Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Jyoti Purush

Dr. Satendra Parik · 2011/03

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पाध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान द्वारा स्वीकृत उच्च माध्यमिक कक्षा 12 हेतु
अनिवार्य हिन्दी की पाठ्यपुस्तक]
ज्योति पुरुष
[विवेकानंद के जीवन पर आधारित नाटक.]
डॉ. सत्येन्द्र पारीक
उपाचार्य,
राजकीय कन्या महाविद्यालय,टोंक
माया प्रकाशन मन्दिर, जयपुर

मपुम्भक
मुद्ग में upc मिल या 80S नन का कागज
मुख्य हेतु urcपिल को 1m Gss. राजन की कार्डशीट
प्रयोग में सो गई है।

प्रस्तुत नाटक प्रस्तुत नाटक 'ज्योतिपुरुष' मेरे पूर्ण नाटकों ‘प्यासा दरिया', 'पारसमणि', 'ढाई आखर तथा 'पावना' के क्रम की पांचवीं कड़ी है। विवेकानन्द का नाम सुनते ही हमारे मानस-पटल पर चमकती हुई बड़ी-बड़ी आँखों उन्नत भव्य ललाट और तेजोद्दीप्त मुखमण्डल वाले एक ऐसे दिव्य युवक की छवि सहज हैं अंकित हो जाती है, जिसने न केवल विदेशियों के द्वारा पदाक्रान्त भारतीय गौरव-गरिमा के सम्बल प्रदान कर अपने ही पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य दी, बल्कि कुण्ठित एवं आहत मानवता में अपने ओजस्वी विचारों के द्वारा स्वाभिमान से सिर ऊंचा करने की अपूर्व प्रेरण भी जगाई। जिसने भारत की आत्मा को सच्चे रूप में परखा-पहिचाना और जो आध्यात्मिक राष्ट्रीयता को अपने जीवन का सर्वोच्च ध्येय मानकर राष्ट्रीय-सांस्कृतिक उत्थान व एकता क अलख जगाते हुए जगह-जगह घूमता रहा। सच तो यह है- विवेकानन्द अपने युग की महती आवश्यकता' थे। उन्होंने 'जाति' को कभी 'धर्म' का अंग नहीं माना तथा धर्म की आड़ में पनप रहे 'निहित स्वार्थों के द्वारा किए गए 'कृत्रिम विभाजनों'' का जमकर विरोध किया। उनके अन्तस् में भारत के दलितवर्ग की पीड़ा मानो जमी हुई थी, जिसे मिटाने के लिए है आजीवन छटपटाते रहे । जीवन में 'कर्म' की प्रधानता का बोध कराती उनकी विशाल पुष्ट भुजाओं में सम्पूर्ण विश्व को मानवता को समेट लेने की अपूर्व क्षमता थी। उनके सिंहनाद में वह धकधकाती आग थी, जिसने देश की युवापीढ़ी में आत्मबोध, आत्माभिमान और आत्मत्याग का नूतन प्राण सचरित कर उन्हें संपूर्ण प्राणिमात्र के हितार्थ जीने-मरने की भावन से आपूरित कर दिया। वे कट्टर राष्ट्रवादी थे। उनके राष्ट्रवाद का अन्तिम लक्ष्य था- समग्र मानव जाति के सेवा के साथ ही साथ भारतीयों की दीनता एवं अज्ञान का नाश । उनके राष्ट्रवाद के इस 'रथ' को 'धर्म' ने 'गति' प्रदान की और 'कर्म' ने 'प्रेरणा'। उन्होंने सांस्कृतिक चेतना क शखनाद कर सोये हुए भारत को जगाया तथा उसे उसके गौरवशाली अतीत से परिचित कराने के साथ ही साथ वेदों और उपनिषदों के प्राचीन 'आत्मज्ञान के सन्देश को आक्षितिज पश्चिम तक गुंजरित किया। भारतीय नारी के प्रति उनके मन में गहरी संवेदना और समादर का प्राव था। 'य नार्यस्तु पूज्यन्ने रमन्ते तत्र देवताः को किसी भी समाज अथवा राष्ट्र के विकास का मूलमंः मानते हुए उन्होंने नारी शिक्षा का भरपूर समर्थन किया तथा इसे नारी के 'शक्ति' रूप कं सार्थकता के लिए आवश्यक भी माना । ।

tiv) ऐसे बहुआयामी, विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न प्रखर व्यक्तित्व के सम्बन्ध में जितना 'कहा जाए, कम है। ज्योतिपुरुष' की रचना के बीच यह अनुभूनि मुझे मारवार होती र तथा मैं बारबार इस दुविधा से घिरता रहा कि नाटक के सौमित कलेवर में उस युगान्ताक व्यक्तित्व के किस पक्ष को समेट्, किसे छोडूं ? 'लेखकीय मोह' में पड़कर मैंने अE अंजलि में अधिकाधिक' को भरने का भरसक प्रयास भी किया, पर विफल हो रहा • नया समेटता तो 'पुराना' फिसलकर अंजलि की पकड़ से छूट जात। 'इने पकडता तो 'क सटक जाता, 'उसे' पकड़ता तो 'वो' निकल भागता । दूसरी दुविधा में दर्शन की 'दुरूहत की। उसे मैंने यथासाध्य सहज बनाने का प्रयास किया है। इस प्रयास में मैंने 'मानवता, प्रे- करुणा, सहजता, समानता व कोमल संवेदना' को ही अपना आधार बनाया है। कहने का आवश्यकता नहीं कि इसी खीचतान के बीच नाटक की रचना को स्वतः गति मिलती रह तथा इसी को सुखद परिणति है मेरा यह नाटक 'ज्योतिपुरुष। इसकी रचना में मुझे अनेक रचनाकारों की रचनाओं से दिशा मिली है। मैं विना भाव से उन सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। अपने इस विनम्र प्रयास में मैं कितना सफल हो पाया हूँ, कथानायक के प्रति में कितना 'न्याय' कर सका हूँ, 'कल्पना' की उड़ानों के बीच 'सत्य' की जितनी रक्षा सकी है मुझसे, मैं नहीं जानता। इसका निर्णय तो मैं सुधोजन पर ही छोड़ता है। माँ. इतना अवश्य कहूँगा कि संवाद और भाषा-सयोजना में मुझे 'भावों से कडा संघर्ष करना पडा है, किन्तु मैने 'शब्दों' को कहीं पर भी 'भावों से हारने नहीं दिया है। अपना यह नया नाटक पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हुए मुझे अत्यधिक सुख एवं सन्तोष का अनुभव हो रहा है। यदि इससे हमारी आज की युवा पीढ़ी को तनिक भी प्रेरणा मिली तो मै अपना श्रम सार्थक समझूगा। डॉ. सत्येन्द्र पारीक नाटक : सिद्धान्त-परिचय मनुष्य एक अनुकरणप्रिय प्राणी है, वह जीवन के सभी क्षेत्रों में अनुकरण करना चाहता है और करता भी है। आकाश में उड़ते पक्षियों को देखकर उसके मन में भी इसी भांति मुक्त रूप से उड़ने की इच्छा उत्पन्न हुई, फलत: वायुयान का आविष्कार हुआ और वह रहस्यमय ग्रह-नक्षत्रों को अनन्त दूरी को नापने का प्रयास भी कर रहा है। कहना न होगा कि साहित्य क्षेत्र में नाटक का जन्म मनुष्य को इसी 'अनुकरण' की प्रवृत्ति का ही परिणाम है जीवन में नाटक का महत्व कम नहीं है। नाटक वास्तव में 'जीवन की झलकी हो है और जीवन भी एक नाटक की भाँति है, जिसमें कई उतार-चढ़ाव आते हैं, गम्भीर मोड़ आते हैं, दृश्यों की भांति परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं। नाटक का अस्तित्व मानव-जीवन में बहुत प्राचीनकाल से रहा है। प्राचीनकाल में किए जाने वाले नटों के खेल इसी का प्रारम्भिक स्वरूप है। वस्तुतः यह सर्वसाधारण के मनोरंजनार्थ किए जाते थे। आगे चलकर इसके स्वरूप में पर्याप्त परिवर्तन आ गया। प्राचीनकाल में इसे राजदरबारों में बहुत प्रिय स्थान उपलब्ध हुआ। संस्कृत-साहित्य में नाटकों की भरमार है । अतः हम नाटक को जीवन से अलग नहीं कर सकते । नाटक 'जीवन को विस्तृत व्याख्या' है। नाटक की आवश्यकता मनोरंजन के लिए अनुभव हुई, आगे चलकर इसके साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि उद्देश्य भी सामने आते गए। नाटक : व्युत्पत्ति और परिभाषा 'नाटक' शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के भिन्न भिन्न मत प्रकाश में आए हैं। कुछ लोग 'नाटक' शब्द का सम्बन्ध 'नट्' धातु से जोड़ते हैं, कुछ 'नाट्' धातु के साथ। किन्तु ऋग्वेद में 'नट्' धातु के प्रयोग के साथ नृत्' का उल्लेख भी मिलता है। यह सत्य है कि 'नट' के खेलों के साथ 'नाटक' का प्रारम्भिक अर्थ किसी न किसी रूप में सम्बन्धित था अवश्य । 'नट्' तथा 'नृत्' धातुओं का सम्बन्ध अनुकरण' तथा 'नृत्य' के साथ जोड़ा जाता है । 'नट् के खेल में अनुकरण होता ही है तथा उसका उद्देश्य मनोरंजन भी है। इसी भाँति 'नत्य' में कुछ विशेष भावों का मुद्राओं के द्वारा प्रदर्शन है, जिनमें अनुकरण की प्रवृत्ति विद्यमान होती है। नाटक में भी भावों और अनुकरण का अस्तित्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यद्यपि "नृत्य' की अपेक्षा 'नाटक' शब्द का !

(vi) अर्थ अधिक व्यापक है, किन्तु सामान्यत: दोनों ही रूपों में भाव, अनुकरण और रस का योग मिलता है। अंग्रेजी में 'नाटक' के लिए 'Drama' शब्द का प्रयोग मिलता है, जिसका सम्बन्ध यूनानी के एक शब्द से जोड़ा गया है, जिसका अर्थ 'कृत' या 'किया हुआ है। इसे हम 'कार्य' कह सकते हैं। इस रूप में पाश्चात्य नाटकों में कार्य को प्रधानता' देखी जा सकती है। भारतीय नाटकों में यही 'कार्य' 'अभिनय' के रूप में प्रस्तुत होता है। उक्त तथ्यों के आधार पर नाटक शब्द को निम्नांकित परिभाषा दी जा सकती है- “नाटक वह दृश्यकाव्य. है, जिसमें प्रत्यक्ष, कल्पना एवं अध्यवसाय का समुचित समन्वय होता है, जिसे अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तथा जिसका उद्देश्य जनमानस को आनन्द की प्रतीति कराना होता है।" नाटक की विशेषताएँ : साहित्य की अन्य सभी विधाओं से 'नाटक' अभिन्न होते हुए भी अपनी कुछ ऐसी विशेषताएँ रखता है, जो उसे उन सबसे अलग ही रूप में प्रस्तुत करती हैं। प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं- 1. नाटक 'दृश्यकाव्य' को कोटि में आता है। काव्य के दो रूप माो गए हैं--दृश्यकाव्य और श्रव्यकाव्य । नाटक प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता तथा पढ़ा व सुना भी जा सकता है, किन्तु साहित्य के अन्य रूप दृश्य नही बन सकते । ये 'श्रव्य' कोटि में ही आते हैं, अर्थात् उन्हें पढ़-सुनकर कल्पना के द्वारा उसका आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। नाटक में कल्पना पर अधिक बल नहीं देना पड़ता, क्योंकि उसमें जो कुछ भी होता है, वह प्रत्यक्षरूप से देखा जा सकता है। इस रूप में यह गुण नाटक को साहित्य की अन्य सभी विधाओं से अलग कर देता है। 2. नाटक में कथा प्रत्यक्ष रूप से प्रस्तुत की जाती है। रंगमंच पर वैसा ही वातावरण और दृश्य-योजना की जाती है, जिससे दर्शकों को नाटक के मूल भावों को समझने में अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। 3. नाटक में कथोपकथनों एवं वातावरण की प्रधानता होती है। नाटक का विकास ही कथोपकथनों के द्वारा होता है। इनसे ही घटनाओं एवं परिस्थितियों की जानकारी मिलती है। इसी भांति वातावरण को अनुकूलता पात्रों और घटनाओं को स्वाभाविक और प्रभावशाली बना देती है। 4. इसमें अतीतकाल में घटी घटनाओं को वर्तमान में घटी घटनाओं की ही भांति प्रस्तुत किया जाता है। 5. साहित्य के अन्य रूपों की अपेक्षा इस विधा से रस की प्राप्ति अधिक सुगमता से तथा अत्यधिक मात्रा में होती है, क्योंकि कुशल अभिनय तथा अनुकूल वातावरण से दर्शक मन्त्रमुग्ध होकर उन्हें ही वास्तविक मान बैठता है।

- (vii) 6. इसमें अनुकरण की प्रवृत्ति प्रधान होता ह। आमनता व आभनात्रया भूल चरित्रों के क्रियाकलापों का अनुकरण अभिनय के द्वारा करते हैं। 7. नाटक में पात्रों और दर्शकों के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है । कहानी, उपन्यास, काव्य आदि रूपों में पाठक और चरित्रों के मध्य लेखक अथवा कवि भी उपस्थित रहता है, जो समय-समय पर अपनी ओर से भी कुछ न कुछ कहता चलता है। किन्तु नाटककार अपने चरित्रों को रंगमंच पर प्रस्तुत कर स्वयं हट जाता है। वहाँ जो भी कुछ कहते हैं, करते हैं-सभी पात्र ही। नाटक के तत्त्व: नाटक के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिए उसके तत्वों का समुचित ज्ञान भी आवश्यक है। पाश्चात्य विद्वानों ने नाटक के निम्नांकित 6 तत्व बतलाये हैं- 1. कथावस्तु 2. पात्र 3. कथोपकथन 4. देशकाल व वातावरण 5. भाषा और शैली 6. उद्देश्य किन्तु, पाश्चात्य विद्वानों ने यही 6 तत्व कहानी और-उपन्यास के सन्दर्भ में भी बतलाए हैं। ऐसी स्थिति में प्रम हो सकता है। इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि नाटक, कहानी और उपन्यास में कोई तात्विक अन्तर है ही नहीं, जबकि वास्तव में आन्तरिक और बाहरी दोनों ही दृष्टि से इन विधाओं में बहुत अन्तर है। अतः भारतीय विद्वानों द्वारा प्रतिपादित नाटक के तत्व उचित प्रतीत होते हैं। उनके अनुसार नाटक के 5 तत्व हैं-- 1. कथावस्तु 2. पात्र. 3. रस 4. अभिनय 5. वृतियाँ वास्तव में पाश्चात्य विचारकों के 6 तत्वों का समाहार इनमें हो जाता है। दूसरे 'अभिनय' जो कि नाटक को अपनी ही विशेषता होती है, वह उन तत्वों में नहीं आ पाई है। 1. कथावस्तु कथावस्तु किसी भी रचना का प्राण अथवा मूल आधार होतो है, जिस पर समूची रचना टिकी रहती है। अतः उसमें प्रवाह और प्रभावशीलता आवश्यक है। उसकी जीवन से निकटता भी होनी चाहिये, ताकि पाठक या दर्शक उसमें अपने जीवन को झरक पा सके। उसमें कौतूहल अथवा जिज्ञासा एवं संघर्ष भी होना चाहिये। कथावस्तु के कई रूप होते हैं- (अ) महत्व की दृष्टि से कथा दो प्रकार की होती है-आधिकारिक और प्रासंगिक । आधिकारिक कथावस्तु रचना की मुख्यकथा है, जो नायक-नायिका से सम्बन्धित होती है। किन्तु प्रासंगिक कथा मुख्यकथा के साथ किसी प्रसंगवश ही आती है; जैसे-राम-कथा में बाली व सुग्रीव की घटना,। प्रासंगिक कथावस्तु भी दो प्रकार. को होती है- 1. पताका, 2. प्रकरी 7 .

1. प्रारम्भ 2. प्रयल (viii) पताका वह प्रासंगिक कथा है, जो मुख्यकथा के साथ अन्त तक चलती है, किन्तु मकरी प्रसंगवश उठकर बीच ही में समाप्त हो जाती है। (आ) विषय को दृष्टि से कथावस्तु तीन प्रकार की होती है- 1. प्रख्यात अथवा ऐतिहासिक, 2. उत्पाद्य 'अथवा काल्पनिक, 3 मिश्रित, 1. प्रख्यात अथवा ऐतिहासिक कथावस्तु, इतिहाम अथवा पुराण से ली गई होती है, जिसके पात्र प्रतिष्ठित और सर्वप्रसिद्ध होते हैं। 2. उत्पाद्य कथावस्तु पूर्णतया कल्पना पर आश्रित होती है। 3. मिश्रित में ऐतिहासिक एव काल्पनिक कथाओं का सामंजस्य होता है। कथा के विकास के आधार पर नाटक को कथावस्तु में 5 अवस्थाएँ मानी गई है- --यह कथानक का प्रारम्भिक भाग है, जिससे नायक की इच्छा अथवा उसके मुख्य उद्देश्य का पता चलता है। -~-नाटक के उद्देश्य की पूर्ति के लिए चरित्रों द्वारा किए गए प्रयल इसके अन्तर्गत आते हैं। 3. प्राप्त्याशा -इस भाग में नायक का उत्कर्ष होने लगता है,मार्ग की कठिनाइयाँ दूर होने लगती है तथा फल-प्राप्ति की आशा हो जाती है। 4. नियताप्ति -इसमें नायक को फल-प्राप्ति निश्चित हो जाती है। 5. फलागम -यहाँ आकर नायक को फल की पूर्ण प्राप्ति हो जाती है। पाश्चात्य विद्वानों ने भी इस सम्बन्ध में पांच रूपों का निर्देश किया है, जो अर्थ की दृष्टि से इनसे मिलते-जुलते है- 1. प्रारम्भ, 2. विकास, 3. चरम सीमा, 4. उतार, 5. अन्त या समाप्ति। कथानक के एक अवस्था से दूसरी अवस्था के विकास का बोध कुछ प्रमुख घटनाओं से होता है, जिन्हें 'अर्थ-प्रकृति' कहा गया है, ये 5 होती है। 2. विन्दु, 3. पताका 5. कार्य। इसी भाँति 5 संघियों भी मानी गई है- 1. मुख संधि, 2. प्रतिमुख संधि, 3. गर्भ सन्यि, 4. अवमर्श या विमर्श संधि, 5. निर्वहण या उपसंहार। 2. पात्र नाटक की कथावस्तु का पात्र बड़ी कुशलता के साथ दर्शकों के सम्मुख करते हैं। इस रूप में चरित्रों अथवा पात्रों का महत्व भी कम नहीं होता। चरित्रों पहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। चरित्र इतने प्रभावशाली होने चाहिए 1. बीज, 4. प्रकरी, जो सर्व-साधारण के मन से सुगमता से न निकल सकें। उन्हें कोई न कोई आदशाभी प्रस्तुत करना चाहिए। सामान्यतः नाटक में 6 प्रकार के पात्रों का समावेश होता है- 1.नायक 2. नायिका 3. प्रतिनायक , 4. पीठमर्द 5. विदूषक 6. दूतिका। 1. नायक-यह कथा का मुख्य पात्र होता है, जिसे फल की प्राप्ति होती है। सारी घटनाएं इसी से सम्बन्धित होती हैं। सभी घटना व्यापारों का संचालक होने के कारण इसे 'नेता' भी कहते हैं। नायकों के 4 प्रकार होते हैं- (अ) धीरोदात्त यह नायक उच्चकुलीय, गम्भीर तेजस्वी और महान होता है, जैसे -राम। (आ) धीरोद्धत-यह क्रोधी, कुटिल एवं प्रचण्ड स्वभाव का पात्र होता है, जैसे लक्ष्मण। । (इ) धोरललित--यह नायक रसिक प्रवृत्ति से मुक्त होता है, जैसे कृष्ण । (ई) धीरप्रशान्त यह शान्त, संयमी, मिष्ठभाषो और मधुर व्यवहार का होता है। इसमें वीरोचित गुण नहीं होते, जैसे-महात्मा बुद्ध । 2. नायिका-यह प्रमुख नारी चरित्र है। नाटक से इसका प्रत्यक्ष और निकट सम्बन्ध होता है। यों तो नायिका के सैकड़ों भेद किए गए हैं, किन्तु प्रमुख भेद 3 ही हैं--1. स्वकीया, 2. परकीया, 3. सामान्या। इनके अतिरिक्त भी स्वाधीनपतिका, वासकसज्जा, उत्कण्ठिता, अभिसारिका,. विप्रलब्धा, खण्डिता, कलहान्तरिता, प्रवत्स्यपतिका, प्रोषितपतिका, आगत्पतिका आदि कई रूप होते 3. प्रतिना -यह नायक का प्रतिद्वन्द्वी होता है तथा उसकी सफलताओं में बाधा डालने का प्रयास करता है। नायक का संघर्ष इसी के साथ रहता है। 4. • पीठमर्द-यह नायक का सहयोगी अन्य प्रमुख चरित्र होता है। 5. विदूषक-नाटक में बीच-बीच में हास्य को सृष्टि के लिए विदूषकों का आयोजन किया जाता है। कभी-कभी गम्भीर परिस्थितियों में यह नायक को सहायता भी करता है। 6. दृतिका यह प्रायः नायक और नायिका के मिलन में सहयोग करती है। इसका कार्य संदेश ले जाना, पत्रादि के आदान-प्रदान में सहायता करना है। नाटक में पात्रों के चरित्र पर सामान्यतः तीन प्रकार से प्रकाश डाला जाता है- 1. कथोपकथनों द्वारा 2. क्रियाकलापों द्वारा 3. स्वगतकथनों से ।

। 13. रस- साहित्य के सभी रूपों से मजन का एक मात्र उद्देश्य रसप्राप्ति माना गर है। इस आनन्द को आलौकिक एवं अनिर्वचनीय स्थिति है, जिसका केवल अनुभव है किया जा सकता है, वर्णन नहीं। साहित्य के अन्य रूपों की अपेक्षा नाटक में रस की अनुभूति सुगम और अधिक मात्रा में होती है। रस की प्राप्ति के लिए निम्नांकित तत्वों का सहयोग आवश्यक है- 1. विभाय, 2. अनुभाय, 3. संचारी भाव । (1) विमाव-यह वे बाह्य दृश्य अथवा पदार्थ होते है, जो भावों को उत्तेजना में सहयोग करते है। इसके दो रूप है- (अ) आलम्बनचे सभी दृश्य अथवा पदार्थ, जिन्हें देखकर भावों में उत्तेजना जाग्रत होती है। जैसे सिंह को देखने से 'भय' उत्पन्न होता है। यहां 'सिंह' आलम्बन होगा। (आ) उद्दीपन- यह आलम्बन से उत्तेजित भावों की वृद्धि में सहयोग करता है। आलम्बन आग लगाने वाला अंगारा है तो उद्दीपन तेज हवा का कार्य करता है, जो अग्नि को तेज कर देता है, जैसे प्रेमिका को देखकर प्रेमी के मन में 'रति भाव जागते हैं। यदि चाँदनी रात हो, नदी का तट हो, सुन्दर हवा बहती हो तो. रति भावों में और भी वृद्धि हो जायेगी । यहाँ चाँदनी रात, नदी-तट व हवा उद्दीपन हैं। (2) अनुभाव-भावों में उत्तेजना आने पर व्यक्ति के मन में जो प्रतिक्रिया अथवा उथल-पुथल होती है, उससे उसके शरीर में कुछ न कुछ परिवर्तन आते हैं। 'यही उत्पन्न होने वाले लक्षण अनुभव हैं, जैसे प्रेम में अनु आ जाना, रोंगटे खड़े होना, क्रोध में नेत्र लाल हो जाना, नथुने फड़कने लगना आदि । अनुभाव कई प्रकार (3) संचारी भाव यह आश्रय के मन में उत्पन्न स्थायी भावों के बीच मे प्रसंगवश उत्पन्न होने वाले भाव हैं, जो उस परिस्थिति के समाप्त होते ही लुप्त हो जाते हैं, जैसे-'प्रेम' नामक स्थायी भाव में प्रिय मिलन पर 'हर्ष वियोग पर 'दुःख', उपेक्षा पर 'क्षोभ और अहित की आशंका पर 'चिन्ता' उत्पन्न होती है। ये सभी संचारीभाव है। अत: यह कहा जा सकता है कि आलम्बन के द्वारा आश्रय के मन में उत्पन्न भाव उद्दीपन से उद्दीप्त होकर संचारियों से पुष्ट होते हुए अनुभावों के माध्यम से व्यक्त होते हैं। यही 'रस-निष्पति' कहलाती है। नाटक के प्रसंग में रस पर विचार करते समय 'साधारणीकरण पर भी विचार आवश्यक हो जाता है। अभिनेताओं के कुशल अभिनय से दर्शक इतना अधिक मंत्रमुग्ध हो जाता है कि वह जानते हुए पी कि यह केवल कथा है और अभिनय करने वाले केवल अभिनेता है, मूल पात्र नहीं, फिर भी वह उन्हें मूल पात्र समझकर उन्हीं के साथ हंसता, रोता और सुख-दुख का अनुभव करता है। यही रस को वह अलौकिक स्थिति - - (xi) 4. अभिनय कथा को स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत करने के लिए अभिनेता व अभिनेत्रियाँ 'अभिनय' का सहारा लेते हैं। यह चार प्रकार का होता है-- (1) आंगिक-अंग-संचालन के द्वारा किया गया अभिनय इसके अन्तर्गत आता है। यह तीन प्रकार का होता है--शरीर के अन्य अंगों के संचालन से, मुख द्वारा प्रदर्शित हाव-भावों से तथा विभिन्न चेष्टाओं से। (2) वाचिक-पात्रों के पारस्परिक कथोपकथनों में आवश्यक उतार-चढ़ाव, तेजी व शांति के द्वारा यह अभिनय सम्पन्न होता है। (3) आहार्य-इसमें पात्रों की वेशभूषा, आकृति एवं आभूषणों की व्यवस्था सम्मिलित होती है। (4) सात्विक यह सभी अभिनयों में कठिन होता है। इसके अन्तर्गत अश्रु, पसीना, कम्प आदि के भावों का प्रदर्शन किया जाता है। इनके लिए आजकल कुछ कृत्रिम पदार्थों का उपयोग किया जाने लगा है। 5. वृत्तियाँ-इससे तात्पर्य 'ढंग' से होता है। ये चार प्रकार की हैं- (1) कैशिकी-इस वृत्ति के अन्तर्गत श्रृङ्गार, हास्य, गीतों एवं नृत्यों की बहुलता होती है। (2) सात्वती-इस वृत्ति में शौर्य, दया, दान आदि वीरोचित कार्यों का निरूपण मिलता है। (3) आरभटी- इसमें माया, इन्द्रजाल, संग्राम, क्रोध, संघर्ष, घात प्रतिघात आदि का चित्रण किया जाता है। (4) भारती-इस वृत्ति में स्त्रियों वर्जित होती हैं। इस प्रकार नारक का गठन होता है। आज नाटक पर्याप्त लोकप्रिय हो गया सिनेमा और टेलीविजन के रूप में इसका विकसित स्वरूप बहुत प्रचलित है। इस रूप में कहा जा सकता है कि नाटक आज हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण स्थान प्रहण करता जा रहा है। नाटक और एकांकी : एकांकी नाटक का हो एक रूप-विशेष है। कलेवर की दृष्टि से तो यह नाटक से छोटा होता है, साथ ही कुछ और भी अन्तर इनमें हैं, जो इस प्रकार है- 1. नाटक का कलेवर तीन अंकों में फैला होने कारण अधिक स्तृित होता है, किन्तु एकांकी-सीमा एक ही अंक में सीमित रहती है। 2. नाटक जीवन के सर्वांगपूर्ण स्वरूप का चित्रण होता है, जबकि एकांकी में नाटककार की दृष्टि जीवन के एक पक्ष पर ही केन्द्रित रहती है। .

(xii) 3. नाटक का वस्तु-विन्यास एकांकी की उपेक्षा अधिक विस्तृत होता है। इसमें मुख्यकथा के साथ-साथ अन्तर्कथाओं का समावेश भी रहता है किन्तु एकांकी में कथानक कटा-छटा, नपा-तुला होता है। 4. नाटक में पात्रों को संख्या अधिक होती है, जबकि एकांकी में बहुत सीमित । 5. नाटक में कथा को गति मन्द होती है। वह नदी की भांति इधर-उपर तटों से टकराती हुई आगे बढ़ती है, किन्तु एकांकी की कथा वायुयान की भांति इधर-उधर भटके बिना अपने निर्दिष्ट स्थान अर्थात् फल की ओर तेजी से बढ़ती है। 6. नाटक-रचना के पोछे कई उद्देश्य हो सकते हैं, जबकि एकांकी में एक ही उद्देश्य सम्भव हो सकता DOO हिन्दी नाटक : उद्भव और विकास प्राचीनकाल में नाटक : यह कथन सत्य प्रतीत होता है कि जब किसी बालक ने खेल ही खेल में अपने में किसी दूसरे बालक की कल्पना की, उसी दिन नाट्यकला की उत्पत्ति हो गई थी। तब से आज तक यह कला निरन्तर विकसित हो रही है। नाटक की सर्वप्रथम उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रो. मेक्समूलर का अनुमान है कि संसार के प्राचीनतम अन्य से यह प्रमाणित हो जाता है कि वैदिककाल में नृत्यकला का पर्याप्त विकास हो चुका था और पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी आदि के संवाद, अभिनय के रूप में नाटक के प्रारम्भिक रूप के भी दर्शन हो जाते हैं। यज्ञों के अवसर पर इन्द्र-मरुत के पक्ष का मण्डन करने वाले दोनों पक्ष परस्पर जो संवाद करते थे, वही कथोपकथन नाटक के विकास का मूलसूत्र-था, किन्तु व्यवस्थित नाटक-लेखन और प्रदर्शन के प्रमाण वैदिक साहित्य में नहीं मिलते हैं। रामायणकाल में वाल्मीकि ने राम के राज्याभिषेक के अवसर पर नटों, नर्तकों और नायकों के उत्तम प्रदर्शन का वर्णन किया है। महाभारत काल में तो 'रामायण' नाटक और 'कौवेर-रम्माभिसार नाटकों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में नाटक-मण्डलियों द्वारा नाटक-प्रदर्शन का तथा राजकर चुकाने का और नटों की शिक्षा-व्यवस्था का विवरण प्राप्त होता है। बौद्धों के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'विनय-पिटक' में रंगशाला और प्रदर्शित अभिनय, नृत्य आदि का उल्लेख है। पतंजलि के महाभाष्य में 'कंस-वध' और 'बालि-वध' नामक दो नाटकों का उल्लेख है। इससे डॉ. कीथ ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि संस्कृत नाटक ईसापूर्व द्वितीय शताब्दी से प्राचीन नहीं तो उससे अधिक अर्वाचीन भी नहीं और इनकी प्रेरणा महाकाव्यों के गायक तथा कृष्णजीवन की उन नाटकीय घटनाओं से प्राप्त हुई, जिनमें बालक कृष्ण अपने शत्रुओं से संघर्ष करके विजय प्राप्त करता है। संस्कृत का समृद्ध नाटक-साहित्य : संसार के प्राचीनतम नाटक-साहित्य में संस्कृत के नाटकों की समृद्धि सर्वोपरि है। कालिदास का 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्', भास के "पंच नाटक , भट्ट नारायण का वेणीसंहार' आदि नाटकों ने सदियों तक भारतीय नाटक साहित्य को प्रभावित किया है। प्राकृत और अपश ने भी संस्कृत की परम्परा का उत्थान किया। हिन्दी ने भी संस्कृत नाटकों से ही प्रेरणा ग्रहण की है।

हिन्दी नाटकों का जन्म और विकास : हिन्दी नाटकों का वास्तविक उद्भव तो भारतेन्दु के उदय के साथ ही माना जाना चाहिए। संस्कृति से आती हुई नाटक-धारा प्राकृत और अपभ्रंश से होती हुई लोक-जीवन में घुल-मिल गई योगी अंतः साहित्य के क्षेत्र में कहीं-कहीं नाटकों को क्रम विच्छिन्न-सा दिखाई देता है । मध्यकाल में मुस्लिम शासकों की धर्म-दृष्टि के कारण हिन्दी में नाटक-साहित्य को प्रोत्साहन नहीं मिला, किन्तु लोक-नाटकों में कृष्ण-रास और जैन-रास ने हजारों वर्षों से चले आये मनोरंजन के इस साधन को जीवित बनाये रखा। रीतिकाल में बनारसीदास का “समय-सार' (सं. 1593), प्राणचन्द्र चौहान का “रामायण महानाटक" (सं.1667), रघुराय नागर का “सभासार" (सं.1757), लच्छीराम का करुणाभरण" (सं. 1772) आदि नाटक कलात्मक दृष्टि से अत्यन्त हीन हैं। ये छन्दोबद्ध संवादात्मक रचनाएं हैं। इस समय दरबारी कवियों ने अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करने के लिये काव्य में नायिका-भेद का ऐसा रूप प्रस्तुत किया कि नाटकों की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा सका । हाँ, इस काल में भी रास-लोला के माध्यम से जनता अपने इष्टदेव के चरित्र को हृदय से लगाये रही। भारतेन्दु से पूर्व का नाटक-साहित्य . रीतिकाल के अन्त में अनेक कवियों ने नाटक के विकास में भाग लिया था। इनमें हृदयराम का “हनुमन्नाटक” (सं. 1680), महाराजा यशवन्तसिंहकृत "प्रबोध चन्द्रोदय” (सं. 1700), सामराज दीक्षित कृत "श्रीदामाचरित” (सं.1738), रीवा नरेश महाराजा विश्वनाथसिह कृत “आनन्द रघुनन्दन”(सं. 1900) आदि रीतिकालीन नाटकों में अन्तिम नाटक में शास्त्रीय रीति से गद्य का प्रयोग हुआ। “आनन्द रघुनन्दन” नाटक में अंक, दृश्य, नट, नटी आदि से नाटक को ऐसा मोड़ दिया गया है कि वर्षों तक हिन्दी में नाटक-तकनीक इसी नाटक के आधार पर विकसित होती रही। भारनेन्दु के पिता बाबू गोपालचन्द्र ने भी “नहुष" नाटक की रचना सं. 1914 वि. में की। भारतेन्दु ने “नहुष” को ही "हिन्दी का पहला नाटक” माना है। किन्तु यह भी ब्रजभाषा के पद्यबद्ध नाटकों की ही परम्परा का नाटक है। अनूदित नाटकों में राजा लक्ष्मणसिंह का “शकुन्तला” नाटक कालिदास के मूल “अभिज्ञान शाकुन्तलम्" का सुन्दर अनुवाद है। इसमें मूलकृति का सौन्दर्य दिखाई देता है। इसका गद्य खड़ीबोली का और पद्य ब्रजभाषा का है। अतः इसे खड़ीबोली का पहला नाटक कहा जा सकता है। भारतेन्दु से पूर्व पारसी थियेटरों को बड़ी धाक थी। पारसी थियेटर कम्पनियाँ देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करके नाटकों का प्रदर्शन करती थीं। इन कम्पनियों ने जनता की भोंडी रुचि को ही तृप्त किया था, किन्तु इनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि इन्होंने हिन्दी को रंगमंच और तद्नुकूल अभिनय की क्षमता प्रदान की। वस्तुतः हिन्दी में व्यवस्थित और साहित्यिक नाटक-लेखन कार्य तो आधुनिककाल में ही प्रारम्भ हुआ, जबकि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नाटकों के माध्यम से हिन्दी-साहित्य की सम्पन्नता में अपना महत्वपूर्ण योग दिया । अतः भारतेन्दु से लेकर अद्यतन नाटक साहित्य के विकास का अध्ययन इस काल को चार भागों में बाँटकर किया जा सकता है- (6) भारतेन्दु-युग (ii) प्रसाद-युग (i) प्रसादोत्तर-युग (iv) नवयुग (| भारतेन्दु-युगः हिन्दी नाटकों को उत्कर्ष तक पहुंचाने में भारतेन्दु युग के लेखकों का बड़ा हाथ है। स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अनेक नाटकों की रचना करके इस दिशा में नेतृत्व प्रदान किया । “हिन्दी-नाटक के जन्मदाता का श्रेय भारतेन्दु को ही दिया जा सकता है। भारतेन्दु युगदष्टा और युगस्रष्टा थे। उन्होंने दो प्रकार के नाटक लिखे थे-मौलिक और अनूदित । भारतेन्दु ने बंगला में विद्यासुन्दर का सुन्दर अनुवाद प्रस्तुत किया। सं. 1929 वि. में उन्होंने “पाखंड-बिखंडन”सं. 1930 में “धनंजय-विजय” “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति , सं. 1932 वि. में “सत्य हरिश्चन्द्र", कर्पूरमंजरी”,सं. 1935 में "मुद्राराक्षस",सं.1937 में “भारत-दुर्दशा, सं. 1938 में "अंधेर नगरी", “नील देवी" आदि नाटक लिखकर हिन्दी में नाटक-लेखन के द्वार खोल दिये। भारतेन्दु-मंडल के अन्य साहित्यकारों ने भी नाटकों को रचना की। इनमें प्रतापनारायण मित्र के "गौ-संकट, “हम्मीरहठ तथा राधाकृष्णदास के “महारानी पद्मावती", "महाराणा प्रताप", "दुखिया बाला” आदि नाटक महत्वपूर्ण हैं । इनके अतिरिक्त श्रीनिवासदास, प्रेमधन, बाबू केशवदास, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने भी नाटक साहित्य की अभिवृद्धि में उल्लेखनीय योग दिया। इन नाटकों ने नाटककला के विकास में अधिक योग नहीं दिया, क्योंकि इनके नाटकों में संस्कृत की स्वगत-भाषण तथा काव्यात्मकता ज्यों की त्यों बनी है। भारतेन्दु के पश्चात् सुधारवादी द्विवेदीयुग में भाषा की शुद्धता का आन्दोलन छिड़ गया और आतंकित साहित्यकारों ने नाटक-साहित्य की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। । (ii) प्रसाद युग : नाटक के क्षेत्र में क्रान्ति प्रसाद ने ही प्रारम्भ की। प्रसाद ने हिन्दी नाटकों का कायाकल्प कर दिया। प्रसाद ने अपने नाटकों के लिए भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग से विषयवस्तु का चयन किया। उन्होंने प्राचीन भारत के गौरव, सभ्यता, संस्कृति और परम्परा के प्रभावशाली, मनोरम और प्रेरणादायक चित्र अपने नाटकों में प्रस्तुत किए। “सज्जन", "कल्याणी-परिणय" और "प्रायश्चित" (सं. 1968 से 71) उनके प्रारम्भिक नाटक हैं । इसके पश्चात् उनको लेखनी से प्रौढ़तर नाटक प्रस्तुत होते गये। राजश्री”,“विशाख", (सं. 1978), “अजातशत्रु" (सं. 1979), "जनमेजय का नागयज्ञ' (सं. 1983), "कामना",“स्कन्दगुप्त" (सं. 1985), “चन्द्रगुप्त, (सं. 1988), "धुवस्वामिनी (सं. 1990) आदि उनके अत्यधिक महत्वपूर्ण नाटक हैं। इसमें से कई नाटकों का रंगमंचीय सफल अभिनय भी हो चुका है। प्रसादजी ने पाश्चात्य और भारतीय नाट्यशैलियों का मिश्रण किया है। प्रसादजी ने नाटकों में देश-प्रेम, राष्ट्रीयता और संस्कृति की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित की है। उनके नाटकों में अन्नईन्द्र की प्रधानता है। इस प्रकार प्रसाद की सांस्कृतिक पुनरुस्थान की भावना, उसका राष्ट्रीयता के प्रति उत्कट आमह,उनका दार्शनिक चिन्तन संघर्षों में जीवन की खोज,शैली-शिल्प . ।

(xvi) में क्रातिकारी परिवर्तन आदि महत्वपूर्ण उपलब्धियां उन्हें हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ नाटककार प्रमाणित कर देती हैं। (iii) प्रसादोत्तर युग : प्रसाद के पश्चात् नाटकों का विकास रुका-सा दिखाई देता है। प्रसाद की शैली और विषय-वस्तु वाले अनेक नाटक लिखे गये, किन्तु कोई भी नाटककार प्रसाद को ऊंचाई तक नहीं पहुँच सका। प्रसाद के पश्चात् ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नाटक लिखने वालों में हरिकृष्ण प्रेमी और उदयशंकर भट्ट प्रसिद्ध हैं। प्रेमजी ने मुगलकालीन राजपूत गौरव, हिन्दू-मुस्लिम एकता का चित्रण करने वाले "रक्षा बन्धन", स्वप्न-भंग, “आहुति", विषपान आदि नाटक लिखे और भट्टजी ने “सगर विजय", मत्स्यगंधा", "विश्वामित्र” नाटकों में पौराणिक चरित्रों का अकन किया। प्रसादोत्तरकाल में ही बैचेन शर्मा “उम", माखनलाल चतुर्वेदी, गोविन्द वल्लभ पंत, जगन्नाथ प्रसाद “मिलिन्द" आदि नाटककारों ने हिन्दी नाटक साहित्य को अपना अमूल्य सहयोग दिया। इस काल के नाटककारों-लक्ष्मीनारायण मिश्र और सेठ गोविन्ददास ने अपनी मौलिक उद्भावनाओं से हिन्दी नाटक को विशेषतः प्रभावित किया है। लक्ष्मीनारायण मिश्र हिन्दी में यूरोपीय ढग से समस्या प्रधान नाटकों के जन्मदाता हैं। उन्होंने “सिन्दूर की होली", "संन्यासी", "राक्षस का मन्दिर","मुक्ति का रहस्य” आदि प्रसिद्ध नाटकों की रचना की। सेठ गोविन्ददास ने लगभग एक सौ से ऊपर नाटक लिखे हैं। इनके नाटकों में मिश्रजी के नाटकों की अपेक्षा अभिनेयता अधिक है। सेठजी के नाटकों में "हर्ष" बहुत महत्वपूर्ण प्रसाद की नाट्य-परम्परा को विकसित करने वालों में औंकारनाथ "दिनकर" का नाम लिया जा सकता है। दिनकर ने प्रसाद को शैली में "मुंज","भोज""पवनंजय” आदि नाटकों की रचना की है। (iv) नवयुग : आजादी के बाद हिन्दी का नाटक-साहित्य अपने मौलिक पदों पर आगे बढ़ रहा है। कई नये नाटककार सामने आये हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रयोगों से हिन्दी नाटक को विविधता प्रदान की है। गीतिनाटकों की रचनाओं में सुमित्रानन्दन पंत को “ज्योत्स्ना', रामधारीसिंह 'दिनकर' की “उर्वशी” मुख्य है। प्रसाद की शैली का युग पूर्णतः समाप्त हो चुका है। कई नवयुवक नाटककारों ने इस क्षेत्र में पदार्पण किया है। हिन्दी नाटक को नया दृष्टिकोण देने वालों में जगदीशचन्द्र माथुर का नाम मुख्य है। उनके "कोणार्क और पहला राजा" (1969) युगान्तरकारी परिवर्तन लेकर उपस्थित हुए। राम कुमार वर्मा का "जौहर की ज्योति”, डॉ. सरनामसिंह का “इन्सान की राह (1969), उपेन्द्रनाथ अश्क का *मॅवर' मोहन राकेश के "आषाढ़ का एक दिन”, लहरों के राजहस, आधे-अपूरे" आदि प्रमुख हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल नाटकों के विकास के लिए विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं। उनके प्रतीकात्मक नार "सूखा सरोवरः,"मादा कैक्टस", "मि. अभिमन्यु” आदि ने बहुत प्रसिद्धि पाई है। , (xvii) नाटक और रंगमंच रंगमंच का सम्बन्ध नाटक से है। रंगमंच वह प्रयोगशाला है जहाँ नाटकों का निरीक्षण-परीक्षण किया जाता है। यहीं नाटकों का अभिनय किया जाता है, जिससे नाटक सामाजिक तक जा पाते हैं। अभिनय का अर्थ ही है सम्मुख ले जाना। जिन प्रक्रियाओं के द्वारा नाटक के आशय का प्रेषण अथवा प्रत्यक्षीकरण सामाजिकों के सम्मुख होता है, उसे अभिनय तथा उसके अभिनय करने वाले को अभिनेता कहा जाता है। अभिनय कला और अभिनेता का कार्य रंगमंच से ही सम्बद्ध है। तात्पर्य यह है कि किसी नाटककार की रचना को यदि अभिनेता सामाजिकों के समक्ष नहीं रख पाता है तो उसमें नाटककार का दोष नहीं, अपितु अभिनेता का ही दोष कहा जायेगा। सफल अभिनेता वही होगा जो प्रत्येक नाटक को अभिनेय बना सके। आज जब भी हिन्दी रंगमंच की चर्चा होती है तो ऐसा कहा जाता है कि हिन्दी में अभिनेय नाटकों की कमी है। समीक्षक मागधजी ने लिखा है कि “बेचारे प्रसादजी को अधकवरे और टुटपुंजिए लोग भी भला-बुरा कह चलते हैं। इसी प्रकार हिन्दी नाटकों की चर्चा में भी हिन्दी रंगमंच की चर्चा किसी न किसी रूप में आती ही है। तब हम कहते हैं कि अभिनेय नाटक ही नहीं है तो फिर रंगमंच की आवश्यकता ही क्या है। कुछ तो ऐसे भी निराशावादी जुटे हैं, जो यहाँ तक कहते हैं कि विज्ञान के युग में सिनेमा से जब मनोरजन आदि के काम हो ही जाते हैं तो रंगमंच की आवश्यकता क्या है किन्तु ऐसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि अधुनातन होटलों के रहते हुए भी घर की रसोई हो क्यों पसन्द की जाती है। खैर, आज यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि रंगमंच का निर्माण नाटको के अनुरूप होना चाहिए अथवा नाटकों को ही रंगमंच के अनुरूप बनाया जाय । इस प्रश्न का उत्तर दो रूपो में सामने आता है। एक वर्ग यह मानता रहा है कि रंगमंच को नाटक के अनुरूप होना चाहिए। प्रसादजी इसी मत के पक्षपाती थे। वे सदा कहा करते थे के रंगमच को नाटक के पीछे चलना चाहिए। अर्थात, नाटककार जैसी रचना दे, उसी के अनुरूप अभिनेता रंगमच तैयार करें। ऊपर अभिनेता शब्द की व्याख्या भी लगभग यही कहती है। अस्तु, कहा जा सकता है कि प्रसाद का कथन कोरे आदर्शवाद पर नहीं, अपितु भारतीय मान्यता पर ही आधृत था।" जिस समय प्रसादजी अपने नाटकों की रचना कर रहे थे, उनके नाटकों की अभिनेयता की चर्चा प्रारम्भ ही नहीं हुई थी, अपितु काफी जोर पकड़ चुकी थी। प्रसादजी के समय हिन्दी का रंगमंच पारसी थियेटरों के रूप में ही था। उन थियेटरों में प्रसाद के नाटकों के अभिनय की कल्पना करना आकाश से तारे तोड़ लाने की कल्पना ही थी। इसी से प्रसाद ने विरोधियों का उत्तर देते हुए “विशाख, नाटक की भूमिका में लिखा था . "आजकल के पारसी रंगमंचों के अनुकूल कहां तक उपयुक्त होंगे, इसे मै नहीं कह सकता। उनका आदर्श केवल मनोरंजन है। हाँ, जातीय आदर्शों से स्थापित यदि कोई रंगमंच, जहाँ कि चमक-दमक से विशेष ध्यान पात्रों के अभिनय पर और आदर्श के विकास पर रखा जाता हो कोई सम्मति अपने अभिनय में अड़चन पड़ने की दे तो मैं उसे स्वीकार करने के लिए सर्वथा प्रस्तुत हूँ।" इस ठेद्वरण से चार बातें स्पष्ट होती हैं- ये नाटक (xviii) (क) प्रसादजी के नाटक मात्र मनोरंजन के ही साधन नहीं, सत्य और आदर्श के संवाहक भी हैं। (ख) इनके तथा इनके नाटकों के समान अन्य नाटकों का अभिनय जातीय आदर्शों से स्थापित रंगमंच पर ही किया जाय, अन्यत्र ये अभिनेय है। (ग) प्रसाद के समय में हिन्दी रंगमंच का आदर्श पारसी रंगमंच ही था, जसका उद्देश्य था मनोरंजन। (घ) रंगमंच पर चमक दमक से विशेष ध्यान पात्रों के अभिनय और आदर्श पर दिया जाय। रंगमंच वास्तव में केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, वह सत्य, जीवन मूल्यों और आदर्श का प्रतिष्ठापक भी है। इतना ही नहीं, रंगमंच जाति, देश और समाज की संस्कृति की प्राणवत्ता का द्योतक भी है। अत: रंगमंच की ओर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। आचार्य भरत ने नाट्यशास्त्र में रंगमंच का पूरा ब्यौरा दिया है। रंगमंच और रंगशाला के विषय में जितना विस्तृत वर्णन वहाँ उपलब्ध है, उतना वर्णन ससार के किसी भी ग्रंथ में नहीं मिलता है। उसमें न केवल नाट्यकला, वेशभूषा, अंग रचना, अभिनय आदि का ही वर्णन है, अपितु इसका भी विशट् वर्णन है कि रंगमंच कैसे होना चाहिए और रंगशाला कहाँ बननी चाहिए। वास्तव में नाटक सांस्कृतिक उत्थान का मापक यंत्र है। किसी देश के नाटक की उन्नति या अवनति के आधार पर वहाँ का सांस्कृतिक इतिहास खोजा जा सकता है। मध्यकाल में रंगमंच का प्राय: अभाव रहा है। उसके कई कारण हैं, पर आधुनिक हिन्दी रंगमंच अब नये रूप में हमारे सामने है। आधुनिक हिन्दी रंगमंच के प्रायः दो ही मूल रूप उपलब्ध होते हैं • पहला लोक रगमंच और दूसरा साहित्यिक रंगमंच । सस्कृत नाटकों और सस्कृत के साहित्यशास्त्रीय ग्रंथों के अध्ययन-मनन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय भी रंगमंच का एक ही रूप नहीं था। भरत ने अभिनेय नाटकों के लिए जो कहा है, वह यथार्थ है- मृदुललितपदार्थ गूढशब्दार्थहीनं जनपदसुखबोध्यं युक्तिमन्नृत्योज्यम् । बहुकृतरसमार्ग सन्धिसन्धानयुक्तं भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् किन्तु आचार्य विश्वनाथ ने अभिनेय नाटकों की परिभाषा ही बदल दी है- पंचसन्धिश्चतुतिः चतुःषष्ठ्यंगसंयुतम् । पट्विंशल्लक्षणोमेतमलंकारोपशोभितम् ॥ महारसं महामोगमुदात्तरचनान्वितम् । महापुरुषसत्कारं साध्वाचारं जनप्रियम् ।। मुश्लिष्टसन्धियोगं च सुप्रयोग सुखाश्रयम् । मृदुशब्दाभिदानं च कवि: कुर्यातु नाटकम् ॥ दोनों ने अभिनेयता को आवश्यक माना है, पर अभिनेयता के स्वरूप में दोनों की मान्यता में छत्तीस का ही सम्वन्ध जंचता है। इसके आधार पर यह कल्पना गलत न होगी कि आचार्य भात लोकशिक्षार्थ पंचम वेद के रूप में लिखित नाटकों की अभिनेयता को 11 कर रहे हैं, जो सम्भवतः लोकरंगमंच पर ही अभिनीत होते होंगे, किन्तु आचार्य (xix) विश्वनाथ साहित्यिक नाटकों की अभिनेयता की चर्चा कर रहे हैं, जिनका अभिनय साहित्यिक रंगमंच पर ही संभव होता होगा। कहना न होगा कि प्रथम के आदर्श रूप भास के नाटकों में मिलेंगे और द्वितीय के आदर्श रूप कालिदास के नाटकों में। स्वयं कालिदास ने भी "अभिरूपभूयिष्ठा परिपदियम् की बात कहकर इसी की पुष्टि की है। “विक्रमोवंशीयम्" में भी कालिदास विद्वत्परिषद की ओर संकेत करते हैं "मारिष बहुशस्तु परिषदा पूर्वेषां कबीनां दृष्टः प्रयोगबन्धः सोहमद्य विक्रमोर्वशीयं नाम नाटकमपूर्वे प्रयोक्ष्ये।” अस्तु, ऐसा कहा जायेगा कि विद्वत्परिषद में अभिनीत होने वाले नाटक सामान्य नाटकों से भिन्न होते थे। ऐसी रंगशाला में प्रायः राजा और राजन्यवर्ग के लोग तथा विद्वान ही दर्शक होते थे। यहाँ नाटक पंचम वेद के रूप में ही नहीं, साहित्य के रूप में भी प्रतिष्ठित था। साहित्यिक रंगमंच के प्रायः चार भाग होते है- नेपथ्य, पाव, दृश्य सामग्री और मंच को दर्शक से अलग करने वाला भाग। लोक रंगमंच के विविध रूप हिन्दीभाषी क्षेत्रों में मिलते हैं, जिनमें मूलतः निम्नांकित रूप अधिक प्रचलित हैं • (1) लीला-नाटकों के रंगमंच, (2) यात्रा-पार्टी और स्वांग नाटकों के रंगमंच, (3) कठपुतलियों के रंगमंच । हिन्दी में जो साहित्यिक रंगमंच मिलते हैं, वे भी दो प्रकार के हैं - एक तो वे जो व्यवसायी हैं और दूसरे वे जो अव्यवसायी रंगमंच के नाम से जाने जाते हैं। हिन्दी में साहित्यिक दृष्टि से रंगमंच का आरम्भ भारतेन्दु द्वारा ही होता है। जिस समय भारतेन्दु ने हिन्दी रंगमंच की स्थापना की, उस समय हिन्दी क्षेत्र रंगमंच से पूर्णतः शून्य नहीं था। भारतेन्दु काल में । पारसी रंगमंच का भी काफी प्रभाव था। भारवेन्दु को विरासत में बंगला का विकसित रगमंच मिला था जिससे उन्होंने पर्याप्त लाभ उठाया । बलिया, कानपुर और मेरठ इत्यादि नगरों में हिन्दी रंगमंच की स्थापना हुई और लोग नये उत्साह से नाटक के अभिनय में ६ भाग लेने लगे। प्रयाग में जो कांग्रेस अधिवेशन हुआ उसमें बदरीनारायण चौधरी ने "भारत सौभाग्य' नाटक का अभिनय किया था। इसी अवसर पर राधाकृष्ण जी का नाटक "प्रताप" भी अभिनीत हुआ था। बालिया वाले अभिनय में स्वयं भारतेन्दु जी प्रमुख भूमिका में उतरे थे। द्विवेदी युग में रंगमंच की स्थिति और भी सुधरनी चाहिए थी किन्तु ऐसा हुआ नहीं। नाटक के क्षेत्र में एक प्रकार को निष्क्रियता व्याप्त होती चली गयी। प्रसाद युग में हमारी रुचि परिष्कृत हुई किन्तु परिष्कृत रुचि के कारण पारसी नाटक द तो पड़ने ही लगे, सिनेमा के प्रचार से भी उन्हें आघात पहुंचा। प्रसादजी ने स्वयं लखा कि “रंगमंच के सम्बन्ध में यह भारी भ्रम है कि नाटक रंगमंच के लिए लिखे पायें। ध्यान से देखें तो प्रसादजी के इस वाक्य का अर्थ यह नहीं है कि वे रंगमंच रोधी थे, किन्तु यही है कि वे केवल इतना ही चाहते थे कि रंगमंच को स्वयं नाटकों । अनुकूल परिवर्तित होना चाहिए न कि रंगमंच के अनुकूल नाटकों की रचना की जानी हिए। श्री सद्गुरुशरण अवस्थी ने भी ऐसे ही नाटक लिखे जो प्रसाद की मान्यताओं मेल खाते थे। निश्चित रूप से प्रसाद युग में ऐसे नाटककार अवश्य हुए जो रंगमंच । तत्कालीन स्थिति पर ध्यान देते हुए अपने नाटकों को रंगमंचीय बनाने का प्रयल कर थे। उपेन्द्रनाथ अश्क, सेठ गोविन्ददास, उदयशंकर भट्ट, हरिकृष्ण प्रेमी आदि ने अपने टकों को अधिकाधिक रंगमंचीय बनाने की कोशिश की। अधुनातन हिन्दी रंगमंच पर होगा हाँ माथुर ने अपने कोणार्क नाटक की भूमिका में रंगमंच के त्रिकोणात्मक विकास का आग्रह किया है- (1) माथुर साहव का कहना है कि रंगमंच यथार्थवादी होना चाहिए। (2) प्राचीन नाट्यकला से प्रेरित किन्तु आधुनिक साधनों से सम्पन्न नागरिक रंगमच अपेक्षित है। (3) परिमार्जित और संशोधित देहाती रंगमंच को भी आवश्यकता है। आज रंगमंच के विकास में सबसे बड़ी बाधा सिनेमा है। डॉ. गोविन्द त्रिगुणायन का कथन है कि रंगमंच के समुचित विकास के लिए विद्यालयों में अभिनय कला का पाठ्यक्रम के रूप में निर्धारण होना चाहिए। वे सरकार की ओर से चालित रंगमच को तीन रूपो में विकसित करने के पक्ष में हैं- लोकनाट्य रंगमंचों के रूप में। हिन्दी साहित्यकारों ने भी रंगमच के विकास में अपनी भूमिका निभायी है। वास्तविकता यह है कि हिन्दी रंगमंच के विकास में काशी और बम्बई जैसे नगरों का विशेष योगदान है। आज हिन्दी रंगमंच व्यावसायिक दृष्टि से विकसित हो रहा है। जो भी हो, यह सत्य है कि हिन्दी रंगमंच और नाटक का गहरा सम्बन्ध है। रंगमंचीयता के गुणों से रहित नाटक आज अच्छी दृष्टि से नहीं देखे जाते हैं। कारण यह है कि नाटक दृश्यकाव्य है और दृश्यकाव्य में जो कुछ अभिनय के माध्यम से रंगमंच पर दिखाया जाता है, वह पाठक की चेतना को सीधा प्रभावित करता है। यह उक्ति कम महत्वपूर्ण नहीं है और न उपेक्षित हो की जानी चाहिए कि “काव्येषु नाटकम् रम्यम् ।” नाट्य शास्त्र के आचार्य भरत ने ब्रह्मा के मुख से कहलाया है कि नाटक पीड़ा, क्लेष और थके हुए व्यक्तियों के आनन्द का साधन है। यद्यपि गीतिकाव्य में भी भावों को सघनता होती है किन्तु वे वैयक्तिक अधिक होते हैं। नाटक के भावों में व्यापक मानवता समाहित रहती है। इसलिए नाटक को सम्पूर्ण साहित्यिक विधाओं में विशेष महत्व दिया गया है। समसामयिक नाटक और रंगमंच समसामयिक शब्द से तात्पर्य समकालीन से है। ऐसी स्थिति में जब हम हिन्दी नाटकों की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय साठोत्तरी हिन्दी नाटक से होता है यह ठीक है कि जयशंकरप्रसाद से हिन्दी नाटक को एक गति प्राप्त हुई और उन्होंने अप अनेक नाटकों के माध्यम से दर्शकों और पाठकों की रुचि को परिष्कृत किया। जो हो, इतना निश्चित है कि प्रसादजी ने साहित्यिक नाटक लिखे हैं। उसके अनुसार साहित्यिक होने के साथ साथ रंगमंचीय भी थे, किन्तु समीक्षकों ने उनके नाटकों पर आरोप लगाया है कि अभिनेय नहीं है। प्रसाद ने ऐसे लोगों को यह उत्तर दिया कि उन लोगों के लिए नाटक नही लिखे हैं जो दो चार पर्दे मंगनी मांग लेते हैं और दो आने के टिकट बेचकर दर्शकों का सस्ता मनोरंजन करते रहते हैं। निश्चय ही प्रसाद यह कथन इस बात को सूचना देता है कि उन्होने हिन्दी नाटक को और रंगमंचीय को बढ़ाने के लिए अपने नाटक लिखे थे। प्रसादोतर काल में यह प्रवृत्ति कुछ और बढ़ी और नाटक कुछ सरल हुए किन्तु साथ साथ वैचारिक और रंगमंचीय आवश्यकता के अनुरूप लिखे जाने लगे। जिन नाटककारों ने यही कार्य किया उनमें हरिकृष्ण - ।

