाचम् आदि स्थलो पर वकार की आवृत्ति के कारण वृत्यनुप्रास अलङ्कार है । प्रथम तावत्प्रत्यक्षक्षोभकमात्मान प्रत्यक्षोभ याचते. - कियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो, न वञ्चनीयाः प्रभवोऽनुजीविभिः । अतोऽर्हसि क्षन्तुमसाधु साधु वा, हितं मनोहारि च दुर्लभ वचः ॥४॥ क्रियास्विति । हे नृप । क्रियासु कृत्यवस्तु ष युक्त नियुक्त रनुजीविभिभूत्यै । चारादिभिरित्यर्थ । चरन्तीति चरा । पचाद्यच् । त एव चारा । चरे पचाद्य- जन्तात्प्रज्ञादित्वादण्प्रत्ययः। त एव चक्ष र्येषा ते चारचक्षुष । 'स्वपरमण्डले, कार्याकार्यावलोकने चाराश्चषषि क्षितिपतीनाम्' इति नीतिवाक्यामृतम् । प्रभवो निग्रहानुग्रहसमर्था स्वामिनो न वञ्चनीया न प्रतारणीया । सत्यमेव वक्तव्या ( ४ ) इत्यर्थ । चारापचारे चक्ष रपचारवद्राज्ञा पदे-पदे निपात इति भाव । अतोऽप्र- तार्यत्वाद्ध तो । असाध्वप्रिय साधु प्रियवा। मदुक्तमिति शेष । क्षन्तु सोढुमर्हसि । कुत । हित पथ्य मनोहारि प्रिय च वचो दुर्लभम् । अतो मद्वचोऽपि हितत्वाद- प्रियमपि क्षन्तव्यमित्यर्थ ॥४४॥ श्लोकान्वय- नृप । क्रियासु युक्त अनुजीविभि चारचक्षुष प्रभव न वञ्चनीया । अत असाधु साधु वा क्षन्तुम् अर्हसि । हित मनोहारि च वच दुर्लभम् । अनुवाद-हे राजन् । करणीय कार्यो मे (स्वामी द्वारा) नियुक्त किये गए सेवको को चाहिये कि वे गुप्तचर रूपी नेत्रो वाले अर्थात् सर्वात्मना गुप्तचरो पर समाश्रित (समर्थ) प्रभुओ को प्रवञ्चना न दे । अतएव मेरे अप्रिय अथवा प्रिय कथन को आप सहन करे (क्योकि) हितकारिणी, साथ ही साथ मनोहर (भी) वाणी दुर्लभ होती है। भावार्थ-अयि महाराज | सन्धिविग्रहसमर्था नरपाला सर्वतोभावेन गुप्तचराश्रिता भवन्ति । अतएव भृत्यभूताना सेषा गुप्तचराणामपि पवित्रतम तावदिद कर्तव्य यत्ते स्वप्रभून न प्रवञ्चयेयु । अयमपि वराको जनस्तादृश एव कोऽपि सेवक अतएव यत्किञ्चिदपि कर्णसुखद कर्णस्फोटक वा वचनम् अनेन जनेन प्रकाश्यते तत्सर्व सोढ समर्थोऽसि । अपि च प्रभो । ईदृशी वाणी सुदुर्लभा भवति या खलु कल्याणदात्री स्यात् मनोहारिणी चापि भवेत् । टिप्पणी-नृप-हे राजन् । (नृन् मनुष्यान् पाति रक्षति इति नृप (न+ पा+क कर्त्तरि, उपपद तत्पुरुषसमास , तत्सम्बुद्धौ हे नृप ।) जो मनुष्यो की रक्षा करे वह नृप है। क्रियासु युक्तै. अनुजीविभि.-कर्त्तव्यनिरत सेवको द्वारा । अनुजीवितु शीलम् एषाम् इति अनुजीविन ( अनु + जीव + णिनि ताच्छील्ये कतरि) ते भृत्य इत्यर्थ । चारचक्षुष.-गुप्तचर रूपी नेत्रो वाले (प्रभव का विशेषण है) चरन्ति स्वामिकार्येण गूढ पर्यटन्ति इति चरा (चम् + अच कर्त्तरि) चरा एव चारा ( (चर+प्रज्ञादित्वात स्वार्थ अण प्रत्यय) त एव चलषि येषा ते चारचक्षुष (बहुव्रीहि समास ) । राजा शासनक्षेत्र के कोने-कोने मे स्वय नही पहुँच पाता परन्तु अपने विश्वस्त गुप्तचरो द्वारा वह प्रत्येक घटना को प्रत्यक्ष कर लेता है, इसीलिए वह 'चारचक्षु' है । प्रभव -स्वामी लोग। प्रभवन्ति प्रकर्षेण वर्तन्ते इति प्रभव (प्र+भू+डकतरि, उक्ते कर्मणि प्रथमा ) न वञ्चनीया-न प्रतारणीया , ठगे नही जाने चाहिये ( वञ्च+ ।
( ४८ ) णिच् + अनीयर, उक्त कर्मणि प्रथमा, बहुवचन) । अत -अस्मात कारणात इमलिए, इस कारण से । ( एतत् +डमि+तसिल पञ्चम्यास्तसिल ) असाधु साधु वा--अप्रिय अथवा प्रिय (कथन) को। क्षन्तुम-~सोढुम्, क्षमा करने के निए, मह्न करने के लिए ( क्षम् + तुमुन् )। अहसि-समर्थ हो, योग्यता रखते हो (अह+ लट् लकार, म यम पुरुष एकवचन) हितम्-कल्याणकरम्, लाभप्रद । मनोहारि-चित्ताकर्षकम् , प्रियरूप ( मनो हतु शीलमस्येति मनोहारि-~मनम् + ह+णिनि ताच्छील्ये ) च वच -भी वचन या कथन । दुर्लभम्-दु खेन लभ्यत इति दुर्लभम् , उपपद तत्पु० समास ( दुर्+लभ् + खल कर्मणि ), हित वच , यह पूरी पक्ति एक सुभाषित है जिसका आशय यह है कि हितकर तथ्य कभी भी मनोहर नहीं होता हे और उसी प्रकार मनोहर तथ्य शायद ही कभी कल्याणकर होता हो। इस प्रकार दोनो का सयोग एक कल्पना ही है । इसीलिए कहा गया हे -'अत्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ ।' इस पद्य मे भी प्रथम तीन पक्तियो मे निबद्ध एक विशेष तथ्य का समर्थन चतुर्थ पक्तिगत सामान्य सुभाषित से किया गया है, अत अर्थान्तरन्याम अलङ्कार है (परिभाषा के लिए द्वितीय श्लोक की टिप्पणी देखे)। तहि तुष्णीम्भाव एव वरमित्याशडक्य आह- स किसखा साधु न शास्ति योऽधिप हितान्न य. सश्र णुते स किम्प्रभुः। सदानुकुलेषु हि कुर्वते ति नृपेष्वमात्येषु सर्वसम्पदः ॥५॥ स इति । य सखा अमात्यादि अधिप स्वामिन हित न शास्ति नोपदिशति । 'ब्रु विशासि' इत्यादिना गासेर्दहा दिपाठाद् द्विकर्मकत्वम् । हितानुपदेष्टा कुत्सित सखा किसखा । दुर्मन्त्रीत्यर्थ । 'किम क्षेपे' इति समासान्तप्रतिषध । तथा य प्रभुनिग्रहानुग्रहसमर्थ स्वामी हितादाप्तजनाधितोपदेष्टु सकाशात् । 'आख्या- तोपयोगे' इत्यपादानत्वात्पञ्चमी। न सशृणुते न शृणोति हितमिति शेष । 'समो गम्युच्छि' इत्यादिना सम्पूर्वाच्छणोरकर्मकत्वादात्मनेपदम् , अकर्मकत्व वैवक्षिकम् । स हितमश्रोता प्रभु किंप्रभु कुत्सितस्वामी पूर्ववत्समास । सर्वथा ? ( ४५ ) सचिवेन वक्तव्य श्रोतव्य च स्वामिना। एव च राजमन्त्रिणोरैकमत्य स्यादित्यर्थ । ऐकमत्यस्य फ्लमाह सदेति । हि यस्मान्नृपेषु स्वामिषु अमा सह भवा अमात्यास्तेषु च । 'अव्ययात्त्यप्'। सदानुकूलेषु परस्परानुरक्तेष सत्सु सर्वसम्पद सदा रतिमनुराग कुर्वन्ति । न जातु जहतीत्यर्थ । अतो मया वक्तव्य त्वया च श्रोतव्यमिति भाव । अत्रैव राजमन्त्रिणोहितानुपदेश- तदश्रवणनिन्दासामर्थ्य सिद्ध रैकमत्यलक्षणकारणस्य निर्दिष्टस्य सर्वसम्पत्सि- द्धिरूपकार्येण समर्थनात कार्येण कारणसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासोऽलङ्कार । तदुक्तम् ‘सामान्य विशेषकार्यकारणभावाभ्या निर्दिष्टप्रकृतसमर्थनमर्थान्तरन्यास' इति ॥५॥ श्लोकान्वय-य अधिप साधु न शास्ति स किं सखा ? य हितात न सशृणुते स किं प्रभु ? हि नृपेषु अमात्येष च अनुकूलेष सर्वसम्पद सदा रतिं कुर्वते । अनुवाद-जो राजा को समुचित उपदेश नही देता है क्या वह मित्र है ( कभी नही) अथवा वह किसखा- कुत्सित मित्र है । ( इसी प्रकार ) जो शुभाकाक्षी व्यक्ति से ( सदुपदेश ) नही सुनता है क्या वह प्रभु है ? ( कभी नही ) अथवा वह किंप्रभु = निन्दनीय नरेश है । क्योकि राजाओ तथा सचिवो के परस्पर अनुकूल रहने पर ही समग्र सम्पत्तियाँ सदैव अनुराग करती है ( अन्यथा नही)। भावार्थ-आत्मान मित्र मन्यमान य कोऽपि जन स्वस्वामिन समुचित- रीत्या नोपदिशति, गुह्य निगृह्य गुणान् न प्रकटीकरोति कि स सखा वर्तते ? न कदापि । यत खललक्षणमेतत् । एवमेव आत्मान प्रभु मन्यमान य कोऽपि जनः स्वभव्योपदेशकात हितवचनानि न सम्यक्तया शृणोति स किं प्रभु कदापि । वस्तुतस्तु यत्रव नृपा अमात्याश्च परस्परानुरक्ता अन्योऽन्यानुकूला सन्ति तत्रैव सकलसम्पत्तय सातत्येन राराज्यन्ते । टिप्पणी-अधिपम्-राजानम्, राजा को । साधु न शास्ति-हित न उपदिशति । कल्याणकर उपदेश नहीं देता है । 'साधु' शब्द शास्ति क्रिया- पद का कर्म है । शास्ति = शास् धातु लट् लकार, प्रथम पु० ए०व० । शास् धातु द्विकर्मक है ( दुह्याच्-पच् दण्डधिप्रच्छिचिब शासुजिमयमुषाम् । कर्मयुक् स्यादकथित तथा स्यान्नीकृष्वहाम् । ) अतएव उसके दो कर्म है। प्रधान कर्म 'साधु' और गौण कर्म 'अधिपम्' । स कि सखा-वह क्या मित्र है ? आचार्य 7 ( ४६ ) mayan मल्लिनाथ 'घण्टापथ' मे 'कि' को प्रश्नवाचक न मानकर पूरे 'किसखा' शब्द को एक समस्तपद मानते है। उनके अनुसार इसका अर्थ होगा-कुत्सित सखा इति किमखा (कर्मवारयसमास) यद्यपि तत्पुरुष समास मे राजन् , अहन् तथा मन्त्रि शब्द के अन्त मे आने पर समामान्त टच् प्रत्यय लगता है ( राजाह - सखिभ्यप्टच् ) और इस प्रकार किम् + सखि+टच् = किसख रूप बनना चाहिए था । परन्तु ऐसा हुआ नही क्योकि 'किम्' शब्द के क्षेप अथवा कुत्सावाची होने पर समासान्त प्रत्यय नही होते ( किम क्षेपे-सूत्र से ) किस खा का अर्थ मलिनाथ करते है-दुर्मन्त्री। अमरकोश किम् को पृच्छा एव जुगुप्सा, दोनो ही अर्थो में प्रस्तुत करता है-'कि पृच्छाया जुगुप्सने' । परन्तु भगीभणिति की दृष्टि से 'किम्' को यहाँ पृच्छा के ही अर्थ मे लेना उचित है । य• हितात् न मशृणुते-जो भलाई चाहने वाले व्यक्ति की बात नही सुनता है । हित शब्द हितेच्छु के अर्थ मे प्रयुक्त है। धा धातु+नपुसके भावेक्त-हितम् ( कल्याण ) हितम् अस्यास्तीति हित (हित + अच् प्रत्यय-अर्शआदिभ्योऽच्' सूत्र से ) स्मान् हितात, अर्थात् शुभेच्छ से । 'आख्यातोपयोगे' अर्थात् जिस गुरु से कोई बीज नियम पूर्वक पढी जाय या ज्ञात की जाय वह अपादान होता है जैसे- उपाध्यायात् अधीते' मे उपा-याय शब्द । हितात् मे पञ्चमी विभक्ति इसी नियम हुइ है । न किंप्रभु -वह क्या प्रभ है ? अर्थात वह व्यक्ति क्या सही अर्थ म प्रभु कहा जाने योग्य है, कत्तई नहीं । मल्लिनाथ 'कुत्सितप्रभु' अर्थ करते है ( कर्मधारय० ) हि- यत क्योकि । नृपेषु -राजाओ मे । अमात्येषु च-और सचिवो मे। अमा सह भवा अमात्या सचिवास्तेषु । 'अमा' एक अव्यय पद है जो 'सह' के अर्थ मे प्रयुक्त होता है ( अमा+त्यप्+सुप् ) अमुकूलेषु-परस्परानुरक्तेषु ( सन्सु ) अनुकूल रहने पर ( कूलम् अनुगता इत्यनकला तेषु-प्रादितत्पुरुषसमास ) । सर्वसम्पद -सकलसम्पत्तय, सारी सम्पदाएँ (सम्पद्यन्ते इति सम्पद -सम् + पद्+क्विप् प्रथमा बहुवचन, सर्वा सम्पद इति सर्वसम्पद -कर्मधारयसमास ) रतिम्-अनुराग ( को) रम् धातु+भावे क्तिन् द्वितीया ए० वचन । कुर्वते-करती है। सामान्यत कृ धातु परस्मैपदी होती है परन्तु नियम है-'स्वरितजित कत्रभिप्राये क्रियाफले' अर्थात् स्वरितेत् तथा जित धातुए आत्मनेपदी हो जाती है, बशर्ते क्रियाफल की प्राप्ति कर्ता को हो रही हो । यहाँ चूंकि रतिफल की प्राप्ति कर्ता को हो रही हो । फलत डुकृञ् धातु (ज इत् होने के कारण) आत्मनेपद मे प्रयुक्त हुई।
( ४७ ) - इस श्लोक मे अर्थान्तरन्यास अलङ्कार का एक विशिष्ट रूप द्रष्टव्य कार्य से कारण का समर्थन (इद कार्येण च समर्थ्यते) 'सकलसम्पत्तिलाभ' कार्य है और 'भूपाल एव अमात्य की परस्पर अनुकूलता' कारण है। कारण का समर्थन कार्य से किया गया है। માપ્ત 7 । सम्प्रति स्वाहकार परिहरति *निसर्गदुर्बोधमबोधविक्नवा. क्व भूपतीना चरित क्व जन्तवः तवानुभावोऽयमवेदि यन्मया निगूढतत्व नयवर्त्म विद्विषाम् ॥६॥ निसर्गति । निसर्गदुर्बोव स्वभावदुर्ग्रहम् । 'ईषदु' इत्यादिना खल् प्रत्यय । भूपतीना चरित क्व । अबोधविक्लवा अज्ञानोपहता जन्तव । मादृशा पामरजना इत्यथ । क्व नोभय सवटत इत्यर्थ । तथापि निगूढतत्त्व सवृतयाथार्थ्य विद्विषा नयवर्त्म पाडगुण्यप्रयोग । 'सन्धिविग्रह्यानानि सस्थाप्यासनमेव च । द्वैधी- भावश्च विज्ञेया पड्गुणा नीतिवेदिनाम् ।।' इत्यादिरूपो यन्मयावेदि । ज्ञातमिति यावत् । विदे कर्मणि लुङ । अयम् । इद वेदनमित्यर्थ विधेयप्राधान्यात पुंल्लिङ्गनिर्देश । तवानुभाव सामथ्यम् । अनुगतो भाव अनुभाव इति धजन्तेन प्रादिसमास न तूपसृष्टाद् घन प्रत्ययः । “श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे' इत्यनुपसर्गाद् भवतेर्धातोर्घा विधानात । अत एव काशिकायाम्-'कथ प्रभावो राज्ञा प्रकृष्टो भाव इति प्रादि- समास' इति । दोपपरिहारौ सम्यग्ज्ञात्वैव विज्ञापयामि । न तु वृथा कर्णकठोर प्रलपामीत्याशय ।।६।। श्लोकान्वय-निसर्गदुर्वोव भूपतीना चरित क्व ? अबोधविक्लवा जन्तव क्व ? विहिपा निगूढतत्त्व नयवर्त्म यन्मया अवेदि, अय तव अनुभाव । अनुवाद-(हे स्वामिन् ) स्वभावत अत्यन्त कष्टपूर्वक समझ मे आ सकने वाला कहाँ (तो) राजाओ का चरित और कहाँ अज्ञान के कारण विकली- भूत (मुझ जैसे) पामर जीव । (फिर भी) गुप्त तत्त्वो वाले, शत्रुओं के नीति- मार्ग को जो मैनं जान लिया, वह आप (ही) का प्रभाव है। भावार्थ-राजन् । दुर्योधनविषयक यत्किञ्चिदपि वृत्त मया सप्रयास ज्ञात तत्र न किञ्चिन् मदीय वैशिष्ट्यम् विद्यन । भवन्त. एव तावच्चिन्तयन्तु-क्व -- ( ४८ ) . भूपतीना निसर्गादेव दुर्ग्राह्य स्वभावादेव अननुमेय चरित , क्व च अस्मादृशा वराका क्षुद्रजन्तव. ये सततमेव अज्ञानेन विकलीभूता । एवम्भूतेऽपि भवच्छत्रूणा दुर्योधनप्रभृतीना रहस्याकुलो नीतिमार्ग मया विज्ञात एव । परन्त स्वामिन् अस्मिन् कर्मणि न तावन्मदीय किमपि बुद्धिवलक्षण्य प्रत्युत भवदीयैव कृपा वरीवति । टिप्पणी-निसर्गदुर्बोधम् - निसर्ग अर्थात स्वभाव से ही दुर्बोध । जिसका मूलत. सर्जन हो उसे 'निसग' कहते है-निसृज्यते इति निसर्ग (नि+सृज् + घञ भावे) और जो दुःखपूर्वक अर्थात अत्यन्त कठिनता से समझ मे आ सके उसे दुर्बोध कहते है-दुखेन काठिन्येन बुध्यते ज्ञायते इति दुर्बोधम् (दुर्+बुध् + रूल् कर्मणि), निसर्गात दुर्बोधम् (पचमी तत्पुरुष) । भपतीनाम्-पृथ्वीपतीनाम्, राजाओ का । जो रक्षण करे वही पति है, पृथ्वी की जो रक्षा करे वह भूपति है-पातीति पति (पा+डति कर्त्तरि) भुव पति इति भपति (षष्ठी तत्पु०) तेषाम् । चरितम्-वृत्तम् अर्थात चरित्र । क्व–कहाँ । दो 'क्व' का एक साथ प्रयोग महान् अन्तर सूचित करता है । 'तप क्व वत्से क्व च तावक वपु' (कुमार- सभव ५।४) की व्याख्या मे मल्लिनाथ कहते है-द्वौ क्वशब्दो महदन्तर सूचयत । राजा का चरित एव वनेचर की बुद्धि-इन दोनो मे भी इसी प्रकार का महान् अन्तर है । अबोधविक्लवा.-अज्ञानोपहता अर्थात अज्ञान या मौढ्य से विकली' भूत लोग । बोध या ज्ञान के अभाव को अबोध कहते है (बुध् + घन = बोध । न बोध इति अबोध-नज तत्पुरुष) जिसका क्लव अथवा शक्ति क्षीण हो जाय उसे 'विक्लव' कहते हैं-विगत क्लव शक्ति येषा ते विक्लवा (बहुव्रीहिसमास ) अबोधेन विक्लवा इति अबोधविक्लवा (तृतीयातत्पुरुष) जन्तव-सामान्यजना । जायते इति जन्तु , जो पैदा भर हो जाय अर्थात निरीह, असहाय । वस्तुत यह शब्द वनेचर के अतिसाधारण बौद्धिकस्तर को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त किया गया है। क्व-कहाँ (पहले क्व की टिप्पणी देखे ) । विद्विषाम्-विद्वेषि- जनानाम्, शत्रुओ का । द्विषन्ति द्वेष कुर्वन्ति इति द्विष शत्रव । विशेषेण द्विष इति विद्विष. ( सुप्सुपा ) तेषाम् । निगूढतत्त्वम्-छिपे हुए रहस्यो वाले (नयवर्ती का विशेषण) निगूढ तत्त्व यस्य तत् (बहु० समास ) अर्थात जिसका तत्त्व या स्वरूप अच्छी तरह छिपा हुआ हो (नि + गुह+क्त) नयवर्त्म-नीति- पथम्, नीतिमार्ग को । नीयते अनेन इति नय (नी+अच्-अनियमित रूप से घज के स्थान पर अच् प्रत्यय हो गया है) नयस्य वर्त्म इति नयवर्त्म । नयवर्ती के लिए आचार्य मल्लिनाथ ने 'षाड्गुण्य-प्रयोग' शब्द रखा है । षाड्गुण्य का अर्थ ।
- बहाने जीती गई पृथ्वी को (अब) नीति से जीतना चाह रहा है । enternet ( ४६ ) नीतिशास्त्र के अनुसार इस प्रकार है-सन्धि, विग्रह, अभियान, आसन(अवसर देखना) द्वधीभाव तथा सश्रय (आत्मसमर्पण)। यन्मया अवेदि-जो मेरे द्वारा जान लिया गया (विद् ज्ञाने+कर्मणि लुड्) । अय तव अनुभाव.-यह आपका प्रभाव है । भवनम् इति भाव , अनुगत भाव इति अनुभाव (अनु+भू+घञ) प्रादितत्पुरुष । सम्प्रति यद्वक्तव्य तदाह- विशङ्कमानो भवतः पराभवं नृपासनस्थोऽपि वनाधिवासिनः । दुरोदरच्छद्मजिता समीहते नयेन जेतु जगती सुयोधनः ॥७॥ विशङ्कमान इति । सुखेन युध्यते सुयोवन ‘भाषाया शासियुधिदृशिधृषिमू- विभ्यो युज्वाच्य' । नृपासनस्थ सिहासनस्थोऽपि । वनमधिवसतीति तस्माद् वनाधिवासिनो वनस्थात् राज्यभ्रष्टादपीत्यर्थ । भवतस्त्वत्त पराभव पराजय विशङ्कमान उत्प्रेक्षमाण सन् । दुष्टमुदरमस्येति दुरोदर द्यूतम् । पृषोदरादित्वा- त्साधु । 'दुरोदरे द्यूतकारे पणे द्यूते दुरोदरम्' इत्यमर । तस्य छद्मना मिषेण जिता लब्धा दुर्नयाजिता जगती महीम् । 'जगती विष्टपे मह्या वास्तुच्छन्दो- विशेषयो' इति वैजयन्ती । नयेन नीत्या जेतु वशीकर्तुं समीहते व्याप्रियते । न तूदास्त इत्यर्थ । बलवत्स्वामिकमविशुद्धागमञ्च जन भुञानस्य कुतो मनसो समाधिरिति भाव । अत्र 'दुरोदरच्छद्मजिताम्' इति विशेषणपदार्थस्य चतुर्थ- पदार्थ प्रति हेतुत्वेनोपन्यासाद् द्वितीयकाव्यलिङ्गमलङ्कार । तदुक्तम्-‘हेतोर्वाक्य- पदार्थत्वे काव्यलिङ्ग निगद्यते' ॥७॥ श्लोकान्वय-नृपासनस्थ अपि सुयोधन वनाधिवासिन भवत. पराभव विशङ्कमान दुरोदरच्छद्मजिता जगती नयेन जेतु समीहते । अनुवाद-सिंहासनासीन होते हुए भी (वह) सुयोधन, वनवासाश्रयी (अत- एव विपन्न) आपसे (अपनी) पराजय की आशा करता हुआ द्यूतक्रीड़ा के भावार्थ-महाराज ! सोऽसौ सुयोधन साम्प्रत राज्यासनम् अलङ्करोति विजानाति च वनवासाश्रयिणो भवतो विपन्ना दशाम् । हन्त । एवम्भूतेऽपि फा०-४ अविकरणे) नृप - दशाविपर्यये सबलोऽपि स निरन्तरमेव पाण्डुनन्दनाद् भवत स्वपराजय विशङ्कते एव । अनयैव विशङ्कया दन्द्रम्यमाणो वराक स द्यूतक्रीडाच्छन सकपटमुररी- कृता पृथ्वीमधुना स्वनीत्या प्रजोपकारकरणादिभिश्च वशीकर्तु प्रयतते । टिप्पणी-नृपासनस्थ अपि सुयोधन -सिहासन पर सुशोभित होता हुआ भी दुर्योवन । जो मनुष्यो की रक्षा करे वह नृप है-नृन् पातीति नृप (नृ+पा+ क कर्त्तरि) जिस पर बैठा जाय वह आमन है-- आस्यते अस्मिन् इति आसनम आस्+त्युट् के आसन को 'नृपासन' कहते हैं - नृपस्य आसनम् = नृपासनम् ( षष्ठीतत्पुरुष ) जो नृपासन पर बैठे वही नृपासनस्य है--- नृपामने तिष्ठति इति नृपासनस्थ ( नृपायन + स्था+क कर्तरि ) । अपि गब्द का प्रयोग निन्दा के अर्थ मे है । भारवि ने दुर्योवन के लिए सुयोधन' नाम का प्रयोग किया है । प्रभूत बलशाली एव अप्रतिम होने के कारण ही ज्येष्ठ धृतराष्ट्रपुत्र का नाम दुर्योधन रखा गया था परन्तु चूँकि महाबली भीम मल्लयुद्ध मे दुर्योवन को नृणवत् समझते थे अत वे उसे 'सुयोधन' ही कहते थे । सुयोबन का अर्थ है--जिससे सुखपूर्वक युद्ध किया जा सके । सु सुखेन युध्यते इति सुयाभर ( सु+ युद्+युच् प्रत्यय उपपदतत्पु० )। बनाधिवासिन भवत वन मे निवास करने वाले आपमें । वनम् कान्तारम् अधिवसतीति वनाधिवासी, तस्मात् ( वन+अधि+वस् ---णिनिकत्तरि ) उपपद तत्पु० । पराभवन्- पराजय को ( परा+भू+अप् भावे द्वितीया एकवचन)। विशङ्कमान - उत्प्रेक्षमाण । आशङ्का करता हुआ (वि+शङ्क+शानच् कर्तरि प्रथमा एक- वचन) दुरोदरच्छदमजिता जगतीम्-द्यूतव्याजेन वशीकृता पृथ्वीम् । जुआ खेलने के बहाने अथवा छल मे जीते गए साम्राज्य को। दुरोदर कहते है जुए को, जिसका उदर दुष्ट हो । जुआ बडे-बडे करोडपतियो को क्षण भर मे हजम कर लेता है--दुष्टम् उदर यस्य तत् दुरोदरम (दु + उदरम् = होना चाहिए दुरुदरम्' किन्तु रूप बनता है 'दुरोदरम्') इस असगत प्रयोग को पारम्परिक मान्यता दे दी गई है-'पृषोदरादीनि ययोपदिष्टम' कह कर। दुरोदरे यत् छद्म यत् कैतव ( सुप्सुपा ) तेन जिता जगतीम् ( तृतीया तत्पु० द्यूतकारे पणे द्यूते दुगेदरम्' इत्यमर । 'त्रिष्वथो जगती लोको विष्टर भवन जगत्' इत्यमर । नयेन-नीत्या, नीति से, सद्व्यवहार से ('औष ग्लोषे नयो न्याये' इत्यमर )। जेतुम्-वशीकर्तुम्, जीतने के लिए (जि+ तुमुन् )। समोहते-वाञ्छति, प्रयतते । इच्छा करता है । (सम् + ईह चेष्टायाम्, प्रथम- पुरुष ए°, लट्लकार)। - - - । इस पद्य मे काव्यलिंग अलङ्कार हे-हेतोर्वाच्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्ग निगद्यते' अर्थात् जब वाक्य या पद के अर्थ मे किसी कारण का उपन्यास किया जाय तो वहाँ काव्य लिग अलकार होता है । यहाँ 'दुरोदरच्छूअजिनाम् इस विशेषण पद का अर्थ 'नयेन जेतुम्' के अर्थज्ञान का कारण प्रस्तुत कर रहा है। 'नयेन जेतु जगती समीहने इत्युक्तम् । तत्प्रकारमाह - तथापि जिह्म. स भवज्जिगीषया तनोलि शुक्रा गुणसम्पदा यशः। सउत्तयम्भूतिमहार्यसनमा- हर विरोधोऽणि सम महात्मभिः ॥८॥ तथापीति । नयापि साशोऽपि । जिह्मो बक । बञ्बक इति यावत् । स दुर्यापनो भवानीपया । गुणर्भवन्तमाऋमिनुमिच्छयेत्यर्थ । 'हेतौ' इति तृतीया । गुणसम्पदा दानदाक्षिग्यादिगरिम् गा करणेन । शुभ्र यश तनोति । स खलो गणलोभनीय त्वत्सम्पदमान्म नाकर्तु त्वत्तोऽपि गुणवत्तामा मन प्रकटय- ती यर्थ । नन्वेव गुग्गिन सतोऽपि सज्जनविरोवो महानस्यम्य दोष इत्याशङ्क य सोऽपि सत्मसर्गान मे नीचसङ्गमावरमुत्कर्षाववादियण-~-समिति । तथा हि भूति समुन्नयन्नुत्पमापात्यन् । 'लट शतृशानचौ' इत्यादिना शतृप्रत्यय पुनर्लडग्रहणमामात् प्रथमासमानाधिकरण्यम् । महात्मभि समम् । सहेत्यर्थ । 'साक सत्रा सम सह' इत्यमर । अनायसङ्गमाद् दुजनससर्गात् 'पञ्चमी विभक्ते' इति पञ्चमी । विरोधोऽपि वर मनाप्रिय । 'दवाढते वर श्रेष्ठेत्रिपु क्लीब मनाप्रिये' इत्यमर । अत्र मै-यपक्षया मनाविप्रयत्वं विरोधस्य । 'भूति समुन्नयन्' इत्यस्य पूववाश्यान्वर समाप्तस्य वाक्यार्यस्य पुनरादानात्समाप्तपुनरा- त्ताख्यानदोपापत्ति । तदुक्त काव्यप्रकाश-समाप्तपुनरादानात्समाप्तपुनरात्तकम् इति । न च वाक्यान्त रमेतत् , येनोक्तदोपपरिहार स्यात । अर्थान्तरन्यासा- लङ्कर । स च भूति समुत्रयनस्य पदार्थ विशेषणद्वारा विरोधवत्त्व प्रति हेतुत्वाभिवानरूपकाव्यतिङ्गानुप्राणित इति ।।८।। श्लोकान्वय-तथापि जिह्म स भवज्जिगीषया गुणसम्पदा शुभ्र यश तनोति । भूति समुनयन् महात्मभि सम विरोध अपि अनार्य- सङ्गमात् वरम् ।
( ५२ ) अनुवाद-फिर भी (अर्थात् विशङ्कित होते हुए भी) कुटिल प्रवृत्तिवाला वह ( दुर्योधन ) आपको जीत लेने की लालसा वश ( दानदाक्षिण्यादि अपनी ) गुणसम्पत्ति से धवन कीति का विस्तार कर रहा है। ऐश्वर्य का अभ्युत्थान करने वाला, महापुरुषो के साथ किया गया विरोधभाव भी दुष्टो के ससर्ग की अपेक्षा अच्छा है। भावार्थ-राजन् । स दुर्योधनो नाह धर्मराजयुधिष्ठिर इव अस्य राज्यास- नस्य न्यायत अधिकारी न च प्रजा मयि अनुरक्ता । (तत्कथमह त प्रजाप्राणभूत नरपति न्यक्कत समर्थोऽस्मि' इत्येव नक्तन्दिवमनुशोचन्निव भवन्तम् आक्रमितुम् इच्छया बहुविधप्रजोपकारकरण स्वकीय धवल यश दिक्ष वितनोति | भवता साध विहितो विग्रहोऽपि तावत तस्य भूषणायैव न तु दूषणाय । यत अनेनैव विरोधेन दुर्योधन महदैश्वयमुपगमित । अतएव दुष्टजनससर्गापेक्षया अय विरोवोऽपि मनाप्रिय एव वर्तते ।। टिप्पणी-तथापि-साशकोऽपि, तदवस्योऽपि-अर्थात् आपसे पराजय की आशङ्का करता हुआ भी ( तत् + थाल् प्रत्यय-'प्रकारवचने थाल्' सूत्र से+अपि ) यद्यपि दुर्योधन अपनी स्थिति को डावॉडोल ही समझ रहा है क्योकि एक तो उसने द्यूतच्छल से राज्यासन पा लिया है, धर्मत वह उसका अधिकारी नही, और दूसरे, उसका शत्र वर्ग भी कुछ कम शक्तिशाली नही) फिर भी अपनी स्थिति को सुदृढ करने मे वह प्रयत्नशील है । 'तथापि' का यही भाव है। जिह्म स-वञ्चक दुर्योधन अर्थात् कुटिल वह दुर्योवन । जो सरलमार्ग छोड दे, कुटिलमार्ग अपना ले उसे 'जिह्म' कहते हैं। जहाति परित्यजति सरलमार्गम् इति जिह्म अथवा हीयते सरलमार्गात् इति जिह्म ( हा = ह= जिह + मन् प्रत्यय औणादिक = जिह्म ) "जिह्मस्तु कुटिले मन्दे' इति हैम । 'जिह्मस्तु कुटिलेऽलसे' इत्यमर । भवज्जिगीषया-आपको जीतने की इच्छा से । जीतने की इच्छा को 'जिगीषा' कहते है-जेतुम् इच्छा जिगीषा (जि+ सन्+अ+टाप् स्त्रियाम् ) । जिगीषा इति भवज्जिगीषा ( षष्ठीतत्पु० ), तया (हेतो' तृतीया )। गुणसम्पदा-गुण- सम्पत्ति से । गणाना सम्पत् इति गुणसम्पत् (षष्ठीतत्पु०), तया ( करणे तृतीया ) । शुभ्रम्-निर्मलम निष्कलङ्कम (यश का विशेषण) । जो शोभित हो उसे शुभ्र कहते हैं । शोभते इति शुभ्रम (शुभ + रक् कर्तरि ) 'शुक्लशुभ्र- शुचिश्वेतविशदश्येतपाण्डुरा' इत्यमर । यश-कीर्तिम कीर्ति को। 'यश - भवत ( ५३ ) कीति समजा च इत्यमर । तनोति-विस्तारयति, फैला रहा है । (तन् धातु, लट् लकार प्रथमपुरुष, एकवचन )। भूति । भूति समुन्नयन्-ऐश्वर्यम् आपादयन, समृद्धि वृद्धि गमयन् अर्थात् ऐश्वर्य या वैभव को बढाता हुआ । भूति का अर्थ है-ऐश्वर्य ( भू+क्तिन् भावे+अम ) 'भूतिभस्मनि सम्पदि इत्यमर । समुन्नयन् (मम + उत् + नी+ शतृ कर्तरि प्रथमा एकवचन ) समुन्नयन का सबन्ध 'विरोध' से है । महात्मभि समम्-श्रेष्ठपुरुषो के माथ । महान् आत्मा येपा ते महात्मान (बहुव्रीहिममास ), ते सह । कर्म वारय एव बहुव्रीहि समास मे समानाधिकरण अथवा जातीय शब्द परे रहने पर ‘महत्' के स्थान मे महा' आदेश हो जाता है। सूत्र है-'आन्महत समानाधिकरग- जातीययो' । 'महान् आत्मा' मे भी आत्मा समानाधिकरण शब्द है, अत 'महान्' ( महत् ) के स्थान पर 'महा' हो गया। 'महात्मभि' मे तृतीया 'सहयुक्तेऽप्रवाने' सूत्र में हुई है ( अर्थात् सह, साक सार्ध एव समम् के योग मे अप्रधान मे तृतीया होती है)। विरोध अपि-विग्रह अपि, वैमनस्य भी । विरुध्यते इति विरोध (वि+रुध् +घञ्ज भावे) अपि समुच्चय के अर्थ मे है । अनार्यसङ्गमात्-दुष्टजनससर्गात्, दुष्टो के साहचर्य या सङ्गति की अपेक्षा । प्रकृत या सभ्य आचरणवाला व्यक्ति आर्य कहा जाता है । जो इस प्रकार का न हो वही अनार्य है । आर्य शब्द की व्युत्पत्ति-अर्य्यन्ते गम्यन्ते आचारपूतत्वात् आश्रीयन्ते इति आर्या ( ऋ+ ण्यत् कर्मणि )। आर्य का लक्षण-कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे स वै आर्य इति स्मृत ।। न आर्या अनार्या ( ना तत्पु०), अनार्याणा मङ्गम ( सम + गम् +अप भावे ) इति अनार्यसगम (षष्ठीतत्पु० ), तस्मात् । 'नीचोऽनार्योऽकुलीनोऽपि शठो दुर्वृत्त' इत्यमर । वरम् -मनाप्रियम् कुछ प्रिय ( ही ) है । 'देवाढते वर श्रेष्ठे त्रिषु क्लीब मनाप्रिय' इत्यमर । प्रस्तुत पद्य मे 'सामान्य से विशेष का समर्थन' रूप अर्थान्तरन्यास अलङ्कार सुस्पष्ट है । साथ ही साथ 'वर विरोधोऽपि सम महात्मभि , रूप कार्य का हेतु 'भूति समुन्नयन्' पद से व्यक्त होने के कारण कायलिंग अलङ्कार भी है । इनके लक्षण पूर्व-व्याख्यात पद्यो मे देखे । ननु 'कातर्य केवला नीति' इत्याशङ्कय नीतियुक्तपौरुषमस्येत्याह सन कृतारिषड्वर्गजयेन मानवी- मगम्यरूपा पदवी प्रपित्सुना। विक विभज्य नक्तन्दिवयस्ततन्द्रिणा वितन्यते तेन नयेन पौरुषम ॥६॥ कृतेति । पष्णा वर्ग पड्वर्ग । अरीणाम त शत्रणा कामक्रोधादीना षड्व- र्गोऽरिषड्वर्ग शिवभागवतवत्समास । तस्य जय कृतो येन त्न तथोक्तेन विनीतेनेत्यर्थ । विनीताधिकार प्रजापालन मिति भाव । अगम्यरूपा पुरुषमात्र- दुष्प्राप्याम । मनोरिमा मानवीम् । मन्पदिप्टसदाचारक्ष ण्णामित्यथ । पदवी प्रजापालनपद्धति प्रपिन्मुना प्रपनमिच्छना । प्रपद्यते सन्नन्तादुप्रत्यय 'सनिमीमा'- इत्यादिनेसादश । अत्र 'लोपोऽभ्यासस्य' इत्यभ्यासलोप । अस्ता तन्द्रिरालस्य यस्य तेनास्ततन्द्रिणा । अनल सेनेत्यर्य । तदि सोनो धातु । तस्माद् 'वटक्रयादयश्च' इत्यौणादिक तिन् प्रत्यय 'कृदिकारादक्तिनो वा दीप' इति । 'वन्दीघटीतरीतन्द्री' इति डीषन्तोऽपि इति क्षीरस्वामी । तथा रामायणे प्रयोग 'निस्तन्द्रिरप्रमत्तश्च स्वदोपपरदोपवित' इति । तेन -दुर्योधनेन । पुरुषस्य कर्म पौरुष पुरुपकार । उद्योग इति यावत् । युवादित्वादण प्रत्यय । 'पौरप पुरुपस्योत्ते भावे कर्मणि तेजमि' इति विश्व । नक्त च दिवा च नक्तन्दिवम् । अहोरात्रयोरित्यर्थ । 'अचतुर-' इत्यादिना सप्तम्यर्यवृत्योरव्योर्द्वन्द्वनि- पातेऽसमासान्त । विभज्याच्या वेलायामिद कर्मेति विभाग कृत्वा नयेन नीत्या विस्तार्यते ॥ ॥ श्लोकान्वय-कृतारिषड्वर्गजयेन अगम्यरूपा मानवी पदवी प्रपित्सुना अस्ततन्द्रिणा तेन नक्तन्दिव विभज्य नयेन पौरुप वितन्यते । अनुवाद-( कामक्रोधादि ) अन्त शत्रुओ के पड्वर्ग पर विजय प्राप्त करने वाले, अगम्य रूपवाली--मनूपदिष्ट प्रजापालनपद्धति को चरितार्थ करने की आकाक्षा वाले ( अतएव ) आलस्यविहीन अर्थात् उत्साहमम्पन्न उस दुर्योधन द्वारा ( कार्योचित ) समय का विभाजन करके, नीतिपूर्वक पुरुषार्थ का विस्तार किया जा रहा है। भावार्थ- -राजन् । प्रजानुकूल्य लोकप्रियत्व च समवाप्तु कि कि न क्रियते तेन दुर्योधनेन | प्रथममेव तेन कामक्रोधमोहलोभमदमात्सय प्रभृतिषट्सख्याका अन्तश्शत्रव वशीकृता यतो हि विनीताधिकार प्रजापालन मिति । अथ साम्प्रत पुरुषमात्रदुरापा भगवता मनुना समुपदिष्टा सदाचारयुक्ता प्रजापालन- ( ५५ ) पद्धति चरितार्थ यितुम् आलस्यादिक विरुद्धभावमपहाय तेन स्वपौरुष विस्तार्यते। स्वामिन् । स्वोद्योगप्रकाशनेऽपि दुर्योधनो नीतिमेवावलम्बते । अथ च पूर्वमेव निश्चि नोति यदस्या वेलायामिद कर्म करणीयम् इति । न तस्य कार्ये समयोपरोध जायते इत्यर्थ । टिप्पणी-कृतारिपड्वर्गजयेन-कर लिया हे शत्रुओ के षड्वर्ग पर विजय जिसने । मल्लिनाथ इन शत्रुओ को 'अन्त शत्रु' कहते है। वरतुत ये मानवमात्र मे विद्यमान विघटनकारी प्रवृत्तियाँ है जिनकी संख्या छ बताई गई है-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एव मात्सर्य ( ईर्ष्या )। इन्ही छहो का समूह ‘पड्वर्ग कहा जाता है । इस प्रकार-कामक्रोधादिकाना षण्णा वर्ग इति षर्डवर्ग , अरीणा षड्वर्ग , इति अरिषड्वर्ग , तस्य जय इति अरिपड्वर्ग- जय (सर्वत्र षष्ठीतत्पु०), कृत अरिषड्वर्गजय येन स तेन दुर्योवनेन(बहुव्रीहि- समाम ।। अगम्यरूपाम्-अगम्य अर्थात् जटिल स्वरूपवाली, अगम्य रूप यस्या मा ताम (बहुव्रीहि ) अथवा अतिशयेन अगम्या इति अगम्यरूपा, ताम --( अगम्य+रूपम् प्रत्यय+टाप् स्त्रियाम --'प्रशमाया रूपम् ) । 'शाकुन्तलम् प्रथमाङ्क' मे भी इसी प्रकार का प्रयोग द्रष्टव्य है-जन्म यस्य पुरोर्वशे युक्तरूपमिद त्वयि १।११॥ मानवीम्-मनूपदिष्टाम , सदाचार- क्ष ण्णामित्यर्थ अर्थात् मनुस्मृतिकार भगवान् मनु की। मनुस्मृति के टीका- कार श्री कुल्लूकभट्ट 'मनु' शब्द का व्याख्यान करते है-सकलवेदार्थ- मननात् मनु । तस्य इयम् इति मानवी, ताम ( मनु+अण् + डीप स्त्रियाम ) । पदवीम् ---प्रजापालनपद्धतिम्, मार्ग को । 