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Hamare Parv Aur Tayohar
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हमारे पर्व और त्यौहार
(सामाजिर प्रतिवेशो द्वारा समवायी ज्ञान)
चौ० हरिहर मिह एम० ए०, यो० टी० (धनारग)
मो० टी० (सेवाग्राम) एR० टी० (टेनमार)
सन्मार्ग प्रकाशन-दिल्ल.
प्रथम सस्करण
1066
प्रकाय समाग प्रकाशन १६ पू० बी०
चगलो रोड गिन्नी
मूल्य सात रपये पचाम पस
रमन प्रस पटना
दो शब्द आज का मानव चाद एव अर ग्रहा पर पहुंचन की कल्पना को चरितार्थ करने लिम प्रयत्नशील है। उसने अपने मस्तिष वा इतना विकाम कर लिया है कि चाद पर पहुँचना पर कुछ वर्षों की ही वान रह गयी है। लेकिन मानवता को जीवित पने लिए मस्तिष्क के साथ माय हृदय का भी समुचित शिराम पावायर जो मनुष्य का मस्तिप्प इतना विकसित हुप्रा है हृदय सचित होता जा रहा है प्राजक तथापथित शिक्षित मनुष्य को अपना नयारथिन अपद का हृदय अधिर विमिन है। उसम मरसता, वाणा अनिधि मवा एवं परापमार की भावना पोलिय की अपक्षा अधिक है। विचारया मे अपेक्षा की जाती है कि वे बच्चा व ममुचित विराम की मार ध्यान देगे वो मस्तिष्क के विकास अनेक माधन बहा उपरार हैं। उनक गरीर के विकास व लिए भी व्यायाम एव घेल कूद का प्रब ध रहता है परतु उनका मनुष्य यनान बाल हृदय में शिकाम का साधन म्फूला म पर्याप्त मात्रा म नहीं देगा मनुष्य परदय व विधाम क लिय ममाज मेवा ईर ममपण तथा माहिर और गगीत प्रादि बनाया का उपासना और मम्याग एक मात्र साधन है। मैंन दसा है। विद्यालया म मापुग्पा को जयन्तिया और पव त्योहार मनाये जान है पर म तरह नहीं मना जान जिसम बच्चा बा विवराम हा दिन पर त्योहारा य दिन रिचालय बदर दिया जाता है और समझ लिया जाता है कि हमने पद स्पोर मान लिय। जयली पौर पद त्योहार ता एक माधन है जिन भवनग पर हम पीछे घूम पर दमन मोर भाग गान रिय माग वितारन परत। जयानी द्वारा हम महापुरपार मा जीवनी से प्रेरणा ग्रहण कर मपन जीवन का उन्नत मनात हैं। इस प्रकार पौहार से भी पनका हिण बरत है धौर गमाज में अपना मार स्थापित पर समाज की कुरीतिया को दूर भरने का प्रपन परत है और अपना परि माजन भी बरते हैं। यदिएमा पर मरते है तो हम यह कह मरत है कि हमने अपन fearrयो म गमुचित उग से पद स्पौहार मनाया। युनियादी विचारया मनाना तीन मापन है । गमात्र, रनि प्रौर उसोग। पक्षिरम पा जाप मान या मुल्य मापन गमाजही है। प्रति घोर उग पागम ममाव सरना है और मानिए PM है कि दुनिया fTAT मगाज पे द्वारा, गमाज के लिय समाज को दी जाता है। समाज में हम को जाना और समाज म ही मरना है । समाज में बाहर रह कर मनुष्य देवता बन जाय तो बन जाय पर मनुष्य नहीं बन सकता । प्राजक्ल भारत का ममाज अम्त यस्त अवस्था में है। भारत म समाज एप व्यक्ति को अलग अलग नप्टिकोण से दया जाता है फलस्वरूप क्षेत्र विशेष म यक्ति विशेष ता इतना आग बढ़ जाता है कि वह मसार का अद्वितीय महापुम्प या जाता है तक्नि वह समाज का अपने साथ खीच नहीं सकता। समाज जहा का तहा रह जाता है । इस कमी को दूर करने के लिये समुचित नान देने की यवस्था विद्यालयो म होनी चाहिय तायि नय समाज का निर्माण हा सके । इमोतिये इस पुस्तक का रचना की गई । इस पुस्तक म ममाज म मनाय जान याले पव और त्यौहारो वा स्कूला में मनाये जाने का ढग बतलाया गया है। मैं मम भता हू गिक्षर यनि इमम उल्लिखित ढग से नये समाज की रचना का दप्पिोण म रचन ए ममाT से सम्पर स्थापित करें ता इन पव त्योहारा से बच्चा का समुचित विवाग हागा और तब जाति निंग रग धम और भूगोल की दिवारें ढहगी और मनुप्य, मनुष्य नगा । इम उपदेश का लेकर इस पुस्तक की रचना की गई है। माता है इमग वाछित पत्र मिलेगा। (चौधरी हरिहर मिह) जिला शिक्षा पदाधिकारी महरसा विषय-सूची * पृष्ठ सख्या ७१४ १५२१ २२२५ २६-२८ २९३२ -मसंध्या (१) बुनियादी तालीम और मुक्ति (२) बुनियादी शिक्षा म समवाय (३) बुनियादी शिक्षा म स्वावलम्बन का स्थान (४) नई तालिम म सामाजिक प्रतिवेग मा स्थान (५) समान मे पर्वो का स्थान (६) सस्था में पर्व किस प्रकार मनाना चाहिए (७) पर्वो का विभाजन (6) नव पव (९) २३ जनवरी-सुभाष जयन्ती (१०) २६ जनवरी (११) २८ जनवरी-लाला लाजपत राय जयन्ती (१२) ३० जनवरी-गांधी पुण्य तिथि (१३) २ फरवरी-मोतीलाल पुण्य तिथि (१४) ११ फरवरी-जमनालाल बजाज पुष्य निधि (१५) १२ परवरी-सर्वोग्य दिवस (१६) १३ फरवरी-सरोजिनी नायडू जम तिथि (१७) १८ फरवरी-रामकृष्ण परमहस जयन्ती (१८) १९ फरवरी-गोपासाष्ण गोरार पुष्प विपि ३३३५ ३६-३७ ३८४१ ४२४७ ५२५५ ६२६५ ६८७० ७१-७३ -- जम यस्या पृष्ठ संख्या ७४७६ ७७७९ ८०८२ ८३८७ ८८९२ १०४ १०७ १०८११२ ११३ ११७ ११८ १२१ १२२ १२४ २२८१२७ (१९) २२ फरवरी-उस्तूरवा पुण्य तिथि (२०) १२ माच-डण्डी कूच दिवस (२१) १३ जल--जालियावाला बाग हत्याकाण्ड (२२) २३ अप्रैल-मा कुअर सिंह (२) ७ मइ-~रवादनाथ टगार (१) १० मई-प्रथम स्वाधीनता संग्राम दिवस (२५) १ जून-दाना भाई नौरोजी पुण्य तिथि (२६) १५ जून-गबघु चितरजन दास पुण्य तिथि (२७) १८ जून-महागनी लक्ष्मा गाई (२८) २३ जुलाई-तिलक जय ती (२९) ९ अगस्त- भारत छोडो आ दालन (३०) १५ अगस्त-म्वत अता दिवस (३१) ११ सितम्बर---विनावा जय ता (३२) ३१ अक्टूबर-पटेल जयती (३३) १२ नवम्बर–महामना प० मदनमोहन मालवीय जी (३४) १४ नव वर--नहरू जयती (३५) ३ दिसम्बर---राजेन्द्र प्रसाद जयन्ती (३६) २५ दिसम्बर--ईसा मसीह जय ती (३७) चत्र शुक्ल रामनवमी (३८) चत्र शुक्ल १३--महावार जयती (३९) वैशाप गुक्ल ३-गषय तृतीया (४०) वैशाय गुक्त ३-परशुराम जयती (४१) गाव गुवन ५-महानि मूर जयन्ती (४२) वैशाख पूर्णिमा-बुद्ध जयन्नी 1४३) ज्येष्ठ वृष्ण १५~यट मावित्रा व्रत १२८१३२ १३३ १३० १३६ १४० १४१ १४५ १४६ १५० १५११५५ १५६ १५९. १६६ १६७ १६८१७८ १७११८ १८६१८८ श्रम सख्या पृष्ठ स स्या १८९-१९० १९१-१९७ १९८ -रक्षावधन १९९२०९ २१० २११-२१३ २१४२१५ २१६-२१७ २१८२२४ (४४) ज्येष्ठ गुक्ल १०-गगा दशहरा (४५) ज्येष्ठ पूर्णिमा-वीर जयन्ती (४६) श्रावण शुक्न ५-नागपचमी (४७) श्रावण शुक्ल ७-~-तुलसी जय ती (४८) श्रावण पूर्णिमा- (४९) भाद्रपद कृष्ण -कृष्णाष्टमी (५०) भाद्रपद शुक्ल ३-हरतालिका प्रत (५१) भाद्रपद शुक्ल ४-गणेश चतुर्यों (५२) भाद्रपद गुक्त पचमी-भारत दु हरिश्चन्द्र (५३) भाद्र गुस्न पचमीऋपि पचमी (५४) भाद्र गुगल १४-~-अनन्त चतुरशी (५५) आश्विन वदी जीवित पुत्रिका (५६) आस्विन कृष्ण १५-~महालया (५७) आश्विन शुक्ल १०--विजयादशमी (४८) कातिर कृष्ण ४-वर चतुर्थी (५९) वातिर अमावास्या-दीपावली (६०) कार्तिक अमावास्या-स्वामी दयान द सरस्वती निवाण (६१) कार्तिक पूर्णिमा-नानक (६२) माप मुनी पचमी-वसन्त पचमी (६३) पान कृष्ण प्रयाशी-महाशिवरात्रि (६४) पारगुन गुन १५---होलिको सव (६५) पावन की १५ तारीसदारवरात (६६) गाय गो पहती तारीग-इदुलफितर (६७) निसा को दस तारीस-ईदुल जोहा (६८) पारशाला प्रयप २२५२२६ २२७ २२८ २२९ २३० २३१ २३० २३३-२३४ २३८२३९ ૨૪૦ ૨૪. ९४६ २५४ २५५२५७ २५८२६० २६१.२६६ २६७-२७१ २७२२७४ २७५२७६ २७७-२८९
यम सख्या
पृष्ठ संख्या
२९०२९४
२९५३००
(६९) आदर्श विद्यार्थी
(७०) बादर्श शिक्षक
(७१) प्राथना
(७२) एकादशी व्रत
(७३) मुहरम
(७४) आदश विद्यालय
३०१३०५
३०६३१०
३११३१२
३१३३१४
प्रथम परिच्छेद बुनियादी नालीम और मुक्ति "सा विद्या या विमुक्तये" हमार पिया का यह उन्धोप है 'विद्या वही है जिसमे हम मुक्ति प्राप्त होता है । हमारे यहां विद्या की एक प्राचीन परम्परा थी और थी उसरी एस जपना विशपना । हम उम विद्या मानत ही न थे जिसस हम मुक्ति न मिल | हमार सार काय-कलाप इसीलिय होते थे कि हम मुक्ति मिर। मनुष्य परमात्मा का एक अश है और परमात्मा म मिल जाना ही इसकी 'क्ति है। जीवन मरण के वाया से छूट जाने को ही मुक्ति कहत हैं। "तु मुक्ति का यह सकुचित अथ हुआ या अन्तिम अथ हुआ। इम मुक्ति मत पहुंचन य लिय अनेर प्रचार के दधना मे मुक्ति प्राप्त करनी होगी। तब अन्न म आवागमन की मुक्ति स्वाभाविक और स्वत हो जायगी। अब प्रन यह है fr विद्या द्वारा मुक्ति प्राप्त करने के लिय क्या करना चाहिय और उमम नई तालीम वहाँ तर सह्याग रगी। आज हम चारा और में अनर प्रकार व वधना म जाई हुए हैं । अथ का व धन है गाय का व धन है ममाज का बधन है पम का वधन है, माया ममता और माह या वचन है और अत म है इस गरार का वधन । रावन पहा म गरार का 'न वयना से मुक्त करता है और तब आत्मा का मुफ्त परस विह अवस्था म पहुचना है। अर्थ या उपन पहला धन है और पराकसम्बन इमारी पहली सीटी और स्वावसम्बन प्रम द्वार है। नई तालीम म हम कम यो स्थान देन है। हम पहना है कि पार पम य द्वारा पान पोप्राप्ति हाना पाहिय । वम म अलग हम पन या मस्तित्व नहा मानने परन्तु इमी रम और पान ये मध्य म आधिर सारसम्बन का रहस्य छिपा हुआ है। पर लोगिय मन पम गिया, उगम पुष्पान हुमा आर सरा हमने या दिया। इस प्रार अपनत्व पाय पन रट पा और हम मुसा हो गए। यह एक एकागी मुसि । .
४ का बोझ ता वढता है कि तु मुक्ति किसी प्रकार की नहीं है प्रत्युत बधन ही बन्ना जाता है। कोरे मस्तिष्क का विकास मनुष्य को शतान बना देता है और गोपक बनाता है। कारे हृदय का विकास मनुष्य को अकमण्य और नपु सक बना देता है और वोर गरीर का विकास मनुष्य का बल बनाता है । इस प्रकार अग्रेजा द्वारा चलाई गई शिक्षा पद्धति मनुष्य का शतान और शोपक बनाती है । कि तु यूरोप मे चलने वाली शिक्षा पद्धति म शरीर और मस्तिष्क दोनों का विकास होता है और मनुष्य मनुष्य न रहकर मगीन हा जाता है । इमलिए नई तालीम म समाज मवा लाफ सवा तथा स्वस्य विनोद का स्थान दकर हृदय के विकास के लिए भी प्रयाप्त स्थान रखा है । रावण बुद्धिमान था । कहा जाता है कि उसके पाम दम व्यक्निया की बुद्धि और पराक्रम था । कि तु तार सग्रह की शक्ति ता राम म ही आई, जिहाने पथर को भी छूगर नारी बना दिया । बदरो का देवता बना दिया और इस प्रकार एक सिर और दो भुजाआ वाला राम रावण स श्रेष्ठ हा गया। हम राम राज्य लाना है और इस गणतत्र को रामनर बनाना है। इसके लिए हम सवप्रथम राम बनना हागा । और इसके लिए नई तालीम ही मिद्ध वाहन बन सकती है। पूर्णता वा प्राग्न करनी ही तो मुक्ति है। पूण म पूण का मिल जाना ही तो मुक्ति है । लार सग्रह की भावना को रख करक सारा शक्तिया वा विकास करना हा ता मुक्ति है और राम भगवान बन गय लाग सग्रह का विकास करत ही। यह देश मच्च अथ म देवता या दा हा जायगा यदि हम नइ तानीम व सक्त पर चनत हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हा। फाम के एक और पहाट वा हम रत है क्यानि वाम सन है। उसके बाद चित है और तव जान द आला है। गास्था म यहा गया है कि चित वनिया का निरोध करना ही योग है । उसर लिए बहुत में रास्त बनाये गय हैं। यम और नियमा पा रहा पती की गई है । जा साधारण मनुष्य के लिए सवथा असम्भव है। चित वत्तिया का निराध परके हम यागी बनना है। मम और नियमा का नामरण परक चिस्वत्तिया का निराध करन म हम दुवात हैं। नव प्रान यह है कि हम योगी यमे वन ग्यादि विना योगी बने हम आवागमन व व धन से मुक्त ननी हो गान । चितवृत्तिया या निराय करना ध्यान वो एवान रन का एक माग बतलाया गया है। यम बोर नियमो से ध्यान का एकाग्रीकरण होता है। परतु वह हमसे होगा नहीं क्यावि हम दुवल हैं और हैं मासारिख । वपीर ने रास्ता बतलाया प्रेम का । प्रेम के द्वारा भी ध्यान एकाग्र हो सकता है। परन्तु हमम वह भी शक्ति नहीं है पि हम प्रेम करें। ससार को ज्वाला, भूप की ज्वाला और माया-ममता की ज्वाला से हमारा प्रेम टिक्ता नहीं है और प्रेम की धार पर चलना तल वार की धार पर चलने के समान है। बड़ी समस्या है यागी बनने की कोरी महत्वावाशा है परन्तु मामन भयर बाधाएँ और भीतर भयकर दुवलताए माग विराध करती हैं। अब बतलायें वि हम योगा क्से बनें और मुक्ति से प्राप्त करें। नई तालीम हमारा सहायिका स्प मे आती है। वह कहती है रि लार कल्याण या भावना से काम करन पर, उद्याग करने पर, सवा परने पर और प्रयाम करने पर अपने आप चितवरिया का निराध होता है और मन एकाग्र हा जाता है। भगवान न भी ता वहा है- 'याग क्ममु योगलम् ।" हमने कम किया। उसम हमन नान प्राप्त किया और हो गय इस प्रकार हम विना प्रयास व योगी। क्या है इससे भी बढकर सरल माग मुक्ति का, विदह होने का और यागी बनने का? एक बात और । योग वा अथ हाना है जाडना और जोडने वार को यहते हैं यागो। ता बम और पान वा जा ममवय पर इन दोना का जाहे वही ता हुआ योगी, और इस प्ररार य याग की माधना करने वाले को ही प्राप्त होती है भौतिर तथा आध्यात्मिर मुनि । ऊपर मैंन लिया है कि मुक्ति प्राप्त करना हो शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य है और मर लिय साधन बतलाया है सचिटानाद का दान। यदि इमे इम तरह म पहें ता और स्पष्ट होगा वि मचिगन का दान वरना और मुक्ति प्राण करना दाना पर ही वस्तु है । वोर इमो लिप साधन है लोक. पल्याण की भावना म भानपूर उन्पा र बाप परना । अव हम यही पर एष यान और समाप्त एनी चाहिये रि जम-मत चित् और आनन तीना का समन्वित रूप ही मच्चिान- पहलाना है उसी प्रकार वाहु हत्य और माप्तिप तीना समन्वित रूप को हा मनुष्य रहत हैं। जिस प्रकार मनुष्य य निमी एर मगरा मनुष्य नहीं रहा । उगा प्रसार सचिनन के विमी रूपमा चिदानर नहीं रहेंगे। जिस प्रकार सत्-चिन और बानर सावत पसना पोहा गपिन पहने हैं टमी प्रकार काम पान और आनर रामयिन रूप पोहो वाम महत है। जिस प्रकार मनुप्प का दिमा- ६ जन नहीं हो सकता, उसी प्रकार हम ऐसे काम की परिकल्पना भी नहीं कर सफ्ते जिसम वेवल मानद ही हो, या केवल मान ही हो या केवल काम ही हो। हम बुनियादी शिक्षा म उस तरह के काम की कल्पना करते है जिस काम म ज्ञान और आन द का अयोयाश्रय तथा नित्य सम्बध हो। और उस प्रकार के काम मे ही हम मुक्ति मिलेगी। एक बात और दखिय । सच्चिदानद वा नाम ही बतला रहा है कि प्राथमि क्ता क्सि मिलनी चाहिए और पृष्ठभूमि क्या है । सत चित और आन द में सवप्रथम सत है और तब चित है और उसके उपरान्त जान है । सत का अथ मन काम बतलाया है और उस तरह का काम बतलाया है जिससे क्षुधा का तृप्ति हो, शरीर की भौतिक जावश्यक्ताओं की पूर्ति हा तया लाक का कल्याण हो। इस प्रभार हम देग्वत हैं कि काम की पृष्ठ भूमि पर नान का ताना-बाना बुना जा सरता है और तब सात्विक आनद की अठरोलियो जगडाई लेंगी। यही है बुनियादी शिक्षा और यही है शिभा की बुनियाद ।
द्वितीय परिच्छेद बुनियादी शिक्षा में समवाय प्रचलित TिII म इतिहास, भूगोल तथा भाषा पढान का अनक क्लाएँ नियत्री है, जिनक सहारे विद्यार्थियों के मस्तिप्र में इन विषयो की विभिन्न सूचनाएँ भरा जाती हैं। सूचना" गान नहा हैं क्यारि वे अनुभव पर वितुन आपारित नहीं है । एमी सूचए यात मात्र है । पर बुनियादी HिT पान प्राप्ति वा आधार 'काम वा मानती है एव काम' द्वारा प्राप्त भान ही सच्चा पान है। ता जिम ढग बा, अंपल्यन ग्रह्म पर मान प्राप्त हो वह समवाय पद्धति है और निगम मूचनाए प्राप्त हा वह सूचना गरह पद्धति ही यही जा मानी है। समवाय हमारी एक पुरानी पद्धति है। इसके लिये हिन्दी म काई दूसरा माद नही और अंग्रेजी में तो बिलकुल ही का दूसरा मत नहीं है। परन्तु हम अग्रेजा कोरेशन (correlation) T से समवाय या अथ निया- सते हैं जा बिलकुल गलत है । काररसन सो वस्तुआ का मम्र घता जुटना है रिलु दाना या अलग-अलग अस्तित्व भी रहता है। परतु गमवाय म बम भार मान या अन्यायाविर सम्बप हाता है । एव वे अभाव म मरे का सभाप निश्चित है, एक यी वल्पना लिए दिना दूसरे की कल्पना की ही नहीं जा साना । दाना एर होशिस के दा पहर बह जाते हैं और इसी को सम- याय बहत है। इस मैं और स्पष्ट करता हूँ। मां-बाप का सम्बध मोरात पहा नायगा मारे भाई का सम्बपवारलान बहा जायगा ! उगम दाना बा असग-अलग अस्तित्व रह्त हुप भी एर दूमर वा मह-मम्ब प यहा जा सपना है। इस प्रकार भी गमा सरत है। रनव की दो गमानालर साना या (correlation) है। वएर मरे ग सम्वपित हैं। एरर अभार मारा सप है। पातु एवं ये अभाव म दूगर को कन्पना नहीं भी ना सस्ता एमी बात नहीं है। दानास स्वतन्त्र पस्तुत हैं दाना यो मिना- पर उपहार है यह टार है परन्तु दाना मिन र एर बस्नु हा गई, उनराम्प परिवर्तित हो गरा और उनकी सगा, वचन तपा शिग मी परिपतन हा गया एक बार नहीं। इस प्रकार जहाँ दो वस्तु हा प्रभार मिल जानो सुन, वचन और लिंग म मा परिवतन हो जाप सपा ८ उनकी उपयोगिता भी ददल जाय वही समवाय प्रारभ होगा! समवाय तो शास्त्रीय शब्द है। घडा और मिट्टी म जो सम्बघ है, सूत और वस्त्र म जो सम्बध है, और घरी तथा छुरी के बट मे जो सम्बध है उसी को समवाय कह सकते हैं । चाकू मे लक्डा लगी है। कोई कहे कि यह चावू नहीं है, लकडी है तो क्या दूर पड़ी हुई लकडी से काम क्यिा जा सकता है, नहीं । यदि उसे लक्दो न कह करके केवल चाकू कहत है और उसम मे हम लकड़ी निकाल रेत है तो क्या वह चाकू का काम करेगा नही । स्पष्ट है कि एक की कल्पना दूसरे के अभाव म की नही जा सकती और उसे ही ममवायी सम्ब व कहते हैं। इस और भी स्पष्ट वसा चाहे तो इस तरह करेंगे। यूरोप के नान और काम की पद्धति कोरलेशन की पद्धति कही जा सकती है। काम का अलग अस्तित्व है नान का अलग अस्तित्व है। लडके कुछ मान प्राप्त करते है और कुछ काम भी कर लते हैं। परन्तु वे इस सिद्धान्त के कायल नहीं है कि काम द्वारा नान हो । इमलिये उनकी पद्धति कारेलेशन की पद्धति कही जायगी और हमारे काम द्वारा नान की पद्धति समवाय की पद्धति कही जायगी। 4 काम + महत्त्व को तो मानत हैं परतु वे इसके वायल नहीं हैं कि काम का सम्बध वास्तविक जीवन से हो और काम उत्पा दहा । इसलिए उनके काम और नान की पद्धति वाली शिक्षा से जीवन की शिभा नहीं प्राप्त हो सकती जर कि हमारे यहाँ उत्पादन कार्यों द्वारा जीवन की गिना मिलती है। और जो वास्तविर शिक्षा है। इसीलिये हमारी समवाय पद्धति म जीवनापयोगी उत्पादव कामा के द्वारा जीवनापयोगी शिमा दा जाता है । जो स्वावलम्बी नागरिका को पैदा करती है । समवाय द म दोग है--सम और वाय । दाना गो वा अपना अपना विरोप अथ है। जिस प्रकार मोटर म दा शक्तियां होती हैं एक गति देती है और इमरी दिगा बनलाती है उसी प्रकार समवाय ग म दो शक्तियां हैं। वाय से गति प्राप्त होती है और सम से दिया। काई काम है उमस पान प्राप्त होता है। काम किया था उसस अनुभव प्राप्त हुआ उस अनुभव के आधार पर फिर काम किया और उमस कुछ और अनुभव प्राप्त हुआ । न काम का अजाण होता है न अनुभव का । आवश्यकता अनुसार काम करते हैं और काम के अनुसार मान प्राप्त करते हैं। इसी को समवाय कहते हैं।
९ - - आजक्र एक बडो भूरा हो गई है। मूल यह है कि इतिहास, भूगोल आदि विपया को हम विषय न समझकर एतद सम्बधी नान की सचनाएँ देने लगे हैं। और फिर इसकी जान प्राप्ति निय काम बा आयाजन करते हैं। यह भान प्राप्ति का बिलकुल ही गलत ढग है । दुम तो उस समय हाता है जब बहे बडे विद्वाना का भी समवाय की और इमी प्टि से देखते हुये पाते हैं। अभी यार्ड ही दिन हुआ जब बिहार के एक विशिष्ठ विद्वान तथा एर विश्वविद्यालय व उपयुलपति न यह प्र न रिया वि भूगात्र पढाना है आप किम प्रकार वाम पर समवाय द्वारा भूगोल पढायेंगे। मैंने उत्तर दिया कि मुझे भूगाल नही पढाना है, सम वाम भरना है और काम करते और रात उत्त ममय यदि विद्यापियो २ मा म जिजामा उपन्न हा गर्द ता उह गणित इतिहास, भूगार तया माहित्य का बनायें दे सार हैं। में सूचना अनुभव आधारित हान वे धारण मान की सना में भी पुरारी जा साती हैं । ममवायो पद्धति द्वारा दिय गय पान म इतिहास भूगात तयादान के नाम स पाल का पृया करलगली रसाएँ नहा साची जा सकती प्रत्युन पान समय भगन रुप म किया जाता है और चि और परिस्थिति के अनुसार विद्यार्थी उस गान या मम्बद्धन स्वाध्याय, अनुभव सत्सग पयटन और जा. सम्पर द्वारा विशेष रूप स पर सरना है। समवायी पान हमारे तान साधन हैं-प्रकृति, समाज मया उसाग। हमार यहाँ सीना के लिय विशाल क्षेत्र पड़ा हुआ है। हमारे देश की तरह ए ऋतुयें और बारह महीन समार के किसी भी म नही पाय जाते। हमारे देश की तरह एटाटोप अपवार में घिरे हुय दिन नया दुग्ध पवन गति सगार विमा भी दाम नहीं पार जान । माराम बातें करनेवाले पहाड, पन अपवार पूर्ण जगल तपा पानान की थाह सलवार गत हमादाम हैं। भयपर मारवार स्थान पिसचिताना पवार स्थान तपासता यण को बहार उठानमा स्थान हमारे दा में है। प्रकृति र इनन विभिन्न कम हमा दन लिय प्रस्तुत है। ममात्र पवन्यौहार गमाज प रा राज गमाज में अम्याम और माने, समाव व दुग और मुग, यमान योगी और गमा ममान मच. नीच तपा समान की निष्प हानवार परिपतन हमारे for है। जीवन-यापन तथा भौतिर या परनामामी पूर्ति र निर अनर प्रार बाम और पये हमारे हैं।
, -समवाय के पहले पहलू का निश्चय करते हुये कायर्ता स्थान तथा समय बी परिस्थिति का ध्यान रखना पडेगा । कायकर्ता की परिस्थिति तथा स्थान और इन दोनो परिस्थितियो के साथ-ही-साथ कायकर्ता की मानस को परिस्थिति का भी ज्ञान रखना चाहिये । शिक्षक तथा शिक्षार्थी के सामने काम का उद देश्य स्पष्ट रखना चाहिय । उद्देश्य म आर्थिक, नतिक तथा आध्यात्मिक के अतिरिक्त भौतिक उद्देश्य रखना चाहिये। जैसे कपडा बना रहे है तो पह नन के लिये । अपने पह्नने के लिय, अपने परिवार के पहनने के लिय तथा अपने साथ वाला के पहनने के लिय। काम करते समय ही यदि विद्यार्थी के मस्तिष्क मे जिनासा उत्पन हो, और अवश्य होगी ता शिक्षक का काम उम नान पिपासा को केवल तृप्त करना ही नहीं है प्रत्युत तीव्र भी करना है। इस प्रकार जो नान प्राप्त होगा वहाँ वास्तविक समवायी नान कहा जायगा और इस प्रकार जो काम हागा वही समवायी काम कहा जायगा। समवायी पद्धति द्वारा नान दिये जान वाले पद्धति म शिक्षा का स्थान माग प्रदशक के अतिरिक्त जऔर कुछ नहीं रह जाता। वह विद्याथियो के साथ माथ रहकर परोक्षरूप से जिनासा का उद्दीपन करता रहेगा। जौर यथाशक्ति उमकी तृप्ति करत हुये विद्यार्थिया म नवीन की जिनासा उत्पन्न करेगा। जिसस वे स्वाध्याय और स्वप्रयत्न द्वारा नारा दीप को और अधिक प्रज्वलित करेंगे । शिक्षक सदा यह देगा कि विद्यार्थी के हृदय में उत्पन्न प्रदीप्त ज्ञान-श्रीपक अनायास अनाध्याय, जकम दुप्क्म विषय वयार, आलस्य दम्भ और अनिच्छा द्वारा बुम न जाय । शिक्षक की सतत जागरुकता के पहरे में विद्यार्थी कम करेगा और नान प्राप्त करेगा सवा करेगा और नान प्राप्त करगा चिन्तन, अभ्यास और अनुभव द्वारा उसे पक्का करेगा और उसे ही समवायी नान कहा जायगा।
- आजकल एव बडो भूत हो गई है। भूल यह है कि इतिहास, भूगोल आदि विषयो को हम विपय न समयकर एतद मम्बधी ज्ञान की मचनाएँ देने लगे हैं। और फिर इसकी पान प्राप्ति के लिये काम का आयोजन करते हैं । यह नान प्राप्ति का विलकुल ही गलत ढग है । दुख तो उस समय होता है जब बड़े बड़े विद्वानो को भी समवाय की और इसी दष्टि मे देखते हुये पाते हैं। अभी थोडे ही दिन हुआ जब विहार क एक विशिष्ट विद्वान तथा एक विश्वविद्यालय के उपमुनि ने यह न किया कि भूगाल पाना है आप विम प्रसार काम कर समवाय द्वारा भूगाल पढायेंग। मैंने उत्तर दिया कि मुझे भूगोल नहीं पढ़ाना है, मुझे वाम वरना है और काम वरल और बराते उस ममय यदि विद्याथिया व मापक म जिनामा उत्पन्न हो गई ता हे गणित इतिहास, भूगार तथा साहिय पा रचनायें दे मारे हैं। ये सूचना अनुभव आधारित होने के कारण पान को सपा में भी पुकारी जा सरती है। समवायी पद्धति द्वारा दिय गये मान म इतिहास, भूगोल तथा दान थे नाम से पान को पृथा परनवानी रेखाएं नहीं सोची जा मवती प्रत्युत पान समय मान व प म किया जाता है और चि और परिस्पिनि के अनुमार विद्यार्थी उम ज्ञान पा सम्वद्धन स्वाध्याय, अनुभव, ममग पयटन और जन- सम्पद द्वारा विप प स पर सकता है। समवायो मान वे हमारे तीन मापन हैं-प्रकृति, समाज तथा उद्याग। हमार यहाँ सीना के लिय विशारत्र पड़ा हुआ है। हमारे देश की तरह छ ऋतुयें और बारह महान मसार के किसी भी देश म नही पाय आने । हमार दा को तरह पाटोप अथवार म घिरे हुये दिन तया दुग्प पवल रात्रि समार निमो भी दा मे नहा पाय जाते। आम बात परनवार पहाड, धन भयकार पूर्ण जगल तथा पाताल री थाह लेनवार गत हमारे दाम हैं। भयार जाहवाल स्थान, चिलचिलाती धूपदा स्थान तथा सदा वर्षा की बहार उद्यानवाल स्थान हमारे दाम हैं। प्रति ने इनन रिभिन्न प हम fram दन मे लिय प्रस्तुत हैं। समाज में पवस्याहार समाज में राति रिवार, ममान अभ्याम और आग्ने, समाज से दुम और मुग, ममात्र को दी और गमा ममान महेप नाश तया ममात्र को निग्य हानेदार परिवतन हमार ft | সালমান বা মীনি সাবসসা বা ধুলি যবিয় অন্য সবা पाम और प पे हमारे frrt | नान प्राप्त करने के लिय जिनासा होनी चाहिये । और यदि हम जिनामु होकर क्यो, क्व, कस और क्मि तरह के प्रश्नो के साथ आँख खोलकर चलते है ता हम नान का विखरी हुई राशि मिलती है। हम अपनी रचि के अनुसार उन रत्नो का चयन करना है और इस प्रकार अपने जीवन को सबल बनाना है। यही है समवायी नान । ऊपर मैंन लिखा है कि अनुभव का ही नान कहते हैं। काम करते हैं, सोसन हैं। काम करना मोखत हैं यह भी एक अनुभव अथात् ज्ञान हुआ। काम करन म भूलें हुई यह भी नान हुआ और अनुभव हुआ और उस काम से सम्बध रखनवाली अय बाता का भा मासत है और उनका अनुभव करते है। दूसरी आर म इतिहास पढत है या भूगोल पढते हैं । उस इतिहास से हम अक्बर क कम क्लापा से परिचय प्राप्त करते हैं। यदि अकबर के कम क्लापा का परकर अपन कम-क्लापा का मुवार नहीं कर सक अक्वर क भ्रमो स अपन भ्रमा का निवारण नहीं कर सक ता नववर के सात पुग्न का नाम रटन स क्या लाभ जबकि हम अपने ही पितामह नौर प्रपितामह का नाम नहीं जानत। और इस प्रकार मस्तिष्क को कूडाखाना बनान से मनुष्य का निभाग बुरित हो जाना है। हमन पढ लिया है कि भारतवप के उतर म हिमालय है। परतु हम पता नहा कि हमारे गांव वे उनर म क्या है । तो ऐमी अवस्था म उत्तर म हिमालय के हान का नान आवश्यक्ता से सम्बद्ध न होन के कारण सडा हुआ पान क्या न कहा जायगा । हम दान शास्त्र के विद्वान हैं किन्तु ईश्वर के प्रति भक्ति नही हम डाक्टर और वैद्य हैं, स्वास्थ्य के पडित हैं परन्तु वोडी और सिगरेट का सेवन करते हैं और रात्रि में जगकर सूर्योन्य सब माते रहत है तो हमारे स्वास्थ्य का ज्ञान एक विडम्बना मात्र क्या न कहा जायगा । हम स्वास्थ्य को परीक्षा मे १०० नम्बर लाते है कि तु दातुन घरने या अभ्यास नहीं है तो स्वास्थ्य की परीक्षा म पास करना क्यो न हाम्या स्पद ममझा जायगा। ऊपर लिखी ये मारी विडम्बनायें जो अपने आप मे राय हैं ममवाय पद्धति द्वारा दिय गय शिषण तथा अनुभव में असम्भव हैं । संसार म मवमे पग वानिमारा स्मो से आवाज उठायी-करा और मोखा । इम विचार का प्रचार हुआ । हापट न इस पर महल खड़ा किया । माटेमरी डिगाडन प्राजक्ट मय जार डाल्टन प्लन आरिकी पद्धतियो करा अर सीम्या व आधार पर ही विरमित का गई। रूसो के शिष्य को अगुली जल गई परन्तु उमने कहा-रावा मन जलने दा। उमम वह मसिंगा।
और इम जलन मे सीखनेवार अनेक पंदा हुए। परतु इतिहास और भूगोला की पाई वम ही चलता रही। गाधी आया। उसने कहा कि करो और सीखा की पद्धनि तो ठीक है परतु निरयन क्म से निरयक नान की प्राप्ति हाने की सम्भावना है और साथ ही उसने यह भी कहा कि विद्यार्थी समान का प्राणा है उम ममाज मे किय जानेवाने कामा से सीम्बना है और साथ ही उसन यह भी बरा दि उत्पादन कामो द्वारा उत्पादक अनुभव प्राप्त करते हुए भोग्य वस्तुमा वा उपादन करके म्वय भोगना और ममार को भागने दना ही वास्तविर करा और मीमा के मिद्धात की शिक्षा हागा । और इस प्रकार उसके हृदय का विकाम हागा और वह पूण हागा । यही ता ममवायी नान है। मत्यराम आता है गुर-आश्रम में और कहता है महाराज मुजे ब्रह्म विद्या दीजिय। गुर उम एक हजार गायें दना है और कहता है इमे चार हजार बरस आना । आजकाल तो हम इम का 'थाया था हरि भजन काजोटन नगरपाग' । आपा या विचारा ब्रह्म विद्या प्राप्त करने में लिय और चराने लगा गाय । परतु श्रद्धा पूर्वक उमन एक हजार गाया की मवा थी और मेवा बरत तथा काम करत हुए उमने अनुभव प्राप्त रिया और नम अनुभव के दन पर उमने ब्रह्म नान प्राप्त किया। गुरु ने दवा उमन चेहर पर दिव्य तज है । गुरु ने यहा--वटा ब्रह्म नान मिल गया। उसने कहा-हाँ गुर और गिन्य दाना मतुष्ट हा गये । एमे हो पान का समवाय पद्धति पत हैं। भगवान न भी वा कहा है- । न पदावान नमत मानम या विश्वानम फल दायकम् । पर गदहा है। उसने पीठ पर नान और विधान की पुस्नया वा वाय लदा है । गर्थे या उन पुस्तया व उपयाा का अनुभव नहीं प्राप्त है । पुस्तक। म वणित विद्याना का वह पान नहीं प्राप्त वर माना है । यही अवस्था उस मनुष्य की है जिगर मस्तिपम ताता रटल विद्याया था वाप पा हुआ है और जा परीशाला म परीभा पुम्नद क पना पर उगन दन ये निय है। आप मनिष की विद्याआ का उपयाग उमा लिए उनना ही है जितना गह का पाठ कर पी हुई पुग्नका का उपयाग गधे के लिए है । म मुशाजी । बहुत यह विद्वान ५ । गति ये आचार थ । व र नदी मेनार गय । उनर गाय उनरा दम वपना बच्चा भी था। हाने नदी तट पर जागर माचना प्रारम्भ रियापि नाम स्निना पाना है। यदि नदी पानी की गहराई सहोमी ऊंचाई म अधिर होगी तानहरो पार करने की दूसरी व्यवस्था करनी होगी। उहीने पानी का नापा और उसका औसत निकाला और उस औसत से सिद्ध हुआ कि पानी उस लड़के के कमर के बरावर है । उहोन लडके को पार करने की आजादी दी और कहा कोई हानि नहीं ! गणित असत्य नहीं हो सकता। लडका नदी पार करने लगा और बीच मे जाकर डूब गया। क्योकि, बीच में पानी अधिक था और तट पर कम जिमका औसत लडके के कमर के बराबर था। मुगीजी ने सर पर हाथ रख कर कहा--लेखा जोखा थाहे लडका डूवा काहे । समवायी नान के अभाव म मुशीजी का सारा नान व्यथ हुआ और उन्हे नडवे में भी हाथ घाना पड़ा। पचत त्र की प्रसिद्ध कहानी-पुस्तक में भी व्यवहारहीन परतु प्रवीण पपिता की क्याए आई है। जिनसे यही सिद्ध होता है कि कम वे दिना नान व्यथ है । और कई अशा में वह हानिकर सिद्ध हाता है । प्राचीन काल म हमारे यहाँ आश्रमो की स्थापना होती थी। विद्यार्थी गुरुकुल में जाकर गुर के परिवार म मम्मिलित होता था। वहाँ राा परि परिवार के वालप तथा भिक्षुक के बालक म वोई अतर नहा रहता था। वहाँ श्री कृष्ण और सुदामा दोनो लक्डो काटते थे । घोर शारीरिक श्रम परके गुर परिवार का पालन पोषण करते थे और अपन शारीर का भी संगठन करते थे । वहाँ का प्रधानता रहती थी और श्रम के माध्यम से ही चरित तथा हृदय की उनति की जाती थी और किया जाता था मस्तिष्क का विकाम । और इसीस से उन गुरकुलो का नाम आश्रम पड़ा था। वास्तविक समवाय पद्धनि इमी समय चलती थी आय भरत के पूर्वकाल की शिक्षा पद्धति आश्रम और समवाय की पद्धति कही जा सकती है । उस समय श्रम येवाट दूसरा स्थान चरित्र का था अर्थात हृदय का या और तीसरा स्थान मस्तिष्क का था। जीवन का प्रारम्भिव काल म पच्चीस वर्षों तक विद्यार्थी श्रम पूर्ण जीवन व्यतीत परता था और (साप-ही-साथ शास्त्र-पटुता तथा यवहार पटुता सघपणगोल ससार के उत्तरदायित्व तथा गुस्तर काया का उदाहरण प्रस्तुत करता था)। उस समय परम्परा थी कि पांच वर्ष तक जननी नौ वप तर पिता और तदुपरात पच्चीस वपा तप आचार्य विद्या प्रदान करता विद्यार्थी पच्चीम वपों तक वल विद्या विक्रम तथा वीय पी रक्षा मरता था और इस प्रकार ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करता था। अयं परमात्मा, विद्या और बीय तीनो हाता है और घय का अर्थ उपासना, ॥ था। प्रा का .