विष्णु प्रभाकर, उदयशंकर भट्ट, तक्ष्मीनारायण मिश्र और डा. रामकुमार वमो के नाम प्रसिद्ध हैं। इन सभी ने नाटक को रंगमंच से घनिष्ठता से जोड़ा। इनके बाद सन् 1970 के बाद नये नये नाटककार सामने आए और उनका नाट्यसृजन समसामयिक हिन्दी नाटक की उपलब्धि कहा जा सकता हिन्दी समसामयिक नाटकों का विकास रंगमंचीय दृष्टि से हो रहा है। इससे पूर्व के नाटककारों ने इस दिशा में रुचि तो प्रदर्शित की थी, कितनी, उतनी जितनी उनसे अपेक्षित थी। प्रश्न यह है कि समसामयिक नाटकाकरों में हम किन-किन नाटककारों को स्थान दे सकते हैं। इस सम्बन्ध में सही कहा जा सकता है कि प्रसिद्ध समसामयिक नाटककारों में भुवनेश्वर, लक्ष्मीनारायण लाल, मोहल राकेश, सुरेन्द्र वर्मा, रमेश बक्षी, सत्यव्रत सिन्हा, जगदीशचन्द्र माथुर और भीष्म साहनी जैसे अनेक नाटककारों का नाम लिया जा सकता है। इन नाटककारों ने जहाँ एक ओर नाटकों में समसामयिक जीवन और परिवेश को प्रस्तुत किया है, वहीं नाटक में रंगमंचीय क्षमताओं का विकास भी किया है। प्रायः यह देखने में आता है कि आज सभी नाटककार रंगमंच को ध्यान में रखकर नाटक लिख रहे हैं। रंगमंच से तात्पर्य मात्र अभिनय से नहीं है, अपितु आजकल रंगमंच का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जाता है। यह केवल अभिनेयता से सम्बन्धित न होकर उन सभी बातों से भी सम्बन्धित है जिसमें स्थान जैसे नाट्यगृह, और उसका स्थापत्य, प्रेक्षागृह में बैठने की व्यवस्था, नेपथ्यगृह और उसकी आवश्यक वस्तुएं, रंगमंच और उसकी सजावट, पात्रों की वेशभूषा, रंग विधान, दृश्य विधान, पात्रों का प्रवेश, संगीत योजना, वातावरण चित्रण और घटनाओं के उत्थान-पतन आदि के अंकन को रंगमंच में शामिल किया जाता डॉ. रामकुमार वर्मा ने रंगमंच के स्वरूप और अर्थ को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “रगमंच का अर्थ केवल स्टेज या अभिनय स्थान ही नहीं है। रंगमंच एक सामाजिक कलात्मक संस्था है जो नाटक और अभिनय के प्रत्येक क्षेत्र में सम्पूर्ण ज्ञान वितरित कर सके। राज्य की ओर से या समाज के द्वारा प्रचुर धन दान देने से वह सम्पूर्ण हो और विश्वविद्यालय की भाँति विद्यार्थियों को रंगमंच के ज्ञान में पूर्णतः दीक्षित कर सके।" इस प्रकार स्पष्ट है कि रंगमंच शब्द अपने संकुचित अर्थ में तो अभिनय, का ही वाचक है, किन्तु व्यापक अर्थ में उसका प्रयोग नाटक तथा अभिनेयता से सम्बन्धित समस्त स्थानों, वस्तुओं, व्यक्तियों और कलाविधियों आदि से भी किया जाता है। समसामयिक नाटकों में रंगमंच का विशेष ध्यान रखा जाता है। किसी नाटककार को ले लीजिए, उसका नाटक रंगमंचीय अत्यन्त आवश्यक अनिवार्यताओं को अवश्य पूरा करता है। लक्ष्मीनारायण लाल के सभी नाटक, यदि कुछ विशेष नाटकों के नाम लें तो मि. अभिमन्यु, मादा कैक्टस, अब्दुल्ला दीवाना, राम की लड़ाई और सूर्यमुख विशेष रूप से रंगमंचीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जगदीशचन्द्र माथुर का पहला राजा नाटक समसामयिक हिन्दी नाटकों में रंगमंचीय आवश्यकताओं को पूरा करता है । कथानक, चरित्र, संवाद और भाषा-शैली, रंग विधान, संगीत, दृश्य विधान, अभिनय स्थल, पात्रों को वेशभूषा और रंगमंचीय सजावट आदि सभी का.ध्यान लक्ष्मीनारायण लाल, जगदीशचन्द्र माथुर, मोहन राकेश बक्षी, सुरेन्द्र वर्मा और नरेश मेहता ने रखा है। यहाँ सभी नाटककारों - , (xaxil) की रंगमंच की दृष्टि से विवेचन करना तो संभव नहीं हैं, किन्तु समग्र रूप से निम्नलिखित बातें कही जा सकती हैं- (1) समसामयिक हिन्दी नाटकों में जो कथावस्तु चुनी जाती है, वह समकालीन जीवन के किसी संदर्भ को संकेतित करती है। किसी भी साठोत्तर नाटक को उठा कर देख लीजिए, यह बात स्पष्ट हो जायेगी कि इन नाटकों में कथावस्तु ऐसी रखी जाती है जिसे आसानी से रंगमंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है। मादा कैक्टस, द्रौपदी, गंगा माटी यक्ष प्रश्न, पहला राजा जैसे नाटक इस दृष्टि से देखे जा सकते हैं। (2) समसामयिक माटकों को कथावस्तु अधिक अंगों में प्रस्तुत नहीं की जाती है। हाँ, उसमें दृश्य अवश्य ऐसे रखे जाते हैं जो कि नाटक के मूल कथ्य को ईमानदारी से प्रकट कर सकें। यही कारण है कि ऐसा वस्तु विधान अभिनय के अनुकूल रहता है और उसे रंगमंच पर आसानी से ही प्रस्तुत किया जा सकता है। (3) मोहन राकेश के नाटकों में किसी को भी उठा लीजिए, सभी में रंगमंचीय आवश्यकताएं देखने को मिल जाती हैं। यदि यह कह दिया जाए कि समसामयिक नाटकों में मोहन राकेश और लक्ष्मीनारायण लाल के नाटक हो ऐसे हैं जिन्हें शत-प्रतिशत रंगमंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यों यह भी एक प्रमाण है कि इन दोनों नाटककारों के नाटक कई बार स्थान-स्थान पर रंगमंच पर प्रस्तुत किए जा चुके हैं। मोहन राकेश का "लहरों के राजहंस और "आधे अधूरे नाटक तो इतने अधिक प्रसिद्ध हैं कि उन्हें अनेक नाट्य संस्थाओं द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया जा चुका है। यह मंचन न केवल सफलतापूर्वक हुआं है, अपितु उल्लेखनीय भी रहा है। इससे यह प्रमाणित होता है कि समसामयिक प्रमुख नाटककार नाट्यसृजन करते समय रंगमंच को विशेषरूप से ध्यान में रखते हैं। (4) समसामयिक नाटकों में जिन संवादों का प्रयोग हुआ है वे प्रसादकालीन नाटकों में आए संवादों की तुलना में अधिक संक्षिप्त, अधिक व्यंजक और अधिक प्रभावी बन पड़े हैं। उदाहरण के लिए आधे-अधूरे और यक्ष प्रश्न जैसे नाटकों के संवादों को लिया जा सकता है। आधे-अधूरे के संवाद तो कही-कहीं इतने व्यंजक और इतने सक्षिप्त हैं कि पात्र केवल एक शब्द बोलता है और वह शब्द जब रंग-मंच पर दर्शकों को सुनने और देखने को मिलता है तो उसकी व्यंजनाएँ भी दर्शक के हृदय में उतर जाती है। यही स्थिति लक्ष्मीनारायण लाल के मादा कैक्टस नाटक की है। उसमें जो संवाद आए हैं वे न केवल संक्षिप्त हैं, अपितु आधुनिक बोध को निरूपित करने वाले भी है। समसामयिक नाटकों में सवादों की स्थिति जितनी कुशलता से नियोजित की गयी है उतनी कुशलता पहले के नाटकों में नहीं की गयी है। अनेक सवाद तो इन नाटकों में ऐसे है जो कथा की टूटी और विखरी हुई कड़ियों तक को जोड़ देते हैं और अनेक संवाद ऐसे हैं जो न केवल रोचक है, अपितु नाटक के मूल उदेश्य को भी संकेतित कर देते हैं। संवाद) कला की ये विशेषताएं समसामयिक हिन्दी नाटकों को रंगमंच के अनुकूल बना सकों है। (5) समसामयिक हिन्दी नाटकों का आकार लघु है, विस्तृत नहीं। उनमें आए घटना एक दूसरे से इस प्रकार जुड़े हुए हैं कि एक संदर्भ के हट जाने से नाटक की कथा - 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(xxiii) का महल गिरने लगता है। नाटकों को रंगमंचीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए समसामयिक नाटककारों ने पात्रों की संख्या भी सीमित रखी है। (6) स्थान, काल और प्रभाव को एकता भी समसामयिक नाटकों की एक ऐसी विशेषता है तो उन्हें रंगमंचीय गुणों से जोड़ देती है। इतना ही नहीं, इन नाटकों में रंगमंच की सज्जा न केवल आधुनिक है अपितु आकर्षक और प्रभावशाली भी है। नाटककारों ने जो रंग निर्देश अपने नाटकों में दिए हैं, वे सुरुचिपूर्ण तो हैं ही, अपितु नाटक के कथ्य से भी जुड़े हुए हैं। इस दृष्टि से लक्ष्मीनारायण लाल, मोहन राकेश, जगदीशचन्द्र माथुर सुरेन्द्र वर्मा और ज्ञानदेव अग्निहोत्री आदि के किसी भी नाटक को लिया जा सकता है। (7) समसामयिक हिन्दी नाटकों में संगीत योजना, रंग योजना, ध्वनि योजना और संदर्भ योजना भी पूरी कलात्मकता के साथ की गयी है। किस दृश्य के लिए कौनसा रंग कौनसी ध्वनि और कौनसा संकेत और कौनसी सजावट उपयुक्त रहेगी, इन सभी बातों का विधान समसामयिक हिन्दी नाटकों किया गया है। (8) किसी भी नाटक को रंगमंचीय और प्रभावशाली बनाने में जो योगदान भाषा और शैली का हो सकता है, वह किसी अन्य तत्व का नहीं। इस दृष्टि से देखें तो स्पष्ट होता है कि समसामयिक हिन्दी नाटकों की भाषा ऐसी है जो दर्शकों को आसानी से समझ में आ सकती है। अपवाद स्वरूप कुछ नाटक ऐसे हैं जिनमें भाषा संस्कृतनिष्ठ और परिमार्जित हो गयी है। इस भाषा को समझने में कठिनाई तो होती है किन्तु आज का दर्शक इतना कमजोर नहीं है कि वह ऐसी बातें न समझ सके। मोहन राकेश के "लहरों के राजहंस” और “आषाढ़ का एक दिन” नाटक की भाषा इसी प्रकार की है, किन्तु उनके "आधे अधूरे" नाटक की भाषा इतनी सरल, इतनी यर्थात, इतनी व्यंजक और इतनी आकर्षक है कि वह सहज ही दर्शक के कानों से होती हुई हृदय में प्रवेश कर जाती है। यही स्थिति लक्ष्मीनारायण लाल के मादा कैक्टस, यक्ष प्रश्न, मि. अभिमन्यु और राम की लड़ाई जैसे नाटकों की है इन नाटकों की भाषा अत्यंत सरल और बोधगम्य है। इसी विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि समसामयिक हिन्दी नाटको का विकास रंगमंचीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हुआ है और हो रहा है। यह नाटक भी रंगमंचीय आवश्यकताओं के अनुरूप OTO 'ज्योति पुरुष पात्र-संयोजन भुवनेश्वरी पीशी बुआ श्री माँ (शारदामणि) हरमोहिनी स्वर्णमयो किरण श्यामा जमना नरेन्द्र (विवेकानन्द) बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त ठाकुर (स्वामी रामकृष्ण परमहंस) मुंशीजी विनय सुयश निमग्न मिस्टर हेस्टी ईश्वरचन्द्र विद्यासागर सुरेन्द्रनाथ मित्र महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर केशवचन्द्र सेन भूपेन्द्र महेन्द्र शिवानन्द दाशरथि सान्याल हृदय प्रतापचन्द्र हाजरा कालीप्रसाद डॉ.महेन्द्रनाथ सरकार इनके अतिरिक्त विद्यार्थी, श्रद्धालु स्त्री-पुरुषों का समूह, चार मछुआरे तथा मन ६ मस्तिष्क अंक .. एक एक दृश्य स्थान : कलकत्ता स्थित सिमुलियापल्ली में बैरिस्टर विश्वनाथ दत का निवास समय प्रातःकाल (भीतर के मध्यमाग में बने विशाल गोलाकार हॉल की सप्पन्न तालदी, सुरुचिपूर्ण एवं कलात्मक साज-सजा। यदाकदा भीतर आ रही हवा की.मंद लहरियों से हिलहिल उठते पदों के उस पार से बाहर की रंग बिरंगी प्राकृतिक छटा झलकाती खिड़कियों के बीच कुर्सियों से घिरी भोजन की मेज, उस पर रखा एक सुन्दर फूलदान, दक्षिणी दीवार से सदे शीशे के पारदर्शी शो-केस में रखे कुछ खिलाने, उस पर रखी नटराज की विशाल काँस्य प्रतिमा दीवारों पर टंगे महापुरुषों के कुछ तैलचित्र, छत से लटके तीन सुन्दर फानूस तथा पश्चिमी दीवार के पास बिछा बड़ा झक्क सफेद गदा व उस पर रखी दो बड़ी मसनदें। , भोजन की मेज के पास ही रसोईघर का दरवाजा तथा उसी से सटा एक छोटा-सा गलियारा, जो बाहरी बैठक से जुड़ा है, जहाँ कानून को मोटी-मोटी किताबों और आल्मारियों में दूंस-ठूसकर भरी फाइलो के बीच बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त अपने मुवक्किलों से भेंट करते है। दीवार पर टगी पेण्डुलम वाली घड़ी में इस समय सात बज रहे है। रसोईघर के दरवाजे के बाहर पीढ़े पर बैठी सब्जी छील और काट रही तथा बीच-बीच में सफाई के काम मे लगी नौकरानी जमुना पर दृष्टि डाल लेती बैरिस्टर दत्त की विधवा बूआ. जिसे सब पीशो बूआ कहकर पुकारते है।

(2) बगल के पूजाघर से आ रही थैरिस्टर दत्त की पत्नी भुवनेश्वरी के रामायण पाठ की धीमी-मधुर ध्वनि भीतर के शान्त वातावरण में और भी मयुर प्रतीत हो रही है.) भुवनेश्वरी : (गाती हुई) पद कमल धोइ चढाइ नाव, न नाथ उतराई चहौं । मोहि राम राउरि आन दसरथ, सपथ सब सांची कहाँ ।। यर तोर मारहु तखन, पै जब लगि न पाय पखारिहौं । तब लगि न तुलसीदास, नाप कृपाल पार उतारिहौ ।। सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे । बिहंसे करना ऐन, वितइ जानको लखन तन ॥ (अचानक पिछले गलियारे से निकलकर भागता हुआ आठ वर्षीय नरेन्द्र तथा उसे पकड़ने का प्रयास करती उमकी दोनों बहिने हरमोहिनी और स्वर्णमयो भीतर आती है। नरेन्द्र उनको पकड़ में आते-आते छूट जाता है तथा अपने को बचाने के लिए भोजन की मेज की दूसरी ओर जा खड़ा होता है।) पीशी बुआ: (चौककर) अरे------क्या हो रहा है ये हरमोहिनी : (सावेश) नरेन ने हमारी गुड़िया को पाँवों से कुचत डाला, बूआ ! ये देखो.-- (हाथ में लटकी कुचल जाने से अस्तव्यस्त हुई गुड़िया को ऊँची उठाकर यूआ को दिखाती है।) स्वर्णमयी (रुऑसे स्वर में) अब इसका ब्याह कैसे होगा ? पोशी वूआ : (गुस्से में) क्यों रे । (खाने की मेज को दूसरी और 'बचाव' मुद्रा में खड़े तथा शरारत भाव मुस्करा रहे नरेन्द्र की ओर ऑखे तरेरकर देखती है।) नरेन्द्र : (उसी भाव से) तुम्ही बताओ, पोशी बुआ-- विना दावत भी- कहीं ध्याह होता है ? हरमोहिनी : (तिनककर) हमारी गुडिया है... हम दावत करें-- न को... (मुंह बिगाड़ती हुई) तुझे इससे क्या ? (हाथ की गुडिया को भोजन वाली मेज पर रखकर उसी ओर झुकती हुई नरेन्द्र को घरने लगती है।) नोट । ( मुंह यनाव।) च--- मांची जरा--- (नाटकीय अन्दाज़ में) जो... बाराती वो नाराज करोगे-- तो कैसे होगा व्याह ? जा--- जा--- बहुत देखे है--- ऐसे बाराती--- (मुंह विगाइतो हुई) हुँअ--- .. .

(3) नरेन्द्र : (शरारतभाव से) तो ठीक है--- (सामने पड़ी गुड़िया को गूढभाव से निहारते हुए) मैं भी देखता हूं--- अब कैसे करती है--- अपनी गुड़िया का ब्याह--- (फुर्ती से गुड़िया को लपकते हुए पीछे सरककर विजेताभाव से हँस पड़ता है। हरमोहिनी स्थाँसी मिल्ला उठती है। बू--- आ---ऽऽऽऽदेखो न--- (रोती हुई) हमारी गुड़िया--- (सिसक उठती हरमोहिनी : .. पोशी बूआ : (सब्जी छीलना छोड़ ताड़नाभाव से) ऐ बोडू । इतना हल्ला क्यों मचवा रहा है ? (आँखें तरेरकर) जानता नहीं--- तेरी माँ--- रामायण पाठ कर रही है? नरेन्द्र : (तमकते हुए) तुमने मुझे--- बोडू कहा, बूआ ? पोशी बूआ : (चाकू टोकरी में रख हाथ पर लगे सब्जी के छिलके साफ करती हुई) बोडू को--- बोडू नही कहूंगी--- तो--- क्या कहूंगी ? (घूरकर) बोल--- नरेन्द्र तो फिर सुन लो तुम भी--- (मुँह बनाकर) हल्ला भौ--- मवाने का हो होता है... सो मचाऊंगा। मैं... खूब मचाऊंगा--- (अल्हड़ अन्दाज़ मे) हो... हो.--हो-हो--- (हाथ की गुड़िया को हवा में नवाते हुए नरेन्द्र उछलने-कूदने व जोर-जोर से हल्ला मचाने लगता है।) पोशी बूआ : (लपकने की मुद्रा में) ठहर---- अभी बताती हूँ तुझे... (सब्जी की टोकरी एक ओर सरकाती हुई नरेन्द्र को पकड़ने उठती है। नरेन्द्र बचने के उद्देश्य से सफाई के काम में लगी नौकरानी जमना की और सरक जाता है।) : (काम छोड़ नरेन्द्र की ओर पलटती हुई) यूं--- बहिनों को नही रुलाते, बबुआ । (उसी ओर बढ़ती हुई) जरा---- अच्छी तरह से पकड़ के रख इसे---- जमना । (प्यार से) गुडिया लौटा दो, बबुआ । (नरेन्द्र के हाथ से गुड़िया लेने का प्रयास करती है, पर वह उसका हाथ झटककर उसे एक ओर धकेलने हुए भोजन की मेज की बगल से पृजायर के दरवाजे की ओर भागता है तथा टीक इमी क्षण रामायण पाठ पूरा कर पूजाघर से बाहर निकलो अपनी माँ भुवनेश्वरों से टकराकर घाशायी हो जाता है। जमना पोशी आ: जपना -- है .

: वाह, हाथ की गुड़िया स्टिककर दूर जा पड़ती है।) भुवनेश्वरी : (चौककर) पिलेह । (नीचे गिरी गुड़िया तया हरमोहिनी य स्वर्णमयी को ओंसी भावमुद्रा में लपककर गुड़िया उठाते देख भुवनेश्वरी सारी यात समर गई। (तीव स्वर में) ये सब क्या है ? : (यनावटी पोलेपन से) कुछ भी तो नहीं, मा । (पकड़े जाने की आशंका से उठकर पोडे की ओर हटते हुए दीवार से सट जाता है। ये अपनी---- गुड़िया के व्याह में... दावत नहीं खिलाएगी---- तो फिर--- (शरारत भरी मुस्कान के साथ तिरछी दष्टि से यहिनों को निहारते हुए) सब तो--- होगा ही-- भुवनेश्वरी : (ममताभरी ताड़ना के भाव से) इतना चटोरा- कबसे हो गया, रे तू ? नरेन्द्र माँ ! वाह... (रुककर) दावत खाने घाला. क्या--- चटोरा हो जाता है ? क्या तुम्हारे गणेशजी-~~ मोदकप्रिय नहीं है ? (मुँह बनाकर) बस---- लडू का प्रसाद बढ़ाओ-..- मनचाहा वरदान पाओ--- । (रुककर) तिस पर---- तुम्तरे रामजी ने तो---- शबरी के जूठे बेर तक नहीं छोड़े-~- (शरारत भरी मुस्कान के साथ) भोलो---- क्या कहोगी उन्हें---- (मुंह बनाकर) चटोरा---- या कुछ और ? भुवनेश्वरी : (कृत्रिम क्रोध के साथ) ठहर जा तू---- मेरे रामजी को निन्दा करता है, दुष्ट । (शरारत भरे अन्दाज़ में खिलखिलाता हुआ नरेन्द्र माँ को पकड़ बचता हुआ तथा पास खड़ी बहिनो को धकियाता हुआ बाहर की ओर भाग जाता है।) पीशी बूआ : कुछ भी कह, बहू ! (रुककर) पू---- रा---- शैतान का अवतार ही है---- तेरा यह लाड़ला---- बिलेह-~- (उत्तर मे माथे का पल्लू ठीक करते हुए भुवनेश्वरी शालीन, किन्तु मोटे भाव से मुस्करा देती है। कमर पर एक हाथ टिकाए पीसी यूआ दृष्टि में वार्द्धक्य की ताडना का भाव लिए कुछ क्षण उसी दिशा की ओर देखती रहती है, जिधर से शरारती नरेन्द्र अभी-अभी भाग निकला था। से :

(5) अंक एक दो दृश्य स्थान बैरिस्टर दत का शयनकक्ष रात्रि समय .. ... (हर प्रकार की सुख-सुविधाओ से लदा शयनकक्ष इस समय एकदम शान्त है। पैडस्टल लैम्प के सुहावने प्रकाश में धोती-कुर्ता पहने, आँखो पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा चढ़ाए तथा एक हाथ में पास ही रखे चौंदी के बहुमूल्य हुक्के का पैववान पकड़े अपने वॉए घुटने पर दाहिनी टॉग टिकाकर सोफे पर आराम की मुद्रा में बैठे बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त एकाग्र भाव से कोई पुस्तक पढ़ने में तल्लीन हैं। कक्ष में बिखरी गम्भीर शान्ति के बीच यदा-कदा हुक्के की 'सुक्' तथा रसोईघर में से आ रही बर्तनों की हल्की-सी 'खड़खट्' की ध्वनियों व पदचापे इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही थी कि घर के लोग अभी जाग रहे है तथा दिनचर्या का कुछ भाग अभी शेष है। इसी क्षण दोनो हाथों में दूध का ग्लास लिए बैरिस्टर दत्त की पत्नी भुवनेश्वरी शयन कक्ष में प्रवेश करती है • पल्लू ढंका माथा ललाट पर 'दपदप्' करती बड़ी लाल सुहाग बिन्दिया तथा मुख पर फैली शान्त, मधुर गम्भीरता से ओत-प्रोत मुस्कानयुत सुघड सलौना शालीन एवं भव्य व्यक्तित्व। पुस्तक पढ़ने में तल्लीन विश्वनाथ को भुवनेश्वरी के आने का जरा भी आभास नही हो पाता। उनके एकदम निकट आकर चुपचाप खड़ी कभी पुस्तक को, तो कभी पति की भावमग्न मुद्रा को निहारती भुवन के होठो पर सहसा मीठी मुस्कान खिंच जाती है-) भुवनेश्वरी : (मीठे उपालम्भ के साथ) लगता है.... क्रिस्तान बनकर तुम---- (विश्वनाथ दत को ध्यान-मुद्रा एक झटके से बिखर जाती है तथा चौकी दृष्टि सहज ही पुस्तक के खुले पृष्टो से कर अपनी ओर निहारती भुवनेश्वरी की मीठे उपालम्भ से भरी दृष्टि से जा टकरानी । विश्वनाथ : विश्वनाथ : (खुले पृष्ठ का कोना मोड़कर पुस्तक यंद करते हुए वैसी ही मोठी मुस्कान के साथ) बाइबिल पढने से--... क्या कोई.--- क्रिस्तान बन जाता है, भुवन ? (रुककर) क्या---- ज्ञान-पिपासा शान्त करने के लिए--- ऐसे ग्रन्थों का अध्ययन वर्जित है ? (हाथ को बाइबित को बगल की मेज पर रखते हुए अपनी प्रश्नमरी दृष्टि भुवनेश्वरी के मुख पर गड़ा देते है।) भुवनेश्वरी : सो मैं--- कब कहती हूँ.... ? (दृध का ग्लास पति के हाथ में देते हुए बगल के सोफे पर बैठ जाती मगर---- तुम तो---- रोज नियम से बाइबिल पढ़ते हो---- (मीठे व्यंग्य भाव से) क्या---- ज्ञानपिपासा शान्त करने की सामर्थ्य---- हमारी अपनी सस्कृति में---- अपने धर्म में नहीं है जो.... (बात काटते हुए) रुको । (दूध का लम्बा चूंट पीकर ग्लास को मेज पर रखते हुए) अपनी संस्कृति---- अपना धर्म---- यह कहना तो संकीर्णता वाली बात हुई-- भुवनेश्वरी : सो क्यों भला ? (सरक गए आचैल को माथे पर खीचती हुई) क्या क्रिस्तानों का धर्म और उनकी संस्कृति---- हमसे अलग नहीं है । विश्वनाथ : पहले---- मै भी ऐसा ही सोचता था---- भुवनेश्वरी तो क्या---- बाइबिल पढ़कर अब तुम्हारा सोच बदल गया है । विश्वनाथ : बदला तो नहीं---- पर, व्यापक हो गया है। (रुककर) अब मैंने यह समझ लिया है कि---. 'इतर' को जाने बिना भेद-अभेद का सही निर्णय नही किया जा सकता---- कहो तो---- किसी भी लकीर के 'छोटे' या 'बडे' होने का निर्णय---- क्या . 'अन्य' लकीर से तुलना किये बिना सम्भव है? (भुवनेश्वरी पलभर के लिए सोच में पड़ जाती है।) (भुवन के मुख पर प्रश्नात्मक दृष्टि डालते हुए) नहीं न ? (दूध के तीन-चार लम्बे-लम्बे यूंट पीकर विश्वनाथ ग्लास खाली कर भुवनेश्वरी : (उत्सुकता-भाव से) तो तुम्हारा मतलब है---- विश्वनाथ (बात काटते हुए सपझाने के भाव से) देखो जिसे तुम अपनी संस्कृति और अपना धर्म कहती हो.... उससे इतर माने जाने वाले क्रिस्तानों की .. .. .

(7) .. बाइबिल को मैं... यही जानने के लिए पढ़ता हूँ कि आखिर---- इसमें ऐसा क्या है.... जो हमसे भिन्न है.--- अथवा हममें ऐसा क्या है.... जो बाइबिल में नहीं है। भुवनेश्वरी : ' तो फिर---- क्या पाया तुमने ? विश्वनाथ यही कि---- विश्व में धर्म और संस्कृति के जो भी रूप आज प्रचलित है---- उन सबका मूल एक ही है---- (रुककर) जैसे एक ही प्रस्फुटित बोज धरती की सतह से बाहर निकलकर--- भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार के साथ अलग-अलग दिशाओं में अपना स्वरूप विकसित कर लेता है। (भुवनेश्वरी अपनी भावमुग्य दृष्टि पति के चेहरे पर गड़ाए बहुत ध्यानपूर्वक पूरी बात सुनती रहती है।) बाह्य दृष्टि वाले---- मात्र उस 'भिन्नता' को ही देखते हैं.... इसीलिए उन्हें हर धर्म---- हर सस्कृति अलग प्रतीत होती है। ऐसे में बुद्धि भी तो यह नहीं सोच पाती कि भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार में भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकसित टहनियों का आधार 'बीजरूप बिन्दु' तो एक ही है.... भुवनेश्वरी : (मुग्ध भाव से) कैसी सुन्दर कल्पना है तुम्हारी ? विश्वनाथ ये मेरी कल्पना नहीं---- शास्त्रो का सत्य है, भुवन ! (स्ककर) श्रीकृष्ण के कथनानुसार सारे 'मार्ग' उन्ही से मिलते हैं.... बाइबिल कहती है---- धरती के भिन्न-भिन्न भागों में बिखरी हर 'किरण' हमें-~-- एक ही 'सूर्य' तक ले जाती है। (रुककर) और तो और---- 'कर्म' का महत्त्व 'गीता' भी मानती है---- और 'बाइबिल' भी। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं---- तुम । 'कर्म' करो---. 'फल' तुम्हें मैं दूंगा---- दूसरी ओर ईसा कहते हैं.... तुम खोजो---- तो पाओगे---- खटखटाओगे.... तो द्वार खुलेगा---- (भावुक स्वर मे) 'कर्म' को कैसी उत्कट प्रेरणा भरी है समानरूप से 'दोनों में----? भुवनेश्वरी : (उत्सुकता भाव से) तो फिर---- जो लोग---- इनमें भेद करते हैं.... विश्वनाथ : (हुबके का कश सुड़कते हुए) वे अंधेरे में हैं, भुवन ! (रुककर) सोचो... नाम बदल देने से हो---- क्या कोई अलग हो जाता है ? (मुँह बनाकर) क्या--- तुम्हारा बिलेह कोई और है... और हमारा नरेन---- कोई और? (भुवनेश्वरी-में कुछ कहती इससे पूर्व ही उछलता-कूदता नरेन्द्र वहाँ आ पमकता है) माँ..-555---बा---.बा 555... (माँ भुवनेश्वरी की और मीठी निगाहों से निहारते हुए नरेन्द्र सीधा अपने पिता विश्वनाथ की गोद मे आ बैठता है।) भुवनेश्वरी : (सहास्य) लो---- शैतान को याद किया नही कि... शैतान आ धमका--- . नरेन्द्र ..

(8) नरेन्द्र : (बालसुलम रोप के साय) देयो न, बारा ! मुंह पनाकर) माँ मुझे- शैतान कहती है.... नरेन्द्र : (दृष्टि में पीटी ताड़ना का भार लिए। यहूंगी नही क्या ? कितना तंग करता है सबको.... ? (पनि बित्यनाय की ओर देखकर) जा- हो... आज मुझे ठीक से रामायण पाठ भी नहीं करने दिया---- तुम् इस लाडले ने... विश्वनाथ : (संह भरी ताड़ना के स्वर में) क्यों रे.... मां के रामायण पाठ समय---- इतना ऊधम क्यों किया तूने आज ? (ममत्व भाव में नरेन्द्र को अपनी भुजा में कर लेते है।) : (नाटकीय अन्दाज में भोलेपन के साय) कथम ? नहीं तो, बाबा ! (E बनाकर शरारत भरी दृष्टि से माँ को निहारते हुए) मां... अपरा रामाय पाठ कर रही थी... तो क्या मैं---- अपना महाभारत पाठ भी नही कर- नरेन्द्र भला, भुवनेश्वरी : (कहते कहते वाक् पटु नरेन्द्र के मुंह पर विजयी मुस्कान खिच जान भुवनेश्वरी : देख लिया न " विश्वनाथ : (दुलारते हुए) देखो, बेटे । तर्क देकर 'अनुचित' को 'उचित सिद्ध न किया जा सकता। भुवनेश्वरी तर्क के तीर तो.... इसके तरकश में---- हर घडी तैयार ही रहते हैं (सहास्य) बैरिस्टर का बेटा है न---- बैरिस्टर ही बनेगा---- नरेन्द्र : तुमसे किमने कहा, मां... मैं बैरिस्टर बनूंगा' लक्षण तो तेरे-... यही कह रहे हैं। (उत्सुक स्वर में) अच्छा--- का तो.... बैरिस्टर नहीं बनेगा---- तो फिर---- क्या बनेगा तू ? नरेन्द्र (शरारत भरी मुस्कान के साथ) कोचवान। भुवनेश्वरी : (चौककर) क्या---- क्या कहा तूने ' (माँ भुवनेश्वरी हक्की-बक्की-सी नरेन्द्र को देखती रह जाती है। पित विश्वनाथ का चेहरा भी कुछ क्षण के लिए गम्भीर हो जाता है। पलभर के लिए दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल पाता) (अविश्वास भाव से) कोचवान बनेगा कलकता के इतने बड़े बैरिस्टर का बेटा बड़ा होकर कोचवान बनेगा ? (खीझभरे स्वर में) लज्जा नहीं आएगी तुझे क्योरे? नरेन्द्र : इसमें लज्जा कैसी ? क्या कोचवान मनुष्य नहीं है , या कि उसे.... मनुष्य के समान सुख-दुख नहीं होते ? या कि उसका लहू लाल नहीं है ? (रुककर) यदि है---- तो फिर ऐसी धारणा क्यों , (कुछ क्षण विश्वनाथ और भुवनेश्वरी - दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल पाते । स्तव्य-से उसे देखते रहते है टुकुर-टुकुर ) .. (9) भुवनेश्वरी : मनुष्य होने तथा लहू का समान रंग, समान सुख-दुख होने से क्या होता है रे ?(रुक कर) कहाँ बैरिस्टर-..- और कहाँ कोचवान , नरेन्द्र : कोचवान भी कोई साधारण व्यक्ति नही होता, माँ ! (पिता के हाथ में पकड़े हुक्के के पेंचवान की नली से खेलते हुए) जो बलवान घोड़े को---- और घोड़ागाड़ी को नियंत्रित रखता है---- वो साधारण कैसे हुआ ? यह तो विशिष्ट योग्यता की बात हुई। (रुककर) हर कोई तो घोड़ागाड़ी चला नहीं सकता। चलाएगा तो---- घोड़ा किधर ही जाएगा--.. और घोडागाड़ी किधर ही---- (और 'हो-हो' कर हँस दिया नरेन्द्र। भुवनेश्वरी और विश्वनाथ हतप्रभ भाव से देखते ही रह गए उसे ।) विश्वनाथ : (तत्काल ही अपने को सहज बनाते हुए सहास्य) लगता है---- जल्दी ही तू---- बैरिस्टरों के भी कान काटने लगेगा--.. भुवनेश्वरी : (मीठी ताड़ना के भाव से निहारती हुई) वाचाल कहीं का ! नरेन्द्र : सही तर्क करना---'क्या वाचालता है, बाबा ? विश्वनाथ : सही तर्क वाचालता नहीं होता---- यह तो ठीक है--- (अटकते स्वर में) पर-- (रहस्यमय अन्दाज में अपनी दृष्टि को नरेन्द्र के मुख पर गड़ाते हुये पलभर के लिए चुप हो जाते हैं विश्वनाथ दत्त ।) नरेन्द्र (उत्सुक स्वर में) पर---..? विश्वनाथ : पर---- (मुख पर नाटकीय गम्भीरता ओढ़ते हुए) तर्क सही है.... इसका निर्णय---- (मुंह बनाकर) खुद ही कैसे कर लिया, तर्काचार्यजी ? (गोद में बैठे नरेन्द्र के दोनों कंधे पकड़ते हुए ठहाका लगाकर हंस पड़ते हैं बैरिस्टर दत।) नरेन्द्र (मुँह बिगाड़ते हुए) देखिए---: "लगे न आप भी माँ का पक्ष लेने ? (परिहासभाव से) अब बैरिस्टर हूँ---- तो अदालत में---- किसी न किसी का पक्ष तो लेना ही होगा मुझे.... (सहसा नरेन्द्र के मुँह पर एक शरारती मुस्कान उभरती है।) नरेन्द्र : (मुंह बनाकर) मगर--- आपकी खिचड़ी पकेगी नहीं इस अदालत में। (सम्मिलित हँसो की एक छोटी-सी हिलोर मे कक्ष के भीतर का संसार पलभर के लिए रसमय हो जाता है।) - विश्वनाथ : (केश सहलाते हुए) · अच्छा----' अब सो जा---- (सहास्य) आज क्या----- पोशो बूआ से लड़ आया तू । नरेन्द्र : नही, बाबा । आज मैं माँ के पास ही सोऊंगा । (रुककर) मुझे उनसे---- महिषासुरमर्दिनी की पूरी कहानी जो सुननी है---- (पिता की गोद से उठकर माँ भुवनेश्वरी के पास जा खड़ा होता है।) (भुवनेश्वरी का हाथ पकड़कर) चलो, माँ । (माँ का हाथ खीचने लगता है।) : विश्वनाथ : .. -- ।

(10) अंक एक तीन दृश्य .. स्थान बैरिस्टर दत्त के भवन का बाहरी भाग समय प्रात काल (आसपास झूमती ताजा हरीतिमा के बीच स्वच्छ-उजली घुली लाल पाट वाली श्वत साड़ी के पल्लू से भली-भाँति सिर ढाँप तथा दोनो हाथों मे जलपात्र लिए भवन के बाहरी आंगन में स्थित तुलसी चौरे के चारों और पक्तिपूर्वक परिक्रमा करती सद्यः स्नाता भुवनेश्वरी । उसके अर्द्धनिमीलित नेत्रों से झाँक रही भावमयी सात्विकता तथा अधरों पर मंद-पद थिरकती तुलसी-वन्दना की अस्पष्ट गुनगुनाहट मिलकर वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। तुलसी चौरे से कुछ दूर हटकर परिसर के उत्तरी कोने मे खड़े एक धने वृक्ष की छाया तले बनाए गए बाड़े में घास चरती तथा पास ही उछल-कूद कर रहे अपने बछड़े को यदा-कदा चाट-सूंघ लेती श्यामा गाय के आसपास साफ-सफाई में लगी नौकरानी श्यामा बीच-बीच में सिर धुमाकर परिक्रमा करती भुवनेश्वरी की ओर देख लेती। तीन परिक्रमाएँ पूरी कर भुवनेश्वरी अपने दोनों हाथ उठा जलपात्र से तुलसी को अर्घ्य देती है। तदुपरान्त खाली जलपात्र को लिए हुए ही प्रणाम की मुद्रा मे मस्तक झुका लेती है। सहसा श्यामा रेभा उठती है। अचानक ध्यानभग हो जाने के कारण चीकी भुवनेश्वरी उसी ओर पलटती है-) भुवनेश्वरी : अब तो--- बछड़े को खोल दे, श्यामा । (सरक आए पल्लू को माथे पर खीचती हुई भुवनेश्वरी उसी ओर बढ़ती है।) (महास्य) कैसी माँ है री तू ! श्यामा होकर भी श्यामा के भीतर की ममता भरी छटपटाहट को नहीं पहचानती । : (मीठी मुस्कान के साथ) तुम नहीं जानती, बऊदी । (उछलकूद कर बड़े की ओर ममता भरी दृष्टि तरेरती हुई) बहुत पेटू और ढीठ हो गया है ये ! श्यामा - (11) (खूटे पर बँधी रस्सी खोलने लगती है।) (रस्सी खोलकर मीठी ताड़ना के भाव से उसे गाय की ओर धकेलती हुई) (बछड़ा लपककर श्यामा गाय के थनो से अपना मुँह लगा देता है तथा उछल-उछलकर दूध पीने लगता है। गाय भी घास चरना छोड़ रंभाती हुई उसे चाटने-दुलारने लगती है। यह सब देख दोनों ही मुस्करा उठती है।) (सहास्य) इसका वश चले---- तो-~-- सारा का सारा दूध ही चट कर जाए---- भुवनेश्वरी : (ममता भरे स्वर में) माँ के दूध पर---- पहला अधिकार तो---- सन्तान का ही होता है न, श्यामा ? श्यामा : सो तो है, बऊदी । (बछड़े की चपल आतुरता को देख श्यामा और भुवनेश्वरी एक साथ हँस पड़ती है। ठीक इसी क्षण मुख्य द्वार से लाल कपड़े से बंधा बस्ता बगल में दयाए एक अधेड़-सा व्यक्ति भवन-परिसर मे प्रवेश करता है - कुर्ता धोती पहने, धोती की लम्बी लांग का छोर कंधे पर डाले तथा ऑखो पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा चढ़ाए। उस ओर पीठ होने तथा परिहासमग्न होने के कारण भुवनेश्वरी व श्यामा को उसके आगमन का आभास ही नहीं हो पाता। आगन्तुक पलभर के लिए वही ठिठक जाता है, फिर अगले ही क्षण सीधे हाथ की तर्जनी से नाक पर सरक आया चश्मा ठीक करते हुए सकुचाए भाव से उसी ओर कदम बढ़ाता है-) आगन्तुक : (हाथ जोड़कर) प्रणाम, बऊदी । (भुवनेश्वरी व श्यापा सम्मिलित हँसी एक झटके के साथ रुक जाती है।) कब भुवनेश्वरी : (चौककर पलटती हुई) अरे---- मुंशीजी आप ? (उत्सुक भाव से). लौटे रायपुर से ?. मुंशीजी : जी---- रात ही लौटा हूँ--- भुवनेश्वरी : (सविस्मय) अकेले ही ? मुंशीजी : जो-~~- (सहमे भाव से) विश्वनाथ बाबू तो---- अभी-~~ पन्द्रह दिन और नहीं लौट पाएंगे, बऊदी ! (सुनते ही भुवनेश्वरी के मुख पर उदासी के भाव उभर आते है।) . भुवनेश्वरी : (सहास्य) लगता है. आपको और आपके बाबू को-- रायपुर की आबोहवा---- बहुत रास आ गई है.... मुशीजी : (खिसियाई मुम्कान के साथ) नहीं---- नहीं---- ऐमी बात नहीं है, वदी, (12) । (मुशी जी की बातों की आवाज सुनकर पीशी बूआ उत्सुक भाव बाहर निकल आती है- पोशी बूआ : (ऊँचे स्वर में) कौन आया है, बहू ? भुवनेश्वरी : (सिर का पल्लू ठीक करती हुई) जी-~-- मुंशीजी आए हैं--- मुशीजी : (सामने से आ रही बूआ की ओर देखते हुए) प्रणाम, पीशी बूआ । (घुटनो के दर्द के कारण हल्की लगड़ाहट के साथ उसी ओर आ हुई) खुश रहो---- मुंशी । खुश रहो.... (पास ही लॉन से सटाकर रखी गई संगमरमर की वैच पर बैठ जा पीशी चूआ .. (आराम की मुद्रा में पीठ टिकाती हुई) कहो---- निपटा आए रायपुर अपने---- सारे मुकदमे ? मुशीजी (लम्बी थकी सॉस के साथ) कहाँ---- पीशी बूआ ? अभी तो.... पन्द्र दिन और लग जाएँगे---- पोशी बृआ: तो क्या---- विशू को फिर जाना होगा रायपुर । मुशीजी : इसीलिए तो---- विश्वनाथ बाबू वहीं रह गए---- पोशी बुआ : (चौककर) क्या मतलब । (कुछ क्षण चुप्पी रहती है।) (भुवनेश्वरी की ओर देखकर) तू उसे---- कुछ-... कहती नही, बहू ? भुवनेश्वरी : क्या कहूं, बूआजी ? (सिर झुकाकर) वे किसी को सुनें तब न ? मुशीजी : रायपुर का काम बहुत बढ़ गया है, बूआजी ! पोशी यूआ : तो.... यहाँ कौन कम काम था पहले हो ? मुंशीजी : यहाँ की बकाया पेशियों के लिए अगली तारीखें लेने ही तो आना पड़ा मुझे बीच ही में---- पीशो यूआ: फिर क्या---- लौट जाओगे तुम भी ? मुंशीजी : जी, यूआजी (नाक पर फिर से सरक आया चश्मा ठीक करते हुए) बाबू कहते है.... .. पीशी युआ: (उत्सुक स्वर मे) क्या कहते हैं--- तुम्हारे मायू ? मुसीबी जी-सहमी मुद्रा और अटकते स्वर मे) वहाँ रायपुर में भी.... अला से और एक ऑफिस खोलने और--- नया मुशी रखने को बोल रहे हैं...- पोशी या : (इंझलाकर) फिर तुम्हारे याय-- वहाँ अलग से एक पर भी क्यों न ले तेने... पुरानी डो--- बोल -- (सहमे स्वर में) हो सके तो-~~-कुछ दिन के लिए बन्दी को सामने आना... :