'अयन वम मार्गाध्वपन्थान पदवी सति इत्यमर । प्रपित्सुना-प्रपत्त मिच्छना, अपनाने की इच्छा रखने वाले के द्वारा (प्र+पद्+सन् + उ कर्त्तरि, तन )। अस्ततन्द्रिणा-निरलसेन, आलस्यहीन । तन्द्रि का तात्पर्य आलस्य से है । अस्त या विनष्ट हो गई है 'तन्द्रि' जिसकी वह अस्ततन्द्रि है-अस्ता विनिहता तन्द्रि तन्द्रा आलस्य वा यस्य स तेन ( बहुव्रीहि ) तन्द्रा तन्द्रि अयवा तन्द्री, तीनो ही शब्द एकार्थक तथा स्त्रीलिंग है । 'तन्द्रि' शब्द ( ह्रस्व इकारान्त ) की व्युत्पत्ति इस प्रकार है--तदि-क्रिन् भावे, औणादिक प्रत्यय । परन्तु क्षीरस्वामी इसे दीर्घ ईकारान्त भी स्वीकार करते है = 'वन्दी- घटीतरीतन्द्रीति डीषन्तोऽपि' । रामायण का एक प्रयोग आचार्य मल्लिनाथ प्रस्तुत करते हैं-- 'निस्तन्द्रिरप्रमत्तश्च स्वदोषपरदोषवित्' इति । तेन = उस ( ५६ ) दुर्योधन के द्वारा । नक्तन्दिव विभज्य--रातदिन का विभाजन करके । नक्त एव दिवा-ये दोनो शब्द अव्यय है । नक्तञ्च दिवा च इति नक्तन्दिवम् अहोरात्रमित्यर्थ (नक्त+दिव+समासान्त अच् अत्यय, द्वन्द्वसमास ) विभज्य ( वि+भज् -- ल्यप् ) का अर्थ है--कार्यानुसार समय का विभाजन करके । आचार्य मल्लिनाथ की व्याख्या देखे----'अस्या वेलायाम् इद कर्म इति विभाग कृत्वा ।' नयेन-नीतिपूर्वकम्, नीति से । पौरुषम् --पुरुषार्थ को। पुरुप के कर्म को 'पौरुष' कहते हे-पुरुषस्य कर्म पौरुप पुरुषकार उद्योग इति यावत् (पुरुष+अण प्रत्यय, उक्त कर्मणि प्रयमा) । वितन्यते-- विस्तार्यते, प्रसार्यते । फैलाया जा रहा है, प्रकाशित किया जा रहा है, (कर्मवाच्य) वि+तन् + लट्-त कर्मणि । -- -- सम्प्रति भृत्यानुरागमाह सखीनिव प्रीतियुजोऽनुजीविनः समानमानान् सुहृदश्च बन्धुभिः । सन्तत दर्शयते गतस्मयः कृताधिपत्यामिव साधु बन्धुताम् ॥१०॥ सखीनिवेति । गतस्मयो निरहङ्कारोऽत एव स दुर्योधन सन्ततमनारत साधु सम्यक् अकपटमित्यर्थ । अनुजीविन भृत्यान् । प्रीतियुज स्निग्धान् सखी- निव मित्राणीव । दर्शयते । लोकस्येति शेष । 'हेतुमति च' इति णिच् । 'णिचश्च' इत्यात्मनेपदम् । शोभन हृदय येषा तान्सुहृदो मित्राणि च । 'सुहृद्- दुर्ह दौ मित्रामित्रयो' इति निपात । बन्धुभिर्धात्रादिभि । समानमानास्तुल्य- सत्कारान् दर्शयते । बन्धूना समूहो बन्धुता ताम् । ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यस्तल्' । कृतमाधिपत्य स्वाम्य यस्यास्ता कृताधिपत्यामिव दर्शयते । बन्धूनधिपतीनिव दर्शयतीर्थ । यथा भृत्यादिषु सख्यादिबुद्धिर्जायते लोकस्य तथा तान् सम्भावय- तीत्यर्थ । अनुजीव्यादीनाम् ‘कर्तुरीप्सिततम कर्म' इति कर्मत्वम् । पूर्वे त्वस्मिन्नेव पदान्वये वाक्यार्थमित्थ वर्णयन्ति--स राजाऽनुजीव्यादीन् सखीनिव दर्शयते । सख्यादय इव ते तु त पश्यन्ति । सख्यादिभावेन पश्यतस्तास्तथा दर्शयते । स्वमेव छन्दानुवर्तितया स्वदर्शन तेभ्य प्रयच्छतीत्यर्थ । अर्थात्तस्ये- प्सितकर्म त्वम् । अणिकर्तुरनुजीव्यादे 'अभिवादिदृशोरात्मनेपदे वेति वाच्यम्' ( ५७ ) . इति पाक्षिक कर्मत्वम् । एव चात्राण्यन्तकर्मणो राज्ञो ण्यन्ते कर्तृत्वेपि 'आरोहयते हस्ती स्वयमेव' इत्यादिवदथ यमाणकर्मान्तरत्वाभावान्नाय णेरणादिसूत्रस्य विषय इति मत्वा णिचश्च' इत्यात्मनेपद प्रतिपेदिरे । भाष्ये तु णेरणादिसूत्र-विषय- त्वमप्यस्योक्तम् । यथाऽऽह --'पश्यन्ति भृत्या राजानम् ' 'दर्शयते भृत्यान् राजा', 'दर्शयते भृत्यै राजा' अत्रात्मनेपद मिद्व भवति इति । अत्राह कैयट --ननु कर्मान्तरसद्भावादत्रात्मनेपदेन भाव्यम । उच्यते-अस्मादेवोदाहरणाद्भाष्यकार- स्यायमेवाभिप्राय ऊह्यते । अण्यन्तावस्थाया ये कर्तृकर्मणी तद्व्यतिरिक्त- कर्मान्तरसदभावादात्मनेपद न भवति । यथा-'स्थलमारोहयति मनुष्यान्, इति । इह त्वण्यन्तावस्थाया कर्तृणा भृत्याना णौ कम त्वमिति भवत्येव आत्मनेपदमिति ॥१०॥ श्लोकान्वय-गतस्मय स सन्तत साबु अनुजीविन प्रीतियुज सखीनिव, सुहृदश्च बन्धुभि समानमानान् इव, बन्धुता कृताधिपत्यामिव दर्शयते । अनुवाद--अभिमान से रहित वह ( दुर्योधन ) सदैव निष्कपट भाव से अनुचरो को स्निग्ध मित्रो की भाँति, मित्रो को महोदरो के समान आदरपात्र और बन्धुओ को ( अपने ) अधिपतियो के समान सम्भावित किया करता है। भावार्थ--अहो। सुयोधनस्य व्यवहारनपुण्यम । तस्य अनुजीविन भृत्यादय तत्कृते स्नेहसवलिता सुहृद । सुहृदश्च ते तादृशमेव सत्कार प्राप्नु- वन्ति यादृश तस्य बन्धव । अर्थात् मित्रसहोदरयो ने कोऽपि व्यवहारभेदो वर्तते । एवमेव कुरुराज बन्धुता कृताधिपत्यामिव सम्भावयति अर्थात् एव दर्शयते यथा तस्य बन्धव एव स्वामिन वर्तन्ते न खलु दुर्योधनस्तेषामधिपति । व्यव- हारोऽय दुर्योधनस्य सम्यक् रूपेण सततमेव प्रवर्तते, न चाय समयापेक्ष स्थाना- पेक्ष पात्रापेक्षश्च । टिप्पणी---गतस्मय. स --निरहवारो दुर्योधन , अभिमानशून्य वह ( सुयोधन ) गत स्मय (स्मि+ अच् भावे ) यस्य स ( बहुव्रीहिसमास ) अमरकाष के अनुसार-'दर्पोऽवलेपोऽवष्टम्भश्चित्तोद्रेक स्मयो मद ।' सन्ततम्- निरन्तर, सदैव । 'सन्तत एव सतत' दोनो शब्द एकार्थक है। इसकी व्युत्पत्ति है-सम + तन्+क्त कर्मणि (सन्ततम् ) परन्तु कभी-कभी 'सम' उपसर्ग का 'म' विकल्प से लुप्त हो जाता है ( समो वा ततहितयो ) तत और हित शब्द आगे रहने पर। उस दशा मे 'सतत' रूप ही बनता है। साधु-सम्यक, -- ५८ ) अक् पटमित्यर्थ अर्थात् सहजभाव मे । अनुजीविन --भृत्यान्, अनुचरो या मेवको को ( द्वितीया बहुवचन ) अनजीवन्ति इति अनुजीविन तान् (अन+ जीव् + णिनि कर्नरि, ताच्छील्ये) । प्रीतियुज सखीन् इद-स्निग्वान् मित्रा- गीठ, प्रीति पगे मित्रो की भाति । प्रीत्या स्नेहेन युज्यन्ते इति प्रीतियुज स्तान् ( प्री+क्तिन् भावे = प्रीति , प्रीति+ युज् + क्विन् कर्तरि ) ससीन् का विशेषण है। क्याय स्निग्ध सवया अथ मित्र सखा सुहृत्' इत्यमर । सुहृदश्च-और मित्रो को। शोभन हृदय है जिनका उन्हे सुहृद् कहते है-शोभन हृदय येषा ते सुहृद तान् । सहृत् रूप निपातन से सिद्ध हुआ है । आचार्य मलिनाथ लिखते है-- मुहृढहृदौ मित्रामित्रयो' इति निपात । बधुभि --भ्रात्रादिभि स्वजनो से, सह के अथ मे तृतीया विभक्ति । जो प्रेम से बाँध ले उन्हे बन्धु कहते है--बध्नन्ति प्रेम्णा इति वन्धव ते बन्धुभि ( बन्ध्+उण् ) । समानमानान् इव--तुल्यसत्कारानिव अर्थात् समान आदर वाले के समान । ममान है मान या आदर जिनका उन्हे । ममान तुल्य मान ( मन्+ भावे घन) आदर येपा ते समानमाना तुल्या- दरास्तान् इव । बन्धताम्--स्वजन-समूह को । बन्धुसमूह को बन्धुता कहते है--वन्यूना समूहो बन्धुता ताम् ( बन्धु+तल समूहार्थे + टाप् स्त्रियाम् , ताम् = 'ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यस्तल्' सूत्र से तल् प्रत्यय ) यह शब्द 'दर्शयते' का कर्म है । अमरकोष के अनुसार-सगोत्रबान्धवज्ञातिबन्धस्वजना समा-ज्ञातेय बन्धुता तेषा क्रमाद्भावसमूह्यो । कृताधिपत्यामिव--चरितार्थ हो रहा है आधिपत्य जिसका, उसकी भॉति कृत विहित आधिपत्यम् ( अधिपति+यक् भावे ) यस्या सा ताम । अधिपति ( अधि+पा+डति कर्तरि ) शब्द मे यक् प्रत्यय 'पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्, सूत्र से लगा है इसका अर्थ है--पत्यन्त तथा पुरोहितादि गण के शब्दो से भाव के अर्थ मे यक् प्रत्यय होता है । परन्तु चूँकि 'अधिपति' शब्द का परिगणन स्पष्टत ब्राह्मणादि गण मे किया गया है, अतएव ‘गुणवचनब्राह्मणादिभ्य कर्मणि च' सूत्र से इसमे ष्यत्र प्रत्यय भी लग जायेगा। दोनो ही रूप सभव है । दर्शयते--सम्भावयति । प्रदर्शित करता है--दृश+णिच+लट्- त । यहाँ 'णिचश्च' नियम से आत्मनेपद का प्रयोग विहित है। णिजन्त धातु आत्मनेपदी तभी होती है जब क्रियाफल कर्तृगामी हो। यहाँ भी दर्शनव्यापार' कर्ता अर्थात् दुर्योधन निष्ठ है, फलत आत्मनेपद प्रयोग हुआ है।
( ५६ ) -- न चाय त्रिवर्गात्प्रमाद्यतीत्याह असक्तमाराधयतो यथायथ विभज्य भक्त्या समपक्षपातया। गुणानुरागादिव सख्यमीयिवान् न बाधतेऽस्य विगणः परस्परम् ॥११॥ अमक्तमिति । यथायथ यथास्व विभज्य । असकीर्णरूप विविच्येत्यर्थ । 'यथास्वे यथायथम इति निपातनाद् द्विीवो नपु सकत्व च । "ह्रम्वो नपु नके प्रातिपदकस्य' इति ह्रस्वत्वम् । पक्षपात पक्षपात आसक्तिविशेप समस्तुल्यो यम्या तया समपक्षपातया (तुल्यादरया) भक्त्याऽनुरागविशेषेण । पूज्येष्वनुरागो भक्तिरित्युपदश । पूज्यश्चाय त्रिवर्ग इति । असक्तमनासक्तम । अव्यमनितयेति यावत् । आराधयत मेवमानस्यास्य दुर्योधनस्य त्रयाणा धर्मार्थकामाना गणस्त्रि- गणस्त्रि वर्ग । 'त्रिवर्गो धर्मकामार्थेश्चतुर्वर्ग समोक्षक' इत्यमर । गुणानुरागान- दीयगुणेष्वनुरागात् । गुणवदाश्रयलोभादित्यर्थ । सख्य मैत्रीम । 'सख्युर्य' इति यप्रत्यय । उपयिवानुपगतवानिवेत्युत्प्रेक्षा। 'उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च' इति क्वसुप्रत्ययान्तो निपात । नात्रोपसगस्तन्त्रम् इति काशिकाकार आह स्म । परस्पर न बाधते । समवर्तित्वादस्य धर्मार्थकाम परस्परानुपमर्दैन वर्वन्त' इत्यर्थ । उक्त च- थर्मार्थकामा सममेव मेव्या यो ह्य कसक्त म जनो जघन्य' इति ॥११॥ - । श्लोकान्वय-यथायथ विभज्य समपक्षपातया भक्त्या असक्तम आराधयत अस्य त्रिगण गुणानुरागात् सख्यम् ईयिवानिव परस्परम न बाधते । अनुवाद-ययोचित रूप से विवेचन करके, समान पक्षपातयुक्त अनुराग- भाव मे, बिना (किसी) आसक्ति के सेवन करते हुए इस दुर्योधन के (धर्म, अर्थ एव काम के) त्रिवर्ग परस्पर विरोध नही करते हे मानो दुर्योधन के गुणो पर लुब्ध होकर वे परम्पर मित्रता को प्राप्त हो गए हो। - भावार्थ-राजन् । धर्मार्थकामा परस्परानुपमर्देन वर्वन्ने । उक्तञ्च- धर्मार्थकामा सममेव सेव्या यो ह्य कसक्त स जनो जघन्य । किन्तु दुर्योवनोऽसौ न जघन्य यतो हि तस्य धर्मार्थकामाना त्रिवर्ग निरन्तरमेव वर्धते । गुणवदा- श्रयलोभात् परस्पर मैत्रीभाव गतवान् इव प्रतिदिन ममुज्जृम्भते । दुर्योधनोऽपि तावदय बर्म अयमर्थ अय काम इत्यनेन रूपेण सम्यक विवेचन विवाय तुल्यादरपूर्वक तान्निषेवते । टिप्पणी-यथायथम विभज्य-ययास्त्र विभज्य, असङ्कीर्णरूप विविच्य इत्यर्थ । यथोचित रूप से । वीप्सा के अर्थ मे निपातनात् यथा शब्द को द्वित्व हो गया है । 'यथास्वे यथाययम' नियम स नपु सकलिङ्ग तथा ह्रस्वो नपु सके प्रातिपदिकस्य, सूत्र मे अन्तिम ‘यथा' के आकार को ह्रस्व हो गया है । विभज्य का अर्थ है-विभाजन या विवेचन करके (वि+भज् + ल्यप्) । समपक्षपातया भक्त्या-तुल्यादरेण अनुरागविशेषेण । समान पक्षपातवाली भक्ति के साथ । पक्षे पात इति पक्षपात (सुप मुपा-समास ) सम तुल्य पक्षपात आसक्ति- विशेष यस्या सा समपक्षपाता तया समपक्षपातया ( बहुव्रीहिसमास ) भक्त्या, अनुरागपूर्वकम् । असक्तम् -अनासक्तम , अव्यसनितया अर्थात् बिना किसी आसक्ति के, निस्सङ्ग भाव से । सञ्+क्त कतीरे = सक्त , न सक्त असक्त ( ना तत्पुरुष ) तत् यथा स्यात्तया असक्तम् ( क्रियाविशेषण ) । आराधयत अस्य --सेवमानस्य दुर्योधनस्य । आ+राध् + लट् लकार- शतृ प्रत्यय, षष्ठी एकवचन । अर्थात् मेवन करते हुए उस दुर्योवन का । त्रिगण -त्रिवर्ग । त्रयाणा, धर्मार्थकामाना गण ( षष्ठी तत्पु० ) इति त्रिगण । धर्म, अर्थ एव काम-इन तीनो को त्रिवर्ग कहते है । नाटक से इन्ही तीनो की सिद्धि बताई गई है-'त्रिवर्गसाधन नाट्यम् ।' त्रिवर्ग मे 'मोक्ष' को भी सयुक्त कर देने पर 'पुरुषार्थ चतुष्टय' सज्ञा बनती है। त्रिवर्गो धर्मकामार्थं श्चतुर्वर्ग समोक्षकै इत्यमर । गुणानुरागात् ---गुणवदाश्रयलोभात । गुणो मे अनुराग होने के कारण अथवा (दुर्योधन के) गुणानुरोधवश । गुणेषु अनुराग ( अनु + रञ्+घञ भावे ) इति गुणानुराग ( सुप्सुपा ), तस्मात् । ‘हेतौ पञ्चमी' इस नियम से हेतु ( कारण ) के अर्थ मे पञ्चमी विभक्ति हुई है कि तु 'विभाषा गुणेऽस्त्रियाम' नियम म वह वैकल्पिक ही है । सूत्र का अर्थ यह है कि स्त्रीलिङ्ग से भिन्न लिङ्ग वाले गुणवाचक शब्दो मे हेत्वर्थक पञ्चमी विभक्ति विकल्प स ही होती है । सख्यम्-मैत्रीभावम् । मित्रता को। सख्युर्भाव सख्यम् (मखि+ य प्रत्यय 'सख्युर्य' सूत्र से ।) ईयिवान् इव-प्राप्तवान् इव । प्राप्त किये हुये से । इण् गतौ+लिटक्वसु सु विभक्ति । परस्परम्-अन्योऽन्यम् । एक दूसरे को। परम्-परम् इति परस्परम् । 'कर्म का व्यतिहार, अर्थात् क्रिया की अदलाबदली सूचित करने के लिये प्राय सर्वनाम शब्द का द्वित्व हो जाता है और प्राय उनमे समास भी - ( ६१ ) कर दिया जाता है' ऐसा वार्तिककार आचार्य कात्यायन का मत है-'म- व्यतिहारे सर्वनाम्नो द्वे वाच्ये समासवच्च बहुलम'। परन्तु आचार्य भट्टोजि दीक्षित अन्य तथा पर शब्दो मे समासवद्भाव मानते ही नही 'अन्यपरयो न समामवत्' । इस प्रकार कर्मव्यतिहार के कारण सवनाम 'पर' को द्वित्व तो हुआ परस्परम्' किन्तु समास नही हुआ ( अन्यथा ‘परपरम ‘रूप बनता ) अब, जब ‘परम्-परम्' के बीच समास नहीं हुआ तो पूर्वपदस्थ (पहले पर मे स्थित ) सुप् को सु हो गया, वार्तिक है- असमासवद्भावे पूर्वपदस्थस्य सुप सुर्वक्तव्य । इस प्रकार- पर + सु + परम् = परस्परम् । न बाधते- विरोध नही करता है ( वाध् धातु, लट्लकार प्रथमपुरुष, एकवचन )। प्रस्तत श्लोक मे 'ईयिवान् इव' आदि शब्दो द्वारा एक सम्भावना व्यक्त की गई है, अतएव वहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कार है-'सम्भावनमयोत्प्रेक्षा' । अथ श्लोकत्रयेण उपायकौशल दर्शयन्नादौ मामदाने दर्शयति - निरत्यय साम न दानजित न भूरिदान विरहय्य सत्कियाम् । प्रवर्तते तस्य विशेषशालिनी, गुणानुरोधेन विना न सत्क्रिया ॥१२॥ निरत्ययमिति । तस्य दुर्योधनस्य निरत्यय निर्बावम् । अमायिकमित्यर्थ अन्यथा जनाना दुर्गहत्वादिति भाव । माम सान्त्वम् । 'साम सान्त्वमुभे समे' इत्यमर । दानवजित न प्रवर्तते । अन्यथा लुब्धाच्चावर्जनस्य शुष्कप्रियैर्वा- क्यैर्दुष्करत्वादिति भाव । उक्तञ्च-'लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्साधुमञ्जलिकर्मणा । मूर्ख छन्दानुरोधन तत्त्वार्थेन च पण्डितम ॥' इति । यथा भूरि प्रभूतम । न तु कदाचित्स्वल्पमित्यर्थ । दान धनत्याग । सदित्यादरार्थेऽव्ययम । 'आदराना- दरयो सदसतो' इति निपातसज्ञास्मरणात् । तस्य क्रिया सक्रिया विरहय्य विहाय । 'ल्यपि लघुपूर्वात्, इत्ययादेशो न प्रवर्तते । अनादरे दानवैफल्यादिति भाव । न चैव सर्वत्र, येनाविवेकित्व कोशहानिश्च स्यादित्याह-प्रति । विशेष- शालिन्यतिशययोगिनी सत्त्रियाऽऽदरक्रिया गुणानुरोधेन गुणानुरागेण विना न प्रवतते । पृथग्विना-'इत्यादिना तृतीया । गुणेष्वादरो भूरिदान चेति नोक्तदोषावकाश इत्यर्थ । अत्रोत्तरोत्तरस्य पूर्व पूर्वविशेषणतया स्थापनादेका- ( ६२ ) - वल्यलङ्कार । तदुक्त काव्यप्रकाशे--'स्थाप्यतेऽपोह्यते वापि यथापूर्व पर परम् । विशेषणतया वस्तु यत्र सैकावली द्विधा इति' ।।१२।। श्लोकान्वय-तस्य निरत्यय साम दानवजित न, भूरिदान मक्रिया विरहग्य न, विशेषशालिनी सत्क्रिया गुणानुरोवेन बिना न प्रवतते । अनुवाद--उसका निष्कपट सान्त्ववचन बिना दान क, प्रभूत-प्रचुर दान बिना सत्कार के ( ओर ) वेशिष्ट्यपूण सत्कार बिना गुणानुरोव के प्रवृत्त नही होता। भावाथ--दुर्योधनस्य सान्त्ववचन कापट्यादिदोषविरहितम् अथच दानादिभि ममल त भवति । न च स वाड्माधुरीमा ग्रेग कम-यापन जन छलयति । दानमपि तस्य तावत् सापमान न भवति प्रत्युत सत्कारपूर्वकमेव प्रवर्तते । एवमेव वैशिष्ट्यमय तस्य सत्कारकर्मापि गुणानुरोधेना विना न प्रवर्तते । एव हि नयना दुर्योवनो गुणशालिनाम् एव जनाना समादर बिदवाति, समादृत्य च तान् ममुपायनादिभि परितोपयति परितोप्य च मधुरवचनामृतस्तान् मभाज- यति ! शोभन मत्क्रियाकौशलम् ।। टिप्पणी--तस्य----दुर्योधनस्य, उस दुर्योवन का। निरत्ययम्-- निर्बारम्, अमायिकम् अर्थात् कपट आदि से विहीन । अत्यय का अर्थ है दोप । अमरकोश के प्रमाण्यानुसार- 'अत्योऽतिक्रमे कृच्छ दोपे दण्डेऽपि' । इस प्रकार, अत्यय या दोप जिससे निकल जाय उसे निरत्यय कहते ह-निर्गत अत्यय ( अति + ई + अच्भावे ) अस्मात् इति निरत्ययम् । (बहुव्रीहिसमास )। साम-सान्त्ववचनम् । अर्थात् मधुर-वचन । किसी मनुष्य को वशीभूत करने के लिये नीतिविदो ने चार उपाय बताए है-साम-दान-दण्ड और भेद । साम अथवा मधुरवचन प्रथमचरण है उस क्रम मे । अमरकोश के अनु मार-'साम सान्त्वमुभे समे' । दानवजित न -अर्थात् दान से विहीन नहीं होता। आचार्य मल्लिनाथ लिखते है---यदि दुर्योधन केवल मीठी बातो से ही सबका सत्कार करता तो सफल न होता क्योकि लोभी व्यक्ति को केवल शुष्क-प्रिय- वाक्यो से वशीभूत करना असम्भव होता है । नीति भी यही है--लुब्धमन गृह्णीयात् साधुमञ्जलिकमेणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन तत्त्वार्थेन च पण्डितम् ।। दानेन ( दा + ल्युट् भावे + टा) वजित (वृज् + णिच् + क्त कर्मणि) इति दानवर्जितम् (तृ० तत्पुरुष )। भूरिदानम्--प्रभूत धनदानम् । भूरि का अर्थ है बहुत । 'पुरहु पुरु भूयिष्ठ स्फार भूयश्च भूरि च' इत्यमर । - । कतरि, सक्रियाम् ---आदरक्रियाम् । सत् एक आदरार्थक अव्यय है । आदर तथा अनादर के लिए क्रमश सत् एव असत् शब्दो का प्रयोग होता है। इस प्रकार सत् या आदर की क्रिया को सक्रिया कहते है। आचार्य मल्लिनाथ लिखते है-सदित्यादरार्थे ऽव्ययम् । 'आदरानादरयो सदसती' इति निपातमज्ञा- स्मरणात् । तस्य क्रिया सत्क्रियाम् । मती ( अस् + लट् + शतृ स्त्रियाम् ) क्रिया इति सत्क्रिया, ताम् ( कर्मधारय समास )। विरहय्य -~-विहाय । विरहित करके, छोड करके ( वि+रह +णि +त्य )। विशेष- शालिनी-अतिशययोगिनी अर्थात् वेगि ट्य-युमा । विशे पेग (वि+शिप +घन भावे तृ० एकवचन) अतिगयेन शालते शोभते इति विशेषगामिनी ( विशेप+शाल +णिनि नाच्छील्ये) सक्रिया -आदरभाव । गुणानुरोधेन विना-गुणानुरागेण विना अर्थात् बिना गुणानुराग के । गुभानाम् अनुरोध ( अनु + रु+घञ भाव ) इति मुगानुरोध , तेन । विना के योग मे तृतीया विभक्ति हुई.--'पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम्' । अर्थात् पृथक् बिना एव नाना के योग मे विकल्पत तृतीया होती है। न प्रनतो-न प्रयुज्यते । नही प्रवृत्त होती है । प्रस्तुत श्लोक मे एकावली अलङ्कार है, जिसका लक्षण है--स्थाप्यतेऽपो- ह्यते वापि यथापूर्व पर परम्-विशेषणतया वस्तु यत्र सैकावली द्विधा । अर्थात् जहाँ पूर्व-पूर्व कयन के विशेषण रूप मे उत्तरोत्तर कथन का विधान हो वहाँ एकावली होती है। साम दान के बिना नहीं होता, दान सत्कार के बिना नही होता, सत्कार गुणानुरोध के बिना नहीं होता, यह क्रम उपर्युक्त कथन की पुष्टि करता है। अथ दण्डप्रकारमाह- वसूनि वाञ्छन्न वशी न मन्युना स्वधर्म इत्येव निवृत्तकारणः । गुरूपदिष्टेन रिपौ सुतेऽपि वा निहन्ति दण्डेन स धर्मविप्लवम् ॥१३॥ वसूनीति । वशी दुर्योवनो वसूनि धनानि वाञ्छन्न लोभान्नेत्यर्य । 'वसु तोये धने मणौ' इति वैजयन्ती। निहन्नीति शेष । तथा मन्युना कोपेन न च ।
( ६४ ) 'मन्युर्दे न्ये ऋतौ क्रुधि' इत्यमर ' धर्मशास्त्रानुसारेण 'क्रोधलोभविवर्जित ' इति स्मरणादित्यथ । किन्तु निवृत्तलोभादिनिमित्त सन्स्वधर्म इत्येव । स्वस्य राज्ञ सतो माय धर्मो ममेद कर्तव्यमित्यस्मादेव हेतोरित्यर्थ 'अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्याश्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरक चैव गच्छति ।' इति स्मरणादिति भाव । गुरूपदिष्टेन प्राड्विवाकोपदिष्टेन । "धर्मशास्त्र पुरस्कृत्य प्राड्विवाकमते स्थित । समाहितमति पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ॥” इति नारदस्मरणात् । दण्डेन दमेन । शिक्षयेत्यर्थ । रिपौ सुतेऽपि वा । स्थितमिति शेष । एतेनास्य समदर्शित्वमुक्तम् । धर्मविप्लव धर्मव्यतिक्रमम् । अधर्ममिति यावत् । निहन्ति निवारयति । दुष्ट एवास्य शत्रु शिष्ट एव बन्धु । न तु सम्बन्धनिबन्धन पक्षपातोस्तीत्यर्थ ॥१३॥ श्लोकान्वय--वशी स वसूनि वाञ्छन् न, मन्युना न, (किन्तु) निवृत्त- कारण स्वधर्म इत्येव गुरूपदिष्टेन दण्डेन रिपो सुतेऽपि वा धर्मविप्लव निहन्ति । अनुवाद--जितेन्द्रिय दुर्योधन न धनसम्पत्ति की आकाक्षावश ( और ) न ही क्रोधवश (प्रत्युत) 'यह मेरा धर्म है' बस यही मान कर, पूर्वाग्रहो से मुक्त होकर, न्यायाधिकरण द्वारा निर्दिष्ट दण्ड से शत्रु अथवा पुत्र के भी सम्बन्ध मे धर्म के व्यतिक्रम का निवारण करता है। भावार्थ--दुष्ट एव दुर्योधनस्व शत्रु शिष्ट एव बन्धु । न तु सम्बन्धनि- बन्धन पक्षपात. विद्यते तस्य । रिपु सुतो वा, य कोऽपि धर्मव्यतिक्रममा- चरति तमेव दुर्योधन गुरूपदिष्टेन दण्डेन नियमयति । तस्य दण्डप्रयोग न धनापेक्षया न वा कोपापेक्षया प्रत्युत लोभादिकै सर्वं पूर्वाग्रहैविमुक्त सन्नेव प्रवर्तते । दुर्योधन स्वयमेवानुभवति ममेद कर्त्तव्यमिति ममाय धर्म इति, 'पश्चाच्च यथोचितमनुवर्तते । टिप्पणी-वशी स.--जितेन्द्रिय दुर्योधन , इन्द्रियजयी दुर्योधन । वश का अर्थ है अधिकार या नियन्त्रण । यह नियन्त्रण जिसके पास हो वही वशी है--वश अस्यास्तीति वशी ( वश + इनि, मत्वर्थे )। वसूनि---धनानि, धनसम्पत्ति को। वैजयन्ती-कोश के अनुसार---'वसु तोये धने मणौ ।' 'वसूनि' वसु शब्द का द्वितीया बहुवचन का रूप है। वाञ्छन् न-अभिलषन् न अर्थात् न चाहता हुआ ( वाञ्छ् धातु + लट् + शतृ प्रत्यय प्रथमा विभक्ति .- ( ६५ ) एकवचन ) । मन्युना न-कोपेन न अर्थात् न ही क्रोधवश । मन्यु का अर्थ है क्रोध--'मन्युर्दैन्ये क्रतो क्रुधि' इत्यमर. । हेतो तृतीया । निवृत्तकारण अपगतहेतु अर्थात् पूर्वाग्रहो से मुक्त, बिना किसी विशेष कारण के। आचार्य मल्लिनाथ लिखते है--निवृत्तलोभादिनिमित्त सन् । निवृत्त (नि+ वृत्+क्त) अपगत कारण लोभादिहेतु यस्य स निवृत्तकारण ( बहु० समास )। इत्येव-अस्मादेव हेतोरित्यर्थ , अर्थात् इसी कारण से । गुरूपदिष्टेन- प्राविवाकोपदिष्टेन, अर्थात् धर्माधिकारियो द्वारा निर्दिष्ट किये गए । गुरुणा+ उपदिष्ट ( उप+दिश्+क्त कर्मणि ) इति गुरूपदिष्ट तेन (तृतीया तत्पु०)। राजा का धर्म है कि वह समुचित न्याय की व्यवस्था करे अन्यथा वह अपयश का भागी होता है । नीति भी यही कहती है-'अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्याश्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरक चैव गच्छति ।' अतएव महर्षि नारद के मतानुसार--'धर्मशास्त्र पुरस्कृत्य प्राड्विवकमते स्थित । समाहितमति पश्येत् व्यवहाराननुक्रमात् ।।' दण्डेन-दमेन, दण्ड द्वारा। रिपो सुतेऽपि वा--शत्रौ पुत्रेऽपि वा अर्थात् शत्रु अथवा पुत्र ही क्यो न हो किन्तु उममे भी। धर्मविप्लवम्-धर्मव्यतिक्रमम् अधर्ममिति यावत् । धर्म के उल्लघन को या अतिक्रमण को। जो मानवसमाज को धारण करे, उसे स्थिरता दे, वही धर्म है। घ्रियतेऽनेन इति धर्म (धृ+म करणे ) । धर्मस्य विप्लव (वि+प्लु+अप भावे ) इति धर्मविप्लव , तम् ( षष्ठी तत्पु०)। निहन्ति-निवारयति, रोकता है (नि+हन्, लट् लकार प्रथमपुरुष एकवचन)। . . सम्प्रति भेदकौशल दर्शयति - विधाय रक्षान् परितः परेतरा- नशङ्किताकारमुपैति शङ्कितः । क्रियापवर्गेष्वनुजीविसात्कृताः कृतज्ञतामस्य वदन्ति सम्पदः ॥१४॥ विधायेति । शङ्का सञ्जाताऽस्य शङ्कितोऽविश्वस्त सन्परित सर्वत्र स्वपर- मण्डले परेतरानात्मीयान् । अवञ्चकानिति यावत् । यद्वा परानितरयन्ति फा०--५ भेदेनात्म सात्वत ति परेतरान् । 'तत्करोतीति' ण्यन्तात्कर्मण्यण्प्रत्यय । रक्षन्तीति रक्षान् रक्षकान् । मन्त्रगुप्तिसमर्थानित्यर्थ । 'नन्दिग्रही' त्यादिना पचाद्यच् । विधाय कृत्वा । नियुज्येत्यर्थ । अशङ्किताकारमुपैति । स्वयमविश्व- स्तोऽपि विश्वस्तवदेव व्यवहरन्परमुखेनैव परान् भिनत्तीत्यर्थ । न तान्रक्षानुपे- क्षते येन तेऽपि विकुर्वीरन्नित्याह--त्रियेति । क्रियाऽपवर्गेषु कर्मसमाप्तिप्वनु- जीविसात्कृता भृत्याधीना कृता । अपरावर्तितया दत्ता इत्यार्थ । 'देये त्रा च' इति सातिप्रत्यय । सम्पद अस्य राज्ञ कृतज्ञतामुपकारित्व वदन्ति । प्रीतिदान- रेवास्य कृतज्ञत्व प्रकाश्यते, न तु वाड्मात्रेणेत्यर्थ । कृतज्ञे राजन्यनुजीविनोऽनु- रज्यन्तेऽनुरक्ताश्च त रक्षन्तीति भाव ॥१४॥ श्लोकान्वय--शङ्कित परित परेतरान् रक्षान् विधाय अशङ्किताकारम् उपैति । क्रियापवर्गेषु अनुजीविसात्कृता सम्पद अस्य कृतज्ञता वदन्ति । अनुवाद--सशक होता हुआ भी वह दुर्योधन, चारो ओर आत्मीय रक्षको को नियुक्त करके, निश्शङ्क व्यक्तियो जैसा स्वभाव बनाये रहता है । कार्य की समाप्ति हो जाने पर सेवको के अधीन की गई (अर्थात् उन्हे दी गई) सम्पत्तियाँ उसकी कृतज्ञता को सूचित करती है । भावार्थ--राजन् । पूर्वमेव मयोक्त यदसौ दुर्योधन निरन्तरमेव भवत. पराभव विशङ्कते । तथापि नयज्ञोऽसौ सर्वासु दिक्षु अवञ्चकान् नियुज्य स्वकी- यान् रक्षकान् आत्मान वीतचिन्तमिव प्रदर्शयति । स्वभावेन सर्वथा असन्दिहान इव परिलक्ष्यते । वस्तुतस्तु तस्य निखिल वैभव सेवकायत्तमेव । अतएव दुर्यो- धनोऽपि कार्यावसानेषु तेभ्योऽनुचरेभ्यो बहुविधपारितोषिकादिसम्पत्तिप्रीतिदा- नानि वितीर्य स्वोपकारित्व सूचयति । टिप्पणी-शङ्कित-अविश्वस्त , अर्थात् शङ्कालु होता हुआ। शड्का जिसमे उत्पन्न हो जाय उसे अंकित कहते है-शका सञ्जाता अस्य इति शङ्कित. (शङ्का + इतच्-तदस्य सज्जातमिति तारकादिभ्य इतच्)। परित --सर्वत्र, सर्वत , चारो ओर । 'समन्ततस्तु परित सर्वतो विष्वगित्यपि' इत्यमर । परेतरान्-आत्मीयान् अवञ्चकान् इति यावत् । विश्वस्त, आत्मीय । जो 'पर' अर्थात् शत्रु से इतर हो वे परेतर हैं अर्थात् स्वपक्षीय अथवा मित्रगण । परेभ्य' शत्रुभ्य इतरे इति परेतरे, तान् परेतरान् (पञ्चमी तत्पु०)। अथवा पर शत्रु इतर अन्य येभ्यस्ते परेतरा तान् परेंतरान् ( बहुव्रीहिसमास ) परेतर मे जब पञ्चमी तत्पुरुष समास होगा तब 'इतर' शब्द सर्वनाम होगा किन्तु बहुव्रीहि मे ( ६७ ) ( 'न बहुव्रीहौ' सूत्र से ) उमका निषेव हो जाने से 'इतर' एक अकारान्त सज्ञा शब्द की भॉति होगा। रक्षान्-रक्षन्ति इति रक्षान् रक्षकान्, मत्रगुप्ति- ममर्थान् इत्यर्थ ( रक्ष +अच् प्रत्यय )। रहस्य को गोपनीय रखने वाले रक्षकवर्ग । विधाय -कृत्वा, नियुज्य अर्थात् नियुक्त करके । (वि+धा + ल्यप् ) अङ्किताकारम् - अशकित ( व्यक्ति ) के आकार को ( प्राप्त होता है ) अशङ्कितस्य असन्दिहानम्य आकार (आ++घञ ) इति अशङ्किताकार ( पप्ठी तत्पु० ) तम् । आचार्य मल्लिनाथ का स्पष्टीकरण- 'स्वयमविश्वस्तोऽपि विश्वस्तवदेव व्यवहरन् ।' उपैति--प्राप्त करता है (उप + इ + लट्लकार प्रथम-पुरुष ए० व० )। क्रियापवर्गेषु-कर्मसमाप्तिषु अर्थात् कार्यों की समाप्ति होने पर । क्रियाणा कार्याणाम् अपवर्ग ( अप + वृज् + णिच् +घञ भावे ) इति क्रियापवर्ग (षष्ठीतत्पुरुष ), तेषु । 'सतिसप्तमी' ( यस्य च भावेन भावलक्षणम् ) का प्रयोग द्रष्टव्य । अनुजीवि- सात्कृता -भृत्याधीना कृता अर्थात् अनुजीवियो ( सेवको) द्वारा प्राप्त की गई ( अनुजीविन् + साति अनुजीविसात् + कृ+ क्त कर्मणि, टाप्- स्त्रियाम् )। सम्पद -सम्पत्तियाँ (प्रथमा विभक्ति बहुवचन का रूप )। अस्य---दुर्योधनस्य, उस दुर्योधन की। कृतज्ञताम्--उपकारित्वम् अर्थात् भावना को । जो किए गए उपकार को जाने, आभार माने वह 'कृतज्ञ' है । कृतज्ञ के भाव को कृतज्ञता कहते है---कृत जानाति इति कृतज्ञ. ( कृत+जा + क कर्तरि ), कृतज्ञस्य भाव कृतज्ञता ( कृतज्ञ + तल +टाप् ), ताम् । उपकार - अथ उपायप्रयोगस्य फलवत्ता दर्शयति - अनारत तेन पदेषु लम्भिता विभज्य सम्यग् विनियोगसत्क्रियाः। फलन्त्युपायाः परिबृहितायती- रुपेत्य सङ्घर्षमिवार्थ सम्पदः॥१५॥ - अनारतमिति । तेन राज्ञा पदेषूपादेयवस्तुषु । ‘पद व्यवसितत्राणस्थानल- क्ष्माधिवस्तुषु' इत्यमर । सम्यगसकीर्णमव्यस्त च विभज्य विविच्य । विनियोगसक्रिया । विनियोग एव सत्क्रियाऽनुग्रह सत्कार इति यावत् । यासा ( ६८ ) ता. लम्भिता स्थानेषु सम्यक्प्रयुक्ता इत्यर्थ । उपायविशेषण वा । उपाया सामादय । सङ्घर्ष परस्परस्पर्धामुपेत्येवेत्युत्प्रेक्षा । परिबृ हितायती प्रचितोत्तर- काला । स्थिरा इत्यर्थ । अर्थसम्पद अनारतमजस्र फलन्ति । प्रसवत इत्यर्थ ॥१५॥ श्लोकान्वय-तेन पदेषु सम्यक् विभज्य विनियोगसत्क्रिया लम्भिता उपाया सवर्षम् उपेत्य इव परिबृ हितायती अर्थसम्पद अनारत फलन्ति । अनुवाद-दुर्योधन द्वारा, यथोचित विवेचन करके, प्राप्य या उपादेय वस्तुओ मे प्रयोग रूपी सत्कार को प्राप्त कराए गए सामादि उपाय मानो परस्पर स्पर्धा करते हुए चिरकाल तक अक्षण्ण रहने वाली अथसम्पत्तियो को निरन्तर फला करते हैं। , भावार्थ-दुर्योधन यथोचित विविच्यव सामादीनाम् उपायाना प्रयोग करोति । यतो हि प्रयोगवैषम्ये न तेषा फलवत्त्वम् । यथोचितसन्दर्भेषु यदि सामाधुपायाना विनियोगः क्रियते तत् स एव तेषा सत्क्रिया भवति । सोऽसौ सुयोधन एवमेव विदधाति । फलतश्च ते सामादिका उपाया परस्परस्पर्धा- भावम् उपेत्यइव प्रभूत सम्पत्तिराशि निरन्तरमेव फलन्ति । स च सम्पत्तिराशि चिरकालावस्थायी भवति । टिप्पणी-तेन-उस दुर्योधन द्वारा। पदेषु-उपादेयवस्तुबु, कर्मसु इत्यर्थ । यथोचित स्थानो मे । उदा० दण्डनीय व्यक्ति के सन्दर्भ मे साम का प्रयोग अथवा मित्र के प्रति भेद का प्रयोग उचित नहीं है । सामाधुपाय तभी सफल होते है जब उनका उचित प्रयोग हो अन्यथा प्रयोक्ता का ही विनाश करते है । पद का सामान्य अर्थ है स्थान--‘पद व्यवसितत्राणस्थानलक्ष्माघ्रिवस्तुषु' इत्यमर । सम्यक विभज्य-असङ्कीर्ण विविच्य, अर्थात् भलीभॉति विवेचन करके, अच्छी तरह समझबूझ करके । विनियोगसत्क्रिया -प्रयोगानुग्रहान् अर्थात् प्रयोग रूपी सत्कार या समादर को। विनियोग (वि+नि+ युज +घञ भावे ) एव सक्रिया इति विनियोगसत्क्रिया ता (द्वितीयाबहुवचन, कर्मधारयसमास )। आचार्य मल्लिनाथ लिखते है-'उपायविशेषण वा' अर्थात् इस शब्द को 'उपाया' का विशेषण भी माना जा सकता है । तब इसकी व्याख्या इस प्रकार होगी-विनियोग सक्रिया येषा ते, उपाया ( बहु• समास ) लम्भिताः-प्रापिता, स्थानेषु सम्यक प्रयुक्ता इत्यर्थ
( ६६ )
.