१३ पर अध्ययन और रक्षण होता है और इस प्रकार विद्यापी ब्रह्म की उपासना, विद्या का अध्ययन तथा वीय की रक्षा करते हुए गुरुकुल म समयापट येरता यो । श्वर, विद्या तथा वीय तीना का कमा उपासना, अध्ययन तथा रमण करता था और माध्यम था इनके लिए शारीरिक श्रम द्वारा दिया हुआ उत्पा- दर वार्य । वहस्पति गुणाचाय का दुश्मन था । परन्तु वाचाय वहम्पति कपुर क्च वा अपनी गुप्त विद्या सजीवनी देन म कुछ भी नहीं हिचके । परतु गिना दन के पहले उमरी पात्रता की पूरी परीमा कर ली गई और प्रमाण नो उमन तुरत ही दे दिया । भने दवयानी की प्रणय प्राथना को तुरत ही छुरा दिया और वदर म इतनी कठिन तपस्या मे मोम्बी हुई विद्या से भी वाज आया। इस तरह के चरित्र वन अनेक उदाहरण हमारे उम समय * आश्रम में पाय जात है। जनर राजा थे---विदेह थे। विह उस कहत हैं जिसम रूप, रम, गध, स्पा और पद प्रति आक्षण नहीं हाता । जल के भीतर वमल पती की तरह रहता है उसे विन्ह वहते हैं उम ही वीतरागी रहते हैं। हाने भी हल चलाएर ल मी या उत्पन्न रिया जिमम ममार शीतलहा गया। और सिम पर नियामि "पुष्पसिंह जा उद्यमी लामो तारो चर । चश्वर्ती राजा ग्लिोपन मौका पासवा को और गारमा में लिय व अपन प्राणा की यति दन ये निय भी प्रस्तुर हो गये। भागवान धोरण या ता सारा जीपन हो ममय रहा है । कन का ताप यह है कि बिना कम पान प्राप्त नहीं हो सकता है और बिना धिमी गम व यदि पान प्राप्त होता है ता में मा महा नहा जा मरता । क्यारि पर रहा गया है जिनान ना है। विना वम उपन्न मान कम मोबमोटी मामन आन पर अमर गिर हागा और मनुष्य धारा सायगा । इमतिय गमवाय पद्धति र अनरिवन EिT पीवाई अब पति नहीं है। समग ये चार पहलू है- (3) हा बना करना है और रियार बरना है इममा निस्चर ar एना चाहिए। (२) निराप ये अनुगार बार परला पाटिय । (३) और गिर रिय हर बार का आआचना करनी चाहिय । ((४) और अन्त म दिया और सामिया य अनुगर अपना गुधार धरना चाहिए।
१४ समवाय के पहले पहलू का निश्चय करते हुये कायर्ता, स्थान तथा समय की परिस्थिति का ध्यान रखना पडेगा । कायक्र्ता की परिस्थिति तथा स्थान और इन दोनो परिस्थितिया के साथ ही साथ कायकर्ता की मानस की परिस्थिति का भी नान रखना चाहिए । शिक्षक तथा शिक्षार्थी के सामने काम का उद देश्य स्पष्ट रखना चाहिए | उद्देश्य म आर्थिक, नतिक तथा आध्यात्मिक के अतिरिक्त भौतिक उद्देश्य रखना चाहिये । जस कपटा बना रहे हैं तो पह- नने के लिये । अपने पह्नन के लिय, अपने परिवार क पहनने के लिये तथा अपने साथ बाला के पहनन के लिय। राम उरत समय ही यदि विद्यार्थी मैं मस्तिष्क म जिनासा उत्पन हा, और अवश्य होगी ता शिक्षक का काम उस नान पिपासा का वेवल तृप्त करना ही नहीं है प्रत्युत तीव्र भी करना है । इस प्रकार जो नान प्राप्त होगा वहीं वास्तविक समवायी नान कहा जायगा और इस प्रकार जो काम हागा वहीं समवायी काम कहा जायगा। समवायी पद्धति द्वारा नान दिये जाने वाले पद्धति में शिक्षक का स्थान माग प्रदशक के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह जाता। यह विद्याथियो के साथ माय रहकर परोलरूप से जिनासा वा उद्दीपन करता रहेगा। और यथाशक्ति उसकी तृप्ति करत हुय विद्यार्थियो म नवीन की जिनासा उत्पन करेगा। जिससे वे स्वा याय और स्वप्रयत्न द्वारा नान दीपक को और अधिक प्रज्वलित करेंगे। गिर गता यह देखेगा कि विद्यार्थी के हृदय में उत्पन्न प्रदीप्त ज्ञान-दीपक अनायास अनाध्याय, जक्म दुष्कम, विषय-वयार नातस्य दम्भ और अनिच्छा द्वारा बुम न जाय । शिक्षा को सतत जागरक्ता के पहर म विद्यार्थी कम करेगा और ज्ञान प्राप्त करेगा सेवा करेगा और नान प्राप्त करगा 'चिन्तन, अभ्यास और अनुभव द्वारा उस पक्का करेगा और उसे ही समवायी मान कहा "जायगा।
तृतीय परिच्छेद गुनियादी शिना में स्वालम्बन का स्थान बुनियादी गिता म स्वावलम्बन या स्वाययिता को पूज्य वापू न युनियादी FTII की रीढ कहा है। Pिा का अथ हा है मनुष्य को ईबर प्रदन ममी मात्तिया का विकाम करना और मभा गक्तिया के विकास म ही स्वावलम्बन था भार मनिहित है। स्वावलम्बन को बार हम नाग देवल आर्थिक दृष्टिकोण में दखत हैं। गाला या विद्यार्थी अपना नापिप आव यकनाना की पूति जिस अाम कर रहा है उमी अगम गाला या विद्यार्थी स्वावनम्बी माना जाता है । परन्तु यही हम भूल जात है कि स्वावलम्बन के दूसरे पहलू भी हैं, जैसे नैतिक और आध्यामिर । पुरानी पदनि म गिता प्राप्त व्यक्ति को यदि नौकरी मिल जाय तो आर्थिक दष्टि से वह म्वावलम्बी कहा जा मरता है परन्तु नैतिक, आध्या- त्मिक और नारीरिक एव अय दृष्टिया से तो वह स्वावलम्बी कदापि नही वहा जा सकता। एक उगहरण म यह वात स्पष्ट हो जायगी। माथिव दष्टि स य स्वावलम्बी व्यक्ति एम स्थान पर पहुचता है जहाँ म उमर गन्नय्य स्थान तक पहुंचन के लिए काइ सवारी नहीं है ता उमद अथ का नारा परा- प्रम समाप्त हो जाता है। और या दूमरी दष्टियों में स्वाग्लम्बा न हा तो यहाँ पर वह पूरी विपत्ति म पड़ जाता है । उसी तरह से अय-मम्पन्न व्यक्ति या पाचा रिमा मारणवा पही अन्यत्र चर जाय ता उम व्यक्ति २ पास मर प्रपारा अय-गम्पन्नता रहत हुए भी उमन्नि उमे मागील का पालन हान बरना पड़ता है। परन्तु बुनियानी गिमा प्राप्त व्यक्ति म मर प्रशार मे स्वायसम्बन की पर्याप्त नत्ति रहती है। यह वह जीवन-यापन म सफल होता है। आपिक और पारीरिक स्वादसम्यन वे माप ही माय ननित्र और आध्या- मिर स्वावलम्बन भी आप पर है । देवन आपिक, गारोरिव तथा नतिर रटिम स्वावलम्बोम्पक्तिनानि और अनीति दातारा यायप ने गुरना है सपा आप्पामिक स्वावलम्बन के अभाव में वह अपना अनप पर मरता है। गमार के लिए वह महान पटरर मिस होगा। रावण ऐगा हो पा निमगे - । सारा भारतवप वस्त था। उसके समय म धम काय का लोप हो रहा था। सारारा यह कि आध्यात्मिक स्वावलम्बन भी मनुष्य के लिए अपरिहाय है। आध्यात्मिक स्वावलम्बन हान पर ही उसके हृदय म करुणा का उद्रेक होगा, लोक सग्रह को भावना का स्फुरण होगा और इस प्रकार होगा वह समाग का पथिक । अब स्पष्ट हो गया कि स्वावलम्बन का वृहद जथ लेते है बुनियादी गालाओ म । और यदि हम एक ही नथ में तो यह एवागी अथ कहा जायगा। परतु बडे दुख की बात है कि अधिवाश यक्ति स्वावलम्बन एक ही अथ अर्थात आर्थिक स्वावलम्बन को आरते है । अभी कुछ ही दिनो पहले एक माननीय मत्री ने निरीक्षण किया। वे वार बार विद्यार्थिया स यही जानना चाहते थकि वे पटपर सरकारी नौरी चाहगे कि जीवन में प्रवेश करते उत्पादक काय करेगे । और जब विद्यार्थी उनसे यह कहते थे कि वे नौकरी नहीं करेंग ता व अपनी प्रमानता प्रकट करते 4 । और उहान यक्त किया ठीक है बुनियादी गालाआ के विद्यार्थिया स यही अपना की जाती है कि वे नारी नहीं करेंगे और स्वावलम्बा जीवन यतीत करेंगे। मैंने कहा जि यह ठाक है कि मरे विद्यार्थी स्वावलम्बी हाग नौकरी नहीं करेंगे। इसका अथ यह हुआ वि व नौररी के पीछे परेशान नहा हो।। परन्तु अवसर प्राप्न हान पर वे नौकरी भी प्राप्त कर सकते है क्याकि हमारे स्वावलम्बन की परिमापा म यह भी जाता है कि परिस्थितिबा जो कोई भी काय सामन आय व्यक्ति उस चुनौती का स्वीकार कर उपम अच्छा अच्छा फन लाये । इस पर वे चौंक और उहाँने कहा कि यह ता ठीन नहा है फिर तो नौकरी म भीड लगान वार लोगा की संख्या की बद्धि ही होगी। मैने कहा कि मर विद्यार्थी नौकरी न मिलन पर जय विद्यार्थिया को तरह वकारों की सस्या की पद्धि नहीं करेंगे और भूमरी के शिकार नहीं हाग । वितु आव यस्ता पडन पर नौकरी के अयोग्य सिक्षम हाबर और गामा व्यवस्था म हाथ बटान लायक हांगे, स्वला स निगल हुए विद्यार्थिमा को नपा ५ अपिक सम्पन्न होंगे, क्योकि उन्हें स्वशासन को शिक्षा नहीं दा नाती जबपि हमार यहाँ विद्यार्थी प्रारम्भ स हो स्वशासन की या ग्रहण परत है। अव वात रही भीड वो। ता इस सम्बन्ध म मरा यह वह्ना है कि माड ता बढेगी हा, जवता वत्त मान सामा- नि ढाँचा रहेगा। इस लिये Pिा समn और सरखार तीना उत्तरदायी है। एक कुम्हार तन ही पट काम वरप ममाज म उस मामाजिक प्रतिष्य तथा आर्थिक अवस्था वा नहीं प्राप्त कर साता जन नि उतन हा घट काम परब या उसस कम हा घट काम बस एक कुर्मी पर बटन वाल बाबू एर आला पर घूमनवाला डासर, एर वहम करने वाला वकील या भाषण देने वाला प्राफेसर उम कुमार की अपक्षा कम योग्यता, कम महिष्णुता और बम उदारता तथा वम श्रम परवे अधिक प्रतिष्ठा अधिक अथ तथा अधिर मौलिक मुग्दा वी उपाय कर सकता है । एसी अवस्था में सभी व्यक्तिया श झुकार इन उत्पादक श्रमो को अपना उन दुर्मी वार कामा प्रति अधिक होगी। भरा माता का मुनकर मत्री महादय जी चुप हो गये और उहान हमारे वर्षों में बात का पह्वाना और स्वीकार किया। महामना पदित मदनमाहन मालवायजा महाराज का बग्ने यदि अपने विश्वविद्यालय स निकरे हुए विद्यार्थिया से मैं अपेक्षा करता हूँ कि वे झाड देने म र उपपुलपति व उच्च प पन्त जिस पद पर रख दिय जायेंगे उस पद का मपादन यापता पूक्म परेंगे। तो हम बुनियादी शिभक अपने विद्याथिया स पहा सपा बरते है शिव परिस्थिति और समय के अनुसार जिस वाय या भी अपने हाथ मी उमका सम्पादन सुपारपण सफलता पूबर करेंगे और यह होगी उनका स्वावलम्बन की एव व्यावहारिप बमोटो। एर वाला है उस सामित साधना साथ प्रतिकूल परिस्थिति म रम Pिा जाता है और वह अपने बुद्धिवन तथा बाहुबल का उपयोग पर उमति की आर अमर हाा है, अपना अम्निव स्थिर कर लेता है, जिराधा पर विजय प्राप्त करना है आर हृदय-बन में द्वारा उस प्रतिकूल परिस्थिति में भी सह्योग और सम्भावना का प्रसार करते हुए चतुर्दिक मत्य का प्रयास परता है, शिव यो सामना ररता है और मुन्दर का निग्पण करता है। वह राम्चे अपम नई तालीम का विद्यार्थी है। यही उसकी बसोटी है। मयारे पनि स निकला हुआ विद्यार्थी का मीमित साधना द्वारा प्रतिकूल परिस्थिति म पुचला जायगा और देशल वाप और पान की पद्धति से पढ़ा हुना विद्यापी, जिसी हार का सम्पर विरान हुआ हा, दुचल भरे जाम पर मगनमा गृजन तामपि नहा भरेगा। ऐसी अवस्था म नई तालिम का विद्यार्थी रापण मिट होगा और नई तालीम ही मन तालीम गिद्ध होगी। FIRTोटी स्वावलावन ही या रसो गई, यह भी एक प्रश्न है। पर भी हम विचार कर। इस प्रश्न या उत्तर दन पहर एर बान में मुहरा दला पाहा है। कुछ विद्वान यह रामाने हैं रि दुनिया काम पाममा महर ता अवश्य हाना चाहिए रितु थापिर स्थापसम्बन काटदा प्रन नहीं बना पाहिह्म । न सागा का मत है, उसे FTII पर भखर F- १८ । पडेगा बौद्धिक स्तर के ऊँचे उठने में स्कावट होगी और साथ ही विद्याथियो का शोपण भी हो सकता है। इस सम्माध मे मेरा नम्र निवेदन यह है कि उनके मस्तिष्क मे अभी शिक्षा की स्पष्ट रेखा नही है । व इतिहास, भूगोल आदि तथ्या के सग्रह मात्र को ही शिक्षा तथा बुद्धि का विकास कहत हैं । परतु हम उस अधूरी शिक्षा कहेंगे । छात्र, जूता बना रहा है लेकिन मुदर और मजबूत जूतो का निर्माण उसने न दिया तो उसका उस गवित का निर्माण कहाँ हुआ जिससे वह मजदूरी का पहचान कर सके, उस शक्ति का विकास यहाँ हुआ जिससे वह समझ म वि उसके जूत की बाजार म पूछ क्या नही है और फिर उसम लोक-कल्याण की भावना के जागरित हाने का अवसर यहीं मिला जिसस उमका हृदय विकसित होता । और इन गुणा के अभाव म क्वल जूता बनान की सैद्धातिक योग्यता और पिसी प्रकार से काम कर रने की भावना मात्र से वह शिक्षित क्से कहा जायगा? यही नही बलि जार्थिक स्वावलम्बन र पहलू को हटा लने से भारी अशिक्षा का डर है, माह और अज्ञान के फ्लने की शका है । और विद्यार्थी तब वगारी की भावना स काम करेगा। श्रम के प्रति वास्तविक निष्ठा उसके हृत्य म नही नागी । सीमित समय म सुपुद वाम उम करना है इसलिए वह क्रेगा। इसके प्रति भी हम सावधान रहना चाह्यि। और इसलिए जार्थिक स्वावलम्बन पर इतना जोर दिया गया है। अब वेवल बात रही गोपण की। इसकी सभावना सनिये नही है कि काम वा नाप तो मिल्वस के निर्माताओ के हाथ म है। शिक्षक तो सहायर' माना गया है। और इसी बात को देखने के लिए निरीक्षको की सेना भी तो तैयार है। ऐसी अवस्था म शापण की आशका नहा करनी चाहिये । और फिर जहाँ उपादित वस्तुजा का उपयोग स्वय वरना है या समाज के कल्याण की भावना से उत्पादित करना है वहाँ गोपण का प्रान उठाना आवश्यकता से अधिक सावधानी खिलाना कहा जाय ता अनुचित नहीं होगा। अब आए हम मूल प्रश्न पर अर्यात स्वालम्बन ही क्या ? हम जर प्यास लगती है पानी पीत है और भूख लगती है तब साते हैं, कपडे की आवश्यकता हाती है तब कपडा पहनते हैं और नही जरूरत रहन पर नहीं पहनत । बहने का तात्पय यह कि मनुष्य आवश्यक्ता के अनुमार वाय बरता है । महाभारत के युद्ध में भारी जन-हानि हुई । हमने आवश्यक्ता समपी कि जन शक्ति बढ़ानी चाहिये और तव नियम बनाय कि बिना पुत्रात्पत्ति के स्वग नही मिलेगा। इसी प्रकार जब नाजी जमनी को सैनिको की आवश्यकता हुई तो डाक्टर कोमिन ( Dr Ko Sching ) ने Rennsylvania Schoolmers's week proceeding, 1939) जमनी के आदश मनुष्य की रूपरेखा इस प्रकार प्रस्तुत की-' It the ideal of the racially pure German of the Nordic endowed with all the racial characteristics ascribed to him in Nati onal Socialist thought to wit, a strong and beauti fully balanced body untiring and resistant to any kind of hardship and, chief of all, the hardships of warfare, loyalty, obediance to the appointed leaders rather than individual, self assertion, a passionate desire to help in the accomplishment af German nation as the master nation above all the races Most of these qualities are the qualities of the sol dier The Soldier is the new ideal of a man इम तरह सम्पूण राष्ट्र को ही सनिय वाने म देखने की आपाक्षा करना और अस निर “यक्तिया या पतित ममझना क्तिना भयकर चिन्तन और मिक्षा का उद्देश्य है। समता के पुजारी तथा सस्थापक एव माक्स वे प्रिय गिप्य महामा रनिन TET "The School, a part from politics, is ? lie and a hypocrisy" अर्थान निमा मस्याएँ राजनीति विहीन रहन पर सारहीन तथा असत्य की प्रतिपादिनी होती हैं। इटली मशिला का उद्देश्य "Work obey and Fight था। 'काम परो, नादा वा पालन करा तथा लडो।' इस प्रकार म लिया कि जिस दा म जिम प्रसार वे व्यक्ति पी आवश्यक्ता हानी है बसे पविनया को तैयार करने व लिए उगी प्रकार का निधा दी जाती है । जब हमार यहाँ अप्रजा का शामन हुआ तो उन रान वे मचाउन म सहायर मिद हा और साथ ही उनके व्यापारम्वद्ध न म मयाग दें। नग्रजी निक्षा पद्धति गम्यापप थी ने अपने पिता के पाग एप पत्र मन् १८३६ म निगा या- "If our plans of education are followed up there not te a singlc idolator among the respectable २० classes in Bengal thirty years hence"-अब इसी बात को दूसरे ढग मे लाड माले साहब के गुरु मिस्टर चाल्स ग्राट के मुख से इम प्रकार सुनिए---"And wherever, we may venture to say, our principles and language are introduced our commence will follow"-(General Appendir to Report from Select Committee on the affairs of East India Company, London, 1832, Page 88) अर्थात जहाँ कही भी म लोगा के सिद्धान्त तथा भाषा का प्रयतन हुआ हमनोगा का व्यापार पलगा । इसी प्रकार सर चाल्म ट्रेवलिप ने अपनी पुस्तक "On the Education of People of India, 1838" म लिखा है कि भारतीया ये मस्तिष्क से उनकी स्वत अता की याद को विल्कुल मिटा दने के लिए उनम नवीन शिक्षा तथा सुधार का प्रचार करना चाहिए। लाड मेकाले ने अपनी बात को और भी स्पष्ट करन के लिए आगे लिखा है-"Form a class who may be interpreters between us and the millions we govern, a class of persons Indians in blood and colour, but English in taste, in opinions, and morals and intellects' अर्थात एक वग का निर्माण करा । जो हमारी तथा मार पराडा गामित प्रजा के मध्य म द्विभाषीय का काम परे, वह वग एसा हा जो स्प रग तथा रवन से भारतीय हो परन्तु रचि, विचार, नतिकता तथा बुद्धि से अंग्रेज हो । अन स्पष्ट हा गया कि जग्रेज शासको को किस प्रकार के व्यक्तिया की आवश्यकता थी। और उन लागो न वैमे ही मूला का सात कर और उसी प्रकार की पाई का प्रचलन पर वैसे ही व्यक्तिया का तयार करना शुरू किया। उन लोगान प्राचीन पाठशालाआ का विनाश किया, जिसे १८३३ वे चाटर + Education Tीपर म स्वीकार भी दिया गया है और नय प्रकार का निया सस्थामा वा निर्माण भी दिया। हम इसा विस्तार म ही जाना चाहत और न यह सिलाना चाहत है कि अनेजा ने किस प्रकार दिला ये स्थान पर विश्वविद्यालया वा निर्माण कर अपने राज्य का दृढ विया । भारत आजार हुआ और पूज्य बापू न देगा कि अब हम ऐसे व्यक्तिया को भाव यकता है जा पारीर से स्वस्थ्य हा और मन स दृढ़ सकल्पवाले हो तया जिनवा हृदय बसवान तथा विशाल हो जो सहिष्ण हो चरित्रवान् हा - तथा जिनकी भुजाओ में इतना बल हो कि वे नये भारत का निम ण कर समें, जिनम शोषण न हा, छूआछूत न हो, ऊंच-नीच थी भावना न हो और हों में पूर्ण स्वावलम्बी। इस प्रकार के व्यक्तियो से भरे हुए नय समाज या उत्य हा जा भारत से राग शाक, दुसन्दारिद्रय, ईयां फूट और धर्मा धना तथा अय प्रकार को सकीणतामा का दर पर स--वे ऐस समाज की रचना कर सकें जो शामनविहीन, विकेंद्रित तया नापणहीन हा, माथ ही वह ऐमे समाज को रचना पर ममें जा हिमा प्रेम और सय पर आधारित हा तया प्रगति व पय पर समार को प्रतिद्विता म सफलतापूर्वक दौड सक, जिमकी आग, कान नाव आदि सभी इन्द्रियां नान-ममम के लिए मुक्त हा और जो 'वसुधव कुटुम्वरम्" व मिदान्त का प्रचार कर मवे। इन्ही भावनामा से प्ररित हापर नई तालोम का उन्भव हुआ। नई तालीम र जीवन को हिरा बहत हैं और यह जीवन के माध्यम से दी जाती है । यह गभावस्या स मृत्यु पय त तर चलती रहता है, ऐमा महात्मा 'जा वा यथन है । परन्तु में इसस भी एक कदम आग बरर बहन के लिए तैयार हूँ। हम हिंदू हैं, हम पुनम र सिद्धान्त को मानते है । पश्चिम की गिमा पनि मनुष्य का अपने पैरा पर सहा तो अवश्य करती है किन्तु उनकी दृष्टि मनुष्य र इम जीवन तर ही मोमिन रखता है । यह भौतिय मिा मात्र पा ही Vिा समपती है परन्तु हृदय व विकास तथा मार मग्रह की भावना के माध्यम म आध्यात्मिक प्रगति व महत्व को स्वीकार करने की आवश्यकता यो स्वीकार नहीं वरनी। पर नई तालीम जमा पर लिसा गया है भौतिर तपा आप्पामा स्वावलम्बन मी भावना का सस्वार उपत्र पर मनुष्य बी आत्मा को मृत्यु की साही व उस पार भी रे जाती है और इस प्रकार उत्पन्न किया गया रास्कार मृत्यु का साडी उम पार य जीव के त्रिमा कलाप का निदान तपा निदान करता है। यह है नई तालीम म स्वालम्बन स्थान या महत्व ।
१-नई तालीम में सामाजिक प्रतिवेपों का स्थान नई तालीम जीवन की शिक्षा है और जीवन के द्वारा दी जाती है मनुष्य एक व्यक्ति है। व्यक्तियों के समूह को ही समाज कहत है। समाज और “यक्ति वा अयोयाश्रय सम्बप है। यदि यक्ति अच्छे होंगे तो ममाज भी अच्छा होगा और समाज यदि अच्छा होगा तो व्यक्ति अच्छे होग । अत समाज का धम है कि व्यक्ति का स्वच्छ रखे और व्यक्ति का धम है कि समाज का स्वच्छ रखे । जा समाज अपने दर रहनवार प्रत्येक व्यक्ति के लिए उन्नति तथा विकास का सभ्यक अवसर देता है और सबकी भलाई चाहना ह वास्तव म वही सर्वोदय समाज है । उस समाज में अधिकार की भलाई का भाव नहा रहता बलि' मवकी भलाई का भाव रहता है । अधि- काग की भलाई की बात तो पश्चिम के बहुमत सिद्धात की दन है । यह हमारी वस्तु नहा है। हमने ता 'सर्वेभूत हिता रता' तथा "सर्वे भवतु सुखिन' सिद्धात का प्रतिपादन किया है। एमा है हमारा समाज । व्यक्ति आर समाज में इतना स्पष्टीकरण करने के उपरात हम अपने मूल प्रन पर आत हैं कि नई तालीम जीवन की शिक्षा है। जीवन-यापन समाज म होता है। समाज की इकाइयाँ एक दूसरे में सम्बद्ध हैं काम 4 द्वारा और वह काम तोन भागा म विभाजित हो सकता है हृदय का पुष्ट करनेवाल काम मस्तिष्क या पुष्ट करनवाले काम और उतर को पुष्ट करनेवाले काम । तीना प्रचार व यामा म तीन प्रकार की पौष्टिकता रहती है। परतु किसी काम म किमी प्रकार की पौष्टिक्ना की विशेषता होती है । नई तालीम म काम मान और जानन्द की विभाजक रेखाएँ नही खीची जा सरती । सन चित और आनन्द की तरह वाहु, मस्तिष्क तथा हृदय तीना का पुष्ट करने वाले पाम ही सच्चिदानर का दान कराते हैं । परन्तु जमा हमन आर कहा है कि मिमी काम में विसी प्रकार की पौस्टिक्ता पोप होती है । जसा भगवान के २४ अवनारा म प्रत्येर अवतार अपनी- पिनी एक-एक विशेषता के लिए प्रसिद्ध है उसी प्रकार सामाजिक काम ज्ञान की वृद्धि तो करते हैं, ३ घा तृप्ति द्वारा तथा आवश्यक बपना द्वारा शरीर को तो पुष्ट करते ही हैं तया मेवा और उल्लास का वातावरण (उपस्थित कर हृदय का विशाल और उमुक्त करते है परन्तु इन मामाजिर कार्यों तथा पव त्याहारा म विशेषतया हृदय क विकास तथा मस्तिष्क के उन्नयन की बात आती है नर उमरे उपरान शरीर की पौष्टिक्ता की बात आती है । हम यहाँ सामाजिक प्रतिवणा द्वारा यह दिखलाने का प्रपन करेंगे नि मनुष्य किन प्रकार अपनी तीना गक्तिया का सम्यक विकाम इन प्रतिवेया ना उचित उपयाग करत कर सकता है और 'यमुधव कुटुम्बकम की तरफ आग बढ़त हुए मृत्यु उम पार को भी बिगडी बना सकता है। मामाजिा प्रतिवप म मुम्पतया उन बाता का वर्णन किया जायगा जा प्रतिदिन समाज म होनेवार पदभ्योहार, राति रिवाज सानी-गमी तथा हास परिहाम मे सम्बन रमने है। सामाजिक प्रतिवे की तुलना हम उम प्रकार का नाम वर माते हैं जिसमा एक किनारा प्रारतिय प्रतिवेप तथा दूमरा किनारा औद्योगिा प्रतिवेप का चूना चलता है । जमा हमन कार लिया है कि व्यक्ति र सामाजिर प्राणी है इसलिए उम समाज म अलग रस र उमा विकास की कपना किडरगाहन तथा डाल्टन-स्नान म भर की जाय परतु नई तालीम म इस प्रकार की वनिमता को पलना ही नहा की जा सकती। हम ता वालव का प्रारम्भ गे ही समाज म तार ममाज में मामने लायर गुणा या उसम उमप करना है जिमम वह आग चलार मच्च अब म सामाजिर प्राणी हो और जिस प्रकार उसन समाज से बहुत कुछ ग्रहण कर अपने सा पुष्ट किया है उसी प्रकार समाज को भी दुधर और गमाज-गचालन म महायक सिद्ध होकर उसको मुप-मुविधा तया मगल का यदि परते हुए उग 'सर्वे भरतु मुगिन की ओर से परे जिसगे सर्वोटप ममाज की स्थापना हा मा । ममाज र पण रण म और समाज प्रर हलचल व्यवहार तथा रत्ती रता रिवाज म गान की राशि विगरी पडी हैं और पालर मफत शिक्षा नेतृर म र गातार चर ता उन यि नान गरी प्राप्ति हागा। दत्तात्रय ने ३४ गुग्ना पामी समार मा और उन आग्रहपूवव अपने आचरण म समावेशपर प्रद्यर का प्राण र सिपाउस विसी मगति गि रास्या मतिम गमे गिना नहीं दी गई। समार सभी महादों में न समाज में ही अकृत्रिम टग से शिक्षा ग्रहण की और इस प्रकार परम तत्त्व की उपलब्धि हुइ और इसलिए ता कहा गया है कि "समाजो परमेश्वर ।" आज हम अपने नई तालीम के विद्यालया में भी रविवद्ध हात चले जा रहे हैं यह बडे दुख की बात है। जसे पुराने प्रकार के विद्यालय समाज से अलग होकर कुछ खास प्रकार की मस्तिष्क सम्बधा सूचनाए विद्यार्थी के मस्तिव में भर देने मात्र ही गिया कहत थे जोर अभर नान को शिक्षा या साधन न मानकर शिक्षा मान वठेस और जिस प्रकार उन विद्यानया से निकलनवार विद्यार्थी समाज के लिए अनुपयुक्त होत ये उमी प्रकार नई तालीम विद्यालया म भी सामाजिक प्रतिवेप तो नाममात्र के लिए ही रह गया है और कुछ खास प्रकार के उद्योगा का समावग स्कूल की पराई म कर और उनका ही अघकचरा नान दवर तथा स्वतन रूप स अक्षर नान कराकर मई तालीम द्वारा शिक्षा दी जाने की इतिथी समय बठे हैं। इस प्रकार नई तालीम के विद्यालय पुरानी तालीम के विद्यालयों की तरह कुछ कुछ रतिवद्ध हात चर जा रहे हैं। यह रढिवद्धता अपने आप उठ जायगी जब हम सामा- जिक प्रतिवेपो का सम्यक उपयोग कर सम्यक नान प्राप्ति की ओर दष्टि रखेंग। इसीलिए नई तालीम वे विद्यालयो मे सामाजिक प्रतिवेपा का अपन अलग बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है । अब हम समयते हैं कि यह स्पष्ट हो गया होगा कि नई तालीम के विद्या लया म सामाजिक प्रतिवपा का क्या स्थान है । सामाजिक प्रतिवेपा या नई तालीम के विद्यालयो म स्थान है एमा हमने लिसा है। परन्तु इसका यह अथ नहीं समझना चाहिए कि पुराने ढग से चलनेवाले विद्यालयो म इमका स्थान नहीं है। सच्ची शिक्षा जहाँ कही भी दी जाती है चाहे वह पुरानी तालीम का विद्यालय हो सभी स्थानो पर मामा- जिक प्रतिवेपो का बराबर मूल्य है । और अब इस राज्य में नई तालीम और पुरानी तालीम को विभेदव दीवारें तो ढह ही रही हैं अत अब इसका प्रश्न ही नहीं रहा । पुरान विद्यालय इतिहास भूगोल नागरिक शास्त्र आदि में तथाकथित नान सबद्ध न, सघयन तथा सम्पुष्टिकरण सामाजिक प्रतिवेपो वा उचित उप- योग करने पर सरते हैं।
२५ पुराने ढग के चलनेवाले विद्यालयो म उनकी अपनी अनेक समस्याओ के साप राष्ट्रव्यापी समस्या अनुशासनहीनता वो आ गई है। हम कहेंगे कि समझदार (वेवल चुद्धिमान और पडिन शिम नही, वेवल त्यागी और तपस्वी शिक्षक नहीं) और लगनगाल शिव नेतृव म यदि सामाजिर प्रतिवगा मा उचित उपयोग किया जाय तो नान और रम को वद्धि र माय-ही-साथ अनुशासन की समस्या भी हा हा जायगी। एमा है महब इन सामाजिर प्रतिवेगौ का। रह गई बात नई तालाम का। ता इमम तो स्पष्ट ही है कि समाज थी हरर हलचल हमार क्षिा को माध्यम हैं। सत नई तालीम म तो इनका विशेष महत्व है और नामाजिक प्रतिवणा द्वारा क्षिा ग्रहण करने के लिए विग प्रकार की पला, स्याक्ति, प्रतिमा, कल्पना तथा सुरुचि, समादारी, लगनगालता, स्पाग और पाहित्य की आवश्यकता है और इतना है महत्वपूर्ण स्थान नई तालीम म इन मामाजिक प्रतिवेपावा।
पर्वो का २-समाज में स्थान उनके उदय होने के कारण, उनका प्रभार पर निर्जीव हाते हैं परतु उन यया की सतह पर काम करनेवाले अगु भी अनवरत वाम करने के कारण थक जाते हैं और उह विश्राम की आव श्यक्ता हानी है। उनके सुचार प स सचालन के लिए समय समय पर स्निग्ब पाथा का प्रयोग भी किया जाता है। यही अवस्था जीवित यत्र वाले प्राणा तथा प्राणिया मे बननवार समाज की भी है। ता जिनने पव और त्याहार हम मानते है वे सभी पक्ति और समाज की थकान का दूर करते हैं उनम नई नागा और नई उमग का संचार करते है तथा नए विचारा की प्रेरणा देत है। मनुष्य उन त्योहारा को मनाकर शिक्षा भी ग्रहण करता है और नए उत्साह के साथ जावन-सग्राम म जुनता है । जीवन चक्र कुम्भकार के चक्र की तरह घूमता है परतु जब कुम्भकार ने चत्र म शिथिलता आने लगती है ता कुम्भकार अपने दण्ड प्रयोग से उसकी गति म तीव्रता ला देता है । उसी प्रकार जीवन चत्र जब शिथिल होने लगता है तो ये पव और त्याहार तथा जयन्तियाँ मनुष्य के जीवन म गति उत्पन्न करती हैं। मनुप्य अपनी भूला का सुधारता है और नया उल्लास नई चेतना तथा नई दढता के साथ आगे बढ़ता है। किम मालूम नहा कि सीता के उज्ज्वल चरित्र ने कितना वा सती बनाया राणा और शिवा वे चरित्रो न देश पर सहान्त होन की प्रेरणा पूकी और क्मेि नहा मालूम है वि वालव गांधी राजा हरिश्च द्र के नाटक को देखकर ही सत्यवती और आग चलकर महात्मा हो गया । अंगरज कवि लौंगफेला ने अपनी कविता शाम आफ लाईफ' (Pslam of hfe) म सत्य हो लिखा है निवडे आदमियों के जीवन चरित हम स्वय बडे बनने की प्रेरणा देते हैं जिगस नाग चलकर समय सक्त पर हन स्वय अपना पदचिह छोड जायें जा पीछ आनवालो के लिए माग प्रदशन का काम पर उनका पथ प्रशस्त करता रह ।
पों के उदयोनेह के कार. वाल देखार मोर नाचते हैं । मोरा लिए बादल का आना आनन्द पा पव है। मनुष्य का प्रति के साथ तात्म्य सम्बध है तो प्रकृति में उल्लासमय वातावरण का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। दीपक पर पतग प्राण न्याद्वारर करता है और इसका कारण पतग नही बतला सकता। मीठो गयो स सदी हुई यायु जीप यो बहोरा करती है । यदि जीव देहास न हो तो यह उसकी यमी समझी जायगी या उमर भीतर के पुरप का जा चतन प है उम पर अधिक अधिकार माना जायगा जा अप्राइतिर है। तो इस प्रकार बहुत- से पव ममम तथा प्रशी का दन 1 स म भात हैं । माय ही मनुष्य स्वभाव स वीर पूना पसन्द करता है। मनुष्य अपन स बढी गावित वे सामने झुक जाता है । तो हम निमी भा क्षेत्र म माग बढे हुए मनुष्य की जयतियां मनात है। उनमाया की याद म उनरे शिराय बाया बानिधिया मनात है और साथ ही उनकी पुण्य तिथियां मनाते है और इस कारण भी परों पा उदय हाता है। - एम भी अवसर आते है कि मनुष्य का वायसान जीवन बुथ विधाम पाना है और शग ममय हम आनन कौसाज म पता है जिसम उन उग, हृदय को गालि, मम्तिन को विक्षिप्तता तयारीर को वापद दूर हो सय । ताहम प्रसर भी त्योहार मनात हैं। बाई पटना पटनी है और जिग पटना का प्रभाव मनुष्य 4 ऊपर या ममाज के ऊपर मुगापर हाता है सा उग घटना की तिथि भी हम पद की तरह मनात है। मनुष्य मा यह म्यभाव है, या जीवमान का यह स्वभाव है ff वे मुगार यस्तु या बार-बार राना चाहते हैं । तो इस कारण भी हम पर स्याहारा का मनाना पाहते है। हमारे यहां री कारण पवा को मनाया जाता था विन्तु अब इनर मनाने को दूसरी परपराएं भी पत पड़ी हैं। भारतीय परम्परा य अनुमार मुगर तिपिमा की स्मृति तानी रयत हैं और पद याता को भून जाना प्रपतरल है। हम मान जीवन म परामय की कलना नही पान वरन् और समृदिवा सपना दगत है और इस पारंग पर पाहारा और जन्निया या मनाते है। परन्तु पश्चिम म प विनार माया रिजोन में देवास मुग हो गुम नही है दुश भी है । और दुरावा अपना अना महर है । और उसमे कभी-कभी इतना प्रभाव उत्पन होता है, जीवन के सुधार मे इतना बल मिलता है जितना सुख नही कर सकता। कि तु यह पश्चिम की देन है । हमारे यहाँ हमारे शास्त्रकारो ने इसकी मान्यता नहीं दी है । किन्तु आज पश्चिम और पूरव की दीवारें टूट रही हैं। एक दूसरे के रीति रिवाज एक दूसरे पर प्रभाव डाल रहे हैं । इमलिए हमने उन पवा को भी मनाना शुरू कर दिया है जिनका अन्त दुःखान्त होता है जस नेताआ की पुण्य तिथियां । उनसे हम प्रेरणा ग्रहण करते हैं शिक्षा ग्रहण करते हैं और ग्रहण करते है सत्य पर शहादत होने की शक्ति और साथ ही ग्रहण करते है उन परिस्थितिया से शिक्षा जिन कारणा स इन पुण्य तिथियो का अवसर उपस्थित हुआ । इस तरह हम न देखा कि पव-त्योहारो की उत्पत्ति प्राकृतिक, सामाजिक, सास्कृतिक और राजनतिक कारणा से होती है । अब रह गया इन पदों के मनाने का समाज पर क्या प्रभाव पटता है ? भारत बहुत पुराना देश है और यदि यह क्हें कि ससार का सबस पुराना देश है तो कोई अत्युति नहीं होगी। इसी कारण यहाँ मनाए जानवाले पव भी अति प्राचीन हैं । प्राचीनता म मिश्रण अनिवाय और स्वाभाविक है। हमारे पव-त्योहारा मे मिश्रण हुआ है । और यह भी स्वाभाविक है कि मिश्रण बुराई की ओर होता है भलाई की ओर नहीं और कालक्म म अच्छाइया का ना| हाता है बुराइयो वा कम नाश होता है । इहा प्राकृतिक नियमो के कारण हमारे पव-त्योहारो म बहुत मिश्रण हुआ है और समाज पर उसका कुप्रभाव भी पडा है । दृष्टान्तस्वरूप हम हाली के पर्व का ही ले सक्ते हैं । उसम इतना मिश्रण हुआ है कि उसका उच्च लक्ष्य आज समाप्तप्राय हो रहा है । परतु पव-त्योहारो के मनाने से मनुष्य गिला ग्रहण करता है तथा प्रेरणा प्राप्त करता है जसा हमने ऊपर लिखा है और ममाज पर सुदर अमर पड़ता है। और इही मुन्दर प्रभावो के कारण समाज में पव-त्योहारो का महत्व है । जिम समाज म जितने ही पव और त्योहार रहत हैं वह समाज उतना ही जागरक और सचेत माना जाता है। भारतवप के विशाल देश होने और विभिन्न प्रकार को ऋतुओ की श्रीडास्थली तथा अपनी प्राचीनता के कारण यहाँ पर्व-त्योहारो को बहुलता है । पिण-सस्थाा म इन पव-त्योहारा तथा तिथियों में से मुन्दर अवसरोपा चयन कर लेना चाहिए और उन्हें उपयुक्त दंग से मनाना चाहिए ।
३-संस्थानों में पर्व किस प्रकार मनाना चाहिए? उनसे किस प्रकार मनुष्य के बाह, हृदय तथा मस्तिष्क का विराम रिया जा सकता है सत्र के प्रारम्भ म प म घटनेवाले पवा की तालिया निश्चित पर लेनी चाहिए। वह तालिका सर्वविदित हो । पव उपस्थित होने के तीन दिन पहल ही विद्यालय वे परिवार की एव बैठप होनी चाहिए और बैटर म पर मनाने को याजना प्रस्तुत कर स्नी चाहिए। साथ ही एक बात और बर रेनी चाहिए वि पर सम्बप की जितनी भी अधिर पुम्नरें प्राप्त हा स. उन्हें शिला और धात्र मिलार सग्रहीत करें। अध्ययन तथा चिन्तन गभीरता के साथ होना चाहिए । अध्ययन तथा चिन्तन का नाट तैयार कर लेना चाहिए और नोटाप नापार पर वविता, निरय आदि प्रस्तुत करने की याजना बना रेनी पाहिए । कार्यो वा बटवारा कर स्ना चाहिए और जिग पर जिम पाम वा “तरदायित्व है उन सुचाररपेण पूरा करें। दिशभर महाग तया माग प्रदर्शन परें । अध्ययन परनवाले प्रथा की तानिया भी तयार करा दें और विद्याधिया यो नाट करा दें। विद्यार्थियों द्वारा नोट को हुई सामप्रिया का समापन परें। वरिता, नियम तथा प्रमन म स्वय भाग लें। पर त्योहारा का मनाने म अध की आवश्यकता पड़ती है। इस समय म सावधान रहना चाहिए। थप सग्रह म भा मावपानी रहनी चाहिए और म्पय म तो पूरी सावधानी यरतनी चाहिए। अप सग्रह आवश्यकतानुसार सहयोग पर हा और व्यय का पूरा विवरण पव समाप्ति में दूगरे दिन ही तथा नाय हा मुना दना चाहिए । गिर भी स्पय नियम पी बात पर पूरा प्यान दें। पर जिग दिस मनाया जाग उमदिन मुबह म व्यक्तिगत और सामूहित गाई पिग से परली पाहिए । भजन और प्रभारी भी गुयह म हा जाए सा और अया हो । यायुमटर सुर्गा धन बग्न से लिए गए धूप का भी प्रयाग मरला पाहिए जिमरा मात्मा तृप्त तमा मन गुर हो । पय मनाने में ग्रामीमा यामा सहमाग ग आवश्यक है और उन्हें भी निरिड करना चाहिए। इसके बाद जिस कारण पव को उपस्थिति हुई हो उन कारणो पर प्रकाश डालना चाहिए। भापण, कविता निवघ, प्रहसन आदि के प्रदशन का प्रवध होना चाहिए और पव मनान के उपरान्त धन्यवाद नापन और प्रसाद वितरण भी हाना चाहिए। जिस दिन पव मनाया जाय उस दिन पव के अनुरूप ही असन और वसन का भी यथाशक्ति प्रवध होना चाहिए। पब मनाना प्रारम्भ करते समय एक वात पर ध्यान देना चाहिए। जिस स्थान स इम पत्र की उत्पत्ति हुई उस स्थान का भौगालिक नान भी दना चाहिए। भापण कविता और प्रहसन आदि को उपस्थित करत समय मच पर उस देश का मानचिम भी रहना चाहिए। और समय समय पर मानचित्र का प्रयाग कर भौगोनिक ज्ञान भी उपलध करना चाहिए। पव, तिथि का पान करने के लिए तत्कालीन राजनतिक सामाजिक, तथा आर्थिक अवस्थाओ पर प्रकाश डालना चाहिए और उन अवस्थाआ के पाश्व में मूलभूत स्थिति की खाज करनी चाहिए और पव द्वारा उस समय की ऐतिहासिक अवस्था पर किस प्रकार प्रभाव डाला गया उम पर भा विचार विनिमय पर रेना चाहिए। इस प्रकार एतिहामिक नान की भा उपनधि पर एनी चाहिए। पव मनाने के वाद सिहावलोकन करना चाहिए और पत्र को महत्ता अनुसार आग भी कुछ दिना तक पर्चाएँ हानी चाहिए । सिहावलोकन करत समय हमने क्सि प्रसार पर्व मनाया, आर्थिक सयोजन किम प्रकार दिया गया, श्रुटियां क्या रह गया सफलताएं हमन कहाँ तर प्राप्तीकी, श्रुटिया या निवारण पिस प्रकार होना चाहिए, आदि बातो का भी निणय कर एना चाहिए। जो भी क्षणिर तथा सुधार की दष्टि स, छिद्राक्षेपण की दष्टि स नही जो भी हा सदभावना तथा सौहाद्र + साथ प्रेम और मिनाप क माथ, सहयाग और आयोग के साथ, उसम कटुता तया तीष्णता नहीं आनी चाहिए । चर्चाजा को रेसवद्ध कर दना चाहिए। विद्याथिया स उन चोजा के सम्बध म कतिपय प्रश्न पूछा चाहिए और प्रानात्तर के उपरान्त ही उन ग्रहण करन की शक्ति की जांच करनी चाहिए । इस प्रकार तो दुआ उनका बौद्रिा रिवास। यह भी देखना चाहिए कि अमुव प्रवार स वितन प्रकार को गिनाएँ प्राप्त होता है और उन सिाआ को विद्यार्थी वहाँ तब ग्रहण कर अपने पावन म उतारतेहैं । विद्यार्थियों से प्रग्न द्वारा उन शिक्षा का निकालना चाहिए। उहें प्यामपट पर अक्ति पर दना चाहिए और विद्यार्थी भी अपनी रहियों में नोट कर लें। शिम भी उन शिक्षामा का व्यवहार मे रे पावें और उन्हें व्यवहार में रे मान का सुगम माग उन विद्यार्थिया का बतला दें। मयम सेवा और त्याग, का उस व्यक्ति न जिस “यक्ति का पद मनाया गया अपने जीवन म किस प्रकार उतारा था और हम पिस प्रकार तार मक्ते हैं इस पर प्रकाश डालना चाहिए और सवत्र त म उन शिक्षामा का जीवन म उतारन का सक्ल्प भी विद्यार्थी से लना चाहिए। और इस प्रकार हागा उनके हृदय का विकास । पिर भी ध्यानपूर यह दराता रहे कि विद्यार्थी अपन सकल्पा पर यहाँ तर दढ़ है और ममय-समय पर उन मरल्या म बल प्रदान वरता चरे। सयमा और नियमा का पारन करेंगे। सरन और बरन पर नियंत्रण रसेंग। व्यवहारा का सस्वार परग । सफाइ करेंगे। और इस प्रकार होगा हमारे परार का सतुलित विकास । एक दिन में बाद एक सप्ताह तर (पत्र की महत्ता व अनुप कम दिनो वर या अधिक दिना तर) इस पर चर्चाएं चरना चाहिए। अपनी गिषण मस्थामा म हम पर्वो को मनावर बाहु, हृदय तथा मन्तिप्त पा विकास पर सरत हैं तया मुदर चरित्र का निर्माण वर मात है। पव मनान के लिए एर यान और यह है कि जिस नि म मन उद्योग प्रारम्भ मिया उस दिन से लेबर -स दिन यत, जिस दिश हमन पव सम्मप में अन्तिम चचा को सभी गतिविधिया, सभी तथ्य तथा निप्पयों मभी चर्चाप्रा, सभी शिआ, गभी प्रदान ग, भाषण तथा एरिया भाटिया रेववद्ध एरने पुन्तर य प म सारर जिन्द ध दना पाहिा बार का हाल पुग्नकानय म मुरभित राना पाहिए जिम समय-समय पर उन चिनन और मनन हा सर माग पदने र लिए जापता मोदी प म काम दे -सरे और गरे दप पुन म पया मनान में गमय ये सिगित प्रतियाँ सहायिका य प म मिद हो । एक बात पर ध्यान देना चागिरम पुनर में उन सभी मशिया को रपनाना तभा यात्रामा विना उनकी त्रुटिया पर प्पान दिपम्मान दना चाहिए दिए सोना न म पर में आयोडर म माग लिपा सा नाम हो हो हानि नहीं । सम्पाप जो टिप्पणाम न व्यक्तियों के प्रति भी कृतनता नापन क्यिा करें जिन लोगो ने आयोजन म भाग लिया, किंतु अपनी रचनाआ तथा इच्छाओ का समपण नहीं किया । उन सभी व्यक्तियो का नाम और उल्लख मध यवाद होना चाहिए । आथिर प्रतिवदन को पूरी रिपोट भी उस पुस्तिरा म सग्निहित रहे और इसके बाद सम्पादक वा स्वतत्र विचार हो और उस विचार म आलोचना तथा माग- प्रदान और सुधार का क्षेत्र सनिहित हा । समय समय पर जब सूल निरायण हो तो निरीक्षक महोदय उन लिखित प्रतिया का अवलावन करें, उन प्रतिया के द्वारा यह दखें कि यह स्कूल प्रगति कर रहा है तो विम मात्रा म जौर उस अपने निरीक्षण प्रतिवेदन में यवित करें।