(13) .. पीशी बूआ भुवनेश्वरी : भुवनेश्वरी : नहीं---- नहीं---- मैं कही नही जाऊंगी---- बुआजी और बच्चों को अकेले छोडकर---- (रुककर) तिस पर---- बिलेह जैसे शरारती को छोडकर ते कतई नहीं-~-- (प्रतिक्रिया में कुछ क्षण कोई कुछ नहीं बोल पाता।) मुशीजी : (खिसियाई मुद्रा में) बूआजी । तनिक बैठक खुलवादें तो---- पीशी बूआ : हाँ.... हॉ---- (वाड़े में काम कर रही श्यामा की ओर देखकर) श्याम 1 मुंशीजी को बैठक खोल दे---- श्यामा : जी.बूआजी । (हाथ का काम यीच ही में छोड़ श्यामा वैठक खोलने चल देती है। पोछे-पीछे ही मुंशी जी भी) जमना का कुछ पता चला, बहूरानी---- दो दिन से क्यों नहीं आई। लगता है---- उसके शराबी---- जुआरी पति ने---- फिर उससे मारपीट की है---- तभी तो.... । (ठीक इसी क्षण भवन परिसर के मुख्य प्रवेश-द्वार का कुण्डा खड़क उठने के कारण भुवनेश्वरी की बात बीच ही में रह जाती है। दृष्टियाँ एक साथ उसी ओर घूम जाती है तो सामने से जमना आत- दीख पड़ती है। निकट आते-आते उत्सुक दृष्टियों को उसकी बेहाल अवस्था से उनके उत्तर स्वत. ही मिल जाते है - अस्त-व्यस्त कपड़े बिखरे बाल, रोई-रोई ललछोही सूजी हुई-सी आँखें, पपड़ाए होट माथे पर उठा गूमड़ और चेहरे पर लगी, एकाध खरौवें।) जमना ? (अपनी तीखी दृष्टि जमना के चेहरे पर गड़ाती हुई) ये सब----- क्या है? (बात पूरी होते न होते येहाल जमना लपककर पीशी यूआ के घुटने पर माथा टिका फफक उठती है। वातावरण अचानक भावुक हो उठता है। भुवनेश्वरी पीशी बुआ के पास बैठ भीगे मन से जमना के केश सहलाने लगती है-) भुवनेश्वरी : (कोमलभाव से) आखिर बात क्या है ? (रुककर) कुछ कह तो--- (स्वामिनियों की स्नेह भरी सहानुभूति पाकर जपना के रोने-फफको का वेग बढ़ जाता है। कुछ क्षण यही सब चलता रहता है।) पोशी यूआ : (सुबकती जपना का केंघा पकड़कर) बोल जमुनी । (व्यथा के वेगवान तूफान और आँसुओ की धारासार वर्षा के बीच जमना अपना चेहरा असर उठाती है।) (रुदन और सुबलियों के बीच) इस बार लौटकर नहीं जाऊंगी..... पोशी बूआ ! (रुककर) चाहे गगा में कूदकर---- अपनी जान ही क्यों ने दे देनी पड़े मुझे.... (कठोर भाव से) कहे देती हूँ---- पोशी बूआ: जमना :

पीशी बूआ : ऐसा अशुभ---- मत बोल, जमनी ! जमना : (आहत् स्वर में) तो फिर क्या करें ? (पुटन और छटपटाहट से भरी जपना अपनी प्रस्मदृष्टि पीशी बुआ के चेहरे पर गड़ा देती है जहाँ इसका कोई उत्तर दिखाई नहीं पड़ रहा था। इसो यीव हल्ला-गुल्ला व रुदन-सुबकियों सुनकर हाथ में एक डण्डे पर कपड़ा लपेटकर बनाई जा रही हनुमानजी की गदा लिए नरेन्द्र तथा दगत में अपनी गुड़ियों को सटकाए हरमोहिनी य स्वर्णमयी उत्सुकमुद्रा में बाहर निकल आते है, पर स्थिति देख दरवाजे पर ही ठिठक जाते है।) बोलो. पोशो बूआ ! क्या करूं में ? (सावेश) पिटती रहूँ इसी तरह ? सहती रहूँ चुपचाप-... ये सारा अन्याय ? पोशी बूआ : (गम्भीर स्वर मे) अन्याय तो इसमें~~~~ है, जमना ! मगर ये सब---- (लप्यो साँस लेती हुई) अब.--- स्त्री को नियति ही बन गया है---- (स्थिति को समझ तथा यूआ की बात सुनकर अपने को रोक न सका नरेन्द्र) नरेन्द्र : (उसी ओर आते हुए) झूठ, पोशी बूआ ! (तीनों ही स्त्रियाँ चौककर एक साथ विस्मित भाव से नरेन्द्र की ओर देखने लगती है। इस बीच मुशीजी को बैठक का दरवाजा खोलकर लौटी श्यामा पी उत्सुक भाव से वही आ खड़ी होती है।) नरेन्द्र (पास आकर) एकदम झूठ... पीशी बूआ : (कौतुक भाव से) सो कैसे रे ? नरेन्द्र अच्छा---- तुम्ही बताओ--- बाबा माँ से कुछ कहते हैं-- इस तरह कभी ? (पोशो बुआ मंत्रविद्ध मुद्रा में 'न' कार भाव से गर्दन हिला देती है।) (सोत्साह) फिर तुम्हारी बात सच कैसे हुई ? (रुककर) जानती नही---- 'मनुस्मृति' क्या कहती है---- (मुँह बनाकर) यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते---- रमन्ते तत्र देवता:... भुवनेश्वरी : (ताड़ना भाव से) रहने दे---- रहने दे...- अपनी बकवास---- (रुककर) पढने में तो जी लगता नहीं जरा भी---- : ऐसा मत कहो, माँ , मुझे सब याद है-- कहो तो-- सुनाऊँ व्याकरण के पाशी बुआ (दोनो हाथो से अपने दोनों गाल थपकाती हुई आश्चर्य-मुद्रा में) उई माँ.... जरा-सा छोरा... शास्त्री की बातें करने लगा है ? (अविश्वाम-भरी दृष्टि से नरेन्द्र ने लगती है।) तुम बिल्कुल चिन्ना न करो, जमना मोमा ! (हाथ की गदा को नवाते हुए) इस हनुमान गदा के प्रहार से---- तुम्हारे सारे कष्ट चूर-चूर हो जाएंगे.... :

(15) (जमना के गालों पर खिच आई अश्रुलोकों को अंगुली के पोर से झटक देता है।) मना : (भोगे स्वर में) बबुवा ! (व्यथित जमना रोना भूलकर सहसा भावुक हो उठती है तथा अपने भरे नयनों में ममता की मिठास लिए नरेन्द्र के केश सहलाने लगती है।) पोशी यूआ : (ताड़ना के स्वर मे) तूने---- फिर शुरू कर दिया न अपना नाटक ? (नरेन्द्र वूआ की ताड़ना को अनसुना कर अपनी हनुमानगदा को वानरी अन्दाज़ में नचाते हुए बाहर की ओर चल देता है।) अरे---- रे---- सुबह-सुबह ही कहाँ चल दिया । नरेन्द्र : हनुमानजी का आशीर्वाद लेने केलाबाड़ी---- भुवनेश्वरी : (मुस्कान भरे स्वर मे) मगर--- केलाबाड़ी में हनुमान जी कहाँ मिलेंगे तुझे? नरेन्द्र : (रुवाकर पलटते हुए) उस दिन भागवत कथा वाले पण्डित जी ने कहा कही था--- हनुमानजी को केला बहुत प्रिय है.--- (रुककर) वे नित्य केला खाने वहाँ आते हैं..-- (अचानक श्यामा की हंसी छूट पड़ती है, जिसे वह मुंह पर पल्लू लगा बरबस रोकने का विफल प्रयास करती है।) तू हंसती है,श्यामा ? (आँखे तरेरकर) सूर्य को भी निगल लेने वाले और सीता मैया को विपत्तियों का हरण करने वाले हनुमान जी पर हँसती है ? : (हँसी रोक सहमे भाव से) ना भैया---- ना.... (सफाई के अन्दाज़ में) मुझे तो तुम्हारी उछल-कूद पर हँसी आ गई थी---- हनुमानजी पर नहीं.... (दोनो हाथ जोड़ श्रद्धाभाव से) वे तो संकटमोचन हैं.... तिस पर---- तुम्हारी ये गदा---- (सहास्य) बाबा रे---- बाबा---- नरेन्द्र : देख लेना---- हनुमानजी जमना मौसी के कष्ट चूर-चूर कर देंगे---- और झरबेरी के गाछ पर रहने वाले भूत को भी भगा देंगे---- भुवनेश्वरी : (घबराकर) मगर---- तू न जाना---- उस झरबेरी के पास---- नरेन्द्र : नहीं जाऊंगा---- तो उस भूत को भगाऊगा कैसे ? (हनुमान गदा नचाते हुए बाहर की ओर दौड़ पड़ता है।) मगर सुन तो---- (ऊँचे स्वर मे) नरेन---- रुक जा---- (मगर नरेन्द्र नहीं रुकता।) (चिंतित स्वर में) हे भगवान । क्या करें इस छोकरे का-~-7 (सोबती हुई) इस बार विशू रायपुर से आ जाए लौटकर---- तो... भुवनेश्वरी : मुझे तो कभी-कभी इस लड़के से बहुत डर लगने लगता है, बुआजी । पीशी बूआ : तू फिक्र न कर, बहू । (नि.श्वास के साथ) सब ठीक हो जायेगा। (भुवनेश्वरी दृष्टि मे आशंका लिए शून्य निहारने लगती है।) श्यामा पीशी बुआ (16) अंक दृश्य एक चार स्थान समय .. विनय - सुयश नरेन्द्र विनय नरेन्द्र मैट्रोपोलिटन इन्स्टीट्यूट दोपहर (अध्यापक के कक्षा में न होने के कारण सहज ही अगम्भीर बन गए वातावरण में अपनी-अपनी सीटो से उठकर पास-पास सिमट आए तथा वेतरतीय भाव से बैठे, खड़े व झुके विद्यार्थियों के एक छोटे-से समूह के वीच बतियाने में तन्मय नरेन्द्र जो अब पहले से बड़ा हो गया है-) : और जो कही---- भूत आ जाता---- नरेन्द्र-:-- और तुम्हें पकड़ लेता---- या---- कच्चा चबा जाता तो....?' (सुनकर नरेन्द्र हँस पड़ता है।) : (उत्सुकतापाव से) जरा भी डर नहीं लगा तुम्हें ? : (अल्हड़ अन्दाज़ में हंसते हुए वाह---- बलिहारी जाता हूँ---- तुम लोगों की बुद्धि पर---- : सो क्यों ? : (हँसी रोककर) अरे इतना भी नहीं जानते तुम ? (समझाने के भाव से) देखो---- 'भूत' का अर्थ होता है---- यो बीत गया---- यानि कि को वर्तमान में है ही नहीं.... (रुककर) और को-- है ही नहीं.... वो भला कैसे पकड़ मकता है.... या---- कच्चा चबा सकता है ? (पलभर के लिए सभी विवारशील मुद्रा बनाए एक-दूसरे को निहारने लगने है।) : (गम्भीर मुद्रा मे) वात तो तेरी--- कुछ-कुछ समझ में आती है रे नरेन्द्र । मगर.. : (परिहाम भाव से) कुछ-कुछ समझते-समझने ही- ये मगर कहाँ से आ गया बीच ही में---- (मुँह बनाकर) तुम्हारी बुद्धि को.--. लपककर कच्ची चवा जाने के लिए? (फिर हंस पड़ता है। माद ही उसके कहने के अन्दार पर एकाय बच्चे भी हँस देते है सुयश नरेन्द्र (17) • किन्तु सुयश मुँह बाए खड़ा उसे देखता भर रहता है।) पुयश : (अविश्वास भाव से) किन्तु.--. अट्टाचार्य सर तो कह रहे-थे---- परेन्द्र (बात काटते हुए) छोड़ न्यार:-- भट्टाचार्य-सर-की बात। उनके अंधविश्वासों की भी---- कोई सीमा है .?. (मुंह बनाकर): जिस स्थान पर जाना हो-~~ पहला पाँव बायाँ ही पड़ना चाहिए। निमग्न । "इस चक्कर में हो तो.... परसों स्कूल आते समय--- उनका गणित गड़बड़ा गया था---- और---- (रुककर) जाने कितने कदम पीछे लौटकर बाएं पॉव' के प्रथम स्पर्श के साथ-- जब उन्होंने स्कूल में प्रवेश किया तो----प्रेयर शुरू हो चुकी थी-- विषय : (सहास्य) हॉ--- और लेट हो जाने के कारण विद्यासागरं सर ने जब उन्हें धूरा---- तो उनकी हालत---- (मुंह बनाकर) बाबा रे---- बाबा---- देखते ...'ही बनती थी---- (विनय के साथ-साथ पास खड़े अन्य तीन-चार विद्यार्थियो को भी स्थिति की कल्पना कर हँसी छूट जाती है। नरेन्द्र : (परिहास भाव से) जो उस वक्त भट्टाचार्य सर के हार्थों में उनका प्रिय हिण्डा होता तो यूं समझो उस दुष्ट पाँव की तो शामत ही आ जाती । (सम्मिलित हँसी की हिलोर फिर उठती है।) सुयश (होठों पर तर्जनी लगाकर मुँह बनाते हुए)। शीऽऽ... (इधर-उधर को देखकर धीमी आवाज में) धीरे बोल- कहीं भट्टाचार्ये सर ने सुन लिया IT' "तो--- उस दुष्ट पाव से पहले तेरी ही शामत आ जाएंगी, बच्चू ! नरेन्द्र निर्भीक स्वर में) क्यों रे भट्टाचार्य सर का डण्डा---'क्या झरबेरी के गाछवाले भूत मे---- ज्यांदा डरावना लगता है तुझे सुयश ? सुयश ... मैं तुम्हारी तरह ब्रह्म समाजी तो हूँ नहीं भाई-जो भूत से न डरूं। नरेन्द्र : तुम्हें ब्रह्म समाज से ऐसी चिढ़ क्यों है, सुयश ? जब देखो तब-... FIR सुयश : . (मुँह बनाकर) सो क्यों न होगी भला ? (एक हाथ कमर पर टिकाते हुए) ब्रह्म समाजियों के पास विरोध के अतिरिक्त--- और है ही क्या ? नरेन्द्र : (सादेश) गलत---- एकदम गलत---- सुयश देखो-हो गया न विरोध शुरू नरेन्द्र (अपने को सयत करते हुए) मेरा मतलब यह नहीं था, सुयश ! (फ्लभर को चुची छा जाती है। 'दोनो मे से कोई कुछ नहीं बोल पाता। अन्य साथी भी मूक दर्शक की भाँति मात्र उन्हें देखते रहते है।) - (सुयश के कंधे पर हाथ रखकर), सोचो. ब्रह्मसमाज को समझे -बिना-- उसके लिए तुरन्त कोई धारणा बना लेना--- क्या उचित है ? " (रुककर) .कोई भी 'पंथ' अथवा विचारधारा' कोरे-'विरोध' के सहारे आगे नही बढ़ सकती---- और न समाज के लिए उपयोगी ही सिद्ध हो सकती - . .

(18) सुयश है। किन्तु, केवल इसी आधार पर विरोध की उपयोगिता को भी नकारा नहीं जा सकता-- : (सविस्मय) 'विरोध' की उपयोगिता ? तुम्हें 'विरोध' में भी उपयोगिता नज़र आती है, नरेन्द्र ? (ठहाका लगाकर हँस पड़ता है।) : हाँ... (मुँह बनाकर) जैसे तुम्हें मेरे इस गम्भीर तर्क में 'हास्य' नज़र आ नरेन्द्र सुयश नरेन्द्र (सुयश की हँसी एक झटके से रुक जाती है।) : (चेहरे पर गम्भीरता ओढ़ते हुए) चलो---- हास्य छोड़कर गम्भीर हो जाते हैं । (मुँह बनाकर) अब कहो--- 'गति' को रोकने वाले 'विरोध' में-- भला क्या 'उपयोगिता' हो सकती है । : क्यों नही ? (रुककर) असत्य, अनुचित और अन्याय को रोकने वाला 'विरोध' क्या तुम्हारी दृष्टि में---- 'उपयोगी' नहीं होता ? (सुयश को तत्काल इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं सूझ पड़ता।) ऐसा 'विरोध'---- हर धर्म में मिलेगा--: (सुयश 'वैचारिक उहापोह' वाली मुद्रा बनाए नरेन्द्र को निहारने लगता . निमग्न नरेन्द्र (सुयश का कथा ,पकड़कर) अब---- मद्य, मास, तम्बाकू जैसे व्यसनों की बात ही लो---- क्या इसका विरोध केवल ब्रह्मसमाज ने ही किया है ? मूर्तिपूजा एव आडम्बरों का विरोध करने वाले कबीर को क्या तुम--- ब्रह्मसमाजी कहोगे ? कहो तो--- ऊंच-नीच और छुआछूत की भर्त्सना-- किस धर्म अथवा पंथ ने नहीं की ? (सुयश की तनी निगाहे शिथिल भाव से नीचे झुकने लगती है।) तब तो---- धर्म सब--- एक ही हुए ? क्यों नरेन्द्र । : (सोल्लास) वाह निमग्न ! वाह---- (निमग्न की पीठ ठोकने लगता है। निमग्न चौककर नरेन्द्र को घूरता कितना जल्दी निचोड़ निकाल लिया तुमने हमारी बातों का (जिज्ञासा भाव से) किन्तु नरेन्द्र- जब धर्म सब एक हैं--- तो पि नामों की भिन्नता क्यों ? पहचान के लिए, मित्र । (समझाने के स्वर में) जरा सोचो---- हम स. 'मनुष्य' हैं--- फिर भी मैं नरेन्द्र---- तुम सुयश---- (अन्य साथियों के और सकेत करते हुए ये निमग्न---- ये विनय क्यों ? क्यों में याया--. बैरिस्टर विश्वनाथ दत कहलाते हैं.... और क्यों हम विद्यासाग मर को विद्यासागर सर--- व भट्टाचार्य मर को भट्टाचार्य सर कहते हैं ? "विविधता' और 'भिन्नता के बीच पहचान' को सुनिश्चित करने के लिए हो तो न ? , सुयश नरेन्द्र .. निमग्न नरेन्द्र .. सुयश नरेन्द्र .. निमग्न .. नरेन्द्र (19) फिर तो यह "मिन्नता' हमें 'बाँटनेवाली' हुई। नहीं... क्योंकि यह वांटना---- हमें 'एकरूपता' से 'बहुरूपता' की ओर ले जाता है, जो "विस्तार' अथवा 'विकास' के लिए आवश्यक है। (रुककर) इतिहास उठाकर देखो--- तो पाओगे कि विकास को गति सदैव ‘एकरूपता' से 'बहुरूपता' की ओर हो रही है। एक 'भावात्मक अन्तर्घारा' बहुरूपोय स्थिति में भो-- उसे परस्पर जोड़े रहती है---- बिखरने नहीं देती। : सो कैसे भला? जैसे बारीक 'धागा' रंगरंग के 'फूलों' की भिन्नता को बनाये रखते हुएं भी उन्हें 'माला' रूप में परस्पर अनुस्यूत किये रहता है---- अथवा 'हाथ' से जुड़ी 'सगुष्ठ अंगुलियाँ'-... अथवा एक ही परिवार में रहने वाले भिन्न-भिन्न रूप-आकार एवं प्रकृति वाले सदस्य। मिथ्या जगत के ये सत्य---- सर्वकालिक और सर्वदेशीय कैसे हो सकते हैं, नरेन्द्र ? (रुककर) 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' वाली उक्ति नहीं सुनी तूने , (प्रश्नात्मक दृष्टि नरेन्द्र के मुख पर गड़ा देता है।) अपवाद कहां नहीं होते, मित्र ? अब हमें ही लो---- (रुककर) भिन्नता हमारे यहां भी है.... (निमान के कंधे पर हाथ रखते हुए) मेरी माँ---- निष्ठावान वैष्णवी---- मगर पीशी बूआ---- (मुँह बनाकर) बाप रे ।.--- ' एकदम कट्टर सनातनो---- त्यौरियां हर वक्त तनी हुई.--- (नाटकीय मुद्रा में) बिना स्नान-ध्यान-कोई चौके में घुस नहीं सकता---- बाएँ हाथ में पात्र पकडकर जल पीना वर्जित । (लम्बी सॉस लेकर) किसको मजाल---- जो छीक अथवा बिल्ली के रास्ता काट देने के बाद कहीं चला जाए---- या कुछ काम कर ले ? (रुककर) मगर बाबा-- एकदम उदार--- गीता भी पढ़ते हैं--- और बाइबिल कुरान भी। इस सबके बावजूद भी परिवार के स्तर पर हम सब एक हैं। मगर---- कल तो तुम कह रहे थे.....कि तुम्हारे बाबा की विधवा चाची ने तुम लोगों को पैतृक घर से बेदखली का नोटिस दे दिया है---- और तुम्हारे बाबा---- : (बीच ही में). "परिवार' की बात 'अदालत' तक चली गई.---. इस "भिन्नता' में कौनसा 'विकास' दीख रहा है तुम्हें नरेन्द्र ? :' (वातावरण में बोझिल हुई जा रही गम्भीरता को कम करते हुए) जो इस प्रकार हर समय शास्त्रार्थ में ही उलझे रहोंगे तो---- (परिहास भाव से सभी के चेहरों पर दृष्टि धुमाकर), जल्दी ही बूढ़े हो जाओगे तुम लोग------ (ठहाका लगाकर हँस पड़ता है। ठीक इसी क्षण छुट्टी को घण्टी बज उठती है। कक्षा में जुटी भीड़ बिखरने लगती है।) .. निमग्न सुयश विनय (20) .. अंक दृश्य एक पाँच .. कक्षा का भीतरी भाग दोपहर । समय .. (अंग्रेजी के अध्यापक मिस्टर हेस्टी. तथा नरेन्द्र के बीच चल रही जोरदार बहस के कारण कक्षा का गरमाया वातावरण तथा भिन्न-भिन्न मुद्राओं में बैठकर यह सब देखने-सुनने में तन्मय सुयश, विनय - निमग्न व अन्य विद्यार्थीगण) , मिस्टर हेस्टी:- (नाक पर सरक आया चश्मा अगुली से ऊपर. सरकाते हुए) तो--- तुम्हारे विचार में-- अंग्रेजी पढनी ही नहीं चाहिए--- क्यों नरेन्द्र , नरेन्द्र जी नहीं, सर । (रुककर) मगर-- उस ढंग से नही--- जिस ढंग से--- आप उसे पढ़ाना चाहते है। मिस्टर हेस्टी: (मुँह बनाकर) ,ओऽऽ--- (नरेन्द्र की ओर आँखे . तरेरकर) यू मीन--- पढ़ाने का दंग----अब हमें-- (सव्यंग्य) तुमसे सीखना होगा ? (हत्के क्रोध के साथ) क्यों ? (शान्त भाव से) मेरा आशय---- ये नहीं था, सर ! मिस्टर हेस्टी: आशय तुम्हारा कुछ भी रहा हो--- मुझे उसकी परवाह नही---- (रुककर) मगर--- इतना समझ लो कि अगर कुछ बनना है- आगे बढ़ना है---- तो अंग्रेजी पढ़नी ही होगी... नरेन्द्र :- (आवेश में सगर्व) - हम क्या अपनी भाषा के मामले में कंगाल है--- जो हमें एक विदेशी भाषा पढ़नी होगी ?::. मिस्टर हेस्टी: भूलते हो---- ये तुम्हारे अपने ही देश के शासकों की भाषा है.--- (मककर) ये विदेशी कैसे हुई 77 जब शामक ही विदेशी है, सर ! (रुककर) तो उसकी भाषा इस देश की---- कैसे मानी जा सकती है (सावेश) और फिर---- किसने बनाय . नरेन्द्र : M (21) उन्हें--- (मुंह बिगाड़कर) इस देश का शासक ? (सुनते ही हेस्टी बुरी तरह तिलमिला उठता है।) मिस्टर हेस्टी... (सनोय) क्या बकते हो ? (अपनी जलती दृष्टि नरेन्द्र के चेहरे पर बिखेरते हुए) तुम्हारी बातों से---- हुकूमत..के खिलाफ---- बगावत की गंध आ रही है, मिस्टर नरेन्द्र । नरेन्द्र .: (कठोर अन्दाज़ में) और मुझे---- आपकी बातों में--- राजनीति की दुर्गन्ध महसूस हो रही है.---- (सव्यंग्य) माननीय शिक्षक महोदय । मिस्टर हेस्टी: (चिल्लाते हुए) नरेन्द्र ! (बौखलाकर उठ खड़ा होता है। नरेन्द्र : - (निर्भीक स्वर में) चिल्लाकर सत्य.को झुठलाया नहीं जा सकता, सर । (पलभर के लिए कक्षा में एकदम सन्नाटा छा जाता है।) (सगर्व) अपने देश की---- अपनी मिट्टी की... अपनी गौरवशाली परम्पराओं की बात कहना----- उस पर गर्व करना----- बगावत नहीं है, सर! .. (नरेन्द्र की बातों का मर्म समझते हुए हेस्टी कुछ क्षण के लिए हतप्रभ बना रहता है। कक्षा में बैठे छात्र मंत्रविद्ध-से कभी अपने अंग्रेजी के अध्यापक हेस्टी को देखते है तो कभी नरेन्द्र का मुँह निहारते लगते है।) (स्थिति को सहज करने का प्रयास करते हुए संयतभाव से) 'मैं यह नहीं (, कहता... कि-- अंमेज़ी या कोई भी अन्य भाषा सीखनी ही नहीं चाहिए। (रुककर) मेरा मानना तो यह है कि---- पहले हम अपनी भाषा में दक्षता प्राप्त करें--.: फिर आगे बढ़ें.... यानि कि---- हम आकाश में कही भी झाँके । किन्तु पावों के नीचे की धरती अपनी ही होनी चाहिए। सच तो यह है कि अपने ही देश में उपलब्ध ज्ञान को आत्मसात् किए बिना ....... विदेशी ज्ञान को पाने के प्रयास में हमारी ही हानि है। (क्षणभर साँस लेकर) अपनी जड़ें जमाए बिना---- कोई भी पौधा--" न फूल खिला सकता है... न फल दे सकता है--- ETAH मिस्टर हेस्टी(आहत अभिमान भरे स्वर में) तो इसका मतलब है---- तुम अंग्रेजी नहीं पढ़ोगे? : (निक भाव से) मैं ही क्या- (आसपास बैठे साथियों पर दृष्टिपात करते हुए यहां कोई भी आपकी अंग्रेजी को नहीं पढ़ेगा---- इस रूप में। मिस्टर हेस्टी: (तिलमिलाए भाव से मेज पर रखो बेत उठाते हुए) खामोश---- (सब ३. विद्याधियों पर दृष्टि घुमाते हुए यहाँ क्या पढ़ाया जाएगा--- कैसे पढ़ायों नरेन्द्र .

-- (22) जाएगा---- इसका फैसला हमारी मर्जी से. होगा---- तुम लोगों से पूछकर नहीं । (हाथ की बेंत को हवा में लहराते हुए) एक बात कान खोलकर सुन लो---- (एक-एक शब्द पर बल देते हुए) अंग्रेजी यहाँ पढ़ाई जाएगी---- और तुम सबको---- उसे पढ़ना पड़ेगा---- (कक्षा में घूरते हुए सक्रोथ) अण्डरस्टैण्ड ? नरेन्द्र नो---- (सावेश) केपीटल नो---. सर ! मिस्टर हेस्टी : व्हाट ? (बौखलाए स्वर मे) अपने टीचर को डिसओबे करते हो । तुम्हारी ये मज़ाल---?" (हाथ में वेंत उठाए हेस्टी नरेन्द्र की ओर लपकता है तथा उस पर ताबड़-तोड़ बेंत बरसाने लगता है। कुछ क्षण नरेन्द्र चुपचाप बेंतों की मार को अपने शरीर पर झेलता रहता है, पर जब बात बर्दाश्त से बाहर होने लगती है तो अपनी मजबूत मुट्ठी में हेस्टी की कलाई को कसकर जहाँ का तहाँ रोक देता है।) नरेन्द्र : (अपनी आग बरसाती निरहों को हेस्टी की बौखलाई निगाहों में डालते हुए) अब और हाथ न चलाइए, सर ! (दाँत पीसकर) वरना---- (ठीक इसी क्षण इन्स्टीट्यूट के प्रिंसिपल ईश्वरचन्द्र विद्यासागर दरवाजे की आड़ से निकलकर कक्षा में तेजी से प्रवेश करते है-) विद्यासागर : (ताड़ना भाव से) ये क्या हो रहा है, नरेन्द्र ? नरेन्द्र : (सहमे स्वर में) सर । (हेस्टी की कलाई छोड़ विनप्रभाव से कुछ पीछे हट जाता है।) क्या हमें अब यहाँ अंग्रेजो को---- विद्यासागर : (निषेधभाव से हाथ उठाते हुए) मैंने सारी बातें सुन ली है.--- (खिसियाए भाव से खड़े हेस्टी की ओर देखकर) मिस्टर हेस्टी ! प्लीज--- अपनी क्लास कन्टीन्यू रखिए---- (नरेन्द्र का कंधा पकड़ते हुए) तुम आओ-~- मेरे साथ---- (हेस्टी पलटकर अपने बैठने के स्थान की ओर बढ़ता है तथा नरेन्द्र को अपने साथ लिए विद्यासागर कक्षा से बाहर बरामदे से होते हुए अपने कमरे की ओर चल देते है।) (आत्पीयमाव से) अपने देश को गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श को भी भूल . गए तुम,नरेन्द्र ? नरेन्द्र : (साय-साय चलते हुए) नहीं, सर ! वह तो हमारी---- शिक्षा-व्यवस्था की आत्मा है---- उमे कैमे भूल जाऊंगा में ?, तो फिर विचारों को भिन्नता को 'व्यक्तिगत' बनाकर तुम्हें मिस्रा हेस्टी से विद्यामागर : लेकिन सर--- राष्ट्रांगरे विद्यासागर : इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए था- नरेन्द्र २ व विद्यासागर : (यात झाटते हुए फेमले ही विदेशी हो.--- विदेशी मानने वाले हों. पर आखिर तो तुम्हारे शुरु हो (आत्मीय मुस्कान के साथ प्रश्नभरी दृष्टि से अपने साथ धीरे-धीरे चल रहे नरेन्द्र को निहारने लगते है।) नरेन्द्र : सो मैं---- मानता हूं, सर ! पर यदि 'गुरु' में 'गुरुत्व' ही न हो... तो क्या किया जाए ? (पलभर साँस लेने के उपरान्त) मिस्टर हेस्टी में 'गुरुत्व' कम--- अपने अंग्रेज होने---- शासक जाति का होने का अभिमान अधिक है। इसीलिए वे.... शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। तुम्हारा---- यह विचार तो सही है, नरेन्द्र ... कि---- 'गुरु' में 'गुरुत्व' होना चाहिए---- पर---- (चलते-चलते फूलों की एक क्यारी के पास रुककर) 'गुरुत्व' का मूल्यांकन--- क्या जाति, धर्म, देश अथवा शासक-शासित की दृष्टि से करना उचित होगा ? (नरेन्द्र निरुत्तर भाव से दृष्टि झुका लेता है।) गुरुत्व' पर किसी का भी एकाधिकार नहीं होता, बेटे ! 'गुरु' कोई भी हो सकता है। इसके लिए तो---- पढ़ा-लिखा होना भी आवश्यक नहीं है। (भावुक स्वर में) जो 'सच्चा ज्ञान' दे.... वही 'गुरु' है। जो ऐसा न होता---- तो एक अति साधारण बहेलिया--- क्या वाल्मीकि के भटके हुए 'कवि' को उसकी सही दिशा इतने सहज भाव से दे पाता---- क्या---- अमर काव्य रामायण की रचना सम्भव हो पाती ? आप ठीक कहते हैं, सर ! (रुककर) ज्ञान तो---."सहज मन से ग्रहण करने का विषय है---- आँख मूंदकर-~~-चुपचाप स्वीकार लेने का नहीं.... (भावावेश मे) कोई पूछे मिस्टर हेस्टी से---- कि वे---- कक्षा में 'शासक' बनकर आते हैं---- या 'शिक्षक' ? विद्यासागर : 'शिक्षक' को तो 'शासक बनकर ही कक्षा में आना पड़ता है, नरेन्द्र ! 'रविद्यासागर के कथन का मर्म न समझ पाने के कारण नरेन्द्र सहसा चौककर उन्हें प्रश्नात्पक भाव से निहारने लगता है।) (मुस्कराते हुए) चौको नहीं---- 'शासक' से मेरा मतलब---- अंग्रेजों की तरह जोर-जबर्दस्ती और अत्याचार दमन-नीति से शासन करने वाले लोगों से नहीं है, बल्कि 'अनुशासक' से है---- यानि कि जो समझाकर---- सिखाकर किसी को अपने अनुसार सोचने-चलने को प्रभावी ढग से प्रेरित करे। (समझाने के अन्दाज़ में) 'अनुशासन' अपने आप में एक "शिक्षा' है.... जीवन के सर्वांगीण विकास व सफलता का एकमात्र मू. 12356 और तब नरेन्द्र :

। - । .. .. .. .. (24) जिसके बिना 'शिक्षा' अधूरी है। नरेन्द्र : जी, सर ! विद्यासागर :- इसीलिए कहता हूँ--- ज्ञानवर्द्धन के लिए अन्य भाषाएँ भी पढ़ना कोई बुरी बात नहीं है.... और यों भी---- सहिष्णुता और उदारता हमारी सांस्कृतिक विरासत है। ::mr नरेन्द्र पर---- क्या अपनी 'अस्मिता' खोकर भी हमारा उदार व सहिष्णु बना रहना--- आवश्यक है, सर? विद्यासागर : नहीं, नरेन्द्र । इस सीमा तक तो. कोई भी स्वाभिमानी व राष्ट्रवादी कभी नहीं जाना चाहेगा। (सुनते ही नरेन्द्र की आँखों में एक चमक-सी कीध उठती है।) नरेन्द्र (चौककर) सर। (अविश्वासभरी दृष्टि एक झटके के साथ उठकर विद्यासागर के 'धीर-गम्भीर मुख पर टिक जाती है।) विद्यासागर : (नरेन्द्र की दृष्टि से दृष्टि मिलाते हुए) हॉ---- (कोमलभाव से नरेन्द्र के कंधे पर अपना हाथ टिका देते है।) 'आदर्श' एक सीमा तक ही व्यवहार्य होते है, बेटे । (रुककर) 'उदारता' और “सहिष्णुता' -भी,तभी तक हमारे लिए ग्राह्य है, जब तक कि वह हमारे 'स्व' और आत्मसम्मान को आहत करने वाली स्थिति न बनने लगे--.. (कुछ पल को चुप्पी में नरेन्द्र के होंठ कुछ कहने को बुदबुदाते हैं, पर इससे पूर्व ही विद्यासागर बोल उठते है-). किन्तु; इसका अर्थ यह भी नहीं---- कि, हम 'मर्यादा' और 'सन्तुलन' को ही भुला बैठे- नरेन्द्र :: (सोत्साह), जब ये अमेज हमें गुलाम समझते हैं... तो फिर हम क्यों उन -..: ... पर अपनी भाषा की निर्भरता-रखें,सरः?. विद्यासागर : इस आयु में भी 'स्वदेश' और स्वाभिमान के विषय में तुम्हारे विचार---- (FE बहुत, गुरु-गम्भीर है, बेटे , ! (प्रसन्न भाव से नरेन्द्र के कपे-पर-हाथ रखकर) --तुम.निश्चय ही एक.दिन----. अपनी असाधारणता को प्रमाणित करते हुए देश का मस्तक ऊंचा.करोगे. (नोन्द्र मावमग्न हो विनय-मुद्रा में दृष्टि झुका लेता है।) ।

(25) T::. भी जुबली नागरी भण्डा य एवं वाचनालय रोल्प लीला एटो I: एक अंक दृश्य ग स्थान बैरिस्टर दत्त के निवास का भीतरी भाग TIT समय ... प्रातकाल । (अपने कमरे में खिड़की के पास बैठकर सितार के तारो पर अपनी अंगुलियों को साधने का सफल-विफल प्रयास करने मे लगा नरेन्द्र। दृष्टि बीच-बीच मे कभी खिड़की के बाहर का परिदृश्य निहार लेती तो कभी लौटकर फिर से कमरे के भीतर के वातावरण और सितार के तारो की झकृति मे डूबने लगती। पर कुछ ही क्षणों में जाने क्या हो जाता है कि-मन फिर से अस्थिर हो उठता और दृष्टि पुन. बाहर भटकने लगती उसकी,। - ...। अपने आप से घिरे, नरेन्द्र को इस बात का जरा भी आभास नहीं हो पाया कि पीशी,बूआ हाथ की छड़ी.को जमीन पर टिकाए दरवाजे पर खड़ी अपनी अनुभवी दृष्टि से चुपचाप उसे पढ़ने की चेष्टा कर रही है। पीशी बुआ अधिक समय चुपचाप नही रह सकी-) पीशी बूआ :'(ताड़नां भाव से)- तीन दिन परीक्षा के रह गए। और तू यहाँ सितार के पीछे पड़ा है रे नरेन्द्र (अपने आप में खोया नरेन्द्र एक झटके से चौकता हुआ तत्क्षण अपने मनोद्वन्द्व को अपने ही भीतर धकेल संयत हो जाता है।) नरेन्द्र (शरारत भरी मुस्कान के साथ) मैं सितार के पीछे पडा हूं.... ये तुमसे किसने कह दिया, पोशी बुआ ?" (छड़ी टिकाती हुई तथा मोटे चश्मे में से आँखें फैलाकर ठीक से देखने का प्रयास करतो पीशी बूआ भीतर आ जाती है नरेन्द्र के एकदम पास-) F- :

(26) पोशी आ -- (ठीक से देखने का सफल-विफल प्रयास करती हुई) कहेगा कौन- देख जो रही हूँ.:.. :: नरेन्द्र : (मुंह बनाकर) ओss-... पीशी बुआ ? अब जब देख ही रही हो---- तो जरा ध्यान से देखो---- मैं सितार के पीछे पड़ा हूँ-- या ये सितार हो मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ा है। पोशी बूआ : (एक हाथ कमर पर टिकाकर) क्या मतलब रे ? नरेन्द्र : (नाटकीय अन्दाज़ मे) अब देखो .. मैंने तो सितार को सिर्फ धूल झाड़ने को हो छुआ था--- मगर मौका पाकर इस सितार ने ही मेरी अंगुलियों को अपने से चिपका लिया--- (मै सब समझती हूँ' के अन्दाज में पोशी बूआ अपनी गर्दन हिलाती (सफाई देता हुआ) सच पीशी बूआ---- अंगुलियों ऐसी चिपकी---- ऐसी चिपकी---- कि बस-~~~ छूटने का नाम ही नहीं ले रही (कृत्रिम भोलेपन के साथ) तुम्ही बताओ-~~- मैं अब क्या करूँ ? (मुंह यनाकर) विवशता में सितार बजाना पड़ रहा है.... (नरेन्द्र के नाटकीय अन्दाज़ से पीशी बूआ के होठों पर बरबस एक मोठी मुस्कान खिंच जाती है।) पीशी बूआ : ' (छड़ी उठाकर) शैतान कही के ! मुझे समझाता है ? (कुछ झुककर दूसरे हाथ से नरेन्द्र का कान पकड़ लेती है।) (मीठी ताड़ना के साथ) अरे } तेरे बैरिस्टर बाप को गोदी में खिला चुकी हूँ.... और तुझे नही समझूगी भला ? मगर---- (सहसा कुछ याद आ जाने से पोशो बूआ एकदम उदास हो खिड़की से बाहर का शून्य निहारने लगती है। नरेन्द्र के कानो पर अगुलियों की पकड़ ढीली हो जाती है तथा हवा उठी छड़ी भी निढालभाव से दुलकती हुई पुनः जमीन पर जा टिकती है। नरेन्द्र चौककर निगाहे उठा पीशी यूआ के उदास गम्भीर चेहरे और - अतीत मे खोई बूढ़ी दृष्टि को निहारने लगता है।) नरेन्द्र :, (साश्चर्य) पीशी बूआ ' (अतीत में खोई पोशी यूआ बोली नही कुछ ।) (झकझोरते हुए) पीशी वूआ.... पोशी वृआ : (चौककर जागती हुई-सी) हाँ.... नरेन्द्र क्या बात है ? तुम अचानक.... चुप क्यों हो गई.? और चेहरे पर ये . . उदासी ।

(27) नरेन्द्र पोशी बूआ : (नरेन्द्र को निहारती हुई बनावटी मुस्कान के साथ) कुछ भी तो नहीं रे । (मन के भावों को छुपाती हुई) अचानक तेरे दादा याद आ गए थे---- : (उत्सुकभाव से) तो सुनाओ न, पोशी बूआ... दादा के जीवन का सत्य---- (अपनी गलती का बोध होते ही पीशी वूआ चौककर दांतों तले अपनी जीभ दबा लेती है- 'हे भगवान ! आग लगे मेरी इस जीभ को भी। ये कैसा प्रसंग छेड़ बैठी मै ?) (बालकों की भॉति हाथ पकड़कर मचलते स्वर में) बोलो, पोशी बूआ । पीशी बूआ : (आँखें तरेरकर) तुझे इससे क्या ? (नरेन्द्र का हाथ झटक देती है।) परीक्षा सिर पर है। बैठकर पढ़ाई कर---- मुझे घर में और भी काम है---- (जाने को उद्यत होती है कि नरेन्द्र फिर पीशी यूआ का हाथ पकड़ लेता है। नरेन्द्र : (हाथ पकड़कर) बैठ जाओ---- आज सब कुछ जानकर ही रहूँगा---- (पोशी बूआ को अपने पास तख्त पर बैठा लेता है।) पीशी बूआ : (प्रसंग को दिशा बदलती हुई) कलकते में उनका अच्छा-खासा नाम था---- घर में लक्ष्मी चेरी बनकर रहती थी---- भरा-पूरा परिवार था.... (दोनों हाथ नचाती हुई) बस--- और क्या ? नरेन्द्र : (मुँह बनाकर) यों मुझे... बहला न सकोगी, पोशो बूआ ! पीशी बूआ : (झुंझलाए अन्दाज़ में घूरकर) तू क्या---- दादा का जीवन-इतिहास लिखेगा ? : यदि जीवन-इतिहास ही लिखना होता---- तो अब तक कभी का लिख चुका होता मैं, पीशी बूआ ! पीशी बूआ : तो फिर--- खोद-खोदकर क्यों पूछ रहा है तू इतना ? नरेन्द्र : नही पृडूंगा---- (रुककर) बस---- इतना बतला दो.... दादा संन्यासी बनकर घर से क्यों चले गए थे ?. (गाल पर हाथ लगा विस्मयभाव से चौकती हुई) बारा रे । तुझे---- पता है, ये बात? : (विजयी मुस्कान के साथ) पता तो मुझे.... और भी बहुत है, पीशी बुआ । पर---- (रुककर) सुनी सुनाई बातों में सत्य क्या है- चाहता हूँ। और क्या सुना तूने, नरेन्द्र पीशी बूआ .... यह पीशी वृआ:

(28) नरेन्द्र .. सुना है.... मेरी दुखिया दादो--- अपने संन्यासी पति की खोज में कहाँ-कहाँ नहीं भटको ? तीन वर्ष के छोटे से बालक मेरे बाबा को लिए-लिए वह काशी तक गई। उसने काशी का एक-एक मन्दिर और भार छान मारा । (रुककर) लोग कहते हैं.... एक बार जब वह अचेत होकर गिर पड़ी.... तो एक अनजान संन्यासी ने उसको.सेवा कर चेतना लौटाई। लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि वह अनजान संन्यासी स्वयं दादा ही थे। वास्तव में वह अनजान संन्यासी कौन था और दादी की चेतना लौटते ही काशी की भीड़ में कहाँ खो गया--- यह रहस्य आज भी बना हुआ है। - (सारी बात सुनकर पोशी यूआ घबरा जातो है।) पोशी यूआ : (ऊँचे स्वर में) यह रानी ! सुनती हो ? (एक क्षण रुककर) कहाँ हो तुम, भुवन ? भुवनेश्वरी : (दूर से ही) जी---- आई55.... (अगले ही क्षण तेजी से कमरे मे भुवनेश्वरी का प्रवेश) क्या बात है,बूआजी ? (नरेन्द्र पर दृष्टि डालती हुई) इसने---- फिर कोई शरारत की पोशी चूआ : सावधान हो जा---- बहू रानी । तेरे इस लाडले बिलेह के पेट में... दाढी निकलने लगी है.... (सुनते ही 'भुवनेश्वरी को हंसी छूटने-छूटने कों होती है पर पोशी बूआ के चेहरे पर विखरी चिन्ता व गम्भीरता को देख छूट नहीं पाती।) भुवनेश्वरी : (सविस्मय) पेट में दाढ़ी ? (सशंक भाव से) मै कुछ---- समझी नही, पीशी बुआ ! नरेन्द्र : (शरारती मुस्कान के साथ) माँ। पोशी. बुआ को भय है.... कि कहीं---- वह दादी. और अधिक लम्बी होकर---- मेरे पेट से. बाहर न निकल जाए.... क्योकि... भुवनेश्वरी : (उत्सुक स्वर में) क्योंकि ? नरेन्द्र (बटुल मुद्दा बनाते हुए) , क्योंकि मैं यह भी जानता हूँ कि तुम आज तक भी सोमवार का व्रत नियमित रूप से क्यों करती हो । (मककर) प्रतिवर्ष नियम से काशी के वोरेश्वर मन्दिर में अनुष्ठान क्यों करवाती हो ? (परिहासमाव से) इसीलिए न--- कि मैं कहीं.... दादा के रास्ते न चला जाऊं.. संन्यासी न बन जाऊँ" : (कठोर स्वर में) नरेन ? -- .

(29) पोशी बूआ :. F TW नरेन्द्र (स्तब्ध भाव से); तू---- भीतर से इतना गहरा है,रे ? FREri (नरेन्द्र चटुल भाव से हँस पड़ता है।) : (चटुल हँसी के साथ) क्या---- अब भी नहीं बतलाओगी, पीशी बूआ---- कि दादा---- संन्यासी बनकर घर से क्यों चले गए थे। पोशी बूआ:(हताश और आशंकित स्वर में) कहूँगी---- सब कुछ कहूँगी---- पर पहले एक वचन देना होगा तुझें ।।। नरेन्द्र कैसा वचन । (पीशी वूआ छड़ी के सहारे धोर-से उठकर सावधानी पूर्वक एक-एक कदम टिकाती नरेन्द्र के पास आती है।) बोलो, पीशी.बुआ ! कैसा वचन चाहती हो तुम,मुझसे-?.. : (एक दृष्टि भुवनेश्वरी के मुख पर डालती हुई नरेन्द्र को निहारने लगती . है। पीशी वूआ । T" (ममत्व भाव से नरेन्द्र के केश सहलाती हुई): वचन दे.... तू दादा के मार्ग का अनुसरण नहीं करेगा---- . (पल भर के लिए नरेन्द्र और पोशी बुआ की दृष्टियों एक-दूसरे पर स्थिर हो जाती है।) ... (गम्भीर होकर) दूंगा वचन- पर पहले यह तो जान लूँ.--- कि दादा ने अपना घर-संसार क्यों छोड़ा? पीशी वूआ । इस घर-ससार से... बेचारे, तेरे दादा को मिला ही क्या था---.: (सव्यथा): सिवाय, शोक, कष्ट, विश्वासघात; और तिरस्कार के ? (अतीत मे डूबती हुई) पिता राममोहन दत्त के असामयिक निधन से तेरे दादा को छोटी-मी उम्र में ही अनाथ और असहाय हो जाना पड़ा। तब तेरी दादी भी छोटी ही थी। तरुण होने, तक वे लोग इस दुनियादारी के हाथों जाने कितनी बार ठगे गए। पर-- इतने ही से पीछा नहीं छूटा-- (लप्वी साँस लेती हुई पोशी वूआ पलभर चुप रहती है।) (भावुक स्वर मे) इधर मैं करमजली बहिन- विधवा हो---- इस घर में कुण्डली मारकर आ बैठी तेरे.... पहले ही से दुःखी.दादा-दादी की छाती. पर। इतना ही नही, ननद होने के अभिमान में चूर-... मैने---- किस-किस तरह तेरो दादी को तिरस्कृत और पीड़ित नहीं किया। बेचारे तेरे दादा---- न तो अपनी सीधी-सादी निरीह पत्नी को पीडा से दृष्टि फिरा मेके---- और न -हो---- नियति के हाथों पिटी अपनी अभागिन; किन्तु अहंकारी बहिन से कुछ कह सके। (आहत भाव से पुन. तख्त पर बैठ जाती है।) ऐसे में बेचारे भैया--- भीतर ही भीतर घुटते रहे.... और इसी घुटन ने (30) उनके मन में ससार के प्रति वितृष्णा उत्पन्न कर दी और वे.... (भावावेश में सहसा कण्ठावरोध हो जाने के कारण पीशी बूआ और कुछ न कह सकी। बूढ़ी आँखों में पीड़ा तरलायित हो उठी। पलभर के लिए कमरे के भीतर का सब कुछ जैसे ठहर गया। गतिमान थी तो केवल तीनो की मौन साँसें ।) नरेन्द्र तो क्या--- जीवन-सघर्षों से बचने का उपाय---- संन्यास है, पीशी बुआ' पीशी बूआ : (चौककर) तू फिर---- व्यर्थ को बकवास करने लगा ? नरेन्द्र : तुमने दादा को समझाया नहीं कभी ? पोशी बूआ : (कठोर स्वर में) मैं अहंकारी---- जब स्वयं ही न समझी---- तो उन्हें क्या समझाती ? (रुककर) और यों भी-~~ दत परिवार के पुरुषों ने कभी सुनी है स्त्रियों की बात---- जो भैया सुनते ? (झुंझलाए भाव से) तू सुनता है घर में किसी की । नरेन्द्र फिक्र न करो। जब सुनने लायक होऊंगा---- तब अवश्य सुनूंगा---- (रुककर) और फिर सब पुरुष---- क्या ऐसे ही होते हैं । पीशो बूआ ; तो फिर वचन दे कि तू कभी दादा के मार्ग का अनुसरण नहीं करेगा---- (पास खड़े नरेन्द्र का हाथ पकड़ उसे भावमयी दृष्टि से निहारने लगती नरेन्द्र नही करूँगा पीशी बुआ । (माँ भुवनेश्वरी की ओर देखते हुए) कभी मां-बाबा के नाम को लजाऊंगा नहीं। (दृढ़ शब्दों मे) विषमताओं और प्रतिकूलताओं से कभी हार नहीं मानूंगा---- भुवनेश्वरी : (नरेन्द्र का कघा थामकर) मुझे अपने बिलेह से यही आशा थी--- | (ममता भाव से नरेन्द्र को अपने में सटा लेती है।) (नरेन्द्र के केश सहलाती हुई) तो अब से तू.... ब्रह्मसमाज के जल्सों और मण्डलियो में नहीं जाएगान पुत्र ? (रुककर) और न ही---- सन्यासियों के पीछे भागेगा। नरेन्द्र : (चौककर) यह तूने कैसे मान लिया. मां---- कि में ब्रह्मममाज के जल्सों और गोष्ठियों में नहीं जाऊंगा-~~ और सन्यासियों में नही मिलूँगा ? भुवनेश्वरी : (तीव स्वर में) नरेन । नरेन्द्र : (समझाते हुए) देखो, माँ । अपने भीतर उद्वेलित प्रश्नों के सत्य तलाशने के लिए जहां भी जाना रोगा-- जाऊँगा... और मिलूँगा भी उन सबमे--- जिनसे मुझे मिलना है....' (आहत भाव से) तो पिर उस वचन का क्या होगा---- जो तूने ..