उपाया
अर्थात् प्राप्त कराए गए ( लभ् + णिच् +क्त कर्मणि )। उपाया-
सामादय , साम, दान, दण्ड और भेद ये चार उपाय । जिसके द्वारा किसी
के समीप पहुँचा जाय उसे उपाय कहते है-उपति उपायते वा एभि इति
( उप + इ+उच् अथवा उप + अय् + घन-करणे ) ।
नीतिशास्त्र मे ये उपाय चतुर्विव बताए गए है। सड घर्षम्उपेत्य इव-
मानो सवर्ष को प्राप्त करते हुए । इत्र का प्रयोग यहाँ उत्प्रेक्षा ( सभावना ) के
जर्य मे हुआ है । सघर्प ( मम् + + धन भावे ) का अर्थ है - 'परस्पर-
स्पर्वाभाव' तथा उपेत्य ( उप + इ + ल्यप् ) का अर्थ है प्राप्त करके ।
परिक हितायतो ~~-प्रचितोत्तरकाला स्थिरा इत्यर्थ , अर्थात् जिनकी 'आयति'
{ भोगकाल, जीवन की अववि, कालक्षमता ) 'परिबृहित' ( वृद्धियुक्त या
अक्षुण्ण हो । परिबृ हिता (परि - वृह +णिच् + क्त कर्मणि, स्त्रियाम् )
आयति (आ+यम् +क्तिन् भावे ) यासा ता परिव हितायती (द्वितीया
बहुवचन ) यह शब्द अयसम्पद का विशेषण है। अर्थसम्पद -- अर्थसम्प-
त्तियो को अर्थात् प्रभूत वनराशि को, सम्पन्न अर्थराशि को । अर्थाना सम्पत्
इति अर्थसम्पत्, ता (द्वितीया बहुवचन ) । अनारतम्-निरन्तरम् ( 'सत-
तानारताश्रान्तसन्तताविरतानिशम्' इत्यमर ) अर्थात् जो आरत या विच्छिन्न
न हो-आ+ रम् + क्त कर्तरि = आरतम् (विच्छिन्नम् ) न आरतम् अनारतम्
(अविच्छिन्नम् इत्यर्थ ) नञ्तत्पुरुष समास । यहाँ क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त
हुआ है । फलन्ति-उत्पन्न करते है।
प्रस्तुत पद्य मे 'उमेत्य इव' प्रयोग के कारण उत्प्रेक्षा अलङ्कार है । सामादि
यथार्थत कभी प्रतिस्पर्धा नही करते तथापि अर्थसौन्दर्य उत्पन्न करने के लिए
कवि उनकी प्रतिस्पर्धा की एक सम्भावना मात्र कर लेता है, और यही
'मम्भावना' उत्प्रेक्षालङ्कार का प्राणतत्त्व है-'भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य
परात्मना
अर्थसम्पदमेवाह
- अनेकराजन्यरथाश्वसङ्कल
तदीयमास्थाननिकेतनाजिरम् ।
नयत्ययुग्मच्छदगन्धिरार्द्रता
भृश नृपोपायनदन्तिनां मदः ॥१६॥
( ७० ) अनेकेति । अयुग्मच्छदस्य सप्तपर्णपुष्पस्य गन्ध इव गन्धो यस्यासावयुग्मच्छ- दगन्धि । 'सप्तम्युपमान'-इत्यादिना बहुव्रीहिरुत्तरपदलोपश्च । 'उपमानाच्च' इति समासान्त इकार । नृपाणामुपायनान्युपहारभूता ये दन्तिनस्तेपा नृपो- पायनदन्तिना मद । 'उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा' इत्यमर । राज्ञामपत्यानि पुमासो राजन्या भत्रिया । 'राजश्वसुराद्यत्' इति यत्प्रत्यय । राजोऽपत्ये जातिग्रहणादन् । रथाश्चाश्वाश्च रथाश्वम् सेनाङ्गत्वादेकवद्भाव । अनेकेपा राजन्याना रथाश्वेन मकुल व्याप्त अनेकराजन्यरथाश्वसकुल तदीयम आस्था- ननिकेतनाजिर सभामण्डपाङ्गण भृशमत्यर्थमार्द्रता पङ्किलत्व नयति । एतत महासमृद्धिरस्थोक्ता । अतएवोदात्तालङ्कार । तथा चालकारसूत्रम --'समृद्धि- मद्वस्तुवर्णनमुदात्त' इति ।।१६।। श्लोकान्वय-अयुग्मच्छदगन्धि नृपोपायनदन्तिना मद अनेकराज्यन्यरथा- स्वसकुलम् तदीयम् आस्थाननिकेतनाजिरम भृशम् आर्द्रता नयति । अनुवाद-नरपतियो द्वारा उपहारस्वरूप अर्पित किए गए गजराजो का, सप्तपर्णपुष्पो की गन्धवाला मदजल, अनेक क्षत्रियराजपुत्रो के रथो एव अश्वो से सकुल, उसके ( मुयोवन के ) सभामण्डप के प्राङ्गण को अत्यधिक पङ्किल बनाए रहता है। भावार्थ-राजन् -राजन् । निरन्तरमेव तस्य सुयोधनस्य सभामण्डपप्राङ्गण पक- क्लिन्न दृश्यते । ये खलु राजपुत्रा अवीश्वर त प्रसादयितु मत्तगजराजान् समु- पायनीकुर्वन्ति तेषामेव मत्तमतगजाना सप्तपर्णपुष्पपरिमलेन मदजलेन तत्प्राङ्गण- मार्द्रत्व नेनीयते । प्राङ्गणञ्चापि सुयोधनस्य समागतराजपुत्राणा रथस्तुग्गैश्च परिव्याप्त भवति । ईदृशी खलु वर्तते अर्थसम्पत्ति सुयोधनस्य | टिप्पणी-अयुग्मच्छदगन्धिः-सप्तपर्णपुष्पसुरभि , अर्थात् सप्तपर्ण पुष्प के समान गन्धवाला (मद का विशेषण) । 'अयुग्मच्छद' का अर्थ है जिसके 'छद' या पत्ते 'युग्म' (जोडे या जूस) न हो अर्थात् एक, तीन, पाँच या सात, इस तरह के हो । चूंकि सतौनावृक्ष (सप्तपर्ण) की प्रत्येक टहनी मे सात ही पत्ते होते हे और चूंकि ‘सात' युग्म या जूंस सख्या नहीं है, अत इस वृक्ष का दूसरा नाम 'अयुग्मच्छद' भी है । अमरकोश मे इसी को विषमच्छद भी कहा गया है-सप्त- पर्णो विशालत्वक् शारदो विषमच्छद । न युग्म अयुग्म (नज तत्पु०) अयुग्मा (-सप्त) छदा पत्राणि अस्येति अयुग्मच्छद ( बहु० समास ) तस्य विकार पुष्पम् इति अयुग्मच्छदम् ( अयुग्मच्छद + अण प्रत्यय )। ध्यान देने योग्य तन यह है कि इस अण्प्रत्यय का यहाँ लोप हो गया है 'पुष्पमूलेषुबहुलम्' वात्तिक से तथा 'द्वहीन प्रसवैसर्वम्, (अर्थात् पुष्प एव फल सूचक शब्द सदैव नपुसकलिङ्ग में ही प्रयुक्त होते है) नियम से क्लीबत्व की प्राप्ति हुई। इस प्रकार 'अयुग्मच्छदम्' का अर्थ हुआ 'सप्तपर्णपुप्पम्' । आगे की प्रक्रिया इस प्रकार है-अयुग्मच्छदस्य गन्ध इत्ययुग्मच्छदगन्ध (पप्ठी-तत्पुरुष ) अयुग्मच्छदगन्ध इव गन्ध अस्य इति अयुग्मच्छदगन्धि (बहुव्रीहि) प्रस्तुत विग्रह मे दो 'गन्ध' शब्द आए है जिनमे समास होने पर दूसरे ‘गन्ध' शब्द का लोप हो गया है । वात्तिक है- मप्तम्युपमानपूर्वस्योत्तरपदलोपश्च वक्तव्य । अर्थात् सप्तमी में प्रयुक्त तथा उपमान पूर्वपद से वहुव्रीहि समास हो, साथ ही साथ उत्तरपद का लोप हो । उपर्युक्त विग्रह मे 'अयुग्मच्छदगन्ध' उपमान पूर्व पद था अत बहुव्रीहि समास हुआ, साथ ही उत्तरपद यानी दूसरे ‘गन्ध' शब्द का लोप भी हो गया । अब 'उपमानाच्च' (अर्थात् उपमान पद के बाद अन्त मे आने वाले शब्द को इकार अन्तादेश हो) नियम मे 'गन्ध' शब्द के अन्त मे 'इ' आदेश हो गया और शब्द बना- अयुम- च्छदगन्धि' । नृपोपायनदन्तिनाम्-राजाओ द्वारा उपहार-स्वरूप दिए गए हाथियो का। उपायन का अर्थ है भेट, उपहार---उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा इत्यमर (उप+इ+ल्युट भावे) दन्ती का अर्थ है हाथी, जिसके प्रशस्त दॉत हो- प्रशस्तौ दन्तौ एषा स्त इति दन्तिन (दन्त+इनि मत्वर्थे, प्रशसायाम् आतिशय्येवा) उपहार-स्वरूप हाथियो को 'उपायनदन्तिन' कहेगे-उपायनानि एव दन्तिन इति उपायनदन्तिन (कर्मधारय) । नृपाणाम् उपायनदन्तिन इति नृपोपायनदन्तिन (ष० तत्पु.) तेषाम मद । मदजल या दानवारि । गण्ड करो मदो दानम् इत्यमर । अनेकराजन्यरथाश्वसङ्क लम्-अनेक क्षत्रियनरेशो के रथो एव अश्वो से परिव्याप्त । अनेक का अर्थ है-बहुत, अगणित । राजा की सन्तति को 'राजन्य' कहते है-मूर्धाभिषिक्तो राजन्यो बाहुज क्षत्रियो विराट् इत्यमर । राज्ञाम् अपत्यानि पुमासो राजन्या क्षत्रिया (राजन्+यत्) राजन्य शब्द मे अपत्यार्थंक यत् प्रत्यय 'राजश्वशुराद्यत्' (जातावेव इति वाच्यम् ) सूत्र से जाति सूचित करने के लिए हुआ है । 'रथाश्व' शब्द मे समाहार-द्वन्द्व समास है- रथाश्च अश्वाश्च इति रथाश्वम् ('द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' सूत्र से समाहार द्वन्द्व तथा नपुसकलिङ्गता । इस सूत्र का अर्थ है-प्राणी, तूर्य एव सेना के अङ्गो का समस्तपद समाहार द्वन्द्वसमास होने से नपुसकलिंग होता है) सडकुल का अर्थ है भरा हुआ-सम्+कुल+क कर्तरि । अब सम्पूर्ण शब्द की व्याख्या देखे- - m ( ७२ ) न एके इति अनेके (नज तत्पु०)अनेके राजन्या इति अनेकराजन्या (कर्मधारय) अनेकराजन्याना रथाश्वम् इति अनेकराजन्यरथाश्वम् (षष्ठी तत्पु० ) अनेक- राजन्यरथाश्वेन सडकुलम् इति अनेकराजन्यरथाश्वसङ कुलम् ( तृतीया तत्पु ) तदीयम्-दुर्योधनस्य, दुर्योधन के । तस्य इदम् इति तदीयम् (तद् + छ = ईय) आस्थाननिकेतनाजिरम्-सभामण्डपप्रागणम्, सभाभवन के ऑगन को। जिसमे स्थित हुआ जाय वह 'आस्थान' है-आस्थीयते अस्मिन् इति आस्थानम् (आ+ स्या+ ल्युट अधिकरणे) । अमरकोश के अनुसार-'आस्थानी क्लीबमास्थान स्त्रीनपु सकयो सद ।' जिसमे निवास किया जाय वह 'निकेतन' हे-निकित्यते अस्मिन् इति निकेतनम् (नि+ किन् + ल्युट अधिकरणे) 'गृह गेहोदवसित वेश्म सद्म निकेतनम्' इत्यमर । अजिर का तात्पर्य है 'ऑगन' । 'अङ्गन चत्वराजिरे' इत्यमर । पूरी व्याख्या इस प्रकार होगी-आस्थानस्य निकेतनम् इति आस्थान- निकेतनम् (षष्ठी तत्पु०), तस्य अजिरम् (पुन षष्ठी तत्पु०) तत् । भृशम्- अत्यर्थम् अत्यधिकम् । आर्द्रताम्-पकिलत्वम् अर्थात् गीलेपन को । नयति- प्रापयति, गमयति, प्राप्त करा देता है। प्रस्तुत पद्य मे सुयोधन के लोकातिशायी वैभव का वर्णन होने के कारण 'उदात्त अलकार है। परिभाषा है.---'लोकातिशयसम्पत्तिवर्णनोदात्तमुच्यते ।' आचार्य मल्लिनाथ अलकारसूत्र का उद्धरण प्रस्तुत करते है-समृद्धिमद्वस्तुवर्ण- नमुदात्त इति । - सम्प्रति जनपदक्षेमकरत्वमाह “सुखेन लभ्या दधतः कृषीवलै- रकृष्टपच्या इव सस्यसम्पद. । वितन्वति क्षेममदेवमातृका- श्चिराय तस्मिन् कुरवश्चकासति ॥१७॥ सुखेनेति । चिराय तस्मिन् दुर्योधने क्षेम वितन्वति क्षेमकरे सति । देव पर्जन्य माता येषा देवमातृका वृष्ट्यम्बुजीविनो देशा । ते न भवन्ति इति 'अदेवमातृका' नदीमातृका इत्यर्थ । “देशो नद्यम्बुवृष्ट्यम्बुसम्पन्नवौहि- पालित । स्यान्नदीमातृको देवमातृकश्च यथाक्रमम् ।" इत्यमर । एतेनास्य कुल्यादिपूर्तप्रवर्तकत्वम उक्तम् । कुरूणा निवासा कुरवो जनपदविशेष ।
०- कृष्टेन पच्यन्ते इति कृष्टपच्या । “राजसूय इत्यादिना कर्मकर्तरि क्यप्प्रत्यान्तो निपात । तद्विपरीता अकृष्टपच्या इव । कृषिर्येषामस्तीति कृषीवलै । कर्पकैरित्यर्थ । "रज कृषि-" आदिना वलच प्रत्यय । 'वले' इति दीर्घ । सुखेनाक्लेशेन लभ्या लब्बु शक्या सस्यसम्पदो दधतो धारयन्त । "नाभ्यस्ताच्छतु" इति नुमागमप्रतिषेव । 'जभित्यादय षट्' इत्यभ्यस्तसज्ञा । सपन्नजनपदत्वादसतापकरत्वाच्च दु साव्योऽयमिति भाव ॥१७॥ श्लोकान्वय-चिराय तस्मिन् क्षेम वितन्वति अदेवमातृका कुरव अकृष्टपच्या इव कृषीवलै सुखेन लभ्य सस्यसपद दधत. चकासति । अनुवाद-चिरकाल से दुर्योधन द्वारा प्रजा का कल्याण करते रहने की स्थिति मे, वर्षाजल के भरोसे न रहने वाला कुरुप्रदेश, बिना जोती हुई भूमि मे ही पकी हुई सी (तथा) कृषको को अनायास प्राप्त होने वाली सम्यसम्पदा को वारण करता हुआ सुशोभित हो रहा है । भावार्थ-सुर्योधनेन किन्न मङ्गल कृत प्रजोपकाराय । कुरुजाङ्गलप्रदेशे तेन कूपकुल्यादीनि सेचनसावनानि विधाय निखिलमेव भौतिक भव्य प्रदत्तम् । फलतश्च कुरुप्रदेश न साम्प्रत वर्षाजलमपेक्षते कृषिकर्मणे । एव प्रतीयते यत् कृषाणा कर्षण विनैव निरायास सस्यसम्पदमाप्नुवन्ति, सर्वोत्कर्षण च वर्तन्ते । । टिप्पणी-चिराय-चिरकाल से, द्वितीया के अर्थ मे प्रयुक्त सुबन्तप्रति- रूपक अव्यय । 'चिराय चिररात्राय चिरस्याद्याश्चिरार्थ का' इत्यमर । तस्मिन्-दुर्योधने, उस (दुर्योधन) के द्वारा ('यस्य च भावेन भावलक्षणम्'- 'सति-सप्तमी' का प्रयोग है यहाँ)। क्षेमम् -- भव्यम्, कल्याण को । वितन्वति- आवहति (सति), वितरित करते रहने पर । आचार्य मल्लिनाथ लिखते है- 'क्षेमकरे सति' अर्थात् कल्याणमाधक बने रहने पर (वि+तन + शतृ, सप्तम एकवचन) । अदेवमातृका --अवृष्ट्यम्बुजीविन , वर्षाजल के भरोसे न रहने वाले । इन्द्र को वर्षा का देवता माना जाता है । यदि प्राकृतिक वर्षा न हो तो कृषिकार्य का होना सर्वथा असम्भव हो जाता है । अतएव 'वर्षा का देवता' ( इन्द्र या पर्जन्य ) ही किसानो के लिए माता के समान है । क्योकि माँ ममतामयी होती है, शिशु को भूखा मरता नही देख सकती । इस प्रकार वर्षा-देव ही जिनकी मॉ हो उन किसानो को 'देवमातृक' कहा जायेगा और जो वृष्टिदेवता के भरोसे न रहकर स्वय खेतीबारी कर ले, राजकीय ( ७४ ) + सेचनसाधनो से वे 'अदेवमातृक' है । अमरकोष ऐसे प्रदेश को 'नदीमातृक' की सज्ञा देता है-'देशो नद्यम्बुवृष्ट्यम्बुसम्पन्नब्रीहिपालित । स्यान्नदीमातृको देवमातृकश्च यथाक्रमम ।' यद्यपि देवमातृक प्रदेश नदीमातृक प्रदेशो से कही अधिक सुख-सम्पन्न होते है फिर भी सुयोधन ने अपने साम्राज्य मे सिचाई आदि का इतना सुखद प्रबन्ध किया है कि कुरुप्रदेश मे कोई कष्ट नही है। यह भी उसकी लोकप्रियता का परिचायक है । देव वृष्टिरूप माता येषा ते देवमातृका ( बहुव्रीहिसमास , ममामान्त क्प् प्रत्यय ) न देवमातृका इति अदेवमातृका (नत्र तत्पु०) कुरव - कुरूणा निवासा कुरवो जनपदविशेपा सुयोधन द्वारा प्रशासित कुरुजाङ्गल-प्रदेश (कुरु + अण् + जनपदे लुप)। अकृष्टपच्या इव-अयलपरिणता इव । कर्षणादि ( जुताई ) के बिना ही पकी हुई, ( सस्यसम्पद का विशेषण ) खेत की जुताई आदि करके जो फसल पकाई जाय, प्राप्त की जाय उमे 'कृप्टपच्या' कहते है-कृष्टेन ( कृष + क्त कमणि+टा) कर्षणेन पच्यन्ते इति कृष्टपच्या ( कृप्ट+ पच् + क्यप् कर्मकर्त्तरि-'राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यथा' सूत्र से निपातनात् क्यप् प्रत्यय का प्रयोग ) न कृष्टपच्या इति अकृष्टपच्या ( नञ तत्पु० )। इव का प्रयोग उत्प्रेक्षा के अर्थ मे हुआ है। कृषीवलै-कर्षकै इत्यर्थ अर्थात् कृपक् गणो द्वारा । जिनके पास खेतीबारी हो वे कृषीवल हे-कृषि अस्ति एषाम् इति कृषीवला ( कृषि+वलच् प्रत्यय मत्वर्थीय), ते कृषीवलै ( अनुक्ते कर्तरि तृतीया ) मत्वर्थीय वलच् प्रत्यय यहाँ ‘रज कृष्यासुतिपरिषदो वलच्' सूत्र से हुआ है । तात्पर्य है-- रजस् कृषि, आसुति और परिषद--इन शब्दो से मत्वर्थ मे वलच् प्रत्यय होता है । वस्तुत इस नियम से भी रूप बनना चाहिये था-'कृषिवले' । परन्तु कृषि का ह्रस्व इकार दीर्घ हो गया है 'वले' सूत्र से, जिसका अर्थ है-वलच् प्रत्यय परे रहने पर पूर्ववर्ती स्वर दीर्घ हो जाता है। कृषीवल का अर्थ है किसान---'क्षेत्राजीव कर्षकश्च कृषकश्च कृषीवल.' इत्यमर। सुखेन लभ्या-बिना किसी आयास या क्लेश के प्राप्त होने योग्य । सुखेन अक्लेशेन लभ्या ( लभ् + यत् कर्मणि ) लब्धु शक्या । 'प्रकृत्वादिभ्य उपसख्यानम्' इस नियम से 'सुखेन' मे तृतीया विभक्ति । सस्यसम्पद-सम्पन्नानि सस्यानि, अर्थात् कृषि समृद्धियो को। सस्याना ( सस् + क्यप् ) सम्पद इति सस्यसम्पदस्ता ( षष्ठी तत्पु०)। 'वृक्षादीना फलं सस्यम्' इत्यमर । दधत -धारयन्त धारण करते हुए (धा + लट् + शतृ प्रथमा बहुव० ) चकासति-- ( ७५ ) सर्वोत्कर्षेण वर्तन्ते अर्थात् शोभित हो रहे है ( चकास + लट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन)। mam ननु एव जनपदानुवर्तिन कथमर्थलाभ इत्यत आह उदारकीर्तरुदय दयावतः प्रशान्तबाध दिशतोऽभिरक्षया स्वय प्रदुग्धेऽस्य गुणैरुपस्नुता वसूपमानस्य वसूनि मेदिनी ॥१८॥ उदारेति । उदारकीर्तेर्महायशस । 'उदारो दातृमहतो' इत्यमर । दयावत परदु खप्रहाणेच्छो अतएव प्रशान्तबाध प्रशमितोपद्रव यया स्यात्तथेति क्रिया- विशेषणम् उदयविशेषणम् वा । 'वा दान्तशान्त'---इत्यादिना शमिधातोण्यन्ता- निठान्तो निपात । अभिरक्षया सर्वतस्त्राणेनोदय वृद्धि दिशत सम्पादयतो वसूपमानस्य कुबेरोपमस्य । 'वसुर्मयूखाग्निधनाधिपेषु' इति विश्व । अस्य दुर्यो- धनस्य गुणैदयादाक्षिण्यादिभिरुपस्नुता द्राविता मेदिनी वमूनि धनानि । 'वसु तोये घने मणौ' इति वैजयन्ती । स्वय प्रदुग्धे अक्लेशेन दुह्यत इत्यर्थ । दुहे कर्मकर्तरि लट् । 'न दुहस्नुनमा यक्चिणौ' इति यक्प्रतिषेध । यथा केनचिद्विदग्धेन नवप्रसूता रक्षिता च गौ स्वय प्रदुग्धे तद्वदिति भाव । अलकारस्तु-'विशेष- णमात्रसाम्यादप्रस्तुतस्य गम्यत्वे समासोक्ति' इति सर्वस्वकार । अत्र प्रतीय- मानया गवा सह प्रकृताङ्गया भेदलक्षणातिशयोक्तिवशाहोह्यत्वेनोक्तिरिति सक्षेप ॥१८॥ श्लोकान्वय-उदारकीर्ते प्रशान्तबाधम् अभिरक्षया उदय दिशत बसूप- मानस्य अस्य गुण उपस्नुता मेदिनी वसूनि स्वय प्रदुग्धे । अनुवाद-महायशस्वी दयावान्, निर्विघ्न प्रजासरक्षण द्वारा वृद्धि, प्राप्त करने वाले, कुबेर के समान इस सुयोधन के गुणो से द्रवीभूत पृथ्वी स्वयमेव सम्पदाओ को प्रस्तुत कर रही है । भावार्थ-र -राजन् । अनारतमेव प्रजासरक्षणतत्परस्य जनपदानुवर्तिनस्तस्य सुयोधनस्य कोषागार न कदापि रिक्त भवति । यद्यपि प्रजामङ्गलसाधने तस्य प्राज्य धन व्ययमुपयाति तथापि रत्नगर्भा सेय धरित्री धनदोपमस्य तस्य सद्गुणै ।
. द्रवीभूता इव स्वयमेव धनानि प्रसूते । यया खत स्ववत्सवात्सल्याभिभूता बेन स्वयमेव दुग्ध विमुञ्चति तथैव वत्सायमानस्य सुयोवनस्यापि कृते पृथ्वीयम् आनकल्यमुपगता। टिप्पणी-उदारकीर्ते-महायशम अर्थात् महायशस्वी । उदार कीति हो जिसकी वह उदारकीति है-उदाग ( उद् + ऋ + धन भावे, स्त्रीलिंग ) कीति ( कृत् + क्तिन् भावे ) यम्य स ( बहु० समास )। दयावत पग्दु खप्रहाणेच्छो अर्थात् दुसर के दुख को विनष्ट करने की इच्छा वाला, दयावान । जो दया सम्पन्न हो वह दयावान् है-दया अस्ति अस्य इति दयावान् ( दया + मतुप् ), तस्य । प्रशान्तबाधम-प्रशमितोपद्रवम यथा स्यात्तथा इति क्रियाविशेषणम् । निर्विघ्न रूप से । प्रशान्ता ( प्र + गम् + क्त कर्म- णिस्त्रियाम् ) बाधा ( बाध् + अ भावे + टाप् ) यस्मिन् कर्मणि, तत् यथा स्यात्तथा प्रशान्तबाधम् । आचार्य मल्लिनाथ 'प्रशान्तबाधम्' को 'उदयम्' का विशेपण भी मानने का विकल्प प्रस्तुत करते है। उस स्थिति मे व्याख्या इस प्रकार होगी। प्रशान्ता बाधा यस्मिन् म प्रशान्तबाध ( उदय ), तम् ( बहुव्रोहि ) अभिरक्षया-सर्वतस्त्राणेन अर्थात् सार्वत्रिक सुरक्षा के साथ । अभि + रक्ष +अ भावे+टाप् स्त्रियाम् ( तृतीया, एकवचन ) उदयम्- वद्धिम्, अभिवृद्धिको, विकास को ( उत् +इ+अच्भावे, द्वितीया एकवचन ) दिशत -सम्पादयत अर्थात् सम्पन्न करते हुए ( दिश् + लट् + शतृ षष्ठी एकवचन )। वसूपमानस्य अस्य-कुबेरसदृशस्य, धनदकुबेर के समान सुयोधन के । वसु अर्थात् कुबेर जिसके उपमान हो वह वसूपमान है। वसु कुवेर उपमान यस्य स ( बहुव्रीहि ) तस्य वसूपमानस्य । 'वसुर्मयूखाग्नि- वनादिपेषु, इति विश्वकोश । गुण -दयादाक्षिण्यादिभि अर्थात् दया, दाक्षिण्य आदि गुणो से ( अनुते कर्तरि तृतीया ) उपस्नुता-द्राविता, प्लाविता । द्रवित की गई, समाकृष्ट को गई ( उप+स्नु + क्त कर्मणि टाप् स्त्रियाम् ) । मेदिनी-पृथ्वी । 'गोत्रा कु पृथिवी पृथ्वी क्ष्मावनिमें दिनी मही' इत्यमर । मेद का अर्थ है-मॉस, मज्जा । अतएव मेदिनी का अर्थ है-मासमज्जादि से युक्त- मेद अस्ति अस्यामिति मेदिनी ( मेद + इनि मत्वर्थे, स्त्रियाम् ) पौराणिक आख्यान के अनुसार विष्णु द्वारा मधु-कैटभ नामक दानवो का जब वध किया गया तो उनके अपार मेद-समूह से पृथ्वी आच्छन्न हो गई, फलत इसे 'मेदिनी' कहा गया। मार्कण्डेय-पुराण मे द्रष्टव्य - 'मधुकैट- भयोस्त्वासीन्मेदमासपरिप्लुता। तेनेय मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभि ।"
( ७७ )
वसूनि-धनानि, सम्पत्तियो को। 'वसु तोये धने मणौ' इति वैजयतीकोश ।
स्वपंप्रदुग्धे-अपने आप दुह देती है अर्थात् स्वय प्रस्तुत कर देती है ( प्र +
दुह + लट् ते कर्मकतरि)।
-
प्रस्तुत पद्य मे 'पृथ्वी' उपमेय पक्ष है । 'दोहन' पृथ्वी का एक ऐसा काय
है जो कि गाय के पक्ष मे समान रूप से घटित हो जाता है जो कि उपमान-पक्ष
है। जब समान काय, लिङ्ग अथवा विशेषण द्वारा प्रस्तुत पदार्थ मे
( उपमेयपक्ष ) अप्रस्तुत पदार्थ ( उपमानपक्ष ) के व्यवहार का आरोप हो तो
अलङ्कारशास्त्र मे उसे 'समासोक्ति' अलङ्कार कहते है-समासोक्ति समैयत्र
कार्यलिङ्गविशेषण । व्यवहारसमारोप प्रस्तुतेऽन्यस्य वस्तुन ॥ इस पद्य मे
भी समासोक्ति अलङ्कार है।
वीरभटानुकूल्यमाह
महौजसो मानधना धनाचिता
धनुर्भूतः सयति लब्धकीर्तयः ।
नसहतास्तस्य नभिन्नवृत्तयः
प्रियाणि वाञ्छन्त्यसुभिः समीहितुम् ॥१६॥
महौजस इति । महौजसो महाबला । अन्यथा दुर्बलानामनुपकारित्वादिति
भाव । मान कुलशीलाद्यभिमान एव धन येषा ते मानधना अन्यथा कदाचिद्
बलदाद्विकुर्वीरनिति भाव । धनाचिता धनैचिता
सत्कृता । अन्यथा
दारिद्र यादेन जब रिति भाव । सहता मिथ सङ्गता स्वार्थनिष्ठा न भवन्तीति
नसहता । नार्थस्य नशब्दस्य सुप्सुपेति समास । भिन्नवृत्तयो मिथो विरोधा-
स्वामिकार्यकरा न भवन्तीति नभिन्नवृत्तय पूर्ववत्समास । अन्यथा स्वामिकार्य-
विघातकतया स्वामिद्रोहिण स्युरित्युभयत्रापि तात्पर्यार्थ । धनु तो धानुष्का ।
आयुधीयमात्रोपलक्षणमेतत् । प्राधान्याद्धनुर्ग्रहणम् । तस्य दुर्योधनस्यासुभि प्राण
प्रियाणि समीहितु कर्तुवाञ्छन्ति । आनृण्यार्थ प्राणान्दातुमिच्छन्ति । अन्यथा
दोषस्मरणादिति भाव । अत्र महोजसादिपदार्थांना प्राणदानकर्त्तव्यता प्रति
विशेषणगत्या हेतुत्वाभिधानात्काव्यलिङ्गमलङ्कार । लक्षण तूक्तम् । यथा
साभिप्रायविशेषणत्वात्परिकरालङ्कार इति द्वयोस्तिलतण्डलवद्विभक्ततया
स्फुरणात्ससृष्टि ॥१॥
( ७८ ) श्लोकान्वय-महौजस मानधना धनाचिंता सयति लव्धकीर्तय नसहता नभिन्नवृत्तय धनुर्भूत असुभि तस्य प्रियाणि ममीहितु वाञ्छन्ति । अनुवाद-महाबलशाली, स्वाभिमानी, वन से सम्मानित, रणभूमि मे यश प्राप्त करने वाले, ( स्वार्थसिद्धि के लिए परस्पर ) सगठित न होने वाले ( तथा ) अविरुद्ध व्यवहार वाले धनुर्धर सैनिक प्राणपण से सुयोधन का प्रिय सम्पन्न करने की आकाक्षा रखते है। भावार्थ-शोभन तावत् सुयोवन-य वीरभटानुकूल्यम् । राजन् । महाबल- शालिन स्वाभिमानिन , पारितोषिकादिभिस्सतत सम्मानिता , समरभूमिषु च अमोवपराक्रमा सुयोवनसैनिका प्राणान् अपि सन्त्यज्य निजस्वामिनो मनोऽभि- लषित सम्पादयितु समीहन्ते । न च ते क्वचिदपि स्वार्थसिद्ध्यर्थ मिथ सड्गता भवन्ति न च इतरेतरविरोविन सञ्जायन्ते अन्यथा स्वामिकार्यविघातकतया राजद्रोहिण स्यु । टिप्पणी-महौजस -महाबला अर्थात् महा ओजस्वी । ओजस् का अर्थ है बल-महत् ओज येषा ते महौजस ( बहुव्रीहि )। मानधना-मान रूपी वन वाले, स्वाभिमानी। मान कुलशीलाद्यभिमान एव धन येषा ते मानधना, बहुव्रीहि । धनाचिता -द्रव्यसत्कृता अर्थात् धन से, पारितोषि- कादि से अचित, सम्मानित । धनेन अर्चिता इति धनाचिंता (तृतीया तत्पु०)। सयति-सङ्ग्रामे । युद्ध मे । सम् + यम् + क्विप् अधिकरणे- सयत् तस्याम् सयति । अमरकोश-'समुदाय स्त्रिया सयत् समित्याजि- समिधुध ।' लब्धकोर्तय -बहुयशस अर्थात् यश प्राप्त करने वाले । लब्धा कीर्ति य ते लब्धकीतंय (बहुव्रीहि )। नम हला-जो सहत या सगठित न हो । मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए ही सगठिन्न होते है। यहाँ भी कुछ वैसा ही आशय है। अर्थात् स्वार्थसिद्धि के लिए संगठित न होने वाले । आचार्य मल्लिनाथ का व्याख्यान देखे-'सहता मिथ समता, स्वार्थनिष्ठा न भवन्ति इति नसहता.' । (सम् + हन्+क्त कर्तरि+जस् ) सहता इति नसहता ( सुप्सुपा समास )। नभिन्नवृत्तय --अर्थात् जिनकी वृत्ति या व्यवहार भिन्न न हो। कोई तीरघाट तो कोई मीरघाट, ऐसी वृत्ति न हो अन्यथा स्वामिकार्य में विधात होगा । आचार्य मल्लिनाब लिखते हैं-'मिथ विरोधात् स्वामिकार्यविघातकरा न भवन्ति इति नभिन्नवृत्तय' पूर्ववत्समास (अर्थात् सुप्सुपा समास ) । भिन्ना वृत्ति येषा ते भिन्नवृत्तय (मिद्+क्त कर्तरि ( ७६ ) - . - . +टाप् स्त्रियाम् । वृत्+क्तिन् भावे ) बहुव्रीहि समास । न भिन्नवृत्तय इति नभिन्नवृत्तय । धनुर्भूत -धानुष्का., धनुर्धर सैनिकगण । धनूषि बिभ्रति इति-धनु त (धनुष् + भृञ +क्विप् कर्तरि, प्रथमा बहुवचन) । असुभि - प्राण अर्थात् प्राणो की बाजी लगा कर । 'असव प्राणा' इत्यमर । असु, प्राण, दार, अक्षत्, लाज आदि शब्द नित्य पुलिङ्ग बहुवचनान्त है । तस्य-उस युयोधन का। प्रियाणि-मनोऽभिलषितानि, अभीष्ट कार्यो को। जो अपने को रुचे वही प्रिय है-प्रीणन्ति इति प्रियाणि (प्री+क कर्तरि ) समीहितु - कर्तुम्, सम्पन्न करने के लिए ( सम् + ईह, +तुमुन् ) वाञ्छन्ति-इच्छन्ति । चाहते है। प्रस्तुत पद्य मे काव्यलिङ्ग और परिकर-इन दो अलङ्कारो की तिनतण्डु- लवत् ससृष्टि है। वाक्यार्थ रूप या पदार्थरूप हेतु के उल्लिखित होने पर 'काव्यलिङ्ग' अलङ्कार होता है-हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्ग निगद्यते' इस पद्य मे प्राण देकर भी प्रिय करना चाहते है' यह एक कार्य है ( वाक्यार्थ रूप ) जिसका कि कारण ( उनका महाबली, मानधन, धनाचित होना आदि) उल्लिखित है, बता दिया गया है । फनत यहाँ काव्यलिङ्ग अलङ्कार है । इसी प्रकार साभिप्राय विशेषणो के उक्त होने पर 'परिकर' अलङ्कार होता है- 'उक्त विशेषण साभिप्राय परिकरो मत ।' प्रस्तुत पद्य मे समागत सभी विशेषण ( महौजस मानधना आदि ) साभिप्राय है साथ ही साथ उक्त है, अत परिकरालङ्कार भी हुआ। साभिप्राय का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक विशेषण कुछ 'सकेत' करता है जैसे 'महौजस' का शाब्दिक अर्थ तो हुआ 'महाबलशाली' किन्तु अभिप्राय कुछ और भी है-'महाबलशाली ही स्वामी का कल्याण साधने में समर्थ है, निर्बल सैनिको से कुछ भी होने का नही ।' सप्रति स्वराष्ट्रवत्परराष्ट्रवत्तान्तमपि वेत्तीत्याह- महीभृता सच्चरितैश्चरः क्रियाः स वेद निःशेषमशेषितक्रियः । महोदयस्तस्य हितानुबन्धिभिः प्रतोयते धातुरिवेहित फलैः ॥