४-पों का विभाजन सामाजिक उत्सव, राउनतिर उत्सव, सांस्कृतिक तथा क्षणिक उत्सव विविधता हमार यहाँ वा भूपण है। हम अनेकता म एकता देखते है और अनवता का बनाए रखने म हा महिष्णुता का विवाम पात हैं। जिन प्रकार हमारा ममाज विविध है उा प्रकार हमारा जावन भी विविध और उस जीवन वा सवल प्रदान करनवार पद भी विविध है और उन पवों स विविध प्रकार को निभाएँ ग्रहण वर हम अपना सवतोमुखी विकास करत हैं । प्राचान कार म जो राजनतिक पब ये आज व धार्मिर या सामाजित पव हो गए हैं। और आज व युग म मना प्रकार के राजनतिर घधा के कारण अना राजननिक पर्वो वा भर हा रहा है । मनु वा विभिन्नता के कारण हमार समाज म अनर प्रसार व ऋतु सम्बधी पर भी आ गए हैं और उन सभी पर्णो का अपना शमणि महत्व है। व मना मिलजुल पर मनुष्य वा पूाता Tी मार ए चतत हैं। पर्वो का मनान म हम अपन दनिब जावन स मुध हट जात हैं और एक पत्लासमय वातावरण म पहुच कर समार व दुस- दारिद्रय म दूर हट जान है और पाही दर निए हम अपन ग भून पर ब्रह्ममानव ६ ममाप पहुंचन है और फिर नए उनाम और नई गिता | माय अपन याय म जुरत हैं । पर्वो का मना कर हम अपना सवतोमुमो वियाम परत है और सा विद्या या विमुकार को उत्तिया का मिद करना चाहत हैं। राजनतिर सग्राम म मुग्य-मुख्य घटनाना वा तिपिया पा हम पव ये रूप म मनात हैं तया राजननिर नताना को वपगाठा तथा पुण्य तिपिया था हम पर हाय प में मानत है और य है हमार राजनतिन पद । विजया रामो दीपावनी हया हालीवाय तया उन सभी पामिर नतामा पीजम निधि तथा पुच विपिया का हम पवम मानत है मिहोने हमार रामार म सामाजिर पालिया का सर ममान का आर बहाया । बस महात्मा बुद्ध महावीर इमा ममाह रामाण परमहा तपा स्वामा विव पानर आदिका का रिपियो तपा पुन तिपियो । रहें ही हम धामिर तपा सामाजिर पय साहार रहा है। ऋतु परिवतन र अनुसार मार - सन्ति गगा दशहरा वमत पचमी आदि पर्वो का हम ऋतुआ के अनुसार मनात हैं और उनसे गिपा प्राप्त करते हैं । इन सभी को हम ऋतु सम्बधी या सास्कृतिक पर कहते हैं । पर्वो का विभाजन हम लिंगो तथा वर्णों के आधार पर भी कर सात हैं। बहुत से एमे पद हैं जिहे महिलाएं विशेष रूप से मनाती है और उसी प्रसार बहुत स पव हैं जि हे पुरुष विशेष रूप से मनात है । उसी प्रकार जसे तोज, भ्रातृ द्वितीया, रावी, छठवत जिवित्पुलिका आदि पर्यों को स्त्रिया विशेष रूप स मनाती हैं । उसी प्रकार विजयादशमी, नागपचमी आदि को पुरुप विशेष रूप से मानते हैं। बहुत ऐसे पव होत है जिहें वालका का पव कहते हैं और बालक तथा विद्यार्थी उसे विशेष रूप स मनाते है जैसे वसत पचमी। बहुत से ऐसे पद हैं जिह कोई विरोप वग विशेष रूप में मनाता है । जैसे दीपात्सव, थोष्ठिया का पव और इसी प्रकार श्रावणी ब्राह्मणो का, विजयादशमी क्षत्रियो का तथा होलिकोत्सव शूद्रा का पव है । धर्मों के आधार पर भी कुछ पद कुछ धम के हैं और कुछ पव कुछ घम । जस इदुलफ्तिर तया मुहरम मुसलमाना के, विजयादशमी तथा दीपो- त्सव हिन्दुआ तथा त्रिसमस ईसाइया के । स्थानीय तथा राष्ट्रीय आधार पर भी पर्यों का विभाजन हो सकता है। बुध पर्वो को मनाने की सीमा सीमित है तथा कुछ पर्वो का मनाने की सीमा वृहद् है, जसे छठ आदि पर बिहार के कतिपय स्थान पर मनाये जाते हैं तथा विजयादशमी सारे भारतवप मे स्कूलो म । जब हम पव मानत हैं तो हमको इस बात पर दृष्टि रखनी चाहिए और विशेष रूप से सामाजिक तथा धार्मिक पर्वो म-कि कोई एसी बात न हो जिसमे किसी की भी धार्मिक भावना पर चोट पहुंचे। हम उन पर्वो का भी मनावें जो सामाजिर तथा पार्मिक दृष्टि स भिन्न हो, और इस प्रकार सहिष्णुता का पाठ साखें । इन पों की उत्तम बाता को बिना किसी पूर्वाग्रह के उमुका मस्तिष्क से ग्रहण करें। पह्न का तात्पय यह है कि विद्यालयो म हम पर्व त्योहारों को सम्यक भाव से सम्यक आचरण द्वारा सम्यक तथा सा वन शिक्षा के लिए सम्पर ढगस मनायें।
३५ हमने अपर दिखलाया है कि कितने प्रकार के पव हमारे यहाँ हैं और पहें किस प्रकार विद्यालया म मनाना चाहिय । अब आगे हम प्रत्येक प्रकार में पर्वो को लेंगे, पयों से सम्बद्ध विपि बातों को बतलायेंगे और उस सम्बध की अगर कोई विशय धात हामी तो उस पर भी प्रकाश डालेंगे। पों पर प्रकाश डालते समय हम सत्र के प्रारम से रेकर सत्र अल तक चलग और बीच बीच म पनवाले पदों पर प्रकार हालते धरेंगे। हमारा यही मम रह्गा जिसस विद्यालया म पद मानने म मुविधा हा ।
1 १-नव वर्ष हमारे यहाँ सत्र प्राचीनकाल म श्रावण की सप्तमी से प्रारम्भ होता था और हम उसे थावणी पूजा कहते थे । विद्यार्थी गुरुकुल म आते थे और नाम लिसाते थे। गहस्थी के सारे काम ममाप्तप्राय हो जाते थे। इसलिए गहस्य भी गुरुकुल में चतुर्मास व्यनात करते थे और इस प्रकार अपनी भूली हुई विद्याओ का पुन सस्कार करते थे। परतु अब स्कूल के सत्र उस दिन से प्रारम्भ नहा होत और न चैत माम के गुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही नया सान प्रारम्भ होता है जिस दिन पौराणिक प्रथा के अनुसार सष्टि का प्रारम्भ हुआ था । अब हम साल के नए दिन का जग्रेजी महीना के अनुमार मनाते है और जनवरी के पहले दिन स सात वा प्रारम्भ होता है और उसी दिन साल का पहला दिन होता है। विधान स्कूल का वदनवार और पताकाआ से सजाना चाहिये । मुख्य द्वार पर मेले का पड गाड कर मिट्टी म जन भर देना चाहिय । कुल- पति वा पता होनी चाहिय और मगीत तथा वाद्य का आयाजन होना चाहिय । विरोप प्रकार का सुचिकर तथा पौष्टिक भाजन करना चाहिय । अगरेजा पद्धति के अनुसार नववप का प्रथम दिन जनवरी महीन की पहली तिथि को ही माना गया है। यद्यपि इस दिन राज्यस्तर पर मरकारी घट्टी रहती है और प्राय विद्यालय आदि बद रहत हैं। फिर भी आवासीय विद्या- लया में छात्र तथा छात्रावास व छात्र पहली तिथि का भी उत्सव मना सकते हैं। या तो विद्यालयादि २ जनवरी का प्राय खुल जाते है और सभी लाग अपन-अपन काम पर जुट जात हैं। नवदप के दिन-नवयप मुखमय व्यतीत हो इसके लिए प्रत्येक छात्र को अपन साथियों के प्रति नववप वी गुभकामनाए प्रकट करनी चाहिए । उस दिन सयम हृदय सातकर बातें करनी चाहिए। एक-दूसरे के प्रति मगल कामना का आवागा रखनी चाहिए। विमीय हृदय पर बातचीत से या कटु व्यवहार से चोट नहीं पहुंचानी चाहिए। गुरजना के प्रति श्रद्धा के साथ अभिवादन के हाथ उठाने चाहिए। उनमे भी छात्रा का आगीवचन प्राप्तकरना चाहिए । परिवार ये बच्चे, माता पिता एवं बय बडे लागा ये माथ मृदुल व्यवहार रसना पाहिए । इसस पात्रो को शिष्टता प्रकट होती है। - पुरानी मान्यताएं-नववर्पोत्सव चाहे जिस रूप म, जिस तिथि को, जिस महीने म मनाया जाय, लक्नि सबा का एक ही उद्देश्य रहता है कि वप का प्रथम दिन अगर आनन्द पूवर बीत गया, तो फिर वप के सारे दिन आनन्द पूण बीतेंगे । यही हमारे यहां की सस्कृति की परम्परागत मा यताएं रही हैं । अंगरेज लाग भी प्राय इसी को मानत हैं । सचमुच वप का प्रथम दिन बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। हम उसरी महत्ता को टुक्रा नहीं सकते। हमारे पूवजा ने भी किसी-न विमी प म इमको मा यता दी है। भले ही उसके विधान तया मनाने व ढग की प्रक्रिया विभिन्न ढग वो हो । शिक्षको का पतध्य-विद्यालय के शिक्षको का भी क्त्तव्य है कि ये अपन वग के छात्रा का नववर्षों मर के अवसर पर अपन विचारा से उन्हें अवगत करायें और उसकी विगए प्रक्रियाओं को समझाए । निसम यह ग्नि यात्रा के दनिक जीवन म एर रणा-यात का काम करता रहे।
२३ जनवरी : सुभाप जयन्ती भौगोलिक अवस्या-बिहार राज्य में सटे दक्षिण म उडीमा राज्य है। पहले विहार और उडीसा दोना प्रात सयुक्त था । उडीसा की राजधानी क्टक है। क्टक महानदी के तट पर यमा हुआ है। इस क्टक हर म रायबहादुर जानकी नाथ वाम रहते थे । ही के पुत्र श्री सुभाष चद्र बाम थे, जिनका जम १८९७ ई० की २३ जनवरी का हुना था। राजनीतिक अवस्था-जिस समय मुभाप वाद् का जम हुआ था, उस समय देश पराधीनता की वडियो म जबडा हआ था। भारतीय राष्टीय काग्रेस का जम १८८५ ई० म हो चुका था। देश म थोडी बहुत राजनीतिक चेतना था रही थी। जीवन वत्त-वाल्यकाल से ही मुभाप विचित्र स्वभाव के थे। उनके पिता जानकीनाथ बास क्टक की नगरपालिका तथा जिला परिपरक प्रधान एव नगर के मधावी और गण्यमा य वकीला म थे। सुभाष बाबू की माता का नाम प्रभावती वोस था। यह कट्टर धार्मिक विचारो म विश्वास रखने वाली सरल सहृदय स्वभाव की सीधी साना महिला थो। सुभाष बाबू की पांच बहनें और छ भाई और थे। इनम से सभी भाइया ने अपने-अपन क्षेत्र म स्याति प्राप्त की। सुभाष का उनकी मां मुबी' कहकर पुकारती थी। प्रारमिक शिक्षा-सुभाष को प्रारभिर शिक्षा एव' यूरोपियन स्कूल म हुई। इस सूल व प्रोटेस्टट वातावरण का वालर सुभाप के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा। घम के नाम पर जो ढाग और दिसावा चलता है उमम सुभाप की आम्था कभी नहीं रही यद्यपि वह स्वय प्रकृति स धामिर व्यक्ति थ। जीया भर उहोंने ब्रह्मचय का पालन किया। स्कूल म प्रथम वग म प्रतिका परामा म उत्तीण हावर वह 47वत्ता पहुचे । मन १९१३ ६० म उहाँने करावना के प्रेसीडे सी वाज म नाम लिगाया । इम काज म उनी पढाई अधिन दिन नहीं चा क्योकि एसाएर उनरा मन आध्यामिक पुत्तिया की ओर चला गया। उहाँने सोचा कि वह भी स्वामी विवकानट के समाा आध्यात्मिा गस्ति उपाय करके विव म एक चमगार प्रगित वगे। ही विचारा वे भाव प्रशह म वपर वह सालह-सत्रह वप की आयु म हो बिना किसी को सूचित क्यि हिमालय की आर गुरु की साज में मन दिय । कहते हैं इस मौन-स्याग स उन्हें गुरु ता नहीं मिला पिन्तु स्वामी विकानद का सान्निध्य अवश्य प्राप्त हुआ, जिसस रामकृष्ण मिशन के बारे में कुछ जान उन्हें मिला। छ महीन ता सार भूमन के बाद जब स प प दान न हुए मोर न पाई गुर ही मिला, तव मुभाष विपत व्यविमूढ हार अपन पर लाट आप । वे अपनी मां व वरणा में पड गये । अविरल अथ धारा बहती हुई मान येश या ग? लगाएर कहा- सुचीतून ता मुझ मार ही माना था।" मुभाष वार पर जोर डाला गया मि वह इगल ड जावर आई. सो. एम० को परोगा पास वर मायें । मभाय धावू व न हन पर भी यह परना पहा । अगस्त १९२०६० में आपन नाई० सी० एस० को परीभा में उनीण हा गय । पराला पाम बरन पर उहान घर पर एक पत्र निमा--भाग्य स में म परीगा में उत्ताण हा गया हूँ। परतु में अफगर यनूगा या नहीं, मह मैं नहीं वह माता । मुश्प लगता है रि मैं अपन दश और मिटिंग सामान्य दाना बी सवा साथ नहीं पर सवत्ता । नीष ही मुन दोना में म एक या चुनना होगा। और सभाप न सुममय निगम के जीवन को टुबरा घर दामेया या रठिन माग अपनाया और त्यागपत्र विटन स्थित भारत सचिव श देवर भारत रौट आये । बम्बई आन ही आपन उसी नाम का (१६ जुगाई, १९२१ ई०) मणिभवन में महात्मा गांधी रा मिल और रंग भए एकपटता उनी राजनीतिर बातचीत की। बालिग दौराा में हा पुरसत म कृष्ण ५ पुजारी समाय न वापू म यहा था-- असहयोग सा मरी गम में जाता है, सरिन यह अहिमा श्या है। अहिगा थय पर ही गांधीजा सनरा मदा मन रहा। यह राजनीति में अदिगा या बाई स्थान मानन य लिए पार नहीं मारे दाय धु कितावा पो अररा राजनानिय गुर बना । मुभा प्रमा- • तिहार - बार न ह'नानन पान नाप चलाता गा प्रिन्सिपर मागिया । यह यात रान यआरया है कि यह बात उन विधारिया for freeरा गया था जिस जगपाग में मानव पारपसरलाराममनित ाि गया पा।
सार्वजनिक जीवन मे-सुभाष बाबू को सावजनिक आदोलन में भाग देने का पहला अवसर तव मिला जब २५ दिसम्बर, १९२१ ई० को प्रिन्स आफ वेल्स क्लक्त्ता आये । सार देश में एक स्वर से उमके स्वागत का विरोध किया गया था। क्लक्त में इस विरोध प्रदशन का नेतृत्व दाम बावू और सुभाष बाबू ने किया । इस प्रदन व भियाग में सुभाष बाबू को छ महीने यी पद की सजा मिली। यह आपकी प्रथम जेल-याना थी। ३३ वप की उम्न में सुभाष वावू कलकत्ता के मेयर और सन १९३८ ई० में काग्रेस के अध्यक्ष चुन गय । पुन १०३९ ई० में महात्मा गाँधी के विरोध 'बावजूद वे काग्रेस के अध्यक्ष चुने गये । परतु कुछ ममय के बार काग्रेस के सिद्धात मे मनभेद हो जाने के कारण जापन काग्रेस छोडकर नया दल 'फारवड बनाव की स्थापना की। आजाद हिंद फौज और सुभाषच द्र बोस-भारतीय सुरक्षा अधिनियम के अनुसार जुलाई १९४० ई० में सुभाष बाबू को गिरफ्तार करक कारावास में वन्द कर दिया गया । परतु वहाँ अस्वस्थ हो जाने के कारण बाद म उहें घर पर जरबद रखा गया । २६ जनवरी १९४१ ई० का नेताजी एक अनासे ढग से वहाँ में निकल पडे और विभिन देशा म उत्तरी भारत अफ्गानिस्तान, रूस तथा जमनी का भ्रमण करते रहे । जुलाई १९४३ ई० में उहांने दक्षिण- पूर्वी एगिया में साठ हजार भारतीय सनिका से सगठित आजार हिद फौज ने नेतृत्व का भार अपने हाथो में लिया जिसका सगठन भी रास बिहारी बोस न मितम्बर, १९४१ में किया था। यह पोज रास बिहारी बोस का भारतीय स्वतत्रता प्राप्ति क सहायताय मिनी थी। इसमें व सनिक थे जि हे जापा- निया न अंग्रेजो को हराकर दी बना लिया था। सेना मचालन के अनुभवी न होन पर भी मुभाष बाबू ने अपन अपूर्व व्यक्तित्व सगठन-ममता तथा जोग पैदा करन वाले हृदय वेधी भाषणा व वल पर आजाद हिन्द फौज को और भी प्रवीण बना डाला । इसका परिणाम यह हुआ कि आजाद हिंद फौज ने निणय तथा दृट हाफर वठिन-स-कठिन युद्ध का भी सामना किया। वर्मा की लडाई में आजाद हिंद फौज ने मुभाष यादू के नेतृत्व में अपनी वीरता का परिचय रिया और तत्प'चात धुछ ममय के लिए यह सेना आमाम तक पहुंच गयी। इस पोज ने कुछ समय तक मणिपुर और ऐशवपुर में काय पिया । परतु रमद अस्त्र गस्त्र पराजित जापानिया को महायता इत्यादि के अभाव के कारण आजाद हिंद फौज का मित्र राष्ट्रा सामने अपनी हार कबूल करनी पड़ी।
कुछ लोगो का कया है कि जापान रे आत्म-समपण (१४ अगस्त, १९४५
ई.) में कुछ समय उपरान ही हांगकांग के पास वाई-दुघटना के कारण
सुभाष बाबू की मृत्यु हो गयी।
प्रश्न
(1) मुमार रादू का जाम कर और किस परिस्थिति में हुआ।
(२) मुभाष बाबू न कहाँ सक शिना पारयो ।
(३) सनान न जो सरकार को नोसो क्या न को!
(1) मुमार गाव सावजनिक जीवन में क्व धाय ?
(१) गाधी जी से उनका मनमद किम लिए हुआ।
(1) मुमाप बाबू ने देश की स्वतंत्रता क लिए क्या किया।
(७) मुमार राव के कार्यों स या शिक्षा मिलती है।
(E) नताजी के जीवन पर मक्षिप्त प्रकार हालिय।
२६ जनवरी भारत में ब्रिटिश राज्य को कालो काली घटाए छा चुकी थी। स्वतत्रता को माग थी। सरियो की गुलामी का दिया जो वास्तव में १५ अगस्त, ४७ को टटी और भारत जगरजी शासन म मुक्त हुआ। लेकिन हम गणतत्र दिवस २६ जनवरी को मनात है। २६ जनवरी के पीछे वास्तव म भारतीय स्वतनता वा एक करुण इतिहास छिपा हुआ है । यह हमार त्याग हमारे उत्सग, हमारो महादत का सवेदनापूर्ण इतिहास है। उसका कारण जानने के लिए भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास पर एक दप्टिपात करना होगा। २६ जनवरी खुशी का दिन है । उस दिन वर्षों की तपस्या पूरी हुई । उस दिन कराडा की आशाए पूरी हुई । सरिया के बाद भारत की सारी जजीरें क्ट गई । जिस दिन के लिए हजारो भारतीय हसते-हसते फासी के तख्ते पर यूल गए, वता का मार साई परतु उफ तक नहीं की, जिस दिन की प्रतीक्षा म लावा जेल म सड गए, वही दिन है २६ जावरी। भारतीय स्वत पता के सग्राम का श्रीगणेश या ता १८५७ ई० से ही हो गया, पर कांग्रेस की स्थापना स भारत म महात्मा गांधी के नेतृत्व म अहिसा त्मक सग्राम फिर गुरु हा गया। शन गन देश म जागरण आया। सुपुप्त जनता न फिर से जगडाई ली। १८८५ ई० म जब कांग्रेस की स्थापना हुई उस समय यह एक सामाजिक सस्था मात्र थी । जव कनवत्त व काँग्रस वा २२वा अधिवेशन दादा भाई नौराजी की अध्यक्षता म हआ तो उस सस्था म सवप्रथम राष्ट्रीयता की भावना आई और विदगी वस्तुआ का वहिवार प्रारम्भ हुआ। इस प्रकार वांप्रेम म राजनीति का प्रवेश हुआ और यह राजनीतिक मस्था बन गई। धौर घोर इसने प्रगति की और औपनिवगिर स्वराय की मांग की। यह मांग १९२१ ५० तर चलती रही। १०२८ ई० म कांग्रम का महत्वपूर्ण अधिवेशन पडित मोतीलान नेहर की अध्यशता म वक्त्ता म हुना। उम अधिवान म इम प्रन पर विचार दिया गया मि मवदनीय पांग्रम द्वारा प्रस्तुत नेहरू रिपोट के अनुमार औपनिवगिर स्वराज्य का अथवा पूण स्वाधान्ता का ध्यय बनाया जाए।
श्री सुभाषचन्द्र बोस तथा पडित जवाहरलाल नेहर आदि नवयुवक नेता पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष म थे। रेविन बांग्रेस के वयोवृद्ध नेतागण औपनिवेशिक म्वराज्य तर ही अपनी मांग सीमित रखना चाहते थे । अन्न म महात्मा गांधी ने दोना दनाम समझौता कराया और मवसम्मति से औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग की अवधि ३१ दिगम्बर १९२९ तर रखी गई। इम धापमा से भरडापर त्रिटिश मरवार ने १ नवम्बर १९२९ को पापणा की दि भारत का औपनिवगिक स्वराज्य दना अग्रजी शागन का सध्य है। और एमरे लिए भारतीय नतामा वा एप मालमज पास (Round table Conference) आगामी अप्रैल तथा मई माह म हागा । लेविन म घोषणा रा विमी का मतोप नहीं हुआ और राहौर-बांग्रम न रावी र पुनीत नट पर प० जवाहरल नहर की अध्यक्षता म यह घोषणा प्रमारित बी- यदि ब्रिटिश सरकार औपनिवरि पराज्य देना चाहे ता ३१ दिसम्बर, १९२९ मे १२ बज रात तर अर्थात १लो जनवरी १९३० में लागू होन भी प्रया घोषणा पर अन्यथा १ला जनवरी १९३० स हमारी मांग पूर स्वाधीनता होगी। इसी पूर्ण स्वाधीनता की मांग समथन म २६ जनवरी १९२० का रविवार दिन सारे भारत म राष्ट्रीय श य नीर जुलम निसाना गया सभा की गयी और प्रस्तार पास पर प्रतिताएँ को गयो नि जव तर हम पूण स्वाधीन न हाँगे उर र हमारा स्वनमा-माम चलता रहेगा। नादिया, टण्डा, सापा, पिम्तीना और बझाम मजा हुई फोमें और पुलिस स घिरे रहने पर हमन प्रतिवप इस स्वतता विस वा अपनी पूरा बता समाप या दुहराते हा मनाया और इम शिवम का मनाने म मनेर पूना न स्वना की वेदी पर हंस-हमार रक्तनपण रिया । और १९० ग प्रति पप हा २६ जावरीमा राष्ट्रीय पर्व प म मनाते जा रहे हैं। १५ अगस्त, १९४७ था जब विग्न न सुत्ता भारतीयारा हम्नारित की तयाको योपनिविय मिना ! निरा राजा भारत रामनार बना रहा। ति २६ उनारी, १001 भारत में पूरा सता का पापणा और गाय मापा निरराया भारत साप पुराना गाम मर गया। भारत या नर्वोच्च पर पनि नाम म पुरा जान मानार पर जनता द्वारा नावित विपापिका-ममा म सम्या 1- शुभ नाम 'हम वितन सुख सपने लेकर इसको पहोते हैं। इस थडे पर मर मिटन की क्सम सभी खाते हैं । हिन्द देश का यह यडा घर घर में लहरायगा । ऊना मदा रहेगा । -रामदयाल पाण्डय इसके बाद कुछ नारे लगान चाहिए । पुन पिसा यक्ति द्वारा इस झडे वा इतिहास और इस २६ जनवरी का इतिहास दुहराना चाहिए। अन्त में राष्ट्र गान (जन-गण मन) के साथ सभा विघटित करनी चाहिए । राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता। कामरूप, पजाब मराठा द्राविड उत्कल बगा । विध्य, हिमाचल यमुना गगा उच्छल जलधि तरगा । तब जागे तब शुभ आगिप मांगे गाए तव जय गाथा जन गण मगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता। जय है जय हे, जय हे जय, जय, जय, जय हे भारत भाग्य विधाता। इन सभी कायकमा के उपरान्त किसी जगह छाये में बटकर कम-से-बम २ घटे तक भूपयन चलना चाहिए । फिर सूप-यम समाप्त होने पर भारतीय स्वतत्रना मग्राम के इतिहास का सना के समक्ष रखना चाहिए और तब छुट्टी हो जानी चाहिए। शाम के समय सूर्यास्त के बाद अद चदार अवस्था में सावधानी के साय सडे होकर पडे रानीचे उतारेंगे। घड़ा उतारने के पूर्व प्रडा नमस्कार गान गाना चाहिये। सभी का अपने सर को ढके रहना चाहिय । अन्त म जन मन गन साथ बहे को सम्मान पूक लपट कर रख देना पाहिये।
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निक्षा ...उस दिन हमलोग अपनी पुरानी प्रतिनाया को दुहरात हैं।
स्वतत्रता या मदा मादा बनान की प्रतिमा परल हैं। दा
लिए मभी
चीजामा उत्मा करन क लिए पार रहत है। महापुरषा के चरित्रो से
प्रेरणा ग्रहण पर अपने का भी उसी तरह बनान यो चटा करत हैं । इस अव.
मर पर दूमरे दा व स्वतत्रता संग्राम का भी तुलनात्मक अध्ययन हाना चाहिए।
हिमर और महिसर मग्रामा का भी विवचन हाना चाहिय । अहिसा ढग के
सग्राम की विपनामा पर मा प्रकाश डालना चाहिय ।
१२६ जनवरीमा मारतीय इतिहास में क्या महत्व है।
२ २१ जनवरी का क्या इतिहास है।
३ मंहको निभ प्रकार और कैम पहराना चाहिय।
४ इम दिवस मनान की पूर्व तैयारी करो!
५ राष्ट्रवन पाराने का नियम स्यारे!
२८ जनवरी लाला लाजपत राय जयन्ती पूर्व तयारी –जयन्ती के दो दिन पूर्व ही इसकी सूचना सभी छात्रा एव शिक्षा को दे दी जायगी। जय ती के दिन मफाई होगी। छात्र एव पिशव निकट के गाव म जाकर सफाई करेंगे। आज सूत्र-यन या कोई उत्पा दक चाय कुछ विशेष तौर पर होगा। वर्गों के वर्गाध्यापक लालाजी के बारे में कुछ नात बातें बतलायेंग। अन्त म सभी को एक सम्मिलित गोष्ठी हागो। छात्र इसम निवघ पढेंगे प्रहमन प्रस्तुत करेंगे। उनके सस्मरण कहग और कविताए पटेंगे। मिक्या के इतिहास पर भी प्रकाश डाला जायगा। लालाजी के जीवन से सम्बद्ध उस समय देश की राजनीतिक घट नाआ पर भी यत्र तत्र प्रकाश डाला जायगा । ततोगत्वा प्रधानजी का भाषण होगा और बाद म गाप्ठी विघटित कर दी जायगी। जम स्थान का परिचय -लालाजी का जम पजार म हुआ था। पजाय देश के उत्तर पश्चिम के काण पर है। पजाव पाच नदिया स वना है। ये नदियाँ रावी, झेलम मतलज व्यास और चनाव है। इही नदिया के पांच पानी के कारण इनका नाम पच+ आब-पजाब पडा। यहाँ वर्षों अत्यन्त कम होती है। वितु इन नदियो । मदान म गहू बहुत पदा हाता है । पजार के लोगो का मुस्य भोजन गहू हा है। यहां के लोग बह ही हृष्ट-पुष्ट और बलवान होते हैं । यहाँ के निवासिया के अधिकाधिन मिक्स धर्मावलम्बी हैं। आजकल पजाव के दा हिस्स हो गए हैं। पूर्वी पजाव और पश्चिमी पजाब । पूर्वी पजार भारत म है और पश्चिमी पजाब पाकिस्तान म । पूर्वी पजार को राजधाना चडीगढ है । पजाब में अमृतसर में सिक्वा का स्वण मदिर बहुत ही विख्यात है। पजाब में ऊन और पसीनाराढ़ी का पाम बहुत अधिक होता है। देशको राजनीतिक हालत --देन परतत्रता के शिरजा में जकड़ा था और स्वतत्रता सिर घुन घुन कर रा रहा थी। देश का जर्रा-जर्रा गुलामी की दुहाई दे रहा था। सवन स्वतत्रता की मांग थी। सारा देश अग्रेजा थे शासन में चल रहा था। कोई उसे प्राण देने वाला न था। गोरे मनमाने ४९ ढग स पासन कर रहे थे। चारी और अत्याचार का ही बोलवाला था। हिन्दुस्तानियों की यही पूछ न थी। लोग कहते भी ता सुनता दोन ? वडे- बडे लोग, राय वहादुर और सर की पदवी रे फूल रह थे। एमी असहाया- वस्था में देश के ऐस व्यक्तिया की आवश्यक्ता महसूस हुई जा इन दुसिया के दुखड़ा को सुने और उह सुगति या समाग दिखलावे जिस पर चलने से देश परतत्रता को बडिया म न रह वर उमुक्त वातावरण स स्वतत्र रूप से विचरण परे । एसे ही समय में लाला लाजपत राय का इस भूमि पर पता- पण हुआ। जीयन वृत्त -नालाजी का जम २८ जनवरी, १८६५ ई० में ननिहाल में निरोजपुर जिले के ढोटिग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम राधा- कृष्ण था। उनके पिता एव सरकारी नौकर थे। ६ वप की अवस्था में लालाजी ने स्कूल का प्रथम दान दिया। १८८० ई० में उहान इस की परीक्षा पास की। बाद में रहे छात्र वृत्ति मिलने लगी और लाहौर में आरर गवनमेंट कालेज में एफ० ए० में अपना नाम लिसवाया। यही पर उन्होंने एफ० ए० को परीक्षा पास की। पिताजी की राय स उ हाने मुस्तारी की परीक्षा भी दी। उसमें भी व सफल हुए। साताजी में सावजनिक सेवा करने की बडी तीय प्रवृति थी। इस साद- पनिर सेवा की ओर प्रवत परन वाला में महर्षि दयानन्द का सबसे बड़ा हाप पा। हा से प्रभावित हाकर उनि आय समाज को ग्रहण रिया और उसी स उनने हृदय में पाप हुए समाज-सवा की बीज अनुरित, पल्लवित और पुष्पित हुए। एम० ए० को परीक्षा के बाद होने वकालत को परीक्षा दी शिन्तु अस पस हा गए । अत अपने गांव नगरॉव में मुस्सारीपरने लगे। दूसरे वप भी पसर गया अन में १८८५ ई. में वकालत की परोगा पासको। १८. ८६० में रहोंने हिमार म रात गुरु पर दी। दालन मारहें पूरा सफल सता मिनी। ये एप प्रसित वील हो गए। 4 मूट जालसाजी मे मुस्दमो को नहा सेत । स्वामी दयानन्द की मृत्यु रे बा १८८६ में साहौर में होने दया. म एनो 4दिक (० ए. भी.) पारेन की स्थापना की।
- सन १८८८ ,ई० के कांग्रेस-अधिवेशन में, जो इनाहाबाद में हुआ था, लालाजी पहली बार सम्मिलित हुए थे। उसमें इन्होने कौंसिलो को बढाये जाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था और कहा था कि कौसिला में लोगा की आवाज हानी चाहिये । अब लालाजी लोकप्रिय नवयुवक नेता बन-गए। १९०५ ई० के बनारस में हुए कांग्रेस अधिवेशन में लालाजी एक प्रमुख वक्ता और राष्ट्रवादी के रूप में आए ! १९०६ ई० में गोखले के साथ के शिष्ट मडल में विलायत गए । वहा से लौटने पर लोगों ने कहा कि स्वतप्रता प्राप्ति के लिए आत्म निर्भरता अत्यन्त आवश्यक है। १९०६७ ई० में उहाने क्सिानो की दगा की कडी जालोचना पजाब सरकार से की। फलस्वरूप उन्हें देश निर्वासन का दण्ड मुगतना पड़ा। इहा दिनो गांधी जी द्वारा चलाए गए अफीका वे सत्याग्रह के लिए गोखले के साथ बहुत-सा धन इकटठा दिया। अत १९१४ ई. तक अमरिका में उह निर्वासित जीवन बिताना पटा । १९१७ ई० में तम्ण भारत (Young Indra) नामक पुस्तक भी लिग्बी जिद भारत मरकार ने जन्न कर लिया परन्तु अमेरीका और इगलण्ड मे इस पुस्तक की वडी प्रसिद्धि हुई। बाद म उहाने 'England's debt to India' नाम की पुस्तक लिखी। १९२० ई० म उह कांग्नम विशेष अधिवशन का सभापति चुना गया । उसमें असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव रखा गया और पजाव में इस कार्यावित करने या कायम निर्धारित किया गया। इस अधिवेशन में लालाजी ने कहा था „We desire to turn our Jaces away from Govt House and turn to the huts of the people' १९०५ ई० में कलकत्ता में हुए हिंदू महासभा के अधिगन पा सभापत्ति निर्वाचित हुए थे। ये पक्के राष्ट्रवादी थे। दश के काम में व कभी भी पीछे नहीं रहे। सन् १९२८ ई० में माइमन कमीशन लाहौर पहुंचा तो लालाजी ने विशेष प्रदर्शन या नेतृत्व किया। इसमें एक गोर सजेष्ट न इन पर लाठी प्रहार किया और इसी लाठी महार से उनकी मृत्यु १७ नवम्बर, १९२८ ई० के ६॥ यजे सुबह में हो गई । मालागी को पंजाब केसरी कहा जाता था। वे बहुत ही ओजस्वा और गलि भाषण दत ये । लालाजी पर जिस दिन लाठी प्रहार हुआ था उस दिन उहोंने बडी जागीली वक्तृता दी थी और कहा था मर गरीर की लगी हुई एकता की पाट ब्रिटिश साम्राज्य के गवाधार के लिए एक एक वीर और वफ्न या एक एक धागा होगा।" लाहौर से प्रकाशित होने वाली दैनिक पत्रिका
'वदे मातरम्" में उहाने अपने विषय इस प्रकार प्रकट दिए मेरा मजहब
हक परस्ती, मेरी मिल्लत कोम परस्ती, मेरी अदालत मेरा अन्तकरण
मरी जायदाद मेरी कसम"
लालाजी के सम्बप में एक पवि ने अपने विषय इस प्रकार प्रकट
।
दिए थे-
-
मरद महान मत्यवान में भो मानवान
रगता हमशा ही जा भाव महामानी का
मानीन्या अपार पर गुमान लवर न था-
गान पी निराली या नमूना जिन्दगानी का
लाजपत रसना था लाजपत वारा की
परता हमला काणी' दशाभिमानी का-
हाय! हाय लुट गया दिनही दहाटे वह
साना पाच पानी वा मरद एव पानी का।
शिक्षाएं मामी और रिवर बनना चाहिये । बोलन को बना सोपनी
चाहिय । दार लिए यनि प्राणा पी वनी देनी पडे ता पीच मुख नहीं
माडना चाह्यि । विमी भी काम में पीछ नहीं रहना चाहिय । सार कामा
को अच्छी तरह पूरा करना चाहिये । यदि विमी वाम या सौंप दना चाहिये
ती उग अपना समझ घर परना चाहिये । माजिनिर वा सा करनी
चाहिये।
मन
१ रागनी के समय म दश की रानीतिर बास्यात्रामवर्णन करो!
२ लानाजी नावन पूत मनुनकरो।
३ सामनरमारन के बारे में न हो?
१ पर रिमतिर मारतम पापापा धराया साल मुषा!
३ लावामा कमोवन स कौन-कौन सीरिता मार करना
३० जनवरी -गाँधी पुण्य-तिथि मौगोलिक अवस्था महात्मा गांधी का जम गुजरात के पोरबन्दर नामक स्थान में हुआ था। गुजरात के तीन तरफ समुद्र लहराता है और इसके एक ओर जमीन है। गांधी जी के जन्म स्थान से कुछ ही दूरी पर समुद्र है । यहां कोई अधिक मात्रा में वर्षा नहीं होती। साथ ही किसी और चीज की भी अधिक पैदावार नही है। वहां की मुख्य पैदावार ज्वार और अरहर है । राजनीतिक अवस्था-जिस समय गांधी जी का जम हुआ था उस समय देश में आजादी की लहर पल चुकी थी। उस आजादी की लडाई म देश के बडे-बडे नेता मम्मिलित थे। देश में पातियां हो रही थी लडाई हो रही थी। हिदू मुसलमान और काले गोरे, ऊंच-नीच और बहे छोटे का प्रश्न था। इस समय देश को एक ऐस व्यक्ति को अत्यन्त आवश्यक्ता थी जो इन सभी भेदो को एक कर सत्य-अहिंसा का मार्ग अपना कर देश का इन झगडो स और गुलामी से मुक्ति दिलाए । लागा के मन में यह धारणा बन गई थी कि देश को एक एसे ही व्यक्ति की जबरत है। महात्मा बुद्ध के भरे हुए २५०० वर्ष से अधिक हो गए थे। उनके सत्य और अहिंसा की शिमा जो उपनिपद काल से प्रारम्भ हो पुन युद्ध के समय में अधिक हो गई थी, इस समय धीमी पड गई थी और भारत ही नहीं बलि विश्व के सारे देश पय- भ्रष्ट हो, ईया-द्वेष की अग्नि में जल रहे थे। ऐस ही अवसर पर १९०५ ई. में बग भ ग हुआ और देश में हिमा और घृणा की लहर फैल गई। शासक भी अधर्म और शोषण तथा विग्रह विभाजन तथा फुशासन की नीति का पालन कर रह 4 और शासित भी हिमा, घणा, अराजकता बौर भवत्य के मार्ग पर चल करके विपस्य विपमौषधम् के सिद्धान्त की पूर्षि पर रहे थे। भगवान श्री कृष्ण की ओजस्वी वाणी ' यदा यता ही धर्मस्य गलानिर्भवति भारत" तिरोहित-सी हो रही थी। उमी समय महात्मा गांधी का पदार्पण भारतीय रगमच पर हुआ। इहोंने यह बतलाना प्रारम्भ किया कि पैर का नाग प्रेम से होता है और हिमा का नाश अहिसा मे होता है । जीवन वृत्त ~विश्व के इस दव विभूति ने २ अक्टूबर, १८६९ ६० के गुजरात के काठियावाड के पोरबन्दर नामक स्थान में वैन्य परिवार के आंगन में विश्व का प्रथम दर्शन किया। पोरवादर का वह छोटा-सा पर चमक उठा । सारा परिवार नृश्यमृत्य हा वठा । इनके पिताजी का नाम वर्मवर गांधी और माना या नाम पुनली बाई था । इनके पिताजी राजकोट रियामत दीवान ५ । बचपन में ही सत्य रिश्वर नारर दसने से इनपर हरिश्चन्द्र ने गुणो का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और य उसी समय से परम सत्यवादी वन गए। १८८७ ई० में इहनि प्रबगिया परीक्षा पास की। इगह में इहाने 'हारटपुल से व रिस्टरी पाम की और अपने दा में इसका अभ्यास गुरुः किया । य बटे ही जानु स्वभाव 44। यत परिस्ट्री में ये सफल न हो सब। यन रेन प्रकारेण य व रिस्ट्रो वरल रह। चन दिना र पचान् उहें पोरब दर की एक व्यापारी सस्था अदुल्ला एण्ड कमनी' में ए नए मुर- বণ # জঙ্গি আসা ধা। চাদা দি ম বা সংশ মা नीय पीडित पे। भारतीया पर हा अत्याचारा को देर उनका दिल दहल उठा । उहान वहाँ या बटु अनुभव प्राप्त किया । और वहाँ के भारतीया को जगान का मढ़ मकल्प दिया । यहा पर उहाने मवप्रयम अहिमात्मा मत्याग्रह स्पी अमोघ सम्म मा दान दिया और उसका प्रभाग राजनीतिक क्षेत्र में मामूहिक रूप स परना प्रारम्भ किया और व मा सर दूर पडे राजनीति की भयर मपपल्याला में । १८९२६० १९१४ ई. तर प्रवासी भारतीया के लिए पुर परत । १९१४ ३० में य भारत लौट साय और यहाँ र निवानिया का नव जागरण वा सदा सुनाया । अमावार में बहाने एक गारमता आपम की स्थापना यो। मारत में रिमाना की रक्षा में लिए निलहे गारा व अपापारा में विरद्ध भख मार दिया। इसमें तात और अभूतपूर्व मप ना मिली । मन् १९२१, १९३० १९४०, १९४२ आनालना रानात गांपा जी न रिया । अनर बार महान जेल में शिरजों को साहा। जा अपार कष्टो वाला पहा लाटिया को मार पी। हिनि भएना मार्ग नहीं हाडा अपन त पर मदत रहे। सामानि याद में मापारिक्ताशी AT पातामण उटी। गग मामा पेलि में बदा मार पहुंचा। इहाने देश विभिभागान र उम भमरता माना या मान रन की घेष्टा का रिनु भालक हम दोयमान नभर का, ३० नवरी, १९४६ को सपा नाम ५ बार ४७ मिनट पर विमा मन निरमायना-मना में एर पय ट नापूराम गारम ने साम्प्रापिर उन्मार में मार हया पर ६४ । सदा के लिए बुझा दिया । समुज्ज्वले चद्र अस्त हो गया जिसकी। दुग्ध यवल, शीतल चाँदनी में सारा भारत विश्राम करने जा रहा था। ठीक ही कहा गया है-- 'रे डूबता है एक पापी नाव को मगधार में।' उसने भारत के सार सुख सपना को जो सदिया के याद साकार होने जा रहे थ, मिट्टी में मिला दिया। गांधी जी की इस नृगस हत्या पर सारा विश्व रा पड़ा और ना जानेवाला युग ३० जनवरी को अथ मुक्ताओं के रस में अर्जाल प्रदान कर सदिया तक पाप प्रान्छालन करता रहेगा। गांधी जी के नष्ट हाने से केवल भारत को ही नहीं वरन सारे विश्व को गहरी क्षति हुई । ये एक तपे-तपाय नता ये । मझधार में पड़ी भारत की डूबती उतराती नया के ये सेक्या थे। ये उनतमना थ। ये अपने सिद्धान्त के बडे पक्के थे। इनक राम रोम से सादगी टपानी थी। जन सेवा करना ही इनके जीवन का सफल व्रत था। उनका आदोलन सदा सत्य और अहिसा पर आधारित था, जो भारत की अमहाय और निरीह जनता के लिए एक सफल और सवल रास्ता चलती हुई नाव वी पाल की तरह था जो उह निदिष्ट दिगा की ओर र चलता था। ये जनता-जनादन स्वरूप थे। ये साधन और साध्य दोनो की पवित्रता पर ध्यान देते थे। ये सत्य अहिसा के प्रतीक थे। महात्मा गांधी युग युग तक वन्दनीय, पूजनीय, अर्थनीय रहगे । पूर्व तयारी ---गांधीजी की पुण्य तिथि के एक दिन पूर्वा ही यात्रा और शिक्षका की एक समिलित गोष्ठी होनी चाहिय । इसमें ३० तारीख के होने वाल कार्यत्रमा को बनावर सरा के बीच प्रचारित कर देना चाहिये। प्रात काल प्रभात फेरी होनी चाहिये । पुनश्च सफाई का कायम रग्मना चाहिए। पुन सुबह से शाम तम बारी-बारी स १० व्यक्तिया की लगातार बताई चलनी चाहिये। शाम को एक गोष्ठी हा । उसमें छात्र, गिक तथा समीपवर्ती ग्रामीण भी मिम्मिकिन हो । उसमें गांधीजी के बार में सभी अपने अपने विषय रखें। कुछ कविता पाठ हो, प्रहमन हो और निबध आदि भी पढे जाएं। जितने निधि प्रहमन आनि पढे जाए उन सबों वो रखपद की पुस्तक का रूप दना चाहिए और पुस्तकालय में रप देना चाहिो । ३० जनवरी के तीन नि पूर्व से ही अन्न, वस्तु का संग्रह करना पाहिए और ३० जनवरो यो उन मदों को असहाय जनता के बीच वितरित
१५
कर देना चाहिय । उसके बाद विद्यालय के प्रधानजी का भाषण हो और
उस उपरान्त भट्टी हो जाए।
निक्षायें अपने सिद्धान्त पर अटल रहबर अर्पन भौनिक गरीर
बलिदान करने को माक्ति । महात्मा गांधी द्वारा प्रयाग की गई सत्य अहिमा
के प्रयाग की शिक्षा इन दिशभका व अलावे हमने यह सीवा की घणा से घृणा
का नाश नही हाता । घणा का ना प्रेम से होता है। बहुजन हिताय से
सजिन हिताय की बात हमन सौपी। इस उपरात गांधीजी के जीवन के
अन्य पहलुओ सा भी दया । उनव प्रयागो म लिया ग्रहण की
प्रश्न
, गांधीजी जन्म के पूर्व देश की राग्नीतिक अवस्या क्या पी!
• गांधीजी क जापन वृत्त को संप में प्रस्तुत करो।
३ गांधीजी माम्मायिकता कोश मिटाना चाइन 4 बार इसके लिए सहान
क्या दिया।
४ गांधीजी की मृत्युमा और मर मिमन की?