(31) कर्म-अभी दिया है ? नरेन्द्र : मैंने वचन---- केवल दादा के मार्ग का अनुसरण न करने का दिया है. मां ! (रुककर) अपने को बांधकर किसी अन्धेरे कोने में पटक देने का नहीं- (सहसा नरेन्द्र के भीतर कुछ घुमड़ने लगता है। मुख पर कुछ ऐसे भाव उमरते हैं जिन्हें न पोशी बूआ समझ पाती है न मों भुवनेश्वरी) (अपने आप से) वह 'प्रकाश' क्या---- यो हो मिल जाता है किसी को ? पीशी वूआ : (सशंक भाव से) क्सि 'प्रकाश' की बात कहता है रे तू ? नरेन्द्र : (भावमय स्वर में) वही---- जिससे ये सम्पूर्ण जड़-चेतन प्रकाशमान है---- और जो---- अनन्त अनन्त 'मरीचिकाओं से घिरा है। .(नरेन्द्र के कथन का आशय कुछ-कुछ समझाती हुई-सी भुवनेश्वरी और पोशी बूआ - दोनों ही किसी अज्ञात आशंका से काँप उठती भुवनेश्वरी : : (प्रसंग की दिशा बदलने के उद्देश्य से) पहले अपनी परीक्षा तो दे ले.... बस तीन ही दिन शेष रह गए हैं। नरेन्द्र : मुझे तो इससे भी बड़ी परीक्षा देनी है, माँ-... और उसमें उत्तीर्ण भी होना है। (सहसा भावावेश में खिड़की के पास आ बाहर का शून्य निहारने लगता है। भुवनेश्वरी लपककर उसे कंधे से पकड़ लेती है।) भुवनेश्वरी : (झकझोरती हुई) बिलेह-... बिलेह-... (पर नरेन्द्र बेसुध-सा एकटक भाव से शून्य निहारता रहता है। उसकी अपलक दृष्टि को देश भुवनेश्वरी डर जाती है।) (कातर स्वर मे) बूआजी 1 मेरे बिलेह को क्या हो गया ? (पीशी यूआ घबराकर एक इष्टके से उठ खड़ी होती है। ठीक इसी क्षण हड़बड़ाई श्यामा का प्रवेश-) बऊदी---- बऊदी.... बाबू रायपुर से लौट आए है.... (पर भीतर की स्थिति को देख उसके कदम और पाणी जहाँ के तहाँ टिठक जाते है।) . " श्यामा - . (32) .. अंक दो दृश्य एक स्थान : बैरिस्टर दत्त का शयनकक्ष समय दोपहर (शयनकक्ष में खिड़की के पास रखी लम्बी आरामकुर्सी पर पाँव फैलाए 'आराम' की मुद्रा में बैठकर सिगार के लम्बे-लम्बे कश खीचने, पुंए के छल्ले उगलते तथा बीच-बीच में बगल की कुर्सी पर वैठी अपनी पत्नी भुवनेश्वरी' से बतियाते वैरिस्टर विश्वनाथ दत्त । अभी-अभी प्रमंगवश विश्वनाथ दत्त द्वारा परिहास के अन्दाज़ में कही गई किसी बात का प्रभाव पति-पत्नी - दोनो ही के चेहरों पर स्पष्ट P : 'दीख पड़ता है ।) ::: भुवनेश्वरी : (मुंह पर हाथ रख तिर्यक् दृष्टि से पति को निहारती हुई) बाबा रे । तुम तो 'कानून' छोड़--- अंब'दर्शन' में भी देखल करने लगे। विश्वनाथ : 'कानून' तो हमारे 'संसार-धर्म' के निर्वाह का साधनमात्र है, भुवन' । (चुटकी बजाकर बगल में रखी ऐश-टे में सिगार की राख को झाड़ते हुए) जबकि 'दर्शन' जीवन का सारतत्त्व---- (वात करते-करते दृष्टि सामने शून्य में गड़ाए विश्वनाथ दत्त सहसा - : * कुंछ सोचिने संगते हैं। भुवनेश्वरी पति की मुद्रा में अचानक हुए इस परिवर्तन को समझ नही पाती और कुछ क्षण निहारती रहती है।) भुवनेश्वरी : (उत्सुळ स्वर में) क्या सोचने लगे ? | विश्वनाथ : (थके भाव से) सोचता हूं---- रायपुरं वाला ऑफिस बन्द कर दूं.... और स्थायीरूप से अब यहीं टिक जाऊ। भुवनेश्वरी : (चांककर) सो क्यों ? मुंशीजी तो कह रहे थे--- तुम्हारा वहाँ का काम दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है.--- और तुम.... (यान काटकर) मुशीजी ठीक ही कर रहे थे, भुवन ! मगर---- . 3 1 (33) . .. भुवनेश्वरी : मगर क्या ? विश्वनाथ : मगर इतने सारे फैले काम को सम्हालेगा कौन ? (रुककर) दो नावों के सवार जैसी स्थिति हो गई है मेरी। (सिगार के तीन-चार लम्वे लम्बे कश लेकर धुंआ छोड़ते हुए विश्वनाथ दत्त शेप दवे टुकड़े को ऐश-ट्रे में रगड़कर छोड़ देते हैं।) (आरामकुर्सी पर कुछ और फैलते हुए) यहाँ रहता हूं तो---- रायपुर वाला काम चौपट होने लगता है.... और रायपुर जाता हूँ---- यहाँ पीछे काम गड़बड़ाने लगता है। (लम्बी सॉस लेकर) समझ में नहीं आता---- मैं अकेला क्या-क्या करूँ ? (रुककर) तिस पर--- कुछ दिनों से तबियत भी ठीक नहीं लग रही---- भुवनेश्वरी : (चिन्तित स्वर में) क्या हुआ तबियत को ? (पास सरककर कोमलभाव से आरामकुर्सी के हत्थे पर टिके पति के हाथ पर अपना हाथ रख देती है।) विश्वनाथ लगता है---- रायपुर का पानी रास नहीं आया मुझे---- (थके भाव से लम्बी सॉस लेते हुए) और यों भी-:-- रायपुर और कलकत्ता के बीच चक्कर लगाते-लगाते---- अब थक चला हूँ मैं। (आरामकुर्सी के सिरहाने टिके अपने सिर के नीचे क्षैतिजिक मुद्रा में दोनों हाथ फैलाकर लगाते हुए विश्वनाथ दत्त छत निहारने लगते है।) क्या बात है ? कोई दुविधा है मन में ? विश्वनाथ : (अपने आप में डूबे हुए ही) बस यों ही---- सिर कुछ भारी है.... (रुककर) सम्भवतः यात्रा की थकान से---- भुवन : तो मैं---- तुम्हारे सिर में तेल मल देती हूँ। (उठकर तेल की शीशी लेने बगल की आल्मारी की ओर बढ़ती है।) विश्वनाथ . रहने दो, भुवन । तुम भी तो पूरे दिन अपनी गृहस्थी में खटते-खटते थक जाती हो भुवनेश्वरी : (हथेली में तेल ले पति के माथे पर मलती हुई) स्त्रियों का क्या है ? उन्हें तो अपना धर्म निभाना ही होता है। विश्वनाथ : (चौकी मुद्रा में सिर घुमा अपने पीछे खड़ी भुवनेश्वरी को निहारते हुए) (झुकी पलकों में कोमलता और अधरों पर मीठी मुस्कान लिए भुवनेश्वरी दोनों हाथों से विश्वनाथ दत्त का अपनी ओर घूमकर उठा हुआ सिर पूर्ववत् सीधा कर पुन, तेल मलने लगती है।) भुवनेश्वरी : (तेल मलते-मलते ही) पुरुष की बात पुरुष जाने---- (मोठी मुस्कान के माय परिहास-मुद्रा में) हॉ---- इतना अवश्य समझ गई हूं---- कि'' भुवनेश्वरी : : और---- पुरुष ? . .

विश्वनाथ : (34) पुरुष--- छुपाने की कला में बहुत पटु होते है। किन्तु---- इसके लिए तुम्हें.... अपना आरोप प्रमाणित करना होगा. अन्यथा--- (परिहास के अन्दाज में मुँह बनाकर) मानहानि का दान दायर हो जाएगा---- भुवनेश्वरी : (परिहास-भाव से) आखिर---- लगे न अपनी कानूनी भाषा में वा करने पर ध्यान रहे---- (नाटकीय मुद्रा में) ये तुम्हारी अदालत ना है... और न हो यहाँ कोई.... 'मी लॉर्ड है। (दोनों एक साथ हँस पड़ते हैं। ठीक इसी क्षण छोटी बिटिया स्वर्णमयी का प्रवेश-) बाबा । मुंशीजो बाहर---- मुवक्किलों वाले कमरे में आपका इन्तजार व स्वर्णमयी : .. भुवनेश्वरी : (तेल के विकने हाथ पौछती हुई) बेटे । मुंशी जी को बोलो---- बान धके हैं--- तबियत भी ठीक नही है उनकी--- । (पुन पास वाली कुर पर बैठनी हुई) यहीं आ जाएं.... स्वर्णमयो : (दुपट्टे कर छोर अंगुली मे लपेटती हुई) जी, माँ ! (जाने को मुड़ती है।) विश्वनाथ : क्या बात है, स्वर्ण ! आजकल बहुत गम्भीर रहने लगी है तू ? (जाते-जाते स्वर्णमयी ठिठक जाती है।) (पलटकर यात्रा के पास आती हुई) परीक्षाएं चल रही हैं न, बाबा इसीलिए.... (विश्वनाथ सेहभाव से स्वर्णमयी का हाथ पकड़ सहलाने लगते है।) बाबा । इस बार तो----जल्दी नहीं लौटेंगे न आप? विश्वनाथ : (भावुक स्वर में) नहीं, बिटिया । अब मैं अधिक से अधिक समय... तुम लोगों के साथ ही बिताऊंगा--1 (रुककर) जाओ---- मुंशीजी के स्वर्णभयो : स्वर्णमयी : जो, वाया। (प्रस्थान) (एक लम्बी मांस के साथ विश्वनाथ दत फिर से 'आराम' की मुद्रा में कुर्मी में पीठ दिका लेते है। भुग्नेश्वरी भी साड़ी का पल्लू पीच ठीक से माया दापनी हुई मरलकर 'प्रतीक्षा को पुहा में सेंट जानी है। मामा ग्रामर रानाने तथा फस पर पड़ी की 'टक टक्' की मिली-जुली नियों के योव द्वार पर पोशी युआ आनी टीय पड़ती (35) पोशी बूआ : (धीरे-धीरे उसी ओर आती हुई) मुंशी क्या खबर लाया, बिशू ? (भुवनेश्वरी शालीनभाव से उठकर दूसरी कुर्सी पर जा बैठती है।) विश्वनाथ : मुंशीजी को---- यही बुलवा लिया है, बूआ ! आते ही होंगे---- (पास वाली कुर्सी की ओर संकेत करते हुए) बैठो। (घुटनों के दर्द से यदा-कदा कराहती व लंगड़ाती पीशी बूआ सावधानीपूर्वक पासवाली कुर्सी पर बैठ जाती है। इस बीच हाथ में कागजो का छोटा-सा पुलिन्दा लिए मुंशी जी आ पहुँचते है।) मुंशीजी : (हाथ जोड़कर) प्रणाम बऊदी---- प्रणाम बाबू---- (पीशी बूआ पर दृष्टि पड़ते ही) ओऽऽ---- पीशी बूआ भी यही हैं----(हाथ जोड़ माथा नवाते हुए) दण्डवत् करता हूँ, पीशी बूआ ! पोशी बूआ : (मुस्कान भरे बुजुर्गाना अन्दाज़ मे) खुश रहो, मुंशी । खुश रहो---- (रुककर) कहो---- अच्छे समाचार लाए हो न ? (मुंशीजी बिना कुछ बोले पास आ कागजों का पुलिन्दा विश्वनाथ दत्त के हाथों में थमा दूसरी कुर्सी पर बैठ जाते है। विश्वनाथ दत्त चश्मा ठीक से सरकाकर मुशी जी के दिए कागजो को उलटने-पलटने तथा कहीं-कही से पढ़ने लगते हैं। भुवनेश्वरी और पीशी बूआ बढ़ी हुई धड़कनों के बीच अपनी उत्सुक-अधीर दृष्टि कभी विश्वनाथ दत्त के हाथो में फैले कागजों पर गड़ाती है तो कभी विश्वनाथ के चेहरे पर आ-जा रहे भावो पर, किन्तु कुछ भी समझ नही पाती। इसी ऊहापोह में कई क्षण खामोशी में गुजर जाते है। (अधीर होती हुई) क्या हुआ, बिशू ? क्या लिखा है इन कागजों में ? (विश्वनाथ कोई उत्तर नही देते। दृष्टि अभी भी कागजो में भटक रही थी।) (आशकित भाव से) चुप क्यों हो ? कुछ कहो न । विश्वनाथ : (लम्वी साँस लेकर) काकी के इस दावे को... अदालत ने मान लिया है कि.... ---- यह भवन वास्तव में उनके पति का है... और हम लोग इम पर गैर-कानूनी कब्जा किए बैठे है।। भुवनेश्वरी : (स्तथ्य भाव से) क्या ? पोशी वूआ : (सावेश) हे भगवान । इसमे बडा इठ--- मंमार में और क्या । सकता पोशी यूआ - भुवनेश्वरी : (पलभर के लिए सब स्तव्य से बंटे रते है। कोई कुछ नही बोल पाता।। (भावावेग मे यहती हुई) लगता है. छोटी यज्दी-... सचिन हामी ही निगल जाना चाहती है।

(30) भुवनेश्वरी : (भीतर ही भीतर टूटती हुई-सो) अब क्या होगा? विश्वनाथ : लगता है.... एक बार तो हमें यह घर छोड़ना ही होगा । (स्ककर) और यो भी मन की सुख-शान्ति के लिए मैं इसे जरूरी भी समझता हूँ। भुवनेश्वरी : (अधीर आवेश के साथ) तो क्या---- इतनी आसानी से अपने पूर्वजों का घर---- यों ही छोड़ दोगे ? विश्वनाथ : तुम लोग फिक्र न करो.... हम आगे ऊंची अदालत में जाएंगे---- हक नहीं छोड़ेंगे। (समझाते हुए) पर सोचो.... जब तक हमें हमारा जायज हक नहीं मिल जाता---- तब तक इस प्रकार अशान्ति और दुर्भावनाओं से भरे माहौल में अपने को झोके रहने से लाभ क्या होगा ? (भुवनेश्वरी और पीशी वूआ कुछ नहीं बोल पातीं।) मुंशी जी ! मुंशीजी (हाथ जोड़कर उठते हुए) जी, बाबू (कागज आगे बढ़ाते हुए) ये सभी कागज राखाल को सौंप दीजिए--- आगे की कार्यवाही के लिए---- मुशीजी (कागज लेकर) जी, बाबू ! चलता हूँ.... (हाथ जोड़कर) प्रणाम । (कागज समेटते हुए उदास मन और भारी कदमों से मुशी जी चल देते विश्वनाथ : उनके जाते ही पीशी बूआ भी तमककर उठ खड़ी होती है।) पोशी बूआ : (सावेश) मैं अभी जाती हूँ, छोटी बऊदी के पास---- और पृछती हूँ- दत्त वश के मान-सम्मान को अदालत के कटघरे में इस तरह खड़ा करने की हिम्मत कैसे हुई उनको । विश्वनाथ : कोई लाभ नही होगा इससे वृआ ! उल्टे जली-कटी सुनने-सुनाने के चक्कर में---- कटुना और बढ़ जायेगी। पोशी बूआ : (उत्तेजित स्वर में) तो क्या हम---- अन्याय का प्रतिकार भी न करें । विश्वनाथ :, प्रतिकार---- समझाने-बुझाने अथवा प्रार्थनाएं करने से नही होता, बूआ । (समझाते हुए) तुम फिन न करो.... हम आगे अपील करेंगे। यों भी अदालत की लडाई को अदालत में ही लड़ना ठीक रहेगा---- तू रख अपनी अदालत--- अपने ही पाप्स.... (भावावेश में पोशो यूआ के भीतर उफन रही आत्मव्यथा चेहरे और शब्दों में फूट पड़ती है।) मुझ करमज़ली के मनहूस माये तते.... दत्त वंश ने जाने कितनी ही अनहोनियों को झेला है--- (कहते-कहते पीशी वृआ की वाणी नम हो जाती है तथा कण्ठावरोध के साथ आँखें भी तरलायित हो उठती है।) पीशीबूआ (37) विश्वनाथ कैसी बातें करती हो, बूआ ? (भावुक स्वर में) बुजुर्गों का साया---- कभी मनहूस नही होता। वह तो आशीर्वादों की शीतल-सुखद छाया होती है---- जिसके तले जीवन की बगिया दिन-रात महकती रहती है। भुवनेश्वरी : (पीशी बूआ के पास आ उनका कंधा पकड़कर) हम आपको वहाँ... अपमानित होने नहीं जाने देंगे, बूआ । बात मेरे अपमान की नहीं.-..- समूचे दत्तवंश के अपमान की है, भुवन (सव्यथा) क्या दत्तवश के अपमान से मेरा अपमान बड़ा है ? (भुवनेश्वरी के पास इस तर्क का कोई उत्तर न था। वह दृष्टि झुका लेती पीशी बूआ : .. मैं अब और चुप नहीं रह सकती, बिटिया ! (सावेश) मुझे एक बार जाना ही होगा वहाँ---- विश्वनाथ मान जाओ, बूआ ! (किन्तु, पीशी बूआ रुकती नहीं। विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी उन्हें जाते हुए चुपचाप देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। कुछ क्षण चिन्ताबोझिल चुप्पी मे निकल जाते है।) भुवनेश्वरी :- (विन्तित स्वर मे) फिर हम लोग रहेंगे कहाँ ? यह भी कोई पूछने की बात है । (स्थिति की गम्भीरता को हल्का करने के उद्देश्य से हँस देते है।) (कृत्रिम सहजता के भाव से) एक अच्छा-सा घर किराए पर ले लेंगे---- - विश्वनाथ : और क्या ? .. भुवनेश्वरी : (सव्यथा) कितनी अजीब बात है--- अपना घर होते हुए भी हमें---- किराए के घर में रहना पड़ेगा---- विश्वनाथ : (फीकी मुस्कान के साथ) पहले घर--- 'अपना' तो सिद्ध हो । भुवनेश्वरी : इस घर के... हम लोग भी तो समानरूप से उत्तराधिकारी हैं ? (रुककर), ससुरजी बड़े थे और काका छोटे---- तिस पर आपने अपनी कितनी कमाई खर्च को है.... इस भवन और परिवार पर-... यह क्या किसी से छुपा है ? (सावेश) क्या केवल किसी के कह देने भर से यह घर उनका हो जाएगा? मात्र कह देने भर की ही बात नहीं है, भाई ! उन्होंने अदालत में इसे सिद्ध किया है तभी तो---- (तमककर) क्या कहकर सिद्ध किया है ? उनका कहना है कि दुर्गादाम दत्त यानि कि मेरे पिता--- यानि कि तुम्को ससुर ने.... संन्याम ग्रहण करते समय अपने मारे पैतृक अधिकार विश्वनाथ : भुवनेश्वरी: विश्वनाथ :

(38) .. के पक्ष में त्याग दिए थे। (सुनकर भुवनेश्वरी के मुंह से व्यथा भरी निश्वास निकल जाती है ।), भुवनेश्वरी : पाण्डु का राज्य हड़पने के लिए---. धृतराष्ट्र ने भी ऐसे ही तर्क दिए थे। विश्वनाथ : इसीलिए तो---- महाभारत हुआ---- भुवनेश्वरी : इन लोगों ने भी तो 'भूमिका'--- महाभारत की ही बना डाली है--- किन्तु.... विश्वनाथ : किन्तु क्या ? भुवनेश्वरी : किन्तु तुम---...- पाण्डवों के समान अपने लिए 'कृष्ण' कहाँ से लाओगे ? विश्वनाथ : (सविस्मय) ऐसा क्यों कहती हो, भुवन ? कृष्ण तो घर में ही मौजूद है-~-- (भावुक स्वर में) अपना नरेन्द्र---- (नरेन्द्र की बात आते ही भुवनेश्वरी उदास हो जाती है, पर मन मे सहसा उत्साह उमड़ आने के कारण विश्वनाथ इस पर ध्यान नही दे पाते ।) बी.ए पूरा होते ही---- हम तान्त नरेन को कानून की पढाई शुरू करवा देंगे। (कल्पना के सुख मे इते हुए) देखना---- बहुत जल्दी ही हमारा नरेन-... कलकत्ता के नामी बैरिस्टरों में गिना जाने लगेगा---- और तब---- (भीतर घुमड़ रही घुटन तथा चेहरे पर छलक आए उदासी के भावो को पति की दृष्टि से छुपाने के उद्देश्य से भुवनेश्वरी खिड़की की ओर मुँह फिरा बाहर का शून्य निहारने लगती हैं। अपनी बात पर ऐसी ठण्डी और अनपेक्षित प्रतिक्रिया से विस्मित विश्वनाथ बैठे न रह सकने के कारण उठकर भुवनेश्वरी के एकदम पास जा खड़े होते है।) (कंधे पर हाथ रखकर) नरेन की बात आते हो तुमने---- मुंह क्यों फिरा लिया अपना ? (उद्वेलित भुवन कोई उत्तर नही दे पाती।) (भुवनेश्वरी को अपनी ओर घुमाते हुए) तुम कुछ--- बोल क्यों नहीं रही । (कंधों से अचानक घुमा दिए जाने के कारण झटका खाकर हड़बड़ाए भाव से अपनी ओर उठी भुवन की पलकों में ढेर सारी उदासी की गहन धुंध के बीच झलमलाती तरल बूंदों पर दृष्टि पड़ते ही बुरी तरह चौक पड़े विश्वनाथ दत्त-) (स्तथ भाव से) भुवन ? (एलमर की चुप्पी के बीच दोनों एक-दूसरे को देखने रहते हैं।) क्या बात है ? (कोमल स्वर में) नरेन ने फिर परेशान किया तुम्हें , भुवनेश्वरी (रुधे कण्ठ से) नरेन पर-... ध्यान ही कर दिया है तुमने ? भुवन । हमारा नरेन... थोड़ा चपल और शरारती जरूर है.... मगर पढ़ाई-लिखाई में तो हर साल अब्बल ही आता है न ? (हल्की मुस्कान : विश्वनाथ :

.. (39) के साथ) और बुद्धि चातुर्य में---- अच्छों-अच्छों के कान काटने की क्षमता है उसमें । (रुककर) कहो तो---- यह हमारे लिए चिन्ता की बात है---- या गर्व की ? भुवनेश्वरी : और जो किसी दिन---- हमारे तुम्हारे ही कान काट बैठे---- तो न कहना---- (रुककर) भुवन ! समय रहते चेताया क्यों नहीं तुमने ? विश्वनाथ : (अपने दोनों कानों पर हाथ रखते हुए मुँह बनाकर) अच्छा बाबा---- मान लेते हैं अपनी गलती । (कोमल स्वर में) अब कहो---- ऐसी क्या बात है, जिसने तुम्हें इतना विचलित कर दिया है ? भुवनेश्वरी : उसका दिन-रात ब्रह्मसमाजियों में आना-जाना, मण्डलियों में भजन गाना, साधु-संन्यासियों के पीछे भागना और पढ़ाई-लिखाई की जगह योगसाधना व शास्त्र-चर्चा करना---- क्या विचलित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं ? (रुककर) सोचो.--- बीस वर्ष की कच्ची आयु---- क्या ऐसे कामों के लिए उपयुक्त है ? (चिन्तित स्वर में) सामारिक अनुभवों में एकदम कोरा बालक-... इन सबके बीच---- यदि अपने दादा की तरह भटक गया---- तो क्या करेंगे हम लोग ? देखो---- यह सब वर्तमान को हवा है.... और किशोरमन को उत्साहभरी हिलोर। इसमें तुम्हें इतना परेशान व आशंकित होने की जरूरत नहीं है। क्या जानती नहीं---- तार्किक तो वह शुरू से ही रहा है ? यदि किसी संन्यासी अथवा अन्य से दो-चार बातें तर्कयुक्त कर ली तो क्या हुआ ? (पति की ऐसी हत्की प्रतिक्रिया से भुवनेश्वरी पलभर के लिए सोच मे पड़ जाती है, पर प्रयास नहीं छोड़ती।) बात इतनी ही होती.... तो कोई चिन्ता न थी। विश्वनाथ : भुवनेश्वरी : विश्वनाथ : तो फिर ? भुवनेश्वरी वित्वनाथ भुवनेश्वरी : जानते हो---- वह सबसे छुपाकर रात में ध्यान भी करता है.--- और हर समय अपनी हथेली की रेखाओं में जाने क्या पढ़ता रहता है। (रुककर) उसके हाथ में एक ऐसी रेखा है---- जो अन्य किसी के हाथ में नहीं है। यह तुमसे किसने कहा? : स्वयं उसी ने बतलाया । (अपनी बात की प्रतिक्रिया जानने के लिए एक क्षण रुककर) कुछ दिन हुए-~~ द्वार पर आए एक संन्यासी मे उसने ऐसे-ऐसे तर्क किए कि वह हतप्रभ रह गया। उसने हाथ व माथे को लकीरें पढ़ी। स्पष्ट तो कुछ नहीं बतलाया---- पर इतना अवश्य कहा--- मां ! तेरा यह पुत्र बड़ा होकर नाम करेगा। (घबराए स्वर में) मानो.- सुनकर मेरा तो कलेजा कांप उठा। : (परिहाम भाव से) बहुत बुलू हो तुम ! বিননার विश्वनाथ : विश्वनाथ : (40) (हँस पड़ते है। भुवन मुंहबाए 'न समझने' की मुद्रा में देखती रह जाती है।) भुवनेश्वरी : क्या मतलब इतना भी नही जानती---- (मुस्कराते हुए) नाम क्या---- केवल संन्यास ले लेने से ही होता है ? (रुककर) यह कलकत्ते का नामी बैरिस्टर होका भी तो नाम कमा सकता है। भुवनेश्वरी : तुम पुरुष हो न---- माँ का हृदय क्या समझो ? (उपालम्भ के स्वर में) जिस आदमी ने अदालत को अपना 'घर' तथा मुवक्किलो को ही अपना 'परिजन' मान लिया हो---- उसे कुछ भी कहने से क्या होगा भला ? (सहास्य) तुम फिक्र न करो--- बी.ए. होते ही उसे कानून की पढाई में लगाने के साथ ही साथ---- सुन्दरवन वाली जमीदारी का काम भी सौंप देंगे---- और जल्दी ही मौका देखकर (परिहासमुद्रा में भुवनेश्वरी की ओर आँखें गड़ाकर) तुम जैसी---- किसी लड़की से उसका ब्याह रचा देगे। (सहास्य) फिर देखते हैं---- वह इस मायाजाल को कैसे काटता (हँस पड़ता है। भुवनेश्वरी के मुख पर भी गम्भीरता के स्थान पर लजाई मुस्कान उभर आती है। ठीक इसी क्षण नरेन्द्र का कमरे में प्रवेश-) नरेन्द्र (प्रसन्न मुद्रा में चौकते हुए) अरे ! बाबा---- आ गए---- ? (लपककर आगे बढ़ पिता के पाँव छूने के उपरान्त लिपट जाता है । विश्वनाथ भी गद्गद्भाव से उसे अपने मे भर लेते है। भुवनेश्वरी पिछली सारी बाते भूल भावमुग्य दृष्टि से पिता-पुत्र का मिलन देखती रहती है।). विश्वनाथ : (सहास्य) और कहिए शास्त्रीजी---- ज्ञानेश्वर जी---- तर्काचार्यजी---- (मुंह बनाकर) कैसा चल रहा है---- आपका काम-काज ? नरेन्द्र : (मीठी मुस्कान के साथ) आपका बेटा हूँ न ? यह सब तो होगा ही--- विश्वनाथ : (पीठ थपकाते हुए प्यार से) और कह---- क्या चल रहा है इन दिनों ' नरेन्द्र बाबा । कुछ ही दिन हुए-~~- मैंने जॉन स्टुअर्ट मिल का 'थ्री एस्सेज ऑन रिलीजन पूरा कर लिया। इसे पढ़कर में एक नये असमंजस में पड़ गया हूँ। भुवनेश्वरी : (मोटी ताड़ना के भाव से) छोड़ो यह शास्त्रचर्चा ! (नरेन्द्र से) दिन पर से अब पर लौटने को फुर्सत मिली है तुझे ? (रुककर) क्या इस शास्त्रचर्चा से ही पेट भर जाएगा तेरा ? नरेन्द्र (वाया को छोड़ माँ भुवनेश्वरी का हाथ पकड़कर बालक की भाँति सटता हुआ) ओऽऽ.• माँ--- सच यहुत भूख लगी है-... :

(41) मरेन्द्र भुवनेश्वरी : तो चल--- (ऊँचे स्वर मे), किरण--- ओ किरण-- भैया का खाना लगा दे--- नरेन्द्र : नहीं, माँ ! मैं किरण के हाथ का परोसा खाना नहीं खाऊंगा---- वश्वनाथ : क्यों भई ? क्या छोटी बहिन से झगड़ा हो गया है ? : नहीं, बाबा ! उसने मेरे साथ अक्षम्य छल किया है---- विश्वनाथ : (चौककर) अक्षम्य छल । (भुवनेश्वरी की ओर देखकर) मैं कुछ समझा नहीं---- भुवनेश्वरी मैं समझाती हूँ.--- (नरेन्द्र पर मुस्कान भरी दृष्टि डालते हुए) कल--- भूल किरण ने इसकी थाली में मछली का झोल परोस दिया--: बस तभी से---- वैश्वनाथ : ओऽऽ--- समझा---- (परिहास-मुद्रा मे) अरे भई । वगाली मोशाय हो.... ये मछली से---- नाराजगी कैसी । भुवनेश्वरी : (सहास्य) जानते हो---- अब हमारा बिलह शाकाहारी हो गया है.... वैश्वनाथ : (परिहास भरी गम्भीर मुद्रा बनाकर) अच्छा--..? इसका मतलब है.... अब तक पूरे नौ सौ चूहे हजम कर चुका ? (नाटकीय अन्दाज में) क्यों से बच्चू ? नरेन्द्र : बरेन्द्र (बाबा की तरह मुँह बनाकर) लेकिन मैं---- हज करने नही जा रहा, बाबा । (सब एक साथ ठहाका लगाकर हँस पड़ते है। इस बीच किरण दरवाजे पर आती दौख पड़ती है। भीतर हँसी का यातावरण देख वह भी मुस्कराए बिना नही रह पाती। तेज हँसी के बीच अचानक विश्वनाथ दत्त की छाती मे तेज दर्द उठता है। वे चेहरे पर वेचैनी के भाव लिए दोनों हाथों से अपनी छाती थाम लड़खड़ा उठते है।) : (घबराकर) बाबा ! क्या हुआ .? (चिल्लाकर) मां---- देखो तो--.. (भुवनेश्वरी स्थिति को समझ पति की ओर लपकती है। इससे पूर्व ही नरेन्द्र अपनी सबल भुजाओं से पिता को थाम लेता है। छाती के दर्द से तिलमिलाते विश्वनाथ दत्त नरेन्द्र की याँहों में लुढ़क पड़ते है। उनका क्षण भर पूर्व का सहज हंसी से भरा उत्फुल्ल मुख धेचनी की आडी निरछी रेखाओ और सहसा छलला आए पसीने की यूंदो से भर उठता है। अचानक उत्पन्न हुई इस अप्रत्याशित स्थिति को देय पति को सम्हालने को लपको भुवनेश्वरी तथा दरवाजे पर खड़ी किरण हक्की-बम्की रह जाती है। कलेजा युरी तरह मे काप उठता है अका।)

(42) .. अंक दृश्य दो दो : स्थान समय .. सुयश . : नरेन्द्र का पढने का कमरा रात्रि (कमरे में इधर-उधर बिखरी पुस्तकों के यौच एक अघखुली पुस्तक को हाथ में लिए विधारमान मुद्रा में बैठा नीन्द्र तथा अपनी विस्मयभरी जिज्ञासु दृष्टि को एकटक उसके मुख पर गड़ाए सामने बैठा उसका अभिन्न मित्र सुयशा चुप्पी भरे ऐसे बोझिल क्षणों के बीच सुयश का धीरज अधिक देर नही टिक पाता।) बात करते-करते ही.... ये तुझे अचानक क्या हो गया, नरेन्द्र ? (अधीर भाव से नरेन्द्र का कया झकझोर देता है।) : (चौककर) हाँ क्या सोचने लगा तू? (गम्भीर स्वर मे) सोच रहा हूँ---- उस पादरी को उन कट्टर सनातनी लोगों ने क्यों मारा-पीटा ? क्या केवल इसीलिए--- कि वह अपने धर्म की---- अपने योशू की बात अन्य लोगों को समझा रहा था । (रुककर) और यदि यह सत्य है.--- तो फिर उन्हें.... अपने ईश्वर की दुहाई देने का--- यीशू की तुलना में अपने ईश्वर की श्रेष्ठता का बखान करने का भला क्या अधिकार है । : ऐसे राजनीति-प्रेरित धर्म का स्वरूप.... कभी कल्याणकारी नहीं हो नरेन्द्र सुयश नरेन्द्र सुयश सकता। नरेन्द्र तु ठीक कहता है, सुयश । इन लोगों ने जाति, धर्म और भाषाओ की तरह---- परमात्मा को भी बांट लिया है। उसे भिन्न-भिन्न नाम देकर---- मठों में, मन्दिरों में, मस्जिदों और गिरजाघरों में 'सीमित बना डाला है। : तो क्या---- उस 'असीमित' को इच्छानुसार 'सीमाओं में बांधा जा सक्ता सुयश सुयश ! (43) रेन्द्र':" यही प्रश्न तो---- मेरे भीतर भी उथल-पुथल मचाए हुए है, (रुककर) क्या परमात्मा आज---- मनुष्य के हाथों इतना विवश हो गया है ? यदि ऐसा है तो---- उसकी 'सर्वशक्तिमानता' और 'सर्वव्याप्ति' पर कौन विश्वास करेगा? : रुक---- रुक जरा---- (गूढ अन्दाज़ में) तू कहीं---- धीरे-धीरे नास्तिक तो नहीं होता जा रहा इन दिनों । : (लम्बी साँस लेकर) यह तो मै स्वयं भी नहीं जानता---- पर इतना स्पष्ट है कि मैं न तो कभी बहुदेववाद को स्वीकार कर पाया हूँ---- और न ही मूर्तिपूजा से सहमत हो पाया हूँ.... (पलभर दोनो के बीच चुप्पी छायी रहती है। इस बीच गर्दन झुकाए नरेन्द्र हाथ वाली पुस्तक के पृष्ठो को निरुद्देश्य भाव से उलटता-पलटता रहता है।) :: (नरेन्द्र के चेहरे पर दृष्टि गढ़ाकर) तुझे इतना उद्विग्न---- पहले तो कभी • नहीं देखा, नरेन्द्र . (नरेन्द्र कोई उत्तर नहीं देता।) (सोचते हुए) यह उद्विग्नता---- कही तेरी अपनी घुटन तो नहीं है । -- कैसी घुटन ? : तेरे पारिवारिक विवाद की---- जिसके कारण तुझे आज अपने पुरखों का आलीशान भवन छोड़कर-... इस तरह किराये के छोटे मकान में गुजारा करना पड़ रहा है। (रुककर) जैसा मैं समझ पा रहा हूँ---- अन्य समस्याएँ भी कारण हो सकती हैं---- यथा--तेरे बाबा की अस्वस्थता, नौकरों की कमी--- सब लोगों की तुझसे.... घर-परिवार के साथ अधिकाधिक जुड़े रहने की अपेक्षा आदि-आदि---- बाबा को अस्वस्थता और मां को घबराहट से---. अवश्य में कुछ विचलित हूँ, सुयश । (रुककर) किन्तु, शेष बातों का मेरे लिए तनिक भी महत्त्व नहीं है। (अपने भीतर झाँकने का प्रयास करते हुए) यो... परिजनों की विविए अपेक्षाओं को मैं समझता हूँ... पर वे मेरे लिए तभी तक अर्थ रखती हैं.... जब तक कि वे मेरे मार्ग में बाधक न बनें। (परिहास-मुद्रा यनाकर) तो यह बता (नरेन्द्र की निगाहो में निगाहे डालते हुए) क्या-... कल वाली परीक्षा की तैयारो भी---- तेरे मार्ग में बाधक है? (प्रश्न की प्रासंगिकता तथा परिहाममुद्रा में सुयश के कहने के अन्दाह से दोनो एक साथ हंस पड़ते है।) : (हँसी के यीच) बहुत चतुर है रे तू ! घुमा-फिराकर अन्तत अपने वांछित बिन्दु पर ले ही आया मुझे।

. . निमग्न नरेन्द्र .. निमान : सुयश निमग्न नरेन्द्र (हँसी फिर एक बार तेज हो जाती है। ठीक इसी क्षण नरेन्द्र के मित्रमण्डली का दूसरा माथी निमग्न हाथ में कुछ कागज के गुनगुनाता हुआ सीढ़ियां चढ़ वहाँ आ धमकता है।) : (मुँह बनाकर कमर पर हाथ लगाते हुए) क्यों भाई ! क्या---- कुछ ६ प्रतीक्षा...- नही कर सकते थे तुम लोग ? (महास्य) अच्छा जी---- तो अब हँसने के लिए भी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। (इस बार की हँसी में तीसरा स्वर भी सम्मिलित हो जाता है।) (सम्मिलित, हँसी के बीच ही बैठते हुए) परीक्षा का भूत सिर पर सर है---- और तुम लोग हँस रहे हो ? (इस समय तक हँसी थम चुकी थी।) : (सकेतात्मक भाव से अंगूठे को नरेन्द्र को ओर घुमाकर) इन मोशाध में उद्विग्नता को---- तात्कालिक चिकित्सा भी तो आवश्यक थी न ! क्या हुआ मोशाय को ? (नरेन्द्र का कथा पकड़कर) क्यों भाई । (गम्भीर होते हुए) सच तो यह है, निमग्न---- कि इन दिनों मेरे महिन में एक भयानक बवडर चल रहा है। अनेक-अनेक प्रश्न-... ऊठापटकियां मचाए हुए हैं। उन्हें शान्त करने को जब कुछ नया पर हूँ.--- तो उससे जुड़े और नए प्रश्न भीतर जाग उठते हैं। (कुछ क्षण हाथ की पुस्तक के पृष्ठों को पलटने में खो जाता है।) (लम्बी साँस लेकर) जितना पढ़ो.... उतने ही प्रम-- उतनी । समस्याएँ.... उतने ही द्वंद्व--.. तो फिर ऐसा पढ़ने से लाभ ही क्या-... जो मन में अशान्ति उत्पनर दे---- (रुककर) हमें भीतर तक अस्थिर कर दे---- (परिहास-भाव से) शायद इसीलिए तुम लोग---- किताबों को छोड़न परीक्षा के भूत को सिर पर लादे-लादे हंस रहे थे ? (इस बार परिहास के बावजूद भी परिहास का वातावरण बनता (नरेन्द्र के पास सरककर) हां... अब कह---- किस समस्या में उलझा) सुयश . निमग्न नरेन्द्र निरेन्द्र चुप रहता है।) शायद मैं---- तेरो कुछ सहायता कर सकूँ। : (सोचते हुए) मेरी समस्या यह कि मैं एक ओर ठस सर्वस सर्वशक्तिमान ईश्वर तथा दमरी और प्रकृति और मनुष्य अनिष्ट व अशुभ का किसी भी प्रकार सामजस्य नहीं चंठा पा रहा हूँ। यानि ? निमग्न :

(45) . प्रश्न यह उठता है कि---- इन दोनों का एक साथ अस्तित्व कैसे रह सकता है ? (रुककर) यदि सचमुच 'ईश्वर' है.--- तो फिर 'पाप' क्यो है ? और यदि---- 'ईश्वर' के होते हुए भी 'पाप' है.--- तो ईश्वर का अस्तित्व और स्वरूप दोनों पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। E (गम्भीर मुद्रा में विचारमग्न होते हुए) हूँ---- प्रश्न तो सचमुच जटिल है। : मेरे भीतर उत्पन्न संशयों ने मुझे इतना हताश कर दिया है कि कभी-कभी मुझे ऐसा लगने लगता है कि पूर्ण सत्यं तक शायद कभी नही पहुँचा जा सकता--- और यदि 'सत्य' को जाना नहीं जा सकता---- तो फिर जीवन का अर्थ ही क्या रह जाता है ? (सव्यथा) सशय व भ्रम का जीवन---- क्या जीने योग्य है । : (चौककर) ! ये---- किस दिशा में सोचने लगा तू (रात अधिक हो जाने के कारण फैल रहे सन्नाटे के बीच बाहर यदा-कदा भौक उठते कुत्तों की आवाजें सुन पड़ती है, पर बातों की गम्भीरता में खोये उन तीनों में से किसी को भी इस बात का ध्यान 7 नही हो पाता।) . : 'सत्य' की ये खोज---- बहुत लम्बी है, नरेन्द्र ! इसके लिए तुझे बहुत कुछ करना होगा। : 'सत्य' की खोज चाहे जितनी लम्बी क्यों न हो---- मैं उसे पार कर 'लूंगा---- पर वह सम्भव तो होनी चाहिए। (रुककर) लोग कहते हैं.... 'ईश्वर है। मैं कहता हूँ.... 'यदि है तो दिखाओ। वे हंस पड़ते हैं... कहते हैं.... 'ईश्वर को तो स्वयं हमने भी नहीं देखा। तब मैं उन पर हंस पड़ता हूं-और कहता हूँ.--. 'जब. तुमने ही ईश्वर को नहीं देखा---- तो कैसे जानते हो कि वह है ' (रुककर) अब तू ही बता------ ऐसे 'द्वन्द्व' में कोई भला कैसे न उद्विग्न होगा ? (हाथ के कागजो को टटोलते हुए कुछ सोचकर निमग्न मुस्करा उठता : (मुस्कराते हुए) रिलेक्स, मित्र ! रिलेक्स- : ('न समझने की मुद्रा मे) क्या मतलब ' : (गर्वीले अन्दाज़ में) बस---- यूं समझ ले---- तुझे अपने 'द्वन्द्वों से मुक्ति मिल गई। : (अविश्वास-भाव से) कोरी बातों से यदि 'द्वंद्व मिटते तो फिर---- : (माथा पकड़कर यात काटते हुए) च---- अपनी आदत के तूने---- चला दिया न तर्क का तौर ? (मुंह बिगाड़ने हुए) तेरे क्या 'आस्था' नाम की कोई चीज है ही नहीं रे ? (सुनकर नरेन्द्र हम पड़ता है।)

नरेन्द्र निमग्न (46) (साश्वर्य) तू---- हंस रहा है ? : (हंसी के बीच) न हंसू तो क्या करूं.... जब तू 'आस्था' को 'चीज है मान बैठा है। (परिहास-भाव से) यानि कि---- तेरे विचार में हो- 'आस्था' को जब चाहो.... जिसको चाहो... जेब में डाल दो-- कहीं---- (मुस्कराते हुए) जाना हो-~~- तो किसी मित्र से--- थोडौं- 'आस्था' उधार ले जाओ.... (खिलखिलाकर हँस पड़ता है।) (हँसी रोकते हुए) छोड़ यह सब बातें... और कह---- कैसे दिला रहा तू---- मुझे---- मेरे 'द्वन्द्रों' से मुक्ति ? : तुझे याद है...- एक बार क्लास में वईसवर्थ पढ़ाते समय प्रोफेसर घोषाल ने 'ट्रांस'---- यानि कि 'भाव-समाधि' की चर्चा की थी। : (स्मृति पर बल देता हुआ) हॉ---- हा.--.. की थी---- उन्होंने यह भी कहा था---- कि---- सात्विक मन की शुद्धता व की यह स्थिति यदि कही देखने को मिल सकती है.... तो केवल दक्षिणेश्वर काली मन्दिर के स्वामी रामकृष्ण परमहंस में---- : (एकदम गम्भीर होते हुए) मगर उन्हें तो लोग---- पागल कहते हैं--- लोग उन्हें क्या कहते हैं---- क्या नही कहते-... इससे तुझे क्या (रुककर विश्वास भरे शब्दों में) पर यह सत्य है---- कि 'द्वन्दू-मुक्ति उन्ही की---- केवल उन्हीं की शरण में सम्भव है---- (पलभर के लिए नरेन्द्र एक गहरे सोच में पड़ जाता है।) : किन्तु यह बात- किस आधार पर कह रहा है तू इसका भी आधार है मेरे पास---- (हाथ के कागजो को खोलते हुए देख---- (कागजी को खोलकर नरेन्द्र के सामने फैला देता है।) निमग्न नरेन्द्र निमग्न : नरेन्द्र निमग्न नरेन्द्र क्या है ये ? .. शिमग्न .. (मुख पर 'न समझने का भाव लिए नरेन्द्र अपनी उत्सुक दृष्टि अपने सामने फैले कागजी को देखने लगता है।) जानता है.--- 'इन दिनों केरावचन्द्र सेन और अन्य ब्रह्मसमाजी नेता-- परमहंम की खूब चर्चा कर रहे हैं। (फैले हुए कागजों को और सके करते हुए) देख---- 'जीवन-दर्पण' तथा 'धर्मतत्व' के इन अंकों में- उनके बारे में कितना छपा है...? लगता है..... अब तो ब्रह्मसमाजीर शन. शनै: उनकी ओर झुकने जा रहे हैं। : (उन्मुक भाव मे) तनिक पढकर तो मुना- क्या छपा है 'जीवन-दर्पण' में" लिया है.--- (पने हुए) भागवत' में एक सच्चे भक्त के औजोर जेन्द्र ..

.. .. । गुण बतलाए गए हैं- वे सभी उनमें देखने को मिलते हैं। जगन्माता के वन्दन के बीच वे न जाने कितनी बार---- रोये--- हंसे----- नाचे---- और अचेत हुए ? सहसा विश्वास ही नहीं होता---- कि---- ‘भक्ति' को 'भावों' की इतनी गहराई में भी उतारा जा सकता है। : (अपने आप में डूबते हुए) फिर लोग उन्हें---- पागल क्यों कहते हैं ? जब उनकी शरण में जाएगा---- तो यह भी जान लेगा---- : सुना है---- वे यदा-कदा केशवचन्द्र सेन के घर भी जाते हैं। : केशवचन्द्र सेन के घर : हाँ। (रुककर) कभी पूछ देखना---- केशव बाबू से। उनसे तो तेरौं अच्छी खासी पहचान है। न हो---- तो कभी चलते हैं.--- दक्षिणेश्वर के रानी रासमणि के काली मन्दिर---- । (रुककर) स्वयं ही देख लेंगे अपनी आँखों से सबकुछ। : कभी क्यों--- वे कल ही सुरेन्द्रनाथ मित्र के यहां आने वाले हैं। : (चौककर) 'कौन सुरेन्द्रनाथ मित्र ? (याद करते हुए) क्या---- वे ही मित्र मोशाय----7 अरे--- वे तो हमारे पुराने घर (नरेन्द्र का गम्भीर चेहरा सहसा खिल उठता है।) : हाँ. हाँ.... वे ही---- वे ही मित्र मोशाय---- : (भावुक स्वर में) तू कल के लिए ही बोल रहा था न--- कि वे.... मित्र मोशाय के घर आएंगे? : हाँ.---. कल ही---- (भावमग्न होते हुए)- तब मैं अवश्य जाऊंगा---- जाना ही होगा मुझे---- (सहसा नरेन्द्र अपने आप में खोने लगता है। - निमग्न व सुयश उसे देख आश्चर्य से भर उठते है।) : निमग्न---- रोक इसे---- यह तो अभी ही चला परमहंस के पास----- : (कंधा पकड़कर झकझोरते हुए) नरेन्द्र::-- नरेन्द्र--- (नरेन्द्र की भावमग्नता नही टूट पाती। निमग्न उसे झकझोरता रहता है। इसी समय रात्रि के गहराते सन्नाटे के बीच दूर कही कुत्ते भौक उठते है। निमग्न और सुयश की आशंकित दृष्टिया पल भर के लिए एक दूसरी से टकराती हुई पुन. भावमन नरेन्द्र को निहारने लगती हैं।) पास ही रहते हैं---- - (48) अंक दो दृश्य तीन स्थान : सुरेन्द्रनाथ मित्र का घर प्रातःकाल समय (पुरुषों की गहमा-गहमी से शनै. शन. बोझिल होता जा रहा महाशय के घर की बैठक का बाहरी भाग तथा इसी से जुड़े सा वाले कमरे में बैठी स्त्रियाँ - कोई कार्यक्रम के शीघ्र आरम्भ के लि प्रतीक्षारत, किमी में हिलोरे लेती उत्सुकता तो कोई सामने सुसगि आमन पर विराजमान स्वामी रामकृष्ण परमहस पर दृष्टि गहा विचारमग्न । अपने अन्तरंग मित्रो सुयश, निमग्न व विनय के सा बगल वाली अभिम पंक्ति में काफी पहले से ही आ बैठा नरेन्द्र। मन में रह-रहकर उठ रही भाँति-भाँति की उत्सुक आशकाओं उद्वेलित दृष्टि कभी ने मूर्द भावसमाधि.की स्थिति में बैठे परमहस 'अति साधारण व्यक्तित्व में कुछ न कुछ 'असाधारण' हँढ़ने के विफल प्रयास करती तो कभी आगत स्त्री-पुरुषो य व्यवस्थाओं के अनिम रूप देने में व्यस्त कार्यकर्ताओ को निहारने लगती। नरेन्द्र यह देख-देखकर हैरान था कि आने वाले पुरुप तो परमहंस के सामने भूमि पर मावा टेक प्रणाम करने के उपगन अपना स्थान ग्रहण क रहे थे, जबकि स्त्रियों केवल हाथ जोड़कर ही आगे बढ़ जाती थी। उसे इस प्रकार खामोश और खोया-खाया देख निमम उन्मुक भाव से कुछ पाम सरक आया.) : (नरेन्ट के कार के पास मुंह लाकर धीमे स्वर में) क्यों रे---- कैसा ला रहा है यहाँ आर? : (अने आमाम यंटे सोगों को सहमी दृष्टि में निहाग्ने हुए यो स्वा मे) निमग्न । बहुत देर में देय रहा ---- टाकुर को केवल पुरप भनि कामापा टिश गाम करने है...- जिया नहीं। ऐमा क्यों । निमान नरेन्ट (49) निमग्न नरेन्द्र निमग्न : तुझे नहीं पता---- स्त्रियों के लिए प्रणाम निषिद्ध है ठाकुर के यहाँ ? : (साश्चर्य) क्यों भला ? (रुककर) क्या परम्परावादियों के समान---- ठाकुर के यहाँ भी---- स्त्रियो को पुरुषों की तुलना में हीन माना जाता है जो... : (नरेन्द्र का हाथ दबा मुँह बिचकाते हुए फुसफुसाहट भरे स्वर में) धीरे बोल---- (इधर-उधर देखते हुए) कोई सुन लेगा। : (सहमे भाव से) कुछ गलत कहा मैंने ? : (गूढ मुस्कान के साथ) मूर्ख है तू । ठाकुर के लिए ऐसा सोचना भी पाप नरेन्द्र निमग्न .. नरेन्द्र निमग्न .. क्या मतलब ? : ठाकुर---- संसार की प्रत्येक स्त्री में---- साक्षात् 'जगन्माता' का निवास मानते हैं। (सहास्य) ऐसे में किसी भी स्त्री का प्रणाम---- भला वे कैसे स्वीकार कर सकते हैं । (रुककर) अब तू ही बता---- उनके लिए 'मातृरूपा स्त्री' प्रणम्य हुई कि नहीं ? (नरेन्द्र सहसा कुछ बोल नहीं पाता। चुपचाप ठाकुर के मुख पर दृष्टि गड़ाए केवल सोचता रहता है।) (मन ही मन सोचते हुए) यह कौन नई बात हुई ? इस देश में तो 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते---- रमन्ते तत्र देवताःका आदर्श प्राचीनकाल से ही हमारी सस्कृति और समाज-व्यवस्था का मूलाधार रहा है । (आशंकित भाव से) लगता है--- 'किसी ने निमान को बहका दिया--- और निमग्न ने मुझे। (रुककर) वरना तो.... 'परमहंस' की ख्याति वाले व्यक्तित्व की इस बढ़ी बेतरतीब दाढ़ी, ठेठ देहाती वेशभूषा---- और कृशकाय शरीर में ऐसा कुछ भी तो दृष्टिगत नही होता---- जिसके आधार पर यह विश्वास हो सके---- 'कि यह मुझे मेरे भीतर के 'दो से मुक्ति दिलाने में समर्थ है। (विचारों में सेव नरेन्द्र को आसणा का कुछ भी ध्यान नहीं गा। इसी समय आतिथ्य सुरेन्द्राय मित्र कुह कहने के लिए सामने आ खड़े होने है। उन्हें देख उपस्थित लोग व्यवस्थित होने लगते है। सारी गहमा-गहमी पलमर में शान्त हो जाती है किन्तु नरेन्द्र तो फिर भी आत्पलोन बना • रहता है। सुयशं निमग्न तथा विनय उसे देख निगाहो ही निगाहों में मुस्कराते हुए मित्र महाशय की ओर घूम जाते हैं। ठाकुर अभी भी नेत्र मृदे भाव-मपाधि की स्थिति में वैट है।) : (टाकुर की ओर देखते हुए सविनय) ठाकुर ! अधालुजन-... आपके श्रीमुख से--- आशीर्वाद के दो शब्द सुनना चाहते हैं। मुरन्द्रनाथ -- सुरेन्द्रनाथ : (50) (ठाकुर के बन्द नेत्र खुल जाते है तथा मुख पर एक मोटी भावरी मुस्कान सहज ही विखर जाती है।) ठाकुर (धीमे-शान्त स्वर मे) आशीर्वचन की अधिकारिणी तो--- जगन्माता है, सुरेन्द्र ! मैं भला---- क्या कह सकता हूँ? (हाथ जोड़कर) तो आप.... जगन्माता से निवेदन करें---- कि वे--- आपके श्रीमुख के माध्यम से हमें अपना आशीर्वाद प्रदान करें। ठाकुर : (मुस्कराते हुए) बहुत चतुर हो गए हो तुम आजकल ! (किसी निर्मल झरने के मधुर कल-नाद के समान सरल-निश्छल हँसी हँस पड़ते है ठाकुर। हँसी के बीच अचानक उनकी दृष्टि आत्मलीन नरेन्द्र पर पड़ती है तो वे एक झटके में अपनी हँसी रोक एकटक दृष्टि से नरेन्द्र को देखने लगते हैं। ठाकुर के इस आकस्मिक और अप्रत्याशित भाव-परिवर्तन से सभी लोग चौक पड़ते है, पर कोई भी इसका कारण नही समझ पाता।) सुरेन्द्रनाथ : (सशंक भाव से) क्या बात है, ठाकुर ? (हाथ जोड़कर) कोई चूक हो गई.... यहाँ किसी से ? ठाकुर : (नरेन्द्र की ओर संकेत कर) 'यह लड़का कौन है ? (सुरेन्द्रनाथ मित्र सहित सभी उपस्थित लोगो को उत्सुक दृष्टियाँ आत्मलीन नरेन्द्र पर गड़ जाती है। निमग्न, सुयश तथा विनय भी हक्के-बक्के-से कभी नरेन्द्र की ओर देखते है तो कभी ठाकुर की ओर । किन्तु, अपने आप मे पूरी तरह डूबा नरेन्द्र इस सबसे सर्वथा बेखबर अपने में ही खोया रहता है।) सुरेन्द्रनाथ : (पहचानते हुए) ये---- नरेन्द्र है, गुरुदेव । कॉलेज में बी.ए. का विद्यार्थी है। इसके पिता विश्वनाथ दत्त हाइकोर्ट में एटर्नी है-..- बहुत ही सज्जन और सुसस्कृत । पास हो को बस्ती में इनका पैतृक भवन है ठाकुर : (कुछ याद करते हुए पहले कभी देखा नहीं इसे । (कहते हुए एक झटके के साथ उठ खड़े हुए ठाकुर और लोग कुछ समझें, इससे पूर्व ही आत्मलीन नरेन्द्र के एकदम पास जा इन्होंने अपनी पैनी निगाहें उसकी अपने आप में खोई स्थिर आँखो मे गड़ा दी। पल भर में ही ठाकुर ने नरेन्द्र को भीतर तक पढ़ लिया। मुख पर उल्लाम और अधरों पर एक मीठी मुस्कान लिए ठाकुर ने नरेन्द्र की कलाई पकड़ ली। एक सर्वथा अपरिचित स्पर्श के साथ ही उसकी गहन आत्पलीनता एक झटके के साथ विखरकर चूर-चूर हो गई। ।