२०॥ महीभृतामिति । अशेषितक्रिय समापितकृत्य । आफलोदयकर्मेत्यर्थ । स दुर्योधन । सच्चरित शुद्धचरित. अवञ्चकरित्यर्थः, परन्तीति चरास्तैश्चर ।। - प्रणिधिभि । पचाद्यच् । महीभृता क्रिया प्रारम्भान्नि शेष वेत्ति। 'विदो लटो वा' इति णलादेश । स्वरहस्य तु न कश्चिद्वे देत्याह-महोदयैरिति धातुरिव तस्य दुर्योधनस्येहितमुद्योगो महोदयैर्महावृद्धिभि महोदयैर्महावृद्धिभि हितमनुबध्नन्त्यनुरुन्धन्तीति हितानुबन्धिभि स्वन्तै रित्यर्थ । फलै कार्य सिद्धिभि प्रतीयते ज्ञायते । फलानुमे- यास्तस्य प्रारम्भा इत्यर्थ ॥२०॥ श्लोकान्वय-अशेषितक्रिय स सच्चरित चरै महाभृता क्रिया नि शेषम् वेद । धातुरिव तस्य ईहित महोदय हितानुबन्विभि फलै प्रतीयते । अनुवाद कार्यों को समाप्त कर लेने वाला वह सुयोधन सच्चरित्र गुप्तचरो द्वारा ( शत्रु) नरपतियो की गतिविधि को पूर्णरूप से जान लेता है । (किन्तु ) विधाता की भॉति सुयोधन का (भी) उद्योग, अतिशय उन्नति बाली, शुभपरिणाममयी कार्य सिद्धियो से (ही ) ज्ञात हो पाता है । भावार्थ-दुर्योधन किञ्चिदपि कार्य समारभ्य असमाप्त न परित्यजति । अथ च समापितकृत्य स शत्रुभूतभूपालाना समग्रान् प्रारम्भान् अपि स्वगूढचरै साकल्येन विजानाति । को भूपाल कदा केन प्रकारेण कस्मात् कारणात् दुर्योधन- विषयक किं विचिन्तयति इति निखिलमेव वृत्त सुयोधनस्य हस्तामलकवत् सुस्पष्टम् । किन्तु दुर्योधनस्य सङ्कल्पा उद्योगा वा फलानुमेया एव भवन्ति स्रष्टु उद्योगा इव । यदा हि महोदयसम्पन्ना शुभपरिणामा प्रकटीभवन्ति तदैव सर्वे ज्ञायते-हन्त । सुयोधनेन तावदिद चिन्तितमासीत् इति । टिप्पणी-अशेषितक्रिय.-समापितकृत्य , अर्थात् जिसने क्रियाओ को अशेषित (पूर्ण) कर लिया हो । कार्यो को अधूरा न छोडने वाला । शेषित का तात्पर्य है- बाकी-अधूरा-छोड देना ( शिष् + णिच्+क्त कर्मणि स्त्रियाम् = शेषिता अथवा शेष + इतच तारकादिभ्य + टाप् = शेषिता अथवा नामधातु + क्त कर्मणि स्त्रियाम् शेषिता) न शेषिता इति अशेषिता ( नत्र तत्पु० ) अशेषिता क्रिया येन स अशेषितक्रिय (बहुव्रीहि ) । स - वह दुर्योधन । सच्चरित.-शुद्धचरितं अवञ्चकैरित्यर्थ । शोभन चरित वाले । जिनका चरित सत् हो वे सच्चरित हैं । सत् ( अस् + शतृ ) चरित चर् + क्त भावे) येषा ते सच्चरिता , तै । चर-गुप्तचरो द्वारा । महीभृताम्-राजाओं के । महीं बिभ्रति इति महीभृत ( मही+ भृन + क्विप् कर्तरि, उपपद तत्पु० ), तेषा महीभताम् । क्रिया-प्रारम्भान् उद्योगो को, कार्यों को । निशेषम् - साकल्येन, पूर्णरूप से । जो बच जाय वही शेष शेष ( ८१ ) है, और जिसमे कुछ शेष रहे उसे 'नि शेष' कहेगे। शिष्+घञ शेष , निर्गत शेष यस्मात् तत् यथास्यात्तथा (बहुव्रीहि ) । यहाँ । के रूप मे प्रयोग हुआ है। वेद-वेत्ति, जानता है। विद् + लट्लकार तिप = विद्+णल् ( अ ) = वेद । यहाँ णल् प्रत्यय 'विदो लटो वा' सूत्र से हुआ है । इसका आशय यह है कि 'विद्' धातु मे विकल्प से लिट् और लट् के पाँच प्रत्यय लगते है।' इस प्रकार 'वेद' रूप लट् तथा लिट् दोनो ही लकारो मे समीचीन है । धातुरिव-प्रजापतेरिव अर्थात् ब्रह्मा की भॉति | जो सृष्टि को वारण करे, वही धाता है—दधाति इति धाता (धा+तृच् कर्तरि ) तस्य, धातु । तस्य ईहितम्- दुर्योधनस्य चेष्टितम अर्थात दुर्योधन की चेष्टाएँ, उसके मनसूबे । ईह+क्त भावे नपु सके ( उक्ते कर्मणि प्रथमा)। महोदय -महद्धिभि , अतिशय समृद्धिशाली । महान् उदय येभ्यस्तानि महोदयानि ( फलानि ) ते ( बहुव्रीहि )। हितानुबन्धिभि हित या कल्याण को बाँध लेने वाले अर्थात् शुभपरिणाम देने वाले। हित कल्याणम् अनुबध्नन्तीति हितानुबन्धीनि ( हित + अनु+बन्ध+णिनि - कर्तरि ताच्छील्ये, उपपदतत्पुरुष ) तै । फलै -कार्यसिद्धिभि अर्थात् परिण- मनसिद्धियो द्वारा। प्रतीयते-ज्ञायते, जाना जाता है, प्रति + इ + लट्प्त कर्मणि । , मित्रबलमाह प्रायन तेन सज्यं क्वचिदुद्यत धनुः कृतं न वा कोपविजिम्माननम् । गुणानुरागेण शिरोभिरुह्यते नराधिपैर्माल्यमिवास्य शासनम् ॥२१॥ नेति । तेन राज्ञा क्वचित्कुत्रापि । सह ज्यया मौा सज्यम् । 'मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुण' इत्यमर । 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इति बहुव्रीहि । धतु नोद्यत नोर्वीकृतम् । आनन वा कोपविजिह्य कोपेन कुठिल न कृतम् । यस्य कोप एव नोदेति कुतस्तस्य युद्धप्रसक्तिरिति भाव । कथ ताज्ञा कारयति राज्ञ इत्यत्राह-गुणेति । गुणेषु दयादाक्षिण्यादिष्वनुरागेण प्रेम्णा माल्यपक्षे सूत्रानुषगण । यद्वा सौरभ्यगुणलोभेन । नराधिपैरस्य शासनमाज्ञा । मालव फा०- ( २ ) . माल्य तदिव । 'चातुर्वर्णादिवत्स्वार्थे ष्य' इति क्षीरस्वामी। शिरोभिरह्यते धायते । 'वचिस्वपियजादीना किति' इति यकि सम्प्रसारणम् । अत्रोपमा स्फुटैव ॥२१॥ श्लोकान्दय-न तेन क्वचित् सज्य वनु उद्यतम न वा आनन कोप- विजिह्म कृतम् । गुणानुरागेण नराधिपै अस्य शासन माल्यमिव शिरोभि. उह्यते । अनुवाद-सुयोधन ने न तो कही प्रत्यञ्चाबद्ध धनुष उठाया अथवा न ही मुखमण्टल को क्रोध के कारण विकृत किया। ( उसके दयादाक्षिण्यादि ) गुणानुरागवश नृपतिगण उसकी आज्ञा को माला के समान शिरोधार्य करते है। प्रिय कर्तु । भावार्थ-राजन् । पूर्वमेव मयोदित यत् सुयोधनधानुष्का प्राणरपि तस्य समीहन्ते । पश्यन्तु तावद्भवन्त तस्य मित्रबलमपि 5 सुयोवनेन क्वचिदपि प्रत्यञ्चालग्न शरासन नोर्वीकृतम् । न च तेन औरस खेदमनुभूय कदापि स्वानन कोपकुटलि कृतम् । कापेक्षा वर्तते एषा व्यापाराणाम् ? यत सर्वमेव सिध्यति मित्रबलेनैव । यथा खलु पुष्पमाला शिरोभिरुह्यते नागरजनै तथैव सुयोधनस्य आज्ञा मित्रनृपतिभि शिरोभि धार्यते । न राजभयेन प्रत्युत तस्य दयादाक्षिण्यादिगुणानुरागेण । सुभगम्मन्योऽसौ सुयोधन टिप्पणी-न तेन-न ( तो ) सुयोधन द्वारा। क्वचित्-कुापि, कही भी। सज्यं धनु -प्रात्यञ्चा या डोरी चढा हुआ धनुष । ज्या का तात्पर्य है धनुष की डोरी-'ज्यया मौा सह इति सज्यम्' ( बहुव्रीहि ) तृतीयान्त शब्द के साथ तुल्ययोग होने पर 'सह' का बहुव्रीहि-समास होता है। सूत्र है-'तेन सहेति तुल्ययोगे।' इस नियम से 'सज्यम्' मे बहुव्रीहि समास हुआ । समस्तपद मे 'सह' के स्थान पर 'स' आदेश हो गया है-'वोपसर्ज- नस्य' नियम से । 'मौर्वी ज्या शिञ्जिनी गुण' इत्यमर । सज्य 'धनु' का विशेषण है- 'धनुश्चापो धन्वशरासनकोदण्डकार्मुकम्' इत्यमर । उद्यतम्- ऊर्वीकृतम् उत्तोलितम् अर्थात् उठाया गया। उद्+यम् +क्त कर्मणि न वा-अथवा न ही। आननम्-वदनम्, मुख को। 'वक्त्रास्ये वदन तुण्डमानन लपन मुखम्' इत्यमर । कोपविजिह्मम्-कोपेन कुटिलम् अर्थात् क्रोधवश विकृत । जिह्म का अर्थ है कुटिल (जिह्मस्तु कुटिले मन्दे-- - ।
( ८३ - -- इतिकोश) कोपेन ( कुप् +घा भावे+टा) विजिह्मम् ( विशेषेण जिह्य + विजिह्मम् प्रादितत्पुरुष ) इति कोपविजिह्मम् ( तृतीया तत्पु० ) कृतम् - किया गया। गुणानुरागेण-दयादाक्षिण्यादिप्रेम्णा । सुयोवन के गुणो के प्रति अनुरागभाव होने के कारण । गुणेषु अनुराग इति गुणानुराग तेन, हेतौ दृतीया ( सप्तमी तत्पु० ) । माला के पक्ष मे गुणानुराग का तात्पर्य होगा- गुण अर्थात् सूत्र मे अनुपग ( प्रवेश ) होने के कारण अथवा सौरभ्यगुण के अनुराग ( लोभ ) वश । नराधिपै ~~ भूपाल राजाओ द्वारा। अस्य शास- नम्-मयोधनस्य आज्ञा । शामन (शास् + ल्युट भावे) का अर्थ है जाज्ञा, नियोग । मुयोवन की आज्ञा । नाल्यमिव-मालेव, माला की भॉति । माला एव माल्यम् (माला + प्यन स्वार्थे) जैसे चातुर्वर्ण्य शब्द 'चातुवण' के ही अर्थ मे प्या प्रत्यय मे निप्पन्न होता है, ठीक वैसे ही 'माल्यम्' मे भी प्या प्रत्यय स्वार्थ मे है-'चातुर्वर्ण्यादित्वात् स्वार्थे प्या'। शिरोभिरुह्यते- शीर्षे धार्यते । अर्थात् सिर-माथे लगाई जाती है ( वह +लट् = त कर्मणि)। 'माल्यम् इव' अश मे 'इव' साधर्म्य ( साम्य ) प्रस्तुत करता है-माल्य तया शासन के बीच । अतएव प्रस्तुत पद्य मे उपमालङ्कार मान्य है 'माधर्म्यम् उपमाभेदे।' सम्प्रति अस्य धार्मिकत्वमाह - - स यौवराज्ये नवयौवनोद्धतं निधाय दुःशासनमिदशासनः । मखेष्वखिन्नोऽनुमतः पुरोधसा धिनोति हव्येन हिरण्यरेतसम् ॥२२॥ - स इति इद्ध शासनोऽप्रतिहताश स दुर्योधनो नवयौवनोद्धतं प्रगल्भम् । धुरन्धरमित्यर्थ । दु खेन शास्यत इति दु शासनस्तम् 'भाषाया शासियुधि'- इत्यादिना खलर्थे युच्प्रत्यय । यौवराज्ये युवराजकर्मणि । ब्राह्मणादित्वात्थ्यत्र । निधाय नियुज्येत्यर्थ । पुरोधसा पुरोहितेनानुमतोऽनुज्ञात । तस्मिन्याजके सतीत्यर्थ । तदुल्लङ्घने दोषस्मरणादिति भाव । 'निष्ठा' इति भूतार्थे क्त ।
( ८४ ) . न तु ‘मतिबुद्धि' इत्यादिना वर्तमानार्थे । अन्यथा 'पुरोधसा' इत्यत्र क्तस्य च वर्तमाने' इति षष्ठी स्यात् । अखिन्नोऽनलसो मखेष ऋतुष, हव्येन हविषा । हिरण्य रेतो यस्य त हिरण्यरेतसमनल धिनोति प्रीणयति । धिन्वे प्रीणनार्थाद् विन्वकृण्व्योर च' इत्युप्रत्यय । अकारश्चान्तादेश ।।२२।। श्लोकान्वय-इद्धशासन स नवयौवनोद्धतम् दु शासन यौवराज्ये निवाय पुरोवसा अनुमत अखिन्न मखेष हव्येन हिरण्यरेतसम धिनोति । अनवाद-अप्रतिहत आज्ञा वाला वह मुयोवन, नई अवस्था के कारण उद्दण्ड दुश्शासन को युवराजपद पर अभिषिक्त करके ( स्वय ) पुरोहित से अनुमति प्राप्त करके, अश्रान्तभाव से यज्ञो मे हवि-सामग्री द्वारा अग्निदेव को प्रसन्न करता है। भावार्थ-न खलु जनपदक्ष मकरत्वम् आत्मोन्नयनमेव वा सुयोधनस्य अभीष्टम् । धार्मिकत्वमपि तस्य प्रख्यातम् । नाममात्रेणैव राज्यकार्य तेन क्रियते । वस्तुतस्तु अभिनवयौवनेन प्रगल्भस्वभाव स्वानुज दुश्शासनमेव युवराज- कर्मणि सस्थाप्य सुयोधन स्वयमेव परलोक सिद्धि भजते । पुरोहितेन अनुमोदन- मवाप्य स अविश्रान्त सन् निरन्तरमेव यज्ञयागादिषु हव्यप्रदानेन भगवत हिरण्यरेतमम् अनुकूलयति । . टिप्पणी-इद्धशासन -अप्रतिहताज्ञ । अनुल्लघनीय शासन या आज्ञा वाला । 'शासन' का अर्थ है आज्ञा । शिष्यते इति शासनम ( शास्+ ल्युट् भावे ), इद्ध (इन्ध्+क्त कर्तरि ) शासन यस्य स इद्धशासन (बहुव्रीहि ) । स -वह (सुयोधन ) । नवयौवनोद्धतम्-युवावस्थयातिप्रगल्भम् । अर्थात् नवयौवन के कारण उद्दण्ड या उद्धत ( को) यूनो भाव यौवनन् ( युवन्+ अण्), नव यौवनम् इति नवयौवनम् (कर्मधारय स०) तेन उद्धत ( उद्+ हन +क्त कर्मणि, तृतीया तत्पु०),। तम् । दुशासनम्-दु शासन को, अपने अनुज को ( दुर् + शास्+युच् कर्मणि, द्वितीया एकवचन ) । यौवराज्ये-युवराजकर्मणि, अर्थात् युवराज के कर्त्तव्य मे, युवराज पद पर । युवराज का अर्थ है युवक राजा और उसका कर्म है यौवराज्य-युवा चासौ राजा चेति यवराज ( कर्मधारय स० ) तस्य कर्म यौवराज्यम् (युवराज+ ष्यञ् कर्मणि), तस्मिन् । युवराज शब्द ब्राह्मणादि गण में पठित है, अत ष्य प्रत्यय यहाँ 'गुणवचनब्राह्मणादिभ्य कर्मणि च' सूत्र से प्रयुक्त हुआ है । .
( ८५ ) . । . निधाय-नियुज्य, नियुक्त करके (नि + धा + ल्यप् ) । पुरोधसा पुरोहित द्वारा । धार्मिक कार्यो मे अग्रेसर अथवा पुरोगामी जो हो वही पुरोधा या पुरोहित हे-पुर वत्ते धीयते वा इति पुरोधा (पुरस् + धा+असि कतरि कर्मणि वा ) तेन पुरोवमा । 'पुरोधास्तु पुरोहित' इत्यमर ( अनुक्त कत्र्तरि तृतीया )। अनुमत --अनुज्ञात , अर्थात् अनुमोदित होकर, समर्थित होकर (अनु+मन+क्त कर्मणि) । अखिन्न -अनलस , आलस्य अथवा श्रान्ति-विहीन होकर, अर्थात् सोत्साह । न खिन्न ( खिद्+क्त कतरि) इति अखिन्न (ना तत्पु०) । मखेषु-ऋतुपु, यज्ञो मे। अमरकोषे-'यज्ञ सवोऽध्वरो याग सप्त- तन्तुर्मख ऋत' । हव्येन-हविषा, पुराडागादि हवन सामग्री द्वारा । जिसका अग्नि मे हवन (दान) किया जाय वही हव्य है-हूयते भक्ष्यत्वेन दीयते इति हव्यम् (हु-+यत् कर्मणि), तेन । करणे तृतीया । हिरण्यरेतसम् -अनलम् । अग्निदेव को । हिरण्य अथवा स्वर्ण ही जिसका रेतस् हो वह । हिरण्य रेतो यस्य स हिरण्यरेता , (बहु०) तम् अग्निम् । 'हिरण्यरेता हुतभुग्दहनो हव्य- वाहन ' इत्यमर । धिनोति-प्रीणयति । प्रसन्न करता है ( धिवि = धिन्व + लट् प्रथमपुरुष एकवचन) धकार, शकार एव हकार की आवृत्तिवश अनुप्रास अलङ्कार द्रष्टव्य है । 'वर्णसाम्यमनुप्रास' आदि लक्षण । सचेत् तादृश उद्योगी तर्हि अस्माभिनिरुद्योगैर्भाव्यमित्याशङ्क य उद्योगाशा दर्शयति - प्रलीनभूपालमपि स्थिरायति प्रशासदावारिधि मण्डलं भुवः । स चिन्तयत्येव भियस्त्ददेष्यती- रहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ॥२३॥ प्रलीनेति । स दुर्योधन प्रलीनभूपालम् नि सपत्लमित्यर्थ । स्थिरायति चिरस्थायीत्यर्थ । भुवो मण्डलम् आवारिधिभ्य आवारिधि 'आड्मर्यादाभि- विध्यो' इत्यव्ययीभाव । प्रशासदाज्ञापयन्नपि । 'जक्षित्यादय षट्' इत्यभ्य- स्तसझा । 'नाभ्यस्तच्छतु ' इति नुमागमप्रतिषेध । त्वत्त्वत्त एष्यतीरागमिष्यती । धात्नामनेकार्थत्वादुक्त थसिद्धि । अथवा पूर्व पाठ । 'एत्येधत्यूठ सु' इति ( ८६ ) वृद्धि । 'लुट सदा' इति शतृप्रत्यय । 'उगितश्च' इति डीप् । आच्छी द्योर्नु म्' इति विकल्पान्नुमभाव भियो भयहेतून् । विपद इत्यर्थ । चिन्तयत्यालोचयत्येव । स एवाह-अहो । बलवद्विरोधिता दुरन्ता दुष्टावसाना । सार्वभौमस्यापि प्रबलै सपत्नै सह वैरायमाणत्वमनर्थपर्यवसाय्येवेति तात्पर्यम् । सामान्येन विशेष- समर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यास ॥२३॥ श्लोकान्वय-स प्रलीनभूपाल स्थिरायति भुवो मण्डलम् आवारिधि प्रशासत् अपि त्वदेष्यती भिय चिन्तयत्येव । अहो बलवद्विरोविता दुरन्ता । अनुवाद-शत्रु-विहीन, सुस्थिर भविष्यवाले, भूमण्डल को समुद्रपर्यन्त प्रशासित करता हुआ भी सुयोधन, आपकी ओर से आने वाली विपत्तियो को गुनता ही रहता है । हन्त | बलवान् के साथ किया गया वैर-विरोध अनर्थ- पर्यवसायी होता है। भावार्थ-किन्न समवाप्त सुयोधनन । निखिलमेव शत्रुनृपतिमण्डल विनाशमुपगमितम् । भविष्यमपि साम्राज्यस्य अक्षुण्ण कृतम् । आसमुद्र भूचक्र स्वपौरुषेण स्वायत्तीकृतम् । किन्तु सजातेऽपि ईदृक् सुखजलदवर्षणे न सुखमनु- भूयते वराकेण तेन । राजन् । भवत्सकाशात् आगमिष्यती विपद स चिन्त- यत्येव । 'न जाने कदा पाण्डबा प्रसह्य रणबलेन साम्राज्यमिद ग्रहीष्यन्ति' इत्यनया चिन्तयाऽनिशमेव दन्दह्यते तच्चेत । प्रबलै सपत्नै सह वैरायमाणत्वम् अनर्यकारकमेव भवतीति महच्चित्रम् । टिप्पणी-स-दुर्योधन । प्रलीनभपालम्-नि सपत्नम् । शत्रु-रहित । प्रलीन हो गए हो, उच्छिन्न हो गए हो नृपतिगण जिसमे ऐसे भूमण्डल को- प्रलीना ( प्र + ली + क्त कर्तरि ) विनष्टा भूपाला (भुव पालयन्ति इति भूपाला , भू + पाल् + णिच् +अण् कर्त्तरि) यस्मिन् तत् (बहुव्रीहिसमास ) । स्थिरायति-चिरस्थायि । स्थिर हो आयति(भविष्य) जिसकी-स्थिरा आयति यस्यतत् (बहुव्रीहि ) कुछ हिन्दी व्याख्याकारो ने 'स्थिरायति' को क्रियाविशेषण मानकर 'प्रशासत्' के साथ संयुक्त करने का सुझाव प्रस्तुत किया है जब कि आचार्य मल्लिनाथ इसे 'भुवोमण्डलम्' का विशेषण मानते है । वस्तुत आचार्य का मत ही तर्कसंगत एव ग्राह्य है क्योकि-'पाण्डव जैसे प्रबल शत्रुओ के कारण दुर्योधन के साम्राज्य का भविष्य वास्तव मे स्थिर नही है।' फिर भी ( ८७ ) - - अपने विश्वस्त गुप्तचरो, मित्रो, सैनिको एव दया-दाक्षिण्यादि गुणो के कारण सुयोधन ने साम्राज्य का भविष्य यथाकथञ्चित् स्थिर बना ही लिया है । ऐसे ही 'स्थिरायतिभुवोमण्डलम्' की बात आचार्य मल्लिनाथ करते है। अत व्याख्याकारो का यह कयन सार्थक नही प्रतीत होता- 'दुर्योधन राज्य करेगा तब भी भूमण्डल कल्पान्त तक स्थिर रहेगा, न राज्य करेगा तब भी आदि ।' कल्पान्तस्थायी साम्राज्य का प्रश्न ही कहाँ उठता है ? यहाँ तो कवि दुरोदरच्छद्मजित साम्राज्यम्' की बात कर रहा है । भुवोमण्डलम् - पृथिव्याश्चक्रम्, पृथ्वीमण्डल को। आवारिधि- -आसमुद्रम् । समुद्रपर्यन्त, जो जलराशि का निवान हो वह 'वारिधि' है, आड् मर्यादा सूचित करने के लिए प्रयुक्त हुआ है-वारि धीयते अस्मिन् इति वारिधि (वारि + वा+कि अधिकरणे ) वारिध आ इति आवारिधि ( अव्ययीभावसमास ) यहाँ 'आङ्' 'मर्यादायाम्' है। प्रशासत् अपि-आज्ञापयन्यपि, प्रकृष्ट रूप से शासन करता हुआ भी (प्र + शास् + शत, प्रथमैकवचन )। अपि का अर्थ है भी' । त्वदेष्यती –त्त्वत्त आगमिष्यती , आगामिनी इति यावत् । तुम्हारी ओर से आने वाली को ( 'भिय' का विशेषण ) त्वत् (युष्मत् शब्द, पञ्चमी एकवचन ) एष्यती ( आ + इ + लृट्-स्यतृ, स्त्रियाम् द्वितीया बहुवचन) इति त्वदेष्यती , सुप्सुपासमास । एष्यती के निर्वचन मे आ उपसर्ग को स्वीकार करने से त्वदैष्यती' पाठ स्वीकार करना होगा जैसा कि आचार्य मल्लिनाथ ने भी निर्देश किया है । वस्तुत यही तर्कसंगत भी प्रतीत होता है। अन्यथा "एष्यती' का अर्थ 'आनेवाली' के बजाय 'जानेवाली' ही होगा । हाँ धातुओ को अनेकार्थक मान कर भले ही हम आगमनपरक अर्थ निकाल ले। भिय भयहेतून् भय के कारणो को अथवा विपत्तियो को। चिन्तयत्येव-आलोच- यत्येव । मोचता ही है । 'एव' का अर्थ यह है कि बेचरा सुयोधन पाण्डवभय को भूलने की लाख चेष्टा करता है परन्तु करे क्या ? बाध्य होकर उसे सोचना ही पडता है, क्योकि 'बलवद्विरोध' है न । अहो-आश्चर्य है (अव्ययपद)। बलवद्विरोधिताः -बलवान् के साथ किया गया विरोधभाव । जिसके पास बल या शक्ति हो वह बलवान् है-बलम् अस्ति अस्य इति बलवान् ( बल+ मतुप + सु ) जो विरोध करे वह 'विरोधी' है-विरूणद्धि इति विरोधी ( वि + रुध् + णिनि कर्तरि ) तस्य भाव विरोधिता ( विरोधिन् +तल स्त्रियाँ, टाप् ) वलवता विरोधिता इति बलवद्विरोधिता ( सुप्सुपा) ।
( ८८ दुरन्ता-दुष्टावसाना अर्थात् अनर्थपर्यवसायिनी । जिसका अन्त दुष्ट या दुखद हो उसे 'दुरन्ता' कहेगे- दुष्ट अन्त यस्या सा (बहु०) । श्लोक की अन्तिम पक्ति एक सामान्यकथन है जिससे एक विशेप तथ्य 'स चिन्तयत्येव भियस्त्वदेष्यती' का समर्थन किया गया है फलत अर्थान्तरन्यास अलकार है। - MORAIN- ननु गूढाकारेङ्गितस्य तस्य भय त्वया कय निरधारि कथाप्रसङ्गन जनैरुदाहृता- दनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रमः। तवाभिधानाद्व्यथते नतानन स दुःसहान्मत्रपदादिवोरगः ॥२४॥ कथेति । कथाप्रसङ्गन गोप्ठीवचनेन जनै , तत्रस्थैरित्यर्थ । अन्यत्र कथा- प्रसङ्गन विषवैद्येन । 'कथाप्रसङ्गो वार्ताया विषवैद्येऽपि वाच्यवत्' इति विश्व । एकवचनस्यातन्त्रत्वाज्जनविशेषणम् । उदाहृतादुच्चारितात्तवाभिधानान्नामधेया- स्मारकाद्ध तो । 'हेतौ' इति पञ्चमी । 'आख्याह्व अभिधान च नामधेय च नाम च' इत्यमर । अन्यत्र तवाभिधानात् । 'नामैकदेशग्रहणे नाममात्रग्रहणम्' इति न्यायात् तश्च वश्च तवौ तायवासुकी तयोरभिधान यस्मिन्पदे तस्मात् । यद्वा, कथाप्रसङ्ग इनाश्च ते जनाश्चेत्येक पदम् । अनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रम स्मृतार्जु- नपराक्रम सन् दु सहात् मन्त्रपदान्मन्त्रशब्दात्स्मारकाद्ध तो । आखण्डलसूनुरि- न्द्रानुज ) उपेन्द्रो विष्णुरिति यावत् । 'सूनु पुत्रेऽनुजे रवौ, इति विश्व । तस्य वि पक्षी । गरुड इत्यर्थ । तस्य क्रम पादविक्षेप । सोऽनुस्मृतो येन स तथोक्त स्मृतगरुडमहिमा । उरग इव नतानन सन् । व्यथते दुखायते । 'पीडा बाधा व्यथा दु खम्' इत्यमर । अत्युत्कटभयदोषादिविकारा दुर्वारा इति भाव । 'सर्वतो जयमन्विच्छेत्पुत्रादिच्छेत्पराजयम्' इति न्यायादर्जुनोत्कर्षकथन युधिष्ठि- रस्य भूषणमेवेति सर्वमवदातम् ।।२४॥ श्लोकान्वय--कथाप्रसङ्गन जनै उदाहृतात् तवं अभिधानात् अनुस्मृता- खण्डलसूनुविक्रम स दु सहात् मन्त्रपदात् उरग इव नतानन व्यथते । अनुवाद-श्रष्ठविषवैद्यो द्वारा उच्चारित किये गए, गरुड एव वासुकि के नामो से युक्त, अत्यन्त दुस्सह मत्रपदो द्वारा (पक्षिराज ) गरुड के माहात्म्य । ATTLES, की ( ८६) का स्मरण करके अवोमुख (निस्तेज) हो जाने वाले विषधर की ( ही ) भॉति वार्तालाप के प्रसग मे तत्रोपस्थित जनो द्वारा उच्चारित तुम्हारे ( युधिष्ठिर ) नाम मे, इन्द्रपुत्र अर्जुन के पराक्रम का अनुस्मरण करके वह सुयोधन अधोमुख होकर व्यथित हो जाता है। लेष उपभा भावार्थ-राजन् । यथा खलु कोऽपि विषधर पक्षिराजगरुडस्य सर्पराज- वामुकेश्च नामधेयैस्मयुत विपवैद्येन च विपोपचाराय समुच्चारित मत्रपदमनु- श्रू य वैनतेयमाहात्म्यमनुस्मृत्य भूयोभूय अधोमुखस्सन् विकलीभवति तथैव हस्तिनापुरे साम्प्रतम् वार्तालापप्रसङ्ग तत्रस्थै जनै यथाकथञ्चित् 'युधिष्ठिर' इत्युच्चारणादेव अनुजसम्बन्वेन महावनुर्वरस्य पार्थस्य अमोघपराक्रम स्मार-स्मार बराक सुयोवन अवोमुखीभूय नितरा क्लेशमावहते इति यन्मया प्रत्यक्षीकृत तन्निवेद्यते । टिप्पणी-यह सम्पूर्ण पद्य दो अर्थ देने वाला है । एक तो दुर्योधन- विषयक और दूसरा सर्प-विषयक । पहला अर्थ प्रासङ्गिक या उपमेयार्थ है और दूसरा अप्रासङ्गिक या उपमानार्थ । प्रत्येक शब्द के दोनो अर्थ क्रमश दिये जा रहे है-कथाप्रसङ्गेनजन -दुर्योवन के पक्ष मे-कथा- प्रसङ्गन वार्तालापक्रमेण जनै तत्रस्यै पुरुषै, अर्थात् बातचीत के प्रसङ्गवश वहाँ पर उपस्थित लोगो द्वारा। कथाया प्रसङ्ग इति कथाप्रसङ्ग (षष्ठी तत्पु०) तेन । सर्प के पक्ष मे-विषवैद्यश्रेष्ठजनै । कथाप्रसङ्ग का अर्थ हे झाडफूक करके विषोपचार करने वाला विषवैद्य। विश्वकोष का प्रमाण द्रष्टव्य-'कथाप्रसङ्गो वार्ताया विषवैद्यपि वाच्यवत्' । 'इन' का अर्थ होता है श्रेष्ठ । इस प्रकार-इना श्रेष्ठा जना इति इनजना ( कर्मधारय )। कथाप्रसङ्गषु विषवैद्येषु इनजना इति कथाप्रसङ्गेनजना ( सुप्सुपा ) तै । अर्थात् श्रेष्ठ विषवैद्यो द्वारा। आचार्य मल्लिनाथ 'कथाप्रङ्गन' को 'जनै' का विशेषण भी मानते है जो कि खटकता है । क्योकि विशेषण तृतीया एकवचन मे और विशेष्य तृतीया बहुवचन मे है । वस्तुत विशेषण-विशेष्य मे लिङ्ग, वचन एव विभक्ति की पूर्णसमता होनी चाहिये । वैयाकरणो का मत है- 'यल्लिङ्ग यद्वचन या च विभक्ति विशेष्यस्य-तल्लिङ्ग तद्वचन सैव विभक्ति विशेषणस्यापि ।' इस प्रकार मूल-पाठ दो ही स्थितियो मे ठीक होगा। या तो-'कथाप्रसङ्गन जनेन' हो या फिर 'कथाप्रसङ्ग जनै '। परन्तु भारवि- प्रदत्त पाठ मे तनिक भी परिवर्तन करने से अभीष्ट दो अर्थ आयेंगे ही नही।
(१० ) ऐमी स्थिति में आचार्य मल्लिनाथ 'एकवचनस्य अतन्त्रत्वात् जनविशेषणमू' कह कर 'कथाप्रसगेन-जन' के वचनभेद का औचित्य मान लेते है । परन्तु यह सब झझट उठे ही क्यो यदि हम पूरे शब्द को एक समस्तपद मान ले जैसा कि ऊपर व्याख्यात है। उदाहृतात्-उच्चारितात् अर्थात् उच्चारित किये गए । (उत् + आ + ह + क्त कर्मणि, पञ्चमी एकवचन) दोनो पक्षो मे समान अर्थ देता है। तवाभिधानात्-दुर्योधनपक्ष मे-तव युधिष्ठिरस्य अभिधानात् नामवेयात् अर्थात् आपके ( 'युधिष्ठर' इस ) नाम से । अभिधान का अर्थ है नाम-अभिवीयते अनेन इति अभिवानम् ( अभि + धा + ल्युट करणे ) तस्मात् । हेत्वर्थे पञ्चमी । 'आख्याहऽभिधानञ्च नामवेयञ्च नाम च ।' इत्यपर । सर्पपक्ष मे-त का अर्थ है ताऱ्या या गरुड और व का अर्थ है वामुकि । 'नाम के एक भाग का उच्चारण करने से पूरे नाम का ग्रहण हो जाता है' यह एक मान्यता (न्याय ) है । जैसे बजाय 'देवदत्त' कह कर बुलाने के केवल 'दत्त' कह कर ही बुलाया जाय, कोई अन्तर नहीं है दोनो मे । ठीक इसी प्रकार 'त और व' कह देने से तार्क्ष्य और वासुकि-~-इन दोनो नामो का साकल्येन बोध हो जाता है। इस प्रकार, ताय एव वासुकि का अभिधान जिसमे हो उस मत्रपद को 'तवाभिधान' कहेगे ( मत्रपदात् का विशेषण )। मल्लिनाथ की व्याख्या देखे-अन्यत्र तवाभिधानात् । 'नामैकदेशग्रहण नाममात्र- 'ग्रहणम्' इति न्यायात् तश्च वश्च तवौ तायवासुकी। तयो अभिवान यस्मिन्पदे, तस्मात् [ बहुव्रीहि ] । अनुस्मृताखण्डलसूनुविक्रम -दुर्योधन पक्ष मे-स्मृतार्जुनपराक्रम अर्थात् अनुस्मृत कर लिया गया है आखण्डल (= इन्द्र) के सूनु ( = पुत्र अर्जुन ) का पराक्रम जिसके द्वारा, ऐसा दुर्योधन । अनुस्मत ( अनु+स्मृ+क्त कर्मणि) आखण्डलसूनो (षष्ठी तत्पु०) विक्रम (वि० + क्रम् + घज भावे) येन स , मुयोधन (बहुव्रीहिसमास ) । 'आखण्डल' इन्द्र का नाम है । अमरकोष देखे---- 'आखण्डल सहस्राक्ष' ऋभुक्षा इत्यमर । 'सूनु' का अर्थ 'पुत्र और भाई' दोनो होता है, किन्तु यहाँ इसका अथ हे 'पुत्र'। 'सूनु पुत्रेऽनुजे रवौं' इति विश्वकोश । सर्पपक्ष मे-अनु मृत कर लिया गया है आखण्डल ( = इन्द्र ) के सूनु ( = अनुज वामन अथवा नारायण ) के 'वि' अर्थात् पक्षी ( वाहनभुत पक्षिराज गरुड ) का क्रम अर्थात पादविक्षेप जिसके द्वारा ऐसा सर्प । आखण्डलस्य सूनु अनुज ( नारायण ), तस्य वि. पक्षी गरुड, तस्य क्रम पादन्यास इति आखण्डलसूनुविक्रम । शेष व्याख्या बहुव्रीहि-परक ऊपर देखे । स -वह सुयोधन । दु सहात्- .