} শাখার্সা * অশ্ন ফী গং মঙ্গার ভালা।
। एनके जीवन से क्या शिक्षा मिलती है।
२ फरवरी : मोतीलाल नेहरू पुण्य-तिथि जम-स्थान को भौगोलिक अवस्था-प० मोतीलाल नेहरू का जम इलाहाबाद में हुआ था। यह उत्तर प्रदेश में है । इसके समीप ही गगा नदी वहती है। यहां गगा, यमुना और सरस्वती (लुप्त) आदि नदियां मिलती हैं । इसीलिए यह एक तीथस्थान है और सभी तीर्थों से बढा है। इसे तीथराज कहते हैं । यहाँ का कुम्भ मेला वडा प्रसिद्ध है। यहा साधारण वर्षा भी होती है। यहा की मुख्य पदावार गना गेहू और चावल है । यहाँ पर शीशा, बसीदाकारी इत्यादि का काम हाता है । यहा एक युनिवसिटी तथा उत्तर प्रदेश का हाईकोर्ट है । यहाँ गर्मी विशेष पटती है । तत्कालीन राजनीतिक अवस्या-जिस समय पडितजी का जम हुआ भारत में अंगरजी राज्य का पूण विस्तार हो चुका था। भारत गुलामी के गिरजे में अच्छी तरह फस गया था। देश के बडे-बडे नेता स्वतन्त्रता की लडाई में भाग ले रहे थे। कि तु अँगरेजा का कूटनीति के कारण उनमें कोई अच्छा सगठन न हा सका। लत कही भी काति हो तो अगरजा द्वारा दवा दी जाती थी। इस अँगरेजी राज्य के काले बादल ये घटाटोप अधकार में पडिनजी वा उदय हुआ। आधुनिक भारत के निर्माताआ में पदिन मातीलाल नहरू का नाम अग्रणी है । इहाने देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। ये हमारे दावे महान् पुरपा में से एक थे। सक्षिप्त जीवन वृत्त-पडित मातालाल नहरु का जम ६ मद १८६१ में हुआ था। इनके पिता का नाम गगाधर था । य तीन भाई थे । मातीलाल जी सवम घाटे थे। पिता के दो-तीन महीने मरने के उपरात इनकी पाइश हुई । य एष अनासे वालर थ । जहाँ पहुच जाते मवा का ध्यान उनका ओर आपित हो जाता । उनका दवार लोग एसा पहा परत ५ वि बडा होने पर यह दावा जर कुछ न कुछ होगा। मचमुच वे कुछ हुए और इस तरह चुछ हुए पि सारी दुनिया उहें दखार दांतो तले अंगुली दवा रेती थी। सचमुच में 'मोनी' मोती थे। क्या नहीं, वहा भी तो गया है- 'होनहार विरवान ये हात चिवन पान ।
बचपन से ही बई साहसी, निडर और दिरेर पे। पडितजी इलाहाबाद में वकालत बरते थे। इनकी मालत सब चली हुई थी। प्रारम्भ में ये अंगरेजो के समथर थे, वितु जलियांवाला बाग में दिल दहलानवाते हत्या. याण्ड से अंगरजा से इनका मन उचट गया और व भारतीय स्वतत्रता संग्राम थी भभक्ती ज्वाला में कूद पडे । अव व देश और कांग्रेस के मणधार हो गये । ये कई बार जन गए और वहाँ की कठोर यातामा वा सहन भी किया। देशरघु चिनरजन दास के साथ मिलकर इहान स्वराज्य पार्टी की स्थापना की। देवधु दाम की मृत्यु के बाद स्वराज्य पार्टी की अस्मता इनवे हाया में आई और य उसे अच्छी तरह निभाय | साइमन कमीशन का यहिलार भी ही के नतृत्व में हुमा । मदत मम्मलन में वे अध्यार भी धुन गए थे । उमको रिपाट ११ वरते ए इहाने औपनिवेशिष स्वराज्य कीम की पी और उनी इम पार वा मबन ममयन भी किया था। १९२८ ई० मा बलवत्ता अधिवेशन महान कांग्रेस का अध्यक्ष-पद सुगाभित रिया या और औपनिवगिर स्वराज्य का मांग की रिपाट ही नेह-रिपाट पुधारी जाने लगी। माग पडित मातीताल जावा नाम बहे आदर में लिया जाता है। ये स्वराज्य की मांग में मवल समथवा म गएर थ। पटिन मातीलाल जी एक अच्छ विद्वान् भी थे । यही कारण है दिन गिन दा माता मथे। पूष समारो--पुण्य तिथि में एक नि पह' ही यात्रा और किसी एर सम्मिलित मैटर हानी पाहिए । इमम मगर निकाय मापनमा पर विचार विमर्श हाना पाहिए । पुन मया का मार्गरम मुना देना चाहिए। दूसरे नि मुबह में मपाई का विशप पायाम हाना चाहिए। इस दिन पम-मे-नम एर घण्टा मूत्र-यम हाना चाहिए । इम उपरात गयो यो युग सर एव ममा हानी चाहिए। राम तर बितर हा । सभी अपन-अपन विचार प्ररटरेंस और पिता पहा जाय । महान रिए जाय। उन मभी भा, मदिनामा और प्रगना को भगवद पर पुग्नर का पद देना चाहिए সৗং পুশন ম মানি শ না আলি। गिनाएं.लिए साग करना निर्भीर और सिर बनना fre बनना और पिया भी नाम का अक्षरह निभान भी गा प्रहा परनी चाहिए।
म
प्रश्न
7
१ मोतीलाल के समय की राजनीतिक हालत क्या थी?
२ मोतीलाल के नीवनवृत्त की एक छोटी-मी झाको प्रस्तुत करो।
३ उनके जीवन स क्या सोखत हो ?
४ नेहर रिपोट स क्या समझन हो ?
५ स्वराज्य पाटी से क्या समझत हो।
६ औपनिवेशिक स्वरान पोर पूण स्वराज्य में क्या अन्तर है ?
७ १८८१० का कलकत्ता काग्रेस अधिवेशन किन बातों के लिए प्रसिद्ध है?
यदि यह कहा जाय कि जवाहर जवाहर नहीं बनत यदि मोतीलाल इनके लिए
माग न प्रशस्त किया होता। तो कहा तक सय
इसे सिद्ध करो।
' गाधीजर के असहयोग आन्दोलन में मोतीलाल की क्या देन रही ?
११ फरवरी--श्री जमनालाल बजाज पुण्य-तिथि जन्मस्थान का मौगोलिक परिचय-श्रीयुा सठ जमनालाल बजाज का जम जयपुर गज्य काशीरावा नामक स्थान म हुआ था। वह गांव मह- भूमि म है । यहाँ जल भी नितान्न कमी है । धारो मोर पंचल बार ही बालू नजर आते हैं। वर्षा नही ही होता । यहाँ था मुस्प जानवर ऊँट है। कोई खाम चीज की पैदावार नहीं है। सड जमनालाल जी का मेवाग्राम म स्थायी निवास था। यह पहाडी इलावा है। यहाँ साधारण वर्षा हा जापा करती है। यहाँ की मुख्य पसल ज्वार और बाजरा है। समकाल का ऐतिहासिर परिचय-~~-जिस समय सठ जी का जन्म हुआ था दाम अंगरेजी राज्य था। देश के लोग स्वतत्रता की लड़ाई म हाथ बँटा रहे थे। उस समय देश म बडे-बड नता ५ । उन नेतामा के नेतृत्व म भारतीय स्वतनना ना बापम करन की येप्टा परते रितु अंगरेजों को तारत के सामने उनकी एर न चलती। एम समए म जमनालाल जी का जम हुआ। जीवन वृत्त- जो या जम जयपुर राज्य के मीर टिकाना म पानी- थापा नामर गौव म हुआ था। इनर पिता का नाम बनीराम बजाज और माता का नाम विरपीवाई था। पबचपन म महे गरीब पे। कौन जानता था कि एक दिन यही जमना साल मा सबसे बड़ा स्यागी महापुरप होगा। वितु गुदडी में भी लाल दिपहा हैं। गौर ने सभी के मुग से अनायास निक्त पहना सहमा भाग्य- वान् है । एपनि जहर तरसी परेगा।' मचमुच म माजी न एगी सरकार कोपि उनरा नाम सुनत हो सभी दाता तल उगली दवा हल है । पर्धा मापारी धास्य परान पारे दसर पुत्र थे। यात यह पी रिपराजकाही मरता था। रितु वह जवानी म हो पर गया। स्वगर कामो मालूम हुमारि नाराम पास पहरा पैदा हुआ है। गले लार गाद स्ने राय रिया। यह मुन्न ही पनीराम जोन अपने एर मयी ग्वान पोम्पन्धरार पोलमाल पर nि:
६० सेठजी ने महात्मा गांधी को अपना घम पिता बनाया था। इहोंने महात्मा गाँधी जी के जीवन भर का खच चलाया । इहोंने वर्धा म गांधीजी के रहने का आथम बना दिया और एक विद्यालय बनवाया। वही विद्यालय आज सेवाग्राम के नाम से प्रसिद्ध है। इहोंने देश के लिए अपनी सारी सम्पत्ति लगा दी। यही कारण है कि इनकी गिनती देश के बडे-बडे नेताआ मे की जाती है । सेठजी की मृत्यु ११ फरवरी, १९४२ ई० में कलकत्ते में हुई। उनके निधन से जो स्थान रिक्त हुआ है पुन उगकी पूर्ति नहीं हुई। सेठजी का निधन राष्ट्र की एक महान क्षति है और देश की उम बुरी परिस्थितियो में 'उनका उठ जाना ठीक उसी प्रकार से था जिस प्रकार से किसी पुराने रोजी पर भयकर नाघात । महान व्यक्ति हिमालय के उच शिखरो की भोनि होते हैं। सचमुच जमना लालजी हिमालय के ही तरह थे। जिस प्रकार हिमालय पर सहस्त्रो विपत्तियां आई और उसको उसन महल किया उमी प्रकार भटजी के जीवन में एमी भयकर भयकर भीपण यातनाए आई है कि जि हे सुनकर रोमाच हो जाते हैं। व जाग से खेलना जानत थे। और यही त्याग और तपस्या का पल था कि वे देश के एक बहुत बड़े नता हुए । पूर्व तयारी -पुण्य तिथि के दिन पूर्ण ही छाना और शिया की एक सम्मिलिन सभा में अगले दिन के कार्यक्रम की सूचना प्रचारित पर देशी चाहिय। पुण्य तिथि व दिन विशेष ढग पर सफाई होनी चाहि। इस दिन गरीना की विप भलाई करनी चाहिये। सूत्र-यन का समय जय दिना से विप होना चाहिये। फिर मभी छात्रा और शिक्षा की एक सम्मिलित गोप्टी होगी। इसमें निगध और पविताएँ आदि पढे जायेंगे, उना सस्मरण पढे जा सरन हैं। मभी अपन अपने पिय प्रवट करें। तक वितर के द्वारा मानाजन करें और उन सभी निबंधी, वविताआ आदि को रखवद्ध कर पुस्तक वा प दे देना चाहिये । उसे पुस्तकालय में सुरक्षित रख देना चाहिये जिसमे आगे दिन काम दे। शिक्षाएँ -देन के लिए त्याग करने और उत्मग हान की शिक्षा एनी चाहिय । उनके जीवन से सयावृत्त की गिमा प्राप्त हाती है। रठिनाईया का सामना परना और हमते हंसते झेलना । किसी भी काम का उत्तर- दापि वपूर्ण ढग से निभाना । गरीबों की तन-मन धन से सेवा करना।
१ सठजी के जन्म स्थान का मौगौलिक और जन्म समय का ऐतिहासिक परि--
चय दो।
२ सठजी क जीवन की एक छोटी-सी झिल-मिल झांकी प्रस्तुत करो।
३ सठ जी दत्तक पुत्र किसके थे और क्यों थे।
है उनका मृत्यु क्यों कब और कैस दुर।
५ उनके जीवन से तुम क्या-क्या सीखते हो।
१२ फरवरी-सर्वोदय दिवस पूर्व तयारी –सर्वोदय दिवस मनान की सूचना दो दिन से ही घोषित कर दी जायगी। सर्वोदय दिवस के दिन प्रान काल प्रभातफेरी करेंगे। फिर निकटस्थ गांव में जाकर ग्रामीणो के साथ सफाई करेंगे और वहाँ से लौटने पर साफ सुथरा होकर विद्यालय आयेंगे। आज सूर यन विशेष स्प मे दा घटा क्यिा जायगा। इसके लिए सूतो स क्पडा तयार कर गरीबो में वितरित कर दिया जायगा। फिर उस दिन लोग गाँधीजी के नाम पर एक गुडी सूत देकर उनके प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पित करेंगे । उन सूता से कपडा तयार कर गरीवा में वितरित कर दिया जायगा। फिर एक गोष्ठी हागो जिममें लाग सर्वोदय की इतिवति एव उसकी प रखा प्रस्तुत करेंगे । भापण देंगे और तक वितब भी करेंग। अन्त में इन सभी भाषण आदि को सकलित कर देंगे और उस प्रधानाध्यापक के कभ में रख देंगे। सवादय क्या है ? -जिम प्रकार विश्व में अधिनायकवाद साम्यवाट, जनतयवाद और गाँधीवाद इत्यादि जनेकानेक्वाद है उसा प्रकार सर्वोदय भा एक वाद है । इन सभी वादा में सर्वोदय का स्थान मूघय है । साम्य वाद में हिमात्मय भावना होता है । अत साम्यवाद में पगुता का समाव है। हिसा स प्राप्त वस्तु ग्रहणीय नहीं। हिमा में दानवता है मानवता नहीं । सर्वोदय की अट्टालिका सत्य, अहिसा प्रेम, शाति और सदभावना, विश्व-वधुव तया वसुधव कुटुम्बकम् की नाव पर आधारित होती है, निर्मित हाती है। बापू भारत में सर्वोदय सामाजिक स्थापना करना चाहते थे। सॉन्य या शातिर अर्थ है सवका उदय । ता जिसमें सभी का विकाग हो और सबका उन्य हो वही है सदिय समाज एमा समाज जिसम एगी उन्नति नही हो परच सातामुखी विकास हा सवयी उन्नति हा और सभी सुयी हो। इगण्ड के एक प्रसिद्ध दार्शनिक दयम का यह मिद्धान्त था कि सरकार या इस बात पर सदय जोर देना चाहिये कि किसी भी समाज में अधिक से अपित व्यक्ति मुखी रहें। बापू ने सोचा कि जिम ममाज म अधिक-मे अधिर लोग सुम्पी रहग उस ममाज म भले ही कम ही सही विन्तु घुछ लोग ६३ अवश्य ही दुःखी रहें। गांधीजी ने इस सिद्धान्त को अस्वीकार किया । 'किन्तु इसी सिद्धात पर आधारित उहाने अपना सिद्धान्त बनाया और उसका नाम रखा सॉदय । समाज एक वन जिसमे न तो कोई दुखी रहे और न काई अधिक सुखो वरन् न कोई दलित रह न कोई शापित, सभी समान रह । सर्वोदय में सर्व मगल की भावना है। इमम एक में उदय की बात नहा, वरन् सव उदय की भावना सम्मिलित है। वस्तुत ममग्न मानव-जाति के अभ्युदय का नाम ही है सर्वोदय । अथात उपनिपदा म एक उद्घाप है- -सर्वे भवन्तु मुसिन । वम उसी का स्पान्तर है सर्वोदय" । गांधीजी के विचारो पर महात्मा रस्विन के विचाराको विगोप छाप पड़ी। रम्किन की एक पुस्तक है 'अटु दि लास्ट (un to the last) इसी के आधार पर सर्वोदय की रूप रेखा गांधीजी न तैयार की। उहाने समाज के हर एक पीडित, दलित और शोपित व्यक्तियों में उत्थान की मगर कामना की। रविवर पत न रहा है कि "जग पीडित है अति दुम से जग पीडित है अति सुख से, अत- "मानव जग म वैट जावे, मुख-रखा दुख-मुख म । मर्वोन्य ममाज म विश्व-वधुत्व की भावना सन्निहित हैं और है वसुपत्र बुटम्यपम् 4 उच्च विचार । समस्त वि व व मभी प्राणिया के लिए सब दय का दार सदा पुला हुआ है । वदा म भी कहा गया है- "सर्वे भवन्तु मुमिन ग मतु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यतु मोपचिर दुगभाग् भवन" । यय हम इस गिदान का परहार म मम ला गवन हैं ? यापू न हमारा या ममाज म दलित, पोडिन मोर नापिन गरीदा वी आर आवपिन रिया । 'उहोंने महा शि उन्ही व्यक्तियो को करिनाईया को दूर करन के लिए हम -पहर पोलिस परनी है। म मिदान्त मोसन्धी तरह समझने में लिए हम एप परिवार को ही उरण स्वरूप रे । परिवार में जो गवने बड़ा होता है यही परिवार या "मुसिया' होता है। उसी के विचार और नारे पर मारे परिवार का कार रापालन होता है। परि मुखिया परिवार ये छोटो मी ति घोर दे मार - ६४ । उनकी कद्र परना छोड दे तो छोटे नष्ट हो जायेंगे। और परिवार संचालन का सिलसिला विगड जायगा। अत परिवार सुचारु रुपेण तभी चल सकता है जब कि मुखिया परिवार के सभी सदस्यो पर एक दृष्टि रसे। इसी विषय को लकर बापू न हरिजना के उत्थान की आवाज उठाई । सर्वोदय सिद्धान्त यह मानता है कि दुनियां के सभी लोग एक है। धम, जाति पांति एव धनी-गरीव के सारे भाव विचार कृत्रिम है। हम सभी एक दूसरे की सेवा करें हम सभी एक दूसरे का उद्धार करें यही है सर्वोदय का ज्ञान । हम अपने जीवन में एकागी उनति कदापि नही कर सकते। यदि हम उन्नति करना है तो समाज के सभी व्यक्तिया को साथ ले चलना पडेगा। सुख दुःस, मिलन विछडन हंसी-गम सब एक दूमरे की सहायता करें तभी हमारी वास्तविक उन्नति होगी। यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम सर्वोत्य सिद्धान्त को ग्रहण करें, अपनावें। इसम सवा की उन्नति की विराट कल्पना है। शासक और शासित, पोपक और शोषित के भेद भाव को दूर रख कर सबा का नतिक स्तर ऊँचा करना ही इमकी मार सिद्धि है । मानव को बधना से उमुक्त कर उस स्वतत्र मनाना ही सर्वोदय का परम लक्ष्य है । इस प्रकार सर्वोदय मे विश्व-कल्याण की भावना सन्निहित है। सर्वोदय समाज में हमारी कु ठित भावनाओं का निराकरण हो सकता है। सत्याचरण के द्वारा ही हम सर्वोदय समाज म सुख-समता का सौरभ फ्ला सकते हैं। प्रेम-दया और सहृदयता की त्रिवेणी प्रवाहित कर सकते हैं। विश्व-ब घुत्व से ही सर्वोदय समाज के क्लेवर की वृद्धि हा सकती है। देशरत्न डा. राजेद्र प्रसाद के सभापतित्व मे इन्दौर के सर्वोदय सम्मेलन म सब प्रयम सर्वोदय की रूप रेखा प्रस्तुत की गई। समाज शोपण या उमू- सन करना हो इसका अन्तिम और महान उद्देश्य है। इसी इन्दौर सम्मेलन म सभी को सांगीण, सवतोमुखी प्रगति का स्वणवसर प्रदान किया गया । साम्प्रायिकता, अस्पृश्यता निवारण, जातिभेद-मूलन ग्रामोद्योग प्रसार, प्राम- सफाई समाज पिता, नारी-पुनरद्वार, मजदूर-सगठन इत्यादि बातों पर विशेष जोर दिया गया। सर्वोदय मेला लगाने का भी आयोजन किया गया। यह मेला गांधीगीको निधन तिथि के दिन लगाने का निश्चित किया गया। सर्यो- प्य समाज मे सचालन हेतु १२ सदस्यो की एक समिति भी है।
इस सिद्धात को अपनाने के लिए हमें अपने अन्तर का महान् बनाना होगा। अतर तभी महान् ह सकता है जब प्रेम, सहानुभूति, दया, ममा, सत्य, अहिंसा और सहृदयता या अपनावें। तब तर हमारा अतर महान् नहीं होता, जबतक हम गरीवा, दलिना, पाडिता धानी से नहीं लगा सकते उनम गल-म-गर नहा मिल सक्त । विश्व के द्वन्द का अन्त सोन्य से ही हा सरना है । यह सब का परम पुनील कन व्य है वि व सर्वोदय सिद्धान्त का अगोहन रें और एवना मदभावना, प्रेम और शान्ति का सन्गा प्रसारित रिक्षाएँ --रीवा की मवा बरसी चाहिय । परस्पर द ईर्याय बरहादि भावनाभा या विस्मृत बरस गर-ग' मिलना चाह्मि । मोपण का निराारण करना चाहिय । मभी का एक दृष्टि से दमना चाहिय । किमी का घाटा-वडा, धनो या गर्गव नहीं माना चाहिय । सय, अहिमा, प्रेम, सहानुभूति, दया, क्षमा सौहाद, मनभावना का ग्रहण कर सोरवल्याण परला पाहिय । समाज शिक्षा का प्रचार परना चाहिए । प्रश्न १ सदिय स या ममकत हो। २ सय दिवस मनाना स या प्रस्तुमरो। ३ मदिय शब्द महामाया ! समस्या ४ सदयी रूप रमा को प्रस्तुतका गाथा! रसार ररय है। इमर क्या रिदार रहती है। निरिन रानी पर गिर दिया गया है। १ महोदव मसान्यानामधारसका रामगुरू । सा सदिर की स्थापना स निन्न-समाज का स्याउ न हो सपना १३ फरवरी- -श्रीमती सरोजिनी नायडू जन्म-दिवस जम स्थान का भौगोलिक परिचय-सराजिनी नायडू का गम हैदराबाद राज्य म हुआ था । यह एक पहादी देश है। यहाँ पर गर्मी काफी पती है । पानी की बुध कभी हाती है। किंतु नाडे के मानसून से कुछ वर्षा हो जाया करती है । इस राज्य म विभिन प्रसार के सनिा पदाथ पाय जाते है । यहाँ बनक प्राचीन विशाल ऐतिहासिक मंदिर है। जब यह राज्य आध प्रदेश म मिल गया और कुछ भाग महाराष्ट्र और मसूर राय म मिल गया । जमकाल का ऐतिहासिक परिचय-जिस समय नायडू का जम हुना, भारत म अगरजो का गामन बन रहा था। गुनामी को जजीरा में बंधा था । नागा को सभा कामा म वधन नग थे । नारिया वा ता समाज म स्थान नहीं था। मदत पता को माग थी किन्तु स्वत गता मि+ भी तब तो। ना के नेता आ गटी के लिए कुर्बान हा रह 4 । उस समय एक ऐमी लतना का अभान खटर रहा था जा ममाज और दा म नारिया का स्थान ऊंचा कर सरे । एसे ही समय म सराजिनी नायडू का जम हुआ ! जीयन बत्त--वी नाय का जम १३ फरवरी १८७८ ई० म हैदराबाद राय म अधारनाथ चट्टोपाध्याय व घर म दुआ था। उन्हें कोई सतान न थी अन दिन मानकर सुगी मनाई। नायडू का गिधा-नीला अगरजा ढग म हुई वा । रिन्तु इहाने भारतीय वैप भूपा अधिक पगद किया। बाल्यावस्था म ही नायडू अगरेजो म कविताएँ बरता था। प बड़ी प्रतिभागाजिनी था। इनकी स्मरण गति इतनी अधिक तेज थी मि इन पिना इनरा बुद्धि पर आ चय बरते थे। कवि का हृदय उन्हें माता पिता ६ सन्यारा म मिना था । याव्य परिशीलन और उस चितन, मनन य विराट-बन्द और विशुद्ध वातावरण म हा उना लाउन न हुआ था । य उ च Pिा प्राप्त करने के लिए विज्ञापन गयो। यहाँ पर उनकी नाव्य प्रतिभा पूर पी। १८९८ ई० म य भारत नौटी । यह एप मारवादी महिना थी। माह्मण हाने पर भी एक बाह्मण पनि मा० गोपिन राजुर म विवाह कर इहान जाति पनि वी विरामनामी का मिनोयोगिता । नापर
की। अपने माहिय प्रेम नया काव्य प्रतिभा और मधुर वाणी के कारण ही
य'भारत-बारिता में नाम स विम्यान है । श्रीमती नापट्ट का दम भारत की
परतता दावार और गारों के अत्याचारा का देगार दूषित हा गया । सन्
१९१५ म राजनैतिर आसन म र सा वक्ता र प म य उदित हुई
और उम समम स इनि दा-सवा या बटन ग्रन लिया जिने आमरण निभाया।
अनेर बार जर की असहा माननामा का सहा । १९२१ म अमिरा गई और
१९२१ म तीमरी गालमज सभा म महिला प्रतिनिधि में पम पन्हान भाग
লিথ্য। বর যা হয় নাৰ য় য ন্য। বাধ্য সারি মাই
इनका उत्तर प्रदा का गानर नियुक्त रिया गया। गरनर रहर हुए उहाले
दायी मत स वी और गम अभूतपूर्व सपा प्राप्त की। मराजिनी
नायडू भारत ३। उन लगामा म म मा मिहान भारतीय स्वातय-आगेउन
* সঙ্গিথ প্রশদা { শাকিব খান মাত্র ২ বা উহ্য ঋণ
वोगना जादा गौरव वा उमन वर मारे गमारा बमरान कर
nि { २ मार, १०८० ई० । 'भारलाविता मानिनी पडू या स्व.
"नाम हुमा । उनी म त असम्म माल तथा महाn anमहानी
पुग युग त जीता-जाता री । उनका चरित्र नारिया व पौष म पूरनीय
वनीय पीय रा।
पूर्व हमारी पर यि मनि पूर साबा मूचित पर ना
चाति विमति दयनामार हा या परसा चाहिए।
निमा गो भगाद पा र पिर परना चाहिए। एर गना
होम पूरन हो गप from । ममा भरतार यानि
যা । ও যব ? যপি ব ল দ ন ।
दना माहित
fromनारिया पतिए मनाई बराबरी गाहा मग्नी
वाहिता T * मारा मिगनगि हा परली पाहिए।
-
२ नाना!
" rr Firint
, नाम REFEMARATraft
१८ फरवरी -रामकृष्ण परमहंस-जयन्ती जम म्यान का भौगालिक परिचय-रामकृष्ण परमहस का जम वगाल के हुगली जिले म कमारपुकुर नामक गाय में हुआ था ! यहाँ पर वर्षा काफी होती है । यहाँ के लोग मानसिक कामा म अधिक तीव होते है । यहाँ के लोग साधारणत धोती और कुरता पहनते हैं। यहां का मुख्य पसल धान है । जम समय का ऐतिहासिक परिचय--जिस समय रामकृष्ण परमहंस का जम हुआ था वगाल म अंगरेजो वा एकच्छत्र राज्य कायम हो चुका था। मासीसिया का भी राज्य था। दोना म लडाई चल रही थी। उस समय कम्पनी का राज्य था। बगाल में क्सिाना पर जमादारा का आधिपत्य था । जमीदारा के क्टु व्यवहार और दुराचरण तथा अत्याचार से सभी किसान प्रस्त थे । इमी समय रामकृष्ण परमहस का जम हुआ था। धामिर और सामाजिक अवस्था-हिद्द धम पर से लोगा का विश्वास उठ रहा था। पा'चाय धम विचारा का प्रभाव उच्च कुलीन वर्गों पर पड़ रहा था । ब्राह्मणाय विधि विधान पाए-मय समझ जान लग और ईमाई मन का प्रभार हा गया । इस्लाम तो यथास्थिति म था किन्तु हिदू धम का हाम हो रहा था। हिट्यो म सामाजिप मीणता फ्ल चुकी थी। ऊँच नीच का भाव बढ़ गया था। ब्राह्मण पारयण्डी हो गये थे । अपने धम म च्युत हा रहे थे । शूद्र ईसाई तथा इस्लाम धम की आर झुक र थ। वण रावीणता का बालवाला था और ममाज छिन भिन्न हो रहा था। इसी समय वरिव धम वा उपटा मेंम और अमिा के माध्यम से देन के लिए श्री रामकृष्ण परमहस का जम बगभूमि म हुआ। जीवन-वत्त-रामकृष्ण परमरम वा कम बगाल राज्य हुगली जिर म यमारपुकुर नामय गाँव म १८ फरवरी १८३६ ई० को हुआ था। पर- बाहर चारा आर नाद गूज उटा जोर गांव म प्रमनमा छा गया। इन बचपन का नाम गाधर था। इनव पिता का नाम सुनाराम नधा माता या नाम नद्रानी था । य जपन माता पिता की तोमरी मताा म । एमा पहा जाता है जिस गाधर वा जम हुना था उनसरी माना मूच्चा म थी तो व पाया भटटी म जाकर चुपचाप राय लपटा नगे।
बालर गदापर को पांच वप की अवस्था में विद्यालय में बैठाया गया । झुछ ही दिनों में अपने राज और प्रताप से सहनि मबा को अपनी मार आरपित कर दिया। जावाइ उप पर वार दा लेना चार-चार दसन की इ-सा प्राट परता। मान वय की अवस्था म ही नत्र पिता का दहान हो गया। बरनवे पालन पापा भार उनी मा पहा । हिनुर अपनी मो का अधिर ना पाद नहा करत य । ६ अपना समय मां मा नियमित म्पम दन ता पिता कोपा अभाव है परन लगा और वे गम्भीर हान : बचपन पोरागित यात्रा और परिवोंग नरेजीमा पर पक्षा असर पाम बचपन मधई तंजा यय वितारानी करना। दावर रितं ग ८ मीन "नरको भार या रिनार प्रसिद्ध स्थान है। यहाँ मातीजो का मन्त्र और जिन मदिर है। मौर र इतिहास व माथ परम मानहान भो र हाता है। इस मदिर म व अपन भाद रामकुमार राय रहा वरत। यहाँ पर না থাকায় মায না, তা সনি বিল দল নানা না गमणि क जामाता ये म हुना। यात्री भार बनि म वि गर । यहा पर ना पर और व्यक्ति म परिचय आनि निरतर : दों नर नामा भी पीरिम्ना मवह व्यनिन माजा उपना था। Mir Tन उनका मन सागराधीश महान सरकारी নানা প্লাহ সৰ বিপৰ ম ব গ । ল্য নানালিত পন पाटि पापा और ला विचारही बार या है हिना आध्यापि मापना निमपा निष्काम मोपलवरीमा को प्राप्त । मापारण वालवारा मामला परत परते थे। जन जना यन में विद्या पातमा गरी सिध्यो माननाय दत...मनाना रतनामा परम में रह गग पवार म्यान विमान में मान म firint ए। १६ अमान १८६६६० ना धामिर सिर पर ही र ओर RT-THAT भारना उनम का यवन म माऔर बार न पर पिजारामरामार वारदा महिना, मरीश प्रग्ना मार निधनाशी गशम माना पूर्व तयारी-एक दिन पूर्व ही छात्र एव शिक्षक एकनित होंगे और उसम अगर दिनवा कायम निश्चित किया जायगा। दूसर दिन प्रात काल उठकर विशेष रूप से सब चीजो की सफाई करेंगे। आज सूत्र-यज्ञ म विशेप समय देंगे । फिर एक सभा होगी। इसम अगर जनता भी सम्मिनित हो म ता सार्ने म सुमध हा । इसम सभी अपन अपन विचारा को प्रकट करेंगे । तर- विता के द्वारा इसम सगोधन करगे और उन विचारा को जनता के समक्ष प्रस्तुत करगे । कविताए पटा जायेंगी। रख पढे जायेंगे। पहसन और नाटक किए जा सकते है। इन सबा यो लेखबद्ध कर पुस्तक म्प देकर पुस्तकालय म रख देंगे। अत म परमस के उपदशा को जनता और छाना व मध्य रखेंगे जिमरा व अपना सुधार कर सक । इस दिन लोक कल्याण का काम अधिक होना चाहिए। रिक्षाएँ-ब्रह्मचारी बनने की कागि करनी चाहिए । स्त्रिया का माता व दप्टिकाप निदु स देसन का प्रयास करना चाहिए। ममाज सेवा का व्रत रेना चाहिए। किसी भी चीज का परायी या जपना नहीं समयनी चाहिए । सुपर और सुगठित शरीर बनान की कापित करनी चाहिए। नियम और सयम म रहन की आदत डाननी चाहिए। अपने जाराध्य दव की पूजा कर मन यो गुद्ध तथा हृदय का क्लुपरहित बनाना चाहिए । प्रश 2 रामहण परमह स के समकाल की ऐतिहासिक तथा सामा िक अवस्था क्या थी? २ इनका नाम क्व और कहा हुआ था। उनके बचपन की क्या मिति थी ? ३ इन नोवन-वृत्त ना एक छोटा सा माकी प्रस्तुत करा। इनक परम प्रिय विश्व- वित्र्यात शिष्य कौन थ. ४ इनक जीवन स नुन कौन-कौन सो शिनाएं ग्रहण करते हो ?
१९ फरवरी गोपाल कृष्ण गोखले
पुण्य-तिथि
जम स्थाrा मोगामि परिचय गोर दाम महागर
काहार जिस कारण नामर र म हुआ था। महाराष्ट्र प्राय
है और HIT तत्र भारत का एक राय है। यह पहाडी जगह है।
अपित नहा होता! 7 यस्यमापत गान गदि म इह-पटलं तथा मम
हात है। बया पम हानी है। गर्मो दुध दिशप पड़ती है रितु रामुः
रहन न कुछ टर पटती है।
राम-चाला ऐतिहामिर पनियर -निम समय मासर पाम
थाजा या गागन धीर धीर भारत म अपना पैर जमा रहा था।
हिम्मा मनामिया का भी राज्य या । दायातमना का वायनर
या नटा पर रह । हि महता, दादा भाई नौराजी मह
गारित राrयामि प्रमुर नता-गण राजनानिक क्षेत्र म हाय
रहय। उमी पाा म गाल कृष्ण का जम हुआ था।
जोदन यत्त ~~-गागर वान ८ मई मन् १८६६ ई० या ए द
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या। जिस समय व गार गाँव मोर दूरीस्टी प्रापड) म अपन लय
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पूतिगार या यौथिया म मा पता था दिन पौरनता
शियानाnt Pाम - निमामिया हा मार ri
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नाग पर टिपरमगार का मागिनो रिहा
যন না শাৰ । ধন গান ।
बाल्यावस्था में ही उनम एक अजीव एव असाधारण प्रतिभा थी। वच पन मे ही के नान से सपो को आश्चय चक्ति कर दिया था। य गणित म भी काफी तज थे। उनके अंग प्रत्यग से तज को ज्याति विकीण हो रही थी। १४ वप की अवस्था म इहाने प्रवगिका परीक्षा में उत्तीणता प्राप्त की। १८ वर की आयु म वी० ए० की दिग्री प्राप्त की। २० वप की अवस्था म प्राध्यापक के पद पर इनकी नियुक्ति हुई। यद्यपि गोग्बो को इतिहास म एम० ए० को उपाधि नहीं प्रदान की गयी था फिर भी एम० ए० के छात्रा को इतिहास पढाया करत थे। सन १८८५ ई० म गाखल काँग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त किए गये। उस समय उनको अवस्था क्वल २८ वप की थी। यह उनकी प्रतिभा का ज्वलत उदाहरण है। इहान उस अवस्या में अपनी प्रतिभा का अपू व परिचय दिया और इतने परिश्रम स काम किया कि सबा ने मुक्त कठ से उनकी प्रासा की। सन १००५ इ० म बनारस म इडियन नशनन कांग्रेस + अधिवगन के सभापति बनाय गय। गोगले न मन १९०५ ई० म एक सम्था भी कायम की थी। उसका शाम भारत-मेवक-समिति ( the servants of Indian Society) है। यह आज भी एक जीतो-जागनी सस्था है और इसका एक मान उद्देश्य है भारत का सेवा करना । गोवर न नमरकर की कटु आलोचना की। भारत के प्रतिनिधि के रूप म वे कई बार इगल्ड गप आर वहीं पर बड़ी गन ने काम किया । अफ्रिका म महामा गांधी के साथ भी काम किया था। उसने बारे म पदाचित यह कहा गया है नि बनना का जापाक्षाय वाय सराय तक पहुचात थे और सरकार की कटिनाइयां वांग्रस तक । १९ फरवरी सन् १९१५ इ० का रात्रि-वला म गावर वा जीवन प्रदीप मदा के लिय बुझ गया। रात ५ दम वा भारत की सारी मागाभा पर पानी फिर गया। मारी जाकाभाना वा अत हा गया । राजननिक अखाडे या एक मवश्रेष्ठ पहलवान इस संसार म चल वमा । दावा सच्चा गुभ निता उट गया। दा भर म सोर का ममुद्र उमर पडा। सभी आठ-आठ आंगू रो रहे थे। गोखरे एक महान आणवादी नेता थे ! उनका सारा जीवन राष्ट्रमवा मही बीता। शापित एव दलित जनना या सवा ही उनका एक मात्र उद्देश्य पा, व एप उभट यत्ता ५ । स्पष्टवादिता माहसिक्ता विनम्रता ।
एवं निवाथ भाव से सवा की सेवा की। ये सब उनके चरित की विशेष- सायें थी । नाड वजन वे गन्दा म "ईश्वर ने उह असाधारण योग्यता से विभूपित रिया था, जिसका प्रमाग उहाने देश और जनता के हिताय किया ।" स्वगवाम के उपरात तिला न रहा पा~पीडित जनता को सन्देश ने हुये भारत वर वा यह हीरा महाराष्ट्र का यह रल और दामतो ( Patriots) वा वह राजा याज "मशान भूमि पर लेटा हुआ अन्त विधाम रहा है। इनसो तरफ दम्पिये और इसी के साकाय करने का उद्याग वाजिय।' गायो न एमा उचा और मम्मानपूण स्थान पवल अपन चरित्र दल तथा बुद्धि की प्रतिभा मे ही प्राप्न दिया ! रितु दुटिन बार वे वाले पट हाथो का कौन राज साता है । एकदिन वह गवा का धमोट होता है। पूर्व तयारा गुण्य तिथि य एवं नि पूर्व ही सभा छात्रा तमा निमा को सम्मिलित गाठी हा । उमम अगर दिन वा वायत्रम प्रसारित रिया जायगा। दूगर रिन अगर मुवह म प्रभान परी हाता और भी अच्छा होगा। उम नि गोद म जापर यहाँ कई तमा जनता को भए वाय बरला चाह्यि । आज निदिचत ममय म विशप समय मृत्रया मेरिया जाय । अत म एक सभा हागो । उगम सभी भाग लग गास के प्रति अपन विचारा का व्यक्त करो। म पढेगे करिता पाउ परेंगे। प्रह- मन परेंग और इन सबा का एयमित पर सुखात रख देंगे । त म ममी सवा पा प्रत जपना। निभा -अधिर-ग-अधिक विद्वान् बनन की यागि परनी चाहिय । मता बनने को मारिली शहिय । -मवा याबाना चाहिर । जनता मी मनाई यी बातें मीमनी चाहिय । पाइभी एना पाय न करना चाहिए जिगमे रिमोशनमा तीन पटचे। , समर होनामिक धवम्यासाचा २ गगरामर औरagr ३ रानमेरिम. ४ सयनसनिपुरदुरे और समाति बनाया नान किम मम्मामा पारपाका! (Rन-त कर 7 नुर रें। उनकी 3r प १ . न मरन मन- मील!
२२ फरवरी-कस्तूरवा पुण्य-तिथि पूर्व तयारी--एक दिन पूर्व सभी छात्रो एवं शिक्षा को मूचित कर दिया जायगा। दूसरे दिन सुबह म सफाई की जायगी। आज सूत्र-यन विगेप तौर पर किया जायगा-एर घटा । मूत्र-यनापरात सभी छान एवं शिश्नक एक स्थान पर एकत्रित होग और वहाँ पर इनके बारे म चर्चाए चलेंगी। अत म प्रधान जी अपना विचार प्रकट करगे। पुन गोष्ठी विघटित हा जायगी। क्यिा वस्तूरबा - देश को रानतिक हालत-देग म अग्रजी शासन की पूरी धाक जम चुकी थी और उसकी दुमत चल रही थी। दश की जनता की दगा जत्य त दयनीय थी। स्त्रिया की हालत एक्दम गिर गई थी और समाज म उनकी कोई पूछ नहा थी। अगरेजा का खुना अत्याचार हाता था और प्राति में प्रवल वग स दमन चम चलाया जाता था। किंतु इतना होन पर भी स्त्रियां-'न हान हूँगा अत्याचार चला मैं हो जाऊ वलिदान मातृ मदिर म हुई पुकार चढा दो मुझको है भगवान । वहा परती था। एसे समय म स्त्रियो की दगा का सुधारने के लिए और समाज में उनका भी कुछ स्थान हा उस दिलान के लिए एष वीरागना की जायग्यक्ता थी जौर उसे पूरा इहांने न तो लश्मानगइ समान अश्वाराही बनकर सयन्मचानन किया और न महारानी विक्टोरिया में समान विसा देश पर शासन ही किया । य विसी सम्राट की पत्नी भी रही थी। किन्तु इतना होन पर भी आज उनका हम भारतीया व हृदय म अपना एर उच्च स्थान है। इसका कारण है उनका त्याग उनकी तपस्या और उनव उच्च पातिव्रत धम का पालन । जीयन-यत्त--गुलामी वे दारण उदाग और नीरम वातावरण म गुजरात में पोरवटर म १८६० ई० म वस्तूरवा वा जम हुआ। वस्तूरवा व तीन महीन पूर्व उमी पारबतर म म० गाँधी का जम हा चुका था । जर इन दाना यी मगार प्रतिमाए हमारे मानस पटल भार हृदय रेग र ममम आती हैं तो मन म एव जद त और अलौविस भाव उपग्न होता है। प्रति न इन दाना वा एप एगा युगात जोडी उत्पन्न की जो एक हा दाप वा दा नियात्रा म प्रालित हावर अपन अलौविष प्राशस समस्त जिव को आलावित पर दिया।
इन पिता का नाम श्री गोकुलदास मावन् और मां का नाम श्रीमती विराजजुनवेचा था। इनर पिताजी अनाज, रई, और अपडे या व्यवमाय बस थ । इनका पाणिग्रहण सस्कार गौधाजी के साथ हुआ। य महा मा जी व माय मिलार हाय म हाथ लेवर और कधै म कधे मिलारर चली और युगल दम्मी की छाया म चार बच्चा बा भरण रापण हुआ । यस्तूरबा गांधी जो में गाय अमिया भी गयी और उहांने वहां अनका मह वपूर्ण पाय पिय । चम्पारण यदि तिहाभिन सत्यार म परवा न एर निम्मरणीय और सक्रिय भाग लिया। वहाँ को पोन्ति जादा स्वास्थ्य, सफाई कार अनुशासन की EिT दन लगी। स्त्री हान स व वघडर पापश्यिाम जाती और भारतीयामा दरिद्रता-मूचर मार रहानियां लागा व समर प्रस्तुत भग्ना था। गोमार धीरे कीर वहां की जनता शिशित हान लगी और गरना तथा अत्याचारी नोलहा वो यूटनीति का मान लगो। ाि चलना रहा, चलती रही और फरा को नापनिया में स्थान पर अग्निराधा (Fireproof) ािल स्मारत बड़ी कर दी। चम्पारण यो विनम म वन्नूरवा वा एक यत वा हाथ है। গ্রায় য শাদী আগস ম ত অনা না যায় ফল্যে সাস प्रिपा रोलट जारी कर लिया गया। इनगे सागा ये ६दय म पण माला प्रात 4 सप्रयनित हो उठा । जनना न सरसार या बालन शनिचय लिया जा पा T पान 7 और उग निह पो और वगुनाह जना पर पर दाग गानिया की बौद्धार । सवत्र टापर के अपाचाराका दानयी ना अपना विराट पा रही थी। ज्योज्यो मन मा बादान न "मपा पीघा जमी नारा रिया । गन्ताप और पय या चाप टट सुपा था। इमा गमय यन-गेन प्रसारण मरणार न गांधीजा था वैद गर तिमा गांधीजीपी गितागे गेसनाया नन प्रापगर और मारित्र समारय मापा र गोपनता पा मा नरेगा गुम भाग्न मौका पिा मार गियान RT पग पा और अनशी पार न पर मोर या rदी सागारगी और अन्नागे हो - पर हम nि ७६ समय को गति गान पान बढती गई। दूसरा विश्व युद्ध गुरु हो गया। भारत स भी सैनिक भेजे जाने लगे । सन् १९४२ माया और आया ९ जगस्त या वह चिरम्मरणीय दिन । गांधीजी ने 'भारत छोडा' (Quit India) या नारा लगाया । दश की जनता जाग उठी। देश के सभी नेता दर निए गए। गाधीजी को पूना के आगाखौ मल में कैद कर भेज दिया गया । बुध दिना के वाद वा को कदर उसी महल म भेज दिया गया, जहाँ गाधीजी थे । गाधीजी ने अनशन प्रारम्भ किया। २१ दिनो बाद उहाने अनगन ताडा । इसी बीच कस्तूरवा का स्वास्थ्य बिगडने लगा। १९४३ ३० म वा की बीमारा ने भयकर रुप धारण कर लिया और उहें युमोनिया हो गया । अब उनका जतिम समय समीप आ गया। अनतागत्वा २२ फरवरी १९४४ को मायकाल ७ बजार ३ मिनट पर मास्त्र पहरदारा से निकलकर और सारे देश की जनता से विछड कर इस दुनिया से सदव के लिए चल बमा। या ने अपने जीवन म अच्छे-मे अछे दिन और बुरे-म गुरे दिन भी पिताय थे। जाज या हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी उनकी जीती जागती तस्वीर मारे मामने प्रस्तुत है । उनकी जिदगी की एक चनती फिरता बहानी है । या की स्मृति अमर है और रहेगी। हम नाज की पुण्य स्मृति के औसू और श्रद्धाजलि के दो फूल समर्पित करत हैं और उनकै नाम पर नतमम्नव हो जात है। शिक्षाएं पातिव्रतधम क्मेि कहत हैं और निर्वाह जीवन म कस करना चाहिए इम यनि स्त्रिया को सीखना है तो वा पे चरित्र का अध्ययन और मनन परें तथा अपने जीवन में उतारने की कोगिग करें वप्टा से हार मानकर अपने या वष्टा के अनुकून कसे बनाया जा सकता है इसे बोई या 4 जीवन से सीत्र । । १ बाने गाधीनी को गांधा बनन में रिस "गार सहयोग दिया। २ चम्पारण और गुजरात में पान महिला-जागरण का काय मिस कार सम्पन किया?