. नरेन्द्र ठाकुर (51) चौकी दृष्टि उठी तो सामने अपने एकदम पास ठाकुर को पाकर घबरा गया वह उस अप्रत्याशित क्षण में। पल भर दृष्टियाँ मिली रही।) (कलाई की पकड़ को और अधिक कसते हुए उपालम्प के स्वर में) इतने दिन कहाँ था तू ? (रुककर) मैं तो तूझे--- ढूंढ-ढूँढकर थक गया था रे । : (चौककर) जी ? चौंक- मत { (भावावेश में) मैं तुझे---- न जाने कबसे जानता हूँ। (मीठे उपालम्भ के साथ) देख---- पहचान लिया न मैने तुझे ? (नरेन्द्र के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर कभी उसकी हथेलियो को उलट-पलट कर देखने लगते है तो कभी उसके ललाट और आँखों में कुछ पढ़ने का प्रयास करते है।) तृ दक्षिणेश्वर क्यों नही आया अब तक ? तुझे तो बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था वहाँ । (नरेन्द्र के पुख पर कोमल दृष्टि डालते हुए) जानता है---- मैं तेरो कब से प्रतीक्षा कर रहा था । (नरेन्द्र ठाकुर से अधिक देर दृष्टि मिलाए न रख सका। वह ठाकुर की बातों और उनके व्यवहार से हक्का-बक्का रह गया। ठाकुर के स्पर्श से नरेन्द्र के पूरे शरीर मे एक विचित्र-सी झुरझुरी दौड़ गई, जैसे अदृश्य विद्युतधारा ही प्रवाहित हुई हो। घबराकर उसने ठाकुर से अपने दोनो हाथ छुड़ा लिए।) (आत्मीय भाव से) अब तो तुझे दक्षिणेश्वर आना ही होगा---- एक बार। (कोमल आग्रह के स्वर में) बोल---- आएगा कि नही । (ठाकुर का सम्मोहन नरेन्द्र के मन-मस्तिष्क पर कुछ इस प्रकार छा चुका था कि अत्यधिक घबराहट और पसीने के बावजूद भी वह मना न कर सका) : आऊंगा--.. ---- अवश्य आऊंगा---- : (तसल्ली की सॉस लेते हुए) अच्छा--- अब कुछ गा-- (गूढ़ अन्दाज में) तू तो वाद्य और कण्ठ दोनों ही प्रकार के संगीत में निपुण होने लगा है। (कहते हुए ठाकुर नरेन्द्र के पास से हटकर पुन. अपने आसन पर जा टाकुर बैठते है। अन्य लोग भी व्यवस्थित होने लगते हैं। मुरेन्द्रनाथ मित्र के संकेत पर हारमोनियम और तबला लिए साजिन्दै परेन्द्र के पास आ बैठते है। नरेन्द्र सहमे भाव से सम्हलने व संयत होने का प्रयाम करता है।) सुरेन्द्रनाथ : गाओ, नरेन्द्र ! ठाकुर का प्रबल आग्रह है---- , (52) नरेन्द्र ठाकुर (नरेन्द्र हारमोनियम अपनी ओर खींचकर अपने अनुकूल स्वर निकालता है। तबलावादक हारमोनियम से फूट रहे स्वरों के अनुसार अपना तालमेल बनाने का प्रयत्न करता है।) : (मन ही मन) अब तो गाना ही होगा। कैसे टालें इस आग्रह को ? (सविस्मय) ठाकुर तो सब कुछ जानते हैं---- : (अधीर भाव से) जल्दी शुरू कर न ? (हारमोनियम के स्वर सधते ही नरेन्द्र गाने लगता है .) : (गाते हुए) 'रहना नहि, देस बिराना है....। यह संसार कागद की पुड़िया, बूंद पड़े धुल जाना है। यह संसार काँटों की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह ससार झाड़ ओ झाँखर, आग लौ बरि जाना है। कहत 'कबीर' सुनो भई माधो, मतगुरु नाम ठिकाना है।' (ठाकुर अत्यधिक तन्मयता के साथ सुनते रहे। अन्य लोग भी मत्रमुग्ध बैठे थे। . गायन समाप्त होते-होते ठाकुर का चेहरा खिल उटा।) ठाकुर : (भावमुग्ध स्वर में) तू तो सचमुच---- बहुत अच्छा गाता है रे लगता है.... सरस्वती स्वयं विराजमान है.... तेरे कण्ठ में। (रुककर) तू दक्षिणेश्वर आना अवश्य । माँ काली का आशीर्वाद मिलेगा तुझे। आएगा ने ? (सामह) याद है न तुझे अपना वचन ? जी.... अवश्य आऊँगा.... ठाकुर : सुरेन्द्र । (नरेन्द्र की ओर सकेत कर) यह तुम्हारा दायित्व है। सुरेन्द्रनाथ : (हाथ जोड़) आप निश्चिन्त रहें, ठाकुर । (महसा सभी के देखने-देखते एक लम्बी साँस खीचकर ठाकुर भाव-समाधि में खो गए। उनकी खुली पलको में दोनो पुतलियों आकाश की ओर लवन स्थिर हो गई। मुरेन्द्रनाय मित्र के संकेत पर तत्क्षण झाझा-मजोर आर पाटे-घड़ियाल यज उठे । श्रद्धानु करबद्ध नमित हो गए। यह देख नरेन्द्र चकरा गया) नरेन्द्र : (चकित पाव मे) ये सब क्या है, निमग्न निमान डार माशि में चले गए हैं । (मकर) समाधि पूरी होने तक---- अब पही सत्र चलता रहेगा..... नोट (उपर-उधर दार डायरे हुए) चल... चुपचाप निकल धनते है यहाँ से।

(53) (उस भावमग्न हलवल में खोए श्रद्धालुओं के बीच निमग्न का हाथ पकड़ नरेन्द्र तेजी से बाहर निकल आता है। पीछे-पीछे ही विनय और सुयश भो। बाहर सड़क पर आकर ही दम लेता है नरेन्द्र ।) : (साश्चर्य) इस तरह भाग क्यों आया तू---- नरेन्द्र ? : (हाँफते हुए) उन विचित्रताओं के बीच---- दम घुटने लगा था मेरा ! विनय नरेन्द्र निमग्न नरेन्द्र कैसी विचित्रताएं ? सुयश नरेन्द्र निमग्न नरेन्द्र 11 सुयश नरेन्द्र निमग्न (असपंजस भाव से) ठाकुर---- क्या सचमुच मुझे पहले से जानते हैं ? (सोचते हुए) मगर कैसे ? मैं तो पहले कभी नहीं मिला इनसे---- फिर ऐसा क्यों कहा उन्होंने मुझसे ? इतने लोगों के बीच केवल मेरा ही हाथ क्यों पकड़ा ? (भावमग्न स्वर में) कैसा विचित्र था-- ठाकुर का स्पर्श ? जैसे एक झटके के साथ पूरे शरीर में विद्युतधारा प्रवाहित हो चली हो। : (उत्सुक भाव से) कैसी थी रे---- वो अलौकिक अनुभूति ? : कुछ समझ नही पा रहा हूँ मैं--- क्या वह अनुभूति---- और कैसी थी । : ठाकुर का व्यक्तित्व है ही अनोखा ! : मुझे तो ये कोई-.-- तांत्रिक लगता है---- जो ढोगी भी है---- और पागल भी---- (सोचते हुए) मै दक्षिणेश्वर नही जाऊँगा---- कदापि नहीं-~-- : फिर तेरे उस वचन का क्या होगा---- जो तूने ठाकुर को दिया : कुछ भी कह---- : (समझाते हुए) प्रथम दर्शन में ठाकुर, के प्रति ऐसी धारणा नहीं बनानी चाहिए तुझे । (रुककर) कह तो---- क्या..जल की सतह देखकर--.. उसकी गहराई का अनुमान लगा सकता है कोई ? (नरेन्द्र चुप रहता है। (कंधा पकड़कर) नहीं, नरेन्द्र । (रुककर) इसके लिए तो तुझे---- 'भीतर' तक पैठना होगा... 'भीतर तक'. (नरेन्द्र गहरे सोच में डूब जाता है।) निमग्न ठीक कहता है, नरेन्द्र । ऐसे असाधारण व्यक्तित्व को साधारण दृष्टि से प्रथम दृष्टया समझ पाना सर्वथा असम्भव है। : किन्तु हमारा नरेन्द्र ही कौन कम 'असाधारण' है ? : (नरेन्द्र की बाँह पकड़कर) चल---- चलते हैं---- (विचारमग्न नरेन्द्र यत्र चालित-सा खिचा चला जाता है।) सुयश विनय निमग्न -- (54) अंक दो चार स्थान सागर-तट अपराह्न (सागर-तट के एकान्त क्षेत्र में खड़ी विविध आकार-प्रकारों वाली ऊबड़-खाबड़ खामोश रनों के बीच घिरा अपने आप से जूझ रहा नरेन्द्र। सामने सुदूर क्षितिज से पागलों की तरह बौखलाकर उसी ओर दौड़ी आ रही आवेग भरी लहरे लहराती हुई खामोश पथरीली चट्टानों से टकराकर चूर-चूर हो उसकी स्थिर-उदास आँखों की राह भीतर तक बिखर-बिखर जा रही थी। तटीय क्षेत्र मे यत्र-तत्र किंकर्तव्यविमूढ़-से पंक्तिबद्ध खड़े ताड़ और नारियल के आसमान छूते वृक्ष। ऐसे में अपने आसपास से पूरी तरह बेखबर नरेन्द्र के विकल-व्यथित मन को मरोड़ती स्मृतियों और कचोटती दुवियाओं के बीच यदा-कदा जाग उठते प्रश्नो की गुपचुप रस्साकशी चल रही थी। सहसा बनती-मिटती लहगे की उठान-गिरान के साथ हिचकोले खाते यो, बाधा पोशी बूआ और ठाकुर के डूबने-उतराते चेहरों की भीड़ को पीछे धकेल बाबा का चेहरा सामने आ गया .) विश्वनाथ : तुम अब बच्चे नी रहे, नरेन । जरा सोचो---- 'ईश्वर' के पीछे इस प्रकार पागलों की भांति भागने से.... क्या मिल जायेगा वह तुम्हें ? अब तक मिला है किसी को ? तुमने महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर से पूछा---- केशवचन्द्र सेन से पूछा---- न जाने कितने ही सन्यासियों में यही प्रश्न किया---- 1 क्या उनमें से किसी ने भी स्वीकार किया है---- कि उनका 'ईश्वर' से साक्षात हुआ है ? (पलभर की चुप्पी में लहरों के चट्टानों से टकराने की ध्वनियाँ गूंजती रहती है।) - 1 .. नरेन्द्र नरेन्द्र .. (55) जो सचमुच हुआ होता ऐसा कभी---- तो 'दर्शन' को---- 'ईश्वर' के 'स्वरूप' को लेकर युगों से इस प्रकार की माथापच्ची को आवश्यकता हो कहाँ थी ? (इसी समय लहरों की हलचल के बीच से नरेन्द्र को स्वयं अपना ही चेहरा निकलता दीख पड़ा, जो वाया से कह रहा था .) : तो फिर ऐसे 'ईश्वर की कल्पना ही कैसे आई मस्तिष्क में---- बाबा---- जिसका 'होना' ही कभी प्रमाणित नहीं हुआ ? (रुककर) क्या---- शास्त्र झूठ बोले---- या हम हो ऐसी सामर्थ्य नहीं जुटा पाए ? विश्वनाथ सो मैं नहीं जानता, पुत्र ! मैं तो गृहस्थ हूं---- और इतना जानता हूँ कि---- जीवन अपने आप में एक 'साधना' है---- और इससे जुड़े दायित्वों का निर्वहन---- हमारा प्रथम 'धर्म' । (लम्बी साँस लेते हुए) तुमसे भी मैं---- यही चाहता हूं, नरेन्द्र ! ईश्वर के प्रति आस्थावान रहो अवश्य---- पर अपने सांसारिक दायित्वों पर भी ध्यान दो। बाबा ! विश्वनाथ : (थके स्वर में) में अब---- शिथिल होने लगा हूँ, बेटे ! शेष 'सांसारिक दायित्व' तुम्हें निभाने है। (रुककर) किन्तु, इसके लिए पहले तुम्हें...- अपने लिए सामर्थ्य जुटानी होगी। : (उत्सुक स्वर मे) कैसी सामर्थ्य , विश्वनाथ : जीविकोपार्जन की---- ताकि तुम अपने परिवार का समुचित पालन-पोषण कर सको। मैं चाहता हूं.--- तुम तुरन्त ही कानून की पढ़ाई शुरू करो--- अटोर्नी की परीक्षा दो---- और कलकत्ते के नामी बैरिस्टर बनो। (लम्बी निःश्वास के साथ) तभी मैं---- तुम्हारी माँ और तुम्हारे भाई-बहिनों के भविष्य के प्रति निश्चिन्त हो सकूँगा। : किन्तु, बावा----? (यात काटते हुए) मेरा अब-:-- कोई भरोसा नहीं है, बेटे ! (रुककर) 1 , तुम बीस पार कर चुके हो----1 स्थिति की जटिलता को समय से पूर्व ही समझते हुए तुम्हें अब---- अपने विवाह के प्रति भी गम्भीरता से सोचना चाहिए। : (चौककर) यह आप क्या कह रहे हैं, बाबा ? अभी तो मैं विद्यार्थी हूँ ? (रुककर) यों भी शास्त्रों में गृहस्थाश्रम की आयु पच्चीस वर्ष बतलाई है। (इसी क्षण लहरो की तेज हिलोर के साथ माँ भुवनेश्वरी का चेहरा भी डूबता-उतरता आता दीख पड़ता है।) भुवनेश्वरी : (मीठी तोड़ना के भाव से) क्यों रे ? (रुककर) तू चाहता है.... मैं जिन्दगी भर गृहस्थी में इसी तरह खटती रहूं। नरेन्द्र । नरेन्द्र विश्वनाथ नरेन्द्र --- (56) : । : ? नरेन्द्र भुवनेश्वरी घर---- अकेले पुरुष से ही नहीं चलता, नरेन ! उसे सम्हालने के लिए--- वपू लानी भी आवश्यक होती है। (भावुक स्वर में) तेरी बहिनें समुगल गई.... पीछे तेरे दोनों छोटे भाई है.--- हम सब है--- उनकी देखभाल के लिए---- मुझे भी तो सहारा चाहिए---- नरेन्द्र : (दृढ़ शब्दों में) नहीं, मां ! मैं अभी विवाह नहीं कर सकता। विश्वनाथ : (कठोर स्वर में) और यदि मैं आज्ञा दूं.--- तो भी नहीं ? नरेन्द्र (विनयभाव से) इस उद्दण्डता के लिए मैं क्षमा चाहता हूं, यावा ! भुवनेश्वरी : (राक्रोघ) नरेन ? अपने बाबा का भी लिहाज नही, तुझे । नरेन्द्र : (अविचलित भाव मे) पर मैं इस समय---- अपने 'सत्य' की खोज में लगा हूँ, माँ । (रुककर) पहले उसे खोज लूं.... तब देखा जाएगा। भुवनेश्वरी : कैसा सत्य । नरेन्द्र : ईश्वर का साक्षात्----- भुवनेश्वरी : क्या---- माता-पिता की अवन्ना करके---- पा सकेगा तू ईश्वर का साक्षात् (सहसा एक तेज हिलोर से डगमगाते माँ भुवनेश्वरी, बाबा विश्वनाथ दत्त तथा स्वयं उसके चेहरों के बीच किसी पुरुष-कण्ठ की भारी ध्वनि गूंज उठती है ) ध्वनि सावधान नरेन्द्र । भूलकर भी लिहाज न करना---- (स्ककर) भावुकता में बह न जाना कही । वरना तेरे भीतर उद्वेलित प्रश्नों का क्या होगा। नरेन्द्र कौन हो तुम ध्वनि : मैं---- तुम्हारा मस्तिष्क---- (इस कथन के साथ ही आड़ी-तिरछी परस्पर एक-दूसरी को काटती छोटी-बड़ी लकीरों वाला एक ऊबड़-खाबड़ चेहरा लहरों के बीच झूलता हुआ उभर आता है।) 'भावुकता' से 'सत्य' नहीं मिलता, नरेन्द्र । अत: किसी भी बात पर केवल, इसीलिए विश्वास मत कर लो--- कि उसे किसी ने कहा है.... या कि वह पुस्तकों में लिखी हुई है। (रुककर) स्वयं 'सत्य' को खोजो, से देखो.... पहले समझो---- और तब विश्वास करो। (इसी समय लहरो पर झूलता सपाट चेहरा लिए नरेन्द्र का मन सामने आ धमकता है-) इसके बहकावे में मत आना, नरेन्द्र । (रुककर) इसके तर्कों के 'मकडजाल' में यदि उलझ गए---- तो वहीं के वही भटकते रह जाओगे। नरेन्द्र : (मस्तिष्क पर जोर डालते हुए तुम्हें---- पहचान नही पा रहा हूँ मैं। (सव्यग्य) 'शास्त्रों' को शुष्क जटिलताओं में जीवन के 'सत्य' तलाशने में , खुद आँखों मन .

(57) ! लगे तुम---- भला अपने 'संवेदनशील' मन को कैसे पहचान पाओगे , (रुककर). इसके लिए तो तुम्हें.... आसमानी ऊंचाइयों को छूते पथरीले गिरि-शिखरों और ऊबड़-खाबड़ तंग घाटियों से नीचे उतरकर समतल भूमि पर आना होगा। (मस्तिष्क व्यंग्य से हँस पड़ता है।) (सहास्य) वाह-... क्या मार्ग बतलाया है जीवन-विकास का ? : (शुश्य भाव से) क्या मतलब ? : (मुंह बनाकर) ऊंचे गिरि-शिखरों से समतल भूमि पर नीचे उतार देने के -नरेन्द्र को--- किसी गहरी-अन्धेरी खाई में धकेलने का इरादा है मस्तिष्क .. দকি बाद----- तुम्हारा मर গন্ধি .. : (सक्रोध) बकवास वन्द करो। ये मन तो बेपेंदी का लोटा है, नरेन्द्र ! जो भावुकता और संवेदनशीलता का आवरण डालकर---- अपने 'ढीलेपन' की दुर्बलता को छिपाना चाहता है। इसीलिए तो इसका चेहरा---- बिना रूप-आकार वाला एकदम सपाट है। (गूढ़ अन्दाज में) तनिक सोची--- जो मन ही विश्वसनीय होता---- तो ऋषि-मुनि और सभी शास्त्र---... क्यों मन को वश में करने की आवश्यकता पर बल देते ? तुम चलो मेरे साथ---- (मस्तिष्क नरेन्द्र को पकड़ने को हाथ बढ़ाता है, पर सहसा बीच में एक लहर आ जाने से यह सम्भव नही हो पाता।) ; (आगे बढ़कर) नही, नरेन्द्र । मैं तुम्हें 'इसके साथ नहीं जाने दूंगा। (रुककर) 'सत्य' हो अथवा 'ईश्वर'-... उसे 'आस्था' से ही पाया जा सकता है... 'तर्क' से नहीं । (रुककर) 'तर्क' से 'आस्था' आहत होती है। तभी तो 'ईश्वर' को 'तातीत' कहते हैं क्योंकि हजारों वर्षों के बाद भी 'दर्शन'--... परमात्मा के साक्षात् की बात तो दूर रही---- उसके स्वरूप' तक का निश्चय नहीं कर पाए । (रुककर) इसलिए 'सत्य' पाना है.... तो तुम्हें मेरे साथ चलना होगा---- (पन हाथ पकड़कर नरेन्द्र को अपने साथ खीच ले चलता है। यह देख मस्तिष्क लपककर नरेन्द्र का दूसरा हाथ पकड़कर विपरीत दिशा में खीव ले जाना चाहता है।) (हाथ खीचते हुए) नही---- नरेन्द्र मेरे साथ जाएगा--- : (नरेन्द्र को अपनी ओर खीचते हुए) नही--- मेरे साथ- (इस अप्रत्याशित खीचतान से तग आ नरेन्द्र बौखला उठता है।) : (सावेश) मैं तुममे से किसी के साथ नही जाऊँगा। हट जाओ यहाँ से... ...

(58) (क्रोथ मे उफनते हुए एक जोरदार झटके के साथ दोनों से अपना हाथ छुड़ा उन्हें एक ओर धकेल देता है। लहरों में इस खींचतान से उत्पन्न तीव्र हलचल के कारण मन = मस्तिष्क के चेहरे खो जाते है। भावावेश में नरेन्द्र हाँफने लगता है।) (भावावेश में) उफ् । क्या करूं--- किधर जाऊँ मैं ?? कहाँ मिलेग मुझे.... मेरा सत्य ? (सहसा एक शान्त व गम्भीर पुरुष स्वर की गूंज के साथ लहरों के बीच महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर का चेहरा दीख पड़ता है नरेन्द्र को) देवेन्द्रनाथ : (शान्त-धीमे स्वर में) उद्विग्न मत हो, पुत्र ! (रुककर) 'सात्विक भाव और 'शुद्ध आचरण' पर चलकर हम जो कुछ पाते हैं... वहीं तो. 'परमतत्त्व' । वह तो तुम्हारे भीतर बैठा है बाहर कैसे मिल सकता है। भला ? (कोमलभाव से) इसीलिए मैंने तुमसे कहा था---- योग के द्वारा 'अपने' को 'अपने भीतर उतारो---- (इसी समय लहरों के थपेड़ों के बीच ठाकुर का चेहरा और स्वर एक साथ स्पष्ट होते है .) ठाकुर (उपालम्प के साथ) देख---- अभी तक भी नहीं आया न तू दक्षिणे । क्या---- ऐसे ही कच्चे होते हैं तेरे वचन ? (रुककर) तुझे 'सत्य पाना है न---- तो बम दुविधा छोड़ अपनी---- और चला आ जगन्माता चरणों में---- (अगले ही क्षण केशवचन्द्र सेन का चेहरा भी उमरता है .) केशवचन्द्र : तुम 'समाज से दूर भागकर 'सत्य' पाना चाहते हो ? यह भूल तुम्हारी। (समझाने के स्वर मे) 'नर में 'नारायण' की छवि देखो सुलझ जाएगा सारा रहस्य---- और मिट जाएगी सारी दुविधा.... (पर अलग-अलग बातो से नरेन्द्र के मन की दुविधा घटने के पर बढ़ जाती है। उद्विग्न दृष्टि उटती-गिरती लहरियों के बीच झूलने पिता विश्वनाथ के चेहरे पर टिक जाती है.) (आसपाम गले चेहगे पर दृष्टि फैकते हुए) मागों को यह विविधता भटका देगी. नरेन्द्र । बचो... इनसे यचो. पुत्र ! (स्ककर) लांट हमारे पाम--- (भुवनेवरी के चेहरे की ओर संकेत कर) देखें तुमारी मां-... कमी आशाभरी दृष्टि मे तुम्तरी और निहार रही है (विन्याम के माय) तुम्हारे सौटने की प्रतीक्षा कर रही है.... (नरेन्द्र की दृष्टि मां भुयनेन्वर्ग के व्यदिन मुख पर कैदिन होती है। : विश्वनाथ :

(59) वनेश्वरी : (सानु नयनों से निहारती हुई) हॉ--- हॉ---- लौट आओ, पुत्र ! (रुककर) मां की गोद में ही मिल सकती है.--- तुम्हें सच्ची शान्ति---. सच्चा सुख- (किंकर्तव्यविमूढ़ नरेन्द्र कभी महर्षि देवेन्द्रनाथ का चेहरा देखता है तो कभी केशवचन्द्र सेन का। कभी ठाकुर का तो कभी माँ-बाबा का। चेहरों की इस भीड़ में कुछ क्षण के लिए नरेन्द्र सब कुछ भूल जाता है अचानक उठी तेज हिलोर के साथ वह आया एक विशाल मत्स्य हिंसमुद्रा में हड़बड़ाए चेहरों की ओर लपकता है। देखते-देखते उन चेहरों के बीच हलचल मच जाती है। विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी नरेन्द्र को लेकर आशंकित हो भयभीत स्वर में चिल्ला पड़ते है) प्रवनाय : (चिल्लाकर) नरेन---- भागो-... वनेश्वरी : नरेन--- प्रश्वनाथ : कहीं यह मत्स्य---- बचो नरेन-... नरे------- (कथन पूरा होने से पूर्व ही अचानक उठी तेज हिलोर और मत्स्य के चपेटे से सब कुछ बिखर जाता है। मत्स्य घूमकर विश्वनाथ दत्त की ओर लपकता है। अगले ही क्षण नरेन्द्र को पुकारता बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त का चेहरा लहरों की उथल-पुथल में कहीं खो जाता है।) : (चिल्लाकर पुकारता हुआ) माऽऽ.... बाबाऽऽऽ---- (नरेन्द्र ने दृष्टि गड़ाकर इधर-उधर देखा पर न बाबा कही दीखे, न माँ । अचानक लहरो मे डूबता-उतराता माँ भुवनेश्वरी का हिचकोले खाता चेहरा दीख पड़ा-) (ऊँचे स्वर मे) मैं आ रहा हूँ, माँ ! (घबराई भुवनेश्वरी की दृष्टि लहरों में बहे जा रहे पति पर पड़ी, जो उन्हें मत्स्य की ओर ही धकेल रही थी। वह चीख पड़ी -) । (कातर कण्ठ से चिल्लाती हुई) दौड़ो---- नरेन---- दौड़ो---- (लहरों में हाथ-पाँव पडाटती हुई) देखो--- तुम्हारे बाबा---- उन्हे बचाओ---- बचाओ---- नरेन---- बिलेह तू कहाँ है ? (इस सम्पूर्ण भावतन्द्रा में खोया सागर-तट पर बैठा नरेन्द्र अपनी वास्तविक स्थिति को भूलकर विल्ला पड़ा -) (भावमग्न अवस्था मे ही उठता हुआ चिल्लाते स्वर मे) माँ । मैं आ रहा हूँ... अभी खोजता हूँ बाबा को । (चिल्लाते हुए) बाबा---- बाबा---- मैं श्वरी - .. । आ रहा हूँ....

(60) (भावमग्न अवस्था में अनजाने ही नरेन्द्र सामने सागर की मवर्ग लहरों की ओर दौड़ पड़ता है। सागर की लहरों पर ढलती साँझ की लालिमा के बीव ठीक इसे क्षण कंधे पर जाल सादे उसी ओर आ रहे तीन-चार मछुआरे ने को पागलों के समान सागर की लहरों की ओर लपकता देख चौंक पड़ते है। स्थिति की गम्भीरता को समझ उनमे से एक बलिष्ट मछुआरी लपककर नरेन्द्र को पकड़ लेता है।) : (नरेन्द्र को पकड़कर रोकते हुए) बाबू---- बाबू.--- ये क्या कर रहे हो ! (उसी भावाविष्ट मनोदशा में छूटने के विफल प्रयास के साथ) मुझे---- जाने दो---- (मामने की ओर सकेत कर) वहाँ--- मेरे संकट में हैं... (मछुआरे उसी ओर दृष्टि गड़ाते है पर वहाँ लहरों के अलावा कुछ भी नही दीखता है। इस बीच तीनों मछुआरे भी दौड़कर पास आ जाते है।) : (सकेत की दिशा मे दृष्टि गड़ाए हुए) कहाँ ? वहाँ तो कोई भी पहला नरेन्द्र - .. दूसरा नरेन्द्र पहला : : (छटपटाते स्वर में) बाबा---555.... (मछुआरे की पकड़ से छूटकर तहरों की ओर भागने का जी प्रयास करने के बावजूद भी नरेन्द्र उस मछुआरे की बलिष्ठ पका छूट नही पाता। यह देख दूसरा मछुआरा भी उसे पकड़ लेता है।) बावू.--- (शक्तिपूर्वक झकझोरते हुए तेज स्वर में) बाबू... (एक झटके के साथ पावतन्द्रा टूटते ही नरेन्द्र चौकी मुद्रा में इयर निहारता है। सागर पर उतस्ती साध्य लालिमा, उठती-गिरती लहरियो और पास खड़े अपरिचित मछुआरों को देख पलभर नरेन्द्र कुछ समझ पाता।) : (चौककर) हॉ---- 2 (ध्यान से इधर-उधर देखते हुए) कौन हो भाई ? (नरेन्द्र विस्फारित नयनों से मछुआरों को कुछ क्षण एकटक देखा इम बीच छायो खामोशी में रह-रहकर पथरीली चट्टानों से मा' टकराने की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती रही। (मविम्मय) तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे, भाई ? नरेन्द्र (61) J : (तीखे स्वर में) ऐ बाबू ! ज्यादा बनने की कोशिश मत करो---- : (भर्सना करते हुए) जिन्दगी से घबराकर मरने जा रहे थे तुम ? (नरेन्द्र चौक पड़ता है।) ': (साश्चर्य) क्या-~~? मरने---- ?? (अविश्वास-मुद्रा में) मैं मरने जा रहा था ? नहीं--- नहीं... मैं इतना कायर नहीं हूँ। , तो फिर--- इस खामोश अन्धेरे के बीच------ लहरों की ओर क्यों भागे जा रहे थे ? (पूरी बात सुनकर नरेन्द्र कुछ क्षण सोचने की मुद्रा बनाए बीते क्षणी को याद करने का प्रयास करता है।) : (इधर-उधर देखकर याद करते हुए खिसियाए स्वर में) माफ करना, भाई ! ख्यालों में डूबे-डूबे ऐसा लगा--- जैसे सागर की लहरों के बीच किसी मत्स्य ने मेरे बाबा को निगल लिया हो। इसी वजह से---- : हम न पकड़ते.... तो जाने क्या हो जाता आज ? : (मुस्कराते हुए) ख्यालों में - इतने डूबे न रहा करो, बाबू । (मुंह बिगाड़कर) जमाना बहुत खराब चल रहा है। (परिहास-भाव से मूढ़ अन्दाज़ पे) अभी तुम्हारा ब्याह नहीं हुआ शायद ? (नरेन्द्र अस्वीकृति सूचक सिर हिला देता है।) : (परिहास भरे स्वर में) तभी.... : बोबो न सही---- माँ-बाप तो होंगे ही न ? उनका तो ख्याल रखते, बाबू (नरेन्द्र के मन को एक जोरदार झटका लगता है।) :' (कोमल व. आत्मीय स्वर मे) माफ करना, भाई । मेरी वजह से तुम्हे बहुत परेशानी हुई (कोमलभाव से एक-एक कर चारों मछुआरी के कंधे छूते हुए तेजी से घा की ओर चल देता है। अब तक थी घर न पहुँच पाने की आतुरता नरेन्द्र के तेन कदोगे स्पष्ट झलक रही थी। मन में अभी भी उठा-पटकियों मचा द. खगेन्द्र को पता ही नहीं चल पाया कि सड़कों, गरियो व बौर के पार करते हुए वह कब घर पहुँच गया। भीतरी परिमर :- बिखरी अप्रत्याशित खामोशी के बीच कई पुरुष-स्त्रियो की अमामान्य गम्भीर हलचल को देख नरेन्द्र घबरा गया। वह कुछ और सोचता या इधर-उधर देखकर स्थिति को समझने की चेष्टा करता इससे पहले ही मुशीत लपककर उसके पास आ पहुँचे।) । (हाथ पकड़कर धीमे स्वर में अब तक कहाँ थे, बबुआ ? हमने तो पूरा १ दुछ दिन और रक जाती तो ठीक रहता। (रुककर) पीररी बुआ (64) ही रह गई. नियति के हाथों लुटी मांग सूना ललाद आशंकित अपेक्षाओं से भरे अनगिनत प्रश्नों को बाहर बिखरने से बचाए रखने को प्रयासरत उदास आँखें पपड़ाए होठ सफेद साड़ी के रूप में मानो जीवन के उड़ गए रग।' देखकर मन भीतर ही भीतर कराह उठा उसका। माँ की एकटक दृष्टि को अधिक देर सह न पाया वह -) कुछ काम है । भुवनेश्वरी : (वीतरागी मुद्रा में) नहीं, बेटे ! (कंधे पर हाथ रखकर) कुछ खा-पीका ही निकलना बाहर---- (वापस लौटने को मुड़ती है।) नरेन्द्र : रुको, माँ । (भुवनेश्वरी के लौटते कदम ठहर जाते है।) (आगे बढ़ माँ का कथा पकड़ते हुए) क्या------ यही कहने आई थी ? (कहते हुए गूढ़ अन्दाज़ में अपनी दृष्टि गड़ा देश है माँ भुवनेश्वरी वै भुवनेश्वरी : (दृष्टि चुराती हुई) क्या अब---- अपने आने जाने की सफाई भी देन होगी तुझे ? नरेन्द्र (माँ का हाथ पकड़कर अपने माथे पर रखते हुए) तो फिर अब कह--- (एक-एक शब्द पर बल देते हुए) तू क्या-... सचमुच यही कहने आ थी। (भुवनेश्वरी हड़बड़ाए भाव से अपना हाथ खीच लेती है।) भुवनेश्वरी : (मोठी ताड़ना के स्वर में) पागल हो गया है ? तेरी शपथ क्या- इतनी सस्ती हो गई रे ? नरेन्द्र : (माँ के एकदम पास सरककरें)- तो फिर बतला---- क्या कहने आई (जैसे अवानक चोरी पकड़ी गई हो' इस मात्र से हकनकाई मुद्रा नरेन्द्र को निहार तुरन्त दृष्टि झुका लेती है भुवनेश्वरी । भावावंग उमड़ आने के कारण कुछ क्षण बोल नहीं पाती वह ।) (कोमलमाव से माँ का कया पकड़ते हुए) बोल न ? भुवनेश्वरी : (परते स्वर मे) बेटा ! कल तेरे यावा का---- अशौचकाल पूरा जाएगा । (रुककर) स्वर्ग और किरण---. दोनों को ही अब.... ससुर लोटना होगा---- ! इसलिए उनकी विदाई का समुचित प्रबन्ध पत आवश्यक है। मुख पर) : तू-~- मुझे? है .. :

ले, पुत्र ! : निश्वी : (फीकी मुस्कान के साथ) मुंशीजी को अपने साथ सोनी हट्टा ले जा---- वर्ग: टीक है.... कर लेना बात किसी और वकील मे--- (आहत स्वर में) (65) तीर्थयात्रा से लौटी नहीं अभी तक । (भावुक स्वर मे) ऐसे में तुम अकेली कैसे रह पाओगी---- यहाँ इस घर में ? भुवनेश्वरी : (लम्बी साँस लेकर) अब तो जैसे भी हो---- अपने ही बूते पर शेप जीवन पूरा करना होगा, पुत्र । (पलभर के लिए वे पुन. चुप्पी से घिर जाते हैं। विचारशील नरेन्द्र के भीतर अनेक-अनेक प्रश्न बुदबुदाने लगते है, पर उपयुक्त अवसर ने जान वह तुरन्त उन्हें अपने भीतर ही दवा देने का प्रयास करता है।) (नरेन्द्र की उत्सुक दृष्टि माँ की ओर उठती, इससे पूर्व ही फुर्ती से पल्लू को गाँठ खोल भुवनेश्वरी अपना स्वर्णहार निकाल नरेन्द्र की हथेली पर रख देती है।) यह क्या, माँ ? : स्वर्ण और किरण की विदाई का प्रवन्ध नही करना है:क्या ? : (सविस्मय) तो? (हार को हथेली पर से उठाकर प्रश्नमुद्रा में मॉ को निहारने लगता वे सब समझा देंगे तुझे। (सुनते ही सारी बात समझ जाता है मरेन्द्र । छाती धक्क रह जाती है : (स्तव्य स्वर में) यह तुम क्या कह रही हो, माँ ? (सावेश) इसे क्या (दृष्टि चुराती हुई) दो-दो बेटियों की विदाई-... क्या यू ही हो जाएगी रे । (मककर) तू क्या---- समधियों का स्वभाव नहीं जानता ? (मककर) तिम पर इस घर का चढ़ा हुआ किराया नहीं देंगे---- तो सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता नहीं चला जाएगा ? उधर राखाल ने मुकदमे की पैरवी को चीच री में रोक दिया है.... उसका क्या होगा? (सव्यथा) घर के मुखिया के चले जाने पर---- कितना कुछ बदल जाता है, माँ ? राखाल चाचा--- इस तरह के हो जाएंगे- यह तो कभी सोचा भी न था हमने। (मककर) मगर तू फिक्र न कर----- मुकदमे की पैरवी के लिए.... मैं किसी और वकील से बात करूंगा। বিব मेन्द्र उसकी।) बेचोगी तुम " दोश्वर्ग : .. मगर क्या---- ममधियों से भी करेगा बान---- कि यहिनों को विदाई के लिए हमारे पास कुछ भी नहीं है ? (मैंह यनाकर) कृपा कर यूं ही ले जाइए इस बार---- (हतप्रम भाव से) नहीं, मां ! उसके लिए तो कुछ न कुछ करना है। नरेन्द्र होगा। है खूब कमाया .. भुवनेश्वरी : तो क्या करेगा... योल ? गिड़गिड़ाकर भीख मांगेगा किसी से ? नरेन्द्र : (क्षुश्य स्वर में) तुमने.... पैरिस्टर विश्वनाथ दत्त के बेटे को आखि समझा क्या है, माँ ? (अपने आवेश को संयत करता हुआ) मगर चिन्ता न कर--- मैं किसी अच्छे कामकाज की तलाश में हूं। मिलते हैं कर लूंगा। देखना---- जल्दी हो सब ठीक हो जाएगा---- भुवनेश्वरी : तेरे सब ठीक हो जाने तक---- हमारे कर्जदार रुके नहीं रहेंगे, बेटे । नरेन्द्र : (चौककर) क्या ? हमारे कर्जदार ?? 'हम पर कर्ज है किसी क ??? भुवनेश्वरी : (व्यथा भरी नि.श्वास के साथ) हां, बेटे । नरेन्द्र : (अविश्वासमाव से) मगर बाबा ने तो.... बैरिस्टरी से उसका क्या हुआ, जो---- भुवनेश्वरी : (बात काटकर) तू क्या---- अपने पिता के उदार स्वभाव को नहीं जानत रे ? (सगर्व) तेरे पिता ने दोनों हाथों से कमाया... तो चार हाथों उसे गरीबो, असहायों और जरूरतमन्दों में बाँटा भी है। ऐसा व्यकि संचय नहीं कर सकता---- कर्ज़ ही छोडकर जाता है.... और तेरे बाब इसके अपवाद नहीं थे। (नरेन्द्र गहरे सोच में डूब जाता है।) क्या सोचने लगा तू ? नरेन्द्र (सव्यथा) सोच रहा हूँ---- आखिर मुझसे यह सब क्यों छुपाया गया ? भुवनेश्वरी : छुपाया नहीं गया, पुत्र ! (लम्बी साँस लेकर) हॉ---- इस बात को----- तो तुम्हें कभी समझाया गया---- और न ही सब कुछ देखकर भी तूने समझने का प्रयास किया। माँ ! भुवनेश्वरी घर में जो भी कुछ होता था---- मभी के सामने ही होता था, बेटे । (रूककर) तू क्या सोचता है- ये सारी बातें तेरे बाबा ने मुझे समझाई थी। उन्होंने तो किसी से कुछ नहीं कहा--- सब कुछ स्वय ही झेलते रहे। (मककर) खुद ही सब समझती रही- (भावुक स्वर में) क्यों हमें अपना आलीशान घर छोडकर किराए के छोटे-से मकान में चला आना पडा ? बग्घी और कोचवान सहसा क्यों हटा दिए गए ? क्यों बच्चों की देखभाल के लिए दो-दो नीन-तीन नौकरों के स्थान पर एक भी नहीं रहा । : नरेन्द्र .. :

(67) (नरेन्द्र गर्दन झुकाए चुपचाप सुनता रहता है।) (कंधे पर हाथ रखकर दुलार भाव से) ये सब बातें समझाने को नहीं-... स्वयं समझने की बातें थी, बेटे । नरेन्द्र : (पछताने के स्वर में) मुझे आश्चर्य है, माँ । इस घर में रहते हुए भी मैं यह सब क्यों नहीं देख-समझ पाया....? भुवनेश्वरी : (उपालम्भ के स्वर में) तू इस घर में रहता ही कब था, पुत्र ? (रुककर) शरीर से यहाँ होते हुए भी तू मन से इस घर मे रहा ही कब ? तूने तो अपना एक अलग ही संसार बसा लिया था---- जिसमें केवल तू ही था अकेला---- केवल तू ही। हम लोगों के लिए तूने उसमें स्थान छोड़ा ही कव था ? तेरा सारा ध्यान तो--- पहले ब्रह्मसमाज की मण्डलियों और साधु-संन्यासियों पर था---- और अब दक्षिणेश्वर के उस ठाकुर पर लगा हुआ है। उसे ही तू.-- अपना सब कुछ मान बैठा है। नरेन्द्र : (सव्यथा) मुझे अब और लज्जित न करो, माँ । तुम फिक्र न करो---- मैं जल्दी ही कोई न कोई कामकाज करने लगूंगा । (भावुक स्वर मे) तुम्हारी पीडा को मैं अच्छी तरह जानता हूं.--- भुवनेश्वरी : (चैन की साँस लेती हुई आश्वस्त भाव से) तो फिर---- पुत्र के रूप में अपने स्वर्गीय पिता के स्वन साकार कर---- अपना 'पुत्र-धर्म' निभा---- नरेन्द्र मैं इसके लिए पूरा-पूरा प्रयत्न करूंगा, माँ । (अचानक खिले मन से) प्रयत्न की कोई आवश्यकता नही है, बेटे । (एकदम पास आकर ममत्वभाव से नरेन्द्र के कपोल सहलाती हुई) तू बस---- केवल 'हाँ' कर दे---- (अपनी याचना भरी दृष्टि झोली की तरह पुत्र के आगे पसार देती - भुवनेश्वरी : नरेन्द्र भुवनेश्वरी : : (चौककर) क्या मतलब ? (स्वर में अधिक से अधिक कोमलता, लाकर) तेरी अन्नदा मौसी की निगाह में एक बहुत अच्छी लड़की है, बेटे ! अत्यन्त ही सुंदर और सुशील । (रुककर) कलकत्ता के रामचन्द्र दत्त की पुत्री---- शिवागी--- यानि कि पार्वती ! इधर तू---- वीरेश्वर महादेव की कृपा का प्रसाद । (कधे पर हाथ रखकर) जानता है-... तेरी पीशी बूआ ने पहले तेरा नाम वीरेश्वर ही रखा था। (नरेन्द्र को मॉ की यह बाते बिल्कुल भी अच्छी नही लग रही थी, फिर भी वह उन्हे शालीनभाव से सुने जा रहा था।) (मोडी कल्पनाओ में खोती हुई) तू वीरेश्वर---- और वह शिवागी--- सचमुच बहुत दुर्लभ जोडी होगी तुम्हारी....

बस---- : नरेन्द्र (अपनी झंझलाहट को रोकने हुए) मां । अभी मेरे अपने निर्वाह का साधन से नहीं है मेरे पास... और तू--- घर में एक और नया प्राणी जोडकर खर्च में वृद्धि करने की बात करती है ? भुवनेश्वरी : (सोत्माह) उसको त चिन्ता न कर, बेटे । उसके पिता बहुत सम्पन है। (रुककर) यं समझले-... यहू के आते ही---- हमारो सारी आर्थिक कठिनाइयां मिट जाएंगी.... नरेन्द्र (उपहास भाव से) वाह मां । वाह.... ! (भुवनेश्वरी नरेन्द्र के सहसा बदले रुख से चौककर उसका मुंह देखने लगती है।) उस धन मे...... क्या परे जीवन की आधिक कठिनाइयां मिट जाएंगी हमारी ? (सव्यग्य) क्या तात्कालिक समाधान, के लिए त मेरे पांवों में स्थायी वैडियां डाल देना चाहती है ? कैसी मा है तू भी ? भुवनेश्वरी : नहीं, बेटे । यह तात्कालिक नही---- स्थायी समाधान है। नरेन्द्र सो कैसे भुवनेश्वरी : (विशेष अन्दाज मे) वे लोग तेरी पढाई पूरे होने---- और तेरे पैरिस्टर बन जाने तक का सारा खर्च करेंगे---- और जब तू अपने पाँवों पर खड़े होकर वावा की तरह कमाने लगेगा---- तो फिर समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएँगी । (मुँह बनाकर) फिर भला हम क्यों उनका खर्च करवाएंगे। नरेन्द्र : (मावेश) समझा---- तो तुम ऐसी मीठी-मीठी बातें करके---- मेरी जीवन नैया को भवसागर में पूरी तरह से डुबो देने के सपने देख रही हो । भुवनेश्वरी : (मीठी ताड़ना के साथ) चुप कर। ऐसा अशुभ मत बोल.... (प्यार से नरेन्द्र का हाथ पकड़कर) बस---- तू 'हाँ' कर दे, बेटे । तृझे मेरी . .. .. शपथ---- (कहती हुई नरेन्द्र का हाथ फुर्ती से अपने सिर पर रखने का प्रयास करती है, पर वह झटके से अपना हाथ माँ के हाथ में खीचकर अलग कर लेता है। (सक्रोध) नरेन्द्र । नरेन्द्र : (झुंझलाकर) तुम व्यर्थ के सपने देखना बन्द करो, माँ ! (दृढ शब्दो में) मुझे विवाह नही करना है.... किसी भी स्थिति में नही.... भुवनेश्वरी : (टूटे स्वर में) नरेन्द्र । (आँखो मे ऑम छलक आते है।) (पल्लू से ऑमू पाटनी हुई) अच्छी तरह जान लिया है मैंने--.. मेरे जीवन में सुख लिखा ही नहीं है। (व्यंग्यमाव से नरेन्द्र की ओर ऑखे तोरती (69) हुई) तू भी क्या करे बेचारा ? (आँखों में हताश आंसुओं का उफनता तूफान लिए भुवनेश्वरी तेजी से बाहर निकल जाती है। हाथ में हार तथा मन में गहरा उद्वेलन लिए नरेन्द्र हतप्रभ भाव से खड़ा रह जाता है। ठीक इसी क्षण सुयश आ धमकता है। चौककर नरेन्द्र हार को अपनी जेब में डाल अपने को एकदम सहज बना लेता है। : (साश्चर्य) अरे ! तू घर बैठा है---- गया नही अपने नए काम पर : (भारी मन से) गया था---- पर लौट आया---- नही करना मुझे वो सुयश नरेन्द्र काम---- सुयश नरेन्द्र .. सुयश : क्यों ? (रुककर) इतनी मुश्किल से उसे राजी किया और तू है कि---- (वात काटकर) वह मुझसे अश्लील और बाजारू पुस्तकें लिखवाना चाहता है---- सो मैं नही लिख सकता--- सुयश ! : तो क्या हुआ ? कौन इससे तेरा मन मैला हुआ जा रहा था। तुझे तो बस.... अपने पैसों से.मतलब । : नहीं, सुयश । मैं अपनी भावनाओं के विरुद्ध कुछ भी नहीं करूंगा---- चाहे मुझे भूखों ही क्यों न मरना पडे। (घूरकर) क्या रुपया-पैसा ही सब नरेन्द्र सुयश (मुयश उपहासभरी मुद्रा बनाता है।) फिर अब क्या करेगा ? : कोई और काम तलाशृंगा। (रुककर) एक जगह है---- अनुवाद का नरेन्द्र काम---- सुयश नरेन्द्र कही जा रहा था । मैं तो तेरे दक्षिणेश्वर के अनुभव सुनने आया था---- : दक्षिणेश्वर के अनुभव फिर कभी सुयश । (कंधा पकड़कर) अभी मुझे मुंशीजी से मिलना है बहुत जरूरी---- (मुह बनाए हुए सुयश नरेन्द्र के साथ बेमन से चल देता है।)

(70) दो अंक दृश्य .. : दक्षिणेश्वर स्थित ठाकुर का आवास समय : दोपहर ठाकुर (जगन्माता जगत्तारिणी माँ काली के भव्य मन्दिर एवं पंचवटी उद्यान से लगपग समान दूरी सयन हरियाली के बीच स्थित टाकुर के आवास कक्ष के बाहरी बरामदे में भूमि पर ही आसन बिछाए विवारमग्न अवस्था मे बैठे ठाकुर। पास ही बैठा उनकी गम्भीर मुखमुद्रा को निहारता नरेन्द्र तथा ठाकुर का ही एक शिष्य शिवानन्द। कुछ क्षण को वैचारिक चुप्पी की बोझिलता को यदा-कदा भग करता सघन-सुशीनल हरियाली के बीच गूज उठता किसी पक्षी का मधुर स्वर) : (सहमा नेत्र खोलते हुए) सारा पाप 'वैयक्तीकरण' में है तथा सारा पुण्य 'सार्वभौमता' में है, नरेन्द्र । मानता हूँ, ठाकुर ! और जानता भी हूँ.--. 'सार्वभौमता' का महत्त्व। (रुककर) किन्तु, ‘सार्वभौमता' के प्रति आस्था के बावजूद भी मेरा मन जाने क्यों 'व्यक्ति की खोज में व्याकुल हो उठता है.... एक ऐसे व्यक्ति की खोज में जो मेरे भीतर हलचल मचाते प्रश्नों, तर्को---- और द्वन्द्रों के बीच से निकालकर 'सत्य' से मेरा साक्षात करवा सके। : (परिहास भाव से) तो---- यूँ क्यों नहीं कहता कि---- तुझे गुरु चाहिए---- (मुस्कराते हुए नरेन्द्र की ओर देखने लगते है।) तुझे ब्रह्मसमाज से कोई मार्ग नहीं मिला, : वहाँ मुझे समाजसुधार की दिशा तो मिली, ठाकुर । किन्तु ईश्वर की और एक डग भी बढ़ाने की सम्भावना दृष्टिगत नहीं हुई। : (सस्मित स्वर मे) और वहाँ का मोहभंग होने पर.... बाद दक्षिणेश्वर याद आया ? क्यों ? : ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर तुझे इतने दिनों (71) नरेन्द्र ठाकुर । । । : नहीं। ब्रह्मसमाज की मण्डलियों में जाना मैंने छोड़ा नहीं है, (रुककर) मैं उसके 'सामाजिक समरसता' और 'मानवतावादी सिद्धान्तों का अभी भी कायल हूँ---- किन्तु इतना भर ही तो मेरा अभीष्ट नहीं है। ठाकुर : तू फिक्र न कर। तेरा यह कार्य मैं करूंगा। मैं हाथ पकडकर तुझे 'सत्य' के पास ले चलूंगा---- उससे तेरा साक्षात् करवाऊंगा---- नरेन्द्र : (आश्चर्य भाव से ठाकुर की ओर देखते हुए मन ही मन) लो---- ये तो गुरु बनने को पहले से ही तैयार बैठे हैं। (सोचते हुए) लगता है---- लोगों ने ठीक ही कहा था--- ठाकुर एकदम सनकी है---- और पागल भी । तिस पर पढ़े-लिखे भी नहीं है। क्या ऐसा व्यक्ति 'गुरु' बनने योग्य है ? (तभी मन में विचारों की दूसरी लहर आई -) (सोचते हुए) तो क्या मैं यहां---- ठाकुर की पढ़ाई-लिखाई की थाह लेने आया हूँ---- या 'ईश्वर' को पाने ? 'ईश्वर' को पाने के लिए क्या पढ़ा-लिखा होना जरूरी है---- या कि अनपढ़ या कम पढे को ईश्वर नही मिलते ? नहीं---- नहीं---- मुझे इन दोनों में किसी एक आवश्यकता को स्वीकार करना होगा---- अन्यथा---- : (नरेन्द्र के विचारों का क्रम तोड़ते हुए) अरे ! तू किस सोच में पड़ गया ? : (चौककर तत्क्षण सहज बनते हुए) मैं सोच रहा था---- 'सत्य' का साक्षात्---- क्या सचमुच इतना आसान है---- जितनी आसानी से आपने कह दिया? (नरेन्द्र की ऐसी आशंका पाम बैठे शिवानन्द को अच्छी नहीं लगी।) शिवानन्द : तुम--- गुरुदेव की सिद्धियों से परिचित नही हो, नरेन्द्र ! इसीलिए ऐसा विचार तुम्हारे मन में आया--.. : (निषेधभाव से तर्जनी उठाकर) नरेन्द्र जिज्ञासु है, शिवा ! यह मैने प्रथम भेंट में जान लिया था। (रुककर) तुम्हें उसके प्रश्न को अन्यथा नही ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर लेना चाहिए। शिवानन्द ठाकुर : पर, गुरुदेव- सत्य' जब तक अजेय है, रहस्य' एवं 'दुरूह' ही प्रतीत होता है, जबकि 'जान चुकने पर वही अत्यन्त सहज एव सुगम । यह बात 'न जाने हुए' को अविश्वसनीय भी लगती है। (नरेन्द्र की ओर स्नेह भाव से निहारते हुए अभी उस स्थिति में पहुंचने में नरेन्द्र को कुछ समय लगेगा---- और प्रयत्न भी करने होंगे। : प्रयत्नशील तो मै पहले से ही हूँ.--- : तो जा-... जगन्माता के दर्शन कर आ। नरेन्द्र ठाकुर (72) नरेन्द्र ठाकुर .. ठाकुर .. : (परिहाम पाव से) जगन्माता के.... या जगन्माता की प्रतिमा के : पहले-... 'अस्ति-नास्ति' को दुविधा से निकल-~~ उतर स्वतः ही मिल जाएगा। यह मेरी 'जिज्ञासा' है, ठाकुर । 'दुविधा नहीं---- 'जिज्ञासा' को जब मार्ग नही मिलता--.. तो वह 'दुविधा' बनकर आड़े आ जाती है। इसीलिए कहता हूं.... (गृह अदान में) पहले जगन्माता के दर्शन कर आ.... : नहीं... में प्रतिमा के आगे माथा नहीं नवाऊंगा--- : (परिहास भाव में) 'प्रतिमा के आगे.... या 'जगन्माता के आगे ? 'प्रतिमा' में मुझे विश्वास नही--- और जगन्माता से कभी---- साक्षात् हुस नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र नहीं। .. नरेन्द्र (ठाकुर हँस पड़ते है।। ठाकुर यदि तुम 'जगन्माता' में विश्वास नहीं करते---- तो कहो.... फिर यहाँ क्य आते हो। नरेन्द्र क्या यहाँ आने के लिए.... मेरे "विश्वास को-~~ आपके "विश्वास के अनुगामी होना पड़ेगा। ठाकुर : (मुस्कराते हुए) यह प्रश्न तू.--- अपने आपसे क्यों नहीं पूछता ? : (परिहास-मुद्रा में) क्यों---- आपको प्रश्नों से भय लगता है । ठाकुर जीवन तो अपने आप में--- स्वयं ही एक प्रश्न है रे ! (रुककर) उस भला डरना कैसा ? (कुछ क्षण की चुप्पी में किसी पक्षो के बोल उठने के साथ ही साथ अचानक नगाड़ी की गूज के बीच दोपहर के भोग के घण्टे बन उठते है। ठाकुर आँख मूंद अपना गला-सहलाने लगते है।) शिवानन्द : (चौककर) गले मे कष्ट हो रहा है, गुरुदेव ? (याद कर) बातों ही बात में आज न तो आपने औषधि पी-... और न ही अब तक भोग पाया। माँ आज अवश्य मुझ पर कुपित होंगी---- | अभी लाता हूँ (उठते हुए) हृदय का भो अब तक पता नहीं.... (तेजी से एक ओर चल देता है। ठाकुर उमसे कुछ कहना चाहकर भी गले के खरखरा उठने के कारण कह नही पाते। वे फिर अपने हाथ से गला सहलाने लगते है। इस बीच उन्हें थोड़ी खाँसी भी आती है। नरेन्द्र उठकर भीतर से पानी लाता है नरेन्द्र (जल-पात्र टाकुर की ओर बढ़ाते हुए) थोड़ा पानी पी लीजिए-- ठाकुर .