( ६१ )
असह्यात् । सहा न जा सकने योग्य मत्रपद द्वारा। दुखेन मह्यते इति दु सह
दु + सह, + खल् कर्मणि, ) तस्मात् । कही-कही 'सुदु सहात्' पाठ भी
स्वीकार किया गया है । मत्रपदात्-मत्रशब्दात्, मत्रगत शब्दो से । मत्रस्य
पदम् इति मत्रपदम् तस्मात् षष्ठी तत्पु०, हेतौ पञ्चमी। उरग इव-सर्प
की भांति । जो पेट के बल चले वह 'उरग' है-उरसा गच्छति इति उरग
(उरस् + गम् + ड तरि ) यहाँ 'उरस्' का स् 'उरसो लोपश्च' सूत्र से
लुप्त हो गया है । नतानन -अधोमुख सन् । नत है आनन जिसका अर्थात्
अधोमुख । नतम् ( नम् + क्त कर्तरि ) आनन यस्य स वहुव्रीहि । व्यथते-
दुखायते अर्थात् व्यथित होता है।
प्रस्तुत पद्य मे श्लेष मे अनुप्राणित पूर्णोपमा अलङ्कार है । उपमा के चार
अङ्ग है-उपमेय, उपमान, वाचकशब्द और साधारणधर्म । जहाँ ये चारो
अङ्ग समवायत प्राप्त हो वही पूर्णोपमा होती है। इस श्लोक मे 'म'
( दुर्योवन ) 'उपमेय' 'उरग' उपमान, 'इव' वाचकशब्द तथा 'नतानन
व्ययते' आदि साधारण वर्म है, फलत पूर्णोपमा है। लक्षण-~~~‘सा पूर्णा
यदि सामान्यधर्म औपम्पवाचि च- उपमेयञ्चोपमानञ्च भवेद्वाच्यम् ।'
इति ।
निगमयति-
तदाशु कतु त्वयि जिह्ममुद्यते
विधीयता तत्र विधेयमुत्तरम् ।
परप्रणीतानि वचासि चिन्वता
प्रवृत्तिसाराः खलु मादृशा गिरः॥२५॥
तदिति । तत्तस्मात्त्वयि जिह्म कपट कर्तु मुद्यते । त्वा जिघासावित्यर्थ, । तत्र
तस्मिन्दुर्योधने विधेय कर्त्तव्यमुत्तर प्रतिक्रियाऽशु विधीयता क्रियताम् । ननु
कर्त्तव्यमपि त्वयैवोच्यतामिति चेत्तत्राह-परेति । परप्रणोतानि परोक्तानि वचासि
चिन्वता गवेपयता मादृशाम् वार्ताहारिणामित्यर्थ । गिर प्रवृत्तिसारा वार्ता-
मात्रसारा खलु । 'वार्ता प्रवृत्तिवृत्तान्त' इत्यमर ।
प्रवृत्तिर्वृत्तान्त' इत्यमर । वार्तामात्रवादिनो वयम्,
न तु कर्त्तव्यार्थोपदेशसमर्थाः। अतस्त्वयैव निर्धार्य कार्यमिति भाव । सामान्येन
विशेषसमर्थनादर्थान्तरन्यास ॥२५॥
( ६२ ) श्लोकान्वय-तत् त्वयि जिह्म कर्तुम उद्यन तत्र विवेयम् उत्तरम् आशु विधीयताम् । परप्रणीतानि वचासि चिन्वता मादृशा गिर प्रवृत्ति- सारा खलु। अनुवाद-अतएव आपके प्रति कपटाचरण करने के लिए समुद्य त, उस सुयोधन के प्रति करणीय प्रतिक्रिया का विधान ( आप द्वारा भी ) शीघ्र किया जाय । दूसरो द्वारा कही गई बातो का मग्रह मात्र करने वाले मुझ जैसे वार्ता- हरो की बाते निश्चय ही केवल वार्तातत्व वाली होती है ( अर्थात् हम सन्देश- मात्र दे सकते है, कर्तव्योपदेश नहीं ) भावार्थ-राजन् । एव हि निश्चप्रचमिद यत् कुटिलौऽसौ सुयोधनस्त्वयि कपटमाचरितु बद्धपरिकरो वर्तते । अतएव तद्विषयेऽपि यत्किञ्चित् समुचितम् उत्तर भवता विचार्यते तदाशु विधीयताम् । एव ब्रु वाणा अपि वय न कर्त्त-- व्यापदेशसमर्था । अपरै जनै समुदितानि वचनानि सङ्कलयताम् अस्मादृशा वार्ताहराणा गिर सन्देशमात्रमावेदयितु समर्था सन्ति न पुन कर्त्तव्य निर्दष्टुम् । टिप्पणी-तत्-तस्मात्, अस्माद्ध तो अर्थात् इसलिए । त्वयि जिह्म कर्तुम् उद्यते-त्वा जिघासौ । आपके प्रति कपट का आचरण करने को उद्यत ( उद् + यम् क्त कर्त्तरि, सप्तमी एकवचन ) । तत्र-तस्मिन् दुर्योधने, उस दुर्योवन के विषय मे ( तत् + डि + बल् स्वार्थे, विषयाधिकरणे सप्तमी ) अव्यय पद होने के कारण विभक्ति का लोप हो गया है। विधेयम्-कर्त्त- व्यम्, करने योग्य । विधातु योग्यम् इति विधेयम् (वि+ वा + यत कर्मणि )। उत्तरम् --प्रतिक्रिया, उत्तर या प्रतिकार । अतिशयेन उत्तरम ( उत् + तरप् ) उक्त कर्मणि प्रथमा । आशु-शीघ्रता 'सत्वर चपल तूर्णमविलम्बितमाशु च' इत्यमर । विधीयताम्-क्रियताम् , किया जाय । (वि + धा लोट् प्रथमपुरुष, एकवचन, कर्मणि) परप्रणो तानि- परोक्तानि, दूसरो द्वारा कही गई । परै प्रणीतानि (प्र + नी + क्त कर्मणि ) इति परप्रणीतानि । (तृतीयातत्पु० )। वचासि-वचनानि, बातो को । चिन्वताम्-गवेषयताम्, सग्रह करने वालो का ( चि + शतृ + षष्ठी बहुवचन ) यद्यपि चि द्विकर्मकधातु है, तथापि प्रस्तुत पद्य मे उसका एक ही कर्म है । मादृशाम्--वार्ताहारिणामित्यर्थ मुझ जैसे सदेशवाहको का (अस्मद + दृश् + क्विन् कर्मकर्तरि, षष्ठी बहुवचन ) । 'यदि दृश् धातु का उत् इति पूर्वक ।
( ६३ ) देखना अर्थ न हो तो त्यदादि उपपद होने पर उसमे का और विवन् प्रत्यय होते है (त्यदादिषु दशोऽनालोचने का च) इस नियम से 'अस्मद् शब्द के उपपद रहने पर 'दृश्' धातु से क्विन् प्रत्यय हुआ। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि अस्मद् शब्द त्यदादिगण मे आने वाला सर्वनाम है और दृश् धातु का उपपद है, साथ ही साथ 'दृश्' धातु का अर्थ यहाँ 'देखना' नही है वरन् वह माम्य के अर्थ मे प्रयुक्त है। दूसरा नियम है-एकवचनार्थक अस्मद् एव युग्मद् शब्द को मपयन्त प्रमश म और (व आदेश होता है, यदि उत्तर पद मे प्रत्यय हो तो ( प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ) इस नियम से उत्तरपद मे क्विन प्रत्यय रहने के कारण 'अस्मद्' के अस्म तक को म आदेश हो गया। रूप बना मद् + दृश् + क्विन् । तीसरा नियम है-सर्वनाम को आकार अन्ता- देश होता है यदि दृक् दृश् या वतु परे रहे ( आ सर्वनाम्ने ) तब रूप बना-माद् + दृश्+विवन् = मादृक्, षष्ठी बहुवचन मे मादृशाम् । गिर - वाच , बाते । गीर्यते इति गी (गृ+ क्विप् कर्मणि, बहुवचने )। प्रवृत्ति- वार्तामात्रसारा , अर्थात् वृत्तन्तवणन-मात्र जिसका तत्त्व हो, ऐसी । प्रवृत्ति ( प्र+वृत्+क्तिन् भावे ) सारो ( सृ+घञ भावे ) यासा त प्रवृत्तिसारा ( बहुव्रीहि ) वार्ता प्रवृत्तिर्वृत्तान्त' इत्यमर । खलु-निश्चय ही। खलु अव्ययपद साथ ही साथ अनेकार्थक है--'निषेववाक्यालङ्कार- जिज्ञासानुनये खलु' इत्यमर । प्रस्तुत पद्य मे उत्तरार्ध के सामान्य कथन से पूर्वार्वगत एक विशेष कथन का समर्थन किया गया है । फलत सामा य से विशेष समर्यनरूप अर्थान्तर- च्यास अलङ्कार है। - सारा इतीरयित्वा गिरमात्तसत्क्रिये गतेऽथ पत्यौ वनसन्निवासिनाम् । प्रविश्य कृष्णासदन महीभुजा तदाचचक्षेऽनुजसन्निधौ वचः ॥२६॥ इतीति-वनसन्निवासिना पत्यौ वनेचराधिप इति गिर ईरयित्वोक्त्वाऽत्त- सकिये गृहीतपारितोषिके मते याते सति । 'तुष्टिदानमेव चाराणा हि वेतनम् ते हि तल्लोभात्स्वामिकार्येष्वतीव त्वरयन्ते' इति नीतिवाक्यामृते । अथ मही- (६४ ) भुजा राज्ञा कृष्णासदन द्रौपदीभवन प्रविश्य अनुजसन्निवौ तद्वनेचरोक्त वचो वाक्यमाचचक्ष आख्यातम् । अथवा कृष्णेति पदच्छेद । सदन प्रविश्यानुजसन्निधौ तद्वच कृष्णाऽचचक्ष आख्यातम् । चक्षिडो दुहादेद्विकर्मकत्वादप्रधाने कर्मणि लिट् ॥२६॥ श्लोकान्वय--वनसन्निवासिना पत्यौ इति गिरम् ईरयित्वा आत्तमत्क्रिये गते अथ महीभुजा कृष्णासदन प्रविश्य अनुजमन्निधौ तद् वच आचचक्षे । अनुवाद--इस प्रकार वार्ता निवेदन करके एव पारितोपिक लेकर वन- चरराज के चले जाने पर राजा युधिष्ठिर द्वारा, द्रौपदीभवन मे प्रवेश करके भाइयो के समीप वह वृत्तान्त वर्णित किया गया । भावार्थ--एव हि यावच्छक्यानि सुयोधनविषयकाणि वृत्तान्तसूत्राणि विनिवेद्य तदर्थञ्च महाराजेन युधिष्ठिरेण प्रभूत पारितोषिक समवाप्य यदा वनचराविपो निजालय प्रतस्थे तदा वर्मराजोऽपि राजमहिष्या भवन प्रविश्य भीमादिभ्रातृणा समीप एव तन्सर्व किरातोक्त वृत्तान्त पुनरा- ख्यातवान् । टिप्पणी--बनसन्निवासिना पत्यो-वनेचराधिपे, अर्थात् वनचरराज- के । वने सन्निवसन्ति इति वनसन्निवासिन ( वन+ सम् + नि+ वस्+ णिनि कर्तरि जस् ) तेषाम् ( उपपद तत्पुरुष ) पति का तात्पर्य स्वामी से है (पा+डति कर्तरि, भावे सप्तमी ) इति-इत्थम् । इस प्रकार से । यह अव्यय पद है तथा वनेचर द्वारा कहे गये सम्पूर्ण सन्देश की ओर इङ्गित करता है। ध्वन्यालोक प्रथमोद्योत की टीका मे लोचनकार आचार्य अभि- नवगुप्त ने 'इति पद' का यही वैशिष्ट्य स्पष्ट करते हुए लिखा है-'इति शब्दो निखिलवाक्यपरामर्शको भवति ।' गिरम्-वाचम्, वाणी को, वृत्तान्त को। ईरयित्वा-उक्त्वा, कह कर ( ईर् + णिच् चौरादिक+क्त्वा ) । आत्तसस्क्रिये-गृहीतपारितोषिके, प्राप्त कर ली गई है मत्क्रिया जिसके द्वारा ऐसे उस वनेचर के ( चले जाने पर ) आत्ता ( आङ + दा + क्त कर्मणि स्त्रियाम् ) सत्क्रिया (द्रष्टव्य श्लो० १२) येन स , तस्मिन् (बहुव्रीहिः) । यद्यपि 'आइ+दा + क्त' का रूप सामान्यत 'आदत्त' बनना चाहिए था परन्तु नियम है कि 'यदि दा धातु के पूर्व स्वरान्त उपसर्ग रहे और यदि कोई तादि कित् प्रत्यय उसके परे हो तो ऐसी स्थिति मे दा धातु अपने स्वर के स्थान पर 'त्' ग्रहण करती है ( अच उपसर्गात्त ) इस प्रकार , (६५) अब 'आड् + दा + क्त' का रूप आड् + त्-त् + क्त = आत्ता बना। गते-याते सति, चले जाने पर । अथ-अनन्तरम् । किसी नवीन प्रकरणारम्भ के लिए या आनन्तर्य सूचित करने के लिए अथ का प्रयोग होता है । अमरकोश देखे- 'मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्यप्वयो अथ'। महाभुजा-राज्ञा ! राजा युधिष्ठिर द्वारा । कृष्णासदन प्रविश्य-द्रौदीभवनमासाद्य, कृष्णा अर्थात् द्रौपदी के भवन मे पहुँचकर । जिनमे बैठा जाय, रहा जाय वह सदन है-सीदन्ति अस्मिन् इति सदनम् (सद् + ल्युट् अविकरणे) कृष्णाया सदनम् इति कृष्णासदनम् (षष्ठी तत्पु०) 'निशान्तपस्त्यसदन भवनागारमन्दिरम्' इत्यमर । अनुजसन्निधौ--- भ्रातृणा समीपे अर्थात् भीमार्जुन प्रभृति भाइयो के समीप । जो अपने बाद पैदा हो वह अनुज है-अनु पश्चात् जाता इति अनुजा. ( अनु + जन् + ड कर्तरि ) तेषा सन्निधि ( सम् + नि + धा+कि भावे ) इति अनुज- मन्निधि (षष्ठी तत्पु०) तस्मिन् । अधिकरणे सप्तमी । 'सन्निवि सन्निकर्षगम् इत्यमर । तद्वच ---वनेचरोक्त वाक्यम् अर्थात् किरात द्वारा कहा गया वह वृत्तान्त, उसको । आचचक्षे. -आख्यातम् पुन कहा गया, दुहराया गया ।। आ+चक्ष +लिट् ए कर्मणि । . निशम्य सिद्धि द्विषतामपाकृती- स्ततस्ततस्त्या विनियन्तुमक्षमा। नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी- रुदाजहार द्रुपदात्मजा गिरः ॥२७॥ निशम्येति । अथ द्रुपदात्मजा द्रौपदी द्विषता सिद्धिम् वृद्धिरूपा निशम्य । ततस्तदनन्तरम् । ततो द्विषद्भ्य आगतास्ततस्त्या । 'अव्ययात्त्यप्' इति त्यप् । अपाकृतीविकारान्विनियन्तु निरोद्धुमक्षमा सती नृपस्य युधि- ष्ठिरस्य मनुव्ययसाययो क्रोधोद्योगयोर्दीपिनी सबधिनी गिरो वाक्यान्युदाजहार जगादेत्यर्थ ॥२७॥ श्लोकान्वय--तत द्विषता सिद्धि निशम्य ततस्त्या अपाकृती विनियन्तु- मक्षमा द्रु पदात्मजा नृपस्य मन्युव्यवसायदीपिनी गिर उदाजहार । अनुवाद-तदन्तर, शत्रुओ की सफलता को सुनकर, उससे समुद्भूत मनोविकारो पर नियन्त्रण पाने में असमर्थ द्रौपदी ने महाराज युधिष्ठिर मे क्रोध एव उद्योग को उद्दीप्त करने वाली बाते कही।
-- भावार्थ--युधिष्ठिरमुखादुनुश्रूय शत्रु समृद्धिकथा दृष्ट्वा च पाण्डवानाम् अनुद्योग द्रुपदतनया महत्कष्टमवाप । स्वभावादेव नारी भावुका भवति । अतस्तच्छ्रवणमात्रेणैव समुद्भूतान् मनोविकारान् नियमयितुमसमर्था सती सा महाराजस्य युधिष्ठिरस्य क्रोधोद्योगयो सवधिनी वाच जगाद । टिप्पणी--तत -तदनन्तरम्, उसके बाद । द्विषता सिद्धि निशम्य-- शत्रणा साफल्य श्रुत्वा । दुर्योधनप्रभृति अपने शत्रुओ की अभिवृद्धि को सुन कर । जो किसी से द्वेष करे वे 'द्विषन्त' है-द्विषन्ति इति द्विषन्त ( द्विष + शतृ कतरि), तेषा द्विषताम् । शेषेषष्ठी। द्विष धातु मे शतृ प्रत्यय 'द्विषोऽमित्रे' सूत्र से लगा है जिसका अर्थ यह है कि द्विष धातु के आगे 'अमित्र' अर्थात् शत्रु अर्थ मे शतृ प्रत्यय लगता है । इस प्रकार बना हुआ 'द्विषत्' शब्द सज्ञा शब्द की तरह प्रयुक्त होता है । सिद्धि का अर्थ है साफल्य ( सिध् + क्तिन् भावे द्वितीया एकवचन )। निशम्य का अर्थ है सुनकर (नि+शम् + ल्यप् )। 'शम्' दिवादिगणी धातु है जिसके रूप 'शाम्यति-शाम्यत --शाम्यन्ति' आदि चलते है । किन्तु 'नि' उपसर्ग से युक्त होने पर इस धातु ( नि + शम ) के दो अर्थ होते हे-मुनना और देखना। सुनने के अर्थ मे निपर्वक शम ( दिवादिगणी ) धातु मे णिच् प्रत्यय जोडकर 'मित' सज्ञा कर दी जाती है और तब 'मितो ह्रस्व' सूत्र से (दिवादिगणी धातु मे आने वाला दीर्घ-स्वर जैसे शाम्यति का 'आ' ) ह्रस्व हो जाता है । इस प्रकार रूप बनता है 'निशमयति' आदि । परन्तु देखने के अर्थ मे णिच् प्रत्यय तो होता है परन्तु मित्सज्ञा और ह्रस्व-विधान नही होता । फलत रूप बनता है निशामयति आदि । एक बात और- शम धातु चुरादिगणी भी है शमन के अर्थ मे (द्रष्टव्य 'शमयति परिताप छायया वारितोष्ण' आदि शाकुन्तलम् मे) नि उपसर्ग जोडने पर इसका भी अर्थ सुनना ही होता है । परन्तु यह भी अमित धातु हे फलत ल्यप् प्रत्यय होने पर इसका रूप 'निशम्य' न बन कर निशमय्य' बनेगा। ततस्त्या--द्विषद्भ्य आगता , शत्रुओ से आई हुई अर्थात शत्रुजनो की सफलता के कारण उत्पन्न होने वाली। तत ( तद् + भ्यस् + तस् स्वार्थे ) आगता इति ततस्त्या (तत + त्यप्-टाप् स्त्रियाम् द्वितीया बहुवचन ) यहाँ त्यप् प्रत्यय 'अव्ययात्त्यप्' सूत्र से हुआ है जिसका अर्थ है--"उद्भूत होने के अर्थ मे अव्यय से त्यप् प्रत्यय होता है ।' अपाकृती - विकरान अर्थात 'विकारो को, प्रतिक्रियाओ को। अपकरणम अपाकृति ( अप+आ++ क्तिन् भावे ), ता अपाकृती ( द्वितीया बहुवचन ) इस अपकरण का अर्थ अपकारादि नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य है प्रबृनि या स्वभाव का अन्यथा हो जाना अर्थात् मनोविकार । विनियन्तम्-निरोद्धम् । रोक पाने मे ( वि+ नि + यम् + तुमुन् )। अक्षमा-असमर्था। असमर्थ । क्षमते इति क्षमा (क्षम् + अच् + टाप् स्त्रियाम् ) न क्षमा इति अक्षमा ( ना तत्पु०) द्रुपदात्मजा-पाञ्चाली, द्रौपदी। जो अपने से पैदा हो, उसे आत्मजा कहते है-आत्मनो जाता इति आत्मजा ( आत्मन् + जन् + ड कर्तरि टाप् स्त्रियाम् )। द्रुपदस्य पञ्चालनरेशस्य आत्मजा इति द्रुपदात्मजा ( षष्ठी तत्पु०)। नृपस्य-युधिष्ठिरस्य । महाराज युधिष्ठिर की। मन्युव्यवसाय- दीपिनी. -क्रोवोद्योगसवर्धिनी , अर्थात् क्रोध एव उद्योग को उद्दीप्त करने वाली (बातो को) । मन्यु का अर्थ है 'क्रोध' । 'मन्युर्दैन्ये ऋतौ क्रुधि' इत्यमर । व्यवसाय का अर्थ है उद्योग (वि० + अ + सो + धन भावे) मन्युश्च व्यवमायश्च इति मन्युव्यसायो ( इतरेतर द्वन्द्व-समास ), तयो दीपिनी ( दीप् + णिच् + णिनि कर्तरि + डीप स्त्रियाम्, द्वितीया बहुवचन ) इति मन्युव्यवसायदीपिनी । षष्ठी तत्पुरुप । डीप् प्रत्यय यहाँ 'ऋन्नेभ्यो डीप' सूत्र से हुआ है जिसका अर्थ है-'ऋदन्त और नान्त शब्द से ( स्त्रीवाची होने पर) डीप् प्रत्यय होता है ।' गिर - वाच , बातो को 'ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वाग्वाणी सरस्वती' इत्यमर । उदाजहार--जगाद । बोनी। अ + हृ +लिट् प्रथम-पुरुष एकवचन । । उद् + श्ववादृशेषु प्रमदाजनोदित भवत्यधिक्षेप इवानुशासनम् । तथापि वक्तु व्यवसाययन्ति मा निरस्तनारीसमया दुराधयः ॥२८॥ भवादृशेष्विति । भवादृशा भवद्विधा । पण्डिता इत्यर्थ । तेषु विषये । 'त्यदादिषु -'इत्यादिना कज । 'आ सर्वनाम्न' इत्याकारादेश । प्रमदाजनोदित स्त्रीजनोक्तम् । वदे क्त । 'वचिस्वपि-' इत्यादिना सम्प्रसारणम् । अनुशासन नियोगवचनमधिक्ष पस्तिरस्कार इव भवति । अतो न युक्त वस्तुमित्यर्थ । तथापि वक्तुमनुचितत्वेऽपि निरस्तनारीसमयास्त्याजितशालीनतारूपस्त्रीसमाचारा । फा०-७ ( १८ ) (Yeshikai -THARU 'समय शपथाचारकालसिद्धान्तसविद' इत्यमर । दुराधय समयोल्लवनहेतुत्वाद् दुष्टा मनोव्यथा 'पु स्याधिर्मानसी व्यथा' इत्यमर । मा वक्तु व्यवसाययन्ति प्रेरयन्ति । न किञ्चदयुक्त दुखितानामिति भाव ॥२८॥ श्लोकान्वय-भवादशेष प्रमदाजनोदितम् अनुशासनम् अधिक्षेप इव भवति । तथापि निरस्तनारीसमया दुरावय मा वक्तु व्ययसाययन्ति । अनुवाद-~~आप जैसो के लिए स्त्रीजनो द्वारा उपदिष्ट नियोगवचन अपमान के समान है फिर भी स्त्रियोचित शालीनता को विनष्ट कर देने वाली दुष्ट मनोव्यथाएँ मुझे बोलने के लिए प्रेरित कर रही है । भावार्थ-महाराज | भवद्विवेप पण्डितजनेषु स्त्रीजनोपदिष्ट नियोगवचन तिरस्कार इव वतते इति न च नाह जाने। किन्तु कि करोमि मन्दभागिनी ? दुराविभिस्तावत् स्त्रीजनोचित शालीनत्व विनाशमुपगतम् । नाह स्वान्त सुखाय भवन्तमुपदेष्टु समीहे किन्तु ता एव दुर्दान्ता मनोव्यथा किञ्चिद्वक्तु मामवना प्रेरयन्ति । टिप्पणी-भवादृशेषु-भवद्विधेष, अर्थात् आप जैसे पण्डित व्यक्तियो के विषय मे ( भवत् + दृश् + को कर्मकर्तरि ) अधिकरणे सप्तमी । विशेष प्रक्रिया के लिए श्लोक २५ मे 'मादृशाम्' पद की टिप्पणी देखे । प्रमदाजनो- दितम्--स्त्रीजनोक्त , अर्थात् स्त्री द्वारा कही गई बात या उपदेश । प्रमदा का अर्थ है स्त्री, जो प्रमद ( हर्ष ) से युक्त हो, वही प्रमदा है--प्र + मद + अप भावे = प्रमद ('प्रमदसम्मदी हर्षे' अर्थात् हर्ष के अर्थ मे प्रमद तथासम्मद इन दोनो शब्दो मे अप् प्रत्यय लगता है) प्रमद अस्ति अस्या इति प्रमदा । प्रमद + अच् प्रत्यय मत्वर्थीय अर्शआदिभ्योऽच सूत्र से + टाप अथवा प्रमद करोति इति प्रमदा (प्रमद+ णिच् + अच् +टाप् स्त्रियाम) । प्रमदा चासौ जनश्च इति प्रमदाजन ( (कर्मधारयममास) । प्रमदाजनेन उदितं (वद् + क्तु कर्मणि) इति प्रमदाजनोदितम् (तृतीया तत्पु०) 'प्रमदा मानिनी कान्ता ललना च नितम्बिनी' इत्यमर । अनुशासनम्-नियोगवचनम् अर्थात उपदेशपरक वचन । अनुशिष्यते इति अनुशासनम् ( अनु + शास् + ल्युट् भावे) । अधिक्षेप इव भवति-तिरस्कार इव वर्तते अर्थात् अपमान के समान है । अधि + क्षिप् + धन भावे = अधिक्षप, 'अधिक्षप समाक्षेपो व्यङ्ग्य- बुक्त वचोऽपि वा' इति कोश । तथापि---फिर भी अर्थात स्त्रीजनोपदेश के स्त्रियाम्) (६६ ) - तिरस्कारसदृश होने पर भी। निरस्तनारीसमया-त्याजितशालीनतारूप- स्त्रीसमाचारा अर्थात् जिन्होने स्त्रियोचित शालीनता को समाप्त कर दिया हे ( ऐमी मनोव्यथाएँ) 'समय' का अर्थ है 'आचार' या 'शालीनत्व' । अमरकोश देखे--'समय शपथाचारकालसिद्धान्तसविद' । नारीणा समया इति नारीसमया ( षष्ठी तत्पु० ), निरस्ता (निर् + अस् + क्त ) त्याजिता नारीसमया यैस्ते निरस्तनारीसमया ( बहुव्रीहि ) दुराधय ---दुर्मनोव्यथा , दुष्ट मनो- व्यथाएँ । 'आवि' शब्द संस्कृत मे पुल्लिङ्ग है जिसका अर्थ है मानसिक व्यथा । 'पु स्याधिर्मानसीव्ययर' इत्यमर । दु दुष्टा आधय ( आ + धा+ कि, प्रथमाबहुवचन ) इति दुरावय , प्रादितत्पु० । माम्-द्रौपदीम्, मुझे (द्रौपदी को)। माम की यहाँ कर्मसज्ञा है और 'कर्मणि द्वितीया' सूत्र से द्वितीया-विभक्ति का प्रयोग हुआ है। संस्कृत मे किसी भी क्रिया का प्रयोग दो प्रकार से होता है। एक तो साधारण-प्रयोग जैसे 'अह गच्छामि' ( मै जाता हूँ) दूसरा प्रयोग प्रेरणार्थक प्रयोग कहलाता है। जैसे- 'स मा गमयति' ( वह मुझे जाने को प्रेरित करता है ) इसी प्रकार 'पढता है' ( पठति ), 'पढाता है' ( पाठयति ) आदि प्रयोग होते है जब क्रिया को प्रेरणार्थक बनाना होता है तो उसमे एक प्रत्यय जोड देते है-'णिच्' । इस प्रकार प्रयमकोटि की क्रियाएँ 'अणिजन्त या अण्यन्त' और द्वितीय कोटि की 'णिजन्त या ण्यन्त' कही जाती है । अब एक सूत्र है-'गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थ शब्दकर्माकाणाम अणि कर्त्ता स णौ' ( कर्म इति शेष ) इसका अर्थ है-- गत्यर्थक, बुद्ध्यर्थक, प्रत्यवसनार्थक, शब्दकर्म वाली तथा अकर्मक वातुओ का ( अणि ) अणिजन्त रूप मे अर्थात अप्रेरणार्थक या सामान्य प्रयोग करने पर जो कर्ता होता है, वही णौ अर्थात् णिजन्त प्रयोग मे कर्म हो जाता है । जैसे-'स गच्छति' मे 'गम्' धातु गत्यर्थक है और 'स' इस धातु का कर्त्ता है । अब यदि हम 'गम्' धातु का प्रेरणार्थक ( णिजन्त या ण्यन्त ) प्रयोग करेंगे तो वही कर्ता 'स' उसका कर्म हो जायेगा । जैसे- रामस्त गमयति । ठीक इसी प्रकार यहाँ भी--वि + अ + सो = व्यवस्यामि ( उत्तम पुरुष एकवचन ) क्रिया अकर्मक है, अत सामान्य प्रयोग मे आने वाला इसका कर्ता 'अहम् ' णिजन्त प्रयोग मे कर्म ( माम ) हो गया है। वक्तम्--कथयितुम, कहने के लिए। व्यवसाययन्ति- प्रेरयन्ति, प्रेरित कर रही है (वि + अ + सो+णिच् लट् लकार प्रथमपुरुष, बहु० )।
( १०० ) अखण्डमाखण्डलतुल्यधामभि- श्चिर धृता भूपतिभिः स्ववंशजैः । त्वयात्महस्तेन मही मदच्युता मतगजेन लगिवापर्वजिता ॥२६॥ अखण्डमिति । आखण्डलतुल्यवामभिरिन्द्रतुल्यप्रभाव । 'धाम रश्मौ गृहे देहे स्थाने जन्मप्रभावयो' इति हैम । स्ववशजै भूपतिभिर्भरतादिभिश्चिरमखण्डम- विच्छिन्न धृता मही । त्वया, मद च्योततीति मदच्युत् । क्विप् । तेन मदस्राविणा मतङ्गजेन स्त्रगिवात्महस्तेन स्वकरेण स्वचापलेनेत्यर्थ । अपव जिता, परिहृता त्यक्ता । स्वदोषादेवायमनर्थागम इत्यर्थ ॥२६॥ श्लोकान्वय-आखण्डलतुल्यधामभि स्ववशजै भूपतिभि चिरम् अखण्ड धृता मही त्वया मदच्युता मतगजेन स्रगिव आत्महस्तेन अपवर्जिता । अनुवाद--( महाराज | ) इन्द्र के समान प्रभावशाली, स्ववगोत्पन्न ( भरतादि ) नरपतियो द्वारा चिरकाल तक अखण्डरूप से प्रशासित पृथ्वी को आपने अपने हाथो गवॉ दिया है, जैसे मदस्रावी गजराज (अर्पित की गई) माला को अपनी ( ही ) सूंड से फेक देता है । भावार्थ--राजन् । स्वदोषात् एव अयमनर्थागम । पुरन्दर दृशै तेजस्विभि स्वकुलोत्पन्न भरतशान्तनुप्रभृतिभि सुगृहीतनामधेय राजर्षिभि यद्भूमण्डल चिरकाल यावदखण्ड प्रशासितमासीत् तदेव भवता म्वकीयेनैव चापलेन द्यूतक्रीडा- दिकन परित्यक्तम् । यथा खलु कोऽपि मदमत्तो गजेन्द्र स्वशीर्षोपरि विन्यस्ता माला स्वेनैव शुण्डादण्डेन दुर क्षिपति । स्वामिन् । तथैव भवतापि स्वपैत्रिक साम्राज्य सम्प्रति अपवजितमस्ति । टिप्पणी-आखण्डलतुल्यधामभि --'आखण्डल' अर्थात् इन्द्र के समान है धाम या तेज जिनका, ऐसे ( भूपतियो द्वारा ) तुल्यं धाम यषा ते तुल्यधा- मान तुल्यप्रभावा ( बहु०, आखण्डलेन तुल्यधामान ( मप्सुपा), ते । अमरकोश देखे-'आखण्डल सहस्राक्ष ऋभुक्षा 'वाच्य लिड्ना समस्तुल्य -सदृक्ष सदृश. सदृक् । विश्वकोश-धाम शक्ती प्रभावे च तेजोमन्दिरजन्मसु । स्ववशज.--स्वकुलोत्पने अर्थात् अपने वश ( चन्द्रवश ) मे उत्पन्न होने वाले ( भूपतियो द्वारा ) । स्वस्थ निजस्य वश इति स्ववश (षष्ठी तत्पु० तस्मिन्
( १-१ )
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जाता इति स्ववशजा (स्वर्वश + जन् + ड कर्तरि )। 'वशोऽन्ववयाः
सन्तान इत्यमर । भूपतिभि -राजाओ द्वारा ('क्व भूपतीनाम्' श्लोक
५ की व्याख्या देख ) । चिरम्-दीर्घकालम्, बहुत दिनो तक ( अव्ययपद )।
अखण्डम्-अविच्छिन्नम् अर्थात् बिना किसी विच्छेद के, सातत्येन,
निरन्तर । धृता-प्रशासिता, वारण की गई। प्रशामित की गई । धृ + क्त
कर्मणि स्त्रियाम् । मही-पृथ्वी ( उक्त कर्मणि प्रयमा) 'गोत्रा कु पृथिवी
पृथ्वी क्ष्मावनिर्मेदिनी मही' इत्यमर । त्वया-आप द्वारा। मदच्युता-
मदनाविणा अर्थात् मतवाले । जो मदजल का स्राव करे उसे मदर
है- मद च्योतति इति मदन्युत् ( मद + च्यु + क्विप् कर्तरि ), तेन
मदच्युता। उपपद तत्पु० । मतगजेन-गजराजेन, हाथी द्वारा। जो मतङ्ग
से उत्पन्न हो उसे मातग या मतगज कहते हे-मतगात् जात इति मतगज
तेन ( मतग + जन् + ड कर्तरि ) । 'मतगजो गजो नाग कुञ्जरो वारण.