१२ मार्च-डाण्डी-कूच दिवस पूर्व-तयारी-स्कूल बन्न हान के पूर्व सभी को अगर दिन व कायम की सूचना दे दी जायगी। दूमरे दिन मूत्र-यनोपरान्त छात्र एव शिक्षर सभी एक स्थान पर एकत्रित होंगे और वहां पर इसका इतिहास प्रस्तुत किया जायेगा। इम इतिहाम वा लिखकर सग्ल्दि कर प्रधानाध्यापक व वक्ष म रस दिया जायगा। इतिहास-मन १९२९ म प० जवाहर लाल नेहा की अध्ययता म लाहोर म वापस का एक अधिवगन हुआ। म अधिवेशन म वाग्रेस ने भारत का पूण स्वराज्य निर्धारित किया। अपन सदम्या का यह आग निया वि क्वल पूण स्वराज्य व ध्येय मे काम करें। २६ जनवरी १९३० को प्रथम बार पूण स्वाधीनता नियम बडे उत्माह स मनाया गया। इस अवसर पर दा म जा उगाह प्रक्ट दिया उसम ता यहा पात हाता पादिश राजनतिर आनान वरन पे लिए नयार है। अपित भारताय पाम पमिटी न गाधी जी का जानन प्रारम्भ करने का अधिकार भी दे लिया। गाधा जा मान्ालन प्रारम्भ वरन म पूर मरवार का अन्तिम चेतावनी दन हुए वायगराय लार इरविन शा २ माच या मावरमता आयम म एर पत्र म निगा था- भारत एर विस्तृत बारादाम है-मविनय अवमा नानालन हा भारत की अराजकता और मुप्न अपराधा म यचा मुस्ता है। बारिश म एर एगी हिमामय माया भी है जा य्याग्याना प्रस्तावा या मम्मतना म विवाद नहा रपती वरन् गर विद्वार म वियाग करता है। यति युगापा बादर परन या आप प्रयाग नहा पर रागे और मर पत्र का आपर हाय पर पाई प्रभाव नहीं पडगा ताना माा नी १ वारोग का मै यायम ग उनप मापिया या स्पर नमर गानून तोडन र निरा पर पड़गा। निधनामा दरि म भ ग घर वा गाविस न्यायपूर समन्ना है। स्वापा- नता सागरास निधना हिताय है। गाधा जी या नमार मवय म गावापान पर गरिहा एक एगी धारा अमीराया गराग सबारसि गमान मरवण चीज है। पत्र का उत्तर मार दरग्नि १३ अप्रैल जालियॉनाला पाग हत्याकाड दिनम पूर्व तयारी -एक दिन पूर्व सवा का इसके विषय म सूचित कर देना चाहिय । दूसरे दिन सूत्र यनोपरान्त सभी शिक्षक एवं छान एक स्थान म एकत्रित होगे और इस विषय म चचायें चलेंगी। छानो द्वारा विरचित निवधा का सकलित कर प्रधान जी के पक्ष म रख देंगे। चर्चा के समय इस बात का ध्यान रहे कि अग्र जी राज्य का इतिहास गुरू म ही बतलाया जाय । १८५७ ई० के प्रथम स्वातन्य युद्ध पर भी प्रकाश डाला जाय । रौलट एक्ट तथा १९२१ व असहयोग आन्दोलन पर भी प्रकाश डाला जाय तथा साथ हा प्रथम विश्व युद्ध और उन्हें इगलड भारत नथा गाघोजी व महयागा का भी स्पष्ट किया जाय । तब जालियां वाला बाग थे हत्याकाड का विशद वणन किया जाय तथा इस काड वा भारत पर क्या प्रभाव पटा इसका भी चर्चा की जाय । सन १९१४ म प्रथम महायुद्ध का अत हो गया था। लोगों में पह' स ही असतोप की आग सुलग रही थी। युद्धापरात भारतीया पर पर बता दिया गया था और वस्तुआ वे मूल्य म वद्धि हो गयी थी। इन आर्थिक कारणो से भारतीया म जत्यधिर असताप के कारण स्पष्ट पलक र थे। बिहार के चम्पारण जिरे व विसाना म अग्रेज निलहा + मिलाफ म एक जवदम्त आदोलन खडा किया। गुजरात के सरा जिले के किसानों का आन्दो- लन भी इसा ममय हुआ । इस प्रकार लागा पर सन शन जयाचारा का दमन चर वाफी तजी से बढ रहा था। और इसी समय एक नई घटना घट गई। भारत म पननवार आगलना का कुचलन प लिए तवालीन सरकार न ततालीन कानूगा का अममध पाया और इसीलिए एक एक्ट बनाया गया जिला नाम रोरा एवपडा । इस निमाता सर सिडनी रोउट थ और जहान नाम पर इस कानून का नाम पेट पर पड़ा 1 इम नय पानून के अनुमार सरपार में हाथा म इतनी शक्ति आ गई कि छोट म छाट आगलना का भी जिमम मिगी भी प्रकार की जनहित यी हानि नहीं हो सस्ती था रार मा सरती थी। सारदा म इमवा पिरोष पिया गया। महा मा गांधी न हो इम जन-व्यापी विद्रोह का महत्व दिया और इसी विरोध का प्रकट करने निय हो १३ अप्रैल १९५० को नाम का जानियां वाला वाग में एक बहुत वही मावजनिर सभा हा रही थी। यह बाग अमृतमर द बीच एक स्थान पर पाजा चारा मार दावारा और ममामा म मिरा हुना था। मम माने जान जिप एव मवरी गलो यो। इस याग म नगभग २०००० व्यक्ति एकत्रित हुए थ जिमम वच्च का भार पुग्प नी गामिल हैं। इसी बीच जनरल हायर नामा एवं अपनर न एक सा भारताय एवं पचा प्रिटिस सनिका साथ उस स्थान पर परचा । सभा म इसम्म जनता का सन निनर वितर हामा नाना दी जोर तीन मिनट यार होउन पर गाली बरमाई जान नगी । इस प्रकार उमन गात एव निरपी जनता पर गाती चा। गोलिया का पाना नर नर नारा रहा बनर चूल मालियो समाप्त न हो गई । बन मिता पर १६०० फायर गिर गय । मसारी जोररय अनुग्गर मृनावी सस्था १०० एव पायता का या गैव-बरीच दा हगार व लगभग था मा हुए पायला का राज नर यही पर घाट दिया गया। पापला के लिए पानी पीन पाना प्रयाय नहा रिया गया डाक्टग को सवा गुध पा की बात ना सारा सापना म तिर तप-नटप कर मर गय । यहाँ जानिया राय बाग वा नाम हया- नाया जा मार जार म पाठा पलान मलिन इस पर रिस गया। अत्यावाग का यही अल नहीं हना। १४ अप्रल ग २४ अप्रैन तर मा17 (पोजा वानून) मारी कर दिया गया। सागा का मापत्ति पत्र का पा रहा था। डा को मार पड़ रही थी और महरा र सागा का परम बन चरन मियूर किया गया था। पौगाजार र शर्मिट की नियुति हुई नियम महामा गधा मा० आरा और ५० मानोरनी। मरवार की मारग एर हटर पनि मी नियुक्ति हाजिरी रिपाट माघम पर भारत मत्री का पता बरत- मरा पर मचाय लिया गया और औचिव तथा मान- वनाश मात्रा यापन रिया गया। सार गार पाप का हग रिचा गया । सागा दो नाग हमा गिरा -मिरर अपm रा विरोध करना चारय । गरा नाति राममाना पा! मग्न र ग्यना पाहिला गमन freो दुरी पारा र पररा हैं। मगन नहीं एन म ८२ शासक गण हम पर अत्याचार कर सक्त है। दूसरों की भलाई पर ख्याल रखना चाहिये । घायला, बेक्सों एव निवला की सेवा करनी चाहिये । प्रश्न १ लागा में घसन्तोप के बदन के कौन-कौन-स कारण ५१ २ नालिया वाला बाग कहा और क्सिलिए प्रसिद्ध है ? ३ जालिया वाला बाग का हत्याकाह कब हुआ और उसमें कितन व्यक्ति उप- स्थित थे। ४ इसम मृत्तका पऔर घायलों की मया को बतलायें । ५ हन्टर कमिटी को रिपोर्ट पर प्रकाश डालें । कायम के द्वारा नियुक्त कमिटी की रिपोर्ट पर प्रकाश डालें । असहयोग धान्दोलन रोनेट एक्ट एव जालिया वाला बाग क्या सम्बन्ध है। ६ मार्शल ला क्या है। इसस पजाब में क्या हुआ? ७ जालिया वाला बाग के हत्याकाठ से लोगों पर एव भारतवर्ष पर क्या प्रभाव . पड़ा, ८ जालिया वाला बाग के हत्याकाह क बार में काग्रेस स तथा महामना प० मदन मोहन मालवीय ने क्या किया इस पर प्रकाश डालें।
२३ अप्रैल बाबू कुअर सिंह पृष्ट भूमि-१८५६ ई० म लाड डलहोगी इगरड लौट गया और लाड यनिंग गवनर जेनरल हार भारत नापा । इनर गासनकाल पी मरसे बड़ी मह वपूर्ण घटना १८५० ई० भी शान्ति थी। ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुए बरीच गन यप हो चुके थे। साम्राज्य विनार त्वरित गति स हो रहा था । इमय विपरान इन अजा वे विद्ध बना दुश्मन भी उठ सड हुए प। बतर भारतीय नरेगा पर सरदारा र मस्तिर म अग्रेशनिराधी भाष नायें थाम कर रही थी। दा निराधी भावनामा 4 फ्लपप पहुत-ग राजाआ ने पव्यत्र एव युद्ध घरव अग्रेजा वा मार मगान का प्रपन विपा, विन्नु व अगफल हुए। समय-समय पर घाट-घाट र हाते रहे कि ? बडा भार एव गनि विद्वाह १८५७ ६० म हुआ। इसम पानी की राना लामा बाई ताया टाप नया नाना माहब का प्रभुम हाय या । इही म मगिरम या घर मिह भी जा विहार एव सयुक्त प्रात (उत्तर प्रदा) र दुध जिली में अपना पहा घडा रिप प । जायन यात-अजा व गुन में देश को मुत परत ये हतु १८५७ ई० भोगव्यापी तालिम गाहाराद न प्यामी घरलो वा अपन रत में शिचित दिया। विहार धागान्ति में अप्रदून बाबू माय हो | nit नागपुर, मारा म रमाबाई और महाराष्ट्र मनाना गाहा पा पानोपा टाप ने जगभयानर पति या वारता यमचाईम माप मचान रिया। चार र गिता सम सन 183320 म नगर (भारम) म हमा पा. इनन बज जान म रहा परत ५। माग मार को अपन मा उनी कान है । जर लगाहान गितीने ९० ई० म मारवा पर आना अधिार पर दिया तब यह मबतमान रणगानुन भर भागार प' मा । गा भाजपुर गा उही साना राजधानी बनाई । रामा मानना पुन मागापा एव या गजा उपती रामनामनामा गए जो मार गिज और अमर सिमे नाम म!ि मान माया' भार मारपुर ५ पान पर गरन और रिपपनमाला र धारामा मार नि नानाभादर की अमर गाथायें गीता की ध्वनि में गूजती सुनाई पडेगी। स्वतत्र भारत के इतिहास म उनसी या गाथायें स्वर्णाक्षरो म अक्ति हैं। शाहानाद का चप्पा- चप्पा उनके जमर प्रताप स प्रदोप्त है और बिहार का कण रण उनका चिर ऋणा है। इननी शिक्षा घर पर ही हुई। हिटो फारमी एव संस्कृत के व बहुत वडे पडित थे। युद्ध श्रिया की शिक्षा म भी बहुत निपुण थे। मुख्थन इहें गितार करन व घोडे की सवारी परन से विशेष स्नह था। चतुर सनापति कल पण इनके रोम रोम म कूट-कूट कर भरा हुआ था एव सेना में कुल संचालन करन की विलक्षण चतुराई थी। उदभट वक्ता हाने के साथ ही इनम बचपन से ही भयाय ये विरुद्ध विद्रोह वरन की भावना विद्यमान था। ये बहुत ही उतार एव धर्मात्मा व्यक्ति थ । दानी होने के साथ ही यायी भी थे। अपने कमठ साथिया को भरपूर दान दने म तनिक भी नहीं हिचक्त थे । सन १०१७ का जमाना था । देग म काति वगूले उठ रहे थे। ताग विद्राह की भावना स पागल हो रहे थे। सारे दश म नातिनारिया ने प्राति परा का एक ही याजना बना रही थी। सभी जगह यह घोषणा कर गइ कि नाति ३१ मई को होगी। मिनु बगान के वरकपुर की छावनी म मगत पाण्ड नामर सिपाटा न उतावरे पन म वुव विद्राहात्मय काय कर लिया जिगर कारण काति १० म को हा प्रारम्भ हा गर्न । गानि की धधकती हुलपट गवा 7 गई । कानपुर की जन जा सना न २५ जन नाम- समपण पर लिया । इधर एक माह के पश्चात दानापुर के मिपाहिया न वाम गरने राइन्यार कर दिया। अब बाबू साहब न भाम्पतता गग्राम की धघाती ज्याला म बूट पडे और गनापुर व मिपाह्यिा का तन मा घा स भरपूर महायना दा। थारा वी अग्रेजा मेा व अपर - नाई यो उन्होंने चढ़ार की और या की पचहरी TIना जन जाति पर पाा स्वय स्थापित कर लिया । दागिना अनार कप्ताा डेनवर एक बाबटी मना पर आरा म चर आया । शिव भा पा रहा और पुट म मारा गया। युद्ध होना बाद मार ईरएप मरी बडो मना नारा गरमशार आ पहुवा गि भी मुहे की पाती पगे। इसी बीच दूमरा ना या पदची जिार कारण यु पर गिह की हार हो गई और ई वा आरा पर गधिकार हा गया ।
८५ इसके बाद कु वर सह अपनी राजधानी जगदीशपुर आये। मजर ईरे ने जगदीशपुर म चाई की। बीपी गज और दुलर के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस लडाई म बहुत-सी अग्रेज सना मारी गई ईर की हार होना जा रही थी किन्तु विगत सना हान की वह स वह याग की ओर बढ़ता गया। अब बाबू साह अपनी राजधानी जगदीशपुर को छोडवर जगन म आवर रहना गुरु कर दिया और यहा म छापामार युद्ध का तरीका अपनाया । जव लसनऊ व कातिनारिया ने आग्मगढ जान की याजना बनाई तव इधर यातू साहब न भी अपनी मना सर आजमगह पर धावा दिया। यह ममाचार पात ही वप्तान सीलमन न एव गारा मना के साथ तापा स रण होर बाजमगढ से २५ मील की दूरी पर तौलिया नामा स्थान म वर सिंह पर आनमण रिया। १८ माच, १८५८ ई० वा मोलमन पर घट गय और उसकी सना रामर भूमि में भाग उठी। तर वनल हम्ग २८ माच का अपनी मना सर आजमगढ आ धमका। विन्नु वर भी युद्ध म गत रहा और आजमगढ पर या साहर या म्बर पापम हा गया । गपनर जनरल लाड निग जो उग गमय प्रयाग म था बा साहब प भय पर्रा उटा। उमो मापर का वा माहब म विरोध परने लिए भेजा वितु यह भी हारपर रट हो पाय लाट आया। ६ अप्रीत पा या मान अपना विजय घोषणा की। अर य अपना १०० मना र माप यनारन ग जगीर लोरवर यापम आ रहे थे। बीच म पपान नुगई न या गब म मुरावला पी रितु या गाह्म न जा घामा पर अपना गारी मना को गाजापुर य निपट जाहनवा पार करा दी। सारी राना पार परन प पश्चात वायू माहा एर नान पर गंगा पार पर रह था सुगईीसना न गारी पाना प्रारम्भ कर दी। एग गाली वाय गाह को पनाई म भा सग गई। चार मार उमी समय या हाय में अपना तलवार उठा परस पहनो नाच पा हाय पाटकर मा भागौरपी र परपा म यह पाहा अपित पिया मां, दुष्ट पिरगी पागोगी मे से अपवित्रर रिपा। यय पर मरे पाम राम रा, मतपय या मुम्हें सरित है।' मायू मारव र पारामा पहुँचा हागा निगगिया 7 प्रिमित मात्रा- गजात सापारानगर स्वागत पिया और उनकारती जारा।
वाबू मार न हाय के क्ट जान पर भो नस्सी बप की नवस्था में २३ अप्रील, का अपनी जमभूमि और राजधानी जगदीशपुर का यग्रेजो से मुक्त कर ही लिया। लेकिन घाव की पीडा अमय हाती जा रही थी और पाव भी वना चला जा रहा था । अत म उमा वण के कारण २६ अग्रोल १८५८ का उनका स्वगवास हो गया । इस प्रकार चला गया या कुवर अमरपुर साहम से सब जरिदलनीत । उसका चित्र देवकर जब भी दुग्मन नाते है भयभीत । वीर प्रश्विनी भूमि धन्य वह धन्य वीर वह घर नतीत । गत थ और गायेंगे हम हरदम उमका जय के गीत । स्वनवना का सैनिक था, आजादी का दीवाना था। सब कहते हैं कुवर सिंह भी बटा वार मरदाना था । (मनोरउन प्रसाद सिंह) बाबू कु वर सिंह बढे हो सच्च सच्चरित्र व्यक्ति थे। चरित्रवल 4 कारण ही अपनी ढलती अवस्था म भी इतनी वही लडाई छडी। वे इतन वडे सूरमा धरि अमेज भी उनम डरत थे और नामी अग्रेजा को भी समर भूमि म मेन दिया। आज यद्यपि दवू साह्य हमारे मध्य नहीं हैं तथापि उनकी स्मृति यब भी और सदा-मवदा के लिये हमारे मानम-पटल और हृदय पटल पर अग्नि रहगी। धय था वह वीर और घय थी यह मूमि जिसन इतना वहा सूर-वीर रत्न उत्पन्न रिया। जगीपुर मे आज भी उनका महल यागार स्वस्प कायम हैं जो उनकी याद दिलाता रहे। दार आते हैं देखत हैं और उनके प्रति अपनी श्रद्धा- लियो अपिन कर दो चार अयुषण बिगर कर चले जात हैं । आज देश का नाव यरता है ही पुत्र रत्ना की जा दावा नव निर्माण और नगात्थान बरे जा चन-जन म पनि उपप बरे जिम देपार विश्व की आंखें चना- घोंप हा जाय। में राव ध्यान देना चा चाहि स्वताना मा
भाग भी मार रहना चाहिये। काई काम निप्काम भाव से करना चाहिये।
माम मरन के पहर पल को माता नहा करनी चाहिय ।
१ मन् १८५७ की पानी क हान का क्या कारए या!
२ कुगर मिह का कान्ति म करा हाय रहा!
३ बुवर सिहक विषय में क्या जानन हा?
४ हनन हारपिय स्या
५ उनक जीवन स तुम्हें कौन-कौन सा शिक्षा प्राप्त होता है।
। १९५० को सन्ति क्या महान है ?
७ मई-रवीन्द्रनाथ टैगोर पृष्ठ भूमि-भारत सदिया, सहस्याब्दियो से मपिया और मनीपियों की जमभूमि रहा है। कृष्ण के क्मयोग का स्थल भारत ही रहा। बुद्ध की तपोभूमि यही थी। टंगार का जम दे भारत न युगो से जीती हुइ परम्परा को यथावत कायम रसन की चप्टा को है। भारत की पुण्य भूमि म रवि वादू का प्रादुर्भाव उम समय हुआ जब कि देश पराधीनता की वडियोम जबडा था। भारत माता सटिया में लौह प्राचीर म ब मिसरियां भर रही थी। उस समय दश म कान्ति प वगूलें उठ रहे थ। आदोलन की चिनगारियां प्रवलित हो रही थी। भारत म अग्रेजो का एकछत्र राज्य स्थापित हो चुका था। देश की दशा आयदिन प्राय युरी से भी बदतर हाती जा रही थी। अग्रेजा का मात्र काम था लूटना । भारत का धन विदेगा म जा रहा था। भारतीया के लिये यह असह्य था। स्वतत्रता के लिय लाग लड रह थे । इन जम के कुछ ही दिन पून १८५७ ई० को महान क्राति हुई थी। उसम भारतीया को सफलता तो हाथ नहीं आ सकी विन्तु अग्नेजा को यह नात हा गया कि भार तोय भी अपनी स्वतत्रता के लिये मर मिटन वाल हैं । इस भाति १८५७ ई० की पनि का तापा और व दूका ये नीच कुचल दिया गया फिर भी भारतीयो ने हिम्मत नहीं हारी। अभी भी उसकी धमनिया म उष्ण रत बोल रहा था। लाग स्वतत्रता का सूय दरवन के लिये तदप रहे थे। अपने को गुलामी की जजीरा स मुक्त हान क लिय यथाशक्ति चष्टा पर रह ५ । कुछ एसी ही समाति काल पी वला यी जबकि भजपनि वीणा पाणि च वर पुत्र रवि याबू पा उदय हुआ। जीवन यत --रवि वायू या जम ७ मई १८६१ को क्लबत्ते के ऐसे मध्य भवन म हुआ जहाँ मुम की सभी सामग्रियो उपल ध थी। प्नवे पिता महपि दवदनाथ अपनी विद्वत्ता तथा माविकता - पिय बगाल म विस्यात धे। एस ही पिता की दखरस म वानर रवि दूज की चांद मा विकसित हो पला । उस वभी विसी वस्तु को ममी नही सटवी।
वगान म उस समय बहुसख्या पि एम थे, जो पढ़ाने के बजाय पीटने मे ही अपना बत्तव्य समझत Pिा को एसीरता से स्कूला म पढने मे उनका नि उचट गया ! एस सूला म पन्ना उन्हें वापि स्वागार नहीं था जहां पर मार पहनी हा । नर पिनानी ने इस भाव का नाड लिया। महर्षि दवदनाय न अपनी सपूण सहानुभूति उन्ता पर समर्पित कर रखी थी। अनु वाला रनि की पढ़ाई को उत्तम व्यवस्था घर पर ही कर दी गइ। घर पर प्रारम्भिर TT अजिन बरन । उपरान व विटन गये। वहाँ पर उन्हान दावों तक गिरा प्राप्त की। छाप-जीवन म हो रवि वाबू खुले नील बाम और उममें इतना विच रज करते हुप उजर-बारे दान और उना मध्य चमाना हुई चपला की घर का वध हागर दवा बराये । प्रहल असून या वायु व पांगम पूमन रम पर हृदय भी हम उना । मरिना या चार रहरा कासावर उन एर जपूत्र मान या जनुन नि उनरा पायानि का म्यात यौ। उन्हें निति प्रेरणा प्राप्त हुई । काय निनो प्राय १३ वप पोरया म ही उप। बम मात्र य हाने भर पी दर थी विसमित हाने म बुध भी समय नहीं नगा। जर र बाबू म वि वे समय पर प्रवा रिया को दुनिया ने गरप्रयम माहिया माहिम जिन विपर पर न नतिमा गचित्र वामा यह चमर उग। मागिय जिन मे म उन ने अपन धरण यदाय, वह मुरित हा उग। उन नी म माहिप का बाद अग अपना नहीं रहा। पहाना, “प पाम, मन र घ आलाधना गीतिरा सदमप निगा और गमनधन पर fr| बगना और रोजी जप दाना भापामा म लिया । माहि यर र बान प्रापमा भीगा अमेजोरियर ममान मारिया को मार टिहाई मनासारी बोगा और राजनीतिमा निगरा सामान11 नर "र मएर थनिम आमा नापी और आमाका बानी नतो दाग मात्र एमाएर मदिरा पा ! नाना मुघमा रिता या I पि गनी मुगा र सिरिना। गन् । सील प्राणाले मी और हामलर मृतु परन्त ना न रतना आप हा प्रहाता हो। अगर म निगाह रचना का पृर- FAT १३.00 तर परमारित रहन अम गीताजलि जा उनकी उद्भत रखनी की अमर देन हैं। इस नोवेल पुरस्कार प्राप्त हुआ और मिली वगेडों के रिल की सच्ची सहानुभति । रवि बाबू भारत के ही नहीं वरन एगिया के मवप्रथम नोवेल पुरस्कार विजेता थे। उनकी पुस्तका का अनुवाद विश्व की सभी प्रमुख भाषाआ म उनके जीवन-काल म ही प्रारम्भ हा गया । एसा सौभाग्य शायद ही किसा का प्राप्त हाता है। प्राय यह दया जाता है कि किसी को स्याति मिलती है ता मृत्यु के बाद हा । रितु रवि यावू सबै अपवाद थ। घय रवि वायू जिसने अपने जीवन-बाल म हो इतना स्यानि अजित की जिस न ता काल सा सकता है और न काद चुरा सस्ता है । दाभक्त रवीद्र का व्यक्ति व रखनी और वक्तृता म यत्र-तत्र सवय विसरा है। आवश्यक्ता है उम साचन और समझने की और सग्रहित करने की। उहाा वग भ ग वा सदव विरोध रिया । जारियाँवाला बाग के हत्याकाड की कटु आलाचना की। यदा-कदा अपनी आजस्विनी वक्तृता म उन्होंने भारतीया का मा पुनीत पथ पर अग्रसर होने के लिय और उनके पत्त व्या की याद दिलात रह । विश्व भारती तथा गाति निकेतन कवि की अमर स्मृति और स्मारक हैं। विश्व भारता ता अनराष्ट्रीयता की एमा मजिल पर स्थित है, जहाँ पर हिंदू बौद्ध मिव ईमाई सभा एक मन से चितन मनन पर शान्ति का शोध करत हैं। प्रशान्त वातावरण, जहाँ पर न ता जातायता है और न साम्प्रदायिकता । गालि निकनन ता वस्तुत 'गानि वा घर है। यह एक तपाभूमि है । इमकी स्थापना रवि वायू व पिना नी महर्षि दवेद्र नाथ टगार न की थी और पूत्ति इहाने की। यहा है कवि को सतन साधना अथक परिश्रम और उद्याग वा पर और प्रतीय । इमको अग्रसर करने म कवि ने तन मन धन स महायता की। यहाँ तर रि इसकी पूत्ति व निय इहान अपना पना अभषण ताका भा बचढाना। जिन तरह उनवा रखना वजाट था उसी तरह उन। बावाज भी विन- क्षण और मधुर था । जब कभी व अपना स्वरचित कविता मुनान लगन ता जनता मत्रमुग्ध हो जाता। एक बदमत आक्षण था उसरी जागराज म एक विचित्र सम्मान या जा निमी का भी अपनी जार बावदित पर रता या। उनो हाथा म चित्रकारी करने की भी याग्यता भी छिपी थी, जो बुटापे म प्रस्ट हुई ! उनकी एसी चित्रकारी होती थी, जिस देशार चित्रकला- ममन भी विस्मय विमुग्ध हो जाने । यदि गभीरतापूर्वक विचार किया जाय ता प्रतीत होगा कि रवि बाबू एव महान् बवि ही नहीं वरन साल कहानी- वार और उप यामरार, गभीर दारानिय चिता और मनीषि, मपुर सगी. तन, इदुपक्लावार और मानवता मन्दिर के सच्चे पुजारा ५ । इनकी प्रतिभा समतोमुखी थी। ऐम रवा का, जिम गरीका के गम और दोन दुपिया दद का अनु भव विधा धौर मरे अतर्राष्ट्रीय हा पर। रवि बाबू नामान्चारण से ही राम राम पुक्ति हो जाना है। इमरा प्रास्त भाल, रिव्य और ममस्पी और, लम्न बाल और लम्बी दादी एक नया चित्र औसा यसमा स्पप्ट हा जाता है। मनर नत हा जाता है इन भाग । पर रवि ७ अगस्त १९४१ को म दुनिया का बाहर के लिए चल गय । उसो निधन पर प्राय सभी प्रमुख राष्ट्रान आंसू बहार और प्रतियप उनकी निपन लिपि पर महाया आभू बहात हैं। आज रवि नहीं हैं पर उगरे आलोव का अस्त नहीं हमा है। वह आज भी हमार जीवन प्रत्यर क्षेत्र 'प्रास्त पय कामागित पर रहा है और गरियो ता हमारी पपमान बरसा रहेगा। उसने इम अमार की पूति हम मात्र और यहाार नही पर मान । उनी य. गत आमा सीमावि लिए उनर विचार उना दान काममा हागा और उमर अपन जीवन र बमक्षेम उतारने और अपनाने की चेष्टा करनी होगी। Fra --निमी भी विषय का अम्पयन घरात बसर अप्पयन रामधि लिगा ता मला मानि माममा पर निगा। विचार ऊँ हान पारिय साय होमाधारण का समापन सापा। जर दि परगाह गाय पारा पो Firm! या एगा राय नहीं पला पाय निगम निमा का पार परी, नाई नो पार कि और सोर मगम नदिना पाहिय । वामम भरना पाहिल तथा राना मोगा अपनी ही सरह गमता चाहिए।
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प्रग्न
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१ रवि वाबू के जन्म काल की अवस्था क्या थी ?
२ रवि वा पलित हुए भारतीय हो कर और मरे अन्तर्राष्ट्रीय हो पर, 'मे?
३ रवि वाद का जीवन चरण सानेप में प्रस्तुत करो ?
४ उहें विश्व-कवि क्या कहा जाता है ?
विश्व को इनकी प्रमुख देन क्या है ?
६ उनके जीवन स उन्हें कौन-सी शिक्षायें प्राप्त होती है ?
मई-प्रथम स्वाधीनता संग्राम दिवस - पूर्व तयारी--प्रथम स्वाधीनता-मग्राम लियस मनान की सूचना सभा वा तीन दिन पूर्व हा दी जायगी। शिसव एव सहर इसको अच्छी तरह म तयारी दरेंगे। नवे मिरभित्र विषयों पर निरघलिया। रवितायें पते जागी। स सबध म लहर अभिनयाहि करें। १० मई २ मुबह म प्रभात परीकी गायगी। याम पामांना म जावर रापावी जायगी। विद्या लय सी भी सपाद उस दिन विगप प्रसार सवी जायगी। चन्दनबार सजाय जायेंगे। भाज दिप प म एकाध घट तर नूर या होगा। इस बार सभा छात्रा का सपन-जपने यों मनर वर्गाध्यापर इन मग्राम पर बुध बनगगे। फिर यात मदानाra frrn को मम्मिलित गोष्टी हागी, इसम नडर भाषण है। निचय म गे और प्रगमनादि प्रस्तुत करेंगे। अन्तना गया गमापनि व भाषण व बाद गारिपटित हा जायगी। देगी हाल म रजा या भर पढ़ चला था। बम्पनी वान र पा रहा था। सारा दा मृतप्राय पाहापा। माई राजनिति नहा की। एकाता नाम निशान तर मिट गया या म1 पग्लना चपन मजरा रा रसापा। पाराजा और नमागमा राज्य घोगा जा रहा था। जमादारा र जमान लो ना रहा यो। अमीग कामी पर अधिकार जमाया जाणथा। सावा Trar ॥ रहा था। नारिया और ममामा दिन दहाट या रिया जा रहा था। मना न मार अाचारापीmam जीत ItATMगराया। एगीगलन मगम र भीषण पानि बाहना जथाप पर पानि र मनराना पारण है । उन कारनामा माना हो पर प्रस्तुत किया जा रहा है- मुगल सम्रा रे साप rint -अाने मुगार गनार माथ Trfrमा मग राममनोपनीर माय अरमान पर दना व 1ि MIT मामिल पान पर सर १५ हार पर माwिriram पा! नानानि गम मयत बसपा २ अवध के नवाव के साथ दुर्व्यवहार --अग्रेजो ने वलपूर्वक लखनऊ पर अधिकार करके वहाँ के नवाब वाजिद अली शाह को निष्कासित कर दिया । उसके मला को निलज्जतापूर्वक लूटा था। इतना ही नहीं वहा के वेगमो के साथ अत्यत घणित दुव्यवहार किया था । इससे वडे वर्गों म निरागा एव असतोप की लहर फैली। फिर वहां की शासन यवस्था नई हो जाने से जनता और भी ऋद्ध हो चली। ३ अपदस्थ समिको मे अमतोष –दगी राज्या के ध्वस्त हा जान म उनकी मेना समाप्त कर दी गई । इस तरह करीब साठ हजार लोग वेकार हो गय । विद्रोह के समय ये भी प्रातिकारी हो गय । जमीदारों के साथ दुयवहार -अग्रेजा ने जमीदारों से भी जमीन छीनकर उ ह गोद लन के अधिकार से वचित कर दिया । बहुत लोगा की पूरी की पूरी जमीन छीन ली गयी। मणिपुर के राजा के १५८ गावा म ११६ छीन लिय गय । इस प्रकार इनकी आर्थिक दगा इतनी रद्दी हो गई कि भूमि के दाम पर ३०% या ४०% पर भी ऋण मिलना कठिन हो गया। इस प्रकार जमीर भी उनके शत्रु हो गये । रूसी आक्रमण की आगया --उसी समय यह अपवाह उठ गयी गिरिननिया के युद्ध म हारन के कारण रूम भारत पर चटाई करगा। ६ बिटिग गासन की समाप्तिको भविष्यवाणी -सन १७५८ में पलामी युद्ध जीतकर क्लाइव न जग्रेजी राज्य कायम किया तो यह भविष्यवाणा हुई मिसो मान बात यह राय नष्ट हो जायगा । १८ ७ इ० वी पानि गने भी प्रभावित हुई । धनका दिनमम -अनजान भारत का स्थायी निवाम नही बनाया था। अन धन कमाउर वे अपन देश र जात थ तो भारतीयो का असह्य हो गया। भारतीय व्यापारा तया उद्योगा का ध्वग-औद्यागिव प्राति क वारण जग्रेज भी प्रभारित हुए । अत जहाँ ये गय वहाँ पर उहाने उद्याा पर एकाधिकार पर लिया। इस तरह भारत वे उद्याग तथा यापार यी हानि हुई। ९ बैबारी से समस्या -गी राया के अपहरण से काफी सनिव बेरार हो गय, जिमम याप। अमताप पता। १० अगजीाि प्रचार जजान भारताय निभा विजापा प्रचार विचा। सभा धर्मो नया नातिया व तोग एक जगह TET प्राप्त करते ९५ थे जो भारतीय परम्परा के विरुद्ध या। अत विद्रोह की आग भडान लगी। ११ मारतीय सनिको को विशाल सत्या -१८५६ ई० में भारतीय "निर ०३३००० तथा अग्रेज ४५३२२ थे। अन इम विषमता सभी नाति हुई। १२ यतन, मता-सरसी में भेद नाति भारतीय मैनिको या वतन "भना कम मिलता था । ऊच पद भी इह नही दिय जान प । वमय अग्रेजा के लिए हो सुररित थे। अत इसस भी असताप या आग नही। १३ अफयाहा का प्रकोप उस समय अपवाह पंाविसमा मदिर जान वार आर म मनुष्य को हटी या चूण निसा था। १४ पर्यो याल कारतूस --मो समय यह भी यवर उहारि कारतूमा म गाम सभा गूअर पापी है । पनिर भी गा प्रयास में पूर्व दान मे मारना हाना था भन हिद मुगलमान सैनिक मि हो उठ। म ही मुम्पन पारण है। क्रान्ति का स्वरूप { Nature of Rebellion ) मन १८५७ ६० की प्राति भारतीय इतिहास में एक महापू और अपूर पाना है। पिन १८४७ ई० यी नानि म उधिर महत्वपूण घटना भारत मनही पती ( Perhaps a more fortunate occurence than the mutiny of 1857 never occured in India ) सुप लागा मा पचन है कि शनि राती नदि आ जापारी नि तर' रही और am मरता हुई चनो गई। याद मम वन गम firat TT (Thc mutiny is like a tropical storm, dera imed, passed away and scemed to Inc fcu tralcs behind it } गीन पान | पति का नाम Trerfrनु गाव मार पर TE TET बार म अनr fort गतिभिरमा । गुग र निविदा पागण स है। म प्रभAT विणा free आयुतित मारत र नलिना पोर गावरार यर मा . मा. मजुमार और stating but हदावनलाल वर्मा आदि अधिक विख्यान हैं। इहोंने अपने तर्कों के आधार पर यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि यह एस राष्ट्रीय जनजाति एवं स्वतत्रता प्राप्ति का पहला किन्तु भीषण विद्रोह था । अप्रेज विद्वानों के विचारा म भी कुछ मतभेद अवश्य पाया जाता है । सर जान लारेंस के मतानुमार यह केवल एक सनिक विद्रोह था। जिसका तत्कालीन कारण कारतूस वाली घटना थी। इसका कार्य भी मम्ब ध विगी पूर्वगामी पडयन स नहीं था यद्यपि बाद म कुछ असनुष्ट व्यक्तियो न अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए ताभ वन्य उठाया । (The munity has it origin in the army and that is proximate cause was the cartidge affair and nothing else It was not atributable to any antecedent conspiracy what ever, all the it was after words taken advantage of by disaffected per sons to compass their own ends ) सरजान सील व विचारा नुमार, सनिक निद्राह पूर्णतया जतरराष्टाय सनिर विद्राह था। जिसका न काइ देशीय नता था और न जिसको जनता पा समथन प्राप्त था। (The mutny wholy unpatriotic selfish Sepoymutny with no native leadership and no popular support ) इस विचारधारा मिल्कुल विपरीत सरतम्रा धाउटरम की घोषणा है कि यह अग्रजा विरुद्ध मुगतमाना या पन्यत्र था जो हिला की शिकायत के बल पर लाभ उठना घात यं । पारत्मवानी घटना न विद्रोह से समय के पूर्व ही उहें भडका रिया बरि वह भलीभांति मगटित भी नहीं हुआ था और उम जा प्रिय राज विद्राह का रूप दन लिए पयाप्त प्रदध भी नहा विय गए थे। (It was the results of Muhamadans cons piracy making capital Hindu grivances The curti dge enccdent morely prccipitated the mutiny before adequate arrangements had been made for making the muting a first step to a popular in sanctions) जाधुनिर भारताय इतिहासकार या मावरकर एव जगार महता इत्यागि न हम भारतीय स्वत मना-मग्राम की मना प्रदान की है। इसम सानिया ये साथ-माय बहुल-रा सामान जा जा स, मग तुष्ट भाग लिया था।
अधिशानिरिमा या या अॅमेजा का मार भगाना । गरि 121 प्रारम्भ म नि म पि गर गचों म प धापणा था पि- 'Drise out the foreigners ol Hindustants' मुगा माट यहा रा रात गजामा म म मिति पा रार वात या पुष्टि रखा है। उमन निगा था~मरी हामि इन्छा कि किमी भारत में निगार कि जाय । यति आप गभानी राना दुमन में वार किन नि नाम जपना मारा ति नार अधिरार "गा TT + गम काय गुपुर र नया नयार है । (I am wiling to resign my impartril rutha rity in the hands of confederacy of native princes who arc chosen to eversise it out cypel the Enghish from India ) यपिग विद्या का मृतपान मनिर विद्रोह या म हा frनु म गाय या पोव अयाचार और अन्याय या ना छिपी हुई थी। पडित नहा न ( Discovery of India ) म from -~-हर मनिर विद्राहा नहा था। यह नीय हो 47 गाजर न न विरह नया भारताय ना मग्राम वाम्प धारपाररिया। ( 11 *76 such more thin military mutiny, and 16 spread rapidly and assumed the character of a popular rebellion and ? #7r of Indian indepen dencc ) या जार गामगर न भी पद्धिता It is true to say that the outbreak sas pri marily thc mutiny of the Sepoys There is cnough cuidcncc to support the cus of Noron and Douſ this samc art75 the commolion hecome which spread and soan developed the chincter of adrell resolt नगर रिज मा afrयर र 1337 भान Tf मार दिया परना fr-The crcses Comc At first apparently 7 nci mihtary mutin it speedily changed its Christer and bekim. 4 national Surrections मिनर मिरर ०५ पर म लिखा था कि-- We nre isolated from the heart of the people, there is utter absence of the tie be tween the governed and governers The minds of the people are in a very drsaffected state' मिस्टर जस्टिम ममार्गी न 'History of our times' म तिखा है कि-'It was the rebellion of native races against English powers' मर चारम वल्म न 'Indian Mutiny' म लिखा है कि--Meerut Sepoys in a movement found a leader, 1 flag and a Cause and the mutiny was transformed into a revo lutionary war दम प्रकार उक्त तक आधार पर यह स्पष्ट हा जाता है कि यह एष राप्तीय जन आन्गलन था । यह पदापि नहीं कहा जा मरता दि इसम राष्ट्रीयता का नितान भाव था। हा उस समय राष्ट्रीयता का विप विधान नहीं हो पाया था । यन प्रालि बनाता म पजार तर पा गई थी। जज विद्वान ट वेनियन कानपुर नरटिम (Kanpur Nar atives) म लिखता है कि from Calcutta to Punjab they exhibited dangerous tamashas and puppet shows in festivals their method of propaganda FFT नाम- इमम कुछ राष्ट्रवादी नत्व भी विद्यमान । (There were some nationalistic elements in it) मन ५७ का पालि का गप्ट्रीय पातान हान वा यह प्रमाण है कि हिद और मुमतमाना म पूणम्पण गान्ति रही और टाना न मिलवर जपा म्वन ना को वरिया का पाटन वी चप्टा या । रिओ ने भी मुगलमाना या पूण महायता दी। उन्गने मुगल-गबाट का नतृव जगीकार रिया । नाना मार न अध्यभता स्वागार पी। मिवना न भी गम विनाम यथा गनि सपना की। पानि का राष्ट्राय आदान पहा जाय ता वार जयुक्ति न होगा । वस्तुत यह एप भारताय म्वन यता मग्राम था म कि पन - गिपा विद्रोह । शांति व सगठन पर एक दृष्टि --14 विप्नव मगटन बतागाम नाना साहव तथा उनका करीत अजीमुन्ना या काम पानि ६ निगम में अमर है। अजीमुन्ना मां अयत प्रतिभावान पत्ति था। उमन म, मिस रती एव तरी तया वर दाम गूम घूमरर नग्रजा र मगटन का पना लगाया। ममार वहादुरलाह और ममाता बगम जानत मल पानिरी योजनामा म व महमत थी। *घर नवधनवाय गाजित अनागाजार उमरी गनी धगम हजरत महल ए मा प्रतिभावान जोर विद्राहिया म मिल गया। जामुला या या पुरार पर हि दुआन गगाजरा आर मुमार माना न नुरानी पथ ग्रहाशी रि अग्रेजा का इस दा मनिसागित बग्न म अपना सब कुछ हाम बरगे। माय हो पावाद व मोरी अहमद र अपाभा नाम पिप बनाय है । अन्ततोगत्वा नाना माहन व अजामुन्नान वाथयात्रा बहाना दावा भ्रमण र मगदन कायम पिया। बमल का फूल और चपाती बानिय चिहन निमित प्रिय गर । पूत मनिया में और भपाती गांरा म घुमाई गई। महिना र सस्तरिर नापय क्या था यर अवतर रहम्यात्मा हा है । सम्पूर्ण " मरा पारि प्रारम बरनी पी। यह यान भागम बाय की यानि इना वट प्यार जमानमा ननिर भी पता अपनाया नशामा। फ्रान्ति कामाय मरयम काति का प्रारभ दपम म बगपुर ग জানা ৪ ম স্মা। ৭ মনিৰাশৰ দ্বাৰাঁ মা দু ধন খনি रहा गया था। रितु न नागा नारर लिया ! नर अपगरान मनिषा म अन्नग दन र पहा । बुद्ध नागा न नाग लिया पिन्न अधिommन विद्रोह नगनिनस रिया। पलवार २० माचा मानन मगन पर 3r) हो मग पाय नाम र शाह्मण ने अपन मनिरामा पिदार रम्ने र रिभरा या मगर मन न उग या वा पिया। पान पान गर्नेछ ।.यूमन राt नाना गर्ने मन गया । "नना ही नही उस वार नार र दशा अजमानी जी महारर यह भी शयर जा । - अम्मा म उस मागवाया गया। नाट अत्रका गबभारापमा मालिदा गया। पररपुर नाम दिया गया मल मन Pr - Rोगग योfrd को भी निशाना मनिलामा - रमा पनि मायाम से ममा गला ग म IT m famir नाममनिरपति विद्रा और मारमा परन ममी। अब नरm" मना इमरान मनिसारस Ririr १०० माय मर म निनावी ज्वाना धधर उठी। नाग कारावाम का नापर मनिया वा मुक्त करने लग जार अग्रेन अपमग ना माग्न ग । उमी दिन दा हजार वाराही निजी लिए रवाना हुए जार ११ मर्द का रिल्ला पच गय । यहा मा बत म वमात्मा काय पिये गये । वाम्द धराम जाग गार गर जार जनक अयज जपयर मारे गय । इस प्रकार धीर पारे नाति ममग्न दा भर म व्याप्त हा गई । झामी, नऊ जवध बनारम इलाहाबाद कानपर जोर विहार म प्रान्ति न भीषण कप पारण दिया। काति का दमन -दम भयानर काति वा दगार अग्रज ता पहर घर ये कि तु बाट मे बट हो साहम म काम लिया । निममता तथा नासता पूर्व प्रांति का दमन किया गया । दिल्ली म विजय प्राप्त कर वहादुर शाह या रगून भज दिया गया । वहा पर उमपी मृत्यु ८७ थप की नवम्या म १८६२ इ० म हा गर्न । बनारम मजनजान स्त्रिया जार पच्चा पर पापा जयाचार निय और उमकी रा हत्याय की गई । स्मिाना का फमर नष्ट पर वभा विद्राह भी अग्नि गातर दी ग । यांगा मामा पी राना नमारा जाय दिना नवजाम्य पाह म दिन रात गातार TT रता रहा । किन कुछ गद्राह्यिा ने जनजाग मिन कर मि वा पाय पान दिया। जय स्थाना की भांति पटाभा स्त्रिया बच्चा और पुरपा पर जयनान सनापूरक अयाचार टा। हयायें भा यी गई ।जनम राना भा वा चारना टुइ महत न निकल गया आर गो मान का यात्रा स गपा पर चा। यहां पर जय शानिवारी भा | गिन्नु न जा न पर्ग पर भी धागा धान रिया। राना यर्ग पर भी जपून वारता 7TII १७जन १:15. वाग्रजान यातिराग्यिा ा पर लिया। भयाना नगर । राना इतन्मान गनुमा म घिर गइ थी। मारा पार व निमर गया। पर गघुना न भी पाछा नहा योग । परनमा घाग नाल म गिपर मर गया जिमग राना आहत न गया। fry अम्पा मभीमा अनामित कामगार किया और यावर १८ जूर का नाम का नगन मगन म हाम्रा मिधारा । उमा भृय रामचन्द्र राम न पागका चिता वनार उममी पापा मम्म कर लिया। दा प्ररारत अप्रेजों ने हाथ म चना गया।
विहार मनी पानि ज्वाना न प्रचार म्प धारण पिया। जारा व निपटम्प जगतापुर व जमाएर वार पुर सिंह जा अम्मा वप व र नसरीनमा म भी आजादा या लहर नोडन गी। य ग प्राति बी प्रनत ज्या म पद परे । उन्हान आजमगट पर जारा त म पानि वी आग सुतरगयी। उनसरी जीत हाती रहा और य पद हात हुए भा लहन रह । प्रल १८/१० वा परत लटत ही "गी वीरगति प्राप्त की। नमा पग भाई यमर मिर भाग गया । उमन अपना गप जीरन कही और म यात क्यिा मारा रानामा निहाग भीम्प रन म जारथ है। र बिहार म भो पाति सी प्रचण्ट वाना वा गमन पिया गया। पारिवारिया र प्रमग नता अब गमाप्त हा पर 2 | अन वपन नाया गण, गर गाहर और पिराज गार बच गय 4। ताया टाप बागियर ग -० जाय गापर हा गया। फिर अजीपुर २ जून या अप्रजा व हाय म पिन गया। अब पीन्द मना दोन संगी। नायागप क्विा भारत पिटार भा रहा । गिम्बर १८५८ या वह वागावत गवाहर निसना। चर प्रातिरा मरतार मानमिह व ग्राम जामिनावरण भिन्न 7 या नापा १. जनपगारदार म "जनरराराताया गर मार और फिगत गाह पा गुप्त गभा ग रही थी। "ना हाम हनानान र पारण ताया वा वहाँ ग माग जाना । पिरताना रागार और पिराज ना माधिया राय " जनागा सर व गमाश गिर म प्राट ना। प्रजानना रिपादारिया रिन्न पिर हार गाना पड़ा। निताग गरिपर आ मित्र गजा मान गिया मगर । fr] नारा मित्र होमन वाा उना गाय विगमपात रिया। पर 7 यम...पा अपाम आगरानगर faR और गारमा समय। सिना पाया गया। 077 जान वानर गमाता और गरम पागना गार मन् 11t पान ग - TR पर frTTP' !