ठाकुर नरेन्द्र (नरेन्द्र के हाथ से जल-पात्र लेकर ठाकुर 'गद्गट्' कर पानी पीने लगते है, पर पाँव-सात घूट से अधिक निगल नहीं पाते। कण्ठ-पीड़ा स्पष्ट रूप से चेहरे पर झलक आती है। वे हॉफते हुए जल-पात्र को वही एक ओर रख देते है तथा बरामदे की दीवार से पीठ टिका पुनः अपने नेत्र मूंद लेते है।) (सामने की ओर देखन हुए) शिवा अभी तक नहीं आया---- आपकी औषधि लेकर.... : (नेत्र मूद-मूदै ही) आ जाएगा---- तब तक तू कुछ गा, नरेन्द्र । (रुककर) भीतर से तानपूरा उठा ला---- : (उठते हुए) जी, ठाकुर ! (भीतर से तानपूरा लाकर गाने बैठ जाता है।) (तानपूरे के तारो को व्यवस्थित करते हुए) 'अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल । कामक्रोध को पहिरि चोलना, कण्ठ विषय की माल । महामोह - के नूपुर बाजत, निन्दा सबद रसाल । भरम भरयों मन भयो पखावज, चलत कुसगत चाल । तृष्णा नाद करत घट भीतर, नानाविध दे ताल । माया को कटि फैंटा बांध्यो, लोभ तिलक दे भाल। कोटिक कला काँछि देखराई, जल थल सुधि नहिं काल । 'सूरदास' सबै अविद्या, दूरि करें नन्दलाल ॥' (दीवार से पीठ टिकाए नेत्र मूदे ठाकुर तन्मयभाव से नरेन्द्र का मधुर भावपूर्ण गायन मुनते रहते है।) (भावमग्नता मे स्वय से ही बातें करते हुए) अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल---. नाचना तो होगा ही---- जब तक वो नचाता रहेगा---- (रुककर) नचा-... देखते हैं.... कौन थकता है पहले । (अचानक ठाकुर को फिर तेज खाँसी उठती है और वे गला व छाती थाम खॉसते-खॉसते बेहाल होने लगते हैं। नरेन्द्र तानपूरा रख उन्हे सम्भालता है। टीक इसी क्षण सामने से शिवानन्द दाशरथि सान्याल के साथ ठाकुर को औषधि एव पोग प्रसादी ले उसी ओर आता दीख पड़ता है।) : (एक दृष्टि ठाकुर पर डाल शिवानन्द की ओर देखते हुए ऊँचे स्वर मे) शिवा । शिवा ।। जल्दी आ-... (स्थिति को भॉप शिवानन्द दाशरथि सान्याल के साथ तन्क्षण भागते हुए वहाँ आ पहुँचता है। सब मिलकर ठाकुर को सम्हालने है।) ठाकुर नरेन्द्र (74) जल्दी औपधि पिला ठाकुर को--- (शिवानन्द औषधि वाला पात्र ठाकुर की ओर बढ़ाता है।) शिवानन्द : (औपधिपात्र ठाकुर के मुंह से लगाकर) औषधि पी लीजिए, गुरुदेव । (खाँसी के बीच रुक-रुककर बहुत मुश्किल से ठाकुर औषधि पौ पाते नरेन्द्र : (ठाकुर की पीठ सहलाते हुए) शिवा ! ठाकुर को भीतर सुलाना ही ठीक रहेगा---- (रुककर) दाशरथि---- तू भीतर जाकर ठाकुर की शैया ठीक कर---- ठाकुर : (हाँफते हुए) नही---- मैं यही ठीक हूँ। (हॉफते हुए सभी के सहारे से दीवार से ठीक तरह पीठ टिकाकर बैठ जाते है। इस समय तक खाँसो रुक जाने के कारण ठाकुर कुछ-कुछ सम्हलने लगते हैं।) (नेत्र खोलते हुए) देखा नरेन्द्र ! अपने संगीत का जादू ? (परिहास-मुद्रा में) उसका नचाना बंद होने से पहले ही खाँसी नचाने लगी हमें , (हँसने का प्रयास करते हैं, पर पुनः खाँसी आ जाने के भय से हस नही पाते ठाकुर।) दाशरथि : गुरुदेव ! अधिक बोलने व परिश्रम के लिए डॉक्टर ने मना किया है आपको । ठाकुर : (दाशरथि को यात पर ध्यान न देकर शिवानन्द की ओर देखते हुए) शिवा---- भोग-प्रसाद लाया है न.--- 2 इधर दे---- (हाथ बढ़ाकर शिवानन्द के हाथ से भोग प्रसाद का पात्र झपट लेते है।) शिवानन्द : (ठाकुर का हाथ पकड़कर) नहीं, गुरुदेव । श्री माँ ने आपके लिए दलिया बनाकर भेजा है...- आप वही लें.... ठाकुर नही---- मैं जगन्माता के भोग-प्रसाद का भात हो खाऊंगा---- मेरे साथ नरेन्द्र भी खाएगा---- ले नरेन्द्र ! तू भी खा---- (हाथ पकड़कर नरेन्द्र को अपने पास बंटा भोगपात्र उसके सामने कर देते .. दाशरथि ठाकुर खा----मैं भी खाता हूँ.-- : ठाकुर । डाक्टर ने भात न खाने को कहा है-... (भात खाने हुए) चिन्ता न कर---- जगन्माता के भात से कोई भी हानि नहीं होगी मुझे---- (नरेन्द्र की ओर ऑखें तोरकर मोठी ताड़ना के साथ) सुना नहीं तुने ? खा----- ..

(75) (नरेन्द्र विवश भाव से भात खाने को कौर जैसे ही मुँह की ओर बढ़ाता है, उसकी कल्पना में रसोईघर के डिब्बो में लगभग बीत चुके सामान के साथ माँ भुवनेश्वरी तथा दोनों भाइयों के चेहरे उभर आते । नरेन्द्र हाथ का कौर जहाँ का तहाँ रह जाता है।) (चौककर) क्या हुआ,रे ? खाता क्यों नहीं? : (अनमने स्वर में) भूख नहीं है, ठाकुर । चलते समय माँ ने दूंस-ठूस कर खिला दिया था मुझे--- (रुककर) आपकी जगन्माता का अनादर न और आपकी अवज्ञा का पाप भी न लगे-- इसलिए थोडा-सा प्रसाद ले लेता हूँ। नरेन्द्र (हाथ का भात पात्र में डाल थोड़ा-सा भात खा जाता है । ठाकुर इधर-उधर ध्यान दिए बिना दोनों हाथों से भात खाते रहते है। इस प्रयास मे कुछ भात मुँह में जाता है, कुछ मुंह के बाहर लग जाता है तो कुछ पात्र में गिरता जाता है। नरेन्द्र ठाकुर का यह रूप विस्मित दृष्टि से देखता रहता है।) : (मन ही मन) लोंग ठीक ही कहते हैं---- ठाकुर सनकी भी है और पागल भी---- (अचानक आगे-आगे हदय का तथा पीछे-पीछे तेजी से प्रतापचन्द्र हाजरा का प्रवेश -) : (अधीर भाव से) मामा ठाकुर ! मामा ठाकुर ।। (ठाकुर सहित सभी लोग हृदय के आतुर स्वर से चौककर उसी ओर देखने लगते है। ठाकुर का भात लिए हाथ पात्र का पात्र में ही रह जाता है।) : (सविस्मय) क्या बात है, हृदय ? ऐसी अधीरता---- (तेजी से आने के कारण हाँफता हुआ हदय एक क्षण कुछ भी बोल ठाकुर नहीं पाता।) हृदय ठाकुर : : (हाँफते हुए) गज़ब हो गया, मामा ठाकुंर । क्या हुआ ? (सशंक स्वर मे) जगन्माता मंगल करे---. (प्रतापचन्द्र हाजरा अल्हड़भाव से पान चबाता रहता है।) : मथुराबाबू ने चाण्डालों की बस्ती को हटाने के लिए उन पर बल-प्रयोग किया है.. : (चौककर) बल-प्रयोग ? किन्तु---- रानी मां के सामने तो कुछ और ही तय हुआ था----फिर-... (बान काटते हुए) मथुराबाबू भला किसी को सुनते हैं । दाकुर ..

(76) प्रतापचन्द्र : (पान चबाते हुए) बड़े लोगों की जिद ऐसी ही होती है, गदापर ! (उपहास भाव से) मैंने पहले ही न कहा था तुझसे-~~- बडे लोगों से मेल मत कर--- नहीं निभ पाएगी उनसे हमारी । (मुंह बनाकर) मगर--- मानता है किमी की ? बडा ज्ञानी समझता है अपने को-- (मुंह बिगाड़कर) हुँअ-... (पॉव पटकता हुआ चलने को उद्यत् होता है।) (जाते-जाते) अरे । जमाने का अनुभव भी कोई चीज होती है--- (नरेन्द्र की ओर मुँह करके) क्यों---- होती है कि नहीं ? (घूरते हुए बोल---- (नोन्द्र हत्प्रय-सा उसे आँखें फाई देखना रहता है। नरेन्द्र से निगाह मिलते ही प्रतापचन्द्र हाजरा पलभर के लिए ठिठक जाता है न पहचान पाने के कारण।) (तीखी दृष्टि गड़ाकर) तू.... ? (याद करते हुए) तू.--- वो ही तो छोकरा है न---- मिरफिरा---- (सोचते हुए) क्या नाम है तेरा---- नरेन्द्र---- (नरेन्द्र अपनी विस्मित दृष्टि प्रतापचन्द्र हाजरा मे मिलाए रखता है।) (मुँह बिगाइते हुए) जाने कैसे-कैसे लोगों को जमा कर लेता है... ये गदाधर भी... . : (पाँव पटकता-बड़बड़ाता वहाँ से चल देता है। नरेन्द्र क्रोध में जाते हुए हाजरा को घूरता रहता है। उसकी बलिष्ठ भुजाएँ फड़कने लगती है, पर वह अपने को सयत कर लेता है।) शिवानन्द : (सावेश) गुरुदेव । प्रतापचन्द्र हाजरा को अभद्रता दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है...- तिस पर रोज-रोज आपका अपमान---- हमसे देखा नहीं जाता। (रुककर) किसी दिन गर्दन पकडकर बाहर फैंक देंगे... हम उसे दक्षिणेश्वर के...- ठाकुर (शान्त भाव से मुस्कराते हुए इस तरह उत्तेजित होने से काम नहीं चलता, शिवा ! (रुककर) और फिर--.. प्रताप-... मन का उतना बुरा नहीं है--.. (सहास्य) बस---- थोड़ा-सा मुँहफट अवश्य है। (सहसा पास खड़े हदय पर दृष्टि पड़ते ही छूटी हुई बात का ध्यान आ जाता है ठाकुर को।) (उत्सुक भाव से) आगे वह, हृदय ! फिर क्या हुआ ? हृदय सुना है.... अनेक घर उजाड डाले गए हैं.... जहाँ-तहाँ झोपड़ियों में आग लगा दी गई है---- अनेक लोग आहत भी हुए है। (ठाकुर के मन में उठे भावावेश के चित्र स्पष्ट रूप से उनके मुख उभर आते है ) नारियों और बच्चों तक का भी ख्याल नहीं किया गया,मामा ठाकुर टाकुर (अविश्वास भाव से) क्या ? .. पर ..

(m) टाकुर नरेन्द्र : (आवेश मे उठ खड़े होते है ठाकुर । यह भी भूल जाते है कि अभी कुछ क्षण पूर्व तबियत बिगड़ गई थी। नरेन्द्र व शिवानन्द रोकते है, पर वे मानते नही।) (सात्रु नयनों और रुंधे कण्ठ से) नारी पर भी अत्याचार----? उस नारी पर--- जिसके भीतर म्वयं जगन्माता निवास करती है। (भावावेश में) निरीह आकांक्षाओं पर महत्त्वाकांक्षाओं का यह ताण्डव आखिर कब तक चलता रहेगा, माँ ? (इधर-उधर देखते हुए इसे रोकना होगा---- रोकना हो होगा---- अन्यथा विनाश की यह तीव्र आँधी मानवता के वटवृक्ष को जड़ों को झकझोर कर रख देगी---- (आवेश में गंगाघाट की ओर बढ़ते है।) नगेन्द्र : (चौंककर) आपकी तबियत ठीक नहीं है, ठाकुर । अधिक विचार का समय नहीं है। चलो---- : कहाँ ? ठाकुर हमें उन निरीह चाण्डालों की मेवा में.... अपने उच्चताजन्य सस्कारों को गलाकर लय कर देना होगा---- जिन्हें महत्त्वाकाक्षाओं के रथ ने कुचलकर रख दिया है। शिवानन्द : (साश्चर्य) चाण्डालों की सेवा , यह आप क्या कह रहे हैं, गुरुदेव । आपकी तबियत ठीक नही है, मामा ठाकुर । दाशरथि इस पर मथुरा बाबू क्या कुपित नहीं होगे ? रानी रासमणिजी क्या--- ठाकुर . .(वात काटकर) न मथुराबाबू हमारे भाग्यविधाता हैं, दाशरथि । और न---- रानी माँ । (हॉफने हुए) सभी उपासनामार्ग मानव कल्याण और उसकी सेवा पर जाकर ही समाप्त होते हैं। सच्चे आध्यात्मिक विकास के लिए समाजसेवा अत्यावश्यक है। मानव-सेवा ही सच्ची ईश्वर-पूजा है-... चलो---- : (रोकते हुए) मामा ठाकुर । (ठाकुर किसी की भी बात पर ध्यान दिए बिना गंगाघाट की ओर चल देते .. .. नरेन्द्र हदय शिवानन्द व दाशरथि तेजी से उनका अनुसरण करते है।) (मन ही मन) विचित्र है ठाकुर ! इनके 'आचरण' को 'तर्क' से समझ पाना सम्भव नही है किसी के भी लिए--.. (तेजी से पीछे-पीछे चल देता है।)

(78) अंक : तीन दृश्य स्थान समय .. एक : दक्षिणेश्वर का पंचवटी उद्यान अपराह (उद्यान क्षेत्र में अत्यधिक पास-पास खड़े अनगिनत अश्वत्थ, बिल्ब आमलक, अशोक एवं वटवृक्षों के विस्तार के कारण 'पंचवटी' नाम से पहचाने जाने वाले इस स्थान पर सघन हरियाली के बीच सहम ही सघन कुंज जैसा दृश्य बन गया है। यहाँ तक कि बेवारी धूप को भी भीतर तक पहुँचने के लिए काफी कुछ 'द्रविड़ प्राणायाम करना पड़ना हरियाली के घने समूहो मे इधर-उधर भटक रही पगडण्डियाँ तथा गंगा तट व समीपस्थ मंदिर की ओर संकेत करता एक सीधा-सरल मार्ग। वातावरण में यत्र-तत्र मिठास घोलते विविध पक्षियों के मधुर कलरव के बीच एक ऊँचे स्थान पर माथे पर पट्टी बाँधे अपने कुछ शिष्यो के साथ बतिया रहे ठाकुर-) शिवानन्द : नरेन्द्र आपसे कितने-कितने तर्क करता है, गुरुदेव । आपको बुरा नहीं लगता ? ठाकुर : नहीं, रे ! उल्टे प्रसन्नता होती है। (रुककर) सच पूछो--- तो मैं--- तुम लोगों को अधश्रद्धा से कभी-कभी उकताने लगता हूँ.-- और जगन्माता से प्रार्थना करता हूँ--- मां । ऐसा कोई मेरे पास भेज--- जो मेरो उपलब्धियों पर शका करे। दाशरथि 'शका' से क्या---- 'आस्था' आहत नहीं होती, गुरुदेव ? ठाकुर नही, पुत्र । “जिज्ञासा' प्रेरित 'शंका' से 'आस्था' आहत नही... पुष्ट ही होती है, किन्तु उसके लिए पहले 'सुदृढ़ तर्क' की सीढ़ियाँ पार करनी .. पड़ती है। प्रतापवन्द्र : (बीच हो मे सहास्य) तो ठीक है.... रानी रासमणि से कहकर बनवाए देते हैं.... दक्षिणेश्वर में सीढियां--(पहिास भाव से) फिर चढ़ते-उतरते रहना उन पर---- (नाटकीय अदाज में) आगे-आगे ठाकुर-- और (79) टाकुर ठाकुर पीछे-पीछे शिप्यमण्डल--- (ठहाका लगाकर हंस पड़ता है। प्रतापचन्द्र हाजरा को स्वयं अपनी ही बात पर अप्रासंगिक रूप से ठहाका लगाकर हंसते देख ठाकुर गूढभाव से मुस्करा देते है, जबकि अन्य सभी प्रतिक्रियाविहीन दृष्टि से उसे निहारते रहते है।) : (सस्मित भाव से अपने शिष्यों की ओर निहारकर) • यहाँ तो 'आस्था' पहले से ही पुष्ट है। ऐसे लोगों के साथ उन सीढ़ियों पर चढकर---- मुझे भला क्या मिलेगा, रे ? (गूढ़ अन्दाज़ में) वहाँ तो तेरी ही आवश्यकता होगी मुझे--- (अपनी तीखी दृष्टि प्रतापचन्द्र हागरा के चेहरे पर गड़ा देते है।) प्रतापचन्द्र : (मुंह बनाकर) ना वावा---- ना । मैं नहीं चढूंगा तुम्हारे साथ---- वो सीढ़ियाँ । (नाटकीय मुद्रा के साथ) तुम्हारा क्या---- ऊपर ले जाकर---- नीचे धकेल दो कहीं। ठाकुर : (सहास्य) घबरा मत। उन सीढ़ियों से लुढ़ककर भी तू सीधा-... जगन्माता के चरणों में ही गिरेगा जाकर.... प्रतापचन्द्र : इससे मुझे क्या मिलेगा। : स्वर्ग। प्रतापचन्द्र : (चौककर) क्या मतलब ? ठाकुर : (सहसा भावुक होते हुए) जगन्माता के चरणों में जो सुख है--- वह और कहाँ ? (रुककर) जानता है.... पैगम्बर हजरत मौहम्मद ने भी अपनी हदीस में एक स्थान पर कहा है---- (भावमग्न स्वर मे) माँ के चरणों में स्वर्ग निवास करता है। (क्षण भर चुप रहकर ठाकुर की गम्भीर भावमुद्रा को देखते हुए अपने सर्वपरिचित अन्दाज़ में) यानि कि तुम मुझे-- स्वर्गवासी बना देना चाहते हो । (प्रतापचन्द्र हाजरा के इस परिहासपूर्ण विश्लेषण तथा भावाभिव्यक्ति के अन्दाज पर इस बार कोई भी मुस्कराए बिना नहीं रह सका।) मगर मैं तुम्हारी यह चाल-... कभी मफल नहीं होने दूंगा---- (घबराए भाव से उठ खड़ा होता है।) मुझे नहीं करनी अपनी 'आस्था' पुष्ट । (रुककर) जो है ही नही'.--- उसमें 'है' की कल्पना कर लेना-... मैं तो बुद्धिमानी नही मानता-... वो जब तुमने कभी प्रयास ही नहीं किया---- तो कैसे जान पाओगे कि.... 'है'.... और सर्वत्र है ? : यदि वह सर्वत्र है.... तो फिर दीखना क्यों नही ? : 'वो तो दीखने को तैयार बैठा है हर समय---- हर स्थान पर---- किन्तु प्रतापचन्द्र: टाकुर प्रतापचन्द्र ठाकुर (80) : उसके लिए 'दृष्टि' भी तो वैसी ही होनी चाहिए। (रुककर) और फिर 'होने के लिए क्या 'दीखना आवश्यक है । प्रतापचन्द्र : यदि 'है'---- तो 'दीखेगा' ही---- ठाकुर जो आँखों-देखा सब 'सत्य' ही होता---- तो बेचारे मृग को---- मरुस्थल की 'मरीचिकाओं के बीच---- यूँ क्यों भटकना पड़ता । (प्रतापचन्द्र हाजरा सहसा हतप्रभ हो निरुत्तर भाव में इधर-उधर देखने लगता है। चर्चा में खोये ठाकुर सहित उनके शिष्यो मे से किसी को भी इस बात का आभास नही हो पाता कि इस बीच थका-हारा वेहाल नरेन्द्र कब वहाँ आ पहुँचता है और चुपचाप कबसे उनकी बातों को सुन रहा - अपने भीतर घुमड़ रहो आवेश भरी व्यथा को अब और रोक पाना नरेन्द्र के लिए सम्भव नही रह गया-) नरेन्द्र : (सावेश) यह तो मृग की नियति ही है, ठाकुर ! अन्यथा---. ठाकुर : (चौककर) नरेन्द्र (विस्फारित दृष्टि से उसे देखने लगते है। चौक पड़ने से वातचीत का क्रम एक ही झटके में टूटकर बिखर जाता है। सहसा चौककर उठी सभी की दृष्टियाँ नरेन्द्र की बेहाल अवस्था को देख और भी हड़बड़ा जाती है।) (साश्चर्य) इतने दिन का रहा रे तू ? (ध्यान से देखकर) और ये.... क्या हाल बना लिया है तू ने अपना ? प्रतापचन्द्र (तिरछी दृष्टि नरेन्द्र पर डालकर) लगता है---- लड़कर आया है किसी मे---- . (सावेश) किमी से क्या--.. स्वय अपने आप से ही लड़कर आया हूँ---- और लडता रहूँगा---- तब तक--- जब तक मुझे मेरा मार्ग नहीं मिल जाता। (आक्रामक मुद्रा मे) तुम्हें लड़ना हो तो बोलो--.. (नरेन्द्र के ऐसे अप्रत्याशित भावावेश पर प्रतापचन्द्र हाजरा सहानुभूति व्यक्त करने के स्थान पर मुंह बना देता है।) प्रतापचन्द्र : (मुंह बनाकर) बाबा रे । ठाकुर (ताड़ना के स्वर में) प्रताप ! हर समय---- हर बात पर परिहास---- ठीक नहीं--- (इम यार प्रतापचन्द्र हाजग न तो कुछ बोलता है और न मुँह बनाकर कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त करता है, प्रन्युत् गर्दन झुकाए सुनता रहता नगेन्द्र :

--- - (81) जीवन को---- यदा कदा ही सही---- गम्भीरता से लेना चाहिए---- (रुककर) किन्तु तुम्हें तो अपने अतिरिक्त किसी और से---- कोई मतलब ही नहीं रह गया--- तापचन्द्र : (सहमे स्वर मे) ठाकुर । कुर : (तीखी दृष्टि प्रतापचन्द्र हाजरा के मुख पर गड़ाकर) कभी सोचा है-... गाँव में आस लगाए---- प्रतीक्षा के एक-एक पल को.-- अपनी धुंधलाई-पथराई दृष्टि में पिरोती---- बूढी असहाय विधवा मां के विषय में ? रतापचन्द्र : ऐसी बात नहीं है, गदाधर ! मैं जल्दी ही गाँव जाऊंगा---- पूरे पाँच दिन रहूँगा वहां और--- डाकुर : (बात काटते हुए) यह बात---- पहले भी अनेक बार कह चुके हो तुम---- और सम्भवतः आगे भी कहोगे---- I (भावुक स्वर में) जन्मदात्री ही जब---. बोझ बन जाए किसी के लिए तो--- (मावातिरेक के कारण ठाकुर अपना कथन पूरा नहीं कर पाते ।) (नरेन्द्र की ओर देखकर) तुम्ही कहो इसे- मित्र है न तुम्हारा ? (नरेन्द्र के अन्तर्मन के सारे तार जैसे एक साथ झन्ना उठते है। चेतना एक तीव्र कचोट से कसमसाने लगती है-) नरेन्द्र (मन ही मन) क्या कहूँ मैं, इसे ? कैसे कहूँ ?? (सोचते हुए) मैं स्वयं भी---- क्या इसके जैसा ही नही हूँ ? मैं भी क्या इसी की तरह आत्मकेन्द्रित नही होता जा रहा हूँ ? क्या मैं सही ढंग से अपनी असहाय विधवा माँ और दोनों छोटे भाइयों के प्रति अपना धर्म निभा रहा हूँ." नही---- (लम्बी साँस लेते हुए) इसीलिए तो उन सबकी चिन्ता छोड---- मैं भी यहाँ आ बैठता हूँ.... दक्षिणेश्वर में---- और ठाकुर के साथ अध्यात्मचर्चा में डूब जाता हूँ। (रुककर) मुझे भी अपना---- केवल अपना ही सुख---- अपनी ही आत्मतुष्टि अभीष्ट रह गई है। (अपने को धिक्कारते हुए) क्या फर्क है मुझमें--- और प्रतापचन्द्र हाजरा में ? क्या मैं भी उस जैसा स्वार्थी नहीं हो गया हूँ ? (मनोद्वन्द्व के बीच ही विचारों की दूसरी लहर आती है।) (सोचते हुए) समझ में नहीं आता---- ठाकुर ये सब बातें मेरे सामने ही क्यों कर रहे हैं ? (अपराध-बोध के साथ) - वे क्या प्रकारान्तर से मुझे समझाना चाह रहे हैं.... या उपालम्भ दे रहे हैं ? (विचारो की ऊहापोह और भी तीव्र हो जाती है।) (दुविधा भाव से घिरे हुए) उफ् ! क्या करूँ - क्या न करूँ ? कुछ समझ नही पड़ता---- किसे छोडूं---- माँ को या ईश्वर को , (विचारमग्नता के बीच नरेन्द्र को क्षणभर के लिए ऐसा लगा जैसे उसके आसपास का सम्पूर्ण प्राकृतिक परिदृश्य गोलाकार रूप में घूमने लगा है। दोनों हाथों से कनपटियों सहित माथा थाम नरेन्द्र चक्कर (82) खाता हुआ-सा गिरने-गिरने को हुआ, किन्तु अत्यधिक सतर्कमाव के साथ शिवानन्द और दाशरथि सान्याल ने उसे बीच ही में सम्हाल लिया) दाशरथि अरे । क्या हुआ तुझे, नरेन्द्र । शिवानन्द : (झकझोरते हुए) नरेन्द्र--- (इस बीच ठाकुर उठकर पास आ जाते हैं।) आँखें खोल, नरेन्द्र । (नरेन्द्र आँखें खोलने व सम्हलने का सफल-विफल प्रयास करता ठाकुर (ध्यान से नरेन्द्र का चेहरा पढ़ते हुए) घबराओ नही तुम लोग---- कुछ नहीं हुआ इसे---- (नरेन्द्र का हाथ पकड़कर) तू आ मेरे साथ, नरेन्द्र ! (ठाकुर हाथ पकड़े-पकड़े खीच ले जाते है नरेन्द्र को गगातट की ओर। नरेन्द्र भी सम्मोहित-सा विवश भाव से साथ-साथ खिंचा चला जाता है। दाशरथि सान्याल, शिवानन्द और प्रतापचन्द्र हाजरा गुमसुम बने देखते रहते है।) नरेन्द्र --- ठाकुर नरेन्द्र (चलते-चलते) इस---- 'अस्ति' 'नास्ति' की दुविधा से बाहर निकल, नरेन्द्र ! अन्यथा कुछ नही कर पाएगा तू ! (निढाल स्वर मे) सो मैं---- निकल चुका हूँ, ठाकुर ! (नि.श्वास के साथ) 'अस्ति' को 'मरीचिका' का 'सत्य' मैंने जान लिया है। मोह भंग हो चुका है उससे मेरा। भ्रम है तेरा (रुककर) न 'अस्ति' 'मरीचिका' है.... और न 'मरीचिका' सत्य। (इस बीच दोनों गगाघाट के पास स्थित मन्दिर के निकट आकर ठहर जाते है।) : तो फिर 'सत्य' क्या है 'अस्ति' का । (रुककर मन्दिर की ओर सकेत करते हुए) क्या---- प्रतिमा ? : नहीं। (शान्तभाव से) प्रतिमा में 'उसके' 'होने' का विश्वास--- जो 'अदृश्य' होकर भी सर्वत्र 'दृश्य' है। : 'अदृश्य'---- 'दृश्य कैसे हो सकता है भला ? (रुककर) जो है ही नही--- उसका होना' कैसे माना जाए.? जैसे मिट्टी में 'कुम्भ', जल में 'लहर' तथा स्वर्ण में 'आभूषण' । (रुककर) तनिक कहो नो--- "मिट्टी' में मिट्टी से भिन्न वह कौन-सा तत्त्व है, जिसे 'काम' वहने हैं अथवा 'जल' में 'लहर---- या 'स्वर्ण' में 'आभूपण। (नरेन्ट किमी गहरे सोच में डूब जाता है।) ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर ..

(83) क्या इन्हें परस्पर अलग कर सकता है कोई ? यदि 'मिट्टी' से 'कुम्भ' को, 'जल' से 'लहर' को--- अथवा 'स्वर्ण' से 'आभूषण' को अलग कर कोई दिखलादे---- तो मैं मान लूंगा उसे अपना गुरु-~~ और तुम्हारी ही तरह 'अस्ति' को अस्वीकार कर दूंगा। (क्षणभर की चुप्पी के बीच सहसा किसी पक्षी का मधुर स्वर तथा किसी जलपाखी के पंख फड़फड़ाकर उड़ने की ध्वनि सुन पड़ती है। पलभर के लिए दोनों का ध्यान उस ओर बँटता है, पर वे तत्क्षण ही पुन अपने विचार प्रवाह में खो जाते है-) जैसे 'वस्तु-सत्ता' और 'भाव' एक-दूसरे में अभिन्न हो समाए रहते हैं, वैसे ही 'ईश्वर' भी 'भाव' रूप में यहां, वहां,जड़ में, चेतन में सर्वत्र विद्यमान हैं। (सहसा नरेन्द्र के मुख पर हत्के आक्रोश के भाव उभरते है।) : (सावेश) यदि ऐसा है---- तो वह क्यों नही देखता मेरी ओर ? क्यों ध्यान नहीं दे रहा मेरे कष्टों पर । (रुककर) क्यों हमें अपने ही घर से बेदखल होकर आज किराए के मकान में रहना पड़ा ? क्यों असमय ही बाबा का साया हमारे माथे पर से हट गया--- और क्यों आज कलकत्ता के नामी बैरिस्टर विश्वनाथ दत के सम्पन्न-सुखी परिवार को ऐसी दशा हो रही है---- कि भरण-पोषण के लिए दर-दर भटकने के बावजूद भी काम नहीं मिल रहा...? (सव्यथा) ऐसे में उसकी 'सर्वत्र विद्यमानता' की बात तो दूर---- केवल 'विद्यमानता' पर भी किसे विश्वास हो पाएगा, ठाकुर ? : ऐसी दुविधा तब आती है, नरेन्द्र । जब हमारी चेतना 'वस्तु-सत्ता' की सीमाओं में अटककर रह जाती है--- और उसमें निहित 'भाव' तत्त्व की अनुभूति नहीं कर पाती । सम्भवत. इसीलिए तुम उस तक पहुंच नहीं पा नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र : (सव्यथा) तो क्या करूं मैं ? आप ही कहिए, ठाकुर ! कैसे बचाऊँ अपनी इस---- बिखरती आस्था को ? : मेरा कहा मान---- (रुककर) सारी दुविधा छोड़कर---- चला जा जगन्मता के चरणों में। (भावुक स्वर में) वहाँ से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता---- जब आपको अपनी जगन्माता पर इतना भरोसा है.--- तो फिर आप ही क्यों नही मेरे लिए जगन्माता से निवेदन करते हैं कि वह मेरे परिवार के भरणपोषण को समुचित व्यवस्था कर दे ? : "नही---- इसके लिए तो तुझे स्वयं ही जाना होगा---- जगन्माता के पास---- (रुककर) मनुष्य को अपना मार्ग स्वयं ही चलकर पार करना होता है... '(नरेन्द्र कुछ सोचते लगता है।) किस सोच मे पड गया तू ? : (समकोच) जगन्माता क्या मेरी बात मुनेंगी । ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर .. नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र (84) (सुनकर ठाकुर हँस पड़ते है।) (सहास्य) मूर्ख है तू ! इतना भी नहीं जानता---- कि वे जगन्माता है-- सवकी माँ । (रुककर) अपने पुत्र के निवेदन पर भी ध्यान नहीं देंगी--- यह कैसे सोच लिया तू ने ? (भावनाओं में बता-उतरता नरेन्द्र न जाने क्या सोचकर ठाकुर चरण स्पर्श कर लेता है।) : (सविनय) आशीर्वाद का आकांक्षी हूँ, ठाकुर । : (परिहास भाव से) माँ से पहले आशीर्वाद देने वाला--- मैं कौन हुआ,रे ? (क्षण भर की चुप्पी मे गंगा की धारा में क्रीडारत लहरियों के बीच किसी नौका में बैठे मल्लाह की अचानक बज उठी याँसुरी की मीठी गूंज वातावरण में एक विचित्र-सा दिव्य सम्मोहन घोल देती है।) (कोमल भाव से नरेन्द्र की ओर निहारते हुए) जा---- मन की उद्विग्नता शान्त कर, सारी चिन्ता, असमजस, आशंका, आक्रोश, असन्तोष और अहंकार को गंगा की धारा में प्रवाहित कर दे---- और फिर निवेदन कर मां से---- : (दोनो हाथ जोड़कर) जी, ठाकुर । (भावमग्न नरेन्द्र विचारो की उथल-पुथल को जैसे-तैसे अपने भीतर समेटे सम्मोहित कदमों से धीरे-धीरे चल देता है मन्दिर की ओर ।) (मन ही मन) मात्र 'प्रतिमा' मानकर जिसकी अब तक उपेक्षा करता रहा- जिससे दूर भागता रहा---- उसे ही अब कैसे और किस मुंह से कह सकूँगा 'अपनी अन्तर्व्यथा ? क्यों सुनेगी वह मेरी बात ? क्यों करेगी वह मेरी सहायता ? (रुककर) और यों भी---- मुझे क्या अधिकार है--- उससे कुछ सांगते का? (यहाँविवार मन में आते ही मन्दिर की ओर बढ़ रहे नरेन्द्र के कदम बरबस सैहम् उठते है। इसी क्षण विचारों की दूसरी हिलोर उठती है-) (सोचते हुए) क्यों ? क्यों नही है अधिकार---- सन्तान को मां से कुछ भी माँगने का ? माँ तो उदार हृदया, करुणामयी, त्यागी और क्षमाशील होती । रह कभी भी मुतार से रुष्ट रही हो सकती । (कर) मे भीतर की व्यथा को अन्तर्यामिनी मां बिना कहे ही सब कुछ जान जाएगी---- समझ जाएगी। (गहन विचापद्लन के बीच खाया परेन्द्र, यह जान ही नहीं पाया कि कब यह मन्दिर की सीढ़ियों चढ अन्तरंग परिसर में प्रविष्ट हो गया। उसे लगा---जैसे वह किसी अनन्त दिव्य ऐश्वर्य के लोक मे आ गया हो। सगमरमर के दमकते फर्श पर बने एक ऊँवे स्थान पर स्थापित जगन्माता जगत्तारिणी की भव्य प्रतिमा । शत्रुसंहारी 'स्वरूप के बीच 'अभय' की मुद्रा में उठा दक्षिण हस्त, जैसे कोमल-मधुर भाव लिए (85) आशीर्वादों की धारासार वर्षा कर रहा था। भीतर तक भीग उठा वह उस वर्षा-जल से। देखते-देखते एक भावपूर्ण कोमल सम्मोहन से घिरने लगा नरेन्द्र, मानो आतुर ममता ने बाहें फैलाकर उसे समेट लिया हो अपने आँचल की छाया में। मंत्रविद्ध-सा नरेन्द्र सहसा भूमिष्ठ हो जगन्माता के चरणों में लोट गया। उस क्षण न उसके मन में कुछ कहने को रह गया- न वाणी मे। क्षणभर के लिए जैसे उसके भीतर यसा 'संसार' शून्य हो गया पूर्णतः । बहुत टटोला उसने अपने को, पर माँ से मांगने को कुछ भी न मिला उसे। अचानक भीतर एक तरग-सी उटी। मन में आया- 'माँ के चरणों से लिफ्ट जी भरकर से ले।' पर उस क्षण रोया भी तो नही गया उससे । अगले ही क्षण नेत्रो में भावाश्रुओं का उफान लिए आगे बढ़ गर्भगृह की चौखट पर माथा टिका दिया उसने। वह केवल इतना ही बोल पाया-) (करबद्ध मुद्रा मे मस्तक उठाते हुए) माँ ! (जगन्माता की छवि को अपने साश्रु नयनों से भीतर समेटते हुए नरेन्द्र अत्यधिक भावविह्वल हो उठने के कारण आगे कुछ भी नही बोल पाया। कण्ठ रुघ गया उसका। जगन्माता की छवि को एकटक भाव से निहारती उसकी दृष्टि को उस क्षण ऐसा लगा, मानो प्रतिमा अपने होंठ हिलाती हुई उससे कह रही थी-) : (कोमल स्वर में) तू चुप क्यों है, पुत्र ! माँग---- क्या मांगता है ? (नरेन्द्र का अंग-अंग रोमाच से सिहर उठा। शिराओं और धमनियों में दौड़ रही रक्त बूंदें जैसे पलभर लिए ठहरकर एक स्वर में पुकार उठी- 'माँ ! माँ !! माँ !!!' नरेन्द्र को उस गूंज-अनुगूज में अपना अस्तित्व लय होता हुआ-सा लगा। यंत्रचालित-सा स्वर उसके मुँह से फूट पड़ा-). : (बेसुध भावस्थिति में डूबे हुए) मुझे भक्ति दो, माँ ! विवेक दो ! वैराग्य दो। (ठीक उसी क्षण ठाकुर गर्भगृह के द्वार पर आ खड़े हुए।) अपना अबाध साक्षात् दो मुझे। : (भीतर आते हुए) जगन्माता से यह क्या मांग बैठा रे तू, नरेन्द्र ? (एक ही झटके से नरेन्द्र की आत्मलीनता टूट गई। वह चौककर उठ खड़ा हुआ) जगन्माता नरेन्द्र ठाकुर (86) नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर : (चौककर पलटते हुए) ठाकुर ! : (पास आकर) मांगने तो.... कुछ और आया था न यहां ? : हाँ । (रुककर) पर फिर पाया---- माँ से भला क्या छुपा है ? सब जानती हैं वह---- (अल्हड़भाव से) स्वय करेंगी मेरो चिन्ता---- मुझे क्या ? (बालसुलभ सरलता से ठाकुर को निहारने लगता है।) सच, ठाकुर ! उस बहुमूल्य और दुर्लभ संयोग के क्षण में समस्त सांसारिक सुख मुझे अति तुच्छ प्रतीत हो रहे थे। (स्थकर) सोचा---- जब मांगना हो है---- तो कुछ दुर्लभ मांगू-~- (आश्वस्त भाव से लम्बी साँस लेकर) सो मांग लिया मैने--- : (परिहास भाव से) 'दुर्लभ' को इतने 'सहज' भाव से मांग लेने वाला---- कौन कम ‘दुर्लभ' है रे ? : (चौककर) मैं कुछ समझा नहीं, ठाकुर । (सहास्य) सब कुछ क्या--- एक ही बार में समझ लेना चाहता है तू (मुँह बनाकर) बहुत च है रे । (हँसते हुए नरेन्द्र के कंधे पर हाथ रख देते है। ठाकुर का स्पर्श होते ही जाने कैसी झंकृति से सारा शरीर झनझना उठा नरेन्द्र का। सम्पूर्ण गर्भगृह तथा बाहरी औसारे के स्तम्भ गोलाकार घूमने लगे, जो देखते-देखते किसी तीव्र प्रकाशपुंज मे एकमेक होते चले गए। आँखें चौधिया उठी नरेन्द्र की। असा प्रकाश के आगे स्वत. ही पलक मुद गए उसके। अगले ही क्षण नरेन्द्र को ऐसा लगा, जैसे वह स्वयं भी प्रकाश के उस महासागर में डूबकर गोलाकार घूमने लगा है। घबरा गया वह बुरी तरह और चिल्ला उठा-) (घबराकर) ठाकुर ! ठाकुर !। (शून्य में हाथ फैलाकर नरेन्द्र सहायता के लिए ठाकुर को पकड़ने का विफल प्रयास करता है।) (भयभीत स्वर में) बचाओ, ठाकुर । मुझे बचाओ---- : (नरेन्द्र के कंधे पर से हाथ हटाते हुए) बस---- इतने में ही घबरा गया तू “(कंधे पर से ठाकुर का हाथ हटते ही सब कुछ सामान्य हो गया। नरेन्द्र घबराए भाव व विस्फारित नयनों से इधर-उधर देखने लगता है।) (नरेन्द्र से दृष्टि मिलते ही) चलो--- आज इतना ही पर्याप्त है। : (हाँफते हुए) आपने ऐसा क्या किया, ठाकुर ? नरेन्द्र : ? ठाकुर नरेन्द्र केवल टाकुर ऐनामा टि- 'चानीय दिले हमिदान (87) ठाकुर : (सहास्य) 'दुर्लभ' क्या---- यों ही मिल जाता है,रे ? (पलभर के लिए नरेन्द्र अपनी दिव्य पूर्वानुभूति में खो जाता है।) नरेन्द्र : (भावुक स्वर मे) उस 'दुर्लभ' को पाने के लिए--- मैं सब कुछ त्याग दूंगा, ठाकुर ! सब कुछ.... ठाकुर : (सहसा गम्भीर होकर) फिर तेरी असहाय विधवा माँ और भाइयों के भरण-पोषण का क्या होगा ? तेरे मकान के मुकदमे का क्या होगा ? नरेन्द्र : (अविचलित भाव से) जगन्माता के होते भला मुझे क्या चिन्ता ? (विश्वास भरे स्वर मे) वे सब ठीक करेंगी। ठाकुर : सो मैं जानता हूँ.--- (कुछ सोचने की मुद्रा में) और यह भी जानता हूँ---- (रुककर) तू इस संसार के लिए जन्मा ही नहीं है। किन्तु... (एक लम्बी निःश्वास लेकर चुप हो जाते है। मुख पर व्यथा के भाव चमक उठते है।) नरेन्द्र : (साश्चर्य) आप---- व्यथित हैं, ठाकुर ? ठाकुर (सव्यथा) नरेन्द्र (अधीर भाव से नरेन्द्र का हाथ पकड़कर मकसमे निदान लगते है। इस बार ठाकुर के स्पर्श से नरेन्द्र को कुछ तेरे बिना तो मैं अपूर्ण हूँ, रे । तुझे घर में है चाहना। (नरेन्द्र के हाथ को अपनी पकड़ को पिक का वचन देना होगा। नरेन्द्र : (सविस्मय) वचन ? कैसा वचन, टा, ठाकुर : (भावुक स्वर में) जब तक मैं नंगा--- (कहते-कहते नरेन्द्र के मटर ही आंग्डों में टी अश्रुधारें यह निकलती हैं। (साग्रह) बोल नहीं ? (भावातिरक मे मागद टाळी दोन पट: मंत्रविद्ध के मन मटा ट है की अथवा उन्दर का निर. धासका (88) .. अंक दृश्य तीन दो .. स्थान सपय : नरेन्द्र का कमरा प्रातकाल : नरेन्द्र (खिड़की तथा उसके आसपास जहाँ-तहाँ फुदकता-उड़ता तथा दीव-बीच में अपनी चहक से कमरे की निर्जीवता को झकझोरने के प्रयास में लगा चिड़ियों का एक जोड़ा तथा इस सबसे एकदम बेखबर खिड़की से बाहर के शून्य पर दृष्टि गड़ाए बैठा विचारो को गहनता में तल्लीन नरेन्द्र) : (मन ही मन) आखिर क्या हो गया था उस क्षण मुझे । (याद करते हुए) सचमुच 'बुद्धि' और 'तर्क' से परे का अनुभव था वह । सहसा विश्वास नहीं होता---- कि यह सब ठाकुर के स्पर्श का ही चमत्कार था। (रुककर) लगता है...-- कोई न कोई दिव्य और चमत्कारिक शक्ति है अवश्य उनके पास । तभी तो उनके हाथ का स्पर्श हटते ही फिर से----- सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो गया। (इसी समय खिड़की की राह हवा का सरसराता हल्का झोका आया और अपने में ही खोए नरेन्द्र के केशो को हौले-से छूता हुआ चुपचाप निकल गया।) (सोचते हुए) समझ नही पडता---- दोनों ही स्थितियों में से कौन-सी स्थिति सच थी. , पहले की 'स्वनवत् सम्मोहन' वाली या बाद वाली सामान्य ? और फिर ठाकुर ने ऐसा किया क्यों ? (मस्तिष्क पर जोर डालते हुए) शायद 'ईश्वर' सम्बन्धी मेरो दुविधा को मिटाने के लिए--- अथवा 'अष्टावन सहिता' के दर्शन को मेरे भीतर प्रत्यक्ष करने के उद्देश्य से ठाकुर को यह सब करना पड़ा। (रुककर) लगता है--- ऋषि-मुनियों ने अथक साधना व तपस्या के उपरान्त जो कुछ पाया--- उसे ठाकुर ने अपने एक ही स्पर्श में मुझे दे दिया। (विचारों की लहर सहसा दूसरी दिशा की ओर मुड़ती है।)

(89) (अपने आप से ही) विचित्र है ठाकुर का व्यक्तित्व ! कभी बेसुध समाधि, कभी भावमग्न प्रेमावेग, कभी आँसू, तो कभी मीठा-चुटीला और सटीक हास-परिहास ! (रुककर) आखिर इनमें ठाकुर का कौनसा रूप सच है , (सोचते हुए) सम्भवतः इन सबको मिलाकर ही 'ठाकुर' का व्यक्तित्व सम्पूर्ण बनता है। (लम्वी साँस लेकर) जो भी हो---- बहुत कठिन है---- इस 'अबूझ पुरुप' को बूझना। (ठीक इसी क्षण हाथ में झाडूं लिए भुवनेश्वरी का कमरे में प्रवेश- नियति की क्रूरता और विषम जीवन के गहन अनुभव के बीच भी नारी जन्य गरिमा व शालीनता को धारण किए उदास गम्भीर चेहरा तथा धुंधराई सघन श्यामल केशराशि में से यत्र-तत्र गुपचुप रूप से ताकझाक कर रहे श्वेत तार। नरेन्द्र को खिड़की के पास विचारमग्न बैठा देख वह क्षणभर के लिए ठिठक जाती है। अगले ही क्षण हाथ की झाडू को वही एक ओर रख चेहरे पर उत्सुकभाव लिए जैसे ही वह नरेन्द्र की ओर बढ़ती है सहसा कोने रखे सितार पर जमी धूल की परत को देख चौक पड़ती है-) भुवनेश्वरी : (ठिठक कर) तेरे सितार पर इतनी सारी धूल--- पहले तो कभी नही जमती थी रे, नरेन । (अपनी साड़ी के पल्लू से सितार को पोछने लगती है। अपने कथन पर विचारों में खोए नरेन्द्र की कोई प्रतिक्रिया न पाकर उत्सुक मुद्रा लिए वह उसी ओर देखने लगती है-) (तीव्र स्वर मे) सुना नहीं, नरेन । (नरेन्द्र की विचारमग्नता फिर भी भंग नही होती।) (पास जा उसका कथा पकड़कर) नरेन ! (आत्मलीनता टूटते ही नरेन्द्र की चौककर उठी दृष्टि एकदम पास खड़ी माँ भुवनेश्वरी पर पड़ती है-) नरेन्द्र : (चौककर) माँ । तुम ? भुवनेश्वरी : (नरेन्द्र के कंधे पर हाथ रखे-रखे हो) ये तुझे इन दिनों क्या होता जा नरेन्द्र : (अपने अन्तर्षावो को फुर्ती से छुपाते हुए कहाँ क्या होता जा रहा है, माँ ? कुछ भी तो नहीं.--- I (नाटकीय अन्दाज में स्वयं की ओर इशारा कर) देखो--- मैं तो पहले जैसा ही हूँ-~-- भुवनेश्वरी : (नरेन्द्र के केशों में ममताभाव से हाथ फिराती हुई) न सितार बजाता है.... न कभी गाता है.... न वो टेढ़ी-मांकी बातें-- न हास-परिहास---- न वो उछलकृद और शरारत---- (यात काटते हुए) अप तो मैं बड़ा हो गया हूँ, मां ! देखो न-- नरेन्द्र :