करी' इत्यमर । स्त्रकइव-माला इव। माला की भॉति । जो यत्नपूर्वक
बनाई जाय, गूयी जाय उसे स्रक् कहते है-सृज्यते सयत्न विधीयते इयम् इति
स्रक ( सृज् + क्विन् कर्मणि निपातनात् ) । 'माल्य मालास्रजौ' इत्यमर ।
आत्महस्तेन-स्वकरेण, अपने (ही) हाथ से । आत्मन हस्त इति आत्म-
हस्त , तेन ( षष्ठी-तत्पुरुष ) । करणे तृतीया । आचार्य मल्लिनाथ 'स्वचापलेन'
शब्द का प्रयोग करते है। वस्तुत चपलता से उनका सङ्केत राजा युधिष्ठिर
के 'द्यूतव्यसन' की ओर है । अपवर्जिता-परिहृता अर्थात् खो दी गई।
अप् + वृज् + णिच् + क्त कर्मणि स्त्रियाम् टाप ।
प्रस्तुत पद्य मे मही एव स्रक् मे उपमेयोपमान-भाव है, फलत उपमालङ्कार
मान्य है-'साधर्म्यमुपमाभेदे' ।
स्वदोषादेवायमनगम इत्युक्तम् । स च दोष
स च दोष कुटिलेष्वकौटिल्य-
मेवेत्याह
व्रजन्ति ते मूढधियः पराभव
भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि ध्नन्ति शठास्तथाविधान
असवृताङ्गान्निशिता इवेषवः ॥३०॥
( १०२ ) । (ज्य व्रजन्तीति । मूढधिय निर्विवेकबुद्धयस्ते । पराभव ब्रजन्ति । ये माया विपु मायावत्सु विषयेषु 'अस्मायामेधा' इत्यादिना विनिप्रत्यय । मायिन मायावन्त ब्रीह्यादित्वात् इनिप्रत्यय , न भवन्ति । अत्रैव अर्थान्तर न्यस्यति प्रविश्येति शठा अपकारिणो धूर्ता तथाविधान् अकुटिलान् असवृताङ्गान् अवमितशरीरान् निशीता । इषव इव । प्रविश्य प्रवेश कृत्वा आत्मीया भूत्वा ध्नन्ति हि । 'आर्जव हि कुटिलेषु न नीति' इति भाव । श्लोकान्वय-मूढधिय ते पराभव ब्रजन्ति ये मायाविषु मायिन न भवन्ति । शठा तथाविधान् ई असवृताङ्गान् निशिता इषव इव प्रविश्य ध्वन्ति हि। “उपभी उML अनुवाद-मूढबुद्धि वाले वे लोग पराभव प्राप्त करते है जो मायावियो के विषय मे ( स्वय) मायावी नही होते । धर्त लोग तथाविध सौम्य पुरुषो के आत्मीय बन कर उन्हे मार ही डालते है जैसे तीखे बाण कवच से अनाच्छादित शरीर वालो के भीतर घुस कर ( उन्हे मार ही डालते है)। भावार्थ-इय खलु नीतिर्यत्-यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिस्तया वर्तितव्य स धर्म । मायाचारी मायया प्रत्युपेय साध्वाचारी सावना प्रत्युपेय । राजन् । मन्दबुद्धयस्ते पुरुषा निरन्तरमेव पराभवमुपयान्ति ये खलु হাট समाचरन्ति । धूर्तास्तु तथाविधसौम्यपुरुषान् अवमितशरीरान् अन्त प्रविश्य मारयन्त्येव यथा खलु तीक्ष्णा बाणा कवचविहीनान् पुरुषान् व्यापादयन्ति । यद्यपि सुयोधनेन कृत कैतव तथापि भवता न किञ्चित्तादृशमेव क्रियते । टिप्पणी--मूढधिय ते--निर्विवेकबुद्वय ते पुरुषा । विवेकहीन बुद्धि वाले वे पुरुष । जिसके द्वारा कुछ चिन्तन किया जाय, वही 'धी' है-ध्यायति अनया इति धी (ध्य + क्विप् करणे ) मूढा (मुह + क्त कर्तरि स्त्रियाम् टाप्) धी येषा ते मूढधिय , बहुव्रीहि । बहुव्रीहि । पराभव-पराजयम् अपमान अथवा परिभव को ( परा + भू + अप भावे )। 'पराभव परिभव पराजय' इति कोश । व्रजन्ति--उपयान्ति, प्राप्त होते है ( ब्रज् + लट् लकार प्रथमपुरुष बहुवचन)। ये--जो लोग । मायाविषु-मायावत्सु अर्थात् छल-प्रपञ्च का आचरण करने वालो मे । जो मायाप्रदर्शन करे, वे मायावी है-माया अस्ति एषाम् इति मायाविन , तेषु ( माया + विनि मत्वर्थे + सुप् )। विनि प्रत्यय यहाँ 'अस्मायामेधास्रजो विनि' सूत्र से हुआ है। तात्पर्य है- अस् मे अन्त होने वाले शब्दों एव माया, मेधा और स्रज् शब्दो से विनि प्रत्यय शाठ्य न ( १०३ ) , होता है । जैसे तेजस्वी, मायावी एव त्रग्वी शब्द । मायिन --मायावन्त माया से युक्त छली प्रपञ्ची। माया अस्ति एषाम् इति मायिन ( माया + इनि मत्वर्थे )। यहाँ मत्वर्थक इनि प्रत्यय 'ब्रीह्यादिभ्यश्च' सूत्र से हुआ है । तात्पर्य है-ब्रीह्यादिगण के शब्दो मे मतुप के अर्थ मे इनि प्रत्यय होता है । न भवन्ति--नही होते है । शठा-धूर्ता, धूर्तगण, अपकारी लोग। तथाविधान्-अकुटिलान् अर्थात् उस प्रकार के सीवे-सादे पुरुषो को । 'तया' का अर्थ है तादृश' और 'विवा' का अर्थ है प्रकृति या स्वभाव । तथा ( तद् + थाल् = तथा, प्रकारवत्रने याल्' सूत्र मे) ( विधा येषा ते तथाविधा ( बहुव्रीहि ), तान् । असवृताङ्गान्---अवमितशरीरान् अर्थात् अनाच्छादित गरीर वालो को । असवृतानि ( सम् + वृ + क्त कर्मणि, नज तत्पु० ) अगानि येषा ते असवृताङ्गा , तान् ( बहुव्रीहि )। आचार्य मल्लिनाथ इसका पर्याय 'अमितशरीरान्' देते है । परन्तु यह शब्द वास्तव मे यर्थक होना चाहिए । बाण के पक्ष मे तो 'अवमितशरीरान्' ठीक है-~-कवचहीन शरीरवालो को। दुष्टो के पक्ष मे इसका अर्थ होना चाहिए-'अगोपितरहस्यान्' अर्थात् रहस्य को गुप्त न रखने वाले। क्योकि शठ लोग ऐसे ही भोले-भाले व्यक्तियों के आत्मीय बन कर उनका विनाश करते है। निशिता इषव इव-तीक्ष्णा बाणा इव, तीखे बाणो की भॉति । नि+शो + क्त कर्मणि प्रथमा ब० व° निशिता । वस्तुत इस प्रक्रिया से रूप बनना चाहिए "निशाता' परन्तु विकल्प मे 'निशिता' रूप बना है- शाच्छोरन्यतरस्याम्' अर्थात् यदि (क्त+ क्तवतु) निष्ठा प्रत्यय परे हो तो शो एव छो धातु को विकल्प से शि और छि आदेश हो जाता है। प्रविश्य-प्रवेश कृत्वा । दुष्टो के पक्ष मे-आत्मीय बनकर या रहस्य जानकर । बाण के पक्ष मे-शरीर मे घुस कर । प्र+विश् + ल्यप् । ध्नन्ति हि-मारयन्ति एव, मार ही डालते है । 'शठा' तथा 'इषव' मे उपमेयोपमान भाव होने के कारण उपमा तथा विशेष ( बाद की दो पक्तियाँ) से सामान्य-समर्थन ( ऊपर की दो पक्तियाँ) स्वरूप अर्थान्तरन्यास । दोनो अलङ्कारो की तिलतण्डुलवत् ससृष्टि है इस पद्य मे। न च लक्ष्मीचाञ्चल्यादनर्थागम , किन्तु स्वोपेक्षादोषमूलत्वादित्याशयेनाह - गुणानुरक्तामनुरक्तसाधनः कुलाभिमानी कुलजां नराधिपः । % 3D ( १०४ ) परस्त्वदन्यः क इवापहारये- न्मनोरमामात्मवधूमिव श्रियम् ॥३१॥ - गुणेति, अनुरक्तसाधनोऽनुकूलसहायवान् । उक्त च कामन्दकीये-'उद्योगा- दनिवृत्तस्य ससहायस्य धीमत । छायेवानुगता तस्य नित्य श्री सहचारिणी ।' इति । कुलाभिमानी क्षत्रियत्वाभिमानी कुलीनत्वाभिमानी च त्वदन्यस्त्वत्तोऽन्य । 'अन्यागत'- इत्यादिना पञ्चमी । क इव नराधिपो । गुणै सन्ध्यादिभि सौन्दर्या- दिभिश्चानुरक्तामनरागिणी कुलजा कुलक्रमादागता कुलीना च मनोरमा श्रियम् आत्मवधूमिव स्वभार्यामिव 'वधूर्जाया स्नुषा स्त्री च' इत्यमर । परै शत्रुभिर- न्यैश्चापहारयेत । स्वयमवापहार कारयेदित्यर्थ । कलत्रापहारवल्लक्ष्म्यपहारोऽपि राज्ञा मानहानिकरत्वादनुपेक्षणीय इति भाव ॥३१॥ श्लोकान्वय-अनुरक्तसाधन कुलाभिमानी त्वदन्य क इव नराविप गुणा- नुरक्ता कुलजा मनोरमामात्मधूमिव श्रियम् परै अपहारयेत् । अनुवाद-अनुकूल सहायको से युक्त, कुलाभिमानी आपके अतिरिक्त भला और कौन अनुकूल सैन्यशक्ति वाला, क्षत्रियत्वाभिमानी नरेश है जो कि गुणो मे अनुरक्त, कुलीन एव मनोरमा अपनी प्रियतमा की भॉति (सव्यादि) गुणो में अनुरक्त, कुलक्रमागत एव सुखदायिक्ती अपनी साम्राज्यलक्ष्मी को दूसरो (शत्रुओ) से अपहृत कराएगा? antagonism भावार्थ--प्राणेश | त्वयैव लावदीदृशमनर्थकृत्यमाचरितम् । अन्यथा त्वदन्य को वापरो नरपति स्वप्रियतमामिव स्वसाम्राज्यलक्ष्मीमपि शत्रुभि अपहारयेत् ? न कोऽपि । साम्राज्यलक्ष्मी अपि सौन्दर्यादिगुणानुरक्ता, सद्वशोत्पन्ना मनोरमा प्रियतमेव सन्ध्यादिगुणाकृष्टा कुलक्रमादागता सुखकरी च भवति । अस्मादेव सापि भार्येव दुस्त्यजा भवति । किन्तु स्वामिन् । श्रीमता तु द्वेअपि शत्रुभि अपहारिते । तदिद महदशोभनम् । टिप्पणी--सम्पूर्णपद्य उभयार्थक है, पहला अर्थ द्रौपदी के पक्ष मे और दूसरा राजलक्ष्मी के पक्ष मे । फलत प्रत्येक शब्द की दो व्यञ्जनाएं हो गई है। अनुरक्त साधन-~-अनुकूलसेवक , अनुकूलसेन अर्थात् (द्रौपदी-पक्ष मे) अनुकूल सेवको-सहायको बाला अथवा अनुकूल सैन्यशक्ति वाला । जिससे किसी अर्थ की सिद्धि की जाय वही साधन है--साधयति अनेन अर्थान् इति साधनम् (साध् + णिच् +करणे ल्युट् अथवा दिवादिगणी धातु (सिध् + णिच् +करणे ल्युट्) व्याकरण के ( १०५ ) - , नियमानुसार यदि सिध् धातु का पारलौकिक अर्थ न हो तो उसका णिजन्त रूप होने पर उसमे आत्व आ जाता है। सूत्र है-सिध्यतेरपारलौकिके' । यहाँ सिव् का प्रयोग (साधन = ) मेना के अर्थ मे है, अत आवागम हो गया जिससे कि साधन शब्द बना । साधन अर्थात् सेवक या सैन्यबल जिसके अनुकूल हो वही अनुरक्तसाधन है-अनुरक्त साधन यस्य स ( बहुव्रीहि ) कुलाभिमानी कुलीनत्वाभिमानी, क्षत्रियत्वाभिमामी जिसे अपने कुन की लाज होगी वह जी ते जी पत्नी का अपहरण परायो से नही कराएगा और जिसे अपने क्षत्रियत्व का अभिमान होगा वह अपनी राज्यलक्ष्मी का अपहरण शत्रुओ से नही कराएगा। पहला अर्थ द्रौपदीपक्षीय और दूसरा राज्यलक्ष्मीपक्षीय है । कुलस्य कुलीनत्वस्य क्षत्रियत्वस्य वा अभिमान ( अभि + मन् + भावे घन । इति कुलाभिमान ( षष्ठी तत्पु०) सोऽस्ति अस्येति ( कुलाभिमान + इनि मत्वर्थीय )। त्वदन्य क इव-आपके अतिरिक्त भला और कौन । 'त्वदन्य' शब्द मे पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग अन्य शब्द के कारण हुआ है ( 'अन्यारादितरते- दिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते' सूत्र से ) 'क इव' म 'इव' के माथ 'क' का प्रयोग प्राय व्यग्रता या वैपरीत्य दिखाने के लिए हुआ है। द्रष्टव्य-किमिव हि मधुराणा मण्डन नाकृतीनाम् ( शाकुन्तल ) अथवा विना सीतादेव्या किमिव हि न दुख रघुपते ( उत्तरचरित ) नराधिप -राजा। अघि पातीति अधिप ( अधि + पा + क कर्तरि ) नराणाम् अधिप. इति नराधिप ( षष्ठी तत्पु० ) गुणानुरक्ताम् --गुणानुरागिणीम् । द्रौपदीपक्ष मे-सौन्दर्यादि गुणो के कारण अनुरक्त तथा राजलक्ष्मीपक्ष मे--सन्धि आदि गुणो के कारण अनुरक्त । गुणै सौन्दर्यादिभि सन्धिविग्रहादिभिर्वा अनुरक्ता इति गुणानुरक्ता ( सुप्सुपा ) ताम् । कुलजाम्-कुलीना, कुलक्रमादागताम् । अर्थात् सद्वश मे उत्पन्न ( द्रौपदी ) अथवा कुलक्रमागत, पैत्रिक ( राजलक्ष्मी ) कुलात् कुले वा जाता इति कुलजा ( कुल + जन् + ड कर्तरि, स्त्रियाँ टाप् ) ताम । मनोरमाम्-हृद्याम अर्थात रमणीय, यही अर्थ दोनो पक्षो मे घटित होगा क्योकि प्रियतमा एव राजलक्ष्मी दोनो ही मनोरमा या हृद्य होती हैं । जो रमा दे वही रमा है-रमयति इति रमा ( रम् + णिच् + अच् कर्तरि+टाप्) मनस रमा इति मनोरमा ताम् ( षष्ठी तत्पु० )। आत्मवधूमिव -स्वभा- र्यामिव अपनी प्रियतमा की भॉति । आत्मन वधू. इति आत्मवधू षष्ठी तत्पु० ताम् । अमरकोश देखे-स्त्री योषिदबला योषा नारी सीमन्तिनी वधू। 'इव' यहाँ उपमार्थक है। श्रियम्-साम्राज्यलक्ष्मी, को। लक्ष्मी पद्मालया पद्मा ( १०६ ) कमला श्रीहरिप्रिया इत्यमरः। परै- अन्य शत्रुभि । द्रौपदी के पक्ष मे-परायो द्वारा । दुर्योधन आदि पराए ही तो थे जिन्होने 'सभाभवन' मे द्रौपदी का वस्त्रापहरण किया था। राजलक्ष्मी पक्ष मे-शत्रुओ द्वारा। अपहारयेत्-- स्वयमेव अपहार कारयेत् । अपहृत करवायेगा। अप+ह + णिच् + लिड्, प्रथम-पुरुष, एकवचन । प्रस्तुत पद्य मे आत्मवधू तथा श्री मे उपमेयोपमान-भाव है, साधर्म्य एव वाचकशब्द का भी प्रयोग है, फलत पूर्णोपमा अलङ्कार है। अथ दशभि कोपोद्दीपन करोति - भवन्तमेहि मनस्विहिते विवर्त्तमान नरदेव वर्मनि । कथन्न मन्युवलयत्युदीरितः शमीतरु शुष्कमिवाग्निरुच्छिख ॥३२॥ भवन्तमिति । हे नरदेव नरेन्द्र एतर्हि इदानीम् अस्मिन्नापत्कालेऽपि इत्यर्थ । 'एतहि सम्प्रतीदानीमधुना साम्प्रत तथा' इत्यमर । 'इदमोहिल्' इति हिल प्रत्यय । एतेतौ रथौ' इत्येतादेश । आपदमेवाह--मनस्विहिते शुरजुगुप्सिते वर्त्मनि मार्गे विवर्त्तमान शत्रुकृता दुर्दशामनुभवन्तमित्यर्थ । भवन्त त्वामुदीरित उद्दीपितो मन्यु क्रोध । शुष्क नीरसम् । 'शुष क' इति निष्ठातकारस्य ककार । शमी चासौ तरुश्चेति विशेषणसमास तम् । शमीग्रहण शीघ्रज्वलन- स्वभावात् कृतम् । उच्छिख उद्गतज्वाल । 'धृणिज्वाले अपि शिखे' इत्यमर । वहिरिव कथ न ज्वलयति । ज्वलयितुमुचितमित्यर्थ । 'मिता ह्रस्व' इति ह्रस्व ॥२२॥ श्लोकान्वय-हे नरदेव एतहि मनस्विहिते वर्त्मनि विवर्त्तमानम् भवन्तम् उदीरित मन्यु शुष्क शमीतरुम् उच्छिख अग्निरिव कथ न ज्वलयति। सापणं (ATदारा लेजोपर) अनुवाद--राजन् । इस समय मनस्वी पुरुषो द्वारा विनिन्दित मार्ग मे ( शत्रुकृत ) दुर्दशा का अनुभव करने वाले आपको उद्दीपित क्रोध, शुष्क शमीतरु को जला देने वाले प्रदीप्त अग्नि की भॉति, क्यो नही प्रज्वलित कर देता?
( १०७ ) . भावार्थ-राजन् । अवस्थान्तरापन्नो भवान् निरन्तरमेव शत्रुकृता दुर्दशा सोर पीडम् अनुभवति। इदमेव तावदाश्चय यन्मार्गोऽप्यय मनस्विविनिन्दित , भवान् अपि सहायादिसम्पन्न । तथापि मौनमवलम्ब्य न किञ्चिदपि भवता क्रियते । कथ न समुद्दीपित क्रोध दुरवस्थ भवन्त तेनेव प्रकारेण ज्वलयति यथा अग्नि शुष्क शमीतरुम् ? टिप्पणी-नरदेव-राजन् । हे महाराज । एतहि-साम्प्रतम्, इस समय अर्थात इस आपत्काल मे भी। इदम् + डि + हिल स्वार्थे = एत + डि + हिल - एतहि । समयवाची इदम् शब्द से हिल प्रत्यय होता है, ऐमा महर्षि पाणिनि का मत है-'इदमोहिल्' । यहाँ इदम् के स्थान पर क्रमश एत और इत आदेश हो जाते है यदि प्राग्दिशीय के र और थ अक्षर परे हो तो । सूत्र है- 'एतेतौ रथो' । चूंकि हिल प्राग्दिशीय प्रत्यय है, अत उसका रकार परे होने के कारण इदम् के स्थान पर एत आदेश हो गया। यह एक अव्ययपद है । अमरकोश देखे-'एतर्हि सम्प्रतीदानीमवुना साम्प्रत तथा ।' मनस्विहिते-शूरजुगुप्सिते अर्थात् पुरुषो द्वारा निन्दित ( मार्ग मे ) । जिसका मन प्रशस्त हो वह मनस्वी कहा जाता है-प्रशस्त मन अस्यास्तीति मनस्वी (मनस् + विनि ) ते गर्हित निन्दितम् ( गह, निन्दायाम् + क्त कर्मणि ) इति मनस्विहितम् तस्मिन् ( नृतीया तत्पु० )। वर्त्मनि-मार्गे । 'अयन वर्ममार्गोध्वपन्थान पदवी सृति' इत्यमर । विवर्तमानम्-शत्रु कृत दुर्दशा का अनुभव करने वाले ( आपको ) वि + वृत् + शानच् कर्त्तरि, तम् । भवन्तम्-श्रीमन्तम् आपको । ( भा + डवतु+ अम् ) उदीरित मन्यु -उद्दीपित क्रोध अर्थात् उद्दापित किया गया क्रोध । उद्द + ईर् + णिच् + क्त कर्तरि प्रथमैकवचन । मन्यु का अर्थ है क्रोध 'मन्युर्दैन्यै ऋतौ क्रुधि' इत्यमर । शुष्कम्-नीरसम्, सूखे हुये (को) शुष् +क्त + सु शुष्कस्त । शुष धातु के आगे लगने वाले निष्ठा ( अर्थात्, क्त क्तवतु ) प्रत्ययो को 'क' हो जाता है, ऐसा पाणिनीय मत है 'शुष क' । शमीतरुम्--शमीवृक्ष (को) शमी चासौ तरुश्चेति तम् ( कर्मधारय ) अथवा शमीनामा तरु इति शमीतरु ( शाकपार्थिवादि समास ) उच्छिख अग्निरिव-उद्गतज्वालो वहि नरिव, उठी हुई लपटो वाले अग्नि की भॉति । उद्गत हो गयी है, ऊपर उठ गई है शिखा या ज्वाला जिसकी, उस अग्नि को 'उच्छिख' कहा जायेगा--- उद्गता शिखर अस्य इति (उत् + शिखा = ) उच्छिख । कथ न ज्वलयति क्यो नही जला देता है % 3D तम. - ?
( १०८ ) प्रस्तुत पद्य मे मन्यु एव अग्नि मे उपमेयोपमान भाव होने के कारण उपमा- लकार मान्य है। नन्वन्त शत्रुत्वादय क्रोधस्त्याज्य एवेत्याशङ्कयाहः । - अबन्ध्यकोपस्य विहन्तुरापदा भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः । अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना न जातहान न विद्विषादर ॥३३॥ अबन्ध्येति । अबन्ध्य कोपो यस्य तस्याबन्ध्यकोपस्य अत एवापदा विहन्तु निग्रहानुग्रहसमर्थस्येत्यर्थ । पु स इति शेष । देहिनो जन्तव स्वयमेव वश्या वगङ्गता भवन्ति । 'वश गत' इति यत्प्रत्यया । अतस्त्वया कोपिना भवित- व्यमित्यर्थ व्यतिरेके त्वनिष्टमाचष्टे--अमर्ष शून्येन नि कापेन जन्तुना कन्यया मोक इतिवत् 'हेतौ' इति तृतीया । हृदयस्य कर्म हार्द स्नेह ! 'प्रेमा ना प्रियता हार्द प्रेम स्नेह,' इत्यमर युवादित्वादण । 'हृदयस्य हृल्लेखयदनासेषु' इति हृदादेश । जातहान जातस्नेहेन जनस्य आदरो न । विद्विषा द्विषता च सता दरो न । अमर्ष हीनस्य रागद्वेषावकिञ्चित्करत्वादगण्यावित्यर्थ । अथवा विद्विषा सता दरो भयन्न । 'दरोऽस्त्रिया भये श्वभ्र' इत्मयर । एतस्मिन्नेव प्रयोगे सन्धिवशाद् द्विधा पदच्छेद । पु वाक्येषु, न दोष । अत स्थाने कोप कार्य त्याज्यस्त्वस्थाने कोप इति भाव । श्लोकावन्य--अबन्ध्यकोपस्य आपदा विहन्तु देहिन स्वयमेव वश्या भवन्ति । अमर्ष शून्येन जन्तुना जातहान जनस्य आदरो न विद्विषा दरो न । अनुवाद-सफल क्रोधवाले, निग्रहानुग्रहसमर्थ व्यक्ति के वशीभूत प्राणी अपने आप हो जाते है ( परन्तु ) अमर्ष शून्य व्यक्ति के मैत्रीभाव बरतने पर ( भी उसके प्रति ) लोगो की आस्था नहीं होती और न ही द्वेषभाव रखने पर भय । भावार्थ-राजन् । निरमों जन क्वचिदपि समादरपात्र न भवति । यतो हि अमर्षेणैव समेषा स्वाभिमानवबा जीवाना हृत्सु उत्साह तदनन्तर समुद्योगश्च जायते । स एव पराक्रमशीलो जीव सर्व आद्रियते । परन्तु यो हि सफलक्रोधो न भवति, किन्तेन ? अजागलस्तनस्येव तस्यापि जन्म निरर्थक- ( १०१ ) मेव । काम स जनोऽस्मन्मित्र शत्रुर्वा । निग्रहानुग्रहसामर्थ्य विगलिते सति तम्य पौरुषमपि विगलितमेव भवति । टिप्पणी-अबन्ध्यकोपस्य-अनिष्फलक्रोधस्य अर्थात् जिसका क्रोध बन्ध्य (बॉझ निष्फल ) न हो । जो अवरुद्ध होने योग्य हो अथवा बँध जाय वही बन्ध्य है-बन्धु योग्य इति वन्ध्य ( बन्ध् + ण्यत् कर्मणि ) अथवा बन्धनमेव बन्ध ( भावे धन ) बन्धे साधु इति बन्ध्य (बन्ध फलावष्टम्भे+ यत् ) न बन्ध्य इति अबस्य (नज तत्पु०), अवन्व्य कोप यस्य स अबन्ध्य- कोप , तस्य (षष्ठी तत्पु० ) आपदाम् विहन्तु -निग्रहानुग्रहसमर्थस्य अर्थात् आपत्तियो का विनाश करने वाले (के ) । आ + पद् + क्विप् भावे = आपद्, तासाम् आपदाम् । वि + हन् + तृच कर्तरि = विहन्तृ तम्य विहन्तु । चूकि विहन्तु' शब्द मे आने वाला तृच प्रत्यय कृत् प्रत्ययो मे आता है, अत 'आपदाम्' ( जो कि मूलत कर्म था) शब्द मे ‘कर्मणि' षष्ठी हुई है। सूत्र है-'कर्तृकर्मणो कृति' (साधारण वाक्य इम प्रकार होता. 'आपद विहन्ति' अर्थात् आपदाओ को ( द्वितीया बहुवचन ) विनष्ट करता है । देहिन -प्राणिन जीवगण । देह जिसके पास हो वह देही है-देह अस्ति एषाम् इति देहिन ( देह + इनि मत्वर्थे, प्रथमा बहुवचन ) स्वयमेव-- अपने आप। वश्या भवन्ति-वशीभूत हो जाते है। जो वश मे हो, वे वश्य है-वश गता इति बश्या ( वश + यत् प्रथमा बहुवचन)। यहाँ यत् प्रत्यय 'वश गत' सूत्र से हुआ है । अमर्षशून्येन जन्तुना-क्रोधहीनेन प्राणिना अर्थात् क्रोधहीन प्राणी द्वारा । मृष् धातु का प्रयोग तितिक्षा या शान्ति के अर्थ मे होता है। इस प्रकार 'मर्ष' का अर्थ है क्षमा या शान्ति । मृतितिक्षायाम् + बञ भावमर्ष , न मर्ष इति अमर्ष ( नञ् तत्पु० ), अमर्षेण शून्य इति अमर्षशून्य (तृतीया तत्पु.), तेन । जन्तु का अर्थ है 'प्राणी-प्राणी तु चेतनो बन्मा जन्तु जन्युशरीरिण' इत्यमर । जातहान- उत्पन्नस्नेहेन अर्थात् प्रेमयुक्त । जात = उत्पन्न हो गया है हाद = स्नेह जिसमे ऐसे प्राणी द्वारा जात हार्द यस्य स जातहार्द , तेन (षष्ठी बहु०) हृदय को कर्म को 'हार्द' कहते है। हृदय के कर्म यद्यपि पाप-पुण्य सभी है, किन्तु शास्त्र-सम्मत कर्म 'प्रेम' होने के कारण 'हार्द' शब्द इसी अर्थ मे रुढ है । हृदयम्य कर्म हार्दम् [ हृदयहृद् + अण् ] । यद्यपि इस प्रक्रिया से 'हार्द' रूप नही इस प्रसग मे यह सूत्र पढे-'हृदयस्य हृत् लेख यण लासेषु अर्थात् लेख शब्द, यत् प्रत्यय, अण प्रत्यय तथा लाम शब्द आगे आने पर हृदय के स्थान पर हृद् आदेश हो जाय । यहाँ अण् प्रत्यय का सन्दर्भ था। 'प्रेमा - ( ११० ) ना प्रियता हार्द प्रेम स्नेह' इत्ममर । जनस्य आहरो न-लोगो की आस्था नहीं होती। विद्विषा-शत्रुणा सता अर्थात् शत्रु होने पर ( व्युत्पत्ति के लिए तीसरा श्लोक देखे ) दरो न-भय नही होता । दर का अर्थ है भय-दृ +अप् भावे = दर ( दरोऽस्त्रिया भये श्वभ्र इत्यमर )। 'विद्विषादर' शब्द मे विद्विषा + दर तथा विद्विषा + आदर -इन द्विविध विग्रहो के कारण प्रस्तुत पद मे सभङ्ग श्लेष है । साथ ही साथ वकार, जकार एव दकारादि की आवृत्तिवश अनुप्रास अलङ्कार भी है । परिभ्रमॅल्लोहितचन्दनोचितः पदातिरन्तगिरिरेणुरूषितः। महारथः सत्यधनस्य मानस दनोति नो कच्चिदय वृकोदरः ॥३४॥ । परिभ्रमन्निति । लोहितचन्दनोचित उचितलोहितचन्दन 'वाहिताग्न्यादिपु' इति साधु अभ्यस्तरक्तचन्दन इत्यर्थ । 'अभ्यस्तेऽपुचित न्याय्यम्' इति यादव । महारथो रथचारी । उभयत्रापि प्रागिति शेष । अद्य तु रेणुरूषितो धूलित्छुरित । पादाभ्यामतति गच्छतीति पदाति पादचारी । 'अज्यतिभ्या च' इत्यवृत्तौ 'पादे च' इत्यौणादिक इन्प्रत्यय । पादस्य पदाज्यातिगोपहतेपु' इति पदादेश । अन्तगिरि गिरिष्वन्त । विभक्त्यर्थेऽव्ययीभाव । 'गिरेश्च सेनकस्य' इति विकल्पात्समासान्ताभाव । परिभ्रमन् अयम् । वृकोदरो भीम । सत्यधनस्य इति सोल्लुण्ठनवचनम् । अद्यापि सत्यमेव रक्ष्यते, न तु भ्रातर इति भाव । तवेति शेष । मानस नो दुनोति कच्चिन्न परितापयति । 'कच्चित्कामप्रवेदने' इत्यमर । स्वाभिप्रायाविष्करण कामवेदनम् ॥३४।। श्लोकात्वय-लोहितचन्दनोचित महारथ रेणुरूषित पदाति अन्तगिरि परिभ्रमन् अय बृकोदर सत्यधनस्य मानसम् नो दुनोति कच्चित । अनुवाद-रक्तचन्दन के अभ्यासी, महारथी ( किन्तु सम्प्रति ) धूलि- धूसरित तथा पैदल (ही ) पर्वतो मे पर्यटन करने वाले ये भीम सत्यप्रतिज्ञ आपके मन को क्या सन्तप्त नही कर देते ? भावार्थ-प्राणनाथ | दृष्ट मया भवदीय बन्धुहार्दम् । निरन्तरमेव य रक्तचन्दनानुलेपस्य उद्वर्तनलोलुप महारथश्चासीत् स एव भवदनुजो वृकोदर' ( १११ ) साम्प्रत पूलिधसरित पदातिरेव गहनपर्वताभ्यन्तरेषु कन्दमूलफलाहरणाय पर्यटति । किमेव पश्यतोऽपि सत्यधनस्य भवत मानस न दुनोति ? टिप्पणी-लोहितचन्दनोचितः-रक्तचन्दनलेपाभ्यासी, अर्थात् लालचन्दन का लेप करने वाले । उचित है लोहित चन्दन जिसके ऐसे भीम उचित ( उच् + क्त कर्मणि ) लोहित चन्दन ( कर्मधारय ) यस्य स लोहितचन्दनो- चित अथवा उचितलोहितचन्दन (बहुव्रीहि )। उपर्युक्त व्याख्यानुसार इस समस्तपद के दोनो ही रूप व्याकरण-सम्मत है क्योकि नियम है --'वाहिता- न्यादिपु' अर्थात् आहिताग्नि गण मे आने वाले शब्दो मे निष्ठान्त शब्द का विकल्प से पूर्वप्रयोग होता है । यद्यपि 'लोहितचन्दनोचित' शब्द आहिताग्निगण मे साक्षात् परिगणित नही है फिर भी कि वह 'आकृतिगण' है अतएव स्वरूपसाम्यवश यहाँ भी वही नियम लागू होगा। निष्ठा का अर्थ है क्त और क्तवतु प्रत्यय । जैसे उपर्युक्त शब्द मे-'उचितम्' । नियमानुसार 'उचितम्' विकल्प से पहले या बाद मे कही भी आ सकता है। 'भीमसेन को रक्तचन्दन अत्यन्त प्रिय था' ऐसी महाभारत की घोषणा है । लोहित का अर्थ है लाल- 'लोहितो रोहितो रक्त' इत्यमर । पाटीरश्चन्दनोऽस्त्री गन्धसार' इति कोष । महारथ - रथचारी, महारथी। महान् रथो यस्य स महारथ ( बहु० ) । कर्मधारय एव बहुव्रीहि समास मे समानाधिकरण शब्द के तथा जातीयर् प्रत्यय परे रहने पर महत् शब्द को आकार अन्तादेश होता है । सूत्र है-'आन्महत समानाधिकरणजातीययो । फलत यहाँ बहुव्रीहि समास के सन्दर्भ मे महान् का 'महा' हो गया। जो वीर अकेले ही दस हजार योद्धाओ का सामना करे, वही महारथी है-'एको दशसहस्राणि योषयेद् यस्तु धन्विनाम् । शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च स महारथ उच्यते ।' रेणुरूषित -धूलिच्छरित , धूलि- धूसरित । रेणुभि रूषित (रूष + क्त कर्तरि ) इति रेणुरूषित (तृतीया तत्पु० ), रेणुढे यो स्त्रिया धूलि' इत्यमर । पदाति -पैदल । अत् धातु सातत्यगमन के अर्थ में प्रयुक्त होती है-पादाभ्याम् अतति गच्छति इति पदाति ( पाद = पद + अत् + इण्) । इण् प्रत्यय यहाँ 'पादे च' तथा 'अज्यतिभ्याञ्च' इन दो ओणादिक सूत्रो से हुआ है जिसका अर्थ है-पाद उपपद, रज् तथा अत् धातु से इण् प्रत्यय होता है। दूसरी बात यह है कि पदाति शब्द मे पाद को 'पद' आदेश भी हो गया है। नियम है कि आजि, आति, ग और उपहत उत्तरपद होने पर पाद को पदादेश हो जाता है-'पादस्य पदाज्यातिगोपहतेषु । पदातिपत्तिपदगपादातिकपदाजय इत्यमर ।।
( ११२ ) अन्तगिरि- अर्थात् पर्वतो मे । गिरिषु इति अन्तगिरि, सप्तमी बहुवचन । विभक्ति के अर्थ मे यहाँ अव्ययीभाव समास हुआ है । (विभक्त्यर्थेऽव्ययीभाव )। आचार्य सेनक के मतानुसार गिरि शब्द मे विकल्प से समासान्त टच प्रत्यय भी लग सस्ता है। उस स्थिति मे समस्तपद का रूप होगा-अन्तर्गिरम् । परिभ्रमन् पर्यटन्, घूमते हुए ( परि + भ्रम् + शतृ प्रत्यय, प्रथमैकवचन) अर्य वृकोदर,--यह भीमसेन । वृक का अर्थ है भेडिया-वातप्रमीतिमृग कोकस्त्वीहामृगो वृक इत्यमर । भेडिये के पेट को 'वृकोदर' कहेगे । वृकोदर के समान जिसका उदर हो वही 'वृकोदर है - वृकस्य उदरम् ( षष्टी तत्पु०), तदिव उदर यस्य स वृकोदर (बहुव्रीहि ) यह शब्द भीमसेन के अतिभक्षी होने का सकेत करता है। वृक' आमाशय मे विद्यमान अग्नि ( जाठराग्नि ) को भी कहते हैं जो खाद्यसामग्री को गला-पचा देता है। अत वृकोदर शब्द की दूसरी व्याख्या यह भी सभव है-वृकनामा अग्निविद्यते उदरे यस्य स वृकोदर (बहु० )। सत्यधनस्य-सत्य रूपी धन वाले ( आपके ) सत्यम् एव धन यस्य स सत्यधन , तस्य ( बहु० )। मानसम्-मन को । मन एव मानसम् ( मनस् + अण् स्वार्थे ) । 'स्वान्त हृन्मानस मन' । नो दुनोति कच्चित्-नही सन्तप्त करते क्या? 'नो' न के अर्थ मे प्रयुक्त होने वाला अव्यय है और कच्चित् भी कुशल-मगल पूछने अथवा अपना अभिप्राय प्रकाशित करने के लिए प्रयुक्त होने वाला अव्यय है । रघुवश मे- 'कच्चित् कुशली गुरुस्ते अथवा उत्तरमेघ मे–'कच्चित्सौम्य । व्यवसितमिद बन्धुकृत्य त्वया मे' आदि द्रष्टव्य है । दुनोति-तापयति (स्वादिगणी दु धातु उपतापे+ लट्लकार प्रथम-पुरुष एकवचन)। विजित्य यः प्राज्यमयच्छदुत्तरान् कुरूनकुप्य वसु वासवोपमः । स वल्कवासासि तवाधुनाहरन् करोति मन्यु न कथ धनञ्जयः ॥३५॥ विजित्येति । वासव इन्द्र उपमा उपमन यस्य स वासवोपम इन्द्रतुल्य । यो धनञ्जय' । उत्तरान् कुरून् मेरोरुत्तरान् मानुषान् देशविशेषान् । विजित्य प्राज्य प्रभूत' 'प्रभूतं प्रचुर प्राज्यम्' इत्यमर । कुप्यात् अन्यत् अकुप्य हेम- 1 ( ११३ ) दुख वा रूप्यात्मक 'स्यात् कोशश्च हिरण्यञ्च हेमरूप्ये कृताकृते । ताभ्या यदन्यत्त- त्कुप्यम्' इत्यमर । वसु धनम् अयच्छद्दत्तवान् । 'पाघ्रा-' इत्यादिना यच्छा- देश । स धनञ्जयतीति धनञ्जयोऽर्जुन 'सज्ञाया भृतृवजि-' इत्यादिना खच्प्रत्यय । अद्विषत्-' इत्यादिना मुमागम । अधुना अस्मिन् काले । अधुना इति निपातनात् साधु । तव वल्कवामामि आहरन् कर्थ मन्यु क्रोध न करोति ।।३५॥ अन्वय-वासवोपम यो घनञ्जय उत्तरान् कुरुन् विजित्य प्राज्यम् अकुग्यम् वसु अयच्छत्, अधुना वुल्कवासासि आहरन् स कथ तव मन्यु न करोति । अनुवाद-इन्द्रतुल्य जिस अर्जुन ने उत्तरकुरुप्रदेशो पर विजय प्राप्त करके, प्रभूत मात्रा वाली स्वर्ण-रजत सम्पत्ति आपको समर्पित की, अब बल्कल-वस्त्र लाने वाला वही ( वीर ) आपके क्रोध को कैसे नही उभाड देता ? भावार्थ---राजन् आस्ता तावदिय कथा वृकोदरस्य । पश्यतु भवान वीर- धनुर्वरस्य पार्थस्य दुर्दशाम् । पुरन्दरसदृश यो धनञ्जय पुरा राजसूययागप्रमग निखिलान् उत्तरकुरुप्रदेशान् स्वबाहुबलेन विजित्य अपरिमय काञ्चन कोश भवते प्रदत्तवान् स एव पार्थ साम्प्रतम् आहिप्डमान अटवीतोऽटवी बल्लल- वनाणि च समुपनयन् कय न तव क्रोधाग्नि प्रोद्ध्र करोति इत्येव महदाश्चर्यम् । किमियम् अनुजदुर्दशा सह्म व विद्यते ? टिप्पणी--वासवोपम.--इन्द्रतुल्य , इन्द्र के समान ( प्रतापशाली ) उपमा ( उप + मा + अड् भावे) का अर्थ हे साम्य । वासव या इन्द्र जिसके साम्य हो वही 'वासवोपम' है । वासव उपमा यस्य स ( बहु० ) 'सुत्रामा गोत्रभिद्वनी वासवो वृत्रहा वृषा' इत्यमर । यो धनञ्जय -योऽर्जुन, जो अर्जुन । द्रौपदी 'य' का प्रयोग करके महाराज युधिष्ठिर को उनके पूर्व- कालीन वैभव की स्मृति दिला रही है । अब तो अर्जुन “भिखारी' हो गया है परन्तु राजसूययाग करते समय दिग्विजय मे 'जो' 'धनञ्जय' था । धनञ्जय का अर्थ ही है-धन को जीतने वाला। धन जयति इति धन + जि + खच् प्रत्यय । भृ तृ वृ तथा जि आदि धातुओ से मज्ञा के अर्थ मे खच् प्रत्यय होता है--- 'सज्ञाया भृतृवृजिधारिसहितपिदम' । यहाँ 'धनञ्जय' एक सज्ञा है, अत जि धातु से खच् प्रत्यय हुआ है । धन और जय के बीच मे मुम् का आगम–'अद्विषदजन्तस्य मुम्' सूत्र से हुआ है। अर्थ है-अरुस्, द्विषद् और अजन्त शब्द को मुम् का आगम हो यदि खिदन्त उत्तरपद परे हो । यहाँ फा०८ ( ११४ ) धन शब्द अजन्त यानी अच् ( स्वर ) से अन्त होने वाला है और उत्तर पद के रूप मे अवस्थित जय शब्द खच् प्रत्यय से अन्त होने वाला खिदन्त है, फलत मुमागम हुआ। उत्तरकुरु की विजय के बाद ही अर्जुन को धनञ्जय की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई थी, अत प्रस्तुत सन्दर्भ मे शब्द का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है । उत्तरान् कुरून्--मेरु के उत्तर मे विद्यमान देश-विशेष । मेरु पर्वत की स्थिति आधुनिक विद्वान् पामीर के आसपास स्वीकार करते है, फलत उत्तरकुरु का अर्थ चीन, मगोलिया, मचूरिया, रूस, तुर्की आदि जनभूमियो मे है । अर्जुन ने इन देशो पर विजय की थी। उत्तरकुरु पृथ्वी के नौ पौराणिक-खण्डो मे से अन्यतम है--भरत, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, उत्तरकुरु, भद्राश्व और केतुमाल । विजित्य-जीत करके ( वि + जि + ल्यप् ) प्राज्यम् - प्रभूतम्, अपरिमेय, बहुत अधिक । प्राजीयते इति प्राज्यम् (प्र+ अजगतौ + ण्यत् कर्मणि ) अथवा प्रकर्षण अज्यते काम्यते इति प्राज्यम् ( प्र + अज् + क्यप् कर्मणि ) 'प्रभूत प्रचुर प्राज्यम्' इत्यमर । अकुप्यम्--हेमरूप्यात्मकम् अर्थात् सोना-चाँदी । जो 'कुप्य' से अतिरिक्त हो वही, 'अकुप्य' है । कुप्य शब्द की व्युत्पत्ति है- 'गुप्यते रक्ष्यते इति कुप्यम् ( गुप् + क्यप् कर्मणि ) अर्थात् जो यत्न पूर्वक सँजोया जाय, रक्षित किया जाय वह 'गुप्य' है ( 'कुप्य' रूप निपातन या 'इरेगुलरिटी' से बन गया है अन्यथा धनार्थक न होने पर इसका रूप गोप्य बनेगा ण्यत् प्रत्यय लगाकर ) जो कुप्य नहीं है वही अकुप्य हैन कुप्यम अकुप्यम् हेमरूप्यात्मकम् (नज तत्पु० )। तो क्या सोना-चाँदी रक्षणीय पदार्थ नही ? वस्तुत अकुप्य शब्द यहाँ लाक्षणिक है । वास्तव मे सोना-चाँदी जमीन में गाडने की चीज नही बल्कि खुले-हाथ खर्च करने के लिए या दान देने के लिए है । अमरकोश देखे-'स्यात्कोशश्च हिरण्यञ्च हेमरूप्ये कृताकृते ताभ्या यदन्यत्तत्कुप्यम् इत्यमर । वसु-धनम्, सम्पत्ति को । अयच्छत्-दत्त- वान्, दिया, समर्पित किया । दाण्धातु + लड्लकार प्रथमपुरुष, एकवचन । व्याकरण के नियमानुसार पा, घ्रा, ध्मा, स्था, म्न, दाण् दृशि, अति, सति, शद् और सद् क्रियाओ के स्थान पर क्रमश पिब, जिघ्र, धम, तिष्ठ, मन, यच्छ, पश्य, ऋच्छ, धौ, शीय एव सीद आदेश हो जाता है । यहाँ दाण के स्थान पर यच्छ हो गया है । अधुना-सम्प्रति, अब अर्थात् इस वनवास मे, अस्मिन् काले इति अधुना (इदम् + डि +धुना स्वार्थे ) अव्ययपद है । वल्कवासासि- बल्कल वस्त्रो को । वल्क या बल्कल का अर्थ है-पेड की छाल । 'त्वक स्त्री बल्क ? ma- ( ११५ ) बल्कन्दमस्त्रियाम्' इति अमरकोश । जिसमे तन ढंका जाय वही वासस् है-वम्यते आच्छाद्यते अङ्गम् अनेन इति वासस् ( वस् अनेन इति वासस् ( वस् + असुन करणे ) बल्कानि एव वासासि इति बल्कवासामि ( कर्मवारय ) आहरन-उपनयन् लाते हुये ( आड + हृ + शतृ, प्रथमैकवचन ) तव मन्युन् -तुम्हारे क्रोध को कथ न करोति-किमिव नोत्पादयति अर्थात् क्यो नही उत्पन्न कर देता ? प्रस्तुत पद्य मे अनुप्रास के अनेक भेद ( छैक, वृत्ति आदि ) प्रयुक्त है । यी वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती कचाचितौ विष्वगिवागजौ गजौ। कथ त्वमेतौ धृतिसयमौ यमौ विलोकयन्नुत्सहसे न बाधितुम् ॥३६॥ वनान्तेति । वनान्तो वनभूमिरेव शय्या तया कठिनीकृताकृती कठिनीहत- देहौ । 'आकारो देह आकृति' इति वैजयन्ती । विष्वक्समन्तात् । 'समन्तस्तु परित सर्वतो विष्वगित्यपि' इत्यमर । कचाचितौ.कचव्याप्ती । विशीर्णक्शा- वित्यर्थ । अत एवागजी गिरिसम्भवौ गजाविव । स्थितावेतो यमौ युग्मजातौ । माद्रीपुत्रावित्यर्थं । 'यमो दण्डधरे ध्वाक्षे सयमे यमजेऽपि च' इति विश्व । विलोकयन् त्व कथ वृतिसयमौ सन्तोषनियमौ । 'वृतिर्योगान्तरे धैर्ये धारणाध्वरतुष्टिषु' इति विश्व । बावितु नोत्सहसे न प्रवर्तमे । 'शकधुप' इत्यादिना तुमुन् । अहो ते महद्धैर्यमिति भाव ॥३॥ श्लोकान्वय--वनान्तशय्याकठिनीकृताकृती विष्वक कचाचितौ अगजौ गजो इव एतौ यमौ विलोकयन् त्व कथम् धृतिसयमौ वाधितुम् न उत्सहसे । अनुवाद--वनस्थली मे शयन कड़ने के कारण कठोर आकृति वाले, चारो ओर विशीर्ण केशो के युक्त, पवतीय गजराजो के समान इन जुडवे भाइयो को देखते हुए ( भी ) आप धैर्य तथा सयम त्याग देने के लिये क्यो नही उद्यत होते? भावार्थ-प्राणनाथ | कस्याग्रत विलपानि ? यौ कमलकोमलौ युग्मजौ नकुलसहदेवौ इन्द्रप्रस्थनगरे नागरावतसौ अभूता तावेव साम्प्रत पर्वतोत्पन्नौ मज राजाविव वान्तारवासकप्ट सहेते । हन्त भो, समन्तत पर्याकुलमूर्द्धजौ .