१०० क्रान्ति की विफलता के कारण १ प्राति का समय से पहले जाराम हा जाना –विताना या एसी धारणा है कि नाति विफल हान का मवम जवदम्त कारण था ममय र पहा ही जारम्भ हा जाना। यदि नाति निश्चित समय पर गुरु हुट होती ना भाग म ब्रिटिश सता का उ मूलन हा गया हाता। २ नाप्ति का स्थानीय हाना-दूमग कारण यह भा हा माता है कि या पाति मार दा म नहीं फन मनी । यह जहाँ तहा छिन्फुट प स ही फनी जिस दवा दिया गया। ३ सफल नेता का अभाव -जहा कहीं भी नाति ह बहा गान्ति कारिया वा नेतृत्व करन वाला काट नहा था। सभी मनमाना करत ।। यह भी शान्ति की विफलता का एक पारण है। ४ राजाआ को स्वामिभक्ति -दुर भारताय नरेश एम 4 जाग्रेजा का अपना गुभचिन्तय मानत 4 आर उमा का म्वामिभक्त वन तथा नान्ति का दगाने म अग्रजा या माथ लिया। जिसम शान्ति समपन रही । ५ जायिक अमुविधायें-त्रान्तिकारिया का गुस् म ना काफी रपय पस म माहवारा न किया नितु बाद म उहान दना पर पर रिया जिसस उन्हें आधिक परिनान्या का सामना करना पड़ा। ६ कृपो का असहयोग -इस प्रान्ति म प्रान्तिमारिया का कृपया का गह्याग न प्राप्त था। यग तक पा जहां तहाँ विमाना न हा नाति पापा दिया। ७ अग्र जो प लिय समय को अनुक्लता -१८८७ या वप अग्रेगा व तिय अनुकूल रहा । क्यावि उम ममय नर चीन नार प्रिमिया के युट गमाप्त हो चुा जोर लग्र जा ची गा वि धी जो दमन करन व frय वापी था। रघर फारम की भी पराजय हा घरी यी नाव उम दिगा TITर या जागा न था। हम प्रभार पानि बी नगपाता जनरा वारण हैं । प्राप्ति या महत्त्य - भारतीय तिहाग म १८४७०वा प्राति पा वन रडा मत्त । नागना व वधन म जपन को मुन करन पाय' अतिम और गरम प्रयास ! रिन ग्म प्राति न य गान या मि मिामा घरास्वता परना याटिन ।
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१ जून-दादा भाई नौरोजी पुण्य तिथि पूर्व तयारी - दिन पूर मना वा दानाभा नौराना पुण्यतिथि की गूचना दे दी जायगा । इम पुण्यतिथि रा सफा विशेष ग म करेंगे और पुन या भी पूरा घर तक पगा।। इस उपगन मभी ठान पर गिभग र स्थान पर एकति हारर विचारा का जादान प्रदान बरंगे । लाग टनर नियय म भापण दंग निघ पर गे जोर व पिता पाट परग। भारतीय ग्वातन्य माम तमा बागम का इतिहास बतलाया जायगा आर यह भा गाया पाया नि हान किम प्रकार स्वाधाना मग्राम म भाग दिया तथा "ह नहाँ त - गपाता मिनी। दादाभा- किस प्ररार स्वना मग्राम प्रपल म्तम्भ रहे किम प्रभार १८ इ० वी पालि फिल रहीआर मम क्या क्या भ और हानिर्या दावी राजनतिक अवस्था -देश गुनामा वा जजीग म जपा गुजा या । "नाग जानादी व तिये पाँच वटा रह य । पितु अग्रेजा 7 मम एम न चर रहा थो। म समय वा वायमराय तार रिपन पा । नाभाइ तौरानी जम राष्ट मरका और भत्ता न जाता म जाजाला पी नर नगर नितु जापमा पट और जाति पानि भयवर मद पवारण लहर गात होगा। भागागा ने अपनी जान की बाजी गाना और भारत मौन चरणा पर जपन का उत्मग वर दिया। लिटिगत म यग स्वर सुनार पटन नग- गहीना वा चिनाजा पर लगेंग हर जग्ग मर यतन प मरने वाला कामता रायम निगा होगा। जार हम मचमुच नका नाम औग्गजय क मारत है पिहान मौत मूर नही हारर हम आपला निा। भाई नौगजी नी अमर नही म बागेसमा इतिहाग -1 मना नहा रहा ग सब नाम मिा भारताय गगठन का नारसना मग परत ग। तर ति मा अग्रता नाग विराव परन TT म गगार महासन पर भाग्नाय एम गिा मगटा पाजार प्ररित ए। गी गमय न कर दिया यम (A D Hume) नामा र बयज मग्यारी यमचाररा न गिति गरिंग
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१० अभूतपूर्व काय किया और राष्ट्रीय स्वतनना- नातन का जागे की पार पाया। दादाजी जगार के ममान र उदार और यायप्रिय तथा गाति । प्रबन ममया य । वे कहा वरन । कि हम भारतीय मिमी एम बात म यकान अरत हजार वह यह वि यद्यपि क्मिान तनिर मद वृद्धि है रिन यनि एक पार उट बाट वान ममया ना जाय कि वह अच्छी और बिन है ता अपन जाप मा वायम्प म परिणत विय जाने प्रति विश्वस्त हा मरत। नता भा मिमी सफलता म जत्यधिन प्रसत हात पार न पिमा विपनता म जयधिव या हात । प काग्रम मचम प्रथम बार स्वतननारा माग रखनकायमा दाग 'जा काहा है विहान १०० १० म मभापति व भाषण म रहा या-- हम काइ रियायत नहा चागत हम ता याय चाहत है। हम स्वशासन अथवा गरड और अयमिनियना जमा गासन चाग्यि । जब पानसागरम और नरम दन व नताना च बीच खुला विराय चन रहा था ना इम मरटपूर्ण म्मिति म पितामह नाता जी ने अपनी चातरी एव व्यक्तिव स दम मघप का रारा जोर लगत्ता अधिवगन म मवप्रथम घोषणा या 'स्वराज्य हमारा जाम गिद्ध अधिकार हजार उम प्राप्त करना ही काग्रम वा वमान नश्य है । दगा उपरान हान सावजनिर जावन स विधाम ग्रहण कर लिया और १०१७ ₹ व १ जून या उनका दहापमान हा गया । स्तुत नाना भार जनता T Tच्च गवर थ जोर । म्वत पना परम पुजारी एव जनय पागर भा। क्ति की भावना नम कर कर पर भग था और ममम्न जावन हो गभनि म पूपण प्रभावित था। उन्गने सपन निमगवामिया करिता म उम म्यान कापाया था जिगा जिसपना गी-या पर गवन । गायर न उना विषय म किया है-- यति रिमा मनुष्य म दवात हाता रे ना रह उनम विद्यमान है। दाग भा* का नाम भारतीय स्वतत्रता मग्राम न म्बन्ध नीताम्बर मनग्य धपत पाना म मात मा ममान निर और निरमा । निपायें -गाव नियतन मन न पिन नर ना चागिा आर नसा पचमा सभणा म उमा मवाना चागिा । दायाम्पसमा या
सायम रमन या माय चाटा रखना चाग्यि । लाम पिता आर मगटन
लाने वा वागिण करना चाग्यि । तर रार यायप्रिय हाना चाहिए।
दारामार नाराज : ममयमा देकी मिनमा धा, साम.
म्याना वैस रिमन व और महापा,
मामेसन क्या-क्या दिया है।
Tमा नाराजामानावना सनपम प्रस्तुन पर ।
उन वन म बापको गैन-ौन सी शिना महाना"
मारतीय स्वतत्रता-मग्रामसी मरदा दायाम- "गर वार मगर
क्या जानन ?
चितरजनदाम घर म ना चर 4 जाइ० मा००T परीक्षा पास करन रितु ननुतीण हान व पाद व वहाँ म बैरिस्टर हायर लौट । १८९८ ई० म विजनी स्टटक दीवान वरदा प्रमाद की कया वासताटवी व माथ इनसा पाणिग्रह्ण मम्वार टुना। इ गलण्ड स लोटन उपरान उन्होंने क्लबत्ता हात्याट म अपना जम्याम शुरु किया । य प्रारम्भ में ही स्वतन विचार प य । हाझाट म गीघ ही रनको बहमुखी प्रतिभा फूट पड़ी। ग्नकी प्रसिद्धि बढ चली। इनका प्रसिद्धि का एक और कारण है। वह यह वि जिम समय लाड वजन महादय पायगराय 4 उस समय वगाल वादा भागा म विभक्त वरन यो बात चला। ग म हलचल मच गइ तथा बगानिया के हृदया म एव आग ही भटक उठा। श्री मुरद्रनाथ बनर्जी के नतृत्व म जारो का आदानन प्रारम्भ हुआ। उगा ममय २ मई १९०८ ० म यम बनान का कुछ सामान एव कारतूमें भा मिली और कई पत्र भी मिले। इन पना बजावार पर ३८ व्यक्तिया पर राजद्रोह का मुकदमा चला । प्रिटिंग मरवार राजार म बलवत्त व सुप्रसिद्ध वैरिस्टर मि० नाटा । आमामिया की आर मे वार नहीं था। म ममय निम्पृह और निपल हार काम बरनवार की मरत थी। इसी ममय वधुदाम जी का मावि नाव हआ। जाट महान तर मुक्तमा चरना रहा । अत म इनका जात हर। जीत हात ही नवा म्यानि दूर दूर नर पर गई । ममम्न म रनवी चचा। जान लगा । टागा व पन्यमा म इहान अपन त्याग का परिचय दिया । सग उनका मनि का द्वार खुल गया। दमी मुषन्म र पारण व रधु + नाम म पुपार जान लग। ने बरिष्ट्री म वन ग्गय पजिन दिय पितु दग-पग न्तु आर गगेया म रितरित वर गिया । १९०० ई० में उन्होंने गजनीनिक क्षत्र म पापण किया। गाय हा उनकी गणना वाय ग महारथिया म हान लगी। १७०६ १० म दादाभार राजा यमभापनिव मास व भधिवन म य कवर प्रतिनिधि कम्प म प्रश्नुत हुए। ०१७ १० म भवानीपुर मा राजनीतिर मम्मनन 'नर नतृत्व मराफी गफल रहा। "ई० म रोट दिन पास दुना। इस पिन या गभी भारतीया न विरोध रिया । इम सत्याग्रह ये वारण मरवार "" और जनता म र स्थाना पर मुटभर हुन । एनम अमृतमर या घटना या प्रमुग्म म्यान - । इमस सरसार न युपित गर मान लॉ (पौजी वानून) जाग पर दिया। मार भारत म हलचल मची और पानियामट तर यर जाललन उठ खड़ा हुआ। गरवार न उमर गिर जांच मिटी बनाई। गगम चार अंग्रेज और तीन भारतीय सम्य ५। जॉन याय हान नगा। म पर वाय ग न विराध प्रगट दिया। उमन अग अपनी पमिग रना जिगर गाम्य अधुराम भी य । यहाँने रिपाट यार बरन म बग हायता की। गन १९२० ई० म गाधीजी न बमस्याग जागलन की धापणा यो। दाबधुराम भी गाधोती ये प्रस्ताव ग पुर महमन थे। अपनी चतना पालन पर ठारर मार गायी टार-बार - अमन्यांग जादालन म गयी कापी मनमना पन गई । घुराम य पुत्र पितर नदाम का ८ माम पानजा की गई। इनायतन आर म्या भा गिरफ्तार करता १० दिगम्बर १९०० १० वा धुलाम नी पद पर लिए गय । छ माग प या व जन र यूर। ...२६० म गया वाप्र म अधियान म व मभापति पा गए । इहाने चिट्टा भाई पटत और मानीनान नहर व गार -गने पराय पार्टीपी स्थापना मायार ग्मर मचान भी व्यवस्था राशा या पार्टी मजबूत होता गट। "मर कुछ समय र उपरात नराम्वास्थ्य गिउन नगा और व दाजि- गि मर गय । घग पर जन ".५ ई० मा उना मगु हा गई। गार मगरना मन ग। भारत मा या अनमान पान आज उट गया । गभा राग उनए नाम जांगू बार और अमानियो अपित यी । Tyाग भाप गर र ननाआ म ग | गाय IPTIम भागरण-बनना यातनामाया मा पल। सा माठियां और अगमयम अपना म्बाप्या पाना पण। "नना हा र भा हो गमग ग र हा मास! नरास गार मान राकान वा पार गधार माता पमजार पर ग्या' निभाए - बनना मा ममय पत्र पर ref पनि हान मभीचिमा पाहिए । रथापा मार र बनना पातितार राम नाम मगना पाहिए। गर्गरानी मय मुग राता
नागिता मिमामा पनि काचित गम्मान करना चाहिए । जपना पराया
राभर भार नहा रखना चागिा । मना ना ममान दनि ा बना चाहिए ।
गया और महायता में भा मत हा माडना चाहिा। गगन थनिया का
मारना चाहिए ।
॥
प्रग्न
गबन ममय का राजनैतिक अवस्था मा या
इनका गवनात्तमपम प्रम्नत कर ।
. रानातिनाम उनका क्य पदापण ॥
८ इन कान कान स "मुग्न काय किये
गटेशबधु क नाम म क्या पुकारे पान "
। न किस पाटा का म्यापना का था?
उनक नावन 7 आपका कान-कान मा शिनाए मिनी"
-
१८ जून -महारानी लक्ष्मी वाई
पृष्ठ भूमि --१८५६ ई० म उलहोजी इगलाह लौट गया और पाड
बोरिंग गवनर जनरल हायर भारत आया। इसके सामन-माल पोमवम
महत्या घटना १६५७ ई० को प्राति यो। ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना
हुए सपमा लानी पूरी हो चुकी थी। साम्राज्य विस्तार त्वरित गनि म
हो रहा था । अत इन जा में विद यहुन में दुमन उठ र हा गर ।
अनवा भारतीय नारारदाराम मस्तिपम अग्रेज विरोधी भावना
वाम कर रही थी। हा पिरायी नावनाला प प बहुन ग गना
न पड्यन एव मुद बस अगरजा का मार भगान का प्रपत्ल किया मितु व
असल रहमाम-ममप पर बार-बार बस हात रह। रिन्नु गम बहा
भवर और मारिन विद्रोह १८५७ ई० म हुआ। मनाया जाना
साह और युवर गिर वा प्रमुग हाप रहा । हो म थामी की रानी
नमो बाद माथी। लिहान झामा ग आस नाम नाम प्रजाप
गोपन पत्त या शिवाय देशना स्वनर मरमरिय
१८५:Farदायापी निमामीण आम-पाम ने अपनी
मातृभूमि पर अपने गन से मांग । झामी मात्रानि पा नेतृत्वमा पाई
पर रही पो। रिहार एवं सयुत प्रान (गनर ) युध जिगम
कुवर गिह तथा महाराष्ट्र नाना माहय एव नागपुर व मनारा मसाला
टापन ग भयानर पालिका मचान पर अपना पतुरा और निभा
कारिया
मम्मा बाई पागम बनारसी, विलाय,
मा. नवाचा, मा ११५० मा RET तिा नाम
माजी और माना नाम भाणा पनपन म नरा
माम मन्नु बाई पा और दागी नगर-पुरा at Tnt
जब मा माग Firmir
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werefore! TRA TET
मारा
-
११४ माहब के साथ म मनु वाई की गिभा का प्रारम्भ हाता है। इनकी बुद्धि वडी ही कुशाग्र थी। खेल खेल म ही इहाने थोडी-बहुत शिक्षा पाया । सन् १८४२, ई० म झांसो क राजा धी गगाधर रादे के साथ मन्नु- वाई के साथ विवाह सम्पन हुआ। ममुराल म आने पर मनु बाई महारानी लक्ष्मी बाई के नाम से पुकारी जाने लगा। लक्ष्मी बाई को एक पुत्र भी उत्पन हुआ था किन्तु दुभाग्यवश तीन महीने के पश्चात ही मृयताक से उठ गया। इस पुत्र शोक से राजा गगाधर राव का बडी गहरी चाट पहुंची और में उसा दुग्व से बीमार पड गये। इम पुत्र गोष को दूर करने के ६ साल से किसी बालक का गोद रन की बात साची गई । अन समीपस्थ कुटुम्ब म ही ये एक पचवर्षीय पुत्र वा दामोदर राव नामसरण कर गाद लिया गया। इससे महाराज गगाधर राव की अवस्था में कुछ तो सुधार आवग्य हुआ। किंतु पुन वे बीमार पर गये और जततोगत्वा व २१ नवम्बर सन १८५३ ई० को उनकी मृत्यु हो गई। महाराजा गमावर राव की मृत्यु उपरात महारानी लक्ष्मा बाई न ज्ञासा राज्य का प्रद व म्वय अपन हाया म लिया। वे स्वय मदानी वग म दरवार क्यिा करती थी। उस समय भारत का लॉड डलहौमी था। उसने दा के भीतर के दशी राज्या को हडपन का नीति अपनाया। डलहौसी की नीति के शिकार नागपुर सतारा, जवध इत्यादि राज्य हो चक थ। उसकी गद्धष्टि यांमी पर भी पडी। और झांमी वा उसन ७ माच १८५४ का त्रिटिश गज्य म मिला लिया। इसम आसी वे लोग बह ही शुद्ध हुए। लक्ष्मी बाई न उमाचद वकील और एम यूरापीयन को काट नाफ डाईर- कार ल इन म भी भेजा किन्तु उमवा कोई भी परिणाम न निकला। नहोसी न राज्य ता लिया हो। उमन घम पास्त्र की आर भी अंगती उठा और दनक पुत्र को नीति पा उल्लघन किया। हिंदू धम गात्रा नुमार दतर पुष भी जोरत व अपन पुत्र का भौति उमर गारी गम्पत्ति का अधिकारी माना जाता है। घम का आधान हाने में हिंदूआ के हृदय म देपाग्नि प्रतित हो उठी। रमी अग्नि न गन गर्न १८५७ ६० का विद्रा का स्पधारण रिया। भ्मी वा असी अगरजा पर विवाम रखन वाती महिला को भी पिदाहिया म पामिन कर लिया गया। मामी को रानी अंग जा की उम दूरनानि म त्यत न हुई। पुछ समय ना तो उन्होंने प्रान्ति म भाग नहीं लिया । रिन्तु वा म उहाँने বা মা ঘন বা অয় না । খোলা হিযা মহা সেন मग्न + लिये मर यूरान, शमी पी आर आमा । उसने २३ माच, १९५७ का युद्ध की घायणा की। रानी ने सत्य सना का नेतृय कर अप्रेजों के दात एट पर दिये । पर कुछ स्वार्थी व्यक्तिया ने अमेजा की कूटनीति म आकर शहर में पश्चिमी दरवाज का भेद बता दिया। जिमम अग्रेजा मना महरम प्रया पा गई। मासी भी मेना ने उसमा मामना किया । इसी समय दूसरा धार भी टूर गमा, जिसमे गोरी मना अघि सना म आ गई । २५ माच, म ३॥ याच तर पनपोर युद्ध होता रहा पर जाने विमी का नहीं हो सकी। रानी रे अपनी महायला ये लय नाना साहब रे पाम पत्र मना । नाना साहब अपन प्रधान मनापनि सारया दोपका २०००० फोगा साथ हामी भन दिया । रिन्तु ताया पगेरी और चरखारीष पूर म जोत हान म राग- ग म मम्न था। वह शामो पहपा ता उसको मना पर तो चलन लगी। कुछ देर तक तो पुट जमकर हुआ। विन्तु बाद म तात्या १४ सना परान हार कालपी लौट आई। जब रानी का दागिन्नानना हा गई। अन जा २ धाव बार-बार हा रथ । परमोसना भी उमा मुगावला अदम्य उमाह एव माहस में कर रहीं था, मिनु जीन । भावना न दा महाराना न किस स निमल भनन पा राप दी। मौ वट्टर वारा ये माप महारानी बाहर की बार निसर । दना पुत्र दामार राव का पानी गे पोर पर बाघ रिया और ITN लिए रवाना हो गई। यी अमोल का शमी पर अयजा पाधितार हा गया। पर रानान ४ परम १.२मान का रास्ता तय पर बार पहुँचौ । जब ह रात को मारमा ति पुन मनि हर कमी पर चहा परन की याजना बन रहा है तो वह पारपीकनिय प्रस्थान पिला। पापा ग ६ मील दूर गलावना गौय मही युर गुहा गया । मारियाना अधीन पारियर कामना ने भी अमेजो रे विदाई री, लाल मा दिहियामा अब बिनु उम विमानाग मीना राम पान मगा। दूग नि मर राना र म पहुंच गई। अब यही पर मरा। इसम जो दो जोन ई और बानी पर उरा अधिगया। अबोगसामी पाऔर पापमान मा । 17 गरिसर पर पा र महो पर राना। म १ मा साहब और तात्या टोपे ने ग्लालियर के धन को राग रग म पानी की तरह बहाना गुरू कर दिया। इसी बीच ५ जून को सेनापति नेपीयर को अधीनता में अग्रेजी सेना ने मुरार की छावनी पर अधिकार कर लिया । १७ जून, १८५८ को बिगडयर स्मीथ ने युद्ध का डका बना दिया । सर हयूराज ने ग्वालियर पर आक्रमण कर दिया । पर वह परास्त हा गया । दूमर दिन पुन दुग पर आक्रमण क्यिा गया। इस बार ग्वालियर को सेना पीछ हट गई और रानी की सेना अग्रेजो के बीच घिर गई। अब रानी न भागना हितकर समयकर मनुआ को नष्ट करते हुए बाहर आई। पहले दिन ही युद्ध म रानी का घोडा घायल होकर गिर पड़ा । जिससे मृयु हो गई । आज वे एक नये घोडे पर सवार थी, पर रानी का पीछा अग्रेजी सेना कर रही या। पर दुर्दैव से मामने एक नाला आ गया। नया घोडा होने के कारण वह उस नही फाद मका और वही अड गया। तबतक अग्रेजी सेना भी आ पहुँची। जब रानी नवेली और अग्रेजी मेना अधिक । फिर भी हिम्मत न हारो और मरते दम तक उहाँने शत्रुआ से पूण बदना लिया। घायल राणी को पास ही बाबा गगादास की कुटिया म रे गय । यही पर ज्येष्ठ गुल्ब ७ सवत १९१४ का इनका स्वगवास हो गया । रामचन्द्र राव नामर भृत्य ने उनको लाा का घाम की चिता पर रखकर जला दिया । मृत्यु के समय उनकी अवस्था २ की थी। वों r इमी तरह दिया गई पथ, मिरवा गई, हमको जो सीख सिसानी थी। स्खूब लड़ी मानी वह तो झांसी वाली रानी थी। आज रानी लक्ष्मी वाई मार मध्य नही है। पर उनकी स्मृति हमारे मानस पटल और हृदयपटन पर मदद अक्ति रहेगी। आज भी झामी आवार है। जा भी जाते हैं, उह अस्मात राना की याद ना जाता है और अद्धाजलि स्वरूप दा चार अय, सुमन बिवर कर चले आते है। घर थी यह वीर रमणी और पय यो वह भूमि जिसन एसी महिला का जम दिया। आज आवश्यकता है दा को एम ही रमणी वा जो दा व नव निर्माण म और ममाज नवायाम मप्रिय हाय बटाये। जन-जन म जागति पता कर, जिस दयावर वि व की और पाचौंध हा नाय । गिपायें -पदन लिन म सब मन लगाना गहिये। यापन मही निर होना चाहिए । भा भा माह मन हा होता चापि । अन्याय
और अधम क विपर लटन के लिये मा तत्पर रहना चाहिये । अपनी मातृ
भूमि का स्वतत्रता कायम रमन निये मतत प्रयत्नशील रहना चाहिये ।
एक माय सगठित हपर एरमना स सदना चाहिये। 1 दुश्मना म पीछ कभी
भी नही हना चाहिय । विमी तरह की विक्ट परिस्थिति आ जान पर भी
विकत नहीं हानी चाहिय और भय म वाम रना चाहिय । सब प्रकार के
पण का मुम्पुरात हा करना चाहिय । बाई भी काम निप्काम भाव स सवा
कलिय हाना चाहिए और काय करन पूर्व उगर पल की आग नहीं
करनी चाहिए ।
१ सर १८५७ की कान्नि कहान के कौन-म पारग १
मान्तिको पृष्ठभूमि को किन रिन लोगान तैयार किया और उममें सनाने
नमा काय पिया।
• मरान्ति में रानी लक्ष्मी नगर का कौन-मा राप !
। रानी नमी पारस जीवन मंदिम में प्रस्तुत करें
, रानी सम्मी पारही प्रमिदिक कौन-सगरयौ।
। १५७१.कीरान्ति के सौन-स परिपाम हुर।
७ क्या इमप्रेनों को नीति म मामत
- रान मारतीयाकीरता के लिय कौन सा काम किया।
बिरिश सामान्यनगरसा के सियोमी मे कौन सी नीति अपनाए और
के क्या परिणाम दुर!
१० रिन किन कारपास १७६० को सन्नि मान्।
११ मामा मात्र मेनिग दिर पाया मनमान्दोनन ।
१. मदनी बार रन म भातको कौन सीरिया प्रामतीरें।
२३ जुलाई-तिलक जयन्ती पूर्व तयारी- दा दिन पूर्व सपो को तिलक जयती की सूचना दे दी जायगी । जयती के दिन विरुप स्प स मपाई और सूत्र-यन करेंगे। सूत्र-यन में रामायण का पाद हागा । सूत्रन्यापरात गीता आर गीता रहस्य का पाठ किया जायगा । इसके बाद वाग्रेस का मक्षिप्त इतिहाम प्रस्तुत पिया जायगा । स्वत बना का इतिहाम भी स्पष्ट पिया जायगा तथा यह बतलाया जायगा वि श्री तिलक को स्वतत्रता का भाग भडमान में किस प्रकार और कितना सह्याग देना पक्ष । फिर टनक महान जीवन पर भी दष्टिपात करते हुए यह स्पष्ट पिया नायगा विरहान अपन जीवन म कौन कौन से मत्त्वपूण काय गिय । गार एक अय नताआ साथ निलप की तुलनामा विवचना भी वी जायगी और माथ ही तिनव की महानता पर भी दष्टिपात पिया जायगा । इमी प्रसार जनव चचार चलेगा। जन म इन सभी लया एव भापणा को समलित कर पुस्तका कार स्प दे देंग और पुस्तकालय में सुरक्षापूक रमवा देंगे। जाम-म्यान का भौगोलिर परिचय --निता का जम महाराष्ट्र ारना गिरि म हुआ था। महाराष्ट्र एर प्रायद्वीप है। यह आपल महाराष्ट्र राय म ण्डना है । महाराष्ट्र एव पहाडी जगत है । पथरीली जमीन रहन य पारण उपन कम होती है । अन व माग स्वभान उदन भिइन म हटे-बटर एब मजबूत हान हैं। यहां पर वर्षा कम हाती है। गर्मों निशा पद्धती ममुद्र निकट रहन र पारण कुछ ठटव रहती है । जमशाल पा ऐतिहासिर परिचय -जन गायर का जन्म हुआ था उम समय में न जा क पर भारत म अच्ची तरह जम गुर 4 1 कुछ निमा म मच भी राय कर र-4। स्वतत्रता व नि हाड मची हुई थी। बड बजे ना लाग राजनीतिक लम्बाइ म कमर कम पर उतर रहे 4 । पिराज शाह मना दाल भाई नौराजी एव महात्व गाविष्ट राणा हे न्याति प्रमुग नताशा मसथ। ये लाग गया जनता वा जागार पर -- उप्रेरित कर रहे थे। उनम पाति र अयुर या प्रम्पुटिन कर रह थे । १८५७ ई० को प्राति समाप्त हा चको यो गितु प्राति याचिनगारिया अभी भी सांगा म वत्त मान थी। लोग 'न चिनगारिया की मुनगान का अयर प्रयाम म गन कर रहा ये जिनपर वर्षों में राक्ष पह गया था और इसी नाति की वेला में महामनि लापमाय बाल गगाधर तिवश प्रादुर्भाव हरा । इहाने हम नाति यो आग की सवजनहिताय को महारा लिया तथा जनजावन व विचाराम नृतना लाई। लाग पुन गवैत तथा जागर हुए । अपरार म एव मुनहरा किरण पारर मामाह आगे बन गए। इसी प्रेरणा वा मे उत्तरित होर हमने अपनी प्यारी स्वतना प्राप्त की। जीयन मृत्त ~भारताय आन्दान या मदान বিব ৰ খিণিত ঘন रमत है। य उप स्वभाव प और महाराष्ट्र म हा मवप्रथम राष्ट्रीयता की पनि दुई जा तिन जम माग्य दान नया यमाता वा पारर गमम्न नना मग | मार गाधर तिर वा जम २३ दुरा- १८५६ ई० म मारनगिरि म हुआ था। मगराष्ट्र मा रहर रादा यार या जमानो पूर्व विाजी प धार या था। य चितपावन पाया। और अगरनाथ पवाया वजना बचपन का नाम गा। मार-टयर मदनरा नाम बाम गय लिन था। मपनका माम धान पा। यह नाम भाग मलकर विश्व प्रगित हा गया । सरपामय पदमबासमा वा जुद्धि वदो तो परे । 'ना শয়ে বাকি গ ঘ । বাসা ব শ ণী * । rশা महापानमा प्रतिनिारयाद न रतिया जाना भाजार ETAIT यार करनगर पमा दिया जाना था। प्रार बनान म हो ग तुन्दर ARE का मग्रह पर दिया था। जब य दम बयानी इनका मानानामृयु हागर - १० पाम । भवना पारन RT भार कारावारगीपर पदा। नए गराऔर रोनाराम या भोजमा करा मारा म. 10.20 यता सानाam दर राम निनर की पूमा म पार । मरी पर रहने दायों मनान, अपमान को मी। 12005. मन र पाररिया। हमर उनि एफ. भोर पुन १०० पाग ८३३१० म एम. पीसा रिनु मनुनामगर ... Brain rrernet पाम रिया। FIRLऔर अपानमर nिाना जाता रहा। मन म मपिता T १२० १९७ ई० के बीच म उहाने पत्रा म छपे रखा द्वारा सावजनिक जीवन म सक्रिय हाथ बटाकर अपनी निभ यता और विद्वता का परिचय दिया। धीरे धीरे उनकी लाप्रियना बहुन वढ गइ । वे जनता म दशभक्ति एवं राष्ट्रीयता की मावना का उत्तेजित करना चाहत य । शिवाजी के उत्सवो से उहाने जनता को राष्ट्रीयता की गिधा दी। इमसे वे जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गय । अन व लाकमाय कलान लग। वे कहा करते थे कि गीता के उपदेशानुसार तो हम गुरआ और सपधिया का भी सहार कर सक्न हैं और हम किसी बुराई व पात्र नहीं हांगे यदि हमने यह काय स्वाय हिन की भावना से नहीं किया है। इस प्रकार उन उत्मवो के द्वारा उहान केवल जनता को जाग्रत ही नहीं किया प्रत्युत राजनतिक आदोलन म लडने योग्य बना दिया। अकाल पीडित जनता की मेवा करने के लिये उहाने एक स्वय सेवर दल का सुसगठन भी किया। पूना म प्लेग का वग जोर था। ऐसे समय में दा नवयुवको ने प्लेग कमिश्नर मिस्टर हैण्ड और एक अन्य अग्रज को गोली से मार दिया । सरकार की ओर से उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और डेढ वष तक य रावास दण्ड दिया गया। महाराष्ट्र म राष्ट्रीय आदोलन को सुसगठित करने तथा पियाजी की स्मृति का पुन जाग्रत करने का श्रेय तिलक जी को ही है। १८८९ ई० में कांगस म प्रवेश किया। इनका विचार उग्र य और कांग्रेस के गरम दल के नेता थे। इनवा आदश या-स्वावलम्बन, सेवा और कष्ट सहन । १९०६ ई. म उनको लोकप्रियता पराकाष्ठा पर पहुँच गयी थी। उनका प्रभाय लोगोष हृदय पर सूब पड़ चुका था । १९०८ ई० मे तिलक को राजद्रोह के जुम म ६ वर्षों का समा हो गयी। उहें निर्वासित कर छ वर्षों के लिए जेल भेज दिया गया। तिलक के साथ इस घोर अयाय से भारतीय चुप हो उठे। जन म ही उहाने तीन अमूल्य मया की रचना की। जिनका नाम 'दो आदि- टिक 'हीम ऑफ दी वेदाज और गीता रहस्य है। इनम 'गीता रहस्म का विचार वडा ही व्यापक मुद तथा परिपक्व है जो तिलक जी की जाज्वलत प्रतिभा पा ज्वर त प्रतीक है। तिसक आपा-मस्तक राष्ट्रवादी नेता थे। व सग यहा परत यदि कांग्रम को नर्मी और राजभक्ति स्वतत्रता प्राप्ति के योग्य मही है । व प्रथम भारतीय ५ जिहांने कहा था-"स्वराज्य मरा जमसिद्ध अधिवार है और मैं इस लकर रहूंगा । ( Swaraj is my birth nght १२१ and I will have it ) उनका मह व विश्वास पनि विदगी गामन कितना भी अच्चा बयान हो स्वशामन म पदापि अच्छा नहा हो सकता। १९०७ ई० म वाम म अलग हा गर और एनौवसष्ट व साथ धन्म- मध मिलावर हामाल आदानन म काम करने लगे। आखिरकार जगस्त १.२० ई. में जिम दिन अमहाग झालन बारम हानवाला था म तिर इस संसार म चल वस। मपि मान इनका भौनिष रार इस समार म नहीं है फिर भी उनका व्यक्तित्व प्रतिभा एवं दद विगर भारतीमा के हृदय पर आधारित है। उनके विचार और प्रतिभा भारतीया नहीं वरन रामान मानव और सारे विश्व या युग-युग ता पर प्रदान गितायें - लिा उमग हाने के लिए सा तत्पर रहना चाहिए। हामी सया मरनी चाहिय । दश की आजानी वा छापम रखना चाहिए। अपने व्यक्तित्व पर प्रतिमा व द्वारा इमरान मन पर विजय प्राप्त करना चाहि । प्रश्न (8) for ममय देशको क्या अवस्था दी में तिरकीजवनी प्रस्तुत २) कांग्रेस में सामानने है। (9) नरम और गरम परमा। 1) विकस्मित ना ! (३) लकी मन अमिर पुनको और बदा निपी गयी।
६ अगस्त-भारत छोडो आन्दोलन पूर्व तयारी-इसकी सूचना एक दिन पूर्व सभी छात्रा एव गिमका को - दी जायगी। दूसरे दिन प्रभात फेरी हागौ। निकटवर्ती ग्नामा म ग्रामाणा 4 माय ग्राम-मफाई भी हागा । सज धजार सूरा जायेंग । स्कूल म पना त्तानन होगा। आज विप प म मूत्र-यन हागा। पुन सास्कृतिक मभा का प्रदान हागा। इसम नाग भाषण देंग निवध पढेंग और सक्षेप म १९४२ को शान्ति पर प्रभात यता गयगा । यह भा वतलाया जायगा कि बम्बई म ८ अगस्त को किस प्रकार भारत द्वाडा प्रस्ताव पाम पिया गया और इमका क्या परिणाम हुआ । माथ ही १८५७ की मास्न प्रानि व माथ गम क्रान्ति का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। '४२ की क्रान्ति का सनिप्त इतिहास दूसरे युद्ध र प्रारम्भ हान पर ब्रिटिश सरकार ने भारत का जवनम्नी जपना जार से मापद म मम्मिलित हान की पापणा कर दी। इसम भारताया में पूछ-नाय तर नहीं किया गया । जय काग्रेस न रिटिश सरकार म भारतीय म्वतमता व ध्यय काम्पीगार वरन व लिए कहा तो काई भी रातापपद उत्तर नहा मिना । कुछ ही रिना के उपरात आयोजाय सफन नतृत्व म पात्रम बी आर स व्यक्तिगत जवना जादान ( Individual civil Disobedience movement) चनाया गया । इसम र जनजानन नर नारिया न सहप मत्रिय भाग लिया। १९४१ के रिसम्पर माम म-जापान निग्न और अमरिया के विपद्ध महासमर की प्रचपन ज्वाना मकद पहा। जापानी मनायें दणि पूर्वी एशिया पर अपना आधिप य जमाना हुई वर्मा म घम गई । एमी हासत म सरल की पूर्ण नीमा पर सतरा पा हुआ। गांधीजी को धीरे धीरे यह वि वाम हो गया कि भारतीय ममस्याआ व जटिल हान व धारण नग्रेजा वा मण म रहना था। वे कहा करत --भारत और ब्रिटन वो रमा उमा म है विनाज ठीर समय म भारत म अनुगामित ढग म हट जाय और उहान -भारत छोडो का प्रस्ताव नागार ममा रणा ।
१२३ अबिर भारतीय काँग्रम समिति ने बम्बई म ८ अगम्त, १९४२ अम्नाद पाम वस आलालन का मप ममपन लिया। इस प्रस्ताव के प्रमुग जग येथ-- जा धरना प्रतिदिन पर रहा है आम यौन मी वायर नामा का यह धारणा पुष्ट हानी जा रहा है रि भाग्न म मिटि मन का नन अनि नाप हामा चाहि । भारत की पात्रता न देवा भारत हित म नारा है चलि मुरमा येति और नाजीवार पामिन्टवाल, मनिाया आर अय प्रसारमामाज्यवादा राष्ट्र पर दूसरे राष्ट्र नायमण राजन वरन नि भो प्रस्ताव में गयाग्रह आसानन मारध मग गया था- मिरी भारत की स्वाधानता और बिना व रविन्द गिर पा ममथन बरन व उदय अहिमामा प्रशाराम और अनिधि विस्तृत परिमाण पर विशाल म पार चार पग्न को शनि नका निचप परता। {पट्टानि मीतारमन्यायम का निशम) म पुनीत अवसर पर अपन मापी गमाणि परत हा गांधी न रहा - *There is no room for negotiations There is no questions of more chance This is an open rebellion You have to do or dic' 7*77* 175 gram margt वायसराय मिना बात थ प रस नार पारवान न लग गानता काम• आम्न हमर दिन और मागी पासाकीनी गिरपारियो । प्रजानना गनमा पा fr না যা * ধ প শ পপি গা বিনা স্ব সাদা { " परिणाम उमाननागको गिरफ्तारी वा मार मविद पापाग गानाको माम्पिनि य जनमानसमाचारवाचनातारा यहा निनाउनर यिा। मागान पानिरीमन-भार पानाता को परिपा उमाना पाना, पाटना आ•ि र यिा। मिति गानमा मनपर गय मनाया। मरम्पाना पराग्यो पनी राजाराममा म मा मार पर कहा यही मरमा माग मा और यता न पायो" ! GIRL नर-नायिका लिा माया पण मग यिा या महापागनावान्नि। font-नापासपनाए रखना पातTr गाप तिरगा पाहि मार United ne stand divided
१०४
we fall' एक दूसरे की सहायता करते रहनी चाहिए। सभा-सुसाइटियो म
भाग लेना चाहिए और इसम अपन विचारो को भी लागो के समक्ष प्रस्तुत
करना चाहिए । जननाय म हाय वटाना चाहिए और उसम मह्योग दना
चाहिए । स्वतत्रता का पौधा सदा रक्त से सीचा जाता है इमे सदा याद
रखना चाहिए ।
प्रग्न
२
४२ का कान्ति के पूर्व भारत की मी अवस्था थी?
४२ को कान्ति क्या हुई?
- इसका प्रस्ताव कहा और किसन पास किया ?