.. (90) (अपनी लिष्ठ भुजाएँ दिखाते हुए मुस्करा पड़ता है।) (सस्मित स्वर में) बचपन वाली उछलकूद और शरारतें-- क्या अब भी करता रहूँगा मैं ? भुवनेश्वरी : (परिहास-मुद्रा में मुँह बनाकर) ओsss---- ये तो मैं भूल ही गई थी, रे।..- कि तू अब बड़ा हो गया है। (पुत्र के मुख को कोमलभाव से निहारती भुवनेश्वरी सहसा उसकी आँखो की गहराई में अन्य दिनो से भिन्न एक विशेष गम्भीरता की झलक पा भीतर ही भीतर काँप उठी। परिहास भाव न जाने कहाँ लुप्त हो गया। माँ के इस आकस्मिक भाव-परिवर्तन को देख नरेन्द्र चौक पड़ा।) नरेन्द्र : (सविस्मय) ये अचानक ही तुझे क्या हो गया, माँ ? (भीतर उठे आकस्मिक भावावेग से घिरी भुवनेश्वरी कुछ न बोल सकी। भीगी दृष्टि से निहारती रही नरेन्द्र का मुख और सहलाती रही उसके केश) (मों का दूसरा हाथ पकड़कर) बोल न, माँ ! क्या बात है ? भुवनेश्वरी : (भीगी दृष्टि और भावुक स्वर के साथ) नू बड़ा हो गया---- यह तो बहुत अच्छी बात है.--- किन्तु---- (कण्ठ फिर रुंध गया भुवनेश्वरी का।) नरेन्द्र (सशक भाव से) किन्तु क्या ? बोल---- भुवनेश्वरी : (अपने को संयत करती हुई) किन्तु---- इतना बड़ा मत हो जाना, बेटे ! कि---- तेरे लिए दुलारने को उठे मेरे हाथ-~~ तुझ तक पहुंच ही न पाएँ---- (नेत्र छलछला आते है भुवनेश्वरी के, जिन्हे वह पल्लू से पांछने लगती .. नरेन्द्र : - (चौकते हुए उठकर) ये क्या कह रही हो, माँ ? क्या-क्या ऊल जलूल सोचने लगी हो तुम आजकल ? किधे से पकड़कर माँ को अपने से सटा लेता है।) (भावुक स्वर मे) रे ! तेरे दुलार भरे आंचल की छाया तो मेरा जीवन है, माँ ! उससे दूर---- भला में कहाँ रह पाऊँगा? (नरेन्द्र की इस बात से भुवनेश्वरी को अस्थिरता कुछ कम होती भुवनेश्वरी : (पल्लू से ऑखें पोछकर मीठी ताड़ना के भाव से नरेन्द्र की ओर निहारती हुई) अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से किसी को भी बहला देना---- तुझे खूब आता है रे, वाक्पटु । (मो भुवनेश्वरी के मुख पर से व्यथा के बादल छंटते देख नरेन्द्र का (91) आशंकित मन कुछ हल्का होने लगता है।) नरेन्द्र : (हँसी के स्वर में) क्यों न होऊंगा वाक्पटु ? (मुँह बनाकर) बैरिस्टर का बेटा जो हूँ। (नाटकीय अन्दाज़ में मुंह बना मॉ की ओर देखने लगता है, पर उसके मुख पर फिर भी हँसी न देख नरेन्द्र फिर चकरा उठता है।) क्या बात है, माँ ? (ककर) कोई दुविधा है मन में ? (भुवनेश्वरी सहसा कुछ बोल नहीं पाती। क्षण भर के लिए दोनो के बीच छा गई अनचाही चुप्पो में विड़ियाओं की उछलकूद , फुदकन और चहक से सारा कमरा भर उठता है।) भुवनेश्वरी : (सकुचाए भाव से) कल मैं काकी माँ के पास गई थी---- नरेन्द्र : (चौककर) काकी माँ के पास ? मगर क्यों ? भुवनेश्वरी : (सहमे स्वर में) सोचा---- वातचीत से कोई रास्ता निकल आए तो---- नरेन्द्र : (बीच ही में वात काटते हुए) जो वे--- बातचीत के लायक लोग ही होते-~~ तो मुकदमे की नौबत ही क्यों आती हमारे बीच ? (सावेश) हमारा ही मकान---- और हमें ही उनके आगे गिड़गिड़ाना पड़े---- यह तो कोई बात नहीं हुई, माँ ? भुवनेश्वरी : मगर काकी माँ तो--- गिड़गिडाने के बाद भी समझौते को तैयार नहीं। उल्टे हमीं पर अपना एहसान थोपने लगी। (रुककर) बोली... तुम्हारे ससुर संन्यासी बनकर चले गए तो हमों ने तुम्हारे पति व परिवार को दरदर भटकने से बचाया--- नरेन्द्र : (आहत मन से) यह तुमने अच्छा नही किया, माँ ! (रुककर) नीति कहती है-- अन्याय का विरोध करो---- (कठोर स्वर मे) हम भी संघर्ष करते हुए अपना न्यायपूर्ण अधिकार लेंगे। भुवनेश्वरी : किन्तु, बेटे ! किसे पता--- मुकदमा कितना लम्बा चलेगा ? किस-किस वकील की मिन्नत-चरौरी नही करनी पड़ेगी हमें ? (लम्बी साँस लेकर) तिस पर--- मुकदमे का खर्च कहाँ से जुटा पाएंगे हम लोग ? नरेन्द्र : तू फिक्र न कर, माँ । मैं आज ही बैरिस्टर बनर्जी से मिलूंगा। वे इस काम में हमारा पूरा साथ दे रहे हैं। भुवनेश्वरी : वो जा---- 'सब काम छोड़कर पहले वकील से मिल-... नरेन्द्र : देख, माँ ! सबसे पहले मुझे सुरेन्द्रनाथ मित्र के घर जाना है। वहाँ ठाकुर आने वाले हैं। उनके दर्शन के बाद ही अन्यत्र जाऊँगा। (सुनते ही भुवनेश्वरी के मन में हलचल मच जाती है।) भुवनेश्वरी : (सावेश) ये दक्षिणेश्वर का साधु-~- तुझे कही का नहीं छोड़ेगा, नरेद्र । देख लेना--- नरेन्द्र . (शान्त भाव से) ऐसा न कहो, मा ! वे कोई साधारण संन्यासी नहीं हैं। वे तो परमहंस है.... परमहंस---- संसार से सर्वथा परे--.. एकदम अनासक्त--- (92) .. .. .. .. .. भुवनेश्वरी : (धड़कते मन से) कहीं लुट न जाएं हम.... तेरे उस परमहंस के हाथों। नरेन्द्र (प्रसग की गम्भीरता को टालते हुए परिहासमुद्रा में) ओ-~~- माँ ! (दोनों कंधे पकड़कर) तू भी बस---- तू ही है-~-1 (सहास्य) अच्छा--- तो मैं चला--- (मेज पर रखा कागजों का पुलिन्दा उठा प्रस्थानोधत होता है ।। भुवनेश्वरी (सशंक भाव से) कागजों का यह पुलिन्दा कैसा है ? नरेन्द्र (हाथ के कागज मों के आगे फैलाते हुए) 'गीतगोविन्द' का बंगला में अनुवाद किया है, माँ ! किसी के लिए। इसे भी तो समय पर पहुंचाना है प्रकाशक के पास । (रुककर) पसन्द आने पर कुछ रुपया भी मिलेगा---- और आगे दूसरा काम भी---- भुवनेश्वरी : (कोमल-करुणभाव से) किन्तु, ऐसे फुटकर काम से क्या होगा, बेटे ! (रुककर) महेन्द्र व भूपेन्द्र के स्कूल की फीस---- और इस घर का किराया--- नरेन्द्र (कागज समेटते हुए) जब तक कोई ढंग का काम नहीं मिल जाता-... तब तक ये ही क्या बुरा है, माँ ? (माँ के कथे पर हाथ रखते हुए तू फिक्र न कर। मैं पिछले सप्ताह विद्यासागर सर से मिला था। उनके मैट्रोपोलिटन इन्स्टीट्यूट की सुकिया स्ट्रीट वाली शाखा में एक अध्यापक का स्थान रिक्त होने वाला है.--- और अगले माह चापातला में उन्ही की एक नई शाखा खुलेगी। सम्भव है---- मुझे वहाँ काम मिल जाएगा। भुवनेश्वरी : (अधीर स्वर मे) सो ठीक है.--- मगर यह बात तू दक्षिणेश्वर वाले तो उस साधु से न कहना---- (आशकिन भाव से) कहीं दिमाग न फिरादे वह तेरा---- (माँ को अधीरता देख नरेन्द्र मुस्करा पड़ता है। ठीक इसी क्षण निमग्न कमरे में प्रवेश करता है।) निमग्न अरे । तू अभी घर ही बैठा है, नरेन्द्र ? नरेन्द्र : (न समझने का पाव मुख पर लिए क्या बात है, निमग्न ? निमग्न विद्यासागर सर ने तुझे बुलाया है तुरन्त---- नरेन्द्र चल--- चलते है.... (कागजो का पुलिन्दा सम्हाल तेजी से निमान के साथ चल देता है।) भुवनेश्वरी : (अधीर भाव से) तू ना मत कर देना, नरेन्द्र । (अल्हड़ भाव से मन में उत्साह लिए नरेन्द्र बिना कोई उत्तर दिए कमरे से बाहर निकल जाता है। परमात्ममाव से आपरित भुवनेश्वरी के दोनों हाथ सहज ही श्रद्धा से जुड़ जाते है तथा पल भर के लिए पलकें भी स्वत मुद जाती है ।) .. .. ..

(93) अंक तीन तीन दृश्य स्थान : ठाकुर का दक्षिणेश्वर स्थित आवासकक्ष ममय .. अपराह्न -- . . (मेघाच्छन्न आकाश की उमड्युमड़ और शीतल वयार की मद लहरियों के बीच अपने कक्ष में विचारमग्न मुद्रा में पलकें मूंदे लेटे स्वामी रामकृष्ण परमहंस । अस्वस्थता के कारण अस्तव्यस्त स्थिति । बीच बीच में खांसी उठकर उन्हें बेहाल कर देती। पास ही खामोशभाव से बैठे प्रतापचन्द्र हाजरा तथा शिवानन्द । दृष्टियों कभी परस्पर मिल जाती तो कभी वातायन से बाहर का दृश्य निहारने लगती। इतना ही नही, यदाकदा ठाकुर के मुख का भी जायजा लेने का प्रयास करती। सहसा पलक उघाड़ ठाकुर इधर-उधर देखने लगते है-) ठाकुर : (सिर को तकिए से कुछ ऊपर उठाते हुए) शिवा ! तनिक सहारा देकर मुझे पीठ के बल बैठा दे---- शिवानन्द : (हाथ जोड़कर उठते हुए) जी, गुरुदेव ! (सहारा देने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है।) प्रतापचन्द्र : रहने दे, शिवा ! बैठाने से कष्ट और बढ़ जाएगा। (शिवानन्द ठिठककर अपने हाथ पीछे कर लेता है।) (हल्के रोप के साथ) ठाकुर तो कुछ समझते नहीं। बस---- जो मन में जंच गई---- उसे पूरा करना है---- चाहे परिणाम कुछ भी क्यों न हो ? (गले की पीड़ा के बीच भी प्रतापचन्द्र हाजरा की बात और उसके अन्दाज़ पर ठाकुर चुपचाप.मुस्कराते रहते हैं।) (सकेत ठाकुर की ओर तथा दृष्टि शिवानन्द की ओर करते हुए) जरा पूछ तो---. अपने इम परमज्ञानी परमहंस से---- क्या आवश्यकता थी--- कल (94) पानी हार्टी में 'चिउड़ा महोत्सव' में जाने को ? कितना मना किया डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार ने---- हमने---- | बोलने-नाचने-गाने की जरूरत नहीं है---- गले को गिल्टी का कष्ट बढ़ जाएगा---- पर नहीं--- (सव्यग्य) राधाकान्त मन्दिर के कीर्तनियों को देख मचल गए महाप्रभु ! फिर क्या- (बड़बड़ाते स्वर में) कीर्तनमण्डल के झांझ-मंजीरे-ढोल-मृदंग थमें-~~ तो ये थमें। धारासार वर्षा में भी रुकने का नाम नहीं-- (मुंह बनाकर) सारी सुधबुध भूलकर भीगते रहे---- भीगते रहे---- मानो भक्तिसागर की उफनती लहरों के बीच सात जन्मों का पुण्य एक साथ ही बटोर लेंगे--- भक्त-शिरोमणि ! (प्रतापचन्द्र हाजरा के कुपित होने के इस मीठे-अनोखे अन्दाज़ पर बरबस हँसी फूट ही पड़ी ठाकुर के मुँह से। हँसी के साथ ही खाँसी का दौर भी उठा। कुछ क्षण की लगातार खांसी से हाँफ उठे ठाकुर।) (सावेश) ज़िद ही जिद में इतना कष्ट बढ़ गया-... किन्तु---- जरा भी पश्चाताप इसके मन में तुझे दीख रहा है, शिवा ? (शिवानन्द खाँसी से बेहाल हो रहे ठाकुर की पीठ सहलाने लगता है। इस बीच तीखी दृष्टि में क्रोध लिए प्रतापचन्द्र हाजरा उन्हें घूरता रहता है। कुछ क्षणों बाद खाँसो थमती है।) ठाकुर : (हॉफते हुए परिहास-भाव से) तू...- पिछले जन्म में अवश्य मेरा पिता रहा होगा, प्रताप ! (रुककर) या फिर---- (मोठे व्यंग्य से) गुरु--- प्रतापचन्द्र : (उसी अन्दाज में) तुम क्या---- थोड़ी देर भी चुपचाप सोये नहीं रह सकते, गदाधर ? ठाकुर : (शून्य निहारते हुए) अब---- सोना ही तो है रे--- (भावुक स्वर में) जगन्माता के चरणों में । प्रतापचन्द्र : (तोखे स्वर में) व्यर्थ की बकवास मत कर, गदाधर ! (इसी क्षण थके-बेहाल नरेन्द्र का अधीरभाव से ठाकुर के कक्ष मे प्रवेश। प्रतापचन्द्र हाजरा को वहाँ देख तथा उसके रोषभरे स्वर को सुनकर नरेन्द्र के तेवर खिंच जाते हैं।) नरेन्द्र : (सरोप) तुम---- फिर यहाँ आ गए, प्रताप ? (तीखी दृष्टि से घूरते हुए) कितनी बार समझाया तुम्हें---- कि तुमारी इस तरह की चुभने वाली बातों से ठाकुर की पोडा और बढ़ जाती है.... मगर तुम हो कि---- उन्हें जली-कटो सुनाने से बाज नहीं आते.... -: (आवेश में अपने दोनों हाय नचाते हुए) पीडा बढ़ जाती है....? (सक्रोध) अरे, ये पीडा नो खुद तेरे ठाकुर को ही मोल ली हुई है।

(95) (रुककर) इतना ही लगाव था--- तो रोका क्यों नहीं पानी हाटी में उसे , (नरेन्द्र हक्का बक्का-सा मुंह बाए देखता-सुनता रह जाता है प्रतापचन्द्र हाजरा के इस रूप को और उसके मुँह से फूट रहे उस कड़वे सच को।) (तीखे स्वर में) बड़ा आया ठाकुर का चहेता---- (मुँह बिगाड़कर) हुँअ--- (एक दृष्टि अपनी ओर सस्मित मुद्रा में निहारते ठाकुर पर डाल तीखी निगाहो से नरेन्द्र को घूरता हुआ मुँह बिगाड़े प्रतापचन्द्र हाजरा तत्क्षण वहाँ से सटक जाता है।) ठाकुर : (खरखराते स्वर में) तुम लोग---- व्यर्थ ही उस बेचारे को कोसते रहते हो---- (कोमलभाव से) वह तो अत्यधिक स्नेहवश हम पर अपना अधिकार समझता है---- तभी ऐसा कह देता है---- नरेन्द्र : आपकी इस सरलता से ही तो उसका हौसला दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, ठाकुर ! (ठाकुर की शैया के पास ही भूमि पर बैठ जाता है।) जब---- जो जी में आता है--- बक देता है। (रुककर) आपके मान-अपमान की भी परवाह नहीं, उसे---- ठाकुर अपनों से---- कैसा मानापमान रे ? नरेन्द्र (साग्रह) ठाकुर । अधिक बोलने के लिए डॉक्टर ने आपको निषेध किया है। (शिवानन्द की और देखकर) शिवा ! दाशरथि अभी नहीं आया डॉक्टर सरकार को लेकर शिवानन्द : बस--- आता ही होगा---- ठाकुर : (प्रसंग बदलने के उद्देश्य से) अब छोड़ ये सारी बातें, नरेन्द्र ! (रुककर) पहले, अपनी कह---- क्या हुआ तेरे काम का ? नरेन्द्र काम तो मिल गया, ठाकुर ! विद्यासागर सर के स्कूल में---- ठाकुर (प्रसन्नता से भरकर) अरे वाह ! (रुककर) देख---- मैंने कहा नहीं था तुझे जगन्माता बहुत कृपालु हैं। तू ने उस दिन माँ से अपने भौतिक सुख के लिए कुछ भी न मांगकर---- उनका मन ही जीत लिया, रे ! (भावुक स्वर में) करुणामयी जगन्माता---- अपनी सन्तानों का पूरा ध्यान रखती है। (नरेन्द्र के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया न पाकर ठाकुर को विस्मय होता (गूढ अन्दाज़ में नरेन्द्र को घृरते हुए) मगर---- काम मिल जाने के बाद भी तू... खुश नजर नहीं आ रहा ? क्या वात है ? (रुककर) घर में सबकुछ ठीक तो है न ? (टाकुर के आत्मीय प्रश्नों में नरेन्द्र का मन सहसा भावुक हो उठता है। . .. ..

(96) वह कुछ क्षण वोल ही नही पाता) बोलन ! न घर में ठीक है, ठाकुर | और न यहाँ । : (चिन्तित स्वर मे) क्या ठीक नहीं है ? (सस्नेह) मुझे कह सारी बात--- (भावावेश में नरेन्द्र का हाथ पकड़ लेते है। ठाकुर के हाथ का स्पर्श होते ही नरेन्द्र दुरी तरह से चौक पड़ता नरेन्द्र ठाकुर .. नरेन्द्र -- : (चौककर) ये क्या , आपका शरीर तो---- ज्वर से तप रहा है, ठाकुर (चिन्तित स्वर में) शिवा । तू जा जल्दी---- और देख--- दाशरथि क्यों नहीं लौटा अब तक (घबराया शिवानन्द तेजी से बाहर की ओर लपकता है। ठाकुर के कण्ठ मे फिर खरखराहट व पीड़ा उठती है। भरपूर प्रयास के बावजूद भी वे बैचेनी के चिह्नो को अपने मुख पर प्रकट होने से रोक नही पाते।) (ठाकुर के कण्ठ पर दृष्टि पड़ाते हुए) आज आपके कण्ठ पर सूजन आ गई, ठाकुर ! हाजरा का क्रोध सर्वथा उचित हो था। (रुककर) अत्यधिक श्रम, थकान और लगातार वर्ग में भौगते रहने के कारण ही यह सब हुआ है। (पछतावे के स्वर मे) हमें आपको पानी हाटी जाने ही नही देना चाहिए था---- (कप्ट कुछ कम होने के साथ ही ठाकुर सहज होने का प्रयास करते ठाकुर : (खरखाते कण्ठ से रम्हल-सम्हल कर) यह सब तो नियनि की लीला---- और देह का धर्म है, रे ! (रुककर) इसके लिए व्यर्थ ही क्यों अपने को कोसता है ? (अचानक मेघ जोर से गर्जना कर उठते है तथा बिजली की कड़क-चमक के साथ वातायन से ठण्डी हवा का एक तीव वेग भीतर आ सिहरा देता नरेन्द्र .. नरेन्द्र फुर्ती से उठकर वातायन के कपाट यद कर देता है।) (व्याकुल दृष्टि से बाहर द्वार की ओर देखकर) न जाने कहाँ अटक गया---- शिवा भी। (ठीक इसी क्षण शिवानन्द का प्रवेश) डॉक्टर बाबू आ गए, नरेन । (आगे-आगे डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार तथा पीछे-पीछे उनकी पेटी उठाए दाशरथि सान्याल के प्रवेश के साथ ही नरेन्द्र ठाकुर के पास से उठकर एक ओर हट जाता है। शिवानन्द :

(97) डॉक्टर से दृष्टि मिलते ही बेचैनी के बीच भी एक मीठी मुस्कान के साथ ठाकुर उन्हें कुछ कहना चाहते है, पर महेन्द्रनाथ निषेधमुद्रा में हाथ उठा उन्हें बोलने से रोक देते है-) महेन्द्रनाथ :: (पास बैठते हुए) मुझे दाशरथि ने पूरी बात बतला दी है। (उपालम्भ भरे स्वर में) आपको ऐसी अवस्था में पानी हाटी की यात्रा नही करनी चाहिए थी। (ठाकुर के शरीर का परीक्षण करने हेतु डॉक्टर सरकार पेटी से उपकरण निकालते है।) (एक हाथ से ठाकुर की छाती पर उपकरण रखते हुए तथा दूसरे हाथ से नन्न थामते हुए) थोड़ा मुंह खोलिए ठाकुर ! (ठाकुर खरखराते कण्ठ के साथ मुंह खोलते है। डॉक्टर सरकार नब्ज़ पर से हाथ हटाकर ठाकुर के खुले मुँह के भीतर गहरे तक दृष्टि गड़ाते हुए उनके कण्ठ के फूले हुए भागों का टटोलकर कुछ क्षण निरीक्षण करते रहते हैं।) नरेन्द्र ठाकुर का कण्ठ देखा नहीं जाता, डॉक्टर बाबू ! (गम्भीर मुखमुद्रा बनाए हाथ के उपकरण को एक ओर रखते हुए डॉक्टर महेन्द्रनाथ के मुँह से एक लम्बी साँस निकल जाती है।) महेन्द्रनाथ : (सोवते हुए) हूँ.--- (टाकुर पर दृष्टि डालकर) नियमित औषधि सेवन और लेप के साथ ही.... कण्ठ के विश्राम हेतु अब आपका अधिक से अधिक मौन रहना भी अनिवार्य है, ठाकुर ! (उपस्थित शिष्यों पर दृष्टि डालते हुए) यह दायित्व आप लोगों का है। टाकुर : किन्तु. डॉक्टर (रुककर) दूर-दूर से आनेवाले श्रद्धालुओं मे मिलने-बोलने पर रोक लगाना---- क्या उनकी भावनाओं के प्रति अन्याय नहीं होगा ? (भावुक होते हुए) नहीं---- नही---- मैं ऐसा नहीं कर सकता---- कदापि नहीं---- महेन्द्रनाथ : तो फिर अपनी इस मनमानी से आपको---- उन लोगों के साथ अन्याय करना होगा---- जो दिन-रात आपकी सेवा में लगे हैं.... और जो सदेव आपको स्वस्थ देखना चाहते हैं। (डॉक्टर सरकार की यह बात सुनकर सहज ही ठाकुर की व्यथित दुष्टि नरेन्द्र दाशरथि, शिवानन्द के झुके उदास चेहरों पर भटकने लगती : क्या आपको श्री मां का जरा भी ध्यान नहीं है । (रुककर) जानते हैं.... क्ल आपके पानी हाटी से अस्वस्थ रोकर लौटने के बाद से अब तक बेन . तो मोई है..- और न ही उन्होंने अन्न-जल ग्रहण किया है। : (चौककर) क्या ? (अत्यधिक व्यथित हो उठते है।) ठाकुर (98) .. महेन्द्रनाथ : आपके तो दर्शनमात्र से ही लोग प्रसन्न हो जाते हैं--- और फिर न बोलने वाली बात तो केवल कुछ ही दिनों की है। स्वस्थ होते ही-- ठाकुर (बात काटकर) मैं---- रथयात्रा से पहले स्वस्थ होना चाहता हूँ, डॉक्टर ! (अचानक ठाकुर को जोरदार खाँसी उठती है तथा हल्की खरखराहट के साथ कण्ठ का कुछ रक्त मुँह से बह निकलता है। देखकर सभी सन्न रह जाते है।) नरेन्द्र : (घबराकर) डॉक्टर बाबू ! (डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार के चेहरे पर भी घनी गम्भीरता छा जातो नरेन्द्र कपड़ा लेकर ठाकुर के मुंह एव वस्त्रों पर उछट आए रक्त को पोछने आगे बढ़ता है पर डॉक्टर हाथ से उसे रोक देते हैं।) महेन्द्रनाथ : उहरो, नरेन्द्र ! पहले इस रक्त का नमूना लेना होगा परीक्षण के लिए--- (अपनी पेटी में से छोटी शीशी निकाल ठाकुर के मुंह से बह आए रक्त का नमूना परने लगते है। नमूना ले चुकने के उपरान्त नरेन्द्र अपने हाथ के कपड़े से ठाकुर का मुँह एवं वस्त्रादि पौछता है। इस बीच कक्ष के द्वार के पास खड़ा शिवानन्द तेजी से कय श्री माँ को सूचना देने गुपचुप स्टक जाता है, इसका किमो को पता नही चल पाता।) (पेटी समेटते हुए) भोजन में इन्हें केवल दूध अथवा एकदम पतला दलिया ही देना होगा तथा लेप वाली पट्टी भी तीन-तीन घण्टे में बदलनी होगी। दाशरथि (सव्यथा) ठाकुर स्वस्थ तो हो जाएंगे न, डॉक्टर बाबू ? महेन्द्रनाथ : रक्त-परीक्षण के उपरान्त हो इस विषय में कुछ कहा जा सकेगा। (रुककर) फिर भी ठाकुर को चिकित्सा के लिए दक्षिणेश्वर से कलकत्ता ले जाना ही होगा । (लम्बी साँस के साथ) सारी बात पूरी सावधानी, समुचित पथ्य-परहेज एवं कण्ठ के अधिकाधिक विश्राम पर निर्भर करती .. (उठ खड़े होते है।) (पेटी लेकर) चलता हूं---- कलकत्ता में मेरे एक डॉक्टर मित्र हैं तुपार मोहन---- मैं उनसे बात करता हूँ। तुम लोग ठाकुर को कलकत्ता पहुंचाने की व्यवस्था करो। (जाते-जाते) जगन्माता-... सब मगल ही करेंगी-- (सहमा ठाकुर की ओर घूमकर) इस सबमें अब आपको---- हम लोगों को अपना पूरा सहयोग देना होगा, ठाकुर । (रुककर) और छोड़नी होगी मनमानी---- (दोनों हाथ जोड़ते हुए प्रणाम ! (उत्तर में ठाकुर मुस्करा देते है। डॉक्टर सरकार तेजी से बाहर निकल जाते है।

ठाकुर .. (99) : कुछ क्षण कक्ष में एकदम स्तब्ध सन्नाटा छाया रहता है जिसमें किंकर्तव्यविमूढ़ नरेन्द्र और दाशरथि एक-दूसरे की आँखों मे जैसे कुछ खोजने का विफल प्रयास करते है। अचानक ठाकुर का अल्हड़ स्वर निस्तब्धता को एक ही झटके में बिखेर देता है-) ये तुम लोग रोनी-सी सूरत बनाए---- किस सोच में डूब गए, क्या---- डर गए डॉक्टर की बातों से । (रुककर) तुम क्या सोचते हो---- डॉक्टर के कहने से~~- मैं सबसे मिलना-बोलना छोड़ दूंगा ? (मुंह बनाकर) इस भुलावे में न रहना---- (इसी समय शिवानन्द, हृदय व प्रतापचन्द्र हाजरा के साथ श्री माँ का हाथ में लेप-पात्र लिए प्रवेश--- आपादमस्तक यवल वस्त्रों मे आवृत्त गौरवर्णी काया शुभ्र ललाट पर दीप्तिमान मोटी लाल सुहाग-बिन्दिया, सलज्ज नेत्रों के बोझ से झुका मस्तक, मुख पर विद्यमान शान्ति की मधुरता व शालीनता का गाम्भीर्य, देह की पोर-पोर से छलकता मातृत्व- मानो साक्षात् सरस्वती ही हो। नरेन्द्र और दाशरथि विनयभाव से एक ओर हटकर श्री माँ के लिए स्थान छोड़ देते हैं।) : (शिकायत के स्वर में) माँ ! ठाकुर को आप ही को समझाना होगा---- कि वे---- डॉक्टर के निर्देशों का यथावत् पालन करें। : (ठाकुर के सिरहाने के पास बैठती हुई) ठाकुर तो स्वयं---- दुनिया को' समझाते हैं। उन्हें इसको... आवश्यकता हो कहाँ है ? (लेप-पात्र भूमि पर रखकर ठाकुर की ओर निहारने लगती है।) सोये हुए ही को तो जगाया जाता है न नरेन ? (पात्र उठा ठाकुर के कण्ठ पर लेप करने लगती हैं। ठाकुर को यदाकदा पीड़ा उठती है, जिसे वे चुपचाप सह लेते है ताकि किसी को पता न चले।) (लेपन करती हुई) बैठ जाओ तुम लोग---- (सब पास आ ठाकुर व श्री मों को घेरकर बैठ जाते है।) माँ ! डॉक्टर बाबू का कहना है---- ठाकुर को कलकत्तां ले जाना होगा---- (शान्तभाव से) पुत्र ! क्या करना है--- क्या नहीं.--- सो सब तुम्ही लोगों को सोचना है। मैं क्या जानूं ? (भावुक स्वर मे) मैं तो छाया हूँ ठाकुर की। (सहमा सुरेन्द्रनाथ मित्र का तेजी से प्रवेश- सारा शरीर वर्षा मे भीगा नरेन्द्र . श्री मों .. नरेन्द्र श्री माँ हुआ) मुरेन्द्रनाथ : (अधीर स्वर में) कैसो तबीयन है ठाकुर को ? (श्री (100) ठिटकते हुए आss... श्री मां भी यही है ? (सविनय हाथ जोड़कर) प्रणाम, माँ ! प्रणाम ठाकुर ! (ठाकुर और श्री माँ मीठी मुस्कार के साथ सुरेन्द्रनाथ मित्र के प्रणार का उत्तर देते है।) (पास बैठते हुए) मैं तो समाचार पाते ही घबरा गया था.... नरेन्द्र : पानी हाटी से लौटते-लौटते ही ठाकुर को कण्ठ पीड़ा सहसा बढ़ गई। और बर भी हो गया। डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार ने लेप और औषधि सेवन के लिए कहा है । (रुककर) उनका कहना है---- ठाकुर को कलकता ही पहुंचाना होगा। रक्त-परीक्षण के बाद ही स्थिति सट हो सकेगी---- सुरेन्द्रनाथ : तो इसमें कठिनाई क्या है ? इसी समय ले चलते हैं ठाकुर को कलकता ! मेरे यहाँ सारी व्यवस्था हो जाएगी---- नरेन्द्र : ठाकुर को आराम को दृष्टि से श्रद्धालुओं की भीड़ और आवाजाही से दूर रखना होगा, सुरेन्द्र दा! ठाकुर : (खरखराने कण्ठ से) सुरेन्द्र । तुम इन सबसे कह दो कि ये---- ख्यालो पुलाव न पकाएं। (लम्बी साँस लेकर) में दक्षिणेश्वर छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा---- जगन्माता के चरणों से दूर---- नरेन्द्र ठाकुर । डॉक्टर बाबू अभी कह नहीं गए थे---- आपको अब अपनी मनमानी छोड़नी होगी। प्रतापचन्द्र : अरे । तुझे अपनी फिक्र न सही---- कम से कम हम लोगों का नो कुछ ख्याल कर, गदाधर ! सुरेन्द्रनाथ : हाँ, ठाकुर । हम सबका निवेदन आप अस्वीकार नहीं कर सकते.... (ठाकुर की धर्मसंकट मे उलझी दृष्टि एक-एक कर सभी पर से होती हुई निढाल भाव से फिर अपने में लौट आती है। एक लम्बी साँस बरबस उनके मुँह से निकल जाती है।) ठाकुर ठीक है.... कर लो तुम लोग भी अपनी जिद पूरी । (भावावेश) पर एक बात भली प्रकार जान लो.... मैं ठीक नहीं हो सकूँगा.... यहाँ से दूर जाकर---- श्री माँ : (कोपल ताड़ना के साथ) शुभ शुभ बोलिए न ?(कुछ क्षण के लिए कक्ष मे चुप्पी छा जाती है, पर उद्वेलन सभी के मन भरा था।) सुरेन्द्रनाथ : (सोचते हुए) बाग बाजार में दुर्गाचरण मुखर्जी स्ट्रीट में एक छोटा-सा मकान है मेरी नजर में। (रुककर) मगर फिर सोचवा. हूँ.... दक्षिणेश्वर के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच रमने वाले ठाकुर उस तंग मकान में घुट न जाएँ कही। (कुछ क्षण मौन रहकर सम्भावित मकानों को उपयुक्तता पर विचार करने लगते है। । ..

(101) : . सभी को दृष्टियों सुरेन्द्रनाथ मित्र पर लग जाती हैं।) मकान तो वसुतल्ला में भी है,श्यामपुकर स्ट्रीट में भी है---- और काशीपुर के पास वराह नगर बाजर से कुछ दूर एक उद्यान भवन भी है। (रुककर) पर तुम लोग मकान को चिन्ता छोडो---- यह मैं देख लूंगा। तुम लोग तो बस यह सोचो---- कि ठाकुर के पास देखभाल के लिए अधिक से अधिक कौन रहेगा और यहां पीछे दक्षिणेश्वर में पूजा का प्रबंध क्या होगा ? नरेन्द्र : होना क्या है ? (रुककर) पोछे मन्दिर की व्यवस्था हदय और रामलाल मिलकर देख लेंगे.... : नहीं-नहीं---- में ठाकुर से दूर नहीं रह पाऊंगा---- नरेन्द्र : देखो, हृदय । कलकत्ता जैसे बडे शहर में अधिक लोगों के लिए व्यवस्था भला कैसे सम्भव हो सकती है । (समझाते हुए) कुछ दिन की ही तो बात है---- और फिर यदि जरूरत हुई.--- तो बुला लेंगे तुम्हें । प्रतापचन्द्र (आतुर भाव से बैठे-बैठे ही आगे सरककर) और मैं ? नरेन्द्र : तुम्हें तो गाँव जाना है न---- माँ से मिलने ? प्रतापचन्द्र : (दढ़ स्वर मे) नही---- मां से फिर मिल लूंगा---- । ठाकुर को नहीं छोड़ सकता। शिवानन्द : आज प्रताप को क्या हो गया है, नरेन्द्र ? (रुककर) ये बदला-बदर रूप ? ठाकुर : (परिहास भाव से) लगता है---- तर्क की सीढ़ियां चढ़े बिना ही--- 'आस्था' पुष्ट हो गई इसकी--- (सब एक साथ हँस पड़ते है। प्रतापचन्द्र हाजरा गम्भीर बना गर्दन झुका लेता है। ठाकुर की अस्वस्थता से गम्भीर बना वातावरण एक बारगी इस हँसी से हल्का हो जाता है।) सुरेन्द्रनाथ : (गम्भीर होकर) हाँ... तो अब कहो.... ठाकुर की देखभाल और सेवा का क्या होगा ? (रुककर) हमें मिलकर यह दायित्व बॉटना होगा--.. क्योंकि सभी के अपने-अपने घर-परिवार हैं और पारिवारिक दायित्व भी। (वातावरण फिर गम्भीर होने लगता है।) (सभी पर दृष्टि डालते हुए) तुममें से कौन---- अधिकाधिक समय ठाकुर के पास रहेगा? नरेन्द्र मैं रहूँगा, सुरेन्द्र दा ! मैं करूंगा ठाकुर की सेवा---- (सुनकर सब चौक पड़ते है।) ठाकुर : (चौककर) तू अकेला क्या-क्या करेगा, रे नरेन्द्र ? (रुककर सॉस लेते हुए) नौकरी करेगा---- घर देखेगा---- पढ़ाई करेगा---- घर का मुकदमा लडेगा--- या मेरी सेवा करेगा? : :

(102) : दाशरथि नरेन्द्र अभी कुछ दिन ही तो हुए है.---- तेरी नौकरी लगे.. : (सावेश) तो क्या हुआ ? (रुककर) आवश्यकता होने पर सब छोड़ दूंगा---- पर ठाकुर को नहीं छोडूंगा। (नरेन्द्र की दृढ़ता और निष्ठा से सव क्षणभर के लिए स्तव्य हो जाते नरेन्द्र दाशरथि ! तुझे मेरा अवकाश-प्रार्थनापत्र कल सुबह ही विद्यासागर सर के पास पहुँचाना होगा। दाशरथि : ठीक है--- पहुंचा दूंगा। (रूककर) मगर--- कितने दिन का अवकाश लेगा तू ? नरेन्द्र : अनिश्चितकाल का---- दाशरथि : (साश्चर्य) यानि , तब तक---- जब तक ठाकुर पूर्णतः स्वस्थ न हो जाएं। (भावुक स्वर में) किसे पता-~-- भक्त को भगवान की पूजा में कितना समय लगेगा ? ठाकुर : (अस्थिर भाव से) नरेन्द्र (सबकी दृष्टि मे विस्मय भरा था। श्री माँ के नेत्रो में वात्सल्य तरलायित हो उठता है। वे भावमुग्य दृष्टि से आशीषों की वर्षा करती हुई निहारती रहती है कुछ क्षण नरेन्द्र को। ठीक इसी क्षण रामलाल का प्रवेश होता है-) रामलाल : (इधर-उधर देखते हुए) प्रतापदादा ! गाँव से कोई आया है बुलाने---- (सहमेभाव से) माँ नही रहो तुम्हारी---- प्रतापचन्द्र : (हक्का बक्का होकर) क्या ? हे भगवान ! यह क्या हो गया ? (फूट पड़ता है।) ठाकुर : (सव्यथा) अब रोने से क्या होगा, रे ? (सावेश) मातृदोष का भागी है तू ! (आवेश और अस्थिरता की मन स्थिति के बीच सहसा ठाकुर को जोरदार खाँसी उठती है, साथ ही पहले की तरह फिर रक्तस्त्राव होने लगता है।) नोन्द्र (घबराकर) ठाकुर ! (नरेन्द्र व सुरेन्द्रनाथ मित्र एक साथ ठाकुर को सम्हालने लपकते हैं। श्री मों की आंखें ठाकुर की देवी, खाँसी और रक्तस्त्राव को देख फटी की फटी रह जाती है। क्षण भर के लिए सभी कुछ जड़ हो जाता है।).

(103) अंक : तीन चार दृश्य : स्थान स्वर्गीय बैरिस्टर दत्त का घर दोपहर (घर के ओमारे में झुककर बैठी धान को फटक-बीन रही उदास भुवनेश्वरी। यंत्रचालित से हाथों का साथ छोड़ उसकी अस्थिर दृष्टि कभी जब धान भरे छाज से उछटती तो खिड़की के पास टगे छीके पर बिखरे अनाज के दानो को उनके इर्द गिर्द मोठी चहक के साथ फुदक-फुदक कर चुग रही ममतालु चिड़िया व उसके अल्हड़ बच्चों पर से होती हुई पास ही तख्त पर बैठे स्कूल का होमवर्क करने मे तन्मय भूपेन्द्र पर टिककर एक मौन चीत्कार कर उठती। गुपचुप बीत रहे उन चिन्ता बोझिल क्षणों के बीच अचानक बाहर वाली कुण्डी खड़क उठती है।) भुवनेश्वरी : (चौककर) भूपी ! देख तो---- महेन स्कूल से आ गया लगता है। (भूपेन्द्र अनमने मन से उठकर दरवाजा खोलता है, पर बाहर महेन के स्थान पर नरेन दद्दा को खड़ा देख खुशी के मारे खिल उठता है।) : (सुखद आश्चर्य से) दद्दा---- तुम ? कहाँ थे इतने दिन । (नरेन्द्र से लिफ्ट जाता है। नरेन्द्र भी उसे अपने में समेट लेता है।) नरेन्द्र : (भूपेन्द्र के केश सहलाते हुए) कैसा है रे तू (नरेन्द्र का स्वर कानों में पड़ते ही मानिनी ममता की त्यौरियाँ खिच जाती हैं। थमे हाथ फिर से छाज से जूझने लगते है, किन्तु कमवख कान वावस अपने भीतर समाते जा रहे स्वर से उदासीन नही रह पाते । परिणामाः स्वर के निकट आने के साथ ही साथ खिंची त्यौरियों के कड़े पहरे में कैद भूपेन (104) दृष्टियाँ जाल में फंसी मछलियो-सी छटपटाने लगती है। (निकट आता स्वर) पढ़ाई ठीक चल रही है न तेरी? और कह- माँ कैसी .. - भूपेन्द्र चलकर खुद ही देख लो न-... वो रही माँ ! (स्वर और पाँव चलकर एकदम सामने आ खड़े हुए तो भी भुवनेश्वरी ने न दृष्टि उठाई और न काम छोड़ा।) नरेन्द्र (अधीर स्वर में) माँ । (रुककर) मुझसे नाराज हो ? (भुवनेश्वरी अपने काम में लगी रहती है। बोलती नही कुछ। जब आतुर नरेन्द्र से रहा नहीं गया तो नीचे बैठ माँ का कंधा पकड़ झवझोर देता है-) माँ ! (सहसा झकझोर दिए जाने पर बरबस दृष्टि को उठना ही पड़ा। सामने नरेन को देख बुरी तरह चौक पड़ी भुवनेश्वरी-) भुवनेश्वरी : (चौककर) तू ? (पलभर के लिए आँखों को विश्वास ही नहीं हुआ कि सामने बैठा नरेन्द्र ही है या कोई और- रूखे बिखरे बाल बुरी तरह सलवट पड़े अस्त-व्यस्त वस्त्र, लाल-लाल सूजी हुई-सी आँखें, न जाने कितनी ‘रातो जगी, शायद रोई हुई भी, पपड़ाए होठ। विस्फारित दृष्टि से टकटकी बाँधे कुछ क्षण नरेन्द्र को देखती रही मुवनेश्वरी1) : (सविस्मय) ऐसे क्या देख रही है, माँ ? (पास सरककर कंथा पकड़ते हुए) में नरेन्द्र हूँ--- तेरा नरेन्द्र । (बाल सुलभ अन्दान में माँ के कंधे पर अपनी ठोडी टिका देता है नरेन्द्र पर भुवनेश्वरी उसे भावावेश में झटक देती है। भुवनेश्वरी : (सावेश) कौन नरेन्द्र ? (सुलगती ममता की तपिश को दृष्टि के द्वारा नरेन्द्र की और उछालती हुई) मैं किसी नरेन्द्र को नहीं जानती। (माँ के कारण कोर का औचित्य समझ रहा नरेन्द्र पलभर के लिए सहम जाता है, उसे मनाने के लिए वह तमाल अपना भाव परिवर्तन करते हुए परिहास-मुद्रा धारण कर लेता है।) नरेन्द्र : (मुँह बनाकर) बाबा रे ! इतना गुस्सा---- कि पहचानना ही न चाहे ? (सहास्य) ठीक है--- तो ले--- मैं ही दिए देता हूँ तुझे अपना परिचय---- (मों के कान के पास मुँह लाकर नाटकीय अन्दाज़ में ऊँने स्वर से) में नरेन्द्र हूँ--- (सहास्य) अरे---- तुम्हारा बेटा--- भुवनेश्वरी : (रुष्ट स्वर मे) मेरा बेटा ? (गर्दन हिलाती हुई) इस नाम का कोई बेटा नही है मेरा । (भावाकुलं स्वर मे) हॉ---- एक बेटा था अवश्य---- (शून्य नरेन्द्र ..

नरेन्द्र नरेन्द्र (105) पर दृष्टि गड़ाए) विलेह---- वह कहीं खो गया है---- (अपने साश्रु नयन नरेन्द्र के आगे याचना-मुद्रा में पसारती हुई) तू जानता है उसे ? (माँ की आँखों में छलछला आई असहाय - विवश ममता को देख नरेन्द्र का कलेजा चिर जाता है एकदम भीतर तक, पर तत्काल ही वह अपने को सयत कर लेता है-) : (मुँह बनाकर) ओ---- माँ ! (दोनो कंधे पकड़कर प्यार से) देख---- पूरे छह दिन बाद तेरा बेटा आया है बाहर से---- और तू उससे आते ही लड़ने बैठ गई? भुवनेश्वरी : (आहत् दृष्टि से नरेन्द्र को निहारती हुई उपालम्म भाव से) छह-छह दिन विना किसी सूचना के---- बिना काम के व्यर्थ ही घर से बाहर रहकर लौटे---- तो तू ही सोच ले---- वो बेटा---- किसी भी दुखिया माँ के लिए सत्कार का पात्र होगा---- या धिक्कार का , (नरेन्द्र के पास माँ के इस तर्क का कोई उत्तर न था।) (सावेश) इतने दिन बाद आज सुध आई है तुझे घर की ? : ठाकुर अचानक गम्भीर रूप से रुग्ण हो गए, माँ ! पानी हाटी के दिव्या महोत्सव में वर्षा के बीच भी नाचते-गाते रहने से गले की गिल्लिय गई। वहां दक्षिणेश्वर में डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार की और कोई लाभ न होने से उन्हें कलकत्ता लाकर कार में दिन पड़ा। (रुककर) डाक्टरों का कहना है कि ठाकुर को करबदल होने लगा है अब । भुवनेश्वरी : (साश्वर्य) तू इतने दिन से कलकत्ता में ही रहने कभी समय नहीं मिला तुझे? नरेन्द्र : ठाकुर को ऐसी अवस्था में छोड़कर न दें, माँ7 (रुककर) सच मान-- पिछले छह जिओभी ने ठाकुर को अकेला नहीं छोड़ा--- पुवनेश्वरी : (आशकित स्वा में) तब तो इटने दिला होगा? नरेन्द्र :: (मस्तक झुकाए सहमे पाव में) *नकटकाकर मांगा, पर लम्बे समय के सिर मार दो दिन मिलने के कार मैंने- वह नौकरी छोरी (सुनकर घम्स बार आकाश की चाची भुवनेश्वरी : (चौककर) क्या ? कसने दिन कठिन भाग दंडकेटकारा नरेन्द्र : तो क्या वादा?-मेटा भुवनेश्वरी : (नीली बने - नरेन्द्र : (106) और हमारी सेवा का कुछ भी ध्यान नहीं तुझे ? (भत्संना के स्वर में) ये भी नहीं सोचा--- घर में असहाय विधवा मां है.--- छोटे भाई है..- नौकरी के बिना उनका पालन-पोषण कैसे होगा? : मनुष्य की भला क्या सामर्थ्य है, मां । कि यह किसी का पालन-पोषण कर सके । (रुककर) वास्तविक पालनकर्ता तो ईश्वर है। भुवनेश्वरी : (सावेश) तो क्या---- हमारे पालन-पोषण के लिए--- तेरा ईश्वर जाएगा नौकरी करने ? (बड़बड़ाती हुई) विचित्र तर्क है तेरा भी---- गुरु की सेवा करेगा तू---- ईश्वर नहीं... और हमारा पालन-पोषण व सेवा करेगा ईश्वर---• तु नही ? नरेन्द्र : ईश्वर तो कर्ता है, माँ ! और मनुष्य निमित्त । (पावुक स्वर मे) मेरे लिए इस संसार में ठाकुर से अधिक महत्त्वपूर्ण कोई भी नहीं है-... भुवनेश्वरी : (तमककर) क्या---- जन्मदात्री मां भी नहीं ? (उत्तर मे मुस्करा देता है नरेन्द्र ।) नरेन्द्र : (भावुक स्वर में) मा । ठाकुर के साथ मेरा सम्बन्ध 'संसारी नहीं है। भुवनेश्वरी : मैं नहीं जानती- ये 'संसारी' 'असंसारी' सम्बन्ध क्या होते हैं ? कैसे होते हैं ? नरेन्द्र बस---- यूं समझत ले---- जैसा 'भक्त' और 'भगवान' का होता है--- भुवनेश्वरी : (आक्रोश भरे स्वर में) भगवान क्या इतना कठोर होता है कभी, नरेन्द्र : नहीं, माँ ! ठाकुर कठोर नहीं हैं। (भावुक स्वर में) एकदम कोमल है-- मक्खन से कोमल---- और स्निग्ध.... किसी असहाय विधवा से उसका एकमात्र समर्थ बेटा छोन लेने वाले को तू 'कोमल' कहता है ? (सक्रोध) वह तो राक्षस से भी अधिक क्रूर व दुष्ट है। (पूर्व स्मृति को कुरेदती हुई) उस संन्यासी ने ठीक ही कहा था--- बचाले मैया--- अपने इस पुत्र को बचाले--- उस दोंगी और पागल से---- वरना खो बैठेगी तू इसे । (अपने को कोसती हुई) सारा दोष तो मेरा ही है,रे । मैं ही अभागिन तुझे मचा नहीं पाई---- (एक लम्बी व्यथा भरी नि.श्वास के साथ भुवनेश्वरी गहरे सोच मे डूब जाती है। तेरा इसमें तनिक भी दोष नहीं है, मां । (रुककर) सच तो यह है कि- मैं तुम्हारो इस 'सांसारिकता' के लिए जन्मा ही नहीं हूं। सम्भवतः ईश्वर ने मेरे लिए---- कुछ और ही विधान रचा लगता है---- (सुनते ही भुवनेश्वरी का कलेजा दुर्भाग्यपूर्ण भावी आशका से कॉप उठता है।) मुक्नेश्वरी (सव्य भाव से) क्या मतलब है तेरा ? (किसी चोट खाई सर्पिणी की तरह फुफकारती हुई भुवनेश्वरी एक क्षण के लिए जैसे अपना आपा खो बैठती है।) : भुवन .. नरेन्द्र ..