- RA . चनभूमिशयनेन च कठिनीकृतशरीरौ तो स्वानुजौ दर्श-दर्श भवान कथ सन्तोषनियमौ परित्यक्त, नोत्सहते ? किमेतावदपि नाल नाल भवत्मत्त्वो- द्र काय? टिप्पणी-वनान्तशैय्याकठिनीकृताकृती--वनस्थली मे शयन करने के कारण कठोर आकृति वाले । वनस्य अन्त इति वनान्त (षष्ठी तत्पु० ), बनान्ते शैय्या ( सुप्सुपा) अथवा वनान्त एव शैय्या इति वनान्तशैय्या ( कर्मधारयसमास )। न कठिना इति अकठिना ( ना तत्पु० ) अकठिना कठिना कृता इति कठिनीकृता ( कठिना + च्चिप्रत्यय + अभूततद्भावे + कृ + क्त कर्मणि + स्त्रियाम् टाप् ) बनान्तशैय्यया कठिनीकृता इति वनान्त- शैय्याकठिनीकृता ( तृतीया तत्पु०), तादृशी आकृति ययोस्तौ ( बहुव्रीहि ) । अमरकोश- अटव्यरण्य विपिन गहन कानन वनम् । हैमकोश-अन्त स्वरूपे निकट प्रान्ते निश्चयनाशयो । अवयवेऽपि । अमरकोश -शैय्याया शयनीयवत्- शयन मञ्चपर्यङ्कपल्यड्का खट्बया समा । वैजयन्तीकोश---आकारोदेह आकृति । विष्टक-समन्तात्, चारो ओर । जो चतुर्दिकव्यापी हो उसे विष्वक् कहते है-विपु अञ्चति गच्छति इति विष्वक् (विषु + अञ्च् + क्विन् ( 'चो कु' नियम से कुत्व । 'समन्ततस्तु परित सर्वतो विष्वगित्यपि' इत्यमर कचाचितौ-कचव्याप्तौ अर्थात् केशसकुल । केशै आचितौ ( आ + चि + क्त कमणि ) इति कचाचितौ, तृतीया तत्पु० । 'चिकुर कुन्तलो बाल कच केश शिरोरुह' इत्यमर । अगजी गजाविव-पर्वतीय हाथियो की भॉति । जो चल न सके उसे 'अग' कहते है तथा उसमे उत्पन्न हुए को अगज-न गच्छतीति अग (नञ् + गम् +ड प्रत्यय ) तस्मिन् जातौ अगजौ (अग + जन् +3 कर्तरि ) । 'इव' औपम्यार्थक है । एतौ यमौ-इन जुडवों भाइयो को । महाराज पाण्डु की कनिष्ठ राजमहिषी माद्री ने नकुल तथा सहदव को एक ही साथ जन्म दिया था, अत इन्हे युग्मज या यमज ( जुडवा ) कहा जाता है । अमरकोश-यमो दण्डधरे ध्वाक्षे सयमे यमजेऽपि च । विलोकयन्- देखते हुए (वि + लोकि + लट् + शतृ प्रथमैकवचन ) । त्व कथ धृतिसयमौ-( आप कैसे } सन्तोषनियमौ अर्थात् वैर्य एव आत्मनिग्रह को। धृतिश्च सयमश्चेति धृतिसयमौ (धृ + क्तिन् भावे, सम् + यम् + अप् भावे ) द्वन्द्वसमास । 'धृतिर्योगान्तरे वैये धारणाध्वरतुष्टिषु' इति कोष । बाधितम्-त्यक्तुम् छोडने के लिए (बाक् +तुमुन् ) । नीत्सहसे-न प्रवर्तसे, नही प्रवृत होते हो? उद् + सह लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन । - ( १७ 'अगजो गजौ' तथा 'धृतिसयमो यमौ' मे यमक अलङ्कार है, लक्षण है-- 'अर्थे सत्यर्थभिन्नाना वर्णाना सा पुन श्रुति यमकम्' अर्थात् भिन्नार्थक वर्णो की पुनरावृत्ति ( अर्थमयी होने पर ) यमक होती है । अय राज्ञो दुर्दशा दर्शयितुमुपोद्धातमाह - - इमारह वेद न तावको धिय विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः। विचिन्तयन्त्या भवदापद परा स्जन्ति चेतः प्रसभ ममाधयः ॥३७॥ इमामिति । इमा वर्तमाना, तव इमा तावकी त्वदीया 'तस्येदम्' इत्यण- प्रत्यय । 'तवकममकावेकवचने' इति तवकादेश । धिय त्वदापद्विषया चित्तवृत्ति- मह न वेद कीदृशी वा न वेद्मि। परवुद्ध रप्रयक्षत्वादिति भाव । 'विदो लटो वा' इति लटो णलादेश । न चात्मदृष्टान्तेनापन्नत्वाद् दुखितमनुमातु शक्यते | वीरादिष्वनै कान्तिकत्वादित्याशयेनाह-चित्तवृत्तयो विचित्ररूपा धीराधीराद्यनेकप्रकारा खलु ( एव भवन्तीति शेष )। किन्तु परामुत्कृष्टा भवदापद ( त्वद्विपत्ति ) । विचिन्तयन्त्या मम चेतश्चित्तम् । आधया मनोव्यथा. 'उपमर्गे घो कि' इति किप्रत्यय । प्रसभ प्रसह्य रुजन्ति भञ्जन्ति 'रुजो भौं' इति धातोर्लट् । पश्यतामपि दु सहा दु खजननी त्वद्विपत्तिरनुभवितार त्वा न विकरोतीति महच्चित्रमित्यर्थ । चेत इति । 'रुजार्थाना भाववचना- नामज्वरे' इति षष्ठी भवति । तत्र शेषाधिकारात् शेषत्वस्य विवक्षि- तत्वात् ॥३७॥ श्लोकान्वय-इमा तावकी धियम् अह न वेद । चित्तवृत्तय विचित्ररूपा - खलु । पराम् भवदापदम् विचिन्तयन्त्या मम चेत आधय प्रसभ रुजन्ति । अनुवाद-आपकी इस ( वर्तमान ) बुद्धि को मै नहीं समझ पा रही हूँ। चित्तवृत्तियाँ वास्तव मे विलक्षण रूपो वाली होती है। ( तथापि ) आपकी महती विपत्ति को बूझने मे तल्लीन मुझ द्रौपदी के चित्त को मनोव्यथाएँ बलपूर्वक भग्न किये दे रही है। भावार्थ-न जानामि राजन् । त्वदीया साम्प्रतिकी चित्तवृत्तिम् । निखिल- मेव वैभव शत्रुभिरपहृतम्, कान्तारवसतिस्तावदुररीकृता । तथापि त्वया न ( ११८ ) किञ्चिदपि अवस्थावपरीत्यमनुभूयते । कीदृशीय तावकी वीरित्यह न वेद्मि । चित्तवृत्तय खलु विलक्षणरूपिण्य भवन्ति इति निश्चप्रचमिदम् । दर्श दर्श तावकी महद्विपत्ति मनो मे व्यथयाऽतिक्राम्यते न च लभ्यते तिलमात्रमपि सौन्यम। टिप्पणी-इमा तावको धियम्-तुम्हारी इस बुद्धि को। मल्लिनाथ 'इमाम्' का अर्थ करते हे -वर्तमानाम्' । क्यो कि 'वर्तमान' शब्द से महाराज युधिष्ठिर की सशयापन्न क्विा अकर्मण्य बुद्धि का बोध होता है । तावकी का अर्थ है त्वदीय या तुम्हारी-तव इयम् इति तावकी, ताम् ( युष्मद + अण् + डीप स्त्रियाम् + अम् ) । व्याकरण के नियमानुसार खञ अथचा अण् प्रत्यय आगे रहने पर युष्मद् एव अम्मद शब्द को एकवचन मे क्रमश तवक+ममक आदेश हो जाता है । सूत्र है। तवकममकावेकवचने । इस प्रकार प्रस्तुत सन्दर्भ मे भी-युष्मद् + अण् = तवक + अण + डीप - तावकी रूप बनेगा। अण् प्रत्यय यहाँ 'तस्येदम् नियम से हुआ है । जिसके द्वारा चिन्तन-व्यान किया जाय वह 'बी' है-व्यायते अनया इति धी ताम् (ध्य + विवप करणे) । बुद्धिमनीषा धिषणा धी प्रज्ञा शेमुपी मति इत्यमर । अह न वेद-अह न जानामि अर्थात् मैं नहीं जानती। 'वेद' विषयक टिप्पणी श्लोक २० मे देखे-'स वेद नि गेपमोषितक्रिय ।' चित्तवृत्तय -- चित्तव्यापारा , मन की वत्तियाँ । चित्तस्य वृत्तय इति चित्तवृत्तय (षष्ठी तत्पु०) 'वृत्तिर्वार्ता वृत्तमपि' इत्यमर 'चित्त तु चेतो हृदयम्' इत्यपि अमर । विचित्ररूपा -विविधरूपा अर्थात् अत्यविक विलक्षण । विशेषेण चित्रा इति विचित्रा , ( प्रादितत्पु० ), अतिशयेन विचित्रा इति विचित्ररूपा ( विचित्र + प्रशमाया रूपप् ) अथवा विचित्र रूप यासा ता विचित्ररूपा (बहुव्रीहि-समास )। खलु-निश्चित रूप से । निश्चय अथवा वाक्यालङ्कार के सन्दर्भ में प्रयुक्त होने वाला एक अव्ययपद । परा भवदापदम्-महती त्वदापत्तिम् । आपकी महती विपत्ति को । भवत आपद इति भवदापद् ताम् भवदापदम् ( षष्ठी तत्पुरुप ) । पग ( पर + टाप् ) का अर्थ है महती । 'विपत्त्या विपदापदौ' इत्यमर । विचिन्तयन्त्या-व्यायन्त्या , सोचती रहने वाली ( 'मम' का विशेषण ) वि + चिन्त् + णिच् + शतृ + डीप स्त्रियाम् + षष्ठी एकवचन । मम चेत –मेरे मन को । आधय -मनोव्यथाये। 'आधि' का अर्थ है मानसिक अथवा देवप्रदत्त कष्ट । 'पु स्याधिर्मानसी व्यथा' इत्यमर । प्रसभम रुजन्ति- ( ११६ ) बलात् व्यथयन्ति, बलपूर्वक व्यथित किये दे रही है । रुजन्ति-रुजोभङ्ग ( तुदादि ) लट् लकार, प्रथम-पुरुष, बहुवचन । प्रस्तुत पद्य के पूर्वार्ध मे प्रथमपक्तिगत विशेषकथन का समर्थन द्वितीयपक्ति- गत सामान्यक्रथन के किया गया है, फलत अर्थान्तरन्याम अलङ्कार है । तदापदमेव श्लोकत्रयेणाह . पुराधिरूढः शयन महाधन विबोध्यसे यः स्तुतिगीतिमङ्गलै.। अभ्रदर्भामधिशय्यम स्थली जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः ॥३८॥ पुरेति । यस्त्व महाधन बहुमूल्य श्रेष्ठम् । 'महाधन महामूत्य' इति विश्व । शयन शय्यामविरूढ सन् । स्तुतयो गीतयश्च ता एव मङ्गलानि नै स्तुतिगीति- मङ्गलै करणभूतै पुरा । विवोध्यम वैतालिकैरिति शेष । पूर्व बोवित इत्यर्थ ! 'पुरि लुड् चाम्मे' इति भूतार्थे लट् । स त्वमदभ्रदर्भा बहुकुगाम् । अस्त्री कुश कुथो दर्भ' इति । 'अदभ्र बहुल बहु' इति चामर । स्थलीमकृत्रिमभूमिम् । 'जानपद' इत्यादिना कृत्रिमार्थे डीप् । एतेन दु सहस्पर्शत्त्वमुक्तम् । 'अविगीड्- स्थामा कर्म' इति कर्मत्वम् । अधिशय्य गयित्वा । 'अययि क्डिड्ति' इत्ययडादेश । अशिवरमङ्गलै शिवारुतै क्रोष्टुवासित 'शिवा हरीतकी क्रोष्ट्री शमी नद्यामलक्युभे' इति वैजयन्ती। निद्रा जहासि । अद्येति शेष ॥३८॥ श्लोकान्वय-य ( त्वम् ) महाधनम् शयनम् अधिरूढ स्तुतिगीति- मङ्गलै पुरा विबोध्यसे, स अदभ्रदर्भाम् स्थलीम् अधिशय्य अशिव शिवारुत निद्राम् जहासि । अनुवाद-बहुमूल्य शय्या पर शयन करते हुए जो आप पूर्वकाल मे माङ्गलिक स्तुतिगीतियो से जगाये जाते थे वही आप ( अब ) कुशकटको से भरी वन्य-भूमि पर सोते हुए, स्यारिनो की अमगलकारिणी बोलियाँ सुनकर निद्रात्याग करते है। भावार्थ-प्राणनाथ | भाग्यविपर्ययेण किन्न सोढ भवता । इन्द्रप्रस्थनगर- सव्युष्य निखिलमेव स्वार्गिक सौख्य प्रत्यक्षीकृतम् । तस्मिन्काले विविधमणि- ( १२० ) रत्नजटिता महार्धा शैय्यास्थलीमविरूढस्सन् भवान् समागत एव प्रत्यूषकाले चारणवातै स्तुतिगीतिमङ्गलै विगतनिद्रोऽस्ति कृत । हन्त । स एव त्व साम्प्रत कुशकण्टकै परिव्याप्ता कान्ताग्भूमिमधिशय्य शिवानामशुभ हुड्वारै निद्रामव- मुञ्चमि । एवमनुभवन्नपि न मनागपि क्षब्धो द श्यस इति महच्चित्रमिदम् । टिप्पणी—य ( त्वम् )-जो आप । 'य' का सकेत वनवास के पूर्व इन्द्रप्रस्थनगराधीश के रूप मे ममस्त सुखभोग करने वाले राजा युधिष्ठिर की ओर है। महाधन शयनम् - बहुमूल्या शैय्याम्, अर्थात् अत्यन्त मूल्यवती, श्रेष्ठ शैय्या पर । महत् धन यस्य तत् महाधनम् ( बहुव्रीहि ) महत् का 'महा' रूप हो गया है । विश्वकोश का प्रमाण-~-'महाधन महामूल्ये ।' शयन का अर्थ है शैय्या। जिस पर सोया जाय, वही 'शयन' है-शय्यते अस्मिन्निति शयनम् ( शीड् + ल्युट्अधिकरणे ) यह शब्द 'अधिरूढ' का कर्म है ( 'अविशीड्स्थासा कर्म' ११४:४६ के अनुसार अधि उपसर्ग के साथ शीड्, स्था तथा आस् धातु का आधार कर्मकारक होता है ) अधिरूड -आरुह्य मुप्त अर्थात् मोए हुये । अधि+रुह +क्त कर्तरि ) । स्तुतिगोतिमङ्गलै-स्तुतिगान रूपी माङ्गलिक वचनो से । स्तुतीना गीतय इति स्तुतिगीतय (पाठी तत्पु०) अथवा स्तुतयश्च ( स्तु + क्तिन् भावे, प्रथमा बहुवचन ) गीतयश्च (गै + तिन् भावे, प्रथमा बहुवचन ) स्तुतिगीतय ( द्वन्द्वसमास ), ता एव मङ्गलानि तै ( कर्मधारयसमास ) । प्राचीन काल मे भूपनियो को जगाने के लिए चारण या बन्दीजन ब्रह्मवेला मे ही गायन प्रस्तुत करते थे। रामचरितमानस मे गोस्वामी जी ने लिखा है-विलपत नृपति भयउ भिनुसारा । बीना वेनु सखपुनि द्वार। ।। पढहि भाट गुन गावहि गायक । सुनत नृपति जनु लागहि मायक ।। (अयोन्या- काण्ड ) पुरा-पूर्व स्मिन् काले अर्थात् पूर्वकाल मे ( भूतकाल के अर्थ मे प्रयक्त होने वाला एक अव्ययपद ) । विबोध्यसे-वीतनिद्र क्रियमे अर्थात् विनिद्र किये जाते थे, जगा दिये जाते थे। यह कर्मवाच्य का प्रयोग है-वि + बुध् + णिच् । लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन । वस्तुत लट् लकार ( वर्तमान काल ) का यह प्रयोग अनद्यतन भूतकाल के अर्थ मे हुआ है । स्त्र है-'पुरिलुड चास्मे' अर्थात् यदि 'स्म' का प्रयोग न विहित हो तो 'पुरा' के योग मे लुड तथा लट् ( लक र ) का प्रयोग अनद्यतनभूत के अर्थ मे होता है। स ( त्वम् )-वही तुम । अदभ्रदर्भाम्-कुशबहुलाम् अर्थात् कुशो मे परिव्याप्त । अदभ्र का तात्पर्य है बहुल होना, अधिक । अदभ्र बहुल बहु इत्यमर । जिस स्थान में अत्यधिक कुश हो उसे 'अदभ्रदर्भा' कहेगे । यह शब्द ( १२१ ) स्थली का विशेषण है-अदभ्रा दर्भा अस्याम् इति ( बहुव्रीहि ), ताम् । स्थलीम् -अकृत्रिमभूमिम् अर्थात् दुस्महस्पर्शवाली, साफ-सुथरी न बनाई गई वन्यभूमि पर । 'अधिशय्य' में प्रयुक्त 'अधि' उपसर्ग के कारण 'स्थली' मे द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। अधिशय्य-सुप्त्वा, सोते हुए या सोकर । अधि + शीड् + ल्यप् प्रत्यय । अशिव शिवास्तै -अमङ्गलकारिभि शृगानीनब्द । अमङ्गलजनक स्यारिनो के शब्दो द्वारा । 'शिव' का अर्थ है कल्याण या मङ्गल । यह शब्द सना और विशेषण दोनो है । स्व श्रेयस शिव भद्र कल्याण मगल शुभम् इत्यमर । शिवा का अर्थ है शृगाली और 'रुतम्' का तात्पर्य है वोली । अमरकोश देखे -स्त्रिया शिवा भूरिमायगोमायुगवूर्तका इत्यमर । इस प्रकार-न शिवानि इति अशिवानि ते ( ना तत्पु० )। गिवाना रुनानि इति शिवारुतानि त शिवारुतै (पष्ठी तत्पुरुष )। निद्रा--- जहासि-स्वाप परित्यजसि, नीद छोडते हो। 'स्यान्निद्रा शयन स्वाप स्वप्न. सदेश इत्यपि' । इत्यमर । पुरोपनीत नृप रामणीयक द्विजातिशेषेण यदेतदन्धसा। तदद्य ते वन्यफलाशिन' पर परति कार्य यशस्ग सम वपुः ॥३६॥ Saam पुरेति । हे नृप, यदेतन्पुरोवर्ति वपु पुरा द्विजातिशेषेण द्विजभुक्तावशिष्टे- नान्धमान्नेन । भिस्सा स्त्री भक्तमन्धोऽन्नम्' इत्यमर । रमणीयस्य भावो रामणी- यक मनोहरत्तमुपनीत प्रापितम् । नयनेद्विकर्मकत्वात्प्रधाने कर्मणि क्तः । 'प्रधान- कर्मण्याख्ये ये लादीनाहढिककर्मणाम इति वचनात् । अद्य वन्यफलाशिनस्ते तव तद्वपुर्यशमा सम परमतिमात्र कार्य परैति प्राप्नोति उभयमपि क्षीयत इत्यर्थ । अत्र सहोक्तिरलड्कार । तदुक्त काव्यप्रकाशे-'सा सहोक्ति सहार्थस्य बतादेक द्विवाचकम्' इति ॥३६॥ श्लोकान्वय-हे नृप। यत् एतत् ते वपु पुरा द्विजातिशेषेण अन्धसा राम- णीयकम् उपनीतम् अद्य वन्यफलाशिन ते तत् यशसा सम पर कार्य परैति । अनुवाद-राजन् । जो यह तुम्हारा शरीर पहले ब्राह्मणो के उच्छिष्ट अन्न ( का भक्षण करने ) से रमणीयता को प्राप्त हो गया था, आज वन्यफला- ६ ( १२२ ) - हारी आपका वही शरीर ( आपके ) यश के साथ (ही) अत्यधिक क्षीणता को प्राप्त हो रहा है। भावार्थ -राजन् । प्रख्यातमासीत्तवातिथ्यकर्म त्रिषु लोकेषु । इदञ्च तव शरीर द्विजातिशेषेण भक्ष्यान्नेन परमरमणीयतामुपगतमासीत् । किन्तु तदेव त्वदीय शरीर सम्प्रति कान्तारलब्धानि यानि कान्यपि फलानि स्वोदरप्रणायैव भक्षयित्वा तथैव अतिमात्र कृशत्वमुपयाति यथा खलु तव यश । ईदृशी खलु ते महती विपत्ति । टिप्पणी-हे नृप । हे राजन् ( सम्बोवन-पद )। यत् एतत् ते यत् पुरोवर्ति दृश्यमान तव शरीरम् , अर्थात समक्ष दृश्यमान जो यह तुम्हारा शरीर । पुरा-प्राक पूर्वकाल मे, पहले । स्यात्प्रबन्धे चिरातीते निकटा- गामिके पुरा इत्यमर । द्विजातिशेषेण-ब्राह्मणोच्छिष्टेन, अर्थात ब्राह्मणो के खाने से बचे हुए ( अन्न द्वारा )। द्विजाति का सामान्य अर्थ यज्ञोपवीत धारण करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय एव वैश्य-इन तीन वर्गों से है परन्तु प्रस्तुत सदर्भ मे इसका विशिष्ट अभिप्राय है--ब्राह्मण । सस्कार-हीन ब्राह्मण को मनु 'शूद्र, की सज्ञा देते है और सस्कारयुक्त को 'द्विज' की । इस प्रकार ब्राह्मण की दो जाति हुई-द्वे जाती येपा ते द्विजातय (बहुव्रीहि ) तेषा शेषेण ( शिप + घज कमणि + टा) इति द्विजातिगेषेण । मनु का प्रमाण- जन्मना जायते श्द्र सस्कारैद्विज उच्यते । वेदपाठात भवेद विप्रो ब्रह्म जानाति ब्राह्मण ।। दन्तविप्राण्डजा द्विजा इत्यमर । अन्धसा-अन्नेन, अन्न द्वारा, अनुक्ते कर्तरि तृतीया । भिस्सा स्त्री भक्तमन्धोऽन्नम् । रामणीयकम्-मनो- हरत्वम , रमणीयता को । रमणीय होने के भाव को रामणीयक' कहते है- रमणीयस्य ( रम + णिच् + अनीयर् + कर्तरि बाहुलकात , षष्ठी विभक्ति) भाव रामणीयकम् (रमणीय + वुन प्रत्यय) । उपनीतम् -प्रापितम ,प्राप्त करा दिया गया था। उप + नी + क्त कर्मणि । अद्य--साम्प्रतम , आज अर्थात वनवास की इस अवधि मे । वन्यफलाशिन ---वन्यफलभोजिन जगली फल खाने वाले आपका । जो वन मे उत्पन्न हो उसे 'वन्य' कहेगे---वने भव वन्यम ( वन + यत.) वन्य फलम इति वन्यफलम (कर्मधारयसमास , तत् अश्नाति इति वन्यफलाशी (वन्यफल + अश् + णिनि कर्तरि, तस्य) । ते तत् वपु ---तुम्हारा वही शरीर । यशसा सम---कीर्त्या सह, यश के साथ-साथ । 'सह' का अर्थ देने वाले शब्दो के योग में अप्रधान मे तृतीया होती है।
( १२३ ) सूत्र है---'सहयुक्तेऽप्रधाने' । पर कार्यम्'---अतितनुताम अत्यन्त कृशता को ( कृश् + क्त = कृश , तस्य भाव कायम = कृश + ष्यत्र ) परैति--- उपयाति, प्राप्त हो रहा है । पस्तुत पद्य मे सहोक्ति अलकार है । सहोक्ति वहाँ होती है जहाँ एव अर्थ को बताने वाला पद 'सह' शब्द के बल पर दो अर्थो का बोधक हो जाय । प्रस्तुत पद्य मे भी शारीरिक कृशता मूलत एक ही अर्थ प्रस्तुत करती हे परन्तु 'मह' शब्द का प्रयोग होने से वह 'यश कृशता' का भी भाव व्यक्त करती है । काव्यप्रकाशकार ने इसका लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत किया है---'मा सहोक्ति महार्थस्य बलादेक द्विवाचकम् ।' अनारत यौ मणिपीठशायिना- वरजयद्राजशिर.सजा रजः। निषीदतस्तौ चरणौ वनेषु ते मृगद्विजालूनशिखेषु बहिषाम् ॥४०॥ अनारतमिति । अनारतम अजस्र मणिपीठशायिनौ मणिपीठस्थितौ यौ । चरणी । राजशिर सजा नमद्भूपालमौलिस्रजा रज पराग अरञ्जयत तौ ते चरणौ मृगै द्विजैश्च तपस्विभि आलूनशिखेषु छिन्नामेष बहिषा कुशाना 'बर्हि कुशहुताशयो' इति विश्व । वनेष काननेष निषीदत तिष्ठत ॥४॥ - श्लोकान्वय-अनारत मणिपीठशायिनौ ते चरणौ राजशिर सजा रज अरञ्जयत तौ मृगद्विजालूनशिखेषु बहिषा वनेषु निषीदत । अनुवाद---निरन्तर रत्नपीठ पर रहने वाले आपके जिन चरणो को भूप- तियो के शिरोमाल्यो की परागधूलि रञ्जित कर देती थी वही (आपके चरण) हरिणो एव तपोधनो द्वारा कुतरे गये अग्रभाग वाले कुशो के वनो मे पड रहे है। भावार्थ---राजन ! किन्न स्मरति भवान स्वकीय पूर्ववैभवम ? चतुरुदधि- मेखला पृथ्वी परिणलयतश्चक्रवर्तिनस्तव चरणकमले मततमेव मणिखचितपाद- पीठस्थिते बभूवतु । अथ च प्रणामार्थ नमद्भूपालमौलिमालाना परागपुजे रञ्जिते आस्ताम । प्रियतम | ताँवव चरणौ साम्प्रत हरिणादिभि वन्यजीवे ( १२४ ) , तपोधनैश्च छिन्नाग्रभागाना कुशाना बनेषु निषीदत इति दर्श दर्ण मनो मे विकलीभवति । टिप्पणी--अनारतम्-सततम , निरन्तर । सततानारताश्रान्तसन्तता- विरतानिशम, इत्यमर । मणिपीठशायिनौ--रत्नफलकस्थितौ अर्थात् मणि- खचित पादपीठ पर शयन करनेवाने । मणिनिर्मित पीठम् इति मणिपीठम् ( शाकपार्थिव आदि की भाँति मध्यमपदलोपी समास ) मणिपीठे शयाते इति मणिपीठशायिनी (मणिपीठ + शीड + णिनि कर्तरि) अमरकोश-रत्न मणि- ईयोरश्मजातौ मुक्तादिकेऽपि च, पीठमासनमस्त्रियाम । यौ ते चरणौ--आपके जिन दो चरणो को। 'यौ' का अभिप्राय है महाराज युधिष्ठिर के वे दो ऐश्वर्यशाली चरण जिन पर समस्त नृपतिगण झुकते थे । ‘पादान प्रपद पाद पदडिघ्रश्चरणोऽस्त्रियाम' इत्यमर । राजशिर स्त्रजा रज -नमद भूपालमौलि- माल्याना पराग अर्थात प्रणामनिवेदनार्थ झुके हुए नरपतियो की शीर्षस्थ मालाओ की परागधूलि । राज्ञा शिरासि इति राजशिरासि ( षष्ठीतत्पु० ), राजशिरसा स्रज इति राजशिर स्रज ( पष्ठी तत्पु० ), तामा रज पराग- धूलि । 'रेणुईयो स्त्रिया घूलि पाशुर्ना न द्वयो रज' इत्यमर । अरञ्जयत्- रंग देती थी ( रङ्ग् + णिच् +लड प्रथमपुरुष एकवचन)। तौ--वही आपके (ऐश्वर्यसम्पन्न) चरण । मृगद्विजालूनशिखेषु---मृगो अर्थात हरिणादि वन्यपशुओ तथा द्विजो ( तपस्वियो ) द्वारा आलून (छिन्न किए गए ) शिखरो वाले (कुशवनो मे)। 'आलून' का अर्थ है छिन्न कर दिया जाना-आ+लू क्रयादिगण + क्त कर्मणि स्त्रियाम । 'द्विज' का अर्थ है तपस्विनजन, ब्राह्मण (द्वि + जन् + ड कर्तरि ) पूरी व्याख्या देखे-मृगाश्च द्विजाश्च इति मृगद्विजा द्वन्द्वसमास ) ते आलूना मृग- द्विजालूना (तृतीया तत्पु० ) तादश्य शिखा येषु तेष ( बहिषा वनेषु ) बहुव्रीहिसमास । बहिषा वनेषु-कुशाना काननेषु । 'बर्हि कुशहुताशयो' इति विश्व । निषीदत ---तिष्ठत , अवस्थित हो रहे है। प्रथमपुरुष द्विवचन । ननु सर्वप्राणिसाधारण्यामापदि का परिदेवनेत्याह नि + सद . + लट् द्विषन्निमित्ता यदिय दशा ततः समूलमुन्मूलयतीव मे मनः ।
( १२५ ) पररपासितवीर्यसम्पदा पराभवोऽप्युत्सव एव मानिनाम् ॥४१॥ . द्विषदिति । यद्यत कारणादिय दशावस्था। "दशावर्ताववस्थायाम्" इति विश्व । द्विषन्तो निमित्त यस्या सा द्विपन्निमित्ता शत्र कृता । द्विषोऽमित्रे इति शतृ प्रत्यय तत मे मन ममूल साशयमुन्मूलयतीवोत्पाटयतीव । दैविकी त्वा- पन्नदु खायेत्याह-परेरिति । परै शत्रुभिरपयासिताऽपर्यावर्तिता वीर्यसम्पत् येषा तेषा मानिना पराभवो विपदप्युत्सव एव इति वैषम्येणार्थान्तरन्याम । मानहानि- १ सहा न त्वापदिति भाव । श्लोकान्वय- यत् इय दशा द्विषन्निमित्ता, तत मे मन समूलम् उन्मूल- यतीव । परै अपर्यासितवीर्यसम्पदाम् मानिनाम् पराभवोऽप्युत्सव एव । अनुवाद-चूकि ( आपकी ) यह दुरवस्था शत्रुओ के कारण हुई है (बस) इसीलिये मेरे चित्त को समूल उन्मूलित सी किये दे रही है। (अन्यथा) शत्रुमो द्वारा अपराभूत शौर्य-सम्पत्ति वाले मनस्वीपुरुषो के लिये पराभव भी उत्सव के ही समान है। भावार्थ- राजन् । विपत्तिग्रस्तो भवान् इति नेद मदन्तरदहनकारणम् । भाग्यपड्क्तिस्तु चक्रारपक्ति रिव आयाति यात्येव । तत्र का परिदेवना ? किन्तु नेय भावत्की विपत्ति देवप्रदत्ता न च पूर्वकृतापराधजन्या । त्रैलोक्य विश्रुतै प्रचण्डपराक्रमै भीमार्जुनादिसदृशै बन्धुगणैस्समुपेतस्सन्नपि वर्मराजो भवान् शत्रुकृता विपत्ति सहते । सत्यपि क्षात्रतेजसि भिक्षावृतिमवलम्ब्य क्लैव्यमुप- गतोऽस्ति इत्यस्मारव कारणात् चित्त मे ममूल उन्मूलयति इव । येषा वीरपुरु- षाणा वीर्यसम्पति शत्रुभि पहृता तेषा कृते तु विपत्तिरपि महोत्सवतुल्यैव किन्तु अरात्यपहृतवीर्याणा कृते मनागपि विपत्ति माक्षान्नरकयातनैव । टिप्पणी-यत्-यत , यस्मात्, कारणात् । चूकि । यह एक अव्ययपद है । इय दशा-इयमवस्था, यह वर्तमान दुर्दशा । 'दशावार्ता अवस्थायाम्' इति विश्व । द्विषन्निमित्ता--शत्रुकृता । द्विषद् अर्थात् शत्र है निमित्त या कारण जिसमे ऐसी ( दशा ) द्विषन्त निमित्तम् अस्या सा द्विषन्निमित्ता (बहुव्रीहि ) । निमित्त का अर्थ है-कारण--'निमित्त हेतुलक्ष्मणो' इत्यमर । द्विषन् की व्याख्या २७ वे पद्य मे देखे--निशम्य सिद्धि द्विषताम् आदि । तत् -तस्मात् कारणात्, इसीलिये अथवा बस उसी कारण से ( अर्थात् यदि दैवयोग से आप . ।
( १२६ ) वनवासी हो गये होते तो मुझे क्तई न अखरता किन्तु चूकि आप शत्रुओ द्वारा वन मे खदेड गये है, पराक्रमसम्पन्न होते हुए भी-बस यही नहीं सहा जाता )। मे मन -मम चितम् अर्थात् मेरा मन । समूलम्-नि शेषम्, पूर्णरूप मे, जड सहित । मूलेन यह वर्तमानम् इति समूलम् ( बहुव्रीहि ) तत् यथा स्यात्तथा, क्रियाविशेषणम् । 'वोपसर्जनस्य' सूत्र से यहाँ वैकल्पिक म्प से 'सहमूलम् रूप भी बनेगा। उन्मूलयति इव--उत्पाटयावर इव । मानो उखडा जा रहा है। उत् +म्ल+णिच् (चरादिगणी ) + लट् प्रथम एकवचन । परै-शत्रुभि , शत्रुओ द्वारा । 'परो दूरान्यश्रेष्ठशत्रुषु' इति हम । अपर्यासितवीर्यसम्पदाम्---अप्रतिहतगौर्यवनानाम् । अपर्यासित, अवि- नष्ट हे वीर्यसम्पत्ति जिनकी । परि + अस् दिवादिगणी क्षेपे + णिच् +क्त कर्मणि स्त्रियाम् = पर्यासिता । न पर्यासिता इति अपर्यासिता ( ना तत्पु०), तादृशी वीर्यसम्पत् ( वीरस्य भाव वीर्यम् वीर+ध्यञ, तस्य सम्पत् इति वीयसम्पत्, षष्ठी तत्पु०) एषामिति अपर्यासितवीर्यसम्पदाम् (बहुव्रीहिसमास )। मानिनाम्-मनस्विनाम् अर्थात् मनस्वी पुरुषो के लिये । मान का अर्थ है आदर, जो मान से युक्त है, वह मानी है-मान् ( पूजायाम् ) + घन भावे = मान । स अस्ति एपामिति मानिना ( मान + इनि मत्वर्थे, प्रथमा बहु० ) तेषा मानिनाम् । पराभवोऽपि---विपदपि, पराजय अथवा विपत्ति भी । 'पराभव परिभव पराजय इतीर्यते' इत्यमर । उत्सव एव-हर्षास्पदमेव, उत्सव ही है । अथ क्षण उद्धर्षों मह उद्धव उत्सव इत्यमर । . विहाय शान्ति नृप धाम तत्पुन., प्रसीद सन्धेहि वधाय विद्विषाम् । व्रजन्ति शत्रूनवधूय निःस्पृहाः शमेन सिद्धि मुनयो न भूभृतः॥४२॥ विहायेति हे नृप । शान्ति शम । विहाय तत्प्रसिद्ध धाम तेजो विद्विषा वधाय पुन सन्धेह्यङ्गीकुरु प्रसीद प्राथनाया लोट् । ननु शमेन कार्यसिद्धी कि क्रोधेनेत्यत्राह--व्रजन्तीति । नि स्पृहा मुनय शमेन क्रोधवर्जनेन सिद्धि व्रजन्ति । भूभृतस्तु शत्रून् अवधूय निर्जित्य । कैवल्यकार्यवद्राजकार्य न शान्ति- माध्यमित्यर्थ ।
( १२७ ) श्लोकान्वय-हे नृप शान्ति विहाय तत् धाम विद्विषा ववाय पुन सन्येहि । प्रसीद । निस्पृहा मुनय शत्रून् अवधूय शमेन सिद्धि व्रजन्ति, भूभृतो न । - अनुवाद-महाराज | शम का परित्याग करके (अपने) उस प्रख्यात तेज को, शत्रुविनाशार्थ पुन वारण कीजिए । प्रसन्न हो जाइए । निष्काम भावना वाले तपस्वीजन (ही कामादि) शत्रुओ पर विजय प्राप्त करके शमवृत्ति द्वारा सिद्धि प्राप्त करते है, नृपतिगण नहीं । भावार्थः -राजन् | कोऽय भवतो व्यामोह ? क्षात्रधर्मपरायणोऽपि भवान् निष्कारणमेव तपस्विजनवृत्तिमवलम्बते? किमिदमव समुचित वतते भरतवशावत- सस्य भवत ? स्वामिन् प्रसीद । कणातिथीक्रियता मद्वचन तावत् । शत्रुजन- विनाशाय स्वकीय तत् प्रसिद्ध तेज पुन स्वीकरोतु भवान् । प्रनष्टा च भवतु सा शमवृत्ति यया खलु इदम् अवस्थान्तरमुपनीतोऽस्ति । नेय भूपालाना परिपाटी यत्ते शत्रु भयेन आत्मान कान्तारप्रदेशे निगृह्य निवसन्तु । प्रसह्य मगराजाक्रमण- मेव तेषामलङ्करणम् । राजन् । निष्कामास्तपस्विन एव कामादिशत्र न नि जत्य शमवृत्या सिद्धि भजन्ते न खलु पृथ्वीपतय । टिप्पणी-हे नृप--हे राजन् सम्बोवनपद । शान्ति विहाय-शमम् अपहाय, शमवृत्ति को छोड करके । शान्ति (शम्धानु, शाम क्तिन् भावे) का अर्थ है चुप्पी साधलेना, तितिक्षा का आश्रय लेना। विहाय (वि-हा +क्त्वा ल्यप्) का अर्थ हे छोड कर । 'शमथस्तु शम शान्ति' इत्यमर । तत् धाम-प्रसिद्ध तेज' अर्थात् उस प्रख्यात तेजस् को (जिसे आपने अपने वैभव के दिनो मे धारण किया था। राजसूययाग आदि अवसर इसी प्रकार के थे) धाम का अर्थ है तेज या पराक्रम 'गृहदेहत्विट्प्रभावा धामानि' इत्यमर । विद्विषा वधाय-शत्रणा विनाशाय अर्थात् शत्र जनो का विनाश करने के लिए । 'विद्विषाम्' की व्याख्या श्लोक ३३ मे देखे (न विद्विषादर ) 'क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिन' सूत्र से 'वधाय' मे चतुर्थी विभक्ति हुई है । 'वध' की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- हन् धातु+अप् भावे । ज्ञातव्य है कि इस प्रसङ्ग मे हन् को 'वव् आदेश हो जाता है 'हनश्च वध' सूत्र मे । इमी शब्द का चतुर्थी एकवचन का रूप । पुन सन्धेहि--भूय स्वीकुरु, पुन धारण कीजिए। सम् + धा + लोट नकार, मध्यमपुरुष एकवचन । प्रसाद-- प्रसन्नो भव, प्रसन्न या अनुकूल हो जाइये । प्र+सद्+लोटलकार, मध्यम- १२८ ) पुरुष एकवचन । निस्पृहा मुनय – निकामास्तपस्विन अर्थात् निरीह ऋषि- मुनि ही । निरस्ता दूरीभूता स्पृहा आकाक्षा येषा ते निस्पृहा (बहुव्रीहि ) स्पृहा का अर्थ है इच्छा। अमरकोश देखे-'इच्छाकाक्षा स्पृहातृड्वाञ्छा- लिप्सामनोरथ' । शव न--कामादिकान षड्रिपून अर्थात् काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद एव मात्सर्य इन छ शत्रुओ को। अबधय-निजित्य, जीत करके, निरस्त करके (अव-धू+ ल्यप) शमेन--शमवत्त्या, शान्ति या तितिक्षा द्वारा । शम का अर्थ है, निरीहावस्था का आत्मसुख अथवा विषयविहीन मनोनिग्रह । शास्त्रो मे इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है-'शमो निरीहावस्था- याम् स्वात्मविश्रामज मुहम' अथवा 'शमस्तावत् श्रवणादिव्यतिरिक्तविषयेभ्यो मनसो निग्रह ।' सिद्धि खजन्ति-साफल्य भजन्ते । सिद्धि को, सफलता को प्राप्त करते है । सिद्धि (सिध् क्तिन् भावे) का अर्थ है सफलता- 'सिद्धिस्तु मोक्षे निप्पत्तियोगयो' इति हैम । वस्तुत यहाँ सिद्धि शब्द उभयार्थक है । राजा के पक्ष म इसका अर्थ है-'सार्वभौम अविकार' तथा मुनि के पक्ष मे 'मोक्ष या मुक्ति' । भभूतो न भूपाला न अर्थात् नृपतिगण (गमवृति मे सिद्धि) नहीं प्राप्त करते है । उनका साधन तो है 'प्रत्याक्रमण' । वे अपने लेज या पौरुष से अपनी सिद्धि (चक्रवर्तिता) प्राप्त करते है। - पुर सरा धामवता यशोधना सुदुःसह प्राप्य निकारमीदृशम् । भवादृशाश्चेदधिकुर्वते रतिम् निराश्रया हन्त हता मनस्विता ॥४३॥ पुर इति । कि च धामवत तेजस्विनाम् । परनिकारासहिष्णूनामित्यथ । पुर सरन्तीति पुर सरा अग्रेसरा। 'पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्ते' इति टप्रत्यय । यशोधना भवादृशा सुदु सहमतिदु सहमीदृशमुत्त्प्रकार पराभव प्राप्य रति सन्तोषमविकुवते स्वीकुर्वते चेत्तर्हि । हन्त इति खेदे । मनस्विताऽभिमानिता निराश्रया मती हता तेजस्विजनैकशरणत्वान्मनस्विताया इत्यर्थ । अत पराक्रमितव्यमिति भाव । यद्यप्यत्र प्रसहनस्यासङ्गतेरधिपूर्वात्करोते 'अधे प्रसहने' इत्यात्मनेपद न भवति । 'प्रसहन परिभव' इति काशिका । तथाऽप्यस्याकर्षभिप्रायविवक्षायामेव प्रयोज- कत्वात्रभिप्राये 'स्वरितजित-' इत्यात्मनेपद प्रसिद्धम ॥४३।।