। इस कान्ति का सनप में विवरण दें और बतायें कि इस क्रान्ति का परिणाम
क्या शुभा
१५ अगस्त:-स्वतंत्रता दिवस
पूर्व तयारी --एव महानातन का विधान २६ जनवरी मरे ।
इतिहास -मव प्रथे ता १५ अगस्न र पोई भारतीय स्वतत्रता का
गय परमाननर तथा वारतापूर्ण इनिहाम दिपा हुआ है । यह हमारे, उमा,
उमाहा वा मामिव विन्तु गौरवपूर्ण इनिहाम है । या ना म्वतता या श्री
गणे। १७५७ को पलामी रा लडाई म ही प्रारम्भ हा गया था
पार पौर
यह जाड पड़ता गया और १८५७ ई. म यह निद्वार या भीषण १ र
फूट पग विन्तु आजादी ना मिल मरी। ८५ ई. मी
स्थापना हुई। निलय आय गावर आये। निलय न पापणा की मगज्य
भरा जाम गिद अधिकार है मैं कर रहगा। (Sharaj is my
birth right and I will have it} पुन गापा जी का प्रानुभावना
और ना नगृव म अहिमामा पानि पिर म गुरु हा गई । मान
जनता में अंगाई मो। जनता न अपनी नीर वा ५. कुन की मोनि
उगर पा और पाति महाप बटान नगी । जवार, पस जार राजद्र
খায়ু, দীব পাস ৪ শত এ সং। বিলয় গা গৰী গম সং
अहिंगा में परम पुनीत अत्रामे या न नाप और नवारा या मुद्याला
पिमा । १.३.१०.६ जनवरी रात्री जवाहासान न पूर राधानता
भी पापणा की। अपना भारत पर दमनचर जी गे पापा । ' अगम्न
०४२.ममारत धागे'आदान जारी पिया गया । अनजाने पर
दाना और गागन एरा { Duide and rule ) पानानि अपनायो।
भारत बनाम विभ- "पल पर पिया और हम रिदिन्न पर लिया।
स्वरना गया मगवान अपनसमग दिया। ननादान
माजाTfmanा परियार र मिटि गार पनि
पापान ने शिमगीय मगरीरिन्नु गायोत्राय मपान न ममवधी
महराजः प्रमा र पराग भारापy र मनाई
परमप्रापान मरिमाप कायापा। न मानावे र नय
मभानगी मामा माग रन बन
गोरमाराना माग परिन, हमारा TT TRTEL TI
का ग मारमा। अनारा गोदा रन मा
- - १५ अगस्त, १९४७ ई० को यनकन प्रशारण हम स्वतत्र हुए हमारा देश स्वतत्र हुआ। भारत मां का बेटियां टटी। हम नव प्रभाल के दशन हुए। मार चिर-सचित सपने साकार हुए। इस खुशी मेसोल्लास हम गा उठे-- 'हम सबका आँखों का तारा, सब देशो स जनुपम न्यारा जगत पिता वा परम दुलारा वच्चा का यह प्यारा है। भारत देश हमारा है। १५ अगस्त हपो ल्लाम का दिन है। उस दिन सदिया की तपस्या पूर्ण हुन । उस दिन काटि-बाटि जनता की आशायें पूरी हुई । युगा के उपरान्त भारत 4 भाग्य न करवट बदला। अपना राज्य हुआ । इसो दिन के लिए महम्या भारतीय फांसा क तम्न पर हसत हसते झुल गये । बहुता न अपनी मूक महादत दी अपनी कुबानी की, जीवन के मार सुखा का ठुकरा दिया । इसी दिन व गुभागमन के लिए लाखा भारतीया का जल यातना सह्नी पडी और वितन तो कारावा म ही घुल घुल कर मर गये । यही वह दिन है- १५ अगस्त स्वन प्रता दिवस । पर इस रिन भी हम पूण स्वराज्य प्राप्त नहीं हा मरा-औपनिवगिक स्वराज्य ही मिल सका। दापक तले अपरा हाता ही है । उम अधेरे के तरफ काई ध्यान नहा रना। इस १५ अगस्त के दिन बहुजनो न खुशी मनाई होगी हपोल्लास म दीपक जलाये हाग और मनायी होगी अरमाना को हाली भी। किन्तु कुछत्र सागा न नहीं । उनम कुछ लाग एस भा थे जिनकी दुनियाँ म अव भी अधकार ही अपवार था। उना मान रहन तब का भी ठिकाना नहीं था। दान गन का तरम रहे थ । दर दर भटव कर संव का धून पाक रह थ । पश्चिमा पजाब और पूर्वी वगान म भाय हुए शरणार्थी थे। जिनकी बडी बुरा दगा हा रहा या। उनका भी मान 1, जह जमीन था फिर भा रणार्थी प । मगर ने इन मारो वस्तुना का त्याग पर निया-वस इमी १५ अगम्न व निए । म दिन सहस्त्रा विषयायें आठ-आठ आंसू राई हागो, अपने पति का दुख मय पर मह-त्रा अनाय याचे विलरा विनय कर सिमक-मिमार राय हाग अपन पिता का अमामयिक मृत्यु पर किन्तु निमा ने अपनी एक दृषि गनी हागी इन अपना और अनाया पर ? बपि विसी न नहा । ज्नकाना कठिनाइया और त्रुटिया के उपरान्न भी १५ अगस्त भारताय स्वतता व इतिहास म एष देदाप्यमान नवा वा प्रमाण है आता है जिसरी
राना म हम आज तर को कमजारिमो को आधापान पर सरन हैं ।
जगा है. हम जग हैं। अब हम मतरता म मय, अहिमा नै माग पर चल रह
है । पत्रह अगस्न का निभा प है मदेश है एकता हो वा है और फूट विना-
इस प्रकार पंद्रह अगाल आया। विलो भत्ता को ममाप्ति हुई।
हम इतना अधिकार मिमि अपने देश का बनाये मा विगारे । इस प्रकार
मह मिद्ध हुआ नि ५ अगम्न १.४७ ई० म हम उत्तरदायी नागरिम हा गय
हमारकपर भारत वप वाचनान या बिगाहम का भार आमगा।
उत्तरदायिव को प्राप्ति म हम सरिया मनात हैं। हम सारे रष्टा वा भूल
जात है, भारत नब निमाण मानद हात है और विभाजन एव दिगिया
द्वारा उता हुए भारत को पुन हरा भरा पल का बीड़ा उठात हैं। इमी
उत्तरदापिवमा भावना बसाय हम स्वाधीनता दिवस का बडी धूमधाम तथा
हो लाम साप मनान है।
तिक्षायें हम अपनी आजारी बारिमी भा मूल्य पर कायम गाना
चाम्यि।
7नि राष्ट्रीय महा सम्मान म पर-पर विधिपूरव पहराना
चामि और " को गदर ममूट समुन्नत एव तिगाली बान शादापय प्रहा
परना चाहिये। पातनामा मुमीवता मापना, ममा भोर तूफाना म मा
अपरामाचा रगना चाहिय । अपन पत्त य-पान या
दत सना पाहिप हम त्याग और मग वा पय स्ना पाह्यि और अपनाना
पाहिय सय अहिमा गाति रहना प्रम और परना को। हम बुद्ध
महागार और गांधी व अनुगामा । अन हम सर अस्मिा का अपनाय गपना
पाकि हम इस प्रकार का प्रयास पग्ना पाहिनि भाग्न हिमालय पर
मम विनियादा मित्रता तालिम मभावना परता आर
वि य-यपुर पामर अनुप्रमाणित कर गरे।
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११ सितम्बर-विनोवा-जयन्ती पूर्व तयारी -विनोवा जय ती की सूचना मभी छात्रो एव शिक्षका को दोनीन दिन पूर्व द दनी चाहिये । लोग इसके लिय खूब धूम धाम स तयारी करेंगे। जयन्ती के दिन प्रभात फेरी की जायगी। आज सफाई की भी रहत योजना रहगी। छात्र निकटस्थ गांवो म आकर ग्रामीणो के माय वहाँ सफाई करेंगे। पिर सभी सजधज कर स्कूल आयेंगे। यहां पर विपि प म दो घट तक मूत्र-यन करेंगे और उस मूत स कपड तैयार कर गरीवा म वितरण कर देंगे । इस दिन सूत्र यन म गीता का पाठ हागा । साथ ही 'गीता प्रवचन' वा भी पठन पाठन होगा । मूत्र-यज्ञोपरात सभी छात्रा एव शिक्षा की। एक सम्मिलित गाप्ठी होगी। इसम विनोबा जा पर चर्चाय चलेंगी। जोग भापण देंग लेख पढेंग प्रहसन च रेंग और कविता पाठ करेंगे। अत मे प्रधान जी का प्रवचन होगा। उम दिन लाग गांवा म जाकर सभी में कुछ रपय पम दान म एकर गरीबा म वितरण करेंगे। देश की राजनतिक अवस्था चिनाबा क ज म ये पूब देश म अग्रजा का एकछत्र राज्य कायम था और उसका दुदमनीय शासन चर रहा था। लोग आजादी की मांग पर रह थ । पर उनकी मांग का सुनने वाला काई न था । लाल वाल पाा गावल आदि प्रमुख नता राष्ट्रीय आन्दालना म मश्यि भाग ले रह ५ । गांधा का भी राष्ट्रीय क्षत्र म यवतरण हो चुका था । अग्रज जनता पर पापी अत्याचार कर रह थ । सभी लाग उनके पाशविक तथा पैगा चिर अत्याचार म उब गय ५ । उसस छुटकारा पान का द्वार खोज रते थे । वाम पर गरीया पिया यबसा और अनाथा एवं अछूता की तबाही थो । मानवता छटपटाती रही थी। अयाय असह्य हो चला था । म सर सभा एमी जवम्या को एमे व्यक्ति की कमी का महसूस कर रह थ जो इन्हें कष्टा में उदार पर साता । भगवान द्वारा प्राथना मुन ली और बिनाबाबप म भगवान यावन म्प घर पर उना बप्य निवारणाथ अवतरित हुए। खम मान या मौगोलिक स्तर-दिनाना या जम माद रायम मालाया जिस प गमाग नामर ग्राम महुवा था । वाताग पहाडामा । यहाँ प साग कापीरसाबरोर मजात हात है। यह मा मुख्य पाचार
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आय थे। वहीं पर वे गांधीजी से मिल । यहा पर उन्हाने बड़ी ही ओजस्वी भाषण दिया । इसस विनावा बडे ही प्रभावित हुए । दुख दिना के बाद म गाधीजी मे मिलन के लिए अहमदाबाद साबरमत्तो जाथम म गय ! यहाँ के वातावरण स वे अत्यन्त जाकृष्ट हुए और वे वही पर रहने गरी । एरवार बीच म १९१७ ई० म उहोंने एक वर्ष के लिये बाप में छुट्टी मांगा और उसम उहाँने महाराष्ट्र का भमण क्यिा और ठीक समय पर वापू. व सामन दाखिल हा गय । सन १९२१ मे व वर्धा म सठ जमुनालाल बजाज के आगह म रह्न लग वहाँ पर प्रे आश्रम का भार उन्ही पर आ पड़ा कितु उसको उन्होंने बडी कुतता ग निवाहा । उहोने नियमा को बनाया और आश्रमवासियो का अपनाने के लिय कहा । अहिंमा सत्य अस्तेय ब्रह्मचय असग्रह शरीर श्रमअस्वाद सर्वत्र भय वजनम् । सवधम समानत्व म्वतंगी स्वाय भावना ही एवादा सेवा वी नम्रत्व प्रतनिश्चय । इमर बाद वे कई साल तक महिता-आश्रम में भी रह । वरीब-करीब ३० वर्षा ता विनोबाजी वधा के समीप म ही रहे। मन १९२३ म राष्ट्रीय झडे के जुर्म म सत्याग्रह करन पर व पहली बार रद किए गए। थाड दिनो के वार कांग्रेस से समझौता हुआ और सत्याग्रहा छा- दिय गए। मन् १९३० २ नमन मत्यायह महाने सक्रिय भाग लिया। इसम भी व कर दिए गए वितु कुछ ही दिनों बाद रिहा कर लिए गए । १९३१ ३०ई० आना म भी जल गए। जल म भी य अपना अध्ययन सम्या रूप म पराय । विशपम्प म गीता का पाठ करते थे । १°३२६० म धुलिया जन म गीता पर उहाँो अपना विचार प्रकट किया । लागा न उगे लिपि- वन पर पुस्तक का म्प लिया और वही गीता प्रवचन नाम म प्रय्यात हुआ। मन् १९३८ म पौनार म परमधाम अर्थात स्वग नामर एप आश्रम का म्थापना भी की। ।
१३१ । मन १९३९ म व्यक्तिगत आगनन म भा व प्रयम - मयामही वन और उनरा नाम दा भर म पंन गया। व तुरत कर कर लिए गए और तीन महीन व वा घाह लिए गए। ९ अगन, १९४२ व 'भारत घाटा आगन म व वर कर लिये गए और नान वो तर मद्रास एव मध्यप्रान की मिपनी जेला म रस गये। १.८५ ई० म जन स मुक्त करगिव गए । गनन भारत का भाग्याय हुआ और १५ अगस्त १९४० काम आजाला या प्राप्ति हुई। लागा या नमनाएं पूरी हुइ और विनावा की तपम्या गपत हुई इस प्रकार आ गया सन १९५१ । सर्वोग्य का वार्षिक अधिदान ८ अ न पा हेरावार व शिवरामपन्ना म हानवाता था। इसम विनादा कामा युनाया गया था। ये आश्रम में तान मो मीन पल पलार ७ अनल का शिगमपन्नी पहेंच गए। मम्मलन मनाप्न हुआ। रिन तगाना और नागाग जिन म कम्युनिम्ग का भरकर उत्पात मचा हुआ या। व पहा १५ अप्रल या तरगाना व लिए प्रम्यान दिय15 अप्रतमा पाचपा नामक ग्राम महान पन दिया। यहाँ पर व गरोवा की नार पया गुना। मवान शिनाया म वहा कि परि ८० एपड जमीन मिल जाप ना हमारा काम चल जा सकता है। यहा पर था रामचन्द्र रही प्रथम भूताना वन और उहनि १०० जमीन भूगन मा। 'म प्रसार पीर धार भून पा वार दड़ा और आज इसका पाम बटे जार-र पर रहा है। माय-ही-माप बुद्धिगन सम्पत्ति-रान मन गन, मान- निपानि धन रहा है। क्य तर भूगन में माना एपर जमान मिल पा गांव-न-गौर नामित धूप है । हमारा मानना है कि भगवान भारत परम मतादापायु पर । निाया नाम एष पर है ग्यानि वाम आनम्विना है पवित्रता म पामरना है और धामा म अग्निाप विनय नियति है।गन और मापारमा है बमला और मगरमा अवतार है। वप्रपान र महान् है मामगर परनमत है और बागान युग मिनिमम गिर| frim गित-बापा का गर नहा पगम याग गरगहैन रिमा ग बाटे। न हो तिहारत है और न पूरा प्रमगा। पति frमा कारण १३२ परते हैं तो केवल एक राम की। वे किसी की निता भी नहीं करते। वे सवजन सुखाय, मवजन हिताय की सोचते हैं। वे सर्वे भवन्तु सुखिन को यामना करत है। शिक्षाएं –दा की पुकार पर योछावर हाने की कामना रखनी चाहिए । बडा की थाना का पालन एव जनता मादर सत्कार करना चाहिए। समय का पूरा स्याल रखना चाहिए। अपनी प्रवृत्ति एक आचरण को सुधारना चाहिए और बुरी चीजो को ओर न ले जाना चाहिए । परन पर ध्यान देना चाहिए। साथ हा माय स्वास्थ्य का अच्छा रखना चाहिए । गरीर को वरिष्ठ बनाना चाहिए । पमे को भलाभानि पच परन के लिए सीखना चानिा । दीन-दुनिया की सदा मेवा और जनता जनादन यी मदैव महायता करनी चाहिए । जहाँ तर हा सर्व स्वदेशी वस्तुआ को ही अपनाना चाहिए । भी विमी मे माया मोह या ईर्ष्या द्वैप नही रखना चाहिए। स्वावलम्बी बनना चाहिए। T 1 । , विनोवा के जन्म के पूर्व की राजनैतिक दशा फैमा या। विनोरा के जन्मस्थान घा मागोलिक परिचय उपस्थित करें। - विनोया के बार म क्या जानन हैं ? उनका नीरनी मनप में प्रस्तुत कर । ३ विनोगा की प्रथम जेनु-यात्रा का वणन करें। ४ विनोबा के बचपन के विषय में क्या जानते है । - पाप सह कमेंट और रनम का प्रभावित हुए। ६ बिनोवा न अपना आन्नम कहा बनवाया घऔर उसका क्या नाम रखा। ७ भूदान का बावश्यकता क्यों पड़ी, मवप्रथम कब कहाँ स शुरू किया गया और सौन पहला भूगनी बना। ८ शुरुम अन्त तक भूनान का दिशा में जो प्रगति रहा है उसका वगन करें। र अब तक भूदान मस्तिनी उमीन मिल नुकी है। २० थान्कन विनाबामहारे और क्या कर रहे हैं। २१ विनोदा और गाधी को तुरनाम्मक न्याय्या परें तथा विनोना को सन्न और महामाप्रमिला करें। २. ग्निोरा जी में भक्तिम्ब नया उनको महानता का यान करें।
३१ अक्टूवर-पटेल जयन्ती पूर्व तयारी ~~जयती की सूचना दो तीन दिन पूर्व ही सबो को दे दी जागो। सब ला पह' से ही जय ती को तयारी म सलग्न हो जायेंगे। जयती के दिन विद्यालय की उहत सफाई होगी। सूत्र-यन का समय भी बुध दिया जायगा। सजाय हुए पगल में लाग इकठे होकर स्व० पटेल के सम्बन्ध म चर्चायें परेंगे । लाग भाषण देंगे निवध पड़ेंगे, वविता पाठ करेंगे। बाद में पभी उपयोगी रचनाओं का संग्रह कर पुस्तक का १५ देकर प्रधान जी के पक्ष दाको राजनतिक हालत ग म आजादी लिए संघप हो रहा था। आजाती को नहर मवत्र व्याप्त हा चुकी थी और देशभक्ति के आवरा म प्रत्येक व्यक्ति की बाटी-वाटा पड रही थी। लोग शान्ति करत भिन्नु गारी सरकार में आगे उनकी एक न चली । न काई अच्छा मगठन था और न अनुशासन ही। इहें कोई प्रेरणा देनेवाला भी तो न था। अगर ये भी नो उनम जनता का उत्तरित करने की गति न थी। बाई मुन्द सगठन नहीं होने के कारण वे एक्वार विसी काय को कर नहीं सकते थे। ऐसी हालत म क एस नेता का आवश्यकता थी जा इन मारी जरूरता को पूरा कर सके। इस सत्रान्ति कान म सरकार पटन का आविर्भाव हुआ और उनके नेतृत्व म हम अनजा से टक्कर रेकर स्वतन हुए। जीवन पत्त -३१ अक्टूबर, १८७५ मे यह साध्य नाग-मा चमक उठा और चमर उठा गुजरात के करमसद का वह छोटा-मा आँगन । आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय हान म उनकी शिक्षा देउन मट्रिक तक ही हो सकी । पुन उहान मुन्नारी पास की और गांधगम चर आये। कुछ दिनों के बाद वे इगलड म वरिस्ट्री पढ़ने गये । कुछ वर्षों के बाद वे वहाँ से पूरे बैरिस्टर बननर आ गय । अहमदाबाद म अपनी प्रक्टिम शुरू की। कुछ ही निो अनन्तर वे वहाँ के एक बहुत बहे बरिस्ट्री में गिने जाने लगे। तबतक १९१८ ई० मे गांधी जी चम्पारण मे लौटे। जालियांवाला बाग में हत्याकाटने पश्चात गांधी जीन मयाग्रह यादो- सन प्रारम लिया। तो वल्लभ भाई पटेल भी अपनी वरिस्टी पर ठोकर मार वर गांधी जी के साथ जो मान म अमर क्सकर उतर आय । गुजरात क १३४ गांव गांव म घूम घूमबर उहान जनता म ऐसी जागति उत्पन्न का कि चग्गे और मादी की धूम मच गयी। मन १९२३ ई० में नागपुर म राष्ट्रीय पण्डे को मान मयादाकी रक्षा व निए उन्होंने पहला कदम उठाया। १९२७ इ० क वारडाली के सत्याग्रह म सरदार की गिनती मवमा य भारतीय नेताजो महान नगी और उसी समय उनके बाया को देखकर बापू ने उन्हें मरदार कह दिया और आगे चनकर इसी नाम न विख्यान हुए। १९३० म म० गाँधी न नमक सयाग्रह प्रारम्भ किया। इमम सरदार ने सक्रिय भाग लिया। व पद किए गए और जेल म जनह य कप्टो का सामना करना पत। मन १०३१ म घराची काँग्रेस के वेमभापति चुने गए । तबतक बापू इगर से तौट जाय थे। उनके जात ही कुछ दिना म पून जागनन उपडाहा। इसम मरदार भा पद किए गए और दो वपों के बार ०३४ १० म म्यास्य सराप हो जाने कारण ये पागमुक्त कर पिए TRI १०४५ ६० के चुनाव के समय दौरा वस पूरे देश मनव जीवन कीर पता दा। अय दना की गर्मोक्तिया के उत्तर म इहाने पहा था-'जर वांटम का स्टीम रोटर चलेगा तो सर विरोधी वार पत्थर "समान दुपा वर चौरम हो गयेंगे। सन १९४२ म भारत छाा प्रस्ताव मा ममयन पटेल न ही पिया था। फम्वरप वैभामय नतामा की तरह जन म ठूस निगा गा और १९४५ ई० म मुक्त किए गए। "लावणे उपरात १५ अगम्त, १०४७ यो स्वतता प्राप्ति 7 गाथ देशा रियागनों TT समस्या बढी मतापजनक राति म मुलयाई और यम करिन ममय म पूर्ण नानि एव व्यवस्था स्थापित रमन का पटारी महान पाय किया और उनकी प्रसिद्धि एक अनि प्रशामक क प मदृह । हमारी सरिया का कठिन तपस्या के अनतर हम आजालो प्राप्त हुई। हम मुन दु। मार सपने गावार ही होने जा रहे थे कि जाम्मान वह तारा जागमान म र ५ ।। हम निराधार हा गय, निरश्रय हा गये। आगुआ का धारा वन चली। रा उठा सारी जनता और रा उठा मारा हिंदू स्तान । किन्तु पात र पुटिन कराल हाथा को कौन राम राक्ता है । भान हम मभी उनकी या- म नतमस्नर हायर पहा पूल अर्पित करत गरनार पटा अपना वीग्ना संगठन तथा निय पण गक्ति म अहिताय । अमरिका ५ प्रसिद्ध पत्रकार मुगिर न पहा था--- गांधी पा और जवाहर नाप क वृत्रम चलनेवाला वांप गये वगम भाई पन राजनिक गण धार है ।' उनम पार्टी गठित करन को जाम त क्षमना पी। जिम ममय १३५ देश म हिंदू मुस्लिम दगा छिड़ गया था तो उसका जबाव उन्होने बडे कठोर और क्षामपूण गर्दा म दिया था-- 'मुसलमान मह न समयें कि लोग उन ‘भाले और तलवार से डर जायगे वलि आत्मरक्षा म लिए हिन्दू भी नलवार का जबाव तलवार से ग । इही कारणाम भारतीय उह अपनी जागा के रूप म मानत ५ वितु आता को लिया अक्म्मान निखर गई। सरदार पटल अनुशासन में बहुत बडे उपासक थे। उन्हें भारत रा लोह पुरप कहा जाता था। उसनर से प्रम था। उनकी सवम बदी पिता यह थी कि ऊपर से व स्खे निष्ठुर और अभिमानी स लगत थे frतु भानर स व नारियल की भांति कामल, मुशायम और सराय । चाणक्य की भांति शत्रु को समूल नष्ट करने म वै विश्वास रखते थ । अपन पनाव म भी ये भारतीय किसान को मानि मादगी पसद करत थ । शिभायें -- लिए सवस्व त्याग करना चाहिए। सुगगठन करन को गक्ति ग्रहण करनी चाहिए। अनुशासन प्रिय होना चाहिए। बड़ा यो बात को मानना चाहिए। पामल सरल एव सनिनय बनना चाहिए । विघ्न वाधाआ से नहा धबडाना चाहिए। सा जपने क्त्तव्य म दल चित्त रखना चाहिए। सत्य, अहिंसा और प्रेम का पुजारी हाना चाहिए। नभी न साप नम्रता का व्यवहार करना चाहिए । सादगी म जीवन यापन करना चाहिए। . 5 पटेल कान का रामेतिक दायें शौं । पटेन न राजनीतिक नेत्र मकान न स मह वपूर्ण कार्य किय" ३ पटेन का नाम आज दुनिया में क्या ऊ चा है" इनकी जायगे मनप में नुन कर। हनका व्यक्ति व गया पान के साथ गापा विनाश और जब लाल की तुलना कर। ४ २ महामना पं० मदनमोहन मालवीय १२ नवम्बर रहे थ। - पृष्ठ भूमि--भारतभूमि म मानवीय जी का प्रादुभाव उम गमय हुआ, जबकि देश पराधीता की वेडिया म आवद्ध था। भारत माना लौह प्राचीर म बर सिसक्यिा भर रही था उस समय दा म मानि के वगूले उठ रह ५ और जादोलन की चिनगारियां प्रज्वनित हा रही थी। भारत म अंगरेजो का एकच्चत्र राज्य स्थापित हो चुका था। देश की अवस्था दिनो दिन बदतर होती जा रही था । अंग्रेज ता भारत का माल लूट भारत का धन विदेगा म जा रहा था। भारत के लिए यह असहा था। स्वतत्रता के लिए लोग ला रह थे उनन जम के कुछ ही पूर्व सन १८५७ की महान क्रान्ति हुई थी। इसम भारतीयों का सफलता ता नहीं मिल सकी किन्तु अंगरेजा को यह नात हो गया कि भारतीय भी अपनी स्वतता पर मर मिटनवाते है। इस तरह १८५७ ई० की प्रान्ति का बदूका और तापा के नीचे कुचल रिया गया । फिर भी भारतीया ने अपनी हिम्मत नहीं हारी थी । अभी भी उनकी धमनिया म उष्ण रक्त सौल रहा था । लोग स्वत प्रता का सूर्य देखन पे लिए नप रहे थे। अपने को गुलामी की जजीरा स मुक्त होन के लिए ययाति चप्टा कर रहे थ। कुछ ऐमी ही सत्रानि काल की बला थी जबदि मालवीय जी का उदय हुआ। जीयन-वत्त-जननी जमभूमि व उन्नायव म महामना प० मदनमाहन मालवीय जा का नाम अग्रगणीय एव भारतीय इतिहास में स्वर्णाभरा म जक्ति किय जान लायर है। 'ना न • दिसम्बर १८६१ ई. में इलाहाबाद म हुआ। इनर पिता का नाम ५० प्रजनाय मालवीय एव माता का नाम भ ना देवी था। मासवा शिवागी हाने वारण वे अपने को मालवीय पहा पलेय। इनका विद्यार्थी जीवन पूण सपा रहा । य पढन निमने म अधिर मचायी नहा य पितु यात्रा और शिक्षा मध्य सवप्रिय लव य प । इन स्वभाव में सभी भाषण हो पात थे। पेपूर म इनरा वि मन सगता था और बचपन से समाज मया को भार उनका झुवाय था। मल- १३७ पद म शधिक रहन वारण एव बार वं एफ० ए० को परोषा में असफल रहे । वितु उससे न तो वे उदास ही हुए और न उनके जीवन का विकास हो “का। असफल रहने , बावजूद भी वे सेल-कूद म निरन्तर भाग - मा १८४ ई० मतपत्ता विश्वविद्यारय से उहाँने स्नातर की परीक्षा पास की। जाग पइन के विचार से एम० ए० मे नाम लिवाया, किन्तु अध्ययन के पम म व्यतिप्रम उपस्थित हो गया । सिंचित मास पढन पश्चात जीवन देवायचय म ना आये । इस जीवन की समर भूमि म उन्हान अधिक कुशलता दिखाई और छात्र-जीवन में विशेष सफलता प्राप्त की। वास्तविक जोवनवे काय भेषम प्रवेग करते समय अय लोगो को भांति भी साधारण थे। पर जिस समय उनकी यात्रा समाप्त हुई, उस समय वें सवमाधारण बिल अपर थ । अपने जीवन-धान म प्रयक क्षत्र में और अपनी यात्रा प्रत्येक पद पर वें जनता जनादन के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चरे। छात्र जीवन की समाप्ति के पश्चात गवनमट हाई स्कूल में ५० } १० माहवार वेतन पर उन्हाने यापन काय पा सहारा लिया। अपनी सरलता, सच्चरिता और योग्यता के कारण शीप ही विद्यार्थिया वे मध्य सप्रिय बन गय। इनका प्रतिभा महमुखी थी। तदातर आपके समीप कालावर राज्य के राजा रामपाल सिह की आर से हिदुस्ता पत्रिका' वा सम्पादन रन का निमश्रण आपा। हिन्दुस्तान आपके सम्पादकत्व में आने से चमर उठा । इनका ग्राहो को सम्या निरतर बढती गई। यहां पर भी आपने पूरी सफलता हामित का। अपनी लेखनी चमकार से सबको चकाचौध वर दिया । ढाई वर्षा तक हिदुस्तान' वा सम्पादन करते रहे और इसके बाद इन्हनि बवारत पढनी आरम्भ कर दी। वकालत पढते समय भी आप लोक सेवा और सावजनिक कार्यों से मुक्त नह । ख्याति प्राप्त पत्रिका इण्डियन ओपिनियन का भा मम्पादन करने लगे। १८११ ई० म इन्होंने वकालत की परीक्षा पाम' को और प्रयाग म अपनी प्रक्टिम प्रारभ कर दी। अपनी सच्चाई और सच्चरिंगना, याम्यता और प्रतिभा एद व्यसि । से मात्र किंचित लिनो म ही आपका नाम प्रख्यात हो गया। वकील की हैसियत से पापन स्तिनो सफलता प्राप्न की इसका पता चोराचोरी काण्ड से ज्ञात होता है। इस फेम म १५१ लोगा को पासा की सजा हो गई थी वितु मालवीय जीव सतत प्रयास स सभी मुक्त कर दिये गए।
है सन १९०२ से १९१० ई० तय सयुक्त प्रातक प्रातीय व्यवस्थापिका मदम्य रहे । इसम उनका काय अत्यधिक सराहनीय इस पद पर रहतर भा उहाँने जनता के हित का सदा ख्याल रखा। अपने जीवन काल का अतिम समय उन्हाने लाक्-मवा म पूण समर्पित कर दिया और मदा जनता के वन रहे । मानवीय जी हिदी हिंदू, हिन्दुस्तान के समय थ। या हिला की द्धि क लिए उन्होंने अनेकानेक प्रयत्न क्यि । अनेको को हिंदी म निवन के लिए मना प्रासाहित करते रहे तथा अनको हिंदी पत्र-परिवाना या मम्पादन किया। हिन्दी साहिय मम्मनन के सभापति के रूप म उहान हिदी का जा सवा की वह सनया स्तुत्य है। हिंदी के प्रति भारतीया की उनामीनता म उह घार तुम होता था। 4 सदा ही हिंदू यम का पालन परत में इमरा परिचय ता उनकी वेग भूपा का दवार ही नात हा नाता । हिंदू धम को पतन की जार जान रखना उना लिए अराहनीय ना । गने पुनरन्थान एव पुनरोद्धार के लिए उन्होंने हिंदू महासभा की स्थापना यी। प्रारम्भ म एम गभा न हिन्दुआ यी वहत पडी सवा वो विन्तु नगर म इमका स्प कुछ विकृत हो गया। हिंदू धम दे जवगुणा म वे अवगन ध और उन अवगुणों वा । मदा निरादर परत थे। अध्ता व प्रनि उनवी अपार श्रद्धा थी । ये न गवत हिती या हिट वा ही उद्धार उत्थान चाहन 4, वग्न पुन मिनार उनरा लश्य भारत का उयान करना था। वे चाहत fr भारतीय विद्यार्थी को हिद गम्कृति एव हिंदू-आरा के अनुसार शिक्षा मिले और इसी ध्यय या रबर न्हान दूि विश्वविद्यालय की स्थापना । वई वर्षों घार और जनवरत परिश्रम प'चा पराडा रपय एरा वरने उहती ग विश्वविद्यालय में लगाया। चार फरवरी १९१३ का भारत में नवातीन वायसराय लाड हाजिन इमा गिता याम पिया। उस दिन मारवाय जी की सम्पूर्ण जीवन का लालसा पूर्ण हुई जिमका व समान रह थ । इस दिन भारत की एक बहुत बडी सनि पूति हुई । यह विश्व विद्यालय उनर पुनीत आतां उनका यहुमुखी प्रतिभा उज्वल व्यत्तिल और जना भारतीय गिरधारा पाता जागता म्मारक है। ग्गा प्रयाट गरी महानता और “याग वा बगान वरती है। यह माननीय जा को आगावारिता और अथक परिश्रम का ज्वान्न प्रनीर है। गी वो मन में प्रतात हाता है यि वारतर म मानवीय जी माधारण हात हुए भी महान ध। राजा हाते हुए भा र और सोक्वि हात टए भी विरक्त थे।
मालवीय जी ने भारत की राजनानिव प्रगति म भी हाथ वगया। काग्रेम की उहाने बहुत बडी मेवा की। इस दावा सभापति भी बन गए। इम्पीरियल जिशिव वौमिा म जातियाँवाला बाग व हत्यापन की घटना का क्ट नाचना की और उसरा सच्चा प जनता र ममल प्रस्तुत किया। १९२१६० महानयार रमज काम में भाग रन के लिए वे इगण्ड मी गए और वहां पर ममी नरह म महात्मा गाधी वा मह्योग प्रदान दिया । १९४० १० म विष्म मिगन का बुराइया का प्रदर्शगत र उहान अपनी याग्यता एव भक्ति का महान् परिचय गिया। मारत विभाजन आप सदा विरद्ध रह । स्कूला एवं बाल जा मे सनिक शिक्षा नाग करन तथा घाटी घाटी चालचर स्वाउट-सस्थामा की स्थापना के लिए मदा प्रोत्साहन दन रह । इनका अटर विश्वास था वि गुनामागे वया स मुत्त हान नियन का मानमिम विमाम कोही भान'कता है, परन शारारित विास की भी भाव यस्ता है। विद्याथिया का व मदा पहा परत य रि--- दूर पिया कसरल करा, नित्य मजा हरिलाम १ मन लगाई विद्या पग, पृण हाग मद काम !! उनमा चरित्र सदा अनुकरणीय रहा है। क्त्त व्यपरायणता दाननीयता परोपकार सत्यनिष्ठा निर्भीरता समान मघा नार लाक-मा तया धम प्रम क मामला म ये साक्षात अवतार ही ये। तमा बहा महान व्यक्ति नव म्बर १९४६ को इस ा म उठ गया। उनकी मृत्य से भारत को वहन चशमदमा पहुचा और बाचा इम निकट भविष्य म महान क्षति की पूत्ति नहीं हा मगा। आज हिदू विश्वविद्याप म जाए तो नव प्रति श्रद्धा से नतमस्तरा जाता है। धयरेशीय जी। शिक्षा-सदा म य वारना चाहिए । निर्भीर मामी आर निडर ন্য ব্যক্তি বা য়ে গ্রান বাণ দান কৰা নাহি। ময়ৱাৰ কবি- दिन पूजा करनी चाहिए । पारारिक विकास की जार विप ध्यान दना चाहिए । समाज मेवा का कान-वाई काप अवय करना चाहिए । काइ भी काय जनता की भलाई के लिए करनी चाहिए जिमम मानव समाज का निज भाषा एव निज देश उत्थान का जार मतन् प्रयनगील रहना चाहिए। साय हा साथ अपन धम का कभी भी याग नगें वरना नाहि ! या धम ये प्रति चला रखनी चाहिए । सवा और महायता समभा मुख नग माहना चाहिए । विनयो बनना चाहिए तथा मरम साथ नम्रता का वत्ताद करता चाहिए । कार्य एका काय नही करना चाहिए, जिससे दूसरे का सटमा मच ।
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१ मालवाय जी के जन्म के पूर्व देश की क्या अवस्था यो?
सन् १८५७ का कान्ति के बार म क्या जानन
३ मालवाय जा का जीवन वृतान मक्षिप्त में प्रस्तुत को
४ मालवीय जी ने मारतीया के लिए कौन-कौन मा कार्य रिया,
५ भारत के लिए उनका मक्स बड़ा कौन सा कार्य है।
। हिन्दु धम के उत्थान के लिए कौन सा काय क्यिा ?
७ क्या इस मंत्र म उनको मरनता मिनो।
८ हिन्दा का कौन मा सदा की।
९ उनके जीवन का क्या सिद्धान्त था ?
१० उनक जीवन स आपको क्या शिक्षाए मिलती है ।
१४ नवम्बर-नेहरू जयन्ती पूर्व तयारी -जयन्ती की सूचना दो दिन पूर्व ही छात्रो एव शिक्षको को दे दी जायगी। लोग निवथ कविता, प्रहसन इयादि नयार रेंग। आज सूत्र यन विशेष रूप से दो घट त हामा । भूत्र-यन के उपरान्न सांस्कृतिक कायम का आयोजन होगा। इसम लोग शिवध पौंग भापण दंगे, पविता पाठ पग चार प्रहसन प्रस्तुत बरंगे । अन्ततोगत्वा प्रधान जी अपना विचार प्रगट वर ! सभा विघटित हान २ उपरात सभी निवधा भापणा, वि. ताआ और प्रहसना या सकलिन घर पुस्तक का रूप दार पुस्तक पक्ष म सुर क्षित रख देंगे। इसके अतिरिक्त १४ नवम्बर को बच्चा का दिन माना जाता है। इसलिये छोटे आट वच्चा को उस दिन स्नान गर उनके वस्त्रादि स्वच्छ पर उनका जुलूस निकालना चाहिय और श्री नहरु क बार म उनके कामल मनिष्कम नानप्रद भावनायें भरनी चाहिय । उमव के उपरान्त वचा मे मिटान वितरण भी करना चाहिये । देश की राजनतिक हालत देश में अग्रजा का एक्च्चा राय जामतु हिमालय कायम था । सार भारत पर उनका दबटवा था। भारतीय जनता गारा सरकार का नीति म तग आ चुकी थी। वह उम उखाड फँक्न की चेप्टा म थी। किन्तु नापा और व दूका क आगे एक न चली। दाम बड- बडे महामान्य नता राजनीति म अति तीव्रता स काम कर रहय। इनम दो दल थे एक नरम दल मरा गरम दल । गरम दल में लान वान पाल थे और नरम दल म बील बरिसर इत्यादि । इन्ही दर नतासा में से एक मोती लास नहर भी थे। जोधन वृत्त जवाहर लाल देश मामान्य नता थे । साथ होनहार विरवान के हात चिकने पात वानी कहावत चरिताथ होती है। मोती का पुत्र जवाहर हुआ। मचमुच यदि मानी मानी था ता आज जवाटर भी जवाहर स कम नहीं । कितना मनमोहन सुरुचिपूण नाम था जवाहर । जसा नाम वमा गुण जमा गुण वमा हो नाम ! वदाचित सररह का मनिवचन स योग विरहा, वही दखन का मिलता है । अग्रे नीम एक कहा वत है 'Boon with a silver spoon in ones mouth 'सचमुच में - उनका जम राजमी ठाट बाट म १९ नवम्बर १८८० ई. में इलाहाबाद में आन द भवन में हुआ। इनका वचपन मुव की गोद में व्यतीत हुआ । उह कभी किसी वस्तु का लाभाव नहा खटवा । ये ग्यारह वर्षों तक मां-बाप के प्यार में एक मात्र उत्तराधिकारी र पिता के प्यार ने इनके स्वभाव का नव निर्माण क्यिा ता मां का स्नह न इन क्बर की श्री वद्धि की। और इमी के बीच उन्होंने अपने सुदर सुव्यवस्थिन और सुगठित सामाजिक जीवन का निमाण किया। जवाहर अपन घर का चांद था जिसकी शुभ्रज्यात्ना में सभी मुख और सतोप की सांस लत थ। यदि भारत का उनके जाम दन का गौरव है तो इगलण्ड का गौरव है उनका सम्यक् विकास करन का। १९०५ ई० में व सवप्रथम इगलण्ड गय । वहाँ के प्रसिद्ध प्राचीन स्कूल हैरा में एण्ट्रस तक की शिक्षा प्राप्त की तदुपरात केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के टिनटी कॉलेज में उन्होंने १८१० में बी० ए० का डिग्री प्राप्त की और १९१२ ई० में इनर टम्पुल से वेरिस्ती परीशानीण हा वे स्वदेश लौट आय । म्परा लौटत ही सन १९१२ में य पटना में कांग्रेम अधिवेशन में सम्मि- लिन दुए। १९१४ में प्रवासी भारतीया क लिय ५० हजार रुपये सग्रह कर अफ्रिका मन थ। सा १९१६ में लखनऊ-कांग्रेस के समय महात्मा गांधी स भेंट हान पर य उना यक्तित्व का टेप कर अत्यत प्रभावित हुये। उन्होंने पौरन मन का चागा इतस्तत फेंक तपवी का दाना धारण कर लिया। सवा और मागी का जीवन-यापन परत हुय महला का त्याग भारत को टूटी पटा झापडियो का आर अविरामानि स चल पडे में । मन १०१० ई० में इहाने जर क्सिाना म वाम विया और इसम उ' आगातार सफलता प्राप्त हुई। १९२१ ई० के असहयोग आनालन म टन छ महान का जल की सजा हुई किन्तु कुछ ही दिनो म घाट दिये म य विमी कपडा वा दूरान पर पिवैटिंग करते हुय पुन बद बिग । इसा ममय इनकी पत्नी बमला नहर बीमार पड़ी और इनमा लाज करानब निय स्वाटजरलड गए। रितु वहीं पर उनका 1- गया। ... स १९९ई. तर म निरनर अखिल भारतीय बारमय मत्रीर। १९२८ ई० म कसत्ता अधिवन म इन्होंने पूर्ण स्वरा वा मांग का। गन १९२९ २ कायस-महाअभियान रा अध्यन निवाधिन और उही पीनध्याता म रावातट पर एक यत यहा अधिव गान हुआ और इसम उहान पूण स्परा र का प्रस्ताव पास किया। १९० गय। १.
मनमक कानून भ ग वरन म उहाने सरिय हाथ बटाया जिसम नहर परि- चार व सभी सदस्या को जर की हवा मानी पड़ी। १९३२ ई० के आगमन के माथ ही भारतीय स्वात य आन्दालना म भी अनि तीना आ गई। इसम जवाहर लाल न वापूर पदचिहा का अनुसरण वर स्वतत्रता देवा का आहवान किया। इससे १९४० म इहे चार वर्षों की जल की सजा हुई। पुन स्वतत्रता सत्याग्रह का तूफानी शशा लिय मन् '४२ का साल आया । इस एतिहासिक प्राति से ब्रिटिश शासन की जड हिल गई। अन्ततोगत्वा यन कन प्रकारण भारत का सौभाग्य-मूप चमक उठा और सदिया। बार १५ अगस्त ४७ वा दास्ता की बटियां टूट गई और भारत स्वातन्य मुप्रभात व स्वर्णिम सौदय को आभा म मुवरित और पुलक्ति हा उठा मोर जाहर लाल नहर नतृत्व और ममित्व में भारत म संवत स्वतत्र साव भीम प्रजातत्र की स्थापना हुई। जवाहर लाल जी जनता जनादन के पुजारी य । जनता उहें परम पूज्य मानती थी। उनर त्याा को महिमा पर काय लिखा जाय तो वह महारान्य वन जा सकता है। उ हान सवा और सादगी का जीवन अपनाया। अनेस चार जल की खिच उनव तेन को परख चुकी थी। जलों म रहकर अनका असा यातनाओ का सहन किया किन्तु जीवन म उहान हार क्यून नहा का। वे अध्ययन गाल रह । जन की चहारदीवारिया व अन्दर भी उनका अध्ययन जारी रहा। इतिहाम से उन विशप प्रम था। वे एक एक क्षण पा प्रतिष्ठा परत थ । उह गोपासन से विशेष रुचि थी। एर रेखक वे म 'जाहर लाल का व्यक्तित्व उत्साह कमण्यता और अनुगमन का प्रतिस्प है। उमकी दष्टि मनिमल आदा की ज्योति है। उनक चरण निशप म सुसम्कृति और आत्म गौरव की लोच है । उनक हृदय म धार अमाताप है, हमारी सामाजिक विरासनता के प्रति उन रिल मदद है, उगा और भूषा र प्रति उनव मन म असीम सहानुभूति है। समा नता और पार-वल्याण का भावना, मात्विर आध, निठुर कापशीलता, शुद्ध आदावाद नाय निणय को शक्ति और बडो प्यारी झझलाहट जवाहर लान नहरू की विपतय है। जहाँ उनम वार याढा का उग्रता स्फूति तथा बधीरता था, वहां राज- नीवित का विवेक भी था । व परिस्थिति स धागे का यात सोचत थ । वह वि मणि की माति पवित्र थे उनकीस यगोलता सदह से परे थो । जोखिम 'म इहे अति आनन्द मिलता था। इनका हृदय वामल था। इभग प्रम, दया और इसानियत भरी पड़ी थी। उनके बारे म "The Hindustan Standard" न लिखा है- "He is aristocratically democratic, subjectively objective, internationally national, institutionally sing ular, individually of the master and massively above the classes He is most pleasing in the Superlative Contradiction irretable by nature, kind at heart, impulsive in emotion, calm in thinking arrogant in opposition, milel in compromise restless in mood, gentle in manners ready to speak impatient to listen Politician, historian and scientist, Nehru is deplomat and pacifest, In him is happily blended All that is to be commonded नहरू जा हमार भारत र प्रधान मंत्री य । वेवर भारत ही नहीं अपितु एगिया और विश्व नताआ म भी अगगण्य य । इनकी गिर नीति म गांधीवाद परिलक्षित हाता था। विश्व स समय दो दना म विभाजित है। एक अमरिका दूसरा स । भारत इन शाना दला व म य म मय की मना तन पतारा पिए अहिह्मा का अमाघ अम्त्र लिए नहरू | गफर नहत्व म शान्ति पथ वा और अगसर हो रहा था। सचमुच म नहर राप्, वाण धार। ईवर न म विश्व विभूति गति व एकमात्र अगदा जवाहर रात को २७ मई २०६४ को २ बजे नि म अपन यहाँ युता बिया । उस दिन मारा भारत गान्मागर म टूब गया। विष दिन ही उग। उग गपुरुष ने जहाँ मात विधाम लिया उमे गाति घाट कहत ह । वर लाज भारत वा तोच-स्थल पा गया है। Oh bc thou blest with all that Heaten can send Long hcalth, long youth long pleasure, and a friend रिक्षायें -~-श के लिए सबम्ब न्याछावर करने के लिये सदैव तपर रहना चाहिए । प्रयक राम म आग रहना चाहिए । दीन दुखिया की सेवा करना चाहिए। मादगी स जीवन यापन करना चाहिए। जनता की माग मा बारिनो बाहिरपटवाटी और निर्मी हाना चाहिए। वष्टा और विघ्न-बाधामा वा दपकर घबडाना नहीं चाहिय। धेय धारण करना चाहिए। अनुशासन प्रिय हाना चाहिए । लाम ल्याण करना चाहिए । सवर प्रति समानता का भाव प्रदर्शित करना चाहिए । निर और माय शाल हाना चाहिए। सभी के साथ प्रम दया और सानियत का भाव प्रगत करना चाहिए। T प्रश्न १ हर नाम के पूरश का प्रथा माया ? २ नहर राजनीतिक क्षेत्र में बम परापण किया ३ नातिक सय में सन्हान कौन-बान-मा महत्वपूण राय रिया ? ४ इनका पावन वृत्त समय में प्रस्तुत करें। ५ इनका नाम आज विश्व में क्या चा है" इनके व्यक्ति के बार मन्या मानत है। ७ मारत को इनकी कौन-सा देन है। ८ विश्व हिताय इहान कौन सा कार्य किया? ६ विश्व अन्य प्रमुख साथ साथ इसकी तलना करें और इन सबा में का स्थान निधारित करें। १० मारत बार स का मैत्री में इसका स्रा हाय रहा है। २५ महात्मा गा के राजनीतिक उत्तराधिकारी न्हर ५१ मिद्ध करें। १३ पचशात ममया ममकत है? १३ हरु पीरिक नीवि पर प्रकार लें। A - am- ३ दिसम्बर-राजेन्द्र प्रसाद जयन्ती पूर्व तयारी –दा दिन पूर्व विद्यालय में राजद-जयन्ता की सूचना प्रमारित कर दी जायगी। जयन्ती के दिन विशेष रूप से सफाई और सूत्र-यन करेंगे। सूत्र-यन म रामायण का पाठ होगा। सूत्र-यनोपरान्न काँग्रम के साक्षिप्त इतिहास और भारत का राष्ट्रीय आ दालन म बिहार का कहाँ तक हाय रहा है इसका सक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जायगा । स्वतत्रता का इतिहास भी स्पष्ट कर दिया जायगा और यह बतानान की चेष्टा की जायगी कि स्वतत्रता को ज्वाला प्रज्वलित करन म राजेन्द्र बाबू का वहाँ तक और कितना सहयाग रहा है । तदुपरान्त इनके काय सकुल जावन पर भी दृष्टिपात परत हुए यह स्पष्ट किया जायगा कि इन जावन म पौन-कोनमी महत्त्वपूर्ण घटनायें घटित हुई । अय राष्ट्रीय नताओ के साथ राजेन्द्र प्रसाद की तुलना मव विवचना भी की जायगी और साथ ही राजेन्द्र को महानता पर भी प्रकाश डाला जायगा। इस प्रकार अनय चर्चामा के उपरात सभी रेखा एव भापणा का म क्लन वर पुस्तक का स्प देंग और उसपर जिल्द बंधवापर सुरक्षित रख देंग। जम स्थान का भौगोलिक परिचय -राजद्र यादू का जम छपरा जिले भ हुआ था। छपरा जिर म मौनमून स वर्षा होनी है। जलगयु उष्ण है और यहाँ धान तथा रबी की फ्मत अच्छा हानी है। गर्मी विशेष पडली है। पृष्ठभूमि -जननी जन्मभूमि व उन्नायको म देशरत्न डाक्टर राजद्र प्रसाद का नाम अग्रगणाय एव भारतीय इतिहास म स्वर्णाक्षरा मजवित किए जान याग्य है । इहाने विश्ववद्य वापूर चरण चिहना का लनुमरण किया एवं भारतीय स्वत तास ग्राम म प्रमुख एव मत्रिय हाथ बटाया । भारतभूमि म राजद्र बाबू वा प्रादुर्भाव उम ममय हुमा जव दा पराधीनता मी पहिया म आवद्ध था। उम ममय दाम यादी पर उठ रहे प और आन्दो- लन भी चिनगारिया प्रज्वनित हा रही था। लोग स्वतत्रता वा मूप दमन लिए तडप रह पे, अपन का गुलामा गाजजीरा ग मुक्त करन के लिए पेप्टा कर रहे य । एमी हा मत्रान्ति काल की कुछ बना थी जब रानट प्रसाद का बिहार गगनागन म यम्पुल्य हुना।
.१४७ . जीवन वृत्त -विहार की विभूति राजेन्द्र वावू का.जम ३ दिसम्बर, १८८४ ई० म बिहार प्रात व छपरा जिलान्तगत जीरादेई ग्राम के एक सु- सम्पन्न एव सुसस्कृत परिवार मे हुआ था। उस समय उदू और फारसी का बोलबाला था, अत इन्हें भी वचपन से ही उदू और फारसी की शिक्षा दी गई। तत्पश्चात इन्होंने छपरा जिला स्कूल, टी के घोष एकेडमी एव पटना विद्यालय म शिक्षा पान के बाद क्लकत्ता विश्वविद्यालय स सन १९०० मे प्रव शिका परीक्षा सवा च्च अब उपलब्ध कर उत्तीण हुए । इन्होंने आसाम, बगाल, बिहार एव उडीसा के समस्त विद्यालयो के रेक्ड तोड दिया। १९०६ ई० म एम० ए० और वाद म एम० एल० को परीक्षाओ म भी उत्तीण हुए। प्रवशिका परीक्षा और विश्वविद्यालय म सवप्रथम आने पर 'हिन्दुस्तान रिव्यू ' के सम्पादन ने राजेन्द्र बाबू के प्रति निम्नाकित विचार व्यक्त किया था- नवयुवक राजेद्र सब प्रकार के प्रतिभाशाली विद्यार्थी है। हम आशा है कि प्रवशिका परीक्षा म जो स्थान उन्होंने प्राप्त किया है उसे वे जीवन भर निभायग। ईश्वर जाने इस नवयुवक व भविष्य में क्या है। लेकिन यदि इसका स्वास्थ्य ठीक रहा तो काई भी पद जो हिन्दुस्तानियो के लिए खुला है, इसकी महत्वाकाक्षा के बाहर नहीं। हम आशा है, आग चलकर यह नव- युवा अपने प्रान्त के हाइकोट का यायाधीग और कांग्रेस का सभापति सम्पादक को इस भविष्यवाणी से युवक राजेन्द्र को आग बढने की प्रेरणा प्राप्त हुई। अपने विद्यार्थीकाल म व सदव सवप्रथम आये । कांग्रेस का सभापति भी नियुक्त हुआ और उन्होंने भारत का प्रथम राष्ट्रपति होकर सारे नभ के शासन की बागडोर पकडकर इसका स चालन क्यिा। सदव दम्मे की बीमारी से पीडित रहने पर भी राजेन्द्र बाबू ने जो कुछ किया वह आज हमलोगा के समक्ष ही है । १९०६ ई० मे ये कांग्रेस म शामिल हुए और अबतक य कांग्रेस के एक मठ सदस्य रहे है। य वग भग आन्दाला से अत्यधिक प्रभावित हुए। इनके मन म राष्ट्रीय भावना का स्रोत सचारित हुआ। ये राष्ट्रीय आदोलन की धधक्ती ज्वाला मैकूद पडे । राजेद्र बाबू ने देशोत्थान ये बायो म खूब खुलकर हाथ बटाया। ई० से ही य साधना के पथ के पथिक् बन । अपनी खूब चलती वकालत को टार मार कर इहोंने गांधी जी के साथ स्वतत्रता स ग्राम में सक्रिय भाग १९१९ ई. के रौलेट ऐक्ट के आदोलन म गांधी जी का पूरा पूरा साथ दिया। १९२२ ई० म गया पांग्रस अधिवेशन में आपने सक्रिय हाय बटाया । विहार मे खादी का प्रचार करने और विद्यापीठ जसी शिक्षण होगा।' लिया। १९१० १४८ . 'सस्थाआ वे असह्योग के समय भी स चालित रखने वाय आप ही को है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चम्पारण म जो आदोलन चलाया गया उसमे भो आपका पूण महयोग रहा। मन '१९२०, १९३० एवं २०४० और १९४२ के सत्याग्रह स ग्रामा म इहोने खुलकर भाग लिया। __१९३० ई० के सत्याग्रह वो बिगर म जा सफलता मिली उसके घयवाद के पात्र आप ही हैं। कई अवसरा पर जेल की हवा भी खाई। अनेका वार पुलिसा की ताठियो का प्रहार भी सहन करना पड़ा। विहार को कांग्रेस का पण स गठन कर इसमें राजनीतिक एवं सांस्कृतिक चेतना लाई । अनाद्धार आदालन म भी आप कभी भी पीछे न रहे । जब कभी देश मे बाल आ, कान या भूकम्प का प्रकोप हुना, आप अपनी सेवा दान करने के लिए सदा तत्पर रहे। सवा राजनानि के जाल मे फ्री रहन पर भी आपने हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा के उत्थान के लिए जो कुछ भी किया, उसका मूल्य कम नहीं । या दा नापन यई पत्रा का सफलतापूर्वक सम्पान किया। जाप ही के परिश्रम के फलस्वरूप पटना विश्वविद्यालय ने हिदी भापा का सवप्रथम पिता का माध्यम बनाया ! राष्ट्र-सवा के साथ ही इहोंने जान दान भी किया। मुजफ्फरपुर कारेन एव कनकत्ता 4 मिटी कारेंज म प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए । कलात्ता के लौ वालजम भी अध्यापन वाम विया। राजद्र वा के परिवार वाला को पूरा विश्वास था कि य बहुत अधिप राम्पत्ति उपाजन परेंग । उनका यह विरास अभरण पलीभूत हुआ । इराने इतनी गम्पत्ति अजित दी कि वे यदि दाना हाथा से भी उलाची जाय तो वह बम हान का नहीं। रहाने वह धन कमाया कि जिसे पाई चार चिरा भी चराने म सफल नहा हो गाना। वह सम्पत्ति समय का आंच लगन पर भी गरार नहीं हो सरती। राजेन्द्र बाबू सचमुच म दा के रल थे। चे विसा पास के ना वरन रामस्न दा के थे। वे जा नुछ परल ये अपने लिए। उनी हत्य म सरने लिए एक स्थान था। मा नि स्वाय Fप मे राया भार म निरत रहते थ। मेवा ही उनका जायन था। यही था उनवे जापन कारमात्र न तो परप्पन को गान गौरन थी और नेतृत का नगा । पराप पार दया, क्षमा, गहानुभूति आदि गुणा म विभूषित र उच्च विचा सपनपनाये सायर । मा पूगम्हि पार गुधर मुटबरम' . ध्येया की भावना को अगीकृत करते थे। इन समाव अत्यल साधु एव विचार- धारा अमल विमत था। बिहार के गांधी और अगर के आधुनिक स्प, सयानुरागी और हिमा के पुजारी सरा मादगी और महिणता की प्रति- मूर्ति राजद्र वायू वस्तुत देश के गौरव गौर विहार के विभूति थे। सादगी और उच्च विचारा का एसा ति बिरले ही मिलत है। बिहार न जिस क्षण जिस लग्न म जिस मूहुत म राजद्र का जम दिया, उसी दिन, उसी क्षण और उमी मुहत म अनकानेक बारका का जम दिया होगा, पर विसी का राजद्र वार जसा दिल और मिाग, हृदय और मस्तिर नहीं मिला। दिमा म ऐमी जय शक्ति थी जा देश का निहास ही बदल दे। हृदय म वह महानता थी ना पट्टर गनु को भी हृदयालिंगन पर दे। सभी जीवा के प्रति इन हाय म प्रेमाभाव था। ये मुद्धि पर भी 2 । भारतीय सभ्यता मार म स्मृति में उन्नायक + प म गोपुस्तको का प्रणयन भी किया। विरचित आत्म क्या' वा अनुवाद व भापाआ म हो रा है। राजद्र याबू काइ व्यक्ति नहीं वरन् एव गति थ । इमो गति न हमारे हृदय म जागति का प्रभाव स चारित रिया। यह शक्ति अजेय थी। और अमर थी। किमी समय हर साहब ने कहा था जिस दशम राजेन्द्र बाबू जसा व्यक्ति है वह कभी भी परत नहीं रह सरता । टीव ही है आज दा परतत्र नहीं । जहाने राष्ट्रपति पद पर अधिष्ठित होकर पूण क्षमता 4 साथ कुशलपूवन अपन काय का सम्मान-स चालन किया। जिस देश का राष्ट्रपति राजेन्द्र वावू जसा यक्ति था वह कापि कठिनाईयों के सामन सिर नहीं नत कर मक्ता । ये हमार दश के जाग्रत आदश में । आज हम नाज है एस दशरल पर। दश का आवश्यक्ता है एम ही उपायका की। अपने गुण-गरिमा के कारण ये चिरम्मरणाय बने रहेंगे। अत मे कवि क्लक्टर सिंह 'देशरी' के शाम दीपित निद्र-सा भारतीय नभ मे राजेन्द्र हमारा है । वह वोटि-काटि दोनो प्रथयहीना का एक सहारा है । निभाय गमक्त बनना चाहिए । समय पडन पर 7 के लिए अतितान हाने म कभी भी हिचकना नही चाहिए । त्यागी और उदार बनना चाहिए। गरीवा का मदव सवा परनी चाहिए। किमी भी व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए। अपना परामा का भेद भाव नहीं परना चाहिए। सबा मो ममान दृष्टि स दखना चाहिए । सबा भार सहायता स कभी मुंह नहा माडना चाहिए । गरीर व्यत्तियों का भी सपार करना चाहिए।
१
२
हाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के समय देश की राजनीतिक अवस्या कैसी यौ।
इनका जावन-वृत्त मक्षिप्त में प्रस्तुत करें।
रागनीतिक क्षेत्र में इनका क्ब पदार्पय हुआ १ इन्होंने कौन सा प्रमुख काम
३
किया?