नरेन्द्र .. (107) (कांपते स्वर में) सन्यास लेगा तू ? (अंगारे बरसाती मुद्रा बनाकर) यही सिखाया है तुझे---- तेरे उस ढोंगी गुरु ने ? (मों के ऐसे क्रोधभरे तेवर भूपेन्द्र के लिए सर्वथा अप्रत्याशित ही थे। वह सहमी दृष्टि से माँ को निहारते हुए कुछ दूर हट जाता है।) : नहीं, माँ ! ये तो ठाकुर ने ही मुझे रोक रखा है 'संन्यास' लेने से---- अन्यथा मैं तो बहुत पहले ही यह निर्णय ले चुका था। (रुककर) वे स्वयं तुम लोगों के अनिश्चित भविष्य को लेकर बहुत चिन्तित रहते हैं। उन्होंने मुझसे वचन लिया है---- कि जब तक वो जीवित हैं---- मैं संन्यासी नहीं बनूंगा---- भुवनेश्वरी : (तिलमिलाए भाव से) और उस वचन का क्या होगा, रे (रुककर) जो तूने---- पीशी बूआ और मुझे दिया था---- (स्मरण दिलाती हुई) कि तू---- अपने दादा के मार्ग का अनुसरण कभी नहीं करेगा---- नरेन्द्र उस वचन पर तो मैं अभी भी दृढ़ हूँ, माँ ! (रुककर) विश्वास रखो---- मैं दादा के मार्ग का कभी अनुसरण नहीं करूंगा--- और न ही कभी ऐसा कोई कार्य करूंगा---- कि जिससे तुम्हें लज्जित होना पड़े---- भुवनेश्वरी : (मुख पर 'न समझने का भाव लिए) तो फिर---- नरेन्द्र : (बीच ही में) संन्यास तो मैं लूंगा, माँ ! (रुककर) मगर दादा की तरह जीवन के संघषों और कठिनाइयों से घबराकर नही । (भावमग्न स्वर मे) यही मेरी नियति है--- और मेरी आध्यात्मिक अनिवार्यता भी... (सहसा कुछ याद कर चौकते हुए उठ खड़ी होती है भुवनेश्वरी ) (चौककर) क्या बात है, माँ, भुवनेश्वरी : (भावुक स्वर में) कैसी माँ हूँ मैं भी ? (रुककर) इतनी देर हो गई---- छह दिन बाद लौटे पुत्र से यह भी नहीं पूछा कि तूने-~~ कुछ खाया-पीया भी है---- या भूखा हो है ? नरेन्द्र : (मों का आँवल पकड़कर) में तो. जन्म-जन्म का भूखा हूँ, माँ । (कोमल एवं भावुक स्वर में) कभी ज्ञान का---- कभी ईश्वर के साक्षात् का--- तो कभी तेरे ममता भरे दुलार का---- (नरेन्द्र की भावनागत मिठास से भुवनेश्वरी का मन पर आता है।) भुवनेश्वरी : (मीठी ताड़ना के भाव से निहारती हुई) चल हट---- दक्षिणेश्वर के उस ढोंगी साधु के साथ रहकर तू भी छलना सीख गया है--- (नरेन्द्र के हाथ से अपना आंचल छुड़ाकर) देखती हूँ.... रसोईघर में तेरे लिए क्या है ? (तेजी से रसोईघर की ओर चल देती है। नरेन्द्र के मुख पर मयुर-कोमल मुस्कान दौड़ जाती है, पर अगले ही क्षण पर की तंग हालत और रसोईघर के खाली डिब्बों का ध्यान आते ही चेहरा स्टक जाता है। जाने क्यों मां को रोकना चाहकर भी नहीं रोक पाता वह।)

(108) . अंक तीन पाँच दृश्य स्थान समय काशीपुर का उद्यान-भवन संध्याकाल .. (मोतीझील के उत्तर में वराहनगर बाजार की यड़ी सड़क से कुछ दूर हटकर स्थित रानी कात्यायिनी देवी के दामाद श्रीयुत् गोपालचन्द्र घोष द्वारा निर्मित इस दुपजिले उद्यान-भवन की निवली मंजिल का पश्चिमी छोरवाला शान्त-एकान्त कक्षा तल पर विनापरत ठाकुर के कट-पीड़ा से त्रस्त मुख को तिरछी मुद्रा में पास बैठकर कोमलभाव से दुलारती-सहलानी अस्तासन सूर्य की अरुणिम किरणे। ठाकुर यदाकदा जब गले की पौड़ा से छटपटाते हुए कराह उठते तो उनके पांव दवा रहे नरेन्द्र के हाथ कुछ क्षण के लिए स्वत हो रुक जाते तथा उसकी व्यथा भौगो दृष्टि उनके पलक मुंदै मुख पर केन्द्रित होने का विफल प्रयास करती हुई आतुरभाव से द्वार पर जा टगती, दिनु अगले ही क्षण निराश हो पुन. अपने आप में लौट आती। गहरी खामोशी के बीच यही क्रम चलता रहा कुछ देर। अवानक उठी तेज पीर के वेग के साथ हो ठाकुर का हाथ बरवस अपने गले पर बंधी लेप लगी पट्टी पर जा पहुँचा। नरेन्द्र ने झपटकर ठाकुर का हाथ पकड़ लिया-) : नहीं, ठाकुर ! हाथ नहीं.... (इस प्रयास में गले पर हल्का-सा दबाव पड़ने ही दर्द के मारे ठाकुर कराह उठे। मुँह खुला तो कुछ रक्त बाहर निकल आया।) (कपड़े से रक्त पोछकर) बहुत कष्ट है,ठाकुर ? (सुनकर प्रयत्नपूर्वक अपनी बंद पलकों को कुछ खोल हौले-से मुस्करा (सस्मित स्वा में) ये तो मैं---- 'देह धर्म निभा रहा हूँ,रे ! नरेन्द्र देते है ठाकुर) ठाकुर : (109) नरेन्द्र आप न ठीक से खा पाते हैं.... न पी पाते हैं---- (रुककर) यहाँ तक कि---- बोलने में भी आपको बहुत पीड़ा होती है। (सव्यथा) ये कैसा 'देह धर्म' हुआ, ठाकुर ? ठाकुर 'देह' है.--- तो 'दैहिक कष्ट' भी होंगे ही। (रुककर सॉस लेते हुए) देह धारण करने वाले को---- कर्मानुसार इन्हें भुगतना ही पड़ता है । (ठाकुर का हाथ यथास्थान रखने के बाद नरेन्द्र फिर उनके पाँव दवाने लगता है।) (खरखराते कण्ठ से) जरा, व्याधि, जन्म, मृत्यु आदि देह के धर्म हैं। राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा तक भी इनसे बच नहीं पाए । (रुककर) अजर-अमर तो केवल आत्मा है। नरेन्द्र : किन्तु, ठाकुर---- (ठीक उसी क्षण काली प्रसाद और शिवानन्द के आ जाने से वातों का क्रम भंग हो जाता है।) (व्यग्र स्वर में) आ गए, शिवा---- तुम लोग ? दवा ले आए , शिवानन्द : हाँ। इस दर्द निवारक औषधि से ठाकुर की पीड़ा तुरन्त ही कम हो जाएगी। (हाथ की दवा नरेन्द्र की ओर बढ़ाता है।) डॉक्टर बाबू ने रात्रि में आने को बोला है। नरेन्द्र (दवा लेकर) ठीक है ! तू पानी ला---- काली ! (कालीप्रसाद फुर्ती से जलपात्र भर लाता है। तीनों मिलकर ठाकुर को दवा पिलाने का प्रयास करते है।) मुंह खोलिए, ठाकुर ! (ठाकुर अनिच्छापूर्वक मुँह खोलते है। नरेन्द्र सावधानी से दवा व थोड़ा-सा जल उनके मुंह में डाल देता है। शेप दवा व जलपात्र को वही रखने के उपरान्त नरेन्द्र ठाकुर का मुँह पौड़कर वस्त्रादि ठीक करने लगता है तथा शिवानन्द व कालीप्रसाद पास ही भूमि पर बैठ जाते है।) ठाकुर इस जर्जर पिजर में व्यर्थ ही तुम लोग इतनी औषधियां उडेलते हो। (रुककर) कुछ नही होने का इनसे---- शिवानन्द यह आप क्या कह रहे हैं, गुरुदेव ? (रुककर) हमारे लिए तो-... ये जर्जर पिंजर ही एकमात्र सर्वम्व है। (उपालम्भ के स्वर में) लगता है. आप स्वयं ही स्वस्थ नहीं होना चाहने .. ठाकुर ! टाकुर : (पलके पूरी खोलने हुए) तुम लोग क्या मोचते हो--- मैं जानबूझकर इतना कष्ट भोग रहा हूँ मैं भी चाहता हूँ.... जल्दी में जल्दी ठीक (110) जाऊ. (सप्पी सांस लेकर) पर सब कुछ तो जगन्माता की इच्छा पर निर्भर है। कालीप्रसाद: तो आप जगन्माता से क्यों नहीं कहते-~कि वे आपको शोध स्वस्यका नरेन्द्र ठाकुर : हाँ, ठाकुर ! आपको इच्छा को जगन्माता टाल नहीं सकतीं। (कण्ठ-पीड़ा अचानक फिर उठती है। ठाकुर दात भीक्कर यिना कराहे उसे सह लेते है।) : (कण्ठ-पीड़ा से अपने को संयत करते हुए) कैसी बात करते हो तुम लोग? माँ क्या.... यह सब नहीं जानती ? (ठाकुर के कथन का मर्म समझ नरेन्द्र को दृष्टि एक क्षण के लिए झुक जाती है।) पुत्र को क्या---- माँ से यह सब कहना पड़ता है ? (एक क्षण के लिए ठाकुर कुछ सोचने लग जाते है। उनको कल्पना में सहज ही घने काले मेयों में समाई सजल शीतलता की अनुभूति कौघ उठती है।) (भावुक स्वर मे) ग्रीष्म-पाम से तपी-झुलसी धरती को क्या कभी अनन्त नीलाकाश से विविध बयार--- और शीतल-तरल-सुखदायिनी,फुहारों के लिए अनुनय करते देखा है तुमने । : (झुकी दृष्टि उठाते हुए) तो फिर---- : (बात काटते हुए निषेध भाव से) ना---- ममता के संसार में किन्तु, परन्तु, लेकिन फिर---- किमी के लिए कोई स्थान नहीं होता, पुत्र ! (पलभर की चुप्पी में ठाकुर नरेन्द्र के मन में चल रही छटपटाहट को समझ लेते है।) (कोमल स्वर में) तू निश्चिन्त रह । माँ वही करेगी---- जो उसे अभीष्ट नरेन्द्र ठाकुर श्री माँ नरेन्द्र (ठोक इसी क्षण हाथों में भोजनपात्र लिए द्वार पर आ खड़ी हुई श्री माँ एक मीठी मुस्कान के साथ सहसा परिहास कर उठती है-) (मोठी मुस्कान के साथ) सो मैं पूरा कर लाई हूँ। : (चौककर उसी ओर देखते हुए) माँ---- आप ? (नरेन्द्र व ठाकुर की एक साथ चौकी दृष्टियो का केन्द्र बनी श्री माँ साक्षात् अन्नपूर्णा-सौ भोजनपात्र लिए धीरे-धीर उसी ओर बढ़ती है।) : हाँ, पुत्र ! मेरा अभीष्ट तो इस समय यह दूध-दलिया है--- (निकटस्थ पीठिका पर वैठती हुई) जो ठाकुर को ग्रहण करना है---- : (विरक्त भाव से) इस समय आहार की--- तो इच्छा है---- और न ही श्री माँ -- आवश्यकता।

(111) : किन्तु, माँ का अभीष्ट तो पूरा करना ही होगा, ठाकुर ! (उठकर) काली ! जरा सहारा लगा तो.... (ठाकुर कुछ कहते, इससे पूर्व ही नरेन्द्र और कालीप्रसाद ने मिलकर उन्हें दीवार के सहारे तकिया लगाकर बैठा कर दिया।) (हाथ बढ़ाकर) लाइए, माँ ! श्री माँ : नहीं, पुत्र । (ठाकुर की ओर भावुक दृष्टि से निहारकर) पूजा तो भक्त को---- अपने ही हाथों से करनी होती है न ? नरेन्द्र : (ठाकुर के पास से हटते हुए) ये तो मैं भूल हो गया था, माँ । (रूककर) सर्वमंगला देवी के आपके ये निराहार व्रत---- कब तक चलेंगे' श्री माँ : (दृष्टि झुकाए) जब तक ठाकुर स्वस्थ नहीं हो जाते---- (व्यथा-भीगी निश्वास के साथ श्री माँ कुछ आगे सरककर दलिया-मिश्रित दूध वाले पात्र को ठाकुर के मुँह से लगा धीरे-धीरे पिलाने का प्रयास करती है, पर ठाकुर कण्ठ-पोड़ा के कारण दूध निगल नही पाते तथा एक खरखराहट की ध्वनि के साथ छटपटा उठते है। मुँह से बाहर बह निकला दलिया-मिश्रित दूध ठाकुर के वस्त्रों पर फैल जाता है, साथ ही रक्त के लाल रेशे भी दीख पड़ते है।) नरेन्द्र : (चिन्तित स्वर में) इतने औषधि सेवन के बाद भी ठाकुर का आन्तरिक रक्तसाव क्यों नही रुक पा रहा---- कुछ समझ नहीं पड़ता---- (इस बार श्री मों एक-एक चम्मच ठाकुर के मुँह में उडेलना चाहती है, पर वह भी बाहर निकलने लगता है। बेहाल ठाकुर निषेध भाव से हाथ उठा पात्र को अपने सामने से हटा देते है। मऑसी मुद्रा में श्री माँ पात्र को विवश भाव से निकटस्थ ताक में रखकर ठाकुर का मुँह व वस्त्र पौछने लगती है।) डॉक्टर महेन्द्रनाथ सरकार के साथ-साथ---- डॉक्टर तुपार मोहन भी कुछ नहीं कर पा रहे है...। (सहसा कालीप्रमाद लपककर ठाकुर के चरण पकड़ लेता है।) कालीप्रसादः (सव्यथा) गुरुदेव ! अब हमसे आपको ऐसी व्यथा देखी नही जाती । (याचना-भरे स्वर में) अब आपको... अपने लिए न सही--- हमारे लिए ही.... जगन्माता से अपने स्वास्थ्य को प्रार्थना करनी होगी---- (पीड़ा के बावजूद भी ठाकुर कालीप्रसाद की भाव-विह्वलना से गद्गद् हो उसका सिर सहलाने लगते हैं।) : (सस्नेह) जानता है---- मेरी प्रार्थना के उत्तर में जगन्माता क्या कहेंगी। कालीप्रमादः (उत्सुक दृष्टि ठाकुर की ओर पसारते हुए) क्या कहेंगी। . ..

ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर नरेन्द्र ठाकुर (112) : (मुस्कराकर) वे कहेंगी---- (मुँह बनाकर) मूर्ख ! तू खा तो रहा है भरपूर---- अपने इतने सारे शिष्यों के मुखों से ? (परिहास-मुद्रा में) तो बता---- फिर इसका क्या उत्तर दे पाऊंगा मैं ? : यदि आप इसे सच मानते है, ठाकुर ! तो फिर क्यों नहीं---- अपनी इस कण्ठपीड़ा को हम सबके बीच बार देते हैं ? : देखो, नरेन्द्र ! न देह-धर्म को कोई बाँट सकता है.... और न ही कर्मफल को। (रुककर) उसका हिसाब तो मनुष्य को स्वयं ही चुकाना पड़ता है। ये सब तो सृष्टि की एक सहज प्रक्रिया है। (ठाकुर के गले की पीड़ा फिर कसक उठती है। इस बार ठाकुर कराहते नहीं, बल्कि दांतों तले होंठ दबाकर खामोश व शान्तभाव से पीड़ा को भीतर ही भीतर सहने का सफल-विफल प्रयास करते हैं, पर उनका यह प्रयास नरेन्द्र की पैनी दृष्टि से छुप नहीं पाता1) : • अब आप और अधिक ने बोलें, ठाकुर ! कुछ देर बिल्कुल विश्राम करें---- अन्यथा कण्ठ-पीडा बढ़ जाएगी। तुम लोग आखिर---- पचभूतों के इस 'अनित्य' मिश्रण में 'ईश्वर को बाँधकर क्यों रखना चाहते हो, रे ? (थक जाने के कारण रुककर थोड़ा सॉस लेते हुए) बदलने दो पंचभूतों को अपना पुराना जर्जर रूप.... बनने दो नए-नए शरीर---- और प्रकट होने दो उन शरीरों में ईश्वर को-~-- नित नए रूपों में...- (सव्यथा) ऐसा न कहिए, ठाकुर ! आपके अभाव को तो कल्पना भी---- हमारे लिए असह्य है। : (हॉफते हुए) 'अनित्य के प्रति ये कैसा मोह, नरेन्द्र ? (सावेश) तोड़ हात इस घेरे को-... और उस 'आत्मरूप परमात्मा' में झाँकने का प्रयास कर.... जो जन-जन के भीतर विद्यमान है। : (भावुक होते हुए) ठाकुर ! (भावमुग्ध दृष्टि से कक्ष का 'शून्य' एकटक भाव से निहारते हुए नरेन्द्र सहमा खो जाता है अपने आप में। प्रकाश का एक विशाल पुंज जमे 'भक्क' मा उसके भीतर फुटकर बिखर जाता है। अन्तर्चेतना जैसे उस विखरे प्रकाश मे एकमेक होने लगती है। उसो के माय नोन्द्र को अपना अस्तित्व भीतर ही भीतर गहरे में घुसता हुआ प्रतीत होता है। घबराकर वह टाकुर को पुकारना चाहता है, पर मुख मे आवाज नहीं निकलती, आंखें खोलकर इधर-उधर देखना चाहता है पा आग्न नहीं खुलती- यहां तक कि शरीर भी हिलडुल नहीं पाता। कुछ ही क्षणों में वह मा अनुपा करने लगता है जैसे ग्रह है। नरेन्द्र .. ठाकुर नरेन्द्र (113) नही। अन्ततः वह पूरी तरह अपने को निश्चेष्ट छोड़ देता है। ठीक उसी क्षण उद्यान-भवन के उत्तरी छोर पर स्थित सर्वमंगलादेवी के मन्दिर की आरती की घण्टियाँ बज उठती हैं। बातों के बीच साँवली साँझ सघन होकर वातायन की राह कक्ष मे कब गुपचुप आ छुपी, किसी को भी इसका भान तक नही हो पाया और न ही कोई जान पाया कि नरेन्द्र भावभग्नता की किन गहराइयो में डूब-उतरा रहा है। पलभर के लिए कक्ष के भीतर का सबकुछ जैसे ठहर गया था। किन्तु, शिवानन्द के फुर्ती से उठकर दीपक जला देने के साथ ही कक्ष की लुप्त होने जा रही चेतना सहसा फिर लौट आई।) शिवानन्द : चलो, नरेन्द्र ! हमारी सामूहिक सांध्य-प्रार्थना का समय हो गया है। (पर नरेन्द्र न तो हिलाडुला और न ही बोला।) इस समय श्री माँ हैं ठाकुर के पास---- (फिर भी नरेन्द्र मे कोई प्रतिक्रिया नही हुई।) (उत्सुक स्वर मे) क्या बात है, भाई ? आज चलना नहीं है क्या ? (उसी .ओर मुड़ते हुए परिहास भाव से) अरे ! किस अखण्ड समाधि मे डूब गए भोलेनाथ (पास जा उत्सुकतापवूक कंधा पकड़ झकझोरने को ज्योही शिवानन्द हाथ आगे बढ़ाता है, नरेन्द्र को पलकमुंदी निस्पन्द मुद्रा देख घबरा कर हाथ वापिस खीच लेता है।) (चौककर) गुरुदेव ! ये नरेन्द्र को बैठे-बैठे ही क्या हो गया ? (विचारमान ठाकुर की मुंदी पलकें एक झटके से खुल जाती है।) ठाकुर (सहज भाव से) क्या हो गया,रे ? (कुछ ध्यान से नरेन्द्र का मुख देखते हुए ठाकुर पुन. पलकें बन्द कर लेते है, मानो कुछ हुआ ही न हो। अन्य सभी लोग नरेन्द्र की ओर देखने लगते है।). शिवानन्द : (घबराए भाव से) गुरुदेव । (नरेन्द्र के निस्पन्द शरीर को टटोलते हुए) इसकी देह तो एकदम ठण्डी पड़ी है.--- बर्फ-सी । ये न हिलता है--न डुलता है---- न नाड़ी का कहीं पता---- न धड़कन का । श्री माँ : (चिन्तित स्वर मे) हे जगत्तारिणी---- माँ भवानी---- (हाथ जोड़कर नेत्र मूंद लेती है।) (मन ही मन) ये अचानक ही क्या हो गया इसे ? रक्षा करना, मां । (कालीप्रसाद भी लपककर पास आ खड़ा होता है।), कालीप्रसादः' नरेन--- नरेन---- आँखें खोलो.... (व्यग्र स्वर में) डॉक्टर बाबू को खवर करूं, गुरुदेव , कहीं कोई अनहोनी---- : शिवानन्द : .

(114) ठाकुर : (नेत्र मूंदे मूदै हो) रहने दे, शिवा ! नरेन्द्र की चिन्ता छोड़ दे। कुछ नहीं होगा इसे---- (सब विस्फारित नयनों से कभी नरेन्द्र को तो कभी ठाकुर को देखते रहते हैं।) (नेत्र खोलते हुए तुम लोग... अब कुछ देर के लिए यहाँ एकान्त छोड़ दो-कालो । कालीप्रसाद : (हाथ जोड़कर) आज्ञा, गुरुदेव ! ठाकुर : सबके जाते ही तू कक्ष का द्वार बन्द कर इस पर अर्गला चढ़ा दे और बाहर खड़े रहकर इस बात का ध्यान रख--- कि कोई भी भीतर न आने : कालीप्रसादः (सविनय) जी, गुरुदेव ! (श्री माँ सहित सभी का कक्ष से प्रस्थान हो जाने के उपरान्त गुरुदेव की आज्ञानुसार कालीप्रसाद ने द्वार बन्द कर धीरे से अर्गला चढा दी। अब कक्ष में गहन निस्तव्यता के बीच मौन प्रकाश बिखेरती दीपक की शान्त-स्थिर लौ की साक्षी में ठाकुर नरेन्द्र के ठीक सामने एकदम पास फ्यासन लगाकर बैठ गए। दृष्टि अपलक भाव से नरेन्द्र के ध्यानरत मुखपण्डस पर केन्द्रित हो गई। अगले ही क्षण ठाकुर को वाणी में स्पन्दन हुआ-) : (खरखाने, किन्तु गम्भीर स्वर मे) या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता---- (नेत्र मुंदते हुए नमस्तस्यै--- नमस्तस्यै---- नमस्तस्यै नमो नमः । (कुछ क्षण मुदे रहने के उपरान्त ठाकुर के ने। फिर खुल गए और पूर्ववत् सेन पर टिक गए। नरेन्द्र की आँखें बन्द थी तथा देह बिल्कुल अचल। मुख पर पनी गम्भीरता एवं अपूर्व शान्ति विद्यमान थी। कुछ क्षणो तक अपनी पैनी दृष्टि से नरेन्द्र की मुखाकृति का अध्ययन करते रहे ठाकुर, फिर न जाने क्या सोचकर उन्होंने उसके माथे पर अपना दक्षिण हस्त रख दिया। स्पर्श के साथ ही ममाथिमा नरेन्द्र को देह तीन बार कॉपी, मानो मेघान आकाश में विद्युत् धारा कौंप-कड़क उठी हो। फिर जैसे सब कुछ शान्त हो गया।) (शान्ति को श्वास लेकर) जागो, पुत्र । तुम्हारी साधना पूर्ण हुई। (नोन्द्र हौले-से आंखें खोलता है। मुख पर अलौकिक शान्ति स्टिक रही थी उसके ।) : (दोनों हाथ जोड़ प्रपति-गुा में) में पन्य हुआ, गुरुदेव ।

(115) ठाकुर : तुम्हें शिष्यत्व प्रदान कर मैं स्वयं को भी कृतकृत्य अनुभव कर रहा हूँ, नरेन्द्र : (मस्तिष्क पर जोर डालते हुए) मैं सहसा 'शून्य' क्यों हो गया था, गुरुदेव ? उस क्षण मुझे ऐसा क्यों लगा---- जैसे मैं अपने आसपास बिखरे प्रकाश के उफनते महासागर में लय होकर अस्तित्वहीन होता जा रहा हूँ। ठाकुर : यही तो 'निर्विकल्प समाधि' है, पुत्र !---- जो साधना का अन्तिम सोपान होती है, जिसमें ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के बीच लेशमात्र भी अन्तर नहीं रह जाता। इस त्रयों का अभेदत्व ही 'निर्विकल्प समाधि' है। (भावुक स्वर में) मुझे प्रसन्नता है कि इसे सफलतापूर्वक पूर्ण करने वाले तुम मेरे पहले शिष्य हो। नरेन्द्र (भावुक स्वर में) गुरुदेव ! ठाकुर : मैंने तो प्रथम दिन ही तुम्हारी मुखाकृति से जान लिया था कि तुम दैवी शक्ति के अंश हो। तुम्हारे भीतर विवेक को सात्विक ज्योति अहर्निश प्रकाशमान है। (रुककर) आज नरेन्द्र का---- विवेकानन्द के रूप में पुनर्जन्म हुआ है। (भावुक स्वर मे) विवेकानन्द बनकर जीवन और जगत ' के अन्येरे कोनों को नई चेतना, नया प्रकाश प्रदान करो, पुत्र ! विवेकानन्द: आपका आशीर्वाद मेरा मार्गदर्शन करेगा, गुरुदेव ! (कहते हुए विवेकानन्द ने अपना माथा टिका दिया गुरु के चरणों में।) ठाकुर : (विवेकानन्द का माथा थपकाते हुए) आज मैं अपनी सम्पूर्ण साधना का फल तुम्हें सौंपकर सन्चे रूप में फकीर हो गया हूँ, पुत्र ! मुझे विश्वास' है--- तुम इसका सदुपयोग करोगे। विवेकानन्द: (माथा उठा हाथ जोड़कर रुथे कण्ठ से) गुरुदेव ! : (भावातिरेक मे विवेकानन्द के नेत्रों से दो पतली धाराएँ गुपचुप वह निकलती हैं।). ठाकुर (थके स्वर मे) आज मैं... एकदम हल्का हो गया हूँ,रे ! लगता है---- जैसे मैं हवा में उड़ रहा हूँ-~~-किसी मुक्त पक्षी की भांति-- (थके भाव से ठाकुर ठण्डी साँस लेते हैं तथा निढालभाव से तकिए पर सिर टिका अपना शरीर एकदम ढीला छोड़ देते है। विवेकानन्द ठाकुर की इस बदलती हुई दशा को देख एक बारगी घबरा जाते । । विवेकानन्द: (सव्यथा) ऐसा क्यों कहते हैं, गुरुदेव ! (बेचैन ठाकुर की छाती सहलाने लगते है।) विवेकानन्द : (मन ही मन) माँ ! मां !। मेरे ठाकुर को व्यथा को हर लो, इनकी पीड़ा नहीं देख सकता, मां ! नहीं देख सकता--- (116) (सहसा बाहर वादल गर्जना कर उठते है।) ठाकुर : (अधमुंदी पलकों और शिथिल स्वर मे) पहले दो बूंट जल पिला, पुत्र और फिर सभी को बुला ले। मेरे बिना वे दुखो हो रहे होंगे। (विवेकानन्द उठकर जलपात्र ले दो चम्मच ठाकुर के मुँह मे उंडेलते हैं जिन्हें वे बहुत कठिनाई से निगल पाते है। जलपात्र यथास्थान रख विवेकानन्द लपककर द्वार को झंझोड़ते है-) विवेकानन्द : (पुकारकर) काली---- शिवा---- दाशरथि---- शीघ्र आओ---- (तत्क्षण द्वार खोल तीनों ही भीतर आ जाते हैं।) शिवानन्द : (आशकित स्वर मे) क्या बात है.-- जल्दी कह--- ठाकुर स्वस्थ तो हैं ? विवेकानन्द : शिवा ! श्री माँ को तुरन्त लिवा ला---- (शिवानन्द उल्टे पाँवो वाहर दौड़ जाता है। काली प्रसाद दाशरथि व विवेकानन्द टाकुर को घेरकर बैठ जाते .. ठाकुर है :- गुरुदेव । श्री माँ आ ही रही हैं---- शिवा गया है उन्हें लिवाने---- काली प्रसादः गुरुदेव । कैसा जो है । दाशरथि : मैं अभी जाता हूँ---- डॉक्टर बाबू के पास.... ठाकुर रहने दे, पुत्र ! अब न डॉक्टर कुछ कर सकेगा---. न कविराज--- (रुककर) 'भवरोग' से अब तक बचा है कोई । (इस बीच शिवानन्द के पीछे पीछे श्री मा मुख पर वेहाली लिए दौड़ी चली आती है।) श्री माँ : (ठाकुर का हाथ पकड़कर पीठिका पर बैठती हुई) कैसा जी है आपका---- ठाकुर ? : (थकी मुस्कान के साथ) ठाकुर तो-- मुक्त पवन का झौंका बन गया अब । (ठाकुर की वातो और स्थिति को देख-समझ श्री माँ रुऑसी होने लगती है।) (विवेकानन्द का हाथ पकड़कर) पुत्र । तू यहाँ बैठ मेरे पास---- और 'निर्वाण षट्क' सुना---- बहुत दिन हो गए तेरे कण्ठ का गायन सुने हुए--- (विवेकानन्द भावातिरेक के कारण सयत नही हो पाता तथा गाने का प्रयास करने पर कण्ठावरोध होने लगता है।) सुना, पुत्र । मेरी प्रबल इच्छा है---- विवेकानन्द : (भोगे कण्ठ से प्रयलपूर्वक गाता हुआ-) 'न पुण्य न पाप न सौख्यं न दुखं न मंत्रो न तीर्थो न वेदान यज्ञाः। ।

(111) अहं भोजनं नैव भोज्य न भोक्ता- श्चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥' (ठाकुर सीधे लेटकर शान्त भाव से कक्ष की छत पर अपनी दृष्टि टिका देते हैं। 'न मृत्युन शंका न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्मः । न बंधु नै मित्रं गुरुनैव शिष्य- श्चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥' (बाहर बादलों की गर्जना व तेज हवा की 'साँय-सॉय' की ध्वनियाँ गहराती खामोश रात में स्पष्ट सुन पड़ती है।) 'अह निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वन्द्रियाणाम् । न चासं गतं नैव मुक्तिन मेय- श्चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।' (भावमग्न विवेकानन्द के मुंह से 'शिवोऽहं---शिवोऽह' का निरन्तर उच्चारण होता रहा और ठाकुर के शान्त मुखमण्डल पर टिकी उनकी अपलक आँखो से दो धाराएँ बहती रही। इस बीच ठाकुर के देह-रोम कब खड़े हो गए और दोनों पुतलियाँ नासिकान पर कब केन्द्रित हो गई, व्यथा और बेसुधि में कोई नही जान पाया। सहसा श्री माँ को कुछ आभास हुआ। उन्होंने ध्यान से ठाकुर को देखा- देखती रही कुछ देर और अचानक एक जोरदार चीत्कार किया उन्होंने .) (करुण चीत्कार के साथ) 'ओ---- माँss5---- यह क्या किया तूने ? (और बिलखती हुई पछाट खाकर ठाकुर की देह पर जा गिरी। विवेकानन्द का 'शिवोऽह' जाप एक झटके से रुक गया। सभी के कलेजे काँप उठे। बाहर आकाश में बिजलियों को कड़क चमक प्रारम्भ हो गई तथा भीतर आसमान फाड़कर धारासार वर्षा इस सबके बीच हत्प्रभ-भाव से जड़ बना अवाक खड़ा था नरेन्द्र अर्थात् विवेकानन्द। ठीक वैसे ही जैसे तूफानी लहरो और तेज हवाओं के बीच हिचकोले खातो कोई नौका हो।) . श्री माँ (118) अंक तीन दृश्य .. स्थान काशीपुर का उद्यान-भवन प्रात.काल समय (लोगों को निरन्तर आवाजाही, ज्ञान-गम्भीर तकों की शाली- उठापटकियों, गरमागरम आध्यात्मिक चर्चाओं एवं बौद्धिक हास-परिहास को हलचलों के स्थान पर गहरे विषाद कचोट भरे सन्नाटे . तथा एक अागीय रिक्तता को पीड़ा में आकण्ठ डूबा काशीपुर के उद्यान-भवन का चप्पा-चप्पा । एक ओर किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से स्तव्य खड़ा माँ सर्वमंगला का मन्दिर तथा उस पर यंत्रचालित-सी फहराती ध्वजा। सघन हरीतिमा का पता-पत्ता जैसे ठाकुर को तलाश रहा था। गंगा भी उदास उदास बह रही थी। न लहरो में कही चपलता दीख पड़ रही थी, न जलपॅखियो में। ठाकुर के अप्रत्याशित रूप से चले जाने से सहसा भीतर ही भीतर बुझ गया विवेक किनारे से कुछ हटकर अग्नि जला सूखी घास की आहुतियों पर आहुतियाँ दिए जा रहा था पागलो की भाँति - सिर मुंडाए, भगवा पहने। गंगा से नहाकर निकले शिवानन्द व कालीप्रसाद कुछ क्षण आश्चर्यभाव से उसका पागलपन देखते रहे-देखते रहे, पर अधिक देर अपने को चुप न रख सके-) शिवानन्द : ये क्या कर रहा है तू---- नरेन्द्र । विवेकानन्द : (दृष्टि उठाकर) नरेन्द्र नहीं---- विवेक कह---- विवेक । (रुककर) ठाकुर ने---- इसी रूप में पुनर्जन्म प्रदान किया है मुझे---- (और दृष्टि झुका फिर सूखी घास अग्नि में डालने लगता है।) कालीप्रसादः अब तक कितनी घास--- अग्नि में स्वाहा कर चुका है तू---- इसका कुछ हिसाब है तुझे? :

(119) शिवानन्द : प्रकृति तो हमारा जीवन है,रे ! उसके प्रति ऐसी निर्दयता-... क्या शोभा देती है तुझे? विवेकानन्द : (अग्नि में घास डालने का क्रम जारी रखते हुए) यह कोरी 'पास' नहीं है, शिवा । शिवानन्द : (चौककर) तो फिर ? विवेकानन्द : (फोकी मुस्कान के साथ) ये तो मेरे भीतर का बचा-खुचा---- अटका रह गया 'संसार' है। (एक लम्बी साँस लेते हुए अग्नि में सूखी घास डालता रहता है बिना .. रुके।) शिवानन्द : .. है । .. पर क्या---- 'संन्यासी को इतनी कठोरता उचित है ? विवेकानन्द : 'कामना' के 'वृक्ष' को 'अनासक्ति' के 'कुठार' से काटे बिना---- कैसे छूटेगा 'संसार--- जो मनुष्य के भीतर तक अपनी जड़ें फँसाए रहता शिवानन्द : (एक क्षण सोचते हुए) कही इस 'कुठार' के प्रहार में तूने---- जल्दबाजी तो नहीं कर डाली, विवेक ? विवेकानन्द : नहीं, शिवा ! (रुककर) ठाकुर ने मुझसे वचन लिया था कि उनके जीवित रहते मैं संसार-त्याग नहीं करूंगा। (लम्बी साँस लेते हुए) तदनुसार अब मेरे संन्यास का समय आ गया---- कालीप्रसादः पर पीछे---- तेरे घर-परिवार का क्या होगा, विवेकानन्द : माँ और भाई नानी के पास रहने चले गए है--- और घर का मुकदमा . . बैरिस्टर बनर्जी पूरी रुवि के साथ देख रहे हैं। वे मेरे दूर के रिश्ते में मामा लगते है। (रुककर) और यों भी---- मैं इस सबसे बहुत दूर चला आया हूँ। तिस पर अब तो. परिव्राजक मनकर अपने हाथों---- अपना ही श्राद्ध और पिण्डदान कर चुका हूँ। (भावमग्न स्वर में) आज से मेरी कोई जाति नहीं, कोई गोत्र । अब मैं सब प्रकार के सामाजिक विधि-निषेधों से शिवानन्द : किन्तु---. अभी तुम ठाकुर के दायित्वों से कहाँ मुक्त हुए हो । (विवेक उठकर गम्भीर भाव से इधर-उधर टहलने लगता है।) इस समय हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न है---- इस उद्यान-भवन का। विवेकानन्द : (गम्भीर मुद्रा मे) सचमुच यह बहुत जटिल प्रश्न है। (सोचते हुए) उद्यान-भवन को आगे भी किराए पर रखा जाए---- या खाली कर दिया जाए " कठिनाई यह है कि खाली करने पर श्री मां को कहाँ रखा जाएगा ? (रुककर) और यदि खाली न करें तो इसके किराए और यहां रहने वालों के खर्च का क्या हो ? रामदादा का कहना है--- उद्यान-भवन को खाली कर श्री मां को कुछ समय के लिए छोटे भवन में स्थानान्तरित कर दिया जाए तथा ठाकुर में अस्थिकलश एवं उनके स्मृतिचिह्न उन्हें दे दिए जाएं-- जिन्हें मुक्त हो चुका हूँ। शिवानन्द :

.. (120) कांकुड़गाछी में अपनी भूमि पर ठाकुर का स्मारक बनाकर सुरक्षित रखेंगे। कालीप्रसादः श्री मां अभी स्वयं ही निश्चय नहीं कर पा रही है कि वे कहाँ रहेंगी? (रुककर) कभी वे वृन्दावन जाने को कहती हैं---- तो कभी वापिस कामारपुकुर लौट जाने की इच्छा प्रकट करती हैं। विवेकानन्द : निर्णय---- श्री माँ की इच्छानुसार ही होना चाहिए। (अचानक कुछ सोच चौकते हुए) चलो---- चलते हैं। अब अधिक समय नहीं रह गया है मेरे पास। (उद्यान-भवन की ओर चल देता है।) शिवानन्द : (चौककर) किस समय की बात कह रहा है तू ? (विवेक न उत्तर देता है-न रुकता है। यह देख शिवानन्द और कालीप्रसाद भी विवशभाव से उसके पीछे-पीछे चल देते है। । कुछ ही क्षणों में वे तीनों सीढ़ियाँ पारकर उद्यान-भवन की परी मंजिल वाले श्री माँ के कक्ष के पास पहुंच कर बाहर ही रुक जाते है। श्री मों की व्यथा की कल्पनामात्र से ही विचलित हुए वे तुरन्त ही भीतर जाने का साहस नही जुटा पाते तथा सहमी दृष्टि लिए द्वार की आड़ से भीतर झाँकते हैं। भीतर गहन निस्तब्धता के बीच दीवार से पीट टिकाए वातायन बाहर के शून्य में डूब-उतरा रही भावोद्वेलित श्री माँ ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो सहसा जड़ से उखाड़कर किसी जनशून्य मार्ग पर क्रूरतापूर्वक फैक दी गई कोई निरोह निरुपाय एव कुम्हलाई लतिका हा। सामने श्री माँ द्वारा उतारकर रख दिया गया अपना कण्ठहार तथा पास ही निर्दयतापूर्वक फाड़कर एक और पटक दिया गया उनकी साड़ी का लाल चौड़ा किनारा देखकर तो विवेक का कलेजा ही जैसे मुँह को आने लगा। कुछ क्षण दुविधा के बीच असहायभाव से झूलते रहने के बाद अन्तत. जैसे-तैसे साहस जुटा विवेक भीतर प्रविष्ट हुआ। पीछे-पीछे ही शिवानन्द और काली प्रसाद भो। श्री माँ को उनके आगमन का आभास तक नहीं हो पाया। विवेक को पुनः कुछ साहस जुटाना पड़ा) विवेकानन्दः (दोनों हाथ जोड़कर सहमे स्वर में) प्रणाम, माँ । (चाळकर श्री पां ने अपना आँसू-भीगा मुखड़ा उठाया तो देखकर पक्क रह गई-भगवा वस्त्रों में सन्यामी बना नरेन्द्र । मिर मुंडा हुआ (121) .. भव्य पाल, 'दप् दम्' करता हुआ तेजस्वी मुखमण्डल, मानो ठाकुर की सम्पूर्ण दिव्यता को धारण कर दिव्य लोक से धरती पर उतरा कोई तेजपुंज हो।) श्री माँ : (कातर स्वर में) यह क्या किया तूने, पुत्र ? विवेकानन्द : (गम्भीर भाव से) मुझे ठाकुर की इच्छा पूरी करनी है, माँ ! उनका सन्देश.... उनको शिक्षाएं-... जन-जन तक प्रसारित-प्रचारित करनी हैं। श्री माँ : (चौककर) निर्णय करने से पूर्व तूने ये भी सोचा---- पीछे क्या होगा? विवेकानन्द : यहाँ आपके पुत्रों को कोई कमी थोड़े ही है, माँ ? (रुककर) गिरीश घोप है, दाशरथि सान्याल है, हृदय है, सुरेन्द्रनाथ मित्र है---- और (पीछे की ओर सकेत कर) शिवा और काली हैं---- (शिवानन्द और कालीप्रसाद विवेक के पीछे से आगे आ श्री माँ को प्रणाम करते है। ये लोग देखेंगे सब । (रुककर) ठाकुर के स्मारक के लिए गंगा किनारे बड़नगर में मित्र महाशय ने अपने व्यय से एक भवन ले लिया है। वहीं होगा हमारा पहला मठ। श्री माँ बैठोगे नहीं, पुत्र (विनयभाव से विवेक श्री मों के पास ही भूमि पर बैठता है। उसके पास ही शिवानन्द और कालीप्रसाद भी) मैं कुछ दिन कामारपुकुर जाना चाहती हूँ, पुत्र ! विवेकानन्द : वहाँ आपका अव कौन रह गया है, माँ ? जो---- श्री माँ : (भावुक स्वर मे) क्या---- ठाकुर नहीं होंगे वहाँ मेरे पास मेरी स्मृतियों में । (नरेन्द्र की आँखों मे तरलता चमक आती है।) विवेकानन्द : (भावुक स्वर में) .वे कहाँ नही हैं, माँ ? (इधर उधर दृष्टि डालते हुए) यहाँ---- वहाँ सर्वत्र हम सभी के रोम-रोम में समाकर---- एक से अनेक हो गए हैं ठाकुर---- "एकोअह बहुस्याम'। (पलभर के लिए भावातिरेक के कारण सहसा चुप्पो छा जाती है। आप चिन्ता न करें, माँ ! आपको कामारपुकुर पहुंचाने की सारी व्या जाएगी । (रुककर) हृदय आपके साथ जाएगा---- रेल से---- श्री माँ - पर मैं रेल से नहीं जाऊंगी, पुत्र । विवेकानन्द : (चौककर) सो क्यों ? श्री मों यह मेरी तपस्या-यात्रा है, पुत्र ! अत. पैदल ही जा। कष्ट क्यों न उठाने पड़ें मुझे । (रुककर) तिस, में पैदल ही यात्रा करेंगे-- तो भला में कैसे रेल ---- .. : ..

(124) (पलभर मान हो जाता है।) 'सर्व मंगल मांगल्ये शिवे । सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्रयम्बके गौरि ! नारायणि नमोस्तुते ॥' (धीरे-धीरे पलक खोल अत्यन्त शान्त भाव से करबद्ध विवेक खड़ा होता है।) श्री माँ : पुत्र ! जाने से पूर्व अपनी मां से नहीं मिलोगे ? विवेकानन्द : (दोनों हाथ जोड़े हुए आप हैं तो मेरी मां । जगन्माता का निवास आपके भीतर। ऐसे में अब किस माता की आवश्यकता रह गई है मुझे। (कहते हुए अपनी भावाश्रुपूरित दृष्टि को विनयभाव से श्री माँ की अ पसार देता है विवेक किसी भिखारी की झोली के समान) श्री माँ के नेत्र छलछला आते हैं।) श्री माँ : (आशीर्वाद-मुद्रा में हाथ उठाए) जाओ, पुत्र ! मंगलमय हो तुम्हा मार्ग---- (करबद्ध भाव से पुन. श्री माँ को प्रणाम कर अकेले और नामही अनजान पथिक के समान भारत की विशालता में खो जाने के लि धीमे-धीमे चल दिया वह 'ज्योतिपुरुष'। मानो कोई पक्षी मुक्त भाव । पंख फैलाए अनन्त नीलाकाश में उड़ चला हो। श्री माँ आशीर्वाद-मुद्रा में उठं हाथ के साथ साधु नयनों से उसे जा हुए निहारती रही---निहारती रही तब तक, जब तक कि वह नेत्रों रे ओझल नही हो गया।)

(125) (ब) शरारती (द) तार्किक महत्वपूर्ण प्रश्न वस्तुनिष्ठ (बहुविकल्पीय) प्रश्न 1. पोशी बूआ द्वारा नरेन्द्र को 'बोडू' कहा जाना किस भाव का द्योतक है ? (अ) बुद्धूपन (स) मंद बुद्धि (य) चतुर 2. माँ भुवनेश्वरी ने बालक नरेन्द्र के 'केलाबाड़ी' जाने से क्यों रोका , () नरेन्द्र की परीक्षा निकट थी। (ब) यह स्थान बहुत दूर घने जंगल में था। (स) वहाँ भूत का निवास था। (द) क्योंकि वह डाकुओं का ठिकाना था। 3. भुवनेश्वरी नियमित रूप से सोमवार का व्रत तथा प्रतिवर्ष काशी के वीरेश्वर मन्दिर में अनुष्ठान क्यों करवाती थी ? (अ) परिवार की सुख-समृद्धि के लिए। (व) नरेन्द्र को 'संन्यासी' बनने से रोकने हेतु । । (स) पति के दीर्घ व सुखी जीवनी की कामनापूर्ति के लिए। . (द) वंश-परम्परा के पालनार्थ । ठाकुर से नरेन्द्र की प्रथम भेंट कहाँ हुई ? (अ) केशवचन्द्र सेन के यहाँ । (ब) दक्षिणेश्वर मन्दिर में। (स) सुरेन्द्रनाथ मित्र के घर पर। (द) ब्रह्मसमाज के समारोह में । 5. 'परिव्राजक' बनकर विवेकानन्द ने अपने ही हाथों अपना क्या किया ? (अ) घर-परिवार का त्याग। (ब) नौकरी का त्याग। (स) सासारिक कामनाओ का त्याग। (द) श्राद्ध और पिण्डदान। लघूत्तरात्मक प्रश्न - “किन्तु, इतना बड़ा मत हो जाना, बेटे । कि तेरे लिए दुलारने को उठे मेरे हाथ तुझ तक पहुँच ही न पाएँ।" नरेन्द्र के प्रति भुवनेश्वरी के इस कथन में कौनसी आशंका । 4 6 11 (126) 7. महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने 'परमतत्व' को पाने का कौनसा मार्ग नरेन्द्र को सुझाया था ? 8. नरेन्द्र ने माँ भुवनेश्वरी तथा पीशी बूआ को जो वचन दिया था, उसका क्या तात्प था । 9. नरेन्द्र ने अपनी बहिन किरण के द्वारा भोजन परोसने की बात का क्यों विरोध किया ? 10 ठाकुर के यहाँ स्त्रियों के लिए प्रणाम का निषेध क्यों था , ठाकुर ने नरेन्द्र से क्या वचन लिया था ? 12. 'अब तक कहाँ थे, बबुआ ? हमने तो पूरा कलकत्ता ही छान मारा तुम्हारे लिए। मुंशीजी ने नरेन्द्र को ऐसा क्यों कहा ? 13. “मुझे आश्चर्य है, माँ । इस घर में रहते हुए भी मैं यह सब क्यों नहीं देख-ममा पाया ?" इस कथन के आधार पर बतलाइए कि नरेन्द्र क्या नहीं समझ पाया । 14. नरेन्द्र ने जगन्माता से क्या 'दुर्लभ' मांगा ? 15. प्रतापचन्द्र हाजरा ठाकुर को किस बात पर कुपित हुआ ? 16. नरेन्द्र ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के स्कूल की नौकरी क्यों छोड़ दी । 17. नरेन्द्र ने स्वयं को 'जन्म-जन्म का भूखा' क्यों कहा ' 18. श्री माँ ने ठाकुर की मृत्यु से उत्पन्न कामारपुकुर जाने के लिए रेल से यात्रा करना क्यों अस्वीकार कर दिया। अति लघूत्तरात्मक प्रश्न 19. अर्थ स्पष्ट कीजिए - भावसमाधि, परमहस, प्रकारान्तर, मरीचिका का सत्य, अस्ति, वाक्पटु, निर्विकल्प समाधि, त्रिविध बयार,पंचभूत, परिव्राजक 20. अन्तर समझाइए - कृतज्ञ-कृतघ्न, विधि-निषेध, अस्ति-नास्ति, प्रसारित प्रवारित, नित्य-अनित्य 21. निम्नाकित शब्दों में उपसर्ग व प्रत्यय बतलाइए - स्वप्नवत, चमतकारिक, अबूझ, यथावत्, सविनय, अनित्य, 22. ठाकुर किस रोग से मम्त थे। 23. ठाकुर ने नियति की लीला' और 'देह का धर्म' किसे कहा है ? 24, ठाकुर के निधन के उपरान्त काशीपुर के उद्यान-भवन में नदी-तट पर बैठा नरेन्द्र "सूखी घास' को अग्नि में क्यों जला रहा था। 25. 'पेट में दाढी का आशय समझाइए पुरु. किसे कहा गया है । क्यों ?

(127) 27. 'ज्योतिपुरुष' नाटक का संक्षिप्त कथासार लिखते हुए उसके कथा-संयोजन की समीक्षा कीजिए। 28. "ज्योतिपुरुष की कथा मानवता, प्रेम, करुणा, सहजता, समानता व कोमल संवेदना को अपने में समेटते हुए सहज ही अपने गंतव्य तक पहुंच गई है", क्या आप इस कथन से सहमत है ? 29. 'ज्योतिपुरुष' नाटक के विविध प्रसंगों में किस प्रसग ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया और क्यों ? 30. “ज्योतिपुरुष के कथा-संयोजन में रचनाकार ने 'कल्पना' की उड़ान के बीच भी 'सत्य' की रक्षा करने में पूर्णतः सफल रहा है", क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? सकारण विवेचन कीजिए। 31. "ज्योतिपुरुष' नाटक संघर्षों की तेज आग में तपकर निखरे व्यक्तित्व की कीर्तिकथा है।" इस कथन के सन्दर्भ में कथानायक नरेन्द्र की चारित्रिक विशेषताओं की चर्चा कीजिए। 32. नाटक को रोचक और जीवन्त बनाने में 'संघर्ष-योजना' के महत्व की चर्चा करते हुए बतलाइए कि 'ज्योतिपुरुष' नाटक में आन्तरिक और बाह्य सघर्षों का संयोजन कहाँ-कहाँ किस-किस रूप में हुआ है ? 33. 'ज्योतिपुरुष' नाटक में किस चरित्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया ? क्यों ? 34. निम्नांकित चरित्रों की विशेषताएँ लिखिए (अ) बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त (स) मुंशीजी (द) मिस्टर हेस्टी (य) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर (O भुवनेश्वरी (ल) पीशी बूआ (व) श्री माँ 35. शीर्षक की सार्थकता को दृष्टि से 'ज्योतिपुरुष' शीर्षक पर विचार करते हुये बतलाइये कि क्या यह नाटक के उद्देश्य को इगित करता है ? 36. 'ज्योतिपुरुष' नाटक को मूल संवेदना को स्पष्ट करते हुये उसके रचनागत उद्देश्य पर प्रकाश डालिए। 37. भावार्थ लिखते हुए बतलाइये कि यह कथन किसने, किस प्रसंग में किससे कहा है ? (अ) बाह्य दृष्टिवाले मात्र उस "भिन्नता' को ही देखते हैं, इसीलिए उन्हें हर धर्म, हर सस्कृति अलग प्रतीत होती है। ऐसे में बुद्धि भी तो यह नही सोच पाती कि भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार में भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकसित टहनियों का आधार बोजरूप बिन्दु तो एक ही है। (ब) इतिहास उठाकर देखो तो पाओगे कि विकास की गति सदैव ‘एकरूपता' से 'बहुरूपता' को ओर ही रही है। एक 'भावात्मक अन्तर्धारा' बहुरूपीय स्थिति में भी उसे परस्पर जोड़े रहती है। (ब) ठाकुर " (128) (स) 'कामना' के वृक्ष को 'अनामक्ति के कुठार से काटे बिना कैसे छूटेगा 'संमार के मनुष्य के भीतर तक अपना सिर धंसाए रहता है। (द) वो तो दिखने को तैयार बैठा है हर समय हर स्थान पर, किन्तु उसके लिए 'दृष्टि' भी तो वैसी ही होनी चाहिए और फिर होने के लिए क्या "दीखना आवश्यक (य) ऐसी 'दुविधा' तब आती है, नरेन्द्र ! जब हमारी चेतना 'वस्तु-सत्ता' की सीमाओं में अटककर रह जाती है और उसमें निहित 'भाव' तन्व की अनुभूति नहीं कर पाती। सम्भवत: इसीलिए तुम उस तक पहुंच नही पा रहे हो। 38. "माँ के दूध पर पहला अधिकार तो सन्तान का ही होता है न, श्यामा ?" भुवनेश्वरी के इस कथन से उसके चरित्र को कौनमी विशेषता परिलक्षित होती है ? 39. 'अन्याय तो इसमें है, जमना। मगर ये मव (लम्बी साँस लेती हुई) अब स्त्री की नियति ही बन गया है।” पीशी बुआ के इस कथन से तत्कालीन समाज को किस समस्या का संकेत मिलता है । 40 'ज्योतिपुरुष' नाटक की संवाद-योजना के सम्बन्ध में अपना अभिमन प्रकट कीजिए। 41, “ज्योतिपुरुष' नाटक की पा सरल एव सूक्तिमयो होन के साथ ही साथ भावानुकूल भी है", इस कथन के सन्दर्भ में नाटक की भाषागत विशेषताएँ बतलाइए। 42. यदि आपको अभिनय करना पड़े तो आप 'ज्योतिपुरुष' नाटक के किस चरित्र की भूमिका निभाना पसन्द करेंगे ? क्यों ? 43 'ज्योतिपुरुष' नाटक की शैली एवं शिल्पगत विशेषताओं का विवेचन कीजिए। 41. "ज्योतिपुरुष' नाटक में तात्विक दृष्टि से रचनाकार का ध्यान किम बिन्दु पर अधिक रहा 45. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् हिन्दी के नाटक साहित्य की प्रगति, स्वरूप एव सम्भावनाओं पर प्रकाश डालिए।

Jyoti Purush

Author
Dr. Satendra Parik
Title
Jyoti Purush
File name
Jyoti Purush
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/03
Publisher
Maya Prakashan Mandir Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
149
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550987
Barcode
4990010031772.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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