( १२६ ) श्लोकान्वय--धामवता पुरःसरा यशोधना. भवादृशा ईदृशम सुदु - सहम् निकारम् प्राप्य रतिम् अधिकुर्वते चेत्, हन्त मनस्विता निराश्रया ( सती ) हता। अनुवाद-तेजस्वियो मे अग्रगण्य, यशोधन आप जैसे लोग यदि इस प्रकार के अत्यन्त दुम्सह अपमान को प्राप्त करके सन्तोष कर लेते है तो खेद है कि मनस्विता आश्रयविहीन होकर विनष्ट हो गई। भावार्थ-कार्यार्थी मनस्वी दुख सुखञ्च न गणयति । पशुविहगा अपि स्वसपत्नपराक्रम न सहन्ते किम्पुन सौर्यसम्पन्ना मानवाः । राजन् । न खलु भवान् दीनोऽसहाय । स्वगुणमहिम्ना यैनिखिलमेव जगत् यशोधवल कृत 'भुवन- विदिते तेषामेव विधुवशे भवज्जन्म जातम् । अग्रगण्योऽस्ति नाथ | तेजस्विनाम्, मतिमताञ्च । यदि एव विधा अपि मनस्विपुङ्गवा सुदुस्सह शत्रुकृतापमान प्रतारणञ्च समवाप्य सन्तोषमेव स्वीकुर्वन्ति तहिं हन्त । वराकी मनस्विता विधवा सीमन्तिनीव निरवलम्बा सती नाममात्रावरोषा भविष्यति । टिप्पणी-धामवताम्-तेजस्विनाम् अर्थातु तेज सम्पन्न पुरुषो के । धाम का अर्थ है-तेज । तेजस्वी पुरुष कभी भी पराधीन नही रह सकता । कालिदास ऐसे पुरुषो के विषय मे कहते हैं-'तेजस्विना हि न वय समीक्ष्यते ।' आचार्य मल्लिनाथ धामवान्' की व्याख्या करते है-'परनिकारासहिष्णु' अर्थात् दूसरो के द्वारा किए गर अपमान को न सहने वाला। विश्वकोश देखे-'धाम शक्ती प्रभावे च तेजोमन्दिरजन्मसु ।' धाम अस्ति एषामिति धामवन्त , ( धामन् + मतुप् +प्रथमाबहु० ) तेषाम् । यद्यपि इस प्रक्रिया से रूप बनना चाहिए 'धाममन्त' किन्तु मतुप के मकार को यहाँ वकारादेश हो गया है । नियम है कि 'म' तथा 'अत्' से अन्त होने वाले और 'म' अथवा 'अत्' उपधा वाले शब्दो के बाद यदि 'मतुप्' प्रत्यय आए तो म के स्थान पर व हो जाता है यवादि-गण के शब्दो को छोडकर। सूत्र है-'मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्य' । यहाँ धामन् ( अदुपध ) के पश्चात् मतुप आया है, अत वकार हुआ । पुर सरा अग्रेसरा अग्रगण्य, प्रमुख । 'पुर सरा अग्रगण्या धुरीणाश्च पुरोगमा ' इत्यमर । 'पुरस्' पूर्व के स्थान पर प्रयुक्त उसी अर्थ का द्योतक एक शब्द है । अस् परे रहने पर पूर्व, अधर तथा अवर के स्थान पर क्रमश पुर्, अध तथा अवस् आते है । व्याकरण का सूत्र है-'पूर्वाधरावराणामसि पुराधावश्चैषाम्' इस प्रकार 'पुरस्' का अर्थ होता है समक्ष या आगे-पूर्व + डि ( सप्तमी विभक्ति )+ फा०-६ -- ( १३० ) ' - पद्य मे कञ्च' सूत्र असि स्वार्थे = पुर् + अस् = पुर । सृ धातु का प्रयोग प्रयाण के अर्थ मे होता है अतएव जो अग्रगामी हो उसे 'पुरस्सर' कहेगे-पुर सरन्तीति पुर. सरा ( पुरस् + सृ + ट कर्तरि )। ट प्रत्यय यहाँ 'पुरोऽग्रतोग्रषु सत्ते सूत्र से हुआ है। तात्पर्य है कि कर्तृवाच्य होने पर पुरस्, अग्रतस् तथा अग्र उपपद रहने पर सृ धातु मे ट प्रत्यय लगता है । यशोधना-यशस्विनं , यश ही जिनका धन है, ऐसे लोग । यश एव धनमेषा ते यशोधना (बहुव्रीहि )। भवादृशा -भवद्विधा पुरुषा । ब्युत्पत्ति के लिए २८ वॉ पद्य देखे- 'भवादृशेषु प्रमदाजनोदितम्' आदि। ईदृशम्- उक्तप्रकारम्, इस प्रकार के । पूर्ववर्णित स्वरूप वाले ( अपमान को ) इदम् + दृश् + का + + द्वितीयैकवचनम् ) । विशेष व्याख्या के लिए २५ वे व्याख्यात 'मादृशाम' शब्द की प्रक्रिया देखे-'प्रवृत्तिमारा खलु मादृर्शा गिर ।' 'त्यदादिषु दृशोऽनालोचने से कज प्रत्यय तथा 'इदकिमोरीश्की' सूत्र से इदम् के स्थान पर ईश् आदेश हुआ। इस प्रकार इदम्-ईश् + दृश् + का = ईदृशम् ( द्वितीयैकवचन ) । सुदुस्सहम् - असह्यतम् अर्थात् अत्यन्त असह्य । सु अतिशयेन दुस्सह सुदूस्सहम् ( प्रादि तत्पु० ) सु + दुर् + सह, + खल = सुदुस्सहम् । व्याकरण के नियमानुसार ईषद् दुर् तथा सु उपपद होने पर सुख और दुख के अर्थ मे खल प्रत्यय का प्रयोग होता है—'ईषद्दु सुषु कृच्छार्थेषु खल् ।' निकारम्- अपमानम्, पराभव को, तिरस्कार को । नि + कृञ + धन भावे 'निकारो हि तिरस्कारोऽपमानश्च पराभव' इत्यमर । प्राप्य-समवाप्य, अनुभूय अर्थात् प्राप्त करके या सह करके । प्र + आप् + क्त्वा ल्यप् प्रत्यय । रतिम् अधिकुर्वते-सन्तोषमवलम्बन्ते । तुष्टि पा लेते है । अधिकुर्वते आत्मनेपदी प्रयोग है अधि + कृ + लट् प्रथमपुरुष बहुवचन । चेत् का अर्थ है 'यदि' । हन्त-खेद के अर्थ मे प्रयुक्त होने वाला एक विस्मयादि- बोधक अव्यय । 'हन्त हर्षेऽनुकम्पाया वाक्यारभ्भविषादयो' इत्यमर । मन- स्विता-अभिमानिता, स्वाभिमान का भाव अथवा आत्मसम्मान की भावना । जिनका मन प्रशस्त हो उन्हे 'मनस्वी' कहा जाता है। मनस्वी का भाव ही 'मनस्विता' है । प्रशस्त मन एषामिति मनस्विन ( मनस् + विनि मत्वर्थे ) तेषा भाव मनस्विता ( मनस्विन् + तल स्त्रियाम् + टाप् )। विनि प्रत्यय यहाँ 'अस्मायामेधास्रजो विनि' सूत्र से हुआ है । निराश्रया-निरवलम्बा सती अर्थात् निराधार, आश्रयविहीन होकर । निर्गत आश्रय ( आ + श्रि तम् ।
( १३१ ) + अच् ) यस्या सा निराश्रया ( बहुव्रीहि ) । हता-विनष्टा, समाप्त या लुप्त हो गई । हन् + क्त कर्मणि + टाप् स्त्रियाम् + सु । अथ क्षमामेव निरस्तविक्रम--- श्चिराय पर्येषि सुखस्य साधनम् । विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कामुक जटाधरः सजुहुधीह पावकम् ॥४४॥ अथेति । अथ पक्षान्तरे निरस्तविक्रम सन् । चिराय चिरकालेनापि क्षमा क्षान्तिमेव । 'क्षितिक्षान्त्यो क्षमा' इत्यमर । मुवस्य साधम पर्येषि अव- गच्छसि । तहि लक्ष्मीपतिलक्ष्म राजचिह्न कार्मुकम् विहाय । धरतीति धर पचाद्यच् । जटाना धरो जटावर सन्निह वने । पावक जुहुधि पावके होम कुवित्यर्थ । अधिकरणे कर्मत्वोपचार । विरक्तस्य कि धनृपेत्यर्थ । 'हुझल्भ्यो हेर्वि' ॥४४॥ श्लोकान्वय-अथ निरस्तविक्रम चिराय क्षमामेव सुखस्य साधनम् पर्येषि लक्ष्मीपतिलक्ष्म कामुक विहाय जटाधर सन् इह पावक जुहुधि । अनुवाद-और यदि पराक्रमविहीन होकर चिरकाल तक क्षमावृत्ति को ही ( आप ) सुख का मूल समझते है तो राजचिह्न धनुष का परित्याग करके, जटाधारी बन कर यही वन मे अग्नितर्पण कीजिए। भावार्थ-यत्किञ्चित् मयोदित भवदुपकारबुद्ध या तत् सर्व समुचितमेव वर्तते इत्यह न मन्ये । राजन् । इदमपि ताबत् स भवति यद् भवच्चिन्तनस्फुरण मज्जल्पनापेक्षया किञ्चिदधिकमेव हितकर स्यात् को वाऽबलाबुद्धिप्रत्यय ? अथ भवान् निरुद्यमस्सन् आजीवन शान्तिमेव हृदयानन्दसन्दोहमूल मन्यते तत् अलमतिविवादेन । स्वस्ति भवते सर्वजनहिताय जगदाधाराय । किन्तु कृपया स्वीक्रियताम्मदीयमभिमतमेकम् । को लाभ शरासनग्रहणेन साम्प्रतम् ? मुनि- वृत्तिमवलम्ब्य जटाधरस्सन् पावक पोषय हव्यप्रदानेन । इदमेव सदलङ्करणमधुना भविष्यति विश्वबन्धोस्तव । ? टिप्पणी-अय-पक्षान्तरे। 'अथ और इति' क्रमश किसी प्रकरण का प्रारम्भ और अन्त द्योतित करने के लिए प्रयुक्त होते है । परन्तु यहाँ इसका प्रयोग पक्षान्तर या विकल्पार्थ को सूचित करने के निमित्त हुआ है । यह ( १३२ ) -- स्याद्या अब्धयपद है। मेदिनीकोश मे इसके अनेक अर्थ प्रस्तुत किये गये है-अथो अथ सशये स्याताम् अधिकरणे च मङ्गले । विकल्पानन्तरप्रश्नकात्या॑रम्भ- समुच्चये ॥ अमरकोशकार ने लिखा है-'मगलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्येष्वथो अथ' । निरस्तविक्रम --व्यपगतपराक्रम अर्थात् पराक्रमविहीन होकर । निरस्त नाशमुपगत विक्रम यस्य स निरस्तविक्रम (बहु० )। चिराय- चिरकाल यावत् चिरकाल तक के लिये । 'चिराय चिररात्राय चिर- चिरार्थका' इत्यमर । क्षमामेव-शान्तिमेव, शान्ति को ही, सन्तोषवृत्ति को ही । क्षम् + अड् भावे + टाप् स्त्रियाम् द्वितीयकवचनम् । क्षितिक्षान्त्यो क्षमा इत्यमर । ‘एवं' यहाँ अवधारण के अर्थ मे है। सुखस्य साधनम्-आनन्दस्य कारणम् । आनन्द या सुख का साधन या कारण । निर्वर्तनोपकरणानुव्रज्यासु च साधनम् इति कोश । पर्येषि-अवगच्छसि । परि+ इ+लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन । इसके बाद 'तहि' का प्रयोग होना चाहिए। लक्ष्मीपतिलक्ष्म कामुकम्-राजचिह्न धनु अर्थात् लक्ष्मीपति = भूपालो के लक्ष्य = चिह्नभूत कामुक = धनुष् को। जो नीतिमान् पुरुष को लक्षित करे, कृपापात्र बनाए, वही 'लक्ष्मी' है-लक्षयति पश्यति नीतिमन्त पुरुषम् इति लक्ष्मी ( लक्ष् + णिच् ई, औणादिक मुडागम ), लक्ष्म्या पति इति लक्ष्मीपति (षष्ठीतत्पु० ), तस्य लक्ष्म इति लक्ष्मीपतिलक्ष्म (षष्ठी तत्पु०) । यह पूर्णशब्द 'कामुकम्। विशेषण होगा । 'लक्ष्मी पद्मालया पद्मा कमला श्रीहरिप्रिया' 'कल- ड्काको लाञ्छन च चिह्न लक्ष्म च लक्षणम्' इत्यमर । कामुक का अर्थ है धनुष् । जो कर्म करने में समर्थ हो वही कामुक है-कर्मणे प्रभवति इति कामुकम् ( कर्म + उकञ ) 'धनुश्चापो धन्वगरासनको- दण्डकामुकम्' इत्यमर । विहाय--परित्यज्य, छोड करके । वि + ह + क्त्वा-ल्यप । जटाधरस्सन्- जटिलस्मन्, मुनिवृत्तिमवलम्ब्य । अर्थात् जटाधारी बनकर । ऋषि-मुनि बन कर । धरतीति धर (धृ + अच्- कर्तरि ) जटाना घर इति जटाधर' (१० तत्पु० समास ) यदि इस शब्द की व्युत्पत्ति हम 'जटा धरति इति जटाधर' करना चाहे तो सम्भव न होगा क्योकि तब 'कर्मण्यण' सूत्र से अण् प्रत्यय लगकर 'जटाधार' रूप बन जायेगा। इह--अस्मिन् वने, इसी वन मे। पावकम्--अग्निदेव को । जो पवित्र करे वही पावक है- पुनाति इति पावक (पू + ण्वुल कर्तरि ) व को अक् आदेश होने के कारण (पू + अक् ) पावक रूप बना । 'आश्रयाशो का ( १३३ - बृहद्भानु कृशान पावकोऽनल' इत्यमर । जुहुधि - तर्पय, हवन कुरु । अर्थात् हवन कीजिए । हु + लोट्लकार मध्यमपुरुष एकवचन । अथ ममयोल्लवनाविभेषि, तदपि न किञ्चिदित्याह न समयपरिरक्षण क्षम ते निकृतिपरेषु परेपु भूरिधाम्नः । अरिषु हि विजयार्थिन क्षितीशा विदर्धात सोपधि सन्धिदूषणानि ॥४५॥ नेति । परेषु शत्रुप निकृति शाठ्यम् पर प्रगन येषु तेषु तयोक्त प्वपकार- तत्परेषु सत्सु भूरिधाम्नो महौजस प्रतीकारक्षमस्य ते तव समयस्त्रयोदशसवत्स- रान् वने वत्स्यामीत्येवरूपा सवित् । 'समय शपथाचारकालसिद्धान्तसविद' इत्यमर । तस्य परिरक्षण प्रतीक्षण न क्षम न युक्तम् । 'युक्त क्षम शक्त हिते त्रिष' इत्यमर । हि यस्माद्विजयार्थिनो विजिगीषव नितीशा अरिष, विषये सोपधि सकपट यथा तथा । 'कपटोऽस्त्री व्याजदम्भोपधयश्छद्मकैतवे' इत्यमर । सन्धिदूषणानि विदधति केनचिद्व्याजेन दोषमापाद्म सन्धि दूषयन्ति । विघटयन्तीत्यर्थ । शक्तस्य हि विजिगीषो सर्वथा कार्यसाधन प्रधान- मन्यत्समयरक्षणादिकमशक्तस्येति भाव । अर्थान्तरन्यासोऽलङ्कार पुष्पिताग्रा वत्तम् ॥४५॥ श्लोकान्वय-परेषु निकृतिपरेषु भूरिधाम्न ते समयपरिरक्षण न क्षमम् । हि विजयार्थिन क्षितीशा अरिष सोपधि सन्धिदूषणानि विदधति । अनुवाद-शत्रुओ के ( आपके प्रति निरन्तर ) शाठ्यतत्पर रहने की स्थिति में परम तेजस्वी आपके लिए प्रतिज्ञा की रक्षा करना समुचित नही है क्योकि विजयाभिलाषी नृपतिगण कपटपूर्वक शत्रुओ के साथ की गई सन्धियो को भङ्ग कर देते है। भावार्थ-राजन् । मायाचारी मायया प्रत्युपेय इतीदमेव शास्त्रवचनम् । भवास्तावत् प्रतिज्ञामनुपालयन बन्धुभिर्मया च साध वनवासकष्टानि सहते किन्तु एवम्भूतेऽपि सुयोधनादिका भवच्छत्रव न मौनभावमवलम्बन्ते । निरन्तरमेव ते शाठ्यसलग्ना सन्ति । काननेऽप्यस्मिन प्रायेण प्रतिदिनमैव ते प्रपीडिता वयम् ।
( १३४ ) -- पर किमधुनापि प्रतिज्ञानुपालन स्तमुचितमेव ? न कदापि । यत विजयाभिलाषु का प्रतीकारक्षम भूपतय न कदापि प्रतिज्ञानुबद्धा भवन्ति । ते तु केनचिद् व्याजेन दोषमासाद्यपूर्वकृत सन्धि विच्छिन्दन्ति । इयमेव राजनीति । भवतापि तावदेवमेव क्रियतामिति मया साभ्यर्थन याच्यते । टिप्पणी-परेषु-शत्रषु । शत्रुओं के। निकृतिपरेषु-शाठ्यसलग्नेष सत्सु, शठता मे लगे रहने पर । 'सति सप्तमी' का प्रयोग । निकृति का अर्थ है-शठता या अपमान । निकृति ही जिनमे प्रधान हा वे 'निकृतिपर' है- निकृति (नि + कृ + क्तिन् भावे ) पर प्रधानम् एषामिति निकृतिपरास्तेषु (बहु० ) कुसृतिनिकृति शाठ्यमइत्यमर । श्रेप्ठारिदूरान्योत्तरे क्लीबन्तु केवले इति मेदिनीकोश । भूरिधाम्नस्ते--महोजसस्तव । प्रचुर पराक्रम वाले आपका। भूरि का अर्थ है प्रचुर---'पुरुहू पुरु भूयिष्ठ स्फार भूयश्च भूरि च' इत्यमर । भूरि भूयिष्ठ धाम तेज अस्यास्ति इति भूरिधामा तस्य भूरिघाम्न (बहु.)। समयपरि- रक्षणम् -शपथप्रतीक्षणम , की गई प्रतिज्ञा का परिरक्षण । समय का तात्पर्य है प्रतिज्ञा या शपथ । महाराज युधिष्ठिर ने तेरह वर्ष वन मे बिताने की प्रतिज्ञा की थी । द्यूतक्रीडा मे पराजित होकर अब वे उसी प्रतिज्ञा का पालन कर रहे है-~'ममय शपयाचारकालसिद्धान्तसविद' इत्यमर । समयस्य ( सम् + ई + अच् + भावे + डस् ) परिरक्षणम ( परि + रक्ष ल्युट भावे) इति समयपरिरक्षणम् ( षष्ठ तत्पु० ) । न क्षमम्-न युक्तम् । उचित नहीं है। क्षमते इति क्षमम्-क्षम् + पचाद्यच से अच् प्रत्यय । 'युक्ते क्षम शक्ते हित त्रिष' इत्यमर । हि-यस्मात् कारणात्, यत क्यो कि । विजयाथिन क्षितीशा -जयाभिलाषिणो भूपतय । विजयाभिलाषो नृपतिगण । जो विजय की अभ्यर्थना करे वे विजयार्थी है--विजयम ( वि + जि+ अच् भावे + अम् ) अर्थयन्ते इति विजयार्थिन ( विजय + अर्थ + णिनि कर्तरि )। क्षितीश का अर्थ है क्षिति अर्थात पृथ्वी के ईश-स्वामी लोग । क्षिते भव ईशा इति क्षितीश (षष्ठी तत्पु० ) 'धरा धरित्री धरणि क्षोणिा काश्यपी क्षिति ।' इत्यमर । अरिषु-शत्रुष , शत्रविषयक । विषयाधिकरणे सप्तमी । 'रिपो वैरिसपत्नारि' इत्यमर । सोपधि-सकपटम्, कपटसहित या किसी बहाने से । 'उपधि' का अर्थ है व्याज या बहाना । 'उपधि व्याजचक्रयो' इत्यमर । उपधीयते इति उपधि ( उप + धा + कि. भावे ) तेन सह वर्तमानम् इति सोपधि ( बहु० ) तत् यथा स्यात्तथा ( क्रियाविशेषणम)।
( १३५ ) सन्धिदूषणानि-सन्धिभङ्गान् अर्थात् पूर्वकृत समझौते का विनाश । सन्धीयते इति सन्धि (सम + धा + कि भावे) तस्य दुषणानि ( दुष + णिच् + ल्युट भावे ) इति मन्धिदूषणानि ( षष्ठी तत्पु० ) । दुष धातु णिजन्त होने पर 'दोपो णौ' सूत्रानुसार दीर्घस्वर युक्त ( दूष ) हो जाती है । विदधति- आरोपयन्ति, कुर्वन्ति । कर देते है । वि + धा + लट् लकार, प्रथमपुरुषबहुवचन । प्रस्तुत पद्य मे उत्तरार्ध के सामान्य-कथन द्वारा पर्वाध के विशेष-कथन का समर्थन किया गया है, फलत अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। साथ ही इस पद्य मे छन्द भी बदल गया है-पुष्पिताग्रा । जब प्रथम एव तृतीय चरण मे क्रमश नगण, नगण, रगण, यगण तथा द्वितीय एव चतुर्थ चरण मे क्रमश नगण, जगण, जगण, रगण और एक गुरु वर्ण हो तो वहाँ पुष्पिताग्रा छन्द होता है । लक्षण इस प्रकार है-'अयुजि नयुग रेफतो यकारो युजि च नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।' प्रस्तुत पद्य मे इसकी चरितार्थता देखे - प्रथम एव तृतीय चरण-।।। SIS नसम यपरि हिविज रक्षण यार्थिन ISS क्षमते क्षितीश अरिषु द्वितीय एव चतुर्थ चरण-।।। निकृति विदध 151 परेष तिसोप 15। परेष धिसन्धि SISS भूरिधाम्न दूषणानि - उक्तमर्थमाशीर्वादपूर्वकमुपसहरति विधिसमयनियोगाद्दीप्तिसंहारजिम शिथिलवसुमगाधे मग्नमापत्पयोधौ । रिपुतिमिरमुदस्योदीयमान दिनादौ दिनकृतमिब लक्ष्मीस्त्वां समभ्येतु भूयः॥४६॥ इति भारविकृतौ किरातार्जुनीये महाकाव्ये प्रथम सर्ग । विधीति । विधिदैवम् । 'विधिविधाने दैवे च' इत्यमर । समय कालस्तयो- नियोगान्नियमनाद्ध तो । तयोर्दु रतिक्रमत्वादिति भाव । अगाधे दुस्तरे । आपत्प- -- योविरिवेत्युपमितसमास । दिनकृतमिवेति वक्ष्यमाणानुसारात्तस्मिन्नापत्पयोधौ मग्नम् । सूर्योऽपि साय सागरे मज्जति परेधु रुन्मज्जतीत्यागम । दीप्ति प्रताप आतपश्च तस्या सहारेण जिह्ममप्रसन्नम् । शिथिलवसु शिथिलधनमन्यत्र शिथिलरश्मिम् । 'वसु देवेऽग्नौ रश्मौ च वसु तोये धने मणौ' इति वैजयन्ती। 'शिथिलबलम्' इति पाठे तूभयत्रापि शिथिलशक्तिकमत्यर्थ । रिपुस्तिमिरमिवेति रिपुतिमिरम उदम्य । निरस्योदीयमानमुद्यन्नम । 'ईड् गतौ' इति धातोर्दैवादि- कात्कर्तरि शानच् । त्वा दिनादौ दिनकृतमिव । लक्ष्मी भूय समभ्येतु भजतु । 'आशिषि लिड लोटो' इति लोट् । चमत्कारकारितया मङ्गलाचरणरूपतया च सर्गान्त्यश्लोकेष लक्ष्मीशब्दप्रयोग । यथाह भगवान्भाष्यकार --- 'मङ्गलादीनि मङ्गलमव्यानि मङ्गलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते बीरपुरुषकाण्यायुष्मत्पुरुषका णि च भवन्त्यध्येतारश्च प्रवक्तारो भवन्ति' इति । पूर्णोपमेयम् । मालिनी वृत्तम सर्गान्तत्वाद्व त्तभेद । यथाह दण्डी ‘सर्गरनतिविस्तीर्णे श्राव्यवृत्तै सुसन्धिभि । सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तै रुपेत लोकरञ्जनम् ।।' इति । अय कवि काव्यवर्णनीय ख्यानपूर्वक सर्गपरिसमाप्ति कथयति-इतीत्यादि । इतिशब्द परिसमाप्तौ । भारविकृताविति कविनामकथनम् । महाकाव्य इति महच्छब्देन लक्षणसम्पत्ति सूचिता। किरातार्जुनीय इति काव्यवर्णनीययो कथनम् । प्रथम सर्ग समाप्त इति शेष । एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम् । किराता- र्जुनावधिकृत्य कृतो ग्रन्थ किरातार्जुनीयम् 'शिशुक्रन्दयमसभद्वन्द्वेन्द्रजनना- दिभ्यश्छ' इति द्वन्द्वाच्छप्रत्यय राघवपाण्डवीयमितिवत् । तथा चार्जुन एवात्र नायक । किरातस्तु तदुत्कर्षाय प्रतिभटतया वर्णित । यथाह दण्डी- 'वशवीर्यप्रतापादि वर्णायित्वा रिपोरपि । तज्जयान्नायकोत्कर्ष कथन धिनोति न ॥ इति । अथात्र सड्ग्रह -नेता मध्यमपाण्डवो भगवतो नारायणस्याशजस्तस्योत्कर्ष कृतेऽनुवर्ण्यचरितो दिव्य किरात पुन । शृङ्गारादिरसोऽङ्गमत्र विजयी वीर प्रधानो रस शैलाद्यानि च वर्णितानि बहुशो दिव्यास्त्रलाभ फ्लम्' इति ॥६॥ श्लोकान्वय--विधिसमयनियोगात् अगाधे आपत्पयोधौ मग्न दीप्तिसहार- जिह्म शिथिलवसु रिपुति मिरम् उदस्य उदीयमान त्वा दिनादौ दिनकृतमिव लक्ष्मी भूय समभ्येतु । अनुवाद-भाग्य एव समय के नियोगवश अगाध विपत्ति रूपी सागर मे निमज्जित, प्रकाश का विनाश हो जाने से कान्तिहीन, मन्दप्रभ ( किन्तु ) शत्रु सदृश अन्धकार का विदलन करके पुन समुदित होते हुए प्रात कालीना - ( १३७ ) । सूर्य ( को प्राप्त होने वाली प्रकाशलक्ष्मी) की ही भाति भाग्य एव समय के नियोगवश अगाध विपत्तिरूप सागर मे निमज्जित, प्रताप का विनाश हो जाने से अप्रसन्न, ऐश्वर्यहीन (किन्तु ) अन्धकार-सदृश शत्रु का विदलन करके अभ्युदय प्राप्त करने वाले आपको, भाग्योदयवेला मे साम्राज्यलक्ष्मी पुन अलबूत करे। भावार्थ-प्राणेश | इदमेव तावज्जगदीश्वर प्रति प्रार्थ्यते मया यद्भवान् यावच्छीघ्र स्वैश्वर्यम् अवाप्नोतु । यथा खलु मूर्य आदिवम समग्रमपि कृ-स्न भूलोक स्वतेजमा प्रकाशयति हन्त ! तनापि देवनियमनात् समागत एव सन्ध्या- काले अगाधविपज्जलनिवौ निपत्य निखिलमेव वैभव प्रजहाति । पुनश्च रजन्य- वसाने प्रातरेव हिमधवलमयूखान् भूयोभूय वित्तीर्य स्वपूर्वशोभामुररीकरोति तथैव भावत्कमपि भाग्यचक्र वर्तते । नेय विपत्ति चिरावस्थायिनी न च वनवासोऽय युगावधि । राजन् । यतकिञ्चिदपि दौभाग्यमनुभूयते भवता न तत् आत्मकृतदोप- फलम् प्रत्युत दैवयोगादेव पूर्वजन्मकृतपापादेव सम्प्राप्तम् । तत्तु निश्चप्रच क्षयमुपयास्यति । पुनरपि भवान् स्वपूर्वैश्वर्य मवाप्स्यति इत्यहमाशासे । टिप्पणी--प्रस्तुतश्लोक मे दो अर्थो का निबन्धन कवि ने युगपद् किया है-एक तो युधिष्ठिरपरक अर्थ जो कि उपमेयपक्ष है और दूसरा सूर्यपरक अर्थ जो कि उपमानपक्ष है। पदावली सम्पूर्ण श्लोक मे एक ही है । विधि- समयनियोगात्-दैवकालनियमनात् । दैव तथा समय के नियम वश । सष्टि की प्रत्येक वस्तु का नियमन दो पदार्थों से होता है एक तो 'विधि' या स्रष्टा जो कि चराचर का स्वामी है और दूसरा काल या समय । कहा भी जाता है-'पुरुष बली नहिं होत है समय होत बलवान ।' प्रचण्डप्रताप वाला सूर्य भी सान्ध्यवेला मे विपत्तिरूपी सागर मे डूब जाता है, यह दैवयोग ही तो है, विश्वविख्यात पौरुष वाले बन्धुओ से युक्त होकर भी धर्मराज युधिष्ठिर यदि वनवासी है तो यह भी दैव तथा काल का ही प्रभाव है। यह शब्दसमूह सूर्य तथा युधिष्ठिर दोनो ही पक्षो मे समान रूप से चरितार्थ होगा । जो सर्जना करे, विधान करे वही 'विधि' है-विदधाति इति विधि (वि+धा+ कि )। नियोग का अर्थ है नियमन अथवा नियन्त्रण-नि+युज्+घञ भावे । विधिश्च समयश्च इति विधिसमयौ (द्वन्द्वसमास ) तयो नियोग इति विधिसमयनियोग (षष्ठी तत्पु० ) विधिविधाने देवे च । कालोदिष्टो ऽप्यनेहापि समयोऽप्यय पक्षति । इत्यमर । अगाधे-अतलस्पर्श, अर्थात् अत्यन्त गभीर । जिसे गहाया ( नापा ) जा सके वह 'गाध' है-गाध्यते ( १३८ ) ८ इति गाध ( गाध्+घञ +कर्मणि ) । न गाध अगाध ( ना तत्पु० ), तस्मिन् । 'आपत्पयोधौ' का विशेषण है और उपर्युक्त दोनो पक्षो मे समान रूप से चरितार्थ होगा । 'अगाधमतलस्पर्श' इत्यमर । आपत्पयोधी विपत्तिसागरे अर्थात् विपत्ति रूपी सागर मे। आपत् पयोधिरिव इति आपत्पयोधि , तस्मिन् ( उपमितसमास )। दोनो पक्षो मे समानार्थक । मग्नम्-विपन्नम्, डूबा हुआ । मज्ज + क्त ( निष्ठाया नत्वम्क्त का न हो जाना) मग्नम् । दीप्तिसहारजिह्मम्-सूर्य के पक्ष मे-दीप्ति अर्थात् आतप ( प्रकाश ) का सहार (विनाश ) हो जाने के कारण कान्तिहीन । दीप्ते आतपस्य सहार नाश इति दीप्तिसहार ( षष्ठी तत्पु० ), तेन जिह्म मन्दप्रभ इति दीप्तिसहारजिह्म ( तृतीया तत्पु० ) । 'स्यु प्रभारुन चिस्त्विड्- भाभाश्छविद्युतिदीप्तय ।' इत्यमर । युधिष्ठिर के पक्ष मे-दीप्ति का अर्थ होगा प्रताप । शेष व्याख्या ऊपर की ही भॉति । शिथिलवसुम–सूर्य के पक्ष मे-मन्द कान्ति वाला । शिथिल वसु रश्मि यस्य स शिथिलवसु , त शिथिल वसुम् ( बहुव्रीहि ) युधिष्ठिर के पक्ष मे—मन्द वैभव वाला । शिथिल वसु धन यस्य स तम् (बहुव्रीहि)। 'वसु' शब्द रश्मि एव वन दोनो अर्थ प्रस्तुत करता है-'वसुदेवेऽग्नौ रश्मौ च वसु तोये धने मणौ' इति वैजयन्ती। रिपुतिमिरम्- सूर्य के पक्ष मे-शत् सदृश अन्धकार को ( रिपुरिव तिमिरम् इति रिपुतिमिर तत् ) युधिष्ठिर के पक्ष मे-अन्धकार सदृश शत्रु को (रिपु तिमिरमिव इति रिपुतिमिर तत्, उपमितसमास ) अन्धकारोऽस्त्रिया ध्वान्त तमिस्र तिमिर तम' इत्यमर । उदस्य-निरस्य अर्थात् विदलित करके, विनष्ट करके । उद् +अस् क्षेपे ( दिवादि )+क्त्वा ल्यप् । दोनो पक्षो मे समानार्थक । उदीयमानम्-सूर्य के पक्ष मे-उदित होते हुए ( उद्यन्तम् ) उद् + ईड् ( दिवादि ) + शानच् कर्तरि द्वितीयैकवचन । युधिष्ठिर के पक्ष मे-अभ्युदय प्राप्त करते हुए, समृद्धि की ओर उन्मुख । सस्कृत-व्याख्या ऊपर की ही भांति । त्वाम्-भवन्तम्, आपको, युधिष्ठिर को । दिनादौ- दिवसारम्भे, प्रात काले वा । अर्थात प्रभातकाल मे । दिनस्य आदि इति दिनादि ( षष्ठी तत्पु० ) तस्मिन् । यद्यपि 'दिनादौ' का साक्षात् सम्बन्ध सूर्य से ही है किन्तु लक्षणया वह युधिष्ठिर के भी पक्ष मे चारितार्थ हो सकता है । तब इसका अर्थ होगा-भाग्योदयवेला मे अथवा अनुकूल समय मे । दिनकृत- मिव-सूय की भाँति । जो दिन करे वह दिनकृत् है-दिन करोति इति 'दिनकृत् तम् इव ( दिन + कृ + क्विप् कर्तरि + अम् ) । लक्ष्मी- - । - ( १३६ ) - सूर्य के पक्ष मे-राजश्री अर्थात् भूपालोचित ऐश्वयलक्ष्मी । भूय -पुन फिर से । 'भूयस्त्रिषु बहुतरे पुनरर्थे तदव्ययम्' इति मेदिनीकोश । समभ्येतु- प्राप्नोतु, सम्यक् रूप से प्राप्त करे, अलकृत करे । सम् + अभि + इ + लोट् लकार प्रथमपुरुषकवचन । प्रस्तुत पद्य मे पूर्णोपमा अलङ्कार है। पूर्णोपमा वहाँ होती है जहाँ पर उपमा के चारो अगो का ( उपमान, उपमेय, साधारणधर्म तथा वाचकशब्द ) साकल्येन प्रयोग हो। प्रस्तुत श्लोक मे 'त्वाम्' ( युधिष्ठिर ) उपमेय, दिनकृतम् ( अर्थात् सूर्य ) उपमान, दीप्तिसहारजिह्मता, शिथिलवमुता, आपत्प- योधिग्नता तथा उदीयमानता आदि साधारणधर्म है। इव उपमावाचक शब्द है । इस प्रकार उपमा के चारो ही अगो का सुस्पष्ट आदान किया गया है । आचार्य मम्मट पूर्णोपमा का लक्षण प्रस्तुत करते है-~~'उपमानोपमेयसाधारण- धर्मोपमाप्रतिपादकानामुपादाने पूर्णा । प्रस्तुत पद्य मे छन्द् भी परिवर्तित कर दिया गया है। महाकाव्य का लक्षण प्रस्तुत करते हुये आचार्य विश्वनाथ ने माहित्यदर्पण मे लिखा है- 'एकवृत्तमय पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकै . नानावृत्तमय क्वापि सर्ग कश्चन दृश्यते ।' इसका मुख्य अर्थ यह है कि महाकाव्य के प्रत्येक सर्ग मे एक ही प्रकार का वृत्त ( छन्द ) होता है । हॉ, सर्ग के अन्त मे वृत्त बदल जाते है । किरात के इस प्रथम सर्ग मे हम इस लक्षण की चरितार्थता पाते है । सम्पूर्ण सर्ग एक ही छन्द ‘व शस्थ',मे है परन्तु अन्तिम दो पद्यो मे कवि ने वृत्तपरिवर्तन कर दिया है । ४५ वे पद्य मे 'पुष्पिताग्रो' है जिसकी व्याख्या पीछे की जा चुकी है। इस अन्तिम पद्य मे कवि ने 'मालिनी' छन्द का प्रयोग किया है, जिसका लक्षण है-'ननमयययुतेय मालिनी भोगिलोके ।' अर्थात् जिसके प्रत्येक चरण मे क्रमश नगण, नगण मगण, यगण और यगण हो ( अर्थात् ३४५=१५ अक्षर हो) तथा क्रमश आठ ( भोगी का अर्थ है सर्प जिनकी सख्या आठ है ) एव सात ( लोक सात है--अतल, वितल, सुतल, तलातल, महीतल, रसातल एव पाताल ) वर्णों के बाद 'यति' हो उसे 'मालिनी' छन्द कहते है। इस पद्य मे देखे- SSS 155 155 विधिस मयनि योगाद्दी तिसहा रजिह्मम् । ( नगण) (नगण ) ( मगण ) ( यगण ) ( यगण ) इसी प्रकार अन्य तीनो चरण भी होगे क्योकि मालिनी समवृत्त छन्द है । + -