४ र देशरत्न क्यों कहा जाता था ?
इन्दान क्सि पार्टी की स्थापना की थी। इनके जीवन से आपको कौन सो
शिक्षायें मिलती है?
२५ दिसम्बर -ईसा मसीह जयन्ती पृष्ठभूमि -~-जब राम माम्राज्य वाक्य अपनी चरमधोमा पर था, उस समय रोम के राज्य सिंहासन पर मम्राट आम्टस आसोन था। उलियन सोजर को मृत्यु बाद दा म गह-युद्ध के कारण अशालि फैली हुई थी। 'इम अशाति को दूर करन और राज्य मानि स्थापित एव लागो म विश्व- बधुत्व भी भावना को जाग्रत करने ३ हतु उसने सुमार की पूजा करनी प्रारम्भ करवाई । अरगम्टम का पत्तित्व बहुत महान था। इसमें भी लोग प्रभावित हुए और उसकी पूजा धूम धाम में मनान लग | विन्तु साम्राज्य की सुबह राज मत्ता को कम और राज्य मम्भालन लगे तो सम्राट पूजा का महाव बम होने लगा। मामाज्य मनगरों की प्रधानना थी। इन नगरो म विभिन्न धम और सम्प्रदाय के लोग एक स्थान पर इक्टठ हाते थे। इसके कारण भी उनम विश्व-अधुत्व की भावना का उदय होन लगा । लेकिन इस विश्व-ब युत्व की भावना पदा हान के उपरात भी व लोग किसी एक धम का मानन के लिए तयार नहीं थे। ईमा के जन्म के पूर्व प्राय २०० वर्षों तर मामाज्यवादी युद्धा गह युद्धा एव वर्ग-सधप कारण जनता का दुष दिन पर दिन बनता ही चला जा रहा था। उनका क्तमान जीवन सीव सघर्षों में आवद्ध और भविष्य निराशाजना था। विवि दास महल भी मस्या म लो गुलाम बनाकर लाए जा रह थे। इन गुलामा के अपने प्राचीन धामिर विश्वास प्राय कमजार पर गए थे। अत वेदाई एमे घम की खाम चिलित थे जो उन्हें काटा म मुक्ति के लिए उनि अनका बार वाति भी की। फिर भी उन्धन शोषण में घुटररा न मित सा। अब उन्हें इस ससार स कोई मान थी। बस मात्र दे परलोक की मार टक टको जगाए हुए थे जहाँ उ गति मिलती । एम टी सभाति वार को बेला म सा धन का उपहुआ। ईसा का जीवन पत्त -- आज विश्व के इतिहास में ईसा का विशिष्ट स्थान है। ईमारे यहूनी लाग जागुआ और रामन उम जसस मह कर पुकारत है । ईसा का जम मिरिया में गल्ला प्रान्त में नजेरय नामर स्थन म प्राय ई० पूर्व म हुआ था। उन माता का नाम मरीयम और पिता का नाम युसूफ था। ईसा जाति के यहूदी व 4 जौर,नम दनको राजी राटी माती या । जव ईसा को जवस्था १० साल की थी ता वहाँ ये 'गरोगा नागरिका ने राम के विरद्ध बगावत किया । इस विद्राह का बन ही गहरा प्रभाव ईमा के हृदय पर पटा। कंगाचित ईमा तान म जनभिन थे एव इस युग के धम और दान से अपरिचित थे । फिर भाजपनें गरीब, अमहाय एव अगित भाइयो में मप्टो का देयपर वे वरत प्रभावित हुए। इसा न सट जान म निभा पाई थी। सेट जान न यहूदिया का यह विश्वास दिया था कि उना टखा और यप्टा व परित्राण के लिए एक ममीहा पा हागा । इसम जान की लोकप्रियता बढती गई। साथ हा उम रोमन अधिकारी का की दष्टि म दया लग। देसामन्ह र प्रभाव में आने में रामा अधिकारिया न सट जान या फामी दे दा । इस घटना में ईमा को अपने शिक्षा कवाय को जारी रखन पी प्ररणा मिली। पर वह पहाड़ा नाम पयटन करन मल्लाग विदेगियो और गरीबों के बीच अपने उपनगा का प्रचार करत नगा । उसो व्यक्तित्व एव तर्प गति में पराजित होकर बहुत-म उमर गागाद हा गय । उन्होंने ईमा को ममीहा स्वीकार पर लिया । यरिया यो अव भी एमा विश्वास था कि ममार ना दुख दूर करन व लिए एक दिन ममोहा जब य ही पदा हागा इन यदिया का अपन पश म लाने के विचार से उनर प्रसिद्ध तीथस्थान जरसलम गया। यहाँ व मदिर 4 इयाणी पुगहिता न ईमा को मसीता मनान में अम्वीकार कर दिया और यह पाटा उनकी आमा म सटया लगा। जरसलम में रामन शासव था जिममा नाम पाटलेटस था। इसक यही लागा न दमा व विरद्ध धार यार शिकायत की और उस राजद्रोही सिद्ध करन की चप्टा यो। वितु पाइलटग एर दिवान व्यक्ति या। उगन ईमा का कृत्या पर ध्यान महा रिया। घाट मग्मा का कद पस लाया गया ता पाइन्टम न उमा वानचीत की। ईमा यी शुद्ध प्रनि एव उम प्रम भर आचरण से वह उपयअधिर प्रसारित हुआ आर ईगा र दिग्द नाई भा पारराई करने में अपामार लिया। जब पुराह्निा न यहाँ पर सपना दाल नतीदप रोमन सम्राट बसमाप निया भजन ग। अततागका मनदर हा पर पाइरस पाईमा व विरद्ध गाय परमा पाके पर राजगह या इलजाम लगाया गया और से पानी की सजा ६ दी गई। मुमा- पाक्षिणा म गो पिप्या न गाय पाट दिया । गिप्या Tal तामह डाला निवेईमा मा जानना भी नगें। उनस पियाधान से ईसा का मर्मान्नर चोट लगो । मरते. समय ईसा ने चिल्ला कर कहा" मेरे ईश्वर मेरे ईश्वर, तून मुये क्या साथ छाड दिया है " साथ ही उसन उन लिप्या के प्रति प्राथना की- या खुदा, तू इहें माफ कर क्योकि य अनानी हैं।' ईसा ये उपदेश --~-३१ वप का युवा ईमा ग्रॉम पर चढ गया और अपने गरीव भाइयो के लिए उसने अपनी शहादत र दी। इम प्रकार गुलामा और गाला का मसीहा इम पृथ्वी पर में मदा के लिए उठ गया। ईसा मार दिया गया वितु उमपे उपदेश अमर हो गए। उसन सतप्त ससार दुसी और असहाय जनता के लिए नवीन आगा और जीवन का सदश दिया। उमन बतलाया कि भल ही इस ससार म न रता और असमानता है पर ईश्वर वे ससार म ऐसे नहीं है। उसके उपदश निम्नलिखित है "तुम गरीव धय हा, क्यादि इश्वर का राज्य तुम्हारा है। अभी जा तुम भूख हा सो ध य हा वयाकि तुम सतुष्ट हाग। तुम रोनेवाले धय हो जो हँसागे। (Blessed are you, who are poor, for the kingdom of God is yours Blessed are you who are hungry now, for you will be satisfied Blessed are weep, for you will laugh ) और भी उसी पहा 'अफसोस उनके लिए है, जिनके पास खाने को अधिक हैं, क्योकि वे भूपे रहेंग। गोचनीय वे है जो धनी है क्योकि उनके सुख का समय बीत गया और पाचनीय वे है जो अभी हँसते है, क्योकि उहै रोना पटेगा।" -लोगा को उसने सिखलाया सम्पदा म विश्वास करनेवाले पुम्पो का ईश्वर के राज्य म प्रवेश हाना बडा हा कठिन है । मूइ ये छेद म ऊँट प्रवेश होना बड़ा सरत वाम है। सूइ ट्रेन में ऊट का प्रवेश करना ईश्वर के राज्य मे धनिको के प्रवश पान स कही यधिक सुगम है।" इस प्रकार ईसा ने अपने पीयूपवर्षी उपदेशा से असहायो, दलिता एव गरीबा का सात्वना दी। उसन लगा को पभी भी विद्रोह करना नहीं मिखलाया । गुलामो के लिए उसन धम का द्वार खोल दिया। उसन उप दंग दिया। -"अपने दुश्मनों का प्यार करा, जो तुमसे घृणा करते है उनसे तुम नम्रता वा वताव करी । जो तुम्हें अभिशाप दत है उहें तुम वरदान दो और जो You who - - १५४ तुम्हें गाली देत हैं उनके लिए दुआयें क्रो। जो मनुष्य तुम्हारे एक गाल पर मार उमके सामने अपनी दूसरा गाल भी पसार दो और जो मनुष्य तुम्हारा कोट छीन ले उसे अपनी कमीज भी दे दी। जो तुम्हे प्यार करते हैं तो इसम क्या खूबी है। नास्तिक व्यक्ति भी अपन प्यार परनवाता को प्यार करता है, इसलिये अपन शत्रुओ को प्यार करो और इहें सहायता दो। कभी निरा मन होवो तुम्हें इसका पूरा पुरस्कार प्राप्त होगा। "ईश्वर गरीबा का है और वह उसी को प्यार करता है। ईश्यर धन और पद दरवकर पक्षपात नही करता। वह ता प्रेम का भूखा है।' ईमा ने सभी प्रकार से गरीवा और गुलामो का पक्ष लिया । ईसा ने एक नाम सिखलाया कि मानव एक दूसरे की सेवा कर और ऐसा करने मे ही ईश्वर की मेवा हो सकती है। ईमाई धम को यह विशिष्टता है कि घम का संचालन करने के लिए पुराहिता की आव यकता है। इसम प्रत्येक मनुष्य ईश्वर से सीधा सम्पर रखता था। जिसम पूजा पाठा और विधि निपधा का स्थान नहीं था। यह एक ईश्वर में विश्वास करता था । ईसा वे मरन के उपरान्त सेंट पान ने इस घम का त्वरित गति मे प्रचार किया । धम प्रचार के लिए उसने कुछ भी उठा नहीं रखा । धम के समय उसने अपने व्यक्तिगत जीवन को कभी भा महत्व नहीं दिया। मण्ट पाल न ईसाई धम की व्याख्या इस प्रकार की वि इमम मभी धर्मों वा सार आ गया । उमन नारिया का आदर करने की शिक्षा दी और दासो के हृदय म नृतन आगा पा सचार क्यिा । ईसाई धम के प्रति रोमन साम्राज्य को नोति -जिम समय ईमाई धम वा उन्य हुआ था उस समय रोमन साम्राज्य म मम्राट पूजा बढे जार गार ग चल चुकी थी। ईमाई सवल ईवर को ही मानत थे । भला ये गन्नाट वो देवता वे प म स मान सकते ? सम्राट के समय तो नतमस्ता हाना की बात रही। वह भी मूत्ति के रूप म । अन माईयो म इम आचरण गरामन अधिकारी अत्यन्त शुध होगा । अव इस धम को कुचन ये लिए यार-वार प्रयन रिया जाने उगा । एरबार २४८६० म रोम की स्थापना का वापियोगय हो रहा था। इम उमर में ईमाया र सम्मिमिन होन गे अस्वीकार कर पिया। यानि इसमे रामन दयामा यो पूजा करनी पत्नी घो। फलत सहाना ईमाई फांसी पर पर अता यि ग | रामन शामाग्य डायरियन 4 गामन-बाल म उनपर ययधिष पूर्ण भरया चार दिए गए। गाई धर्मावलम्विया मो सम्पति जान वर सी गई।
उकी पावन पुस्तक बाइबिर एव बर धार्मिक पुस्त अग्नि को अर्पित कर दी गई। उनके लिए यायालया का द्वार बद कर दिया गया और ईसाई धम लौह प्राचीर म चन्द कदी की भांति बराहने लगा। इन बेपनाह अया 'चारो के पश्चात भी इसकी प्रगति निरन्तर वढनी गई। इस दमन ने आग म घी का काम किया। महीदा की शहादत न चच की स्थापना की। अव उच्च वग लोग भी इस धम के अनुयायी होने लग। ३२४ ई० मे ईसाईया के मित्र महान कोन्स्टेनटाईन ने इस धम को राज्य धम की स्वीकृति प्रदान की। ईसाईया को सम्पत्ति लौटा दी गई और इनपर से कानूनी असुविधायें हटा दी। अब ईसाई धम का स्वरूप हो परिवत्तित हो गया, जबतक इसका दमन होता रहा जबतक लपे पाय लाग ही इस धम को स्वीकार करत थे । विन्तु राज्य का समथन प्राप्त हाने से इमम अवाछित व्यक्ति भी आने लगे। रोम माई धम का सवप्रमुख केद्र वना, क्याकि साम्राज्य की राजधानी थी। वहाँ का पादरी जो पाप कहलाता या, कयोलिक ससार का धमगुर वना । इस प्रकार अनेक विघ्न-बाधाआ और कप्द क्टका को राहा मे गुजरता हुमा ईसाई धम एक दिन राज्य घम वन गया । आज भी विश्व में ईसाई धम माननवाला की सख्या सबसे अधिक है। इस कारण यह है कि इस नियम बहुत ही सरल एव सीध माप है । शिमायें --एक इश्वर में विश्वास कग । एकनिष्ठ एव दढ विश्वामी बनो। सबके प्रति मदा सच्चा एव ईमानदार बना । दुख और मुख म सदा मुस्कुराते रहो । क्प्ट एव तक्लोपा के क्षण में सवका साथ दो। किसी एक लक्ष्य रेकर आगे बढा । अतीत से प्रेरणा ग्रहण करो और उस अपने जीवन मे उतारने की चेष्टा करो। प्रश्न (१) इसा + जम के पूर्व क्या अवस्या था ? (२) ईसा का जीवन-वृत अपने शब्दों में लिखो। (३) उनके प्रमुख उद्देश्य कौन-कौन थे। (४) इस धम का प्रचार कैसे हुआ और इसके प्रति रोमन साम्राज्य की कैमा नोनि रही? (1) इसा के जीवन वृत एव ईसाई धम त आपको कोन कोन सो शिक्षा प्रामपुर आपके जीवन का कौन सा लन्य है और इन शिक्षाओं में स किन किन शिक्षामा को अपन जावन में रतारने की चेष्टा का है ? १ चैत्र शुक्ल रामनवमी पूर्व तैयारी-म्पन पत्र होन प पू सवा मो गपना दना चाहिए fr हमाग रागामी का पय मनाउँग । य-ि आग पागप गौर म मठ हो या राम का मन्दिर आदिमा यही पर पर प्रामाणा र माय गमनयनी पा पर्व मनाना पाहिए । वहाँ ग ग्रामीणा ग यह पता नगा एना पााि कि वहाँ पर लोग अच-मगह भा कर रहा है? कर रहै तो विद्यालय में भी बुराण आर्थिय गहायना र दनी पाहिए। दूगर दिन छात्र ण्य PिT विद्यालय का सफार पर मतिम पग वर्ग की सपाई करगे और वहीं पर रात्र- यत परेंगे। पुन राम की क्या पचा होगा उना विषय म वविना और एप पढ़ जायेंग। जन म रामायण पार होगा। रामायण पाठोपरान प्रमाद वितरण होगा और घात पुन निज निज गह लोट जायगे । क्या--यहुत पुराने समय म दवायु वा म दारय नाम + राजा अयाध्या म राज्य कर । ५ । उनको तीन रानियां थी-योरया, माद और गुमिमा । वितु सबस पद की बात यह था कि उद कोई भी सतान नहीं थी। अत पियान कहा किलाप कर। राजा दारप न एनन्य वरिष्ठ का आमा दी। वनिप्ठ ऋपि न गी भाषि का यन बरन व पिए चुनाया। मन प्रारम्भ हुआ। उग याम सोर बनी। 37 वीर दादा भागा म चौटवर मोगल्या और क्वई याद दिया गया । काया और कई न अपन- अपन हिम्म म थाही थारी पोर निपातार सुमित्रा का नाद दी, यत कौशल्या को एक पुत्र राम और कइ वा एक पुत्र भरत तथा मुमित्रा को दो पुत्र लमण तथा पात्रुघ्न हुए। राम का जम पर सुना नवमी दिन सोमवार को हुआ था। चारों भाई प्रमग वरन लगे । इसी समय विवामित्र मुनि राम की यहादुरी का मुनकर दारय व पास दो भाइया को गुध ग्निो के लिए एन आए । क्यावि जगत म तपम्या परन म वाया । राम और लक्ष्मण सार रामसा वा मारकर उनर यम वा गिविग्न पर लिया। विवा मित्र मुनि उहं परिप्रमण के लिए जनापुर ले गए। इसी समय सीता का स्वयपर हो रहा था। दश दिशा र भूपति उम स्वयवर म आप ५ । नितु सम एक गिव धनुप रखा हुआ था । उमे चगना था। वितु मभी राज हार गय रिसी म बुद्ध न हो सका यहाँ तक कि सभी राजाओं न एक माथ उठाने की कोगिश की विन्नु व्यय । "भूप सहस दस एहि पारा, लो उटावा टरे न टारा।' अन जन जी उदास हावर चाले- वोर विहीन मही में जाना। अव लक्ष्मण का ध नभा उठा । राम ने उने शात पर पनुप नाग और सीता से जारी कर धूमधाम से पाध्या लौट । राजा दारथ अव ब्ढे हो चरे थे । उहान मोला कि राम को रव में गद्दी र स्वय वन म जारर समस्या कर । एसा साचरर उहाल एक सभा बुलाई जिमम राम को युवराज बनाने और तदन्तर उन्हें मिहामना करन की बात का। इसी समय उन्हें सवर लगा कि कैबई बाप भवन म है । व वहाँ पर पाडाय हुए गाए । यकई को उहांने तवामुर मगाम न नभय दा वर मांगन के लिए रहा था। बाद में बहा कि मैं अवसर आने पर माग लू गा। इस समय जवसर देकर उमन वर मान की आना मागी। उमन मागा वि राम का चौदह वप का मनवास और भरत का राजगहा द । मह बचन सुनत ही उनक परा तो को मिट्टी सिंगरने लगी । कठार जपात हुआ । उहान समझ रखा था कि "जाब नेह कि मागि थवेना" जितु व तो थे दि ' प्राण लाइ पर वचन न जाई।" राम बन गये और राम रे वियोग म इधर दारय के प्राय पसउर गए । अयाध्या की जनता राम के रथ ये पार चिनाती हुई दारी । 'सुमन्त “थ रायो, सुमत रथ रामा।' इस समय भरत ननिहाले म थे । वशिष्ठ ने उन्हें दाग्य के मृयापरान्त बुलाया और यहा आन पर उन्हें सारा मम्वाद सुनाया। विन्तु महाँ पर कुछ दूसरा हो ममा बंधा हुआ था। वहां की जनता म न ता काई सम्मान था और न दित म कोई अरमान | सारी जनता विह वल थो राम के कम । भरत अयोन्या की जनता र साथ राम का पुन जगल से वापस जान के लिए चन पढे । चित्रकूट म दाना भाइया म मुनाकात हुई। भरत और अयोध्या की जनता को कातर वाणी का मुनार भी गम नहा लौटे। व तो पृथ्वी पर इसीलिए भवतीण हुए थे कि पृथ्वी र पापिया के अयाचारा से लोगों का निवारण दिशाना या उन्हें। अत म भरत रामा व ऐकर अयोध्या लौट रए । और अयाध्या के समीप बन म निवास करने लग। खाको सिंहासन पर रख राम की प्रतिमूर्ति प म उनपा पूरा भरत हए राय पालन करते रहे। राम जगत मलित एक स्व मृग रे पाई उसका वध करन के लिए दाई पितु वह तो या मायावा मृग । वुद दूर जाने पर वह गायर हो -- १५८ गया। इधर राम के नहीं लौटन पर सीवा लति भ्याकुल हुई। उन्होंने लक्ष्मण को राम को साजन के लिए भेगा। सभ्मण को नारी हाप पर विश्वास नहीं हुआ अन उहोंने सापडो ये चारो जार एवं सकोर मार दी और इसके बाहर जाने से निषेध पर दिया । इमी समप स्काधिपति रावण यो सुअवसर प्राप्त हुआ और भिमारी का भप धारण कर सीना को चुरान के निमित्त भिगा लेन आया। मीता पीची लकीर के भीतर से ही भिना देने लगी। किन्तु रावण जो भिसारी या कहा कि मैं रेगा के भीतर से भिदा नहीं लगा। ज्याही सोता रमा क बाहर आई । रावण सीता को चुराकर लका ल गया। बीच म जायु जा राम का परम भक्त था, रावण स लड पहा बिन्तु रावण ने उसरा एव पर काट दिया। जब राम अपनी कुटिया म लौटे ता सीता को न दसपर विचलित हुए। सवत्र उहान सोता की साज की। यहाँ तक की वन व पेड-पौधा से भी पूछन चलते' ह खग मृग ह मधुकर श्रेणी, तुम दसी सीता मृगनयनी माग म पायल जटायु में मट हुई। उमन मारा विवरण यह मुनाया। अब राम वा त्रोध भडक उठा । माग म उन्होंने रिलिया पर यालि का वध किया और सुगीव से मंत्री कर बन्दरा को सना जुदाई और इम सेना को रेकर रवा पर बडाई करने के लिए प्रस्थान क्यिा । सेतु बाघ रामश्वरम म उन्होंने शिव पूजा की और इम बाद समुद्र पर पुल बाघ सनासहित एका पर उतर गए। इस प्रकार वहाँ के अत्याचारी राजा रावण को युद्ध म मारकर भारत का लक्ष्मी का अयोध्या ल आए और पृथ्वी को उमा भीषण दमन-चत्रा से मुक्ति ग्लिाई। वहां के राज्य को उमने भाई विभीषण को सौप दिया। अयोध्या म खूब आनर मनाया गया और खूब धूमधाम के साथ उनका राज्याभिषेक किया गया । इस प्रकार उन्हाने गुरतर लोर-वल्याण का काय क्यिा । आज हमलोग उन्ही की यादगारी में उनकी जम तिथि मनाते हैं। शिक्षाएं ---राम की तरह पितृ-मातृ भक्त एव देशभक्त होना चाहिए । राम की तरह भ्रातृप्रेम रखना चाहिए। हम सभी को इस जनराज्य को राम राज्य म बदलने के लिए राम बनना चाहिए । भरत और राम के बीच राय गेंद की तरह लुढ़क रहा था। इसमे हम असगह तथा निर्लोभ की शिक्षा गहण करते हैं । मीता के पातिव्रत से और राम के पत्नीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए । राम के पुम्पाय और क्ष्ट-सहिष्णु जीवन से भी प्रेरणा प्राप्त हाती है। अपने वचन का पालन सदा करना चाहिए। सीता ऐमी लक्ष्मी 1 को प्राप्त करने के लिए जनर ऐसे विदह (स्थितिप्रन) का भी हल उठाकर क्मठ बनना पडा। इससे कम तथा पान का समन्वय करन की प्रेरणा होती है। १ तुलसी न राम-कपा को माषा में बांधकर हिन्दी साहित्य के साथ-साथ देश का बहुत बड़ा क्ल्याप किया तपा उन्मान तथा हास हिन्दू जनता क मानस में बल का सचार किया । स ? विवेचना करें। • तुलसीदास जी ने राम की क्या का पालन कौर के निगुणवाद के प्रतिक्रिया स्वरूप ग्रहण क्यिा, सरी व्याया करें। राम के जीवन स जो शिक्षा मा होती है, उसे लेखबर करें तथा दिसलाएं कि राम ने सदा मर्यादा की रक्षा है और इसीलिए उन्हें मयादा पुरप तम रहते हैं। भारत मानचित्र प्रदर्शित कर राम की पदयात्रा को अयोध्या से लका ताक मार्ग को दिखलाए।
चत्रशुक्ल १३-महावीर जयन्ती पूय तयारी –म्वूल व होन व पूर्व गभी छात्रा एर नियमा यो मूचित कर लिया जायगा हि अगर दिन महावीर जयती है। रसर दित मूत्र मा परान मभी छात्र पर जगह मम्मिलित होंगे और यही पर महावीर व गम्ब म चचाएँ चलेंगी। माग उनो विषय म तर वितर रंगे। नविताएँ पग निपपपरेंगें गोप्य समाप्त होने के उपरान्त उन सभी निराश एव यविताओ यो मलिन वर एक नर रित के आधार पर माम "उनकी जीयमी तिपरर सजिल परया दों और उमे प्रधानाध्यापन के काम या पुस्तकालय म रस देंग। इसमे हम जागे गहायता मित्र मैगी नया आगामी वप म महावीर-जयन्ना मनान व उपरात हम तुनना करेंगे कि उन सम्बघ म विप साज हुई है या यम । मम अपनी प्रगति अयदा वा पान मिल जायगा। जम स्थान का मौलिए परिचय ~~भगवान महावीर का जम गणतय पानी के एष गाला नगर कुण्ड ग्राम के नायर राजा मिद्धाथ यहाँ हुआ था। उस समय वुण्ड ग्राम नामर दा गाम का वत्तमान नाम मुकुण्ड है और वाती वा बनियावमा । ग्राह्मणा या हाँ निवास स्थान था वह ब्राह्मण कुडपुर एव जहाँ पनिया का नियाम स्थान था वहाँ भरिया का कुण्ठपुर कहलाता था। यदा हा नगर जन यम ६ अनुयायी य । जाजाल गाली का नाम बनिया वमाड है । यह बिहार प्रान के मुजफ्फरपुर जिले म है यह तुर्की स्टेशन मे छ मील और मुजफ्फरपुर म १५ मील की दूरी पर है। यहाँ पर प्राचीन काल कुछ प्रतीक भग्नावपि वे रूप में मिलते है। यहां की मुम्प फ्मन धान है कि तु अच्छी फमल नहीं होती है। महावीर के समय म विश्व भर में धार्मिर जादोलन हो रहे थे। चीन म पाआजे और पयुसोलस और ईरान म जाय्युस्ट नाम के पक्तियो के नेतृत्व म धामिक जाटोलन चल रने । नभी भारत म भी एक धार्मिक आदालन का जम हुआ। भारत म धार्मिक रागेलन मोत परे । दानासाना के उगम म्याना से वेद विरोधी चिता ने इम क्षेत्र म अपनी प्रौट प्राति के बीज डाले। क्षत्र शीघ्र लहलहा उठे। मुस्यत दो चिन्तक वद्धमान महावीर और गौतम बुद्ध । यना का खच इतना बढ़ गया था कि साधारण लागा के लिए यन कराना दुभर प्रतीत होता जा रहा था । इन यना में निरीह, निबल और निर्दोप पशुआ की बलि चटाई जाती थी। वे तो यह समयते थे कि "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ।" जम काल की धार्मिक अवस्था –भगवान महावीर का जिम युग मे जम हुआ था उस समय का समाज सामाजिक आडम्बरा, रुढियो, अध विश्वासो अधानुकरणा स भरा हुआ था। समाज का पान हो रहा था । वेदाजौर उपनिपदा के आदर्शों को कण्ठाग कर रेने म ही लोग अपन जीवन की साथक्ता समझते थे। और उहोने इमी म ही अपना चरम विकास मान लिया था । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वश्य अपने को 'द्विज' को उपाधि से आभूषित कर गद्रा और स्त्रिया के साथ बडा ही अनुचित यवहार कर रहे थे। इन कठोर और जमानुपिक अत्याचारा का समाज पर वटा ही गहरा प्रभाव पड़ रहा था। लागा म भाइचार की भावना का सवथा अभाव था । एक दूसरे के साथ सदा कटू “यवहार कर रहे थे । समाज लोगा म मिलन की भावना नहीं थी, अत समाज दिनोदिन पतन के गत म गिरा जा रहा था। तम काल को राजनतिक अवस्था -जिस समय महावीर का जम हुआ था उस समय वगाली म गणतन के सूय की रानी छिटक रही थी। गगा के उत्तर तट म वाली का गणतन राज्य था और दक्षिण में मगध साम्राज्य का विस्तार हो रहा था । कौगल और वाशी, ब्रज और अस्मा जम पदादि मगध के सामने घुटने टेक रहे थ । रितु वशाली का भाग्यान्य हो रहा था । वशाली के गणतत्र राज्य म अमनचैन की वर्षा हा रही थी। घी दूध की नदिया वह रही थी। सोन के दिन थ, चांदी की रातें थी। वैशाली के गणतत्र राज्य की दूग्ध घवल चांदनी म लोग सुख की नाद सा रहे थे । इमी वशाली म महावार का जम हुआ था। जीवन-परिचय -आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व जन धम 4 चौबीसवें तीथकर भगवान महावीर का जम ईमा के ५९० वप पूर्व वैशाली के समीप कुण्ड गाम मे हुआ था। आजवल कु हगाम का वत्त मान नाम वमुकुण्ड है और वसाली का बनिया वसाढ । महावीर के पिता सिद्धार्थ कुण्डगाम क नायक राजा थे। उनकी माता त्रिशला लिच्छविया के प्रतिनिधि राजा 'चक" ।
की भगनी थी। व क्षत्रिय हुन म उत्पन्न हु। । बचपन म इनका नाम वद्धमान था। अपन माता पिता र दहात के बाद भगवान महावीर ने ३० वप की उप म अपा यह भाई नदी वद्धन सजाना प्राप्त पर श्रमण धम गहा पिया। वारह वर्षों की कठार और पट गाध्य तपस्या एव अनररत चेष्टा के उपराा उहान पाम्मीर नामक गांव व वाहर मनुपालिका नदी । उत्तरी तट पर क्वल्य जया मान प्राप्त विमा । उस ममय स व अहत अर्थात पूज्य, जिन अथात् विजना, frग थ वधन मुक्त एव महावीर कहतार लग । इस समय स लगभग ३० वपा तब महावीर निरनर मगध जग मिथिना और कौशल म अपना धम प्रचार परत रहे। बसब प्रशर म निगए थे। समाज के वधना ता का उहान विचार नहीं किया। और सम्मा पो थीयला मानवर उनका परित्याग कर दिया। व सना सवटा नग्न पिरत रहे । बहत्तर वप पी अवस्था तक जपो उपदा वा प्रचार परत दुए महावीर ने लगभग ईसा से पूर २०० वर्ष म अपना शरीर त्याग दिया। भगवान महावीर न पदिय पमकाण्डा TT उपयोगा और श्रेयस्कर नहीं बनाया है। आत्मा दह रूप है या दह मे भिन्न है ? परलोप पया है ? प्रियाण क्या है य राब समस्यायें गिना आत्म चिन्तन नहीं सुननायी जा सकता। उहाँने बनाया-वस्तु स्वभावो घमा । अथात् जिस वस्तु का जा स्वभाव रूप है उनका उमी प म पूणरूपण स्थिर हा जाना ही उसका घम है। भगवान था कृष्ण न गाता म भा इसी बात पो थेयान स्वधर्म निधन । की उक्ति स रहा है। भगवान महावीर ५ विचार से शुद्ध जीव को बधन नहा होगा। जिस जीव म राग-द्वेष है जथात् जा धम स च्युत है उमी जोव म बधन है। उहान कहा कि यह मनुष्य नाय चाल है। जीवा २ अच्च दुरे रम जल है। काम योग कीचड है मनुप्य समान कमल है। बोतराग भि ही धम है। धम तोथ जन का किनारा है। कमल का उडवर हस्तगत हा जागा ही निमाण है।" जन जीवन का ध्यय पार्थिव अस्नित्य के पाशा से मुक्ति पाना है । जीवा को उनके गारीरी हारे वारण कामिक है। वम मुक्ति के तीन प्रमुख सावन हैंसम्यर यद्धा, मम्यक नान और सम्यक चरण । महावीर ने इसम आजीवन ब्रह्मचय भी जोर लिया है। उन्होंने कहा है कि मनुष्य ज्बतक ।
अत उसे कामा है तबतक वह लोकमाण्ड के पास म बया हुआ है । आज म ब्रह्मप या व्रत गहग करना चाहिए तभी उसे मुक्ति मिर मरती है। उन्हान तप के महत्व पर अधिक जार दिया है साथ ही साथ उन्हाने महिमा, सय अस्गह तथा अपरिगह पर भी विशेष जोर दिया है। कायिर यातना और यौगिक क्रियाओ का व बडा महत्व देत थ । यना एवं उसम दी जाने वाली पनि को उन्होने बहुत ही भला बुरा कहा है। यता का उन्हाने धार हिमा का साधन माना और उनके विरुद्ध अपनी जोरदार आवाज उठाई। भगवान महावार के उपदेश यात सरल भाषा मे हाने थ। लोगा को उनके उपदशों को समझन म तनिक भी कठिनाइ नहीं होनी थी और सरत भाषा होन के कारण ही लोगा न उनक जावन शन की गभीरता को बड़ी सरलता से समझ लिया और उसा सरलतापूर्व दशन गम्भीरता न आज है भारत ने अयतम ज्यानिधर महापुरुपा म सम्मान से सुगामित किया है और हम उनके जावन दशन से जनवरत, प्रभावित और पुतरित हा रह है। दिखाएं -~-सदा सत्य बोलना चाहिए। हिसा नहीं करनी चाहिए। निवता एव निरीह प्राहिमा का नहीं सताना चाहिए। ब्रह्मचय का पालन करना चाहिए। इसस बीय की पुष्टि होता है और हर पर काति एव रोना आती है । देशाटन कर ज्ञानाजन करना चाहिए। देशाटन नानाजन का सपष्ठ साधन है। चोरी नहीं करनी चाहिय । धन सरा अमिर मगृह नहीं करना चाहिए। १ महावार के मकान के पानिक अवस्था का उल्लस करे। মাং লাল সব অন্যায় কাজ কর। महावार का मक्षित जावन इत्त प्रस्तुत कर । उनको गिताय स्या है। उन* मात हा प्रा हुआ था। थोर पितन वर्षों ता इहाने धन-प्रचार किया ? ४ महावीर क विचार से युद्ध मोर गाथा रिचार की पुनना करें। ५ नरम भो तर भारत में लित है किन्नु योद्धयम का नामानिशान मिट गया क्या सपारण उत्तरद वैशाख शुक्ल ३-अक्षय तृतीया वैशाय माम के शुक्ल पण को तृतीया यो अषय तृतीया यहते हैं । इसी दिन स लाग सतयुग या प्रारम्भ मानत हैं। पूर्व तयारी-एक पूर्व सभी छात्रा एव शिक्षका को इसके विपयार्य मूचना दे देंगे। दूमर दिन स्नान पर श्री सन्मी नारायण या दान एव पूजन चरना चाह्यि । जल से भरा मिट्टी या बत्त न, पमा जो या सत्त चानी दही, और बल नया आम या तान करना चाहिए । २४ घट म एक्बार फ्ला- हार करना चाहिए । स्कूल पे हह पडित जी धाया और पिदाका की एक गोष्ठी बुनाकर, उराम इमसी कथा गुनायेंग और इमका महात्म्य बतलायेंगे । क्या-राजा युधिष्ठिर वे पूछन पर श्री कृष्ण जी न इसका माहाम्य इस प्रकार बतलाया था- पुराने जमान म किमी गांव में एक गरीब वनियां रहता था वह सदा सत्य बोलता पा एव देवताआ और ब्राह्मणा की पूजा करता था। उसका परिवार बहुत बडा था अत वह मदा चिन्तित रहा करता था। एक दिन उसने वही पर अक्षय तृतीय का महात्म्य सुना। उस माहात्म्य वा सुनकर उसके हदय म यह उत्क्ठा जगी कि मैं भी इस व्रत को पर, उसने व्रत किया और यथाक्ति दान भी दिया। ऐसा कहा जाता है कि मृत्यु के उपरात प्रत के प्रभाव से उसका जम कुशवाहा पूर्व में राजा के घर मे हुआ। तभी से अभय तृतीया व्रत को परम्परा चली आ रही है। शिक्षाए-लक्ष्मी नारायण का दशन और पूजन करने से हृदय शुद्ध, निर्मल, कोमल एव निर्विकार हो जाता है और उसम सद् गुणा का विकास होता दान करने से गरीबो और दरिद्रो को भाजन मिल जाता है और एक प्रकार से वल्लि भगवान का दान हा जाता है, क्याकि कल्लि भगवान गरीबों का ही माना गया है। उपवास रहने से पट साफ हो जाता है और चित्त शुद्ध हो जाता है। काम करने म मन लगता है और शरीर म स्फूर्ति तथा चेहरे मे जाति की वृद्धि होती है।
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अक्षय तृतीया क्व मनायी जाता है। इसका विधान क्या है?
इसको क्या क्या है थोर किमन कही है?
इसका क्या महत्त्व है ?
क्या पक्षय तृतीया व्रत करना छाना के लिए जानदारक होगा? यदि हागा
तो स! सकारण उत्तर दें
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वैशाख शुक्ल ३-परमुराम जयन्ती परशराम जी या जम क्षय नीया को हुआ था। यह जय ती उत्तर भारत म मथुरा और पानी के पीच तथा परिण म परशुराम-क्षेत्र म विशेष प से मनाई राती है। पूय तयारी-~ए नि पूर्व सवा वो इगो विषय म सूचना दे दी जायगी। दूगर दिन मूत्र-यणोपरान सभी छान एव शिक्षक एवं जगह नुटेंगे, वही पर विद्यालय ये प्रधान पडित जी या याद नाय निर इमरे विषय म चर्चा करेंगे एव परशुराम जी वा जयनी एव ग्नये कार्यों में परिषय परायेंगे। इमका विधान यह है कि दिन भर इन एव उपवाग परें । रात पा यदि हो सवे ता पलाएर बर और 7 करें तो वह भी उत्तम हागा। परशुराम जी मा पजन परें और उनाो पचा गुा। पथा-पाची कार म जय वि' पटिव युग अस्त हो रहा था भूग-वा म यमदग्नि नाम 4 महातपस्वी मुनि का आविर्भाव हुआ। भृगु-या वडा ही प्रतिष्टित था। शुपाचाय नृगु में ही पुत्र थे जो दानवा य गुर 4 और उहाने अपनी सजीवनी विद्या में समय समय पर सुरा का बडा ही उपसार दिया था। भृगु-बग म ही मपि च्यवन यनुत बडे तपस्वी पठाए थ। एसा नहा जाता है कि राजा सरयाति न बहुत ही अनुनय विनय व सा अपना ६ या को ह दान म दिया था। रही ये वाम रचित और और जसे वापि हुए । गर्भावस्था म हो गया न और की हत्या करन की सोची था वितु प्रयत्न विफल हो गया। १६ वप के सगर राजा को औव ने ही युद्ध कला म पारगत बना दिया था। इस प्रकार भृगु-वा बडे ही सदाचारी सत्यवादी वीर धीर, निप्वाम एवं परोपकारी हात थे। हरि भजन एवं नान पीसोज, तथा सदु- पदेश देवर लार कल्याण करना ही भृगु वसिया का प्रधान रम आर धम था। ता यमदग्नि के जम रेते ही सारी कुटिया जालाक्ति हान लगी। जम के समय इनके चेहरे की काति जग्नि के समान थी इसीलिए या नाम यमदग्नि पड़ा। इनकी पत्नी का नाम रणुका था। रेणुका से वा मानादि ५ पुन उत्पन हुए। परशुराम जपने भारया में कनिष्ठ थे। य बचपन से ही